प्यार की सूली पर लटकी अंजली – भाग 1

25 वर्षीय अंजलि यादव 22 मई, 2019 को अपने कमरे में कुरसी पर अकेली बैठी गहन चिंतन में डूबी हुई थी. वह सिद्धार्थनगर जिले के मोहाना थाना स्थित गौहनिया बाजार में विजय कुमार के मकान में पहली मंजिल पर रहती थी. अंजलि और उस की सहकर्मी मित्र खुशबू सिद्धार्थनगर के कंचनपुर प्राइमरी पाठशाला में एक साथ पढ़ाती थीं. चूंकि उन दिनों विद्यालय में ग्रीष्मकालीन छुट्टियां हो गई थीं. इसलिए छुट्टियां होते ही खुशबू अपने घर चली गई थी. अंजलि भी अपने घर जाने की तैयारी में थी.

अंजलि उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के कठौद थाना क्षेत्र के हुसेपुरा सुरई की रहने वाली थी. वह सिद्धार्थनगर में रह कर नौकरी करती थी. 22 दिसंबर, 2017 को उस की पहली तैनाती सिद्धार्थनगर जिले के गौहनिया प्राइमरी पाठशाला में हुई थी. सरकारी अध्यापिका बन कर अंजलि संतुष्ट नहीं थी. क्योंकि उस ने अपने जीवन के लिए इस से भी बड़ा लक्ष्य तय किया था. वह लक्ष्य था आईएएस अधिकारी बनने का. अपनी धुन की पक्की अंजलि विद्यालय से कमरे पर आने के बाद एग्जाम की तैयारी करती थी.

बहरहाल, 22 मई को अंजलि अपने कमरे में अकेली थी. उसे अकेली देख कंपनी देने के लिए मकान मालिक की दोनों बेटियां रिया और सीमा उस के कमरे में आ गईं. वैसे भी जब वह अकेली होती थी, रिया और सीमा अकसर उसे कंपनी देने उस के पास आ जाया करती थीं. उस दिन भी दोनों बहनें उसे कंपनी देने कमरे में आई थीं.

बातोंबातों में कब 2-3 घंटे बीत गए, उन्हें पता ही नहीं चला. शाम साढ़े 3 बजे के करीब रिया और सीमा अपने कमरे में लौट आईं तो अंजलि फिर अकेली रह गई थी. एक घंटे बाद यानी शाम साढ़े 4 बजे के करीब अंजलि के कमरे से धुएं का तेज गुबार आसमान की ओर उठा तो उसे देख कर पासपड़ोस के लोग हैरान रह गए. कुछ ही देर में मौके पर सैकड़ों लोग जमा हो गए. अचानक घर के बाहर लोगों की भीड़ जुटते देख रिया और सीमा हैरान रह गईं. वे यह नहीं समझ पा रही थीं कि अचानक इतने लोग उन के घर के बाहर क्यों जमा हुए हैं. लेकिन जल्दी ही दोनों हकीकत समझ गईं. क्योंकि बाहर खड़े लोग आगआग चिल्ला रहे थे. पड़ोस के 8-10 लोग पहली मंजिल पर अंजलि यादव के कमरे तक पहुंचे. उन के साथ रिया और सीमा भी थीं. लोगों ने देखा कि उस के कमरे के बाहर दरवाजे पर ताला लगा हुआ था. उन्होंने किसी तरह ताला तोड़ कर दरवाजा खोला.

कमरा खुलते ही भीतर का हृदयविदारक दृश्य देख कर सभी स्तब्ध रह गए. अंजलि की लाश पंखे से लटक रही थी. वह बुरी तरह जल चुकी थी. यह देख कर रिया और सीमा गश खा कर फर्श पर गिर गईं. उन्हें यह देख कर गहरा सदमा पहुंचा कि अभी थोड़ी देर पहले तीनों ने एक साथ बैठ कर घंटों बातें की थीं और अब ऐसे कैसा हो गया.

खैर, मौके पर ही भीड़ में से किसी ने 100 नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी. चूंकि यह इलाका मोहाना थानाक्षेत्र के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोलरूम द्वारा यह सूचना मोहाना थाने को दे दी गई.

पुलिस भी कुछ नहीं समझ पाई

यह खबर मिलते ही थानाप्रभारी अंजनी राय पुलिस टीम के साथ गौहनिया बाजार स्थित मौके पर जा पहुंचे. क्राइम सीन देख कर थानाप्रभारी और अन्य लोग भौचक रह गए. बुरी तरह जली अंजलि की लाश पंखे से झूल रही थी. उस के गले में लोहे की तार और पैर में जंजीर बंधी हुई थी. जंजीर तख्त के पटरे के ऊपर बने सुराख में बंधी थी. तख्त से सटे कमरे में गैस सिलेंडर रखा था और किचन में लाल रंग के 2 बैग रखे थे.

थानाप्रभारी ने इस की जानकारी एसपी डा. धर्मवर सिंह और एएसपी मायाराम वर्मा को दे दी. सूचना पा कर दोनों अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने भी घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया. थोड़ी देर बाद एफएसएल की टीम भी वहां आ गई. टीम ने वहां से सबूत जुटाए.

जांच करने के दौरान हैरान करने वाली यह बात सामने आई कि गैस सिलेंडर अंजलि के कमरे में कैसे पहुंचा? जबकि उसे किचन में होना चाहिए था. फिर उस के सामान से भरे 2 बैग किचन में क्यों रखे गए? जबकि बैग उस के कमरे में होने चाहिए थे.

परिस्थितियों से यह संकेत मिल रहे थे कि उस कमरे में अंजलि के अलावा कोई और भी था, जो उसे बेहद करीब से जानता रहा होगा और उस की पहुंच उस के कमरे तक रही होगी. पते की बात तो यह थी कि अंजलि के कमरे तक पहुंचने के लिए घर के मुख्यद्वार से हो कर जाना होता था. ऐसे में कोई था तो कातिल घटना को अंजाम दे कर आसानी से बाहर कैसे चला गया था. उसे किसी ने देखा तक नहीं, यह बात बेहद चौंकाने वाली थी.

एसपी डा. धर्मवीर सिंह और एएसपी मायाराम वर्मा ने मकान मालिक विजय कुमार से घटना से संबंधित पूछताछ की. विजय ने बताया कि इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं, लेकिन उन की दोनों बेटियां रिया और सीमा अंजलि के साथ लंबा समय बिताती थीं. उन से जरूर कोई जानकारी मिल सकती है.

विजय कुमार ने अपनी दोनों बेटियों को बुला लिया. उस समय वे एकटक फर्श पर नजरें गड़ाए उसे ही देखे जा रही थीं. लग रहा था जैसे दोनों किसी गहरे सदमे में हों, उन्हें होश ही न हो. अधिकारियों ने उन से अंजलि की जिंदगी से जुड़े कुछ सवाल पूछे, लेकिन वे दोनों न तो कुछ बोल पाईं और न ही बता पाईं. उस के बाद पुलिस ने पड़ोसियों से घटना के बारे में जानकारी करनी चाही, लेकिन वे कुछ नहीं बता सके.

लाश और मौके की स्थिति देख कर यही अनुमान लगाया जा रहा था कि अंजलि की हत्या कर के हत्यारे ने उस के शव को पंखे से लटका दिया होगा. यह हत्या है या आत्महत्या, इस सच का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद लग सकता था.

पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. उस के बाद पुलिस ने घटना की जानकारी उस के पिता अजय कुमार यादव को देते हुए उन्हें जल्दी पहुंचने के लिए कह दिया.

बेटी अंजलि की आकस्मिक मौत की सूचना मिलते ही घर में कोहराम मच गया. अंजलि की मां सावित्री देवी और छोटी बहन मनोरमा का रोरो कर बुरा हाल था. गांव वाले भी अंजलि की मौत की खबर सुन कर स्तब्ध थे. यकीन नहीं हो पा रहा था कि जो खबर उन्होंने सुनी, वह सच है. अंजलि थी ही ऐसी व्यवहारकुशल कि कोई भी उस की मौत को सच मानने के लिए तैयार ही नहीं था.

बहरहाल, बेटी की मौत की खबर मिलते ही अजय यादव अपने शुभचिंतकों को साथ ले कर जालौन से सिद्धार्थनगर चल दिए. उन के साथ में उन की छोटी बेटी मनोरमा भी थी. सिद्धार्थनगर पहुंच कर अजय यादव सीधा मोहाना थाने पहुंचे. उस समय शाम के 6 बज रहे थे.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

4 साल बाद : क्यों किया प्रेमिका से किनारा – भाग 3

सलमान की यह बात रचना की समझ में नहीं आई. वह अपनी मांग पर अड़ी रही. सलमान इस के लिए तैयार नहीं हुआ. साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाले सलमान का नकली चेहरा सामने आ गया था. जिस वासना की चाहत में उस ने रचना को स्कूटी दी थी, उस रचना ने उस की आंखों में वासना की आग देख ठेंगा दिखा दिया.

इस बात को ले कर दोनों के बीच विवाद भी हुआ. सलमान ने रचना को भलाबुरा कहा तो रचना भी पीछे नहीं रही. उस ने सलमान को उस के दोस्तों के सामने ही जलील किया. रचना यहीं चुप नहीं बैठी, उस ने सलमान के खिलाफ दारागंज थाने में छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज करा दिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद रचना और सलमान के बीच दूरियां बढ़ गईं. दोनों ने एकदूसरे से मिलना बात करना बंद कर दिया. रचना ने अपने घर वालों को बता दिया कि सलमान नाम का लड़का उसे छेड़ता है. बहन की बात सुन कर भाई भोला का खून खौल उठा. उस ने सलमान को धमका कर बहन की तरफ न देखने और उस से दूर रहने की हिदायत दे दी.

इंतकाम की आग

रचना ने सलमान के साथ जो किया, वह उसे काफी नागवार लगा. वह अपमान की आग में झुलस रहा था. उस ने यह कभी नहीं सोचा था, रचना उस के साथ ऐसी घिनौनी हरकत भी कर सकती है. तभी उस ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि जब तक वह रचना से अपने अपमान का बदला नहीं ले लेगा, तब तक उस के इंतकाम की आग ठंडी नहीं होगी. लेकिन सवाल यह था कि वह रचना से दोबारा कैसे मिले ताकि फिर से दोस्ती हो जाए और वह उसे विश्वास में ले कर अपना इंतकाम ले सके.

जैसेतैसे सलमान ने रचना तक अपना संदेश भिजवाया कि वह एक बार आ कर मिल ले. वह उस से मिल कर माफी मांगना चाहता है. रचना सलमान की बात मान गई और उसे माफ कर दिया. यही नहीं दोनों फिर से पहले की तरह मिलने लगे. सलमान यही चाहता भी था. उस ने रचना को अपने खतरनाक इरादों की भनक तक नहीं लगने दी.

इस बीच 3-4 महीने बीत गए. रचना पर फिर से सलमान के इश्क का जादू चल गया. सलमान को इसी का इंतजार था. सलमान ने अपने दोस्तों लकी पांडेय और ममेरे भाई अंजफ से बात कर के रचना को रास्ते से हटाने की बात की. लकी और अंजफ उस का साथ देने को तैयार हो गए.

तीनों ने मिल कर योजना बनाई कि रचना को किसी तरह सलमान के घर बुलाया जाए और उस का काम तमाम कर के लाश नदी में फेंक दी जाए. इस से किसी को पता भी नहीं चलेगा और वे लोग पुलिस से भी बचे रहेंगे.

योजना बन जाने के बाद सलमान ने 16 अप्रैल, 2016 की अलसुबह रचना को फोन कर के सुबह 10 बजे रेलवे स्टेशन पर मिलने के लिए कहा.

अपनी स्कूटी ले कर रचना ठीक 10 बजे सलमान से मिलने स्टेशन पहुंच गई. सलमान वहां मौजूद मिला. उस ने रचना की स्कूटी प्रयागराज स्टेशन के स्टैंड पर खड़ी कर दी और उसे अपनी बाइक पर बैठा कर बक्शी खुर्द स्थित अपने घर ले गया. उस के घर में बेसमेंट था.

सलमान रचना को बेसमेंट में ले गया. वहां लकी और अंजफ पहले से मौजूद थे. उन्हें देख रचना खतरे को भांप गई.

उस ने वहां से भागने की कोशिश की लेकिन उन तीनों ने उसे दौड़ कर पकड़ लिया और उस के हाथपांव रस्सी से बांध दिए. फिर सलमान ने चाकू से उस का गला रेत कर हत्या कर दी.

लाश ठिकाने लगाने के लिए सलमान ने अपने मामा शरीफ को फोन किया. शरीफ फौर्च्युनर ले आया. चारों ने मिल कर लाश जूट के बोरे में भर दी. इस के बाद कपड़े से कमरे में फैला खून साफ कर दिया.

रचना की लाश जूट की बोरी में भर कर फौर्च्युनर में लाद दी गई. सलमान और उस के मामा शरीफ सहित चारों लोग पहले नैनी की तरफ गए. इरादा था लाश को यमुना में फेंकने का, लेकिन 5 घंटे तक भटकने के बाद भी उन्हें मौका नहीं मिला.

इस के बाद ये लोग नवाबगंज की तरफ निकल गए. लेकिन वहां भी लाश को गंगा में फेंकने का मौका नहीं मिला. इन लोगों ने प्रयागराज की सीमा के पास प्रतापगढ़, वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर रचना की लाश हथिगहां के पास सड़क किनारे फेंक दी और सब लौट आए.

इस के बाद सलमान बाइक से फिर वहां गया. उस के पास एक बोतल पैट्रोल था. उस ने रचना की लाश पर पैट्रोल डाला और आग लगा दी, ताकि लाश पहचानी न जा सके, लौट कर उस ने रचना की स्कूटी सोरांव के एक परिचित के गैराज में खड़ी कर दी.

बाद में जो हुआ, जगजाहिर है. सलमान और उस के पिता ने पैसों के बल पर पुलिस को अपने पक्ष में कर लिया.

रचना के केस की पैरवी कर रहे उस के भाई भोला को साल 2018 में सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में फंसा कर जेल भिजवा दिया

गया था. इस पर भी रचना के घर वालों ने हार नहीं मानी.

रचना की छोटी बहन निशा शुक्ला ने पैरवी करनी शुरू की. आखिरकार हाईकोर्ट की चाबुक से पुलिस की नींद टूटी और आरोपियों को जेल जाना पड़ा.

सलमान और लकी के गिरफ्तार होने के 3 दिनों बाद थाना दारागंज के थानेदार आशुतोष तिवारी ने अंजफ को और 20 दिनों बाद मामा शरीफ को दारागंज से गिरफ्तार कर लिया.

करीब 4 सालों से जिस रचना शुक्ला की हत्या रहस्य बनी थी, आरोपियों की गिरफ्तारी से सामने आ गई.

अगर पुलिस पीडि़ता उमा शुक्ला की बातों पर विश्वास कर लेती तो घटना के दूसरे दिन ही चारों आरोपी गिरफ्तार हो जाते और इस समय अपने गुनाह की सजा काट रहे होते. बहरहाल, देर से ही सही आरोपी जेल की सलाखों के पीछे चले गए.

साजन की सहेली : वंदना कैसे बनी शिकार – भाग 3

आष्टा से सटा जिला है शाजापुर, जिस का एक कस्बा है बेरछा, जो मावा उत्पादन के लिए प्रदेश भर में मशहूर है. बीती पहली फरवरी को सुबह बेरछा के गांव धुंसी के चौकीदार इंदर सिंह बागरी ने थाने में इत्तला दी कि जगदीश पाटीदार नाम के किसान के खेत में एक जली हुई लाश पड़ी है.

बेरछा थाने की तेजतर्रार प्रभारी दीप्ति शिंदे खबर मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचीं. एसपी शैलेंद्र सिंह के निर्देश पर एफएसएल अधिकारी आर.सी. भाटी भी वहां पहुंच चुके थे. लाश इतनी जल चुकी थी कि उसे किसी भी तरह पहचानना नामुमकिन था.

बारीकी से जांच करने पर लाश के नीचे से चाबियों का गुच्छा और अधजला थरमस मिला. लाश के दाहिने पांव में बिछिए और बाएं हाथ की कलाई में चूडि़यां मिलने से यह भर तय हो पाया कि लाश किसी महिला की है. आसपास उड़ कर गिरे. कई अधजले कागज भी बरामद हुए. इन कागजों की लिखावट को लेंस से पढ़ने पर जो शब्द पुलिस वालों को समझ आए वे मुगलई रोड, श्रमिक, जिला स्वास्थ्य अधिकारी, इनवास, इंजेक्शन की बौटल और चिकित्सक आदि थे.

इन शब्दों से अंदाजा लगाया गया कि मृतका का संबंध जरूर स्वास्थ्य विभाग से है. साफ दिख रहा था कि महिला की हत्या कर उस की लाश को पहचान छिपाने की गरज से जलाया गया है. अब तक गांव वालों की भीड़ घटनास्थल पर लग गई थी जिन से पूछताछ करने पर पता चला कि एक दिन पहले एक मारुति वैन इस इलाके में देखी गई थी.

इन साक्ष्यों से पुलिस वालों के हाथ कुछ खास नहीं लग रहा था. ऐसे में मुगलई रोड गांव को आधार बना कर पुलिस जांच आगे बढ़ी तो मालूम हुआ कि यह गांव सीहोर जिले की आष्टा तहसील का है.

आष्टा थाने में पूछताछ करने पर पुलिस का मकसद पूरा हो गया, जहां से पता चला कि मंडीदीप निवासी 2 महिलाएं नीलम और सुनंदा सोनी ने स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत अपनी बहन वंदना सोनी की गुमशुदगी दर्ज कराई है. इन दोनों बहनों ने बिछिए और चूडि़यां देख कर वंदना के होने की पुष्टि कर दी.

लाश पहचान में आ गई लेकिन हत्यारे गिरफ्त से बाहर थे, लिहाजा इंसपेक्टर दीप्ति शिंदे सीधे आष्टा अस्पताल पहुंचीं और सीसीटीवी फुटेज निकलवाए, जिन से पता चला कि 31 जनवरी की दोपहर 12 बजे तक वंदना अस्पताल में थी और आखिरी बार किसी एक महिला व बच्ची के साथ बाहर जाती हुई दिखी थी.

पुलिसिया पूछताछ में यह बात भी उजागर हुई कि वंदना कुछ दिन पहले ही बजरंग कालोनी सोनी लौज के पास एक मकान में रहने के लिए आई थी, इस के पहले वह मारूपुरा में अन्नू शाह के मकान में रह रही थी और इस परिवार से उस के बेहद अंतरंग और घनिष्ठ संबंध थे. लेकिन कुछ दिनों से वंदना और हनीफा में लड़ाई होने लगी थी.

सुनंदा और नीलम ने अपने बयानों में बता दिया कि वंदना और अंसार के बीच प्रेम प्रसंग था, जिस के चलते हनीफा उसे परेशान कर रही थी. यह बात वंदना ने फोन पर अपनी बहनों को बताई थी.

शक होने पर पुलिस जब अंसार के घर पहुंची तो पता चला कि हनीफा मायके गई हुई है. इस से पुलिस का शक यकीन में बदलता नजर आया. पुलिस काररवाई आगे बढ़ती, इस के पहले ही स्वर्णकार समाज ने आरोपियों की गिरफ्तारी को ले कर अधिकारियों व मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिए और जुलूस भी निकाला.

इसी दौरान आष्टा पुलिस को उस वैन ड्राइवर का पता चल गया जो बेरछा में देखी गई थी. पूछताछ में ड्राइवर ने बताया कि हनीफा और उस का एक साथी वैन में कुछ सामान भर कर ले गए थे. हनीफा के साथी का नाम गुड्डू उर्फ रामचरण पता चला, जो पेशे से तांत्रिक भी था.

अब करने को कुछ नहीं रह गया था. पुलिस ने जल्द ही अंसार सहित हनीफा और रामचरण को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में हैरानी की बात अंसार द्वारा खुद को वंदना का कातिल बताना थी. जब पुलिस ने इस हादसे का रिक्रिएशन यानी नाट्य रूपांतरण कराया तो अंसार गड़बड़ाता दिखा.

अब हनीफा से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने सच उगल दिया कि घटना वाले दिन वह अस्पताल गई थी और वंदना को झांसा दे कर घर ले आई थी. उस का किराएदार गुड्डू पहले से ही तैयार था. वंदना और हनीफा के बीच की बातचीत जब तकरार और तूतूमैंमैं में बदली तो हनीफा ने वंदना के सिर पर रौड दे मारी. वंदना बेहोश हो गई तो गुड्डू और हनीफा ने गला रेत कर उस की हत्या कर दी.

वंदना की लाश दोनों ने प्लास्टिक के एक ड्रम में ठूंसी और उसे वैन में रख कर 85 किलोमीटर दूर बेरछा के लिए निकल गए. वैन ड्राइवर को हालांकि इन पर शक हो रहा था कि कुछ गड़बड़ है लेकिन अपनी ड्यूटी बजाते हुए उस ने ज्यादा पूछताछ नहीं की. ड्राइवर ने ड्रम गुड्डू की बताई जगह उतार दिया और आष्टा वापस आ गया.

लाश वाले ड्रम को हनीफा के पास छोड़ कर गुड्डू गांव के पैट्रोल पंप से 2 लीटर पैट्रोल लाया और दोनों ने मिल कर वंदना की लाश को जला दिया. जलाने के बाद गुड्डू भोपाल अपने एक दोस्त देवेंद्र ठाकुर के पास आ गया. उसे भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. हनीफा वापस आष्टा आ गई थी.

इन दोनों का अंदाजा था कि जली लाश पुलिस पहचान नहीं पाएगी और दोनों पकड़ से बाहर रहेंगे. हत्या के समय अंसार बस में ड्यूटी पर था जो हनीफा को बचाने के लिए कत्ल का इलजाम अपने ऊपर ले कर पुलिस को गुमराह कर रहा था.

आरोपी यानी हत्यारे अब सलाखों के पीछे हैं. वंदना ने जमाने की परवाह न करते हुए एक शादीशुदा मर्द से प्यार कर उस के साथ ही जीने की जिद करने की गलती की थी तो हनीफा पैसों के लालच में आ कर पति का सौदा करने की चूक कर बैठी थी.

बाद में जब अंसार वंदना से शादी करने पर उतारू हो गया तो उस ने सौतन को ठिकाने लगा दिया. अंसार ने खूब मौज की हालांकि वह भूल गया था कि बीवीबच्चों के होते हुए एक कुंवारी लड़की से इश्क लड़ाना जुर्म नहीं पर गलत बात जरूर है.

बदले पे बदला : प्रेम की आग – भाग 3

बेबी उसे यह विश्वास दिलाने में सफल हो गई कि तरुण ही नीलेश का हत्यारा है और वह भी उस से बदला लेना चाहती है. मेघा जब इस बाबत तैयार होती दिखी तो बेबी ने उस से वादा किया कि तरुण की मौत के बाद वह उसे घर की बहू जरूर बनाएगी.
पर हत्या कैसे की जाए, इस की योजना बेबी ने मेघा को बता दी. साथ ही उसे एक सिम भी खरीद कर दे दिया. योजना के मुताबिक मेघा ने तरुण को फोन करने शुरू किए. लेकिन बात करने के बजाय वह हर बार रौंग नंबर कह कर फोन काट देती थी.

आवाज सुन कर ही तरुण ने अंदाज लगा लिया कि जिस की आवाज इतनी खनक भरी है, वह लड़की जरूर सुंदर होगी. धीरेधीरे यह रौंग नंबर राइट नंबर में तब्दील हो गया और मेघा व तरुण लंबीलंबी बातें करने लगे.

जब तरुण जाल में फंसने लगा तो बेबी ने मेघा को समझाया कि लोहा गरम हो चुका है, अब चोट करने का वक्त आ गया है. चूंकि मिलने के लिए एकांत की जरूरत थी, इसलिए बेबी ने आर.के. नगर में 4 हजार रुपए महीने पर एक मकान किराए पर ले लिया.

किसी गुरु की तरह मेघा को समझाते हुए बेबी ने मंत्र दिया कि सैक्स हर मर्द की कमजोरी होती है, इसलिए तुम अकेले में तरुण को अपने हुस्न की पूरी झलक दिखा देना. इस से उस की प्यास और भड़केगी, लेकिन भूल कर भी उस की प्यास बुझा मत देना. इस के बाद हम उसे जब, जहां, जैसे बुलाएंगे, वह सिर के बल दौड़ा चला आएगा.

मेघा पहले एक होटल में तरुण से मिली तो वह अपनी खूबसूरत और सैक्सी टेलीफोनिक प्रेमिका को देखते ही पागल सा हो उठा. मेघा ने जब यह खबर बेबी को बताई तो उस ने उस से कहा कि पहली जनवरी को तरुण को अकेले में मिलने के लिए बुलाए.

इधर मेघा के हुस्न और इश्क के समंदर में खयाली गोते लगा रहे तरुण को सपने में भी अंदाजा नहीं था कि वह उस के सौतेले भाई नीलेश की प्रेमिका है, जो उस की मौत की स्क्रिप्ट लिख रही है और जिस की डायरैक्टर बेबी है.

कुछ दिन बातों में और बीते तो तरुण खुल कर मेघा से कहने लगा कि एक बार मेरी प्यास बुझा दो. इस पर मेघा ने उसे बताया कि वह इस के लिए तैयार है.
उस ने यह भी कहा कि इस के लिए नए साल का पहला दिन ठीक रहेगा. इशारों में नहीं बल्कि उस ने खुल कर तरुण को यह भी बता दिया कि वह किस्मत वाला है, क्योंकि इस दिन उसे तोहफे में कुंवारापन मिलेगा.

इतना सुनना भर था कि तरुण की नींद, भूखप्यास सब गायब हो गई और वह बेसब्री से 1 जनवरी का इंतजार करने लगा. उस दिन वह मां राजकुमारी से झूठ बोल कर मेघा से मिलने आर.के. नगर के सूने मकान में गया तो मेघा ने उसे सब्र रखने की बात कह कर कौफी पिलाई, जिस में उस ने ढेर सारी नींद की गोलियां मिला दी थीं.

तरुण यह सोचसोच कर खुश था कि जल्द ही मेघा का नग्न संगमरमरी जिस्म उस की बांहों में मचल रहा होगा. दूसरी तरफ मेघा यह सोचसोच कर खुश हो रही थी कि आज वह अपने प्रेमी नीलेश की मौत का बदला लेगी.

कौफी पीने के बाद भी तरुण पर नींद की गोलियों का उतना असर नहीं हुआ, जितना उस की हत्या के लिए चाहिए था. बेकाबू हो आया तरुण अब शराफत भूल कर सैक्स करने पर आमादा हो गया था, इसलिए मेघा ने चालाकी से उसे क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश कर दिया. तरुण को तो पता भी नहीं चला होगा कि वह मेघा के नहीं बल्कि मौत के आगोश में है.

तरुण की बेहोशी की खबर मेघा ने बेबी को दी तो वह पति बालाराम और दोनों बेटों योगेश व अभिषेक को ले कर आ गई. इन पांचों ने मिल कर बेहोश तरुण के हाथपैर रस्सी से कस कर बांधे और मुंह पर टेप चिपका दी.

बेहोश तरुण को अपनी कार में डाल कर बेबी कोटा ले आई. कोटा के नजदीक बेबी का गांव अमने था. वहां 5 दिन पहले ही तरुण की कब्र खोदी जा चुकी थी. नए साल के पहले दिन लगभग शाम 7 बजे इन पांचों ने मिल कर बेहोश तरुण को उस कब्र में जिंदा दफन कर दिया.

इतना जानने के बाद पुलिस वालों के पास कानूनी खानापूर्तियां करना ही बाकी रह गया था. सभी को गिरफ्तार कर जब विस्तार से पूछताछ की गई तो इन्होंने बताया कि तरुण की चप्पलें, बाइक और मोबाइल फोन इन्होंने बिलासपुर से कोटा के रास्ते में अलगअलग जगहों पर फेंक दिए थे, जिन्हें पुलिस ने बाद में बरामद भी कर लिया. मेघा ने क्लोरोफार्म एक कैमिस्ट की दुकान से खुद को बीफार्मा की छात्रा बता कर खरीदा था और मांगने पर अपना आइडेंटिटी कार्ड भी दिखाया था.

3 जनवरी को पुलिस पांचों को ले कर अपने गांव गई, जहां उन की बताई जगह को खोदा गया. पुलिस ने एसडीएम और तहसीलदार की मौजूदगी में तरुण की लाश बाहर निकाली जो करीब 4 फुट के गड्ढे में दफनाई गई थी.

गड्ढा खोद कर तरुण की लाश निकालने में करीब 2 घंटे लग गए. इस दौरान आसपास के गांवों के लोग भी इस सनसनीखेज और अजीबोगरीब हत्याकांड की खबर सुन कर वहां इकट्ठा हो गए थे.

पंचनामा बनाने और दूसरी खानापूर्ति करने के बाद तरुण की लाश राजकुमारी और शांतनु को सौंप दी गई. पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई बेबी की मारुति कार भी जब्त कर ली.

इस ब्लाइंड मर्डर की गुत्थी को सुलझाने में सरकंडा थाना इंचार्ज संतोष जैन, एसआई आर.ए. यादव और विनोद वर्मा सहित हैडकांस्टेबल निमोली ठाकुर, आर. मुरली भार्गव, अतुल सिंह, अनूप मिश्रा, रीना सिंह सहित साइबर सैल के सबइंसपेक्टर प्रभाकर तिवारी, हेमंत आदित्य, नवीन एक्का और शकुंतला साहू का उल्लेखनीय योगदान रहा.

4 जनवरी को एक प्रैस कौन्फ्रैंस में बिलासपुर की अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अर्चना झा और साइबर सैल के डीएसपी प्रवीण चंद्र राय जब तरुण हत्याकांड का खुलासा कर रहे थे, तब मीडिया वाले इस कहानी को किसी जासूसी उपन्यास की तरह सुन रहे थे.
मामला था भी कुछ ऐसा, जिस में एक व्यभिचारी पिता की दूसरी बीवी एकलौते बेटे की मौत की वजह बनी थी.

साथ ही एक लड़की द्वारा फिल्मी स्टाइल में अपने प्रेमी की कथित हत्या का बदला लेने पर उतारू हो गई थी. लेकिन अब वह बजाय ससुराल के ससुराल वालों के संग ही जेल में है.

बेवफाई का बदला : क्या था बच्ची का कसूर – भाग 3

गीता ज्यादा कुछ बोलनेबताने की स्थिति में नहीं थी. वह सदमे में थी और बारबार बेहोश हो रही थी. वैवाहिक विवाद की स्थिति में घनश्याम सब से ज्यादा संदेहास्पद पात्र था. पुलिस ने हर कोण और हर तरह से उस से पूछताछ की लेकिन वह कहीं से भी अपराधी नहीं लगा. आखिर उसे इस हिदायत के साथ जाने दिया गया कि वह पुलिस को बताए बिना कोटा से बाहर न जाए.

राजेश मील को यह बात बारबार कचोट रही थी कि गीता जवान है, कमोबेश खूबसूरत भी है. लेकिन ऐसा क्या था कि अपनी बसीबसाई गृहस्थी छोड़ कर पिता के पास रह रही थी. पति घनश्याम के बारे में जो जानकारी पुलिस ने जुटाई थी, उस से उस का हत्या का कोई ताल्लुक नहीं दिखाई दे रहा था.

इस बीच पुलिस को यह भी पता चल चुका था कि वह सीधासादा नेकनीयत का आदमी था. इतना सीधा कि उसे कोई भी घुड़की दे कर डराधमका सकता था.

सवाल यह था कि दिल्ली जैसे शहर में रहते हुए क्या पतिपत्नी के बीच कोई तीसरा भी था? ऐसे किस्से की तसदीक तो मोबाइल ही हो सकती है. लिहाजा राजेश मील ने फौरन सीआई को हिदायत देते हुए कहा, ‘‘अनीस, गीता के गायब हुए मोबाइल का नंबर है न तुम्हारे पास? फौरन उस की काल डिटेल्स ट्रैस करने का बंदोबस्त करो.’’

अनीस अहमद फौरन इस काम पर लग गए. काल ट्रैसिंग के नतीजे वाकई चौंकाने वाले थे. अनीस अहमद ने जो कुछ बताया, उस ने एसपी राजेश मील की आंखों में चमक पैदा कर दी. गीता के मोबाइल की मौजूदगी दिल्ली के तुगलकाबाद में होने की तसदीक कर रही था. साफ मतलब था कि आरोपी दिल्ली के तुगलकाबाद में मौजूद था.

सीआई अनीस अहमद के नेतृत्व में दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने जो जानकारी जुटाई, उस के मुताबिक आरोपी का नाम कालूचरण बेहरा था. कालूचरण को पुलिस ने घनश्याम के पुल प्रह्लादपुर स्थित घर के पास वाले मकान से धर दबोचा.

कालूचरण घनश्याम का पड़ोसी निकला. गीता के दिल्ली में रहते हुए कालूचरण से प्रेमिल संबंध बन गए थे. घनश्याम और गीता के बीच अलगाव की बड़ी वजह यह भी थी. दिल्ली गई पुलिस टीम ने घनश्याम के मकान सहित अन्य जगहों से कई महत्त्वपूर्ण सुराग एकत्र किए. कालूचरण दिल्ली स्थित कानकोर में औपरेटर था.

पुलिस कालूचरण बेहरा को दिल्ली से हिरासत में ले कर सोमवार 3 जून को कोटा पहुंची. यहां शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की गिरफ्तारी दिखा कर मंगलवार 4 जून को न्यायालय में पेश कर 3 दिन के रिमांड पर ले लिया. पुलिस की शुरुआती पूछताछ में मासूम गुनीषा की हत्या को ले कर कालूचरण ने जो खुलासा किया, वह चौंकाने वाला था.

दक्षिणपूर्वी दिल्ली के पुल प्रह्लादपुर में घनश्याम के पड़ोस में रहने के दौरान ही कालूचरण के घनश्याम की पत्नी गीता से प्रेमिल संबंध बन गए थे. गीता के कोटा चले जाने के बाद भी कालू कोटा आ कर गीता से मिलताजुलता रहा. लेकिन पिछले कुछ दिनों से गीता के किसी अन्य युवक से संबंध बन गए थे. नतीजतन उस ने कालू से कन्नी काटनी शुरू कर दी थी.

कालू ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो उस ने उसे बुरी तरह दुत्कार दिया था. बेवफाई और अपमान की आग में सुलगते कालू ने गीता को सबक सिखाने की ठान ली. इस रंजिश की बलि चढ़ी मासूम गुनीषा.

पड़ोसी होने के नाते घनश्याम और कालू के बीच अच्छा दोस्ताना था. पतिपत्नी के बीच अकसर होने वाले झगड़े में कालू गीता का पक्ष लेता था. नतीजतन गीता का झुकाव कालू की तरफ होने लगा. गीता का रंगरूप बेशक गेहुआं था, लेकिन भरे हुए बदन की गीता के नैननक्श काफी कटीले थे.

कालू से निकटता बढ़ी तो गीता पति की अनुपस्थिति में कालू के कमरे पर भी आने लगी. यहीं दोनों के बीच अनैतिक संबंध बने. अनैतिक संबंध बनाने के लिए कालू ने उसे अपने प्यार का भरोसा दिलाते हुए कहा था कि वह शादी नहीं करेगा और सिर्फ उसी का हो कर रहेगा.

दिल्ली में पतिपत्नी के बीच झगड़े इस कदर बढे़ कि गीता ने घनश्याम को छोड़ने का फैसला कर लिया और बेटी गुनीषा को ले कर कोटा आ गई.

पिता के लिए बेटी का साझा दुख था. इसलिए उस ने भी बेटी का साथ दिया. यह 3 साल पहले की बात है. इस बीच गीता ने घनश्याम पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए तलाक का मुकदमा दायर कर दिया था. यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.

गीता के कोटा आ जाने के बावजूद कालू के साथ उस के संबंध बने रहे. कालू अकसर कोटा आता रहता था और 4-5 दिन गीता के घर पर ही रुकता था. कालू ने गीता को खुश रखने के लिए पैसे लुटाने में कोई कसर नहीं रखी थी.

पिछले करीब 6 महीने से कालू को अपने और गीता के रिश्तों में कुछ असहजता महसूस होने लगी. दिन में 10 बार फोन करने वाली गीता न सिर्फ उस का फोन काटने लगी थी, बल्कि अपने फोन को व्यस्त भी दिखाने लगी थी. कालू ने गीता की बेरुखी का सबब जानने की जुगत लगाई तो पता चला कि उस की माशूका किसी और के हाथों में खेल रही है. उस ने अपने रसूखों से इस बात की तसदीक भी कर ली.

हालात भांपने के लिए जब वह कोटा पहुंचा तो गीता में पहले जैसा जोश नहीं था. उस ने कालू को यहां तक कह दिया कि अब वह यहां न आया करे. गुस्से में उबलता हुआ कालू दिल्ली लौटा तो इसी उधेड़बुन में जुट गया कि गीता को कैसे उस की बेवफाई का ताजिंदगी याद रखने वाला सबक सिखाए. उस ने गीता की बेटी और पूरे परिवार की चहेती गुनीषा को मारने का तानाबाना बुन लिया.

अपनी योजना को अंजाम देने के लिए वह 29 मई की रात को ट्रेन से कोटा आया. घर का चप्पाचप्पा उस का देखाभाला था.  30 मई की देर रात वह करीब 2 बजे पीछे के रास्ते से घर में घुसा और सब से पहले उस ने तख्त पर पड़े तीनों मोबाइल कब्जे में किए. फिर गीता के पास सोई गुनीषा को चद्दर समेत ही उठा लिया.

नींद में गाफिल गुनीषा कुनमुनाई भी, लेकिन कालू ने उस का मुंह बंद कर दिया. कूलरों के शोर में वैसे भी गुनीषा की कुनमुनाहट दब गई. गुनीषा का गला घोंट कर टंकी में डालने की योजना वह पहले ही बना चुका था. छत पर जाने का रास्ता भी उसे पता था.

गुनीषा को दबोचे हुए वह छत पर पहुंचा. अलगनी से उठाई गई बनियान से उस का गला घोंट कर कालू ने उसे पानी की टंकी में डाल दिया फिर वह जिस खामोशी से आया था, उसी खामोशी से बाहर निकल गया. मोबाइल इस मंशा से उठाए थे, ताकि इस बात की तह तक पहुंचा जा सके कि गीता के आजकल किस से संबंध थे. लेकिन मोबाइल ही उस की गिरफ्तारी का कारण बन गए.

आनंद का आनंद लोक : किरण बनी शिकार – भाग 3

उस परिवार का लड़का दिल्ली में रह कर सोफे बनाने का काम करता था. उस लड़के व उस के परिवार को कविता पसंद आ गई. परिवार अच्छा होने की वजह से सरोज ने उस युवक से अपनी बेटी कविता की कोर्ट मैरिज करा दी. यह पिछले साल नवंबर की बात है.

इधर किरन अब जब भी आनंद से मिलती तो विवाह करने की जिद करती. अब आनंद के लिए  किरन को समझाना मुश्किल होने लगा. इसे ले कर वह तनाव में रहने लगा.

कोराना वायरस का प्रकोप पूरे विश्व में फैला हुआ था. उस से बचाने के लिए भारत सरकार ने देश में लौकडाउन कर रखा था. उत्तर प्रदेश की बात करें तो ताज नगरी आगरा में कोरोना संक्रमितों की संख्या सब से अधिक थी.

21 अप्रैल की रात 9 बजे आगरा के थाना लोहामंडी क्षेत्र के हसनपुरा में रहने वाले वरुण प्रजापति ने गजानन नगर में रहने वाली डाक्टर गरिमा बंसल के घर के पास एक कार्टन बौक्स पड़ा देखा. आश्चर्य की बात यह थी कि वह बौक्स सफेद चादर में बंधा हुआ था.

वरूण ने आसपास के लोगों को बुलाया. लोगों के आने पर तरहतरह की बातें होने लगीं. यह रहस्य जानने को सभी बेकरार थे कि बौक्स में है क्या. पता चला कि वह कार्टन बौक्स दोपहर में वहां नहीं था, शाम को अंधेरा घिरने पर किसी ने उसे वहां डाला होगा.

मामला संदिग्ध होने पर वरुण ने 112 नंबर पर काल कर के पुलिस को सूचना दे दी. सूचना मिलते ही एसपी सिटी रोत्रे बोहन प्रसाद व शाहगंज थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. जहां बाक्स मिला था, वहां से महज एक किलोमीटर की दूरी पर थाना शाहगंज था.

इंसपेक्टर सत्येंद्र राघव ने वहां पहुंचने के बाद एक पुलिसकर्मी को पीपीई किट पहना कर 2 फुट का वह कार्टन बौक्स खुलवाया. बौक्स खुलने पर उस में एक युवती की लाश मिली. मृतका की उम्र लगभग 25-26 वर्ष रही होगी. उस के गले पर दबाने के निशान थे. मृतका ने नीले रंग का सलवारसूट पहन रखा था. उस के पैर दुपट्टे से बंधे हुए थे. दाएं हाथ पर किरन लिखा था.

बौक्स पर जो चादर बंधी थी, और वह बौक्स किसी अस्पताल के लग रहे थे. बौक्स दवाइयों में इस्तेमाल होने वाला था. चादर भी अस्पतालों में बिछाई जाने वाली थी.

इस से लगा कि हत्यारे का कनेक्शन किसी हौस्पिटल से है. एक किलोमीटर तक के अस्पतालों की जानकारी एकत्र की गई तो ऐसा कोई हौस्पिटल नहीं मिला. मृतका की लाश के फोटो भी कोई नहीं पहचान पाया. मृतका की शिनाख्त नहीं हो पाई तो इंसपेक्टर सत्येंद्र राघव ने लाश को मार्चरी में रखवा दिया. फिर थाने आ कर उन्होंने वरुण प्रजापति से लिखित तहरीर ली और अज्ञात के विरूद्ध भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

वह अभागी किरन ही थी

अगले दिन एक महिला अपने बेटे के साथ शाहगंज थाने पहुंची और अपना नाम सरोज व बेटे का नाम सागर बताया. उन दोनों के अनुसार वे लाश मिलने की बात सुन कर थाने पहुंचे थे. सरोज की बेटी किरन घटना वाले दिन सुबह 10 बजे घर से निकली थी लेकिन वापस नहीं लौटी थी.

इंसपेक्टर सत्येंद्र राघव ने उन्हें लाश का फोटो दिखाया तो सरोज रो पड़ी, वह लाश उस की बेटी किरन की ही थी. शिनाख्त होने पर इंसपेक्टर राघव ने उन से किरन के बारे में पूछताछ की. लेकिन सरोज ने कुछ भी ऐसा नहीं बताया जो पुलिस के काम का होता. वह किरन के प्रेमसंबंधों को बदनामी के डर से छिपा गईं.

इंसपेक्टर राघव ने बौक्स मिलने के स्थान की सीसीटीवी फुटेज खंगालनी शुरू की. सीसीटीवी फुटेज में एक व्यक्ति बाइक पर पीछे बौक्स रखे आता दिखाई दिया. उस इलाके की पूरी सीसीटीवी फुटेज देखते हुए इंसपेक्टर राघव खुशी नेत्रालय तक पहुंच गए.

लौकडाउन की वजह से नेत्रालय बंद चल था, लेकिन उन्हें यह जानकारी मिल गई कि उस नेत्रालय में कोई रहता है. वह नेत्रालय पहुंचे तो आनंद ने गेट खोला. पुलिस को वहां आया देख कर वह चौंका और भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस से बच कर भाग नहीं पाया.

पुलिस को उस की हीरो सुपर स्पलैंडर बाइक भी वहीं खड़ी मिल गई. यह वही बाइक थी, जिस पर आनंद बौक्स रख कर फेेंकने ले गया था. उस के पास से किरन की पासबुक और आधार कार्ड भी बरामद हो गए.

थाने ला कर जब आनंद से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया और हत्या की वजह बता दी.

किरन ने शादी करने की बात को ले कर आनंद का जीना हराम कर दिया था. दिन रात बस एक ही रट कि शादी कर लो. जबकि आनंद पहले से ही शादीशुदा था, वह तो उस के साथ खेल रहा था. ऐसे में शादी करने का तो सवाल ही नहीं उठता था.

21 अप्रैल की सुबह 10 बजे किरन घर से अपनी मां से कह कर निकली कि वह आनंद से मिलने जा रही है. किरन सीधे वहां से खुशी नेत्रालय पहुंची. लौकडाउन की वजह से नेत्रालय बंद था. लेकिन आनंद अंदर अपने कमरे में मौजूद था.

आनंद और किरन बैठ कर बात करने लगे. बात बात में ही शादी को ले कर दोनों में विवाद होने लगा.

दोपहर साढ़े 12 बजे आनंद ने प्लास्टिक की रस्सी से किरन का गला घोंट दिया, जिस से किरन की मौत हो गई.

आनंद ने किरन के पैरों को उस के दुपट्टे से बांध दिया. फिर नेत्रालय में रखे एक 2 फुट के कार्टन बौक्स और सफेद चादर को उठा लाया. कार्टन बौक्स में आंखों के लेंस आते थे.

उस बौक्स में उस ने किसी तरह किरन की लाश को ठूंसा और कार्टन बंद कर के उसे उसी प्लास्टिक की रस्सी से बांध दिया, जिस से उस ने किरन का गला घोंटा था. इस के बाद कार्टन बौक्स को सफेद चादर से बांध कर रख दिया और रात होने का इंतजार करने लगा.

वह साढ़े 7 घंटे लाश को अपने कमरे में रखे रहा. रात 8 बजे उस ने बौक्स को अपनी हीरो सुपर स्पलैंडर बाइक पर रखा और गजानन नगर में डा. गरिमा बंसल के घर के पास डाल दिया. फिर वहां से चला आया.

लेकिन उस का गुनाह छिप न सका और पकड़ा गया. इंसपेक्टर सत्येंद्र राघव ने आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी करने के बाद अतुल कुमार उर्फ आनंद को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया.

कातिल हसीना : लांघी रिश्तों की सीमा – भाग 3

राजेश साधारण पढ़ालिखा युवक था. वह दिल्ली में किसी कंपनी में काम करता था. बात तय होने के बाद 8 जून, 2015 को मुनकी का ब्याह राजेश के साथ हो गया.

शादी के बाद मुनकी अपनी ससुराल में रहने लगी. मुनकी ने जैसे पति का सपना संजोया था, राजेश वैसा ही था. वह उसे खूब प्यार करता था और उस की हर ख्वाहिश पूरी करता था.

मुनकी को ससुराल में वैसे तो हर तरह का सुख था, लेकिन पति की कमी उसे खलती थी. क्योंकि राजेश दिल्ली में प्राइवेट कंपनी में काम करता था. उसे महीने 2 महीने  बाद ही छुट्टी मिल पाती थी. फिर कुछ दिन पत्नी के संग रह कर वह वापस चला जाता था. मुनकी ने पति के साथ रहने की इच्छा जताई तो राजेश ने यह कह उसे कर अपने साथ ले जाने से मना कर दिया कि मांबाप की सेवा कौन करेगा.

मुनकी की ससुराल और मायके में चंद खेतों की दूरी थी. अत: मुनकी का मायके आनाजाना लगा रहता था. वह सुबह मायके जाती तो शाम को ससुराल आ जाती थी. मुनकी की शादी हो जरूर गई थी, लेकिन कंधई सिंह उसे भूला नहीं था. वह अब भी एक तरफा प्यार में उस का दीवाना था. जब भी वह मायके आती थी तो कंधई उसे ललचाई नजरों से देखा करता था. कभीकभी वह उस से हंसीमजाक भी कर लेता था.

कंधई सिंह ने जब देखा कि मुनकी उस की किसी बात का बुरा नहीं मानती तो वह उस की ससुराल भी जाने लगा. उस ने मुनकी के सासाससुर से भी मेलजोल बढ़ा लिया था. वह कंधई को इसलिए घर आने से मना नहीं करते थे, क्योंकि वह उन की बहू का मौसेरा भाई था.

हर तरह का मुनकी को ससुराल में आना पसंद नहीं था लेकिन वह इस वजह से उसे मना नहीं कर पाती थी, क्योंकि उसे डर सता रहा था कि कहीं कंधई पुरानी बातों का जिक्र उस के पति और ससुराल वालों से न कर दे.

कंधई सिंह ने मुनकी देवी की ससुराल आना शुरू किया तो उस ने पुरानी हरकत फिर शुरू कर दी. कभी वह उस से प्यार का इजहार करता तो कभी शारीरिक छेड़छाड़. मुनकी उस से पीछा छुड़ाने की कोशिश करती थी. उस ने कई बार सोचा कि वह सासससुर से कहे कि वह कंधई को घर न आने दें, पर वह हिम्मत नहीं जुटा सकी. इस तरह समय बीतता रहा.

4 फरवरी, 2020 की शाम मुनकी घर में अकेली थी. उस की सास पड़ोस में हो रहे कीर्तन में गई थी और ससुर खेत पर सिंचाई करा रहे थे. तभी कंधई सिंह आ गया. उस ने सूना घर देखा तो उसे मुनकी की देह जीतने का यह सुनहरा मौका लगा. उस ने भीतर से दरवाजे की कुंडी बंद कर ली और अंदर के कमरे में जा कर मुनकी को दबोच लिया.

मुनकी भी अस्मत बचाने के लिए कंधई से भिड़ गई. स्वयं को मुक्त कराने के लिए वह कंधई को गालियां भी बक रही थी. और उस पर थप्पड़ भी बरसा रही थी. लेकिन कंधई उसे बेतहाशा चूमचाट रहा था. किसी तरह मुनकी उस के शैतानी चंगुल से छूट गई और कुंडी खोल कर बाहर आ गई.

इस के बाद कंधई भी नहीं रुका और वहां से चला गया. कुछ देर बाद उस की सास भी आ गई. लेकिन उस ने कंधई की हरकतों की जानकारी अपनी सास को नहीं दी.

देर रात मुनकी के सासससुर गहरी नींद में सो गए तब मुनकी ने अपने पति राजेश को फोन मिलाया और कहा, ‘‘आप तुरंत घर आ जाइए. मैं मुसीबत में हूं. न आए तो मैं अपनी जान दे दूंगी.’’

‘‘पर ऐसी क्या बात हो गई, जो तुम जान देने की बात कर रही हो.’’ राजेश ने पत्नी से पूछा.

‘‘हर बात का जवाब फोन पर नहीं दिया जा सकता. कुछ गंभीर बातें होती हैं, जो आमनेसामने बैठ कर ही की जा सकती हैं. इसलिए तुम फौरन घर आ जाओ.’’ मुनकी ने पति को जवाब दिया.

राजेश, अपनी पत्नी को बेहद प्यार करता था. वह जान गया कि मुनकी किसी बात को लेकर बेहद परेशान है. अत: उस ने घर जाने का निश्चय किया और उसी दिन वह दिल्ली से ट्रेन में बैठ कर घर के लिए चल दिया.

पति को बताई व्यथा

18 घंटे के सफर के बाद राजेश घर पहुंचा तो मुनकी उसे देखते ही फूटफूट कर रोने लगी. कुछ देर बाद जब आंसुओं का सैलाब थमा तो उस ने अपनी व्यथा पति को बताई और बदतमीज मौसेरे भाई कंधई सिंह को सबक सिखाने को उकसाया.

पत्नी की आपबीती सुन कर राजेश का खून खौल उठा. उस ने कंधई को सबक सिखाने की ठान ली. राजेश ने अपने ससुर भीखू को घर बुलाया और सारी बात बता कर सहयोग मांगा. भीखू पहले से ही कंधई पर जलाभुना बैठा था. वह राजेश का साथ देने को राजी हो गया. इस के बाद राजेश, भीखू और मुनकी देवी ने सिर से सिर जोड़ कर कंधई सिंह की हत्या की योजना बताई.

इधर 2-3 दिन बीत गए और मुनकी ने कोई शिकवा शिकायत नहीं की तो कंधई सिंह को लगा कि मुनकी दिखावे का विरोध करती है. दिल से वह भी उस से मिलना चाहती है. अत: अब जब भी मौका मिलेगा वह अपनी इच्छा पूरी कर लेगा. भले ही मुनकी विरोध जताती रहे.

7 फरवरी, 2020 की रात 8 बजे एक बार फिर राजेश भीखू और मुनकी ने आपस में मंत्रणा की. फिर तीनों तेंदुआ बरांव गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय के पास पहुंच गए. राजेश अपने साथ लोहे की रौड ले आया था. राजेश और भीखू स्कूल के पूर्वी छोर पर खेत किनारे घात लगा कर बैठ गए.

योजना के अनुसार मुनकी ने रात लगभग 8 बजे कंधई सिंह से मोबाइल फोन पर बात की और देह मिलन के बहाने उसे प्राथमिक विद्यालय के पूर्वी छोर पर बुला लिया.

कंधई सिंह इस के लिए न जाने कब से तड़प रहा था. सो वह मुनकी के झांसे में आ गया. उस ने पत्नी राधा से कहा कि वह जरूरी काम से जा रहा है. कुछ देर में वापस आ जाएगा. फिर वह घर से निकला और प्राथमिक विद्यालय के पूर्वी छोर पर पहुंच गया. मुनकी उस का ही इंतजार कर रही थी. वह मुनकी से बात करने लगा. तभी घात लगाए बैठे राजेश और भीखू ने उस पर हमला कर दिया.

रौड के प्रहार से कंधई सिंह का सिर फट गया और वह रास्ते में ही गिर पड़ा. इस के बाद भीखू और मुनकी ने कई प्रहार कंधई सिंह के सिर व चेहरे पर किए जिस से उस की मौत हो गई. नफरत और घृणा से भरी मुनकी ने कंधई के गुप्तांग पर भी प्रहार कर उसे कुचल दिया. हत्या करने के बाद राजेश ने कंधई का मोबाइल फोन तोड़ कर वहीं फेंक दिया. फिर वह्य तीनों फरार हो गए.

12 फरवरी, 2020 को थानाप्रभारी देवेंद्र पांडेय ने अभियुक्त राजेश, भीखू तथा मुनकी से पूछताछ करने के बाद उन्हें श्रावस्ती की जिला अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित  

बदले पे बदला : प्रेम की आग – भाग 2

इसी दौरान तरुण को सिविललाइंस थाने में यातायात पुलिस के सीसीटीवी का काम मिल गया तो उस की इमेज भी एक पुलिस वाले की बन गई. यह दीगर बात थी कि वह सिर्फ डाटा रिकौर्ड करने का काम करता था.

तरुण की गुमशुदगी से इस कहानी का गहरा ताल्लुक है, यह पुलिस वालों को उस वक्त और समझ आ गया जब उन की जानकारी में यह बात भी आई कि बेबी और शांतनु कुछ दिनों तक साथसाथ रहे थे. बाद में दोनों अपनेअपने घरों को लौट आए थे.

दरअसल, दोनों का जी एकदूसरे से भर गया था या कोई और वजह थी, यह तो किसी को नहीं पता. लेकिन बात तब गंभीर लगी जब पिछले साल सितंबर में बेबी के बड़े बेटे नीलेश मांडले की लाश संदिग्ध अवस्था में बिलासपुर कोटा रेलवे लाइन पर मिली.

बेबी को शक था कि कहीं तरुण ने उस से बदला लेने के लिए नीलेश की हत्या कर या करवा न दी हो. जबकि पुलिस की जांच में इसे खुदकुशी माना गया था. इस से बेबी को लगा कि नीलेश के पुलिस से नजदीकी संबंध होने के चलते पुलिस वाले मामले को खुदकुशी करार दे कर दबा रहे हैं.

इस बारे में उस ने शांतनु से बात की तो शांतनु ने अपने बेटे तरुण का पक्ष लिया. इस से बेबी और ज्यादा तिलमिला उठी. उसे लगा कि बापबेटे दोनों उसे बेवकूफ बना रहे हैं. शांतनु की चाहत उस के शरीर तक ही सीमित है, उसे नीलेश की मौत से कोई लेनादेना नहीं है. नीलेश की जगह अगर तरुण मरा होता तो उसे समझ आता कि जवान बेटे को खो देने का दर्द क्या होता है.

जिस तरह दोनों अपनेअपने परिवार से अलग हुए थे, इस मसले पर विवाद होने के बाद अपनेअपने घरों को कुछ इस तरह लौट गए, मानो कुछ हुआ ही न हो. शांतनु राजकुमारी और तरुण के पास अपने घर चला गया और बेबी बालाराम और दोनों बेटों के पास चली गई.

तरुण के गायब होने का इस कहानी से संबंध जोड़ते हुए पुलिस ने तफ्तीश शुरू की और दूसरे दिन सुबह को बेबी और बालाराम को थाने बुला लिया. जब दोनों से तरुण के बाबत पूछताछ की गई तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता. चूंकि दोनों सच बोलते लग रहे थे, इसलिए पुलिस वालों ने उन्हें जाने दिया.

लेकिन तरुण का अभी तक कहीं अतापता नहीं था. अब तक किसी को उस के और मेघा के प्रेम प्रसंग के बारे में कुछ मालूम भी नहीं था. अगर वह किसी हादसे का शिकार हुआ होता तो अब तक उस का पता चल जाता, लेकिन पूछताछ और जांच में ऐसी कोई बात या घटना सामने नहीं आई थी, जो तरुण से ताल्लुक रखती हो.

लेकिन जांच के दौरान पुलिस वालों को पता चला कि तरुण आखिरी बार मेघा गोयल के साथ दिखा था, जो लिंगियाडीह की रहने वाली थी. पूजा और इमरान नाम के 2 गवाहों ने इस बात की पुष्टि की थी कि मेघा 1 जनवरी की दोपहर तरुण की बाइक पर सवार हो कर उस के साथ आर.के. नगर की तरफ जाती हुई दिखी थी.

मेघा तक पहुंचने के लिए पुलिस ने मोबाइल फोनों का सहारा लिया. तरुण के फोन की काल डिटेल्स निकालने पर पता चला कि पहली जनवरी को उस की एक खास नंबर पर ज्यादा और काफी लंबी बातें हुई थीं. लेकिन यह नंबर उस ने सेव नहीं किया था.

तरुण का मोबाइल नंबर ट्रेस करने पर पता चला कि उस की लोकेशन दोपहर 2 बजे से ले कर शाम 6 बजे तक आर.के. नगर में थी. बाद में उस की लोकेशन कोटा की मिली जो बिलासपुर से 30 किलोमीटर दूर है.

पुलिस वालों ने बेबी और बालाराम को पूछताछ के बाद जाने तो दिया, लेकिन दोनों पर शक बरकरार था. तरुण के फोन के इस अज्ञात नंबर और बेबी के फोन की लोकेशन एक साथ मिल रही थी. यह बात इस लिहाज से खटके की थी कि कहीं यह नंबर बेबी का ही तो नहीं है. इधर तरुण की गुमशुदगी की चर्चा पूरे बिलासपुर और छत्तीसगढ़ में होने लगी थी.

अब तक यह भी साफ हो गया था कि तरुण आखिरी बार कोटा में था. लेकिन किस हालत में, यह पता नहीं चल पा रहा था. मेघा के फोन के सहारे पुलिस ने उसे धर दबोचा तो एक नई सनसनीखेज और रोमांचक कहानी इस तरह सामने आई.

शुरू में मेघा ने यह तो मान लिया कि तरुण उस के साथ था, लेकिन उस ने यह कहते पुलिस को गुमराह करने की कोशिश भी की कि वह अपने घर चला गया था. लेकिन जल्दी ही वह पुलिस वालों के सामने टूट गई और तरुण की हत्या की बात स्वीकार ली. उस ने हैरतंगेज बात यह बताई कि कत्ल की इस वारदात में उस का साथ बेबी और बालाराम सहित उन के 2 बेटों योगेश और अभिषेक ने भी दिया था.

तरुण की हत्या की योजना बेबी ने ही बनाई थी, जो शांतनु से अलग होने के बाद से ही बदले की आग में जल रही थी. इसी दौरान उसे पता चला कि उस के बड़े बेटे नीलेश का प्रेम प्रसंग मेघा गोयल से था. दोनों साथसाथ पढ़ते थे.
बेबी जब मेघा से मिली तो उस की चंचलता देख उस की बांछें खिल उठीं. बातों ही बातों में उसे पता चला कि मेघा भी नीलेश की मौत के बाद से खार खाए बैठी है और उस के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है.