‘माया’ जाल में फंसा पति – भाग 1

चित्रकूट जिले के गांव लोहदा का रहने वाला फूलचंद विश्वकर्मा कानपुर की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में ट्रक ड्राइवर की नौकरी करता था. उस की मां और बड़े भाई का परिवार गांव में रहते थे. ट्रक ड्राइवर का पेशा ऐसा है, जिस में कई बार आदमी को लौटने में महीनोंमहीनों लग जाते हैं. इसी वजह से फूलचंद पिछले एक साल से गांव में रह रही बूढ़ी मां और भाई के परिवार से नहीं मिल सका था. समय मिला तो उस ने 5 जुलाई, 2018 को गांव जाने का फैसला किया.

फूलचंद तहसील राजापुर स्थित अपने गांव लोहदा पहुंचा तो उस की वृद्धा मां तो पुश्तैनी घर में मिल गई, लेकिन अलग रह रहा बड़ा भाई शिवलोचन और उस का परिवार घर में नहीं था. वह मां से मिला तो उस की आंखें भर आईं और वह उस के गले लग कर रो पड़ी. फूलचंद को लगा कि मां से एक साल बाद मिला है, इसलिए वह भावुक हो गई है. उस ने जैसेतैसे सांत्वना दे कर मां को चुप कराया और बड़े भाई शिवलोचन और उस के परिवार के बारे में पूछा.

उस की मां चुनकी देवी ने रोते हुए बताया कि पिछले 8 महीने से शिवलोचन का कोई पता नहीं है. बहू माया भी 7-8 महीने पहले दोनों बच्चों को ले कर अपने मायके चली गई थी. तब से वापस नहीं लौटी.

मां की बात सुन कर फूलचंद परेशान हो गया. उस ने इस बारे में मां से विस्तार से पूछा तो उस ने बताया कि 8 महीने पहले जब कई दिनों तक शिवलोचनदिखाई नहीं दिया तो उस ने और गांव वालों ने बहू माया से उस के बारे में पूछा.

माया ने बताया कि शिवलोचन अपनी नौकरी पर कर्वी चला गया है. इस के कुछ दिन बाद माया भी यह कह कर दोनों बच्चों के साथ मायके चली गई कि घर में राशन खत्म हो गया है. जब शिवलोचन लौट आएं तो खबर भिजवा देना, मैं आ जाऊंगी.

फूलचंद को मालूम था कि उस का भाई शिवलोचन कर्वी के एक जमींदार तेजपाल सिंह के खेतों में टै्रक्टर चलाने का काम करता था. जमींदार की गाडि़यां भी वही ड्राइव करता था. मां ने बताया कि उस ने शिवलोचन को कई बार फोन भी कराया था, लेकिन उस का फोन बंद था. मां ने आशंका व्यक्त करते हुए यह भी कहा कि शिवलोचन इतने महीनों तक कभी भी कर्वी में नहीं रहा, बीचबीच में वह आता रहता था.

फूलचंद इस बात को समझता था कि आदमी भले ही कितना भी व्यस्त क्यों न रहे, ऐसा नहीं हो सकता कि अपने परिवार की सुध ही न ले. संदेह की एक वजह यह भी थी कि भाई का हालचाल जानने के लिए फूलचंद ने खुद भी भाई के मोबाइल पर फोन किए थे, लेकिन उस का फोन हर बार बंद मिला था. उस वक्त उस ने यही सोचा था कि संभव है, भाई किसी ऐसी जगह पर हो, जहां नेटवर्क न मिलता हो.

संदेह पैदा हुआ तो फूलचंद उसी दिन गांव के 2 आदमियों को साथ ले कर कर्वी के जमींदार तेजपाल सिंह के पास गया. वहां उसे जो जानकारी मिली, उस ने फूलचंद की चिंता और बढ़ा दी. तेजपाल सिंह ने बताया कि शिवलोचन नवंबर 2017 में दीपावली के बाद से काम पर नहीं आया है.

उस के कई दिनों तक काम पर न आने की वजह से उन्होंने उस के मोबाइल पर फोन किया तो उस की बीवी माया ने फोन उठाया. उस ने कहा कि शिवलोचन ने उन की नौकरी छोड़ दी है, उसे कहीं दूसरी जगह ज्यादा पगार की नौकरी मिल गई है.

तेजपाल सिंह ने आगे बताया कि उन्होंने इस के बाद यह सोच कर फोन नहीं किया कि जब वह अपना बकाया वेतन लेने के लिए आएगा तो पूछेंगे कि अचानक नौकरी क्यों छोड़ दी.

तेजपाल सिंह के यहां से मिली जानकारी के बाद चिंता में डूबा फूलचंद उदास चेहरा लिए अपने गांव लौट आया. फूलचंद ने घर लौट कर भाई के बारे में गहराई से सोचा तो यह बात उस की समझ में नहीं आई कि भाई ने जब दूसरी जगह नौकरी कर ली थी तो माया भाभी ने गांव वालों और मां से यह क्यों कहा था कि वह कर्वी में अपने काम पर गया है.

फूलचंद ने शिवलोचन के साथसाथ अपनी भाभी माया को भी कई बार फोन किया था, लेकिन शिवलोचन की तरह माया का भी फोन बंद मिला था. फूलचंद की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर शिवलोचन कहां चला गया और 8 महीने से घर क्यों नहीं लौटा. ऊपर से उस का फोन भी बंद था.

आश्चर्य की बात यह थी कि उस की भाभी माया जब से अपने मायके गई थी, वापस नहीं लौटी थी. न ही उस ने किसी को फोन कर के कभी कुशलक्षेम पूछी थी. ऊपर से उस का फोन नहीं लग रहा था.

फूलचंद को अपने भाई शिवलोचन की चिंता सताने लगी तो वह भाई की खोजबीनमें जुट गया. फूलचंद की एक बड़ी बहन थी, सावित्री. उस की शादी चित्रकूट की मऊ तहसील में हुई थी. उस के पास शिवलोचन की ससुराल वालों का नंबर था.

फूलचंद ने फोन कर के बहन को बताया कि शिवलोचन पिछले कई महीनों से लापता है और माया अपने मायके गई है. दोनों में से किसी का फोन भी नहीं लग रहा. शिवलोचन के बारे में पता लगाने की सोच कर फूलचंद ने सावित्री से माया के पिता का नंबर ले लिया.

उस ने वह नंबर लगा कर जब माया के पिता से बात की तो उस ने बताया कि माया अपने दोनों बच्चों को ले कर 8 महीने पहले दीपावली के बाद उन के पास आई थी. लेकिन वह 2 महीना पहले दोनों बच्चों को उन के घर छोड़ कर यह कह कर गई थी कि शिवलोचन के बारे में जानकारी लेने लोहदा जा रही है, 2-4 दिन में आ जाएगी. लेकिन उस के बाद ना तो वह घर लौटी, न ही उस ने फोन कर के बच्चों की कुशलक्षेम पूछी.

माया के पिता ने जो कुछ बताया, वह चौंकाने वाला था. क्योंकि अभी तक तो फूलचंद इस भ्रम में था कि उस की भाभी माया अपने मायके में है, लेकिन जब पता चला कि माया अपने मायके से 2 महीना पहले ही कहीं चली गई है तो फूलचंद के माथे पर परेशानी की लकीरें और गहरा गईं.

अय्याशी में डूबा रंगीन मिजाज का कारोबारी – भाग 1

देश भर में क्रिकेट व अन्य खेलों का सामान बनाने के लिए प्रसिद्ध शहर जालंधर (पंजाब) के उपनगर लाजपतनगर की कोठी नंबर 141 में प्रसिद्ध करोड़पति बिजनैसमैन जगजीत सिंह लूंबा का परिवार रहता था. उन के सीमित परिवार में 60 वर्षीय पत्नी दलजीत कौर, 42 वर्षीय बेटा अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू, बहू परमजीत कौर उर्फ पम्मी, 20 वर्षीय पोता शानजीत सिंह, मनजीत सिंह और पोती आशीषजीत कौर थीं. जगजीत लूंबा बड़े सज्जन एवं दयालु प्रवृत्ति के इंसान हैं.

धनवान होने के बावजूद भी उन्हें किसी चीज का घमंड नहीं था. शहर में उन की जगजीत ऐंड कंपनी नाम से बहुत बड़ी फर्म है, जिस के अंतर्गत 2 पैट्रोल पंप, सर्विस स्टेशन और एक बहुत बड़ी मैटल ढलाई की फैक्ट्री है, जिस में कई फर्नेस लगे हैं. अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू अपने पिता के साथ कारोबार संभालने में उन की मदद करता था. दलजीत कौर भी कभीकभार पति और बेटे की मदद के लिए पैट्रोल पंपों पर चली जाती थीं. तीनों बच्चे अभी पढ़ रहे थे. बड़ा पोता शानजीत सिंह एपीजे कालेज जालंधर का छात्र था. कुल मिला कर लूंबा परिवार सुखचैन से अपना जीवन निर्वाह कर रहा था.

23 फरवरी, 2017 की शाम करीब 4 बजे की बात है. दलजीत कौर अपने ड्राइंगरूम में परमजीत कौर उर्फ पम्मी और खुशवंत कौर उर्फ नीतू के साथ बैठी चाय पी रही थीं. खुशवंत कौर परमजीत कौर के पति के दोस्त बलजिंदर सिंह की पत्नी थी. दोनों के आपस में पारिवारिक संबंध थे. बलजिंदर की भी जालंधर के लक्ष्मी सिनेमा के पास मैटल ढलाई की फैक्ट्री थी.

अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू की शादी के बाद से परमजीत कौर और खुशवंत कौर के बीच गहरी दोस्ती हो गई थी. इसी कारण वह हर रोज शाम के समय उस से मिलने उस के घर आ जाया करती थी. पिछले कई दिनों से दलजीत कौर की कमर में दर्द हो रहा था. शायद उम्र का तकाजा था. वह रोज शाम के ठीक 4 बजे फिजियोथैरेपी करवाने के लिए डाक्टर के यहां जाती थीं.

पर उस दिन खुशवंत कौर के आ जाने पर उन्होंने डाक्टर के यहां जाना कैंसिल कर दिया था. तीनों बच्चे शाम 4 से 6 बजे तक ट्यूशन पढ़ने चले जाते थे. मतलब आम दिनों में 4 से 6 बजे तक यानी 2 घंटे पम्मी घर में अकेली होती थी. उस दिन पम्मी की बेटी ट्यूशन चली गई थी.

बेटा शान जब ट्यूशन पढ़ने जाने के लिए निकलने लगा तो पम्मी ने कहा, ‘‘बेटा शान, तुम्हारे पापा का फोन आया था. उन्होंने कहा है कि तुम अपने छोटे भाई के साथ जा कर अवतारनगर रोड पर स्थित कार की दुकान पर एजेंट से मिलो. वह आज तुम्हारे पसंद की जीप खरीदवाएंगे.’’

‘‘ठीक है मम्मी.’’ शान ने मां की बात सुन कर कहा और छोटे भाई मनजीत को ले कर कार से अवतारनगर की तरफ चला गया.  दरअसल शान कई दिनों से अपने लिए जीप खरीदवाने की जिद कर रहा था.

तीनों महिलाएं चाय की चुस्कियां लेते हुए आपस में बतिया रही थीं कि तभी डोरबेल बजी. घंटी बजते ही पम्मी ने चाय का प्याला टेबल पर रखा और दरवाजे पर जा कर दरवाजा खोला तो सामने 2 आदमी खड़े थे. बिना कुछ कहे ही उन्होंने पम्मी को भीतर की ओर धक्का दे कर दरवाजा बंद कर दिया.

इस से पहले कि पम्मी कुछ समझ पाती, उन दोनों में से एक ने अपनी कमर से पिस्तौल निकाली और पम्मी को निशाना बना कर एक के बाद एक 3 गोलियां चला दीं. पम्मी को तो चीखने का अवसर भी नहीं मिला और वह फर्श पर गिर गई. गोलियों की आवाज सुन कर दलजीत कौर ड्राइंगरूम से बाहर आईं. बहू की हालत देख कर वह चिल्लाईं, ‘‘ओए मार दित्ता जालमा.’’

उन के साथ ही खुशवंत कौर भी कमरे से बाहर आ गई थी. माजरा समझ दोनों हमलावरों पर झपट पड़ीं. उन की इस हरकत से हमलावर घबरा गए. खुशवंत कौर दोनों में से एक से गुत्थमगुत्था हो गई. दलजीत कौर दूसरे आदमी से भिड़ गईं, जिस के हाथ में पिस्तौल था.

पिस्तौल वाले हमलावर ने दलजीत कौर से खुद को छुड़ाने के लिए उन पर गोली चला दी. इस के बाद दूसरे आदमी ने खुशवंत कौर को काबू करने के लिए अपने हाथ में थामा पेचकस उस की गरदन में पूरी ताकत से घुसेड़ दिया. उसी समय पिस्तौल वाले ने उस पर भी गोली चला कर मामला खत्म कर दिया.

तीनों औरतों की हत्या कर दोनों हमलावरों ने चैन की सांस ली और ड्राइंगरूम से निकल कर लौबी में आ गए. लौबी में रखे फ्रिज के पीछे टंगी चाबियों में से उन्होंने एक चाबी उठाई और घर के पिछवाड़े आ कर कोठी के बैक साइड वाला दरवाजा खोल कर निकल गए. मात्र 6-7 मिनट में वे 3 हत्याएं कर के आराम से चले गए थे.

दूसरी ओर जीप देखने के बाद शाम सवा 5 बजे शंटू जब अपने दोनों बेटों के साथ कोठी पर आया तो मुख्य दरवाजा भीतर से बंद मिला. काफी खटखटाने के बाद भी जब अंदर से कोई आहट नहीं सुनाई दी तो किसी अनहोनी की आशंका से परेशान हो कर बापबेटों ने धक्के मार कर दरवाजा तोड़ दिया. इस के बाद सामने का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. शंटू चीखने लगे, ‘‘मार गए…मार गए… बीजी को मार गए.’’

बच्चे भी मदद के लिए उन के साथ चीखने लगे थे. चीखपुकार सुन कर पड़ोसी जमा हो गए. उन में खुशवंत कौर का बेटा अर्शदीप भी था. मां की लाश देख कर वह भी जोरजोर से रोने लगा. पड़ोसियों की मदद से तीनों को नजदीक के प्राइवेट अस्पताल ले गया. पौश कालोनी में दिनदहाड़े हुई 3 हत्याओं की खबर जंगल में लगी आग की तरह शहर भर में फैल गई. लोगों में दहशत भर गया.

कोई इसे आंतकवादी घटना बता रहा था तो कोई आपसी रंजिश. किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था. डा. अमनप्रीत सिंह ने मुआयना करने के बाद दलजीत कौर और खुशवंत कौर को मृत घोषित कर दिया. पुलिस केस था, इसलिए अस्पताल से भी पुलिस को सूचना दे दी गई.

परमजीत कौर की हालत नाजुक थी. उस के दिल की धड़कनें काफी धीमी थीं. उस की जान बचाने के लिए डाक्टरों ने उसे वेंटीलेटर पर रख दिया.

खबर मिलते ही थाना डिवीजन नंबर-4 के थानाप्रभारी प्रेम सिंह और थाना डिवीजन नंबर-6 के थानाप्रभारी गुरवचन सिंह दलबल सहित घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाजपतनगर इलाका पहले थाना डिवीजन नंबर-6 में था, पर बाद में उसे थाना डिवीजन नंबर-4 में शामिल कर दिया गया. घटनास्थल पर पहुंचने के बाद पुलिस को पता चला कि सब लोग अस्पताल गए हैं तो थानाप्रभारी ने कोठी पर 2 सिपाही तैनात कर इंसपेक्टर प्रेम सिंह के साथ अस्पताल पहुंच गए. डाक्टर परमजीत को बचाने की कोशिश कर रहे थे पर उस की हालत में सुधार नहीं हो रहा था. फिर रात 9 बजे के करीब उस ने दम तोड़ दिया.

बाप का इश्क बेटी को ले डूबा – भाग 3

7 सालों का समय कुछ कम नहीं होता. संतोष और अनीता के संबंधों की सारी जानकारी उस के परिवार वालों को हो चुकी थी. वे लोग अब उस पर शादी करने का दबाव बनाने लगे थे. अनीता भी अब और ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहती थी.

वह भी अपने और संतोष के प्यार को रिश्ते का नाम देने के लिए दबाव बनाए हुए थी. वह उस से शादी कर के अपना एक घर बनाना चाहती थी. इस से संतोष की परेशानी बढ़ गई थी.

संतोष शादीशुदा और एक बच्ची का बाप था. वह अनीता की वजह से अपने परिवार की शांति भंग नहीं करना चाहता था. लेकिन जब पानी संतोष के गले तक आ गया तो मजबूरन उसे अनीता के सामने अपना मुंह खोलना पड़ा. अनीता को एक अच्छे माहौल में ले जा कर उस ने अपने शादीशुदा होने की बात बता दी.

उस ने कहा कि उस की शादी गांव और जाति के रस्मोरिवाज से बचपन में ही हो गई थी और अब वह एक बच्ची का पिता भी है.

ऐसे में अगर वह दूसरी शादी करेगा तो उस की ब्याहता का क्या होगा. उस ने साफ कह दिया कि अब वह दूसरी शादी नहीं कर सकता. लेकिन वह चाहे तो उस के साथ जीवन भर रह सकती है. उसे किसी भी तरह की परेशानी नहीं होने देगा.

यह जान कर अनीता सन्न रह गई. उसे लगा कि उस के ऊपर कोई पहाड़ गिर पड़ा. उसे लगा कि मानो उस का अस्तित्व ही खत्म हो गया. कुछ समय के लिए तो वह एक मूर्ति जैसी बन गई, लेकिन जब होश आया तो वह पागल सी हो गई थी. उस दिन अनीता और संतोष के बीच काफी कहासुनी और लड़ाईझगड़ा हुआ था.

संतोष की इस बात से अनीता काफी आहत हुई थी. उस के दिल में संतोष के प्रति नफरत हो गई. जाहिर सी बात है कोई भी लड़की तलाकशुदा या विधवा हो कर रह सकती है, लेकिन रखैल बन कर रहना पसंद नहीं करेगी.

काफी सोचनेविचारने के बाद अनीता ने यह तय किया कि बच्चे और प्यार का गम क्या होता है, अब वह संतोष को समझाएगी. जिस तरह से उस ने उस के 2-2 बच्चों का खून किया था, उस का बदला वह उसी तरह से चुकाएगी. तब उसे यह एहसास होगा कि बच्चा चाहे गर्भ में हो या गर्भ से बाहर, उसे खोने में कितना दर्द होता है.

अनीता ने संतोष की बेटी अंजलि के प्रति एक खतरनाक योजना बना कर उस के घर और स्कूल का पता लगा लिया और उस की अच्छी तरह रेकी की. पहले उस की योजना अंजलि को स्कूल से उठाने की थी, लेकिन स्कूल की चाकचौबंद सुरक्षा और अकसर मां के साथ होने के कारण उस का प्लान सफल नहीं हो सका.

इस के बाद उस ने संतोष के घर के पास से ही अंजलि को उठा लिया था. अंजलि को उठाने के पहले वह उस जगह पर आ कर बैठ जाती थी, जहां अंजलि बच्चों के साथ खेला करती थी.

मौका देख कर वह अंजलि को अपने पास बुला कर टौफी और चौकलेट दिया करती थी. 2-4 दिनों में जब अंजलि उस के काफी करीब आ गई तो वह उसे अपनी मीठीमीठी बातों में बहला कर अपने साथ ले कर चली गई.

अंजलि को पहले वह लोकमान्य तिलक स्कूल तक पैदल ले कर आई. फिर आटोरिक्शा से नालासोपारा रेलवे स्टेशन ले गई. वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने अपने पास चाकू रख लिया था.

नालासोपारा स्टेशन से बोरीवली स्टेशन और फिर वहां से एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ कर वह गुजरात के नवसारी रेलवे स्टेशन पहुंची. वहां मौका देख कर वह अंजलि को बाथरूम में ले गई और उस 5 वर्षीय बच्ची का गला काट कर हत्या कर दी.

अपने इंतकाम का बदला लेने के बाद अनीता सुबह की गाड़ी से अपने घर लौट आई थी. वह निश्चिंत थी कि पुलिस उस के पास तक नहीं पहुंच सकेगी. लेकिन पुलिस उस तक पहुंच ही गई.

अनीता वाघेला से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 362 के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे तलोजा जेल भेज दिया गया.

अंजलि सरोज की हत्या की कहानी जब लोगों के सामने आई तो उस के परिवार वालों को तो क्या पूरे इलाके के लोगों को एक धक्का सा लगा. एक मासूम बच्ची अपने पिता के इश्क की भेंट चढ़ गई थी.

कथा लिखे जाने तक अनीता वाघेला जेल में बंद थी. आगे की जांच पीआई के.डी. कोल्हे कर रहे थे.

बेगम बनने की चाह में गवाया पति – भाग 3

अनवर को भला क्या ऐतराज हो सकता था, इसलिए वह उसी वक्त पिंकी के पास पहुंच गया. घर का दरवाजा बंद कर के उन्होंने 2 घंटे तक मौजमस्ती की. इस के बाद तो यह रोज का सिलसिला हो गया. कभी सुबह तो कभी शाम को तो कभी दोपहर में मौका मिलते ही पिंकी अनवर को फोन लगा कर घर आने का न्यौता दे देती थी. कभीकभी फोन कर के अनवर खुद उस के पास पहुंच जाता था.

कहानी 2 साल तक नियमित रूप से चलती रही. नतीजतन पहले मोहल्ले वालों को और फिर सुनील को पिंकी और अनवर के रिश्ते पर शक होने लगा. सुनील को जब यह लगने लगा कि पिंकी और अनवर के बीच में कुछ चल रहा है तो उस ने पिंकी से साफ कह दिया कि मेरी गैरमौजूदगी में अनवर को घर की चौखट के अंदर न बुलाए. अगर वह आए भी तो बाहर से ही बात कर उसे चलता कर दे.

सुनील के इस फरमान के बाद अनवर और पिंकी की मौजमस्ती पर ब्रेक लग गया. क्योंकि पिंकी को शक था कि उस ने अगर अनवर को कमरे में अंदर आने दिया तो इस की खबर सुनील तक जरूर पहुंच जाएगी. इसलिए कुछ दिनों तक दोनों फोन पर ही बातें कर के मन को समझाते रहे.

लेकिन ऐसा कब तक चलता. अंतत: अनवर ने ही एक रास्ता निकाला. उस ने पिंकी के मिलन के लिए एक जगह तय कर ली. फिर तो पति का डर छोड़ कर पिंकी अनवर के पास उस जगह जाने लगी.

लेकिन इस दौरान पिंकी और अनवर दोनों ही डरे हुए रहते थे. इसी के मद्देनजर अनवर ने एक दिन पिंकी को सलाह दी कि यदि वह किसी तरह सुनील से छुटकारा पा ले तो वह उसे अपनी बेगम बनाने को राजी है. इतना ही नहीं, उस ने यह भी वादा किया कि वह उस से शादी करने के लिए अपना धर्म तक बदलने को तैयार है. पिंकी अनवर की बातों में आ गई. जिस के बाद दोनों ने सुनील से छुटकारा पाने के लिए उस की हत्या करने की ठान ली.

इसी बीच करवाचौथ का त्यौहार पास आ गया. पिंकी इस बार करवाचौथ अनवर के साथ मनाना चाहती थी, इसलिए उस ने अनवर से कहा कि करवाचौथ से पहले वह सुनील को रास्ते से हटा दे. लेकिन दोनों को मौका नहीं मिल पाया तो पिंकी ने करवाचौथ की रात में सुनील की हत्या करने की योजना अनवर को समझा दी. पिंकी की योजना अनवर को सही लगी. योजनानुसार अनवर ने नींद की गोलियां ला कर पिंकी को दे दीं.

करवाचौथ की रात पोंछा सिंदूर…

करवाचौथ की रात पिंकी ने दुलहन की तरह शृंगार किया और पूजा के बाद सुनील को नींद की गोलियां मिला दूध पीने को दिया. सुनील को दूध पीने की आदत नहीं थी, सो उस ने मना किया तो पिंकी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हर करवाचौथ पर औरत की नई सुहागरात होती है, इसलिए कम से कम आज तो दूध पीने को मना मत करो.’’

जाहिर है पत्नी की ऐसी बात सुनील कैसे टालता. उस ने मुसकराते हुए एक ही बार में दूध का पूरा गिलास खाली कर दिया. यह देख कर पिंकी खुश हो गई और उसे बिस्तर पर लिटा कर बच्चों को सुलाने के बहाने दूसरे कमरे में चली गई. सुनील से उस ने कह दिया था कि बच्चों सुला कर आती है.

गोलियों के असर से सुनील कुछ ही देर में गहरी नींद में सो गया. यह देख कर पिंकी ने अनवर को फोन कर घर आने को कहा. अनवर ने सुनील की हत्या करने के बाद उस की लाश ठिकाने लगाने का भी प्लान बना लिया था, इसलिए योजना के अनुसार वह अपने ही घर के पास रहने वाले रफीक (परिवर्तित) नाम के नाबालिग लड़के को बुला कर पिंकी के यहां ले गया. पिंकी और अनवर ने गहरी नींद में सो रहे सुनील की गला दबा कर हत्या कर दी.

सुनील की हत्या करने के बाद अनवर को पिंकी के साथ मौजमस्ती करनी थी, इसलिए उस ने तब तक के लिए रफीक को दूसरे कमरे में भेज दिया. इस के बाद सुनील का शव पलंग से नीचे उतार कर पिंकी उसी पलंग पर अनवर को ले कर लेट गई.

लगभग घंटे भर बाद अनवर ने बिस्तर से उठ कर अपने कपड़े पहने और सुनील की लाश बोरे में भरी. फिर उस बोरे को वह रफीक की मदद से अपने खेत पर ले गया. जाने से पहले उस ने पिंकी को पूरा पाठ पढ़ा दिया कि पुलिस को क्या बोलना है. उस के घर का दरवाजा बाहर से बंद करता गया.

अनवर ने नारायणपुर के अपने खेत में पहले ही शव दफन करने के लिए गड्ढा खोद रखा था, इसलिए उस ने लाश को खेत पर ले जा कर दफन करने के बाद पिंकी को मोबाइल पर काम हो जाने की खबर दे दी.

यह खबर पा कर पिंकी अनवर की बेगम बनने के सपने देखते हुए गहरी नींद में सो गई. योजना अनुसार पिंकी ने दूसरे दिन सुबह होने पर पड़ोसियों को आवाज लगा कर अपना दरवाजा खुलवाने के बाद सुनील के रात में लापता हो जाने की बात बता दी.

लोगों के दिमाग से सुनील के गायब होने की बात उतर जाए, इसलिए वह देवास छोड़ कर अपने बच्चों के साथ मायके में जा कर रहने लगी थी. उस की योजना 4-6 महीने बाद देवास वापस आ कर अनवर की बेगम बन कर रहने की थी, लेकिन सिविल लाइंस टीआई की टीम ने उस का सपना पूरा होने से पहले ही उसे और उस के प्रेमी के साथ गिरफ्तार कर लिया.

पिंकी और उस के प्रेमी अनवर शाह से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. नाबालिग रफीक से पूछताछ कर उसे बाल न्यायालय में पेश कर बाल सुधारगृह भेजा गया.

वासना में बनी पतिहंता : पत्नी ही बनी कातिल – भाग 3

सुनीता से नजदीकियां बढ़ाने के लिए मनदीप रोज बेटी को स्कूल छोड़ने के लिए आने लगा. इधर सुनीता भी मनदीप पर पूरी तरह फिदा हो थी. आग दोनों तरफ बराबर लगी थी. इस का एक कारण यह था कि अपनी उम्र के 40वें पड़ाव पर पहुंचने के बाद और 3 युवा बच्चों की मां होने के बावजूद सुनीता के शरीर में गजब का आकर्षण था.

दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद पति सुनील जब घर लौटता तो खाना खाते ही सो जाता था. जबकि उस की बगल में लेटी सुनीता उस से कुछ और ही अपेक्षा करती थी. लेकिन सुनील उस की जरूरत को नहीं समझता था. उसे मनदीप जैसे ही किसी पुरुष की तलाश थी, जो उस की तमन्नाओं को पूरा कर सके.

यही हाल मनदीप का भी था. पत्नी से मनमुटाव होने के कारण वह उसे अपने पास फटकने नहीं देती थी, इसलिए जल्दी ही सुनीता और मनदीप में दोस्ती हो गई, जिसे नाजायज रिश्ते में बदलते देर नहीं लगी थी. पति और बच्चों को स्कूल भेजने के बाद सुनीता स्कूल जाने के बहाने घर से निकलती और मनदीप के साथ घूमतीफिरती. कई महीनों तक दोनों के बीच यह संबंध चलते रहे.

इसी बीच अचानक सुनील को सुनीता के बदले रंगढंग ने चौंका दिया. उस ने अपने बच्चों से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि स्कूल से लौटने के बाद मम्मी बनसंवर कर न जाने कहां जाती हैं और आप के काम से लौटने के कुछ देर पहले वापस लौट आती हैं. सुनील को तो पहले से ही शक था, उस ने सुनीता का पीछा किया और उसे मनदीप के साथ बातें करते पकड़ लिया. यह 2 मई, 2019 की बात है.

मनदीप की बात को ले कर सुनील का सुनीता से खूब झगड़ा हुआ और उस ने सुनीता का स्कूल जाना बंद करवा दिया. यहां तक कि उस ने उस का फोन भी उस से ले लिया.

बाद में सुनीता ने माफी मांग कर भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न करने की कसम खाई और स्कूल जाना शुरू कर दिया था. बात करने के लिए मनदीप ने उसे एक नया फोन और सिमकार्ड दे दिया था. वे दोनों फोन पर बातें करते, मिल भी लेते थे. पर अब वे पहले जैसे आजाद नहीं थे.

इस तरह चोरीछिपे मिलने से सुनीता परेशान हो गई. एक दिन सुनीता ने अपने मन की पीड़ा जाहिर करते हुए मनदीप से कहा, ‘‘मनदीप, तुम कैसे मर्द हो, जो एक मरियल से आदमी को भी ठिकाने नहीं लगा सकते. तुम भी जानते हो कि सुनील के जीते जी हमारा मिलना मुश्किल हो गया है.’’

मनदीप ने उसे भरोसा दिया कि काम हो जाएगा. फिर दोनों ने मिल कर सुनील की हत्या की योजना बनाई. अब मनदीप के सामने समस्या यह थी कि वह यह काम अकेले नहीं कर सकता था.

नवंबर, 2019 में मनदीप जब जालसाजी के केस में जेल गया था, तब उस की मुलाकात जेल में बंद पंकज राजपूत से हुई थी. पंकज लुधियाना के थाना टिब्बा में दर्ज दफा 307 के केस में बंद था.

दोनों की जेल में मुलाकात हुई और दोस्ती हो गई थी. कुछ दिन बाद मनदीप की जमानत हो गई और वह जेल से बाहर आ गया. बाहर आने के बाद वह बीचबीच में पंकज से जेल में मुलाकात करने जाता रहता था.

सुनील की हत्या की योजना बनाने के बाद उस ने जेल जा कर पंकज को अपनी समस्या के बारे में बताया. पंकज ने उसे अपने 2 साथियों रमन और प्रकाश के बारे में बताया.

उस ने मनदीप के फोन से रमन को फोन कर मनदीप का साथ देने को कह दिया. रमन ने इस काम के लिए 10 हजार रुपए मांगे, जो मनदीप ने दे दिए थे. रमन और प्रकाश ने अपने साथ सन्नी को भी शामिल कर लिया था.

सुनीता ने किराए के हत्यारों को सुनील का पूरा रुटीन बता दिया कि वह कितने बजे काम पर जाता है, कितने बजे किस रास्ते से घर लौटता है, वगैरह.

इन बदमाशों ने तय किया कि सुनील को घर लौटते समय रास्ते में कहीं घेर लिया जाएगा. सुनील की हत्या के लिए 20 मई, 2019 का दिन चुना गया था पर टाइमिंग गलत होने से उस दिन सुनील बच गया.

अगले दिन 21 मई को रात 8 बजे मनदीप सन्नी को अपने साथ ले कर बीआरएस नगर से अपनी जेन कार द्वारा एक धार्मिक स्थल पर पहुंचा. रमन और प्रकाश भी बाइक से वहां पहुंच गए थे. इस के बाद चारों सुनील के मालिक की कोठी के पास मंडराने लगे.

सुनील अपने मालिक की कोठी पर फैक्ट्री की चाबियां देने के बाद अपनी इलैक्ट्रिक साइकिल से घर के निकला तो चीमा चौक के पास चारों ने उसे घेर कर जेन कार में डाल लिया. उस की साइकिल सन्नी ले कर चला गया जो उस ने लेयर वैली में फेंक दी थी.

सुनील को कार में डालने के बाद मनदीप ने उस के सिर पर लोहे की रौड से वार कर उसे घायल कर दिया. फिर सब ने मिल कर उस की खूब पिटाई की. इस के बाद साइकिल की चेन उस के गले में डाल कर उस का गला घोंट दिया.

सुनील की हत्या करने के बाद वे उस की लाश को सिटी सेंटर ले आए और सड़क किनारे सुनसान जगह पर फेंक कर रात 11 बजे तक सड़कों पर घूमते रहे. इस के बाद सभी अपनेअपने घर चले गए. शाम साढ़े 7 बजे से रात के 11 बजे तक सुनीता लगातार फोन द्वारा मनदीप के संपर्क में थी. वह उस से पलपल की खबर ले रही थी.

रिमांड अवधि के दौरान पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त चेन भी बरामद कर ली, लेकिन कथा लिखे जाने तक मृतक की साइकिल बरामद नहीं हो सकी.

रिमांड खत्म होने के बाद पुलिस ने सुनील की हत्या के अपराध में उस की पत्नी सुनीता, सुनीता के प्रेमी मनदीप उर्फ दीपा, रमन, प्रकाश और सन्नी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बाप का इश्क बेटी को ले डूबा – भाग 2

जरूरी काररवाई पूरी कर के मुंबई पुलिस बच्ची के शव को अपने कब्जे में ले कर मुंबई लौट आई और उसे पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया. इधर जब अंजलि की हत्या की बात उस बिल्डिंग और आसपड़ोस के रहने वालों को पता लगी तो लोगों में आक्रोश फूट पड़ा.

देखते ही देखते पुलिस स्टेशन के सामने हजारों की भीड़ जमा हो गई. भीड़ पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगी. भीड़ तब तक शांत नहीं हुई, जब तक एसएसपी राजतिलक रोशन, एसपी मंजुनाथ शिंगे और एएसपी जयंत वंजवले ने पुलिस थाने आ कर 24 घंटे के अंदर हत्यारे को गिरफ्तार करने का आश्वासन नहीं दिया.

मामले को तूल पकड़ते देख पुलिस के बड़े अधिकारियों की आंखों से नींद गायब हो गई थी. उन्होंने जांच टीम को शीघ्र से शीघ्र अंजलि के हत्यारों को गिरफ्तार करने का निर्देश दिए. पुलिस टीम ने अंजलि के परिवार और आसपास के लोगों से गहराई से पूछताछ करने के अलावा इलाके में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाली. लोकमान्य तिलक स्कूल के एक सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में अंजलि एक महिला के साथ नालासोपारा स्टेशन की तरफ जाते हुए दिखाई दी.

वह महिला कौन थी और कहां से आई थी, यह जानने के लिए पुलिस टीम ने उस का स्केच बनवा कर जब मामले की जांच की तो पता चला कि वह महिला कई बार अंजलि के स्कूल और उस के घर साईं अपर्णा बिल्डिंग के आसपास संदिग्ध अवस्था में दिखाई दी थी. जिस दिन अंजलि गायब हुई थी, उस दिन भी वह बिल्डिंग परिसर में आई थी.

पुलिस जांच का चक्र तेजी से घूम रहा था. उस महिला का स्केच पूरे शहर में चिपकवाने के अलावा जनपद के सभी पुलिस थानों को भी भेज दिया गया. इस के अलावा स्केच अंजलि के पिता संतोष सरोज को भी दिखाया गया.

स्केच देखते ही संतोष ने अपना सिर पीट लिया. उस ने कहा कि यह तो उस की प्रेमिका है. पुलिस ने संतोष को सीसीटीवी कैमरे में अंजलि के साथ जाने वाली उस महिला की फुटेज दिखाई तो संतोष ने कहा कि यह उस की प्रेमिका अनीता वाघेला है और यह नालासोपारा (पूर्व) के नगीनदास पाड़ा इलाके में रहती है.

बिना देर किए पुलिस टीम अनीता के घर पहुंच गई. वह घर पर ही मिल गई. पुलिस उसे हिरासत में ले कर थाने लौट आई. पुलिस ने जब उस से अंजलि की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने आसानी से अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. अनीता से पूछताछ के बाद अंजलि की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह प्यार में चोट खाई नागिन के प्रतिशोध वाली निकली—

22 साल की अनीता का रंग हालांकि बहुत साफ नहीं था, लेकिन कुदरत ने उसे कुछ इस तरह गढ़ा था कि जो भी उसे देखता, देखता ही रह जाता था. सांवले सौंदर्य की मालकिन अनीता के जिस्म की कसावट और फिगर देख मनचले गहरी सांसें लेते हुए फिकरे कसते थे. इस के अलावा अनीता खुले विचारों वाली महत्त्वाकांक्षी युवती थी.

आमतौर पर अनीता जैसी महत्त्वाकांक्षी युवतियां जो सपने देखती हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर या कोई भी जोखिम उठा कर पूरा करने की कोशिश करती हैं.

यह अलग बात है कि इस के लिए उन्हें जो कीमत चुकानी पड़ती है, वह कभीकभी भारी पड़ जाती है. तब उन के पास हाथ मलने और अपनी नादानियों पर पछताने के सिवा कुछ नहीं रह जाता. यही हाल अनीता का हुआ था. वह आंख मूंद कर संतोष सरोज पर भरोसा कर के प्यार करने की भूल कर बैठी थी.

मूलरूप से गुजरात की रहने वाली अनीता वाघेला अपने मातापिता और भाईबहनों के साथ नालासोपारा (पूर्व) के नगीनदास पाड़ा इलाके में रहती थी. वह अपने और परिवार के लिए कैटरिंग का काम किया करती थी. उस की और संतोष सरोज की मुलाकात करीब 7 साल पहले नगीनदास पाड़ा के आटो स्टैंड पर हुई थी.

उस दिन वह अपने काम पर जाने के लिए काफी लेट हो रही थी. तब वह अपनी मंजिल तक संतोष के आटोरिक्शा से पहुंची थी. अनीता आटो से उतर कर चली तो गई लेकिन उस की शोख चंचल निगाहें, मुसकराता चेहरा संतोष के दिमाग में ही घूमता रह गया. उस की पहली ही झलक में संतोष अपना होशोहवास खो बैठा था, यह जानते हुए भी कि वह एक शादीशुदा और एक बच्ची का बाप है.

लेकिन वह यह सब भूल कर अनीता का सामीप्य पाना चाहता था. इस के लिए वह अकसर नगीनदास पाड़ा के आटो स्टैंड पर अनीता के आने का इंतजार करता था. वह दिख जाती तो वह मुसकराते हुए उस से अपने आटो में चलने की बात कहता. अनीता को तो किसी न किसी आटो से जाना ही था, लिहाजा वह संतोष के आग्रह पर उस के ही आटो में बैठ जाती.

2-4 बार संतोष के आटो से आनेजाने के बाद अनीता और संतोष के बीच बातों का सिलसिला शुरू हो गया. स्वयं को अविवाहित बता कर उस ने अनीता को अपने प्रभाव में ले लिया. बातों और मिलने का सिलसिला शुरू हो गया तो दोनों एकदूसरे के करीब आ गए. जब भी अनीता को संतोष के साथ कहीं घूमने के लिए जाना होता तो वह संतोष को बेझिझक फोन कर बुला लेती. इस तरह दोनों में गहरी दोस्ती हो गई.

दोस्ती का दायरा बढ़ा तो अनीता के मन में संतोष के प्रति प्यार का अंकुर फूट पड़ा. वह सरोज को अपने मनमंदिर में बैठा कर गृहस्थ जीवन के सुंदर सपने देखने लगी. जिस का संतोष ने भरपूर फायदा उठाया.

उस ने अनीता को शादी का लालच दे कर उस का अपनी पत्नी की तरह इस्तेमाल किया. 7 सालों में अनीता 2 बार गर्भवती भी हुई. लेकिन संतोष ने अपनी कोई न कोई मजबूरी बता कर उस का गर्भपात करवा दिया था.

वासना में बनी पतिहंता : पत्नी ही बनी कातिल – भाग 2

एएसआई सुनील कुमार ने मृतक की फैक्ट्री में उस के साथ काम करने वालों के अलावा उस के मालिक प्रवीण गर्ग से भी पूछताछ की. यहां तक कि मृतक के पड़ोसियों से भी मृतक और उस के परिवार के बारे में जानकारी हासिल की गई, पर कोई क्लू हाथ नहीं लगा.

सब का यही कहना था कि सुनील सीधासादा शरीफ इंसान था. उस की न तो किसी से कोई दुश्मनी थी और न कोई लड़ाईझगड़ा. अपने घर से काम पर जाना और वापस घर लौट कर अपने बच्चों में मग्न रहना ही दिनचर्या थी.

एएसआई सुनील की समझ में एक बात नहीं आ रही थी कि मृतक की लाश इतनी दूर सिटी सेंटर के पास कैसे पहुंची, जबकि उस के घर आने का रूट चीमा चौक की ओर से था. उस की इलैक्ट्रिक साइकिल भी नहीं मिली. महज साइकिल के लिए कोई किसी की हत्या करेगा, यह बात किसी को हजम नहीं हो रही थी.

बहरहाल, अगले दिन मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट में बताया गया कि मृतक के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था और उस का गला चेन जैसी किसी चीज से घोटा गया था. मृतक के शरीर पर चोट के भी निशान थे. इस से यही लग रहा था कि हत्या से पहले मृतक की खूब पिटाई की गई थी. उस की हत्या का कारण दम घुटना बताया गया.

पोस्टमार्टम के बाद लाश मृतक के घर वालों के हवाले कर दी गई. सुनील की हत्या हुए एक सप्ताह बीत चुका था. अभी तक पुलिस के हाथ कोई ठोस सबूत नहीं लगा था. मृतक की साइकिल का भी पता नहीं चल पा रहा था.

एएसआई सुनील कुमार ने एक बार फिर इस केस पर बड़ी बारीकी से गौर किया. उन्होंने मृतक की पत्नी, भाई और अन्य लोगों के बयानों को ध्यान से पढ़ा. उन्हें पत्नी सुनीता के बयानों में झोल नजर आया तो उन्होंने उस के फोन की कालडिटेल्स निकलवा कर चैक कीं.

सुनीता की काल डिटेल्स में 2 बातें सामने आईं. एक तो उस ने पुलिस को यह झूठा बयान दिया था कि पति ने उसे 8 बजे फोन कर कहा था कि वह घर आ रहा है, खाना तैयार रखना.

लेकिन कालडिटेल्स से पता चला कि मृतक ने नहीं बल्कि खुद सुनीता ने उसे सवा 8 बजे और साढ़े 8 बजे फोन किए थे. दूसरी बात यह कि सुनीता की कालडिटेल्स में एक ऐसा नंबर था, जिस पर सुनीता की दिन में कई बार घंटों तक बातें होती थीं. घटना वाली रात 21 मई को भी मृतक को फोन करने के अलावा सुनीता की रात साढ़े 7 बजे से ले कर रात 11 बजे तक लगातार बातें हुई थीं.

यह फोन नंबर किस का था, यह जानने के लिए एएसआई सुनील कुमार ने मृतक के भाई और बेटे से जब पूछा तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की. बहरहाल, एएसआई सुनील कुमार ने 2 महिला सिपाहियों को सादे लिबास में सुनीता पर नजर रखने के लिए लगा दिया. साथ ही मुखबिरों को सुनीता की जन्मकुंडली पता लगाने के लिए कहा. इस के अलावा उन्होंने उस फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह नंबर आई ब्लौक निवासी मनदीप सिंह उर्फ दीपा का है.

मनदीप पेशे से आटो चालक था. सन 2018 में वह जालसाजी के केस में जेल भी जा चुका था. मनदीप शादीशुदा था और उस की 3 साल की एक बेटी भी थी. हालांकि उस की शादी 4 साल पहले ही हुई थी, लेकिन उस की पत्नी से नहीं बनती थी. पत्नी ने उस के खिलाफ वूमन सेल में केस दायर कर रखा था.

सुनीता पर नजर रखने वाली महिला और मुखबिरों ने यह जानकारी दी कि सुनीता और मनदीप के बीच नाजायज संबंध हैं. इस बीच फोरैंसिक लैब भेजा गया मृतक का फोन ठीक हो कर आ गया, जिस ने इस हत्याकांड को पूरी तरह बेनकाब कर दिया.

एएसआई सुनील कुमार ने उसी दिन सुनीता को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो वह अपने आप को निर्दोष बताते हुए पुलिस को गुमराह करने के लिए तरहतरह की कहानियां सुनाने लगी. जब उसे महिला हवलदार सुरजीत कौर के हवाले किया गया तो उस ने पूरा सच उगल दिया.

सुनीता की निशानदेही पर उसी दिन 3 जून को 30 वर्षीय मनदीप सिंह उर्फ दीपा, 18 वर्षीय रमन राजपूत, 23 वर्षीय सन्नी कुमार और 21 वर्षीय प्रकाश को भाई रणधीर सिंह चौक से जेन कार सहित गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में सभी ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उन्होंने सुनीता और मनदीप के कहने पर सुनील की हत्या की थी.

पांचों अभियुक्तों को उसी दिन अदालत में पेश कर 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में सुनील हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह पति और जवान बच्चों के रहते परपुरुष की बांहों में देहसुख तलाशने वाली एक औरत के मूर्खतापूर्ण कारनामे का नतीजा थी.

सुनील जब धागा फैक्ट्री में अपनी नौकरी पर चला जाता था तो सुनीता घर पर अकेली रह जाती थी. इसी के मद्देनजर उस ने पास ही स्थित प्ले वे स्कूल में चपरासी की नौकरी कर ली. पतिपत्नी के कमाने से घर ठीक से चलने लगा.

इसी प्ले वे स्कूल में मनदीप उर्फ दीपा की बेटी भी पढ़ती थी. पहले मनदीप की पत्नी अपनी बेटी को स्कूल छोड़ने और लेने आया करती थी, पर एक बार मनदीप अपनी बेटी को स्कूल छोड़ने आया तब उस की मुलाकात सुनीता से हुई.

सुनीता को देखते ही वह उस का दीवाना हो गया. हालांकि सुनीता उस से उम्र में 10-11 साल बड़ी थी, पर उस में ऐसी कशिश थी, जो मनदीप के मन भा गई. यह बात करीब 9 महीने पहले की है.

बेगम बनने की चाह में गवाया पति – भाग 2

पुलिस ने उसी समय अनवर शाह को भी उस ने घर से उठा लिया. चूंकि पिंकी पहले ही पूरी बात बता चुकी थी, इसलिए अनवर ने भी बिना किसी टालमटोल के अपना अपराध स्वीकार करते हुए पास के गांव नारायणपुर स्थित अपने खेत में दफन सुनील की लाश बरामद करवा दी.

पुलिस ने अनवर और पिंकी से विस्तार से पूछताछ की तो सुनील की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

मध्य प्रदेश के भैंसोड़ा गांव की रहने वाली पिंकी बचपन से ही काफी खूबसूरत और चंचल स्वभाव की थी. उस का काम दिन भर गांव की गलियों में धमाचौकड़ी मचाना था. बताते हैं कि इस दौरान किशोरावस्था में ही गांव के कुछ युवकों ने उस के चंचल स्वभाव का फायदा उठा कर उस के साथ यौन संबंध बनाने शुरू कर दिए थे. पिंकी को भी यह सब अच्छा लगता था. इसी वजह से उस के मांबाप ने काफी कम उम्र में ही उस की शादी बामनखेड़ा में रहने वाले सुनील कुमार के संग कर दी थी.

सुनील सीधा सच्चा युवक था. पत्नी को वह जितना प्यार करता था, उतना ही अपने मातापिता का सम्मान भी करता था. यह बात पिंकी को अच्छी नहीं लगती थी. वह सासससुर से दूर रहना चाहती थी, इसलिए सुनील पर गांव छोड़ कर शहर में रहने के लिए दबाव बनाने लगी. जिस के चलते करीब 10 साल पहले सुनील देवास में आ कर विजय रोड स्थित एक दुकान पर नौकरी करने लगा.

धीरेधीरे पैसे जोड़ कर उस ने विशाल नगर में एक मकान भी बनवा लिया. पिंकी अब तक 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. उम्र भी 30 के आसपास पहुंच गई थी. लेकिन उस की सुंदरता में वह कसक अभी बाकी थी जो किसी को भी अपना दीवाना बनाने की कूवत रखती थी.

विशाल नगर में पिंकी के पड़ोस में अनवर शाह रहता था. अनवर खेती के अलावा ट्रैक्टर चलाने का काम करता था. कोई 2 साल पहले एक रोज उस की नजर सुबहसुबह धूप में बैठ कर बाल सुखाती पिंकी पर पड़ी तो वह उस के हुस्न पर फिदा हो गया.

अनवर औरतों का पुराना खिलाड़ी था. अपने खेत में काम करने वाली कई महिलाओं के साथ उस के यौनसंबंध थे. जिस दिन उस ने पिंकी को देखा, उसी दिन से उसे पाने की कोशिश करने लगा. इस के लिए उस ने सब से पहले सुनील से दोस्ती बढ़ाई और इस बहाने उस के घर आनेजाने लगा.

यही नहीं, वह जब भी सुनील के घर आता, उस के बच्चों के लिए खानेपीने की चीजें जरूर ले जाता. इस का नतीजा यह निकला कि कुछ समय बाद वह बच्चों को टौफी, चौकलेट देने के बहाने ऐसे समय पर भी सुनील के घर आने लगा, जब पिंकी घर पर अकेली होती थी.

अनवर था औरतों का शिकारी……………..

पिंकी के साथ भाभी का रिश्ता तो वह पहले ही बना चुका था, सो कभीकभी 2-4 मिनट रुक कर उस से बात भी करने लगा. अनवर जानता था कि कहानी 2-4 मिनट से ही शुरू हो कर पूरी रात तक पहुंचती है. इसलिए इस दौरान मौका मिलने पर वह पिंकी की सुंदरता की तारीफ करने से भी पीछे नहीं रहता था.

इतना ही नहीं, कभीकभार पिंकी की गोद से उस का बच्चा अपनी गोद में लेने के बहाने वह उस के नाजुक अंगों को छूने की भी कोशिश करता था. इस से पिंकी को जल्द ही अनवर के मन की बात समझ में आ गई.

इस के बाद उस के दिमाग में अनवर की चाहत लावा बन कर फूटने लगी. इसलिए उस ने भी अनवर के लिए अपने मन की लगाम को ढील देनी शुरू कर दी. इस से अनवर समझ गया कि मछली दाना निगल चुकी है.

2 साल पहले वह ईद के दिन जानबूझ कर ऐसे समय में पिंकी के घर गया, जब सुनील घर पर नहीं था. अनवर को देख कर पिंकी ने मुसकराते हुए उसे ईद की बधाई दी.

‘‘अपनी मुबारकबाद अपने पास ही रखिए, मुझे नहीं चाहिए.’’ अनवर ने गुस्सा होने का नाटक करते हुए कहा. ‘‘क्यों, मेरी मुबारकबाद में ऐसा क्या खोट है जो तुम्हें नहीं चाहिए?’’ पिंकी ने पूछा.

‘‘अरे, मुबारकबाद देनी ही है तो गले मिल कर दो. मालूम है आज सुबह से मैं ने किसी को मुबारकबाद नहीं दी. छिप कर घर में बैठा था कि सब से पहले आप से ही मुबारकबाद लूंगा. इसलिए मुबारकबाद देनी है तो गले मिल कर दो.’’

‘‘अच्छा बाबा, अंदर आ जाओ या बाहर दुनिया के सामने गले लगूंगी.’’ कहते हुए पिंकी उसे अपने साथ अंदर ले आई. फिर गहरी सांस लेते हुए उस के गले से लिपट गई.

अनवर को इसी मौके का इंतजार था. इस के बाद वह समझ गया कि पिंकी पूरी तरह उस के जाल में फंस चुकी है. इसलिए उस ने पिंकी को तभी अपनी बांहों से दूर किया, जब उस ने अगले दिन दोपहर में मिल कर उस के साथ एकांत में कुछ पल बिताने का वादा किया.

पिंकी की हां सुनते ही अनवर ने जेब से नया चमचमाता मोबाइल फोन निकाल कर उस के हाथ में देते हुए कहा, ‘‘ये लो दीवाने का ईद का पहला तोहफा. जब भी मौका मले मुझे फोन लगा दिया करो.’’

पिंकी ने उस के हाथ से मोबाइल ले कर चुपचाप छिपा कर रख दिया. ताकि उस पर सुनील की नजर न पड़े. पूरी रात पिंकी और अनवर ने अपनेअपने घरों में बेचैनी से काटी दूसरे दिन सुबह होते ही जब सुनील दुकान पर जाने के लिए घर से निकला, पिंकी ने नए मोबाइल से अनवर को फोन लगा कर कह दिया कि वह दोपहर होने का इंतजार नहीं कर सकती, इसलिए वह अभी घर आ जाए.

बाप का इश्क बेटी को ले डूबा – भाग 1

उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के रहने वाले भालचंद्र सरोज अपने परिवार के साथ महानगर मुंबई के तालुका वसई के उपनगर नालासोपारा की साईं अपर्णा बिल्डिंग में लगभग 30 सालों से रह रहे थे. अपनी रोजीरोटी के लिए उन्होंने उसी बिल्डिंग के परिसर में किराने की दुकान खोल ली थी.

परिवार में उन की पत्नी के अलावा एक बेटा संतोष सरोज था, जिस की शादी उन्होंने मालती नाम की लड़की से कर दी थी. संतोष की एक बेटी थी अंजलि. भालचंद्र सरोज का एक छोटा सा परिवार था, उन का जीवन हंसीखुशी के साथ व्यतीत हो रहा था. संतोष 10वीं जमात से आगे नहीं पढ़ सका था, इसलिए भालचंद्र ने उसे एक आटोरिक्शा खरीदवा दिया था. किराने की दुकान और आटो से जो कमाई होती थी, उस से उन की घरगृहस्थी आराम से चल रही थी.

अंजलि अपने मातापिता के अलावा दादादादी की भी लाडली थी. संतोष भले ही खुद नहीं पढ़लिख सका था, लेकिन बेटी को उच्चशिक्षा दिलाना चाहता था. इसीलिए उस ने अंजलि का दाखिला जानेमाने लोकमान्य तिलक इंगलिश स्कूल में करवा दिया था. परिवार में सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. इसी दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिस का दुख यह परिवार जिंदगी भर नहीं भुला सकेगा.

बात 24 मार्च, 2018 की है. संतोष सरोज की 5 वर्षीय बेटी अंजलि हमेशा की तरह उस शाम 7 बजे बच्चों के साथ खेलने के लिए बिल्डिंग से नीचे आई तो फिर वह वापस नहीं लौटी. वह बच्चों के साथ कुछ देर तक तो अपने दादा भालचंद्र सरोज की दुकान के सामने खेलती रही. फिर वहां से खेलतेखेलते कहां गायब हो गई, किसी को पता नहीं चला.

जब वह 8 बजे तक वापस घर नहीं आई तो उस की मां मालती को उस की चिंता हुई. जिन बच्चों के साथ वह खेलने गई थी, मालती ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की. उसी दौरान संतोष घर लौटा तो मालती ने बेटी के गुम हो जाने की बात पति को बताते हुए उस का पता लगाने के लिए कहा.

संतोष बिल्डिंग से उतरने के बाद अंजलि को इधरउधर ढूंढने लगा. वहीं पर उस के पिता की दुकान थी. वह पिता की दुकान पर पहुंचा और उन से अंजलि के बारे में पूछा. पोती के गायब होने की बात भालचंद्र को थोड़ी अजीब लगी. उन्होंने बताया कि कुछ देर पहले तक तो वह यहीं पर बच्चों के साथ खेल रही थी. इतनी देर में कहां चली गई.

उन्हें भी पोती की चिंता होने लगी. वह भी दुकान बंद कर के बेटे के साथ उसे ढूंढने के लिए निकल गए. संभावित जगहों पर तलाशने के बाद भी जब वह नहीं मिली तो उन की चिंता और बढ़ गई.

अंजलि के गायब होने की बात जब पड़ोस के लोगों को पता चली तो वे भी उसे खोजने लगे. वहां आसपास खुले गटर और नालों को देखने के बाद भी अंजलि का कहीं पता नहीं चला. बेटी की चिंता में मां मालती की घबराहट बढ़ती जा रही थी. चैत्र नवरात्रि होने की वजह से लोग यह भी आशंका व्यक्त कर रहे थे कि कहीं उसे तंत्रमंत्र की क्रियाएं करने वालों ने तो गायब नहीं कर दिया.

सभी लोग अंजलि की खोजबीन कर के थक गए तो उन्होंने पुलिस की मदद लेने का फैसला किया. लिहाजा वे रात करीब 11 बजे तुलीज पुलिस थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी किशोर खैरनार से मिल कर उन लोगों ने उन्हें सारी बातें बताईं और अंजलि की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. अंजलि का सारा विवरण दे कर उन्होंने उस का पता लगाने का अनुरोध किया. थानाप्रभारी ने अंजलि का पता लगाने का आश्वासन दे कर उन्हें घर भेज दिया.

थाने से घर लौटे सरोज परिवार का मन अशांत था. उन का दिल अपनी मासूम बच्ची को देखने के लिए तड़प रहा था. वह रात उन के लिए किसी कालरात्रि से कम नहीं थी. सुबह होते ही संतोष सरोज का परिवार फिर से अंजलि की खोज में निकल गया. उन्होंने उस की गुमशुदगी के पैंफ्लेट छपवा कर रेलवे स्टेशनों के अलावा बसस्टैंड और सार्वजनिक जगहों पर लगवा दिए.

उधर थानाप्रभारी किशोर खैरनार ने अंजलि की गुमशुदगी की जांच सहायक पीआई के.डी. कोल्हे को सौंप दी. के.डी. कोल्हे ने जब मामले पर गहराई से विचार किया, तो उन्हें लगा कि या तो बच्ची का फिरौती के लिए अपहरण किया गया है या फिर उसे किसी दुश्मनी या तंत्रमंत्र क्रिया के लिए उठा लिया गया है.

उन्होंने सरोज परिवार से भी कह दिया कि यदि किसी का फिरौती मांगने के संबंध में फोन आए तो वह उस से प्यार से बात करें और इस की जानकारी पुलिस को जरूर दे दें.

जांच के लिए पीआई के.डी. कोल्हे ने पुलिस की 6 टीमें तैयार कीं, जिस में उन्होंने एपीआई राकेश खासरकर, नितिन विचारे, शिवाजी पाटिल, एसआई भरत सांलुके, हैडकांस्टेबल सुरेश शिंदे, कांस्टेबल भास्कर कोठारी, महेश चह्वाण आदि को शामिल किया. सभी टीमें अलगअलग तरीके से मामले की जांच में जुट गईं.

पुलिस ने अंजलि के फोटो सहित गुमशुदगी का संदेश अनेक वाट्सऐप गु्रप में भेजा और उसे अन्य लोगों को भी भेजने का अनुरोध किया. पीआई के.डी. कोल्हे दूसरे दिन अपनी जांच की कोई और रूपरेखा तैयार करते, इस के पहले ही उन्हें स्तब्ध कर देने वाली एक खबर मिली.

खबर गुजरात के नवसारी रेलवे पुलिस की तरफ से आई थी. रेलवे पुलिस ने मुंबई पुलिस को बताया कि जिस बच्ची की उन्हें तलाश है, वह बच्ची मृत अवस्था में नवसारी रेलवे स्टेशन के बाथरूम में पड़ी मिली है. किसी ने गला काट कर उस की हत्या की है.

सूचना मिलते ही पुलिस की एक टीम अंजलि के परिवार वालों को ले कर तुरंत नवसारी रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हो गई. नवसारी रेलवे पुलिस ने जब संतोष सरोज और उस के परिवार वालों को बच्ची की लाश दिखाई तो वे सभी दहाड़ मार कर रोने लगे, क्योंकि वह लाश अंजलि की ही थी.