Kanpur crime : देवर को मोहरा बनाकर कराया बड़ी बहन का मर्डर

Kanpur crime : कभीकभी इंसान इश्क में इतना अंधा हो जाता है कि वह अच्छेबुरे का फर्क भी नहीं समझता. बबीता ने बड़ी बहन बबली के सुहाग पर डाका डाल कर उसे अपने कब्जे में कर लिया था. इस का अंजाम इतना खतरनाक निकला कि…   

11 सितंबर, 2018 की सुबह करीब 8 बजे कानपुर शहर के थाना कैंट के थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी थाने में पहुंचे ही थे कि उसी समय एक व्यक्ति बदहवास हालत में उन के पास पहुंचा. उस ने थानाप्रभारी को सैल्यूट किया फिर बताया, ‘‘सर, मेरा नाम दिलीप कुमार है. मैं सिपाही पद पर पुलिस लाइन में तैनात हूं और कैंट थाने के पुलिस आवास ब्लौक 3, कालोनी नंबर 29 में रहता हूं. बीती रात मेरी दूसरी पत्नी बबीता ने पंखे से फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. आप को सूचना देने थाने आया हूं.’’

चूंकि विभागीय मामला था. अत: थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी ने दिलीप की सूचना से अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अवगत कराया फिर सहयोगियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस टीम जब दिलीप के आवास पर पहुंची तो बबीता का शव पलंग पर पड़ा था. उस की उम्र करीब 23 साल थी. उस के गले में खरोंच का निशान था. वहां एक दुपट्टा भी पड़ा था. शायद उस ने दुपट्टे से फांसी का फंदा बनाया था. थानाप्रभारी अभी जांच कर ही रहे थे कि एसएसपी अनंत देव, एसपी राजेश कुमार यादव तथा सीओ (कैंट) अजीत प्रताप सिंह फोरैंसिक टीम के साथ वहां गए. पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर सिपाही दिलीप कुमार उस की पत्नी बबली से पूछताछ की.

 दिलीप ने बताया कि उस की ब्याहता पत्नी बबली है. बाद में उस ने साली बबीता से दूसरा ब्याह रचा लिया था. दोनों पत्नियां साथ रहती थीं. बीती रात बबीता ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली जबकि बबली ने बताया कि बबीता को मिरगी का दौरा पड़ता था. वह बीमार रहती थी, जिस से परेशान हो कर उस ने आत्महत्या कर ली. पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ के बाद मृतका के परिवार वालों को भी सूचना भिजवा दी. फोरैंसिक टीम ने जांच की तो पंखे, छत के कुंडे रौड पर धूल लगी थी. अगर पंखे से लटक कर बबीता ने जान दी होती तो धूल हटनी चाहिए थी. मौके से बरामद दुपट्टे पर भी किसी तरह की धूल नहीं लगी थी

गले पर मिला निशान भी फांसी के फंदे जैसा नहीं था. टीम को यह मामला आत्महत्या जैसा नहीं लगा. फोरैंसिक टीम ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अपने शक से अवगत कराया और शव का पोस्टमार्टम डाक्टरों के पैनल से कराने का अनुरोध किया. इस के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भिजवा दी. एसएसपी अनंत देव ने तब मृतका बबीता के शव का पोस्टमार्टम डाक्टरों के पैनल से कराने को कहा. डाक्टरों के पैनल ने बबीता का पोस्टमार्टम किया और अपनी रिपोर्ट पुलिस अधिकारियों को भेज दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट को पढ़ कर थानाप्रभारी चौंक पड़े, क्योंकि उस में साफ कहा गया था कि बबीता की मौत गला दबा कर हुई थी. यानी वह आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या का मामला निकला. श्री त्रिपाठी ने अपने अधिकारियों को भी बबीता की हत्या के बारे में अवगत करा दिया. फिर उन के आदेश पर सिपाही दिलीप कुमार को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. अब तक मृतका बबीता के मातापिता भी कानपुर गए थे. आते ही बबीता के पिता डा. बृजपाल सिंह ने थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी सीओ अजीत प्रताप सिंह चौहान से मुलाकात की. उन्होंने आरोप लगाया कि सिपाही दिलीप उस के परिवार वालों ने दहेज के लिए उन की बेटी बबीता को मार डाला. उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग की.

चूंकि बबीता की मौत गला घोंटने से हुई थी और सिपाही दिलीप कुमार शक के घेरे में था. अत: थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी ने मृतका के पिता डा. बृजपाल सिंह की तहरीर पर सिपाही दिलीप कुमार उस के पिता सोनेलाल मां मालती के खिलाफ दहेज उत्पीड़न गैर इरादतन हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. बबीता की मौत की बारीकी से जांच शुरू की तो उन्होंने सब से पहले हिरासत में लिए गए सिपाही दिलीप कुमार से पूछताछ की. दिलीप कुमार ने हत्या से साफ इनकार कर दिया. उस की ब्याहता बबली से पूछताछ की गई तो वह भी साफ मुकर गई. पासपड़ोस के लोगों से भी जानकारी जुटाई गई, पर हत्या का कोई क्लू नहीं मिला.

सिपाही दिलीप के पिता सोनेलाल भी यूपी पुलिस में एसआई हैं. वह पुलिस लाइन कानपुर में तैनात हैं. सोनेलाल भी इस केस में आरोपी थे. फिर भी उन्होंने पुलिस अधिकारियों से मुलाकात की और बताया कि बबीता की हत्या उन के बेटे दिलीप ने नहीं की है. उन्होंने कहा कि बबीता के पिता बृजपाल ने झूठा आरोप लगा कर पूरे परिवार को फंसाया है. पुलिस जिस तरह चाहे जांच कर ले, वह जांच में पूरा सहयोग करने को तैयार हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि यदि जांच में मेरा बेटा और मैं दोषी पाया जाऊं तो कतई बख्शा जाए. एसपी राजेश कुमार यादव सीओ प्रताप सिंह भी चाहते थे कि हत्या जैसे गंभीर मामले में कोई निर्दोष व्यक्ति जेल जाए, अत: उन्होंने एसआई सोनेलाल की बात को गंभीरता से लिया और थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी को आदेश दिया कि वह निष्पक्ष जांच कर जल्द से जल्द हत्या का खुलासा कर दोषी के खिलाफ काररवाई करें.

अधिकारियों के आदेश पर थानाप्रभारी ने केस की सिरे से जांच शुरू की. उन्होंने मामले का क्राइम सीन दोहराया. इस से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि बबीता का हत्यारा कोई अपना ही है. क्योंकि घर में उस रात 4 सदस्य थे. सिपाही दिलीप कुमार, उस की ब्याहता बबली, 3 वर्षीय बेटा और दूसरी पत्नी बबीता. अब रात में बबीता की हत्या या तो दिलीप ने की या फिर बबली ने या फिर दोनों ने मिल कर की या किसी को सुपारी दे कर कराई. दिलीप कुमार बबीता की हत्या से साफ मुकर रहा था. उस का दरोगा पिता सोनेलाल भी उस की बात का समर्थन कर रहा था. यदि दिलीप ने हत्या नहीं की तो बबली जरूर हत्या के राज से वाकिफ होगी. अब तक कई राउंड में पुलिस अधिकारी दिलीप तथा उस की ब्याहता बबली से पूछताछ कर चुके थे. पर किसी ने मुंह नहीं खोला था.

इस पूछताछ में बबली शक के घेरे में रही थी. पुष्टि करने के लिए पुलिस ने बबली के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस से पता चला कि उस ने घटना वाली शाम को अपने देवर शिवम से बात की थी. अत: 14 सितंबर को बबली को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लियामहिला पुलिसकर्मियों ने जब उस से उस की छोटी बहन बबीता की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गई. लेकिन मनोवैज्ञानिक तरीके से की गई पूछताछ से बबली टूट गई. उस ने बबीता की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. बबली ने बताया कि उस की सगी छोटी बहन बबीता उस की सौतन बन गई थी. पति बबीता के चक्कर में उस की उपेक्षा करने लगा था. इतना ही नहीं, वह शारीरिक और मानसिक रूप से भी उसे प्रताडि़त करता था. पति की उपेक्षा से उस का झुकाव सगे देवर शिवम की तरफ हो गया. फिर शिवम की मदद से ही रात में बबीता की रस्सी से गला कस कर हत्या कर दी.

बबली के बयानों के आधार पर पुलिस ने शिवम को चकेरी से गिरफ्तार कर लिया. शिवम चकेरी में कमरा ले कर रह रहा था और पढ़ाई तथा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था. थाने में भाभी बबली को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया. फिर उस ने भी हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. शिवम ने बताया कि बबली भाभी उस के बीच प्रेम संबंध थे. भाभी उस से मिलने चकेरी आती थी. किसी तरह बबीता को यह बात पता लग गई थी तो वह शिकायत दिलीप भैया से कर देती थी. फिर दिलीप भैया हम दोनों को पीटते थे. इसी खुन्नस में हम दोनों ने गला घोट कर बबीता को मार डाला. शिवम ने हत्या में प्रयुक्त रस्सी भी पुलिस को बरामद करा दी जो उस ने झाडि़यों में फेंक दी थी.

चूंकि बबीता की हत्या की वजह साफ हो गई थी, इसलिए थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी ने दहेज हत्या की रिपोर्ट को खारिज कर बबली शिवम के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और दोनों को गिरफ्तार कर सिपाही दिलीप उस के मातापिता को क्लीन चिट दे दी. पुलिस द्वारा की गई जांच, आरोपियों के बयानों और अन्य सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर नाजायज रिश्तों एवं सौतिया डाह की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली

उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले का एक छोटा सा गांव है रूपापुर. इसी गांव में डा. बृजपाल सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी ममता के अलावा 2 बेटियां बबली और बबीता थीं. बृजपाल सिंह गांव के सम्मानित व्यक्ति थे. वह डाक्टरी पेशे से जुड़े थे. उन के पास उपजाऊ जमीन भी थी. कुल मिला कर वह हर तरह से साधनसंपन्न और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. उन्होंने बड़ी बेटी बबली की शादी फर्रुखाबाद जिले के गंज (फतेहगढ़) निवासी सोनेलाल के बेटे दिलीप कुमार के साथ तय कर दी. दिलीप कुमार उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही था. सोनेलाल भी उत्तर प्रदेश पुलिस में एसआई थे. उन का छोटा बेटा शिवम पढ़ रहा था. सोनेलाल का परिवार भी खुशहाल था.

दोनों ही परिवार पढ़ेलिखे थे, इसलिए सगाई से पहले ही परिजनों ने एकांत में बबली और दिलीप की मुलाकात करा दी थी. क्योंकि जिंदगी भर दोनों को साथ रहना है तो वे पहले ही एकदूसरे को देखसमझ लें. दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया तो 11 दिसंबर, 2012 को सामाजिक रीतिरिवाज से दोनों की शादी हो गई. शादी के बाद बबली कुछ महीने ससुराल में रही फिर दिलीप को कानपुर के कैंट थाने में क्वार्टर मिल गया. क्वार्टर आवंटित होने के बाद दिलीप अपनी पत्नी को भी गांव से ले आया. वहां दोनों हंसीखुशी से जिंदगी व्यतीत करने लगे.

दिलीप जब ससुराल जाता तो उस की निगाहें अपनी खूबसूरत साली बबीता पर ही टिकी रहती थीं. वह महसूस करने लगा कि बबली से शादी कर के उस ने गलती की. उस की शादी तो बबीता से होनी चाहिए थी. ऐसा नहीं था कि बबली में किसी तरह की कमी थी. वह सुंदर, सुशील के साथ घर के सभी कामों में दक्ष थी. लेकिन बबीता अपनी बड़ी बहन से ज्यादा सुंदर और चंचल थी, इसलिए दिलीप का मन साली पर इतना डोल गया कि उस ने फैसला कर लिया कि वह बबीता को अपने प्यार के जाल में फंसा कर उस से दूसरा विवाह करने की कोशिश करेगा.

रिश्ता जीजासाली का था सो दिलीप और बबीता के बीच हंसीमजाक होता रहता था. एक दिन दिलीप ससुराल में सोफे पर बैठा था तभी बबीता उसी के पास सोफे पर बैठ कर उस की शादी का एलबम देखने लगी. दोनों के बीच बातों के साथ हंसीमजाक हो रहा था. अचानक दिलीप ने एलबम में लगे एक फोटो की ओर संकेत किया, ‘‘देखो बबीता, मेरे बुरे वक्त में कितने लोग साथ खड़े हैं.’’

बबीता ने गौर से उस फोटो को देखा, जिस में दिलीप दूल्हा बना हुआ था और कई लोग उस के साथ खड़े थे. फिर वह खिलखिला कर हंसने लगी, ‘‘शादी और आप का बुरा वक्त. जीजाजी, बहुत अच्छा मजाक कर लेते हैं आप.’’

‘‘बबीता, मैं मजाक नहीं कर रहा हूं सच बोल रहा हूं.’’ चौंकन्नी निगाहों से इधरउधर देखने के बाद दिलीप फुसफुसा कर बोला, ‘‘बबली से शादी कर के मैं तो फंस गया यार.’’

‘‘पापा ने दहेज में कोई कसर छोड़ी है और दीदी में किसी तरह की कमी है.’’ हंसतेहंसते बबीता गंभीर हो गई, ‘‘फिर आप दिल दुखाने वाली ऐसी बात क्यों कर रहे हैं.’’

‘‘बबली को जीवनसाथी चुन कर मैं ने गलती की थी.’’ कह कर दिलीप बबीता की आंखों में देखने लगा फिर बोला, ‘‘सच कहूं, मेरी पत्नी के काबिल तो तुम थी.’’

गंभीरता का मुखौटा उतार कर बबीता फिर खिलखिलाने लगी, ‘‘जीजाजी, आप भी खूब हैं.’’

‘‘अच्छा, एक बात बताओ. अगर बबली से मेरा रिश्ता हुआ होता और मैं तुम्हें प्रपोज करता तो क्या तुम मुझ से शादी करने को राजी हो जाती.’’ कह कर दिलीप ने उस के मन की टोह लेनी चाही.

बबीता से कोई जवाब देते बना, वह गहरी सोच में डूब गई.

‘‘सच बोलूं?’’ बबीता ने कहा, ‘‘आप बुरा तो नहीं मानेंगे.’’

दिलीप का दिल डूबने सा लगा, ‘‘बिलकुल नहीं, लेकिन सच बोलना.’’

‘‘सच ही बोलूंगी जीजाजी,’’ शर्म से बबीता के गालों पर गुलाबी छा गई, ‘‘और सच यह है कि मैं आप से शादी करने को फौरन राजी हो जाती.’’

यह सुन कर दिलीप का दिल बल्लियों उछलने लगा किंतु मन में एक संशय भी था, सो उस ने तुरंत पूछ लिया, ‘‘कहीं मेरा मन रखने के लिए तो तुम यह जवाब नहीं दे रही.’’

‘‘हरगिज नहीं, बहुत सोचसमझ कर ही मैं ने आप को यह जवाब दिया है.’’ बबीता आहिस्ता से निगाहें उठा कर बोली, ‘‘आप हैं ही इतने हैंडसम और स्मार्ट कि किसी भी लड़की के आइडियल हो सकते हैं.’’

दिलीप ने अपनी आंखें उस की आंखों में डाल दीं, ‘‘तुम्हारा भी…’’

‘‘मैं कैसे शामिल हो सकती हूं.’’ बबीता बौखलाई सी थी, ‘‘आप तो मेरे जीजाजी हैं.’’

बबीता ने मुंह खोला ही था कि तभी उस की मां ममता वहां गईं. अत: दोनों की बातों पर वहीं विराम लग गया. दिलीप से हुई बातों को बबीता ने सामान्य रूप से लिया, मगर दिलीप का दिमाग दूसरी ही दिशा में सोच रहा था. उसे विश्वास हो गया कि बबीता भी उस पर फिदा है. लिहाजा वह बबीता पर डोरे डालने लगा. शादी के ढाई साल बाद बबली गर्भवती हुई तो उस की खुशी का ठिकाना रहा. दिलीप को भी बाप बनने की खुशी थी. एक रोज बबली ने पति से कहा कि उसे अब घरेलू काम खाना बनाने में दिक्कत होने लगी है. अत: वह बबीता को घर की देखरेख के लिए लिवा लाए. कम से कम वह घर का काम तो कर लिया करेगी.

पत्नी की बात सुन कर दिलीप खुशी से झूम उठा. उस ने बबली से कहा कि वह अपने मातापिता से बबीता को भेजने की बात कर ले. कहीं ऐसा हो कि वह उसे भेजने से इनकार कर देंबबली ने मां से बात की तो वह बबीता को दिलीप के साथ भेजने को राजी हो गईं. इस के बाद दिलीप ससुराल गया और बबीता को साथ ले आया. बबीता ने आते ही घर का कामकाज संभाल लिया. साली घर गई तो दिलीप के जीवन में भी बहार गई. वह उसे रिझाने के लिए उस पर डोरे डालने लगा. पहले दोनों में मौखिक छेड़छाड़ शुरू हुई. फिर धीरेधीरे मगर चालाकी से दिलीप ने उस से शारीरिक छेड़छाड़ भी शुरू कर दी.

उन दिनों बबीता की उम्र 19-20 साल थी. उस के तनमन में यौवन का हाहाकारी सैलाब थमा हुआ था. दिलीप की कामुक हरकतों से उसे भी आनंद की अनुभूति होने लगी. दिलीप को छेड़ने पर वह उस का विरोध करने के बजाय मुसकरा देती. इस से दिलीप का हौसला बढ़ता गया. बबीता भी दिलीप में रुचि लेने लगी. फिर एक दिन मौका मिलने पर दोनों ने अपनी हसरतें भी पूरी कर लीं. साली के शरीर को पा कर जहां दिलीप की प्रसन्नता का पारावार था, वहीं बबीता को प्रसन्नता के साथ ग्लानि भी थी. उस ने कहा, ‘‘जीजाजी, यह अच्छा नहीं हुआ. तुम्हारे साथ मैं भी बहक गई.’’

‘‘तो इस में बुरा क्या है?’’

‘‘बुरा यह है कि मैं ने बड़ी बहन के हक पर अपना हक जमा लिया. यह पाप है.’’ वह बोली.

‘‘प्यार में पापपुण्य नहीं देखा जाता. भूल जाओ कि तुम ने कुछ गलत किया है. बबली का जो हक है, वह उसे मिलता रहेगा.’’ कहते हुए दिलीप ने बबीता को फिर से बांहों में समेटा तो वह भी अच्छाबुरा भूल कर उस से लिपट गईउसी दिन से दोनों के पतन की राह खुल गई. देर रात जब बबली सो जाती तो बबीता दिलीप के बिस्तर पर पहुंच जाती फिर दोनों हसरतें पूरी करते. बबली ने बेटे को जन्म दिया तो घर में खुशी छा गई. पति के अलावा सासससुर सभी खुश थे. कुछ समय बाद बबली ने महसूस किया कि छोटी बहन बबीता उस के पति से कुछ ज्यादा ही नजदीकियां बढ़ा रही है. उस ने उस पर नजर रखनी शुरू की तो सच सामने गया

उस ने नाजायज रिश्तों का विरोध किया तो दिलीप बबीता दोनों ही उस पर हावी हो गए. तब बबली ने बबीता को घर वापस भेजने का प्रयास किया लेकिन दिलीप ने उसे नहीं जाने दिया. एक रात जब बबली ने पति को छोटी बहन के साथ बिस्तर पर रंगेहाथ पकड़ा तो दिलीप बोला कि वे एकदूसरे को प्यार करते हैं और जल्द ही शादी भी कर लेंगे. यदि उस ने विरोध किया तो वह उसे घर से निकाल देगाइस धमकी से बबली डर गई. अब वह डरसहमी रहने लगी. बबली का विरोध कम हुआ तो दिलीप और बबीता खुल्लमखुल्ला रासलीला रचाने लगे. इसी बीच चोरीछिपे दिलीप ने बबीता के साथ आर्यसमाज मंदिर में शादी कर ली और उसे पत्नी का दरजा दे दिया.

डा. बृजलाल सिंह को जब दामाद की इस नापाक हरकत का पता चला तो वह किसी तरह बबीता को घर ले आए. घर पर मां ने उसे समझाया और बहन का घर उजाड़ने की नसीहत दी. लेकिन बबीता जीजा के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि उसे मां की नसीहत अच्छी नहीं लगी. उस ने मां से साफ कह दिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह दिलीप का साथ नहीं छोड़ेगी. डा. बृजपाल सिंह ने बड़ी बेटी बबली का घर टूटने से बचाने के लिए पुलिस में दिलीप की शिकायत की. जांच के दौरान पुलिस ने बबीता का बयान दर्ज किया

बबीता ने तब हलफनामा दे कर कहा कि उस ने दिलीप से आर्यसमाज में शादी कर ली है. अब वह उस की पत्नी है और उसी के साथ रहना चाहती है. मांबाप उसे बंधक बनाए हैं. बबीता के इस बयान के बाद डा. बृजपाल मायूस हो गए. इस के बाद बबीता दिलीप के साथ चली गई. दिलीप ने अब बबीता को पत्नी का दरजा दे दिया था और उसे सुखपूर्वक रखने लगा था. बबली और बबीता दोनों सगी बहनें अब एक ही छत के नीचे रहने लगी थींबबीता ने बहन के सुहाग पर कब्जा भले ही कर लिया था लेकिन बबली ने मन से बबीता को स्वीकार नहीं किया था. बल्कि यह उस की मजबूरी थी. दोनों एकदूसरे से मन ही मन जलती थीं लेकिन दिखावे में साथ रहती थीं और हंसतीबतियाती थीं.

बबीता सौतन बन कर घर में रहने लगी तो दिलीप बबली की उपेक्षा करने लगा. वह बबीता की हर बात सुनता था, जबकि बबली को झिड़क देता था. ब्याहता की उपेक्षा कर वह बबीता के साथ घूमने और शौपिंग के लिए जाता. कभीकभी किसी बात को ले कर दोनों बहनों में झगड़ा हो जाता तो दिलीप बबीता का पक्ष ले कर बबली को ही बेइज्जत कर देता. बिस्तर पर भी बबीता ही दिलीप के साथ होती, जबकि बबली रात भर करवटें बदलती रहती थी. बबली का एक देवर था शिवम. शिवम चकेरी में रहता था और पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था. शिवम बबली भाभी से मिलने आताजाता रहता था. शिवम को बबली से तो लगाव था लेकिन बबीता उसे फूटी आंख भी नहीं सुहाती थी

उस का मानना था कि बबीता ने दिलीप से शादी कर के अपनी बड़ी बहन के हक को छीन लिया है. उसे बहन की सौतन बन कर नहीं आना चाहिए था. बबली की उपेक्षा जब घर में होने लगी तो उस की नजर अपने देवर शिवम पर पड़ी. उस ने अपने हावभाव से शिवम से दोस्ती कर ली. दोस्ती प्यार में बदली और फिर उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. बबली अकसर देवर शिवम से मिलने जाने लगी. देवरभाभी के मिलन की शिकायत बबीता ने बढ़ाचढ़ा कर दिलीप से कर दीदिलीप ने निगरानी शुरू की तो बबली को छोटे भाई शिवम के साथ घूमते पकड़ लिया. इस के बाद उस ने बीच सड़क पर गिरा कर शिवम को पीटा तथा बबली की पिटाई घर पहुंच कर की. फिर तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. बबीता की शिकायत पर बबली शिवम की जबतब पिटाई होती रहती थी.

देवरभाभी के मिलन में बबीता बाधक बनने लगी तो बबली ने शिवम के साथ मिल कर उसे रास्ते से हटाने का फैसला ले लिया. बबली जानती थी कि जब तक बबीता जिंदा है, वह उस की छाती पर मूंग दलती रहेगी और तब तक उसे तो घर में इज्जत मिलेगी और ही पति का प्यार.  उसे यह भी शक था कि बबीता ने उस से उस का पति तो छीन ही लिया है, अब वह धन और गहने भी छीन लेगी इसलिए उस ने शिवम को अपनी चिकनीचुपड़ी बातों के जाल में उलझा कर ऐसा उकसाया कि वह बबीता की हत्या करने को राजी हो गया. 10 सितंबर, 2018 की शाम बबली बबीता में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ. इस झगड़े ने बबली के मन में नफरत की आग भड़का दी.

उस ने एकांत में जा कर शिवम से बात की और उसे घर बुला लिया. शिवम घर आया तो बबली ने उसे बाहर वाले कमरे में पलंग के नीचे छिपने को कहा. शिवम तब पलंग के नीचे छिप गया. बबीता को शिवम के आने की भनक नहीं लगी. देर शाम दिलीप जब घर आया तो बबीता ने उस के साथ खाना खाया फिर दोनों कमरे में कूलर चला कर पलंग पर लेट गए. आधी रात के बाद बबीता लघुशंका के लिए कमरे से निकली तभी घात लगाए बैठे शिवम बबली ने उसे दबोच लिया और घसीट कर वह उसे कमरे में ले आए इस के बाद शिवम ने बबीता का मुंह दबोच लिया ताकि वह चिल्ला सके और बबली ने रस्सी से उस का गला घोट दिया. हत्या करने के बाद शिवम रस्सी का टुकड़ा ले कर भाग गया और बबली अपने मासूम बच्चे के साथ कर कमरे में लेट गई.

इधर सुबह को दिलीप की आंखें खुलीं तो बिस्तर पर बबीता को पा कर कमरे से बाहर निकला. दूसरे कमरे में बबली बच्चे के साथ पलंग पर लेटी थी. बबीता को खोजते हुए दिलीप जब बाहर वाले कमरे में पहुंचा तो पलंग पर बबीता की लाश पड़ी थी. लाश देख कर दिलीप चीखा तो बबली भी कमरे से बाहर गई. बबीता की लाश देख कर बबली रोने लगी. उस के रोने की आवाज सुन कर पासपड़ोस के लोग गए. फिर तो पुलिस कालोनी में हड़कंप मच गया. इसी बीच दिलीप कुमार थाने पहुंचा और पुलिस को पत्नी बबीता द्वारा आत्महत्या करने की सूचना दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी पुलिस बल के साथ पहुंचे और फिर आगे की काररवाई हुई.

15 सितंबर, 2018 को पुलिस ने अभियुक्त शिवम और बबली को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत नहीं हुई थी.   

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime : बहनोई के बड़े भाई ने ही छोटे भाई के साले की हत्या कराई

UP Crime : सीधीसादी खूबसूरत रश्मि का विवाह एक ऐसे आदमी से हो गया, जिसे इंसान से कम, शराब से ज्यादा प्यार था. उत्तर प्रदेश (UP Crime) के जिला गोरखपुर के थाना कैंट का सब से व्यवस्ततम है इलाका अग्रसेन चौराहा. फर्नीचर व्यवसायियों की सब से बड़ी मार्केट होने की वजह से यहां पूरे दिन भीड़ लगी रहती है. इस मार्केट की दुकानगीता फर्नीचरकाफी बड़ी और प्रतिष्ठित मानी जाती है. फर्नीचर व्यवसायी अभिषेक रंजन अग्रवाल की यह दुकान उन की पत्नी गीता के नाम पर है. दुकान के पीछे ही उन का मकान भी है.

18 जून, 2013 की रात साढ़े 8 बजे अभिषेक अग्रवाल ने दुकान के कर्मचारियों सनी प्रजापति और राजेंद्र साहनी से दुकान बढ़ाने को कह कर खुद दुकान से बाहर कर अपने परिचित रवि अग्रवाल के साथ खड़े हो कर बातें करने लगे. इसी बीच बैंक रोड की ओर से एक मोटरसाइकिल उन के करीब कर रुक गईउस पर 2 युवक सवार थे. वे कौन हैं, यह देखने के लिए जैसे ही अभिषेक पलटे, पीछे बैठे युवक ने रिवाल्वर निकाल कर उन पर 2 गोलियां दाग दीं. दोनों ही गोलियां उन के सिर में लगीं. गोलियां लगते ही अभिषेक जहां जमीन पर गिर गए, वहीं मोटरसाइकिल युवक भाग निकले. उन के हाथों में रिवाल्वर थे, इसलिए कोई भी उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं कर सका.

अप्रत्याशित घटी इस घटना से जहां सभी हैरान थे, वहीं पूरी बाजार में हड़कंप सा मच गया था. दोनों नौकर पहले तो भाग कर घायल हो कर गिरे अभिषेक के पास आए. उन्हें तड़पता देख कर सनी जहां रवि अग्रवाल की मदद से उन्हें संभालने लगा, वहीं रवींद्र घर के अंदर की ओर घटना की सूचना देने के लिए भागा. घर के सदस्य सूचना पा कर बाहर आते, उस के पहले ही पड़ोस के दुकानदारों ने अभिषेक को एक रिक्शे पर बैठाया और पास के विंध्यवासिनीनगर स्थित स्टार नर्सिंगहोम के लिए रवाना हो गए. पीछेपीछे अभिषेक के घर वाले भी अस्पताल की ओर भागे. लेकिन अभिषेक को अस्पताल ले जाने का कोई फायदा नहीं हुआ. क्योंकि अस्पताल पहुंचने के पहले ही उस की मौत हो चुकी थी. डाक्टरों ने देखते ही उसे मृत घोषित कर दिया था. मौत की जानकारी होते ही घरवाले बिलखबिलख कर रोने लगे.

सूचना पा कर अभिषेक के तमाम परिचित भी अस्पताल पहुंच चुके थे. किसी ने घटना की सूचना फोन द्वारा पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी थी, जहां से सूचना पा कर थाना कैंट के इंस्पेक्टर टी.पी. श्रीवास्तव सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. वहीं से उन्होंने इस घटना की सूचना अधिकारियों को दे कर खुद अस्पताल जा पहुंचे. इस के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर, पुलिस अधीक्षक (नगर) परेश पांडेय, क्षेत्राधिकारी (कैंट) वी.के. पांडेय, कोतवाली के इंसपेक्टर बृजेंद्र कुमार सिंह भी वहां पहुंच गए.

पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर औपचारिक काररवाई निपटाने के बाद पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कालेज भिजवा दी. पुलिस ने घटनास्थल से 9 एमएम के 2 खोखे बरामद किए थे. सारी काररवाई निपटाने के बाद थाने लौट कर पुलिस ने मृतक अभिषेक के पिता अर्जुन कुमार अग्रवाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अभिषेक के बहनोई विवेक कुमार लाट, उस के मंझले भाई विनय कुमार लाट तथा 2 अज्ञात बदमाशों के खिलाफ अपराध संख्या 513/2013 पर भादंवि की धारा 302/120 बी/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना कैंट पुलिस ने उसी दिन विनय कुमार लाट को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई. पहले तो वह पुलिस को बरगलाता रहा, लेकिन वह कोई पेशेवर अपराधी तो था नहीं, इसलिए पुलिस ने जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो उसे टूटते देर नहीं लगी. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने सुपारी दे कर किराए के हत्यारों से अभिषेक की हत्या कराई थी. विनय द्वारा अपराध स्वीकार कर लेने और हत्यारों के नाम बता देने के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस मामले में नामजद दूसरा अभियुक्त विनय का भाई विवेक पहले से ही जेल में बंद था. पुलिस अन्य अभियुक्तों की तलाश में जुट गई. इस मामले में सोचने वाली बात यह थी कि आखिर बहनोई के बड़े भाई ने ही छोटे भाई के साले की हत्या क्यों कराई? अभिषेक का बहनोई जेल में क्यों बंद था? यह सब जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा. गोरखपुर के थाना कैंट के रहने वाले 72 वर्षीय अर्जुन कुमार अग्रवाल ढुनमुनदास बालमुकुंददास इंटर कालेज से 30 जून, 2003 को रिटायर होने के बाद अपने एकलौते बेटे अभिषेक रंजन के साथ उस के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बच्चों में 3 बेटियां रश्मि, शालिनी, दिवीता और एकलौता बेटा अभिषेक रंजन था. उन का यह बेटा तीसरे नंबर पर था.

अध्यापक होने की वजह से अर्जुन कुमार खुद तो संस्कारी थे ही, उन के चारों बच्चे भी उन्हीं की तरह संस्कारी थे. अर्जुन की बड़ी बेटी रश्मि सीधीसादी, बेहद सुशील थी. उस ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर (UP Crime) विश्वविद्यालय से संस्कृत से एमए करने के बाद नेट परीक्षा भी पास कर ली थी. अर्जुन कुमार अग्रवाल के सभी बच्चे इसी तरह पढ़ेलिखे थे. बायोलौजी से प्रथम श्रेणी में बीएससी करने के बाद अभिषेक रंजन अग्रवाल ने पढ़ाई छोड़ कर व्यवसाय की ओर कदम बढ़ाया था. अपने घर के आगे पड़ी जमीन में दुकान बनवा कर उस ने फर्नीचर और हार्डवेयर का काम शुरू कर दिया था. जल्दी ही उस का यह व्यवसाय चल निकला.

घर में हर तरह से खुशहाली थी. रश्मि शादी लायक हुई तो अर्जुन कुमार उस के लिए लड़का ढूंढ़ने लगे. एक दिन अर्जुन कुमार अग्रवाल की नजर स्थानीय अखबार के शहनाई कालम मेंवधु चाहिएमें छपे एक विज्ञापन पर पड़ी तो उन्हें लगा कि यहां बात बन सकती है. यह विज्ञापन रामस्वरूप लाट ने अपने बेटे के विवाह के लिए छपवाया था. उस  में फोन नंबर भी दिया था, इसलिए अर्जुन कुमार अग्रवाल ने तुरंत फोन कर के बात कर लीआखिर वहां बात बन गई. जल्दी गोदभराई कर के कुल 15 दिनों में अर्जुन कुमार ने अपनी बड़ी बेटी रश्मि का विवाह रामस्वरूप लाट के बेटे विवेक कुमार से कर दिया था. पहली और बड़ी बेटी का विवाह था, इसलिए अर्जुन कुमार ने अपनी हैसियत से कहीं ज्यादा इस शादी में खर्च किया था.

रामस्वरूप लाट ने यह विवाह इतनी जल्दी में कराया था कि अर्जुन कुमार को मौका ही नहीं मिला था कि वह लड़के या उस के घर वालों के बारे में ठीक से पता कर पाते. बाद में जो पता चला, उस के अनुसार गोरखपुर की कोतवाली के आर्यनगर के दक्षिणी हुमायूंपुर मोहल्ले के राज नर्सिंग होम के पास रहने वाले रामस्वरूप लाट ठेकेदारी करते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटे, कमलेश कुमार लाट, विनय कुमार लाट, विवेक कुमार लाट, विकास कुमार लाट तथा 3 बेटियां, कमला, वंदना और एप्पुल थीं

कमलेश प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. उस से छोटे विनय, विवेक और विकास विजय चौक स्थित फोटो विजन स्टूडियो को संभालते थे. रामस्वरूप लाट सुखी और संपन्न थे, इसलिए उन की समाज में एक हैसियत थी. रामस्वरूप की बड़ी बेटी कमला की शादी कोलकाता में हुई थी. बेटों में भी कमलेश और विनय की शादी हो चुकी थी. अब उन्हें 2 बेटों और 2 बेटियों की शादी करनी थी. उसी बीच उन का बड़ा बेटा कमलेश अपने परिवार के साथ कैंट स्थित हरिओमनगर कालोनी में रहने चला गया. बाद में उस ने अपने लिए लखनऊ में मकान बनवा लिया तो अपना वह मकान सब से छोटे भाई विकास को दे कर परिवार के साथ लखनऊ चला गया.

विकास उस में रहने लगा तो विनय ने कोतवाली के विष्णु मंदिर स्थित बशारतपुर मोहल्ले में अपने लिए मकान बनवा लिया. विवेक उस की दोनों, बहनें वंदना और एप्पुल तथा मांबाप आर्यनगर स्थित पुश्तैनी मकान में एक साथ रहते थे. रहते भले ही सभी भाई अलगअलग थे, लेकिन एकदूसरे से दिल से जुड़े थे. अभिषेक को जब भी मौका मिलता, बहन का हालचाल लेने उस के घर जाता रहता था. इस के अलावा विवेक का स्टूडियो अभिषेक के घर के नजदीक ही था, इसलिए सालेबहनोई की मुलाकात अकसर होती रहती थी. रश्मि जब भी मायके आती, खुश नजर आती. इसलिए मायके वालों को यही लगता था कि वह ससुराल में खुश है.

लेकिन रश्मि की यह खुशी ऊपरी तौर पर थी, जबकि अंदर से वह बहुत दुखी थी. इस की वजह थी पति का शराबी होना. इस में दुख देने वाली बात यह थी कि शराब का घूंट हलक के नीचे उतरते ही विवेक किसी को भी नहीं पहचानता था, वह उस की पत्नी की क्यों हो. उस स्थिति में अगर रश्मि कुछ कह देती तो विवेक उसे भद्दीभद्दी गालियां तो देता ही था, पिटाई करने में भी पीछे नहीं रहता थाइस की एक वजह यह भी थी कि विवेक की कल्पना के अनुरूप रश्मि खूबसूरत नहीं थी, इसलिए वह उसे पत्नी नहीं मानता था.पति के इस उपेक्षित व्यवहार को रश्मि ने अपना भाग्य मान लिया था और ससुराल में उस के साथ क्या होता है, मायके वालों से नहीं बताया

बात उन दिनों की है कि जब रश्मि को 7 माह का गर्भ था. नवरात्र चल रहे थे. विवेक स्टूडियो बंद कर के घर पहुंचा ही था कि उस की मां का फोन गया. मां उन दिनों लखनऊ में थी. विवेक ने फोन रिसीव किया तो मां ने बिना हालचाल पूछे ही कहा, ‘‘कैसे कहूं, समझ में नहीं रहा है. कहूंगी तो कहोगे कि मेरे पत्नी के पीछे हाथ धो कर पड़ी हूं.’’

‘‘कहो तो बात क्या है?’’ विवेक ने कहा.

‘‘तेरी पत्नी कह रही थी कि बहुओं को पीटना इस घर का रिवाज है. अब तुम्हीं बताओ, मैं ने कब किस के साथ मारपीट की है, जो मुझ पर इस तरह के आरोप लग रहे हैं. जब से सुना है, कलेजे में आग लगी है. पूछ तो अपनी लुगाई से, आखिर वह चाहती क्या है? मांबेटे के बीच दरार क्यों डाल रही है?’’

मां ने ये बातें जिस तरह कही थीं, सुनते ही विवेक की देह में आग लग गई. उस ने आव देखा ताव, रश्मि पर पिल पड़ा. उस के हाथ में जो भी आया वह उसी से उसे मारता रहा. उस समय उस ने यह भी नहीं सोचा कि रश्मि गर्भवती है. कहीं उल्टासीधा चोट लग गई तो क्या होगा. आखिर इस पिटाई से रश्मि की हालत बिगड़ गई. वह चलनेफिरने लायक नहीं रही. तब विवेक उसे रिक्शे पर बैठा कर ससुराल छोड़ आया. मांबाप और अभिषेक उस की हालत देख कर दंग रह गए. यह सब कैसे हुआ, सभी पूछते रह गए. लेकिन रश्मि ने बताया नहीं. उस ने झूठ बोल दिया कि पीरियड नजदीक होने की वजह से उसे कुछ तकलीफ हो गई है

जिस की वजह से इतनी रात को यहां गई. मांबाप ने उस की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इस की वजह यह थी कि उस के साथ यह सब जो हुआ था, उस के बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था. उन्होंने उसे आराम करने के लिए कह दिया. विवेक उसे छोड़ कर उसी समय अपने घर लौट गया. पति ने इतना मारापीटा था, इस के बावजूद रश्मि ने इस बात को दिल से नहीं लिया. शायद यही वजह थी कि उस ने मायके वालों से सच्चाई छिपा ली थी. उसे यह भी पता था कि अगर भाई को सच्चाई का पता चल गया तो हंगामा हो जाएगा. इसलिए चुप रहने में ही सब की भलाई है.

यही सोच कर रश्मि ने इस बात को भुला दिया. 3 दिनों बाद विवेक ने फोन किया. माफी मांगते हुए उस ने कहा कि उसे अपने किए पर काफी पछतावा है. इतने में ही रश्मि का दिल पसीज गया और उस ने विवेक को माफ कर दिया. यही नहीं, उस के साथ वह ससुराल भी गई.

रश्मि के ससुराल आने के बाद 2-4 दिनों तक घर का माहौल ठीक रहा. उस के बाद फिर पहले जैसे ही हालात हो गए. छोटीछोटी बातों को ले कर तूफान खड़ा होने लगा. विवेक पहले की तरह फिर रश्मि के साथ बदसलूकी और मारपीट करने लगा. जबकि उसे मना कर लाते समय उस ने वादा किया था कि अब वह उस के साथ बदसलूकी करेगा मारपीट. लेकिन घर आते ही वह अपना वादा भूल गया. धीरेधीरे रोज की यही नियति बन गई. समय पर रश्मि ने बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम श्रद्धा रखा गया. विवेक बेटी को पा कर निहाल था. उस की एप्पुल बुआ उस पर जान छिड़कती थी. वैसे तो सब कुछ ठीक रहता था, लेकिन विवेक की मां के आते ही घर का माहौल खराब हो जाता.

वह उलटासीधा पढ़ाती तो मां के प्रेम में अंधा विवेक वही करता, जो मां उसे करने को कहती. जब तक वह घर में नहीं रहती, घर में सुखचैन रहता. वैसे वह ज्यादातर बड़े बेटेबहू के साथ लखनऊ में रहती थी. श्रद्धा 2-3 महीने की थी, तभी एक दिन विवेक की बहन वंदना ने विवेक और रश्मि को अपने घर खाने पर बुलाया. बेटी को साथ ले कर रश्मि पति के साथ ननद के यहां पहुंची. हंसीठिठोली के बीच विवेक बातबात में रश्मि को जलील करने लगा. रश्मि वहां तो कुछ नहीं बोली, लेकिन घर कर वह विवेक से जलील करने की वजह पूछने लगी. विवेक ने ठीक से जवाब नहीं दिया तो इसी बात पर दोनों में नोकझोंक हो गई. विवेक दूसरे कमरे में जा कर सो गया और रश्मि अपने कमरे में सुबह रश्मि ने विवेक से कुछ कहा तो रात की खुन्नस निकालने के लिए वह उस की पिटाई करने लगा.

पति की इस हरकत से क्षुब्ध हो कर उसी समय रश्मि बेटी को ले कर मायके गई. रश्मि के अकेली आने पर मांबाप को समझते देर नहीं लगी कि बेटीदामाद में ऐसा कुछ जरूर हुआ है, जिस की वजह से रश्मि को घर छोड़ कर अकेली आना पड़ा. जब उन्होंने ध्यान से देखा तो उस के जिस्म पर उभरे नीले निशान दामाद की दरिंदगी की कहानी कह रहे थे. पहली बार उन्हें अहसास हुआ कि उन्होंने बेटी को गलत हाथों में सौंप दिया है. आगे से ऐसा हो, इस के लिए अर्जुन कुमार ने बेटी का मेडिकल करवाया और उसे ले कर महिला थाने पहुंच गए. महिला थाने की थानाप्रभारी से रश्मि के साथ हुए अत्याचार के बारे में बता कर कानूनी काररवाई करने को कहा, ताकि भविष्य में बेटी के साथ कोई अनहोनी हो तो इस के लिए उस के दामाद विवेक को जिम्मेदार माना जाए.

रश्मि नहीं चाहती थी कि उस के पिता कोई ऐसा काम करें, जिस से ससुराल जाने पर उसे परेशानी हो. इसलिए थानाप्रभारी से उस ने कोई भी काररवाई करने से मना कर दिया. इस के बावजूद रश्मि के लिए परेशानी खड़ी हो गई. विवेक को पता चल ही गया था कि रश्मि पिता के साथ महिला थाने गई थी. इस बात से रश्मि के प्रति उस का व्यवहार और बदल गया. अब वह पहले से ज्यादा शराब पी कर आने लगा और रश्मि को परेशान करने लगा. इसी तरह 3 साल बीत गए. इन 3 सालों में रश्मि ने ससुराल में एक दिन भी सुख का अनुभव नहीं किया. कोई भी ऐसा दिन नहीं बीता, जिस दिन पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा या मारपीट हुई हो. शारीरिक उत्पीड़न और प्रताड़ना उस की जिंदगी का हिस्सा बन गई थी. एक तरह से उस की जिंदगी नरक बन कर रह गई थी.

शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न सहतेसहते रश्मि पूरी तरह से टूट गई थी. जब उस की सहनशक्ति खत्म हो गई तो ससुराल में उस के साथ क्याक्या हुआ, उस ने एकएक बात मांबाप को बता दी. बेटी की दुखद कहानी सुन कर मांबाप के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे हैरानी से बेटी का मुंह ताकते रह गए कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी उस ने उफ तक नहीं की. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि नाजों से पलीबढ़ी बेटी ससुराल में दुख के अंगारों पर झुलस रही है. वह ऐसे गुनाह की सजा वह काट रही है, जिसे उस ने कभी किया ही नहीं है. बिना वजह रश्मि को परेशान किए जाने की बात से अर्जुन कुमार और अभिषेक बहुत दुखी हुए. अब उन के पास कानून का सहारा लेने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. इसलिए उन्होंने बेटी से दामाद द्वारा मारपीट करने की तहरीर महिला थाने में दिलवा दी.

रश्मि द्वारा दी गई तहरीर ने आग में घी का काम किया. महिला थाने की थानाप्रभारी ने विवेक को थाने बुलवा कर सब के सामने उसे इस तरह जलील किया कि वह भीगी बिल्ली बन कर रह गया. उस ने सब के सामने माफी मांगी और वादा किया कि भविष्य में वह फिर कभी किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं देगा. विवेक के घडि़याली आंसू पर रश्मि तो पिघल गई, लेकिन उस के इस नाटक पर तो अर्जुन और अभिषेक को यकीन हुआ, ही थानाप्रभारी को. रश्मि के कहने पर उस के घर वाले और पुलिस उसे इस शर्त पर विवेक के साथ भेजने को राजी हुई कि भविष्य में अगर रश्मि के साथ किसी भी तरह की कोई अनहोनी होती है तो इस के लिए वही जिम्मेदार होगा. विवेक ने यह शर्त मान ली तो रश्मि को उस के साथ भेज दिया गया.

रश्मि पति के साथ ससुराल तो गई, लेकिन इस के बाद उसे मायके वालों का मुंह देखना नसीब नहीं हुआ. विवेक का सख्त आदेश था कि वह तो मायके जाएगी और ही वहां फोन करेगी. यही नहीं, मायके वालों का फोन आता है, तब भी वह बात नहीं करेगी. इस तरह विवेक ने ससुराल वालों से संबंध लगभग तोड़ लिए. उसे नाराजगी इस बात की थी कि ससुर और साले ने दूसरी बार पत्नी से उस की शिकायत करा दी थी, जिस की वजह से उसे थाने में सब के साने जलील किया गया था. यह अपमान वह भूल नहीं पा रहा था.

रश्मि ने सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ दिया था. अब बेटी ही उस के लिए एकमात्र जीने का सहारा रह गई थी. उसे ही देख कर वह जी रही थी. सासससुर, ननददेवर सभी ने मुंह मोड़ लिया था. शायद उस ने भी ठान लिया था कि वह वही करेगी, जो भारतीय नारियां करती आई हैं. जिस इज्जत के साथ वह ब्याह कर ससुराल आई है, उसी इज्जत के साथ उस की अर्थी ससुराल से ही उठेगी. इसी तरह 5 साल बीत गए. सन 2008 में रश्मि की छोटी बहन दिवीता की शादी तय हुई. बेटी की शादी तय होने की बात अर्जुन कुमार ने बेटी रश्मि और दामाद विवेक को भी बताई. बहन की शादी तय होने की बात सुन कर रश्मि बहुत खुश हुई. जाने क्या सोच कर विवेक ने रश्मि को शादी में जाने की अनुमति दे दी. यही नहीं, वह खुद भी उस शादी में शामिल हुआ.

बेटीदामाद के आने से सभी को खुशी हुई. अर्जुन कुमार और उन की पत्नी को लगा, शायद अब सब ठीक हो जाएगा. इस के बाद विवेक खुद भी ससुराल आनेजाने लगा और रश्मि को भी साथ ले जाने लगा. 2 बार वह रश्मि को ले कर सिंगापुर भी घूमने गया. विवेक भले ही ससुराल आनेजाने लगा था और रश्मि को देश के बाहर घुमाने भी ले गया था, लेकिन रश्मि के साथ वह जो व्यवहार करता आया था, उस में कोई बदलाव नहीं आया थावह अभी भी रश्मि को जलील करने से चूकता था, उस के साथ मारपीट करने में पीछे रहता था. उस में सब से बड़ी कमी यह थी कि वह यह भी नहीं देखता था कि पत्नी से कहां और कैसा व्यवहार किया जाए. बाप के इस व्यवहार से श्रद्धा भी दुखी रहती थी. कहने का मतलब यह था कि विवेक ने शराफत का जो चोला ओढ़ रखा था, वह मात्र दिखावा था, जबकि उस की आदत में कोई सुधार नहीं आया था.

विवेक का जब मन होता, वह गंदीगंदी गालियां देते हुए रश्मि की पिटाई करने लगता. जबकि रश्मि को गालियों से बहुत चिढ़ थी. ऐसे में रश्मि विरोध करती तो घर का माहौल बिगड़ जाता. मजबूरन समझदारी का परिचय देते हुए रश्मि को ही चुप होना पड़ता. मार्च महीने की बात है. रश्मि मायके आई हुई थी. उसी बीच एक दिन उस ने देवर विकास और उस की पत्नी को खाने पर अपने घर बुलाया. रात में विवेक भी गया. खाना खा कर विकास तो पत्नी के साथ चला गया, लेकिन विवेक ससुराल में ही रुक गया. सब के जाने के बाद विवेक सोने के लिए लेटा तो पत्नी से लाइट बंद करने को कहा. काम में व्यस्त होने की वजह से रश्मि सुन नहीं पाई. इसलिए लाइट औफ नहीं की. विवेक गुस्से में उठा तो शराब की खाली पड़ी बोतल उस के पैर से टकरा गई.

फिर तो विवेक का गुस्सा इस कदर बढ़ा कि उस ने चप्पल निकाली और रश्मि के घर में ही उस की पिटाई करने लगा, साथ ही गंदीगंदी गालियां भी दे रहा था. हद तो तब हो गई, जब गिलास में रखी शराब उस ने उस के मुंह पर उड़ेल दी. इस पर रश्मि को भी गुस्सा गया. उस ने आवाज दे कर मांबाप को बुला लिया. इस के बाद उस रात विवेक से खूब झगड़ा हुआ. विवेक अकेला था, जबकि रश्मि का पूरा परिवार था. अंत में रश्मि ने ही बीचबचाव कर के मामला शांत कराया. इस के बाद एक बार फिर विवेक के संबंध ससुराल वालों से खराब हो गए. इतना सब होने के बावजूद रश्मि बेटी को ले कर पति के साथ ससुराल गई.

3 अप्रैल, 2013 की शाम 4 बजे के आसपास रश्मि ने अभिषेक को फोन कर के बताया कि विवेक ने उसे और श्रद्धा को खाने की चीज में जहर मिला कर खिला दिया है. इस के आगे वह कुछ नहीं कह पाई, क्योंकि दूसरी ओर से फोन कट गया था. शायद किसी ने फोन छीन कर काट दिया था. अभिषेक के पास सोचने का भी समय नहीं था. उस ने जल्दी से गाड़ी निकाली और पिता को साथ ले कर रश्मि की ससुराल जा पहुंचाविवेक घर में ही था. लेकिन उस से कोई बात किए बगैर बापबेटे सीधे रश्मि के कमरे में पहुंचे. श्रद्धा और रश्मि बिस्तर पर पड़ी तड़प रही थीं. बापबेटे ने मिल कर दोनों को गाड़ी में लिटाया और विंध्यवासिनीनगर स्थित स्टार नर्सिंग होम ले गए. दोनों का इलाज शुरू हुआ. इस बीच ससुराल का कोई भी सदस्य उन्हें देखने नहीं आया. रात करीब 11 बजे रश्मि की ननद वंदना जरूर आई. थोड़ी देर रुक कर वह भी चली गई.

श्रद्धा की हालत तो स्थिर रही, लेकिन रश्मि की हालत बिगड़ती गई. तब अर्जुन कुमार और अभिषेक, दोनों को वहां से डिस्चार्ज करा कर डा. मल्ल नर्सिंगहोम ले गए. श्रद्धा तो जैसेतैसे बच गई, लेकिन 2 दिनों तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करते हुए 5 अप्रैल की शाम 6 बजे रश्मि मौत से हार गई और यह दुनिया छोड़ कर चली गई. रश्मि की मौत की सूचना पा कर कोतवाली पुलिस अस्पताल पहुंची और लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद श्रद्धा के बताए अनुसार अभिषेक ने कोतवाली पुलिस को जो तहरीर दी, उस के आधार पर कोतवाली पुलिस ने अपराध संख्या 139/2013 पर भादंवि की धारा 302, 307, 498 के तहत विवेक कुमार लाट के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच कोतवाल प्रभारी इंसपेक्टर बृजेंद्र सिंह ने स्वयं संभाली.

6 अप्रैल, 2013 की सुबह बृजेंद्र सिंह ने विवेक कुमार को आर्यनगर स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद उसी दिन उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. जांच के दौरान इंस्पेक्टर बृजेंद्र सिंह को अभिषेक ने रश्मि के हाथों के लिखी 13 बिंदुओं में 7 पृष्ठों की मर्मस्पर्शी एक चिट्ठी सौंपी. उस चिट्ठी में रश्मि ने पति के हर जुर्म को विस्तार से लिखा था. जांच के दौरान कोतवाली प्रभारी ने उस में लिखा एकएक शब्द सच पाया. इस मामले में पुलिस ने 29 जून, 2013 को विवेक कुमार लाट के खिलाफ आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया.

श्रद्धा ने अपने बयान में पुलिस को बताया था कि उस के पापा ने ही उसे और उस की मां को खाने के चीज में जहर मिला कर जबरदस्ती खिलाया था. जिसे खाने के कुछ देर बाद दोनों की हालत बिगड़ने लगी थी. अभिषेक ने पुलिस को बताया था कि उस की बहन बहुत ज्यादा सुंदर नहीं थी. वह निहायत सीधीसादी और परंपराओं में जीने वाली नारी थी. उस की यही बातें विवेक की पसंद नहीं थीं. वह अय्याश था. उस के कई औरतों से नाजायज संबंध थे. रश्मि ने इस का विरोध किया तो वह उस के साथ मारपीट करने लगा. 15 सालों तक वह तिलतिल मरती रही.

अभिषेक बहन की मौत का बदला लेना चाहता था. इसी वजह से वह बहन की हत्या के मामले की पैरवी ठीक से कर रहा था. विवेक के घर वालों ने जब उस की जमानत के लिए अदालत में याचिका दायर की तो अभिषेक की पैरवी की वजह से उस की जमानत याचिका खारिज हो गई. विवेक का मंझला भाई विनय कुमार लाट अभिषेक पर दबाव बना रहा था कि इस मामले से धारा 302 हटवा दे. अभिषेक इस के लिए तैयार नहीं था. अभिषेक और अर्जुन कुमार रश्मि की ससुराल वालों की धमकियों की परवाह किए बगैर मामले की पैरवी करते रहे. आखिरकार वही हुआ, जिस की उन्होंने परवाह नहीं थी. 18 जून, 2013 को भाड़े के शूटरों से विनय कुमार लाट ने अभिषेक रंजन अग्रवाल की हत्या करवा दी. मृतक अभिषेक के पिता अर्जुन कुमार अग्रवाल ने बेटे की हत्या की नामजद रिपोर्ट विवेक, उस के मंझले भाई विनय कुमार और 2 अज्ञात शूटरों के खिलाफ थाना कैंट में दर्ज कराई थी.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना कैंट के इंस्पेक्टर टी.पी. श्रीवास्तव ने जांच के दौरान पाया कि यह हत्या पूर्व में हुए झगड़े की वजह से जेल में बंद एक बाहुबली सफेदपोश अपराधी को सुपारी दे कर कराई गई थी. विनय ने पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार भी किया था. लेकिन हत्यारे कौन थे, कहां से आए थे? पुलिस इस का पता नहीं लगा सकी. जबकि इस मामले में नामजद अभियुक्त विनय और विवेक के बड़े भाई और प्रौपर्टी डीलर कमलेश कुमार लाट का कहना था कि रश्मि ने पारिवारिक कारणों से आजिज कर खुद ही जहर खा लिया था और श्रद्धा को भी खिलाया था. अस्पताल में उस ने सब के सामने यही कहा भी था. लेकिन अर्जुन कुमार और अभिषेक ने जबरदस्ती उस के निर्दोष भाई को जेल भिजवा दिया. उस की जमानत तक नहीं होने दी. अभिषेक की हत्या में भी उन का कोई हाथ नहीं है.

इस लड़ाई में एकमात्र गवाह 14 वर्षीया श्रद्धा लाट की जान खतरे में है. शूटरों के पकड़े जाने से अर्जुन कुमार का परिवार दहशत में है. उन की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात है. पुलिस ने विवेक कुमार और विनय कुमार पर 8 नवंबर, 2013 को गैंगस्टर एक्ट भी लगा दिया है. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्तों विवेक और विनय की जमानत नहीं हुई थी.

   —कथा परिजनों और पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime stories : सिपाही का बेटा बना कातिल

Crime stories : सिपाही का बेटा होने की वजह से सूरज का मन काफी बढ़ा हुआ था. बाप भी उसे नहीं रोकता था. उसी का परिणाम था कि उस ने पूरे गांव से दुश्मनी तो मोल ली ही, एक निर्दोष को मार भी डाला. ढलते सूरज से वातावरण की गरमी जरूर कम हो गई थी, लेकिन गांव बिलासपुर का तापमान अचानक तब बढ़ गया, जब सिपाही रामनाथ रावत के बेटे सूरज रावत और रामानंद की पत्नी लक्ष्मी के बीच घंटों से चल रही तूतूमैंमैं मारपीट तक पहुंच गई. यह कहासुनी शुरू तो सूरज के मौसेरे भाई हृदयनाथ रावत से हुई थी, लेकिन जैस ही बात बढ़ी सूरज भी छोटे भाई गुड्डू के साथ वहां पहुंच गया था.

लड़ाईझगड़ा शुरू होते ही तमाशा देखने वाले इकट्ठा हो ही जाते हैं, वैसा ही यहां भी हुआ था. लगभग पूरा गांव तमाशा देखने के लिए लक्ष्मी के घर के सामने इकट्ठा हो गया था. गांव वालों ने बीचबचाव कर के मामला जरूर शांत करा दिया, लेकिन सूरज मारपीट नहीं कर पाया था, इसलिए उस का गुस्सा शांत नहीं हुआ था. वह सब के साथ अपने घर गया. गुस्से में होने की वजह से उस ने आव देखा ताव खूंटी पर टंगी पिता की लाइसेंसी राइफल उतारी और छत पर जा कर लक्ष्मी को निशाना बना कर गोलियां चलाने लगासंयोग से उस का हर निशाना चूक गया और गोलियां लक्ष्मी को लगने के बजाय तमाशा देखने वालों को लगीं, जिन में 13 साल के अमरनाथ की मौत हो गई.

इस के अलावा परमशीला, प्रीति, सुधा, सीमा, उमेश, पवन कुमार और रोशन घायल हुए. उस की इस हरकत से गांव में भगदड़ मच गई. किसी ने इस घटना की सूचना फोन द्वारा थाना उरुवा पुलिस को दी तो सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अरुण कुमार राय के हाथपांव फूल गए. थोड़ी ही देर में वह पुलिस बल के साथ गांव बिलासपुर जा पहुंचे. पुलिस कोई काररवाई कर पाती, नाराज गांव वालों ने थानाप्रभारी सहित सभी पुलिसकर्मियों को एक कमरे में बंद कर के बंधक बना लिया. इस के बाद उन्होंने पुलिस की जीप में आग लगा दी.

बंधक बने अरुण कुमार राय ने मोबाइल फोन द्वारा घटना और बंधक बनाए जाने की सूचना उच्च अधिकारियों को दी तो थोड़ी ही देर में पूरा गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया. सूचना पा कर आईजी जकी अहमद, डीआईजी नवीन अरोड़ा, एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (ग्रामीण) यस चेन्नपा, क्षेत्राधिकारी विजय शंकर 4 थानों के थानाप्रभारी तथा भारी मात्रा में पीएसी पहुंच गई थी. अधिकारियों ने आते ही सब से पहले बंधक बनाए थानाप्रभारी अरुण कुमार राय एवं उन के सहोगियों को मुक्त कराया. इस के बाद मृतक अमरनाथ के शव को अपने कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मेडिकल कालेज भिजवाने के साथ घायलों को इलाज के लिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस जिला अस्पताल भिजवा दिया.

घटनास्थल की औपचारिक काररवाई से फारिग हो कर पुलिस ने सूरज द्वारा चलाई गई गोली से मारे गए अमरनाथ के पिता बलिकरन यादव से एक तहरीर ले कर थाना उरुवा में अपराध संख्या 76/2013 पर भादंवि की धाराओं 302/504/506 7 क्रिमिनल एमेंडमेंट एक्ट के तहत सूरज रावत, उस के छोटे भाई गुड्डू, मौसेरे भाई हृदयनाथ और चंदन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस ने नामजद चारों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया

इस के तुरंत बाद पुलिस ने एक अन्य मुकदमा अपराध संख्या 77/2013 पर भादंवि की धाराओं 147, 148, 323, 504, 506, 307, 353, 332, 427, 435 7 क्रिमिनल एमेंडमेंट एक्ट तथा 2/3 के तहत ग्रामप्रधान असलम, आजम, पूर्व ब्लाकप्रमुख मुख्तार अहमद, विनोद, पप्पू, प्रवीण, मोतीलाल, उमेश, सागर तथा 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर के सभी की धरपकड़ शुरू कर दी. ग्रामप्रधान असलम को छोड़ कर बाकी सभी नामजद लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया. पुलिस ने गिरफ्तार अभियुक्तों को अगले दिन अदालत में पेश किया, जहां से सभी को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

इसी के साथ आइए अब यह जानते हैं कि ऐसा क्या हुआ था, जिस की वजह से एक नाबालिग मारा गया तो 7 लोग घायल हुए. यही नहीं, गांव के इतने लोग जेल भेजे गए. यह पूरी कहानी कुछ इस तरह की पृष्ठभूमि पर तैयार हुई है, जिस में पुलिस की लापरवाही साफ नजर आती है. जिला मुख्यालय गोरखपुर से दक्षिण में 60 किलोमीटर की दूरी पर है थाना उरुवा. इसी थाने का एक गांव है बिलासपुर. यादव बाहुल्य इस गांव में ज्यादातर लोग खेतीकिसानी करते हैं. कुछ लोग सरकारी नौकरियों में भी हैं. मेहनती होने की वजह से गांव के ज्यादातर लोग साधनसंपन्न और आर्थिक रूप से मजबूत हैं. 50 वर्षीय रामानंद यादव उर्फ नंदू भी अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी लक्ष्मी के अलावा तीन बच्चे, जिन में 2 बेटे और 1 बेटी राखी थी. रामानंद मेहनती था, जिस की वजह से खेती से ही उस के दिन मजे से कट रहे थे.

रामानंद की एकलौती बेटी राखी कुछ ज्यादा ही समझदार थी. दोनों भाई पढ़ाई छोड़ कर पिता के काम में हाथ बंटाने लगे थे, लेकिन राखी पूरी लगन के साथ पढ़ रही थी. यही वजह थी कि मातापिता ही नहीं, भाई भी उसे पढ़ालिखा कर किसी लायक बनाना चाहते थे. घर में छोटी होने की वजह से वह सब की लाडली भी थी. बलिया के रहने वाले रामनाथ रावत भी इसी गांव में कर रहने लगे थे. वह उत्तर प्रदेश पुलिस में थे. उन की तैनाती थाना उरुवा में हुई थी, तभी उन्होंने गांव बिलासपुर में अपना मकान बनवा लिया था और उसी में परिवार के साथ रहने लगे थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे सूरज और चंदन थे. उन्हीं के साथ उन की साली का बेटा हृदयनाथ भी रहता था. वह होमगार्ड था और थाना उरुवा में ही तैनात था.

रामनाथ का बड़ा बेटा सूरज कोचिंग चलाता था, जिस में गांव के बच्चों के साथ रामानंद की बेटी राखी भी पढ़ने जाती थी. बात तब की है, जब वह छठवीं में पढ़ती थी. राखी साथ पढ़ने वाली अन्य लड़कियों से खूबसूरत तो थी ही, हृष्टपुष्ट होने की वजह से अपनी उम्र से अधिक की भी लगती थी. चुलबुली होने की वजह से वह हर किसी का मन मोह लेती थी. यही वजह थी कि वह सूरज को भी अच्छी लगने लगी थी. जब भी वह उसे देखता, उस की आंखों में एक अजीब सी चमक जाती. उम्र में भले ही राखी छोटी थी, लेकिन सूरज की नीयत को भांप गई थी. जिन कातिल नजरों से सूरज उसे घूरता था, उस से वह समझ गई थी कि गुरु क्या चाहता है

इसलिए राखी सूरज से सतर्क और होशियार रहने लगी थी. क्लास खत्म होते ही वह अन्य सहपाठियों के साथ निकल जाती थी. पिछले साल मार्च की बात है. राखी घर से कोचिंग पढ़ने गई थी. बच्चों के साथ वह क्लास में भी थी. लेकिन शाम को वह घर नहीं पहुंची. घर वालों को चिंता हुई. उन्होंने उस की तलाश शुरू की. तलाश में सूरज से भी पूछा गया. उस ने बताया कि राखी तो क्लास खत्म होते ही चली गई थी. सूरज के जवाब से रामानंद परेशान हो उठा. 2 दिनों तक रामानंद और उस का परिवार राखी की तलाश में भटकता रहा. लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. तीसरे दिन सुबह विक्षिप्त हालत में राखी घर पहुंची तो उस की हालत देख कर कोहराम मच गया. राखी बुरी तरह डरी हुई थी.

उस की हालत देख कर मां लक्ष्मी का तो बुरा हाल था. उस के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. किसी तरह खुद पर काबू पा कर बेटी को नहलायाधुलाया और भोजन कराया. मां की ममता और अपनों के बीच आने के बाद राखी का डर थोड़ा कम हुआ तो घर वालों के पूछने पर 2 दिनों तक गायब रहने की उस ने जो वजह बताई, वह कलेजा चीर देने वाली थी. राखी ने बताया था कि वह कोचिंग से घर के निकली तो रास्ते में सूरज ने अपने दोस्तों, चंदन, अमित, नागेंद्र और बृजेश के साथ मिल कर उस का अपहरण कर लिया था और उसे ले जा कर एक कमरे में बंद कर दिया था. उस के बाद 2 दिनों तक लगातार उस के साथ जबरदस्ती करते रहे. उस की हालत खराब हो गई तो उसे गांव के बाहर छोड़ कर भाग गए.

बेटी की करुण कहानी सुन कर मांबाप का दिल खून के आंसू रो पड़ा. कोई छोटीमोटी बात नहीं थी. सीधासीधा सामूहिक दुष्कर्म का मामला था. रामानंद ने गांव वालों को जमा किया और बेटी को साथ ले कर थाना उरुवा जा पहुंचा. बेटी के साथ घटी घटना की नामजद तहरीर थानाप्रभारी को सौंपी. थानाप्रभारी ने काररवाई का भरोसा दे कर सभी को घर भेज दिया. रामानंद को तहरीर दिए धीरेधीरे 3 महीने बीत गए, लेकिन पुलिस ने उस की तहरीर पर कोई काररवाई नहीं की. बाद में पता चला कि उसी थाने में आरोपी सूरज का बाप रामनाथ रावत तैनात था, इसीलिए रामानंद की तहरीर दबा दी गई थी.

थाने से रामानंद को न्याय नहीं मिला तो उस ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. आखिर 8 जून, 2012 को अदालत के आदेश पर पुलिस ने पांचों आरोपियों सूरज, चंदन, अमित, नागेंद्र और बृजेश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज किया और गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. इसी के साथ होहल्ला होने पर रामनाथ को थाना उरुवा से हटा कर थाना कैंपियरगंज में तैनात कर दिया गया. बेटे के जेल जाने से रामनाथ रावत तिलमिला उठा. रामानंद और उस का साथ देने वाले ग्रामप्रधान असलम, दिनेश, विजीत और लक्ष्मण को उस ने सबक सिखाने का निश्चय कर लिया. ग्रामप्रधान असलम की पहल पर सूरज और उस के साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था, इसलिए रामनाथ ने उसे अपना सब से बड़ा दुश्मन माना और सब से पहले उसे ही सबक सिखाने के लिए मौके की तलाश में जुट गया.

आखिर उसे मौका मिल ही गया. उसे कहीं से पता चला कि गांव की एक जमीन को ले कर रामकृपाल की पत्नी बिंदू देवी और ग्रामप्रधान असलम के बीच झगड़ा चल रहा हैपुलिस सूत्रों की मानें तो गांव की उस जमीन पर बिंदू जबरन कब्जा करना चाहती थी. इस बात की जानकारी ग्रामप्रधान असलम को हुई तो उस ने बिंदू के मंसूबों पर पानी फेरते हुए जमीन पर सरकारी कब्जा करवा दिया. ग्रामप्रधान के इस रवैये से बिंदू ने उसे अपना दुश्मन मान लिया. कहते हैं, दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. यही सोच कर रामनाथ बिंदू तक पहुंच गया. वह कानून का मंझा हुआ खिलाड़ी था. उस ने बिंदू को ग्रामप्रधान असलम के खिलाफ इतना उकसाया कि अपने फायदे के लिए बिंदू नैतिकअनैतिक किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गई.

रामनाथ के कहने पर 21 सितंबर, 2012 को बिंदू अदालत के माध्यम से उरुवा थाना में दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. न्यायालय के आदेश पर यह रिपोर्ट रामानंद यादव उर्फ नंदू, ग्रामप्रधान असलम, रामानंद के बेटों श्याम, सुंदर, दिनेश, विजीत और लक्ष्मण के खिलाफ दर्ज हुई थी. मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस ने नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. लेकिन ग्रामप्रधान असलम फरार होने में कामयाब रहा. बाद में उस ने अग्रिम जमानत करा ली, जिस से वह जेल जाने से बच गया. इस तरह एक बार रामनाथ की फिर विजय हो गई. 6 महीने बाद सूरज और उस के चारों दोस्तों की जमानत हो गई. जेल से बाहर आने के बाद शरम करने के बजाय सूरज की अकड़ और बढ़ गई. दूसरी ओर रामानंद यादव उर्फ नंदू को छोड़ कर बाकी अन्य 5 लोगों को भी सेशन कोर्ट से जमानत मिल गई. इस तरह वे भी जेल से बाहर गए.

लक्ष्मी पति की जमानत के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाए थी. 5 जुलाई, 2013 को रामानंद की जमानत पर सुनवाई थी, जिस के लिए कुछ जरूरी कागजात उरुवा थाने को अदालत भेजने थे. रामनाथ का रिश्तेदार हृदयनाथ वहीं तैनात था. कहा जाता है कि उस ने वे कागजात इधरउधर करवा दिए, जिस से उस दिन कागजात अदालत देर से पहुंचे और रामानंद की जमानत नहीं हो सकी. लक्ष्मी के घर का रास्ता रामनाथ रावत के घर के सामने से ही था. पति की जमानत होने से दुखी लक्ष्मी अपने घर जा रही थी, तभी सूरज के मौसेरे भाई हृदयनाथ ने दरवाजे से उस पर गंदीगंदी फब्तियां कसीं तो दुखी और परेशान 

लक्ष्मी को उस पर गुस्सा गया. उस ने उसे उसी तरह जवाब दे दिया. लक्ष्मी की बातें हृदयनाथ को इतनी बुरी लगीं कि वह उस से लड़ने लगा. दोनों के बीच तूतू मैंमैं होने लगी तो घर के अंदर बैठा सूरज भी बाहर गया. उस के पीछेपीछे उस का छोटा भाई गुड्डू भी था. भाइयों को देख कर हृदयनाथ को ताव गया और उस ने आव देखा ताव, लक्ष्मी के गाल पर दो थप्पड़ लगा दिए.

लक्ष्मी अकेली थी, इसलिए वह उस समय चुपचाप घर चली गई. बड़ा बेटा श्याम घर पर ही था. उस ने बेटे से पूरी बात बताई तो उस का खून खौल उठा. वह रोजरोज की इस किचकिच से ऊब चुका था. अब वह इस किस्से को हमेशाहमेशा के लिए खत्म करना चाहता था. मजे की बात यह थी कि रामनाथ के परिवार से गांव के किसी भी आदमी से नहीं पटती थी. गांव का हर आदमी उस के व्यवहार से परेशान था. उस के बेटे गांव वालों से जबतब बिना मतलब पंगा लेते रहते थे.

यही वजह थी कि पूरा गांव रामनाथ और उस के बेटों के खिलाफ था. लक्ष्मी के साथ मारपीट की जानकारी गांव वालों को हुई तो वे श्याम को ले कर थाने जा पहुंचे. थानाप्रभारी छोटेलाल छुट्टी पर थे. उन की जगह सबइंस्पेक्टर अरुण कुमार राय ने थाने की जिम्मेदारी संभाल रखी थी. संयोग से वह भी उस समय थाने में नहीं थे. श्याम ने मां के साथ हुई मारपीट की जानकारी थाना पुलिस को दी तो उन्होंने काररवाई करने के बजाय उसे थाने से भगा दिया. श्याम, मां और गांव वालों के साथ थाने से लौट आया. किसी तरह इस बात की जानकारी अरुण कुमार राय को हुई तो उन्होने सूरज, गुड्डू और हृदयनाथ को थाने बुलाया. पूछताछ कर के उन्होंने कोई काररवाई किए बगैर उन्हें वापस भेज दिया.

सूरज, गुड्डू और हृदयनाथ को थाने से छोड़ दिए जाने की जानकारी गांव वालों को हुई तो उन्हें पुलिस पर बहुत गुस्सा आया. वे बीच गांव में इकट्ठा हो कर आगे की रणनीति पर विचार करने लगे. सूरज के दोस्त चंदन को लक्ष्मी के साथ मारपीट और थाने जाने की बात की जानकारी हुई तो मित्र की मदद के लिए वह भी उस के घर जा पहुंचा. सूरज का वह खास दोस्त था. उसी समय सीनाजोरी दिखाते हुए हृदयनाथ वहां जा पहुंचा, जहां गांव वाले इकट्ठा थे. उस के पीछेपीछे सूरज, गुड्डू और चंदन भी वहां जा पहुंचे. उन्हें पता था कि माहौल अभी गरम है, फिर भी वे वहां चले गए. हृदयनाथ के वहां पहुंचते ही गांववालों ने उसे घेर लिया.

स्थिति मारपीट तक पहुंच गई. हृदयनाथ के साथी पिट सकते थे, इसलिए सभी वापस गए. लेकिन सभी गुस्से में थे. इसी का नतीजा था कि कमरे में खूंटी पर टंगी पिता की लाइसेंसी राइफल सूरज ने उतारी और छत पर जा कर गोलियां चलाने लगा. घटना के समय सूरज का बाप रामनाथ रावत थाना कैंपियरगंज में अपनी ड्यूटी पर था. उस का इस कांड से कोई लेनादेना नहीं था. लेकिन पुत्रमोह में उस ने उसे जो अनुचित बढ़ावा दिया, यह उसी का परिणाम था, जिस में एक निर्दोष मारा गया तो 7 लोग घायल हुए. कथा लिखे जाने तक फरार ग्रामप्रधान असलम की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. पुलिस ने अदालत से 82/83 की काररवाई कर के उस के घर की कुर्की कर ली थी. इस के बावजूद वह हाजिर नहीं हुआ था. गोली कांड में भी गिरफ्तार अभियुक्तों में से किसी की जमानत नहीं हुई थी. पुलिस ने अपनी जांच पूरी कर के अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया है.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में राखी बदला हुआ नाम है.

   

Family Dispute : रोटी बना रही मां को बेटे ने मारी गोली

Family Dispute : कभीकभी औरत अपने व परिवार के विनाश की खुद ही रचयिता बन जाती है. बेबीरानी का पति रेलवे में नौकरी करता था, उस के 2 बेटे भी थे. घर में सब कुछ होते हुए भी बेबी ने रेलवे के गार्ड गजेंद्र से नाजायज संबंध बना लिए. यही संबंध उस के परिवार के लिए इतने घातक साबित हुए कि…

उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के थाना टूंडला क्षेत्र के मोहल्ला इंदिरा कालोनी में 19 सितंबर, 2018 को दोपहर 2 बजे गोली चलने की आवाज से सनसनी फैल गई. गोली चलने की आवाज रिटायर्ड दरोगा रमेशचंद्र के मकान की ओर से आई थी. इस मकान में ग्राउंड फ्लोर और फर्स्ट फ्लोर पर किराएदार रहते थे. चूंकि गोली की आवाज फर्स्ट फ्लोर से आई थी, इसलिए नीचे रहने वाले किराएदार तुरंत ऊपर पहुंचे तो वहां किराए पर रहने वाली महिला बेबीरानी खून में लथपथ किचन में पड़ी थी. उसे इस हालत में देखते ही उन्होंने शोर मचाया. इस के बाद तो मोहल्ले के कई लोग वहां पहुंच गए.

महिला के सिर से खून बह रहा था. उस के शरीर में कोई हरकत न होने से लोग समझ गए कि उस की मौत हो चुकी है. घटना के समय मृतका का 4 साल का बच्चा आदित्य घर में ही मौजूद था. इसी दौरान किसी ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. कुछ ही देर में थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. पता चला कि हत्या के समय महिला रसोई में खाना बना रही थी. खाना बनाते समय कोई उस के सिर में गोली मार कर चला गया. पुलिस को पूछताछ के दौरान पता चला कि 35 साल की बेबीरानी अपने 4 साल के बेटे आदित्य के साथ इस मकान में रहती थी. यह मकान रिटायर्ड दरोगा रमेशचंद्र का है.

इस बीच मकान मालिक रमेशचंद्र भी वहां पहुंच गए. उन्होंने बताया कि डेढ़ महीने पहले ही बेबी ने उन का मकान किराए पर लिया था. इस से पहले यह इसी क्षेत्र में अमित जाट के मकान में किराए पर रहती थी. थानाप्रभारी ने महिला की हत्या की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. इस पर एसएसपी सचिंद्र पटेल, एसपी (सिटी) राजेश कुमार सिंह, सीओ संजय वर्मा फोरैंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए. उच्चाधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के साथ ही पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी.

फोरैंसिक टीम द्वारा कई स्थानों से फिंगरप्रिंट उठाए गए. घटनास्थल का जायजा लेने पहुंचे एसएसपी सचिंद्र पटेल के निर्देश पर थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. अधिकारियों ने 4 साल के मासूम आदित्य से पूछा कि घर में कौन आया था? मम्मी को गोली किस ने मारी? आदित्य ने बताया, ‘‘भैया आए थे. उन्होंने ठांय किया और मर गई मेरी मम्मी.’’

उस बच्चे ने भैया का नाम लिया तो पुलिस पता करने में जुट गई कि यह भैया कौन है. पुलिस ने छानबीन की तो जानकारी मिली कि मृतका बेबीरानी के पहले पति रामवीर के बड़े बेटे गुलशन को आदित्य भैया कहता था. बेबी के पहले पति रामवीर की हत्या 9 साल पहले हो चुकी है. पहले पति की हत्या के बाद बेबी ने अपने प्रेमी विजेंद्र सिंह उर्फ गुड्डू से दूसरी शादी कर ली. दूसरे पति से 4 साल का बेटा आदित्य है. दूसरे पति से भी नहीं बनी बेबी की पुलिस को पूछताछ में पता चला कि शादी के कुछ समय बाद बेबी की दूसरे पति से नहीं पटी और वह उस से अलग हो गया. वर्तमान में वह आगरा में रह रहा है. बेबी पहले पति रामवीर की पेंशन से गुजारा करते हुए बेटे आदित्य के साथ किराए के मकान में रहती थी.

बेबी के पास उस के पहले पति का बेटा गुलशन अकसर आयाजाया करता था. पड़ोसियों ने भी गुलशन के वहां आते रहने की बात कही. बेबी के पहले पति रामवीर से 2 बेटे हैं गुलशन और हिमांशु. पिता की हत्या के बाद बच्चों के दादादादी दोनों को अपने साथ शिकोहाबाद के गांव कटौरा बुजुर्ग ले गए थे. वहीं रह कर दोनों बच्चे बड़े हुए. मृतका के 4 वर्षीय बेटे के बयान के आधार पर पुलिस को यह शक हो गया कि बेबी की हत्या (Family Dispute) में उस के बेटे गुलशन का हाथ हो सकता है. जांच के दौरान यह भी पता चला कि दूसरा पति विजेंद्र सिंह पिछले ढाई साल से अपने बेटे आदित्य को देखने तक नहीं आया. चूंकि पुलिस का शक 20 वर्षीय गुलशन की तरफ था, इसलिए पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश में जुट गई.

थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय दूसरे दिन पुलिस की एक टीम के साथ गांव कटौरा बुजुर्ग पहुंचे. घर पर उस का बीमार भाई हिमांशु मिला. उस ने बताया कि उसे मां की हत्या के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उस ने बताया कि गुलशन घर पर नहीं है. वह दिल्ली में रह कर काम करता है. लिहाजा पुलिस टीम वहां से बैरंग लौट आई. 29 सितंबर को पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर आरोपी गुलशन को ऐत्मादपुर तिराहे से बाइक सहित गिरफ्तार कर लिया. गुलशन बाइक से कहीं जा रहा था. गिरफ्तार करने वाली टीम में थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय, एसआई मुकेश कुमार, सुरेंद्र कुमार, इब्राहीम खां, धर्मेंद्र सिंह शामिल थे. गुलशन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा पुलिस ने बरामद कर लिया. आरोपी गुलशन ने थाने में मौजूद एसपी (सिटी) राजेश कुमार सिंह द्वारा की गई पूछताछ में जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

बेबीरानी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी के थाना भौगांव अंतर्गत गांव मोटा की रहने वाली थी. उस की शादी थाना शिकोहाबाद के गांव कटौरा बुजुर्ग निवासी 30 साल के रामवीर सिंह से हुई थी, जो रेलवे में खलासी पद पर नौकरी करता था. उस की पोस्टिंग टूंडला में हुई थी तो वह वहीं आ कर बस गया. वह रेलवे कालोनी के क्वार्टर में पत्नी बेबीरानी व दोनों बच्चों गुलशन व हिमांशु के साथ रहने लगा. तीखे नैननक्श, सुंदर और शोख अदाओं वाली बेबी के प्रेम संबंध हाथरस के सादाबाद के रहने वाले गजेंद्र उर्फ गुड्डू से हो गए थे, जोकि रेलवे में गार्ड था तथा टूंडला के रैस्टकैंप में ही रहता था. रामवीर के ड्यूटी पर जाने के बाद गुड्डू बेबी से मिलने उस के क्वार्टर पर पहुंच जाता था.

इस की भनक जब रामवीर को लगी तो उस ने बेबी पर निगाह रखनी शुरू कर दी. वह पत्नी पर सख्ती करने लगा, जिस की वजह से बेबी अपने पति से नाखुश रहने लगी. गहरी साजिश रची थी हत्या की  3-4 अक्तूबर, 2009 की आधी रात को जब पूरा परिवार घर में सोया हुआ था, तभी रात लगभग 2 बजे 2 व्यक्ति उस के क्वार्टर पर आए तथा दरवाजा खटखटाया. जैसे ही बेबी ने दरवाजा खोला, उन्होंने सोते हुए रामवीर को दबोच लिया तथा चाकू से उस का गला रेत कर उस की हत्या कर दी. उस समय घर पर उस का बेटा गुलशन 11 साल का था.

बेबी अपने प्रेमी गुड्डू के प्रेमपाश में पूरी तरह बंध चुकी थी. उस से अवैध संबंध थे. अवैध संबंधों में बाधक बनने पर रामवीर भेंट चढ़ गया. इस मामले में तत्कालीन एसएसपी रघुवीर लाल को बेबीरानी ने बताया कि जगदीश नामक व्यक्ति ने दरवाजा खुलवाया था. उस के साथ एक व्यक्ति कोई और था. उन के द्वारा पति को चाकू मारने पर वह चीखीचिल्लाई, लेकिन कोई सहायता के लिए नहीं आया. घटना के बाद पड़ोसी वहां पहुंचे, लेकिन तब तक बदमाश भाग गए. पुलिस जांचपड़ताल कर ही रही थी, तभी पुलिस को मृतक के 11 वर्षीय बेटे गुलशन ने ऐसी जानकारी दी कि उस से न सिर्फ हत्यारे के बारे में जानकारी मिली बल्कि हत्या की वजह भी सामने आ गई.

एसपी रघुवीर लाल के निर्देश पर मृतक के चश्मदीद बेटे गुलशन व दूसरे बेटे हिमांशु को भी पूरी पुलिस सुरक्षा प्रदान करने के साथ उन बच्चों की मां बेबीरानी को हिरासत में ले लिया गया था. घटना की रिपोर्ट मृतक के भाई श्यामवीर सिंह ने अपनी भाभी बेबीरानी और उस के प्रेमी गजेंद्र उर्फ गुड्डू व शाहिद के विरुद्ध दर्ज कराई थी. ‘मेरे पिता को हत्यारों ने जिस तरह से मारा है, उन्हें उन की सजा मैं ही दूंगा कोई और नहीं.’ यह बात गुलशन ने तत्कालीन एसपी से कही तो वह भी सन्न रह गए. उन्होंने जब उस से उस के पिता की हत्या के बारे में पूछा तो उस की आंखों में खून उतर आया था.

घटना के चश्मदीद गुलशन ने तब पूरी घटना को बताते हुए कहा था कि बस उसे अपनी रिवौल्वर दे दो, वह अपनी मां को अभी मार देगा. उस ने सिर्फ हत्यारों की पहचान ही नहीं कराई बल्कि अपनी मां की पोल भी खोल दी थी. उस ने बताया, ‘‘बदमाशों ने उस के पिता को पलंग से खींच कर जमीन पर गिराया तभी वह जाग गया था. इस दौरान उस की मां उसे खींच कर दूसरे कमरे में ले जाने लगी थी. पिता की चीख पर जब उस ने पलट कर देखा तो उस ने पिता के गले में चाकू घुसा पाया.’’ इस दौरान उस ने मां के रोने की बात को नाटक बताया था.

गुलशन के सामने हुई थी पिता की हत्या इस छोटी सी उम्र में अपनी आंखों के सामने हुई पिता की हत्या से उस समय मासूम गुलशन के चेहरे पर बदले की भावना के तीखे तेवर स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. पुलिस कस्टडी में बैठी बेबीरानी को तब उस के प्रेम संबंधों के चलते न ही प्रेमी मिल पाया था और न ही पति रहा और बच्चे भी उस से दूर चले गए थे. पिता की हत्या के बाद बिखरे रिश्ते अंत तक नहीं जुड़ पाए. गुलशन पिता की हत्या का चश्मदीद गवाह था. बेबी जेल से जल्दी छूट आई थी. वह पति की पेंशन से अपना खर्च चला रही थी. गुलशन ने रिश्तों की बर्फ पिघलाने की हरसंभव कोशिश की. उस ने मां को दादादादी के गांव चल कर रहने की बात कही, लेकिन उस ने साफ इनकार कर दिया.

बेबी व गुड्डू के कोर्ट से बरी होने के बाद दोनों ने शादी कर ली थी. शादी के बाद बेबी के गुड्डू से एक बेटा आदित्य हुआ जो इस समय 4 साल का है. शादी के बाद बेबी की अपने दूसरे पति गजेंद्र से भी नहीं पटी. वक्त गुजरने के साथसाथ बेबी और गजेंद्र अलग हो गए. गुलशन ने बताया कि वह कई दिन से मां के पास लगातार जा रहा था. छोटा भाई बीमार था, उस का इलाज कराने की बात पर मां ने कहा कि मेरे पास आ कर रहो. गुलशन ने मना कर दिया. उस का कहना था कि जो मेरे बाप को मरवा सकती है, वह मुझे भी मरवा सकती थी. गुलशन को पिता की जगह आश्रित कोटे से रेलवे में नौकरी मिलने का मामला भी तय हुआ था.

मां उस से इस कदर नफरत करने लगी थी कि जब उस की नौकरी लगने का मौका आया तो उस ने सहमतिपत्र पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया. वह उस से बेगाने जैसा (Family Dispute) व्यवहार कर रही थी. मां के सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर जरूरी थे. भाई का इलाज व नौकरी को मना करने पर गुलशन का खून खौल उठा. गुलशन बना मां का हत्यारा 19 सितंबर को दोपहर 2 बजे वह मां के पास पहुंचा. उस समय वह रसोई में रोटी बना रही थी. आटे की लोई बेल रही थी. गुलशन ने तमंचे से उस के सिर के पीछे गोली मार दी. गोली लगते ही बेबी कटे पेड़ की तरह रसोई में ही गिर गई. उस के हाथ से आटे की लोई छूट कर पास ही गिर गई. घटना को अंजाम दे कर गुलशन तेजी से घर से भाग गया. भागते समय उस के 4 वर्षीय सौतेले भाई आदित्य ने उसे देख लिया था.

मृतका बेबी का 4 साल का बेटा आदित्य अनाथ हो गया. मां की हत्या के बाद अब उसे कहां भेजा जाएगा, कोई नहीं बता रहा है. क्योंकि पिछले ढाई साल से उस का पिता गजेंद्र उर्फ गुड्डू एक बार भी उसे देखने नहीं आया. फिलहाल पुलिस ने उसे पड़ोस में रहने वाली एक महिला को सौंप दिया है. यह अजीब संयोग था कि मां का कातिल बना बेटा गुलशन अपने पिता की हत्या में मां के खिलाफ गवाह था. वहीं अब दूसरा बेटा आदित्य मां की हत्या के मामले में अपने बड़े भाई के खिलाफ गवाह है. अपने प्रेमी की मोहब्बत पाने के लिए उस ने अपनी ही मांग का सिंदूर उजाड़ डाला. जेल से छूटने के बाद प्रेमी के साथ घर बसाया, मगर सब कुछ उजड़ गया.

पहले पति के बेटे की गोली का शिकार बनी मृतका बेबी का शव पोस्टमार्टम कक्ष में रखा रहा. टूंडला में ही मृतका की बहन रेनू रहती है, लेकिन मायका व ससुराल पक्ष से, यहां तक कि बेबीरानी से शादी रचाने वाला गजेंद्र सिंह उर्फ गुड्डू भी सामने नहीं आया. बेबी को अपने किए की सजा उसे मौत के रूप में मिली. अपनों के होते हुए भी पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने ही लावारिस लाशों की तरह उस का अंतिम संस्कार किया.

पुलिस ने हत्यारोपी गुलशन को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Maharashtra Crime : बेटे को मरवाने के लिए मां ने बेचा मंगलसूत्र

Maharashtra Crime : बेटा कितना भी राक्षस बन जाए, मां के साथ दुराचार नहीं कर सकता. लेकिन रामचरण द्विवेदी ऐसा दुराचारी बन गया था कि उस ने उस मां का भी शिकार कर लिया, जिस ने उसे जन्म दिया था. मां इस अनर्थ को सह नहीं पाई और उस ने…

सुबह के यही कोई साढ़े 9 बजे का समय था. मुंबई (Maharashtra Crime) महानगर से सटे जनपद पालघर के उपनगर वसई जानकी पाड़ा की पहाडि़यों के बीच की खाई के पास काफी लोगों की भीड़ जमा थी. लोगों के जमा होने की वजह यह थी कि उस गहरी खाई में एक युवक की लाश पड़ी थी. मामला हत्या का लग रहा था, इसलिए किसी व्यक्ति ने इस की सूचना पालघर पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. यह क्षेत्र थाना वालिव के अंतर्गत आता था, इसलिए कंट्रोल रूम ने युवक की लाश की सूचना थाना वालिव के अलावा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी संजय हजारे इंसपेक्टर डी.वी. वांदेकर और एसआई विनायक माने को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल थाने से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर था. पुलिस 10 मिनट में मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने खाई में उतर कर युवक की लाश पर सरसरी नजर डाली. उस की उम्र करीब 22 साल थी. वह जमीन पर औंधे मुंह पड़ा हुआ था, शरीर पर किसी धारदार हथियार के कई घाव थे. उस का गला भी काटा हुआ था.

थानाप्रभारी संजय हजारे टीम के साथ लाश का निरीक्षण कर ही रहे थे कि पालघर डिवीजन के एसपी मंजूनाथ सिंगे, एसडीपीओ दत्ता तोटेवाड़ फोरेंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए. फोरेंसिक टीम का काम खत्म होने के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक के शव का निरीक्षण किया और थानाप्रभारी को दिशानिर्देश दे कर लौट गए. थानाप्रभारी संजय हजारे ने शव को खाई से बाहर निकलवाया और वहां भीड़ से उस की शिनाख्त करने को कहा. लेकिन भीड़ में ऐसा कोई नहीं था जो मृतक को पहचान पाता. इस से यह बात साफ हो गई कि मृतक उस जगह या उस इलाके का रहने वाला नहीं था.

प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए पालघर जिला अस्पताल भेज दिया. यह 21 अगस्त, 2017 की बात है. थाने लौटने के बाद थानाप्रभारी संजय हजारे ने इस केस के बारे में अपने सहायकों के साथ विचारविमर्श किया और जांच की जिम्मेदारी इंसपेक्टर डी.वी. वांदेकर को सौंप दी. डी.वी. वांदेकर ने मामले की तह तक जाने के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में उन्होंने एसआई विनायक माने और कुछ सिपाहियों को टीम में शामिल किया. पुलिस के सामने सब से बड़ी समस्या लाश की शिनाख्त की थी, क्योंकि शिनाख्त के बाद ही आगे की कडि़यां जुड़ सकती थीं.

शिनाख्त के लिए पुलिस ने वायरलैस से जिले के सभी पुलिस थानों को मृतक का हुलिया भेज कर यह पता लगाने की कोशिश की कि किसी पुलिस थाने में उस हुलिए के युवक की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. पुलिस टीम को पूरी आशा थी कि किसी न किसी पुलिस थाने में मृतक के लापता होने की शिकायत जरूर दर्ज होगी. लेकिन पुलिस टीम की यह उम्मीद विफल हो गई. किसी भी थाने में मृतक के हुलिए से मिलतेजुलते किसी युवक की गुमशुदगी की सूचना दर्ज नहीं थी. लेकिन इस से पुलिस टीम निराश नहीं हुई. टीम ने लाश के फोटो वाले पैंफ्लेट छपवा कर जिले के सभी रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और सार्वजनिक स्थानों पर लगवा दिए.

इस के अलावा पुलिस ने सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया का सहारा ले कर मृतक की शिनाख्त की अपील की. लेकिन इस से भी कामयाबी नहीं मिली. जैसेजैसे समय गुजर रहा था, वैसेवैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का दबाव बढ़ता जा रहा था. तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस के हाथ खाली थे. 15 दिसंबर को पुलिस को अचानक एक गुप्त सूचना मिली. इस सूचना पर काम किया गया तो सफलता मिलती गई. पुलिस को सूचना मिली कि जिस युवक की हत्या हुई थी, उस युवक का नाम रामचरण द्विवेदी है. वह उसी दिन से गायब है, जिस दिन खाई में अज्ञात लाश मिली थी. सूचना में यह भी बताया गया कि रामचरण उपनगर भायंदर के गणेश देवल नगर में रहने वाले रामदास द्विवेदी का बेटा है.

सूचना मिलने के बाद पुलिस ने रामदास और उस के परिवार वालों को थाने बुला लिया. उन्हें जब लाश के फोटो और कपड़े दिखाए गए तो वे फोटो और कपड़ों को देखते ही दहाड़ मार कर रोने लगे. रामदास ने बताया कि यह उस का बेटा रामचरण है. पुलिस ने रामदास द्विवेदी से उस के बेटे के बारे में पूछताछ की तो उस ने बस इतना ही बताया कि रामचरण का चालचलन ठीक नहीं था. वह आवारा किस्म का युवक था. ड्रग्स के अलावा वह शराब और शबाब का भी आदी था. औरत उस की खास कमजोरी थी, जिस की वजह से इलाके के कई लोगों से उस की दुश्मनी हो गई थी.

प्रारंभिक पूछताछ करने के बाद पुलिस ने रामचरण द्विवेदी और उन के परिवार को घर भेज दिया. शव की शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस टीम का सिरदर्द आधा हो गया था. अब उन्हें यकीन हो गया था कि हत्या की गुत्थी जल्दी ही सुलझ जाएगी. पुलिस टीम ने मुखबिरों के जरिए जब मृतक रामचरण का इतिहास खंगाला तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. इस के बाद पुलिस गणेश देवल नगर पहुंची. पुलिस ने वहां के लोगों से पूछताछ की तो संदेह की सुई रामचरण द्विवेदी के घर वालों की तरफ ही घूम गई.

पुलिस ने रामचरण के घर वालों को फिर से थाने में बुला कर पूछताछ की तो वे पुलिस के सवालों के बीच उलझ कर रह गए. उन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि उन्होंने रामचरण के गायब होने की शिकायत स्थानीय पुलिस थाने में क्यों नहीं दर्ज कराई. पुलिस समझ गई कि दाल में जरूर ही कुछ काला है. लिहाजा जब उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो रामदास ने सच उगल दिया. उस ने बताया कि उस के सामने ऐसे हालात बन गए थे कि उसे अपने ही बेटे की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. चूंकि उस से विस्तृत पूछताछ करनी थी, इसलिए पुलिस ने उसे वसई कोर्ट के मैट्रोपोलिटन मजिस्टै्रट के यहां पेश कर के एक सप्ताह के रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान रामदास और उन की पत्नी रजनी ने अपने ही बेटे की हत्या करने की जो कहानी बताई वह पारिवारिक रिश्तों को तारतार कर देने वाली निकली. रामदास द्विवेदी मुंबई के उपनगर भायंदर (वेस्ट) में अपने परिवार के साथ रहता था. परिवार में उस की पत्नी रजनी के अलावा 2 बेटे थे. बड़े बेटे का नाम सीताराम और छोटे का नाम रामचरण था. बड़े बेटे की शादी हो चुकी थी. छोटा बेटा रामचरण भी शादी के लायक हो गया था. लेकिन उस का आचरण ठीक नहीं होने के कारण उस के लिए कोई रिश्ता नहीं आ रहा था.

रामदास द्विवेदी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर के मछली शहर का रहने वाला था. उस के पिता रामचंद्र द्विवेदी कथावाचक ब्राह्मण थे. गांव, समाज और बिरादरी में उन की काफी इज्जत थी. लेकिन उन के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. पूजापाठ में इतनी कमाई नहीं थी कि घर का खर्च सुचारू रूप से चल सके. घर की परेशानियों की वजह से रामदास द्विवेदी रोजीरोटी की तलाश में मुंबई चला आया था. मुंबई के भायंदर इलाके में उस के गांव के कई लोग रहते थे. उन के सहयोग से रामदास को कोई अच्छी नौकरी तो नहीं मिली, उसी इलाके की एक इमारत में चौकीदारी की नौकरी जरूर मिल गई. हालांकि चौकीदारी में इतनी कमाई नहीं थी. लेकिन रामदास मेहनती इंसान था.

वह लोगों की कारों की धुलाई और साफसफाई कर के इतना कमा लेता था कि घरपरिवार का काम चल सके. धीरेधीरे पैसे जमा कर के उस ने अपना एक झोपड़ा खरीद लिया था. अपने खर्चे के बाद जो पैसा बचता, उसे वह गांव भेज देता था. इस से परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक होने लगी थी. इसी दौरान बनारस की रहने वाली लक्ष्मी से उस की शादी हो गई. शादी के बाद रामदास ने कुछ दिनों तक अपनी पत्नी को मांबाप की सेवा में छोड़ा. उस के बाद वह पत्नी को ले कर (Maharashtra Crime) मुंबई चला आया. समय के साथसाथ लक्ष्मी सीताराम और रामचरण 2 बच्चों की मां बन गई थी. रामचरण चूंकि छोटा था, इसलिए सभी उसे बहुत प्यार करते थे. उस समय उन्हें यह नहीं पता था कि यही लाड़प्यार एक दिन उन के पूरे परिवार को समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगा.

परिवार के लाड़प्यार ने रामचरण को इस कदर बिगाड़ दिया कि बाद में उसे संभालना मुश्किल हो गया. स्कूल में उस का मन पढ़ाईलिखाई में कम मटरगश्ती में ज्यादा लगता था. घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह अपने बड़े बेटे सीताराम को अधिक पढ़ालिखा नहीं पाए थे. लेकिन रामचरण से उन्हें काफी उम्मीदें थीं. मगर घर वालों का यह सपना सपना ही रह गया. कहने के लिए तो वह स्कूल जाता था लेकिन पढ़ाई के नाम पर वह आवारा बच्चों के साथ घूमता था जो अपने ही घरों से चोरी कर के लाए पैसों का गलत इस्तेमाल करते थे. छोटी सी उम्र में ही रामचरण ड्रग्स, चरस, शराब और शबाब के चक्कर में पड़ गया.

शुरू में रामदास द्विवेदी और घर वालों को रामचरण की इस कमजोरी के बारे में पता नहीं चला और जब पता चला तब तक काफी देर हो चुकी थी. रामचरण नशे के उस मुकाम पर पहुंच गया था, जहां से लौटना मुश्किल था. वह जिस बस्ती और इलाके में रहता था, वहां के लोगों के लिए वह सिर दर्द बन गया था. मारपीट, राहजनी और अय्याशी के शौक में वह पूरी तरह जकड़ चुका था. मोहल्ले की कोई भी लड़की या औरत रास्ते में उस के सामने आने तक से डरती थी. अपनी बस्ती और इलाके की कई औरतों को वह अपनी हवस का शिकार बना चुका था. अपनी धौंस और डर दिखा कर रामचरण कई औरतों का यौनशोषण कर चुका था.

इज्जत और समाज में बदनामी होने के डर से कोई उस के खिलाफ पुलिस में नहीं जाता था. इस से उस का हौसला इतना बढ़ गया था कि ड्रग्स के नशे में उस ने अपने घर को भी नहीं छोड़ा. पहले उस ने अपनी भाभी के साथ रेप किया और इस के बाद अपनी मां की इज्जत भी तारतार कर डाली थी. रामचरण इंसान से जानवर बन गया था. मां ने जिस बेटे को जन्म दिया, वही बेटा एक दिन उस के साथ ही रेप कर बैठेगा, यह बात लक्ष्मी ने सपने में भी नहीं सोची थी. एक जानवर में और रामचरण में अब कोई फर्क नहीं रह गया था. कहावत है कि जब कोई आदमी जानवर बन जाए और फिर आदमखोर हो जाए तो उसे मार देना ही एक रास्ता होता है.

यही सोच कर लक्ष्मी ने रामचरण के लिए एक खतरनाक फैसला ले लिया. बेटे के कृत्य की वजह से वह बड़ी ही शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. एक तरह से वह घुटघुट कर जी रही थी. अपने खतरनाक फैसले में अपने पति रामदास द्विवेदी, बेटे सीताराम द्विवेदी और बहू को भी शामिल कर लिया. यह काम उन में से किसी के भी बस का नहीं था, लिहाजा वह किराए के हत्यारे को तलाशने लगे. इस तलाश में लक्ष्मी और उस के पति को अपने ही इलाके में रहने वाले अपराधी प्रवृत्ति के केशव मिस्त्री की याद आई. केशव मिस्त्री वसई के जानकीपाड़ा में रहता था और राजगीर का काम करता था. कभीकभार वह लक्ष्मी और उन के परिवार से मिलनेजुलने आया करता था.

इस मामले में लक्ष्मी और उस के पति, बेटे और बहू ने केशव मिस्त्री से मिल कर जब सारी बातें बता कर अपनी योजना बताई तो वह रामचरण को मारने के लिए तैयार हो गया. उस ने इस काम के लिए एक लाख रुपए की मांग की. लक्ष्मी इतना पैसा देने की स्थिति में नहीं थी. उस ने अपनी मजबूरी बताई तो मामला 50 हजार रुपए में तय हो गया. लक्ष्मी के पास 50 हजार रुपए भी नहीं थे उस के पास शादी का मंगलसूत्र था. बेटे को मरवाने के लिए उस ने अपना मंगलसूत्र तक बेच कर केशव मिस्त्री को पैसे दे दिए. पैसे मिलने के बाद केशव मिस्त्री ने इस काम को अंजाम देने के लिए अपने दोस्त राकेश यादव को तैयार कर लिया.

योजना के अनुसार 20 अगस्त, 2017 को केशव मिस्त्री और राकेश यादव लक्ष्मी के घर आए और रामचरण द्विवेदी को शराब और शबाब की पार्टी के बहाने अपने साथ लाए टैंपो में बैठा कर जानकीपाड़ा की खाई के पास ले गए और उसे टैंपो से उतार कर उस के गले और शरीर पर गंड़ासे से वार कर के अधमरा कर दिया. फिर उन्होंने उस की गरदन काट कर उसे खाई में फेंक दिया. पुलिस ने गिरफ्तार रामदास द्विवेदी, उस की पत्नी लक्ष्मी द्विवेदी, बेटे सीताराम द्विवेदी और बहू के बयान दर्ज किए. तत्पश्चात उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. जब पुलिस टीम केशव मिस्त्री और राकेश यादव के घर पहुंची तो पता चला कि वे दोनों घटना को अंजाम देने के बाद अपने गांव उत्तर प्रदेश चले गए.

यह जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी संजय हजारे ने एसआई विनायक माने को एक पुलिस टीम के साथ उत्तर प्रदेश के लिए रवाना कर दिया, जहां उन्होंने केशव मिस्त्री और राकेश यादव को गिरफ्तार कर लिया और मुंबई ले आए थे. पुलिस ने दोनों आरोपियों से भी विस्तार से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. लक्ष्मी परिवर्तित नाम है.

 

Crime Stories : कोठी नंबर 387 में हुआ रहस्यमयी कत्ल

Crime Stories : पुष्पा कोहली ने अपनी बेटी किरन की हत्या इसलिए कराई क्योंकि उस का आचरण सही नहीं था और उस के कर्मों से परिवार की बदनामी हो रही थी. लेकिन यह बात इसलिए गले नहीं उतरती क्योंकि परिवार के किसी अन्य सदस्य को इस बात की भनक तक नहीं थी. सैक्टर-46 फरीदाबाद के चौकीप्रभारी सोहनपाल अपनी टीम के साथ क्षेत्र की रात्रि गश्त पर निकलने की तैयारी कर रहे थे कि तभी पुलिस कंट्रोल रूम से फोन आ गया. उन्हें बताया गया कि सेक्टर-45 की कोठी

नंबर 387 में एक कत्ल हो गया है. पुलिस चौकी से घटनास्थल महज 2 किलोमीटर दूर था. सोहनपाल अपनी टीम के साथ 10 मिनट में उस जगह पहुंच गए, जहां वारदात हुई थी. वह पौश एरिया था और अकसर सुनसान रहता था. इस वजह से पड़ोसियों को भी इस घटना का पता नहीं चल पाया था. रात को लगभग 3 बजे पुलिस को आया देख आसपास की कोठियों से लोग बाहर निकल आए. कोठी नंबर 387 में मौजूद एक व्यक्ति ने कोठी का मेनगेट खोल दिया. पता चला वह उसी कोठी में रहने वाला किराएदार राजेश सिंह था.

चौकीप्रभारी सोहनपाल ने अंदर जा कर देखा तो बेड पर एक लड़की मरी पड़ी थी, जिस की हत्या गला रेत कर की गई थी. बिस्तर खून से पूरी तरह सना हुआ था. जिस कमरे में हत्या हुई थी, उस में रखी अलमारी और उस का लौकर खुला हुआ था. अलमारी का सारा सामान बिखरा पड़ा था. प्रथमदृष्टया मामला लूटपाट का लग रहा था. ऐसा लगता था जैसे हत्यारे लूटपाट के इरादे से घर में घुसे हों और विरोध करने पर लड़की की हत्या कर के कीमती सामान व नकदी ले कर फरार हो गए हों. पुलिस को सूचना कोठी की मालकिन पुष्पा कोहली ने दी थी. उस ने बताया कि मृतका उस की बेटी किरन है. पुष्पा के अनुसार उस का पति सुरेंद्र कोहली और 12 वर्षीय बेटा नितिन कोहली बीते दिन सुबह ही उस की अस्वस्थ मां को देखने बठिंडा, पंजाब गए थे. वारदात के वक्त पुष्पा कोहली और किरन ही घर में थीं.

पौश इलाके में हुई इस सनसनीखेज (Crime Stories) वारदात की सूचना पा कर पुलिस के उच्चाधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पूछताछ में पुष्पा कोहली ने बताया कि बीती रात करीब पौने 10 बजे जब वह रसोई में खाना बना रही थी, तभी मेनगेट खोल कर बुरके वाली 2 औरतें अंदर आईं. किरन उन दोनों को अंदर ले आई. कुछ देर बाद जब उस ने किरन से उन दोनों के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वे उस की परिचित हैं और उसे उन के साथ कुछ हिसाबकिताब करना है. उस वक्त बुरके वाली दोनों औरतें सोफे पर बैठी थीं. वे दोनों चूंकि अपने चेहरों पर नकाब डाले हुए थीं इसलिए वह उन के चेहरे नहीं देख सकी थी. उन्हें बैठा छोड़ कर वह अपने कमरे में चली गई थी.

पुष्पा के अनुसार कुछ देर बाद किरन एक गिलास में पानी ले कर उस के कमरे में आई. उस ने चूंकि थोड़ी देर पहले ही खाना खाया था इसलिए पानी पी कर गिलास मेज पर रख दिया. उस के बाद या तो वह बेहोश हो गई थी या फिर सो गई थी. पुष्पा के अनुसार देर रात करीब 2 बजे जब वह उठी तो उस के दोनों हाथ और दोनों पैर दुपट्टे से बंधे हुए थे और मुंह में कपड़ा ठुंसा हुआ था. उस ने उठने की कोशिश की तो वह बिस्तर से नीचे गिर गई. कपड़ा ठुंसा होने की वजह से उस के मुंह से आवाज भी नहीं निकल रही थी.

पुष्पा ने आगे बताया कि जैसेतैसे उस ने बेड पर पड़ा फोन उठा कर पहले किरन का नंबर मिलाया लेकिन उस ने फोन नहीं उठाया. फिर उस ने अपनी नौकरानी सपना के पति अजीत का नंबर मिलाया. नंबर तो लग गया लेकिन मुंह में कपड़ा ठुंसा होने की वजह से बात नहीं हो सकी. इस पर वह घिसटते हुए दरवाजे के पास पहुंची और दोनों पैरों से जोरजोर से कमरे का दरवाजा पीटा. दरवाजा पीटने की आवाज सुन कर किराएदार राजेश सिंह नीचे आया. वह बाहर से दरवाजा खोल कर अंदर आया और उस के हाथपैर खोल दिए. तब तक नौकरानी सपना और उस का पति भी आ गए थे.

पुष्पा कोहली ने आगे बताया कि उस के यह पूछने पर कि किरन कहां है, राजेश सिंह ने जवाब दिया कि वह अपने कमरे में सो रही होगी. लेकिन जब उस के कमरे में जा कर देखा गया तो किरन मरी पड़ी थी. किसी ने उस का गला काट कर उस की हत्या कर दी थी. उस का सारा बिस्तर खून में डूबा हुआ था और अलमारी का सामान इधरउधर फैला पड़ा था. यह देख कर उस ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी थी. उपरोक्त बातें बतातेबताते पुष्पा कोहली फूटफूट कर रोने लगी. पुलिस ने उस से नंबर ले कर उस के पति सुरेंद्र कोहली को फोन कर के इस हादसे की सूचना दे दी और जल्दी से जल्दी फरीदाबाद पहुंचने को कहा. इस के साथ ही पुलिस ने पुष्पा की शिकायत पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 394 के तहत केस दर्ज कर लिया.

सुबह को एसीपी पूनम दयाल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस की जांच इलाका पुलिस की जगह सीआईए एनआईटी इंचार्ज इंसपेक्टर विमल कुमार, सबइंसपेक्टर नरेंद्र कुमार और अश्विनी कुमार को सौंप दी ताकि पौश इलाके में हुई इस हत्या के मामले से जल्दी से जल्दी परदा उठ सके.इंसपेक्टर विमल कुमार ने अपनी टीम के साथ मौकाएवारदात का मुआयना किया. उन्होंने पुलिस फोटोग्राफर, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट और फोरेंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया था ताकि जरूरी सुबूत जुटाए जा सकें. प्राथमिक काररवाई के बाद मृतका किरन की लाश को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया गया. पोस्टमार्टम से पता चला कि उस की मृत्यु श्वांस नली कट जाने के कारण हुई थी.

पूछताछ और पुलिस छानबीन में पता चला कि मृतका किरन के पिता सुरेंद्र कोहली काफी समय पहले पंजाब से आ कर फरीदाबाद में बस गए थे. उन का फरीदाबाद सैक्टर-28 में बिल्डिंग मैटीरियल का कारोबार था. सुरेंद्र कोहली का विवाह 1989 में बठिंडा, पंजाब की पुष्पा कोहली से हुआ था. विवाह के बाद कोहली के घर में किरन का जन्म हुआ जिसे घर में सब प्यार से गुडि़या कहते थे. किरन के जन्म के 11 साल बाद कोहली परिवार में बेटा जन्मा जिस का नाम नितिन रखा गया. 12 वर्षीय नितिन कोहली फिलहाल फरीदाबाद के एक नामी स्कूल में कक्षा-7 में पढ़ रहा था. पुष्पा कोहली घरेलू महिला थी और घर पर रह कर घरपरिवार व बच्चों की जिम्मेदारी संभालती थी.

किरन जवान हो चुकी थी. उस पर चूंकि कभी भी पारिवारिक पाबंदियां नहीं रही थीं इसलिए वह शुरू से ही फैशनपरस्त और आजादखयाल लड़की थी. मोबाइल, फिल्में, टीवी और इंटरनेट की दुनिया ने उसे और भी आधुनिक और स्वच्छंद बना दिया था. वह जो करना चाहती थी, कर गुजरती थी बिना इस बात की परवाह किए कि उस के परिवार वालों की नजर में वह अच्छा है या नहीं. इसी सब के चलते किरन ने अपने परिवार की मरजी के खिलाफ 22 नवंबर, 2010 को एक विजातीय युवक रंजीत त्रिपाठी से प्रेमविवाह कर लिया था. रंजीत गांव लकड़पुर जिला फरीदाबाद का रहने वाला था. शादी के बाद किरन घर छोड़ कर रंजीत त्रिपाठी के साथ दिल्ली स्थित सरिता विहार के निकटवर्ती इलाके मदनपुर खादर में किराए के मकान में रहने लगी थी.

परिवार से अलग रह कर जब जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों से सामना हुआ तो किरन और रंजीत दोनों ने अलगअलग प्राइवेट फर्मों में नौकरी कर ली. किरन ने जिस फर्म में नौकरी की, वह रियल एस्टेट का कारोबार करती थी. उस के मालिक का नाम महफूज आलम था. महफूज आलम का औफिस कालिंदीकुंज में था. कालिंदीकुंज मदनपुर खादर के पास ही है इसलिए किरन को औफिस आनेजाने में कोई परेशानी नहीं होती थी. महफूज आलम के साथ काम करतेकरते किरन उस के लिए काफी महत्वपूर्ण बन गई थी.

नतीजतन महफूज आलम उसे अच्छी तनख्वाह के अलावा सौदे से मिलने वाली रकम में मोटा कमीशन भी देने लगा. इसी के चलते किरन ने अच्छाखासा बैंक बैलेंस इकट्ठा कर लिया था. दूसरी ओर उस के पति रंजीत को नौकरी से इतना पैसा भी नहीं मिलता था कि घर का खर्च ठीक से चल सके.जब उम्मीद से ज्यादा पैसा मिलने लगता है तो कई कमजोर लोगों के पैर बहकने लगते हैं. किरन के साथ भी ऐसा ही हुआ. आय का स्रोत बढ़ा तो उस ने शराब पी कर देर से घर आना शुरू कर दिया. रंजीत ने यह बात किरन की मां पुष्पा कोहली को बताई. मां ने अपने स्तर पर किरन को समझाने का प्रयास भी किया लेकिन इस से किरन की दिनचर्या और व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया.

नतीजतन पतिपत्नी के बीच मतभेद बढ़ने शुरू हो गए. इस बात को ले कर रंजीत और किरन के बीच कई बार गरमागरम बहस भी हुई. पति से जब ज्यादा मतभेद बढ़ गए तो किरन ने उस के खिलाफ दिल्ली की साकेत कोर्ट में तलाक का मुकदमा डाल दिया. इस के बाद वह 27 जून, 2013 को रंजीत का साथ छोड़ कर फरीदाबाद में मां के पास आ कर रहने लगी. घर लौट कर भी किरन में कोई बदलाव नहीं आया. अब उस ने नाइटक्लब में शराब पी कर देर रात घर आना शुरू कर दिया था. जवाब मांगने पर वह गालीगलौज और मारपीट तक पर उतर आती थी. किरन का हाईप्रोफाइल लाइफस्टाइल कोहली परिवार के लिए बदनामी का कारण बन रहा था.

एक तो शादी के बाद भी बेटी घर में बैठी थी, दूसरे वह शराब पी कर देर रात घर लौटती थी. मां पुष्पा कोहली इस बात को ले कर तनावग्रस्त रहने लगी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इस समस्या का कैसे समाधान करे. यह सब चल ही रहा था कि किरन की हत्या हो गई थी. बहरहाल, इंसपेक्टर विमल कुमार ने अपनी टीम के साथ बेहद बारीकी से घटनास्थल का मुआयना किया तो पाया कि पुष्पा कोहली द्वारा लिखाई गई रिपोर्ट और मौकाएवारदात पर पाए गए सुबूतों में काफी झोल है. इसी को ध्यान में रख कर उन्होंने सुरेंद्र कोहली के किराएदार राजेश सिंह, नौकरानी सपना व उस के पति अजीत के अलगअलग बयान दर्ज किए.

जब उन बयानों को क्रौस चैक किया गया तो विमल कुमार को कई बातों पर शक हुआ. मसलन किरन ने पुष्पा को गिलास में पानी दिया था जिसे पी कर वह बेहोश हो गई थी और शायद बाद में सो गई थी. यह बात समझ के बाहर थी कि किरन ने बिना मांगे मां को पानी क्यों दिया और उस ने क्यों पीया? इंसपेक्टर विमल कुमार ने गिलास के बचे पानी को सूंघ कर देखा तो वह सामान्य पानी था और उस में किसी तरह की कोई गंध नहीं थी. फिर भी उन्होंने उस पानी और गिलास को जांच के लिए प्रयोगशाला भिजवा दिया. दूसरे पुष्पा कोहली से जब दोनों बुरकेवालियों के डीलडौल, शक्ल और आवाज के बारे में सवाल किए गए तो वह कोई संतोषप्रद जवाब नहीं दे सकी. संदेह हुआ तो पुलिस टीम ने पुष्पा कोहली का मोबाइल फोन सर्विलांस पर ले लिया और उस के फोन की पिछले 6 महीने की काल डिटेल्स निकलवाई.

इस बीच पुष्पा कोहली के पति सुरेंद्र कोहली, बेटा नितिन और कुछ अन्य रिश्तेदार भी आ गए थे. माहौल कुछ ऐसा था कि पुलिस पुष्पा से कड़ाई से पूछताछ भी नहीं कर सकती थी. अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद किरन का शव उस के परिवार को सौंप दिया गया. उन लोगों ने उसी दिन उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए किरन की नानी भी आई थी. इंसपेक्टर विमल कुमार ने नानी से भी पूछताछ की. पता चला कि वह पूरी तरह से स्वस्थ थी. जबकि पुष्पा ने अपनी इसी मां को अस्वस्थ बता कर पति सुरेंद्र कोहली और बेटे नितिन को 250 किलोमीटर दूर बठिंडा भेजा था.

पुष्पा से टुकड़ों में हुई पूछताछ में महफूज आलम का नाम कई बार आया था. बुरकेवाली औरतों का जिक्र आने से पुलिस का शक महफूज आलम पर ही गया. पुलिस ने महफूज आलम से पूछताछ की लेकिन उस ने इस मामले में अपनी कोई भी भूमिका होने से इनकार किया. अलबत्ता यह जरूर माना कि किरन उस के यहां काम कर चुकी थी और वह उसे मोटा वेतन देता था. महफूज हालांकि किरन की हत्या में अपनी कोई भी भूमिका होने से इनकार कर रहा था. फिर भी हत्या का मामला होने की वजह से पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए थाने में ही बिठाए रखा बाद में उसे छोड़ दिया गया.

किरन की हत्या की सूचना पा कर उस का पति रंजीत त्रिपाठी भी फरीदाबाद आ गया था. वह फिलहाल मुंबई में नौकरी कर रहा था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की लेकिन हत्या में उस की किसी भी तरह की भूमिका न मिलने पर अगले आदेश तक उसे घर छोड़ कर न जाने की कड़ी हिदायत दे कर जाने दिया गया. पुष्पा कोहली के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स पुलिस के पास आ गई थी. उस का गहराई से अध्ययन करने पर पुलिस को उस में एक ऐसा नंबर मिला जिस पर पुष्पा दिन के समय हफ्ते में 2-3 बार फोन करती थी. यह नंबर पंजाब का था.

पुष्पा से इस नंबर के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह नंबर उस के  एक मुंहबोले चाचा का है, जो पंजाब में रहता है. उस से वह पारिवारिक बातें करती थी. घटना वाली रात पुष्पा कोहली के मोबाइल पर आनेजाने वाली कुल 3 काल्स पाई गई थीं. पहली काल रात 8 और 9 बजे के बीच आई थी जोकि मिस्ड काल थी. इसी नंबर पर पुष्पा कोहली के मोबाइल से 10 बजे के आसपास एक मिस्ड काल दी गई थी. तीसरी और आखिरी काल पुष्पा कोहली की नौकरानी सपना के मोबाइल से आई थी, जिसे रिसीव किया गया था. पुलिस ने उस नंबर पर जिस से मिस्ड काल आई थी और जिस पर पुष्पा ने मिस्ड काल दी थी, फोन किया तो वह नंबर लगातार बंद मिला.

जब उस नंबर की जांच की गई तो पता चला कि उस नंबर की सिम पंजाब से नकली आईडी और फरजी पते पर खरीदी गई थी. लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि घटना वाली रात उस नंबर की लोकेशन सेक्टर-45 और उस के आसपास थी. ऐसा लग रहा था जैसे उस नंबर का इस्तेमाल किसी खास मकसद से ही किया गया था. इस से शक की सुई पूरी तरह से पुष्पा कोहली पर आ कर ठहर गई. अपने शक को और पुख्ता करने के लिए जब पुलिस ने पुष्पा की नौकरानी सपना से उस के द्वारा की गई फोन काल के बारे में पूछा तो इस हत्याकांड की तसवीर काफी हद तक साफ हो गई. लेकिन कुछ कारणों से पुलिस अब भी पुष्पा कोहली से पुलिसिया तरीके से पूछताछ नहीं कर सकती थी क्योंकि वह शिकायतकर्ता होने के साथसाथ महिला भी थी.

अंतत: इंसपेक्टर विमल कुमार ने अपने उच्चाधिकारियों से विचारविमर्श कर के 3 जनवरी 2014 को पुष्पा को हिरासत में ले लिया. जब सपना द्वारा दिए गए बयान को आधार बना कर उसे घेरा जाने लगा तो पहले तो वह पुलिस को बरगलाती रही लेकिन अंत में टूट गई. आखिर उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही सुपारी दे कर (Crime Stories) अपनी बेटी किरन की हत्या कराई थी. दरअसल पुष्पा की नौकरानी सपना ने घटना वाली रात कोठी के आगे वैगनआर कार खड़ी देखी थी. बाद में उस ने पुष्पा को फोन कर के पूछा था कि क्या घर में कोई मेहमान आया है. चूंकि पुष्पा ने सपना की काल रिसीव की थी इसलिए यही उस के लिए मुसीबत बन गई क्योंकि यह बात सपना ने पुलिस को बता दी थी. जबकि पुलिस को दिए बयान के अनुसार उस वक्त  पुष्पा बेहोश थी.

पुलिस को दिए गए इकबालिया बयान में पुष्पा कोहली ने बताया कि किरन की आदतों और व्यवहार से वह तनावग्रस्त रहने लगी थी. अपनी इस समस्या को हल करने की योजना के तहत उस ने अपने गांव के मुंहबोले चाचा हवलदार कुलविंदर सिंह, जोकि जालंधर के कैंट थाने में तैनात था, को हत्या की रात फरीदाबाद बुलाया. कुलविंदर अपने एक अन्य साथी के साथ वैगनआर कार से 27 दिसंबर की देर शाम फरीदाबाद पहुंच गया था. वह अपना मोबाइल फोन जालंधर में अपने घर छोड़ आया था ताकि पुलिस की जांच में उस पर कोई आंच आए तो वह साबित कर सके कि वह हत्या के वक्त जालंधर में था.

कुलविंदर पंजाब से फरजी आईडी पर खरीदी गई नई सिम अपने साथ लाया था. इसी सिम को उस ने दूसरे मोबाइल में डाल कर पुष्पा कोहली को मिस्ड काल दे कर अपने फरीदाबाद पहुंचने की सूचना दी थी. पूर्व नियोजित योजना के तहत पुष्पा ने अपने मोबाइल से उसे मिस्ड काल दी जिस का मतलब था कि रास्ता साफ है, कभी भी अंदर आ सकते हो. इस के बाद रात के अंधेरे में कुलविंदर और उस के साथी ने घर के अंदर घुस कर किरन की गला रेत कर हत्या कर दी और कमरे में रखी अलमारी का सामान इधरउधर बिखेर दिया ताकि मामला लूट व हत्या का लगे. हत्या के वक्त पुष्पा कोहली अपने बेडरूम में चली गई थी और अपने कानों को तकिए से ढक लिया था ताकि बेटी के चीखने की आवाज उसे सुनाई न दे.

इस हत्या की एवज में पुष्पा कोहली ने कुलविंदर को 1 लाख रुपए व सोने के कुछ गहने दिए थे जिन्हें ले कर वह उसी रात अपने साथी के साथ पंजाब लौट गया था. पुष्पा के बयान के आधार पर पुलिस ने इस मामले में भादंवि की धारा 302, 494 के अलावा 34 भी जोड़ दी. पुष्पा कोहली को विधिवत 4 जनवरी 2014 को गिरफ्तार कर के फरीदाबाद की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कुलविंदर व उस के साथी की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम जालंधर गई लेकिन वह भूमिगत हो गया था. शायद उसे हरियाणा पुलिस के आने की सूचना पहले ही मिल गई थी. फरीदाबाद पुलिस उच्चाधिकारियों द्वारा दबाव बना कर फरार चल रहे हवलदार कुलविंदर और उस के साथी की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही है. पुष्पा कोहली जेल में बंद है.

इस मामले में पुलिस किरन की हत्या की जो थ्योरी बता रही है, वह गले नहीं उतरती. क्योंकि कोई भी मां केवल अपने तनाव को दूर करने के लिए सुपारी दे कर बेटी की हत्या नहीं करा सकती. संभव है, पुलिस जांच में कोई और सच्चाई सामने आए. लेकिन इस की संभावना फिलहाल कम ही है.

—कथा पुलिस सूत्रों, परिजनों के बयानों पर आधारित है.

 

UP Crime news : पत्थर से वार कर दोस्त की खोपड़ी के किए कई टुकड़े

UP Crime news : मनीष जिस सौरभ को अपना सब से अच्छा दोस्त समझता था, पैसों के लालच में वही उस का सब से खतरनाक दुश्मन बन गया था. मनीष को घर से गए 24 घंटे से ज्यादा बीत गए थे. इतनी देर तक वह घर वालों को बताए बिना कभी गायब नहीं रहा था. उस के भाई अनिल ने कई बार उस के दोनों फोन नंबरों पर फोन किया था, लेकिन हर बार उस के दोनों नंबरों ने स्विच्ड औफ बताया था. इस के बावजूद वह बीचबीच में फोन मिलाता रहा कि शायद फोन मिल ही जाए. पूरा घर मनीष को ले कर काफी परेशान था.

संयोग से सुबह 7 बजे के लगभग मनीष का फोन मिल गया. मनीष के फोन रिसीव करते अनिल ने कहा, ‘‘मनीष, तू कहां है? कल से तेरा कुछ पता नहीं चल रहा है, तुझे घरपरिवार की इज्जत की भी फिक्र नहीं है. तू किसी को कुछ बताए बगैर ही दोस्तों के साथ मटरगश्ती कर रहा है?’’

‘‘भाई… मैं घंटे भर में घर पहुंच रहा हूं.’’ दूसरी तरफ से मनीष की लड़खड़ाती आवाज आई.

लड़खड़ाती आवाज सुन कर अनिल चौंका. उस की समझ में नहीं आया कि वह इस तरह क्यों बोल रहा है. उस ने कहा, ‘‘वो तो ठीक है. तू घंटे भर में नहीं सवा घंटे में आ जाना, लेकिन यह तो बता कि कल शाम से तेरे दोनों फोन बंद क्यों हैं? और तेरी आवाज को क्या हुआ है, जो इस तरह आ रही है?’’

‘‘भैया, वो क्या है कि मेरे फोन गाड़ी में रह गए थे.’’ मनीष की आवाज फिर लड़खड़ाई. इस के साथ फोन कट गया. अनिल ने तुरंत फोन मिलाया, लेकिन फोन का स्विच औफ हो गया. जिस तरह मनीष की आवाज लड़खड़ा रही थी. साफ लग रहा था कि वह बहुत ज्यादा नशे में है. 24 वर्षीय मनीष संगत की वजह से शराब भी पीने लगा था. इसलिए अनिल ने तय किया कि उस के आते ही वह उस से बात करेगा कि वह अपनी आदत सुधारेगा या नहीं?

जिस समय अनिल मनीष से फोन पर बातें कर रहा था, उस समय उस की मां और घर के अन्य लोग भी वहीं बैठे थे. मनीष से हुई बातचीत अनिल ने घर वालों को बताई तो वे और ज्यादा परेशान हो उठे. उन्हें चिंता होने लगी कि वह गलत लोगों के साथ तो नहीं उठनेबैठने लगा. चूंकि अनिल की मनीष से बात हो चुकी थी, इसलिए वह यह सोच कर अपनी दुकान पर चला गया कि घंटे, 2 घंटे में मनीष घर लौट ही आएगा. अब वह शाम को उस से बात करेगा.

शाम के 5 बज गए, लेकिन न तो मनीष घर आया और न ही उस का कोई फोन ही आया. बूढ़े पिता ओमप्रकाश गुप्ता बेटे की चिंता में पिछली रात भी नहीं सो पाए थे. बेटे को ले कर सारी रात उन के मन में उलटेसीधे विचार आते रहे. अब दूसरा दिन भी बीत गया था और उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. अनिल दुकान से जल्दी ही घर आ गया था. वह मनीष के कुछ दोस्तों को जानता था. उस ने उन से भाई के बारे में पूछा, लेकिन उन से उस के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिली. 12 फरवरी को जब मनीष घर से निकला था, तो बड़ी बहन शशि ने उसे फोन किया था. तब उस ने कहा था कि वह मोंटी के मेडिकल स्टोर पर बैठा है और आधे घंटे में घर आ जाएगा.

मोंटी उर्फ मुकेश शर्मा का मेडिकल स्टोर लंगड़े की चौकी में था. अनिल अपने भाई राजीव के साथ मोंटी की दुकान पर पहुंचा. जब अनिल ने मोंटी से मनीष के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मनीष कल दोपहर को यहां आया तो था, लेकिन घंटे भर बाद मोटरसाइकिल से चला गया था. यहां से वह कहां गया, यह मुझे पता नहीं. वहां से निराश हो कर दोनों भाई मनीष की अन्य संभावित स्थानों पर तलाश करने लगे, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. थकहार कर दोनों भाई रात 11 बजे तक घर लौट आए. बीचबीच में वह मनीष को फोन भी मिलाते रहे, लेकिन उस के दोनों फोन स्विच्ड औफ ही बताते रहे. किसी अनहोनी की आशंका से घर की महिलाओं ने रोनापीटना शुरू कर दिया. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि मनीष ऐसी कौन सी जगह चला गया है, जहां से उस से फोन पर बात नहीं हो पा रही है.

खैर, जैसेतैसे रात कटी. अगले दिन पूरे मोहल्ले में मनीष के 2 दिनों से गायब होने की खबर फैल गई. मोहल्ले वाले गुप्ता के यहां सहानुभूति जताने के लिए आने लगे. उन्हीं लोगों के साथ राजीव और अनिल जीवनी मंडी पुलिस चौकी पहुंचे और चौकी प्रभारी सूरजपाल सिंह को मनीष के लापता होने की जानकारी दी. यह पुलिस चौकी थाना छत्ता के अंतर्गत आती है, इसलिए सूरजपाल सिंह उन्हें ले कर थाने पहुंचे. थानाप्रभारी भानुप्रताप सिंह को जब मनीष के गायब होने की जानकारी दी गई तो उन्होंने तुरंत उस की गुमशुदगी दर्ज करा कर मामले की जांच एसएसआई रमेश भारद्वाज को सौंप दी.

जब उन्हें पता चला कि मनीष अपनी मोटरसाइकिल (UP Crime news) यूपी80एवाई 4799 से घर से निकला था तो उन्होंने वायरलैस से जिले के समस्त थानों को मनीष का हुलिया और उस की मोटरसाइकिल का नंबर बता कर उस के गायब होने की सूचना देने के साथ कहलवाया कि अगर इन के बारे में कुछ पता चलता है तो तुरंत थाना छत्ता को सूचना दें. यह मैसेज प्रसारित होने के कुछ देर बाद ही थाना सदर बाजार से थाना छत्ता को सूचना मिली कि मैसेज में बताई गई नंबर की नीले रंग की मोटरसाइकिल पिछली शाम को एक रेस्टोरेंट के सामने लावारिस हालात में बरामद हुई है. थाना सदर बाजार आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के नजदीक है.

एसएसआई रमेश भारद्वाज ने यह खबर मिलने के बाद अनिल को थाने बुलाया और उसे साथ ले कर थाना सदर बाजार पहुंचे, ताकि वह मनीष की बाइक को पहचान कर सके. थाना सदर बाजार पुलिस ने जब उसे रेस्टोरेंट के सामने से लावारिस हालत में बरामद की गई मोटरसाइकिल दिखाई गई तो अनिल ने उसे तुरंत पहचान लिया. वह मोटरसाइकिल मनीष की थी. मनीष गुप्ता का परिवार आर्थिक रूप से काफी संपन्न था. वह हाथों में सोने की वजनी  अंगूठियां और गले में सोने की काफी वजनी चेन पहने था. उस के मोबाइल फोन भी काफी महंगे थे. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने लूटपाट कर के उस का कत्ल कर के लाश कहीं फेंक दी हो. लव एंगल की भी संभावना थी. इस बारे में पुलिस ने अनिल से पूछा भी, लेकिन उस का कहना था कि इस तरह की कोई बात उस ने नहीं सुनी थी. अगले महीने उस की शादी भी होने वाली थी.

एसएसआई रमेश भारद्वाज ने मनीष के दोनों फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगवाने के साथ उन की पिछले 5 दिनों की काल डिटेल्स भी निकलवाई. 13 फरवरी, 2014 को मनीष के दोनों फोनों की लोकेशन लंगड़े की चौकी की मिली थी. इस के बाद लोकेशन खेरिया मोड़ अर्जुननगर की आई. वहीं से उस की अनिल से अंतिम बार बात हुई थी. इस का मतलब वह वहीं से लापता हुआ था. घर वाले भी अपने स्तर से मनीष के बारे में छानबीन कर रहे थे. उस के स्टेट बैंक औफ बीकानेर, आईडीबीआई, एक्सिस बैंक और एचडीएफसी बैंकों में खाते थे, जिन में उस के लाखों रुपए जमा थे. मनीष के पास हर समय इन बैंकों के डेबिड कार्ड रहते थे.’

मनीष के बड़े भाई राजीव ने सभी बैंकों में जा कर छानबीन की तो पता चला कि अयोध्या कुंज, अर्जुननगर की आईसीआई सीआई बैंक के एटीएम से 13 फरवरी की शाम 17 हजार 5 सौ रुपए निकाले गए थे. इस के अलावा 14,15 और 16 फरवरी को अलगअलग एटीएम कार्डों से साढ़े 3 लाख रुपए निकाले गए थे. यह बात जान कर घर वालों को आश्चर्य हुआ कि मनीष ने इतने पैसे क्यों निकाले. यह जानकारी उन्होंने पुलिस को दी. जीवन मंडी पुलिस चौकी के इंचार्ज सूरजपाल सिंह राजीव गुप्ता के साथ पास ही स्थित एचडीएफसी बैंक गए. उन्होंने ब्रांच मैनेजर से इस बारे में बात की तो ब्रांच मैनेजर ने बताया कि मनीष गुप्ता के खाते से एटीएम कार्ड द्वारा उस रोज 11 बज कर 19 मिनट पर डेबिड कार्ड द्वारा पैसे निकाले गए थे. वे रुपए मोतीलाल नेहरू रोड स्थित भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम बूथ से निकाले गए थे.

पुलिस जानती थी कि पैसे निकालने वाले का भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम बूथ पर लगे सीसीटीवी कैमरे में फोटो जरूर आया होगा. उस दिन की फुटेज हासिल करने के लिए पुलिस ने स्टेट बैंक औफ इंडिया के अधिकारियों से बात की. जब बैंक अधिकारियों ने पुलिस और राजीव गुप्ता को फुटेज दिखाई तो पता चला, मनीष के खाते से पैसे निकालने वाला कोई और नहीं, मनीष का दोस्त सौरभ शर्मा था. सौरभ शर्मा मुकेश शर्मा उर्फ मोंटी का सगा भांजा था. उस की मोबाइल फोन रिचार्ज करने और एसेसरीज बेचने की दुकान थी. राजीव गुप्ता अकसर उसी के यहां से अपना मोबाइल रिचार्ज कराते थे. उस की दुकान मोंटी के मेडिकल स्टोर के बराबर में ही थी.

मनीष ने अपने पैसे सौरभ से क्यों निकलवाए थे, इस बारे में सौरभ ही बता सकता था. पुलिस राजीव को साथ ले कर सौरभ शर्मा की दुकान पर पहुंची. वह दुकान पर ही मिल गया. पुलिस के साथ राजीव और अनिल को देख कर वह सकपका गया. सबइंस्पेक्टर सूरजपाल सिंह ने उस से मनीष के बारे में पूछा तो उस ने उस के बारे में कुछ भी बताने से साफ मना कर दिया. परंतु जब उसे एटीएम के कैमरे की फुटेज दिखाई गई तो उस ने कहा, ‘‘क्या इस में मैं मनीष गुप्ता के एटीएम कार्ड्स से रुपए निकालता दिख रहा हूं. सर, उस समय मैं अपने कार्ड से रुपए निकालने गया था.’’

सौरभ झूठ बोला रहा था, यह बात पुलिस और राजीव गुप्ता अच्छी तरह जान रहे थे. पुलिस उस के खिलाफ और सुबूत जुटाना चाहती थी, इसलिए उस समय उस से ज्यादा कुछ नहीं कहा. चौकीप्रभारी ने यह बात थानाप्रभारी भानुप्रताप सिंह को बताई. मनीष के बारे में कोई जानकारी न मिलने से लोगों में पुलिस के प्रति गुस्सा बढ़ता जा रहा था. जनता आंदोलन न कर दे, इस से पहले ही एसएसपी शलभ माथुर ने इस मामले को ले कर एसपी (सिटी) सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज, क्षेत्राधिकारी करुणाकर राव और थानाप्रभारी भानुप्रताप सिंह को अपने औफिस में बुला कर मीटिंग की और जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा करने के निर्देश दिए.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का आदेश मिलते ही थानाप्रभारी ने सौरभ शर्मा और उस के मामा मोंटी उर्फ मुकेश शर्मा को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. मोंटी ने बताया कि जिस समय मनीष उस के मेडिकल स्टोर पर आया था, वह दुकान पर नहीं था. उस समय मेडिकल पर सौरभ था. सौरभ ने मोंटी की इस बात की पुष्टि भी की. इस के बाद पुलिस ने सौरभ से मनीष के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि मनीष पर बाजार का करीब 15 लाख रुपए का कर्ज हो गया है, इसलिए वह गोवा भाग गया है.

‘‘अगर वह गोवा भाग गया है तो उस का एटीएम कार्ड तुम्हारे पास कैसे आया, जिस से तुम ने पैसे निकाले थे?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने उस के नहीं, अपने कार्ड से पैसे निकाले थे.’’ सौरभ ने कहा.

पुलिस ने जब उस के खाते की जांच की तो पता चला कि उस ने उस दिन अपने खाते से पैसे निकाले ही नहीं थे. इस सुबूत को सौरभ झुठला नहीं सकता था, इसलिए उस ने स्वीकार कर लिया कि मनीष के एटीएम कार्ड्स से पिछले 3-4 दिनों में साढ़े 3 लाख रुपए उसी ने निकाले थे. पुलिस ने जब उस से मनीष के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि अपने भांजे रिंकू शर्मा के साथ मिल कर उस ने मनीष की हत्या कर उस की लाश को चंबल के बीहड़ों में फूंक दी है. जब घर वालों को पता चला कि उस के दोस्तों ने मनीष की हत्या कर दी है तो घर में हाहाकार मन गया.

पुलिस मनीष की लाश बरामद करना चाहती थी. चूंकि उस समय अंधेरा हो चुका था इसलिए बीहड़ में लाश ढूंढना आसान नहीं था. अगले दिन यानी 18 फरवरी, 2014 की सुबह इंसपेक्टर भानुप्रताप सिंह की अगुवाई में गठित  एक पुलिस टीम सौरभ शर्मा को ले कर चंबल के बीहड़ों में जा पहुंची. टीम सौरभ शर्मा द्वारा बताए स्थान पर पहुंची तो वहां लाश नहीं मिली. सौरभ पुलिस टीम को वहां 3 घंटे तक इधरउधर घुमाता रहा. पुलिस ने जब सख्ती की तो आखिर वह पुलिस को वहां से करीब 4 किलोमीटर दूर अरंगन नदी के पास स्थित एक पैट्रोल पंप के पीछे ले गया. उस ने बताया कि यहीं से उस ने मनीष की लाश को खाई में फेंकी थी.

खाई में भी पुलिस को लाश दिखाई नहीं दी. इस से अनुमान लगाया गया कि जंगली जानवर लाश खींच ले गए हैं. लिहाजा पुलिस इधरउधर लाश ढूंढने लगी. करीब 15 मिनट बाद एक पुराने खंडहर के पीछे एक सड़ीगली लाश दिखाई दी. लाश काफी विकृत अवस्था में थी. उस का चेहरा किसी भारी चीज से कुचला गया था. उस का दाहिना हाथ शरीर के सारे कपड़े गायब थे. बाएं हाथ की एक अंगुली में सोने की अंगूठी थी. उसी अंगूठी और जूतों से मनीष के भाई राजीव ने लाश की शिनाख्त की. लाश की स्थिति से अनुमान लगाया कि मनीष की हत्या कई दिनों पहले की गई थी. मनीष की लाश बरामद होने की बात राजीव ने अपने घर वालों को बता दी.

मौके की जरूरी काररवाई पूरी कर के पुलिस लाश ले कर आगरा आ गई. जैसे ही लाश पोस्टमार्टम हाउस पहुंची, सैकड़ों की संख्या में लोग वहां पहुंच गए. पुलिस के खिलाफ लोगों का गुस्सा भड़क उठा और वहां से जीवनी मंडी पुलिस चौकी पहुंच कर वहां से गुजरने वाले वाहनों को अपने गुस्से का शिकार बनाना शुरू कर दिया. लोग दुकानों पर तोड़फोड़ और लूटपाट करने लगे. इस में कई राहगीर भी घायल हुए. मौके पर जो 2-4 पुलिसकर्मी थे वे उन्हें समझाने और रोकने में असमर्थ रहे. उसी समय शहर के मेयर वहां पहुंचे तो भीड़ ने उन की गाड़ी को भी क्षतिग्रस्त कर दिया. किसी तरह गनर के साथ भाग कर वह सुरक्षित जगह पर पहुंचे. यह हंगामा लगभग एक घंटे तक चलता रहा.

ऐसा लग रहा था मानो शहर में पुलिस नाम की कोई चीज ही नहीं है. जब एसपी (सिटी) सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज काफी फोर्स के साथ वहां पहुंचे और हंगामा करने वालों पर लाठीचार्ज किया गया तब जा कर हंगामा रुका. पूछताछ में सौरभ शर्मा ने मनीष की हत्या की जो कहानी पुलिस को बताई, वह ‘मन में राम बगल में छुरी’ वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली थी. मनीष गुप्ता आगरा जिले के थाना छत्ता के मोहल्ला मस्वा की बगीची का रहने वाला था. वह अपने 9 बहनभाइयों में 8वें नंबर पर था. उस के पिता ओमप्रकाश गुप्ता की इलैक्ट्रिकल की दुकान थी, जिस से उन्हें अच्छी आमदनी होती थी. बीएससी करने के बाद मनीष पिता के साथ दुकान पर बैठने लगा था.

पिछले 8-9 महीने से मनीष दवाइयों का कारोबार करने लगा था. उस के संबंधों और व्यवहार की वजह से उस का यह कारोबार चल निकला था. उसे मोटी कमाई होने लगी थी. उस ने कई बैंकों में अपने खाते खोल लिए थे. मनीष गुप्ता अपने खानपान और पहनावे का काफी खयाल रखता था. शौकीन होने की वजह से वह महंगे मोबाइल फोन रखता था. दोनों हाथों की अंगुलियों में 7 सोने की अंगूठियां और गले में काफी वजनी सोने की चेन पहने रहता था. यह सब देख कर कोई भी उस की संपन्नता को समझ सकता था. वैसे तो अपनी उम्र के तमाम लड़कों के साथ उस का उठनाबैठना था, लेकिन उन में से 5-7 लोग उस के काफी करीबी थे. उन के साथ उस की दांत काटी रोटी थी. उन्हीं में से एक था सौरभ शर्मा. खेरिया मोड़, अर्जुननगर का रहने वाला सौरभ मनीष का ऐसा दोस्त था, जो मनीष की हर बात को जानता था.

सौरभ के पिता का देहांत हो चुका था. वह अपने परिवार के साथ किराए के मकान में रहता था. उस के मामा मोंटी उर्फ मुकेश शर्मा का लंगड़े की चौकी में मेडिकल स्टोर था. इस के अलावा मोंटी प्रौपर्टी डीलिंग का काम भी करता था. मोंटी ने अपने मेडिकल स्टोर के पास एक केबिन बनवा कर उस में सौरभ को मोबाइल रिचार्ज और एसेसरीज का धंधा करा दिया था. मनीष मोंटी के मेडिकल स्टोर पर दवाएं सप्लाई करता था. इसलिए वहां आने पर सौरभ से अपना मोबाइल फोन रिचार्ज करा लेता था. सौरभ मनीष के हमउम्र था, इसलिए उस की उस से दोस्ती हो गई.

सौरभ काफी तेजतर्रार था. उसी की मार्फत मनीष ने आईसीआईसीआई और एचडीएफसी बैंकों में खाते खुलवाए थे. मनीष को उस पर इतना विश्वास हो गया था कि कई बार उस ने अपने खातों में मोटी रकम जमा कराने के लिए सौरभ को भेज दिया था. सौरभ और मनीष बेशक गहरे दोस्त थे, लेकिन दोनों के स्तर में जमीनआसमान का अंतर था. सौरभ भी चाहता था कि उस के पास भी ढेर सारे पैसे हों. लेकिन उस छोटी सी दुकान की आमदनी से उस की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकती थी. लिहाजा उस ने अपने धनवान दोस्त की दौलत के सहारे अपनी इच्छा पूरी करने की योजना बनाई. उस योजना में उस ने अपने भांजे रिंकू को भी शामिल कर लिया. रिंकू की स्थिति भी सौरभ जैसी ही थी. दोनों ने सलाहमशविरा कर के मनीष के पैसे हड़पने की एक फूलप्रूफ योजना बना डाली.

13 फरवरी, 2014 को देपहर के समय मनीष घर से खापी कर अपनी मोटरसाइकिल से मोंटी के मेडिकल स्टोर पर पहुंचा. उस समय मोंटी अपनी दुकान पर नहीं था. सौरभ ही वहां बैठा था. सौरभ ने मनीष से अपनी प्रेमिका से मिलवाने की बात कही. पहले तो मनीष ने टाल दिया, लेकिन बारबार कहने पर मनीष तैयार हो गया. तब सौरभ ने मनीष को अर्जुननगर अपने घर के पास भेज कर इंतजार करने को कहा. मनीष अर्जुननगर तिराहे पर पहुंच कर सौरभ का इंतजार करने लगा. करीब 2 मिनट बाद सौरभ वहां पहुंचा. सौरभ उस की मोटरसाइकिल पर बैठ गया तो मनीष उस के बताए स्थान की तरफ चल दिया. रास्ते में सौरभ का भांजा रिंकू शर्मा भी मिल गया. सौरभ ने उसे भी उसी मोटरसाइकिल पर बैठा लिया.

सौरभ उसे अर्जुननगर के ही एक कमरे पर ले गया, जिसे रिंकू शर्मा ने अपनी पढ़ाई के लिए किराए पर ले रखा था. कुछ देर बाद रिंकू मनीष के लिए कोल्डड्रिंक की एक बोतल ले आया. उस कोल्डड्रिंक में रिंकू ने नींद की दवा मिला रखी थी. कोल्डड्रिंक पीने के बाद मनीष बेहोश होने लगा. तब तक अंधेरा हो चुका था. मनीष की आंखें झपकने लगीं तो सौरभ अपने असली रूप में आते हुए बोला, ‘‘मनीष, मैं ने तुम्हें किडनैप कर लिया है. अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो तुम्हें काट कर किसी नाले में फेंक दिया जाएगा.’’

मनीष जानता था कि उस का दोस्त सौरभ गुस्सैल और लड़ाकू है, लेकिन उसे यह पता नहीं था कि वह पैसों के लिए इतना गिर सकता है. उस की जान खतरे में थी. वह बेहोशी की तरफ बढ़ रहा था. फिर भी जान खतरे में देख कर उस ने हाथ जोड़ कर सौरभ से पूछा, ‘‘तुझे क्या चाहिए भाई? मुझे बता दे. मैं तुझे वह सब कुछ दे दूंगा.’’

‘‘फिलहाल तो तू अपनी जेब में रखे सभी एटीएम कार्ड्स मुझे दे कर उन के पिन नंबर बता दे. अर्द्धबेहोशी की हालत में भी मनीष समझ रहा था कि अगर उस ने एटीएम कार्ड्स और पिन नंबर नहीं दिए तो ये दोनों उस के साथ कुछ भी कर सकते हैं. लिहाजा उस ने अपने सभी एटीएम कार्ड्स उसे सौंपते हुए उन के पिन नंबर बता दिए. इस के थोड़ी देर बाद मनीष पूरी तरह बेहोश हो गया. मनीष के बेहोश होते ही सौरभ ने उसी शाम एक एटीएम कार्ड का इस्तेमाल कर के पास के ही आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम से साढ़े 7 हजार रुपए निकाल लिए. उस समय रिंकू मनीष की निगरानी कर रहा था.

सौरभ ने मनीष के दोनों मोबाइल फोनों को स्विच औफ कर दिया था. रात में मनीष को होश न आ जाए, सौरभ ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. मनीष के परिवार वालों को गुमराह करने के लिए अगले दिन सुबह सौरभ ने उस के दोनों फोन चालू कर दिए. दूसरी ओर मनीष के गायब होने से उस के घर वाले परेशान थे. इस बीच जब मनीष के भाई अनिल का फोन आया तो मनीष होश में नहीं था. फिर सौरभ ने उसे पहले ही बता दिया था कि उसे फोन पर क्या कहना है. इसलिए फोन रिसीव कर के मनीष ने वही कहा जो सौरभ ने कहने के लिए कहा था.

भाई से बात कराने के बाद सौरभ ने उसे पुन: बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. उस के बाद दोनों मोबाइल फिर बंद कर दिए. उन्होंने उस के हाथों की अंगूठियां और गले से चेन निकाल ली. योजना के अनुसार उन्होंने एक ही अंगूठी छोड़ दी थी. अब वह उसे ठिकाने लगाने योजना बनाने लगे. योजनानुसार 14 फरवरी, 2014 की सुबह करीब साढ़े 9 बजे रिंकू अरनौटा गांव जाने को कह कर एक टैंपो ले आया. यह गांव चंबल के बीहड़ में पड़ता है.

अर्द्धबेहोशी की हालत में उन दोनों ने मनीष को उस टैंपो में बैठा दिया. सौरभ मनीष के साथ टैंपो में बैठ गया तो रिंकू मनीष की मोटरसाइकिल ले कर टैंपो के पीछेपीछे चलने लगा. अरनौटा गांव के पास सुनसान जगह पर मनीष को टैंपो से उतार कर उन्होंने मोटरसाइकिल पर बैठा लिया और बसई अरेला गांव के नजदीक आंगन नदी के पैट्रोल पंप के पीछे की झाडि़यों में जा पहुंचे. वहां उन्होंने उस की गला दबा कर हत्या कर दी.

मनीष की शिनाख्त न होने पाए इस के लिए उन्होंने उस के कपड़ों व चेहरे पर तेजाब डाल कर उसे जला दिया. तेजाब वे अपने साथ ले कर आए थे. मनीष के दाहिने हाथ को पत्थर पर रख कर दूसरा भारी पत्थर पटक कर उस के उस हाथ को शरीर से अलग कर दिया. दूसरे हाथ की भी सारी अंगुलियां तोड़ दीं. एक अंगूठी इन लोगों ने जानबूझ कर उस की अंगुली में छोड़ दी थी कि अगर पुलिस को लाश मिल भी जाए तो वह उसे प्रेम प्रसंग के चलते नफरत में की गई हत्या समझे, लूट की वजह से नहीं. वहां से चलने से पहले सौरभ और रिंकू ने एक भारी पत्थर उठा कर मनीष के सिर पर दे मारा. मनीष की खोपड़ी कई टुकड़ों में बंट गई. लाश को बुरी तरह क्षतिग्रस्त करने के बाद दोनों ने उसे 40-50 फुट नीचे गहरी खाई में फेंक दी और फिर आगरा लौट आए.

फतेहाबाद रोड स्थित एटीएम से एक लाख 10 हजार रुपए अलगअलग कार्डों के जरिए निकाल लिए. इस के बाद उन्होंने मनीष की मोटरसाइकिल (UP Crime news) आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के बाहर खड़ी कर दी और घर चले गए. सौरभ ने मनीष एटीएम कार्डों से कुल साढ़े 3 लाख रुपए निकाले. मनीष के गहने और एटीएम से निकाले रुपए दोनों ने आपस में बांट लिए. मनीष की मोटरसाइकिल आगरा कैंट स्टेशन के बाहर जीआरपी ने बरामद कर के इस की सूचना थाना सदर बाजार को दे दी थी, जिसे बाद में मनीष के भाई ने पहचान लिया था. सौरभ और रिंकू के खिलाफ भादंवि की धारा 364, 302, 201 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

दूसरे अभियुक्त रिंकू की गिरफ्तारी के लिए कई जगहों पर दविश डाली गई, लेकिन वह नहीं मिल सका. कथा संकलन तक वह फरार था. पुलिस उसे सरगर्मी से तलाश रही है. मामले की विवेचना एसएसआई रमेश भारद्वाज कर रहे हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Haryana Crime news : करोड़ों की जमीन के लालच में बहन ने किया भाई का कत्ल

Haryana Crime news : सुरजीत को प्रीति से नहीं, उस की करोड़ों की जमीन से प्यार था, जिसे पाने के लिए उस ने सोनू की मदद से षड्यंत्र रच कर उस के पति विजय और नरेश की हत्या की, फिर…

इलाके की गश्त से लौटतेलौटते मुझे सुबह के 4 बज गए थे. थाने आते ही मैं ने एक सिपाही से चाय बना कर लाने को कहा. पूरी रात गश्त करने की वजह से काफी थकान महसूस हो रही थी, इसलिए कमर सीधी करने की गरज से मैं रेस्टरूम में पड़े बेड पर लेट गया. सिपाही चाय बना कर लाता, उस के पहले ही मुंशी ने मेरे पास आ कर कहा, ‘‘सर, अभीअभी मुंडियां चौकी से वायलैस संदेश आया है कि गुरु तेगबहादुर नगर की गली नंबर-3 में किसी की हत्या कर दी गई है.’’

चूंकि संदेश स्पष्ट नहीं था, इसलिए अधिक जानकारी नहीं मिल सकी थी. लेकिन उस के बाद चौकीइंचार्ज सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह ने फोन कर के मुझे जल्दी घटनास्थल पर पहुचंने को कहा है. मुंशी अपना काम कर के चला गया था. हत्या की जानकारी मिलने पर चाय पीने का होश कहां रहा. चाय की बात भूल कर मैं उठा और परिसर में खड़ी जीप पर सवार हो कर ड्राइवर से मुंडिया चौकी की ओर चलने को कहा. मेरे जीप पर सवार होते ही मेरे साथ गश्त कर रहे सिपाही भी जीप पर सवार हो गए थे. सब के सवार होते ही जीप चल पड़ी थी.

मुंडिया चौकी, लुधियाना-चंडीगढ़ रोड पर मुंडियां गांव से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर थी. सड़क से गांव जाने वाली टूटीफूटी सड़क पर हम हिचकोले खाते हुए लगभग 25 मिनट में मुंडिया चौकी पहुंचे. चौकी का मुंशी हेडकांस्टेबल सुखविंदर सिंह चौकी पर ही मिल गया था. उसे साथ ले कर मैं घटनास्थल पर जा पहुंचा. चौकीइंचार्ज वरनजीत सिंह और हेडकांस्टेबल हरभजन सिंह वहां पहले ही पहुंच गए थे. जिस घर में वारदात हुई थी, उस के सामने काफी भीड़ जमा थी. उन्हीं लोगों के बीच 24-25 साल की एक खूबसूरत औरत दहाड़े मार कर रो रही थी. पूछने पर पता चला कि इस का नाम प्रीति है और इसी के पति की हत्या हुई है.

‘‘जिस की हत्या हुई है, उस का नाम क्या है?’’ मैं ने सबइंसपेक्टर वरनजीत से पूछा तो उस ने बताया, ‘‘सर, एक नहीं, 2 लोग मारे गए हैं. यह महिला रो रही है, इस के पति का नाम विजय कुमार था. दूसरा उस का साथी नरेश था. उस की लाश ऊपर के कमरे में पड़ी है.’’

एक ही मकान में 2-2 हत्याओं की बात सुन कर मैं चकरा गया. प्रीति का रोरो कर बुरा हाल था. वह छाती पीटपीट कर रो रही थी. आसपड़ोस की औरतें उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं. फिलहाल वह कुछ बताने की स्थिति में नहीं थी, इसलिए मैं ने मोहल्ले वालों से घटना के बारे में पूछना शुरू किया. उन लोगों ने बताया कि 2 गोलियां चली थीं. उस के बाद प्रीति गली में खड़ी हो कर चिल्ला रही थी, ‘‘मार दिया रे, मेरे पति को गोली मार दिया रे… पकड़ो… गोली मार कर वे भागे जा रहे है.’’

उस की चीखपुकार सुन कर ही लोग बाहर आए थे. मैं उन लोगों से जानना चाहता था कि गोली मारने वाले कौन थे, कहां से आए थे, उन्होंने दोनों को गोली क्यों मारी? लेकिन इस बारे में आसपड़ोस वाले कुछ नहीं बता सके थे. इस घटना की सूचना अधिकारियों को देने के साथ सुबूत जुटाने के लिए मैं ने क्राइम टीम को भी घटनास्थल पर बुला लिया. चौकीइंचार्ज वरनजीत सिंह के साथ मैं ने घटनास्थल और लाशों का बारीकी से निरीक्षण किया.

गभग 35-40 गज का वह 2 मंजिला मकान था. भूतल पर एक कमरा, रसोई, टायलेट था तो ऊपर वाली मंजिल पर सिर्फ एक कमरा और उस के सामने बरामदा बना हुआ था. मारा गया विजय कुमार पत्नी प्रीती के साथ भूतल पर रहता था. ऊपर वाले कमरे में उस का दोस्त नरेश अकेला ही रहता था. वह विजय के साथ ही काम करता था और उस का खानापीना भी उसी के साथ होता था. विजय कुमार की लाश नीचे वाले कमरे में बेड पर पड़ी थी. वह 26-27 साल का अच्छाखासा जवान था. उस के सीने पर एक सुराख था, जिस से उस समय तक खून रिस रहा था. सीने के उस सुराख को देख कर लग रहा था कि हत्यारे ने उस पर एकदम करीब से गोली चलाई थी.

मैं ने कमरे में एक नजर डाली. कमरे का सारा सामान यथावत था. किसी भी चीज के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई थी. अच्छी तरह निरीक्षण करने के बाद भी वहां से ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला, जिस से हत्यारों तक पहुंचने में मदद मिलती. इस के बाद मैं सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह के साथ ऊपर वाले कमरे में गया. उस कमरे का हाल भी लगभग नीचे वाले कमरे जैसा ही था. नरेश की उम्र भी 26-27 साल थी. उस की भी सीने में गोली मर कर हत्या की गई थी. कमरे में पड़े बेड के पास ही 3 कुरसियां और एक टेबल रखी थी. टेबल पर कांच के 4 खाली गिलास, बीयर की 4 खाली बोतलें, एक शराब की खाली बोतल, पानी का जग और एक प्लेट रखी थी, जिस में शायद खानेपीने का कोई सामान रखा गया था. इस का मतलब था कि हत्याएं होने से पहले सब ने एकसाथ बैठ कर शराब पी थी.

मेरे कहने पर वरनजीत सिंह ने वह सारा सामान कब्जे में ले लिया. क्राइम टीम ने भी अपना काम निबटा लिया तो अन्य औपचारिक काररवाई पूरी कर के मैं ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दीं. इस के बाद थाने लौट कर मैं ने अज्ञात लोगों के खिलाफ इस मामले का मुकदमा दर्ज करा कर जांच शुरू कर दी. प्रीति का बयान लेने की गरज से उसी दिन दोपहर को मैं उस के घर पहुंचा. सांत्वना दे कर मैं ने उस से पूरी घटना के बारे में विस्तार से बताने को कहा. प्रीति गुरु तेगबहादुर नगर की गली नंबर 3 निहाल सिंह वाली मुंडियां में स्थित मकान में अपने पति विजय कुमार के साथ किराए पर रहती थी. विजय कुमार ने वह पूरा मकान किराए पर ले रखा था. इसी मकान के ऊपर वाले कमरे में उस का दोस्त नरेश रहता था.

विजय अपने साथी नरेश के साथ मकानों और औफिसों में एल्युमिनियम की खिड़कीदरवाजे लगाने का काम करता था. काम न होने की वजह से उस दिन सुबह से ही दोनों घर पर थे. प्रीति एक ब्यूटीपार्लर में काम करती थी. उस दिन उस की साप्ताहिक छुट्टी थी, इसलिए वह भी घर पर थी. करीब 3 बजे विजय ने प्रीति से कहा, ‘‘तुम 2-3 घंटे के लिए ब्यूटीपार्लर वाली अपनी सहेली के यहां चली जाओ. बाहर से मेरे कुछ दोस्त आ रहे हैं. उन से हमें कुछ व्यक्तिगत बातें करनी हैं, जो तुम्हारे सामने नहीं हो सकतीं.’’

विजय कुमार के कहने पर प्रीति अपनी सहेली के घर चली गई. उसी के साथ विजय और नरेश भी स्कूटर से अपने आने वाले दोस्तों को लेने के लिए समराला चौक की ओर रवाना हो गए थे. शाम 7 बजे के आसपास प्रीति वापस आई तो ऊपर वाले कमरे से बातचीत और हंसने की आवाजें आ रही थीं. प्रीति ने ऊपर जा कर कमरे में झांक कर देखा तो विजय और नरेश के साथ 2 लड़के बैठे थे. सब शराब पीते हुए आपस में हंसीमजाक कर रहे थे. विजय के साथ बैठे उन लड़कों को प्रीति ने इस के पहले कभी नहीं देखा था. उसे देख कर विजय उठा और उस के पास आ कर बोला, ‘‘अच्छा हुआ तुम आ गईं. मैं तुम्हें फोन करने वाला था. तुम नीचे जाओ और सभी के लिए खाने का इंतजाम करो.’’

प्रीति नीचे आ गई और खाना बनाने लगी. 10 बजे तक उस का खाना बन गया तो वह बेड पर लेट गई, क्योंकि अभी तक ऊपर उन लोगों की महफिल जमी हुई थी. रात करीब 11 बजे विजय ने प्रीति से खाना लगाने को कहा तो उस ने खाना लगा दिया. खाना खा कर नरेश और बाहर से आए दोनों लड़के ऊपर वाले कमरे में सोने चले गए तो विजय और प्रीति नीचे वाले कमरे में लेट गए. नशे में होने की वजह से विजय तुरंत सो गया, लेकिन प्रीति को नींद नहीं आ रही थी. लगभग आधे घंटे बाद विजय के दोनों दोस्तों में से एक ने नीचे आ कर कमरे का दरवाजा खटखटाया. प्रीति ने सोचा किसी को पानी वगैरह चाहिए, इसलिए उस ने दरवाजा खोल दिया. विजय का वह दोस्त धीरे से अंदर आ गया और कमरे में पड़े बेड पर बैठ गया. खटरपटर से विजय की भी आंख खुल गई थी. दोस्त को देख कर वह भी उठ कर बैठ गया.

विजय के साथी ने आंखों से कोई इशारा किया तो विजय ने प्रीति की ओर देखते हुए कहा, ‘‘प्रीति, तुम थोड़ी देर के लिए बाहर चली जाओ. हमें एक जरूरी बात करनी है.’’

विजय की इस बात पर प्रीति हैरान रह गई. उस की समझ में नहीं आया कि ऐसी कौन सी बात है, जो आधी रात को होनी है, सुबह नहीं हो सकती. बात करने का यह भी कोई समय है. प्रीति उतनी रात को बाहर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन विजय जिद पर अड़ गया. आधी रात को कोई तमाशा न खड़ा हो, यह सोच कर प्रीति गुस्से से पैर पटकती हुई बाहर निकल गई. प्रीति कमरे से बाहर निकली ही थी कि एक धमाका हुआ. वह गोली चलने की आवाज थी. गोली चलने की आवाज सुन कर वह तुरंत लौट पड़ी. वह कमरे के दरवाजे पर ही पहुंची थी कि अंदर से वह लड़का तेजी से प्रीति को धक्का दे कर निकल गया. उस के हाथ में पिस्तौल थी. पिस्तौल देख कर ही वह सारा मामला समझ गई.

तभी एक धमाका ऊपर हुआ. उस ने ऊपर की ओर देखा तो सीढि़यों से उस का दूसरा साथी उतर रहा था. दोनों लड़के नीचे मिले और बाहर गली में खड़े उस के स्कूटर को स्टार्ट किया. पीछे वाले लड़के ने प्रीति को पिस्तौल दिखा कर कहा, ‘‘हम लोगों के जाने तक चुप रहना. अगर शोर मचाया तो तुझे भी गोली मार दूंगा.’’

दोनों लड़के उसी के स्कूटर से चले गए. प्रीति असमंजस की स्थिति में किसी बुत की तरह खड़ी यह सब देखती रही. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. लड़कों के जाने के बाद वह भाग कर कमरे में गई. अंदर की हालत देख कर उस की सांस थम सी गई. बेड पर उस के पति की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस के सीने से खून बह रहा था. यह देख कर उस के होश उड़ गए. प्रीति चीखतीचिल्लाती हुई मदद के लिए ऊपर के कमरे की ओर भागी. हड़बड़ाहट में उसे खयाल ही नहीं रहा कि ऊपर भी एक धमाका हुआ था. बेड पर पड़ी नरेश की लाश देख कर उसे उस धमाके की याद आ गई. नरेश की लाश उसी तरह पड़ी थी, जिस तरह विजय की लाश पड़ी थी. 2-2 लाशें देख कर प्रीति पागलों की तरह मदद के लिए चीखने लगी.

प्रीति का चीखनाचिल्लाना सुन कर आसपास वाले अपनेअपने घरों से बाहर आ गए, लेकिन हत्यारे तो कब के भाग चुके थे. पड़ोसी प्रीति को सांत्वना देने लगे. इतनी जानकारी मिलने के बाद मैं ने प्रीति से हत्यारों का हुलिया जानना चाहा तो उस ने बताया, ‘‘दोनों की उम्र 30 साल के आसपास रही होगी. उन की लंबाई ठीकठाक थी. उन के सिर के बाल छोटेछोटे थे. एक ने जींस पर शर्ट पहन रखी थी तो दूसरे ने टीशर्ट.’’

प्रीती से पूछताछ के बाद एक बार फिर मैं ने प्रीति के पड़ोसियों से पूछताछ की. पड़ोसियों ने बताया था कि आधी रात को गोलियों के चलने की आवाज से उन की आंखें खुल गई थीं. उस के बाद स्कूटर स्टार्ट होने की आवाज आई थी. स्कूटर के चले जाने के कुछ देर बाद प्रीति के चीखनेचिल्लाने की आवाज आई तो सभी घर से बाहर आ कर उस की ओर दौड़ पड़े थे. लुधियाना का मुंडियां कलां अभी नया बस रहा मोहल्ला था. इसलिए वहां के ज्यादातर प्लौट खाली पड़े थे. लेकिन यह मोहल्ला सुनसान भी नहीं था. प्रीति जिस गली नंबर 3 के मकान में रहती थी, उस गली में कोई भी प्लौट खाली नहीं था. मैं ने इंचार्ज सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह और हेडकांस्टेबल हरभजन सिंह को गुप्तरूप से इस मामले की जांच करने का आदेश दिया.

अब तक की जांच से यह पता चल गया था कि हत्यारे मारे गए लोगों की जानपहचान के थे. लेकिन बाद में जो जानकारियां मिलीं, वे चौंकाने वाली थीं. पड़ोसियों ने बताया था कि प्रीति का असली नाम कमलजीत कौर था. पतिपत्नी में लगभग रोज ही झगड़ा होता था. लेकिन वे इस झगड़े की वजह नहीं बता सके थे. मैं ने अंदाजा लगाया कि झगड़े की वजह नरेश भी हो सकता था, क्योंकि वह शुरू से ही उन दोनों के साथ रह रहा था. पड़ोसियों ने यह भी बताया था कि विजय और नरेश कोई खास कामधंधा नहीं करते थे. इस के बावजूद उन के खर्च शाही थे. इस का अंदाजा तो उन के घर को देख कर भी लगाया जा सकता था.

क्येंकि घर में सुखसुविधा का हर सामान मौजूद था. इस का मतलब यह हुआ कि कहने को वे डोरविंडो फिटिंग का काम करते थे, लेकिन उन का असली काम कुछ और ही था. उन का रहनसहन, खानपान, पहनावा और खर्च देख कर कहीं से भी नहीं लगता था कि वे मेहनतमजदूरी करने वाले साधारण लोग थे. बहरहाल, अब तक मेरी और सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह की जांच एवं पड़ोसियों से मिली जानकारी से यही नतीजा निकल रहा था कि इस दोहरे हत्याकांड की वजह कहीं न कहीं से अवैध संबंध हैं, क्योंकि अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि ये हत्याएं लूटपाट या आपसी रंजिश की वजह से नहीं हुई थीं. अगर ये हत्याएं रंजिश की वजह से हुई होतीं तो हत्यारे प्रीति को भी जिंदा न छोड़ते.

क्योंकि कोई भी अपराधी यह कभी नहीं चाहेगा कि उस के किए अपराध का कोई चश्मदीद गवाह जिंदा रहे. यह सोचने वाली बात थी कि घर के 2 लोगों की हत्या कर के हत्यारे प्रीति को जिंदा क्यों छोड़ गए? यह पता लगाना जरूरी था. क्योंकि इसी के पीछे विजय और नरेश की हत्या का रहस्य छिपा था. इसी बात को ध्यान में रख कर मैं ने अपनी जांच आगे बढ़ाई. मैं ने कुछ विश्वसनीय और तेजतर्रार पुलिस वालों की एक टीम बना कर प्रीति के बारे में पता लगाने के साथ अपने कुछ मुखबिरों की भी मदद ली. टीम को मैं ने मारे गए विजय और नरेश के कामधंधे एवं उन के चरित्र के बारे में भी पता करने को कहा था. आखिर मेहनत रंग लाई और कुछ ही दिनों में जो नतीजा सामने आया, वह चौंकाने वाला था. मजे की बात यह थी कि इस दोहरे हत्याकांड की साजिश रचने वाली खुद प्रीति उर्फ कमलजीत कौर ही थी.

मेरे कहने पर सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह प्रीति को थाने ले आए. मैं ने उस से पूछताछ शुरू की तो वह उस हर बात से मना करती रही, जो मैं ने अपने सूत्रों से पता किया था. मैं ने उस पर दबाव बनाने की कोशिश की तो वह पुलिस को बुराभला कहते हुए बोली, ‘‘मेरे ही पति की हत्या हुई है. आप लोग हत्यारों को ढूंढ़ने के बजाय मुझे ही दोषी ठहराने पर तुले हैं.’’

जब मुझे लगा कि सीधी अंगुली से घी निकलने वाला नहीं है तो मैं ने पुलिसिया दांव आजमाने का मन बनाया. मैं ने उसे महिला पुलिस जसबीर कौर और सिमरन कौर के हवाले कर दिया. फिर तो थोड़ी ही देर में प्रीति अपना अपराध स्वीकार कर के इस दोहरे हत्याकांड की सच्चाई बताने को तैयार हो गई. इस के बाद उस ने विजय और नरेश की हत्याओं के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी:

प्रीति उर्फ कमलजीत कौर मूलरूप से हरियाणा के करनाल (Haryana Crime news) की रहने वाली थी. उस के परिवार में मातापिता के अलावा एक भाई जोगा सिंह था. मातापिता का नाम बताना इसलिए उचित नहीं है, क्योंकि वे शरीफ, सज्जन और इज्जतदार लोग हैं. जोगा सिंह और प्रीति, दोनों बचपन से उच्च महत्त्वाकांक्षी और स्वच्छंद प्रवृत्ति के थे. मौजमस्ती में डूबे रहने की वजह से दोनों ही ज्यादा पढ़लिख नहीं सके तो अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी करने के लिए अपराधियों से संबंध बना लिए और अपहरण, लूटपाट, डकैती और हत्याओं जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम देने लगे.

प्रीति उर्फ कमलजीत कौर अपने भाई जोगा सिंह से 4 कदम आगे थी. खूबसूरत तो वह इतनी थी कि जिस की भी नजर एक बार उस पर पड़ जाती, हटाने का नाम नहीं लेता था. यही वजह थी कि राह चलते लोगों को पलक झपकते वह अपना दीवाना बना लेती थी. यही वजह थी कि प्रीती के जवान होते ही उस के चाहने वालों की लाइन लग गई थी. लेकिन वह सभी को मय के भरे प्याले की तरह अपनी जवानी को दूर से दिखा कर ललचाती रहती थी, किसी को हाथ नहीं लगाने देती थी.

उसी बीच उस के भाई जोगा सिंह के हाथों एक कत्ल हो गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. मातापिता बहनभाई के कारनामों से वैसे ही दुखी थे, इसलिए उन की ओर से जोगा की पैरवी का सवाल ही नहीं उठता था. इसलिए प्रीति को ही भाई को छुड़ाने की पैरवी करनी पड़ रही थी. वह सप्ताह में 2 बार उस से मिलने करनाल जेल भी जाती थी. उन्हीं दिनों हरियाणा के जींद का रहने वाला विजय कुमार भी अपने दोस्त नरेश से मिलने सप्ताह में 2 बार करनाल जेल आता था. उसी दौरान प्रीति की मुलाकात विजय से हुई थी. विजय भी हृष्टपुष्ट एवं इस तरह का खूबसूरत युवक था कि कोई भी लड़की उसे देखे तो कम से कम एक बार उसे और देखने का मन हो जाए.

विजय शक्लसूरत और पहनावे से ठीकठाक तो लगता ही था, यह भी लगता था कि उस के पास पैसों की कमी नहीं है. जबकि सच्चाई यह थी कि वह हरियाणा के एक ऐसे अपराधी गिरोह का सदस्य था, जो लूटमार, अपहरण और डकैती आदि से मोटी कमाई कर रहा था. बहरहाल, जेल में अपनेअपने मिलने वालों का नाम लिखवा कर विजय और प्रीति जेल के बाहर बैठ कर मिलाई का इंतजार करते थे. प्रीति सुंदर तो थी ही, विजय खाली समय में उसे ही ताकता रहता था. स्मार्ट विजय प्रीति को भा गया, इसलिए वह भी उस से आंखें मिलाने लगी. परिणामस्वरूप जल्दी ही दोनों में दोस्ती हो गई तो वे सब से अलग हट कर एकांत में एक साथ बैठने लगे. जल्दी ही दोनों की यह दोस्ती काफी गहरी हो गई.

विजय अपने दोस्त नरेश की जमानत की कोशिश कर ही रहा था, प्रीति से दोस्ती के बाद उस ने जोगा की जमानत के लिए कोशिश ही नहीं की, बल्कि पैसा भी पानी की तरह बहाया. उसी की कोशिश का नतीजा था कि नरेश के साथ जोगा को भी जमानत मिल गई. नरेश और जोगा की जमानतें हो गईं तो विजय और प्रीति का करनाल जेल जाना बंद हो गया, लेकिन अब तक दोनों के संबंध इतने गहरे हो चुके थे कि वे कभी हिसार तो कभी जींद तो भी करनाल तो कभी कुरुक्षेत्र में मिलने लगे. विजय ने प्रीति पर जो एहसान किया था, वह उसे कैसे भूल सकती थी. धीरेधीरे वह विजय के इतने करीब आ गई कि घर वालों को बिना बताए ही विजय से कोर्टमैरिज कर ली.

मांबाप से तो वैसे भी कोई मतलब ही नहीं था, लेकिन बहन का यह कदम भाई जोगा सिंह को भी अच्छा नहीं लगा. अत: वह भी उस से नफरत करने लगा, क्योंकि वह विजय की असलियत अच्छी तरह जानता था. शादी के बाद कुछ दिनों तक प्रीति विजय के साथ करनाल में रही, लेकिन उस के बाद विजय और नरेश उसे ले कर लुधियाना आ गए. लुधियाना के मुंडिया में किराए का मकान ले कर सभी एक साथ रहने लगे. दरअसल विजय का प्रीति से शादी कर के लुधियाना आने की वजह यह थी कि हरियाणा (Haryana Crime news) पुलिस, खासकर जींद पुलिस विजय और नरेश के पीछे हाथ धो कर पड़ गई थी. वे कभी भी ऐनकाउंटर में मारे जा सकते थे. इसलिए वे लुधियाना भाग आए थे. प्रीति से शादी उस ने इसलिए की थी कि पत्नी के साथ रहने पर लोगों को संदेह कम होता है और मकान वगैरह भी आसानी से मिल जाता है.

विजय और नरेश आपराधिक गिरोह के सदस्य हैं, यह बात प्रीति को पहले मालूम नहीं थी. लेकिन जब उसे इस बात का पता चला तो भी उस ने बुरा नहीं माना, क्योंकि वह ऐशोआराम से जीने की आदी थी. विजय के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. इस के अलावा उस के पास रुतबा भी था. उस के एक बार कहने पर विजय और नरेश किसी को भी गोली मार सकते थे. विजय और प्रीति का दांपत्य ठीकठाक चल रहा था. लेकिन इस में दरार तब आ गई, जब विजय को अपने दोस्त नरेश को ले कर प्रीति पर शक हो गया. दरअसल हुआ यह कि एक दिन नरेश जल्दी घर आ गया. खाना खा कर वह प्रीति के पास बैठ कर बातें करने लगा. किसी बात पर दोनों हंस रहे थे कि तभी अचानक विजय आ गया. उस ने नरेश और प्रीति की इस हंसी का कुछ और ही नतीजा निकाल लिया.

अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की सोच कुछ ऐसी होती है. क्योंकि उन्हें जब स्वयं पर ही विश्वास नहीं होता तो वे दूसरे पर भला कैसे विश्वास कर सकते हैं. बस उसी दिन से विजय और प्रीति के बीच क्लेश शुरू हो गया. धीरेधीरे यह क्लेश इतना बढ़ गया कि प्रीति विजय से नफरत करने लगी. उसी दौरान विजय के घर उस के गिरोह के सरगना सुरजीत का आनाजाना शुरू हो गया. सुरजीत, बिट्टू और सोनू डागर का एक ऐसा गिरोह था, जिस का आतंक उन दिनों पूरे हरियाणा में था. इन के हाथ इतने लंबे थे कि जेल में रहते हुए भी ये आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते रहते थे. नरेश और विजय सुरजीत के गिरोह के सक्रिय सदस्य थे.

उसी बीच किसी बैंक को लूटने के चक्कर में सुरजीत कई दिनों तक विजय के घर रुका तो प्रीति की खूबसूरती पर वह रीझ गया. वहां रहते हुए उस ने देखा था कि विजय रोज शराब पी कर उस की पिटाई करता है. प्रीति की परेशानी को देखते हुए एक दिन उस ने कहा, ‘‘प्रीति, अगर तुम विजय को छोड़ दो तो मैं तुम्हें अपनाने को तैयार हूं. मैं तुम्हें रानी बना कर रखूंगा. तुम्हें तो पता ही है कि गिरोह का सरगना मैं हूं. विजय और नरेश मेरे गिरोह के सदस्य हैं. मेरे सामने इन की क्या औकात है. अगर मैं इन्हें अपने गिरोह से निकाल दूं तो इन्हें सड़क पर खड़े हो कर भीख मांगनी पड़ेगी.’’

प्रीति भी महसूस कर रही थी कि सुरजीत उस पर पूरी तरह से फिदा है. उस की बात में दम भी था. गिरोह का सरगना वही था. उस ने देखा भी था कि किसी की भी हिम्मत उस के सामने बोलने की नहीं होती थी. उस के सामने शेर बना रहने वाला विजय सुरजीत के सामने आंख तक नहीं उठाता था. प्रीति सुरजीत की बात मान कर उस की झोली में जा गिरी. अब समस्या यह थी कि विजय से कैसे पीछा छुड़ाया जाए. अगर सुरजीत चाहता तो अपनी ताकत के बल पर भी प्रीति को अपने साथ भी रख सकता था. लेकिन इस में खतरा था. जोरू के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है. सामने से नहीं तो पीछे से विजय वार कर ही सकता था. इसलिए सुरजीत ने सोचा, विजय को खत्म कर दिया जाए. जब वह रहेगा ही नहीं तो वार कौन करेगा.

विजय से शादी की वजह से जोगा सिंह प्रीति से काफी नाराज था. इसी वजह से प्रीति को भी भाई से नफरत हो गई थी. जिस की वजह से वह भाई के बारे में कुछ और ही सोचने लगी थी. जोगा सिंह की पैतृक जमीन की कीमत करोड़ों में थी. उस पर उस का अकेले का कब्जा था. जब इस बात का पता सुरजीत को चला तो उस ने बहनभाई की नफरत को हवा दे कर प्रीति को उकसाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी करोड़ों की जमीन जोगा सिंह हड़पे हुए है. अगर उसे निपटा दिया जाए तो करोड़ों की वह जमीन तुम्हारी हो सकती है.’’

करोड़ों की जमीन के लालच में प्रीति भाई की हत्या कराने के लिए तैयार हो गई. इस के बाद वह सुरजीत को ले कर जींद के सापर गांव में रहने वाली अपनी बड़ी बहन बलजीत कौर के यहां भी गई. उस ने भी हामी भर दी, क्योंकि जोगा सिंह ने उसे भी हिस्सा नहीं दिया था. इस के बाद सुरजीत ने जो योजना बनाई, उस के अनुसार पहले विजय और नरेश को ठिकाने लगा कर प्रीति को हासिल करना था. प्रीति के साथ आने के बाद उसे जोगा सिंह से प्रीति के हिस्से की जमीन मांगना था. अगर उस ने जमीन दे दी तो ठीक अन्यथा उसे ठिकाने लगा कर पूरी जमीन पर कब्जा कर लेना था. इस के बाद प्रीति को भी ठिकाने लगा कर करोड़ों की उस जमीन पर वह कब्जा कर लेता. इस योजना को अंजाम देने के लिए सुरजीत ने सोनू डागर को साथ मिला लिया.

यहां यह बताना जरूरी है कि सुरजीत और सोनू सजायाफ्ता अपराधी थे. करनाल के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के यहां से सुरजीत को उम्रकैद की सजा हुई थी. 6 साल की सजा काटने के बाद 7 मार्च, 2009 को वह 32 दिनों के पैरोल पर जेल से बाहर आया तो लौट कर गया ही नहीं. इस के बाद अदालत से उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया था. जिस रात विजय और नरेश की हत्या हुई थी, उस से एक दिन पहले सुरजीत ने विजय को फोन कर के कहा था कि अगर वह लुधियाना में उस के रहने की व्यवस्था कर दे तो कुछ दिनों के लिए वह लुधियाना आ जाए. विजय ने ऊपर वाले जिस कमरे में नरेश रहता था, उसी में सुरजीत के रहने की व्यवस्था कर के उस ने उसे लुधियाना आने के लिए कह दिया था.

फिर उसी दिन शाम को सुरजीत और सोनू डागर समराला चौक पहुंच गए थे. विजय और नरेश वहां खड़े उन का इंतजार कर रहे थे. विजय उन्हें साथ ले कर अपने घर पहुंचा. घर जाते हुए रास्ते में उन्होंने खानेपीने की चीजें खरीद ली थीं. घर पहुंचते ही महफिल जम गई थी. सुरजीत को देख कर प्रीति खुशी से झूम उठी थी, क्योंकि उसे पता था उस दिन उसे विजय से मुक्ति मिल जाएगी. योजना के अनुसार, सुरजीत ने विजय और नरेश को अधिक शराब पिला दी थी. उन की महफिल देर रात तक जमी रही. रात 11 बजे खाना खा कर सब सो गए. साढ़े 11 बजे के बाद सुरजीत उठा और बगल में सो रहे नरेश को गोली मार दी. नरेश को मार कर दोनों नीचे उतरे. नीचे आ कर सोनू ने सो रहे विजय को गोली मार कर उस का भी खेल खत्म कर दिया. प्रीति खड़ी तमाशा देखती रही.

साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाली प्रीति ने सुख और दौलत के लिए अपनी आंखों के सामने पति की हत्या करवा कर खुद को विधवा करवा लिया. विजय और नरेश की हत्या कर के सुरजीत और सोनू विजय के ही स्कूटर से चले गए. उन के जाने के बाद प्रीती ने अपना नाटक शुरू किया. पूछताछ के बाद मैं ने प्रीती को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मैं ने सुरजीत और सोनू की तलाश में न जाने कहांकहां छापे मारे, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. मैं ने समय से इस मामले की चार्जशीट अदालत में पेश कर दी, जिस से मुकदमा चला. हत्या का षड्यंत्र रचने और पुलिस को गुमराह करने के जुर्म में प्रीति को 5 साल की सजा हुई. इस समय वह लुधियाना की जेल में अपनी सजा काट रही है. मजे की बात यह है कि सुरजीत और सोनू का पता आज तक नहीं चला है.

— प्रस्तुति : हरमिंदर खोजी

 

Delhi Crime : पहले बीवी से बात की फिर झूल गया फांसी पर

Delhi Crime : उस ने मरने से पहले आखिरी बार अपनी पत्नी से बात की. बातचीत के कुछ समय बाद उस ने फांसी के फंदे पर लटक कर आत्महत्या कर ली. इस सनसनीखेज वारदात ने लोगों को झकझोर कर रख दिया. मामला राजधानी दिल्ली के मौडल टाउन इलाके के कल्याण विहार की है, जहां 39 वर्षीय पुनीत खुराना की मौत की खबर सुन कर सनसनी फैल गई।

उस ने अपने ही घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी. जब परिवार वालों को पता चला कि दरवाजा अंदर से बंद है तो उन्होंने देखा कि वह फांसी के फंदे पर लटका हुआ है.

पुलिस को सूचना

आननफानन में इस की सूचना पुलिस को दी गई। पुलिस को जांच में पता चला कि पुनीत की शादी 2016 में हुई थी और उस का अपनी पत्नी से तलाक का केस चल रहा था.

परिवार वालों का कहना है कि पुनीत अपनी पत्नी से परेशान था और उस ने आखिरी बार अपनी पत्नी से बात भी की थी. इसी बीच पुनीत की पत्नी का इंस्टा पोस्ट भी सुर्खियों में रहा. करीब 6 दिन पहले पुनीत की पत्नी मनिका पाहवा ने अपने इंस्टा पोस्ट में लिखा था कि तनावभरे माहौल और दुर्व्यवहार के बाद वह ठीक हो रही है और बेहतर होने की कोशिश कर रही है.

आखिरी बार की बातचीत

पुनीत के परिवार वालों ने कहा है कि आखिरी बार पुनीत ने अपनी पत्नी से बात की थी. बात करते हुए दोनों के बीच बिजनैस को ले कर भी चर्चा हुई थी. इसी बातचीत का एक (Delhi Crime) औडियो कौल सामने आया है. बातचीत का ब्योरा कुछ इस तरह है :

पत्नी : हैलो, नींद नहीं आ रही क्या? तुम तो मुझे और मेरे परिवार को बदनाम कर रहे थे…

पुनीत : साफसाफ बताओ जो चाहिए तुम्हें, बाकी जो तुम्हें करना है करो.

पत्नी : अब धमकी दोगे कि सुसाइड कर लूंगा या घर छोड़ जाऊंगा?

पुनीत : इन बातों का कोई मतलब नहीं निकलता है. तुम बताओ कि मुझ से क्या चाहिए? मेरा किसी से भी अफेयर नहीं है.

पत्नी : मुझे इन बातों से फर्क नहीं पड़ता. हम तलाक की बात कर चुके हैं. हम दोनों सिर्फ बिजनैस पार्टनर हैं, वह भी अलगअलग। लेकिन तुम्हारी झूठ बोलने की आदत है। भिखारी, मैं ने तुझ से क्या मांगा?

पुनीत : तुम मुझे गालियां क्यों दे रही हो?

पत्नी : यह भाषा मैं ने तुम से ही सीखी है. सामने आए तो चांटा मारूंगी, लेकिन तुम्हें मार कर मैं अपने हाथ गंदे नहीं करना चाहती.

पुनीत : मैं ने कौल इसलिए किया कि तुम मेरा अकाउंट हैक न करो.

पत्नी : तुम दूसरी लड़कियों से क्यों मिलते हो…

पुनीत के सुसाइड (Delhi Crime) करने के बाद पुलिस का कहना था कि इस घटना में व्यापार में घाटे के ऐंगल से जांच की जा रही है. पुलिस ने कहा कि दोनों के बीच बिजनैस को ले कर बातचीत हुई थी. पुनीत और उस की पत्नी बेकरी का बिजनैस किया करते थे और दोनों ही उस में पार्टनर थे. इसी बीच पत्नी ने कहा कि हम दोनों के बीच तलाक का केस चल रहा है, लेकिन यह तो नहीं है कि मुझे कारोबार से अलग कर दिया जाए.

इसी बीच पुनीत के परिवार वालों ने आरोप लगाया है कि पुनीत की आखिरी रिकौर्डिंग कर के पत्नी ने अपने रिश्तेदारों को भेजी थी.

पुलिस ने पुनीत का फोन जब्त कर लिया है और पत्नी को जांच के लिए बुलाया है. पुलिस अभी पूरे मामले की जांच कर रही है. सारे सुबूतों के आधार पर काररवाई की जाएगी.