Love Story: ये आदत आप के प्रेमी की तो नहीं

Love Story: 20 वर्षीय आकांक्षा उर्फ माही 25 वर्षीय प्रेमी सूरज उत्तम को अपना सब कुछ मान बैठी थी. तभी तो वह उस के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी, लेकिन सूरज कई अन्य लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा था. प्रेमी की यह आदत प्रेमिका पर इतनी भारी पड़ी कि…

आकांक्षा उर्फ माही की रोजरोज की किचकिच से सूरज उत्तम परेशान था. वह उस पर शादी करने का दबाव डाल रही थी. शादी न करने पर माही ने उसे रेप के मामले में फंसाने की धमकी भी दे दी थी. सूरज की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस प्रौब्लम से बाहर कैसे निकले?

21 जुलाई, 2025 की सुबह 8 बजे 20 वर्षीय आकांक्षा कान्हा रेस्टोरेंट जाने को घर से निकली तो सूरज फोन पर बात कर रहा था. आकांक्षा को शक हुआ कि वह अपनी किसी गर्लफ्रेंड से बतिया रहा है. उस ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दोपहर को फोन कर सूरज को कान्हा रेस्टोरेंट बुला लिया.

सूरज ने अपना मोबाइल फोन टेबल पर रखा. फिर आमनेसामने बैठ कर दोनों बातें करने लगे. इसी समय सूरज की खास गर्लफ्रेंड का वीडियो कौल आया. इस कौल को आकांक्षा उर्फ माही ने देखा तो वह सूरज से झगडऩे लगी. माही को शक हुआ कि सुबह भी सूरज इसी से बात कर रहा था. वीडियो कौल को ले कर दोनों कुछ देर झगड़ते रहे, फिर सूरज वहां से चला गया.

रात 10 बजे सूरज कमरे पर आया तो गर्लफ्रेंड को ले कर दोनों के बीच फिर झगड़ा शुरू हो गया. आकांक्षा धमकी भरे लहजे में बोली, ”सूरज, एक बात कान खोल कर सुन लो. यदि तुम ने मुझे धोखा दिया और शादी नहीं की तो मैं रेप का केस दर्ज करा कर तुम्हें जेल भिजवा दूंगी. फिर ताउम्र जेल में ही रहोगे.’’

आकांक्षा का गुस्सा शांत करने के लिहाज से सूरज बोला, ”माही, मैं तुम्हारे सिवाय किसी और से प्यार नहीं करता. तुम बिना वजह मुझ पर शक कर रही हो.’’

”झूठ, सफेद झूठ. सच्चाई यह है कि तुम खेलते मेरे शरीर से हो और प्यार कहीं और लुटाते हो.’’ माही का गुस्सा और बढ़ गया.

”ऐसा नहीं है माही, मैं तुम्हें बेहद प्यार करता हूं.’’ कहते हुए सूरज माही से प्यार जताने आगे बढ़ा.

तभी माही ने एक जोरदार तमाचा सूरज के गाल पर जड़ दिया और बोली, ”खबरदार! जो मेरे शरीर को छूने की जुर्रत की.’’

गाल पर तमाचा लगते ही सूरज तिलमिला उठा. उस का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वह आपा खो बैठा और आकांक्षा पर लातघूंसे चलाने लगा. माही चीखी तो सूरज के हाथ उस की गरदन पर पहुंच गए. वह उस का गला कसने लगा. चंद मिनट बाद ही आकांक्षा उर्फ माही की सांसें थम गईं. प्रेमिका माही की हत्या के बाद सूरज घबरा गया. उस ने कानपुर के नौबस्ता में रह रहे अपने दोस्त आशीष को फोन कर सारी बात बताई और मदद मांगी. रात 11 बजे आशीष बाइक से सूरज के कमरे में आ गया.

दोनों ने आकांक्षा उर्फ माही का शव उस के काले रंग के ट्रौली बैग में पैक किया. इस के बाद बंद ट्रौली बैग को बाइक पर रखा और दोनों निकल पड़े. सूरज बाइक चला रहा था, जबकि आशीष पीछे की सीट पर ट्रौली बैग पकड़ कर बैठा. सूरज और आशीष रात के अंधेरे में कानपुर से बिंदकी, फतेहपुर होते हुए लगभग 132 किलोमीटर की दूरी तय कर रात 3 बजे बांदा के चिल्ला घाट यमुना पुल पर पहुंचे. फिर ट्रौली बैग को जिस में माही का शव था, उफनती यमुना नदी में फेंक दिया. उस के बाद दोनों वापस कानपुर आ गए.

आकांक्षा उर्फ माही का मोबाइल फोन सूरज के पास ही था. हत्या के बाद भी उस ने उस का मोबाइल फोन बंद नहीं किया था. विजयश्री अपनी बेटी माही के लिए बेहद परेशान थी. वह उसे बारबार कौल कर रही थी, लेकिन माही उस का कौल रिसीव ही नहीं कर रही थी. जैसेजैसे समय बीतता जा रहा था, वैसेवैसे उस की चिंता भी बढ़ती जा रही थी.

22 जुलाई, 2025 की शाम विजयश्री की बात बड़ी बेटी प्रतीक्षा से तो हो गई थी, लेकिन छोटी बेटी आकांक्षा उर्फ माही से नहीं हो पा रही थी. उस के मोबाइल फोन की रिंग तो जा रही थी, लेकिन वह जवाब नहीं दे रही थी. देर रात विजयश्री ने अपनी चिंता से प्रतीक्षा को अवगत कराया तो उस ने बताया कि माही के फोन पर रिंग जा रही है, लेकिन वह फोन उठा नहीं रही है. यह पहला अवसर था, जब माही मांबहन में से किसी का फोन रिसीव नहीं कर रही थी, अत: विजयश्री घबरा उठी. किसी अनहोनी की आशंका से उस का दिल कांप उठा. जैसेतैसे करवट बदल कर उस ने वह रात बिताई, फिर सवेरा होते ही उस ने ट्रेन पकड़ी और कानपुर पहुंच गई.

प्रतीक्षा कानपुर के बर्रा क्षेत्र में किराए पर रहती थी. विजयश्री उस के रूम पर पहुंची. प्रतीक्षा ने मम्मी के सामने ही माही को कौल लगाई, लेकिन कौल रिसीव नहीं हुई.

तब प्रतीक्षा ने माही के फोन पर मैसेज भेजा, ‘माही, मम्मी रो रही हैं. तुम उन से बात क्यों नहीं कर रही हो.’

कुछ देर बाद माही के फोन से मैसेज आया, ‘बाद में बात करूंगी, अभी मैं ड्यूटी पर हूं.’

प्रतीक्षा ने फिर से मैसेज किया, ‘मम्मी ने पुलिस में शिकायत कर दी है. सूरज का नाम लिखा दिया है.’

इस का माही के फोन से तुरंत मैसेज आया, ‘सूरज का नाम क्यों लिखा दिया. मैं अपनी मरजी से अलग हुई हूं.’

आकांक्षा उर्फ माही नौबस्ता गल्ला मंडी स्थित ‘कान्हा रेस्टोरेंट’ में काम करती थी, अत: विजयश्री प्रतीक्षा के साथ माही का पता लगाने कान्हा रेस्टोरेंट पहुंची. रेस्टोरेंट मालिक ने बताया कि आकांक्षा से उस की फोन पर तो बात नहीं हुई, लेकिन उस ने मैसेज भेजा है कि उसे लखनऊ में जौब मिल गई है, इसलिए अब रेस्टोरेंट में काम नहीं कर पाएगी. मैसेज पढ़ कर मैं ने उसे कोई जवाब नहीं दिया.

आकांक्षा उर्फ माही की एक खास दोस्त मंजू हंसपुरम में रहती थी. विजयश्री उस के घर पहुंची. मंजू ने बताया कि आकांक्षा ने उसे मैसेज भेजा था कि सूरज से ब्रेकअप कर वह लखनऊ आ गई है. मंजू ने कहा कि मैसेज पढऩे के बाद उस ने आकांक्षा से फोन पर बात करने का प्रयास किया था, लेकिन बात नहीं हो पाई. पता नहीं वह किन हालात से गुजर रही होगी. थकहार कर मांबेटी वापस आ गईं. देर रात विजयश्री ने अपने मोबाइल फोन से बेटी को मैसेज किया, ‘माही मुझ से बात करो. बहुत घबराहट हो रही है.’

इस का जवाबी मैसेज आया, ‘भैया, मैं बाद में बात करूंगी.’

इस मैसेज को पढ़ कर विजयश्री का माथा ठनका. वह जान गईं कि माही का फोन कोई दूसरा व्यक्ति चला रहा है. माही खतरे में है. दरअसल, विजयश्री जिस मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रही थी, उसे उस के बड़े बेटे ने खरीद कर दिया था.

माही ने मम्मी के मोबाइल फोन नंबर को अपने मोबाइल फोन में ‘भैया’ के नाम से सेव कर रखा था. माही अगर मैसेज भेजती तो भैया की जगह मम्मी के नाम मैसेज आता. इसी से उसे संदेह हो गया.

आकांक्षा उर्फ माही का प्रेमी था सूरज उत्तम. वह उसी के साथ लिवइन रिलेशन में रहती थी. प्रतीक्षा व उस की मम्मी ने सूरज उत्तम से फोन पर बात की और माही के बारे में पूछा. इस पर उस ने माही के बारे में कोई जानकारी होने से इंकार किया. उस के बाद सूरज उत्तम भी विजयश्री के साथ हो लिया और माही की तलाश में जुटा रहा. प्रतीक्षा और उस की मम्मी माही की तलाश करतेकरते थक गईं तो गुमशुदगी दर्ज कराने थाना नौबस्ता पहुंचीं, लेकिन वहां उन्हें यह कह कर टरका दिया गया कि उन की बेटी जिस कान्हा रेस्टोरेंट में काम करती थी, वह थाना हनुमंत विहार के अंतर्गत आता है.

यह जानकारी पा कर विजयश्री थाना हनुमंत विहार पहुंची. वहां उस ने एसएचओ राजीव सिंह को सारी बात बताई और बेटी की गुमशुदगी दर्ज करने की गुहार लगाई. इस पर उन्होंने कहा कि लड़की कुंवारी है. इज्जत का सवाल है. कुछ रोज और इंतजार कर लो. शायद वापस आ जाए. निराश हो कर तब विजयश्री वापस आ गई. धीरेधीरे एक सप्ताह बीत गया, लेकिन न तो माही का कुछ पता चला और न ही गुमशुदगी दर्ज हो पाई. इस के बाद विजयश्री पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार से मिली और गुमशुदा बेटी माही का पता लगाने की गुहार लगाई.

सीपी अखिल कुमार ने विजयश्री को आश्वासन दिया कि रिपोर्ट दर्ज कर उन की बेटी की खोज की जाएगी, लेकिन आश्वासन के बाद भी काररवाई नहीं हुई. इस के बाद विजयश्री ने महिला हेल्पलाइन नंबर 1090 पर कौल लगाई और मदद मांगी. इस पर विजयश्री फिर से थाना हनुमंत विहार पहुंची और एसएचओ राजीव सिंह से मिली. अब तक थाने पर फरमान आ चुका था, अत: बिना किसी हीलाहवाली के माही की गुमशुदगी की सूचना 8 अगस्त, 2025 को दर्ज कर ली गई. मामले की जांच एसआई सुशील कुमार को सौंपी गई.

लेकिन एसआई सुशील कुमार ने माही को खोजने का कोई प्रयास नहीं किया. विजयश्री जब भी दारोगा सुशील कुमार से माही के बारे में पूछती तो वह झल्ला कर कहता, ”तुम्हारी बेटी अपने किसी प्रेमी के साथ घूमने गई होगी. जल्द ही वापस आ जाएगी.’’

दारोगा का जवाब विजयश्री के मन में कांटे की तरह चुभता. परंतु वह मन मसोस कर लौट आती. पुलिस भले ही सुस्त थी, लेकिन विजयश्री बेटी की खोज में जुटी रही. वह जानकारी जुटाने उस मकान पर पहुंची, जहां उस की बेटी अपने प्रेमी सूरज के साथ रहती थी. मकान में कई किराएदार थे. विजयश्री ने किराएदारों से बेटी माही के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि माही को 21 जुलाई के बाद उन्होंने नहीं देखा. उस के साथ रहने वाला सूरज भी कमरा खाली कर माही का सारा सामान ले गया.

विजयश्री ने पूछा, ”क्या सूरज सामान ट्रौली बैग में भर कर ले गया?’’

इस पर किराएदारों ने बताया कि आकांक्षा जब आई थी, तब ट्रौली बैग था, लेकिन जब सूरज ने कमरा खाली किया, तब ट्रौली बैग नहीं था. सूरज द्वारा कमरा खाली करना और ट्रौली बैग न होने से विजयश्री का माथा ठनका. वह कमरे में पहुंची तो वहां अलमारी पर एक दीपक जल रहा था. दीपक जलता देख विजयश्री को शक हो गया कि उन की बेटी माही के साथ सूरज ने कोई अनहोनी कर दी है. वह जान गई कि माही के गायब होने का राज सूरज के पेट में ही छिपा है.

पुलिस की निष्क्रियता से परेशान विजयश्री ने तब मुख्यमंत्री हेल्पलाइन नंबर 1076 पर अपनी शिकायत दर्ज कराई. वहां से सख्ती बरती गई तब थाना हनुमंत विहार पुलिस सक्रिय हुई. यह मामला डीसीपी (साउथ) दीपेंद्र नाथ चौधरी के संज्ञान में आया तो उन्होंने एसएचओ राजीव सिंह को फटकार लगाई और जल्द से जल्द माही प्रकरण को सुलझाने का आदेश दिया. आदेश पाते ही राजीव सिंह जांच में जुट गए. उन्होंने कौल कर विजयश्री को थाने बुलाया और उन का बयान दर्ज किया. विजयश्री ने बयान में कहा कि सूरज के साथ उन की बेटी माही लिवइन रिलेशन में रह रही थी.

उस की गुमशुदगी का राज उस के दिल में ही छिपा है. यदि उस से सख्ती से पूछताछ की जाए तो माही का पता चल सकता है. विजयश्री ने सूरज का मोबाइल फोन नंबर भी पुलिस को मुहैया करा दिया. इंसपेक्टर राजीव सिंह ने सूरज के फोन नंबर की कौल डिटेल्स तथा लोकेशन निकलवाई तो चौंकाने वाली जानकारी निकली. पता चला कि सूरज और माही के बीच हर रोज बात होती थी. 21 जुलाई, 2025 की दोपहर माही ने आखिरी बार सूरज से बात की थी.

सूरज की लोकेशन 21 जुलाई की रात को कानपुर से बिंदकी होते हुए बांदा की तरफ जाते दिखाई दे रही थी. सब से चौंकाने वाली बात यह थी कि माही के मोबाइल फोन की लोकेशन भी इस दरम्यान बांदा तक गई थी. 3 दिनों बाद उस का फोन बंद हो गया था. 15 सितंबर, 2025 की सुबह 10 बजे एसएचओ राजीव सिंह ने शक के आधार पर सूरज को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर उस से 4 घंटे तक आकांक्षा उर्फ माही के बारे में पूछताछ की गई.

लेकिन सूरज लगातार यही बताता रहा कि किसी दूसरी गर्लफ्रेंड से बात करने को ले कर उस का माही से मामूली विवाद हुआ था. फिर वह घर से चली गई. उस के बाद उस की बात नहीं हुई. वह कहां है? किस के साथ है? उसे कुछ भी पता नहीं है. सूरज ने मुंह नहीं खोला तो एसएचओ राजीव सिंह उसे डीसीपी (साउथ) के औफिस ले गए. यहां डीसीपी दीपेंद्र नाथ चौधरी ने उस से पूछताछ की. तब उस ने साफ कह दिया कि उसे माही की कोई जानकारी नही है.

लेकिन जब उन्होंने सूरज के सामने उस के फोन की डिटेल्स रखते हुए सख्ती से पूछा तो वह घबरा गया और बोला, ”साहब, आकांक्षा उर्फ माही अब इस दुनिया में नहीं है. मैं ने उसे मार डाला है.’’

”क्याऽऽ तूने उसे मार डाला?’’ डीसीपी चौंक पड़े. फिर पूछा, ”लाश कहां है?’’

”साहब, माही की लाश को उसी के ट्रौलीबैग में भर कर कानपुर से 132 किलोमीटर दूर बांदा के चिल्लाघाट पुल से यमुना नदी में फेंक दी थी. लाश ठिकाने लगाने में मेरे दोस्त आशीष ने भी मदद की थी.’’

”तुम ने अपनी गर्लफ्रेंड माही की हत्या क्यों की?’’ डीसीपी चौधरी ने पूछा.

इस के बाद सूरज ने अपनी लिवइन पार्टनर की हत्या से ले कर उस की लाश ठिकाने लगाने तक की पूरी कहानी पुलिस को बता दी.

इस के बाद पुलिस ने सूरज की निशानदेही पर दबिश दे कर आशीष को भी उस के नौबस्ता स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने सहज ही जुर्म कुबूल कर लिया, लेकिन शव को ठिकाने लगाने में प्रयुक्त आशीष की बाइक को पुलिस बरामद नहीं कर पाई. दूसरे रोज पुलिस सूरज व आशीष को साथ ले कर बांदा के चिल्ला घाट यमुना पुल पर पहुंची. फिर 2 दिन तक माही के शव को बरामद करने के लिए सर्च औपरेशन चलाया, लेकिन यमुना उफान पर थी इसलिए शव बरामद नहीं हो पाया.

20 सितंबर, 2025 को डीसीपी (साउथ) दीपेंद्र नाथ चौधरी ने प्रैसवार्ता की और मीडिया के सामने आकांक्षा उर्फ माही की लव क्राइम स्टोरी का खुलासा किया. इस सनसनीखेज मामले का खुलासा करने में पुलिस को लगभग 2 महीने का समय लग गया. चूंकि दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: एसएचओ राजीव सिंह ने मृतका की मम्मी विजयश्री की तरफ से बीएनएस की धारा 103(1) के तहत सूरज तथा आशीष के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा दोनों को बाकायदा गिरफ्तार कर लिया.

आकांक्षा उर्फ माही कौन थी? वह सूरज के संपर्क में कैसे आई? सूरज ने उस की हत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए माही के अतीत की ओर चलते हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर एक चर्चित कस्बा है-रूरा. व्यापारिक कस्बा होने से यहां हर रोज चहलपहल रहती है. रूरा उत्तर रेलवे का बड़ा स्टेशन भी है. इसी रूरा कस्बे से 5 किलोमीटर दूर डेरापुर रोड पर एक गांव है-सुजनीपुर. इसी गांव में सुरेश उर्फ बच्चन लाल वर्मा रहता था. उस के परिवार में पत्नी विजयश्री के अलावा 2 बेटे सूरज व आदर्श तथा 2 बेटियां प्रतीक्षा व आकांक्षा थी.

सुरेश वर्मा के पास थोड़ी सी खेती की जमीन थी. वह मेहनतमजदूरी कर परिवार का भरणपोषण करता था. आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण विजयश्री अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा न दिला सकी. बड़ा बेटा सूरज इंटरमीडिएट पास करने के बाद रूरा कस्बे में एक कपड़े की दुकान पर काम करने लगा. बात फरवरी 2022 की है. मियादी बुखार व पीलिया से सुरेश उर्फ बच्चन लाल की मौत हो गई. पति की मौत के बाद परिवार में आर्थिक प्रौब्लम आ गई. विजयश्री की बेटियां जवानी की दहलीज पर थीं. उसे उन के ब्याह की भी चिंता सताने लगी थी, लेकिन घर की माली हालत ऐसी थी कि वह उन के ब्याह के बारे में सोच भी नहीं सकती थी.

 

मम्मी की व्यथा को बड़ा बेटा सूरज भलीभांति समझता था. अत: वह दिल्ली चला गया. वहां वह किसी फैक्ट्री में काम करने लगा. कमाई का पैसा सूरज घर भेजने लगा तो विजयश्री को कुछ राहत मिलने लगी. कर्ज का पैसा भी चुकता करने लगी. एक परिचित के माध्यम से विजयश्री की दोनों बेटियों प्रतीक्षा व आकांक्षा की 20 जून, 2024 को कानपुर में बर्रा बाईपास पर स्थित ‘गुड फूड रेस्टोरेंट’ में नौकरी लग गई.

नौकरी लगने के बाद प्रतीक्षा ने बर्रा में राजेश गुप्ता के मकान में एक कमरा किराए पर ले लिया. इस कमरे में प्रतीक्षा छोटी बहन आकांक्षा उर्फ माही के साथ रहने लगी. दोनों बहनें साथ जातीं और साथ आतीं. मेहनत और लगन से काम करने से दोनों ने रेस्टोरेंट में पैठ बना ली.

प्रतीक्षा व आकांक्षा को सैलरी मिली तो दोनों ने मोबाइल फोन किस्तों में खरीद लिया. उधर सूरज जब दिल्ली से घर आया तो उस ने मम्मी को वह फोन दे दिया, ताकि वह सब से बात कर सके. सूरज ने दूसरा फोन खरीद लिया. आकांक्षा ने मम्मी के फोन नंबर को अपने फोन में भैया के नाम से सेव कर लिया. विजयश्री अब अकसर देर शाम बेटियों से बात करती और फिर निश्चिंत हो कर सो जाती.

इसी दौरान इंस्टाग्राम के माध्यम से आकांक्षा की दोस्ती सूरज उत्तम से हुई. दोस्ती प्यार में बदली और फिर उन के बीच चैटिंग होने लगी. चैटिंग के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर शेयर किए, फिर उन के बीच मोबाइल फोन के जरिए भी खूब बातें होने लगीं. एक रोज आकांक्षा ने फोन कर सूरज को अपने गुड फूड रेस्टोरेंट बुलाया. सूरज कुछ देर बाद ही रेस्टोरेंट पहुंच गया. वहां पहली बार दोनों ने एकदूसरे को देखा.

20 वर्षीया खूबसूरत आकांक्षा उर्फ माही को देख कर सूरज उस का दीवाना बन गया. वहीं 25 वर्षीय सूरज को देख कर आकांक्षा को लगा कि यही उस के सपनों का राजकुमार है. वह भी उस की दीवानी बन गई. इस के बाद दोनों का प्रेम प्रसंग परवान चढऩे लगा. दोनों के बीच की दूरियां सिमटने लगीं. फिर एक रोज दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. आकांक्षा उर्फ माही सूरज के साथ गुलछर्रे उड़ाने लगी. सूरज उस पर पैसा खर्च करने लगा.

एक रोज बातचीत के दौरान माही ने सूरज से उस के घरद्वार के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह फतेहपुर जिले के गांव हरीखेड़ा का रहने वाला है. पापा महानंद उत्तम किसान हैं. उस के 2 अन्य भाई कल्लू व अमन हैं, जो कैटरिंग का काम करते हैं. वह इलैक्ट्रिशियन है और हंसपुरम में रहता है. सूरज के बारे में जानने के बाद माही ने अपने बारे में सूरज को बताया. कुछ समय बाद सूरज आकांक्षा से मिलने उस के किराए वाले रूम पर आने लगा.

एक दिन प्रतीक्षा ने दोनों को मिलन करते देख लिया तो उस ने माही को फटकार लगाई. तब माही ने बताया कि वह और सूरज एकदूसरे से प्रेम करते हैं. उन की दोस्ती इंस्टाग्राम के जरिए हुई थी. वह सूरज से शादी कर उसे अपना जीवनसाथी बनाना चाहती है. माही के लव अफेयर की बात सुन कर प्रतीक्षा के होश उड़ गए. उस ने माही की प्रेम कहानी मम्मी विजयश्री को बताई तो वह परेशान हो गई. विजयश्री ने बेटी को बहुत समझाया, ऊंचनीच का पाठ पढ़ाया, लेकिन माही टस से मस नहीं हुई. उस ने दोटूक शब्दो में मम्मी से कह दिया कि वह सूरज से प्रेम करती है और उसी से ब्याह रचाएगी.

इधर सूरज उत्तम का माही के रूम में आनाजाना बढ़ा तो अन्य किराएदारों की शिकायत पर मकान मालिक राजेश गुप्ता ने सूरज के आने का विरोध किया. आकांक्षा ने सारी बात प्रेमी सूरज को बताई तो उस ने नौबस्ता की धोबिन पुलिया के पास प्रमोद तिवारी के मकान में कमरा किराए पर ले लिया. 11 जुलाई, 2025 को माही ने अपना सारा सामान ट्रौली बैग में भरा और सूरज द्वारा लिए गए किराए के कमरे में आ कर रहने लगी. सूरज भी उस के साथ रहने लगा. इस तरह दोनों लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

यही नहीं, सूरज उत्तम ने माही की नौकरी भी छुड़वा दी और नौबस्ता गल्ला मंडी स्थित कान्हा रेस्टोरेंट में नौकरी दिलवा दी. इस रेस्टोरेंट में सूरज इलैक्ट्रिशियन था. उस की मालिक से खूब पटती थी. साथ रहते आकांक्षा को चंद दिन ही बीते थे कि उसे पता चला कि सूरज के कई अन्य लड़कियों से भी प्रेम संबंध हैं. उन से वह छिप कर बातें करता है. उस ने ऐतराज जताया तो दोनों में कहासुनी होने लगी. माही सूरज पर जल्द शादी करने का दबाव भी बनाने लगी.

एक रोज आकांक्षा ने रोते हुए बड़ी बहन प्रतीक्षा को सूरज की अन्य लड़कियों से दोस्ती के बारे में बताया. तब प्रतीक्षा ने सूरज को फटकार लगाई. इस पर सूरज ने माफी मांग ली. लेकिन माफी मांगने के बावजूद उस ने अन्य लड़कियों से बतियाना बंद नहीं किया. 21 जुलाई, 2025 को भी माही और सूरज के बीच इसी बात को ले कर झगड़ा इतना बढ़ गया कि सूरज ने गला घोंट कर आकांक्षा उर्फ माही की हत्या कर दोस्त आशीष के सहयोग से उस की लाश ठिकाने लगा दी.

दूसरे दिन जब माही के मोबाइल फोन पर कौल आने लगी तो उस ने कौल रिसीव नहीं की. मैसेज आने पर मैसेज करता रहा, ताकि उस के जानने वालों को लगे कि वह जिंदा है. इस तरह 3 दिन तक वह माही के जानने वालों को गुमराह करता रहा. 25 जुलाई को वह कानपुर सेेंट्रल स्टेशन पहुंचा और मुंबई जाने वाली ट्रेन में आकांक्षा का फोन बंद कर रख दिया. ऐसा उस ने पुलिस को गुमराह करने के लिए किया.

21 सितंबर, 2025 को पुलिस ने आरोपी सूरज उत्तम और आशीष को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक पुलिस की 5 टीमें आकांक्षा उर्फ माही का शव बरामद करने के लिए सर्च औपरेशन में जुटी थीं, लेकिन शव बरामद नहीं हुआ था. Love Story

 

 

फाइवस्टार Hotel में अधिकारी के साथ किया बलात्कार

Hotel  वाणिज्यिक कर विभाग के बड़े अधिकारी पंकज सिंह ने फाइवस्टार होटल में नीलिमा के साथ बलात्कार किया था या फिर उन के बीच आपसी सहमति से संबंध बने थे, यह बात तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी. लेकिन यह तय है कि इस मामले ने पुलिस की उलझनें जरूर बढ़ा दी हैं.

5 अगस्त, 2018 की शाम के करीब साढ़े 7 बजे थे. भोपाल के प्रेमपुरा इलाके स्थित नामी जहांनुमा रिट्रीट की रौनक शवाब पर थी. लोग आजा रहे थे और कुछ लोग वहां इत्मीनान से बैठे बतिया रहे थे. जहांनुमा रिट्रीट फाइवस्टार होटल है, लिहाजा वहां ऐरेगैरे तो ठहरने की सोच भी नहीं पाते. जिन की जेब में खासा पैसा होता है, वही इस शानदार होटल का लुत्फ उठाते हैं. होटल के लौन में साइकिलिंग करते एक अधेड़ पुरुष और उस के साथ बेहद अंतरंगता से हंसतीबतियाती महिला को साइकिल पर पैडल मारते देख कोई भी यही अंदाजा लगाता कि वे पतिपत्नी हैं और नए जोड़ों की तरह अठखेलियां कर रहे हैं.

इस के पहले दोनों एक साथ कैरम खेलते दिखे थे. इस पर भी होटल स्टाफ को कोई हैरानी नहीं हुई थी क्योंकि सर्वसुविधायुक्त इस लग्जरी होटल में ऐशोआराम के सारे साधन और सहूलियतें मौजूद हैं.  वह पुरुष भरेपूरे चेहरे वाला था और रुआब उस के हावभाव से साफ झलक रहा था. उस की साथी महिला उम्रदराज होते हुए भी युवा लग रही थी. बेइंतहा खूबसूरत और स्मार्ट दिख रही वह महिला पुरुष से बेतकल्लुफी से पेश आ रही थी. साइकिलिंग करतेकरते पुरुष गिर पड़ा तो महिला ने तुरंत स्टाफ से फर्स्टएड बौक्स मंगाया और उस की मरहमपट्टी खुद अपने हाथों से की. नजारा देख कर ऐसा लग रहा था कि अगर दूसरे के घाव या चोट अपने ऊपर लेने का कोई प्रावधान होता तो वह महिला उस पुरुष की चोट ले लेती.

उस के चेहरे से चिंता साफ झलक रही थी जबकि पुरुष को कोई खास चोटें नहीं आई थीं. उन की ये नजदीकियां युवा दंपतियों को भी मात कर रही थीं, देखने वाले जिन का पूरा लुत्फ उठा रहे थे. इस के उलट एकदूसरे की बातों में डूबे इन दोनों को मानो किसी की परवाह ही नहीं थी. लगभग 5 घंटे दोनों ने इसी तरह से साथ गुजारे. दरअसल ये दोनों जहांनुमा रिट्रीट में रुकने के लिए आए थे, लेकिन उस समय कोई कमरा खाली नहीं होने की वजह से वक्त गुजार रहे थे. रात 12 बजे के बाद इन्हें रूम नंबर 14 आवंटित हुआ तो दोनों एकदूसरे से सट कर कमरे की तरफ बढ़ गए.

एंट्री रजिस्टर में पुरुष ने अपना नाम पंकज कुमार सिंह, उम्र 42 वर्ष, पता नोएडा, उत्तर प्रदेश और पेशा सरकारी अधिकारी लिखा और साथ आई महिला का नाम नीलिमा (परिवर्तित नाम) दर्ज किया गया लेकिन इन दोनों के बीच का रिश्ता नहीं लिखा गया था. इस की वजह यह थी कि होटल के एंट्री रजिस्टर में रिलेशन वाला कौलम ही नहीं था. आमतौर पर यह कौलम अब अनिवार्य है लेकिन जहांनुमा रिट्रीट के रजिस्टर में नहीं था तो नहीं था. पंकज ने भारत सरकार द्वारा जारी किया गया पहचान पत्र दिया था तो नीलिमा ने पैन कार्ड दिया था. दोनों रिसैप्शन की खानापूर्ति कर के कमरे में बंद हो गए. अब तक होटल में आनेजाने वालों की तादाद इक्कादुक्का ही रह गई थी और स्टाफ के लोग भी ऊंघते हुए सोने की तैयारी करने लगे थे. रात को होटल के बंद कमरों में ठहरे लोग क्या करते हैं, इस से होटल स्टाफ कोई मतलब नहीं रखता और मतलब रखने के कोई माने या वजह है भी नहीं.

ऐसा ही पंकज और नीलिमा के मामले में हुआ था जो तकरीबन 5 घंटे तक होटल परिसर में घूमतेफिरते और बतियाते रहे थे. दोनों ने खाना भी साथ खाया था. दोनों की ही बौडी लैंग्वेज शाही थी तो इस की वजह भी थी कि पंकज उत्तर प्रदेश के वाणिज्य कर विभाग में डिप्टी कमिश्नर थे और नीलिमा इसी विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर थे. बंद कमरे की अजब कहानी रात लगभग साढ़े 3 बजे नीलिमा कमरे से बाहर आई तो परेशानी और बदहवासी उस के चेहरे से साफ झलक रही थी. हालांकि उस के कपड़े अस्तव्यस्त नहीं थे और न ही बाल बिखरे हुए थे, जैसा कि आमतौर पर बलात्कार के मामलों में पीडि़ता के साथ होता है.

बाहर आ कर नीलिमा ने रिसैप्शन पर बैठे कर्मचारी को तुरंत कैब बुलाने को कहा लेकिन वजह पूरी तरह नहीं बताई. टैक्सी आई तो वह बाहर जा कर उस में बैठ गई और ड्राइवर को थाने चलने को कहा. टैक्सी ड्राइवर हैरानी से इस संभ्रांत महिला को देखते हुए उन्हें नजदीकी कमलानगर थाने ले गया जो कोटरा इलाके में है. जहांनुमा रिट्रीट होटल इसी थाने के अंतर्गत आता है. नीलिमा सीधे थाने के अंदर गई और मौजूद पुलिसकर्मी से रिपोर्ट लिखने को कहा. इतनी रात गए कोई अभिजात्य व सभ्य सी दिखने वाली महिला बलात्कार (Hotel)  की रिपोर्ट लिखाने आए तो थाने में खलबली मचना स्वाभाविक सी बात थी. नीलिमा का परिचय जान कर तो पुलिसकर्मी और भी हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत उच्चाधिकारियों को इस हाईप्रोफाइल बलात्कार मामले की खबर दी.

सुबह की रोशनी होने से पहले कमला नगर थाने के टीआई मदनमोहन मालवीय और एसपी (नौर्थ भोपाल) राहुल कुमार लोढ़ा ने विस्तार से नीलिमा से जानकारी ली तो इस अनूठे बलात्कार की कहानी कुछ इस तरह सामने आई. नीलिमा मूलत: भोपाल की ही रहने वाली है. दरअसल भोपाल के जिस नामी मिशनरी स्कूल में वह पढ़ी थी, उस के पूर्व छात्रों के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए 3 दिन पहले भोपाल आई थी. तब वह होटल जहांनुमा पैलेस के कमरा नंबर 104 में ठहरी थी. स्कूल का जलसा शानदार रहा था. कार्यक्रम के दौरान वह ऐसे कई सहपाठियों से मिली थी, जिन से बिछुड़े मुद्दत हो चुकी थी. सालों बाद जब पुराने दोस्त मिलते हैं तो पुरानी कई यादें ताजा हो उठती हैं. तब लोग अपनी नौकरी और पेशे की परेशानियां व तनाव भूल जाते हैं.

पुराना याराना नया फसाद ऐसा ही नीलिमा के साथ हुआ था. नीलिमा के लिए भोपाल नया नहीं था, क्योंकि यहां उस का बचपन गुजरा था. तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक 5 अगस्त को नीलिमा को दिल्ली जाना था. दिल्ली रवाना होने के लिए जब वह एयरपोर्ट पहुंची तो एकाएक तभी पंकज का फोन आ गया. पंकज और नीलिमा पुराने परिचित थे. साल 2009 में नीलिमा का चयन वाणिज्यिक कर विभाग में हुआ था, जबकि इसी विभाग में पंकज की नियुक्ति सन 2010 में हुई थी लेकिन पद पंकज का ऊंचा था. एक ही विभाग में होने के कारण दोनों में परिचय हुआ और जल्द ही अच्छी जानपहचान में बदल गया. शादी की बात या चर्चा हुई या नहीं, यह तो नीलिमा ने पुलिस को नहीं बताया लेकिन चौंका देने वाली बात यह जरूर बताई कि पंकज ने पहले भी उस के साथ न केवल दुष्कर्म किया था बल्कि उस का वीडियो बना कर उसे ब्लैकमेल भी कर रहा था.

हुआ यूं था कि अब से कोई 7 साल पहले पंकज नीलिमा को अपनी मां से मिलाने के बहाने अपने घर ले गया था लेकिन वहां मां नहीं थी, घर खाली था. पंकज की नीयत में खोट था. एकांत का फायदा उठा कर उस ने नीलिमा के साथ जबरदस्ती की और वीडियो भी बना लिया. नीलिमा कभी इस बाबत मुंह न खोले, इसलिए उस ने वीडियो वायरल करने की धमकी दी थी. उस की यह धमकी कारगर साबित हुई. दोनों ही उच्चाधिकारी शादीशुदा हैं 5 अगस्त को पंकज ने फोन पर अपने किए की माफी मांगने की बात कही. इस पर नीलिमा ने ध्यान नहीं दिया तो उस ने फिर पुराना वीडियो वायरल करने की धमकी दी. नीलिमा की शादी एक बैंककर्मी से हो चुकी थी, जिस से उसे एक बेटी भी थी.

शादी तो पंकज की भी हो चुकी थी लेकिन उस का अपनी पत्नी से तलाक हो चुका था. अगर वाकई पंकज अपनी धमकी पर अमल कर बैठता तो नीलिमा के लिए कई झंझट खड़े हो जाते. इसलिए नीलिमा ने रुकने में कोई बुराई नहीं समझी. नीलिमा के भोपाल में मौजूद रहने की बात पंकज को पता लग गई थी. पर यह खबर पंकज को कैसे लगी थी, यह खुलासा तो कहानी लिखे जाने तक नहीं हुआ था. (Hotel)  होटल में न जाने कैसे पंकज ने नीलिमा के साथ नजदीकियां हासिल करने में सफलता हासिल कर ली. फिर जो हुआ, वह ऊपर बताया जा चुका है. मामले पर लीपापोती की कैसीकैसी कोशिशें की गईं, यह पुलिस काररवाई से भी समझ आता है कि पुलिस का एक बयान यह भी सुर्खियों में रहा था कि नीलिमा पहले से जहांनुमा रिट्रीट में ठहरी हुई थी और पंकज भी उसी होटल में रुका था.

हादसे की रात 12 बजे पंकज दरवाजा खुलवा कर जबरन नीलिमा के कमरे में घुस गया और उस ने नीलिमा के साथ बलात्कार किया. सुबह कोई 3 बजे जैसेतैसे कर के नीलिमा कमरे से बाहर आई और होटल प्रबंधन को अपने साथ हुए हादसे से अवगत कराया. खबर मिलने पर पुलिस आई और नीलिमा की रिपोर्ट दर्ज की. इस विरोधाभास पर पुलिस की ओर से कोई स्पष्टीकरण जारी न होना भी हैरत की बात थी. पूछताछ में पुलिस के उड़े होश नीलिमा ने बताया कि पंकज ने उस के साथ दुष्कर्म के अलावा मारपीट और गालीगलौज भी की और उस की बेटी को अगवा करने की भी धमकी दी थी.

नीलिमा की शिकायत पर पुलिस ने पंकज के खिलाफ भादंवि की धाराओं 376, 294 और 323 के तहत मामला दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया और मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जमानत मिल गई. इस के पहले उस का मैडिकल भी कराया गया था. यह मामला उतना सहज नहीं है जितना लग रहा है. इस की वजह यह है कि रिपोर्ट लिखाते वक्त नीलिमा ने 3 बार अपने बयान बदले थे. अलावा इस के इतने बड़े पद पर होने के बाद भी उस ने ऐसे आदमी पर भरोसा क्यों किया जो उस के साथ पहले भी ज्यादती कर चुका था. तब उस ने उस की रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं कराई. इस के बावजूद भी वह आधी रात को उस के साथ एक कमरे में रुकने और सोने भी चली गई. यह बात भी समझ से परे है.

ऐसे कई झोल इस हाईप्रोफाइल बलात्कार केस में हैं, जो अब शायद ही सामने आएं. वजह पुलिस इस बारे में ज्यादा जानकारियां नहीं दे रही. चर्चा यह भी रही कि दोनों भोपाल में रहते हुए कई अधिकारियों और एक रसूखदार भाजपा नेता से भी मिले थे. पंकज सिंह से पूछताछ की गई तो पुलिस वालों के रहेसहे होश भी तब उड़ गए. जब यह पता चला कि उस के पिता रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं और एक भाई कलेक्टर और दूसरा भाई आईपीएस अधिकारी है. आरोपी और पीडि़ता दोनों रसूखदार और पहुंच वाले हों तो पुलिस वालों के लिए एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति हो जाती है, इसलिए पुलिस ने मामले को ज्यादा तूल नहीं दिया और बलात्कार का यह मामला आयागया हो गया.

वैसे भी इसे बलात्कार मानने और कहने में हिचकने की अपनी वजहें हैं जिन्हें पंकज सिंह का वकील अदालत में गिनाएगा कि यह सब पीडि़ता की सहमति से हुआ था. क्योंकि वह अपनी मरजी से उस के मुवक्किल के साथ कमरे में ठहरी थी और बलात्कार से बचने के लिए चिल्लाई नहीं थी, फिर इसे बलात्कार कैसे कहा जा सकता है. रही बात पहले किए गए दुष्कर्म की तो भोपाल पुलिस इस बात को पचाने में कामयाब रही कि ऐसा कोई वीडियो उसे नहीं मिला था.

इस हाईप्रोफाइल बलात्कार केस के चर्चे भोपाल के राजनैतिक और प्रशासनिक गलियारों में है कि देखें कोई नया गुल खिलता है या फिर दोनों पक्षों में अदालत से बाहर समझौता हो जाएगा, जिस की उम्मीद ज्यादा है.

कॉलगर्ल राबिया के प्यार में Professor की मौत

अपने एक छात्र के जरिए प्रोफेसर दीपक पाटील एक कालगर्ल राबिया के चक्कर में पड़ गए. जब यह बात राबिया के हिस्ट्रीशीटर प्रेमी राज चव्हाण को पता चली तो…

महाराष्ट्र के जिला जलगांव के अमलनेर सिटी के रहने वाले दीपक पाटील जययोगेश्वर कालेज में प्रोफेसर थे. अपने सुखी वैवाहिक जीवन में मशगूल प्रो. दीपक पाटील का एक विद्यार्थी था सागर मराठे. सागर होनहार छात्र था. लेकिन एक दोस्त के माध्यम से उस की जानपहचान राबिया बानो नाम की एक कालगर्ल से हो गई थी. सागर राबिया से मिलनेजुलने लगा, जिस से उस के भी राबिया से शारीरिक संबंध बन गए थे. वैसे तो राबिया के कई ग्राहक थे लेकिन उन सब में वह सागर को बहुत चाहती थी. राबिया का जब मन होता वह सागर को फोन कर के बातें कर लेती थी. एक बार की बात है. सागर और राबिया एक रेस्टोरेंट में बैठे थे. तभी इत्तफाक से प्रो. दीपक पाटील भी वहां आ गए.

सागर ने राबिया को अपनी दोस्त बताते हुए उस की मुलाकात प्रो. दीपक पाटील से कराई. पहली ही मुलाकात में राबिया की खूबसूरती और बातों से प्रो. दीपक बहुत प्रभावित हुए. हालांकि वह शादीशुदा थे, इस के बावजूद भी राबिया को उन्होंने अपने दिल में बसा लिया. अगले दिन सागर जब कालेज आया तो उन्होंने किसी बहाने से सागर से राबिया का फोन नंबर ले लिया. प्रो. पाटील का मन राबिया से बात करने के लिए आतुर था. ड्यूटी पूरी करने के बाद उन्होंने राबिया को फोन कर के उसे अपने बारे में बताया. राबिया भी समझ गई कि यह मोटी आसामी है, इसलिए वह भी उन से रसभरी बातें करने लगी.

इस के बाद आए दिन प्रोफेसर साहब की राबिया से फोन पर बातें होने लगीं. घर में खूबसूरत बीवी होने के बावजूद वह राबिया को चाहने लगे थे. इतना ही नहीं, उस से मुलाकातें भी करने लगे थे. प्रो. दीपक पाटील का जब मन होता वह राबिया को होटल में बुला लेते और अपनी हसरतें पूरी करते. लेकिन इस के बदले में वह उसे पैसे कम देते थे. राबिया 2-4 बार तो उन से होटल में मिली लेकिन बाद में उस ने उन से मिलने के लिए मना कर दिया. इस पर प्रो. दीपक उसे बारबार फोन कर के तंग करने लगे. उन के बारबार तंग करने से राबिया परेशान हो गई. उस ने इस की शिकायत सागर मराठे से की क्योंकि उसी ने उस की मुलाकात प्रो. दीपक से कराई थी. सागर ने भी प्रोफेसर को समझाया लेकिन वह नहीं माने.

जब राबिया ने उन की काल रिसीव करनी बंद कर दी तो वह दूसरे नंबरों से उसे काल करने लगे. उस ने कई बार प्रो. दीपक को झिड़क भी दिया था, पर वह अपनी हरकत से बाज नहीं आए. अमलनेर की ही म्हाडा कालोनी में रहने वाली राबिया का एक प्रेमी था राज चव्हाण. वह हिस्ट्रीशीटर था. अलगअलग पुलिस थानों में उस पर दर्जनों केस दर्ज थे. बता दें राबिया शादीशुदा युवती थी. उस की शादी सूरत में हुई थी. शादी के कुछ ही दिनों में राबिया ने पति का घर छोड़ दिया था. बाद में वह अमलनेर में अपनी मां के यहां आ कर रहने लगी थी. पति को छोड़ने के बाद राबिया पूरी तरह आजाद हो गई थी.

राबिया का अमलनेर के रेलवे परिसर में आनाजाना लगा रहता था. इसी इलाके में राज चव्हाण भी रहता था. हर रोज दोनों की नजरें मिलने लगी थीं. कुछ ही दिनों में दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया था. अपराध के सिलसिले में राज चव्हाण को लंबे समय के लिए दूसरी जगहों पर जाना पड़ता था. कभी पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने पर उसे जेल जाना पड़ता तो राबिया के सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो जाती थी. अपने प्रेमी राज चव्हाण की गैरमौजूदगी में वह जिस्मफरोशी का धंधा करती थी. राबिया को प्रो. दीपक का बारबार फोन करना पसंद नहीं था. प्रोफेसर के अलावा उसे सागर मराठे पर भी गुस्सा आता था. एक दिन उस ने प्रोफेसर दीपक और सागर की शिकायत राज चव्हाण से कर दी. अपनी प्रेमिका की शिकायत सुन कर राज का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने दोनों को सबक सिखाने की ठान ली.

राज चव्हाण का एक दोस्त था विजय डेढ़े. विजय बदलापुर मुंबई में रहता था. राज और विजय ने राबिया को परेशान करने वाले प्रोफेसर दीपक और उन के विद्यार्थी सागर को मारपीट कर सीधा करने का प्लान बनाया. वे दोनों को एक साथ बुलाना चाहते थे. यह काम राबिया ही कर सकती थी इसलिए राज ने राबिया के माध्यम से प्रो. दीपक और सागर को साथसाथ बुलाने की योजना बनाई. राज के इशारे पर राबिया ने दोनों को 3 मार्च, 2018 की रात के 10 बजे साथसाथ अमलनेर के प्रताप महाविद्यालय के पास स्थित स्टेडियम के पास पहुंचने को कह दिया. राबिया का फोन आने पर प्रोफेसर साहब फूले नहीं समा रहे थे.

चूंकि दोनों को राबिया ने बुलाया था, इसलिए प्रो. दीपक और सागर मराठे का आना निश्चित था. उन के आने से पहले ही राज चव्हाण और विजय रात के अंधेरे में स्टेडियम के पास छिप कर बैठ गए. रात 10 बजे के करीब प्रो. दीपक और सागर मराठे स्टेडियम के पास पहुंचे तो उन्हें वहां राबिया मिल गई. तभी अचानक सागर मराठे का ध्यान अंधेरे में छिप कर बैठे राज चव्हाण की तरफ चला गया. सागर उसे पहचानता था, इसलिए वहां से भाग गया. कहीं प्रोफेसर साहब भी न भाग निकलें, इसलिए छिपे बैठे राज चव्हाण और विजय ने दीपक पाटील को दबोच लिया. उन्होंने उस समय प्रोफेसर साहब से कुछ नहीं कहा, बल्कि उन्हें एक ढाबे पर ले गए, वहां पर दोनों ने मिल कर प्रो. दीपक को जबरन जरूरत से ज्यादा मात्रा में शराब पिलाई.

छात्रों को पढ़ाने वाला प्रोफेसर अय्याशी के चक्कर में 2 गुंडों के बीच बैठा जबरदस्ती शराब पी रहा था. कुछ ही देर में प्रोफेसर पर नशा छा गया, उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था. इस दौरान उन का बैंक एटीएम कार्ड दोनों गुंडों ने छीन लिया. उस का पासवर्ड भी विजय ने मारपीट कर पूछ लिया. एटीएम कार्ड हासिल करने के बाद दोनों ने उन की डंडे से पिटाई करनी शुरू कर दी. इस मारपीट में प्रो. दीपक बुरी तरह से घायल हो गए. उन्हें पता था कि बदनामी से बचने के लिए प्रोफेसर मारपीट की बात किसी को नहीं बताएंगे. बाद में दोनों हमलावरों ने जख्मी प्रोफेसर को उन्हीं की बाइक से शहर के डा. हजारे के क्लीनिक तक पहुंचाया. तब तक काफी रात हो चुकी थी. उन्होंने डा. हजारे को काफी आवाजें दीं, लेकिन किसी ने गेट नहीं खोला.

आखिर राज और विजय ने जख्मी प्रोफेसर को उसी हालत में क्लीनिक के पास छोड़ दिया और उन की मोटरसाइकिल से वहां से भाग निकले. प्रोफेसर का एटीएम कार्ड उन के पास ही था, जिस से उन्होंने करीब 40 हजार रुपए निकाल लिए. अस्पताल के बाहर लहूलुहान पड़े प्रो. दीपक को इलाज नहीं मिला तो उन्होंने दम तोड़ दिया. रात लगभग 2 बजे उन की लाश पर किसी की नजर पड़ी तो उस ने इस की सूचना अमलनेर पुलिस थाने में दी. खबर मिलने पर थानाप्रभारी अनिल बड़गूजर पुलिस टीम के साथ डा. हजारे के क्लीनिक के पास पहुंची. सुबह करीब साढ़े 3 बजे इस घटना की खबर मृतक प्रो. दीपक की पत्नी तथा रिश्तेदारों को मिली तो वे सब वहां पहुंच गए. सुबह होने पर पुलिस ने जब उन की लाश का निरीक्षण किया तो उन के शरीर पर चोटों के गहरे घाव थे.

लोग इसे एक सड़क दुर्घटना मान कर चल रहे थे लेकिन उन की बाइक वहां नहीं थी. इस से पुलिस उन की मौत को संदेहात्मक मान रही थी. प्रो. दीपक की पत्नी को यह हत्या का मामला लग रहा था, इसलिए उन्होंने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा दिया. इस घटना को ले कर अमलनेर शहर में खलबली मच गई थी. पुलिस अधीक्षक दत्तात्रेय कराले ने पूरे मामले को ध्यान में रखते हुए इस केस की जांच पर क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर सुनील कुराड़े को भी लगा दिया था. मामले की जांच थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच के इंचार्ज सुनील कुराडे और उन की टीम भी कर रही थी.

अपराध करने के बाद राज चव्हाण, विजय डेढे और राबिया फरार हो चुके थे. इधरउधर घूमतेघूमते वे सूरत पहुंचे. सूरत में राबिया की बहन का बेटा रहता था, जिस का नाम अजीज था. कुछ दिनों तक वे अजीज के पास रहे. वहीं पर राज को पैसों की जरूरत पड़ी तो उस ने अजीज को अपना मोबाइल बेच दिया. जलगांव क्राइम ब्रांच की टीम को जांच के दौरान यह जानकारी मिल गई थी कि दीपक पाटील का राज चव्हाण की प्रेमिका राबिया के पास आनाजाना था, इसलिए यह आशंका जताई जाने लगी कि उन की हत्या में बदमाश राज चव्हाण का हाथ हो सकता है. ऐसे में पुलिस का राज चव्हाण से पूछताछ करना जरूरी था. पुलिस को राज चव्हाण का मोबाइल नंबर मिल चुका था, जो सर्विलांस पर लगा दिया था. पुलिस को उस के मोबाइल की लोकेशन सूरत की मिली. क्राइम ब्रांच की टीम तुरंत सूरत के लिए रवाना हो गई. चूंकि राज अपना फोन अजीज को बेच चुका था, इसलिए पुलिस ने अजीज को हिरासत में ले लिया. उस ने बताया कि राज और राबिया सूरत से जा चुके हैं.

राज कोई दूसरा फोन प्रयोग करने लगा था. उस से उस ने 1-2 बार अजीज को भी फोन किया था. पुलिस ने उस के दूसरे नंबर की जांच की. वह नंबर उस समय बंद आ रहा था, जिस से उस की लोकेशन नहीं मिल रही थी. जब अजीज पुलिस हिरासत में था, उसी दौरान उसे राज चव्हाण ने फोन किया. अजीज ने मोबाइल का स्पीकर औन कर के पुलिस के सामने ही उस से बात की. बातचीत के दौरान राज ने अजीज को बताया कि वह इस समय राबिया के साथ वाशीम जिले के कारंजा गांव में रह रहा है. यह जानकारी मिलने पर क्राइम ब्रांच की टीम 16 मई, 2018 को कारंजा के लिए रवाना हो गई. पुलिस ने कारंजा से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक झुग्गी बस्ती में रह रहे राज और राबिया को हिरासत में ले लिया.

दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि प्रो. दीपक की हत्या विजय डेढे के साथ मिल कर की थी. क्राइम ब्रांच ने यह जानकारी अपने अधिकारियों को दी तो अमलनेर पुलिस ने विजय डेढे को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने राबिया, उस के प्रेमी राज चव्हाण और विजय डेढे से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. मामले की जांच थाना अमलनेर के प्रभारी अनिल बड़गूजर कर रहे हैं.

रूह का स्पंदन : दक्षा को मिल ही गई खुशी

‘‘डूयू बिलीव इन वाइब्स?’’ दक्षा द्वारा पूरे गए इस सवाल पर सुदेश चौंका. उस के चेहरे के हावभाव तो बदल ही गए, होंठों पर हलकी मुसकान भी तैर गई. सुदेश का खुद का जमाजमाया कारोबार था. वह सुंदर और आकर्षक युवक था. गोरा चिट्टा, लंबा, स्लिम,
हलकी दाढ़ी और हमेशा चेहरे पर तैरती बाल सुलभ हंसी. वह ऐसा लड़का था, जिसे देख कर कोई भी पहली नजर में ही आकर्षित हो जाए. घर में पे्रम विवाह करने की पूरी छूट थी, इस के बावजूद उस ने सोच रखा था कि वह मांबाप की पसंद से ही शादी करेगा.
सुदेश ने एकएक कर के कई लड़कियां देखी थीं. कहीं लड़की वालों को उस की अपार प्यार करने वाली मां पुराने विचारों वाली लगती थी तो कहीं उस का मन नहीं माना. ऐसा कतई नहीं था कि वह कोई रूप की रानी या देवकन्या तलाश रहा था. पर वह जिस तरह की लड़की चाहता था, उस तरह की कोई उसे मिली ही नहीं थी.
सुदेश का अलग तरह का स्वभाव था. उस की सीधीसादी जीवनशैली थी, गिनेचुने मित्र थे. न कोई व्यसन और न किसी तरह का कोई महंगा शौक. वह जितना कमाता था, उस हिसाब से उस के कपड़े या जीवनशैली नहीं थी. इस बात को ले कर वह हमेशा परेशान रहता था कि आजकल की आधुनिक लड़कियां उस के घरपरिवार और खास कर उस के साथ व्यवस्थित हो पाएंगी या नहीं.
अपने मातापिता का हंसताखेलता, मुसकराता, प्यार से भरपूर दांपत्य जीवन देख कर पलाबढ़ा सुदेश अपनी भावी पत्नी के साथ वैसे ही मजबूत बंधन की अपेक्षा रखता था. आज जिस तरह समाज में अलगाव बढ़ रहा है, उसे देख कर वह सहम जाता था कि अगर ऐसा कुछ उस के साथ हो गया तोसुदेश की शादी को ले कर उस की मां कभीकभी चिंता करती थीं लेकिन उस के पापा उसे समझाते रहते थे कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. सुदेश भी वक्त पर भरोसा कर के आगे बढ़ता रहा. यह सब चल रहा था कि उस से छोटे उस के चचेरे भाई की सगाई का निमंत्रण आया. इस से सुदेश की मां को लगा कि उन के बेटे से छोटे लड़कों की शादी हो रही हैं और उन का हीरा जैसा बेटा किसी को पता नहीं क्यों दिखाई नहीं देता.
चिंता में डूबी सुदेश की मां ने उस से मेट्रोमोनियल साइट पर औनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने को कहा. मां की इच्छा का सम्मान करते हुए सुदेश ने रजिस्ट्रेशन करा दिया. एक दिन टाइम पास करने के लिए सुदेश साइट पर रजिस्टर्ड लड़कियों की प्रोफाइल देख रहा था, तभी एक लड़की की प्रोफाइल पर उस की नजर ठहर गई.
ज्यादातर लड़कियों ने अपनी प्रोफाइल में शौक के रूप में डांसिंग, सिंगिंग या कुकिंग लिख रखा था. पर उस लड़की ने अपनी प्रोफाइल में जो शौक लिखे थे, उस के अनुसार उसे ट्रैवलिंग, एडवेंचर ट्रिप्स, फूडी का शौक था. वह बिजनैस माइंडेड भी थी.
उस की हाइट यानी ऊंचाई भी नौर्मल लड़कियों से अधिक थी. फोटो में वह काफी सुंदर लग रही थी. सुदेश को लगा कि उसे इस लड़की के लिए ट्राइ करना चाहिए. शायद लड़की को भी उस की प्रोफाइल पसंद आ जाए और बात आगे बढ़ जाए. यही सोच कर उस ने उस लड़की के पास रिक्वेस्ट भेज दी.
सुदेश तब हैरान रह गया, जब उस लड़की ने उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. हिम्मत कर के उस ने साइट पर मैसेज डाल दिया. जवाब में उस से फोन नंबर मांगा गया. सुदेश ने अपना फोन नंबर लिख कर भेज दिया. थोड़ी ही देर में उस के फोन की घंटी बजी. अनजान नंबर होने की वजह से सुदेश थोड़ा असमंजस में था. फिर भी उस ने फोन रिसीव कर ही लिया.
दूसरी ओर से किसी संभ्रांत सी महिला ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘मैं दक्षा की मम्मी बोल रही हूं. आप की प्रोफाइल मुझे अच्छी लगी, इसलिए मैं चाहती हूं कि आप अपना बायोडाटा और कुछ फोटोग्राफ्स इसी नंबर पर वाट्सऐप कर दें.’’
सुदेश ने हां कह कर फोन काट दिया. उस के लिए यह सब अचानक हो गया था. इतनी जल्दी जवाब आ जाएगा और बात भी हो जाएगी, सुदेश को उम्मीद नहीं थी. सोचविचार छोड़ कर उस ने अपना बायोडाटा और फोटोग्राफ्स वाट्सऐप कर दिए.
फोन रखते ही दक्षा ने मां से पूछा, ‘‘मम्मी, लड़का किस तरह बातचीत कर रहा था? अपने ही इलाके की भाषा बोल रहा था या किसी अन्य प्रदेश की भाषा में बात कर रहा था?’’
‘‘बेटा, फिलहाल वह दिल्ली में रह रहा है और दिल्ली में तो सभी प्रदेश के लोग भरे पड़े हैं. यहां कहां पता चलता है कि कौन कहां का है. खासकर यूपी, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान वाले तो अच्छी हिंदी बोल लेते हैं.’’ मां ने बताया.
‘‘मम्मी, मैं तो यह कह रही थी कि यदि वह अपने ही क्षेत्र का होता तो अच्छा रहता.’’ दक्षा ने मन की बात कही. लड़का गढ़वाली ही नहीं, अपने इलाके का ही है. मां ने बताया तो दक्षा खुश हो उठी.
दक्षा मां से बातें कर रही थी कि उसी समय वाट्सऐप पर मैसेज आने की घंटी बजी. दक्षा ने फटाफट बायोडाटा और फोटोग्राफ्स डाउनलोड किए. बायोडाटा परफेक्ट था. दक्षा की तरह सुदेश भी अपने मांबाप की एकलौती संतान था. न कोई भाई न कोई बहन. दिल्ली में उस का जमाजमाया कारोबार था. खाने और ट्रैवलिंग का शौक. वाट्सऐप पर आए फोटोग्राफ्स में एक दाढ़ी वाला फोटो था.
दक्षा को जो चाहिए था, वे सारे गुण तो सुदेश में थे. पर दक्षा खुश नहीं थी. उस के परिवार में जो घटा था, उसे ले कर वह परेशान थी. उसे अपनी मर्यादाओं का भी पता था. साथ ही स्वभाव से वह थोड़ी मूडी और जिद्दी थी. पर समय और संयोग के हिसाब से धीरगंभीर और जिम्मेदारी भी थी.
दक्षा का पालनपोषण एक सामान्य लड़की से हट कर हुआ था. ऐसा नहीं करते, वहां नहीं जाते, यह नहीं बोला जाता, तुम लड़की हो, लड़कियां रात में बाहर नहीं जातीं. जैसे शब्द उस ने नहीं सुने थे, उस के घर का वातावरण अन्य घरों से कदम अलग था. उस की देखभाल एक बेटे से ज्यादा हुई थी. घर के बिजली के बिल से ले कर बैंक से पैसा निकालने, जमा करने तक का काम वह स्वयं करती थी.
दक्षा की मां नौकरी करती थीं, इसलिए खाना बनाना और घर के अन्य काम करना वह काफी कम उम्र में ही सीख गई थी. इस के अलावा तैरना, घुड़सवारी करना, कराटे, डांस करना, सब कुछ उसे आता था. नौकरी के बजाए उसे बिजनैस में रुचि ही नहीं, बल्कि सूझबूझ भी थी. वह बाइक और कार दोनों चला लेती थी. जयपुर और नैनीताल तक वह खुद गाड़ी चला कर गई थी. यानी वह एक अच्छी ड्राइवर थी.
दक्षा को पढ़ने का भी खासा शौक था. इसी वजह से वह कविता, कहानियां, लेख आदि भी लिखती थी. एकदम स्पष्ट बात करती थी, चाहे किसी को अच्छी लगे या बुरी. किसी प्रकार का दंभ नहीं, लेकिन घरपरिवार वालों को वह अभिमानी लगती थी. जबकि उस का स्वभाव नारियल की तरह था. ऊपर से एकदम सख्त, अंदर से मीठी मलाई जैसा.
उस की मित्र मंडली में लड़कियों की अपेक्षा लड़के अधिक थे. इस की वजह यह थी कि लिपस्टिक या नेल पौलिश के बारे में बेकार की चर्चा करने के बजाय वह वहां उठनाबैठना चाहती थी, जहां चार नई बातें सुननेसमझने को मिलें. वह ऐसी ही मित्र मंडली पसंद करती थीं. उस के मित्र भी दिलवाले थे, जो बड़े भाई की तरह हमेशा उस के साथ खड़े रहते थे.
सब से खास मित्र थी दक्षा की मम्मी, दक्षा उन से अपनी हर बात शेयर करती थी. कोई उस से प्यार का इजहार करता तो यह भी उस की मम्मी को पता होता था. मम्मी से उस की इस हद तक आत्मीयता थी. रूप भी उसे कम नहीं मिला था. न जाने कितने लड़के सालों तक उस की हां की राह देखते रहे.
पर उस ने निश्चय कर लिया था कि कुछ भी हो, वह प्रेम विवाह नहीं करेगी. इसीलिए उस की मम्मी ने बुआ के कहने पर मेट्रोमोनियल साइट पर उस की प्रोफाइल डाल दी थी. जबकि अभी वह शादी के लिए तैयार नहीं थी. उस के डर के पीछे कई कारण थे.
सुदेश और दक्षा के घर वाले चाहते थे कि पहले दोनों मिल कर एकदूसरे को देख लें. बातें कर लें और कैसे रहना है, तय कर लें. क्योंकि जीवन तो उन्हें ही साथ जीना है. उस के बाद घर वाले बैठ कर शादी तय कर लेंगे.
घर वालों की सहमति से दोनों को एकदूसरे के मोबाइल नंबर दे दिए गए. उसी बीच सुदेश को तेज बुखार आ गया, इसलिए वह घर में ही लेटा था. शाम को खाने के बाद उस ने दक्षा को मैसेज किया. फोन पर सीधे बात करने के बजाय उस ने पहले मैसेज करना उचित समझा था.
काफी देर तक राह देखने के बाद दक्षा का कोई जवाब नहीं आया. सुदेश ने दवा ले रखी थी, इसलिए उसे जब थोड़ा आराम मिला तो वह सो गया. रात करीब साढ़े 10 बजे शरीर में दर्द के कारण उस की आंखें खुलीं तो पानी पी कर उस ने मोबाइल देखा. उस में दक्षा का मैसेज आया हुआ था. मैसेज के अनुसार, उस के यहां मेहमान आए थे, जो अभीअभी गए हैं.
सुदेश ने बात आगे बढ़ाई. औपचारिक पूछताछ करतेकरते दोनों एकदूसरे के शौक पर आ गए. यह हैरानी ही थी कि दोनों के अच्छेबुरे सपने, डर, कल्पनाएं, शौक, सब कुछ काफी हद इस तरह से मेल खा रहे थे, मानो दोनों जुड़वा हों. घंटे, 2 घंटे, 3 घंटे हो गए. किसी भी लड़की से 10 मिनट से ज्यादा बात न करने वाला सुदेश दक्षा से बातें करते हुए ऐसा मग्न हो गया कि उस का ध्यान घड़ी की ओर गया ही नहीं, दूसरी ओर दक्ष ने भी कभी किसी से इतना लगाव महसूस नहीं किया था.
सुदेश और दक्षा की बातों का अंत ही नहीं हो रहा था. दोनों सुबह 7 बजे तक बातें करते रहे. दोनों ने बौलीवुड हौलीवुड फिल्मों, स्पोर्ट्स, पौलिटिकल व्यू, समाज की संरचना, स्पोर्ट्स कार और बाइक, विज्ञान और साहित्य, बच्चों के पालनपोषण, फैमिली वैल्यू सहित लगभग सभी विषयों पर बातें कर डालीं. दोनों ही काफी खुश थे कि उन के जैसा कोई तो दुनिया में है. सुबह हो गई तो दोनों ने फुरसत में बात करने को कह कर एकदूसरे से विदा ली.
घर वालों की सहमति पर सुदेश और दक्षा ने मिल कर बातें करने का निश्चय किया. सुदेश सुबह ही मिलना चाहता था, लेकिन दक्षा ने ब्रेकफास्ट कर के मिलने की बात कही. क्योंकि वह पूजापाठ कर के ही ब्रेकफास्ट करती थी. सुदेश में दक्षा से मिलने के लिए गजब का उत्साह था. दक्षा की बातों और उस के स्वभाव ने आकर्षण तो पैदा कर ही दिया था. इस के अलावा दक्षा ने अपने जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें मिल कर बताने को कहा था. वो बातें कौन सी थीं, सुदेश उन बातों को भी जानना चाहता था.
निश्चित की गई जगह पर सुदेश पहले ही पहुंच गया था. वहां पहुंच कर वह बेचैनी से दक्षा की राह देख रहा था. वह काले रंग की शर्ट और औफ वाइट कार्गो पैंट पहन कर गया था. रेस्टोरेंट में बैठ कर वह हैडफोन से गाने सुनने में मशगूल हो गया. दक्षा ने काला टौप पहना था, जिस के लिए उस की मम्मी ने टोका भी था कि पहली बार मिलने जा रही है तो जींस टौप, वह भी काला.
तब दक्षा ने आदत के अनुसार लौजिकल जवाब दिया था, ‘‘अगर मैं सलवारसूट पहन कर जाती हूं और बाद में उसे पता चलता है कि मैं जींस टौप भी पहनती हूं तो यह धोखा देने वाली बात होगी. और मम्मी इंसान के इरादे नेक हों तो रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता.’’
तर्क करने में तो दक्षा वकील थी. बातों में उस से जीतना आसान नहीं था. वह घर से निकली और तय जगह पर पहुंच गई. सढि़यां चढ़ कर दरवाजा खोला और रेस्टोरेंट में अंदर घुसी. फोटो की अपेक्षा रियल में वह ज्यादा सुंदर और मस्ती में गाने के साथ सिर हिलाती हुई कुछ अलग ही लग रही थी.
अचानक सुदेश की नजर दक्षा पर पड़ी तो दोनों की नजरें मिलीं. ऐसा लगा, दोनों एकदूसरे को सालों से जानते हों और अचानक मिले हों. दोनों के चेहरों पर खुशी छलक उठी थी.
खातेपीते दोनों के बीच तमाम बातें हुईं. अब वह घड़ी आ गई, जब दक्षा अपने जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण बातें उस से कहने जा रही थी. वहां से उठ कर दोनों एक पार्क में आ गए थे, जहां दोनों कोने में पेड़ों की आड़ में रखी एक बेंच पर बैठ गए. दक्षा ने बात शुरू की, ‘‘मेरे पापा नहीं हैं, सुदेश. ज्यादातर लोगों से मैं यही कहती हूं कि अब वह इस दुनिया में नहीं है, पर यह सच नहीं है. हकीकत कुछ और ही है.’’
इतना कह कर दक्षा रुकी. सुदेश अपलक उसे ही ताक रहा था. उस के मन में हकीकत जानने की उत्सुकता भी थी. लंबी सांस ले कर दक्षा ने आगे कहा, ‘‘जब मैं मम्मी के पेट में थी, तब मेरे पापा किसी और औरत के लिए मेरी मम्मी को छोड़ कर उस के साथ रहने के लिए चले गए थे.
‘‘लेकिन अभी तक मम्मीपापा के बीच डिवोर्स नहीं हुआ है. घर वालों ने मम्मी से यह कह कर उन्हें अबार्शन कराने की सलाह दी थी कि उस आदमी का खून भी उसी जैसा होगा. इस से अच्छा यही होगा कि इस से छुटकारा पा कर दूसरी शादी कर लो.’’
दक्षा के यह कहते ही सुदेश ने उस की तरफ गौर से देखा तो वह चुप हो गई. पर अभी उस की बात पूरी नहीं हुई थी, इसलिए उस ने नजरें झुका कर आगे कहा, ‘‘पर मम्मी ने सभी का विरोध करते हुए कहा कि जो कुछ भी हुआ, उस में पेट में पल रहे इस बच्चे का क्या दोष है. यानी उन्होंने गर्भपात नहीं कराया. मेरे पैदा होने के बाद शुरू में कुछ ही लोगों ने मम्मी का साथ दिया. मैं जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे सब शांत होता गया.
‘‘मेरा पालनपोषण एक बेटे की तरह हुआ. अगलबगल की परिस्थितियां, जिन का अकेले मैं ने सामना किया है, उस का मेरी वाणी और व्यवहार में खासा प्रभाव है. मैं ने सही और गलत का खुद निर्णय लेना सीखा है. ठोकर खा कर गिरी हूं तो खुद खड़ी होना सीखा है.’’
अपनी पलकों को झपकाते हुए दक्षा आगे बोली, ‘‘संक्षेप में अपनी यह इमोशनल कहानी सुना कर मैं आप से किसी तरह की सांत्वना नहीं पाना चाहती, पर कोई भी फैसला लेने से पहले मैं ने यह सब बता देना जरूरी समझा.
‘‘कल कोई दूसरा आप से यह कहे कि लड़की बिना बाप के पलीबढ़ी है, तब कम से कम आप को यह तो नहीं लगेगा कि आप के साथ धोखा हुआ है. मैं ने आप से जो कहा है, इस के बारे में आप आराम से घर में चर्चा कर लें. फिर सोचसमझ कर जवाब दीजिएगा.’’
सुदेश दक्षा की खुद्दारी देखता रह गया. कोई मन का इतना साफ कैसे हो सकता है, उस की समझ में नहीं आ रहा था. अब तक दोनों को भूख लग आई थी. सुदेश दक्षा को साथ ले कर नजदीक की एक कौफी शौप में गया. कौफी का और्डर दे कर दोनों बातें करने लगे तभी अचानक दक्षा ने पूछा था, ‘‘डू यू बिलीव इन वाइब्स?’’
सुदेश क्षण भर के लिए स्थिर हो गया. ऐसी किसी बात की उस ने अपेक्षा नहीं की थी. खासकर इस बारे में, जिस में वह पूरी तरह से भरोसा करता हो. वाइब्स अलौकिक अनुभव होता है, जिस में घड़ी के छठें भाग में आप के मन को अच्छेबुरे का अनुभव होता है. किस से बात की जाए, कहां जाया जाए, बिना किसी वजह के आनंद न आए और इस का उलटा एकदम अंजान व्यक्ति या जगह की ओर मन आकर्षित हो तो यह आप के मन का वाइब्स है.
यह कभी गलत नहीं होता. आप का अंत:करण आप को हमेशा सच्चा रास्ता सुझाता है. दक्षा के सवाल को सुन कर सुदेश ने जीवन में एक चांस लेने का निश्चय किया. वह जो दांव फेंकने जा रहा था, अगर उलटा पड़ जाता तो दक्षा तुरंत मना कर के जा सकती थी. क्योंकि अब तक की बातचीत से यह जाहिर हो गया था. पर अगर सब ठीक हो गया तो सुदेश का बेड़ा पार हो जाएगा.
सुदेश ने बेहिचक दक्षा से उस का हाथ पकड़ने की अनुमति मांगी. दक्षा के हावभाव बदल गए. सुदेश की आंखों में झांकते हुए वह यह जानने की कोशिश करने लगी कि क्या सोच कर उस ने ऐसा करने का साहस किया है. पर उस की आंखो में भोलेपन के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया. अपने स्वभाव के विरुद्ध उस ने सुदेश को अपना हाथ पकड़ने की अनुमति दे दी.
दोनों के हाथ मिलते ही उन के रोमरोम में इस तरह का भाव पैदा हो गया, जैसे वे एकदूसरे को जन्मजन्मांतर से जानते हों. दोनों अनिमेष नजरों से एकदूसरे को देखते रहे. लगभग 5 मिनट बाद निर्मल हंसी के साथ दोनों ने एकदूसरे का हाथ छोड़ा. दोनों जो बात शब्दों में नहीं कह सके, वह स्पर्श से व्यक्त हो गई.
जाने से पहले सुदेश सिर्फ इतना ही कह सका, ‘‘तुम जो भी हो, जैसी भी हो, किसी भी प्रकार के बदलाव की अपेक्षा किए बगैर मुझे स्वीकार हो. रही बात तुम्हारे पिछले जीवन के बारे में तो वह इस से भी बुरा होता तब भी मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता. बाकी अपने घर वालों को मैं जानता हूं. वे लोग तुम्हें मुझ से भी अधिक प्यार करेंगे. मैं वचन देता हूं कि बचपन से ले कर अब तक अधूरे रह गए सपनों को मैं हकीकत का रंग देने की कोशिश करूंगा.’’
सुदेश और दक्षा के वाइब्स ने एकदूसरे से संबंध जोड़ने की मंजूरी दे दी थी.

सौजन्य- मनोहर कहानियां, मई 2019