Suspense Love Story: प्रेमजाल

Suspense Love Story: उद्योगपति का बेटा अंकुर सोच भी नहीं सकता था कि उसे प्यार करने वाली, उस पर जान छिड़कने वाली शमा का एक दूसरा रूप भी है. यह रहस्य तब खुला जब एक दिन भूलवश शमा का मोबाइल उस की गाड़ी में रह गया. फिर तो मोबाइल के वाट्सअप से ऐसे राज खुले कि…

आधी रात हो जाने के बाद भी अंकुर की आंखों में नींद नहीं थी. शाम की घटना ने उसे इस कदर बेचैन कर दिया था कि वह सो नहीं पा रहा था. उसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि कोई लड़की इस तरह का छलावा भी कर सकती है? शमा केवल उस की दोस्त ही नहीं थी बल्कि वह उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता था. जबकि वह दोस्ती और प्यार का खेल इस तरह खेल रही थी कि अंकुर विश्वास ही नहीं कर पा रहा था. रविवार का दिन था, दोनों ने एक दिन पहले ही तय कर लिया था कि रविवार को मल्टीप्लेक्स सिनेमा घर में मूवी देखेंगे. शमा आटो में बैठ कर थिएटर पहुंच गई थी. अंकुर पहले से ही 2 टिकट ले कर उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘हाय शमा.’’ कहते हुए अंकुर ने अपने पर्स से पैसे निकाल कर आटो वाले को दिए. पर्स जेब में रखते हुए वह मुड़ा तो शमा चहकी, ‘‘मैं लेट तो नहीं हुई अंकुर?’

‘‘अरे नहीं, बिलकुल सही टाइम पर आई हो.’’

‘‘चलो चलते हैं.’’ शमा ने अंकुर का हाथ थामते हुए कहा.

‘‘हांहां चलो.’’ कहते हुए अंकुर शमा के साथ थिएटर में चला गया.

शमा जब कभी आटो पर आती थी तो किराया अंकुर ही देता था. अगर कभी वह मैट्रो में आती थी तो अंकुर स्टेशन के बाहर कार में उस का इंतजार करते हुए मिलता था. शमा एक बड़े पब्लिक स्कूल में अध्यापिका थी. उस का ताल्लुक एक मध्यमवर्गीय परिवार से था. जबकि अंकुर एक रईस परिवार का बेटा था. शमा उसे बहुत ही संस्कारवान, पढ़ीलिखी और समझदार लड़की जान पड़ती थी. उसे लगता था कि वह उस की जीवनसंगिनी बनने के योग्य है. अंकुर की यह धारणा पिछले 2 सालों से बनी हुई थी.

थिएटर पूरी तरह से भरा हुआ था. उन दोनों ने जैसे ही हाल में प्रवेश किया, फिल्म सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट परदे पर चल रहा था. यानी मूवी बस शुरू ही हुई थी. गेटकीपर ने टौर्च जला कर उन्हें उन की सीटों का रास्ता दिखाया. दोनों अपनी सीटों पर बैठ गए. अंकुर को शमा के साथ मूवी देखने में कुछ अलग ही मजा आता था. इधरउधर कार में घूमने या किसी रेस्तरां में बैठने के बजाय उसे थिएटर में पासपास बैठना ज्यादा अच्छा लगता था. शमा का हाथ अपने हाथों में ले कर मूवी देखने में यह मजा दोगुना हो जाता था. जब परदे पर कोई प्यारभरा गीत चलता था या कोई रोमांटिक दृश्य चल रहा होता था तो उसे लगता था जैसे परदे पर वह और शमा ही हों. उस वक्त दोनों उन दृश्यों में खो जाते थे.

शमा से अंकुर की मुलाकात उस के स्कूल के एक कल्चरल प्रोग्राम में ही हुई थी. उस प्रोग्राम में अंकुर विशिष्ट अतिथि के तौर पर आया था. उस प्रोग्राम के लिए उस के उद्योगपति पिता ने बतौर प्रायोजक बड़ा आर्थिक सहयोग दिया था. इसी नाते उस के पिता को विशिष्ट अतिथि बनाया गया था. लेकिन ऐन वक्त पर उन्हें उद्योगपतियों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए बाहर जाना पड़ गया था. पापा ने स्कूल कमेटी के प्रेसीडेंट से विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगते हुए कहा था कि वे जरूरी काम से बाहर हैं, इसलिए प्रोग्राम में नहीं आ पाएंगे.

स्कूल कमेटी के प्रेसीडेंट को बड़ी निराशा हुई. उन्हें यह अच्छा नहीं लग     रहा था कि प्रोग्राम के प्रायोजक ही प्रोग्राम में मौजूद न हों. आखिर तय हुआ कि उन की गैरमौजूदगी में प्रतिनिधि के तौर उन का बेटा अंकुर प्रोग्राम में मौजूद रहेगा. लंदन से एमबीए करने के बाद अंकुर ने पापा की टैक्सटाइल इंडस्ट्रीज में बैठना शुरू कर दिया था. निर्धारित दिन अंकुर ही प्रोग्राम में आया. बहुत बड़े स्कूल कैंपस में रखे गए प्रोग्राम में क्षेत्र के सांसद मुख्य अतिथि थे और भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी विशिष्ट अतिथि. विद्यार्थियों के घर वालों के अलावा भी विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्टजनों को प्र्रोग्राम में बुलाया गया था. कुल मिला कर वहां करीब 15 सौ के आसपास लोग मौजूद थे.

प्रोग्राम की एंकरिंग स्कूल की खूबसूरत और ऊर्जावान अध्यापिका शमा कर रही थीं.

‘‘और अब मैं गुजारिश करूंगी आज के प्रोग्राम की शान युवा उद्यमी अंकुर गुप्ता से कि वे मंच पर आएं.’’ शमा ने एक विशेष अंदाज में अंकुर का नाम मंच से पुकारा, तो वह उस से खासा प्रभावित हुआ. मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के भाषण खत्म हो चुके थे. अंकुर यंत्रवत उठा और मंच की ओर चल पड़ा.

शमा ने मंच की सीढि़यों पर ही हाथ आगे बढ़ा कर अंकुर का स्वागत किया. हुस्न की मलिका सी शमा के हाथों की गरमी अंकुर ने अपने हाथों में महसूस की. गजब की खूबसूरत थी वह. पलभर के लिए अंकुर की नजरें उस से मिलीं. उस की बातचीत से उसे लगा कि शमा बहुत ही तहजीब वाली संस्कारवान लड़की है. अंकुर मंच के डायस पर खड़ा था और पूरा विद्यालय प्रांगण उस के स्वागत में बज रही तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था. अन्य अतिथियों के संबोधन के बाद उस ने अपने अनुभवों और आधुनिक विचारों से परिपूर्ण भाषण दिया. अंकुर अच्छा वक्ता था. हर क्षेत्र की खबरों से वह अपडेट रहता था और अच्छा बोल लेता था. वह कालेज स्टूडेंट यूनियन का प्रेसीडेंट भी रह चुका था.

शमा भी अंकुर से खासी प्रभावित हुई. अंकुर उसे पहली ही नजर में भा गया था. स्कूल प्रोग्राम के बाद शमा से अंकुर की फिर मुलाकात हुई. शिष्टाचारवश वह उसे गाड़ी तक छोड़ने गई थी. उन चंद मिनटों की मुलाकात में ही शमा ने उसे अपना परिचय दे दिया था. उस ने बताया कि वह एक मध्यम वर्गीय शर्मा परिवार से ताल्लुक रखती है. उस के पापा एक न्यूज चैनल में कैमरामैन हैं. वह 2 बहनों और एक भाई में सब से छोटी है. अध्यापन उस का शौक भी है और रोजगार भी.

‘कभी हमारे औफिस आइए.’’ अंकुर ने अपना विजिटिंग कार्ड शमा को देते हुए कहा.

‘‘जरूर, कभी आऊंगी.’’ शमा मुसकान बिखेरते हुए बोली.

उस दिन शमा से हुई मुलाकात अंकुर को बेचैन कर गई थी. रहरह कर उस की आंखों के सामने शमा का खूबसूरत चेहरा घूम रहा था. शमा मिले भी तो कहां मिले. उस ने अपना कार्ड तो शमा को दिया था पर उस का अतापता नहीं पूछा था. न ही मोबाइल नंबर लिया था.

एक दिन अचानक वाट्सअप पर आए एक मैसेज ने अंकुर को चौंका दिया. ‘‘हैलो सर, गुड मौर्निंग.’’

बिलकुल नया नंबर था. अंकुर समझ नहीं पाया कि ये किस का नंबर है. उस ने चैट की डीपी में देखा, किसी लड़की की तसवीर लगी थी. उस ने उसे क्लोज कर के देखा, वह शमा ही थी.

‘वेरी गुड मौर्निंग जी.’ अंकुर ने लिखा.

दूसरी ओर शमा आनलाइन थी. उस ने फिर टाइप किया, ‘कैसे हैं सर आप?’

‘फाइन. आप कैसी हैं, शमाजी?’ अंकुर ने पूछा.

‘मैं भी ठीक हूं सर. पर आप मुझे शमाजी मत बोलिए. सिर्फ शमा चलेगा.’

‘ओके. और आप मुझे सर नहीं, अंकुर बोलें. आप मुझे इतना बड़ा मत बनाइए.’ अंकुर ने लिखा.

और शमा ने मुसकान वाली स्माइली के साथ लिखा, ‘ओके, अंकुर सर.’

उस दिन पहली मोबाइल चैट के बाद अंकुर और शमा नजदीक आते चले गए. मोबाइल चैट के बाद मुलाकात. फिर मुलाकात दोस्ती में और दोस्ती प्यार में बदल गई.

अंकुर और शमा की मुलाकातों का सिलसिला चल रहा था. वह जब भी मिलती अंकुर विदा होते हुए कहता, ‘‘फिर कब और कहां मिलना है?’’

‘‘अभी एक हफ्ते तो बहुत बिजी हूं. बहुत सारे काम करने हैं.’’

‘‘यानी एक हफ्ते की छुट्टी.’’

‘‘अरे यार छुट्टी क्यों? मोबाइल है न, मैसेज कर लेना. फ्री हुई तो बात कर लूंगी.’’ शमा कहती.

और आज अंकुर ने शमा के साथ मूवी देखने का प्रोग्राम बनाया था. बहुत ही रोमांटिक लव स्टोरी वाली मूवी थी. दोनों ने मूवी में खूब एंजौय किया.

थिएटर से बाहर आ कर अंकुर ने शमा से कहा, ‘‘एकएक कप कौफी पीते हैं, सामने ही कैफे कौफीडे है.’’

‘‘हां अंकुर, यह ठीक रहेगा. मेरा भी बहुत मन कर रहा है. आज ठंड भी बहुत है.’’

‘तो चलो, देर किस बात की, आप की ठंड दूर किए देते हैं.’

अंकुर ने टेढ़ी नजरों से शरारतपूर्ण अंदाज में कहा तो शमा ने प्यार भरा एक घूंसा अंकुर की बाजू पर दे मारा. और बोली, ‘‘तुम कभी नहीं सुधरोगे.’’

‘‘तुम मुझे सुधारना क्यों चाहती हो शमा?’ अंकुर ने शरारत से कहा, तो शमा ने उस की बाजू पर एक और घूंसा जड़ दिया.

‘‘चलो, शमा मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’’ अंकुर ने कैफे कौफीडे से निकलते हुए कहा.

‘‘घर नहीं, घर के नजदीक बोलो.’’

‘‘ओके बाबा, घर के नजदीक.’’ अंकुर ने कहा.

शमा का घर अंकुर के रास्ते में ही पड़ता था. कभीकभी वह शमा को उस के घर के नजदीक बने मदर डेयरी बूथ के पास छोड़ देता था. वहीं से शमा का घर चंद कदमों की दूरी पर था.

‘‘ओके डार्लिंग, सीयू, मिलते हैं. अपना खयाल रखना.’’ कार से उतरते हुए शमा ने अंकुर से कहा.

‘‘ओके जरूर रखूंगा. आप का आदेश सिर आंखों पर.’’ अंकुर ने कहा, तो शमा उस की नाक खींचते हुए बोली, ‘‘नाटी बौय.’’

अंकुर कुछ ही दूरी पर गया था कि उस की नजर बराबर वाली सीट पर पड़ी. उस ने देखा शमा का मोबाइल सीट पर पड़ा रह गया था. वह मोबाइल ले जाना भूल गई थी. लेकिन अब क्या करे, शमा को मोबाइल कैसे लौटाए? उस के पास कोई और नंबर भी नहीं था, जिस पर काल कर के शमा को बता देता. शमा के घर वह जा नहीं सकता था. अंकुर ने सोचा शमा खुद ही काल करेगी, तभी बता दूंगा. एक पल के लिए उस के मन में खयाल आया, चलो देखते हैं मोबाइल में क्या कुछ है? लेकिन दूसरे पल उस ने सोचा इस तरह चोरीछिपे किसी का मोबाइल देखना गलत है. फिर सोचा देख भी ले तो क्या गलत है? आखिर उस ने घर के रास्ते में ही कार को साइड में पार्क किया.

शमा का मोबाइल उस ने अपने हाथ में लिया. कीपैड का पासवर्ड उसे पता था. उस ने कई बार शमा को खोलते हुए देखा था, लेकिन कभी इस का फायदा नहीं उठाया था. शमा के मोबाइल का पासवर्ड ‘शमा 22’ था. यानी नाम और उस के बर्थडे की तारीख. अंकुर ने शमा टाइप किया तो मोबाइल का लौक खुल गया. मोबाइल को खुला देख अंकुर की इच्छा उस का वाट्सअप खोलने की हुई. उस ने वाट्सअप खोला. उसे यह देख कर घोर आश्चर्य हुआ कि उस में एक भी नया मैसेज नहीं था. शमा उस के साथ पिछले 5-6 घंटे से थी. शमा ने एक बार भी मोबाइल नहीं छुआ था. इस का मतलब शमा वाट्सअप ज्यादा यूज नहीं करती थी. एक पल के लिए उसे बहुत अच्छा लगा.

‘कहीं ऐसा तो नहीं कि नेटवर्क काम नहीं कर रहा हो.’ अंकुर बुदबुदाया. उस ने स्क्रीन को नीचे कर के देखा. फिर देख कर बोला, ‘ओहो, डाटा नेट ही बंद कर रखा है.’ अंकुर ने जैसे ही मोबाइल डाटा के आइकोन को टच किया, नेट शो करने लगा. जैसे ही नेट औन हुआ, एक साथ 8-10 अलगअलग नंबरों से कई मैसेज आ गए. इस का मतलब शमा का फोन कई नंबरों के चैट पर था. अंकुर यह जानने को बेचैन हुआ कि वे किन कं नंबर हैं? पलभर के लिए उसे लगा कि कहीं गलत तो नहीं कर रहा, किसी के मोबाइल को खोल कर? कई सवाल उस के दिमाग में कौंधे. आखिर उस से रहा नहीं गया और उस ने सभी चैट पढ़ने का निर्णय कर लिया.

चैट पढ़ कर अंकुर सन्न रह गया. मानों उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. उस की स्थिति काटो तो खून नहीं वाली थी. जिस शमा को वह बहुत संस्कारवान समझता था, जिसे वह अपनी जीवन संगिनी बनाने के बारे में सोचने लगा था, उस का दूसरा रूप उस के सामने था. मोबाइल में कई लड़कों के मैसेज थे.

‘‘यार शमा तुम ने 3 घंटे मैसेज नहीं करने को कहा था, अब नहीं रहा जा रहा, कहां हो. अपने पापा के साथ क्या कर रही हो आज.’’ एक नंबर से मैसेज था. तो दूसरे में ‘‘शमा डार्लिंग, अपना मोबाइल संभाल कर रखा करो. आखिर बहन को देती ही क्यों हो, जो 5-6 घंटे के लिए बैन करना पड़े.’’ शमा ने भी कई चैट में रोमांटिक बातें कर रखी थीं. अंकुर का सिर चकरा गया. कई चैट में अश्लील जोक्स और पोर्न मूवी की छोटीछोटी क्लिपिंग भी थीं.

कुछ नंबरों पर शमा और कुछ लड़कों के अंतरंग चित्र थे. इन चित्रों को शमा ने आदान प्रदान किया था. अंकुर ने देखा कुछ लड़के तो उस के परिचित थे, जिन्हें वह अच्छी तरह से जानता था. ज्यादातर अमीर घरानों के बिगड़ैल लड़के थे. अंकुर की समझ में आ गया था कि शमा अपनी खूबसूरती और अदाओं से अमीरजादों पर अपना दिल लुटाती है और अमीरजादे उस पर अपनी दौलत. अंकुर ज्योंज्यों शमा के मोबाइल के चैट पढ़ता जा रहा था, उस का माथा घूम रहा था. उस ने शमा की एक सहेली की चैट खोली. दोनों ने एकएक पल सांझा किया हुआ था.

सहेली की चैट में अपना नाम देख कर अंकुर चौंक गया था. शमा ने लिखा था कि प्रसिद्ध टैक्सटाइल मिल ओनर का पुत्र अंकुर उस पर जान छिड़कता है.

‘‘ओ गौड!’’ अंकुर ने माथा पीट लिया.

शमा ने अपनी सहेली को वह सेल्फी भी भेज रही थी, जो शमा ने अंकुर के साथ अंतरंग पलों में ली थी. वह इस खयाल से ही कांप गया कि वह सेल्फी किसी के हाथ लग गई तो उस के परिवार की बड़ी बदनामी होगी. जबकि शमा बड़ी बेशर्मी से उस सेल्फी को अपनी सहेली से शेयर कर चुकी थी. अंकुर के मन में आया कि शमा का मोबाइल ही तोड़ कर फेंक दें. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. लेकिन अगले ही पल उस ने सोचा इस से होगा क्या? सेल्फी तो उस की सहेली के पास भी भेजी गई है. शमा उस सेल्फी को ले कर कुछ भी कर सकती है. हो सकता है ब्लैकमेल करे?

वह सोचने लगा कि शमा से छुटकारा कैसे पाए? क्योंकि वह आसानी से तो पीछा छोड़ेगी नहीं. जीवनसंगिनी बनाना तो दूर वह तो दोस्ती के भी काबिल नहीं है. इसी उधेड़बुन में अंकुर लगातार शमा के मोबाइल के वाट्सअप पर अलगअलग चैट पढ़ता जा रहा था. आखिर में उस ने एक बहुत बिगड़े अमीरजादे की चैट खोली. लिखा था, ‘‘शमा तुम मुझे यूं ब्लैकमेल नहीं कर सकती. जो भी हम दोनों के बीच था, उस में हम दोनों की सहमति थी. तुम्हारा मन मुझ से भर गया तो तुम ने मुझे छोड़ दिया. जब तक मैं ने तुम पर पैसा लुटाया तब तक तुम मुझ पर मर मिटने का नाटक कर रही थीं. और अब जब तुम्हें नएनए लड़के मिल गए तो मुझे दूध से मक्खी की तरह निकल फेंका.’’

यह सब पढ़ते ही अंकुर का सिर चकरा गया. ‘उफ्फ, इतना गंदा खेल.’ वह बुदबुदाया. उसे शमा पर गुस्सा आया और खुद पर खीझ. आखिर वह शमा के प्रेमजाल में फंसा ही क्यों? जो हुआ सो हुआ, पर अब इस बला से कैसे छुटकारा मिले? वह सोच ही रहा था कि उस के दिमाग में एक आइडिया आया. उस ने सभी चैट की फोटो शमा के मोबाइल से अपने मोबाइल में फारवर्ड किए और शमा के मोबाइल से अपनी चैट डिलीट कर दी. अंकुर ने उस लड़के का मोबाइल नंबर भी नोट कर लिया, जिस ने शमा पर गुस्सा निकाल रखा था.

उस ने तय कर लिया कि वह शमा को इस बात का एहसास तक नहीं होने देगा कि उस की हरकतों को वह जान गया है. वह शमा को उसी के बुने जाल में फंसा कर छुटकारा पाएगा. उस ने शमा के मोबाइल के वाट्सअप पर सभी चैट को अनरीड कर दिया. यानी अब फिर से ये लगने लगा था कि उस की चैट किसी ने पढ़ी नहीं है. यह वाट्सअप का नया वर्जन था, जिस का उस ने फायदा उठाया.

तभी अंकुर के मोबाइल की घंटी बजी. यह कोई नया नंबर था. उस ने मोबाइल को औन किया.

‘‘अंकुर.’’ उधर से आवाज आई. वह शमा ही थी.

‘‘क्या हुआ शमा, ये किस का नंबर है. तुम्हारा मोबाइल कहां गया.’’

‘‘अरे यार, तुम से मिल कर होश कहां रहता है. होशोहवास खो देती हूं.’’

‘‘क्या हुआ बताओ ना?’’

‘‘तुम अपनी गाड़ी में देखो, वहीं पड़ा होगा मेरा मोबाइल. भूल गई हूं शायद.’’

‘‘अरे हां, ये पड़ा है. चलो कल ले लेना ओके.’’

‘‘नहीं, अभी वापस आओ, मुझे अभी चाहिए.’’ शमा ने बड़ी आतुरता से कहा.

‘‘सुबह औफिस जाते हुए दे दूंगा भई, विश्वास रखो.’’ अंकुर ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘नहीं अभी वापस आ कर दे कर जाओ. मुझे चाहिए.’’ शमा ने घबराई हुई सी आवाज में कहा.

‘‘ओके, आता हूं.’’

शमा की घबराई हुई आवाज और मोबाइल के प्रति इतनी व्याकुलता अंकुर को समझ आ रही थी.

अंकुर ने कार का यूटर्न लिया और फिर से शमा के घर की तरफ चल पड़ा.

शमा मदर डेयरी बूथ पर ही मिल गई. अंकुर की कार देखते ही वह उस तरफ लपकी.

‘‘अंकुर, बड़ी मुश्किल से कुछ काम का बहाना कर के घर से बाहर आई हूं.’’

‘‘ओके बेबी. इस में घबराने वाली क्या बात थी.’’ अंकुर ने कहा.

‘‘चलो छोड़ो, अभी जल्दी में हूं. चलती हूं.’’ कह कर शमा ने अपना मोबाइल लिया और वापस चली गई.

घर आ कर अंकुर ने जरूरी काम निपटाए और अपने बैडरूम में आ गया. उस के मन में कई तरह की उथलपुथल चल रही थी. उस ने शमा के मोबाइल से फारवर्ड की गई सभी फोटो कंप्यूटर में डाउनलोड कीं. कई लड़कों के साथ शमा के अंतरंग पलों की सेल्फी थीं. उस ने फोटोशौप में जा कर सभी सेल्फी में लड़कों के चेहरों को धुंधला कर दिया. अब सिर्फ शमा ही दिख रही थी. लड़कों के चेहरों के सिवा सब कुछ पूर्ववत था. इस के बाद अंकुर ने अपने कंप्यूटर के कलर प्रिंटर से कुछ कलर प्रिंट निकाले. इस के बाद उस ने एक मोबाइल नंबर डायल किया. यह नंबर उस लड़के का था, जो शमा की हरकतों से परेशान था. अगले दिन अंकुर ने प्रिंटर से निकाले सारे कलर प्रिंट उस लड़के को निर्धारित जगह पर भिजवा दिए.

शमा के स्कूल में हलचल मची थी. स्कूल खुलते ही देखा गया कि बहुत सारे रंगीन पैंफ्लेट स्कूल कैंपस में बिखरे पड़े हैं. इन पर शमा के अंतरंग पलों की वे तमाम फोटो थीं, जो उस ने खुद सेल्फी के रूप में ली थीं. पूरे स्कूल में एक ही चर्चा थी. शमा मैडम ऐसी है. शमा जैसे ही स्कूल पहुंची, एक बच्चा बड़े ही भोलेपन से एक पैंफ्लेट उस के हाथों में थमा कर बोला, ‘‘मैडम आप की सेल्फी बहुत अच्छी है.’’ शमा ने देखा तो जड़ हो गई. मारे शरम के उस से हिला नहीं गया. वह खुद को अपने ही बुने जाल में फंसा हुआ महसूस कर रही थी. Suspense Love Story

लेखक – रवि चमडि़या  

 

 

Mumbai Crime Story: प्यार में उजड़ी गृहस्थी

Mumbai Crime Story: अगर कोई किसी पर सब से ज्यादा विश्वास करता है तो पहले नंबर पर आती है पत्नी और उस के बाद दोस्त. लेकिन कभीकभी ये दोनों भी दगा करने से नहीं चूकते.

मुंबई से सटे जिला थाणे की तहसील अंबरनाथ के गांव नेवाली आकृति चाल में रहने वाले कुछ लोग सुबह काम के लिए निकले तो गांव से कुछ दूरी पर घनी झाडि़यों के बीच उन्हें प्लास्टिक का एक सुंदर और बड़ा सा कैरीबैग पड़ा दिखाई दिया. तेज बारिश होने के बावजूद उस पर खून के धब्बे दिखाईं दे रहे थे. इसलिए लोगों को यही लगा कि इस में किसी की लाश भरी है. मामला गंभीर था, इसलिए थोड़ी ही देर में वहां भीड़ लग गई. किसी ने इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. वह इलाका थाना हिल लाईन के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना हिल लाईन पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के बाद ड्यूटी पर तैनात असिस्टैंट इंसपेक्टर पढ़ार ने काररवाई करते हुए सच्चाई का पता लगाने के लिए नेवाली गांव स्थित पुलिस चौकी पर तैनात सबइंसपेक्टर दंगड़ू शिवराम अहिरे और पुलिस कांस्टेबल शेषराव वाघ को घटनास्थल पर भेज दिया. सबइंसपेक्टर दगड़ू शिवराम अहिरे और कांस्टेबल शेषराव वाघ गांव नेवाली पहुंचे तो गांव से कुछ दूरी पर उन्हें भीड़ लगी दिखाई दी. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि लाश वहीं पर पड़ी है.

उन्होंने वहां जा कर सब से पहले तो उस कैरीबैग को झाडि़यों से बाहर निकलवाया. गांव वालों की मौजूदगी में जब उसे खोला गया तो उस में प्लास्टिक की मोटी थैली में एक युवक की लाश को तोड़मरोड़ कर भरा गया था. लाश बाहर निकाली गई. मृतक 27-28 साल का युवक था. किसी तेज धार वाले चाकू से उस का गला काट कर हत्या की गई थी. सांवले रंग का वह युवक शरीर से ठीकठाक था. इस का मतलब हत्या में एक से अधिक लोग शामिल रहे होंगे.

दगड़ू शिवराम अहिरे और शेषराव वाघ ने इस बात की जानकारी सीनियर इंसपेक्टर मोहन बाघमारे को दी तो वह तुरंत इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर, असिस्टैंट इंसपेक्टर मनोज सिंह चौहान, महिला सबइंसपेक्टर वी.एस. शेलार, कांस्टेबल के.बी. जाधव, दिनेश कुभारे, जी.एस. मोरे और महिला कांस्टेबल पेड़वाजे को ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.  उन के पहुंचने तक प्रैस फोटोग्राफर, डाग स्क्वायड, फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम के अलावा एडीशनल पुलिस कमिश्नर बसंत जाधव और असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर डी. जगताप वहां पहुंच चुके थे.

डाग स्क्वायड, प्रैस फोटोग्राफर और फिंगर प्रिंट ब्यूरो का काम खत्म हो गया तो घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया गया. इस के बाद लाश की शिनाख्त की बात आई तो भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने मृतक की शिनाख्त कर दी. मृतक का नाम संजय हजारे थे. वह अपनी पत्नी अनुभा, एक बच्ची और दोस्त दीपांकर पात्रा के साथ कुछ दिनों पहले ही वहां रहने आया था. मृतक की शिनाख्त होते ही मोहन बाघमारे ने एक सिपाही भेज कर मृतक की पत्नी अनुभा को घटनास्थल पर बुलवा लिया. अनुभा पति की लाश देखते ही फूटफूट कर रोने लगी. पुलिस ने उसे समझाबुझा कर शांत कराया और वहां की सारी औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला मध्यवर्ती अस्पताल भिजवा दिया.

इस के बाद पुलिस थाने लौट आई थी. थाने लौट कर मोहन बाघमारे ने अपने स्टाफ के साथ सलाहमशविरा कर के हत्या के इस मामले की जांच इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर को सौंप दी. जितेंद्र आगरकर ने सहयोगियों के साथ जांच शुरू की तो उन्हें मृतक संजय हजारे की पत्नी अनुभा और साथ रहने वाले उस के दोस्त दीपांकर पात्रा पर शक हुआ. क्योंकि घटनास्थल पर जब अनुभा रो रही थी तो उन्होंने महसूस किया था कि पति की मौत पर कोई पत्नी जिस तरह रोती है, वैसा दर्द अनुभा के रोने में नहीं था. वह दिखावे के लिए रो रही थी. इसलिए उन्होंने जांच की शुरुआत अनुभा और दीपांकर से शुरू की.

उन्होंने दोनों को थाने बुला कर पूछताछ शुरू कर दी. पुलिस ने जब अनुभा से पूछा कि यह सब कैसे हुआ तो नजरें चुराते हुए उस ने कहा कि कल रात उन का अंडे खाने का मन हुआ तो वह अंडे लेने निकले. लेकिन वह गए तो लौट कर नहीं आए. मुझे लगा कि बारिश तेज हो रही है, इसलिए वह कहीं रुक गए होंगे. रात 12 बजे तक मैं ने उन का इंतजार किया. उतनी रात तक भी वह नहीं आए तो मैं बेटी के साथ सो गई. दीपांकर पात्रा के बारे में पूछा गया तो उस ने उसे अपना मुंहबोला भाई बताया. उस से भी पूछताछ की गई. उस ने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए खुद को निर्दोष बताया.

अनुभा का बयान जितेंद्र आगरकर के गले नहीं उतर रहा था. जिस औरत का पति रात को घर न आए, भला वह निश्चिंत हो कर कैसे सो सकती है? इस के अलावा दीपांकर ने पूछताछ में जो बयान दिया था, वह अनुभा के बयान से एकदम अलग था. अनुभा ने उसे मुंहबोला भाई बताया था, जबकि दीपांकर ने खुद को उस का दूर का रिश्तेदार बताया. इसी वजह से अनुभा शक के घेरे में आ गई थी. पुलिस को लग रहा था कि किसी न किसी रूप में अनुभा पति की हत्या में शामिल है. लेकिन पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत न होने की वजह से पुलिस उस पर सीधा आरोप नहीं लगा पा रही थी.

पुलिस सबूत जुटाने के लिए वहां पहुंची, जहां संजय अनुभा के साथ पहले रहता था. क्योंकि शिनाख्त के दौरान लोगों ने बताया था कि मृतक यहां कुछ दिनों पहले ही रहने आया था. अनुभा और दीपांकर ने पूछताछ में बताया था कि यहां आने से पहले वे अंधेरी (पूर्व) के गौतमनगर में रहते थे. जितेंद्र आगरकर ने अपने सहयोगियों को गौतमनगर भेज कर संजय और उस की पत्नी के बारे में पता किया तो वहां से पता चला कि संजय और उस की पत्नी अनुभा के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था. झगड़े की वजह थी अनुभा के संजीव शिनारौय के साथ के अवैध संबंध.

संजीव पहले उन के साथ ही रहता था. बाद में उसे अलग कर दिया गया था. इस के बावजूद अनुभा उस से मिलती रहती थी. जांच टीम के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस ने तुरंत संजीव को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो हर अभियुक्त की तरह उस ने भी पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस को पूरा विश्वास था कि हत्या इसी ने की है, इसलिए पुलिस ने उस से सच उगलवा ही लिया. इस के बाद अनुभा को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में अनुभा और संजीव ने संजय की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस तरह थी.

संजय हजारे पश्चिम बंगाल के जिला 24 परगना के वीरभूम का रहने वाला था. चूंकि उस के यहां सोनेचांदी के गहने बनाने और उन पर नक्काशी करने का काम होता आया था, इसलिए थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के वह भी यही काम करने लगा था. गांव में उस की एक छोटी सी दुकान थी, जिस से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि परिवार का गुजरबसर आराम से होता. मुंबई मेहनती और महत्त्वाकांक्षी युवकों के सपनों की नगरी है. संजय भी घर वालों से इजाजत ले कर सन 2005 में मुंबई आ गया था.

मुंबई में उस के गांव के कई लड़के पहले से ही रहते थे, इसलिए मुंबई में संजय को किसी तरह की परेशानी नहीं हुई. वह उन्हीं के साथ रह कर सोनेचांदी के गहने बनाने और उन पर नक्काशी का काम करने लगा. कुछ दिनों तक इधरउधर काम करने के बाद बोरीवली की एक बड़ी फर्म में उसे काम मिल गया. यहां उसे ठीकठाक पैसे मिलने लगे. ठीकठाक कमाई होने लगी तो पैसे इकट्ठा कर के उस ने अंधेरी (पूर्व) के गौतमनगर में एक मकान खरीद लिया.

वह अकेला ही रहता था, इसलिए दीपांकर और संजीव को भी उस ने अपने साथ रख लिया. संजीव उसी के गांव का रहने वाला था, जबकि दीपांकर पात्रा दूसरे गांव का रहने वाला था, बाद में दीपांकर ने ही उस की शादी अपनी दूर की रिश्तेदार अनुभा से करा दी. वह उस का रिश्तेदार हो गया. यह सन 2001 की बात है. चूंकि संजय के पास अपना मकान था, इसलिए शादी के बाद वह पत्नी अनुभा को मुंबई ले आया. उस के मकान में 2 कमरे थे. इसलिए अनुभा के आने के बाद भी उस के दोनों दोस्त भी उसी के साथ रहते रहे. साल भर बाद अनुभा ने एक बेटी को जन्म दिया. सभी उस बच्ची को खूब प्यार करते थे. उन के लिए वह खिलौने की तरह थी, इसलिए वे उसे खूब खेलाया करते थे.

कहा जाता है कि आदमी की नीयत कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता है. ऐसा ही संजीव के साथ हुआ. इस की नीयत अनुभा पर बिगड़ने लगी. उस की नीयत खराब हुई तो वह उस के नजदीक जाने की कोशिश करने लगा. देखने में भले ही सब कुछ पहले की तरह ठीकठाक लग रहा था, लेकिन ऐसा था नहीं. अब अनुभा को देखते ही संजीव का मन मचल उठता था. उसे संजय से ईर्ष्या होने लगी थी. जल्दी ही अनुभा को भी संजीव के दिल की बात का आभास हो गया. संजीव उस के ज्यादा से ज्यादा नजदीक आने की कोशिश में लगा था. सभी सुबह काम पर जाते तो शाम को ही आते. सब साथसाथ खाना खाते हंसीमजाक करते और फिर सो जाते.

2 कमरे के उस मकान में एक कमरे में संजय अपनी पत्नी के साथ सोता था तो दूसरे कमरे में दीपांकर और संजीव. संजीव संजय और अनुभा की बातें तथा हंसीठिठोली सुनता तो उस के सीने पर सांप लोटने लगता. उसे संजय से जलन होने लगती. वह सोचता कि काश संजय की जगह अनुभा उस की बांहों में होती. आखिर संजीव का यह सपना पूरा हो ही गया. अनुभा गर्भवती हुई थी तो संजय से ज्यादा संजीव उस का खयाल रखता था. जब कभी संजय काम अधिक होने की वजह से देर में आता तो संजीव समय पर घर आ कर घर के कामों में अनुभा की मदद ही नहीं करता, बल्कि उस के खानेपीने का भी ध्यान रखता.

उस की इस सेवा का अनुभा पर खासा असर पड़ा और न चाहते हुए भी वह उस की ओर खिंचती चली गई. बेटी पैदा होने के बाद कुछ ऐसा संयोग बना कि दोनों के बीच की मर्यादा की दीवार ही ढह गई. पहली बार मर्यादा की दीवार टूटी थी तो दोनों को अपने किए पर पछतावा हुआ था. लेकिन जो नहीं होना चाहिए था, वह हो चुका था. भले ही उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ था, लेकिन उन के कदम यहीं रुके नहीं. आगे भी अनुभा और संजीव को जब भी मौका मिला, वे संजय के साथ विश्वासघात करने से नहीं चूके.

अनुभा और संजीव जो भी करते थे, पूरे चौकस हो कर करते थे, लेकिन उन के ये संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. संजय को पत्नी और संजीव के संबंधों के बारे में पता चल ही गया. काम पर तो तीनों साथसाथ जाते थे, लेकिन कोई न कोई बहाना कर के संजीव बीच में आ जाता था. अनुभा के साथ मौजमस्ती कर के वह फिर काम पर पहुंच जाता. ऐसे में पड़ोसियों को शक हुआ तो उन्होंने यह बात संजय को बताई. संजय को उन की बात पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि उसे अपने दोस्तों और पत्नी पर पूरा भरोसा था.

अनुभा और संजीव संजय के इसी विश्वास का फायदा 3 सालों तक उठाते रहे. आखिर एक दिन जब उस ने अपनी आंखों से दोनों को एकदूसरे की बांहों में देख लिया तो उसे अनुभा और संजीव की इस बेवफाई से गहरा आघात लगा. उस ने संजीव को खूब खरीखोटी सुनाई और उसी समय घर से निकाल दिया. पत्नी को भी उस ने खूब धिक्कारा. संजीव ने संजय का घर भले छोड़ दिया, लेकिन अनुभा को नहीं छोड़ा. अनुभा से अपने संबंध रखे रहा. मौका मिलते ही वह अनुभा के पास आ जाता और इच्छा पूरी कर के चला जाता. इस में अनुभा भी उस की मदद करती थी.

इस बात को ले कर संजय और अनुभा के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था. बात बढ़ जाती तो संजय अनुभा की पिटाई भी कर देता था. लेकिन मारनेपीटने और समझाने का अनुभा पर कोई असर नहीं हुआ. तब संजय ने अनुभा को संजीव से अलग करने का दूसरा उपाय सोचा. परिचितों की मदद से उस ने अपना गौतमनगर वाला मकान बेच दिया और अंबरनाथ तहसील के नेवाली गांव की आकृति चाल में एक अच्छा सा मकान खरीद लिया. 12 नवंबर, 2015 को पूजापाठ करा कर वह पत्नी अनुभा, बेटी और दीपांकर के साथ उस में रहने आ गया.

नेवाली आने के बाद संजय को लगा कि अब संजीव अनुभा की जिंदगी से निकल जाएगा. अनुभा भी धीरेधीरे उसे भूल जाएगी. यह सोच कर संजय अपने काम में व्यस्त हो गया. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. न तो संजीव अनुभा को भूल पाया और न अनुभा ही उसे दिल से निकाल पाई. अनुभा से अलग हुए संजीव को 10 दिन भी नहीं हुए थे कि वह उस के लिए तड़प उठा. यही हाल अनुभा का भी था. दीपावली का त्योहार नजदीक था, इसलिए काम ज्यादा था. संजय को रात में भी काम करना पड़ता था. इस बात की जानकारी संजीव को थी ही, इसलिए जब संजय रात को काम के लिए कंपनी में रुक जाता तो संजीव उस के घर पहुंच जाता.

एक रात तबीयत खराब होने पर संजय अचानक घर पहुंचा तो वहां संजीव को देख कर दंग रह गया. संजय को देख कर संजीव और अनुभा के जहां होश उड़ गए, वहीं संजय का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा. उस के गुस्से को देख कर संजीव तो भाग गया, लेकिन अनुभा कहां जाती. संजय ने सारा गुस्सा उसी पर उतार दिया. उस ने उस दिन उस की जम कर पिटाई की. पत्नी को मारपीट कर वह घर से बाहर निकल गया. संजय के घर से बाहर जाने के बाद कुछ देर तक तो अनुभा रोती रही, उस के बाद उसे अपने और संजीव के बीच रोड़ा बनने वाले संजय से इस तरह नफरत हुई कि उस ने तुरंत एक खतरनाक फैसला ले लिया.

उस ने उसी समय संजीव को फोन कर के कहा, ‘‘संजीव, अब बहुत हो चुका. संजय को अपने रास्ते से हटाना ही होगा. हमारे संबंधों को ले कर जब देखो तब वह मुझे मारता रहता है. शहर से ले कर गांव तक मुझे बदनाम भी कर दिया है. मेरा जीना हराम हो गया है. उस ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा है. लोग मुझ पर थूक रहे हैं. इसलिए मैं चाहती हूं इस किस्से को ही खत्म कर दिए जाए.’’

अनुभा की बात सुन कर संजीव का दिमाग घूम गया. उस ने अनुभा को धीरज बंधाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, मैं उस की व्यवस्था कर दूंगा.’’

‘‘तुम कल साढ़े 8 बजे आ जाना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ अनुभा ने कहा और फोन काट दिया.

23 नवंबर, 2015 को संजीव ने बाजार जा कर एक तेज धार वाला चाकू खरीदा और ठीक समय पर संजय के घर पहुंच गया. संजय उस समय तक घर नहीं आया था. अनुभा ने उसे पीछे वाले कमरे में छिपा दिया और संजय के आने का इंतजार करने लगी. उस समय दीपांकर घर पर नहीं था. वह अपने एक दोस्त के यहां गया था. रात 10 बजे के करीब संजय घर आया तो अनुभा मुंह फुलाए बैठी थी. संजय ने उस से खाना मांगा तो खाना देने के बजाय वह उस से उलझ पड़ी और उसे कस कर पकड़ लिया. इस के बाद अंदर छिपा बैठा संजीव एकदम से बाहर आया और साथ लाए चाकू से उस के गले पर हमला कर दिया.

चाकू लगने से संजय चीखा और जमीन पर गिर पड़ा. दोनों ने उसे तब तक दबोचे रखा, जब तक वह मर नहीं गया. संजय मर गया तो वे उस की लाश को ठिकाने लगाने की तैयारी करने लगे. संयोग से उसी समय मौसम खराब हो गया और तेज बारिश होने लगी. बरसात की वजह से बस्ती के लोग अपनेअपने घरों में बंद हो गए तो उन्हें लाश को ठिकाने लगाने का अच्छा मौका मिल गया. दोनों ने लाश को एक प्लास्टिक की मोटी थैली में लपेट कर कैरीबैग में भरा और रात करीब 2 बजे उसी बारिश में ले जा कर बस्ती से लगभग 2 सौ मीटर की दूरी पर स्थित घनी झाडि़यों में फेंक दिया.

पूछताछ के बाद जितेंद्र आगरकर ने हत्या के इस मामले को अपराध संख्या 346/2015 पर दर्ज करा कर अनुभा और संजीव को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में बंद थे. Mumbai Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story: अपमान के बदले – ले ली भाई, भाभी और पत्नी की जान

Crime Story: रामप्रकाश को जब पता चला कि उस की पत्नी के बड़े भाई से संबंध हैं तो उसे पत्नी से ही नहीं, बड़े भाई से भी नफरत हो गई. लेकिन उस ने जो किया, क्या वैसा करना ठीक था. रामप्रकाश जैसे ही घर के पीछे की ओर गया, पीछे से रामपाल ने आ कर बड़े भाई को अकेले में पा कर लगभग फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘भइया, आज मैं आप से बड़े भइया राजकुमार के बारे में कुछ बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘अंबर (रामपाल को घर में सभी अंबर कहते थे) तुम्हारे और बड़े भइया के बीच हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है, अब क्या हो गया?’’ रामप्रकाश ने पलट कर जवाब में कहा.

‘‘पहले तो वह कह रहे थे कि मेरी शादी में सारा खर्च वह करेंगे. लेकिन गहने बनवाने लगे तो 40 हजार रुपए मुझ से ले लिए. उस समय मैं ने पिंटू से 70 हजार रुपए ले कर उस में से 40 हजार रुपए उन्हें दिए थे. अब वह अपने पैसे मांग रहा है. मैं ने भइया से कुछ रुपए देने को कहा तो उन्होंने मुझे गाली दे कर भगा दिया.’’

‘‘अंबर, तुम भइया का स्वभाव अच्छी तरह जानते हो. उन की आदत ही ऐसी है. इस में नाराज होने की कोई बात नहीं है.’’ रामप्रकाश ने छोटे भाई रामपाल को समझाने के उद्देश्य से कह.

लेकिन रामपाल समझने के बजाय रामप्रकाश को भी बड़े भाई राजकुमार के खिलाफ भड़काते हुए बोला, ‘‘तुम भइया को जितना सीधा समझते हो, वह उतने सीधे हैं नहीं. तुम तो उन की ओर से आंखें मूंदे हुए हो, इसलिए उन की बुराई तुम्हें दिखाई नहीं देती. गांव वाले क्या कहते हैं, तुम्हें पता है? पूरे गांव में चर्चा है कि रंजना भाभी और बड़े भइया के बीच गलत संबंध है.’’

रामपाल का इतना कहना था कि रामप्रकाश को गुस्सा आ गया. वह थोड़ी ऊंची आवाज में बोला, ‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है अंबर, तुम झूठ कह रहे हो. भइया ऐसा काम नहीं कर सकते. उन पर इस तरह का घिनौना आरोप लगा कर तुम मेरी नजरों में गिर गए.’’

‘‘अगर तुम सच देखना चाहते हो तो जब बड़े भइया तुम्हें और आशा भाभी को किसी रिश्तेदार के यहां भेजें तो रात में अचानक आ कर तुम देख लेना, बड़े भइया और भाभी रंजना एक साथ मिलेंगी.’’ रामपाल ने ने भी थोड़ी ऊंची आवाज में कहा.

छोटे भाई उस की इस बात से नाराज हो कर पैर पटकता हुआ रामप्रकाश चला गया. उस के पीछेपीछे रामपाल भी चला गया. रामपाल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना माल के गांव थावर में अपने बड़े भाइयों राजकुमार और रामप्रकाश के साथ रहता था. राजकुमार मूलरूप से लखनऊ के ही थाना मलिहाबाद के गांव चौसझा का रहने वाला था. 20 साल पहले वह अपना गांव छोड़ कर थावर आ गया था और यहीं रहने लगा था. यहां वह अपनी क्लिनिक चलाता था. उस ने बीयूएमएस की डिग्री ले रखी थी.

उस की क्लिनिक ठीकठाक चलने लगी थी तो उस ने अपने दोनों भाइयों रामप्रकाश और रामपाल को भी यहीं बुला लिया था. इस तरह तीनों भाई एक साथ रहने लगे थे. राजकुमार ही पूरे परिवार की देखभाल करता था. उस के दोनों ही भाई उम्र में उस से काफी छोटे थे.

राजकुमार की शादी आशा के साथ हुई थी. शादी के कई सालों के बाद भी जब उसे खुद की कोई संतान नहीं हुई तो उस ने सन 2006 में अपनी साली रंजना की शादी अपने छोटे भाई रामप्रकाश से करा दी थी. शादी के बाद रंजना को 2 बेटे, 6 साल का तुषार, 3 साल का ईशान और 4 माह की एक बेटी अनिष्का थी. रंजना ब्यूटीपार्लर का कोर्स किए हुए थी, इसलिए राजकुमार ने उसे घर के ही एक कमरे में ब्यूटीपौर्लर खुलवा दिया था.

कुछ दिनों पहले राजकुमार ने अपने सब से छोटे भाई रामपाल की शादी कराई थी. उस की शादी में उन्होंने करीब एक लाख रुपए के गहने बनवाए थे. शादी के समय राजकुमार ने रामपाल से कहा था कि शादी के खर्च में वह भी कुछ मदद करे. तब राजपाल ने इधरउधर से पैसों का जुगाड़ कर के राजकुमार को दिए थे.

न जाने क्यों राजकुमार और उस की पत्नी आशा रामपाल को पसंद नहीं करते थे. रामपाल को इस बात का अहसास भी था. भाईभाभी के इस व्यवहार से उसे लगता था कि भइया मंझले भाई रामप्रकाश और उस की पत्नी रंजना को ही अपनी सारी जायदाद देंगे. रामपाल में कुछ बुरी आदतें थीं, जिस की वजह से उस ने कई लोगों से कर्ज ले रखा था. कर्ज चुकाने के लिए वह जब भी बड़े भाई राजकुमार से पैसे मांगता, वह उसे बेइज्जत कर के भगा देता था.

रामपाल ने मंझले भाई रामप्रकाश के मन में शंका का बीज डाल दिया था. एक दिन रामप्रकाश की रिश्तेदारी में शादी थी. राजकुमार ने अपनी पत्नी आशा से कहा कि वह रामप्रकाश और दोनों बेटों को ले कर शादी में चली जाए. आशा ने वैसा ही किया. रामप्रकाश ने अपनी पत्नी रंजना से भी शादी में चलने को कहा तो उस ने सुबह ब्यूटीपौर्लर खोलने का बहाना कर के शादी में जाने से मना कर दिया.

इस बात से रामप्रकाश की शंका यकीन में बदल गई. उसे रामपाल की बात सच लगी. वह भाभी आशा और दोनों बेटों को ले कर शादी में चला तो गया, लेकिन सभी को वहां छोड़ कर रात में चुपके से घर आ गया. घर पहुंच कर उस ने पत्नी रंजना और बड़े भाई राजकुमार को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. इस के बाद उसे पत्नी रंजना और बड़े भाई से नफरत हो गई.

इस के बाद वह बड़े भाई से बदला लेने के लिए छोटे भाई रामपाल से मिल गया. अपने अपमान का बदला लेने के लिए दोनों भाइयों ने बड़े भाई की हत्या की योजना बना डाली. 5 नवंबर की रात करीब ढाई बजे रामपाल मोटरसाइकिल से थावर पहुंचा. योजना के अनुसार, रामप्रकाश ने घर का दरवाजा पहले से ही खोल रखा था. रामपाल घर में घुसा और क्लीनिक में हंसिया और बांका ले कर छिप गया.

इस के बाद रामप्रकाश ने पीठ में दर्द होने की बात कह कर रंजना को इंजेक्शन लाने के लिए कहा. रंजना जैसे ही उठ कर क्लीनिक की ओर गई, वहां छिपे रामपाल ने उसे पकड़ लिया और ब्यूटीपौर्लर वाले कमरे में घसीट ले गया. उस के पीछेपीछे रामप्रकाश भी वहां पहुंच गया. इस के बाद दोनों ने उसे खत्म कर दिया. इस के बाद दोनों पहली मंजिल पर गए, जहां राजकुमार पत्नी आशा के साथ सो रहा था.

दोनों ने पहले आशा पर वार किया. आशा की चीख से राजकुमार जाग गया तो दोनों उस पर टूट पड़े. जब रामपाल और रामप्रकाश को लगा कि दोनों मर गए हैं तो रामप्रकाश ने बांका और हंसिया घर के बाहर फेंक दिया और रामपाल को भाग जाने के लिए कहा. जब रामपाल भाग गया तो वह दरवाजा खोल कर चिल्लाने लगा कि घर में बदमाश घुस आए हैं. शोर सुन कर गांव वाले इकट्ठा हो गए. उस समय राजकुमार कराह रहा था, लेकिन अस्पताल ले जाते समय उस की मौत हो गई. रामप्रकाश ने गांव के ही 2 लोगों, राजाराम और प्रेमरैदास के खिलाफ हत्या का शक जताते हुए मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने जांच की तो नामजद लोगों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला.

मोहनलालगंज के सांसद कौशल किशोर ने तो इस हत्याकांड का परदाफाश करने के लिए पुलिस पर दबाव डाला तो गांव वालों ने भी सड़क जाम कर के पुलिस के खिलाफ नारेबाजी की. तब लखनऊ के एसएसपी राजेश कुमार पांडेय ने थाना माल के थानाप्रभारी विनय तिवारी, एसएसआई गणेश तिवारी, क्राइम ब्रांच के भगवान सिंह, अनिल सिंह चंदेल और हमीदउल्ला की एक टीम बनाई, जिस का नेतृत्व मलिहाबाद के सीओ जावेद खान को सौंपा.

आखिर 4 दिनों के बाद 9 नवंबर को इस टीम ने राजकुमार, आशा और रंजना की हत्या के आरोप में राजकुमार के दोनों सगे भाई रामप्रकाश और रामपाल को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में रामपाल और रामप्रकाश ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दरअसल, जब पुलिस घटनास्थल पर पहुंची थी तो वहां लूट का कोई सबूत नहीं मिला था. आसपड़ोस वालों ने बदमाशों के आनेजाने की भी आवाज नहीं सुनी थी. रामपाल जब वहां पहुंचा था तो उसे देख कर ही लग रहा था कि वह अभीअभी नहा कर आया है. उस के बाल भी गीले थे. नहाने वाली जगह पर भीगा तौलिया मौजूद था. उस पर खून के कुछ दाग भी लगे थे.

रामप्रकाश ने बताया था कि बदमाशों ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया था, लेकिन जब पुलिस ने गांव वालों से पूछा कि घर का दरवाजा किस ने खोला था तो कोई सामने नहीं आया. इस से पुलिस को लगा कि हत्या में घर वालों का ही हाथ है. बाद में पूछताछ में ये बातें सामने आ गईं.

पूछताछ में रामप्रकाश ने कहा, ‘‘मैं भाभी आशा को बहुत मानता था. वह हमें भी बेटे की तरह मानती थीं. रंजना उन की सगी छोटी बहन थी. उन्हें रंजना की हत्या में मेरे शामिल होने का पता चलता तो वह हमारे खिलाफ हो जातीं. रंजना ने जो किया था, मुझे उस बात से उस से चिढ़ हो गई थी. इस हालत में न चाहते हुए भी मुझे भाभी की हत्या करनी पड़ी.’’

पूछताछ के बाद पुलिस ने रामपाल और रामप्रकाश को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था, कथा लिखे जाने तक दोनों भाई जेल में थे. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Hindi Crime Story: रजनी को भाया प्रेमी का धमाल

Hindi Crime Story: रजनी उर्फ कुंजावती अपने भाईबहनों में सब से बड़ी ही नहीं बल्कि कदकाठी से भी ठीक ठाक थी. इसलिए अपनी उम्र से काफी बड़ी लगती थी. उस का परिवार उत्तर प्रदेश के शहर इटावा में रहता था. उस के पिता किसान थे. जैसे ही वह जवान हुई तो उस के मातापिता उस के लिए योग्य वर की तलाश में लग गए.

उन्हें इस बात का डर था कि कहीं रजनी के कदम बहक गए तो उन की इज्जत पर दाग लग जाएगा. उन्होंने रजनी की शादी के लिए ग्वालियर जिले के महाराजपुरा कस्बे के गांव गुठीना में रहने वाले सुलतान माहौर को पसंद कर लिया. फिर जल्द ही उन्होंने उस की शादी सुलतान के साथ कर दी.

रजनी सुंदर तो थी ही, दुलहन बनने के बाद उस की सुंदरता में पहले से ज्यादा निखार आ गया. रजनी जैसी सुंदर पत्नी पा कर सुलतान बेहद खुश था. दोनों के दांपत्य की गाड़ी खुशहाली के साथ चलने लगी. समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और रजनी 3 बच्चों की मां बन गई. लेकिन कुछ दिनों बाद आर्थिक परेशानियों ने परिवार की खुशी पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया. शादी से पहले सुलतान छोटामोटा काम कर के गुजरबसर कर लेता था, लेकिन 3 बच्चों का बाप बन जाने से घर के खर्चे भी बढ़ गए थे. वहीं रजनी की बढ़ती ख्वाहिशों ने उस के खर्चों में काफी इजाफा कर दिया था.

आर्थिक परेशानी से उबरने के लिए  वह एक शोरूम में रात के समय चौकीदारी भी करने लग गया था. इस दौरान उसे शराब पीने की भी लत लग गई, जिस की वजह से वह पैसे शराबखोरी में उड़ा देता था. इस के चलते घर की माली हालत डांवाडोल होने लगी थी. यहां तक कि उस ने कई लोगों से कर्ज ले लिया था. उधर जब से कोविड के कारण लौकडाउन लगा, तब से सुलतान की मजदूरी और चौकीदारी का काम भी छूट गया था. इस के बावजूद वह लोगों से पैसा उधार ले कर शराब पी लेता था और हद तो तब हो गई जब अपनी पत्नी रजनी उर्फ कुंजावती को शराब के नशे में जराजरा सी बात पर पीटना शुरू कर देता था.

पति की ये आदतें रजनी को काफी सालती थीं. सुलतान के पड़ोस में अजीत उर्फ छोटू कोरी रहता था. वह रजनी को भाभी कहता था, इसलिए दोनों में हंसीमजाक होता रहता था. रजनी को अजीत से मजाक करने में किसी तरह का संकोच नहीं होता था. एक दिन दोनों हंसीमजाक कर रहे थे तो रजनी ने कहा, ‘‘देवरजी, कब तक इस तरह हंसीमजाक कर के दिन काटोगे? कहीं से घरवाली ले आओ.’’

‘‘भाभी, घरवाली मिलती तो जरूर ले आता. जब तक कोई नहीं मिल रही आप से हंसीमजाक कर संतोष करना पड़ रहा है.’’ अजीत ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘जब तक घरवाली नहीं मिल रही तो इधरउधर से जुगाड़ कर लो.’’ रजनी ने बिना किसी हिचकिचाहट के अजीत की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

‘‘कौन फिक्र करता है भाभी भूखे आदमी की. जिस का पेट भरा रहता है, उसे ही हर कोई पूछता है,’’ अजीत ने शरमाते हुए कहा.

‘‘क्या तुम ने कभी किसी से अपनी परेशानी का जिक्र कर के देखा है?’’

‘‘कोई फायदा नहीं भाभी, लोग मेरी हंसी ही उड़ाएंगे.’’ वह बोला.

‘‘अजीत, जब तक तुम किसी से कहोगे नहीं, कोई तुम्हारी मदद कैसे करेगा?’’ रजनी ने कहा.

‘‘भाभी, अगर आप से कहूं तो क्या आप मेरी मदद करना पसंद करेंगी? भलाबुरा कहते हुए गालियां जरूर देंगी,’’ अजीत ने रजनी के चेहरे पर नजरें गड़ा कर कहा.

रजनी ने चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘एक बार कह कर तो देखो. अरे, मैं तुम्हारी मुंहबोली भाभी हूं अजीत, भला पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो क्या बाहर वाला मदद करने आएगा.’’

अब इस से भी ज्यादा रजनी क्या कहती. अजीत इतना भी नासमझ नहीं था कि वह रजनी की बात का मतलब न समझ पाता.

‘‘जरूर भाभी, मौका मिलने पर कह दूंगा.’’ वह मुसकराते हुए बोला.

संयोग से अगले दिन अजीत को पता चला कि सुलतान किसी काम से बाहर गया है. उस दिन अजीत का मन अपने काम में नहीं लगा रहा था. दिन भर उसे रजनी की याद सताती रही. शाम होने पर घर आने पर वह रजनी की एक झलक देखने को बेचैन हो उठा.

रजनी भी पति की गैरमौजूदगी में अजीत को रिझाने के लिए जैसे ही सजसंवर कर दरवाजे पर आई  तो उस की नजर अजीत पर पड़ी. अजीत भी रजनी को देख कर बिना वक्त जाया किए उस के घर पर जा पहुंचा.

अजीत को अचानक इस तरह आया देख कर रजनी ने हंसते हुए कहा, ‘‘देवरजी, आज आप अपने काम से जल्दी लौट आए?’’

‘‘क्या बताऊं भाभी, आज मेरा मन काम में जरा भी नहीं लगा.’’

‘‘क्यों?’’ रजनी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘सच बताऊं?’’

‘‘हां, मुझे तो सचसच बताओ.’’

‘‘भाभी, जब से तुम्हें और तुम्हारी सुंदरता  को देखा है, मेरा मन किसी काम में लगता ही नहीं है. आप सच में बेहद खूबसूरत है.’’

‘‘ऐसी सुंदरता किस काम की, जिस की कोई कदर ही न हो,’’ रजनी ने लंबी सांस लेते हुए कहा.

‘‘क्या भैया तुम्हारी कोई कदर नहीं करते भाभी?’’

‘‘सब कुछ जानते हुए भी अनजान मत बनो, तुम तो जानते हो कि मेरे वो रात में चौकीदारी करते हैं, सो रात को घर से बाहर रहते हैं. ऐसे में मेरी रातें कैसे गुजरती हैं, वो तो मुझे ही पता है.’’

‘‘भाभीजी, जिस स्थिति से आप गुजर रही हैं, ठीक वही स्थिति मेरी है. मैं भी रात भर करवटें बदलता रहता हूं. अगर आप मेरा साथ दें तो हम दोनों की समस्या खत्म हो सकती है,’’ यह कहते हुए अजीत ने रजनी को अपनी बांहों में भर लिया.

पुरुष सुख से वंचित रजनी चाहती तो यही थी, मगर उस ने हावभाव बदलते हुए बनावटी गुस्से में कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो, छोड़ो मुझे. बच्चे देख लेंगे.’’

‘‘बच्चे तो अपनी मौसी के बच्चों के साथ बाहर खेल रहे हैं. भाभी, आप ने तो मेरा सुखचैन सब छीन रखा है,’’ अजीत ने कहा.

‘‘नहीं अजीत, छोड़ो मुझे. मैं बदनाम हो जाऊंगी, कहीं की नहीं रहूंगी मैं.’’ वह बनावटी बोली.

‘‘नहीं भाभी, अब यह संभव नहीं है. कोई बेवकूफ ही होगा जो रूपयौवन के इस प्याले के इतने नजदीक पहुंच कर पीछे हटेगा,’’ इतना कह कर अजीत ने बांहों का कसाव बढ़ा दिया.

दिखाने के लिए रजनी न…न…न करती रही, जबकि वह स्वयं अजीत के जिस्म से बेल की तरह लिपटी जा रही थी. इस के बाद वह पल भी आ गया, जब दोनों ने मर्यादा भंग कर दी. एक बार मर्यादा मिटी तो यह सिलसिला चल निकला. जब भी उन्हें मौका मिलता, इच्छाएं पूरी कर लेते. दोनों पड़ोस में रहते थे, इसलिए उन्हें मिलने में कोई परेशानी भी नहीं होती थी. रजनी अब कुछ ज्यादा ही खुश रहने लगी थी, क्योंकि उस का प्रेमी मौका मिलने पर बिस्तर पर धमाल मचाने आ जाता था.

अब उस की आर्थिक परेशानी भी दूर हो गई थी. रजनी खर्चे के लिए अजीत से जब भी रुपए मांगती, वह बिना नानुकुर के चुपचाप निकाल कर रजनी के हाथ पर रख देता था. रजनी और अजीत के बीच अवैध संबंध बने तो उन की बातचीत और हंसीमजाक का लहजा बदल गया. अब दोनों एकदूसरे का खयाल भी कुछ ज्यादा ही रखने लगे थे, इसलिए आसपड़ोस वालों को शक होने लगा.

लोग इस बात को ले कर चर्चा करने लगे. नतीजा यह निकला कि इस बात की जानकारी सुलतान को भी हो गई. सुलतान ने लोगों की बातों पर विश्वास न कर के खुद सच्चाई का पता लगाने का निश्चय किया. वह जानता था कि यदि इस बारे में पत्नी से पूछताछ करेगा तो वह सच बात बताएगी नहीं, बल्कि होशियार हो जाएगी. सच पता लगाने के लिए वह एक दिन बाहर जाने के बहाने घर से निकला और छिप कर रजनी और अजीत पर नजर रखने लगा.

एक दिन दोपहर के समय उस ने रजनी और अजीत को रंगेहाथों पकड़ लिया. गुस्से में  उस ने रजनी की जम कर पिटाई कर दी. रजनी के पास सफाई देने को कुछ नहीं था, इसलिए वह भविष्य में कभी ऐसा न करने की कसम खाते हुए माफी मांगने लगी. गुस्से में सुलतान ने अजीत को भी कई थप्पड़ जड़ दिए. साथ ही चेतावनी दी कि आज के बाद वह उस के घर के आसपास भी दिखाई दिया तो ठीक नहीं होगा.

रजनी सुलतान की सिर्फ पत्नी ही नहीं, उस के 3 बच्चों की मां भी थी, इसलिए बच्चों के भविष्य की फिक्र करते हुए उस ने दोबारा ऐसी गलती न करने की चेतावनी दे कर उसे माफ कर दिया. यह बात सच है कि जिस महिला का पैर एक बार बहक चुका हो, उसे संभालना मुश्किल होता है. यही हाल रजनी का भी था. कुछ दिनों तक अपनी कामोत्तेजना पर जैसेतैसे काबू रखने के बाद वह फिर चोरीछिपे अजीत से मिलने लगी.

इस का पता सुलतान को चला तो उस ने रजनी को काफी बुराभला कहा. इस के बाद रजनी का अजीत से मेलजोल कुछ कम हो गया, लेकिन बंद नहीं हुआ. जब मिलने में परेशानी होने लगी तो एक दिन रजनी ने अजीत से कहा, ‘‘मुझ से तुम्हारी दूरी बरदाश्त नहीं होती. अब मैं सुलतान के साथ नहीं रहना चाहती.’’

‘‘अगर ऐसा है तो उसे ठिकाने लगा देते हैं. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. वह शराब पीता ही है, खाना खा कर बेसुध हो जाता है, इसलिए उस की हत्या करना भी आसान है.’’

इसी के साथ दोनों ने सुलतान की हत्या की योजना बना ली.

5 जून, 2021 की रात सुलतान शराब पी कर बेसुध सो गया. सोने से कुछ समय पहले ही उस ने रजनी के साथ मारपीट की थी. पति के सोने के बाद रजनी ने प्रेमी अजीत को फोन कर के बुला लिया. मगर जैसे ही अजीत आया सुलतान की नींद खुल गई. रजनी और अजीत ने सुलतान को पकड़ा और उस के गले में रस्सी का फंदा बना कर उस का गला घोंट दिया. इस के बाद अजीत काफी डर गया तो वह अपने घर भाग गया, मगर रजनी कशमकश में फंस गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे?

आखिर उस का मन नहीं माना तो वह घर के पास में रहने वाली अपनी बहन के घर चली गई. यहां पर रजनी की मां भी आई हुई थी. उस ने हिचकियां लेले कर रोते हुए बहन और मां को बताया कि उस के पति ने आत्महत्या कर ली है. इन लोगों को रजनी की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. शायद इसी वजह से एक बार तो लगा कि वह फूटफूट कर रो पड़ेगी, लेकिन किसी तरह खुद को संभालते हुए आखिर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या आप लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है?’’  बाद में यह बात पूरे मोहल्ले में फैल गई.

सुबह होते ही गंधर्व सिंह ने महाराजपुरा थानाप्रभारी प्रशांत यादव को फोन कर इस घटना की सूचना दे दी. थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया. बात सिर्फ आत्महत्या कर लेने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गुठीना जैसे छोटे से गांव में इस तरह की घटना घट गई और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं हुई.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रशांत यादव  एसआई जितेंद्र मवाई के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. चलने से पहले उन्होंने इस की सूचना सीएसपी रवि भदौरिया को भी दे दी थी. प्रशांत यादव घटनास्थल का निरीक्षण शुरू करने वाले थे कि सीएसपी भदौरिया भी आ पहुंचे. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो सीएसपी लौट गए. उन के जाने के बाद  थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर सुलतान की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

रजनी और उस के प्रेमी ने जिस रस्सी से फंदा बना कर सुलतान का गला घोंटा था, वह भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले ली. उस के बाद थानाप्रभारी ने गंधर्व सिंह की तरफ से अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. थानाप्रभारी इस केस की जांच में जुट गए. उन्होंने इस बारे में मृतक की पत्नी रजनी से पूछताछ की. थाने पहुंचते ही रजनी डर गई और उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने प्रेमी अजीत के साथ मिल कर पति को ठिकाने लगाया था.

पुलिस ने 6 जून, 2021 को ही रजनी के प्रेमी अजीत को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने ही सुलतान की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद दोनों ने सुलतान की हत्या की जो सनसनीखेज कहानी सुनाई, वह परपुरुष की बांहों में सुख तलाशने वाली औरत के अविवेक का नतीजा थी. पूछताछ  और सारे साक्ष्य जुटाने के बाद  पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. रजनी के साथ उस का 3 वर्षीय सब से छोटा बेटा भी जेल गया है.

रजनी ने जो सोचा था, वह पूरा नहीं हुआ. वह एक हत्या की अपराधिन बन गई. उस के साथ उस का पे्रमी भी. जो सोच कर उन दोनों ने सुलतान की हत्या की, वह अब शायद ही पूरा हो, क्योंकि यह तय है कि दोनों को सुलतान की हत्या के अपराध में सजा होगी. Hindi Crime Story

Short Hindi Story: सब्र की सीमा

Short Hindi Story: हर बात की एक सीमा होती है. समुद्र और सब्र की भी सीमा होती है. दोनों अपनी सीमा तोड़ दें तो अनर्थ हो जाएगा. प्रेम और धोखेबाजी की एक दुखांत कथा…

राजेंद्र तिवारी ने क्याक्या सपने नहीं संजोए थे, क्याक्या नहीं सोचा था, अपने लिए…उस के लिए और अपने भावी जीवन के लिए. जबकि वह जानता था कि सपने कभी सच नहीं होते, अपना सोचा कभी पूरा नहीं होता. शायद यही वजह थी कि आज उसे उस का खून अपने ही हाथों करने पर मजबूर होना पड़ा. दरअसल इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता शायद उसे सूझा ही नहीं.  शादी के 10 महीनों का जीवन उस के लिए नारकीय था. हर पल उस की यही कोशिश रही कि यह जीवन किसी तरह सुखमय हो जाए. लेकिन कलयुग में शायद यह उस के लिए संभव नहीं था.

उस ने विश्वास किया तो दगा मिली. प्यार दिया तो घृणा हाथ लगी. जहर का घूंट पीतेपीते वह पूरी तरह थक चुका था. जब सहन की सीमा पार हो गई तो वह कर बैठा, जो कानून की नजरों में अपराध था. उस का कहना था कि यह अपराध तो बहुत पहले हो चुका होता, अगर वह गांधीवादी सोच का न होता. इतना घृणित दृश्य देखने के बाद शायद ही कोई अधिक समय तक चुप बैठता. लेकिन वह शांति का उपासक था, अहिंसा का पुजारी था, इसीलिए सोचता था कि बाकी जिंदगी अहिंसा और नेकी की राह पर चलते हुए कट जाए तो बेहतर होगा.

लेकिन ऐसा हो नहीं सका. क्योंकि वह जितना टालता, समस्या उतनी ही उलझती रही. एक बार तो उस ने उस की ओर से एकदम से निगाहें हटा लीं, परंतु उसे यह भी अच्छा नहीं लगा. मजबूर हो कर यह कठोर कदम उठाना पड़ा. वह मानता है कि इस सब का गुनहगार वही है. लेकिन उस के द्वारा किए गए इस अपराध का एक अच्छा परिणाम यह निकला कि समाज को कलंकित करने वाला सदा के लिए मिट गया. उस का मानना है कि उस ने अपराध नहीं, समाज पर एहसान किया है.

उसे वह पहली मुलाकात आज भी अच्छी तरह याद है. वह लखनऊ के हजरतगंज में एक कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षक था. वह इंस्टीट्यूट अखिलेश अग्रवाल का था. अग्रवाल शिक्षा विभाग में नौकरी करते थे. वह कभीकभार ही वहां आते थे. इंस्टीट्यूट की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी राजेंद्र तिवारी पर ही थी.

उस दिन क्लास के बाद राजेंद्र औफिस में बैठा आराम कर रहा था, तभी एक लड़की उस के औफिस में आई. बहुत खूबसूरत थी वह. गजब का आकर्षण था उस में. वह अपलक उस की ओर देखता रहा.

‘‘मैं कंप्यूटर सीखना चाहती हूं.’’ उस के स्वर में मिठास थी.

राजेंद्र हड़बड़ा कर बोला, ‘‘हां..हां, बैठिए.’’

‘‘कितने दिनों में मैं कंप्यूटर सीख जाऊंगी.’’ सामने की कुरसी पर बैठते हुए उस ने पूछा.

‘‘यह तो सीखने वाले पर डिपेंड करता है. वैसे थोड़ी सी प्रैक्टिस से 6 महीने में अच्छाखासा सीख जाएंगी.’’

‘‘ठीक है, मुझे एडमीशन के लिए फार्म दे दीजिए.’’

‘‘आप का नाम?’’ मेज की दराज से फार्म निकाल कर उस की ओर बढ़ाते हुए राजेंद्र ने पूछा.

‘‘अमिता सक्सेना. मैं सर्विस करती हूं, इसलिए शाम को ही आ सकूंगी.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप फार्म भर दीजिए.’’

उस ने सरसरी निगाह फार्म पर डाली. फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘मैं इसे भर कर बाद में ले आऊं तो कोई हर्ज है?’’

‘‘नहीं, कोई हर्ज नहीं है. फार्म के साथ आप फीस जमा कर दीजिएगा. उसी दिन आप का एडमीशन हो जाएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं जब भी आऊंगी, इसे भर कर ले आऊंगी.’’ इतना कह कर अमिता चली गई.

अमिता राजेंद्र को अच्छी लगी थी. ऐसा नहीं कि वह कोई आशिकमिजाज था. लड़कियों से खासतौर पर वह दूर ही रहता था. पर अमिता में न जाने क्या खासियत थी कि वह काफी देर तक उस के खयालों में खोया रहा. उस ने जैसे उस के ऊपर कोई जादू कर दिया था. वह दोबारा उस की एक झलक पाने के लिए बेचैन हो उठा था. उस के बारे में उस के मन में इस बात का भी संदेह था कि कहीं वह विवाहित तो नहीं. वह अगले दिन अमिता का इंतजार करता रहा कि शायद वह आए, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.

3 दिनों बाद अमिता आई. फार्म उस ने राजेंद्र को दे दिया. फार्म में उस के नाम के पहले ‘कुमारी’ शब्द देख कर उसे बड़ा सुकून मिला. फार्म पर सरसरी नजर डाल कर उस ने पूछा, ‘‘आप कहां नौकरी करती हैं?’’

‘‘स्टेशन रोड पर एक बिल्डर के औफिस में. यह इंस्टीट्यूट आप का है?’’

वह बीच में ही बोल उठा, ‘‘मुझे राजेंद्र तिवारी कहते हैं. मैं यहां प्रशिक्षक हूं. यह इंस्टीट्यूट अखिलेश अग्रवाल का है. लेकिन देखभाल मैं ही करता हूं. कभी कोई चीज समझ में न आए तो बिना झिझक पूछ लेना, शरमाना नहीं.’’

‘‘जी, वैसे मैं कल से जौइन करूंगी.’’ कह कर अमिता मुसकराई और कुरसी से उठ खड़ी हुई.

उस ने अगले दिन से जौइन कर लिया. कंप्यूटर सिखाते समय राजेंद्र की नजरें उसी पर टिकी रहतीं. अमिता ने उस का कहा माना था, मतलब उसे जो समझ में न आता, झट पूछ लेती. राजेंद्र भी पूरे मनोयोग से उसे कंप्यूटर सिखा रहा था.

कोई एक सप्ताह बाद एक दिन क्लास समाप्त होने पर अमिता औफिस में आई, ‘‘मुझे आप से कुछ पूछना है?’’

‘‘पूछो, क्या पूछना है?’’

उस ने कुछ सवाल पूछे. राजेंद्र ने उत्तर समझा दिए. बाद में व्यंग्य करते हुए उस ने कहा, ‘‘लगता है, मेरा बताया तुम्हारी समझ में नहीं आता.’’

‘‘नहीं, आप बतातेसिखाते तो बहुत अच्छा हैं, पर मेरी ही समझ में देर से आता है.’’ चेहरे पर मासूमियत लाते हुए वह बोली.

‘‘हां, बेवकूफों के साथ यही होता है.’’

राजेंद्र के इस मजाक पर उस ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘चलिए, आप ने पहचान तो लिया. गुरु को अपना ही गुण शिष्य में दिखाई पड़ता है.’’

कुछ देर तक दोनों यूं ही हंसीमजाक करते रहे. बातोंबातों में अमिता बोली, ‘‘किसी दिन मेरे घर चाय पर आइए. मेरा घर पता है आप को?’’

उस ने राजेंद्र को बताया कि अमीनाबाद में वह अपने चाचा के साथ रहती है. उस के मातापिता लखनऊ में ही तालकटोरा थानाक्षेत्र स्थित राजाजीपुरम कालोनी में रहते हैं. राजेंद्र भी राजाजीपुरम में ही रहता था. यह बात उस ने अमिता को बताई तो उस ने पूछा, ‘‘आप किस ब्लौक में रहते हैं?’’

‘‘ई ब्लौक में.’’

‘‘अरे, मैं भी ई ब्लौक में रहती हूं.’’

‘‘तुम अब वहां क्यों नहीं रहती?’’

वह टालते हुए बोली, ‘‘ऐसे ही, अच्छा अब मैं चलूंगी, काफी देर हो गई है.’’

इस बातचीत के बाद दोनों काफी घुलमिल गए थे. इस बीच एक बार राजेंद्र उस के घर भी हो आया. उस के चाचा हंसमुख और मिलनसार लगे. उस ने लौटते समय अमिता के चाचा को अपने घर आने के लिए आमंत्रित किया. उस का अनुमान था कि उन के साथ अमिता भी आएगी. पर न तो चाचा आए और न अमिता. अचानक एक दिन राजेंद्र अमिता के औफिस जा पहुचा. ज्यादा बड़ा औफिस नहीं था. फिर भी 15-20 लोग काम करते थे. उसे देख कर अमिता मुसकरा दी. वह झेंप सा गया. उस समय उस की ड्यूटी समाप्त होने वाली थी. उसे बैठने के लिए कह कर वह एक केबिन में गई. शायद वह उस के बौस की केबिन थी, 2 मिनट बाद ही बाहर आ कर बोली, ‘‘आइए, चलें.’’

दोनों एक रेस्तरां में जा पहुंचे. कौफी पीते हुए उस ने राजेंद्र को छेड़ा, ‘‘आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए?’’

‘‘तुम से मिलने का मन था, चला आया.’’

राजेंद्र की इस बात पर वह गुमसुम हो गई. उसे लगा, जैसे उस ने कुछ गलत कह दिया हो. झट सफाई दी, ‘‘मुझे गलत मत समझो.’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है. आज पहली बार मुझ से किसी ने इतने अपनत्व से बात की है, वरना सब मुझे काट खाने दौड़ते हैं. मातापिता से भी मुझे प्यार नहीं मिला. घर में हर एक ने मुझे दुत्कारा. मजबूरी में मैं चाचा के यहां रहने लगी. वहां सब मुझे ऊपर से तो प्यार दिखाते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर जलते हैं. एक भी महीने अगर पूरी तनख्वाह उन्हें न दूं तो मुझ पर पहाड़ टूट पड़ता है. समझ में नहीं आता, मैं क्या करूं.’’ कहतेकहते अमिता की आंखें सजल हो गईं.

उस समय राजेंद्र को ऐसा लगा कि अमिता दुनिया में बिलकुल अकेली है, बेसहारा है. शायद वह अपने अंदर दुख ही दुख समेटे है. वह अपने को उस का सब से बड़ा हमदर्द समझ कर बोल पड़ा, ‘‘इस में इतना परेशान होने की क्या बात है? मैं तो हूं, सब ठीक हो जाएगा.’’

राजेंद्र की इस सहानुभूति ने अमिता को आत्मबल दिया. उस के काफी समझानेबुझाने पर वह सामान्य हो गई. इस के बाद दोनों काफी करीब आते गए. दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. मुलाकातों का सिलसिला तेजी से चल निकला. रोज ही मिलना, बातें करना, साथ घूमना जैसे जरूरी हो गया. अमिता की बातों से राजेंद्र को लगता कि जैसे वह उस के बिना रह नहीं पाएगी. वह भी उस का जीवन सुखमय बनाना चाहता था. इसीलिए उस ने उस का हाथ थामने का निर्णय ले लिया. जबकि राजेंद्र उस से 4 साल छोटा था. लेकिन उस ने इस की भी परवाह नहीं की. उसे डर था कि उस के कदम पीछे खींच लेने से एक इंसान की जिंदगी चली जाएगी और उस का जिम्मेदार वह होगा.

राजेंद्र के पिता शिवप्रसाद तिवारी रायबरेली की डलमऊ तहसील स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हेड क्लर्क थे. रायबरेली में ही उस का पैतृक घर था. 3 भाइयों और एक बहन में वह दूसरे नंबर पर था. सब से बड़े भाई देवेंद्र कुमार तिवारी घर पर ही खेतीबाड़ी का काम देखते थे. उस से छोटा नरेंद्र और बहन थी. दोनों पढ़ रहे थे. राजेंद्र के इस निर्णय की जानकारी उस के पिता को होगी तो उन का क्या रुख होगा, यह उसे अच्छी तरह पता था. एक तो प्रेम विवाह, दूसरा अपने से बड़ी उम्र की लड़की से, तीसरा विजातीय. उस के निर्णय का पता चलते ही उन्होंने उस से संबंध तोड़ लिए. उस ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, पर उन्होंने उस की एक न सुनी.

घर वालों से बगावत कर के राजेंद्र ने अमिता से प्रेम विवाह कर लिया. इस विवाह में दोनों के ही परिवारों के लोग शामिल नहीं हुए. शादी के बाद वह अमिता को राजाजीपुरम स्थित अपने मकान में ले आया. वैवाहिक जीवन हंसीखुशी बीतने लगा. इंस्टीट्यूट में नौकरी करने के साथसाथ राजेंद्र किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था. शादी के बाद उस ने इस ओर खास ध्यान देना शुरू कर दिया. अमिता नियमित रूप से अपनी नौकरी पर जा रही थी.

एक दिन राजेंद्र अमिता के औफिस पहुंचा तो उस के बौस दिनेश मेहरा कहीं जाने की तैयारी में थे. अमिता ने राजेंद्र का परिचय उन से कराया तो वह तपाक से बोले, ‘‘अरे तुम राजेंद्र हो, कहो कैसी कट रही है?’’

‘‘सब बढि़या चल रहा है.’’ राजेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘कभी कोई काम हो तो बताना.’’ कहते हुए उन्होंने राजेंद्र के कंधे पर हाथ रखा और आगे बढ़ गए. मेहराजी पहली मुलाकात में राजेंद्र को काफी भले आदमी नजर आए. उस समय उसे क्या पता था कि ऊपर से सज्जन लगने वाले यह शख्स उस की जिंदगी में जहर घोल कर रख देंगे. अमिता ने एक दिन उसे बताया कि मेहराजी बड़ी दिलचस्पी से हमारे घर की बातें पूछा करते हैं. यह बात उसे बड़ी अजीब लगी कि आखिर उन का उस के घर से क्या मतलब. बहरहाल उस ने उस समय इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया.

धीरेधीरे छोटीछोटी बातों पर अमिता राजेंद्र से झगड़ने लगी. उस की सही बात को भी गलत बताती. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अमिता के व्यवहार में अचानक यह बदलाव क्यों आ गया. एक रात जब उस ने उस के व्यवहार में आए बदलाव के बारे में पूछा तो उस से मिली जानकारी से वह दंग रह गया. अमिता ने बताया कि मेहराजी अकसर उस के घर के बारे में राय दिया करते थे कि यह काम ऐसे होना चाहिए, फलां काम नहीं करना चाहिए. मेहराजी अमिता को जिस तरह की सलाह देते थे, उस के हिसाब से वह बिलकुल बेतुकी होती थीं. चूंकि अमिता पूरी तरह उन की सलाह पर चल रही थी, इसीलिए उन दोनों में मनमुटाव हो रहा था.

उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह कौन सी राजनीति है? आखिर मेहराजी उस के परिवार में कलह पैदा करने पर क्यों तुले हैं? राजेंद्र ने इस ओर गंभीरता से ध्यान शुरू किया. उसी बीच उसे पता चला कि उस की शादी के पहले से ही मेहराजी के अमिता से काफी आत्मीय संबंध थे. दरअसल शादी से पहले जब अमिता अपनी पारिवारिक स्थिति से परेशान थी तो मेहराजी उस के साथ सहानुभूति जता कर उस के हमदर्द बन गए थे. लेकिन शादी के बाद अमिता की स्थिति बदल गई थी. शायद यही कारण था कि मेहराजी ने कूटनीति अपना कर उस के वैवाहिक जीवन में फूट डालने की कोशिश शुरू कर दी थी, ताकि वे फिर अमिता के हितैषी बन सकें.

सीधे स्वभाव की अमिता को मेहराजी ने अपने व्यवहार से काफी प्रभावित कर रखा था. जबतब काम के बहाने वह उसे साथ ले जाते. घुमातेफिराते, ऊंचेऊंचे ख्वाब दिखाते, कीमती सामान खरीद कर देते. राजेंद्र ने अमिता को समझाने का भरसक प्रयास किया. पर उसे लगा कि वह मेहराजी से जलता है, इसलिए ऐसी बातें कर रहा है. यही वजह थी कि उस के समझानेबुझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. मेहराजी से वह इतना अधिक प्रभावित थी कि उन के आगे उस की हर बात महत्त्वहीन थी. अब उसे विश्वास हो गया कि अमिता के सीधे और सरल स्वभाव का मेहरा नाजायज फायदा उठा रहा है.

राजेंद्र ने अमिता को बहुत समझाया, मेहराजी के साथ घूमनेफिरने से मना किया, उन की मक्कारी के बारे में बताया. एक बार तो अमिता को उस की बातें समझ में आ गईं. उस ने वादा किया कि अब वह कभी मेहराजी से औफिस के काम के अलावा कोई बात नहीं करेगी. कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन जल्दी ही मेहराजी ने उसे फिर बहकाना शुरू कर दिया. इस बार उन्होंने अमिता को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ा दिया. अब जब भी राजेंद्र उसे समझाता तो जवाब मिलता, ‘‘मैं स्वतंत्र हूं, बंधुआ नहीं.’’

अजीब थी उस की स्वतंत्रता और मेहराजी का स्वतंत्रता पाठ. राजेंद्र के सामने ही उस का घर उजड़ रहा था और वह असहाय था. लेकिन वह कठोर कदम उठा कर मेहराजी को कोई आसान मौका नहीं देना चाहता था. वह नहीं चाहता था कि उस का घर बिखरे. राजेंद्र ने अमिता को समझाया कि ये पैसे वाले लोग उन की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. पैसे के बल पर वे उन्हें खरीदने तथा गुलाम बनाने की कोशिश करते हैं. उन का हित इसी में है कि मेहनत से जो कुछ कमाएं, उसी में गुजारा करें. दूसरों के पैसों के पीछे न भागें.

अमिता ने महसूस किया कि राजेंद्र की बात सही है. इसीलिए उस ने फिर वादा किया कि अब वह मेहराजी की बातों पर ध्यान नहीं देगी. लेकिन अगले ही दिन जब वह औफिस से लौटी तो मेहराजी ने उस के सारे उपदेश गलत सिद्ध कर दिए. उसी शाम मेहराजी उस के घर आ धमके. उन्होंने राजेंद्र को चेतावनी दी, ‘‘अमिता तुम से जो कुछ कहे, वह तुम्हें मानना होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो अंजाम ठीक नहीं होगा.’’

यह सुन कर राजेंद्र सन्न रह गया. शांत और विनम्र भाव से उस ने जवाब दिया, ‘‘ठीक है, जो आप चाहते हैं, वही होगा. साथ ही मैं कोशिश करूंगा कि जितनी जल्दी हो, अमिता की जिंदगी से दूर हो जाऊं.’’

राजेंद्र मेहराजी के सामने इसलिए विनम्र हो गया था कि शायद उस के दुख को समझ कर उन्हें सद्बुद्धि आ जाए. पर हुआ इस के विपरीत. मेहराजी ने अपनी जीत पर प्रसन्न हो कर राजेंद्र के सामने ही उस की पत्नी को ले कर घूमने चले गए. उन के जाने के बाद राजेंद्र आंसू बहाता रहा. सोचता रहा कि क्या दुनिया में कमजोर लोगों के साथ ऐसा ही होता है? लौटने पर अमिता को जब उस ने समझाया तो वह बोली, ‘‘मेहराजी तो मजाक कर रहे थे, आप बुरा मान गए.’’

उस के साथ मजाक? आखिर क्या रिश्ता है मेहराजी से उस का, जो वह उस से मजाक कर रहे थे? उस की समझ में नहीं आ रहा था. इसलिए चुप रह गया. इस गंभीर समसया के समाधान का वह रास्ता ढूंढने लगा. काफी माथापच्ची के बाद भी उसे कोई उपाय नहीं सूझा. हां, इस बीच मेहराजी और अमिता का मिलनाजुलना और भी आसान हो गया. हुआ यह कि गरमियों में राजेंद्र के मकान मालिक सपरिवार घूमने चले गए. इस बीच अमिता ने 15 दिनों की छुट्टी ले ली. राजेंद्र के नौकरी पर जाने के बाद घर में केवल अमिता ही रह जाती थी. मेहराजी उस की अनुपस्थिति में घर आ जाते. दोनों घंटों बैठ कर गपशप करते या फिर घूमने चले जाते.

राजेंद्र को इस बात का आभास तब हुआ, जब घर लौटने पर कमरे में मेहराजी का कोई न कोई सामान पड़ा मिलता. बरतन जूठे मिलते. आखिर एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, आज चाय बहुत बनी है?’’

‘‘मेहराजी आए थे.’’ अमिता ने बड़े तीखे स्वर में कहा. राजेंद्र चुप रह गया.

राजेंद्र ने उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर असफल रहा. इसी बीच उस के इंस्टीट्यूट का समय भी बदल गया. जिस दिन समय बदला था, उस दिन जल्दी छुट्टी हो गई. वह घर आ गया. वहां बाउंड्री वाले मेनगेट पर अंदर से ताला बंद था. अंदर के दरवाजे भी बंद थे. ग्रिल वाला गेट फांद कर वह खिड़की के पास पहुंचा. एक कब्जा टूटा होने के कारण खिड़की ठीक से बंद नहीं होती थी. चुपके से उस ने अंदर झांका तो अमिता और मेहरा को आपत्तिजनक अवस्था में देख कर उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. वह तो सिर्फ यही समझता था कि दोनों के बीच मामला केवल घूमनेफिरने तक ही सीमित था.

उस समय राजेंद्र की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे. एक बार उस के मन में आया कि पड़ोसियों को बुला कर मेहराजी को मजा चखा दे. फिर यह सोच कर चुप रह गया कि इस में बदनामी उसी की होगी. गेट फांद कर वह फिर बाहर आ गया. कुछ देर इधरउधर चहलकदमी कर सोचता रहा, लेकिन कुछ समझ में नहीं आया. फिर कुछ देर बाद उस ने जोर से गेट भड़भड़ाया. अमिता बाहर निगली. गेट पर उसे देख कर चौंकी. उस ने ग्रिल वाले मेनगेट का ताला खोला. वह अंदर पहुंचा. सामने मेहराजी बैठे थे. उन्हें यह जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने सब कुछ देख लिया था. वह बनावटी हंसी हंसता रहा. कुछ देर बाद मेहराजी चले गए.

राजेंद्र ने इस बारे में अमिता से भी कुछ नहीं कहा. लेकिन इधरउधर की बात कर उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर कोई नतीजा नहीं निकला. वह बराबर यही कहती रही, ‘‘मेहराजी बहुत अच्छे आदमी हैं. तुम नाहक उन से जलते हो. वह हमारी हर तरह से मदद कर रहे हैं. उन का एहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती.’’

उन्हीं दिनों अमिता ने अपने मातापिता के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया. उस के मातापिता पास में ही रहते थे. अब वह सुबह बहुत जल्दी औफिस जाने के लिए निकलती और रात देर से घर लौटती. राजेंद्र फोन कर के पूछ भी नहीं सकता था कि वह कहां है और कब तक आएगी. जल्दी जाने और  देर से लौटने का कारण पूछने पर राजेंद्र को धमकी मिलती, ‘‘मेरी जो इच्छा होगी करूंगी, तुम मुझे रोक नहीं सकते.’’

राजेंद्र की विनम्रता और सीधेपन का नाजायज फायदा उठाया जाता रहा. वह उसे कमजोर और डरपोक समझ रही थी. वह नहीं चाहता था कि उस की इज्जत चौराहे पर नीलाम हो, लोग उस पर हंसें. लेकिन अब उसे इस बात का पश्चाताप हो रहा था कि उस ने मातापिता की बात नहीं मानी. उन के न चाहते हुए भी प्रेमविवाह क्यों कर लिया? अब महसूस हो रहा था कि मांबाप हमेशा अपनी संतान के हित की सोचते हैं. अपने अनुभवों के आधार पर ही संतान को उचित राय देते हैं. मांबाप की याद आते ही वह दुखी हो उठता. प्रेम के नाम से उसे नफरत होने लगी थी.

दूसरी ओर मेहराजी ने अमिता को यह आश्वासन दे रखा था कि अगर पति उसे छोड़ देगा तो वह उसे अपनी पत्नी बना लेंगे. मेहराजी की संपत्ति की वह मालकिन हो जाएगी. शायद यही वजह थी कि जब भी राजेंद्र उसे समझाने की कोशिश करता, वह बेबाक कह देती, ‘‘ठीक है, मैं मेहराजी के साथ जा रही हूं, रात देर से लौटूंगी.’’

मेहरा और अमिता ने राजेंद्र के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि एक ही रास्ता शेष था कि वह उन के बीच से हट जाए. मेहरा के औफिस के तमाम कर्मचारी अमिता और बौस के रिश्ते को जान गए थे. इस से राजेंद्र को खुद पर शरम महसूस हो रही थी. वह अपने प्रेम और धोखेबाजी के बारे में सोचसोच कर परेशान हो रहा था. आखिर क्या उसे सारी जिंदगी यही देखना पड़ेगा. उस दिन तो वह जैसे आसमान से गिर पड़ा, जब अमिता को अपने सगे भाई अश्विनी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस ने भाईबहन के पवित्र रिश्ते पर बदनुमा दाग लगा दिया था. अब राजेंद्र समझ गया कि असली दोषी कौन है. वह अभी तक सारा दोष मेहराजी को ही दे रहा था, जबकि अपना ही सिक्का खोटा था. इस घटना के बाद वह पूरी तरह टूट गया.

आखिर कोई कब तक अपने स्वाभिमान को तिलांजलि देता रहेगा? कितना झुकेगा? कितना दबेगा? राजेंद्र ने काफी प्रयास किया कि बात उसी तक सीमित रहे, आगे न बढ़े. पर उस का चुप रहना उस की कमजोरी माना जा रहा था. वह इस विचार का था कि वह प्यार सच्चा नहीं होता, जिस में प्रेमी को क्षमा न किया जा सके. इसी कारण वह अमिता को समझाबुझा कर सही रास्ते पर लाने का असफल प्रयास करता रहा. लेकिन उस के मनमस्तिष्क को तो मेहराजी ने विकृत कर दिया था. ‘वाह रे मेहराजी, तुम ने अजीब राजनीति का खेल खेला. तुम समझते होगे कि राजेंद्र घुटघुट कर मर जाएगा या फिर जहर खा लेगा. फिर तुम मनचाहा राज करोगे.’ लेकिन राजेंद्र ऐसा करने वालों में नहीं था. शायद वह कोई कठोर कदम उठाने से रुक जाता था. उसे विश्वास था कि कुदरत उन्हें उन के कर्मों का दंड अवश्य देगा.

लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है. समुद्र और सब्र की भी सीमा होती है. दोनों अगर अपनी सीमा तोड़ दें तो अनर्थ हो जाता है. किसी चीज की अति करने का अर्थ होता है विनाश. वे दोनों अति की ओर अग्रसर हो रहे थे. राजेंद्र शांत रह कर बुरे दिन टलने का इंतजार करता रहा. वह अपनी पत्नी को अब न तो कुछ समझाता था और न ही उस की किसी हरकत का विरोध करता था. उसे बिलकुल स्वच्छंद छोड़ दिया था, इसलिए कि शायद कभी ठोकर खा कर वह अपने कर्मों पर शर्मिंदगी महसूस करे. लेकिन वे घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही थीं. एक दिन अमिता ने राजेंद्र से कहा, ‘‘आज मैं अपनी मां के साथ बाजार जाऊंगी.’’

राजेंद्र ने उस की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया तो उस ने अपने कुछ कपड़े लिए और घर से निकल गई. उसे इस तरह कपड़े ले जाते देख उसे शक हुआ. उस के जाने के थोड़ी देर बाद वह घर से निकला और अपनी ससुराल जा पहुंचा. वहां मजदूर घर की पुताई कर रहे थे. अमिता की मम्मी और पापा बाजार गए थे. घर में केवल अमिता का भाई अश्विनी था. वह सीधे उस के कमरे की ओर बढ़ा. कमरे के दरवाजे को हाथ से धकेलने की कोशिश की, लेकिन वह अंदर से बंद था. उस ने अपना शक मिटाने के लिए खिड़की से अंदर झांका. वहां का दृश्य देख कर वह कांप उठा. वह चुपचाप वापस लौट आया.

राजेंद्र ने तय कर लिया कि अब वह यह घर छोड़ कर चला जाएगा. उस का मन वैराग्य की ओर मुड़ गया. लेकिन उस के संन्यासी हो जाने से उस के दुश्मनों का मतलब हल हो जाएगा. यह सोच कर उस ने तय किया कि दुनिया से पूछ लिया जाए कि आखिर कौन गलत है, कौन सही? जब उस का जीवन बरबाद हो ही गया है तो फिर सच उजागर करने में ज्यादा से ज्यादा उस की जान ही तो जाएगी. वैसे भी कैसा डर? इस जिंदगी से तो मौत ही अच्छी है. वह जानता था कि अन्याय करने वाले से ज्यादा दोषी अन्याय सहने वाला होता है. पर वह मजबूर था. किसी को दंड नहीं दे सकता था. क्योंकि किसी को दंड देने का कोई अधिकार उस के पास नहीं था. यही सोच कर उस का संन्यास ले लेने का निर्णय पक्का होता गया.

लेकिन शायद ऐसा नहीं होना था. 21 जनवरी को रात साढ़े 8 बजे अमिता औफिस से घर लौटी. उस के इतनी देर से आने के बावजूद राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा. उस ने कपड़े बदले. वह विचारों में खोया था. अचानक उस के दिमाग में आया कि क्यों न घर छोड़ने से पूर्व अमिता को आखिरी बार समझाने की कोशिश करे. राजेंद्र ने उस से बात छेड़ी ही थी कि वह बिफर उठी. उसे दुत्कारने लगी. इस के बावजूद वह उसे समझाने की कोशिश करता रहा. उस के समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने उसे खरीखोटी सुनानी शुरू कर दी. वह भी थोड़ा उत्तेजित हुआ. दोनों में झगड़ा होने लगा. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम मेरे जीवन से निकल जाओ. तुम्हारे लिए अब मेरी जिंदगी में कोई जगह नहीं है. न ही अब मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. अब मैं मेहराजी की पत्नी बन कर रहूंगी.’’

राजेंद्र ने उसे अपने प्यार की दुहाई दी. परंतु वह जानबूझ कर उस की खिल्ली उड़ा रही थी. वह अपना होश खो बैठा. मेज पर पड़ी कैंची उस के हाथ में आ गई. उस ने कैंची का भरपूर वार उस के पेट पर कर दिया. वह चीख उठी. परंतु उस पर तो जैसे शैतान सवार हो गया था. वह कैंची से उस के शरीर को गोदता चला गया. वह जमीन पर गिर पड़ी. कुछ देर तड़पने के बाद उस ने दम तोड़ दिया. अमिता की मृत देह देख कर राजेंद्र के सिर पर सवार शैतान उतर गया. सामने लाश देख कर वह कांप उठा. अब क्या होगा? उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. उस ने क्या सोचा था और क्या कर बैठा. कहां सब कुछ त्याग कर वह संन्यासी बनने चला था, कहां अब खूनी बन गया.

स्वयं को संतुलित कर उस ने आपबीती लिखनी शुरू की. उस के साथ जो कुछ हुआ था, सब लिख डाला. यह घटना स्पष्ट रूप से दिनेश मेहरा तथा अमिता के भाई के कारण ही हुई थी. राजेंद्र ने सब कुछ होशोहवास में लिखा था. 28 पृष्ठों के उस पत्र की कौपियां राष्ट्रपति, भारत सरकार, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री और लखनऊ के जिलाधिकारी को आवश्यक काररवाई हेतु भेज दिया. राजेंद्र कुमार तिवारी द्वारा लिखे गए इस पत्र को पढ़ कर थाना तालकटोरा के थानाप्रभारी रामकुमार यादव की आंखें फटी रह गईं. हत्यारे ने न केवल अपना अपराध स्वीकार किया था, बल्कि हत्या के कारण को भी स्पष्ट लिख दिया था. हत्या करने के बाद ही यह पत्र लिखा गया था, क्योंकि पत्र के अंत में राजेंद्र कुमार ने अपने हस्ताक्षर करने के साथ खून की छींटें भी डाली थीं.

थानाप्रभारी को यह पत्र अमिता की लाश के समीप एक मेज पर मिला था, जिसे वह उसी समय पूरा पढ़ गए थे. मेज पर ही खून से सनी कैंची भी रखी थी. कमरे की दीवारों पर भी खून के छींटे पड़े थे. मृत अमिता के शरीर पर सलवारकुर्ता था. राजेंद्र कुमार तिवारी की मकान मालकिन श्रीमती बाधवा भी उसी मकान के एक हिस्से में रहती थीं. पूछताछ के दौरान श्रीमती बाधवा ने पुलिस को बताया कि बीती रात उन्होंने राजेंद्र तथा उस की पत्नी के बीच हुए झगड़े की आवाजें सुनी थीं. घटना वाली सुबह जब वह बाहर निकलीं तो राजेंद्र के घर का दरवाजा बंद था. उन्हें आश्चर्य हुआ, क्योंकि उस समय तक दोनों लौन में बैठ कर अखबार पढ़ते हुए दिखाई देते थे.

उन्होंने दरवाजा खटखटाया. राजेंद्र को आवाज दी, पर अंदर से कोई जवाब नहीं मिला. वह सशंकित हो उठीं. मकान के पिछले हिस्से की तरफ जाने पर उन्होंने बाथरूम के दरवाजे पर ताला बंद पाया. श्रीमती बाधवा ने यह बात अमिता के पिता को बता देना उचित समझा. उन का फोन नंबर उन के पास था. उन्होंने फोन कर के उन्हें पूरी बात बता दी. एकदो पड़ोसियों को साथ ले कर अमिता के पापा राजेंद्र के मकान पर पहुंचे. उन लोगों ने भी दरवाजा खटखटाया. ताला तोड़ने की कोशिश की, पर सफल न हो सके. राजेंद्र को फोन किया. उस का फोन बंद था. किसी अनिष्ट की आशंका से उन्होंने थाना तालकटोरा पुलिस को फोन किया. थानाप्रभारी रामकुमार यादव पुलिस दल के साथ मौके पर पहुंचे. ताला तोड़ कर जब उन्होंने अंदर प्रवेश किया तो वहां अमिता का शव पड़ा था.

रामकुमार यादव इस घटना से काफी परेशान हो उठे थे. सुबहसुबह उन के थानाक्षेत्र में 2 अन्य घटनाएं भी हो चुकी थीं. एक अन्य युवती की हत्या का मामला था और तालकटोरा थानाक्षेत्र के डी-ब्लौक स्थित रेलवे लाइन पर एक घायल युवक मिला था. उस युवक को कुछ लोग बेहोशी की हालत में उठा कर थाने ले आए थे. उसे उपचार हेतु अस्पताल भेज दिया गया था. युवक की शिनाख्त नहीं हो सकी थी. थानाप्रभारी ने संभावित स्थानों पर खोज की, परंतु राजेंद्र नहीं मिला. उस का फोन बंद ही था, इसलिए संपर्क नहीं हो सका. उस की तलाश में पुलिस टीम रायबरेली गई. वह अपने पिता के यहां भी नहीं मिला. पुलिस उस के पिता शिवप्रसाद तिवारी को अपने साथ लखनऊ ले आई. उन से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक बार फिर राजेंद्र की तलाश की, पर उस का पता नहीं चला.

अचानक थानाप्रभारी का माथा ठनका कि कहीं रेलवे लाइन पर घायल मिला युवक ही राजेंद्र न हो. इस के बाद उन्होंने शिवप्रसाद तिवारी को साथ लिया और बलरामपुर अस्पताल जा पहुंचे. वह युवक अभी तक बेहोश था. शिवप्रसाद तिवारी उसे देखते ही रो पड़े. वह राजेंद्र ही था. उस की निगरानी के लिए 2 सिपाहियों को वहां तैनात कर दिया गया. तीन दिनों बाद 25 जनवरी को राजेंद्र को होश आ गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस का कहना था, ‘‘मैं ने जो कुछ किया, उस का मुझे कोई दुख नहीं है. मलाल तो इस बात का है कि मेरा परिवार तबाह करने वालों को कानून ने कोई सजा नहीं दी. अब कुदरत ही उन के कर्मों का फल उन्हें देगा, ऐसा मेरा विश्वास है.’’

लेकिन सवाल उठता है कि क्या अमिता की हत्या के बाद राजेंद्र द्वारा लिखे गए पत्र में लगाए गए आरोपों की कोई सजा कथित दोषियों को मिल सकती है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ लोगों को बदनाम करने के लिए हत्या के बाद लिखे गए पत्र में राजेंद्र ने उन का नाम लिखा हो? शायद यही वजह है कि दिनेश मेहरा (55 वर्ष) का कहना है, ‘‘मेरा और अमिता का रिलेशन केवल औफिशियल था. राजेंद्र ने अपने पत्र में मेरा जिक्र क्यों किया, यह मुझे नहीं पता. हो सकता है, उस ने मुझे बदनाम करने के लिए ऐसा किया हो. जहां तक सवाल है कि राजेंद्र ने अमिता की हत्या क्यों की तो इस का पता लगाना पुलिस का काम है, मेरा नहीं. हां, मैं यह जरूर कह सकता हूं कि अमिता बहुत ही मेहनती महिला थी. औफिस का काम भी वह पूरी ईमानदारी और लगन से करती थी. उस की मौत का मुझे दुख है.’’

दूसरी ओर अमिता के भाई अश्विनी का कहना था, ‘‘मुझे जो कुछ कहना है, पुलिस के सामने या अदालत में कहूंगा. लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि राजेंद्र न केवल सनकी, बल्कि पागल था. उस ने जो कुछ लिखा है, अपनी सनक और पागलपन की झोंक में लिखा है. हत्या के असली कारण से पुलिस का ध्यान हटाने के लिए उस ने ऊलजुलूल बातें अपने पत्र में लिखी हैं. आखिर इन बातों का कोई सुबूत तो होना चाहिए.’’

एक अहम सवाल यह भी है कि जब राजेंद्र अपना अपराध स्वीकार कर रहा है तो उसे हत्या का असली कारण छिपाने से क्या लाभ? उस ने अमिता से प्रेमविवाह किया था. दोनों साथसाथ रह रहे थे. दोनों ही सर्विस में थे. इसलिए न तो आर्थिक संकट जैसा कोई कारण था और न ही सर्विस को ले कर कोई मनमुटाव था. बहरहाल, पुलिस का कहना है कि उसे हत्या का अपराधी मिल गया है. पुलिस का काम तो हत्या के अपराधी को पकड़ने के साथ ही समाप्त हो गया है. किसी को सजा देने का काम अदालत का है. शायद इसी कारण पुलिस ने राजेंद्र द्वारा पत्र में लिखी गई बातों की वास्तविकता का पता नहीं लगाया और न ही इस संबंध में कोई छानबीन की.

थानाप्रभारी रामकुमार यादव इस बारे में कहते हैं, ‘‘राजेंद्र ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया है. उस ने अपने पत्र में किस पर क्या आरोप लगाया है, इस की जांच का काम हमारा नहीं है. हां, इतना जरूर है कि पाप का प्रायश्चित करने वाला व्यक्ति न झूठ बोल सकता है और न झूठ लिख सकता है. अदालत भले ही किसी को सजा न दे सके, लेकिन कुदरत जरूर सजा देगी.’’

कथा लिखे जाने तक राजेंद्र को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. पुलिस आरोपपत्र तैयार करने में जुटी थी. Short Hindi Story

—कथा सत्य घटना पर आधारित है. कथा में पात्रों एवं स्थानों के नाम बदले हुए हैं.

 

Love Story: अंधेरे में डूबी जिंदगी

   लेखक – अशोक कुमार प्रजापति, Love Story:  मिताली ने मेरी मंगेतर होते हुए भी मेरे लिए वह कुछ किया था, जो मांबाप भी नहीं कर सकते थे. लेकिन सूर्यबाला के चक्कर में मैं ने उसे इतना बड़ा धोखा दिया कि मेरी जिंदगी ही मेरे लिए धोखा बन गई. बात उन दिनों की है जब मैं भी लाखों युवकों की तरह बेरोजगार था और एक अदद नौकरी की तलाश में दिल्ली की सड़क से ले कर गलियों तक की खाक छान रहा था. नवंबर के शुरुआती दिन थे. खाड़ी देश से मिताली के भेजे रुपए लगभग खत्म हो चुके थे. मतलब जल्दी ही मेरे फाकाकशी के दिन शुरू होने वाले थे. थकहार कर कनाट प्लेस के पालिका बाजार की कछुए की पीठ जैसी उथली पश्चिमी ढलान पर बैठ कर सितारों भरे आसमान को देखना मेरी कई फालतू आदतों में शुमार था. यह काम मैं बिना नागा करता था.

भीड़भाड़ से थोड़ा अलग इन चमकते आकाशीय पिंडों से बातें करना मुझे अनोखा सुकून देता था. मुझे दिन की अपेक्षा रातें कुछ ज्यादा लुभाती थीं. कभीकभी मैं सोचता कि रातें तो तारे गिनने के लिए होती हैं, जबकि लोग इस बढि़या काम से विमुख हो कर अपनेअपने दड़बों में बंद हो कर विभिन्न कामों में वक्त जाया करते हैं.

खैर, मैं ही कौन सा तुर्रम खां था कि तारे गिन डाले हों. मैं न तो कोई ‘एस्ट्रोलोजर’ था और न ही मुझे ऐसे बेढब आकाशीय पिंडों की खोज करनी थी, जो निकट भविष्य में धरती को नेस्तनाबूद करने के लिए इस की ओर भागे आ रहे हों. यह काम तो खगोलवेत्ताओं का है, जो आकाश पर आंख जमाए रातदिन ब्रह्मांड में टकटकी लगाए रहते हैं. बहरहाल, उस सुहानी शाम को भूखे पेट मैं सिर्फ यही कामना कर रहा था कि चांद अपने ही शक्ल की बेहिसाब रोटियां धरती पर फेंके या फिर पास की चमचमाती सड़क पर खनखनाते हुए चांदी के सिक्के बरस पड़े या तारे पिघल कर हीरेमोती में तब्दील हो जाएं और महुए की तरह टपकने लगें. मैं खाहमख्वाह नामुमकिन ख्यालों में खोया था. वैसे खुली आंखों से ख्वाब देखने के लिए वह जगह बुरी नहीं थी.

शाम के धुंधलके में पेड़ों की छाया और झाडि़यों के पीछे रूपसियों की रूमानी हरकतें शुरू हो गई थीं. लोहे के पाइपों पर लगे रोशनी के गोलाकार लैंप जल उठे थे. लोग अपनेअपने भावशून्य चेहरे संभाले कठपुतलियों की तरह इधरउधर आजा रहे थे. पार्क धीरेधीरे खाली होता जा रहा था, सिर्फ मुझ जैसे चंद निखट्टू मिट्टी के लोंदे की तरह जहांतहां पसरे पड़े थे. मेरी नजरें नीली जींस और झकाझक सफेद टौप पहने एक युवती पर जमी थीं. वह भी रहरह कर तिरछी निगाहों से मुझे देख लेती थी. लग रहा था जैसे शाम की ठंडाती हवा को अपनी बांहों में समेटे वह किसी की प्रतीक्षा में खड़ी हो.

अचानक आइस्क्रीम पार्लर से शंकुनुमा आइस्क्रीम खरीद कर खाते हुए वह लापरवाही से पालिका बाजार की ओर चली आई. मैं चारों ओर से खुद को समेटे जेब में पड़े सिर्फ 5 सौ रुपए के नोट को खर्चने के अर्थशास्त्र से जूझने लगा. अगले हफ्ते तक मिताली ने अगर खाते में 8-9 हजार रुपए न डाले तो मकानमालिक मेरा सामान सड़क पर फेंक देगा. इस के बाद बेटिकट यात्रा कर के गांव पहुंचने के अलावा मेरे पास कोई उपाय नहीं रहेगा. मेरा संघर्ष अंतहीन होता जा रहा था.

मिताली मेरी मंगेतर थी. वह बगदाद के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में नर्स थी. वह एक साल के अनुबंध पर वहां गई थी. लौट कर आने पर हमारी शादी होने वाली थी. उसी की सलाह पर मैं नौकरी की तलाश में दिल्ली आया था. मैं सायकोलौजी से पोस्टग्रेजुएट था, वह भी यूनिवर्सिटी टौपर गोल्ड मेडलिस्ट. लेकिन यह सब किसी काम का साबित नहीं हो रहा था. रोटी के लिए मेडल बेचने की नौबत आती दिख रही थी. मेडल का कोई बाजार भाव था या वह भी फालतू चीज थी, बाजार से ही पता चल सकता था.

‘‘दिल्ली में बहुत गरमी पड़ती है?’’ पीछे से खनकती आवाज आई तो मैं ने पलट कर देखा. आइस्क्रीम ले कर जाने वाली वही लड़की मेरे पीछे खड़ी थी.

‘‘हां, यह तो है, लेकिन दिल्ली में गरमी से राहत देने वाली चीजें भी खूब मिलती हैं.’’ मैं ने उस की बात के जवाब में कहा.

‘‘आप तो बड़े दिलचस्प आदमी लगते हैं.’’ अजीब सी नजरों से घूरते हुए वह मेरे बगल में बैठ गई.

‘‘और आप उतनी ही दिल्लगी पसंद भद्र युवती.’’

‘‘यह जगह है ही बड़ी रोमांटिक, आप का क्या ख्याल है?’’

‘‘हां, है तो, शायद आप की खूबसूरती से ही यहां की रूमानियत जिंदा है.’’ मैं कुछ गलत तो नहीं कह रहा?’’

मेरी इस बात पर वह लड़की शरमा कर झेंप गई. ऐसी ही बातों में हम ने लगभग घंटा समय गुजार दिया. इस बीच हमारे बीच तमाम तरह की बातें हुईं, परिचय भी. मुझे वह बड़े जटिल चरित्र की लड़की लग रही थी.

‘‘रात बहुत हो गई है, अब हमें ‘रोटी’ रेस्टोरेंट चलना चाहिए, कुछ खानापीना हो जाए न.’’ वह एकाएक इस तरह बोली जैसे घंटे भर की रोमांटिक बातों से मेरा जी बहलाने के बदले अपना मेहनताना मांग रही हो.

उस की इस चौंकाने वाली सलाह पर मेरे ऊपर बज्रपात सा हुआ. ‘रोटी’ जाने का मतलब था 7-8 सौ रुपए खर्च होना. जबकि मेरी जेब में सिर्फ 5 सौ रुपए का एक नोट था. 30-40 रुपए फुटकर भी रहे होंगे. मुझे आनंद विहार जाने वाली अंतिम मैट्रो भी पकड़नी थी.

‘‘मैं रोटी नहीं खाता. हमारे यहां लोग सुबहशाम भात खाते हैं. वैसे भी मैं ने पिज्जा खा लिया है, इसलिए अब कुछ खाने का मन नहीं है.’’ मैं ने उस बला से छुटकारा पाने की कोशिश में कहा.

‘‘तुम झूठ बोल रहे हो. दिल्ली में बेरोजगारों को बहुत भूख लगती है, वह भी कई तरह की. तुम ने अभीअभी बताया है कि तुम बेरोजगार हो.’’

‘‘केवल बेरोजगार ही नहीं, बिना किसी ठौरठिकाने का भी. मुझे रातें यहीं कहीं फुटपाथ पर गुजारनी है, सो कहीं जाने की जल्दी नहीं है. इसलिए कृपया आप जाइए, आप को देर हो रही होगी. देर रात तक लड़कियों का घर से बाहर रहना वैसे भी सुरक्षित नहीं है.’’ मैं ने पिंड छुड़ाने की गरज से बहाना बनाते हुए कहा.

‘‘लड़कियों जैसे नखरे मत दिखाओ. मुझे भूख लगी है, सो तुम्हें चलना ही पड़ेगा. आखिर हम घंटे भर पुराने दोस्त हैं, मेरी खातिर इतना भी नहीं कर सकते? अब इस पर भी नहीं माने तो मैं शोर मचा दूंगी कि तुम मेरे साथ छेड़खानी कर रहे हो. तुम जानते ही हो कि रेप कांड को ले कर दिल्ली सहित पूरे देश में लोग किस तरह उबल रहे हैं.’’ उस ने कुटिलता से मुसकराते हुए मेरी चेतना को झकझोर दिया.

‘‘बात यह है मिस कि मेरी जेब में सिर्फ 5 सौ रुपए ही हैं और इसी से न जाने कब तक मुझे काम चलाना पड़े. ऐसे में मैं किसी होटल रेस्टोरेंट की गद्दीदार कुर्सी पर बैठ कर गुलछर्रे उड़ाने की बिलकुल नहीं सोच सकता. और ‘रोटीबोटी’ खाने के बाद होटल वालों के जूते खाना मुझे बिलकुल पसंद नहीं है.’’

‘‘बस, इतनी सी बात है. 5 सौ का नोट ले कर मजनुओं के इस टीले पर दिल्ली के रंगीन नजारों का लुत्फ उठाने के लिए आ कर बैठ गए हो. कोई बात नहीं. मेरे पास पैसे हैं, आज तुम्हें मेरा साथ देना ही होगा. लाखों की आबादी वाली इस बेदिल दिल्ली में मैं निहायत अकेली हूं. तनहाई काटने को दौड़ती है. तुम मेरी मजबूरी समझते क्यों नहीं?’’ उदासी से उस ने कहा, ‘‘और हां, मैं रेडलाइट वाली पंछी नहीं हूं, जैसे कि तुम्हारे दिल में खयाल आ रहे होंगे.’’

कुछ मिनट बाद मैं ऊहापोह की स्थिति में उस की तलहथी की मुलायमियत का अनुभव करते हुए धीरेधीरे ‘रोटी’ की ओर चला जा रहा था. सड़क के दोनों ओर अंगे्रजों के जमाने की बनी इमारतों के बुर्ज में कबूतर आशियाना बनाए दुबके बैठे थे. इन पुरानी इमारतों में अजीब तरह की जर्जर भव्यता व्याप्त थी, जो अब इन की विशिष्ट पहचान बन चुकी थी.

‘‘रात गहरा चुकी है. मैं अकेली हूं, तुम चाहो तो मेरे फ्लैट पर रात बिता सकते हो, इतनी रात गए वैसे भी उतनी दूर जाना ठीक नहीं है. दिल्ली में इन दिनों कुछ भी सुरक्षित नहीं है.’’ रोटी रेस्टोरेंट से निकलते ही उस ने बड़ी साफगोई से कहा.

थोड़ी नानुकुर के बाद मैं उस के साथ औटो में बैठ गया. इस के बाद हम दोनों की खूब जम गई. नतीजतन मेरी कई रातें सूर्यबाला के फ्लैट पर गुजरीं. जल्दी उस का एक जोड़ी नाइट सूट मेरे र्क्वाटर पर भी रखा रहने लगा. इसी सब के चलते एक व्यस्त दोपहर को मिताली ने फोन द्वारा सूचना दी कि उस की एक सहेली का कांट्रैक्ट पूरा हो गया है. वह इंडिया जा रही है. उस के हाथों वह मेरे लिए एक उपहार और कुछ सूखे मेवे भेज रही है, दिल्ली रेलवे स्टेशन से ‘कलेक्ट’ कर लूं. मैं ने ऐसा ही किया. मिताली का भेजा गिफ्ट मुझे मिल गया. कमरे पर आ कर मैं ने पैकेट खोला तो उस में एक कीमती मोबाइल फोन था, जिस में ढेर सारे नए फीचर मौजूद थे. नेट और फेसबुक के साथसाथ फोटो भेजने वाली सुविधा भी थी. मिताली ने मेरे लिए एक पत्र भी भेजा था. जिस में उस ने लिखा था कि उस ने गुड़गांव में 70 लाख का एक फ्लैट बुक करा लिया है. उस की किस्तें भी कटने लगी हैं. लेकिन उसे दूसरे तरीके से इस की कीमत चुकानी पड़ेगी.

दरअसल, इस के लिए उस ने 2 साल के लिए अपना कांट्रैक्ट बढ़वा लिया था, जिस से कर्ज अधिक से अधिक भरा जा सके. वह शादी के बाद नए फ्लैट में रहने का अरमान पाले हुए थी. मुझे ‘नेट’ की तैयारी करने की सख्त हिदायत के साथ उस ने आश्वस्त किया था कि जरूरत पड़े तो मैं कोचिंग ज्वाइन कर लूं, पैसे वह भेज देगी. सूर्यबाला को मैं ने ये बातें जानबूझ कर नहीं बताईं. मैं अपने रोमांस और रोमांच भरे आनंदमय जीवन का इतनी जल्दी अंत नहीं करना चाहता था. सूर्यबाला के भी दिन अच्छे नहीं चल रहे थे. वह अपनी प्यारी अम्मा की दयादृष्टि पर दिल्ली में रह रही थी. सूर्यबाला के 27वें जन्मदिन पर मैं ने अपनी मंगेतर द्वारा भेजा गया फोन उसे भेंट कर दिया. मेरे लिए वह किसी काम का था भी नहीं. उसे रिचार्ज कराने के लिए मेरे पास पैसे ही नहीं होते थे.

सूर्यबाला के 27वें जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए मैं ने उसे साथ ले कर नवंबर की उस सुबह काठगोदाम जाने वाली गाड़ी पकड़ ली और नैनीताल पहुंच गया. हमारा तीन दिन का प्रोग्राम था. वहां एक ठंडी शाम में हम नैनी झील के किनारे नैना देवी मंदिर की एक संगमरमरी बेंच पर बैठे पहाड़ से सूर्य का लुढ़कना देख रहे थे. उस के पहाड़ के पीछे छिपने के बाद भी घाटी आलोकित रही, हवा के झोंके झील को स्पर्श करते हुए मल्लीताल की ओर चले जा रहे थे.

‘‘एक बात बताओ सूर्यबाला, तुम ने ऐसी कौन सी गलती कर दी कि तुम्हारे पिता ने एकाएक तुम्हें पैसे देने बंद कर दिए?’’

‘‘पापा मुझे सिविल सेवा में भेजना चाहते थे. मैं पढ़ाई में साधारण थी, इस के बावजूद बोर्ड में जुगाड़ से मेरे अच्छे नंबर आ गए थे. लेकिन नंबरों का प्रतिशत कम होने की वजह से मेरा एडमीशन किसी नामी गिरामी कालेज में नहीं हो सका. परिणामस्वरूप मुझे डीयू के नार्थ ब्लाक के एक साधारण से कालेज में एडमीशन ले कर पढ़ाई करनी पड़ी.

‘‘ग्रैजुएशन के बाद मैं महत्त्वाकांक्षी बाप के दबाव में सिविल सर्विस की तैयारी करने लगी. लाख कोशिश के बाद भी मैं प्रारंभिक परीक्षा तक नहीं पास कर सकी. मेरी असफलता से नाराज हो कर पापा ने एक अरबपति सांसद के बेटे से मेरी शादी तय कर दी. शादी का यह सौदा 3 करोड़ में तय हुआ था.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात थी. बाप अरबपति था तो लड़का भी कम से कम करोड़पति तो रहा ही होगा. स्विस बैंक में भी कुछ जमा होंगे. इतना होने के बावजूद समस्या क्या थी? तुम तो वहां ऐश करतीं.’’

‘‘ऐश क्या करती, लड़के पर 3-3 हत्याओं और 2 दुष्कर्म के केस दर्ज थे. उस का एक पैर जेल में तो दूसरा कोर्ट में रहता था. क्या तुम ऐसे लड़के के साथ शादी की सलाह दे सकते हो?’’

‘‘कदापि नहीं, लेकिन यहां मामला कुछ अलग है. ऐसे लोगों के लिए यह अपराध नहीं है. उन के लिए यह राजनीतिक जीवन की योग्यता है. ऐसे लोगों के खिलाफ कभी गवाहसबूत नहीं मिलते, सो सजा भी नहीं होती. अगर सजा हो भी गई तो तुम्हारे ऊपर क्या फर्क पड़ता, उस की दौलत की मालकिन तो तुम ही होती न, इस दुनिया में मर्दों की कमी तो है नहीं?’’

‘‘बात यहीं खत्म नहीं हुई थी सुशांत. मेरे पिता ने मेरे बौयफ्रैंड के हाथपैर तुड़वा दिए थे. वह बेचारा आज तक लापता है. पता नहीं जीवित भी है या नहीं? मैं इस घटना के बाद डिप्रेस हो गई थी और शादी से साफ मना कर दिया था. बस उस के बाद उन्होंने मुझे खर्च देना बंद कर दिया था. मम्मी चोरीछिपे कुछ पैसे भेज देती हैं.’’

तुम्हारी कहानी तो बड़ी ही दुखद है सूर्यबाला. खैर, तुम्हारा एक अंतिम चांस बचा है, तुम तैयारी शुरू कर लो. जनरल और औप्शनल पेपर की कोचिंग कर लो. सायकोलौजी मैं तैयार करा दूंगा.’’

‘‘क्या मास्टर डिग्री में तुम्हारा सब्जेक्ट सायकालौजी रहा है?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘हां, मैं यूनिवर्सिटी टौपर हूं और गोल्डमेडलिस्ट भी. मेरे पास अच्छे नोट्स हैं.’’

‘‘अरे, पहले कभी नहीं बताया?’’ वह प्यार से मेरे सीने पर मुक्का जमा कर बोली.

‘‘लेकिन कोचिंग के लिए 78 हजार रुपए कहां से आएंगे?’’

‘‘तुम्हें इस की चिंता करने की जरूरत नहीं है. उस का इंतजाम मैं कर लूंगा.’’

‘‘तो ठीक है, मैं एक कोशिश और करती हूं. तुम्हारे साथ होने से शायद सफलता मिल ही जाएं.’’

मैं ने मिताली से नेट की तैयारी के लिए कोचिंग करने की इच्छा जताई तो अगले सप्ताह ही उस ने मेरे खाते में 90 हजार रुपए डलवा दिए. मैं ने पैसे सूर्यबाला को दे दिए. इस के बाद उस ने कोचिंग ज्वाइन कर ली और मैं शिक्षा व्यवस्था को कोसता घर पर ही तैयारी करने लगा. इस बीच मैं ने एक स्कूल में टीचर की नौकरी कर ली थी. 15 हजार हर महीने वेतन का एग्रीमेंट हुआ था. लेकिन बेईमान स्कूल प्रबंधन सिर्फ 12 हजार रुपए ही देता था. जो कुछ मिल रहा था, कम से कम इस से मेरी बेरोजगारी कुछ हद तक दूर हो गई थी, साथ ही मेरी मटरगश्ती पर बे्रक भी लग गई थी. तारों की गिनती भूल गया था और चांद भी मेरे आकाश से कब का गायब हो गया था.

परीक्षा समाप्त होने पर सूर्यबाला मेरे साथ रहने लगी. मैं स्कूल से लौटता तो वह युवाओं के आजकल के खिलौने से खेलती मिलती. वह उस में इस तरह डूबी रहती कि मेरे कदमों की आहट तक उसे सुनाई न देती. खाते समय या बिस्तर पर वह बताती रहती कि उस ने आज कहांकहां, कितनों को एड किया, उस की पोस्ट को कितने लोगों ने लाइक किया. उस के लाइक करने वालों की संख्या 25 हजार के ऊपर हो चुकी थी और उस के डेढ़ हजार फालोवर थे. दुनिया का शायद ही कोई देश बचा हो, जहां उस के स्त्रीपुरुष मित्र न रहे हों. उन दिनों वह उसी में खोई रहती थी. मैं रोजाना उस में आने वाले बदलावों को समझने की नाकाम कोशिश कर रहा था. हमारे बीच का शारीरिक आकर्षण और यौन आवेश लगभग ठंडा पड़ चुका था. उपहार में उसे मोबाइल देना मुझ पर भारी पड़ता जा रहा था.

गरमी की छुट्टियां चल रही थीं. मेरा अधिकतर समय घर पर ही बीत रहा था. उन्हीं दिनों इराक में शिया अलगावादियों ने अपने ही देश के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था. कई शहर और तेल कुओं पर उन का कब्जा हो गया था. वे तेजी से बगदाद की ओर बढ़ रहे थे. सारे संपर्क लगभग टूट चुके थे. कई दिनों की लगातार कोशिश के बाद मिताली से कुछ मिनट के लिए संपर्क हुआ. मैं ने उसे सब कुछ छोड़ कर जितनी जल्दी हो सके, किसी तरह घर लौट आने की सलाह दी. लेकिन उधर से सिर्फ उस की गहरी सिसकियां सुनाई देती रहीं.

कुछ मिनट बाद संपर्क फिर से टूट गया. अगले दिन अखबार में खबर आई कि जिस अस्पताल में वह नौकरी करती थी, उस के बाहर भारी गोलाबारी हो रही थी. नर्सें बेसमेंट में छिपी थी. 2 दिनों बाद पता चला कि नर्सों को विद्रोही अगवा कर के कहीं दूसरी जगह ले जा रहे थे. चिंता के मारे मेरी रातों की नींद उड़ गई थी. मैं अपना यह दुख सूर्यबाला से शेयर भी नहीं कर सकता था. मुझे उदास देख कर वह भी उदास हो जाती थी. लेकिन उस ने मेरी उदासी का कारण नहीं पूछा.

चंद दिनों बाद एक अखबार ने रहस्योद्घाटन किया कि कुछ नर्सें इसलिए वापस नहीं आना चाहतीं, क्योंकि उन्होंने बड़े शहरों में फ्लैट के लिए भारी कर्ज ले रखा है और गल्फ कंट्री की मोटी तनख्वाह वाली नौकरी के बगैर उन का कर्ज अदा करना संभव नहीं है. गोलीबारी में 2 नर्सें मारी भी गई थीं. घायल तो कई नर्सें हुई थीं. अपने घर वालों के दबाव में ज्यादातर नर्सें लौटना चाहती थीं. अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की नीति के अनुसार, इराकी सरकार की मदद के लिए फौज भेजने के निर्णय के बाद तो स्थिति और भी विस्फोटक हो गई, हालात बिगड़ने लगे थे.

इसी बीच भारत सरकार की मदद से तमाम लोग वापस भी आ गए थे. उन से भी कोई पक्की खबर नहीं मिल सकी थी. वहां के समाचार के लिए हम पूरी तरह से मीडिया के मोहताज थे. मिताली और मेरे परिवार वाले भी परेशान थे. लोग सरकार से लगातार नर्सों की सुरक्षित वापसी के लिए गुहार लगा रहे थे. इस से अधिक वे लोग कर भी क्या सकते थे? मेरे दिन उदासी में कट रहे थे. उसी बीच एक दिन सूर्यबाला ने खुशखबरी सुनाई कि वह प्रारंभिक परीक्षा में पास हो गई थी. उस दिन हमारे सपनों को पंख लग गए थे. हालांकि वे पंख इतने मजबूत नहीं थे कि मैं उन की बदौलत आकाश की असीम ऊंचाइयों तक उड़ान भर सकूं. हम ने यादगार बनाने के लिए वह शाम एक पांचसितारा होटल में बिताई. एग्जाम की कौपी जांचने के मानदेय रूप में मिले 8 हजार रुपए वहां हवा हो गए.

4 दिनों बाद खबर छपी कि अगवा भारतीय नर्सों का उपयोग विद्रोही ढाल के रूप में कर रहे हैं. उन्होंने धमकी दी थी कि अगर उन पर अमेरिकी या पश्चिमी देशों द्वारा सैन्य कारवाई की गई तो वे उन्हें मार डालेंगे. यह खबर पढ़ कर मेरा दिमाग सुन्न हो गया. परिवार वालों के होश फाख्ता हो गए. नर्सों को न जाने कितनी मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी जा रही होंगी. मैं उस दिन को कोसने लगा, जब मंगनी के 2 दिनों बाद ही मिताली बगदाद जाने की जिद करने लगी थी. मेरे लाख मना करने के बावजूद कसमोंवादों की घुट्टी पिला कर वह अपनी महत्वाकांक्षा की भारी भरकम गठरी लिए दूर देश चली गई थी. जैसेतैसे दिन तनावपूर्ण वातावरण में कट रहे थे. नर्सों की वापसी की उम्मीद धूमिल पड़ती जा रही थी. मैं भीषण मानसिक द्वंद्व में जी रहा था, साथ ही बड़ी निर्लज्जता से सोच रहा था कि मिताली का जो भी होना हो, जरा जल्दी हो जाए.

उन दिनों मेरा सारा ध्यान सूर्यबाला पर केंद्रित होता जा रहा था. हालांकि एक अनजान डर दिल में बसा था. सूर्यबाला की बोल्डनेस और एकदम खुले विचार पर मैं मुग्ध था. उस की अत्याधुनिक पश्चिमी सोच का कोई भी कायल हो सकता था. संकीर्णता उस के दिमाग में रत्ती भर भी नहीं दिखाई देती थी. उस की मुसकराहट ऐसी थी कि दुश्मन भी फिदा हो जाए. नेट क्वाईलीफाई करते ही मेरा आत्मविश्वास सातवें आसमान पर जा पहुंचा. फटाफट मैं ने 6-7 जगहों पर प्रवक्ता के लिए आवेदन कर दिया था. सूर्य बाला मुख्य परीक्षा की तैयारी में लगी थी. उस के हिस्से की घरेलू जिम्मेदारी मैं ने अपने जिम्मे ले ली थी. खाना बनाने से ले कर उस के कपड़े तक मैं धोता था. मैं चाहता था कि अंतिम चांस में वह निश्चित रूप से सफलता हासिल कर ले.

वक्त अपनी गति से बीत रहा था. जाड़ा, गरमी और बरसात अपनेअपने तामझाम के साथ आतेजाते रहे. बगदाद से किसी भी तरह की खबर मिलनी बंद हो चुकी थी. मीडिया वाले ऊब चुके थे. हम पर निराशा के बादल गहराते जा रहे थे. सूर्यबाला का अधिकतर समय बाहर घूमनेफिरने या नेट पर चैट में गुजरता था. धीरेधीरे हमारे बिस्तर अलग हो गए. हम मशीनी जिंदगी से ऊब से गए थे. एक शाम लंबे अंतराल के बाद हम दोनों आमनेसामने बैठे थे. उस ने अपने हाथों को कैंची की तरह बांध रखा था. उस के खुले चमकीले रेशमी बाल लहरा रहे थे. उस के चेहरे पर एक बेबसी भरी लाचारी छाई थी.

मैं ने बात शुरू करने की गरज से कहा, ‘‘आज रात की हवा में ठंडक है, अक्तूबर बीता जा रहा है.’’ मैं सोचता हूं कि अब हमें शादी कर लेनी चाहिए या यह कहें कि अपने रिश्ते को नाम दे दिया जाए.

‘‘आज यह बचकाना विचार तुम्हारे दिमाग में कहां से आ गया.’’ उस ने कहा.

‘‘देखो सूर्यबाला, हमारे बीच अब किसी तरह की दूरी नहीं बची है. फिर शादी तो हमें एक न एक दिन करनी ही है इसलिए जितनी जल्दी हो सके, हमें विवाह कर लेना चाहिए. क्योंकि इस में सब से बड़ी मुश्किल यह है कि हम अलगअलग जाति से हैं, इसलिए तमाम रुकावटें आएंगी.’’

‘‘यह सच है कि हमारे बीच शारीरिक संबंध हैं, लेकिन यह एक तरह की भूख है. किसी भी तरह की भूख को शांत करने के लिए जातिधर्म की बातें एकदम बेमानी हैं. हम ने एक दूसरे को भोगा है और एक जैसा आनंद प्राप्त किया है, सो हिसाबकिताब बराबर रहा. हमारे पास अब खोनेपाने को कुछ नहीं बचा. इस तरह के संबंधों पर हायतौबा मचाना बेकार है. शाम होने को है, घर में सब्जी का एक टुकड़ा नहीं है. इन अर्थहीन बातों में समय गंवाने के बजाय बाजार से सामान लाना ज्यादा महत्वपूर्ण है.’’ सूर्यबाला ने बेरुखी से कहा.

‘‘आई एम सीरियस सूर्यबाला, जबकि तुम मेरी बात का मजाक उड़ा रही हो? हम एकदूसरे से प्रेम करते हैं. जिस मोड़ पर हम पहुंच चुके हैं, वहां से पीछे लौटना संभव नहीं है.’’ मैं ने मन की बात कह दी.

‘‘लेकिन मैं ऐसी बेतुकी बातों को सीरियसली नहीं लेती. हुंह… प्रेम, हमबिस्तर होने का मतलब कब से प्रेम हो गया? हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं है. शारीरिक, आर्थिक या बौद्धिक आकर्षण और स्वार्थ सिद्धि के दांवपेंच को प्रेम कहना उस की तौहीन है. हमारातुम्हारा प्रेम सिर्फ ढोंग है, एक्साइटिंग फन, एक साथ मल्टीपल एंड प्लांड रोमांसभोग का खूब मजेदार और उत्तेजनापूर्ण गेम. इस में थ्रिल भी है और सस्पेंस भी. हमारा रोमांटिक सफर यहीं तक था. इस मोड़ से आगे 2 रास्ते हैं, जिन पर हम अलगअलग चलते हुए अपना सफर जारी रख सकते हैं.’’ उस ने बेबाकी से कहा.

‘‘तुम कल की प्रशासक हो. तुम्हें तो कम से कम ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए. ईमानदारी और सचरित्रता एक अच्छे प्रशासक की पहली शर्त है. देश की सेवा का व्रत लेने वाले का चरित्र अनुकरणीय होना चाहिए.’’

‘‘कोई सेवावेवा के लिए सिविल सर्विस में नहीं जाता, मि. सुशांत. उन के दिमाग में दंभपूर्ण और दूर का शातिराना लक्ष्य होता है, पावर और पैसा. सेवा भावना सिर्फ नैतिक पाखंड है, कंप्लीट हिपोक्रेसी. वैसे अपवाद तो सब जगह होते हैं.’’

‘‘तुम सही हो सकती हो, लेकिन वह अलग मसला है. हमारे बीच लंबे समय से शारीरिक संबंध रहे हैं. इसलिए विवाह हमारी नैतिक जिम्मेदारी बन गई है.’’ मैं ने उसे समझाना चाहा.

‘‘तुम झूठ बोल रहे हो. तुम भी मेरी तरह कपटपूर्ण जीवन जी रहे हो. आज के अधिकतर युवा गलाकाट प्रतियोगिता में तनावग्रस्त हैं. वे इस से मुक्ति के लिए शराब, सिगरेट और मादक पदार्थों का प्रयोग करते हैं, जो अंततोगत्वा उन्हें बरबाद कर देता है.

‘‘मैं ने शारीरिक संबंध को तनाव दूर करने के लिए खुराक के रूप में प्रयोग किया है और इस काम में बराबर का साथ देने के लिए मैं तुम्हें धन्यवाद देती हूं. इस से अधिक कुछ नहीं है. और तुम यौन संबंध और विवाह को एकदूसरे का पूरक मान बैठे हो. लेकिन इन दोनों में दूरदूर तक कोई संबंध नहीं है.

‘‘जिस्मानी संबंध स्थापित करना एक बात है और उसी पार्टनर से विवाह करना बिलकुल अलग बात होती है. एक का संबंध शारीरिक भूख से है, जबकि दूसरा अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है. भूख की आंच में घृणा, आस्था, विश्वासअंधविश्वास, मानसम्मान सब जल कर खाक हो जाते हैं. विवाह के लिए कई सामाजिक शर्तें होती हैं, जिसे हमतुम पूरा नहीं करते. हम अलगअलग जाति से ताल्लुक रखते हैं. मैं विजातीय विवाह कर के जीवन में किसी तरह का टंटाबखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहती. इसलिए तुम भी इस तरफ सोचना बंद कर दो.’’

इतना कह कर वह सब्जी लाने के लिए थैला ढूंढ़ने किचन में चली गई.

‘‘तो मैं इतने दिनों तक नाहक ही पैसे और वक्त बरबाद करता रहा?’’ उस के वापस आने पर मैं ने पूछा.

‘‘बरबाद करना मत कहो, इंजौय करना कहना उपयुक्त होगा.’’ थैला उठाते हुए उस ने कहा. मानो यह सब उस के प्लान के अनुसार हो रहा था. सूर्यबाला की 2 टूक बातों से मैं भौंचक रह गया था. मेरे दिमाग में जैसे भूसा भर गया था. वह अकेली ही बाजार चली गई. मेरे मन में सूर्यबाला की महीनों से बनी छवि एकबारगी ध्वस्त हो गई. मैं अचानक आकाश से जमीन पर आ गिरा और मिताली के प्रति विश्वासघात के दर्द से कराह उठा. सूर्यबाला के जाल में फंस कर मैं मिताली को लगभग भूल चुका था. अचानक बेतरह उस की यादें सताने लगीं. सूर्यबाला बेहद खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन उस के बदन की स्त्रैण खुशबू अद्वितीय थी, जिस के जादू से मैं बच नहीं सका था. मेरी वह रात जैसेतैसे करवट बदलते गुजरी.

अगले दिन स्कूल से लौटा तो सूर्यबाला घर में नहीं थी. वह अपना सामान पैक कर के जा चुकी थी. उस का मोबाइल भी बंद था. दिल तो टूटने के लिए ही बना है और वह टूट चुका था. मैं कई दिनों तक ऊहापोह की स्थिति में जीता रहा.  इसी तरह कई महीने बीत गए. जब नहीं रहा गया तो एक दोपहर को अंतिम उम्मीद ले कर मैं उस के बदरपुर स्थित फ्लैट पर पहुंच गया. संयोग से वह फ्लैट पर ही थी. मुझे सामने पा कर वह चौंकी और देर तक मुझे चुपचाप घूरती रही.

‘‘कैसी हो? अंदर आने को नहीं कहोगी?’’ मैं ने ढिठाई से कहा.

‘‘ठीक है, आ जाओ. लेकिन मुझे जरूरी काम से कहीं जाना है, इसलिए जो कुछ भी कहना है, जरा जल्दी कहो.’’ उस ने चाय का पानी इंडक्शन चूल्हे पर चढ़ाते हुए कहा.

मैं ने कमरे में इधरउधर नजर डाली. खूंटी पर 3-4 मर्दाना कपड़े टंगे थे, जहां कभी मेरे टंगे होते थे. मेज पर सुनहरे फ्रेम में जड़ी एक नवयुवक की तस्वीर रखी थी.

‘‘तुम्हारे सिविल सर्विस के रिजल्ट का क्या हुआ?’’ मैं ने उत्सुकतावश पूछा.

‘‘होना क्या था, नहीं हुआ.’’ शीशे की तिपाई पर चाय रखते हुए बिना किसी लागलपेट के उस ने कहा.

‘‘अब आगे क्या करोगी?’’

‘‘अभी कुछ सोचा नहीं. वर्षों की थकी हूं, कुछ दिन आराम करूंगी. उस के बाद डिसाइड करूंगी कि क्या करना है. और तुम?’’

‘‘अभी कहीं से काललेटर नहीं आया है. प्रतीक्षा कर रहा हूं. और अब यह नया शिकार कौन है?’’ मैं ने फोटो की ओर इशारा कर के पूछा.

‘‘यह मेरा दूर का रिश्तेदार है. अब हम ‘लिवइन रिलेशन’ में हैं और जल्दी ही शादी करने वाले हैं. एमएनसी में सौफ्टवेयर इंजीनियर है, 7 लाख का पैकेज है. यह तुम्हारे मोबाइल का ही कमाल है, उसी ने हमें मिलाया है, तुम्हें कैसा लगा?

‘‘देखने में तो ठीकठाक है, बिस्तर पर कैसा व्यवहार करता है, यह तो तुम जानो.’’ मैं ने इर्ष्यावश उसे चिढ़ाने की नीयत से कहा.

अंतिम कोशिश का विकल्प समाप्त हो चुका था. अब वहां एक पल के लिए भी रुकना मुश्किल हो रहा था. चाय के लिए थैंक्स बोल कर मैं सीढि़यां उतरने लगा. मैं ने अपने पीछे खटाक से दरवाजा बंद होने की कर्कश आवाज सुनी. वह गुस्से में थी. मैं तेजतेज कदमों से 3-4 पतली गलियों को पार कर के सड़क पर आ गया. कनेर की छांव में पल भर रुक कर गहरीगहरी सांसें लीं, सिर उठा कर ढलते सूरज को देखा और उस के अस्त होने की दिशा में चल पड़ा.

वक्त रुका नहीं था. रूस ने अंतरिक्ष में 5 सितारा होटल बना लिया, पश्चिमी वैज्ञानिकों ने कमजोर दिल को मजबूत करने वाली कोशिकाएं विकसित कर लीं. उधर अमेरिका ने अपने हथियारों के जखीरे में चंद महाघातक हथियार और शामिल कर लिए. भारत में कुछ करोड़ और बच्चे पैदा हो गए. यही नहीं भारत ने मंगल की ओर कदम बढ़ा दिए. समाज में मल्टीपल लिवइनरिलेशन का आगाज हो चुका था.

मैं एक मौकापरस्त युवती की चालाकी से आहत अपनी बेवकूफी पर लज्जित था. अपने मिथ्या प्रेम की अप्रत्याशित परिणति पर उतना ही हैरान भी. स्कूल में होली की लंबी छुट्टियां चल रही थीं. लगभग साल भर के अंतराल के बाद एक शाम मैं ने अपने गांव जाने वाली ट्रेन पकड़ ली. घर पर किसी ने उत्साह से मेरा स्वागत नहीं किया. मां के चेहरे पर मेरे लिए अतिरिक्त सहानुभूति थी और पिता 2 दिनों बाद पहला वाक्य बोले, ‘‘कब लौटना है?’’

दिल्ली के मेरे कृत्यों की जानकारी सब को हो चुकी थी. होली के 3 दिनों बाद निर्लज्जता की सफेद खाल ओढ़ कर मैं ने एक बार मंगेतर के गांव जाने का निश्चय ही नहीं किया बल्कि अगले दिन 3 घंटे की बस यात्रा कर के वहां पहुंच भी गया. मुझे अपने दरवाजे पर देख कर मेरी भावी सास रोनेपीटने लगी. मैं समझ रहा था कि शायद मिताली को कुछ हो गया है, सो मेरी सूरत रोनी हो गई.

‘‘युद्ध के खत्म होते ही वह लौट आई थी, पर अब वह पहले वाली मिताली नहीं रही. तुम चाहो तो एक बार मिल सकते हो, लेकिन मुझे लगता है कि कोई फायदा नहीं होने वाला. वह तुम्हारे बारे में सब कुछ जान चुकी है.’’ सिगरेट की खाली डिबिया पर भद्दे अक्षरों में लिखा पता थमाते हुए मिताली के बूढ़े पिता बोले और लाठी उठा कर खेतों की ओर चले गए. 2-4 कदम जा कर वह पलट कर बोले, ‘‘और हां, अब तुम्हें मेरे यहां आने की जरूरत नहीं है. समाज में मेरी भी कुछ मानमर्यादा है.’’

दरवाजे के पीछे से मिताली की छोटी बहन रुआंसा चेहरा लिए सब देखसुन रही थी. मैं तकरीबन 20 मिनट से खड़ा था, पर किसी ने बैठने तक को नहीं कहा. अपनी निरर्थक उपस्थिति को समेट कर मैं ने एक नजर उस छोटी लड़की पर डाली और चुपचाप स्टेशन जाने वाली राह पर चल पड़ा. दिल्ली पहुंचने के तीसरे दिन डाकिया 2 नियुक्ति पत्र दे गया. एक जेएनयू से था और दूसरा पटना स्थित एक बी ग्रेड कालेज का. मुझे थोड़ी खुशी हुई, पर जल्दी ही इन में से एक का चुनाव करना था. मेरे पास 2 ही सप्ताह का समय था. मैं ने जेएनयू का औफर स्वीकार कर लिया. देखतेदेखते लंबा समय गुजर गया.

साल भर बाद अप्रैल की पहली तारीख को मैं ने स्कूल के प्रिंसिपल को अपना इस्तीफा सौंप दिया और अपना हिसाबकिताब कर के दिल्ली से सदा के लिए विदा लेने का फैसला कर लिया. लेकिन जाने से पहले भीषण मानसिक कशमकश और ऊहापोह की स्थित में मैं ने एक बार अपनी मंगेतर से मिलने का फैसला किया. उस का पता मेरे पास था ही. गरमी तेज हो चुकी थी, इसलिए सुबह जल्दी ही उस के फ्लैट पर पहुंच गया और घंटी बजा कर दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करने लगा. दरवाजा खुला तो मैं ने कहा, ‘‘कैसी हो, अंदर आने को नहीं कहोगी?’’

‘‘मैं तुम्हें अंदर आने को क्यों कहूं? कोई वजह बची है क्या?’’ नाराज हो कर उस ने कहा.

‘‘क्यों, हमारी मंगनी हो चुकी है. यह वजह कम है क्या?’’ मैं ने अपने होंठों पर मुसकान लाने की कोशिश करते हुए बेशरमी से कहा.

‘‘अरे वाह, निर्लज्जता की किस मिट्टी के बने हो तुम? अगर तुम मेरे मंगेतर हो तो मंगेतर का मोबाइल तो दिखाओ.’’ हाथ कंगन को आरसी क्या वाली कहावत के अंदाज में उस ने हाथ नचाते हुए कहा.

‘‘वह दूसरी कहानी है, वही तो बताने आया हूं.’’

‘‘अच्छा. आओ अंदर आ जाओ. मैं भी तो सुनूं तुम्हारी वह दर्द भरी कहानी. लेकिन मुझ से किसी स्वागतसत्कार की आशा मत करना. और अगर यहां कुछ लेने आए हो तो निराश ही होना पड़ेगा. समझ गए न? मैं पहले ही काफी बेवकूफी कर चुकी हूं. अब कोई बेवकूफी नहीं करूंगी.’’

‘‘मैं समझता हूं कि जो कुछ कहनेसुनने आया था, वह सब तुम्हें पहले से ही पता है. अब कुछ भी कहना बेकार है. मुझे अफसोस है कि मैं तुम्हारे विश्वास पर खरा नहीं उतर सका. इस के लिए पूरी तरह से मैं ही जिम्मेदार हूं.

‘‘तुम्हारा वह बेशकीमती मोबाइल फोन तुम तक पहुंच गया है. तुम ने उस के अंदर स्वर्णाक्षरों में अपना नामपता लिखवा रखा था, यह सब सूर्यबाला ने मुझे बता दिया था. मैं उस के बारे में कुछ भी कहने की बेशर्मी नहीं कर सकता. मुझे खेद है कि मैं तुम्हारे विश्वास का कत्ल कर के तुम्हारे खूनपसीने की कमाई एक धूर्त और मक्कार लड़की पर लुटाता रहा, उसे बदचलन नहीं कहूंगा. हां, इतना जरूर कहूंगा कि मंगनी के बाद डेढ़ साल की प्रतीक्षा किसी लड़के के लिए बेसब्र कर देने वाली होती है. इसे मेरा इजहार मत समझना.’’

हम टेबल के आरपार बैठे थे और हमारे बीच लंबी असहजता पसरी थी. सड़क किनारे नंगे शीशम पर एक अबाबील चिडि़या बैठी अपने पर खुजला रही थी. हम एकदूसरे के दिल में अभी भी जिंदा थे. मैं ने कहा, ‘‘मंगनी के बाद तुम ने अपने दिल के दरवाजे बंद कर लिए, पर मैं वैसा नहीं कर सका. खैर, अब वक्त काफी पीछे रह गया है. मेरी वजह से तुम्हें जो पीड़ा पहुंची है, उस के लिए माफी ही मांग सकता हूं. अब इस के सिवा मैं और कुछ कर भी तो नहीं सकता.’’

वह उठ कर अंदर चली गई. किचन से बर्तन के खनकने की उदास आवाज आती रही. कुछ मिनट बाद वह एक प्याली चाय बना लाई और चुपचाप मेरे सामने रख दी. निश्चित रूप से वह एक दयालु युवती थी. वह कुछ देर पहले कही अपनी ही कठोर बातों पर अडिग नहीं रह सकी. उस के चेहरे से अब तक मेरे प्रति उपजी घृणा तिरोहित हो चुकी थी और उस की जगह गंभीर औपचारिकता और शांति ने ले ली थी.

‘‘इराक युद्ध में तबाही के सिवा उस देश को कुछ भी हासिल नहीं हुआ, लेकिन उस की बड़ी कीमत मुझे चुकानी पड़ी.’’ उस की आवाज लगभग फुसफुसाहट जैसी थी.

मैं चाय की चुस्की के लिए प्याले को होंठों से कुछ दूरी पर थामे रहा. रोकने की लाख कोशिश के बावजूद मेरी आंखों से दो बूंद आंसू प्याले में टपक पड़े. मैं ने प्याला टेबल पर वहीं रख दिया, जहां से उठाया था और नि:शब्द बैठा रहा. मेरे होंठ कांप रहे थे. मिताली निहायत उदासी में डूबी मुझे पढ़ने की कोशिश में लगी थी. मैं ने उठते हुए कहा, ‘‘चाय के लिए धन्यवाद, पर मुझे अफसोस है कि अपनी ही वजहों से मैं तुम्हारे अनुपम और अंतिम उपहार को भी संभाल न सका. अच्छा, अब मैं चलूं प्रिय, धूप तेज हो रही है?’’

‘‘क्या कहा… प्रिय?’’ वह जरा तल्खी से बोली.

‘‘हां, और शायद अंतिम बार. मुझे जेएनयू और पटना के कालेज में प्रवक्ता की नौकरी का औफर मिला है. न मालूम क्यों, मैं दिल्ली छोड़ रहा हूं. पटना का औफर स्वीकार कर लिया है. मेरे मातापिता बूढ़े हो चले हैं. मैं उन के पास रहना चाहता हूं. कुछ सामान पैक करना है, भारीभरकम वस्तुएं बेच दूंगा. और ये रुपए रख लो. तुम ने बड़े कठिन समय में मेरी सहायता की थी, 75 हजार हैं. मंगनी की अंगूठी और बाकी रुपए बाद में भेज दूंगा.’’

रुपयों से भरा लिफाफा मेज पर रख कर मैं ने अलविदा के लिए हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘हो सके तो मेरी नादानियों को माफ कर देना.’’

मिताली बिना कुछ बोले आंचल में मुंह दबा कर तेजी से बेडरूम की ओर भागी, जहां से उस के सुबकने की आवाज आ रही थी. मैं आहिस्ता से फ्लैट से बाहर आया, दरवाजा भेड़ा और मुख्य सड़क पर निकल आ गया. मैं ने एक बार पलट कर उस तिमंजिले भवन की ओर देखा, बालकनी में मिताली खड़ी थी. क्रोटन की सुनहरी पत्तियों और बेला के सफेद फूलों के बीच से उस का उदास चेहरा अंतिम बार देख रहा था.

औटो पर सवार हो कर मैं ने ड्राइवर से कहा, ‘‘आनंद विहार.’’ Love Story

 

Love Crime Story: मन को भा गई जब दोस्त की प्रेमिका

Love Crime Story: अजय ने अरविंद के साथ दोस्ती का ही फर्ज नहीं निभाया, बल्कि हर तरह से सहारा भी दिया. इतने घनिष्ठ संबंध होने के बावजूद ऐसा क्या हुआ कि दोस्त ही दुश्मन बन गया…

सुबहसुबह गांव अहिलापुर के ग्रामप्रधान सियाराम को गांव वालों ने बताया कि बाईपास के पास गन्ने के खेत में किसी युवक की लाश पड़ी है तो सियाराम कुछ लोगों के साथ खेत के अंदर जा पहुंचे. वहां सचमुच खून से लथपथ एक युवक की लाश पड़ी थी. उन्होंने फौरन इस बात की जानकारी बरेली के थाना इज्जतनगर पुलिस को दी. कत्ल की सूचना मिलते ही थाना इज्जतनगर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम सहयोगियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

बाईपास पर पहुंच कर थानाप्रभारी ने देखा कि गन्ने के खेत में एक युवक की लाश पड़ी थी. लाश देख कर ही लग रहा था कि उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार कर के उस की हत्या की गई थी. तलाशी में मृतक युवक के पास से ऐसा कुछ नहीं मिला, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती. उस के एक हाथ पर एकेवाईयूएमके जरूर गुदा था. इस से पुलिस कुछ अंदाजा नहीं लगा सकी. आसपड़ोस के लोगों को घटनास्थल पर बुला कर शिनाख्त कराने की कोशिश की गई, लेकिन कोई भी उस के बारे में कुछ नहीं बता सका. इस के बाद थानाप्रभारी ने लाश की फोटो करा कर घटनास्थल की अन्य काररवाई निपटाई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

अगले दिन के अखबार में लाश की फोटो छपवाई गई तो उसे देख कर मुरादाबाद के पिपली ठाकुरद्वारा गांव का रहने वाला सुधीर थाना इज्जतनगर पहुंचा. अखबार में छपी फोटो इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम के सामने रख कर उस ने कहा, ‘‘साहब, इस आदमी की शक्ल मेरे छोटे भाई अरविंद से मिलती है. मैं उस लाश को देखना चाहता हूं, जिस की यह फोटो है.’’

इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम ने एक सिपाही के साथ उस लड़के को बरेली स्थित पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया. सुधीर ने लाश देख कर उस की शिनाख्त अपने छोटे भाई अरविंद की लाश के रूप में कर दिया. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम ने थाना इज्जतनगर में अपराध संख्या 610/14 पर अरविंद की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज करा कर जांच शुरू कर दी. पूछताछ में मृतक अरविंद के बड़े भाई सुधीर ने बताया था कि अरविंद बरेली के सुभाषनगर में संगीता के यहां किराए पर रहता था. वहां वह अकेला ही रहता था और औटो चलाता था.

दूसरी ओर अरविंद की हत्या की जानकारी उस के जानने वालों को हुई तो वे पोस्टमार्टम हाऊस के बाहर इकट्ठा होने लगे. अरविंद जिस संगीता के मकान में रहता था, वह भी आ गई थी. अरविंद की परिचितों में एक औरत सरला भी थी. आते ही वह संगीता पर उस की हत्या का आरोप लगाने लगी तो संगीता ने सरला को अरविंद की हत्या का जिम्मेदार ठहराया. उन की बातें सुन कर इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम को लगा कि अगर इन दोनों महिलाओं से अरविंद के बारे में पूछताछ की जाए तो शायद हत्यारों तक पहुंचना आसान हो जाएगा. इसलिए उन्होंने संगीता और सरला को पूछताछ के लिए थाना इज्जतनगर आने को कहा.

थाने में की गई पूछताछ में सरला ने बताया कि वह अपने परिवार के साथ बिहारीपुर में किराए के मकान में रहती थी. संगीता के यहां जाने से पहले अरविंद उसी के साथ उस के मकान में रहता था. लेकिन इधर कुछ महीनों से वह सुभाषनगर की तिलक कालोनी में रहने वाली संगीता के घर रहने चला गया था. संगीता ठीक औरत नहीं थी. 2 दिन पहले अरविंद उस से मिलने उस के घर आया था. तब उस ने मुरादाबाद जाने की बात कही थी. थोड़ी देर रुक कर वह चला गया था. बाद में जब उस ने अरविंद को फोन कर के मुरादाबाद जाने के बारे में पूछा तो उस ने फोन काट दिया था. इस से वह समझ गई कि अरविंद मुरादाबाद नहीं गया था.

सरला से पुलिस को मृतक अरविंद का मोबाइल नंबर मिल गया था. संगीता ने पूछताछ में बताया था कि इन दिनों अरविंद उसी के घर किराए पर रह रहा था, इसलिए सरला उस से जलती थी. इसी वजह से उस ने अरविंद की हत्या करा दी थी. दोनों महिलाओं से पूछताछ के दौरान इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम ने उन के घर के सभी लोगों के मोबाइल नंबर ले लिए और उन की काल डिटेल्स निकलवाई. मृतक अरविंद के फोन नंबर की काल डिटेल्स से उस के कुछ दोस्तों के भी नंबर मिल गए थे. पुलिस ने उस के सभी दोस्तों को भी बुला कर पूछताछ की.

अरविंद के दोस्तों से पता चला कि उस की दोस्ती सरला के बेटे अजय से थी. इस के बाद अजय को भी थाने बुला कर पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पुलिस को अजय पर शक हुआ तो पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. काल डिटेल्स के अनुसार उस की घटना वाले दिन अरविंद से तो बात हुई  ही थी, एक अन्य मोबाइल नंबर पर भी 6 मिनट से ज्यादा बात हुई थी. अजय से उस नंबर के बारे में पूछा गया तो वह नंबर उस की प्रेमिका कामिनी का निकला.

कामिनी का भी संगीता के यहां आनाजाना था. अरविंद भी वहीं रहता था. काल डिटेल्स से पता चला था कि अजय की कामिनी से हर रोज लंबीलंबी बातें होती थीं. इस से इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम को लगा कि अरविंद की हत्या की वजह कहीं कामिनी तो नहीं. अगर कामिनी की वजह से हत्या हुई होगी तो यह हत्या अजय ने की होगी. संदेह होने पर थानाप्रभारी ने अजय से पूछा कि घटना वाले दिन वह उस समय कहां था, जिस समय अरविंद की हत्या हुई थी. थानाप्रभारी के इसी सवाल में अजय फंस गया और उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने अपने 2 दोस्तों विमल और पालू के साथ मिल कर अरविंद की हत्या की थी. अजय ने पूछताछ में अरविंद की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह प्रेमिका के लिए की गई हत्या की कहानी थी.

एकेवाईयूएमके यानी अरविंद कुमार यादव उर्फ मुन्नू कुमार उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद के गांव पिपली ठाकुरद्वारा का रहने वाला था. उस के मातापिता गुजर चुके थे. एक बड़ा भाई था, जो गांव में ही रहता था. अरविंद की उम्र 28 साल थी. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. गांव में खेतीबाड़ी न होने की वजह से उस ने गाड़ी चलाना सीखा और बरेली में औटो चला कर गुजरबसर करने लगा. गांव से बरेली आनेजाने में उसे परेशानी होती थी. उस ने अपनी यह परेशानी बरेली के कुछ दोस्तों को बताई तो उस के एक दोस्त अजय ने इसे गंभीरता से लिया. 19 वर्षीय अजय मां और 3 बहनों के साथ बरेली के बिहारीपुर में किराए पर रहता था. उस की बहनों में मधु उस से बड़ी थी, जबकि बाकी की 2 बहनें छोटी थीं. अजय के पिता नेत्रपाल की कुछ साल पहले बीमारी से मौत हो चुकी थी. पिता की मौत के बाद बारादरी की एक फर्नीचर की दुकान पर नौकरी कर के वही पूरे परिवार को पाल रहा था.

अरविंद ने जब अजय से अपनी परेशानी बताई तो उसे उस पर तरस आ गया था. उस ने अरविंद के सामने अपने साथ रहने का प्रस्ताव रखा. हालांकि अजय उम्र में अरविंद से काफी छोटा था, लेकिन वह उसे पक्का दोस्त समझता था. दोस्त के इस प्रस्ताव पर उस की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए. उसे अजय की दोस्ती पर गर्व महसूस हुआ. जिस हौसले से उस ने अरविंद को अपने घर में रहने को कहा था, अरविंद की नजरों में उस का कद काफी बढ़ गया था. अरविंद अजय के घर रहने लगा. कुछ ही दिनों में अरविंद अजय की मां एवं बहनों से इस तरह घुलमिल गया, जैसे वे सब उस की अपनी हों. अजय की बहनें भी उसे सगे भाई की तरह मानती थीं. अरविंद अजय के घर रहनेखाने के रूप में एक तय रकम देता था. अजय के घर रहने से अरविंद को अपने काम पर जाने में काफी आसानी हो गई थी.

उस का काम ऐसा था कि हर रोज नएनए लोगों से मुलाकात होती थी. इन में अच्छे लोग भी होते थे और बुरे लोग भी. एक दिन अरविंद के औटो में एक महिला सवार हुई. बातचीत में उस ने अरविंद से उस के बारे में पूरी जानकारी ले ली. अरविंद ने उसे उस के घर छोड़ा और अपना किराया ले कर चला गया. लेकिन उस दिन के बाद उस महिला को जब भी कहीं आनाजाना होता, वह अरविंद के ही औटो से आतीजाती. लगातार मिलते रहने की वजह से अरविंद उस महिला से काफी घुलमिल गया.

अरविंद के पूछने पर उस हंसमुख स्वभाव की महिला ने अपना नाम संगीता बताया. संगीता का पति मोहरपाल भी औटो चलाता था. उस के 3 बच्चों में 2 बेटे आकाश उर्फ बबलू, विशाल और एक बेटी पूजा थी. अरविंद अविवाहित था, इसलिए हंसमुख स्वभाव की संगीता उसे काफी अच्छी लगी. बातचीत और हावभाव से उसे लगा कि अगर वह संगीता के ऊपर थोड़ा खर्च करता है तो संगीता जल्दी ही उस के काबू में आ सकती है. दूसरी ओर खुले विचारों वाली संगीता के दिल में भी अरविंद के प्रति कुछ ऐसी ही सोच थी. अरविंद ने संगीता से नजदीकियां बढ़ाने के लिए कोशिशें तेज कर दीं. वह संगीता को मुफ्त में सैरसपाटा कराने के साथसाथ उस पर पैसे भी खर्च करने लगा.

संगीता ने अरविंद का झुकाव अपनी ओर देखा तो उस ने उसे खुली छूट दे दी. इस का नतीजा यह निकला कि उन दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. इस के बाद संगीता के करीब आने के लिए अरविंद बेचैन रहता था. संगीता को भी अरविंद से जो सुख मिलता था, उस के लिए वह भी परेशान रहने लगी थी. इस दिक्कत को दूर करने के लिए अरविंद अजय का घर छोड़ कर संगीता के यहां रहने आ गया. सरला की समझ में यह नहीं आया कि इतना प्यार मिलने के बावजूद अरविंद अचानक उस का घर छोड़ कर क्यों चला गया? लेकिन अजय अरविंद का दोस्त था, इसलिए उसे अरविंद के जाने की वजह पता थी. लेकिन यह बात वह मां को बता नहीं सकता था.

इधर कुछ दिनों से संगीता के घर एक खूबसूरत लड़की कामिनी आनेजाने लगी थी. अरविंद ने उस के बारे में पूछा तो संगीता ने बताया कि उसे काम की तलाश है. दरअसल संगीता चालू किस्म की औरत थी. वह भोलीभाली और गरीब लड़कियों को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर अपने परिचित ग्राहकों के आगे परोसती थी. कामिनी संगीता की इस वास्तविकता को नहीं जानती थी. वह जब भी संगीता से मिलने आती, संगीता उसे अपने पास बिठा कर सुनहरे ख्वाब दिखाती. इस बीच अगर वहां अरविंद होता तो वह कामिनी से हंसीमजाक कर के उस के करीब आने की कोशिश करता. जबकि कामिनी उसे जरा भी तवज्जो नहीं देती थी.

अरविंद भले ही अजय का घर छोड़ कर चला आया था, लेकिन उन की दोस्ती अभी भी पहले जैसी ही थी. इसलिए अजय अकसर उस से मिलने संगीता के घर आता रहता था. इसी आनेजाने में किसी दिन अरविंद ने अजय का परिचय कामिनी से करा दिया. अजय और कामिनी हमउम्र थे, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई, जो जल्दी ही प्यार में बदल गई. अजय और कामिनी में निकटता बढ़ी तो एक दिन कामिनी ने अजय से अरविंद की शिकायत करते हुए कहा कि अरविंद की नीयत उस के प्रति ठीक नहीं है. जब देखो, तब वह उस से छेड़छाड़ करता रहता है.

कामिनी की इस शिकायत पर अजय ने अरविंद से कहा कि वह कामिनी से प्यार करता है, इसलिए वह उसे परेशान न करे. इस के बाद अरविंद कामिनी को और परेशान करने लगा. तब अजय ने उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे डाली. अरविंद ने उस की धमकी एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी. जब भी उस की मौजूदगी में कामिनी संगीता से मिलने आती, वह उसे पटाने की कोशिश में लग जाता. अरविंद की इन ओछी हरकतों का कामिनी ने विरोध भी किया, लेकिन संगीता की ओर से खुली छूट मिली होने की वजह से अरविंद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. कामिनी के खूबसूरत जिस्म को पाने के लिए उस का मन मचल रहा था. वह जब भी कामिनी को छेड़ता, कामिनी उस की शिकायत अपने प्रेमी अजय से करती. इस के बाद अजय गुस्से में अरविंद के पास पहुंच जाता और उस से लड़ाईझगड़ा करता.

इस तरह कामिनी को ले कर दोनों के बीच आए दिन लड़ाईझगड़ा होने लगा. जब अजय ने देखा कि अरविंद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है तो उस ने अपने दोस्तों, विमल पुत्र रामशरण निवासी कोधल, थाना सिकंदरा, आगरा और पालू पुत्र सूरजपाल निवासी नौरंगपुर, थाना ममौरा, बरेली के साथ मिल कर अरविंद की हत्या की योजना बना डाली.  विमल पहले आगरा में रहता था. वह फेसबुक के जरिए अजय की बड़ी बहन मधु के संपर्क में आया था. दोनों में घनिष्ठता बढ़ी तो वह मधु से मिलने बारबार बरेली आने लगा. मधु से मिलनेजुलने में परेशानी न हो, इस के लिए उस ने उस के भाई अजय से दोस्ती गांठ ली थी. अजय से दोस्ती के बाद विमल उस के घर बेरोकटोक आनेजाने लगा था. मधु के ही लिए विमल अरविंद की हत्या की योजना में अजय का साथ देने को तैयार हुआ था.

27 नवंबर को अजय ने कामिनी को फोन किया तो उस ने एक बार फिर अरविंद की शिकायत की. तब अजय ने कहा, ‘‘आज के बाद अरविंद तुम्हें फिर कभी परेशान नहीं करेगा.’’

यह सुन कर कामिनी खुश हो गई. उसी रात अजय लोहे की रौड ले कर अरविंद को सबक सिखाने के लिए बाईपास के सुनसान रास्ते पर पहुंच गया. विमल और पालू भी उस के साथ थे. कुछ देर इंतजार करने के बाद जब अरविंद आया तो तीनों ने उसे घेर लिया. अरविंद कुछ समझ पाता, अजय ने लोहे की रौड से पीटपीट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. अरविंद की हत्या करने के बाद लाश को घसीट कर उन्होंने सड़क के किनारे के एक गन्ने के खेत में फेंक दिया और खून से सनी वह रौड भी उन्होंने वहीं फेंक दी थी.

पुलिस ने अजय की निशानदेही पर लोहे की वह रौड भी बरामद कर ली थी, जिस से उस ने अरविंद की हत्या की थी. दोनो अन्य अभियुक्तों, विमल और पालू में से पुलिस ने विमल को तो अजय के घर से गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन पालू पकड़ में नहीं आया. पूछताछ के बाद अजय और विमल को पुलिस ने अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. पालू की तलाश की जा रही है. Love Crime Story

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. संगीता और कामिनी प

Delhi News : भोली सूरत वाली कातिल प्रेमिका

Delhi News : उत्तरी दिल्ली से एक ऐसी हैरान कर देने वाली वारदात सामने आई है, जिसे सुनकर लोग सन्न रह गए. यहां एक युवती ने अपने पूर्व प्रेमी के साथ मिलकर अपने लिवइन पार्टनर की बेरहमी से न सिर्फ हत्या कर दी, उसे आग के हवाले कर दिया. सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह थी, जिस ने एक प्रेमिका को इतना क्रूर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया? चलिए जानते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से

यह दर्दनाक घटना 5-6 अक्टूबर, 2025 की रात उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर थाना क्षेत्र के गांधी विहार इलाके की है. पुलिस के अनुसार, 21 वर्षीय अमृता चौहान नाम की युवती ने अपने पूर्व बौयफ़्रेंड सुमित कश्यप (27 वर्ष) के साथ मिलकर लिवइन पार्टनर रामकेश मीणा (32 वर्ष) की हत्या की और फिर उसे आग की घटना जैसा दिखाने की कोशिश की.

मृतक रामकेश मीणा उत्तरी दिल्ली के गांधी विहार में रह कर यूपीएससी परिक्षा की तैयारी कर रहा था. वह अपनी गर्ल फ्रेंड अमृता चौहान के साथ मई 2025 से लिवइन रिलेशन में रह रहा था. इसी दौरान रामकेश ने प्रेमिका के कुछ आपत्तिजनक वीडियो बनाए और उन्हें एक हार्ड डिस्क में सेव कर लिया.
जब अमृता को इस बात का पता चला तो उस ने रामकेश से वीडियो डिलीट करने की मांग की, लेकिन वह ऐसा करने से इनकार कर रहा था. इतना ही नहीं, उस ने प्रेमिका की बदनामी के लिए झूठी कहानियां भी फैलानी शुरू कर दीं.

डीसीपी राजा बांठिया के मुताबिक, बदनामी और ब्लैकमेलिंग से परेशान हो कर अमृता चौहान ने अपने पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप (27 वर्ष) से संपर्क किया और दोनों ने बदला लेने की योजना बनाई. जांच में खुलासा हुआ कि युवती, उस का पूर्व बौयफ्रेंड और उस का एक दोस्त संदीप कुमार (29 वर्ष) ने मिलकर रामकेश की हत्या की साजिश रची.
अमृता को क्राइम शो देखने का बेहद शौक था और उस ने उन शोज़ से मिले फोरैंसिक नालेज का इस्तेमाल रामकेश मीणा के प्रदर की परफेक्ट प्लानिंग की.

5-6 अक्टूबर, 2025 की रात तीनों रामकेश के फ्लैट पर पहुंचे. वहां पहले उन्होंने रामकेश के साथ झगड़ा किया फिर उसी दौरान गला घोंटकर और बेरहमी से पीटपीट कर उसे मार डाला.

हत्या के बाद शव को जलाने की साजिश रची गई ताकि यह घटना दुर्घटना लगे. अमृता के पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप, जो मुरादाबाद में एलपीजी गैस वितरक का काम करता था ने आग लगाने की पूरी योजना बनाई. उस ने गैस सिलेंडर का रेगुलेटर खोल दिया, मृतक के शरीर पर तेल और शराब डालकर लाइटर से आग लगा दी और सिलेंडर को उस के सिर के पास रख दिया.

पुलिस के अनुसार, करीब एक घंटे बाद सिलेंडर में विस्फोट हुआ और शव पूरी तरह जल गया. शुरुआत में यह मामला हादसे का लगा, लेकिन जांच के दौरान पोस्टमार्टम रिपोर्ट और कौल डिटेल्स से सच्चाई सामने आ गई. पुलिस ने प्रेमिका अमृता चौहान, उस के पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप और तीसरे आरोपी संदीप कुमार को गिरफ्तार कर लिया है. Delhi News