Social Crime Story: सहेली ही निकली ब्लैकमेलर

Social Crime Story: मनजीत कौर ने प्रवीण कुमारी को सहेली समझ कर उस के कहने पर अपनी वीडियो क्लिप बनवा ली थी, तब उसे क्या पता था कि यही वीडियो क्लिप उस की जान का जंजाल बन जाएगी.

तनवीर सिंह ने अपनी बहन मनजीत कौर को एटीएम कार्ड देते हुए कहा, ‘‘पापा ने मुझे पैसे निकालने के लिए दिया था, लेकिन मेरा कालेज जाना जरूरी है. इसलिए तुम ऐसा करना कि थोड़ी देर में जा कर पहले एटीएम से रुपए निकाल लेना, उस के बाद बाजार जा कर दरजी से अपने कपड़े ले लेना और लौटते हुए दहीहांडी रेस्टोरेंट वाले शमीजी को 20 हजार रुपए दे देना.’’

‘‘ठीक है, तुम्हारा कालेज जाना जरूरी है तो तुम जाओ. मैं घर के काम करा कर चली जाऊंगी.’’ मनजीत ने कहा.

‘‘और हां, प्रेस वाले से भी पूछ लेना कि उस ने कार्ड छाप दिए या नहीं? अगर नहीं छापे हों तो उन से कह देना कार्ड जल्दी छाप दें. शादी में कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं, कार्ड बांटने में भी बड़ा समय लगता है. यह काम जितनी जल्दी निपट जाए, उतना ठीक रहेगा.’’ तनवीर ने कपड़े पहनते हुए कहा.

मनजीत कौर ने भाई से एटीएम कार्ड ले कर अपने पर्स में रख लिया. इस के बाद वह मां के साथ घर के कामों में लग गई. घर के काम कराने के बाद खाना वगैरह खा कर मनजीत दोपहर को बाजार के लिए निकली. पहले उस ने एटीएम से रुपए निकाले.

उस के बाद औटो से गुमार मंडी बाजार गई, जहां दरजी के यहां से उस ने अपने कपड़े लिए. वहां से घंटाघर जा कर लहंगे वाले के यहां से होते हुए वह सिविल लाइन स्थित दहीहांडी रेस्टोरैंट पहुंची. रेस्टोरैंट के मालिक शमीजी को उस ने 20 हजार रुपए दिए, क्योंकि शादी में चायनाश्ते का इंतजाम शमीजी को ही करना था.

सारे काम निपटा कर मनजीत कौर औटो से घर पहुंची. औटो का किराया दे कर जैसे ही वह गेट में घुसी, उस के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से एक लड़की की आवाज आई. उस ने अपनी मोटी आवाज में लापरवाही से पूछा, ‘‘मनजीत बोल रही हैं?’’

‘‘जी हां, आप कौन?’’ मनजीत ने पूछा.

‘‘मनजीत है न तो ध्यान से सुन,’’ फोन करने वाली लड़की रौब से धमकी भरे लहजे में बोली. इस के बाद उस ने मनजीत से जो कहा, उसे सुन कर उस का चेहरा सफेद पड़ गया. हाथपैर कांपने लगे. उसे लगा, जैसे फोन हाथ से छूट कर गिर जाएगा. फोन ही नहीं, वह खुद भी गिर जाएगी.

उस लड़की की बातों से मनजीत इतना घबरा गई कि उस से एक कदम भी नहीं चला गया. फोन कटने के तुरंत बाद मनजीत के फोन पर एक वीडियो का एमएमएस आ गया. कांपते हाथों से उस ने इनबौक्स खोल कर वीडियो देखी तो उस के होश उड़ गए. उस का दिलदिमाग और शरीर से नियंत्रण खो गया, जिस से वह चकरा कर गेट के पास ही गिर गई.

संयोग से उसी समय उधर से उस की पड़ोसन गुजर रही थी. उस ने मनजीत को गिरते देखा तो शोर मचाते हुए वह उस के पास पहुंच गई. घर वालों के बाहर आतेआते शोर सुन कर अन्य पड़ोसी भी आ गए थे. पड़ोसियों की मदद से मनजीत के पिता जरनैल सिंह उसे उठा कर अंदर ले गए. डाक्टर को बुलाया गया. उस ने इंजैक्शन लगाया. पूछने पर बताया कि शायद इसे एकदम से किसी बात का गहरा सदमा लगा है.

कुछ दिनों बाद ही मनजीत की शादी होने वाली थी. ऐसे में इस तरह कुछ हो जाना चिंता की बात थी. घर वालों को कुछ पता नहीं था. मनजीत को जो सदमा लगा था, वह फोन पर बात होने और वीडियो देखने के बाद लगा था. आखिर किस ने उसे फोन किया था, फोन करने वाले ने ऐसा क्या कह दिया था और उस वीडियो में ऐसा क्या था, जिसे सुन कर उसे इस तरह का सदमा लगा कि वह बेहोश हो गई थी.

यह सब जानने से पहले आइए थोड़ा मनजीत और उस के घर वालों के बारे में जान लेते हैं. मनजीत के पिता सरदार जरनैल सिंह सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. रिटायर होने के बाद उन्होंने लुधियाना के जस्सियां रोड स्थित नवीननगर में शानदार कोठीनुमा मकान बनवाया था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा बेटा तनवीर सिंह और बेटी मनजीत कौर थी.

जरनैल सिंह का छोटा परिवार था. वह हर तरह से सुखी और संपन्न थे. दोनों बच्चों को उन्होंने अच्छी शिक्षा दिलाई थी. मनजीत कौर ने पटना साहिब हिमाचल से बीडीएस (दंत चिकित्सक) की पढ़ाई की थी, जबकि बेटा तनवीर सिंह लुधियाना के आर्य कालेज से बीबीए की पढ़ाई कर रहा था. मनजीत अभी और पढ़ना चाहती थी, लेकिन उस की उम्र शादी लायक हो गई थी, इसलिए मातापिता ने उस का विवाह करना उचित समझा. लड़का देख कर उन्होंने उस की शादी ही नहीं तय कर दी थी, बल्कि जल्दी ही उस की शादी होने वाली थी.

मनजीत सहित पूरा परिवार इस शादी से खुश था. घर में शादी की तैयारियां बड़े जोरोंशोरों से चल रही थीं. इसी बीच मनजीत कौर के साथ यह हादसा हो गया था. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक हंसतीखेलती मनजीत को यह क्या हो गया? मनजीत बिस्तर पर पड़ गई. उसे बिस्तर पर पड़े धीरेधीरे एक सप्ताह हो गया. वह न कुछ खातीपीती थी और न किसी से बात करती थी. अकेली पड़ीपड़ी आंसू बहाती रहती थी. कुछ पूछने पर ठीक से जवाब भी नहीं देती थी. हर समय खोईखोई सी रहती थी. घर का हंसीखुशी का माहौल एक अबूझ से सन्नाटे में तब्दील हो गया था.

शादी के दिन नजदीक आते जा रहे थे. कार्ड बांटे जा चुके थे, करीबी रिश्तेदार आने भी लगे थे. पहले की कुछ रस्में निभाई भी जाने लगी थीं, लेकिन उन रस्मों में भाग लेते समय मनजीत के चेहरे पर उदासी सी छाई रहती थी. पूरा परिवार परेशान था. सब लोग पूछपूछ कर थक गए थे, लेकिन मनजीत ने कुछ नहीं बताया. उस ने जैसे अपने होठों पर ताला जड़ लिया था. यही खामोशी उसे भीतरभीतर खाए जा रही थी.

आखिर इस तरह कब तक चलता. हर चीज का एक अंत होता है. एक दिन भाई तनवीर ने गुरुग्रंथ साहब के पावन स्वरूप श्री जपुजी साहब का गुटखा ले कर मनजीत के सिर पर रखते हुए कहा, ‘‘आप को गुरुग्रंथ साहबजी की कसम, सचसच बताओ क्या बात है, जो तुम अपनी यह हालत किए हो?’’

मनजीत काफी धार्मिक विचारों वाली थी. वह रोजाना सुबह ज्वालानगर स्थित गुरु निवारण साहब गुरुद्वारा जाती थी, शाम की अरदास में भी वह शामिल होती थी. इस के अलावा दिन में जब भी उसे समय मिलता था, वह नामसिमरन करती थी. लेकिन जब से उस की यह हालत हुई थी, उस ने गुरुद्वारा जाना बंद कर दिया था. उस दिन भाई तनवीर ने जब जपुजी साहब का गुटखा उस के सिर पर रखा तो गुटखा हाथ में ले कर वह जोरजोर से गुरु का नाम ले कर रोने लगी. तनवीर ने उसे चुप नहीं कराया. वह चुपचाप खड़ा उसे रोते देखता रहा. शायद वह चाहता था कि उस के मन में जो गुबार भरा है, वह निकाल दे, तभी ठीक रहेगा.

काफी देर तक रोने के बाद जब मनजीत का मन हलका हुआ तो उस ने तनवीर को जो बताया, उसे सुन कर तनवीर को भी चक्कर आने लगा. उस ने भाई को जो बताया था, वह कुछ इस तरह था. मनजीत रोजाना सुबह गुरुद्वारा साहब जाती थी. वहीं उस की मुलाकात प्रवीण कुमारी से हुई. वह भी लगभग रोज ही गुरुद्वारा आती थी. दोनों में परिचय हुआ तो बातचीत में उस ने खुद को मनजीत के सामने बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की बताया. इस की वजह यह थी कि मनजीत की गुरुघर में बड़ी श्रद्धा थी. इस तरह दोनों जल्दी ही गहरी दोस्त बन गईं. कुछ दिनों की मुलाकात में मनजीत उसे बहन मानने लगी थी.

गुरुद्वारा साहब में अरदास के बाद मनजीत प्रवीण कुमारी के साथ बैठ कर काफी देर तक बातें करती. इसी बातचीत में प्रवीण कुमारी ने मनजीत कौर के घरपरिवार, आर्थिक स्थिति और उस की शादी के बारे में जान लिया था. यही नहीं, उसे यह भी पता चल गया था कि उस के हाथों में काफी रुपए हैं.

इस के बाद एक दिन याद रखने के बहाने प्रवीण कुमारी ने गुरुद्वारा प्रांगण में मनजीत की एक छोटी सी वीडियो क्लिप बना ली. प्रवीण कुमारी यह वीडियो यादगार के लिए बना रही थी, इसलिए मनजीत कौर ने खुशीखुशी बनवा ली थी. तब उसे क्या पता था कि यही वीडियो उस की जान के लिए आफत बन जाएगी. उसे यह वीडियो बनवाने का पछतावा तो उस दिन हुआ, जिस दिन प्रवीण कुमारी ने उसे ब्लैकमेल करने के लिए फोन पर उस वीडियो  की क्लिप भेजी.

दरअसल, प्रवीण कुमारी ने उस समय तो यादगार के तौर पर मनजीत कौर की वह सीधीसादी वीडियो क्लिप बनाई थी, लेकिन बाद में उस ने उस वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर के उसे अश्लील बना दिया था. दरअसल, वह वीडियो मिक्सिंग की एक्सपर्ट थी. अपना यह ज्ञान अच्छे काम में लगाने के बजाय वह गलत काम में लगाने लगी, जो एक तरह से अपराध था. अश्लील वीडियो बना कर उस ने अपने मोबाइल फोन से वीडियो मनजीत कौर के मोबाइल पर भेज कर उस से ढाई लाख रुपए मांगे. इसी के साथ उसे धमकी भी दी कि अगर उस ने उसे रुपए नहीं दिए तो वह उस वीडियो को उस की ससुराल वालों के पास भेजने के साथसाथ इंटरनैट पर भी डाल देगी.

प्रवीण कुमारी की धमकी सुन कर और अपना वीडियो देख कर मनजीत कौर की हालत खराब हो गई थी. क्योंकि ढाई लाख रुपए देना उस के वश की बात नहीं थी. अगर वह वीडियो उस की ससुराल पहुंच जाती तो उस का रिश्ता तो टूटता ही, बदनामी ऊपर से होती. मांबाप की छोड़ो, वह किसी को भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहती. इसी बात को मन में लिए मनजीत कौर घुटघुट कर जी रही थी. कई बार तो उस के मन में आत्महत्या करने तक की बात आ चुकी थी.

प्रवीण कुमारी ने तो ढाई लाख रुपए की मांग करते हुए मनजीत कौर को धमकाया ही था, उस के 2 दिनों बाद किसी आदमी ने भी फोन कर के रुपए मांगे थे. उस ने भी रुपए न देने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी थी. इस के बाद तो लगातार उस के फोन आने लगे थे. वह उस से रुपए तो मांगता ही था, अश्लील बातें भी करता था, जिस से मनजीत और ज्यादा डर गई थी. मनजीत कौर की पूरी बात सुनने के बाद इस विषय पर तनवीर काफी देर तक सोचता रहा. मामला गंभीर ही नहीं, बहुत नाजुक भी था. छोटी सी गलती उस की बहन की जिंदगी तबाह कर सकती थी. आखिर काफी सोचविचार कर उस ने जो कदम उठाया, वह एकदम सही था.

तनवीर सिंह मनजीत को साथ ले कर जगतपुरी पुलिस चौकी पहुंचा और चौकीइंचार्ज एएसआई जगतार सिंह को पूरी बात बता दी. उस ने जगतार सिंह से इस मामले को गुपचुप तरीके से निपटा कर दोषियों को गिरफ्तार करने की प्रार्थना की. मामले की गंभीरता को देखते हुए जगतार सिंह ने तुरंत इस बात की जानकारी थानाप्रभारी अवतार सिंह को देने के साथ, तनवीर की शिकायत डीडी नंबर 24 पर दर्ज कर के तुरंत काररवाई शुरू कर दी.

थानाप्रभारी अवतार सिंह ने इस मामले को सुलझाने के लिए हैडकांस्टेबल हरविंदर सिंह, जसवीर सिंह और कांस्टेबल जतिंदर सिंह की एक टीम बनाई, जिसे उन्होंने ज्वालानगर स्थित दुख निवारण गुरुद्वारा के पास लगा दिया. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि प्रवीण कुमारी गुरुद्वारे जरूर आएगी, जहां से उसे पकड़ लिया जाएगा. लेकिन पुलिस की यह चाल बेकार गई, क्योंकि प्रवीण कुमार वहां आई ही नहीं. फिर भी वहां से यह जरूर पता चल गया कि वह अपने पति महेंद्र के साथ कहां रहती है.

इस का मतलब यह था कि मनजीत कौर को फोन पर प्रवीण के अलावा जिस आदमी ने धमकी दी थी, वह उस का पति महेंद्र रहा होगा. घर का पता मिलने के बाद चौकीइंचार्ज जगतार सिंह ने प्रवीण कुमारी के घर छापा मारा तो पतिपत्नी घर पर नहीं मिले. इस के बाद मुखबिरों को उन के पीछे लगा दिया गया, साथ ही उन के घर पर एक सिपाही भी तैनात कर दिया गया. सिपाही प्रवीण कुमारी के घर इस तरह नजर रख रहा था कि किसी को पता नहीं चल रहा था कि घर पर नजर रखी जा रही है.

30 दिसंबर को जगतार सिंह जैसे ही चौकी पर पहुंचे, मुखबिर ने उन्हें बताया कि प्रवीण कुमारी अपने पति महेंद्र के साथ बसअड्डे पर मौजूद है. उन्होंने देर करना उचित नहीं समझा और सहयोगियों को साथ ले कर तुरंत बसअड्डे पर पहुंच गए. लेकिन प्रवीण कुमारी उन्हें वहां नहीं मिली. तब वह जस्सिया रोड पर संगम पैलेस की ओर बढ़े. थोड़ी दूर जाने पर प्रवीण कुमारी उन्हें 2 लोगों के साथ जाते दिखाई दे गई. पुलिस ने उन्हें घेर कर पकड़ लिया. पूछने पर पता चला प्रवीण कुमारी के साथियों के नाम महेंद्र और सुखचरण थे. महेंद्र तो प्रवीण कुमारी का पति था, जबकि सुखचरण उन का साथी था. पुलिस तीनों को पकड़ कर जगतपुरी पुलिस चौकी ले आई.

चौकी में की गई पूछताछ में पता चला यह सारी योजना प्रवीण कुमारी और महेंद्र के साथ पकड़े गए सुखचरण सिंह ने बनाई थी. वह उसी गुरुद्वारे में ग्रंथी था, जहां मनजीत कौर रोज माथा टेकने आती थी. उसे मनजीत कौर के परिवार की आर्थिक स्थिति का पता था, इसलिए उस ने प्रवीण कुमारी और महेंद्र के साथ मिल कर उसे ब्लैकमेल करने की योजना बनाई थी.

गुंथी सुखचरण सिंह शादीशुदा था और काफी दिनों से उसी गुरुद्वारा में ग्रंथी था, जबकि महेंद्र उन दिनों बेकार था. महेंद्र का पहले अच्छाखासा काम चल रहा था. लेकिन वह और प्रवीण कुमारी अय्याश प्रवृति के थे, इसलिए अय्याशी के चक्कर में उन का कामधंधा बंद हो गया था. इस के बावजूद उन के शाही खर्चों में कोई कमी नहीं आई थी.

खर्चों की वजह से प्रवीण कुमारी और महेंद्र पर काफी कर्ज हो गया. कर्ज देने वाले परेशान करने लगे तो उन्होंने ग्रंथी सुखचरण सिंह के कहने पर मनजीत को ब्लैकमेल करने की योजना बना ली. सीधीसादी मनजीत उन के जाल में फंस भी गई. अच्छा तो यह हुआ कि उस का भाई समझदार था. वह पुलिस के पास चला गया, जिस से एक लड़की की जिंदगी बरबाद होने से बच गई. पूछताछ के बाद जगतार सिंह ने उसी दिन यानी 30 दिसंबर, 2015 को अपराध संख्या 221/15 पर भादंवि की धारा 389/120बी के तहत प्रवीण कुमारी, उस के पति महेंद्र और ग्रंथी सुखचरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर तीनों को सक्षम अदालत में पेश कर एक दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान जगतार सिंह ने तीनों अभियुक्तों के मोबाइल फोन कब्जे में ले कर उन्हें जांच के लिए भेज दिए. रिमांड अवधि समाप्त होने पर सभी को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Social Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, बदनामी की वजह से कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं)

Etah Crime Story: शक में उजाड़ा आशियाना

Etah Crime Story: सुखबीर के शक्की स्वभाव की वजह से पहली पत्नी छोड़ कर चली गई तो उस ने दूसरी शादी कर ली. लेकिन वह अपने स्वभाव को नहीं बदल सका. इस के बाद उस ने जो कुछ किया, उस की वजह से अब वह जेल में है.

उत्तर प्रदेश के जिला एटा के कस्बा भरथरा के रहने वाले गयाप्रसाद के परिवार में पत्नी के अलावा एक ही बेटा था सुखबीर. उस के पास खेती की ठीकठाक जमीन तो थी ही, कस्बे में बढि़या पक्का मकान भी था. छोटा परिवार था, इसलिए हर तरह से सुखी था. सुखबीर पढ़ाई के साथसाथ खेती के कामों में पिता का हाथ जरूर बंटाता था, लेकिन उस की सोच कुछ और ही थी. वह उस छोटे से कस्बे से निकल कर किसी बड़े शहर में रहना चाहता था.

सुखबीर का एक दोस्त राजपाल दिल्ली की एक गारमेंट बनाने वाली कंपनी में नौकरी करता था. वह जब भी घर आता, उसे देख कर सुखबीर को लगता था  कि वह उस से ज्यादा सुखी है. उसी की देखादेखी सुखबीर ने कस्बे के टेलर सुलतान की दुकान पर कपड़ों की सिलाई का काम सीखा और अच्छा कारीगर बनने के लिए घर में ही कपड़ों की सिलाई की दुकान खोल ली. सुखबीर शादी लायक हो गया था और कमाने भी लगा था. उस के लिए रिश्ते भी आने लगे थे. गयाप्रसाद ने एटा निवासी मोहर सिंह की बेटी महादेवी को पसंद कर के उस की शादी कर दी. इस बीच सुखबीर कस्बे वाली अपनी सिलाई की दुकान बंद कर के दिल्ली चला गया था. शादी के बाद वह महादेवी को भी दिल्ली ले आया. दिल्ली में वह नंदनगरी में किराए का कमरा ले कर रहता था.

महादेवी काफी खुशमिजाज और मिलनसार थी, इसलिए जल्दी ही आसपास रहने वाली औरतों से उस की दोस्ती हो गई. सुखबीर सुबह नौकरी पर जाता तो शाम को ही आता था. घर आ कर वह रोजाना महादेवी पूछता, ‘‘कोई आया तो नहीं था?’’

2-4 दिन तो महादेवी को उस का यह सवाल सामान्य लगा. लेकिन जब सुखबीर रोजाना और लगातार यही सवाल करने लगा तो उसे हैरानी हुई. आखिर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘अपने यहां कोई आने वाला है क्या, जो आप रोजाना एक ही बात पूछते हैं?’’

‘‘नहीं, मेरा मतलब पड़ोसियों से है.’’ सुखबीर ने कहा, ‘‘कोई पड़ोसी तो अपने यहां नहीं आया था?’’

‘‘पड़ोसियों को कोई काम पड़ेगा तो आएंगे ही. मुझे भी कोई काम पड़ता है तो मैं भी उन के यहां जाती हूं.’’ महादेवी ने सहजभाव से कहा.

महादेवी का इतना कहना था कि सुखबीर ने लपक कर उस के बाल पकड़ कर खींचते हुए कहा, ‘‘खबरदार, ऐसी भूल आगे से कतई मत करना. किसी भी पड़ोसी से कोई मतलब मत रखना. तुम्हें जिस भी चीज की जरूरत हो, मुझ से कहना.’’

पति का यह रूप देख कर महादेवी सन्न रह गई. उसे लगा कि उस का पति शक्की है. उस दिन के बाद महादेवी ने खुद को कमरे में कैद कर लिया. लेकिन अगलबगल रहने वालों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए मौका मिलने पर वे उस के पास आ कर बैठ जाते थे. महादेवी उन्हें मना भी नहीं कर सकती थी. उस दिन महादेवी को डांट कर शक्की स्वभाव के सुखबीर को लगा कि उस ने सब ठीक कर दिया है. महादेवी अब कमरे के बाहर कदम नहीं रखेगी. वह कमरे से बाहर ही नहीं निकलेगी तो उस की दोस्ती किसी से नहीं होगी.

दरअसल, सुखबीर को इस बात का डर था कि मिलनेजुलने से कहीं महादेवी की किसी लड़के से आंख न लड़ जाए. अगर आंख लड़ गई तो वह उसे छोड़ कर उस लड़के के साथ चली जाएगी. तब वह घर वालों और समाज को क्या जवाब देगा. सुखबीर महादेवी पर अंकुश लगा कर यही सोच रहा था कि अब उसे चिंता करने की जरूरत नहीं है. लेकिन जब एक दिन पड़ोसी बाल्टी ले कर पानी मांगने आ गया तो सुखबीर का खून खौल उठा. उस ने उसे धक्का देते हुए कहा, ‘‘हमारे घर नगरपालिका का नल लगा है क्या, जो पानी लेने चले आए. आज के बाद कभी इधर दिखाई दिए तो ठीक नहीं होगा.’’

महादेवी को यह बुरा तो बहुत लगा, लेकिन न वह कुछ कह सकती थी और न कुछ कर सकती थी. शक्की आदमी का क्या भरोसा, उसे ही कुछ कह दे. शक की वजह से उस ने उस की जिंदगी नरक कर दी है. उस के पास सिर्फ 2 ही काम थे, घर के काम करना और रात को पति को खुश करना. उस की अपनी न कोई इच्छा रह गई थी, न खुशी.

महादेवी ने फोन कर के पिता को सारी बातें बता दी थीं. मोहर सिंह ने आश्वासन दिया था कि वह जल्दी ही दिल्ली आ कर उसे लिवा लाएगा. लेकिन इसी बीच महादेवी की सास सुजाता बीमार पड़ी तो सुखबीर उसे मां की सेवा के लिए गांव छोड़ गया. महादेवी की सेवा से सुजाता जल्दी ही ठीक हो गई. बहू की सेवा से वह बहुत खुश थी. गयाप्रसाद भी बहू से खुश थे.

महादेवी के गांव जाने के बाद सुखबीर बेचैन रहने लगा था. उसे लगता था कि वह गांव के किसी लड़के से जरूर प्यार कर बैठेगी. अपने इसी शक की वजह से एक दिन वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. घर आ कर जब उसे पता चला कि महादेवी गर्भवती है, तब उसे लगा कि यह बच्चा उस का नहीं, किसी और का है. इतना ही नहीं, उस ने महादेवी से पूछ भी लिया, ‘‘महादेवी, तुम्हारे गर्भ में किस का पाप पल रहा है?’’

महादेवी ने उसे तो भलाबुरा कहा ही, यह भी तय कर लिया कि अब वह किसी भी कीमत पर उस शक्की आदमी के साथ नहीं रहेगी. उस ने पिता को फोन कर के सारी बात बता कर साथ ले चलने को कहा.

मोहर सिंह अगले ही दिन आ गए. उन्होंने जब गयाप्रसाद तथा सुजाता को पूरी बात बताई तो वे हैरान रह गए. क्योंकि उन्हें इस बारे में कुछ पता ही नहीं था. मोहर सिंह ने जब इस बारे में सुखबीर से बात की तो उस ने कहा, ‘‘महादेवी का चरित्र ठीक नहीं है. उस के गर्भ में पल रहा बच्चा मेरा नहीं है.’’

गयाप्रसाद ने उसे बहुत डांटाफटकारा. लेकिन महादेवी ने तो पहले ही तय कर लिया था कि अब उसे वहां नहीं रहना, इसलिए गयाप्रसाद और सुजाता के रोकने के बावजूद वह पिता के साथ चली गई.

समय पर उसे बेटा पैदा हुआ. मोहर सिंह ने इस बात की सूचना गयाप्रसाद को दे दी. गयाप्रसाद ने सुखबीर से बेटे और बहू को लाने के लिए कहा, पर उस ने मना कर दिया और दिल्ली चला गया. गयाप्रसाद और सुजाता अकेले पड़ गए थे. बेटे की हरकतों से वे बीमार रहने लगे और कुछ ही दिनों में दोनों की मौत हो गई. मांबाप की मौत के बाद सुखबीर को भी लगने लगा कि वह एकदम अकेला पड़ गया है, इसलिए उसे दूसरा विवाह कर लेना चाहिए.

सुखबीर दिल्ली में जहां रहता था, वहां से कुछ दूरी पर सरवरी बेगम रहती थी. उस के कई रिश्तेदार सीमापुरी और नंदनगरी में रहते थे. उस ने गांव के कई लड़कों की शादी कराई थी. उस की उन लोगों से जानपहचान थी, जो बंगाल, बिहार और उड़ीसा से लड़कियां लाते थे और जरूरतमंदों से पैसे ले कर उन की शादियां करवा देते थे.

सुखबीर ने सरवरी से कहा, ‘‘मौसी, तुम मेरी भी शादी करा दो, जो पैसे लगेंगे, मैं दे दूंगा.’’

सरवरी उस के शक्की स्वभाव को जानती थी, इसलिए उस ने मना कर दिया. लेकिन सुखबीर उस के पीछे पड़ गया. उस ने वादा किया कि अब वह पहले जैसा नहीं करेगा. इस के बाद सरवरी ने उस से पैसे तैयार रखने को कह दिया.

कुछ दिनों बाद सरवरी ने बिहार की काजल से उस की शादी करवा दी. सुखबीर ने काजल के लिए जो रकम खर्च की थी, उस के हिसाब से काजल बहुत अच्छी थी. इस तरह एक बार फिर सुखबीर की गृहस्थी बस गई. कमरे पर आते ही सुखबीर ने काजल से साफ कह दिया कि उसे अपना कमरा छोड़ कर न तो आसपड़ोस में किसी के यहां जाना है और न अपने कमरे में किसी को आने देना है. दरवाजा बंद कर के चुपचाप अपने कमरे में रहना है.

कुछ दिनों बाद सुखबीर ने वह कमरा छोड़ दिया. इस की वजह यह थी कि कहीं काजल को किसी से उस के शक्की स्वभाव के बारे में पता न चल जाए. नई जगह सुखबीर को बनाबनाया खाना भी मिलने लगा और देहसुख भी. काजल गरीब परिवार से आई थी, उसे कमाने वाला पति मिल गया था, इसलिए वह बहुत खुश थी, लेकिन उस की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. सुखबीर जब तक घर से बाहर रहता, यही सोचता रहता कि कहीं कोई काजल को बरगला कर उसे भगा न ले जाए. मोहल्ले के कई लड़के अभी कुंवारे थे.

घर आ कर सुखबीर काजल से रोजाना पूछता कि वह दिन भर क्या करती रही, कोई आया तो नहीं था, तुम किसी के यहां गई तो नहीं थी?’’

एक जैसे सवालों का रोजरोज जवाब देतेदेते एक दिन काजल को गुस्सा आ गया. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें क्या लगता है, मैं दिन भर कमरे के अंदर सोती रहूंगी, पड़ोस में किसी से बात नहीं करूंगी?’’

‘‘इस का मतलब मेरे जाने के बाद तुम आसपड़ोस में जा कर आवारागर्दी करती हो?’’ कह कर सुखबीर उस की पिटाई करने लगा.

काजल यह सोच कर परेशान थी कि उस ने ऐसा क्या कह दिया, जो सुखबीर उस की पिटाई करने लगा. जब वह थक गया तो उसे समझाने लगा, ‘‘तुम्हें पता नहीं, यहां आसपड़ोस में सब लफंगे रहते हैं, इन से मिलनाजुलना ठीक नहीं है. बिना मतलब की बदनामी होगी.’’

काजल ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन उसे पता था कि आसपड़ोस में कोई लुच्चालफंगा नहीं रहता. सभी एकदूसरे के सुखदुख में काम आने वाले हैं. उस का पति ही शक्की है.

एक दिन काजल ने सुखबीर को खाना देते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे गांव का कोई राजपाल आया था. वह तुम्हारे बारे में पूछ रहा था.’’

‘‘तुम ने उसे बैठाया नहीं?’’

‘‘मैं उसे क्यों बैठाऊंगी,’’ काजल ने कहा.

‘‘अच्छा किया, वह अच्छा आदमी नहीं है.’’

राजपाल का इस तरह कमरे पर आना सुखबीर को अच्छा नहीं लगा. वह उस का दोस्त था और उसी के साथ नौकरी करता था. सुखबीर को वही दिल्ली लाया था. राजपाल की शादी नहीं हुई थी, इसलिए सुखबीर को उस से खतरा महसूस होता था. अगले दिन सुखबीर नौकरी पर जा रहा था तो राजपाल उसे रास्ते में मिल गया. उस ने कहा, ‘‘अच्छा हुआ सुखबीर तुम मिल गए. खुशी की बात है कि तुम ने शादी कर ली. इसी तरह मेरी भी कहीं करा दो.’’

सुखबीर ने 2-4 बातें कर के किसी तरह राजपाल से पीछा छुड़ाया. राजपाल भी वहीं रहता था, इसलिए अकसर दोनों की मुलाकात हो जाती थी. उसे देखते ही सुखबीर मुंह घुमा कर चला जाता था. एक दिन राजपाल ने उसे रोक कर पूछा, ‘‘क्या बात है सुखबीर, तुम मुझे देख कर मुंह क्यों घुमा लेते हो?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. सुबह मिलते हो तो ड्यूटी पर जाना होता है, शाम को थका होता हूं.’’ सुखबीर बहाना बना कर चलने लगा तो राजपाल ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘शादी की है, कम से कम एक दिन घर में दावत ही कर दो. मन बदल जाएगा, होटल का खाना खाखा कर जी ऊब गया है.’’

‘‘काजल किसी से मिलनाजुलना पसंद नहीं करती.’’ सुखबीर ने कहा.

राजपाल हैरानी से उसे देखता रह गया. उस दिन काजल ने उस से कितनी इज्जत के साथ बात की थी. उस ने सोचा कि किसी दिन वह काजल से अकेले में बात करेगा.

दूसरी ओर सुखबीर को लगा कि राजपाल काजल के पीछे पड़ गया है. घर पहुंचते ही उस ने काजल से पूछा, ‘‘मेरे जाने के बाद राजपाल आता है क्या?’’

‘‘हां, 2-3 बार तुम्हें पूछने आया था?’’ काजल ने कहा.

सुखबीर उस की पिटाई करते हुए बोला, ‘‘तुम ने बताया क्यों नहीं?’’

बिना मतलब की यह मारपीट काजल से सहन नहीं हुई. उस ने सुखबीर को धक्का दे कर कहा, ‘‘तुम्हारी पहली पत्नी तुम्हारे इसी व्यवहार से छोड़ कर चली गई. तुम मुझे खरीद कर लाए हो तो इस का मतलब यह नहीं कि मैं तुम्हारा हर अत्याचार सहती रहूंगी.’’

काजल के इस तरह डट कर खड़ी होने से सुखबीर को लगा कि यह भी किसी के बहकावे में आ गई है. जरूर कोई इसे फुसला रहा है. कहीं यह उसे जहर दे कर उस के साथ चली न जाए, वह रात भर इसी बात पर विचार करता रहा. अंत में उस ने तय किया कि काजल को ले कर वह भरथरा चला जाएगा और फिर से कपड़े सीने की अपनी दुकान खोल लेगा.

सुखबीर काजल को ले कर गांव आ गया और अपनी कपड़े सीने वाली दुकान खोल ली. वह कपड़े अच्छे सिलता था, इसलिए उस की दुकान चल निकली.

कुछ दिनों बाद राजपाल गांव आया तो उस से मिलने उस की दुकान पर जा पहुंचा. जब राजपाल ने उसे बताया कि वह भी नौकरी छोड़ कर गांव आ गया है तो वह सन्न रह गया. उसे लगा कि इस ने नौकरी काजल के लिए छोड़ी है. अब वह काजल और राजपाल पर नजर रखने लगा. कुछ दिनों बाद जब काजल ने बताया कि वह गर्भवती है तो सुखबीर को लगा कि काजल और राजपाल के जो नाजायज संबंध हैं, यह उसी का परिणाम है. इस की वजह यह थी कि सुखबीर के शक्की मिजाज से काजल परेशान थी. इधर कभीकभार वह राजपाल से मिलने लगी थी.

दरअसल गांव में वह सिर्फ राजपाल को ही जानती थी. वह जब भी उस से मिलती सुखबीर की शिकायत कर के किसी भी तरह उस से छुटकारा दिलाने को कहती. राजपाल अविवाहित था. उसे काजल से हमदर्दी थी. साथ ही लगाव भी हो गया था. इसलिए वह उसे मौका मिलने पर छुटकारा दिलाने का आश्वासन देता रहता था.

सुखबीर काजल और राजपाल पर नजर रख ही रहा था, इसलिए उसे इन के मिलनेजुलने की जानकारी हो गई. लेकिन उस ने कभी अपनी आंखों से दोनों को नहीं देखा था. फिर भी वह घर में ताला लगा कर दुकान पर जाने लगा. काजल एक तरह से कैदी बन कर रह गई थी. एक दिन सुखबीर ताला बंद करना भूल गया तो काजल ने मौका पा कर एक बच्चे को भेज कर राजपाल को बुलवा लिया. उस ने राजपाल से कहा कि वह अपने मांबाप के पास जाना चाहती है, इसलिए किसी तरह उस का यह संदेश उस के मांबाप तक भिजवा दे.

इसी बीच सुखबीर को याद आया कि वह घर खुला छोड़ आया है. ताला बंद करने वह घर पहुंचा तो उस ने राजपाल और काजल को बातें करते देख लिया. इस के बाद वह खुद को रोक नहीं पाया और डंडा ले कर राजपाल को दौड़ा लिया.

राजपाल जान बचा कर भागा. वह तो उस के हाथ नहीं लगा, लेकिन काजल फंस गई. पहले उस ने लोहे की रौड से उस की पिटाई की. वह बेहोश हो गई तो घर में सब्जी काटने वाली छुरी से उस पर कई वार कर दिए. थोड़ी देर में काजल मर गई. पड़ोसियों ने काजल की चीखें तो सुनी थीं, लेकिन कोई सुखबीर के मामले में पड़ना नहीं चाहता था, इसलिए कोई उसे बचाने घर के अंदर नहीं गया.

सुखबीर का गुस्सा शांत हुआ तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस ने फावड़े से गड्ढा खोद कर लाश को गाड़ दिया और घर में ताला लगा कर भाग निकला. पड़ोसियों ने सुबह सुखबीर के घर ताला लगा देखा तो पुलिस को सूचना दे दी. कोतवाली देहात के प्रभारी पदम सिंह पुलिस के साथ सुखबीर के घर पहुंचे तो अंदर की स्थिति देख कर हैरान रह गए. ताजी खुदी मिट्टी के बीच एक पैर दिखाई दे रहा था.

पदम सिंह ने मिट्टी हटवाई तो काजल की लाश बाहर आ गई. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर थाने में हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर सुखबीर की तलाश शुरू कर दी.

पुलिस जानती थी कि सुखबीर दिल्ली भाग सकता है, इसलिए दिल्ली जाने वाले सभी रास्तों पर नाकाबंदी कर दी गई. आखिर सुखबीर एटा के बसअड्डे पर मिल गया. वह भाग इसलिए नहीं सका, क्योंकि उस के पास किराए के पैसे नहीं थे. उस ने सोचा था कि रात को घर जाएगा और चुपके से कुछ पैसे और सामान ले कर भाग जाएगा.

पूछताछ में उस ने काजल की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस का कहना था कि काजल एक चरित्रहीन औरत थी, इसलिए उस ने उसे मार दिया. पूछताछ के बाद उसे जेल भेज दिया गया. अपने शक्की स्वभाव के कारण उस ने घर तो उजाड़ा ही, जिंदगी भी बरबाद कर ली. Etah Crime Story

 

Mumbai Crime Story: एक विवाहिता की खूनी लव स्टोरी

Mumbai Crime Story: सलमान से प्यार होने के बाद संगीता को स्वप्निल कांटे की तरह चुभने लगा था. उस ने इस कांटे को निकालने के लिए सलमान से कहा तो अपराध करने से पहले उस ने यह भी नहीं सोचा कि उस के पत्नीबच्चों का क्या होगा…

स्वप्ननगरी के नाम से मशहूर मुंबई से लगा महाराष्ट्र का एक जिला है रायगण. इसी जिले की तहसील पनवेल के गांव न्हावा शेवा में नामदेव पाटील का छोटा सा परिवार रहता था. उन की पत्नी की मौत हो चुकी थी. समुद्र के किनारे बसा यह गांव सुप्रसिद्ध इंटरनेशनल बंदरगाह के पास है, जिस से यहां से प्रतिदिन पचासों मालवाहक जहाज देशविदेश आतेजाते हैं.

28 वर्षीय स्वप्लिन नामदेव पाटील का एकलौता बेटा था. करीब 7 साल पहले सन 2008 में स्वप्लिन का विवाह नवी मुंबई स्थित नेरुल के रहने वाले स्वर्गीय मारुती गायकवाड की एकलौती बेटी संगीता गायकवाड़ के साथ हुआ था. पतिपत्नी एकदूसरे से खुश थे. दोनों के 2 बच्चे थे, 5 वर्षीया अक्षरा और 4 वर्षीय जिविक. बच्चे पास के ही एक इंगलिश स्कूल में पढ़ते थे.

स्वप्लिन पाटील उरण स्थित ओएनजीसी में अस्थाई कर्मचारी के रूप में काम करता था. वहां से उसे इतना वेतन मिल जाता था कि उस के परिवार का खर्च आराम से चल सके. वह सुबह अपनी मोटरसाइकिल से ड्यूटी पर जाता था और शाम को 8-9 बजे तक घर लौट आता था.

संगीता सुबह पति को नाश्ता कराने और औफिस भेजने के बाद बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेजती थी. संगीता सुंदर तो थी ही, महत्त्वाकांक्षी और फैशनपरस्त भी थी. उसे पत्नी के रूप में पा कर स्वप्निल बहुत खुश था. स्वप्निल और संगीता के वैवाहिक जीवन के 7 साल बड़े मजे में गुजर गए. लेकिन वक्त ने धीरेधीरे रंग बदलना शुरू किया.

1 दिसंबर, 2015 की सुबह लगभग 7 बजे नवी मुंबई के नेरुल थाने के कांस्टेबल कांकड़ अपने इलाके की गस्त कर के थाने लौट रहे थे, तभी उन्हें खबर मिली कि नेरुल के सेक्टर 14 के रामलीला मैदान परिसर में बुरी तरह घायल एक युवक पड़ा है. यह खबर पुलिस कंट्रोल रूम से प्रसारित हुई थी. खबर सुन कर जब कांस्टेबल कांकड़ घटनास्थल पर पहुंचे, तब तक वहां लोगों की भीड़ लग चुकी थी.

घायल युवक के माथे और सिर में गंभीर चोटों के निशान थे, जिन से निकला खून बह कर आसपास फैल गया था. घायल युवक के सिर के पास ही एक बड़ा सा पत्थर पड़ा था, जिस पर खून के निशान थे. इस से पता चलता था कि युवक को उसी पत्थर से मार कर घायल किया गया था. कांस्टेबल कांकड़ ने वहां लगी भीड़ को हटा कर घायल युवक का निरीक्षण किया तो उन्हें लगा कि घायल युवक धीरेधीरे सांस ले रहा है. कांकड़ विलंब किए बिना 2 लोगों के साथ घायल युवक को नेरुल के डाक्टर डीवाई पाटील अस्पताल ले गए. लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. निरीक्षण के बाद डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

यह जानकारी नेरुल पुलिस थाने के वरिष्ठ महिला पुलिस इंसपेक्टर संगीता शिंदे अल्फांसो को मिली तो उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और तत्काल सहायक इंसपेक्टर नागराज मजगे, असिस्टैंट इंसपेक्टर जगवेंद्र सिंग राजपूत, अर्जुन गायकवाड़, सबइसंपेक्टर नितिन शिंदे, कांस्टेबल पोपट पावरा, जालिंदर कोली, गणेश वनकर और गणेश खेड़कर को साथ ले कर डाक्टर डीवाई अस्पताल पहुंच गई. पहले उन्होंने अस्पताल के डाक्टरों से मृतक के बारे में पूछताछ की. उस के बाद मृतक के कपड़ों की तलाशी ली. तलाशी में मृतक की जेब से कुछ कागज निकले, जिन में मृतक का पहचान पत्र और एक विजिटिंग कार्ड भी था. पहचान पत्र में मृतक का नाम और पता लिखा था.

विजिटिंग कार्ड पर लिखे फोन नंबर पर फोन करने से पता चला कि वह विजिटिंग कार्ड मृतक के मामा जितेंद्र म्हात्रे का था. पुसिल ने म्हात्रे को तुरंत डाक्टर डीवाई अस्पताल पहुंचने को कहा. विजिटिंग कार्ड के पीछे भी एक नंबर लिखा था. उस नंबर पर फोन किया गया तो वह नंबर मृतक के चचेरे भाई सत्यवान पाटील का निकला. मृतक का नाम स्वप्निल पाटील था. पुलिस ने सत्यवान को भी अस्पताल पहुंचने को कह दिया. जितेंद्र म्हात्रे और सत्यवान पाटील ने डाक्टर डीवाई पाटील अस्पताल पहुंच कर स्वप्निल को जिस हालत में देखा, उस से उन के होश उड़ गए. उन्होंने यह खबर स्वप्निल के घर वालों को दे दी.

पुलिस अभी सत्यवान और जितेंद्र म्हात्रे से स्वप्निल के बारे में पूछताछ कर रही थी कि मृतक का सारा परिवार अस्पताल पहुंच गया. स्वप्निल की लाश देख कर पूरा परिवार छाती पीटपीट कर रोने लगा. जितेंद्र म्हात्रे और सत्यवान ने उन्हें जैसेतैसे संभाला. आवश्यक पूछताछ के बाद पुलिस ने स्वप्निल की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के बाद घटनास्थल का निरीक्षण कर के पुलिस थाने लौट आई.

थाने लौटते वक्त पुलिस स्वप्निल के मामा जितेंद्र म्हात्रे और सत्यवान को अपने साथ थाने ले आई थी. पुलिस ने उन्हीं दोनों की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के विरुद्ध स्वप्निल की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. शुरुआती पूछताछ में संगीता शिंदे अल्फांसो को यह मामला काफी रहस्यमय लगा. इसलिए उन्होंने इस केस की जांच खुद ही करने का फैसला लिया.

पारिवारिक परिस्थितियों के बारे में गहराई से पूछताछ करने पर मृतक के मामा जितेंद्र म्हात्रे ने संगीता शिंदे को बताया कि उन्हें जिस व्यक्ति पर संदेह है, उस का नाम महेश ठाकुर है. कुछ सालों पहले महेश ठाकुर और स्वप्निल की पत्नी संगीता के बीच चक्कर था. संगीता का चरित्र कुछ ठीक नहीं था, इस बात को ले कर महेश ठाकुर और स्वप्निल के बीच जोरदार झगड़ा हुआ था. उस समय स्वप्निल ने महेश ठाकुर को काफी मारापीटा था. पिटने के बाद महेश ठाकुर ने स्पप्निल को देख लेने की धमकी दी थी.

संगीता शिंदे ने सोचा भी नहीं था कि इस गंभीर मामले की जांच आगे बढ़ाने के लिए इतनी जल्दी राह मिल जाएगी. उन्होंने तुरंत अपने सहायकों को आदेश दिया कि महेश ठाकुर और संगीता को पूछताछ के लिए थाने ले आएं. उन के आदेश पर पुलिस टीम दोनों को थाने ले आई. थाने पर दोनों से अलगअलग पूछताछ की गई. महेश ठाकुर से हुई पूछताछ में वह तो निर्दोष लगा, लेकिन संगीता से थोड़ी सख्ती के साथ पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि बीते दिन स्वप्निल अपने दोस्त सलमान के साथ बैठा शराब पी रहा था. तब यह बात उस ने उसे फोन कर के बताई थी. इस से ज्यादा वह कुछ नहीं जानती.

इस पूछताछ के बाद पुलिस ने सलमान के बारे में जानकारी एकत्र की, साथ ही उस का मोबाइल नंबर ले कर रजिस्ट्रेशन फार्म निकलवाया. रजिस्ट्रेशन फार्म से उस का पता मिल गया. सलमान की गिरफ्तारी के लिए इंसपेक्टर संगीता शिंदे अल्फांसो ने सबइंसपेक्टर नितिन शिंदे के नेतृत्व में एक पुलिस टीम को उस के पते पर भेज दिया. 4 दिसंबर, 2015 को सबइंसपेक्टर नितिन शिंदे ने अपनी टीम के साथ कराड़ शहर जा कर सरगम लौज में छिपे बैठे सलमान और उस के साथी शाहिद सुतार को गिरफ्तार कर लिया. जब पुलिस टीम उन्हें मुंबई लाई तो संगीता शिंदे ने उन से पूछताछ की.

लेकिन दोनों ने खुद को निर्दोष बताया. संगीता शिंदे ने उन की जुबान खुलवाने के लिए उन्हें जांच टीम के हवाले कर दिया. दोनों पुलिस टीम को गुमराह करते हुए खुद को निर्दोष बताते रहे. इस के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश कर के रिमांड लिया और पूछताछ शुरू की. आखिर पुलिस को दोनों के साथ थोड़ी सख्ती करनी पड़ी, साथ ही उन्हें यह भी बता दिया गया कि संगीता पुलिस हिरासत में है और उस ने सब कुछ बता दिया है. पुलिस का यह दांव काम कर गया.

बचाव का कोई रास्ता न देख दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उन दोनों की अपराध स्वीकारोक्ति के बाद एक खूनी लव स्टोरी का सच सामने आया. 21 वर्षीय सलमान शेख जिला सतारा के कराड़ शहर स्थित सांई बाबा नगर में अपने दादादादी, 2 छोटे भाई, बहन, मां और पत्नी कश्मीरा के साथ रहता था. बड़ा होने के बावजूद यह परिवार हर तरह से सुखी और संपन्न था. सलमान के पिता का कराड़ शहर में दूध का कारोबार था. उन के पास अच्छी नस्ल की काफी भैंसें थीं.

सलमान उन का बड़ा बेटा था. लाडप्यार में पलाबढ़ा सलमान आठवीं से आगे नहीं पढ़ पाया था. जवान होते ही पिता ने उस की शादी अपने एक रिश्तेदार की बेटी कश्मीरा से कर दी थी, साथ ही उसे अपने कारोबार में भी लगा लिया था. सलमान शराब और शबाब का शौकीन था. जब तक उस की पत्नी उस के साथ रहती थी, तब तक वह ठीक रहता था. उस के जाते ही वह इधरउधर मुंह मारने लगता था. उस के ठिकाने होते थे कराड़ के होटल और लौज.

स्वप्निल और संगीता से सलमान की मुलाकात कुछ महीने पहले कराड़ के सरगम लौज में हुई थी. दरअसल स्वप्निल और संगीता पिकनिक मनाने कराड़ गए थे. उन दिनों सलमान की पत्नी कश्मीरा गर्भवती होने की वजह से अपने मायके गई हुई थी. सलमान मन बहलाने के लिए उस लौज में ठहरा था. सलमान ने संगीता को देखा तो वह उसी के सपने देखने लगा. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद संगीता के सौंदर्य में कोई कमी नहीं आई थी. यही वजह थी कि उस का दूधिया बदन पहली ही नजर में सलमान की आंखों में समा गया था.

संगीता की नजदीकी पाने के लिए सलमान ने उस के पति स्वप्निल से दोस्ती गांठ ली. दरअसल स्वप्निल शराब का शौकीन था. जाहिर है, पीनेपिलाने वालों से दोस्ती करना बड़ा आसान होता है. पहला दांव चलते हुए सलमान उस का हमप्याला बन गया. एक टेबल पर साथसाथ पीने के बाद सलमान ने स्वप्निल के सामने प्रस्ताव रखा कि वह गाइड बन कर उन लोगों को शहर की सभी खासखास जगहों पर घुमाएगा. उस ने ऐसा ही किया भी.

स्वप्निल सलमान के व्यवहार का कायल हुआ तो संगीता उस के व्यक्तित्व की. कराड़ छोड़ते समय स्वप्निल और सलमान दोनों गर्मजोशी से गले मिले. दोनों ने अपनाअपना मोबाइल नंबर पहले ही एकदूसरे को दे दिया था. सलमान ने बातोंबातों में संगीता का नंबर भी हासिल कर लिया था. सलमान को स्वप्निल का ड्यूटी टाइम पता था. वह संगीता को ऐसे समय फोन करने लगा, जब उस का पति घर पर नहीं होता था. धीरेधीरे संगीता भी उस की बातों में रुचि लेने लगी. नतीजा यह हुआ कि दोनों एकदूसरे से खुलते गए और औपचारिकताएं पीछे छूटती गईं. सलमान जबतब संगीता को कराड़ आने का आमंत्रण देता रहता था. लेकिन स्वप्निल की वजह से संगीता का कराड़ जाना संभव नहीं था.

धीरेधीरे स्थिति यह आ गई कि संगीता की जिंदगी में भले ही स्वप्निल था, पर सपनों में सलमान था. अधर में फंसी संगीता चिड़चिड़ी हो गई थी. अब उस की पति से भी आए दिन तकरार होने लगी थी. तकरार होती तो कभीकभी वह अपने मायके नेरुल चली जाती. वहां बहाना कर के वह कराड़ चली जाती, जहां सलमान उस के ठहरने, खानेपीने का इंतजाम करता. नतीजा यह हुआ कि दोनों के बीच अनैतिक संबंध बन गए. जब संगीता कराड़ से वापस लौटती तो सलमान उसे 5-10 हजार रुपए भी दे देता था. अब तक संगीता पूरी तरह बदल चुकी थी. उस ने पति, बच्चों और ससुर की परवाह करना छोड़ दिया था. उस के ख्वाबों में केवल सलमान बसता था. वह मन ही मन दोनों की तुलना करती तो स्वप्निल से सलमान ही बेहतर नजर आता.

दूसरी ओर सलमान और संगीता के संबंधों के बारे में स्वप्निल को कोई जानकारी नहीं थी. बहरहाल सलमान की वजह से स्वप्निल और संगीता के बीच दूरियां बढ़ती गईं. इन दूरियों को बढ़ाने में स्वप्निल की शराब पीने की लत भी एक वजह बनी. जल्दी ही वह समय भी आया, जब संगीता स्वप्निल से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगी. संगीता और सलमान के बीच की दूरियां कम करने में संगीता की मां श्वेता गायकवाड का भी हाथ था. दरअसल संगीता अपने मायके नेरुल जाती थी तो उस की मां उसे पूरी छूट दे देती थी. इस का लाभ उठाते हुए संगीता सलमान के पास कराड़ चली जाती थी.

इस घटना के कुछ दिनों पहले सलमान के यहां बेटा पैदा हुआ. खुशी के इस मौके पर सलमान ने स्वप्निल, संगीता और उस की मां श्वेता को भी बुलाया. तीनों आए भी. मौका देख कर सलमान ने संगीता की मां श्वेता के खूब कान भरे. उस ने शिकायती लहजे में कहा कि स्वप्निल न केवल शराबी है, बल्कि संगीता को मारतापीटता भी है. अगर कुछ नहीं किया गया तो वह किसी दिन संगीता की हत्या कर सकता है.

करोड़ से लौटने के बाद संगीता और उस की मां श्वेता ने स्वप्निल से पीछा छुड़ाने के लिए एक खतरनाक योजना बनाई. योजना के अनुसार, संगीता स्वप्निल के साथ घर लौट आई. उस के और सलमान के बीच पहले की ही तरह बातें होती रहीं. एक दिन बातोंबातों में संगीता ने सलमान के पुरुषार्थ को ललकारते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें मर्द तभी समझूंगी, जब तुम हम दोनों के बीच आए कांटे को निकाल फेंकोगे. इस के बाद ही हम सुख से रह सकेंगे.’’

प्रेमिका के ये शब्द सलमान के लिए पत्थर की लकीर बन गए. वह उसी दिन से अपने और संगीता के बीच से स्वप्निल को हटाने के बारे में सोचने लगा. लेकिन स्वप्निल को वह अकेले मौत के घाट नहीं उतार सकता था. इस के लिए उस ने अपने बचपन के दोस्त शाहिद सुतार और कराड़ शहर की सुपर मार्केट के रहने वाले मल्हारी उर्फ मल्या उर्फ हनुमंत गंजुले से बात की. उस ने उन्हें अपनी और संगीता की लव स्टोरी बताई, साथ ही 60 हजार रुपए का लालच भी दिया. एक तो दोस्ती, दूसरे पैसों का लालच. उस के दोनों दोस्त उस की मदद करने के लिए तैयार हो गए.

फूलप्रूफ योजना तैयार करने के बाद सलमान शेख ने घटना के एक दिन पहले स्वप्निल को फोन कर के कहा कि वह उस से मिलने के लिए नेरुल, नवी मुंबई आ रहा है. उस ने साढ़े 4 बजे का समय भी बता दिया. उस के आने की बात सुन कर स्वप्निल खुश हो गया. योजना के अनुसार, सलमान और उस के दोस्त कराड़ से बस पकड़ कर पहले कोल्हापुर नाका पहुंचे और फिर वहां से दूसरी बस से सुबह साढ़े 4 बजे नवी मुंबई के उपनगर नेरुल पहुंच गए. नेरुल पहुंच कर सलमान ने एसएमएस से अपने पहुंचने की जानकारी संगीता को दे दी.

इस के बाद सलमान ने स्वप्निल को फोन किया, लेकिन उस ने उस का फोन नहीं उठाया. उस के कई बार फोन करने के बाद भी स्वप्निल ने जब फोन नहीं उठाया तो तीनों संगीता की मां श्वेता के घर चले गए. इन लोगों ने श्वेता को अपनी पूरी योजना बताई.

श्वेता ने चायपानी पिलाने के बाद उन्हें वहां से जाने को कह दिया, क्योंकि उन के वहां रुकने से किसी को शक हो सकता था. सलमान अपने दोस्तों के साथ नेरुल स्टेशन चला गया. वहां प्लेटफार्म पर बैठ कर तीनों ने एक घंटा बिताया. इस बीच मल्हारी उर्फ मल्या कुछ देर के लिए अपने एक रिश्तेदार से मिलने के लिए भी गया. सुबह करीब 8 बजे सलमान के पास स्वप्निल का फोन आया. उस ने समय से न पहुंच पाने के लिए माफी मांगी. इस के बाद अपनी पत्नी संगीता को फोन कर के कहा कि वह सलमान से मिलने नेरुल जा रहा है. फिर वह कुछ ही मिनटों में नेरुल रेलवे स्टेशन पहुंच गया.

अपनी योजना को पूरा करने के लिए सलमान और उस के दोस्त स्वप्निल की मोटरसाइकिल पर बैठ गए. सलमान ने नेरुल की पहाडि़यां देखने की इच्छा जाहिर की तो स्वप्निल उन्हें नेरुल की पहाडि़यों पर ले गया. लेकिन वहां इन लोगों को स्वप्निल को मारने का मौका नहीं मिला. दिन के उजाले में खतरा था. इसलिए समय बिताने के लिए ये लोग वापस नेरुल रेलवे स्टेशन आ गए. स्वप्निल ने सलमान के दोनों दोस्तों को स्टेशन पर छोड़ा और उन्हें वहीं रुकने के लिए कह कर वह सलमान के साथ घर आ गया. उस वक्त स्वप्निल के पिता नामदेव सो रहे थे. संगीता ने दोनों को खाने के लिए दालचावल दिया.

खाना खाने के बाद वे लगभग 12 बजे घर से निकल गए. वहां से दोनों सीधे पामबीच तालाब पर गए, जहां काफी बच्चे और नौजवान बैठ कर खेल रहे थे. दोनों वहीं पर आराम से बीते दिनों की बातें करने लगे. बातों ही बातों में स्वप्निल ने बीयर पीने की इच्छा जाहिर की. लेकिन सैलरी न आने के कारण स्वप्निल की जेब खाली थी. सलमान उस के लिए एक बोतल बीयर ले आया. स्वप्निल ने पामबीच पर बैठेबैठे बीयर खत्म कर दी. उस के बाद दोनों नेरुल रेलवे स्टेशन गए, जहां सलमान के दोनों दोस्त उन का इंतजार कर रहे थे. स्वप्निल ने अपनी मोटरसाइकिल पार्किंग में खड़ी कर दी.

इस के बाद चारों दोस्त लोकल ट्रेन पकड़ कर वाशी रेलवे स्टेशन आए. वहां से इन लोगों ने औटो लिया और सागर विहार बार पहुंचे, जहां स्वप्निल ने बीयर मांगी. लेकिन बीयर पीने के बाद भी उसे इतना नशा नहीं हुआ कि सलमान और उस के दोस्त उसे आराम से मौत के घाट उतार सकते. 2 बीयर पीने के बाद स्वप्निल शराब मांगने लगा. सलमान और उस के साथी यही चाहते थे. सलमान और उस के साथी अपना काम निकालने के लिए वाशी मौल गए. वहां जा कर सब ने अपने लिए बीयर और स्वप्निल के लिए शराब खरीदी. शराब ले कर वे फिर नेरुल रेलवे स्टेशन आ गए.

वहां से चारों दोस्त नेरुल के सेक्टर 14 के रामलीला मैदान चले गए. सब बीयरशराब का मजा लेने लगे. तब तक सुबह के 5 बजे गए थे. मैदान सुनसान था. सलमान ने स्वप्निल को अपनी बातों में उलझाए रखा. उसी बीच मौका देख कर मल्हारी उर्फ माल्या पेशाब करने के लिए उठा और पास ही पड़ा एक बड़ा सा पत्थर ला कर स्वप्निल के सिर पर पटक दिया. इस के बाद बारीबारी से सभी ने स्वप्निल के सिर पर पत्थर मारे और उसे मरा समझ कर वहां से उस की मोटरसाइकिल ले कर नेरुल स्टेशन आ गए. नेरुल स्टेशन पर उस की मोटरसाइकिल छोड़ कर वे ट्रेन द्वारा सीवीडी बेलापुर आए. वहां उन्होंने अपने खून सने कपड़े बदले और कराड़ चले गए.

मल्हारी उर्फ मल्या अपने घर चला गया. सलमान और शाहिद सुतार दोनों सरगम लौज में जा कर छिप गए, जहां से पुलिस ने उन्हें पकड़ा था. सलमान और शाहिद सुतार के बयानों के आधार पर पुलिस ने छापा मार कर मल्हारी उर्फ माल्या, संगीता, उस की मां श्वेता को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने सलमान शेख, शाहिद सुतार, मल्हारी उर्फ मल्या, संगीता और श्वेता से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उन के विरुद्ध भादवि की धारा 302, 120बी के तहत केस दर्ज किया और फिर उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Mumbai Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories: गैरतमंद

Hindi StoriesHindi StoriesHindi Stories: बरकत मसीह दोहरे चरित्र का आदमी था. वह अपनी पत्नी कामिनी से प्रेम भी करता था और नफरत भी. उस की मोहब्बत ही हमेशा नफरत को काबू किए रहती थी, लेकिन एक दिन जब उस की नफरत मोहब्बत पर हावी हुई तो…

बात तब की है, जब मेरी तैनाती पंजाब के एक ऐसे देहाती इलाके में थी, जो काफी हराभरा था. उन दिनो गांवों में बिजली की बात तो दूर, सड़कें भी पक्की नहीं थीं. वह इलाका काफी पिछड़ा हुआ था. गर्मियों के दिन थे. दोपहर को मैं एक पेड़ के नीचे बैठा काम कर रहा था, तभी पास के एक गांव का नंबरदार मुझ से मिलने आया. वह बड़ा ही चापलूस था, लेकिन मेरा मुखबिर था. मैं ने उस से आने की वजह पूछी तो उस ने बताया कि एक घटना घट गई है, वह उसी की सूचना देने आया है.

उस ने बताया कि उस के गांव का बरकत मसीह अपनी घर वाली को साइकिल पर बिठा कर कहीं जा रहा था. जब वह छोटी नहर की पुलिया पर पहुंचा तो सामने से एक बैलगाड़ी बहुत तेज रफ्तार से आ रही थी. बैल भड़के हुए थे, जो गाड़ी वाले से संभल नहीं रहे थे. नहर की पुलिया पर दोनों ओर कोई दीवार नहीं थी, इसलिए बरकत मसीह ने बैलगाड़ी से बचने की कोशिश की तो साइकिल सहित नहर में जा गिरा. जब तक वह संभलता, पत्नी कई गोते लगा चुकी थी. नहर अधिक गहरी नहीं थी. उस ने पास जा कर देखा तो पत्नी अधमरी हो चुकी थी. वह पत्नी को पानी से बाहर निकाल कर ला रहा था, तभी उस ने दम तोड़ दिया.

यह एक साधारण सी घटना थी, जिस में पुलिस का कोई काम नहीं था. फिर भी मैं ने नंबरदार से कुछ बातें पूछ कर तसल्ली कर ली. इस घटना पर कोई रिपोर्ट भी दर्ज नहीं करनी थी. नंबरदार अपना कर्तव्य समझ कर मुझे खबर करने आ गया था. उसे गए कुछ समय ही गुजरा था कि वह दोबारा एक लड़के को ले कर मेरे पास आ गया. उस के चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे वह कोई नई खबर ले कर आया है. मैं ने उसे बिठा कर आने का कारण पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मलिक साहब, मामला गड़बड़ है.’’

‘‘कौन सा मामला गड़बड़ है?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘वही बरकत मसीह और उस की पत्नी वाला. आप तुरंत मेरे साथ चलिए.’’ उस ने कहा.

‘‘उस में तुम्हें क्या गड़बड़ लगा, जरा मुझे भी तो बताओ?’’

‘‘मैं तो क्या, यह लड़का बताएगा.’’ उस ने लड़के को मेरे सामने करते हुए कहा, ‘‘ओए, तू ने जो कुछ देखा था, साहब को बता दे.’’

पहले तो लड़का झिझका, उस के बाद उस ने जो बताया, उस से मुझे वह मामला हत्या का लगा. वह लड़का नंबरदार के ही गांव का रहने वाला था. जिस समय नहर पर वह घटना घटी थी, वह जामुन के एक पेड़ पर चढ़ कर जामुन तोड़ रहा था. दोपहर का समय था, आसपास कोई आदमी दिखाई नहीं दे रहा था. उस ने देखा कि एक साइकिल सवार साइकिल पर पीछे एक औरत को बैठाए जा रहा था. सामने से एक बैलगाड़ी आ रही थी, जिस के बैल काबू से बाहर थे.

साइकिल वाले ने घबरा कर साइकिल मोड़ी तो वह साइकिल सहित नहर में गिर गया. पानी में गिरते ही औरत हाथपैर मारने लगी. आदमी ने उस की मदद करने के बजाय उस का सिर पकड़ कर पानी में डुबो दिया. कुछ देर तड़प कर औरत ऊपर उभरी तो उस ने उस का गला दबा दिया. इस के बाद उस ने औरत को पानी से बाहर निकाला तो औरत में कोई हलचल नहीं दिखाई दे रही थी. आदमी ने इधरउधर देखा. कुछ दूर खेतों में कुछ किसान काम कर रहे थे. उस ने आवाज दे कर उन किसानों को बुलाया तो 7-8 लोग वहां आ गए. लड़का भी पेड़ से उतर कर उन के पास पहुंच गया.

पता चला कि वह औरत मर चुकी थी. वह उसी आदमी की पत्नी थी. उस ने उन किसानों से पत्नी के डूब कर मरने की बात बताई तो उन लोगों ने दुख प्रकट किया. एक आदमी ने उस की साइकिल नहर से निकाली और एक रेहड़ी का प्रबंध कर के औरत की लाश को गांव भिजवाया. लड़के ने पहली बार हत्या करते देखा था, इसलिए वह इतना डर गया था कि गांव जाने के बजाय इधरउधर घूमता रहा. नंबरदार थाने में रिपोर्ट कर के वापस जा रहा था, तभी रास्ते में वह उसे मिल गया. लड़के को लगा कि सारी बात नंबरदार को बता देनी चाहिए. नंबरदार ने जब यह बात सुनी तो वह लड़के को ले कर थाने आ गया.

मैं ने नंबरदार से नहर के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि नहर दूसरी नहरों से काफी छोटी थी. वह इतनी गहरी भी नहीं थी कि उस में कोई डूब कर मर जाए. पानी से पुलिया की ऊंचाई भी इतनी नहीं थी कि गिरने से चोट लगे. साफ था कि बरकत मसीह ने ही अपनी पत्नी की हत्या की थी. मैं ने नंबरदार से पूछा, ‘‘क्या उन का घर में आपस में झगड़ा होता था, जिस से उस ने पत्नी को मार दिया?’’

‘‘लड़ाईझगड़े का तो सवाल ही नहीं पैदा होता मलिकजी, वह तो अपनी बीवी का दीवाना था. कुछ लोेग तो उसे जोरू का गुलाम कहते थे. उस की पत्नी थी ही इतनी खूबसूरत कि कोई भी उस का दीवाना हो सकता था.’’

नंबरदार की इस बात से लगा कि शायद लड़के के देखने में कोई गलती हो गई है. वह पत्नी को डूबने से बचा रहा होगा, इसे लगा होगा कि वह उसे डुबो रहा है. जल्दी में कोई कदम उठाने के बजाय मैं ने लाश का पोस्टमार्टम कराना उचित समझा. मैं 2 सिपाहियों के साथ बरकत मसीह के घर पहुंच गया. मरने वाली महिला कामिनी के मांबाप पास के गांव के रहने वाले थे, जो आ चुके थे. कामिनी की बुआ के आने का इंतजार हो रहा था. उन के घर में रोनापीटना मचा था. पुलिस देख कर घर में सन्नाटा छा गया. गांव वाले आपस में खुसुरफुसुर करने लगे थे.

मैं ने नंबरदार से कहा कि वह बरकत को बुला कर मेरे पास ले आए. कुछ ही देर में बरकत मसीह आ गया. वह सुंदर और जवान युवक था. मैं ने पुलिसिया नजरों से उसे देखा. उस की आंखें लाल थीं और उन में नमी थी. शायद वह रो रहा था. मैं ने उस से कहा, ‘‘मर्द हो कर औरतों की तरह आंसू बहा रहे हो, धीरज रखो.’’

उस ने घबरा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं.’’ उस के बाद दोनों हाथों से वह अपनी आंखें साफ करने लगा.

‘‘कामिनी को क्या हुआ, एक बार मैं उस की लाश देखना चाहता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘सर, वह पानी में डूब कर मर गई.’’ कह कर उस ने मुझे पूरी घटना सुना दी.

‘‘पहले मैं लाश देखूंगा, क्योंकि अगर कहीं कोई नई बात निकल आई तो मैं अपने अधिकारियों को क्या जवाब दूंगा.’’ मैं ने कहा, ‘‘इस में घबराने की कोई बात नहीं है. तुम ऐसा करो, लाश के कमरे से सब को निकाल दो. मैं जा कर लाश देख लूंगा.’’

सब को निकाल कर उस ने मुझे कमरे में बुलाया. कमरे में आ कर मैं ने बरकत को बाहर जाने को कहा, लेकिन वह बाहर जाने को तैयार नहीं था. मैं ने 2 सिपाहियों से उसे बाहर ले जाने को कहा तो वे उसे खींच कर बाहर ले गए. बरकत के जाने के बाद मैं ने लाश की चादर खींची तो लाश देख कर मुझे धक्का सा लगा. वह बहुत सुंदर युवती थी. उस की आंखें इस तरह खुली थीं, जैसे मुझे ही देख रही हो. चेहरे में काफी खिंचाव था. नंबरदार की वह बात मुझे सच लगी कि उस औरत का कोई भी पति होता, वह गुलाम बन कर ही रहता.

मैं ने उस की गरदन की ओर देखा तो मुझे वह चीज दिखाई दे गई, जो मैं देखना चाहता था. गले पर लाल सा निशान था और वह निशान गला दबाने का था. मैं ने दोनों सिपाहियों को बुला कर कहा, ‘‘बरकत को कहीं जाने मत देना.’’

नंबरदार से कहा कि वह लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की व्यवस्था करे. वह एक तांगा ले आया तो जरूरी काररवाई करने के बाद मैं ने लाश को सिविल अस्पताल भिजवा दिया. शक की बुनियाद पर बरकत को हिरासत में ले कर थाने आ गया. अगले दिन मैं थाने आया तो सिपाही ने कहा कि बरकत मुझ से बात करना चाहता है. मैं ने उसे अपने कमरे में बुलाया तो देखा, उस की आंखें लाल हो रही थीं, जैसे वह सारी रात सोया न हो. उस ने कहा, ‘‘आप ने मुझे हवालात में क्यों बंद कर रखा है? मेरी घरवाली मर गई है, मुझ गरीब से क्या गलती हो गई है?’’

‘‘मुझे कुछ शक है. लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कह सकूंगा.’’ मैं ने कहा.

शाम करीब 5 बजे पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, कामिनी की मौत पानी में डूबने और सांस रुकने से हुई थी. उस में लिखा था कि मृतका के फेफड़ों, आंतों और मैदे में इतना पानी नहीं था, जितने पानी में डूब कर मौत होती है. इस के अलावा उस के गले पर दबाव का जो निशान पाया गया था, उस के बारे में कहा गया था कि उस पर कोई वजन पड़ा हो या दबाया गया हो. एक खास बात यह थी कि मृतका 3 महीने की गर्भवती थी.

रिपोर्ट देखने के बाद मुझे लड़के के बयान पर यकीन हो गया. कामिनी की लाश को उस के मातापिता के हवाले कर दिया. बरकत के ससुर ने पूछा कि उसे हवालात में क्यों बंद कर रखा है तो मैं ने कहा, ‘‘मुझे शक है कि तुम्हारी बेटी को बरकत ने गला घोंट कर मारा है? क्या तुम्हारी बेटी बरकत के साथ खुश थी?’’

मेरी इस बात पर वह मुझे हैरानी से देखते हुए बोला, ‘‘जी, वह बहुत खुश रहती थी, हमेशा बरकत की तारीफ करती रहती थी.’’

मैं ने कहा, ‘‘सोच कर बताओ, कभी उन में कोई झगड़ा हुआ था?’’

‘‘नहीं सरकार, शादी के बाद से अब तक उन में कोई झगड़ा नहीं हुआ था.’’ उस ने कहा.

मैं ने उस से बहुत घुमाफिरा कर पूछा, लेकिन कोई काम की बात पता नहीं चली. उस के जाने के बाद मैं ने बरकत को बुलवा कर कहा, ‘‘कामिनी की लाश का पोस्टमार्टम हो गया है और उसे तुम्हारे ससुर और साले ले गए हैं.’’

यह सुन कर वह रोते हुए बोला, ‘‘मुझे भी जाने दीजिए सरकार, मैं अपनी कामिनी को अपने हाथों से दफनाना चाहता हूं.’’

मैं ने कहा, ‘‘इन्हीं हाथों से, जिन से तुम ने उस का गला दबाया था.’’

यह सुन कर वह ऐसा उछला, जैसे उस के पैरों पर बम फोड़ दिया गया हो. उस की आंखें फैल गईं और रंग पीला पड़ गया. गर्मियों में वह ऐसे कांप रहा था, जैसे लोग ठंड में कांपते हैं. वह संभल कर बोला, ‘‘यह क्या कह रहे हैं सरकार, कामिनी तो मेरी जान थी, भला मैं उसे क्यों मारूंगा?’’

‘‘हत्या की वजह भी तुम्हीं बताओगे, वरना मैं तो पता कर ही लूंगा.’’ मैं ने कहा.

‘‘सरकार, आप पूरे गांव में किसी से भी पूछ लें, हम दोनों में कितना प्रेम था,’’ बरकत ने कुछ सोच कर कहा, ‘‘वह मेरे बच्चे की मां भी बनने वाली थी. मैं अपने बच्चे और पत्नी को कैसे मार सकता हूं?’’

बरकत ने जो कहा था, उस में वजन था. लेकिन मैं उस लड़के के बयान और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को कैसे झुठला सकता था. मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘कामिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफसाफ लिखा था कि उस की हत्या गला दबा कर की गई थी.’’

वह मेरी बात पर घबराने के बजाय दृढ़ता से बोला, ‘‘साहब, हम दोनों एकसाथ नहर में गिरे थे. हो सकता है, साइकिल का कोई पुरजा उस की गरदन पर जा लगा हो.’’

उस ने दलील अच्छी दी थी. लेकिन मैं समझ रहा था कि वह जरूरत से ज्यादा चालाक है और मुझ से झूठ बोल रहा है. मुझे लगा कि यह आसानी से मानने वाला नहीं है, इसलिए मैं ने सख्ती करने का फैसला कर लिया. मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारे लिए यही अच्छा है कि तुम इकबालिया बयान दे दो. हो सकता है मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं. अगर नहीं देते हो तो मुझे जरूरत भी नहीं है. मेरे पास ऐसा गवाह मौजूद है, जिस ने तुम्हें कामिनी का गला दबाते हुए देखा है. अब बोलो, क्या कहना चाहते हो?’’

मेरी इस बात पर उस की हालत खराब हो गई, उस से कुछ कहते नहीं बन रहा था. मैं उसे और मौका नहीं देना चाहता था, इसलिए मेज पर घूसा मार कर पूछा, ‘‘बोलो, तुम ने हत्या की है?’’

‘‘नहीं सरकार, मैं ने उस की हत्या नहीं की है.’’ वह सहम कर बोला.

मैं ने उसे हवालात में बंद कर दिया और अपने मुखबिरों से कहा कि वे शाम तक यह पता लगा कर बताएं कि कामिनी का चरित्र कैसा था? लेकिन मुखबिरों से कोई काम की बात पता नहीं चली. मैं ने उस लड़के को दोबारा बुला कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं ने अपनी आंखों से उसे गला दबाते देखा था. कुछ और बातें पूछ कर मैं ने उस लड़के को भेज दिया. उस के जाने के बाद नंबरदार आ गया तो उस ने बरकत के बारे में कुछ बातें बताईं.’’

नंबरदार के बताए अनुसार, बरकत एक हकीम की दुकान पर जड़ीबूटियां कूटने का काम करता था. वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था. किसी बात पर दोनों में कभीकभी छोटामोटा झगड़ा जरूर हो जाता था, लेकिन बाद में बरकत उसे मना लेता था. बरकत के घर के बराबर में एक औरत रहती थी, जिस का नाम सरदारा था. लोग उसे दारू कहते थे, उस की कामिनी से बहुत पटती थी. वह उस के बारे में सबकुछ जानती थी. अगर उस से पूछताछ की जाए तो शायद वह उस के बारे में कुछ बता सके.

मैं ने दारू को लाने के लिए तुरंत एक सिपाही को भेज दिया. इसी बीच एक और मुखबिर आ गया. उस ने मुझे जो कुछ बताया, वह मुझे पहले से ही पता था. लेकिन उस ने एक नई बात यह बताई कि बरकत को कोई बीमारी लगी थी, जिस का इलाज वह उसी हकीम से करा रहा था, जिस के यहां काम करता था. मैं ने मुखबिर से कहा कि वह उस की बीमारी का पता लगा कर मुझे बताए. जिस सिपाही को मैं ने दारू को लाने को भेजा था, वह उसे ले कर आ गया. लेकिन उस के साथ उस का पति भी आया था. दोनों काफी घबराए हुए थे. मैं ने दोनों को अपने कमरे में बुलवाया. औरत 35 साल के लगभग थी और मर्द 40 के लपेटे में था. मैं ने देखा, मर्द घबराया हुआ लग रहा था, लेकिन औरत शांत थी.

‘‘हम से क्या गलती हो गई सरकार,’’ मर्द हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘आप ने मेरी घरवाली को क्यों बुलवाया है?’’

मैं ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘घबराने की कोई बात नहीं है. मुझे इन से 2-3 बातें पूछनी हैं.’’

यह कह कर मैं ने पति को बाहर भेज दिया. औरत मेरी ओर देखने लगी. मैं ने कहा, ‘‘सुना है कि तुम्हारी कामिनी से बड़ी गहरी दोस्ती थी. उस के मरने का मुझे बहुत अफसोस है. उस के बारे में मैं तुम से 2-3 बातें पूछना चाहता हूं.’’

‘‘बस जी, अल्लाह को जो मंजूर था, वह हो गया. बड़ी प्यारी लड़की थी,’’ उस ने एक आह भर कर कहा, ‘‘आप जो पूछना चाहें, पूछ लें. मुझे जो पता होगा, जरूर बताऊंगी.’’

‘‘मुझे शक है कि कामिनी की हत्या हुई है,’’ इतना कह कर मैं ने उस के चेहरे को गौर से देखा. मुझे लगा था कि हत्या की बात पर वह उछल पड़ेगी, लेकिन वह सामान्य रही.

‘‘आप का शक ठीक है, मुझे भी यही शक था. लेकिन मैं किसी से कुछ कह नहीं सकी.’’ उस ने कहा.

दारू ने यह बात कह कर मुझे हैरान कर दिया था. मैं ने पूछा, ‘‘शक का कोई कारण तो होगा?’’

‘‘यह लंबी कहानी है,’’ उस ने कहा.

इस के बाद उस ने मुझे जो कहानी सुनाई, उसे मैं यहां संक्षेप में लिख रहा हूं.

कामिनी 2 भाइयों की एकलौती बहन थी, इसलिए घर में सब की लाडली थी. जवान हुई तो इतनी खूबसूरत निकली कि सब के आकर्षण का केंद्र बन गई. ईसाई होने की वजह से उसे घूमनेफिरने की आजादी थी. उस से लड़के बात करने से कतराते थे, क्योंकि वह ऐसा जवाब देती थी कि वे मुंह ताकते रह जाते थे. कामिनी की बिरादरी के कई लड़के उस से शादी करना चाहते थे, लेकिन उसे उन में से कोई भी पसंद नहीं था. वह अपनी ही तरह सुंदर लड़का चाहती थी. उन्हीं दिनों गांव के एक लड़के से उस की दोस्ती हो गई, जो बहुत सुंदर था. उस का नाम कमाले था.

उन की दोस्ती दीवानगी तक जा पहुंची. दोनों रोजाना चोरीछिपे मिलने लगे, लेकिन उन का यह मिलन छिपा नहीं रहा. जल्दी ही उस के भाइयों और पिता को पता चल गया. उन्होंने सख्ती करने के बजाय उस की शादी बरकत से कर दी. कमाले को जब उस की शादी के बारे में पता चला तो उस ने कामिनी से भाग चलने को कहा. लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं हुई. क्योंकि मांबाप, भाइयों ने उसे बहुत लाडप्यार से पाला था, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि उस की वजह से उस के घरवालों की बदनामी हो. अपने मांबाप की इज्जत के लिए उस ने अपनी मोहब्बत का गला घोंट दिया. उस दिन वह कमाले से लिपट कर इतना रोई थी कि कमाले को संभालना मुश्किल हो गया था.

इस के बाद कमाले ने कहा, ‘‘अच्छा, ऐसा करता हूं कि मैं तुम से महीने में 2-3 बार मिलने आ जाया करूंगा.’’

‘‘अगर किसी ने देख लिया तो बदनामी होगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘जरूरी नहीं कि हम मिलें ही, दूर से ही एकदूसरे को देख लिया करेंगे.’’ कमाले ने समझाया.

कामिनी ब्याह कर बरकत के घर आ गई. कमाले महीने में 2-3 बार बरकत के गांव आता रहता था. इस तरह दोनों दूर से ही एकदूसरे को देख कर अपने मन को तसल्ली दे लेते थे. इसी बीच कामिनी ने अपनी पड़ोसन दारू को अपना भेदी बना लिया. उस ने उस से सब कुछ सचसच बता दिया. इस के बाद दारू उस की खबर कमाले तक पहुंचाने लगी. कभीकभी दारू उन का मिलन भी करवा देती थी. शादी को 2 साल हो गए थे, लेकिन उसे कोई बच्चा नहीं हुआ था. उस जमाने में डाक्टरी टैस्ट तो होते नहीं थे, सारी कमी मर्द के बजाय औरत पर डाल दी जाती थी.

कमाले बराबर कामिनी से मिलने आता रहता था, बाद में दोनों एक वीरान कब्रिस्तान के पास रात में मिलने भी लगे थे. उस जगह पर कोई दिन में भी नहीं जाता था. उन दिनों घरों में शौचालय तो होते नहीं थे, लोग खेतों में जाया करते थे. औरतें अंधेरे में जाया करती थीं. कामिनी भी दारू के साथ जाती थी, उधर कमाले आ जाता था. दारू उसे कमाले के पास छोड़ कर इधरउधर हो जाती थी. वे दोनों मिलते जरूर थे, लेकिन रहते अपनी हद में थे.

धीरेधीरे दोनों हदें पार करने लगे. समय गुजरता रहा. शादी के 2 सालों बाद कामिनी ने अपने अंदर कुछ बदलाव देखा तो उस ने दारू से कहा. दारू ने उसे गले से लगा कर कहा, ‘‘बड़ी खुशी की बात है, तू मां बनने वाली है.’’

कामिनी सुन कर बहुत खुश हुई. उस ने बरकत को यह बात बताई तो वह भी खुश हुआ. लेकिन कुछ देर बाद वह बुझ सा गया और सिर झुका कर कुछ सोचने लगा. कामिनी समझ नहीं पाई कि उस के मां बनने की खुशी में उसे खुश होना चाहिए था, जबकि वह बुझ सा क्यों गया. इस के बाद बरकत के मिजाज में चिड़चिड़ापन आ गया.

बरकत को चुप देख कर एक दिन कामिनी ने पूछा तो बरकत ने उसे जो जवाब दिया, उसे सुन कर वह सन्न रह गई. उस ने कहा, ‘‘कामिनी यह बच्चा मेरा नहीं हो सकता, क्योंकि मैं बाप बनने के काबिल नहीं हूं.’’

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’ कामिनी ने कहा, ‘‘यह बच्चा तुम्हारा ही है. तुम से किस ने कहा कि तुम बाप नहीं बन सकते?’’

‘‘कामिनी हमारी शादी के डेढ़ साल बाद भी जब हमें कोई बच्चा नहीं हुआ तो मैं ने हकीमजी, जिन के यहां मैं काम करता हूं, से पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि तुम्हारी पत्नी बिलकुल ठीक है, कमी मेरे अंदर है. लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है, मैं तुम्हें ऐसी दवा दूंगा कि तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे. और वह दवा पूरे छह महीने तक चलेगी. लेकिन अभी दवा लेते हुए मुझे 2 महीने ही हुए हैं.’’

कामिनी ने कहा, ‘‘हो सकता है, तुम 2 महीने में ही ठीक हो गए हो?’’

यह सुन कर उसे कुछ तसल्ली हुई, लेकिन पूरी तरह नहीं. अब उस की हालत ऐसी हो गई कि कभी वह खुश रहता तो कभी कामिनी से लड़नेमरने पर उतारू हो जाता. कामिनी गुस्सा हो जाती तो किसी तरह उसे मना लेता. एक दिन बरकत काम से लौटा तो कामिनी से बहुत लड़ा. उस ने कहा, ‘‘यह जो बच्चा तेरे पेट में पल रहा है, यह हराम का है. मैं ने हकीम से पूछा था कि क्या उन की दवा से मैं 2 महीने में ठीक हो सकता हूं तो उन्होंने कहा कि कभी नहीं, यह जो दवा दी गई है, यह 3 महीने चलेगी, उस के बाद नई दवा दी जाएगी, जो 3 महीने चलेगी. उस के बाद ही तुम पूरी तरह से ठीक हो जाओगे.

उस दिन भी कामिनी ने बरकत को काफी समझाने की कोशिश की, पर बरकत उस की बात मानने को तैयार नहीं था. पति की इस बात पर कामिनी रूठ गई, पर बरकत ने उसे मना लिया. इस घटना के 2-3 दिनों बाद गांव में एक मेला लगा. कामिनी ने बरकत से कहा कि वह उसे मेला दिखा लाए. बरकत की उस दिन छुट्टी थी. वह उसे साइकिल पर बिठा कर मेला दिखाने ले गया. पता चला कि दोनों नहर में गिर गए, जिस में कामिनी की मौत हो गई.

इस के बाद दारू ने कहा, ‘‘अब आप को पता चल गया होगा कि मैं ने क्यों कहा था कि ऐसा तो होना ही था.’’

पूरी कहानी सुनने के बाद मैं ने दारू से कहा कि अब वह घर जाए. फिर जब कभी जरूरत पड़ेगी, उसे बुला लिया जाएगा. उस के जाने के बाद मैं ने अपने एक एएसआई जो पठान था, को बुला कर उसे कमाले का पता दे कर कहा कि वह उसे ले आए. अगर वह न आए तो उस की ठुकाई कर के उसे घसीटता हुआ ले आए. वह तुरंत उसे लेने चला गया. इस के बाद मैं ने बरकत को हवालात से निकाल कर लाने को कहा. अब मेरे पास गवाह भी था और पूरी कहानी भी मैं सुन चुका था. मुझे कमाले का बयान भी लेना था और बरकत का मैडिकल चैकअप भी कराना था, क्योंकि मैं यह साबित करना चाहता था कि वह संतान पैदा करने  के काबिल नहीं है, जबकि उस की पत्नी को 3 महीने का गर्भ था और उस ने शक की बिनाह पर उस की हत्या की थी.

एक सिपाही बरकत को मेरे कमरे में ले आया. वह कुरसी पर बैठने जा रहा था, तभी मैं ने अपने हाथ में थामा बेंत का डंडा जोर से मेज पर पटका, जिस से एक तेज आवाज हुई. वह उछल कर पीछे हट गया. मैं ने डांट कर कहा, ‘‘वहीं खड़े रहो. मैं ने तुम्हें बड़ा सम्मान दिया, लेकिन अब तुम इस के काबिल नहीं रहे, लगातार झूठ बोलते रहे. अब झूठ बोले तो तुम्हें उलटा लटका दूंगा. मैं एक बार और कह रहा हूं कि अगर तुम ने शराफत से इकबालिया बयान दे दिया तो फायदे में रहोगे.’’

‘‘मैं क्या इकबालिया बयान दूं, मैं ने अपनी बीवी की हत्या नहीं की है.’’ उस ने कहा.

वह काफी ढीठ हो रहा था. मैं ने उस पर सीधा हमला करते हुए कहा, ‘‘कामिनी के पेट में किस का पाप पल रहा था?’’

यह सुन कर वह 2 कदम पीछे हट गया, उस का चेहरा पीला पड़ गया. वह मुझे इस तरह देखने लगा, जैसे मैं कोई जादूगर हूं.

‘‘वह मेरी घर वाली थी, उस के पेट में मेरा ही बच्चा होगा न.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम बड़े बेशर्म हो. मुझे पता है कि तुम इस काबिल नहीं हो कि बाप बन सको. अगर नहीं मानोगे तो मैं उस हकीम को यहां बुलवा लूंगा जिस की दवा तुम खा रहे थे.’’ मैं ने उसे घेरने की गरज से कहा.

हमला उस की मरदानगी पर हुआ था, इसलिए उसे परेशान तो होना ही था. वह सिर झुका कर खड़ा हो गया. मुझे उस पर दया भी आई. उस ने सिर उठाया तो उस की आंखों में आंसू थे. उस ने कहा, ‘‘सरकार, मैं बश्ेर्म नहीं हूं. मैं ने ही कामिनी को गला घोंट कर मारा है. पूछिए, आप क्या पूछना चाहते हैं, मैं आप की सभी बातों का जवाब दूंगा.’’

इस के बाद उस ने लंबा बयान दिया, जो इस तरह था. बरकत की शादी कामिनी से हुई तो वह बहुत खुश था. कामिनी बहुत सुंदर थी. वह उस की हर बात मानता था. कामिनी ने उस की इस कमजोरी का खूब फायदा उठाया. वह उसे अंगुलियों पर नचाने लगी. लोग उसे जोरू का गुलाम कहने लगे. एक साल बीता तो लोग पूछने लगे कि बच्चा क्यों नहीं हो रहा? दोनों यही जवाब देते कि अभी जल्दी क्या है, हो जाएगा. लेकिन अकेले में जब वे इस बात पर विचार करते तो परेशान हो जाते. मर्द कैसा भी हो, वह यह कतई सहन नही कर सकता कि कोई उसे नपुंसक कहे.

बरकत ने पत्नी से कहा, ‘‘वह गांव की किसी दाई को दिखा कर पूछे कि अभी तक उसे बच्चा क्यों नहीं ठहरा.’’

कामिनी ने एक दाई को दिखाया तो उस ने कहा कि वह बिलकुल ठीक है. मर्द में ही कोई कमी हो सकती है. कामिनी ने बरकत से कहा कि वह हकीम से अपने आप को चैक कराए. बरकत ने ऐसा ही किया. हकीम ने बताया कि वह बच्चा पैदा करने लायक नहीं है. अगर वह बच्चा चाहता है तो उसे 6 महीने तक इलाज कराना होगा. हकीम ने उस का इलाज शुरू कर दिया. उसे दवा खाते 2 महीने ही हुए थे कि कामिनी ने उस से बताया कि वह मां बनने वाली है. यह सुन कर वह बहुत खुश हुआ, लेकिन पलभर बाद उसे लगा कि कामिनी मजाक कर रही है. अगर ऐसा सचमुच है तो उस के किसी से अवैध संबंध हैं.

बरकत ने हकीम से पूछा तो उस ने कहा कि 2 महीने में उस का ठीक होना कतई संभव नहीं है. यह दवा 2 कोर्स में होती है. अभी तो उस का पहला कोर्स चल रहा है. दूसरा कोर्स 3 महीने बाद शुरू होगा, जिस में बच्चा पैदा करने वाले शुक्राणु बढ़ाए जाएंगे. बरकत समझ गया कि कामिनी हराम का बच्चा लिए घूम रही है. उस ने तय कर लिया कि वह इस बात का पता लगाएगा कि कामिनी के किसी के साथ अवैध संबंध तो नहीं हैं? उस ने कई बार दिन में आ कर देखा, वह उसे घर में ही मिली. उसे लगा कि कामिनी रात को दिशामैदान जाती है, तब वह प्रेमी से मिलती होगी. उस ने रात में भी उस का पीछा किया, लेकिन उसे कोई शक वाली बात नहीं दिखाई दी.

लेकिन एक रात वह अचानक कामिनी और दारू का पीछा करता हुआ गया तो उस रात दोनों बहुत दूर निकल गईं. कब्रिस्तान के पास पहुंच कर दारू तो खेत में चली गई, जबकि कामिनी हंसती हुई कब्रिस्तान में गायब हो गई. बरकत ने आगे बढ़ कर वहां जो देखा, अवाक रह गया. कामिनी एक जवान लड़के से लिपटी हुई थी. दोनों की दबीदबी हंसी की आवाजें आ रही थीं. आगे जो हुआ, उसे देख कर बरकत को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन किसी तरह खुद पर नियंत्रण कर के वह वापस घर आ गया.

बस, वहीं से उसे पत्नी से नफरत हो गई, लेकिन कामिनी को देख कर पता नहीं उसे क्या हो जाता था कि वह सब कुछ भूल जाता था. उस ने सोचा कि सब कुछ देख कर भी वह चुप रहेगा. अगर वह कामिनी को तलाक देता है या उस की हत्या करता है तो इतनी सुंदर पत्नी से हाथ धो बैठेगा, इसलिए सब कुछ जानते हुए भी वह चुप रहा.

इस घटना के कुछ दिनों बाद कामिनी ने बरकत से कहा कि वह उसे मेला दिखा लाए. दोनों साइकिल पर मेला देखने जा रहे थे तो रास्ते में बरकत के दिमाग में हलचल मची, वह उसे मारने के बारे में सोच रहा था, लेकिन उस की भोली सूरत देख कर उस का इरादा बदल जा रहा था. यही सोचतेसोचते उस की साइकिल नहर की पुलिया पर पहुंच गई.

उसी बीच सामने से तेजी से बैलगाड़ी को आता देख कर वह संतुलन खो बैठा. बैलगाड़ी से बचने के चक्कर में वह पत्नी के साथ नहर में गिर गया. कामिनी तैरना नहीं जानती थी. वह बारबार पानी से सिर निकाल कर कह रही थी कि मुझे बचा लो. वह उसे बचाने के लिए तेजी से तैर कर गया, लेकिन तभी उसे उस की बेवफाई याद आ गई. उस ने उसे बचाने के बजाय उस की गरदन पकड़ कर दबा दी, जिस से वह मर गई.

बयान देते समय बरकत रो रहा था. मैं समझ रहा था कि उस का रोना असली है. वह दोहरे चरित्र का मालिक था. उसे कामिनी से प्रेम भी था और नफरत भी. उस का बयान सुन कर मैं आंखें बंद किए बैठा था कि तभी मेरे पठान एएसआई ने आ कर कहा, ‘सर, मैं कमाले को ले आया हूं.’ मैं ने उसे अंदर लाने को कहा. मेरे कमरे में एक सुंदर जवान आया, जो कमाले था. उस के पीछे एएसआई खड़ा था.’ मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हें पता है, कामिनी पिछले दिनों नहर में डूब कर मर गई है?’’

उस ने कहा, ‘‘जी पता है, इस की चर्चा आसपास के गांवों में फैल चुकी है.’’

‘‘तुम्हें तो कामिनी के मरने का बहुत दुख होगा?’’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

‘‘साहब, मेरा उस से क्या वास्ता? मैं तो उसे जानता तक नहीं, मुझे उस के मरने का क्यों दुख होगा?’’ उस ने कहा.

‘‘मैं ने सुना है कि तुम उस से मिलने बहुत दूर से आते थे. तुम्हारी उस से बहुत गहरी दोस्ती थी.’’

‘‘साहब, आप ने गलत सुना है. मैं तो उस को जानता तक नहीं था.’’

एएसआई, जो उस के पीछे खड़ा था, को मैं ने उसे इशारा किया. उस ने कमाले के बालों को जोर से झटका दिया तो वह नीचे गिर पड़ा. जैसे ही वह उठा, उस के गाल पर तमाचा मारा तो उस के मुंह से खून निकलने लगा.

‘‘तुम से जो पूछा जा रहा है, उसे ठीकठीक बताओ, नहीं तो खाल खींच लूंगा.’’ एएसआई ने कहा.

मैं ने कहा, ‘‘सचसच बताओ, कामिनी से तुम्हारे संबंध थे या नहीं? अगर झूठ बोले तो मैं तुम्हारी अम्मा दारू को भी बुला लूंगा, जो तुम दोनों को मिलवाती थी.’’

इस पर वह टूट गया. उस ने भी वह पूरी कहानी सुना दी, जो ऊपर लिखी गई है. मैं ने उस का बयान लिख कर उस के हस्ताक्षर करा लिए. केस मजबूत हो गया था. कमाले का बयान, बरकत का बयान, जिस लड़के ने बरकत को गला दबाते देखा था, उस की गवाही, दारू की गवाही, हकीम की गवाही. यह सब तैयार कर के मैं ने अदालत में चार्जशीट पेश कर दी.

अपराधी के बयान और सभी गवाहों के बयान से अदालत ने बरकत को मृत्युदंड की सजा दी. बरकत के वकील ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिस में उस ने कहा कि बरकत अपनी पत्नी के चरित्र से इतना दुखी हो गया था कि वह हर समय दिमागी तौर से बीमार रहने लगा था. एक दिन इसी तकलीफ के कारण उत्तेजित हो कर उस ने पत्नी की हत्या कर दी. अदालत ने उस की यह अपील मान ली और उस की मृत्युदंड की सजा कम कर के केवल 7 साल की Hindi Stories

Chandrapur Murder Case: लिवइन पार्टनर ही निकला कातिल, आत्महत्या की कहानी के पीछे छिपा था मर्डर का सच

Chandrapur Murder Case: यह मामला एक ऐसे रिश्ते की कड़वी सच्चाई को सामने लाता है, जहां भरोसा ही जानलेवा साबित हो गया. एक युवती, जो अपने पार्टनर के साथ नई जिंदगी की शुरुआत कर रही थी, उसे क्या पता था कि उस का यही फैसला उस की जिंदगी का अंत बन जाएगा. शुरुआत में इस घटना को आत्महत्या बताकर मामला शांत करने की कोशिश की गई, लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो हर कोई हैरान रह गया.

महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के दुर्गापुर थाना क्षेत्र के तुकूम इलाके में रहने वाली 29 वर्षीय प्रियंका अपने प्रेमी अंकेश योगेश बहीरवार के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. दोनों के बीच कुछ समय से नजदीकियां थीं और वे एक साथ रह रहे थे. लेकिन इस रिश्ते के पीछे क्या चल रहा था, यह किसी को नहीं पता था. जब प्रियंका की अचानक मौत की खबर सामने आई तो पहले इसे आत्महत्या बताया गया, जिस से किसी को शक न हो.

पुलिस के अनुसार, 14 मार्च,2026 की रात करीब सवा 8 बजे यह घटना हुई, लेकिन इस का खुलासा कई दिनों बाद हुआ. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ हुआ कि प्रियंका की मौत आत्महत्या नहीं, बल्कि गला घोंटकर की गई हत्या थी. जांच में सामने आया कि आरोपी ने मोबाइल चार्जर के केबल का इस्तेमाल कर उस का गला दबाया, जिस से उस की मौत हो गई.

घटना के बाद आरोपी ने परिजनों को फोन कर बताया कि प्रियंका बात नहीं कर रही है. जब परिजन मौके पर पहुंचे तो वह अचेत अवस्था में पड़ी थी और उस के गले पर निशान साफ दिखाई दे रहे थे. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. शुरुआत में पुलिस ने इसे सामान्य मौत मानते हुए मामला दर्ज किया, लेकिन बाद में रिपोर्ट आने के बाद जांच का रुख बदल गया.

2 अप्रैल,2026 को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या की पुष्टि होते ही पुलिस हरकत में आई और जांच तेज कर दी. इस के बाद आरोपी अंकेश योगेश बहीरवार को गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में कई अहम बातें सामने आने की उम्मीद है. बताया जा रहा है कि प्रियंका अपने पति से अलग हो चुकी थी और अंकेश के साथ रह रही थी, लेकिन आपसी विवाद ने इस रिश्ते को खौफनाक अंजाम तक पहुंचा दिया. पुलिस अब पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है. Chandrapur Murder Case

True Crime Story: प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल

True Crime Story: सुंदर पत्नी होने के बावजूद जसवीर सिंह अपने से आधी उम्र की लड़की के इश्क में फंस कर उस से शादी का वादा कर बैठा. पत्नी के रहते शादी नहीं हो सकती थी, इसलिए उस से छुटकारा पाने के लिए उस ने जो किया, घर ही नहीं, जिंदगी भी बरबाद कर ली.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के थाना भोजीपुरा का एक गांव है कैथोला बेनीराम. जसवीर अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. गांव का वह बेहद संपन्न किसान था. 22  नवंबर को वह बरेली शहर में रह कर पढ़ रहे अपने तीनों बच्चों से मिलने जाने लगा तो पत्नी गुरप्रीत से कहा कि चाहे तो वह भी साथ चल सकती है. गुरप्रीत को भी तीनों बच्चों से मिले काफी समय हो गया था, इसलिए उस ने सोचा कि वह भी चली जाए. एक तो बच्चों से मुलाकात हो जाएगी, दूसरे वहां से वह अपनी जरूरत के सामान भी खरीद लेगी.

गुरप्रीत तैयार हो गई तो जसवीर उसे मोटरसाइकिल से बरेली ले गया. पहले गुरप्रीत ने खरीदारी की, उस के बाद दोनों बच्चों से मिलने गई. मम्मीपापा को साथ आया देख कर बच्चे काफी खुश हुए. बच्चों से मिलने में उन्हें काफी देर हो गई. गुरप्रीत की इच्छा बच्चों को छोड़ कर घर आने की नहीं हो रही थी, लेकिन जब अंधेरा होने लगा तो जसवीर ने उस से घर चलने को कहा. गुरप्रीत को भी लगा कि देर करना ठीक नहीं है, इसलिए बच्चों को प्यार कर के वह पति के साथ मोटरसाइकिल से गांव की ओर चल पड़ी. जाड़े के दिनों में दिन छोटा होने की वजह से अंधेरा जल्दी घिर आता है. जसवीर जल्दी घर पहुंचना चाहता था, इसलिए वह खेतों के बीच बनी सड़क से तेजी से घर की ओर चला जा रहा था.

रास्ता सुनसान था. जैसे ही वह गांव के पास नत्थू मुखिया के खेतों के नजदीक पहुंचा, 2 मोटरसाइकिल सवारों ने उसे ओवरटेक कर के अपनी मोटरसाइकिल उस के आगे अड़ा दी. मजबूरन जसवीर को अपनी मोटरसाइकिल रोकनी पड़ी. तभी एक और मोटरसाइकिल उस के पीछे आ कर इस तरह खड़ी हो गई कि वह उन लोगों से बच कर भाग न सके. दोनों मोटरसाइकिलों पर बैठे चारों लोग उतर कर उस के सामने आ गए. जसवीर कुछ समझ पाता, उन में से एक ने तमंचा निकाल कर उस पर गोली चला दी. गोली उसे लगने के बजाय उस के सिर को छूते हुए निकल गई. उस ने दूसरी गोली चलाई तो वह उसे लगने के बजाय मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी गुरप्रीत की कनपटी पर जा लगी. वह नीचे गिर कर तड़पने लगी.

सड़क से थोड़ी दूरी  पर जसवीर के चाचा नरेंद्र सिंह और मामा बलविंदर सिंह खेतों में पानी लगाए हुए थे. गोली चलने की आवाज सुन कर वे उस की ओर दौड़े तो उन्हें आते देख कर बदमाश भाग गए. जसवीर ने मोटरसाइकिल की हैडलाइट के उजाले में हमलावरों में से एक को पहचान लिया था. उस का नाम नबी बख्श था और वह उस से रंजिश रखता था. बाकी लोगों के चेहरों पर कपड़ा बंधा था, इसलिए वह उन्हें नहीं पहचान पाया था. बदमाशों के भाग जाने के बाद जसवीर चाचा और मामा की मदद से बुरी तरह से घायल गुरप्रीत को अस्पताल ले जा रहा था कि रास्ते में उस की मौत हो गई. लाश अस्पताल में ही छोड़ कर वह थाना भोजीपुरा पहुंचा और थानाप्रभारी अनिल कुमार सिरोही को पूरी बात बताई.

अनिल कुमार सिरोही पुलिस बल ले कर जसवीर के साथ अस्पताल पहुंचे और लाश का निरीक्षण करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर जसवीर ने नबी बख्श और उस के 3 अज्ञात साथियों के खिलाफ जो तहरीर दी, उसी के आधार पर अपराध संख्या 637/2015 भादंवि की धारा 302/307 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद अनिल कुमार सिरोही ने नामजद नबी बख्श और उस के साथियों को पकड़ने के लिए एक टीम बनाई, जिस में सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई, कांस्टेबल धीरेंद्र सिंह, संजीव कुमार आदि को शामिल किया. इस का नेतृत्व वह खुद कर रहे थे. वह टीम के साथ नबी बख्श की तलाश में उस के घर पहुंचे तो वह घर पर ही मिल गया.

वह उसे हिरासत में ले कर थाने ले आए और जब उस से जसवीर पर जानलेवा हमला और उस की पत्नी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो उस ने कहा कि जिस समय जसवीर घटना को अंजाम देने की बात कर रहा है, उस समय तो वह कुछ लोगों के साथ अपने घर पर था. अनिल कुमार सिरोही ने जब नबी बख्श के बयान की उन लोगों से तसदीक की तो बात सही निकली. तब नबी बख्श ने कहा, ‘‘साहब, कुछ दिनों पहले औटो में बैठने को ले कर मेरा जसवीर से झगड़ा हुआ था. उस झगड़े में मारपीट भी हो गई थी. उसी मारपीट का बदला लेने के लिए जसवीर उसे और उस के साथियों को झूठे मुकदमे में फंसा रहा है.’’

अनिल कुमार सिरोही को नबी बख्श निर्दोष लगा तो उन्होंने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. अब सवाल यह था कि नबी बख्श ने गुरप्रीत की हत्या नहीं की थी तो हत्या किस ने की थी? उस की जसवीर से क्या रंजिश थी? गुरप्रीत के हत्यारों को पकड़ने की पुलिस के सामने कठिन चुनौती थी. थाना भोजीपुरा पुलिस गुरप्रीत के हत्यारों की तलाश कर ही रही थी कि पंचायत चुनाव पड़ गए, जिस से इस मामले पर वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई.

चुनाव खत्म होते ही अनिल कुमार सिरोही गुरप्रीत के हत्यारों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे कि 16 दिसंबर की शाम 4 बजे जसवीर घायल अवस्था में थाना भोजीपुरा पहुंचा. उस के पेट में गोली लगी थी, जहां से उस समय भी खून बह रहा था. संयोग से गोली एकदम किनारे लगी थी. एक तरह से वह मौत के मुंह में जाने से बालबाल बचा था. इस बार भी उस ने गोली मारने का आरोप नबी बख्श पर लगाया. जसवीर ने भले ही नबी बख्श पर आरोप लगा कर तहरीर दी थी, लेकिन थानाप्रभारी ने इस बार नामजद मुकदमा दर्ज कराने के बजाय अपराध संख्या 680/2015 पर भादंवि की 307 के तहत अज्ञात हमलावर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

एक तो अनिल कुमार ने नबी बख्श को छोड़ दिया था, दूसरे इस बार जब उस के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज नहीं किया तो जसवीर को यह बात बड़ी नागवार गुजरी, लेकिन वह कुछ करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए चुपचाप चला गया. अनिल कुमार सिरोही की समझ में नहीं आ रहा था कि जसवीर आखिर ऐसा कर क्यों रहा है? वह जिस तरह हमलों में बारबार बचा जा रहा था, उस से उन्हें लगा कि कहीं वह खुद तो ऐसा नहीं कर रहा? जसवीर जिस तरह नबी बख्श पर आरोप लगा रहा था, उस से उन्हें उस पर शक हुआ.

गुरप्रीत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, गोली उसे कनपटी से सटा कर मारी गई थी. जबकि जसवीर का कहना था कि बदमाशों ने मोटरसाइकिल रुकवा दूर से उस पर और गुरप्रीत पर गोली चलाई थी. जसवीर और नबी बख्श के बयानों की सच्चाई पता लगाने के लिए उन्होंने दोनों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. उन्होंने दोनों की काल डिटेल्स की जांच की तो जसवीर की काल डिटेल्स में 2 मोबाइल नंबर ऐसे मिले, जिन पर बहुत ज्यादा फोन किए गए थे. उन्होंने उन नंबरों की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो उसे देख कर उन्हें लगा कि यह सारा खेल जसवीर का ही खेला है.

उन्होंने सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई के नेतृत्व में कुछ पुलिस वालों को जसवीर को गिरफ्तार करने भेज दिया. गौरव बिश्नोई जसवीर के घर पहुंचे तो वह घर में ही मिल गया. वह उसे पकड़ कर थाने ले आए. अनिल कुमार सिरोही ने जसवीर से पूछताछ शुरू की तो एक बार फिर उस ने सारा आरोप नबी बख्श के ऊपर मढ़ने की कोशिश की, लेकिन जब उसे उस के दोस्त पिंकू उर्फ महेंद्र और उस की काल डिटेल्स और मोबाइल फोन की लोकेशन दिखाई गई तो उस के चेहरे का रंग उड़ गया. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने जो बयान दिया, उस के अनुसार गुरप्रीत की हत्या की कहानी कुछ इस तरह सामने आई.

बरेली के थाना भोजीपुरा के गांव कैथोला बेनीराम के रहने वाले लक्खा सिंह के बेटे जसवीर सिंह की गिनती इलाके के प्रतिष्ठित और संपन्न किसानों में होती थी. उस की सौ बीघा खेतों में लहलहाती फसल स्वयं उस की संपन्नता की कहानी बयां करती थी. हर साल गन्ने की खेती से उसे लाखों की रकम मिलती थी. 18 साल पहले उस की शादी बिलासपुर की रहने वाली गुरप्रीत कौर से हुई थी. गुरप्रीत बेहद खूबसूरत थी. उस की जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर जसवीर फूला नहीं समा रहा था. दूसरी ओर गुरप्रीत भी जसवीर जैसे बांके छैलछबीले नौजवान को जिंदगी के हमसफर के रूप में पा कर अपने मातापिता की पसंद पर गर्व कर रही थी कि जिन्होंने अपनी चांद जैसी गोरी और फूल जैसी खूबसूरत बेटी के लिए हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में एक सुखीसंपन्न दामाद ढूंढ़ा था.

जसवीर से शादी के बाद गुरप्रीत को ऐसा लगा, जैसे उस की सारी मनोकामना पूरी हो गई है. जसवीर के घर किसी चीज की कमी नहीं थी. गुरप्रीत पति से जिस भी चीज की मांग करती, वह उस की हर मांग को पलक झपकते पूरा कर देता था. क्योंकि पत्नी की खुशी में ही वह अपनी खुशी समझता था. उन का दांपत्य हंसीखुशी से गुजर रहा था. देखतेदेखते कई साल गुजर गए. इस बीच गुरप्रीत 3 बच्चों की मां बन गई. उस के तीनों बेटों के नाम गुरुशांत, रौकी और शैंकी थे. बच्चे जैसेजैसे बड़े हुए, जसवीर ने उन की पढ़ाई की व्यवस्था बरेली शहर के एक नामी स्कूल में कर दी. गुरप्रीत और जसवीर चाहते थे कि उन के तीनों बेटे पढ़लिख कर उन का नाम रौशन करें.

शादी के कुछ सालों बाद जसवीर के रंगढंग में बदलाव आने लगा तो गुरप्रीत को चिंता हुई, क्योंकि जसवीर शराब पीने के साथसाथ दूसरी औरतों में रुचि लेने लगा था. उस ने पति को खानदान की इज्जत की दुहाई देते हुए समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर पत्नी की बातों का कोई असर नहीं हुआ. वह हमेशा शराब और शबाब में डूबा रहने लगा.

गुरप्रीत ने पहले जसवीर को प्यार से समझाबुझा कर रास्ते पर लाने की कोशिश की, लेकिन जब उस की आदत में कोई सुधार नहीं हुआ तो वह उस की बुराइयों का विरोध करते हुए उस से लड़नेझगड़ने लगी. जसवीर अब तक इस सब का आदी हो चुका था, इसलिए गुरप्रीत का रोकनाटोकना उसे अच्छा नहीं लगता था. उस का मानना था कि वह उस की सारी जरूरतें पूरी कर देता है, उसे किसी चीज की कमी नहीं होने देता है तो वह बेवजह उस के रास्ते में टांग अड़ाती है. मर्दों के तो 10 तरह के शौक होते हैं, फिर उस के पास कमी ही किस चीज की है. जब उस के पास इतनी दौलत है तो उसे जिंदगी में सारे शौक पूरे कर लेने चाहिए.

शादी के इतने सालों बाद और 3 बच्चे होने से गुरप्रीत में अब पहले वाली खूबसूरती नहीं रह गई थी. जबकि जसवीर कमउम्र की खूबसूरत लड़कियों के साथ मौजमस्ती करना चाहता था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था. गुरप्रीत को गांव के किसी न किसी से पति की हरकतों के बारे में पता चल ही जाता था. उस समय तो वह पति की करतूतें सुन कर खून का घूंट पी कर रह जाती, लेकिन जब जसवीर घर आता तो वह उस की जम कर खबर लेती.

ऐसा रोजरोज होने से जसवीर का मन गुरप्रीत की ओर से उचट गया, अब वह घर आने से भी कतराने लगा. जबकि गुरप्रीत पति से पहले जैसा प्यार चाहती थी. लेकिन घर से बाहर मौजमस्ती कर के लौटे जसवीर के शरीर में इतनी ताकत नहीं होती थी कि वह पत्नी को संतुष्ट कर सके. वैसे भी अब उस की उम्र 55 साल के करीब थी. इस उम्र में वह जोश कहां होता है, जो जवानी के शुरुआती दिनों में होता है. नतीजतन गुरप्रीत कौर की सारी रात करवटों में बीत जाती.

अगले दिन वह पति की उलटीसीधी हरकतों का विरोध करते हुए उसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश करती. लेकिन पत्नी के लाख विरोध के बावजूद जसवीर पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. वह वही करता था, जो उस के मन में आता था. दौलत के मद में चूर जसवीर अपनी अय्याशियों और शौक के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहता था. एक साल पहले उस की मुलाकात बरेली के थाना सीबीगंज के गांव जौहरपुर के रहने वाले ड्राइवर बालकराम से हुई. दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी तो एक दिन वह बालकराम के साथ उस के घर चला गया. वहां उस की सयानी बेटी शानू उस के सामने आई तो जसवीर की आंख फटी की फटी रह गई.

25 वर्षीया शानू हुस्न की साक्षात मूर्ति थी. दिलफेंक स्वभाव का जसवीर उस दिन के बाद किसी न किसी बहाने उस के घर जाने लगा. शानू को समझते देर नहीं लगी कि जसवीर उस की खूबसूरती का दीवाना हो चुका है और वह उस से नजदीकियां बढ़ाने को बेताब है. बातों ही बातों में शानू जान गई कि जसवीर मोटा असामी है. उसे लगा कि अगर किसी तरह वह उस की बातों में आ गया तो वह उस के पैसों पर न केवल पूरी जिंदगी ऐश करेगी, बल्कि उस की जायदाद की मालकिन भी बन सकती है. यह सोच कर उस ने जसवीर की उम्र की परवाह न कर के उस से प्रेम में डूबी मीठीमीठी बातें करने लगी.

शानू ने निकटता बढ़ाने के लिए अपना मोबाइल नंबर जसवीर को दे दिया. फिर जसवीर शानू से फोन पर लंबीलंबी बातें करने लगा. कुछ ही दिनों में दोनों इतने नजदीक आ गए कि उन के बीच अंतरंग संबंध बन गए. जसवीर ने सूखा छावनी में हरिओम के घर में एक कमरा किराए पर ले रखा था. वहां उस का एक दोस्त पिंकू रहता था. पिंकू के साथ वह प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा करता था. शानू से मिलने के लिए यह जगह एकदम सुरक्षित थी. जसवीर जब भी बरेली आता, शानू को फोन कर के वहीं बुला लेता.

जब शानू को विश्वास हो गया कि जसवीर पूरी तरह उस के प्यार की गिरफ्त में आ चुका है और अब वह उस से हर जायजनाजायज मांगे पूरी करवा सकती है तो एक दिन प्यार के हसीन पलों के बीच उस ने जसवीर के आगे शादी का प्रस्ताव  रख दिया. जसवीर को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई. उस ने शानू को आगोश में लेते हुए शादी के लिए हां कर दी. लेकिन उस ने यह भी कहा कि शादी के पहले उसे अपनी पत्नी गुरप्रीत को रास्ते से हटाना होगा. शानू जसवीर के मुंह से पत्नी की हत्या के बाद शादी की बात सुन कर खुश हो गई. इस के बाद वह जब भी जसवीर से मिलती, उस के ऊपर शादी के लिए दबाव जरूर डालती.

सितंबर में किसी तरह गुरप्रीत को पता चल गया कि जसवीर का संबंध बरेली की किसी लड़की से है तो वह उस पर उस लड़की से संबंध तोड़ने के लिए दबाव डालने लगी. लेकिन जसवीर तो उसे ही रास्ते से हटाना चाहता था. इसलिए उस ने गुरप्रीत की हत्या की तैयारी कर ली. वह पिंकू उर्फ महेंद्र के साथ शानू से मिलने जौहरपुर गया. पिंकू जसवीर की हर बात का राजदार था. शानू को ले कर वे सीबीगंज के परसाखेड़ा इंडस्ट्रियल एरिया पहुंचे, जहां तीनों ने गुरप्रीत को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. वहां से घर लौट कर जसवीर मौके की तलाश में लग गया. गुरप्रीत को विश्वास में लेने के लिए अब वह उस से प्यार से पेश आने लगा. जसवीर का बदला व्यवहार देख कर मासूम गुरप्रीत को लगा कि शायद जसवीर की अक्ल ठिकाने आ गई है. वह उस की बातों पर विश्वास करने लगी.

21 नवंबर को जसवीर ने गुरप्रीत से बच्चों से मिलने के लिए शहर चलने को कहा तो बच्चों से मिलने के लिए लालायित गुरप्रीत उस के साथ चलने को तैयार हो गई. इस के बाद जसवीर ने पिंकू को फोन कर के बता दिया कि वह कल गुरप्रीत को ले कर शहर आएगा, इसलिए वह उस की हत्या की पूरी तैयारी कर ले. 22 नवंबर को भी जसवीर ने सुबह पिंकू को फोन किया. इस के बाद अपनी योजना के अनुसार, वह सुबह 10 बजे गुरप्रीत को ले कर घर से निकला और फतेहगंज पश्चिमी होता हुआ मिलक पहुंचा. वहां जसवीर की मामी रहती थीं. कुछ देर वहां रुक कर वह फतेहगंज और सीबीगंज होता हुआ अपने बच्चों के पास छावनी हार्डमैन पहुंचा.

गुरप्रीत को बच्चों के पास छोड़ कर वह सूखा छावनी में पिंकू से मिला और उस से कहा कि वह शाम 6 बजे गुरप्रीत को अपनी मोटरसाइकिल से ले कर सोहरा होता हुआ घर की ओर जाएगा, वह नत्थू मुखिया के खेतों के पास उस से मिले. उसी सुनसान जगह पर गुरप्रीत की हत्या करनी है. पिंकू को गुरप्रीत की हत्या की योजना समझा कर जसवीर बच्चों के पास लौट आया. शाम 6 बजे वह गुरप्रीत के साथ वापस घर जाने के लिए निकला तो रास्ते में फतेहगंज पश्चिमी चौराहे पर रुका. वहां उस ने कृष्णा से गन्ने के रुपए लिए.

उसी बीच पिंकू पहले से तय योजना के अनुसार, अगरास जाने वाले रास्ते से कैथोला बेनीराम गांव के बाहर नत्थू मुखिया के खेतों के पास पहुंच गया और जसवीर के आने का इंतजार करने लगा. जसवीर वहां पहुंचा तो पिंकू ने उसे हाथ दे कर रोक लिया. जसवीर ने गुरप्रीत को मोटरसाइकिल से उतरने के लिए कहा. अपनी हत्या से अनजान गुरप्रीत मोटरसाइकिल से उतर कर खड़ी हो गई. इस के बाद जसवीर ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की और कमर में खोंसा तमंचा निकाल कर उस की कनपटी से सटा कर गोली चला दी.

गोली लगते ही गुरप्रीत गिर कर तड़पने लगी. इस के बाद पिंकू ने तमंचा निकाला और गुरप्रीत के सीने में गोली मार दी. इस के बाद पहले से तय योजना के अनुसार, पिंकू ने अपने तमंचे में दोबारा गोली भरी और जसवीर के कान के पास लगा कर गोली चला दी, ताकि पुलिस के सामने वह खुद को निर्दोष बता कर गुरप्रीत की हत्या का आरोप अपने पुराने दुश्मन नबी बख्श पर लगा सके. इस के लिए उस ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की.  जब पुलिस ने नबी बख्श को नहीं पकड़ा तो उस ने पेट के पास तमंचा सटा कर गोली मारी और थाने पहुंच गया. लेकिन पुलिस के सामने उस की यह चालाकी भी काम नहीं आई और वह पकड़ा गया.

अनिल कुमार सिरोही ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त उस का तमंचा नत्थू मुखिया के खेत के पास से बरामद कर लिया. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने मुकदमे में पिंकू और शानू का नाम भी जोड़ दिया है. शानू को धारा 120बी का अभियुक्त बनाया गया है. कथा लिखे जाने तक पुलिस पिंकू और शानू को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी. इस बीच अनिल कुमार सिरोही का तबादला हो गया था. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Crime Story: रिश्ते जो खून में रंग गए

Suspense Crime Story: पढ़ीलिखी और अच्छे परिवार की अर्चना अजय कुमार की फेसबुक प्रोफाइल से इतना प्रभावित हुई कि उस से दोस्ती कर उस के साथ घर बसाने के सपने देखने लगी. अपनी इस चाहत को पूरा करने के लिए उस ने पति ओमप्रकाश को ही नहीं, 4 साल के बेटे शिवा को भी मौत के घाट उतार दिया…

सूरज के निकलते ही आसमान में छाई कोहरे की धुंध साफ होने लगी थी. चिडि़यों की मधुर कलरव ने सुबह होने का आभास कराया तो बागेश्वरी देवी भी उठ गईं. उन की बड़ी बहू पहले ही उठ कर फ्रेश हो गई थी. लेकिन पहली मंजिल पर रहने वाला उन का छोटा बेटा, बहू और पोता अभी तक नहीं उठा था. चायनाश्ते का समय हो गया था, इस के बावजूद वे लोग पहली मंजिल से नीचे नहीं आए थे. एक बार तो बागेश्वरी देवी को लगा कि शायद ठंड होने की वजह से वे उठ न पाए होंगे. लेकिन इतनी देर तक न कभी बेटा ओमप्रकाश सोता था और न पोता शिवा. इसलिए वह परेशान होने लगीं. वह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की कोतवाली शाहपुर के मोहल्ला अशोकनगर में रहती थीं.

मकान की ऊपरी मंजिल पर काम चल रहा था. साढ़े 8 बजतेबजते मजदूर काम पर आ गए थे, लेकिन तब तक ऊपर सो रहे लोगों में से कोई नहीं उठा था. मजदूर जैसे ही सीढि़यां चढ़ते हुए प्रथम तल पर पहुंचे, उन्हें कमरे के अंदर से दरवाजे के जोरजोर से थपथपाने और औरत के चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी. एक मजदूर ने जल्दी से दरवाजे की बाहर से लगी सिटकनी खोल दी. mअंदर से घर की छोटी बहू अर्चना तेजी से बाहर निकली और सीधे सामने वाले कमरे की तरफ भागी. उसे इस तरह भाग कर कमरे में जाते देख मजदूर हैरान रह गए.

अर्चना ने जैसे ही दरवाजे पर हाथ रखा, दरवाजा खुल गया. अंदर का दिल दहला देने वाला नजारा देख कर उस के पांव चौखट पर ही जम गए और वह जोर से चीखी. उस कमरे में बैड पर ओमप्रकाश की लाश चित पड़ी थी. फर्श पर खून ही खून फैला था. उन्हीं के बगल 4 साल के मासूम बेटे शिवा की भी लाश पड़ी थी. दोनों लाशें देख कर ही अर्चना जोर से चीखी थी. बापबेटे की लाशें देख कर मजदूरों के भी हाथपांव फूल गए. अर्चना रोतीचीखती नीचे सास बागेश्वरी देवी के पास पहुंची. बहू के मुंह से बेटे और पोते की हत्या की बात सुन उन का पूरा बदन कांपने लगा. घर में रोनापीटना मच गया. दोनों की आवाजें सुन कर पड़ोसी भी आ गए. जैसेजैसे यह खबर मोहल्ले में फैलती गई, लोग बागेश्वरी देवी के घर इकट्ठा होने लगे.

बागेश्वरी देवी की बड़ी बहू ने फोन द्वारा इस घटना की सूचना अपने पति राजकुमार को दे दी. वह उत्तर प्रदेश पुलिस में इंसपेक्टर थे. छोटे भाई और भतीजे की हत्या की बात सुन कर वह भी सन्न रह गए. उन्होंने कोतवाली शाहपुर के प्रभारी आनंदप्रकाश शुक्ला को फोन द्वारा घटना की जानकारी दे दी. इंसपेक्टर आनंदप्रकाश शुक्ला तुरंत एसआई रामकृपाल यादव, एएसआई विमलेंद्र कुमार, कांस्टेबल संतोष कुमार, रामविनय सिंह, शिवानंद उपाध्याय और जनार्दन पांडेय को साथ ले कर अशोकनगर स्थित राजकुमार यादव के घर पहुंच गए. मृतक ओमप्रकाश यादव के ससुर दीपचंद यादव राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पीएसओ थे. उन्हें जब घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने गोरखपुर रेंज के आईजी पी.सी. मीणा को फोन किया.

इस के बाद तो आईजी पी.सी. मीणा, डीआईजी आर.के. चतुर्वेदी, एसएसपी लव कुमार, एसपी हेमंत कुटीयार, सीओ कमल किशोर, क्राइम ब्रांच, एसटीएफ की टीम, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम वहां पहुंच गईं. थोड़ी ही देर में अशोकनगर पुलिस छावनी में तब्दील हो गया. पुलिस ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल की जांच की. जिस कमरे में दोनों लाशें पड़ी थीं, वहीं बैड के पास खून से सना एक हथौड़ा और एक कूदने वाली रस्सी पड़ी थी. लाशें देख कर ही लग रहा था कि हत्यारे ने हथौड़े से ओमप्रकाश की हत्या की थी, जबकि उन के बेटे का रस्सी से गला घोंटा था. पुलिस ने दोनों सामानों को कब्जे में ले लिया.

सभी को यह बात परेशान कर रही थी कि आखिर बच्चे की हत्या क्यों की गई? पुलिस की नजर जब कमरे के दरवाजे की सिटकनी पर पड़ी तो दरवाजे पर सिटकनी तोड़ने जैसा कोई निशान नहीं था. देख कर लग रहा था कि किसी ने सिटकनी के पेंच खोल कर उसे फर्श पर रख दिया था. जबकि पूछताछ में अर्चना ने बताया था कि उस के पति अंदर से सिटकनी बंद कर के सोए थे. उस ने यह भी कहा था कि लूटपाट का विरोध करने पर लुटेरों ने हथौड़े से उस के पति की हत्या की होगी. उसी समय बच्चा जा गया होगा, तब पहचाने जाने के डर से उन्होंने बच्चे को भी मार दिया होगा. लूटपाट के दौरान खटपट की आवाज सुन कर वह आ न जाए, इसलिए बदमाशों ने उस के कमरे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी थी.

अर्चना का बयान पुलिस को कुछ अजीब लग रहा था. बागेश्वरी देवी के बड़े बेटे इंसपेक्टर राजकुमार आ गए तो वह उस कमरे में गए, जहां दोनों लाशें पड़ी थीं. उन्होंने भी कमरे का निरीक्षण किया. उन्हें भी साफ लग रहा था कि यह लूट का मामला नहीं है. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. मृतक की मां बागेश्वरी देवी की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ दोनों हत्याओं का मुकदमा दर्ज कर लिया. यह 21 जनवरी, 2016 की बात है.

यह मामला एक तो विभागीय था, दूसरे बात मुख्यमंत्री तक पहुंच चुकी थी, इसलिए उसी दिन शाम को आईजी पी.सी. मीणा, एसएसपी लव कुमार ने एसपी (सिटी) हेमंत कुटीयार, एसपी (क्राइम ब्रांच) मानिकचंद और सीओ (कैंट) कमल किशोर को बुला कर विचारविमर्श करने के साथ इस केस का जल्द से जल्द खुलासा करने के निर्देश दिए. एसएसपी लव कुमार के निर्देश पर थानाप्रभारी आनंदप्रकाश शुक्ला ने सब से पहले मृतक ओमप्रकाश और उन की पत्नी अर्चना के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. ओमप्रकाश की काल डिटेल्स से तो कुछ खास नहीं मिला, लेकिन अर्चना की काल डिटेल्स चौंकाने वाली थी. रात साढ़े 12 से डेढ़ बजे के बीच उस ने एक नंबर पर कई फोन किए थे.

जांच में पता चला कि वह नंबर फिरोजाबाद जिले के स्वामीनगर के रहने वाले अजय कुमार यादव का था और उस के फोन की लोकेशन 20 जनवरी की दोपहर के बाद से ले कर उस समय तक गोरखपुर की थी. यही नहीं, इस के पहले भी उस नंबर पर अर्चना की दिन में कईकई बार लंबीलंबी बातें होती रही थीं. सारा माजरा पुलिस की समझ में आ गया. अर्चना शक के दायरे में आ गई, लेकिन पुलिस ने इस बात का अहसास किसी को नहीं होने दिया. अजय कुमार गोरखपुर में ही था, लेकिन पुलिस के पास उस का कोई फोटो नहीं था, जिस से उसे पहचाना जा सके.

अजय कुमार के फोटो के लिए पुलिस ने सोशल साइट फेसबुक खंगाली तो उस में उस का फोटो मिल गया. लेकिन फेसबुक पर पड़े उस के फोटो देख कर एक बारगी पुलिस को झटका सा लगा, क्योंकि एक फोटो में वह समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ बैठक में था तो दूसरे फोटो में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हाथ मिला रहा था. उन्होंने यह बात एसएसपी लव कुमार को बताई तो उन्होंने कहा कि स्थितियों से साफ लगता है कि इन हत्याओं में उसी का हाथ है, इसलिए उसे तुरंत गिरफ्तार करो. देर होने पर वह हाथ से निकल सकता है.

मोबाइल की लोकेशन से पुलिस को पता चल गया था कि अजय कुमार बसअड्डे पर है. पुलिस को फोटो मिल ही गया था, इसलिए 22 जनवरी की सुबह पुलिस ने बसअड्डे को घेर लिया. बसअड्डे पर भारी मात्रा में पुलिस बल देख कर अजय ने भागने की कोशिश तो की, लेकिन वह भाग नहीं सका. पुलिस उसे पकड़ कर सीधे शाहपुर कोतवाली ले आई. अजय कुमार के पकड़े जाने की सूचना मिलते ही एसएसपी लव कुमार और एसपी (सिटी) हेमंत कुटीयार थाने आ गए. अजय ने खुद को समाजवादी पार्टी का नेता बताते हुए बिना वजह थाने लाए जाने पर रौब तो खूब झाड़ा, लेकिन जब उस के सामने काल डिटेल्स रखी गई तो उस की सारी हेकड़ी निकल गई.

रुआंसी आवाज में हाथ जोड़ कर उस ने पुलिस अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. अर्चना की बातों में आ कर मुझ से यह अपराध हो गया. उसी ने मुझ पर पति और बच्चे को रास्ते से हटाने का दबाव डाला था.’’

इस के बाद अजय ने ओमप्रकाश और उन के 4 साल के मासूम बेटे की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. अजय ने स्वीकार कर लिया कि इन हत्याओं में अर्चना का भी हाथ था. इसलिए पुलिस अर्चना को गिरफ्तार करने के लिए अजय को साथ ले कर अशोकनगर कालोनी पहुंच गई. उस समय इंसपेक्टर राजकुमार के घर परिवार वाले तो थे ही, अर्चना के पिता दीपचंद भी मौजूद थे. पुलिस अधिकारी पूछताछ के बहाने उसे लौन में वहां ले आए, जहां अजय कुमार खड़ा था. उसे पुलिस हिरासत में देख कर अर्चना का चेहरा सफेद पड़ गया.

अजय को देख कर अर्चना समझ गई कि उस का खेल खत्म हो गया है. अब उस के सामने अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं है. इस से पहले कि उस से पुलिस कुछ पूछती, उस ने खुद ही कह दिया,  ‘‘हां, मैं ने ही अजय के साथ मिल कर पति और बेटे की हत्या की है. मुझे इस का कोई मलाल भी नहीं है.’’

अर्चना के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन कर वहां खड़े लोग दंग रह गए. बेटी की करतूत पर दीपचंद तो गश खा कर गिर पड़े और बेहोश हो गए. पुलिस ने अर्चना को भी गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद एसएसपी लव कुमार ने पुलिस लाइंस में प्रैसवार्ता आयोजित कर अर्चना और अजय कुमार को पत्रकारों के सामने पेश किया तो दोनों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए ओमप्रकाश और उन के 4 साल के बेटे की हत्या के पीछे की पूरी कहानी सुना दी. इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के थाना जमनिया के खलीलचक ढडनी के रहने वाले भोलानाथ यादव का 5 लोगों का छोटा सा परिवार था. उन 5 लोगों में 2 तो वह पतिपत्नी थे, बाकी 2 बेटे राजकुमार व ओमप्रकाश और एक बेटी प्रमिला. भोलानाथ साधनसंपन्न किसान थे, इसलिए अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाई. पढ़लिख कर बड़ा बेटा राजकुमार यादव उत्तर प्रदेश पुलिस में सबइंसपेक्टर हो गया तो दूसरा बेटा ओमप्रकाश यादव नेत्र परीक्षक. पिता की मौत के बाद राजकुमार ने पूरे परिवार को अपने साथ रख लिया था. उन की पोस्टिंग गोरखपुर हुई तो वहां किराए पर रहते हुए उन्होंने कोतवाली शाहपुर के अंतर्गत बशारतपुर की पौश कालोनी अशोकनगर में जमीन खरीद कर अपना मकान बनवा लिया.

राजकुमार की शादी हो चुकी थी, ओमप्रकाश ने नेत्र परीक्षक का डिप्लोमा कर लिया तो उन की भी शादी सिंगापुर में हो गई. शादी के बाद ओमप्रकाश पत्नी को सिंगापुर से गोरखपुर ले आए. पत्नी को गोरखपुर में अच्छा नहीं लगा तो 6 महीने बाद ही वह सिंगापुर लौट गई. उस ने ओमप्रकाश को भी वहां आने को कहा, लेकिन ओमप्रकाश घरपरिवार छोड़ कर जाना नहीं चाहते थे, इसलिए मना कर दिया. दोनों ही अपनीअपनी जिद पर अड़े थे. इसी जिद ने उन के बीच तलाक करा दिया. इस के बाद सन 2009 में 34 साल के ओमप्रकाश की दूसरी शादी लखनऊ के रहने वाले पीएसी के कंपनी कमांडर दीपचंद यादव की बड़ी बेटी अर्चना से हो गई. उस समय अर्चना यही कोई 19 साल की थी.

उन की 2 बेटियों में अर्चना बड़ी थी. वह पढ़ीलिखी और खूबसूरत तो थी ही, स्वच्छंद स्वभाव की भी थी. अकेली घूमना, दोस्ती करना और महंगे मोबाइल फोन रखना उसे अच्छा लगता था. यह प्रवृत्ति उस की शादी के बाद भी बनी रही. खूबसूरत अर्चना को पा कर ओमप्रकाश खुश थे. करीब साल भर बाद उन के घर बेटा पैदा हुआ तो पतिपत्नी ने प्यार से उस का नाम नितिन रखा. घर में सभी उसे प्यार से शिवा कहते थे.  इस तरह ओमप्रकाश का घर खुशियों से भर गया.

ओमप्रकाश जिस मकान में परिवार के साथ रहते थे, वह उन के बड़े भाई राजकुमार यादव का था. वह भी भाई की तरह अपनी मेहनत की कमाई से एक घर बनाना चाहते थे, जिसे वह अपना कह सकें. अपने सपनों का महल खड़ा करने के लिए उन्होंने जीतोड़ मेहनत की. आखिर उन की मेहनत सफल हुई और उन्होंने थाना गुलरिहा के मोगलहा में जमीन खरीद कर सुंदर सा अपना घर बनवा लिया. 13 फरवरी, 2016 को उन के बेटे नितिन उर्फ शिवा का जन्मदिन था, उसी दिन वह अपने नए मकान में जाने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन उन का यह सपना सपना ही रह गया. क्योंकि अर्चना और ओमप्रकाश के जो 5 साल हंसीखुशी से बीते थे, पिछले साल से उन की खुशियों में अचानक ग्रहण लग गया था.

ओमप्रकाश की बशारतपुर के एक कौंप्लेक्स में औप्टिकल्स की दुकान थी. उन के दुकान पर चले जाने के बाद अर्चना घर में खाली रहती थी. बूढ़ी सास बागेश्वरी देवी और जेठानी नीचे के कमरे में रहती थीं, जबकि वह पहली मंजिल पर. खाली समय में वह टीवी देख कर समय बिताती थी या फिर मोबाइल पर सोशल साइट फेसबुक पर दोस्तों के साथ चैटिंग करती थी. किसी दिन फेसबुक के ‘ऐडेड फ्रैंड’ लिस्ट में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हाथ मिलाते हुए था सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ बैठे अजय कुमार यादव पर उस की नजर पड़ी तो वह उस से काफी प्रभावित हुई.

उस ने अजय की प्रोफाइल खोल कर देखी तो उस में उस का पता गांव स्वामीनगर, थाना शिकोहाबाद, जिला फिरोजाबाद दिया था. उस का मोबाइल नंबर भी उस में था. अर्चना ने अपने फेसबुक के मुख्य पेज पर अपनी शादी से पहले की आकर्षक फोटो लगा रखी थी. अजय की राजनीतिक पहुंच देख कर उस ने उसे ‘फ्रेंड रिक्वैस्ट’ भेज दी तो अजय की ओर से रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली गई. उस के बाद उन के बीच चैटिंग शुरू हो गई. जल्दी ही दोनों गहरे दोस्त बन गए.

अजय कुमार यादव फिरोजाबाद के थाना शिकोहाबाद के गांव स्वामीनगर का रहने वाला था. दो भाइयों में वही बड़ा था. उस के घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. गांव में उस के पिता श्यामबहादुर यादव की किराने की दुकान थी. पिता के न रहने पर अजय भी दुकान पर बैठता था. उस की शादी भी हो चुकी थी. पत्नी काफी खर्चीली थी, जबकि उस के खर्च पूरे करने का अजय के पास कोई साधन नहीं था, इसलिए जल्दी ही दोनों में तलाक हो गया था. पत्नी के चले जाने के बाद अजय अकेला हो गया था. उस के बाद वह समाजवादी पार्टी से जुड़ गया और मेहनत की बदौलत जल्दी ही युवजन सभा में जिला स्तर का पद पा लिया.

फिर तो उस का बड़े नेताओं के बीच उठनाबैठना होने लगा. ऐसे में ही उस का फोटो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ भी खिंच गया, जिसे उस ने फेसबुक पर अपलोड कर दिया. इस फोटो को काफी लोगों ने लाइक किया. इसी दौरान अजय ने दूसरी शादी कर ली. दूसरी पत्नी से 2 बच्चे पैदा हुए. लेकिन दूसरी पत्नी से भी उस की अनबन रहने लगी और वह भी नाराज हो कर बच्चों के साथ मायके चली गई. यह 2 साल पहले की बात है. इधर पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से अजय को पार्टी से निकाल दिया गया. लेकिन उस के उस फोटो को देख कर अर्चना तो उस से प्रभावित हो ही चुकी थी.

अजय और अर्चना की दोस्ती होने के बाद जबतब उन की फोन पर भी बातचीत होने लगी थी. जल्दी ही उन की दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे. इसी का नतीजा था कि मई, 2015 में अर्चना ने अजय को अपने मायके लखनऊ में मिलने के लिए बुला लिया. उस ने उसे मायके में इसलिए बुलाया था, ताकि मिलने में कोई बाधा उत्पन्न न हो. वहां मां के अलावा घर में कोई और नहीं रहता था. पापा दिन में ड्यूटी पर चले जाते थे, छोटी बहन वंदना की शादी ही हो चुकी थी. वह अपनी ससुराल में रहती थी.

पति से बहाना कर के अर्चना बेटे को ले कर मायके आ गई. अजय उस के दिए पते पर लखनऊ पहुंच गया. अर्चना ने मां से अजय का परिचय पुराने दोस्त के रूप में कराया. इस के बाद दोनों एकांत में मिले तो खुद को रोक नहीं पाए और वासना के प्रवाह में ऐसे बहे कि मर्यादा भंग कर बैठे. अजय अर्चना से मिल कर फिरोजाबाद लौट गया तो अगले दिन अर्चना भी लखनऊ से गोरखपुर आ गई. इस के बाद उस ने ओमप्रकाश को महत्त्व देना बंद कर दिया. वह हर घड़ी मोबाइल से ही चिपकी रहती. उस की यह आदत न पति को अच्छी लग रही थी और न ही सास को. जब भी कोई उस से कुछ पूछता, वह कोई बहाना बना देती. धीरेधीरे ओमप्रकाश को उस पर शक होने लगा.

इस बीच अजय अर्चना से मिलने उस के ससुराल भी आने लगा था. सास बागेश्वरी देवी ने इस नए चेहरे को देखा तो पूछ बैठीं कि यह कौन है? तब उस ने खुद को अर्चना का दूर का रिश्तेदार बता दिया था, वह अर्चना के सभी रिश्तेदारों को जानती थीं. इतने दिनों बाद यह नया रिश्तेदार कौन आ गया, यह बात बागेश्वरी देवी के गले नहीं उतरी तो उन्होंने ओमप्रकाश से बात की. ओमप्रकाश ने जब अर्चना से अजय के बारे में पूछा तो अपनी गलती मानने के बजाय वह पति से लड़ने पर आमादा हो गई. बस उसी दिन के बाद उन के रिश्ते में जो दरार पड़ी, वह धीरेधीरे बढ़ती ही गई.

पतिपत्नी के बीच इतनी दूरियां बढ़ गईं कि लगभग रोज ही घर में महाभारत होने लगा. यही नहीं, दोनों अलगअलग कमरों में सोने लगे. ओमप्रकाश नितिन को ले कर सोता था, जबकि अर्चना दूसरे कमरे में अकेली सोती थी. एक तरह से अब अर्चना के लिए पति उस के प्रेम में रोड़ा बन रहा था. रोजरोज के झगड़े से वह ऊब चुकी थी. इसी का नतीजा था कि उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए अजय से बात की. अजय उस के लिए कुछ भी करने को तैयार था, इसलिए वह उस का साथ देने के लिए राजी हो गया.

20 जनवरी, 2016 को पड़ोस में रवि राय के यहां सालगिरह का कार्यक्रम था, जिस में ओमप्रकाश भी सपरिवार जाना था. यही दिन अर्चना को पति को रास्ते से हटाने के लिए उचित लगा. उस ने अजय को फोन कर के 20 जनवरी को गोरखपुर बुला लिया. 3 बजे दोपहर अजय गोरखपुर पहुंच गया. उस समय मकान में काम चल रहा था, इसलिए बागेश्वरी देवी ऊपर थीं. अर्चना ने पीछे की सीढि़यों से अजय को अपने कमरे में ला कर छिपा दिया.

देर शाम ओमप्रकाश लौटे तो पत्नी से पार्टी में चलने को कहा. उस समय सिर दर्द का बहाना बना कर अर्चना ने पार्टी में जाने से मना कर दिया. ओमप्रकाश ने भी जाने की जिद नहीं की. बेटे को तैयार किया और खुद भी तैयार हो कर चले गए. पति के जाने के बाद अर्चना ने अजय को बाहर निकाला और उसे खिलायापिलाया. ओमप्रकाश के लौटने का समय हुआ तो उसे फिर छिपा दिया. रात करीब 11 बजे ओमप्रकाश बेटे के साथ पार्टी से लौटे और बेटे के साथ अपने कमरे में सो गए. सोते समय उन्होंने दरवाजे की सिटकनी अंदर से बंद नहीं की. मजदूरों के  जाने के बाद उन के औजारों से हथौड़ा निकाल कर अर्चना ने अपने कमरे में पहले ही रख लिया था.

बच्चों की कूदने वाली रस्सी भी उस ने रख ली थी. अपनी इस योजना को वह किसी भी तरह से विफल नहीं होने देना चाहती थी. सब के सो जाने के बाद अर्चना रात एक बजे के करीब दबे पांव अपने कमरे से निकली और पति के कमरे में गई. देखा कि बापबेटे गहरी नींद में सो रहे हैं तो वापस आई और अजय को हथौड़ा और रस्सी थमा कर एक बार फिर पति के कमरे में आ गई. अर्चना ने उसे पति पर वार करने के लिए इशारा किया तो अजय ने हथौड़े से ओमप्रकाश के सिर पर पूरी ताकत से वार कर दिया. भरपूर वार से ओमप्रकाश भले ही चीख नहीं पाया, लेकिन शरीर ने तो हरकत की ही, जिस से नितिन जाग गया. पापा को मारते देख वह चिल्लाने लगा. अर्चना डर गई. दूसरी ओर संगमरमर के फर्श पर खून देख कर अजय भी कांप उठा.

अर्चना ने अजय से बच्चे को खत्म करने को कहा तो अजय की हिम्मत जवाब दे गई. उस ने मना किया तो भेद खुलने के डर से अर्चना कांप उठी. तब उस ने खुद ही बेटे का गला पकड़ लिया. उस समय मां की वह ममता भी नहीं जागी, जिस के बारे में कहा जाता है कि मां की ममता से बढ़ कर इस दुनिया में कुछ भी नहीं है. मां मर सकती है, लेकिन अपने बच्चों को खरोंच तक नहीं आने दे सकती. लेकिन वासना में अंधी अर्चना ने बेटे को गला दबा कर मार दिया.

पुलिस और घर वालों को गुमराह करने के लिए अर्चना ने घर का सामान बिखेर दिया साथ ही सिटकनी खोल कर फर्श पर रख दी, ताकि सभी को यही लगे कि लूट की नीयत से सिटकनी तोड़ कर अंदर आए लुटेरों ने ओमप्रकाश और नितिन की हत्या कर दी है. इस के बाद दोनों ने बाथरूम में जा कर खून से सने हाथपैर धोए और कमरे में जा कर सो गए.

सुबह 4 बजे दोनों उठे तो अर्चना ने दरवाजा खोल कर बाहर झांका. कोई दिखाई नहीं दिया तो उस ने पीछे की सीढ़ी से अजय को बाहर निकाल दिया. अजय वहां से निकल कर गोरखपुरमहारागंज राष्ट्रीय राजमार्ग पर आया और टैंपो से बसअड्डे पर जा कर छिप गया. वह वहां इसलिए रुका था, क्योंकि अगले दिन अर्चना भी उस के साथ जाने वाली थी. वह अर्चना को ले जा पाता, उस के पहले ही पुलिस ने मोबाइल की लोकेशन के आधार पर उसे पकड़ लिया.

अर्चना ने प्रेमी अजय के साथ मिल कर जो किया, उस की सजा उसे अवश्य मिलेगी. अब उन की बाकी की जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे बीतेगी. लेकिन अर्चना को अभी भी अपने किए का दुख नहीं है. Suspense Crime Story

—कथा पुल

Crime Story Hindi: गलतफहमी ने बनाया दोस्त को दुश्मन

Crime Story Hindi: सजल और निश्चल गहरे दोस्त थे. निश्चल की प्रेमिका राखी ने उस से दूरियां बनानी शुरू कीं तो निश्चल को लगा कि उस की प्रेमिका को सजल ने ही उस के खिलाफ भड़काया है. इस गलतफहमी के चलते उस ने एक ऐसी खतरनाक योजना बनाई कि…

दोस्ती में आदमी एकदूसरे की आदतों, बातों और इरादों से अच्छी तरह परिचित हो जाता है. उस बीच दोनों एकदूसरे को काफी हद तक जान चुके होते हैं. दोस्ती की इसी पगडंडी पर चलते हुए शुरू किया गया प्यार का सफर लंबा चलता है. निश्चल ने भी राखी के साथ प्यार के खुशनुमा सफर की शुरुआत दोस्ती के बाद ही की थी. उन का प्यार इतनी गहराई तक पहुंच गया था कि उन्होंने ख्वाबों का एक महल भी बना लिया था, लेकिन एक दिन निश्चल को अचानक अपने ख्वाब तब टूटते नजर आए, जब राखी की बातों में अचानक बेरुखी की हवाएं तैरने लगीं.

पहले तो निश्चल ने प्रेमिका की बेरुखी को नजरंदाज करने की कोशिश की, लेकिन एक दिन तो हद हो गई. उस दिन उस ने आदतन राखी के मोबाइल पर फोन किया तो उस ने बड़ी बेरुखी से कहा, ‘‘कहो, किसलिए फोन किया है?’’

राखी के इस व्यवहार पर निश्चल पहले तो हैरान हुआ, फिर भी उस की बेरुखी को नजरअंदाज करते हुए बड़े प्यार से बोला, ‘‘कैसी बात कर रही हो, अपने प्यार से बात करने की भी कोई वजह होती है क्या. दिल ने याद किया तो मैं ने तुम्हारा नंबर मिला दिया.’’

‘‘वह तो ठीक है निश्चल, पर मैं चाहती हूं कि अब हमारा इस तरह ज्यादा बातें करना ठीक नहीं है.’’ राखी ने उसी लहजे में जवाब दिया.

राखी की इन बातों और व्यवहार से निश्चल का दिमाग घूम गया. उस ने कहा, ‘‘राखी, तुम्हें क्या हो गया है. तुम ये कैसी अजीब बातें कर रही हो?’’

‘‘मैं जो कह रही हूं, ठीक ही कह रही हूं. अब पता नहीं तुम्हें यह सब अजीब क्यों लग रहा है.’’ राखी तुनक कर बोली.

‘‘मैं एक बात कहूं राखी?’’ निश्चल ने कहा.

‘‘हां, कहो.’’

‘‘मैं पिछले 2-3 दिनों से महसूस कर रहा हूं कि तुम काफी बदल सी गई हो. बताओ मुझ से ऐसी क्या गलती हो गई है?’’ निश्चल ने माहौल सामान्य करने की गरज से कहा.

‘‘ऐसी तो कोई बात नहीं है निश्चल. फिर भी तुम्हें ऐसा लगता है तो मैं भला इस में क्या कर सकती हूं.’’ राखी ने निराश करने वाले अंदाज में कहा.

‘‘क्या तुम मेरे प्यार का इम्तिहान ले रही हो?’’ निश्चल ने पूछा.

‘‘मैं कौन होती हूं ऐसा करने वाली. वैसे भी मुझे अभी बहुत काम है. अब हम बाद में बात करेंगे. ओके बाय.’’ कहने के साथ ही राखी ने फोन काट दिया.

निश्चल यह सोचसोच कर परेशान था कि राखी को अचानक न जाने ऐसा क्या हो गया है, जो वह इस तरह का व्यवहार करने लगी है. उसी दौरान उस के दिमाग में आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि राखी को उस की वे बातें पता चल गई हों, जो राज बनी रहनी चाहिए थीं. इस के बाद वह यह सोचने लगा कि राखी को ऐसी बातें भला कौन बताएगा? इस पर उस ने सोच के घोड़े दौड़ाए तो कुछ देर बाद गहरी सांस ले कर हलके से बुदबुदाया, ‘ओह, अब समझ में आया, सजल ने ही राखी को उस के बारे में बताया होगा.’

अपने इस खयाल की पुष्टि के लिए उस ने फिर से राखी का मोबाइल मिलाया तो राखी ने पूछा, ‘‘अब क्या हुआ, मैं ने कहा तो था कि बाद में बात करेंगे.’’

‘‘राखी, मुझे एक बात पूछनी थी.’’ निश्चल बोला.

‘‘बताओ क्या पूछना है?’’

‘‘मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या तुम्हारी सजल से कोई बात हुई थी?’’ निश्चल ने पूछा.

‘‘हां, हुई तो थी, लेकिन इस में बुरा क्या है. वह तुम्हारा अच्छा दोस्त है.’’ राखी ने कहा.

‘‘मुझे लगता है कि उसी ने मेरे बारे में तुम से कुछ उलटीसीधी बातें की हैं, तभी तुम बदल गई हो.’’ निश्चल ने अपने मन की बात कही.

‘‘सौरी निश्चल, मैं इस बारे में कोई कमेंट नहीं करना चाहती.’’

राखी बात को खींचना नहीं चाहती थी, इसलिए उस ने बात को यहीं विराम देना चाहा.

लेकिन निश्चल राखी से सच्चाई जानना चाहता था, इसलिए उस ने पूछा, ‘‘तो फिर इस बेरुखी की वजह क्या है, यह तो बता दो?’’

‘‘मैं कुछ नहीं बताना चाहती, बाय.’’ पीछा छुड़ाते हुए राखी ने अपनी बात खत्म कर दी.

निश्चल उस के इस रूखे और उपेक्षित व्यवहार से ठगा सा रह गया. निश्चल अरोड़ा उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के कस्बा बेहट की संजय कालोनी निवासी रमेश अरोड़ा का बेटा था. राखी भी उसी कालोनी में रहती थी. कुछ महीने पहले ही दोनों के बीच दोस्ती के बाद प्यार हो गया था. दोनों अकसर मोबाइल पर लंबीलंबी बातें और चैटिंग किया करते थे. राखी के प्यार से निश्चल की जिंदगी में जैसे बहार आ गई थी. लेकिन राखी का अचानक बदला रुख उसे परेशान करने लगा था. उस का ही एक दोस्त था सजल चुघ.

25 वर्षीय सजल की कस्बे में ही छोटे चौक पर पुश्तैनी किराने की दुकान थी. वह एक प्रतिष्ठित परिवार से था. उस के पिता राजेंद्र चुघ दुकान संभालते थे, जबकि चाचा मुकेश चुघ व्यापारी नेता थे. सजल व निश्चल न सिर्फ गहरे दोस्त थे, बल्कि वे एकदूसरे के हमराज भी थे. इसी दोस्ती के नाते निश्चल ने उस का परिचय अपनी प्रेमिका राखी से करा दिया था. सजल निश्चल की गैरमौजूदगी में भी कभीकभी राखी से बातें कर लिया करता था. इसीलिए राखी के बदले रवैए के पीछे निश्चल यह मान बैठा था कि सजल ने ही उस के बारे में राखी से कोई ऐसी बात कह दी होगी, जिस से राखी उस से दूरियां बना रही है.

जिंदगी के बहुत मौकों पर इंसान गलतफहमियों का शिकार हो जाता है. गहरे दोस्त होने के नाते निश्चल को यूं तो अपने मन में पल रही गलतफहमियों को बातचीत के जरिए दूर कर लेना चाहिए था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. वह दोस्ती में ऐसी बातें कर के खुद को छोटा साबित नहीं करना चाहता था. अलबत्ता वह मन ही मन सजल से नाराज रहने लगा था. इतना ही नहीं, उस ने उस के खिलाफ एक खतरनाक योजना तक बना डाली थी.

12 नवंबर, 2015 की रात को सजल दुकान बंद कर के घर आया और करीब सवा 8 बजे अपने दादा बाबूराम चुघ से घूमने जाने की बात कह कर घर से निकल गया. वह अकसर इसी तरह जाता था. लेकिन वह आधे घंटे बाद घर वापस आ जाता था, जब उस दिन 2 घंटे बाद भी वह वापस नहीं आया तो घर वालों ने उस के मोबाइल पर फोन किया. उस का फोन स्विच्ड औफ मिला. सजल के पास एक और मोबाइल फोन था. घर वालों ने उस फोन का नंबर मिलाया. उस पर घंटी तो जा रही थी, लेकिन वह फोन रिसीव नहीं कर रहा था. घर वालों ने 2-3 बार उस नंबर पर फोन किया. हर बार घंटी बजती रही, लेकिन फोन नहीं उठा.

इस के बाद घर के सभी लोग सजल को ढूंढ़ने निकल पड़े. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. रात में कई बार उसे फोन किया गया, लेकिन उस ने एक भी फोन का जवाब नहीं दिया. उस की चिंता में घर वाले रात भर जागते रहे. अगली सुबह उस का दूसरा मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ हो गया. उस के इस तरह अचानक लापता होने का कारण किसी की समझ में नहीं आ रहा था. सजल के करीबी दोस्त निश्चल अरोड़ा और अनुज सक्सेना भी परेशान थे.

सभी लोगों को यही लग रहा था कि किसी ने फिरौती के लिए उस का अपहरण कर लिया है. जब कहीं से सजल के बारे में कुछ पता नहीं चला तो उस के पिता राजेंद्र चुघ अपने रिश्तेदारों के साथ थाना कोतवाली पहुंचे और थानाप्रभारी नरेश चौहान से मिल कर सजल की गुमशुदगी दर्ज करा दी. मामला एक प्रतिष्ठित व्यापारी के बेटे के लापता होने का था, इसलिए पुलिस भी इस मामले को ले कर चिंतित थी. उसी दिन पुलिस को सूचना मिली कि बेलका गांव के पास बेहट शाकुंभरी मार्ग पर ऋषिपाल के आम के बाग में एक युवक की लाश पड़ी है.

खबर मिलते ही नरेश चौहान पुलिस टीम के साथ उस बाग में पहुंच गए. वह लाश एक 24-25 साल के लड़के की थी. शव खून से लथपथ था. देख कर ही लगता था कि उस के सिर पर गोली चलाई गई थी. शव के नजदीक ही 2 मोबाइल पड़े थे. एक मोबाइल की बैटरी निकली हुई थी, जबकि दूसरा स्विच्ड औफ था. उसी दिन व्यापारी राजेंद्र चुघ ने अपने बेटे सजल की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. उन्होंने उस का जो हुलिया बताया था, वह उस मृत युवक से मेल खा रहा था. यह लाश कहीं सजल की तो नहीं है, जानने के लिए थानाप्रभारी ने फोन कर के राजेंद्र चुघ को बाग में ही बुला लिया. राजेंद्र चुघ अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंचे तो लाश देखते ही रो पड़े. उन की पत्नी को तो इतना सदमा पहुंचा कि वह बेहोश हो गईं.

राजेंद्र चुघ ने उस लाश की पहचान अपने बेटे सजल के रूप में की. उन्होंने बताया कि दोनों मोबाइल सजल के ही हैं. शव के पास लाल रंग की एक हवाई चप्पल पड़ी थी, जो मृतक की नहीं थी. पुलिस ने सोचा कि शायद यह हत्यारे की है. मामला हत्या का था, इसलिए सूचना पा कर एसपी चरण सिंह यादव, एसपी (देहात) जगदीश शर्मा भी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने भी मौकामुआयना किया. शव के आसपास किसी वाहन के टायरों के निशान भी थे. सजल की हत्या से कस्बे में सनसनी फैल गई थी. हत्या के विरोध में कस्बे के बाजार बंद हो गए. सैकड़ों व्यापारी घटनास्थल पर जमा हो गए. सभी व्यापारी हत्यारों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे.

पुलिस ने व्यापारियों को समझाबुझा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया. एसएसपी राजेंद्र प्रसाद यादव ने नरेश चौहान को केस का जल्द से जल्द खुलासा करने को कहा. इस के अलावा उन्होंने क्राइम ब्रांच के तेजतर्रार इंसपेक्टर संजय पांडेय को भी इस केस की जांच में लगा दिया. पुलिस टीम हत्या की वजह तलाशने में जुट गई. पुलिस ने मृतक के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से कोई रंजिश होने से इंकार कर दिया. एक बात साफ थी कि हत्यारे सजल के करीबी थे. क्योंकि इतनी दूर उन के साथ वह अपनी मरजी से ही गया था.

जवान बेटे की मौत से चुघ परिवार में कोहराम मचा था. पुलिस अच्छी तरह जानती थी कि अगर केस का खुलासा नहीं हुआ तो बड़ा बखेड़ा खड़ा होगा, इसलिए पुलिस हत्यारों की तलाश में लग गई. अगले दिन पुलिस को कुछ लोगों से पता चला कि 12 नवंबर की रात को उन्होंने सजल के साथ निश्चल और अनुज को जाते देखा था. इस खबर की पुष्टि के लिए पुलिस ने सजल के मोबाइल की लोकेशन के साथ निश्चल और अनुज के मोबाइल की लोकेशन निकलवाई.

तीनों के मोबाइल फोनों की लोकेशन साथसाथ पाई गई. शक पुख्ता होने पर नरेश चौहान ने निश्चल और अनुज को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने सजल की हत्या में अपना हाथ होने से साफ इंकार कर दिया. लेकिन जब मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर उन से पूछताछ की तो वे ज्यादा देर तक पुलिस को गुमराह नहीं कर सके. उन्हें सच बोलने पर मजबूर होना पड़ा. इस के बाद उन्होंने सजल की हत्या का चौंकाने वाला राज उगला. पता चला कि महज गलतफहमी में एक दोस्त दूसरे की जान का दुश्मन बन गया था.

दरअसल, निश्चल अपनी प्रेमिका राखी के व्यवहार में आए बदलाव की वजह नहीं समझ पाया था. इस बात को ले कर वह परेशान रहने लगा था. एक दिन उस ने राखी से जिद कर के पूछने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘राखी, तुम इतनी बदल क्यों गई हो?’’

‘‘निश्चल, ऐसा तुम्हें लगता है तो बताओ भला मैं क्या कर सकती हूं.’’ राखी ने टालने वाले अंदाज में कहा.

‘‘नहीं, कोई तो वजह है. वह वजह क्या है, आज तुम्हें बतानी ही होगी.’’ निश्चल ने दबाव डालते हुए पूछा.

‘‘कोई वजह नहीं है निश्चल. मैं तुम से और ज्यादा बात करना नहीं चाहती. इसलिए आगे से तुम इस बात का ध्यान रखना.’’ राखी ने दो टूक जवाब दिया.

राखी की यही बेरुखी उस पर बिजली बन कर गिरी थी. रहरह कर उस के दिमाग में यह बात आती रहती थी कि इस के पीछे सजल ही जिम्मेदार है. वही राखी को उस के खिलाफ भड़काने का काम कर रहा है.

बस, वह मन ही मन सजल से रंजिश रखने लगा. उसे यह गलतफहमी हो गई कि सजल राखी को भड़का कर उस की खुशियों को छीनने का काम कर रहा है. सजल को सबक सिखाने के लिए निश्चल ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अपने दोस्त अनुज सक्सेना को भी उस ने अपनी इस योजना में शामिल कर लिया. यह योजना थी सजल की हत्या की. उस की हत्या के लिए उस ने एक तमंचे और कुल्हाड़ी का भी इंतजाम कर लिया. वह सजल से लगातार मिलता रहा और अपने इरादों को बिलकुल भी जाहिर नहीं होने दिया. वैसे भी जब कोई अजीज दोस्त हो तो उस के इरादों को भांपना मुश्किल हो जाता है. सजल भी दोस्ती के विश्वास में निश्चल के इरादों से पूरी तरह अंजान था.

12 नवंबर, 2015 की रात सजल घर से घूमने के लिए निकला तो उसे रास्ते में निश्चल व अनुज मिल गए. निश्चल चूंकि जानता था कि सजल रात में घूमने के लिए घर से रोजाना निकलता है, इसलिए पहले से ही वह अपनी आल्टो कार संख्या यूपी 16 एक्स-1015 लिए रास्ते में खड़ा था. निश्चल और अनुज के इस तरह मिलने पर सजल को हैरानी नहीं हुई. कुछ देर में घूम कर आने की बात कह कर उन्होंने सजल को अपनी कार में बैठा लिया. सजल को अपने दोस्तों पर जरा भी शक नहीं हुआ. वे कार से ऋषिपाल के आम के बाग में पहुंच गए. उस वक्त वहां बिलकुल सुनसान था.

अनुज ने सजल को बातों में लगा लिया तो उसे बीच निश्चल ने तमंचा निकाल कर उस के सिर को टारगेट कर के गोली चला दी. गोली लगते ही सजल नीचे गिर गया और उस की मौत हो गई. अनुज ने भी तमंचा ले कर एक गोली और उस पर चलाई. सजल की हत्या करने के बाद उन्होंने सजल के दोनों मोबाइल फोन उस की जेब से निकाल कर वहीं फेंक दिए. फेंकते समय ही एक मोबाइल की बैटरी निकल गई थी. सजल की हत्या कर के वे जल्दी से वहां से भागे, जिस से निश्चल की एक चप्पल वहीं छूट गई थी. घटनास्थल से कुछ दूर जा कर उन्होंने एक खेत में तमंचा व कुल्हाड़ी छिपा दी और अपनेअपने घर चले गए.

अगली सुबह तक सजल के लापता होने की खबर फैल चुकी थी. चूंकि वे उस के गहरे दोस्त थे, इसलिए सजल को ढुंढवाने का उन्होंने भी बराबर नाटक किया. सजल का शव मिलने पर वे भी घटनास्थल पर पहुंचे. दोनों ने सोचा था कि उन्हें सजल के साथ जाते हुए किसी ने नहीं देखा. लेकिन गांव के ही किसी व्यक्ति ने उन्हें सजल के साथ जाते देख लिया था. उसी के आधार पर वे पुलिस की गिरफ्त में आ गए. एसपी देहात जगदीश शर्मा और सीओ चरण सिंह भी थाने आ गए थे. पुलिस ने तमाम लोगों की मौजूदगी में हत्याकांड का खुलासा किया.

जब कस्बे के लोगों को पता चला कि सजल की हत्या किसी और ने नहीं, उस के खास दोस्तों ने की थी तो सब हैरान रह गए. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर खेत से हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का तमंचा, खाली कारतूस और एक कुल्हाड़ी बरामद कर ली थी. हत्या में प्रयुक्त की गई कार भी पुलिस ने बरामद कर ली थी. विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हो सकी थी.

निश्चल ने गलतफहमी को दिल से नहीं लगाया होता और सजल दोस्त के इरादों को भांप गया होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती. न सजल दुनिया से जाता और न उस के दोस्त जेल जाते. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, राखी बदला हुआ नाम है.

Love Story: जी नहीं पाए प्यार करने वाले

Love Story: नरेश और भारती शादी कर के एकदूसरे के साथ जिंदगी बिताना चाहते थे. लेकिन जाति ने उन का यह सपना ही नहीं चकनाचूर किया, जिंदगी ही लील ली.

आगरा का एक छोटा सा गांव है नगला लालजीत, जिस की आबादी मुश्किल से 5 सौ होगी. इस में कुशवाहा ज्यादा हैं, जबकि ठाकुरों के सिर्फ 4 घर हैं. इन में एक घर है हुकुम सिंह का. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 5 बेटे और एक बेटी थी. उन का सब से छोटा बेटा था नरेश, जो किसी मोबाइल कंपनी में सेल्समैन था. इसी गांव का रहने वाला गिरिराज कुशवाहा शादीब्याह में खाना बनाने का ठेका लेता था. उस के परिवार में पत्नी जलदेवी के अलावा 3 बेटियां सीमा, रोशनी, भारती और 2 बेटे देवेश तथा योगेश थे.

सीमा की शादी उस ने देवी रोड निवासी शैलेंद्र के साथ की थी तो उस से छोटी रोशनी की शादी आगरा के रहने वाले बंटू से. तीसरी बेटी भारती का अभी विवाह नहीं हुआ था. यह कहानी गिरिराज की इसी तीसरी बेटी भारती की है. एक साल पहले तक हुकुम सिंह और गिरिराज कुशवाहा सुखशांति से रह रहे थे. उन के घरों के बीच ज्यादा दूरी नहीं थी. छोटा सा गांव है, इसलिए गांव का हर कोई एकदूसरे को जानता ही नहीं था, बल्कि सभी रिश्ते की डोर से बंधे थे, चाहे वह किसी भी जाति के हों.

भारती मात्र आठवीं तक पढ़ी थी, क्योंकि इस से आगे वह न पढ़ना चाहती थी और न ही गिरिराज उसे पढ़ाना चाहता था. लेकिन एक पढ़ाई वह मांबाप से छिपछिप कर जरूर पढ़ रही थी. और वह थी इश्क की. इस पढ़ाई में उस के साथ था हुकुम सिंह का सब से छोटा बेटा नरेश. किसी दिन नरेश और भारती की नजरें टकराईं तो उन के दिलों की धड़कनें बढ़ गईं. दोनों अलगअलग जाति के थे, लेकिन इश्क करने वाले कहां इस की परवाह करते हैं. प्यार दोनों को करीब ले आया और वे लुकछिप कर मिलने लगे.

उन्हें मिलने में परेशानी भी नहीं होती थी, क्योंकि आजकल लगभग सभी के पास मोबाइल फोन है ही. यही मोबाइल फोन उन की भी मिलने में मदद कर रहा था. उन्हें जब मिलना होता, फोन कर के समय और जगह तय करते, उस के बाद तय समय और जगह पर मिल लेते. भारती और नरेश प्यार ही नहीं कर बैठे, साथ जीने और मरने की कसमें भी खा लीं, लेकिन उन की जाति अलगअलग थी, इसलिए उन्हें पता था कि उन का यह सपना आसानी से पूरा नहीं होगा. इसलिए कभीकभी भारती नरेश से पूछती भी थी कि समाज के डर से कहीं वह उसे छोड़ तो नहीं देगा?

तब नरेश कहता, ‘‘भारती, मैं अपने घर वालों को छोड़ सकता हूं, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता.’’

नरेश भले ही भारती को हर तरह से साथ देने का आश्वासन देता था, पर वह जानता था कि यह सब इतना आसान नहीं है. गांव में, वह भी दूसरे जाति की लड़की से शादी करना बहुत ही मुश्किल काम है. लेकिन उस का प्यार दीवानगी की हद तक पहुंच चुका था, इसलिए उस की अच्छाबुरा सोचने की समझ ही खत्म हो चुकी थी. न उसे घरपरिवार दिखाई दे रहा था और न समाज. उसे परिणाम की भी चिंता नहीं थी. नरेश और भारती भले ही लुकछिप कर मिल रहे थे, लेकिन उन का यह प्यार गांव वालों की नजरों से छिपा नहीं रह सका. फिर एक दिन वही हुआ, जिस का डर था. भारती फोन पर नरेश से बातें कर रही थी, तभी गिरिराज ने उस की कुछ बातें सुन लीं. उस ने पूछा, ‘‘किस से बातें कर रही है?’’

जवाब में भारती कुछ कहती, गिरिराज ने उस के हाथ से मोबाइल छीन लिया. उस में नरेश की फोटो लगी देख कर उस ने अपना सिर पीट लिया. उसे समझते देर नहीं लगी कि बेटी आशिकी में फंस गई है.

‘‘यह सब क्या है?’’ गिरिराज ने फोटो दिखाते हुए पूछा, ‘‘तू नरेश से क्यों बातें करती है?’’

भारती अंजान बनते हुए बोली, ‘‘पापा मैं तो अपनी सहेली से बातें कर रही थी, कभीकभी नेटवर्क की गड़बड़ी की वजह से किसी दूसरे को फोन ही नहीं लग जाता, बल्कि उस का फोटो भी आ जाता है.’’

गिरिराज इतना बेवकूफ नहीं था, जितना भारती समझ रही थी. उस ने पूछा, ‘‘पहले तो यह बता, नरेश का नंबर तेरे मोबाइल में कैसे आया?’’

‘‘पड़ोसी है, अब पड़ोसी का नंबर मोबाइल में नहीं आएगा तो क्या दूसरे गांव वालों का आएगा?’’ भारती रुआंसी हो कर बोली.

गिरिराज को लगा कि वह बेटी के साथ ज्यादती कर रहा है. जब मोबाइल है तो उस में नंबर तो होंगे ही. रही बात नरेश की तो वह गांव का ही नहीं है, पड़ोसी भी है. मोबाइल का काम भी करता है. इसलिए उस का नंबर भारती के पास है तो बुरा क्या है. वह चुप हो गया. गिरिराज भले ही चुप हो गया, लेकिन भारती कहां चुप होने वाली थी. वह उसी दिन नरेश से मिली और पूरी बात बता कर बोली, ‘‘आज तो किसी तरह बच गई, लेकिन इस तरह कब तक चलेगा. जो कुछ भी करना है, जल्दी करो.’’

नरेश ने कहा, ‘‘पहले तो हम घर वालों से कहेंगे कि वे हमारी शादी कर दें. नहीं करेंगे तो मैं तुम्हें ले कर कहीं दूर चला जाऊंगा, जहां घर वाले पहुंच ही नहीं पाएंगे.’’

भारती को नरेश पर पूरा विश्वास था, वह उस से अलग होना भी नहीं चाहती थी, इसलिए वह उस के साथ भागने को तैयार थी. लेकिन जब एक दिन गिरिराज ने बेटी को नरेश के साथ देख लिया तो उसे ममझते देर नहीं लगी कि बेटी ने उस से झूठ बोला था. उस ने पत्नी से कहा, ‘‘भारती पर नजर रखो, उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दो, वरना यह हमारी नाक कटवाने वाली है.’’

इस के बाद भारती पर नजरों के पहरे लग गए. उस का बाहर आनाजाना बंद कर दिया गया.

यही नहीं, सोचविचार कर गिरिराज ने बड़े दामाद शैलेंद्र को फोन कर के बुलाया और पूरी बात बता दी. इस पर शैलेंद्र ने कहा, ‘‘आप नरेश के पिता से मिलें और उन से कहें कि वह बेटे को समझाएं.’’

गिरिराज ने हुकुम सिंह से शिकायत की तो उन्होंने नरेश को समझाने का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि समझाया भी. लेकिन नरेश को तो जैसे ऐसे ही मौके की तलाश थी. उस ने कहा, ‘‘पापा, मैं भारती से प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है,’’ हुकुम सिंह ने उसे डांटा, ‘‘ऐसा कतई नहीं हो सकता. एक तो वह गांव की है, दूसरे दूसरी जाति की है. तुम जानते हो गांव में ठाकुरों के सिर्फ 4 ही घर हैं. कुशवाहा ज्यादा हैं. अगर कुछ उल्टासीधा किया तो इस का खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा.’’

बाप की इस बात से नरेश की समझ में आ गया कि भारती को भगा कर ले जाना ठीक नहीं है. क्योंकि अगर वह उसे भगा कर ले गया तो गांव के कुशवाहा उस के घर वालों का जीना हराम कर देंगे. अब उसे गांव में ही रह कर अपने और भारती के घर वालों को मनाना होगा. नरेश ने गिरिराज को संदेश भिजवाया कि वह भारती से प्यार करता है और शादी करना चाहता है. वह वादा करता है कि भारती को खुश रखेगा. लेकिन जब यह संदेश गिरिराज को मिला तो वह उबल पड़ा. उस ने नरेश को तो कुछ नहीं कहा, लेकिन भारती की जम कर पिटाई कर दी. उस का कहना था कि उसी की वजह से आज उसे यह दिन देखना पड़ा है.

भारती की बहनों और बहनोइयों ने भी उसे समझाया. लेकिन उस ने साफ कह दिया कि वह शादी करेगी तो नरेश से, वरना पूरी जिंदगी कुंवारी रहेगी. हुकुम सिंह और उन की पत्नी शांति भी नरेश को समझा रहे थे कि वह ऐसा कोई काम न करे, जिस से परिवार को परेशानी हो. इस आशिकी की वजह से दोनों परिवारों में काफी तनाव था. गांव भी इस आशिकी से अंजान नहीं था. गिरिराज ने बदनामी से बचने के लिए दिसंबर के पहले सप्ताह में गांव की पंचायत बुलाई. पंचायत में दोनों ही बिरादरी के लोग शामिल थे. सभी इस शादी के खिलाफ थे, इसलिए सभी ने नरेश और भारती को समझाया कि वे ऐसा न करें. उन के ऐसा करने से गांव की बदनामी तो होगी ही, आने वाली पीढ़ी पर भी इस का बुरा असर पड़ेगा.

लेकिन नरेश और भारती उन की बातों से सहमत नहीं थे. उन का कहना था कि वे नए जमाने के लोग हैं. वे अपनी खुशी देखते हैं, परंपरा नहीं. इस पर बुजुर्गों ने उन्हें डांट कर चुप करा दिया और कहा कि वे जो चाहते हैं, वैसा कतई संभव नहीं है.

‘‘तो फिर ठीक है, आप सभी हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए. हम अपनीअपनी दुनिया में एकदूसरे की यादों के सहारे जी लेंगे.’’ भारती ने कहा.

इस पर कुशवाहा नाराज हो गए. उन का कहना था कि बेटी को अविवाहित कैसे रखा जा सकता है. लेकिन भारती का बागी सुर मुखर हो उठा, ‘‘कुछ भी हो, मैं नरेश के अलावा किसी और से शादी नहीं कर सकती.’’

दोनों की जिद को देखते हुए पंचायत ने फैसला किया कि इन्हें गांव से बाहर रिश्तेदारियों में भेज दिया जाए. गिरिराज को लगा कि बेटी ने उस का सिर झुका दिया है, इसलिए उस ने पंचायत के सामने कहा, ‘‘अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह दोनों को काट कर रख देगा.’’

ठाकुरों ने कोई जवाब नहीं दिया. उन का सोचना था कि कुछ दिन दोनों अलग रहेंगे तो सब ठीक हो जाएगा. उस समय यह किसी ने नहीं सोचा था कि गिरिराज ने जो कहा है, वह सचमुच ही वैसा कर डालेगा.

जो छिपा था, इस पंचायत के बाद पूरी तरह खुल गया. नरेश और भारती जो अब तक लुकछिप कर मिलते थे, वे खुलेआम मिलने लगे. शांति को बेटे की जान खतरे में लगी तो उस ने उसे बेटी के पास दिल्ली भेज दिया. लेकिन पंचायत में जो हुआ था, उस से गिरिराज को लग रहा था कि उस की मूंछें नीची हो गई हैं. मूंछें उठाने के लिए उसे कुछ करना ही होगा. उस ने अपनी जाति के कुछ लोगों से बात की तो उन्होंने कहा कि बेटी को खत्म कर दो, सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इज्जत भी बच जाएगी.

गिरिराज ने भारती को खत्म करने का इरादा तो बना लिया, लेकिन उसे लगा कि भारती की हत्या पर नरेश चुप नहीं बैठेगा. क्योंकि वह उसे जान से ज्यादा प्यार करता है. भारती की मौत का संदेह होते ही वह पुलिस के पास पहुंच जाएगा. जब इस बात पर गहराई से विचार किया गया तो उस के बड़े दामाद शैलेंद्र ने कहा, ‘‘दोनों को खत्म कर देते हैं. किसी ठाकुर में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह पुलिस के पास जा कर शिकायत करेगा.’’

दामाद की बात गिरिराज को भी उचित लगी. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. गांव में कत्ल करने पर वे पकड़े जा सकते थे. इसलिए योजना बनी कि कहीं दूर ले जा कर दोनों को मारा जाए. इस के लिए भारती को विश्वास में लेना जरूरी था. घर वालों ने कोशिश भी शुरू कर दी. लेकिन भारती को विश्वास नहीं हो रहा था. उसे विश्वास तब हुआ, जब जलदेवी उस के लिए शादी का जोड़ा खरीद कर ले आई. इस के बाद भारती को लगा कि उस के घर वाले सचमुच शादी को तैयार हैं.

मां ने ही नहीं, पिता ने भी कहा, ‘‘हमारी समझ में आ गया है कि तू सचमुच नरेश को बहुत प्यार करती है. फिर इस में बुराई ही क्या है. नरेश है भी तो ऊंची जाति का. मुझे पहले लगता था कि वह धोखा दे देगा. लेकिन अब हमें उस पर भी विश्वास हो गया है. वह तुझ से शादी कर के तुझे सुखी रखेगा.’’

भारती को पिता की बातों पर विश्वास तो नहीं हो रहा था, लेकिन उसे उस की बातों में कोई साजिश भी नजर नहीं आ रही थी. वह कुछ नहीं बोली तो गिरिराज ने कहा, ‘‘गांव में तो हम तेरी शादी करा नहीं सकते, क्योंकि गांव वाले यह शादी कतई नहीं होने देंगे. तू ऐसा कर, नरेश को प्रिंस के ढाबे पर बुला ले. हम उसे ले कर ग्वालियर के किसी मंदिर चलते हैं और वहीं तुम दोनों की शादी करा देते हैं. नगला लालजीत गांव ग्वालियर के लिए जाने वाले हाईवे के किनारे बसा है. भारती जानती थी कि गांव वाले उस की शादी का विरोध कर रहे हैं. इसीलिए मम्मीपापा उस की शादी गांव से बाहर किसी मंदिर में करना चाहते हैं. उस ने नरेश को फोन कर के सारी बात बताई तो वह बहुत खुश हुआ.

किसी को कुछ बताए बगैर वह उसी रात प्रिंस के ढाबे पर पहुंच गया. गिरिराज पत्नी और भारती के साथ वहां पहले से मौजूद था. उस ने उसे गाड़ी में बैठाया और चल पड़ा. भारती और नरेश पिछली सीट पर एक साथ बैठे थे. वे सुनहरे भविष्य की कल्पनाओं में इस तरह खोए थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब गाड़ी मौजपुरा के जंगल में पहुंच गई. वहां पहुंचते ही नरेश समझ गया कि ये लोग उस की शादी कराने नहीं, उन्हें मारने लाए हैं. क्योंकि पीछे से भारती का बहनोई शैलेंद्र मोटरसाइकिल से भी वहां पहुंच गया था. नरेश तो कुछ नहीं बोला, लेकिन भारती फट पड़ी, ‘‘तुम लोग इतने बड़े धोखेबाज निकलोगे, मैं ने सोचा भी नहीं था. इस से अच्छा तो तुम लोगों ने पैदा होते ही मेरा गला घोंट दिया होता. ’’

नरेश और भारती ने जिंदगी के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन उन लोगों ने नरेश को उस के मफलर तथा भारती को उस की शाल से गला घोंट कर मार दिया. दोनों लाशें वहीं छोड़ कर सभी लौट आए. भारती के पास शिनाख्त लायक वैसे भी कुछ नहीं था, नरेशजेबों से भी सब कुछ निकाल लिया गया था. सभी यह सोच कर निश्चिंत थे कि पुलिस उन तक पहुंच नहीं पाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

अगले दिन राजस्थान के जिला धौलपुर के थाना मनियां के थानाप्रभारी रतन सिंह को जंगल में 2 लाशें पड़ी होने की सूचना मिली तो सहयोगियों के साथ वह वहां पहुंच गए. उन्होंने शिनाख्त के लिए दोनों लाशों की तलाशी ली तो लड़की के पास से तो कुछ नहीं मिला, लेकिन लड़के की जेब से परिचय पत्र मिल गया, जिस से पता चला कि वह आगरा के गांव नगला लालजीत का रहने वाला है. लाशों पर चोटों के निशान के अलावा लड़के के गले पर मफलर और लड़की के गले पर शाल कसा हुआ था. इस से पुलिस को लगा कि इन्हें गला घोंट कर मारा गया है. हमउम्र लड़कालड़की की लाशें होने की वजह से यह भी अंदाजा लगाया गया कि यह प्रेमी जोड़ा रहा होगा और घर वालों ने ही इन की हत्याएं की हैं.

राजस्थान पुलिस लाशों की खबर ले कर नगला लालजीत स्थित हुकुम सिंह के घर पहुंची तो हड़कंप मच गया. वहीं पूछताछ में पता चला कि दूसरी लाश गांव के गिरिराज कुशवाहा की बेटी भारती की थी. गांव में तो किसी ने कुछ नहीं बताया, लेकिन जब हाईवे पर बने टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज चेक की गई तो उस में गिरिराज और जलदेवी के साथ गाड़ी में बैठे नरेश और भारती दिख गए. इसी के आधार पर थाना मनियां पुलिस ने पतिपत्नी को हिरासत में ले लिया. पोस्टमार्टम के बाद दोनों लाशें घर वालों को सौंप दी गई थीं. गांव ला कर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

थाने ला कर गिरिराज और जलदेवी से पूछताछ शुरू हुई. वे कोई पेशेवर अपराधी तो थे नहीं, जल्दी ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस जानती थी कि केवल ये दोनों नरेश और भारती की हत्या नहीं कर सकते. इस के बाद पुलिस ने उन से शैलेंद्र का भी नाम उगलवा लिया. लेकिन शैलेंद्र डर के मारे फरार हो चुका था. पुलिस ने गिरिराज की निशानदेही पर नरेश का सामान, वह गाड़ी, जिस से भारती और नरेश को ले जाया गया था, बरामद कर ली थी. इस के बाद दोनों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया था.

कथा लिखे जाने तक शैलेंद्र को भी गिरफ्तार कर के पुलिस ने जेल भेज दिया था. सभी जेल में बंद थे, किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime: गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू रोकने की साजिश – प्रेमी ने कंपनी को दी बम से उड़ाने की धमकी

Love Crime: एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया, जो आप को भी हैरान कर देगा. जहां एक बौयफ्रेंड ने अपनी गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू रुकवाने की ऐसी साजिश रची कि सभी हैरान रह गए. उस ने ईमेल के जरिए कंपनी को एक मैसेज भेजा और कहा कि वह बम से उड़ा देगा. चलिए जानते हैं इस लव और क्राइम की स्टोरी को विस्तार से, जो आप को होने वाले क्राइम से सचेत करेगी.

यह घटना हरियाणा के गुरुग्राम के सेक्टर 43 स्थित वन होराइजन सेंटर में एक निजी कंपनी से सामने आई है. जहां प्रेमी अनिकेत ने सुबह 9 बजे कंपनी को मेल भेज कर धमकी दी. यह मेल कंपनी के औफिशियल मेल आईडी पर भेजा गया था. आसपास इलाके में बम की धमकी से हड़कंप मच गया. पुलिस को सूचना दी गई और पुलिस मौके पर पहुंची. इसके बाद पुलिस ने स्निक डौग और मेटल डिटेक्टर की मदद से कंपनी का पूरा केबिन चेक किया.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि मेल फेक था और बम की सूचना भी फेक थी. एसीपी विकास कौशिक ने बताया कि डीएलएफ थाना साइबर की पूरी टीम ने कंपनी में सभी को खाली करवा कर तलाशी ली. कई घंटों तक जांच चली, लेकिन पुलिस को कोई भी संदिग्ध वस्तु नहीं मिली.

जांच में खुलासा हुआ कि प्रेमी अनिकेत ने यह साजिश अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड से रिश्ता सुधारने के लिए रची थी. अनिकेत ने यह वारदात इसलिए की ताकि गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू स्थगित हो जाए और वह उस से फिर से संपर्क कर सके. आरोपी अनिकेत के खिलाफ पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली है. Love Crime