Love Crime: 10 साल बाद

Love Crime: सीमा ने 10 साल पहले भाग कर दूसरी जाति के रामू के साथ प्रेम विवाह कर लिया था. वह उस के साथ सुखी तो थी ही, उस के 2 बच्चों की मां भी बन गई थी. इतने दिनों बाद भी घर वाले उस के इस प्रेम को बरदाश्त नहीं कर सके और…

अमित ने जीजा के पैर छूते हुए उन का उखड़ा मूड देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है जीजाजी, आजआप कुछ नाराज से लग रहे हैं?’’

‘‘नाराजगी की वजह तुम अच्छी तरह जानते हो अमित. 10 साल से हम जिस आग में जल रहे हैं, वह तुम्हें बताने की जरूरत नहीं है.’’

अमित ने बहनोई को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘जीजाजी, बात काफी पुरानी हो चुकी है, इसलिए अब तो उसे भूल जाना चाहिए.’’

लेकिन जगदीश उस बात को भुलाना नहीं चाहता था, इसलिए उस ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारी जगह मैं होता तो परिवार की उस बेइज्जती का बदला ले कर रहता.’’

जगदीश की इस बात से अमित सोच में पड़ गया. उस की बहन सीमा ने जो किया था, क्या वह इतना बड़ा अपराध था कि उस के लिए जीजाजी जो कह रहे हैं, क्या वह उचित है? अमित उर्फ भूरा 23 साल का हो गया था. जब उस की बहन सीमा ने दूसरे जाति के लड़के से शादी कर के घर छोड़ा था, तब वह 10-11 साल का था. खटीक जाति का गंगा सिंह एटा जिले के थाना रिजोर के गांव इब्राहीमपुर में रहता था. उसी का बेटा था अमित. उस के अलावा गंगा सिंह की 4 बेटियां थीं ममता, यशोदा, रमा और सीमा. परिवार बकरियों की खरीदफरोख्त का काम करता था. इस धंधे में इतनी कमाई हो जाती थी कि जिंदगी मजे से चल रही थी.

गंगा सिंह के घर से कुछ ही दूरी पर कुम्हार जाति का काशीराम रहता था. उस के 2 बेटे थे रामू और पुष्पेंद्र. पुष्पेंद्र की शादी रीना से हो गई थी, जबकि रामू अविवाहित था. पड़ोसी होने के नाते गंगा सिंह और काशीराम का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. इसी आनेजाने में गंगा सिंह की बेटी सीमा और काशीराम का बेटा रामू एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

सीमा खूबसूरत और हमेशा खुश रहने वाली लड़की थी तो रामू जवान और कामकाजी लड़का था. सीमा उसी जैसे पति के सपने देखती थी. इसीलिए वह जब भी रामू को देखती, उस का दिल धड़क उठता. रामू पढ़ालिखा भी था, जबकि सीमा की जाति में पढ़ेलिखे लड़के कम ही मिलते थे. इस तरह सीमा मन ही मन उसे चाहने लगी थी.

सीमा गांव की अन्य लड़कियों से थोड़ा अलग थी, इसलिए वह लड़कों में आकर्षण का केंद्र थी. लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि कोई उसे कुछ कह दे. एक दिन सीमा खेतों में बकरियों का चारा लेने गई. वह चारे का बोझ उठाने के लिए इधरउधर देख रही थी. तभी रामू न जाने कहां से आ गया. सीमा ने उसे इशारे से बुलाया तो उस ने पास आ कर कहा, ‘‘सीमा, तुम इतना बड़ा बोझ उठा ले जाओगी?’’

सीमा ने तिरछी नजरों से उसे देखते हुए कहा, ‘‘अब तुम आ गए हो तो इसे संभालोगे नहीं?’’

रामू ने सीमा की आंखों में झांका तो उन में उसे कुछ ऐसा दिखाई दिया, जो उसे अपनी ओर खींच रहा था. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘इस बोझ को तो मैं हंसतेहंसते जीवन भर संभालने को तैयार हूं.’’

‘‘अच्छा, तुम्हें खुद पर इतना गुमान है?’’

‘‘अगर अच्छी सूरत मेरे ऊपर इस तरह मेहरबान है तो मुझे गुमान होगा ही.’’ कह कर रामू ने बोझ उठा लिया.

सीमा ने हैरानी से कहा, ‘‘लाओ, बोझ मुझे दे दो, गांव के किसी ने देख लिया तो बिना मतलब की बातें होंगी.’’

‘‘पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो और कौन करेगा?’’ रामू ने कहा.

‘‘रामू, बहुत दिनों से मैं तुम से एक बात कहना चाहती हूं.’’

‘‘तो आज कह डालो.’’

‘‘तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो. क्या मैं भी तुम्हें अच्छी लगती हूं?’’

रामू सोच में पड़ गया. अच्छे लगने का मतलब वह अच्छी तरह से समझता था. उस के दिमाग में तुरंत आया कि अगर इस बात की जानकारी खटीकों को हो गई तो बवाल हो जाएगा. वह कुछ कहता, उस के पहले ही सीमा ने अपना हाथ बढ़ा कर कहा, ‘‘मेरा हाथ थाम लो रामू, मैं सिर्फ तुम्हारी हूं.’’

रामू की रगों में जवानी का खून था. वह भी सीमा को पसंद करता था. सीमा के स्पर्श से वह आवेश में आ गया. उस ने सीमा का हाथ थाम कर कहा, ‘‘लो हाथ थाम लिया, अब तुम मेरी हो. मैं जीवन भर तुम्हारा यह हाथ नहीं छोड़ूंगा. इस के लिए मुझे चाहे जो भी करना पड़े.’’

उस दिन दोनों ने एकदूसरे को मन और वचन से अपना तो लिया, लेकिन उन्हें पता था कि उन के प्यार की राह में जाति एक ऐसी बाधा है, जिसे पार करना आसान नहीं होगा. इस के बावजूद उन्होंने प्यार ही नहीं किया, उसे आजीवन निभाने का निर्णय भी ले लिया. रामू को पता था कि शादी के लिए न तो उस के घर वाले राजी होंगे और न सीमा के. इसलिए वह पैसे इकट्ठे करने लगा कि अगर सीमा के साथ उसे घर छोड़ना पड़े तो उस के पास इतने पैसे होने चाहिए कि वह कहीं भी व्यवस्थित हो सके. अगर हाथ में पैसा रहेगा तो वह कहीं भी रह लेगा.

सीमा की 3 तीनों बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थीं. सब से बड़ी बहन ममता डुड़ला में जगदीश के साथ ब्याही थी. वह फूल बेचने का काम करता था. सीमा के घर वालों को उस के और रामू के प्यार का पता नहीं चल पाया, लेकिन न जाने कहां से उस के जीजा जगदीश को इस बात की जानकारी हो गई. उस ने ससुराल आ कर सासससुर को खूब खरीखोटी सुनाते हुए कहा, ‘‘तुम लोग एक लड़की नहीं संभाल सके. दूसरे गांव में रह कर मुझे पता चल गया कि सीमा रामू कुम्हार के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है और तुम लोग हो कि आंखें मूंदे बैठे हो.’’

दामाद की बात पर गंगा सिंह के कान खड़े हो गए. उस ने सीमा से पूछा तो उस ने मना करते हुए कहा कि जीजाजी उस पर झूठा इल्जाम लगा रहे हैं, वह रामू से बाहर कभी नहीं मिली. दामाद की बात को गंगा सिंह और निर्मला ने भले ही गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन उन की समझ में यह बात जरूर आ गई थी कि बेटी जवान हो चुकी है, अब इस का ब्याह कर देना चाहिए. उस के लिए लड़के की खोज तो शुरू ही हो गई, उस पर नजर भी रखी जाने लगी.

जबकि जगदीश ने यह दांव चल कर कुछ दूसरा ही सोचा था. वह सीमा की शादी अपने छोटे भाई से करवाना चाहता था. उसे सीमा की ऐसी कमी मिल गई थी, जिस की बदौलत वह सासससुर को बदनामी का डर दिखा कर मौके का फायदा उठाना चाहता था. दरअसल, उस का भाई शराबी और जुआरी तो था ही, कोई कामधंधा भी नहीं करता था. इसलिए सीमा के घर वाले इस रिश्ते के लिए जल्दी तैयार नहीं होते.

मौके का फायदा उठाने के लिए एक दिन जगदीश ससुराल आया और सासससुर से बदनामी की बात कह कर उस ने सीमा की शादी अपने भाई से करने को कहा तो उस की बातें सुन कर सीमा ने गुस्से में कहा, ‘‘जीजा, तुम ने सोच कैसे लिया कि मैं तुम्हारे उस आवारा भाई से शादी कर लूंगी.’’

गंगा सिंह और निर्मला सन्न रह गए. रामू और सीमा के मिलनेजुलने की बात भले ही उन्हें बरदाश्त नहीं थीं, लेकिन वे सीमा की शादी जगदीश के भाई से भी नहीं करना चाहते. उन्होंने दामाद को यह कह कर चुप करा दिया कि इस मामले पर फिर कभी बात करेंगे. सीमा सब कुछ समझ चुकी थी. वह रामू से मिली और उस से साफसाफ कह दिया कि जो भी करना है, जल्दी करो, वरना किसी दिन जगदीश अपने भाई से उस की शादी करा देगा.

गांव में रहते रामू और सीमा की शादी हो नहीं सकती थी. इसलिए एक दिन रामू ने सीमा के साथ गांव छोड़ दिया. पैसे उस ने जमा ही कर रखे थे. वह सीमा को ले कर हरियाणा के शहर पानीपत आ गया और कमरा किराए पर ले कर सीमा के साथ रहने लगा. उस ने सीमा के साथ मंदिर में शादी भी कर ली थी. गुजरबसर के लिए उस ने एक फैक्ट्री में नौकरी भी कर ली थी. इस तरह रामू और सीमा ने जातिबिरादरी के पचड़ों से दूर आ कर अपनी अलग दुनिया बसा ली थी.

लेकिन दूसरी ओर वे जिस दुनिया को छोड़ आए थे, वहां आग लग चुकी थी. सब से ज्यादा नाराज जगदीश था. उस ने पहले तो सासससुर की खूब लानतमलानत की, उस के बाद ससुर को साथ ले कर थाना रिजोर पहुंचा और रामू के खिलाफ सीमा को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने जितना हो सकता था, रामू के घर वालों को तो परेशान किया ही, कुरकी तक कर डाली, पर रामू और सीमा का कुछ पता नहीं चला. पता चलता भी कैसे, रामू ने घर छोड़ने के बाद उधर झांका ही नहीं. सब कुछ भुला कर रामू और सीमा अपनी दुनिया में खुश थे. उन्होंने घर वालों से पूरी तरह संबंध तोड़ लिए थे. सीमा ने देव को जन्म दिया तो दोनों बेटे के साथ अपनी दुनिया में मस्त हो गई.

लेकिन सीमा के घर वाले उस की इस हरकत को पचा नहीं पा रहे थे. इस की एक वजह यह थी कि बिरादरी वाले सीमा के घर वालों को अपमानित करते रहते थे. सीमा जब घर से भागी थी, तब अमित काफी छोटा था. लेकिन जब वह बड़ा हुआ और बहन के भागने की बात समझ में आई तो उसे लगा कि बहन ने दूसरी जाति के लड़के ताने मार कर के साथ भाग कर अच्छा नहीं किया. रहीसही कसर जगदीश पूरी कर देता था.

एक दिन अचानक गांव में यह बात फैल गई कि रामू, सीमा और बच्चे के साथ फिरोजाबाद में रह रहा है. अमित की नफरत भड़क उठी, लेकिन गंगा सिंह और निर्मला ने उसे समझाया कि जब सीमा रामू के साथ खुश है तो अब उन्हें सब कुछ भुला देना चाहिए. मांबाप के समझाने पर अमित रामू से मिलने गया तो रामू ने उसे गले लगा लिया. इस से अमित को लगा कि रामू इतना बुरा नहीं है, जितना जगदीश उसे बताता रहा है.

इस के बाद सीमा की बहनें भी उस के यहां आनेजाने लगीं. लेकिन रामू ने कभी किसी पर विश्वास नहीं किया. यही वजह थी कि वह सीमा और बेटे को ले कर कभी गांव नहीं गया. उसी बीच बेटी तनु पैदा हुई. अब उन के 2 बच्चे हो गए थे. सब ठीक हो गया था, लेकिन जगदीश के कलेजे की आग अभी तक ठंडी नहीं हुई थी. वह रामू को खत्म कर के सीमा की शादी अपने भाई से करवा कर अपनी उस आग को ठंडी करना चाहता था. इस के लिए वह अमित को अपने साथ मिलाना चाहता था. यही वजह थी कि मौका मिलने पर वह उसे भड़काता रहता था.

एक दिन जगदीश भी सीमा के घर जा पहुंचा. जीजा का आना सीमा को अच्छा नहीं लगा, लेकिन घर आए मेहमान को वह भगा भी नहीं सकती थी. बातचीत में जगदीश ने जब कहा कि उस की वजह से समाज में उन की बड़ी बदनामी हुई है, अगर वह चाहे तो अभी भी सब ठीक हो सकता है. इस पर सीमा ने पूछा कि वह कैसे तो जगदीश ने कहा, ‘‘हम रामू को ठिकाने लगा कर तुम्हारी शादी अपने भाई से करवा देंगे. इस तरह तुम्हारा घर भी बस जाएगा और समाज में हमारी इज्जत भी वापस आ जाएगी.’’

‘‘तो अभी तक तुम्हारे भाई की शादी नहीं हुई? वैसे भी उस आवारा से शादी करेगा ही कौन? जीजाजी, अच्छा यही होगा कि अब तुम चुपचाप यहां से निकल लो, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. एक बात और, अगर किसी ने मेरे पति पर बुरी नजर डाली तो मैं उसे छोड़ूंगी नहीं.’’

जगदीश साली से बेइज्जत हो कर चला तो आया, लेकिन उस ने तय कर लिया कि वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा. इस के बाद उस ने रामू को कई बार ठिकाने लगाने की कोशिश की, लेकिन हर बार रामू बच गया.

अब सीमा उस के निशाने पर थी. उस ने सीमा के मौसेरे भाई अशोक और अमित को भड़काना शुरू किया. उस की बातों में आ कर अमित को भी लगने लगा कि सीमा ने जो किया है, उस से उस के परिवार की बड़ी बेइज्जती हुई है, इसलिए उसे जिंदा रहने का हक नहीं. आखिर सब ने मिल कर सीमा के नाम मोत का फरमान जारी कर दिया. रामू फिरोजाबाद के किशननगर में वीरपाल यादव के मकान में किराए पर रहता था.

10 अक्तूबर, 2015 की शाम 4 बजे सीमा ने मकान मालकिन राजबेदी से कहा कि भाई का फोन आया है कि मां की तबीयत बहुत खराब है, इसलिए वह आसफाबाद चौराहे पर उस का इंतजार कर रहा है. वह उस के साथ मां को देखने अस्पताल जा रही है. इस के बाद सीमा अपने 8 साल के बेटे देव और 4 साल की बेटी तनु को ले कर चली गई. आसफाबाद चौराहे पर अमित थ्री व्हीलर लिए खड़ा था. वह सीमा और बच्चों को उस पर बैठा कर इधरउधर घुमाने और लगा. शाम होने लगी तो सीमा ने कहा, ‘‘जल्दी करो, मुझे घर भी जाना है.’’

अमित ने किसी को फोन किया तो थोड़ी ही देर में एक कार उस के पास आ कर रुकी. उस में से जगदीश और अशोक उतरे तो सीमा को शक हुआ. उस ने बच्चों के साथ भागना चाहा तो तीनों ने मारपीट कर बच्चों के साथ उसे कार में बैठाया और जंगल की ओर चल पड़े. अगले दिन थाना नारखी के उमरगढ़ से कुतुबपुर जाने वाले रास्ते पर खेतों के बीच पड़ने वाले एक कुएं में कुछ बच्चों ने एक महिला और 2 बच्चों की लाशें देखीं. शाम का समय था, लोग पंचायत चुनाव में वोट डाल कर लौट रहे थे.

बच्चों ने उन्हें कुएं में 3 लाशें पड़ी होने की बात बताई तो वे कुएं के पास पहुंचे. पुलिस को सूचना दे कर 2 लोग कुएं में उतर गए. नीचे जाने पर पता चला कि औरत और लड़की तो मर चुकी थी, जबकि लड़के की सासें चल रही थीं. उन्होंने लड़के को बाहर निकाला. तब तक पुलिस भी पहुंच गई थी. इंसपेक्टर श्रवण कुमार राणा ने बच्चे को तुरंत जिला अस्पताल भिजवाया. उस के बाद उन्होंने लाशें निकलवाईं. लाशों की शिनाख्त नहीं हो सकी, जिस से अंदाजा लगाया गया कि मृतक यहां के रहने वाले नहीं थे.

दूसरी ओर शाम को रामू घर पहुंचा तो जब मकान मालकिन ने बताया कि सीमा के भाई का फोन आया था और वह बच्चों को ले कर अपनी मां को देखने अस्पताल गई है तो वह सिर थाम कर बैठ गया. उस ने सीमा को फोन किया तो उस का फोन बंद था. उस ने भाई को फोन किया तो पता चला कि गंगा सिंह के घर में ताला लगा है. रामू समझ गया कि कुछ अनहोनी हो गई है. 13 अक्तूबर के अखबार में जब 2 लाशें और एक बेहोश बच्चे के कुएं में मिलने की खबर छपी तो खबर पढ़ कर रामू के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह जिला अस्पताल पहुंचा तो बेटे को देख कर सन्न रह गया. उस ने रोरो कर पुलिस को बताया कि बेहोश बच्चा उस का बेटा है.

इस के बाद पोस्टमार्टम में रखी महिला और बच्ची की लाशों की शिनाख्त उस ने अपनी पत्नी और बेटी के रूप में कर दी. रामू की दुनिया लुट चुकी थी. देव को होश आया तो उस ने सारी बात बता दी. उस के बाद अपराध संख्या 958/15 पर भादंवि की धारा 302, 307, 201 के तहत जगदीश, अशोक और अमित के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

जगदीश को उसी दिन उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उस की गिरफ्तारी की खबर पा कर अमित और अशोक गांव छोड़ कर भाग गए. 9 जनवरी को नए थानाप्रभारी जसपाल सिंह पंवार ने अमित को दिल्ली के गोविंदपुरी से गिरफ्तार कर लिया, लेकिन अशोक कथा लिखे जाने तक पकड़ा नहीं जा सका था. अमिल और जगदीश अपने किए की भले ही सजा पा जाएं, लेकिन उस से रामू की उजड़ी दुनिया तो अब बस नहीं सकती.

अमित का कहना था कि उसे अपनी बहन और उस के बच्चों को मारने का जरा सा भी अफसोस नहीं है, क्योंकि उस की वजह से गांव में उन लोगों की जो बदनामी हुई थी, उस के लिए यही उचित था. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Real Love Story Hindi: आखिर जीत गई मोहब्बत

Real Love Story Hindi: पाकिस्तान की रहने वाली ताहिरा ने मकबूल से निकाह के लिए लंबा इंतजार तो किया ही, पति के साथ रहने के लिए उन्होंने वह हर शर्त मान ली थी, जो भारत सरकार ने उन पर थोपी थी. उन में एक यह भी थी कि जब तक उन्हें भारतीय नागरिकता नहीं मिल जाती, वह कादियां से बाहर नहीं जाएंगी. आखिर उन्हें 13 सालों बाद अब जा कर नागरिकता मिली है.

100 बरस से ज्यादा पुरानी अहमदिया जमात का एक ही नारा है- ‘मोहब्बत सबलिए, नफरत किसी से नहीं.’ पाकिस्तान में इस संप्रदाय को इस्लामपरस्त नहीं माना जाता, जबकि भारत में इस जमात का अपना अहम रुतबा है. संयुक्त भारत के जिला स्यालकोट के रहने वाले चौधरी मंजूर अहमद इसी जमात के थे. इतना ही नहीं, वह दिनरात इस के प्रचारप्रसार में लगे रहते थे. वह अविवाहित थे और घरपरिवार की तरफ से उन के ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी. इसलिए उन का समय जमात के प्रचारप्रसार में ही गुजारता था.

भारतपाक विभाजन के समय चौधरी मंजूर अहमद अपने 313 साथियों को ले कर कादियां (भारत) आ गए थे. यहां आने के बाद भी वह अपने साथियों के साथ अपनी जमात का प्रचारप्रसार करने में लगे थे. देखतेदेखते 10 बरस का लंबा दौर गुजर गया. बात सन 1957 की है. धर्मप्रचार के एक कार्यक्रम के तहत मंजूर अहमद का लखनऊ जाना हुआ. वहीं पर बनारस के अब्दुल हकीम आए हुए थे. उस पहली मुलाकात में उन्हें मंजूर अहमद इस कदर भा गए कि उन्होंने अपनी बेटी खुर्शीदा हकैया का उन से निकाह करने का फैसला कर लिया.

बात चली तो सिरे चढ़ते देर नहीं लगी. इस तरह जल्दी ही उन दोनों का निकाह हो गया. खुर्शीदा से मंजूर अहमद को 2 बेटियों सलीमा व आतिया के अलावा 2 बेटे मकबूल अहमद और मंसूर अहमद हुए. इन में दूसरे नंबर पर पैदा हुए मकबूल का जन्म सन 1968 में हुआ था. अपने 4 बच्चों के साथ मंजूर अहमद बहुत खुश थे. बच्चों को दीनी तालीम के अलावा स्कूली शिक्षा भी दिलाई. मंजूर अहमद का इंतकाल हो जाने के बाद घरपरिवार की तमाम जिम्मेदारी उन के बेटे मकबूल अहमद के कंधों पर आ गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया भी.

इस बीच बड़ी बहन सलीमा का निकाह इंगलैंड में रहने वाले अहमद उर्फ मुन्नू के साथ हो गया था. मकबूल पत्रकारिता के क्षेत्र में आना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की. विभाजन के समय मंजूर अहमद के अधिकांश करीबी रिश्तेदार पाकिस्तान में ही रह गए थे. इसी वजह से मंजूर अहमद पत्नी के साथ कभीकभी पाकिस्तान भी जाते रहते थे. पति के इंतकाल के बाद खुर्शीदा बेगम भी अपने उन रिश्तेदारों से मिलने कई बार पाकिस्तान जा चुकी थीं. कई बार मकबूल भी उन के साथ पाकिस्तान गए थे. सन 1999 में भी मकबूल अहमद पाकिस्तान गए. इस बार उन के साथ उन की छोटी बहन अतिया भी थी.

मकबूल के एक फूफा डा. मोहम्मद अनवर फैसलाबाद में अपना क्लीनिक चलाते थे. वह कई बार इस बात की शिकायत कर चुके थे कि मकबूल पाकिस्तान आता है तो उन के घर नहीं ठहरता. लिहाजा मकबूल अहमद इस बार अतिया को ले कर सीधे उन्हीं के यहां चले गए. उस वक्त उन के यहां दावत चल रही थी, जिस में शरीक होने के लिए काफी लोग आए थे. उन्हीं में एक युवती भी थी, जिस की खूबसूरती ने मकबूल अहमद के दिल में खलबली मचा दी. बाद में पता चला कि वह युवती फैसलाबाद में निजी प्रैक्टिस करने वाले डा. जहूर अहमद की बेटी थी. डा. जहूर अहमद डा. मोहम्मद अनवर के करीबी दोस्त थे.

पहली नजर में दोनों एकदूजे के हो गए. मकबूल की बुआ नुसरत बेगम की अनुभवी आंखों ने झट से ताहिरा और मकबूल के दिलों का हाल पढ़ लिया था. उस वक्त ताहिरा की अम्मी नसीरा बेगम भी वहां मौजूद थीं. 5 बहनों और 3 भाइयों में ताहिरा छठे नंबर की थी. उन दिनों वह बीएससी में पढ़ रही थी. पार्टी खत्म होते ही ताहिरा अपनी अम्मी के साथ अपने घर चली गई. मकबूल को अपने फूफा के यहां ही रुकना था. मकबूल के लिए वह रात बितानी मुश्किल हो गई. रात भर उस की आंखों के आगे ताहिरा का ही चेहरा घूमता रहा. यही हाल ताहिरा का भी था.

हालांकि इस के बाद दोनों की छिटपुट मुलाकातें तो हुईं, लेकिन वे एकदूसरे से अपनी मोहब्बत का इजहार नहीं कर सके. वीजा अवधि खत्म होने के बाद मकबूल वापस भारत लौट तो आए, पर उन का दिल पाकिस्तान में ही रह गया. उसी दौरान मकबूल की बड़ी बहन सलीमा अपने शौहर के साथ कादियां आई. एक दिन इधरउधर की बातें चल रही थीं तो बात मकबूल के निकाह पर आ कर रुक गई. सलीमा ने कुछ लड़कियों की बातें अभी छेड़ी ही थीं कि मकबूल ने सीधे ताहिरा का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘आपा, आप लोग एक बार पाकिस्तान जा कर उसे देख आएं. उस के बाद आप जो फैसला करेंगी, मैं मान लूंगा.’’ इस के बाद ऐसा ही किया गया.

सलीमा और उस के पति अहमद उर्फ मुन्नू ताहिरा को देखने पाकिस्तान गए. ताहिरा की खूबसूरती और उस के व्यवहार ने उन दोनों का मन मोह लिया. ताहिरा उन्हें खूब पसंद आई. यह बात उन्होंने भारत लौट कर सभी को बता दी. ताहिरा के अब्बूअम्मी को भी जानकारी हो गई थी कि सलीमा उन की बेटी को अपने भाई के लिए पसंद करने आई थी. डा. जहूर अहमद और नसीरा बेगम को भी मकबूल पसंद था. लिहाजा इस रिश्ते को दोनों तरफ से मंजूरी मिल गई. ताहिरा और मकबूल की मुराद पूरी हो रही थी, इसलिए दोनों बहुत खुश थे.

इस के बाद ताहिरा और मकबूल अहमद फोन पर बातें करने लगे. दूसरी ओर खुर्शीदा बेगम पाकिस्तान जाने की योजना बनाने लगीं. आखिर मार्च, 2001 में खुर्शीदा बेगम मकबूल और अतिया को ले कर पाकिस्तान पहुंच गईं. इस बार ये लोग फैसलाबाद न जा कर लाहौर में अपनी एक रिश्तेदार आबिदा बेगम के यहां रुके थे. यह खबर उन्होंने डा. जहूर अहमद को भिजवाई तो वह अपनी पत्नी और बेटी ताहिरा को ले कर लाहौर पहुंच गए. वहीं पर एक सादा रस्म में मकबूल और ताहिरा की सगाई कर दी गई. इसी के साथ यह बात तय हो गई कि कादियां में निकाह पढ़वाया जाएगा. कादियां अहमदिया संप्रदाय का एक पवित्र स्थान है.

सगाई के बाद मकबूल अपनी अम्मी और बहन के साथ भारत लौट आए. ताहिरा भी फैसलाबाद चली गई. अब ताहिरा का पासपोर्ट बनना जरूरी था, जिसे बनने में करीब 9 महीने लग गए. मकबूल के परिवार वालों ने दिसंबर, 2001 में निकाह करने का फैसला करते हुए ताहिरा को हिंदुस्तान आने का न्योता भिजवा दिया. ताहिरा के परिवार वालों ने भी निकाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं. ताहिरा अपने घर वालों के साथ हिंदुस्तान के लिए रवाना होती, उस से पहले 13 दिसंबर को भारतीय संसद पर आतंकी हमला हो गया.

पुलिस के हाथ लगे सबूतों से यह बात सिद्ध हो गई कि हमला करने वाले आतंकवादियों का संबंध पाकिस्तान से था. इस के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ राजनैतिक व व्यापारिक संबंध तोड़ने के अलावा यातायात से जुड़े सभी रास्ते सील कर दिए. रास्ते सील होने से न कोई भारत से पाकिस्तान जा सकता था और न ही कोई पाकिस्तान से भारत की सीमा में दाखिल हो सकता था. इस से ताहिरा की भारत आने की तैयारी धरी की धरी रह गई. उस ने तत्काल मकबूल को फोन किया. इस के बाद दोनों 3 दिनों तक एकदूसरे को बारबार फोन कर के आश्वस्त करते रहे कि उन का प्यार सच्चा है, उन्हें अपना मुकाम जरूर हासिल होगा.

16 दिसंबर को जब भारतपाकिस्तान के बीच दूरसंचार पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया तो दोनों प्रेमी तड़प कर रह गए. वे जो फोन द्वारा बातचीत कर लेते थे, वह भी बंद हो गई. अब तड़पने के अलावा वे कुछ नहीं कर सकते थे. अपना दर्द एकदूसरे से कहने का भी उन के पास कोई जरिया नहीं रह गया था. मकबूल और ताहिरा ने यादों में तड़प कर 2 बरस का लंबा अरसा गुजार दिया. इस के बावजूद भी उन के दिलों में पुनर्मिलन की आस बरकरार थी. मगर उन के घर वालों को अब इस बात का कतई भरोसा नहीं रहा था कि आगे यह निकाह कभी हो सकेगा.

उन्होंने इसे कुदरत के अजब संयोग का खेल मान लिया. लिहाजा दोनों के घर वालों ने उन्हें समझाना भी शुरू कर दिया कि वे एकदूसरे को भूल कर कहीं और निकाह कर लें. पर इस के लिए न तो ताहिरा राजी हुई और न ही मकबूल. दोनों ने साफ कह दिया कि वे भले उम्र भर कुंवारे बैठे रहेंगे, लेकिन किसी अन्य से निकाह करने की बाबत सोच भी नहीं सकते.

सरहद पर लगी तमाम पाबंदियों को देखते हुए मकबूल ने अपनी महबूबा तक पहुंचने का दूसरा जरिया खोजा. उन्होंने अपने हिस्से की कुछ जमीन बेच दी और वह यूरोप पहुंच गए. लेकिन वहां से भी उन्हें पाकिस्तान जाने की अनुमति नहीं मिल पाई तो वह इंगलैंड में रह रही अपनी बड़ी बहन सलीमा के पास पहुंच गए. यह बात जुलाई, 2002 की है.

इंगलैंड से मकबूल ने ताहिरा को फोन किया. फोन पर उन की काफी दिनों बाद बात हुई थी. इसलिए अपने दिलों का हाल बयां करते समय उन की आंखें छलक आईं. उसी समय मकबूल ने ताहिरा को सुझाव दिया, ‘‘ताहिरा मुझे नहीं लगता कि हमारे मुल्कों के रिश्तों में जल्दी कोई सुधार होगा. इसलिए मेरी मानो, तुम पाकिस्तान में ही किसी अच्छे लड़के से निकाह कर लो.’’

इतना कह कर मकबूल ने फोन बंद कर दिया. मकबूल की बात सुन कर ताहिरा तड़प कर रह गई. इस के बाद तो मकबूल को पाने का उस का इरादा और भी पुख्ता हो गया. उसी दौरान सितंबर, 2002 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने की फिर से पहल की. उसी साल नवंबर में एक और बात हुई. ‘इंडो-पाक दोस्ती मंच’ का सेमिनार हुआ तो इस में पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल, पत्रकार कुलदीप नैयर और पंजाब के तत्कालीन वनमंत्री तृप्त राजेंद्र सिंह के अलावा मकबूल अहमद भी शिरकत करने पहुंचे.

दोनों देशों के बीच तनाव के चलते आने वाली परेशानियों के विषय पर बातचीत करते हुए मकबूल ने अपनी प्रेमकहानी की अधूरी दास्तान का भी शिद्दत से बखान कर डाला. इस का नतीजा यह निकला कि ताहिरा और मकबूल की प्रेमकथा मीडिया की जानकारी में आ गई. फलस्वरूप तमाम अखबारों ने इसे त्रासद कथा के रूप में प्रमुखता से छापा. भारतपाकिस्तान के अलावा अन्य देशों की मीडिया को भी इस अनूठी प्रेमगाथा ने आकृष्ट किया. इसी दौरान दोनों देशों के बीच चलने वाली सदभावना बस सदा-ए-सरहद फिर से शुरू कर दी गई और दूरभाष सेवा पर लगा प्रतिबंध भी हटा दिया गया. इन युवा प्रेमियों के लिए यह खबर बहुत अच्छी रही. मकबूल ने ताहिरा से कह दिया कि वह तुरंत उसी बस से भारत चली आए.

मकबूल का निमंत्रण पाते ही ताहिरा ने पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास से वीजा के लिए संपर्क किया. पर दूतावास ने यह कहते हुए ताहिरा को कादियां का वीजा देने से मना कर दिया कि अभी उस की वहां शादी नहीं हुई है. ताहिरा ने उसी दिन यह बात मकबूल को बता दी. मकबूल ने समय गंवाए बिना किसी तरह गृह मंत्रालय से संपर्क किया तो उसे बताया गया कि अगर वह अपनी जिम्मेदारी पर ताहिरा को कादियां लाना चाहता है तो गृह मंत्रालय से उसे विशेष अनुमति मिल सकती है, अलबत्ता अनुमति मिलने में खासा वक्त लगेगा. मकबूल अब और ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहते थे, लिहाजा उन्होंने इस संबंध में अपनी लिखित फरियाद विभिन्न विभागों के उच्चाधिकारियों के अलावा कई राजनेताओं एवं अखबारों को भी भेज दी.

उन्होंने पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास में भी यह फरियाद भिजवाई. इस के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल से मकबूल ने खुद मुलाकात की. इंद्रकुमार गुजराल ने उन की मदद करने का आश्वासन दिया. मकबूल की अपनी कोशिश जारी थी तो वहां पाकिस्तान में ताहिरा भी चुप नहीं बैठी थी. वह भी लगातार भारतीय दूतावास के अधिकारियों से मिल कर अपनी समस्या का हल निकालने की कोशिश कर रही थी.

आखिर उन की कोशिशें रंग लाईं. ताहिरा को 14 अक्तूबर, 2003 से ले कर 14 दिसंबर, 2003 यानी 2 महीने का कादियां में रहने का वीजा मिल गया. लेकिन आगे एक नई समस्या और उन के सामने आ खड़ी हुई. समस्या यह थी कि सद्भावना बस ‘सदा-ए-सरहद’ में अगले 2 महीने तक एक भी सीट खाली नहीं थी. इस के बावजूद ताहिरा ने उम्मीद नहीं छोड़ी. इत्तेफाक से एक शख्स ने किसी वजह से इस बस का अपना टिकट एक दिन पहले निरस्त करा लिया. इस के बाद वह सीट ताहिरा को अलौट कर दी गई.

ताहिरा ने इस बात की खबर मकबूल को दे दी. अब ताहिरा की खुशी का ठिकाना नहीं था. वह भारत आने की तैयारी में जुट गई. आखिर 28 अक्टूबर, 2003 की सुबह करीब 6 बजे हिंद-पाक के बाघा बौर्डर पर सदभावना बस आ कर रुकी तो मकबूल की खुशी का पारावार न रहा. बस नंबर एलएक्सएक्स 2425 से उतर कर ताहिरा मकबूल की बगल में आ खड़ी हुई तो वहां 2 देशों की सुकोमल भावनाओं के अनूठे दृश्य का अद्भुत मंजर पैदा हो गया. कुछ लोगों ने आगे बढ़ कर उन्हें फूलमालाएं पहनाते हुए उन का अभिनंदन किया तो अनेक प्रैस फोटोग्राफरों ने उन्हें अपने कैमरों में कैद कर लिया.

‘सदा-ए-सरहद’ बस लाहौर और दिल्ली के बीच चलती है. बाघा बौर्डर पर यह कस्टम क्लीयरेंस के लिए रुकती जरूर है, लेकिन इस का कोई भी यात्री वहां उतारा नहीं जाता. सुरक्षागाडि़यों के बीच चलने वाली इस बस पर सवार सभी सवारियों को बस के अंतिम पड़ाव पर ही उतारा जाता है. मकबूल के साथ बाघा बौर्डर पर हुई कुछ देर की मुलाकात के बाद ताहिरा फिर से बस में बैठ गई. बस के चलते ही मकबूल ने अपने भाई मंसूर अहमद को भी टैक्सी से दिल्ली के लिए रवाना कर दिया.

दिल्ली में बस से उतरते ही ताहिरा को पत्रकारों ने घेर लिया. उस दिन सभी चैनलों पर ताहिरा ही छाई रही. 28 अक्तूबर को वह दिल्ली में रुकी. इस के अगले दिन मंसूर अहमद उसे शताब्दी एक्सप्रैस से अमृतसर ले गया. अमृतसर से ये लोग टैक्सी कर के कादियां पहुंचे. वहां ताहिरा को अतिया के साथ रखा गया. दोनों घरों के बुजुर्गों ने अलगअलग देशों में बैठे होने पर भी ताहिरा और मकबूल के निकाह की तारीख 7 नवंबर, 2003 मुकर्रर कर दी. लेकिन लाख चाहने के बावजूद इस तारीख को भी निकाह नहीं हो पाया, क्योंकि ताहिरा के घर वालों को भारत आने के लिए वीजा नहीं मिल पाया था.

लिहाजा यह तारीख मुल्तवी कर दी गई और ईद के तुरंत बाद दोनों का निकाह करना तय किया गया. ईद भी 26 नवंबर, 2003 की थी. ईद के बाद भी उन का निकाह नहीं हो सका. वजह वही थी, ताहिरा के घर वालों को वीजा न मिलना. उधर ताहिरा के वीजा की अवधि समाप्त होने के दिन तेजी से नजदीक आ रहे थे. आखिर दोनों परिवारों की सहमति से यही तय किया गया कि ताहिरा के अभिभावकों की गैरमौजूदगी में ही 7 दिसंबर, 2003 को उस का निकाह मकबूल से कर दिया जाए. इस के लिए स्थानीय अभिभावकों की व्यवस्था की गई.

उसी दिन कादियां में स्थानीय लोगों को एक अलग ही नजारा देखने को मिला. निकाह के मौके पर मकबूल अहमद ने बिसकुटी रंग का कुरतापायजामा पहन रखा था, ऊपर से आकर्षक जालीदार टोपी भी पहन रखी थी. आकर्षक लिबास पहने और हाथों में मेहंदी रचाए ताहिरा भी किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. सभी धर्मों के लोग इस खुशी में शरीक होने को इकट्ठा थे. कादियां निवासी डा. बशीर अहमद के घर बाराती मेहमानों के खानपान का इंतजाम था. ताहिरा के पिता डा. जहूर अहमद की गैरमौजूदगी में उन के वकील के रूप में हिंदुस्तानी जमाते अहमदिया के मुख्य सचिव साहिबजादा मिर्जा वसीम अहमद ने 25 हजार रुपए की हक मेहर की जमानत पर रस्म अदायगी के तहत हामी भरी.

इन्हीं मिर्जा साहिब ने निकाह कुबूल करवाया और पढ़वाया भी. ऐसा लग रहा था, जैसे निकाह की यह रस्म 2 इंसानों के बीच न हो कर, 2 मुल्कों के बीच संपन्न हो रही हो. इस में कोई शुबहा भी नहीं था. दुलहन पाकिस्तान की थी और दूल्हा हिंदुस्तानी. इस निकाह से 2 देशों का मिलन ही तो हो रहा था. कादियां की मसजिद मुबारक में संपन्न इस ऐतिहासिक निकाह और दूल्हादुलहन के अटूट बंधन की खातिर सैकड़ों लोगों ने नमाज अता की और दुआ मांगी. कादियां के अहमदिया ग्राउंड में हिंदू भाइयों ने कादियां पहुंचे हर शख्स के लिए खानपान की अच्छी व्यवस्था कर रखी थी.

अनूठे निकाह के इस अवसर पर साहिबजादा मिर्जा वसीम अहमद की बेगम अमतुल कदूस ने ताहिरा की मां की भूमिका अदा की. अमृतसर की डा. हरसुचेतन, डा. दलजीत कौर व सलीमा बानो ने ताहिरा की बहनों की भूमिका निभाई. इस तरह तमाम रस्में पूरी कर दोपहर के भोजन के बाद ताहिरा की डोली कादियां के जानेमाने समाजसेवी डा. बशीर अहमद के घर से उठी. मकबूल के घर पर दुलहन के इंतजार में सब पलकें बिछाए खड़े थे. इस मौके पर दुनिया भर से कादियां पहुंचे पत्रकारों से ताहिरा ने नम आंखों से इतना ही कहा था, ‘‘हिंदुस्तानियों जैसी मोहब्बत की मिसाल कहीं नहीं मिल सकती. मेरे परिवार का एक भी सदस्य यहां न होने के बावजूद मुझे अहसास तक नहीं हुआ कि मैं यहां अकेली हूं.’’

मगर यह खुशनसीबी फिलहाल एक हफ्ते की थी. 14 दिसंबर को वीजा की अवधि समाप्त होने पर ताहिरा को भरे मन से वापस पाकिस्तान लौट जाना पड़ा. इस के बाद कुछेक बार अपनी दुलहन से मिलने मकबूल पाकिस्तान गया और कुछेक बार ताहिरा हिंदुस्तान आई. यह वाजिब हल नहीं था. मुस्तकिल तौर पर एकसाथ रहने को जरूरी था कि दोनों में से कोई एक अपने मुल्क की नागरिकता छोड़ कर दूसरे मुल्क की नागरिकता हासिल कर ले. ताहिरा ने ससुराल में रहने के लिए हिंदुस्तान की नागरिकता लेने की इच्छा जताई. इस संबंध में उस ने कागजी काररवाई शुरू कर दी.

लेकिन उस के आवेदन पर आपत्ति लग गई. इस की वजह यह थी कि नागरिकता हासिल करने की अर्जी दाखिल करने से पहले ताहिरा को एक साल का वीजा ले कर इतने समय तक लगातार कादियां में रहना था. पर उस ने ऐसा नहीं किया था. बाद में अर्जी स्वीकार हुई तो उस के सामने शर्त रखी गई कि आगे वह कम से कम 7 सालों तक हिंदुस्तान में रहेगी. वीजा की शर्तों के मुताबिक वह कादियां से बाहर नहीं जा सकेगी और अगर वह कादियां से बाहर गई तो उसे गिरफ्तार कर वापस पाकिस्तान भेज दिया जाएगा. ताहिरा पति के साथ रहने के लिए हर शर्त मानने को तैयार थी. वह नियमानुसार कादियां पहुंच गई.

सभी शर्तों का उस ने बड़ी शिद्दत से पालन किया. एक लंबे अरसे तक वह कादियां की चारदीवारी के भीतर अपने पत्नी धर्म का पालन करती रही, साथ ही उस ने भारतीय नागरिकता हासिल करने के अपने प्रयास भी जारी रखे. इस संबंध में मकबूल अहमद लगातार भागदौड़ कर रहे थे. इस दौरान ताहिरा 2 बेटियों समायला मकबूल व सूफिया मकबूल के अलावा बेटे मग्फर मकबूल की मां बन गई. ताज्जुब की बात यह रही कि जहां इन तीनों बच्चों को भारतीय नागरिकता हासिल हो गई थी, वहीं ताहिरा अभी भी पाकिस्तानी नागरिक थी.

खैर, इन की मेहनत रंग लाई. करीब 13 सालों के लंबे इंतजार के बाद 11 अप्रैल, 2016 को ताहिरा को भारत के गृह मंत्रालय से सूचना मिली कि उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान करने संबंधी उपायुक्त, गुरदासपुर को लिख दिया गया है. इस संबंध में वह सीधे जा कर उन से मिल सकती हैं. उपायुक्त अभिनव त्रिखा पहले ही इस दंपति का सहयोग कर रहे थे. उन के पास संबंधित पत्र पहुंचा भी नहीं था कि गुरदासपुर से उन का तबादला हो गया. उपायुक्त के रूप में आए प्रदीप सब्बरवाल को गृह मंत्रालय का पत्र मिला तो उन्होंने ताहिरा को बताया कि अब बहुत जल्दी उन्हें भारत की नागरिकता का प्रमाण पत्र दे दिया जाएगा. इस के आधार पर वह अपना भारतीय पासपोर्ट भी बनवा सकेंगी.

खुद को खुशनसीब मानते हुए अब ताहिरा बेहद उत्साहित हैं. उन का कहना है कि भारतीय नागरिकता का प्रमाण पत्र हासिल होते ही वह कादियां से निकल कर सब से पहले मोहब्बत के प्रतीक ताजमहल का दीदार करेंगी. इस के बाद भारत के अन्य दर्शनीय स्थलों को देखने जाएंगी. भारतीय पासपोर्ट बन जाने पर वह पति व बच्चों के साथ पाकिस्तान का भी चक्कर लगा कर आएंगी. ताहिरा इस बात पर गर्वित भी थीं कि भले 13 सालों बाद ही सही, आखिर वह हिंदुस्तानी तो बन ही गईं. Real Love Story Hindi

Heart Touching Story: मां को बनाया आया

Heart Touching Story: बच्चे का जन्म उस बच्चे के मांबाप के लिए एक सुंदर सपना सच होने जैसा होता है. बच्चे के जन्म लेते ही मां की ढेरों आशाएं उस से जुड़ जाती हैं. बच्चे में मां को अपना भविष्य सुरक्षित नजर आने लगता है. मां की उम्मीद बंध जाती है कि बच्चा जब बड़ा होगा तो उस के जीने का सहारा बनेगा. उसे अच्छी जिंदगी देगा. अपने इस सपने को साकार करने के लिए मांबाप जब अपने छोटे से फूल जैसे बच्चे को पढ़ालिखा कर बड़ा करते हैं और समाज में सम्मान से जीने की राह दिखाते हैं. खासतौर पर अगर जन्म लड़के का हो तो मांबाप कुछ ज्यादा ही आशान्वित हो जाते हैं.

बच्चा बड़ा हो कर जब कमाने लगता है और उस का मांबाप को संभालने का वक्त आता है, उस वक्त वह अपने स्वार्थ और बढ़ती इच्छाओं के चलते शादी कर के अपनी दुनिया अलग बसा लेता है. उसे अपनी मां फांस की तरह चुभने लगती है. लेकिन जब उस का खुद का परिवार बनना शुरू होता है और उस के अपने बच्चे को संभालने की बारी आती है तो वही अपनी मां उस को याद आने लगती है. उस के हिसाब से मां से अच्छा बच्चे को भला कौन संभाल सकता है और आया को भारी रकम देने का खर्चा भी बच जाएगा. इस तरह बच्चे अपने स्वार्थ के लिए अपनी ही मां को घर की आया बनाने से नहीं चूकते.

बच्चे संभालने के लिए साथ रखा

खासतौर पर उन मांओं को यह तकलीफ ज्यादा सहन करनी पड़ती है जो तलाकशुदा या विधवा का जीवन जी रही हों. वह मां जिस को बुढ़ापे में आराम की जरूरत होती है उस को बच्चे की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है क्योंकि पतिपत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं.

ऐसे ही हालात की मारी 60 वर्षीय प्रेमा कुलकर्णी एक विधवा हैं. प्रेमा के पति की ऐक्सिडैंट में मौत हो गई और चूंकि वे पढ़ीलिखी नहीं थीं इसलिए उन्होंने घरघर काम कर के अपने बच्चे को पढ़ायालिखाया इस उम्मीद से कि उन का बेटा उन को बड़ा हो कर संभालेगा और उन को बुढ़ापे में काम नहीं करना पड़ेगा लेकिन इस के ठीक विपरीत प्रेमा बताती हैं,

‘‘मेरे बेटे ने कमाई शुरू करते ही शराब पीनी शुरू कर दी. और चूंकि हम लोग गरीब हैं, झोंपड़पट्टी में रहते हैं इसलिए वहां पर कुछ गलत लड़कों की संगत में उस ने जुआ खेलना भी शुरू कर दिया. ‘‘उस के बाद उस की एक लड़की से दोस्ती हुई जोकि उस के औफिस में ही काम करती थी, उस से उस ने शादी कर ली. जब मेरे बेटे की शादी हुई तो मुझे लगा घर में बहू आएगी तो शायद मेरा बेटा सुधर जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

‘‘मेरा बेटा और बहू दोनों काम पर चले जाते थे और मुझे घर का पूरा काम करने को बोलते थे जबकि मैं इतनी उम्र में 5 घरों का काम पहले से कर रही थी. जब मैं ने इस बात पर एतराज किया तो वे दोनों मेरा घर छोड़ कर अलग हो गए. 1 साल तक मैं अकेली रही. जब उस को बच्चा हुआ तो वे दोनों मेरे पास आए और अपने साथ ही रहने को कहा.

‘‘मैं भी अकेली घर में रहरह कर तंग हो गई थी इसलिए बेटे के पास चली गई लेकिन बाद में मुझे समझ आया कि उन्होंने मुझे अपना बच्चा संभालने के लिए घर में रखा है. बुढ़ापे में मुझे छोटे से बच्चे को संभालने में तकलीफ होती थी. साथ ही मुझे भरपेट खाना भी नहीं मिलता था. मेरी बहू फ्रिज में ताला लगा कर जाती थी ताकि मैं फ्रिज में से कुछ ले कर खा न सकूं. जब इस बात को ले कर मैं ने बहू से झगड़ा किया तो वह और बेटा दोनों मुझ से झगड़ा करने लगे. आखिर तंग आ कर मैं वापस अपनी झोंपड़ी में चली आई और घरघर काम कर के ही अपना पेट पाल रही हूं.’’

मजबूरी भी कारण

प्रेमा की तरह ही एक और भारतीय नारी हैं जो अपने पति की सेवा और बच्चों का पालनपोषण ही अपना धर्म समझती हैं. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी कार्य में लगा दी. उन का नाम है वीणा मिश्रा.

65 वर्षीय वीणा के 3 बच्चे हैं, 1 लड़का और 2 लड़कियां वीणा अपने बारे में बताते हुए कहती हैं कि बेटियों की तो उन्होंने पढ़ालिखा कर शादी कर दी और बेटे को इंजीनियरिंग करवाई. चूंकि बेटा पढ़ाई में होशियार था इसलिए उस ने पढ़लिख कर अच्छी नौकरी पा ली और उसी नौकरी के तहत उस को अमेरिका में ट्रांसफर मिल गया. हम अपने बेटे की तरक्की से बहुत खुश थे और हमारा बेटा हमारा अच्छे से खयाल भी रख रहा था. वीणा आगे बताती हैं कि वह जब पूरी तरह सैटल हो गया तो हम ने हिंदुस्तान की ही एक लड़की से उस की शादी करवा दी.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. उस का इरादा कुछ सालों में इंडिया में ही बसने का था. लेकिन शादी के बाद वह एकदम से बदल गया. वहां पर ही वह रचबस गया. उस के 2 बच्चे भी हो गए. वह हमें लगातार नियमित तौर पर पैसे भी भेजता था. लेकिन क्योंकि उस की पत्नी भी नौकरी करती है इसलिए घर में बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं था. वहां पर (अमेरिका में) पहले तो नौकरानी मिलती नहीं है और अगर मिलती भी है तो उस की तनख्वाह ही 60 हजार रुपए से ऊपर होती है.

वीणा कहती हैं कि बेटे ने कहा कि वे वहीं उन के साथ अमेरिका में रहें ताकि उस के बच्चों को कोई संभालने वाला मिल जाए. मेरे पति और मुझे दोनों को इंडिया से बहुत प्यार है, हमारा पूरा जीवन यहीं गुजरा है इसलिए हम ने अमेरिका आने से मना कर दिया. नतीजा यह हुआ कि उस ने हमें खर्चे के पैसे भेजने बंद कर दिए. आखिर में थकहार कर हमें अमेरिका जाना ही पड़ा.

वीणा और प्रेमा की तरह कितनी ही बेबस बूढ़ी और लाचार मांएं हैं जो अपने बच्चों के घर में ही नौकरानी जैसी बन गई हैं. अगर वे इस के खिलाफ जाती हैं तो उन को अपने बुढ़ापे का सहारा खोना पड़ता है. इसलिए वे नौकरानी बनना कुबूल कर लेती हैं या फिर उन्हीं के साथ रहने का फैसला करती हैं. Heart Touching Story

Hindi Stories: प्यार के दो रंग

Hindi Stories: आदमी की किस्मत उस के पसीने से लिखी होती है, जिस ने भी यह बात कही है, गलत नहीं कही. उस घर में जो रौनक, हुस्न और खुशबू थी, वह सनोवर के पसीने की बदौलत थी.

शाम को घर पहुंचा तो 6 बज रहे थे. 7 बजे किसी पार्टी में जाना था. मैं ने ड्राइंगरूम  में कदम रखा तो वह खुशबू से महक रहा था. बैडरूम में दाखिल हुआ तो मैं ने जोहरा को सिंगार मेज के बड़े आईने के सामने खड़ी देखा. वह अभीअभी नहा कर गुसलखाने से निकली थी. उस के बालों में नमी थी. उस के बाल गरदन तक बड़ी नफासत से तराशे हुए थे. उन से भीनीभीनी खुशबू फूट रही थी. वह मेकअप करने में मसरूफ थी. उस ने मुझे आईने में देखा और रस्मी अंदाज से बोली, ‘‘हैलो डियर.’’

‘‘हैलो…’’ मैं ने अपना ब्रीफकेस पलंग पर रख दिया, ‘‘पार्टी 7 बजे है और तुम अभी से तैयार हो रही हो?’’

‘‘मैं तैयार कहां हो रही हूं?’’ उस ने कहा, ‘‘सिर्फ पाउडर लगा रही थी. अभी मैं ब्यूटीपार्लर जा रही हूं.’’

‘‘ब्यूटीपार्लर?’’ मैं ने बैड पर बैठते हुए उस की तरफ देखा, ‘‘यह जो सिंगार मेज पर मेकअप के सामान की दुकान लगी है और हर महीने जो तुम 2 हजार रुपए का सामान खरीदती हो, वह मेरी समझ में नहीं आता. जब बातबात पर ब्यूटीपार्लर जाती हो तो फिर मेकअप का सामान मत खरीदा करो.’’

‘‘जब भी किसी पार्टी में जाती हूं तो ब्यूटीपार्लर से तैयार हो कर आती हूं. घर में रहती हूं या शौपिंग के लिए जाती हूं तो घर में मेकअप कर लेती हूं. यह बात तुम भूल जाते हो.’’

‘‘तुम्हें अपनी नजरों के सामने पा कर हर बात भूल जाता हूं.’’

‘‘तुम तैयार हो जाओ, तब तक मैं ब्यूटीपार्लर से हो आऊं.’’ वह बोली, ‘‘अपनी गाड़ी की चाबी तो देना.’’

वह गाड़ी की चाबी ले कर तेजी से बाहर निकल गई. उस ने न तो चाय के लिए पूछा था और न ही नौकरानी को बुला कर कहा था कि मेरे लिए चाय वगैरह बना दे. उसे मेरा खयाल कभी नहीं रहता था. वह तो अपने आप और अपनी दुनिया में गुम रहती थी. मैं उस की खुदगरजी का जैसे आदी हो गया था. वह घर में बीवी नहीं, महबूबा बन कर रह रही थी.

मैं गुसलखाने से बाहर आया. 7 बज गए थे. जोहरा 5-7 मिनट पहले ही ब्यूटीपार्लर से तैयार हो कर आई थी. मैं ने उस की सजधज देखी तो देखता ही रह गया. वह किसी दुलहन के अंदाज में बनसंवर कर आई थी. बेहद हसीन होने के बावजूद वह अपने आप को और भी हसीन बनाने की कोशिश करती थी, ताकि महफिलों में हर किसी की नजर में छा जाए.

उस का हुस्न रोजबरोज निखरता जा रहा था. इस की एक वजह यह थी कि उसे सारा दिन सजनेसंवरने और दावतों में जाने के सिवा कोई और काम नहीं था. मैं कभीकभी सोचता था कि क्या मैं ने जोहरा से सिर्फ इसलिए शादी की थी कि मेरी बीवी हसीन औरत हो? क्या औरत महज हुस्न व शबाब का नाम है? क्या मर्द को औरत के शबाब और जिस्म ही से दिलचस्पी होती है? उसे औरत से कुछ और नहीं चाहिए क्या?

मैं ने उस के करीब पहुंच कर उसे अपने बाजुओं में कैद कर लेना चाहा तो वह एकदम तेजी से पीछे हटी, ‘‘ओह नो डियर, मेरे बाल, कपड़े और मेकअप का सत्यानाश हो जाएगा.’’

‘‘और मेरे जज्बात का…’’ मैं ने क्षुब्ध हो कर पूछा.

‘‘उन्हें वापसी तक काबू में रखो,’’ वह मुसकराई, ‘‘मैं ने 500 रुपए दिए हैं ब्यूटीपार्लर वालों को.’’

जब हम गाड़ी में बैठे तो उस ने अपने पर्स से एक चिट निकाल कर मेरी तरफ बढ़ाई, ‘‘पहले आप यहां चलें. मेरी सहेली और उस के शौहर को साथ ले कर पार्टी में चलते हैं. वे भी इत्तफाक से इस पार्टी में बुलाए गए हैं.’’

‘‘यह क्या कोई नई चीज है?’’ मैं उस के हाथ से चिट ले कर पता पढ़ने लगा.

‘‘यह सनोवर है…’’

‘‘सनोवर!’’ मेरा दिल धड़क उठा. मैं ने अनजान बन कर पूछा, ‘‘कौन सनोवर? शायद यह नाम मैं पहली बार सुन रहा हूं.’’

‘‘लो, तुम मेरी सब से प्यारी सहेली और अपनी क्लासफेलो को भूल गए?’’ उस ने हैरत से मेरी तरफ देखा.

‘‘जब तुम मिल गईं तो किसी को याद रखने की जरूरत ही क्या है?’’ मैं ने कहा, ‘‘कुछ याद तो आ रहा है कि कोई लड़की सनोवर हमारे साथ पढ़ती थी. वही सनोवर थी न, जो बहुत काली चमकीली सी थी?’’

‘‘खैर, अब बहुत ज्यादा बनिए नहीं,’’ उस ने अपनी कमर की तरफ बढ़ते मेरे हाथ को पकड़ कर कहा, ‘‘तुम्हारे साथ उस का हर वक्त उठनाबैठना था. तुम उस के साथ कुछ ज्यादा ही बातें नहीं करते थे बल्कि उसे अपने नोट्स भी देते थे.’’

‘‘इस बात को 7-8 साल का अरसा हो गया है और मैं बहुत सारी पुरानी बातें भूल चुका हूं.’’ मैं ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा, ‘‘सनोवर से तुम्हारी मुलाकात कहां हो गई? इतने अरसे तक वह कहां गायब रही?’’

‘‘उस से कल मेरी मुलाकात जौहरी बाजार में हो गई थी.’’

‘‘वह तुम्हारी सब से प्यारी सहेली थी,’’ मैं बोला, ‘‘मगर अब नहीं रही. उस ने 7-8 बरसों में भूल कर भी तुम्हारी खबर नहीं ली. ऐसी बेवफा सहेली के यहां तुम किस लिए जा रही हो?’’

‘‘वह शादी के बाद अपने शौहर के साथ लंदन चली गई थी. करीब 3 साल पहले ही वापस आई है.’’

‘‘उस की शादी शायद कदूस से हुई थी,’’ मैं ने उसे याद दिलाया, ‘‘कदूस भी हमारा हमजमात और अच्छे दोस्तों में था. उस ने एक शहर में रहते हुए कभी मिलने की कोशिश नहीं की. दोनों मियांबीवी बड़े खुदगर्ज निकले.’’

‘‘तुम उन दोनों को तो इलजाम दे रहे हो, मगर जरा खुद भी तो सोचो कि तुम या मैं कितनी बार उन के यहां गए हैं.’’

‘‘तुम सच कहती हो.’’ कह कर मैं ने बात खत्म कर दी.

मैं सरोवर का सामना नहीं करना चाहता था, इसलिए कि मैं उस की मोहब्बत का मुजरिम था. मैं सोच रहा था कि सनोवर से जब सामना होगा, नजरें मिलेंगी तो निगाहों की जुबान न जाने कितने शिकवेशिकायतें करेंगी. क्या मेरे पास कोई जवाब होगा? क्या मैं उस के किसी सवाल का जवाब दे सकूंगा? उस से नजरें मिला सकूंगा? क्या मैं इस काबिल हूं कि उस के सामने जा सकूं?

मैं ने सिगरेट खरीदने के बहाने गाड़ी अचानक पान की दुकान के सामने रोक दी, इसलिए कि मेरे खयालों में सनोवर का चेहरा बारबार लहराने लगा था. दोएक बार मुझ से एक्सीडेंट होतेहोते रह गया था. मैं ने सिगरेट खरीदते वक्त सोचा कि जोहरा से कहूंगा कि वह गाड़ी चलाए. लेकिन मुझे यह कहने की नौबत नहीं आई. वह मेरे कहने से पहले ही स्टीयरिंग पर बैठ गई थी. मैं गाड़ी में बैठा तो उस ने इंजन स्टार्ट करते हुए कहा, ‘‘तुम आज गाड़ी बहुत बेतुके ढंग से चला रहे हो. 2 बार एक्सीडेंट होतेहोते बचा है. लगता है, तुम्हारा दिमाग कहीं और है, नजरें कहीं और…’’

‘‘तुम जो मेरे पास कयामतखेज हुस्न के साथ बैठी हो, उस की वजह से मैं किसकिस को काबू में रखूं?’’

‘‘आज तुम बहुत ज्यादा खुशामदाना बातें कर रहे हो. खैरियत तो है?’’ उस ने कातिल नजरों से मेरी ओर देखा.

मैं ने उस की बात को हंस कर टाल दिया. आदमी अपनी पहली मोहब्बत को कभी भुला नहीं सकता. मैं भी वह दिन नहीं भूला, जिस दिन मैं ने सनोवर के कदमों में अपना दिल रख दिया था. हम दोनों ने अपनी मोहब्बत का राज किसी पर जाहिर नहीं किया था. एकदूसरे से चुपकेचुपके मोहब्बत करते थे और चोरीछिपे मिलते थे. फाइनल इम्तिहान के बाद एक दिन सनोवर का टेलीफोन आया, ‘‘क्या तुम आज शाम मुझ से अजीज पार्क में मिल सकते हो?’’

मैं अजीज पार्क में पहुंच गया था उसे लेने के लिए. करीब ही मेरे दोस्त का एक फ्लैट था. वह 10 दिन के लिए अपनी बीवी को ले कर सैर पर गया था. फ्लैट की चाबी मेरे पास छोड़ गया था. मैं सनोवर को साथ ले कर उस फ्लैट पर पहुंचा था. फ्लैट में कदम रखते ही वह मेरे सीने पर सिर रख कर बिलख पड़ी थी. फिर फूटफूट कर रोने लगी. मैं हैरानपरेशान हो रहा था कि बात क्या है. मैं ने उस के बालों को सहलाया. उस से पूछा तो उस ने मेरे सीने को अपने आंसुओं से भिगो दिया. बड़ी मुश्किल से उस ने अपने आंसुओं और जज्बात पर काबू पाया. मैं खामोश खड़ा उस की तरफ देखता रहा, फिर पूछा, ‘‘क्या बात है सनोवर? तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’

‘‘हमारी मोहब्बत की आजमाइश का वक्त आ गया है,’’ उस की आवाज भर्रा सी गई, ‘‘अब क्या होगा?’’

मैं अच्छी तरह से समझ गया था कि वह क्या कहना चाहती थी. उस ने जो इशारा किया था, वह साफ था. इधर मैं और जोहरा कुछ दिनों से एकदूसरे में दिलचस्पी लेने लगे थे. मेरा दिल सनोवर से कुछ भर सा गया था. शायद इसलिए भी कि हम तनहाई में कई बार मिले थे, मोहब्बत भरी बातें भी की थीं. उस ने मुझे अपने घर वालों की कमजोर माली हालात के बारे में बहुत कुछ बता दिया था. मैं ने उसे तसल्ली दी थी, ‘‘हमारी मोहब्बत हर आजमाइश में पूरी उतरेगी.’’

‘‘कदूस का रिश्ता आया है. वह मुझ से एक महीने के अंदरअंदर शादी करना चाहता है, इसलिए कि वह लंदन जाने वाला है.’’

‘‘कदूस का रिश्ता आया है?’’ मैं हैरत और खुशी से उछल पड़ा. मुझे यकीन नहीं आया, इसलिए कि जोहरा और कदूस एकदूसरे के गहरे मित्र थे. मेरा क्या, सनोवर और तमाम हमजमातों का खयाल था कि वे दोनों मोहब्बत करते थे. जोहरा की तरफ से निराश हो कर ही मैं सनोवर की तरफ झुका था.

इधर जोहरा से मेरी मुलाकातें होने लगी थीं. मेरा खयाल था कि वह चूंकि बड़े घराने और फ्री सोसाइटी की लड़की है और मैं लौन टेनिस का मशहूर खिलाड़ी हूं, इसलिए वह मुझ से मिलती है. सनोवर ने मुझे बहुत बड़ी खुशखबरी सुनाई थी. मैं ने अपनी खुशी को हैरत के नीचे दबाते हुए कहा, ‘‘यह कैसे हो सकता है सनोवर? कदूस मोहब्बत जोहरा से करे और शादी तुम से करने के लिए अपना रिश्ता भेजे? नामुमकिन.’’

‘‘शायद जोहरा और उस के घर वालों ने कदूस का रिश्ता कबूल करने से इनकार कर दिया हो.’’ सनोवर बोली.

‘‘जोहरा अगर कदूस से मोहब्बत करती है तो इनकार का सवाल ही पैदा नहीं होता. और फिर कदूस कोई ऐरागैरा नहीं है. वह एक ऐसा नौजवान है, जिस के सामने यकीनी तौर पर उज्जवल भविष्य है. उस का खानदान भी हर लिहाज  से बड़ा है.’’

‘‘जोहरा की बात छोड़ो, मेरी बात करो.’’ वह जख्म खाए लहजे में बोली, ‘‘कदूस में इतनी खूबियां हैं तो क्या मेरे मांबाप मेरा रिश्ता देने से इनकार कर देंगे? हरगिज नहीं. वे उस के बारे में रस्मी तौर पर जांच कर रहे हैं. 4-5 दिनों में जवाब देने वाले हैं.’’

‘‘मुझे उम्मीद नहीं है कि तुम्हारा उस से रिश्ता हो जाए.’’ मैं ने अपना खयाल जाहिर किया.

‘‘क्यों?’’ उस ने मेरे सीने से अपना सिर उठा कर मेरी आंखों में झांका तो उस की आंखों में शदीद हैरानी थी, ‘‘क्यों नहीं कबूल करेंगे? एक तरह से मेरे घर वाले तैयार हो गए हैं. क्या तुम्हारे वालिद के पास 2-3 लाख रुपए हैं?’’

‘‘कदूस ने किसी चीज की मांग नहीं की है. उस ने कहा है कि उसे किसी दहेज की जरूरत नहीं है.’’

‘‘यह कदूस कब से इतने ऊंचे खयालात का मालिक हो गया?’’

‘‘मेरा खयाल है कि वह जोहरा से इंतकाम लेने के लिए मुझ से शादी कर रहा है. मैं चाहती हूं कि तुम कल ही अपने घर वालों को मेरे यहां भेजो. दहेज की शर्त न रखो तो बात बन जाएगी. मैं कदूस से शादी करने से इनकार कर दूंगी.’’

वह फिर मेरे सीने से लग गई. मैं जोहरा के बारे में सोचने लगा. जोहरा सनोवर से कहीं ज्यादा हसीन थी. उस का रंग भी दूध की तरह उजला था. सब से बढ़ कर तो यह बात थी कि वह एक दौलतमंद घराने की लड़की थी. मुझे दहेज में हर चीज मिल सकती थी और साथ ही उस के डैडी मुझे अच्छी नौकरी भी दिला सकते थे. सनोवर से मैं मोहब्बत तो कर सकता था, पर शादी नहीं.

‘‘मेरे घर वाले इतनी जल्दी मेरी शादी करने पर शायद ही तैयार हों,’’ मैं ने बहाना पेश किया, ‘‘इसलिए कि मैं अब तक रोजगार वाला नहीं हुआ हूं और फिर मेरी छोटी बहन की शादी भी होनी है. क्या तुम्हारे घर वाले

2-1 साल तक रुक नहीं सकते?’’

सनोवर फिर रोने लगी थी. वह मुझे हर कीमत पर पाना चाहती थी और मैं था कि उसे खूबसूरती से टाल देना चाहता था. मैं ने उसे अपने बाजुओं के घेरे में कैद कर के कहा, ‘‘सनोवर, अगर तुम यह समझती हो कि मेरी मोहब्बत में कोई खोट है और मुझे आजमाना चाहती हो तो आजमा सकती हो. कहो तो मैं इस फ्लैट की बालकनी से छलांग लगा कर जान दे सकता हूं. खुदकुशी कर सकता हूं. कदूस को कत्ल कर सकता हूं, मगर तुम से शादी नहीं कर सकता, इसलिए कि मजबूरियां मेरी राह में रुकावट बनी हुई हैं.’’

‘‘तुम कत्ल कर सकते हो, अपनी जान दे सकते हो, मगर मुझ से शादी नहीं कर सकते? तुम यह क्यों नहीं कहते कि तुम मुझ से शादी करना ही नहीं चाहते? तुम्हें मुझ से मोहब्बत नहीं रही है. तुम्हारा दिल मुझ से भर चुका है.’’

‘‘तुम मेरी मोहब्बत पर, मुझ पर इलजाम लगा रही हो?’’ मैं ने उसे अपने सीने से अलग करते हुए कहा, ‘‘मैं बालकनी से छलांग लगाने जा रहा हूं, ताकि तुम्हें मेरी मोहब्बत का यकीन आ जाए.’’

मैं उसे एक तरफ हटा कर बालकनी की तरफ बढ़ने लगा तो उस ने लपक कर मेरा बाजू पकड़ लिया. वह भयभीत हो कर बोली, ‘‘नहीं एयाज, नहीं. मुझे माफ कर दो. मैं जज्बात की रौ में बह कर न जाने क्या कुछ कह गई. प्लीज, मुझे माफ कर दो.’’

वह फिर रोने लगी. उस की हिचकियां बंध गईं. मैं उसे काफी देर तक समझाता रहा. एक घंटे के बाद वह फ्लैट से निकली तो कदूस से शादी के लिए तैयार हो गई थी. उस ने रुखसत होते वक्त मुझ से कहा था कि वह कभी भी इस मोहब्बत को भुला नहीं सकेगी. तीसरे दिन मुझे कदूस मिला तो उस ने बताया कि उस ने न तो जोहरा से कभी मोहब्बत की और न ही शादी के बारे में कभी सोचा. वह चूंकि एक हसीन लड़की थी, इसलिए उस का साथ उसे अच्छा लगता था. वह तो सनोवर को पहले दिन से पसंद करता रहा था, मगर कभी उस ने उस पर अपनी मोहब्बत जाहिर नहीं की थी.

कोई 20 दिनों के बाद सनोवर और कदूस की शादी हो गई. उस के एक महीने बाद जोहरा से मेरी शादी भी हो गई. जोहरा को पा कर मैं बहुत खुश था, इसलिए कि वह अपने साथ दहेज में एक मकान और गाड़ी भी लाई थी. फिर मुझे जोहरा के वालिद की सिफारिश पर एक बड़ी फर्म में आलातरीन ओहदा मिल गया था. अब मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं थी. मैं एक हसीन और जवान दौलतमंद औरत का शौहर था.

3 साल पर लगा कर उड़ गए. फिर मैं महसूस करने लगा कि एक मर्द को महज औरत के शबाब की तलब ही नहीं होती, वह औरत से और भी बहुत कुछ चाहता है. मैं जो कुछ चाहता था, वह जोहरा मुझे न दे सकी थी. वह बीवी नहीं, महबूबा थी, दोस्त थी.

मैं ने उसे इशारों में बहुत कुछ समझाने की कोशिश की. उस ने या तो नहीं समझा, या समझा तो नजरअंदाज कर गई. मैं ज्यादती नहीं कर सकता था, इसलिए कि मुझे जो कुछ मिला था, वह सब उसी की बदौलत था. मैं ने हालात से समझौता कर लिया. फिर वह तिलिस्म टूटने लगा, जिस का मैं कैदी था. उजली और साफ रंगत, हुस्न और जिस्मानी कशिश का जोर टूटने लगा. मुझे सनोवर की याद आ जाती. मैं सनोवर से शादी कर लेता तो शायद वह सब मिल जाता, जो एक शौहर चाहता है.

कदूस के घर के सामने गाड़ी रुकी तो मैं ने उस घर की तरफ देखा. वह एक घर था, मामूली सा. जोहरा ने मुझे रास्ते में बताया था कि यूके से वापसी के बाद कदूस को बहुत अच्छा जौब नहीं मिल सका. घंटी बजाने के चंद लम्हे बाद दरवाजा खुला तो नजरों के सामने कदूस था. हम दोनों एकदूसरे से बड़ी गर्मजोशी से बगलगीर हो गए. कदूस मेरा हाथ पकड़ कर अंदर ले गया. मेरे पीछेपीछे जोहरा थी. घर में दाखिल होते ही मेरी अजीब सी कैफियत हुई. उस घर की फिजा में एक ऐसी महक थी, जो सिर्फ और सिर्फ औरत के वजूद से फूटती है. ऐसी महक मेरे घर की फिजा में क्यों नहीं है? आखिर मेरे घर में भी तो एक औरत रहती है. मेरा घर भी खुशबुओं में बसा रहता है, मगर वे खुशबुएं तो बाजार से खरीदी हुई होती हैं.

बैठक में सनोवर अपने बच्चों के साथ हमारे स्वागत के लिए खड़ी थी. हम दोनों की निगाहें चार हुईं. मेरा खयाल था कि वह मुझे देख कर शायद अपने जज्बात पर काबू न पा सके, मगर उस की आंखों में कुछ नहीं था. उस का चेहरा कोरे कागज की तरह नजर आ रहा था. वह इस तरह मिली, जैसे पहली बार मिल रही हो.

मैं यह सोचे बगैर न रह सका कि क्या उस के दिल के किसी कोने में मेरी तस्वीर नक्श नहीं है? क्या ऐसा मुमकिन है कि औरत अपनी पहली मोहब्बत को भुला दे? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह औरों के सामने अपनी मोहब्बत का इजहार न करना चाहती हो? औरत से बड़ा अदाकार कौन हो सकता है?

‘‘क्या तुम पार्टी में नहीं चल रही हो?’’ जोहरा ने हैरत से पूछा, ‘‘तुम अभी तक तैयार नहीं हुई?’’

‘‘मैं पार्टी में चल रही हूं और तैयार हूं.’’ सनोवर ने मुसकरा कर जवाब दिया.

‘‘ऐं! इस हालत में?’’ जोहरा ने उसे नीचे से ऊपर तक हैरानी से देखा.

सनोवर गुलाबी रंग की साड़ी और उसी रंग का ब्लाउज पहने थी. उस के चेहरे पर मेकअप बिलकुल नहीं था. उस ने अपने लंबे, स्याह बालों का जूड़ा बांध रखा था. गले में मोतियों का एक हार और कानों में टौप्स थे. वह सादगी की मूरत बनी हुई थी. दूसरी तरफ जोहरा ब्यूटीपार्लर से सज कर आई थी. उस ने गहरे भूरे रंग की साड़ी और बगैर आस्तीन का नीची तराश का ब्लाउज पहना हुआ था. वह उस लिबास में अपने हुस्न और बदन की नुमाइश कर रही थी. मैं ने उन दोनों की तुलना की. मुझे जोहरा के मुकाबले सनोवर कहीं ज्यादा हसीन लगी. उस की सादगी के आगे जोहरा का हुस्न हलका पड़ गया था.

फिर सनोवर का कोई एक रूप नहीं था. उस का हर रूप अपने अंदर दिलकशी लिए हुए था. एक रूप तो ऐसी औरत का, जो घर की चारदीवारी में अपने आप को खुश और संतुष्ट महसूस करती है. दूसरा रूप एक वफादार बीवी का था. वह जब भी अपने हमसफर की तरफ देखती, उस की आंखों में मोहब्बत का नूर फैला हुआ होता था. उस की मोहब्बत और नजरें जैसे सिर्फ कदूस की अमानत हों. उस ने एक बार भी मेरी तरफ मोहब्बत भरी नजर से नहीं देखा था. उस ने जब भी मुझ से कोई बात की, या मेरी तरफ देखा तो एक अजनबी औरत की तरह. सनोवर एकदम से बदल जाएगी, मैं ने सोचा भी नहीं था.

उस का तीसरा रूप एक मां का था. उस के 2 प्यारेप्यारे बच्चे थे. उन बच्चों से उस घर में रौनक थी और वे उस गुलशन के महकते हुए फूल थे. मेरे भी दिल में बाप बनने की ख्वाहिश मौजूद थी. लेकिन जोहरा ने मुझ से कह दिया था कि वह 10 सालों तक मां बनने के बारे में सोच भी नहीं सकती. वह पहले जिंदगी के मजे लेना चाहती थी, इसलिए उसे बच्चों का झंझट पसंद नहीं था. बहरहाल, सनोवर के अनगिनत रूप थे. उस का हर रूप इतना हसीन था कि मुझे एक पछतावा सा हो रहा था और कदूस पर रश्क आ रहा था कि उसे कैसा अनमोल मोती मिल गया था.

पार्टी से वापसी पर जब हम ने उन्हें उन के घर छोड़ा तो उन्होंने रस्मी तौर पर किसी रोज घर आ कर खाना खाने की दावत दी. जोहरा बोली, ‘‘हम किसी रोज अचानक आ जाएंगे और चल कर किसी होटल में डिनर लेंगे.’’

‘‘होटल में क्यों? मैं घर पर ही खाना बना लूंगी.’’ सनोवर ने जवाब दिया.

‘‘घर पर क्या खाक लुत्फ आएगा?’’ जोहरा बोली, ‘‘होटल में तो पसंद की बहुत सारी डिशें मिल जाती हैं.’’

‘‘मैं तुम्हें तुम्हारी पसंद की सारी डिशें पका कर खिलाऊंगी.’’

एक दिन जोहरा उस का इम्तिहान लेने के लिए उस के यहां पहुंच गई. उस ने मुर्ग बिरियानी, कोरमा, शामी कबाब और पुडिंग की फरमाइश कर दी. सनोवर खाना पकाने में जुट गई. वह बावर्चीखाने में अकेली ही सारा काम कर रही थी. मैं, जोहरा और कदूस बैठक में बैठे टीवी पर सीरियल देख रहे थे और बातें भी करते जा रहे थे. जोहरा एक बार भी उठ कर बावर्चीखाने में नहीं गई. वह घर में भी बावर्चीखाने में झांकती तक नहीं थी. मेरे घर में नौकर थे, जो चाय तक बना कर देते थे. मैं चाहता था कि जोहरा बावर्चीखाने में जा कर उस का हाथ न बंटाए, मगर बातें तो करे. फिर मुझे खयाल आया कि वह जा भी कैसे सकती है? बावर्चीखाने में कदम रखेगी तो उस का मेकअप गरमी से खराब हो जाएगा और उस के लिबास पर दागधब्बे भी तो पड़ सकते हैं. उसे हर वक्त अपने मेकअप और लिबास का खयाल जो रहता है.

खाने में चूंकि देर थी, इसलिए सनोवर चाय बना कर ले आई. वह पसीने से नहाई हुई थी. पसीने के साफ व शफ्फाक कतरे उस की सुराहीदार गरदन और चेहरे पर मोतियों की तरह दमक रहे थे. वह ट्रे तिपाई पर रख कर चाय बनाने के लिए बैठ गई. उस ने चाय बनाने से पहले साड़ी के पल्लू से गरदन और चेहरे पर से पसीना पोंछा. मुझे उस का यह रूप भी बहुत भाया.

आदमी की किस्मत उस के पसीने ही से लिखी होती है—जिस ने भी यह बात कही है, गलत नहीं कही. उस घर में जो रौनक, हुस्न और खुशबू थी, वह उसी पसीने की बदौलत ही थी.

जोहरा ने सरोवर की तरफ देखते हुए कदूस से कहा, ‘‘आप मेरी सहेली पर बहुत जुल्म कर रहे हैं.’’

‘‘कैसा जुल्म?’’ कदूस ने चौंक कर जोहरा की तरफ देखा, ‘‘क्या कोई अपनी बीवी पर जुल्म भी कर सकता है?’’

‘‘यह जुल्म नहीं तो और क्या है? घर में एक भी नौकर नहीं है,’’ जोहरा कहने लगी, ‘‘सनोवर न सिर्फ सारा दिन बावर्चीखाने में अकेली काम करती है, बल्कि दूसरे तमाम कामकाज भी खुद ही करती है. वह 2 बच्चों को भी संभालती है. इसी वक्त देखिए, पसीने में किस बुरी तरह भीग गई है. आप इस गरीब के लिए दो-एक नौकर भी नहीं रख सकते? हमें देखिए. हम सिर्फ मियांबीवी हैं, पर घर में 3 नौकर हैं, एक नौकरानी भी.’’

‘‘मैं ने कभी सनोवर को नौकर रखने से मना नहीं किया, बल्कि उस से कितनी बार कहा है कि कोई नौकर रख लो. मगर यह मेरी बात सुनती ही नहीं है.’’

‘‘जिस घर में औरत हो, उस घर में नौकर का क्या काम?’’ सनोवर ने प्यालियों में चाय उड़ेलते हुए कहा, ‘‘औरत अगर घर का काम नहीं करेगी तो फिर क्या करेगी? मेरे खयाल में एक औरत को सब से ज्यादा खुशी घर के कामकाज और शौहर की खिदमत से होती है.’’

‘‘गरमी और पसीने से तुम्हारा दम नहीं घुटता?’’ जोहरा ने ताज्जुब से पूछा.

‘‘इस पसीने से तो बदन हलका हो जाता है और एक ताजगी आ जाती है.’’ सनोवर ने जवाब दिया.

‘‘हिश…’’ जोहरा बोली, ‘‘तुम क्या से क्या हो गई हो?’’

‘‘मैं औरत हो गई हूं,’’ सनोवर हंस पड़ी, ‘‘और तुम बेगम साहिबा हो गई हो. इसलिए तुम्हें यह सब कुछ अजीब लग रहा है.’’

सनोवर के यहां से निकल कर घर वापस आते समय जोहरा बोली, ‘‘सनोवर शुरू से ही कंजूस रही है और फिर उन के माली हालात भी शायद अच्छे नहीं हैं. इसलिए वह नौकर नहीं रख रही है. आजकल नौकर भी तो खूब पैसे लेते हैं.’’

‘‘कदूस की तनख्वाह बहुत अच्छी है. वह मुझे बता रहा था कि नौकरी छोड़ कर कोई कारोबार शुरू करने वाला है,’’ मैं बोला, ‘‘सनोवर दरअसल एक घरेलू औरत बन गई है. देखो न, उस ने खाना भी कितना अच्छा और लजीज पकाया था. वह एक अच्छी बावर्चिन भी है.’’

जोहरा मेरी तरफ देख कर बोली, ‘‘तुम आज भी दकियानूसी के दकियानूसी ही हो.’’

सनोवर के यहां हमारा आनाजाना कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. मैं किसी न किसी बहाने जोहरा को उस के यहां ले जाता था. सनोवर और कदूस मेरे यहां सिर्फ एक बार आए थे. मैं सनोवर के यहां इसलिए भी जाने लगा था कि उस के बच्चे मुझ से बहुत हिलमिल गए थे. मैं चाहता था कि जोहरा के दिल में भी बच्चों की ख्वाहिश जाग उठे.

मालूम नहीं, एक दिन मुझे क्या हुआ. मैं दफ्तर से निकल कर न चाहते हुए भी सनोवर के घर की तरफ चल पड़ा, यह जानते हुए कि घर पर कदूस नहीं होगा. मैं सनोवर से बहुत सारी बातें करना चाहता था.

सनोवर मुझे देख कर हैरान सी हुई. मुझे अंदर बिठाने में उसे दुविधा हो रही थी. फिर भी मुझे बैठक में बिठाया तो उस ने किसी अजनबी औरत की तरह मेरी तरफ सवालिया नजरों से देखा, ‘‘क्या आप को उन से कुछ काम था?’’

‘‘मैं आज तुम से कुछ बातें करना आया हूं सनोवर.’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं आप की सनोवर नहीं, कदूस की बीवी, उन के बच्चों की मां और इस घर की मालकिन हूं.’’ उस ने तेज लहजे में जवाब दिया.

‘‘मैं तुम्हें वही समझता हूं, जो तुम ने कहा है. मैं पुराने जख्म ताजा करने नहीं आया हूं.’’

‘‘फिर किसलिए आए हो?’’

‘‘मैं तुम से वह बात कहने आया हूं, जो किसी और से कह नहीं सकता हूं,’’ मैं ने टूटे हुए लहजे में कहा, ‘‘मेरे दिल को सुकून उसी वक्त मिल सकता है, जब मैं अपनी गलती को कबूल कर लूं.’’

‘‘मगर मैं सुन कर क्या करूंगी? मेरे दिल में तो सिर्फ कदूस की तसवीर नक्श है,’’ वह बोली, ‘‘क्या आप जोहरा जैसी हसीन और अमीर औरत को पा कर खुश नहीं हैं?’’

‘‘मुझे एक औरत कहां मिली है सनोवर?’’ मैं ने एक सर्द आह भरी, ‘‘बकौल तुम्हारे एक बेगम साहिबा, महबूबा और मौडल गर्ल मिली है. मुझे तो तुम जैसी औरत की तलाश थी. मैं ने तुम्हें खो कर बहुत बड़ी सजा पाई है. उस का खामियाजा आज तक भुगत रहा हूं. क्या तुम मुझे माफ कर सकोगी कि मैं ने जोहरा को पाने के लिए तुम से झूठ बोला, तुम्हें धोखा दिया.’’

‘‘मैं ने आप को उसी रोज माफ कर दिया, जिस रोज मैं कदूस की हो गई. उस रोज से न तो मैं ने कभी पीछे पलट कर देखा और न आप को याद किया. आप आइंदा कभी मुझ से इस बारे में बात न करें.’’

मैं थोड़ी देर के बाद उस के वहां से निकला तो मेरे दिलोदिमाग फूल की तरह हलके हो गए थे. सीने पर जो बोझ था, वह हट गया था.

मैं घर पहुंचा तो कदूस की गाड़ी कोठी के अहाते में खड़ी देखी. मेरे दिल में शिकस्त की लहर ने सिर उठाया. क्या वह मेरी गैरमौजूदगी में जोहरा से मिलने आता रहता है? जोहरा ने कभी मुझ से कदूस के आनेजाने के बारे में नहीं बताया. जोहरा उस से यकीनन मिलती होगी. कदूस ने मुझ से शादी से पहले झूठ कहा था कि उसे जोहरा से कभी मोहब्बत नहीं थी. उस की किसी वजह से जोहरा से शादी न हो सकी तो उस ने सनोवर से शादी कर ली. आज उन की मोहब्बत जाग उठी है.

दोनों बैठक में मौजूद थे. मैं दूसरे रास्ते से अपने बैडरूम में गया. अलमारी से पिस्तौल निकाल कर दबे पांव बैठक की तरफ बढ़ा. मैं दरवाजे के पास पहुंच कर रुक गया. कदूस अजीब से लहजे में कह रहा था, ‘‘मैं सनोवर से शादी कर के पछता रहा हूं. वह दकियानूसी औरत है. उसे घर, शौहर और बच्चों के सिवा किसी और चीज में दिलचस्पी नहीं है. न कपड़े पहनने का, न तफरीह और पार्टियों का. वह कहती है कि औरत का बनावसिंगार उस के शौहर के लिए होता है, न कि दुनिया वालों के लिए. मुझे तो तुम दोनों पर रश्क आता है, जो बेफिक्री की जिंदगी गुजार रहे हो. न बच्चे, न झमेले. होटलों में खाना. दावतों में शिरकत करना. एयाज बड़ा खुशनसीब है कि उसे तुम जैसी बीवी मिली.’’

यह सब सुन कर मैं उलटे पांव बैडरूम में लौट गया और पिस्तौल वापस अलमारी में रख दी. फिर सामने के दरवाजे से बैठक में चला गया. अजीब बात थी कि अब मुझे जोहरा से शिकायत नहीं रह गई थी.

Crime Stories: बेईमान हुए इमानदार रिश्ते

Crime Stories: ताऊ और ताई तो शालू को पढ़ालिखा कर उस की जिंदगी रौशन करना चाहते थे जबकि वह कशिश के प्यार में पड़ कर अपने शुभचिंतक ताऊ और ताई को धोखा दे रही थी. इस के बाद उस ने क्या किया…

बच्चे पढ़लिख कर कामयाबी के शिखर पर पहुंच जाएं हर मातापिता के लिए यह बेहद खुशी की बात होती है. उन्हें लगता है कि उन की जिंदगी भर की मेहनत कामयाब हो गई. उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता शनसवीर सिंह और उन की पत्नी निर्मला खुश थीं कि उन का युवा बेटा पुलकित सिंह भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में सलैक्शन के बाद लेफ्टिनेंट बन गया था.

11 जून, 2015 को देहरादून आयोजित पासिंग आउट परेड में जब उन्होंने अपनी आंखों से बेटे के कंधों पर स्टार लगते देखे तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. शिक्षा के बल पर उन्होंने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचा दिया था. मृदुभाषी शनसवीर खुद तो उच्च शिक्षित थे ही, उन की पत्नी निर्मला भी उच्च शिक्षित थीं. उन्होंने एमएससी (फिजिक्स) व बीएड की डिग्रियां ली थीं और शिक्षिका रही थीं, लेकिन सन 2000 में उन्होंने पारिवारिक कारणों से नौकरी को अलविदा कह दिया था.

शनसवीर जनपद मेरठ की मवाना रोड स्थित पौश कालोनी डिफैंस कालोनी की कोठी नंबर सी-53 में रहते थे. उन के 2 ही बच्चे थे, बड़ी बेटी प्रिंसी और उस से छोटा पुलकित. प्रिंसी ने एमबीबीएस, एमडी किया था, जिस का उन्होंने विवाह कर दिया था. प्रिंसी के पति भी डाक्टर थे. प्रिंसी दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर सीनियर रेजीडेंट डाक्टर नियुक्त थीं. शनसवीर सिंह मूलरूप से मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के गांव जंघेड़ी के रहने वाले थे. उन के पिता वेद सिंह किसान थे. शनसवीर 5 भाइयों में चौथे नंबर पर थे. उन के अन्य भाई गांव में ही रहते थे. इन में सुभाष की तबीयत खराब रहती थी, उन का नियमित उपचार चल रहा था.

शारीरिक कमजोरी की वजह से वह ठीक से चलफिर नहीं पाते थे. कुछ महीने पहले शनसवीर ने मेरठ में ही उन का औपरेशन कराया था. कुछ दिन मेरठ रह कर वह गांव चले गए थे. जबकि उन की पत्नी सविता शनसवीर के साथ ही रह रही थीं. उन के सब से छोटे भाई सुखपाल की युवा बेटी शालू सिंह उन्हीं के पास रह कर पढ़ रही थी. वह एक इंजीनियरिंग कालेज से बीबीए कर रही थी. शनसवीर की पोस्टिंग वर्तमान में जिला संभल में थी. वह वहीं रहते भी थे. हफ्ते-10 दिन में घर आ जाया करते थे.

शनसवीर परिवार के अपने नजदीकी लोगों को साथ ले कर चलने वाले व्यक्ति थे. यही वजह थी कि वह एक भाई का इलाज करा रहे थे तो दूसरे भाई की बेटी को अपने पास रख कर पढ़ा रहे थे. दरअसल निर्मला चाहती थीं कि उन के बच्चों की तरह शालू भी पढ़ाई कर के कुछ बन जाए. वह शालू को बहुत प्यार करती थीं. प्रिंसी और पुलकित के बाद शालू ही उन के प्यार की एकलौती हकदार थी. निर्मला उस की सभी जरूरतें बिना किसी भेदभाव के पूरा करती थीं.

सिंह दंपति बेटे की पासिंग आउट परेड देखने के लिए देहरादून गए थे. 14 जून को वापस आए तो पुलकित भी उन के साथ था. अगले दिन शनसवीर अपनी ड्यूटी पर चले गए, जबकि पुलकित एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली और वहां से चंडीगढ़ चला गया. शनसवीर के ड्यूटी पर चले जाने के बाद कोठी में 3 लोग ही रह गए थे. एक उन की पत्नी निर्मला, दूसरी निर्मला की देवरानी सविता और तीसरी उन की भतीजी 20 वर्षीया शालू.

शनसवीर आदतन प्रतिदिन संभल से पत्नी को फोन करते रहते थे. 17 जून को भी उन्होंने दिन में 2 बार उन से बात की. इस के बाद रात 10 बजे उन्होंने पत्नी का मोबाइल मिलाया तो वह स्विच औफ आया. इस पर उन्होंने घर का लैंडलाइन फोन मिलाया तो फोन भतीजी शालू ने उठाया. आवाज पहचान कर वह बोले, ‘‘अपनी ताई से बात कराओ.’’

‘‘नमस्ते ताऊजी, वह तो घर पर नहीं हैं.’’ शालू ने कहा तो शनसवीर चौंके. क्योंकि उस वक्त निर्मला को घर पर ही होना चाहिए था.

‘‘कहां हैं वह?’’

‘‘पता नहीं, मुझे तो बहुत फिक्र हो रही है.’’ शालू के जवाब से उन की चिंता बढ़ी तो उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘वह मिठाई ले आने की बात कह कर करीब 7 बजे गई थीं, लेकिन अभी तक आई नहीं हैं.’’

‘‘और तुम मुझे अब बता रही हो?’’ उन्होंने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा और शालू से निर्मला को आसपड़ोस में देखने को कहा.

उन्होंने सोचा कि हो सकता है, कहीं उन्हें बातों में वक्त लग गया हो. यह बात सच थी कि निर्मला को मिठाई लेने दुकान पर जाना था, क्योंकि उन्होंने फोन पर यह बात दिन में उन्हें बताई थी कि मोहल्ले के कुछ लोगों को बेटे के अफसर बनने की खुशी में मिठाई दे कर आनी है. इस तरह बिना बताए इतनी देर तक निर्मला कहां हैं, इस बात ने शनसवीर को चिंता में डाल दिया था. कुछ देर बाद उन्होंने शालू को पुन: फोन किया. उस ने बताया कि वह पड़ोस में सब के यहां पूछ आई है, वह किसी के यहां नहीं हैं.

शनसवीर ने फोन पर शालू से ही बात की, क्योंकि जेठ होने की वजह से सविता उन से टेलीफोन पर भी बात नहीं करती थी. उन्होंने शालू से पुन: फोन कर के कहा, ‘‘मनोरमा के यहां देख आओ, शायद वहां हों?’’

‘‘नहीं ताऊजी, वह तो खुद ही उन्हें पूछने आई थीं. वह इंतजार कर के चली गईं.’’

शालू के इस जवाब से वह और भी चिंतित हो गए. दरअसल मनोरमा पड़ोस में ही साकेत में ही रहती थीं और निर्मला की सहेली थीं. परेशान हाल शनसवीर ने प्रिंसी को इस उम्मीद में फोन किया कि शायद मां ने बेटी को ही कुछ बताया हो. डा. प्रिंसी ने बताया कि उस की मां से दिन में बात हुई थी शाम को नहीं हुई. शनसवीर ने मनोरमा को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वह निर्मला से मिलने गई थीं, लेकिन वह घर पर नहीं मिली थीं.

परेशान शनसवीर आधी रात के बाद संभल से चल कर मुंहअंधेरे मेरठ पहुंच गए. इस बीच न तो निर्मला घर आई थीं और न ही उन का मोबाइल औन हुआ था. निर्मला के इस तरह गायब होने से घर में शालू व सविता भी परेशान थीं. शनसवीर के आने पर उन दोनों ने उन्हें बता दिया कि उन्हें निर्मला के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है. निर्मला के बैडरूम में ताला लगा हुआ था. शालू ने बताया कि चाबी वह साथ ले गई हैं. बैडरूम में ताला लगाने का औचित्य शनसवीर की समझ में नहीं आया. उन्होंने किसी तरह दरवाजा खोला. बैडरूम बिलकुल सामान्य था. पत्नी कहीं किसी दुर्घटना की शिकार न हो गई हों, यह सोच कर उन्होंने शहर के अस्पतालों में भी पता किया. लेकिन उन का कोई पता नहीं चल सका. इस बात का पता चलने पर उन के कई परिचित भी आ गए थे.

शनसवीर ने पुलिस कंट्रोल रूम को पत्नी के लापता होने की सूचना दे दी थी. पुलिस उन के घर आई और थाने चल कर गुमशुदगी दर्ज कराने को कहा. वह अपने परिचित महेश बालियान के साथ थाना लालकुर्ती पहुंचे और पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने पत्नी का एक फोटो भी पुलिस को दे दिया. निर्मला रहस्यमयी ढंग से कहां लापता हो गई थीं, कोई नहीं जानता था. उन के अपहरण की आशंका जरूर थी, लेकिन शनसवीर के पास कोई भी संदिग्ध फोन नहीं आया था. अगले दिन शनसवीर की बेटी डा. प्रिंसी व दामाद भी घर आ गए. इस बीच पुलिस अधिकारियों को यह बात पता चली तो डीआईजी रमित शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे ने अधीनस्थों को इस मामले में जल्द काररवाई करने के निर्देश दिए.

एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह व एसपी संकल्प शर्मा के निर्देशन में थाना लालकुर्ती के थानाप्रभारी विजय कुमार पुलिस टीम के साथ शनसवीर के घर पहुंचे. निर्मला के लापता होने के वक्त चूंकि उन की देवरानी सविता व भतीजी शालू ही घर पर थे, इसलिए पुलिस ने दोनों से पूछताछ कर के उन के लापता होने का पूरा घटनाक्रम पता लगाया. पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए निर्मला और परिवार के अन्य सदस्यों के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उन सभी नंबरों की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के प्रभारी श्यामवीर सिंह व उन की टीम को लगा दिया गया.

जांच में अगले दिन पता चला कि निर्मला के फोन की अंतिम लोकेशन कालोनी की ही थी. इस के बाद उन का मोबाइल बंद हो गया था. एक और खास बात यह थी कि शालू का भी मोबाइल निर्मला के लापता होने के बाद से लगातार बंद था. पुलिस को निर्मला के लापता होने की कोई खास वजह समझ में नहीं आ रही थी. इसलिए उस ने अपनी जांच परिवार के इर्दगिर्द ही समेट दी. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थाना की थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने एकएक कर के परिवार के सभी सदस्यों से पूछताछ की. सविता घर में ही रहती थी, बाहरी दुनिया से उसे ज्यादा मतलब नहीं था. निर्मला को ले कर वह अपने बयान पर कायम थी कि उसे नहीं पता कि वह कहां चली गईं.

पुलिस ने शालू से उस का मोबाइल बंद होने की वजह पूछी तो वह कोई खास जवाब नहीं दे सकी. जबकि इस के पहले प्रतिदिन उस के मोबाइल का जम कर इस्तेमाल होता था. पुलिस ने उसे शक के दायरे में ले लिया. शालू तेजतर्रार युवती थी. शालू निर्मला की सगी भतीजी थी. उन के गायब होने में उस का कोई हाथ हो सकता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता था. लेकिन मोबाइल उस की चुगली कर रहा था. अपने इस शक को पुलिस ने शनसवीर को भी बता दिया.

शनसवीर के पास भतीजी पर शक करने की कोई वजह तो नहीं थी, लेकिन उस की एक बात में उन्हें भी झोल नजर आ रहा था. दरअसल उस ने बताया था कि निर्मला की सहेली मनोरमा जब घर आई थीं तो बैठ कर इंतजार कर के चली गई थीं. जबकि मनोरमा का कहना था कि वह निर्मला को पूछने के लिए आईं तो शालू ने बिना दरवाजा खोले ही कह दिया था कि पता नहीं वह कब आएंगी, आप कब तक बैठ कर इंतजार करेंगी. दोनों की बातों में भिन्नता थी. सविता से इस बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह घर के अंदर थी. मनोरमा कब आई थीं, उसे पता नहीं. मामला परिवार का था, इसलिए सभी ने शालू से पूछताछ की, लेकिन उस ने निर्मला के बारे में कोई जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया.

इस बीच पुलिस ने शालू के मोबाइल की काल डिटेल्स में मिले एक ऐसे नंबर को जांच में शामिल कर लिया, जिस पर वह सब से ज्यादा बातें करती थी. वह नंबर कशिश पुत्र चंद्रपाल निवासी गांव सलारपुर का था. यह गांव मेरठ के ही थाना इंचौली के अंतर्गत आता था. इस में चौंकाने वाली बात यह थी कि घटना वाली शाम इस नंबर की लोकेशन कालोनी की ही पाई गई थी. इस से पहले भी कई बार इस की लोकेशन कालोनी की पाई गई थी. इस का मतलब वह शालू के पास आता रहता था. अब शालू पूरी तरह शक के दायरे में आ गई थी. निस्संदेह कुछ ऐसा जरूर था, जो वह सभी से छिपा रही थी.

पुलिस एक बार फिर 20 जून को शनसवीर के घर पूछताछ करने पहुंच गई. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने शालू से पूछताछ की, ‘‘तुम कशिश को जानती हो?’’

इस पर वह चौंकी जरूर, लेकिन बहुत जल्दी उस ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, ‘‘जी हां, वह मेरे साथ पढ़ता है.’’

‘‘17 तारीख को क्या वह यहां आया था?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

पुलिस जानती थी कि उस का यह जवाब बिलकुल झूठ है.

‘‘सोच कर बताओ?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

सविता ने भी घर में किसी के आने से इनकार कर दिया था. अलबत्ता चिंतामग्न जरूर थी. पुलिस ने अपना सारा ध्यान शालू पर जमा दिया. पुलिस समझ गई थी कि शालू जरूरत से ज्यादा चालाक लड़की है. पुलिस सख्ती नहीं दिखाना चाहती थी. ऐसी स्थिति में उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लेना जरूरी था. पुलिस ने शनसवीर को असलियत बता कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस अब उस के जरिए ही कशिश तक पहुंचना चाहती थी. उस शाम एक और नंबर की लोकेशन भी कालोनी में थी. उस नंबर पर भी कशिश की बातें होती थीं. वह नंबर गौरव उर्फ राजू पुत्र चंद्रसेन का था. वह भी गांव सलारपुर का रहने वाला था.

पुलिस समझ गई कि इस तिगड़ी के बीच ही निर्मला के लापता होने का राज छिपा है. सविता गांव की भोली सूरत वाली औरत थी. पुलिस को उस पर ज्यादा शक नहीं था. पुलिस शालू को ले कर कशिश की तलाश में कालेज पहुंची. कशिश उस दिन कालेज नहीं आया था. पुलिस ने शालू से कशिश को फोन कर के कालेज बुलाने को कहा. उस की बात तो हुई, लेकिन कशिश ने बताया कि वह मोदीनगर में है. इसलिए अभी नहीं आ सकता. पुलिस ने कशिश की लोकेशन पता लगाई तो पता चला कि वह गांव में ही है. पुलिस उस के गांव पहुंची और कशिश के साथसाथ गौरव को भी हिरासत में ले लिया.

तीनों को थाने ला कर अलगअलग बैठा कर पूछताछ की गई तो उन के बयानों में भिन्नता नजर आई. इस के बाद पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने ऐसे चौंकाने वाले राज से पर्दा उठाया, जिसे सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. ये लोग निर्मला की हत्या कर के उन की लाश को ठिकाने लगा चुके थे. इस हत्या में उन का साथ भोली दिखने वाली निर्मला की देवरानी सविता ने भी दिया था. वह पूरे राज को छिपाए हुए थी. पुलिस ने उसे भी हिरासत में ले लिया.

निर्मला की हत्या का पता चला तो परिवार में कोहराम मच गया. पुलिस ने कशिश की निशानदेही पर डिफैंस कालोनी से करीब 20 किलोमीटर दूर मोदीपुरम-ललसाना मार्ग पर एक स्थान से निर्मला का शव बरामद कर लिया. उन के गले में अभी भी दुपट्टा कसा हुआ था और हाथ बंधे हुए थे. पुलिस ने शव का पंचनामा कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने पकड़े गए लोगों के खिलाफ शनसवीर की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को विधिवत गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद सभी से विस्तृत पूछताछ की गई. निर्मला शालू को बहुत प्यार करती थीं. ऐसी स्थिति में आखिर सगी भतीजी ही उन की कातिल क्यों बनी, इस के पीछे एक चौंकाने वाली कहानी थी.

लोक निर्माण विभाग में नौकरी लगने के साथ ही शनसवीर परिवार को साथ रखने लगे थे. बाद में उन की तैनाती मेरठ में हुई तो उन्होंने डिफैंस कालोनी में अपनी कोठी बना ली. शनसवीर और उन की पत्नी उस सोच के व्यक्ति थे, जो परिवार को साथ ले कर चलते हैं और सभी की कामयाबी का ख्वाब देखते हैं. कई साल पहले वह छोटे भाई सुभाष की बेटी शालू को अपने साथ मेरठ ले आए कि शहर में अच्छी पढ़ाई कर के वह कुछ बन जाएगी. शालू बचपन से तेजतर्रार थी, यह बात सिर्फ उस की आदतों में लागू होती थी न कि पढ़ाई के मामले में. शनसवीर के परिवार में रह कर उस ने 8वीं तक की पढ़ाई की. बाद में वह गांव वापस चली गई. वहां रह कर उस ने मुजफ्फरनगर से इंटर किया. आगे की पढ़ाई वह अच्छे से कर सके, इसलिए निर्मला जून, 2013 में उसे अपने पास मेरठ ले आईं.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मेरठ के एक इंस्टीट्यूट में उस का दाखिला करा दिया गया. इस बीच निर्मला की बेटी प्रिंसी ने सीपीएमटी का एग्जाम पास कर लिया. इस के बाद उस ने एमबीबीएस और एमडी किया. बाद में उस का विवाह हो गया और वह राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर चिकित्सक अपनी सेवाएं देने लगी. साल 2014 में शनसवीर का बेटा पुलकित भी आईएमए में प्रशिक्षण के लिए चला गया.

इस बीच शनसवीर का स्थानांतरण संभल हो गया था. वहां से वह घर आते रहते थे. निर्मला भी कभीकभी उन के पास चली जाया करती थीं. रिश्तों में कोई दूरी महसूस न हो, इसलिए निर्मला शालू का हर तरह से खयाल रखती थीं. शालू उन लड़कियों में से थी, जो आजादी का नाजायज फायदा उठाती हैं. उस ने भी ऐसा ही किया. उस की दोस्ती अपने ही कालेज में पढ़ने वाले कशिश से हो गई. उन के बीच मोबाइल से ले कर घरेलू फोन तक पर बातों का लंबा सिलसिला चलने लगा.

निर्मला जब पति के पास संभल चली जातीं तो शालू की आजादी और बढ़ जाती. कुछ महीने पहले शनसवीर अपने भाई सुभाष का औपरेशन कराने के लिए मेरठ ले आए. उन के साथ उन की पत्नी सविता भी आई. औपरेशन के बाद सुभाष कुछ दिनों कोठी में रहे, उस के बाद गांव चले गए, जबकि सविता वहीं रहती रही. उधर शालू की कशिश से दोस्ती प्यार में बदल गई. दोस्ती और प्यार तक तो ठीक था, लेकिन दोनों के कदम मर्यादा की दीवारों को लांघ चुके थे. हालात बिगड़ने तब शुरू हुए, जब कशिश उस से मिलने कोठी पर भी आने लगा. अभी तक उस के और शालू के संबंध निर्मला से पूरी तरह छिपे थे. सविता यह बात किसी को न बताए. शालू ने निर्मला की बुराइयां कर के उसे अपने पक्ष में कर लिया था.

निर्मला व सविता की आर्थिक स्थिति में जमीनआसमान का अंतर था. यह बात सविता को अंदर ही अंदर कचोटती थी. जलन की यही भावना थी, जो उस ने शालू की हरकतों को निर्मला से पूरी तरह छिपा लिया था और उसे बिगड़ने की पूरी छूट दे दी थी. वह नहीं जानती थी कि बाद में इस का अंजाम भयानक भी हो सकता है. निर्मला सभी का भला करने की सोच रही थीं. उन के मन में अविश्वास जैसी कोई बात नहीं थी. लेकिन वह नहीं जानती थीं कि उन के लिए दोनों के दिलों में जहर भरा  है. निर्मला बहुत सुलझी हुई महिला थीं, पर रिश्तों के विश्वास के मामले में वह अपने ही घर में धोखा खा रही थीं.

शालू इंस्टीट्यूट जाने के बहाने न सिर्फ कशिश के साथ घूमतीफिरती थी, बल्कि निर्मला के पति के पास संभल चले जाने या बाजार आदि जाने के बाद उसे घर में ही बुला कर उस के साथ वक्त बिताती थी. निर्मला कभी सविता से शालू के बारे में कुछ पूछतीं तो वह उस की कोई शिकायत नहीं करती थी. ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं. एक दिन निर्मला को यह बातें किसी तरह पता चलीं तो उन्होंने शालू को जम कर लताड़ा और उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. शालू ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि कशिश केवल उस का सहपाठी है, इसलिए कभीकभी कालेज की कापीकिताब देनेलेने के लिए आ जाता है.

देवर की बेटी को वह उस के अच्छे भविष्य के लिए अपने साथ रख कर पढ़ा रही थीं. सामाजिक व नैतिक रूप से उसे सही रास्ते पर रखने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. उन्होंने ऐसा ही किया भी. शालू ने कशिश से अपने रिश्ते खत्म करने की बात कह कर झूठी कसमें भी खा लीं. कसमें खाने व झूठ बोलने से शालू का गहरा नाता था. पकड़ में आई शालू की पहली गलती थी, इसलिए उन्होंने यह बातें पति व अन्य से छिपा लीं. शालू ने वादा तो किया, लेकिन वह उस पर लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी.

कशिश ने फिर से घर आना शुरू किया तो निर्मला ने परिवार के लोेगों को यह बात बता दी. सभी ने शालू को समझाया. गैर युवक घर में आता है, सविता ही इस बारे में कुछ बता सकती थी. लेकिन उस का कहना था कि शालू उस के सो जाने के बाद उसे बुलाती होगी. इसलिए उसे पता नहीं चलता. जबकि यह कोरा झूठ था. सविता जानती थी कि कशिश कब आताजाता था. शालू की हरकतें पता चलने पर शनसवीर उसे मेरठ में रखने के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने अपना इरादा बताया तो निर्मला शालू के पक्ष में आ गईं. उन्होंने कहा कि उसे एक आखिरी मौका देना चाहिए. दरअसल वह नहीं चाहती थीं कि शालू की पढ़ाई बीच में छूटे और उस का भविष्य खराब हो.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन शालू ने फिर से पुराना ढर्रा अख्तियार कर लिया. वह फोन पर अकसर लंबीलंबी बातें करती, जिस के लिए निर्मला उसे डांट देती थीं. उसी बीच शनसवीर मेरठ आए और निर्मला को ले कर बेटे की परेड में शामिल होने देहरादून चले गए. वहां से वापस आ कर वह संभल चले गए. एक दिन निर्मला शालू की अलमारी में किताबें देखने लगीं तो उन्हें अलमारी में छिपा कर रखे गए कुछ ऐसे कागज मिले, जिन्हें देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे महिला चिकित्सकों की रिपोर्टें थीं. उन पर शालू का नाम भी लिखा था. दरअसल शालू प्यार में नैतिकता की सारी हदें लांघ गई थी. शालू इस हद तक गिर जाएगी, निर्मला को कतई उम्मीद नहीं थी.

उन्होंने उसे बुला कर न सिर्फ थप्पड़ जड़ दिया, बल्कि इस बारे में पूछा तो रिपोर्ट देख कर उस के होश उड़ गए. उस के मुंह से शब्द नहीं निकले. निर्मला गुस्से में थीं. उस दिन उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें बरदाश्त नहीं कर सकती. सब को तुम्हारी असलियत बता कर गांव भेज दूंगी. तूने अब मेरा भरोसा तोड़ दिया है.’’

शालू की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. वह चालाक तो थी ही, उस ने रोने का नाटक किया और निर्मला के पैर पकड़ कर माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने अब सही रास्ते पर चलने की कसमों की झड़ी लगा दी. यह 16 जून, 2015 की बात थी. शालू अपनी हरकत पकड़े जाने से बहुत डर गई. सविता से भी यह बातें छिपी नहीं थीं. उस ने शालू से कहा कि अब उसे कोई नहीं बचा सकता. शालू अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी.

इसलिए मन ही मन उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया और वह फैसला कशिश को फोन पर बता कर कहा, ‘‘कशिश मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती. ताई ने अगर ये बातें सब को बता दीं तो मुझे हमेशा के लिए गांव जाना पड़ जाएगा. तुम किसी भी तरह उन्हें रास्ते से हटा दो. उन के मरने के बाद कोठी में तुम आजादी से आ सकोगे. वैसे भी उन के बाद यहां सब मेरा है.’’

कशिश के सिर पर भी शालू के प्यार का जुनून सवार था. दोनों ने निर्मला को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. अपनी इस योजना में कशिश ने गांव के ही अपने दोस्त गौरव को भी शामिल कर लिया. उधर शालू ने सविता को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया. सविता ने भी सोचा कि निर्मला के दुनिया से चले जाने के बाद घर पर उस का एकक्षत्र राज हो जाएगा. इस बीच शालू निर्मला पर उस वक्त नजर रखती थी, जब वह फोन पर पति व बेटी से बातें करती थीं. उन्होंने शालू की हरकत किसी को नहीं बताई थी. जब वह बात करती थीं तो शालू हाथ जोड़ कर उन के सामने खड़ी हो जाती थी. यह शालू की योजना का हिस्सा था.

योजना के अनुसार 17 जून को कशिश कालोनी में आया. शालू बहाने से बाहर आ कर उस से मिली तो वह नींद की गोलियां उसे देते हुए बोला, ‘‘जब अपना काम कर लेना तो फोन कर देना.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हें फोन कर दूंगी.’’

दोपहर बाद निर्मला अपने बैडरूम में थीं, तभी शालू उन के लिए शरबत बना कर ले आई. उस में उस ने नींद की कई गोलियां मिला दी थीं. निर्मला को चूंकि मालूम नहीं था, इसलिए उन्होंने शरबत पी लिया. शरबत ने अपना असर दिखाया और वह जल्दी ही सो गईं. नींद की गोलियां ज्यादा डाली गई थीं. इसलिए कुछ देर में उन की नाक से खून और मुंह से झाग आने लगा. यह देख कर शालू खुश थी. उस ने कशिश को फोन किया और उस के आने का इंतजार करने लगी. कशिश व गौरव वैगनआर कार से घर आ गए. सविता ने गला दबाने के लिए उन दोनों को दुपट्टा ला कर दे दिया. कशिश व गौरव ने दुपट्टे से निर्मला का गला दबा दिया.

इस दौरान शालू व सविता ने निर्मला के पैरों को जकड़ लिया था. निर्मला गोलियों की हैवी डोज के चलते विरोध के काबिल नहीं बची थीं. हत्या के बाद चारों ने मिल कर निर्मला के शव को कार में रख दिया. कार कोठी के अंदर आ गई थी. सविता घर पर ही रही, जबकि कशिश, गौरव व शालू एक सुनसान स्थान पर शव को छिपा कर लौट गए. कशिश व गौरव अपने घर चले गए. जबकि शालू ने वापस आ कर निर्मला के बैडरूम को साफ कर के बाहर से ताला लगा दिया. उस ने उन के मोबाइल का स्विच्ड औफ कर के उसे छिपा दिया. उस ने अपना भी मोबाइल बंद कर दिया. उस ने कशिश को समझा दिया था कि यहां वह सब संभाल लेगी और अपने हिसाब से उस से बात करेगी.

शाम को निर्मला की सहेली मनोरमा उन्हें पूछने के लिए आई तो बिना दरवाजा खोले ही शालू ने उन के घर में न होने की बात कह कर उन्हें लौटा दिया. शालू व सविता ने राज छिपाए रहने की पूरी योजना बना ली थी. शालू ने सविता को समझा दिया था कि वह अपनेआप ही सब संभाल लेगी. 10 बजे शनसवीर का फोन आया तो शालू ने उन से निर्मला के लापता होने की बात बता दी. शालू व सविता ने हत्या के राज को पूरी तरह छिपाए रखा. वह अपने इस झूठ के नाटक में कामयाब रही थी, लेकिन मोबाइल ने उस की पोल खोल दी. पुलिस ने वैगनआर कार भी बरामद कर ली. सभी आरोपियों को पुलिस ने अगले दिन यानी 21 जून को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

रिश्तों की इस हत्या से हर कोई हैरान था. खून के रिश्तों में मदद का ऐसा अंजाम होगा, यह शनसवीर ने कभी नहीं सोचा था. वैसे भी रिश्तों में हुई घटनाएं बहुत दर्द देती हैं. यह दर्द तब और भी बढ़ जाता है, जब उसे देने वाले अपने होते हैं. शालू ने अपनी आजादी का नाजायज फायदा न उठा कर केवल पढ़ाई पर ध्यान लगाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: पिता की डायरी

Hindi Stories: पिता के प्यार को समझना उतना आसान नहीं होता, जितनी आसानी से मां के प्यार को समझा जा सकता है. पिता का प्यार क्या होता है, यह मैं ने उस दिन जाना, जब मैं…

वह दिल्ली की दिसंबर की ठंड से कांपती सुबह थी, जब मैं अपना घर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था. उस समय सुबह के 5 बज रहे थे. मैं तंग आ चुका था अपनी जिंदगी से. खासतौर पर अपने पिता के व्यवहार से तो मैं इतना थक गया था कि अब उन की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था. सच तो यह था कि मुझे न सिर्फ अपने पिता से, बल्कि अपने पूरे परिवार से नफरत हो गई थी. घर जाता तो वहां मेरा दम घुटता था. इसलिए मैं ने फैसला कर लिया था कि अब कभी वापस नहीं लौटूंगा.

बचपन से ले कर आज तक मुझे हर कदम पर समझौता करना पड़ा था. और तो और अब मैं अपनी पसंद की लड़की से शादी भी नहीं कर सकता था. यह तो हद ही हो गई थी. शादी न करने की वजह थी, मेरे महान पिता की यह सोच कि लड़की बड़े घर की है, ज्यादा पढ़ीलिखी है, हाईक्लास. बड़ी सोसायटी में उठनेबैठने वाली. वह हमारे घर में एडजस्ट नहीं कर सकेगी. उन का कहने का अंदाज कुछ ऐसा था, जैसे लड़की न हो कर कोई सोफा सेट हो, जिसे घर में फिट करने की बात कर रहे हों. भला यह भी कोई वजह होती है किसी लड़की को रिजैक्ट करने की?

शायद वह चाहते थे कि मैं ऐसी लड़की से शादी करूं, जो अंगूठा छाप हो. छोटे से दो बाई दो के कमरे में रहती हो और दिमाग से पैदल हो. मतलब अगर उसे सोसायटी की समझ आ गई, तो फिर वह घर की बहू बनने लायक नहीं रहेगी. ऐसे महान विचार थे मेरे पिता के.

अरे सोचना तो लड़की वालों को चाहिए था कि वे अपनी मौडर्न, स्मार्ट, एजूकेटिड लड़की को कैसे घर में दे रहे हैं. लेकिन यहां तो मामला ही उलटा था. सच कहूं तो इस मामले में मेरी लाइफ का बैंड बज गया था. उस लड़की का नाम सोनिया था, जिसे मैं प्यार करता था. नाम में ही इतना फर्क था, मतलब कहां सोनिया और कहां हरिलाल यानी मैं. पिता का नाम रामलाल और बेटे का नाम हरिलाल. अपने नाम को भी मैं ने लाइफ में बहुत झेला था. कालेज में सब मजाक उड़ाते थे. फिर मुझे खुद ही अपना नामकरण करना पड़ा. मैं हरिलाल से हैरी बन गया. यह अलग बात है कि इस के लिए मुझे गवर्नमेंट के गजट से ले कर न्यूजपेपर के क्लासीफाइड एडवरटाइजमेंट तक सब जगह अपना नाम प्रिंट कराना पड़ा. तब कहीं मैं हरिलाल से हैरी बना.

हां, तो मैं अपने पिता यानी रामलालजी की बात कर रहा था. मेरे पिता की दिल्ली के नवीन शाहदरा में हार्डवेयर की एक छोटी सी दुकान थी. वह रोजाना अपने पुराने बजाज चेतक स्कूटर से दुकान आतेजाते थे. उस स्कूटर को पुराना बोलना भी ‘पुराने’ शब्द का अपमान था. बाबा आदम के जमाने का स्कूटर था, जिस के हौर्न को छोड़ कर सब कुछ बजता था. मैं अपने पिता को उस स्कूटर पर आतेजाते देखता तो बड़ी शर्म महसूस होती. यारदोस्तों के सामने उन्हें अपना पिता बताने में भी मुझे शर्म आती. लेकिन पिताजी को अपने उस पुराने स्कूटर पर भी गर्व था.

‘‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन.’’ वह गर्व से कहते, ‘‘पुरानी चीजें सोना होती हैं सोना. अब तो ऐसे मजबूत स्कूटर बनने ही बंद हो गए.’’

उन्होंने जीवन में एक ही अच्छा काम किया था कि मेरी ग्रैजुएशन कंपलीट करा दी थी. आगे की पढ़ाई के लिए भी उन्होंने पूरा सहयोग दिया. निस्संदेह उन का सहयोग न होता तो मैं पीएचडी न कर पाता.

अरे हां, मैं अपना इंट्रोडक्शन तो दे ही नहीं पाया. मैं ने इंगलिश लिटरेचर में पीएचडी कर ली थी. खास बात यह कि मेरा फर्स्ट ग्रेड था. अब मुझे आसानी से किसी भी डिग्री कालेज में लेक्चरर का जौब मिल सकता था. इसलिए घर छोड़ते वक्त मैं ने अपने सर्टिफिकेट की फाइल साथ ले ली थी. कहानी की बैकग्राउंड और कैरेक्टर मैं ने आप को अच्छी तरह समझा दिए हैं. अब आप वह बात सुनिए, जिस की वजह से यह कहानी लिख रहा हूं.

सुबहसुबह घर छोड़ कर भागते समय मुझ से एक गड़बड़ हो गई. दरअसल मैं ने घर में अपनी जैकेट ढूंढ़ी, लेकिन मुझे मेरी जैकेट नहीं मिली. ठंड बहुत थी, इसलिए मैं ने जल्दबाजी में पापा का ही कोट पहन लिया और अपने सर्टिफिकेट की फाइल ले कर घर छोड़ दिया. मैं ने आखिरी बार अपनी मां और अपने से 4 साल छोटी बहन को देखा, जो एकदूसरे से चिपटी गहरी नींद सो रही थीं. उन्हें पता ही नहीं था कि थोड़ी देर बाद घर में कितना कोहराम मचने वाला है.

अपने पिता के तो मैं ने आखिरी बार दर्शन करने भी जरूरी नहीं समझे थे. मैं घर से निकल कर पैदल ही जल्दीजल्दी मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ा. मुझे मैट्रो पकड़ कर सब से पहले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचना था और फिर वहां से ट्रेन पकड़ कर कुछ दिनों के लिए कहीं दूरदराज के इलाके में निकल जाना था. मैं ने सोच रखा था कि कुछ दिन अकेले रह कर आगे की प्लानिंग करूंगा. तब तक घर में भी सब कुछ शांत हो जाएगा.

उस दिन ठंड कुछ ज्यादा ही थी. कोट में भी मुझे जबरदस्त ठंड लग रही थी. मैं ने देखा कई लोग बाइक पर आजा रहे थे. उन्हें बाइक पर आतेजाते देख कर मुझे अपनी चाहत याद आ गई. दरअसल पिछले कई सालों से मेरी इच्छा थी कि एक बाइक खरीदूं. लेकिन इच्छा पूरी नहीं हो पाई थी. पापा हर साल कहते थे कि मुझे बाइक दिलाएंगे, लेकिन बाइक आज तक नसीब नहीं हुई थी. जबकि तमाम फटीचर बाइक लिए घूमते थे. मुझे अभी भी सर्दी लग रही थी. मेरे लिए मैट्रो स्टेशन तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था. मुझे लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. वरना कोट में इतनी ठंड लगने का सवाल ही नहीं था.

मैं एक टीन शेड के नीचे जा कर खड़ा हुआ और जल्दी से कोट उतार कर देखा कि आखिर समस्या क्या है? कोट का अंदर का हाल देख कर मैं हैरान रह गया. उस का अंदर का अस्तर बिलकुल फटा हुआ था, इसीलिए उस में सर्दी नहीं रुक रही थी. मुझे हैरानी हुई, पापा रोजाना वही कोट पहन कर दुकान पर जाते थे. अचानक मुझे याद आया. कई सालों पहले जब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था, तब पापा ने वह कोट लाल किले की उस मार्केट से खरीदा था, जहां पुराने कपड़ों की सेल लगती थी. वह कोट भी पुराना था. ताज्जुब की बात यह थी कि उसी दिन उन्होंने चांदनी चौक के कपड़े के एक बड़े शोरूम पर जा कर मेरे लिए ब्लेजर का कपड़ा खरीदा था, जिस की सिलाई ही एक हजार से ज्यादा चली गई थी.

उस के बाद मेरे तो कई कोट बने, लेकिन उन का वही एक कोट आज तक चल रहा था. कोट के फटे हुए स्तर ने मुझे अंदर तक हिला दिया था. कोट उतार कर मैं अभी देख ही रहा था कि तभी एक घटना और घटी. कोट की पौकेट से पापा का पर्स निकल कर नीचे गिर गया. मैं ने जल्दी से पर्स उठाया और उसे खोल कर देखने लगा कि उस में कितने रुपए हैं? रुपए तो उस में सिर्फ 780 ही थे, लेकिन पर्स के अंदर एक पतली सी छोटी डायरी थी. इस डायरी को पापा किसी को हाथ भी नहीं लगाने देते थे. आज वही डायरी मेरे हाथ लग गई थी. मुझे ऐसा लगा, जैसे कोई खजाना मेरे हाथ लग गया हो.

मैं ने जल्दी से डायरी खोल कर पढ़ी. उस पतली सी डायरी के तीसरे पन्ने पर ‘मां के गहनों’ से संबंधित कुछ जानकारी थी, जिस से पता चलता था कि मेरी ग्रैजुएशन के लिए उन्हें वे सारे गहने बेचने पड़े थे, आगे के पन्नों पर तो ऐसी जानकारी थी, जिस ने मुझे बिलकुल ही हिला कर रख दिया. पता चला कि मेरी आगे की पढ़ाई और पीएचडी के लिए तो उन्होंने अपनी दुकान तक गिरवी रखी हुई थी. हकीकत जान कर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. मुझे पढ़ाने के लिए पापा ने इतना सब कुछ किया और मुझे पता ही नहीं था.

तभी उस डायरी में मुझे एक कागज दिखाई दिया. कागज क्या किसी न्यूज पेपर की कटिंग थी. मैं ने खोल कर देखा. वह एक बाइक कंपनी का विज्ञापन था, जिस में लिखा था कि अपनी पुरानी बाइक या स्कूटर के बदले नई बाइक ले सकते हैं. इस का मतलब पापा कुछ भी नहीं भूले थे. उन के बारे में सोच कर मेरी आंखों में आंसू आ गए. जो पापा इतनी मुश्किलों में भी मेरे लिए इतना सोचते थे, मैं उन्हीं को छोड़ कर भाग रहा था. एकाएक मेरी दिशा बदल गई. मैं मैट्रो स्टेशन की जगह अब वापस अपने घर की तरफ भागा. मैं ने पापा के कोट को कस कर अपने सीने से चिपकाए हुए था. अब मुझे उस में बिलकुल भी सर्दी नहीं लग रही थी. मैं ने जोर से अपने घर का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुआ. मैं सब से पहले पापा को देखना चाहता था.

घर का माहौल एकदम सामान्य था. मां और मेरी छोटी बहन जाग गई थीं और अपना रूटीन का काम कर रही थीं. मां किचन में जल्दीजल्दी नाश्ता बना रही थीं, जबकि छोटी बहन घर की सफाई में लगी थी. उन्हें पता ही नहीं चला था कि मैं घर छोड़ कर भागा था.

‘‘पापा कहां हैं?’’ मैं ने घर में घुसते ही मां से पूछा.

‘‘अरे,’’ मां चिल्लाईं, ‘‘तू सुबहसुबह कहां चला गया था? फोन भी नहीं लग रहा था तेरा. इतनी बेखयाली में था कि जातेजाते कोट भी अपने पापा का पहन गया. वह चिल्लाते हुए अपना कोट ढूंढ़ रहे थे. उन की सब से ज्यादा जान तो उस डायरी में अटकी थी, जिसे वह किसी को छूने नहीं देते.’’

‘‘लेकिन पापा हैं कहां?’’

‘‘पता नहीं, आज सुबह से ही पता नहीं उन के दिमाग में क्या चल रहा था?’’ मां गुस्से में ही बोलीं, ‘‘बड़े खुश नजर आ रहे थे. अभी थोड़ी देर पहले घर से निकले हैं. बोल कर गए हैं, मैं जरा कश्मीरी गेट तक जा रहा हूं. आज तो नाश्ता भी नहीं कर के गए.’’

‘‘कश्मीरी गेट?’’ मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.

मैं वापस उलटे पैर घर से बाहर भागा.

‘‘अरे…अरे.’’ मां चिल्लाईं, ‘‘अब तू कहां जा रहा है? नाश्ता तो करता जा. हद है दोनों बापबेटों से. कोई भी कुछ काम बता कर नहीं करता. इस घर में सब से बड़ी पागल तो बस मैं हूं.’’

जब मां के आखिरी शब्द मेरे कान में पड़े, तब तक मैं घर से बाहर निकल चुका था. मैं ने घर के बाहर देखा, पापा की स्कूटर नहीं थी. मैं कश्मीरी गेट का नाम सुन कर ही समझ गया था कि पापा कहां गए हैं. मैं सीधे कश्मीरी गेट के उस बाइक के शोरूम पर पहुंचा, जहां का विज्ञापन मैं ने पापा की डायरी में देखा था. उम्मीद के मुताबिक पापा वहां मौजूद थे और शोरूम के सेल्स मैनेजर से बहस कर रहे थे. दरअसल सेल्स मैनेजर उन के खटारा स्कूटर को लेने से मना कर रहा था. उस की निगाह में वह स्कूटर नहीं था. जबकि पापा उसे उस स्कूटर की अच्छाई गिनवा रहे थे और कोशिश कर रहे थे कि उस स्कूटर का पैसा लगा कर वह उन से बाकी पैसा ले ले और बाइक दे दे.

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मेरी इच्छा हुई कि मैं अपने पापा से लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ूं. हमारे पापा हमारे लिए कितनी कुर्बानियां देते हैं और हमें वे सब मामूली बातें लगती हैं. मैं भाग कर पापा के पास पहुंचा और उन्हें अपने सीने से लिपटा लिया.

‘‘अरे बंटी,’’ वह मुझे बंटी ही कहते थे, ‘‘तू कब आया? देख मैं तेरे लिए नई बाइक लेने की कोशिश कर रहा हूं. अच्छा हुआ तू आ गया, तू अपने लिए बाइक पसंद कर ले. मैं पैसा ले कर आया हूं.’’

‘‘नहीं पापा.’’ मैं बड़ी मुश्किल से अपनी रुलाई रोक पाया, ‘‘मुझे अब बाइक नहीं चाहिए. आप शायद भूल गए हैं कि अब आप के बेटे हरिलाल ने पीएचडी कर ली है. मैं हरिलाल से डा. हरिलाल बन गया हूं. जल्द ही मुझे किसी बड़े कालेज में जौब भी मिल जाएगी. आप ही सोचिए डा. हरिलाल बाइक पर कैसे घूम सकता है? उसे तो कार चाहिए. कार भी बड़ी वाली. चिंता मत करिए मैं जल्द ही अपने वेतन से कार खरीदूंगा. फिर आप को उस में सैर कराऊंगा.’’

पापा हंस पड़े. उन की हंसी किसी बच्चे जैसी थी.

‘‘चलो, अब घर वापस चलते हैं.’’

उन्होंने जल्दी से अपना स्कूटर स्टार्ट करना चाहा.

‘‘नहीं.’’ मैं ने उन्हें स्कूटर स्टार्ट करने से रोका, ‘‘आज आप का यह स्कूटर मैं चलाऊंगा. आखिर डा. हरिलाल को भी तो ड्राइविंग अच्छे से आनी चाहिए. आगे चल कर कार भी तो ड्राइव करनी है.’’

पापा हंस पड़े. थोड़ी देर बाद मैं पापा को स्कूटर की पीछे वाली सीट पर बिठा कर घर की तरफ दौड़ा जा रहा था. जिस स्कूटर को देख कर मुझे शर्म आती थी, उसी स्कूटर को आज डा. हरिलाल गर्व से चला रहा था, क्योंकि वह मेरे पापा का स्कूटर था.

‘‘मुझे तुझ से कुछ कहना है बेटा.’’ स्कूटर के पीछे बैठेबैठे पापा ने कहा.

‘‘क्या?’’

‘‘मैं ने सोनिया से तेरी शादी के लिए मना किया, तुझे बुरा तो नहीं लगा?’’

‘‘बिलकुल भी नहीं.’’ मैं ने निस्संकोच भाव से कहा, ‘‘आप की बात बिलकुल सही है. हमारी और उन की फैमिली में बहुत फर्क है. अब कहां डा. हरिलाल और कहां सोनिया?’’

मेरी बात सुन कर वह फिर हंस पड़े.

उन की हंसी में मुझे बारिश की बूंदों की खनक महसूस हो रही थी. सचमुच उस एक सुबह ने मेरी पूरी दुनिया बदल डाली. मेरे और सोनिया के प्यार का जरूर ‘द एंड’ हो गया था, लेकिन मेरे पापा के साथ मेरी एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई थी. Hindi Stories

 

Hindi Kahani: सगुन असगुन

Hindi Kahani: जिस दिन सेहर के मांबाप ने रिश्ता मंजूर किया, उस के तीसरे रोज हमारे तायाजान का इंतकाल हो गया. वह साल भर से बीमार थे और उन की उम्र भी सत्तर से ऊपर थी. मैं ने हर मुमकिन कोशिश की कि यह खबर सेहर तक न पहुंचे. लेकिन सेहर से यह बात भला कैसे छिप सकती थी?

मैं अपने दोस्त वाजिद के ड्राइंगरूम में बैठा उस से गप्पें लड़ा रहा था. पास ही उस का छोटा भाई हामिद भी बैठा था. हम तीनों इंतजार में थे कि भीतरी दरवाजे का परदा हटे और वाजिद की बहन अपनी चंचल मुसकराहट के साथ हमें चाय पेश करे. इसी बीच बाहरी दरवाजे की घंटी बजी. हामिद उठ कर दरवाजा खोलने गया. फिर जनाना सैंडिलों की टकटक की आवाज आई तो मेरी नजर बेअख्तियार उसी तरफ चली गई. दरवाजे का परदा फर्श से करीब एक फुट ऊंचा था और उस के पास से गुजरने वाले के सिर्फ पैर नजर आते थे. अचानक मेरी नजर उन पैरों पर पड़ी. उफ मेरे खुदा, इतने खूबसूरत पांव शायद ही पहले कभी देखे हों. सफेद हील की सैंडिलों में उस के गुलाबी पांव बहुत भले लग रहे थे.

नाखूनों पर नफासत से लगी नेलपौलिश और गजब ढा रही थी. वह चली गइ, लेकिन मैं बहुत देर तक नजरें जमाए वहीं देखता रहा. उस के खूबसूरत पांव देख कर मुझे यकीन हो चला था कि वह खुद भी बेहद हसीन होगी. न जाने कब तक मैं सोचों में गुम रहता कि वाजिद की आवाज ने मुझे चौंका दिया, ‘‘यार हैदर, अब वापस आ जाओ. वह तो कब की जा चुकी है.’’

कुछ ही देर बाद वाजिद की बड़ी बहन चाय की ट्रे लिए कमरे में दाखिल हुई. मैं वाजिद का बेतकल्लुफ दोस्त था और इस नाते हम दोनों के घर वाले भी एकदूसरे से बखूबी वाकिफ थे. इसलिए मैं भी उन्हें वाजिद की तरह बाजी ही कहता था और वह भी मुझ से बड़ी बहन की तरह सलूक करती थीं. उन के हाथ में चाय की ट्रे देख कर मुझे थोड़ी सी हैरत हुई और मैं कह उठा, ‘‘अरे बाजी, आप ने क्यों तकलीफ की? हमें ही आवाज दे ली होती.’’

‘‘तुम खुद तो यहां छिपे बैठे हो. आवाज किसे देती? और जितनी देर में आवाज यहां तक पहुंचती, उतनी देर में मैं खुद ही पहुंच गई.’’

‘‘मैं तो इसलिए कह रहा था कि शायद आप के यहां मेहमान आए हुए हैं. आप उन्हें अटैंड कर रही होंगी.’’

‘‘मेहमान, मेहमान तो कोई नहीं आया.’’ वह चौंकते हुए बोलीं, फिर जैसे उन्हें कुछ याद आ गया, हंसते हुए कहने लगीं, ‘‘अच्छा, तुम शायद सेहर की बात कर रहे हो. अरे भई, वह तो शबनम की सहेली है और उसी के कमरे में बैठी है. मगर तुम मेहमानों के बारे में इतने फिक्रमद क्यों हो, क्या इरादे हैं?’’

‘‘कुछ नहीं, मेरा क्या इरादा हो सकता है? वह तो मैं ने घंटी की आवाज सुनी थी, इसलिए पूछ लिया.’’ मैं ने झेंपते हुए कहा.

बाजी वापस चली गईं और मैं सेहर के बारे में सोचने लगा. पैरों की झलक तो मैं ने देख ही ली थी. अब नाम भी मालूम हो गया था. बाजी ने तो मजाक में एक बात कही थी, लेकिन मैं सेहर के बारे में संजीदा होता गया.  मुझे यकीन था कि सेहर और उस के घर वाले मेरा रिश्ता कबूल कर लेंगे. लेकिन इस यकीन की दीवार में उस वक्त दरारें पड़ जातीं, जब मैं अपनी कटी हुई अंगुलियों के बारे में सोचता. जी हां, यही वह कमी थी, जिस के कारण मैं अपना सपना सच कर पाने में नाकाम रहा था. वह मनहूस दिन मैं कभी न भूलूंगा, जब एक हादसे ने मेरी शख्सियत को ग्रहण लगा दिया था.

अपिया दीदी के जन्म के 5 साल बाद मैं पैदा हुआ था. मेरे जन्म पर खूब खुशियां मनाई गईं. अम्मी, पापा और अपिया, सभी मुझे उठाएउठाए फिरते. मैं उन दिनों शायद डेढ़, 2 साल का था, जब बकरीद के मौके पर पापा ने कुछ रोज पहले ही बकरा ला कर घर में बांध दिया. मैं सारा दिन उस से खेलता रहता. उसे जबरदस्ती ठूंसठूंस कर घास खिलाता. हमारे यहां ईद के तीसरे दिन कुरबानी हुआ करती थी. जब पापा कसाई को ले कर आए तो मैं वहीं खड़ा रहा और कसाई की एकएक हरकत देखता रहा. इस दौरान अम्मी ने कई बार मुझे आवाजें दीं, मगर मैं ने वहां से हिलने का नाम न लिया.

बोटियां बनाने के बाद कसाई ने बकरे की सिरी अपने सामने रखी तो मैं ने उस पर सवालों की बौछार कर दी, ‘‘आप इस का क्या करेंगे?’’

‘‘अब इसे भी काटेंगे.’’ कसाई ने अपना छुरा ऊपर उठाया.

उसी लम्हे मैं ने अपना बायां हाथ बकरे की सिरी पर रख दिया और बोला, ‘‘इस को न काटें.’’

मगर उस वक्त तक देर हो गई थी. कसाई को अंदाजा नहीं था कि मैं अपना हाथ बीच में ले आऊंगा. उस का छुरा नीचे आया और मेरे बाएं हाथ की तीन अंगुलियों को काटता हुआ सिरी की हड्डी पर पड़ा. सिरी के तो 2 टुकड़े हो गए, मगर इस के साथ ही मेरी अंगुलियां हाथ से जुदा हो कर दूर जा गिरीं. मेरी चीखें सुन कर सब लोग आ गए. पापा मुझे ले कर अस्पताल की तरफ दौड़े. त्यौहार का मौका था. इसलिए बड़ी मुश्किल से डाक्टर मिला. उस ने खून साफ कर के मेरे हाथ की डे्रसिंग की और इंजेक्शन लगा दिया. डे्रसिंग के बाद पापा मुझे घर ले आए.

बचपन तो जैसेतैसे बीत गया, मगर जवानी में कदम रखते ही मुझे अपनी इस कमी का तीखा अहसास होने लगा. मैं अच्छी शख्सियत का मालिक होने के बावजूद इस अहसास से पीछा छुड़ाने में नाकाम रहा. बस, यही खयाल हर सोच पर छा जाता कि मेरा हाथ देख कर कौन मुझे अपनी लड़की देगा. सेहर के बारे में जानने के बाद मैं अजीब दुविधा की हालत में फंस गया था. इस से पहले जब भी अम्मी ने मेरे रिश्ते की बात चलानी चाही, मैं ने उन्हें मना कर दिया. मैं नहीं चाहता था कि मेरे मांबाप जिस घर में रिश्ता ले कर जाएं, वहां इनकार हो जाए. लेकिन अब मैं ने फैसला कर लिया था कि सेहर के मामले में यह खतरा उठा कर ही रहूंगा.

दूसरे दिन मैं फिर वाजिद के यहां गया. वह घर पर मौजूद नहीं था. बाजी मेरी हालत देख कर हैरानी से बोलीं, ‘‘यह तुम ने क्या हालत बना रखी है? तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं बिलकुल ठीक हूं बाजी. आप से एक बात करनी है. वह सेहर है न, उस के पांव…’’

मेरी बात सुन कर बाजी खिलखिला कर हंसते हुए बोलीं, ‘वाह जनाब, न सूरत देखी न जानपहचान हुई, सिर्फ पांवों पर मर मिटे?

‘‘बाजी, मैं संजीदा हूं.’’

‘‘मेरे भैया, मैं ने कब कहा कि तुम संजीदा नहीं हो, लेकिन पहले उस से मिल तो लो.’’

‘‘जाहिर है, यह काम भी आप को ही कराना होगा.’’

अभी यह बातचीत हो ही रही थी कि अचानक मुझे खयाल आया और मैं माथे पर हाथ मारते हुए बोला, ‘‘अरे बाजी, मैं तो भूल ही गया. इतवार को अपिया की मंगनी है. अम्मी ने आप सब लोगों को बुलाया है. आप के लिए तो खास तौर पर ताकीद की है कि शबनम को ले कर जरा जल्दी आ जाएं.’’

‘‘कहो तो सेहर को भी साथ ले आऊं? इसी बहाने मुलाकात भी हो जाएगी.’’ बाजी मुझे छेड़ते हुए बोलीं.

मंगनी वाले दिन हमारे घर बड़ी चहलपहल थी. सारे मेहमान आ गए थे. मगर मुझे बाजी का इंतजार था. खुदाखुदा कर के वह और शबनम आई. सेहर उन के साथ नहीं थी. हंगामे में उन से कुछ पूछना बेकार था. जलसा खतम होते ही मैं अपिया के कमरे की तरफ लपका. बाजी ने मेरी बेचैनी भांप ली थी. मैं ने सारे लिहाज को ताक पर रख कर उन से पूछा, ‘‘बाजी, कुछ मालूम हुआ?’’

‘‘आराम से बैठो. अभी बताती हूं.’’

मैं उन के करीब कालीन पर बैठ गया. वह प्यार से मेरे सिर में अंगुलियां फेरते हुए बोलीं, ‘‘मेरे भैया, हर बात को दिमाग पर सवार नहीं कर लेते.  इस तरह जिंदगी बहुत कठिन हो जाती है.’’

बाजी की यह बात सुन कर मैं चौंक उठा. जरूर कोई ऐसी बात थी, जिसे बाजी बताने में हिचक रही थीं. मेरे दिल की धड़कन तेज होने लगी. शायद सेहर ने मुझे कबूल करने से इनकार कर दिया था और इसलिए वह बाजी के साथ हमारे घर नहीं आई.

मगर मैं अपने होशोहवास काबू में रखते हुए बोला, ‘‘बाजी, आप बेफिक्र हो कर मुझे सब कुछ बता दें. मैं बुरी से बुरी खबर सुनने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘सेहर शबनम की बहुत करीबी सहेली है. इसलिए मैं ने पहले शबनम से बात करना मुनासिब समझा और यह एक तरह से अच्छा ही हुआ,’’

बाजी लम्हा भर रुकीं और फिर मेरे चेहरे को गौर से देखते हुए बोलीं, ‘‘सेहर की 2 बहनें और भी हैं. वह सब से बड़ी है. बहुत छोटी उम्र में सेहर के लिए पहला रिश्ता आया और उस की मंगनी कर दी गई, लेकिन मंगनी के दूसरे ही दिन लड़के के किसी करीबी रिश्तेदार की मौत हो गई और उन लोगों ने सेहर को मनहूस मान कर मंगनी तोड़ दी.

‘‘कुछ दिनों बाद दूसरा रिश्ता आया. मंगनी की रस्म एक बार फिर धूमधाम से अदा की गई. लेकिन बदकिस्मती कि वहां भी किसी की मौत हो गई और वह मंगनी भी टूट गई. इन 2 इत्तफाकों ने सेहर को इतना मायूस कर दिया कि अब वह शादी के नाम से ही डर जाती है. उस की दोनों छोटी बहनों की शादी हो चुकी है. लोगों की बातें सुनसुन कर वह खुद भी अपने आप को मनहूस समझने लगी है.’’ यह कह कर बाजी ने गहरी सांस ली और खामोश हो गईं.

मेरे दिल में एक बार फिर उम्मीद के चिराग जल उठे. मैं ने कहा, ‘‘बाजी, यह तो कोई खास बात नहीं. सेहर जैसी पढ़ीलिखी लड़कियों को ऐसा नहीं सोचना चाहिए. मेरा खयाल है, आप सेहर से सीधे तौर पर बात करें और उसे मेरे बारे में सब कुछ बता दें.’’

‘‘वह तो मैं कर ही लूंगी, लेकिन पहले तुम्हारी अम्मी की रजामंदी तो ले लूं. ऐसा न हो कि वह भी सेहर को मनहूस समझ कर इनकार कर दें.’’

‘‘यह काम भी आप ही को करना होगा. मेरी तो हिम्मत नहीं पड़ती कि अम्मी से अपनी शादी की बात करूं.’’

बाजी मेरी बात पर हंस कर बोलीं, ‘‘खुद कुछ मत करना. हर काम में मुझे ही आगे कर देना. वैसे यह तो बताओ कि इस सारी भागदौड़ का मुझे क्या इनाम मिलेगा?’’

‘‘एक अदद प्यारसा दूल्हा, जो मैं तलाश करूंगा.’’

बाजी ने मेरे सिर पर हलकीसी चपत लगाई. दूसरे दिन अपिया ने मुझे बताया कि अम्मी इस रिश्ते के लिए तैयार हैं और एकदो रोज में वह सेहर को देखने जाएंगी. अपिया की जबानी यह खुशखबरी सुन कर मैं खुशी से झूम उठा. तभी मेरी नजर अपने हाथ पर गई, ‘‘अपिया, मेरे हाथ के बारे में उन लोगों को साफसाफ बता देना. हो सकता है…’’ मेरे अंदर के खौफ ने मुझे जुमला पूरा न करने दिया. अपिया ने बढ़ कर मेरे हाथ थाम लिए और प्यार से बोलीं, ‘‘मेरे प्यारे भाई, यह कोई ऐसी बड़ी बात नहीं, जिसे तुम ने अपने दिमाग पर सवार कर रखा है. तुम बेफिक्र रहो. इंशाअल्लाह, सब ठीक हो जाएगा.’’

दूसरे दिन शाम को बाजी और शबनम हमारे घर आईं. फिर अम्मी और अपिया को साथ ले कर सेहर के यहां गईं. उन के जाते ही मैं बेचैन हो गया. न जाने कैसेकैसे खयाल दिल में आ रहे थे. घबरा कर मैं बाहर निकल आया और इधरउधर भटकता रहा. काफी देर बाद घर लौटा. सब लोग वापस आ गए थे. अपिया किचन में थीं. मैं सीधा वहीं पहुंचा. अपिया के चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं था, जिस से मैं नतीजे के बारे में अंदाजा लगा पाता.

आखिर अपिया खुद ही बोलीं, ‘‘सेहर बड़ी प्यारी लड़की है. तुम्हारी पसंद की दाद देनी पड़ेगी. उन लोगों ने जवाब देने के लिए कुछ मोहलत मांगी है.’’

‘‘आप ने उन्हें मेरे हाथ के बारे में बता दिया था न?’’

‘‘हां बाबा, सब कुछ बता दिया. वे लोग बड़े रोशन खयाल हैं. उन्होंने इस बात को कोई अहमियत नहीं दी, बल्कि खुद ही सेहर के बारे में भी सब कुछ बता दिया. अम्मी ने भी उन लोगों से कह दिया कि ये सब जाहिलाना बातें हैं. इस में सेहर का क्या कसूर?’’

मैं खुशी से दीवाना हो गया और बेअख्तियार दौड़ता हुआ अम्मी के पास चला गया. अम्मी मुझे देखते ही मुसकरा दीं और मेरे सिर पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘खुश रहा करो बेटा. अल्लाह ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा. अब दुआ करो कि सेहर भी अपने खौफ से छुटकारा हासिल कर ले और इस रिश्ते के लिए हामी भर ले.’’

‘‘अम्मी, पापा ने तो कुछ नहीं कहा?’’ मैं ने डरतेडरते पूछा.

‘‘नहीं बेटा, वह क्या कहेंगे? हम सब तुम्हारी खुशी में खुश हैं.’’

कई दिन बीत गए, लेकिन उन लोगों की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. मेरी बेचैनी दिनबदिन बढ़ती जा रही थी. अपिया भी फिक्रमंद नजर आ रही थीं. उन का खयाल था कि एक बार फिर याद दिलाने के लिए सेहर के घर जाना चाहिए. मगर अम्मी का कहना था कि कुछ दिन और देख लो. इसी दौरान एक रोज शबनम का फोन आया. संजोग से मैं घर पर ही था. शबनम ने बताया कि सेहर उस के पास ही बैठी है और मुझ से कुछ बात करना चाहती है. मेरे कहने पर शबनम ने फोन का रिसीवर सेहर को थमा दिया.

‘‘हैदर साहब, शबनम के बेहद इसरार पर में ने अपने आप को बड़ी मुश्किल से रजामंद किया है कि आप से सीधे तौर पर बातचीत करूं. सब से पहले तो मैं यह कहना चाहूंगी कि आप अपने दिमाग से यह खयाल निकाल दें कि हाथ की मामूली सी खराबी की वजह से कोई लड़की आप को कबूल करने को तैयार नहीं होगी. मर्द की खूबसूरती उस की शराफत और काबिलियत होती है और ये खूबियां आप में मौजूद हैं. वह लड़की बेहद खुशनसीब होगी, जिसे आप जैसा हमसफर मिलेगा. लेकिन मैं अपने मामले में यही चाहती हूं कि आप मेरा खयाल दिल से निकाल दें. मेरा तो नाम लेने वाला भी मुश्किलों में घिर जाता है.’’

‘‘सेहर साहिबा, इस मेहरबानी का बेहद शुक्रिया. आप ने जो कुछ मेरे बारे में कहा है, वह मुझ जैसे इंसान को शर्मिंदा करने के लिए काफी है, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि जो मशविरा आप मुझे दे रही हैं, अगर वही मैं आप को दूं तो?’’

‘‘जी, मैं समझी नहीं…’’

‘‘बिलकुल सामने की बात है सेहर,’’ मैं बेतकल्लुफी पर उतर आया, ‘‘जिस तरह आप की नजर में मेरे हाथ की खराबी की कोई अहमियत नहीं है, ठीक उसी तरह आप को भी बेकार का वहम दिमाग से निकाल देना चाहिए. कुदरत के कामों में इंसान का क्या दखल? मुझे हैरत है कि आप समझदार और पढ़ीलिखी होने के बावजूद ऐसे वहमों में उलझी हुई हैं. जरूरी तो नहीं कि हर बार ऐसा ही हो. अगर खुदा न करे, ऐसी कोई बात हुई तो आप को उस से कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा. यह मेरा वादा है.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि आप अपनी जिद नहीं छोड़ेंगे?’’

‘‘सवाल ही नहीं पैदा होता. मैं हर कीमत पर आप को अपनाने का इरादा कर चुका हूं.’’

‘‘तो फिर अच्छी तरह सुन लीजिए. मेरे मांबाप पहले ही मेरी वजह से बहुत दुख उठा चुके हैं. अब मैं उन्हें और दुखी नहीं करना चाहती. अगर आप लोगों ने रिश्ता खत्म किया तो मैं जबरदस्ती आप के घर चली आऊंगी और फिर सारी उम्र वहां से निकलने का नाम नहीं लूंगी, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाए.’’ उस के लहजे में झुंझलाहट थी.

‘‘आप अभी तशरीफ ले आएं. अच्छा है, दोनों तरफ का खर्च बच जाएगा.’’ मैं ने हंसते हुए कहा.

फिर वही हुआ, जिस का सेहर को शुबहा था. जिस दिन सेहर के मांबाप ने रिश्ता मंजूर किया, उस के तीसरे रोज हमारे तायाजान का इंतकाल हो गया. वह साल भर से बीमार थे और उन की उम्र भी 70 से ऊपर थी. मैं ने हर मुमकिन कोशिश की कि यह खबर सेहर तक न पहुंचे. लेकिन सेहर से यह बात भला कैसे छिप सकती थी?

फिर एक दिन शबनम का फोन आया और मुझे मौजूद पा कर उस ने रिसीवर सेहर को थमा दिया.

‘‘मैं ने आप से कहा था न कि मेरा खयाल दिल से निकाल दें. क्या अब भी आप मुझे मनहूस नहीं कहेंगे?’’ सेहर भर्राई हुई आवाज में बोली.

‘‘पहले यह बताएं कि यह खबर आप तक कैसे पहुंची?’’ मैं ने कुछ तेज लहजे में पूछा.

‘‘इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. आज नहीं तो कल, यह खबर मुझे मिलनी ही थी.’’

‘‘देखो सेहर, तायाजान पिछले एक साल से बीमार थे. अब अगर उन का वक्त पूरा हो गया तो इस में तुम्हारा क्या कुसूर? फिर तुम्हें परेशान होने की जरूरत भी क्या है? तुम तो पहले ही धमकी दे चुकी हो कि हर हालत में हमारे ही घर आओगी.’’

मेरी यह बात सुनते ही वह खिलखिला कर हंस दी और रिसीवर शबनम को पकड़ा दिया.

‘‘हैदर भाई, अभी कुछ देर पहले तो यहां सावनभादो की झड़ी लगी हुई थी. आप ने क्या कह दिया कि यहां तो मौसम ही बदल गया है?’’

‘‘तुम कहां से आ गई कबाब में हड्डी बन कर… 2 मिनट चैन से बात भी नहीं करने देती.’’

‘‘बस जी, अब कोई बात नहीं होगी. वह कह रही है… ऐसे जिद्दी इंसान से तो मैं इकट्ठे ही बात करूंगी.’’

मेरे दिमाग से बहुत बड़ा बोझ उतर गया. सेहर का खौफ दूर हो गया था और वह मजबूती के साथ जिंदगी का सफर तय करने के लिए तैयार थी. मैं ने बाजी और अपिया को इस बात पर तैयार कर लिया कि हमारी शादी जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही बेहतर होगा. क्या मालूम कल कोई और हादसा हो जाए और सेहर के लिए नई मुश्किल पैदा हो. आखिर वह दिन भी आ गया, जिस का हम सब को शिद्दत से इंतजार था.

धड़कते दिल के साथ मैं दुलहन के कमरे में दाखिल हुआ. सेहर सिर झुकाए मसहरी पर बैठी थी. मेरी नजर सब से पहले उस के पांवों पर गई. उस के गुलाबी पांवों में सुर्ख मेंहदी और भी गजब ढा रही थी. जब मैं ने उस का घूंघट उठाया तो मुझे अपनी किस्मत पर यकीन हो आया. वह मेरे तसव्वुर से कहीं ज्यादा हसीन निकली.

‘‘सेहर, तुम जानती हो कि मैं ने सिर्फ तुम्हारे पांव देख कर ही तुम्हें पसंद कर लिया था? है न अजीब बात?’’

‘‘सारी बातें ही अजीब हुई हैं. मुझे तो अब भी यकीन नहीं आ रहा.’’ उस ने हौले से जवाब दिया.

‘‘यकीन तो दिला दूं, लेकिन मुझे क्या मिलेगा, बोलो?’’ मैं ने कहा तो वह लजा कर रह गई.

मजे की बात तो यह देखिए कि तब से अब तक हमारे घर न तो कोई गमी हुई और न दूसरी कोई बिपदा आई. सेहर के कदम बहुत अच्छे सगुन साबित हुए. Hindi Kahani

 

Hindi Crime Stories: एक थी प्रिया

Hindi Crime Stories: डा. प्रिया की शादी हुए 5 साल हो गए थे, लेकिन उन के और डा. कमल के संबंध पतिपत्नी की तरह नहीं बन पाए थे. आखिर इस की वजह क्या थी, आगे इस का परिणाम क्या हुआ?  दिल्ली के थाना नबी करीम पुलिस की जीप 18 अप्रैल की रात करीब 2 बजे पहाड़गंज स्थित होटल प्रेसीडेंसी पहुंची तो मैनेजर बाहर ही मिल गया. थानाप्रभारी जीप से जैसे ही उतरे, मैनेजर ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, हमारे होटल के कमरा नंबर 302 में ठहरी डा. प्रिया वेदी  के कमरे में कोई हलचल नहीं हो रही है. हमें डर लग रहा है कि उस में कोई अनहोनी तो नहीं हो गई?’’

‘‘डा. प्रिया वेदी कौन हैं, होटल में कब से ठहरी हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘वह अकेली ही थीं या उन के साथ कोई और भी था?’’

‘‘सर, आज ही दिन के साढ़े बारह बजे के आसपास वह अकेली ही आई थीं. सामान के नाम पर उन के पास एक ट्रौली बैग था. पहचान पत्र के रूप में उन्होंने राजस्थान ट्रांसपोर्ट अथौरिटी की ओर से जारी किया गया ड्राइविंग लाइसेंस दिया था.’’

‘‘वह जब से आईं, बाहर बिलकुल नहीं निकलीं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘कमरे में जाने के बाद से उन्होंने न तो रूम अटेंडेंट को बुलाया है और न ही कमरे से बाहर निकली हैं. सर, जब वह यहां आई थीं तो कुछ तनाव में लग रही थीं. रिसैप्शन पर ही मैं ने उन्हें ठंडा पानी मंगा कर पिलाया था, ताकि वह रिलैक्स महसूस करें. मैं ने उन से पूछा भी था, पर उन्होंने कुछ बताया नहीं था. वैसे भी किसी से उस की व्यक्तिगत बातों के बारे में ज्यादा नहीं पूछा जा सकता.’’

‘‘इस बीच आप ने उन के बारे में पता करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘सर, आधी रात तक जब उन के कमरे से किसी तरह की सर्विस की कोई काल नहीं आई तो मैं ने रूम अटेंडेंट को भेजा कि जा कर मैडम से पूछ लो कि उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है. लेकिन बारबार बेल बजाने के बाद भी जब उन्होंने दरवाजा नहीं खोला तो मुझे शक हुआ और मैं ने पुलिस को सूचना दे दी.’’ मैनजर ने एक ठंडी सांस ले कर कहा.

‘‘चलो, मुझे वह कमरा दिखाओ, जिस में डा. प्रिया वेदी ठहरी हुई हैं.’’

मैनेजर पुलिस टीम को तीसरी मंजिल स्थित कमरा नबंर 302 पर ले गया. थानाप्रभारी ने कमरे का दरवाजा खुलवाने की काफी कोशिश की. जब दरवाजा खुलवाने की उन की हर कोशिश नाकामयाब हो गई तो उन्होंने कहा, ‘‘अब कमरे का दरवाजा तोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.’’

मैनेजर ने रिसैप्शन से 2-3 कर्मचारियों को बुलवा लिया तो उन्होंने कमरे के दरवाजे पर जोरजोर धक्के दिए, जिस से अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर जाने पर कमरे में पड़ा बैड खाली मिला. कमरे से अटैच बाथरूम खोला गया तो उस में डा. प्रिया खून से लथपथ पड़ी थीं. उन के एक हाथ की नस कटी थी तो दूसरे में ड्रिप लगी थी. होटल मैनेजर ने बताया कि यही डा. प्रिया वेदी हैं. थानाप्रभारी ने डा. प्रिया की नब्ज देखी तो वह थम चुकी थी. उन में जीवन का कोई भी लक्षण नहीं था. थाना नबी करीम पुलिस डा. प्रिया की लाश का निरीक्षण कर ही रही थी कि उन के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर थाना डिफेंस कालोनी पुलिस भी उन के घर वालों के साथ होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई.

घर वालों ने भी उस लाश की शिनाख्त डा. प्रिया के रूप में कर दी. उन्होंने बताया कि यह दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट थीं और अपने पति डा. कमल वेदी के साथ एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहती थीं. पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो डा. प्रिया वेदी का लिखा साढ़े 3 पेज का एक सुसाइड नोट मिला. होटल के कमरे का हर सामान अपनी जगह रखा था. डा. प्रिया का भी सामान सुरक्षित था. इस से साफ लग रहा था कि यह हत्या का नहीं, खुदकुशी का ही मामला है. पुलिस ने जरूरी काररवाई के बाद डा. प्रिया वेदी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इतनी काररवाई निपटातेनिपटाते सुबह हो गई थी.

19 अप्रैल को पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने डा. प्रिया की लाश घर वालों को सौंप दी तो उसी दिन उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अंतिम संस्कार में एम्स के भी कई डाक्टर शामिल हुए थे. वे डा. प्रिया की मौत को ले कर तरहतरह की बातें कर रहे थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि डा. प्रिया वेदी ने आत्महत्या की है. उन का कहना था कि वह बहुत ही हंसमुख और मिलनसार थीं. साथी डाक्टरों से उन के काफी अच्छे संबंध थे. उन का कहना था कि उन्होंने अपने दिल में छिपे दर्द का  कभी किसी को अहसास नहीं होने दिया. डा. प्रिया एम्स में अगस्त, 2014 से एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के पद पर काम कर रही थीं. उन के पति डा. कमल वेदी भी एम्स में ही स्किन के डाक्टर थे. वह डा. कमल से एक साल जूनियर थीं.

होटल के कमरे में पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला था, उस में डा. प्रिया ने पति पर समलैंगिक होने का आरोप लगाया था. पुलिस की शुरुआती जांच में यह बात सामने भी आई है कि डा. प्रिया ने खुदकुशी करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट पर कई बातें लिखी थीं. डा. प्रिया ने फेसबुक पर लिखा था कि मैं पिछले 5 सालों से डा. कमल वेदी के साथ शादीशुदा जिंदगी बिता रही हूं, लेकिन हमारे शारीरिक संबंध नहीं बने, जो कि दांपत्य के लिए जरूरी होते हैं. शादी ही इसी के लिए होती है. मुझे एक फर्जी ईमेल आईडी मिली थी, जिस के द्वारा मेरे पति समलैंगिकों से बातें करते थे. मुझे जब इन सब बातों का पता चला तो मुझे प्रताडि़त किया जाने लगा.

उसी दिन डा. प्रिया के घर वालों ने दिल्ली के नबी करीम पुलिस थाने में डा. कमल के खिलाफ दहेज प्रताड़ना एवं अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज करा दिया. दिल्ली पुलिस ने शुरुआती जांच में मिले साक्ष्यों एवं डा. प्रिया के घर वालों के बयान के आधार पर 19 अप्रैल को डा. कमल को गिरफ्तार कर लिया. डा. प्रिया कौन थीं, कितने संघर्षों के बाद डाक्टर बन कर उन्होंने पिता का सपना पूरा किया था? इतना संघर्ष कर के जीवन को संवारने वाली डा. प्रिया ने आखिर आत्महत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए हमें जयपुर से शुरुआत करनी होगी.

राजस्थान की राजधानी जयपुर, जो गुलाबी नगर के नाम से मशहूर है, के चांदपोल बाजार में एक छोटी सी गली है, जिसे गोविंदरावजी का रास्ता कहते हैं. इसी रास्ते में कान महाजन बड़ के पास रामबाबू वर्मा रहते हैं. वह टेलरिंग यानी कपड़ों की सिलाई की दुकान से गुजरबसर करते थे. उन के 3 बच्चे थे, सब से बड़ा बेटा विजय, उस से छोटी बेटी प्रिया और सब से छोटा बेटा लोकेश. उन के तीनों ही बच्चे पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार थे. रामबाबू वर्मा खुद तो ज्यादा नहीं पढ़ सके थे, लेकिन वह बच्चों को पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे. यही उन का सपना भी था, जिसे पूरा करने के लिए वह जम कर मेहनत कर रहे थे. उन का चूनेमिट्टी का मकान था. सीमित आय थी. जाहिर है, घर के हालात बहुत अच्छे नहीं थे. कपड़ों की सिलाई की आमदनी से किसी तरह परिवार की दालरोटी चल रही थी. बच्चे पढ़ने लगे तो खर्च बढ़ता गया.

लेकिन रामबाबू ने हिम्मत नहीं हारी. वह बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन दूनी और रात चौगुनी मेहनत करने लगे. पत्नी भी उन का साथ देती थीं. इस तरह बच्चों की पढ़ाई के लिए पतिपत्नी न दिन देख रहे थे न रात. पतिपत्नी की दिनरात की मेहनत रंग लाई और बड़े बेटे विजय का सिलेक्शन मैडिकल में हो गया. प्रिया उस से छोटी थी. भाई के सिलेक्शन के बाद उस ने भी डाक्टर बनने का मन बना लिया. पढ़ाई में वह तेज थी ही, भाई का सपोर्ट मिला तो उस ने भी मातापिता को निराश करने के बजाय उन के सपनों में रंग भर दिया.

प्रिया ने प्रीमैडिकल टैस्ट पास कर लिया. बड़ा बेटा विजय मैडिकल की पढ़ाई कर ही रहा था. रामबाबू वर्मा के लिए 2 बच्चों की मैडिकल की पढ़ाई का खर्च वहन करना मुश्किल था. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बैंक से बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लिया, लेकिन उन की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं आने दी. प्रिया का अजमेर के जेएलएन मैडिकल कालेज में दाखिला हुआ था. वह पूरी लगन से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी. बीचबीच में वह घर भी आती रहती थी. इस तरह चांदपोल की गली में प्रिया आइडियल गर्ल बन गई थी. क्योंकि पुराने से मकान में रह कर गरीबी में पलबढ़ कर वह डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी.

आखिर वह दिन भी आ गया, जब प्रिया एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर के डाक्टर बन गई. रामबाबू वर्मा के लिए वह सब से ज्यादा खुशी का दिन था. उन का सब से बड़ा सपना पूरा हो गया था. बड़े बेटे विजय के डाक्टर बनने से ज्यादा खुशी उन्हें प्रिया के डाक्टर बनने से हुई थी. इस के बाद 24 अप्रैल, 2010 को उन्होंने प्रिया की शादी डा. कमल वेदी से कर दी. डा. कमल वेदी राजस्थान के सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ के रहने वाले महेश वेदी के बेटे थे. परिवार वालों की सहमति से दोनों की शादी धूमधाम से हुई थी. रामबाबू वर्मा के लिए खुशी की बात थी कि उन्हें डाक्टर बेटी के लिए डाक्टर दामाद भी मिल गया था. वह निश्चिंत थे कि बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी.

दोनों की जोड़ी खूब जमेगी. प्रिया भी अपने ही पेशे का जीवनसाथी मिलने से खुश थी. वह जानती थी कि एक डाक्टर की भावना को दूसरा डाक्टर ही अच्छी तरह समझ सकता है. बेटी को डाक्टर बना कर और उस की शादी कर के रामबाबू वर्मा  एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए थे. अब उन के ऊपर छोटे बेटे लोकेश की जिम्मेदारी रह गई थी. लोकेश भी पढ़ाई में तेज था. वह बैंक की नौकरियों की तैयारी कर  रहा था. वह भी अपने प्रयासों में सफल हो गया और उसे बैंक में नौकरी मिल गई. फिलहाल वह कोटा में एक बैंक में प्रोबेशनरी अफसर है. डा. कमल वेदी को उसी बीच सन 2012 में दिल्ली के एम्स में नौकरी मिल गई. वह एम्स में स्किन के डाक्टर हैं. इस के बाद सन 2014 में डा. प्रिया भी एम्स में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के रूप में तैनात हो गईं. पतिपत्नी को एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहने के लिए मकान भी मिल गया था.

डा. प्रिया को भले ही एम्स में पति डा. कमल के साथ नौकरी मिल गई थी, लेकिन वह खुश नहीं थीं. डा. प्रिया के मायके वालों के अनुसार डा. कमल ने प्रिया को कभी पति का प्यार नहीं दिया. वह अपने वैवाहिक जीवन को ले कर परेशान रहती थी. जब इस बात की जानकारी रामबाबू को हूई तो उन्होंने कमल के पिता महेश वेदी से बात की. महेश वेदी ने रामबाबू को भरोसा दिलाया कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा. डा. कमल ने भले ही प्रिया के वैवाहिक जीवन के सुनहरे सपनों को चूरचूर कर दिया था, लेकिन प्रिया अपने पति कमल से बेहद प्यार करती थी. वह न तो पति को छोड़ना चाहती थी और न ही अपने परिवार को टूट कर बिखरने देना चाहती थी.

करीब ढाई साल पहले रामबाबू वर्मा को जब बेटी पर हो रहे जुल्मों की जानकारी मिली तो प्रिया ने उन्हें मां की कसम दिला  कर चुप करा दिया था. वह चुपचाप मानासिक और शारीरिक अत्याचार सहन करती रही. डा. प्रिया ने फेसबुक पर पोस्ट लिख कर अपना दर्द बयां किया था. उन्होंने लिखा था कि शादी के 6 महीने बाद ही मुझे यकीन हो गया था कि मेरा पति डा. कमल समलैंगिक है और उस के कई लोगों के साथ समलैगिक संबंध हैं. उनहोंने लोगों के नाम भी फेसबुक पर लिखे थे. उन्होंने जब कमल के लैपटौप में उस के समलैंगिक संबंधों के सबूत दिखाए तो कमल ने कहा कि किसी ने उस का एकाउंट हैक कर के इस तरह की चीजें डाल दी हैं.

डा. प्रिया ने आगे लिखा था कि मैं सच जान चुकी थी. फिर भी मैं कमल से बेहद प्यार करती थी, लेकिन वह मेरे प्यार को समझ नहीं पाए. अगर हमारे समाज में ऐसे लोग हैं तो कभी उन से शादी मत कीजिए. अपने जीवन के अंतिम समय से कुछ घंटे पहले डा. प्रिया ने फेसबुक पर जो स्टेटस अपडेट किया था, उस में डा. कमल को गुनहगार बताया था. उन का कहना था कि वह कमल से बेहद प्यार करती थीं, इस के बावजूद उस ने उसे छोटीछोटी चीज के लिए तरसाया. केवल एक महीने पहले उस ने खुद को समलैंगिक माना. इस सब के बावजूद वह उस की मदद करना चाहती थीं, लेकिन वह उसे टौर्चर करता रहा.

इसी फेसबुक पेज पर डा. प्रिया ने एक रात पहले के वाकए का जिक्र करते हुए लिखा था, ‘तुम ने मुझे इतना अधिक टौर्चर किया है कि अब तुम्हारे साथ सांस भी नहीं ले सकती. तुम इंसान नहीं, राक्षस हो, क्योंकि तुम ने मेरी खुशी छीन ली. तुम्हारे जैसे लोग केवल लड़की और उस के घर वालों की भावनाओं से खेलते हैं. डा. कमल, मैं ने तुम से कभी कुछ नहीं चाहा था, क्योंकि मैं तुम्हें बेहद प्यार करती थी, जबकि तुम ने कभी मेरे प्यार की अहमियत नहीं समझी. कमल तुम मेरे गुनहगार हो. 18 अप्रैल की सुबह डा. प्रिया जब उठीं तो बेहद तनाव में थीं. बीती रात ही डा. कमल ने उस से झगड़ा किया था. वह फ्रेश हुईं और एक ट्रौली बैग में जरूरी सामान रख कर कुछ देर वह सोचती रहीं, फिर एकाएक मन को कठोर कर के अस्पताल में इमरजेंसी ड्यूटी होने की बात कह कर घर से निकल पड़ीं.

सुबह करीब साढ़े 9 बजे प्रिया ने जयपुर में अपने पिता को फोन किया कि प्लीज पापा, जल्दी आ जाओ. आप नहीं आओगे तो मेरा मरा मुंह देखोगे. उसी दिन सुबह करीब 11 बजे प्रिया ने कोटा में रहने वाले अपने छोटे भाई लोकेश को फोन कर के यही बातें कही थीं. प्रिया की बातों से उस के घर वालों की चिंता बढ़ गई थी. रामबाबू वर्मा तुरंत घर वालों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. दूसरी ओर कोटा से छोटा भाई लोकेश भी अपने एक कजिन के साथ दिल्ली के लिए चल पड़ा था. रास्ते से उन्होंने कई बार प्रिया को फोन किए, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. इस बीच प्रिया का भी कोई फोन नहीं आया.

जब रामबाबू वर्मा, लोकेश और उन के अन्य रिश्तेदार दिल्ली पहुंचे तो रात हो चुकी थी. प्रिया के बारे में जब उन्हें कोई सही सूचना नहीं मिली तो सभी थाना डिफेंस कालोनी पहुंचे और प्रिया की गुमशुदगी दर्ज करने का अनुरोध किया. पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज कर प्रिया के मोबाइल के आधार पर उस की लोकेशन पता की तो वह पहाड़गंज इलाके में मिली. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि वह पहाड़गंज में होंगी. पुलिस ने प्रिया के पति डा. कमल एवं घर के अन्य लोगों से भी बात की. वे भी प्रिया के बारे में कुछ नहीं बता सके थे. इस के बाद पुलिस मिली मोबाइल लोकेशन के आधार पर रामबाबू वर्मा, लोकेश एवं डा. कमल आदि को साथ ले कर पहाड़गंज के होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई, जहां डा. प्रिया की लाश मिली.

पूछताछ में पता चला कि डा. प्रिया एवं डा. कमल के रिश्तों में इतनी दूरियां आ चुकी थीं कि इसी साल 26 जनवरी को जब जयपुर में प्रिया के छोटे भाई लोकेश की शादी थी तो उस में केवल प्रिया ही गई थी. लेकिन प्रिया ने अपने व्यवहार से किसी को इस बात की भनक नहीं लगने दी थी कि हालत यहां तक पहुंच चुकी है. बहरहाल, डा. प्रिया की मौत ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं. उस के घर वाले प्रिया को इंसाफ दिलाने की मांग कर रहे हैं. जयपुर के स्टैच्यू सर्किल पर प्रिया की याद में कैंडल मार्च भी निकाला गया. फेसबुक पर तेजी से वायरल होने के बाद डा. प्रिया का सुसाइड नोट उस में से हटा दिया गया. डा. प्रिया का वाल पोस्ट उस की मौत के बाद करीब साढ़े 3 हजार लोगों ने शेयर किया था. इस के बाद फेसबुक ने प्रिया की प्रोफाइल को रिमेंबरिंग प्रिया वेदी कर दिया, साथ ही उन का वाल पोस्ट फेसबुक से हटा दिया. Hindi Crime Stories