Cyber Crime Story : बैंक अधिकारी बनकर लूटे लाखों

मार्च, 2017 के तीसरे या चौथे सप्ताह की बात है. छुट्टी का दिन होने की वजह से भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जे.सी. मोहंती दोपहर को अपने सरकारी बंगले में बने औफिस में बैठे फाइलें देख रहे थे. उन की टेबल पर फाइलों का ढेर लगा था. वह राजस्थान में जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी के भूजल विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं. वह पानी के महकमे से जुड़े हैं और इस समय गर्मी का मौसम चल रहा है, इसलिए फाइलों की संख्या काफी हो गई थी.

वह फाइल पर मातहत अधिकारियों द्वारा लिखी गई टिप्पणियों को ध्यान से पढ़ रहे थे कि अचानक उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उन्होंने मोबाइल के स्क्रीन पर आने वाले नंबर को सरसरी तौर पर देखा और फिर स्विच औन कर के कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘सर, मैं स्टेट बैंक औफ इंडिया से बोल रहा हूं.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘हां, बताइए.’’ श्री मोहंती ने फाइल पर नजरें गड़ाए हुए ही कहा.

‘‘सर, आप को पता ही होगा कि एक अप्रैल से स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर  सहित देश के 5 बैंकों का एसबीआई में विलय हो रहा है. आप का खाता एसबीबीजे में है. आप के एसबीबीजे के एटीएम कार्ड का वेरिफिकेशन करना है, ताकि उसे एसबीआई से जोड़ा जा सके.’’ दूसरी ओर से फोन करने वाले ने नपेतुले शब्दों में कहा.

बात करने वाले का लहजा सभ्य और अधिकारी जैसा था. इसलिए जे.सी. मोहंती ने पूछा, ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन इस में मुझे क्या करना है?’’

‘‘सर, आप अपने एटीएम कार्ड के नंबर बता दीजिए.’’ फोन करने वाले ने कहा.

एसबीबीजे के एसबीआई में विलय की बात श्री मोहंती को पता थी, क्योंकि रोज ही मीडिया में इस की खबरें आ रही थीं. इसलिए उन्होंने टेबल पर ही रखे अपने पर्स से स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर का एटीएम कार्ड निकाल कर उस पर सामने की ओर लिखे बारह अंकों का नंबर फोन करने वाले को बता दिया. दूसरी ओर से फोन करने वाले ने एटीएम कार्ड नंबर नोट करते हुए दोबरा बोल कर कन्फर्म करते हुए कहा, ‘‘थैंक्यू सर, आप का एक मिनट और लूंगा, आप को एटीएम कार्ड के पीछे लिखा सीवीवी नंबर भी बताना होगा.’’

जे.सी. मोहंती ने सीवीवी नंबर भी बता दिया. इस के बाद फोन कट गया तो वह फिर से अपने काम में व्यस्त हो गए. कुछ देर बाद उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. उन्होंने मैसेज देखा तो उस में ओटीपी नंबर था. उसे उन्होंने अपनी डायरी में नोट कर लिया.

मैसेज आने के करीब 10 मिनट बाद उन के मोबाइल पर एक बार फिर उस व्यक्ति का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘सर, आप को एक बार और कष्ट दे रहा हूं. आप के मोबाइल पर ओटीपी नंबर का मैसेज आया होगा. इसी ओटीपी नंबर से आप के एटीएम कार्ड और बैंक खाते का वेरिफिकेशन किया जाएगा. कृपया आप वह ओटीपी नंबर बता दीजिए, ताकि आप के खाते और एटीएम कार्ड को वेरिफाई कर के स्टेट बैंक औफ इंडिया से जोड़ कर अपडेट किया जा सके.’’

कुछ देर पहले ही अपनी पर्सनल डायरी में लिखा ओटीपी नंबर जे.सी. मोहंती ने सहज भाव से फोन करने वाले को बता दिया और अपने काम में व्यस्त हो गए. शासन सचिवालय में आसीन आईएएस अधिकारियों का जीवन बहुत व्यस्त होता है. दिनभर मीटिंगों और फाइलों में सिर खपाना पड़ता है. कभी संबंधित मंत्री बुला लेते हैं तो कभी मुख्य सचिव. मुख्यमंत्री औफिस से भी दिन में 2-4 बार किसी न किसी फाइल के बारे में पूछताछ की जाती है. वैसे भी उन दिनों राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था, इसलिए भूजल विभाग के सवालों के जवाब के लिए उन का विधानसभा में उपस्थित रहना जरूरी था.

इन्हीं व्यस्तताओं के बीच जे.सी. मोहंती के मोबाइल पर पचासों मैसेज ऐसे आए, जिन्हें वह खोल कर देख या पढ नहीं सके. 3 अप्रैल, को वह सचिवालय के अपने औफिस में बैठे थे. जिस समय वह थोड़ा फुरसत में थे, तभी उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. उन्होंने वह मैसेज पढ़ा तो हैरान रह गए. मैसेज के अनुसार उन के बैंक खाते से 30 हजार रुपए निकाले गए थे.

जबकि बैंक से या एटीएम से उन्होंने कोई पैसे नहीं निकाले थे, इसलिए वह परेशान हो उठे. वह तुरंत शासन सचिवालय में ही स्थित स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर की शाखा पर पहुंचे और बैंक मैनेजर को पूरी बात बताई. बैंक मैनेजर ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत जे.सी. मोहंती के बैंक खाते की डिटेल निकलवाई, जिसे देख कर श्री मोहंती को झटका सा लगा. उन के बैंक खाते से 22 मार्च से 3 अप्रैल के बीच अलगअलग समय में 2 लाख 73 हजार रुपए निकाले गए थे.

उन के मोबाइल पर बैंक की ओर से इस निकासी के मैसेज भी भेजे गए थे, पर व्यस्तता की वजह से वह उन मैसेजों को देख नहीं सके थे. खाते से करीब पौने 3 लाख रुपए निकलने की डिटेल देख कर जे.सी. मोहंती को करीब 15 दिनों पहले मोबाइल पर आए उस फोन की याद आ गई, जिस में खुद को बैंक अधिकारी बता कर किसी आदमी ने उन से एटीएम कार्ड का नंबर, सीवीसी नंबर और ओटीपी नंबर मांगा था. जे.सी. मोहंती को समझते देर नहीं लगी कि वह साइबर ठगों द्वारा ठगी का शिकार हो गए हैं. उन के साथ औनलाइन ठगी की गई है. उन्हें दुख इस बात का था कि सितंबर, 2016 में एक बार और उन के साथ साइबर ठगी हो चुकी थी. उस समय उन के क्रेडिट कार्ड से विदेश में 86 हजार रुपए की शौपिंग की गई थी. जयपुर के थाना अशोकनगर में इस की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. लेकिन ठगों का पता नहीं चल सका था.

इस औनलाइन ठगी से जे.सी. मोहंती परेशान हो उठे थे. उन्होंने बैंक मैनेजर से पैसों की निकासी रोकने को कहा ही नहीं, बल्कि बैंक की जरूरी कागजी खानापूर्ति भी की, ताकि औनलाइन ठगी करने वाले भविष्य में उन के खाते से पैसे न निकाल सकें. इस के बाद अपने औफिस पहुंच कर उन्होंने पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को फोन कर के अपने साथ हुई साइबर ठगी की जानकारी दी. जे.सी. मोहंती के साथ हुई ठगी की बात सुन कर संजय अग्रवाल हैरान रह गए. हैरानी की बात यह थी कि राजस्थान पुलिस और विभिन्न बैंकों की ओर से अकसर समाचार पत्रों, इलैक्ट्रौनिक और डिजिटल मीडिया द्वारा रोजाना लोगों को औनलाइन ठगी के बारे में जागरूक करने के लिए बताया जा रहा है कि किसी भी व्यक्ति को फोन पर अपने एटीएम कार्ड या बैंक खाते की डिटेल कतई न दें.

पुलिस और बैंकों की इतनी कवायद के बावजूद भी आम आदमी रोजाना इन ठगों का शिकार हो रहे हैं, लेकिन अगर कोई सीनियर आईएएस अफसर इस तरह की ठगी का शिकार हो जाए तो ताज्जुब होगा ही. संजय अग्रवाल ने जे.सी. मोहंती को रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह देते हुए साइबर ठगों को जल्दी ही पकड़ने का आश्वासन दिया. मूलरूप से ओडि़सा के रहने वाले राजस्थान कैडर के सन 1985 बैच के आईएएस अधिकारी जे.सी. मोहंती ने उसी दिन जयपुर में शासन सचिवालय के पास स्थित थाना अशोकनगर में अपने साथ हुई इस ठगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. औनलाइन ठगी का यह मात्र एक उदाहरण है. ऐसी ठगी राजस्थान सहित देश के लगभग हर राज्य में रोजाना सौ-पचास लोगों के साथ हो रही है. राजस्थान में सन 2016 में साइबर क्राइम के 907 मुकदमे दर्ज हुए थे, जिन में 530 मुकदमे सिर्फ जयपुर शहर में दर्ज हुए थे.

मुकदमों के दर्ज होने के बाद जांच में सामने आया कि साइबर ठग खुद को बैंक मैनेजर बता कर लोगों के मोबाइल पर फोन कर के कहते हैं कि ‘आप का एटीएम कार्ड बंद हो रहा है या आप के एटीएम कार्ड की क्रय करने की सीमा बढ़ाई जा रही है अथवा आप के एटीएम कार्ड को आधार कार्ड से लिंक किया जा रहा है.’ किसी भी व्यक्ति से ये ठग मोबाइल फोन पर कहते हैं कि ‘आप का एटीएम कार्ड पुराना हो गया है. उस के बदले नया कार्ड जारी किया जा रहा है, इसलिए आप को एटीएम कार्ड का नया पासवर्ड दिया जा रहा है. आप ने पिछली बार एटीएम से कब रकम निकाली थी? क्या आप ने नए केवाईसी या आधार कार्ड को लिंक नहीं किया है?’

बैंक वालों की तरह तकनीकी बातें कह कर ये ठग मोबाइल फोन पर ही लोगों से एटीएम कार्ड का नंबर, सीवीसी नंबर और ओटीपी नंबर पूछ लेते हैं. इस के बाद ये साइबर ठग स्मार्ट फोन या कंप्यूटर के माध्यम से मनी ट्रांसफर सौफ्टवेयर द्वारा उस व्यक्ति के खाते की रकम निकाल लेते हैं. राजस्थान में इस तरह की लगातार हो रही ठगी की वारदातों का पता करने के लिए जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन तथा पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की तकनीकी शाखा एवं संगठित अपराध शाखा के अधिकारियों की एक टीम बनाई.

इस टीम ने जांच शुरू की तो पता चला कि इस तरह की वारदातें करने वाले महाराष्ट्र के पुणे जिले के तलेगांव इलाके में रह रहे हैं. टीम ने उन अपराधियों को चिन्हित कर उन की निगरानी शुरू की तो पता चला कि ये ठग कौल सैंटर की तर्ज पर बैंक अधिकारी बन कर रोजाना सैकड़ों लोगों को फोन करते हैं और उन से एटीएम कार्ड का नंबर आदि पूछ कर औनलाइन ठगी करते हैं. कई दिनों की निगरानी के बाद क्राइम ब्रांच ने महाराष्ट्र के पुणे के एसपी (ग्रामीण) सुवेज हक तथा क्राइम ब्रांच के अधिकारियों की मदद से 27 मार्च को 5 लोगों को महाराष्ट्र के तलेगांव दाभाड़े से गिरफ्तार किया. इन में झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड निवासी 3 सगे भाई यूसुफ, मुख्तार एवं अख्तर शामिल थे. यूनुस के इन तीनों बेटों में यूसुफ सब से बड़ा और अख्तर सब से छोटा था.

इन के अलावा महाराष्ट्र के पुणे के तलेगांव दाभाड़े निवासी संजय सिंधे और शैलेश को भी गिरफ्तार किया गया था. इन के पास से पुलिस ने 10 छोटे और 4 बड़े मोबाइल फोन, 15 सिम, 7 एटीएम कार्ड और 9 लाख 86 हजार  500 रुपए बरामद किए थे. इन लोगों ने पिछले साल जयपुर के रहने वाले गोपाल बैरवा को फोन कर के उन से 29 हजार 600 रुपए ठगे थे. इस का मुकदमा जयपुर पूर्व के थाना बस्सी में दर्ज था. गिरफ्तार अभियुक्तों को पुलिस जयपुर ले आई. इन से की गई पूछताछ में पता चला कि झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड के रहने वाले तीनों ठग भाइयों ने अपने गांव के ही दूसरे लोगों से बैंक अधिकारी बन कर औनलाइन ठगी करना सीखा और फर्जी आईडी से दर्जनों सिम हासिल कर के आसान तरीके से मोटा पैसा कमाने लगे.

ये लोग ठगी के लिए फर्जी आईडी से लिए गए सिम और दर्जनों मोबाइल का उपयोग करते थे, ताकि पुलिस इन तक पहुंच न सके. इन लोगों ने फर्जी मोबाइल सिमों पर ई-वौलेट भी रजिस्टर्ड करा रखे थे, जिन में शिकार हुए आदमी के बैंक खाते से औनलाइन पैसे ट्रांसफर करते थे. इस के बाद ये औनलाइन शौपिंग करते या ई-वौलेट के माध्यम से उस पैसे को अपने बैंक खाते में भेज देते. ये ठगी गई रकम से ई-वौलेट के जरिए मोबाइल भी रिचार्ज करते थे. इस के लिए ये मोबाइल की दुकान चलाने वालों से मिलीभगत कर उन्हें 30 से 40 प्रतिशत तक कमीशन का लालच देते थे. इस तरह मोबाइल रिचार्ज कर दुकानदारों से मिलने वाली रकम को ये लोग अपने घर वालों के बैंक खाते में जमा कराते थे.

देश भर में हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए झारखंड सहित विभिन्न राज्यों की पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा इलाके में रहने वाले साइबर ठगों पर शिकंजा कसा तो करमाटांड के रहने वाले तीनों ठग भाई अपने साथियों संजय सिंधे और शैलेश की मदद से इसी साल फरवरी से पुणे के तलेगांव इलाके में किराए के एक मकान में रहने लगे. उसी मकान से ये पांचों ठगी की वारदात करते थे.

पूछताछ में पता चला कि इन पांचों अभियुक्तों ने पिछले एक साल में राजस्थान सहित देश के 23 राज्यों में 85 हजार से अधिक फोन किए थे. लेकिन ये मुख्य रूप से राजस्थान के लोगों को अपना निशाना बनाते थे. इस का पता इस से चलता है कि 85 हजार फोन में से लगभग 50 हजार फोन राजस्थान के सभी 33 जिलों में किए गए थे. राजस्थान का ऐसा कोई जिला नहीं बचा था, जहां इन लोगों ने ठगी न की हो. अकेले जयपुर शहर में ही इन लोगों ने करीब 5 हजार फोन किए थे. पुलिस ने इन से जो करीब 10 लाख रुपए बरामद किए थे, ये रुपए एक महीने का कलेक्शन बताया गया था.

तीनों ठग भाइयों ने धोखाधड़ी से करोड़ों रुपए कमाए हैं. ठगी की रकम को इन्होंने करीब 25 बैंक खातों और 50 से अधिक ई-वौलेट में जमा कराई थी. इन के 10 बैंक खातों की डिटेल खंगाली जा रही है. इन में 4 खाते प्राइवेट बैंकों और 6 सरकारी बैंकों में हैं. इन में 4 बैंक खाते केरल में हैं. इन सभी खातों में 58 लाख 18 हजार रुपए जमा हुए थे, लेकिन इन में एक जनवरी, 2017 से 23 मार्च तक 8 लाख 49 हजार रुपए ही बचे थे. जयपुर पुलिस ने इस से पहले औनलाइन ठगी के एक अन्य मामले में 23 मार्च को एक अभियुक्त दिनेश मंडल को मुंबई से वहां की पुलिस की मदद से गिरफ्तार किया था. मूलरूप से झारखंड के जामताड़ा का रहने वाला दिनेश मंडल मुंबई में वर्ली स्थित जनता कालोनी के कोलीकम में रह कर औनलाइन ठगी कर रहा था.

उस ने पिछले साल जयपुर के विनोद कुमार पाल को फोन कर के खुद को बैंक अधिकारी बता कर एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 7 हजार रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस का मुकदमा जयपुर पश्चिम के थाना सदर में दर्ज हुआ था. पुलिस ने दिनेश मंडल से 4 मोबाइल फोन और 7 सिम बरामद किए थे. उस से की गई पूछताछ में पता चला कि उस ने ठगी के लिए मोबाइल फोन से लगभग 29 सौ लोगों को फोन किए थे. जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने लगातार हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए काफी समय पहले अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन एवं पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की विशेष टीम गठित कर इस टीम को ऐसे अपराधियों का पता लगाने का जिम्मा सौंपा था.

इस टीम ने ठगी के एकएक मामले का अध्ययन कर अपराधियों की कार्यप्रणाली समझी. उस के बाद तकनीकी माध्यम से उन मोबाइल नंबरों का पता लगाया, जिन से लोगों को ठगी का शिकार बनाया गया था. व्यापक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने झारखंड से 3 ठगों को गिरफ्तार किया था. इस से पहले इसी साल 24 फरवरी को सब से पहले सत्यम राय को पकड़ा गया. वह झारखंड के देवघर के खाजुरिया बसस्टैंड के पास स्थित विकासनगर का रहने वाला था. फिलहाल वह पश्चिम बंगाल के कोलकाता के टालीगंज में के.एम. लक्षकार रोड पर रह रहा था. उस ने पिछले साल जयपुर के राजेंद्र गहलोत को अपना शिकार बनाया था.

20 साल के सत्यम राय ने फोन पर खुद को बैंक अधिकारी बता कर राजेंद्र गहलोत से एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 43 हजार 391 रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस ठगी का मुकदमा जयपुर दक्षिण के थाना ज्योतिनगर में दर्ज है. पूछताछ में सत्यम राय ने बताया था कि राजेंद्र गहलोत से ठगी कर के उस ने 21 हजार 891 रुपए का सैमसंग गैलेक्सी ए 5 एड्रौयड मोबाइल फोन औनलाइन खरीदा था. बाकी रकम उस ने अलगअलग गेटवे के माध्यम से बैंक खाते तथा वौलेटों में डाली थी. मोबाइल फोन आ गया तो उसे ओएलएक्स पर आईफोन एस-5 से एक्सचैंज कर लिया था.

कोलकाता से बीबीए की पढ़ाई करने के बाद सत्यम राय ने हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी और बंगला सहित अन्य भाषाएं सीखीं, ताकि पूरे देश में विभिन्न बोलीभाषाओं में बात कर लोगों को झांसे में ले सके. पूछताछ में उस ने बताया था कि वह ठगी के जरिए मिली रकम के एक हिस्से से औनलाइन शौपिंग करता था, जिसे वह बेच कर पैसे खड़े कर लेता था. पुलिस ने सत्यम राय से सैमसंग गैलेक्सी ए-7, आईफोन एस-5 और सैमसंग गैलेक्सी ए-5 फोन बरामद किए थे. उस से पूछताछ और उस के मोबाइल फोन की जांच से पता चला कि उस ने देश के अनेक राज्यों में ठगी के लिए कुल 2860 लोगों को फोन किए थे.

जयपुर के सूरज प्रजापति से 55 हजार रुपए की इसी तरह की गई ठगी में पुलिस ने सागरदास और उस के साले विक्कीदास को 26 फरवरी, 2017 को गिरफ्तार किया था. ये दोनों ठग झारखंड में जामताड़ा जिले के अंबेडकर चौक पंडेडीह के रहने वाले थे. पुलिस ने इन से 5 मोबाइल फोन बरामद किए थे. इन मोबाइल फोनों में फर्जी आईडी पर जारी किए गए सिम मिले थे. जीजासाले ने अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 779 लोगों को फोन किए थे. जयपुर निवासी राजेश कुमार वर्मा से बैंक अधिकारी बन कर 21 हजार 566 रुपए की  औनलाइन ठगी करने के मामले में जयपुर पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड थाना के धरवाड़ी गांव के रहने वाले जयकांत मंडल को मार्च, 2017 के पहले सप्ताह में गिरफ्तार किया था.

पुलिस ने उस से 3 मोबाइल फोन, 4 सिम और 4 एटीएम कार्ड बरामद किए थे. वह झारखंड के धनबाद के देवली गोविंदपुर में रह कर आईटीआई कर रहा था. उस ने कई भाषाएं सीख रखी थीं. जांच में पता चला कि जयकांत ने ठगी के लिए विभिन्न मोबाइल नंबरों से अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 9068 लोगों को फोन किए थे. जांच में पता चला है कि झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड सहित कुछ इलाके साइबर अपराधियों के गढ़ हैं. कहा जाता है कि करमाटांड के झिलुआ गांव के रहने वाले सीताराम मंडल ने सन 2008-09 में बैंक अधिकारी बन कर लोगों से औनलाइन ठगी के साइबर अपराध को जन्म दिया था. इस का जाल अब पूरे जामताड़ा जिले में फैल चुका है. आजकल वहां 150 से अधिक गिरोह काम कर रहे हैं, जिन में 20 से 30 साल के युवा शामिल हैं.

इन में कुछ गिरोह ऐसे भी हैं, जिन्होंने वेतन और कमीशन के आधार पर दूसरे युवकों को नौकरी दे रखी है. कुछ पुराने ठग नई पीढ़ी के युवाओं को औनलाइन ठगी की ट्रेनिंग देते हैं और इस के बदले में मोटा मेहनताना वसूलते हैं. इन गिरोहों ने बैंक अधिकारी बन कर पूरे देश में अब तक कई अरब रुपए की ठगी की है. मजे की बात यह है कि इन में ज्यादातर ठग ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं हैं. लेकिन देश के अलगअलग राज्यों की भाषाएं सीख कर ये लोगों को ठग रहे हैं. देश में ऐसा कोई वर्ग नहीं है, जो इन की ठगी का शिकार न हुआ हो.

केंद्रीय मंत्री से ले कर, विभिन्न राज्यों के मंत्रियों, आईएएस एवं आईपीएस अधिकारियों, जज, डाक्टर, प्रोफेसर, आयकर अधिकारी, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटैंट, बिजनेसमैन सभी इन की ठगी का शिकार हो चुके हैं, जबकि इन लोगों को कहा जाता है कि ये अपनी बुद्धि और वाकचातुर्य के बल पर देश को चला रहे हैं. आम आदमी को तो ये ठग कुछ ही मिनट में बातों में उलझा कर उस का एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर आदि हासिल कर लेते हैं. इन ठगों ने केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री, बांका के जिला जज, एयरपोर्ट अथौरिटी के एजीएम सहित तमाम बडे़बडे़ अधिकारियों को ठगा है.

साइबर ठगी में लगे तमाम लड़के उच्च शिक्षा भी हासिल कर सूचना प्रौद्योगिकी में दक्ष हो रहे हैं, ताकि लोगों को उन के हिसाब से हैंडल किया जा सके. जामताड़ा में साइबर क्राइम की शुरुआत एसएमएस से मोबाइल फोन का बैलेंस उड़ा कर दूसरों को सस्ती दरों पर मोबाइल फोन का बैलेंस बेचने से हुई थी. इस के बाद 8-9 सालों में यह जिला पूरे देश में चर्चित हो चुका है. जामताड़ा इलाके से जब मोबाइल फोन से बहुत ज्यादा फोन किए जाने लगे तो मोबाइल कंपनियों को मोटी कमाई होने लगी. नेटवर्क की समस्या दूर करने के लिए मोबाइल कंपनियों ने वहां नए टौवर लगवा दिए, जिस से वहां नेटवर्क अच्छा हो गया. इस से ठगों का काम और ज्यादा आसान हो गया.

ठगी की रकम से ठग ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं. उन के पास आलीशान मकान और लग्जरी गाडि़यां हैं. सड़कें खराब होने से गाडि़यां चलाने में परेशानी हुई तो इन ठगों ने सड़कें भी खुद ही बनवा लीं. अब ये अपराधी खुद को भारतीय रिजर्व बैंक का अधिकारी बता कर ठगी करने लगे हैं. एटीएम रिन्यू करने, उस की वैलिडिटी बढ़ाने एवं आधार कार्ड से जोड़ने के बहाने तो कई सालों से चल रहे हैं. जामताड़ा इलाके में रोजाना किसी न किसी राज्य की पुलिस साइबर ठगों की तलाश में पहुंचती रहती है. इसलिए अब यहां के ठग थोड़ेथोड़े समय के लिए दूसरे राज्यों में जा कर अपना  ठगी का धंधा करते हैं.

जामताड़ा से पिछले 2 सालों में 268 साइबर अपराधी गिरफ्तार किए गए हैं. इन से 16 सौ से ज्यादा मोबाइल फोन, 176 लग्जरी कारें और करोड़ों रुपए बरामद किए गए हैं.  जयपुर पुलिस की ओर से देवघर से गिरफ्तार मिथलेश ने पुलिस को बताया कि वह अपना एसबीआई का बैंक एकाउंट साइबर ठगों को किराए पर देता था. इस के बदले वह खाते में जमा होने वाली रकम से 20 प्रतिशत हिस्सा लेता था.

भले ही अपराधी पकड़े जा रहे हैं, लेकिन साइबर ठगी बंद होने का नाम नहीं ले रही है. पढ़लिख कर आदमी बुद्धिमान हो जाता है, लेकिन जामताड़ा के अनपढ़ या मामूली शिक्षित अपराधी उन लोगों की आंखों से भी काजल चुरा लेते हैं, जो खुद को सब से ज्यादा समझदार समझते हैं.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

गर्लफ्रेंड को जीबी रोड बेचने आए प्रेमी ने की एसएचओ से डील

दिल्ली के थाना कमला मार्केट के थानाप्रभारी सुनील कुमार ढाका के सरकारी मोबाइल फोन पर  लगातार ऐसी काल्स आ रही थीं, जिस में फोन करने वाला अपने बारे में कुछ न बता कर उन से ही पूछता था कि आप कौन हैं और कहां से बोल रहे हैं? जब वह उसे अपने बारे में बताते तो फोन करने वाला तुरंत काल डिसकनेक्ट कर देता.

शुरुआत में तो वह यही समझ रहे थे कि शायद किसी से गलत नंबर लग जा रहा है. पर जब रोजाना ही अलगअलग नंबरों से ऐसी काल्स आने लगीं तो उन्हें शक हुआ. क्योंकि फोनकर्ता पुलिस का नाम सुनते ही फोन काट देता था. वह यह जानना चाहते थे कि आखिर फोन करने वाला कौन है और वह चाहता क्या है. क्योंकि एक ही फोन पर लगातार रौंग काल आने की बात गले नहीं उतर रही थी.

इस के बाद उन के पास एक अनजान नंबर से काल आई तो उन्होंने फोन करने वाले से झूठ बोलते हुए कहा, ‘‘मैं अशोक बोल रहा हूं, आप कौन हैं और किस से बात करनी है?’’

‘‘जी, मैं ने जीबी रोड फोन मिलाया था.’’ उस ने कहा.

जीबी रोड दिल्ली का बदनाम रेडलाइट एरिया है. लेकिन अब इस का नाम बदल कर श्रद्धानंद मार्ग हो गया है. यहां पर मशीनरी पार्ट्स का बड़ा मार्केट है और उन्हीं दुकानों के ऊपर तमाम कोठे हैं, जहां सैकड़ों की संख्या में वेश्याएं धंधा करती हैं. रोड का नाम कागजों में भले ही बदल गया है, लेकिन लोगों की जबान पर आज भी जीबी रोड ही रटा हुआ है.

जैसे ही उस आदमी ने जीबी रोड का नाम लिया, थानाप्रभारी उस के फोन करने का आशय समझ गए. वह बात को आगे बढ़ाते हुए बोले, ‘‘आप ने सही जगह नंबर मिलाया है. मैं वहीं से बोल रहा हूं. बताइए, किसलिए फोन किया है?’’

‘‘मैं वहां पूरी रात एंजौय करना चाहता हूं, कितना खर्च आएगा.’’ उस ने पूछा.

इस बात पर थानाप्रभारी को गुस्सा तो बहुत आया कि वह पुलिसिया भाषा में उसे सही खुराक दे दें, लेकिन उन्होंने गुस्सा जाहिर करना उचित नहीं समझा. उन्होंने बड़े प्यार से कहा, ‘‘आप यहां आ जाइए. जिस लड़की को पसंद करेंगे, उसी के हिसाब से पैसे बता दिए जाएंगे. आप जब यहां आएंगे तो मैं यकीन दिलाता हूं कि खुश हो कर ही जाएंगे. आप यहां मार्केट में आने के बाद मेरे इसी नंबर पर फोन कर देना, मैं किसी को भेज दूंगा.’’

इतना कह कर थानाप्रभारी ने उस से पूछा, ‘‘वैसे एक बात यह बताओ कि मेरा यह नंबर आप को कहां से मिला?’’

‘‘यह नंबर एक सैक्स साइट पर था. मैं जीबी रोड की एक वीडियो देख रहा था. उसी में यह फोन नंबर था. वहीं से ले कर मैं आप को फोन कर रहा हूं.’’ उस आदमी ने कहा.

सैक्स साइट पर पुलिस का फोन नंबर होने की बात पर थानाप्रभारी चौंके. जब नंबर वहां है तो ऐसे ही लोगों के फोन आएंगे. चूंकि उन की फोन पर बातचीत जारी थी, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘मैं तो यह सोच रहा था कि यह नंबर हमारे किसी कस्टमर ने आप को दिया होगा.’’

‘‘नहीं, कस्टमर ने नहीं दिया, सैक्स साइट से ही लिया है.’’ उस ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, आप जब आएं तो मुझे बता देना. अच्छी व्यवस्था करा दूंगा.’’ उन्होंने कहा और काल डिसकनेक्ट कर दिया.

इस तरह के फोन काल्स से थानाप्रभारी परेशान थे. इस से बचने के 2 ही रास्ते थे. पहला यह कि वह अधिकारियों से बात कर इस नंबर के बदले कोई दूसरा नंबर ले लें और दूसरा यह कि जिस सैक्स साइट पर उन का यह नंबर डाला गया है, वहां से यह नंबर हटवा दें.

इंटरनेट पर सैक्स से संबंधित तमाम साइटें हैं. यह फोन नंबर पता नहीं किस साइट पर है. फिर भी थानाप्रभारी ने गूगल पर कई साइट्स खोजीं, लेकिन उन्हें अपना नंबर नहीं मिला. जिस फोन नंबर से उन के पास फोन आया था, उन्होंने उसी नंबर को रिडायल किया. पर वह नंबर स्विच्ड औफ पाया गया. उन्होंने सोचा कि अब की बार इस तरह का किसी का फोन आएगा तो उस से साइट का नाम भी पूछ लेंगे.

19 नवंबर, 2017 को भी थानाप्रभारी अपने औफिस में बैठे थे, तभी सुबह करीब पौने 9 बजे उन के मोबाइल पर किसी ने फोन कर के पूछा, ‘‘क्या आप जीबी रोड से बोल रहे हैं?’’

यह सुन कर थानाप्रभारी झुंझलाए लेकिन खुद पर काबू पाते हुए उन्होंने फोन करने वाले से कहा, ‘‘हां, मैं वहीं से बोल रहा हूं. कहिए, कैसे याद किया?’’

‘‘दरअसल, बात यह है कि मेरे पास एक न्यू ब्रैंड टैक्सी है. मैं उसे बेचना चाहता हूं.’’ उस आदमी ने धीरे से कहा.

चूंकि जीबी रोड थाना कमला मार्केट इलाके में ही है. यहां पर टैक्सी धंधा करने वाली महिला को कहते हैं, इसलिए वह समझ गए कि यह किसी लड़की का सौदा करना चाहता है. जो लड़की या महिला यहां लाई जाती है, वह यहीं की हो कर रह जाती है.  उस आदमी की बात से लग रहा था कि वह इस क्षेत्र का पुराना खिलाड़ी है, क्योंकि वह कोड वर्ड का प्रयोग कर रहा था. उस लड़की की जिंदगी बचा कर थानाप्रभारी उस गैंग तक पहुंचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘यह बताओ कि टैक्सी किस हालत में है?’’

‘‘एकदम न्यू ब्रैंड है. बस यह समझ लो कि वह अभी सड़क पर भी नहीं उतरी है.’’ उस ने कहा, ‘‘वह केवल 15 साल की है.’’

15 साल की है तो उसे जरूर प्रेमजाल में फांस कर या नौकरी के बहाने लाया गया होगा. उस की नीयत को भांप कर थानाप्रभारी ने उस से बातचीत जारी रखी, ‘‘ठीक है, हम उसे खरीद लेंगे.’’

‘‘कितने रुपए देंगे उस टैक्सी के?’’ वह बोला.

‘‘देखो भाई, हम बिना देखे उस के दाम कैसे बता सकते हैं. अच्छा, यह बताओ कि वह है कैसी? आप हमें उस के फोटो वगैरह दिखाइए, उस के बाद ही बताया जाएगा.’’

‘‘वह एकदम स्लिम है और लंबाई करीब 5 फुट है.’’ उस ने बताया, ‘‘मैं उस के फोटो भी दिखा दूंगा. कोई लफड़ा तो नहीं होगा.’’

‘‘लफड़ा किस बात का. देखो, तुम्हें बेचना है और हमें खरीदना तो इस में लफड़े की कोई बात ही नहीं है.’’

‘‘आप को एक बात ध्यान रखना है कि किसी भी तरह वह लड़की अपने घर वालों को फोन न कर पाए. अगर उस ने फोन कर दिया तो हम दोनों ही फंसेंगे.’’ उस ने आशंका जताते हुए कहा.

‘‘यहां आने के बाद किसी का भी घर लौटना मुमकिन नहीं होता. और तो और बाद में जब तुम भी यहां आओगे तो वह तुम्हें भी यहां नहीं दिखेगी.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘तुम से मिलने मैं आ जाऊंगा, तभी बात करते हैं.’’

‘‘ठीक है आ जाना, पर तुम यहां कोठे पर मत आना, क्योंकि इस तरह के सौदे बाहर ही होते हैं. दूसरी जगह कहां मिलना है, इस बारे में हम फोन कर के तय कर लेंगे.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

इस पूरी बातचीत में थानाप्रभारी सुनील ढाका ने यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह पुलिस अधिकारी हैं. वह कोठों के दलालों की स्टाइल में ही बात करते रहे.

इस के बाद भी उस दिन 3-4 बार उसी आदमी ने फोन कर इस संबंध में बात की. इस बातचीत में उस ने तय कर लिया कि कल वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आएगा और वहां बैठ कर आपस में बात की जाएगी.

‘‘ठीक है, तुम वहां आ जाना. मैं 2 लड़कों गुलाब और सुंदर को भेज दूंगा. लड़की का फोटो वगैरह देख कर वे डील फाइनल कर लेंगे. इस के बाद तुम लड़की ले आना और वहीं हम तुम्हें पैसे दे देंगे.’’ थानाप्रभारी ने कहा. इसी के साथ उन्होंने गुलाब का फोन नंबर भी उसे दे दिया.

थानाप्रभारी ने इस मामले की जानकारी एसीपी अमित कौशिक और डीसीपी मंजीत सिंह रंधावा को दे दी. मामला एक लड़की की जिंदगी उजड़ने से बचाना था, इसलिए डीसीपी ने कहा कि वह बातचीत में ऐहतियात बरतें. लड़की बेचने वालों को किसी तरह का शक नहीं होना चाहिए, वरना गड़बड़ हो सकती है.

डीसीपी के निर्देश के बाद सुनील कुमार ढाका ने उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से उन के पास लड़की का सौदा करने वाले का फोन आया था. उस फोन की लोकेशन गुड़गांव की आ रही थी.

20 नवंबर को थानाप्रभारी उस आदमी से फोन द्वारा संपर्क में रहे. उस ने बताया कि वह दिल्ली के लिए मैट्रो से चल पड़ा है. शाम 4, साढ़े 4 बजे तक वह नई दिल्ली पहुंच जाएगा.

‘‘ठीक है, तुम नई दिल्ली मैट्रो स्टेशन पहुंचो, मेरे दोनों लड़के गुलाब और सुंदर वहां पहुंच जाएंगे. तुम उन से बात कर लेना.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उसे अपने कांस्टेबल गुलाब का फोन नंबर दे दिया था, इसलिए वह गुलाब के संपर्क में आ गया. उस ने बताया कि वे 2 लोग आ रहे हैं और शाम साढ़े 4 बजे मैट्रो के गेट नंबर-4 के बाहर मिलेंगे. कांस्टेबल सुंदर और गुलाब मैट्रो के गेट नंबर 4 के बाहर खड़े हो गए.

मैट्रो ट्रेन से उतरने के बाद उस आदमी ने गुलाब से बात की तो गुलाब ने बताया कि वह मैट्रो के गेट नंबर 4 पर खड़ा है. कुछ देर बाद वहां 2 युवक पहुंचे. उन्होंने अपने नाम अमर और रंजीत बताए. अमर गुलाब से बातें करने लगा और रंजीत वहां से कुछ दूर जा कर खड़ा हो गया. अमर ने अपने मोबाइल फोन में उस लड़की की फोटो गुलाब को दिखाई, जिस का सौदा करना था. 15 साल की वह लड़की वास्तव में खूबसूरत थी. अमर ने उस लड़की के साढ़े 3 लाख रुपए मांगे.

‘‘साढ़े 3 लाख तो बहुत ज्यादा है. मैं कल ही बंगाल से 70-70 हजार में 2 लड़कियां लाया हूं. भाई, जो मुनासिब है ले लो.’’ गुलाब ने कहा.

‘‘देखिए, मेरे पास इस के अलावा 5 लड़कियां और हैं. अगर सही पैसों में तुम से डील हो जाती है तो सारी की सारी तुम्हें ही दे दूंगा.’’ अमर ने कहा.

‘‘हमारे पास भी आल इंडिया से लड़कियां आती हैं. हमारे आदमी हर स्टेट में हैं. वे हम से जुड़ कर मोटी कमाई कर रहे हैं. तुम भी ऐसा कर सकते हो.’’

दोनों ही तरफ से लड़की का मोलभाव होने लगा. अंत में बात 2 लाख 30 हजार रुपए में तय हो गई. अमर ने कहा कि वह लड़की को यहीं ले आएगा और किसी बहाने से उसे छोड़ कर चला जाएगा.

गुलाब और सुंदर अमर और रंजीत से इस तरह बातचीत कर रहे थे, जैसे वे सचमुच में पक्के धंधेबाज हों. गुलाब ने उन के साथ सेल्फी ली और एक दुकान पर बैठ कर चायनाश्ता भी किया. कुछ ही देर की बातचीत में वे सब एकदूसरे से घुलमिल गए. अमर ने बताया कि वह कल 11-12 बजे के बीच लड़की को यहां ले आएगा. लौटते समय गुलाब ने अमर को एक हजार रुपए थमा दिए.

‘‘ये पैसे किस बात के?’’ अमर ने पूछा.

‘‘इन्हें ऐसे ही रख लो. इतनी दूर से आए हो, किराएभाड़े के लिए हैं. घबराओ मत, इन्हें मैं सौदे की रकम से नहीं काटूंगा. वह पैसे तो लड़की के मिलते ही तुम्हें हाथोंहाथ दे दूंगा.’’ गुलाब ने कहा.

इस के बाद अमर और रंजीत मैट्रो से ही वापस चले गए.  कांस्टेबल गुलाब ने विश्वास बनाए रखने के लिए उन से यह भी नहीं पूछा कि वे कहां से आए हैं. अगले दिन दोपहर डेढ़ बजे अमर ने फोन कर के गुलाब से कहा, ‘‘आप लोग गुड़गांव बसअड्डे पर आ जाइए. यहीं पर लड़की भी दिखा दूंगा और पैसे ले कर सौंप भी दूंगा.’’

थानाप्रभारी ने कांस्टेबल गुलाब से पहले ही कह दिया था कि डील करते समय वह किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं करेंगे. उन से खरीदार की तरह ही बातचीत करें. इसी बात को ध्यान में रखते हुए गुलाब ने उस दिन गुड़गांव आने से मना कर दिया.

उन्होंने कहा कि हम आज गुड़गांव नहीं आ सकते, क्योंकि आज उन्हें अपने एक रिश्तेदार के यहां शादी में जाना है. अगर ज्यादा जल्दी हो तो वे लड़की को ले कर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आ जाएं.

कुछ देर सोच कर अमर ने कहा, ‘‘ठीक है, आप लोग कल ही गुड़गांव आ जाइए.’’

‘‘हां, यही ठीक रहेगा.’’ गुलाब ने उस की बात का समर्थन करते हुए कहा.

अमर सुनील कुमार ढाका और गुलाब से फोन पर दिन में कईकई बार बातें कर रहा था, लेकिन अगले दिन यानी 21 नवंबर को उन के पास अमर का कोई फोन नहीं आया. इस से थानाप्रभारी को आशंका हुई कि कहीं उसे उन के पुलिस होने की भनक तो नहीं लग गई.

यदि ऐसा हुआ तो गड़बड़ हो जाएगी. अगर उस ने किसी तरह लड़की कोठे पर पहुंचा दिया तो वहां लड़की को तलाश पाना मुश्किल हो जाएगा.

वह गुलाब से इसी मुद्दे पर बात कर रहे थे कि तभी 11 बजे के करीब अमर का फोन आ गया. उस ने कहा, ‘‘आप लोग गुड़गांव आ जाइए. मैं बसअड्डे के पास आप का इंतजार करूंगा. यहीं पर आप लड़की को देख लेना.’’

थानाप्रभारी ने एएसआई विजय, कांस्टेबल गुलाब और सुंदर को निर्देश दे कर गुड़गांव भेज दिया. तीनों गुड़गांव पहुंच गए. रास्ते भर गुलाब अमर से फोन पर बातचीत करते रहे.

जब वह वहां पहुंचे तो अमर और उस का साथी बसअड्डे के पास ही खड़े मिले. चूंकि वे गुलाब और सुंदर को ही जानते थे, इसलिए एएसआई विजय बसअड्डे के पास एक दुकान पर खड़े हो गए. गुलाब ने अमर से लड़की के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि वह अभी उसे ले कर नहीं आया है. उस ने मोबाइल फोन में लड़की के कुछ अन्य फोटो उन्हें दिखाए.

इस बार उस के मोबाइल में लड़की के अलगअलग तरह के फोटो थे. उस ने कहा कि वह लड़की को यहीं ले आता है, वे यहीं पैसे दे कर लड़की को ले जाएं.

‘‘लेकिन अभी हम पैसे नहीं लाए हैं. ऐसी बात थी तो पहले बता देते, हम पैसे ले कर आते. अब बताइए, क्या करें.’’ गुलाब ने कहा.

‘‘करना क्या है, हम चाह रहे थे कि यह मामला आज ही निपट जाए.’’ अमर ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, आज नहीं तो कल निपट जाएगा. लेकिन हम चाहते हैं कि लड़की को ले कर तुम दिल्ली आ जाओ. पैसे वहीं मिल जाएंगे.’’

अगले दिन 22 नवंबर, 2017 को अमर अपने दोस्त और उस लड़की को ले कर मैट्रो से दिल्ली के लिए निकल पड़ा. दिल्ली के लिए निकलने से पहले उस ने गुलाब को फोन कर के बता दिया.

कांस्टेबल गुलाब ने यह बात थानाप्रभारी को बता दी. थानाप्रभारी ने एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई दिनेश कुंडू, एएसआई सर्वेश, विजय, कांस्टेबल गुलाब, सुंदर, महिला कांस्टेबल मधु को शामिल किया. गवाही के लिए वह किसी स्थानीय आदमी को साथ रखना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने मोहम्मद हफीज उर्फ बबलू प्रधान से बात की और उसे अपनी टीम के साथ नई दिल्ली मैट्रो स्टेशन पर ले गए.

चूंकि अमर ने मैट्रो के गेट नंबर 4 के पास मिलने को कहा था, इसलिए उस गेट के आसपास सभी पुलिसकर्मी तैनात हो गए.

दिल्ली पहुंच कर अमर ने गुलाब को फोन किया तो गुलाब अपने साथी सुंदर के साथ वहां पहुंच गए. वह अमर को पहचानते थे, इसलिए मैट्रो के गेट नंबर 4 के पास उन्होंने अमर को खड़े देखा तो वह उस से बड़ी गर्मजोशी से मिले.

उन्होंने उसे 20 हजार रुपए दे कर बाकी के पैसे लड़की सौंपते समय देने को कहा. वहां अमर अकेला था. उस ने लड़की को अपने साथी रंजीत के साथ वहां से थोड़ी दूरी पर खड़ी कर दिया था.

अमर जल्द ही अपनी बकाया की रकम ले कर लड़की को उन के हवाले कर वहां से खिसक जाना चाहता था, इसलिए वह गुलाब को उस जगह ले गया, जहां रंजीत के साथ लड़की खड़ी थी. लड़की को देख कर गुलाब ने अपने सिर को खुजाया. यह उन का इशारा था. इस के बाद थानाप्रभारी सहित उन की टीम के सदस्य वहां पहुंच गए. उन्होंने अमर और उस के साथी को हिरासत में ले लिया.

गुलाब और सुंदर को जीबी रोड कोठे का दलाल समझने वाले अमर और रंजीत को जब पता चला कि वे दलाल नहीं, बल्कि पुलिस वाले हैं तो उन के होश उड़ गए. जिस मनीषा नाम की लड़की को वे बेचने लाए थे, उसे महिला कांस्टेबल मधु ने अपनी हिफाजत में ले लिया.

थाने ले जा कर जब अमर और रंजीत से पूछताछ की गई तो पता चला कि वे दोनों बिहार के रहने वाले थे और वह लड़की भी बिहार की थी.

लड़की को अपने प्यार के जाल में फांस कर उसे रेडलाइट एरिया में बेचने की कोशिश करने की उन्होंने जो कहानी बताई, वह बहुत ही हैरान कर देने वाली थी—

24 साल का अमर मूलरूप से बिहार के सुपौल जिले के इरारी गांव के रहने वाले लक्ष्मण का बेटा था. इसी गांव के रहने वाले रंजीत शाह से उस की अच्छी दोस्ती थी. अमर दिल्ली और गुड़गांव में पहले नौकरी कर चुका था.

मई, 2017 की बात है. अमर बिहार के मोतिहारी जिले में अपने एक जानकार के यहां आयोजित भोज में गया था. वहीं पर मनीषा से उस की मुलाकात हुई. 15 साल की मनीषा खूबसूरत के साथ हंसमुख भी थी. वह भी परिवार के साथ उसी भोज में आई थी. पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे से काफी प्रभावित हुए. उसी दौरान उन्होंने अपने फोन नंबर एकदूसरे को दे दिए.

भोज से घर लौटने के बाद अमर के दिलोदिमाग में मनीषा ही घूमती रही. अगले दिन मन नहीं लगा तो उस ने मनीषा को फोन लगा दिया. दोनों में औपचारिक बातें हुईं. इस के बाद उन के बीच बातों का सिलसिला शुरू हो गया. धीरेधीरे बातों का दायरा बढ़ता गया और वह प्यार के बंधन में बंधते गए. दोनों ही एकदूसरे को इतना चाहने लगे कि उन्होंने शादी करने का फैसला ले लिया.

इस के बाद योजना बना कर दोनों 15 अक्तूबर, 2017 को अपनेअपने घरों से भाग निकले. 15 साल की मनीषा अपना घर छोड़ कर मोतिहारी रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई, जहां अमर अपने दोस्त रंजीत के साथ उस का इंतजार कर रहा था.  मोतिहारी से तीनों दिल्ली आ गए. दिल्ली से मैट्रो द्वारा गुड़गांव पहुंच गए. चूंकि गुड़गांव से अमर और रंजीत अच्छी तरह वाकिफ थे, इसलिए गुड़गांव सेक्टर-10 के शक्तिनगर में रह रहे अपने जानकार की मदद से एक कमरा किराए पर ले लिया.

चूंकि अमर ने मनीषा से शादी करने का वादा किया था, इसलिए अपने ही कमरे में 2 दोस्तों के सामने उस ने मनीषा से शादी कर ली. अग्नि के फेरे लगा कर पर मनीषा की मांग में सिंदूर भर दिया. इस के बाद दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

शादी के बाद अमर ने मनीषा को बताया कि वह शादीशुदा तो है ही, उस का एक बच्चा भी है. इस पर मनीषा ने हैरानी से कहा, ‘‘तुम ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?’’

‘‘तुम ने कभी पूछा ही नहीं, इसलिए मैं ने नहीं बताया. लेकिन तुम परेशान मत होओ, भले ही मैं शादीशुदा हूं, तुम्हारा पूरा खयाल रखूंगा. पहली पत्नी से मेरा एक बच्चा है. एक बच्चा मैं तुम से चाहता हूं. मैं वादा करता हूं कि तुम्हें हर तरह से खुश रखने की कोशिश करूंगा.’’ अमर ने कहा.

मनीषा बिना सोचेसमझे ऐसा कदम उठा चुकी थी जो उस के लिए नुकसानदायक साबित हुआ था. वह अमर से शादी कर चुकी थी. इसलिए घर वापस जाना उस ने जरूरी नहीं समझा. लिहाजा उस ने तय कर लिया कि अब चाहे जो भी हो, वह अमर के साथ ही रहेगी. आगे जो होगा, देखा जाएगा. वह अमर के साथ हंसीखुशी से रहने लगी.

15-20 दिनों बाद अमर का मनीषा से मन भर गया. अब मनीषा उसे गले की हड्डी लगने लगी. वह उस से छुटकारा पाना चाह रहा था. इस बारे में उस ने दोस्त रंजीत से बात की. उसे अकेली छोड़ कर वह जा नहीं सकता, क्योंकि बाद में मनीषा द्वारा पुलिस से शिकायत करने पर उस के फंसने की आशंका थी. अगर वह उस की हत्या कर देता तो भी उस के जेल जाने की आशंका थी.

ऐसे में रंजीत ने उसे कोठे पर बेचने की सलाह दी. कोठे पर जाने के बाद कोई भी लड़की बाहर नहीं आ सकती और इस में उन्हें अच्छीखासी रकम भी मिल जाती. दोस्त का यह आइडिया अमर को पसंद आ गया. उन्होंने जीबी रोड के कोठों का नाम सुना था. वे उसे दिल्ली के जीबी रोड के किसी कोठे पर बेचना चाहते थे.

वे ऐसे किसी दलाल को नहीं जानते थे, जो उन का यह काम करा देता. वे सीधे कोठे पर यह सोच कर नहीं जा रहे थे कि सौदा न पटने पर कहीं कोठे वाली पुलिस से पकड़वा न दे. लिहाजा वे मनीषा को कोठे पर बेचने का कोई और तरीका खोजने लगे.

आजकल ज्यादातर लोगों के पास स्मार्टफोन है, जिन पर इंटरनेट का खूब प्रयोग होता है. इस स्मार्टफोन ने लोगों को स्मार्ट बना दिया है. उन्हें कोई भी जानकारी चाहिए, झट गूगल पर सर्च करने बैठ जाते हैं. रंजीत के दिमाग में जाने क्या आया कि वह गूगल पर सैक्स से संबंधित साइट्स खोजने लगा. इस के बाद उस ने यूट्यूब पर जीबी रोड रेडलाइट एरिया से संबंधित वीडियो देखीं.

एक वीडियो में जीबी रोड के कोठों के अंदर के दृश्य भी दिखाए गए थे. वीडियो देखते देखते रंजीत की नजर दीवार पर लिखे एक फोन नंबर 8750870424 पर गई, जहां लिखा था कि कोई भी समस्या या शिकायत इस नंबर पर करें.

यह फोन नंबर दिल्ली के कमला मार्केट थाने के थानाप्रभारी का था. यह फोन नंबर मध्य जिला के डीसीपी ने इस आशय से जीबी रोड के कोठों पर लिखवाया था कि किसी जरूरतमंद लड़की से जबरदस्ती धंधा कराए जाने पर वह इस नंबर पर शिकायत कर सके.

रंजीत को यह जानकारी नहीं थी कि यह नंबर पुलिस का है. उस ने सोचा कि यह कोठे के संचालक का होगा. दोनों दोस्तों ने तय कर लिया कि इस फोन नंबर पर बात कर के वे मनीषा को बेचने की कोशिश करेंगे.

रंजीत ने अमर को यह बात पहले बता दी थी कि मनीषा का सौदा जितने रुपयों का होगा, उस में से एक लाख रुपए वह लेगा. इन रुपयों को खर्च करने का प्लान भी उस ने बना लिया था. रंजीत ने तय कर लिया था कि वह कोई पुरानी कार खरीद कर अपने घर ले जाएगा. इस के बाद अमर ने उसी नंबर पर फोन किया.

जैसे ही अमर ने पूछा कि आप जीबी रोड से बोल रहे हैं तो थानाप्रभारी सुनील कुमार ढाका ने हां कह दिया. क्योंकि इस से पहले भी उन के पास ऐसी कई काल आ चुकी थीं. उन्होंने अमर से ऐसे बात की, जैसे वह किसी कोठे के संचालक हों.

उन की इसी समझदारी पर मनीषा कोठे पर बिकने से बच गई. उन्होंने अमर और रंजीत के खिलाफ भादंवि की धारा 120बी, 363, 366ए, 376, 370 और पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. उन्हें गिरफ्तार कर 23 नवंबर, 2017 को न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी कपिल कुमार के समक्ष पेश कर एक दिन का रिमांड लिया.

रिमांड अवधि में पूछताछ करने के बाद उन्हें फिर से 24 नवंबर को कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने मनीषा को चाइल्ड वेलफेयर सोसायटी भेज दिया.

थानाप्रभारी के इस कार्य की पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक, डीसीपी मंदीप सिंह रंधावा ने भी सराहना की है. उन्होंने इसे एक सच्ची समाजसेवा बताया. मनीषा बिहार के मोतिहारी जिले के लौकी थानाक्षेत्र की थी. लिहाजा थानाप्रभारी सुनील कुमार ढाका ने इंटरनेट से मोतिहारी के एसएसपी औफिस का नंबर हासिल किया. फिर उन्होंने एसएसपी औफिस से थाना लौकी का फोन नंबर लिया.

वहां के थानाप्रभारी रामचंद्र चौपाल को उन्होंने मनीषा के बरामद होने की सूचना दी तो उन्होंने बताया कि मनीषा एक गरीब परिवार की है. घर वालों ने उस के भाग जाने की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई थी.

बहरहाल, थानाप्रभारी रामचंद्र चौपाल ने मनीषा के घर वालों को मनीषा के दिल्ली से बरामद होने की जानकारी दे दी. कथा संकलन तक मनीषा के घर वाले दिल्ली नहीं पहुंच सके थे. मामले की जांच थानाप्रभारी सुनील कुमार ढाका कर रहे हैं.

जीबी रोड के कोठे में लिखे इस फोन पर भले ही किसी शोषिता ने पुलिस से शिकायत न की हो, पर इस नंबर ने एक लड़की को शोषित होने से जरूर बचा लिया. देश भर के सभी रेडलाइट एरिया में यदि स्थानीय पुलिस के नंबर इसी तरह प्रसारित किए जाएं तो और भी तमाम लड़कियां देह व्यापार के धंधे में जाने से बच सकती हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. मनीषा परिवर्तित नाम है.

एक धूर्त का बैंड बाजा बारात

25 मई, 2019 की बात है. राजस्थान के जिला सीकर के एसपी डा. अमनदीप सिंह कपूर से मिलने के लिए एक अधेड़ उम्र का आदमी उन के औफिस पहुंचा. उस आदमी ने अपना नाम सुशील कुमार शर्मा निवासी सीकर शहर बताया. सुशील ने करीब आधे घंटे तक एसपी को अपनी दास्तान सुनाई.

सुशील की बातें सुन कर एसपी डा. कपूर हैरान रह गए. उन्होंने कहा कि मेरी पुलिस की अब तक की नौकरी में पहली बार इस तरह का अनोखा मामला सामने आया है. आप पुलिस थाने जा कर रिपोर्ट दर्ज करवा दीजिए. हम उस धोखेबाज और उस के साथियों का पता लगा कर कानून के मुताबिक सजा दिलवाएंगे.

सुशील को आश्वासन देने के बाद एसपी डा. कपूर ने उसी समय कोतवाली प्रभारी को फोन कर कहा कि आप के पास सुशील कुमार जी आएंगे. उन की रिपोर्ट दर्ज कर किसी होशियार अधिकारी से पूरे मामले की जांच कराइए और इस मामले में जो भी प्रोग्रेस हो, मुझे बताते रहिए.

एसपी की बातें सुन कर सुशील कुमार को कुछ उम्मीद जगी. एसपी साहब से मिलने के बाद वह सीधे थाने पहुंच गए. वहां मौजूद थानाप्रभारी श्रीचंद सिंह को उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा कि उन्हें एसपी साहब ने भेजा है.

थानाप्रभारी ने सुशील को सम्मान से बिठाया, फिर पूछा कि आप लिखी हुई रिपोर्ट लाए हैं या यहां बैठ कर लिखेंगे. सुशील ने बताया कि वह पहले ही रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए तहरीर लिख कर लाए हैं. इसी के साथ सुशील ने अपने बैग से 2-3 कागज निकाल कर थानाप्रभारी को दे दिए.

थानाप्रभारी श्रीचंद सिंह ने तसल्ली से उन कागजों को पढ़ा. फिर अपने मातहत अधिकारी को बुला कर उन्हें कागज सौंपते हुए एफआईआर दर्ज करने को कहा. जब तक कंप्यूटर पर रिपोर्ट दर्ज करने की काररवाई चलती रही, तब तक थानाप्रभारी ने फौरी तौर पर सुशील से केस संबंधी कई बातें पूछ लीं, ताकि मुलजिमों को जल्द पकड़ा जा सके.

रिपोर्ट दर्ज करने की काररवाई में तकरीबन एक घंटे का समय लग गया. एफआईआर की एक कौपी सुशील शर्मा को दे कर थानाप्रभारी ने भरोसा दिया कि अपराधियों को जल्द से जल्द पकड़ने का प्रयास किया जाएगा.

सुशील कुमार की ओर से पुलिस थाने में दर्ज कराई गई रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह था कि इमरान नाम के युवक ने फरजी तरीके से ब्राह्मण बन कर कबीर शर्मा के नाम से उन की बेटी सुमन से धोखे से शादी रचा ली थी. शादी के लिए इमरान ने फरजी परिवार और फरजी ही बाराती तैयार किए थे. ये सभी लोग कबीर की शादी में माथे पर तिलक छाप लगा कर ब्राह्मण के रूप में शामिल हुए थे.

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रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू की. सुशील शर्मा और उन के परिवार के बयान और प्रारंभिक जांच में सामने आया कि कुछ साल पहले इमरान भाटी ने कबीर शर्मा के नाम से फरजी फेसबुक आईडी बनाई थी. फेसबुक पर उस ने सीकर की रहने वाली युवती सुमन शर्मा से दोस्ती की. उस समय सुमन सीकर जिले के एक निजी कालेज में पढ़ती थी.

फेसबुक पर दोस्ती हुई तो दोनों में चैटिंग करने लगे. बाद में मोबाइल पर भी बातें होने लगीं. सुमन को कबीर की बातों से यह अहसास नहीं हुआ कि वह किसी दूसरी जातिधर्म का है. सुमन उस की बातों और उस के व्यक्तित्व से प्रभावित थी. कबीर ने इस का फायदा उठाया और सुमन को अपने प्रेमजाल में फंसा लिया. सुमन उस से प्यार करने लगी.

कबीर इस खेल में माहिर था. वह सुमन को नित नए सपने दिखाने लगा. सुमन उन सतरंगी सपनों की कल्पना में खो कर मन ही मन कबीर से विवाह करने की सोचने लगी. लेकिन वह संस्कारी युवती थी. उसे अपने मातापिता की इज्जत प्यारी थी. वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी, जिस से उस के परिवार की प्रतिष्ठा पर जरा सी भी आंच आए. इस बीच वह एक निजी कालेज में जौब करने लगी थी.

सुमन कालेज स्तर तक पढ़लिख चुकी थी. उस की उम्र भी शादी लायक हो गई थी. कालेज में जौब करने से वह आत्मनिर्भर भी हो गई थी. मांबाप अब उस के हाथ पीले करने की सोच रहे थे. इस के लिए उन्होंने अपने नाते रिश्तेदारों से भी सुमन के लिए अच्छा वर तलाशने को कह दिया था. घर में जब सुमन की शादी के लिए लड़का देखने की बातें होने लगीं तो नवंबर 2018 में एक दिन उस ने अपने मातापिता को कबीर के बारे में बताया. सुमन ने मोबाइल पर कबीर की फोटो दिखा कर उस से शादी करने की इच्छा जताई.

पिता को सुमन की यह बात जरा भी बुरी नहीं लगी. उन्होंने सुमन से कहा कि अगर कबीर शर्मा उस की नजर में अच्छा और सज्जन लड़का है तो उन्हें उस से शादी करने में कोई ऐतराज नहीं है. लेकिन पहले कबीर से मिल कर उस के मातापिता, परिवार और खानदान वगैरह के बारे में पता लगाएंगे.

सुमन ने भी इस पर सहमति जता कर कहा कि मैं कबीर से आप की बात करा दूंगी. सुमन ने कबीर को फोन कर अपने पिता की इच्छा के बारे में बता दिया. इस के 1-2 दिन बाद ही कबीर ने सुशील शर्मा को फोन कर खुद का परिचय दिया.

सुशील के पूछने पर कबीर ने खुद को जयपुर निवासी गौड़ ब्राह्मण बताया. कबीर ने विदेश में खुद का बिजनैस होने का हवाला दे कर कहा कि वह जनवरी में जयपुर आएगा.

इस के बाद कबीर की सुशील शर्मा से 1-2 बार और बात हुई. सुमन से तो उस की प्राय: बात रोज ही बात होती थी. सुमन को भी उम्मीद थी कि परिवार की सहमति से उस की शादी उस के सपनों के राजकुमार कबीर से हो जाएगी.

इसी साल जनवरी में एक दिन जयपुर में लड़का लड़की देखने का कार्यक्रम तय हो गया. तय कार्यक्रम के मुताबिक सीकर से सुमन, उस के पिता और परिवार के अन्य लोग जयपुर के निवारू रोड पर स्थित साउथ कालोनी के एक फ्लैट पर पहुंच गए.

फ्लैट पर कबीर ने सुशील शर्मा और उन के परिवार के लोगों को अपने चाचा रामकुमार शर्मा, चाची संतोष और भतीजे मनन से मिलवाया. उस समय फ्लैट पर कई अन्य लोग भी मौजूद थे. कबीर ने उन्हें भी अपना रिश्तेदार बताया.

कबीर ने सुमन के पिता को बताया कि उस के पिता रामेश्वर शर्मा जयपुर में ही पीतल फैक्ट्री के पास शास्त्रीनगर में रहते हैं. पिता ने दूसरी शादी की है. सौतेली मां के कारण पिता उस के पास नहीं आते.

उसे यह फ्लैट चाचा रामकुमार ने दिलवाया है. कबीर के पिता के दूसरी शादी करने और अलग रहने पर सुशील शर्मा को कुछ शंका हुई कि रामेश्वरजी शादी में शरीक होंगे या नहीं. यह शंका जताने पर कबीर ने सुशील शर्मा को आश्वस्त किया कि वह उन्हें मना लेगा.

बातचीत में सुशील शर्मा को बेटी सुमन के लिए कबीर उपयुक्त लड़का लगा. ब्राह्मण कुल के कबीर के चाचाचाची और अन्य रिश्तेदारों से मिल कर वह उन के घर परिवार के बारे में संतुष्ट हो गए.

फिर भी सुशील शर्मा ने कबीर की जन्मकुंडली का मिलान कराने की बात कही. कबीर ने पहले से तैयार अपनी जन्मकुंडली सुमन के पिता को सौंप दी. दूसरी तरफ, कबीर के रिश्तेदार भी सुमन को अपने घर की बहू बनाने को तैयार हो गए.

सुशील शर्मा ने सीकर आ कर कबीर की जन्मकुंडली पंडित को दिखाई तो उस में कोई दोष नजर नहीं आया. जन्मपत्री के मुताबिक कबीर मांगलिक था और सुमन भी मांगलिक थी. मांगलिक युवती की शादी मांगलिक युवक से ही हो सकती है, यह बात इमरान उर्फ कबीर को पता थी.

सुमन को प्रेमजाल में फांसने के बाद जब इमरान को सुमन के मांगलिक होने का पता चला तो उस ने फरजी नाम, जातिधर्म व पते वाली मांगलिक दोष की जन्मपत्री बनवा कर रख ली थी. यही जन्मपत्री कबीर ने सुमन के पिता को दी थी.

जन्मपत्री का मिलान होने पर सुशील शर्मा ने कबीर से शादी की बात आगे बढ़ाई. इस पर कबीर ने कहा कि हमारे सारे रिश्तेदार जयपुर में रहते हैं. वे सब सीकर नहीं आ सकते, आप को जयपुर आ कर शादी करनी होगी. जयपुर में शादी की सारी व्यवस्था हम लोग कर देंगे. आप केवल पैसों और जेवरों का इंतजाम कर लेना. सुशील शर्मा चाहते तो यही थे कि बेटी की शादी सीकर से ही धूमधाम से हो लेकिन वरपक्ष की इच्छा को देखते हुए वह जयपुर में शादी करने को तैयार हो गए.

बातचीत के बाद तय हुआ कि 12 फरवरी को जयपुर में सगाई करेंगे और इस के अगले ही दिन विवाह का सही मुहूर्त है, इसलिए 13 फरवरी की शादी तय हो गई.

कुछ दिन बाद कबीर ने सुशील शर्मा को जयपुर बुला कर शादी के लिए लोहामंडी में मातेश्वरी रिसोर्ट दिखाया. सुशील शर्मा को व्यवस्था ठीकठाक लगी तो उन्होंने 12 और 13 फरवरी के लिए रिसोर्ट बुक करवा दिया. शादी के लिए बैंड, कैटरिंग, सजावट, घोड़ी, पंडित, वीडियो फोटोग्राफर और अन्य सारी व्यवस्थाएं करने की जिम्मेदारी कबीर ने ले ली थी.

शादी में कबीर की ओर से छपवाए गए शादी के कार्ड में उस के पिता का नाम रामेश्वर शर्मा और दादा का नाम भागीरथ शर्मा लिखा था. कार्ड में जयपुर के पीतल फैक्ट्री शास्त्रीनगर निवारू रोड का पता और 2 मोबाइल नंबर भी लिखे हुए थे.

12 फरवरी, 2019 को जयपुर के मातेश्वरी रिसोर्ट में पारंपरिक रीतिरिवाज से कबीर और सुमन की सगाई  हो गई. रिंग सेरेमनी में सुमन और कबीर ने एकदूसरे को अंगूठी पहनाई. सगाई के दस्तूर में कबीर के वे सारे रिश्तेदार शामिल हुए, जो जनवरी में फ्लैट में मिले थे. वधू पक्ष से भी सीकर से कई लोग वहां पहुंचे थे.

इस के दूसरे ही दिन 13 फरवरी, 2019 को इसी रिसोर्ट में धूमधाम से कबीर और सुमन की शादी हो गई. वधूपक्ष के लोगों ने वरपक्ष के रिश्तेदारों के बारे में पूछा तो किसी को कबीर का चाचा, किसी को जीजा और किसी को भतीजा बताया गया. स्टेज पर वरवधू को आशीर्वाद देने का कार्यक्रम हुआ. बाद में हिंदू रीतिरिवाज से अग्नि के समक्ष फेरे लिए गए.

धूमधाम से शादी होने पर सुमन के पिता सुशील शर्मा ने रात को ही सारी व्यवस्थाओं के बिल ले कर कबीर को 11 लाख रुपए नकद दिए. रिसोर्ट के किराए के डेढ़ लाख रुपए और खाने के करीब पौने 2 लाख रुपए अलग से दिए.

इस के अलावा उन्होंने बेटी को शादी में करीब 5 लाख रुपए की ज्वैलरी कपड़े वगैरह दिए. एकलौती बेटी होने के कारण सुशील शर्मा ने दिल खोल कर दानदहेज दिया था. वैवाहिक रस्में पूरी होने के बाद तड़के सुशील शर्मा ने बेटी सुमन को ससुराल के लिए विदा कर दिया. सुमन की ससुराल निवारू रोड पर साउथ कालोनी के उसी फ्लैट में बताई गई थी, जहां पहली बार लड़का लड़की देखने की रस्म हुई थी.

शादी के कुछ दिनों बाद सुमन अपने पीहर सीकर आ गई. दामाद कबीर शर्मा कुछ दिन बाद सीकर आया तो उस की खूब आवभगत की गई. इस दौरान कबीर ने सुशील शर्मा से कारोबार के लिए 5 लाख रुपए की आवश्यकता बताई. सुशील ने कुछ दिन पहले ही बेटी की शादी की थी, इसलिए वह पैसों की व्यवस्था नहीं कर सके.

1-2 दिन ससुराल में खातिरदारी कराने के बाद जमाई राजा कबीर जयपुर जाने की बात कह कर सुमन के साथ चला गया. बाद में कबीर फोन कर सुमन के पिता पर पैसों का इंतजाम करने का दबाव डालने लगा. थक हार कर सुशील शर्मा ने अपने परिचित से ढाई लाख रुपए उधार लिए. यह रुपए ला कर उन्होंने घर में रख दिए और कबीर को बता दिया.

कबीर और सुमन 14 मई को सीकर आए और उसी रात करीब 3 बजे कबीर वे ढाई लाख रुपए और घर में रखे जेवर चुरा कर सुमन के साथ वहां से भाग गया.

अगले दिन सुबह जब सुशील शर्मा को दामाद और बेटी घर में नहीं मिले तो वह समझ नहीं पाए कि अचानक बिना बताए कहां चले गए. बाद में घर में पैसे और जेवर भी गायब मिले तो उन्हें शक हुआ. उन्होंने कबीर और सुमन के मोबाइल पर काल किया, लेकिन उन के फोन स्विच्ड औफ मिले.

सुशील को बड़ा ताज्जुब हुआ. वह समझ नहीं पा रहे थे कि माजरा क्या है. 1-2 दिन इंतजार करने के बाद भी दामाद और बेटी से बात नहीं हुई तो सुशील शर्मा ने शादी में मोबाइल द्वारा खींची गई फोटो अपने परिचितों और कुछ जानकारों को दिखाईं. फोटो देख कर उन्हें जो बातें पता चलीं, उसे सुन कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

लोगों ने बताया कि जिस युवक को आप कबीर शर्मा बता रहे हैं, उस का असली नाम इमरान भाटी है. वह सीकर के ही वार्ड 28 में अंजुमन स्कूल के पास अपने बीवीबच्चों के साथ रहता है, परिवार में पत्नी के अलावा 3 बच्चे हैं.

कबीर शर्मा के इमरान भाटी होने और फरजी जातिधर्म, नकली परिवार और बाराती बना कर फरजीवाड़े से शादी रचाने की बात पता चलने के बाद सुशील शर्मा ने 25 मई, 2019 को सीकर के एसपी डा. अमनदीप सिंह कपूर से मुलाकात की. इस के बाद ही उन की रिपोर्ट दर्ज हुई.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद एडिशनल एसपी डा. देवेंद्र शर्मा के नेतृत्व में पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी. पुलिस ने सीकर शहर में इमरान भाटी के घर पहुंच कर उस के घर वालों से पूछताछ की. पता चला कि इमरान की पत्नी और तीनों बच्चे मुंबई गए हुए हैं. इमरान के मोबाइल की काल डिटेल्स भी निकलवाई गई. साथ ही उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया गया.

जांचपड़ताल में पता चला कि इमरान सीकर में जयपुर रोड स्थित एक कार शोरूम में मार्केटिंग की नौकरी करता था. बाद में पैसों की हेराफेरी करने पर उसे नौकरी से निकाल दिया गया था. कार शोरूम में नौकरी करते हुए भी उस ने एक युवती का एमएमएस बना लिया था. फिर उसे धमकी दे कर मोटी रकम ऐंठी थी. बदनामी के डर से युवती ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई थी.

इमरान की शादी सन 2005 में सीकर के रोशनगंज मोहल्ले में रहने वाली सईदा से हुई थी. सईदा पढ़ीलिखी है. उस के 3 बच्चे हैं. बड़ा बेटा 13 साल, उस से छोटा 11 साल का और सब से छोटी बेटी 7 साल की है. इमरान के पिता इकबाल भाटी ने पुलिस को बताया कि इस साल फरवरी में इमरान ने कहा था कि उस का ट्रांसफर जयपुर हो गया है, इसलिए अब वह जयपुर में ही रहेगा.

जयपुर जाते समय इमरान उन से 4 लाख रुपए ले कर गया था. इकबाल भाटी ने बताया कि उन के बेटे इमरान ने सीकर की सुमन शर्मा से जयपुर में दूसरी शादी कर ली, इस का पता उन्हें बाद में लगा था. इमरान की पत्नी सईदा और उस के पीहर व ननिहाल वालों को भी इस बात की जानकारी मिल गई थी.

पति द्वारा दूसरी शादी करने का पता चलने पर सईदा मुंबई में अपने पीहर वालों के पास चली गई. उस ने यह बात मायके वालों को बताई तो उन्हें भी उस की इस करतूत पर हैरत हुई.

सईदा ने बताया कि उस के लिए इमरान मर चुका है. उस ने मेरा और बच्चों का जीवन बरबाद कर दिया. जातिधर्म बदल कर फरजी तरीके से दूसरी शादी कर के उस ने अब हमें कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.

बेटे इमरान की करतूतें सामने आने पर पिता इकबाल भाटी ने भी उसे अपनी प्रौपर्टी से बेदखल कर दिया. जो मकान इमरान के नाम था, उसे बहू सईदा और उस के बच्चों के नाम गिफ्ट डीड करवा दिया. एक गैराज में से इमरान का हिस्सा बहू और उस के बच्चों के नाम कर दिया.

फरजीवाड़े से दूसरी शादी करने के बाद इमरान ने एक दिन सईदा को फोन कर कहा, ‘‘मैं 40 दिन की जमात पर जा रहा हूं. इस दौरान मैं धर्म के काम में व्यस्त रहूंगा, इसलिए मुझे फोन मत करना.’’ लेकिन जब बाद में सईदा को असलियत पता चली तो इमरान ने उसे फोन नहीं किया.

जांच में यह भी पता चला कि अय्याश किस्म का इमरान भाटी उर्फ कबीर शर्मा चेन स्मोकर और शराबी है. उस ने सीकर के अपने कई दोस्तों से भी लाखों रुपए उधार ले रखे थे. वह देर रात तक मोबाइल पर लड़कियों से चैटिंग करता था. रात को शराब पी कर घर आने पर पत्नी सईदा और मां से झगड़ा करता था.

जातिधर्म बदल कर फरजीवाड़े से शादी करने के मामले में पुलिस किसी भी आरोपी को नहीं पकड़ पाई थी, इस से लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा था. सर्वसमाज के लोग पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने के लिए लामबंद हो गए. 31 मई को सर्वसमाज के प्रमुख लोगों ने सीकर में बैठक कर कहा कि मामले में जल्द काररवाई नहीं की गई तो सड़क पर उतरना पड़ेगा.

जनाक्रोश को देखते हुए पुलिस ने जांचपड़ताल तेज कर दी. आरोपी इमरान उर्फ कबीर शर्मा की तलाश में 4 पुलिस टीमें जयपुर, पुणे, दिल्ली व मुंबई भेजी गईं. पुलिस ने कई लोगों से इमरान के संभावित ठिकाने के बारे में पूछताछ की, लेकिन उस का सुराग नहीं मिला.

वह बी चबीच में मोबाइल बंद रख कर अपने ठिकाने बदलता रहा, जिस से पुलिस को उस की लोकेशन नहीं मिल पा रही थी. सुमन का मोबाइल फोन भी बंद था. इमरान अपने परिवार, किसी दोस्त से फोन, इंटरनेट या सोशल साइट्स के जरिए भी संपर्क नहीं कर रहा था.

एडिशनल एसपी डा. देवेंद्र कुमार शर्मा और सीओ सिटी सौरभ तिवाड़ी के नेतृत्व में पुलिस टीमें लगातार भागदौड़ कर इमरान के बारे में सूचनाएं हासिल कर रही थीं, लेकिन उस का पता नहीं चल पा रहा था. पुलिस ने इमरान की शादी में ब्राह्मण के रूप में नकली बाराती बन कर पहुंचे लोगों को भी तलाश कर पूछताछ की गई.

इस बीच 2 जून को इस मामले में उस वक्त नया मोड़ आ गया, जब सुमन के 2 वीडियो यूट्यूब पर अपलोड किए गए, जो कुछ ही देर में वायरल हो गए. वीडियो में सुमन ने एक दल और अपने परिवार वालों से खुद और इमरान की जान को खतरा बताया था. सुमन ने यह भी कहा कि मैं इमरान को 6 साल से जानती हूं. यह भी जानती हूं कि वह शादीशुदा है और उस के 3 बच्चे हैं.

इन में एक वीडियो 8.21 मिनट का और दूसरा 7.40 मिनट का था. दोनों वीडियो में 17 कट थे. वीडियो देख कर महसूस हो रहा था कि जैसे सुमन कोई लिखी हुई स्क्रिप्ट पढ़ रही है. इस से यह माना गया कि सुमन पर दबाव बना कर यह वीडियो बनाया और जारी किया गया.

वीडियो में सुमन का कहना था कि वह 18 मार्च को एएसपी के सामने पेश हुई थी, वहां परिजनों ने उस से एक प्रार्थनापत्र दिलवाया था. लेकिन असल में एएसपी 18 मार्च को खाटू श्यामजी के मेले में ड्यूटी पर थे और अगले दिन 19 मार्च को वह अवकाश पर थे. इस से सुमन की कहानी में झूठ पकड़ में आ गया.

पुलिस ने वायरल हुए वीडियो के संबंध में भी जांच शुरू कर दी, लेकिन वीडियो से उन के ठिकाने के बारे में कोई अनुमान नहीं लग सका. वीडियो वायरल होने के बाद सर्वसमाज और भगवा रक्षा वाहिनी ने 3 जून, 2019 को मामले में जल्द गिरफ्तारी की मांग करते हुए तहसीलदार को मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन दिया. ज्ञापन में कहा गया कि आरोपियों ने युवती को डराधमका कर झूठा वीडियो वायरल करवाया है. लगातार भागदौड़ के बाद पुलिस को इमरान के मुंबई में होने का पता चला.

मुंबई में पहले से ही सीकर पुलिस की टीम इमरान और सुमन की फोटो ले कर होटलों व अन्य स्थानों पर उस की तलाश में जुटी हुई थी. पुलिस को पता चला कि 3 व 4 जून की रात इमरान अपनी बीवी के साथ मुंबई के पालघर इलाके में नियामतनगर के एक फ्लैट पर आएगा. पुलिस ने उस फ्लैट पर निगरानी रखी.

रात करीब 2 बजे इमरान जब सुमन के साथ उस फ्लैट पर पहुंचा तो पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया. यह फ्लैट इमरान के एक परिचित का था. पुलिस दल 4 जून की सुबह दोनों को ले कर सीकर के लिए रवाना हो गई.

पुलिस पूछताछ में इमरान ने बताया कि 15 मई, 2019 को सीकर से भागने के बाद वे दोनों दिल्ली चले गए. दिल्ली में काफी पैसे खर्च हो गए थे. बाद में सुमन को साथ ले कर इमरान अपने दोस्त के पास शरण लेने के लिए पुणे चला गया. लेकिन पुणे में वह दोस्त नहीं मिला. तब इमरान अपने सौतेले भाई की पत्नी के पास मुंबई के नियामत नगर आ गया.

सौतेले भाई की पत्नी इन दोनों के आने से परेशान हो गई. इस पर इमरान और सुमन सुबह जल्दी उस के फ्लैट से निकल जाते और आधी रात के बाद वापस आते थे. दिन में वे रेलवे स्टेशन पर छिप कर रहते और शाम को किराए का मकान तलाशते थे.

इस बीच इमरान को सुमन के पिता की ओर से पुलिस में मुकदमा दर्ज कराने का पता चल गया था. इमरान ने खुद को बचाने के लिए सुमन से 6 पेज में वे सारी बातें लिखवाईं जो उस के पक्ष में हो सकती थीं. इस के बाद उस ने सुमन को डराधमका कर दोनों वीडियो बनवाए.

इमरान ने कई बार वीडियो रुकवा कर उस से अपने मन मुआफिक बातें बुलवाईं. वीडियो बनवा कर इमरान ने ही यूट्यूब पर अपलोड कर दिए. फिर अपने दोस्तों को लिंक शेयर कर वीडियो वायरल करा दिए. दोनों वीडियो पुणे में बनाए गए थे.

सुमन ने पुलिस को बताया कि इमरान उसे डराधमका कर ले गया था. पुलिस को सुमन के बैग से 6 पेज की वह स्क्रिप्ट भी मिल गई जो इमरान ने वीडियो बनाने के लिए उस से लिखवाई थी. सुमन के पास जेवर व अन्य दस्तावेज भी मिल गए. बाद में सुमन को उस की इच्छा पर मां के साथ भेज दिया गया.

6 जून, 2019 को पुलिस ने इमरान को अदालत में पेश कर 4 दिन के रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान पूछताछ में उस ने बताया कि जयपुर में फरजी ब्राह्मण परिवार और रिश्तेदारों की व्यवस्था करने के लिए उस ने एक इवेंट कंपनी को ठेका दिया था. इवेंट कंपनी के मालिक रामकुमार शर्मा को ही उस ने अपना चाचा बना कर सुमन के परिजनों के सामने पेश किया था.

सगाई और शादी में भी रामकुमार ने ही कबीर के रिश्तेदारों के नाम पर किराए के लोगों की व्यवस्था की और उन्हें किराए के ही सूटबूट पहना दिए. इन में किसी को जीजा, किसी को मामा और फूफा बताया गया.

पूछताछ में इमरान से पता चला कि सुमन परिवार में एकलौती थी, इसलिए उस की नजर सुमन के मातापिता की संपत्ति पर थी. इमरान ने पहली बीवी सईदा से पीछा छुड़ाने के लिए फरवरी में जयपुर जाने से पहले खुद के नाम की संपत्ति सईदा और बच्चों के नाम कर दी थी. इमरान की करतूतों का ही परिणाम था कि ईद वाले दिन वह अपने शहर में पुलिस की गिरफ्त में था, लेकिन ईद पर उस से मिलने के लिए कोई नहीं आया.

पुलिस ने 7 जून, 2019 को सुमन शर्मा के बयान अदालत में मजिस्ट्रैट के समक्ष दर्ज कराए. बयान में उस ने अपहरण और शादी से पहले दुष्कर्म करने की बात कही. यह भी कहा कि हिंदू रीतिरिवाज से शादी करने के बाद इमरान उसे दिल्ली ले गया, वहां निजामुद्दीन में एक मसजिद में जबरन निकाह भी किया. इमरान ने उस पर जबरन धर्म बदल कर अपने साथ रहने का दबाव बनाया.

बयान में उस ने कहा कि 15 मई की रात इमरान ने साथ चलने को कहा तो उस ने मना कर दिया था. इस पर इमरान ने धमका कर कहा कि तूने मुझ से शादी की है, अपराध में तू भी बराबर की भागीदार है. मेरे साथ तू भी जेल जाएगी. इस के बाद डराधमका कर घर से जेवर और नकदी निकाल कर वे दोनों रात करीब 3 बजे चले गए थे.

सुमन ने बयान में कहा कि इमरान से उस का परिचय 6 साल पहले तब हुआ, जब वह सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ में पढ़ाई करती थी. इमरान ने जयपुर में एक होटल में ले जा कर उस के साथ दुष्कर्म किया था. बाद में भी उस ने यह काम कई बार किया था.

बयानों के आधार पर पुलिस ने सुमन का मैडिकल परीक्षण कराया. इस में दुष्कर्म की पुष्टि हुई. नतीजतन मुकदमे में दुष्कर्म की धाराएं भी जोड़ दी गईं. केस की जांच भी एसआई अमित कुमार से बदल कर थानाप्रभारी श्रीचंद सिंह को सौंप दी गई.

पुलिस ने 9 जून, 2019 को इमरान उर्फ कबीर शर्मा का पोटेंसी टेस्ट कराया. इस में वह पूरी तरह स्वस्थ और सक्षम पाया गया. पुलिस ने जयपुर में उस होटल पर पहुंच कर भी जांच-पड़ताल की, जहां इमरान ने युवती के साथ दुष्कर्म किया था. सुमन और इमरान के फोन नंबरों की काल डिटेल्स की भी जांच की गई.

रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने 10 जून, 2019 को इमरान उर्फ कबीर शर्मा को अदालत में पेश कर फिर से 2 दिन के रिमांड पर लिया. पुलिस ने इमरान से फरजी रिश्तेदारों और बारातियों के बारे में पूछताछ की. उसे शादी का वीडियो दिखा कर उन की पहचान कराई गई. कथा लिखे जाने तक पुलिस मामले की जांच कर रही थी.

—कथा में सुशील कुमार शर्मा और सुमन शर्मा परिवर्तित नाम हैं

अंजाम-ए-साजिश : एक निर्दोष लड़की की हत्या

 रेलवे लाइनों के किनारे पड़ी बोरी को लोग आश्चर्य से देख रहे थे. बोरी को देख कर सभी अंदाजा लगा रहे थे कि बोरी में शायद किसी की लाश होगी. मामला संदिग्ध था, इसलिए वहां मौजूद किसी शख्स ने फोन से यह सूचना दिल्ली पुलिस के कंट्रोलरूम को दे दी.

कुछ ही देर में पुलिस कंट्रोलरूम की गाड़ी मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने जब बोरी खोली तो उस में एक युवती की लाश निकली. लड़की की लाश देख कर लोग तरहतरह की चर्चाएं करने लगे.

जिस जगह लाश वाली बोरी पड़ी मिली, वह इलाका दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना सरिता विहार क्षेत्र में आता है. लिहाजा पुलिस कंट्रोलरूम से यह जानकारी सरिता विहार थाने को दे दी गई. सूचना मिलते ही एसएचओ अजब सिंह, इंसपेक्टर सुमन कुमार के साथ मौके पर पहुंच गए.

एसएचओ अजब सिंह ने लाश बोरी से बाहर निकलवाने से पहले क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को मौके पर बुला लिया और आला अधिकारियों को भी इस की जानकारी दे दी. कुछ ही देर में डीसीपी चिन्मय बिस्वाल और एसीपी ढाल सिंह भी वहां पहुंच गए. फोरैंसिक टीम का काम निपट जाने के बाद डीसीपी और एसीपी ने भी लाश का मुआयना किया.

मृतका की उम्र करीब 24-25 साल थी. वहां मौजूद लोगों में से कोई भी उस की शिनाख्त नहीं कर सका तो यही लगा कि लड़की इस क्षेत्र की नहीं है. पुलिस ने जब उस के कपड़ों की तलाशी ली तो उस के ट्राउजर की जेब से एक नोट मिला.

उस नोट पर लिखा था, ‘मेरे साथ अश्लील हरकत हुई और न्यूड वीडियो भी बनाया गया. यह काम आरुष और उस के 2 दोस्तों ने किया है.’

नोट पर एक मोबाइल नंबर भी लिखा था. पुलिस ने नोट जाब्जे में ले कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

पुलिस के सामने पहली समस्या लाश की शिनाख्त की थी. उधर बरामद किए गए नोट पर जो फोन नंबर लिखा था, पुलिस ने उस नंबर पर काल की तो वह उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले आरुष का निकला. नोट पर भी आरुष का नाम लिखा हुआ था.

सरिता विहार एसएचओ अजब सिंह ने आरुष को थाने बुलवा लिया. उन्होंने मृतका का फोटो दिखाते हुए उस से संबंधों के बारे में पूछा तो आरुष ने युवती को पहचानने से इनकार कर दिया. उस ने कहा कि वह उसे जानता तक नहीं है. किसी ने उसे फंसाने के लिए यह साजिश रची है.

आरुष के हावभाव से भी पुलिस को लग रहा था कि वह बेकसूर है. फिर भी अगली जांच तक उन्होंने उसे थाने में बिठाए रखा. उधर डीसीपी ने जिले के समस्त बीट औफिसरों को युवती की लाश के फोटो देते हुए शिनाख्त कराने की कोशिश करने के निर्देश दे दिए. डीसीपी चिन्मय बिस्वाल की यह कोशिश रंग लाई.

पता चला कि मरने वाली युवती दक्षिणपूर्वी जिले के अंबेडकर नगर थानाक्षेत्र के दक्षिणपुरी की रहने वाली सुरभि (परिवर्तित नाम) थी. उस के पिता सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं. पुलिस ने सुरभि के घर वालों से बात की. उन्होंने बताया कि नौकरी के लिए किसी का फोन आया था. उस के बाद वह इंटरव्यू के सिलसिले में घर से गई थी.

पुलिस ने सुरभि के घर वालों से उस की हैंडराइटिंग के सैंपल लिए और उस हैंडराइटिंग का मिलान नोट पर लिखी राइटिंग से किया तो दोनों समान पाई गईं. यानी दोनों राइटिंग सुरभि की ही पाई गईं.

पुलिस ने आरुष को थाने में बैठा रखा था. सुरभि के घर वालों से आरुष का सामना कराते हुए उस के बारे में पूछा तो घर वालों ने आरुष को पहचानने से इनकार कर दिया.

नौकरी के लिए फोन किस ने किया था, यह जानने के लिए एसएचओ अजब सिंह ने मृतका के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस से सुरभि के फोन पर कई बार काल की गई थीं और उस से बात भी हुई थी. जांच में वह फोन नंबर संगम विहार के रहने वाले दिनेश नाम के शख्स का निकला. पुलिस काल डिटेल्स के सहारे दिनेश तक पहुंच गई.

थाने में दिनेश से सुरभि की हत्या के संबंध में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कबूल कर लिया कि अपने दोस्तों के साथ मिल कर उस ने पहले सुरभि के साथ सामूहिक बलात्कार किया. इस के बाद उन लोगों ने उस की हत्या कर लाश ठिकाने लगा दी.

उस ने बताया कि वह सुरभि को नहीं जानता था. फिर भी उस ने उस की हत्या एक ऐसी साजिश के तहत की थी, जिस का खामियाजा जेल में बंद एक बदमाश को उठाना पड़े. उस ने सुरभि की हत्या की जो कहानी बताई, वह किसी फिल्मी कहानी की तरह थी—

दिल्ली के भलस्वा क्षेत्र में हुए एक मर्डर के आरोप में धनंजय को जेल जाना पड़ा. जेल में बंटी नाम के एक कैदी से धनंजय का झगड़ा हो गया था. बंटी उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र का रहने वाला था.

बंटी भी एक नामी बदमाश था. दूसरे कैदियों ने दोनों का बीचबचाव करा दिया. दोनों ही बदमाश जिद्दी स्वभाव के थे, लिहाजा किसी न किसी बात को ले कर वे आपस में झगड़ते रहते थे. इस तरह उन के बीच पक्की दुश्मनी हो गई.

उसी दौरान दिनेश झपटमारी के मामले में जेल गया. वहां उस की दोस्ती धीरेंद्र नाम के एक बदमाश से हुई. जेल में ही धीरेंद्र की दुश्मनी बुराड़ी के रहने वाले बंटी से हो गई. धीरेंद्र ने जेल में ही तय कर लिया कि वह बंटी को सबक सिखा कर रहेगा.

करीब 2 महीने पहले दिनेश और धीरेंद्र जमानत पर जेल से बाहर आ गए. जेल से छूटने के बाद दिनेश और धीरेंद्र एक कमरे में साथसाथ संगम विहार इलाके में रहने लगे.

उन्होंने बंटी के परिवार आदि के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी. उन्हें पता चला कि बंटी के पास 200 वर्गगज का एक प्लौट है. उस प्लौट की देखभाल बंटी का भाई आरुष करता है. कोशिश कर के उन्होंने आरुष का फोन नंबर भी हासिल कर लिया.

इस के बाद दिनेश और धीरेंद्र एक गहरी साजिश का तानाबाना बुनने लगे. उन्होंने सोचा कि बंटी के भाई आरुष को किसी गंभीर केस में फंसा कर जेल भिजवा दिया जाए. उस के जेल जाने के बाद उस के 200 वर्गगज के प्लौट पर कब्जा कर लेंगे. यह फूलप्रूफ प्लान बनाने के बाद वह उसे अंजाम देने की रूपरेखा बनाने लगे.

दिनेश और धीरेंद्र ने इस योजना में अपने दोस्त सौरभ भारद्वाज को भी शामिल कर लिया. पहले से तय योजना के अनुसार दिनेश ने अपनी गर्लफ्रैंड के माध्यम से उस की सहेली सुरभि को नौकरी के बहाने बुलवाया. सुरभि अंबेडकर नगर में रहती थी.

गर्लफ्रैंड ने सुरभि को नौकरी के लिए दिनेश के ही मोबाइल से फोन किया. सुरभि को नौकरी की जरूरत थी, इसलिए सहेली के कहने पर वह 25 फरवरी, 2019 को संगम विहार स्थित एक मकान पर पहुंच गई.

उसी मकान में दिनेश और धीरेंद्र रहते थे. नौकरी मिलने की उम्मीद में सुरभि खुश थी, लेकिन उसे क्या पता था कि उस की सहेली ने विश्वासघात करते हुए उसे बलि का बकरा बनाने के लिए बुलाया है.

सुरभि उस फ्लैट पर पहुंची तो वहां दिनेश, धीरेंद्र और सौरभ भारद्वाज मिले. उन्होंने सुरभि को बंधक बना लिया. इस के बाद उन तीनों युवकों ने सुरभि के साथ गैंपरेप किया. नौकरी की लालसा में आई सुरभि उन के आगे गिड़गिड़ाती रही, लेकिन उन दरिंदों को उस पर जरा भी दया नहीं आई.

चूंकि इन बदमाशों का मकसद जेल में बंद बंटी को सबक सिखाना और उस के भाई आरुष को फंसाना था, इसलिए उन्होंने सुरभि के मोबाइल से आरुष के मोबाइल नंबर पर कई बार फोन किया. लेकिन किन्हीं कारणों से आरुष ने उस की काल रिसीव नहीं की थी.

इस के बाद तीनों बदमाशों ने हथियार के बल पर सुरभि से एक नोट पर ऐसा मैसेज लिखवाया जिस से आरुष झूठे केस में फंस जाए. उस नोट पर इन लोगों ने आरुष का फोन नंबर भी लिखवा दिया था.

फिर वह नोट सुरभि के ट्राउजर की जेब में रख दिया. सुरभि उन के अगले इरादों से अनभिज्ञ थी. वह बारबार खुद को छोड़ देने की बात कहते हुए गिड़गिड़ा रही थी. लेकिन उन लोगों ने कुछ और ही इरादा कर रखा था.

तीनों बदमाशों ने सुरभि की गला घोंट कर हत्या कर दी. बेकसूर सुरभि सहेली की बातों पर विश्वास कर के मारी जा चुकी थी. इस के बाद वे उस की लाश ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगे. उन्होंने उस की लाश एक बोरी में भर दी.

इस के बाद इन लोगों ने अपने परिचित रहीमुद्दीन उर्फ रहीम और चंद्रकेश उर्फ बंटी को बुलाया. दोनों को 4 हजार रुपए का लालच दे कर इन लोगों ने वह बोरी कहीं रेलवे लाइनों के किनारे फेंकने को कहा.

पैसों के लालच में दोनों उस लाश को ठिकाने लगाने के लिए तैयार हो गए तो दिनेश ने 7800 रुपए में एक टैक्सी हायर की. रात के अंधेरे में उन्होंने वह लाश उस टैक्सी में रखी और रहीमुद्दीन और चंद्रकेश उसे सरिता विहार थाना क्षेत्र में रेलवे लाइनों के किनारे डाल कर अपने घर लौट गए.

लाश ठिकाने लगाने के बाद साजिशकर्ता इस बात पर खुश थे कि फूलप्रूफ प्लानिंग की वजह से पुलिस उन तक नहीं पहुंच सकेगी, लेकिन दिनेश द्वारा सुरभि को की गई काल ने सभी को पुलिस के चंगुल में पहुंचा दिया. मामले का खुलासा हो जाने के बाद एसएचओ अजब सिंह ने हिरासत में लिए गए आरुष को छोड़ दिया.

दिनेश से की गई पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के अन्य साथियों सौरभ भारद्वाज, चंद्रकेश उर्फ बंटी और रहीमुद्दीन उर्फ रहीम को भी गिरफ्तार कर लिया. पांचवां बदमाश धीरेंद्र पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका, वह फरार हो गया था. गिरफ्तार किए गए बदमाशों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

पुलिस को इस मामले में दिनेश की प्रेमिका को भी हिरासत में ले कर पूछताछ करनी चाहिए थी, क्योंकि सुरभि की हत्या की असली जिम्मेदार तो वही थी. उसी ने ही सुरभि को नौकरी के बहाने दिनेश के किराए के कमरे पर बुलाया था.

बहरहाल, दूसरे को फांसने के लिए जाल बिछाने वाला दिनेश खुद अपने बिछाए जाल में फंस गया. पहले वह झपटमारी के आरोप में जेल गया था, जबकि इस बार वह सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोप में जेल गया. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

डेढ़ करोड़ का विश्वास

घटना 14 जुलाई, 2020 की है. उस रोज राम गोयल सो कर उठे तो घर का अस्तव्यस्त हाल देख कर उन के होश उड़ गए. कमरे में तिजोरी खुली पड़ी थी, जिस में रखी कई किलोग्राम सोनाचांदी व नकदी सब गायब थी. यह देख कर घर में हड़कंप मच गया.

राम गोयल को पता चला कि घर से 3 किलो सोने और चांदी के आभूषण, नकदी और अन्य कीमती सामान गायब है. इस के अलावा परिवार के साथ रह रही बेटी की नौकरानी अनुष्का, जो दिल्ली से आई थी, वह भी गायब थी. अनुष्का राम गोयल की बेटीदामाद की नौकरानी थी. वह उन के बच्चों की देखभाल करती थी.

जून, 2020 महीने में राम गोयल की बेटी एक समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली से राजगढ़ अपने पिता के यहां आई थी. बेटी के बच्चों की देखभाल के लिए अनुष्का भी उस के साथ आ गई थी. इसलिए पिछले एक महीने से वह राम गोयल के घर पर ही रह रही थी.

वह एक नेपाली लड़की थी. नेपाली अपनी बहादुरी और ईमानदारी के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं. राम गोयल की भी अनुष्का के प्रति यही सोच थी. लेकिन कुछ ही समय में अनुष्का अपना असली रंग दिखा कर करोड़ों का माल साफ कर के भाग चुकी थी.

घटना की रात अनुष्का ने अपने हाथ से कढ़ी और खिचड़ी बना कर पूरे परिवार को खिलाई थी. खाने के बाद पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया. जाहिर था, खाने में कोई नशीली चीज मिलाई गई थी, जिस के असर से घर में हलचल होने के बावजूद किसी सदस्य की आंख नहीं खुली.

इस बात की खबर मिलते ही थाना पचोर के टीआई डी.पी. लोहिया तुरंत पुलिस टीम के साथ राम गोयल के यहां पहुंचे तथा उन्होंने मौकामुआयना कर सारी घटना की जानकारी एसपी प्रदीप शर्मा को दी. कुछ ही देर में एसपी शर्मा भी मौके पर पहुंच गए.

घटनास्थल की जांच करने के बाद एसपी प्रदीप शर्मा ने आरोपियों को पकड़ने के लिए एडिशनल एसपी नवलसिंह सिसोदिया के निर्देशन में एक टीम गठित कर दी.

टीम में एसडीपीओ पदमसिंह बघेल, टीआई डी.पी. लोहिया, एसआई धर्मेंद्र शर्मा, शैलेंद्र सिंह, साइबर सैल टीम प्रभारी रामकुमार रघुवंशी, एसआई जितेंद्र अजनारे, आरक्षक मोइन खान, दिनेश किरार, शशांक यादव, रवि कुशवाह एवं आरक्षक राजकिशोर गुर्जर, राजवीर बघेल, दुबे अर्जुन राजपूत, अजय राजपूत, सुदामा, कैलाश और पल्लवी सोलंकी को शामिल किया गया.

इधर लौकडाउन के चलते पुलिस का एक काम आसान हो गया था. टीआई लोहिया जानते थे कि लौकडाउन के दिनों में ट्रेन, बस बंद हैं इसलिए लुटेरी नौकरानी अनुष्का ने पचोर से भागने के लिए किसी प्राइवेट वाहन का उपयोग किया होगा.

क्योंकि इतनी बड़ी चोरी एक अकेली लड़की नहीं कर सकती, इसलिए उस के कुछ साथी भी जरूर रहे होंगे. अनुष्का कुछ समय पहले ही दिल्ली से आई थी. टीआई लोहिया ने अनुष्का का मोबाइल नंबर हासिल कर उसे सर्विलांस पर लगा दिया. इस के अलावा उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवाई.

काल डिटेल्स से पता चला कि अनुष्का एक फोन नंबर पर लगातार बातें करती थी और ताज्जुब की बात यह थी कि वारदात वाले दिन उस फोन नंबर की लोकेशन पचोर टावर क्षेत्र में थी. जाहिर था कि वह मोबाइल वाला व्यक्ति अनुष्का का कोई साथी रहा होगा, जो उस के बुलाने पर ही घटना को अंजाम देने राजगढ़ आया होगा.

एसपी प्रदीप शर्मा के निर्देश पर टीआई लोहिया की टीम पचोर क्षेत्र में हर चौराहे, हर पौइंट, हर क्रौसिंग पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने में जुट गई. इसी कवायद में एक संदिग्ध कार पुलिस की नजर में आई, जिस का रजिस्ट्रेशन नंबर यूपी-14एफ-टी2355 था.

टीआई लोहिया समझ गए कि चोर शायद इसी गाड़ी में सवार हो कर पचोर आए और घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. इसलिए पुलिस की एक टीम ने पचोर से व्यावह हो कर गुना और ग्वालियर तक के रास्ते में पड़ने वाले टोल नाकों के कैमरे चैक कर उस गाड़ी के आनेजाने का रूट पता कर लिया.

जांच में पता चला कि उक्त नंबर की कार दिल्ली के उत्तम नगर के रहने वाले मनोज कालरा के नाम से रजिस्टर्ड थी, इसलिए तुरंत एक टीम दिल्ली भेजी गई. टीम ने मनोज कालरा को तलाश कर उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह किराए पर गाडि़यां देने का काम करता है. उक्त नंबर की कार उस ने एक नौकर पवन उर्फ पद्म नेपाली के माध्यम से 12 जुलाई को इंदौर के लिए बुक की थी.

जबकि इस कार के ड्राइवर से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि 13 जुलाई, 2020 को 3 युवक उसे शादी में जाने की बात बोल कर पचोर ले गए थे. दिल्ली पहुंची पुलिस टीम सारी जानकारी एसपी प्रदीप शर्मा से शेयर कर रही थी. इस से एसपी प्रदीप शर्मा समझ गए कि उन की टीम सही दिशा में आगे बढ़ रही है.

लेकिन वे जल्द से जल्द चोरों को पकड़ना चाहते थे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि देर होने पर आरोपी माल सहित नेपाल भाग सकते हैं. ड्राइवर ने यह भी बताया कि वापसी में सभी लोगों को उस ने दिल्ली में बदरपुर बौर्डर पर बस स्टैंड के पास छोड़ा था.

अब पुलिस को जरूरत थी उन तीनों नेपाली लड़कों की पहचान कराने की, जो दिल्ली से गाड़ी ले कर पचोर आए थे.

इस के लिए पुलिस ने दिल्ली में रहने वाले सैकड़ों नेपाली परिवारों से संपर्क किया. शक के आधार पर 16 लोगों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. जिस में एक नया नाम सामने आया बिलाल अहमद का, जो लोगों को घरेलू नौकर उपलब्ध कराने के लिए एशियन मेड सर्विस की एजेंसी चलाता था.

बिलाल ने पुलिस को बताया कि अनुष्का उस के पास आई थी, उस की सिफारिश सरिता पति नवराज शर्मा ने की थी. जिसे उस ने दिल्ली में एक बच्ची की देखभाल के लिए नौकरी पर लगवा दिया था.

जांच के दौरान पुलिस टीम को पवन थापा के बारे में जानकारी मिली. पता चला कि पवन ही वह आदमी है जो उन तीनों लोगों को दिल्ली से पचोर ले कर आया था. पवन भी पुलिस के हत्थे चढ़ गया. उस ने पूछताछ में बताया कि उत्तम नगर के सम्राट उर्फ वीरामान ने टैक्सी बुक की थी, जिस के लिए उसे15 हजार रुपए एडवांस भी दिए थे.

इस से पुलिस को पूरा शक हो गया कि इस मामले में सम्राट की खास भूमिका हो सकती है. दूसरी बात यह पुलिस समझ चुकी थी कि इस बड़ी चोरी के सभी आरोपी उत्तम नगर के आसपास के हो सकते हैं. इसलिए न केवल पुलिस सतर्क हो गई, बल्कि अन्य आरोपियों की रैकी भी करने लगी.

आरोपी लगातार अपना ठिकाना बदल रहे थे, इसलिए तकनीकी टीम के प्रभारी एसआई रामकुमार रघुवंशी और आरक्षक मोइन खान ने चाय व समोसे वाला बन कर उन की रैकी करनी शुरू कर दी, जिस से जल्द ही जानकारी हासिल कर सम्राट उर्फ वीरामान धामी को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में वीरामान पहले तो कुछ भी बताने की राजी नहीं था. लेकिन जब उस ने मुंह खोला तो चौंकाने वाला सच सामने आया.

वास्तव में वीरामान खुद वारदात करने के लिए पचोर जाने वाली टीम में शामिल था. अन्य 2 पुरुषों और महिला के बारे में पूछताछ की तो सम्राट ने बताया कि अनुष्का अपने प्रेमी तेज के साथ नई दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहती है.

पुलिस ने बदरपुर इलाके में छापेमारी कर के दोनों को वहां से गिरफ्तार कर उन के पास से चोरी का माल बरामद कर लिया. यहां तेज रोक्यो और अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल के साथ उन का तीसरा साथी भरतलाल थापा भी पुलिस गिरफ्त में आ गए.

मौके पर की गई पूछताछ के बाद दिल्ली गई पुलिस टीम ने दिल्ली पुलिस की मदद से मामले के मुख्य आरोपी वीरामान उर्फ सम्राट मूल निवासी धनगढ़ी, नेपाल, अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल निवासी जनकपुर, तेज रोक्यो मूल निवासी जिला अछम, नेपाल, भरतलाल थापा को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की थी.

इस के अलावा आरोपियों को पचोर तक कार बुक करने वाला पवन थापा निवासी उत्तम नगर नई दिल्ली, बेहोशी की दवा उपलब्ध कराने वाला कमल सिंह ठाकुर निवासी जिला बजरा नेपाल, चोरी के जेवरात खरीदने वाला मोहम्मद हुसैन निवासी जैन कालोनी उत्तम नगर, जेवरात को गलाने में सहायता करने वाला विक्रांत निवासी उत्तम नगर भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

अनुष्का को कंपनी में काम पर लगवाने वाली सरिता शर्मा निवासी किशनपुरा, नोएडा तथा अनुष्का को नौकरानी के काम पर लगाने वाला बिलाल अहमद उर्फ सोनू निवासी जामिया नगर, नई दिल्ली को गिरफ्तार कर के बरामद माल सहित पचोर लौट आई. जहां एसपी श्री शर्मा ने पत्रकार वार्ता में महज 7 दिनों के अंदर जिले में हुई चोरी की सब से बड़ी घटना का राज उजागर कर दिया.

अनुष्का ने बताया कि राम गोयल का पूरा परिवार उस पर विश्वास करता था. इसलिए परिवार के अन्य लोगों की तरह अनुष्का भी घर में हर जगह आतीजाती थी. एक दिन उस के सामने घर की तिजोरी खोली गई तो उस में रखी ज्वैलरी और नकदी देख कर उस की आंखें चौंधिया गईं और उस के मन में लालच आ गया. यह बात जब उस ने दिल्ली में बैठे अपने प्रेमी तेज रोक्यो को बताई तो उसी ने उसे तिजोरी पर हाथ साफ करने की सलाह दी.

योजना को अंजाम देने के लिए उस का प्रेमी तेज रोक्यो ही दिल्ली से बेहोशी की दवा ले कर पचोर आया था. वह दवा उस ने रात में खिचड़ी में मिला कर पूरे परिवार को खिला दी. जिस से खिचड़ी खाते ही पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया. तब अनुष्का अलमारी में भरा सारा माल ले कर पे्रमी के संग चंपत हो गई. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर एक करोड़ 53 लाख रुपए का चोरी का सामान और नकदी बरामद कर ली.

पुलिस ने सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच टीआई डी.पी. लोहिया कर रहे थे.

100 करोड़ के घोटाले में फंसीं कौशिक बहनें

हरियाणा में सहकारिता विभाग में हुए करोड़ों के घोटाले के बाद एकीकृत सहकारी विकास परियोजना आईसीडीपी को बंद कर दिया गया है. प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सहकारिता विभाग में हुए घोटाले का स्पैशल आडिट करने के आदेश जारी किए हैं.1995 से केंद्र व राज्य सरकार द्वारा एकीकृत सहकारी विकास परियोजना में कितना पैसा दिया गया, कितना खर्च हुआ, कितना धन बचा और कितने धन का गोलमाल हुआ है, सभी धन और खर्च और घोटाले  को स्पैशल आडिट में शामिल किया गया है.

मुख्यमंत्री ने अपने आदेश में कहा था कि आडिट राज्य सरकार किसी प्राइवेट एजेंसी से कराएगी, जिस के लिए टेंडर जारी किए जाएंगे. ज्ञात रहे कि मुख्यमंत्री के आदेश पर हरियाणा की एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) सहकारिता विभाग में हुए घोटाले की जांच कर रही है.

हरियाणा सरकार में सहकारिता विभाग के मंत्री डा. बनवारी लाल का कहना है कि घोटाले में शामिल सभी अधिकारियों को बरखास्त किया जाएगा. सहायक रजिस्ट्रार अनु कौशिक और उपमुख्य लेखा परीक्षक योगेंद्र अग्रवाल को पहले ही बरखास्त करने की सिफारिश की गई है. अन्य अधिकारियों को भी बरखास्त करने की सिफारिश की जाएगी.

अब तक एसीबी जिलों में तैनात 11 अधिकारियों व कर्मचारियों को गिरफ्तार कर चुकी है. घोटाले में शामिल किसी भी अधिकारी व कर्मचारी को बख्शा नहीं जाएगा. एसीबी की जांच रिपोर्ट के आधार पर घोटाले में शामिल अधिकारियों को बरखास्त किया जाएगा.

इस ऐतिहासिक घोटाले को ले कर प्रदेश में विपक्ष के तेवर भी आक्रामक हो गए. विपक्षी पार्टियां प्रदेश के सहकारिता मंत्री डा. बनवारी लाल को जिम्मेदार मानते हुए पद त्याग करने की मांग कर रही हैं. हरियाणा प्रदेश के एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच के बाद सहकारिता विभाग के घोटाले का परदाफाश हुआ है.

प्रारंभिक जांच में करीब 100 करोड़ रुपए के घोटाले की आशंका व्यक्त की गई थी, लेकिन जैसेजैसे जांच आगे बढ़ रही है, घोटाले की राशि भी बढ़ती जा रही है. स्पैशल आडिट में यह राशि बढ़ कर कितने करोड़ होगी, अभी इस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

एसीबी ने इस 100 करोड़ के घोटाले की मास्टरमाइंड सहायक रजिस्ट्रार अनु कौशिक और बिजनैसमैन स्टालिनजीत सिंह को बताया है. इन्होंने ही फेक बिल और फरजी कंपनियों के नाम पर सरकारी पैसे को ठिकाने लगाया. साथ ही अपने बैंक अकाउंट का पैसा हवाला के जरिए दुबई और कनाडा तक पहुंचाया. ये दोनों भी विदेश भागने की फिराक में थे, लेकिन हरियाणा एंटी करप्शन ब्यूरो  (एसीबी) को इस की भनक लग गई और दोनों को समय रहते गिरफ्तार कर लिया.

एसीबी ने 13 मई, 2023 को गुरुग्राम में एफआईआर दर्ज कराई थी, जिस में तीनों बहनें अनु कौशिक, गुंजन कौशिक व नताशा कौशिक और उस के मातापिता को नामजद किया गया था. गुंजन को छोड़ कर सभी को गिरफ्तार कर लिया गया था.

गुंजन कौशिक कनाडाई है. इस वजह से एसीबी के द्वारा गुंजन को गिरफ्तार करना संभव नहीं हुआ. एसीबी यह योजना बना रही है कि गुंजन तक पहुंचने के लिए इंटरपोल की सहायता ली जाए. अनु कौशिक ने सहकारिता विभाग के करोड़ों रुपए हवाला के जरिए अपनी बहन गुंजन  के पास कनाडा और दुबई में भेजे थे.

बताया गया है कि अनु कौशिक की सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति की जानकारी एसीबी को मिल गई है. पता चला है कि रिश्वत की रकम से करनाल, कैथल, अंबाला व गुरुग्राम में बेनामी प्रौपर्टी अनु कौशिक ने खरीदी. एसीबी का दावा है कि घोटालेबाजों की 5 करोड़ की संपत्ति अब तक अटैच की जा चुकी है.

एक दरजन से ज्यादा अधिकारी हुए गिरफ्तार

इस घोटाले की जांच कर रही एसीबी की टीम के सूत्रों का कहना है कि गुंजन से पूछताछ में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं.  इस घोटाले में कुछ बड़े नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के नाम आने की संभावना है, इसलिए एसीबी हर पहलू पर पुख्ता सबूत और जानकारी एकत्र करने पर फोकस कर रही है, जिस से कोर्ट में केस की सुनवाई शुरू होने पर अच्छी पैरवी की जा सके.

हरियाणा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने कहा कि भ्रष्टाचारी चाहे कोई भी हो, कितना ही बड़ा अधिकारी क्यों न हो, दोषी पाए जाने पर बख्शा नहीं जाएगा. उन्होंने कहा कि ब्यूरो पूरी पारदर्शिता व निष्पक्षता के साथ दोषियों के खिलाफ काररवाई करने के लिए वचनबद्ध है. आगे भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ यह अभियान जारी रहेगा.

सब से अहम बात यह है कि इस पूरे मामले का डेली अपडेट चीफ और डीजीपी शत्रुजीत कपूर से खुद सीएम मनोहर लाल खट्टर ले रहे थे. उन्होंने बताया कि एसीबी ने अब तक घोटाले में शामिल 6 राजपत्रित अधिकारियों, आईसीडीपी रेवाड़ी के 4 अन्य अफसरों और 4 निजी व्यक्तियों की गिरफ्तारी की है.

इन आरोपियों में आडिट औफिसर बलविंदर, डिप्टी चीफ आडिटर योगेंद्र अग्रवाल, जिला रजिस्ट्रार सहकारी समितियां, करनाल रोहित गुप्ता, सहायक रजिस्ट्रार सहकारी समिति (एआरसीएस) अनु कौशिक, रामकुमार, जितेंद्र कौशिक, कृष्ण बेनीवाल शामिल हैं.

बाद में हिसार के ए.आर. खटकड़ को भी गिरफ्तार किया गया है. उन के अकाउंट से लाखों के ट्रांजेक्शन मिले हैं और भी कई अधिकारी अभी एसीबी के रडार पर हैं. एंटी करप्शन ब्यूरो का मानना है कि उन्होंने 100 करोड़ का घोटाला तो पकड़ा है, जबकि यह घोटाला कई सौ करोड़ का हो सकता है. सहकारिता विभाग में पिछले 2 सालों से तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिवों के आदेश के बाद भी आडिट नहीं हो रहा था.

एसीबी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सहकारी समितियों में भरतियों के एवज में कर्मचारियों से एक से डेढ़ लाख रुपए लिए गए. अब एसीबी ने सहकारिता विभाग के पास से इन कर्मचारियों की सूची मांग ली है. सूची के आधार पर अनु कौशिक के कार्यकाल के दौरान भरती हुए युवाओं से पूछताछ की जाएगी.

जांच में यह भी सामने आया है कि अनु कौशिक ने अंबाला में निगदू सोसाइटी की 45 एकड़ जमीन अवैध तरीके से बेच दी. इस मामले की जांच अभी चल रही है.

सुनियोजित तरीके से किया घोटाला

एकीकृत सहकारी विकास परियोजना के तहत ग्रामीण तथा कृषि क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करते हुए विकास कार्य कराए जाने थे और सहकारी समितियों को विकसित किया जाना था. इस के लिए केंद्र सरकार ने पर्याप्त धनराशि दी थी. इस पैसे को कहां खर्च किया गया, इस का कोई उल्लेख अभिलेखों में एसीबी को नहीं मिला है.

जांच में पाया गया है कि आरोपियों ने पैसा कनाडा और दुबई भेजा है. जांच में यह भी सामने आया है कि मुख्यालय स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत से घोटाले को अंजाम दिया गया. ठेकेदार स्टालियन जीत ने अधिकारियों से मिल कर उन्हें रिश्वत दे कर फरजीवाड़ा किया.

ठेकेदार ने अपनी आधा दरजन से अधिक कंपनियां पंजीकृत करा रखी थीं. अलगअलग जिलों में इटालियन जीत ने अलगअलग कंपनियों के नाम पर सहकारिता विभाग का कार्य लिया. स्वयं सहायता समूह तैयार कर के उन के नाम से रकम निकाल ली. ठेके के लिए इटालियन जीत ने कोटेशन अपनी ही दूसरी कंपनियों के लगाए. फरजी बिल लगाए गए और आडिटरों द्वारा उसे सही करार दे कर घोटाले को महीनों तक जारी रखा गया.

एसीबी को अधिकारियों और ठेकेदार के बीच हुई वाट्सऐप चैट भी मिली है. इस चैट में अधिकारियों को पैसों के लेनदेन सहित बिलों के भुगतान का पूरा लेखाजोखा मिला है. चैट के आधार पर एसीबी ने अंबाला और करनाल में 3-3 केस दर्ज कराए थे. 4 अधिकारियों को यहां से गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की.

इसी जांच के आधार पर 31 जनवरी, 2024 को घोटाले के 6 केस दर्ज किए गए थे. सहकारिता विभाग ने भी अपना पक्ष प्रस्तुत किया है. विभाग का दावा है कि फील्ड आईसीडीसी प्रोजेक्ट के तहत कुल राशि में से 20.87 करोड़ रुपए ही खर्च किए हैं. ऐसे में 100 करोड़ रुपए का गबन कैसे हो सकता है.

आईसीडीसी प्रोजेक्ट के तहत हरियाणा को कुल 139 करोड़ रुपए मिलने थे, लेकिन विभाग को 61.67 करोड़ रुपए ही मिले. इस में से 20.87 करोड़ रुपए खर्च किए गए, जबकि 41.40 करोड़ रुपए खर्च नहीं हुए हैं. विभाग की ओर से बाकायदा डाटा भी जारी किया गया है. इस के तहत हैफेड को 7.5 करोड़ रुपए दिए गए थे, जो अब विभाग को वापस कर दिए गए हैं.

इसी प्रकार 21.5 करोड़ रुपए हरियाणा वेयरहाउसिंग कारपोरेशन को दिए गए, जो वापस किए जाने हैं. जबकि 9 करोड़ रुपए खजाना विभाग में जमा कराए गए हैं और 40 लाख रुपए कुल राशि का ब्याज जमा कराया गया है.

अभी फील्ड के कार्यालयों में 3 करोड़ रुपए की राशि शेष है, जो खर्च नहीं हो सकी है. ऐसे में कुल 41.40 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हुए हैं. इस बारे में सहकारिता विभाग के मंत्री डा. बनवारी लाल ने कहा कि जब 100 करोड़ रुपए जारी ही नहीं हुए तो इतना घोटाला कैसे हो सकता है.

एसीबी की सहकारिता विभाग के घोटाले की जांच को ले कर अभी तक लोग आश्चर्यचकित हैं कि एसीबी को जांच किस दवाब में सौंपी गई. सरकार और पार्टी के नेताओं का दावा है कि मुख्यमंत्री ने एसीबी को सहकारिता विभाग के घोटाले की जांच सौंपी थी.

सरकार की जीरो टालरेंस नीति के तहत किसी भी घपले, घोटाले या लापरवाही की शिकायत पर मुख्यमंत्री बहुत सख्त हैं. जीरो टालरेंस नीति के तहत केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ यह प्रावधान रखा है कि यदि किसी आरोपी पर घोटाला या भ्रष्टाचार सिद्ध होता है, तब सरकार उन अफसरों को सेवा से हटा सकती है. इस में यह प्रावधान भी है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद सरकार अदालती फैसले से पहले भी काररवाई कर सकती है.

जांच प्रक्रिया पर है लोगों को शक

उधर लोगों का कहना है कि नवंबर 22 में रेवाड़ी जिले की शिकायत आई थी. मुख्य सचिव ने एसीबी को शिकायत पर जांच सौंपी थी. उस वक्त यह अनुमान नहीं था कि यह घोटाला करोड़ों में हो सकता है, लेकिन मुख्य  सचिव को यह अंदाजा हुआ कि बड़े अधिकारी इन शिकायतों पर काररवाई ठीक से नहीं कर रहे हैं.

लोग कहते हैं कि राजाराम इंद्रजीत सिंह विचार मंच रेवाड़ी के संयोजक प्रवीण राव उर्फ बौबी राव ने 2022 में सहकारी समितियों के भ्रष्टाचार की शिकायत की थी. प्रवीण राव सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते रहते हैं.

उन का कहना है कि शिकायत और आरटीआई के माध्यम से निरंतर प्रयास किए जाने के कारण समाचार पत्रों और सोशल मीडिया तथा चैनलों के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित कराया गया था. मजबूर हो कर सरकार को सहकारी विभाग के घोटाले की जांच करानी पड़ी.

कांग्रेस और विपक्ष के कई नेता भी इस का श्रेय उन्हीं को ही देते हैं. बताया जाता है कि पार्टी के कुछ नेताओं को सहकारिता मंत्री डा. बनवारी लाल की केंद्रीय नेताओं से निकटता और तालमेल पसंद नहीं था. यह पार्टी की अंदरूनी कलह का नतीजा है कि उन्हें हाशिए पर पहुंचाने के लिए उन के विभाग की एसीबी से जांच कर घोटाले का परदाफाश कराया गया है.

विपक्षी दलों का कहना है कि यह जांच भी लाल फीताशाही का शिकार हो कर रह जाएगी. छोटी मछलियों को ही इस का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. जबकि बड़ी मछलियां सरकार के संरक्षण में पहले की तरह पलती रहेंगी.

एसीबी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर  को लोग ईमानदार अफसर बताते हैं. अधिकांश लोगों की नजर में मुख्यमंत्री मनोहर लाल की छवि एक कठोर, ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ की है. दोनों से बहुत आशाएं हैं और उम्मीद है कि छोटीबड़ी मछलियां नहीं, हर घोटालेबाज को सलाखों के पीछे पहुंचाने में कोई नहीं रोक सकता. लोग लोकसभा चुनाव के मद्ïदेनजर भी ऐसी ही कठोर काररवाई की अपेक्षा कर रहे हैं.

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव, पूर्व केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस कार्य समिति की सदस्य, हरियाणा कांग्रेस की पूर्व प्रदेशाध्यक्ष एवं उत्तराखंड की प्रभारी कुमारी शैलजा ने 100 करोड़ के घोटाले के मामले में सरकार को घेरा है तथा कटघरे में खड़ा किया है. कहा कि गठबंधन सरकार की नाक तले सहकारिता विभाग में 100 करोड़ रुपए का घोटाला हो गया और सरकार को भनक तक नहीं लगी, ऐसा कैसे हो सकता है?

सीबीआई जांच की उठी मांग

हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बनने पर इस की जांच करवाई जाएगी और इस घोटाले के दोषियों पर कड़ी काररवाई करते हुए उन से एकएक रुपए की वसूली की जाएगी.

मीडिया को जारी एक बयान में कुमारी शैलजा ने कहा कि भाजपा-जजपा गठबंधन की सरकार आने के बाद से ऐसा कोई विभाग नहीं बचा, जहां घोटाले न हुए हों. कभी शराब घोटाला, कभी धान घोटाला और न जाने कौनकौन से घोटाले हुए, सरकार सभी घोटालों में जांच का नाटक करती रही, पर आज तक किसी घोटाले में किसी पर कोई काररवाई नहीं हुई. सरकार अपने लोगों को बचाने में लगी रही.

जनता जानती है कि घोटालों में कौनकौन शामिल था तो सरकार कैसे नहीं जान पाई. उन्होंने कहा कि सहकारिता विभाग के 100 करोड़ रुपए के घोटाले की जड़ें करनाल तक फैली हुई हैं. सब से खास बात यह है कि मुख्यमंत्री खुद करनाल से विधायक हैं.

उन्होंने कहा कि सहकारिता विभाग का घोटाला रेवाड़ी से शुरू हुआ है और मंत्री भी रेवाड़ी के ही रहने वाले हैं. इस घोटाले में मंत्री और अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए.

जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला जो भाजपा में संयुक्त रूप से सरकार में हैं तथा उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं. इस सहकारिता विभाग के 100 करोड़ से अधिक के घोटाले पर बिलकुल चुप्पी साधे हुए हैं.

सरकार में शामिल होने से पहले उन्होंने आरोप लगाया था कि हरियाणा में भाजपा की खट्टर सरकार में ओवरलोडिंग के नाम पर 5 हजार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है.

वे कुरुक्षेत्र जिले के गांव मथाना, मोरथला सहित आधा दरजन गांवों में जनचौपाल कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों से रूबरू हो रहे थे. उन का यह बयान 31 जुलाई, 2019 को सभी छोटेबड़े समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था.

उन्होंने कहा था कि सुनियोजित ढंग से किए गए इस लूट के घोटाले में अकेली अफसरशाही ही शामिल नहीं, बल्कि इस में सीएम से ले कर भाजपा सरकार के कई मंत्री, विधायकों की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता और इन लोगों ने मिल कर ही इस ‘मनोहर’ घोटाले को अंजाम दिया है.

यह बात  जननायक जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद दुष्यंत चौटाला ने कही थी. उन्होंने मांग की है कि इस घोटाले की जांच सीबीआई से होनी चाहिए, ताकि लूट की कमाई करने वालों के कालिख भरे चेहरे जनता के सामने आ सकें.

दुष्यंत चौटाला ने ओवरलोडिंग के मामले को ‘मनोहर’ घोटाले की संज्ञा देते हुए कहा था कि मुख्यमंत्री अपनी सरकार के लोगों को बचाने के लिए अधिकारियों को बलि का बकरा बनाने का प्रयास रहे हैं.

उन्होंने कहा कि एसआईटी की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश भर के विभिन्न जिलों से प्रतिमाह 120 करोड़ रुपए की लूट की जा रही थी. इस की गणना की जाए तो एक वर्ष में 1400 करोड़ रुपए एकत्रित किए गए और ओवरलोडिंग के नाम पर 4 सालों में इस काली कमाई का आंकड़ा 5 हजार करोड़ रुपए से अधिक का है.

वर्तमान के उपमुख्यमंत्री व पूर्व सांसद दुष्यंत चौटाला ने कहा था कि मनोहर लाल खट्टर सरकार में आए दिन घोटाले उजागर हो रहे हैं. सब से पहले उन्होंने स्वयं प्रदेश में हजारों करोड़ रुपए का दवा घोटाले को तथ्यों सहित उजागर किया था, जिस की जांच आज तक खट्टर सरकार ने पूरी नहीं की.

इस के बाद रोडवेज में किलोमीटर स्कीम के नाम एक औन रिकौर्ड एक हजार करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया और इस किलोमीटर स्कीम को मंजूरी देने में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से ले कर परिवहन मंत्री का सीधा दखल था.

दुष्यंत चौटाला ने कहा था कि यदि इन घोटालों की जांच निष्पक्ष व सही ढंग से की जाए तो कई भाजपाइयों के चेहरों को घोटाले का कलंक बेरंगत कर सकता है. यह बात लगभग 5 साल पुरानी है. वो अब सरकार में शामिल हैं और इस सहकारिता विभाग के घोटाले पर चुप्पी साधे हुए हैं.

40 महीने कैद में रहा कंकाल

प्यार करने की खौफनाक सजा

सुबह करीब साढ़े 5 बजे आगरा के पुलिस नियंत्रण कक्ष को सूचना मिली कि आगरा-ग्वालियर की अपलाइन रेल पर शाहगंज और  सदर बाजार के बीच में एक युवक ने ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या कर ली है. सूचना शाहगंज और सदर बाजार के बीच होने की मिली थी. यह बात मौके पर जा कर ही पता चल सकती थी कि घटना किस थाने में आती है, इसलिए नियंत्रणकक्ष द्वारा इत्तला शाहगंज व सदर बाजार दोनों थानों को दे दी गई.

खबर मिलने के बाद दोनों थानों की पुलिस के साथसाथ थाना राजकीय रेलवे पुलिस आगरा छावनी की पुलिस टीम भी वहां पहुंच गई. पुलिस को रेलवे लाइनों के बीच एक युवक की लाश 2 टुकड़ों में पड़ी मिली. यह 25 जुलाई, 2014 की बात है.

सब से पहले पुलिस ने यह देखा कि जिस जगह पर लाश पड़ी है, वह क्षेत्र किस थाने में आता है. जांच के बाद यह पता चला कि वह क्षेत्र थाना सदर की सीमा में आता है.

रेलवे लाइनों में लाश पड़ी होने की सूचना पा कर आसपास के गांवों के तमाम लोग वहां पहुंच गए. लोगों ने उस की शिनाख्त करते हुए कहा कि मरने वाला युवक शिवनगर के रहने वाले नत्थूलाल का बेटा मनीष है. लोगों ने जल्द ही मनीष के घर वालों को खबर कर दी तो वे भी रोते बिलखते वहां पहुंच गए. जवान बेटे की मौत पर वे फूटफूट कर रो रहे थे.

सदर बाजार के थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने एएसपी डा. रामसुरेश यादव, एसपी सिटी समीर सौरभ व एसएसपी शलभ माथुर को भी घटना की जानकारी दे दी तो वे भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

जिस तरीके से वहां लाश पड़ी थी, देख कर पुलिस अधिकारियों को मामला आत्महत्या का नहीं लगा बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे उस की हत्या कहीं और कर के लाश ट्रैक पर डाल दी हो ताकि उस की मौत को लोग हादसा या आत्महत्या समझें.

कपड़ों की तलाशी ली तो पैंट और कमीज की जेबें खाली निकलीं. मनीष के घर वालों ने बताया कि उस के पास 2 मोबाइल फोनों के अलावा पर्स में पैसे व वोटर आईडी कार्ड व जेब में छोटी डायरी रहती थी जिस में वह लेबर का हिसाब किताब रखता था. इस से इस बात की पुष्टि हो रही थी कि किसी ने हत्या करने के बाद उस की ये सारी चीजें निकाल ली होंगी ताकि इस की शिनाख्त नहीं हो पाए.

पुलिस ने नत्थूलाल से प्रारंभिक पूछताछ  कर मनीष की लाश का पंचनामा तैयार कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और नत्थूलाल की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के जांच थानाप्रभारी सुनील कुमार ने संभाल ली. एसएसपी शलभ माथुर ने जांच में क्राइम ब्रांच को भी लगा दिया.

थानाप्रभारी ने सब से पहले मनीष के घर वालों से बात कर के यह जानने की कोशिश की कि उस का किसी से कोई झगड़ा या दुश्मनी तो नहीं थी. इस पर नत्थूलाल ने बताया कि मनीष पुताई के काम का ठेकेदार था. वह बहुत शरीफ था. मोहल्ले में वह सभी से हंसता बोलता था.

उन से बात करने के बाद पुलिस को यह लगा कि उस की हत्या के पीछे पुताई के काम से जुड़े किसी ठेकेदार का तो हाथ नहीं है या फिर प्रेमप्रसंग के मामले में किसी ने उस की हत्या कर दी. इसी तरह कई दृष्टिकोणों को ले कर पुलिस चल रही थी.

अगले दिन पुलिस को मनीष की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई. पुलिस को शक हो रहा था, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से वह सही साबित हुआ. यानी मनीष ने सुसाइड नहीं किया था, बल्कि उस की हत्या की गई थी. रिपोर्ट में बताया गया कि उस की सभी पसलियां टूटी हुई थीं, उस के दोनों फेफड़े फट गए थे. गुप्तांगों पर भी भारी वस्तु से प्रहार किया गया था. इस के अलावा उस के शरीर पर घाव के अनेक निशान थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह बात साफ हो गई कि मनीष की हत्या कहीं और की गई थी और हत्यारे उस से गहरी खुंदक रखते थे तभी तो उन्होंने उसे इतनी बेरहमी से मारा.

मनीष के पास 2 महंगे मोबाइल फोन थे जो गायब थे. पुलिस ने उस के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. उस से पता चला कि उन की की अंतिम लोकेशन सोहल्ला बस्ती की थी.

इस बारे में उस के पिता नत्थू सिंह से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि सोहल्ला बस्ती में मनीष का कोई खास यारदोस्त तो नहीं रहता. उन्होंने यह जरूर बताया कि मनीष के 2 कारीगर मुन्ना और बंडा इस बस्ती में रहते हैं. वह उन के पास अकसर जाता रहता था.

मनीष की कालडिटेल्स पर नजर डाल रहे एएसपी डा. रामसुरेश यादव को एक ऐसा नंबर नजर आया था जिस से अकसर रात के 12 बजे से ले कर 2 बजे के बीच लगातार बातचीत की जाती थी. जिस नंबर से उस की बात होती थी, बाद में पता चला कि वह नंबर माधवी नाम की किसी लड़की की आईडी पर लिया गया था.

जांच में लड़की का नाम सामने आते ही पुलिस को केस सुलझता दिखाई दिया. क्योंकि मुन्ना और बंडा उस के भाई थे. एसएसपी को जब इस बात से अवगत कराया तो उन्होंने माधवी और उस के भाइयों से पूछताछ करने के निर्देश दिए. एक पुलिस टीम फौरन माधवी के घर दबिश देने निकल गई. लेकिन घर पहुंच कर देखा तो मुख्य दरवाजे पर ताला बंद था. यानी घर के सब लोग गायब थे.

माधवी के पिता भूपाल सिंह, भाई और अन्य लोग कहां गए, इस बारे में पुलिस ने पड़ोसियों से पूछा तो उन्होंने अनभिज्ञता जता दी. पूरे परिवार के गायब होने से पुलिस का शक और गहरा गया.

किसी तरह पुलिस को भूपाल सिंह का मोबाइल नंबर मिल गया. उसे सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन आगरा के नजदीक धौलपुर गांव की मिली. पुलिस टीम वहां रवाना हो गई. फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस ने माधवी, उस के पिता भूपाल सिंह, 3 भाइयों कुंवरपाल सिंह, बंडा और मुन्ना को हिरासत में ले लिया.

थाने ला कर उन सब से मनीष की हत्या के बारे में पूछताछ की तो भूपाल सिंह ने स्वीकार कर लिया कि मनीष की हत्या उस ने ही कराई है. उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली.

मनीष के पिता और दादा दोनों ही रेलवे कर्मचारी थे. इसलिए उस का जन्म और परवरिश आगरा की रेलवे कालोनी में हुई थी. उस की 3 बहनें और एक छोटा भाई था. पिता नत्थूलाल रेलवे कर्मचारी थे ही, साथ ही मां विमलेश ने भी घर बैठे कमाई का अपना जरिया बना रखा था. वह आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर आनेजाने वाले ट्रेन चालकों व गार्डों के लिए खाने के टिफिन पैक कर के उन तक पहुंचाती थी. इस से उन्हें भी ठीक आमदनी हो जाती थी.

मनीष समय के साथ बड़ा होता चला गया. इंटरमीडिएट करने के बाद वह रेलवे के ठेकेदारों के साथ कामकाज सीखने लगा. फिर रेलवे के एक अफसर की मदद से उसे मकानों की पुताई के छोटेमोटे ठेके मिलने लगे. देखते ही देखते उस ने रेलवे की पूरी कालोनी में रंगाई पुताई का ठेका लेना शुरू कर दिया. वह ईमानदार था इसलिए उस के काम से रेलवे अधिकारी भी खुश रहते थे.

मोटी कमाई होने लगी तो मनीष के हावभाव, रहनसहन, खानपान सब बदल गया. महंगे कपड़े, ब्रांडेड जूते, नईनई बाइक पर घूमना मनीष का जैसे शौक था. 2-3 सालों में उस की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई थी.

वह जिस तरह कमा रहा था, उसी तरह दान आदि भी करता. गांव में गरीब लड़कियों की शादी में वह अपनी हैसियत के अनुसार सहयोग करता था. मोहल्ले में भी वह अपने बड़ों को बहुत सम्मान करता था. इन सब बातों से वह गांव में सब का चहेता बना हुआ था.

करीब 4-5 साल पुरानी बात है. मनीष का कामकाज जोरों पर चल रहा था. उसे रंगाई पुताई के कारीगरों की जरूरत पड़ी तो वह पास की ही बस्ती सोहल्ला पहुंच गया. वहां पता चला कि बंडा और मुन्ना नाम के दोनों भाई यह काम करते हैं.

वह इन दोनों के पास पहुंचा और बातचीत कर के अपने काम पर ले गया. मनीष को दोनों भाइयों का काम पसंद आया तो उन से ही अपने ठेके का काम कराने लगा. वह उन्हें अच्छी मजदूरी देता था इसलिए वे भी मनीष से खुश थे.

धीरेधीरे मनीष का मुन्ना के घर पर भी आनाजाना शुरू हो गया. इसी दौरान मनीष की आंखें मुन्ना की 17-18 साल की बहन माधवी से लड़ गईं. माधवी उन दिनों कक्षा-9 में पढ़ती थी. यह ऐसी उम्र होती है जिस में युवत युवती विपरीतलिंगी को अपना दोस्त बनाने के लिए आतुर रहते हैं. माधवी और मनीष के बीच शुरू हुई बात दोस्ती तक और दोस्ती से प्यार तक पहुंच गई. फिर जल्दी ही उन के बीच शारीरिक संबंध भी कायम हो गए.

इस तरह करीब 4 सालों तक उन के बीच प्यार और रोमांस का खेल चलता रहा. माधवी भी अब इंटरमीडिएट में आ चुकी थी. प्यार के चक्कर में पड़ कर वह अपनी पढ़ाई पर भी ज्यादा ध्यान नहीं दे रही थी, जिस से वह इंटरमीडिएट में एक बार फेल भी हो गई. उस के घर वालों को यह बात पता तक नहीं चली कि उस का मनीष के साथ चक्कर चल रहा है.

माधवी सुबह साइकिल से स्कूल के लिए निकलती लेकिन स्कूल जाने की बजाय वह एक नियत जगह पहुंच जाती. मनीष भी अपनी बाइक से वहां पहुंच जाता. मनीष किसी के यहां उस की साइकिल खड़ी करा देता था. इस के बाद वह मनीष की बाइक पर बैठ कर फुर्र हो जाती.

स्कूल का समय होने से पहले वह वापस साइकिल उठा कर अपने घर चली जाती. उधर मनीष भी अपने कार्यस्थल पर पहुंच जाता. वहां माधवी के भाइयों को पता भी नहीं चल पाता कि उन का ठेकेदार उन की ही बहन के साथ मौजमस्ती कर के आ रहा है.

माधवी के पिता भूपाल सिंह गांव से दूध खरीद कर शहर में बेचते थे. वह बहुत गुस्सैल थे. आए दिन मोहल्ले में छोटीछोटी बातों पर लोगों से झगड़ना आम बात थी. झगड़े में उन के तीनों बेटे भी शरीक  हो जाते थे, जिस से मोहल्ले में एक तरह से भूपाल सिंह की धाक जम गई थी.

लेकिन इतना सब होने के बाद भी मनीष के साथ इस परिवार के संबंध मधुर थे. मुन्ना और बंडा भी मनीष के घर जाने लगे.

मनीष और माधवी एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे. उन्होंने शादी कर के साथसाथ रहने का फैसला कर लिया था. लेकिन उन के सामने समस्या यह थी कि उन की जातियां अलगअलग थीं. दूसरे माधवी के पिता और भाई गुस्सैल स्वभाव के थे इसलिए वे डर रहे थे कि घर वालों के सामने शादी की बात कैसे करें. लेकिन बाद में उन्होंने तय कर लिया कि उन के प्यार के रास्ते में जो भी बाधा आएगी, उस का वह मिल कर मुकाबला करेंगे.

माधवी जब घर पर अकेली होती तो मनीष को फोन कर के घर बुला लेती थी. एक बार की बात है. उस के पिता ड्यूटी गए थे भाई भी अपने काम पर चले गए थे और मां ड्राइवरों के टिफिन पहुंचाने के बाद खेतों पर गई हुई थी. माधवी के लिए प्रेमी के साथ मौजमस्ती करने का अच्छा मौका था. उस ने उसी समय मनीष को फोन कर दिया तो वह माधवी के घर पहुंच गया.

मनीष माधवी के घर तक अपनी बाइक नहीं लाया था वह उसे रेलवे फाटक के पास खड़ी कर आया था. उस समय घर में उन दोनों के अलावा कोई नहीं था इसलिए वे अपनी हसरत पूरी करने लगे. इत्तफाक से उसी समय घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया. दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनते ही दोनों के होश उड़ गए. उन के जहन से मौजमस्ती का भूत उड़नछू हो गया. वे जल्दीजल्दी कपड़े पहनने लगे.

तभी माधवी का नाम लेते हुए दरवाजा खोलने की आवाज आई. यह आवाज सुनते ही माधवी डर से कांपने लगी क्योंकि वह आवाज उस के पिता की थी. वही उस का नाम ले कर दरवाजा खोलने की आवाज लगा रहे थे.

माधवी पिता के गुस्से से वाकिफ थी. इसलिए उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए. कमरे में भी ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां मनीष को छिपाया जा सके. दरवाजे के पास जाने के लिए भी उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. उधर उस के पिता दरवाजा खोलने के लिए बारबार आवाजें लगा रहे थे.

दरवाजा तो खोलना ही था इसलिए डरते डरते वह दरवाजे तक पहुंची. दरवाजा खुलते ही मनीष वहां से भाग गया. मनीष के भागते ही भूपाल सिंह को माजरा समझते देर नहीं लगी. वह गुस्से से बौखला गया. घर में घुसते ही उस ने बेटी से पूछा कि मनीष यहां क्यों आया था.

डर से कांप रही माधवी उस के सामने मुंह नहीं खोल सकी. तब भूपाल सिंह ने उस की जम कर पिटाई की और सख्त हिदायत दी कि आइंदा वह उस से मिली तो वह दोनों को ही जमीन में जिंदा गाड़ देगा.

शाम को जब भूपाल के तीनों बेटे कुंवर सिंह, मुन्ना व बंडा घर आए तो उस ने उन्हें पूरा वाकया बताया. बेटों ने मनीष की करतूत सुनी तो वे उसी रात उसे जान से मारने उस के घर जाने के लिए तैयार हो गए. लेकिन भूपाल सिंह ने उन्हें गुस्से पर काबू कर ठंडे दिमाग से काम लेने की सलाह दी.

इस के बाद बंडा व मुन्नालाल ने मनीष के साथ काम करना बंद कर दिया था. 15 दिनों बाद माधवी की बोर्ड की परीक्षाएं थीं इसलिए उन्होंने माधवी पर भी पाबंदी लगाते हुए उस का स्कूल जाना बंद करा दिया.

4 महीने बीत गए. माधवी ने सोचा कि घर वाले इस बात को भूल गए होंगे. इसलिए उस ने मनीष से फिर से फोन पर बतियाना शुरू कर दिया. लेकिन अब वह बड़ी सावधानी बरतती थी. लेकिन माधवी की यही सोच गलत निकली. उसे पता नहीं था कि उस के घर वाले मनीष को ठिकाने लगाने के लिए कितनी खौफनाक साजिश रच चुके हैं.

योजना के अनुसार 28 जून, 2014 को सुबह के समय बंडा ने मेज पर रखा माधवी का फोन फर्श पर गिरा कर तोड़ डाला. माधवी को यह पता न था कि वह फोन जानबूझ कर तोड़ा गया है. घंटे भर बाद बंडा उस के फोन को सही कराने की बात कह कर घर से निकला.

इधर भूपाल सिंह ने यह कह कर अपनी पत्नी को मायके भेज दिया कि उस के भाई का फोन आया था कि वहां पर उस की बेटी को देखने वाले आ रहे हैं. पिता के कहने पर मां के साथ माधवी भी अपने मामा के यहां चली गई. जाते समय भूपाल सिंह ने पत्नी से कह दिया था कि मायके में वह माधवी पर नजर रखे.

उन दोनों के घर से निकलते ही बंडा घर लौट आया. उस ने तब तक माधवी का सिम कार्ड निकाल कर अपने फोन में डाल लिया. उस ने माधवी के नंबर से मनीष को एक मैसेज भेज दिया. उस ने मैसेज में लिखा कि आज घर पर कोई नहीं है. रात 8 बजे वह घंटे भर के लिए घर आ जाए.

पे्रमिका का मैसेज पढ़ते ही मनीष का दिल बागबाग हो गया. उस ने माधवी को फोन करना भी चाहा लेकिन उस ने इसलिए फोन नहीं किया क्योंकि माधवी ने उसे मैसेज के अंत में मना कर रखा था कि वह फोन न करे. केवल रात में जरूर आ जाए, ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा.

रात 8 बजे मनीष दबेपांव माधवी से मिलने उस के घर पर पहुंच गया. घर का मुख्य दरवाजा भिड़ा हुआ था. दरवाजा खोल जैसे ही वह सामने वाले कमरे में गया, उसे पीछे से माधवी के भाइयों ने दबोच लिया.

माधवी के भाइयों ने उस का मुंह दबा कर उस के सिर पर चारपाई के पाए से वार कर दिया. जोरदार वार से मनीष बेहोश हो कर गिर पड़ा. उस के गिरते ही उस पर उन्होंने लातघूंसों की बरसात शुरू कर दी. उन्होंने उस के गुप्तांग को पैरों से कुचल दिया. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

हत्या करने के बाद लाश को ठिकाने भी लगाना था. आपस में सलाह करने के बाद उस के शव को तलवार से नाभि के पास से 2 हिस्सों में काट डाला. करीब 4 घंटे तक मनीष की लाश उसी कमरे में पड़ी रही.

लाश के टुकड़ों से खून निकलना बंद हो गया तो रात करीब 1 बजे जूट की बोरी में दोनों टुकड़े भर लिए. उन्हें रेलवे लाइन पर फेंकने के लिए मुन्ना और बंडा बाइक से निकल गए. हत्या करने के बाद उस की सभी जेबें खाली कर ली गई थीं ताकि पहचान न हो सके. उस के महंगे दोनों मोबाइल स्विच्ड औफ कर के घर पर ही रख लिए.

मुन्ना और बंडा जब लाश ले कर घर से निकल गए तो घर पर मौजूद भूपाल और उस के बेटे कुंवरपाल ने कमरे से खून के निशान आदि साफ किए. इस के बाद उन्होंने हत्या में प्रयुक्त हथियार, मनीष के दोनों मोबाइल आदि को एक मालगाड़ी के डिब्बे में फेंक दिया. वह मालगाड़ी आगरा से कहीं जा रही थी. मनीष की जेब से मिले कागजों और पर्स को भी उन्होंने जला दिया.

मुन्ना और बंडा लाश को सोहल्ला रेलवे फाटक से करीब आधा किलोमीटर दूर आगरा-ग्वालियर रेलवे ट्रैक पर ले गए. बाइक रोक कर ये लोग मनीष के शव को बोरे से निकाल कर मुख्य लाइन पर फेंकना चाह रहे थे तभी उन्हें सड़क पर अपनी ओर कोई वाहन आता दिखाई दिया.

तब तक वे शव को बोरे से निकाल चुके थे. उन्होंने तुरंत लाश के दोनों टुकड़े लाइन पर डाल दिए और बोरी उठा कर वहां से भाग निकले.

दोनों भाइयों ने रास्ते में एक खेत में वह बोरी जला दी और घर आ गए. घर आ कर मुन्ना व बंडा ने खून के निशान वाले कपड़े नहाधो कर बदल लिए. जब उन्होंने शव को पास की ही रेलवे लाइन पर फेंकने की बात अपने पिता को बताई तो भूपाल ने माथा पीट लिया.

वह समझ गया कि लाश पास में ही डालने की वजह से उस की शिनाख्त हो जाएगी और पुलिस उन के घर पहुंच जाएगी. इसलिए सभी लोग घर का ताला लगा कर रात में ही 2 बाइकों पर सवार हो कर वहां से भाग निकले.

घर से भाग कर वे चारों माधवी व उस की मां के पास पहुंचे. वहां पर भूपाल सिंह ने पत्नी को सारा वाकया बताया तो वह भी डर गई. उसे पति व बेटों पर बहुत गुस्सा आया. लेकिन अब होना भी क्या था अब तो बस पुलिस से बचना था.

वे चारों वहां से भाग कर आगरा के पास धौलपुर स्थित एक परिचित के यहां पहुंचे. लेकिन पुलिस के लंबे हाथों से बच नहीं सके. सर्विलांस टीम की मदद से वे पुलिस के जाल में फंस ही गए. हत्या में माधवी का कोई हाथ नहीं था इसलिए उसे पूछताछ के बाद छोड़ दिया.

पूछताछ के बाद सभी हत्यारोपियों को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक सभी हत्यारोपी जेल की सलाखों के पीछे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों व मनीष के घर वालों के बयानों पर आधारित. माधवी परिवर्तित नाम है.

अंधविश्वास में दी मासूम बच्ची की बलि

खूनी नशा : एक गलती ने खोला दोहरे हत्याकांड का राज

गुरुवार 31 जनवरी को थोड़ी देर पहले बारिश हुई थी, इसलिए ठंड बढ़ गई थी. रात 8 बजते बजते ठंड से ठिठुरता भीमगंज मंडी कुहासे की चादर में लिपट गया था. इस के बावजूद बाजारों की चहलपहल में कोई कमी नहीं आई थी. इलाके में जैन मंदिर, राम मंदिर और गुरुद्वारा होने की वजह से आम दिनों की तरह उस दिन भी लोगों की अच्छीखासी आवाजाही थी.

सर्राफा कारोबारी राजेंद्र विजयवर्गीय का दोमंजिला मकान जैन मंदिर के सामने ही था. उन के परिवार में पिता चांदमल के अलावा 45 वर्षीय पत्नी गायत्री और 18 वर्षीय बेटी पलक थी. स्टेशन रोड पर उन की विजय ज्वैलर्स के नाम से सर्राफे की दुकान थी. राजेंद्र विजयवर्गीय के पिता चांदमल का रोजाना का नियम था कि शाम 7 बजे जब जैन मंदिर में आरती होती थी. वे घर से राम मंदिर जाने के लिए निकल जाते थे. मंदिर से वह स्कूटर से दुकान पर पहुंचते और दुकान बंद करने के बाद घर लौट आते थे, तब तक साढ़े 8 बज जाते थे.

पितापुत्र दोनों अकसर साथ ही घर लौटते थे. उस दिन राजेंद्र कुछ जरूरी काम निपटाने की वजह से दुकान पर ही रुक गए थे. जबकि चांदमल लगभग साढ़े 8 बजे नौकर के साथ घर लौट आए थे. नौकर को बाहर से ही रुखसत कर चादंमल ऊपरी मंजिल स्थित अपने निवास पर पहुंचे. उन्होंने गेट पर लगी कालबेल बजाई.

लेकिन रोजाना फौरन खुल जाने वाले दरवाजे पर कोई हलचल नहीं हुई. जबकि कालबेल की आवाज बाहर तक सुनाई दे रही थी. उन्होंने दरवाजे पर दस्तक देने की कोशिश की तो यह देख कर हैरान रह गए कि दरवाजा अंदर से लौक्ड नहीं था. वह एक ही धक्के में खुल गया. ऐसा पहली बार ही हुआ था.

चांदमल ने बहू गायत्री के कमरे की तरफ बढ़ते हुए आवाज लगाई तो वहीं खड़े रह गए. गायत्री के कमरे के बाहर खून बिखरा पड़ा था. बहू की खामोशी और फर्श पर बिखरे खून ने उन्हें इस कदर डरा दिया कि वे बुरी तरह चीख पड़े.

चांदमल के चिल्लाने की आवाज ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाली किराएदार रश्मि ने सुनी तो चौंकी. वह तभी मंडी से सब्जी ले कर लौटी थी. वह हड़बड़ाई सी सीढि़यों की तरफ दौड़ी. बदहवास से खड़े चांदमल ने कमरे में बिखरे खून की तरफ इशारा किया तो रश्मि ने पहले चांदमल को संभाला. फिर गायत्री की तलाश में कमरे की तरफ बढ़ी.

वहां का दृश्य देख कर चांदमल और रश्मि दोनों की आंखें फटी रह गईं. ड्राइंगरूम के फर्श पर गायत्री की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. चांदमल को संभालने की कोशिश में रश्मि को थोड़ा आगे पलक पड़ी दिखाई दी. उस के आसपास खून का दरिया सा बना हुआ था. साफ लगता था कि दोनों मर चुकी हैं.

चांदमल ने इस वीभत्स दृश्य को देखा तो उन के रहे सहे होश भी उड़ गए. सन्नाटे में खड़े चांदमल समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर ये सब कैसे हो गया. अंतत: उन्होंने जैसेतैसे रश्मि की मदद से खुद को संभाला और मोबाइल से बेटे राजेंद्र को इत्तला दी. इस के बाद उन्होंने रश्मि को फोन दे कर पुलिस को सूचना देने को कहा.

पुलिस को खबर देने के बाद रश्मि ने मोहल्ले के लोगों को आवाज दी. जरा सी देर में पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया. जैन मंदिर से भीमगंज मंडी पुलिस स्टेशन का फासला बमुश्किल एक किलोमीटर का है. थानाप्रभारी श्रीचंद्र सिंह ने फोन कर के उच्चाधिकारियों को घटना के बारे में बताया.

पुलिस अधिकारी पहुंचे घटनास्थल पर

इस के बाद श्रीचंद्र सिंह पुलिस टीम के साथ 15-20 मिनट में राजेंद्र विजयवर्गीय के मकान पर पहुंच गए. दोहरे हत्याकांड ने कोटा के पुलिस महकमे को हिला दिया था. आईजी विपिन कुमार पांडे, एसपी दीपक भार्गव, एडीएम पंकज ओझा सहित आधा दरजन थानों की पुलिस मौके पर पहुंच गई. डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया. विजयवर्गीय परिवार के घर के बाहर भारी भीड़ जुट गई थी.

पुलिस अधिकारियों ने देखा कि खून तो बैडरूम में फैला था, लेकिन गायत्री और पलक दोनों के शव ड्राइंगरूम में पड़े थे. पुलिस को लगा कि हत्यारों ने मांबेटी दोनों को उन के कमरों में मारा होगा और फिर शवों को घसीटते हुए ड्राइंगरूम में ला कर पटक दिया होगा.

दोनों के कमरों से ड्राइंगरूम तक खिंची खून की लकीर भी इसी ओर इशारा कर रही थी. जिस दरिंदगी से मांबेटी की हत्या की गई थी, उस से लगता था कि दोनों की हत्याएं किसी रंजिश की वजह से गई थीं.

इस बारे में राजेंद्र विजयवर्गीय का कहना था कि हम लोग तो सीधी सच्ची जिंदगी जी रहे थे. दुश्मनी या रंजिश का तो कोई सवाल ही नहीं है. लेकिन एसपी दीपक भार्गव राजेंद्र के जवाब से संतुष्ट नहीं थे. क्योंकि घटनास्थल का वीभत्स दृश्य साफ साफ रंजिश की ओर इशारा कर रहा था. हत्यारों ने किसी वजनी हथियार से दोनों के सिर, गरदन और हाथों पर इतने घातक वार किए थे कि उन का भेजा तक बाहर आ गया था.

मौका मुआयना करने के दौरान पुलिस को बैड पर 2 सरिए पड़े नजर आए. खून सना चाकू बैड के नीचे पड़ा था. चाकू पर लगा खून बता रहा था कि मांबेटी के गले उस चाकू से ही रेते गए होंगे. बैडरूम में रखी अलमारियों के टूटे हुए ताले बता रहे थे कि वारदात को चोरी डकैती के लिए अंजाम दिया गया था.

लेकिन राजेंद्र विजयवर्गीय सदमे की वजह से कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं थे. पुलिस ने भी उन पर दबाव नहीं बनाया. एसपी भार्गव का मानना था कि हत्यारे 2 या 2 से ज्यादा रहे होंगे. प्रारंभिक जांच और मौकामुआयना के बाद पुलिस ने दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए एमबीएस अस्पताल भिजवा दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दोनों की मौत हैड इंजरी से होनी बताई गई. गायत्री के सिर पर 5 चोटें थीं, साथ ही सिर में मल्टीपल फ्रैक्चर भी थे. सिर की कई हड्डियां टूट गई थीं. जबकि पलक के सिर में 2 चोटें थीं. इन में एक चोट इतनी घातक थी कि भेजा ही बाहर आ गया था.

हथियार सरियों के रूप में सामने आ चुके थे. गायत्री और पलक दोनों के हाथों पर भी गहरी खरोंचें और चोटें थीं.

मौके पर टूटी हुई चूडि़यों के टुकड़े भी पाए गए थे. इस का मतलब उन्होंने अपने बचाव के लिए बदमाशों से काफी संघर्ष किया था. मांबेटी के नाखूनों में त्वचा और मांस के अंश थे, जो हत्यारों के हो सकते थे. इस का पता लगाने के लिए नेल स्क्रैपिंग का सैंपल भी लिया गया. पुलिस की फोरैंरिक टीम ने भी मौके से फिंगरप्रिंट और फुटप्रिंट उठाए.

विजयवर्गीय के घर से एक सड़क सीधी स्टेशन की तरफ जाती थी और दूसरी हटवाड़े से होते हुए शहर की ओर. यही सड़क शहर के अलावा सैन्य क्षेत्र की तरफ भी जाती थी. यही वजह रही होगी कि हत्यारे बिना किसी की नजर में आए वारदात कर के आसानी से फरार हो गए थे.

नहीं मिल रहा था कोई क्लू

पुलिस यह सोच कर भी चल रही थी कि वारदात को अंजाम देने के लिए हत्यारों ने कम से कम 5-7 दिन तक रैकी की होगी. खोजी कुत्ते भी इसीलिए भटक कर रह गए थे. वारदात को जिस तरह अंजाम दिया गया था, उस से लगता था कि आरोपी विजयवर्गीय परिवार के अच्छे खासे परिचित रहे होंगे.

जिस घर में वारदात हुई, उस का मुख्यद्वार लोहे का था. लेकिन कुंडी ऐसी थी जो अंदर बाहर दोनों तरफ से आसानी से खोली जा सकती थी. ऐसे में घर में किसी के घुसने की खबर लगने का कोई मतलब ही नहीं था. राजेंद्र विजयवर्गीय की पत्नी गायत्री और ससुर चांदमल सामाजिक गतिविधियों से भी जुड़े हुए थे. इसलिए उन के यहां लोग अकसर आतेजाते रहते थे.

राजेंद्र विजयवर्गीय का कहना था कि घर में 5 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. जब कोई घर में ऊपर आता था तो गायत्री या पलक कैमरे में देख कर ही दरवाजा खोलती थीं. जाहिर है, इस का मतलब था आने वाले परिचित ही रहे होंगे.

दरअसल पुलिस को सभी कैमरे टूटे हुए मिले थे. उन की हार्डडिस्क भी गायब थी. इस का मतलब हत्यारे घर के चप्पेचप्पे से वाकिफ थे. घर की दोनों तिजोरियों के ताले तोड़े गए थे. मतलब बदमाशों को पता रहा होगा कि घर की दौलत उन्हीं तिजोरियों में है.

पोस्टमार्टम के बाद जब मांबेटी का अंतिम संस्कार किया गया. उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए हजारों लोग एकत्र हुए. व्यापारी संघ के लोगों में इस वारदात को ले कर अच्छाभला रोष था. उन्होंने पुलिस पर दबाव बनाने के लिए धरनेप्रदर्शन की चेतावनी भी दी.

अगले दिन यानी पहली फरवरी को एसपी दीपक भार्गव ने राजेंद्र से घर से चोरी गए सामान की बाबत पूछा तो उन्होंने बताया कि तिजोरियों में करीब एक करोड़ रुपए की नकदी और जेवर गायब हैं. इस का मतलब वारदात को धन के लालच में अंजाम दिया गया था. इस बात को राजेंद्र ने भी स्वीकार किया. इस से पुलिस को तफ्तीश की एक दिशा मिल गई. निस्संदेह इस वारदात में विजयवर्गीय परिवार का कोई करीबी ही शामिल रहा होगा.

10 टीमें जुटीं जांच में

दोहरे हत्याकांड का खुलासा करने के लिए डीजीपी विपिन पांडे के निर्देशन में एसपी दीपक भार्गव ने 10 टीमों का गठन किया. हत्या और लूट के मामले से जुड़े संदिग्ध और आदतन अपराधियों से पूछताछ का काम डीएसपी भंवर सिंह हाड़ा को सौंपा गया. उन की मदद के लिए हर थाने से 10 जवानों की टीम बनाई गई.

सीसीटीवी कैमरों को खंगालने की जिम्मेदारी उद्योगनगर पुलिस इंसपेक्टर विजय शंकर शर्मा और उन की टीम ने संभाली. इस के अलावा मामले से जुड़ी हर सूचना के एकत्रीकरण और पुलिस प्रशासनिक बंदोबस्त का प्रभारी थाना भीमगंज मंडी के इंसपेक्टर श्री चंद्र सिंह को बनाया गया.

पुलिस ने इलाके में वारदात के उस एक घंटे में किए गए सभी मोबाइल काल्स को राडार पर ले लिया. सौ से डेढ़ सौ कैमरों से सीसीटीवी फुटेज भी ली गई.

कैमरे खंगालने के लिए एडीशनल एसपी राजेश मील और प्रशिक्षु आईपीएस अमृता दुहन पूरी मुस्तैदी से लगे रहे. पुलिस की अलगअगल टीमों ने अपराधियों की तलाश में होटलों और धर्मशालाओं को भी खंगाला. एसपी दीपक भार्गव ने तो भीमगंज मंडी थाने में ही पड़ाव डाल दिया. वह पुलिस टीमों से पलपल की जानकारी लेते रहे. इस बीच पुलिस ने पूरी रेंज में हाई अलर्ट जारी कर दिया था. शहर की सीमाओं पर पूरी तरह नाकेबंदी कर दी गई थी ताकि अपराधी शहर छोड़ कर भागना चाहे तो धर लिया जाए.

अंगौछा बना सूत्र

इस दोहरे हत्याकांड की जांच में एक मोड़ शनिवार 2 फरवरी को उस समय आया जब पुलिस को घटनास्थल से सफेद रंग का एक अंगौछा मिला. संभवत: हत्यारे अफरातफरी में अंगौछा छोड़ गए थे.

पुलिस ने अंगौछे की पहचान को ले कर जब राजेंद्र विजयवर्गीय से पूछा, तो वे कुछ नहीं बता सके. अलबत्ता मुखबिरों में से एक ने संदेह जताया कि यह अंगौछा राजेंद्र की दुकान पर मुनीमी करने वाले मस्तराम का हो सकता है.

पुलिस जांच में मस्तराम जैसे सैकड़ों लोग राडार पर थे. रविवार 3 फरवरी की शाम पुलिस को एक मुखबिर से सूचना मिली कि राजेंद्र विजयवर्गीय परिवार का एक पुराना कर्मचारी आजकल जम कर पैसे उड़ा रहा है. उस ने 70 हजार का मोबाइल और महंगे कपड़े खरीदे हैं.

कहावत है कि अपराधी वारदात करने के बाद किसी न किसी बहाने मौकाएवारदात पर जरूर आता है. कई बार यही चूक उस के पकड़े जाने का सबब बनती है. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. 3 फरवरी को गायत्री और  पलक की शोकसभा थी. शोकसभा में मातमपुर्सी के लिए आया एक व्यक्ति फूटफूट कर रोने लगा. वह बारबार कह रहा था, ‘‘यह सब कैसे हो गया?’’

राजेंद्र को दिलासा देने के लिए जब वह उन के पास गया तो उस के मुंह से निकलती शराब की बदबू विजय की नाक तक पहुंच गई. उन्होंने उसे वहां से जबरन हटाने का प्रयास किया लेकिन वह और ज्यादा जोरों से रोने लगा.

शोकसभा में सादे कपड़ों में भीमगंज मंडी थानाप्रभारी श्रीचंद्र सिंह भी मौजूद थे. उन्हें यह सब कुछ अटपटा लगा तो उन्होंने राजेंद्र विजयवर्गीय से पूछा कि वह कौन है. राजेंद्र ने बताया कि उस का नाम मस्तराम मीणा है और वह बूंदी के बड़ा तीरथ गांव का रहने वाला है. उन्होंने यह भी बताया कि मस्तराम उन का बहुत विश्वस्त नौकर था. 3 साल पहले वह उन की दुकान पर मुनीम था.

नतीजतन मस्तराम पुलिस की नजर में चढ़ गया. पुलिस उसे उठा कर थाने ले आई. जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो पूरी कहानी पता चल गई. पता चला कि इस वारदात को मस्तराम ने अपने एक साथी लोकेश मीणा, जो उसी के गांव का रहने वाला था, के साथ मिल कर अंजाम दिया था.

मस्तराम मीणा और लोकेश मीणा एक ही गांव के रहने वाले थे और दोनों दोस्त थे. बूंदी जिले की केशोराय पाटन तहसील के बड़ा तीरथ गांव के रहने वाले 3 भाइयों के परिवार में 28 साल का मस्तराम अविवाहित था. उस के पिता किसान प्रभुलाल मीणा की 3 साल पहले मौत हो गई थी.

इस के बाद तीनों भाइयों ने पुश्तैनी जमीन 18 लाख में बेच दी थी और रकम का बंटवारा कर लिया था. मस्तराम को बंटवारे में 6 लाख रुपए मिले. उस ने यह रकम अय्याशी में उड़ा दी. मस्तराम ने केशवराय पाटन इंस्टीट्यूट से इलेक्ट्रिशियन ट्रेड में आईटीआई की परीक्षा पास की थी. शराब के नशे में हुड़दंग करने पर वह गांव वालों से कई बार पिट चुका था.

इस वारदात में मस्तराम का सहयोगी रहा लोकेश मीणा 10वीं में फेल होने के बाद से ही आवारागर्दी करने लगा था. उस ने आरसीसी पाइप्स की ठेकेदारी भी की थी. लेकिन झगड़ा फसाद करने के कारण धंधा नहीं चल पाया. केशोराय पाटन थाने में उस के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज थे.

कुछ समय पहले वह अपनी भाभी को भी ले कर भाग गया था. तभी से उस के घर वालों ने उस से किनारा कर लिया था. मस्तराम और लोकेश मीणा दोनों सोचते थे कि किसी बड़ी लूट को अंजाम दें और ऐशोआराम की जिंदगी जिएं.

मक्कारी में 2 कत्ल कर डाले

मस्तराम मीणा सर्राफ राजेंद्र विजयवर्गीय की दुकान पर नौकरी कर चुका था. उसे पता था कि घर का कौन सदस्य कब आताजाता है, नकदी जेवर कहां रखे हैं. उस ने लोकेश को अपनी योजना बताई कि एकदो को मारना तो पड़ेगा लेकिन मोटा माल मिलेगा. लोकेश इस के लिए तैयार हो गया.

कह सकते हैं कि इस हत्याकांड का मास्टरमाइंड मस्तराम ही था. पूछताछ में उस ने बताया कि दोनों ने वारदात से पहले दुकान और घर दोनों जगहों की रेकी की. रेकी के बाद वारदात का वक्त शाम के 7 बजे का रखा गया. उस समय राजेंद्र विजयवर्गीय दुकान पर होते थे और उन के पिता चांदमल को राम मंदिर में दर्शन करते हुए दुकान पर पहुंचना होता था.

रात साढ़े 8-9 बजे से पहले दोनों में से कोई नहीं लौटता था. ग्राउंड फ्लोर की किराएदार रश्मि अकेली रहती थी और उस वक्त सब्जी मंडी चली जाती थी. लूट के लिए हत्या करना पहले ही तय था, इसलिए दोनों सरिए और चाकू साथ ले कर आए थे. मांबेटी गायत्री और पलक दोनों उन्हें जानती थीं, इसलिए कालबेल बजाने पर दरवाजा खुलवाने में कोई दिक्कत नहीं थी.

दरवाजा खोलते ही गायत्री सामने नजर आई. दोनों को बैठने को कह कर जैसे ही वह अपने कमरे की तरफ बढ़ी, दोनों ने मौका दिए बगैर सरिए से उन के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए. फिर भीतर जा कर पलक का भी यही हाल किया. दोनों में जान न रह जाए, यह सोच कर मस्तराम और केशव ने चाकू से दोनों का गला रेत कर उन की मौत की तसल्ली कर ली.

बाद में दोनों ने मांबेटी की लाशों को घसीट कर ड्राइंगरूम में डाल दिया. मस्तराम को पता था कि जेवर और नकदी गायत्री के कमरे की तिजोरी में रखे होते हैं. मस्तराम और लोकेश अपने साथ बैग ले कर आए थे. तिजोरी तोड़ कर जितनी भी रकम और जेवर मिले, उन्होंने बैग में भरे और वहां से फुरती से निकल गए. बस पकड़ कर दोनों सीधे गांव पहुंचे और गहने व रकम का बड़ा हिस्सा घर में छिपा दिया.

फिर दोनों ने रात में ही बूंदी से रोडवेज की बस पकड़ी और जयपुर चले गए. जयपुर में दोनों बसस्टैंड के पास ही एक होटल में रुके. अगले दिन दोनों ने जम कर खरीदारी की और शराब पी. दोनों ने अपने लिए 70-70 हजार के महंगे मोबाइल फोन, कपड़े और अन्य सामान खरीदा. शनिवार 2 फरवरी को दोनों वापस कोटा आ गए.

मस्तराम को अपने पकड़े जाने का डर नहीं था. फिर भी अपनी इस तसल्ली के लिए कि किसी को उस पर शक न हो, वह शोक जताने का दिखावा करने चला गया. बस उस की यही सोच उसे ले डूबी. राजेंद्र विजयवर्गीय ने पुलिस को बताया कि हत्यारों ने करीब एक करोड़ की लूट की थी.

पुलिस ने दोनों आरोपियों के कब्जे से लूटे गए 37 लाख में से 21.70 लाख रुपए और 2 किलो 26 ग्राम सोना, साढ़े 13 किलो चांदी के जेवर बरामद कर लिए. मस्तराम ने बताया कि गायत्री और पलक जो गहने पहने थी, उन्होंने वे भी उतार लिए थे. सीआई श्रीचंद्र सिंह ने बताया कि आरोपियों के कब्जे से सोने की चेन और कंगन भी बरामद कर लिए गए.

लोकेश ने वारदात करने के बाद 8 लाख रुपए, कंगन और चेन अपने गांव जा कर खेत में गाड़ दिए. लूट की रकम का बंटवारा करने के बाद मस्तराम पाटन के एक गांव में अपने रिश्तेदारों के पास गया था. उस ने उन्हें 8 लाख रुपए यह कह कर रखने को दिए कि रकम जमीन बेच कर मिली है, थोड़े दिन रख लो फिर आ कर ले जाऊंगा.

वारदात खुलने के बाद मस्तराम के रिश्तेदारों ने यह रकम पुलिस को यह कहते हुए सौंप दी कि उन्हें इस घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

इस मामले में भीमगंज मंडी के थानाप्रभारी श्रीचंद सिंह की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही. शोकसभा में मस्तराम मीणा के हावभाव उन्हें खटके तो उन्होंने पूरा ध्यान उसी पर लगा दिया. इस कोशिश में उन्हें उस की कलाइयों पर खरोंचों के निशान नजर आए, जिस से उन का शक पुख्ता हो गया. उन्होंने कांस्टेबल शिवराज को उसे फौरन उठाने को कहा.

सीआई श्रीचंद्र सिंह ने बताया कि जयपुर में अच्छीखासी खरीदारी के बाद दोनों हत्यारे वापस होटल नहीं पहुंचे थे. अगले दिन होटल मालिक ने कमरे की सफाई करवाई तो प्लास्टिक की थैली में कपड़े मिले, जिन्हें स्टोर में रखवा दिया गया था. श्रीचंद्र सिंह ने वह थैली भी बरामद कर ली.

इस मामले को केस औफिसर स्कीम में लिया गया है और 15 दिन में कोर्ट में चालान पेश किया जाएगा. इस केस को सुलझाने में एएसपी राकेश मील, उमेश ओझा, प्रशिक्षु आईपीएस अमृता दुहन, डीएसपी भंवर सिंह, राजेश मेश्राम, सीआई महावीर सिंह, मुनींद्र सिंह, मदनलाल और विजय शंकर शर्मा सहित 200 पुलिसकर्मी शामिल रहे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित