बहू के भेष में आयी मौत

उत्तर प्रदेश जिला फिरोजाबाद के थाना शिकोहाबाद का एक गांव है औरंगाबाद. यहां के निवासी राजाराम बघेल के बेटे राकेश कुमार की उम्र काफी हो गई थी, लेकिन किसी वजह से उस की शादी नहीं हो पा रही थी. मांबाप को बेटे की शादी की चिंता सता रही थी. वे लोग चाहते थे कि किसी तरह राकेश का घर बस जाए. उन्होंने यह इच्छा अपने रिश्तेदारों को भी बता रखी थी.

राजाराम की रिश्ते की एक बहन रज्जो की बेटी रेनू आगरा के पास एत्मादपुर कस्बे में ब्याही थी. एक दिन रेनू ने बातों ही बातों में अपनी पड़ोसन को बताया कि उस के रिश्ते का एक भाई है राकेश, जिस की अभी तक शादी नहीं हुई है. कोई लड़की हो तो बताना.

पड़ोसन ने कुछ सोचते हुए कहा कि वह इटावा के पास जसवंतपुर में रहने वाली पूजा नाम की एक लड़की को जानती है. लड़की सुंदर और भले परिवार की है. लेकिन उस बेचारी के मांबाप नहीं हैं. तुम कहो तो मैं उस से बात कर सकती हूं. लेकिन एक बात और है, यदि बात बन गई तो शादी का दोनों तरफ का खर्चा राकेश के घर वालों को ही करना पड़ेगा.

रेनू ने यह बात मामा राजाराम को बताई तो वह उम्मीद की इस किरण को खोना नहीं चाहते थे. लिहाजा वह बेटे का घर बसाने के लिए दोनों तरफ का खर्चा करने के लिए तैयार हो गए. राजाराम एत्मादपुर में रेनू के यहां चले गए. उन्होंने शादी की बात चलाने वाली उस महिला से बात की तो उस महिला ने 40 हजार रुपए का खर्च बताया. इस के लिए राजाराम तैयार हो गए.

शादी के लिए रेनू ने अपनी पड़ोसन को 40 हजार रुपए मामा राजाराम से दिलवा दिए. दोनों पक्षों में आपसी रजामंदी से तय हुआ कि शादी मंदिर में करा ली जाए तो ठीक रहेगा. इस से शादी का अनावश्यक खर्चा बच जाएगा. और जो 40 हजार रुपए दिए हैं, उन से पूजा के लिए कपड़े, जेवर आदि खरीद लिए जाएंगे. बातचीत में तय हो गया कि शादी फिरोजाबाद के एक मंदिर में संपन्न करा ली जाएगी.

17 नवंबर, 2018 को दोनों पक्ष फिरोजाबाद के एक मंदिर में पहुंच गए. शादी में राकेश के कुछ रिश्तेदारों के साथ ही लड़की पूजा के चाचा, भाई व कुछ अन्य रिश्तेदार शामिल हुए. रीतिरिवाज से राकेश और पूजा का विवाह संपन्न हो गया.

शादी संपन्न होने के बाद दुलहन को विदा करा कर राकेश अपने घर औरंगाबाद गांव लिवा लाया. दूसरे दिन शादी की अन्य रस्मों के साथ ही कंगन खुलने की रस्म संपन्न हुई. घर में खुशी का माहौल था. शादी के बाद राकेश के मन में खुशी के लड्डू फूट रहे थे.

18 नवंबर को पूजा का भाई भी उस से मिलने आ गया. रात 8 बजे नईनवेली दुलहन पूजा ने घर का खाना खुद बनाया. घर में सास कंठश्री, ससुर राजाराम के अलावा पति राकेश ही था. सभी को खाना खिलाने के बाद बहू ने सोते समय सभी को पीने को दूध भी दिया.

बहू के इस व्यवहार से सभी खुश थे. घर के सब काम निपटाने के बाद पूजा भी पति के कमरे में चली गई. जहां राकेश उस का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था. दुलहन के आते ही राकेश ने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया. इस के बाद वह कुछ देर पूजा से बात करता रहा. बातचीत करते हुए उसे 10 मिनट ही हुए होंगे कि राकेश को नींद आने लगी.

अगले दिन जब राकेश की आंखें खुलीं तो वह शिकोहाबाद के जिला संयुक्त अस्पताल में था. राकेश को पता चला कि उस के अलावा उस के मातापिता भी वहां भरती हैं. सभी को बेहोशी की हालत में वहां पड़ोसियों ने भरती कराया था. अस्पताल से छुट्टी मिली तो वे लोग घर पहुंचे तो वहां न तो उस की पत्नी थी और न ही पत्नी का भाई.

दोनों भाईबहन के वहां न होने पर राकेश को चिंता हुई. घर में तलाशी लेने पर उसे पता चला कि उस के घर में रखे 80 हजार रुपए, सोनेचांदी की ज्वैलरी, नए कपड़ों के अलावा उस की मोटरसाइकिल भी गायब थी. इस का मतलब साफ था कि दोनों भाईबहन यह सामान ले कर रफूचक्कर हो चुके थे. फिर तो यह बात जंगल की आग की तरह पूरे गांव में फैल गई और गांव में लुटेरी दुलहन की चर्चा होने लगी.

किसी ने इस मामले की सूचना थाना शिकोहाबाद को दी तो थानाप्रभारी लोकेश भाटी भी औरंगाबाद में राजाराम के घर पहुंच गए. उन्होंने राकेश से घटना की जानकारी ली. थानाप्रभारी भी समझ गए कि दुलहन के रूप में उस के घर आई पूजा ही योजनाबद्ध तरीके से घर में लूटपाट कर सामान ले गई. इसलिए उन्होंने राकेश की तहरीर पर भादंवि की धारा 328, 380, 420, 34 व 411 के तहत मुकदमा दर्ज कर के मामले की पड़ताल शुरू कर दी.

उन्होंने इस की सूचना एसपी सचिंद्र पटेल को भी दे दी. एसपी सचिंद्र पटेल ने आरोपियों की तलाश के लिए एसपी (ग्रामीण) महेंद्र सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में सीओ अजय सिंह चौहान, थानाप्रभारी लोकेश भाटी, क्राइम ब्रांच प्रभारी कुलदीप सिंह आदि को शामिल किया गया.

शादी के दौरान राकेश के रिश्तेदारों ने पूजा और उस के परिजनों के कुछ फोटो अपने मोबाइल से खींच लिए थे. उन्होंने वह फोटो पुलिस को सौंप दिए. उन फोटो के आधार पर पुलिस ने मुखबिरों के माध्यम से लुटेरी दुलहन पूजा और उस के परिजनों को तलाशना शुरू कर दिया.

जिस महिला के माध्यम से यह शादी हुई थी, पुलिस ने उस महिला से भी पूछताछ की. वह महिला पुलिस को इटावा जिले के जसवंतनगर गांव में स्थित पूजा के घर पर भी ले गई, लेकिन वहां पूजा नहीं मिली.

पुलिस अपने स्तर से पूजा की तलाश कर रही थी, पर वह नहीं मिली. लेकिन इस जांच के दरम्यान पुलिस को एक महत्त्वपूर्ण जानकारी जरूर मिल गई. पता चला कि राकेश के साथ शादी रचा कर लूट करने वाली दुलहन पूजा जसवंतनगर की नहीं बल्कि जिला फिरोजाबाद के थाना रामगढ़ के अब्बास नगर निवासी सलीम की पत्नी रुखसाना है.

पुलिस ने बिना देरी किए अब्बास नगर में सलीम के घर दबिश डाल दी. उस समय रुखसाना घर पर ही मिल गई. महिला सिपाही प्रेमवती शर्मा ने उसे हिरासत में ले लिया.

थाने ला कर रुखसाना से पूछताछ की गई. उस ने बताया कि उस का नाम पूजा नहीं रुखसाना है और राकेश के यहां हुई लूट की घटना से उस का कोई संबंध नहीं है. जबकि शादी के फोटो से उस का चेहरा मेल खा गया. उस की बातचीत से लग रहा था कि वह झूठ बोल रही है. लिहाजा पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की.

सख्ती से पूछताछ करने पर रुखसाना टूट गई. उस ने न सिर्फ अपना यह अपराध स्वीकार किया बल्कि इस घटना में शामिल अपने गिरोह के साथियों के नाम भी पुलिस को बता दिए.

पूजा उर्फ रुखसाना द्वारा बताए गए साथियों को गिरफ्तार करने के लिए थानाप्रभारी ने एसआई शेर सिंह, हैडकांस्टेबल मनोज कुमार, महिला कांस्टेबल प्रेमवती शर्मा आदि की एक टीम क्राइम ब्रांच प्रभारी कुलदीप सिंह के नेतृत्व में भेजी.

टीम ने शिकोहाबाद के गांव लभौआ निवासी मुकेश कुमार, थाना रामगढ़ के छपरिया निवासी जुबैर, इटावा जिले के गांव टिमरुआ निवासी अनिल कुमार तथा थाना रामगढ़ के प्रतापनगर निवासी मनोहर सिंह को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस को इन के कब्जे से 12,350 रुपए नकद, राकेश के यहां से लूटे गए सोने के कुछ आभूषण व राकेश की चुराई गई बाइक भी बरामद कर ली. इन से पूछताछ में जो कहानी आई, वह इस प्रकार निकली—

यह 5 लोगों का गिरोह था, जो ऐसे युवकों को अपना शिकार बनाता था जिन की किसी वजह से शादी नहीं हो पा रही होती थी. पूजा उर्फ रुखसाना दुलहन बनती थी, जबकि अनिल कुमार व मुकेश कुमार मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे. जुबैर दुलहन का भाई व वृद्ध मनोहर सिंह फरजी दुलहन के चाचा की भूमिका निभाता था.

इसी तरह इन्होंने राजाराम के बेटे राकेश को फांसा था. 17 नवंबर को जब राकेश की शादी पूजा उर्फ रुखसाना से हुई, तो ये चारों लोग निश्चित समय पर मंदिर भी गए थे. शादी के बाद पूजा जब राकेश के घर पहुंची तो योजनानुसार जुबैर 18 नवंबर को शाम के समय राकेश के घर पहुंच गया.

जुबैर अपने साथ नशीला पाउडर ले कर गया था. दूध में नशीला पाउडर मिला कर राकेश, उस के पिता राजाराम व मां कंठश्री को रात में दे दिया गया. तीनों के बेहोश होते ही दुलहन बनी पूजा और नकली भाई जुबैर ने संदूक व अलमारी की तलाशी ली. उन्होंने उस में रखे नए कपड़े, 80 हजार रुपए की नकदी और ज्वैलरी निकाल ली. फिर दोनों राकेश की मोटरसाइकिल ले कर वहां से रफूचक्कर हो गए.

अभियुक्तों ने बताया कि उन के दिमाग में यह आइडिया अभिनेत्री सोनम कपूर की सन 2015 में आई फिल्म ‘डौली की डोली’ से आया था. जल्द पैसा कमाने के लिए इन लोगों ने भी गैंग बनाया.

गैंग का सदस्य मुकेश कुमार शादी कराने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाता था. रुखसाना पैसों के लालच में इस काम के लिए तैयार हो गई. रुखसाना 4 बच्चों की मां थी. पर अपनी शारीरिक बनावट से ऐसी नहीं दिखती थी.

लड़के पक्ष को बताया जाता कि यह बिना मांबाप की लड़की है. इसलिए शादी का खर्च भी यह दूल्हा पक्ष से ले लेते थे. इस तरह वह जिले के अनेक लोगों को अपना निशाना बना चुके थे. लूटे हुए माल को सभी आपस में बांट लेते थे.

पांचों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद एसपी (देहात) महेंद्र सिंह ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के केस का खुलासा किया. उन्होंने बताया कि जिस महिला के सहयोग से राकेश की शादी कराई गई थी, उस पर भी शक किया जा रहा है. इस के अलावा गिरोह में और भी लोगों के शामिल होने की आशंका व्यक्त की जा रही है. जांच के बाद जो भी आरोपी होगा, उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा जाएगा.

पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. उधर राकेश के पिता राजाराम की अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद फिर से तबीयत खराब रहने लगी. उन्हें शायद दूध में ज्यादा मात्रा में नशीला पदार्थ मिला दिया था, जिस से घटना के 20 दिन बाद 4 दिसंबर, 2018 को उन की मौत हो गई.

राजाराम की मौत हो जाने पर पुलिस ने केस में हत्या की धारा भी जोड़ दी. पुलिस मामले की जांच कर रही है. कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में बंद थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बड़े गुनाह की छोटी सजा : मासूम को नहीं मिला इंसाफ

सरकारी कारतूसों का नक्सली कनेक्शन

कारतूस कांड घोटाले का संबंध 6 अप्रैल, 2010 की एक हिंसक घटना से है. उस रोज दिनदहाड़े छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा इलाके में एक बड़ा नक्सली हमला हुआ था, जिस में सीआरपीएफ की एक टुकड़ी पर नक्सलियों ने अंधाधुंध गोलियां चला दी थीं.

इस हमले में कुल 76 जवान घटनास्थल पर ही मारे गए थे. इतनी बड़ी घटना से पूरे देश में हाहाकार मच गया था. सामान्य तौर पर नक्सली बारूदी विस्फोट करते रहे हैं या फिर जमीन के नीचे विस्फोटक बिछा देते थे. जबकि यह मामला सीधे गोलियां बरसाने का था.

इस की एसटीएफ द्वारा गहन जांच की जाने लगी तभी इस सिलसिले में एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई. घटनास्थल पर बरामद सैकड़ों कारतूस पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले यानी प्रतिबंधित थे. इस का सीधा अर्थ था कि नक्सलियों ने पुलिस से सांठगांठ कर गोलियां हासिल कर ली थीं. वे गोलियां 9 एमएम बोर की थीं. फिर क्या था, इस के बाद तो केंद्र समेत कई राज्य सरकारों के कान खड़े हो गए.

मामले की जांच उत्तर प्रदेश की एसटीएफ को सौंपी गई. एसटीएफ की टीम ने बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ समेत प्रदेश के कई जिलों में छापेमारी शुरू कर दी.

एसआई की डायरी ने खोले राज

एसटीएफ की टीम ने घटना के 3 सप्ताह बाद 29 अप्रैल, 2010 को रामपुर सिविल लाइंस थाना क्षेत्र के ज्वालानगर में रेलवे क्रौसिंग के पास छापेमारी की. तब सीआरपीएफ के 2 हवलदार विनोद पासवान और विनेश कुमार को गिरफ्तार किया था. उन के पास से कारतूस, राइफल और नकदी बरामद की गई थी.

इस के बाद एसटीएफ ने दोनों की निशानदेही पर अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया था. गिरफ्तार लोगों में पीएसी से रिटायर्ड दरोगा यशोदानंद भी शामिल था.

यही नहीं, एसटीएफ ने तीनों के कब्जे से 1.76 लाख रुपए और ढाई क्विंटल कारतूस के खोखे, मैगजीन और हथियारों के पुरजे बरामद किए थे.

इस मामले में एसटीएफ के दरोगा आमोद कुमार सिंह की तहरीर पर सिविल लाइंस रामपुर की कोतवाली में केस दर्ज किया गया था. उस समय रामपुर के एसपी रमित शर्मा थे. उन्होंने मामले को गंभीरता से लिया था और वर्तमान समय में प्रयागराज पुलिस कमिश्नर ने घटना की जांच अपनी निगरानी में शुरू करवाई थी. जांच के इस क्रम में टीम को यशोदानंद के पास से एक डायरी मिली थी.

यशोदानंद की डायरी में कई जिलों के पुलिस और पीएसी के जवानों के नाम लिखे थे. दरअसल, यशोदानंद उन से खोखा और कारतूस खरीदता था. एसपी ने डायरी के आधार पर सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था. कुल 25 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई थी. जांच और पूछताछ में करीब एक साल का वक्त लग गया था.

आखिरकार कोर्ट ने इस मामले में 31 मई, 2013 को आरोप तय कर दिया था. हालांकि इस के बाद केस की जब सुनवाई शुरू हुई, तब कोर्ट से सभी आरोपियों को जमानत मिल गई थी. केस की सुनवाई के दौरान ही इस मामले के सूत्रधार यशोदानंद की मौत हो गई थी.

इस तरह कारतूस घोटाले के जिन आरोपियों पर नक्सलियों से संबंध के भी आरोप लगे थे, वह एक गिरोह की तरह काम करते थे.

उस गिरोह का सरगना पीएसी का रिटायर्ड दरोगा यशोदानंद था, जबकि दूसरे सहयोगियों में पुलिस और पीएसी के जो 20 जवान रहे, वे हैं- (1) विनोद पासवान, निवासी महादेवगढ़, थाना भदोह, जिला पटना, बिहार. (2) विनेश, निवासी ग्राम धीमरी, थाना मझोला, जिला मुरादाबाद, यूपी. (3) दिनेश कुमार, निवासी गांव सुधनीपुर कलां, थाना सराय इनायत, प्रयागराज, यूपी. (4) वंशलाल, निवासी वीरपुर, थाना घाटमपुर, जिला, कानपुर नगर, यूपी. (5) अखिलेश पांडेय, निवासी रेकबार डीह, थाना सराय लखन, जिला मऊ, यूपी. (6) रामकृपाल सिंह, निवासी बिशनुपुरा, थाना बिरियारपुर, जिला देवरिया, यूपी. (7) नाथीराम सैनी, निवासी जलालपुर, थाना भवन, जिला शामली. (8) रामकृष्ण शुक्ल, निवासी सुगौना, थाना हरपुर बुधहट, जिला गोरखपुर. (9) अमर सिंह, निवासी चांद बेहटा, थाना कोतवाली नगर, जिला हरदोई. (10) बनवारी लाल, निवासी विजीदपुर, थाना फतेहपुर चौरासी, जिला उन्नाव. (11) राजेश कुमार सिंह, निवासी सोहगप, पूरनपट्टी थाना गुढऩी, जिला सीवान, बिहार. (12) राजेश शाही, निवासी हरैया, थाना तटकुलवा, जिला देवरिया. (13) अमरेश कुमार, निवासी देवनगर, थाना शिवली, जिला कानपुर देहात. (14) विनोद कुमार सिंह, निवासी उमती, थाना रानीपुर, जिला मऊ. (15) जितेंद्र सिंह, निवासी शेखपुरा, थाना बक्सा, जिला जौनपुर. (16) सुशील कुमार मिश्र, निवासी बजेटा, थाना लालगंज बनकटी, जिला बस्ती. (17) ओमप्रकाश सिंह, निवासी रघुनाथपुर, थाना खुरहजा बबुरी, जिला चंदौली. (18) लोकनाथ निवासी, विहिवा कलां, थाना कोतवाली, जिला चंदौली. (19) मनीष कुमार राय, निवासी पई, थाना भंडवा, जिला चंदौली. (20) रजयपाल सिंह, निवासी किशनपुर, थाना बकेवर, जिला फतेहपुर.

21 पुलिस जवानों को हुई सजा

इन पर भले ही  नक्सलियों को कारतूस की सप्लाई के आरोप लगे, लेकिन पुलिस आरोपियों और नक्सलियों के बीच के संपर्क को कोर्ट में साबित करने में नाकाम रही. बचाव पक्ष ने पुलिस पर ही सभी आरोपियों को झूठे केस में फंसाने का आरोप लगाया था. तब अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता प्रताप सिंह मौर्य और अमित कुमार ने केस की पैरवी करते हुए 9 गवाह पेश किए थे.

साल 2013 में भले ही आरोपियों पर दोष साबित नहीं हो पाया हो, लेकिन यह मामला बना रहा और आरोपियों से पूछताछ और घटनाक्रम की जांचपड़ताल जारी रही. अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि एसटीएफ ने मौके से आरोपियों की गिरफ्तारी की. कारतूस और दूसरे संदिग्ध सामान भी बरामद किए गए. यशोदानंद अलगअलग जिलों में तैनात आर्मरों से खोखा कारतूस खरीद कर नक्सलियों को सप्लाई करता था.

पूछताछ में नाथीराम सैनी ने गिरोह के कारनामे का खुलासा कर दिया. वह बी.आर. अंबेडकर पुलिस अकादमी, मुरादाबाद में आर्मर हैडकांस्टेबल था. उसे एसटीएफ ने मुरादाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर से गिरफ्तार किया था. नाथीराम ने बताया कि कैसे उस की मदद से पुलिस ने कारतूस घोटाले को अंजाम दिया था.

मुरादाबाद की पुलिस अकादमी में सबइंसपेक्टर की ट्रेनिंग होती है. पुलिस रंगरूटों को अभ्यास के लिए फायरिंग रेंज में निशाना लगाना होता है. प्रत्येक रंगरूट को निशाने के लिए 7 कारतूस मिलते थे. जबकि वह रिकौर्ड में 7 की जगह 70 दर्ज कर देता था. इस रिपोर्ट को वह अपने सीनियर अफसर को भेज देता था. इसी तरह के काम पीएसी और सीआरपीएफ के कुछ जवान भी करते थे.

शस्त्रागार से कारतूसों की हेराफेरी का यह अनोखा तरीका तब तक किसी की नजर में नहीं आया था. जबकि इस से जवान मोटी रकम हासिल कर लेते थे. कारतूस घोटाले का मास्टरमाइंड रिटायर्ड दरोगा यशोदानंद पुलिस, पीएसी और सीआरपीएफ में फायरिंग अभ्यास के बाद निकलने वाले खाली कारतूस खोखों को भी खरीद लेता था. इस के लिए वह पुलिस पीएसी और सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर के आर्मर के संपर्क में रहता था.

इस की विस्तृत जांच रिपोर्ट तत्कालीन एसपी रमित शर्मा ने बनाई थी और वह थाना सिविल लाइंस के तत्कालीन एसएचओ रईस पाल सिंह को सौंप दी थी. इस में एसआई देवकी नंदन गुप्ता को भी एसपी रमित शर्मा का सहयोगी बनाया गया था. देवकीनंदन ने ही विभिन्न जिलों से 21 पुलिस जवान और 4 अन्य आम नागरिकों को पकड़वाया था.

दोनों पक्षों की सुनवाई का महत्त्वपूर्ण दिन 12 अक्तूबर, 2023 को रामपुर की कचहरी के अपर जिला एवं स्पैशल जज (ईसी) की अदालत का था. इस मामले को सुनने के बाद स्पैशल जज विजय कुमार ने सभी आरोपियों को सरकारी संपत्ति चोरी करने, चोरी का माल बरामद होने और षडयंत्र रचने की धाराओं में दोष सिद्ध कर दिया.

अगले दिन 13 अक्तूबर को उन्हें सजा सुनाई जानी थी. दिन के 10 बज चुके थे. जिला न्यायाधीश विजय कुमार अपने चैंबर में प्रवेश कर चुके थे. कुछ समय में वह अदालत में दाखिल हो गए. अदालत कक्ष खचाखच भरा हुआ था. परिसर में पुलिसकर्मी, मीडियाकर्मी, आरोपियों के परिजनों का भी जमावड़ा लगा हुआ था.

अदालत की काररवाई शुरू हो चुकी थी. पेशकार ने न्यायाधीश महोदय के सामने केस की फाइलें रख दी थीं. उन्होंने सामने रखी फाइलों को खोल कर कुछ कागजात देखते हुए सामने खड़े सरकारी वकील प्रताप सिंह मौर्य और अमित सक्सेना से मामले के बारे में बताने को कहा था.

इस दौरान बचाव पक्ष के वकील शंकर लाल लोधी, पी.के. नंदा, सुधीर सरन कपूर, विनीत चौधरी भी मौजूद थे. उन की दलीलों को न्यायाधीश ने नहीं माना. बचाव पक्ष से सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर, रामपुर के तत्कालीन असिस्टेंट कमांडर जे.एन. मिश्रा को भी अदालत ने तलब किया था. वर्तमान में जे.एन. मिश्रा कश्मीर के पुलवामा में तैनात हैं.

सीआरपीएफ जवानों के अनुरोध पर उन की कोर्ट में गवाही हुई थी. घटना के समय वह सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर, रामपुर में तैनात थे. अपनी गवाही में असिस्टेंट कमांडर जे.एन. मिश्रा ने सीआरपीएफ जवानों को बचाने का प्रयास किया. उन्होंने कहा था कि घटना के समय जवानों की मौजूदगी सीआरपीएफ कैंपस में ही थी, लेकिन अदालत ने उन के बयान को नकार दिया था.

सरकारी वकील ने पिछली सुनवाई में 9 गवाहों के बयानों के चलते अभियुक्तों के बच जाने का हवाला देते हुए नई रिपोर्ट के आधार पर संक्षिप्त जानकारी दी और उन्हें सख्त से सख्त सजा देने की गुजारिश की. इस आधार पर ही बीते दिन 12 अक्तूबर को आरोपियों को दोषी ठहराया गया था.

दोषी ठहराए गए 20 जवानों के अलावा  4 आम लोगों को भी इस मामले में दोषी ठहराया गया था. इस में बिहार के रोहतास के डेहरीआन सोन के तेंदवा थाना के मुरलीधर शर्मा, मऊ के हलधर थाना के अगडीपुर गांव निवासी दिलीप कुमार एवं आकाश और गाजीपुर जिले के थाना बिरनो के बद्ïदूपुर गांव निवासी शंकर हैं.

उत्तर प्रदेश के रामपुर कारतूस कांड में सभी आरोपियों को 10-10 साल की कैद की सजा के साथसाथ 10-10 हजार रुपए का जुरमाना भी लगाया गया. इस के अलावा सीआरपीएफ के दोनों हवलदारों विनाद कुमार पासवान और विनेश कुमार को आम्र्स ऐक्ट में 7-7 साल की सजा और 10-10 हजार का जुरमाना भी लगाया. सभी को अदालत से ही दोपहर बाद सीधा जेल भेज दिया गया.

दुलहनें जो ब्लैकमेल करें, लूटें, मार भी डालें

शादी वाले घर में कुछ रीतिरिवाजों से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया गया था. इस कार्यक्रम में नवविवाहिता शिवानी का तथाकथित भाई और दूसरे साथी भी शामिल हुए.

अगली रात शिवानी ने अपने पति और उस के घर वालों को खाने में नशीला पदार्थ खिला कर बेहोश कर दिया. फिर अपने साथियों के साथ मिल कर शादी का सामान और लाखों रुपए के जेवर ले कर फरार हो गई. यह बात 21 दिसंबर, 2023 की है.

उत्तर प्रदेश के गोंडा में 27 दिसंबर, 2023 को एक अजबगजब चोरी का मामला सामने आया. यहां एक नवविवाहिता अपने ससुराल वालों को नशीला पदार्थ खिला कर घर में रखी नकदी और कीमती जेवर ले कर फरार हो गई. जब ससुराल वालों को होश आया तो उन के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई. उन्होंने फौरन पुलिस में इस की शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने आरोपी नवविवाहिता को अपने गिरफ्त में ले लिया. उस के साथ 4 अन्य लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

बाद में पुलिस ने लुटेरी दुलहन समेत उस के साथियों को गिरफ्तार कर लिया. आरोपियों के पास लूटे गए लाखों रुपए के जेवरात, घर के सामान, 350 नशीली गोलियां और एक मोबाइल फोन बरामद हुआ.

इन ठगों ने पूछताछ में स्वीकार किया कि उन का एक संगठित गिरोह है, जो रुपयों के लिए कई तरीके अपना कर ऐसी घटनाओं को अंजाम देता है.

मामला कुछ ऐसा हुआ कि गोंडा जिले के खरगूपुर थाना क्षेत्र के निवासी बृजभूषण पांडेय की किसी वजह से शादी नहीं हो रही थी. तब जोखू नाम के एक बिचौलिए ने लखीमपुर खीरी की शिवानी उर्फ गोमती देवी नाम की युवती से बीते 17 दिसंबर को धूमधाम से उस की शादी करा दी.

यह कैसे फंसाती हैं शिकार को

नवंबर 2023 में भी कानपुर पुलिस ने ऐसी ही एक लुटेरी दुलहन को गिरफ्तार किया था. उस ने पहले पति को तलाक दिए बिना 2 युवकों से शादी की और उन्हें लाखों की चपत लगा दी थी. शातिर महिला का शिकार हुए तीसरे पति ने महिला की असलियत जानने के बाद पुलिस से शिकायत की.

यह महिला सरकारी नौकरी वालों को शिकार बनाती थी और फेसबुक पर दोस्ती का झांसा दे कर शिकार को फंसाती थी. वह सरकारी नौकरी वाले युवकों को प्रेम जाल में फंसाने के बाद उन से शादी करती थी और शादी के बाद लूट का खेल शुरू होता था.

शादी के कुछ समय बाद वह अपने पति से पहले लाखों रुपयों की डिमांड करती थी. ऐसा ही उस ने तीसरे पति शिवम के साथ किया. मगर शिवम ने आर्थिक स्थिति का हवाला दे कर उस की मांग पूरी करने से इंकार दिया. तब उस महिला, जिस का नाम संगीता था, ने स्पाई कैमरे से शिवम के अश्लील वीडियो बनाए और रेप में फंसाने की धमकी देने लगी.

इस से शिवम डर गया. शिवम को पता चला कि संगीता पहले भी कुछ लोगों को शिकार बना चुकी है. उस ने मामले की शिकायत पुलिस से की. जांच में सामने आया कि संगीता की पहली शादी 2017 में आनंद बाबू नामक शख्स से हुई थी. संगीता ने नपुंसक बता कर बिना तलाक दिए पति को छोड़ दिया था. उस के बाद से पैसों के लालच में वह सरकारी नौकरी पेशा लोगों को शिकार बनाने लगी.

फरवरी 2023 में अजमेर के रहने वाले अंकित की शादी भी गोरखपुर की रहने वाली गुडिय़ा से हुई थी. शादी से पहले दुलहन के कथित परिवार वालों ने 80 हजार रुपए नकद और कुछ पैसे औनलाइन ट्रांसफर कराए थे. इस शादी के बाद दोनों परिवार के लोग बनारस से सटे चंदौली जिले के एक गेस्टहाउस में रुके.

शादी की सारी रस्में पूरी हो गईं. विदाई का वक्त हुआ. अंकित ने विदाई कराई. उसे दुलहन को ले कर अजमेर जाना था. सब ट्रेन में सवार हुए. ट्रेन में दुलहन का एक परिचित भी बैठ गया. बनारस से कानपुर तक का सफर सही रहा.

ट्रेन जब कानपुर पहुंची तो दुलहन के इस ‘परिचित’ छोटू ने अपनी पोटली खोली. छोटू की पोटली में नशीला पाउडर था. उस ने अंकित और अंकित के घर वालों को चाय और नमकीन में नशीला पदार्थ मिला कर बेहोश कर दिया. फिर सामान वगैरह लूट कर वह दुलहन अपने साथी छोटू के साथ फरार हो गई. परिवार की बेहोशी टूटी तो उन्हें पूरा मामला समझ में आया और थाने में रिपोर्ट लिखाई गई.

बाद में लुटेरी दुलहन पुलिस की गिरफ्त में आई. इस युवती को दुलहन बनने का इतना शौक था कि वह हर महीने एक दूल्हे को फंसा कर उस से शादी करती थी और उस के बाद माल ले कर अपने साथियों के साथ फरार हो जाती थी.

मामले एक जैसे, लोग सतर्क क्यों नहीं

दिसंबर 2022 में जयपुर पुलिस ने दिल्ली से एक ‘लुटेरी दुलहन’ को गिरफ्तार किया था, जिस ने जुलाई 2022 में शादी की थी. शादी के बदले में दूल्हे के परिवार से 3 लाख रुपए लिए गए थे.

शादी के एक हफ्ते बाद ही दुलहन घर से गहने और 2 लाख रुपए ले कर फरार हो गई थी. पुलिस ने इस मामले में 2 लोगों को भी गिरफ्तार किया था, जिन का काम ही शादी के नाम पर लोगों को ठगना था.

इन सभी मामलों में ठगी का ट्रेंड लगभग एक जैसा रहा है. ठगों का पूरा गैंग होता है. इन में पुरुष सदस्य बिचौलिए का काम करते हैं. वे ऐसे लड़कों का पता लगाते हैं, जो शादी के लिए लड़की की तलाश कर रहे होते हैं. फिर गैंग के ही लोग दुलहन परिवार के सदस्य बन कर दूल्हे के परिवार वालों से मिलते हैं.

शादी से कुछ दिन पहले के बाद खर्च के नाम पर दूल्हे के परिवार से पैसों की मांग की जाती है. कुछ दिन बाद ही दुलहन नकदी और जेवर अपने साथ ले कर फरार हो जाती है. कुछ मामलों में तो एक ही लड़की ने कई बार लुटेरी दुलहन बन कर वारदात को अंजाम दिया है. कई बार शादी वाले जेवर ले कर दुलहन भाग जाती है.

ऐसी ही कहानी अभिनेत्री सोनम कपूर अभिनीत फिल्म ‘डौली की डोली’ की थी, जो 23 जनवरी, 2015 को रिलीज हुई थी. इस फिल्म में सोनम लुटेरी दुलहन बनी थी. फिल्म में सोनम एक ऐसी लुटेरी दुलहन के किरदार में नजर आई, जो पैसों के लिए शादी करती थी और फिर लड़के को धोखा दे देती है.

सोनम ने फिल्म में एक छोटे शहर की ऐसी लड़की का किरदार निभाया था, जिस के सपने बड़े थे. कुछ समय बाद वह दिल्ली आ जाती है और यहीं से पैसों के लिए लड़कों को ठगते हुए लुटेरी दुलहन बन जाती है.

छानबीन है बहुत जरूरी

शादीब्याह ऐसा मामला है, जिस में 2 परिवार मिलते हैं. उन के बीच हमेशा के लिए एक रिश्ता बन जाता है. इस रिश्ते की डोर सोचसमझ कर ही किसी के हाथों में देनी चाहिए. अचानक इतने बड़े फैसले नहीं लेने चाहिए. खासकर उस समय जब सामने वाला परिवार परिचित नहीं है.

पहले उस परिवार के बारे में दूसरों से खोज खबर लीजिए. उस परिवार और लड़की को भलीभांति समझिए. जब तक सही जानकारी न मिले, शादी करने की जल्दी मत कीजिए.

धोखे से बचना है तो सतर्कता बहुत जरूरी है. कोशिश यह करनी चाहिए कि किसी परिचित परिवार से ही रिश्ता जोड़ें या ऐसे परिवार से जिसे आप का कोई जानने वाला पहले से जानता हो. व्यक्ति को परखिए. उस के बाद ही शादी के लिए ‘हां’ बोलिए.

कलावती और मलावती का दुखद अंत

बड़े गुनाह की छोटी सजा : मासूम को नहीं मिला इंसाफ – भाग 3

पुलिस ने मुन्ना को दिल दहला देने वाली यातनाएं दे कर जुर्म कबूल करवा लिया कि उस के सोनू व उस की 10 वर्षीय बेटी दिव्या से नाजायज संबंध थे. दिव्या के रेप व मर्डर की बात कबूल करा कर उसे कानपुर कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया. लेकिन पुलिस की इस कहानी को सोनू भदौरिया ने सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि मुन्ना बेगुनाह है. पुलिस ने उसे झूठा फंसाया है. मीडिया वालों ने मुन्ना लोध की गिरफ्तारी पर संदेह जता कर छापा तो पुलिस तिलमिला उठी.

सोनू भदौरिया व उस की बेटी दिव्या के चारित्रिक हनन तथा मुन्ना लोध को झूठा फंसाने को ले कर शहर की जनता में फिर से गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

महिला मंच की नीलम चतुर्वेदी, अनीता दुआ, पार्षद आरती दीक्षित, गीता निषाद, श्रम संगठन के ज्ञानेश मिश्रा तथा स्कूली बच्चों ने जगहजगह धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिए. बड़े प्रदर्शन से पुलिस बौखला गई और उस ने प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं. पुलिस ने उन पर शांति भंग करने का मुकदमा भी दर्ज कर दिया.

एसपी (ग्रामीण) लालबहादुर व सीओ लक्ष्मीनारायण की शासन में पकड़ मजबूत थी. इसी का लाभ उठा कर उन्होंने पुलिस बर्बरता कायम रखी. सोनू भदौरिया की मदद को जो भी आगे आया, पुलिस अफसरों ने उसे प्रताडि़त किया और झूठे मुकदमे में फंसा दिया. पुलिस रात में दरवाजा खटखटा कर लोगों को डराने लगी.

महिला दरोगा शालिनी सहाय सोनू भदौरिया को धमकाती कि वह केस वापस ले ले. साथ ही सोनू को शहर छोड़ कर गांव चली जाने का भी दबाव बनाया गया. वह उस की बेटी दीक्षा से कहती थी कि वह मां से कहे कि उसे शहर में नहीं गांव में जा कर रहना है.

सोनू के मकान मालिक राजन शुक्ला को भी पुलिस ने धमकाया कि वह सोनू को मकान से निकाल दे. पुलिस ने राजन शुक्ला, उन के भतीजे तथा अन्य किराएदारों को भी पूछताछ के नाम पर प्रताडि़त किया.

समाचार पत्रों ने भी निभाई भूमिका

स्थानीय समाचार पत्रों ने पुलिस की इस दमन नीति को सुर्खियों में छापना शुरू किया तो पुलिस अफसरों की भृकुटि तन गईं. उन्होंने अखबारनवीसों को चेताया कि पुलिस की छवि खराब न करें अन्यथा परिणाम अच्छा नहीं होगा.

लेकिन पुलिस की धमकी से अखबारनवीस डरे नहीं, बल्कि उन्होंने दिव्या कांड व पुलिस की दमन नीति को ले कर कानपुर शहर व प्रदेश की कानूनव्यवस्था बिगड़ने के खतरे का समाचार प्रकाशित किया.

इस के बाद यह मामला सड़क से संसद तथा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक गूंजा. सांसद राजाराम पाल ने दिव्या कांड का मामला संसद में उठाया तो कानपुर शहर के विधायकों ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को इस मामले से अवगत कराया.

राज्यपाल ने प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को चिट्ठी लिखी. इस के बाद जब यह मामला मायावती के संज्ञान में आया तो उन्होंने त्वरित काररवाई करते हुए 23 अक्तूबर, 2010 को यह मामला लखनऊ सीबीसीआईडी को सौंप दिया. यही नहीं मायावती ने दिव्या कांड को उलझाने वाले तथा आरोपियों की मदद करने वाले पुलिस अफसरों पर भी बड़ी काररवाई की.

डीआईजी प्रेम प्रकाश का शासन ने स्थानांतरण कर दिया और उन के खिलाफ जांच बैठा दी गई. एसपी (ग्रामीण) लाल बहादुर, सीओ लक्ष्मीनारायण मिश्र तथा इंसपेक्टर अनिल कुमार को तत्काल निलंबित कर उन के खिलाफ साक्ष्य छिपाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी गई.

आखिर ऊंट आया पहाड़ के नीचे

मामला सीबीसीआईडी के हाथ में आया तो इंसपेक्टर ए.के. सिंह ने अपनी टीम के साथ बारीकी से जांच शुरू की. उन्होंने स्कूल जा कर छानबीन की और खून आदि के नमूने एकत्र किए. इस के बाद मृतका दिव्या के आंतरिक वस्त्र और स्कर्ट में मिले स्पर्म का नमूना लिया. स्पर्म ब्लड के मिलान के लिए जांच अधिकारी ए.के. सिंह ने सीएमएम कोर्ट में 13 लोगों का नमूना लेने की अरजी डाली.

अरजी मंजूर होने पर 9 नवंबर, 2010 को सीबीसीआईडी ने अदालत के आदेश पर चंद्रपाल वर्मा, मुकेश वर्मा, पीयूष वर्मा, संतोष व मुन्ना सहित 13 संदिग्धों के रक्त के नमूने सीएमएम अदालत में लिए. पीयूष, मुकेश, संतोष व चंद्रपाल का स्पर्म नमूना ले कर लखनऊ स्थित एफएसएल लैब भेजा गया. जांच में पीयूष वर्मा के स्पर्म का नमूना दिव्या के स्कर्ट से मिले स्पर्म से मेल हो गया.

सीबीसीआईडी ने अपनी जांच में पीयूष वर्मा, मुकेश वर्मा, चंद्रपाल वर्मा तथा संतोष वर्मा को मामले में दोषी ठहराया, जिस में पीयूष वर्मा को मुख्य आरोपी तथा 3 अन्य को साक्ष्य छिपाने तथा गैरइरादतन हत्या का ठहराया, जबकि मुन्ना लोध को निर्दोष बताया गया. विवेचना के दौरान सीबीसीआईडी को मुन्ना के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला.

सीबीसीआईडी ने धारा 196 (अपराध का होना न पाया जाना) के तहत कोर्ट में अरजी दी. जिस के आधार पर मुन्ना के वकील शिवाकांत दीक्षित ने कोर्ट में बहस की. अदालत ने उसे दोषमुक्त करार दे कर जेल से छोड़ने का आदेश दिया.

11 जनवरी, 2011 को सीबीसीआईडी ने डीएनए टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर पीयूष वर्मा के खिलाफ भादंवि की धारा 377, 302, 201, 109, 376(2)(एफ), 202, 511 के तहत कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की. वहीं चंद्रपाल वर्मा, मुकेश वर्मा और संतोष के विरुद्ध भादंवि की धारा 304ए, 201 के तहत कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई.

आरोपियों ने अपने बचाव व जमानत के लिए कानपुर कोर्ट के चर्चित अधिवक्ता गुलाम रब्बानी को नियुक्त किया, जबकि सोनू भदौरिया ने केस को मजबूती से लड़ने के लिए अधिवक्ता अजय सिंह भदौरिया व संजीव सिंह सोलंकी को नियुक्त किया.

अजय सिंह ने आर्थिक रूप से कमजोर सोनू का केस नि:शुल्क लड़ा. गुलाम रब्बानी ने आरोपियों की जमानत हेतु कोर्ट में जम कर बहस की. दूसरी ओर अभियोजन पक्ष के वकील अजय सिंह ने उन के तर्कों का विरोध किया. दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कोर्ट ने आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद चंद्रपाल वर्मा, मुकेश वर्मा, पीयूष व संतोष ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

हाईकोर्ट ने अंतत: 2 साल जेल में रहने के बाद 19 अप्रैल, 2012 को चंद्रपाल वर्मा, मुकेश व संतोष को जमानत दे दी. लेकिन पीयूष को जमानत नहीं मिली.

इस के बाद इस मामले की कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. सीबीसीआईडी के अधिवक्ता नागेश कुमार दीक्षित ने कोर्ट के सामने मामले को रेयरेस्ट औफ रेयर बताया और आरोपियों के लिए फांसी की सजा की मांग की.

अदालत ने खूब निभाई अपनी भूमिका

अभियोजन पक्ष ने इस मामले में 39 गवाह पेश किए. बचावपक्ष की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता गुलाम रब्बानी ने कोर्ट में 39 गवाहों से 115 पेज की लिखित बहस पेश की. वहीं जवाब में पीडि़त पक्ष (अभियोजन) की ओर से सीबीसीआईडी के वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी नागेश कुमार दीक्षित व पीडि़ता के अधिवक्ता अजय सिंह भदौरिया व संजीव सिंह सोलंकी ने मात्र 12 पेज की संक्षिप्त बहस में सभी तर्कों को खारिज कर दिया.

एडीजे द्वितीय ज्योति कुमार त्रिपाठी ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कहा, ‘‘बचाव पक्ष के सभी तर्क निराधार हैं. यह एक गंभीर अपराध है. ऐसे अपराध रेयरेस्ट औफ रेयर की ही श्रेणी में आते हैं. ऐसे अपराध और कुकृत्य से समाज में दहशत फैलती है, इसलिए इस अपराध के अभियुक्तों को किसी भी सूरत में राहत नहीं दी जा सकती.’’

इसी के साथ ही उन्होंने दुष्कर्म और हत्या के आरोपी पीयूष वर्मा को आजीवन कारावास की सजा तथा 75 हजार रुपए का जुरमाना भरने की सजा सुनाई.

rapiest-piyush-verma-divya-rape-case

सहअभियुक्त मुकेश वर्मा व संतोष कुमार उर्फ मिश्राजी को गैर इरादतन हत्या व अपराध की सूचना न देने का दोषी मानते हुए एक साल 3 महीने की सजा तथा 21 हजार रुपए के जुरमाने की सजा दी गई. साक्ष्य के अभाव में अदालत ने चंद्रपाल वर्मा को बरी कर दिया गया. माननीय जज ने जुरमाने की आधी रकम पीडि़त पक्ष को देने का आदेश दिया.

दिव्या रेप मर्डर में फैसला आने में 8 साल का समय लगा. इस का कारण गवाहों का अधिक होना था. कभी गवाह के न आने तो कभी आने पर भी गवाही न होने के कारण तारीख पर तारीख लगती रही. यह मुकदमा 4 कोर्टों में ट्रांसफर हुआ. सुनवाई के दौरान 7 जज बदले.

अंत में 5वीं कोर्ट के एडीजे द्वितीय ज्योति कुमार त्रिपाठी ने अंतिम बहस पूरी की और फैसला सुनाया. फैसले के बाद पीयूष वर्मा को जेल भेज दिया गया.

कोर्ट के फैसले से दिव्या की मां सोनू भदौरिया खुश नहीं है. उस का कहना है कि पीयूष वर्मा को फांसी की सजा मिलनी चाहिए थी. अन्य आरोपियों को भी कम सजा मिली है. वह कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपियों को अधिक सजा दिलाने के लिए हाईकोर्ट की शरण लेगी और अपने अधिवक्ता अजय सिंह भदौरिया के मार्फत अपील करेगी.

—कथा कोर्ट के फैसले तथा लेखक द्वारा एकत्र की गई जानकारी पर आधारित

बड़े गुनाह की छोटी सजा : मासूम को नहीं मिला इंसाफ – भाग 2

रिपोर्ट दर्ज कर के भी मनमानी  करती रही पुलिस

भारतीय ज्ञान स्थली स्कूल में मासूम छात्रा दिव्या से कुकर्म व हत्या की सूचना पा कर कल्याणपुर थानाप्रभारी अनिल कुमार सिंह, रावतपुर चौकी इंचार्ज शालिनी सहाय, सीओ लक्ष्मीनारायण मिश्रा, एसपी (ग्रामीण) लाल बहादुर श्रीवास्तव तथा डीआईजी प्रेमप्रकाश भी हैलट अस्पताल पहुंच गए.

उन्होंने हंगामा कर रहे लोगों को किसी तरह शांत कराया और कहा कि घटना की जांच होगी. दोषियों को किसी भी हालत में बख्शा नहीं जाएगा. शाम 6 बजे सोनू भदौरिया की तहरीर पर भारतीय ज्ञान स्थली स्कूल के प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा तथा उन के दोनों बेटों पीयूष वर्मा व मुकेश वर्मा के खिलाफ कुकर्म व हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई.

रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस अधिकारियों ने स्कूल में छापा मारा तो वहां ताला बंद मिला. पुलिस स्कूल के पास ही रह रहे स्कूल के प्रबंधक के घर पहुंची तो प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा तथा उस के दोनों बेटे पीयूष वर्मा व मुकेश वर्मा फरार थे. घर में मौजूद महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उन से स्कूल की चाबी ले कर स्कूल खोला गया. पुलिस ने जब स्कूल की जांच की तो वहां पर दिव्या के साथ हुई हैवानियत के सबूत मिलने शुरू हो गए.

पुलिस को स्कूल की सीढि़यों पर खून के धब्बे मिले. सीढि़यों से ऊपर बने लैब में भी खून के धब्बे थे, जिन्हें पोंछने तथा साफ करने का प्रयास किया गया था. एक कुरसी पर भी खून लगा था. इस के अलावा बाथरूम में भी खून फैला था अैर वाशबेसिन टूटा था.

स्कूल में लगे सीसीटीवी कैमरों से छेड़छाड़ की गई थी, वे सब बंद थे. एसपी (ग्रामीण) के आदेश पर खून के धब्बों का खून बतौर सैंपल एकत्र कर लिया गया. इस के साथ ही दिव्या के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

भारतीय ज्ञान स्थली स्कूल का प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा शातिर दिमाग व्यक्ति था. उस की शासन प्रशासन में अच्छी पकड़ थी. उस ने जब खुद को और बेटों को फंसते देखा तो पहले ही दिन से बेटों व स्वयं को बचाने के लिए हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए. उस ने हर उस अधिकारी को प्रभाव में लेने का प्रयास किया, जो मामले की जांच कर रहा था.

हर वह सबूत मिटाने का प्रयास किया, जो उन लोगों को फंसा सकता था. वह हर उस नेता को खरीदने का प्रयास करने लगा, जो सोनू भदौरिया का साथ दे रहा था. उस ने कई ऐसे गुर्गों को भी अपने पक्ष में कर लिया था, जो सोनू भदौरिया को केस वापस लेने को धमका सकें.

दौलत के प्रभाव में लपेटा कई को

चंद्रपाल वर्मा के प्रभाव का असर यह हुआ कि घटना की शाम तक सोनू के पक्ष में खड़ी पुलिस अचानक बदल गई. पुलिस अधिकारी कहने लगे कि यह मामला दुष्कर्म का नहीं है. दिव्या की मौत बीमारी से हुई है. इस के लिए सीओ (कल्याणपुर) लक्ष्मी नारायण मिश्रा ने प्राइवेट डा. आभा मिश्रा को स्कूल में जांच के लिए बुलाया. आभा मिश्रा उन की रिश्तेदार थी.

आभा मिश्रा ने जांच में सारा मामला ही पलट दिया. डा. आभा मिश्रा ने कहा कि दिव्या गर्भवती थी. उस ने गर्भ गिराने के लिए गोलियां खाईं, जिस से ब्लीडिंग शुरू हुई. अधिक रक्तस्राव से उस की मौत हो गई. डा. आभा मिश्रा की यह बात आम लोगों के गले नहीं उतरी. इस से लोग आक्रोशित हो उठे.

लोगों के आक्रोश को देखते हुए 28 सितंबर, 2010 को 3 डाक्टरों के पैनल ने दिव्या के शव का पोस्टमार्टम किया. दिव्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट दिल दहला देने वाली थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार दिव्या के साथ कुकर्म किया गया था और उस के नाजुक अंग को नाखून से नोचा गया था. डाक्टरों ने बताया कि कोई मानसिक विक्षिप्त आदमी ही ऐसी हैवानियत कर सकता है. उस का गुदाद्वार पूरी तरह से फट गया था और अत्यधिक खून बहने से उस की मौत हो गई थी.

पोस्टमार्टम हाउस में चर्चित महिला नेता पार्षद आरती दीक्षित व पार्षद गीता निषाद भी मौजूद थीं. इन महिला नेताओं ने दिव्या का शव मिलने के बाद पोस्टमार्टम हाउस के बाहर सड़क जाम कर दी और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग कर रही थीं.

जाम की सूचना पा कर सीओ लक्ष्मीनारायण मिश्रा, इंसपेक्टर अनिल कुमार सिंह तथा एसपी (ग्रामीण) लालबहादुर आ गए. आते ही पुलिस ने जाम खुलवाने के लिए लाठी चार्ज कर दिया. इस लाठी चार्ज में पार्षद आरती दीक्षित, गीता निषाद तथा सोनू भदौरिया घायल हो गईं. इस के बावजूद पुलिस ने पार्षद आरती दीक्षित व गीता निषाद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

दिव्या उर्फ दिव्या की हत्या से पहले कुकर्म करने की खबर जब कानपुर के प्रमुख समाचारपत्रों में छपी तो लोगों में क्रोध की आग भड़क उठी. लोगों का गुस्सा पुलिसिया काररवाई पर था, जो आरोपियों को बचाने में जुटी थी. देखते ही देखते पूरा शहर मासूम को न्याय दिलाने के लिए उमड़ पड़ा.

पुलिस की कार्यशैली से नाराज लोगों ने आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए कैंडिल मार्च, जुलूस और प्रदर्शन का सहारा लिया. बच्चे हों या बड़े, महिलाएं हों या बुजुर्ग हर कोई हाथों में कैंडिल और बैनर ले कर दिव्या को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतर आया.

लोगों ने लाठियां खाईं पर दिव्या को न्याय दिलाने की मुहिम कमजोर नहीं पड़ने दी. नानाराव पार्क से जुलूस निकाला गया तो माल रोड की दोनों तरफ की सड़कें लोगों की भीड़ से पट गईं.

लोग उतर आए सड़कों पर

भारी भीड़ के आगे पुलिस को सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने पड़े. राजनीतिक दल, स्कूली बच्चे, सामाजिक संगठन, व्यापारी, डाक्टर, शिक्षक, कर्मचारी संगठन, श्रम संगठन और महिला संगठन दिव्या को न्याय दिलाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे. हर घर से मासूम को न्याय दिलाने की आवाज सुनाई दे रही थी.

candle-march-divya-kand

मोतीझील में निकाले गए कैंडिल मार्च की अगुवाई करने के लिए मुंबई से फिल्म निर्माता निर्देशक महेश भट्ट भी आए थे. इस के बाद तो पूरा शहर उमड़ पड़ा. यह कैंडिल मार्च ऐसा था, जिस में पूरे शहर को आंदोलन की चपेट में ले लिया था. सोनू भदौरिया की आर्थिक मदद हेतु भी लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगे थे. हर रोज उस के खाते में हजारों रुपए आने लगे थे.

आखिर उमड़े जनसैलाब के आगे पुलिस को झुकना पड़ा और उस ने स्कूल के प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा तथा उस के दोनों बेटों पीयूष व मुकेश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. लेकिन पुलिस ने अपना खेल अभी भी बंद नहीं किया. इंसपेक्टर अनिल कुमार सिंह ने सोनू भदौरिया के घर के पास किराए पर रहने वाले किन्नर काजल पर जुर्म कबूल करने का दबाव डाला. उसे यातनाएं दीं. लेकिन जब बात नहीं बनी तो उसे छोड़ दिया गया.

इस के बाद पुलिस ने दिव्या की मां सोनू भदौरिया के नजदीक में रहने वाले रिक्शा चालक मुन्ना लोध को टारगेट बनाया. 6 अक्तूबर, 2010 को उसे दिव्या रेप और मर्डर केस में गिरफ्तार कर लिया गया. मुन्ना लोध मूलरूप से उन्नाव जिले के सरावां गांव का रहने वाला था.

वह अपने रिक्शे से बच्चों को स्कूल पहुंचाता था. मुन्ना लोध सोनू भदौरिया की मदद करता था. इन्हीं मधुर संबंधों को जोड़ कर एसपी (ग्रामीण) लालबहादुर श्रीवास्तव, सीओ लक्ष्मीनारायण मिश्रा व इंसपेक्टर अनिल कुमार सिंह ने अनोखी कहानी रच दी.

नई कहानी बनाई पुलिस ने

पुलिस की कहानी के अनुसार मुन्ना लोध के सोनू भदौरिया से अवैध संबंध थे. वह उस की बेटियों दिव्या व दीक्षा की देखभाल करता था. इसी बीच उस ने दिव्या से भी अवैध संबंध बना लिए. अवैध रिश्तों के चलते दिव्या गर्भवती हो गई.

इस की जानकारी जब मुन्ना को हुई तो वह घबरा गया और मैडिकल स्टोर से गर्भ गिराने वाली गोलियां ले आया. घटना वाले दिन उस ने दिव्या को वह गोलियां खिला दीं और स्कूल छोड़ आया. गोलियां खाने से दिव्या को ब्लीडिंग शुरू हो गई. बाद में ज्यादा खून बहने से उस की मौत हो गई.

बड़े गुनाह की छोटी सजा : मासूम को नहीं मिला इंसाफ – भाग 1

उस दिन दिसंबर 2018 की 5 तारीख थी. वैसे तो कानपुर कोर्ट में हर रोज चहलपहल रहती है, लेकिन उस दिन  अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (द्वितीय) ज्योति कुमार त्रिपाठी की अदालत में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. पूरा कक्ष लोगों से भरा था. कक्ष के बाहर भी भीड़ जुटी थी.

दरअसल उस दिन एक ऐसे मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था, जिस ने पूरी मानवता को शर्मसार किया था. लोग तरहतरह के कयास लगा रहे थे. कोई फांसी की सजा की बात कह रहा था तो कोई आजीवन कारावास होने का अनुमान लगा रहा था.

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ज्योति कुमार त्रिपाठी ने ठीक साढ़े 10 बजे न्यायालय कक्ष में प्रवेश किया और कुरसी पर विराजमान हो गए. मुकदमे के 4 अभियुक्त पीयूष वर्मा, मुकेश वर्मा, चंद्रपाल वर्मा तथा संतोष कुमार उर्फ मिश्राजी कठघरे में खड़े थे. उन के आसपास पुलिस का पहरा था. उन के चेहरों पर न्याय का भय साफ झलक रहा था.

माननीय न्यायाधीश ने अंतिम बार अभियोजन व बचावपक्ष के वकीलों की बहस सुनी और अभियोजन पक्ष के गवाहों की सूची पर नजर डाली, 39 गवाह थे. फैसले की यह घड़ी आने में 8 साल का समय लग गया था.

आखिर मामला क्या था, जिस के फैसले को जानने के लिए सैकड़ों लोग अदालत पहुंचे थे. इस के लिए हमें 8 साल पहले घटी उस घटना को जानना होगा, जो बेहद हृदयविदारक थी.

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के कल्याणपुर थाने के अंतर्गत एक मोहल्ला है रोशननगर. इसी मोहल्ले में राजन शुक्ला के मकान में सोनू भदौरिया नाम की महिला किराए पर रहती थी. सोनू के परिवार में पति हमीर सिंह के अलावा 2 बेटियां दिव्या (10 वर्ष) तथा दीक्षा (7 वर्ष) थीं. सोनू भदौरिया माल रोड स्थित एक मौल में काम करती थी. मौल से मिलने वाले वेतन से उस के परिवार का भरणपोषण होता था.

सोनू भदौरिया का पति हमीर सिंह मूलरूप से मध्य प्रदेश के भिंड जिले के गांव रामगढ़ का निवासी था. गांव में रह कर हमीर सिंह खेती करता था. उस की पत्नी सोनू पढ़ीलिखी महिला थी. वह अपनी बेटियों को भी पढ़ालिखा कर योग्य बनाना चाहती थी, इसलिए वह गांव छोड़ कर सन 2010 में कानपुर आ गई थी. यहां उस ने रोशन नगर निवासी राजन शुक्ला के मकान में किराए पर एक कमरा ले लिया था और बेटियों के साथ रहने लगी थी.

उस ने बेटियों के पढ़ने के लिए अच्छे स्कूल की जानकारी जुटाई तो पता चला कि गणेश नगर (रावतपुर) स्थित भारती ज्ञान स्थली स्कूल अच्छा है. उस ने इसी स्कूल में अपनी बेटियों दिव्या का दाखिला कक्षा-6 में तथा दीक्षा का कक्षा-3 में करा दिया. सोनू बच्चों को स्कूल भेज कर अपने काम पर चली जाती थी. पति से अलग रह कर भी वह बच्चों की अच्छी तरह से देखभाल कर रही थी.

मालिकों ने ही स्कूल को बनाया दुष्कर्म का अड्डा

सोनू भदौरिया मिलनसार व व्यवहार कुशल महिला थी. मकान मालिक राजन शुक्ला व मकान में रहने वाले अन्य किराएदार सोनू से सहानुभूति रखते थे. सोनू के पड़ोस में रहने वाला रिक्शाचालक मुन्ना लोध सोनू की दोनों बेटियों को स्कूल से घर लाता था. सोनू के काम से वापस आने तक वही उन की देखभाल करता था.

भारती ज्ञान स्थली स्कूल के प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा धनाढ्य व्यक्ति थे. गणेश नगर में ही उन का आलीशान स्कूल व बंगला था. चंद्रपाल के 2 बेटे थे मुकेश व पीयूष. दोनों ही स्कूल के संचालन में उन की मदद करते थे. चंद्रपाल का छोटा बेटा पीयूष वर्मा अय्याश प्रवृत्ति का था. उस की कुदृष्टि खूबसूरत लेडी टीचरों व छात्राओं पर गड़ी रहती थी. कुछ तो उस की कुदृष्टि से बच निकलती थीं, पर कुछ मजबूर हो जाती थीं.

bharti-gyan-sthali-school-kanpur

एक रोज पीयूष की नजर दिव्या पर पड़ी. पीयूष ने दिव्या के परिवार के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह सोनू भदौरिया की बेटी है जो प्राइवेट नौकरी करती है. 10 वर्षीय दिव्या को अपनी बातों में फांसने के लिए उस ने उस से बोलना बतियाना शुरू कर दिया और उस मासूम के शरीर पर नजरें गड़ाने लगा. दिव्या मासूम बच्ची थी, वह उस के कुत्सित इरादों को कैसे भांपती.

हर रोज की तरह 27 सितंबर, 2010 को सोनू भदौरिया दोनों बेटियों को स्कूल छोड़ कर अपने काम पर चली गई. मौका मिलने पर पीयूष वर्मा दिव्या को बहलाफुसला कर दूसरी मंजिल पर स्थित लैब में ले गया. लैब में पहुंचते ही उस ने दरवाजा बंद कर लिया और दिव्या के साथ अश्लील हरकतें करने लगा.

दिव्या ने विरोध किया तो उस ने उस की पिटाई कर दी. डरीसहमी दिव्या की जुबान बंद हुई तो वह उस मासूम पर बाज की तरह टूट पड़ा. उस ने मासूम बच्ची के साथ प्राकृतिक, अप्राकृतिक कुकृत्य किया.

इस दरम्यान दिव्या दर्द से चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन उस हवस के दरिंदे को उस पर जरा भी दया नहीं आई. हवस के दौरान वह इतना वहशी हो गया कि उस ने मासूम के गुप्तांग पर चोट तो पहुंचाई ही, साथ ही दांतों से उस के चेहरे को भी जख्मी कर दिया.

कर्मचारियों को भी घसीटा जुर्म में

दरिंदा बना पीयूष वर्मा तब घबराया, जब दिव्या बेहोश हो गई और उस के गुप्तांग से ब्लीडिंग होने लगी. घबराहट में पीयूष वर्मा ने स्कूल के क्लर्क संतोष कुमार उर्फ मिश्राजी को बुलाया. संतोष ने दिव्या की हालत देखी तो वह सब समझ गया. संतोष ने तत्काल स्कूल की आया परवीन व माया को बुलाया और ब्लीडिंग बंद कराने का प्रयास कराया, लेकिन दोनों ही असफल रहीं.

खून साफ करने के लिए दिव्या को बाथरूम ले जाया गया. इस के बाद माया व परवीन ने दिव्या के कपड़े बदले. बच्चों का दाखिला होते समय ड्रैस और किताबें स्कूल प्रबंधन द्वारा बेची जाती थीं. दिव्या के कपड़े खून से सन जाने के कारण उस के खून सने कपड़े उस के बैग में रख दिए गए और नई ड्रैस उसे पहना दी गई.

इस के बाद क्लर्क संतोष कुमार, माया और परवीन दिव्या को उस के घर छोड़ कर वापस लौट गए. मकान मालिक राजन शुक्ला ने दिव्या की हालत देखी तो वह घबरा गए. उन्होंने तत्काल सोनू भदौरिया को फोन कर के दिव्या की हालत की जानकारी दे दी. बेटी के बारे में सुन कर सोनू घबरा गई. वह तुरंत औफिस से घर के लिए निकल गई. सोनू घर पहुंची तो दिव्या बेहोश पड़ी थी.

राजन ने बताया कि स्कूल वाले दिव्या को इस हालत में यहां छोड़ कर बिना कुछ बताए चले गए. सोनू ने मकान मालिक राजन शुक्ला तथा 2 किराएदारों गोविंद व योगेंद्र को साथ लिया और दिव्या को इलाज के लिए कुलवंती अस्पताल ले गई.   लेकिन दिव्या की हालत देख कर अस्पताल के डाक्टरों ने उसे अपने यहां भरती करने से मना कर दिया.

इस के बाद लगभग 3 बजे सोनू बेटी को ले कर लाला लाजपतराय अस्पताल (हैलट) पहुंची. वहां के डाक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया. बेटी की मौत से सोनू बदहवास हो गई और उस के स्कूल बैग को सीने से चिपका कर रोने लगी. इसी बीच सोनू की निगाह बैग पर लगे खून के धब्बे पर पड़ी.

उस ने बैग खोल कर देखा तो उस में बेटी के खून से सने अंडरगारमेंट देख उस का माथा ठनका. उस ने बेटी के शरीर को गौर से देखा तो उस के नीचे का हिस्सा खून से सना हुआ था और खून रोकने के लिए नाजुक अंग पर पट्टी बांधी गई थी. स्कूल में बेटी के साथ हुए कुकर्म की आशंका से सोनू ने हंगामा खड़ा कर दिया. पड़ोसी भी सोनू का साथ देने लगे.

एक आधा अधूरा खतरनाक खेल

कलावती और मलावती का दुखद अंत – भाग 3

आखिर जयदेव ततमा और अशोक को जिस बात का डर था, वही सब हुआ. विचारों के टकराव और अहं ने पति और पत्नी के बीच इतनी दूरियां बना दीं कि वे एकदूसरे की शक्ल देखने को तैयार नहीं थे. एक छत के नीचे रहते हुए वे एकदूसरे से पराए जैसा व्यवहार करने लगे. रोज ही घर में पतिपत्नी के बीच झगड़े होने लगे थे.

रोजरोज के झगड़े और कलह से घर की सुखशांति एकदम छिन गई थी. पतियों ने कलावती और मलावती को अपने जीवन से हमेशा के लिए आजाद कर दिया. बाद में दोनों का तलाक हो गया. पते की बात यह थी कि कलावती और मलावती दोनों की जिंदगी की कहानी समान घटनाओं से जुड़ी हुई थी. दुखसुख की जो भी घटनाएं घटती थीं, दोनों के जीवन में समान घटती थीं.

यह बात सच है कि दुनिया अपनों से ही हारी हुई होती है. अशोक भी बहनों की कर्मकथा से हार गया था. पर वह कर भी क्या सकता था. वह उन्हें घर से निकाल भी नहीं सकता था. सामाजिक लिहाज के मारे उस ने बहनों को अपना लिया और सिर छिपाने के लिए जगह दे दी. वे भाई के अहसानों तले दबी हुई थीं, लेकिन दोनों उस पर बोझ बन कर जीना नहीं चाहती थीं.

ऐसा नहीं था कि वे दोनों दुखी नहीं थीं. वे बहुत दुखी थीं. अपना दुख किस के साथ बांटें, समझ नहीं पा रही थीं. वे जी तो जरूर रही थीं, लेकिन एक जिंदा लाश बन कर, जिस का कोई वजूद नहीं होता. पति के त्यागे जाने से ज्यादा दुख उन्हें पिता की मौत का था.

कलावती और मलावती ने भाई से साफतौर पर कह दिया था कि वे उस पर बोझ बन कर नहीं जिएंगी. जीने के लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगी. दोनों बहनें फिर से समाजसेवा की डगर पर चल निकलीं. अब उन पर न तो कोई अंकुश लगाने वाला था और न ही टीकाटिप्पणी करने वाला.

वे दोनों घर से सुबह निकलतीं तो देर रात ही घर वापस लौटती थीं. सोशल एक्टिविटीज में दिन भर यहांवहां भटकती फिरती थीं. अशोक बहनों के स्वभाव को जान चुका था. वह भी उन पर निगरानी नहीं रखता था. उसे अपनी बहनों और उन के चरित्र पर पूरा भरोसा था कि वे कभी कोई ऐसा काम नहीं करेंगी, जिस से समाज और बिरादरी में उसे शर्मिंदा होना पड़े.

लेकिन गांव के उस के पड़ोसियों खासकर वीरेंद्र सिंह उर्फ हट्टा, लक्ष्मीदास उर्फ रामजी, बुद्धू शर्मा और जितेंद्र शर्मा को कलावती और मलावती के चरित्र पर बिलकुल भरोसा नहीं था.

दोनों बहनों के चरित्र पर लांछन लगाते हुए वे उन्हें पूरे गांव में बदनाम करते थे. वे कहते थे कि ततमा की दोनों बेटियां पेट की आग बुझाने के लिए बाजार में जा कर धंधा करती हैं. धंधे की काली कमाई से दोनों के घरों में चूल्हे जलते हैं. धीरेधीरे यह बात पूरे गांव में फैल चुकी थी. उड़ते उड़ते कुछ दिनों बाद यह बात कलावती और मलावती तक आ पहुंची.

सुन कर दोनों बहनों के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई. सहसा उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उन्होंने जो सुना है, वह सच है. जबकि उन का चरित्र एकदम पाकसाफ था. अपने चरित्र को ले कर दोनों बहनों ने जब गांव वालों की बातें सुनीं, तो वे एकदम से परेशान हो गईं.

वैसे भी किसी चरित्रवान के दामन पर ये दाग किसी गहरे जख्म से कम नहीं थे. दोनों ने फैसला किया कि उन्हें नाहक बदनाम करने वालों को इस की सजा दिलवा कर दम लेंगी, चाहे वह कितना ही ताकतवर क्यों न हो. उन्होंने पता लगा लिया कि उन्हें बदनाम करने वाले उन के पड़ोसी वीरेंद्र, लक्ष्मीदास, बुद्धू और जितेंद्र थे.

जिद की आग में पकी कलावती और मलावती ने वीरेंद्र, लक्ष्मीदास, बुद्धू और जितेंद्र शर्मा की कुंडली तैयार की. गांव के चारों बाशिंदे ग्रामप्रधान के भरोसेमंद प्यादे थे. प्रधान के रसूख की बदौलत वे कूदते थे.

चारों ही प्रधान की ताकत के बल पर असामाजिक कार्यों को अंजाम देते थे. ये बातें दोनों बहनों को पता चल गई थीं. दोनों ने आरटीआई के माध्यम से ग्राम प्रधान और उन के चारों प्यादों के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर के वीरेंद्र सिंह और लक्ष्मीदास के खिलाफ जलालगढ़ थाने में मुकदमा दर्ज करा कर उन्हें जेल भिजवा दिया.

वीरेंद्र और लक्ष्मीदास को जेल भिजवाने के बाद दोनों बहनें शांत नहीं बैठीं. इस के बाद उन्होंने बुद्धू और जितेंद्र शर्मा को जेल भिजवा दिया. कुछ दिनों बाद वीरेंद्र और लक्ष्मीदास जमानत पर जेल से रिहा हुए तो दोनों बहनों ने फिर से उन के खिलाफ एक नया मुकदमा दर्ज करा दिया.

उन लोगों को फिर से जेल जाना पड़ा. इंतकाम की आग में जलती कलावती और मलावती ने चारों के खिलाफ ऐसी जमीन तैयार की कि उन के दिन जेल की सलाखों के पीछे बीत रहे थे.

वीरेंद्र सिंह, लक्ष्मीदास, बुद्धू और जितेंद्र शर्मा बारबार जेल जाने से परेशान थे. समझ में नहीं आ रहा था कि कलावती और मलावती नाम की दोनों बहनों से कैसे छुटकारा पाया जाए. वे लोग खतरनाक योजना बनाने लगे. दिलीप शर्मा, विनोद ततमा, प्रकाश ततमा,सोनू शर्मा, रामलाल शर्मा, विष्णुदेव शर्मा, पप्पू शर्मा, उपेन शर्मा, इंदल शर्मा, सुनील शर्मा, सतीश शर्मा और बेचन शर्मा उन का साथ देने को तैयार हो गए.

वीरेंद्र सिंह, लक्ष्मीदास और उस के सहयोगियों ने फैसला कर लिया कि जब तक दोनों बहनें जिंदा रहेंगी, तब तक उन्हें चैन की सांस नहीं लेने देंगी. उन दोनों को मौत के घाट उतारने में ही सब की भलाई थी. घटना से करीब 5 दिन पहले सब ने योजना बना ली.

वीरेंद्र सिंह और उस के साथियों ने कलावती और मलावती के खिलाफ खतरनाक षडयंत्र रच लिया था. उन्होंने उन की रेकी करनी शुरू कर दी.

रेकी करने के बाद उन लोगों ने दोनों बहनों की हत्या करने की रूपरेखा तैयार कर ली. योजना में तय हुआ कि दोनों बहनों की हत्या के बाद उन के सिर धड़ से अलग कर के अलगअलग जगहों पर फेंक दिया जाएगा ताकि पुलिस आसानी से लाशों की शिनाख्त न कर सके.

सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. बात 23 जून, 2018 के अपराह्न 2 बजे की थी. वीरेंद्र ने अपने सहयोगियों को दोनों बहनों पर नजर रखने के लिए लगा दिया था. दोपहर 2 बजे के करीब कलावती और मलावती घर से जलालगढ़ बाजार जाने के लिए निकलीं.

दोनों ने अपने भतीजे मनोज से बता दिया था कि वे जलालगढ़ बाजार जा रही हैं. वहां से कुछ देर बाद लौट आएंगी. दोनों के घर से निकलते ही इस की सूचना किसी तरह वीरेंद्र सिंह तक पहुंच गई.

वीरेंद्र सिंह ने सहयोगियों को सतर्क कर दिया कि दोनों जलालगढ़ बाजार के लिए घर से निकल चुकी हैं. चक हाट से जलालगढ़ जाने वाले रास्ते में कुछ हिस्सा सुनसान और जंगल से घिरा हुआ था. कलावती और मलावती जब सुनसान रास्ते से जलालगढ़ बाजार की ओर जा रही थीं कि बीच रास्ते में वीरेंद्र सिंह, लक्ष्मीदास, बुद्धू शर्मा, जितेंद्र शर्मा सहित 12 और सहयोगियों ने उन का रास्ता घेर लिया.

वे सभी दोनों बहनों को जबरन उठा कर बिलरिया घाट ले गए. वीरेंद्र और उस के साथियों ने मिल कर दोनों बहनों को तेज धार वाले चाकू से गला रेत कर मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद दोनों के सिर धड़ से काट कर अलग कर दिए गए. फिर दोनों के कटे सिर घाट के किनारे जमीन खोद कर दबा दिए. उस के बाद बाकी शरीर को वहां से करीब 500 मीटर दूर ले जा कर झाडि़यों में फेंक कर अपनेअपने घरों को चले गए.

वीरेंद्र और उस के साथियों ने बड़ी चालाकी के साथ घटना को अंजाम दिया, लेकिन वे भूल गए थे कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से ज्यादा दिनों तक नहीं बच सकता.

एक न एक दिन कानून के लंबे हाथ अपराधी के गिरेहबान तक पहुंच ही जाता है. इसी तरह वे सब भी कानून के हत्थे चढ़ गए. 4 आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस ने फरार 12 आरोपियों को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार 16 आरोपियों के खिलाफ पुलिस ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था. गिरफ्तार आरोपियों में से किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. वीरेंद्र और उस के साथियों ने अगर सूझबूझ के साथ काम लिया होता तो उन्हें ऐसे दिन देखने को नहीं मिलते.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित