Social stories: एक नया कौंसेप्ट भाबीजी घर पर हैं

Social stories: आजकल टीवी मनोरंजन का सब से बड़ा साधन है. लेकिन टीवी पर अच्छे मनोरंजक प्रोग्राम कभीकभी ही नजर आते हैं. ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ऐसा सीरियल है, जिसे हर दृष्टि से मनोरंजक कहा जा सकता है. साथ ही सोद्देश्य भी.

टी वी जिसे दूरदर्शन के जमाने में बुद्धू बक्सा कहा जाता था, अब बुद्धू नहीं रहा. बुद्धू इसलिए नहीं क्योंकि अब यह स्मार्ट बन कर मोटी कमाई करने लगा है. लाखों लोगों की रोजीरोटी चलाने लगा है. और हां, अच्छे पढ़ेलिखों को बेवकूफ भी बनाने लगा है. कमाई को देखते हुए अब कभी के इस बुद्धू बक्से पर दर्जनों इंटरटेनमेंट चैनल आ गए हैं. न्यूज चैनलों की तो भरमार है ही. टीवी पर तमाम प्रोग्राम बने हैं, बन रहे हैं. कुछ अच्छे तो कुछ बुरे लेकिन अपनेअपने कंटेंट के हिसाब से चलते सब हैं. वैसे यह सब भी चैनल्स पर निर्भर करता है कि किस प्रोग्राम को कितने दिन चलाना है, दर्शकों पर नहीं. अब कलर्स के ‘बालिका वधू’ को ही ले लीजिए, जो एक अच्छे उद्देश्य, अच्छी कहानी और अच्छे कलाकारों के साथ शुरू हुआ था.

लोगों ने इसे पसंद भी किया लेकिन अब बोझ से लगने वाले इस सीरियल को चैनल रबर की तरह खींचे जा रहा है. टीआरपी से भी उसे कोई लेनादेना नहीं. कहानी तो मूल कहानी से भटक कर कहीं से कहीं चली ही गई, कलाकार भी वक्तवक्त पर बदलते रहते हैं. शुरू की बालिका वधू भी अब जवान हो गई.

ऐसा नहीं है कि दूरदर्शन या दूसरे चैनल्स पर अच्छे प्रोग्राम्स नहीं आते. कई यादगार सीरियल्स आए. दूरदर्शन के ‘हमलोग’, ‘बुनियाद’, ‘ये जो जिंदगी’, ‘कथा सागर’ और ‘तमस’ को भला कौन भूल सकता है. जहां सवाल दूसरे इंटरटेनमेंट चैनल्स का है तो उन पर सिर्फ इंटरटेनमेंट (उन के हिसाब से) रचा जाता है. इस इंटरटेनमेंट में अगर आप समाज या परिवार के लिए कोई मैसेज ढूंढने लगें तो यह सिर्फ एक छलावा ही साबित होगा. अलबत्ता भव्यता जरूर आप को प्रभावित करेगी.

भव्यता इसलिए क्योंकि यह व्यवसाय का एक हिस्सा है. विज्ञापन देने वाली कंपनियों को अपना प्रचार कर के अपने प्रोडक्ट बेचने होते हैं. जाहिर है, सौंदर्य प्रसाधन सजीधजी महिलाओं को देख कर खरीदे जाते हैं और घरेलू प्रोडक्ट जगमगाते बड़ेबड़े घरों को देख कर पसंद किए जाते हैं. इस चक्कर में सीरियल्स की कहानी कहीं गौण हो जाती है, रह जाते हैं गोलगोल घूमते दृश्य. रियलिटी शोज और कौमेडी शोज का हाल भी बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन के अपने अलग दर्शक होते हैं. जहां सवाल कौमेडी शोज का है तो इन में दर्शकों को हंसाने के नाम पर ज्यादातर अश्लीलता ही परोसी जाती है. लाफ्टर चैलेंज, कौमेडी सर्कस सीरीज, कौमेडी क्लासेज, कौमेडी नाइट्स बचाओ जैसे कौमेडी शोज में ह्यूमर नाममात्र का और अश्लीलता अधिक नजर आती थी.

हां, कपिल शर्मा का ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ अपने कौंसेप्ट और कपिल की माइंड औफ प्रजेंस की वजह से कामयाब जरूर रहा. लेकिन अब इस में भी सेंस और ह्यूमर की कमी नजर आने लगी है. कह सकते हैं कि इस से भी अब दर्शकों का मोह भंग होने लगा है. इसी सब के बीच 2 मार्च, 2015 से एंड टीवी पर एक शो शुरू हुआ है, ‘भाबीजी घर पर हैं’. कौमेडी टच वाले इस शो में लंपटपन तो है लेकिन सेंस औफ ह्यूमर भी है. खास बात यह है कि इस शो में कलाकारों का चयन बहुत सोचसमझ कर किया गया है.

मसलन, शिल्पा शिंदे यानी अंगूरी सीधीसादी खूबसूरत महिला के रूप में एक अलग ही तरह का करेक्टर है, जो अंगरेजी के शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाती. जब उस का पति जगमोहन तिवारी या लंपट पड़ोसी विभूति नारायण मिश्रा उस के गलत उच्चारण को सही करते हैं तो अनायास उस के मुंह से निकल जाता है ‘सही पकड़े हैं’. सही मायनों में देखा जाए तो यही तीन शब्द अंगूरी के करेक्टर की जान हैं.

वैसे बात बोलने के अंदाज की हो, अदाओं की हो या फिर चलनेफिरने की. निस्संदेह शिल्पा शिंदे ने अपने करेक्टर के लिए बहुत मेहनत की होगी. सीरियल की दूसरी महिला यानी अनीता भाभी का करेक्टर भी भूमिका के हिसाब से कम नहीं है. ग्रूमिंग क्लास चलाने वाली यह महिला स्टाइलिश भी है और अपने निठल्ले पति विभूति को अपने कंट्रोल में भी रखती है. यह भूमिका सौम्या टंडन ने निभाई है जो पहले ही कई शो कर चुकी हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ के सब से मंझे हुए कलाकार हैं आशिफ शेख, जो करीब 65 फिल्मों और सीरियल्स में काम कर चुके हैं. अंगरेजी, उर्दू और हिंदी तीनों ही भाषाओं पर उन की अच्छी पकड़ है. विभूति नारायण मिश्रा की भूमिका को वह एक लंपट पति के रूप में बखूबी निभा रहे हैं. अंगूरी के पति जगमोहन तिवारी की भूमिका रोहिताश गौड़ ने निभाई है. रोहिताश भी दर्जनों फिल्मों और सीरियल्स में काम कर चुके हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ का कौंसेप्ट दरअसल इस अधार पर रखा गया है कि पत्नी भले ही कितनी खूबसूरत और सुशील क्यों न हो, लंपट पति पड़ोसी की पत्नी पर लाइन मारने से बाज नहीं आता. इस सीरियल में भी कुछ ऐसा ही है. विभूति नारायण मिश्रा की नजर मनमोहन तिवारी की पत्नी अंगूरी पर है और मनमोहन तिवारी की निगाह विभु की पत्नी अनीता पर. जाहिर है, दोनों ही लंपट स्वभाव के हैं, लेकिन अंदर ही अंदर संस्कारी भी हैं. इसी वजह से दोनों में से कोई भी अपने मन की बात नहीं कह पाता. दूसरी ओर दोनों महिलाएं पूरी तरह संस्कारी भी और अपनेअपने पतियों को प्यार करने वाली भी हैं. इसलिए जरूरत पड़ने पर दोनों मिल कर अपने ढंग से बिगड़े हुए पतियों को लाइन पर भी लाती हैं.

इस सीरियल का तानाबाना पड़ोसी की पत्नी पर नजर रखने वाले पतियों की पंचलाइन के साथ बुना गया है. कहानी कोई एक नहीं है. हर दूसरे तीसरे एपीसोड के बाद कहानी बदल जाती है. विषय भी सामाजिक और आम आदमी की जिंदगी से जुडे़ होते हैं, जिन्हें चंद कलाकारों के माध्यम से रोचक बनाने की कोशिश की जाती है. पृष्ठभूमि चूंकि कानपुर की रखी गई है, इसलिए ज्यादातर जगहों पर स्थानीय भाषा का ही इस्तेमाल किया जाता है. छोटी सी जगह, दो मामूली से घरों, चाय की दुकान और एक गली को सेट बना कर ऐसा धारावाहिक खड़ा करना जिसे सब पसंद करें, आसान नहीं है.

विभूति नारायण मिश्रा और मनमोहन तिवारी, जिस का कच्छेबनियान का बिजनैस है, एकदूसरे को कभी नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं तो कभी एकदूसरे को उस की बीवी की नजरों में गिराने की, ताकि वे एकदूसरे की बीवी की नजरों में श्रेष्ठ बन जाएं. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि उन्हें कहीं न कहीं मात खानी पड़ती है. कहानी को आगे बढ़ाने के लिए सीरियल में बीचबीच में दूसरे करेक्टरों को भी लाया जाता है. इन में एक करेक्टर है सक्सेना, जिस ने खुद को पागल घोषित कर रखा है और पागलपन के लिए बिजली के शाक लेता है. कोई उसे थप्पड़ मारता है तो वह ‘आई लाइक इट’ बोलता है यानी उसे पिटने से शाक मिलता है जो उसे अच्छा लगता है.

उस का बोलने का अंदाज और मासूमियत भरी हास्यप्रद बातें सहज ही प्रभावित करती हैं. दूसरा करेक्टर है दरोगा हप्पू सिंह का, जिस के माथे पर तेल वाले बालों की लटें लटकी रहती हैं. दरोगा हप्पू सिंह जब अपने 9-9 ठैंया बच्चों और प्रेग्नेंट बीवी के नाम पर न्यौछावर मांगता है तो उस के इस अंदाज में रिश्वत मांगना नहीं, बल्कि हास्य का पुट ज्यादा नजर आता है. उस के इस तरह रिश्वत मांगने पर कानूनव्यवस्था पर गुस्सा नहीं आता बल्कि हप्पू सिंह पर प्यार आता है. हप्पू सिंह का उठतेबैठते ‘अरे दादा’ बोलना भी एक अलग तरह का हास्य और चुटीलापन पैदा करता है. साथ ही अनीता को गोरी मैम कहना भी, जिसे सुन कर विभूति नारायण मिश्रा चिढ़ता है.

कहानी आगे बढ़ाने के लिए दो छिछोरों मलखान और टेका के अलावा एक सब्जी वाले को भी रखा गया है, जिन के रोल तो खास नहीं हैं, पर मन को भाते हैं. लेखक ने अपनी कल्पना का कमाल दिखाया है 2 करेक्टरों को रचने में. इन में एक है रिक्शावाला पेलू जिस के चेहरे पर कोई भाव नहीं आता, जो बोल नहीं सकता. अलबत्ता कुछ पूछने पर वह अपने कानों पर बंधे अंगोछे से कागज की परची निकाल कर देता है जिस पर कुछ न कुछ चुटीला लिखा होता है. मानो उसे पहले ही पता हो कि उस से क्याक्या पूछा जा सकता है. पेलू का करेक्टर बिना भाव, बिना कुछ बोले भी बहुत कुछ कह जाता है.

दूसरा करेक्टर है मनमोहन तिवारी की मां का जो कहीं दूर अलग रहती हैं और अपनी बहू अंगूरी को बहुत प्यार करती हैं. तिवारी मां से बहुत डरता है जबकि अंगूरी मां को ही पति के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है. तिवारी की मां भले ही एक फ्रेम में नजर आती है, पर वह उसी में ऐसा कुछ कर जाती है कि हास्य खुद उभर आता है. मसलन छज्जे पर खड़े हो कर अंगूरी से बतियाना, तिवारी को बैल कहना, बात खत्म होते ही उस के हाथ से टकरा कर कोई चीज नीचे गिरना, नीचे किसी का चिल्लाना और उस का तुरंत वहां से हट जाना, जैसी बातें अलग तरह का हास्य पैदा करती हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ में कहींकहीं तो इतने अच्छे पंच होते हैं जो मानव मन पर गहरे तक असर करते हैं. मसलन, इस सीरियल के एक एपिसोड में अनीता भाभी ब्लड डोनेशन कैंप लगाती है. उस के पति के अलावा सभी अनीता को प्रभावित करने के लिए ब्लड डोनेट करते हैं. उस का खास आशिक तिवारी तो 2 बार बेहोश हो जाने के बाद भी कई बार ब्लड डोनेट करता है.

इस मामले में दरोगा हप्पू सिंह भी पीछे नहीं रहता. वह एक कैदी का 2 बोतल खून निकलवा कर ले आता है और उसे अपना बताता है. उधर कैदी कहता है, ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कहा था तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, लेकिन आजकल तो लोग खून चूस कर भी आजाद नहीं करते.’

यह बात नेताओं और अफसरों के लिए बहुत सटीक है.

खास बात यह है कि दो लंपट पुरुषों और उन की पत्नियों के इर्दगिर्द बुनी गई सामाजिक सरोकार वाली इस सीरियल की कहानियों में भले ही कुछ खास न हो पर अश्लीलता बिलकुल नहीं है. हां, चुटीलापन जरूर है जो दर्शकों को बांधे रखता है. कई सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य भी इस में नजर आता है. किसी भी विषय को इस तरह संदेश के साथ हास्य में बांध देना हंसीखेल नहीं है. आज के समय में जब अच्छे सीरियल्स देखने को नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में यह सीरियल ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ताजे हवा के झोंके की तरह है जो मनोरंजन की प्राणवायु देता है. साथ ही यह भी बताता है कि भव्यता से इतर कम संसाधनों में भी अच्छा काम किया जा सकता है. बस करने वाला चाहिए.  Social stories

Hindi Kahani: छिताई का कन्यादान

Hindi Kahani: राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. वह दिन में अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. दोनों का प्रेम अमर था. लेकिन सुलतान अलाउद्दीन ने छिताई पर नजर डाली तो सब कुछ गड़बड़ा गया. इस के बावजूद दोनों मिल कर ही रहे.

सुलतान अलाउद्दीन खिलजी बुरी तरह फंस गया था. उसे गुमान नहीं था कि यादव राजा रामदेव की दासियां इतनी तेज हैं कि उड़ती चिडि़यों को पहचान ही नहीं लेतीं, जमीन से उन के कान भी काट लेती हैं. अलाउद्दीन अपना नाम सुन कर भागना चाहता था, मगर वह औरत जो दासी मालूम पड़ती थी, उस से अधिक फुर्तीली निकली. उस ने अपनी कमर में बंधी कमंद को भागने वाले पर निशाना लगा कर फेंका. भागने वाला कमंद में फंस कर रह गया. उस की मुश्कें कस चुकी थीं और वह अपनी कमर में एक ओर बंधे नेजे को निकाल नहीं पा रहा था.

तब तक वह औरत एकदम रूबरू आ खड़ी हुई. बोली, ‘‘कटारी मेरे पास भी है बादशाह सलामत. हथियार मत इस्तेमाल कीजिए वरना पछताइएगा. मैं जरा भी आवाज दूंगी तो हमारे सिपाही दौड़े आएंगे. आप के इस तरह पकड़े जाने पर आप की फौज को भागने का रास्ता न मिलेगा, जान लीजिए.’’

अलाउद्दीन खूब अच्छी तरह जानता था कि वह चालाक औरत एकदम सही कह रही थी. उस के पकड़े जाते ही लड़ाई का पासा पलट जाएगा. चाहे बाद में दिल्ली की फौज उसे छुड़ा ले, इस राज्य को नूस्तनाबूद कर दे, मगर उस पर जो धब्बा लग जाएगा, वह फिर न मिटेगा. यह भी हो सकता है कि राजा रामदेव उसे हाथियों से कुचलवा दें या भयानक खाई में फेंकवा दें. वह एकबारगी सिहर उठा. उस ने अपनी हेकड़ी में अकेले इधर आ कर कितनी बड़ी गलती की है. राघो (राघव) चेतन से अलाउद्दीन का प्रस्ताव सुन कर राजा रामदेव का उबल पड़ना बिलकुल वाजिब था.

राघव ने मना किया था कि वह सांप के बिल में न घुसे. मगर सुलतान को अपनी सूझबूझ और बहादुरी पर कुछ ज्यादा ही इत्मीनान हो गया था. अब वह क्या कर सकता था, सिवाय गिड़गिड़ाने के. न जाने यह शैतान की खाला क्या गुल खिलाएगी?

चापलूसी और चालाकी में अदाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप तो बेकार नाराज हो रही हैं. मैं तो शिकार करने आया था. सोचा, कोई परिंदा है. इसी वास्ते लपका था. बताइए, मैं आप की क्या खिदमत कर सकता हूं?’’

उस दासी ने, जिस का नाम मैनरूह था, जवाब दिया, ‘‘सेवा तो हमारे महाराज आप को बताएंगे. मैं क्या बताऊंगी? बस, अब आप चले चलिए चुपचाप.’’

बड़ी आजिजी से अलाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप खामखा नाराज हो रही हैं. शाम हो रही है. मुझे नमाज पढ़ना है. आप जानती हैं. मशहूर है, मैं दीन ईमान का पाबंद और मजहबी सुलतान हूं. मैं इस वक्त खजाने के साथ तो नहीं आया. मगर मेरा ईमान मेरे साथ है. मैं आप को रानी बना दूंगा. जितनी चाहिए, दौलत मैं आप को दे दूंगा. गले का हार बतौर इत्मीनान अभी दे दूंगा. बस मुझे आजाद कर दीजिए.’’

दासी मैनरूह ने सख्ती से उत्तर दिया, ‘‘सुलतान, माफ करना, जिस इंसान को जिस चीज की भूख होती है, उसे वही हर कदम पर याद आती है. आप के पास अगर सही मायने में दौलत होती तो आप मुझे यह लालच न देते. मेरे महाराज ने आज तक किसी को इस तरह का लालच नहीं दिया, क्योंकि देवगिरि देवताओं और ऋषियों का बसाया है. यहां जीने वाली ताउम्र रानी रहती है. मुझे क्या कमी है, जो आप मुझे देंगे? आप को महाराज के सामने जरूर ले जाऊंगी. वही न्याय करेंगे.’’

अलाउद्दीन एकदम घबरा उठा. उसे यह अंदाज हो गया था कि यह दासी गरीब हो या न हो, मगर अपने मजहब में और अपने स्वामी राजा रामदेव में विश्वास रखती है. उस ने चट दूसरा पासा फेंका, ‘‘आपा जान, आप ने मेरी बात समझी नहीं. मैं आप को आप के ईमान से रत्ती भर नहीं डिगाना चाहता. आप सोचिए, एक बहन के जरिए एक सुलतान को बेबस बना कर दरबार में पेश किया जाए तो क्या उस के लिए यह डूब मरने की बात नहीं है? मैं इसी तालाब में कूद कर जान दे दूंगा, मगर अपनी शान में हरगिज बट्टा नहीं लगने दूंगा. आप मुझे जिंदगी नहीं दे सकतीं, तो क्या? आप मेरी मौत नहीं रोक सकतीं. अगर ऐसा हो गया तो आप को आप की सौगंध है, आप हमेशा अपने पाप में झुलसती रहेंगी. एक मजहबी सुलतान को आप ने बिना लड़े या चेतावनी दिए धोखे से पकड़ लिया है.’’

मैनरूह एक बार कांप गई. अगर अलाउद्ीन तालाब में कूद पड़ा, या उस ने हीरा चूस लिया या सीने में छुरी घोंप ली और मर गया तो इस का पाप किसे लगेगा? उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘नहीं नहीं, तुम हमारे महाराज का भेद लेने यहां आए थे. मैं पेश कर दूंगी. वही तुम्हारा न्याय करेंगे.’’

अलाउद्दीन के मन में उम्मीद जगी. बोला, ‘‘अगर मुझे भेद लेने के लिए आना होता तो खुद अकेले बिना तलवार क्यों आता? मैं तो आप लोगों के ईमान को जानता हूं. आप कभी किसी निहत्थे को नहीं छुएंगे. यह आप के धरम का कौल है. भेद लेने के वास्ते मैं भेष बदल कर अपने लोगों को भेजता. मैं तो बस चिडि़यों का शिकार करता हुआ यहां आया था. आप ने देखा होगा बड़ी बी.’’

मैनरूह बोली, ‘‘मैं तो बस यही जानती हूं कि आप का न्याय अब हमारे महाराज करेंगे.’’

अलाउद्दीन ऐसे उछला, जैसे वह कमंद सहित लहराते तालाब में कूद जाएगा. कहने लगा, ‘‘बस, मैं ने जान लिया. मेरी जिंदगी आज तक की थी. मेरी मौत का पाप आप के सिर. अलविदा.’’

मैनरूह फिर घबराई. बोली, ‘‘सुलतान, आप उतावले क्यों हैं? मैं महाराज के पास ले चलती हूं.’’

अलाउद्दीन रुआंसा हो कर बोला, ‘‘अगर महाराज के सामने जा सकता तो आप से दया की भीख क्यों मांगता? आप को अपनी बहन बनाया. आप अपने बड़े भाई की इज्जत को खाक मत कीजिए. आप यही चाहती हैं कि मैं घेरा उठा लूं. मैं अपनी फौज ले कर यहां से चला जाऊंगा.’’

मैनरूह चाहती तो यही थी. खुद महाराज रामदेव भी यही चाहते थे. मगर मैनरूह महाराज की प्रजा ही नहीं थी, बल्कि राजकुमारी छिताई की दासी भी थी. सब से बढ़ कर वह एक औरत होने से उस की पीड़ा को जानती थी. उस ने रुखाई से कहा, ‘‘बहन बनाया है तो यही मेरी इच्छा नहीं है. इस से भी बड़ी इच्छा है. वह पूरी होनी हो तो बताऊं.’’

अलाउद्दीन के बहुत आग्रह करने पर उस ने कहा, ‘‘राजकुमारी छिताई मेरी बेटी की तरह है. आप भी उसे अपनी बेटी मानिए और दोस्ती कर के तब आदर से जाइए.’’

अलाउद्दीन एकदम आसमान से गिरा. छिताई ही नहीं मिली तो इस जद्दोजहद से क्या हासिल? तो भी वह आजाद तो होना ही चाहता था. उस का खून खौल रहा था. मगर किसी तरह इस खूसट औरत को टालना भी था. उस ने कहा, ‘‘जब तुम कहती हो तो इस में कौन सी मुश्किल है. मैं तुम्हारी बात मान लेता हूं.’’

मैनरूह अलाउद्दीन से भी चालाक निकली. दृढ़ता से बोली, ‘‘बादशाह, इस में एतबार की तो नहीं, इत्मीनान की बात है. आप उस मसजिद की ओर रूबरू हो कर कुरान पाक की कौल ले कर कहिए कि छिताई को मैं अपनी बेटी मानता हूं. तभी मैं हुजूर को छोड़ पाऊंगी.’’

अलाउद्दीन दांत पीस कर रह गया. उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. अंधेरा होता जा रहा था. चारों तरफ वे परिंदे हौसले से बोल रहे थे, जिन का शिकार करने वह आया था. लगा, जैसे वे उस की बेबसी पर कलरव कर रहे हों. क्यों वह इस शहर की चहारदीवारी में आया? उसे क्या मालूम था कि यादव राजा रामदेव तो सीधा है, मगर उस के कारकुन बाज की मानिंद चालाक हैं. वह इस एकांत बाग में चिडि़यों का शिकार खेलने लगा. शिकार के बजाय शैतान की खाला गले पड़ी, जिसे इसलाम के सब कायदेकानून मालूम हैं. अगर इस ने इस वक्त राजा रामदेव के सामने उसे खड़ा कर दिया तो बेशक वह उस के सर को कलम करा देगा.

अपनी लड़की के बारे में राघव चेतन की बात सुन तो वह बिफर रहा होगा. सुलतान ने हड़बड़ा कर मसजिद की तरफ मुंह किया और बोला, ‘‘मैं अपने रसूल व कुरान पाक की कसम उठाता हूं, मैं हमेशा छिताई को अपनी बेटी की मानिंद मानूंगा.’’

यह सुन कर मैनरूह बहुत खुश हुई. उस ने झुक कर सलाम किया और सविनय अपनी गुस्ताखी के लिए क्षमा मांगते हुए सुलतान के बंधन खोल दिए. आजाद होते ही एक बार फिर अलाउद्दीन का खून खौल उठा. उस के जी में आया, कमर के नेजे को निकाल कर अभी इस औरत को मार डाले. मगर उस ने अपने को रोका. अगर यह एक बार भी चीखी तो दर्जनों लोग आ कर अलाउद्दीन को पकड़ लेंगे. अगर न भी चीख पाए तो उस के खून के कुछ धब्बे उस के कपड़ों पर पड़ेंगे, जिस से बादशाह फिर खतरे में पड़ सकता है. किले की घेरेबंदी में होने से तमाम चौकसी चारों तरफ होगी. खून का घूंट पी कर सुलतान बोला, ‘‘बड़ी बी, आप ने वही किया, जो आप का फर्ज था. अब आप मुझे महफूज बाहर निकलने में मदद कीजिए.’’

मैनरूह ने फिर क्षमा मांगी. बोली, ‘‘आप ने मुझे बहन कहा तो मेरा कर्तव्य है कि मैं आप की सहायता करूं. बस आप कुछ बोलिएगा नहीं. मुझे सब पहचानते हैं. मुझे कोई कुछ नहीं बोलेगा.’’

मैनरूह चलने लगी. पीछे चलते सुलतान को फिर नेजे का खयाल कौंधा. मगर उस ने मन मार लिया. उल्टे उस ने एक मोती की माला निकाली और मैनरूह को नजर करनी चाही. मगर उस सजग दासी ने कान पकड़ कर कहा, ‘‘हुजूर, आप ने मुझे बहन का रिश्ता बख्शा, मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

बारबार कहने पर भी दासी ने स्वीकार नहीं किया. बोली, ‘‘जब आप दिल्ली बुलाएंगे तो ले लूंगी.’’

सचमुच मैनरूह का सब अदब कर रहे थे. उस ने गेट खुलवाया. शहर के फाटक से बाहर होते ही अलाउद्दीन जो भागा तो उस ने अपनी छावनी में जा कर ही दम लिया. वहां उस की खोज हो रही थी. उस शाम जो गुजरी, उस ने ताउम्र किसी के सामने उस का खुलासा नहीं किया. उस ने इस बात का बारबार शुक्र अदा किया कि पकड़ लिए जाने पर भी मैनरूह ने उस की बिना किसी को कानोंकान खबर हुए रिहाई करा दी थी.

जब अलाउद्दीन ने खापी लिया तो राघव चेतन लौट आया. बादशाह को बाखैरियत देख कर उस की जान में जान आई. उस की आपबीती बहुत खराब थी. राजा रामदेव आपे से बाहर हो गया था. किसी म्लेच्छ को कन्यादान करना उस की कल्पना के बाहर था. तो भी उस ने दूत के नाते राघव चेतन को जाने दिया था. दूतियां उस के बाद लौटीं. उन्होंने बताया कि औरों की तरह रामदेव के रनिवास में भी सब मरने को तैयार हैं, परंतु मुसलमानों के हाथ में पड़ने को नहीं. चित्तौड़ में पद्मिनी के जौहर और रणथंभौर में राजपूतों के बलिदान को वह भूला नहीं था. जब छिताई नहीं मिलनी है तो घेरा डालने से क्या फायदा? देवगिरि को लूटने का काम तो वह बरसों पहले ही कर चुका था. सोते समय वह सारी बातों पर विचार करने लगा.

कई साल हो गए. उस ने पहलेपहल नुसरत खां को सेनापति बना कर देवगिरि को खूब लूटा था. फिर वह राजा रामदेव को भी दोस्ती का लालच दे कर दिल्ली ले गया था. बीती बातें उस के मन में कौंध रही थीं…

पराजय की चिंता में राजा रामदेव ने दौलत देने में कसर नहीं की थी. अलाउद्दीन रामदेव को मोहरा बना कर दक्खिन की अकूत दौलत, जो दक्खिनी राजाओं के पास थी, हासिल करना चाहता था. रामदेव बूढ़ा हो रहा था, सोचता था कि अलाउद्दीन से आश्रय पा कर वह पड़ोसी राजाओं को दबा सकेगा. अलाउद्दीन ने दिल्ली में अपने सिपहसालार उलूम खां को राजा के स्वागत में भेजा था और दरबार में खूब आवभगत की थी.

दरबार के स्वागतसत्कार, ठाठबाट और रागरंग में 3 साल बीत गए. रामदेव को पता ही नहीं चला. जब देवगिरि से रानी का दूत आया तो उसे होश हुआ. राजकुमारी छिताई समय के साथ सयानी होती जा रही है. राजा के अनुरोध को अलाउद्दीन मान गया. विदाई के समय राजा ने देवगिरि के राजप्रासाद को सज्जित कराने की दृष्टि से एक चित्रकार की मांग की, क्योंकि दिल्ली के महलों में चित्रकारी देख कर वह प्रफुल्लित हुआ था. सुलतान ने अपना खास चित्रकार साथ भेजा. लौट कर राजा ने जब बेटी को देखा तो चौंका. 3 साल में ही राजकुमारी कितनी यौवन संपन्न हो गई थी.

राजा ने पुराने भवनों के साथ नए प्रासाद का भी निर्माण करा कर पौराणिक ग्रंथों के विविध प्रसंगों को अपनी इच्छा से चित्रित कराया. चित्रकार नए चित्रों में नए रंग भरता तथा नई आकृतियां अंकित करता रहता था. मन में बसे चित्रों की छवि को वह तूलिका के जादू से अधिक ललित, जीवंत एवं मनोहर बना कर प्रस्तुत कर देता था. एक दिन वह तन्मय हो कर चित्र बना रहा था कि उस की दृष्टि पार्श्व के द्वार पर गई. दमकते सौंदर्य तथा छलकते यौवन की साक्षात स्वामिनी खड़ी थी. उस ने बहुत सुंदरता को सिरजा था, मगर आज विधाता की इस चपल, नवल तथा विरल सृष्टि को निहार कर चकित रह गया था. जिस तन्मयता से वह चित्र की सृष्टि में लीन था, उतना ही वह लालित्य की देवी उस क्षणक्षण संवरती कृति को निहारने में खोई थी.

जैसे ही चित्रकार का ध्यान भंग हुआ और उस ने पीछे देखा, वैसे ही वह सुंदरी जल में फिसलती मीन की तरह अंतराल में विलीन हो गई. चित्रकार के मन में उस अनुपम सौंदर्य को चित्रित करने की लालसा घर कर गई. चित्रकार को यह आभास हो गया था कि वह राजकुमारी छिताई थी. चित्रकार दरबार के साथ ही अंत:पुर में भी चित्र बना रहा था. अतएव उस ने फिर से उस दमकते सौंदर्य का दर्शन कर लिया और इस बार उस ने पूरी सजगता से चुपचाप छिताई की छवि अपनी तूलिका से उतार ली और चित्र को अपने पास रख लिया.

इस बीच राजा ने बेटी हेतु वर की तलाश जारी रखी. उस ने पुत्री का विवाह द्वारसमुद्र के राजा भगवान नारायण के पुत्र राजकुमार सौंरसी के साथ निश्चित कर दिया. चित्रांकन का कार्य समाप्त होने के पश्चात विवाह का मंडप सजाया गया और विवाह कार्य सकुशल संपन्न हो गया. राजकुमारी पति के साथ डोली में ससुराल चली गई. चित्रकार भी पुरस्कार पा कर और अपने स्वामी हेतु उपहार ले कर दिल्ली चला गया. कुछ ही दिनों बाद प्रिय पुत्री के बिना घर सूना पा कर राजा रामदेव ने छिताई को बुला लिया. छिताई और सौंरसी, दोनों देवगिरि आ गए. वैभव और दुलार की कमी न थी. युवक सौंरसी रात्रि में छिताई के साथ रमण करता और दिन में ऊबने लगता तो आखेट के लिए निकल जाता.

राजा रामदेव दामाद को अनजाने क्षेत्र में अकेले जाने से रोकते थे. मगर नवयौवन के अल्हड़पन में सौंरसी परवाह नहीं करता था. एक दिन मृग के पीछे घोड़ा दौड़ाता वह जंगल में घुस गया. मृग आश्रय पा कर एक आश्रम में घुस गया. आश्रमवासी बाहर निकल आए और दयावश राजकुमार से मृग को छोड़ देने का अनुरोध किया. राजकुमार जोश में था. उस ने हिरण को नहीं छोड़ा. तब उस आश्रमवासी ने कुपित हो कर कहा, ‘‘जैसे तुम ने मृगी को दुखी किया है, उसी प्रकार तुम जिस स्त्री के मोह में पड़े हो, वह दूसरे पुरुष के वश में पड़ेगी और तुम दुख भोगोगे.’’

सुन कर सौंरसी अवाक रह गया. उस के प्रार्थना करने पर आश्रमवासी बोले, ‘‘तुम पश्चाताप करोगे तो तुम्हारा दुख दूर होगा.’’

सौंरसी लौट तो आया मगर उस का मन शंकित रहने लगा. उस ने आखेट पर जाना एकदम बंद कर दिया. इस से छिताई और राजा प्रसन्न रहने लगे. राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. अब दिन में वह अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां भी होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. सौंरसी ने अपनी प्रणयिनी छिताई को वीणा सिखाना शुरू किया. धीरेधीरे संगीत ने उन की संगति में ऐसा माधुर्य घोल दिया कि लययुक्त स्वरलहरियां उन के एकांत की निर्विघ्न साधना बन गईं. सुख के ये सरकते दिन आनंद के नित नूतन सोपान बनते चले गए.

उधर चित्रकार जब काम पूरा कर के दिल्ली पहुंचा तो उस ने राजा रामदेव के व्यवहार की प्रशंसा करते हुए राजा के उपहार बादशाह अलाउद्दीन को दिए. अलाउद्दीन ने अपने मित्र की प्रशंसा की. एक दिन अवसर पा कर चित्रकार ने एकांत में संजो कर बनाए और रखे गए राजकुमारी छिताई के चित्र को सम्राट अलाउद्दीन को दिखाया.

बादशाह एकटक उसे निहारते हुए कल्पना के नवीन संसार में विलुप्त हो गया. उस ने तय कर लिया कि ऐसी सुकुमारी सुंदरी कन्या का भोग अवश्य करना चाहिए. वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि आक्रमण किस बहाने किया जाए क्योंकि अपनी खुशी से तो अपनी ब्याहता कन्या अथवा पत्नी न राजा रामदेव दे पाते और न सौंरसी. जब उसे पता चला कि सौंरसी और छिताई देवगिरि में हैं तो उसे लगा कि देवगिरि पर इस समय आक्रमण से जहां छिताई मिलेगी, वहीं फिर से दौलत हासिल होगी.

अत: उस ने प्रकट में बहाना बनाया कि उसे अपने मित्र राजा रामदेव को देखे बहुत दिन हो गए हैं और वह उन्हें लड़की के ब्याह पर बधाई देगा. इस बहाने के कारण उसे राजा ने बीच में रोकने का प्रयास नहीं किया. वह देवगिरि आया और राजधानी को चारों तरफ से घेर लिया. राजा कुछ समझ न सका. परंतु देवगिरि दुर्ग की दुर्गमता के आगे अलाउद्दीन की एक न चली. अत: अब अलाउद्दीन ने छिताई को उसे सौंपने पर घेराबंदी उठाने की शर्त पेश की तो राजा ही नहीं, पूरी प्रजा इस अपमान पर भड़क उठी.

परिणामस्वरूप युद्ध छिड़ गया. सौंरसी वहां फंस गया था और विशेष क्रोध में था. अत: उस के नेतृत्व में देवगिरि के वीर आतताई पर टूट पड़े. अनेक वीर मारे गए. अलाउद्दीन के साधन बड़े थे और वह दूसरे स्थानों से सेना मंगा कर क्षति को पूरी कर लेता था. इसलिए देवगिरि सेना बारबार आक्रमण कर के भी विजयी नहीं हो पाती थी. परंतु जैसे आज देवगिरि दुर्ग की रक्षा व्यवस्था 7 सौ वर्षों के बाद भी रोमांचित कर देती थी, उसी तरह उस समय भी वह अपराजेय थी. इस से अलाउद्दीन पूरी कोशिश के बावजूद जीत न सका.

महीने पर महीने बीत रहे थे. किले में रसद और सैन्य बल की प्रतिदिन कमी होती जा रही थी. अतएव राजा ने विचार प्रकट किया कि सौंरसी और छिताई को किसी तरह सुरक्षित निकाल कर और निश्चिंत हो कर अत्याचारी अलाउद्दीन पर टूट पड़ा जाए. पहले तो सौंरसी रणक्षेत्र से हटने को कतई तैयार न था. उसे उस शाप की भी याद थी कि दुर्ग से बाहर निकलते ही कहीं छिताई आक्रामकों के हाथ न पड़ जाए. परंतु जब उसे सैनिकों की कमी बताई गई तो वह इस शर्त पर अकेले बाहर जाने को तैयार हो गया कि वह अपने राज्य द्वारसमुद्र जा कर वहां की सेना लाएगा और बाहरभीतर दोनों तरफ से अलाउद्दीन पर जोरदार आक्रमण किया जाएगा.

सौंरसी को भेष बदलना पड़ा था. उस ने अपने सारे राजकीय शृंगार छिताई को सौंप दिए. तरुण पतिपत्नी एकदूसरे पर मर मिटने की कसम खाते हुए विलग हुए. जब तक नीचे उतरता हुआ सौंरसी दिखाई दिया, छिताई देखती रही. फिर सिसकते हुए उस ने अपने भी सारे आभूषण उतार दिए और तपस्विनी का जीवन जीने लगी. कई दिनों बाद जब सुलतान को सौंरसी के निकल जाने की खबर मिली तो वह आशंकित हो गया कि कहीं छिताई भी उस के साथ फुर्र न हो गई हो. अलाउद्दीन को यह भी उम्मीद बंधी कि सौंरसी के चले जाने से वृद्ध राजा लाचार हो गया होगा. अत: उसे पुरानी दोस्ती की याद दिला कर छिताई मांग ली जाए.

इस से दोस्ती स्थाई हो जाएगी. छिताई के दुर्ग में होने का सही पता करने के लिए महिला गुप्तचर भेजे गए. जब इत्मीनान हो गया तो अलाउद्दीन ने विशेष कुटनी दूतियों को छिताई के पास भेजा जो उसे सौंरसी से विमुख कर के सुलतान की तरफ ललचा सकें. लेकिन दूतियां छिताई पर कोई प्रभाव न डाल सकीं. वे यह खबर ले आईं कि छिताई प्रतिदिन राम सरोवर आती है. अलाउद्दीन को चित्तौड़ और रणथंभौर में सौंदर्य के प्रति अपनी आसक्ति को पूर्ण करने का अवसर नहीं मिला था. अत: यहां वह विशेष सजग था.

सुलतान ने अपने एक ब्राह्मण दरबारी राघव चेतन को छिताई सौंपने के आग्रह के साथ राजा रामदेव को समझाने भेजा. ब्राह्मण होने से यह अंदेशा नहीं था कि दूत राघव चेतन का वध होगा. साथ ही अलाउद्दीन ने दूतियों को हिंदू साध्वी का रूप बना कर भेजा जो छिताई को फिर से राजी करें. अलाउद्दीन ने अपनी एक योजना मन में बना ली थी. उसे छिताई को देखे बिना चैन नहीं था. अतएव राघव चेतन के सेवक के रूप में वह खुद परकोटे के भीतर प्रवेश कर गया. राघव चेतन दरबार में गया. दूतियां रनिवास की ओर गईं. सुलतान रामसरोवर में छिताई के दर्शन करने आने की प्रतीक्षा करने लगा. आसपास का वातावरण रमणीय था और तरहतरह के पंछी जलक्रीड़ा कर रहे थे. सुलतान ने समय बिताने के लिए पंछियों का शिकार करना शुरू कर दिया, जिस में वह इतना रम गया कि जब छिताई सखियों सहित आई तो वह जान न सका.

पंछियों के आर्तनाद तथा बेबस कलरव से आकृष्ट हो कर छिताई तो दर्शन कर के चली गई, किंतु मैनरूह को उस ने कारण पता लगाने भेजा. मैनरूह ने सुलतान को छिताई की बेटी मानने की ईमान से कौल उठाने की बात मनवा कर मुक्त किया. सुलतान ने घेरा उठा लिया और लौटने की तैयारी करने लगा.

मैनरूह ने पूरी घटना राजा रामदेव को बता दी. वह प्रसन्न हुआ कि मुसीबत टली. उस ने दासी की खूब प्रशंसा की. जलने वाले हर दरबार में होते हैं. सौंरसी की अनुपस्थिति में जो प्रधान सेनापति थे, उन्होंने इस में भी अलाउद्दीन शासक की कोई चाल बताई. उन्होंने कहा कि दासी की बातों पर विश्वास कर के वे अलाउद्दीन की पकड़ में आ जाएंगे. उन्होंने यहां तक डींग मारी कि जब सुलतान हारने वाला है तो वह शराफत की आड़ में बचना चाहता है. उन्होंने दासी के विरुद्ध काररवाई करने को कहा. यदि वह सचमुच सुलतान था तो उसे किसी भी शर्त पर छोड़ने के बजाय पकड़ कर राजा के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए था. अत: या तो दासी झूठी है या सुलतान.

प्रधान सेनापति की बातों से लोग असमंजस में पड़ गए. सचमुच यह अजीब बात थी कि इतना बड़ा सुलतान निपट अकेले वाटिका में आए, फंसे और निकल जाए. प्रधान सेनापति चित्तौड़, गुजरात और रणथंभौर में अलाउद्दीन की मक्कारियों का विवरण देते हुए जोर देने लगे कि सुलतान की यह भी कोई जालसाजी है. अतएव देवगिरि को युद्ध करना चाहिए. अन्य दरबारी भी सशंकित थे. पुराना पापी पाप छोड़ भी दे तो शक उस का पीछा नहीं छोड़ता. सब की आशंका एवं आक्रोश से राजा को कहना पड़ा कि मैनरूह को अलाउद्दीन ने बहन कहा है तो एक बार आजमाइश की जाए. बात सही है तो उस के कहने पर अलाउद्दीन फिर से घेरा डाल दे.

दासी के माध्यम से सुलतान को खबर मिली. सेनापति की आज्ञा से देवगिरि के सैनिकों ने आक्रमण जारी रखा. इस पर सुलतान का क्रोध उबल पडा़. उस ने फिर से मोर्चे बांधे. अबकी बार लड़ाई प्रतिष्ठा की थी. अलाउद्दीन ने अपनी योजना के अनुसार शह दी. छिताई जहां दर्शन के निमित्त आती थी, वह स्थान मुख्य दुर्ग तथा उस की खाई के बाहर था. अलाउद्दीन के कमंद के सहारे उस जगह आहिस्ताआहिस्ता अपने सैनिक उतारे और उन्हें पेड़ों पर छिप कर बैठा दिया. रक्षकों का ध्यान बंटाने के लिए दुर्ग की दूसरी ओर शोरगुल के साथ आग जलवा दी.

दूसरे दिन जब छिताई आई तो अलाउद्दीन के छिपे सैनिक उस की टोली पर टूट पड़े. छिताई के साथ आई 40 दासियां मार डाली गईं. दूसरी तरफ निकटस्थ फाटक पर अलाउद्दीन के सैनिक पूरे वेग से टूट पड़े. छिताई पकड़ ली गई और सुलतान के सामने पेश की गई. छिताई एकदम भावशून्य हो गई थी. सुलतान ने उसे दिलासा दिया कि वह छिताई को बेटी की तरह रखेगा. कह तो दिया मगर छिताई के ललित सौंदर्य को सम्मुख पा कर एक बार सुलतान का चित्त चंचल हो उठा. मगर अपने कौल को याद कर के वह सहम गया.

छिताई के पीछे कुटनियां लगा दी गईं, जो उसे सजनेधजने और पथभ्रष्ट होने के लिए तैयार करें. छिताई ने उन का मर्म समझते ही आंखकान मूंद लिए. अब उस ने खाना तो दूर, पानी पीना भी छोड़ दिया. उस ने प्रतिज्ञा की कि उस विधर्मी महल में अनशन कर के वह प्राण त्याग देगी. जब यह खबर बादशाह को मिली तो वह खुद छिताई के पास आया और उसे समझाने की कोशिश की.

छिताई ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया और अपने हठ पर अडिग रही. छिताई का चेहरा बुझ गया और कंचनवत शरीर की कांति मलीन हो गई थी. सुलतान को लगा कि यदि और देर हुई तो छिताई मर जाएगी. तब उस ने छिताई को अपने विश्वस्त राघव के महल में भेज दिया. अलाउद्दीन ने उस की सुरक्षा की इस आशय से अलग व्यवस्था की कि भविष्य में समय बदलने पर उस का मन भी बदल जाए. साथ लाई उस की वीणा भी मन बहलाने के लिए भेज दी.

उधर जब सौंरसी तैयारी के साथ देवगिरि वापस पहुंचा तो उसे छिताई के अपहरण की सूचना मिली. यह आघात वह सहन न कर सका. उस ने दुर्ग, सेना, महल, राजपाट सब त्याग दिया. उस की दशा एक बार तो विक्षिप्त की भांति हो गई. वह जंगल में चला गया और उस ने वैरागी रूप धर लिया. जो मिला, खा लिया और इधरउधर घूमने लगा. वह छिताई की हर ओर खोज करने लगा. अपने असह्य वियोग की करुणा को उस ने वीणा में झंकृत करना आरंभ किया.

संगीत अन्य कलाओं की भांति साधना है जो भावातिरेक में स्वरों को चमत्कार के रूप में प्रकट करता है. भावों की गहनता कला को साधना के सोपानों से सिद्धि के शिखर का स्पर्श करा देती है. जब छिताई की अतृप्त स्मृति को सौंरसी वीणा के विराट सुरों से तृप्त करने का प्रयास करता तो प्रतीत होता जैसे अदृश्य से दृश्य हो रहा हो. एकांत में सौंरसी के वीणा वादन पर पशुपक्षी स्तब्ध हो कर मुग्ध हो जाते. पुष्प झूमने लगते. प्रकृति थिरकने लगती. वैरागी सौंरसी रुकता नहीं था, टोह लेतेलेते मंजिल की ओर बढ़ा जाता था.

वियोगी हृदयों की भी कोई अनजानी आहट होती होगी. भावी प्रेरणावश सौंरसी दिल्ली पहुंच गया. उस ने एक उपवन में डेरा डाला. प्रात: संध्या अथवा जब उस को भावोद्वेग होता, वह वीणा के तार छेड़ देता. तब बटोही थम जाते. पखेरू चित्रलिखित बन जाते और जल का निर्झर संगत करने लगता था.

उधर अलाउद्दीन ने छिताई के पास इस लालसा से वीणा भेज दी थी कि वह जब प्रकृतिस्थ होगी तो मन बहलाएगी. राघव चेतन के महल में वह कुछ संयमित तो हुई, परंतु स्वाभाविक न बन सकी. राघव चेतन की बातों तथा प्रेरक आशावादिता से वह शरीर संरक्षण हेतु कुछ खानेपीने लगी, मगर वीणा को उस ने हाथ नहीं लगाया. यह वही वीणा थी, जिस पर सौंरसी ने उसे वीणा बजाना सिखाया था. वह वीणा को छेड़ती तो न थी, परंतु उसे छोड़ती भी नहीं थी. वह वीणा उसे प्रियतम की सुधि दिलाती रहती थी.

सुलतान छिताई की वीणा सुनना चाहता था. मगर अन्यमनस्का छिताई उन तारों पर अंगुली नहीं रखती थी. अंत में बादशाह की आज्ञा से दिल्ली के प्रसिद्ध वीणावादक गोपाल नायक छिताई को वीणा झंकार की शिक्षा देने हेतु भेजे गए. सुलतान ने वादा किया कि जिस दिन छिताई वीणावादन करेगी, गोपाल नायक को मुंहमांगा ईनाम मिलेगा.

गोपाल नायक ने बारंबार चेष्टा की. गायन और वादन से छिताई में छिपे कलाकार को जगाने की चेष्टा की परंतु सफल न हुए. अलबत्ता दोनों कलाकारों ने एकदूसरे में अंतर्निहित कला को पहचान लिया. परस्पर सहानुभूति भी हुई. गोपाल नायक छिताई की यातना को समझते थे. छिताई कम से कम एक बार वीणा बजा कर उन की प्रतिष्ठा सुलतान की निगाह में बढ़ाना चाहती थी, मगर कर न सकी.

अंत में उस ने वह वीणा स्वयं गोपाल नायक को दे दी. उस ने कहा, ‘‘गुरुजी, इसे रख लीजिए. शायद कभी वे आएंगे तो देख कर पहचान तो लेंगे अपनी वीणा को. फिर वे इसे बजाएंगे अवश्य. जब उन के हाथ से वीणा बजेगी तो कितना ही शोर हो, मैं सो भी रही होऊं तो इस वीणा के सुरों को पहचान कर जान लूंगी.’’

दिल्ली में सौंरसी के वीणा वादन की अलौकिकता की ख्याति बढ़ रही थी. उस ने भी संगीतज्ञ एवं वीणावादक गोपाल की पारंगतता के विषय में सुना. सौंरसी गोपाल नायक के घर गया. गोपाल नायक ने सम्मानपूर्वक अपने कक्ष में बैठाया. वार्ता करते हुए सौंरसी ने वहां छिताई द्वारा प्रदत्त अपनी वीणा देखी तो उसे बजाने की अभिलाषा व्यक्त की. जैसे ही सौंरसी ने उस वीणा के सुर झनझनाए तो वे चिरपरिचित स्वर छिताई के कानों में गूंज उठे.

उसे प्रियतम के आगमन का आभास हो गया. वह भावातिरेक में विह्वल हो उठी. सुलतान की पाबंदियों के चलते वह अपने स्वामी से मिल नहीं सकती थी. गोपाल नायक इस कौशल से वीणा बजाने और सौंरसी के उत्साह से जान गए कि यह युवक छिताई की प्रियतम है. उन्होंने उसे राघव चेतन की मार्फत सुलतान से मिलने की सलाह दी, परंतु छिताई के विषय में कुछ नहीं बताया.

योगी वेश में सौंरसी राघव चेतन से मिला और उन से सुलतान से मिलाने की प्रार्थना की. राघव योगी की वीणा वादन कला तथा व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ. उस ने योगी की भेंट दरबार में सुलतान से कराई. योगी ने बताया कि वह दक्षिण में सिंहल से आया है और उस का सब कुछ दिल्ली के बाहर के उद्यान में छिन गया है. सुलतान को आश्चर्य हुआ, क्योंकि उद्यान में कोई आताजाता न था. फिर योगी के पास ऐसी क्या संपत्ति होगी जो कोई छीनेगा.

योगी की बातें रहस्यमय लगीं तो भी अलाउद्दीन ने उसे परखने की दृष्टि से वीणा बजाने को कहा. योगी ने सिर झुका कर अनुरोध किया कि सुलतान यदि एक बार उद्यान में दरबार लगाएं तो उसे उस का खोया सब कुछ मिल जाएगा. वहीं वह वीणा भी बजाएगा. सुलतान मुसकराया.

उद्यान के सुरम्य वातावरण में दरबार का आयोजन किया गया. सुलतान ने अनुभव किया कि योगी का वीणा वादन शुरू होते ही दिल गुलाब के फूल की तरह खिल उठा. फिजा खुशगवार होने लगी. लगा, जैसे कुदरत ने नींद से जाग कर अंगड़ाई ली हो. पशुपक्षी एकत्रित होने लगे. जब तक वीणा बजती रही, पूरा दरबार, पशुपक्षी, पेड़पौधे सब चुपचाप सुनते रहे. वीणा वादन खत्म होने पर सुलतान बोल उठा, ‘‘मरहबा! क्या खूब!’’

उसे छिताई से अपना वादा याद आया. इस वीणा पर भी यदि छिताई ने वीणा नहीं बजाई तो वह बहरी हो चुकी होगी. उस ने राघव चेतन से छिताई को वीणा सहित बुला लाने का आदेश दिया. जब तक छिताई आ नहीं जाती, उस ने योगी को वीणा बजाने का आदेश दिया. सुलतान ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारी वीणा से छिताई की तकलीफ दूर हो जाए तो तुम जो मांगोगे, तुम्हें ईनाम दिया जाएगा.’’

सौंरसी तन्मय हो कर बजाने लगा. दूर से आती हुई छिताई ने जब वीणा की वह चिरपरिचित स्वरलहरी सुनी तो उस का दिल उछलने लगा. छिताई के पांव स्वचालित से उठने लगे. जब उस ने सौंरसी को देखा, तो दाढ़ीमूंछ, केश तथा जोगिया भेष के बावजूद पहचान गई. फिर तो प्रच्छन्न आह्लाद का ज्वार उमड़ आया. मुखमंडल प्रफुल्लता की आभा से दीप्त हो उठा. सारी सभा उस की इस असाधारण मन:स्थिति से प्रमुदित हो उठी.

राघव चेतन ने वीणा निकाली. गोपाल नायक ने उसे ला कर बीच सभा में छिताई के सामने वादन की स्थिति में प्रस्तुत कर दिया. आनंद की उदात्त लहरियां सौंरसी तथा छिताई के मानस में गूंज रही थीं. आंखों के मिलते ही वे एकदूसरे को पहचान ही नहीं गए, बल्कि उन में वियोग का संताप, उलाहना, यातना, सब आनंद में परिवर्तित हो गए. उस आनंद में संगीत सुख की वर्षा बन निर्झर सा फूट पड़ा.

अनजाने में छिताई ने सौंरसी की दी हुई वीणा को उठा लिया. लगा कि वह सुहाग के दिनों की पारंगतता को पुन: प्राप्त कर चुकी है. न जाने कब तक दोनों एकदूसरे की ओर अपलक निहारते हुए वीणा बजाते रहे. पशुपक्षी एकटक उन्हें देख रहे थे. संगीत के ताल पर मोर नाचने लगे. मृग थिरकने लगे. लगता था, जैसे वीणा की स्वर लहरियों से सब अलौकिक हो उठा हो.

धीरेधीरे सौंरसी ने वीणा की गति धीमी की. छिताई ने भी साथ दिया. जब उन्होंने वीणा वादन रोका तो पूरी सभा सन्नाटे से करतल ध्वनि में बदल गई. सुलतान ने छिताई को इतनी उत्फुल्ल कभी नहीं देखा था. छिताई ने वीणा ही नहीं बजाई, उस ने अपनी कला और उल्लास से पूरी सभा को आह्लादित कर दिया था. सुलतान को अपना वादा याद आया. उस ने सौंरसी से पूछा, ‘‘तुम्हारा ईनाम पक्का. बताओ, तुम्हें क्या चाहिए. आज हमें पता चला कि मौसीकी भी एक तरह की इबादत है. और छिताई, हम ने तुम्हारी बारीकियों को भी परखा. गजब का हुनर है तुम दोनों में.’’

सौंरसी बुत बना बैठा रहा. वीणा वैसे ही पकड़े रहा. एकटक सुलतान को देखता रहा. सुलतान ने फिर शाबाशी देते हुए कहा, ‘‘जोगी, बताओ तुम क्या चाहते हो? तुम जो मांगोगे, वह तुम्हें मिलेगा.’’

जोगी ने अदब से सिर झुकाया, मुसकराया. फिर फरमाया, ‘‘मान्यवर, आप मुझे वचन देते हैं?’’

अलाउद्दीन की पारखी नजरों ने परख लिया था कि वे दोनों एकदूसरे के निकट रहे हैं. तुरंत उसे शक हो गया कि यही सौंरसी है. परंतु सभा के सम्मुख वह दो बार पूर्व ही वचन दे चुका था. उस ने बेसाख्ता कह दिया, ‘‘बेशक, हम अपनी बात पर कायम रहेंगे. अपना ईनाम मांगो.’’

जोगी ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘श्रीमान, मुझे छिताई को ही दान में दे दीजिए.’’

सुलतान कुछ बोले, इस के पहले ही छिताई आर्तस्वर में, जिस में संयोग का आवेग और विरह की विवशता निहित थी, सिसकती हुई अपने पति के चरणों में गिर पड़ी. सुलतान ने एक बार सभा को देखा, फिर राघव चेतन को निहारते हुए बोला, ‘‘पंडित, वो क्या कहते हैं, तुम्हारे मजहब में? हां, कन्यादान. जोगी, तुम चाहे जो भी हो, मैं छिताई को तुम्हें कन्यादान करता हूं.’’

सौंरसी ने उठ कर 3 बार बंदगी की. पूरी सभा में वाहवाह, बाखूब, वल्लाह, आमीन की आवाजें गूंज उठीं. सुलतान ने हंसते हुए फरमाया, ‘‘मगर मैं ने बेटी को तो कुछ दिया ही नहीं. छिताई, बताओ, तुम क्या चाहती हो?’’

कुछ लोग कठोर अलाउद्दीन की इस दरियादिली पर चकित थे. चित्तौड़ और रणथंभौर के किलों को पत्थर के खंडहरों में तब्दील करने वाले अलाउद्दीन ने सब के सामने छिताई को अपनी बेटी पुकारा था. सौंरसी तथा छिताई की तपस्या ने पत्थर को भी पिघला दिया था. संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था. छिताई ने सिसकते हुए, हाथ जोड़ कर भूमि पर सिर रखा. बोली, ‘‘हे सम्राट, हे पिता, मुझे आप का बस आशीर्वाद चाहिए. आप ने मुझे सब कुछ दे दिया.’’

सौंरसी ने विनयपूर्वक अपना वास्तविक परिचय तथा छिताई को अपनी परिणीता बताया. पूरी सभा इस अद्भुत जोड़ी पर स्नेह की वर्षा करने लगी. अलाउद्दीन ने शाही ढंग से छिताई और सौंरसी की विदाई की. देवगिरि पहुंचने पर दोनों का भव्य स्वागत हुआ. छिताई ने अपने धैर्य से विजय प्राप्त की थी. कुछ दिन वहां रह कर दोनों द्वारसमुद्र चले गए. कोई 5 सौ वर्ष पूर्व कवि नारायण दास ने ‘छिताई वार्ता’ प्रेम काव्य की रचना की थी, जिस का विवरण डाक्टर राजमल वोरा ने अपनी पुस्तक ‘देवगिरि के यादव राजा’ में उल्लिखित किया है. Hindi Kahani

लेखक – जगदीश जगेश   

 

UP News: खत्म हो गया खूबसूरत रिश्ता

UP News: परिवार पैसों से नहीं, प्यार से खुश रहता है, जिस के लिए संयम, विवेक, समर्पण और आपसी तालमेल जरूरी है. डा. विशाल यही नहीं कर पाए, जिस की वजह से आज वह पत्नी को प्रताडि़त कर मौत के मुंह तक पहुंचाने के आरोप में जेल में हैं.

किसी परिवार की खुशहाली का मूल आधार सिर्फ दौलत ही नहीं, त्याग, समर्पण, विश्वास, आपसी प्यार, अपनापन और भावनाओं का संगम होना जरूरी है. जहां यह सब नहीं होता, वहां खुशियां पानी के बुलबुले और कोहरे जैसी होती हैं. जिस तरह कुछ वक्त के बाद बुलबुला अपना वजूद खो देता है और कोहरा छंट जाता है, कुछ वैसा ही खुशियों के साथ होता है. दौलत की चकाचौंध से प्यार करने वालों की अन्य मामलों में झोलियां खाली ही रह जाती हैं, क्योंकि पैसा जरूरतों को तो जरूर पूरी कर देता है, लेकिन वह सब नहीं दे पाता, जो खुशहाल जिंदगी के लिए जरूरी होता है.

राजेश कौड़ा इन बातों को अच्छी तरह जानतेसमझते थे. व्यवहारकुशल राजेश के लिए उन का अपना परिवार ही पूरी दुनिया था. वह सरकारी मुलाजिम थे. हर आम आदमी की तरह वह भी चाहते थे कि उन के परिवार में खुशियों के जुगनू हमेशा रोशनी बिखेरते रहें. इसी सोच के समुद्र में उन्होंने प्यार, समर्पण और जिम्मेदारियों की किश्ती को हमेशा चलाया था. राजेश कौड़ा उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के मोहल्ला अरविंदपुरी के रहने वाले थे. परिवार के संचालन व बच्चों की संस्कारपूर्ण परवरिश में गृहणियों का बड़ा योगदान होता है. उन की पत्नी प्रेमलता ने इस काम को दिल के साथसाथ दिमाग से पूरा किया. उन की 3 बेटियां, शालिनी, सोनिया और शिवानी थीं. बच्चे मातापिता के लिए अनमोल पूंजी की तरह होते हैं, जिसे वे अपने ढंग से सहेज कर रखते हैं.

राजेश की मानसिकता ऐसी नहीं थी कि बेटियों के साथ कोई भेदभाव करते. वह इस से पूरी तरह मुक्त थे. ज्ञान की रोशनी दुनिया के हर खजाने से ज्यादा अनमोल होती है. वह इस बात को जानते और समझते थे. इसी वजह से उन्होंने बेटियों को बेटा समझा और उन्हें शिक्षा की आजादी दी. परिवार का माहौल, मातापिता के विचार, संस्कार और जिम्मेदारियां अच्छी हों तो उस का असर बच्चों पर पड़ता ही है. कोड़ा दंपत्ति की बेटियां न सिर्फ उन की उम्मीदों पर खरी उतरीं, बल्कि उन्होंने ऊंची शिक्षा हासिल कर के उन का नाम भी रोशन किया. उन में एमबीबीएस, एमडी की पढ़ाई करने वाली शालिनी गोल्ड मैडलिस्ट थी. तीनों बेटियां पढ़लिख कर कामयाब हुईं तो उन्होंने एकएक कर के सभी का विवाह कर दिया.

शालिनी का विवाह मेरठ शहर के ही थाना सदर बाजार के पौश इलाके थापरनगर में विशाल से हुआ था. विशाल खुद भी डाक्टर थे. उन्होंने विदेश से मैडिकल की पढ़ाई की थी. उन के पिता डा. सी.एल. आर्य की गिनती नामी डाक्टरों में होती थी. वह सादगी पसंद अच्छे स्वभाव के डाक्टर थे. कोठी के बाहरी हिस्से में ही वह ‘आर्य चेस्ट क्लीनिक’ चलाते थे. उन के परिवार में पत्नी वीना आर्य के अलावा एक बेटी थी सपना, जिस का विवाह हो चुका था. शालिनी का विवाह विशाल के साथ सन 2002 में हुआ था. विवाह और उस की खुशियां बसंत ऋतु की तरह होती हैं, जिस में हजारों रंगबिरंगे फूल एक साथ खिल कर जिंदगी को महका देते हैं. जीवन के इस पायदान पर अनोखी मादकता होती है. लगता है, वह पल ठहर जाए और खुशियों का घरौंदा आबाद रहे.

लेकिन यह सिर्फ खूबसूरत सोच भर होती है, वास्तविकता में ऐसा कतई नहीं होता. इस के पीछे आईने की तरह साफ वजह यह होती है कि एक तो वक्त अपनी चाल नहीं छोड़ता, दूसरे जिंदगी कभी घुमावदार होती है तो कभी सीधी. समय अपनी गति से चलता रहा. समय के साथ शालिनी 2 बेटियों, वर्णिका और निकिता की मां बनी. शालिनी और उस के पति विशाल भी डा. सी.एल. आर्य की क्लिनिक में ही मरीजों को देखते थे. क्लिनिक के बोर्ड पर तीनों का संयुक्त नाम था. आर्य परिवार के पास नाम, दौलत और शोहरत, सभी कुछ था. अच्छी जिंदगी के लिए यह सब खुशनसीब लोगों के पास ही होता है या यूं कहें कि इस तरह की जिंदगी के लिए न जाने कितने लोग तरसते हैं.

आधुनिकता के दौर में चकाचौंध भरी जिंदगी के पीछे कुछ ऐसी हकीकतें होती हैं, जो सामाजिक तौर पर प्रत्यक्ष नजर नहीं आतीं. बहुत से घरों की दीवारों की पीछे न जाने कितने तूफान चल रहे होते हैं. यानी सिर्फ दौलत और शोहरत देख कर यह अंदाजा लगाना कठिन होता है कि वहां सब खुश हैं. डा. आर्य के परिवार में भी कुछ ऐसा ही था. हंसमुख स्वभाव की शालिनी बेहद मृदुभाषी थी. उस के इस स्वभाव को न सिर्फ मरीज, बल्कि आसपास के लोग भी पसंद करते थे. उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य स्वभाव के जितने अच्छे थे, उन की पत्नी वीना ठीक इस के उतना ही विपरीत थीं. तेजतर्रार वीना हर बात पर टीकाटिप्पणी करना और परिवार को अंगुलियों पर नचाना अपना हुनर समझती थीं.

ऐसी बातों का दायरा हद से ज्यादा फैल जाए तो घर की शांति को ग्रहण लग जाता है. उन की इन बुरी आदतों का शिकार शालिनी भी हो चुकी थी. पढ़ेलिखे होने के बावजूद डा. विशाल और उन की मां वीना आर्य रूढि़वादी सोच और कुरीतियों का शिकार थीं. उन्हें शालिनी से शिकायत थी कि उस ने बेटे को जन्म नहीं दिया. इस के अलावा दहेज से ले कर छोटीछोटी बातों पर बतंगड़ बन जाना आम बात हो गई थी. ऐसी बातें खुशियों पर ग्रहण लगाने वाली होती हैं. शालिनी कभी झगड़े का तो कभी मारपीट का शिकार हो जाती थी, लेकिन पिता के घर से मिले संस्कार उसे बांधे रखते थे.

इस के अलावा एक बात यह भी थी कि डा. सी.एल. आर्य बहू शालिनी को बेटी की तरह मानते थे. वह बहू की काबलियत और व्यवहार की कद्र करते थे. सामाजिक अच्छाइयों और बुराइयों का भी उन्हें खयाल था. जब भी झगड़े के हालात उत्पन्न होते थे, डा. आर्य शालिनी की ढाल बन कर खड़े हो कर मामले को शांत करा देते थे. शालिनी की अपनी बहनों और मातापिता से बातें होती रहती थीं. इन कड़वाहटों से वे भी वाकिफ थे, लेकिन मामला चूंकि बेटी की ससुराल का था, इसलिए किसी प्रकार का वे हस्तक्षेप नहीं करते थे. बहुत सी बातों को खामोशी के धागों से शालिनी अपने होंठों को सिल लेती थी. शालिनी की परेशानी तब और बढ़ गई, जब उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य की मौत हो गई.

कौडा दंपति ने शालिनी को नाजों से पाला था. हर मातापिता चाहते हैं कि उन की बेटी ससुराल में खुश रहे. वे भी ऐसा ही चाहते थे, लेकिन शालिनी के मामले में ऐसा नहीं हो सका था. वह बेटी को समझाते हुए वैवाहिक जीवन का वास्ता दे कर परिवार को संभालने की नसीहतें दिया करते थे. उसे भी परिवार के संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं का खयाल था. अब तक शालिनी की बड़ी बेटी वर्णिका नौवीं कक्षा में आ चुकी थी, जबकि उस से छोटी निकिता पांचवीं कक्षा में थी. वक्त अपनी गति से चल रहा था. बुरा वक्त किसी की जिंदगी में कब दस्तक दे दे, इस बात को कोई नहीं जानता. शालिनी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

30 अगस्त, 2015 की सुबह करीब साढ़े 11 बजे शालिनी की बेटी वर्णिका का अपनी नानी प्रेमलता के पास फोन आया तो वह चौंकीं. वजह यह थी कि उस ने बताया था कि घर में झगड़ा हो रहा है. उस के पिता और दादी मम्मी को परेशान कर रहे हैं. बेटी को ले कर पहले से ही चिंतित कौड़ा दंपति पर यह खबर बिजली बन कर गिरी. प्रेमलता ने यह बात पति को बताई तो वह मेरठ में ही रहने वाली अपनी बहन उमा और बहनोई राजकुमार को साथ ले कर कुछ ही देर में बेटी की ससुराल थापरनगर पहुंच गए.

उस वक्त घर में महाभारत छिड़ा हुआ था. उन लोगों का इस तरह अचानक आना विशाल और वीना को नागवार गुजरा. वीना उन की आवभागत करने के बजाय बेरुखी से बोली, ‘‘भाईसाहब, आप को इस तरह नहीं आना चाहिए, यह हमारे घर का मामला है.’’

राजेश हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘माफ कीजिए बहनजी, कौन पिता चाहता है कि उस की बेटी दुखी रहे. फिक्र तो सभी को होती है. आप लोग मेरी बेटी को इस तरह परेशान करते हैं, यह ठीक नहीं है. ऐसी क्या भूल हो गई हमारी बेटी से?’’

इस पर वीना हाथ नचा कर बोलीं, ‘‘हमें आप को यह बताने और समझाने की जरूरत नहीं है, आप यहां से चले जाएं तो बेहतर होगा.’’

राजेश को बेटी की ससुराल में अपने साथ इस तरह के रूखे और अपमानजनक व्यवहार की उम्मीद नहीं थी. वह शर्मिंदा हो गए. अपने सामने पिता की इस तरह बेइज्जती होते देख शालिनी की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा, ‘‘पापा, आप चले जाइए. यहां तो यह रोज का हाल है.’’

राजेश का दिल नहीं माना. उन्होंने विशाल से कहा, ‘‘बेटा, अपने पविर को संभाल कर रखो. बुजुर्गों ने कहा है कि रोजरोज की कलह अच्छी नहीं होती. वैसे तो यह आप के घर का मामला है, लेकिन बड़ा होने के नाते तुम्हें समझा तो सकता ही हूं.’’

राजेश का इस तरह समझाना विशाल को कांटे की तरह चुभा. वह भी बेरुखी से ही पेश आया. उस ने कहा, ‘‘हम सब संभाल लेंगे पापाजी, आप चिंता न करें. मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूं. प्लीज, आप यहां से चले जाइए.’’

राजेश मन मसोस कर वहां से चले आए. मातापिता बेटी को ससुराल में सुखी रहने की उम्मीद करते हैं, लेकिन वहां जो हालात थे, उन्होंने राजेश और उन की पत्नी को चिंता में डाल दिया था. हंसमुख स्वभाव की बेटी कब गंभीर हो गई थी, उन्हें पता ही नहीं चला था. उन्होंने सोचा कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. उन्हें क्या पता था कि इस से भी बुरा होने वाला है. उसी रात करीब 2 बजे किसी व्यक्ति ने फोन कर के उन्हें बताया कि उन की बेटी को जहर दे दिया गया है. उसे जबरदस्ती इंजेक्शन लगा कर मारने की कोशिश की गई है. इस सूचना ने उन की नींद उड़ा दी. आननफानन में उन्होंने अपने नातेरिश्तेदारों को फोन किया और धड़कते दिल से शालिनी के घर जा पहुंचे. वहां पता चला कि शालिनी को जसवंतराय अस्पताल ले जाया गया है.

सभी लोग जसवंतराय अस्पताल पहुंचे. शालिनी की हातल गंभीर थी और उसे आईसीयू में भरती कराया गया था. डा. विशाल तब तक वहीं था, लेकिन उन लोगों को देखते ही उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. बातचीत में उस की ससुराल वालों से झड़प हो गई तो वह भाग निकला. घटना की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना मिलते ही थाना सदर बाजार के थानाप्रभारी राजेंद्रपाल सिंह मौके पर पहुंच गए.

शालिनी का इलाज कर रहे डाक्टरों का कहना था कि उस के शरीर में सल्फास की प्रकृति का जहर है. उस के हाथ, कमर व अन्य जगहों पर चोट के भी निशान थे. इस का मतलब उस के साथ मारपीट भी की गई थी. राजेश परिवार के हालातों से वाकिफ थे. शालिनी की इस हालत के लिए उस की ससुराल वाले जिम्मेदार थे. उन्होंने हत्या का आरोप लगा कर हंगामा शुरू कर दिया. शालिनी की हालत बेहद नाजुक थी. उसे वेंटीलैटर पर रखा गया था. वह बोलने की स्थिति में नहीं थी. घर वाले परिवार के हालात और उत्पीड़न का हवाला दे कर सल्फास या जहरीला इंजेक्शन जबरन लगाने का आरोप लगा रहे थे.

एसएसपी डी.सी. दुबे को इस हाईप्रोफाइल मामले की सूचना मिली तो उन्होंने पुलिस को निष्पक्ष काररवाई के निर्देश दिए. इस बीच शालिनी की बेटियों को ननिहाल भेज दिया गया. अपने मरीजों के लिए संवेदनशील रहने वाली डा. शालिनी खुद मौत से लड़ रही थी. जहर उस के शरीर में पूरी तरह घुल चुका था. डाक्टर उसे बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे, लेकिन अथक प्रयास के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. करीब 28 घंटे मौत से लड़ कर शालिनी की सांसों की डोर टूट गई. इस से उस के परिवार में कोहराम मच गया. अस्पताल में पूछताछ में पता चला कि शालिनी को वहां सीने व पेट दर्द की शिकायत के बहाने भरती कराया गया था.

पुलिस ने राजेश की तहरीर पर पुलिस ने अपराध संख्या 414/15 पर भादंवि की धारा 307, 328, 504, 506 व दहेज अधिनियम की धारा 498ए के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद शालिनी के शव के पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया. अब तक डा. विशाल और शालिनी की सास वीना, दोनों ही कोठी में ताला लगा कर फरार हो चुके थे. शालिनी की मौत से हर कोई आहत और आक्रोशित था. पोस्टमार्टम के बाद 1 सितंबर को गमगीन माहौल में उस के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. शालिनी की बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. कभी दुलहन के रूप में बेटी को विदा करने वाले राजेश कौड़ा ने सोचा भी नहीं था कि उन्हें होनहार बेटी की अर्थी को कंधा देना पड़ेगा.

इस बीच लोगों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर जाम लगा दिया. मौके पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक (नगर) ओमप्रकाश सिंह ने जल्द गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर जाम खुलवाया. पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए 4 पुलिस टीमों का गठन किया तो ये टीमें मांबेटे की तलाश में लग गईं. अगले दिन शालिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. उस की मौत शरीर में जहर घुलने से हुई थी. लीवर, किडनी से ले कर शरीर के हर अंग में जहर फैल गया था. उस के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाने का निशान था. डाक्टर ने पुलिस के कहने पर जांच के लिए बिसरा सुरक्षित रख लिया था. बाद में उसे जांच के लिए आगरा स्थित फोरैंसिंक लैब भेज दिया गया था.

उधर पुलिस ने आरोपियों की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी थी, लेकिन वे हत्थे नहीं चढ़ रहे थे. विशाल विदेश भाग सकता था, इस आशंका के तहत लुकआउट नोटिस जारी करा दिया गया था. विशाल का मोबाइल स्विच औफ था. उस की काल डिटेल्स से पता चला कि उस के कई लड़कियों और महिलाओं से संबंध थे. शालिनी के घर वालों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे से भी मुलाकात की. 4 सितंबर को शालिनी की तेहरवीं की रस्म में आर्य परिवार की छोड़ो, उन का कोई रिश्तेदार तक नहीं आया था.

गिरफ्तारी न होने से शालिनी के घर वालों में गुस्सा था. आरोपियों का कुछ पता नहीं चल रहा था. शालिनी के परिजनों ने 5 सितंबर को विशाल की कोठी पर उस के और वीना के कातिल होने संबंधी पोस्टर चस्पा कर के धरना दे दिया. पुलिस ने गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर धरना खत्म कराया. पुलिस को बिसरा रिपोर्ट का इंतजार था. इस बीच पुलिस ने अदालत से दोनों आरोपियों का गैर जमानती वारंट हासिल कर लिया. देखतेदेखते कई दिन बीत गए. मामला मीडिया की सुर्खियां बना था.

शालिनी की बिसरा जांच रिपोर्ट आ गई. उस में एल्यूमिनियम फास्फाइड (सल्फास) नामक जहर के अंश पाए गए थे. उसे जहर दिया गया था या उस ने मानसिक दबाव में खुद खाया था, इस का जवाब गिरफ्तारी के बाद ही मिल सकता था. अभियुक्तों की गिरफ्तारी को ले कर लोग सड़कों पर उतर आए. उन्होंने कैंडल मार्च निकाले और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर से भी मुलाकात की. पुलिस विशाल तक भले पहुंच नहीं पा रही थी, लेकिन अदालत से उस के घर की कुर्की का वारंट हासिल कर के चस्पा जरूर कर दिया था. पुलिस से बचने के लिए अपनी गिरफ्तारी पर स्टे हेतु विशाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अरजी लगाई, लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया.

आखिर 16 सितंबर को डा. विशाल की फरारी का पटाक्षेप हो गया. उसे पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह अदालत में आत्मसमर्पण करने जा रहा था. विशाल से विस्तृत पूछताछ की गई. शालिनी के घर वालों और विशाल से पूछताछ में जो कहानी निकल कर आई, वह आर्थिक संपन्न परिवार में  घरेलू हिंसा के सामाजिक कलंक व उजले चेहरों के पीछे की चौंकाने वाली हकीकत थी. शालिनी होनहार थी. एमबीबीएस की पढ़ाई में वह अपने बैच की टौपर रही. इस के लिए उसे गोल्ड मैडल भी मिला. इस के साथ ही वह बालीबौल की भी अच्छी खिलाड़ी थी. राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले कर उस ने कई इनाम जीते थे. डाक्टर की डिग्री हासिल करने के साथ ही कौड़ा दंपति ने उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू कर दी थी.

शालिनी खूबसूरत होने के साथ होशियार थी, इसलिए थोड़े प्रयास के बाद 12 साल पहले उन्होंने शालिनी का रिश्ता डा. सी.एल. आर्य के एकलौते बेटे डा. विशाल में तय कर दिया. आर्थिक रूप से संपन्न डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव और आचरण के व्यक्ति थे. समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चेस्ट स्पैशलिस्ट के रूप में उन का नाम था. समाज में उन्हें इज्जत की नजरों से देखा जाता था. राजेश को लगा कि वह खुशनसीब हैं, जो उन्हें बेटी के लिए इतना अच्छा रिश्ता मिल गया. उन्होंने सोचा कि हमपेशा पति के साथ शालिनी खुश रहेगी.

रस्मी बातचीत के बाद शालिनी और विशाल ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. राजेश के परिवार को पहला झटका तब लगा, जब श्रीमती वीना आर्य ने दहेज की ख्वाहिश जाहिर की. दहेज को भले ही बुराई, कुप्रथा, कानून के खिलाफ कहा जाए, लेकिन यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है कि दहेज समाज में परंपरा बन गया है. शादियों में लाखोंकरोड़ों खर्च किए जाते हैं. कभी लड़के वालों की मांग पर तो कभी सामाजिक दिखावे के लिए तो कभी हैसियत के अनुसार. राजेश ने भी अपनी हैसियत के अनुसार शहर के एक बड़े फार्महाउस में 1 नवंबर, 2002 को धूमधाम से विवाह समारोह आयोजित कर के भारी मन से बेटी को विदा कर दिया. इस विवाह में उन्होंने 25 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए.

हर लड़की की तरह शालिनी ने भी मन में ढेरों उमंगे और सपने लिए ससुराल में पहला कदम रखा. विवाह का एक साल हंसीखुशी से बीत गया. ससुर के क्लीनिक में ही शालिनी ने प्रैक्टिस शुरू कर दी. शालिनी ने बेटी को जन्म दिया तो सास के अरमानों पर जैसे पानी फिर गया. वह बेटे की ख्वाहिश रखती थीं. बहुत जल्द उन्होंने ताने देने शुरू कर दिए तो सास की बातें शालिनी के हृदय पर तीर की तरह चुभने लगीं. इतना ही नहीं, उन्होंने नवजात बेटी के पालनपोषण से भी इंकार कर दिया. डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव के व्यक्ति थे. वह बहू का पक्ष लेते तो वीना उन्हें भी आड़े हाथों लेती, ‘‘यह तुम्हारी बहू है बेटी नहीं, जो इस का पक्ष लेते हो.’’

डा. आर्य समझाने की कोशिश करते, ‘‘बहू भी बेटी समान होती है वीना, तुम्हें इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए.’’

डा. आर्य कहते जरूर थे, लेकिन उन की इस तरह की बातें वह एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती थीं. शालिनी ने सास की आए दिन होने वाली तानेबाजियों की शिकायत पति विशाल से की. उसे उम्मीद थी कि वह उस के दिल के घावों पर सहानुभूति का फीहा रखेगा, लेकिन उस ने भी अपनी मां का समर्थन कर के उसे निराश कर दिया. वीना आर्य दानदहेज से भी नाखुश थीं. इसे ले कर भी वह ताने मारने लगीं थीं.

शालिनी एक बार मायके आई तो हमेशा खिलखिलाने वाली बेटी का बुझा चेहरा देख कर राजेश और प्रेमलता को लगा कि वह बीमार रही है. उन्होंने उस के दुखी और उदास रहने की वजह पूछी तो मातापिता के प्यारभरे बोलों से टूटी हुई शालिनी के सब्र का बांध टूट गया. कंपकंपाते होंठों से उस ने आपबीती कह सुनाई. कौड़ा दंपति ने बेटी को समझाया, विवाह के बाद बहुत कुछ सहना पड़ता है.

शालिनी ने एक बार फिर बच्चे के नवजीवन की तैयारी की तो वीना खुश हुई कि इस बार जरूर बेटा होगा. यह बात अलग थी कि उन के अरमानों पर एक बार फिर पानी फिर गया. शालिनी को दोबारा भी बेटी हुई तो उन पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाने लगा. हर रोज लगता था, जैसे पति और सास अपने दिलों की भड़ास निकालते हैं. उन के शब्द कानों में पिघले सीसे की तरह उतरते थे. समय बीतता गया. शालिनी बेटियों को बहुत प्यार करती थी. वह चाहती थी कि वे पढ़लिख कर नाम रोशन करें. उधर बेटी का जीवन सुखद रहे, यह सोच कर राजेश कौड़ा ने कुछ रस्मी अवसरों पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार वीना आर्य को नकद रुपए भी दिए.

इस बीच डा. सी.एल. आर्य कैंसर से पीडि़त हो गए. ऐसे बुरे वक्त में विशाल ने पिता को उपेक्षित सा कर दिया. शालिनी ने एक अच्छी बहू का फर्ज निभा कर उन की खूब सेवा की. बेटे से ज्यादा उन्होंने शालिनी पर नाज किया. विशाल उन की कसौटी पर काबिल बेटे के तौर पर खरा नहीं उतरा. शालिनी को अपनी विरासत का सही उत्तराधिकारी मान कर उन्होंने अपनी करोड़ों की संपति का बड़ा हिस्सा उस के नाम कर दिया.

यह परिवार में विवाद की नई वजह बन गया. एक साल पहले डा. सी.एल. आर्य इस दुनिया से विदा हो गए. ससुर की मौत के बाद तो शालिनी के लिए प्रताड़नाओं का जैसे दौर ही शुरू हो गया. पति और सास को उस से मारपीट करने में कोई गुरेज नहीं था. शालिनी अपनी सोच सकारात्मक रखती थी. उस ने सोचा कि वक्त के साथ उन का व्यवहार सुधर जाएगा, परंतु ऐसा नहीं हुआ. विशाल और वीना किसी दूसरी ही मिट्टी के बने थे. उन के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया. शालिनी की किस्मत में शायद दुख ही दुख लिखे थे. सन 2015 में वीना और विशाल ने शालिनी से नई मांग शुरू कर दी कि वह अपने पिता से दोनों बेटियों के नाम 10-10 लाख रुपए की एफडी कराने को कहे.

राजेश कौड़ा रिटायर हो चुके थे. उन की हैसियत ऐसी नहीं थी. शालिनी इस बात को जानती थी. जब यह आए दिन की बात हो गई तो शालिनी ने दबी जबान से अपनी मां से यह बात कही. बेटी की खुशी के लिए उन्होंने किसी तरह 2 लाख रुपए नकद दे दिए. आर्थिक संपन्न होने के बावजूद वीना और विशाल के लिए यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी. वह अपनी मांग पर अड़े रहे.

शालिनी परिवार की अनेक बातों को कड़वा घूंट समझ कर पी जाती थी और मायके में नहीं बताती थी. वह नहीं चाहती थी कि मातापिता को उस के कारण कोई दुख पहुंचे. जीवन घिसटता हुआ सा चल रहा था. मानसिक प्रताड़ना झेलना जैसे शालिनी की जिंदगी का हिस्सा बन गया था. एक बार यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर थमा नहीं. घर का माहौल अशांत हो चुका था. बातचीत भी गालीगलौज से की जाती थी. दुत्कार और उत्पीड़न हदों को लांघ रहा था. पतिपत्नी के बीच अक्सर तनाव रहता था.

उा. विशाल अक्सर अकेले ही विदेश घूमने चला जाता था. वह सिंगापुर, पेरिस, स्वीटजरलैंड और मलेशिया जाता था. वह क्यों जाता था, यह शालिनी को बताना जरूरी नहीं समझता था. एक मायने में वह पिता की दौलत पर मौज करने वाला बेटा था. काम में उस का मन कम ही लगता था. विशाल की लड़कियों से दोस्ती थी. शालिनी इस का विरोध करती तो उस की आवाज को दबाने के लिए उस के साथ मारपीट की जाती.

शालिनी सहनशील थी, लेकिन तनाव के बीच घुटघुट कर जी रही थी. बेटियों की खातिर वह अपने परिवार को किसी भी सूरत में टूटने नहीं देना चाहती थी. शालिनी उस बंधन को निभा रही थी, जो वक्त के साथ खोखला सा हो गया था. खुशियां जैसे उस से रूठ चुकी थीं. वह दर्द के दरिया में सफर कर रही थी. आसपड़ोस के लोगों को बाहरी तौर पर सब ठीक लगता था, लेकिन अंदर भूचाल चल रहा था. वह अपना दिन मरीजों में बिता देती थी. उस का स्वभाव अच्छा था. मरीजों के प्रति वह संवेदनशील रहती थी, इसलिए मरीज उसे ही दिखाना पसंद करते थे. उस की शोहरत काबिल डाक्टर के रूप में हो रही थी. डा. विशाल इस बात से बहुत चिढ़ता था. मौका मिलते ही वह अपनी इस भड़ास को निकाल भी देता था. कहते हैं कि अति का अंत कभी सुखद नहीं होता.

30 अगस्त रविवार के दिन जब झगड़ा ज्यादा बढ़ गया और शालिनी से मारपीट की जाने लगी तो उस की बेटी वर्णिका ने घबरा कर अपनी नानी को फोन कर दिया. राजेश कौड़ा वहां आए, लेकिन उन्हें अपमानित कर के वापस कर दिया गया. घर का माहौल काफी खराब हो चुका था. बात घर से बाहर न जा पाए, शालिनी को मनाने के उद्देश्य से विशाल शालिनी और बच्चों को ले कर मूवी दिखाने गया. रात में वे वापस आए तो घर में फिर विवाद हो गया. इस के बाद कुछ ऐसा हुआ कि बुरी खबर मिलने के बाद राजेश कौड़ा ने बेटी को अस्पताल में पाया. चाह कर भी वह उसे बचा नहीं सके.

पुलिस ने विशाल को साथ ले कर कोठी का मुआयना किया, लेकिन वहां सल्फास की शीशी या सीरींज नहीं मिली. पूछताछ के बाद पुलिस ने विशाल को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. विशाल का कहना था कि उस ने पत्नी को नहीं मारा. वह अपनी बेटियों के लिए उसे जिंदा रखना चाहता था. शालिनी खुद भी बेटियों के लिए जिंदा रहना चाहती थी.

कथा लिखे जाने तक विशाल की जमानत नहीं हो सकी थी, जबकि पुलिस वीना आर्य की सरगरमी से तलाश कर रही थी. शालिनी की दोनों बेटियां अपने ननिहाल में रह रही थीं. डा. शालिनी को जहर दिया गया या उन्होंने खुद खाया, यह तो जांच के बाद ही स्पट होगा, लेकिन आर्थिक संपन्नता के बावजूद संबंधों की कड़वाहट से संयम, विवेक और समर्पण के अभाव में एक परिवार तो बिखर ही गया. मासूम बच्चियां भी उस की त्रासदी झेलने को विवश हो गई हैं. UP News

(कथा पात्रों से बातचीत व पुलिस सूत्रों पर आधारित)

Hindi stories: तवायफ का प्यार

Hindi stories: समाज की यही सोच है कि तवायफ सिर्फ पैसों से प्यार करती है, लेकिन कजरी अपने प्रेमी जावेद के बेटे को जिस तरह पालपोस कर बड़ा कर रही है, उस से साफ साबित होता है कि तवायफ के अंदर भी दिल होता है, जो किसी से प्यार भी कर सकता है.

शहर के बीच बने उस प्रमुख बाजार में काफी रौनक थी. सड़क किनारे दोनों ओर दुकानें बनी थीं तो उन के ऊपर रहने के लिए मकान बने थे. उन मकानों पर जाने के लिए दुकानों के बराबर सीढि़यां बनी थीं. यह बात अलग थी कि उन पर चढ़ने से ज्यादातर लोग कतराते थे. मकानों की रैलिंग और खिड़कियों पर रंगबिरंगी भड़काऊ पोशाक व चेहरोें पर गाढ़ा मेकअप पोते लड़कियां खड़ी रहती थीं. सड़क पर आनेजाने वाले लोग कनखियों से उन की ओर देखते तो आंखों व हाथों को नचा कर इशारे कर दिया करती थीं. जहां वे रह रही थीं, वहां की भाषा में वे तवायफों के कोठे थे.

नीचे जो बाजार थी, वहां कपड़े, राशन, हार्डवेयर, चाय आदि की दुकानें थीं. ये कोठे अंगरेजों के जमाने से भी पहले से आबाद थे. लोग समाज से नजरें चुराने की नाकाम कोशिश करते हुए सीढि़यां चढ़ जाया करते थे और उसी अंदाज में तेजी से उतर कर बाजार की भीड़ का हिस्सा बन कर ओझल हो जाया करते थे. मुद्दतों से यही सिलसिला चला आ रहा था. सीढि़यों से कोठे तक न जाने कितनी यादें, किस्से और कद्रदानों के राज दफन थे. उन कोठों की चारदीवारियों ने कई तवायफों की इठलाती जवानी और उन की रेशमी जुल्फों में बड़ेछोटे धन्नासेठों को उलझते देखा था. जिन चेहरों का आकर्षण लोगों को अपनी तरफ खींचता था, उन्हें वक्त के साथ बेरौनक होते हुए भी देखा था.

ऐसी जगहों की खास बात यह होती है कि जब सूरज अपनी रेशमी लालिमा बिखेरता है, तब एकदम उलट सुबह वहां अलसाई हुई होती है, लेकिन रातें इस तरह आबाद होती हैं, जैसे वहां सुबह का आगाज हुआ हो. शाम का धुंधलका जैसे ही दस्तक देता है, वैसे ही घुंघरुओं और सुरताल की आवाज फिजा में बहनी शुरू हो जाती है. तवायफों के नृत्य और उन के इर्दगिर्द दायरा बनाने के शौकीन खुदबखुद अपनीअपनी पसंद के कोठे पर चले जाते थे. ऐसे शौकीनों में रानी मौसी के कोठे पर कजरी का नाम खूब मशहूर था. जब वह खूबसूरत लिबास में आ कर महफिल में अपने चांद से चेहरे से घूंघट उठाती तो लोगों की सांसें थम जाया करती थीं.

वह बला की सुंदर थी. खूबसूरती के साथ वह सुरताल व नृत्य की कला के संगम में पूरी तरह पारंगत थी. वह नाचनागाना शुरू करती तो कद्रदानों की फरमाइशें बढ़ जाया करती थीं. इतना ही नहीं, वे खुश हो कर उस पर नोटों की जैसे बरसात करते थे. जितने भी नोट उस पर लुटाए जाते, वे उस की मौसी की थैली में समा जाते थे. यह बात उसे अखरती नहीं थी, क्योंकि रानी से उस का खून का रिश्ता था. वह उस की सगी मौसी थी. उस शाम भी साफसफाई के बाद कोठे के बरामदेनुमा कमरे को लड़कियों ने करीने से सामान लगा कर सजा दिया था. जगहजगह इत्र भी लगा दिया था, जिस की भीनीभीनी खुशबू पूरे कमरे में फैल रही थी. हारमोनियम वादक और तबला, ढोलक उस्ताद तयशुदा जगह पर बैठ कर रियाज में मशगूल हो गए थे.

कद्रदानों के बैठने के लिए सोफा था और नीचे सलीके से मैरून रंग का खूबसूरत कालीन बिछा दिया गया था. कमर व हाथ टिकाने के लिए सिरहाने पर मसनद लगा दिए गए थे. धीरेधीरे लोगों का आना शुरू हुआ तो रानी ने दिलकश मुसकान से उन का स्वागत किया.

‘‘तशरीफ लाइए, हुजूर.’’ रानी अपने पुराने चाहने वालों को ज्यादा तवज्जो दिया करती थी. इस की खास वजह भी थी. वे उस की आमदनी का बड़ा जरिया थे. ऐसे लोग शानोशौकत दिखा कर पैसे तो लुटाते ही थे, साथ ही खुश हो कर अलग से भी कुछ पैसे दे जाया करते थे. महफिल की तैयारी पूरी हो चुकी थी. एक पुराना कद्रदान रानी से मुखातिब हुआ, ‘‘कजरी को बुलाइए मौसी, सच पूछिए तो हम उसी के दीदार के लिए आते हैं.’’

‘‘मेहरबानी आप की. ऊपर वाला आप की हसरतों को बरकरार रखे.’’ मौसी ने शोखी से कहा और एक लड़की को इशारे से कजरी को बुलाने के लिए कह दिया.

कमरे में सरगोशियां थीं. कुछ लम्हों के बाद कजरी दाखिल हुई तो खामोशी पसरी और सभी की निगाहें उसी पर टिक गईं. कजरी ने लाल रंग का सुर्ख रेशमी लिबास पहना हुआ था. कमरे में जल रहीं लाइटों की रौशनी में उस के लिबास पर टांके गए सफेद, पीले व गुलाबी रंग के सितारे जगमगा रहे थे. धीरेधीरे चल कर कजरी बीच में आ कर खड़ी हो गई. एक लड़की ने आगे बढ़ कर पीतल के घुंघरुओं का जोड़ा उस के पैरों में बांध दिया. कजरी ने अपनी गोरी कलाइयों में कोहनी से आधा नीचे तक रंगबिरंगी चमकीली चूडि़यां पहनी हुई थीं.

अगले लम्हों में कजरी ने मोर की तरह पंख फैलाने के अंदाज में कलाइयों को आगे बढ़ा कर उन में कंपन कर के चूडि़यों को खनकाया तो एक पुरानी गजल के साथ सुरताल शुरू हो गई. सभी एकटक उसे ही निहार रहे थे. शबाबनुमा महफिल के आगाज से मौसी खुश थी, लेकिन चंद मिनटों में ही उस की खुशी मायूसी में बदल गई. क्योंकि पारखी मौसी ने यह बात पकड़ ली कि उस दिन कजरी की थिरकन में वह बात नहीं थी, जो और दिनों में हुआ करती थी. ढोलक व तबले की ताल तो बराबर थी, लेकिन कजरी के कदमों के साथ घुंघरुओं की खनक बदली सी लग रही थी.

उस की आवाज में भी उदासी थी. मौसी ने कद्रदानों के चेहरों पर गौर किया, वे भी उतने खुश नहीं थे. साफ लग रहा था कि कजरी का मन उस समय कहीं और था. गजल का दौर खत्म हुआ तो कजरी ने नए मेहमानों की तरफ रुख कर के दोनों हाथों से घूंघट पलट दिया. उस दिन उस का चेहरा बेनूर था. मानो सारे जहां की उदासी वहां सिमट आई थी. जल्दी से मेहमानों को सलाम कर के वह अपने कमरे में चली गई. अन्य लड़कियों ने भी नृत्य दिखाए, लेकिन उस दिन की महफिल बेरौनक ही रही. मेहमान नाखुशी से गए. मेहमानों की बेरुखी देख कर मौसी भी नाखुश थी. उस दिन पहली मर्तबा कजरी ने सभी को निराश किया था.

मेहमानों के रुखसत होते ही मौसी सीधे कजरी के कमरे में पहुंची. वह बिस्तर पर उदास बैठी नींद के आगोश में समाए मासूम बच्चे को निहार रही थी. मौसी उस के बराबर में बैठ कर बोली, ‘‘खुद को दर्द से उबार ले कजरी, तेरी वजह से आज पहली बार महफिल वीरान सी रही है.’’

‘‘कोशिश तो कर रही हूं मौसी.’’ कजरी ने उदासी से कहा.

‘‘जरा सोच इस तरह जिंदगी कैसे कटेगी? तू जो आज कमा लेगी, वह कल तेरे ही बुढ़ापे में काम आएगा.’’ मौसी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘मैं ने जमाना देखा है कजरी. तवायफ की जवानी तो सुंदर बगीचे जैसी होती है, जिस पर भंवरे दूरदूर से आ कर मंडराते हैं, लेकिन बुढ़ापा तो उजड़ा चमन किसी दोजख की तरह होता है.’’

‘‘मैं क्या करूं मौसी? जावेद की याद मेरे दिल से नहीं निकलती.’’ कजरी बोली.

‘‘बेटा, यादें जाने के लिए नहीं होतीं. फिर इस का मतलब यह भी तो नहीं कि हम अतीत को याद करकर के खुद को ही परेशान कर लें. जावेद की मोहब्बत की निशानी तो तेरे पास है.’’ मौसी ने फिर समझाया.

‘‘यही तो सहारा है मौसी.’’ कहते हुए कजरी ने बच्चे को उठा कर अपने सीने से चिपका लिया.

‘‘अपने लिए न सही, कम से कम इस बच्चे की खातिर तो दर्द से निकल जा. इसे पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बना. जिस दिन यह काबिल हो जाएगा, तू अपनी मोहब्बत पर नाज करेगी,’’ मौसी बोली, ‘‘अब तू आराम कर. इस बारे में हम कल सुबह बात करेंगे. इस के बाद कजरी उस 4 महीने के बच्चे के साथ सो गई.’’

अगले दिन दोपहर के वक्त कजरी रोजमर्रा की भांति खिड़की पर बैठी थी, लेकिन उसे बाजार सूना लग रहा था. जावेद को वह बाजार की भीड़ में दूर से पहचान लेती थी. उस के लिए निगाहों में बेकरारी होती थी. यादों के साए मंडराए तो उस ने खिड़की के कपाट बंद कर दिए और सिसकियां भरने लगी.

मौसी ने नजदीक आ कर उस के आंसू पौंछे और प्यार से गले लगा कर समझाया, ‘‘कब तक गम मनाएगी पगली. जाने वाले कभी लौट कर नहीं आया करते.’’ मौसी की बातें उस के दिल पर फाहा रख देती थीं, ‘‘हम तवायफें हैं बेटा. दर्द से हमारा करीब कर रिश्ता होता है. अब तू काम में मन लगा कर बच्चे की परवरिश की सोच.’’

मौसी की बातें ठीक थीं. चंद रोज में ही कजरी का उस बच्चे से गहरा रिश्ता हो गया था. उस का नाम अकरम था. वह हर तरह से उस का खयाल रखती और अपने से चिपकाए रखती. अकरम उस की मोहब्बत की निशानी था. कजरी ने सोच लिया था कि अब वह उस के लिए मां का हर फर्ज निभाएगी.  4 महीने का अकरम उस की मोहब्बत की निशानी तो था, लेकिन वह उस की अपनी औलाद नहीं था. वह बिन ब्याही मां भी नहीं थी. बावजूद इस के मां होने के सभी अहसास से वह रूबरू हो गई थी. वक्त की अजीब चाल से वह जिस किरदार में पहुंची थी, उस के पीछे भी एक रोचक कहानी थी—

दरअसल, कजरी खानदानी तवायफ थी. 15 साल पहले उस के घर वालों ने उसे उत्तर प्रदेश के एक बड़े शहर में उस की मौसी रानी के पास भेज दिया था. रानी का अपना कोठा था. किसी तवायफ का अपना कोठा होना बिरादरी में बड़ी बात होती है. पूरे तवायफ बाजार में रानी का रुतबा था. कजरी को वह बेटी की तरह मानती थी. रानी के चाहने पर ही कजरी को उस के पास भेजा गया था. कुछ ही दिनों में कजरी वहां के माहौल में रचबस गई थी. रानी के कोठे पर यूं तो और लड़कियां भी थीं, लेकिन कजरी उन में सब से ज्यादा खूबसूरत और नाचगाने की कला में पारंगत थी.

कुछ ही दिनों में कजरी कोठे के सारे तौरतरीके जान गई. जल्दी ही कजरी का जादू रानी के कोठे पर आने वाले लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगा. तवायफों की सच्ची मोहब्बत दौलत होती है. कजरी आई तो रानी की झोली में नोटों की जैसे बारिश होने लगी. कजरी उस की सगी बहन की बेटी थी, इसलिए पैसे का बंटवारा भी नहीं होता था. मौसी ने कह दिया था कि उस के कोठे की उत्तराधिकारी कजरी ही होगी. कजरी के चर्चे ऐसे हुए कि कद्रदान भी वहां आने लगे.

कजरी अपने पेशे की हकीकत जानती थी. ऐसा नहीं था कि वहां आने वाले सभी लोग नाचगाने के ही शौकीन होते थे. बहुतों की ख्वाहिश उस से आगे होती थी. तब मोटी रकम के बदले मौसी उन के कदमों को बढ़ा देती थी. कजरी जानती थी कि आज नहीं तो कल, उसे यह सब अपनाना ही पड़ेगा, क्योंकि यह उस के खानदान की परंपरा रही थी. रानी मौसी उसे अपने खानदान में नानी के जमाने तक के रोमांचक किस्से भी सुनाया करती थी.

रानी का ताल्लुक जिस जाति से था, वहां तवायफ होना कोई बुरी बात नहीं थी. वह बताती थी कि किस तरह धन्नासेठों से ले कर बड़े जमींदार तक उस के मुरीद थे. दरअसल उस की मां रेशमाबाई का ऐसा नाम था, जिन की महफिल में 5 सौ मील से भी लोग चल कर आते थे. उन्हें विशेष मौकों पर अपने यहां इज्जत से बुलाया जाता था. उन के लिए बैलगाड़ी या घोड़ाबग्गी भेजी जाती थी. उस जमाने में रईस लोगों के पास यातायात का यही साधन होता था. जिस के पास बैलों की जोडि़यां होती थीं, दूरदूर के गांवों तक उन का नाम होता था.

रेशमा के पास तबला व हारमोनियम वाले अपने उस्ताद थे. उन की उंगलियों की थिरकन से निकलने वाला संगीत महफिल में चारचांद लगा दिया करता था. मशालों, लालटेन व मिट्टी के तेल वाले हंडों की रौशनी में महफिल पूरे अदब से सजती थी. नक्काशीदार सुराहियों में मदिरा भर कर मेहमानों को पीतल के बेलुओं व कटोरों में परोसा जाता था. रेशमाबाई जब लहरा कर नाचती थी तो रात जैसे जवान हो जाती थी. लोगों के दिलों में चटक कर जैसे कलियां सी खिलती थीं. हर कोई बेसाख्ता कह उठता था, ‘‘वाह, रेशमाबाई, कमाल कर दिया तुम ने.’’

महफिल में फिर नाचगाने की फरमाइश होती तो रेशमा पानी पी कर फिर नए सुरताल पर थिरकने लगती. रेशमा ने जमाना देखा था. उन्होंने अपने सामने जवानों को बूढ़ा व बच्चों को जवान होते देखा था. दोनों ही पीढि़यां उन की कला की कद्रदान थी. रेशमा महफिलों से अशर्फियां ले कर निकलती थीं. खास बात यह थी कि इस तरह के चंद अवसरों को छोड़ कर महफिल में फूहड़ता नहीं होती थी. इस की वजह यह थी कि रईस लोग अमीराना तरीके से अदब से रहते थे. तवायफ होने का मतलब उन्हें बेइज्जत करना नहीं था. रेशमाबाई ने कला के दम पर ही दौलत और शोहरत कमाई थी. दरजनों तवायफों ने उन्हें अपनी उस्ताद मान कर कला के हुनर सीखे थे.

घुंघरू बांध कर तबले पर थिरक देना भर ही उन के लिए कला नहीं थी. कितनी थाप पर कितनी बार पैरों, कमर, गरदन व कलाइयों में थिरकन हो, इस तक का हिसाब पारखी नजरों व उंगलियों पर रखा जाता था. जरा सी गलती होने पर वह टोक देती थीं, ‘‘अपने कदमों को ताल से मिलाओ बेटियों, वरना मेरा नाम भी खराब कर दोगी. लोग कहेंगे कि रेशमा जैसी उस्ताद की चेलियां बढि़या नहीं नाचतीं.’’

वह समझाती थीं कि हुस्न के साथ कला भी जरूरी है. जो कला के फन में माहिर होता है वह कभी भूखा नहीं मरता. कुदरत कला को तब और भी निखार देती है, जब कोई उस के लिए दिल से जिए. बारबार गलती करने पर सजा भी दी जाती थी. दरअसल जिसे उस्ताद समझा जाता था, उसे बहुत इज्जत बख्शी जाती थी. दूसरे शब्दों में मातापिता से भी ज्यादा अधिकार उस्ताद या गुरु के पास होते थे. उस्ताद के कहे शब्द पत्थर की लकीर हुआ करते थे. उस के खिलाफ जाने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता था.

रेशमा अपने साथ एक पानदान जरूर रखती थी. वह कांसे का बना था. उस पर खूबसूरत नक्काशी के साथ मूंगे भी जड़े थे, जिस में अलगअलग आकार के खाने बने थे. उस में पका कर फेंटा गया सुर्ख कत्था, छाली (सुपारी), खुशबूदार इलायची और गीले कपड़े में गोलाई से बांध कर पान रखे होते थे. जो लड़की नानी को उस्ताद मानती थीं, वे उस में साफ सुपारियां सरौते से कतर कर रख दिया करती थीं.

वह बताती थी कि पानदान उन की मां के जमाने का था. दूर कस्बे का एक पंसारी नानी की कला का मुरीद था. एक पोटली में वह ताजा सुपारियां दे जाया करता था. वह कहता था, ‘‘रेशमा तुम्हारे लिए ताजा सुपारियों के ढेर से ये नगीने निकाल कर लाता हूं. मैं ने अपने तिजारती को बोला हुआ है कि मुझे माल एकदम बेहतरीन चाहिए.’’

तब रेशमा खुश हो कर कहतीं, ‘‘हां, हां खूब समझती हूं. रेह लाए हो या नहीं?’’

‘‘गुस्ताखी माफ, वह तो भूल ही गया. अगली बार आऊंगा तो ले आऊंगा.’’ रेह दरअसल कपड़े धोने वाली मिट्टी थी. पहले साबुन नहीं था और देहात के इलाकों में लोग कपड़े धोने में इसी मिट्टी का इस्तेमाल किया करते थे.

रेशमा नामी पंसारी के आने का मकसद खूब समझती थी. वह ऐसे वक्त ही आता था, जब वह लड़कियों को कला सिखा रही होती थी. कुछ देर बैठ कर वह चला जाता था. तब के बड़े दुकानदार, तिजारत करने वाले सूदखोर भी हुआ करते थे, जो अपने बहीखातों में न जाने कितनों की मजबूरियां कैद किए रखते थे. रेशमा के पास आने वाले उस पंसारी की पहचान सूदखोर के रूप में भी थी. जातेजाते एक दिन उस ने कहा, ‘‘रेशमा, मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरूर बताना.’’

‘‘सेवा तो है पंसारी बाबू.’’ रेशमा ने झट से कह दिया.

उस ने एकदम अधीर हो कर पूछा, ‘‘क्या?’’

‘‘तुम जितनी बार यहां आया करो, उतनी बार अपने बहीखाते से किसी गरीब की मजबूरियों को आजाद कर दिया करो.’’ रेशमा के इतना कहने पर उस व्यापारी को मानो झटका सा लगा. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मेरा पेशा ही ऐसा है तो क्या करूं.’’

‘‘पेशा तो हमारा भी है, लेकिन लोगों की दुआएं भी ले लिया करो. बुरे वक्त में काम आया करती हैं.’’ यह सुनते ही खिन्नतापूर्ण मौन धारण कर के वह चला गया था.

शादियों के मौकों पर रेशमा की व्यस्तता बढ़ जाती थी. दरअसल शादियां पहले महज एक रात या दिन की नहीं होती थीं. बारातें एकएक सप्ताह रुका करती थीं. इस दौरान उन की खूब आवभगत हुआ करती थी. खाना ढाक के चौड़े सूखे पत्तों से बनी पत्तलों पर परोसा जाता था. चावलकढ़ी के साथ मोटे अनाज की बनी रोटियों का चलन था. चावल के साथ गन्ने के रस से बनी शक्कर व खांड भी होती थी. उड़द की धुलवां दाल व गेहूं की रोटियां तो बिरले ही बनाते थे. एक तो उन की पैदाइश कम थी, दूसरे महंगे भी होते थे. मीठे  में बूंदी के लड्डू, गन्ने के रस की खीर, कलाकंद और हलवा बनता था. खाने के साथ मट्ठे के सन्नाटे (रायते) का भी खूब चलन था.

बड़ा हो या छोटा, सभी लोग जमीन पर बैठ कर खाना खाते थे. उस जगह को पहले झाड़ू से बुहारा जाता था. फिर पानी के छींटे मार कर सूत या जूट से बुनी हुई पट्टियां बिछाई जाती थीं. कतारबद्ध बैठ कर खाना खाने वाले लोगों के इस समूह को पंगत कहते थे. सभी खाना एक साथ शुरू करते थे और एक साथ उठते थे. कोई अपना खाना खा कर बीच में ही उठ जाए तो इसे अच्छा नहीं माना जाता था. एक पंगत के उठने के बाद फिर से झाड़ू लगा कर पानी का छिड़काव किया जाता. फिर पट्टियों को झाड़ कर बिछाया जाता था. मिट्टी के मटकों, शहतूत की टहनियों (शाखाओं) से बने टोकरों व कागज की रद्दी से बनी पल्लियों (बड़ेछोटे आकार के बरतन का रूप) से खाना परोसा जाता था. खाना भट्ठियों पर तांबे, पीतल के बरतनों व लोहे की कड़ाहियों में पकता था.

उस जमाने की सादगी में लोगों में इतना मेलजोल था कि सभी एकदूसरे के मेहमानों की सेवा में जुट जाते थे. पड़ोसियों के बीच मनमुटाव या कोई भेदभाव नहीं होता था. छलकपट से दूर लोगों में आपसी प्रेम बहुत होता था. बड़ेबुजुर्गों को इतनी इज्जत बख्शी जाती थी कि धमाचौकड़ी मचाते व गलती करते बच्चे छिप जाया करते थे या एकदम शरीफ बन कर दुआसलाम करते थे. उन्हें डांटे जाने व घर पर शिकायत होने का डर होता था. यदि कोई जना बच्चे की गलती की शिकायत उस के मांबाप से करता था तो मातापिता नाराज नहीं होते थे, बल्कि खुश होते थे कि कोई अपना ही बच्चों की गलतियां बता रहा है.

मेहमानों के मनोरंजन के लिए महफिलें सजाई जाती थीं. अपनीअपनी हैसियत के अनुसार तवायफों को बुलाया जाता था. रेशमा ऐसी ही महफिलों में व्यस्त हो जाती थी. समय के साथ नानी के कदम बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे थे. अब वह सिर्फ एक उस्ताद बन कर रह गई थीं. उन्होंने अपना पंसदीदा फूलों के छापे वाला चूड़ीदार लहंगा, जिस में रंगबिरंगे गोटे लगे थे, कोटी (कमर के ऊपर का ब्लाउजनुमा कपड़ा) व ओढ़नी (दुपट्टे का रूप) पुराने संदूक में सहेज कर रख दिया था. बरसात के बाद सीलन दूर करने के लिए वह उन्हें धूप दिखा दिया करती थीं. आभूषणों में कंठा, हार, कड़े, पायल, माथे का टीका व तगड़ी भी उन के पास थी. तगडि़यां अधिकांश चांदी की होती थीं, जिन्हें लहंगे के ऊपर कमर पर सजाते हुए पहना जाता था. अपनी बेटियों को उन्होंने कला सिखा दी थी. रानी मौसी भी उन में से एक थी.

कजरी नाचगाना बचपन से ही सीखती आई थी. वह जवानी की दहलीज पर पहुंची तो उसे मौसी के पास भेज दिया गया था. तवायफों को एक सबक यह भी दिया जाता था कि मोहब्बत जैसी गिरफ्त से दूर रहो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि उन में दिल या नाजुक भावनाएं नहीं होती. यह बात अलग थी कि कजरी के दिल पर अब तक किसी ने दस्तक नहीं दी थी. जिंदगी के किसी मोड़ पर किस को किस से मोहब्बत हो जाए, इस बात को कोई नहीं जानता. कोठे पर आने वाले नए कद्रदानों में एक कद्रदान से उस की भी नजरें चार हो गईं. उस का नाम जावेद था. नौजवान जावेद उसी शहर का बाशिंदा था. एक दिन वह कजरी से बोला, ‘‘मेरे पास इतनी दौलत तो नहीं है, जो तुम्हें उस से खुश रखूं, लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए चाहत है.’’

कजरी ने उस की बात हंसते हुए एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी थी.

जावेद का कोठे पर आने का सिलसिला शुरू हो गया. कजरी समझ गई कि वह उस पर डोरे डालने की कोशिश कर रहा है. उस की आंखों में एक अजीब सी कशिश होती थी. इसी कशिश ने ताकीदों के बावजूद कजरी के दिल पर दस्तक दे दी. यह सोच कर परेशान भी थी कि तवायफों से लोग इस तरह तो दिली रिश्ता कायम नहीं करते. वह पैसा फेंक कर तमाशा देख कर चले जाते हैं. वह तवायफ थी. उस की शख्शियत किसी को इस कदर प्रभावित कर रही थी. यह अजीब सी ही बात थी. उलझन तब वाकई बहुत बढ़ जाती थी, जब आप को पता हो कि सामने वाला जान कर भी अंजान बन रहा है. कजरी ने उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की.

दूसरी तरफ जावेद ने सोचा कि कभी तो कजरी उस की चाहत कबूल कर लेगी. उस के पास जाते समय उस के दिल में उम्मीद का एक दीया रौशन होता था, लेकिन वापसी तक दिल में अंधेरा ही होता था. रौशनी और अंधेरे का यह खेल कई दिनों तक चलता रहा. जावेद के इस जुनून को देख कर कजरी उस से बातें कर लिया करती थी. बातों से ही उसे पता चला कि जावेद शादीशुदा है. यह बात साफगोई से जावेद ने उसे खुद बताई थी. कजरी ने उसे समझाया जरूर कि वह उस के ज्यादा चक्कर में न पड़े, लेकिन जावेद की भावनाओं ने उस पर ऐसा असर डाला कि वह भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी.

हालांकि वह यह भी जानती थी कि उस की मोहब्बत किसी मुकाम पर नहीं पहुंचेगी, क्योंकि न तो वह अपना पेशा छोड़ सकती थी और न जावेद समाज में उसे अपना सकता था. फिर भी वह जावेद को अपने दिल से नहीं निकाल पा रही थी. दिलों में उठते अरमानों का सिलसिला चाहत के दरख्त के अंतिम छोर पर पहुंचा तो जावेद ने एक दिन उसे दिल की बात बताने का फैसला कर लिया.

एक दिन वह कजरी के पास आया. कुछ देर बातचीत कर के वह जाने लगी तो वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘कजरी मेरी बात सुनो.’’

‘‘फरमाइए?’’ कजरी ने अदा के साथ कहा.

‘‘मैं तुम से दिली मोहब्बत करता हूं.’’ जावेद ने एक ही बार में मन की बात कह दी.

कजरी ने नजाकत के साथ अपने होंठों पर प्यारी मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘यह तो हम बहुत पहले से जानते हैं. हम इसे कबूल कर लेते हैं, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ वह आश्चर्य से उस का चेहरा देखते हुए बोला.

‘‘तुम निकाहशुदा शख्स हो.’’ कजरी बोली.

‘‘वह ठीक, लेकिन यकीन मानो मैं इस मोहब्बत की खातिर अपनी बीवी का दिल नहीं दिखाऊंगा.’’ जावेद ने साफसाफ बता दिया.

कजरी जानती थी, जावेद दिल से नेक इंसान है. वह उसे समझा कर भी थक चुकी थी. न जाने कौन से पल थे, जो सारी बातें जानने के बावजूद उस की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गई थी. कोई रास्ता न देख उस ने मोहब्बत कबूल कर ली थी.

इस के बावजूद उस ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘तवायफ के कोठे पर आते हो, जानते हो जमाना क्या कहेगा?’’

जावेद आशिकाना अंदाज में अपने सीने पर हाथ रख कर बोला, ‘‘जमाना चाहे कुछ भी कहे, मुझे इस की चिंता नहीं.’’ वह मुसकरा कर बोला, ‘‘एक और बात कहूं कजरी?’’

‘‘बिलकुल.’’ लंबी सांस लेते हुए कजरी ने कहा.

‘‘मैं अपनी मोहब्बत को ताजिंदगी आबाद रखूंगा.’’

उस की बातें सुन कर कजरी के पास कहने को कुछ नहीं रहा. क्योंकि जावेद की मोहब्बत में कोई स्वार्थ नहीं था. इसी तरह उन की मोहब्बत आगे बढ़ती रही. मोहब्बत के पक्षी की उड़ान कितनी ऊंची होती है, आज तक कोई नहीं जान पाया. वैसे तो जावेद रोजाना ही कजरी से मिलने आता था, पर एक बार कई दिनों तक वह उस के पास नहीं आया तो उसे चिंता सताने लगी. जावेद के इंतजार में वह हर रोज खिड़की के सामने बैठ जाया करती. सड़क पर आनेजाने वाले लोगों में उस की नजरें जावेद को तलाशती थीं. लेकिन उस की आंखें थक जाती थीं. वह दिखाई नहीं देता.

वह एक अजीब कशमकश के दौर से गुजर रही थी. उसे यह तक नहीं पता था कि जावेद रहता कहां है. उस ने अपने दिल को समझाया कि यदि पता भी होता तो भी वह शायद उस की दहलीज पर नहीं जा पाती. इस से उस की बीवी की नजरों में छिपा रिश्ता उजागर होने से तूफान खड़ा हो सकता था. तकरीबन 15 दिनों बाद उसे जावेद आता दिखाई दिया तो उस की आंखों को जैसे करार मिला. वह ऊपर आया तो वह अपनेपन से शिकायत लहजे में बोली, ‘‘कहां थे इतने दिन? मुझे कितनी फिक्र हो रही थी.’’

‘‘मेरी तबीयत खराब थी कजरी. तुम से मिलने की बेकरारी मुझे भी बेचैन करती थी, लेकिन बुखार ने जैसे शरीर की जान ही निकाल ली थी.अब चलने के काबिल हुआ तो चला आया.’’

‘‘पता है जावेद, मैं ने कभी किसी के लिए इतनी तड़प महसूस नहीं की, जो तुम्हारे लिए की है.’’

जावेद को उस की नरगिसी आंखों में बेपनाह मोहब्बत का दरिया तैरता नजर आ रहा था. वक्त के साथ उन की मोहब्बत का सिलसिला चलता रहा. एक दिन जावेद उस के पास आया तो दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं. जावेद ने मोहब्बत से कजरी को अपनी बांहों के दायरे में ले लिया. कजरी का सारा शरीर रोमांचित हो गया. मोहब्बत की पनाह में सिर रखा तो जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में खो गई. जावेद के प्यार की कशिश दिनबदिन उसे उस के नजदीक ले जा रही थी.

उस की मोहब्बत का किस्सा मौसी से छिपा नहीं रहा. वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘ऐसे चक्कर में ना पड़ कजरी.’’

तब कजरी सफाई देती, ‘‘मौसी वह दिल का अच्छा है और वाकई मुझ से मोहब्बत करता है.’’

इस पर मौसी ने हंस कर कहा, ‘‘देख बेटी, हम ठहरीं तवायफें. हमारे लिए दिल से की गई मोहब्बत किसी ग्रहण की तरह होती है. तुम यह ग्रहण अपनी जिंदगी में क्यों लगा रही हो. हमारे नसीब में पाक मोहब्बत नहीं होती.’’ मौसी इतने पर ही नहीं रुकी, ‘‘पहले मोहब्बत फिर शादी. अरे पगली हम सदा सुहागनें होती हैं. शादियां नहीं करतीं, लेकिन सोलह शृंगार करती हैं. वह इसलिए कि हमारे कद्रदान खुश रहें. हमारे पास आते रहें.’’

जावेद की मोहब्बत पा कर कजरी बेहद खुश थी. ऊपर वाले ने उसे जैसे खुशियों से नवाज दिया था. खुशियों के बीच कभीकभी अंधेरे साए भी मंडरा जाया करते हैं. अनहोनी जैसे शिद्दत से उन के पीछे आ रही थी. एक दिन कजरी को एक आदमी ने आ कर बताया, ‘‘जावेद का ऐक्सीडैंट हो गया है. अस्पताल में उस की हालत नाजुक है और तुम्हें अपने पास बुलाया है.’’

यह सुन कर एक लम्हे के लिए कजरी के हवास उड़ गए. उस का कलेजा धक्क से रह गया. उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था. उस ने रानी मौसी को साथ लिया और बताए गए अस्पताल पहुंच गई. पता चला कि जावेद अपनी बीवी और 4 महीने के फूल से बेटे के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था, तभी दुर्घटना का शिकार हो गया था. जावेद और उस की बीवी बुरी तरह घायल थे, जबकि बेटा सहीसलामत था. यह हालत देख कर कजरी की आंखों में आंसुओं के सिवा कुछ नहीं था. जावेद की हालत बिगड़ती जा रही थी.

वह लगातार कजरी को निहारे जा रहा था. कुछ इस तरह जैसे अलविदा कहने से पहले कोई किसी को जी भर कर निहार लेना चाहता था. उस ने कजरी से कहा, ‘‘कजरी, मैं शायद न बच पाऊं, लेकिन तुम मुझ से एक वादा करो.’’

‘‘क्या?’’ कजरी ने पूछा.

‘‘मेरा अपना तो कोई नहीं है. मुझे व मेरी बीवी को यदि कुछ हो जाए तो तुम मेरे बेटे अकरम की हमारे मजहब के हिसाब से बेहतर परवरिश कर देना.’’

कजरी के लिए सब कुछ बुरे ख्वाब जैसा था. वक्त जैसे थम सा गया था. कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था. कुछ देर बाद जावेद और उस की बीवी ने दम तोड़ दिया. जावेद की इस तरह हुई मौत कजरी पर बिजली बन कर गिरी थी. मौसी के शब्द भी जैसे कानों में गूंज रहे थे कि तवायफों के नसीब में पाक मोहब्बत नहीं हुआ करती. जावेद के दूरदराज के रिश्तेदार थे. खबर मिलने पर वे भी आ गए थे. उन्होंने ही जावेद और उस की बीवी को नमाज ए जनाजा के बाद सुपुर्द ए खाक कर दिया. जावेद ने जो आखिरी ख्वाहिश जाहिर की थी, उस पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं था.

कजरी ने अकरम को अपना लिया. जावेद की जुदाई के गम में ही वह आंसू बहाती थी. और तभी से रात की महफिल में घुंघरुओं की खनक जाती रही. गम दिलोदिमाग पर काबिज था, इसलिए महफिल बेरौनक हो गई थी. मौसी ने उसे समझाने की भरसक कोशिश की. कजरी ने किसी तरह खुद को संभाल लिया. इस के बाद उस के दिल में किसी शख्स के लिए मोहब्बत की धड़कन जैसे हमेशा के लिए बंद हो गई. कजरी तवायफ थी. यह उस का खानदानी पेशा था. उस के हिसाब से उसे छोड़ा नहीं जा सकता था और वह छोड़ना भी नहीं चाहती थी.

क्योंकि उस के पास कमाई का और कोई जरिया नहीं था. हालांकि वह नहीं चाहती थी कि कोठे के माहौल में अकरम की परवरिश हो. वह उसे पढ़ाना चाहती थी. इसलिए जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो कजरी ने उस का दाखिला शहर के एक नामी स्कूल में करा दिया. स्कूल में हौस्टल भी था, जहां दूरदूर से आए बच्चे रह कर पढ़ते थे. अपने माहौल से दूर रखने के लिए उस ने अकरम को हौस्टल में रख दिया. उस की मां के रूप में अपना नाम लिखाया. कजरी हफ्तापंद्रह दिन में अकरम से मिलने जाया करती थी. वह उसे घुमाने भी ले जाती थी.

वह उस की परवरिश मुसलिम रीतिरिवाज से कर रही थी. बाजारों की रौनक ईद की नजदीकी का ऐलान करती तो वह अकरम को बाजार भी घुमाती. अकरम की खुशियों में ही उस की खुशियों की दुनिया सिमटी हुई थी. अकरम के मनपसंद के कपड़े सिलवाए जाते और ईद पर सिवइयां बना कर मुंह मीठा कराया जाता. मुसलिम रस्मोरिवाज को अकरम अच्छे से समझ सके, इसलिए वह बीचबीच में उसे मदरसे में तालीम भी दिलाती. ईद पर ईदगाह पर अकरम कजरी के साथ ही नमाज अदा करने जाया करता.

समय अपनी गति से चलता रहा. वह अपने पेशे से जो कमाती, उसी से बेटे की फीस भरती और उस के बाकी खर्चे उठाती. समाज से वह यह राज छिपाने की कोशिश करती रही कि उस की मोहब्बत की निशानी नामी स्कूल में पढ़ रहा है. वह नहीं चहती थी कि अकरम की पढ़ाई में उस की वजह से कोई परेशानी आए. अकरम बड़ा हो गया था. वह सीबीएसई बोर्ड में पढ़ाई करते हुए हाईस्कूल में आ गया था.

अकरम का वार्षिक परीक्षाफल आया तो पता चला कि उस ने अपनी कक्षा में टौप किया है. बेटे की इस उड़ान से कजरी बेहद खुश थी. बेटा उस की उम्मीदों पर खरा उतरा था. खुशियों और नाखुशियों की दस्तक वक्त के हाथ में होती है. इंसान कठपुतली बनता है और वक्त सब तय कर देता है. कजरी भी वक्त की इस चाल का शिकार हुई. अकरम के स्कूल में कोई नहीं जानता था कि अकरम की मां कजरी का पेशा क्या है? लेकिन एक दिन यह राज बेपर्दा हुआ तो कजरी के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

दरअसल, वह अकरम का रिजल्ट लेने उस के स्कूल गई थी. वहां छात्रों की भीड़ थी. अकरम टौपर छात्र था. उस की फोटो के साथ कब कजरी का फोटो भी खिंच गया. यह उसे पता ही नहीं चला. वह फोटो अखबार में छपा तो रात के अंधेरे में मुंह छिपा कर कजरी के कोठे पर जाने वाले उजले चेहरे वालों ने उसे पहचान लिया. बस, यहीं से जैसे कयामत की बुनियाद रख दी गई. लोगों की फितरत होती है, वह इस तरह की बातों को सामने लाने में पूरी जान लगा देते हैं. मनोविज्ञान के हिसाब से यह एक बीमारी है. यह बात स्कूल प्रबंधन तक पहुंचा दी गई.

कथित सभ्य समाज के लोगों के तर्क थे कि इस से उन के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. वह किसी तवायफ के बेटे के साथ अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकते. यह बात अलग थी कि ऐसी तवायफों के पहलू में ही हजारोंलाखों कथित सभ्य लोग समाज में मुंह छिपा कर अपने गम मिटाया करते हैं. नोटों की खनक पर उन्हें एक रात की दुलहन बना कर मोहब्बत बरसाते हैं.

कायदे से तो कजरी की तारीफ होनी चाहिए थी कि उस ने गलीच समझे जाने वाले ऐसे पेशे में रह कर भी बेटे की जिंदगी को रोशन कर दिया था. परंतु हुआ इस का उलटा. स्कूल प्रबंधन ने कजरी को स्कूल बुला कर कहा, ‘‘माफ करना, हमें आप के बेटे को स्कूल से निकालना होगा.’’

‘‘ऐसा मत कीजिए. मेरा बच्चा तो नर्सरी से आप के यहां पढ़ रहा है. वह होनहार है.’’ आहत कजरी ने हाथ जोड़ लिए.

‘‘तब हमें पता नहीं था.’’

कजरी की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘क्या मैं इंसान नहीं हूं या मेरा बेटा इंसान नहीं है? कौन कहता है कि तवायफ के बेटे को पढ़ने का हक नहीं है? मैं उसे बड़ा आदमी बनाना चाहती हूं. मैं तो पहले ही अपने कलेजे के टुकड़े को दूर रखे हुए हूं. ऊपर से आप इस तरह की बात कह रहे हैं.’’

कजरी की बातें अपनी जगह ठीक थीं, लेकिन उन्हें मानने को कोई तैयार नहीं था. स्कूल प्रबंधन ने उस की एक न सुनी.

‘‘मुझे थोड़ा वक्त दीजिए.’’ कह कर कजरी वहां से चली आई. उस का अपमान हुआ था, लेकिन वह जिस पेशे में थी, उस में मानअपमान के उस के लिए कोई मायने नहीं थे. कजरी एक सामाजिक संस्था की संचालक को जानती थी. कजरी की वह बहुत इज्जत करती थी. अकरम के दाखिले में भी उन्होंने ही भूमिका निभाई थी. कजरी ने नई मुसीबत उन्हें बताई.

कजरी की समस्या बड़ी जटिल थी. फिर भी उन्होंने वादा किया कि उस का बेटा उसी स्कूल में पढ़ेगा. कोई भी उसे जबरदस्ती नहीं निकाल सकेगा. सामाजिक संस्था संचालिका स्कूल गई. तर्कवितर्क के बीच उन की स्कूल प्रबंधन के साथ हंगामा हुआ. स्कूल के पास टौपर छात्र को निकालने की कोई मजबूत वजह नहीं थी. एनजीओ की दखल के बाद उन्हें अपना निर्णय बदलना पड़ा. अकरम हौस्टल में ही रहा.

उम्र और वक्त ने अकरम को भी समझदार बना दिया था. उस ने कजरी से कभी अपने पिता का नाम नहीं पूछा. शायद उसे अंदाज हो गया था कि तवायफों के बच्चों के पिता नहीं हुआ करते. समय चक्र और स्कूल में हुई बेरुखी की घटना से आहत अकरम जान चुका था कि उस की मां का पेशा इज्जत का नहीं है. एक दिन वह कजरी की गोद में सिर रख कर बोला, ‘‘आप को पता है कि मैं काबिल बन कर सब से पहला क्या काम करूंगा.’’

‘‘क्या?’’ कजरी आश्चर्य से बोली.

‘‘आप को इस माहौल से निकालूंगा.’’

उस की बात और प्यार से कजरी की आंखें नम हो गईं, ‘‘मैं अपने हालात से खुश हूं अकरम. बस, तू कामयाब हो जा.’’

कजरी अकरम की हर वह ख्वाहिश पूरी करती है, जिस का वह तलबगार होता है. वह मातापिता दोनों का प्यार उसे दे रही है. उस की जिंदगी का एक ही बड़ा मकसद है कि अकरम बड़ा हो कर एक अच्छा इंसान बने. कजरी का किरदार वाकई बहुत ऊंचा है, लेकिन उस के पेशे की पहचान उसे आगे नहीं आने दे रही. वह जानती है कि समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा. बेटे के भविष्य की फिक्र भी उस के कदमों को थामे रखती है. वह असल जिंदगी में मां नहीं बनी, लेकिन उस में एक मां का अहसास है. दिल में प्यार है और समर्पण भी.

कजरी अकरम को बताना नहीं चाहती कि वह उस की असल मां नहीं है. वह नहीं चाहती कि उस के बेटे का दिल टूटे. ढोलक की थाप और घुंघरुओं के शोर में जिम्मेदारी और मोहब्बत का वादा उस के कानों में गूंजता है. कजरी ने अपनी मोहब्बत और मां के फर्ज के लिए जो कर दिया, वह वाकई प्रशंसनीय है. जो लोग कजरी की इस हकीकत को जानते हैं, वे उस की दिल से इज्जत करते हैं. Hindi stories

—कथा सच्ची घटना पर आधारित, पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.    (सभी फोटो: मौडलिंग)

 

Mumbai News: राधे मां का मायावी संसार

Mumbai News: राधे मां का मामला सामने आने के बाद यह बात साफ हो गई है कि साधुसंत हो या कोई तथाकथित अध्यात्म का ठेकेदार, सब के लिए मार्केटिंग जरूरी है. जितनी अच्छी मार्केटिंग होगी, उतना ही लाभ मिलेगा. अगर खूबसूरती पर आडंबर का आवरण चढ़ा दिया जाए तो कहना ही क्या…

वहां अनगिनत लोगों का जमावड़ा था. अधिकांश के माथे पर राधे मां के नाम की लाल पट्टी बंधी थी. भीड़ के बावजूद वहां पुलिस नहीं थी, अलबत्ता कैमरों के साथ बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी जरूर मौजूद थे. जिन में पलपल की खबर देने की होड़ सी लगी थी. जिस जगह यह जमावड़ा लगा था वह थी मुंबई में बालकेश्वर इलाके के एक बड़े मकान के सामने की खुली जगह. उस दिन तारीख थी इसी साल की 14 अगस्त. सुबह का वक्त. इस जगह को प्रैस वालों ने पिछले रोज तब से ही अपने कैमरों के फोकस पर ले रखा था, जब मुंबई की ढिंडोसी कोर्ट के माननीय सेशन जज वी.ए. राउत ने राधे मां के खिलाफ दर्ज दहेज प्रताड़ना के केस में उन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी.

यह आपराधिक प्रकरण मुंबई के थाना कांदिवली में 7 लोगों के खिलाफ दर्ज हुआ था. इन में 6 लोगों से पुलिस ने पूछताछ पूरी कर ली थी, जिन्हें अदालत से अग्रिम जमानत भी मिल चुकी थी. सातवीं आरोपी राधे मां थीं, जिन से पूछताछ करने के लिए पुलिस ने सम्मन भेज कर उन्हें 14 अगस्त को दोपहर 12 बजे थाना कांदिवली बुलाया था. शुरू में राधे मां ने शायद इस सब को हल्केपन से लिया था. दरअसल, उन का मानना था कि कोई उन के खिलाफ कुछ भी कहता रहे, न तो पुलिस उन का कुछ बिगाड़ सकती है और न कोई कानून. संभवत: राधे मां को यह भी भरोसा था कि उन की कथित महानता के चलते पुलिस उन के खिलाफ कोई केस दर्ज करने की हिम्मत नहीं कर पाएगी.

उन के इस अति आत्मविश्वास का कारण था, उन के अनुयायियों में महानगर के तमाम बड़ेबड़े प्रभावशाली लोगों का होना, जिन में कई जानीमानी फिल्मी हस्तियां भी थीं. वैसे भी उन के भक्तों का दायरा इतना बड़ा था कि अपनी धर्मगुरु राधे मां के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने की स्थिति में वे जमीनआसमान एक कर सकते थे. यही वजह थी कि राधे मां के खिलाफ आवाजें उठते ही बड़ी संख्या में लोग उन के आश्रम पर एकत्रित होने लगे. कई लोग ऐसे भी थे जो फोन कर के उन्हें हर तरह से आश्वस्त कर रहे थे.

राधे मां का आश्रम बोरीवली स्थित एक विशाल इमारत के 5वें माले पर था. इस बिल्डिंग के छठें माले पर राधे मां ने अपना निजी आवास बना रखा था, जहां उन की अनुमति के बगैर कोई नहीं आजा सकता था. जिस इमारत में आश्रम और राधे मां का निवास है वह मुंबई (मलाड) की मशहूर एम.एम. मिठाईवाला चेन के मालिक मनमोहन गुप्ता की है. पूरा गुप्ता परिवार राधे मां का अनन्य भक्त है. परिवार के मुखिया मनमोहन गुप्ता राधे मां के आदेश के बिना न तो कोई व्यापारिक फैसला लेते हैं और न ही पारिवारिक.

मनमोहन गुप्ता का एक भांजा है नकुल. 30 अप्रैल, 2012 को उस की शादी मुंबई के ही कांदिवली इलाके की रहने वाली निक्की अग्रवाल से हुई थी. यह शादी राधे मां की अनुमति से ही संपन्न हुई थी. लेकिन चंद रोज बाद ही यह विवाह टूटने के कगार पर पहुंच गया था. इस की वजह बताई जा रही हैं राधे मां. कम से कम निक्की का तो यही कहना है. 16 जुलाई, 2015 को निक्की ने इस संबंध में थाना कांदिवली में भादंवि की धाराओं 498ए, 406 एवं 506 के तहत गुप्ता परिवार के 6 सदस्यों के अलावा राधे मां को भी नामजद करते हुए अपनी रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. यह प्राथमिकी पुलिस ने अदालती आदेश पर दर्ज की थी.

अपनी इस रिपोर्ट में निक्की ने जिस पर सब से ज्यादा आरोप लगाए थे, वह थीं राधे मां. निक्की के आरोप के अनुसार यह शादी न केवल राधे मां की अनुमति से हुई थी, बल्कि शादी से जुड़े अन्य मामलों में भी उन का पूरा दखल था. दानदहेज की बातें भी उन्होंने ही खुल कर की थीं. बकौल निक्की सब कुछ तय हो जाने के बाद राधे मां ने शादी में शिरकत करने के लिए वायुमार्ग से आने की बात कहते हुए एक विशेष हेलीकौप्टर, लग्जरी गाड़ी व 25 लाख रुपयों की मांग की थी, जो उस के घर वाले उन की इच्छा के मुताबिक पूरी नहीं कर पाए. निक्की के अनुसार दहेज में 25 लाख रुपए दे दिए जाने के बावजूद राधे मां शेष मांगें पूरी न होने की वजह से खफा हो गईं.

शादी हो जाने के बाद इसी की सजा देने के लिए उन्होंने उसे तब अपने यहां हाजिर होने का फरमान सुना दिया, जब वह अपने पति के साथ हनीमून पर विदेश गई हुई थी. अपनी गुरुमां के आदेश की अवहेलना करना उस के पति के बूते की बात नहीं थी. लिहाजा हनीमून बीच में छोड़ नकुल ने वापस लौट कर उसे राधे मां के सामने पेश कर दिया. निक्की द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार इस के बाद राधे मां ने उसे अपनी सेविका बना कर अपने निवास पर रख लिया, जहां उस से साफसफाई करने से ले कर कई ऐसे कार्य भी करवाए जाते थे जिन्हें करने के बारे में उस ने अपने घर में कभी सोचा तक नहीं था.

बकौल निक्की इन कामों में जरा सी भी कोताही होने पर उसे राधे मां के गुस्से का शिकार बनना पड़ता था. राधे मां उस के प्रति न केवल कठोर शब्दों का इस्तेमाल करती थीं बल्कि उस के जिस्म के हिस्सों पर अपने त्रिशूल की नोक चुभो कर उसे बुरी तरह प्रताडि़त भी करती थीं. बाद में वह उस की ससुराल वालों को बुलवा कर उन से उस की पिटाई भी करवाती थीं. उस वक्त राधे मां निक्की को संबोधित कर के कहती थीं, ‘‘आगे से कभी भी मुझे न कहने की जुर्रत मत करना.’’

निक्की ने पुलिस को बताया कि उस के परिवार वालों ने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्चा कर के उस की शादी बड़ी धूमधाम से की थी, जिस में अच्छाखासा दहेज भी दिया गया था. लेकिन उस का जीवन नर्क बना दिए जाने के बावजूद उस की ससुराल वाले उस के मातापिता से 65 लाख रुपए नगद मांग कर रहे थे.

बकौल निक्की यह सब राधे मां के कहने पर किया जा रहा था. राधे मां ने उसे एक तरह से अपनी बंधक बना लिया था. तमाम तरह की प्रताड़नाओं की वजह से उस का जीवन नर्क बनता जा रहा था. न कोई उसे बचाने वाला था, न ही उस की बात सुनने वाला. उस के मातापिता व भाई रौनक अग्रवाल उस की दशा देख कर अलग खून के आंसू रो रहे थे. लेकिन राधे मां के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत उन में भी नहीं थी. निक्की की सोच के मुताबिक राधे मां ने शायद उस पर काला जादू कर के उसे अपने वश में कर रखा था. वह जितना भी इस जाल से निकलने का प्रयास करती, उतना ही और ज्यादा फंसती जाती थी. आखिर जैसेतैसे एक दिन वह राधे मां के जाल से निकल कर अपने घर पहुंचने में सफल हो गई.

इस के बाद उस ने वकील सन्नी वास्कर से मिल कर अपनी तहरीर तैयार की और इसे ले कर पुलिस के पास पहुंची. लेकिन जब पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की तो उस ने अदालत में अपनी याचिका लगाई. आखिर अदालत ने पुलिस को प्राथमिकी दर्ज कर के काररवाई करने का निर्देश दिया. निक्की की शिकायत पर पुलिस ने 7 लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर के 6 लोगों के बयान लिए और राधे मां को थाने में पेश होने का लिखित आदेश दिया.

राधे मां के पास जब यह आदेश पहुंचा तब वह बोरीवली स्थित अपने आवास पर थीं, जहां से वह अचानक गायब हो गईं. पुलिस को संदेह हुआ कि कहीं वह विदेश भागने की कोशिश न करें, लिहाजा इस संबंध में रेड कौर्नर नोटिस जारी कर के उन की फोटो के साथ सभी हवाईअड्डों को सूचित कर दिया गया. इधर यह सब चल रहा था, उधर मुंबई की एक वकील फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट ने राधे मां पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाते हुए उन के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा दी. इस बारे में फाल्गुनी का कहना था कि राधे मां की कथित महिमा के बारे में सुन कर वह खुद उन के दरबार में गई थीं. वहां का माहौल एकदम अभद्र व अश्लील था, जिस से आहत हो कर उन्होंने राधे मां के खिलाफ बोरीवली थाने में शिकायत दर्ज करवाई.

बकौल फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट राधे मां अपने यहां लोगों को देर रात की पार्टियों में बुलाती हैं, जिस में वह बौलीवुड के गानों पर लोगों के साथ नाचती हैं. इतना ही नहीं, बल्कि वह अपने भक्तों खासकर पुरुषों को उन्हें गोद में उठा कर झूला झुलाने और चूमने को भी कहती हैं. मुंबई में जगहजगह राधे मां के होर्डिंग्स लगे हुए थे. उन्हें दुर्गा मां का अवतार कह कर प्रचारित किया गया था. वह रहती भी अपनी अलग वेशभूषा में थीं. निहायत कीमती लाल सुर्ख जोड़े के साथ महंगे आभूषणों से लदीफदी राधे मां के चेहरे पर फिल्मी तारिकाओं जैसी चमक और सौंदर्य झलकता था. वह गहरे लाल रंग की लिपस्टिक का इस्तेमाल करती थीं. उन के माथे पर गहरे लाल रंग की लंबी रेखा खिंची रहती थी.

केशविन्यास भी फिल्मी तारिकाओं से कम नहीं था, जिस में दाईं तरफ बालों में गुलाब का फूल टंका रहता था. इस कथित दिव्य रूप के साथ राधे मां के दाएं हाथ में गोटे वाली लाल रंग की चुनरी में लिपटा छोटा सा त्रिशूल होता था और बायां हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में उठा रहता था. संभवत: मार्केटिंग को ध्यान में रखते हुए राधे मां का यही स्वरूप जनमानस को परोसा गया था. अपनी इसी छवि के साथ राधे मां आम लोगों के जेहन में समाई हुई थीं. दरअसल अगर कोई व्यक्ति उन का भक्त नहीं भी था तो भी वह उन के इस रूप को राधे मां के रूप में पहचानता था. इस कथित दिव्य चेहरे के पीछे कोई दूसरा चेहरा भी छिपा हो सकता था, इस बारे में अभी तक शायद किसी ने सोचने की जहमत नहीं उठाई थी.

लेकिन खुद को देवी का अवतार बताने वाली राधे मां के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने का जरा सा धुआं क्या उठा कि छोटे रूप में ही सही आग की चिंगारियां नजर आने लगीं. इन चिंगारियों की चमक तब और बढ़ गई जब सोशल साइट्स पर राधे मां का एक वीडियो वायरल हुआ. इस वीडियो में वह अपने चिरपरिचित परिधान की जगह थोड़े मौडर्न लिबास में फिल्मी गाने की धुन पर हिरणी वाले अंदाज में ठुमके लगाती हुई नजर आईं.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई, किसी ने उन के कुछ ऐसे अभद्र चित्र भी नेट पर डाल दिए, जिन में वह निहायत आधुनिक लिबास पहने नजर आ रही थीं. ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने आधेअधूरे मौडर्न कपड़ों में मौडलिंग का सेशन करवाया हो. अभी तक यह रहस्य ही था कि आखिर राधे मां के इस तरह के फोटो जुटा कर किस ने सार्वजनिक कर दिए. इसी बीच टीवी कलाकार राहुल महाजन ने एक टीवी चैनल पर आ कर बताया कि ये फोटो उन्होंने अपने एक मित्र से हासिल कर के सार्वजनिक किए थे ताकि ऐसे ढोंगी साधुसंतों की सच्चाई लोगों के सामने आ सके.

इस के साथ ही राधे मां का हर क्रियाकलाप ब्रेकिंग न्यूज बनने लगा. सभी न्यूज चैनलों पर राधे मां पर होने वाली परिचर्चा दिखाई जाने लगी. कोई राधे मां के हक में बोल रहा था तो कोई विरोध में. अखबारों के पन्ने भी इस तरह के समाचारों से रंगने लगे थे. घरघर में राधे मां की चर्चा हो रही थी. दूसरी ओर अपने खिलाफ मामला दर्ज होने और पुलिस द्वारा थाने में पेश होने का सम्मन मिलने पर राधे मां अपने बोरीवली आश्रम कम निवास से गायब हो गईं. इस से पुलिस को संदेह हुआ कि राधे मां विदेश भागने की कोशिश कर सकती हैं. इसी के मद्देनजर उन के खिलाफ रेड कौर्नर नोटिस जारी कर दिया गया.

पुलिस को तो राधे मां की तलाश थी ही, मीडिया भी उन की खोजखबर लेने के लिए दिनरात शिद्दत से जुटा था. आखिर 8 अगस्त की भोर में कुछ मीडियाकर्मियों को पता चला कि राधे मां अपने खास भक्तों के साथ महाराष्ट्र के औरंगाबाद स्थित एक बड़े होटल में ठहरी हैं. उन्हें यह भी पता चला कि वह होटल से सुबहसुबह नांदेड़ के लिए रवाना हो जाएंगी. इस का नतीजा यह हुआ कि जब राधे मां नांदेड़ जाने के लिए तैयार हो कर होटल से बाहर निकलीं तो पत्रकारों ने उन्हें घेर कर सवाल दागने शुरू कर दिए, जिस पर एक बार तो वह बेहोश हो कर जमीन पर गिर गईं. इस पर उन के साथी पत्रकारों को लताड़ते हुए उन्हें गोद में उठा कर उन की कार तक ले गए. इस बीच वह होश में आ गई थीं.

राधे मां के पास काले रंग की चमचमाती विदेशी जगुआर कार थी. भारतीय मुद्रा में इस कार की कीमत करीब एक करोड़ रुपए है. इस कार में ड्राइवर के साथ वाली सीट हटा कर लाल रंग का सिंहासन लगवा दिया गया था. साथ ही इस के नीचे आने वाले कार के पहिए पर भी लाल रंग पोत दिया गया था. अन्य तीनों पहिए जिस तरह के थे, उन्हें वैसा ही रहने दिया गया था. पत्रकार लगातार प्रश्न पूछते हुए राधे मां के पीछे आ गए थे. राधे मां के साथियों ने जब उन्हें ले जा कर गाड़ी में बने सिंहासन पर बैठा दिया तो वह एक बार तो अपना चेहरा हाथों में छिपा कर रोने लगीं. फिर अचानक खिड़की का शीशा नीचे करते हुए पत्रकारों से मुखातिब हो कर बोलीं, ‘‘मैं मीडिया, पुलिस और कानून का सम्मान करती हूं. मेरा न्याय मेरा भगवान करेगा.’’

इस के बाद वह अपने समर्थकों समेत नांदेड़ के लिए रवाना हो गईं. मीडिया भी उन के पीछे लगा रहा. नांदेड़ के एक बड़े गुरुद्वारे में जा कर राधे मां ने मत्था टेका और अरदास की. 9 तारीख को वह मुंबई लौट आईं. इसी दिन किसी ने उन की वेबसाइट को हैक कर लिया. मातामणि श्री राधे गुरु मां चैरिटेबल ट्रस्ट के कार्यकारी ट्रस्टी संजीव गुप्ता ने इस बारे में पत्रकारों को बताया कि किसी शरारती तत्व ने वेबसाइट हैक कर के उस पर लिख दिया था— ‘प्लीज, ढोंग करने वाले किसी तथाकथित संत को मत पूजो. आप लोग मेहनत कीजिए. राधे मां को पूजने से कुछ नहीं होगा.’

बहरहाल जल्दी ही वेबसाइट को ठीक कर दिया गया. बहरहाल, मुंबई लौट कर राधे मां एक मजार पर चादर चढ़ाने भी गईं. इस के साथ ही उन्होंने कांदिवली थाने में एक लिखित प्रार्थनापत्र दे कर इस बात की गुजारिश की कि 14 अगस्त की बजाय थाने में उन की पेशी 26 अगस्त तक के लिए मुल्तवी कर दी जाए. दरअसल राधे मां के एक बेटे को हीरो के रूप में ले कर एक फिल्म निर्माता फिल्म बना रहे थे ‘इश्क डौट कौम’. इस फिल्म की शूटिंग बैंकाक में हो रही थी, जिसे देखने के लिए राधे मां को वहां जाना था. लेकिन पुलिस ने उन का यह अनुरोध अस्वीकार करते हुए अपना सख्त आदेश भिजवा दिया कि वह किसी भी सूरत में 14 अगस्त, 2015 को दिन के ठीक 12 बजे थाने में हाजिर हो जाएं, यही उन के हित में होगा.

नांदेड़ से मुंबई लौटने पर राधे मां बोरीवली न जा कर बालकेश्वर इलाके में स्थित अपने दूसरे आवास पर जा कर ठहर गई थीं. यहीं से उन्हें थाना कांदिवली पहुंचना था. इस जगह से थाने की दूरी करीब 30 किलोमीटर थी. मुंबई के ट्रैफिक को देखते हुए डेढ़-2 घंटे का वक्त लग सकता था. लिहाजा तय हुआ कि वहां से 10 बजे निकला जाए. अपने चिरपरिचित अंदाज में राधे मां सही वक्त पर अपने इस निवास से निकल भी आईं. लेकिन बाहर आते ही उन्हें पत्रकारों ने घेर लिया, जिस पर राधे मां ने इतना ही कहा, ‘‘देखिए, मैं पूरी तरह प्योर और पायस हूं. मैं ने आज तक कभी किसी का दिल नहीं दुखाया. मैं पूरी तरह प्योर हूं.’’

फिर उन्होंने पहले तो आम प्रचलित कवितानुमा बात कही, ‘‘सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से.’’

इस के बाद राधे मां ने कबीर के इस दोहे का उल्लेख किया, ‘‘साच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप. जाके हृदय साच है ताके हृदय आप.’’

इस के बाद राधे मां ने खुद को बेकसूर कहते हुए फरमाया कि वह पैसे वाली देवी हैं, उन के श्रद्धालु उन्हें इतना चढ़ावा चढ़ाते हैं कि उन्हें पैसों की कोई कमी नहीं है. ऐसे में वह निक्की के परिवार वालों से पैसा क्यों मांगेगी? जबकि वह तो हमेशा दूसरों की मदद करती आई हैं. इसी मौके पर राधे मां ने इलैक्ट्रौनिक मीडिया के एक फोटोग्राफर से कहा, ‘‘बेटा, इस वक्त भी मेरी गाड़ी में 20 लाख रुपया पड़ा है, जिसे मैं जिसे चाहूं दे सकती हूं. तुम्हारा कैमरा अगर टूट जाए तो चिंता नहीं करना. मैं ले कर दूंगी तुम्हें नया कैमरा.’’

खैर, अपने साथियों, छोटी मां व टल्ली बाबा समेत वह अपने 60 समर्थकों सहित दिन के ठीक पौने 11 बजे कांदिवली थाने के लिए रवाना हो गईं. इस बार वह काले रंग की अपनी जगुआर कार पर न जा कर सफेद रंग की फार्चुनर गाड़ी से निकली थीं. बहरहाल, राधे मां ने थाने में क्या कहा, यह जानने से पहले उन का इतिहास खंगालने की कोशिश करते हैं. राधे मां का वास्तविक नाम है सुखविंदर कौर. कुछ लोग उन्हें बब्बो के नाम से भी जानते हैं. उन का जन्म 4 अप्रैल, 1965 को जिला गुरदासपुर (पंजाब) के गांव दोरांगला निवासी अजीत सिंह के यहां हुआ था.

उन की 3 बहनें और 2 भाई थे. अजीत सिंह पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में नौकरी करते थे. अपनी पुत्रवधू की हत्या में सजा भुगतने के बाद 2014 में उन की मृत्यु हो गई थी. सुखविंदर ने गांव के सरकारी स्कूल से 10वीं पास की थी. जब वह कुल 17 साल की थी, तभी उस की शादी कर दी गई. उस की ससुराल जिला होशियारपुर के कस्बा मुकेरियां में थी. उस का पति मोहन सिंह अपने पिता करम सिंह हलवाई के साथ दुकान पर काम करता था.

सुखविंदर को धर्मकर्म में बचपन से ही रुचि थी. शादी के बाद भी उस का धर्मकर्म के प्रति लगाव बना रहा. इत्तफाक से उस की कही कई बातें सच हो गई थीं. इसी को ध्यान में रख कर उस ने अपने पति के बारे में भी भविष्यवाणी की कि विदेश में जा कर काम करने से वह अच्छा पैसा कमा सकते हैं. मोहन सिंह पत्नी की बात मानते हुए दोहा कतर चले गए. तब तक सुखविंदर 3 बच्चों की मां बन चुकी थी.

पति के विदेश जाने के बाद घरगृहस्थी चलाने के लिए सुखविंदर ने घर पर ही कपड़े सिलने का काम शुरू कर दिया. लेकिन उस ने अपनी भक्ति में कमी नहीं आने दी. स्थानीय काली मंदिर में जा कर वह घंटों काली मां की पूजाअर्चना किया करती थी. धीरेधीरे वह अध्यात्म की दिशा में मुड़ कर मुकेरियां स्थित डेरा परमहंस बाबा के महंत रामादीन दास की शिष्या बन गई. महंत ने उसे आध्यात्मिक दीक्षा दी. साथ ही नया नाम दिया—राधे मां.

इस के बाद सुखविंदर राधे मां के रूप में सत्संग करने लगीं. वैसे भी लोग अब उन्हें राधे मां के नाम से ही जाननेपुकारने लगे थे. खानपुर में मां भगवती मंदिर राधे मां का आध्यात्मिक केंद्र बन गया. आज भी वहां के लोगों का कहना है कि इस तरह के सत्संग के दौरान वह अपने भक्तों को वरदान देती थीं, जिस से उन के संकट दूर हो जाते थे. उन दिनों खुद को देवी का अवतार कहते हुए राधे मां जागरण भी किया करती थीं. सन 2002 में राधे मां ने फगवाड़ा में ऐसे ही एक भव्य जागरण का आयोजन करवाया, जिस में उन्होंने खुद को मां दुर्गा के अवतार के तौर पर प्रचारित करने का प्रयास किया. फगवाड़ा में रहने वाले विश्व हिंदू परिषद के नेता सुरेंद्र मित्तल ने इस बात का विरोध किया.

30 मार्च 2002 को हुए जागरण के बाद राधे मां एक कारोबारी अरण नंदा के दीवान हाउस में ठहरी हुई थीं. सुरेंद्र मित्तल ने अपने साथियों के साथ वहां पहुंच कर राधे मां का विरोध किया. यह विरोध प्रदर्शन 3 घंटों तक चला. मौके पर स्थानीय पुलिस भी पहुंच गई थी. आखिर राधे मां द्वारा सार्वजनिक रूप से माफी मांगे जाने के बाद यह प्रदर्शन खत्म हो पाया. जो भी था, एक जगह राधे मां का विरोध हुआ तो 10 जगह जयजयकार भी होती रही. राधे मां प्रवचन सुनातीं व जागरण करतीं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देतीं. भक्त भी कहते रहे कि राधे मां के आशीर्वाद से उन के कष्ट दूर हो गए हैं.

कहते हैं कि ऐसा ही एक आशीर्वाद राधे मां ने मुंबई के एक भक्त मनमोहन गुप्ता को भी दिया था. काम हो जाने पर वह राधे मां से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्हें अपने साथ मुंबई ले गए. इस तरह मुंबई का जानामाना गुप्ता परिवार राधे मां का अनन्य भक्त बन गया. मनमोहन गुप्ता का लड़का संजय गुप्ता अपनी ग्लोबल एडवरटाइजिंग एजेंसी चलाता था. यह एजेंसी बड़ेबड़े होर्डिंग्स लगाने का काम करती थी. संजय गुप्ता ने अपने इस व्यवसाय के माध्यम से राधे मां को उच्च श्रेणी की देवी बना कर लोगों के सामने पेश किया और अपने बोरीवली वाले विशाल बंगले की 2 मंजिलें उन्हें दे दीं. राधे मां को विदेशी जगुआर गाड़ी भी संजय गुप्ता ने ही भेंट की थी.

फलस्वरूप गुप्ता परिवार की बदौलत कुछ ही सालों में राधे मां की प्रसिद्धि इस तरह आसमान छूने लगी कि 2 अगस्त, 2012 को जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि ने गुरु पूर्णिमा पर अनुष्ठानों के साथ राधे मां को महामंडलेश्वर की पदवी से नवाज दिया. इस अलंकरण समारोह को पूरी तरह गुप्त रखा गया था. अखाड़े के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार महामंडलेश्वर पदवी मिलने के अगले ही दिन राधे मां मुंबई चली गई थीं. इस के बाद उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी दिए जाने पर कई सवाल उठने लगे.

जांच के लिए राधे मां के आध्यात्मिक गुरु स्वामी पंचनंद के नेतृत्व में 11 सदस्यीय जांच समिति बनी. समिति ने राधे मां के जीवन से जुड़े विभिन्न स्थानों पर जा कर जांच की. इस के बाद उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी से निलंबित कर दिया गया था. इस से पहले द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने राधे मां को नासिक कुंभ मेले में औपचारिक शाही स्नान में हिस्सा लेने से रोक दिया था. अखाड़ों में संतों के बीच राधे मां को ले कर भले ही कुछ भी चलता रहा हो, मुंबई में राधे मां का दबदबा तब तक पूरी तरह कायम रहा, जब तक निक्की ने उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई थी. निक्की की उसी रिपोर्ट ने उन्हें थाने पहुंचने को मजबूर कर दिया था.

बहरहाल, 14 अगस्त 2015 को दिन के ठीक पौने 11 बजे बालकेश्वर से चला राधे मां का काफिला 12 बज कर 20 मिनट पर थाना कांदिवली जा पहुंचा. मामले की नजाकत को देखते हुए थाने में भारी पुलिस बल का प्रबंध किया गया था. राधे मां के अलावा किसी को भी थाने के भीतर नहीं जाने दिया गया. थाने के विशेष रूम में 3 महिला इंसपेक्टरों और एक पुरुष इंसपेक्टर ने राधे मां से 75 सवालों की सूची के साथ 4 घंटे 42 मिनट तक पूछताछ की. इस पूछताछ के दौरान 25 मिनट तक राधे मां रोईं और एक बार बेहोश भी हुईं. तब उन्हें वातानुकूलित कमरे में ले जा कर उन की सहायक छोटी मां को भीतर बुलाया गया जो लगातार उन्हें टेट्रापैक जूस व काजू देती रहीं.

इस बीच राधे मां के वकील अशोक गुप्ते व आबाद कोंडा उन्हें हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत दिलवाने का प्रयास करते रहे जो आखिर स्वीकार कर ली गई. यह जमानत 2 हफ्तों के लिए स्वीकार की गई. साथ ही राधे मां को इस बात का निर्देश भी दिया गया कि उन्हें तय समय पर मामले की जांच के सिलसिले में कांदिवली पुलिस थाने जाना होगा. यह सिलसिला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि इस दौरान अन्य कई जगहों पर राधे मां के खिलाफ शिकायतें दर्ज हो गईं. जगहजगह आक्रोश भी प्रकट हो रहा था.

इस सिलसिले में मुकेरियां में हिंदू संगठनों ने न केवल उन के विरोध में प्रदर्शन किया, बल्कि उन का पुतला जला कर उन के चित्रों वाले होर्डिंग्स पर कालिख पोत दी गई. तमाम संतों के बीच वह बहस का मुद्दा तो बनी ही रहीं. यहां तक कि राधे मां का मामला लोकसभा में भी गूंजा. सदन में सरकार से फरजी साधूसाध्वियों के खिलाफ कठोर कदम उठाने की मांग की जाती रही. मलोट कस्बे के वकील चूनीलाल भारती ने स्थानीय सिटी पुलिस में राधे मां के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज करवाते हुए आरोप लगाया कि राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर खुद को दुर्गा मां का अवतार बता कर चौकी लगाती हैं. इस से जहां वह अंधविश्वास फैला रही हैं, वहीं वह धार्मिक भावनाओं से भी खिलवाड़ कर रही हैं. बकौल वकील भारती राधे मां ने यह पाखंड रच कर 1000 करोड़ की संपत्ति एकत्र की है.

राधे मां पर एक आरोप उन के भाई के ससुराल वालों ने भी लगाया है. आरोप के अनुसार पंजाब के गांव नानोमंगल निवासी बलविंदर कौर की शादी राधे मां के भाई सुखबीर सिंह हुई थी. बलविंदर आंगनवाड़ी में सरकारी नौकरी करती थी. शादी के 6 साल बाद तक उसे बच्चा नहीं हुआ तो 6 जून, 2002 को गला दबा कर उस की हत्या कर दी गई. इस आरोप में राधे मां के पिता अजीत सिंह और भाइयों सुखबीर सिंह व निर्मल सिंह के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हुआ. 11 अक्तूबर 2004 को इन तीनों को 10-10 साल कैद की सजा सुनाई गई थी. बलविंदर के भाई जगतार सिंह ने आरोप लगाया है कि उस की बहन की हत्या के षडयंत्र में राधे मां भी शामिल थी, लेकिन उस के खिलाफ कुछ नहीं किया गया. अब इस की विस्तृत जांच की जाए.

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा-चंबा सीमा पर स्थित हटली राम मंदिर के महंत श्यामसुंदर ने बताया कि वह और राधे मां गुरु रामादीन दास परमहंस के शिष्य थे. गुरुजी ने ही सुखविंदर कौर को राधे मां बनाया था. महंत श्यामसुंदर का आरोप है कि गुरुजी की संपत्ति हथियाने के मकसद से राधे मां एक बार उन्हें अपने साथ विदेश ले गईं, जहां से वापस आने पर गुरुजी इस कदर बीमार हुए कि आखिर मौत की नींद ही सो गए. महंत श्यामसुंदर को आशंका है कि अब राधे मां से उन्हें भी जान का खतरा है.

14 अगस्त को फगवाड़ा निवासी सुरेंद्र मित्तल ने एसएसपी कपूरथला को लिखित शिकायत दे कर राधे मां, उस की बहन राजेंद्र कौर उर्फ रज्जी मौसी, रितु सरीन उर्फ छोटी मां, उस की पुत्रवधू मेघा सिंह व संजीव गुप्ता पर धमकाने, अश्लीलता फैलाने व आडंबर रच कर हिंदू धर्म को ठेस पहुंचाने के आरोप लगाए हैं. लुधियाना में भी इस तरह की एक शिकायत अदालत में दर्ज हुई है. फिल्म अभिनेत्री डौली बिंद्रा पहले राधे मां की मुरीद थीं, अब उन्होंने भी इसी तरह की शिकायत मुंबई पुलिस में की है.

फिल्म अभिनेता ऋषि कपूर खुल कर राधे मां के खिलाफ बोले, तो दिग्गज फिल्म निर्माता सुभाष घई ने उन के हक की बात की. गायक सोनू निगम तो पूरी तरह राधे मां के समर्थन में उतर पड़े. 17 अगस्त 2015 को उन्होंने राधे मां के समर्थन में एक के बाद एक ट्वीट कर के उन का समर्थन करते हुए उन की तुलना काली मां से कर डाली. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, ‘काली मां को तो राधे मां से भी कम कपड़ों में दर्शाया गया है, यह बहुत रोचक है कि यह देश कपड़ों की वजह से एक महिला पर केस चलाना चाहता है.’ सोनू का दूसरा ट्वीट था, ‘पुरुष साधु नग्न घूम सकते हैं, अजीब तरह के डांस कर सकते हैं, लेकिन रेप का आरोप लगने के बाद ही उन्हें जेल में डाला जा सकता है. क्या यह लैंगिक समानता है?’

सोनू ने तीसरे ट्वीट में लिखा, ‘केस चलाना चाहते हैं तो अनुयायियों पर केस चलाइए. अपने आप पर केस चलाइए. महिलाओं और पुरुषों को धर्मगुरु बनाने के लिए अलगअलग नियम. यह सही नहीं है.’ इसे ले कर सोनू निगम के खिलाफ केस भी दर्ज हुआ है क्योंकि उन्होंने राधे मां की तुलना काली मां से कर दी थी. बहरहाल, इसे रोचक ही कहा जाएगा कि इस वक्त राधे मां की सर्वाधिक चर्चा फिल्मनगरी में है. कोई उन का विरोध कर रहा है तो कोई उन के हक में आवाज बुलंद कर रहा है. राधे मां के एक पूर्व अनुयायी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर जो बताया वह भी कम रोचक नहीं है, ‘सब माया का खेल था, जबरदस्त मार्केटिंग थी. प्रचार से लोग, बीड़ी कच्छा बेच कर क्या से क्या बन गए, यहां तो फिर भी…’

इसी सब के चलते 20 अगस्त को राधे को पुन: थाने बुलाया गया. इस बार उन के सामने 23 सवालों की सूची रखी गई. इस सूची में एक नया नाम ‘डैडी’ भी शामिल था. पूछताछ में राधे मां ने बताया कि डैडी उन के पति को कहा जाता है जबकि अपने और डैडी के पासपोर्ट के बारे में राधे मां ने कोई जानकारी नहीं दी. जो भी हो, ज्यादा रोचक तो इस समाचार को माना जाना चाहिए कि ‘ग्लैमरस राधे मां’ नाम से इस प्रकरण पर फिल्म की घोषणा भी हो गई है. Mumbai News

 

Lucknow News: धंधे की तपिश में झुलसी बेटी

Lucknow News: सायरा लखनऊ में देहधंधे की बड़ी धुरी थी. दूसरे की बेटियों को वेश्यावृत्ति की आग में झोंकने वाली सायरा अपनी बेटियों पर इस धंधे की छाया भी नहीं पड़ने देना चाहती थी. लेकिन उस की करतूतों की सजा बेटी को उठानी ही पड़ गई. सायरा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही चंचल और शोख हसीन भी. अन्य लड़कियों की तरह शादी को ले कर उस के भी सुनहरे सपने थे. लेकिन उस के सारे सपने उस वक्त चकनाचूर हो गए जब उस की शादी सीतापुर जिले के महमूदाबाद कस्बे के हुसनैन के साथ हुई. उस का मायका भी इसी कस्बे के दूसरे मोहल्ले का था.

हुसनैन मेहनतमजदूरी करता था. वह जो पैसे कमाता था उस से उस के घर का केवल खर्च ही चल पाता था. ऐसे में उस ने अपने सपनों को एक तरफ सरका दिया और अपनी घरगृहस्थी में रम गई. लेकिन जब कभी वह गहने या अच्छे कपड़े पहनी हुई अन्य महिलाओं को देखती तो उस के दिल में टीस सी उठती थी. तब वह सोचती कि उस के सपने भी कभी पूरे होंगे या जिंदगी ऐसे ही अभावों में कटेगी.

जब उसे निश्चित हो गया कि कस्बे में रह कर उस के सपने पूरे नहीं हो सकते तो उस ने लखनऊ जाने की ठान ली और इस के लिए उस ने पति को भी किसी तरह तैयार कर लिया. इस के बाद सायरा और हुसनैन महमूदाबाद से लखनऊ पहुंच गए. पुराने लखनऊ में उन्होंने एक कमरा किराए पर ले लिया. शहर में जाते ही कोई काम मिलना आसान नहीं होता, इसलिए हुसनैन रिक्शा चलाने लगा. इस से उसे पहले से ज्यादा कमाई होने लगी पर शहर में रहने की वजह से उन के खर्च भी बढ़ने लगे थे. इस के बावजूद भी दोनों वहां खुश थे.

सायरा खुद भी अपने लिए कामधंधे की तलाश में लग गई. किसी जानकार के माध्यम से उसे एक ब्यूटीपार्लर में काम मिल गया. उस की शादी को 8 साल हो हो चुके थे और वह 4 बच्चों की मां भी बन गई थी. ब्यूटीपार्लर में काम करने की वजह से वह बनठन कर रहती थी. इस से पता नहीं लग पाता था कि वह 4 बच्चों की मां है. उसी ब्यूटीपार्लर में काम करने वाली परवीन नाम की एक औरत से उस की दोस्ती हो गई. सायरा परवीन से अपने घर के हालात बताती रहती थी.

एक दिन परवीन ने उस से कहा, ‘‘सायरा, तुम्हारी गरीबी देख कर मुझे दया आ रही है. वैसे मेरे पास एक काम है. इस में पैसा खूब है लेकिन यह बात तुम अपने तक ही रखना.’’

‘‘क्या काम है और इस में मुझे करना क्या होगा?’’ सायरा ने अचंभे से पूछा.

‘‘देख, करना कुछ नहीं है. बस यह समझ ले कि जिस काम को तू हुसनैन के साथ मुफ्त में करती है, उसी को तुझे दूसरी जगह करना है. 3 से 4 घंटे में ही तुझे उतने पैसे मिल जाएंगे, जितने ब्यूटीपार्लर में 15 दिन में नहीं कमाती होगी.’’

‘‘अच्छा…’’ सायरा हंसते हुए बोली.

‘‘मैं तो कई सालों से इसे मजे से कर के पैसे कमा रही हूं.’’ परवीन ने बताया.

‘‘फिर तुम ब्यूटीपार्लर में नौकरी क्यों करती हो?’’ सायरा ने पूछा.

‘‘वह तो सिर्फ दिखावे के लिए है. इस बहाने मैं घर से बाहर आ जाती हूं.’’

‘‘इस में कोई रिस्क तो नहीं है?’’ सायरा ने पूछा.

‘‘रिस्क कैसा. तू मेरे साथ रहेगी तो सब जान जाएगी. हम दोनों मिल कर यह काम करते हैं.’’ परवीन ने कहा तो सायरा ने हां कर दी. इस के बाद दोनों मिल कर जिस्मफरोशी का धंधा करने लगीं.

सायरा के पति हुसनैन को पता नहीं था कि उस की बीवी क्या काम करती है. जबकि उस की गतिविधियों से मोहल्ले वाले उस के चालचलन को जान चुके थे. मगर इस की उस ने चिंता नहीं की. उस का मकसद पैसे कमाना था, इसलिए लोगों की बातों को अनसुना कर वह अपने मिशन में जुटी रही. परवीन के साथ रह कर सायरा भी इस क्षेत्र की खिलाड़ी बन गई. धंधे की सारी जानकारी हो जाने के बाद सायरा परवीन से अलग रह कर काम करने लगी.

फिर उस ने पुराना मोहल्ला का कमरा छोड़ कर मडियांव इलाके में दूसरा कमरा किराए पर ले लिया. यहां उस ने एक प्लौट भी खरीद लिया. मडियांव इलाके में घनी आबादी नहीं थी. वह एक नई कालोनी बस रही थी. इस कारण वहां पर कौन किस के पास आजा रहा है, इस का किसी को पता भी नहीं चल रहा था. कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सकता. यानी उस के पति हुसनैन को भी उस के धंधे की भनक लग गई. उस ने उसे डांटा और उस के काम का विरोध किया पर सायरा को बिना कोई ज्यादा मेहनत किए अच्छी आमदनी हो रही थी इसलिए उस ने पति के विरोध की परवाह नहीं की.

हुसनैन भी गैरतमंद था, अपनी बात पर अड़ते हुए उस ने पत्नी को कई चेतावनियां भी दीं. इस का भी उस पर असर नहीं हुआ तो वह उस से अलग हो कर दूसरी जगह रहने लगा. अब सायरा की लगाम कसने वाला कोई नहीं था. वह अपने घर पर ही ग्राहकों को बुलाने लगी. इसी दौरान उस की मुलाकात हरदोई जिले के लालबहादुर मिश्रा से हुई. सायरा को एक ऐसे आदमी की जरूरत थी जो उस के साथ रहे और कोई मुसीबत आए तो उस का साथ दे. सायरा के काम से वाकिफ होते हुए भी लालबहादुर मिश्रा ने सायरा से शादी करने के लिए मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया. फिर उस ने अपना नाम शम्सुद्दीन रख लिया.

लालबहादुर का साथ मिलते ही सायरा की कमाई तेजी से बढ़ने लगी. अब उस ने अपने साथ दूसरी लड़कियां भी रख लीं. इस से उसे और ज्यादा कमाई होने लगी. कुछ दिनों बाद उस ने मडियांव की ही बसंत विहार कालोनी में एकएक कर के 4 प्लौट खरीद लिए. इन में से 2 प्लौट अपने नाम से और 2 लालबहादुर के नाम पर थे. करीब 1 हजार वर्गमीटर के इन प्लौटों पर उन्होंने 28 कमरे बनवाए. सारे कमरों को होटल के कमरों की तरह से तैयार कराया गया था. सभी कमरों में होटल की तरह सभी सुविधाएं मौजूद थीं.

कमरों में एसी, फ्लोर टाइल्स, छतों पर पीओपी की पूरी कारीगरी, दीवारों पर महंगा पेंट और कमरों में आरामदायक बेड डाले गए थे. कमरे इस तरह से बनाए गए थे कि आपातकाल में वहां से सुरक्षित निकला जा सके. मडियांव में हिंदुओं की आबादी ज्यादा थी इस वजह से वह हिंदू औरत की तरह रह रही थी. उस के मोहल्ले में भी किसी को यह पता नहीं था कि उस का पति हिंदू से मुस्लिम बन गया है. सायरा ने अपने घर के सामने एक मंदिर भी बनवा रखा था. वह खुद भी सुबहशाम उस मंदिर में पूजा करने जाती थी. सायरा के इस काम से मोहल्ले वाले भी प्रभावित रहते थे.

दूसरी ओर सायरा अपने धंधे को और बढ़ाने का काम भी कर रही थी. उस के पास दूसरे शहरों से भी लड़कियां आने लगीं. वह लड़कियां उस के मकान में ही ठहरती थीं. मोहल्ले वालों से उन लड़कियों को किराएदार बताती. किसीकिसी को वह अपनी रिश्तेदार तक बता देती थी. वहां जो ग्राहक आते, उन से कमरों का किराया भी वसूलती थी. इस तरह उस की आमदनी दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी. धीरेधीरे सायरा के संबंध दूसरे राज्यों में जिस्मफरोशी का धंधा करने वाले लोगों से भी हो गए. दिल्ली, मुंबई व अन्य शहरों की सी-ग्रेड की मौडल भी उस के यहां आने लगीं. कुछ दलाल उस के यहां नाबालिग लड़कियों को भी छोड़ जाते थे. उन्हें वह अपने घर के तहखाने में ठहराती थी.

तहखाने में भी एसी लगे थे. जब कोई लड़की देहधंधे के लिए तैयार नहीं होती तो उस को डरायाधमकाया जाता था. उसे भूखाप्यासा रखा जाता था. वहां रहने वाले मुस्टंडे उस के साथ बलात्कार करते. ऐसी प्रताड़नाओं को सह कर ज्यादातर नाबालिग लड़कियां सायरा की बात मानने को तैयार हो जाती थीं. तब वह उन्हें ग्राहकों के पास भेज देती थी. सायरा के ग्राहकों में पुलिस, बिल्डर, माफिया और छोटे नेता तक शामिल थे. ये उस के यहां आते थे तो कई अपने पास ही लड़कियां बुलवाते थे. अपने धंधे को चलाने के लिए उस ने लखनऊ में ही अलगअलग जगहों पर कुछ और कमरे भी किराए पर ले रखे थे.

वह दूसरों की लड़कियों को देहधंधे में लगाने का काम करती थी. लेकिन उस ने अपनी लड़कियों को इस से दूर रखा. अपनी बड़ी बेटी सना की वह शादी कर चुकी थी. अपनी छोटी बेटी सोनी और बेटे साजिद को वह अपने साथ रखती थी. उस के यहां बाहरी लोगों का ज्यादा आनाजाना हो गया तो मोहल्ले वाले भी उस की असलियत समझ गए. फिर तो उस के यहां आए दिन छापे पड़ने लगे. सायरा की जिंदगी ऊपर से भले ही सरल दिख रही थी, पर उस की परेशानियां भी कम नहीं थीं. मोहल्ले वालों की शिकायत पर उस के अड्डे पर कई बार पुलिस के छापे भी पड़े, जिस में सायरा और लालबहादुर को जेल भी जाना पड़ा. बाद में वे लोग जमानत पर जेल से बाहर आ गए.

उन के ऊपर कई मुकदमे चल रहे थे. लालबहादुर पर गुंडा एक्ट भी लगा हुआ था. उसे जिला बदर भी किया गया था. इस के बावजूद भी वह पुलिस से चोरीछिपे अपने घर पर रह रहा था. सायरा ग्राहकों की मांग पर अपने घर के कमरों को खास किस्म की थीम से भी सजाती थी. इस के लिए ग्राहक को अलग से पैसा देना पड़ता था. जैसे किसी ग्राहक को सुहागरात जैसा कमरा चाहिए तो वह फूलों से सजा कर कमरे को तैयार करा देती थी.

पहली जून, 2015 की रात करीब साढ़े 8 बजे सायरा कहीं बाहर से घर लौटी थी. लालबहादुर और बेटा साजिद कुछ सामान लेने के लिए बाजार गए थे. घर में अंदर घुसने के बाद सायरा ने अपनी साड़ी उतार कर मैक्सी पहन ली. उस की 16 साल की बेटी सोनी किचन में खाना बना रही थी. उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई. सायरा ने दरवाजा खोला तो सामने 2 लोग थे. सायरा उन में से एक को जानती थी. इसलिए उस ने उन्हें घर में बुला लिया. तभी उन में से एक युवक ने बड़ी फुरती से सायरा की कनपटी और गरदन पर गोली मार दी.

गोलियों की आवाज सुन कर बेटी सोनी किचन से बाहर आई तो बदमाशों को देख कर डर की वजह से वह बाथरूम में घुस गई. लेकिन वह बाथरूम का दरवाजा बंद कर पाती, उस से पहले ही बदमाश उस के पीछेपीछे पहुंच गए. दरवाजा खोल कर उन्होंने सोनी के माथे पर गोली मार कर हत्या कर दी. 2 लोगों की हत्या कर के बदमाश वहां से भाग गए. आधे घंटे बाद सायरा का बेटा साजिद घर लौटा तो घर का गेट खुला देख कर उसे कुछ अजीब लगा. वह अंदर दाखिल हुआ तो मां को खून से लथपथ देख कर उस की चीख निकल गई. फिर वह अपनी बहन सोनी की तलाश करने लगा.

बाथरूम में वह भी मृत अवस्था में मिली. दोनों लाशें देख कर वह जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने की आवाज सुन कर आसपास के कुछ लोग वहां आ गए. उन के सहयोग से वह मां और बहन को मैडिकल कालेज के ट्रामा सेंटर ले गया, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. अस्पताल की तरफ से सूचना थाना मडियांव पुलिस को दे दी गई. सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी संतोष सिंह भी अस्पताल पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया.

मडियांव थाने से महज कुछ दूरी पर हुए दोहरे हत्याकांड से पुलिस भी हैरान रह गई. खबर मिलने पर सीओ राजेश यादव और डीआईजी आर.के. चतुर्वेदी मौके पर पहुंच गए. साजिद ने पुलिस को बताया कि उस की मां हर समय ज्वैलरी पहने रहती थीं. पर उन की लाश पर एक भी ज्वैलरी नहीं थी. हत्यारे उस की मां के सारे गहने भी उतार कर ले गए. घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के आवश्यक काररवाई शुरू कर दी. इस केस को खोलने के लिए एक पुलिस टीम बनाई गई. टीम में इंसपेक्टर संतोष सिंह, एसएसआई अक्षय कुमार सिंह, हेडकांस्टेबल अमरेश त्रिपाठी, सिपाही अनिल सिंह, हमीदुल्लाह, राजीव पांडेय, लवकुश, रामनरेश कनौजिया आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने सायरा के धंधे और उस से जुड़े हर पहलू की छानबीन शुरू की. दिन पर दिन बीतते रहे लेकिन घटना से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. इस बीच लखनऊ में राजेश पांडेय को एसएसपी के रूप में तैनात किया गया. एसएसपी ने टीम के साथ मिल कर केस की समीक्षा की. सर्विलांस सेल को भी टीम के साथ लगाया गया. फिर सायरा के नजदीकियों से एकएक कर के पूछताछ की. इस का नतीजा यह निकला कि पुलिस टीम हत्यारे तक पहुंच गई. हत्यारा भी और कोई नहीं सायरा की खास सहेली फिरोजा का पति शिवओम निकला. उस ने इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

शिवओम मडियांव थाने के ही नौबस्ता का रहने वाला था. वह आपराधिक किस्म का था. सन 2003 में उस ने अपनी पहली पत्नी पंचमाला उर्फ सुमन की हत्या कर के उस की लाश भी ठिकाने लगा दी थी. पंचमाला के साथ शिवओम की शादी सन 1996 में हुई थी. उस के एक बेटी भी हुई. बेटी के पैदा होने के बाद शिवओम घर से दूर रहने लगा था. पंचमाला ने जब पति की छानबीन की तो पता चला कि उस ने धर्म बदल कर खदरा की रहने वाली फिरोजा से निकाह कर लिया है. तब 2 मई, 2003 को पंचमाला ने शिवओम के खिलाफ विकास नगर थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया. रिपोर्ट दर्ज होते ही शिवओम डर गया. पुलिस के डर से उस ने पत्नी के साथ समझौता कर लिया और उसे अपने घर ले आया.

9 जुलाई, 2003 को पंचमाला अचानक कहीं लापता हो गई. पुलिस ने जब शिवओम से पूछताछ की तो उस ने सारी सच्चाई बयां कर दी. उस ने बताया कि वह पंचमाला की हत्या कर के लाश को ठिकाने लगा चुका है. तब पुलिस ने पत्नी की हत्या के आरोप में उसे जेल भेज दिया. अदालत में केस चलने के बाद उसे 7 साल की सजा हुई, लेकिन बाद में हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर वह बाहर आ गया. शिवओम की दूसरी पत्नी फिरोजा की सायरा से अच्छी दोस्ती थी. फिरोजा की 2 बेटियां थीं. कई बार फिरोजा सायरा के पास जाती तो अपनी दोनों बेटियों को भी ले जाती थी.

शिवओम सायरा के धंधे से वाकिफ था, इसलिए फिरोजा का उस के यहां जाना उसे पसंद नहीं था. उसे शक था कि सायरा कहीं उस की पत्नी और दोनों बेटियों को भी देहधंधे में न लगा दे. उस ने पत्नी से कहा कि वह सायरा से नहीं मिला करे लेकिन सायरा फिरोजा की गहरी दोस्त थी, इसलिए उस ने पति की बात नहीं मानी. शिवओम ने कई बार सायरा को भी समझाया था कि वह उस की पत्नी और बेटियों से न मिला करे. लेकिन सायरा ने उस की बात को अनसुना कर दिया. तब उस ने सायरा को ही रास्ते से हटाने की योजना बना ली.

पहली जून, 2015 की देर शाम को योजना के अनुसार शिवओम अपने दोस्त आमिर के साथ सायरा के घर पहुंच गया. दरवाजा बंद था. दस्तक देने पर सायरा ने दरवाजा खोला तो शिवओम ने उसे 2 गोली मारी, जिस से उस का वहीं काम तमाम हो गया. तभी सायरा की बेटी सोनी वहां आ गई. चूंकि वह शिवओम को पहचानती थी, इसलिए न चाहते हुए मजबूरी में उस की हत्या करनी पड़ी. सायरा के शरीर पर सोने के काफी गहने थे. शिवओम ने उस के सारे गहने उतारे और भाग गया. गहने गायब होने से पुलिस को शुरू में यह शक हुआ था कि कहीं हत्या की वजह लूट तो नहीं थी. लेकिन पुलिस ने जब जांच की तो मामला दूसरा ही निकला.

एसएसपी राजेश पांडेय ने केस का खुलासा करने वाली टीम की सराहना की है. जिस देहधंधे ने सायरा को गरीबी से उठा कर ऐशोआराम की जिंदगी मुहैया कराई, वही धंधा उस की मौत का कारण बना. इस तरह की घटनाओं से यही सीख मिलती है कि बुरे काम का अंजाम बुरा ही होता है. बुराई का अंजाम उस व्यक्ति को ही नहीं, उस के पूरे परिवार को उठाना पड़ता है. Lucknow News

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

Crime Stories: जानलेवा

Crime Stories: इन्क्वायरी अफसर ने अपनी जांच में पूरे भरोसे के साथ औफिस बौय रमीज को कत्ल के इल्जाम में फंसा दिया था कि असली मुलजिम यही है, लेकिन एडवोकेट मिर्जा अमजद बेग ने अपने तर्कों से उस की जांच को गलत साबित कर दिया. जो औरत मेरे सामने बैठी थी, वह चेहरे से ही काफी परेशान लग रही थी. वह 28-29 साल की गोरी सी दुबलीपतली औरत थी. शक्लसूरत से वह किसी शरीफ घराने की लग रही थी. मैं ने उस से आने की वजह पूछी तो उस ने दुखी

लहजे में कहा, ‘‘वकील साहब, मेरे शौहर को बचा लीजिए.’’

‘‘आप के शौहर को क्या हुआ, किस से बचाना है उन्हें?’’

‘‘पुलिस उन्हें कत्ल के इल्जाम में पकड़ ले गई है.’’

‘‘आप के शौहर ने किस का कत्ल किया है?’’

‘‘वकील साहब, मेरे शौहर ने कोई कत्ल नहीं किया, फिर भी उन पर पुलिस माजिद निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ ले गई है. उन्हें किसी गहरी साजिश के तहत फंसाया गया है.’’

मेरे सवालों के जवाब में उस औरत ने जो बताया था, उस के अनुसार औरत का पति रमीज और माजिद निजामी एक ही कंपनी में काम करते थे. कंपनी का नाम खान ट्रेडर्स था, जो एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम करती थी. निजामी उस कंपनी में जनरल मैनेजर था, जबकि रमीज औफिस बौय था. उसे चपरासी भी कह सकते हैं. रमीज सीधासादा, लड़ाईझगड़े से दूर रहने वाला ठंडे मिजाज का आदमी था. उस से औफिस का हर आदमी खुश रहता था.

इतना जान लेने के बाद मैं ने उस औरत, जिस का नाम सानिया था, से पूछा, ‘‘जब तुम्हारे शौहर के सब से इतने अच्छे संबंध थे तो फिर उन्हें पुलिस क्यों पकड़ ले गई?’’

उस ने उदासी से कहा, ‘‘यह मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘यह कब और कहां की बात है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘माजिद निजामी को कल शाम औफिस के उस के कमरे में कत्ल किया गया था और मेरे शौहर को आज सुबह 9-10 बजे घर से गिरफ्तार किया गया. उस समय वह औफिस जाने की तैयारी कर रहे थे.’’

‘‘गिरफ्तार करते समय पुलिस ने क्या कहा था?’’

‘‘कोई सवाल किए बगैर पुलिस ने सीधे उन पर निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ लिया था. परेशान हो कर मैं भागीभागी थाने पहुंची तो वहां सिर्फ इतना पता चला कि रमीज ने औफिस के मैनेजर निजामी का कत्ल कर दिया है. इस के बाद मैं उन के औफिस गई तो बाकी बातें वहां से पता चलीं.’’

‘‘आप को इस केस से संबंधित छोटीबड़ी जो भी बातें औफिस से पता चली हों, मुझे विस्तार से बताओ. उस के बाद ही मैं आप के शौहर की कुछ मदद कर सकूंगा.’’

सानिया ने मुझे जो कुछ बताया था, वह इस प्रकार था. खान ट्रैडर्स का औफिस एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में था, जो बलोच कालोनी के पास थी. उस बिल्डिंग में खान ट्रैडर्स का औफिस तीसरी मंजिल पर था. वहां एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम होता था. रमीज को वहां काम करते 6 साल हो गए थे. वह भले ही कम पढ़ालिखा था, लेकिन चपरासी का अपना काम बहुत अच्छे से करता था, जैसे फाइलें इधर से उधर पहुंचाना, चाय बनाना, पिलाना, लंच करवाना और औफिस की सफाई आदि अपनी निगरानी में करवाना. बैंक के काम भी वही करता था.

सईद खान बड़ा बिजनैसमैन था. एक अरसे से वह यह कंपनी चला रहा था. शहर में उस का नाम था. वह डिफैंस इलाके में रहता था. अन्य स्टाफ में महमूद खान, जो एकाउंट देखता था, नादिरा अलवी कंपनी की डायरेक्टर थीं. मकतूल निजामी जनरल मैनेजर था. लुबना अली रिसैप्शनिस्ट थीं, जो फोन औपरेटर का भी काम करती थीं. खान ट्रैडर्स के औफिस का समय 10 बजे से 6 बजे था. एक रमीज को छोड़ कर बाकी सभी लोग 11 बजे तक आते थे. वह जल्दी इसलिए आ जाता था, क्योंकि उसे औफिस खोल कर साफसफाई करवानी होती थी. उस दिन वह औफिस जाने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया था.

मकतूल निजामी समनाबाद में अपनी बीवीबच्चों के साथ रहता था. वह कर्मठ और ईमानदार आदमी था. औफिस में वह काफी देर तक काम करता था, जिस से रात 9 बजे तक घर पहुंचता था. लेकिन उस दिन जब वह 10 बजे तक भी घर नहीं पहुंचा तो उस की बीवी शाइस्ता ने औफिस फोन किया. औफिस में किसी ने फोन नहीं उठाया तो उसे लगा कि वह औफिस से निकल चुके हैं. उस ने थोड़ी देर और राह देखी. जब काफी देर हो गई तो उस ने असिस्टैंट को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘आ जाएंगे, कहीं फंस गए होंगे.’’

लेकिन शाइस्ता की परेशानी बढ़ती जा रही थी, क्योंकि निजामी का कुछ अतापता नहीं चल रहा था. असिस्टैंट ने बताया था कि जब वह औफिस से निकला था तो निजामी काम कर रहे थे. रमीज भी था. उस ने यह भी बताया कि जब एकाउंटैंट महमूद औफिस से निकला था तो उन के पास कोई मिलने वाला बैठा था. जब कहीं से कुछ पता नहीं चला तो रात साढ़े 11 बजे शाइस्ता ने अपने बड़े बेटे इमरान को मोटरसाइकिल से औफिस भेजा. घर से औफिस काफी दूर था, इसलिए वह वहां देर रात पहुंचा. वह मोटरसाइकिल खड़ी करने के लिए पार्किंग में गया तो यह देख कर चौंका कि उस के पापा की कार वहां खड़ी थी. इस का मतलब पापा अभी औफिस में ही थे.

उस ने एक बार फिर औफिस में फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. वह बड़बड़ाया, ‘अगर पापा अंदर हैं तो फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं?’

उस ने चौकीदार के पास जा कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘जब मैं ने औफिस बंद किया था तो वहां कोई नहीं था.’’

चौकीदार भी सोच में पड़ गया कि आखिर निजामी साहब कहां चले गए? इमरान ने पूछा, ‘‘क्या तुम ने उन्हें जाते हुए देखा था?’’

‘‘नहीं, मैं उस समय गेट पर मौजूद नहीं था.’’

‘‘जब उन की गाड़ी यहां खड़ी है तो वह कैसे चले गए?’’

‘‘हो सकता है गाड़ी खराब हो गई हो, इसलिए यहीं छोड़ गए हों.’’

‘‘वह कभी इस तरह गाड़ी छोड़ कर नहीं जा सकते. चलो मान लेते हैं कि उन्होंने गाड़ी छोड़ दी, लेकिन उन्हें घर तो पहुंचना चाहिए. तुम मेरे साथ ऊपर चलो, हम वहां देखते हैं.’’

चौकीदार इमरान के साथ चल पड़ा. ऊपर जाते हुए चौकीदार ने पूछा, ‘‘आप ने औफिस के अन्य लोगों को फोन कर के उन के बारे में पूछा था?’’

‘‘हां, उन के असिस्टैंट और दोस्तों से पूछा था, कहीं से कुछ पता नहीं चला. रिश्तेदारों से भी पूछा था.’’

चौकीदार ने सोचते हुए कहा, ‘‘एक उलझन है. जब कोई औफिस में गाड़ी छोड़ कर जाता है तो मुझे जरूर बताता है, पर निजामी साहब ने कुछ नहीं कहा था.’’

ऊपर पहुंच कर चौकीदार ने निजामी के कमरे के दरवाजे की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘देखिए, दरवाजा बंद है.’’

लेकिन जब इमरान ने दरवाजे के हैंडल को घुमा कर हलका सा धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. इस का दरवाजा लौक नहीं था. चौकीदार बड़बड़ाया, ‘‘मैं ने तो सारे दरवाजों के हैंडल घुमा कर देखे थे, पता नहीं यह कैसे खुला रह गया?’’

दोनों कमरे के अंदर घुसे. कमरे में लाइट जल रही थी. पंखा भी चला रहा था. सामने एक दहशतनाक मंजर था, निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था, उस की गरदन और सिर टेबल पर बेढंगे अंदाज में रखा था. चेहरे का बायां हिस्सा बाएं कान के बल पर टेबल पर टिका था और दाईं ओर से उस की गरदन कान से जरा नीचे और आगे से पीछे तक कटी हुई नजर आ रही थी. किसी बहुत तेज धार वाले हथियार से गरदन इस तरह काटी गई थी कि आधी से अधिक कट गई थी. यह खतरनाक काम उस समय किया गया था, जब निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था.

गरदन काटने के बाद उस का सिर झटके से टेबल पर आ टिका था. वार इतना घातक था कि उसे मरने में जरा भी देर नहीं लगी. उस की गरदन से निकला खून औफिस में बिछे कालीन को दागदार कर गया था. इमरान बाप की लाश देख कर बुरी तरह घबरा गया. उस ने मां को फोन किया. चौकीदार ने कंपनी के मालिक सईद खान और अन्य लोगों को फोन किया. करीब 4 बजे सुबह तक सईद खान, महमूद, नादिरा और लुबना आदि पहुंच गए. रमीज के घर फोन नहीं था, इसलिए उसे खबर नहीं दी जा सकी. जल्दी ही पुलिस भी पहुंच गई.

इंसपेक्टर कादरबख्श अपने 2 साथियों के साथ आया था. जांचपड़ताल और पूछताछ शुरू हुई. चौकीदार से भी पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पुलिस का शक रमीज पर गया. पुलिस को उसी पर क्यों शक हुआ, यह आप को अदालत की काररवाई के दौरान पता चलेगा. सानिया की विपदा सुन कर मैं ने यह केस ले लिया था. अगले दिन पुलिस ने रमीज को अदालत में पेश किया. उस पर निजामी का बेदर्दी से कत्ल करने का इल्जाम था. हालात और मौके की स्थिति भी कुछ यही कह रही थी. अदालत ने थोड़ी काररवाही के बाद मुलजिम रमीज को 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर दे दिया.

अदालत के बाहर सानिया 5 साल की बेटी को लिए परेशान खड़ी थी. मैं ने उसे तसल्ली दे कर कहा, ‘‘यह कत्ल का केस है, अभी जमानत का सवाल ही नहीं उठता. चिंता मत करो, अगर तुम्हारा शौहर बेगुनाह है तो वह जरूर छूट जाएगा.’’

रमीज से मुलाकात होने पर कई बातें और पता चलीं. औफिस के हालात, आपस के ताल्लुक और वहां की हर छोटीबड़ी बात मैं ने उस से पूछी. मैं ने उस से कहा, ‘‘सारी सच्चाई सुन कर साफ लगता है कि तुम्हें फंसाया गया है, पर इस का ठोस सबूत ढूंढना जरूरी है. तुम्हारा औफिस में कोई ऐसा हमदर्द है, जो तुम्हारी मदद कर सकता है.’’

‘‘हां, लुबना मैम औफिस की राजनीति में नहीं रहतीं. वह मेरी हमदर्द भी हैं. वह आप को बहुत कुछ बता सकती हैं, क्योंकि उन्हें काफी कुछ पता है.’’

‘‘मैं लुबना से बात करूंगा. क्या औफिस के बाहर भी तुम्हारा ऐसा कोई दोस्त है, जो मेरे लिए जानकारियां जुटा सकता है?’’

‘‘हां, मेरा एक अच्छा दोस्त है बाबर अली, वह प्रूफ रीडिंग करता है, समझदार और पढ़ालिखा भी है.’’

रमीज ने उस का फोन नंबर मुझे दे दिया था. मैं ने लुबना से फोन पर बात की तो उस ने कहा, ‘‘यहां मैं कुछ नहीं कह सकती. आप के औफिस आ कर बात करूंगी.’’

अगले दिन शाम को वह मेरे औफिस आई. मुझे उस से काफी उपयोगी जानकारियां मिलीं. पर इस शर्त के साथ कि बीच में उस का नाम नहीं आना चाहिए. इस के बाद मैं ने बाबर अली से मुलाकात की. वह बड़े काम का आदमी निकला. मैं ने उसे केस से संबंधित कुछ जानकारियां जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी थीं, उस ने बड़ी मेहनत तथा फुरती से काम शुरू कर दिया और कई बातें मालूम कर लीं. वे जानकारियां रमीज को बरी करवाने में बड़ी उपयोगी साबित हुईं.

रिमांड अवधि खत्म होने के बाद भी रमीज की जमानत नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक माजिद निजामी की मौत 11 जुलाई की रात 6 से 8 के बीच हुई थी. तेज धार वाले हथियार से उसे मौत के घाट उतार गया था. पुलिस ने वहीं से हथियार को बरामद भी कर लिया था. वह तेज धार की बड़ी छुरी थी. उस के लंबे फल पर लगे खून के नमूने को लेबौरेटरी भेजा गया था, वहां से पता चला कि उसी से कत्ल किया गया था. 2 महीने बाद मुकदमे की बाकायदा सुनवाई शुरू हुई. जज ने मुलजिम के अपराध की रिपोर्ट पढ़ कर सुनाई. मेरे मुवक्किल ने कत्ल से साफ इनकार कर दिया. सरकारी वकील ने रमीज से कुछ सवाल किए. जिस का मतलब कुछ इस तरह निकलता था.

वह 6 सालों से खान ट्रैडर्स में मेहनत, लगन और ईमानदारी से काम कर रहा था. उस से सब खुश थे, घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से वह अकसर कंपनी से लोन या एडवांस लेता रहता था. पिछले 6 सालों में वह 9 बार एडवांस ले चुका था. सरकारी वकील ने इसी बात को मुद्दा बना कर उसे उलझाना चाहा, ‘‘रमीज, तुम ने दसवीं बार औफिस से एडवांस मांगा था. इस की क्या वजह थी और इस का क्या नतीजा निकला था?’’

‘‘मैं एक बड़ी मुसीबत में फंस गया था. मेरे एक बड़े ही अजीज दोस्त ने मुझ से 10 हजार रुपए मांगे थे, जो मेरे पास नहीं थे. उसे पैसों की सख्त जरूरत थी. मैं ने जो एडवांस ले रखा था, उस की सिर्फ 2 किश्तें बाकी थीं. इसलिए मैं एडवांस नहीं ले सकता था. मैं ने एक सूदखोर से एक महीने के लिए 10 हजार रुपए उधार ले कर अपने उस दोस्त को दे दिए थे.

‘‘उस ने एक महीने में लौटाने का वादा किया था. मैं ने उसे बता दिया था कि ये रुपए 1 हजार रुपए महीने के ब्याज पर ले कर दे रहा हूं, जिसे हर हाल में अगले महीने लौटाना है. पर मेरी बदनसीबी कि मेरा वह दोस्त मेरे रुपए ले कर दुबई चला गया और मैं फंस गया. 2 महीने ब्याज भरने के बाद औफिस का एडवांस पूरा हो गया तो मैं ने औफिस से एडवांस मांगा, पर कंपनी ने एडवांस देने से साफ मना कर दिया.’’

‘‘एडवांस न मिलने पर तुम्हें जनरल मैनेजर पर सख्त गुस्सा आया होगा. तुम्हें लगा होगा कि उसे किसी ने तुम्हारे खिलाफ भड़का दिया है.’’

‘‘मैं मुश्किल में था, इसलिए गुस्सा आना लाजिमी था. इस से पहले हर बार मुझे एडवांस मिल गया था. इसलिए मुझे यह शक भी हुआ.’’

‘‘इसी बात को ले कर तुम एकाउंटैंट महमूद के पास भी गए थे. उस ने तुम से हमदर्दी तो जताई, पर जनरल मैनेजर के आदेश के बगैर वह तुम्हें एडवांस नहीं दे सकता था. तुम ने महमूद के सामने कहा था, ‘जी चाहता है कि जनरल मैनेजर को चाय में जहर मिला कर पिला दूं.’ क्या यह सच है?’’

‘‘हां, उस दिन मैं बहुत परेशान था. तब गुस्से में मैं ने ऐसा कह दिया था, पर मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं था.’’

‘‘और तुम ने बदला लेने के लिए जहर के बजाय निजामी का छुरी से कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठ है, मेरे खिलाफ कोई साजिश रची गई है.’’

‘‘क्या तुम इस बात से इनकार करोगे कि वारदात वाले दिन मृतक का कोई दोस्त उस से मिलने आया था?’’

‘‘जी हां, आए थे. उन का नाम तौसीफ अहमद था.’’

‘‘मृतक ने उस के लिए तुम से चाय लाने को कहा था?’’

‘‘जी हां, चाय लाने के लिए कहा था. लेकिन उस दिन दूध खत्म हो गया था, तब मैं चाय लेने नजदीक के होटल चला गया था.’’

‘‘तुम ने चाय लाने में इतनी देर कर दी कि दोस्त ही नहीं, औफिस के सभी कर्मचारी तक चले गए. आखिर क्यों देर की? देर होने पर उन्होंने तुम्हें डाटा होगा. उस के बाद तुम ने गुस्से में उन का कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठा इल्जाम है. कत्ल से मेरा कोई वास्ता नहीं है. होटल में लड़ाई हो रही थी, इसलिए मुझे आने में देर हो गई थी. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, मैं ने कत्ल नहीं किया.’’

इस के बाद सरकारी वकील की जिरह खत्म हो गई. मैं ने जज से इन्क्वायरी अफसर से कुछ सवाल पूछने की इजाजत मांगी. इजाजत मिलने पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘इंसपेक्टर कादरबख्श साहब, अभी सरकारी वकील से पता चला कि जब मेरा मुवक्किल चाय ले कर आया तो जनरल मैनेजर का दोस्त और दूसरे लोग जा चुके थे. मुलजिम ने अच्छा मौका देख कर उस का कत्ल कर दिया. आप इस बात को साबित कैसे करेंगे? जबकि मेरा मुवक्किल इस इल्जाम से मना कर रहा है. आप के पास इस वारदात का कोई गवाह भी नहीं है.’’

‘‘जिस समय मृतक का दोस्त आया था, मुलजिम के अलावा एकाउंटैंट महमूद भी मौजूद था. जब मुलजिम को चाय लेने भेजा गया था, तब तीनों थे. लेकिन जब वह लौट कर आया तो महमूद और तौसीफ जा चुके थे. इस के बाद यह काम कौन कर सकता है सिवाय रमीज के? यह उसी का काम हो सकता है?’’ इन्क्वायरी अफसर ने कहा.

‘‘वाह जनाब, क्या थ्यौरी है. जरा सी डांट पड़ने पर मुलजिम कत्ल कर के आराम से घर चला गया और उस ने दरवाजा तक बंद नहीं किया. एक बात बताइए, क्या आप ने छुरी से फिंगरप्रिंट्स उठाए थे?’’

‘‘जी हां, फिंगरप्रिंट्स उठाए थे.’’

‘‘क्या छुरी पर मुलजिम की अंगुलियों के निशान मिले थे?’’

‘‘नहीं, उस पर निशान नहीं मिले, साफ कर दिए होंगे.’’

‘‘मैं आप से जो सवाल करने जा रहा हूं, जरा उस का सोचसमझ कर जवाब दीजिएगा. क्या आप ने मकतूल की लाश और कमरे की ध्यान से जांच कर के कमरे का नक्शा तैयार किया था?’’

‘‘जी हां, सब बहुत ध्यान और सावधानी से किया था.’’

मैं ने भी कमरे और लाश की स्थिति के बारे में पता किया था. इसलिए मैं ने पूछा, ‘‘आप की तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक मृतक को तेज धार वाली छुरी से मारा गया था. उस की आधी से ज्यादा गरदन कट गई थी. जब वार किया गया था, वह अपनी कुरसी पर बैठा था. गरदन कटने के बाद सिर टेबल पर आ टिका था. गरदन का कटा हुआ हिस्सा ऊपर और सुरक्षित हिस्सा नीचे टेबल पर टिका था, मैं गलत तो नहीं कह रहा इंसपेक्टर साहब?’’

‘‘नहीं, आप बिलकुल सही कह रहे हैं.’’

‘‘अब मैं घटनास्थल की बात करता हूं. उस कमरे में 2 दरवाजे हैं, एक अंदर जाने का और दूसरा वौशरूम का. मृतक की टेबल 3 बाई 5 फुट की है, जिस के आगे आने वालों के लिए कुर्सियां रखी हैं. मृतक के बाएं हाथ की ओर एक साइड टेबल रखी है, इसलिए वह दाईं ओर से अपनी कुरसी तक जाता था. फर्श पर ब्लू कालीन बिछा है, सफेद परदे लगे हैं, ठीक है न?’’

मैं ने घटनास्थल का ऐसा नक्शा खींचा कि इन्क्वायरी अफसर हैरान हो कर बोला, ‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. लेकिन एक बात मेरी समझ में यह नहीं आई कि यह सब बता कर आप साबित क्या करना चाहते हैं?’’

सरकारी वकील ने बीच में बात काट कर कहा, ‘‘मिर्जा साहब को इस तरह की बेमतलब की बातें कर के मुकदमे को उलझाने की आदत है. जनाबेआली इन्हें रोका जाए.’’

जज ने मेरी ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘आप का इस बारे में क्या कहना है बेग साहब?’’

‘‘जनाबेआली, मैं ने यह सारी मेहनत ऐसे ही नहीं की है. इस का इस मुकदमे से गहरा संबंध है, जिस का खुलासा आगे होगा. पहले इस मामले के गवाह मि. महमूद और मि. तौसीफ अहमद के बयान हो जाएं. जो कुछ मैं ने इन्क्वायरी अफसर से पूछा है, उस का ताल्लुक मेरे मुवक्किल की बेगुनाही से है.

‘‘मुझे पूरा यकीन है कि उसे साजिश कर के फंसाया गया है, वह बेकसूर है. कातिल कोई और है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार निजामी की मौत 6 से 8 बजे के बीच हुई थी. 6 बजे औफिस के अन्य लोग जा चुके थे. एकाउंटैंट 6 बजे औफिस से निकला था.

‘‘मुलजिम, मृतक और मृतक का दोस्त औफिस में मौजूद था. अगर पुलिस का यह दावा है कि कत्ल मेरे मुवक्किल ने किया है तो मैं भी दावा कर सकता हूं कि कत्ल तौसीफ अहमद या महमूद ने किया है या इस के अलावा बाहर का भी कोई आदमी हो सकता है. खैर, कातिल जो भी है, जल्दी ही सामने आ जाएगा. यह सारी मेहनत मैं ने इसीलिए की है.’’

‘‘ओके इट्स ओके, क्या अब आप मुलजिम से कुछ सवाल पूछना चाहते हैं?’’

‘‘जनाबेआली, मैं मुलजिम से 2-4 सवाल जरूर पूछूंगा, जिस से अगली सुनवाई में आसानी रहे.’’

जज ने मुझे इजाजत दे दी.

मैं ने रमीज से पूछा, ‘‘तुम बता सकते हो कि वारदात वाले दिन मृतक का दोस्त तौसीफ अहमद उस से मिलने कितने बजे औफिस पहुंचा था?’’

‘‘जी मुझे बिलकुल याद है. वह साढ़े 5 या पौने 6 बजे आए थे.’’

‘‘एक जवाब चाहिए.’’

‘‘करीब 5:40 पर आए थे.’’

‘‘जब तौसीफ अहमद आए थे, तब औफिस में कौनकौन था?’’

‘‘सिर्फ एकाउंटैंट महमूद साहब थे, बाकी सभी लोग जा चुके थे.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’

‘‘मेहमान से चाय के लिए पूछना मेरी ड्यूटी थी. जब मैं ने निजामी साहब से पूछा तो उन के दोस्त ने कहा, ‘अच्छी सी चाय पिलवाओ.’

‘‘हमारी बिल्डिंग के पास ही एक होटल है. मैं वहीं चाय लेने चला गया था.’’

‘‘तुम चाय लेने होटल क्यों गए, जबकि खान ट्रैडर्स में चाय बनाने और खाना गरम करने के लिए किचन है.’’ मैं ने थोड़ा तेज लहजे में पूछा.

‘‘वकील साहब, आप की बात सही है. पर उस दिन दूध खत्म हो गया था, इसलिए मुझे चाय लाने के लिए बाहर जाना पड़ा. मैं ने निजामी साहब को इंटरकौम पर बता दिया था कि औफिस में दूध खत्म हो गया है, चाय लेने के लिए बाहर जाना पड़ेगा. उन्होंने इजाजत दे दी थी, लेकिन जल्दी आने को कहा था.’’

‘‘पुलिस जांच के अनुसार, जब तुम चाय ले कर लौटे तो मृतक निजामी का दोस्त तौसीफ अहमद जा चुका था. लेट होने पर मृतक ने तुम्हें डांटा और चाय पीने से मना कर दिया तो तुम ने गुस्से में किचन में जा कर चाय की केतली पटकी और डबलरोटी काटने वाली छुरी पीछे छिपा कर मृतक के कमरे में गए. एडवांस न मिलने से तुम उन से पहले से ही नाराज थे. उन की डांट ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया, जिस से तैश में आ कर तुम ने जनरल मैनेजर माजिद निजामी का कत्ल कर दिया. क्या सब कुछ ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘नहीं, वकील साहब, यह सब झूठ है. मैं चाय लेने गया था, सिर्फ यह सच है.’’

‘‘सच क्या है, विस्तार से बताओ?’’

‘‘मैं चाय लेने होटल गया तो वहां होटल के मालिक की एक आदमी से लड़ाई हो रही थी, जिस से चाय बनने में इतनी देर लग गई कि मैं ऊपर औफिस जाने के बजाय नीचे से ही घर चला गया था.’’

‘‘तुम नीचे से ही घर क्यों चले गए थे?’’ मैं ने यह बात जानबूझ कर पूछी, ‘‘तुम्हें तो चाय लेने भेजा गया था.’’

‘‘हां, मुझे चाय लेने भेजा गया था, लेकिन चाय तैयार होती, उस के पहले ही मैनेजर साहब अपने दोस्त के साथ चले गए थे. जिन के लिए मुझे चाय लानी थी, वे चले गए तो मैं ऊपर औफिस में जा कर क्या करता.’’ रमीज ने आत्मविश्वास के साथ बताया.

‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि निजामी साहब अपने दोस्त के साथ चले गए हैं? तुम तो उस समय चाय के लिए होटल में खड़े थे?’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘यह बात मुझे महमूद साहब ने बताई थी.’’

‘‘पर महमूद साहब को तो तुम औफिस में बैठा छोड़ कर गए थे?’’

‘‘यह सच है कि जब मैं चाय के लिए जा रहा था तो महमूद साहब औफिस में बैठे थे. मैं ने उन से भी चाय के लिए पूछा था. तब उन्होंने मना कर दिया था. लेकिन जब मैं चाय के लिए होटल में खड़ा था और चाय तैयार होने वाली थी तो मैं ने महमूद साहब को अपनी ओर आते देखा. करीब आ कर उन्होंने मुझ से कहा, ‘माजिद निजामी चाय का इंतजार कर के अपने दोस्त तौसीफ अहमद के साथ निकल गए हैं. अब चाय ले जाने की जरूरत नहीं है. तुम भी अपने घर चले जाओ.’’

मैं ने कहा, ‘‘अगर वह चले गए हैं तो मुझे औफिस बंद करना होगा. मैं ऊपर जा कर औफिस बंद कर देता हूं.’’

‘‘औफिस मैं ने बंद कर दिया है. मुझे एक जगह जाना है, इसलिए तुम्हारा इंतजार किए बिना ही मैं चला आया. औफिस भी मैं ने बंद कर दिया है.’’

‘‘निजामी साहब से जब इंटरकौम पर बात हुई थी, तब उन्होंने जल्दी आने को कहा था, क्योंकि उन का दोस्त ज्यादा देर रुकने वाला नहीं था. लेकिन लड़ाई की वजह से देर हो गई. महमूद साहब ने बताया कि मेहमान चले गए हैं तो मैं ने सोचा कि मैं औफिस जा कर क्या करूंगा. बहुत होगा, अगले दिन निजामी साहब डाटेंगे तो डांट सुन लूंगा. फिलहाल घर जाना ही बेहतर समझा. मुझे सोचते देख कर महमूद साहब बोले, ‘क्या तुम्हें ऊपर औफिस में कोई काम है क्या?’

‘‘मैं ने कहा, ‘नहीं, मुझे कोई काम नहीं है. आप कह रहे हैं तो मैं घर चला जाता हूं.’ कह कर मैं घर चला गया. अगले दिन मैं औफिस आने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने मुझे कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया.’’

मैं ने आखिरी सवाल पूछा, ‘‘पुलिस जांच के अनुसार मृतक की कार औफिस की बिल्डिंग के नीचे पार्किंग में खड़ी थी, तुम्हारी नजर उस पर नहीं पड़ी?’’

‘‘जनाब, चाय का होटल बाईं ओर जरा अंदर की तरफ है. मैं वहीं से सीधे घर चला गया था. इसलिए गाड़ी मुझे नहीं दिखाई दी. वैसे भी महमूद साहब के कहने पर मुझे उन के जाने का यकीन हो गया था.’’

इस के बाद अदालत का समय खत्म हो गया. अगली पेशी पर 3 गवाहों को अदालत में लाया गया. 2 गवाहों की गवाही में कोई खास बात नहीं थी, तीसरे गवाह का नाम तौसीफ अहमद था, वह 50 साल का अच्छाभला सेहतमंद आदमी था. वह बड़े सुकून और इत्मीनान से विटनैसबौक्स में खड़ा था. मैं ने जिरह शुरू की, ‘‘तौसीफ साहब, आप की मृतक से काफी गहरी दोस्ती थी, उन की मौत का मुझे भी अफसोस है. आप कितने बजे निजामी साहब के औफिस पहुंचे थे?’’

‘‘मैं करीब पौने 6 बजे उन के औफिस पहुंचा था.’’

‘‘उस वक्त वहां कौनकौन था?’’

‘‘निजामी साहब, उन का एकाउंटैंट महमूद और औफिस बौय रमीज. एकाउंटैंट का जिक्र निजामी साहब ने ही किया था.’’

‘‘क्या निजामी साहब ने आप के सामने मुलजिम रमीज को चाय लाने भेजा था?’’

‘‘जी हां, औफिस में दूध खत्म हो गया था. इस के बाद उन्होंने होटल से जल्दी चाय लाने के लिए कहा था, क्योंकि मुझे जरा जल्दी जाना था.’’

‘‘क्या मुलजिम जल्दी चाय ले कर आ गया था?’’

‘‘जल्दी क्या, वह गया तो लौट कर आया ही नहीं.’’

मैं ने नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि उस दिन आप बिना चाय पिए ही चले गए थे, कितने बजे गए थे आप?’’

‘‘मैं करीब साढ़े 6 बजे वहां से निकला था.’’

‘‘जब आप निकले थे, तब तक मुलजिम नहीं आया था?’’

‘‘जी हां, तब तक नहीं आया था, निजामी साहब को बड़ा गुस्सा आया था. अगर वह आ जाता तो चाय उस के मुंह पर फेंक देते, लेकिन वह आया ही नहीं.’’

‘‘अफसोस कि वह सीधे घर चला गया था. उस के बाद उसे औफिस आने का मौका ही नहीं मिला. तौसीफ साहब जब आप साढे़ 6 बजे जाने के लिए औफिस से निकले थे तो क्या निजामी साहब भी आप के साथ निकले थे? जब आप निकल रहे थे तो एकाउंटैंट महमूद अपने कमरे में मौजूद था?’’

‘‘निजामी साहब मेरे साथ नहीं गए थे. उन्हें कुछ काम निपटाने थे. महमूद का मुझे पता नहीं, क्योंकि मैं निजामी साहब के पास से उठ कर इधरउधर देखे बगैर, सीधे बाहर निकल गया था.’’

‘‘थैंक्यू तौसीफ साहब, आप ने एकदम सटीक जवाब दिए हैं. बस अब आप को एक टेस्ट देना बाकी है. यही टेस्ट निजामी साहब के असली कातिल तक पहुंचाएगा. इस टेस्ट में वही लोग शामिल होंगे, जो 6 बजे से 8 बजे तक औफिस में मौजूद थे.’’

तौसीफ अहमद उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे. सरकारी वकील ने कहा, ‘‘बेग साहब, आप कैसे टेस्ट की बात कर रहे हैं?’’

‘‘यह ऐसा टेस्ट है, जो असली कातिल को सामने ले आएगा.’’ मैं ने जज की ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा.

जज ने पूछा, ‘‘बेग साहब, अभी आप कितने लोगों का टेस्ट लेंगे और यह कैसा टेस्ट है?’’

‘‘जनाबेआली, यह टेस्ट उन लोगों का लिया जाएगा, जो वारदात के समय वहां मौजूद थे. निजामी साहब तो रहे नहीं, मुलजिम रमीज, गवाह तौसीफ अहमद और कंपनी के एकाउंटैंट महमूद साहब का टेस्ट लेना है. मृतक की गरदन जिस अंदाज में कटी थी, वह खुदकुशी नहीं, यकीनन कत्ल था. फिंगरप्रिंट्स मिले नहीं, इसलिए टेस्ट से ही सच्चाई पता चल सकती है. यह एक साधारण टेस्ट है.’’

मैं ने तौसीफ अहमद से पूछा, ‘‘आप टेस्ट के लिए तैयार हैं?’’

‘‘जी हां, मैं तो तैयार हूं.’’

मैं गवाह तौसीफ अहमद को जज साहब के पास ले गया. एक पैड और कलम देते हुए बोला, ‘‘आप जज साहब के सामने इस पैड पर लिखें कि मैं ने निजामी साहब का कत्ल नहीं किया है.’’

उन्होंने मेरे कहे अनुसार लिख दिया.

‘‘शुक्रिया अहमद साहब, अब आप जा सकते हैं.’’

जज ने सवालिया नजरों से मेरी ओर देखा तो मैं ने कहा, ‘‘जनाबेआली, मुझे इस टेस्ट से यह साबित करना है कि गवाह तौसीफ बहमद राइट हैंड से काम करने का आदी है.’’

जज साहब ओके, कह कर कागज देखने लगे. फिर वही टेस्ट मैं ने मुलजिम रमीज से करवाया, दोनों कागज जज की टेबल पर रख कर कहा, ‘‘जनाब, मैं यह साबित करना चाहता था कि ये दोनों सीधे हाथ से काम करने के आदी हैं.’’

सरकारी वकील बड़ी उलझन में था. उस ने पूछा, ‘‘जनाबेआली, यह क्या हो रहा है?’’

जज ने कागज देखते हुए कहा, ‘‘बेग साहब यह साबित करना चाहते थे कि ये दोनों राइट हैंडेड हैं. नतीजे के बारे में तो यही बताएंगे.’’

अदालत में बैठे लोग सन्न मारे सारी काररवाही देख रहे थे. मैं ने आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘जैसा कि जज साहब ने बताया है, तौसीफ अहमद और मुलजिम रमीज राइट हैंड से काम करने के आदी हैं. घटनास्थल का नक्शा, कमरे और टेबल की सिचुएशन, लाश की स्थिति इस बात की गवाह है कि माजिद निजामी का कत्ल किसी ऐसे आदमी ने किया है, जो बाएं हाथ से काम करने का आदी है. यानी लैफ्ट हैंडेड है. इसलिए तौसीफ अहमद और रमीज दोनों में से कोई भी कातिल नहीं हो सकता.’’

इन्क्वायरी अफसर जो बड़े ध्यान से सारी काररवाही देख रहा था, एकदम बोल पड़ा, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं बेग साहब?’’

मैं ने जांच अधिकारी की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘कादरबख्श साहब, आप ने बड़ी बारीकी से लाश की जांच की थी और बड़ी सावधानी से कमरे का नक्शा बनाया था. यह पौइंट आप की समझ में आना चाहिए था.’’

उस के चेहरे पर घबराहट नजर आने लगी. अब मैं ने जज की ओर देख कर कहा, ‘‘जनाबेआली, मैं ने पिछली पेशी में इस से लंबी जिरह जिस मकसद से की थी, उस का मकसद यही था. अब मौका है कि मैं अपने मुवक्किल को बेगुनाह साबित करूं.’’

जज गहरी दिलचस्पी से मेरी बातें सुन रहे थे. अदालत में सन्नाटा छा गया था. सभी का ध्यान मेरी ओर था. मैं अपनी दलीलें आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘जनाबेआली, मृतक की कुरसी उस के कमरे में इस कोण से ऐसी पोजीशन में रखी थी कि दाएं हाथ से काम करने वाले के लिए उस पर, खास तौर पर उस की गरदन पर ऐसा हमला करना नामुमकिन था.

‘‘कमरे की दीवार और मृतक की गरदन के बीच इतना फासला नहीं था कि लंबे फल वाली छुरी को आजादी से घुमा कर गरदन पर भरपूर वार किया जा सकता. अगर इत्तफाक से ऐसा हो भी जाता तो उस स्थिति में गरदन को बाएं तरफ से कान के नीचे से कटना चाहिए था.

‘‘लेकिन हकीकत में मृतक की गरदन दाईं ओर से कान के नीचे से कटी थी. इस का मतलब यह कि किसी लेफ्ट हैंडेड आदमी ने निजामी पर कातिलाना हमला किया था, जो बहुत घातक साबित हुआ. मृतक पलक झपकते ही मर गया.’’

‘‘मेरा तो इस तरफ ध्यान ही नहीं गया. सचमुच यह तो बहुत खास पौइंट है.’’ इन्क्वायरी अफसर ने शर्मिंदा होने वाले लहजे में कहा.

‘‘आप का इस ओर ध्यान नहीं गया, कोई बात नहीं. मैं आप का ध्यान इस तरफ दिला रहा हूं. आप घटनास्थल के नक्शे को दिमाग में ताजा करें और पूरी ईमानदारी से बताएं कि माजिद निजामी का कातिल कौन हो सकता है. लेफ्ट हैंडेड या राइट हैंडेड? यह आप की समझबूझ का टेस्ट है.’’

इन्क्वायरी अफसर ने फौरन दृढ़ता से जवाब दिया, ‘‘कातिल ने वह खतरनाक वार बाएं हाथ से ही किया था. कातिल लेफ्ट हैंडेड था.’’

‘‘और मेरा मुवक्किल एक सौ एक प्रतिशत राइट हैंडेड है.’’ मैं ने जज की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘जनाबेआली, आप ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि मुलजिम दाएं हाथ से काम करने का आदी है. जबकि इन्क्वायरी अफसर भी कह रहे हैं कि कातिल यकीनन लेफ्ट हैंडेड था. इसलिए मेरी आप से दरख्वास्त है कि मेरा मुवक्किल बेगुनाह है, इसलिए उसे बाइज्जत बरी किया जाए.’’

जज ने घूर कर इन्क्वायरी अफसर की ओर देखा और नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि पूरी विवेचना ही गलत है.’’

इन्क्वायरी अफसर घबरा कर बोला, ‘‘जनाबेआली, यह लेफ्टराइट की गलती तो मुझ से हो गई है.’’

‘‘आप की यह लेफ्टराइट की गलती एक बेगुनाह इंसान को गुनहगार बना देती. यह अदालत आप को हुक्म देती है कि 7 दिनों के अंदर नया चालान पेश करें और अब लेफ्टराइट की गलती नहीं होनी चाहिए.’’

उसी वक्त सरकारी वकील की हैरतभरी आवाज गूंजी, ‘यह लेफ्ट हैंडेड व्यक्ति कौन हो सकता है, जिस ने निजामी का कत्ल किया है?’

‘‘मेरे दोस्त अब लेफ्ट हैंडेड कातिल को तलाशना जरूरी है, क्योंकि पहले लापरवाही की गई. अगर कमरे और टेबल की सिचुएशन व नक्शे को बारीकी व सावधानी से देखा जाता तो यह बात पहले ही पता चल जाती कि कातिल लेफ्ट हैंडेड है, क्योंकि जिस तरफ से राइट हैंड उपयोग में आ सकता था, वहां इतनी जगह ही नहीं थी कि खुल कर छुरी का वार किया जा सकता. मैं आप को इतनी हिंट दे सकता हूं कि लेफ्ट हैंड कातिल को इस्तगासा के गवाहों में ही ढूंढ़े, जो 6 से 8 बजे के बीच औफिस में मौजूद थे. एक इशारा और कर दूं, मैं ने अभी तक कातिल का अदालती टेस्ट नहीं लिया है.’’ मैं ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.

‘‘ऐसा तो सिर्फ एक ही आदमी है, खान ट्रैडर्स का एकाउंटैंट महमूद.’’ उस ने सोचते हुए कहा.

‘‘मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा. इंसपेक्टर साहब, वैसे अक्लमंद को इशारा काफी है.’’ मैं ने मुसकरा कर कहा. इस के साथ ही अदालत का वक्त खत्म हो गया. अगली पेशी पर अदालत ने मेरे मुवक्किल को बाइज्जत बरी कर दिया. इन्क्वायरी अफसर ने खुद को अक्लमंद साबित करते हुए एकाउंटैंट महमूद को अदालत के सामने पेश कर दिया. महमूद ने पुलिस कस्टडी में ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

वह लेफ्ट हैंडेड था. उसी ने कंपनी के जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतारा था. अपने मंसूबे को पूरा करने के लिए वारदात के दिन औफिस बौय रमीज को कुरबानी के बकरे की तरह इस्तेमाल किया था. उस से झूठ बोल कर उसे औफिस आने देने के बजाय उसे घर भेज दिया, ताकि अगले दिन जब वह औफिस आए तो फौरन ही उस के कत्ल के इल्जाम में धर लिया जाए. उस के प्लान के मुताबिक ऐसा ही हुआ. औफिस से मिली जानकारी के मुताबिक जनरल मैनेजर निजामी एक बेहद ईमानदार और उसूल वाला आदमी था, जब से उस ने यह कंपनी संभाली थी. उन लोगों को बड़ी तकलीफ थी, जो कंपनी को नुकसान कर के खुद का घर भर रहे थे. बेईमानी करने में सब से ऊपर नाम महमूद का था.

वारदात से करीब 3 महीने पहले मृतक ने एकाउंटैंट का एक संगीन फ्रौड पकड़ लिया था, जिस की वजह से महमूद को बौस के सामने बुरी तरह से अपमानित होना पड़ा था और बौस ने अगली बार उसे निकाल बाहर करने की धमकी दी थी. इस से औफिस में उस की बदनामी और थूथू हुई थी. अपनी बदनामी और अपमान का बदला लेने के लिए वह मौके की ताक में था. उस के दिल में बदले की आग दहक रही थी. रमीज को जनरल मैनेजर ने एडवांस देने से मना कर दिया. रमीज अपनी दिल की भड़ास महमूद के सामने निकालता. निजामी को बुराभला कहता और लोगों के सामने भी उस के खिलाफ बकबक करता.

महमूद को रमीज की शक्ल में एक कुरबानी का बकरा मिल गया. उस ने फैसला कर लिया कि वह जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतार देगा और इस कत्ल का इल्जाम रमीज के सिर पर डाल देगा. ऐसी बातें करेगा, जिस से सब का शक रमीज की तरफ चला जाए. जो लोग उसूल परस्त और ईमानदार होते हैं, उन्हें कदमकदम पर मुसीबतों का सामना करना पड़ता है और कभीकभी ईमानदारी जानलेवा भी साबित होती है, जैसा कि माजिद निजामी के साथ हुआ. पर महमूद भी अपने बदले की आग में खुद जल गया. Crime Stories

 

Karnataka News: बच्चा न होने पर पत्नी का मर्डर

Karnataka News: एक बेहद शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक पति ने पत्नी को सिर्फ इस वजह से मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि उसे संतान नहीं हो रही थी. इसी कारण आरोपी ने पत्नी का गला घोंटकर उस की जान ले ली. सवाल यह है कि क्या वाकई बच्चे की चाह में पति हत्यारा बना या इस वारदात के पीछे कोई और सच्चाई छिपी है. आइए जानते हैं इस सनसनीखेज क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो हर किसी को झकझोर कर रख देगी.

यह शर्मनाक घटना कर्नाटक के बेलगावी जिले से सामने आई है. यहां पति फकीरप्पा गिलक्कनवर ने बच्चा न होने के कारण अपनी पत्नी राजेश्वरी की गला घोंटकर हत्या कर दी. वारदात के बाद फकीरप्पा ने झूठी कहानी सुनाई और कहा कि राजेश्वरी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है. उसने रिश्तेदारों को बुलाकर यही बात दोहराई.

सूचना मिलने के बाद राजेश्वरी के पेरेंट्स बेटी के अंतिम संस्कार में पहुंचे तो शव देखकर लगा कि बेटी की मौत दिल के दौरे से नहीं हुई, बल्कि इसे मारा गया है. क्योंकि राजेश्वरी के गले पर मौजूद निशान थे. इस के बाद हन्होंने तुरंत बैलहोंगल पुलिस स्टेशन पुलिस को पूरे मामले की जानकारी दी. सूचना मिलते ही पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की. जांच के दौरान हत्या का सच सामने आ गया.

पुलिस ने आरोपी फकीरप्पा गिलक्कनवर को तुरंत हिरासत में ले कर थाने पहुंचाया. राजेश्वरी के शव को पोस्टमार्टम के लिए बेलगावी बीआईएमएस भेजा गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंटकर हत्या की पुष्टि हुई. पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस के बाद पुलिस ने आरोपी फकीरप्पा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. Karnataka News

Delhi News: पार्क में युवक की गोली मारकर हत्या

Delhi News: एक शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक युवक की पार्क में गोली मारकर हत्या कर दी गई. आखिर कौन थे वे अपराधी, जिन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया. पूरा सच जानने के लिए पढ़िए पूरी स्टोरी विस्तार से.

यह घटना देश की राजधानी दिल्ली से सामने आई है. गणतंत्र दिवस की सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद दिल्ली में बदमाशों के हौसले बुलंद नजर आ रहे हैं. शास्त्री पार्क इलाके में देर रात समीर उर्फ मुस्तकीम उर्फ कमू पहलवान नामक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई. पुलिस को रात करीब 11 बजकर 24 मिनट पर बुलंद मसजिद इलाके में गोली चलने की सूचना मिली थी. मौके पर पहुंची पुलिस को पता चला कि घायल समीर उर्फ मुस्तकीम उर्फ कमू पहलवान को उस के फेमिली वाले पहले ही जेपीसी अस्पताल ले जा चुके थे. जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल की जांच की और वहां से अहम सबूत जुटाए. शास्त्री पार्क थाने में इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने कई टीमें गठित की हैं. यह घटना दिल्ली की कानून व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े करती है. पुलिस हर एंगल से मामले की जांच कर रही है.

पुलिस आरोपियों की पहचान कर उन्हें पकड़ने के लिए पूरी तरह जुटी हुई है. इस के लिए आसपास के इलाकों, संदिग्ध ठिकानों और तकनीकी सर्विलांस की मदद ली जा रही है. पुलिस मृतक समीर के फेमिली वालों और अन्य लोगों से भी पूछताछ कर रही है, ताकि कोई ठोस सुराग मिल सके. पुलिस का कहना है कि वे हर पहलू से जांच कर रहे हैं और जल्द ही इस मामले का खुलासा किया जाएगा. Delhi News

True Crime Story: बेमेल प्यार का एक अनूठा फसाना

True Crime Story: तबरेज इलाहाबाद के विवेकानंद मार्ग पर चमेलीबाई धर्मशाला के पास स्थित प्रभात सिंह की मशीनरी पार्ट्स की दुकान पर नौकरी करता था. वह रोजाना सुबह 10 बजे के करीब दुकान पर पहुंचता तो कुछ देर बाद प्रभात भी वहां पहुंच जाता था. इस के बाद ही तबरेज दुकान खोल कर उस की साफसफाई करता था. 30 नवंबर, 2016 को भी जब तबरेज निर्धारित समय पर दुकान पर पहुंचा तो दुकान का शटर खुला मिला. यह देखते ही उस के मुंह से निकला, ‘‘लगता है भैया आज सुबहसुबह ही दुकान आ गए हैं.’’

लेकिन जब दुकान के भीतर गया तो वहां प्रभात नहीं दिखा. वह मन में बुदबुदाने लगा, ‘‘ऐसे दुकान खोल कर कहां चले गए भला?’’

दुकान के अंदर आड़ातिरछा रखा सामान निकाल कर उस ने दुकान के बाहर लगा दिया. फिर दुकान की साफसफाई कर के वह दुकान में बैठ कर प्रभात के लौटने का इंतजार करने लगा. आधे घंटे से ज्यादा बीत गया पर प्रभात नहीं लौटा तो तबरेज पास की दुकान पर चाय पीने चला गया. प्रभात का जिनजिन दुकानों पर उठनाबैठना था, तबरेज वहां भी गया पर उसे उस का मालिक दिखाई नहीं दिया तो बुदबुदाते हुए वह वापस दुकान पर आ कर बैठ गया.

उसी समय चित्रा दौड़ती हुई बदहवास सी दुकान पर आई. जिस मकान में प्रभात की दुकान थी, चित्रा उसी मकान मालिक सत्येंद्र सिंह की बेटी थी. उस के साथ उस का चचेरा भाई गोलू भी था. वह बोली, ‘‘त…तब… तबरेज…’’

‘‘हां बताओ, तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’

‘‘बात ही कुछ ऐसी है. आओ मेरे साथ, खुद ही चल कर देख लो.’’

किसी अनहोनी की आशंका के साथ तबरेज चित्रा और गोलू के पीछेपीछे उस के घर पहुंच गया. घर दुकान के एकदम पीछे ही था. जैसे ही वह कमरे में पहुंचा तो उस का मालिक प्रभात फांसी के फंदे पर झूला हुआ दिखा. यह देख कर उस की चीख निकल गई, ‘‘यह कैसे हो गया?’’

तभी चित्रा बोली, ‘‘पता नहीं, इन्होंने आत्महत्या क्यों कर ली? इन के हाथ में सुसाइड नोट भी है. तबरेज तुम इन के घर वालों को फोन कर के जानकारी दे दो.’’

तबरेज ने तुरंत अपने मोबाइल से प्रभात के पिता वीरेंद्र प्रताप सिंह को फोन कर के उस की आत्महत्या की जानकारी दे दी. प्रभात का घर वहां से कुछ ही दूरी पर था इसलिए थोड़ी ही देर में वीरेंद्र प्रताप सिंह अपने घर वालों और पड़ोसियों के साथ वहां पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी.

उस समय भी प्रभात रसोईघर के बगल वाले कमरे में फांसी पर लटका पड़ा था. खबर मिलने पर अनेक व्यापारी भी वहां पहुंच गए. घर के जवान आदमी की मौत पर घर वाले बिलखबिलख कर रो रहे थे. किसी ने सूचना थाना कोतवाली पुलिस को भी दे दी.

चूंकि घटनास्थल से थाना कोतवाली महज आधा एक किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए 10 मिनट में ही एसपी (सिटी) विपिन कुमार टांडा व कोतवाली प्रभारी अनुपम शर्मा मय फोर्स घटनास्थल पर पहुंच गए.

अब तक सत्येंद्र सिंह के मकान के बाहर भारी संख्या में भीड़ मौजूद हो चुकी थी, जिस के कारण रोड पर जाम लग गया था. पुलिस ने फांसी पर लटके प्रभात सिंह को नीचे उतारा. उस की मौत हो चुकी थी. शव की बारीकी से जांच की तो पहली ही नजर में मामला संदिग्ध नजर आया. प्रभात के सिर व शरीर पर चोटों के निशान थे.

यह देख प्रभात के घर वाले और अन्य व्यापारी हंगामा करने लगे. उन का आरोप था कि प्रभात की हत्या करने के बाद उसे फांसी पर लटकाया गया है, जिस से मामला आत्महत्या का लगे. मृतक के हाथ में 2 पेज का एक सुसाइड नोट भी था.

उस सुसाइड नोट में एक लड़की से प्रेम संबंध और उस की बेवफाई का जिक्र था. प्रभात और उस की तथाकथित प्रेमिका का कितना पुराना रिश्ता था, इस बात का उल्लेख उस नोट में किया गया था. सुसाइड नोट में कितनी सच्चाई है, यह बात जांच के बाद ही पता चलती.

मृतक के परिजनों ने सीधे तौर पर दुकान मालिक सत्येंद्र सिंह की बेटी चित्रा सिंह पर आरोप लगाया कि उस ने ही अपने सहयोगियों के साथ मिल कर प्रभात की हत्या की है. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए.

प्रभात की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद उस के भाई प्रदीप की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया. पोस्टमार्टम के बाद शाम को जब पुलिस को रिपोर्ट मिली तो उस में भी बताया गया कि प्रभात के सिर पर लोहे की रौड जैसी किसी चीज से वार किया गया था, जिस से उस की मौत हुई थी.

मकान मालिक सत्येंद्र सिंह घटना से एकदो दिन पहले अपनी पत्नी राशि के साथ प्रतापगढ़ चले गए थे. वहां उन के किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी. घर पर उन की बेटी चित्रा और उस का चचेरा भाई कौशिक उर्फ गोलू मौजूद था.

एसपी (सिटी) विपिन कुमार टांडा के समक्ष चित्रा सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा, ‘‘सर, प्रभात सिंह का उस के प्रति एकतरफा प्यार था. वह मुझ से उम्र में भी दोगुना बड़ा था. भला मैं उस से कैसे प्रेम कर सकती हूं. मेरा उस की हत्या या आत्महत्या से कोई वास्ता नहीं है.’’

‘‘जिस वक्त प्रभात तुम्हारे कमरे में घुस कर फांसी पर लटका, उस वक्त तुम कहां थी?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, मैं रोज सुबह नहाने के बाद पूजा करती हूं. बुधवार को भी रोजाना की तरह नहाने के बाद मैं पूजा करने चली गई थी. पूजा के बाद मैं ने बालकनी से नीचे की ओर देखा तो नीचे प्रभात की कार दिखी. मैं यह सोचते हुए सीढि़यों से नीचे उतरी कि प्रभात आज दुकान पर इतनी जल्दी कैसे आ गए. तभी देखा कि वह हमारी रसोई के बगल वाले कमरे में लटका हुआ था. मैं समझ नहीं पाई कि यह काम करने के लिए उस ने मेरा घर ही क्यों चुना?’’ वह बोली.

घर में फर्श पर जो खून का धब्बा मिला था, उस के बारे में पुलिस ने उस से पूछा तो उस ने उसे चुकंदर का रस बताया.

पुलिस को लग रहा था कि यह झूठ बोल रही है इसलिए उस से और उस के चचेरे भाई गोलू से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने ही अपना जुर्म कबूल कर लिया. उन्होंने कहा कि प्रभात की हत्या करने का उन का कोई इरादा नहीं था. पर हालात ऐसे बन गए जिस से उस का कत्ल हो गया.

प्रभात सिंह इलाहाबाद शहर के कीडगंज थाना क्षेत्र के कृष्णानगर निवासी वीरेंद्र प्रताप सिंह का बेटा था. कारोबारी वीरेंद्र प्रताप सिंह के 4 बेटे और एक बेटी थी. उन की पत्नी कनकलता का देहांत हो चुका था. मांगलिक होने की वजह से प्रभात की शादी नहीं हुई थी.

वीरेंद्र प्रताप सिंह के एक दोस्त थे सत्येंद्र सिंह, जो प्रतापगढ़ में एक सरकारी मुलाजिम थे. कोतवाली थानाक्षेत्र के विवेकानंद मार्ग पर रहते थे. वीरेंद्र प्रताप ने सन 2003 में उन की एक दुकान किराए पर ली थी, जहां उस ने बंधु ट्रेडर्स के नाम से मशीनरी पार्ट्स बेचने का काम शुरू कर दिया. उस दुकान को प्रभात संभालता था.

दोस्ती के नाते सत्येंद्र उन से दुकान का किराया तक नहीं लेते थे. प्रभात का सत्येंद्र सिंह के घर में खूब आनाजाना था. दुकान के पीछे ही सत्येंद्र सिंह का आवास था. उन की एक बेटी चित्रा थी, घर में आनेजाने के कारण उन दोनों के बीच प्रेमसंबंध स्थापित हो गए. उस समय प्रभात की उम्र 36 साल और चित्रा की 16 साल थी.

कुछ दिनों बाद ही उन के संबंधों की खबर उन के घर वालों को भी हो गई. घर वालों ने उन्हें लाख समझानेबुझाने की कोशिश की लेकिन इस का उन पर कोई असर नहीं हुआ. बल्कि उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों की उम्र में काफी अंतर था. लेकिन प्यार का भूत जिन के सिर पर सवार होता है, उन के बीच उम्र आड़े नहीं आती.

धीरेधीरे समय आगे बढ़ने लगा. चित्रा जहां जवान थी तो दूसरी ओर प्रभात की उम्र ढलान की ओर बढ़ रही थी. शायद यही कारण था कि उस पर जान छिड़कने वाला प्रभात अब उसे नीरस नजर आने लगा था. वह उस से इतना प्यार करता था कि वह उसे कालेज तक छोड़ने और लेने जाने लगा था.

लेकिन चित्रा प्रभात से दूरी बनाने लगी थी और अपनी उम्र के लड़कों से मोबाइल पर घंटों बतियाती थी. प्रभात जब भी उसे फोन करता तो वह उस का फोन रिसीव नहीं करती. बारबार फोन करने के बाद वह उस का फोन उठाती तो बेमन से बात करती.

प्रभात समझ नहीं पा रहा था कि पिछले 10 सालों से प्यार करने वाली चित्रा के अंदर यह बदलाव कैसे आ गया. प्रभात के मना करने के बावजूद भी वह वाट्सऐप और फेसबुक पर पता नहीं किसकिस से चैटिंग करती रहती थी. किसी भी तरह वह प्रभात से अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन प्रभात उसे किसी भी हाल में छोड़ने या भुलाने को तैयार नहीं था.

29 नवंबर, 2016 की रात को प्रभात ने चित्रा से बात करने के लिए कई बार उस का नंबर मिलाया. पहले तो उस का मोबाइल व्यस्त आ रहा था पर बाद में वह स्विच्ड औफ हो गया. प्रभात ने सुबह उठ कर फिर से उस का मोबाइल नंबर डायल किया. घंटी बजने के बावजूद चित्रा ने फोन नहीं उठाया.

गुस्से में वह सुबह 8 बजे ही अपने घर से निकल गया और दुकान खोलने के बाद सीधे चित्रा के कमरे में पहुंचा. वहां चित्रा बिलकुल अकेली थी. मोबाइल रिसीव न करने की बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगा. उन का शोर सुन कर चित्रा का चचेरा भाई कौशिक उर्फ गोलू उठ गया.

उस ने देखा कि गुस्से से लालपीला प्रभात चित्रा के साथ मारपीट कर रहा है तो उस ने बीचबचाव करने की कोशिश की. उस समय प्रभात चित्रा का गला दबाए हुए था. गोलू ने बताया कि उस ने चित्रा दीदी को बचाने की कोशिश की. तब प्रभात उस से उलझ गया और हाथापाई करने लगा.

उसी दौरान गोलू की नजर दीवार से सटा कर रखे सरिए पर गई. किसी तरह उस ने प्रभात के चंगुल से खुद को छुड़ाया तो प्रभात चित्रा से भिड़ गया. तभी गोलू ने सरिया उठा कर पीछे से प्रभात के सिर पर दे मारा. एकदो वार और करने पर प्रभात नीचे गिर गया और मर गया.

इस के बाद दोनों ने एक रस्सी गले में बांध कर उसे कुंडे से लटका दिया ताकि मामला आत्महत्या का लगे. जहांजहां उस का खून गिरा था, उसे साफ कर के चुकंदर का जूस डाल दिया. फिर दोनों रोने का नाटक करने लगे. चित्रा को जब पता चला कि दुकान पर नौकर तबरेज आ चुका है तो वह घबराई हुई उस के पास गई और उसे कमरे में ला कर बताया कि प्रभात ने आत्महत्या कर ली है.

इधर मृतक के छोटे भाई सुधीर सिंह ने बताया कि प्रभात ने चित्रा के नाम लाखों रुपए की प्रौपर्टी और जायदाद कर दी थी. प्रभात उस से प्रौपर्टी वापस न मांग ले, इसलिए उस ने अन्य लोगों के साथ मिल कर उस की हत्या कर दी. उधर चित्रा का कहना है कि वह प्रभात से प्यार नहीं करती थी. प्रभात एकतरफा उसे चाहता था.

पुलिस ने चित्रा और उस के चचेरे भाई गोलू को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभी यह पता नहीं लग सका है कि मृतक के हाथ में जो सुसाइड नोट मिला, वह किस ने लिखा था. फोरैंसिक जांच के बाद ही यह स्थिति साफ हो सकेगी. केस की विवेचना कोतवाली प्रभारी अनुपम शर्मा कर रहे हैं. True Crime Story