Hindi Stories: एक अनूठी प्रेम कहानी – बाजीराव मस्तानी

Hindi Stories: संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ आई और सफल भी रही. निस्संदेह लोगों ने इस प्रेमकहानी को पसंद किया. लेकिन सच यह है कि बाजीराव और मस्तानी के प्रेम को उस जमाने में कोई समझ नहीं पाया था, इसीलिए उन के अपनों ने ही उन्हें एक नहीं होने दिया. फिर भी ये दोनों पात्र ऐतिहासिक आईने में अमर हैं.

प्रेम कहानियां मानव मन को हमेशा से प्रभावित करती रही हैं. कुछ प्रेम कहानियां तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो कर अमर भी हो गई हैं. लेकिन यह दुख की ही बात है कि मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम और उन की प्रेमिका मस्तानी की अद्भुत प्रेम कथा के बारे में हम उतना नहीं जानते, जितना हमें जानना चाहिए 18वीं सदी के इन ऐतिहासिक पात्रों ने भारत के भाग्य का फैसला किया था.

पेशवा बाजीराव मराठा साम्राज्य के ऐसे नायक थे, जिन्होंने अपने बहुत कम समय के शासनकाल में मराठा साम्राज्य को महाराष्ट्र की सीमा से निकाल कर पूरे हिंदुस्तान में फैला दिया था. इस अजेय योद्धा के रणकौशल और वीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 39 साल की उम्र में 41 युद्ध लड़े और किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए. बाजीराव की बहादुरी को देखते हुए उन्हें ‘इंडियन नेपोलियन’ कहना गलत नहीं होगा. वैसे नेपोलियन कई युद्धों में पराजित हुआ था, लेकिन बाजीराव प्रथम हमेशा अजेय रहे.

सन 1720 में मुगल सम्राट औरंगजेब की मौत के बाद उत्तर भारत में ही नहीं दक्खिन में भी राजनीतिक शून्यता का आलम छा गया था, जिसे पेशवा बाजीराव ने एक झटके में दूर कर के दिल्ली पर मराठों का कब्जा कायम कर दिया था. मुगल सम्राट और सूबेदार जिन्हें अपनी बारूदी ताकत पर नाज था, बाजीराव प्रथम के रहमोकरम पर जीने को मजबूर हो गए थे.

मस्तानी के प्रेम में व्याकुल रहे बाजीराव इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने अपने प्रेम को पवित्र रखा, उसे कभी वासना में नहीं डूबने दिया. वह ऐसा दौर था, जब ज्यादातर राजा, नवाब, रासरंग में डूब कर रंगरेलियां मनाने में व्यस्त रहते थे, लेकिन बाजीराव के लिए उन की प्रेमिका मस्तानी कभी भी उन की कमजोरी नहीं बनीं, बल्कि उन के अदम्य साहस, पराक्रम में पलपल की हमसफर और प्रेरणास्रोत रहीं.

बाजीराव और मस्तानी की प्रेम कहानी जानने से पहले हमें उन के बारे में जान लेना चाहिए. बाजीराव प्रथम चितपावन ब्राह्मण कुल के पराक्रमी योद्धा थे, जिन्होंने अपनी वंश परंपरा की उपलब्धियों में चार चांद लगा दिए थे. सन 1707 के बाद छत्रपति मराठा सम्राट की हैसियत दिनोंदिन गिरती जा रही थी. तभी अष्टप्रधान मंत्रिमंडल के प्रधानमंत्री पेशवा सत्ता के सिरमौर बन गए. शिवाजी ने जिस मराठा स्वराज की नींव रखी थी, उन के बाद उन के उत्तराधिकारी उतने योग्य साबित नहीं हो सके. जबकि पेशवाओं ने इन कमियों को अपनी काबिलियत बना लिया था.

बालाजी विश्वनाथ ने जो सपना देखा था, उसे उन के योग्य पुत्र बाजीराव ने तूफान की गति से पूरा कर दिखाया. जब मुगल सत्ता पतन पर थी, तभी सन 1720 में बाजीराव प्रथम ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली. उस समय की स्थिति को देखसमझ कर उन्होंने घोषणा कर दी कि मुगल वृक्ष अब पतन की ओर है, इस की शाखाओं को काटने के बजाय इस की जड़ों पर प्रहार कर के पूरे वृक्ष को ही उखाड़ फेंका जाए तो बेहतर होगा.

इस के बाद मराठा जांबाज सेनापतियों की सैनिक टुकडि़यों ने पूरे उत्तर भारत को रौंदना शुरू कर दिया. मराठा सैनिकों के घोड़ों के टापों से सुदूर उत्तर भारत की रियासतें धूल के गुबार से ढकती चली गईं. मुगल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला, हैदराबाद के पहले निजाम चिन किलीज खां, और अवध के नवाब ने बाजीराव की फौज को दिल्ली की ओर जाने से रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की कोशिश नाकाम रही. बात तब की है जब उत्तर भारत, खासकर मुगल दरबार, जो उस समय के कमजोर शासक की करतूतों से षड्यंत्रों का अड्डा बना हुआ था, की कमजोरी का फायदा उठा कर मुगल सेनापति अन्य रियासतों पर कब्जा करने के मंसूबे पाल रहे थे.

बाजीराव की प्रेमिका मस्तानी को ले कर इतिहास में तरहतरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि मस्तानी छत्रसाल की फारसी बेगम की बेटी थी. कुछ लोग उसे हैदराबाद के नवाब की दरबारी नर्तकी भी मानते हैं. मस्तानी उत्तर मध्यकाल की बहुत ही खूबसूरत शख्सियत थी, जिस की मिसाल कहीं नहीं थी. मस्तानी अपने अद्वितीय सौंदर्य, संगीत और नृत्यकला के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी तीरंदाजी, घुड़सवारी, तलवारबाजी और रणकौशल के लिए भी इतिहास में अमर है. बाजीराव के साथ उस ने तमाम युद्ध अभियानों में अपना पराक्रम दिखाया. युद्ध के मैदान में उस का साहस, वीरता और कौशल बाजीराव जैसा ही था, जो खुद असंभव रणनीति बना कर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में माहिर था.

जाहिर है ऐसी काबिलियत की धनी मस्तानी बाजीराव के दिलोदिमाग में छा गई होगी. पहले परिचय के साथ ही प्रेम की जो कहानी शुरू हुई, वह मरते दम तक जरा भी मंद नहीं पड़ी. दोनों जैसे एकदूसरे को पा कर धन्य हो गए थे. बाजीराव का जीवन युद्धों में बीत रहा था. लेकिन मस्तानी ने महिला हो कर भी उन नाजुक घडि़यों में हमेशा बाजीराव का साथ दिया था. इस प्रेमकथा एक सच यह भी है कि बाजीराव का साथ निभाने के लिए मस्तानी को बहुत कष्ट उठाने पड़े थे.

प्यार अगर सच्चा हो तो उस में कष्ट कोई मायने नहीं रखते. कुछ ऐसी ही बातें बाजीराव और मस्तानी के प्रेम में नजर आती हैं. बारूदों की गंध, तलवारों की टंकारों और खून से लथपथ युद्ध के मैदानों में भी प्रेम की सुकोमल भावनाओं की उपस्थिति सचमुच बहुत विलक्षण लगती है. शायद ऐसे माहौल में भी बाजीराव और मस्तानी कुछ पल निकाल कर एकदूसरे को प्रेमिल सहारा देते थे. मस्तानी ने बाजीराव के सपनों में बाधा खड़ी करने के बजाय मराठा साम्राज्य के चमत्कारिक प्रसार में योगदान किया था. लेकिन 18वीं सदी का रूढि़वादी समाज और शाही सोच प्रेम की भावनाओं को समझने में कतई समर्थ नहीं रहे. इसीलिए उन के रास्तों में लोगों, खासकर करीबी लोगों ने अनगिनत बाधाएं खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

मस्तानी के बारे में एक मान्यता यह भी है कि वह गुजरात के मुगल सूबेदार शुजाअत खां की दरबारी नर्तकी थी. 1724 में जब चिमनाजी अप्पा ने गुजरात पर हमला किया तो वह शुजाअत खां को मार कर मस्तानी को लूट लाया. बाद में मस्तानी को उस ने पेशवा बाजीराव की सेवा में सौंप दिया. गुजराती लोक गीतों में उसे अफगानी गुर्जर नर्तक जाति की माना जाता है. उसे ‘भवन कांचरी’ नृत्यांगना भी कहा जाता है. यहीं से वह छत्रसाल की रक्षा के लिए बाजीराव के साथ बुंदेलखंड गई. जैतपुर के युद्ध में उस के अदम्य साहस से खुश हो कर छत्रसाल ने उसे अपनी बेटी बना लिया था.

दूसरी मान्यता यह है कि मस्तानी राजपूत राजा छत्रसाल की ईरानी बेगम की बेटी थी. बचपन से ही उस ने नृत्य संगीत और शाही जिंदगी के हर रंग और अच्छेबुरे पहलुओं को जिया और सहा. सन 1728 में जब इलाहाबाद के मुगल सूबेदार मुहम्मद खां बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला कर के छत्रसाल के बेटे जगतराज को बंदी बना लिया. इस स्थिति में बुजुर्ग राजपूत शासक ने मुहम्मद खां बंगश के सामने घुटने टेकने के बजाय उसे सबक सिखाने के लिए पेशवा बाजीराव प्रथम को सहायता प्रस्ताव भेजा.

बाजीराव तुरंत अपनी सेना सहित छत्रसाल की मदद के लिए आए और जैतपुर के युद्ध में उन्होंने मुहम्मद खां बंगश को बुरी तरह हरा दिया. इसी युद्ध में पहली बार बाजीराव ने मस्तानी को लड़ते देखा था, उसी समय वह उस के रूपसौंदर्य के साथसाथ उस के हुनर और काबिलियत पर फिदा हो गए थे. पहली नजर का यह प्यार आजीवन चला. छत्रसाल ने झांसी, ओरछा, बांदा की जागीर के साथसाथ बाजीराव के शादी के प्रस्ताव पर अपनी बेटी का हाथ भी उन्हें थमा दिया.

बाजीराव और मस्तानी एकदूसरे पर मर मिटे थे. बाजीराव उसे अपने साथ पूना ले आए, लेकिन मजहब की दीवारों और षड्यंत्रोंकुचक्रों ने उन का जीना मुहाल कर दिया. दोनों का अटूट प्रेम किसी से बरदाश्त नहीं हुआ. सन 1739 में नाना साहेब, चिमना जी अप्पा, राधा देवी और काशीबाई के षड्यंत्र सफल हुए. परिणामस्वरूप पेशवा को युद्ध अभियान में अकेले पूना से बाहर जाना पड़ा. उन की अनुपस्थिति में इन लोगों ने मस्तानी को पूना के पार्वती बाग में कैद कर लिया. बाजीराव इस खबर से भले ही टूट गए, लेकिन मस्तानी ने हिम्मत नहीं हारी.

किसी तरह आजाद हो कर मस्तानी पटास पहुंची. बाजीराव उसे सामने देख कर बहुत खुश हुए. लेकिन यह अंतिम मिलन ज्यादा देर तक नहीं चल सका. मस्तानी के पीछेपीछे पेशवा की मां राधा देवी और पटरानी काशी बाई भी पटास पहुंच गए और बाजीराव प्रथम पर दबाव डालना शुरू किया. एक तरफ मां की डांटफटकार और मराठा साम्राज्य की सौगंध दिलाई जा रही थी तो दूसरी तरफ काशीबाई के अविरल आंसू बाजीराव को धर्मसंकट में डाल रहे थे. भारी मन से बाजीराव ने मस्तानी को खुद से दूर कर के पूना भेज दिया. इस बिछोह का बाजीराव पर गहरा असर पड़ा.

एक ओर युद्ध उन्हें चैन नहीं लेने दे रहे थे, दूसरी ओर परिवार के लोग जिंदगी के खालीपन को बढ़ाने पर आमादा थे. जिन की वजह से बाजीराव को अपनी रूहानी प्रेरणा और ताकत मस्तानी को खुद से अलग करना पड़ा. बाजीराव मस्तानी की प्रेमकहानी ने भारतीय राजनीति को बहुत ही प्रभावित किया है लेकिन दुख की बात यह है कि यह प्रेम कहानी इतिहास के पन्नों में ही दर्ज हो कर खो गई. मस्तानी नफरत की शिकार होती चली गई. पावल में बनी उस की खंडहरनुमा कब्र को देख कर शायद ही कोई विश्वास कर सके कि यहां वह शख्सियत चिर निद्रा में दफन है, जिस की जिंदगी ने हिंदुस्तान के इतिहास की दशा और दिशा को बदल कर रख दिया था.

बाजीराव की मां राधा देवी, पत्नी काशीबाई, भाई चिमनाजी अप्पा और पुत्र अंजाने में इस प्रेम के दुश्मन बन बैठे थे. सच्चा प्यार कभी आसान नहीं होता, इसलिए बाजीराव और मस्तानी ने इस चुनौती को हंसतेहंसते स्वीकार किया था. सभी जानते हैं कि बाजीराव, मस्तानी को बुंदेलखंड से पूना ले आए थे. उस समय पेशवा पूना से और छत्रपति सतारा से अपना काम संभालते थे.

चूंकि मस्तानी की मां छत्रसाल की फारसी मुसलिम बेगम थीं, इसलिए मस्तानी को मराठा समाज कभी स्वीकार नहीं कर पाया. स्वयं बाजीराव का कट्टर ब्राह्मण समाज इस विवाह को मान्यता देने को तैयार नहीं था. बाजीराव के लिए यह स्थिति बहुत कठिन थी. एक ओर घरसमाज का विरोध था, दूसरी ओर मराठा साम्राज्य की पूरी जिम्मेदारी. वह चक्की के 2 पाटों के बीच फंस कर तड़पते रहे. एक तरफ मस्तानी का अनन्य प्रेम था, तो दूसरी ओर मराठा साम्राज्य के सपने थे, जिन्हें पूरा करना उन की सब से बड़ी प्राथमिकता थी. सन 1734 ई में उन्होंने मस्तानी के लिए अलग महल बनवाया. जहां उन्होंने इबादत के लिए मसजिद भी बनवाई थी. यह आज भी देखी जा सकती है.

बाजीराव ने मस्तानी से विवाह कर के उसे ब्याहता पत्नी का सम्मान दिया था. पटरानी चूंकि काशीबाई थी, इसलिए वह अपने ईर्ष्यालु स्वभाव की वजह से बाजीराव के कंधे से कंधा मिला कर साथ नहीं दे पाईं. उस समय समाज को पूरी तरह से दरकिनार करना पेशवा बाजीराव जैसे शक्तिशाली पुरुष के लिए भी संभव नहीं था. अप्रैल 1740 में बाजीराव जब अपने 1 लाख सैनिकों के साथ युद्ध के लिए दिल्ली आ रहे थे तो उन की सेना ने इंदौर के पास खरगोन में पड़ाव डाला. वहीं पर बाजीराव को तेज बुखार आया, जिस की वजह से उन की मृत्यु हो गई. वहीं पर नर्मदा नदी के किनारे उन का अंतिम संस्कार किया गया. बाद में सिंधिया ने वहां उन की याद में छतरी बनवाई.

मातापिता की मौत के बाद शमशेर बहादुर की परवरिश उस की सौतेली मां काशीबाई ने की थी. शमशेर बहादुर ने मराठा साम्राज्य के विस्तार में अपनी वीरता का परिचय भी दिया था. सिर्फ 39 साल की आयु में बाजीराव ने जीवन के सब रंग देख लिए थे. एक तरफ पेशवा के रूप में उन्होंने आकाश की बुलंदियों को छुआ तो दूसरी ओर पारिवारिक अंतर्कलह ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था.

बाजीराव की मौत की खबर को मस्तानी सहन नहीं कर सकी और फिर जल्दी ही उस की भी जीवनलीला समाप्त हो गई. कहा जाता है कि इस दुखद खबर से व्यथित हो कर उस ने हीरा निगल लिया था, जिस से उस की मृत्यु हो गई थी. कुछ इतिहासकार उस की मौत की वजह विषपान मानते हैं. पूना से 65 किलोमीटर दूर पावल में मस्तानी की कब्र आज भी देखी जा सकती है.

इस प्रेम कहानी का दुखद अंत यह साबित करता है कि समाज चाहे कितना भी विकसित हो जाए, लेकिन सोच अथवा नजरिए को बदलने का संघर्ष सभी को करना पड़ता है. योग्यता भी अक्सर दकियानूसी सोच के आगे घुटने टेक देती है. बाजीराव चाहते तो अन्य योद्धाओं की तरह भोगविलास का जीवन व्यतीत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने प्रेम को सम्मान देने की कोशिश की और मरते दम तक इसी संघर्ष में बहादुरी से जूझते रहे.

यह भी दुख की ही बात है कि मस्तानी का चरित्र चित्रण अधूरा है. इतिहास में बहुत कम लोगों ने उस के बारे में लिखा है. उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेज शायद इस घटना को मराठा गौरव के विपरीत मान कर इसे दबाने के लिए मौन रहे, लेकिन इश्क और मुश्क कब छिपे हैं? एक न एक दिन दुनिया उन की हकीकत से रूबरू हो ही जाती है. इसीलिए इतिहास में इन गुम पात्रों को फिल्मी रूपहले परदे पर साकार करने की कोशिशें भी होती रही हैं, लेकिन इस में इतिहास को किस तरह पेश किया जाता है यह अलग विषय है.

यहां काशीबाई के चरित्र की चर्चा किए बगैर यह कहानी अधूरी रहेगी. देखने में तो काशीबाई घोर स्वार्थी और षड्यंत्रकारी लगती थी, लेकिन इस में उस का क्या दोष था? वह बाजीराव की पटरानी थी. पति पर उस का हक था. वह अपने पति के प्रेम को पाने के लिए हमेशा तरसती रही. काशीबाई जिस हक की हकदार थी, वह उसे कभी नहीं मिला.

इसीलिए उस ने जो कुछ भी किया, वह उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल ही था. काशीबाई में मानवीय चरित्र की अनेक कमियां हो सकती हैं, लेकिन यह भी सच है कि उस ने भी बाजीराव को दिल की गहराइयों से चाहा था. लेकिन उस की चाहत की कभी कद्र नहीं हुई. बाजीराव और मस्तानी नायकनायिका बन गए, जबकि काशीबाई खलनायिका बन कर इतिहास के अंधेरों में खो गई. Hindi Stories

Patna News: बुलाया शादी के लिए – मार दी गोली

Patna News: पटना के रहने वाले रजनीश ने शादी डौटकौम पर इंदौर की सृष्टि जैन का प्रोफाइल और फोटो देखा तो उसे मिलने के लिए फ्लाइट का टिकट भेज कर पटना बुला लिया. लेकिन सृष्टि के पटना आने पर ऐसा क्या हुआ कि रजनीश को अपने हाथ उस के खून से रंगने पड़े.

25 जनवरी की सुबह के 10 बज रहे थे. सोमवार का दिन होने की वजह से सड़कों पर कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ थी. पटना के मीठापुर का भी वही हाल था. सड़कों पर भीड़भाड़ की वजह से गाडि़यां सरकसरक कर चल रही थीं. उसी भीड़ में एक औटो भी हौर्न बजाता हुआ आगे निकलने की कोशिश में लगा था. उस में एक लड़की बैठी थी, जो औटो ड्राइवर से बारबार जल्दी से जल्दी पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन पर पहुंचाने को कह रही थी. लेकिन भीड़ की वजह से औटो आगे बढ़ नहीं पा रहा था. औटो में बैठी लड़की कभी अपनी घड़ी देखती तो कभी औटो से सिर बाहर निकाल कर पीछे की ओर देखती.

जैसे ही औटो चाणक्य लौ यूनिवर्सिटी के पास पहुंचा, एक सफेद रंग की बुलेट मोटरसाइकिल पीछे से आ कर औटो के साथसाथ चलने लगी. उस पर 2 युवक सवार थे. उन्हें देख कर लड़की घबरा गई और उस ने ड्राइवर से औटो भगाने को कहा. लेकिन भीड़ की वजह से औटो ड्राइवर औटो भगा नहीं सका. इसी बीच मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे युवक ने पिस्तौल निकाली और औटो में बैठी लड़की को लक्ष्य बना कर 4 गोलियां दाग दीं.

लड़की पर गोलियां दाग कर मोटरसाइकिल सवार जिस तरह पीछे से आराम से आए थे, उसी तरह आराम से आगे बढ़ गए. उन्हें रोकने की कोई हिम्मत भी नहीं कर सका. गोलियां लगने से लड़की चीखी तो औटो ड्राइवर ने औटो रोका और लड़की की मदद करने के बजाय वह औटो ही छोड़ कर भाग गया. गोलियां चलने से बाजार में अफरातफरी मच गई थी. लोग दुकानें बंद करने लगे थे. थोड़ी देर में अफरातफरी थमी तो लोगों को पता चला कि औटो में बैठी लड़की पर गोलियां चलाई गई थीं. वह अभी भी उसी में घायल पड़ी है. कुछ लोगों ने तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

पुलिस को सूचना दी गई. पहले पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, उस के बाद अस्पताल गई. शिनाख्त के लिए लड़की के पर्स और बैग की तलाशी ली गई तो उन में से मिले कागजातों से पता चला कि लड़की का नाम सृष्टि जैन था. वह इंदौर के स्नेहनगर की रहने वाली थी. 23 जनवरी को वह गो एयर की फ्लाइट से दिल्ली से पटना आई थी और मीठापुर के मणि इंटरनेशनल होटल में ठहरी थी. 24 जनवरी को उसे फ्लाइट से दिल्ली जाना था, लेकिन उस ने फ्लाइट का टिकट कैंसिल करा कर 25 जनवरी को पटना से इंदौर जाने के लिए पटनाइंदौर एक्सप्रैस का टिकट करवाया था. 25 जनवरी की सुबह 10 बजे वह होटल छोड़ कर औटो से पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन जा रही थी, तभी रास्ते में उसे गोली मार दी गई थी.

इस के बाद 11 बजे के करीब उस की मां ममता जैन ने सृष्टि के मोबाइल पर फोन कर के पता करना चाहा कि क्या वह ट्रेन में बैठ गई है तो किसी पुलिस वाले ने फोन रिसीव कर के उन्हें बताया कि सृष्टि को गोली मार दी गई है और वह अस्पताल में है. जिस समय सृष्टि को गोली मारी गई थी, औटो ड्राइवर राजकपूर सिंह औटो छोड़ कर भाग गया था. पुलिस ने उस के औटो में लिखे पुलिस कोड जे-647 से उस का मोबाइल नंबर और पता ले कर उसे फोन किया. वह परसा बाजार के पूर्वी रहीमपुर गांव का रहने वाला था. थाने आने पर औटो ड्राइवर राजकपूर सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि लड़की पर गोली चलाए जाने के बाद वह काफी डर गया था.

वह उस लड़की को ले कर स्टेशन जा रहा था, तभी चाणक्य लौ यूनिवर्सिटी के पास बुलेट मोटरसाइकिल से 2 लड़के आए और उन में से पीछे बैठे लड़के ने लड़की को गोली मार दी थी. गोली मार कर वे करबिगहिया की ओर गए थे. पुलिस ने जब सृष्टि के पिता सुशील जैन से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि शादी डौटकौम पर 20 दिनों पहले उन की छोटी बेटी शगुन ने मृतका सृष्टि का प्रोफाइल डाला था. बिहार का कोई लड़का उसे पसंद आ गया था तो वह उसी से मिलने पटना आई थी.

जब सृष्टि की बहन शगुन से पूछताछ की गई तो उस ने बताया था कि शादी डौटकौम पर सृष्टि का प्रोफाइल देख कर पटना के रजनीश की ओर से उस के लिए विवाह का प्रस्ताव आया था. रजनीश सृष्टि को अपने घर वालों से मिलवाना चाहता था, इसीलिए उस ने सृष्टि को पटना बुलवाया था. रजनीश ने ही सृष्टि के लिए फ्लाइट का टिकट भी भेजा था और पटना में ठहरने के लिए होटल का भी इंतजाम किया था. 23 जनवरी की सुबह 11 बज कर 35 मिनट पर वह पटना पहुंची थी और मणि इंटरनेशनल होटल के कमरा नंबर 106 में ठहरी थी.

उसी दिन दोपहर 2 बज कर 10 मिनट पर रजनीश सिंह ने अपने दोस्त राहुल के साथ उसी होटल में कमरा नंबर 107 बुक कराया था. होटल के रजिस्टर में उस ने अपने पिता का नाम राजेश्वर प्रसाद सिंह और पता राघौपुर, जिला वैशाली लिखा था. 24 जनवरी को सभी होटल से निकल गए थे, लेकिन कुछ देर बाद सृष्टि होटल लौट आई थी और इस बार वह कमरा नंबर 103 में ठहरी थी. उस ने होटल मैनेजर को बताया था कि उस का टिकट कंफर्म नहीं हुआ, इसलिए वह वापस आ गई थी.

24 जनवरी को एक बार फिर रजनीश अपने दोस्त राहुल के साथ होटल पहुंचा और सीधे सृष्टि के कमरे में गया. होटल के मैनेजर राजकुमार के अनुसार, इस बार रजनीश सृष्टि के कमरे पर गया तो दोनों के बीच किसी बात को ले कर बहस होने लगी. जल्दी ही इस बहस ने तल्खी का रूप ले लिया. इस कहासुनी में सृष्टि बारबार कह रही थी कि अब वह उस के पीछे नहीं आएगा. जबकि रजनीश उसे धोखेबाज कह रहा था. उस का कहना था कि उस ने उस के 1 लाख रुपए ठग लिए हैं.

रजनीश से मिलने के बाद सृष्टि ने अपने घर वालों को फोन कर के बताया था कि रजनीश उसे ठीक आदमी नहीं लगता. उस के पास पिस्तौल भी है, जिसे ले कर वह घूमता है. वह एयरपोर्ट पर भी पिस्तौल ले कर आया था. वह ऐसे आदमी से कतई विवाह नहीं करेगी, बाकी बातें वह इंदौर लौट कर बताएगी. सृष्टि की मां ममता जैन ने बताया था कि रजनीश ने उन से भी फोन पर मीठीमीठी बातें की थीं. वापस आने के लिए सृष्टि 24 जनवरी को फ्लाइट पकड़ने के लिए एयरपोर्ट पर गई थी, लेकिन फ्लाइट नहीं मिली. इस के बाद उस ने पटनाइंदौर एक्सप्रैस से 25 जनवरी को लौटने का टिकट लिया था.

सृष्टि के पिता सुशील जैन मूलरूप से राजस्थान के उदयपुर के रहने वाले थे. 4 साल पहले ही वह इंदौर आ कर रहने लगे थे. यहां वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी ममता जैन के अलावा 2 बेटियां, बड़ी सृष्टि और छोटी शगुन थी. सृष्टि ने उदयपुर से एमबीए किया था, जबकि शगुन 12वीं में पढ़ रही थी. उन का परिवार इंदौर के स्नेहनगर में रहता था. इस के पहले वह खातीवाला टैंक में अनमोल पैलेस में फ्लैट नंबर 402 में रहते थे. इंदौर की कई कंपनियों में काम करने के बाद सृष्टि दिल्ली में इंडिया बुल्स कंपनी में टीम लीडर के पद पर काम कर रही थी. पिछले महीने उस ने यह नौकरी छोड़ दी थी और दूसरी कंपनी में नौकरी पाने की कोशिश कर रही थी. नौकरी छोड़ने के बाद सृष्टि इंदौर आ कर मांबाप के साथ रह रही थी.

लाश के निरीक्षण के दौरान पुलिस ने देखा था सृष्टि के हाथ पर ‘आर एस’ अक्षर का टैटू बना था, जिस से अंदाजा लगाया कि यह ‘रजनीश सृष्टि’ लिखा है. उस के दूसरे हाथ पर ‘सम लव वन, सम लव यू, आई लव यू, दैट इज यू’ लिखा था. पुलिस ने होटल के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकलवा कर चेक की तो उस में सृष्टि से जुड़ी कई बातें सामने आईं. फ्लाइट न मिलने पर जब वह होटल लौटी तो उस की मुलाकात बंगलुरु के रहने वाले सुरेश रेड्डी से हुई. फुटेज में वह होटल के रिसैप्शन काउंटर के पास वाले सोफे पर रेड्डी के साथ बैठी हुई दिखाई दे रही थी.

सृष्टि ने रेड्डी के साथ सैल्फी लेने की बात कही तो पहले तो उस ने मना कर दिया. बातचीत में सृष्टि ने उसे बताया था कि वह इंदौर से पटना आई है. वह एक मोबाइल फोन खरीदना चाहती है, वह चल कर खरीदवा दे. इस के बाद रेड्डी उसे औटो से बाजार ले गया था. रेड्डी अपनी कंपनी के काम से पिछले 15 दिनों से उस होटल में ठहरा था. फुटेज से यही लगता था कि 24 जनवरी को सृष्टि और रेड्डी की मुलाकात थोड़ी ही देर में दोस्ती में बदल गई थी. होटल से निकलने के बाद उन्होंने 10 हजार रुपए का मोबाइल फोन खरीदा था. मोबाइल का बिल रेड्डी के नाम से बना था. इस के बाद दोनों नाइट शो फिल्म देख कर देर रात होटल लौटे थे. होटल स्टाफ ने भी पुलिस को उन के देर से लौटने की बात बताई थी.

पुलिस सूत्रों के अनुसार, सृष्टि के मोबाइल फोन के मेमोरी कार्ड से पुलिस को कुछ आपत्तिजनक वीडियोज मिले थे, लेकिन पुलिस इस बारे में कुछ नहीं बता रही है. मेमोरी कार्ड से पता चलता है कि सृष्टि विवाहित थी. लेकिन वह औनलाइन साथी की तलाश में थी. रजनीश की तरह सृष्टि ने भी अपने प्रोफाइल में खुद के बारे में गलत जानकारियां दी थीं. सृष्टि के परिवार वालों ने पुलिस को बताया था कि उदयपुर में पढ़ाई के दौरान ही सृष्टि ने प्रेमविवाह कर लिया था, लेकिन वह शादी कुछ समय बाद ही टूट गई थी और सन 2011 में सृष्टि ने अपने पति से तलाक ले लिया था.

सोचने वाली बात यह है कि अगर रजनीश से सृष्टि की पहले से जानपहचान नहीं थी तो किसी अजनबी के बुलाने पर वह इंदौर से पटना कैसे चली गई? रजनीश सृष्टि के पड़ोस वाले कमरे में ही रात में ठहरा था. लेकिन यह बात उस ने अपने घर वालों को नहीं बताई थी. दोनों के बीच कहीं पहले से तो कोई रिश्ता नहीं था? आखिर रजनीश बारबार सृष्टि पर एक लाख रुपए ठगने का आरोप क्यों लगा रहा था? केवल विवाह के प्रस्ताव ठुकराने से कोई किसी लड़की की हत्या क्यों करेगा?

सृष्टि की हत्या के 8 दिनों बाद 2 फरवरी को सृष्टि के हत्यारे रजनीश को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. वह अपनी पत्नी और  दोनों बच्चों के साथ कंकड़बाग में अपने किसी रिश्तेदार के यहां गया था, तभी पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. पुलिस को उस के वहां आने की जानकारी पहले से थी, इसलिए सादे लिबास में वहां पुलिस वालों को तैनात कर दिया गया था. उस के आते ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. वह पटना से हो कर दिल्ली भागने की फिराक में था. पूछताछ में रजनीश ने पुलिस को बताया था कि सृष्टि उसे ब्लैकमेल करने लगी थी. लोगों को ब्लैकमेल करना उस की आदत में शुमार था. इस काम में उस का परिवार भी उस का साथ देता था. पुरुषों को फंसा कर वह रुपए ऐंठती थी. यहां आ कर उस ने उस से गहने खरीदने को कहा था.

सृष्टि के बारबार बदलते बातव्यवहार से ही रजनीश को उस पर शक हो गया था, जिस से उस ने गहने खरीदने से मना कर दिया था, इसी बात से सृष्टि उस से नाराज हो गई और होटल में ही उस से बहस करने लगी, जो जल्दी तल्खी में बदल गई. बात ज्यादा बढ़ी तो वह रजनीश को गालियां देने लगी. इस के बाद सृष्टि ने अपना सामान उठाया और अकेली ही औटो से स्टेशन की ओर चल पड़ी. रजनीश के पास पिस्तौल थी ही, उस ने देखा कि सृष्टि उसे धोखा दे कर जा रही है तो उस ने बुलेट से जा कर रास्ते में उसे गोली मार दी.

राघौपुर के वीरपुर बरारी टोला का रहने वाला रजनीश किसान राजेश्वर प्रसाद सिंह का बेटा है. पुलिस ने उस के गांव वाले घर पर छापा मारा तो वहां से 7.65 बोर की गोलियों के 6 खोखे मिले हैं. रजनीश की 13 साल पहले किरण सिंह से शादी हुई थी. उस के 2 बच्चों में बड़ा बेटा प्रियांशु 12 साल का और छोटा बेटा कुणाल 9 साल का है.  रजनीश की गिरफ्तारी से किरण काफी परेशान है. उस का कहना है कि उस के पति किडनी के मरीज हैं, अगर उन्हें समयसमय पर दवाएं नहीं दी गईं तो उन की जान जा सकती है.

14 दिसंबर, 2007 में किरण ने दिल्ली के अपोलो हौस्पिटल में अपनी किडनी दान की थी. दूसरी किडनी रजनीश के बड़े भाई अनिल ने 4 मार्च, 2015 को दी थी, जिस की वजह से उसे दिन में 3 बार दवा खानी पड़ती है. पीने के लिए उसे मिनरल वाटर दिया जाता है. सृष्टि के पिता का कहना है कि रजनीश पुलिस को बेमतलब की कहानियां गढ़ कर सुना रहा है. हत्या को ले कर भी वह पुलिस को बरगला रहा है. सृष्टि की मां का कहना है कि किसी अनजान लड़की से 5-10 दिनों की बातचीत में रजनीश ने ढाई लाख रुपए से ज्यादा उस पर कैसे और क्यों खर्च कर दिए?

4 जनवरी को सृष्टि की बहन शगुन ने उस की शादी का प्रोफाइल शादी डौटकौम वेबसाइट पर डाला था. उस के 10 दिनों बाद रजनीश की ओर से शादी का प्रस्ताव आया था. रजनीश ने बताया था कि उस के पिता की मोटरसाइकिल की एजेंसी है, जिस का सालाना कारोबार 70-80 लाख रुपए का है. अपने बारे में उस ने बताया था कि वह आईपीएस की तैयारी कर रहा है. उस के इसी प्रोफाइल और प्रस्ताव के बाद ही सृष्टि उस से मिलने पटना आई थी.

पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रजनीश की तरह सृष्टि ने भी शादी के वेबसाइट पर अपने बारे में गलत जानकारियां दे रखी थीं. उस ने पहले विवाह और तलाक के बारे में बिलकुल नहीं बताया था. रजनीश तो गलत था ही, सृष्टि भी अपने बारे में गलत जानकारी दे कर दोबारा शादी की फिराक में थी. पुलिस पूछताछ में रजनीश ने सृष्टि की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. उस ने सृष्टि से हुई जानपहचान के बारे में पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार, उस ने सृष्टि पर काफी रुपए खर्च कर दिए थे. इस के बाद भी वह उस से और कई चीजें खरीदने को कह रही थी. इस से उसे लगा कि यह काफी खर्चीली है. अब तक वह उस से करीब 2 लाख रुपए खर्च करवा चुकी थी.

24 जनवरी को रजनीश ने सृष्टि के पास एक नया मोबाइल फोन देखा, जिस में सृष्टि ने सुरेश रेड्डी के साथ सैल्फी ले रखी थी. वह फोटो देख कर उस के दिल को काफी गहरी ठेस लगी. रजनीश की अपनी पत्नी से बिलकुल नहीं पटती थी, इसीलिए वह दूसरी शादी के बारे में सोच रहा था. पहली नजर में सृष्टि रजनीश को बहुत अच्छी लगी थी, जिस से उस ने उस से विवाह करने का मन बना लिया था. विवाह के बाद वह उस के साथ दिल्ली में रहना चाहता था. लेकिन जब वह उस की ऊलजुलूल मांगों को पूरी नहीं कर सका तो सृष्टि ने उस से विवाह करने से मना कर दिया था.

पुलिस को दिए अपने बयान में रजनीश ने बताया था कि सृष्टि की हत्या कर के वह मीठापुर से सीधा अनीसाबाद होते हुए हाजीपुर चला गया था. रास्ते में महात्मा गांधी पुल से उस ने अपना मोबाइल फोन, टैबलेट और पिस्तौल का लाइसेंस गंगा नदी में फेंक दिया था. इसी के साथ अपनी बुलेट मोटरसाइकिल को नाव पर रख कर गंगा नदी के बीच में डुबो दिया था. इस के बाद वह हाजीपुर, वैशाली और पटना में ठिकाने बदलबदल कर समय गुजारता रहा.

रजनीश के बड़े भाई अनिल सिंह ने पुलिस को दिए बयान में कहा था कि रजनीश की किडनी ट्रांसप्लांट कराई गई है, जिस से वह शारीरिक रूप से काफी कमजोर है. ऐसे में वह किसी की हत्या कैसे कर सकता है? उसे दिन में 4 बार दवाइयां खानी पड़ती हैं और मिनरल वाटर पीना पड़ता है. ट्रांसपोर्टर का कारोबार करने वाले अनिल का कहना है कि तबीयत खराब रहने की वजह से रजनीश गांव पर ही ब्याज पर रुपए देने  का काम करता था. उसे हत्या के इस मामले में फंसाया गया है. बहरहाल, रजनीश पुलिस की गिरफ्त में है और सृष्टि की मौत हो चुकी है. सृष्टि के पिता इस हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं.

पुलिस का कहना है कि रजनीश के तार किडनी बेचने वाले गिरोह से जुड़े हो सकते हैं. शादी के बहाने रजनीश ने अपहरण की नीयत से सृष्टि को पटना बुलाया था, लेकिन उस से बातचीत के बाद सृष्टि को कुछ खतरा महसूस हुआ तो उस ने वापस जाने में ही अपनी भलाई समझी. लेकिन वह लौट नहीं पाई, क्योंकि रजनीश को उस से खतरा था. रजनीश पहले भी एक बच्चे के अपहरण के मामले में जेल जा चुका है. वैशाली के थाना जोरावरपुर में उस पर अपहरण का केस दर्ज है. कुछ दिनों पहले ही वह जमानत पर छूटा था. अगवा किए गए बच्चे का अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है. पुलिस जांच में पता चला है कि बच्चे का अपहरण किडनी निकालने के मकसद से किया गया था.

जांच के बाद पुलिस ने उस का खाता सील कर दिया था, जिस में 90 लाख रुपए जमा थे. उस के घर से फरजी स्टांप और कई सरकारी अफसरों की मुहरें बरामद हुई थीं. रजनीश खुद भी 2 बार किडनी ट्रांसप्लांट करवा चुका है. पुलिस यह पता कर रही है कि जिस डाक्टर ने उस की किडनी ट्रांसप्लांट की थी, कहीं रजनीश उस डाक्टर या अस्पताल के साथ मिल कर किडनी बेचने का रैकेट तो नहीं चला रहा था? पुलिस को जानकारी मिली है कि सृष्टि ने दिल्ली में किसी डाक्टर के यहां भी काम किया था. हो सकता है रजनीश की किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान उन की जानपहचान हुई हो? दोनों के बीच रुपयों को ले कर होटल में हुई बहस कहीं किडनी खरीदबिक्री के रैकेट से तो नहीं जुड़ी थी?

रजनीश भी पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में ही रह रहा था और किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीजों को किडनी मुहैया कराने की दलाली का काम करने लगा था. इस काम से उस ने काफी पैसे कमाए थे. वह जब भी अपने गांव वीरपुर आता था, दोस्तों पर खूब पैसा खर्च करता था. लेकिन सृष्टि के पिता का कहना है कि सृष्टि और रजनीश की पहले से जानपहचान और प्रेम प्रसंग की बात बिलकुल गलत है. एसएसपी मनु महाराज के अनुसार, पुलिस रिकौर्ड के मुताबिक रजनीश का आपराधिक रिकौर्ड रहा है. उस के बीमार और कमजोर होने की वजह से पुलिस उस से फिलहाल सख्ती से पूछताछ नहीं कर पा रही है. Patna News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News: कला का पुजारी, कलाकार का कातिल

Crime News: मौडर्न आर्ट से नाम कमाने वाले चिंतन उपाध्याय ने एक नायक बन कर हेमा हिरानी से प्यार ही नहीं किया, जीवनसाथी भी बनाया. लेकिन जब उन के प्यार में दरार आई तो चिंतन को खलनायक बनते देर नहीं लगी.

21 नवंबर को जयपुर के जवाहर कला केंद्र में जयपुर आर्ट समिट की शुरुआत हुई. समिट के पहले दिन गाय की डमी को एक बैलून के सहारे आसमान में लटकाया गया था. गाय की डमी वाली यह कलाकृति सिद्धार्थ करवाल की थी. जिस समय यह समिट शुरू हुआ था, उस समय देश भर में बीफ को ले कर काफी विवाद चल रहा था. पीपुल फार एनीमल संस्था के संयोजक सूरज सोनी तमाम कार्यकर्ताओं के साथ समिट में पहुंचे और गाय की उस कलाकृति को ले कर हंगामा करने लगे. सूचना मिलने पर थाना बजाजनगर की पुलिस ने वहां जा कर कलाकृति को उतरवा लिया.

पुलिस को हंगामा करने वालों पर काररवाई करनी चाहिए थी, लेकिन पुलिस ने इस के बजाय कलाकारों से ही धक्कामुक्की नहीं की, बल्कि एक कलाकार अनीश अहलूवालिया के तो बाल तक पकड़ कर खींचे. जबकि कलाकार सिद्धार्थ करवाल, जिस की कलाकृति पर यह हंगामा हुआ था, उन का कहना था कि हम ने तो गाय की पीड़ा को दर्शाया है. आज धरती पर गाय को न कच्ची जमीन मुहैया है, न ही चारा. जब तक गाय दूध देती है, तब तक लोग उसे खिलाते हैं, उस के बाद खुला छोड़ देते हैं. हम ने अपनी कलाकृति के माध्यम से यह जताना चाहा है कि अगर यही हालात रहे तो आगे चल कर गाय जमीन छोड़ कर आसमान में रहना पसंद करेगी. हालात बदलने के लिए मैं ने यह बात अपनी कला के माध्यम से कहने की कोशिश की है.

दूसरी ओर पीपुल फौर एनीमल संस्था के संयोजक सूरज सोनी का कहना था कि गाय की डमी को इस तरह आकाश में लटका कर आखिर कलाकार क्या संदेश देना चाहते हैं. इस कृति पर ऐसा कोई स्पष्ट संदेश लिखा भी नहीं गया था. यह जनभावना को आहत करने वाला काम है. गाय को पूजनीय मानने वाला समाज इसे सहन नहीं करेगा. सोनी ने मुख्यमंत्री औफिस को फैक्स भेज कर मामले की जांच की भी मांग की थी.

हंगामे के दौरान कलाकार अनीश अहलूवालिया और चिंतन उपाध्याय ने सिद्धार्थ करवाल की इस कलाकृति को सही ठहराते हुए पुलिस से उलझने की कोशिश की थी. इसलिए पुलिस दोनों कलाकारों को थाने ले गई. लेकिन वहां इन दोनों को यह हिदायत दे कर छोड़ दिया गया कि वे गाय की डमी को दोबारा हवा में नहीं लटकाएंगे. थाना बजाजनगर के थानाप्रभारी महेंद्र कुमार गुप्ता का कहना था कि गाय की डमी उतरवाने के साथ ही विरोध करने वाले शांत हो गए थे. एक तरह से यह विवाद यहीं खत्म हो गया था. बात खत्म हो गई थी सो थाने में कोई मामला भी दर्ज नहीं किया गया. इस के बावजूद यह मामला पूरे देश में मीडिया की सुर्खियां बन गया.

मीडिया द्वारा इस घटना की जानकारी राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को मिली तो उन्होंने ट्वीट कर के कलाकारों के साथ हुई अभद्रता पर दुख जताया. उन्होंने लिखा कि मैं इस घटना से आहत हूं. जयपुर के पुलिस कमिश्नर जंगा श्रीनिवास ने कलाकारों से व्यक्तिगत रूप से बात कर के अभद्रता के लिए माफी मांगी. विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय संयोजक नरपत सिंह ने भी कलाकारों का समर्थन करते हुए कहा कि विरोध का यह तरीका गलत है. विहिप इस विरोध में शामिल नहीं है. कलाकारों से अभद्रता के मामले में थाना बजाजनगर थानाप्रभारी महेंद्र कुमार गुप्ता और कांस्टेबल सुमेर सिंह को लाइन हाजिर कर दिया गया.

यह कहानी ऊपर वाले मामले में विरोधियों का डट कर सामना करने वाले कलाकार चिंतन उपाध्याय की है. उन की आगे की इस कहानी में एक नायिका भी है. वह भी कलाकार है. चिंतन भी मौडर्न आर्ट बनाते हैं और नायिका भी. दोनों की चरचा देश में ही नहीं, विदेशों तक है. चित्र बनातेबनाते ही दोनों के दिल मिल गए. प्यार इतना बढ़ा कि शादी कर ली. लेकिन शादी के बाद धीरेधीरे उन के प्यार का रंग हलका पड़ता गया और आगे चल कर उन की यह प्रेम कहानी खूनी बन गई.

12 दिसंबर को मुंबई के उत्तरी उपनगर कांदीवली की धानुकवाड़ी के एक नाले में गत्ते के डिब्बों में बंद पौलीथिन में लिपटी 2 लाशें मिलीं. नाले में पड़े उन डिब्बों की सूचना किसी सफाई करने वाले ने पुलिस को दी थी. पुलिस ने मौके पर पहुंच कर दोनों लाशें बरामद कीं. इन में एक लाश महिला की थी और दूसरी पुरुष की. लाशों के निरीक्षण में पुलिस को लगा कि दोनों को गला घोंट कर मारा गया है. उस के बाद लाशों को पौलीथिन में लपेट कर डिब्बों में भर कर फेंका गया था. महिला के दोनों हाथ बंधे थे और शरीर पर पूरे कपड़े नहीं थे. वैसी ही हालत पुरुष लाश की भी थी. दोनों लाशें पूरी तरह क्षतविक्षत नहीं हुई थीं, जिस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि  इन की हत्या एक दिन पहले ही हुई है.

अगले दिन यानी 13 दिसंबर को दोनों लाशों की शिनाख्त हो गई. महिला की लाश मशहूर कलाकार चिंतन उपाध्याय की ही तरह प्रसिद्ध कलाकार उन की पत्नी हेमा उपाध्याय की थी, जबकि दूसरी लाश हेमा के वकील हरीश भंबानी की थी. हेमा और हरीश दोनों ही 11 दिसंबर की शाम से लापता थे. हेमा उपाध्याय के घरेलू नौकर हेमंत मंडल ने पुलिस को 11 दिसंबर की शाम को ही हेमा के लापता होने की सूचना दे दी थी. हेमा के घर वालों ने भी उसी दिन पुलिस को उन की गुमशुदगी के बारे में तहरीर दे दी थी. कलाकार हेमा उपाध्याय की लाश मिलने के बाद देश के कला जगत में सनसनी फैल गई थी.

पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या और सबूत मिटाने का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. दोनों लाशों का पोस्टमार्टम करा कर लाशें उन के घर वालों को सौंप दी गई थीं. घर वालों ने उसी दिन यानी 13 दिसंबर को ही उन का अंतिम संस्कार कर दिया था. एक तरफ मृतकों का अंतिम संस्कार हो रहा था तो दूसरी ओर पुलिस ने उन्हें मारने वालों में से 3 लोगों को हिरासत में ले लिया था, जिन के नाम थे, प्रदीप राजभर, विजय राजभर और आजाद राजभर.

इन से की गई पूछताछ के बाद मुंबई पुलिस ने स्पेशल टास्क फोर्स की मदद से उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के थाना बड़ागांव के अंतर्गत आने वाले गांव कविरामपुर से शिवकुमार राजभर उर्फ साधु को गिरफ्तार किया. पुलिस ने गिरफ्तार किए गए लोगों से हेमा और हरीश के कई एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन बरामद कर किए. पुलिस को शुरुआती जांच में ही पता चल गया था कि हेमा उपाध्याय के अपने पति चिंतन उपाध्याय से संबंध अच्छे नहीं थे. पुलिस ने चिंतन उपाध्याय से भी लंबी पूछताछ की थी. लेकिन सबूत न मिलने की वजह से उन्हें छोड़ दिया गया था. जबकि हेमा के घर वालों ने पहले ही चिंतन पर संदेह जताया था. पुलिस ने चिंतन को छोड़ जरूर दिया था, लेकिन चोरीछिपे उन पर नजर रखे हुए थी.

21 दिसंबर की शाम पुलिस ने चिंतन को पूछताछ के लिए एक बार फिर बुलाया. रात भर पूछताछ चलती रही. इस पूछताछ में उस ने जो भी बयान दिया, उन में कुछ बातें विरोधाभासी थीं, जिस के बाद 22 दिसंबर को पुलिस ने उसे भादंवि की धारा 302, 201 एवं 120 के तहत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने चिंतन को उसी दिन अदालत में पेश किया और पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए एक जनवरी, 2016 तक के लिए रिमांड पर ले लिया.

पहले गिरफ्तार किए गए 4 आरोपी भी रिमांड पर चल रहे थे. इन सभी से पूछताछ में मुख्य अभियुक्त के रूप में विद्याधर राजभर उर्फ गोटू का नाम सामने आया. अब पुलिस विद्याधर को पकड़ने की कोशिश करने लगी. लेकिन लाख कोशिश के बाद भी वह पुलिस की पकड़ में नहीं आया. गिरफ्तार लोगों से की गई पूछताछ में इस बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी. हेमा उपाध्याय चिंतन से शादी से पहले हेमा हिरानी थीं. हेमा का जन्म सन 1972 में गुजरात के बड़ौदा में हुआ था. सन 1992 में हेमा जब बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट की बैचलर डिग्री (पेंटिंग) की पढ़ाई कर रही थीं, तभी उन का परिचय चिंतन उपाध्याय से हुआ.

चिंतन उपाध्याय राजस्थान का रहने वाला था. उस का जन्म सन 1972 में बांसवाड़ा जिले के परतापुर गांव में हुआ था. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय विख्यात चित्रकार और सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं. वह नेशलन ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित हैं. पिता की चित्रकारी, कूची और कैनवास को देखदेख कर चिंतन में भी चित्रकारी के प्रति रुचि बढ़ती गई. उस ने भी पेंटिंग में फाइन आर्ट की बैचलर डिग्री के लिए बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी में प्रवेश ले लिया.

चिंतन और हेमा एक ही बैच में पढ़ रहे थे. उन की उम्र भी लगभग बराबर थी. साथसाथ पढ़ाई करते और पेंटिंग बनातेबनाते दोनों एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. उन का प्यार परवान चढ़ता गया. सन 1995 में दोनों ने बैचलर डिग्री की पढ़ाई पूरी कर के पेंटिंग से फाइन आर्ट की मास्टर डिग्री के लिए उसी यूनिवर्सिटी में प्रवेश ले लिया. 2 सालों की मास्टर डिग्री की पढ़ाई के दौरान चिंतन और हेमा अपने प्यार की पेंटिंग को भी अनेक रंगों से सजाते रहे. अपने प्यार की कल्पनाओं को ड्राइंग शीट और कैनवाश पर उतारते रहे.

सन 1997 में दोनों ने मास्टर डिग्री हासिल कर ली. इस बीच उन्होंने अपनी बनाई पेंटिंग से देश के कला जगत में अपनी अच्छी पहचान बना ली थी. अब तक उन का प्यार इतना बढ़ चुका था कि वे एकदूसरे के बिना रह नहीं पाते थे. शायद यही वजह थी कि सन 1998 में हेमा और चिंतन ने शादी कर ली और मुंबई में बस गए. शादी करने के बाद मन को संतोष मिला तो हेमा और चिंतन की कलाकृतियों में और भी निखार आ गया. देश की अनेक ख्यातिनाम आर्ट गैलरियों में उन के चित्रों की प्रदर्शनियां लगने लगीं. उन के चित्रों की सराहना भी खूब होती थी. हेमा उपाध्याय अपनी कलाकृतियों के साथ फोटोग्राफी के लिए भी जानी जाने लगीं.

कला में सफलता मिलने के बाद हेमा और चिंतन आर्थिक रूप से मजबूत हुए तो उन्होंने मुंबई के पौश इलाके जुहू में एक करोड़ 20 लाख रुपए में एक फ्लैट खरीद लिया. इस फ्लैट में हेमा का हिस्सा 15 प्रतिशत और चिंतन का हिस्सा 85 प्रतिशत था. चिंतन ने हेमा के साथ मुंबई में फ्लैट भले ही ले लिया था, लेकिन जयपुर से उन्होंने नाता पहले की ही तरह बनाए रखा. निर्माणनगरी में रहने वाले अपने पिता विद्यासागर उपाध्याय के यहां वह बराबर आतेजाते रहे. इस की एक वजह यह भी थी कि मुंबई और दिल्ली की तरह जयपुर का भी कला की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है. अपने काम के सिलसिले में चिंतन देश के विभिन्न शहरों के अलावा विदेश भी जाते रहते थे.

हेमा और चिंतन का वैवाहिक जीवन हंसीखुशी से बीत रहा था. दोनों अपनेअपने काम से भी खुश थे. इसी बीच गुजरात दंगों के दौरान चिंतन उपाध्याय पूरे देश में उस समय सुर्खियों में आए, जब उन्होंने बड़ौदा की अलकापुरी सृजन आर्ट गैलरी में न्यूड हो कर प्रदर्शन किया. एक तरफ तो हेमा और चिंतन का कैरियर ऊंचाइयां चढ़ रहा था, दूसरी ओर उन के बीच आत्मीयता घटती जा रही थी. चिंतन का कहना था कि उन्हें हेमा से जो शांति और समर्पण मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा था. अब तक दोनों के बीच झगड़े होने लगे थे.

सन 1992 से 1998 के बीच के 6 सालों में प्यार की दीवारें जितनी मजबूत हुई थीं, अब वे दरकने लगी थीं. झगड़े शुरू हुए तो प्यार और विश्वास घटने लगा. शादी के 12 साल बीततेबीतते दोनों के संबंध टूटने की कगार पर आ गए. चिंतन ने पुलिस को बताया कि हेमा उस से हमेशा गाली दे कर बात करती थी. यह अमानवीय तो था ही, दिल को भी गहरा धक्का लगता था. जबकि पुलिस का कहना है कि चिंतन की खुद की सोच बड़ी घटिया थी, जिस से वह हेमा को परेशान करता था. इसी वजह से सन 2010 में हेमा ने मुंबई की अदालत में तलाक का मुकदमा दायर करा दिया था.

इस के बाद मुंबई के जुहू स्थित फ्लैट में चिंतन और हेमा रहते तो एक ही साथ थे, लेकिन अगलअलग कमरों में. हेमा की ओर से तलाक के मुकदमे की पैरवी एडवोकेट हरीश भंबानी कर रहे थे. तलाक के मुकदमे के दौरान ही हेमा ने सन 2013 में चिंतन उपाध्याय के खिलाफ उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी. हेमा ने अरोप लगाया था कि चिंतन उन के कमरे की दीवारों पर अश्लील चित्र बनाते हैं. आरोप के अनुसार चिंतन ने दीवार पर जो अश्लील चित्र बनाए थे, उस में महिला को कुत्ते के साथ अश्लील मुद्रा में दिखाया गया था.

हालांकि बाद में अदालत ने हेमा की इस शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि चिंतन का बैडरूम उन की व्यक्तिगत जगह है, उस में वह कुछ भी कर सकते हैं. हेमा ने अदालत से चिंतन से 2 लाख रुपए महीने गुजाराभत्ता दिलाने का अनुरोध किया था. लेकिन अदालत ने अपने फैसले में चिंतन उपाध्याय को हेमा को गुजारेभत्ते के रूप में हर महीने 40 हजार रुपए देने का आदेश दिया था. जनवरी, 2015 में हेमा ने पारिवारिक अदालत में एक याचिका दायर कर के अनुरोध किया था कि फाइनल सैटलमेंट के रूप में उसे चिंतन से 5 करोड़ रुपए दिलाए जाएं.

अगर चिंतन इतनी रकम एक साथ नहीं दे पाते तो वह 5 लाख रुपए हर महीने दें. दोनों के बीच सन 2014 में तलाक हुआ था, लेकिन भरणपोषण और संपत्ति के हिस्से का विवाद अभी भी अदालतों में चल रहा था. कहा जा रहा है कि अदालतों के चक्कर लगातेलगाते और मुकदमों में लाखों रुपए खर्च होने से चिंतन परेशान था. इसीलिए उस ने हेमा को मारने की साजिश रची. हेमा को मारने के लिए उस ने किराए के हत्यारे के रूप में विद्याधर राजभर को चुना.

विद्याधर राजभर उर्फ गोटू उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. चिंतन पिछले कई सालों से उसे जानता था. मुंबई के कांदिवली में उस की फोटोफ्रेमिंग की वर्कशौप और वेयरहाउस था. वह फाइबर ग्लास बनाने और बेचने का भी काम करता था, साथ ही इमिटेशन ज्वैलरी सहित कई अन्य कामधंधे भी करता था. कई सालों पहले विद्याधर राजभर काम की तलाश में जयपुर आया था, तब चिंतन ने ही उसे काम दिलवाया था. उस ने कई सालों तक जयपुर में काम किया. इसी बीच पेंटिंग से जुड़े कामों की वजह से वह चिंतन के पिता के संपर्क में आया. जयपुर में रहते हुए ही विद्याधर की चिंतन से अच्छी दोस्ती हो गई थी. बाद में विद्याधर मुंबई जा कर बस गया.

चिंतन के माध्यम से ही विद्याधर की मुलाकात मुंबई में हेमा उपाध्याय से हुई थी. चिंतन के साथ हेमा के लिए भी वह पेंटिंग की फोटोफ्रेमिंग का काम करने लगा. इसी वजह से उस का चिंतन हेमा के जुहू स्थित फ्लैट पर आनाजाना था. विद्याधर राजभर का चिंतन और हेमा से कारोबारी लेनदेन भी था. एक बार विद्याधर के पिता गंभीर रूप से बीमार हुए थे तो चिंतन ने दोस्ती के नाते उस की आर्थिक मदद की थी. चिंतन ने उसे 5 लाख रुपए उधार दिए थे. बाद में विद्याधर ने यह रकम नहीं लौटाई. हेमा से भी विद्याधर ने कुछ रकम उधार ले रखी थी. पैसों के लेनदेन को ले कर हेमा और विद्याधर के बीच कई बार विवाद भी हुआ था. हेमा ने कई बार उस से रकम लौटाने को कहा था.

चिंतन उपाध्याय को यह बात पता थी. इसलिए उस ने विद्याधर राजभर से हेमा की हत्या का सौदा किया. विद्याधर ने हेमा की हत्या के लिए पहले 30 लाख रुपए मांगे थे. बाद में वह बाईस लाख रुपए पर आ गया था. चिंतन के दबाव पर वह 10 लाख रुपए नकद और उधारी वाले 5 लाख रुपए के माफ करने पर हेमा की हत्या के लिए राजी हो गया था. इस के बाद चिंतन ने विद्याधर राजभर को हेमा की हत्या की सुपारी देते हुए कुछ रकम एडवांस भी दे दी थी.

यह करीब 3 महीने पहले की बात है. चिंतन ने हेमा की हत्या की साजिश रच कर एक दिन विद्याधर को जयपुर बुलाया. विद्याधर जयपुर के निर्माणनगर स्थित चिंतन के घर आया तो उस ने स्कैच बना कर उसे हत्या की पूरी योजना समझाई कि हेमा की हत्या कैसे करनी है. चिंतन से सौदा तय होने के बाद विद्याधर राजभर ने सब से पहले शिवकुमार राजभर उर्फ साधु से बात की, क्योंकि यह काम उस के अकेले के वश का नहीं था. साधु उस के अच्छे परिचितों में था. वह फाइबर की मूर्तियां बनाने के कारखाने में काम करता था. पिछले कई सालों से वह मुंबई के पश्चिमी कांदीवली इलाके में रहता था. हेमा की हत्या के लिए साधु राजी हो गया तो विद्याधर ने प्रदीप राजभर और आजाद राजभर को भी हेमा की हत्या में साथ देने के लिए राजी कर लिया.

इस के बाद मुंबई में चैंबूर स्थित एक रेस्तरां में चिंतन ने विद्याधर राजभर के साथ मीटिंग कर के हेमा की हत्या की साजिश को अंतिम रूप दिया. इस मीटिंग में टैंपो चालक विजय राजभर भी मौजूद था. विजय राजभर ने ही दोनों लाशों के डिब्बों को ले जा कर नाले में फेंका था. पुलिस ने बाद में इसे भी गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने चैंबूर स्थित उस रेस्तरां की सीसीटीवी फुटेज की भी जांच की थी. येजना के अनुसार, 11 दिसंबर को विद्याधर राजभर ने हेमा को फोन कर के कहा कि उस के पास चिंतन के खिलाफ कुछ अहम सबूत हैं. उन सबूतों को वह उन्हें दिखाना चाहता है. इस के लिए उस ने हेमा को कांदीवली स्थित अपने वेयरहाउस में रात को बुलाया.

सबूत हासिल करने के लिए हेमा अपने वकील हरीश भंबानी को साथ ले कर विद्याधर के वेयरहाउस पहुंचे तो वहां अन्य 3-4 लोगों को देख कर हैरानी हुई, लेकिन उन्हें किसी खतरे का अहसास नहीं था, इसलिए वे दोनों निश्चिंत थे. विद्याधर कुछ देर तक हेमा को अपनी बातों में उलझाए रहा. उस के बाद उस ने अपने साथियों की मदद से हेमा और हरीश को क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश कर दिया. बेहोश होने के बाद दोनों की गला घोंट कर हत्या कर दी गई. दोनों के मर जाने के बाद उन की जेबों का सारा सामान, मोबाइल आदि निकाल कर कपड़े उतार दिए गए, फिर दोनों लाशों के हाथपैर बांध कर पौलीथिन में लपेट कर गत्ते के डिब्बों में भर दिया गया, जिन्हें विजय राजभर टैंपो से उसी रात नाले में फेंक आया.

रिमांड अवधि पूरी होने के बाद पुलिस ने चिंतन और पकड़े गए अन्य अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां पुलिस ने चिंतन का रिमांड बढ़ाने की मांग की तो अदालत ने बाकी लोगों को जेल भेज कर चिंतन का रिमांड 1 जनवरी तक बढ़ा दिया. 1 जनवरी को रिमांड अवधि पूरी होने पर उसे दोबारा अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 11 जनवरी तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. पुलिस ने चिंतन उपाध्याय के दिल्ली स्थित मकान से कई अहम सबूत जब्त किए हैं. इन में पैन ड्राइव, आईपौड और कुछ संदिग्ध पेंटिंग शामिल हैं. पुलिस की एक टीम ने जयपुर जा कर भी जांचपड़ताल की है. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय से निर्माणनगर स्थित घर पर करीब ढाई घंटे तक पूछताछ की गई.

पुलिस जांच में यह बात भी सामने आई है कि दिल्ली शिफ्ट होने के बाद चिंतन उपाध्याय मुंबई में कभी 3 दिन से ज्यादा नहीं रुकता था, लेकिन 2 से 6 दिसंबर के बीच वह मुंबई में ही रहा. इस के अलावा हेमा और हरीश के लापता होने के अगले दिन 12 दिसंबर को उस ने हरीश के घर वालों को फोन कर के उन के बारे में पूछा था. चिंतन ने 6 दिसंबर को विद्याधर राजभर को एक एसएमएस किया था, लेकिन पुलिस के थाने बुलाने से पहले उस ने वह एसएमएस डिलीट कर दिया था.

कथा लिखे जाने तक विद्याधर राजभर पुलिस के हाथ नहीं लगा था. इस के अलावा एक अन्य व्यक्ति के भी इस दोहरे हत्याकांड में शामिल होने की बात सामने आई है. पुलिस का कहना है कि चिंतन उपाध्याय ने ही हेमा की हत्या की साजिश रची थी. उसी साजिश के तहत विद्याधर राजभर ने अपने साथियों के साथ हेमा और उन के एडवोकेट हरीश भंबानी की हत्या की थी. विद्याधर के पकड़े जाने पर ही इस मामले की सारी गुत्थी सुलझेगी.

बहरहाल, हेमा उपाध्याय की हत्या से भारतीय कला जगत में सन्नाटा पसरा हुआ है. कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि चिंतन जैसा प्रतिभाशाली कलाकार एक प्रतिभाशाली कलाकार की हत्या भी करा सकता है. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय का कहना है कि मेरा बेटा बेकसूर है. पुलिस को उस के बारे में गलत जानकारी दी गई है. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Canada: प्यार पर कोई जोर नहीं

Canada: विदेश में रह रहे गुरजिंदर ने अगर भारतीय सभ्यता से इतर वेस्टर्न कल्चर अपना कर अपनी प्रेमिका मेपल को उसी नजरिए से देखा होता तो आज मेपल जिंदा होती और उसे जेल में उम्रकैद भी न काटनी पड़ती. लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया और…

रोज की तरह 28 सितंबर, 2011 को भी मेपल बटालिया सुबह यूनिवर्सिटी जाने के लिए तैयार हुई तो बड़ी बहन रोजलीन ने कहा, ‘‘आज मैं ने कार अच्छे से साफ कर दी है, कई दिनों से साफ नहीं हुई थी न. तू मेरा एमपी-3 प्लेयर भी ले जा. म्यूजिक सुनते हुए ड्राइविंग में बड़ा मजा आता है.’’

‘‘ठीक है दीदी, लेकिन मुझे यूनिवर्सिटी जल्दी पहुंचना है. क्लास से पहली स्टडी भी करनी है. मुझे म्यूजिक का ज्यादा शौक है नहीं, सिर्फ खाली समय में खुद को हल्का महसूस करने के लिए सुन लेती हूं.’’ मेपल ने कहा.

‘‘चल ठीक है, अब देर मत कर.’’ रोजलीन ने कहा.

मेपल किताबें और पर्स ले कर कार में बैठी और यूनिवर्सिटी चली गई. वह कनाडा के सुर्रे की साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी में हेल्थ साइंस ग्रैजुएशन की प्रथम वर्ष की छात्रा थी.  मेपल ही नहीं, उस का पूरा परिवार कनाडा का नागरिक था. लेकिन वे मूलरूप से भारत के रहने वाले थे. मेपल भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में पैदा हुई थी. उस के परिवार में पति हरकीरत उर्फ हैरी बटालिया, मां सरबजीत, 2 बड़ी बहनें रोजलीन उर्फ रोजी और सिमरन थीं.

मुंबई में रहने के दौरान हरकीरत ड्राइवर की नौकरी कर के किसी तरह परिवार को पाल रहे थे. आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी. मेपल 3 महीने की थी, तभी हरकीरत के किसी दोस्त ने उस से कहा कि यहां रह कर उस की आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं होने वाला है. उस की 3 बेटियां हैं, उन्हें पढ़ानेलिखाने और शादी करने में ही उस की जिंदगी खप जाएगी. फिर भी वह पैसों के अभाव में न बेटियों को अच्छी शिक्षा दिला पाएगा और न अच्छे घरों में उन की शादियां कर पाएगा.

‘‘तो फिर क्या करूं?’’ हरकीरत ने पूछा था.

‘‘तू कनाडा चला जा. उसे तो मिनी पंजाब कहा जाता है. तुझे वहां कोई न कोई रोजगार मिल ही जाएगा. कुछ नहीं होगा तो टैक्सी चला कर अच्छी कमाई कर लेगा. वहां रह कर बेटियों को अच्छी तरह पढ़ा भी लेगा और अच्छे घरों में उन की शादियां भी कर देगा.’’ दोस्त ने कहा.

‘‘भाई, तू कह तो ठीक रहा है, मेरे कई रिश्तेदार वहां हैं. जब वे गए थे, खस्ताहाल थे, अब दौलत में खेल रहे हैं. मैं भी कोशिश करता हूं.’’ हरकीरत ने कहा.

और फिर किसी तरह कोशिश कर के हरकीरत परिवार सहित कनाडा चला गया. कुछ दिनों तक उस ने वहां टैक्सी चलाई, उस के बाद अपना रोजगार कर लिया. धीरेधीरे रोजगार बढ़ा तो आर्थिक स्थिति बेहतर होती गई. बेटियों का अच्छे स्कूल में एडमिशन करा दिया. उस की दोनों बड़ी बेटियां पढ़ाई में बस ठीकठाक कही जा सकती थीं. लेकिन सब से छोटी मेपल काफी तेज दिमाग की थी. वह स्कूल की हर तरह की गतिविधियों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. हरकीरत को अपनी इस बेटी से काफी उम्मीदें थीं. मेपल पढ़ाई में जितनी तेज थी, उतनी ही खूबसूरत भी थी. हंसमुख और खुले विचारों की भी थी.

अपनी दोनों बहनों के मुकाबले मेपल का हाथ भी ज्यादा खुला था. वह खुल कर खर्च करती थी. उस का कहना था कि जिंदगी खुल कर जीने के लिए है. एकएक पल ऐसा जीना चाहिए कि यादगार बन जाए. स्कूल में उस की दोस्ती लड़कियों से ही नहीं, तमाम लड़कों से भी थी. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मेपल ने डाक्टर बनने के लिए हेल्थ साइंस में एडमिशन लिया था. लेकिन वह सिर्फ स्टूडेंट ही नहीं थी, मौडल और अभिनेत्री भी थी. वह मौडलिंग तो कर ही रही थी, ‘डायरी औफ विंपी किड’ फिल्म में छोटी सी भूमिका भी की थी. सेंट्रल सिटी मौल द्वारा आयोजित मौडल खोज प्रतियोगिता में हिस्सा ले कर वह फाइनल राउंड तक पहुंच गई थी. उस का फाइनल होना अभी बाकी था.

मेपल यूनिवर्सिटी पहुंची तो पार्किंग में ही उस की एक दोस्त मिल गई. दोनों पार्किंग की एक बैंच पर बैठ कर पढ़ाई कर करने लगीं. अचानक मेपल किताब ले कर उठी और टहलते हुए पढ़ने लगी. उसी बीच उस से कूछ दूरी पर एक कार आ कर रुकी. कार से 2 लड़के उतरे. कार चला रहे युवक ने इधरउधर देखा और स्वचालित आधुनिक रिवौल्वर से मेपल पर गोलियां चला दीं. गोलियों की गूंज से कैंपस गूंज उठा. गोलियों की आवाज सुन कर मेपल की सहेली दौड़ कर जब तक उस के पास पहुंचती, वह लहूलुहान हो जमीन पर गिर चुकी थी. गोलियां चलाने वाला लड़का अपने साथी के साथ कार से भाग गया था.

यूनिवर्सिटी स्टाफ, प्रोफेसर, स्टूडेंट एकत्रित हो गए. घटना की सूचना पुलिस को भी दे दी गई थी. सुर्रे सिटी के तमाम पुलिस अधिकारी कुछ ही मिनटों में वहां पहुंच गए थे. एंबुलैंस द्वारा मेपल को सिटी अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. घटना की सूचना मेपल के पिता हरकीरत को भी दे दी गई थी. वह पत्नी और बड़ी बेटी रोजलीन के साथ अस्पताल पहुंचे. इस के बाद लाश का पोस्टमार्टम कराया गया. उस के बाद लाश उन्हें सौंप दी गई. 8 अक्तूबर को उन्होंने डल्टास रिवर के किनारे उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पूरा परिवार मेपल की मौत से काफी दुखी था.

पुलिस को मिली पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, गोलियां थोड़ी दूर से चलाई गई थीं. 2 गोलियां उस के दिल के करीब, एक पेट में, एक माथे पर तथा एक गरदन पर लगी थी. ये पांचों गोलियां एक ही रिवौल्वर से चलाई गई थीं. हमलावर कौन थे? यह किसी को पता नहीं था. उस समय यूनिवर्सिटी कैंपस स्थित पार्किंग में खास चहलपहल नहीं थी. 2-4 स्टूडेंट ही इधरउधर थे. क्योंकि उस समय यूनिवर्सिटी के क्लास शुरू होने में काफी देर थी. मेपल, उस की सहेली और जो अन्य स्टूडेंट थे, वे पढ़ने की गरज से समय से पहले आ गए थे. वहां के शांत वातावरण में ठीक से पढ़ाई हो जाती थी.

मेपल की सहेली बस इतना ही बता पाई थी कि पढ़तेपढ़ते अचानक मेपल उठी और टहलते हुए पढ़ने लगी. अचानक गोलियां चलने की आवाज से वह चौंकी. जब उसे लगा कि गोलियां उसी पर चलाई गई हैं तो वह उस की ओर भागी. जब उस ने पलट कर देखा तो हमलावर कार में बैठ रहे थे. इसलिए उस ने सिर्फ उन की पीठ देखी थी, शक्ल नहीं. करीब 50 पुलिस अधिकारी इस मामले की जांच में लगे थे. मेपल के दोस्त सायर से पूछताछ की गई. उस ने बताया, ‘‘मेपल समझदार और खुशमिजाज लड़की थी. सालों से उस का प्रेमसंबंध पंजाबी समुदाय के गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी से था, जो उस की हत्या के कुछ दिनों पहले ही टूटा था. गुरजिंदर उस का पहला प्रेम था.

प्रेमसंबंध टूटने के बाद दोनों के बीच तनाव चल रहा था. गुरजिंदर अकसर उस का पीछा करता था. हत्या से पहले 24 सितंबर, 2011 को मेपल ने सुर्रेटिम होर्टंस में गुरजिंदर धालीवाल पर हमले का आरोप लगाया था. उस ने अपने बयान में कहा था कि जिस समय वह अपने एक बौयफ्रैंड के साथ कौफी शौप में थी तो गुरजिंदर वहां पहुंच गया था. लड़ाईझगड़ा करते हुए वह मारपीट पर उतारू हो गया था. उस ने उसे देख लेने की धमकी भी दी. बाद में मेपल ने अपने बयान वापस ले लिए थे, जिस से गुरजिंदर पर कोई केस नहीं चला था.’’

हरकीरत ने भी गुरजिंदर पर शक जाहिर किया था. गुरजिंदर शक के दायरे में था. लेकिन उस से पूछताछ से पहले पुलिस यूनिवर्सिटी में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देख लेना चाहती थी. फुटेज में यह तो दिख रहा था कि मेपल की हत्या में 2 युवकों का हाथ है, जो कार से वहां आए थे. लेकिन उस फुटेज से उन की पहचान करना आसान नहीं था.

पुलिस ने गुरजिंदर को हिरासत में ले लिया. उस से लंबी पूछताछ की गई, लेकिन उस के चेहरे के हावभाव और बातों से जरा भी नहीं लग रहा था कि उस ने किसी की हत्या की है. पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत भी नहीं थे, इसलिए उसे छोड़ दिया गया. लेकिन पुलिस उस की चोरीछिपे निगरानी करती रही. पुलिस ने मेपल और गुरजिंदर के मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स भी निकलवाई थी. इस से भी किसी खास आधार पर गुरजिंदर को दोषी करार नहीं दिया जा सकता था.

हालांकि कामयाबी नहीं मिल रही थी, फिर भी पुलिस हार मानने को तैयार नहीं थी. मेपल जिस मौडल खोज प्रतियोगिता में भाग ले रही थी, उस का फिनाले 15 अक्टूबर, 2011 को होना था. मेपल के विजेता बनने की संभावना थी. कहीं किसी प्रतिद्वंद्वी ने उस की हत्या न करा दी हो, पुलिस ने इस की भी जांच की. दूसरी ओर आयोजकों ने मेपल की हत्या से दुखी हो कर प्रतियोगिता को जनवरी तक के लिए टाल दिया था.

धीरेधीरे 5 महीने बीत गए, मेपल की हत्या की गुत्थी नहीं सुलझी. पुलिस ने तमाम अपराध करने वालों से भी पूछताछ कर ली थी, ड्रग्स रैकट से भी जोड़ कर छानबीन की गई थी, पर कोई तथ्य हाथ नहीं लगा था. न तो मेपल किसी तरह के ड्रग्स की आदी थी और न ही उस के किसी दोस्त के ड्रग्स गिरोह से किसी प्रकार के संबंध थे. कहीं ये सैक्स माफियाओं का काम न हो, इस दृष्टि से भी जांच की गई थी, लेकिन सारी कोशिशें बेकार गई थीं.

मेपल की हत्या को एक साल गुजर गया. 28 सितंबर, 2012 को उस की पहली बरसी थी. बरसी वाले दिन सुर्रे पार्क में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया, जिस में करीब 2 सौ लोगों ने भाग ले कर मेपल को श्रद्धांजलि दी. इस सभा में लोगों ने कामना की कि उस का हत्यारा जल्द से जल्द पकड़ा जाए, ताकि उस की आत्मा को शांति मिल सके.

इसी आयोजन में हरकीरत बटालिया ने बटालिया परिवार की ओर से मेपल स्कौलरशिप मेमोरियल फंड्स की स्थापना की घोषणा की. इस संस्था की ओर से साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी, जिस में मेपल पढ़ती थी, में आर्ट्स और हेल्थ साईंस पढ़ने वाली आर्थिक रूप से कमजोर लड़कियों की अर्थिक मदद का ऐलान किया गया. बटालिया परिवार की ओर से इस संस्था में 50 हजार डालर की राशि दान स्वरूप दी गई. इस संस्था में सामाजिक कार्य करने वाले तथा व्यवसाई भी दान कर सकते थे.

इस के अलावा उन्होंने पुलिस से लिखित रूप से मेपल के हत्यारे को पकड़ने की अपील करने के साथ अब तक की गई कोशिशों के लिए धन्यवाद भी दिया. पुलिस के लिए मेपल हत्याकांड पहेली बना हुआ था. पुलिस ने हर तरकीब अपना ली थी, पर कोई सुराग नहीं मिला था. लेकिन उस के मुखबिर अब भी मुस्तैद थे और गुरजिंदर तथा उस के खास दोस्तों की अभी तक निगरानी रखी जा रही थी. आखिर पुलिस को एक दिन सफलता मिल ही गई. 1 दिसंबर की रात गुरजिंदर का 22 वर्षीय दोस्त गुरसिमर बेदी एक बार में दोस्तों के साथ शराब पी रहा था. तभी उस के मुंह से निकला, ‘‘देखो, एक साल पहले हम ने कितनी होशियारी से मेपल की हत्या की कि आज तक पुलिस कोई सुराग नहीं लगा पाई.’’

अगली ही टेबल पर बैठे पुलिस के मुखबिर ने यह बात सुन ली. उस ने तुरंत पुलिस को फोन कर के बुला लिया. मुखबिर के इशारे पर गुरसिमर को पकड़ लिया गया. खुद को पुलिस से घिरा देख वह घबरा गया और उस का सारा नशा उतर गया. उस की समझ में आ गया कि अब बचना मुश्किल है. उसे पुलिस स्टेशन लाया गया, जहां सीधे पूछा गया कि मेपल बटालिया की हत्या किस ने की और क्यों की?

बिना किसी लागलपेट के गुरसिमर ने सच बोल दिया, ‘‘मेपल की हत्या गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी ने की थी. उस के साथ मैं भी था. मैं ने ही उसे वह रिवौल्वर उपलब्ध कराई थी, जिस से मैपल को गोली मारी गई थी. उस ने यह हत्या क्यों की, यह मुझे मालूम नहीं. मैं तो उस का साथ दोस्ती की वजह से देने को तैयार हो गया था. मेरी समझ में अभी तक नहीं आया कि दोनों गहरे दोस्त थे, एकदूसरे को प्यार भी करते थे, इस के बावजूद उस ने मेपल की हत्या कर दी?’’

‘‘इस समय वह कहां मिलेगा?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘अपने घर पर.’’ गुरसिमर ने कहा.

गुरसिमर बेदी को साथ ले कर पुलिस ने गुरजिंदर के घर छापा मारा. उस समय रात के साढ़े 12 बज रहे थे. वह अपने बैडरूम में सो रहा था. उस के घर वालों से उस के बारे में पूछा गया तो उन्होंने पूछा, ‘‘आप लोग उसे क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘एक साल पहले उस ने एक लड़की की हत्या की थी. उसी अपराध में उसे गिरफ्तार करना है.’’ एक पुलिस अधिकारी ने कहा.

‘‘वह ऐसा कतई नहीं कर सकता, आप को कोई गलतफहमी हुई है. वह एक होनहार और नेक चालचलन वाला लड़का है.’’ उस के पिता ने कहा.

घरवालों की लाख कोशिश के बावजूद पुलिस गुरजिंदर को गिरफ्तार कर के पुलिस स्टेशन ले आई. वह बारबार कहता रहा, ‘‘मैं ने मेपल की हत्या नहीं की. मैं तो उसे दिल की गहराई से प्यार करता था. भला मैं उस की हत्या कैसे कर सकता हूं.’’

गुरसिमर को उस के सामने बैठा कर एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘इस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और सबूत भी दे दिए हैं. तुम्हारे पास बचाव का अब कोई रास्ता नहीं है. सच्चाई स्वीकार करने में ही तुम्हारी भलाई है.’’

‘‘मैं ने किसी की हत्या नहीं की.’’ गुरजिंदर अपनी बात पर अड़ा रहा.

‘‘ठीक है, अब लाई डिटेक्टर से ही पता चलेगा कि तुम सच बोल रहे हो या झूठ?’’ पुलिस अधिकारी ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया.

इस के बाद गुरजिंदर घबरा गया. झूठ के सहारे आगे चलना उसे कठिन लगा. ऐसे में उसे सच बोल देना ही ठीक लगा. उस ने कहा, ‘‘हां, मैं ने ही की है मेपल की हत्या. मैं उस की हत्या करना नहीं चाहता था. मैं तो उस के साथ सारी जिंदगी बिताना चाहता था, लेकिन उस ने काम ही ऐसा किया कि मजबूर हो कर मुझे उस की हत्या करनी पड़ी.’’

19 वर्षीया मेपल बटालिया जिस एंवर करिक सैकेंडरी स्कूल में पढ़ती थी, उसी में गुरजिंदर भी पढ़ता था. मेपल जब हाईस्कूल में पढ़ रही थी, तभी उस की मुलाकात गुरजिंदर से हुई थी. दोनों ने एकदूसरे को आकर्षित किया तो उन के बीच दोस्ती हो गई. बाद में उन्हें पता चला कि उन के परिवार एकदूसरे से परिचित हैं. इस से दोस्ती और भी गहरी हो गई. दोनों का एकदूसरे के घर भी आनाजाना होने लगा. दोनों की मम्मियां अकसर साथसाथ शौपिंग के लिए जाती थीं.

मेपल चंचल स्वभाव की थी, जबकि गुरजिंदर गंभीर और शर्मीला. विपरीत स्वभाव का होने के बावजूद दोनों में खूब पटती थी. मेपल सैकेंडरी में पहुंची तो दोनों का आकर्षण और बढ़ गया. गुरजिंदर यूनिवर्सिटी में पहुंच गया था. नजदीकी तो पहले से ही थी. अब दोनों इस दोस्ती को एक रिश्ते का नाम देना चाहते थे. गुरजिंदर शर्मीले स्वभाव की वजह से दिल की बात जुबान पर नहीं ला पाया. पर मेपल ने पहल करते हुए एक दिन प्रपोज कर दिया, ‘‘क्या मेरे साथ डेट पर चलोगे?’’

दोनों अकसर साथसाथ घूमते थे, पर डेट पर जाने का अर्थ दूसरा ही था. इसलिए मेपल के प्रस्ताव पर गुरजिंदर शरमा गया. उस ने मुसकरा कर सिर हिला दिया. छुट्टी के दिन दोनों ने डेट पर जाने का प्रोग्राम बनाया. गुरजिंदर अपनी कार से उसे डोनियाल पार्क ले गया, जहां वे एकांत में बैठ कर बातें करने लगे. अचानक मेपल ने पूछा, ‘‘क्या तुम मुझ से प्यार करते हो?’’

गुरजिंदर इधरउधर देखने लगा. उसे जवाब न देते देख मेपल ने अपना प्रश्न दोहराया. इस पर उस ने सिर्फ यही कहा, ‘‘क्या तुम…?’’

‘‘पहले तुम बताओ, सवाल पहले मैं ने किया है तो जवाब पहले तुम दोगे.’’ मेपल ने शरारती अंदाज में कहा.

‘‘अगर मैं हां कहूं तो.’’ गुरजिंदर ने कहा.

‘‘ऐसे नहीं, मुझे प्रपोज करो.’’ मेपल बोली.

‘‘मुझे प्रपोज करना नहीं आता.’’ गुरजिंदर अब भी शरमा रहा था.

‘‘अच्छा बाबा, मैं ही प्रपोज करती हूं, मैं तुम से बेहद बेहद प्यार करती हूं.’’ मेपल ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘मैं भी तुम से प्यार करता हूं. साथ ही वादा करता हूं कि हमेशा इसी तरह प्यार करता रहूंगा.’’ गुरजिंदर ने कहा.

इस के बाद दोनों एकदूसरे से खुल गए. उन की बातचीत का अंदाज बदल गया. उन के होंठ भी कई बार आपस में टकराए, पर उन्होंने इस से आगे की हद पार नहीं की. इस के बाद मेपल और गुरजिंदर ज्यादा से ज्यादा एकदूसरे के करीब रहने लगे. उन के घर वालों को उन के प्यार का पता नहीं था. उन्हें तो सिर्फ यही मालूम था कि दोनों अच्छे दोस्त हैं.

मेपल ने सेकेंडरी पास कर के साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी में हेल्थ साइंस में एडमिशन ले लिया. वहीं वह मौडलिंग भी करने लगी. वहीं से उसे लघु फिल्म ‘डायरी औफ विंपी किड’ में एक भूमिका मिल गई. इस से उस के हौसले और बढ़ गए. वह अकसर मौडलिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी. इस के बावजूद उस ने पढ़ाई को नजरअंदाज नहीं किया. वह पढ़ाई को भी पूरा समय देती थी. वहीं गुरजिंदर ग्रैजुएशन पूरा कर के पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगा था.

प्यार की नींव विश्वास पर टिकी होती है. दोनों के बीच विश्वास था भी पर गुरजिंदर का विश्वास उस दिन डगमगा गया, जब उस ने मेपल को एक अन्य युवक के साथ यूनिवर्सिटी में हाथ में हाथ डाले घूमते देख लिया. उस दिन वह मेपल से मिलने यूनिवर्सिटी गया था. यह उसे अच्छा नहीं लगा, इसलिए निराश मन से वह बिना मिले ही लौट गया. जब दोनों दूसरे दिन मिले तो गुरजिंदर ने पूछा, ‘‘कल तुम्हारे साथ कौन लड़का था?’’

‘‘क्लास में पढ़ता है. हम दोनों में अच्छी दोस्ती है. पर तुम्हें मेरा उस के साथ घूमना बुरा क्यों लगा, यह तो आम बात है.’’ मेपल ने कहा.

गुरजिंदर उस के जवाब से संतुष्ट नहीं था. उस ने कहा, ‘‘मुझे यह अच्छा नहीं लगता. मैं नहीं चाहता कि कोई तुम्हें छुए भी.’’

बात आईगई हो गई. कुछ दिनों बाद गुरजिंदर कौफी शौप में कुछ दोस्तों के साथ गया तो वहां एक प्राइवेट केबिन में उस की नजर चली गई. वहां मेपल किसी लड़के के साथ अश्लील मुद्रा में बैठी थी. यह देख कर वह गुस्से से कांपने लगा. उस ने उस केबिन में जा कर दोनों को भलाबुरा कहने के साथसाथ मेपल से अपना कौमार्य टेस्ट कराने को कहा. उस ने कहा कि उसे शक है कि उस के कई लड़कों से शारीरिक संबंध हैं.

इस पर मेपल खुद पर काबू नहीं रख पाई. वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम कौन होते हो मुझ पर इस तरह का इल्जाम लगाने वाले. किस हक से तुम मुझे कुंवारेपन का टेस्ट कराने को कह रहे हो. हमारे बीच प्यार है, हम ने शादी नहीं की, जो तुम इस तरह हक जता रहे हो.’’

‘‘लेकिन मैं तो तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारने की सोच बैठा हूं.’’ गुरजिंदर ने कहा.

‘‘यह तुम्हारी सोच है, जरूरी नहीं कि मेरी भी यही सोच हो. मैं जिंदगी को बांधना नहीं चाहती. मैं खुल कर जीने में विश्वास रखती हूं. तुम्हें अच्छा नहीं लगता तो तुम अपना रास्ता अलग कर सकते हो.’’ मेपल ने दो टूक जवाब दिया.

गंभीर स्वभाव का गुरजिंदर बौखला गया. पर उस ने खुद पर संयम रखा. 24 सितंबर, 2011 को उस ने मेपल को उसी लड़के के साथ फिर देखा तो खुद पर काबू नहीं रख पाया और दोनों से उलझ पड़ा. वह मारपीट तक पर उतारू हो गया. उस का यह रूप देख कर मेपल ने इस की शिकायत पुलिस से कर दी, पर दूसरे दिन उस ने अपनी शिकायत वापस ले ली. हां, उस ने गुरजिंदर को चेतावनी जरूर दी कि आइंदा वह उस की जिंदगी में दखल न दे, वरना परिणाम अच्छा नहीं होगा.

‘‘परिणाम किस का अच्छा होगा, किस का बुरा यह तो अब पता चलेगा.’’ गुरजिंदर बड़बड़ाया.

उस ने मेपल को सबक सिखाने की योजना बना कर अपने दोस्त गुरसिमर बेदी से बात की. गुरजिंदर ने उस से सहयोग मांगा तो वह तैयार हो गया. उस ने साथ देने का वादा तो किया ही, साथ ही उस के कहे अनुसार एक रिवौल्वर का इंतजाम भी कर दिया. इस के बाद उस ने मेपल पर नजर रखनी शुरू कर दी. 28 सितंबर, 2011 को मेपल यूनिवर्सिटी के लिए घर से निकली तो दोनों उस का पीछा करते हुए वहां पहुंच गए और मौका देख यूनिवर्सिटी कैंपस में कार रोक कर गुरजिंदर ने उस पर गोलियां चला दीं और भाग खड़े हुए. मेपल के मरने की खबर गुरजिंदर को अपने घर वालों से मिल चुकी थी, क्योंकि वे मेपल के अंतिम संस्कार में गए थे, पर वह मेपल के घर शोक जताने भी नहीं गया.

पुलिस ने शक के आधार पर उसे हिरासत में भी लिया, पर वह झूठ बोल कर शक के दायरे से निकल गया. अंत में साल भर बाद उस का गुनाह सामने आ गया और वह पकड़ा गया. गुरजिंदर और गुरसिमर को सुर्रे सिटी कोर्ट में पेश किया गया, वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. 17 सितंबर, 2012 को अगली पेशी पर गुरजिंदर के वकीलों ने उसे निर्दोष बताते हुए सबूत भी दिए, पर कोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया.

30 अप्रैल, 2013 को पुलिस ने दोनों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दी. चार्जशीट, गवाह और सबूतों के आधार पर कोर्ट ने दोनों को दोषी करार दिया. यह संयोग ही था कि 28 सितंबर, 2011 को मेपल की हत्या हुई थी और 28 सितंबर, 2014 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी को साजिश रचने व हत्या करने के आरोप में 19 साल की सश्रम कारावास की सजा तथा उस के साथी गुरसिमर बेदी को साजिश में शामिल होने और हथियार मुहैया कराने के आरोप में 8 साल की सजा सुनाई.

कथा लिखे जाने तक 15 नवंबर, 2015 को गुरजिंदर के वकील ने जमानत की अर्जी कोर्ट में लगाई थी, पर कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए अर्जी खारिज कर दी थी. Canada

Husband Wife Conflict: फर्क देवर और पति में

Husband Wife Conflict: मातृत्व सुख न पाने से शांति बेचैन रहने लगी थी, इस के लिए वह पति को दोषी मानती थी. जब उस ने यह बात पति से कही तो वह उस से लड़ाईझगड़ा ही नहीं करने लगा, बल्कि शराब पी कर मारनेपीटने भी लगा. इस के बाद शांति ने इस सब से छुटकारा पाने के लिए क्या किया.

19 नवंबर की सुबह 10 बजे राजू थाना लहरापुर पहुंचा और थानाप्रभारी धर्मपाल सिंह को बताया कि बीती रात किसी ने उस के भाई वीरेंद्र की गोली मार कर हत्या कर दी है. उस की लाश गांव के बाहर नलकूप वाले कमरे में पड़ी है. हत्या की खबर पा कर धर्मपाल सिंह ने राजू से कुछ सवाल पूछे और पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. रवानगी से पहले उन्होंने सीओ राकेश सिंह को भी घटना से अवगत करा दिया था.

राजू लहरापुर थाने के गांव अनेसों का रहने वाला था, जो थाने से 7 किलोमीटर दूर उत्तरपश्चिम दिशा में था. पुलिस को वहां पहुंचने में आधे घंटे का समय लगा. घटनास्थल पर भीड़ जुटी हुई थी. थानाप्रभारी धर्मपाल सिंह भीड़ को हटा कर उस कमरे के अंदर पहुंचे, जहां वीरेंद्र की लाश पड़ी थी. लाश के पास मृतक की पत्नी शांति दहाड़ें मार कर रो रही थी. कमरे में पड़ी चारपाई पर वीरेंद्र की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. बिस्तर खून से तरबतर था. दीवारों पर भी खून के छींटें पड़े थे. वीरेंद्र के सीने में गोली मारी गई थी, जिस से उस की मौत हो गई थी. मृतक की उम्र 35 साल के आसपास रही होगी.

थानाप्रभारी धर्मपाल सिंह अभी जांचपड़ताल कर ही रहे थे कि सीओ राकेश सिंह भी आ गए. उन्होंने फोरेंसिक टीम को भी घटनास्थल पर बुला लिया था. टीम ने कमरे से साक्ष्य एकत्र कर लिए. राकेश सिंह ने भी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, मृतक की पत्नी भाई तथा गांव के मुखिया से पूछताछ की. पूछताछ में मृतक के भाई राजू ने बताया कि उस का बड़ा भाई वीरेंद्र नलकूप की रखवाली के लिए रात को नलकूप के कमरे में सोता था. कभीकभी वह खुद भी वहां सो जाता था. बीती रात 8 बजे खाना खा कर वह नलकूप पर सोने आ गए थे.

सुबह 8 बजे वह उन के लिए नाश्ता ले कर आया तो देखा कि किसी ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी थी. उस ने हत्या की जानकारी पहले भाभी शांति को दी, उस के बाद गांव के अन्य लोगों को. इस के बाद हत्या की सूचना देने थाना लहरापुर चला गया.

‘‘तुम्हारे भाई की गांव में किसी से रंजिश तो नहीं है?’’ राकेश सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, हमारी गांव में किसी से कोई रंजिश नहीं है.’’

‘‘कोई लेनदेन का विवाद?’’

‘‘नहीं, भैया किसी से कोई लेनदेन नहीं करते थे. हम अपनी हैसियत के मुताबिक ही रहते थे. कर्ज लेना भैया को बिलकुल पसंद नहीं था. हां, वह शराब के शौकीन जरूर थे, लेकिन खानेपीने में अपना ही पैसा खर्च करते थे.’’

राकेश सिंह ने मृतक की पत्नी शांति से पूछताछ की तो वह फफकफफक कर रो पड़ी. चंद मिनट बाद उस के आंसुओं का सैलाब रुका तो बोली, ‘‘साहब, मेरे पति अच्छेभले थे. कोई तनाव या परेशानी नहीं थी. रात 8 बजे खाना खा कर वह नलकूप पर सोने आए थे. पता नहीं रात में किस ने मेरा सुहाग उजाड़ दिया. सुबह देवरजी उन्हें नाश्ता देने आए तो हमें उन की हत्या की जानकारी मिली.’’

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ धर्मपाल सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, मुझे चोरों पर शक है. लगता है, रात में चोर नलकूप की मोटर चुराने आए थे, वह जाग गए होंगे और चोरों को ललकारा होगा, तब उन्होंने गोली मार दी होगी.’’

गांव के मुखिया भगवत ने सीओ राकेश सिंह को चौंकाने वाली जानकारी दी. उन्होंने बताया कि वीरेंद्र की हत्या का राज घर में ही छिपा है. वीरेंद्र की पत्नी शांति का चालचलन ठीक नहीं है. उस के अपने देवर राजू से नाजायज रिश्ते हैं. वीरेंद्र उन अवैध रिश्तों का विरोध करता था, साथ ही शांति से मारपीट भी. शक है कि शांति और राजू ने मिल कर वीरेंद्र को मार डाला है. यह जानकारी मिलते ही राकेश सिंह ने राजू को हिरासत में ले लिया और मृतक वीरेंद्र के शव को पोस्टमार्टम के लिए औरैया जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह राजू को ले कर थाना लहरापुर आ गए.

थाने पर राकेश सिंह तथा धर्मपाल सिंह ने राजू से पूछताछ शुरू की तो वह घडि़याली आंसू बहाने लगा. उस की आंखों से बहते आंसू देख कर एक बार तो ऐसा लगा कि वह निर्दोष है. लेकिन जब धर्मपाल सिंह ने राजू से कड़ाई से पूछताछ की तो वह टूट गया और भाई की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. अगले दिन पुलिस ने राजू की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा भी बरामद कर लिया, जिसे उस ने अपने खेत के पास झाडि़यों में छिपा दिया था. राजू गिरफ्तार हुआ तो शांति घबरा गई. वह अपना सामान समेट कर भागने की तैयारी कर रही थी कि पुलिस ने उसे भी पकड़ लिया. थाने पर जब उस का सामना अपने देवर राजू से हुआ तो उस ने भी सच बताना ठीक समझा. उस ने बड़ी आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया.

चूंकि राजू और उस की भाभी शांति ने वीरेंद्र की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए धर्मपाल सिंह ने मृतक के चचेरे भाई ध्रुवपाल को वादी बना कर राजू व शांति के खिलाफ वीरेंद्र की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के साथ ही दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. दोनों से की गई पूछताछ में अवैध रिश्तों की सनसनीखेज कहानी प्रकाश में आई. औरैया जनपद में तिरवाबिंदियापुर रोड पर  एक कस्बा है सहार. इसी कस्बे में रहने वाले राजकुमार की बेटी थी शांति. राजकुमार ने शांति का विवाह औरैया जिला के थाना लहरापुर के अंतर्गत आने वाले अनेसों गांव निवासी वीरेंद्र के साथ किया था.

वीरेंद्र के मातापिता की मौत हो चुकी थी. वह अपने छोटे भाई राजू के साथ रहता था. उस के पास 10 बीघा जमीन थी, जिस में अच्छी उपज होती थी. कुल मिला कर उन का जीवन खुशहाल था. देखतेदेखते 5 साल बीत गए, पर शांति की गोद सूनी ही रही. गोद सूनी रहने का दोष शांति अपने पति पर देती थी,  जिस से दोनों में झगड़ा होता रहता था. इस झगड़े से वीरेंद्र इतना परेशान हो जाता था कि वह शराब के ठेके पर पहुंच जाता और फिर लड़खड़ाते कदमों से ही घर लौटता. धीरेधीरे 3 साल और बीत गए. लेकिन शांति को मातृत्व सुख नहीं मिला. शांति समझ गई कि वह अक्षम पति से मातृत्व सुख कभी प्राप्त नहीं कर सकती. इसलिए वह पति से घृणा करने लगी.

शराब पीने को ले कर दोनों में झगड़ा इतना बढ़ता कि वीरेंद्र शांति को जानवरों की तरह पीट देता. समय के साथ मनमुटाव इतना बढ़ा कि वीरेंद्र घर के बजाय खेत पर बनी नलकूप की कोठरी में सोने लगा. शांति स्वभाव से मिलनसार थी. राजू भाभी के प्रति सम्मोहित था. जब दोनों साथ चाय पीने बैठते, तब शांति उस से खुल कर हंसीमजाक करती. शांति का यह व्यवहार धीरेधीरे राजू को ऐसा बांधने लगा कि उस के मन में शांति का सौंदर्यरस पीने की कामना जागने लगी. एक दिन राजू खाना खाने बैठा तो शांति थाली ले कर आई और जानबूझ कर गिराए गए आंचल को ढंकते हुए बोली, ‘‘लो देवरजी खाना खा लो, आज मैं ने तुम्हारी पसंद का खाना बनाया है.’’

राजू को भाभी की यह अदा बहुत अच्छी लगी. वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘भाभी, तुम भी अपनी थाली परोस लो, साथ खाने में मजा आएगा.’’

खाना खाते वक्त दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो राजू बोला, ‘‘भाभी, तुम सुंदर और सरल स्वभाव की हो, लेकिन भैया ने तुम्हारी कद्र नहीं की. मुझे पता है कि अभी तक तुम्हारी गोद सूनी क्यों है? वह अपनी कमजोरी की खीझ तुम पर उतारते हैं. लेकिन मैं तुम्हें प्यार करता हूं.’’

यह कह कर राजू ने शांति की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. सच में शांति पति से संतुष्ट नहीं थी. उसे न तो मातृत्व का सुख प्राप्त हुआ था और न ही शारीरिक सुख, जिस से उस का मन विद्रोह कर उठा. उस का मन बेईर्मान हो चुका था. आखिरकार उस ने फैसला कर लिया कि अब वह असंतुष्ट नहीं रहेगी. इस के लिए उसे रिश्तों को तारतार क्यों न करना पड़े.

औरत जब जानबूझ कर बरबादी के रास्ते पर कदम रखती है तो उसे रोक पाना मुश्किल होता है. यही शांति के साथ हुआ. शांति जवान भी थी और पति से असंतुष्ट भी. वह मातृत्व सुख भी चाहती थी. अत: उस ने देवर राजू के साथ नाजायज रिश्ता बनाने का निश्चय कर लिया. राजू वैसे भी शांति का दीवाना था. एक शाम शांति बनसंवर कर चारपाई पर लेटी थी. तभी राजू आ गया. वह उस की खूबसूरती को निहारने लगा. शांति को राजू की आंखों की भाषा पढ़ने में देर नहीं लगी. शांति ने उसे करीब बैठा लिया और उस का हाथ सहलाने लगी. राजू के शरीर में हलचल मचने लगी.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद होश दुरुस्त हुए तो शांति ने राजू की ओर देख कर कहा, ‘‘देवरजी, तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो. लेकिन हमारे बीच रिश्ते की दीवार है. अब मैं इस दीवार को तोड़ना चाहती हूं. तुम मुझे बस यह बताओ कि हमारे इस नए रिश्ते का अंजाम क्या होगा?’’

‘‘भाभी, मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं दूंगा. तुम अपना बनाओगी तो तुम्हारा ही बन कर रहूंगा.’’ कह कर राजू ने शांति को बाहों में भर लिया.

ऐसे ही कसमोंवादों के बीच कब संकोच की सारी दीवारें टूट गईं, दोनों को पता ही नहीं चला. उस दिन के बाद राजू और शांति बिस्तर पर जम कर सामाजिक रिश्तों और मानमर्यादाओं की धज्जियां उड़ाने लगे. वासना की आग ने उन के इन रिश्तों को जला कर खाक कर दिया. राजू अपनी भाभी के प्यार में इतना अंधा हो गया कि उसे दिन या रात में जब भी मौका मिलता, वह शांति से मिलन कर लेता. शांति भी देवर के पौरुष की दीवानी थी. उन के मिलन की किसी को कानोकान खबर नहीं थी.

कहते हैं कि वासना का खेल कितनी भी सावधानी से खेला जाए, एक न एक दिन भांडा फूट ही जाता है. ऐसा ही शांति और राजू के साथ भी हुआ. एक रात पड़ोस में रहने वाली चचेरी जेठानी रूपा ने चांदनी रात में आंगन में रंगरलियां मना रहे राजू और शांति को देख लिया. इस के बाद तो इन की पापलीला की चर्चा पूरे गांव में होने लगी. वीरेंद्र को जब देवरभाभी के नाजायज रिश्तों की जानकारी हुई तो उस का माथा ठनका. उस ने इस बाबत शांति से बात की तो उस ने नाजायज रिश्तों की बात सिरे से खारिज कर दी. उस ने कहा, ‘‘राजू सगा देवर है. उस से हंसबोल लेती हूं. पड़ोसी इस का मतलब गलत निकालते हैं. उन्होंने ही तुम्हारे कान भरे हैं.’’

वीरेंद्र ने उस समय तो पत्नी की बात मान ली, लेकिन मन में शक पैदा हो गया, इसलिए वह चुपकेचुपके पत्नी पर नजर रखने लगा. परिणामस्वरूप एक रात वीरेंद्र ने शांति और राजू को रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. वीरेंद्र ने दोनों की पिटाई की और संबंध तोड़ने की चेतावनी दी. लेकिन इस चेतावनी का असर न तो शांति पर पड़ा और न ही राजू पर. हां, इतना जरूर हुआ कि अब वे सतर्कता बरतने लगे. जिस दिन वीरेंद्र, शांति को राजू से हंसतेबतियाते देख लेता, उस दिन शराब पी कर शांति को पीटता और राजू को भी भलाबुरा कहता. उस ने गांव के मुखिया से भी भाई की शिकायत की, साथ ही राजू को समझाने के लिए भी कहा कि वह घर न तोड़े.

शांति शराबी पति की मारपीट से तंग आ चुकी थी. इसलिए उस ने एक दिन शारीरिक मिलन के दौरान राजू से पूछा, ‘‘देवरजी, हम कब तक इस तरह चोरीछिपे मिलते रहेंगे? आखिर कब तक उस शराबी की मार खाते रहेंगे? कहीं किसी दिन उस ने शराब के नशे में मेरा गला घोंट दिया तो..?’’

‘‘ऐसा नहीं होगा भाभी. तुम साथ दोगी तो मैं भाई को ही ठिकाने लगा दूंगा.’’

‘‘मेरी मांग का सिंदूर मिटा कर क्या मुझे विधवा बना दोगे?’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हारी मांग में सिंदूर भर कर तुम्हें अपना बना लूंगा.’’

‘‘तो ठीक है, मैं तुम्हारा साथ दूंगी.’’

इस के बाद शांति और राजू ने वीरेंद्र की हत्या की योजना बना डाली. योजना के तहत राजू ने किसी अपराधी से 2 हजार रुपए में तमंचा व 2 कारतूस खरीदे और उन्हें घर में छिपा कर रख दिया. इस के बाद दोनों उचित समय का इंतजार करने लगे. हत्या की योजना बनने के बाद वीरेंद्र के प्रति शांति का व्यवहार नरम पड़ गया. वह दिखावटी रूप से उस के प्रति प्यार जताने लगी. कभीकभी वह शारीरिक मिलन के लिए नलकूप वाली कोठरी पर भी चली जाती. पत्नी के इस व्यवहार से वीरेंद्र को लगा कि उस ने भाई से संबंध खत्म कर लिए हैं.

18 नवंबर, 2015 की रात 8 बजे वीरेंद्र घर आया. शांति ने उसे बड़े प्यार से खाना खिलाया. इस के बाद वह खेतों पर नलकूप वाली कोठरी पर सोने चला गया. उस के जाते ही राजू और शांति ने बात कर के अपनी योजना को अंजाम तक पहुंचाने का निश्चय कर लिया. गांव के ज्यादातर लोग जब गहरी नींद सो गए तो राजू ने कमर में तमंचा खोंसा और शांति के साथ खेतों पर जा पहुंचा. शांति ने कोठरी के दरवाजे की कुंडी खटखटाई. इस पर वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘कौन?’’

‘‘मैं हूं शांति. दरवाजा खोलो.’’

वीरेंद्र ने सोचा, शांति शारीरिक मिलन के लिए आई है. इसलिए उस ने सहज ही दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही राजू ने कमर में खोसा तमंचा निकाला और वीरेंद्र के सीने पर 2 फायर झोंक दिए. गोली लगते ही वीरेंद्र खून से तरबतर हो कर चारपाई पर गिर पड़ा. चंद मिनट तड़पने के बाद उस ने दम तोड़ दिया. भाई की हत्या करने के बाद राजू ने तमंचा झाडि़यों में छिपा दिया और शांति के साथ घर आ गया. सुबह 8 बजे दिखावे के तौर पर राजू नाश्ता ले कर नलकूप पर गया और वहां से बदहवास भागता हुआ गांव आया. गांव वालों को उस ने भाई की हत्या हो जाने की जानकारी दी.

कुछ देर बाद वह थाना लहरापुर पहुंचा और थानाप्रभारी धर्मपाल सिंह को हत्या की सूचना दी. सूचना पाते ही धर्मपाल सिंह घटनास्थल पर पहुंचे और शव को कब्जे में ले कर जांचपड़ताल शुरू कर दी. जांच में देवरभाभी के नाजायज रिश्तों के चलते वीरेंद्र की हत्या का रहस्य उजागर हो गया. 21 नवंबर, 2015 को थाना लहरापुर पुलिस ने अभियुक्त राजू और शांति को औरैया कोर्ट में रिमांड मजिस्टे्रट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हुई थी. Husband Wife Conflict

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Dehradun Crime: काल बनी एक बहू

Dehradun Crime: फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही चंचल बेहद खूबसूरत और पढ़ीलिखी थी. फौजी पति की दूरियों की वजह से वह संजय के प्रेम में उलझ गई. सास ने उसे संभालने की कोशिश की तो संजय चंचल के साथसाथ करोड़ों की प्रौपर्टी के चक्कर में ऐसा अंधा हुआ कि उस ने चंचल के साथ मिल ऐसी खतरनाक साजिश रची कि…

कमला जोशी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 25 किलोमिटर दूर थाना प्रेमनगर के संपन्न गांव श्यामपुर में रहती थीं. उन के परिवार में 2 बेटे बड़ा राजेंद्र और छोटा दीपक था. दोनों बेटों का वह विवाह कर चुकी थीं. राजेंद्र खेतीबाड़ी संभालता था, जबकि दीपक भारतीय सेना में नौकरी कर रहा था. दीपक की पत्नी चंचल कमला के पास ही रहती थी. वह देहरादून में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी. वह स्कूटी से आतीजाती थी.

कमला जोशी के पास करोड़ों की प्रौपर्टी थी. घर से लगी रही उन की 4 बीघा जमीन थी, देहरादून में भी उन्होंने प्लौट खरीद रखा था. उन का परिवार वैसे तो खुशहाल था, लेकिन उन्हें एक बात की हमेशा फिक्र लगी रहती थी. दरअसल राजेंद्र का विवाह उन्होंने 7-8 साल पहले कर दिया था, लेकिन अनबन के चलते एक साल बाद ही उस का पत्नी से तलाक हो गया था. राजेंद्र का एक बेटा था भास्कर, जिसे उस ने अपने पास ही रख लिया था. 7 वर्षीय भास्कर परिवार में सभी का लाडला था.

कमला उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी थीं. वह चाहती थीं कि किसी भी तरह बड़े बेटे की गृहस्थी दोबारा बस जाए तो उन की जिम्मेदारी पूरी हो जाए. इस से एक तो राजेंद्र को सहारा मिल जाता और भास्कर को मां का प्यार. उन की छोटी बहू चंचल सुंदर होने के साथसाथ पढ़ीलिखी और समझदार थी. वह हर तरह से परिवार के सभी सदस्यों का खयाल रखती थी. थोड़ी परेशानी तब होती थी, जब चंचल दीपक के पास चली जाती थी.

दीपक की तैनाती उड़ीसा में थी. नवंबर के दूसरे सप्ताह में भी चंचल दीपक के पास चली गई थी. बड़े बेटे का घर बसाने के लिए कमला ने अपने कई नातेरिश्तेदारों से कह रखा, लेकिन उस की उम्र और एक बेटा होने की वजह से कोई उस से रिश्ता करने को तैयार नहीं था. इस के बावजूद कमला ने प्रयास नहीं छोड़ा. आखिरकार किसी ने उन्हें पिथौरागढ़ में एक रिश्ता बताया. कमला इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थीं. अपने स्तर से उन्होंने जो जानकारियां जुटाईं, उस हिसाब से लड़की और उस का परिवार दोनों ही बहुत अच्छे थे.

बातचीत हो जाने के बाद कमला ने वादा कर लिया कि वह जल्द ही लड़की देखने आएंगी. दीपक अपनी मां और भाई से बात करता रहता था. 27 नवंबर, 2015 की सुबह उस ने राजेंद्र के मोबाइल पर फोन किया तो उस की बात कमला से हुईं. उन्होंने उसे बताया कि वे लोग रास्ते में हैं और लड़की देखने के लिए पिथौरागढ़ जा रहे हैं. कमला ने बताया था कि उन के साथ राजेंद्र और भास्कर भी हैं. मां के साथ हुई दीपक की यह आखिरी बातचीत थी. क्योंकि उस ने शाम के वक्त मां के मोबाइल पर फोन किया तो वह स्विच औफ मिला. इस के बाद रात से सुबह हो गई, लेकिन दीपक की मां से दोबारा बात नहीं हो सकी.

इस से उस की चिंता बढ़ गई. उस ने किसी तरह पता कर के लड़की वालों के यहां पिथौरागढ़ फोन किया तो पता चला कि वे वहां पहुंचे ही नहीं थे, जबकि वे लोग उन का इंतजार कर रहे थे. दीपक ने अपने नातेरिश्तेदारों को भी फोन किए, पर घर वालों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. उस का मन तरहतरह की आशंकाओं से घिरने लगा. वे घर भी वापस नहीं पहुंचे थे. दीपक इस से परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वे लोग गए तो कहां गए.

कुछ नहीं सूझा तो उस ने छुट्टी ली और पत्नी चंचल के साथ अगले दिन घर पहुंच गया. जब वह अपने स्तर से उन की खोजबीन में नाकाम रहा तो उस ने स्थानीय थाना प्रेमनगर में अपनी मां, भाई और भतीजे की गुमशुदगी दर्ज करा दी. दीपक ने एसएसपी डा. सदानंद दाते से भी मिल कर परिवार को खोजने की गुजारिश की. पुलिस ने खोजबीन शुरू की तो पता चला कि 28 नवंबर को उन की कार नंबर – यूके 07 एपी 5359 उत्तर प्रदेश के रामपुर जनपद के बिलासपुर इलाके में लावारिस हालत में पाई गई थी.

दीपक ने पुलिस को बताया कि राजेंद्र कार चलाना नहीं जानते थे. पिथौरागढ़ जाने के लिए वे कोई ड्राइवर कर के गए होंगे. लेकिन उन के साथ ड्राइवर कौन गया था, यह उसे पता नहीं था. एसपी (सिटी) अजय कुमार के निर्देश पर पुलिस ने बिलासपुर पहुंच कर कार की जांचपड़ताल की. कार में सभी सामान सुरक्षित था. बारीकी से जांच की गई तो उस में एक्सिस बैंक के एटीएम की एक परची मिली. वह उपनगर काशीपुर की थी. इस से अनुमान लगाया गया कि काशीपुर में उन्होंने एटीएम का इस्तेमाल किया होगा. सदानंद दाते ने एक पुलिस टीम काशीपुर के लिए रवाना कर दी. पुलिस  ने एटीएम के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी.

इस फुटेज से पता चला कि राजेंद्र और उस की मां कमला करीब 8 मिनट एटीमए केबिन में रहे थे. बाद में उन के पास एक लंबातगड़ा युवक भी आया था, जिस से उन्होंने कुछ बात की थी. संभावना थी कि वही ड्राइवर रहा होगा. हालांकि उस का चेहरा बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं था, लेकिन पुलिस को उम्मीद थी कि उस के जरिए अब जोशी परिवार के लापता होने का सुराग मिल जाएगा. लेकिन यह उम्मीद ज्यादा नहीं टिक सकी, पता चला कि वह वहां का सिक्योरिटी गार्ड था. इस से केवल यह पता चला कि जोशी परिवार काशीपुर तक सुरक्षित था.

जोशी परिवार रहस्यमय हालात में कहां लापता हो गया, कोई नहीं जानता था. इसी बीच ऊधमसिंहनगर में सितारगंज के सिडकुल के पास एक बच्चे का शव पड़ा मिला. शव मुख्य सड़क से करीब 30 मीटर अंदर झाडि़यों में मिला था. शव मिलने की सूचना पर थानाप्रभारी सी.एस. बिष्ट मौके पर पहुंचे. बच्चे की हत्या गरदन काट कर की गई थी. इस की सूचना आला अधिकारियों को दी गई तो एएसपी टी.डी. वैला भी घटनास्थल पर पहुंचे.

मौके पर पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस ने उस के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस की सूचना मिलने पर दीपक भी सितारगंज पहुंचा. शव देख कर वह बिलख पड़ा. वह शव उस के भतीजे भास्कर का था. सितारगंज पुलिस ने बच्चे की हत्या, अपहरण और साक्ष्य छिपाने का मुकदमा दर्ज कर लिया. जो जोशी परिवार लापता था. उस में से एक बच्चे भास्कर की हत्या की जा चुकी थी. उन की कार भी बरामद हो चुकी थी. जबकि कमला और राजेंद्र का कुछ पता नहीं था. ऊधमसिंहनगर के एसएसपी केवल खुराना ने इस मामले की तह तक जाने और गहनता से जांच कर ने के लिए एएसपी टी.डी. वैला, एएसपी काशीपुर कमलेश उपाध्याय और सीओ खटीमा लोकजीत सिंह के नेतृत्व में पुलिस की 3 टीमों का गठन किया.

लेकिन उन्हें घटना के तार देहरादून से जुड़े होने का अंदेशा था. सब से अहम बात यह थी कि राजेंद्र जिस ड्राइवर को अपने साथ ले कर गया होगा, वह कार ड्राइवर कौन था, यह पता लगाना जरूरी था. ड्राइवर का पता चलने पर ही अहम सुराग मिल सकते थे. पुलिस ने जोशी परिवार के आसपास रहने वालों से भी पूछताछ की, लेकिन ड्राइवर के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सका. ड्राइवर को उन्होंने हायर किया था या कोई जानपहचान वाला चालक था, इस बारे में कुछ पता नहीं चल पा रहा था. हां, यह आशंका जरूर प्रबल हो गई थी कि जोशी परिवार किसी बड़ी साजिश का शिकार हुआ है. भास्कर का शव मिलने के बाद राजेंद्र और उस की मां के जीवित होने की उम्मीद कम ही रह गई थी.

पुलिस ने दीपक और उस की पत्नी चंचल से भी पूछताछ की, लेकिन उन्होंने किसी से भी कोई रंजिश होने से इंकार कर दिया. जोशी परिवार के पास करोड़ों की पारिवारिक जमीन थी. यह पूरी प्रौपर्टी कमला के नाम थी. इस नजरिए की गई जांच में सामने आया कि प्रौपर्टी को ले कर भी किसी से किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं था. ड्राइवर का पता लगाने के लिए पुलिस ने राजेंद्र के मोबाइल की काल डिटेल्स हासिल की, लेकिन उस में भी कोई नंबर ऐसा नहीं मिला, जो किसी ड्राइवर का रहा हो.

राजेंद्र के मोबाइल में आखिरी काल पिथौरागढ़  से आई थी. पुलिस वहां पहुंची तो वह उस लड़की के पिता का नंबर था, जिसे जोशी परिवार देखने जा रहा था. उन्होंने बताया कि राजेंद्र का फोन 27 नवंबर को सिर्फ यह बताने के लिए आया था कि वे लोग उन के यहां आ रहे हैं. इस के बाद राजेंद्र से चाहकर भी उन का कोई संपर्क नहीं हो सका था. पुलिस के सामने अब 2 तरह की आशंकाएं थीं. एक तो यह कि इस परिवार की हत्याएं लूटपाट के लिए की गई थीं और दूसरी यह कि कार ड्राइवर ने ही उन लोगों के साथ कुछ गलत किया हो. इस बात को ध्यान में रख कर दोनों जिलों देहरादून और ऊधमसिंहनगर की पुलिस ने कई संदिग्ध लोगों से पूछताछ की.

लेकिन कोई सुराग नही मिल सका. मामला उलझ कर रह गया था. वारदात का मोटिव समझ से परे था. जोशी परिवार की खुले तौर पर किसी से कोई रंजिश नहीं थी और न ही कोई दूसरा ऐसा विवाद जिस के लिए परिवार को ही लापता कर दिया जाता. नि:संदेह इस घटना को साजिश के तहत अंजाम दिया गया था. पुलिस ने राजेंद्र के पूर्व ससुराल वालों से भी पूछताछ की, लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस जांचपड़ताल में जुटी थी, परंतु कहीं से कोई सुराग हाथ नहीं लग रहा था.

पुलिस ने शक के आधार पर काम करती है. परिवार की समाप्ति पर कमला की करोड़ों की प्रौपर्टी का दीपक ही एकलौता वारिस था. यह भी संभव था कि उस के इशारे पर ही किसी रहस्यमय तरीके से इस मामले को अंजाम दिया गया हो. आज के दौर में प्रौपर्टी को ले कर हत्याएं हो जाना कोई नई बात नहीं है. अपने ही अपनों के खून के प्यासे बन जाते हैं. प्रौपर्टी के एंगल पर पुलिस ने दीपक को भी शक के दायरे में रख कर 5 दिसंबर को उस से गहन पूछताछ की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस किसी नतीजे पर पहुंच पाती, इस से पहले गुत्थी और ज्यादा उलझ गई. एसएसपी केवल खुराना के निर्देश पर पुलिस ने 7 दिसंबर को उस स्थान के आसपास कांबिग कर के खोजबीन शुरू की, जहां भास्कर का शव मिला था. इस खोजबीन में उत्तर दिशा की झाडि़यों से पुलिस को 2 शव और मिले. दोनों शव बुरी तरह सड़गल चुके थे. कपड़ों के आधार पर उन की शिनाख्त कमला और राजेंद्र के रूप में की गई. पुलिस ने दोनों शवों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस सनसनीखेज तिहरे हत्याकांड में पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि हत्याओं को किस ने और क्यों अंजाम दिया? ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी, जिस के लिए 3 हत्याएं कर दी गईं. ड्राइवर का अब तक कुछ पता नहीं चल सका था.

जबकि वही मुख्य संदिग्ध भी था. वह सुपारी किलर भी हो सकता था और किसी लुटेरे गिरोह का सदस्य भी. दीपक व उस की पत्नी किसी रंजिश की बात से इनकार कर चुके थे. इस मामले की जांच में स्पैशल औपरेशन गु्रप की टीम को भी लगा दिया गया. देहरादून व ऊधमसिंहनगर पुलिस की 10 टीमें केस के खुलासे में जुट गईं. पुलिस के शक की सुई ड्राइवर पर ही टिकी थी. क्योंकि कुछ ऐसे ड्राइवर भी होते हैं, जो दिखावे के लिए तो कार चलाने का काम करते हैं, लेकिन किसी गिरोह के साथ मिल कर अपराध को अंजाम देते हैं.

देहरादून से सितारगंज के बीच कई सुनसान इलाके थे, लेकिन हत्यारों ने उसी स्थान को क्यों चुना, यह भी एक बड़ा सवाल था. ऐसा प्रतीत होता था कि हत्या पूर्व नियोजित थी और शातिराना अंदाज में तीनों को ठिकाने लगा दिया गया था. पुलिस के पास हत्या की जांच के लिए 3 बिंदु प्रमुख थे. एक ड्राइवर, दूसरा संपत्ति और तीसरा प्रेम प्रसंग. संपत्ति के मामले में पुलिस दीपक से खूब घुमाफिरा कर गहन पूछताछ कर चुकी थी. वह खुद को बेकसूर बता रहा था. उस के खिलाफ पुलिस को कोई सबूत भी नहीं मिला था. ड्राइवर के गुनाहगार और राजदार होने के शक में भी कई लोगों से पूछताछ की जा चुकी थी.

जांच कर रही पुलिस ने इस बार नजरिया बदल कर प्रेम के एंगल पर भी काम करना शुरू किया. इस के लिए कुछ रिश्तों को खंगालना शुरू किया गया. इस कड़ी में घर की छोटी बहू यानी दीपक की पत्नी चंचल पर जांच केंद्रित की गई. पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की काल डिटेल्स की जांचपड़ताल शुरू की तो पुलिस चौंकी. दरअसल घटना वाले दिन उस के मोबाइल पर एक नंबर से कुछ एसएमएस किए गए थे, जिस नंबर से एसएमएस किए गए थे, वह श्यामपुर के ही संजय पंत का था.

संजय पंत जोशी परिवार के पड़ोस में ही रहता था. इस पर पुलिस ने संजय के मोबाइल की लोकेशन की जांच की तो उसे यह देख कर झटका लगा कि घटना वाले दिन उस की लोकेशन राजेंद्र के मोबाइल के साथसाथ सितारगंज तक गई थी. इस से साफ था कि घटना वाले दिन वह उन के साथ था. चंचल और संजय मोबाइल पर अकसर बातें किया करते थे. काल डिटेल्स इस की गवाही दे रही थी. इस का मतलब संजय और चंचल का जरूर कोई गहरा कनेक्शन था.

गुत्थी सुलझती नजर आई तो पुलिस बिना देरी किए देहरादून पहुंची. संजय को पकड़ लिया गया. देहरादून के एसपी (सिटी) अजय कुमार के निर्देश पर चंचल को भी हिरासत में ले लिया गया. उन दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस ऊधमसिंहनगर आ गई. पुलिस ने दोनों के मोबाइल ले कर चेक किए तो उन में से घटना वाली तारीख के एसएमएस नदारद थे. जाहिर था कि उन्होंने एसएमएस डिलीट कर दिए थे. पुलिस ने दोनों से गहराई से पुछताछ की तो उन्होंने जो बताया, सुन कर पुलिस के भी रोंगटे खड़े हो गए.

जोशी परिवार का कातिल संजय पंत था और इस साजिश में चंचल भी शामिल थी. दोनों के अवैध रिश्ते और संपत्ति का लालच इतने बड़े कांड की वजह बन गया था. किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक बहू पूरे परिवार के लिए काल बन जाएगी. करीब डेढ़ साल पहले संजय और चंचल की नजरें चार हुई थीं, धीरेधीरे दोनों का झुकाव एकदूसरे की तरफ हो गया था. चंचल का पति दूर रहता था, संजय ने इस बात का फायदा उठाया और अपनी मीठीमीठी बातों से चंचल को अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब हो गया.

चंचल को भी पति से दूरियां खलती थीं. भविष्य की परवाह किए बिना दोनों ने प्रेम की पींगे बढ़ानी शुरू कर दीं. संजय किसी न किसी बहाने से कमला के घर आनेजाने लगा. एक ही गांव और पड़ोसी होने से उस का इस तरह आना कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी. वक्त गुजरता रहा. संजय और चंचल मुलाकातों के अलावा मोबाइल पर भी बातें किया करते थे. दोनों एकदूसरे से प्यार का इजहार कर चुके थे. एक दौर ऐसा भी आया, जब उन के बीज मर्यादा की दीवार गिर गई. यूं तो हर नजरिए से उन का रिश्ता अवैध था, लेकिन उन दोनों को इस में खुशियां मिल रही थीं.

चंचल काफी पढ़ीलिखी थी. उस की समझदारी पर पूरे परिवार को गर्व था. कमला ने जमाना देखा था. बहू के रंगढंग उन से छिप नहीं सके. उन्होंने एक दिन चंचल को समझाया, ‘‘संजय का हमारे घर ज्यादा आनाजाना ठीक नहीं है बहू. मैं सबकुछ जान कर भी अंजान नहीं रह सकती. तुम खुद को सुधार लो, इसी में परिवार की भलाई है.’’

चंचल जैसे इस के लिए पहले से तैयार थी. यह एक सच है कि ऐसी गलतियां कर ने वाला इंसान अपनी कारगुजारियों को छिपाने के लिए झूठ बोलने लगता है और इसी के चलते वह काफी शातिर भी हो जाता है. वह जानती थी कि एक न एक दिन यह नौबत आ कर रहेगी. अच्छा इंसान वही होता है, जो अपनी गलती स्वीकार कर के उसे सुधार ले, लेकिन चंचल ने उल्टा दांव चला. वह हैरान हो कर बोली, ‘‘यह आप क्या कह रही हैं मांजी? आप को इतनी घटिया बातें सोचते हुए शरम नहीं आई?’’

‘‘सोचना क्या, मैं सब देख रही हूं.’’ कमला गुस्से से बोलीं.

‘‘सच देखतीं तो आप ऐसा नहीं बोलतीं. ऐसा कुछ भी नहीं है, जैसा आप सोच रही हैं. अपने दिमाग से इस तरह की बातों को निकाल दीजिए.’’

‘‘सच्चाई तो कड़वी लगती है बहू, लेकिन मैं ने तुम्हें समझाना अपना फर्ज समझा. मैं तुम्हारी हरकतों से अपने परिवार को बदनाम नहीं होने दूंगी.’’ बहू के शातिराना रुख से हैरान कमला ने चेतवानी भरे लहजे में कहा.

उन्होंने अगले दिन संजय को भी समझाया कि वह उन के यहां ज्यादा न आया करे. पतन की राहें बहुत रपटीली होती हैं. कुछ दिनों तो दोनों दूर रहे, लेकिन बहुत जल्द दोनों पुराने ढर्रे पर उतर आए. संजय रात के वक्त भी छिपतेछिपाते आने लगा. जो गलतियां करता है, वह कहीं न कहीं लापरवाह भी हो जाता है. एक रात कमला ने उन दोनों को पकड़ा तो उन्हें जम कर फटकारा. संजय चुपचाप वहां से खिसक गया. कमला ने चंचल को खरीखोटी सुनाई, ‘‘मैं ने सोचा था चंचल कि तू मेरी बातों से संभल जाएगी, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर चला गया है. अब मैं यह सब बरदाश्त नहीं कर सकती. मुझे इस बारे में दीपक से बात करनी पड़ेगी.’’

चंचल रंगेहाथों पकड़ी गई थी. उस के पास कहनेसुनने को कुछ नहीं था. वह नहीं चाहती थी कि यह बात उस के पति तक पहुंचे. उस ने कमला से माफी मांग कर कभी कोई गलती न करने की कसम खाई. सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते. कमला ने भी वक्त के साथ बहू को माफ कर दिया. बेटे को दु:ख न पहुंचे, इसलिए वह इन बातों को दबा गईं. संजय का आनाजाना भी कम हो गया. अपने किए पर वह भी माफी मांग चुका था. कुछ दिनों की सावधानी के बाद दोनों अब देहरादून जा कर एकदूसरे से मिलने लगे. चंचल फैशन डिजाइनिंग के कोर्स के लिए जाती थी. इसी बहाने वह संजय से मिल लेती थी. मोबाइल पर भी वह बातें और एसएमएस किया करते थे. अब दोनों को ही परिवार के लोग बाधा लगने लगे थे.

अपने अवैध रिश्ते में संजय और चंचल एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खा चुके थे. संजय दुष्ट और अपराध करने वाला युवक था. चंचल पूरी तरह उस के रंग में रंगी हुई थी. उन के प्रेमप्रसंग में कमला व राजेंद्र बड़ी बाधा थे, गनीमत यह थी कि ये बातें अभी दीपक को नहीं पता थी. संजय चाहता था कि अपने और चंचल के बीच की हर दीवार को गिरा कर न सिर्फ उस से विवाह कर ले, बल्कि करोड़ों की प्रौपर्टी भी उस की हो जाए. उस ने इस बारे में चंचल से बात की तो उस ने भी अपनी स्वीकृति दे दी.

इस के बाद संजय इसी बारे में सोचने लगा. उस ने रुपयों का इंतजाम कर के 30 हजार रुपए में सितारगंज के रहने वाले दुष्ट प्रवृत्ति के युवक अनिल कुमार से एक माउजर खरीद लिया. संजय व चंचल चाहते थे कि हत्याएं इतनी सफाई से की जाएं कि किसी को उन के ऊपर जरा भी शक न हो. वे दोनों जानते थे कि कमला राजेंद्र के लिए लड़की देखने के लिए पिथौरागढ़ जाने वाली हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर वह पहले ही अपने पति के पास उड़ीसा चली गई. उड़ीसा जाने के बावजूद वह संजय के संपर्क में बनी रही.

संजय ने उस से वादा किया कि अगर कमला पिथौरागढ़ गईं तो वह सभी का काम तमाम कर देगा. संजय ने अपनी योजना को अंजाम देने के लिए कमला और राजेंद्र से मेलजोल और बढ़ा लिया. उसे पता चला कि 27 नवंबर को उन्हें पिथौरागढ़ जाना है. राजेंद्र को ड्राइवर की जरूरत थी. उस ने इस बारे मं सजय से कहा तो वह खुद उन के साथ जाने को तैयार हो गया. संजय कार चलाना जानता था. कमला और राजेंद्र को इस बात की खुशी हुई कि संजय उन के लिए अपना समय निकाल रहा है.

27 नवंबर को वह उन्हें कार से ले कर पिथैरागढ़ के लिए निकला. संयोगवश उसे किसी ने भी उन के साथ जाते नहीं देखा. संजय ने अपने पास माउजर और एक चाकू रख लिया. ये लोग हरिद्वार पहुंचे तो दीपक का फोन आया और उस ने मां से बात की. इस के बाद संजय ने बहाने से राजेंद्र का मोबाइल लिया और उस का सिम ढीला कर दिया, जिस से उस का नेटवर्क चला गया. राजेंद्र टैक्नोलौजी के मामले में कमजोर था, इसलिए उस ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. संजय नहीं चाहता था कि किसी का फोन आए और वह लोग उस के साथ होने के बारे में कुछ बता दें. वे काशीपुर पहुंचे तो राजेंद्र ने एटीएम से कुछ पैसे निकाले.

इस बीच संजय ने 2 बार चंचल से 4-4 मिनट बात की. इस के बाद जंगल का रास्ता सुनसान था. कमला और भास्कर कार में सो रहे थे, जबकि राजेंद्र जाग रहा था. सिडकुल के पास पहुंच कर संजय ने कार रोक दी. राजेंद्र ने उस से कार रोकने की वजह पूछी तो उस ने कहा कि उसे थकान हो रही है. कुछ देर रुक कर चलेंगे. संजय कार से नीचे उतर गया. राजेंद्र भी नीचे उतर गया. बाहर से कार के अंदर कोई आवाज न जाए, इसलिए संजय ने कार के शीशे बंद कर दिए.

संजय बात करते हुए बहाने से राजेंद्र को कुछ दूर ले गया और माउजर से उस के सिर में गोली मार दी. राजेंद्र ने तुरंत ही दम तोड़ दिया. संजय उसे खींच कर झाडि़यों में ले गया और लाश को छिपा दिया. इस बीच उस ने राजेंद्र की जेब से मोबाइल निकाल कर उसे स्विच्ड औफ कर दिया. इस के बाद वह कमला जोशी के पास पहुंचा और उन्हें बताया कि राजेंद्र झाडि़यों के पीछे बैठ कर शराब पी रहा है और आने से मना कर रहा है. यह सुन कर कमला जोशी उस के साथ चल दीं. मौका पाते ही संजय ने उन्हें भी गोली मार दी.

दोनों शव ठिकाने लगा कर वह कार ले कर थोड़ा दूर आगे गया और एक जगह पर कार रोक कर भास्कर को जगा कर अपने साथ झाडि़यों की तरफ ले गया. संजय हैवान बन चुका था. उस ने चाकू निकाल कर मासूम भास्कर की पहले गरदन काटी और फिर उस के पेट पर वार किए. भास्कर ने तड़प कर दम तोड़ दिया. हत्या कर के तीनों की लाशें ठिकाने लगाने के बाद उस ने यह बात चंचल को एसएमएस कर के बता दी. कमला ने बैग में जो आभूषण लड़की को देने के लिए रखे थे, वह उस ने खुद कब्जा लिए. उस ने एक थैले में आभूषण, चाकू व माउजर रखा और आगे जा कर कलमठ में जंगल में एक स्थान पर गड्डा खोद कर उसे छिपा दिया.

इस के बाद वह रुद्रपुर होते हुए बिलासपुर पहुंचा और सड़क किनारे कार छोड़ कर बस से देहरादून चला गया. हत्या का मामला ठंडा हो जाने के बाद चंचल और संजय की योजना दीपक को भी ठिकाने लगाने की थी. लेकिन उस से पहले ही वे पुलिस के शिकंजे में आ गए. संजय की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हथियार और आभूषण बरामद करने के साथ ही पुलिस ने माउजर बेचने वाले अनिल को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत भेज दिया गया.

चंचल के अविवेक ने जहां एक भरेपूरे परिवार को उजाड़ दिया, अंधे प्यार और लालच ने संजय को भी जुर्म की राह पर धकेल दिया. दोनों ने मर्यादाओं का खयाल किया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. चंचल के पति दीपक का कहना था कि उसे नहीं लगता कि उस की पत्नी का हत्या में कोई हाथ है. वह पूरे कांड का मास्टरमाइंड संजय को मानता है. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. Dehradun Crime

 

Crime Story: दौलत से जीता दिल

Crime Story: रविंद्र का दिल दोस्त की पत्नी परमजीत पर आया तो वह उस पर विदेश से कमा कर लाई दौलत लुटाने लगा. परिणामस्वरूप उस ने परमजीत को तो पा लिया, लेकिन दोस्त को गंवा कर…

जगतार सिंह में भले ही लाख बुराईयां रही हों, लेकिन उस में एक सब से बड़ी अच्छाई यह थी कि उसे कितना भी जरूरी काम क्यों न हो, वह शाम के 7, साढ़े 7 बजे तक घर जरूर लौट आता था. जिस किसी को उस से मिलना होता या कोई काम करवाना होता, वह शाम 7 बजे के बाद उस का इंतजार उस के घर पर करता था. जगतार सिंह पंजाब बिजली बोर्ड में नौकरी करता था. लेकिन न जाने क्यों आज से 5-6 साल पहले उस ने अपनी यह नौकरी छोड़ दी और घर पर रह कर स्वतंत्र रूप से बिजली मरम्मत का काम करने लगा था. उस के इलाके के ज्यादातर किसान बिजली बोर्ड के बजाय उस पर ज्यादा भरोसा करते थे.

इसीलिए दूरदूर तक के गांवों में जब किसी की घर की बिजली या ट्यूबवेल की मोटर खराब होती, लोग बिजली बोर्ड में शिकायत करने के बजाय जगतार को ले जा कर अपना काम करवाना ज्याद बेहतर समझते थे. एक तो इस से उन का समय बच जाता था, दूसरे जगतार की भी रोजीरोटी अच्छी तरह से चल रही थी. 25 अगस्त, 2015 की शाम जब जगतार अपने निश्चित समय पर घर नहीं लौटा तो उस के घर वालों को चिंता हुई. इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. क्योंकि उस का फोन बंद बता रहा था. जब रात 10 बजे तक भी वह घर नहीं लौटा तो उस के घर वाले परेशान हो उठे.

जगतार सिंह का मोबाइल बंद था, इसलिए बात नहीं हो पा रही थी. उस की पत्नी परमजीत  कौर, बड़ा भाई गुरबख्श सिंह तथा गांव के कुछ अन्य लोग उस की तलाश में निकल पड़े थे. रात करीब 11 बजे अचानक उस का फोन मिल गया. उस की पत्नी परमजीत कौर उर्फ पम्मी से उस की बात हो गई. इस के बाद उस ने सभी को बताया कि जगतार अपने दोस्तों के साथ कहीं बैठा खापी रहा है. चिंता की कोई बात नहीं है, थोड़ी देर में वह घर आ जाएगा. जगतार अपने किन दोस्तों के साथ बैठा खापी रहा है, यह उस ने नहीं बताया था.

बहरहाल, जगतार से बात हो जाने के बाद घर वालों की चिंता कुछ कम हो गई. लेकिन फोन पर कहने के बावजूद जगतार रात को घर नहीं आया. उस के बाद से उस का फोन बंद हो गया तो सुबह तक बंद ही रहा. अगले दिन यानी 26 अगस्त, 2015 को किसी ने बताया कि गांव नरीकोकलां स्थित पंचायती अनाज मंडी स्टोर की ट्यूबवेल की हौदी में जगतार सिंह की लाश पड़ी है. पंचायती अनाज मंडी जगतार के गांव सहिके से करीब 4-5 किलोमीटर दूर थी. लाश पड़ी होने की सूचना मिलने पर गांव के सरपंच, उस की पत्नी, भाई और गांव के कुछ लोग नरीकोकलां जा पहुंचे. वहां एक ट्यूबवेल की पानी की हौदी में जगतार की लाश पड़ी थी.

उस के सिर और पैर पर मामूली चोटों के निशान थे. लाश को ट्रैक्टर की ट्रौली पर लाद कर उस के गांव सहिके लाया गया. जगतार के पास अपना स्कूटर था, जिस से वह गांवगांव जा कर लोगों का बिजली का काम करता था. काफी तलाशने पर भी उस का स्कूटर वहां नहीं मिला. यही नहीं, उस के औजार और मोबाइल फोन भी नहीं मिला. बहरहाल, गांव आ कर जब घर और गांव वालों ने कहा कि यह साफसाफ हत्या का मामला और इस की सूचना पुलिस को देनी चाहिए तो उस की पत्नी परमजीत कौर उर्फ पम्मी ने रोते हुए स्पष्ट कहा कि वह इस बात की सूचना पुलिस को कतई नहीं देना चाहती.

क्योंकि पुलिस को सूचना दी गई तो वह लाश को कब्जे में ले कर उस का पोस्टमार्टम कराएगी. वह नहीं चाहती कि मरने के बाद उस के पति की लाश को काटपीट कर दुर्दशा की जाए. जगतार के बड़े भाई गुरबख्श सिंह और सरपंच ने परतजीत को काफी समझाया कि पोस्टमार्टम होने से पता चल जाएगा कि जगतार की मौत क्यों और कैसे हुई है? लेकिन परमजीत अपनी बात पर अड़ी रही. उस का कहना था कि जगतार की मौत बिजली का करंट लगने से हुई होगी, इसलिए पोस्टमार्टम की कोई जरूरत नहीं है.

सरपंच ही नहीं, घर तथा गांव वाले कहते रह गए, लेकिन परमजीत ने किसी की नहीं सुनी. मजबूर हो कर गांव वालों ने पुलिस को सूचित किए बगैर ही जगतार सिंह का अंतिम संस्कार करा दिया. पंजाब के जिला संगरूर का एक कस्बा है अमरगढ़. इसी कस्बे से लगभग 8 किलोमीटर दूर गांव है सहिके. गुरनाम सिंह इसी गांव के रहने वाले थे. उन की 7 संताने थीं, जिन में 3 बेटे और 4 बेटियां थीं. बड़ा बेटा गुरबख्श सिंह सेना से रिटायर्ड हो कर गांव में ही रहता था. उस से छोटा था जगतार, जो बिजली मरम्मत का काम करता था और गांव में ही रहता था. उस से छोटा था अवतार सिंह, जिस की जून, 1999 में मौत हो गई थी.

उस की मौत कैसे हुई, इस बात का पता आज तक नहीं चला. गुरनाम सिंह की भी मौत हो चुकी है. गांव में अब सिर्फ 2 भाई, फौजी गुरबख्श सिंह और जगतार सिंह ही रहते थे. दोनों के मकान भले ही अलगअलग थे, लेकिन आमनेसामने थे. सन 1994 में जगतार का विवाह परमजीत कौर से हुआ था. उस के 2 बच्चे थे, 19 साल की बेटी हरप्रीत कौर और 14 साल का बेटा. परमजीत कौर ने जिद कर के पति का अंतिम संस्कार भले ही करा दिया था, लेकिन फौजी गुरबख्श सिंह के मन में हर समय यही बात घूमा करती थी कि आखिर परमजीत ने जगतार की लाश का पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराने दिया. यह एक ऐसा संदेह था, जो उसे किसी भी तरह से चैन नहीं लेने दे रहा था.

जगतार के अंतिम संस्कार की सारी रस्में पूरी हो गईं तो परमजीत अपने मायके मलेरकोटला चली गई. इस के बाद तो वह पूरी तरह से आजाद हो गई. कभी वह संगरूर चली जाती तो कभी अमरकोट. उसे न पति की मौत का दुख था और न अब बच्चों की कोई परवाह रह गई थी. यह सब देख कर फौजी गुरबख्श सिंह को और ज्यादा दुख होता. जब नहीं रहा गया तो उन्होंने सरपंच के साथ मिल कर निजी तौर पर परमजीत कौर के बारे में छानबीन की तो उन्हें दाल में कुछ काला नजर आया. परमजीत की हरकतों से मन का संदेह बढ़ता गया तो 8 सितंबर को वह सरपंच को साथ ले कर थाना अमरगढ़ जा पहुंचे.

सारी बात उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर संजीव गोयल को बताई तो उन्होंने भी संदेह व्यक्त किया कि उन के भाई की मौत बिजली का करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई है. संजीव गोयल ने गुरबख्श सिंह की पूरी बात सुन कर उन की शिकायत दर्ज करा कर उन्हें पूरा विश्वास दिलाया कि वह जल्दी ही जगतार की मौत के रहस्य से परदा उठा देंगें. इस मामले में संजीव गोयल के सामने समस्या यह थी कि मर चुके जगतार सिंह का अंतिम संस्कार हो चुका था. कोई इस तरह का सबूत भी नहीं था कि उसी के आधार पर वह इस मामले की जांच करते.

अब जो भी सबूत जुटाए जा सकते थे, वे सिर्फ पूछताछ कर के ही जुटाए जा सकते थे. इसलिए उन्हें लगा कि सब से पहले मृतक जगतार की पत्नी परमजीत कौर से ही पूछताछ करनी चाहिए. उन्होंने सहिके जा कर परमजीत कौर से जगतार सिंह की मौत के बारे में पूछा तो उस ने उन से भी कहा कि उन की मौत बिजली का करंट लगने से हुई थी. उस दिन वह पंचायती मंडी के उस ट्यूबवेल की मोटर ठीक करने गए थे. मोटर ठीक करते हुए उन्हें करंट लगा और वह हौदी में गिर गए, जिस से उन की मौत हो गई.

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन तुम ने इस बात की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी? तुम्हें ऐसी क्या जल्दी थी कि बिना पोस्टमार्टम कराए ही तुम ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया?’’ संजीव गोयल ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने सोचा कि आज नहीं तो कल उन का अंतिम संस्कार कराना ही है, इसलिए मैं ने देर करना उचित नहीं समझा और उन का अंतिम संस्कार करा दिया.’’

‘‘अच्छा जगतार की अस्थियां कहां हैं?’’ संजीव गोयल ने पूछा.

‘‘उन्हें तो मैं ने श्रीकीरतपुर साहिब में प्रवाह दी हैं.’’

‘‘मतलब, तुम ने सारे सबूत मिटा दिए, कुछ भी नहीं छोड़ा. खैर, फिर भी मैं सच्चाई का पता लगा ही लूंगा.’’ संजीव गोयल ने कहा.

इस के बाद उन्होंने अन्य लोगों से पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्हें पता चला कि जगतार के मरने के बाद से परमजीत कौर को न बच्चों की कोई चिंता है और न उस की मौत का जरा भी दुख है. उसे देख कर कहीं से भी नहीं लगता कि 10-15 दिन पहले ही उस के पति की मौत हुई है. बहरहाल, उस दिन की पूछताछ में सरपंच ने ही नहीं, गांव के जिस किसी से उन्होंने पूछा, सभी ने यही आशंका व्यक्त की कि जगतार की मौत करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई है और उस की हत्या में कहीं न कहीं से परमजीत का हाथ जरूर है.

इसी पूछताछ में संजीव गोयल को गांव वालों से पता चला कि परमजीत कौर के घर रविंद्र उर्फ रवि तथा जुगराज का काफी आनाजाना था. हत्या वाले दिन यानी 25 अगस्त की शाम जगतार को उन्हीं दोनों के साथ टोरिया गांव की ओर जाते देखा गया था. संजीव गोयल थोड़ा और गहराई में गए तो पता चला कि परमजीत कौर और रविंद्र के बीच जरूर कुछ चल रहा है. इस के तुरंत बाद उन के एक मुखबिर ने उन्हें बताया कि परमजीत कौर को उस ने रविंद्र के साथ मलेरकोटला की ओर जाते देखा था. उन के हाथ में बैग थे, जिस से यही लगता है कि वे गांव छोड़ कर कहीं जा रहे हैं.

यह सूचना मिलते ही संजीव गोयल ने समय गंवाना उचित नहीं समझा और तुरंत जीप से पीछा कर के रास्ते में ही रविंद्र और परमजीत कौर को गिरफ्तार कर के थाने ले आए. फौजी गुरबख्श सिंह के बयान के आधार पर रविंद्र, जुगराज और परमजीत कौर को नामजद कर के जगतार की हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर पूछताछ शुरु की गई. 10 सितंबर, 2015 को संजीव गोयल ने रविंद्र और परमजीत को सक्षम अदालत में पेश कर के विस्तार से पूछताछ के लिए 2 दिनों के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान रविंद्र की निशानदेही पर मृतक जगतार का स्कूटर और मोबाइल फोन बरामद कर लिया गया.

रिमांड खत्म होने पर दोनों को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें संगरूर की जिला जेल भेज दिया गया. मृतक जगतार के भाई फौजी गुरबख्श सिंह, सरपंच एवं गांव वालों तथा अभियुक्तों से की गई पूछताछ में जगतार की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह परमजीत कौर के पतन की कहानी थी. जगतार सिंह और रविंद्र बचपन के दोस्त थे. उन का खेलनाकूदना, खानापीना बचपन से अब तक साथ रहा. जवान होने पर भी दोनों ज्यादातर साथ ही रहते थे. रविंद्र सिंह उर्फ रवि पड़ोसी गांव मुंडिया के रहने वाले काका सिंह का बेटा था.

सवेरा होते ही रविंद्र जगतार के गांव सहिके आ जाता या फिर जगतार उस के गांव मुंडिया पहुंच जाता. जवान होने पर दोनों की शादियां ही नहीं हो गईं, बल्कि वे एकएक बेटी के बाप भी बन गए. जगतार बिजली मरम्मत का काम करता था, जबकि रविंद्र निठल्ला घूमते हुए आवारागर्दी किया करता था. बचपन से ही उस की काम करने की आदत नहीं थी. लगभग 8 साल पहले वह अपने एक रिश्तेदार के पास विदेश चला गया, जहां 3 साल रहा. वहां से लौटा तो उस के पास ढेर सारे रुपए थे.  वह कार से जगतार से मिलने उस के घर गया तो उस के लिए भी ढेर सारे महंगे उपहार ले गया था. रविंद्र के ठाठबाट देख कर जगतार की पत्नी परमजीत खूब प्रभावित हुई.

उस दिन के बाद जगतार का घर शराब का अड्डा बन गया. रोज महफिलें सजने लगीं. रविंद्र के साथ उस का दोस्त जुगराज भी आता था. वह गांव शेरखां वाला के रहने वाले राम सिंह का बेटा था. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद परमजीत अभी जवान और खूबसूरत लगती थी. उस की मांसल देह किसी को भी दीवाना बना सकती थी. रविंद्र पहले से ही उस का दीवाना था. इसीलिए विदेश से लौटने पर परमजीत को खुश करने के लिए वह उस के लिए भी तरहतरह के महंगे उपहार खरीद कर लाने लगा.

एक दिन जब जगतार की गैरमौजूदगी में उस ने परमजीत कौर का हाथ पकड़ कर कहा कि वह उस से प्यार करने लगा है और उस के लिए पागल हो गया है तो परमजीत खुशीखुशी उस के आगोश में समा गई. इस की वजह यह थी कि वह भी तो रविंद्र और उस की कमाई की दीवानी थी. रविंद्र और परमजीत के बीच अवैधसंबंध तो बन गए, लेकिन जगतार के घर पर रहने की वजह से उन्हें मिलने का अवसर कम ही मिल पाता था. इस का उपाय रविंद्र ने यह निकाला कि जगतार की उस ने मलेरकोटला में बिजली बोर्ड में नौकरी लगवा दी.

वह सुबह नौकरी पर जाता तो रात में ही लौटता. उस के नौकरी पर जाते ही रविंद्र उस के घर पहुंच जाता. यह लगभग रोज का नियम बन गया. रविंद्र परमजीत कौर पर दोनों हाथों से रुपए लुटा रहा था. वह उस के इस तरह खर्च करने से बहुत खुश थी. शायद इसी वजह से उस ने रविंद्र के कहने पर उस के दोस्त जुगराज से भी संबंध बना लिए थे. अब परमजीत एक ही समय में अपने 2 प्रेमियों, रविंद्र और जुगराज को खुश करने लगी थी.

सब कुछ बढि़या चल रहा था कि मोहल्ले में उड़तेउड़ते यह खबर किसी दिन जगतार के कानों तक पहुंच गई. इस के बाद उस ने मलेरकोटला छोड़ दिया और घर पर ही रहने लगा. उसी बीच किसी दिन उस ने परमजीत कौर, रविंद्र और जुगराज को रंगेहाथों पकड़ लिया. उस समय परमजीत कौर और रविंद्र ने माफी मांग कर बात संभाल ली. जगतार ने भी उन्हें माफ कर दिया. लेकिन वे चोरीछिपे मिलते रहे.

परमजीत कौर को इस तरह चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए उस ने रुआंसी हो कर कहा, ‘‘देखो रविंद्र, इस तरह चोरीछिपे मिलना मुझे अच्छा नहीं लगता. अगर इस बार हम पकड़े गए तो जगतार माफ नहीं करेगा. तुम मुझ से संबंध बनाए रखना चाहते हो तो तो मुझे भगा ले चलो या फिर जगतार का कोई इंतजाम कर दो.’’

रविंद्र परमजीत की देह का इतना दीवाना था कि उस से बिछुड़ने की कल्पना से ही डरता था. इसलिए उस ने परमजीत कौर के साथ मिल कर जगतार को ही रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. इस योजना में उस ने जुगराज को भी शामिल कर लिया. 25 अगस्त की शाम रविंद्र ने जगतार के साथ खानेपीने का कार्यक्रम बनाया. यह महफिल उन्होंने सहिके गांव से 4 किलोमीटर दूर खेतों में जमाई. शराब पीने के दौरान रविंद्र और जुगराज ने बातोंबातों में जगतार को कुछ ज्यादा ही शराब पिला दी.

जब जगतार संतुलन खोने लगा तो दोनों उसे ले कर पंचायती मंडी के पास आ गए और वहां उस की जम कर पिटाई की. उस के बाद गला घोंट कर उस की हत्या कर दी और लाश ट्यूबवेल की हौदी में फेंक कर परमजीत को फोन कर दिया कि उन्होंने जगतार की हत्या कर दी है. इस के बाद परमजीत कौर ने घटनास्थल पर जा कर खुद देखा कि जगतार सचमुच मर चुका है या वे झूठ बोल रहे हैं. जगतार की लाश देख कर उसे विश्वास हो गया तो वह गांव लौट आई. जगतार की हत्या के समय वह इतना बेचैन थी कि मात्र एक घंटे में उस ने कई बार रविंद्र को फोन कर के पूछा था कि काम हो गया या नहीं?

यह बात संजीव गोयल को तब पता चली, जब उन्होंने परमजीत कौर और रविंद्र के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. रविंद्र और परमजीत को जेल भेज कर संजीव गोयल ने इस हत्याकांड के तीसरे अभियुक्त जुगराज की तलाश शुरू की तो 16 सितंबर, 2015 को उन्होंने उसे भी संगरूर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी स्वीकार कर लिया कि जगतार की हत्या में रविंद्र के साथ वह भी शामिल था.

पूछताछ के बाद संजीव गोयल ने 17 सितंबर को जुगराज को भी अदालत में पेश किया, जहां से उसे भी जेल भेज दिया गया. जगतार की मौत के बाद उस के बच्चे अकेले रह गए थे. अब वे अपने फौजी ताऊ गुरबख्श सिंह के साथ रह रहे हैं. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories: कंजौइंड ट्विन्स

Hindi Stories: कंजौइंड ट्विन्स यानी आपस में जुड़े बच्चे बहुत कम पैदा होते हैं. ऐसे बच्चों को अलग करना मैडिकल साइंस के लिए चुनौती होता है. फिर भी डाक्टर अपनी ओर से प्रयास करते हैं. चंडीगढ़ पीजीआई में अभी एक ऐसा ही सफल औपरेशन हुआ है.

कई बरस पुरानी बात है. लुधियाना के सीएमसी (क्रिश्चियन मैडिकल कालेज) अस्पताल में पीडिएट्रिक सर्जरी यूनिट के इंचार्ज हुआ करते थे डा. योगेश कुमार सरीन. सीएमसी से थोड़ा आगे डा. जेनी का नर्सिंगहोम था. डा. जेनी से डा. सरीन का अच्छा परिचय था. एक दिन वह किसी काम से उन के यहां गए तो देखा कि डा. जेनी किसी चिंता में डूबी थीं. डा. सरीन ने उन्हें गुडमौर्निंग कहा तो वह हड़बड़ा कर उठ बैठीं, ‘‘डा. सरीन, वैरी गुडमौर्निंग. यह तो बहुत अच्छा हुआ कि आप आ गए. आइए, आप खुद देखिए यहां कैसी आश्चर्यजनक घटना घटी है.’’

डा. जेनी डा. सरीन को लेबररूम के साथ वाले कमरे में ले गईं और एक बैड पर लेटी बच्ची उन्हें दिखाई. उस बच्ची को देख कर डा. सरीन चौंके. बैड पर एक नहीं, 2 नवजात बच्चियां लेटी थीं. आम इंसानों की तरह उन के भी 2-2 हाथ, 2-2 पैर थे. मगर खास बात यह थी कि दोनों के धड़ बीच से जुड़े थे. एक का पेट कहां पर खत्म हुआ और दूसरी का कहां से शुरू हुआ, इस का पता गहराई से देखने पर भी नहीं चल रहा था. दोनों की एक ही नाभि थी, जबकि टांगें विपरीत दिशा में थीं. उन की स्थिति 180 डिग्री का कोण दर्शा रही थी.

उन बच्चियों को देख कर सरीन ने डा. जेनी से पूछा, ‘‘डिलीवरी कितने बजे हुई है?’’

‘‘सुबह करीब 7 बजे. हैरान करने वाली बात यह है डाक्टर साहब कि डिलीवरी पूरी तरह नौरमल थी. मेरी तो यही समझ में नहीं आ रहा कि मेरे हाथों एकदम सहज रूप से यह डिलीवरी हो कैसे गई?’’

‘‘कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता. खैर, बच्चियों को देख कर जच्चा का क्या रिएक्शन रहा? अभी वह कहां है?’’

‘‘वह तो बेहोश पड़ी है. लेकिन उस का पति यहीं है. उस से कोई बात करना चाहें तो बुला लेती हूं. ऐसी विचित्र संतान देख कर मेरी तरह वह भी काफी परेशान है.’’

डा. सरीन चुपचाप खड़े सोचते रहे. उन्हें सोचते देख डा. जेनी भी चुप हो गईं. कुछ देर बाद वह बोले, ‘‘हां, बच्चियों के पिता को बुलवा लें.’’

डा. जेनी ने एक कर्मचारी को भेज कर उन बच्चियों के पिता राजकुमार को बुलवा लिया. वह लुधियाना के धूरीलाइन एरिया का रहने वाला था और एक हौजरी कंपनी में मशीन औपरेटर था. उस ने बताया कि उस की पत्नी लता के प्रसव का समय नजदीक आने पर वह चैकअप के लिए इसी नर्सिंगहोम में लाया था. उसे बताया गया कि लता के गर्भ में जुड़वां बच्चे हैं. यह पता लगने के बाद वह पत्नी का विशेष ध्यान रखने लगा. अब जब उस की पत्नी को अजीबोगरीब बच्चियां पैदा हुई हैं तो वह असमंजस में है कि क्या करे.

राजकुमार की बात खत्म होने पर डा. सरीन बोले, ‘‘चलो जो होना था, वह हो गया. इन बच्चियों को ले कर अब आगे क्या सोच रहे हो?’’

डा. सरीन की बात सुन कर राजकुमार की आंखों में आंसू भर आए. लग रहा था जैसे वह अभी रोने वाला है. वह किसी तरह अपनी भावनाओं पर काबू पाते हुए बोला, ‘‘डाक्टर साहब, यहां से घर जाते ही सब लोग हम पर हंसेंगे. मैं भला उन्हें क्या जवाब दूंगा. मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा. आखिर इन बच्चियों का हम करेंगे क्या?’’

‘‘ये तुम्हारी अपनी औलाद हैं न कि गैर की. इन के बारे में फैसला तुम्हीं को लेना पड़ेगा.’’

‘‘मैं क्या फैसला लूं डाक्टर साहब, लता अभी बेहोशी में है. होश में आने पर जब वह इन अजीबोगरीब बच्चियों को देखेगी तो उस का हार्ट फेल हो जाएगा. घबराहट में इस वक्त मेरी भी टांगें कांप रही हैं.’’

‘‘किस बात की घबराहट है तुम्हें, बताओ? इस सब में तुम्हारी तो कोई गलती नहीं है. बहरहाल, यह सब ठीक भी हो सकता है.’’

‘‘मतलब, क्या ये बच्चियां ठीक हो सकती हैं.’’ राजकुमार ने भावुक हो कर कहा.

डा. सरीन ने राजकुमार की पीठ पर हाथ रखते हुए उसे ढांढ़स बंधाते हुए कहा, ‘‘मैडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है कि असंभव मानी जाने वाली बातें संभव होने लगी हैं. कोई बड़ी बात नहीं कि औपरेशन द्वारा अलग कर के इन्हें नौरमल जिंदगी जीने लायक बना दिया जाए.’’

‘‘ऐसा है तो डाक्टर साहब कर दीजिए इन का औपरेशन. मैं तो समझता हूं कि औपरेशन के बाद दोनों में से एक भी बच गई तो हमारे जीवन में खुशियां लौट आएंगी.’’ उस ने कहा.

‘‘देखो, औपरेशन के बाद एक बचेगी, दोनों मर जाएंगी या फिर दोनों बच जाएंगीं, इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. इस मुद्दे पर कुछ भी सोचने के बजाय फिलहाल तुम यह बताओ कि औपरेशन का खर्च उठा सकते हो?’’

डा. सरीन के सवाल का जवाब देने के बजाय राजकुमार ने उन्हीं से सवाल किया, ‘‘कितना खर्च आ सकता है?’’

‘‘कम से कम एक लाख रुपए तो मान कर चलिए.’’

एक लाख रुपए का नाम सुन कर राजकुमार के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह एकदम मरी सी आवाज में बोला, ‘‘डाक्टर साहब, जितना मैं कमाता हूं, उस से हमारी रोटी मुश्किल से चलती है. इतनी बड़ी रकम जुटाना हमारे बस की बात नहीं है.’’

‘‘ठीक है, तुम परेशान मत होओ. तुम्हारे जैसे असमर्थ लोगों के लिए हमारे यहां अस्पताल की तरफ से खर्च उठाने का प्रावधान है. इस बारे में मैं अस्पताल के अधिकारियों से बात करता हूं.’’ डा. सरीन ने कहा.

‘‘डाक्टर साहब, अगर ऐसा हो जाए तो मैं आप का और अस्पताल वालों का एहसान कभी नहीं भूल पाऊंगा.’’

इस के बाद राजकुमार को कमरे से बाहर भेज कर डा. सरीन ने डा. जेनी से इस बारे में चर्चा करते हुए कहा, ‘‘मेरी राय में बच्चियों को अभी सीएमसी ले जा कर उन के टेस्ट करा लेने चाहिए. जब सारे टेस्टों की रिपोर्ट आ जाएंगी, तभी इन के औपरेशन के बारे में सोचा जा सकेगा.’’

‘‘बच्चियों के पिता से आप की बात हो ही चुकी है. फिर हमें भला क्या एतराज हो सकता है. आप इन बच्चियों को सीएमसी ले जाएं.’’ डा. जेनी बोलीं.

‘‘अभी इन्हें यहीं रहने दो. मैं इस बारे में पहले सीएमसी के अधिकारियों से बात कर लूं.’’ कह कर डा. सरीन वहां से चले आए. इस के बाद उन्होंने सीएमसी के डायरैक्टर डा. रिचर्ड डेनियल, डा. अब्राहम थौमस और मैडिकल सुपरिटैंडेंट डा. बसंत पवार से बात की. सब ने छूटते ही कहा, ‘‘डा. योगेश, यदि आप को लगता है कि ये बच्चियां औपरेशन द्वारा अलग हो सकती हैं तो उन्हें तत्काल यहां ले आओ. औपरेशन का खर्च अस्पताल वहन कर लेगा.’’

इस तरह जन्म के 4 घंटों के अंदर ही बच्चियों को सीएमसी के आइसोलेशन रूम में भरती कर लिया गया. उस वक्त दिन के ठीक 11 बजे थे. तब तक राजकुमार के रिश्तेदारों को यह खबर मिल गई थी. उन में से कइयों ने तत्काल अस्पताल पहुंच कर अधिकारियों व डाक्टरों से अपनी नाराजगी जाहिर की. यह नाराजगी इस बात पर थी कि डाक्टर बच्चियों की जान की कीमत पर नया प्रयोग करने जा रहे थे. कई वरिष्ठ डाक्टरों ने उन्हें समझाया कि वह इन बच्चियों पर प्रयोग नहीं कर रहे, बल्कि इन की सलामती के लिए औपरेशन कर रहे हैं. यह बात रिश्तेदारों की समझ में आई, तब कहीं जा कर वे लोग शांत हुए.

बाद में इन बच्चियों की बात पूरे शहर में फैल गई तो लोगों में उन्हें देखने की जिज्ञासा जाग उठी. वे बच्चियों की एक झलक देखने के लिए डाक्टरों से गुहार लगाने लगे. कई स्थानीय पत्रकार भी अस्पताल में उच्चाधिकारियों से मिले. लेकिन अस्पताल प्रशासन ने पत्रकारों से भी कह दिया कि अभी वे इस मामले को सार्वजनिक नहीं करना चाहते. अस्पताल की जिस विंग में उन बच्चों के परीक्षण वगैरह चल रहे थे उस विंग के मुख्य दरवाजे पर ताला लगा दिया गया, ताकि कोई भी वहां न पहुंच सके.

डा. सरीन ने बच्चियों के भीतरी हिस्सों की जानकारी लेने के लिए एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई आदि करवाए. इन की रिपोर्टों से पता चला कि बच्चियों के सैक्सुअल आर्गेंस कौमन हो चुके थे. पेशाब की 2 थैलियां थीं तो बड़ी आंत कौमन थी. योनि में 3-3 छेदों के बजाय 1-1 छेद था. एक छेद में से कभीकभी सिर्फ पेशाब आता था तो दूसरी के छेद में से मल व पेशाब दोनों आ रहे थे. मतलब मल त्याग के लिए दोनों बच्चियों का एक ही द्वार था. एक बच्ची का दायां गुरदा और दूसरी बच्ची का बायां गुरदा एक ही पेडू में खुल रहे थे. दोनों में बड़ी आंत जहां एकसाथ जा रही थी, वहीं छोटी आंत एकदम अलग थी. अनेक टैस्ट करने पर भी योनि व बच्चेदानी का स्टेटस डाक्टरों को पता नहीं लग पा रहा था.

उक्त टैस्टों की रिपोर्टों के चलते निर्णय लिया गया कि बच्चियां जब 7 महीने की हो जाएं, तभी उन का औपरेशन किया जाना चाहिए. डाक्टरों को उम्मीद थी कि तब तक इन के भीतर कुछ अंग भी परिपक्व हो जाएंगे. इस दौरान डाक्टरों व अधिकारियों  के बीच औपरेशन की बारीकियों पर वार्ताएं व तैयारियां चलती रहीं. उस वक्त इन लोगों के सामने एक अन्य समस्या भी आई. समस्या यह थी कि सीएमसी में पीडिएट्रिक सर्जरी के एक ही डाक्टर थे डा. योगोश कुमार सरीन. जबकि इस अति नाजुक तथा अहम औपरेशन के लिए उन्हें सहयोग करने के लिए एक और डाक्टर की आवश्यकता थी.

ऐसे किसी डाक्टर की तेजी से तलाश शुरू हुई. चंडीगढ़ के पीजीआई (पोस्टग्रैजुएट इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज) अस्पताल के शिशु शल्य चिकित्सा विभाग में डा. जयकुमार महाजन एक साल के अनुबंध पर कार्यरत थे. अपने किसी सहयोगी के माध्यम से डा. सरीन को डा. महाजन के बारे में जानकारी मिली तो वह चंडीगढ़ जा कर उन से मिले. बातचीत होने पर वह उन्हें अपने लिए एकदम उपयुक्त लगे. डाक्टर महाजन भी उन के साथ काम करने के लिए तैयार हो गए. लेकिन वह पीजीआई के साथ हुए अनुबंध के बाद ही काम कर सकते थे.

डा. सरीन डा. महाजन के पीजीआई के अनुबंध के पीरिएड गुजरने का इंतजार करने लगे. जैसे ही डा. महाजन का पीजीआई चंडीगढ़ से अनुबंध खत्म हुआ, उन्होंने लुधियाना आ कर सीएमसी जौइन कर लिया. तब तक दोनों बच्चियां 7 महीने की हो चुकी थीं. लिहाजा डा. सरीन ने औपरेशन की तिथि निर्धारित कर दी. अपनी पूरी तैयारी और औपरेशन के रिहर्सल वगैरह डा. सरीन ने एक सप्ताह पहले ही से शुरू कर दिए.

अलगअलग विषयों वाले डाक्टरों की एक टीम इस कार्य को संपन्न करने के लिए तैयार की गई. डा. सरीन के औफिस में इस टीम के सदस्यों की रोजाना 2-3 घंटों की मीटिंग होने लगी. एकएक नुक्ते पर गहनता से विचार किया जाने लगा. फिर एक दिन डा. सरीन अपनी टीम के साथ औपरेशन थिएटर में गए और डमी पर औपरेशन कर के अपना रिहर्सल किया.

डा. सरीन ने पढ़ रखा था कि इश्चियो फेग्स टेटरीपस की श्रेणी में आने वाले केस के तहत भारत में इस तरह का पहला औपरेशन सन 1986 में कोलकाता में हुआ था. इसे डा. सुबीर चटर्जी ने किया था. इस औपरेशन की प्रक्रिया 4 महीनों तक चली थी. वह भी 2 चरणों में. दूसरी ओर डा. सरीन ऐसे औपरेशन को एक ही चरण में पूरा कर के नया कीर्तिमान बनाने की योजना पर विचार कर रहे थे. अपनी सभी तैयारियों के साथ डा. सरीन उस दिन भोर में ही तैयार हो कर अस्पताल पहुंच गए. अपने केबिन में एक घंटे से ज्यादा समय तक एकाग्रचित्त बैठ कर वह औपरेशन की तमाम स्थितियों पर गहराई से विचार करते रहे. सुबह के ठीक 7 बजे वह औपरेशन थिएटर में पहुंच गए.

पूरी तैयारी के बाद औपरेशन शुरू होने पर बच्चियों का मध्य भाग खुला तो एक आश्चर्यचकित करने वाली बात यह सामने आई कि बच्चियों की बच्चेदानी और योनि का एक ही रास्ता था. यूटेरस में ही आगे आंत के साथसाथ पेशाब के मसाने भी खुल रहे थे. यह जानकारी डा. सरीन को किसी भी टैस्ट से नहीं मिली थी. फिर भी उन्होंने औपरेशन शुरू किया. इस प्रक्रिया में उन्होंने बच्चियों की बड़ी आंत काट कर बराबर बांट दी. रेशों तक को उन्होंने पूरी बारीकी एवं सफाई के साथ आपस में जोड़ दिया.

औपरेशन में एनेस्थीसिया का भी अहम रोल रहा. डा. ललिता अफजल और डा. मेरी वर्गीज ने अपनी टीम के साथ इस भूमिका को बखूबी निभाया. बच्चियों के जिस्म को काट कर अलग कर दिए जाने के बाद आर्थोपीडियंस डा. ए.के. माम और डा. अतुल ने अपनी टीम के साथ बच्चियों के कूल्हों की हड्डियों को पहले काटा, फिर सही स्थिति में जोड़ दिया. इस से उन की टांगें पूरी तरह सहज अवस्था में आ गईं. इस के बाद डा. अब्राहम थौमस की निजी देखरेख में हुए कौस्मैटिक सर्जरी के महत्त्वपूर्ण कार्य को भी संपन्न कर दिया गया.

इस तरह शाम के साढ़े 6 बजे एक बच्ची को औपरेशन थिएटर से निकाल कर इंटेसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भरती कर दिया गया. ठीक एक घंटे बाद दूसरी बच्ची को भी औपरेशन थिएटर से निकाल कर आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया. अस्पताल के भीतर कितना बड़ा इतिहास रचा जा रहा था, इस बात की जरा भी भनक बाहर किसी को न लगे, इस के पूरे प्रबंध किए गए थे. औपरेशन सफल हो जाने के एक हफ्ते बाद तक भी अस्पताल के बाहर किसी को इस बात की खबर नहीं लगी कि दोनों बच्चियों का औपरेशन हो गया या नहीं? और यदि हो गया तो वे किस स्थिति में हैं.

मैडिकल सुपरिटेंडेंट डा. बसंत पवार ने जब बच्चियों के स्वास्थ्य की जांच कर ली तो सीएमसी के डाइरैक्टर डा. रिचर्ड डेनियल और एमएस डा. बसंत पवार ने एक संवाददाता सम्मेलन कर अपने मैडिकल संस्थान की यह बहुत बड़ी सफलता सार्वजनिक की. अपनी बच्चियों के सफल औपरेशन पर राजकुमार और उस की पत्नी लता की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए. निशुल्क औपरेशन करने पर उन्होंने सीएमसी के प्रशासनिक अधिकारियों और डाक्टरों का आभार व्यक्त किया. सोलहवीं सदी के प्रख्यात चिकित्सक एंबरोस पारे ने अपनी एक पुस्तक में लिखा था कि प्रकृति के विपरीत असाधारण रूप से जुड़े हुए प्राणियों को दैत्य कहा जाता है और वे प्राय: कुछ समय तक ही जीवित रहते हैं.

मगर आज के युग में ऐसा नहीं है. स्वास्थ्य संबंधी साहित्य में ऐसे कई किस्से मशहूर हुए हैं. सर्वाधिक मशहूर किस्सा एंग और चांग भाइयों का है, जो कि साएम में सन 1811 में पैदा हुए थे. उन के पिता चीनी थे, मां आधी चीनी व आधी साइमीस थी. एंग और  चांग निचली छाती व नाभि की जगह आपस में जुड़े थे और उन के बीच के जुड़े भाग का दायरा 17 सेंटीमीटर था. 18 साल की उम्र में ये अमेरिका जा कर वारनस की सर्कस में भरती हो गए थे.

63 वर्ष जीने वाले इन भाइयों की नुमाइश कर वारनस ने खूब पैसे कमाए. यहीं से वारनस ने इन का नाम सिआमीज ट्विंस रख दिया और यह संज्ञा आज भी विभिन्न तरह से जुड़े हुए बच्चों के लिए दी जाती है. एंग और चांग ने जुड़वा बहनों से शादी की. एंग ने 9 बच्चे और चांग ने 10 बच्चे पैदा किए. अपने जीवन में एंग और चांग ने खूब पैसे कमाए, परंतु सारी जिंदगी ये जानवरों की तरह दुनिया भर में प्रदर्शित किए गए. 63 वर्ष की उम्र में चांग की निमोनिया से मृत्यु हो गई. इस के 2 घंटे बाद एंग ने भी प्राण त्याग दिए. इन के पोस्टमार्टम में दोनों के बीच थोड़ा सा जिगर ही जुड़ा पाया गया. वर्तमान ज्ञान और शल्य चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे केस को आसानी से अलग किया जा सकता है.

इतिहास ऐसी कितनी ही कहानियों से भरा है. अब तक 600 के करीब सिआमीज दुनिया भर में पैदा हो चुके हें. लेकिन कुछ ही जुड़वां प्राणियों को अलग करने की कोशिश की गई है. ऐसी प्रथम शल्य चिकित्सा सन 1689 में डा. फेरियस ने की थी. अगले 260 सालों में यानी सन 1950 तक केवल 12 ऐसे जुड़वां बच्चों को अलग करने की कोशिश की गई.

दुनिया भर में आज तक केवल 50 के करीब ऐसे जुड़वां सफलतापूर्वक अलग किए जा सके हैं. इन में से प्राय: 2 में से केवल एक को ही जीवित बचाया जा सका है. भारत में अब तक कुल 10 ऐसे जुड़वां बच्चे अलग किए गए, मगर सभी केसों में जिंदा केवल एक ही रह पाया था. लुधियाना वाले केस में एक लड़की आज भी जीवित और स्वस्थ है, जबकि दूसरी की कुछ दिनों बाद ही मृत्यु हो गई थी. मैडिकल सूत्रों के अनुसार 189000 मामलों में एक केस कंजौइंड ट्विंस का होता है. इन में एक तिहाई बच्चे 24 घंटों के भीतर मर जाते हैं. यों ऐसे केसों में मेल चाइल्ड के मुकाबले फीमेल चाइल्ड का सरवाइवल रेट 3.1 प्रतिशत है.

लीवर से जुड़ी बच्चियों जन्नत और मन्नत का औपरेशन कर के उन्हें सफलतापूर्वक अलग किया गया है और दोनों स्वस्थ एवं चुस्तदुरुस्त हैं. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के रहने वाले मोहम्मद सलीम की पत्नी सोनिया ने अंबाला के कस्बा बराड़ा के सरकारी अस्पताल में जन्नत और मन्नत को जन्म दिया था. इस से पहले इन के यहां 5 साल की नरगिस और 3 साल की नगमा नाम की बेटियां पैदा हुई थीं. 27 अगस्त, 2015 को पैदा होने वाली जन्नतमन्नत पेट और लिवर के निचले हिस्से से आपस में जुड़ी थीं. इन्हें अलग न किया जाता तो उन की मौत संभावित थी, यह सोच कर डाक्टरों ने इन्हें चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में रैफर करते हुए जन्म के 4 घंटों के भीतर वहां पहुंचा दिया.

पीजीआई में सर्जरी का फैसला करने के बाद पीडिएट्रिक सर्जरी टीम ने रेडियोलौजी डिपार्टमैंट की मदद ली. 3 महीनों तक दोनों बच्चियों के एमआरआई परीक्षण और सीटी स्कैन किए जाते रहे. इन इमेजिंग से पता चला कि दोनों बच्चियों के शरीर में एक ही लीवर था. अलबत्ता हार्ट, किडनी, इंटेस्टाइन व कुछ अन्य अंदरूनी अंग अलगअलग थे. पैदाइश के वक्त बच्चियों का वजन काफी कम था, इस स्थिति में उन की सर्जरी करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था. 3 महीनों बाद जब उन का वजन बढ़ कर 4 किलोग्राम से ज्यादा हो गया, तब उन की सर्जरी करने पर विचार हुआ.

15 साल पहले भी ठीक इसी तरह का केस पीजीआई में आया था. मगर तब उन्हें अलग नहीं किया जा सका था. बाद में दोनों बच्चियों की मौत हो गई थी. लिहाजा इस बार पीजीआई प्रशासन इस मुद्दे पर बहुत चौकस था. किसी भी तरह के रिस्क के चलते वह अपने खाते में बदनामी लेने के हक में नहीं था. जन्नत और मन्नत के पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से इस औपरेशन पर होने वाला सारा खर्च अस्पताल प्रशासन द्वारा खुद वहन करने का भी निर्णय लिया गया. इस विशेष औपरेशन में इस्तेमाल होने वाले नए उपकरण खरीद कर 2 विशेष औपरेशन थिएटर भी तैयार करने की व्यवस्था की गई थी.

औपरेशन को अपने सफल अंजाम तक पहुंचाने के लिए डा. रवि कनौजिया, डा. जे.के. महाजन, डा. नीरजा और डा. संध्या की अगुवाई में 30 डाक्टरों की एक विशेष टीम तैयार की गई थी. इस टीम में पीडियाट्रिक, एनेस्थीसिया, पीडियाट्रिक आईसीयू व रेडियोलौजिस्ट विभागों से जुड़े तमाम अनुभवी डाक्टर थे. एक औपरेशन थिएटर में बच्चियों का औपरेशन कर के उन्हें अलग किया जाना था तो दूसरे में उन के आगे के अन्य औपरेशन किए जाने थे.

30 नवंबर, 2015 को इस औपरेशन की शुरुआत सुबह ही कर दी गई. यह क्रिया लगातार 8 घंटों तक चली. औपरेशन हर लिहाज से पूरी तरह कामयाब रहा. सर्जरी के बाद जन्नत तो जल्दी ठीक हो गई, लेकिन मन्नत को कुछ समय के लिए वैंटीलेटर पर रखना पड़ा था. बहरहाल, अब दोनों बच्चियां पूरी तरह तंदरुस्त हो कर अपने मातापिता के साथ घर जा चुकी हैं. इस औपरेशन के टीम लीडर डा. रवि कन्नौजिया के बताए अनुसार नारमल प्रेग्नैंसी में एंब्रयो फर्टिलाइज होने के बाद टूटता नहीं है, जिस वजह से एक ही बच्चा पैदा होता है. यह एंब्रयो अगर फर्टिलाइज होने के बाद टूटते हुए भी अगर कहीं से जुड़ा रह गया तो दोनों बच्चों के आपस में जुड़े रहने की संभावना बन जाती है. ऐसे ही बच्चों को मैडिकल साइंस में ‘कंजौइंड ट्विंस’ कहा जाता है. Hindi Stories

 

Hindi Crime Story: उधार के पैसे और हत्या

Hindi Crime Story: अपने परिजनों के राजनीतिक रसूख के चलते कोई बिगड़ैल नवाब अगर पैसे उधार लेकर आंखें दिखाने लगे, पैसे देना ना चाहे, तो उसका परिणाम जतिन राय जैसा हो सकता है.

रायपुर के खमताराई थाना इलाके में जतिन राय अभी नाबालिग ही था. उम्र थी 20 वर्ष और पार्षद अंजनी विभार का भतीजा था. चाचा भी प्रदेश में सत्ता में धमक रखते हैं.

राजधानी रायपुर के थाना खम्हारडीह इलाके में एक सूटकेस से जतिन राय नाम के युवक की लाश मिली. पुलिस इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले प्रदीप नायक, सुजीत तांडी और केवी दिवाकर को गिरफ्तार तो कर लिया मगर संपूर्ण घटनाक्रम को देखें तो जहां यह घटना एक बड़ा संदेश देती है कि अगर परिजन राजनीति में है, प्रभावशाली है तो बच्चे किस तरह “बिगड़े नवाब” बन सकते हैं. दूसरी तरफ पुलिस हत्या जैसे गंभीर अपराध पर भी कैसा लचीला रुख अपनाती है और अगर राजनीतिक प्रभाव ना हो मुख्यमंत्री तक पहुंच नहीं हो तो कुंभकर्णी नींद में सोती रहती है.

अपनी मौत का सामान लेकर आया जतिन!

आरोपियों ने जो घटनाक्रम पुलिस के समक्ष बयां किया है उसके अनुसार जतिन राय को कहा गया था कि अपने साथ एक बड़ा सुटकेश ट्रॉली बैग लेकर आना. क्योंकि हमें कहीं बाहर जाना है. जतिन ने अपनी मां से बैग मांगा, उन्होंने बैग देने से मना कर दिया.दूसरी तरफ आरोपी बार-बार उसे कॉल कर बुला रहे थे.

जतिन ने आखिरकार अपने पड़ोसी अभय से एक बड़ा सूटकेस लिया और प्रदीप से मिलने के लिए निकला.आरोपी प्रदीप के बताए स्थान पर पहुंचने के बाद थोड़ी देर में अपने 20 हजार रुपए लौटाने को लेकर दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ. फिर प्रदीप ने अपने साथियों के साथ मिलकर जतिन की गला दबाकर हत्या कर दी. उसकी लाश को उसी सूटकेस में भर दिया जिसे लेकर वह पहुंचा था. वे आरोपी जतिन का स्कूटर लेकर चंडीनगर में सुनसान इलाके के कुएं में लाश भरे बैग को डाल कर आराम से अपने अपने घर चले गए.

राजनीतिक रसूख!

9 फरवरी 2021को जतिन के लापता होने की शिकायत खमतराई थाने में परिवार ने दर्ज करवाई गई . मगर 5 दिनों तक पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही जहां परिजनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. थाने तक महापौर एजाज मेंबर और पर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा आ पहुंचे. मामला मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दरबार तक पहुंचा और पुलिस को तत्परता से आरोपियों को खोजने का निर्देश मिला.और कहते हैं न, जब पुलिस अपने पर आ जाए तो आरोपी बच नहीं सकते. इस घटनाक्रम में भी यही हुआ सख्ती बरतने पर प्रदीप, उसका साथी सूरज और केवी दिवाकर पुलिस के समक्ष सच स्वीकार कर लिया.

दरअसल, करीब एक महीने पहले हत्या के आरोपी प्रदीप ने अपनी बाइक गिरवी रखी थी. इसके बदले में उसे 30 हजार रुपए मिले थे. इसमें से 20 हजार रुपए मांगने पर प्रदीप ने जतिन को दिए थे. और अब इन रुपयों को जतिन लौटा नहीं रहा था. जब भी प्रदीप पैसा मांगता तो जतिन बहाने बनाने लगता और ऐसा व्यवहार करता कि रुपए तो नहीं मिलेंगे जो करना है कर लेना. हालांकि जतिन के परिवार वालों का कहना है कि प्रदीप, जतिन से चिढ़ता था, इसलिए उसकी हत्या की और अब झूठ ही रुपयों की देनदारी की बातें कर रहा है.

“क्राइम पेट्रोल” देख बनाया प्लान

इस सनसनीखेज हत्याकांड के संदर्भ में पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि इस हत्याकांड के पीछे जहां पैसों की लेनदेन थी, रुपए नहीं मिलने से नाराज प्रदीप को “क्राइम पेट्रोल” का एक एपिसोड देखकर यह सुझा कि क्यों ना जतिन राय को कुछ इस तरह सजा दे दी जाए. पुलिस के समक्ष यह भी सच सामने आ गया है कि प्रदीप घटना से पहले जतिन को लगातार फोन कर रहा था, वो उसे बुला रहा था, जतिन जाने से इनकार कर चुका था. मगर वह बार-बार दोस्ती की दुहाई दे रहा था.

जतिन जब प्रदीप के पास भनपुरी स्थित मकान में पहुंचा तो यहां दोस्तों ने उसका स्वागत किया और मिलकर शराब पार्टी की. प्रदीप ने जानबूझकर जतिन को ज्यादा शराब पिलाई. प्रदीप ने तीव्र आवाज में म्यूजिक चला रखा था ताकि किसी को कोई आभास ना मिले. इसके बाद हत्यारों ने मौका मिलते ही उसकी गला घोंट कर हत्या कर दी और जो सूटकेस जतिन लेकर आया था उसी में उसके शव को डालकर खम्हारडीह में फेंक दिया गया.

तीन दिन बाद कचरा बीनने वाले एक बच्चे की नजर कुएं में पड़े बैग और उसमें से निकले पैरों पर पड़ी थी. और मामला पुलिस तक पहुंचा. मगर पुलिस जांच में उदासीन रही जब जतिन राय के चाचा और परिजनों ने हंगामा किया तब जाकर पुलिस के उच्च अधिकारियों के कान में जूं रेंगी और मामले की जांच में में तेजी आई और अंततः मामले का खुलासा हुआ. Hindi Crime Story

Suspense Crime Story: दौलत की खातिर दांव पर लगी दोस्ती

Suspense Crime Story: 19मार्च, 2021 की रात 10 बजे शीला देवी अपने देवर आनंद प्रजापति के साथ जनता नगर चौकी पहुंचीं. उस समय इंचार्ज ए.के. सिंह चौकी पर मौजूद थे. उन्होंने शीला देवी को बदहवास देखा, तो पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम घबराई हुई क्यों हो? कोई गंभीर बात है क्या?’’

‘‘हां सर. हमें किसी अनहोनी की आशंका है.’’

‘‘कैसी अनहोनी? साफसाफ पूरी बात बताओ.’’

‘‘सर, दरअसल बात यह है कि रात 8 बजे मेरा बेटा शैलेश, उस का दोस्त अर्श गुप्ता व विनय घर पर नीचे कमरे में शराब पी रहे थे. कुछ देर बाद कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आईं. फिर वे लोग बाइक से कहीं चले गए.

‘‘उन के जाने के बाद मैं कमरे में गई, तो वहां खून से सनी चादर देखी. अनहोनी की आशंका से मैं घबरा गई. मैं ने इस की जानकारी पड़ोस में रहने वाले अपने देवर आनंद को दी, फिर उन के साथ सूचना देने आप के पास आ गई. आप मेरी मदद करें.’’

शीला देवी की बात सुनकर ए.के. सिंह को लगा कि जरूर कोई अनहोनी घटना घटित हुई है. उन्होंने यह सूचना बर्रा थानाप्रभारी हरमीत सिंह को दी फिर 2 सिपाहियों के साथ शीला देवी के बर्रा भाग 8 स्थित मकान पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के चंद मिनट बाद ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह भी आ गए. हरमीत सिंह ने ए.के. सिंह के साथ कमरे का निरीक्षण किया तो सन्न रह गए. कमरे के फर्श पर खून पड़ा था और पलंग पर बिछी चादर खून से तरबतर थी. कमरे का सामान भी अस्तव्यस्त था. खून की बूंदें कमरे के बाहर गली तक टपकती गई थीं.

निरीक्षण के बाद हरमीत सिंह ने अनुमान लगाया कि कमरे के अंदर कत्ल जैसी वारदात हुई है या फिर गंभीर रूप से कोई घायल हुआ है. शैलेश और उस का दोस्त या तो लाश को ठिकाने लगाने गए हैं या फिर अस्पताल गए हैं. कहीं भी गए हों, वे लौट कर घर जरूर आएंगे. अत: उन्होंने घर के आसपास पुलिस का पहरा लगा दिया तथा खुद भी निगरानी में लग गए. रात लगभग डेढ़ बजे शैलेश और उस का दोस्त अर्श गुप्ता वापस घर आए तो पुिलस ने उन्हें दबोच लिया और थाना बर्रा ले आए. दोनों के हाथ और कपड़ों पर खून लगा था. इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने पूछा, ‘‘तुम दोनों ने किस का कत्ल किया है और लाश कहां है?’’

शैलेश कुछ क्षण मौन रहा फिर बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपने बचपन के दोस्त विनय प्रभाकर का कत्ल किया है. वह बर्रा भाग दो के मनोहर नगर में रामजानकी मंदिर के पास रहता था. उस की लाश को मैं ने अर्श की मदद से रिंद नदी में फेंक दिया है. पैट्रोल खत्म हो जाने की वजह से हम ने विनय की मोटरसाइकिल खाड़ेपुर-फत्तेपुर मोड़ पर खड़ा कर दी और वापस लौट आए.’’

‘‘तुम ने अपने दोस्त का कत्ल क्यों किया?’’ थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने शैलेश से पूछा.

इस सवाल पर शैलेश काफी देर तक हरमीत सिंह को गुमराह करता रहा. पहले वह बोला, ‘‘साहब, नशे में गलती हो गई. हम ने उस का कत्ल कर दिया.’’

फिर बताया कि उस के मोबाइल फोन में उस की महिला मित्र की कुछ आपत्तिजनक फोटो थीं. उन फोटो को विनय ने धोखे से अपने मोबाइल फोन में ट्रांसफर कर लिया था. वह उन फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दे कर ब्लैकमेल कर रहा था, इसलिए हम ने उसे मार डाला. लेकिन थानाप्रभारी हरमीत सिंह को उस की इन दोनों बातों पर यकीन नहीं हुआ. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने सख्ती की तो दोनों टूट गए.

फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने 10 लाख रुपए की फिरौती मांगने के लिए विनय की हत्या की योजना बनाई थी. कुछ माह पहले संजीत हत्याकांड की तरह शव को ठिकाने लगाने के बाद उसी के मोबाइल फोन से उस के घर वालों को फोन कर फिरौती मांगने की योजना थी. उस ने दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की थी. लेकिन फिरौती मांगने के पहले ही वे पकड़े गए.

शैलेश व अर्श की जामातलाशी में उन के पास से 3 मोबाइल फोन मिले, जिस में एक मृतक विनय का था तथा बाकी 2 शैलेश व अर्श के थे. उन के पास एक पर्स भी बरामद हुआ जिस में मृतक का फोटो, आधार कार्ड तथा कुछ रुपए थे. बरामद पर्स मृतक विनय प्रभाकर का था. शैलेश व अर्श गुप्ता की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त आलाकत्ल बांका तथा लाश ठिकाने लगाने में इस्तेमाल मोटरसाइकिल बरामद कर ली. बांका उस ने अपने कमरे में छिपा दिया था और पैट्रोल खत्म होने से उस ने मोटरसाइकिल खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ी कर दी थी.

फिरौती और हत्या के इस मामले में थानाप्रभारी हरमीत सिंह कोई कोताही नहीं बरतना चाहते थे. क्योंकि इस के पहले संजीत अपहरण कांड में बर्रा पुलिस गच्चा खा चुकी थी. अपहर्त्ताओं ने फिरौती की रकम भी ले ली थी और उस की हत्या भी कर दी थी. इस मामले में लापरवाही बरतने में एसपी व डीएसपी सहित 5 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था. अत: उन्होंने घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी.

सूचना पा कर रात 3 बजे एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय थाना बर्रा पहुंच गए. उन्होंने घटना के संबंध में गिरफ्तार किए गए शैलेश व अर्श गुप्ता से विस्तार से पूछताछ की. फिर दोनों को साथ ले कर रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. इस के बाद कातिलों की निशानदेही पर नदी किनारे पड़ा विनय प्रभाकर का शव बरामद कर लिया.

विनय की हत्या बड़ी निर्दयतापूर्वक की गई थी. उस का गला धारदार हथियार से काटा गया था, जिस से सांस की नली कट गई थी और उस की मौत हो गई थी. मृतक विनय की उम्र 26 वर्ष के आसपास थी और उस का शरीर हृष्टपुष्ट था. 20 मार्च की सुबह 5 बजे बर्रा थाने के 2 सिपाही मृतक विनय के घर पहुंचे और उस की हत्या की खबर घर वालों को दी. खबर पाते ही घर व मोहल्ले में सनसनी फैल गई. घर वाले रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. वहां विनय का शव देख कर मां विमला तथा बहन रीता बिलख पड़ीं. पिता रामऔतार प्रभाकर तथा भाई पवन की आंखों से भी अश्रुधारा बह निकली. पुलिस अधिकारियों ने उन्हे धैर्य बंधाया.

पवन ने एसपी दीपक भूकर को बताया कल शाम साढ़े 7 बजे किसी का फोन आने पर उस का भाई विनय यह कह कर अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से घर से निकला था कि अपने दोस्त से मिलने जा रहा है. उस के बाद वह घर नहीं लौटा. रात भर हम लोग उस के घर वापस आने का इंतजार करते रहे. उस का फोन भी बंद था. सुबह 2 सिपाही घर आए. उन्होंने विनय की हत्या की सूचना दी. तब हम लोग यहां आए. लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि विनय की हत्या किस ने और क्यों की?

‘‘तुम्हारे भाई की हत्या किसी और ने नहीं, उस के बचपन के दोस्त शैलेश प्रजापति व उस के साथी अर्श गुप्ता ने की है. वह तुम लोगों से फिरौती के 10 लाख रुपए वसूलना चाहते थे. लेकिन शैलेश की मां ने ही उस का भांडा फोड़ दिया और दोनों पकड़े गए.’’

यह जानकारी पा कर पवन व उस के घर वाले अवाक रह गए. क्योंकि वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि शैलेश ऐसा विश्वासघात कर सकता है. निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम हाउस हैलट अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह शैलेश के उस कमरे में पहुंचे, जहां विनय का कत्ल किया गया था. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने जहां घटनास्थल का निरीक्षण किया, वहीं फोरैंसिक टीम ने भी बेंजाडीन टेस्ट कर साक्ष्य जुटाए.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल बांका भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने मृतक के भाई पवन को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201 तथा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत शैलेश प्रजापति तथा अर्श गुप्ता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्हें न्यायसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की सनसनीखेज घटना का खुलासा हुआ.

कानपुर शहर का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-बर्रा. इस क्षेत्र के बड़ा होने से इसे कई भागों में बांटा गया है. रामऔतार प्रभाकर अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के भाग 2 में मनोहरनगर में जानकी मंदिर के पास रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विमला के अलावा 2 बेटे पवन कुमार, विनय कुमार तथा बेटी रीता कुमारी थी. रामऔतार प्रभाकर आर्डिनैंस फैक्ट्री में काम करते थे. किंतु अब रिटायर हो चुके थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

फैक्ट्री में रामऔतार प्रभाकर के साथ सोमनाथ प्रजापति काम करते थे. सोमनाथ भी बर्रा भाग 8 में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शीला देवी के अलावा एकलौता बेटा शैलेश था. सोमनाथ भी रिटायर हो चुके थे. सोमनाथ बीमार रहते थे. उन्हें सुनाई भी कम देता था और दिखाई भी. उन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. रामऔतार और सोमनाथ इस के पहले अर्मापुर स्थित फैक्ट्री की कालोनी में रहते थे. 3 साल पहले दोनों ने बर्रा क्षेत्र में जमीन खरीद ली थी और अपनेअपने मकान बना कर रहने लगे थे. मकान बदलने के बावजूद दोनों की दोस्ती में कमी नहीं आई थी. दोनों परिवार के लोगों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

रामऔतार का बेटा विनय और सोमनाथ का बेटा शैलेश बचपन के दोस्त थे. दोनों एकदूसरे के घर आतेजाते थे. विनय ने हाईस्कूल पास करने के बाद आईटीआई से मशीनिस्ट का कोर्स किया था. वह नौकरी की तलाश में था. जबकि शैलेश ड्राइवर बन गया था. वह बुकिंग की कार चलाता था.

शैलेश का एक अन्य दोस्त अर्श गुप्ता था. वह फरनीचर कारीगर था और गुजैनी गांव में रहता था. अर्श और शैलेश शराब के शौकीन थे. अकसर दोनों साथ पीते थे और लंबीलंबी डींग हांकते थे. उन दोनों ने विनय को भी शराब पीना सिखा दिया था. अब हर रविवार को शैलेश के घर शराब पार्टी होती थी. तीनों बारीबारी से पार्टी का खर्चा उठाते थे.

एक शाम खानेपीने के दौरान विनय ने शैलेश व अर्श को बताया कि उस की बहन रीता की शादी तय हो गई है. 27 अप्रैल को बारात आएगी. शादी में लगभग 10-12 लाख रुपया खर्च होगा. पिता व भाई ने रुपयों का इंतजाम कर लिया है. शादी की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. शैलेश व अर्श मामूली कमाने वाले युवक थे. वह शार्टकट से लखपति बनना चाहते थे. इस के लिए शैलेश उरई में पान मसाला का कारोबार करना चाहता था. उरई में वह जगह भी देख आया था. लेकिन कारोबार के लिए उस के पास पैसा नहीं था.

पैसा कहां से और कैसे आए, इस के लिए शैलेश और अर्श ने सिर से सिर जोड़ कर विचारविमर्श किया तो उन्हें विनय याद आया. विनय ने बताया था कि उस के यहां बहन की शादी है और घर वालों ने 10-12 लाख रुपए का इंतजाम किया है. दौलत की चाहत में शैलेश व अर्श ने दोस्त के साथ छल करने और फिरौती के रूप में 10 लाख रुपया वसूलने की योजना बनाई. संजीत हत्याकांड दोनों के जेहन में था. उसी तर्ज पर उन दोनों ने विनय की हत्या कर के उस के घर वालों से फिरौती वसूलने की योजना बनाई.

योजना के तहत 19 मार्च, 2021 की रात पौने 8 बजे शैलेश ने अर्श के मोबाइल से विनय प्रभाकर के मोबाइल पर काल की और पार्टी के लिए घर बुलाया. विनय की 5 दिन पहले ही लोहिया फैक्ट्री में नौकरी लगी थी. फैक्ट्री से वह साढ़े 7 बजे घर लौटा था कि 15 मिनट बाद शैलेश का फोन आ गया. पार्टी की बात सुन कर वह शैलेश के घर जाने को राजी हो गया.

रात 8 बजे विनय अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से बर्रा भाग 8 स्थित शैलेश के घर पहुंच गया. उस समय कमरे में शैलेश व अर्श गुप्ता थे और पार्टी का पूरा इंतजाम था. इस के बाद तीनों ने मिल कर खूब शराब पी. विनय जब नशे में हो गया तो योजना के तहत अर्श व शैलेश ने उसे दबोच लिया और उस की पिटाई करने लगे. विनय ने जब खुद को जाल में फंसा देखा तो वह भी भिड़ गया. कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. इसी बीच शैलेश ने कमरे में छिपा कर रखा बांका निकाला और विनय की गरदन पर वार कर दिया. विनय का गला कट गया और वह फर्श पर गिर पड़ा.

इस के बाद अर्श ने विनय को दबोचा और शैलेश ने उस की गरदन पर 2-3 वार और किए. जिस से विनय की गरदन आधी से ज्यादा कट गई और उस की मौत हो गई. हत्या करने के बाद उन दोनों ने शव को तोड़मरोड़ कर चादर व कंबल में लपेटा और फिर विनय की मोटरसाइकिल पर रख कर रिंद नदी में फेंक आए. वापस लौटते समय उन की बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया, इसलिए उन्होंने बाइक को खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ा कर दिया. फिर पैदल ही घर आ गए.

घर पर उन के स्वागत के लिए बर्रा पुलिस खड़ी थी, जिस से वे पकड़े गए. दरअसल, शैलेश की मां शीला ने ही कमरे में खून देख कर पुलिस को सूचना दी थी, जिस से पुलिस आ गई थी. 21 मार्च, 2021 को थाना बर्रा पुलिस ने आरोपी शैलेश प्रजापति व अर्श गुप्ता को  कोर्ट में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित