Delhi Crime Story: प्यार में भटका पुजारी

Delhi Crime Story: मंदिर का पुजारी बन कर गजानन ने न जाने कितनी औरतों को पथभ्रष्ट किया, लेकिन जब उन में से एक सुनीता ने उस से अपनी देह की कीमत 10 लाख रुपए वसूल ली तो ऐसा क्या हुआ कि पुजारी को जान गंवानी पड़ी…

दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक नांगली राजपुर स्थित यश गैस्टहाऊस में 27 अक्तूबर, 2015 को एक ऐसी घटना घटी कि गैस्टहाऊस के मैनेजर और कर्मचारी सिहर  उठे. शाम के करीब 4 बजे गैस्टहाऊस के कमरा नंबर 24 से अचानक चीखने की आवाजें आने लगीं. चीखें सुन कर मैनेजर सुमित कटियार 2 कर्मचारियों के साथ उस कमरे की ओर भागे. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि कमरे से धुआं भी निकल रहा है.

उस कमरे में सुबह ही एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया था. कमरे से चीखने की जो आवाज आ रही थी, वह उसी आदमी की थी. मैनेजर की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस आदमी के साथ ऐसा क्या हो गया, जो वह इस तरह चीख रहा है. चीखों और धुआं निकलने से उस ने यही अंदाजा लगाया कि शायद वह आदमी जल रहा है. यह सोच कर सुमित कटियार घबरा गए. कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. उन्होंने दरवाजा थपथपाया, लेकिन वह नहीं खुला. वह परेशान हो उठे. जब उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने अन्य कर्मचारियों के साथ मिल कर कमरे का दरवाजा तोड़ दिया. कमरे के अंदर का खौफनाक दृश्य देख कर सब की घिग्घी बंध गई.

कमरे में पड़े बैड के नीचे एक आदमी आग में जलते हुए तड़प रहा था. उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था. बैड के पास खड़ी उस की पत्नी हैरत से उसे जलता देख रही थी. वह भी उसी हालत में थी. सुमित कटियार ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के इस घटना की सूचना दे दी. थोड़ी ही देर में पुलिस कंट्रोल रूम की गाड़ी वहां पहुंच गई, जिस में 4 पुलिसकर्मी थे. यह क्षेत्र दक्षिणीपूर्वी दिल्ली के थाना सनलाइट कालोनी के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से इस घटना की सूचना थाना सनलाइट कालोनी को भी दे दी गई थी.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल 2 हैडकांस्टेबलों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. निरीक्षण में उन्हें कमरे में एक अधेड़ आदमी फर्श पर झुलसा पड़ा मिला. वह बेहोशी की हालत में लगभग 90 प्रतिशत जला था. उस के कपड़े बैड के पास रखी मेज पर रखे थे. मेज के नीचे एक कोल्डड्रिंक्स की 2 लीटर की खाली बोतल रखी थी, जिस में थोड़ा पैट्रोल था. थानाप्रभारी ने एक हैडकांस्टेबल के साथ उस जले हुए आदमी को इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया.

जिस व्यक्ति के साथ यह घटना घटी थी, वह कौन था, कहां का रहने वाला था और यह घटना कैसे घटी थी, इस बारे में थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने गैस्टहाऊस के मैनेजर सुमित कटियार से पूछा तो उन्होंने बताया कि जो आदमी आग से झुलसा है, उस का नाम गजानन है. वह सुबह साढ़े 10 बजे अपनी पत्नी सुनीता के साथ आया था. उस ने आईडी के रूप में अपने वोटर कार्ड की फोटोकौपी जमा कराई थी.

तब उसे कमरा नंबर 24 दे दिया गया था. इस के बाद अभी थोड़ी देर पहले कमरे से चीखने की आवाज सुनाई दी तो वह कुछ कर्मचारियों के साथ वहां पहुंचा. तब उस ने कमरे से धुआं निकलते देखा. उस ने दरवाजा खुलवाने की कोशिश की. जब दरवाजा नहीं खुला तो उस ने दरवाजा तोड़ दिया. इस के आगे मैनेजर ने बताया कि जब उस ने गजानन की पत्नी सुनीता से आग लगने के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि उस की शादी को 15 साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें संतान नहीं हुई. बड़ेबड़े डाक्टरों को दिखाया, तांत्रिकों के पास भी गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

संतान न होने की वजह से दोनों काफी परेशान थे. एक दिन पहले उस के पति ने उस से कहा कि कल उन्हें महाराष्ट्र के नागपुर शहर चलना है. वहां एक बहुत पहुंचे हुए फकीर हैं, जो दुआ पढ़ा हुआ पानी देते हैं. वह पानी पीने के बाद संतान सुख का लाभ मिलता है. चूंकि जिस ट्रेन से उन्हें नागपुर जाना था, वह रात 9 बजे की थी. इतना टाइम वे सड़क पर नहीं बिता सकते थे, इसलिए आराम करने के लिए इस गैस्टहाऊस में आ गए. शारीरिक संबंध बनाने के बाद पति पर न जाने क्या फितूर सवार हुआ कि उन्होंने साथ लाए कपड़े के बैग से 2 लीटर वाली प्लास्टिक की बोतल निकाली और उस में भरा पैट्रोल खुद पर उड़ेल लिया. वह कुछ समझ पाती पति ने माचिस की तीली जला कर खुद को आग लगा ली.

‘‘कहां है गजानन की पत्नी सुनीता?’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा तो मैनेजर इधरउधर देखने लगा. उस ने पूरा गैस्टहाऊस छान मारा, लेकिन सुनीता कहीं नहीं मिली.

‘‘तुम्हारी लापरवाही की वजह से वह भाग गई,’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने कहा, ‘‘तुम ने गजानन की उस पत्नी की कोई आईडी ली थी?’’

‘‘सर, पति की आईडी मिल गई तो मैं ने उस की आईडी लेना जरूरी नहीं समझा.’’ कह कर मैनेजर ने सिर झुका लिया.

‘‘वह गजानन की पत्नी ही थी, मुझे नहीं लगता. वह मौजमस्ती के लिए उस के साथ यहां आई थी. मुझे पूरा यकीन है कि वह पैट्रोल गजानन नहीं वही लाई थी. अपना काम कर के वह रफूचक्कर हो गई. उस ने तुम्हें झूठी कहानी सुना कर विश्वास में ले लिया और कपड़े पहन कर चली गई. लापरवाही तुम लोग करते हो और भुगतना पुलिस को पड़ता है.’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने  नाराजगी प्रकट करते हुए कहा.

थानाप्रभारी ने गैस्टहाऊस का रजिस्टर चैक किया तो उस में गजानन का पता चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली का लिखा था. जबकि उस ने अपने वोटर आईडी कार्ड की जो छायाप्रति जमा कराई थी, उस में उस का पता गांव कामनवास, सवाई माधोपुर, राजस्थान लिखा था. पुलिस ने गैस्टहाऊस के मैनेजर को वादी बना कर भादंवि की धारा 307 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. गजानन का हाल जानने के लिए ओमप्रकाश लेखवाल अस्पताल पहुंचे तो उन्हें पता चला कि गजानन की मौत हो चुकी है. मरने से पहले उस ने डाक्टरों को बताया था कि उसे सुनीता उर्फ रिंकू ने जलाया था.

गजानन की मौत की खबर उस के घर वालों को देना जरूरी था, इसलिए उस ने गैस्टहाऊस में दिल्ली का जो पता लिखाया था, पुलिस चांदनी चौक स्थित उस पते पर गौरीशंकर मंदिर पहुंची तो वहां से पता चला कि गजानन पहले इसी मंदिर में महंत था. लेकिन कुछ दिनों पहले उसे वहां से हटा दिया गया था. अब वह सवाई माधोपुर स्थित अपने गांव में रहता था. दिल्ली वह 10-15 दिनों में आताजाता रहता था. इस के बाद दिल्ली पुलिस ने राजस्थान पुलिस को गजानन की हत्या की खबर भिजवा कर संबंधित थाने द्वारा उस के घर वालों को उस की हत्या की खबर भिजवा दी. खबर सुन कर गजानन के घर वाले थाना सनलाइट कालोनी पहुंच गए.

डीसीपी संजीव रंधावा ने सुनीता की तलाश के लिए पुलिस की एक टीम बनाई, जिस में एसआई ललित कुमार, हैडकांस्टेबल मान सिंह, कांस्टेबल सूबे सिंह, महिला कांस्टेबल संगीता सिंह को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व ओमप्रकाश लेखवाल को सौंपा गया. गजानन चांदनी चौक के जिस गौरीशंकर मंदिर में महंत था, पुलिस टीम ने वहीं से जांच शुरू की. वहां से पुलिस को कई चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. पता चला कि गजानन 10 साल पहले दिल्ली आया था और गौरीशंकर मंदिर का महंत बन गया था. मंदिर में पूजापाठ कराने के साथसाथ वह ज्योतिषी एवं तंत्रमंत्र का भी काम करता था. उस के पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुरुषों के साथसाथ महिलाएं भी आती थीं.

इन में कुछ महिलाओं से उस की अच्छी जानपहचान हो गई थी. वह शराब भी पीने लगा था. इन में से कुछ महिलाओं से उस के अनैतिक संबंध भी बन गए थे. बाद में जब यह बात गौरीशंकर मंदिर की प्रबंधक कमेटी को पता चली तो कमेटी ने सन 2008 में गजानन को मंदिर से निकाल दिया था. इस के बाद गजानन ने मंदिर के बाहर फूल एवं पूजा सामग्री बेचने की दुकान खोल ली. उस की यह दुकान बढि़या चलने लगी थी. उस ने दुकान पर काम करने के लिए 2 नौकर रख दिए और खुद राजस्थान स्थित अपने घर चला गया. यह 2-3 साल पहले की बात है. वह हफ्तादस दिन में दुकान पर आता और नौकरों से हिसाब कर के चला जाता था. यह जानकारी हासिल कर के पुलिस टीम थाने लौट आई.

उधर पोस्टमार्टम के बाद 20 अक्तूबर, 2015 को लाश गजानन के परिजनों को सौंप दी गई. घर वालों ने निगमबोध घाट पर ही उस की अंत्येष्टि कर दी. एसआई ललित कुमार ने घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी पर शक नहीं जताया. पुलिस ने गैस्टहाऊस में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी. फुटेज में सुनीता उर्फ रिंकू का चेहरा तो नजर आ रहा था, लेकिन पुलिस के लिए मुश्किल यह थी कि इतनी बड़ी दिल्ली में उसे कहां ढूंढ़ा जाए. पुलिस के पास सुनीता का कोई मोबाइल नंबर भी नहीं था, जिस से उस के द्वारा उसे ढूंढने में आसानी हो.

गैस्टहाऊस में गजानन के कपड़ों से एक मोबाइल फोन मिला था. घर वालों ने बताया था कि वह मोबाइल गजानन का ही है. ललित कुमार ने सुनीता का फोन नंबर जानने के लिए गजानन के मोबाइल की काल लौग देखी तो एक नंबर पर उन की नजर टिक गई. क्योंकि वह नंबर ‘माई लव’ के नाम से सेव था. ललित कुमार जानना चाहते थे कि यह नंबर किस का है. उन्होंने अपने सैल फोन से वह नंबर मिलाया. कुछ देर बाद एक महिला ने फोन रिसीव कर के ‘हैलो’ कहा तो ललित कुमार बोले, ‘‘कार में चलने का शौक है तो इस के लोन की किस्तें भी समय से जमा करा दिया करो. 3 महीने हो गए, आप ने अभी तक किश्तें नहीं जमा कीं.’’

‘‘अरे भाई, आप कौन बोल रहे हैं? मैं ने कार के लिए कब लोन लिया?’’ दूसरी ओर से महिला ने कर्कश स्वर में कहा.

‘‘आप रुखसार बोल रही हैं न?’’ ललित कुमार ने पूछा.

‘‘नहीं बाबा, मैं रुखसार नहीं, सुनीता हूं. रौंग नंबर.’’

‘‘सौरी मैडम, गलत नंबर लग गया.’’ ललित कुमार ने कहा. इस के बाद उन्होंने फोन काट दिया. इस बातचीत के बाद उन की आंखों में चमक आ गई. क्योंकि सुनीता के फोन नंबर की पुष्टि हो गई थी.

ललित कुमार ने सुनीता का फोन नंबर सर्विलांस पर लगवाया तो उस की लोकेशन लाल किला, रेलवे कालोनी की मिली. वह टीम के साथ रेलवे कालोनी पहुंचे तो वहां के लोगों से सुनीता के बारे में पूछने पर पता चला कि सुनीता का पति रेलवे में नौकरी करता है. वह पहले इसी कालोनी में पति के साथ रहती थी, पर 4 सालों से वह परिवार के साथ नोएडा में कहीं रहने चली गई है. पता चला कि रेलवे कालोनी का वह क्वार्टर उस ने किसी को किराए पर दे रखा था. किराएदार से वह उस दिन मिलने आई थी. उस से मिल कर वह नोएडा चली गई थी. नोएडा में सुनीता कहां रह रही है, यह बात रेलवे कालोनी में रहने वाला कोई नहीं बता सका.

अलबत्ता सुनीता ने जिस परिवार को अपना क्वार्टर किराए पर दिया था, उस ने पुलिस को बताया कि उस का कुछ जरूरी सामान एक कमरे में रहता है, जिस की चाबी सुनीता के पास रहती है. आज जब वह मिलने आई थी तो वहां से कुछ सामान अपने बैग में भर कर ले गई थी. इतनी जानकारी मिलने के बाद ललित कुमार ने सर्विलांस द्वारा सुनीता के फोन की लोकेशन पता की तो इस बार लोकेशन नोएडा सैक्टर-29 की निकली. 28 अक्तूबर, 2015 की सुबह ललित कुमार ने टीम में शामिल महिला कांस्टेबल के साथ नोएडा के सैक्टर- 29 स्थित एक मकान पर दबिश दी तो वहां सुनीता मिल गई.

थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, ‘‘मेरा गजानन से रिश्ता जरूर था, मगर मैं ने उन्हें जला कर नहीं मारा. उन्होंने खुद ही पैट्रोल डाल कर आग लगाई थी.’’

‘‘तो फिर तुम वहां से भागी क्यों?’’ थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा.

‘‘स…सर, मैं डर गई थी.’’ वह बोली.

‘‘गजानन भला खुद को आग क्यों लगाएगा?’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा.

‘‘सर, बात यह है कि गजानन की पत्नी बीमार रहती है. जब मुझ से उन का रिश्ता बना तो वह मुझ पर शादी करने का दबाव बनाने लगे. मैं 2 बच्चों की मां हूं. बच्चों को छोड़ कर मैं ऐसा कैसे कर सकती थी?’’ कह कर सुनीता सिसकने लगी.

पलभर बाद वह हिचकियां लेते हुए बोली, ‘‘26 अक्तूबर की शाम गजानन ने  फोन कर के कहा कि मुझ से मिलने की उस की काफी इच्छा है. अगले दिन उन्होंने सुबह 10 बजे मुझे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर बुलाया. अगले दिन तयशुदा समय पर मैं स्टेशन के बाहर पहुंची तो उन्हें मैं ने इंतजार करते पाया. उन के कंधे पर कपड़े का एक बैग था.

‘‘गजानन मुझे यश गैस्टहाऊस ले गए. उन्होंने वहां मुझे अपनी पत्नी बताया था. कमरे में जा कर हम ने शारीरिक संबंध बनाए. उस के बाद गजानन ने साथ लाए बैग से प्लास्टिक की 2 लीटर की बोतल निकाली और उस का ढक्कन खोला. उस में पैट्रोल भरा था.

‘‘गजानन ने मुझ से कहा कि वह आखिरी बार पूछ रहा है कि मैं उस से शादी करूंगी या नहीं? मैं ने साफ इनकार कर दिया. तब उन्होंने कहा कि जब तुम नहीं मान रही तो मैं खुदकुशी कर लूंगा, लेकिन पुलिस यही समझेगी कि उसे तुम ने जलाया है. इस के बाद गजानन ने पूरा पैट्रोल अपने शरीर पर छिड़क कर आग लगा ली.’’

फिर सुनीता जोरजोर से रोते हुए बोली, ‘‘सर, मैं ने उन्हें नहीं मारा. मुझे फंसाने के लिए उन्होंने खुदकुशी की थी.’’

ओमप्रकाश लेखवाल को लगा कि सुनीता की आंखों के आंसू घडि़याली हैं, यह जरूर कुछ छिपा रही है. उन्होंने महिला कांस्टेबलों को इशारा किया. महिला कांस्टेबल ने सुनीता को एक अलग कमरे में ले जा कर थोड़ी सख्ती की तो उस ने सहजता से अपना जुर्म कबूल कर लिया. सुनीता उर्फ रिंकू मूलरूप से पटना, बिहार की रहने वाली थी. 13 साल पहले उस की शादी विजय कुमार के साथ हुई थी. विजय कुमार दिल्ली में रहता था और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर बतौर टैक्नीशियन नौकरी करता था. वह पति के साथ खुश थी. वह 2 बच्चों की मां बनी.

विजय कुमार को रेलवे की ओर से जामामस्जिद के पास बनी रेलवे कालोनी में क्वार्टर मिला था. उस में वह पत्नी सुनीता और बच्चों के साथ रहता था. सुनीता आजादखयालों की थी, जबकि विजय कुमार पंरपरावादी. सुनीता को घूमने एवं सिनेमाहौल में फिल्में देखने का शौक था. अपने शौक पूरे करने के लिए वह पति से अनापशनाप खर्च लेती रहती थी. सुनीता अकसर गौरीशंकर मंदिर भी जाया करती थी. वहीं 8 साल पहले उस की मुलाकात मंदिर के महंत गजानन से हुई. गजानन पुजारी होने के साथसाथ ज्योतिषी भी था. यही वजह थी कि उस के पास महिलाओं की भीड़ लगी रहती थी. सुनीता गजानन से मिली तो वह उस का दीवाना हो गया. इस के बाद दोनों के बीच संबंध बन गए.

कुछ दिनों बाद गजानन और सुनीता के संबंधों की बात मंदिर की प्रबंधक कमेटी को पता चली तो उसे मंदिर से निकाल दिया गया. तब वह मंदिर के बाहर फूल व पूजा सामग्री बेचने लगा. सुनीता और गजानन के संबंध पहले की ही तरह जारी रहे. गजानन ने चांदनी चौक में किराए का मकान ले रखा था. जब भी उस की इच्छा होती, वह सुनीता को अपने कमरे पर बुला लेता. वह सुनीता को शौक पूरे करने के लिए अच्छेखासे पैसे भी देता था. सन 2014 के अगस्त महीने में गजानन ने सवाई माधोपुर में अपना एक प्लौट 25 लाख रुपए में बेचा तो सुनीता के मांगने पर उस ने उसे 10 लाख रुपए उधार दे दिए. सितंबर, 2015 के अंतिम दिनों में गजानन ने उस से अपने रुपए मांगे तो सुनीता बहाने बनाने लगी.

दरअसल, अब तक गजानन का मन सुनीता से भर चुका था. वह अपने 10 लाख रुपए ले कर उस से हमेशा के लिए पीछा छुड़ाना चाहता था. लेकिन सुनीता की नीयत में खोट आ गई थी. वह गजानन के 10 लाख रुपए किसी भी सूरत में लौटाना नहीं चाहती थी. वह टालमटोल करने लगी तो गजानन धमकी देने लगा कि उस ने उस के अंतरंग क्षणों की वीडियो बना रखी है. अगर उस ने उस के पैसे नहीं लौटाए तो वह वीडियो उस के पति को दिखा देगा.

सुनीता डर गई. उस ने गजानन की हत्या करने की योजना बना डाली. सुनीता ने 26 अक्तूबर, 2015 की रात गजानन को फोन किया. उस समय गजानन सवाई माधोपुर स्थित अपने घर में था. सुनीता ने कहा, ‘‘कल सुबह तुम हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर 11 बजे मिलना. मैं तुम्हारे 10 लाख रुपए लौटा दूंगी.’’

पैसों के लालच में गजानन रात में ही ट्रेन द्वारा राजस्थान से चल पड़ा और 27 अक्तूबर की सुबह 9 बजे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंच गया. वह स्टेशन के बाहर खड़ा हो कर सुनीता का इंतजार करने लगा. 10 बजे के करीब सुनीता वहां पहुंची. वह गजानन को नांगली राजपुर स्थित यश गैस्टहाऊस ले गई. वहां गजानन ने एक कमरा बुक कराया. जैसे ही वे दोनों कमरे में पहुंचे, तभी सुनीता ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. मौके का फायदा उठाने के लिए गजानन ने उसे आगोश में ले लिया.

इस के बाद दोनों ने कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाए. हसरतें पूरी करने के बाद दोनों बिस्तर पर निर्वस्त्र लेटे थे, तभी गजानन ने उस से अपने 10 लाख रुपए मांगे. तब सुनीता ने कहा, ‘‘पंडितजी, 8-10 सालों से मैं तुम्हारी सेवा करती आ रही हूं. अब तो आप उन पैसों को भूल जाइए.’’

‘‘नहीं सुनीता, घर वालों को इस की जानकारी हो गई है. वे सब मुझ से झगड़ा करते हैं. इसलिए मैं  पैसे मांग रहा हूं.’’ गजानन ने कहा.

सुनीता उठी और साथ लाए बैग से पैट्रोल से भरी बोतल निकाल कर उस के ऊपर उड़ेल दी. इस से पहले कि गजानन कुछ समझ पाता, सुनीता ने उस पर आग लगा दी. जलता हुआ गजानन चीखने लगा. उस की चीख सुन कर गैस्टहाऊस का मैनेजर वहां आ पहुंचा. इस के बाद क्या हुआ, आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं. सुनीता से पूछताछ कर के पुलिस ने 29 अक्तूबर, 2015 को उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Honey Trap Case: सुनहरे जाल में फंसा डीआरडीओ का वैज्ञानिक

Honey Trap Case: धन और सुंदर रूपयौवन का लालच ऐसा है जिस से कोई बच नहीं सकता. शातिर किस्म के लोग कहीं धन दिखा कर तो कहीं सुंदर यौवन दिखा कर सुनहरा जाल फेंकते हैं और मनचाहा शिकार फांस ही लेते हैं. इस जाल में फंसने से विरला ही कोई हो जो बच सके. रामायण की कथा के नायक और त्रिकालदर्शी कहे जाने वाले राम ही जब सोने के हिरण के भ्रम में फंस कर अपनी पत्नी सीता को गंवा बैठे तो आम इंसान की क्या औकात है.

आजकल हनीट्रैप के मामले भी ऐसे ही हैं. आए दिन नए राम फंस रहे हैं पर यह मामला जरा गंभीर किस्म का है. देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. महाराष्ट्र एटीएस ने डीआरडीओ के सीनियर सिस्टम इंजीनियर निशांत अग्रवाल को गिरफ्तार कर पाकिस्तान की आईएसआई के लिए जासूसी करने का खुलासा किया है. निशांत फेसबुक पर पाकिस्तान की फर्जी महिला के जाल में फंस गया था. उसे हाल ही में युवा इंजीनियर का अवार्ड भी मिला था.

निशांत अग्रवाल पाकिस्तान की दो महिलाओं  के फर्जी नाम से बने फेसबुक अकाउंट से उन के जाल में फंसा हुआ था. उस की इन ‘महिलाओं’ से चैटिंग होती थी. चैटिंग के दौरान उस ने अपनी मिसाइल यूनिट से कई गोपनीय जानकारियां जुटानी शुरू कर दीं. इन में से कुछ जानकारियां पाकिस्तान तक पहुंचाने की बात सामने आई है.

निशांत मिसाइल यूनिट में सीनियर सिस्टम इंजीनियर है. वह नागपुर में डीआरडीओ की ब्रह्मोस यूनिट में कार्यरत था. उस के पास यहां की कई तकनीकी गोपनीय जानकारियां रहती थीं. गोपनीय जानकारियों को उस ने अपने निजी लैपटोप और मोबाइल में सेव कर रखा था.

उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र एटीएस उस से पूछताछ कर रही है. निशांत के अलावा जासूसी के शक में डिफेंस मैटेरियल एंड स्टोर्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेबलिशमेंट [डीएमएसआरडीई] कानपुर के दो वैज्ञानिकों से भी पूछताछ की गई. दोनों वैज्ञानिक ब्रह्मोस से संबंधित बेहद संवेदनशील पार्ट्स को विकसित करने वाली तकनीक से जुड़े हैं. एटीएस ने एक महिला वरिष्ठ वैज्ञानिक को हिरासत में लिया है. पूछताछ के बाद उस का लैपटोप भी सीज किया है. संस्थान के इन वैज्ञानिकों को भी फेसबुक के जरिए ट्रैप किया गया. एटीएस को शक है कि ब्रह्मोस से जुड़ी टैक्नोलौजी को लीक किया गया है.

पिछले दिनों बीएसएफ के जवान अच्युतानंद मिश्रा को भी पाकिस्तान के लिए जासूसी के इल्जाम में पकड़ा गया था. उसे इसी तरह जाल में फंसाया गया था. अच्युतानंद की गिरफ्तारी के बाद फेसबुक आईडी से कई दोस्तों की पड़ताल की गई तो निशांत का पता चला. जांच पड़ताल के दौरान पाकिस्तान की दो और महिलाओं के नाम से बनी फर्जी फेसबुक आईडी पर कई राज्यों के और लोग भी चैटिंग कर रहे हैं.

यूपी एटीएस का कहना है कि उस की जांच में पता चला है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई खूबसूरत लड़कियों की फर्जी फेसबुक आईडी बना कर केंद्रीय बलों और वैज्ञानिक संस्थानों के लोगों को प्रेमजाल में फंसा कर जासूसी करा रही है.

आईएसआई के लिए जासूसी करने के आरोप में डीआरडीओ के इंजीनियर निशांत अग्रवाल की गिरफ्तारी एक कर्मचारी पर ही नहीं, सरकार और समूचे समाज व्यवस्था पर सवाल उठाती है? डीआरडीओ देश की रक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान है. इस के एक वरिष्ठ अधिकारी पर जासूसी का आरोप बहुत गंभीर बात है.

सरकारी पद पर बैठने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह के लालच से दूर रहने की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है. ईमानदार, वफादार, कर्तव्यनिष्ठ रहने की न तो हमारे समाज ने ऐसी कोई ट्रेनिंग दी और न ही सरकार ने. कहने को उन के लिए नियमकायदे, आचारसंहिता बनी हुई है पर उस की परवाह कौन करता है.

लालच बुरी बला है, जैसी सूक्तियां सिर्फ दीवारों पर शोभा देती हैं. वास्तविक जीवन में इन सूक्तियों को लोग नहीं अपनाते. गिफ्ट, इनाम, धन दोगुना करने जैसे लालच में लोग आए दिन फंसते हैं.

हालांकि धर्म के प्रवचनों में तमाम तरह की अच्छी सीखें बताई गई हैं पर धर्म की अच्छी सीखें खुद ही एक तरह का जाल ही हैं जो भक्तों को फंसाता है और प्रवचनकर्ता, गुरु को फायदा पहुंचाता है. यह सुनहरी अच्छी सीखों का जाल गुरु, प्रवचनकर्ता ही फेंकता है जो भक्तों को धनदौलत त्याग करने की सलाह देता है और स्वयं स्वर्ण सिंहासन पर बैठता है, एसी गाड़ी में चलता है. धर्म सब से बड़ा सुनहरा जाल है.

जिम्मेदार पद पर बैठे कर्मचारी को कोई भी रूप यौवन, धन का लालच दे कर अपने जाल में फंसा ले, यह शासन, प्रशासन ही नहीं, समाज व देश के लिए भी गंभीरता से सोचने की बात है. Honey Trap Case

Bhopal Crime Story: देवेंद्र से देविका बनने की दर्द भरी दास्तां

Bhopal Crime Story: मुसीबत और परेशानियां ऐसी थीं कि देवेंद्र को उनका कोई हल नहीं सूझ रहा था और जो सूझा वह हैरान कर देने वाला है. साल 2017 तक एक एनजीओ में काम करने बाला यह हट्टा कट्टा  युवा आम लड़कों की तरह ही रहता था लेकिन अब औपरेशन के जरिये लड़की यानि ट्रांसजेंडर बनकर अपने ही शहर भोपाल में किन्नरों की टोली में तालियां बजाता नजर आता है .

आमतौर पर कोई भी लड़का ट्रांसजेंडर तभी बनने की सोचेगा जब उसमें बचपन से ही लड़कियों जैसे लक्षण हों या फिर वह खुद को सेक्स कर पाने में असमर्थ पाये पर देवेंद्र के साथ ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि उसकी कहानी दिल को छू जाने वाली है. खासतौर से उस वक्त जब रक्षा बंधन का त्योहार आने वाला है. देवेंद्र अपनी बहन के लिए देविका बना था जिसका उसे कोई मलाल भी नहीं है, उल्टे वह खुश है कि बलात्कार के झूठे आरोप में फंसने से भी बच गया.

देवेंद्र अपनी बहन को बहुत चाहता था और उसकी विदाई 20 मई 2016 को इन दुआओं के साथ उसने की थी कि बहन ससुराल जाकर खुशहाल ज़िंदगी जिये लेकिन भगवान कहीं होता तो उसकी सुनता. हुआ यूं कि शादी के कुछ दिनों बाद ही बहन की ससुराल वालों ने उस पर तरह तरह के जुल्मों सितम ढाने शुरू कर दिये ठीक वैसे ही जैसे फिल्मों और टीवी सीरियलों में दिखाये जाते हैं. दहेज के लालची ससुराल वालों ने उसकी बहन को इतना सताया कि वह खून के आंसू रो दी .

अब देवेंद्र ने वही गलती की जो आमतौर पर दहेज के लिए सताई जाने वाली लड़कियों के घर वाले करते हैं. यह गलती थी ससुराल वालों के हाथ पैर जोड़ना और अपनी पगड़ी उनके चरणों में रख देना. ऐसे फिल्मी टोटकों से तो फिल्मों में भी बात नहीं बनती फिर यह तो सामने से होकर गुजर रही हकीकत थी. देवेंद्र ने मध्यस्थता करते हर मुमकिन कोशिश की कि जैसे भी हो बगैर किसी झगड़े फसाद विवाद या कोर्ट कचहरी के बहन की ज़िंदगी में खुशियां आ जाएं पर कोई कोशिश कामयाब नहीं हुई तो उसने भी थकहार कर वही रास्ता पकड़ा जो सभी पकड़ते हैं.

ननद की धमकी

लेकिन थाने जाने से पहले उसने बहन की ससुराल बालों को आगाह करना या धोंस देना कुछ भी समझ लें जरूरी समझा कि शायद इससे उनमें अक्ल आ जाए. आमतौर पर ससुराल वाले इस बात से डरते हैं कि अगर बहू या उसके घर वालों ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो कभी कभी जमानत के भी लाले पड़ जाते हैं. यही इस मामले में भी हुआ, शुरू में तो बहन के ससुराल वाले डरे लेकिन जल्द ही बहन की चालाक ननद ने इस का भी तोड़ निकाल लिया और ऐसा निकाला कि देवेंद्र की सारी हेकड़ी तो हेकड़ी मर्दानगी भी हमेशा के लिए हवा हो गई.

इस ननद ने उसे ही यह धमकी देना शुरू कर दिया था कि अगर वह थाने गया तो वह भी थाने जाकर देवेंद्र के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा देगी. इस धमकी का उम्मीद के मुताबिक असर हुआ और देवेंद्र ने बहन की ससुराल जाना बंद कर दिया. लेकिन इससे बहन का कोई भला या मदद नहीं हो पा रही थी इसलिए एक दिन उसने जी कडा करते बचाव का रास्ता ढूंढ़ ही लिया कि अगर वह मर्द ही न रह जाये तो बहन की ननद क्या खाकर उसके खिलाफ बलात्कार की झूठी रिपोर्ट लिखाएगी .

नवंबर 2017 में देवेंद्र ऑपरेशन करा कर लड़की बन गया और अपना नया नाम रखा देविका . अब उसे ननद का डर नहीं रह गया था लिहाजा उसने बहन को बचाने पुलिसिया और कानूनी काररवाई शुरू कर दी . मामला जब विधिक सेवा प्राधिकरण पहुंचा तो उसने बेहिचक सारे पत्ते सचिव आशुतोष मिश्रा के सामने खोलते अपने  मेडिकल दस्तावेज़ भी दिखाये  और बताया कि बहन की ननद की धमकियों से आजिज़ आकर उसने यह फैसला लिया था .

देखते ही देखते बहन को तलाक मिल गया और वह ससुराल नाम की जेल से आजाद हो गई . लेकिन डर के चलते और बहन की सलामती के लिए देविका बन गए देवेंद्र को बहुत बड़ी क़ुर्बानी देनी पड़ी जिसकी मिसाल शायद ही ढूंढे से मिले. साड़ी और सलवार सूट पहने देविका माथे पर बिंदी और बड़ा सा टीका भी लगाती है और चूड़ियां भी पहनती है. उसका मेकअप भी लड़कियों जैसा तड़क भड़क भरा होता है .

देवेंद्र, देविका बनकर खुश है और अब ट्रांसजेंडर्स के भले के लिए काम करना चाहता है . मुमकिन है जल्द ही उसकी ज़िंदगी और बहन के लिए त्याग पर कोई फिल्म निर्माता फिल्म बनाए जिसमें भरपूर मसाला और जायका होगा लेकिन देवेंद्र की ज़िंदगी में जरूर कोई जायका नहीं रह गया है. बेहतर तो यह होगा कि वह फिर से आपरेशन कराके पहले की तरह लड़का बन जाये और ज़िंदगी का भरपूर लुत्फ उठाए.

Gurugram Crime: इश्क जान भी लेता है

Gurugram Crime: अभिषेक उर्फ नीतू पैसे वाले बाप का बेटा था, इसलिए वह दिन भर दोस्तों के साथ कार से आवारागर्दी करने के साथ अय्याशी भी करता था. अय्याशी करने में ही उस ने ऐसा क्या कर डाला कि आज वही नहीं, उस के सारे दोस्त जेल में हैं. ना हर सिंह गुड़गांव के थाना सदर के अंतर्गत आने वाले गांव इसलापुर के रहने वाले थे. गुड़गांव, सोनीपत और हिसार में उन की हार्डवेयर की 3 दुकानें थीं. गांव में भी उन की कई  एकड़ खेती की जमीन थी. इस के अलावा गुड़गांव में उन के 2 आलीशान मकान थे. उन की 3 बहनें थीं, जिन की शादियां हो चुकी थीं.

छोटी बहन विमला की शादी दौलताबाद के रहने वाले देवेंद्र कुमार के साथ हुई थी. देवेंद्र भारतीय सेना में सूबेदार थे. उन की पोस्टिंग सिक्किम में थी. विमला घर पर ही रह कर बच्चों आदि को देखती थी. उन के 2 बेटे थे, सचिन और मोहित. दोनों ही जवान थे. बच्चों की देखरेख के लिए नाहर सिंह भी विमला के यहां ही रहते थे. देवेंद्र को फौज से जब भी छुट्टी मिलती थी, वह अपनी बीवीबच्चों के पास आ जाया करते थे.

25 अगस्त, 2015 की शाम लगभग 5 बजे नाहर सिंह छोटे भांजे मोहित और उस के दोस्त सक्षम के साथ गुड़गांव के सैक्टर-23 स्थित एक कैफे में बैठे कौफी पी रहे थे, तभी वहां अभिषेक उर्फ नीतू अपने दोस्तों मन्ना, दीपांकर और नितेश के साथ आया. आते ही नीतू ने मोहित की मेज पर रखे कौफी के प्याले को उठा कर फेंक दिया. नीतू की इस हरकत से मोहित और सक्षम को गुस्सा आ गया. पास बैठे नाहर सिंह समझ नहीं पाए कि नीतू ने ऐसा क्यों किया. इस से पहले कि नाहर सिंह कुछ कहते, सक्षम ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘लगता है, उस दिन की मार के तेरे निशान ठीक हो गए हैं, जो…’’

उस की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि नीतू के दोस्त नितेश ने सक्षम के गाल पर जोरदार थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘अपनी जुबान बंद रख, वरना अभी काट कर फेंक दूंगा.’’

दोस्त की बेइज्जती मोहित बरदाश्त नहीं कर सका और नितेश से भिड़ गया, ‘‘तू ने इस पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे की?’’

‘‘ओए चल दूर हट यहां से. अब बहुत भौंक चुका तू.’’ नीतू ने अंटी से रिवौल्वर निकाल कर मोहित पर तानते हुए कहा, ‘‘मैं अपना अपमान कभी नहीं भूलता. अपमान का बदला जब तक ले न लूं, चैन की नींद सोना हराम समझता हूं. तेरी कोई आखिरी ख्वाहिश हो तो अपने मामू को बता दे.’’

इसी के साथ नीतू के दोस्तों ने नाहर सिंह को हथियारों के बल पर काबू कर लिया था. नीतू की धमकी पर मोहित आगबबूला हो कर नीतू को पीटने के लिए आगे बढ़ा ही था कि अभिषेक ने उस पर एक के बाद एक कई फायर झोंक दिए. गोलियां मोहित के सीने, पेट व आंख के पास लगीं. मोहित लहूलुहान हो कर नीचे गिर कर कराहने लगा. उस समय कैफे में और भी लोग थे. गोलियों की आवाज सुन कर सभी चौंके. लेकिन हथियारों को देख कर किसी की कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई. वे सुरक्षित स्थान तलाशने लगे. अपने सामने भांजे के साथ हुई इस वारदात पर नाहर सिंह भी कुछ नहीं कर सके. मोहित की हत्या कर हमलावर कार से फरार हो गए.

नाहर सिंह ने तुरंत पुलिस को फोन कर के इस घटना की सूचना दी. गोली मारने की खबर पाते ही थाना पालम विहार के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह राणा पुलिस टीम के साथ थोड़ी ही देर में सैक्टर-23 के उस कैफे में पहुंच गए. मोहित की कुछ देर बाद ही मौत हो चुकी थी. पुलिस ने अपने आला अधिकारियों को भी इस हत्या की सूचना दे दी थी. थानाप्रभारी ने नाहर सिंह से बात की तो उन्होंने पूरा वाकया बता दिया. इस के अलावा थानाप्रभारी ने कैफे के मैनेजर, वेटरों और वहां मौजूद ग्राहकों से भी पूछताछ की. इस के बाद घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. नाहर सिंह की तहरीर पर पुलिस ने नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली.

मामला एकदम स्पष्ट था. कैफे में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में भी साफ नजर आ रहा था कि मोहित पर गोलियां अभिषेक उर्फ नीतू ने चलाई थीं. इसलिए पुलिस को सिर्फ हत्याभियुक्तों को गिरफ्तार करना था. उन की गिरफ्तारी के लिए पुलिस कमिश्नर नवदीप सिंह विर्क ने एसीपी (क्राइम) राजेश कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह राणा, एसआई सुखजीत सिंह, एएसआई सुरेश कुमार, सुनीता कुमार, हैडकांस्टेबल संदीप, धीरज सर्वसुख के अलावा कांस्टेबल धर्मेंद्र, नीति आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन 28 अगस्त को पुलिस ने नामजद अभियुक्तों के घरों पर दबिश दी तो वे सभी अपनेअपने घरों से फरार मिले. फिर उसी दिन शाम के समय एक मुखबिर की सूचना पर गुड़गांव के हिमगिरी चौक से अभिषेक उर्फ नीतू, ब्रजेश उर्फ नोनी, दीपांकर, बौबी तथा आदित्य को गिरफ्तार कर लिया गया. थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने मोहित की हत्या की वजह तो बता ही दी, साथ ही एक ऐसे हत्याकांड से भी परदाफाश किया, जिस की फाइल पुलिस बंद कर चुकी थी.

21 वर्षीय अभिषेक उर्फ नीतू एक अमीर बाप की बिगड़ी औलाद था. उस के पिता भानमल गुड़गांव के धनवापुर गांव में अपने परिवार के साथ रहते थे. करीब 4 साल पहले एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने उन की 5 एकड़ जमीन 22 करोड़ में खरीदी थी. जमीन बेचने के बाद उन्होंने आलीशान मकान बनवाया, नौकर रखे और 2 कारें खरीदीं. तब से यह परिवार ठाठबाट से रह रहा था. अचानक पैसा आता है तो अपने साथ कई बुराइयां भी लाता है. ऐसा ही इस परिवार में भी हुआ. अभिषेक उर्फ नीतू भानमल का एकलौता बेटा था, इसलिए वह उस की हर फरमाइश पूरी करते थे.

अभिषेक अपने यारदोस्तों के साथ कार ले कर दिन भर इधरउधर घूमता और अय्याशी करता. वह अपने पिता से जितने पैसे मांगता, वह उसे मिल जाते थे. जिन्हें वह खुले हाथों से खर्च करता था. इसलिए उस के दोस्त भी उस से खुश रहते थे. उस के खास दोस्तों में 20 वर्षीय ब्रजेश उर्फ नोनी, 19 वर्षीय दीपांकर, 20 वर्षीय बौबी, 18 वर्षीय आदित्य थे. ये सभी उस के घर के आसपास ही रहते थे. ये सभी कार से जब भी घूमने निकलते, इतना ऊधम मचाते थे कि राहगीर भी परेशान हो जाते थे. कोई इन का विरोध करता तो ये उस की पिटाई कर देते. एक तरह से इलाके में इन का आतंक छा चुका था.

पिता ने भी कभी नीतू पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की, जिस से वह और ज्यादा उद्दंड होता चला गया. बातबात पर सीधेसादे लोगों को पीटना, राह चलती लड़कियों को छेड़ना, शराब पी कर हुड़दंग मचाना, हवाई फायर कर के दहशत फैलाना आदि नीतू का जैसे शगल बन गया था. नाहर सिंह ने शादी नहीं की थी. वह अपनी बहनों और भांजों को बेहद चाहते थे. उन की बहनें भी संपन्न थीं. वह खुद भी उन के लिए काफी खर्च करते थे. अपने भांजों को भी वह जेब खर्च के लिए इतने पैसे देते थे, जिन से एक मध्यमवर्गीय परिवार का एक महीने का खर्च चल सकता था.

दरअसल, नाहर सिंह की सोच थी कि पढ़लिख कर उन के भांजों को कोई बहुत अच्छी नौकरी तो मिलेगी नहीं, इसलिए वह उन्हें नेता बनाना चाहते थे. और नेता बनने के लिए शैक्षिक योग्यता की जगह दबंगई होनी चाहिए. अपनी इसी सोच के चलते वह मोहित और सचिन को दबंग बना रहे थे. मामा की शह पर मोहित कुछ ज्यादा ही बिगड़ चुका था. लोगों से मारपीट कर आतंक फैला कर उस ने इलाके में अपनी दबंगई कायम कर ली थी. वह कई संगीन वारदातों को भी अंजाम दे चुका था. दरअसल, मोहित और अभिषेक उर्फ नीतू पहले दोस्त थे. उन के बीच दुश्मनी की शुरुआत सन 2012 में तब हुई थी, जब मानसी से नीतू ने कोर्टमैरिज कर ली थी.

मानसी मूलरूप से बिहार के रहने वाले फकीरेलाल की बेटी थी. फकीरेलाल गुड़गांव की एक कंपनी में काम करते थे और गुड़गांव के सैक्टर- 4 में किराए पर कमरा ले कर अपने बच्चों के साथ सपरिवार रहते थे. मानसी फैशनपरस्त और बिंदास लड़की थी. उस की कई लड़कों से दोस्ती थी. वह उन के साथ कार या बाइक से घूमती, फिल्में देखती और महंगे रैस्टोरैंट में खाना खाती. कई युवकों से उस के शारीरिक संबंध भी थे.

रोजाना नएनए लड़कों के साथ घूमते हुए उसे मोहल्ले के अनेक लोगों ने देखा था. उन्होंने उस की शिकायत फकीरेलाल से की तो उन्होंने उसे डांटा. लेकिन मानसी बहक कर उस ढलान पर पहुंच चुकी थी, जहां से वापस आना उस के लिए आसान नहीं था. इसलिए पिता के समझाने का उस पर जरा भी असर नहीं हुआ. मानसी का अपने पुरुष दोस्तों के साथ घूमनेफिरने का सिलसिला कायम रहा. इस से मोहल्ले में फकीरेलाल की बदनामी हो रही थी. लाख समझाने के बावजूद भी जब मानसी नहीं मानी तो तंग आ कर फकीरेलाल ने उसे घर से निकाल दिया.

घर से निकालने पर मानसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, बल्कि वह सैक्टर-18 में किराए के फ्लैट में रहने लगी. अब उस से कोई टोकाटाकी करने वाला नहीं था, जिस से वह पूरी तरह से आजाद हो गई थी. उसे जब जहां मन होता, जाती थी. वह क्लबों और पबों में डांस भी करने लगी थी. सन 2012 के फरवरी महीने में एक पब में मानसी की मुलाकात विक्की से हुई. पहली ही मुलाकात में मानसी विक्की के दिल में उतर गई. विक्की उस पर खूब रुपए लुटाता था. वह विक्की की गाड़ी में घूमतीफिरती. विक्की उस की हर फरमाइश पूरी करता. विक्की भी गुड़गांव का रहने वाला था. वह भी एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखता था. विक्की और मोहित आपस में गहरे दोस्त थे.

विक्की ने मानसी से साफ कह दिया था, ‘‘मानसी, मैं तुम से शादी तो नहीं कर सकता. पर हां, तुम्हारा सारा खर्च ताउम्र उठाता रहूंगा. तुम्हें जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. परंतु बदले में मुझे तुम से इसी तरह का प्यार चाहिए. तुम एक बात का खास ध्यान रखना कि किसी दूसरे पुरुष ने तुम्हें छुआ भी तो मैं हरगिज बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

मानसी उस की शर्त मानने को तैयार हो गई. तब जिस फ्लैट में मानसी रहती थी, उस का किराया, कार, सौंदर्य प्रसाधन और खानेपीने का सारा खर्च विक्की उठाने लगा. वह हफ्ते में 1-2 बार उस से मिलने उस के फ्लैट पर पहुंच जाता था. विक्की से मुलाकात के बाद मानसी ने अपने और पुरुष दोस्तों से मिलनाजुलना बंद कर दिया. विक्की उस से हफ्ते में 1-2 बार ही मिलने आता था. उस के जाने के बाद मानसी का मन नहीं लगता था. रोजना ही नएनए दोस्त बनाने वाली मानसी भला विक्की के साथ बंध कर कैसे रह सकती थी. लिहाजा उस ने फिर से लोगों से दोस्ती करनी शुरू कर दी.

उसी दौरान उस की मुलाकात अभिषेक उर्फ नीतू से हुई. नीतू की शानोशौकत देख कर मानसी का झुकाव उस की तरफ हो गया. नीतू हर मायने में उसे विक्की से अच्छा लगा.

विक्की को जब यह बात पता चली तो उस ने मानसी से कहा, ‘‘मैं ने कहा था न कि अगर किसी पराए पुरुष ने तुम्हारे शरीर को छुआ भी तो मैं बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

‘‘विक्की, मैं भी इंसान हूं और मेरी भी कुछ भावनाएं हैं,’’ मानसी ने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा, ‘‘मैं भी चाहती हूं कि मेरा पति हो, घर हो, बच्चे हों. यह सब तुम्हारे साथ नहीं हो सकता. इसलिए मैं रखैल नहीं, पत्नी बन कर जीना चाहती हूं.’’

मानसी की बात सुन कर विक्की को गुस्सा आ गया, वह चिल्लाते हुए बोला, ‘‘मानसी, मेरे जीतेजी तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगी.’’

‘‘चिल्लाओ मत. मैं तुम्हारी ब्याहता नहीं हूं, जो इस तरह मुझ पर अपना हक जता रहे हो.’’ मानसी भी गुस्से में आ गई. वह आगे बोली, ‘‘मैं नीतू से शादी कर रही हूं. वह तुम से ज्यादा दौलतमंद है और मेरे सारे अरमान पूरे करने की उस की हैसियत भी है. और सुन लो, आज के बाद मेरा तुम से कोई वास्ता नहीं.’’

विक्की मानसी को धमकाते हुए वहां से चला गया. विक्की का पत्ता काटने के बाद अप्रैल, 2012 में अभिषेक उर्फ नीतू ने मानसी से कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज की बात जब विक्की को पता चली तो उसे बहुत बुरा लगा. गुस्से में तिलमिलाया हुआ वह नीतू से मिला.

‘‘नीतू जब तुम्हें यह बात पता थी कि मानसी मेरी रखैल है तो तुम ने उस से कोर्टमैरिज क्यों कर ली?’’ विक्की ने पूछा.

‘‘विक्की, मैं ने मानसी के साथ कोई जोरजबरदस्ती नहीं की. वह राजी थी, तभी तो शादी हुई. अगर वह मुझे नहीं चाहती तो भला मैं उसे कैसे पा सकता था. उस ने जब अपनी मरजी से शादी की है तो इस में तुम्हारे लिए बुरा मानने वाली क्या बात है.’’ नीतू बोला.

‘‘देख नीतू, तू मेरा दोस्त है, इसलिए तुझे एक बात बता रहा हूं कि मानसी जैसी लड़कियां उसी पर प्यार न्यौछावर करती हैं, जिस के पास दौलत होती है. उस ने तुझ से यह जानने के बाद शादी की है कि तेरे पास मुझ से ज्यादा दौलत है. एक दिन उसे तुझ से ज्यादा पैसे वाला कोई और मिल गया तो वह तुझे भी ठुकरा देगी.

फिर तुझे भी उस की हकीकत पता चलेगी और उस दिन तू बहुत पछताएगा.’’ यह कह कर विक्की वहां से चला गया. समय गुजरता रहा और 2 साल बीत गए. नीतू तो उसे पहले की तरह प्यार करता था, लेकिन मानसी का प्यार जरूर फीका पड़ गया. उस का नीतू से एक तरह से मन भर गया था. हालांकि नीतू उस पर दोनों हाथों से पैसे खर्च कर रहा था. इस के बावजूद वह नए दोस्तों को तलाशने लगी. इस की वजह साफ थी कि उसे अलगअलग लोगों के साथ मौजमस्ती करने की आदत जो पड़ गई थी.

अभिषेक ने जब उसे डांस क्लबों में जाने से मना किया तो मानसी ने साफ कह दिया, ‘‘नीतू, मैं कोई पिंजरे में बंद हो कर रहने वाली चिडि़या नहीं हूं. मेरा जो मन करेगा, मैं वही करूंगी. तुम कभी मुझे रोकने की कोशिश भी मत करना.’’

इस के बाद वह नीतू को छोड़ कर अलग किराए के मकान में रहने लगी. अभिषेक उस से मिलने आता तो वह उसे दुत्कार देती. इस बात का अभिषेक को बड़ा दुख होता था. लाखों रुपए उस पर खर्च करने के बावजूद उसे प्रेमिका की दुत्कार मिलती थी. काफी समझाने के बावजूद भी जब मानसी ने उस की बात नहीं मानी तो अभिषेक उर्फ नीतू ने मानसी को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. उस ने उसे ठिकाने लगाने की योजना बना भी ली.

योजना के तहत 5 जुलाई, 2014 को नीतू अपने 2 दोस्तों खुशीराम और कपिल के साथ गुड़गांव के सैक्टर-17 स्थित गंदे नाले के पास पहुंचा. नीतू मानसी का काम तमाम कर के लाश को उसी नाले में ठिकाने लगाना चाहता था, लेकिन मानसी को नाले के पास बुलाना आसान नहीं था, क्योंकि उस ने उस से संबंध खत्म कर लिए थे.

नीतू जानता था कि मानसी बेहद लालची है. इसलिए उसे वहां बुलाने के लिए उस ने एक चाल चली. उस ने वहीं से मानसी को फोन किया. उस वक्त शाम को 5 बज रहे थे. उस ने कहा, ‘‘मानसी, मैं ने तुम्हारे लिए 8 तोले का एक हार बनवाया है. हार का डिजाइन इतना अच्छा है कि तुम्हें जरूर पसंद आएगा. आज रात ही मैं मुंबई जा रहा हूं. फिर हमारी मुलाकात हो या न हो, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम इस हार को ले लो.’’

मानसी 8 तोला सोने के हार के लालच में आ गई. वह हार लेने के लिए साढ़े 5 बजे गंदे नाले के पास पहुंच गई. नीतू को देखते ही वह चहक कर बोली, ‘‘नीतू, तुम तो मुझे एकदम भूल गए. कभीकभार तो मुझ से मिलने आ जाय करो. मैं तुम्हें बहुत मिस करती हूं.’’

कुछ देर बाद नीतू के दोस्त खुशीराम और कपिल वहां पहुंचे तो वह चौंकी, क्योंकि वह पहले से उन्हें जानती थी. मानसी ने सोचा कि उन से उसे क्या मतलब. उसे तो हार ले कर वहां से निकल जाना है. उस ने नीतू का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘लाओ, वह हार कहां है.’’

नीतू ने जेब से चाकू निकाल कर लहराया, ‘‘अब हार पहन कर क्या करोगी, जब तुम जीवित ही नहीं रहोगी.’’

चाकू देख कर और उस की बातें सुन कर मानसी घबरा गई. इस से पहले कि वह कुछ कह पाती, अभिषेक ने चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए. मानसी वहीं गिर गई और कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. इस के बाद खुशीराम और कपिल ने उस की लाश उठा कर नाले में फेंक दी.4 दिनों बाद 9 जुलाई, 2014 को नाले में महिला की लाश पड़ी होने की सूचना थाना राजेंद्रपार्क पुलिस को मिली तो पुलिस ने नाले से लाश निकलवाई. लाश काफी सड़गल गई थी. वह पूरी तरह कीचड़ में सनी हुई थी. मृतका कौन है, यह जानने के लिए पुलिस ने पहले लाश धुलवाई. उस का चेहरा गल चुका था, इसलिए वहां मौजूद भीड़ में से कोई भी उसे पहचान नहीं सका.

पुलिस को उस की बाईं हथेली पर नीतू नाम गुदा मिला. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और लावारिस मान कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अभिषेक उर्फ नीतू की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को पता चला कि 9 जुलाई, 2014 थाना राजेंद्रपार्क पुलिस ने नाले से जो महिला की लाश बरामद की थी, वह मानसी की थी. अगर नीतू पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ता तो मानसी की हत्या का राज उजागर ही न हो पाता.

एक दिन गुड़गांव के सैक्टर-28 स्थित एक कैफे में मोहित अपने दोस्तों के साथ मौजूद था, तभी अभिषेक उर्फ नीतू अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा. मोहित के दोस्तों ने नीतू का मजाक उड़ाया तो नीतू गालियां बकने लगा. तभी मोहित और उस के दोस्तों ने नीतू और उस के दोस्तों की पिटाई कर दी. उसी पिटाई का बदला लेने के लिए नीतू मौका ढूंढ़ रहा था.

25 अगस्त, 2015 की शाम को उसे यह मौका मिल गया. उसे पता चला कि मोहित अपने दोस्त सक्षम व मामा नाहर सिंह के साथ ओल्ड बौक्स कैफे में है तो वह अपने साथियों के साथ वहां पहुंच गया और मोहित की गोली मार कर हत्या कर दी.

मोहित की हत्या एवं मानसी की हत्या के आरोप में पुलिस ने अभिषेक उर्फ नीतू, ब्रजेश, दीपांकर, बौबी, आदित्य को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर के 2 दिनों की पुलिस रिमांड पर ले कर हत्या में प्रयुक्त रिवौल्वर व मानसी की हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. मानसी की हत्या में शामिल खुशीराम और कपिल को गिरफ्तार करने पुलिस पहुंची तो वे घर से फरार मिले. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं जा सके थे. इस के बाद सभी अभियुक्तों को 29 अगस्त, 2015 को पुन: न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.Gurugram Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bank Robbery: दिल्ली की सबसे बड़ी लूट

Bank Robbery: एटीएम कैश वैन से दिनदहाड़े साढ़े 22 करोड़ रुपए की लूट से पुलिस के हाथपैर फूल गए थे. रात भर चले पुलिस अभियान के बाद लुटेरा पकड़ा गया तो सच्चाई जान कर सभी हैरान रह गए. आखिर क्या निकला दिल्ली की इस सब से बड़ी लूट का राज…

बैंकों ने अपनी एटीएम मशीनों में कैश डालने की जिम्मेदारी विभिन्न निजी एजेंसियों को दे रखी है. उन एजेंसियों ने अलगअलग इलाकों में अपने करेंसी चेस्ट बना रखे हैं. बैंकों से मोटी रकम निकाल कर पहले करेंसी चेस्ट में पहुंचाई जाती है, उस के बाद वह कैश वैनों द्वारा अलगअलग एटीएम बूथों तक पहुंचाया जाता है. सिक्योरिटी एंड इंटेलिजैंस सर्विसेज (एसआईएस) सिक्योरिटी एजेंसी भी पिछले कई सालों से बैंकों की एटीएम मशीनों में पैसे डालने का काम कर रही है.

26 नवंबर, 2015 को पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी स्थित कंपनी के करेंसी चेस्ट पर एसआईएस की कैश वैन पैसे ले जाने के लिए पहुंची. वहां की ऐक्सिस बैंक से 38 करोड़ रुपए निकाल कर करेंसी चेस्ट में मौजूद संदूकों में भर दिए गए. यह कैश वैन द्वारा अलगअलग एटीएम बूथों तक पहुंचाया जाना था. रुपयों से भरे उन संदूकों में से 9 संदूक एसआईएस की एक वैन में रख दिए गए, जिन में साढ़े 22 करोड़ रुपए थे.

ये साढ़े 22 करोड़ रुपए दिल्ली के ओखला स्थित एटीएम मशीनों में रखे जाने थे. इसलिए दोपहर ढाई बजे के करीब एसआईएस की वह वैन ओखला के लिए चल पड़ी. उस वैन को प्रदीप शुक्ला चला रहा था और सुरक्षा के लिए गनमैन विजय कुमार पटेल उस के साथ था. विकासपुरी से चल कर वह वैन करीब साढ़े 3 बजे श्रीनिवासपुरी की रेड लाइट पर पहुंची. गनमैन विजय कुमार को लघुशंका लगी थी, इसलिए वह ड्राइवर से कह कर वैन से उतर गया.

कुछ देर बाद जब वह लौट कर आया तो उसे वहां कैश वैन दिखाई नहीं दी. विजय कुमार ने इधरउधर नजर दौड़ाई कि ड्राइवर ने रेडलाइट पार कर के वैन खड़ी न कर दी हो. लेकिन उसे कहीं भी वैन नहीं दिखी. यह बात करीब पौने 4 बजे की थी. विजय कुमार के पास वैन के ड्राइवर प्रदीप शुक्ला का फोन नंबर था. उस ने उसे फोन किया. कई बार घंटी बजने के बाद प्रदीप ने फोन रिसीव कर के बताया कि रेडलाइट पर ट्रैफिक पुलिस ने वैन खड़ी नहीं होने दी, इसलिए वह इसी रोड पर थोड़ी दूर आगे खड़ा है.

जिस तरफ प्रदीप शुक्ला ने वैन खड़ी होने की बात कही थी, विजय उसी ओर था. लेकिन उसे वैन नजर नहीं आ रही थी. विजय ने थोड़ा आगे बढ़ कर भी देखा लेकिन उसे कहीं भी कैश वैन दिखाई नहीं दी. विजय ने प्रदीप को फिर फोन किया. इस बार उस का फोन बंद था. उस ने कई बार ड्राइवर को फोन किया, लेकिन अब उस का फोन बंद हो चुका था. वह चौंका कि अब फोन बंद क्यों है? आखिर वह उसे छोड़ कर वैन ले कर कहां चला गया?

उस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रदीप वैन ले कर कंपनी के हैडऔफिस चला गया हो. अगर ऐसा हुआ तो उस से जवाबतलब किया जाएगा. कंपनी के अधिकारी उसी से पूछेंगे कि कैश की सुरक्षा की जिम्मेदारी उस की थी तो कैश छोड़ कर वह क्यों गया? एक बार फिर उस ने ड्राइवर प्रदीप को फोन किया, लेकिन इस बार भी उस का फोन बंद ही मिला. विजय कुमार परेशान हो उठा था. वह औफिस फोन कर के पूछना चाहता था कि ड्राइवर प्रदीप वहां तो नहीं आया है, लेकिन डांट पड़ने की वजह से उस ने औफिस में फोन नहीं किया बल्कि सीधे ओखला फेज-1 स्थित कंपनी के औफिस पहुंच गया.

औफिस पहुंच कर पहले उस ने पार्किंग एरिया में कैश वैन को ढूंढा. जब वैन वहां नहीं दिखी तो विजय ने वहां मौजूद कंपनी के कर्मचारियों से प्रदीप के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि प्रदीप शुक्ला यहां नहीं आया है. यह जान कर विजय के होश उड़ गए. उसे लगा कि अब उस की नौकरी गई. लेकिन यह ऐसी बात थी, जिसे छिपाया भी नहीं जा सकता था. वह डरताडराता कंपनी के एरिया मैनेजर आनंद कुमार के पास पहुंचा और जब उन्हें ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के कैश वैन सहित गायब होने की बात बताई तो वह सन्न रह गए, क्योंकि ड्राइवर प्रदीप पूरे साढ़े 22 करोड़ रुपए के साथ गायब था. उन्होंने तुरंत प्रदीप शुक्ला का फोन मिलाया, लेकिन उस का फोन उस समय भी बंद था.

आनंद कुमार के दिमाग में तुरंत आया कि ड्राइवर वह रकम ले कर कहीं भाग तो नहीं गया? अगर ऐसा हुआ तो यह कंपनी के लिए भी बड़ी बदनामी वाली बात होगी. इसलिए मैनेजर ने गार्ड विजय कुमार से कहा कि अभी वह इस बारे में किसी से कोई बात न करे. एरिया मैनेजर आनंद कुमार ने इस बारे में कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की तो सभी में खलबली मच गई. क्योंकि यह कोई छोटीमोटी बात नहीं थी. जिस कैश वैन के साथ प्रदीप शुक्ला लापता था, उस में जीपीएस लगा था. उस के माध्यम से पता लगाया जा सकता था कि वैन उस समय कहां है. इसीलिए उन्होंने उस समय पुलिस को सूचना नहीं दी. कंपनी के अधिकारी खुद ही अपने स्तर से वैन का पता लगाने लगे.

जीपीएस के माध्यम से पता चला कि वह वैन दिल्ली में गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के पास खड़ी है. कंपनी के अधिकारियों की उम्मीद जागी और वे आननफानन गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के नजदीक पहुंचे तो वहां उन्हें सर्विस लेन में वह वैन खड़ी दिखाई दी. जब वे वैन के पास पहुंचे तो उस में कैश से भरे सभी संदूक गायब मिले. अब कंपनी के अधिकारियों को विश्वास हो गया कि ड्राइवर प्रदीप शुक्ला किसी दूसरी गाड़ी में उन संदूकों को ले कर भाग गया है.

अब इस बात को छिपाया नहीं जा सकता था. पुलिस को सूचना देना जरूरी था, इसलिए शाम पौने 6 बजे के करीब उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के कैश वैन के ड्राइवर द्वारा साढ़े 22 करोड़ रुपए ले कर गायब होने की सूचना दे दी. जैसे ही यह सूचना पुलिस के बड़े अधिकारियों तक पहुंची तो उन के होश उड़ गए. क्योंकि नवंबर, 2014 में दिल्ली के कमलानगर में कैश वैन से जो डेढ़ करोड़ रुपए की लूट हुई थी, वह केस अभी तक नहीं खुल पाया था, ऊपर से यह नया केस सामने आ गया.

जिस जगह यह घटना हुई थी, वह इलाका दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना ओखला के अंतर्गत आता था. सूचना पाते ही ओखला के थानाप्रभारी नरेश सोलंकी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा और एसीपी (कालकाजी) जसवीर सिंह भी आ गए. चूंकि लूट का यह बड़ा मामला था, इसलिए जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया भी चल पड़े थे. लूट की खबर मिलते ही पुलिस ने दिल्ली से बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग शुरू कर दी थी. सभी पुलिस अधिकारी उस जगह पहुंच गए, जहां कैश वैन खड़ी मिली थी. इस के बाद उन्होंने उस जगह का भी मुआयना किया, जहां वैन का ड्राइवर गनमैन विजय कुमार पटेल को छोड़ कर चला आया था.

डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा ने जरूरी जांच के लिए फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया था. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने स्पैशल सेल और क्राइम ब्रांच की स्पैशल टीम को भी बुला लिया था. सभी टीमें अपनेअपने स्तर से जांच कर रही थीं. पुलिस अधिकारियों के गले यह बात नहीं उतर रही थी कि जब घटना पौने 4 बजे घटी थी तो कंपनी के अधिकारियों ने 2 घंटे बाद पुलिस को सूचना क्यों दी? आखिर इतनी देर तक वे मामले को क्यों दबाए रहे. इस पर कंपनी के अधिकारी अपनी सफाई में यही कह रहे थे कि जीपीएस के माध्यम से वे पहले खुद ही ड्राइवर और वैन को तलाशने की कोशिश कर रहे थे. यही करने में उन्हें इतना समय लग गया.

बहरहाल, मौके की काररवाई निपटाने के बाद थाना ओखला में ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के खिलाफ अमानत में खयानत का मामला दर्ज कर लिया गया. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने इस केस के खुलासे के लिए स्पैशल सेल, क्राइम ब्रांच, स्पैशल स्टाफ के अलावा थानों के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों को भी लगा दिया. सभी टीमें अलगअलग तरीके से केस की जांच में जुट गई. पुलिस ने पूछताछ के लिए गनमैन विजय कुमार को हिरासत में ले लिया था. इस वारदात के पीछे पुलिस को 3 ऐंगल नजर आ रहे थे. पहला यह कि कैश वैन का ड्राइवर प्रदीप शुक्ला इतनी बड़ी लूट को अकेला अंजाम नहीं दे सकता था. उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर ही वारदात को अंजाम दिया होगा.

दूसरा ऐंगल यह लग रहा था कि किसी प्रोफेशनल गिरोह ने रास्ते में प्रदीप को काबू कर के उस का अपहरण कर लिया होगा और रकम व प्रदीप को वह अपनी गाड़ी में डाल कर ले गए होंगे. अगर ऐसा हुआ तो अपहर्त्ता प्रदीप की हत्या कर सकते थे. तीसरा ऐंगल यह लग रहा था कि गनमैन विजय कुमार ने साजिश रच कर यह वारदात कराई है. गनमैन योजना के तहत लघुशंका के बहाने उतर गया होगा और उस के साथियों ने ड्राइवर का पीछा कर के वारदात को अंजाम दिया होगा. पुलिस इन तीनों संभावनाओं पर तहकीकात कर रही थी.

विकासपुरी से कैश ले कर वैन जिस रूट से होते हुए श्रीनिवासपुरी की रेडलाइट तक पहुंची थी, पुलिस ने यह पता लगाया कि इस रास्ते में कहांकहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पुलिस यह जानना चाहती थी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बदमाश विकासपुरी से ही किसी गाड़ी से कैश वैन का पीछा कर रहे थे. इस के अलावा गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी गई. क्योंकि कैश वैन लावारिस अवस्था में इसी मैट्रो स्टेशन के पास खड़ी मिली थी. पुलिस की एक टीम विकासपुरी स्थित करेंसी चेस्ट पहुंची. वहां से पता चला कि एसआईएस की किसी भी वैन में रोजाना 10 करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं रखे जाते थे तब पुलिस को इस बात पर हैरानी हुई कि उस दिन वैन में साढ़े 22 करोड़ रुपए क्यों रखे गए?

इस के अलावा यहां एक खामी और सामने आई, वह यह थी कि हर दिन हरेक कैश वैन पर 2 गनमैन, एक ड्राइवर और एक कस्टोडियन सवार होता था लेकिन उस दिन कैश वैन में एक गनमैन और एक कस्टोडियन को क्यों नहीं भेजा गया? इतने ज्यादा कैश के साथ केवल एक ही गनमैन क्यों भेजा गया? कस्टोडियन सुरेश कुमार उस वैन में क्यों नहीं गया? इस के अलावा पुलिस को यह भी पता चला कि वैन में रकम रखने की जिम्मेदारी कस्टोडियन की होती है, लेकिन उस वैन में साढ़े 22 करोड़ रुपए कस्टोडियन के बजाय किसी विक्रम नाम के कर्मचारी ने रखे थे.

इन खामियों को देख कर पुलिस को शक हुआ कि लूट की योजना बनाने में यहां के कर्मचारियों का भी हाथ हो सकता है. इसीलिए पुलिस ने विक्रम, कस्टोडियन सुरेश कुमार और अन्य कई कर्मचारियों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. इस से पहले दिल्ली में कैश लूट के जो मामले हुए थे, उन में जिन बदमाशों के शामिल होने की बात सामने आई थी, पुलिस ने उन बदमाशों के डोजियर के आधार पर उन की तलाश शुरू कर दी. उन में से पुलिस के हाथ जितने भी बदमाश लगे, उन से भी सख्ती से पूछताछ की जाने लगी.

प्रदीप शुक्ला नाम का जो ड्राइवर कैश के साथ लापता था, पुलिस ने एसआईएस कंपनी से उस का फोटो और उस की डिटेल हासिल की तो पता चला कि वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिला बलिया का रहने वाला था और उस ने 10 सितंबर, 2015 को ही इस कंपनी में नौकरी जौइन की थी. कंपनी में उस ने दक्षिणी दिल्ली के कोटला मुबारकपुर का पता लिखवाया था. पुलिस की एक टीम उस के कोटला मुबारकपुर वाले पते पर पहुंची तो पता चला कि वह पहले कभी इस पते पर रहता था. मकान मालिक ने पुलिस को बताया कि अब वह ओखला इंडस्ट्रियल एरिया के नजदीक हरकेशनगर में रहता है.

हरकेशनगर का पता ले कर पुलिस टीम जब उस के कमरे पर पहुंची तो वहां उस की पत्नी शशिकला और 3 बच्चे मिले. पुलिस ने जब शशिकला से उस के पति के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह अपनी ड्यूटी गए हैं. पुलिस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रदीप घर में नोटों के बौक्स रख कर कहीं फरार हो गया हो और पत्नी झूठ बोल रही हो. यह शंका दूर करने के लिए पुलिस ने उस के कमरे की तलाशी ली, लेकिन वहां उसे कुछ नहीं मिला. पुलिस वहां से खाली हाथ लौट आई. अब तक पुलिस की किसी भी टीम को ऐसा कोई क्लू नहीं मिल सका था, जिस से प्रदीप के बारे में कोई जानकारी मिल सकती.

अब तक काफी रात हो चुकी थी. लेकिन पुलिस टीमें अपनेअपने काम में लगी थीं. पुलिस ने ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा रखा था, इस से उस की आखिरी लोकेशन अपराह्न पौने 4 बजे श्रीनिवासपुरी की आ रही थी. इस से यही लग रहा था कि वहां से कैश वैन सहित फरार होते समय उस ने अपना फोन बंद कर दिया था. पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि प्रदीप ने उसी दिन 26 नवंबर को आखिरी बार किसी अजीत के फोन पर बात की थी. बाद में पता चला कि अजीत भी हरकेशनगर में रहता है.

पुलिस अजीत के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. उस से प्रदीप के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि प्रदीप से उस की कोई खास बात नहीं हुई थी, लेकिन उस ने प्रदीप को शाम 4-5 बजे के बीच ओखला फेज-3 में देखा था. थानाप्रभारी नरेश सोलंकी अजीत को ले कर ओखला फेज-3 में उस जगह पहुंच गए, जहां उस ने प्रदीप को देखा था. वहां तमाम इंडस्ट्री हैं, इसलिए प्रदीप को ढूंढना आसान नहीं था. थानाप्रभारी ने इस बात से डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा को अवगत कराया तो उन्होंने उस इलाके में सर्च औपरेशन चलाने के निर्देश दिए.

सर्च औपरेशन में सरिता विहार के थानाप्रभारी महिंदर सिंह, नेहरू प्लेस पुलिस चौकी इंचार्ज मनमीत मलिक, एसआई राजेंद्र डागर, जितेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल यतेंद्र आदि को भी लगा दिया गया. इस टीम का निर्देशन कालकाजी के एसीपी जसवीर सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम हर फैक्ट्री में जाती और प्रदीप का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछती. इसी क्रम में पुलिस ओखला फेज-3 स्थित एक ढाबे पर पहुंची. वह ढाबा अजय का था. वह ढाबा देर रात तक खुला रहता था. पुलिस ने ढाबे वाले को प्रदीप का फोटो दिखाया तो उस ने बताया कि इसे उस ने यहीं पर रात साढ़े 9 बजे के करीब देखा था.

ढाबे वाले से बात कर के बाद पुलिस को यकीन हो गया कि प्रदीप जिंदा है. क्योंकि पुलिस को आशंका थी कि अपहर्त्ताओं ने उसे कहीं मार न दिया हो. कैश कहां है, यह बात प्रदीप के मिलने पर ही पता लग सकती थी. इसलिए उसे ढूंढना जरूरी था. पुलिस को लगा कि कुछ घंटे पहले जब प्रदीप यहीं था तो जरूर यहीं कहीं छिपा होगा. इस के बाद पुलिस पूरे उत्साह से एकएक फैक्ट्री में जा कर उसे खोजने लगी. खोजबीन करते हुए पुलिस ढाबे से करीब 50 गज दूर एक फैक्ट्री के गेट पर पहुंची तो उस में अंदर से ताला बंद था. गेट खटखटाने पर गेट पर एक अधेड़ उम्र का आदमी आया. वह उस फैक्ट्री का चौकीदार था. उस का नाम रामसूरत था.

पुलिस ने चौकीदार को ड्राइवर प्रदीप शुक्ला का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछा और गोदाम की तलाशी लेने के लिए कहा. पुलिस को देख कर चौकीदार रामसूरत डर गया. वह गेट की चाबी लेने की बात कह कर अंदर गया और कुछ देर बाद लौट कर गेट खोल कर पुलिस को अंदर ले आया. उस ने एक कमरे का दरवाजा खोल कर कहा, ‘‘सर, जिस की आप को तलाश है, वह यह रहा.’’

पुलिस कमरे में घुसी तो सचमुच वहां फरार ड्राइवर प्रदीप शुक्ला मिल गया. उसी कमरे में कैश से भरे 9 संदूक भी रखे थे. यह सब देख कर पुलिस की बांछें खिल उठीं. पुलिस ने प्रदीप को हिरासत में ले कर उन बक्सों की जांच की तो उन में से केवल एक बक्से की क्लिप हटी थी, बाकी 8 बक्से जैसे के तैसे थे. पुलिस ने प्रदीप शुक्ला और चौकीदार रामसूरत को उसी समय हिरासत में ले लिया. रामसूरत लाख सफाई देता रहा कि उस का इस मामले से कोई संबंध नहीं है, पर पुलिस ने उस की एक न सुनी. हां, पुलिस ने उसे इतना भरोसा जरूर दिया कि अगर वह निर्दोष पाया गया तो उसे छोड़ दिया जाएगा. यह बात 27 नवंबर, 2015 सुबह 3 बजे की है.

एसीपी जसबीर सिंह ने ड्राइवर प्रदीप शुक्ला को गिरफ्तार करने व कैश बरामद होने की जानकारी डीसीपी व अन्य अधिकारियों को दी तो डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा, जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया सहित कई अन्य अधिकारी भी ओखला के उस गोदाम पर पहुंच गए. सभी संदूकों को जब्त करने के बाद पुलिस प्रदीप शुक्ला और चौकीदार रामसूरत को थाने ले आई. पुलिस यही अनुमान लगा रही थी कि इतनी बड़ी रकम को लूटने में जरूर किसी बड़े गैंग का हाथ रहा होगा, लेकिन थाने में प्रदीप शुक्ला से जब पूछताछ की गई तो पता चला कि इस लूट में उस के अलावा कोई दूसरा शामिल नहीं था. और यह लूट भी कोई पहले से बनाई प्लानिंग के तहत नहीं की गई थी, बल्कि अचानक यह सब किया गया था.

प्रदीप शुक्ला ने करीब 3 महीने पहले ही सिक्योरिटी एजेंसी एसआईएस में ड्राइवर की नौकरी जौइन की थी. उस की ड्यूटी विकासपुरी ब्रांच से कैश ले कर कंपनी के ओखला स्थित हैडऔफिस में पहुंचाने की थी. कभीकभी उसे एटीएम मशीनों में पैसे रखने वाली टीम के साथ भी भेज दिया जाता था. प्रदीप ने बताया कि उस से जितना काम लिया जाता था, उस के मुताबिक उसे सैलरी नहीं मिलती थी. मजबूरी में उसे कम पैसों में वहां नौकरी करनी पड़ रही थी. इसीलिए कभीकभी उस के दिमाग में विचार आता था कि जो पैसे वह वैन में ले कर जाता है, अगर उसे मिल जाएं तो उस की पूरी जिंदगी ठाठ से कटेगी.  लेकिन यह उस की केवल सोच थी, उस ने वे पैसे ले कर भागने के बारे में कभी नहीं सोचा. बहरहाल कम वेतन मिलने की वजह से वह मानसिक तनाव में जरूर रहता था.

26 नवंबर को वह साढ़े 22 करोड़ रुपए विकासपुरी के करेंसी चेस्ट से ले कर चला. जब श्रीनिवासपुरी रेडलाइट के पास वैन का गनमैन विजय कुमार पटेल लघुशंका के लिए उतर गया तो अचानक उसे लालच आ गया. उस ने सोचा कि पैसे ले कर भागने का इस से अच्छा मौका उसे फिर कभी नहीं मिलेगा और वह नोटों से भरे उन 9 संदूकों को ले कर सीधे ओखला फेज-3 स्थित रामसूरत के पास पहुंच गया. वह उसे पहले से जानता था.

रामसूरत जिस गोदाम में चौकीदारी करता था, वहां पहले मर्सिडीज कारों का वर्कशाप था. लेकिन कुछ सालों से वहां तार का काम होता था. यह गोदाम धु्रवकुमार नाम के एक बिजनेसमैन का था. रामसूरत धु्रवकुमार के यहां पिछले 22 सालों से नौकरी कर रहा था. प्रदीप की पत्नी शशिकला पहले इसी गोदाम में काम करती थी. तभी से प्रदीप की रामसूरत से जानपहचान थी. रामसूरत ने ही किसी से सिफारिश कर के प्रदीप की नौकरी एसआईएस सिक्योरिटी कंपनी में बतौर ड्राइवर लगवाई थी.

शाम को करीब 5 बजे प्रदीप कैश वैन ले कर रामसूरत के पास गोदाम में पहुंचा. प्रदीप ने रामसूरत को बताया कि उन 9 संदूकों में पन्नी के बंडल हैं. उन्हें वह बनारस ले जाएगा, जिस की एवज में उसे 10 हजार रुपए मिलेंगे. इस के बाद उस ने वैन से नोटों से भरे सारे संदूक उतार कर गोदाम के एक कमरे में रख दिए. फिर मौका मिलने पर उस ने खर्चे के लिए एक संदूक से 11 हजार रुपए निकाल लिए.

इस के बाद वह यह कह कर वैन ले कर चला गया कि थोड़ी देर में लेबर ले कर आ रहा है ताकि सभी संदूकों को पैक करा कर बनारस ले जा सके. इस पर रामसूरत मान गया. इस के बाद प्रदीप वैन को गोविंदपुरी मेट्रो स्टेशन के पास छोड़ कर चला आया. लौटते समय रास्ते भर वह यही सोचता रहा कि इस रकम को ले कर वह कहां जाए. प्रदीप ने खर्चे के लिए एक संदूक से 11 हजार रुपए निकाल लिए थे. खानेपीने का कुछ सामान लेने के लिए वह बाजार चला गया. वहां से उस ने महंगी शराब खरीदी, होटल से चिकन पैक कराया. इस के बाद वह गोदाम लौट आया. उसे अकेले देख कर रामसूरत ने पूछा, ‘‘तुम तो पैकिंग के लिए लेबर लेने गए थे, लेबर कहां है?’’

इस पर प्रदीप ने बताया कि रात की वजह से लेबर नहीं मिली, सुबह को देखूंगा. रामसूरत ने भी उस की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और वह वहां से चला गया. उस के जाने के बाद प्रदीप ने उन संदूकों के पास बैठ कर शराब पी और चिकन खाया. फिर वह कपड़ा बिछा कर वहीं सो गया. रामसूरत भी अपनी जगह पर जा कर सो गया. सुबह 3 बजे के करीब किसी ने गेट खटखटाया तो रामसूरत की नींद खुली. वह गेट पर गया तो बाहर भारी संख्या में पुलिस को देख कर घबरा गया. पुलिस वालों ने जब उसे फोटो दिखाया तो वह समझ गया कि प्रदीप जरूर ही कोई गलत काम कर के भागा है. चाबी लेने के बहाने रामसूरत उस कमरे में आया जहां प्रदीप सो रहा था.

रामसूरत ने प्रदीप को जगा कर कहा, ‘‘ये पन्नी के बौक्स क्या तुम चोरी कर के लाए हो, जो पुलिस यहां आई है.’’

पुलिस का नाम सुनते ही प्रदीप डर गया. वह झट से बोला कि कोई भागने का रास्ता हो तो बताओ. इस से रामसूरत को विश्वास हो गया कि वह जरूर कोई गड़बड़ कर के आया है. इस से पहले कि प्रदीप वहां से भाग पाता, रामसूरत ने कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. प्रदीप मिन्नतें करते हुए दरवाजा खोलने को कहता रहा लेकिन रामसूरत ने उस की एक नहीं सुनी और वह गेट पर खड़े पुलिस वालों को उस कमरे में ले गया जहां प्रदीप था. प्रदीप ने एक संदूक से जो 11 हजार रुपए निकाले थे, उन में से वह साढ़े 10 हजार रुपए खर्च कर चुका था.

उस से पूछताछ के बाद पुलिस को जब यकीन हो गया कि इस लूट के मामले में उस के अलावा किसी और का हाथ नहीं है तो हिरासत में लिए गए बाकी लोगों को छोड़ दिया गया. साथ ही पुलिस ने ईमानदारी से अपना फर्ज निभाने वाले चौकीदार रामसूरत को धन्यवाद भी दिया. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने 10 घंटे के अंदर ही दिल्ली की सब से बड़ी कैश लूट का खुलासा कर रकम बरामद करने वाली पुलिस टीम की सराहना की. प्रदीप से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. मामले की विवेचना थानाप्रभारी नरेश सोलंकी कर रहे हैं. Bank Robbery

—कथा पुलिस सूत्रों

Swachh Bharat: स्वच्छता लाने के लिए

Swachh Bharat: हमारे यहां स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है. इस के लिए सरकार ने टैक्स भी वसूलना शुरू कर दिया है. लेकिन क्या घरों, मोहल्लों और सड़कों की

सफाई से भारत स्वच्छ हो जाएगा? स्वच्छता तभी संभव है, जब हर नागरिक स्वच्छता के महत्व को समझे या फिर दंडात्मक तरीके से इस के महत्त्व को समझाया जाए. अगर बात सड़कों की करें तो सड़कें तो साफ हो जाएंगी, लेकिन उन पर चलने वाले वाहनों का क्या? सड़कों पर अगर आप गौर से देखें तो 20-25 प्रतिशत वाहन ही साफसुथरे नजर आएंगे. ज्यादातर वाहनों पर धूल, मिट्टी या कीचड़ लगी मिलेगी. खासकर नंबर प्लेटों पर. इस के लिए हमारे यहां भी चीन जैसी कोई शुरुआत होनी चाहिए.

चीन के नानजिंग शहर में एक नई शुरुआत हुई है, जिस का आम लोगों ने समर्थन भी किया है और स्वागत भी. वहां जो भी वाहन गंदा नजर आता है, उस के मालिक को जुरमाना भरना होता है. खासतौर पर लोक परिवहन से जुड़े वाहनों को इस नियम का सख्ती से पालन करना होता है. दरअसल, कुछ समय पहले लोगों ने लोक परिवहन से जुड़े वाहनों के फोटो खींच कर औनलाइन कर दिए और लिख दिया, ‘ये वाहन पर्यटकों के बीच देश की छवि खराब कर रहे हैं.’ इस बात को प्रशासन ने गंभीरता से लिया और इस के लिए नियम बना डाला. परिणाम यह निकला कि सड़कों पर दौड़ने वाले सभी वाहन साफसुथरे नजर आने लगे. यह नियम निजी वाहन चालकों पर भी लागू किया गया.

जिस किसी वाहन के पहियों, चेसिस या फिर बौडी पर धूल, मिट्टी अथवा कीचड़ दिखाई देती है, उस पर पहली बार में 11 सौ रुपए जुरमाना लगाया जाता है. इस का पूरा डाटा औनलाइन दर्ज किया जाता है. अगर दूसरी बार वही वाहन नियम तोड़ता मिलता है तो जुरमाने की राशि बढ़ जाती है.

अगर किसी वाहन की नंबर प्लेट धूल या कीचड़ के कारण दिखाई न दे रही हो तो उसे अधिक जुरमाना भरना पड़ता है. सब से ज्यादा जुरमाने का प्रावधान वाहन के बाहरी हिस्से के क्षतिग्रस्त होने या खराब दिखने वाले पेंट वर्क पर लगाया जाता है. इस में ड्राइवर या वाहन मालिक को 5 हजार से ले कर 20 हजार रुपए तक देने पड़ते हैं. अगर बर्फबारी या बारिश के कारण कीचड़ लगता है तो नियम में छूट मिल सकती है. Swachh Bharat

Jinnah Love Story: जिन्ना और रत्ती की प्रेम कहानी

Jinnah Love Story: पाकिस्तान के जनक जिन्ना को भले ही कट्टर माना जाता हो, लेकिन उन के अंदर एक प्यारभरा दिल भी था जो रत्ती यानी रतनबाई के लिए धड़कता था. दोनों में प्यार भी हुआ, परवान भी चढ़ा. लेकिन शादी के बाद…

बात सन 1938 की है. सांप्रदायिक राजनीति पूरे उफान पर थी. इस दौरान मोहम्मद अली जिन्ना देश के सब से बड़े मुसलिम नेता के तौर पर उभर रहे थे. ऐसे नाजुक मौके पर उन की बेटी दीना ने एक गैरमुसलिम युवक नेविल वाडिया के साथ शादी की इच्छा प्रकट की तो जिन्ना का उत्तर अप्रत्याशित नहीं था. उन्होंने पिता के अधिकार से कहा, ‘‘हिंदुस्तान में तुम्हारे लायक लाखों मुसलिम लड़के हैं. उन में से तुम किसी को भी चुन सकती हो.’’

लेकिन दीना अपनी जिद्दी मां और उस से भी ज्यादा अपने जिद्दी पिता की संतान थी. इसलिए उस ने जो जवाब दिया, वह जिन्ना के लिए भी अप्रत्याशित था. दीना ने कहा, ‘‘डैडी, हिंदुस्तान में लाखों मुसलमान लड़कियां थीं, फिर भी आप ने उन में से किसी से शादी नहीं की.’’

जिन्ना को अपनी लाडली एकलौती बेटी के जवाब ने लाजवाब कर दिया. लेकिन वह अपनी बेटी केइशारे को समझ गए थे. उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि 20 साल पहले का उन के अपने जीवन का इतिहास इतनी जल्दी स्वयं को दोहराएगा. उन्होंने भी पारसी खानदान में जन्मी रतनबाई उर्फ रत्ती से प्यार किया था और सारे जमाने से लड़ कर उस से शादी की थी. बहुत अनोखी, मगर बहुत ट्रैजिक थी उन की प्रेम कहानी.

रतनबाई पेटिट का जन्म सन 1900 में मुंबई के समृद्ध और प्रतिष्ठित पारसी पेटिट परिवार में हुआ था. पेटिट परिवार मुंबई के पेडर रोड पर एक विशाल बंगले में रहता था. परिवार के कई बंगले पुणे दार्जिलिंग और कई रमणीक स्थानों पर थे. रत्ती आकर्षक और प्रतिभाशाली लड़की थी. कला और साहित्य में उस की गहरी दिलचस्पी थी. वह देश के स्वतंत्रता संग्राम की लहर से भी अछूती नहीं थी. परिवार में उस जमाने में कई राजनीतिज्ञों और नेताओं का आनाजाना लगा रहता था. रत्ती उन की बातचीत, बहस और चर्चाएं अकसर सुनती रहती थी.

उस की 2 बुआओं की राजनीतिक हलचलों में गहरी दिलचस्पी थी. उन के साथ वह अकसर मुंबई की राजनीतिक सभाओं और मीटिंगों में जाती रहती थी. मुंबई के सामाजिक, राजनीतिक और व्यापारिक क्षेत्र के दिग्गजों के बीच 40 की उम्र पार कर चुके जिन्ना का व्यक्तित्व कई कारणों से विशिष्ट था. जिन्ना तब अपने पेशेवराना और सार्वजनिक जीवन के चरम पर थे. 1915 में मुंबई में जिन्ना के बारे में वोलपर्ट ने लिखा है, ‘‘किचनर की तरह बड़ी मूंछें, स्याह बाल और कटार की तरह पतले जिन्ना रोनाल्ड कोलमैन की तरह बोलते थे और एंथनी इडेन की तरह कपड़े पहनते थे. पहली ही नजर में ज्यादातर महिलाएं उन की प्रशंसक बन जाती थीं तो ज्यादातर पुरुष उन से ईर्ष्या करते थे.’’

सर दिनशा पेटिट से उन की अच्छी मित्रता थी. जिन्ना का उन के घर अकसर आनाजाना होता रहता था. जीवन के सब से खतरनाक माने जाने वाले सोलहवें साल की दहलीज पर खड़ी रत्ती के मन में धीरेधीरे अपने पिता के उम्र के इस सुदर्शन प्रौढ़ के प्रति कहीं न कहीं आकर्षण का अंकुर फूटने लगा था. दूसरी तरफ जिन्ना मनोरम व्यक्तित्व की रत्ती में हो रहे परिवर्तन को अनदेखा करने की स्थिति में नहीं थे.

जिन्ना के व्यक्तित्व से प्रभावित रत्ती उन के हर सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने लगी थी. लेकिन धर्म और उम्र की दूरी के कारण दोनों के बीच पनप रहे प्यार को अभव्यक्त होने का मौका नहीं मिला था. तभी जिन्ना पेटिट परिवार के साथ गर्मियां बिताने के लिए अप्रैल, 1916 में दार्जिलिंग पहुंचे. दार्जिलिंग की वादियों में दोनों को पहली बार एकदूसरे की कोमल भावनाओं का अहसास हुआ. जब वे वापस लौटे तो दोनों के मन में एक साथ जीवन बिताने के खूबसूरत सपने पल रहे थे.

जनवरी, 1917 की एक शाम सर दिनशा पेटिट के बंगले पर विभिन्न धार्मिक समुदायों की एकता पर चर्चा के दौरान जिन्ना ने उन से विभिन्न समुदायों के बीच वैवाहिक रिश्तों के बारे में उन की राय जाननी चाही. सर पेटिट की राय इस के लिए अनुकूल थी. इस मौके का लाभ उठाते हुए जिन्ना ने थोड़ा झिझकते हुए उन की बेटी रत्ती के साथ शादी का प्रस्ताव रख दिया.

कुछ समय पहले व्यक्त किए गए अपने उदार विचार की ऐसी परिणति से सर पेटिट चौंक गए और गुस्से से उबल पड़े. उन से केवल 3 साल छोटे एक प्रौढ़ से अपनी 16 साल की किशोर बेटी की शादी की बात उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोची थी. परिवार की मेहमाननवाजी और मैत्री संबंध का लाभ उठाते हुए किशोर बेटी के साथ प्रेमसंबंध बढ़ाने की जिन्ना की कोशिश उन्हें अनैतिक लग रही थी. उन्होंने जिन्ना के इस असंस्कृत प्रस्ताव को गुस्से के साथ खारिज कर दिया.

प्रेमबद्ध बैरिस्टर जिन्ना की सारी दलीलें और अपीलें बेकार गई थीं. इस के बाद जिन्ना और पेटिट की दोस्ती तो दूर रही, बातचीत भी बंद हो गई थी. पेटिट ने शादी की मंजूरी तो दूर रही, रत्ती के जिन्ना से मिलने पर भी रोक लगा दी थी. फिर उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया. उन के आवेदन पर पारसी विवाह कानून के प्रावधान के तहत रत्ती के जिन्ना से मिलने पर सख्त रोक लगा दी गई थी और रत्ती को अपने विवाह के बारे में फैसला लेने के लिए अक्षम घोषित कर दिया था. कानून का सम्मान करने वाले जिन्ना ने रत्ती से तब तक मुलाकात नहीं की, जब तक 20 फरवरी, 1918 को वह 18 साल की नहीं हो गईं.

रत्ती ने 19 अप्रैल, 1918 को जिन्ना के साथ मुंबई की जामिया मसजिद में जा कर मौलाना नजीर अहमद खोजांदी की मौजूदगी में इसलाम कबूल कर लिया और फिर शिया रस्मोरिवाज के मुताबिक शादी की. शादी के गवाहों में मजमूदाबाद के राजा शामिल थे, जो दुलहन की शादी की अंगूठी ले कर आए थे. जिन्ना जब लंदन में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, तब उन की इच्छा थी कि शेक्सपियर के रोमानी नाटक रोमियो जूलियट में रोमियो की भूमिका निभाएं. नाटक में रोमियो का रोल करने का तो उन्हें अवसर नहीं मिल पाया, लेकिन वास्तविक जिंदगी में कुछ वैसा ही रोल करने का मौका जरूर मिला. उन की जूलियट ने 2 साल उन का इंतजार किया.

बाद में जब वह 18 साल की हुई और घर में उस की सालगिरह मनाने की तैयारियां चल रही थीं. उसी दिन वह पिता का घर छोड़ कर जिन्ना के घर चली गईं. सर पेटिट इस घटना से इतने क्षुब्ध थे कि उन्होंने बेटी की मौत की सूचना छपवा कर उस का उठावना तक कर दिया था. इस के बाद उन्होंने रत्ती से कभी कोई संबंध नहीं रखा.

कुछ दिनों बाद अखबार में रत्ती के इसलाम कबूल करने और जिन्ना के साथ उन की शादी की खबर छपी. धर्म परिवर्तन के बाद रत्ती का नाम मरियम रखा गया. रत्ती के साथ शादी में जिन्ना को सर पेटिट के ऐतराज के अलावा भी कई रुकावटें आईं. जिन्ना को अपने इस्माइली शिया समुदाय के विरोध का भी सामना करना पड़ा. असल में इस विवाह को ले कर जिन्ना और पेटिट के परिवार में ही नहीं वरन पारसी और इस्माइली शिया समुदाय में भी तनाव पैदा हो गया था.

जिन्ना एक जानेमाने राजनीतिज्ञ और चोटी के वकील थे, इस के बावजूद इस्माइली जमात की सर्वोच्च सभा रत्ती को अपने समाज में शामिल करने से हिचकिचा रही थी. इस्माइली  समाज मुख्य रूप से व्यापारियों का समाज था. पारसी मुंबई के व्यापार और उद्योग पर छाए हुए थे और पेटिट इस समाज के प्रतिष्ठित सदस्य थे. वे दूसरे धर्म के अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ जो कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, अपने समाज की किशोर लड़की की शादी को पचा नहीं पा रहे थे.

वे इस बात से और भी खफा थे कि मुसलिम कानून धर्म परिवर्तन के बिना उस विवाह को कबूल नहीं कर सकता था. इस के अलावा इस्माइली समाज के लोग रत्ती को अपने धर्म में शामिल कर के पारसियों को नाराज नहीं करना चाहते थे. लेकिन आखिरकार जिन्ना ने इन सारी समस्याओं को अपने तरीके से हल कर लिया. उन्होंने इस्माइली समाज से नाता तोड़ लिया और असरी जमात के अनुसार विवाह किया.

निकाह में मेहर की रकम 1001 रुपए तय की गई, लेकिन जिन्ना ने फौरन 1 लाख 25 हजार रुपए का तोहफा दिया. जिन्ना सिविल मैरिज कर के ज्यादा खुश हो सकते थे, लेकिन उस जमाने के कानून के मुताबिक कोर्टमैरिज का विकल्प चुनने वाले लोगों को यह ऐलान करना होता था कि वे किसी मजहब को नहीं मानते. जिन्ना मुसलिम निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे और इस तरह की घोषणा से उन का चुनाव निरस्त हो जाता.

ख्वाजा रजी हैदर लिखते हैं कि मुंबई के पारसी इस धर्मांतरण से काफी नाराज थे. पारसी अखबारों ने शादी के दिन को काला शुक्रवार घोषित कर दिया. अपहरण का मामला दर्ज किया गया और जब यह मामला अदालत पहुंचा तो न्यायाधीश ने पूछा कि क्या जिन्ना ने पैसे के लिए शादी की है. इस से नाराज जिन्ना ने कहा कि इस सवाल का जवाब केवल उन की पत्नी ही दे सकती हैं. पत्नी आगे आईं और उन्होंने अदालत को बताया कि वह प्यार की खातिर मुसलमान बनीं और न तो वह और न ही उन के पति उन के पिता की दौलत में हिस्सा चाहते हैं.

डा. सैय्यद महमूद को लिखे पत्र में सरोजिनी नायडू ने इस विवाह की बहुत अच्छी तसवीर पेश की है, ‘‘सो, जिन्ना ने आखिरकार अपने मन का नीला फूल तोड़ लिया. यह सब बहुत अचानक हुआ और इस का जबरदस्त विरोध भी हुआ. पारसियों में काफी नाराजगी थी. लेकिन मुझे लगता है कि उस लड़की ने बड़ी कुरबानी दी है और अभी तक उसे इस का अहसास नहीं है. जिन्ना इस सब के लायक हैं, वह प्यार करते हैं. ऐसा प्यार जो वास्तव में इंसानी है और उन के अंतर्मुखी एवं आत्मकेंद्रित प्रकृति का वास्तविक भाव है.’’

शादी के बाद जिन्ना और रत्ती सुहागरात मनाने नैनीताल गए. वे वहां एक हफ्ता रहे. जिन्ना के रेतीले जीवन में पहली बार कोई रसधार फूटी थी. वह उस की हर बूंद को आत्मसात कर लेना चाहते थे. नैनीताल से वे कार से दिल्ली आए. वहां नए बने मेरीडियन होटल में रुके. इस होटल के वातावरण और साजसज्जा में मुगलकाल के साथसाथ ब्रिटिश सुखसुविधाओं का सुंदर समन्वय था.

जिन्ना और रत्ती की उम्र में 2 दशक का लंबा फासला होने के बावजूद दोनों अपने समय में भारत के सब से चर्चित दंपति थे तो उस की वजह यह थी कि अपने गोरे रंग, लंबी छरहरी देहयष्टि, कीमती सूट, आत्मविश्वास से भरी तेजस्वी आंखें, पश्चिमी शिष्टाचार, अंगरेजी पर जबरदस्त अधिकार, आकर्षक व्यक्तित्व, एक सफल वकील की छवि और राजनीति में प्रखर सेक्युलर और राष्ट्रवादी नेता की छवि से महिमामंडित जिन्ना के साथ ग्लैमर जुड़ा हुआ था. रत्ती के जिन्ना के प्रति आकर्षण में इस ग्लैमर की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. पर रत्ती खुद भी कम नहीं थीं.

अभिजात्य वर्ग की रत्ती किशोरावस्था से यौवन की तरुणाई की ओर बढ़ते सौंदर्य की मिसाल थीं. उन के तीखे ईरानी नाकनक्श, लंबोतरा चेहरा, गुलाब पंखुड़ी जैसे होंठ, सुडौल ग्रीवा उन के सौंदर्य को विशिष्ट बनाते थे. पर सौंदर्य की बाहरी चमकदमक के पीछे रत्ती बेहद संवेदनशील और कुशाग्र बुद्धि वाली स्वाभिमानी युवती थीं. मुंबई की सब से मशहूर और खूबसूरत दुलहन के तौर पर रत्ती अपने बालों में ताजे फूल, हीरे जडि़त गहने पहनती थीं. हाथी के दांत के होल्डर में रखी अंगरेजी सिगरेट पीती थीं. माणिक, पन्ने और गले के काफी नीचे तक के रेशमी परिधान पहनती थीं, जिस से बुजुर्ग महिलाएं दंग रहती थीं. इस के  अलावा अपने समय के मुंबई की सब से स्वच्छंद और ग्रंथिमुक्त व्यक्तित्व थीं. जिन्ना ने भी रत्ती के उन्मुक्त जीवन में कभी हस्तक्षेप नहीं किया, न करने दिया.

जिन्ना दंपति के हनीमून से मुंबई लौटने के बाद मुंबई के गवर्नर लौर्ड विलिंगडन ने रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया. उस दिन रत्ती ने गले से बहुत नीचे कट वाला फैशनेबल गाउन पहन रखा था, जिस से उन की मेजबान खुश नहीं थीं. जब वे सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे, तब लेडी विलिंगडन ने एक एडीसी से कहा कि मिसेज जिन्ना को ठंड लग रही होगी, उन के लिए एक शाल ले आएं.

बताया जाता है कि जिन्ना खड़े हो गए और बोले, ‘‘जब मिसेज जिन्ना को ठंड लगेगी तो वह खुद बताएंगी और खुद ढकने के लिए कपड़ा मांगेंगी.’’

और फिर लौर्ड विलिंगडन जब तक गवर्नर रहे, तब तक जिन्ना गवर्नर हाउस दोबारा नहीं गए. रत्ती स्वभाव से आजादखयाल थीं. एक बार कश्मीर में वह एक फार्म से परेशान हो गईं, जिस में उन की यात्रा का मकसद दर्ज करने को कहा गया था. उन्होंने लिखा, ‘राजद्रोह फैलाने के लिए’.

शिमला के वाइसराय लौर्ड चेम्सफोर्ड ने जिन्ना दंपति के सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया था. जब रत्ती का परिचय कराया गया तो उन्होंने पश्चिमी ढंग से झुक कर अभिवादन करने के बजाय दोनों हाथ जोड़ कर सम्मान प्रकट किया. वाइसराय को यह नागवार गुजरा. भोजन के बाद उन्होंने रत्ती को अपने पास बुलवाया और सख्त आवाज में कहा, ‘‘आप के पति का राजनीतिक भविष्य उज्जवल है. आप को अपने व्यवहार से इसे खराब नहीं करना चाहिए. ‘इन रोम यू मस्ट डू ऐज रोमंस डू’ यह उन का अंतिम वाक्य था.’’

रत्ती ने विनम्र हो कर कहा, ‘‘ठीक वही तो किया है महामहिम. मैं हिंदुस्तान में हूं और हिंदुस्तानी अंदाज में ही मैं ने आप का अभिवादन किया है.’’

चेम्सफोर्ड निरुत्तर हो चुके थे. उस के बाद रत्ती उन के किसी आयोजन में शामिल नहीं हुईं. रत्ती से शादी के पहले जिन्ना के मुंबई आवास साउथ कोर्ट पर उन की बहन फातिमा का कब्जा था. रत्ती के प्रवेश से उन का एकछत्र राज टूटा. इस से पहले जिन्ना रत्ती को भी वक्त नहीं दे पा रहे थे. राजनीतिक व्यस्तताओं ने उन्हें रत्ती से दूर कर दिया. रत्ती खुद को उपेक्षित महसूस करने लगीं. जनवरी, 1928 में उन्होंने जिन्ना से अलग रहने का फैसला किया. उन्होंने मुंबई में समंदर किनारे बने ताज होटल में एक सुइट बुक करा लिया था. यही वह वक्त था जब उदारवादी और सेक्युलर जिन्ना का नया अवतार सामने आया. वह था मुसलिम सांप्रदायिक नेता का.

उधर रत्ती जिन्ना से अलग भले ही हो गई थीं, लेकिन जिन्ना के प्रति आत्मीय भाव बना हुआ था. वह बदलते जिन्ना को देख कर व्यथित थीं. धीरेधीरे पहले से खराब तबीयत और खराब होने लगी. अप्रैल, 1928 में वह इलाज के लिए मां के साथ पेरिस रवाना हुईं. जिन्ना भी रत्ती से मिलने के लिए पेरिस के अस्पताल पहुंचे. उन्होंने डाक्टरों से मशविरा कर रत्ती के लिए बेहतर डाक्टर और नर्स की व्यवस्था की. वह एक महीना साथ रहे, देखभाल से रत्ती ठीक होने लगी थीं.

फिर अचानक दोनों में झगड़ा हुआ और रत्ती मां के साथ मुंबई लौट गई. कुछ समय ठीक रहने के बाद स्वास्थ्य फिर गिरने लगा. 18 फरवरी, 1929 को रत्ती ने जिन्ना के लिए लिखा—

मेरे प्रिय,

मैं ने तुम्हें इतना प्यार किया, जितना कभी किसी पुरुष को नहीं किया. यही प्रार्थना है कि जिस ट्रैजेडी का प्रारंभ प्रेम से हुआ था, उस का अवसान भी प्रेम से ही हो. गुडनाइट… गुडबाय. 2 दिनों बाद अपने जन्मदिन पर रतनबाई ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं. तब पहली बार सर पेटिट ने जिन्ना से बात की. केवल इतना ही कहा कि रत्ती बहुत बीमार है. यहां आ जाओ. परीकथा की इस हसीन नायिका का अंत सुखद नहीं था.

रत्ती इस दुनिया से जरूर चली गई थीं, लेकिन जिन्ना के दिल से नहीं जा पाई. जिन्ना पाकिस्तान जाने से पहले जब भी मुंबई में होते थे, हर बृहस्पतिवार को रतनबाई जिन्ना की मजार पर फातिहा पढ़ने जाते थे. कुछ लोग तो उन के पीछे मजाक में यहां तक कहने लगे थे, ‘कायद रतनबाई के मरने के बाद कुछ ज्यादा ही मोहब्बत करने लगे हैं.’ Jinnah Love Story.

 लेखक – सतीश पेडणेकर  

MP Crime: दोस्त का कत्ल – वफादारी की मिली सजा

MP Crime: मध्य प्रदेश के जिला नरसिंहपुर की एक तहसील है गोटेगांव. इस तहसील क्षेत्र में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल झोतेश्वर होने की वजह से छोटा शहर होने के बावजूद गोटेगांव खासा प्रसिद्ध है. गोटेगांव के इलाके में ही एक गांव है कोरेगांव.

8 दिसंबर, 2019 की सुबह कोरेगांव का रहने वाला खुमान ठाकुर झोतेश्वर पुलिस चौकी की इंचार्ज एसआई अंजलि अग्निहोत्री के पास आया. उस ने अंजलि को बताया कि उस के भाई का बड़ा लड़का आशीष 6 दिसंबर को किसी काम से घर से निकला था, लेकिन वापस नहीं लौटा. उन्होंने उसे गांव के आसपास के अलावा सभी रिश्तेदारों के यहां तलाश किया, लेकिन उस की कोई खबर नहीं मिली. उस ने आशीष की गुमशुदगी दर्ज कर उसे तलाशने की मांग की.

एसआई अंजलि अग्निहोत्री ने खुमान से पूछा, ‘‘आप को किसी पर कोई शक हो तो बताओ.’’

खुमान के साथ आए उस के दामाद कृपाल ने बताया कि 6 दिसंबर को उस ने आशीष को उस के दोस्तों पंकज और सुरेंद्र के साथ खेतों की तरफ जाते देखा था. उस ने यह भी बताया कि आशीष के परिवार के लोगों ने जब पंकज और सुरेंद्र को बुला कर पूछताछ की तो वे इस बात से साफ मुकर गए कि आशीष उन के साथ था. इसलिए हमें उन पर शक हो रहा है.

चौकी इंचार्ज अंजलि अग्निहोत्री ने खुमान की शिकायत दर्ज कर इस घटना की सूचना तत्काल एसपी गुरुचरण सिंह, एसडीपीओ (गोटेगांव) पी.एस. बालरे और टीआई प्रभात शुक्ला को दे दी.

एसडीपीओ के निर्देश पर चौकी इंचार्ज एसआई अंजलि अग्निहोत्री ने कोरेगांव में पंकज और सुरेंद्र के घर दबिश तो दोनों घर पर ही मिल गए. उन दोनों से पुलिस चौकी में पूछताछ की गई तो पंकज और सुरेंद्र ने बताया कि हम तीनों दोस्त मछली मारने के लिए गांव से बाहर खेतों के पास वाले नाले पर गए थे.

मछली मारते समय नाले के पास से जाने वाली मोटरपंप की सर्विस लाइन से आशीष को करंट लग गया, जिस से उस की मौत हो गई.

उन्होंने बताया कि आशीष की इस तरह हुई मौत से वे दोनों घबरा गए. डर के मारे उन्होंने आशीष के शव को नाले के समीप ही गड्ढा खोद कर दफना दिया.

पुलिस को पंकज और सुरेंद्र द्वारा गढ़ी गई इस कहानी पर विश्वास नहीं हुआ. उधर आशीष का छोटा भाई आनंद ठाकुर पुलिस से कह रहा था कि उस के भाई की हत्या की गई है.

मामला संदेहपूर्ण होने के कारण पुलिस ने गोटेगांव के एसडीएम जी.सी. डहरिया को पूरे घटना क्रम की जानकारी दे कर दफन की गई लाश को निकालने की अनुमति ली.

उसी दिन गोटेगांव एसडीपीओ पी.एस. बालरे, फोरैंसिक टीम सहित दोनों आरोपियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. आरोपियों की निशानदेही पर कोरेगांव के नाले के पास खेत में बने एक गड्ढे से लाश निकाली गई.

आशीष के पिता ने लाश के हाथ पर बने टैटू को देखा तो वह फूटफूट कर रोने लगा. लाश के गले पर घाव और खून का निशान था. इस से स्पष्ट हो गया कि आशीष की मौत करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई थी. पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए जबलपुर मैडिकल कालेज भेज दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि आशीष की मौत बिजली के करंट से नहीं, बल्कि किसी धारदार हथियार से गले पर किए गए प्रहार से हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ कर पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि आशीष की हत्या पंकज और सुरेंद्र ने ही की है.

पुलिस ने दोनों आरोपियों से जब सख्ती से पूछताछ की तो पंकज जल्दी ही टूट गया. उस ने पुलिस के सामने आशीष की हत्या करने की बात कबूल ली. आशीष ठाकुर की हत्या के संबंध में उस ने पुलिस को जो कहानी बताई, वह अवैध संबध्ाोंं पर गढ़ी हुई निकली—

आदिवासी अंचल के छोटे से गांव कोरेगांव के साधारण किसान पुन्नूलाल का बड़ा बेटा आशीष और गांव के ही जगदीश ठाकुर के बेटे पंकज की आपस में गहरी दोस्ती थी. हमउम्र होने के कारण दोनों का दिनरात मिलनाजुलना बना रहता था. आशीष पंकज के घर आताजाता रहता था. पंकज ठाकुर की शादी हो गई थी और पंकज की पत्नी अनीता (परिवर्तित नाम) से भाभी होने के नाते आशीष हंसीमजाक किया करता था.

एक लड़की के जन्म के बाद भी अनीता का बदन गठीला और आकर्षक था. अनीता आशीष की शादी की बातों को ले कर उस से मजाक किया करती थी. 24 साल का आशीष उस समय कुंवारा था. वह अनीता की चुहल भरे हंसीमजाक का मतलब अच्छी तरह समझता था. देवरभाभी के बीच होने वाली इस मजाक का कभीकभार पंकज भी मजा ले लेता था.

दोस्तों के साथ मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो देख कर आशीष के मन में अनीता को ले कर वासना का तूफान उठने लगा था. इसी के चलते वह अनीता से दैहिक प्यार करने लगा. उसे सोतेजागते अनीता की ही सूरत नजर आने लगी थी.

पंकज का परिवार खेतीकिसानी का काम करता था. घर के सदस्य दिन में अकसर खेतों में काम करते थे. इसी का फायदा उठा कर आशीष पंकज की गैरमौजूदगी में अनीता से मिलने आने लगा.

करीब 2 साल पहले सर्दियों की एक दोपहर में आशीष पंकज के घर पहुंचा तो अनीता की 2 साल की बेटी सोई हुई थी और अनीता नहाने के बाद घर की बैठक पर कपड़े बदल रही थी.

अनीता के खुले हुए अंगों और उस की खूबसूरती को देखते ही आशीष के अंदर का शैतान जाग उठा. वह घर की बैठक के एक कोने में पड़ी चारपाई पर बैठ गया और अनीता से इधरउधर की बातें करने लगा.

बातचीत के दौरान जैसे ही अनीता उस के पास आई, उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और बोला, ‘‘भाभी, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.’’

आशीष के बंधन में जकड़ी अनीता ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘आशीष, छोड़ो, कोई देख लेगा.’’

इस पर आशीष ने उस के गालों को चूमते हुए कहा, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करता हूं तो डरना क्या.’’

अनीता कुछ शरमाई तो आशीष ने उसे अपने सीने से दबाते हुए अपने होंठे उस के होंठों पर रख दिए. देखते ही देखते आशीष के कृत्य की इस चिंगारी से उठी वासना की आग ने अनीता को भी अपने आगोश में ले लिया.

आपस की हंसीमजाक से शुरू हुआ प्यार का यह सफर वासना के खेल में बदल गया. अनीता अपना सब कुछ आशीष को सौंप चुकी थी. अब जब भी पंकज के घर के लोग काम के लिए निकल जाते, आशीष अनीता के पास पहुंच जाता और दोनों मिल कर अपनी हसरतें पूरी करते.

एक बार पंकज ने आशीष को अनीता के साथ ज्यादा नजदीकी से बात करते देख लिया, तब से उस के दिमाग में शक का कीड़ा बैठ गया. उस ने अनीता को आशीष से दूर रहने की हिदायत दे कर आशीष से इस बारे में बात की तो वह दोस्ती की दुहाई देते हुए बोला, ‘‘तुम्हें गलतफहमी हुई है, मैं तो भाभी को मां की तरह मानता हूं.’’

लेकिन प्यार के उन्मुक्त आकाश में उड़ने वाले इन पंछियों पर किसी की बंदिश और समझाइश का कोई असर नहीं पड़ा. आशीष और अनीता के प्यार का खेल बेरोकटोक चल रहा था. जब भी उन्हें मौका मिलता, दोनों अपनी जिस्मानी भूख मिटा लेते थे.

पंकज भी अब पत्नी अनीता पर नजर रखने लगा था. पंकज अकसर सुबह को खेतों में काम के लिए निकल जाता और शाम को ही वापस आता था. लेकिन एक दिन जब वह दोपहर में ही घर लौट आया तो अपने बिस्तर पर आशीष और अनीता को एकदूसरे के आगोश में देख लिया.

अपनी पत्नी को पराए मर्द की बांहों में देख कर उस का खून खौल उठा. आशीष तो जल्दीसे अपने कपड़े ठीक कर के वहां से चुपचाप निकल गया, मगर क्रोध की आग में जल रहे पंकज ने अपनी पत्नी अनीता की जम कर धुनाई कर दी.

पंकज ने बदनामी के डर से यह बात किसी को नहीं बताई. वह गुमसुम सा रहने लगा और आशीष से मिलनाजुलना भी कम कर दिया. अब उस ने गांव के एक अन्य युवक सुरेंद्र ठाकुर से दोस्ती कर ली. इसी दौरान आशीष की शादी भी हो गई और उस ने अनीता से मिलनाजुलना बंद कर दिया. लेकिन पंकज के दिल में बदले की आग अब भी जल रही थी.

उस की आंखों में आशीष और अनीता का आलिंगन वाला दृश्य घूमता रहता था. उस के मन में हर समय यही खयाल आता था कि कब उसे मौका मिले और वह आशीष का गला दबा दे.

पंकज सोचता था कि जिस दोस्त के लिए वह जान की बाजी लगाने को तैयार रहता, उसी दोस्त ने उस की थाली में छेद कर दिया.

6 दिसंबर के दिन योजना के मुताबिक सुरेंद्र ठाकुर आशीष को मछली मारने के लिए गांव के बाहर नाले पर ले गया. नाले के पास ही पंकज ठाकुर अपने खेतों पर उन दोनों का इंतजार कर रहा था.

उस ने आशीष और सुरेंद्र को नाले में मछती मारते हुए देखा तो वह खेत पर रखे चाकू को जेब में छिपा कर नाले के पास आ गया.

आशीष नाले के पानी में कांटा डाले मछली पकड़ने में तल्लीन था. तभी पंकज ने मौका पा कर आशीष के गले पर चाकू से धड़ाधड़ कई वार किए तो आशीष छटपटा कर जमीन पर गिर गया.

कुछ देर में उस ने दम तोड़ दिया. यह देख पंकज ने अपने खेतों से फावड़ा ला कर गड्ढा खोदा और सुरेंद्र की मदद से आशीष को दफना दिया. चाकू और फावड़े को इन लोगों ने खेत के पास झाडि़यों में छिपा दिया. फिर कपड़ों पर लगे खून के छींटों को नाले में धोया और दोनों अपनेअपने घर चले गए.

हत्या के बाद दोनों सोच रहे थे कि उन्हें किसी ने नहीं देखा. लेकिन आशीष के जीजा कृपाल ने सुरेंद्र और आशीष को नाले की तरफ जाते देख लिया था. इसी आधार पर घर वालों ने सुरेंद्र और पंकज पर संदेह होने की बात पुलिस को बताई थी. पंकज ने बिना सोचेसमझे बदले की आग में अपने दोस्त पंकज का कत्ल तो कर दिया, लेकिन कानून की पकड़ से नहीं बच सका.

पंकज और सुरेंद्र के इकबालिया बयान के आधार पर आशीष ठाकुर की हत्या के आरोप में गोटेगांव थाने में भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहम मामला कायम कर उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

जवानी के जोश में अपने दोस्त की पत्नी से अवैध संबंध बनाने वाले आशीष को अपनी जान गंवानी पड़ी तो पंकज ठाकुर और सुरेंद्र ठाकुर को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा. MP Crime

Call Girl Story: कॉलगर्ल – होटल में उस रात क्या हुआ

Call Girl Story: मैं दफ्तर के टूर पर मुंबई गया था. कंपनी का काम तो 2 दिन का ही था, पर मैं ने बौस से मुंबई में एक दिन की छुट्टी बिताने की इजाजत ले ली थी. तीसरे दिन शाम की फ्लाइट से मुझे कोलकाता लौटना था. कंपनी ने मेरे ठहरने के लिए एक चारसितारा होटल बुक कर दिया था. होटल काफी अच्छा था. मैं चैकइन कर 10वीं मंजिल पर अपने कमरे की ओर गया.

मेरा कमरा काफी बड़ा था. कमरे के दूसरे छोर पर शीशे के दरवाजे के उस पार लहरा रहा था अरब सागर.

थोड़ी देर बाद ही मैं होटल की लौबी में सोफे पर जा बैठा.

मैं ने वेटर से कौफी लाने को कहा और एक मैगजीन उठा कर उस के पन्ने यों ही तसवीरें देखने के लिए पलटने लगा. थोड़ी देर में कौफी आ गई, तो मैं ने चुसकी ली.

तभी एक खूबसूरत लड़की मेरे बगल में आ कर बैठी. वह अपनेआप से कुछ बके जा रही थी. उसे देख कर कोई भी कह सकता था कि वह गुस्से में थी.

मैं ने थोड़ी हिम्मत जुटा कर उस से पूछा, ‘‘कोई दिक्कत?’’

‘‘आप को इस से क्या लेनादेना? आप अपना काम कीजिए,’’ उस ने रूखा सा जवाब दिया.

कुछ देर में उस का बड़बड़ाना बंद हो गया था. थोड़ी देर बाद मैं ने ही दोबारा कहा, ‘‘बगल में मैं कौफी पी रहा हूं और तुम ऐसे ही उदास बैठी हो, अच्छा नहीं लग रहा है. पर मैं ने ‘तुम’ कहा, तुम्हें बुरा लगा हो, तो माफ करना.’’

‘‘नहीं, मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा. माफी तो मुझे मांगनी चाहिए, मैं थोड़ा ज्यादा बोल गई आप से.’’

इस बार उस की बोली में थोड़ा अदब लगा, तो मैं ने कहा, ‘‘इस का मतलब कौफी पीने में तुम मेरा साथ दोगी.’’

और उस के कुछ बोलने के पहले ही मैं ने वेटर को इशारा कर के उस के लिए भी कौफी लाने को कहा. वह मेरी ओर देख कर मुसकराई.

मुझे लगा कि मुझे शुक्रिया करने का उस का यही अंदाज था. वेटर उस के सामने कौफी रख कर चला गया. उस ने कौफी पीना भी शुरू कर दिया था.

लड़की बोली, ‘‘कौफी अच्छी है.’’

उस ने जल्दी से कप खाली करते हुए कहा, ‘‘मुझे चाय या कौफी गरम ही अच्छी लगती है.’’

मैं भी अपनी कौफी खत्म कर चुका था. मैं ने पूछा, ‘‘किसी का इंतजार कर रही हो?’’

उस ने कहा, ‘‘हां भी, न भी. बस समझ लीजिए कि आप ही का इंतजार है,’’ और बोल कर वह हंस पड़ी.

मैं उस के जवाब पर थोड़ा चौंक गया. उसी समय वेटर कप लेने आया, तो मुसकरा कर कुछ इशारा किया, जो मैं नहीं समझ पाया था.

मैं ने लड़की से कहा, ‘‘तुम्हारा मतलब मैं कुछ समझा नहीं.’’

‘‘सबकुछ यहीं जान लेंगे. क्यों न आराम से चल कर बातें करें,’’ बोल कर वह खड़ी हो गई.

फिर जब हम लिफ्ट में थे, तब मैं ने फिर पूछा, ‘‘तुम गुस्से में क्यों थीं?’’

‘‘पहले रूम में चलें, फिर बातें होंगी.’’

हम दोनों कमरे में आ गए थे. वह अपना बैग और मोबाइल फोन टेबल पर रख कर सोफे पर आराम से बैठ गई.

मैं ने फिर उस से पूछा कि शुरू में वह गुस्से में क्यों थी, तो जवाब मिला, ‘‘इसी फ्लोर पर दूसरे छोर के रूम में एक बूढ़े ने मूड खराब कर दिया.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘बूढ़ा 50 के ऊपर का होगा. मुझ से अननैचुरल डिमांड कर रहा था. उस ने कहा कि इस के लिए मुझे ऐक्स्ट्रा पैसे देगा. यह मेरे लिए नामुमकिन बात थी और मैं ने उस के पैसे भी फेंक दिए.’’

मुझे तो उस की बातें सुन कर एक जोर का झटका लगा और मुझे लौबी में वेटर का इशारा समझ में आने लगा था.

फिर भी उस से नाम पूछा, तो वह उलटे मुझ से ही पूछ बैठी, ‘‘आप मुंबई के तो नहीं लगते. आप यहां किसलिए आए हैं और मुझ से क्या चाहते हैं?’’

‘‘मैं तो बस टाइम पास करना चाहता हूं. कंपनी के काम से आया था. वह पूरा हो गया. अब जो मरजी वह करूं. मुझे कल शाम की फ्लाइट से लौटना है. पर अपना नाम तो बताओ?’’

‘‘मुझे कालगर्ल कहते हैं.’’

‘‘वह तो मैं समझ सकता हूं, फिर भी तुम्हारा नाम तो होगा. हर बार कालगर्ल कह कर तो नहीं पुकार सकता. लड़की दिलचस्प लगती हो. जी चाहता है कि तुम से ढेर सारी बातें करूं… रातभर.’’

‘‘आप मुझे प्रिया नाम से पुकार सकते हैं, पर आप रातभर बातें करें या जो भी, रेट तो वही होगा. पर बूढ़े वाली बात नहीं, पहले ही बोल देती हूं,’’ लड़की बोली.

मैं भी अब उसे समझने लगा था. मुझे तो सिर्फ टाइम पास करना था और थोड़ा ऐसी लड़कियों के बारे में जानने की जिज्ञासा थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘कुछ कोल्डड्रिंक वगैरह मंगाऊं?’’

‘‘मंगा लो,’’ प्रिया बोली, ‘‘हां, कुछ सींक कबाब भी चलेगा. तब तक मैं नहा लेती हूं.’’

‘‘बाथरूम में गाउन भी है. यह तो और अच्छी बात है, क्योंकि हमाम से निकल कर लड़कियां अच्छी लगती हैं.’’

‘‘क्यों, अभी अच्छी नहीं लग रही क्या?’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘नहीं, वह बात नहीं है. नहाने के बाद और अच्छी लगोगी.’’

मैं ने रूम बौय को बुला कर कबाब लाने को कहा. प्रिया बाथरूम में थी.

थोड़ी देर बाद ही रूम बौय कबाब ले कर आ गया था. मैं ने 2 लोगों के लिए डिनर भी और्डर कर दिया.

इस के बाद मैं न्यूज देखने लगा, तभी बाथरूम से प्रिया निकली. दूधिया सफेद गाउन में वह सच में और अच्छी दिख रही थी. गाउन तो थोड़ा छोटा था ही, साथ में प्रिया ने उसे कुछ इस तरह ढीला बांधा था कि उस के उभार दिख रहे थे.

प्रिया सोफे पर आ कर बैठ गई.

‘‘मैं ने कहा था न कि तुम नहाने के बाद और भी खूबसूरत लगोगी.’’

प्रिया और मैं ने कोल्डड्रिंक ली और बीचबीच में हम कबाब भी ले रहे थे.

मैं ने कहा, ‘‘कबाब है और शबाब है, तो समां भी लाजवाब है.’’

‘‘अगर आप की पत्नी को पता चले कि यहां क्या समां है, तो फिर क्या होगा?’’

‘‘सवाल तो डरावना है, पर इस के लिए मुझे काफी सफर तय करना होगा. हो सकता है ताउम्र.’’

‘‘कल शाम की फ्लाइट से आप जा ही रहे हैं. मैं जानना चाहती हूं कि आखिर मर्दों के ऐसे चलन पर पत्नी की सोच क्या होती है.’’

‘‘पर, मेरे साथ ऐसी नौबत नहीं आएगी.’’

‘‘क्यों?’’

मैं ने कहा, ‘‘क्योंकि मैं अपनी पत्नी को खो चुका हूं. 27 साल का था, जब मेरी शादी हुई थी और 5 साल बाद ही उस की मौत हो गई थी, पीलिया के कारण. उस को गए 2 साल हो गए हैं.’’

‘‘ओह, सो सौरी,’’ बोल कर अपनी प्लेट छोड़ कर वह मेरे ठीक सामने आ कर खड़ी हो गई थी और आगे कहा, ‘‘तब तो मुझे आप का मूड ठीक करना ही होगा.’’

प्रिया ने अपने गाउन की डोरी की गांठ जैसे ही ढीला भर किया था कि जो कुछ मेरी आंखों के सामने था, देख कर मेरा मन कुछ पल के लिए बहुत विचलित हो गया था.

मैं ने इस पल की कल्पना नहीं की थी, न ही मैं ऐसे हालात के लिए तैयार था. फिर भी अपनेआप पर काबू रखा.

तभी डोर बैल बजी, तो प्रिया ने अपने को कंबल से ढक लिया था. डिनर आ गया था. रूम बौय डिनर टेबल पर रख कर चला गया.

प्रिया ने कंबल हटाया, तो गाउन का अगला हिस्सा वैसे ही खुला था.

प्रिया ने कहा, ‘‘टेबल पर मेरे बैग में कुछ सामान पड़े हैं, आप को यहीं से दिखता होगा. आप जब चाहें इस का इस्तेमाल कर सकते हैं. आप का मूड भी तरोताजा हो जाएगा और आप के मन को शायद इस से थोड़ी राहत मिले.’’

‘‘जल्दी क्या है. सारी रात पड़ी है. हां, अगर कल दोपहर तक फ्री हो तो और अच्छा रहेगा.’’

इतना कह कर मैं भी खड़ा हो कर उस के गाउन की डोर बांधने लगा, तो वह बोली, ‘‘मेरा क्या, मुझे पैसे मिल गए. आप पहले आदमी हैं, जो शबाब को ठुकरा रहे हैं. वैसे, आप ने दोबारा शादी की? और आप का कोई बच्चा?’’

वह बहुत पर्सनल हो चली थी, पर मुझे बुरा नहीं लगा था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘डिनर लोगी?’’

‘‘क्या अभी थोड़ा रुक सकते हैं? तब तक कुछ बातें करते हैं.’’

‘‘ओके. अब पहले तुम बताओ. तुम्हारी उम्र क्या है? और तुम यह सब क्यों करती हो?’’

‘‘पहली बात, लड़कियों से कभी उम्र नहीं पूछते हैं…’’

मैं थोड़ा हंस पड़ा, तभी उस ने कहना शुरू किया, ‘‘ठीक है, आप को मैं अपनी सही उम्र बता ही देती हूं. अभी मैं 21 साल की हूं. मैं सच बता रही हूं.’’

‘‘और कुछ लोगी?’’

‘‘अभी और नहीं. आप के दूसरे सवाल का जवाब थोड़ा लंबा होगा. वह भी बता दूंगी, पर पहले आप बताएं कि आप ने फिर शादी की? आप की उम्र भी ज्यादा नहीं लगती है.’’

मैं ने उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया और कहा, ‘‘मैं अभी 34 साल का हूं. मेरा कोई बच्चा नहीं है. डाक्टरों ने सारे टैस्ट ले कर के बता दिया है कि मुझ में पिता बनने की ताकत ही नहीं है. अब दूसरी शादी कर के मैं किसी औरत को मां बनने के सुख के लिए तरसता नहीं छोड़ सकता.’’

इस बार प्रिया मुझ से गले मिली और कहा, ‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ.’’

मैं ने उस की पीठ थपथपाई और कहा, ‘‘दुनिया में सब को सबकुछ नहीं मिलता. पर कोई बात नहीं, दफ्तर के बाद मैं कुछ समय एक एनजीओ को देता हूं. मन को थोड़ी शांति मिलती है. चलो, डिनर लेते हैं.’’

डिनर के बाद मुझे आराम करने का मन किया, तो मैं बैड पर लेट गया. प्रिया भी मेरे साथ ही बैड पर आ कर कंबल लपेट कर बैठ गई थी. वह मेरे बालों को सहलाने लगी.

‘‘तुम यह सब क्यों करती हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई अपनी मरजी से यह सब नहीं करता. कोई न कोई मजबूरी या वजह इस के पीछे होती है. मेरे पापा एक प्राइवेट मिल में काम करते थे. एक एक्सीडैंट में उन का दायां हाथ कट गया था. कंपनी ने कुछ मुआवजा दे कर उन की छुट्टी कर दी. मां भी कुछ पढ़ीलिखी नहीं थीं. मैं और मेरी छोटी बहन स्कूल जाते थे.

‘‘मां 3-4 घरों में खाना बना कर कुछ कमा लेती थीं. किसी तरह गुजर हो जाती थी, पर पापा को घर बैठे शराब पीने की आदत पड़ गई थी. जमा पैसे खत्म हो चले थे…’’ इसी बीच रूम बौय डिनर के बरतन लेने आया और दिनभर के बिल के साथसाथ रूम के बिलों पर भी साइन करा कर ले गया.

प्रिया ने आगे कहा, ‘‘शराब के कारण मेरे पापा का लिवर खराब हुआ और वे चल बसे. मेरी मां की मौत भी एक साल के अंदर हो गई. मैं उस समय 10वीं जमात पास कर चुकी थी. छोटी बहन तब छठी जमात में थी. पर मैं ने पढ़ाई के साथसाथ ब्यूटीशियन का भी कोर्स कर लिया था.

‘‘हम एक छोटी चाल में रहते थे. मेरे एक रिश्तेदार ने ही मुझे ब्यूटीपार्लर में नौकरी लगवा दी और शाम को एक घर में, जहां मां काम करती थी, खाना बनाती थी. पर उस पार्लर में मसाज के नाम पर जिस्मफरोशी भी होती थी. मैं भी उस की शिकार हुई और इस दुनिया में मैं ने पहला कदम रखा था,’’ बोलतेबोलते प्रिया की आंखों से आंसू बहने लगे थे.

मैं ने टिशू पेपर से उस के आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘सौरी, मैं ने तुम्हारी दुखती रगों को बेमतलब ही छेड़ दिया.’’

‘‘नहीं, आप ने मुझे कोई दुख नहीं पहुंचाया है. आंसू निकलने से कुछ दिल का दर्द कम हो गया,’’ बोल कर प्रिया ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘पर, यह सब मैं अपनी छोटी बहन को सैटल करने के लिए कर रही हूं. वह भी 10वीं जमात पास कर चुकी है और सिलाईकढ़ाई की ट्रेनिंग भी पूरी कर ली है. अभी तो एक बिजली से चलने वाली सिलाई मशीन दे रखी है. घर बैठेबैठे कुछ पैसे वह भी कमा लेती है.

‘‘मैं ने एक लेडीज टेलर की दुकान देखी है, पर सेठ बहुत पगड़ी मांग रहा है. उसी की जुगाड़ में लगी हूं. यह काम हो जाए, तो दोनों बहनें उसी बिजनेस में रहेंगी…’’ फिर एक अंगड़ाई ले कर उस ने कहा, ‘‘मैं आप को बोर कर रही हूं न? आप ने तो मुझे छुआ भी नहीं. आप को मुझ से कुछ चाहिए तो कहें.’’

मैं ने कहा, ‘‘अभी सारी रात पड़ी है, मुझे अभी कोई जल्दी नहीं. जब कोई जरूरत होगी कहूंगा. पर पार्लर से होटल तक तुम कैसे पहुंचीं?’’

‘‘पार्लर वाले ने ही कहा था कि मैं औरों से थोड़ी अच्छी और स्मार्ट हूं, थोड़ी अंगरेजी भी बोल लेती हूं. उसी ने कहा था कि यहां ज्यादा पैसा कमा सकती हो. और पार्लरों में पुलिस की रेड का डर बना रहता है. फिर मैं होटलों में जाने लगी.’’

इस के बाद प्रिया ने ढेर सारी बातें बताईं. होटलों की रंगीन रातों के बारे में कुछ बातें तो मैं ने पहले भी सुनी थीं, पर एक जीतेजागते इनसान, जो खुद ऐसी जिंदगी जी रहा है, के मुंह से सुन कर कुछ अजीब सा लग रहा था.

इसी तरह की बातों में ही आधी रात बीत गई, तब प्रिया ने कहा, ‘‘मुझे अब जोरों की नींद आ रही है. आप को कुछ करना हो…’’

प्रिया अभी तक गाउन में ही थी. मैं ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, ‘‘तुम दूसरे बैड पर जा कर आराम करो. और हां, बाथरूम में जा कर पहले अपने कपड़े पहन लो. बाकी बातें जब तुम्हारी नींद खुले तब. तुम कल दिन में क्या कर रही हो?’’

‘‘मुझ से कोई गुस्ताखी तो नहीं हुई. सर, आप ने मुझ पर इतना पैसा खर्च किया और…’’

‘‘नहींनहीं, मैं तो तुम से बहुत खुश हूं. अब जाओ अपने कपड़े बदल लो.’’

मैं ने देखा कि जिस लड़की में मेरे सामने बिना कुछ कहे गाउन खोलने में जरा भी संकोच नहीं था, वही अब कपड़े पहनने के लिए शर्मसार हो रही थी.

प्रिया ने गाउन के ऊपर चादर में अपने पूरे शरीर को इतनी सावधानी से लपेटा कि उस का शरीर पूरी तरह ढक गया था और वह बाथरूम में कपड़े पहनने चली गई.

थोड़ी देर बाद वह कपड़े बदल कर आई और मेरे माथे पर किस कर ‘गुडनाइट’ कह कर अपने बैड पर जा कर सो गई.

सुबह जब तक मेरी नींद खुली, प्रिया फ्रैश हो कर सोफे पर बैठी अखबार पढ़ रही थी.

मुझे देखा, तो ‘गुड मौर्निंग’ कह कर बोली, ‘‘सर, आप फ्रैश हो जाएं या पहले चाय लाऊं?’’

‘‘हां, पहले चाय ही बना दो, मुझे बैड टी की आदत है. और क्या तुम शाम 5 बजे तक फ्री हो? तुम्हें इस के लिए मैं ऐक्स्ट्रा पैसे दूंगा.’’

‘‘सर, मुझे आप और ज्यादा शर्मिंदा न करें. मैं फ्री नहीं भी हुई तो भी पहले आप का साथ दूंगी. बस, मैं अपनी बहन को फोन कर के बता देती हूं कि मैं दिन में नहीं आ सकती.’’

प्रिया ने अपनी बहन को फोन किया और मैं बाथरूम में चला गया. जातेजाते प्रिया को बोल दिया कि फोन कर के नाश्ता भी रूम में ही मंगा ले.

नाश्ता करने के बाद मैं ने प्रिया से कहा, ‘‘मैं ने ऐलीफैंटा की गुफाएं नहीं देखी हैं. क्या तुम मेरा साथ दोगी?’’

‘‘बेशक दूंगी.’’

थोड़ी देर में हम ऐलीफैंटा में थे. वहां तकरीबन 2 घंटे हम साथ रहे थे. मैं ने उसे अपना कार्ड दिया और कहा, ‘‘तुम मुझ से संपर्क में रहना. मैं जिस एनजीओ से जुड़ा हूं, उस से तुम्हारी मदद के लिए कोशिश करूंगा. यह संस्था तुम जैसी लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होने में जरूर मदद करेगी.

‘‘मैं तो कोलकाता में हूं, पर हमारी ब्रांच का हैडक्वार्टर यहां पर है. थोड़ा समय लग सकता है, पर कुछ न कुछ अच्छा ही होगा.’’

प्रिया ने भरे गले से कहा, ‘‘मेरे पास आप को धन्यवाद देने के सिवा कुछ नहीं है. इसी दुनिया में रात वाले बूढ़े की तरह दोपाया जानवर भी हैं और आप जैसे दयावान भी.’’

प्रिया ने भी अपना कार्ड मुझे दिया. हम दोनों लौट कर होटल आए. मैं ने रूम में ही दोनों का लंच मंगा लिया. लंच के बाद मैं ने होटल से चैकआउट कर एयरपोर्ट के लिए टैक्सी बुलाई.

सामान डिक्की में रखा जा चुका था. जब मैं चलने लगा, तो उस की ओर देख कर बोला, ‘‘प्रिया, मुझे तुम्हें और पैसे देने हैं.’’

मैं पर्स से पैसे निकाल रहा था कि इसी बीच टैक्सी का दूसरा दरवाजा खोल कर वह मुझ से पहले जा बैठी और कहा, ‘‘थोड़ी दूर तक मुझे लिफ्ट नहीं देंगे?’’

‘‘क्यों नहीं. चलो, कहां जाओगी?’’

‘‘एयरपोर्ट.’’

मैं ने चौंक कर पूछा, ‘‘एयरपोर्ट?’’

‘‘क्यों, क्या मैं एयर ट्रैवल नहीं कर सकती? और आगे से आप मुझे मेरे असली नाम से पुकारेंगे. मैं पायल हूं.’’

और कुछ देर बाद हम एयरपोर्ट पर थे. अभी फ्लाइट में कुछ वक्त था. उस से पूछा, ‘‘तुम्हें कहां जाना है?’’

‘‘बस यहीं तक आप को छोड़ने आई हूं,’’ पायल ने मुसकरा कर कहा.

मैं ने उसे और पैसे दिए, तो वह रोतेरोते बोली, ‘‘मैं तो आप के कुछ काम न आ सकी. यह पैसे आप रख लें.’’

‘‘पायल, तुम ने मुझे बहुत खुशी दी है. सब का भला तो मेरे बस की बात नहीं है. अगर मैं एनजीओ की मदद से तुम्हारे कुछ काम आऊं, तो वह खुशी शानदार होगी. ये पैसे तुम मेरा आशीर्वाद समझ कर रख लो.’’

और मैं एयरपोर्ट के अंदर जाने लगा, तो उस ने झुक कर मेरे पैरों को छुआ. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, जिन की 2 बूंदें मेरे पैरों पर भी गिरीं.

मैं कोलकाता पहुंच कर मुंबई और कोलकाता दोनों जगह के एनजीओ से लगातार पायल के लिए कोशिश करता रहा. बीचबीच में पायल से भी बात होती थी. तकरीबन 6 महीने बाद मुझे पता चला कि एनजीओ से पायल को कुछ पैसे ग्रांट हुए हैं और कुछ उन्होंने बैंक से कम ब्याज पर कर्ज दिलवाया है.

एक दिन पायल का फोन आया. वह भर्राई आवाज में बोली, ‘सर, आप के पैर फिर छूने का जी कर रहा है. परसों मेरी दुकान का उद्घाटन है. यह सब आप की वजह से हुआ है. आप आते तो दोनों बहनों को आप के पैर छूने का एक और मौका मिलता.’

‘‘इस बार तो मैं नहीं आ सकता, पर अगली बार जरूर मुंबई आऊंगा, तो सब से पहले तुम दोनों बहनों से मिलूंगा.’’

आज मुझे पायल से बात कर के बेशुमार खुशी का एहसास हो रहा है और मन थोड़ा संतुष्ट लग रहा है.

Hindi stories: मैं कहा आ गई

Hindi stories: नरगिस जो सोच कर दिलशाद बेगम का कोठा छोड़ कर भागी थी, जब उसे वैसा ही माहौल भाई के घर में भी मिला तो उसे लगा, इस से अच्छा तो दिलशाद बेगम का कोठा ही था. अंतर सिर्फ इतना है कि यहां डांस को आर्ट कहा जाता है और वहां मुजरा.

सिसिगरेट का लंबा कश खींच कर गुलजार खां बोला, ‘‘दिलशाद बेगम, मैं तुम से फिर कह रहा हूं, शरीफों का खून बड़ा बेएतबार होता है. किसी दिन खट्टा खाओगी. मेरी मेहनत बेकार जाएगी.’’

‘‘गुलजार खां, उसे पढ़ने का शौक था, मैं ने पढ़ने बैठा दिया. बस, इतनी सी बात है. आंखें दिखाते ही सिर से पांव तक कांप जाती है.’’

‘‘मगर तुम यह क्यों भूल जाती हो कि पढ़नेलिखने से अच्छाईबुराई में तमीज करना आ जाता है. जिस दिन ऐसा हो गया, समझो, गई हाथ से.’’

‘‘समझ में नहीं आता, तुम्हारी इस बात पर हंसूं या कहकहे लगाऊं. जितने तमाशाई हमारे यहां आते हैं, माशाअल्लाह सब पढ़ेलिखे होते हैं. अच्छे खानदानों से भी होते होंगे, लेकिन सफेद कपड़े पहन कर कीचड़ में आ जाते हैं. नरगिस कीचड़ में कमल सी है.’’

‘‘तमाशा देखना अलग बात है, तमाशा बनना अलग. वे सब तमाशा देखने आते हैं, तमाशा बनने नहीं. नरगिस की बात और है.’’

‘‘पैदा किए की तो खैर मोहब्बत होती ही है, मगर पालने की मोहब्बत भी कम नहीं होती. 4 साल की उम्र से पाला है उसे.’’

‘‘बेचारी तुम्हीं को अपनी मां समझती है,’’ गुलजार खां ने दांत निकालते हुए कहा. फिर एकदम संजीदा हो गया, ‘‘अच्छा, यह बताओ, तुम से उस ने कभी अपने बाप का नाम पूछा है?’’

‘‘हां, बचपन में पूछती थी, मगर अब शायद समझ गई है कि इस बाजार में बाप नहीं, सिर्फ मां होती हैं.’’

‘‘अगर उसे मालूम हो जाए कि उस का कोई बाप भी है और तुम उस की मां नहीं हो तो सोचो, क्या होगा?’’

‘‘यह तो मैं बाद में सोचूंगी, पहले तुम यह बताओ कि तुम्हें आज हुआ क्या है?’’

‘‘हुआ यह है कि मुझे 20 हजार रुपए की जरूरत है.’’

‘‘मैं तुम्हें नरगिस की कीमत से बहुत ज्यादा दे चुकी हूं.’’

‘‘वह तो मुझे मिल चुकी है. अब मैं इस राज को छिपाने के लिए थोड़े से पैसे मांग रहा हूं. तुम्हें नहीं मालूम, किसी राज को छिपाना कितना मुश्किल होता है.’’

‘‘अब तुम्हें देने के लिए मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है,’’ दिलशाद बेगम गुर्राई, ‘‘और हां, इस घमंड में मत रहना कि तुम नरगिस को मेरे खिलाफ भड़का दोगे. मैं ने कच्ची गोलियां नहीं खेलीं. मैं तुम्हारी तरफ से उस के दिल में इतना जहर भर चुकी हूं कि अब वह तुम्हारी सूरत से भी नफरत करती है.’’

‘‘सोच लो, दिलशाद बेगम.’’

‘‘सोच लिया. यह कोठा यूं ही नहीं चला रही हूं.’’

दिलशाद बेगम के लहजे में इतना विश्वास था कि गुलजार खां खुशामद पर उतर आया, ‘‘दिलशाद बेगम, मैं ने तुम्हारी कितनी खिदमत की है और तुम हो कि मामूली सी रकम के लिए इनकार कर रही हो.’’

‘‘इनकार नहीं कर रही, तुम्हारी धमकियों का जवाब दे रही हूं.’’

‘‘धमकियां कैसी? मैं तो मजाक कर रहा था. लाओ, जल्दी से रकम निकालो.’’

‘‘एक शर्त पर. आइंदा तुम मेरे पास रकम लेने नहीं आओगे.’’

‘‘मंजूर है.’’

‘‘तुम बैठो, मैं अभी आई.’’ कह कर दिलशाद बेगम अपने कमरे में चली गईं.

आगे क्या होता है, यह देखने या सुनने की नरगिस को जरूरत नहीं थी. वह उलटे कदमों वापस हुई और घर से बाहर निकल गई. उस की हालत उस परिंदे की तरह थी, जिस के पर काट कर तेज हवा में उसे छोड़ दिया गया हो. उस ने ये बातें इत्तिफाक से सुन तो ली थीं, लेकिन उसे यह मालूम नहीं था कि सच्चाई का रहस्योद्घाटन कितना कष्टदायक होता है. कल तक वह कितनी मजबूत थी. आज रेत की दीवार की तरह बैठी जा रही थी. अगर गुलजार खां उस से यह बात कहता तो शायद वह कभी यकीन न करती. लेकिन दिलशाद बेगम, जिसे अब तक वह अपनी मां समझती रही थी, उस ने खुद कबूल किया था कि वह उस की मां नहीं है.

नरगिस इस बाजार की गंदगी को कबूल कर चुकी थी. वह यहां पैदा हुई है तो यहीं के आदाब उस पर सजेंगे. उसे कभी भूले से अपने बाप का खयाल आया भी था तो वह यह सोच कर हंस दी थी कि इस बाजार में किसे यह नेमत मिलती है, जो उसे मिलेगी. लेकिन जैसे ही उस पर राज खुला कि वह किसी की अमानत है, उसे खयानत के अहसास ने बेचैन कर दिया. वह अब तक अपने बाप का नाम डुबोती रही है. लेकिन कौन बाप? गुलजार खां ने यह तो बताया ही नहीं. कहीं वह जल्दी तो वहां से नहीं हट गईं? शायद उस ने बाद में नाम भी बताया हो.

गली में उस वक्त सन्नाटा था. इक्कादुक्का लोग चलफिर रहे थे. इन गलियों में तो रातें जागती हैं, दिन सोते हैं. उस वक्त भी दरोदीवार ऊंघ रहे थे. अगर सुगरा उसे बुला कर न ले गई होती तो वह भी इस वक्त सो रही होती. सुगरा उस के पड़ोस में रहती थी और नरगिस की तरह वह भी तालीम की मंजिल से गुजर रही थी. सुगरा और वह एक ही उस्ताद से नाच की तालीम हासिल कर रही थीं.

नरगिस इन्हीं खयालों में गुम थी कि उसे गुलजार खां आता दिखाई दिया.

‘‘गुलजार खां.’’ नरगिस ने उसे हौले से पुकारा.

‘‘हूं, क्या है?’’

‘‘तुम कल मुझ से मिल सकते हो?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बस, ऐसे ही.’’ नरगिस ने इठलाते हुए कहा.

‘‘मैं आज ही एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर जा रहा हूं.’’

‘‘मेरी खातिर एक दिन के लिए रुक नहीं सकते?’’ नरगिस फिर इठलाई.

नरगिस ने उस से कभी सीधे मुंह बात नहीं की थी. उस ने अदाएं दिखाईं तो गुलजार खां के मुंह में पानी आ गया, ‘‘चल, तू कहती है तो रुक जाता हूं, लेकिन बात क्या है?’’

‘‘कल ही बताऊंगी.’’ नरगिस ने कहा और भागती हुई घर में चली गई.

नरगिस घर में दाखिल हुई तो दिलशाद बेगम उस के इंतजार में थी. दिलशाद बेगम उसे देखते ही गुर्राई, ‘‘कहां थीं तुम?’’

नरगिस का जी चाहा कि उस से भी ज्यादा जोर से चीख कर कहे, ‘तुम यह पूछने वाली कोन होती हो?’ लेकिन अभी इस का वक्त नहीं आया था. इसलिए बोली, ‘‘जरा देर के लिए सुगरा के पास गई थी.’’

‘‘खबरदार, जो कल से तू ने एक कदम भी बाहर निकाला.’’

‘‘अच्छा अम्मां.’’

‘‘और यह भी सुन लो. बहुत पढ़ चुकी. मैं कल मास्टर साहब को मना कर दूंगी. सिर्फ उस्तादजी आएंगे. हमारा रिश्ता किताबों से नहीं, घुंघरुओं से है. उसी में मन लगाओ.’’

नरगिस ने यह भी नहीं पूछा कि यह जुल्म क्यों कर रही हो? उस ने किसी प्रतिक्रिया का इजहार किए बगैर सिर झुका कर अपने कमरे का रास्ता लिया. अब उसे यह सोचना था कि वह हालात से समझौता कर ले या उस माहौल से बगावत कर के यहां से निकल जाए, लेकिन यहां से निकल कर कहां जाए? इस का फैसला गुलजार खां से मुलाकात के बाद ही किया जा सकता था. रात को नरगिस सोने के लिए लेटी तो नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. जिस बिस्तर पर वह शौक से लेटती थी, आज गंदगी का अहसास हो रहा था. उसे अपनेआप से घिन आ रही थी. सोचतेसोचते जैसे किसी ने उस के जेहन में कोई झरोखा खोल दिया.

उस ने उस झरोखे से बाहर झांक कर देखा. शादी का घर था, मेहमानों से भरा हुआ शोर था. 4 साल की एक बच्ची सुर्ख रंग के कपड़े पहने, तितली की तरह इधर से उधर घूमती फिर रही थी. फिर उस के जी में न जाने क्या आया कि अकेली घर से बाहर आ गई. सामने गुब्बारे वाला खड़ा था. वह उस के करीब जा कर खड़ी हो गई और हसरतभरी नजरों से गुब्बारों की तरफ देखने लगी.

‘‘गुब्बारा लोगी?’’ एक आदमी ने उस के करीब आ कर बड़े प्यार से पूछा.

‘‘पैसे नहीं हैं.’’ वह बोली.

‘‘पैसे मैं दिए देता हूं.’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘नहीं, अम्मा कहती हैं, किसी से पैसे नहीं लेते.’’

‘‘गैरों के लिए कहा होगा, मैं तो चचा हूं तुम्हारा.’’

बच्ची राजी हो गई. गुब्बारे वाला इतनी देर में आगे बढ़ चुका था. वह उस की उंगली थामे आगे बढ़ती रही. फिर क्या हुआ था? नरगिस ने याददाश्त के झरोखे में झांक कर देखा, दूर तक अंधेरा फैला हुआ था. रेल की सीटी की आवाज आई. वह रो रही थी. फिर चुप हो कर सो गई. अम्मा का चेहरा तो कुछकुछ याद भी था, अब्बा तो बिलकुल याद नहीं थे.

नरगिस को ताज्जुब हो रहा था कि अब तक उसे ये बातें क्यों याद नहीं आई थीं. खयाल तक नहीं आया था इन बातों का. गुलजार खां, तू ने यह क्या कर दिया? ऐसी बातें मेरे कानों में क्यों डाल दीं? मैं गफलत की नींद सो रही थी, तू ने मुझे क्यों जगा दिया? क्या मैं अब जिंदगीभर सो सकूंगी? जो बिछड़ गए, जिंदा भी होंगे? जिंदा हुए भी तो मुझे मिलेंगे कैसे?

दिन निकल गया. नरगिस सोई कब थी कि जागती. उस ने अपने मंसूबे के मुताबिक जरूरी तैयारी की और गुलजार खां का इंतजार करने लगी. दोपहर के करीब जब दिलशाद बेगम अपने कमरे में सो रही थी, गुलजार खां आ गया. वह उस वक्त आया ही इसलिए था कि दिलशाद बेगम सो रही होगी.

‘‘गुलजार खां, तुम अम्मा से पैसे मांग रहे थे?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘हां, मांगे तो थे, लेकिन तुम्हें कैसे मालूम हुआ?’’

‘‘किसी ने भी बताया हो, मगर यह बात सही तो है न?’’

‘‘कह तो रहा हूं सही है.’’

‘‘क्या जरूरत आ पड़ी?’’

‘‘मेरी बेटी की शादी है. उस की मां को मैं तलाक दे चुका हूं. बेटी से भी नहीं मिलता, लेकिन है तो मेरा खून. उस की शादी का सुना तो मैं ने सोचा, कोई जेवर बनवा दूं,. कुछ हक मेरा भी तो है.’’

‘‘क्या तुम अपनी बेटी से बहुत मोहब्बत करते हो?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘मोहब्बत तो मुझे मालूम नहीं, किस बला का नाम है, लेकिन उस की शादी का सुना तो दिल चाहा कि मैं भी उस के लिए कुछ करूं.’’

‘‘जिसे खुश करने के लिए अपना सब कुछ कुरबान करने को जी चाहे, वही महबूब होता है. इसी जज्बे का नाम मोहब्बत है.’’

‘‘होगा, मुझे क्या?’’ गुलजार खां लापरवाही से बोला.

‘‘तुम अपनी बेटी से मिलते तो हो नहीं, बरसों से तुम ने उसे देखा भी नहीं होगा?’’

‘‘मिलने या न मिलने से क्या होता है. बेटी तो है वह मेरी.’’

‘‘वह भी तुम से मोहब्बत करती होगी?’’

‘‘क्यों नहीं करती होगी?’’

‘‘फिर तुम से मिलने क्यों नहीं आती?’’

‘‘अपनी मां के डर से. उस की मां बड़ी जालिम है.’’

‘‘मैं भी अपनी मां के डर से अपने बाप से नहीं मिलती.’’

‘‘कौन सी मां?’’ गुलजार खां अनजाने तौर पर पूछ बैठा.

‘‘दिलशाद बेगम और कौन?’’ नरगिस ने इत्मीनान से जवाब दिया.

‘‘हां, मगर बाप… बाप कौन है तुम्हारा?’’

‘‘यही पूछने के लिए तो मैं ने तुम्हें बुलाया है.’’

‘‘दिमाग खराब है क्या?’’ गुलजार खां ने झुंझला कर कहा, ‘‘मैं क्या ठेकेदार हूं तुम्हारे बाप का, और यह ठेकेदारी कबूल कर भी ली तो इस बाजार में किसकिस के बाप को तलाश करता फिरूंगा?’’

‘‘अगर नहीं मालूम तो छोड़ो.’’ कह कर नरगिस अपनी जगह से उठी और जेवर का डिब्बा ला कर गुलजार खां के सामने रख कर बोली, ‘‘ये कुछ जेवर हैं.’’

‘‘वह तो मैं भी देख रहा हूं, मगर तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘गुलजार खां, तुम ये जेवर अपनी बेटी को दे दो.’’

‘‘ये…ये… सब मेरा मतलब है, ये सब ले लूं?’’ गुलजार खां ने बेसब्री से जेवर की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘‘नहीं, ऐसे नहीं.’’

‘‘फिर कैसे?’’

‘‘मुझे जिस घर से उठाया था, उस घर की निशानदेही कर दो. मेरा बाप भी तो मेरी शादी के लिए पैसे जमा करता फिर रहा होगा. उस की मेहनत ठिकाने लगा दो…’’

‘‘मेरा क्या वास्ता तुम्हारे बाप से…?’’

‘‘अब कोई फायदा नहीं गुलजार खां, मुझे वह गुब्बारे वाला याद आ गया है, जिस के पीछेपीछे मैं चली थी. वह आदमी तुम ही थे, जिस ने मेरी उंगली थाम कर कहा था, ‘गुब्बारा लोगी?’ तुम गुब्बारा तो नहीं दिला सके, यह कोठा दिला दिया.’’

‘‘ऐ लड़की, लानत भेज अपनी याददाश्त पर. मैं ऐसे घटिया काम नहीं करता.’’

‘‘गुलजार खां, मैं ने दिलशाद बेगम से तुम्हारी बातचीत सुन ली है. अब तुम सीधी तरह मुझे मेरे बाप का नाम बता दो.’’

‘‘मैं ऐसी बेहूदा बातों का जवाब नहीं देता. हिम्मत है तो दिलशाद बेगम से पूछो.’’

‘‘गुलजार खां, सोच लो. तुम्हारे 2 लफ्जों की कीमत ये सारे जेवर हैं.’’

गुलजार खां के चेहरे का रंग बदलने लगा. लगता था, जैसे वह किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले सोचने की क्रिया से गुजर रहा है.

‘‘गुलजार खां, तुम ने जिंदगी में शायद ही कोई नेक काम किया हो. आज एक नेकी कमा लो. जरा सोचो, तुम्हारी बेटी इतने जेवर देख कर कितनी खुश होगी.’’ नरगिस ने उस की गैरत को झिंझोड़ा.

‘‘अगर दिलशाद बेगम को मालूम हो गया, तो…?’’

‘‘फिक्र मत करो. तुम्हारा नाम कहीं नहीं आएगा. तुम्हारा नाम लेने के लिए मैं यहां रहूंगी ही नहीं.’’

‘‘लेकिन मैं तुम्हें क्या बताऊं? इतना अरसा गुजर गया, मुझे कुछ याद नहीं रहा.’’

‘‘सोचो, गुलजार खां, सोचो. जेहन पर जोर डालो. याद करो. कुछ तो याद होगा.’’

‘‘सच्ची बात तो यह है कि मैं तुम्हारे बाप को जानता तक नहीं. वह मकान तक मुझे याद नहीं, जहां से मैं ने तुम्हें उठाया था.’’

‘‘वह शहर तो याद होगा.’’

‘‘हां, शहर याद है. मोहल्ला भी याद आ जाएगा, लेकिन मकान, यह मुश्किल है.’’

‘‘शहर और मोहल्ला ही बता दो.’’

‘‘मैं ने तुम्हें मुलतान से उठाया था और मोहल्ले का नाम था मुमताजाबाद. इस के सिवा मुझे कुछ याद नहीं.’’

नरगिस के तनबदन में आग लग रही थी. उस का दिल चाह रहा था कि गुलजार खां का मुंह नोच ले. उस का मुजरिम उस के सामने था, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकती थी.

‘‘अब तुम क्या करोगी?’’ गुलजार खां ने पूछा.

‘‘करना क्या है. मुलतान जाऊंगी. मुमताजाबाद में कोई तो जानता होगा कि 15 साल पहले वहां किस की दुनिया उजड़ी थी. कुछ तो मालूम होगा. कुछ भी कर लूंगी, मगर अब यहां नहीं रहूंगी.’’

नरगिस बोलती रही और गुलजार खां डिब्बे से जेवर निकाल कर कंधे पर पड़े रूमाल में बांधता रहा. उस ने तमाम जेवर समेटे और खामोशी से बाहर निकल गया. अब नरगिस सोच रही थी कि यहां से कैसे निकले? जिस घर में उस ने 15 बरस काट दिए थे, अब वहां 15 मिनट गुजारना भी मुश्किल था.

अगले दिन सुबह हुई, फिर दोपहर हुई और फिर पूरे बाजार में यह खबर फैल गई कि नरगिस भाग गई.

दिलशाद बेगम को रहरह कर गुलजार खां की बात याद आ रही थी. उस ने कहा था, ‘ज्यादा ढील मत दो, वरना खट्टा खाओगी.’ ठीक कहता था. खा लिया खट्टा. ऐसी हर्राफा निकली कि कानोंकान खबर नहीं होने दी और भाग गई.

नरगिस ने एक बड़ी चादर से अपने जिस्म को अच्छी तरह लपेटा हुआ था. दिन का वक्त था, इसलिए चहलपहल जरा कम थी. वह गली से निकली और जिधर मुंह उठा, पैदल चल दी. वह गली से निकलते ही तांगे में बैठ सकती थी, लेकिन खामख्वाह तांगे वाले के फिकरों का निशाना बनना नहीं चाहती थी. जब उसे यकीन हो गया कि वह बहुत दूर निकल आई है तो उस ने एक तांगे वाले को हाथ दिया.

‘‘स्टेशन चलोगे?’’

‘‘क्यों नहीं चलेंगे, सवारियां कहां है?’’ तांगे वाले ने पूछा.

‘‘मैं अकेली हूं.’’ नरगिस बोली.

‘‘बैठिए.’’

नरगिस तांगे की पिछली सीट पर बैठ गई. तांगे वाले ने चाबुक लहराई और घोड़े ने कदम उठा दिए.

‘‘स्टेशन जा रही हैं, तो किसी दूसरे शहर भी जा रही होंगी, लेकिन यों खाली हाथ…?’’

नरगिस का जी चाहा कि उसे डांट दे, लेकिन यह सोच कर गुस्सा पी गई कि बातचीत के दौरान शायद कोई मतलब की बात हाथ लग जाए, ‘‘मेरी सास रावलपिंडी से सवार हुई होंगी. मेरा सामान उन्हीं के पास है.’’

‘‘लेकिन इतनी जल्दी क्यों जा रही हैं? गाड़ी आने में पूरे 2 घंटे बाकी हैं.’’

‘‘मेरी घड़ी खराब थी.’’

 

तांगे वाले ने इस बार कोई नया सवाल नहीं उठाया. समझ में नहीं आता था कि वह नरगिस के स्पष्टीकरण से आश्वस्त हो गया है या मायूस हुआ था. स्टेशन आ गया तो उस ने अजीब अंदाज में कहा, ‘‘लो बीबी, स्टेशन आ गया. तुम तो शायद पहली बार यहां आई होगी?’’

नरगिस कुछ नहीं बोली. तांगे वाला पैसे ले कर चलता बना, नरगिस हैरान खड़ी थी. उसे यह तो मालूम था कि टिकट लेना होता है, लेकिन टिकट कहां से मिलेगा, यह मालूम नहीं था. उस ने एक कुली से पूछा और टिकट लेने के लिए कतार में खड़ी हो गई. मुलतान का टिकट लिया और प्लेटफार्म पर पहुंच गई.

गाड़ी आने में अभी काफी देर थी. प्लेटफार्म पर लोगों की भीड़ देख कर उसे बड़ी खुशी हुई. अगर उसे कोई ढूंढने आया भी तो इस भीड़ में छिपना बहुत आसान होगा, नरगिस ने सोचा और एक खानदान के साथ इस तरह मिल कर बैठ गई, जैसे उसी खानदान का हिस्सा हो.

आहिस्ताआहिस्ता भीड़ बढ़ती जा रही थी. शायद गाड़ी आने वाली थी. नरगिस ने चादर से मुंह निकाल कर रेल की खाली पटरियों की तरफ देखा. फिर अचानक उस की आंखों ने जैसे कोई खौफनाक दृश्य देख लिया. वही तांगे वाला, जो उसे ले कर आया था, उसे आता हुआ नजर आया. उस के अंदाज से मालूम हो रहा था, जैसे वह किसी को ढूंढ रहा हो. नरगिस के दिल में एक खौफ ने सिर उठाया, ‘हो न हो, वह मुझे घर से भागी हुई लड़की समझ रहा हो.’

नरगिस ने फौरन चादर उतारी और बिछा कर उस पर आराम से बैठ गई. उसे मालूम था कि तांगे वाला उसे चादर से ही पहचानता है. उस ने चेहरा इतने गौर से नहीं देखा था कि उसे पहचान सकता. हुआ भी वही. तांगे वाला उस के करीब से गुजरा. लेकिन वह उसे पहचान नहीं सका. इतनी देर में गाड़ी आने का शोर मच गया और नरगिस भी दूसरे मुसाफिरों की तरह गाड़ी की तरफ लपकी. जिस खानदान के साथ वह बैठी थी, उसी के साथ एक जनाने डिब्बे में दाखिल हो गई. उस ने चादर फिर ओढ़ ली और एक तरफ सिमट कर खड़ी हो गई.

‘‘अकेली हो?’’ अचानक एक बूढ़ी औरत ने पूछा.

‘‘हां.’’ नरगिस बोली.

‘‘यहां बैठ जाओ.’’ बुढि़या अपनी जगह से थोड़ा सा खिसक गई.

नरगिस उस के करीब जा बैठी.

‘‘कहां जा रही हो?’’ बूढ़ी औरत ने पूछा.

‘‘मुलतान.’’

‘‘अच्छा है, साथ रहेगा. मैं भी मुलतान जा रही हूं.’’

अभी ये बातें हो रही थीं कि तांगे वाला 2 जनाना पुलिसवालियों के साथ डिब्बे में दाखिल हुआ. अब चादर उतारने का वक्त नहीं था. नरगिस ने बूढ़ी औरत से कहा, ‘‘मेरे पीछे बदमाश लगे हैं. आप उन से कह दीजिए कि मैं आप की बहू हूं. बाकी बात मैं आप को बाद में बताऊंगी.’’

बुढि़या अभी गौर ही कर रही थी कि तांगे वाले ने इशारे से बताया कि यही है वह लड़की.

एक पुलिसवाली उस के करीब आई, ‘‘ऐ, क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘शाजिया.’’ नरगिस ने जानबूझ कर गलत नाम बताया.

‘‘घर से भाग कर आई हो?’’

‘‘दिमाग तो ठीक है आप का? मेरी सास बैठी हैं. इन से पूछ लें, मैं कैसे आई हूं.’’

अब बुढिया को याद आया. नरगिस ने क्या कहा था और अब उसे क्या करना है, ‘‘वाह, भई वाह. एक तो तुम मर्द को ले कर जनाना डिब्बे में घुस आई हो, ऊपर से मेरी बहू पर इल्जाम लगा रही हो. वर्दी में न होती तो चोटी पकड़ कर मारती.’’

बुढि़या चीखी तो अन्य औरतों की भी हिम्मत हुई. तांगे वाले की मौजूदगी पर औरतों ने ऐसा शोर मचाया कि वह दरवाजे पर तो खड़ा ही था, घबरा कर नीचे उतर गया. पुलिसवालियां भी इस सूरतेहाल से घबरा गईं और 2-4 सवाल करने के बाद वे भी रफूचक्कर हो गईं.

बुढि़या नरगिस के लिए बड़ी मददगार साबित हुई. उसी बीच गाड़ी ने प्लेटफार्म छोड़ दिया और तेज रफ्तार से दौड़ने लगी. नरगिस की परेशानी कुछकुछ दूर हो गई थी. लिहाजा वह अपने खयालों में खो गई. घर और घर वालों के बारे में सोचतेसोचते नरगिस की आंखों के कोने भीग गए.

‘‘अब मुलतान आने वाला है,’’ बूढ़ी औरत ने कहा, ‘‘संभल कर बैठ जाओ. मेरा बेटा मुझे लेने आएगा. सिर ढांप कर उस के सामने आना. वह गुस्से का जरा तेज है.’’

‘‘अच्छा मांजी.’’ नरगिस ने बूढ़ी को मां कह कर मुखातिब किया.

नरगिस को रहरह कर उस बूढ़ी औरत पर प्यार आ रहा था. वह बूढ़ी औरत थोड़ी ही देर में उसे मां जैसी लगने लगी थी. वह सोच रही थी, यह बूढ़ी या तो कामयाब ड्रामा कर रही है या फिर वाकई इतनी स्नेहशील है. इस के साथ जो लोग रहते होंगे, खुशकिस्मत होंगे. वे लड़कियां कितनी नसीब वाली होंगी, जो इस की सरपरस्ती में रहती होंगी. गाड़ी की रफ्तार कम हो गई थी. कुछ औरतें यह कहती हुई उठीं कि मुलतान आ रहा है. नरगिस ने भी साथ लाए हुए कपड़ों की पोटली संभाली. इस के सिवा उस के पास कोई और सामान था ही नहीं.

मुलतान आ गया. उस वक्त रात हो रही थी और नरगिस को मुमताजाबाद के सिवा पते के नाम पर कुछ भी मालूम नहीं था. न मकान नंबर मालूम था, न बाप या भाई में से किसी का नाम. वह सोच रही थी कि काश, यह रात उसे उस बूढ़ी औरत के साथ गुजारनी नसीब हो जाए. फिर सुबह वह मुमताजाबाद चली जाएगी, लेकिन अपनी जुबान से वह कैसे कहती?

गाड़ी से उतर कर नरगिस जैसे ही प्लेटफार्म पर खड़ी हुई, बूढ़ी औरत ने कहा, ‘‘इतनी रात को कहां घर ढूंढती फिरोगी? सुबह चली जाना. अभी मेरे साथ चलो. तुम्हें अभी अपनी कहानी भी तो मुझे सुनानी है. ऐ, वह लो, मेरा बेटा आ गया.’’ बूढ़ी ने नरगिस का हाथ इस तरह थाम रखा था, जैसे उसे डर हो कि इस भीड़ का फायदा उठा कर वह गायब न हो जाए.

एक नौजवान लड़का तेजी के साथ आया और उस बूढ़ी औरत के पास जो छोटा सा संदूक था, उसे उठा कर एक तरफ को चल दिया. नरगिस भी उस बूढ़ी औरत के साथसाथ चलती हुई स्टेशन के बाहर आ गई. बाहर तांगा तैयार था. लड़के ने सामान तांगे पर रखा. इस का मतलब था, उसी तांगे पर बैठना है. बूढ़ी औरत ने नरगिस का हाथ थामा और तांगे में बैठ गई.

‘‘अम्मां यह कौन है?’’ लड़के ने पूछा.

‘‘क्या खबर कौन है?’’ बूढ़ी औरत ने मजाक के अंदाज में कहा.

‘‘मखौल न किया करो. तुम्हारे साथ आई है. तुम्हीं को मालूम नहीं कौन है?’’

‘‘सच्ची बात तो यही है. अब घर चल कर पूछूंगी. वैसे तुझे इस से क्या? चुप बैठा रह.’’

रास्तेभर उन तीनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई. कभीकभी लड़का पीछे पलट कर देख लेता था. नरगिस को अंदाजा हो रहा था कि वह शहर लाहौर के मुकाबले छोटा है. एक बार फिर इस खयाल ने उसे घेर लिया कि वह आज बहुत सालों बाद अपने शहर में है. बूढ़ी का मकान शायद स्टेशन से काफी फासले पर था. तांगा बहुत देर तक चलता रहा. तब कहीं मकान आया, जहां उस बूढ़ी औरत को उतारना था. उस घर में उस बूढ़ी के अलावा 3 औरतें और थीं. उस के 3 बेटे थे, 2 बहुएं थीं और एक बेटी थी, जो लड़का उन्हें ले कर आया था, वह कुंवारा था.

‘‘पहले नहा कर कपड़े बदलो, फिर खाना खाएंगे. उस के बाद तुम्हारी कहानी सुनूंगी.’’ बूढ़ी औरत ने नरगिस से कहा.

इन सब कामों से निपटने के बाद वह बूढ़ी औरत नरगिस को ले कर एक कमरे में चली गई. बोली, ‘‘हो सकता है, तुम्हारी कहानी में कोई ऐसी बात हो, जो सब के सुनने की न हो, इसलिए मैं तुम्हें यहां ले आई. अब सुनाओ, तुम कौन हो और तुम पर क्या बीती है?’’

नरगिस ने शुरू से अब तक की अपनी पूरी कहानी उसे सुना दी.

‘‘बस, इतनी सी बात पर परेशान हो?’’ बूढ़ी औरत बोली.

‘‘मांजी, यह इतनी सी बात है? मैं किसी शरीफ घराने में रहने के लायक हूं?’’

‘‘क्यों, क्या हो गया तुम्हें? तुम जहां भी रही, उस में तुम्हारा क्या कसूर? तुम तो शरीफ घरानों की लड़कियों से भी शरीफ हो. वे तो अच्छेभले माहौल में भी बिगड़ जाती हैं और तुम उस गंदगी से बच कर निकल आई.’’

‘‘लेकिन मेरे मांबाप, भाईबहन?’’

‘‘अल्लाह फजल करेगा. मेरा बेटा सरफराज, जो हमें स्टेशन से ले कर आया है, पत्रकार है. अखबार वालों के बड़े लंबे हाथ होते हैं. मैं उस से कहूंगी, वह ढूंढ़ निकालेगा.’’

‘‘मुझे आप एक बार मुमताजाबाद ले चलें. शायद मैं अपना घर पहचान लूं.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं… मैं कल ही तुम्हें ले जाऊंगी. मेरी एक मिलने वाली वहां रहती है.’’

इस के बाद नरगिस इस तरह सोने के लिए लेट गई, जैसे चांदरात को बच्चे ईद के इंतजार में सोते हैं.

उस बूढ़ी के साथ सुबह मुमताजाबाद पहुंचते ही नरगिस की आंखें उस के हाथों से निकल गईं. आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं लेते थे. उसे महसूस हो रहा था, जैसे वह 4 साल की बच्ची है. घर का रास्ता भूल गई है और रास्ते में खड़ी रो रही है.

‘‘हौसला करो बेटी. क्या सड़क पर तमाशा बनोगी. लोग कहेंगे, मैं तुम्हें चुरा कर ले जा रही हूं.’’ बूढ़ी ने समझाया.

नरगिस ने आंसुओं को हौसले की मुट्ठी में बंद किया और बूढ़ी के साथसाथ चलने लगी. किसी गली में भी उसे यह महसूस नहीं हुआ कि वह यहां पहले भी आ चुकी है. हर मकान को भूखों की तरह देखती हुई चल रही थी.

बड़ी बी उसे ले कर एक से दूसरी, तीसरी और चौथी गली में घूमती रही. कई गलियां घूमने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘भई, तुम तो जवान हो, मेरी टांगें जवाब दे गईं. आधा मुमताजाबाद रह गया है. वह फिर कभी देख लेंगे. अब चल कर कुछ देर बैठते हैं. मैं ने कहा था न मेरी एक मिलने वाली यहां रहती है. चलो, वहां चलते हैं.’’

‘‘चलिए.’’ नरगिस बेदिली से बोली.

वहां जाते हुए नरगिस ने एक जगह को बड़े गौर से देखा. फिर वह एकदम से चीखी, ‘‘अम्मा, यह है मेरा घर. मुझे याद आ गया. यही तो है. मुझे तुम यहां ले चलो. मुझे सब याद आ गया. यही है मेरा घर.’’

बूढ़ी चौंकी, ‘‘यही तो है वह मकान, जहां मैं तुझे लाने वाली थी, इसी में तो मेरी वह जानने वाली रहती है. चलो, पहचान लेना, वरना मैं उन से खुद पूछ लूंगी.’’

दोनों अंदर चली गईं. अंदर एक औरत सिल पर मसाला पीस रही थी. एक औरत अपने बच्चे को लिए बैठी थी. वे अंदर पहुंचीं तो 4 नौजवान लड़कियां कमरे से निकल कर सेहन में आ गईं.

‘‘आओ खाला, बहुत दिनों बाद आईं.’’ उस औरत ने कहा, जो मसाला पीस रही थी.

‘‘हां, तू तो बहुत आ गई मेरे यहां.’’ बूढ़ी औरत ने ताना दिया.

 

नरगिस दीवानों की तरह एकएक दीवार को ताक रही थी. उसे यह भी खयाल नहीं आया कि वह वहां मेहमान बन कर आई है. वह भाग कर जीने की तरफ गई. बिलकुल ऐसा ही जीना था. इस में अब दरवाजा लग गया है, मगर यह तो बाद में भी लग सकता है. उस वक्त नहीं होगा, लेकिन ये लोग तो कोई और हैं. फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है, जैसे मैं यहां आ चुकी हूं?

औरतें उसे गौर से देख रही थीं और इशारों से पूछ रही थीं, यह कौन है? नरगिस इन सब से बेपरवाह कोनेखुदरे झांकती फिर रही थी. कुछ कोने उस के लिए अजनबी थे. कुछ हिस्से ख्वाब की तरह नजर आ रहे थे. यकीन नहीं आ रहा था, मगर उस का दिल कहता था, इस घर में कोई खास बात जरूर है.

‘‘खाला, यह कौन है?’’ एक औरत ने पूछा.

‘‘है एक बेचारी. बचपन में अगवा हो गई थी. अब 15 सालों बाद किसी तरह भाग कर आई है. इतने से बच्चे को याद रहता है. घंटाभर से मुझे लिए फिर रही है. हर मकान को समझ बैठती है, यही उस का घर है.’’ बूढ़ी ने कहा.

‘‘अल्लाह इस की मुश्किल आसान करे. इसे इस के मांबाप से मिलवाए.’’

सब ने ‘आमीन’ कहा. इतनी देर में नरगिस भी आ कर बैठ गई. उसे देख कर सब चुप हो गए.

‘‘अम्मा, यहां से चलो. यहां मेरा जी घबराता है.’’ नरगिस ने कहा.

‘‘तू तो जिद कर के यहां आई थी, अब जी घबराने लगा.’’

‘‘अच्छा आप बैठें. मैं जा रही हूं.’’

‘‘अरी सुन तो, मैं भी चल रही हूं. अच्छा बहन, फिर आऊंगी. यह लड़की तो हवा के घोड़े पर सवार है.’’ बूढ़ी ने कहा और बुरका संभाल कर उठ गई.

‘‘क्या हुआ, मकान देख लिया?’’ बूढ़ी ने रास्ते में पूछा.

‘‘नहीं, यह वह घर नहीं है, लेकिन न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है, जैसे यही है.’’

‘‘तू जी हलकान मत कर. मैं आज ही सरफराज से कहूंगी. वह सब पता लगा देगा.’’

‘‘नहीं अम्मा, दुनिया की भीड़ में गुम हो कर कोई नहीं मिलता. इंसान हो या मकान, सब गुम हो जाते हैं.’’

‘‘अल्लाह की जात से मायूस नहीं होते बेटी.’’

‘‘अच्छा एक बात बताइए.’’

‘‘पूछ बेटी.’’

‘‘अगर मेरे घर वाले मुझे नहीं मिले तो आप मुझे अपने घर में रख लेंगी? मैं आप की नौकरी करूंगी.’’

‘‘कैसी बातें करती है बेटी, तू काहे को नौकरी करने लगी? तू तो मेरी बेटी जमीला की तरह है. खैर से तेरे वारिस तुझे मिल जाएं. अगर नहीं मिलते तो तू भी मेरी जमीला है.’’

बड़ी बी ने सरफराज से जिक्र किया तो उस ने वादा किया कि वह नरगिस के सरपरस्तों की तलाश के लिए जो कुछ होगा, करेगा.

 

नरगिस को यहां रहते हुए 3 दिन हो गए थे. एक नई जिंदगी से उस का परिचय हुआ था. उस ने पहली बार शरीफ घरों के आदाब देखे थे. उसे पहली बार अहसास हुआ था कि घर की दहलीज हर एक के लिए नहीं होती. इन औरतों की आंखों में जो शरमोहया थी, नरगिस ने पहले नहीं देखी थी. चिराग जलने के बाद यहां पराए मर्दों के कदमों की आवाजें नहीं गूंजती थीं. औरतें मुसकराती थीं, कहकहे नहीं लगाती थीं. सिरों पर आंचल न भी हो, तो लगता था, शरमोहया का साया सिर पर है.

नमाज की चौकी पर बैठी हुई बड़ी बी रहमत का फरिश्ता लगती थीं. शौहरों के सामने दस्तरख्वान सजाती हुई बीवियां, भाइयों से जिद करती हुई बहनें कितनी अच्छी, कितनी प्यारी लगती थीं.

सरफराज बराबर कोशिश में लगा हुआ था. आखिरकार एक दिन वह कामयाब हो गया. उस ने बड़ी बी के सामने एक अखबार रखते हुए कहा, ‘‘पहचानिए तो, किस की तसवीर है?’’

‘‘कोई बच्ची है, जमीला को दिखाओ.’’

‘‘अम्मा, यह उसी लड़की की बचपन की तसवीर है, जो आप के घर में ठहरी है.’’

‘‘नरगिस की?’’ हैरानी से बड़ी बी की आंखें फैल गईं.

‘‘हां, इस का उस वक्त का नाम नजमा था. नरगिस बाद में रखा गया होगा.’’

‘‘मगर यह कैसे मालूम हुआ कि यह नरगिस की ही तसवीर है.’’

‘‘अम्मा, मैं ने 15 साल पहले के अखबार खंगाले. दरअसल मुझे यकीन था कि नरगिस के वालिदैन ने गुमशुदगी का इश्तिहार जरूर दिया होगा. वही हुआ. यह इश्तिहार मुझे नजर आ गया. इस में जो पता दिया गया है, वह मुमताजाबाद का है. यह भी लिखा है कि शादी के हंगामे में किसी संगदिल ने इसे अगवा कर लिया था. नरगिस ने भी यही बताया था. तसदीक उस वक्त हो जाएगी, जब हम उस पते पर जाएंगे, जो इस इश्तिहार में दिया गया है.’’

‘‘देखें, तो अपनी बच्ची की तसवीर,’’ बड़ी बी ने अखबार उठा लिया, ‘‘ऐ हां, है तो यह नरगिस ही. वही नाक, वही नक्शा. हाथ टूटें उस के, जिस ने उसे उस के मांबाप से जुदा किया.’’ फिर बड़ी बी ने नरगिस को आवाज दी, ‘‘नरगिस, जरा इधर तो आ.’’

‘‘जी अम्मा.’’ नरगिस लगभग दौड़ती हुई आ गई.

‘‘मैं तुझे एक चीज दिखाऊंगी, लेकिन तू वादा कर कि रोएगी नहीं.’’

‘‘नहीं रोऊंगी.’’ नरगिस बोली.

‘‘यह देख, क्या है?’’ बड़ी बी ने अखबार में छपी हुई तसवीर पर उंगली रखते हुए कहा.

‘‘तसवीर है किसी की.’’ नरगिस बोली.

‘‘किसी की नहीं, तुम्हारी तसवीर है.’’

अब नरगिस की समझ में आया, वह क्या दिखाना चाहती हैं. उस ने तसवीर देखी. ऊपर ‘गुमशुदा की तलाश’ और नीचे मुमताजाबाद का पता छपा हुआ था.

नरगिस कुछ देर तक उस तसवीर को गौर से देखती रही, फिर चीख मार कर बेहोश हो गई.

जब तक नरगिस होश में आई, तब तक सरफराज तय कर चुका था कि वह पहले खुद उस के मांबाप के पास जाएगा. जो लड़की तसवीर को देख कर बेहोश हो सकती है, वालिदैन को देख कर खुशी से मरने के करीब पहुंच जाएगी.

‘‘जब पता चल ही गया है तो आप मुझे वहां ले चलें. अम्मा, आप को भी ले कर चलूंगी. अपनी मां को बताऊंगी कि यह न होतीं तो मैं आप तक कभी न पहुंच सकती. अम्मा, पहले उन्हें यह बताइएगा नहीं कि मैं नजमा हूं. जरा वह भी तो बेताब हों. उन से कह दीजिएगा कि पता मालूम हो गया है. अब आप की बेटी 2-4 दिनों बाद मिलेगी. देख लेना अम्मा, खुशामद करेंगे और मेरे अब्बा कि बस, नजमा को आज ही ले आओ. मैं दिल ही दिल में खूब हंसूंगी उन पर. बेचारों को ज्यादा मत सताना. थोड़ी देर में बता देना कि नजमा यह क्या खड़ी है. बड़ा मजा आएगा.’’

नरगिस ये हवाई किले बना रही थी, जबकि सरफराज का मशविरा था कि वह अकेला जाएगा. हीलहुज्जत के बाद नरगिस तैयार हो गई और सरफराज अपनी वालिदा को ले कर मकान ढूंढ़ने चला गया.

‘‘यह तू मुझे कहां ले आया?’’ बड़ी बी ने मकान को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा.

‘‘अखबार में इसी मकान का नंबर छपा है.’’ सरफराज ने अखबार देखते हुए कहा.

‘‘लेकिन यह तो शाहिदा का मकान है. मेरी सहेली है. मैं तो नरगिस को ले कर यहां आ चुकी हूं.’’

‘‘अच्छा, मगर पता तो यही है.’’

‘‘सरफराज,’’ बड़ी बी ने सरगोशी की, ‘‘नरगिस भी इस मकान को देख कर चौंकी थी. शायद उस की याददाश्त ने सही निशानदेही की थी. हो सकता है, शाहिदा का नरगिस से वाकई कोई ताल्लुक हो.’’

‘‘चलिए, मालूम करते हैं. अकसर यह भी होता है कि गुम हो जाने वाली लड़कियों के रिश्तेदार उन्हें कबूल करने से कतराते हैं. अगर ऐसा हुआ तो हमें सख्त जद्दोजहद करनी पड़ेगी.’’

‘‘कैसी जद्दोजहद? मैं शाहिदा की जान को आ जाऊंगी. बच्ची का इस में क्या कसूर? बस तुम इतना खयाल करना कि यह जिक्र न आने पाए कि नरगिस अब तक तवायफ के कोठे पर थी. मैं कोई और बहाना तलाश लूंगी.’’

बड़ी बी अंदर चली गईं. कुछ देर बाद सरफराज को भी बुला लिया गया.

‘‘आप इस बच्ची को जानती हैं?’’ सरफराज ने शाहिदा को अखबार दिखाते हुए पूछा.

शाहिदा ने गौर से तसवीर को देखा और इनकार में सिर हिला दिया.

‘‘गौर से देखिए, कुछ याद कीजिए,’’ सरफराज ने जोर दिया, ‘‘यह 15 साल पुरानी तसवीर है.’’

‘‘नहीं बेटा, मैं इस को नहीं जानती.’’ शाहिदा ने फिर इनकार किया.

‘‘अच्छा यह बताइए, 15 साल पहले आप के घर में कोई बच्ची गुम हुई थी?’’

‘‘अल्लाह न करे. ऐसा हादसा तो कभी पेश नहीं आया.’’

‘‘फिर यह इश्तिहार कैसा है? इस में तो आप ही के घर का पता है.’’

‘‘कमाल है,’’ सरफराज किसी सोच में डूब गया, ‘‘अच्छा, यह बताइए, आप के यहां हाजी फरीद अहमद किस का नाम है?’’

‘‘किसी का भी नहीं. मेरे शौहर का नाम तो अब्दुल हमीद था.’’

सरफराज को अपनी सारी मेहनत बेकार जाती हुई नजर आ रही थी. अचानक उस के जेहन में एक खयाल बिजली की तरह कौंधा.

‘‘आप इस मकान में कब से हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘तकरीबन 12 साल से.’’

‘‘हूं,’’ सरफराज ने चुटकी बजाई, ‘‘यह इश्तिहार है 15 साल पहले का. इस का मतलब है, आप से पहले इस मकान में कोई और रहता था और वह थे हाजी फरीद अहमद यानी नरगिस के वालिद. उन्होंने किसी वजह से यह मकान आप को बेच दिया और यहां से चले गए.’’

‘‘हां, यही होगा.’’

‘‘आप मुझे मकान के कागजात दिखा सकती हैं?’’

‘‘बात क्या है? हमें पूरी तरह समझाओ.’’

‘‘मैं बताती हूं,’’ बड़ी बी ने कहा, ‘‘उस रोज जो लड़की मेरे साथ आई थी, यह तसवीर उसी की है. बचपन में वह गुम हो गई थी. शायद मैं ने तुम्हें बताया भी था. उस रोज वह यहां आई थी तो इस मकान को देख कर चौंकी भी थी. अब हमें उस के मांबाप की तलाश है. कागजात से यह मालूम हो जाएगा कि यह मकान वाकई हाजी फरीद का था, जो नरगिस के बाप हैं. यह तस्दीक हो जाए तो सरफराज उन्हें भी तलाश कर लेगा.’’

‘‘अच्छा, मैं कागजात ले कर आती हूं.’’

सरफराज ने कागजात देखे. मकान वाकई हाजी फरीद अहमद के नाम पर था, लेकिन बेचने वाले रशीद अहमद और हमीद अहमद थे, जिन की वल्दियत हाजी फरीद अहमद मरहूम लिखी हुई थी. इस का मतलब था कि हाजी साहब का इंतकाल हो गया था और उन के बेटों यानी नरगिस के दोनों बड़े भाइयों ने यह मकान बेच दिया था.

‘‘मामला बिलकुल साफ है. हम नरगिस के वारिसों के बहुत करीब पहुंच चुके हैं. अब गुत्थी सिर्फ यह है कि वे दोनों शख्स इस वक्त कहां हैं? मुलतान में या मुलतान के बाहर? अगर मुल्क में ही हैं तो मैं उन्हें जरूर तलाश लूंगा.’’

अगले दिन सरफराज ने पूरे मुल्क के अखबारों में टेलीप्रिंटर से यह खबर पहुंचा दी कि 15 साल पहले गुम होने वाली बच्ची नजमा वल्द हाजी फरीद मरहूम, जिस के भाइयों के नाम रशीद अहमद और हमीद अहमद हैं, हमारे पास मौजूद है और अपने भाइयों को तलाश रही है. ये लोग खबर को पढ़ते ही हम से संपर्क करें. इसी किस्म का इश्तिहार उस ने टीवी को भी दिया.

तीसरे दिन सरफराज के पास टेलीफोन आया, ‘हम ने खबर पढ़ी. हम कल आप के पास आ रहे हैं.’

यह टेलीफोन कराची से रशीद अहमद की तरफ से था. दूसरे दिन रशीद अहमद और उस की बेगम सरफराज के घर पहुंच गए. उस के लिबास और हुलिए से जाहिर हो रहा था कि वे निहायत दौलतमंद हैं. सरफराज को यह देख कर इत्मीनान हुआ कि दौलतमंद होने के बावजूद रशीद अपनी गुमशुदा बहन को भूला नहीं था. उस के चेहरे पर घबराहट और खुशी के मिलेजुले भाव साफ बता रहे थे कि वे नरगिस से मिलने के लिए बेचैन हैं.

‘‘पहले यह साबित कीजिए कि आप ही रशीद अहमद वल्द हाजी फरीद अहमद हैं.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘मुझे मालूम था कि आप यह सबूत जरूर चाहेंगे, इसलिए मैं अपना पासपोर्ट साथ ले आया हूं. इस के अलावा मैट्रिक का सर्टीफिकेट भी है. मैं ने मैट्रिक मुलतान से ही किया था. अब्बाजी की तसवीर भी है, जिस में हम दोनों भाई उन के साथ बैठे हुए हैं. और एक सब से अहम सबूत यह है कि नजमा की जो तसवीर उस वक्त अखबार में छपी थी, वह मेरे अलबम में थी, जो मैं अपने साथ लाया हूं, यह देखिए.’’

‘‘आप ने इस तसवीर को बहुत संभाल कर रखा है.’’ सरफराज ने तसवीर को देखते हुए कहा.

‘‘क्यों न रखते साहब. कोई दिन ऐसा नहीं गया, जब हम ने इसे याद न किया हो. एक ही तो हमारी बहन थी. वह भी ऐसी, जो हम दोनों भाइयों के जवान होने के बाद पैदा हुई थी. मेरे छोटे भाई हमीद की शादी पर ही वह गुम हुई थी. उसे कहांकहां नहीं ढूंढ़ा हम ने. अब्बाजी तो ऐसे बिस्तर से लगे कि फिर उठ ही न सके. मां भी कुछ अरसे बाद ही हम से रूठ गईं. नजमा क्या गई, हमारा तो घर ही उजड़ गया. हम दोनों भाइयों का दिल भी उचाट हो गया. लिहाजा हम ने वह मकान बेच दिया. हमीद तो बाहर निकल गया. आजकल जापान में है. मैं कराची चला गया. अब वह मिली है तो ऐसे वक्त कि अम्माजी…’’ उस की आवाज आंसुओं में बह गई. वह बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘रशीद साहब, हौसला रखिए. अल्लाह ने इतनी बड़ी खुशी दी है कि आप का दामन भर जाएगा. उसे समेटिए और खुदा का शुक्रिया अदा कीजिए. मैं नजमा को बुलाता हूं.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘ठहरिए सरफराज साहब, मैं यह कैसे यकीन कर लूं कि वह नजमा मेरी बहन ही है?’’

‘‘इस की गवाही आप का दिल दे रहा है. आप के आंसू शहादत दे रहे हैं.’’

‘‘वह तो है, लेकिन मैं एक इत्मीनान करना चाहता हूं.’’

‘‘फरमाइए.’’

‘‘हमारे घर में एक मुर्गा था, जो कटखना हो गया था. उस ने नजमा की पीठ पर चोंच मार दी थी. जख्म बहुत दिन पका था और कंधे से कुछ नीचे निशान छोड़ गया था. वह निशान अब भी होगा.’’

‘‘यकीनन होगा.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘आप मेरी बेगम को अंदर से जाइए. यह उस निशान को देख लेंगी. फिर कोई शक नहीं रहेगा.’’

‘‘बेशक.’’

रशीद अहमद की बेगम अंदर चली गई. कुछ देर बाद वह इस खुशखबरी के साथ बाहर आई कि निशान मौजूद है. रशीद अहमद की आंखें एक बार फिर भीग गईं.

‘‘आप लोग बैठें. मैं नजमा को ले कर आता हूं.’’ सरफराज ने कहा और कमरे से निकल गया.

रशीद अहमद की आंखें दरवाजे पर लगी थीं. उसे सांस लेने की फुरसत भी नहीं थी. पलक झपकाना भूल गया था. फिर कुछ आउट हुई. सरफराज की वालिदा के साथ नरगिस कमरे में दाखिल हुई. रशीद अहमद अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ. कुछ देर दोनों भाईबहन एकदूसरे को देखते रहे, फिर जैसे नरगिस को होश आ गया.

‘‘भाई जान.’’ उस ने कहा और दौड़ कर रशीद अहमद के गले से लग कर रोने लगी. रोरो कर मन कुछ हलका हुआ तो पूछा, ‘‘अम्मा को नहीं लाए और अब्बाजी भी नहीं आए?’’

‘‘तू घर चल, सब से मुलाकात हो जाएगी. अभी तो मैं और तेरी भाभी आए हैं तुझे लेने.’’

‘‘मुझे अम्मा बहुत याद आती हैं. मुझे जल्दी से घर ले चलें.’’

‘‘चलते हैं. जरा इन लोगों का शुक्रिया अदा कर लूं.’’

‘‘भाईजान, इन का शुक्रिया जरूर अदा कीजिए. ये न होते तो और न जाने कितने दिन ठोकरें खाती.’’ कह कर नरगिस फिर रोने लगी.

‘‘रशीद साहब, यह मेरी वालिदा हैं.’’ सरफराज ने बड़ी बी का परिचय कराया.

‘‘मांजी, मैं किस मुंह से आप लोगों का शुक्रिया अदा करूं.’’

‘‘शुक्रिया कैसा बेटा, तुझे तेरी बहन मिल गई, हमें तो खुदा ने एक जरिया बनाया था. तेरी बहन बहुत प्यारी है. इस का खयाल रखना. इसे कोई तकलीफ न पहुंचे.’’

‘‘यह मेरी जान है मांजी. मेरे पास अल्लाह का दिया सब कुछ है. मैं इसे सोने में तौल दूंगा.’’

‘‘बेटा, बहनें मोहब्बत की भूखी होती हैं, दौलत की नहीं.’’ बड़ी बी ने कहा.

‘‘मैं आप की नसीहत याद रखूंगा.’’

‘‘मैं अपनी बच्ची को तैयार कर दूं. आप की अमानत है, ले जाइएगा.’’

बड़ी बी नरगिस को अंदर ले गईं. तैयार करने का तो बहाना था. उन्हें दरअसल उसे यह नसीहत करनी थी, ‘‘मेरी एक बात याद रखना. अपने अतीत को भूल जाना. कभी किसी पर जाहिर मत करना कि तुम कोठे पर रही हो. यह ऐसी तोहमत है, जो तुम्हारे भाई की मोहब्बत को आधा कर देगी. भाई अगर बर्दाश्त कर भी लेगा तो भाभी आज नहीं, तो कल तुम्हें ताने जरूर देगी.’’

‘‘लेकिन भाई पूछेंगे जरूर कि 15 साल कहां रही? किस माहौल में जवान हुई? मैं उन से क्या कहूंगी?’’

‘‘बेटी, यह तुम्हारी मरजी पर निर्भर है. तुम समझदार हो. कोई कहानी गढ़ लेना. इसी में तुम्हारी बेहतरी है.’’

‘‘ठीक है, अम्मा. मैं समझ गई.’’

‘‘अब जाओ अपने भाई के साथ.’’

‘‘आप लोग मुझे बहुत याद आएंगे.’’

‘‘अरे, तुम्हें वहां ऐसा प्यार मिलेगा कि भूल जाएगी. फिर भी अगर मैं याद आऊं तो चली आना मुझ से मिलने. कराची कौन सा दूर है.’’

नरगिस उस घर से इस तरह रुखसत हुई, जैसे कोई बेटी अपनी मां के घर से ससुराल जाती है.

नरगिस ने सोचा भी नहीं था कि रशीद भाई इतने दौलतमंद होंगे. वह उन का मकान देख कर हैरान रह गई. उन की कोठी, कमरों की सजावट, अमीराना ठाठबाट, ये सब चीजें उस के लिए विस्मयकारी थीं. उसे भाई से मिलने की खुशी तो थी ही, भाई को खुशहाल देख कर उस का दिल और भी ज्यादा खुश हुआ.

घर पहुंचते ही वह एक बार फिर जानपहचान की मंजिल से गुजरी. रशीद अहमद की 2 बेटियां और एक बेटा था. बेटियां तो नरगिस की तरकीबन हमउम्र थी, लेकिन बेटा छोटा था. नरगिस के पहुंचते ही इमराना उस से मिलते आई, ‘‘हैलो.’’

‘‘यह मेरी बड़ी बेटी इमराना है,’’ रशीद ने परिचय कराया, ‘‘तुम से कोई 2 साल बड़ी होगी.’’

इस के बाद एक और लड़की अंदर दाखिल हुई. उस का नाम फरहाना था. बेटे का नाम इमरान था.

नरगिस उन लड़कियों को देख कर ज्यादा खुश नहीं हुई. उन के कपड़े, तराशे हुए बाल और लज्जाहीनता उस के लिए निराशाजनक थी. उसे पहली नजर में अंदाजा हो गया कि इस घर का रहनसहन अंग्रेजी तर्ज का है, लेकिन यह कोई ऐसी खराब बात नहीं थी. बड़े घराने ऐसे ही जिंदगी गुजारते हैं.

औचारिक परिचय के बाद रशीद अहमद नरगिस से मुखातिब हुए, ‘‘इतने दिनों कहां रहीं? तुम पर गुजरी क्या? कुछ हमें भी तो बताओ.’’

‘‘हां, नजमा, कुछ तो बताओ.’’ भाभी बोलीं.

नरगिस ने अपनी कहानी सुनाई, लेकिन कुछ तब्दीली के साथ, ‘‘भाईजान, मुझे तो कुछ याद नहीं रहा था. यह कहानी मरते वक्त मुझे मेरे मोहमिन (उपकारी) ने सुनाई. उस ने मुझे बताया कि कोई शख्स तुम्हें मुलतान से लाहौर ले आया था. जाहिर है कि किसी गलत इरादे से ले कर आया होगा. लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था. वह अभी रेलवे स्टेशन से बाहर आया था कि उस पर दिल का दौरा पड़ा. जिस ने मुझे पालापोसा, टैक्सी चलाता था. खैर, जब उस शख्स को हार्टअटैक हुआ तो उस ने टैक्सी को हाथ दिया. टैक्सी में बैठने से पहले ही उसे यकीन हो गया था कि वह अब बचेगा नहीं. उस ने मुझे सुपुर्द कर अटकअटक कर उस के अब्बू का पता बताया कि वह मुझे वहां पहुंचा दे.

‘‘उस के मरने के बाद उस ने बहुत चाहा कि मुझे मेरे घर पहुंचा दे, लेकिन उस के दिल में बेईमानी आ गई. उस वक्त वह बेऔलाद था. उस की अपनी बेटी मेरे आने के बाद पैदा हुई. उस ने और उस की बीवी ने तय किया कि जब खुदा ने यह तोहफा उसे दिया है तो वे हमें वापस नहीं करेंगे.

‘‘भाईजान, उस ने मरते वक्त मुझ से माफी मांगी और दरख्वास्त की कि उस की मौत के बाद मैं अपने घर चली जाऊं और अगर वह बच गया तो खुद मुझे मेरे घर छोड़ जाएगा. लेकिन मौत ने उसे मोहलत नहीं दी. इस से भी ज्यादा गजब यह हुआ कि उस ने सिर्फ यह बताया था कि मेरा घर मुमताजाबाद, मुलतान में है. इस से पहले कि वह मकान नंबर या अब्बा का नाम बताता, उस की रूह उड़ गई. यह भी हो सकता है कि इतने दिन गुजर जाने के बाद वह यह मालूमात भूल ही गया हो. उसे सिर्फ मुमताजाबाद याद रह गया हो.’’

‘‘उस बेहूदा आदमी ने तुम्हें हम से जुदा कर दिया और तुम उसे मोहसिन कहती हो. सोचो, अगर वह उसी वक्त तुम्हें हमारे पास ले आता तो आज यह दिन देखने को नहीं मिलता.’’ रशीद अहमद ने गुस्से से कहा.

‘‘मैं उसे इसलिए मोहसिन कहती हूं कि उस ने अपनी मौत से पहले मेरी हकीकत मुझे बता कर मुझ पर एहसान किया. अगर वह न बताता तो आज मैं वहां होती, जहां से अगर वापस आती तो आप मुझे अपनी बहन जानते हुए भी कबूल करने से इनकार कर देते.’’

नरगिस ने आगे बताया, ‘‘अब यह बताना जरूरी नहीं कि अब मेरा वहां रहना मुश्किल नहीं रहा था. मैं उन के घर से निकली और मुलतान का टिकट ले कर गाड़ी में बैठ गई. गाड़ी में मुझे सरफराज की वालिदा मिल गई. फिर जो कुछ हुआ, वह सरफराज साहब आप को बता ही चुके हैं.’’

नरगिस को कराची आते ही यह खबर मिल चुकी थी कि उस के वालिदैन का इंतकाल हो चुका है. अब रशीद भाईजान ही उस के सब कुछ हैं. उस की खुशी आधी रह गई थी, लेकिन यह खुशी फिर भी थी कि अब वह एक शरीफ घर में शरीफाना जिंदगी गुजारेगी.

 

नई जगह थी, इसलिए सुबह जल्दी ही नींद टूट गई. सुबह से कुछ पहले ही वह बिस्तर से उठी. जब से वह बड़ी बी के घर आई थी, नमाज की पाबंद हो गई थी. नमाज अदा की और फिर लौन में आ कर टहलने लगी. कुछ देर बाद वह वापस आ गई. घर में अभी तक सब लोग सो रहे थे. नरगिस कुछ देर अपनी जिंदगी पर गौर करती रही. कोई व्यस्तता तो थी नहीं. लेटेलेटे नींद आ गई. आंख खुली तो घड़ी में साढ़े नौ बज रहे थे. नरगिस घबरा कर उठी और एक बार फिर हाथमुंह धो कर बाहर निकली तो भाई रशीद को अकेले नाश्ता करते देखा.

नरगिस ने सलाम करने के बाद कहा, ‘‘मैं तो समझ रही थी, आप औफिस जा चुके होंगे.’’

‘‘अरे, अपना औफिस है. तेरा भाई किसी का मुलाजिम तो है नहीं. आओ, तुम भी नाश्ता कर लो.’’ रशीद बोला.

‘‘इमराना और फरहाना कहां हैं?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘उन्हें कालेज जाना होता है, 8 बजे चली गई होंगी.’’

‘‘और इमरान?’’

‘‘उस की मत पूछो. बरखुरदार नींद के ऐसे शौकीन हैं कि दोपहर की शिफ्ट में दाखिला लिया है. वह 11 बजे उठेंगे.’’

‘‘भाभी को तो नाश्ते की मेज पर होना चाहिए था. आप अकेले नाश्ता कर रहे हैं.’’

‘‘वह रात को देर तक जागती हैं. उन्हें कहीं जाना तो होता नहीं. अपनी मर्जी से उठती हैं. हमारी मुलाकात शाम की चाय पर होती है या रात के खाने पर.’’

नरगिस सोच में पड़ गई. यह कैसा घर है, जहां लोग एकसाथ बैठ कर नाश्ता भी नहीं करते. हर शख्स अपनी अलग जिंदगी गुजार रहा है.

रशीद अहमद ने नाश्ता किया और तैयार होने के लिए ड्रेसिंगरूम में चले गए. तैयार हो कर आए तो नरगिस भी नाश्ता कर चुकी थी.

‘‘अच्छा नजमा, मैं औफिस जा रहा हूं. तुम्हारी खातिर दोपहर को आ जाऊंगा. उस वक्त तक तुम्हारी भाभी भी उठ जाएंगी. तुम उन से गपशप करना.’’

नरगिस अपने भाई को छोड़ने दरवाजे तक गई और उस वक्त तक वहां खड़ी रही, जब तक ड्राइवर ने गाड़ी गेट से बाहर नहीं कर ली. यह पहला मौका था, जब कोई रशीद अहमद को छोड़ने दरवाजे तक आया था.

इतने बड़े घर में नरगिस अकेली घूमती रही. अल्लाहअल्लाह कर के 11 बजे इमरान सो कर उठा. उठते ही उस ने पूरे घर को सिर पर उठा लिया. मजबूरन उस की मां को भी उठना पड़ा. मांबेटे जल्दीजल्दी तैयार हुए. इमरान ने नाश्ता किया और स्कूल चला गया.

थोड़ी देर में रशीद अहमद आ गए. उन्हें देख कर बीवी चौंकी, ‘‘आप आज इतनी जल्दी आ गए.’’

‘‘भई, मैं ने सोचा, नजमा अकेली बोर हो रही होगी. इमरानाफरहाना आ जाएं तो कहीं घूमने निकलते हैं.’’

इमराना और फरहाना आ गईं. दोपहर का खाना सब ने मिल कर खाया. नरगिस को खुशी हो रही थी कि नाश्ते पर न सही, खाने पर तो सब मौजूद हैं.

‘‘कराची बाद में घूमेंगे, पहले तुम लोग नजमा को घर तो दिखा दो.’’ खाने के बाद रशीद अहमद ने बेटियों से कहा.

‘‘अच्छा डैडी.’’ उन्होंने बेदिली से कहा और नरगिस को ले कर चली गई. तमाम कमरे दिखाने के बाद वे उसे एक हौलरूपी कमरे में ले गईं. उस कमरे में कालीन के सिवा कोई फर्नीचर नहीं था. संगीत के जितने वाद्य हो सकते हैं, सब उस कमरे में मौजूद थे. तबले की जोड़ी, हारमोनियम, ड्रम, गिटार. क्या था, जो वहां नहीं था. एक कोने में घुंघरू पड़े हुए थे. नरगिस को फुरेरी आ गई. उसे बहुत दिनों बाद दिलशाद बेगम का कोठा याद आ गया.

‘‘यह सब क्या है इमराना?’’ नरगिस ने भयभीत आवाज में पूछा.

‘‘यह हमारा बालरूम है. यहां हम डांस करते हैं, संगीत सुनते हैं, शोर मचाते हैं, मौज उड़ाते हैं. यह साउंडप्रूफ कमरा है. यहां हम कितना ही शोर मचाएं, बाकी घर वाले डिस्टर्ब नहीं होते.’’

‘‘तुम लोग डांस करती हो?’’ नरगिस को जैसे यकीन नहीं हुआ.

‘‘हां, आप को भी दिखाएंगे किसी दिन. फरहाना तो ऐसा नाचती है कि बिजली भी क्या कौंधेगी. डैडी कहते हैं, पहले तालीम पूरी कर लो, वरना फिल्मों के दरवाजे तो उस के लिए हर वक्त खुले हैं.’’

नरगिस पर हैरतों के पहाड़ टूट रहे थे. तमाशबीनों के सिवा यहां तो सब कुछ दिलशाद बेगम के कोठे की तरह था.

नरगिस सोच रही थी. अगर वह यह सब कुछ न देखती तो अच्छा था. वह तो किसी पाकीजा माहौल की तलाश में आई थी, मगर यह सब क्या है? उस ने सोचा, वह इस माहौल को बदलने की कोशिश करेगी. शरीफ घरों का नक्शा उस के जेहन में कुछ और था, जो यहां नहीं था.

‘‘घर देख आईं नजमा?’’ रशीद अहमद ने पूछा.

‘‘जी, आप का घर बहुत पसंद आया.’’ उस की आवाज में छिपे व्यंग्य को रशीद अहमद महसूस नहीं कर सका.

‘‘आओ, अब तुम्हें कराची घुमाने चलते हैं.’’ रशीद अहमद ने कहा. उस के बाद इमराना और फरहाना से कहा कि वे भी चलें. इमराना और फरहाना लिबास बदल कर चलने को निकलीं तो नरगिस की आंखें झुक गईं. जींस की पतलून पर ऊंचीऊंची शर्ट्स पहने वे बिलकुल लड़का लग रही थीं.

नरगिस बोली, ‘‘तुम लोगों ने यह क्या लिबास पहना है? क्या इसी तरह बाहर जाओगी?’’

‘‘क्यों…? इस लिबास में क्या है?’’ इमराना ने तैश में आ कर कहा.

‘‘यह लिबास शरीफ लड़कियों पर अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘क्या हम शरीफ लड़कियां नहीं हैं? आप इसलिए आई हैं हमारे घर कि हमारी ही बेइज्जती करें?’’

‘‘यह बेइज्जती नहीं, लड़कियों पर दुपट्टा सजता है.’’

‘‘बसबस, अपनी नसीहत अपने पास रखें. डैडी, मैं यह बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकती. मैं नहीं जाती, आप लोगों के साथ.’’

‘‘मैं भी नहीं जाऊंगी.’’ फरहाना ने बहन का साथ दिया.

‘‘तुम लोग क्यों इतनी जज्बाती होती हो? नजमा इस तरह के लिबास की आदी नहीं. कुछ दिन यहां रहेगी तो सीख जाएगी. खुद भी यही लिबास पहना करेगी.’’

नरगिस का मुंह लटक गया. वह समझ रही थी कि भाई उस की तारीफ करेंगे और बेटियों को डांटेंगे कि कैसा लिबास पहन कर आ गईं, मगर वह तो उलटे उन की हिमायत कर रहे थे. भाभी अलग मुंह बनाए खड़ी थीं. अब नरगिस के बिगड़ने का सबब ही नहीं था. उस ने माफी मांग ली, ‘‘मुझे माफ कर दो इमराना. भाईजान ठीक कहते हैं. मैं इस लिबास की आदी नहीं हूं न, इसलिए यह बात कह दी. आओ, घूमने चलें.’’

बुझे मन से दोनों बहनें उस के साथ चल दीं.

अगले दिन नरगिस ने सुना कि मास्टर साहब आए हैं तो उस के तालीम के शौक ने सिर उभारा, ‘‘भाईजान, मैं भी मास्टर साहब के पास जा कर बैठ जाऊं?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं. मैं इंटरकौम पर कहता हूं, इमराना दरवाजा खोल देगी, तुम जाओ.’’ रशीद बोला.

‘‘मगर वह है किस कमरे में?’’

‘‘बालरूम में, और कहां.’’

‘‘जी अच्छा, मैं जाती हूं.’’

नरगिस ने सोचा, मास्टर साहब से वह खुद बात करेगी. मास्टर साहब तैयार हो गए तो भाई से कह कर  कल से खुद भी पढ़ना शुरू कर देगी. नरगिस ने दरवाजे को धक्का दिया. दरवाजा खुला हुआ था. रोम, अतोम, ततोम, तना, तरा, री… अंदर से आवाजें आ रही थीं. नरगिस उन आवाजों से अवगत थी. यह किस किस्म की पढ़ाई है. वह डरतेडरते अंदर गई. जिन्हें वह मास्टर साहब कह रही थी, वह उस्तादजी थे. उन से इमराना और फरहाना संगीत की तालीम हासिल कर रही थीं. नरगिस के लिए उस घर में यह एक और नई बात थी. उस्तादजी ने नरगिस की तरफ देखा और गाना बंद कर दिया.

‘‘यह लड़की कौन है?’’

‘‘डैडी की बहन हैं.’’

‘‘आज से पहले तो नजर नहीं आईं?’’

‘‘अभी तो आई हैं मुलतान से.’’

‘‘अच्छा चलो, तुम सबक दोहराओ.’’

नरगिस एक तरफ सिमट कर बैठ गई. सबक फिर शुरू हो गया.

थोड़ी देर बाद मास्टर साहब रुखसत हो गए और दूसरे उस्तादजी के आने का वक्त हो गया. अब नाच की महफिल जम गई. नरगिस को बारबार महसूस हो रहा था, जैसे वह दिलशाद बेगम के कोठे पर बैठी है. उसी रात 11 बजे की बात है. इमराना ने नरगिस से कहा, ‘‘आओ, तुम्हें अपने दोस्तों से मिलाऊं.’’

नरगिस खुशीखुशी उस के साथ चली गई. बालरूम में महफिल जमी हुई थी. नरगिस का खयाल था, इमराना की सहेलियां होंगी, लेकिन यहां तो मामला ही दूसरा था, 4 लड़के बैठे थे.

डेक बज रहा था, फरहाना नाच रही थी. चारों लड़के सोफे पर बैठे दाद दे रहे थे. नरगिस ने सोचा, तमाशबीनों की कसर थी इस घर में, अब यह भी पूरी हो गई. सिर्फ नोट नहीं बरसाए जा रहे हैं. बाकी सब वही है, जिस से बच कर वह यहां आई थी. उसे यों लगा, जैसे सब कुछ वही है, सिर्फ कोठा बदल गया है. अब यह उस के बर्दाश्त से बाहर था. वह गुस्से से उठी और सीधे भाई के पास कमरे में पहुंच गई.

‘‘भाईजान, यह क्या माहौल बनाया है आप ने?’’

‘‘क्या हो गया?’’ रशीद अहमद घबरा कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं अभी बालरूम से आ रही हूं,’’ नरगिस ने बताया, ‘‘फरहाना डांस कर रही है और वह भी लड़कों के सामने.’’

‘‘ओह,’’ रशीद अहमद बुरी तरह हंसने लगा, ‘‘बस इतनी सी बात है? उन लोगों ने एक म्युजिकल ग्रुप बनाया है. प्रोग्राम करते हैं. किसी प्रोग्राम की रिहर्सल कर रहे होंगे.’’

‘‘भाईजान, आप की नजर में यह कोई बात ही नहीं है. लोग मुजरा देखने घरों से दूर जाते हैं, मगर यहां तो घर ही में मुजरा हो रहा है.’’

‘‘नजमा,’’ रशीद जोर से चीखा, ‘‘खबरदार, मेरी बच्चियों के शौक को मुजरा कहती हो? मैं ने तो सुन लिया, लेकिन सोचो, इमराना या फरहाना ने सुन लिया होता तो उन के दिलों पर क्या गुजरती. तुम्हारी भाभी पार्टी में गई हैं. अगर वह होतीं तो कितना बिगड़तीं तुम पर.’’

‘‘लेकिन भाईजान, क्या मैं सच नहीं कर रही हूं?’’

‘‘बिलकुल नहीं. म्यूजिक एक आर्ट है और मेरी बच्चियां आर्टिस्ट हैं. यह आर्ट उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाएगा.’’

‘‘नाम बदलने से मुजरा आर्ट बन सकता है, लेकिन रहेगा तो मुजरा ही.’’

‘‘क्या बेवकूफी की रट लगा रखी है. बड़े घरानों में इसे बुरा नहीं समझा जाता. अब तुम बड़े घर में आ गई हो. एडजस्ट होने की कोशिश करो.’’

‘‘बहुत अच्छा, भाईजान.’’

नरगिस सोच रही थी, क्या दिलशाद बेगम का कोठा भी बड़ा घर था? क्या वह घर छोड़ कर उस ने गलती की है? क्या वह एडजस्ट नहीं हो सकी थी? क्या वहां से आना उस की गलती थी?

बहुत दिनों बाद उस रात नरगिस फिर रोई. ये आंसू खुशी के नहीं, पछतावे के थे. नरगिस से नजमा बनने का पछतावा. अब उस ने तय किया कि वह इस घर के मामलों में दखल नहीं देगी.

दूसरे दिन शाम को घर में भूचाल आ गया. नौकरचाकर भागेभागे फिर रहे थे. शायद कोई अहम मेहमान आने वाले थे. मुमकिन है, इमराना या फरहाना में से किसी का रिश्ता आया हो. भाभी की जुबानी मालूम हुआ कि टीवी के प्रोड्यूसर फरहाना से मुलाकात के लिए आए हैं. कोई ड्रामा तैयार हो रहा है. वह फरहाना को उस में शामिल करना चाहते हैं.

नरगिस तो वहां जा कर नहीं बैठी, लेकिन जब वे चले गए तो भाभी ने उसे बताया, ‘‘शुक्र है, फरहाना की मेहनत वसूल हो गई. प्रोड्यूसर ने बताया कि वह एक ड्रामा तैयार कर रहे हैं, जिस में 2-3 मुजरे पेश किए जाएंगे. फरहाना उस ड्रामे में तवायफ बन कर मुजरा करेगी. अब देखना, कैसी शोहरत होती है उस की.’’

नरगिस जहर का घूंट पी कर रह गई.

प्रोड्यूसर और अदाकारों का आनाजाना बढ़ने लगा. फरहाना के दिमाग भी अर्श को छू रहे थे. सीधे मुंह बात ही नहीं करती थी. उठतेबैठते प्रोड्यूसर की तारीफें, अदाकारों के किस्से. फिर उस ड्रामे की शूटिंग शुरू हो गई. फरहाना रात गए वापस आती. सुबह होते ही फिर चली जाती.

 

उसी बीच जापान से नरगिस का दूसरा भाई हमीद आ गया था. नरगिस भाई की मोहब्बत में गुम हो गई. नरगिस ने उस से भी दबेदबे लफ्जों में फरहाना की शिकायत की, लेकिन उस का कहना भी यही था कि इस में कोई हर्ज नहीं है, यह मौडर्न जमाना है. और उस को नापसंद करने वाले दकियानूसी हैं. हमीद कुछ दिन रहने के बाद वापस चला गया. नरगिस फिर जैसे होश में आ गई. उसे होश आया तो मालूम हुआ, ड्रामा मुकम्मल हो गया है.

‘‘आज फरहाना का मुजरा प्रसारित होगा.’’ भाभी ने नरगिस को बताया.

पूरा घर टीवी के सामने मौजूद था. रशीद अहमद बारबार घड़ी की तरफ देख रहे थे. वक्त हुआ और ड्रामा शुरू हो गया. फिर वह सीन आया, जिस में मुजरा पेश किया जाना था. प्रोड्यूसर ने हकीकत का रंग भरने के लिए असली वेश्या बाजार में शूटिंग की थी. फरहाना बता रही थी, ‘‘यह सेट नहीं है, असली कोठा है.’’

चंद उच्छृंखल किस्म के जवान तकियों से टेक लगाए बैठे थे. बूढ़ी नायिका पानदान खोले बैठी थी. इतनी देर में फरहाना कैमरे के सामने आई. दाग की एक गजल पर उस ने नाचना शुरू किया. एक नौजवान बारबार उठता था और फरहाना शरमा कर कलाई छुड़ा लेती थी और फिर नाच शुरू हो जाता था.

‘‘वेलडन फरहाना.’’ डांस खत्म होने के बाद रशीद अहमद ने बेटी को मुबारकबाद दी.

‘‘खुदा करे, यह सीन मशहूर हो जाए.’’ भाभी ने बेटी को मुबारकबाद दी.

इमराना तो खुशी से फरहाना के गले लग गई.

नरगिस इस धूमधाम से बेपरवाह सोच रही थी. यह कैसा इंकलाब है. मैं कोठे पर सिखलाई जाने के बावजूद वहां नाच नहीं सकी, भाग आई. एक शरीफ घर की लड़की वहां पहुंच कर नाच आई. वही लोग, जो तवायफ को गाली समझते हैं, तवायफ की तरह नाचने पर अपनी बेटी को मुबारकबाद दे रहे हैं.

उस दिन तो फरहाना को होश ही नहीं था, लेकिन दूसरे दिन उस ने नरगिस से पूछा, ‘‘नजमा फूफी, कैसा था मेरा डांस?’’

‘‘डांस तो बाद की बात है, पहले यह बताओ कि उस वक्त तुम में और किसी तवायफ में कोई फर्क था?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘फर्क नहीं रहने दिया, यही तो मेरा कमाल था.’’ फरहाना ने जवाब दिया.

‘‘तुम करो तो कमाल. यही कमाल तवायफ करें तो समाज गाली देता है.’’

‘‘इसलिए कि तवायफ आर्टिस्ट नहीं होती.’’ फरहाना ने दलील दी.

‘‘बहुत खूब. मगर यह क्यों भूलती हो कि वे तुम से बड़ी आर्टिस्ट होती हैं. तुम से बेहतर नाच सकती हैं.’’

‘‘गलत. तवायफ तमाशबीनों को खुश करने की अदाएं जानती हैं, नाच क्या जानें?’’

‘‘तमाशबीनों को तो तुम ने भी खुश किया. देखा नहीं, तुम्हारे डैडी और तुम्हारी मम्मी कैसे खुश हो रहे थे. हालांकि उन्हें फिक्रमंद होना चाहिए था.’’

‘‘यह महज अदाकारी थी.’’

‘‘तवायफ भी तो अदाकारी करती है.’’

‘‘आप कहना क्या चाहती हैं?’’

‘‘यही कि उस वक्त तुम में और किसी तवायफ में कोई फर्क नहीं था, सिवाय इस के कि तुम अदाकारा भी थीं.’’

‘‘ऐसी घटिया सोच पर मैं इस के अलावा आप से क्या कह सकती हूं कि आप अनपढ़, जाहिल और गंवार हैं. आप इस फन की एबीसी भी नहीं जानतीं और चली हैं आलोचना करने.’’

‘‘जहां तक जानकारी की बात है फरहाना, तो मैं बता सकती हूं कि तुम ने कहांकहां गलती की है.’’

‘‘जिन उस्तादों से मैं ने सीखा है, उन की आप को हवा भी नहीं लगी है. पांव उठा कर चलना आता नहीं, चली हैं मेरी गलतियां निकालने.’’

‘‘मैं तुम्हारी गलतफहमी दूर कर दूं?’’

‘‘क्या करेंगी आप?’’

‘‘उस गजल की रिकौर्डिंग है तुम्हारे पास, जिस पर तुम नाची थीं?’’

‘‘है.’’

‘‘बालरूम में चलो और उसे बजाओ.’’

फरहाना की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या होने वाला है. उस ने कैसेट को प्लेयर में रख दिया और देखने लगी कि क्या होता है.

नरगिस का बदन हरकत में आया और उस के अंगों ने शायरी शुरू कर दी. वह नाच रही थी और फरहाना उसे हैरानी से देख रही थी. जिसे वह जाहिल, गंवार कह रही थी, वह उस वक्त माहिर नर्तकी नजर आ रही थी. फरहाना ने कई बार अपनी आंखों को मसला, लेकिन यह हकीकत थी, ख्वाब नहीं था.

‘‘फरहाना, इसे कहते हैं नाच.’’

‘‘नजमा फूफी, आप ने यह डांस कहां सीखा?’’

‘‘इसे छोड़ो कि यह डांस कहां सीखा, यह पूछो कि मैं ने इस वक्त डांस क्यों किया? तुम न भी पूछो तो मैं तुम्हें बताऊंगी. मैं ने यह अदना सा नमूना इसलिए पेश किया कि तुम यह जान लो कि नाच सिर्फ तवायफ पर सजता है. तुम घर की जन्नत छोड़ कर दोजख तक जाओगी, लेकिन नाच फिर भी नहीं आएगा. यह नाच मैं ने यह बताने के लिए किया है कि मैं नाच सकती हूं, लेकिन मैं इस पर फख्र नहीं करती. फख्र करती हूं शराफत के उस आंचल पर, जो इस वक्त भी मेरे सिर पर है. आर्ट के नाम पर खुद को धोखा मत दो. तुम्हारा आर्ट हमारी शराफत और पाकीजगी है, जो तुम कहीं रख कर भूल गई हो. तुम्हें नाच इसलिए नहीं आ सकता, क्योंकि तुम तवायफ बनने की अदाकारी तो कर सकती हो, पर वह जख्म कैसे खाओगी, जो तवायफ के दिल पर रोज लगते हैं. अब भी वक्त है, लौट आओ. इसलिए कि तवायफ जब बगावत करती है तो किसी शरीफ घराने में पनाह लेती है. तुम बगावत करोगी तो कहां जाओगी? कुछ सोचा? सोच लो तो मुझे बता देना.’’

फरहाना सोचती तो क्या, उस ने तो पूरे घर में ऐलान कर दिया कि उस ने एक आर्टिस्ट खोज लिया है. यह खबर रशीद अहमद तक कैसे नहीं पहुंचती. रशीद ने पूछा, ‘‘सुना है, तुम डांस बहुत अच्छा करती हो?’’

‘‘मजबूरियां जब हद से बढ़ जाएं तो नाच बन जाती हैं.’’ नरगिस बोली.

‘‘तुम्हें यह फन भी आता है, मुझे मालूम ही नहीं था.’’

‘‘मालूम होता भी कैसे, मेरे कदम तो भाई की चारदीवारी में हैं.’’

‘‘फन और खुशबू को छिपे नहीं रहना चाहिए. तुम कहो तो मैं कोशिश करूं. एमडी से ले कर चेयरमैन तक सब से परिचय है.’’

‘‘अब मुझ में भागने की हिम्मत नहीं है.’’

‘‘यह तुम किस किस्म की बातें कर रही हो? सोचो तो, तुम्हारी तसवीरें अखबारों की जीनत बनेंगी. मशहूर हो जाओगी. तुम्हारे साथ मेरी शोहरत भी होगी.’’

नरगिस को लगा, जैसे उस का भाई नहीं, गुलजार खां सामने खड़ा है, जो फिर एक शरीफ घर की लड़की को उठाने आ गया है. वह गौर से उन्हें देख रही थी.

‘‘मगर तुम ने यह फन सीखा कहां से?’’ रशीद ने पूछा.

‘‘सुन सकेंगे?’’

‘‘अरे भई, यकीनन किसी अच्छे उस्ताद का नाम आएगा, सुनेंगे क्यों नहीं.’’

‘‘मेरी उस्ताद थीं दिलशाद बेगम और मैं ने यह फन लाहौर की हीरा मंडी (वेश्या बाजार) में 15 साल की लगातार मेहनत से सीखा है.’’

‘‘क्या… तो तुम…?’’

‘‘हां, भाईजान, मैं तवायफ थी और शराफत की तलाश में अपने वारिसों के साए में पनाह लेने आई थी.’’

‘‘आहिस्ता बोलो. किसी ने सुन लिया तो क्या कहेगा. मेरी इज्जत खाक में मिल जाएगी.’’

‘‘कह दीजिएगा, फरहाना की तरह अदाकारी कर रही है.’’

‘‘खामोश, मेरी बेटी का नाम अपने साथ न लो. अगर तुम पहले यह सब कुछ बता देतीं तो मैं अपने घर के दरवाजे बंद कर लेता. वैसे भी तुम हमारे लिए मर चुकी थीं.’’

‘‘तो बंद कर लीजिए. यों भी मुझे जिस घर की तलाश थी, यह वह घर नहीं है.’’

‘‘दरवाजे अब बंद करूंगा तो दुनिया से क्या कहूंगा?’’

‘‘कह दीजिएगा कि तवायफ थी, निकाल दिया.’’

‘‘बहुत खूब, मैं अपने मुंह पर खुद कालिख मल दूं.’’

‘‘मैं अगर आप के मशविरे पर अमल कर के आर्ट के नाम पर नाचने का प्रदर्शन करूं, तो आप का मुंह सलामत रहेगा?’’

‘‘वह और बात होगी.’’

‘‘मगर इस तरह मेरे मुंह पर कालिख मल जाएगी. दिलशाद बेगम कहेगी, शाबाश, नरगिस बेगम, शाबाश. तू ने कोठा छोड़ दिया, पेशा नहीं छोड़ा. जो काम मैं तुम से नहीं ले सकी, तेरे सगे भाई ने ले लिया.’’

रशीद सिर झुका कर अपने कमरे में चला गया और नरगिस अपने कमरे में आ गई.

दोपहर का वक्त था. सब अपनेअपने कमरों में थे. नरगिस खामोशी से उठी. ड्राइंगरूम में रखी हुई रशीद अहमद की तसवीर अपनी चादर में छिपाई और खामोशी से बाहर आ गई.

‘‘बीबीजी आप…’’ दरबान ने पूछा.

‘‘हां, मैं जरा पड़ोस में जा रही हूं. कोई पूछे तो बता देना.’’

नरगिस सड़क पर आई और एक टैक्सी को हाथ दे कर रोका, ‘‘स्टेशन चलो.’’

स्टेशन पहुंच कर नरगिस ने एक कुली से बुकिंग औफिस का पता पूछा. चंद औरतें खिड़की के सामने खड़ी थीं. वह भी खड़ी हो गई.

‘‘कहां की टिकट दूं?’’

‘‘मुलतान.’’

टिकट ले कर गाड़ी का वक्त पूछा और प्लेटफार्म पर आ गई. आज वह फिर एक गुलजार खां से, एक दिलशाद बेगम से बच कर भाग रही थी. हरम गेट, मुलतान- अपनी मांजी के पास. Hindi stories

   लेखक – डा. साजिद अमजद