Social Story: पाकिस्तान के योग गुरू शमशााद हैदर

Social Story: शमशाद हैदर उस मुल्क में लोगों को योग सिखा रहे हैं, जहां योग को मजहबी आईने से देखा जाता है. कट्टरपंथियों ने उन्हें योग न सिखाने की धमकियां भी दीं लेकिन…

भोर होते ही शमशाद हैदर हरेभरे पेड़ों के बीच बने ग्राउंड में पहुंच गए. पूरे ग्राउंड पर हरी मखमली घास थी. उस पर जमी शबनम की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं. पक्षियों की चहचहाहट भी शुरू हो गई थी. भोर का वक्त वाकई अंतरमन को सुकून पहुंचाता है. उस वक्त हवाएं ताजगी से लबरेज होती हैं और फिजा बिलकुल शांत. लगता है कि जैसे प्रकृति बांहें फैला कर इंसान का इस्तकबाल कर रही हो. वक्त का दायरा बढ़ना शुरू हुआ तो उस मैदान में लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया. आने वाले ज्यादातर शख्स कुरतापाजामा पहने हुए थे. उन के चेहरे पर दाढ़ी थी और सिर पर जालीदार टोपी. वहां जो भी आ रहा था वही हैदर को बड़े अदब के साथ अस्सलामु अलैकुम कर रहा था.

हैदर भी मुसकरा कर उन का स्वागत करते हुए ‘वालेकुम अस्सलाम मियां, तशरीफ लाइए,’ कह रहे थे. दुआसलाम के दौरान वह लोगों की खैरखबर भी पूछ रहे थे. आगंतुकों में युवा व अधेड़ परदानशीं महिलाएं व चंद बच्चे भी शरीक थे. कुछ ही देर में वहां आए सभी लोग 4-5 कतारों में साथ लाई चटाई व चादर बिछाने के बाद उस पर पालथी लगा कर बैठ गए. इन कतारों में से एक अलग कतार महिलाओं की भी थी. हैदर भी एक सफेद चादर बिछा कर ठीक उन के सामने बैठ गए थे और अनुलोम विलोम व प्राणायाम के बाद उन्होंने विभिन्न आसन करने शुरू कर दिए. वह जैसा करते, लोग भी वैसा कर रहे थे. करीब एक घंटे बाद यह सिलसिला थम गया. लोग जाने लगे, तो एक बुजुर्ग शख्स शमशाद हैदर के नजदीक आ कर समझाने वाले अंदाज में बोले, ‘‘खबरदार भी रहा कीजिए हैदर मियां.’’

‘‘इंसानियत के दुश्मनों से क्या डरना चचा. फिर मैं तो नेकी की राह पर चल रहा हूं.’’ हैदर ने मुसकरा कर जवाब दिया, तो बुजुर्ग थोड़ा उत्तेजित हो गए. वैसे उन का यह अंदाज हैदर के लिए तो कतई नहीं था.

उन्होंने हाथ नचा कर कहा, ‘‘अरे यही नेकियां तो जालिमों के दिलों में छाले पैदा करती हैं. अब, सलीम का ही मसला लो, उस का क्या कुसूर था कि उन जालिमों ने उसे मारापीटा और उस के घर को भी आग के हवाले कर दिया. यह तो शुक्र है कि उस बेचारे की किसी तरह जान बच गई. वो तो ऐलानिया तौर पर कह रहे थे कि किसी को ऐसा नहीं करने देंगे. उन्हें लगता है कि योग पर हिंदुस्तान की मजहबी मुहर लगी है.’’

‘‘यही तो गलतफहमी है चचा. हकीकत में तो योग मजहबी बंदिशों से आजाद कला और विज्ञान है.’’ हैदर बोले.

‘‘ठीक है हैदर मियां अब चलता हूं. तुम्हें समझाना मैं ने अपना फर्ज समझा.’’ कहते हुए बुजुर्ग वहां से रुखसत हो गए.

दरअसल इस तरह का योगाभ्यास करना या सिखाना हिंदुस्तान में तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन जिस जगह हैदर यह सब करा रहे थे वह आतंकपरस्त पाकिस्तान के प्रमुख शहर इस्लामाबाद की सरजमीं थी. कट्टरपंथी ताकतें इस के सख्त खिलाफ थीं. यही वजह थी कि लोगों को योग से जोड़ने की कोशिश करने वाले लाहौर के बाशिंदे सलीम के साथ कट्टरपंथियों ने एक दिन न केवल मारपीट की बल्कि उस के आशियाने को भी आग के हवाले कर दिया.

यूं तो हैदर भी कुछ ऐसे लोगों की धमकियों के शिकार थे, लेकिन इस के बावजूद भी वह न केवल खुद योग कर रहे थे बल्कि लोगों को भी सिखा रहे थे. उस रोज भी वह इस्लामाबाद शहर के उस ग्राउंड में लोगों को योग सिखाने पहुंच गए थे. योग से अनेक लोगों को लाभ हो रहा था, इसलिए उन के शिविर में लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही थी. कट्टरपंथी योग को भी हिंदुस्तानी देन समझते थे, इसलिए वे इस का विरोध कर रहे थे. जबकि शमशाद हैदर की फितरत अलग थी. वह नहीं मानते थे कि योग पर सिर्फ हिंदुस्तान का हक है. उन्होंने मजहबी मुकाम से ऊपर उठ कर विज्ञान के नजरिए से उसे देखा था.

पहले उन्होंने हिंदुस्तान, नेपाल, तिब्बत जा कर खुद योग की बारीकियों को सीखा था. फिर अपने मुल्क में आ कर लोगों को सिखाने लगे. शुरुआती दिक्कतों के बाद हजारों लोग उन से जुड़ गए और वह बन गए योगा टीचर. शमशाद हैदर ने कभी खुद भी नहीं सोचा था कि वह ऐसे मुकाम पर पहुंच जाएंगे. दरअसल मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे शमशाद हैदर पाकिस्तान के पंजाब सूबे के बाशिंदे थे. लेकिन वर्षों पहले उन के वालिदैन रावलपिंडी के नजदीकी शहर इस्लामाबाद में आ कर बस गए थे.

मर्गल्ला पहाड़ी के किनारे बसे करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस शहर को पाकिस्तान के महंगे शहर के रूप में जाना जाता है. इस शहर को पार्कों का नगर भी कहा जाता है. मशहूर पार्क फातिमा जिन्ना, जापानी पार्क, शकरपडि़आ यहीं पर हैं. यहां प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय भी है. सन 1992 के बाद की बात है. हैदर अपेंडिक्स के दर्द से पीडि़त हो गए. उन्होंने डाक्टरों को दिखाया. डाक्टरों द्वारा दी गई दवा से दर्द तो कुछ वक्त के लिए ठीक हो जाता था, लेकिन स्थाई समाधान नहीं हुआ. उस से वह तनावग्रस्त रहने लगे. वह आधाशीशी के दर्द से भी पीडि़त हो गए.

हैदर के लिए यह तकलीफों का दौर था. एक दिन उन्हें एक चिकित्सक ने बताया कि यदि वह अपने दिमाग और शरीर पर नियंत्रण कर लें, तो उन्हें समस्या से स्थाई राहत मिल सकती है. चिकित्सक ने सलाह तो दे दी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था. उन्होंने इस की पुरजोर कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सके. उन्हें किसी ने बताया कि योग एक ऐसी कला है, जिस के द्वारा इस तरह के मरीजों को लाभ मिल जाता है. पाकिस्तान में लोग योग को जानते तक नहीं थे. उन्होंने योग के बारे में थोड़ाबहुत पढ़ कर अपने स्तर से जैसा हो सकता था योग किया, इस से उन्हें फौरी राहत मिली, तो उन्होंने फैसला कर लिया कि वह न सिर्फ योग सीखेंगे बल्कि लोगों को भी सिखा कर उन्हें बीमारियों से निजात दिलाएंगे.

यह फैसला लेने के बाद उन्होंने योग विषय को पढ़ना शुरू किया. उन्होंने योग सीखने के लिए सब से पहले नेपाल और तिब्बत का रुख किया. वहां रह कर योग सीखा. इस से कुछ ही दिनों में उन्हें अपने अंदर ढेरों बदलाव महसूस हुए. योग के मामले में संस्कृति व आयुर्वेद प्रधान भारत देश आगे था. इस का एक बड़ा इतिहास था. यह बात उन्हें पता चल चुकी थी. हैदर की सोच थी कि इल्म जहां से भी मिले, उसे ले लेना चाहिए. नतीजतन उन्होंने योग की गहराइयों को जानने के लिए वीजा बनवा कर भारत का रुख किया. सन 2005 में वह विश्वविख्यात आध्यात्मिक गुरु सत्य नारायण गोयनका के नासिक के इगतपुरी स्थित सेंटर में आ गए.

भारत के अलावा कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड, बर्मा (अब म्यांमार), नेपाल समेत कई देशों में गोयनका के सेंटर थे. किसी पाकिस्तानी की योग में इस तरह रुचि देख कर वह भी हैरान हुए. उन्होंने उन्हें योग की बारीकियां पूरे मनोयोग से सिखाईं. नतीजतन एक दिन हैदर एक अच्छे योगी बन गए. पाकिस्तान आ कर हैदर चंद लोगों को योगासन सिखाने लगे. उन्हें लगा था कि यह बात किसी को नागवार नहीं गुजरेगी, लेकिन जब कट्टरपंथी लोगों को यह पता चला कि हैदर पड़ोसी मुल्क से योग सीख कर आए हैं तो उन के प्रति दिलों में नाराजगी बढ़ गई. कट्टरपंथियों के लिए जैसे यह नाकाबिले बरदाश्त था.

इंसान के पास ऐसा कोई हुनर नहीं होता कि वह लोगों के दिलों की बात जान कर हर किसी को खुश रख सके. हैदर को भी लगा कि सभी उन से संतुष्ट कैसे हो सकते हैं. परेशानी तब हुई जब एक दिन कुछ लोगों ने हैदर को बीच राह रोक लिया. पहली ही नजर में वह जान गए कि उन के इरादे नेक नहीं हैं. उन में से एक हैदर से मुखातिब हुआ, ‘‘सुना है आजकल लोगों को कुछ सिखा रहे हो मियां.’’

हैदर ने शांत अंदाज में जवाब दिया, ‘‘जी.’’ इतने में दूसरा शख्स सख्त लहजे में बोला, ‘‘जानते हो, तुम ऐसे मुल्क की बातें सिखा रहे हो जो हमारा सब से बड़ा दुश्मन है.’’

‘‘ऐसा नहीं है. लोगों को जो सिखा रहा हूं वह सिर्फ हिंदुस्तान की बात नहीं बल्कि सेहत को दुरुस्त रखने की एक कला है. अब आप ही बताओ कि अपनी सेहत को दुरुस्त रखना कौन सा गुनाह है?’’

‘‘जो भी हो सुधर जाओ हैदर मियां वरना यह तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा.’’ उन्होंने धमकी दी.

उन लोगों से ज्यादा उलझना हैदर ने ठीक नहीं समझा. इसलिए वह वहां से चुपचाप चले गए. लोग इस इतिहास को भी नहीं जानते थे कि योग के पुरातन गुरु पतंजलि का जन्म पाकिस्तान के ही मुलतान इलाके में हुआ था. हैदर ने कट्टरपंथियों के खौफ को अपने ऊपर काबिज नहीं होने दिया. उन्होंने ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी और अपने साथ अमन व सेहतमंद लोगों को जोड़ना शुरू कर दिया. धीरेधीरे उन्होंने एक समूह बना लिया. योग से लोगों को फायदा होना शुरू हुआ, तो वह हैदर की प्रशंसा करने लगे. एकएक कर के वह उन से जुड़ते चले गए.

समूह चीटियों का हो या इंसानों का, वह हमेशा ताकतवर होता है. हैदर के मामले में भी ऐसा ही हुआ. उन की पहचान बढ़ने लगी और वह छोटे पार्कों से ले कर बड़े ग्राउंड में जा कर योग सिखाने लगे. फिर उन्होंने इसे पेशे के तौर पर भी अपना लिया. जो लोग निजी तौर पर उन से योग सीखना चाहते थे, उन से उन्होंने फीस लेनी शुरू कर दी. हैदर से पुरुषों के अलावा कई महिलाएं व लड़कियां भी योग सीखती थीं. उन की शख्सियत एक अच्छे इंसान के रूप में थी. मोहब्बत का कोई वक्त, उम्र या जगह पहले से मुकर्रर नहीं होती. यह अपने आप हो जाया करती है.

योग सिखाने के दौरान ही हैदर की मुलाकात एक युवती शुमाइला से हुई. शुमाइला अस्थमा से पीडि़त थी और हर सुबह उन से योग सीखने आती थी. हैदर ने अपना ध्यान उन पर लगा दिया. शुमाइला को कुछ दिनों में बीमारी से निजात मिल गई. हैदर से वह खासी प्रभावित हुई. वक्त की रफ्तार के बीच दोनों ने एकदूसरे के दिलों पर कब चुपके से दस्तक दे दी इस का खुद उन्हें भी तब पता चला जब दीदार की चाह में उन की नजरें बेकरार रहने लगीं और दिलोदिमाग में बारबार एकदूसरे के खयाल आने लगे. मुलाकात के दौरान उन के दिल की धड़कनों में इजाफा हो जाता. चाहतों का अंदाज कभी बातों से तो कभी आंखों की गहराइयों से होता है.

आंखें अल्फाज नहीं देतीं, लेकिन बेजुबान हो कर भी बहुत कुछ बयां कर जाती हैं. बेकरारी बरदाश्त से बाहर होने लगी तो एक दिन दोनों ने इजहार भी कर दिया. दोनों के बीच मोहब्बत का पौधा खिला, तो हसरतों में ऐसा इजाफा हुआ कि उन्हें एकदूसरे में अपनी दुनिया नजर आने लगी. बेकरारी के करार के लिए दोनों परिवारों की रजामंदी से हैदर ने शुमाइला को सन 2012 में अपनी शरीक-ए-हयात बना लिया. अब उन की जिंदगी में जैसे खुशियों का दरख्त लहरा गया था. शुमाइला चूंकि खुद अच्छे से योग सीख चुकी थीं इसलिए उन्होंने भी महिलाओं को योग सिखाना शुरू कर दिया. योग को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने एक संस्था बना ली. फिर वक्त ने उन की ख्याति को एक बड़ा मुकाम बख्श दिया.

45 वर्षीय शमशाद की ख्याति मुसलिम योग अध्यापक के रूप में हो गई. उन की शोहरत योग गुरू के रूप में इतनी बढ़ गई कि अब संभ्रांत तबके के हजारों लोग उन से योग सीख रहे हैं. इन में कई विभागों के अधिकारी, इंजीनियर, डाक्टर, व्यवसाई व आम आदमी शामिल हैं. वह स्कूलों में जा कर भी बच्चों को योग की शिक्षा देते हैं. 10 हजार से ज्यादा छात्र उन से योग सीख कर आगे बढ़ रहे हैं. उन से योग सीखने वालों में राजनीतिज्ञ व पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के खिलाड़ी भी हैं. हैदर के शिष्यों में सिंध प्रांत चीफ मिनिस्टर सैयद कईम अली शाह और गवर्नर गुलाम मुस्तफा खार भी शामिल हैं.

इस्लामाबाद व लाहौर जैसे शहरों के पार्कों में मुसलिम लोगों का योग करना अब आम बात है. हजारों लोगों को योग सिखा कर पाकिस्तान में बड़ा नाम बन चुके अमनपसंद योगी शमशाद हैदर कहते हैं कि शह और मात व दुश्मनी का खेल कोई मजहब नहीं सिखाता. विज्ञान और प्रकृति कभी मजहबी नहीं होते. लोगों को मोहब्बत से रहना चाहिए. Social Story

—कथा पात्रों से बातचीत पर आधारित॒॒॒॒॒॒

 

True crime Story: भंग हुए सपनों के कंकाल

True crime Story: सुरजीत सिंह ने अपनी एकलौटी बेटी बरखा की शादी ब्रिटेन में रहने वाले एनआरआई जसबीर से इसलिए की थी ताकि उस की जिंदगी हंसीखुशी से कट सके. लेकिन ब्रिटेन पहुंचने पर उसे पति की सच्चाई पता चली तो…

रात का दूसरा पहर अपने अंतिम पड़ाव पर था. बावजूद इस के बिस्तर पर लेटी बरखा की आंखों से नींद कोसों दूर थी. नींद आती भी तो कैसे? एक एनआरआई लड़के के साथ अगले दिन उस की सगाई जो होने वाली थी. इसलिए उस की आंखों में नींद की जगह हसीन ख्वाबों ने डेरा जमा रखा था. वह पलकें बंद किए रहरह कर मुस्कराए जा रही थी. वह खुद भी नहीं चाहती थी कि वे ख्वाब उस की आंखों से दूर हों. आखिर उसे एक अजीब से आनंद की अनुभूति जो हो रही थी. समय कब रुकता है. वह तो अपनी गति से सरकता जा रहा था. रात का तीसरा और फिर चौथा पहर भी यूं ही गुजर गया. सुबह के उजाले ने दस्तक दे दी थी. अन्य दिनों की अपेक्षा उस दिन उस ने कुछ पहले ही बिस्तर छोड़ दिया.

उस के चेहरे पर ताजगी देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह रात भर सोई नहीं थी. चेहरे पर मुस्कराहट अब भी कायम थी. दिल उमंगों से भरा था और रोमरोम रोमांचित हो रहा था. बरखा रानी पंजाब के होशियारपुर जिले के रहने वाले सुरजीत सिंह की इकलौती बेटी थी. यही कारण था कि वह सब की लाडली थी. वह सुंदर तो थी ही साथ ही पढ़ने में तेज थी. उस का हंसमुख व चंचल स्वभाव सभी को पसंद था. उस ने संस्कारों का दामन सदा थामे रखा था, तभी तो कभी कोई ऐसा कदम उठाने की गलती नहीं की, जिस से किसी को उस के चरित्र पर अंगुली उठाने का मौका मिले.

यही कारण था कि मांबाप भी उस पर पूरा भरोसा करते थे. एमए करने के बाद बरखा टीचर बनना चाहती थी, पर उस के पिता सुरजीत सिंह नहीं चाहते थे कि बेटी शादी से पहले नौकरी करे. वह चाहते थे कि पढ़ालिखा कर उस की शादी अपनी ही बिरादरी के किसी ऐसे संस्कारी युवक से करें, जो विदेश में रह कर खूब कमाता हो ताकि बेटी सुखी रह सके. उन के कई रिश्तेदार और परिचित विदेश में रहते थे. उन से भी उन्होंने बरखा के लिए कोई एनआरआई लड़का देखने के लिए कह दिया था. कुछ दिनों बाद उन के एक रिश्तेदार ने उन्हें बरखा के लिए एक लड़का बताया. वह अच्छा पढ़ालिखा होने के साथ संस्कारी भी था और ब्रिटेन में रह कर अच्छा कमा रहा था.

उस युवक का नाम था जसबीर राम गिंडे. वैसे जसबीर भी पंजाब का ही रहने वाला था. वहीं से उस ने बीटेक की पढ़ाई की थी. फिर आईटी क्षेत्र में महारत हासिल कर के वह ब्रिटेन चला गया था. वहां आईटी औफिसर के पद पर उस की नौकरी स्काटलैंड के रायल बैंक में लग गई थी. 2 साल बाद जब वह वहां ठीक से स्थापित हो गया तो अपने परिवार को भी वहीं ले गया. उस के परिवार में मांबाप के अलावा एक छोटी बहन थी. उस ने विक्टरी लेन, रीड्सवुड में एक बंगला भी खरीद लिया था. बंगला खरीदने में उस के पिता ने भी अपनी जमीन बेच कर उस की आर्थिक मदद की थी.

जसबीर गिंडे 28 साल का हो गया था. सो उस के मातापिता चाहते थे कि जल्दी से उस के सिर पर सेहरा बांध दें. बेटे का घर बसाने के बाद वह बेटी के भी हाथ पीले करना चाहते थे. क्यों कि वह भी 26 साल की हो चली थी. वैसे वह बेटी की शादी पहले करनी चाहते थे. लेकिन उस ने शर्त रखी थी कि वह भाभी के आने बाद ही घर से विदा होगी. जसबीर शादी नहीं करना चाहता था, पर मांबाप की इच्छा के आगे उसे झुकना पड़ा. यह अक्टूबर, 2012 की बात है. पिता के कहने पर जसबीर शादी के उद्देश्य से परिवार सहित भारत आया था. पहली नजर में ही उसे बरखा की खूबसूरती भा गई.

उस के मातापिता व बहन को भी बरखा पसंद आ गई थी. वहीं बरखा व उस के मातापिता को भी जसबीर और उस का परिवार पसंद आ गया था. इसलिए उन का रिश्ता तय हो गया. उसी समय यह बात भी तय हो गई कि शादी यानी आनंदकारज की रस्म मार्च, 2013 में होगी. रिश्ता पक्का होने के बाद जसबीर और बरखा करीब एक सप्ताह साथ घूमेफिरे, ताकि एकदूसरे को और अच्छे से जान सकें. इस दौरान दोनों ही खुश और संतुष्ट थे. जसबीर को लगा कि बरखा उस के लिए एक सफल जीवनसाथी सिद्ध होगी. वहीं बरखा को भी लगा कि उस ने जिस तरह के युवक के साथ जिंदगी जीने का ख्वाब देखा था, जसबीर वैसा ही है.

करीब 15 दिन भारत में रह कर जसबीर परिवार के साथ ब्रिटेन लौट गया. जाते समय बरखा ने उस से मुस्करा कर कहा था, ‘‘मैं तुम्हारा सेहरा बांध कर आने का इंतजार करूंगी.’’

बरखा और जसबीर की फोन पर अकसर बातें होती रहती थीं. इसी तरह वक्त गुजरता गया. मार्च, 2013 का महीना भी आ गया. शादी की तारीख से एक सप्ताह पहले ही जसबीर का परिवार भारत आ गया. आते ही वह बरखा से मिला. दोनों ने घंटों साथ बिताए. इस के बाद बरखा की नींद गायब हो गई. नींद की जगह जसबीर की यादों ने ले ली थी. सगाई तय होने के अगले दिन दोनों गुरुग्रंथ साहिब के समक्ष गुरुद्वारे में सात फेरों के बंधन में बंध गए. एक सादा समारोह में शादी करने के बाद दोनों परिवारों की तरफ से एक बैंक्वेट हाल में रिसैप्शन दिया गया, जिस में करीब 700 लोगों ने शिरकत की.

घर से विदा होने के बाद वह जसबीर के पुश्तैनी मकान में पहुंची. वहां वह 2 दिन ठहरने के बाद मायके लौट आई. जसबीर के परिवार को ब्रिटेन लौटना था. इसलिए उन्होंने हनीमून भी नहीं मनाया था. उन्होंने तय किया था कि वे ब्रिटेन पहुंच कर ही हनीमून मनाएंगे. बरखा का पासपोर्ट तो बन चुका था, पर वीजा नहीं मिला था. इस कारण दोनों के बीच फिर से सात समुद्र की दूरी बन गई. पर उन के साथ कुछ हसीन यादें थीं. जिनके सहारे और मोबाइल पर बात कर के उन का वक्त कटता रहा.

इस दौरान जसबीर की बहन के लिए भी अच्छा लड़का मिल गया तो उस की सगाई भी तय कर दी गई. बहन की शादी से पहले ही जसबीर पत्नि का वीजा लगवाने की कोशिश करने लगा. आखिर 6 महीने बाद अगस्त में बरखा को वीजा मिल गया. वीजा मिलने के बाद जसबीर और उस का परिवार तो खुश था, बरखा की खुशी का भी ठिकाना नहीं था. वह भारत से ही दुलहन की तरह सजधज कर ब्रिटेन पहुंची. वहां एयरपोर्ट पर जसबीर उसे लेने आया. पति को देख कर उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह उस के गले लग गई. खुशी के कारण उस की आंखों से आंसू छलक आए.

बरखा जब जसबीर के विक्टरी लेन स्थित घर पर पहुंची तो उस के स्वागत में परिवार के सभी लोग खड़े मिले. मेन दरवाजे पर एक फीता बंधा था और पूरे घर को दुलहन की तरह सजाया गया था. बरखा ने जैसे ही फीता काटने की रस्म अदा की तो सभी ने ताली बजा कर, नाचगा कर खुशी का इजहार किया. पूरे परिवार ने दिल खोल कर बरखा का इस तरह स्वागत किया, जिस की कल्पना तक बरखा ने नहीं की थी. जसबीर ने उसे तोहफे की टोकरी देते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा नए घर में स्वागत है.’’ इस पर बरखा मंदमंद मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी. उन के इस अपनेपन में वह अपने वतन, अपने घरवालों की याद को भी बिसरा बैठी थी. वह अपने भाग्य पर इतरा रही थी.

बरखा के आने से घर का माहौल ही बदल गया था. उस के आने के चौथे दिन ही उस की ननद यानी जसबीर की छोटी बहन की शादी होनी थी. इस खुशी में बरखा के आने से चार चांद लग गए थे. बरखा ने इस तरह सारा घर संभाल लिया था, जैसे वह वहां बरसों से रह रही हो. ननद की शादी की तैयारी उस ने अपने हाथों से की. यहां तक कि ननद को सजाया भी उस ने ही. बहन की शादी के बाद तीसरे दिन जसबीर और बरखा हनीमून के लिए लंदन चले गए. दोनों ने एक सप्ताह खूब सैर की, खूब आनंद उठाया. इस दौरान जसबीर ने बरखा को ऊपरी तौर पर तो प्यार किया. उस की हर खुशी का खयाल भी रखा, पर उस ने पतिपत्नी के बीच बनने वाले सुख का अहसास उसे नहीं करवाया. बरखा ने भी इस बात पर ज्यादा गौर नहीं किया.

हनीमून से लौट कर दोनों खुश थे. फिर जसबीर अपनी नौकरी पर जाने लगा. अपनी नई जिंदगी की शुरुआत के साथ जसबीर अपने और बेहतर भविष्य की तलाश में भी लग गया. वह बैंक की नौकरी छोड़ कर लंदन स्थित फाइनेंशियल ओंबड्समैन सर्विस में नौकरी पाने की कोशिश करने लगा. बरखा का दिन घर के काम और सासससुर की देखभाल में बीत जाता, तो रात को उसे उम्मीद होती कि पति उसे औरतपन के सुख से अवगत कराएगा, पर ऐसा नहीं होता तो उसे थोड़ा दुख होता. पर उस ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया.

बरखा की कई बार रात को आखें खुलीं तो उस ने पति को किसी से मोबाइल पर बात करते हुए पाया. एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘आखिर इतनी रात को किस से बात करते हो? क्या कोई और लड़की है तुम्हारी जिंदगी में? अगर ऐसा है, तो मुझे साफसाफ बता दो.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल, मैं दोस्तों से बात करता हूं. दिन में तो काम की वजह से समय मिल नहीं पाता. इस कारण रात को तसल्ली से बात कर लेता हूं.’’ जसबीर ने सफाई दी.

‘‘लाओ, जरा अपना फोन दिखाओ.’’ बरखा ने सच्चाई जानने की कोशिश की.

जसबीर ने एक पल भी नहीं गंवाया, न ही किसी प्रकार की नानुकुर की. उस ने अपना मोबाइल पत्नी के हाथ में थमा दिया. बरखा ने काल डिटेल्स की जांच की. उस ने देखा कि जिस नंबर पर जसबीर ने रात को बात की थी, वह किसी अंगरेज युवक का था. उस के मोबाइल में किसी भी लड़की के नाम से कोई नंबर सेव नहीं था. इस से वह संतुष्ट तो हो गई, पर उसे यह बात खलती रही कि उसे जसबीर पर शक नहीं करना चाहिए था.

‘‘देख लिया.’’ जसबीर ने कहा, ‘‘मेरा भरोसा करो. मेरा किसी लड़की से किसी तरह का संबंध नहीं है. यकीन करो कि आज तक मैं ने कभी किसी लड़की को नजर भर कर देखा तक नहीं है. मेरी जिंदगी में आने वाली तुम पहली और आखिरी लड़की हो. मैं भरोसा दिलाता हूं कि कभी तुम्हारा भरोसा नहीं टूटने दूंगा.’’

जसबीर की बात से बरखा संतुष्ट थी. उसे पूरा यकीन हो गया था कि जसबीर सही बोल रहा है. एक शाम औफिस से आने के बाद जसबीर कहीं जाने के लिए तैयार होने लगा तो बरखा ने पूछ ही लिया, ‘‘कहां जा रहे हो?’’

‘‘अरे हां, मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गया. दरअसल, मैं एक क्लब का मेंबर हूं. वहां आज रात हम दोस्तों ने पार्टी रखी है. वहीं जाना है. मैं रात को घर नहीं आऊंगा. तुम चिंता मत करना.’’ जसबीर ने कहा. बरखा को जसबीर की बात पर कोई शक नहीं था. इस कारण उस ने ज्यादा पूंछताछ नहीं की. जसबीर तैयार हो कर चला गया.

रात में सासससुर को खाना खिलाने के बाद रसोई साफ करके बरखा भी सोने चली गई. सुबह उस के उठने से पहले ही कालबेल बजी तो उसी ने दरवाजा खोला, उस का पति लौटा था. बरखा ने महसूस किया कि जसबीर के चेहरे पर खुशी और संतुष्टी के भाव थे. वह बेहद उत्साहित दिख रहा था. उसने प्यार से बरखा को चूमते हूए कहा, ‘‘खूब मजा आया रात दोस्तों के साथ मस्ती कर के.’’

इस पर बरखा मुस्करा दी और उस के लिए रसोई में चाय बनाने चली गई. जसबीर के बंगले में 4 कमरे थे. एक ड्राईंगरूम और 3 बेडरूम. एक बेडरूम जसबीर के मातापिता के लिए था. दूसरा जसबीर और बरखा के लिए. तीसरा बेडरूम जसबीर की बहन का था. जो उस की शादी के बाद खाली रहता था. यह बेडरूम जसबीर व बरखा के बेडरूम के बराबर में ही था. 11 सितंबर, 2013 की रात करीब 2 बजे की बात है. प्यास महसूस होने पर बरखा की नींद टूटी तो उस ने पाया कि जसबीर बेड पर नहीं था. जबकि वह उस के साथ ही सोया था. उस ने सोचा कि शायद बाथरूम गया होगा. पानी पीने के बाद उस की आंख तुरंत नहीं लगी. वह करवटें बदलती रही. इसी बीच उसे तरहतरह की अवाजें सुनाई देने लगीं. वह चौंकी. उठ कर इधरउधर देखा. कहीं कोई नहीं था.

वह सोच में पड़ गई. फिर उस ने सोचा कि पति ही बाथरूम में स्पीकर औन कर के अपने किसी दोस्त से बतिया रहा होगा. क्योंकि वह दोस्तों से रात में ही बातें करता था. तभी उस की नजर मेज पर रखे मोबाइल पर गई. मोबाइल पति का ही था. वह चौंकी कि जब मोबाइल यहां है तो वो बाथरूम में किस से बातें कर रहा है. वह बिस्तर से उठी और बाथरूम का दरवाजा खटखटाने लगी. अंदर से जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उस ने दरवाजे का हैंडल घुमाया. दरवाजा खुल गया. दरवाजे के खुलते ही वह चौंक गई क्योंकि पति बाथरूम में था ही नहीं. उसे अब चिंता हुई कि आधी रात को वह चला कहां गया.

उस ने सासससुर के बेडरूम के नजदीक जा कर देखा. वहां भी दरवाजा बंद था और अंदर खामोशी छाई थी. अब वह खाली पड़े बेडरूम की तरफ गई. उस ने दरवाजे पर कान लगाए तो महसूस किया कि आवाजें उसी बेडरूम से आ रही थीं. अंदर से आने वाली आवाजें पुरुषों की ही थीं. एक आवाज को तो वह पहचान गई, वह उस के पति की थी. लेकिन दूसरी आवाज उसे अनजानी लगी. दोनों आवाजों का लहजा उसे अजीब लगा. उस ने दरवाजे के हैंडल को घुमाया. अंदर से लौक न होने की वजह से वह खुल गया. दरवाजा खोलते ही बरखा की नजर अंदर बेड पर पड़ी तो वह हैरान रह गई. उसे अपनी आंखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था.

बेड पर जसबीर के साथ उस की ही उम्र का एक भारतीय मूल का युवक और था. उस समय दोनों के शरीर पर कपड़े का नामोनिशान नहीं था. दोनों एकदूसरे से लिपटे हुए पतिपत्नी की तरह प्यार कर रहे थे. यह देख कर बरखा समझ गई कि उस का पति ‘गे’ है, इसीलिए वह उस से शारीरिक संबंध नहीं बनाता था. बरखा की हैरत का ठिकाना नहीं था. दिल तो किया कि उसी समय पति को जलील करे, पर इतनी रात में किसी तरह का बवाल खड़ा करना उस ने उचित नहीं समझा. उस ने सोचा कि एकांत के समय वह जसबीर से बात करेगी. बहरहाल वह आहत थी. उस के सारे ख्वाब पलभर में टूट कर बिखर गए.

हौले से दरवाजा बंद कर के वह अपने बेडरूम में आ कर लेट गई. उस की नींद तो उड़ चुकी थी. अब तो वीरान आंखों में ख्वाबों की जगह आंसुओं ने ले ली. वह रोती रही और अपनी किस्मत को कोसती रही. सुबह करीब 5 बजे बरखा ने बेडरूम का दरवाजा खुलने की आवाज सुनी तो हल्की सी आंख खोल कर देखा. जसबीर लौट आया था. वह आंख बंद कर सोने का नाटक कर ऐसे ही लेटी रही. जसबीर भी उस के बराबर में आ कर लेट गया. फिर जल्दी ही उसे नींद आ गई. बरखा ने 6 बजे के करीब बिस्तर छोड़ दिया. क्योंकि इसी समय उस के सासससुर भी उठ जाते थे. वह उन्हें बेड टी बना कर देती थी. उस ने बाथरूम में जा कर चेहरा देखा तो उस की आंखें रोरो कर लाल हो चुकी थीं. चेहरा भी भावशून्य दिख रहा था. उस ने अच्छे से चेहरा धोया और रसोई में चाय बनाने चली गई.

चाय बना कर जब वह सासससुर के बेडरूम में गई तो उस का चेहरा देख सास ने टोका, ‘‘क्या बात है बरखा, तुम्हारी आंखें क्यों लाल हैं?’’

‘‘पता नहीं, सारी रात जलन सी होती रही.’’ वह सच्चाई छिपा गई.

‘‘लापरवाही ठीक नहीं है. जसबीर को जगने दे. डाक्टर के पास चली जाना.’’ सास ने कहा.

‘‘ठीक है.’’ बरखा बोली. फिर वह अपने कामों में लग गई. करीब 9 बजे जसबीर सो कर उठा और तैयार हुआ. बरखा ने अन्य दिनों की तरह उस का नाश्ता लगा दिया. वह नाश्ता करने लगा. उसे यह अहसास नहीं हुआ कि बरखा ने उस का नंगापन देख लिया है. जबकि बरखा के अंदर एक तूफान उमड़ रहा था.

जसबीर बैंक चला गया. उस के जाने के बाद वह सारे दिन तरहतरह के खयालों में खोई रही.

रात में जब बरखा बेडरूम में पहुंची तो जसबीर ने टोका, ‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही. मां कह रही हैं कि तुम्हारी आंखें भी लाल थीं. सब खैरियत तो है?’’

बरखा ने लंबी सांस ली, ‘‘खैरियत ही तो नहीं है.’’

‘‘क्या हुआ?’’ जसबीर ने पूछा.

‘‘मैं ने तुम्हें नंगा ही नहीं देखा, तुम्हारा नंगापन भी देख लिया है.’’ उस ने गुस्से में कहा.

‘‘क्या कह रही हो, समझ नहीं आया. साफसाफ कहो.’’ जसबीर नहीं जानता था कि पत्नी किस तूफान को थामे है.

‘‘मुझे पता चल गया कि तुम मुझ से दूर क्यों रहते हो? मुझे यहां आए एक महीना हो गया, पर तुम ने मुझे पत्नी का सुख नहीं दिया.’’ बरखा का ज्वालामुखी धीरेधीरे फटने लगा था.

‘‘क्या पता चल गया?’’ जसबीर नासमझ बनते हुए बोला.

‘‘यही कि तुम ‘गे’ हो.’’ बरखा शेरनी की तरह दहाड़ी.

‘‘क्या, क्या कह रही हो?’’ अपनी सच्चाई सुन कर जसबीर हड़बड़ा गया.

‘‘अगर तुम में किसी औरत को रखने की काबिलियत नहीं है तो क्यों की मुझ से शादी?’’ वह गुर्राई.

‘‘बरखा, तुम समझने की कोशिश करो. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’ जसबीर मामला शांत करने की गरज से बोला.

‘‘अगर तुम ‘गे’ थे, तो पहले ही बता देना चाहिए था. मुझे गलतफहमी में रख कर शादी क्यों की?’’

‘‘मैं शादी नहीं करना चाहता था, मांबाप की जिद के कारण करनी पड़ी. डरता था कि मेरे गे होने का राज खुल गया तो उन पर क्या गुजरेगी. पर सच मानो बरखा, मैं तुम से प्यार करता हूं. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’ जसबीर ने उसे सफाई दी.

‘‘तुम्हारे इस तरह के प्यार के साथ जिंदगी नहीं गुजरेगी. तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद कर के रख दी.’’ वह शांत होने का नाम नहीं ले रही थी.

‘‘मैं खुद को बदल दूंगा बरखा, मुझे कुछ समय दो.’’ जसबीर गुनहगार की तरह गिड़गिड़ा रहा था.

‘‘तुम जिस आदत के आदी हो, वह कभी नहीं बदलती. तुम नपुंसक हो नपुंसक. अब मैं सब को बता दूंगी कि तुम गे हो.’’ वह चीखी.

नपुंसक की गाली सुन कर जसबीर भी खुद पर काबू नहीं रख पाया. वह भी चीखा, ‘‘अपनी हद मेें रहो वरना…’’

‘‘वरना क्या. हां, बताओ वरना क्या.’’ कहते हुए बरखा ने उसे बेड से धक्का दे कर नीचे गिरा दिया.

इस के बाद तो जसबीर जैसे होश ही खो बैठा, ‘‘अभी बताता हूं.’’ कहते हुए उस ने बेड के पास रखे वैक्यूम क्लीनर का पाइप खींचा और उस के गले में लपेट कर कसने लगा. साथ ही बड़बड़ाता रहा, ‘‘देखो, मैं क्या कर सकता हूं.’’

जसबीर ने उस का गला तब तक दबाए रखा, जब तक कि उस की सांस नहीं थम गई. कुछ ही देर में उस की गरदन एक ओर लुढ़क गई, तो जसबीर की आंखें फटी की फटी रह गईं. उस का गुस्सा उड़नछू हो गया. अब उसे अफसोस हुआ कि वह क्या कर बैठा. मगर अब हो भी क्या सकता था. वह घबराया. उस के मातापिता अपने बेडरूम में सो रहे थे. उस ने हलके से मेन गेट खोला और बाहर का जायजा लिया. उसे दूर तक कहीं कोई नजर नहीं आया. वह फटाफट बेडरूम में लौटा और पत्नी की लाश को घसीट कर लान में ले आया और वहां रखे इनसिनेटर (कूड़ेदान) में डाल कर ऊपर से कुछ सूखे पत्ते उस में डाल दिए.

इस के बाद वह थोड़ी दूर स्थित पेट्रोल पंप पर जा कर वहां से एक कैन में पेट्रोल भरवा लाया. वह पेट्रोल इनसिनेटर के अंदर उड़ेल कर आग लगा दी. उसी समय उस के बंगले के सामने वाले बंगले की खिड़की से एक महिला ने उसे यह सब करते हुए देख लिया था. उस ने सोचा कि वह कूड़े को आग लगा रहा है. जसबीर आग लगा कर बेडरूम में लौट आया और आगे के बारे में सोचने लगा. उधर सुबह उस के मातापिता सो कर उठे और उन्हें बेड टी नहीं मिली तो वह बरखा को आवाज लगाने लगे. जसबीर को इस का अहसास ही नहीं था. वह तो अपनी उलझन में उलझा था. उस की मां बरखा को खोजते हुए बेडरूम में आ गईं. उन्होंने जसबीर से पूछा, ‘‘बेटा, बरखा कहां है? आज चाय नहीं दी.’’

मां की आवाज सुन कर जसबीर हड़बड़ाहट में बोला, ‘‘वह तो रात को मुझ से झगड़ने के बाद घर छोड़ कर चली गई.’’

‘‘कहां गई? तू ने उसे जाने क्यों दिया? कहां होगी वह. इस परदेश में उस का हमारे अलावा कोई है भी नहीं.’’ जसबीर की मां घबरा गईं.

जसबीर खामोश रहा, तो वह फिर बोलीं, ‘‘यहां बैठा क्या कर रहा है? जा कर उसे खोज. पुलिस में रिपोर्ट लिखवा.’’

जसबीर होश में आया. उसे बचाव का कोई रास्ता नहीं सूझा तो वह तैयार हो कर वाल्सेल पुलिस स्टेशन जा पहुंचा और बरखा की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. गुमशुदगी दर्ज करने के बाद इंसपेक्टर सर्बजीत जोहल कुछ सहकर्मियों के साथ जसबीर के बंगले पर पहुंचे. वहां पड़ोसियों से पूछताछ करने पर सामने वाले बंगले में रहने वाली महिला ने बता दिया कि रात को उस ने जसबीर के बंगले में स्थित बगीचे में रखे इनसिनेटर से धुआं उठते देखा था. वहां से कुछ अजीब सी गंध भी आ रही थी.

इंसपेक्टर सर्बजीत ने बगीचे में रखे इनसिनेटर का ढक्कन उठाया, तो चौंक पड़े. उस में राख के बीच एक मानव कंकाल पड़ा था. संभवतया वह किसी महिला का था क्योंकि वहां पर कुछ गहने भी थे. सोने की चूडि़यां, ब्रेसलेट और अंगूठी. इस बारे में जब जसबीर की मां से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ये वही जेवर हैं, जो बरखा ने शादी के रोज से अब तक पहने रखे थे. इस से यही पता लगा कि वह कंकाल बरखा का ही था.

लाश की शिनाख्त हो गई, तो सवाल उठा कि घर में ही हत्या कर बरखा की लाश को जला दिया गया और घर में किसी को पता भी नहीं चला. जबकि सभी साक्ष्य बता रहे थे कि हत्या पूरी योजना के साथ की गई होगी. इस बारे में जसबीर से पूछा गया, तो वह बारबार झूठ बोलता रहा. इंसपेक्टर सर्बजीत को शक था कि जसबीर ने ही बरखा को जलाया होगा. उसे उसी समय हिरासत में ले लिया गया और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस स्टेशन में जब जसबीर से सख्ती से पूछताछ की गई, तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपनी नवविवाहिता बरखा की हत्या की थी. उस ने कहा कि यह सब गुस्से में हुआ. उस का इरादा उस की हत्या करने का नहीं था.

दूसरे दिन यानी 13 सितंबर, 2013 को जसबीर को वाल्वर हैमाट कोर्ट में पेश किया गया. साथ ही बरखा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी पेश की गई. रिपोर्ट में बताया गया कि बरखा की मौत दम घुटने के कारण हुई. जसबीर को कोर्ट से जेल भेज दिया गया. वहीं भारत में रहने वाले बरखा के मातापिता को घटना की सूचना दे दी गई. उस के पिता सुरजीत सिंह ब्रिटेन पहुंच गए और अंतिम संस्कार के लिए बेटी का कंकाल अपने साथ भारत ले आए.

कोर्ट में जसबीर के खिलाफ मुकदमा चला. कई पेशियां हुईं. डिफेंस केस के वकील डेविड नाथन ने कोर्ट में बताया कि सारी जांच के बाद यह नतीजा निकलता है कि जसबीर ने अपनी पत्नी की हत्या पूरी योजना के साथ की थी. उस ने जिस अमानवीयता से घटना को अंजाम दिया, उस के हिसाब से आरोपी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जसबीर लंबे समय से डिप्रेशन में रहता था. 2010-11 में उस ने अपने डिप्रेशन का इलाज करवाया था. इलाज करने वाले डा. श्रीनिवास ने कोर्ट में बताया कि जसबीर राम गिंडे ने उन से करीब 2 साल इलाज करवाया था. वह काम से संबंधित तनाव में रहता था.

डिप्रेशन के चलते उस ने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी. एक बार तो उस ने अपनी कलाई भी काट ली थी और एक बार फांसी लगाने की भी कोशिश की थी. कोर्ट में वह वीडियो भी दिखाई गई, जब बरखा शादी के बाद पहली बार जसबीर के बंगले में दाखिल हुई थी. वहीं जसबीर की बहन की शादी की वीडियो भी दिखाई गई. इस के विपरीत पुलिस ने उस पेट्रोल पंप की सीसीटीवी फुटेज भी पेश की, जिस में साफ दिख रहा था कि घटना वाली रात जसबीर ने वहां से पेट्रोल खरीदा था.

कोर्ट में दरजन भर गवाह पेश किए गए. इन में एक सरकारी वकील डेबी गोल्ड ने कोर्ट में बयान दिया कि जब जसबीर भारत में रहता था, तो वहां पंजाब में भी उस के कई गे दोस्त थे. ब्रिटेन में भी उस के कई एशियन और ब्रिटिश गे युवकों से शारीरिक संबंध थे. उस ने गे मेल फ्रेंड्स क्लब भी बना रखा था. गे क्लब में मेलमुलाकात के साथ आपस में देह संबंध भी बनाए जाते थे. उन्होंने बताया कि वह चाह कर भी अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध नहीं बना सकता था. इसलिए वह पत्नी से तलाक लेने की भी सोच रहा था. पर डर था कि इस के लिए उसे कारण बताना होगा. अगर वह गे होना कारण बताता तो उस के परिवार की भी बदनामी होती. कुल मिला कर वह एक झूठी मैरिज लाइफ बिता रहा था.

वहीं आरोपी जसबीर राम गिंडे ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कोर्ट में बयान दिया कि जब वह 12 साल का था, तब उसे पता चला कि वह समलैंगी प्रवृत्ति का है. विपरीत लिंगी की तरफ उस का कोई आकर्षण नहीं था. उस ने कभी अपने मातापिता को अपनी सच्चाई नहीं बताई थी. क्योंकि वे इसे सहन नहीं कर पाते. इसी कारण वह शादी नहीं करना चाहता था, पर मातापिता की इच्छा के कारण उसे मजबूर होना पड़ा था.

जसबीर ने आगे बताया कि लाख छिपाने के बाद भी आखिर पत्नी को उस की सच्चाई पता चल गई थी. इस पर 12 सितंबर, 2013 की रात बरखा ने उसे बहुत जलील किया. बात बढ़ गई तो गुस्से में अपना आपा खो दिया और हत्या का गुनाह कर बैठा. सारे गवाह और सुबूत जसबीर के खिलाफ थे. वहीं वह खुद अपना अपराध स्वीकार कर चुका था. इसलिए जज जान वार्नर ने उसे दोषी करार देते हुए कहा कि अभियुक्त ने बरखा के साथ क्रूरतापूर्वक व्यवहार किया था. उस की निर्दयता से हत्या कर दी. हद तो यह हो गई कि मानवीयता की हद पार करते हुए उस ने उस के शरीर को पेट्रोल डाल कर जला दिया. फिर झूठी रिपोर्ट लिखवाने पुलिस स्टेशन चला गया.

यानी उस ने योजना अनुसार घटना को अंजाम दिया. इसलिए अभियुक्त जसबीर राम गिंडे का यह अपराध क्षमा की श्रेणी में नहीं आता. 25 अप्रैल, 2015 को जज जान वार्नर ने अपना फैसला सुनाते हुए जसबीर राम गिंडे को 21 साल की सजा सुनाई. साथ ही यह भी कहा कि उस की जमानत की किसी अरजी पर कभी सुनवाई नहीं की जाएगी. वह समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. कोर्ट से पुलिस वैन में जेल जाते वक्त जसबीर राम गिंडे की आंखों के आंसू थम नहीं रहे थे. उसे अपने किए पर पछतावा था. True crime Story

 

Love Story: खूनी इश्क

Love Story: फूलजहां की जिद के आगे झुकते हुए फौजदार उस की शादी अच्छन से करने को राजी हो गए थे. लेकिन उस के भाइयों को न जाने उस की शादी पर क्यों ऐतराज था कि उन्होंने फूलजहां के न मानने पर उसे मार दिया. दिन भर की यात्रा पूरी कर के जिस तरह सूरज अपने घर लौटने को बेताब था, उसी तरह घर लौटने को बेताब पक्षी भी कोलाहल मचाते हुए अपने ठिकाने की ओर लौट रहे थे. उन का यह शोर वातावरण को बेहद खुशनुमा बना रहा था. लेकिन इस सब से बेखबर अच्छन चहलकदमी करते हुए गांव की ओर से आने वाली पगडंडी पर नजरें जमाए था.

उस के चेहरे के भावों से ही लग रहा था कि उसे किसी का बड़ी बेसब्री से इंतजार है. शायद उसी के इंतजार में कभी उस की नजर घड़ी पर जाती थी तो कभी गांव की ओर जाने वाली पगडंडी पर. आखिर इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं और फूलजहां आती हुई दिखाई दे गई. उसे आता देख कर अच्छन के चेहरे पर सुकून के भाव आ गए और होंठ मुसकरा उठे. उस ने फूलजहां के पास जा कर कहा, ‘‘फूल, आज आने में तुम ने बड़ी देर कर दी, तुम्हारा इंतजार करतेकरते मेरी आंखें पथरा गईं. मुझे तो लगने लगा था कि तुम आओगी ही नहीं.’’

‘‘अच्छू, मुझे आने में थोड़ी देर क्या हो जाती है, तुम बेचैन हो उठते हो. अब मैं तुम्हारी तरह लड़का तो हूं नहीं कि जहां मरजी हो, चल दूं. लड़की हूं न, 10 बहाने बनाने पड़ते हैं, तब कहीं जा कर घर से निकल पाती हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारी परेशानी समझता हूं, लेकिन मैं अपने इस दिल को कैसे समझाऊं, जो जब तक तुम्हें देख नहीं लेता, उसे चैन नहीं मिलता. इन आंखों को तुम्हारी मजबूरी कैसे बताऊं, जो हर वक्त तुम्हें देखने के लिए बेचैन रहती हैं.’’ अच्छन ने कहा.

उस के प्यार भरे ये बोल सुन कर फूलजहां के गाल लाल हो उठे और पलकें झुक गईं. उस ने शरमाते हुए पूछा, ‘‘अच्छू, एक बात पूछूं, तुम मुझे हमेशा इसी तरह प्यार करते रहोगे न? कभीकभी मुझे डर लगता है कि कहीं तुम मुझे बीच मंझधार में छोड़ कर किसी और के न हो जाओ?’’

‘‘फिर कभी ऐसी बातें मत करना फूल,’’ फूलजहां की इस बात पर अच्छन तड़प कर बोला, ‘‘मैं पूरी दुनिया को छोड़ सकता हूं, पर तुम से अलग नहीं हो सकता. अगर कभी तुम्हें लगे कि मैं तुम से दूर हो रहा हूं तो बेझिझक तुम मुझे अपने हाथों से जहर दे देना. मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं होगी, क्योंकि जिंदगी में मैं ने केवल तुम्हें चाहा है.’’

अच्छन आगे कुछ और कहता, फूलजहां ने आगे बढ़ कर उस के होंठों पर उंगली रख दी, ‘‘बसबस, बहुत हो गया. मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. मुझे तुम पर पूरा भरोसा है.’’

उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर का एक कस्बाथाना है परौर. इसी थाने के बम्हनी चौकी गांव में फौजदार अपने परिवार के साथ रहते थे. उन का काफी बड़ा परिवार था. पत्नी शकीना बेगम के अलावा 8 बेटे और 4 बेटियां थीं. बेटों में जगनूर, गुल हसन, मसनूर हसन, शब्बन, जाहिद, गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे, नूर हसन, नबी हसन और बेटियां आसीन, रियासीन, मरजीना तथा फूलजहां थीं. फौजदार के बेटे जैसेजैसे बड़े होते गए, काम पर लगते गए. इस समय उन के सभी बेटे दिल्ली में अलगअलग फैक्ट्रियों में नौकरी कर रहे हैं. बेटियां जैसेजैसे सयानी हुईं, उन्होंने उन की शादियां कर दीं. इस तरह उन की दोनों बड़ी बेटियों का निकाह हो चुका है. बेटों में केवल गुल हसन का निकाह हुआ है. वह अपनी पत्नी और बच्चों को ले कर दिल्ली में रहता है.

फौजदार की दोनों छोटी बेटियां मरजीना और फूलजहां भी विवाह लायक हो गईं थीं. फूलजहां सब से छोटी थी, इसलिए उस पर सभी का प्यार कुछ ज्यादा ही उमड़ता था. बड़े भाइयों ने तो उसे गोद में खिलाया था, इसलिए वह शुरू से ही उन की आंखों का तारा थी. यही वजह थी कि वह बोलने लायक हुई तो जैसे ही उस के मुंह से कुछ निकलता, उस के भाई झट उसे पूरी कर देते थे. इसी वजह से वह जिद्दी हो गई थी और अपनी हर बात मनवाने की कोशिश करती थी.

उस के घर से थोड़ी दूरी पर उस की फूफी का मकान था. उस के फूफा अकरम गांव में ही रह कर खेतीकिसानी करते थे. उन के एक बेटा अच्छन के अलावा 2 बेटियां थीं. धीरेधीरे अच्छन जवान हो चुका था. उसी दौरान ममेरी बहन फूलजहां से उसे प्यार हो गया था. रिश्ते में दोनों भाईबहन थे, बचपन से दोनों एकदूसरे के साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. लेकिन जवान होते ही उन की आंखों को एकदूसरे की सूरत भाने लगी थी, क्योंकि दिल ने दिल से प्यार की डोर जो बांध दी थी. वह प्यार की डोर जवान होने पर एकदूसरे को इतना करीब ले आई कि वे एकदूसरे से अलग होने की बात सपने में भी नहीं सोच सकते थे.

उम्र के 17वें बसंत में पहुंची छरहरी देहयष्टि वाली फूलजहां अब लड़कों से बातें करने में हिचकिचाने लगी थी. कोई लड़का उस की ओर देख लेता तो वह शरमा जाती. ये सारे बदलाव शायद जवान होने की वजह से आए थे. लेकिन अगर उस में कुछ नहीं बदला था तो वह था उस का जिद्दीपन और अच्छन के प्रति प्यार. जब भी अच्छन उस की आंखों के सामने होता, वह उसी को देखा करती. उस पल चेहरे पर जो खुशी होती थी, कोई भी देख कर भांप सकता था कि दोनों के बीच कुछ जरूर चल रहा है.

अच्छन को भी उस का इस तरह से देखना भाता था, क्योंकि उस का दिल भी तो फूलजहां के प्यार का मरीज था. दोनों की आंखों में एकदूसरे के लिए प्यार साफ झलकता था. वे इस बात को महसूस भी करते थे, लेकिन दिल की बात एकदूसरे से कह नहीं पा रहे थे. एक दिन फूलजहां अच्छन के घर पहुंची तो उस समय घर में वह अकेला ही था. फूलजहां को देखते ही उस का दिल तेजी से धड़क उठा. उसे लगा कि दिल की बात कहने का उस के लिए यह सब से अच्छा मौका है. अच्छन उसे कमरे में बैठा कर फटाफट 2 कप चाय बना लाया. चाय का घूंट भर कर फूलजहां ने दिल्लगी करते हुए कहा, ‘‘चाय तो बहुत अच्छी बनी है, तुम कहीं चाय की दुकान क्यों नहीं खोल लेते.’’

‘‘अगर तुम रोजना मेरी दुकान पर आ कर चाय पीने का वादा करो तो मैं आज ही दुकान खोले लेता हूं.’’ अच्छन ने फूलजहां की आंखों में झांकते उस की बात का जवाब उसी की अंदाज में दिया तो फूलजहां लाजवाब हो गई. दोनों इसी बात पर काफी देर तक हंसते रहे. अचानक अच्छन गंभीर हो कर बोला, ‘‘फूल, मुझे तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘कहो.’’

‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगी?’’

‘‘जब तक कहोगे नहीं कि बात क्या है, मुझे कैसे पता चलेगा कि अच्छा मानना है या बुरा.’’

‘‘फूल, मैं तुम से प्यार करता हूं. यह प्यार आज का नहीं, वर्षों का है, जो आज किसी तरह हिम्मत जुटा कर कह पाया हूं. ये आंखें सिर्फ तुम्हें देखना पसंद करती हैं और दिल को करार तुम्हारे पास रहने पर आता है. तुम्हारे प्यार में मैं इतना दीवाना हो चुका हूं कि अगर तुम ने मेरा प्यार स्वीकार नहीं किया तो मैं पागल हो जाऊंगा.’’

आखिर अच्छन ने दिल की बात कह ही दी, जिसे सुन कर फूलजहां का चेहरा शरम से लाल हो गया, पलकें झुक गईं. होंठों ने कुछ कहना चाहा, लेकिन जुबां ने साथ नहीं दिया. फूलजहां की हालत देख कर अच्छन बोला, ‘‘कुछ तो कहो फूल, क्या मैं तुम से प्यार करने लायक नहीं?’’

‘‘क्या कहना जरूरी है. तुम खुद को दीवाना कहते हो और मेरी आंखों में बसी चाहत को नहीं देख सकते. सच पूछो तो जो हाल तुम्हारा है, वही हाल मेरा भी है. मैं ने भी तुम्हें बहुत पहले से दिल में बसा लिया है. डरती थी कि कहीं यह मेरा एकतरफा प्यार न हो.’’

फूलजहां ने भी चाहत का इजहार कर दिया तो अच्छन खुशी से झूम उठा. उसे लगा कि सारी दुनिया की दौलत फूलजहां के रूप में उस की झोली में आ कर समा गई है. इस तरह दोनों के बीच प्यार का इजहार हो गया तो फिर एकांत में भी उन के मिलनेजुलने का सिलसिला शुरू हो गया. दोनों घंटों गांव के बाहर सुनसान में मिलने लगे. वे एकदूसरे पर जम कर प्यार बरसाते और हमेशा एकदूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते. जैसेजैसे समय बीतता गया, दोनों की चाहत बढ़ती और प्रगाढ़ होती गई.

दोनों ने अपने प्यार को जमाने की नजरों से बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन जल्द ही उन की चाहत के चर्चे गांव की गलियों में तैरते हुए फूलजहां के पिता फौजदार के कानों तक पहुंच गए. उस ने फूलजहां को इस बात के लिए डांटाफटकारा, लेकिन फूलजहां पर उन के डांटने का कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि उस ने साफसाफ कह दिया कि वह अच्छन से प्यार करती है और निकाह भी उसी से करेगी. इस के बाद उन के घर में काफी वादविवाद हुआ, लेकिन फूलजहां अच्छन से निकाह करने की अपनी जिद पर अड़ी रही.

उधर अच्छन को पता चला तो उस ने भी अपने घर वालों से अपने दिल की बात बता दी. ऐतराज करने के बजाय अच्छन की मां ने अपने भाई फौजदार से उस की बेटी फूलजहां का निकाह अपने बेटे अच्छन से कराने की बात कही. वह उस समय तो कुछ नहीं बोले, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पत्नी शकीना से बात की तो फूलजहां की जिद और अच्छन के घर वालों की सहमति देख कर वह भी मन मार कर फूलजहां का निकाह अच्छन से करने को तैयार हो गए.

फूलजहां से पहले मरजीना का निकाह होना था, क्योंकि वह उस से बड़ी थी. लेकिन फूलजहां ने जिद पकड़ ली कि पहले उस का निकाह किया जाए, मरजीना का बाद में. मांबाप हमेशा अपनी औलादों के सामने असहाय हो जाते हैं. फौजदार भी फूलजहां की जिद के आगे मजबूर हो गए. फिर क्या था, फूलजहां और अच्छन के निकाह की तैयारियां शुरू हो गईं. लेकिन जब फूलजहां अच्छन के निकाह की बात फूलजहां के भाइयों गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे और गुल हसन को पता चली तो न जाने क्यों उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी. 12 अगस्त को वे दिल्ली से शाहजहांपुर पहुंचे और फूलजहां को अच्छन से निकाह न करने के लिए समझाने लगे, लेकिन फूलजहां नहीं मानी. अब इस बात को ले कर घर में रोज कलह होने लगी.

16 अगस्त की रात 10 बजे फूलजहां तंग आ कर अपने प्रेमी अच्छन के घर चली गई, जिस के बाद उस के दोनों भाइयों का अपने पिता फौजदार से काफी झगड़ा हुआ. बेटों के डर से फौजदार अगले दिन यानी 17 अगस्त की सुबह पत्नी शकीना और बेटी मरजीना को साथ ले कर अपने रिश्तेदारी में चले गए. सुबह होने पर अच्छन के मामा मुख्तयार ने नन्हे और गुल हसन के पास खबर भिजवाई कि वे आ कर अपनी बहन फूलजहां को ले जाएं. दूसरी ओर गांव में फूलजहां और अच्छन के निकाह को ले कर पंचायत बैठ गई. 5 घंटे तक पंचायत चली, लेकिन पंच किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे.

गांव में हो रही बदनामी से नन्हे और गुल हसन काफी नाराज थे. दोनों शराब खरीद कर ले आए और घर में बैठ कर पीने लगे. नशा चढ़ा तो गांव में हो रही बदनामी को ले कर दोनों में बात हुई कि बदनामी की जड़ फूलजहां है, इसे खत्म कर देना ही ठीक है. नन्हे ने छुरी उठाई और गुल हसन के साथ अच्छन के घर पहुंच गया. वहां फूलजहां अच्छन के साथ बैठी मिली. नन्हे फूलजहां के बालों को पकड़ कर घसीटते हुए बाहर निकालने लगा तो वह भाइयों से कहने लगी, ‘‘मुझे क्यों मार रहे हो, मैं ने आप लोगों का क्या बिगाड़ा है?’’

फूलजहां भाइयों से भिड़ गई. इस छीनाझपटी में नन्हे के हाथ से चाकू छूट गया, जिसे फूलजहां ने उठा लिया. उस ने अपने बचाव में चाकू चलाया तो वह नन्हे के हाथ में लग गया. गुल हसन ने किसी तरह उस के हाथ से चाकू छीन लिया और उसे घसीट कर अच्छन के घर से बाहर ले आया. दोनों भाई अच्छन को गालियां दे रहे थे. मौका देख कर अच्छन जान बचा कर भाग गया. गांव वालों ने दोनों भाइयों के सिर पर खून सवार देखा तो दुबक गए. उन्हें रोकने की किसी की हिम्मत नहीं हुई. दोनों भाई फूलजहां को घसीट कर अपने घर के पास ले आए और उसे जमीन पर पटक दिया. नन्हे ने उसे दबोच लिया तो गुल हसन छुरी से उस का गला इस तरह काटने लगा, जैसे किसी जानवर का काटा जाता है.

फूलजहां तड़पी, चिल्लाई, लेकिन बेदर्द भाइयों को उस पर बिलकुल रहम नहीं आया. गांव वाले भी अपनी आंखों के सामने सब कुछ होता देखते रहे, लेकिन आगे नहीं आए. कुछ ही पलों में फूलजहां की मौत हो गई. गुल हसन ने फूलजहां का सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया. इस के बाद उसे एक कपड़े में बांध कर पूरे गांव में घूमे. लोग डर से अपने घरों में दुबक गए. इसी बीच किसी ने पुलिस के आने की बात कही तो दोनों भाई गांव छोड़ कर भाग गए.

दरअसल, दिनदहाड़े नृशंस हत्या होते देख गांव के चौकीदार महेश ने परौर थाने जा कर घटना की सूचना दे दी थी. घटना काफी संगीन थी, इसलिए थानाप्रभारी राजेश सिंह ने घटना की सूचना तुरंत उच्चाधिकारियों को दी और खुद पुलिस बल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर लाश का जायजा लेने के बाद उन्होंने गांव वालों से पूछताछ शुरू कर दी. इसी बीच सीओ जलालाबाद आदेश कुमार त्यागी भी पहुंच गए. पूछताछ के बाद थानाप्रभारी राजेश सिंह ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भिजवा दिया.

थाने लौट कर राजेश सिंह ने चौकीदार महेश को वादी बना कर गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे और गुल हसन के खिलाफ फूलजहां की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के बाद अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए छापे मारे जाने लगे. परिणामस्वरूप अगले दिन शाम 5 बजे नन्हे उन की पकड़ में आ गया. उस के  पास से हत्या में प्रयुक्त छुरी बरामद हो गई. 19 अगस्त को पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इसी दिन फूलजहां की बिना सिर की लाश का पोस्टमार्टम हुआ. पोस्टमार्टम के बाद लाश गांव वालों के सुपुर्द कर दी गई. गांव वालों ने ही गांव से कुछ दूरी पर बने कब्रिस्तान में बिना सिर वाली फूलजहां की लाश को दफना दिया.

20 अगस्त को राजेश सिंह ने दोपहर को जुआ मोड़ से गुल हसन को गिरफ्तार कर लिया. उसे थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि हत्या करने के बाद उस ने कपड़े में बंधे सिर को मोहनपुर गांव के पास रामगंगा के घाट पर जा कर पानी के तेज बहाव में फेंक दिया था. इस के बाद नाव से उस पार कटरी में जा कर छिप गया था. 19 अगस्त की रात वह ससुराल पहुंचा तो ससुराल वालों ने कहा कि इस तरह भागते रहने से अच्छा है कि वह थाने जा कर हाजिर हो जाए. इस के बाद 20 अगस्त की सुबह वह थाने जा रहा था, तभी जुआ मोड़ पर पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

राजेश सिंह ने फूलजहां के कटे सिर को बरामद करने के लिए रामगंगा में एक दरजन गोताखोरों को उतारा, लेकिन फूलजहां का कटा सिर बरामद नहीं हो सका. अगले दिन गुल हसन को भी सीजेएम की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi crime story: इज्जत लुटा कर इलाज

Hindi crime story: तंत्रमंत्र की दुकानदारी   करने वाले ठग तांत्रिकों को पता होता है कि इज्जत लुटा कर भी जल्दी कोई औरत विरोध में खड़ी नहीं होगी, क्योंकि उसे बदनामी का डर होता है. इसी का वे फायदा भी उठाते हैं.

परिवार में किसी एक पर मुसीबत आ जाए तो इसे सहज रूप में लिया जा सकता है, लेकिन अगर पूरा परिवार ही किसी न किसी परेशानी से ग्रस्त हो तो दिमाग बहुत दूर तक की सोचने लगता है. इंसानी फितरत है कि परेशानी में आदमी जो भी सोचता है, उलटा ही सोचता है.

वीना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. परेशानी आने पर उस के दिमाग में भी उलटेसीधे विचार आने लगे थे. उसे लगने लगा था कि हो न हो, किसी ने ‘कुछ करा दिया है’. उस के दिमाग में यह बात गहरे तक बस गई थी. इस के बाद आसपड़ोस के लोगों से वह कहने लगी थी कि ‘किसी ऐसे तांत्रिक के बारे में बताओ, जो अपनी अलौकिक शक्तियों से उस के परिवार को परेशानियों से निजात दिला सके.’

कोई 7-8 साल पहले वीना की शादी महेश से हुई थी. 6 और 4 साल के उस के 2 बेटे थे. चंडीगढ़ के सब से बड़े कस्बे मनीमाजरा में किराए का मकान ले कर वह परिवार के साथ रहती थी. महेश का चावलों का कारोबार था. कुछ दिनों पहले तक इस परिवार में सब ठीकठाक था. वीना खुद भी सेहतमंद थी और उस के दोनों बच्चे तथा पति भी स्वस्थ थे. महेश का स्वास्थ्य ठीक था तो वह काम भी डट कर करता था. लिहाजा मेहनत के हिसाब से कमाई भी होती थी. परिवार में सब खुश थे.

लेकिन हालात ने करवट बदली तो सब बिगड़ता चला गया. वीना और उस के परिवार की खुशियों को जैसे किसी की नजर लग गई. बिना किसी बीमारी के ही महेश के स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी. इस का सीधा असर उस के काम पर पड़ा, आमदनी घट गई. इसी के साथ दोनों बच्चे भी अकसर बीमार रहने लगे. वीना और महेश को तीसरे बच्चे की चाहत नहीं थी. उसी परिस्थिति में लाख एहतियात बरतने के बावजूद वीना गर्भवती हो गई. पांव भारी हुए तो उस का भी स्वास्थ्य गिरने लगा. गर्भपात कराने के लिए वह डाक्टर के पास गई तो उस के स्वास्थ्य को देख कर डाक्टर ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. फलस्वरूप गर्भ 7 महीने का था.

इस सब से वीना के दिमाग में एक बात बैठ गई कि उन से जलने वाले किसी आदमी ने उस के परिवार पर ‘कुछ’ करवा दिया है. ऐसे में उठतेबैठते हर किसी से एक ही बात कहती थी कि अगर पहचान का कोई तांत्रिक हो तो बताओ. एक दिन वीना की पड़ोसन राधा ने उसे बताया, ‘‘हां, एक तांत्रिक है, जिसे सब बंगाली बाबा कहते हैं. वह मनीमाजरा के मढ़ीवाला टाउन में रहता है. भला और होशियार आदमी है. तुम एक बार उस के पास चली जाओ, समझो सारी मुसीबतों से छुटकारा मिल गया. उस का इलाज थोड़ा अजीबोगरीब जरूर है, मगर है पक्का. रूहानी ताकतों का मालिक है वह बंगाली बाबा.’’

वीना हैरानी से आंखें फाड़े राधा की बातें सुनती रही. दूसरी ओर राधा तांत्रिक का बखान करती जा रही थी, ‘‘यह हम लोगों के लिए संयोग की ही बात है कि उस जैसा पहुंचा हुआ तांत्रिक मनीमाजरा में रह रहा है. पैसे का भी उसे कोई लालच नहीं है. जो चाहो दे दो. न मन हो तो कोई बात नहीं. कुछ भी नहीं कहता.’’

राधा की बातों से वीना काफी प्रभावित हुई. उस समय वीना मात्र 26 साल की थी. अभी तो पूरी जिंदगी उस के सामने पड़ी थी. परेशानियों में घिरी जिंदगी वैसे ही बेमजा हो जाती है. यह सोच कर उस ने राहत महसूस की कि अब तांत्रिक बंगाली बाबा की बदौलत उस की सारी मुसीबतें दूर हो जाएंगी. शाम को महेश घर आया तो वीना ने उसे तांत्रिक के बारे में बता कर उस के डेरे पर चलने को कहा. लेकिन महेश ने मना करते हुए कहा, ‘‘ऐसे लोगों के पीछे समय और पैसा मत बरबाद करना. ये लोग ठग होते हैं. बिना मतलब तुम्हें किसी चक्कर में डाल देंगे.’’

वीना को पहले से ही पता था कि उस का पति नास्तिक है. तंत्रमंत्र, पूजापाठ, साधुसंतों पर उसे जरा भी विश्वास नहीं है. वह था भी अडि़यल स्वभाव का. दूसरे की बात जल्दी नहीं मानता था. इसलिए वीना ने इस बारे में उस से और ज्यादा बात करना ठीक नहीं समझा. अगले दिन शाम को वह राधा के घर पहुंची और उस से अपने साथ तांत्रिक के पास चलने को कहा. राधा उस समय घरेलू कामों में व्यस्त थी. इसलिए उस ने वीना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम अकेली ही चली जाओ. तांत्रिक बुजुर्ग आदमी है, फालतू बातें नहीं करता. तुम जरा भी मत घबराओ, कहीं कोई परेशानी नहीं होगी. फिर ऐसी पाक जगहों पर कोई सिफारिश थोड़े ही चलती है. आज तुम अकेली ही चली जाओ, अगली बार मैं तुम्हारे साथ चलूंगी.’’

उस समय शाम के 5 बज रहे थे. राधा के मना करने पर निराश हो कर वीना पहले अपने घर गई. वहां से दोनों बच्चों को साथ ले कर 6 बजे तांत्रिक बंगाली बाबा के यहां जा पहुंची. तांत्रिक बुजुर्ग आदमी था. शक्लसूरत से भी शरीफ लग रहा था. दाढ़ी के पीछे उस का गंभीर चेहरा उस के रूहानियत से जुड़ा होने का आभास दिला रहा था.

तांत्रिक का व्यक्तित्व देख कर वीना को लगा कि निश्चित उस के परिवार पर आई मुसीबतें दूर हो जाएंगी. तांत्रिक के दरबार में उस समय 5-6 लोग बैठे थे. उन के सामने वह तांत्रिक आसन पर बैठा था. वह आए लोगों को बारीबारी से बुलाता, उन की समस्याएं सुनता और झाड़फूंक करने के बाद इलायची का प्रसाद दे कर कहता, ‘‘फिर कोई परेशानी आए तो सीधे मेरे पास आ जाना. वैसे तुम्हें आने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इतने में ही ठीक हो जाएगा.’’

इस के बाद वह उसे विदा कर देता. वीना दोनों बच्चों के साथ बैठ कर अपनी बारी का इंतजार करने लगी. उस ने बच्चों को पहले ही सहेज दिया था, इसलिए वे खामोश बैठे थे. एक बार भी नजर उठा कर तांत्रिक ने उस की ओर नहीं देखा था. जो आदमी नंबर आने पर उस के पास पहुंचता था, वह उस से भी नजरें मिला कर बात नहीं करता था. कुछ बोलता भी तो बस नीचे देखते हुए बुदबुदाने के स्वर में बोलता था.

नंबर आने पर वीना तांत्रिक के सामने जा कर बैठ गई. दोनों बच्चे उस के अगलबगल बैठ गए. तांत्रिक ने नजरें झुकाए हुए ही वीना के पैरों की ओर देखा, फिर धीरेधीरे नजरें ऊपर करते हुए उस के चेहरे पर गड़ा दीं. वीना काफी खूबसूरत थी, लेकिन उसे एक बार भी यह नहीं लगा कि तांत्रिक उस की खूबसूरती को निहार रहा है. उस ने इस सब को एकदम सहज रूप से लिया. वीना ने अपनी समस्या बताने के लिए जैसे ही मुंह खोला, तांत्रिक ने हाथ के इशारे से उसे कुछ कहने से रोक दिया. उस के चेहरे पर अपनी नजरें जमाए हुए ही उस ने कहा, ‘‘मेरी बच्ची, तुम्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है.

मैं तुम्हारी आंखों में ही सब कुछ देख रहा हूं. अभी यह जान लेना थोड़ा मुश्किल है कि इसे किस ने भेजा है, मगर हकीकत पूरी तरह मेरे सामने है. उस ने भीतर से तुम्हें पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया है. यह शैतानी ताकत तुम्हारे जरिए तुम्हारे परिवार को बरबाद करना चाहती है.’’

वीना ने तो पहले ही से यह बात अपने मन में बैठा रखी थी. इसलिए हैरान होते हुए वह बोली, ‘‘यह बात एकदम सही है. मेरे परिवार में एकएक कर के सभी धीरेधीरे परेशानियों में घिरते जा रहे हैं. आप के पास मैं आई ही अपनी इसी परेशानी के लिए हूं.’’

‘‘मुझे तुम्हारी इस बरबादी का जिम्मेदार तुम्हारे भीतर बैठा दिखाई दे रहा है.’’

‘‘लेकिन बंगाली बाबा, किस ने यह सब किया या करवाया है? वह कौन सी ताकत है, जिस ने मुझे अपने काबू में कर रखा है?’’ वीना ने भयभीत होते हुए पूछा.

‘‘मैं पहले ही तुम से कह चुका हूं, मेरी बच्ची कि करने या करवाने वाले की बाबत अभी नहीं बताया जा सकता. वक्त आने पर इस बात का खुलासा भी कर दूंगा.’’ तांत्रिक ने कहा.

इस के बाद अपनी दोनों आंखें बंद कर के दोनों हाथ ऊपर उठा कर मंत्र पढ़ने के अंदाज में बुदबुदाने लगा. कुछ देर यही क्रम चलता रहा. उस के बाद आंखें खोल कर बोला, ‘‘जिस ने तुम्हें काबू में कर रखा है, वह एक बदजात जिन्न है. उस के बारे में तुम्हें बाद में खुल कर बताऊंगा. बहरहाल इस सब की तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं तुम्हारे शरीर के अंदर ही इस जिन्न को मसलमसल कर मार दूंगा. उस का वजूद मिटते ही तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी. यह सब करने से पहले तुम्हें एक बात बता देना चाहता हूं.’’

‘‘जी बंगाली बाबा, बताइए. मैं आप की हर बात मानूंगी. बस आप मेरे परिवार पर आई. मुसीबतों को हमेशा के लिए खत्म कर दीजिए.’’

‘‘उन्हें तो खत्म समझो. देखो, अब मैं जो तुम्हें बताने जा रहा हूं, उसे गौर से सुनना.’’ तांत्रिक ने कहा.

‘‘जी बाबा.’’

‘‘मैं अपने काम की किसी से कोई फीस तो लेता नहीं. रोटी कमाने के मेरे पास दूसरे तमाम काम हैं. हां, तुम्हारा यह जो काम मैं करने जा रहा हूं, इस की फीस जरूर लेता हूं.’’

‘‘जी बाबा.’’

‘‘दरअसल, यह जो काम मैं करने जा रहा हूं, इस के लिए मुझे कई बार वह सब भी करना पड़ता है, जो करने को मेरा मन गवाही नहीं देता. लेकिन न करूं तो मेरी पनाह में आया आदमी ठीक नहीं होगा. इसलिए करने से पहले मैं अपने किए की खुदा से माफी मांग लेता हूं और अपनी पनाह में आए आदमी से उम्मीद करता हूं कि पूरी तरह ठीक हो जाने पर वह अपनी हैसियत के मुताबिक 11, 21 या फिर 31 गरीबों को भरपेट खाना खिलाए. इस काम की मैं तुम से भी यही फीस चाहता हूं मेरी बच्ची.’’

‘‘बिलकुल बंगाली बाबा. बस एक बार सब ठीक काम हो जाए. मैं वैसा ही करूंगी, जैसा आप कहेंगे.’’ वीना ने कहा.

अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ फेर कर तांत्रिक ने कहा, ‘‘दूसरी बात यह कि तांत्रिक क्रियाएं बहुत नाजुक होती हैं. जैसा मैं कहूं, तुम्हें वैसा ही करना होगा. अगर तुम इस क्रिया को आज ही शुरू करवाना चाहती हो तो अपने बच्चों को घर छोड़ कर अकेली आ जाओ. बच्चों की मौजूदगी में वे तांत्रिक क्रियाएं नहीं की जा सकतीं, जिन्हें इस मामले में अमल में लाना है.’’

तांत्रिक की हर बात पर वीना हां में हां करती जा रही थी. इस के बाद उस के कहे अनुसार वह बच्चों को अपनी एक परिचिता के यहां छोड़ आई. उस के लौट कर आने के बाद तांत्रिक ने बेझिझक कहा, ‘‘अंदर वाले कमरे में पलंग बिछा है, जा कर उस पर एकदम सीधी लेट जाओ.’’

वीना पूरी तरह तांत्रिक के कहे में आ चुकी थी. शक की कोई गुंजाइश उसे नजर नहीं आ रही थी. इसलिए बिना किसी झिझक के वह अंदर जा कर पलंग पर लेट गई. तांत्रिक बाहर बैठा क्या कर रहा है, उसे पता नहीं था. करीब आधे घंटे तक वह उसी तरह लेटी रही.

इस के बाद तांत्रिक आया तो वह कुछ बुदबुदा रहा था. उस के हाथ में नीले रंग के धागों में बंधी ताबीजें थीं. उस में से एक ताबीज उस ने वीना के गले में डाल दी. बाकी ताबीजें उस के हवाले करते हुए बोला, ‘‘इन्हें अपने पति और बच्चों को पहना देना.’’

‘‘जी बंगाली बाबा.’’ कह कर वीना ने ताबीज ले कर माथे से लगा लिए.

इस के बाद, ‘‘ये प्रसाद खा लो.’’ कह कर तांत्रिक ने एक छोटी इलायची वीना के मुंह में डाल दी और बाहर चला गया.

इलायची चबाते ही वीना पर नशा सा छाने लगा. उसे लगने लगा, वह मदहोश होती जा रही है. तभी तांत्रिक अंदर आया और गौर से वीना को देखने लगा. इस बार भी वह पहले की ही तरह कुछ बुदबुदा रहा था. फिर वह उस की बगल में लेट गया. नशे जैसी स्थिति में होने की वजह से चाह कर भी वीना उस की किसी हरकत का विरोध नहीं कर सकी. वीना को सब दिखाई दे रहा था, उस के साथ क्या किया जा रहा है, इस का भी उसे आभास हो रहा था, लेकिन वह किसी भी तरह का विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. इलायची में कोई नशीली चीज खिला कर तांत्रिक ने उसे बेबस कर दिया था. अंत में उस ने अपनी मनमरजी कर डाली.

मुंह काला करने के बाद तांत्रिक ने कहा, ‘‘इसी तरह तुम्हें लगातार 3 दिनों तक अकेली आना होगा. 4 दिनों की क्रिया के बाद जिन्न खुदबखुद खत्म हो जाएगा. जिन्न मर गया तो समझो तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो गईं.’’

वीना ने उठ कर कपड़े पहने और धीमेधीमे कदमों से अपनी परिचिता के यहां से बच्चों को ले कर घर आ गई. जो कुछ उस के साथ हुआ था, उसे सब याद था. इस सब से अब उसे आत्मग्लानि होने लगी थी, साथ ही तांत्रिक पर गुस्सा आ रहा था. सोचने लगी, ‘यह इंसान है या पिशाच, जिस ने 7 महीने की गर्भवती का भी लिहाज नहीं किया.’

तांत्रिक के बारे में सोचसोच कर वीना की कनपटियां सुलगने लगीं. पति काम से लौटा तो तबीयत खराब होने का बहाना कर के चुपचाप लेटी रही. पति से इस बारे में बात करना उसे ठीक नहीं लगा. मर्दों का क्या भरोसा, बात का बतंगड़ बना दें. गलती खुद उसी की थी, जो कथित रूहानी ताकतों से इलाज कराने अपनी मरजी से तांत्रिक के पास चली गई. पति ने उसे इस सब के लिए पहले ही मना किया था. जैसेतैसे वीना ने वह रात गुजारी. रात भर में वह जितना अपनेआप को कोस सकती थी, कोसती रही. इस के साथ मन ही मन वह निर्णय भी लेती रही कि ढोंगी तांत्रिक बंगाली बाबा को उस के किए की सजा जरूर दिलाएगी.

अगले दिन जब महेश काम पर चला गया तो वीना फिर तांत्रिक के बारे में सोचने लगी. उस ने सोचा कि अगर वह चुप रहती है तो तांत्रिक आगे भी इसी तरह अन्य औरतों को खराब करता रहेगा. मैला तन ले कर वीना अपने पति को धोखा नहीं देना चाहती थी. काफी कशमकश के बाद उस ने सोच लिया कि अंतत: जो होगा, देखा जाएगा. पहली जरूरत तांत्रिक को सजा दिलाने की है. उस ने तांत्रिक के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने के लिए सोचा, मगर अकेली थाने जाने की हिम्मत नहीं हुई. लिहाजा इस बारे में रायमशविरा करने वह अपनी जेठानी के घर चली गई.

जेठानी चंडीगढ़ के सेक्टर 20 में रहती थी. देवरानी के मुंह से तांत्रिक की घिनौनी करतूत सुन कर वह हैरान रह गई. वह उसे तत्काल समाजसेवी परमजीत कौर और भजन कौर के पास ले गई. दोनों ने सारी बातें सुन कर सुझाव दिया कि आज शाम वीना फिर तांत्रिक के पास जाएगी. वे तांत्रिक को रंगेहाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले करना चाहती थीं. वे तांत्रिक बंगाली बाबा की घिनौनी करतूत की चश्मदीद गवाह भी बनना चाहती थीं. फिर ऐसा ही किया गया. उसी रात 8 बजे वीना को बंगाली बाबा के ‘दरबार’ में भेजा गया. परमजीत कौर और भजन कौर कुछ अन्य लोगों के साथ बाहर चौकन्नी हो कर खड़ी थीं.

पहले दिन वाली प्रक्रियाएं करने के बाद बंगाली बाबा ने वीना के मुंह में इलायची डाली. वीना ने उस की आंख बचा कर झट से इलायची उगल दी. इस के बाद बंगाली बाबा तंत्रमंत्र की नौटंकी करते हुए जैसे ही उस की बगल में लेटा, उस ने शोर मचा दिया. बस फिर क्या था, महिलाओं ने तेजी से भीतर घुस कर तांत्रिक को रंगेहाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया. वीना के बयान के आधार पर भादंवि की धाराओं 356 व 341 के तहत थाना मनीमाजरा में तांत्रिक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया.

जब इस बात की जानकारी डीएसपी (ईस्ट) विजयपाल सिंह को मिली तो वह भी थाने पहुंच गए. उन्होंने इस मामले की जांच इंसपेक्टर धनराज शर्मा को सौंपी गई. तांत्रिक को रात भर हवालात में रखा गया. अगले दिन उसे अदालत में पेश कर के उसे पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. अभी तक पूछताछ में तांत्रिक यही कह रहा था कि वह काले इल्म का जबरदस्त जानकार है. इस इल्म के तहत जिन्नों को इसी तरह भगाया जाता है. चूंकि प्रक्रिया में विघ्न पड़ गया है, इसलिए वीना के अलावा वे लोग भी बरबाद हो जाएंगे, जिन्होंने उस का अमल तोड़ने की जुर्रत की है. काले इल्म से उस ने कुछ पुलिसकर्मियोंको भी बरबाद करने की धमकी दी. लेकिन जब पुलिस ने उस पर सख्ती की तो वह सारी हेकड़ी भूल कर असलियत बताने को तैयार हो गया.

उस की उम्र 50 साल के आसपास थी. उस का नाम था शाहिद तौफीक. वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के कस्बा मलिहाबाद का रहने वाला था. उस के परिवार में बीवी मल्लिका खातून के अलावा 4 बेटे थे. कामधंधे की तलाश में वह 20 साल पहले अकेला ही चंडीगढ़ आया था. काम जम जाने के बाद वह अपने परिवार को भी साथ ले आया था. धीरेधीरे उस ने अपनी बीवी और चारों लड़कों को भी काम से लगा दिया था. इस से उस की अच्छीखासी कमाई होने लगी थी. सब कुछ बहुत बढि़या चल रहा था कि अचानक शाहिद तौफीक तांत्रिक बन गया. इस के बाद वह अकेला ही रहने लगा. पहले वह मियांजी के नाम से, फिर बंगाली बाबा के नाम से मशहूर हो गया.

शाहिद को पहले तंत्रमंत्र की कोई जानकारी नहीं थी. करीब 5 साल पहले वह कुछ दिनों के लिए एक धार्मिक डेरे पर पहुंच गया, जहां तंत्रक्रियाएं की जाती थीं. वहीं वह थोड़ा तंत्रमंत्र सीख गया. वहां से लौट कर उस ने खुद को तांत्रिक घोषित कर तंत्र विद्या से समस्याओं के समाधान की अपनी ढोंग की दुकान खोल ली. शाहिद खर्च भर का कमा लेता था. ज्यादा पैसे कमाने की उसे कोई जरूरत भी नहीं थी. इसीलिए उस ने इस विद्या को लोकसेवा घोषित कर के बिना फीस के कथित रूहानी इलाज करना शुरू कर दिया. इस से उस का अच्छाखासा प्रचार हुआ और दूरदूर से लोग उस के पास आने लगे.

कथित तंत्रक्रियाओं के दौरान शाहिद ने 2 बातें देखीं, एक तो इस में तीरतुक्के ज्यादा चलते थे. अपनी परेशानियों के कारण उस के पास आने वाले लोग दरअसल मानसिक तनाव से ग्रस्त होते थे. तंत्रक्रियाओं के नाटक के चलते पीडि़त व्यक्ति स्वयं को हलका महसूस करने लगता था. मानसिक तनाव में कमी आती थी तो वह अपने काम में तवज्जो देने लगता, इस से उस का काम संवरने लगता. दूसरी बात उस ने यह देखी कि तंत्र के नाम पर किसी भी औरत को भैरवी बना कर उस से आराम से मनमानी की जा सकती थी. यही सब वह करता भी था. तंत्रमंत्र की आड़ में उस ने न जाने कितनी औरतों को खराब किया, इस का हिसाब खुद उस के पास नहीं था.

इज्जत लुटा कर भी कभी कोई औरत उस के विरोध में खड़ी नहीं होती थी. उस के पकड़े जाने पर भी कोई पीडि़ता उस के खिलाफ बयान देने थाने नहीं आई. भला हो वीना का, जिस ने उस पाखंडी तांत्रिक के चेहरे से शराफत का मुखौटा नोच फेंका था, वरना तंत्रमंत्र में आस्था रखने वाली न जाने कितनी औरतें अपनी इज्जत लुटवाती रहतीं. Fपुलिस ने तांत्रिक के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे 7 साल की बामशक्कत कैद की सजा हुई. ऊपरी अदालतों में अपील करने से भी उसे कोई लाभ नहीं मिला. अपनी सजा भुगत कर कुछ साल पहले वह जेल से बाहर आया. इस बीच उस का परिवार मनीमाजरा छोड़ कर उत्तर प्रदेश चला गया था. शाहिद भी शायद वहीं चला गया है.

वीना और उस के घर वालों के बारे में यही सुखद समाचार है कि अपनी मेहनत से महेश ने जहां अपना अच्छाखासा धंधा जमा लिया है, वहीं वीना खुद भी बेकरी का कारोबार करती है. महेश ने उस की महाभूल को गलती की संज्ञा दी, जो उस के लिए सबक बन कर काम आई. आज उन के 2 नहीं, 3 बेटे हैं और तीनों शहर के बेहतरीन एवं नामचीन स्कूलों में पढ़ रहे हैं. तीनों की गिनती मेधावी छात्रों में होती है. Hindi crime story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

True Crime Story: अधेड़ उम्र का इश्क – पति की कातिल दुलारी

True Crime Story: बांदा जिले के बुधेड़ा गांव के रहने वाले शिवनारायण निषाद 18 जून, 2021 की रात को गांव में रामसेवक के घर एक शादी के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे. जब वह देर रात तक वापस नहीं लौटे तो घर पर मौजूद पत्नी दुलारी की चिंता बढ़ने लगी. उस समय दुलारी घर पर अकेली थी. उस का 20 वर्षीय बेटा और 17 वर्षीय बेटी राधा गांव अलमोर में स्थित एक रिश्तेदारी में गए हुए थे. दुलारी ने पति की चिंता में जैसेतैसे कर के रात काटी.

सुबह होने पर दुलारी ने अपने बेटे को फोन कर के रोते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे पिताजी गांव में ही रामसेवक चाचा के घर मंडप पूजन के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे, लेकिन अभी तक वह घर वापस नहीं लौटे हैं.’’

बेटे दीपक ने जब अपने पिता के गायब होने ही बात सुनी तो वह भी घबरा गया. फिर वह मां को समझाते हुए बोला, ‘‘घबराओ मत मां, मैं घर आ रहा हूं. हो सकता है पिताजी रात होने पर वहीं रुक गए हों. फिर भी आप उन के घर जा कर पूछ आओ.’’

‘‘ठीक है बेटा, मैं रामसेवक चाचा के घर पता करने जा रही हूं.’’ दुलारी ने दीपक से कहा.

दुलारी जब रामसेवक के घर पहुंची तो रामसेवक ने बताया कि शिवनारायण गांव के ही 2 लोगों सूबेदार और चौथैया के साथ रात 10 बजे ही वहां से लौट गए थे.

यह बात दुलारी ने दीपक को फोन कर के बताई तो दीपक के मन में तमाम तरह की आशंकाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया. उसी दिन दीपक अपनी बहन के साथ गांव अलमोर से घर वापस  लौट आया. दुलारी और घर के लोग सोचने लगे कि जब रामसेवक चाचा के यहां से वह लौट आए तो कहां चले गए. अभी तक वह घर क्यों नहीं आए? उस दिन दीपक अपने ताऊ पिता रामआसरे, मां दुलारी और परिजनों के साथ पिता को आसपास खोजने में लगा रहा.

इस के बाद परिजनों ने सूबेदार और चौथैया से शिवनारायण के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि हम लोग रात में 10 बजे साथ ही लौटे थे और गांव के शिवलाखन की पान परचून की दुकान पर गए, लेकिन उस समय उस की दुकान बंद थी. तब हम लोग अलगअलग हो कर अपनेअपने घरों को वापस लौट गए थे. इस के बाद शिवनारायण कहां गया, हमें नहीं पता. शिवनारायण की 2 बेटियां, जो अपनी ससुराल में थीं, वह भी पिता के लापता होने की सूचना मिलने पर मायके आ चुकी थीं.

अब शिवनारायण के घर वालों के मन में तमाम तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी थीं. बेटे दीपक और बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. इस दौरान बेटे ने अपने सभी रिश्तेदारियों में फोन कर उन के बारे में जानना चाहा. लेकिन सभी जगह निराशा ही हाथ लग रही थी.

शिवनारायण को गायब हुए 2 दिन होने वाले थे, फिर भी घर वाले पुलिस के पास न जा कर इधरउधर खोजने में ही लगे हुए थे. इसी दौरान 20 जून, 2021 की सुबह गांव के सूबेदार और अन्य लोग जब यमुना नदी किनारे से जा रहे थे. तो उन्होंने हाथपैर बंधे घुटनों के बीच डंडा फंसे एक लाश पड़ी देखी. यह बात उन्होंने गांव के अन्य लोगों को बताई. इस के बाद वह लाश देखने के लिए यमुना किनारे गए. वहां ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी.

गांव वालों ने वह लाश पहचान ली. मृतक और कोई नहीं 2 दिन से गायब हुआ शिवनारायण ही था. इधर ग्रामीणों ने नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना स्थानीय थाने जसपुरा के थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को भी दे दी. थानाप्रभारी सुनील इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को देने के बाद अपने मातहतों के साथ घटनास्थल पर रवाना हो गए. नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना पा कर शिवनारायण निषाद के परिजन भी रोतेबिलखते वहां पहुंच चुके थे. पति की लाश देख कर दुलारी दहाड़ें मार कर रोने लगी.

सूचना पा कर बांदा के एसपी अभिनंदन के अलावा एएसपी महेंद्र प्रताप सिंह चौहान, सीओ (सदर) सत्यप्रकाश शर्मा के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस नें अपनी जांच में पाया कि लाश पानी में फूल कर उतरा कर नदी के किनारे आई है. ऐसे में अनुमान लगाया कि शिवनारायण की हत्या 18 जून की रात में कर दी गई थी. क्योंकि पानी में पड़ा शव करीब 24 घंटे बाद ही उतरा कर ऊपर आता है. थानाप्रभारी ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने वहां से कुछ सबूत भी जुटाए.

पुलिस ने लाश को देख कर यह कयास लगाया कि हत्या में एक से ज्यादा लोग शामिल रहे होंगे. क्योंकि पुलिस को घटनास्थल पर ऐसा कोई निशान और न ही दोपहिया व चार पहिया वाहनों के टायरों के निशान मिले, जिस से यह कहा जा सके कि हत्या इसी जगह पर की गई थी. इसी को आधार बना कर पुलिस यह मान रही थी कि हत्या कहीं और की गई है. लाश को नदी में ठिकाने लगाने के उद्देश्य से यहां ला कर फेंका गया था.

जिस समय बुधेड़ा गांव में पुलिस अधिकारी व थाने की पुलिस घटनास्थल का मौकामुआयना कर रही थी, पुलिस को वहां जमीन पर खून पड़ा भी दिखा. साथ ही कुछ दूरी पर चूडि़यों के टुकड़े भी बरामद हुए थे. जिन्हें फोरैंसिक टीम ने अपने कब्जे में ले लिया. मौके पर मौजूद गांव वालों ने बताया कि टूटी चूडि़यां मृतक की पत्नी दुलारी की हैं. उन का कहना था कि मामले की जानकारी होने पर दुलारी वहां बैठ कर रो रही थी. हो सकता है उस दौरान चूडि़यां टूट कर बिखर गई हों.

लेकिन पुलिस किसी भी साक्ष्य को हलके में नहीं ले रही थी, इसलिए वहां मौजूद हर संदिग्ध वस्तु को अपने कब्जे में ले रही थी. इस दौरान हत्या से जुड़े साक्ष्यों को इकट्ठा करने के लिए पुलिस ने शव मिलने वाले स्थान से पैदल ही नदी किनारे करीब डेढ़ किलोमीटर तक छानबीन की, लेकिन वहां से पुलिस को कोई अन्य और खास सबूत नहीं मिला.

पुलिस ने जरूरी साक्ष्यों को इकट्ठा करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. इस दौरान पुलिस ने परिजनों से शिवनारायण के घर वालों से किसी से रंजिश होने की बात पूछी तो उन्होंने बताया कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं थी. दोपहर तक पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंट कर हत्या करने और फेफड़ों में पानी न होने की पुष्टि हुई. इस के बाद पुलिस ने शिवनारायण के बेटे दीपक की तहरीर पर हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत दर्ज कर लिया.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने एसपी के निर्देश पर जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में कांस्टेबल शुभम सिंह, सौरभ यादव, अमित त्रिपाठी, महिला कांस्टेबल अमरावती व संगीता वर्मा को शामिल कर जांच शुरू की. थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को शुरुआती पूछताछ में मृतक शिवनारायण के बड़े भाई रामआसरे और बेटे दीपक ने बताया कि 6 महीने पहले गांव के ही एक दुकानदार ने शिवनारायण से विवाद किया था और धमकी दी थी.

इस के बाद पुलिस दुकानदार और रात में दावत में साथ रहे व लाश मिलने की सूचना देने वाले सूबेदार सहित 4 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले गई. लेकिन पुलिस को उन लोगों से पूछताछ में ऐसी कोई बात नहीं मिली, जिस से उन पर हत्या का शक किया जा सके. जसपुरा थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह शिवनारायण निषाद के हत्या की हर एंगल से जांच कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने मृतक के घर के हर सदस्य का बयान दर्ज किया था.

उन्हें जांच में पता चला कि शिवनारायण रात के 9 बजे ही दावत से अपने घर के लिए वापस लौट लिए थे. चूंकि उस समय हलकी बारिश हो रही थी, ऐसे में 45 साल की उम्र में उन के कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता था. ऐसे में पुलिस यह मान कर चल रही थी कि शिवनारायण घर लौटे थे और उन के साथ घर पर ही कोई घटना हुई थी. उस दिन घर पर मृतक शिवनारायण की पत्नी ही मौजूद थी. क्योंकि उस के बच्चे रिश्तेदारी में पैलानी थानांतर्गत अमलोर गांव गए हुए थे. मौके पर मिली चूडि़यों के टुकड़ों के आधार पर पुलिस का शक पत्नी दुलारी पर और भी पुख्ता होता जा रहा था.

उधर पुलिस को मृतक के हाथपांव के बांधने और घुटनों के बीच डंडा बांधने की बात समझ आ चुकी थी. यह हत्या के बाद लाश को उठा कर ले जाने में उपयोग किया गया होगा. इसी दौरान पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि उसी गांव के रहने वाले जगभान सिंह उर्फ पुतुवा का अकसर शिवनारायण निषाद के घर आनाजाना था. चूंकि शिवनारायण जगभान के खेतों में बंटाई पर खेती करता था. इसी दौरान जगभान का  शिवनारायण की पत्नी दुलारी से अवैध संबंध हो गए थे. जिस की जानकारी होने पर शिवनारायण और जगभान के बीच खटास पैदा हो गई थी.

अब पुलिस शिवनारायण की पत्नी दुलारी और जगभान पर अपनी जांच केंद्रित कर आगे बढ़ रही थी. इसी सिलसिले में थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जगभान के घर जा कर पता करना चाहा तो वह घर पर नहीं मिला. लेकिन उस की पत्नी दुलारी ने पुलिस को बताया कि वह शाम को 6 बजे पास के एक गांव में शादी में गए थे. वहां से वह साढ़े 11 बजे रात में लौट कर आए थे. दुलारी ने यह भी बताया कि उन के साथ ही गांव के भोला निषाद की 4 बेटियां भी शादी में गई थीं. जहां भोला की 3 लड़कियां वहीं रुक गई थीं, जबकि एक उन के साथ वापस आई थी.

इस के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जहां शादी थी, वहां पता किया तो लोगों ने बताया कि जगभान वहां से साढ़े 8 बजे ही निकल  गया था. फिर पुलिस ने भोला निषाद के घर जा कर पूछताछ की तो  लड़कियों ने बताया कि जगभान उन के घर 9 बजे आए थे, उस के बाद तुरंत वह वापस चले गए. अब पुलिस के सामने सवाल यह था कि जगभान जब भोला के घर से साढ़े 8 बजे चला आया तो वह अपने घर साढ़े 11 बजे रात में पहुंचा था. तो इन ढाई घंटों के दौरान वह कहां रहा.

इस आशंका के आधार पर पुलिस ने जगभान सिंह से ढाई घंटे गायब रहने का कारण पूछा तो वह उस का सही जबाब नहीं दे पाया. पुलिस ने जब कड़ाई से मृतक की पत्नी दुलारी और जगभान सिंह से पूछताछ की गई तो उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या किए जाने की बात स्वीकारते हुए हत्या का राज उगल दिया. उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के जसपुरा थाना क्षेत्र के बुधेड़ा गांव के निवासी शिवनारायण गांव में रह कर खेती करता था. वह दूसरों के खेत बंटाई पर ले कर भी खेती करता था.

शिवनारायण ने गांव के ही जगभान सिंह का खेत भी बंटाई पर ले रखा था. खेत बंटाई में लेने के कारण खेत मालिक जगभान शिवनारायण के घर आनेजाने लगा था. इस बीच जगभान और शिवनारायण की पत्नी दुलारी के बीच नजदीकियां बढ़ाने लगी थीं. दोनों की ये नजदीकियां कब शारीरिक संबंधों में बदल गईं, उन्हें पता ही नहीं चला. लेकिन एक दिन शिवनारायण ने जगभान और दुलारी को साथ में देख लिया तो वह आगबबूला हो गया और जगभान सिंह को घर न आने कि कड़ी हिदायत दे डाली. इस के बावजूद भी जगभान सिंह शिवनारायण के घर आता रहा.

लेकिन बारबार शिवनारायण द्वारा जगभान को घर आने से मना करने की वजह से बीते साल जगभान ने शिवनाराण को अपना खेत बंटाई पर नहीं दिया, तभी से दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था. इसी बात से जगभान और दुलारी शिवनारायण से खार खाए बैठे थे. वह इसी उधेड़बुन में थे कि किसी तरह शिवनारायण को ठिकाने लगाया जाए. हत्यारोपी दुलारी ने बताया कि घटना वाले दिन उन के अविवाहित बेटाबेटी गांव अलमोर में अपने एक दिश्तेदार के घर गए हुए थे. उस दिन घर में कोई नहीं था. उसी दिन दोनों ने शिवनरायण को ठिकाने लगाने के लिए तानाबाना बुन लिया था.

जगभान दावत से लौटने के बाद  रात के 9 बजे दुलारी के घर पहुंच गया. इधर मंडप कार्यक्रम से घर लौटे शिवनरायण ने दुलारी को जगभान के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखा तो गुस्से में उस का खून खौल गया और वह पत्नी को मारनेपीटने लगा और जगभान से गालीगलौज करने लगा. तभी दुलारी ने प्रेमी जगभान के साथ मिल कर अपने पति को चारपाई पर पटक दिया और गला दबा कर उस की हत्या कर दी. उसी दौरान उन लोगों नें लाश को ठिकाने लगाने का प्रयास किया, लेकिन गांव के लोग उस समय जाग रहे थे. ऐसे में उन्होंने शिवनारायण की लाश चारपाई के नीचे छिपा दी. इस के बाद जगभान रात के 11 बजे अपने घर चला आया.

जगभान ने बताया कि रात करीब 2 बजे जब मोहल्ले के लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तब वह रात के सन्नाटे में फिर से शिवनारायण के घर पहुंचा. जहां उस ने और दुलारी ने शिवनारायण की लाश के हाथपांव बांध कर दोनों पैरों के बीच डंडा डाल कर लाश को यमुना नदी में फेंक आए. इतना सब करने के बाद दुलारी और जगभान अपनेअपने घर चले गए. घर आने के बाद दुलारी ने पति के गायब होने की खबर पूरे गांव में फैला दी और जानबूझ कर पति को खोजने का नाटक करती रही. लेकिन पुलिसिया जांच में उन का जुर्म छिप नहीं सका.

पुलिस ने शिवनारायण की पत्नी दुलारी और उस के आशिक जगभान से पूछताछ करने के बाद दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया. वहीं एसपी अभिनंदन ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को ईनाम देने की घोषणा की है. True Crime Story

 

Crime Stories: मौज के बाद मौत

Crime Stories: शिवानी मनोज से प्यार ही नहीं करती थी, बल्कि उसे अपना सब कुछ सौंप भी चुकी थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि उसे मनोज की हत्या करनी पड़ी मनोज कैनवास पर अपनी कल्पना के रंग भरने में मशगूल था. बीचबीच में वह गहरे चिंतन में खो जाता था, जैसे ही कोई बिंब उस के मस्तिष्क में उभरता, उस का ब्रुश हरकत में आ जाता. अपने कमरे के शांत वातावरण में वह पूरी तरह पेंटिंग बनाने में लीन था. तभी किसी महिला की हंसी की आवाज ने उस का ध्यान भंग कर दिया. उस ने पलट कर देखा तो शिवानी खड़ी थी, जो रिश्ते में उस की भाभी लगती थी.

मनोज ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ओह तो आप हैं.’’

‘‘क्यों… मैं यहां नहीं आ सकती क्या?’’ शिवानी ने शरारती लहजे में पूछा.

‘‘क्यों नहीं आ सकतीं भाभी. आप जब चाहें तब आ सकती हैं. बात यह थी कि मेरा पूरा ध्यान पेंटिंग में था, इसलिए मुझे पता ही नहीं चला कि आप कब आ गईं. आप की हंसी की आवाज मेरे कानों में पड़ी, तब आप के आने का पता चला.’’

‘‘इस का मतलब कि मेरे आने से तुम डिस्टर्ब हो गए. इस वक्त मेरा यहां आना तुम्हें अच्छा नहीं लगा होगा?’’ शिवानी ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है. आप के आने से तो मुझे बहुत खुशी होती है. एक तरह से प्रेरणा मिलती है. अरे आप खड़ी क्यों हैं, बैठिए न.’’ मनोज ने कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा.

शिवानी कुरसी पर बैठ गई और पेंटिंग को गौर से देखने लगी. पलभर बाद उस ने कहा, ‘‘मनोज, मैं तुम से एक बात कहूं?’’

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘सचमुच तुम बहुत सुंदर पेंटिंग बनाते हो, तुम्हारे हाथों में कमाल का जादू है. इतनी अच्छी पेंटिंग मैं पहली बार देख रही हूं.’’

‘‘आप लोगों का आशीर्वाद है भाभी.’’

इस पर शिवानी उस के नजदीक आ कर चुलबुलेपन से बोली, ‘‘अच्छा पक्की बात है यह.’’

‘‘हां, इस में कोई शक नहीं है. दुनिया में जो कुछ भी है, उस में बड़ों का आशीर्वाद है.’’ मनोज ने कहा.

‘‘लेकिन मुझे तो नहीं लगता कि मुझे कुछ मिला है.’’ शिवानी की बात में शरारत छिपी थी.

मनोज ने गहरी नजरों से शिवानी को नीचे से ऊपर तक देखा. उस के बाद उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘कभी आईने के सामने खड़ी हो कर खुद को निहार लेना, पता चल जाएगा कि आप को क्या मिला है.’’

इस के जवाब में शिवानी खिलखिला कर हंस पड़ी. इस के बाद अपनी आवाज में शरारत का रंग घोलते हुए बोली, ‘‘लेकिन मेरे पति तो मुझे साधारण कहते हैं. पता नहीं तुम्हारी नजर में मैं इतनी अच्छी क्यों हूं?’’

‘‘सौंदर्य का पुजारी ही सुंदरता की परिभाषा जानता है. मेरी नजर में तो आप सुंदरता की मूर्ति हो.’’

‘‘सच.’’ शिवानी ने चहक कर पूछा तो मनोज ने मुसकरा कर सहमति में सिर हिला दिया. इस से शिवानी खुशी से गदगद हो गई. दोनों के बीच बातचीत चल रही थी कि शिवानी का पति पवन आ गया.

मनोज और पवन गहरे दोस्त थे. उस के आने से दोनों दोस्तों में बातें होने लगीं. कुछ देर बैठ कर शिवानी पति के साथ घर चली गई. लेकिन जाते समय शिवानी ने मनोज की आंखों में जिस तरह झांक कर मुसकराई थी, मनोज के दिल में हलचल मच गई थी. इस के बाद मनोज का मन पेंटिंग बनाने में नहीं लगा. मध्य प्रदेश के सतना जिले के थाना सिविल लाइन के अंतर्गत गांधीग्राम में 32 वर्षीय पवन चौधरी उर्फ नंदू रहता था. पवन आजीविका के लिए पेंटिंग का काम करता था. उस के पिता रामसजीवन चौधरी मजदूरी करते थे. वह अपने बड़े बेटे रामाश्रय चौधरी के साथ रहते थे. रामाश्रय औटो चलाता था.

पवन का विवाह करीब 10 साल पहले शिवानी से हुआ था. विवाह के बाद दोनों गृहस्थ जीवन में रम गए थे. वैसे तो इन के घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन उन्हें एक चीज खटकती थी. जिस के लिए वे हर समय चिंतित रहते थे. उन की शादी को कई साल हो गए थे, लेकिन उन की बगिया सूनी की सूनी थी. दोनों अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहे थे, लेकिन शिवानी मां नहीं बन सकी थी. मनोज चौधरी पवन का रिश्ते का भाई था. उस की उम्र भी यही कोई 22 साल थी. वह अविवाहित था. वह भी पवन की तरह ही पेंटिंग करता था. उस के हाथों में गजब का हुनर था. उस की शुरू से ही कला में रुचि थी. वह किशोर उम्र में आर्ट पेपर पर ही किसी न किसी की तसवीर बनाता रहता था. समय के साथ वह बड़ा हुआ तो उस का ब्रुश कैनवास पर चलने लगा.

लेकिन उस का यह शौक उस का पेट नहीं भर सकता था. ऐसे में उसे मजबूरी में गाडि़यों की नंबर प्लेट, दीवारों और बैनरों पर लिखने का काम करना पड़ा. लेकिन समय मिलने पर वह तसवीर बनाने का अपना शौक पूरा कर लेता था. मनोज और पवन रिश्तेदार थे और एक जैसा काम करते थे, इसलिए उन के बीच अच्छी दोस्ती थी. दोनों ही शराब के जबरदस्त शौकीन थे. मनोज के घर तो मांबाप के कारण शराब की महफिल जम नहीं सकती थी, इसलिए पवन अपने घर शराब की महफिल जमाता था.

मनोज रोजाना शाम को पवन के घर पहुंच जाता. पवन के अलावा घर में उस की पत्नी शिवानी होती थी. शिवानी के तीखे नयननक्श और छरहरा बदन उस की खूबसूरती में चार चांद लगाते थे. ऐसे में मनोज की आंखें हर समय उसी पर टिकी रहती थीं. बच्चे पैदा न होने की वजह से शिवानी के सौंदर्य में कोई कमी नहीं आई थी. वह शिवानी के घर आता था तो शिवानी भी उस के घर जाती थी. लेकिन उस के साथ पवन होता था. फिर भी मनोज और उस की बातें हो जाती थीं. शिवानी भी मनोज को चाहने लगी थी. शादीशुदा होते हुए भी उस ने मनोज को अपने दिल में बसा लिया था. मनोज की हर बात उसे भाती थी.

उस के बात करने का अंदाज और उस की बनाई हुई पेंटिंग, सब उस की आंखों को सुहाती थीं. बस दिल में तमन्ना थी कि मनोज का सान्निध्य उसे मिल जाए और उसे वह जी भर कर प्यार करे. जबकि पवन उसे प्यार देने में कोई कसर नहीं छोड़ता था. वह उस का भरपूर खयाल रखता था. शिवानी भी पवन के प्यार में कोई कमी महसूस नहीं करती थी, लेकिन उसे न जाने मनोज में ऐसा क्या दिखा था कि वह अपने आप को उस की तरफ खिंचने से नहीं रोक पा रही थी.

वह सारी मर्यादाएं तोड़ कर उस के आगोश में समाने को आतुर थी. वह जब भी मनोज से मिलती, उस की और उस की पेंटिंग की खूब तारीफ करती. उस की बातें सुन कर मनोज को भी यकीन हो गया था कि शिवानी के भी दिल में उस के लिए कुछ है. एक दिन जब शिवानी उस के घर आई तो दोनों में खूब बातें हुईं. अगले दिन दोपहर में वह शिवानी के घर पहुंच गया. अपने साथ वह पेंटिंग का सामान भी ले गया था. अपने घर अचानक मनोज के आया देख कर शिवानी बहुत खुश हुई. उस के हाथ में पेंटिंग का सामान देख कर वह बोली, ‘‘आज कौन सी पेंटिंग बनाई है पेंटर बाबू? वैसे तुम्हारे अंदर यह खूबी है कि तुम किसी का भी चित्र बनाते हो तो लगता है वह अभी साकार हो उठेगा.’’

‘‘मैं तो सिर्फ अच्छा बनाने की कोशिश करता हूं. यह देखने वालों का नजरिया होता है. तुम जैसी कला की कद्रदानों के कारण ही कला जिंदा है.’’ मनोज ने एक कलाकार की हैसियत से बहुत कुछ कह दिया.

मनोज ने शिवानी की खूबसूरत आंखों में झांका. शिवानी उस की हर बात को बड़ी संजीदगी से अपने जेहन में उतारने की कोशिश कर रही थी. एकएक बात उस के अंदर खलबली मचा रही थी. मनोज द्वारा साथ में लाई गई अधूरी पेंटिंग को देखते हुए बोली, ‘‘इस पेंटिंग में प्रेम की कौन सी भाषा उकेर रहे हो?’’

‘‘बनाने से पहले बता दूंगा तो तुम्हारे लिए इस पेंटिंग का महत्त्व कम हो जाएगा. अभी यह अधूरी है, जब पूरी हो जाएगी, तब देखना. बस शर्त यह है कि इसे आंखों से नहीं दिल से देखना. कभीकभी जो चीज आंखों से नहीं दिखाई देती, वह आंखें बंद करने पर दिखाई देती है.’’ कह कर मनोज ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

पहले तो शिवानी उस की बात पर हंसी, इस के बाद उस के कान के पास मुंह ले जा कर धीरे से बोली, ‘‘पेंटर बाबू, क्या मुझे नहीं बताओगे कि आंखें बंद कर के तुम क्या देख रहे हो?’’

मनोज ने हड़बड़ा कर आंखें खोल लीं. कला के पारखी मनोज ने शिवानी की आंखों की भाषा पढ़ ली. उस में प्रेम की गहरी कशिश और आमंत्रण था. शिवानी के शब्द ‘पेंटर बाबू’ और ‘मुझे नहीं बताओगे’ अपनेआप का अधिकार जता रहे थे.

तभी शिवानी ने कहा, ‘‘मैं भी पेंटिंग सीखना चाहती हूं, क्या मुझे सिखाओगे?’’

‘‘इस के लिए कीमत चुकानी पड़ेगी.’’ मनोज मजाकिया अंदाज में बोला.

शिवानी के होंठों पर कटीली मुसकान उभर आई. वह शरारती लहजे में बोली, ‘‘बड़े लोभी कलाकार हो, एक कला के कद्रदान से भी कीमत वसूलना चाहते हो. बताओ, क्या कीमत लोगे?’’

‘‘पहले वादा करो कि तुम मुझ से नाराज तो नहीं होगी.’’ मनोज ने गंभीर हो कर कहा.

‘‘चलो, मैं वादा करती हूं कि नाराज नहीं  होऊंगी. जो भी कहना है, खुल कर कह डालो.’’ शिवानी बोली.

‘‘शिवानी, मैं जानता हूं कि तुम शादीशुदा हो, फिर भी पता नहीं तुम ने मेरे ऊपर कैसा जादू कर दिया है कि मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. दिनरात उठतेबैठते तुम ही तुम मेरे खयालों में छाई रहती हो. यहां तक कि पेंटिंग बनाने का जुनून भी तुम्हारे प्यार के आगे फीका पड़ गया है. यदि तुम ने मेरे प्यार को ठुकरा दिया तो मैं मर जाना पसंद करूंगा.’’

‘‘ऐसी अशुभ बात मत बोलो मनोज. मैं तो कब से तुम्हें अपना मान बैठी हूं. बस यही बात तुम्हारे मुंह से सुनने के लिए तरस रही थी.’’

शिवानी ने मनोज के प्यार को कबूल किया तो उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. फिर क्या था, दोनों के तन में वासना की आग भड़क उठी, जो हसरतें पूरी होने के बाद ही शांत हुई. उस दिन से दोनों के जीवन में एक नई बहार आ गई. उन के मिलन का सिलसिला अनवरत चलने लगा. 30 मई, 2015 की सुबह नकटी मोड़ पर राहगीरों ने एक प्लास्टिक की बोरी देखी, जिस में से सड़ांध आ रही थी. लोगों को शक हुआ तो इस की सूचना थाना सिविल लाइंस को दे दी. सूचना मिलते ही टीआई अशोक सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने बोरी खुलवाई तो उस में एक युवक की लाश निकली.

मरने वाले की उम्र 22-23 साल थी. देखने से ही लग रहा था कि लाश कई दिनों पुरानी है, इसलिए सड़ गई है. पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन कोई भी लाश को पहचान नहीं पाया. अचानक टीआई अशोक सिंह को याद आया कि एक दिन पहले थाने में एक युवक की गुमशुदगी दर्ज हुई थी. उन्होंने थाने में फोन कर के इस की जानकारी की तो पता चला कि कोठी थाने के सोनोर निवासी हरिदीन चौधरी ने अपने बेटे मनोज चौधरी की गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

मनोज की उम्र भी 22-23 साल थी. इसलिए उन्होंने मनोज के घर वालों को घटना की सूचना भिजवा दी. सूचना मिलते ही घर वाले मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश देखते ही उस की शिनाख्त मनोज के रूप में कर दी. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद टीआई अशोक सिंह ने जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. थाने आ कर उन्होंने मृतक मनोज के घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि मनोज 27 मई को अपनी बुआ के घर हाटी गया था. वहां से वह रात 11 बजे यह कह कर निकला था कि वह अपनी बहन के घर कुसियारा जा रहा है, लेकिन वह वहां नहीं पहुंचा.

जब वह अपनी बहन के यहां नहीं पहुंचा तो उस की काफी तलाश की गई, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. तब पिता हरिदीन चौधरी ने 29 मई को थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. अगले दिन उस की लाश मिल गई. पिता ने बताया कि उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. टीआई ने सोचा कि ऐसी कोई न कोई वजह तो जरूर रही होगी, जिस की वजह से मनोज की हत्या की गई. उन्होंने हरिदीन चौधरी से मनोज के दोस्तों व परिचितों के नाम पूछे तो उन्होंने बताया कि उस का खास दोस्त एक ही था, वह था गांधीग्राम में रहने वाला पवन चौधरी. वह बस उसी के घर ज्यादा आताजाता था. दोनों में गहरी दोस्ती थी. इस पूछताछ के बाद टीआई अशोक सिंह ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

अशोक सिंह को मुखबिरों से पता चला कि पवन की पत्नी शिवानी काफी रंगीनमिजाज थी. पवन की गैरमौजूदगी में मनोज उस से मिलने भी जाता था. इस से पुलिस को शक हुआ कि कहीं शिवानी और मनोज के बीच कोई चक्कर तो नहीं था? अशोक सिंह ने पवन व शिवानी के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि शिवानी के नंबर से हर रोज पवन के नंबर पर कईकई बार लंबीलंबी बातें होती थीं. 27 मई की रात 11 बजे के करीब मनोज ने शिवानी को फोन किया था. उस के बाद से ही मनोज लापता था. इस का मतलब यह था कि मनोज की हत्या के तार शिवानी से जुड़े थे.

अशोक सिंह ने शिवानी को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. उस से पूछताछ शुरू की गई तो शातिरदिमाग शिवानी ने उन्हें काफी देर तक गुमराह किया. लेकिन जब महिला कांस्टेबल ने उसे सवालों में उलझाया तो वह टूट गई. उस ने अपना गुनाह कबूल करते हुए अपने पति पवन उर्फ नंदू और देवर देवानंद उर्फ देवा का नाम उगल दिया. इस के बाद पुलिस ने तत्काल काररवाई करते हुए पवन और देवानंद को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उन्होंने मनोज की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मनोज और शिवानी के बीच एक बार संबंध बने तो बारबार दोहराए जाने लगे. लेकिन ऐसे संबंधों की गुप्त जिंदगी अधिक लंबी नहीं होती, एक दिन सामने आ ही जाती है. मनोज रोजाना दोपहर को अपने काम से गायब हो जाता था. इस से पवन के मन में शंका हुई कि यह आखिर जाता कहां है? एक दिन पवन भी दोपहर में अचानक अपने घर आ गया. घर का दरवाजा बंद था, लेकिन अंदर से उस की पत्नी और किसी युवक के हंसने की तेजतेज आवाजें आ रही थीं. पवन का मन शंका से घिर गया.

उस ने दरवाजा खटखटाया और शिवानी को आवाज दी. लेकिन दरवाजा काफी देर बाद खुला. वह अंदर घुसा तो कमरे में मनोज खड़ा मिला. पवन को माजरा समझते देर नहीं लगी. उस ने दोनों को काफी फटकारा. मनोज से कहा कि वह आइंदा उस के घर में कदम न रखे, नहीं तो उस के लिए अच्छा नहीं होगा. मनोज वहां से चला गया और शिवानी ने भी पति से गलती के लिए माफी मांग ली. अब मनोज का शिवानी के यहां आनाजाना बंद हो गया. एकदूसरे से अलग रहने की वजह से वे बेचैन रहने लगे. वे फोन पर तो बातें कर लेते थे, लेकिन मिलन के लिए जुगत लगाते रहते.

27 मई, 2015 को मनोज अपनी बुआ से मिलने उस के घर हाटी गया. वहां से रात 11 बजे वह अपनी बहन के घर कुसियारा जाने की बात कह कर निकला. वहां से निकलते ही उस ने मोबाइल से शिवानी से बात की तो उस ने उसे अपने घर बुला लिया, क्योंकि उस समय वह घर पर अकेली थी. मनोज जैसे ही शिवानी के घर पहुंचा उसे अकेली पा कर उस ने उसे बांहों में भर लिया और प्यार करने लगा. इत्तफाक से उसी समय पवन आ गया. उसे देख कर मनोज की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उस ने बात बनाते हुए कहा कि उसे बहन के यहां कुसियारा जाना था, पर रात ज्यादा हो गई, इसलिए वह रात बिताने के लिए यहां आ गया.

लेकिन पवन ने उसे अपनी आंखों से दूसरी हालत में देखा था, इसलिए उसे उस पर गुस्सा आ रहा था. लिहाजा पवन उस पर टूट पड़ा. उस ने उस की लानतमलामत शुरू कर दी. दोनों के बीच हाथापाई होने लगी, इस में मनोज पवन पर भारी पड़ने लगा. उस ने पवन को उठा कर पटक दिया और उस के सीने पर सवार हो गया. जब शिवानी ने देखा कि मनोज उस के पति की जान ले सकता है तो वह हरकत में आ गई. पति की जान बचाने के लिए वह कमरे में रखा टीवी का तार उठा लाई और प्रेमी मनोज के गले में डाल कर खींचने लगी. इस से मनोज की पकड़ ढीली पड़ गई.

इस का फायदा उठा कर पवन ने मनोज को गिरा दिया. इस के बाद दोनों ने मिल कर मनोज के गले में फंसे तार को कस कर खींचा. दम घुटने से मनोज की कुछ ही देर में मौत हो गई. हत्या करने के बाद शिवानी और पवन के सामने मनोज की लाश को ठिकाने लगाने की समस्या आई. दोनों ने रायमशविरा कर के तय किया कि बाथरूम में गड्ढा खोद कर लाश को दबा दिया जाए. सुबह 4 बजे तक दोनों ने बाथरूम में गड्ढा खोदा और उस में मनोज की लाश डाल कर उस में मिट्टी डाल दी. इस के बाद निश्चिंत हो कर दोनों अपनी दिनचर्या में लग गए. अभी 2 दिन ही बीते थे कि लाश सड़ने की वजह से तेज बदबू उठने लगी. इस से दोनों को अपने पकड़े जाने की चिंता हुई तो उन्होंने लाश को कहीं बाहर ठिकाने लगाने का फैसला किया.

इस के लिए पवन ने गांधीग्राम में ही रह रहे अपने छोटे भाई देवानंद चौधरी उर्फ देवा को सारी बात बता कर लाश ठिकाने लगाने में मदद मांगी. भाई को मुसीबत में पड़ा देख कर देवानंद उस की मदद करने को तैयार हो गया. शिवानी, पवन और देवानंद ने लाश को ठिकाने लगाने की योजना बना ली. 29 मई, 2015 की रात तकरीबन 11 बजे देवानंद अपने भाई रामाश्रय चौधरी का औटो नंबर एमपी 19 आर 1438 ले कर पवन के घर पहुंचा. तीनों ने बाथरूम के गड्ढे से मनोज की लाश को निकाला और एक प्लास्टिक की बोरी में भर कर औटो से नकटी मोड़ पर फेंक आए.

लेकिन उन का गुनाह कानून की नजर से बच नहीं सका और वे कानून के शिकंजे में फंस गए. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त तार, फावड़ा और औटो बरामद कर लिया. इस के बाद तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Crime Story: सपनों से सस्ता सिंदूर – पति को बनाया शिकार

Hindi Crime Story: 31 वर्षीय कल्पना बसु कर्नाटक के जिला बीवी का धोखा में आने वाले तालुका माहेर की रहने वाली थी. उस का जन्म एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था. उस के जन्म के कुछ दिनों पहले ही पिता का निधन हो गया था. मां ने मेहनतमजदूरी कर उसे पालापोसा. पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह ज्यादा पढ़ाईलिखाई भी नहीं कर पाई थी.

कल्पना खूबसूरत होने के साथसाथ महत्त्वाकांक्षी भी थी. वह चाहती थी कि उसे ऐसा जीवनसाथी मिले जो उस की तरह हैंडसम हो और उस की भावनाओं की कद्र करते हुए सभी इच्छाओं को पूरा करे. लेकिन उस के इन सपनों पर पानी तब फिर गया जब उस की शादी एक ऐसे मामूली टैक्सी ड्राइवर बसवराज बसु के साथ हो गई, जो उस के सपनों के पटल पर कहीं भी फिट नहीं बैठता था.

38 वर्षीय बसवराज बसु उसी तालुका का रहने वाला था, जिस तालुका में कल्पना रहती थी. प्यार तो उसे बचपन से ही नहीं मिला था. उस के पैदा होने के बाद ही मांबाप दोनों की मौत हो गई थी. उसे नानानानी ने पालपोस कर बड़ा किया था. नानानानी की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह भी पढ़लिख नहीं सका. जिंदगी का बोझ उठाने के लिए जैसेतैसे वह टैक्सी ड्राइवर बन गया था. ड्राइविंग का लाइसैंस मिलने पर वह माहेर शहर आ कर कैब चलाने लगा. जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया तो नातेरिश्तेदारों ने उस की शादी कराने की सोची. आखिरकार उस की शादी कल्पना से हो गई.

खुले विचारों वाली कल्पना से शादी कर के वह खुश था. लेकिन कल्पना उस से खुश नहीं थी. ड्राइवर के साथ शादी हो जाने से उस की सारी ख्वाहिशों और सपनों पर जैसे पानी फिर गया था. पति के रूप में एक मामूली टैक्सी ड्राइवर को पा कर उस के सारे सपने कांच की तरह टूट कर बिखर गए थे.

कुल मिला कर बसवराज बसु और कल्पना का कोई मेल नहीं था, लेकिन मजबूरी यह थी कि वह करती भी तो क्या. बसवराज बसु अपनी आमदनी के अनुसार पत्नी की जरूरतों को पूरी करने की कोशिश करता था, पर पत्नी की ख्वाहिशें कम नहीं थीं. उस की आकांक्षाएं ऐसी थीं, जिन्हें पूरा करना बसवराज के वश की बात नहीं थी. लिहाजा वह अपनी किस्मत को ही कोसती रहती.

समय अपनी गति से चलता रहा. कल्पना 2 बच्चों की मां बन गई. इस के बाद कल्पना की जरूरतें और ज्यादा बढ़ गई थीं, जिन्हें बसवराज बसु पूरा नहीं कर पा रहा था. ऐसी स्थिति में कल्पना की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. उस का पति जब घर से टैक्सी ले कर निकलता था तो तीसरेचौथे दिन ही घर लौट कर आता था. घर आने के बाद भी वह कल्पना का साथ नहीं दे पाता था. ऐसे में कल्पना जल बिन मछली की तरह तड़प कर रह जाया करती थी.

उड़ान के लिए कल्पना को लगे पंख

कल्पना खूबसूरत और जवान थी. बस्ती में ऐसे कई युवक थे, जो उस को चाहत भरी नजरों से देखते थे. एक दिन कल्पना के मन में विचार आया कि क्यों न ऐसे युवकों से लाभ उठाया जाए. इस से उस के सपने तो पूरे हो ही सकते हैं, साथ ही शरीर की जरूरत भी पूरी हो जाएगी.

यही सोच कर कल्पना ने उन युवकों को हरी झंडी दे दी. कई युवक उस के जाल में फंस गए. बच्चों के स्कूल और पति के काम पर जाने के बाद वह मौका देख कर उन्हें घर बुला कर मौजमस्ती करने लगी, साथ ही उन से मनमुताबिक पैसे भी लेने लगी.

कल्पना का रहनसहन और घर के बदलते माहौल को पहले तो बसवराज समझ नहीं सका, लेकिन जब सच्चाई उस के सामने आई तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस पत्नी को वह अपनी जान से भी ज्यादा चाहता है, जिस के लिए वह रातदिन मेहनत करता है, उस के पीठ पीछे वह इस तरह का काम करेगी. उस ने यह भी नहीं सोचा कि दोनों बच्चों पर इस का क्या असर पड़ेगा.

मामला काफी नाजुक था. मौका देख कर बसवराज बसु ने जब कल्पना को समझाना चाहा तो वह उस पर ही बरस पड़ी. उस ने पति को घुड़कते हुए कहा कि तुम्हारे और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद अगर मैं अकेली रहती हूं. ऐसे में अगर मैं किसी से दोचार बातें कर लेती हूं तो इस में बुरा क्या है. तुम्हें यह अच्छा नहीं लगता तो मैं आत्महत्या कर लेती हूं.

कल्पना का बदला व्यवहार और माहौल देख कर बसवराज बसु यह बात अच्छी तरह से समझ गया कि कल्पना को समझानेबुझाने से कोई फायदा नहीं होगा. इसलिए उस ने उस जगह को छोड़ देना ही सही समझा. वह पत्नी और बच्चों को ले कर बेलगांव शहर चला गया.

वहां बसवराज कुड़चड़े थाने के अंतर्गत आने वाले अनु अपार्टमेंट में किराए का फ्लैट ले कर रहने लगा. उस ने टैक्सी चलानी बंद कर दी और किसी की निजी कार चलाने लगा. उसे विश्वास था कि बेलगांव में रह कर पत्नी के आशिक छूट जाएंगे और वह सुधर जाएगी.

लेकिन बसवराज की यह सोच गलत साबित हुई. कल्पना चतुर और स्मार्ट महिला थी. बेलगांव आ कर वह और भी आजाद हो गई. यहां उसे न समाज का डर था और न गांव का. उस ने उसी अपार्टमेंट में रहने वाले पंकज पवार नाम के युवक को फांस लिया. पंकज एक निजी कंपनी में डाटा एंट्री औपरेटर था. वह मडगांव का रहने वाला था.

बसवराज की सोच हुई गलत साबित

31 वर्षीय पंकज पवार की शादी हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे भी थे. लेकिन वह कल्पना के लटकोंझटकों से बच नहीं सका. कल्पना से संबंध बन जाने के बाद पंकज पवार उस के फ्लैट पर आनेजाने लगा. एक दिन पंकज कल्पना से मुलाकात कराने के लिए अपने 3 दोस्तों सुरेश सोलंकी, अब्दुल शेख और आदित्य को भी साथ ले आया. पहली ही मुलाकात में ही कल्पना ने उस के तीनों दोस्तों पर ऐसा जादू किया कि वे भी उस के मुरीद हो गए. उन तीनों से भी कल्पना के संबंध बन गए.

कुछ ही दिनों में कल्पना के यहां आने वाले युवकों की संख्या बढ़ने लगी. धीरेधीरे कल्पना के कारनामों की जानकारी इलाके भर में फैल गई. उस की वजह से बसवराज बसु की ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले की बदनामी होने लगी. ऐसे में बसवराज का वहां रहना मुश्किल हो गया. दोनों बच्चे अब काफी बड़े हो गए थे. बसवराज बसु ने अपने बच्चों के भविष्य के मद्देनजर कल्पना को काफी समझाया, लेकिन अपनी मौजमस्ती के आगे उस ने बच्चों को कोई अहमियत नहीं दी.

कल्पना पर जब पति के समझाने का कोई असर नहीं हुआ तो वह उसे छोड़ कर वहीं पर जा कर रहने लगा, जहां वह नौकरी करता था. इस के बावजूद वह अपनी पूरी पगार ला कर कल्पना को दे जाता था.
हालांकि कल्पना के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. बसवराज बसु के जाने के बाद वह और भी आजाद हो गई थी. वह अपने चारों दोस्तों के साथ बारीबारी से घूमतीफिरती और मौजमजा करती. इस के अलावा वह उन से अच्छीखासी रकम भी ऐंठती थी. वह पूरे समय अपने रूपयौवन को सजानेसंवारने में लगी रहती थी. यहां तक कि अब वह घर पर खाना तक नहीं बनाती थी. खाना पकाने के लिए उस ने अपने प्रेमी अब्दुल शेख की पत्नी सिमरन शेख को सेवा में रख लिया था.

2 अप्रैल, 2018 को बसवराज बसु की जिंदगी का आखिरी दिन था. एक दिन पहले उसे जो पगार मिली थी, उसे पत्नी को देने के लिए वह 2 अप्रैल को दोपहर में फ्लैट पर पत्नी के पास पहुंचा. घर का जो माहौल था, उसे देख कर उस का खून खौल उठा. कल्पना ने बेशरमी की हद कर दी थी. वहां पर सुरेश सोलंकी, आदित्य और अब्दुल शेख जिस अवस्था में थे, उसे देख कर साफ लग रहा था कि कल्पना उन के साथ क्या कर रही थी. यह देख कर बसवराज का खून खौल गया.

वह पत्नी को खरीखोटी सुनाते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हें खर्चे के लिए पैसे देने के लिए आता हूं. लेकिन तुम्हारा यह घिनौना रूप देख कर तुम्हें पैसा देने और यहां आने का मन नहीं होता. लेकिन बच्चों के लिए यह सब करना पड़ता है.’’

बसवराज की मौत आई रस्सी में लिपट कर

पति की बात सुन कर कल्पना डरी नहीं बल्कि वह भी उस पर हावी होते हुए बोली, ‘‘तो मत आओ. मैं ने तुम्हें कब बुलाया और पैसे मांगे. तुम क्या समझते हो, मेरे पास पैसे नहीं हैं? तुम कान खोल कर सुन लो, मैं जिस ऐशोआराम से रह रही हूं, वह तुम्हारे पैसों से नहीं मिल सकता. तुम्हारी पूरी पगार से तो मेरा शैंपू ही आएगा. रहा सवाल बच्चों का तो उन की चिंता तुम छोड़ दो.’’

कल्पना की यह बात सुन कर बसवराज बसु को जबरदस्त धक्का लगा. इस के बाद पतिपत्नी के बीच झगड़ा बढ़ गया. तभी गुस्से में आगबबूला कल्पना ने अपने तीनों प्रेमियों को इशारा कर दिया. कल्पना का इशारा पाते ही उस के तीनों प्रेमियों ने मिल कर बसवराज बसु को पीटपीट कर बेदम कर दिया.
शारीरिक रूप से कमजोर बसवराज बसु बेहोश हो कर जमीन पर गिर गया. उसी समय अब्दुल शेख की बीवी सिमरन भी वहां आ गई. तभी कल्पना के घर के अंदर बंधी नायलौन की रस्सी खोल कर बसवराज के गले में डाल कर पूरी ताकत से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. यह देख कर सिमरन सहम गई.

टुकड़ों में बंट गया पति

अब्दुल शेख और कल्पना ने सिमरन को धमकी दी कि अपना मुंह बंद रखे. अगर मुंह खोला तो उस का भी यही हाल होगा. डर की वजह से सिमरन चुप रही. कल्पना और उस के प्रेमियों का गुस्सा शांत हुआ तो वे बुरी तरह घबरा गए. हत्या के समय पंकज वहां नहीं था.

थोड़ी देर सोचने के बाद कल्पना और उस के प्रेमियों ने बसवराज बसु की लाश ठिकाने लगाने का फैसला ले लिया. कल्पना ने शव ठिकाने लगवाने के मकसद से पंकज को फोन कर के बुला लिया. लेकिन पंकज को जब हत्या का पता चला तो वह घबरा गया. पहले तो पंकज ने इस मामले से अपना हाथ खींच लिया, लेकिन अपनी प्रेमिका कल्पना को मुसीबत में घिरी देख कर वह उस का साथ देने के लिए तैयार हो गया.
चारों ने मिल कर बसवराज बसु के शव को बाथरूम में ले जा कर उस के 3 टुकड़े किए और उन टुकड़ों को कपड़ों में लपेट कर प्लास्टिक की 3 बोरियों में भर दिया. मौका देख कर उसी रात 12 बजे इन लोगों ने तीनों बोरियों को अब्दुल शेख की कार की डिक्की में रख दिया. इस के बाद ये लोग कुड़चड़े महामार्ग के अनमोड़ घाट गए और उन बोरियों को एकएक किलोमीटर की दूरी पर घाट की घाटियों में दफन कर के लौट आए.

जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त बेखबर होते गए. उन का मानना था कि इस हत्याकांड से कभी परदा नहीं उठेगा और उन का राज राज ही रह जाएगा. लेकिन वे यह भूल गए थे कि उन के इस राज की साक्षी अब्दुल शेख की बीवी सिमरन शेख थी, जिस की आंखों के सामने बसवराज बसु की हत्या का सारा खेल खेला गया था. वह इस राज को अपने सीने में छिपाए हुए थी.
पता नहीं क्यों सिमरन को हत्या में शामिल लोगों से डर लगने लगा था. यहां तक कि अपने पति से भी उस का विश्वास नहीं रहा. उसे ऐसा लगने लगा जैसे उस की जान को खतरा है. वे लोग अपना पाप छिपाने के लिए कभी भी उस की हत्या कर सकते हैं. इस डर की वजह से सिमरन शेख बेलगांव की जानीमानी पत्रकार ऊषा नाईक देईकर से मिली और उस ने बसवराज बसु हत्याकांड की सारी सच्चाई बता दी.

आखिर राज खुल ही गया

बसवराज बसु की हत्या की सच्चाई जान कर ऊषा नाईक के होश उड़ गए. उन्होंने सिमरन शेख को साहस और सुरक्षा का भरोसा दे कर मामले की सारी जानकारी बेलगांव कुड़चड़े पुलिस थाने के थानाप्रभारी रवींद्र देसाई और उन के वरिष्ठ अधिकारियों को दी. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में थानाप्रभारी रवींद्र देसाई ने अपनी जांच तेजी से शुरू कर दी.

उन्होंने 24 घंटे के अंदर बसवराज बसु हत्याकांड में शामिल कल्पना बसु के साथ पंकज पवार, अब्दुल शेख और सुरेश सोलंकी को गिरफ्त में ले कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश किया, जहां सीपी अरविंद गवस ने उन से पूछताछ की. पुलिस गिरफ्त में आए चारों आरोपी कोई पेशेवर अपराधी नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

9 मई, 2018 को उन्हें गिरफ्तार कर पुलिस अनमोड़ घाट की उस जगह पर ले कर गई, जहां उन्होंने बसवराज बसु के शव के टुकड़े दफन किए थे. उन की निशानदेही पर पुलिस ने शव के तीनों टुकड़ों को बरामद कर लिया. घटना के समय बसवराज जींस पैंट पहने हुए था. उस की पैंट की जेब में उस का ड्राइविंग लाइसेंस मिला, जिस से यह बात सिद्ध हो गई कि शव बसवराज का ही था. शव को कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए मडगांव के बांबोली अस्पताल भेज दिया.

पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए कल्पना बसु, पंकज पवार, सुरेश सोलंकी और अब्दुल शेख से विस्तृत पूछताछ कर के उन के विरुद्ध भांदंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. फिर चारों को मडगांव मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी आदित्य गुंजर फरार था, जिस की पुलिस बड़ी सरगरमी से तलाश कर रही थी. Hindi Crime Story

Hindi Stories: एक निर्णय से बदल गई कई जिंदगियां

Hindi Stories: रूढि़वादी विचारों में फंस कर लोग आर्गन डोनेट करने में हिचकिचाते हैं. लेकिन एक आम गृहिणी संतोष ने पति के आर्गन डोनेट कर के कई लोगों को नई जिंदगी दी. आज चिकित्सा के क्षेत्र में जितना तेजी से विकास हो रहा है, मरीजों की संख्या भी उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही है. इस

का अनुमान प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले मरीजों से लगाया जा सकता है. प्रदूषण, असंयमित दिनचर्या व अन्य वजहों से आज आर्गन फेल्योर मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है. आर्गन डोनेट कर के इस तरह के मरीजों की सहायता की जा सकती है, लेकिन समाज में फैले रूढि़वादी विचार इस रास्ते में बाधक बने हुए हैं. पर हाल ही में एक मरीज के घर वालों ने रूढि़वादी विचारों को त्याग कर एक ऐसा फैसला लिया कि कई लोगों की जिंदगी बदल गई.

दिल्ली के पश्चिम विहार निवासी रामबाबू आनंद पर्वत स्थित किसी निजी कंपनी में नौकरी करते थे. 29 जुलाई की शाम 6, साढ़े 6 बजे ड्यूटी पूरी कर के शाम को स्कूटर से वह अपने घर लौट रहे थे, तभी पंजाबीबाग के नजदीक किसी भारी वाहन ने पीछे से उन के स्कूटर में टक्कर मार दी. जिस से वह स्कूटर से उछल कर दूर जा गिरे और बेहोश हो गए. टक्कर मार कर वह भारी वाहन तेज गति से भाग गया. 57 वर्षीय रामबाबू को देखने के लिए सड़क पर चलने वाले कई लोग जमा तो हो गए, लेकिन इतनी हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा था कि उन्हें किसी अस्पताल तक पहुंचा सके. कुछ लोगों की मानवीयता जागी भी, लेकिन वे घायल रामबाबू को अस्पताल ले जा कर पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ना चाहते थे.

उधर से कार से गुजरने वाले लोग भीड़ को देख कर कार की गति धीमी कर के जायजा लेने की कोशिश तो करते, लेकिन जब उन्हें पता चलता कि मामला एक्सीडेंट का है तो वे वहां से खिसक जाते. दिल्ली में ज्यादातर लोग संवेदनहीन हो गए हैं. इस की वजह पुलिस का लफड़ा हो या उन की भागती जिंदगी, लेकिन इस मानसिकता की वजह से दुर्घटनाग्रस्त अनेक लोगों को समय पर चिकित्सा नहीं मिल पाती. कुछ देर बाद एक औटो वाले ने घायल रामबाबू को लोगों के सहयोग से अपने औटो में डाला और उन्हें नजदीक के एमजीएस अस्पताल ले गया.

आपातकालीन वार्ड में रामबाबू का इलाज शुरू हो गया. इस दुर्घटना में उन्हें कोई खुली चोट नहीं आई थी. लेकिन जब अस्पताल में जांच हुई तो पता चला कि उन के सिर में गंभीर चोट आई है. प्राथमिक उपचार के बाद डाक्टरों ने उन्हें आईसीयू में भरती कर दिया. रामबाबू को आईसीयू में भरती कर तो लिया, लेकिन डाक्टरों ने उन का उपयुक्त तरीके से इलाज शुरू नहीं किया. इस की वजह यह थी कि रामबाबू की तरफ से अस्पताल में एडवांस पैसे जमा नहीं हुए थे. और पैसे जमा करता भी कौन, क्योंकि उन का कोई परिजन या नजदीकी वहां था नहीं.

जो औटो वाला उन्हें भरती करने आया था, वह भी वहां से कब का जा चुका था. रामबाबू की सीरियस हालत को देखते हुए डाक्टरों को उन का इलाज शुरू कर देना चाहिए था. रही बात पैसों की तो उन के घर वालों के पहुंचने पर उन से ले लेते. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए अस्पताल प्रशासन की तरफ से स्थानीय पंजाबीबाग थाने की पुलिस को जानकारी दे दी गई. लिहाजा पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई.

पुलिस को रामबाबू के पास ड्राइविंग लाइसेंस और स्कूटर के जो कागज मिले थे, उन से पता चला कि वह पश्चिमी दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके के हैं. उन कागजों से उन्हें एक फोन नंबर मिला. उस फोन नंबर पर बात की गई तो वह रामबाबू की पत्नी संतोष का था. पुलिस ने संतोष को रामबाबू की दुर्घटना की जानकारी देते हुए पंजाबीबाग के एमजीएस अस्पताल आने को कहा.

पति का एक्सीडेंट होने की बात सुन कर संतोष घबरा गईं. उस समय वह घर पर अकेली थीं. उन का एकलौता बेटा चिराग नोएडा में अपनी नौकरी पर था. उन्होंने उस समय बेटे को फोन कर के यह जानकारी दी और खुद अपने पड़ोसियों के साथ एमजीएस अस्पताल पहुंच गईं. आईसीयू में इलाज शुरू करने से पहले डाक्टर ने उन से पैसे जमा कराने को कहा. लेकिन जल्दबाजी में वह घर से पैसे ले कर चलना ही भूल गई थीं. पति के एक्सीडेंट की खबर मिलने पर वह इतना घबरा गई थीं कि जल्दी से पड़ोसी को बता कर उस के साथ अस्पताल आ गईं. वह डाक्टरों से लाख कहती रहीं कि इलाज शुरू करें, बेटे के आने पर पैसे जमा करा देंगी, लेकिन डाक्टरों का दिल नहीं पसीजा.

एक, सवा घंटा बाद रामबाबू का बेटा चिराग जब नोएडा से अस्पताल पहुंचा तो उस ने इधरउधर से पैसे इकट्ठे कर के अस्पताल में जमा कराए. इस के बाद ही करीब साढ़े 8 बजे डाक्टरों ने रामबाबू का इलाज शुरू किया. जांच में पता चला कि उन के मस्तिष्क की कुछ नसें फट गई हैं.

डाक्टरों की टीम उन के उपचार में लगी रही, पर उन की हालत में सुधार नहीं हो पा रहा था. इस से घर वालों की चिंता बढ़ती जा रही थी. चिराग बारबार डाक्टरों के पास जा कर पिता की तबीयत के बारे में पूछ रहा था. जब चिराग को लगा कि इस अस्पताल में पिता की हालत सुधरने वाली नहीं है तो उस ने सर गंगाराम अस्पताल के अपने जानकार न्यूरोसर्जन से सलाह ली. चिराग ने व्हाट्सऐप से न्यूरोसर्जन को पूरी रिपोर्ट भेज दी थी. न्यूरोसर्जन ने उसे सलाह दी कि ब्रेन की कंडीशन ठीक नहीं है, इसलिए उन्हें आब्जर्वेशन में रखना पड़ेगा.

चिराग अपने पिता को किसी अच्छे अस्पताल में ले जाना चाहता था. इस के लिए उस ने सब से पहले सर गंगाराम अस्पताल में बात की, पर वहां के आईसीयू में कोई बेड खाली नहीं मिला. इस के बाद उस ने साकेत के मैक्स अस्पताल में बात की. इत्तफाक से वहां के आईसीयू में भी बेड खाली नहीं था. वह परेशान हुआ जा रहा था. ऐसे में उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तभी उस के एक परिचित ने राजेंद्र प्लेस स्थित बीएल कपूर अस्पताल के बारे में बताया कि वह भी मल्टीस्पैशिलिटी अस्पताल है. वहां बात कर के देखो.

तब चिराग ने बीएल कपूर अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता को अपने पिता की हालत से अवगत कराते हुए आईसीयू में बेड उपलब्ध कराने की मांग की. उन के हां कहने के बाद चिराग 30 जुलाई को तड़के 3-4 बजे अपने पिता को एमजीएस अस्पताल से बीएल कपूर अस्पताल ले गया. वहां आईसीयू में वेंटिलेटर पर रख कर डाक्टरों की टीम उन के इलाज में जुट गई. सीनियर न्यूरोसर्जन डा. विकास गुप्ता और डा. राजेश पांडे के नेतृत्व में टीम रामबाबू के उपचार में लगी रही, लेकिन उन की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. उन की हालत सीरियस बनी हुई थी. अगले दिन तक उन की हालत सुधरने के बजाय और ज्यादा सीरियस हो गई. आखिर 31 जुलाई को सुबह साढ़े 10 बजे रामबाबू का ब्रेन डेड हो गया.

ब्रेन डेड होने की हालत में मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है, जबकि शरीर के अन्य अंग कुछ घंटों तक सक्रिय रहते हैं. डा. विकास गुप्ता ने रामबाबू का ब्रेन डेड होने वाली बात उन के एकलौते बेटे चिराग को बताई तो उस के ऊपर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. वह अस्पताल में ही फफकफफक कर रोने लगा. संतोष को जब पता लगा कि उस के पति अब इस दुनिया में नहीं रहे तो वह भी जोरजोर से रोने लगीं. कुछ रिश्तेदार मांबेटे को ढांढस बंधाने लगे. उन के परिवार के लिए यह एक गहरा सदमा था.

ब्रेन डेड होने की स्थिति में रामबाबू का ठीक होना असंभव था, क्योंकि कुछ घंटों बाद उन के बाकी आंतरिक अंगों के निष्क्रिय हो जाने पर डाक्टर उन्हें मृत घोषित कर देते. रामबाबू का इलाज कर रही टीम ने यह बात अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता को बताई तो उन्होंने सोचा कि ऐसी हालत में यदि उन के अन्य अंगों को जरूरतमंद लोगों में प्रत्यारोपित कर दिए जाएं तो कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है. इस से पहले इस अस्पताल में इसी तरह के 9 जनों के आर्गन दूसरे मरीजों में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किए जा चुके थे. मगर यह काम रामबाबू के घर वालों की सहमति के बिना नहीं हो सकता था.

ऐसे में सब से बड़ी समस्या रामबाबू के परिजनों से बात करने की थी, क्योंकि उन का तो रोरो कर बुरा हाल था. घर वाले ही नहीं, रिश्तेदार भी शोक में डूबे थे. एक तो उन के घर का आदमी चला गया था, ऊपर से उस के अंगदान की बात उन से करना आसान नहीं था.

अब डाक्टरों के सामने यह बात एक चुनौती जैसी हो गई कि गमगीन माहौल में संतोष और उन के बेटे से किस तरह बात की जाए. दूसरे बात यह भी थी कि उन के परिवार से बातचीत की शुरुआत जल्दी की जाए क्योंकि उन्होंने बात करने में देर कर दी तो रामबाबू के आर्गन भी निष्क्रिय हो जाएंगे, जिस से उन का ट्रांसप्लांट नहीं हो सकेगा. रामबाबू के परिवार की ओर से अस्पताल में जो लोग मौजूद थे, उन में उन का बेटा चिराग ही ज्यादा भागदौड़ कर रहा था. वही ज्यादा एक्टिव था. डाक्टरों ने सब से पहले उस से ही बात करना मुनासिब समझा.

डाक्टरों की टीम ने एक कक्ष में बैठा कर उस से बातचीत शुरू की. सब से पहले उन्होंने उसे सांत्वना देते हुए समझाया. जब वह कुछ सामान्य हुआ तो कहा, ‘‘देखो चिराग, आप के परिवार की जो क्षति हुई है, उस की पूर्ति कोई नहीं कर सकता, लेकिन आप थोड़ा समझ कर फैसला लेंगे तो कई लोगों को नई जिंदगी दे सकते हैं.’’

डाक्टर की बात सुन कर चिराग चौंका और उन की तरफ गौर से देखते हुए बोला, ‘‘वह कैसे?’’

‘‘देखो, आप के पिता का ब्रेन डेड हो चुका है. अब इस के कुछ घंटे बाद शरीर के आंतरिक अंग भी निष्क्रिय हो जाएंगे. यदि उन के अंग डोनेट कर दिए जाएं तो कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है. यह बहुत बड़ा परोपकार होगा.’’ डाक्टर ने समझाया.

चिराग पढ़ालिखा और समझदार था, फिर भी उसे यह बात सुन कर एक झटका सा लगा क्योंकि एक तो उस के पिता जा चुके थे, ऊपर से डाक्टर उन के अंगदान करने को कह रहे थे. वह बोला, ‘‘आप यह क्या कह रहे हैं?’’

‘‘देखो चिराग, आप पढ़ेलिखे और समझदार हो, इसलिए आप जानते होगे कि भारत में ऐसे तमाम मरीज हैं, जिन्हें आर्गन की जरूरत है, लेकिन तमाम वजहों से वे आर्गन ट्रांसप्लांट नहीं करा सकते. सोचो, ऐसे में उन को आप के पिता के आर्गन मिल गए तो वे लोग कितनी दुआएं देंगे.’’ डाक्टर ने कहा.

डाक्टर की बात चिराग की समझ में आ तो गई, लेकिन अंतिम निर्णय तो उस की मां संतोष को ही लेना था, क्योंकि उन की लिखित अनुमति के बिना यह काम नहीं हो सकता था. चिराग के हावभाव देख कर डाक्टरों को लग रहा था कि बात पौजिटिव जा रही है.

‘‘कल्पना करो चिराग, उन की दोनों आंखें उन लोगों को ट्रांसप्लांट की जाएंगी, जिन की जिंदगी में अंधेरा है. जब वे आप के पिता की आंखों से दुनिया देखेंगे तो कितनी खुशी महसूस करेंगे. वे आप को जिंदगी भर दुआएं देंगे और यह बात ध्यान रखो कि आप को यह फैसला बहुत जल्दी लेना है.’’ डाक्टर ने समझाया.

डाक्टरों से बात कर के जैसे ही चिराग कक्ष से बाहर निकला, उस के रिश्तेदारों ने उस से पूछना शुरू कर दिया कि डाक्टर क्या कह रहे थे? जब चिराग ने उन्हें पिता के अंगदान करने वाली बात बताई तो कुछ रिश्तेदार आश्चर्यचकित हो कर अपनीअपनी दलीलें देने लगे कि ऐसे दुख के माहौल में डाक्टर भी भला यह कैसी बात कर रहे हैं. कुल मिला कर दलीलें देने वाले रिश्तेदार अंगदान करने के पक्ष में नहीं थे.

डाक्टरों की बात चिराग की समझ में आ चुकी थी, इसलिए उस ने रिश्तेदारों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. उस ने इस बारे में अपनी मां से बात की. बेटे की बात सुन कर एक बार को संतोष भी उस की तरफ देखने लगीं कि यह क्या कह रहा है? एक तो पति चले गए थे, ऊपर से यह उन का शरीर फड़वा कर अंगदान करने को कह रहा है. उन्होंने साफ कह दिया कि वह उन की लाश की दुर्गति नहीं होने देंगी.

चिराग के 1-2 रिश्तेदार थे, जो उस की बात से सहमत थे. तब चिराग ने उन के साथ मां को समझाया. थोड़ी कोशिश के बाद बात उन की समझ में आ गई. लेकिन उन्होंने शर्त यह रखी कि पति के जो भी अंग जिन लोगों को ट्रांसप्लांट किए जाएं, उन से बदले में कोई पैसा न लिया जाए. तब डाक्टरों ने उन्हें भरोसा दिया कि जब आप अंगदान कर रहे हैं तो पैसे लेने की बात ही नहीं उठती. इस के बाद संतोष ने पति के अंगदान करने की लिखित अनुमति दे दी.

रामबाबू के ब्रेन डेड का पहला टेस्ट सुबह साढ़े 10 बजे हुआ था. दूसरा टेस्ट 6 घंटे के अंतराल पर होना था, उस के बाद ही अंग प्रत्यारोपण की काररवाई होनी थी. अब उन्हें अनुमति मिल ही गई थी. इस के बाद डाक्टरों ने शाम साढ़े 4 बजे फिर से रामबाबू का परीक्षण किया तो उस में भी रिपोर्ट ब्रेन डेड की ही आई.

संतोष से कानूनी प्रक्रिया पूरी कराने के बाद अब आगे की काररवाई करनी थी. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए कुछ कानूनी औपचारिकताएं भी पूरी करनी थीं. रामबाबू की दुर्घटना पश्चिमी दिल्ली के थाना पंजाबीबाग क्षेत्र में हुई थी, इसलिए उस थाने के एसएचओ ईश्वर सिंह को भी शाम 7 बजे अस्पताल बुलवा लिया गया. रामबाबू के कौनकौन से अंग दान करने हैं, यह जानने के लिए थानाक्षेत्र के हिसाब से संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस के डाक्टर का वहां होना जरूरी था.

डाक्टरों ने एसएचओ ईश्वर सिंह को आर्गन डोनेट करने वाली बात बताई तो उन्होंने इस काम में भरपूर सहयोग किया. उन्होंने संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल के डाक्टर को बुलाने के लिए एक गाड़ी भेज दी. उस गाड़ी से रात साढ़े 9-10 बजे डा. ढींगरा बीएल कपूर अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने जांच कर के बताया कि रामबाबू का हार्ट, लीवर, किडनी और दोनों कार्निया ही ट्रांसप्लांट लायक हैं. अब बात यह थी कि ये अंग किसे ट्रांसप्लांट किए जाएं. किडनी ट्रांसप्लांट के 30-35 मरीज बीएल कपूर अस्पताल में ही वेटिंग लिस्ट में थे. डा. एच.एस. भटियाल, डा. आदित्य प्रधान और डा. सुनील प्रकाश की टीम ने रामबाबू की दोनों किडनियां इसी अस्पताल के प्रतीक्षारत 2 रोगियों में ट्रांसप्लांट कर दीं.

इसी अस्पताल के एक मरीज को उन का लीवर ट्रांसप्लांट कर दिया गया. कार्निया के लिए सेंटर फौर साइट से डा. ए.के. नायक को बुला लिया गया. वे रामबाबू की दोनों कार्निया अपने साथ ले गए. अब उन का हार्ट बचा था. ऐसा मरीज बीएल कपूर अस्पताल की प्रतीक्षा सूची में नहीं था. इस के लिए डा. संजय मेहता ने पहले दिल्ली के एम्स अस्पताल से संपर्क किया. वहां कई पेशेंट हार्ट ट्रांसप्लांट की वेटिंग लिस्ट में थे. रामबाबू का ब्लड ग्रुप ए पौजिटिव था. उन का हार्ट उसी ब्लड ग्रुप के पेशेंट में ट्रांसप्लांट किया जा सकता था. एम्स के डाक्टरों ने इसी ग्रुप के वेटिंग लिस्ट के मरीजों से बात करनी चाही.

रात के 2 बज चुके थे, उस समय उन के कई मरीजों के फोन बंद मिले. कुछ मरीज दिल्ली से बाहर थे. 1-2 मिले भी, लेकिन वे दिल्ली से दूर के थे. उन का उसी समय अस्पताल पहुंचना असंभव था. लिहाजा एम्स में भी हार्ट ट्रांसप्लांट का मरीज नहीं उपलब्ध हो सका. एम्स में मरीज उपलब्ध न होने पर सर गंगाराम अस्पताल में बात की गई, वहां भी कोई ऐसा मरीज नहीं मिला, जो रात में ही हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए उन के अस्पताल आ सकता.

हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए अपोलो और मेदांता अस्पताल में भी बात की, लेकिन वहां भी कोई मरीज नहीं मिला तो मैक्स अस्पताल में बात की गई. इस अस्पताल में भी कई मरीज वेटिंग में थे. वेटिंग लिस्ट के मरीजों से बात की गई तो साकेत स्थित मैक्स अस्पताल का 42 वर्षीय मिराजुद्दीन उसी समय अस्पताल आने को तैयार हो गया.

दिल्ली के अबुल फजल एन्क्लेव के शाहीन बाग का रहने वाला मिराजुद्दीन दैनिक मजदूर था. कई अस्पतालों में इलाज कराने के बाद पिछले 3 महीने से उस का मैक्स अस्पताल के डा. राजेश मल्होत्रा के नेतृत्व में इलाज चल रहा था. उस का हार्ट डायलेस हो चुका था. वह 15-20 प्रतिशत ही काम कर रहा था. उस से बात की गई तो वह उसी समय अस्पताल आने को तैयार हो गया. मैक्स अस्पताल साकेत की तरफ से पेशेंट कन्फर्म की सूचना बीएल कपूर अस्पताल को दे दी गई.

रामबाबू राजेंद्र प्लेस स्थित बीएल कपूर अस्पताल में थे. वहां से हार्ट साकेत के मैक्स अस्पताल लाना था. यह दूरी 20 किलोमीटर थी. हार्ट निकालने के बाद कुछ घंटे के अंदर ही दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट होना जरूरी था. इन दोनों अस्पतालों को जो सड़कें जोड़ती हैं, उन पर अकसर ज्यादा ट्रैफिक रहता है. वैसे रात में रोड अकसर खाली मिलता है. फिर भी इत्तफाक से हार्ट ले जाने वाली एंबुलेंस जाम में फंसने के बाद उन की कोशिश पर कहीं पानी न फिर जाए. यही चिंता दोनों अस्पतालों के डाक्टरों को थी.

तब बीएल कपूर अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता ने रात में ही दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त शरद अग्रवाल से बात कर के मदद मांगी. अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को समझते हुए शरद अग्रवाल ने उन्हें सहयोग देने का आश्वासन दिया. उन्होंने रात में ही ट्रैफिक पुलिस के अधिकारियों से बात कर के उक्त दोनों अस्पतालों के बीच ग्रीन कारीडोर बनाने के निर्देश दिए, ताकि हार्ट को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने में कोई असुविधा न हो.

ट्रैफिक पुलिस अलर्ट हो गई. हार्ट ले कर जाने वाले मार्ग पर ट्रैफिक पुलिस के जवान तैनात हो गए. पूरी तैयारी के बाद चीफ कार्डियो सर्जन डा. रजनीश मल्होत्रा ने 4 डाक्टरों की टीम बीएल कपूर अस्पताल भेज दी. हार्ट सुरक्षित निकालने से पहले टीम ने हार्ट में कार्डियोप्लीजिया का इंजेक्शन दे दिया, जिस से उन का हार्ट 90 मिनट के लिए रुक गया.

इस के बाद उसे प्रिजर्व कर के आइस में रख लिया. उस जीवित हार्ट को ले कर रात 3 बजे डाक्टरों की टीम बीएल कपूर अस्पताल से मैक्स अस्पताल के लिए रवाना हो गई. एंबुलेंस से आगे पुलिस की 2 गाडि़यां ग्रीन कारीडोर में रास्ता बनाते हुए चल रही थीं. 3 बज कर 16 मिनट पर डाक्टर उस हार्ट को ले कर साकेत स्थित मैक्स अस्पताल पहुंच गए.

मैक्स अस्पताल में डा. रजनीश मल्होत्रा के नेतृत्व में टीम पेशेंट मिराजुद्दीन के साथ औपरेशन थिएटर में तैयार थी. टीम ने हार्ट ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू कर दी. सुबह 6 बजे तक औपरेशन की प्रक्रिया चली. इस के बाद उस में खून का प्रवाह शुरू कर दिया. मिराजुद्दीन के शरीर में रामबाबू का हार्ट काम करने लगा. यह देख कर डा. रजनीश मल्होत्रा की टीम बहुत खुश हुई. क्योंकि मैक्स अस्पताल में हार्ट ट्रांसप्लांट का यह पहला मामला था. जब हार्ट सही तरीके से काम करने लगा तो डा. रजनीश मल्होत्रा ने मिराजुद्दीन को 24 घंटे वेंटीलेटर पर रख कर दूसरे वार्ड में ट्रांसफर कर दिया.

सफलतापूर्वक हार्ट ट्रांसप्लांट होने की प्रक्रिया में ट्रैफिक पुलिस की भी अहम भूमिका रही. दोनों अस्पतालों के डाक्टरों ने पुलिस की ग्रीन कारीडोर व्यवस्था की सराहना की है. संतोष और उन के बेटे द्वारा लिए गए अहम फैसले ने कई मरीजों को नई जिंदगी दी है. संतोष की तरह अन्य लोगों को भी इस तरह की सामाजिक सेवा में आगे आना चाहिए.

उत्तर भारत के गिनेचुने अस्पतालों में ही हार्ट ट्रांसप्लांट की सुविधा मौजूद है. दिल्ली में सब से ज्यादा हार्ट ट्रांसप्लांट एम्स में किए गए हैं. एम्स में अब तक करीब 25 हार्ट ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं. Hindi Stories

 

Emotional Story: मजा, जो बन गया सजा

Emotional Story: न्यू आगरा के रहने वाले रामप्रसाद ने मंजू की शादी कर के यही सोचा था कि वह बेटी से मुक्ति पा गए हैं. लेकिन मंजू को न पति अच्छा लगा था, न उस के घर वाले. यही वजह थी कि एक बेटी पैदा होने के बाद भी वह ससुराल में मन नहीं लगा पाई और एक दिन बेटी को ले कर बाप के घर आ गई.

बेटी ससुराल वालों से लड़ाईझगड़ा कर के हमेशा के लिए मायके आ गई है, यह बात न तो रामप्रसाद को अच्छी लगी थी और न उन की पत्नी को. उन्होंने मंजू को ऊंचनीच समझा कर ससुराल भेजना चाहा तो उस ने साफ कह दिया कि उन्हें उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है, वह कहीं नौकरी कर के अपना और बेटी का गुजारा कर लेगी.

मंजू ने यह बात कही ही नहीं, बल्कि कोशिश कर के नौकरी कर भी ली. उसे एक कंपनी में चपरासी की नौकरी मिल गई थी. इस के बाद वह निश्चिंत हो गई, क्योंकि उसे वहां से गुजारे लायक वेतन मिल जाता था. रहने के लिए पिता का घर था ही.

मंजू अपनी नौकरी पर औटो से आतीजाती थी. इसी आनेजाने में कभी मंजू की मुलाकात औटोचालक करन शर्मा से हुई तो दोनों में जल्दी ही जानपहचान हो गई.

करन अकसर मंजू को अपने औटो से लाने ले जाने लगा तो धीरेधीरे उन की यह जानपहचान दोस्ती में बदल गई. उस के बाद दोनों में प्यार हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन यहां परेशानी यह थी कि दोनों ही शादीशुदा नहीं, बच्चे वाले थे.

मंजू तो खैर पति को छोड़ कर आ गई थी, लेकिन करन शर्मा तो पत्नी और बच्चों के साथ रह रहा था. इस के बावजूद वह मजा लेने के चक्कर में मंजू से प्यार कर बैठा.

करीब 7 साल पहले करन की शादी भावना से हुई थी. उस के 2 बच्चे थे  बेटा ललित और बेटी आयुषि. भावना अपने इस छोटे से परिवार में खुश थी. प्यार करने वाला पति था तो सुंदर से 2 बच्चे. इन्हीं सब की देखभाल में उस का समय बीत जाता था.

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लेकिन अचानक मंजू ने उस के प्यार में सेंध लगा दी थी. मंजू के ही चक्कर में पड़ कर करन देर से घर आने लगा. वह भावना को घर का खर्च भी कम देने लगा. इस की वजह यह थी कि अब वह अपनी कमाई का एक हिस्सा मंजू पर खर्च करने लगा था.

कुछ दिनों तक तो भावना की समझ में ही नहीं आया कि पति में यह बदलाव कैसे आ गया? लेकिन जब उस ने देखा कि करन देर रात तक न जाने किस से फोन पर बातें करता रहता है तो उसे संदेह हुआ. उस ने पूछा भी कि इतनी रात तक वह किस से बातें करता रहता है? करन ने लापरवाही से कह दिया कि उस का एक दोस्त है, उसी से वह बातें करता है.

आखिर बहाना कब तक चलता. भावना को लगा कि पति झूठ बोल रहा है तो उसे डर लगा कि पति कहीं किसी गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा है. भावना का डर गलत भी नहीं था.

उधर मंजू के दबाव में करन ने उस से नोटरी के यहां शादी कर ली थी. शादी के बाद मंजू मायके में नहीं रहना चाहती थी, इसलिए करन ने थाना सिकंदरा की राधागली में किराए पर एक कमरा ले लिया और उसी में दोनों पतिपत्नी के रूप में रहने लगे. मंजू की बेटी इच्छा भी उसी के साथ रह रही थी.

मंजू को लगता था कि वह करन को अपने प्यार की डोर में इस तरह से बांध लेगी कि वह अपनी ब्याहता पत्नी को भूल जाएगा. जबकि वास्तविकता यह थी कि करन 2 नावों की सवारी कर रहा था. वह मंजू से इस तरह मिल रहा था कि भावना को पता न चले, क्योंकि वह जानता था कि अगर उसे पता चल गया तो घर में तूफान आ जाएगा.

यही वजह थी कि करन रात में मंजू के यहां जाता तो कोई न कोई बहाना बना कर जाता था. लेकिन पति के बदले हावभाव से परेशान हो कर भावना ने उस की शिकायत ससुर से कर दी. राधेश्याम ने बेटे को डांटफटकार कर तरीके से रहने को कहा. भावना ने भी धमकी दी कि अगर वह ढंग से नहीं रहा तो वह बच्चों को छोड़ कर मायके चली जाएगी.

पत्नी की इस धमकी से करन डर गया, क्योंकि अगर पत्नी घर छोड़ कर चली जाती तो वह बच्चों को कैसे संभालता? आखिर पत्नी की धमकी के आगे करन ने सरेंडर कर दिया और मंजू से मिलनाजुलना कम कर दिया. उस के इस व्यवहार से मंजू को लगा कि वह परेशानी में फंस गई है, क्योंकि करन से शादी करने के बाद वह नौकरी भी छोड़ चुकी थी. अब वह पूरी तरह से करन पर ही निर्भर थी. मकान के किराए के अलावा घर के खर्चे की भी चिंता थी.

एक दिन ऐसा भी आया, जब करन का मोबाइल फोन बंद हो गया. मंजू परेशान हो उठी. करन के बिना वह कैसे रह सकती थी? वह मायके भी नहीं जा सकती थी. करन के घर का पता भी उस के पास नहीं था. आखिर औटो वालों की मदद से उस ने करन को खोज निकाला.

मंजू करन के घर पहुंच गई. उस ने करन से साथ चलने को कहा तो भावना भड़क उठी. मंजू को भलाबुरा कहते हुए भावना ने कहा कि करन उसे छोड़ कर कैसे जा सकता है. उस ने उस से ब्याह किया है. उस से उस के 2 बच्चे हैं.

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मंजू और भावना में लड़ाई होने लगी. शोर सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. किसी ने थाना पुलिस को फोन कर दिया. सूचना पा कर थाना सिकंदरा के थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय करन के घर पहुंच गए. वह करन, मंजू और भावना को थाने ले आए.

तीनों की बातें सुन कर ब्रजेश पांडेय की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? एक आदमी ने मौजमस्ती के लिए 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया था. करन को न मंजू छोड़ रही थी और न भावना. छोड़ती भी कैसे, दोनों का भविष्य अब उसी पर टिका था. इस परेशानी को ध्यान में रख कर थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय ने कहा कि करन एक महीने मंजू के साथ रहेगा और एक महीने भावना के साथ. जब तक वह जिस के साथ रहेगा, उस की कमाई पर उसी का हक होगा.

मंजू को यह समझौता कतई मंजूर नहीं था, क्योंकि उस का रिश्ता तो रेत की दीवार की तरह था, जो कभी भी ढह सकती थी. लेकिन भावना इस समझौते पर राजी थी. मंजू ने इस समझौते का विरोध करते हुए कहा कि एक दिन करन उस के साथ रहेगा और एक दिन भावना के साथ.

हालांकि इस समझौते का कोई कानूनी मूल्य नहीं था, फिर भी ब्रजेश पांडेय ने एक कागज पर लिखवा कर दोनों औरतों और करन के दस्तखत करवा लिए. इस समझौते से जहां मंजू ने राहत की सांस ली, वहीं भावना को मजबूरी में सौतन के लिए अपने पति का बंटवारा करना पड़ा.

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करन ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा भी होगा, इसलिए अब वह परेशान था. उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन उस ने जो गलती की थी, अब उस का खामियाजा तो उसे भोगना ही था.

थानाप्रभारी ने जो समझौता कराया था, करन के घर वालों ने उस का सख्ती से विरोध किया. जब इस समझौते की खबर अखबारों में छपी तो सभी हैरान थे कि एक पुलिस अधिकारी ने ऐसा समझौता कैसे करा दिया? बात उच्चाधिकारियों तक पहुंची तो कोई बवाल होता, उस के पहले ही इंसपेक्टर ब्रजेश पांडेय का तबादला कर दिया गया.

कुछ भी हो, मंजू को लग रहा है कि उस की अपनी गृहस्थी बस गई है. करन अब एक दिन उस के साथ रहता है तो अगले दिन भावना के साथ. उस दिन वह जो कमाता है, उसे देता है जिस के साथ रहता है. लेकिन करन का लगाव भावना और अपने बच्चों के प्रति अधिक था, इसलिए अब वह मंजू पर उतना ध्यान नहीं देता, जितना देना चाहिए. इस से आए दिन उस का मंजू से झगड़ा होता रहता है.

करन ने जो गलती की है, अब वह उस का खामियाजा भोग रहा है. उसे भी कहां सुख मिल रहा है. कभी वह मंजू की ओर भागता है तो कभी भावना की ओर. परेशानी की बात तो यह है कि अभी इस समझौते को हुए ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, खींचतान शुरू हो गई है. आगे क्या होगा, कौन जानता है.

आखिर एक आदमी की गलती से 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. उस का भी क्या होगा, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है. यह समझौता भी कितने दिनों तक चलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. Emotional Story

Social Story: बहू भी कराती है हत्या

Social Story: आमतौर पर यह माना जाता है कि ससुराल में बहू पर ही अत्याचार होता है. यह अत्याचार कभी ससुर करता है कभी सास. लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबीपनाह गांव की रहने वाली बहू पर उसकी ससुराल वालों ने कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि खुद उसने ही करोडों की जायदाद के लालच में अपने ससुर की हत्या चचेरे देवर और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी और हत्या के आरोप में अपने पति और सगे देवर को फंसाने की कोशिश की, पर अपराध छिपाये नही छिपता और बहू को अपने डेढ साल के बच्चे के साथ जेल जाना पड़ा.

नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने दो बेटो संजय और रणविजय सिंह के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह की आम कह बाग और दूसरी जायदाद थी. जिसकी कीमत करोडो में थी. मुन्ना के बडे बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी.

सुशीला के 2 बच्चे 4 साल की बडी लडकी और डेढ साल का बेटा था. सुशीला पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इस कारण उसने अपने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिये. जिससे वह अपनी शादी न करे. सुशील को डर था कि देवर की शादी के बाद उसकी पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक लगेगा. यह बात जब मुन्ना सिह को पता चली तो वह अपने छोटे बेटे की शादी कराने का प्रयास करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिन्ता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उसकी मदद नहीं करेगा.

तब उसने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया. जब शिवम पूरी तरह से उसके काबू में आ गया तो उसने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिये कहा. शिवम जब इसके लिये तैयार नहीं हुआ तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रूपये देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात सुशीला के सुसर बुजुर्ग किसान मुन्ना सिंह चैहान आम की फसल बेचकर अपने घर आये. इसके बाद खाना खाकर आम की बाग में सोने के लिये चले गये. वह अपने पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने शिवम को फोन गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेन्द्र को भी ले आया था.

तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पांव पहुंच कर तीनो ने उनको दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल ड़ाल दिया. सुशीला ने उनके पांव पकड लिया और शिवम,राघवेन्द्र ने उनको काबू में किया. जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गये. वही पर दोनो ने गमझे से गला दबा कर उनकी हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार 2 सौ रूपये मिले. शिवम ने 45 सौ रूपये राघवेन्द्र को दे दिये. सुशीला ने आलमारी और बक्से की चाबी ले ली. सबलोग अपने घर चले आये. सुबह पूरे गांव मे मुन्ना सिह की हत्या की खबर फैल गई. मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया.

एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहु सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना के संबंध अपने बेटो से अच्छे नहीं थे. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनो बेटो संजय और रणविजय से पूछताछ शुरू की तो दोनो बेकसूर नजर आये.

इस बीच गांव में यह पता चला कि मुन्ना सिंह की बहू सुशीला के देवर से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की तो उसकी कुछ हरकते संदेह प्रकट करने लगी.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल की काल डिटेल देखनी शुरू की तो उनको पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम के फोन को देखा तो उसमें राघवेन्द्र का फोन मिला. इसके बाद पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला से सबसे पहले अलग अलग बातचीत शुरू की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उसके देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था. सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे तो वह अकेली पूरे जायदाद की मालकिन बन जायेगी. पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला तीनो को आमने सामने बैठाया.तो सबने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

14 जून को माल पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के समाने पेश किया. वहां से तीनो को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ साल के बेटे को भी जेल ले गई. उसकी 4 साल की बेटी को पिता संजय और चाचा रणविजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते वक्त भी सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था. वह बारबार शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज हो रही थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि मारने के समय उसने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड रखे थे.