Crime Stories: नामो नामो और भेड़िया

Crime Stories: नामो मर्द का बच्चा था, उस ने गांव में ललकार कर कहा था कि वह अपनी एक टांग के बदले में दुश्मनों की एक लाश जरूर गिराएगा. वह तो ऐसा नहीं कर सका, पर…

एक दिन मैं अपने क्वार्टर में नाश्ता कर रहा था कि थाने से एक कांस्टेबल आया. उस ने आते ही बताया कि थाने से 2 ढाई मील दूर के एक गांव में हत्या हो गई है. मैं चाहता तो अपने हिसाब से आराम से जाता, लेकिन तब थानेदारों की ऐसी आदत नहीं थी. दूसरे अंगरेजों का जमाना था, जो ऐसे मामलों में लापरवाही बरदाश्त नहीं करते थे. इस के अलावा जल्दी पहुंचने का एक फायदा यह होता था कि घटनास्थल पर पैरों के निशान और दूसरे तमाम सबूत आराम से मिल जाते थे.

तैयार हो कर मैं सिपाही के साथ थाने पहुंचा तो वहां 3 आदमी मेरे इंतजार में बैठे थे. उन में से एक को मैं जानता था. वह उस गांव का नंबरदार था, जहां घटना घटी थी. दूसरे 2 लोगों में एक मृतक का भाई था. बातचीत से वह किसी सम्मानित परिवार का लगता था. उस ने अपना नाम मुख्तार बताया था और मरने वाले का नाम बख्तियार.

मुख्तार के बताए अनुसार, घटना कुछ इस तरह घटी थी. बख्तियार अपने खलिहान में सोया हुआ था. वहां सोने की वजह यह थी कि गेहूं की कटी फसल खेत में पड़ी थी. बख्तियार के बारे में उस ने बताया कि वह फौज का रिटायर हवलदार था. उस के पास सिंगल बैरल बंदूक थी, जिसे वह अपने पास रख कर सोता था. सुबह गांव का एक आदमी उधर से गुजरा तो उस ने देखा कि बख्तियार के धड़ का निचला हिस्सा चारपाई पर है और अगला हिस्सा चारपाई से नीचे गिरा पड़ा है.

बख्तियार को उस हालत में देख कर वह आदमी उस के पास तक गया तो उस ने देखा, चारपाई के नीचे खून जमा है. वह आदमी भाग कर मुख्तार के पास आया और उस ने यह बात मुख्तार को बताई तो वह गांव के नंबरदार को साथ ले कर खलिहान पहुंचा. बख्तियार मर चुका था, इसलिए दोनों बख्तियार के लड़के को साथ ले कर थाने आ गए. जब मैं सिपाहियों के साथ मौकाएवारदात पर पहुंचा, वहां काफी लोग इकट्ठा हो चुके थे. हमें देख कर लोग इधरउधर हो गए. मैं ने आगे बढ़ कर लाश का निरीक्षण किया. मृतक चारपाई से आधा लटका हुआ था, उस के दोनों हाथ आगे की ओर कुछ इस तरह फैले थे, जैसे मरने से पहले उस ने किसी चीज को पकड़ने की कोशिश की हो.

उस का चेहरा मिट्टी से लिथड़ा हुआ था. लाश से कुछ दूरी पर एक सिंगल बैरल बंदूक पड़ी थी. मृतक की आंखें खुली थीं. वह सुंदर पट्ठा जवान था. चेहरे से ही लगता था कि वह दबदबे वाला आदमी था. मेरे कहने पर 2 सिपाहियों ने लाश को सीधा कर के चारपाई पर लिटा दिया. मृतक के सीने और पेट पर खून जमा था. चाकू के 2 घाव सीने पर और एक लंबा घाव पेट पर था. सीने के घाव दिल के पास थे. मैं ने अंदाजा लगाया कि चाकू से दिल कट गया होगा, जिस से उस की मौत हो गई है.

सारी बातें नोट कर के मैं आसपास का निरीक्षण करने लगा. मैं ने हर चीज को बहुत बारीकी से देखी, लेकिन मुझे वहां कोई सबूत नहीं मिला. इस के बाद मैं ने पैरों के निशानों पर गौर किया तो एक ओर से एक आदमी के पैरों के निशान चारपाई की ओर आए थे. वे केवल आने के निशान थे, जाने के नहीं. इस से मैं ने अनुमान लगाया कि ये निशान मृतक के होंगे. मैं ने चारपाई की ओर घूम कर देखा तो सिरहाने की ओर मुझे एक जूते का निशान दिखाई दिया. वह दाएं जूते का निशान था. इस का मतलब यह था कि हत्यारा मृतक के सिरहाने की ओर से खेत से हो कर आया था. मैं आगे बढ़ा तो मुझे यह देख कर हैरानी हुई कि केवल दाएं पैर के जूते के निशान थे, बाएं पैर के जूते का कोई निशान नहीं था.

मैं ने बैठ कर ध्यान से देखा तो दाएं पैर के जूते के बराबर एक गोल सा निशान था, जो उस निशान के साथ चल रहा था. यह लाठी या बैसाखी का निशान हो सकता था. इस का मतलब हत्यारा बाईं टांग से लंगड़ा था, जो लाठी या बैसाखी के सहारे चलता था. मैं ने चारपाई के आसपास की जमीन को देखा, इन निशानों के अलावा वहां कोई और निशान नहीं था. इस का मतलब हत्यारा अकेला था. मैं ने कागजी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मृतक के बड़े भाई मुख्तार को नंबरदार के घर बुलवा लिया. नंबरदार ने बताया कि मृतक अंग्रेजी फौज में हवलदार था. लड़ाई खत्म होने के 3 महीने बाद वह रिटायर हो कर घर आ गया था. वह दबंग आदमी था और गांव में दबदबा रखता था.

संपन्न घराने का बख्तियार फौज में पैसों के लिए नहीं, बल्कि मिलिट्रीमैन कहलाने के लिए भरती हुआ था. मैं नंबरदार से बात कर ही रहा था कि मृतक का बड़ा भाई मुख्तार आ गया. मैं ने नंबरदार को बाहर भेज कर उसे अंदर बुलाया. दुख जताने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘मृतक की किसी से दुश्मनी तो नहीं थी या इधर किसी से उस का झगड़ा तो नहीं हुआ था?’’

मुख्तार ने जवाब दिया, ‘‘हम दुश्मनी रखने वाले लोग हैं जी, हमारे यहां छोटेमोटे लड़ाईझगड़े तो होते ही रहते हैं. असल लड़ाई नहर पार के एक परिवार से है. उन के साथ कई बार लाठीडंडे चल चुके हैं.’’

‘‘क्या यह दुश्मनी इस हद तक है कि हत्या की नौबत आ जाए? क्या उन लोगों में इतनी हिम्मत है कि तुम्हारे घर में आ कर वे हत्या कर सकें?’’ मैं ने पूछा.

उस ने कहा, ‘‘दुश्मनी तो ऐसी ही है जी, वे लोग मारनेमरने से नहीं डरते.’’

‘‘दुश्मनी की वजह?’’

‘‘वास्तव में गलती हमारे ही आदमी की है. हम ने माफी भी मांगी, लेकिन उन लोगों का रवैया इतना बेइज्जती वाला था कि न चाहते हुए भी बात बढ़ गई और लाठियांडंडे और कुल्हाडि़यां तक चल गईं, जिस में कुछ उन के आदमी घायल हुए, कुछ हमारे.’’

‘‘थाने तक बात पहुंची थी?’’ मैं ने यह बात सोच कर पूछी थी कि थाने में उस लड़ाई का रिकौर्ड होगा.

मुख्तार ने बताया कि दोनों पक्षों में से कोई थाने नहीं गया था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या उन लोगों में कोई ऐसा आदमी है, जिस की बाईं टांग कटी हुई हो या बाईं टांग से लंगड़ाता हो.’’

‘‘बिलकुल है मलिकजी, लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं?’’ उस ने कहा.

‘‘मौकाएवारदात से पैरों के जो निशान मिले हैं, उन में दाईं टांग के जूते के निशान हैं, जबकि बाईं टांग के जूते की जगह बैसाखी या लाठी के निशान हैं.’’

मुख्तार ने बताया, ‘‘उस लंगड़े का नाम इनामुल्लाह है और वह नामो के नाम से मशहूर है. मुझे यकीन है कि हत्यारा वही है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘यह बात तुम इतने यकीन से पैरों के निशान की वजह से कह रहे हो?’’

‘‘यह बात नहीं है. इस की वजह यह है कि नामो की टांग हमारे साथ हुई लड़ाई में ही कटी थी,’’ मुख्तार ने कहा, ‘‘बड़ा ही जीवट वाला लड़का है, लड़ाई में हमारे किसी आदमी की कुल्हाड़ी उस की टांग में ऐसी लगी कि टांग की हड्डी कट गई. पहले तो वह गांव के झोलाछाप डाक्टरों से इलाज कराता रहा, जब टांग ठीक नहीं हुई तो शहर के अस्पताल गया. तब तक टांग में जहर फैल गया था. मजबूरी में डाक्टरों को उस की टांग काटनी पड़ी. गांव लौट कर उस ने कहा था कि दुश्मनों के एक आदमी को मार कर वह इस का बदला लेगा.’’

मुख्तार, जब्बार और बख्तियार, तीनों भाई संपन्न जमींदार थे. गांव में उन का दबदबा था. मुख्तार सब से बड़ा था, उस से छोटा जब्बार और बख्तियार सब से छोटा. मुख्तार का एक बेटा और 3 बेटियां थीं, जबकि जब्बार का एक बेटा था. जब वह 10 साल का था, तभी जब्बार हैजे से मर गया था. उस के बेटे को दोनों भाइयों ने मिल कर पाला था. उस का नाम गुलाम हुसैन था, लेकिन सब उसे गामो कहते थे, गामो एकदम स्वस्थ और काफी सुंदर था. गामो को शुरू से ही पहलवानी का शौक था. वह गांव की कबड्डी की टीम का लीडर था. आसपास के गांवों में उस की धूम थी. उस की कबड्डी की टीम दूसरे गांवों में भी खेलने जाया करती थी.

नहर पार वालों से उन का कांटेदार मुकाबला होता था. गामो के कारण उस के गांव की टीम का पलड़ा भारी रहता था. एक बार गामो की टीम नहर पार वाले गांव में कबड्डी खेलने गई और मैच जीत लिया. रास्ते में मालटा का एक बाग पड़ता था. जब वे बाग के पास से गुजर रहे थे तो उन्हें बाग की ओर से एक अधेड़ औरत आती दिखाई दी. उस औरत ने गामो के पास आ कर कहा कि वह उस से अकेले में बात करना चाहती है.

वह औरत उसे मालटा के बाग में ले गई. बाग में गहरा अंधेरा था. गामो को एक पेड़ के नीचे कोई खड़ा दिखाई दिया. अंधेरे की वजह से दूर से यह पता नहीं चला कि वह मर्द है या औरत. जब वह पास पहुंचा तो उस ने देखा कि वह एक सुंदर लड़की थी. गामो ने पीछे मुड़ कर उस औरत को देखा तो वह गायब थी.

‘‘तुम्हें मैं ने ही बुलाया है, बुरा तो नहीं लगा?’’ लड़की ने पूछा.

गामो ने कहा, ‘‘बुरा तो नहीं लगा, लेकिन मुझे यहां क्यों बुलाया है?’’

‘‘मेरा नाम फातिमा है, दिल के हाथों मजबूर हो कर मैं तुम से मिलना चाहती थी.’’

गामो ने उसे समझाया कि इस तरह वह बदनाम हो जाएगी, इसलिए वह उस का खयाल दिल से निकाल दे और वापस चली जाए.

‘‘औरत हो कर मैं ने इतना बड़ा कदम उठा लिया और तुम मर्द हो कर भी डर रहे हो. चाहो तो साफसाफ कह दो कि मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगी. इस के बाद मैं कभी तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगी.’’ फातिमा ने कहा.

गामो ने कहा, ‘‘तुम बहुत सुंदर हो फातिमा, मुझे अच्छी भी लगती हो, लेकिन तुम अपनी इज्जत का खयाल करो और वापस चली जाओ.’’

‘‘मुझे गलत मत समझना गामो, मैं तुम से सच्चा प्रेम करती हूं. मैं इस शर्त पर वापस जाऊंगी कि तुम मुझ से दोबारा मिलने का वादा करो, वरना मैं तुम्हारे पीछेपीछे तुम्हारे घर तक पहुंच जाऊंगी.’’

गामों ने उस से मिलने का वादा कर लिया. इस के बाद दोनों रोज मालटा के उसी बाग में मिलने लगे. गामो घोड़ी पर बैठ कर नहर पार से आ कर फातिमा से मिलता था. उन के मिलने की यह बात ज्यादा दिनों तक परदे में नहीं रह सकी. गामो और फातिमा के प्रेम के चर्चे पूरे गांव में फैल गए. जब इस बात की जानकारी फातिमा के घर वालों को हुई तो वे मरनेमारने को तैयार हो गए. उन्होंने फातिमा का घर से निकलना बंद कर दिया. इस के बावजूद फातिमा किसी न किसी तरह गामो से मिलने पहुंच जाती थी. फातिमा के बाप और भाइयों ने उस की पिटाई भी की, लेकिन वह नहीं मानी.

फातिमा की बिरादरी वालों ने ऐलान कर दिया कि अगर गामो उन के गांव के पास भी दिखाई दिया तो वे उस के हाथपांव तोड़ कर उसे हमेशा के लिए अपाहिज बना देंगे. इस पूरे मामले की जानकारी गामो के ताऊ और चाचा को हुई तो उन्होंने उसे समझाया कि वह यह चक्कर छोड़ दे. वह न तो पार वाले गांव में जाए और न ही फातिमा से मिलने की कोशिश करे. उस ने कहा कि अगर उस का रिश्ता फातिमा के घर भेजा जाए तो वह उन की बात मान लेगा.

लेकिन दोनों परिवार एक ही टक्कर के थे, इसलिए गामो की बात नहीं मानी गई. उन्हीं दिनों में बख्तियार फौज से आया था. उस के भाई मुख्तार ने कुछ आदमियों को तैयार कर के उस से कहा कि वह पार के गांव में जा कर गामो के लिए फातिमा के रिश्ते की बात करे. बख्तियार उन लोगों के साथ नहर पार कर के गांव पहुंचा तो गांव वालों ने उन की आवभगत की. सभी ने पूरे मामले पर बात कर के गामो के ताऊ मुख्तार की ओर से माफी मांगी. लेकिन जैसे ही इन लोगों ने फातिमा के रिश्ते की बात की, वे एकदम से बिगड़ गए. फातिमा की बिरादरी वालों ने कहा कि वे फातिमा का नाम भी न लें. सभी वापस आ गए. यह सुन कर गामो ने कहा कि कुछ भी हो, वह फातिमा को हासिल कर के रहेगा. उस के लिए उसे कुछ भी करना पड़े.

कुछ दिनों बाद गामो गांव से गायब हो गया. उसे सब जगह तलाशा गया, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. 2 दिन बीत गए तो गामो के घर वालों को लगा कि गामो नहर पार वालों के हत्थे चढ़ गया है. उन्होंने 2 लोगों को नहर पार के गांव भेजा कि चुपके से पता करें कि गामो वहां तो नहीं पहुंचा. उन्होंने वापस आ कर बताया कि वह वहां नहीं है. अब उन के लिए गामो चिंता का विषय बन गया.

चौथे दिन फातिमा के गांव के लोग कुल्हाड़ी, भाले, लाठी और दूसरे हथियार ले कर गामो के गांव आ पहुंचे. उन का कहना था कि गामो को उन के हवाले करो. कुछ मिनटों में गामो की बिरादरी वाले भी हथियार ले कर मैदान में आ गए. बात खुली तो पता चला कि फातिमा रात के किसी वक्त घर से गायब हो गई थी. उन्हें पूरा यकीन था कि फातिमा गामो के साथ ही गई है. मुख्तार ने उन लोगों को बताया कि गामो तो 3 दिनों से गायब है, वे खुद ही उसे तलाश रहे हैं. फातिमा के घर वाले यह बात मानने को तैयार नहीं थे. उन का कहना था कि गामो गांव में ही कहीं छिपा है और फातिमा उसी के साथ है.

बात बढ़ कर मारपीट तक जा पहुंची तो दोनों ओर के 5-6 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. इसी लड़ाई में नामो की टांग पर कुल्हाड़ी लग गई थी, जिस की वजह उसे टांग से हाथ धोना पड़ा था. यहीं से दोनों परिवारों में दुश्मनी हो गई थी. मैं ने इस पर चिंतन किया तो लगा कि हत्या का कारण संभवत: यही है. मैं ने मुख्तार से 2-4 बातें और पूछीं, जो तफ्तीश के लिए जरूरी थीं. मुख्तार ने फातिमा की बिरादरी के एकएक आदमी का नाम ले कर हत्या का शक जताया. मैं ने उस का पूरा बयान लिख लिया. मेरे लिए यह आसान हो गया कि अब इधरउधर देखने के बजाय तफ्तीश एक ओर करनी थी.

कागजी काररवाई पूरी कर के मैं फातिमा के गांव पहुंचा और उस गांव के नंबरदार को ले कर नामो के घर गया. वहां हमें एक बैठक में बिठाया गया. कुछ देर बाद एक आदमी बैसाखी के सहारे चलता हुआ अंदर आया. उसे देख कर ही मैं समझ गया कि यही नामो है. वह बड़ा सुंदर और सजीला जवान था. ऐसे जवान को बैसाखी के सहारे चलते देख मुझे दुख हुआ.

मैं ने कहा, ‘‘सचमुच तुम मर्द हो, तुम ने अपना वचन पूरा कर के दिखा दिया.’’

‘‘कौन सा वचन?’’ उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘आप किस वचन की बात कर रहे हैं जी?’’

मैं ने कहा, ‘‘याद करो नामो, जब तुम्हारी एक टांग कटी थी तो तुम ने रोनेधोने के बजाय ललकारते हुए कहा था कि अपनी एक टांग के बदले दुश्मन की एक लाश गिराओगे.’’

उस ने अपनी कनपटी पर अंगुली मारते हुए कहा, ‘‘ओह हां, वह तो मैं ने गुस्से में कह दिया था. लड़ाईझगड़े में घाव तो आते ही रहते हैं. मेरी टांग तो मेरी गलती के कारण कटी थी. शहरी डाक्टर ने कहा था कि अगर गांव के किसी झोलाछाप को न दिखा कर सीधे शहर आ जाते तो टांग ठीक हो सकती थी.’’

‘‘तो तुम ने अपनी टांग का बदला ले ही लिया?’’ मैं ने उस की बात को नजरअंदाज कर के कहा.

‘‘कैसा बदला जी,’’ उस ने परेशान होते हुए कहा, ‘‘मैं ने किस से बदला ले लिया?’’

‘‘इतना परेशान क्यों होते हो नामो, एक टांग वाला होते हुए भी तुम ने दुश्मन के घर में जा कर उस पर वार किया.’’ मैं ने कहा.

नामो की हालत देखने वाली थी. वह आंखें फाड़फाड़ कर मेरी ओर देख रहा था. अगर 2 टांग वाला होता तो शायद एकदम से उठ कर खड़ा हो जाता, लेकिन एक टांग का होने की वजह से वह कुरसी पर बैठेबैठे इधरउधर हिल रहा था.

‘‘आप क्या कह रहे हैं.’’ उस ने सिटपिटा कर कहा, ‘‘मैं ने किसी दुश्मन पर वार नहीं किया. आप किस दुश्नम की बात कर रहे हैं?’’

‘‘तुम अच्छी तरह जानते हो मैं किस दुश्मन की बात कर रहा हूं.’’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘गामो को भूल गए, रात को गामो के चाचा की हत्या कर दी गई है. यह बताओ कि यह काम तुम ने अकेले किया या तुम्हारे साथ कोई और भी था?’’

मुझे उम्मीद थी कि मेरी बात सुन कर नामो उछल पड़ेगा और जोरशोर से मना करेगा. लेकिन उस ने कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. उस ने कहा, ‘‘मैं गामो के चाचा की हत्या क्यों करने लगा? लेकिन हां, अगर कभी गामो सामने आ गया तो उस की हत्या जरूर करूंगा. और हां, हत्या कर के छिपाऊंगा भी नहीं, सीधा आप के पास चला आऊंगा.’’

‘‘अगर तुम मुझे साफसाफ बता दो तो मैं तुम्हारे बचाव के लिए रास्ता निकाल लूंगा. अगर नहीं मानोगे तो फिर मैं खुद ही साबित कर दूंगा कि यह हत्या तुम ने ही की है. उस के बाद मुझ से किसी भलाई की उम्मीद न रखना.’’

अभी मैं नामो से पूछताछ कर रहा था कि कांस्टेबल ने बताया कि नामो की बिरादरी के कुछ लोग मुझ से मिलना चाहते हैं. मैं ने कहा कि अभी किसी को भी अंदर मत आने दो. मैं अपराधी को उस समय कोई छूट नहीं देना चाहता था.

‘‘घटनास्थल पर तुम्हारे पैरों के निशान देखे गए हैं.’’ मैं ने उस के पैरों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘इस तरह के निशान और किसी के हो ही नहीं सकते, दाएं जूते का निशान और बाएं जूते की जगह बैसाखी का निशान. अब भी मना करोगे कि हत्या तुम ने नहीं की?’’

मेरी बात के जवाब में नामो कसम खाखा कर खुद को निर्दोष बताने लगा. लेकिन मैं उस की कोई बात मानने को तैयार नहीं था. पुलिस वाले अगर कसमों पर ऐतबार करने लगें और रोनेधोने से डर जाएं तो अपराधी जेल जा ही नहीं सकते. मैं ने घटनास्थल से मिलने वाले निशानों के मोल्ड बनवा लिए थे. वहां जमीन नर्म थी, निशान बिलकुल साफ दिखाई दे रहे थे. वे देसी जूते के निशान थे, जो देहात में ज्यादातर लोग पहनते थे. अब मुझे नामो के निशान से घटनास्थल पर पाए गए निशानों का मिलान करना था.

‘‘हत्या करने वाला हथियार कहां है, खुद दे दोगे तो ठीक रहेगा, नहीं तो घर की तलाशी ले कर मैं खुद बरामद कर लूंगा.’’

‘‘जब मैं ने हत्या ही नहीं की तो हथियार कहां से बरामद कराऊं.’’ नामो ने लगभग रोनी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘अगर तलाशी लेने का ही शौक है तो ले लो.’’

इस से मैं ने अनुमान लगाया कि हथियार घर में नहीं है. हत्या करने के बाद या तो इस ने नहर में फेंक दिया है या कहीं दबा दिया है. फिर भी मैं ने तलाशी लेने का फैसला किया. मैं ने कांस्टेबल को बुला कर कहा कि नामो के रिश्तेदारों को अंदर भेज दे. 3 आदमी अंदर आए, जो सम्मानित लग रहे थे. उन में से एक फातिमा का पिता था, दूसरा जो उम्र में सब से बड़ा था, वह नामो का पिता था. तीसरा नामो का ससुर था. मैं ने उन्हें पूरी जानकारी दे कर कहा कि वे नामो से कह दें कि वह अपना अपराध स्वीकार कर ले और हत्या का हथियार बरामद करा दे.

नामो ने अपराध स्वीकार करने से मना कर दिया. मैं ने उस के घर की तलाशी लेने के लिए 2 कांस्टेबल लगा दिए. नामो अपने मातापिता से अलग रहता था. एक गली छोड़ कर दूसरी गली में उस के मातापिता का घर था. इस से भी मैं ने अनुमान लगाया कि नामो का बाप झूठ बोल रहा है कि नामो सारा दिन अपने घर से नहीं निकला था. दोनों के घरों में काफी दूरी थी. मैं ने नामो को गिरफ्तार कर लिया, उस के घर की बारीकी से तलाशी ली गई. टीन के एक संदूक से एक बड़ा चाकू निकला, जो एक कपड़े में लपेट कर रखा था. यह कमानीदार चाकू था, जो उन दिनों अपराधी लोग रखा करते थे.

इस के अलावा एक बरछे का फल निकला, जो जरूरत पड़ने पर बांस में लगाया जा सकता था. मैं ने दोनों हथियार अपने कब्जे में ले लिए. मैं नामो को ले कर थाने आ गया. अब मुझे पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. नामो की काररवाई कर के मैं दूसरे केसों में उलझ गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में हत्या का समय रात ढाई बजे के करीब लिखा था. मौत का कारण वही था, जो मैं ऊपर लिख चुका हूं. चाकू या कटार के वार से मृतक का दिल 2 जगह से कट गया था. पेट में गहरा घाव था, जिस से पेट की आंतें कट गई थीं.

मैं ने चाकू और बरछी मैडिकल टेस्ट के लिए भेज दीं, ताकि पता लग सके कि उन हथियारों पर खून के धब्बे तो नहीं थे. शाम तक रिपोर्ट आ गई, जिसे देख कर मैं चकरा गया. लिखा था कि दोनों हथियारों पर खून का कोई निशान नहीं मिला. शाम तक मृतक की लाश भी आ गई, जो कानूनी काररवाई कर के मृतक के घर वालों को सौंप दी गई. मैं समझ गया कि नामो ने हत्या कर के हथियार कहीं फेंक दिया है. अब उस से उगलवाना था कि हथियार कहां फेंका है? मैं ने एक कांस्टेबल से कहा कि वह नामो को हवालात से निकाल कर मेरे पास ले आए. अचानक मुझे मौकाएवारदात पर पाए गए निशानों का खयाल आ गया. कांस्टेबल उसे ले कर आ गया.

मैं ने कांस्टेबल को समझाया कि वह नामो को थाने के सहन में ले जा कर 10 कदम चलवाए और उस के बाद हवालात में बंद कर दे. कांस्टेबल मेरी बात समझ गया. उस ने उस के पैरों के निशान ले लिए और मुझे आ कर बता दिए. घटनास्थल पर मिले जूते के निशानों में जूते की तली में एड़ी की ओर ऐसा निशान उभरा था, जैसे जूता घिस गया हो और वहां चमड़े का टुकड़ा लगवाया गया हो. मैं ने नामो के खुरों के निशान देखे तो वे घटनास्थल पर पाए जाने वाले खुरों से बिलकुल अलग थे. मैं ने बैसाखी के निशान देखे तो वे भी अलग लगे. मैं ने अपने कमरे में जा कर कांस्टेबल को बुला कर कहा कि वह नामो को मेरे पास ले आए. वह उसे ले आया.

‘‘मैं तुम पर कोई दबाव नहीं बनाऊंगा, लेकिन तुम हत्या करना स्वीकार कर लो तो फायदे में रहोगे. एक बात याद रखो, यह आखिरी मौका है, इस के बाद मुझ से कोई उम्मीद मत रखना. घटनास्थल पर तुम्हारे खुरे मौजूद हैं, हत्या का कारण भी साफ है. तुम्हारे खिलाफ सबूत भी मजबूत हैं, बोलो बयान दोगे या नहीं?’’

‘‘मेरा बयान वही है, जो पहले दिया था. जब मैं ने हत्या की ही नहीं तो क्या बयान दूं. अगर मैं ने हत्या की होती तो मैं खुद थाने आ कर पेश हो जाता. अल्लाह गवाह है, वह मेरी मदद जरूर करेगा.’’

मुझे उस की बात में सच्चाई दिखाई दे रही थी. झूठा आदमी बयान देता है तो पता चल जाता है और सच बोलने वाले का चेहरा अलग ही पहचाना जाता है. मैं अपना शक दूर किए बिना नामो को छोड़ना नहीं चाहता था. मैं ने सोचा कि जरूरी नहीं कि नामो ने हत्या के समय यही जूते पहने हों. मैं ने एक कांस्टेबल से कहा कि वही नामो के घर जा कर उस के सारे जूते ले आए. साढ़े 11 बजे का समय. मुझ से एक कांस्टेबल ने कहा कि नामो का ससुर और बाप मिलना चाहता है. उन्होंने मेरे पास आ कर कहा कि वे नामो से मिल कर मुझ से बात करना चाहते हैं. मैं ने कहा कि अभी तफ्तीश चल रही है, इसलिए वे उस से नहीं मिल सकते.

नामो के बाप ने मेरे आगे हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘नामो पर दया करें मलिकजी. आप जो कहेंगे, आप की सेवा कर देंगे. अल्लाह ने हमें बहुत कुछ दिया है.’’

‘‘सेवा जरूर बताऊंगा, पहले मैं काम पूरा कर लूं. आप ऐसा करें, नामो से कहें मुझे सब कुछ सचसच बता दे. फिर मैं आप को सेवा बताऊंगा.’’

मेरी बात सुन कर वे एकदूसरे का मुंह देखने लगे. इतने में वह कांस्टेबल आ गया, जिसे मैं ने नामो के घर भेजा था. उस ने मुझे इशारे से बताया कि वह काम कर लाया है. मैं ने नामो के बाप और ससुर से कहा कि वे अच्छी तरह सोच लें, उस के बाद बताएं. उस के बाद मैं ने उन्हें भेज दिया. कांस्टेबल एक थैले में डाल कर 5 जोड़ी जूते ले आया था. उन में एक को छोड़ कर सभी जूते नए थे. पुराने जूते की तली में एक तला लगा हुआ था. मैं कांस्टेबल को ले कर उस जगह गया, जहां नामो के जूते के निशान थे. मैं ने कांस्टेबल से कहा कि वह नामो के दाएं पैर का जूता पहन कर कच्ची जमीन पर चले.

वह 8-10 कदम चला. मैं ने उन निशानों को ध्यान से देखा तो वे भी उन निशानों से थोड़े अलग थे. इस से मैं समझ गया कि नामो निर्दोष है. उस के अपराधी न निकलने से मेरी सारी मेहनत बेकार जा रही थी. मैं ने मुखबिरों को बुला कर आसपास के गांवों में ऐसे आदमी को ढूंढ़ने को कहा, जिस का बायां पैर कटा हुआ हो या फिर बाएं पैर की जगह वह बैसाखी के सहारे चलता हो. इस सारी काररवाई के बाद मैं ने नामो को छोड़ दिया. लेकिन उस से कह दिया था कि वह गांव से बाहर न जाए. अगर कहीं जाना हो तो थाने में बता कर जाए. अब मैं मुखबिरों के सहारे था. ऐसे आदमी को ढूंढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं था.

मुखबिरों की कोशिश के बावजूद आसपास के गांवों में ऐसा कोई आदमी नहीं मिला. इस तरह 5 दिन बीत गए और मेरी तफ्तीश एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी. मैं हताश हो चला था. मैं अपने एसआई महेंद्र को नामो को लाने के लिए भेजने की सोच ही रहा था कि एक मुखबिर थाने आ गया. वह एक आदमी को साथ लाया था. मुखबिर ने बताया कि यह आदमी साथ वाले गांव में रहता है. जिस रात बख्तियार की हत्या हुई थी, उस की दूसरी सुबह यह एक शादी में गया था. रात को जब यह वापस आया तो इसे बख्तियार की हत्या की खबर मिली.

उसे यह भी पता चला कि पुलिस को एक ऐसे आदमी की तलाश है, जो बाईं टांग से लंगड़ा हो. इस आदमी ने बताया कि उस ने इस तरह का लंगड़ा आदमी घटना से एक दिन पहले देखा था. यह बात मुखबिर के कान में पड़ी तो वह उसे मेरे पास ले आया. मैं ने उस से पूरी बात बताने के लिए कहा. उस का नाम रूपकुमार था. उस के बताए अनुसार, वह घटनास्थल वाले गांव के साथ वाले गांव में रहता था. घटना से एक दिन पहले वह गांव के एक सिरे पर स्थित परचून की दुकान से कुछ सामान लेने गया था. वह दुकान एक रिटायर्ड फौजी की थी, जो विश्वयुद्ध में बर्मा के एक युद्ध क्षेत्र में घायल हो गया था. उस के घाव कुछ इस तरह के थे कि उस का दायां बाजू बेकार हो गया था. सब लोग उसे फौजी दुकानदार कहते थे.

रूपकुमार जब सौदा ले कर दुकान से निकलने लगा तो अचानक फौजी के घर का दरवाजा खुला. एक आदमी बैसाखी के सहारे घर से निकला और रूपकुमार को देख कर तुरंत अंदर चला गया. रूपकुमार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया. उस से अगले दिन रूपकुमार अपने एक रिश्तेदार की शादी में चला गया. जब वह शादी से लौट कर आया तो उसे पता चला कि पास वाले गांव में एक आदमी की हत्या हो गई है. उस ने जब यह सुना कि पुलिस को एक लंगड़े हत्यारे की तलाश है तो उसे उस फौजी दुकानदार के घर से निकलने वाले लंगड़े की याद आ गई. उस ने लोगों से उस के बारे में बताया. बात फैलतेफैलते मेरे मुखबिर के कान तक पहुंची और वह उसे मेरे पास ले आया.

मैं ने रूपकुमार से कहा, ‘‘अगर वह लंगड़ा तुम्हारे सामने आ जाए तो क्या तुम उसे पहचान लोगे?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं ने एक पल के लिए देखा था. लेकिन मैं उसे पहचान लूंगा, क्योंकि उस के चेहरे पर एक लंबा घाव का निशान था.’’

‘‘क्या तुम पूरे विश्वास से कह सकते हो कि उस की बाईं टांग नहीं थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं जी,’’ वह कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘मुझे ऐसा शक है कि वह अपनी दाईं टांग पर खड़ा था और उस की बैसाखी बाईं ओर थी. मैं ने एसआई महेंद्र को बुला कर कहा कि वह फौजी दुकानदार को अपने साथ ले आए.

2 घंटे बाद महेंद्र सिंह फौजी को ले आया. उस का नाम प्रकाश नारायण था, लेकिन लोग उसे फौजी कहते थे. वह मेरे कमरे में आया. सांवले रंग का वह साधारण सा आदमी था. शक्ल से गरीब घराने का लगता था. वह कुछ घबराया हुआ लग रहा था. उस ने हाथ जोड़ कर मुझे प्रणाम किया और एक ओर खड़ा हो गया. मैं ने उसे बैठने के लिए कहा. वह बैठ गया तो उस से इधरउधर की बातें करने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘वह लंगड़ा कहां है?’’

मेरा सवाल सुन कर प्रकाश ऐसा बिदका जैसे किसी ने सुई चुभो दी हो. वह हैरानी से मेरा मुंह देखने लगा. मैं ने सोच लिया कि उसे संभलने का मौका नहीं दूंगा.

उस ने कहा, ‘‘आप किस लंगड़े की बात कर रहे हैं, मैं समझा नहीं?’’

‘‘वही लंगड़ा, जिस के साथ मिल कर तुम ने हवलदार बख्तियार की हत्या की है.’’

यह सुनते ही प्रकाश ऐसे उछला, जैसे मैं ने उस पर बम फेंक दिया हो.

‘‘मेरे सामने झूठ बोलने की कोशिश मत करना प्रकाश, मेरे पास ऐसे कई गवाह हैं, जिन्होंने उस लंगड़े को तुम्हारे घर आतेजाते देखा है. अगर तुम ने झूठ बोला तो मैं तुम्हारा क्या हाल बनाऊंगा, सोच भी नहीं सकते. तुम्हारा एक हाथ तो बेकार है ही, दूसरा भी तोड़ दूंगा. फिर भीख मांगते फिरोगे.’’

वह हकला कर बोला, ‘‘मैं ने हत्या नहीं की है सर.’’

‘तो फिर किस ने की है?’’

‘‘जी, गुल्लू ने की है.’’ प्रकाश ने बड़ी मुश्किल से कहा.

‘‘यह गुल्लू कौन है, सीधी तरह उस का नाम बताओ?’’ मैं ने सख्ती से कहा.

‘‘उस का नाम गुलजार है, उसी को लंगड़ा गुल्लू कहते हैं.’’

‘‘हत्या के समय तुम उस के साथ थे?’’ मैं ने यह बात इसलिए कही कि वह मौके का गवाह हो सकता था..

‘‘नहीं सर,’’ उस ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘आप मुझ से चाहे जैसी कसम ले लें, हत्या के वक्त मैं उस के साथ नहीं था. वह अकेला ही था.’’

मैं ने प्रकाश से पूछा, ‘‘गुल्लू की बख्तियार से क्या दुश्मनी थी?’’

‘‘पुरानी बात है सर, गुल्लू ने अपना बदला लिया है. हवलदार की ही वजह से उस की टांग कटी थी.’’

प्रकाश ने जो बात बताई, उस के अनुसार, गुल्लू भी फौज में था और वह बख्तियार के साथ युद्ध में अगले मोरचे पर तैनात था. गुल्लू हवलदार के अधीनस्थ था. उस जमाने में हवलदार के अधीन 5 जवान हुआ करते थे. जंग जोरों पर थी. प्रकाश गुल्लू और 3 सिपाही बख्तियार के अधीन थे. एक दिन जापानियों का जोरदार हमला हो रहा था, बम बारिश की तरह बरस रहे थे. हवलदार बख्तियार ने गुल्लू को कोई काम बता कर कहा कि वह जा कर उस काम को करे. गुल्लू ने कहा कि हमले का जोर कम हो जाएगा तो वह उस काम को कर देगा.

हवलदार बहुत सख्त फौजी था, अनुशासन में रह कर काम करता था, अपनी बात मनवाने का आदी था. उस ने कहा, ‘‘यह काम अभी करो, मेरा आदेश है, नहीं तो तुम्हारे विरुद्ध काररवाई की जाएगी.’’

गुल्लू न चाहते हुए भी मोर्चे से बाहर चला गया. वह अभी कुछ दूर ही गया होगा कि एक गोला उस के पास आ कर फटा, जिस का एक छोटा टुकड़ा उस के मुंह पर लगा और दूसरा उस के घुटने पर. घाव इतना गहरा था कि डाक्टरों को उस की टांग काटनी पड़ी. गुल्लू को फौज से रिटायर कर दिया गया. इस घटना के लिए गुल्लू बख्तियार को ही जिम्मेदार मानता था. उस ने तभी प्रण कर लिया था कि वह उस से इस का बदला जरूर लेगा. कुछ दिनों बाद प्रकाश भी घायल हो कर गांव आ गया. गुल्लू को पता था कि प्रकाश हवलदार के साथ वाले गांव में रहता है.

प्रकाश और गुल्लू के पत्र के माध्यम से संबंध बने हुए थे. गुल्लू ने उस से कह रखा था कि बख्तियार जब भी गांव आए, उसे सूचित कर दे. जिन दिनों हवलदार बख्तियार गांव आया हुआ था. प्रकाश किसी काम से उस के गांव गया तो उसे पता चला कि वह गांव आया हुआ है. उस ने चिट्ठी लिख कर गुल्लू को हवलदार के गांव आने के बारे में बता दिया. गुल्लू प्रकाश के गांव आ गया और उस के घर में छिप गया. वह इतनी दूर से घोड़ी पर आया था. घटना वाली रात गुल्लू ने प्रकाश को बताया कि वह हवलदार का काम तमाम करने जा रहा है और वहीं से अपने गांव चला जाएगा.

गुल्लू अपनी घोड़ी पर बैठ कर रात को ही चला गया, अगले दिन प्रकाश को पता चला कि बख्तियार की हत्या हो गई है. मैं ने प्रकाश से गुल्लू के गांव का पता पूछा. उस ने जो पता बताया, वह मेरे थाने से 6-7 मील दूर था और मेरे इलाके में नहीं आता था. मैं ने प्रकाश का पूरा बयान लिखा और उसे गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दिया.

मैं समय नष्ट करना नहीं चाहता था. मैं ने 2 कांस्टेबलों को साथ लिया और गुल्लू को गिरफ्तार करने चल दिया. मैं उस इलाके के थानेदार से मिला. वह एक सिख था. उस का नाम गजेंद्र सिंह था, उस ने मेरी बड़ी आवभगत की. मैं ने उसे अपने आने के बारे में बताया.

‘‘आप जलपान करें मलिकजी, आप का मुलजिम आप को मिल जाएगा.’’ कह कर उस ने एक हैडकांस्टेबल और 2 सिपाहियों को इस आदेश के साथ गुल्लू के गांव भेज दिया कि वे उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आएं.

आधे घंटे बाद हैडकांस्टेबल और सिपाही एक आदमी को ले आए. मैं उसे देखते ही समझ गया कि यही गुल्लू है. वह दाईं टांग से बैसाखी पर चल रहा था. वे लोग उसे तांगे पर बिठा कर लाए थे. मैं ने देखा कि उस के चेहरे पर गहरे लंबे घाव का निशान था. गुल्लू ने वैसी ही जूती पहनी हुई थी. मैं ने उस की जूती उतरवा कर देखी तो उस के नीचे तला लगा हुआ था. गजेंद्र सिंह ने कानूनी काररवाई पूरी कर के अपराधी मेरे हवाले कर दिया. मैं उसे ले कर अपने थाने लौट आया.

रात को मैं ने गुल्लू को अपने कमने में बुलाया तो हैडकांस्टेबल ने उसे मेरे सामने ला कर खड़ा कर दिया. उस की आंखें नींद से भारी हो रही थीं. मैं ने हैडकांस्टेबल को इशारा किया कि इसे सोने मत देना. जैसे ही उसे झपकी आती, वह उस के बाल पकड़ कर जोरदार झटका देता. मैं ने उसे खड़ा रखने को कहा.

‘‘तुम अपनी गिरफ्तारी का कारण समझ गए हो गुल्लू,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें ऐसे ही गिरफ्तार नहीं किया, मेरे पास तुम्हारे खिलाफ पक्के सबूत हैं और गवाह भी. तुम ने हवलदार बख्तियार की हत्या की है, मौकाएवारदात पर तुम्हारी जूतियों के निशान मिले हैं. इस के अलावा तुम्हारे दोस्त प्रकाश ने सब कुछ उगल दिया है और हत्या का कारण भी बता दिया है. अब तुम्हारे पास हत्या की बात स्वीकार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.’’

‘‘हां, उस भेडि़ए की हत्या मैं ने ही की है.’’ उस ने नींद से पीछा छुड़ाने के लिए अपने सिर को झटका देते हुए कहा, ‘‘मैं ने उस से बदला ले लिया है. अब मैं जिंदा नहीं रहना चाहता. पूछो, क्या पूछते हो?’’

मैं ने उसे अपने सामने कुरसी पर बिठा दिया. उस ने अपना काफी लंबा बयान दिया, जिसे मैं यहां छोटा कर के बता रहा हूं.

बात उन दिनों की थी, जब विश्वयुद्ध जोरों पर था. जो भी हृष्टपुष्ट जवान दिखाई देते थे, उसे भरती कर लिया जाता था. गरीब घर का गुल्लू जवान था. उस का बाप दूसरों की जमीन ले कर बटाई पर खेती करता था. गुल्लू को यह काम पसंद नहीं था. गुल्लू भी फौज में भर्ती हो गया. उस ने सोचा कि साल, 2 साल में पैसा इकट्ठा हो जाएगा तो शादी कर लेगा. गुल्लू के 2 बड़े भाई थे, जो विवाहित थे. जब लड़ाई ने जोर पकड़ा तो गुल्लू की यूनिट को अगले मोर्चे पर जाने का आदेश मिला. वह बर्मा का मोर्चा था.

जापानी फौज तेजी से आगे बढ़ती हुई बर्मा तक पहुंच गई थी. प्रकाश भी इसी यूनिट में था. गुल्लू और प्रकाश में दोस्ती हो गई थी. बख्तियार इस यूनिट का हवलदार था. प्रकाश और गुल्लू उस के अधीन सिपाही थे. हवलदार बख्तियार बहुत सख्त था. जब वह गुस्से से बात करता था तो उस की आवाज ऐसी निकलती थी, जैसे कोई भेडि़या गुर्रा रहा हो.

प्रकाश और गुल्लू अकसर उस की सख्ती का निशाना बनते थे. गुल्लू तो उस से इतना तंग आ चुका था कि एक दिन उस ने प्रकाश से कहा कि किसी दिन गोलाबारी के बीच वह इस भेडि़ए को गोली मार देगा. लेकिन उसे इस का मौका कभी नहीं मिला. उस के बाद वह घटना घट गई, जिस में उस की टांग चली गई. गुल्लू बेकार हो कर घर आ गया. लंगड़ा होने के साथसाथ चेहरे पर जो घाव आए थे, उस से वह बदसूरत हो गया था. उस की हालत देख कर उस की बूआ ने उस से रिश्ता तोड़ने के लिए कह दिया. गुल्लू को इस का बहुत दुख हुआ. इतना ही नहीं, उस की मंगेतर ने भी कह दिया कि एक लंगड़े और बदसूरत आदमी के साथ वह पूरा जीवन नहीं गुजार सकती.

गुल्लू इस सब का जिम्मेदार बख्तियार को मानता था. वह उस से इतनी अधिक घृणा करने लगा कि अगर उस का बस चलता तो जंग में ही उसे गोली मार देता. उस के एक महीने बाद प्रकाश भी घायल हो कर घर आ गया. दोनों में पक्की दोस्ती हो गई. खतोखिताबत होने लगी. गुल्लू को पता था कि बख्तियार प्रकाश के साथ वाले गांव में रहता है. उस ने प्रकाश से कह रखा था कि जब भी बख्तियार घर आए, उसे जरूर सूचना दे दे. युद्ध समाप्त हो गया तो हवलदार बख्तियार रिटायर हो कर अपने गांव आ गया. प्रकाश को पता चला तो उस ने गुल्लू को पत्र द्वारा सूचना दे दी.

सूचना मिलते ही गुल्लू एक घोड़ी पर सवार हो कर प्रकाश के घर आ गया. घर से चलते समय उस ने एक लंबा तेज धार वाला चाकू अपने पास रख लिया था. दिन के समय प्रकाश और गुल्लू घोडि़यों पर सवार हो कर बख्तियार के गांव चले गए. वे गांव के अंदर न जा कर बाहर से चक्कर काट कर खेतों की ओर चले गए. प्रकाश ने यह पता कर लिया था कि बख्तियार रात को खेतों में सोता है और उस के पास एक बंदूक भी है, जिसे वह अपने पास रखता है.

प्रकाश ने दूर से गुल्लू को वह खेत दिखा दिए, जहां बख्तियार सोता था. गुल्लू को जगह दिखा कर वह वापस आ गया. अब गुल्लू बेचैनी से रात का इंतजार करने लगा. आधी रात के समय वह प्रकाश के घर से निकला. दोनों के बीच यह तय हुआ था कि अगर गुल्लू हवलदार की हत्या करने में कामयाब हो गया तो वापस नहीं आएगा और अगर कामयाब नहीं हुआ तो फिर प्रकाश के घर आ जाएगा. आधी रात का समय था. जब गुल्लू बख्तियार के गांव के बाहर होता हुआ खेतों की तरफ पहुंचा. उस ने दूर से देखा तो हवलदार एक चारपाई पर सोता दिखाई दिया. वह अपनी घोड़ी को धीरेधीरे चला कर खेत के किनारे पहुंच गया. वहां से वह हवलदार की ओर बढ़ा. हवलदार उस वक्त गहरी नींद सोया हुआ था.

गुल्लू किसी तरह की आहट किए बिना हलवदार के सिर की ओर पहुंच गया. सिर की ओर इसलिए कि अगर उस की आंख खुल भी जाए तो वह दिखाई न दे. उस ने बैसाखी जमीन पर रखी और चाकू निकाल कर हवलदार के सीने में भोंक दिया. चाकू लगने पर हवलदार एक झटके के साथ उठा और उस के मुंह से भयानक चीख निकली. उस ने बाएं हाथ से बंदूक पकड़ी, लेकिन तब तक गुल्लू ने चाकू का दूसरा वार कर दिया. बंदूक हवालादार के हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ी. गुल्लू उस समय बदले की भावना से पागल हो गया था. उस ने तीसरा वार हवलदार के पेट पर कर के पेट फाड़ दिया.

हवलदार मुंह के बल आधा चारपाई से नीचे गिर गया, जबकि उस का आधा धड़ चारपाई पर ही रहा. इस से उस की जान निकल गई. गुल्लू ने खून से सना चाकू हवलदार के कपड़ों से साफ कर के अपनी जेब में रख लिया. फिर बैसाखी उठाई और घोड़ी पर सवार हो कर अपने गांव चला गया. मैं ने उस से पूछा कि वह चाकू कहां है, जिस से हवलदार की हत्या की थी? उस ने बताया कि घर में मचान पर फेंक दिया था. मैं ने उस का पूरा बयान लिख कर उस के हस्ताक्षर करा लिए और उसे ले कर चाकू बरामद करने चला गया. उस के गांव पहुंच कर नंबरदार और 2 सम्मानित व्यक्तियों को साथ ले कर गुल्लू के घर गया, जहां गुल्लू ने मचान से चाकू बरामद करा दिया.

मैं ने गुल्लू को मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के उस का बयान करा दिया. गुल्लू ने वही बयान मजिस्ट्रैट के सामने भी दिया. मौके का कोई गवाह नहीं था. अगर गुल्लू अपने बयान से पलट जाता तो बच जाता. लेकिन उसे अब जिंदा रहने में कोई रुचि नहीं थी. उस ने बताया कि अपंग होने के कारण उस के भाई और भाभियां उसे बोझ समझते हैं. सेशन जज ने गुल्लू को मृत्युदंड दिया, जबकि प्रकाश को उस का साथ देने के लिए 5 साल के कारावास की सजा दी. हाईकोर्ट में गुल्लू के बाप ने अपील की, जहां उस के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया. गुल्लू की जान बचने पर उस के बाप को खुशी हुई, लेकिन गुल्लू को कोई खुशी नहीं हुई थी. Crime Stories

 

Jaipur Crime: पैसे के खेल में मिली जेल

Jaipur Crime: जयपुर स्थित पुलिस चौकी रेनवाल मांजी के इंचार्ज सत्यपाल ने करीब डेढ़ लाख के इनामी बदमाश नंदू और उस के साथियों को 10 लाख रुपए ले कर छोड़ दिया होता तो पुलिस का एक दूसरा चेहरा कभी सामने न आता, लेकिन पुलिस ने सत्यप्रकाश का गेम ऐसा बिगाड़ा कि बदमाश तो जेल गए ही, मोटी रकम का सपना देखने वाले 3 पुलिस वाले भी नप गए.

29 अप्रैल की दोपहर को यही कोई डेढ़-पौने 2 बज रहे थे. गरमी ऐसी जैसे आसमान से आग बरस रही हो. ऊपर से लू चल रही थी. भयानक गरमी और लू के बावजूद गुड़गांव पुलिस जयपुर के भांकरोटा-जयसिंहपुरा रोड पर दिल्ली के नंबर वाली एक फौर्च्युनर गाड़ी का पीछा कर रही थी. पुलिस की गाड़ी में 4-5 लोग सवार थे, जबकि दिल्ली के नंबर की जिस गाड़ी का वे पीछा कर रहे थे, उस में 3 लोग सवार थे.

गुड़गांव पुलिस आगे वाली उस गाड़ी का पीछा करते हुए भांकरोटा चौराहे से करीब आधा किलोमीटर दूर जयसिंहपुरा के पास उस गाड़ी के एकदम करीब पहुंच गई. इस से फौर्च्युनर में सवार लोगों को लगा कि वे घिर गए हैं. अपने आप को घिरा देख उन्होंने गाड़ी रोक दी और पीछा कर रही गुड़गांव पुलिस की गाड़ी पर फायरिंग करनी शुरू कर दी. जवाब में पुलिस ने भी 8-10 राउंड गोलियां चलाईं. फिल्मी स्टाइल में दिनदहाड़े सरेआम मेनरोड पर गोलियां चलने से उधर से वाहनों से गुजर रहे लोग और राहगीर दहशत में आ गए. ट्रैफिक रुक गया और लोग जान बचाने के लिए इधरउधर भागने लगे.

इस बीच गुड़गांव पुलिस ने फायरिंग करने वाले बदमाशों में से एक को पहचान लिया था. वह दिल्ली का नंबर वन मोस्टवांटेड अपराधी कपिल सांगवान उर्फ नंदू था. उस पर करीब डेढ़ लाख रुपए का इनाम घोषित था. उस की दिल्ली पुलिस के साथसाथ हरियाणा पुलिस को भी तलाश थी. सड़क पर मची भगदड़ का फायदा उठाते हुए बदमाश अपनी गाड़ी में सवार हो कर सड़क के किनारे खड़े एक टैंपो को टक्कर मारते हुए भाग निकले. गुड़गांव पुलिस उन का पीछा करने के लिए गाड़ी मोड़ ही रही थी कि तभी एक ट्रक उन की गाड़ी के सामने आ गया. ट्रक निकल गया तो गुड़गांव पुलिस ने फिर से बदमाशों की गाड़ी का पीछा किया.

पुलिस को बदमाशों की गाड़ी भांकरोटा से मुहाना जाने वाले समानांतर रास्ते पर 2-3 सौ मीटर दूर दिखाई दी, लेकिन कुछ दूर जाने के बाद बदमाशों की गाड़ी जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास पुलिस की आंखों से ओझल हो गई. गुड़गांव पुलिस ने कुछ देर तक इधरउधर घूम कर बदमाशों की तलाश की, लेकिन उन का कोई पता नहीं चला.

थकहार कर गुड़गांव पुलिस ने इस बात की सूचना आला अधिकारियों को देने के साथ यह भी बता दिया कि मोस्टवांटेड अपराधी नंदू भी उन में शामिल था. इस के बाद गुड़गांव पुलिस के अधिकारियों ने तुरंत जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल से फोन पर बात की. बातचीत से पता चला कि गुड़गांव पुलिस ने बदमाशों की तलाश में अपने आने की सूचना जयपुर पुलिस को नहीं दी थी. खैर, जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने दिल्ली और हरियाणा के कुख्यात अपराधी नंदू के जयपुर में होने और बदमाशों द्वारा फायरिंग किए जाने की घटना को गंभीरता से लिया. उन्होंने तुरंत पूरे जयपुर में कड़ी नाकेबंदी करवा दी.

भांकरोटा, जयसिंहपुरा, नेवटा सहित आसपास के इलाकों में जयपुर पुलिस की क्यूआरटी व एटीएस के अलावा कई थानों की पुलिस ने पूरे शहर की घेराबंदी कर ली. राजस्थान की राजधानी जयपुर से बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर पुलिस ने कड़ी निगरानी शुरू कर दी. खासतौर से दिल्ली रोड और सीकर रोड पर बदमाशों के भागने की आशंका को देखते हुए पुलिस की विशेष टीमें लगाई गईं. जयपुर पुलिस उस दिन दोपहर से ले कर रात तक सड़कों पर डटी रही, साथ ही भांकरोटा, जयसिंहपुरा व मुहाना आदि इलाकों में गश्त भी करती रही, लेकिन फायरिंग कर के भागने वाले बदमाशों के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

हालांकि यह गुड़गांव पुलिस का मामला था, लेकिन दिल्ली और हरियाणा के कुख्यात अपराधी नंदू और उस के साथियों के जयपुर में होने और पुलिस पर फायरिंग कर के भागने की घटना से जयपुर पुलिस कमिश्नर चिंतित हो उठे थे. चिंता की एक खास वजह यह भी थी कि करीब सवा महीने पहले 21 मार्च को राजस्थान के कुख्यात अपराधी और मोस्टवांटेड आनंदपाल तथा उस के गुर्गे नागौर में पुलिस पर गोलियां बरसा कर भाग निकले थे. इस घटना से राजस्थान पुलिस की काफी छीछालेदर हुई थी. इसलिए जयपुर पुलिस नंदू के मामले में किसी तरह की लापरवाही नहीं बरतना चाहती थी.

दरअसल, गुड़गांव पुलिस ने इस घटना से 1-2 दिन पहले लूट के आरोप में 2 बदमाशों को गिरफ्तार किया था. उन से पूछताछ में पता चला था कि नंदू अपने कुछ साथियों के साथ जयपुर में है. इसी सूचना के आधार पर गुड़गांव पुलिस की क्राइम ब्रांच के सबइंसपेक्टर सुरेंद्र और सतीश कुमार के साथ उन की टीम 29 अप्रैल को जयपुर आई थी. गुड़गांव पुलिस को कपिल सांगवान उर्फ नंदू की एक लग्जरी कार की लूट के मामले तलाश में थी.

मोस्टवांटेड नंदू की इस कहानी में उसी दिन एक नया मोड़ आ गया. भांकरोटा चौराहे के पास जयसिंहपुरा रोड पर गुड़गांव पुलिस से मुठभेड़ के बाद नंदू अपने दोनों साथियों के साथ फौर्च्युनर गाड़ी से भाग रहा था, तभी डिग्गी रोड पर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी के सामने वाली सड़क पर उन की गाड़ी का एक टायर फट गया. टायर फटने के बावजूद बदमाश अपनी गाड़ी को तेजी से भगा कर ले जा रहे थे. टायर फटने से उछलती हुई दौड़ रही गाड़ी को देख कर एक टायर पंक्चर बनाने वाले युवक को शक हुआ. उस ने यह बात पुलिस चौकी के पास स्थित पैट्रोल पंप के मालिक कैलाश चौधरी को बताई तो वह अपने पैट्रोल पंप के केबिन से बाहर निकल आए. बाहर आ कर उन्होंने देखा, कार रोक कर उस में 3 लड़के उतरे और अपने बैग ले कर तेजी से भागने लगे.

उन लड़कों के भागने से आसपास के लोगों को शक हुआ तो कुछ लोगों ने उन्हें थोड़ी दूर दौड़ा कर धांधो की ढाणी के पास पकड़ लिया. इस बीच, वहीं चाय की दुकान करने वाले एक आदमी ने रेनवाल मांजी पुलिस चौकी को इस मामले की सूचना दे दी. लोगों ने जिस जगह तीनों युवकों को पकड़ा था, वह जगह पुलिस चौकी से करीब आधा किलोमीटर दूर थी, इसलिए 5 मिनट में ही चौकी से 2 सिपाही निर्मल और कालूराम मोटरसाइकिल से वहां आ पहुंचे. दोनों सिपाही उन लड़कों के हावभाव देख कर ही समझ गए कि ये कोई भले आदमी नहीं हैं. सिपाहियों ने वहां मौजूद लोगों से कहा कि इन्होंने जयपुर में एक्सीडेंट किया है, इसीलिए इन की गाड़ी का बंपर टूट गया है और टायर भी फट गया है. उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, पुलिस इन से पूछताछ कर के भागने के कारणों का पता लगा लेगी.

इस तरह वहां जमा लोगों को भरोसा दे कर दोनों सिपाही तीनों युवकों को रेनवाल मांजी पुलिस चौकी ले गए. यह दोपहर करीब 3 बजे की बात है. सिपाही निर्मल और कालूराम तीनों युवकों को ले कर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी पहुंचे तो चौकीप्रभारी एएसआई सत्यप्रकाश वहां मौजूद थे. यह चौकी जयपुर ग्रामीण जिला पुलिस के थाना फागी के अंतर्गत आती है. चौकीप्रभारी सत्यप्रकाश ने तीनों युवकों के बैगों की तलाशी ली तो उन में से पिस्तौल और कारतूस के अलावा कुछ रकम भी मिली. पिस्तौल और कारतूस देख कर सत्यप्रकाश समझ गए कि ये तीनों वही अपराधी हैं, जिन के लिए जयपुर पुलिस ने नाकेबंदी कर रखी है.

जयपुर पुलिस का वायरलैस मैसेज पहले ही चौकी पर पहुंच चुका था, जिस में कहा गया था कि दिल्ली और हरियाणा का मोस्टवांटेड नंदू गुड़गांव पुलिस पर फायरिंग कर के अपने 2 साथियों के साथ एक फौर्च्युनर गाड़ी में भागा है. नंदू की तलाश में कड़ी नाकेबंदी की जाए. चौकीप्रभारी ने एक क्रेन बुलवा कर तीनों युवकों की फटे टायर वाली फौर्च्युनर गाड़ी खिंचवा कर चौकी पर मंगवा ली थी. सत्यप्रकाश ने तीनों के नामपते पूछे तो उन में एक ने अपना नाम नवीन राठी तो दूसरे ने हिमांशु छिल्लर और तीसरे ने सचिन छिंकारा बताया. हथियारों के बारे में वे कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए. सत्यप्रकाश को पता चल चुका था कि ये युवक और कोई नहीं, नंदू और उस के साथी हैं.

इस बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने थोड़ी सख्ती की तो तीनों युवकों में से एक स्मार्ट से युवक ने सत्यप्रकाश से सीधेसीधे कहा, ‘‘देखो साहब, मेरा नाम नवीन राठी नहीं, बल्कि नंदू है. ये दोनों मेरे साथी हैं. हरियाणा का एक गैंग हमारे पीछे पड़ा है. वे लोग हमें मार देंगे. आप हमें छोड़ दो, बोलो कितना पैसा चाहिए? इस के अलावा हम तीनों को जयपुर पुलिस भी तलाश रही है. यह नाकेबंदी हमारे लिए ही हो रही है.’’

वह गांव की पुलिस चौकी थी. चौकीप्रभारी सत्यप्रकाश खेलाखाया पुलिस वाला था. उसे पता था कि तीनों ही मोटी मुर्गियां हैं, इसलिए उस ने नंदू की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘ठीक है, हम तुम को बचा लेंगे. लेकिन इस के लिए तुम्हें 30 लाख रुपए देने होंगे.’’

‘‘इंचार्ज साहब, कभी 30 लाख रुपए गिने भी हैं या सिर्फ जुबान से कह दिया?’’ नंदू ने कुटिलता से कहा, ‘‘2-4 लाख की बात हो तो कहो, वरना 5-7 दिन जेल में रह लेंगे. उस के बाद जमानत हो जाएगी. हमारे लिए जेल आनाजाना कोई नई बात नहीं है.’’

सत्यप्रकाश समझ गए कि तीनों बदमाश पैसे तो दे देंगे, लेकिन सौदेबाजी करनी पड़ेगी. उन्होंने पुलिसिया भाषा में सौदेबाजी की तो नंदू 10 लाख रुपए देने पर राजी हो गया. चौकी पर सत्यप्रकाश के अलावा 2 सिपाही निर्मल और कालूराम भी थे. उन्हें भी सारी बातें पता थीं. सत्यप्रकाश ने दोनों सिपाहियों को अपने विश्वास में ले कर उन्हें 3-3 लाख रुपए में राजी कर लिया. इतनी रकम के लिए दोनों सिपाही अपनी जुबान बंद रखने को तैयार हो गए.

सत्यप्रकाश और नंदू के बीच सौदेबाजी हो गई तो नंदू ने गुड़गांव के अपने एक साथी को फोन कर के कहा, ‘‘मैं जयपुर से बोल रहा हूं. यहां जयपुर पुलिस ने हमें पकड़ लिया है. 10 लाख रुपए ले कर आ जाओ, नहीं तो ये लोग हमें गिरफ्तार कर लेंगे.’’

इसी के साथ नंदू ने उसे यह भी बता दिया कि किस आदमी से 10 लाख रुपए मिलेंगे. साथ ही यह भी बता दिया कि 10 लाख रुपए ले कर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी आना है. पुलिस से सौदा होने के बाद नंदू और उस के साथियों की चिंता और तनाव थोड़ा कम हुआ. खुद को रिलैक्स महसूस करते हुए उन्होंने सोचा कि जान बची तो लाखों पाए. सौदेबाजी के बाद नंदू और उस के साथियों की चौकीइंचार्ज और दोनों सिपाहियों से दूरियां खत्म हो गईं. नंदू ने सत्यप्रकाश से कह कर चायनाश्ता मंगवाया. तीनों बदमाश चौकी में ही मेहमान की तरह कुर्सियों पर आराम करने लगे.

सत्यप्रकाश के कहने पर पुलिस चौकी के रसोइए मानसिंह ने उन तीनों के लिए रात का खाना बनाया तो उन्होंने रात करीब साढ़े 8 बजे डिनर किया. इस के बाद तीनों पुलिस चौकी में बने इंचार्ज के रेस्टरूम में आराम करने लगे. बीचबीच में वे अपने साथियों से मोबाइल पर बात भी कर रहे थे. चौकी का एक सिपाही कमरे के बाहर पहरा दे रहा था. दूसरी ओर एडिशनल सीपी (क्राइम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देश और डीसीपी (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में गठित जयपुर पुलिस की विशेष टीमें हरियाणा पुलिस पर फायरिंग कर के भागे तीनों बदमाशों की तलाश में जुटी थीं.

इन्हीं पुलिस टीमों में से एक को जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास मल्टीस्टोरी फ्लैट्स में हरियाणा के कुछ युवकों के रहने और दिल्ली के नंबरों की गाडि़यों के आनेजाने की जानकारी मिली. इस जानकारी के आधार पर पुलिस टीम ने रात करीब साढ़े 7 बजे एक फ्लैट पर छापा मारा. फ्लैट की तलाशी में सिम का रैपर, मोबाइल का खाली डिब्बा और कई ऐसे दस्तावेज मिले, जिन से पता चला कि इस फ्लैट में कपिल सांगवान उर्फ नंदू रहता था.

रैपर से पुलिस को मोबाइल का नंबर मिल गया. उस नंबर को पुलिस ने सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन रेनवाल के आसपास आ रही थी. इस के बाद पुलिस की एक टीम रेनवाल इलाके में नंदू और उस के साथियों की तलाश में लग गई. इस पुलिस टीम ने रेनवाल मांजी चौकी के भी 2-3 चक्कर लगाए, पर न तो वहां कोई फौर्च्युनर गाड़ी नजर आई और न ही नंदू और उस के साथी.

इस पुलिस टीम ने रेनवाल मांजी पुलिस चौकी में जाने की जरूरत इसलिए महसूस नहीं की क्योंकि अगर कोई संदिग्ध बदमाश पकड़े जाते तो अब तक पूरे जयपुर में वायरलैस गूंज रहे होते और वहां तमाम आला अफसरों का जमावड़ा लग गया होता. दूसरा कारण यह था कि चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश ने नंदू और उस के साथियों की फौर्च्युनर गाड़ी को झाडि़यों में इस तरह छिपा दिया था कि बाहर से देखने पर वह किसी को नजर नहीं आ रही थी.

नंदू का मोबाइल सर्विलांस पर लगा होने की वजह से पुलिस को यह पता चल गया कि गुड़गांव से कुछ लोग 10 लाख रुपए ले कर जयपुर आ रहे हैं. साथ ही यह भी कि पैसा लाने वालों में से एक का नाम गजराज सिंह है. पुलिस ने उन के फोन टेप करने शुरू किए. गुड़गांव से आ रहे लोगों की लोकेशन जयपुर-दिल्ली रोड की आ रही थी.

इस जानकारी के आधार पर जयपुर पुलिस ने दिल्ली रोड पर लगी नाकेबंदी सख्त करवा दी, साथ ही दिल्ली और हरियाणा के नंबर वाली गाडि़यों की तलाशी सख्ती से ली जाने लगी. नाकेबंदी के दौरान क्राइम ब्रांच एवं दक्षिणी जिले की स्पैशल पुलिस टीम ने जयपुर के पास थाना मुहाना की टीलावाला चौकी के पास एक गाड़ी रोकी. उस गाड़ी में 3 लोग सवार थे. गाड़ी की तलाशी में एक बैग मिला, जिस में 10 लाख रुपए भरे थे. पुलिस ने गाड़ी में सवार तीनों लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने अपने नाम गजराज सिंह, परमजीत सिंह और पंकज बताए.

इन तीनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो जयपुर ग्रामीण जिले की रेनवाल मांजी पुलिस का भांडा फूट गया और पुलिस का एक दूसरा ही चेहरा सामने आ गया. उन तीनों ने बताया कि नंदू और उस के साथियों को जयपुर ग्रामीण जिले की पुलिस ने पकड़ रखा है और उन्हें छोड़ने के लिए 10 लाख रुपए मांगे हैं. नंदू ने ही उन्हें फोन कर के 10 लाख रुपए लाने को कहा था. ये रुपए ले कर वे रेनवाल मांजी पुलिस चौकी जा रहे थे. उन्होंने यह भी बताया कि नंदू और उस के साथी रेनवाल पुलिस चौकी पर ही हैं.

जांच में लगी पुलिस टीमों ने यह बात अपने उच्चाधिकारियों को बताई. अब जयपुर पुलिस को बेहद सावधानी बरतनी थी, क्योंकि मामले में पुलिस का दूसरा चेहरा सामने आ गया था, साथ ही रेनवाल मांजी चौकी पुलिस को पता चलने पर नंदू और उस के साथियों की जान का खतरा भी हो सकता था. इस के अलावा नंदू की गुड़गांव से आए उस के साथियों से मोबाइल पर बातचीत जारी रखवानी थी, ताकि नंदू या रेनवाल मांजी चौकी पुलिस को यह शक न हो कि 10 लाख रुपए ला रहे उस के साथियों को पुलिस ने पकड़ लिया है.

जब इस बात की जानकारी जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को हुई तो उन्होंने रणनीति बना कर रेनमाल मांजी पुलिस चौकी पर छापा मारा. इस के लिए पुलिस टीम ने रात के 12 बजे का समय चुना था. नंदू और उस के दोनों साथी इंचार्ज के कमरे में आराम करते मिल गए. चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाही निर्मल और कालूराम भी वहीं थे. पुलिस ने नंदू और उस के साथियों को तो पकड़ा ही, साथ ही चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों को भी हिरासत में ले लिया.

जयपुर पुलिस द्वारा आधी रात को मारे गए छापे से नंदू और उस के साथियों के अलावा चौकी के तीनों पुलिसकर्मी भी हैरान थे कि यह सब अचानक कैसे हो गया? जब जयपुर पुलिस ने बाहर गाड़ी में बैठे गुड़गांव से आ रहे गजराज सिंह, परमजीत सिंह और पंकज को बाहर निकाला तो उन की समझ में आ गया कि इन्हीं लोगों से पुलिस को उन के रेनवाल मांजी चौकी में होने की जानकारी मिली होगी. एक ही दिन में नंदू के आपराधिक जीवन में यह तीसरा मोड़ आया था.

इस बीच एक और घटना घट गई. हुआ यह कि शुरुआती पूछताछ के बाद जयपुर पुलिस ने 30 अप्रैल को रेनवाल मांजी चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों निर्मल और कालूराम को भांकरोटा थाना पुलिस के हवाले कर दिया. तीनों आरोपी भी उसी थाने में थे. हालांकि एक तरह से वे अपराधी थे, लेकिन उन्हें हवालात में नहीं रखा गया था. इसलिए तीनों पुलिस की नजरों के बीच थाने में इधरउधर घूम रहे थे.

इस का फायदा उठा कर एएसआई सत्यप्रकाश टहलतेटहलते शाम को थाने से बाहर निकल कर फरार हो गया. उसे भागने का मौका भी मिला तो उस वक्त जब जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल कमिश्नर औफिस में नंदू और उस के साथियों के पकड़े जाने की जानकारी देने के लिए प्रैस कौन्फ्रैंस कर रहे थे. उस समय थाना भांकरोटा के थानाप्रभारी हेमेंद्र शर्मा कमिश्नर औफिस में ही थे. कहा जाता है कि सत्यप्रकाश किसी परिचित की कार से भागा था, लेकिन पुलिस ने सत्यप्रकाश को 20 घंटे बाद अगले दिन एक मई को बीकानेर से पकड़ लिया. इस से जयपुर पुलिस की लाज बच गई.

अपराधियों से मिलीभगत करने के आरोप में जयपुर आईजी हेमंत प्रियदर्शी ने एएसआई सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों निर्मल और कालूराम को निलंबित कर दिया. यह अलग बात है कि अगर सत्यप्रकाश, निर्मल और कालूराम अपराधियों को छोड़ने के एवज में सौदेबाजी न करते तो उन्हें प्रमोशन तो मिलता ही, नंदू और उस के साथी बदमाशों पर पुलिस की ओर से घोषित करीब 2 लाख रुपए की इनाम की राशि भी मिल सकती थी.

नंदू के जीवन में एक ही दिन में 3 मोड़ आने के बाद भी उस की परेशानी खत्म नहीं हुई थी. पहले हरियाणा पुलिस से मुठभेड़ हुई. उस में बचा तो ग्रामीणों ने पुलिस को सौंप दिया. पुलिस से सौदेबाजी की तो भी किस्मत धोखा दे गई. खुद के साथ उस के साथी भी पकड़े गए. गुड़गांव से मंगाए 10 लाख रुपए भी गए और रुपए लाने वाले भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. दिल्ली और हरियाणा में गैंग के लोगों को जब पता चला कि नंदू सहित उन के 6 साथियों को जयपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है तो गिरोह के 4 लोग उन की जमानत के लिए 5 लाख रुपए ले कर 1 मई को जयपुर पहुंचे. नंदू की किस्मत यहां भी धोखा दे गई. वे चारों भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

पुलिस ने उन्हें दौलतपुरा टोल के पास नाकेबंदी के दौरान पकड़ लिया. वे हरियाणा के नंबर की टाटा सफारी में सवार थे. उन की गाड़ी में बिना लाइसैंसी रिवौल्वर, 10 जिंदा कारतूस और 5 लाख रुपए नकद मिले. पकडे़ गए आरोपियों में अजय कुमार जाट, संदीप जाट, राजन जाट और सतपाल जाट शामिल थे. ये चारों हरियाणा के झज्जर के रहने वाले थे. इन में सतपाल उस गजराज सिंह का भाई था, जो गुड़गांव से नंदू को छुड़वाने के लिए 10 लाख रुपए ले कर जयपुर जा रहा था.

नंदू गिरोह के हौसले इतने बुलंद थे कि जयपुर पुलिस द्वारा 6 साथियों के पकड़े जाने के बाद भी सतपाल ने पकड़ने वाले पुलिस इंसपेक्टर से कहा, ‘‘हमें तो गजराज और उस के साथियों की जमानत करानी है. इस में मदद कर के जो चाहो, मिल जाएगा.’’

जयपुर पुलिस ने हरियाणा पुलिस पर फायरिंग कर के भागे नंदू और उस के दोनों साथियों सचिन छिंकारा व गुलशन उर्फ हिमांशु छिल्लर से पूछताछ की और 1 मई को उन्हें मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश कर के 3 मई तक पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि पूरी होने पर थाना भांकरोटा पुलिस ने 3 मई को उन्हें फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेजने का आदेश दिया गया. बाद में दिल्ली पुलिस की अर्जी पर अदालत ने तीनों को प्रोडक्शन वारंट पर दिल्ली पुलिस को सौंप दिया.

जयपुर पुलिस ने रेनवाल मांजी चौकी के गिरफ्तार एएसआई सत्यप्रकाश तथा सिपाही निर्मल और कालूराम को भी न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. नंदू के गिरोह के उन 7 लोगों को भी जेल भेज दिया गया, जो 10 लाख रुपए और 5 लाख रुपए ले कर आए थे. रिमांड अवधि के दौरान पूछताछ में नंदू और उस के साथियों के अपराधों के साथ जयपुर को अपनी शरणस्थली बनाने का जो खुलासा हुआ, वह इस प्रकार था.

कपिल सांगवान उर्फ नंदू दिल्ली के 10 मोस्टवांटेड अपराधियों में नंबर वन है. मूलरूप से हरियाणा स्थित महेंद्रगढ़ जिले के नांगल चौधरी पुलिस थानाक्षेत्र के नांगल वाली गांव के रहने वाले सूरजभान के बेटे नंदू का दिल्ली पुलिस के रिकौर्ड में स्थाई पता आरजेड-81बी, नंदा एन्कलेव, नजफगढ़, दिल्ली दर्ज है. 20 वर्षीय नंदू पर दिल्ली पुलिस की ओर से करीब डेढ़ लाख रुपए का इनाम घोषित है.

नंदू के खिलाफ दिल्ली के विभिन्न पुलिस थानों में हत्या, हत्या के प्रयास, लूट और एक्सटौर्शन आदि के 10 मुकदमे दर्ज हैं. इन के अलावा हरियाणा के जींद सिटी व गुड़गांव में भी उस के खिलाफ मुकदमे दर्ज हैं. नंदू और उस के साथियों पर विभिन्न थानों में 8 हत्याओं के मामले दर्ज हैं. वह बीए औनर्स का छात्र है और पिछले 3 सालों से आपराधिक वारदातें कर रहा है. नंदू का बड़ा भाई ज्योति सांगवान उर्फ बाबा भी कुख्यात अपराधी है. उस के खिलाफ दिल्ली एवं अन्य राज्यों में हत्या सहित कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. उस के साथी सचिन छिंकारा पर भी दिल्ली पुलिस की ओर से 50 हजार रुपए का इनाम घोषित है.

मासूम सा दिखने वाला नंदू इतना खूंखार है कि गोली चलाना और किसी की हत्या कर देना, उसे तमाशा लगता है. वह अपने दुश्मनों से ज्यादा उन के परिवार के लिए खतरनाक है. नंदू ने अपने गिरोह के साथ 20 दिसंबर, 2015 की रात ढाई बजे के करीब दिल्ली में नजफगढ़ के पास छावला इलाके में कुख्यात अपराधी मंजीत महाल के गैंग के सदस्य और घुम्मनहेड़ा के रहने वाले नफे सिंह उर्फ मंत्री के पिता हरिकिशन, मां कमला और पत्नी शर्मिला को गोलियां मार कर उन की हत्या का प्रयास किया था. इन में से हरिकिशन की मौत हो गई थी, जबकि दोनों महिलाएं गंभीर रूप से घायल हो गई थीं. हरिकिशन दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड हैडकांस्टेबल थे.

इस मामले में नंदू के साथ गुलशन और सचिन भी थे. दरअसल मंजीत महाल गैंग के नफे सिंह उर्फ मंत्री व अन्य लोगों ने उसी रात दीनपुर इलाके में 11 बजे के करीब सुर्रखपुर निवासी नंदू के जीजा सुनील उर्फ डाक्टर की गोली मार कर हत्या कर दी थी. जीजा की हत्या की सूचना मिलते ही उसी रात नंदू ने बदला लेने के लिए आरोपी नफे सिंह के पिता की हत्या कर दी थी.

नफे सिंह के पिता हरिकिशन सिंह की हत्या करने के अगले दिन नंदू अपने साथियों गुलशन और सचिन के साथ जयपुर आ गया था. जयपुर के एक होटल में उन्होंने पार्टी कर के अपने दुश्मन के बाप की हत्या का जश्न मनाया और फिर जयपुर में ही अपना ठिकाना बना लिया. यहां रहने के लिए उस ने वैशालीनगर में थाने के पीछे की गली में किराए का फ्लैट लिया. यहां रहते हुए वह दिल्ली और हरियाणा भी जाता रहा. उस के साथी भी उस से मिलने जयपुर आते रहे. जयपुर में नंदू नवीन राठी के नाम से रहता था, जबकि गुलशन ने अपना नाम हिमांशु छिल्लर रख लिया था. दोनों ने इन्हीं नामों की आईडी की भी व्यवस्था कर ली थी.

इसी साल 11 जनवरी के दूसरे सप्ताह में नंदू अपने साथियों के साथ दिल्ली गया. उस ने शिकारपुर गांव के रहने वाले 45 वर्षीय विनोद और 19 वर्षीय उस के बेटे कमल की उन के घर में ही हत्या कर दी. पुलिस जांच में पता चला कि विनोद उस धर्मेंद्र उर्फ माडू के पिता थे, जो 20 दिसंबर की रात नंदू के जीजा सुनील उर्फ डाक्टर की हत्या के समय हत्यारों के साथ था. कमल धर्मेंद्र का छोटा भाई था. नंदू और उस के साथियों के हाथों मारे गए विनोद और कमल न तो किसी आपराधिक गैंग में शामिल थे और न ही उन के खिलाफ कोई मामला दर्ज था. कहा जाता है कि नंदू घर में मौजूद 2 बच्चों को भी मारना चाहता था, लेकिन साथियों ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया था. सुनील उर्फ डाक्टर की हत्या में शामिल आरोपी धर्मेंद्र को क्राइम ब्रांच ने 31 दिसंबर, 2015 को गिरफ्तार कर लिया था.

विनोद और उस के बेटे कमल की हत्या के बाद नंदू और उस के साथी जयपुर आ कर वैशालीनगर वाले फ्लैट में रहने लगे थे. शक होने पर मकान मालिक ने उन से अपना फ्लैट खाली करा लिया तो उस ने जयपुर के मुहाना के जयसिंहपुरा स्थित ओमेगा रेजीडेंसी अपार्टमेंट में 203 नंबर का फ्लैट किराए पर ले लिया था. उस के साथ 2-3 साथी भी वहां रहते थे. नंदू व उस के साथियों ने फ्लैट मालिक से खुद को स्टूडेंट बताया था.

अपार्टमेंट के गार्ड ने पुलिस को बताया कि नंदू उर्फ नवीन और उस के साथी 2-3 दिन में एक बार फ्लैट से निकलते थे. खानेपीने का सामान ये लोग रात को लाते थे. इन से मिलने के लिए हरियाणा व दिल्ली नंबरों के गाडि़यों में लड़के आते थे. नंदू ज्यादातर खुद ही खाना बनाता था. वे फ्लैट की साफसफाई भी खुद ही करते थे. फ्लैट मालिक ने इन का पुलिस सत्यापन नहीं कराया था. बाद में भेद खुलने पर जयपुर की थाना मुहाना पुलिस ने जयसिंहपुरा निवासी केदार शर्मा को गिरफ्तार कर लिया था. यह फ्लैट तेलंगाना निवासी रिटायर्ड कर्नल शिशिर कुमार का था. कर्नल ने फ्लैट की देखभाल की जिम्मेदारी केदार शर्मा को सौंप रखी थी. केदार ने इन किराएदारों का पुलिस सत्यापन नहीं कराया था.

जयपुर में रहने के दौरान नंदू और उस के साथियों का कोई आपराधिक मामला पुलिस के सामने नहीं आया है. इस बारे में नंदू और उस के साथियों ने पुलिस को बताया कि दिल्ली और हरियाणा पुलिस उन के खिलाफ तेजी से काररवाई कर रही थी, जिस से बचने के लिए उन्होंने जयपुर को अपना ठिकाना बना लिया था. वे जयपुर में कोई अपराध कर के पुलिस की नजरों में नहीं आना चाहते थे. पुलिस को फ्लैट की तलाशी में कुछ ऐसा सामान मिला है, जिस से लगता है कि फ्लैट में युवतियों का भी आनाजाना था. नंदू और उस के साथियों ने अय्याशी के लिए लड़कियां लाने की बात कबूल की है.

मुठभेड़ की इस घटना के 5 दिनों पहले 24 अप्रैल को संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास नंदू के किराए के फ्लैट से करीब 400 मीटर दूरी पर 20-21 साल की एक युवती का अधजला शव मिला था. इस लाश की शिनाख्त नहीं हुई है. थाना मुहाना पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. पुलिस ने नंदू और उस के साथियों से युवती के अधजले शव के बारे में भी पूछताछ की है, लेकिन अभी खुलासा नहीं हुआ है. पुलिस को शक है कि यह लाश नंदू और उस के साथियों की महिला मित्र की हो सकती है.

हालांकि नंदू और उस के साथियों ने इस बात से इनकार किया है. पूछताछ में नंदू के जयपुर की एक युवती से संबंध होने की बात सामने आई है. नंदू की उस युवती से सोशल साइट के माध्यम से बातचीत होती रहती थी. पुलिस उस युवती के बारे में जानकारी जुटा रही है.

पुलिस जांच में पता चला है कि बड़े भाई ज्योति सांगवान उर्फ बाबा के अपराधी होने की वजह से ही कपिल सांगवान उर्फ नंदू अपराध की दुनिया में आया था. कुछ समय पहले बड़ा भाई हत्या के एक मामले में भोंडसी जेल चला गया तो नंदू ने गिरोह की कमान संभाल ली. इस गिरोह का दिल्ली, हरियाणा में उगाही और नशीले ड्रग्स का काम है. हरियाणा पुलिस से मुठभेड़ के दौरान जिस फौर्च्युनर कार से नंदू और उस के साथी भागे थे, वह कार गुड़गांव से लूटी गई थी.

हरियाणा पुलिस इसी कार लूट के मामले में जयपुर आई थी. नंदू और उस के साथी दिल्ली और हरियाणा में हाईवे पर लग्जरी गाडि़यां भी लूटते थे. नंदू पर 7 गाडि़यां लूटने का आरोप है. गिरोह द्वारा लूटी गई एक एसयूवी कार की सड़क दुर्घटना हो गई तो ये उसे छोड़ कर भाग गए थे. कोई बड़ी वारदात करने के बाद भी ये लोग गाडि़यों को लावारिस छोड़ कर भाग जाते थे. नंदू का सब से विश्वासपात्र गुलशन उर्फ हिमांशु छिल्लर है. वह कार भगाने में माहिर है. गुलशन की वजह से ही नंदू और उस के साथी कई बार पुलिस की पकड़ से बच निकले थे. सचिन छिंकारा भी नंदू का खास है. अधिकांश बड़ी वारदातों में वह नंदू के साथ रहा है.

पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल के अनुसार, 30 अप्रैल को पकड़े गए 6 अपराधियों (नंदू और उस के दोनों साथियों के अलावा इन्हें छुड़ाने आए 3 लोग) से एक पिस्तौल, 6 कारतूस, पौइंट 38 स्मिथ ऐंड वेसन रिवौल्वर, 6 कारतूस, एक लाइसैंसी और्डिनेंसी रिवौल्वर और 10 लाख रुपए जब्त किए गए हैं. इस के बाद इन अपराधियों की जमानत कराने के लिए आ रहे लोगों से एक अवैध रिवौल्वर, 10 कारतूसों के अलावा 5 लाख रुपए जब्त किए गए हैं.

रिवौल्वर, कारतूस और रकम झज्जर निवासी अजय कुमार उर्फ अजय खत्री से बरामद हुई है. अजय के 3 साथियों झज्जर निवासी संदीप उर्फ नगड़, सतपाल उर्फ डिल्लुआ और राजन को काररवाई के दौरान उत्पात मचाने के आरोप में धारा 151 सीआरपीसी के तहत गिरफ्तार किया गया है. संदीप उर्फ नगड़ नंदू और उस के साथियों को छुड़ाने के लिए 10 लाख रुपए लाते समय पकड़े गए गजराज का सगा भाई है. हरियाणा पुलिस पर फायरिंग के सिलसिले में भी इन लोगों पर भांकरोटा थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है.

नंदू और उस के साथियों को छोड़ने के लिए 10 लाख रुपए में सौदा करने वाले एएसआई सत्यप्रकाश एवं सिपाही निर्मल और कालूराम को पुलिस की सेवा से बर्खास्त करने की काररवाई शुरू कर दी गई है. पुलिस महानिदेशक मनोज भट्ट ने उन के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए हैं. विभागीय जांच इसलिए की जा रही है, ताकि वे अदालत में अरजी लगा कर बिना जांच किए बर्खास्त करने का हवाला दे कर फिर बहाल न हो सकें.

इस पूरे मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों का कहना है कि उन्होंने गैलेंट्रीवार्ड लेने के लिए नंदू और उस के साथियों को छिपा दिया था. वे इन के पूरे गिरोह को पकड़ना चाहते थे, इसीलिए जयपुर पुलिस को इस की सूचना नहीं दी थी. हालांकि इस के उलट जयपुर पुलिस का कहना है कि सर्विलांस के दौरान टेप किए गए अपराधियों के मोबाइल पर हुई बातों में 10 लाख रुपए दे कर छोड़ने की बात साफ सुनाई दे रही है. बहरहाल, नंदू और उस के साथियों की गिरफ्तारी से जयपुरवासियों और दिल्ली तथा हरियाणा पुलिस को भले ही राहत मिली है, लेकिन इस से पुलिस और अपराधियों के चेहरे भी बेनकाब हो गए हैं, साथ ही चिंता की यह बात भी सामने आई है कि जयपुर और आसपास के इलाके कुख्यात अपराधियों की शरणगाह बनते जा रहे हैं.

राजस्थान पुलिस का कहना है कि नंदू कुख्यात अपराधी आनंदपाल से भी ज्यादा खूंखार है. आनंदपाल ने राजस्थान पुलिस को परेशान कर रखा है. 3 सितंबर, 2015 को नागौर पेशी से अजमेर लौटते समय कुख्यात आनंदपाल पुलिस की मिलीभगत से भाग निकला था. उस के बाद 21 मार्च को नागौर में पुलिस की आनंदपाल से मुठभेड़ हुई, जिस में एक जवान की मौत हो गई थी. इस के बाद भी वह पुलिस को चकमा दे गया था. उस ने राजस्थान पुलिस का चैन छीन रखा है. Jaipur Crime

 

Contract Killing Story: मास्टर माइंड – औरत की हत्या

Contract Killing Story: कहा जाता है कि महेशचंद की पत्नी और तीनों बेटियों की हत्या आशा शर्मा ने कराई थी, लेकिन सबूतों के अभाव में 3 साल बाद वह जेल से छूट गई. आश्चर्य की बात यह है कि 7 साल बाद आशा शर्मा की उसी 16 अप्रैल को हत्या हो गई, जिस 16 अप्रैल को उस ने 4 लाशें बिछवाई थीं.

आशा शर्मा के कत्ल की कीमत एक लाख रुपए तय हुई थी. 20 हजार रुपए मदन को एडवांस दे दिए गए थे, बाकी काम हो जाने पर दिए जाने थे. एडवांस की रकम ले कर मदन जैसे ही अपनी दुकान पर पहुंचा, उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नंबर देखा तो चौंका. फोन आशा शर्मा का था. वही आशा शर्मा, जिस के कत्ल की वह सुपारी ले कर आया था. पहले तो उस ने सोचा फोन रिसीव ही न करे, लेकिन वह जानता था कि जब तक फोन नहीं उठाएगा तब तक वह बारबार फोन करती रहेगी. आखिर मन मार कर उस ने फोन रिसीव कर के ‘हैलो’ कहा.

वह आगे कुछ बोलता, इस से पहले ही दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हाय हैंडसम, ले आए मुझे मारने की सुपारी? तुम्हें शर्म नहीं आई, मेरी जान की कीमत 1 लाख रुपए लगाते हुए. एडवांस भी कुल 20 हजार. अरे 5-10 लाख लिए होते तो मुझे भी खुशी होती.’’

आशा शर्मा की बात सुन कर मदन घबरा गया. घबराने की बात थी भी. अभीअभी सौदा हुआ था और आशा को पता चल गया था. मदन के चेहरे पर घबराहट के चिह्न साफ नजर आ रहे थे, मुंह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे. उसे चुप देख कर दूसरी ओर से आशा ने ही कहा, ‘‘घबराओ मत, मैं किसी से नहीं कहूंगी. बस तुम एक घंटे के अंदरअंदर मेरे शास्त्रीनगर वाले घर पर आ जाओ. और हां, अगर तुम नहीं आए तो महेश और उस की बीवी मुन्नी के साथ थाने में खड़े नजर आओगे.’’

मदन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बोले. उसे चुप देख आशा गुर्राने जैसी आवाज में बोली, ‘‘मेरी आवाज सुन कर तेरी पैंट गीली हो गई क्या? घबरा मत, मैं घर पर अकेली हूं. जल्दी आना, मुझे ज्यादा इंतजार करने की आदत नहीं है.’’

अपनी बात कह कर आशा शर्मा ने झटके से फोन काट दिया. मदन की समझ में नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे. न तो वह आशा शर्मा से अंजान था और न आशा शर्मा उस से. दोनों एकदूसरे की नसनस को जानते थे. कुछ नहीं सूझा तो मदन दुकान को भूल कर अपने दोस्त बौबी के घर जा पहुंचा. उस ने बौबी को पूरी बात बता कर सलाह मांगी. बौबी भी आशा शर्मा से अंजान नहीं था. रायमशविरे के बाद तय हुआ कि दोनों दोस्त साथसाथ आशा के घर जाएंगे.

मदन और बौबी आशा के शास्त्रीनगर स्थित घर जा पहुंचे. उन्हें देखते ही आशा शर्मा के होठों पर विजयी मुसकान फैल गई. वह फिल्म शोले के गब्बर सिंह वाले स्टाइल में बोली, ‘‘आओ महारथी, आओ. कौन सा हथियार लाए हो मेरी जान लेने के लिए?’’

कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी, फिर भी मदन ने हिम्मत जुटा कर लड़खड़ाती आवाज में कहा, ‘‘आप को मारने की हिम्मत कौन कर सकता है? हवाई घोड़े दौड़ाना अलग बात है और किसी की जान लेना अलग बात.’’

‘‘जानती हूं, तुम्हें भी और मेरी जान की सुपारी देने वाली को भी.’’ आशा सोफे की ओर इशारा कर के बोली, ‘‘बैठ जाओ, फिर बात करेंगे. मुझे कोई जल्दी नहीं है, न मरने की न मारने की. और हां, डरो मत. मैं बिलकुल अकेली हूं. चाहो तो घर में घूम कर देख लो. चुहिया की जात तक नहीं है यहां.’’

मदन और बौबी बिना बोले सोफे पर बैठ गए. आशा ने दोनों के चेहरों को गौर से देखा फिर बोली, ‘‘मुन्नी ने मेरे कत्ल की कीमत सिर्फ 1 लाख लगाई है, यह मेरी बेइज्जती है, नाकाबिलेबर्दाश्त. मैं इस गेम को बदलना चाहती हूं. मैं तुम लोगों को 50 लाख रुपए दूंगी, लेकिन इस के बदले में तुम्हें मुन्नी और उस की तीनों बेटियों की हत्या करनी होगी. बोलो, क्या कहते हो?’’

मदन और बौबी दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्या जवाब दें. उन्हें चुप देख कर आशा शर्मा ने ही कहा, ‘‘यही सोच रहे हो न कि मैं 50 लाख कहां से लाऊंगी? अरे बड़ा सीधा सा गणित है, मुन्नी और उन की बेटियों के मरते ही मैं महेश की पत्नी बन जाऊंगी, करोड़ों की मालकिन. उस के बाद 50 लाख या 1-2 करोड़ रुपए की कीमत क्या रह जाएगी मेरे लिए.’’

मदन और बौबी इस के बाद भी कुछ नहीं बोले तो आशा शर्मा ने एक और दांव खेला. वह अपने दोनों पांव सेंट्रल टेबल पर रखते हुए बोली, ‘‘काम हो जाने के बाद हमारा पैसे का लेनदेन तो खत्म हो जाएगा लेकिन मैं तुम्हारे लिए हाजिर रहूंगी.’’

सेंट्रल टेबल पर पैर रखने से आशा शर्मा की साड़ी घुटनों तक खिसक गई थी. उस के खुले दूधिया पैर इशारा समझने के लिए काफी थे. डरेसहमे मदन और बौबी की निगाहें उस के पैरों पर ही जमी थीं. आशा शर्मा ने कुछ इस अंदाज में बात की थी कि जरा सी देर में माहौल सामान्य हो गया. आशा ने मदन और बौबी के सामने ऐसा चारा डाला कि वे उस की बात मानने को तैयार हो गए. मोटी रकम और अपने जिस्म का लालच दे कर उस औरत ने पूरी बाजी ही पलट दी.

जब मदन और बौबी आशा के घर से निकले तो उन की नजरों के सामने निशाने के रूप में मुन्नी देवी और उस की तीनों बेटियों के चेहरे घूम रहे थे. उन्होंने सोच लिया था कि उन्हें क्या करना है. और इस के ठीक चौथे दिन मुन्नी और उस की तीनों बेटियों का कत्ल हो गया. उस दिन तारीख थी 16 अप्रैल, 2009. इस चौहरे हत्याकांड की तह तक जाने से पहले आप को बताते चलें कि इस घटना के 7 साल बाद 16 अप्रैल, 2016 को आशा शर्मा का भी कत्ल हो गया. कातिल था उस का अपना पति सुनील शर्मा. खास बात यह कि मृतका के पति सुनील ने ही अपने घर का पता बता कर पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी थी. वहां से इस की जानकारी थाना गांधी पार्क को दी गई थी.

अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बता कर थानाप्रभारी संजय पांडेय अपनी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सुनील शर्मा का घर गली नंबर 3, शास्त्रीनगर, नौरंगाबाद में था. चूंकि उस ने पुलिस कंट्रोल रूम को अपना पता बता दिया था, इसलिए पुलिस को उस के घर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई. वहां पहले ही तमाम लोग एकत्र हो गए थे. हत्या मकान के फर्स्ट फ्लोर पर हुई थी. पुलिस ऊपर पहुंची तो वहां एक कमरे में 40 साल की एक महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस का हत्यारा सुनील शर्मा वहीं खड़ा था. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. लाश के पास ही 17 साल की एक लड़की और 12 साल का लड़का खड़ा रो रहा था. ये दोनों मृतका और सुनील के बच्चे थे.

पूछताछ में उन्होंने बताया कि मम्मी 3 साल जेल में रह कर आई थीं. जब से वह जेल से लौटी थीं, तभी से पापा उन के साथ कलह करते थे. दोनों की छोटीछोटी बातों पर लड़ाई होती थी. आज मम्मी को अकेला पा कर उन्होंने उन की हत्या कर दी. इस बीच खबर पा कर एसपी (सिटी) अंशुल गुप्ता और सीओ (द्वितीय) सोमदत्त भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लोहे की जिस रौड से सुनील ने आशा के सिर पर वार किए थे, वह वहीं पड़ी थी. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया था.

पुलिस ने प्राथमिक काररवाई के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की. गिरफ्तार किए गए सुनील शर्मा को थाने भेज दिया गया. उसी दिन मृतका की 17 वर्षीया बेटी प्रियंका की ओर से पिता के खिलाफ मां की हत्या का मुकदमा दर्ज कराया गया. अगले दिन सुनील को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. पोस्टमार्टम के बाद आशा की लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई. उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. इस मामले की जांच की जिम्मेदारी खुद थानाप्रभारी संजय पांडेय ने ली.

आशा और सुनील शर्मा की शादी सन 1998 में हुई थी. आशा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही शोख और चंचल भी. सुनील जितना कमाता था, उस से गुजरबसर तो हो जाता था, लेकिन आशा के फैशन और शौक शृंगार के लिए पैसे नहीं बचते थे. कालांतर में जब घर में एक बेटी और बेटा आ गए तो घर का खर्चा बढ़ गया. पति को समझानेबुझाने के बाद आशा ने खुद घर से बाहर निकलने का फैसला किया, ताकि परिवार के बढ़े खर्चों को साधने के लिए कोई काम ढूंढ़ सके.

नौकरी के लिए इधरउधर धक्के खाने के बजाय आशा ने एलआईसी एजेंट बनने का फैसला किया. इस की 2 वजहें थीं. एक तो वह अपनी खूबसूरती के बूते पर लोगों को प्रभावित कर के उन्हें एलआईसी की पालिसियां बेच सकती थी, दूसरे चूंकि यह फुलटाइम जौब नहीं था, इसलिए अपने बच्चों के लिए भी समय निकाल सकती थी. अपनी इसी सोच के चलते वह एलआईसी एजेंट बन गई. बहरहाल अपने रूपयौवन और अदाओं के बूते पर उस ने काफी लोगों को एलआईसी की पालिसियां बेचीं, जिस की वजह से उसे अच्छा कमीशन मिलने लगा.

जून, 2007 में आशा की मुलाकात अलीगढ़ के थाना गांधी पार्क के मोहल्ला गांधीनगर निवासी एक्सपोर्टर महेशचंद से हुई. उन से वह एलआईसी की पालिसी के चक्कर में मिली थी. आशा खूबसूरत भी थी और जवान भी. ऊपर से उस की कातिल अदाएं. महेशचंद पहली ही मुलाकात में उस के दीवाने हो गए.

मर्दों की नजरों को बखूबी पहचानने वाली आशा ने जल्दी ही उन्हें शीशे में उतार लिया. महेशचंद उस के प्रति थोड़े उदार दिखाई दिए तो आशा ने उन्हें मोटी रकम की पालिसी कराने के लिए राजी कर लिया. इस के लिए महेशचंद ने उसे अगले दिन नौरंगाबाद स्थित अपनी फैक्ट्री में बुलाया. उन्होंने आशा से कहा, ‘‘फार्म भर लाना, मैं साइन कर के चैक दे दूंगा. और हां, लंच हमारे साथ ही करना.’’

जातेजाते आशा ने अनौपचारिक होते हुए अपनी तरफ से पहल की, ‘‘सिर्फ लंच, हम ने तो सोचा था कि आप डिनर भी कराएंगे.’’

‘‘माफ करें आशाजी, यह हमारी गलती है.’’ महेशचंद हंसते हुए बोले, ‘‘भला ऐसा कौन होगा जो आप के साथ डिनर नहीं करना चाहेगा. हम तो चाहते हैं, आप हमारे साथ हर रोज डिनर करें.’’

आशा हंसते हुए जाने लगी तो महेशचंद ने पूछा, ‘‘तो डिनर का न्यौता मंजूर है?’’

‘‘बिलकुल मंजूर है.’’ आशा बोली, ‘‘आप बुलाएं और हम न आएं, ऐसे तो हालात नहीं हैं.’’

आशा चली गई. महेशचंद सोच रहे थे कि उन्होंने चिडि़या को फंसाने के लिए जो दाना डाला, वह उस ने चुग लिया है. उधर आशा सोच रही थी कि यहां तो मुर्गा खुद ही अपनी गर्दन पर छुरी चलवाने के लिए तैयार हो गया है.

लंच भी हुआ, डिनर भी और पालिसी भी हो गई. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. महेशचंद ने उसे घर बुला कर अपनी पत्नी और बच्चों से न केवल मिलवाया, बल्कि उन की भी पालिसियां करवा दीं. इस के बाद आशा शर्मा का उन के परिवार में आनाजाना हो गया. महेशचंद के बच्चे उसे आंटी कहते थे. आशा भी उन्हें खूब लाड़ लड़ाती थी. धीरेधीरे वह उन के परिवार की सदस्य जैसी बन गई. इस बीच महेशचंद और आशा के अवैध संबंध बन गए थे.

हार्डवेयर कारोबारी महेशचंद का एक्सपोर्ट का भी काम था. उन के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. वह आशा को ले कर होटलों में जाने लगे. वहां एंट्री रजिस्टर में वह आशा को पत्नी लिखते थे. इतना ही नहीं, उन्होंने आशा के लिए थाना क्वारसी के नंगला तिकोना की संगम विहार कालोनी में एक शानदार मकान भी खरीद दिया था. इस मकान में सारी सुखसुविधाएं मौजूद थीं. इस के बाद महेशचंद का ज्यादातर समय पत्नी और परिवार की जगह आशा के साथ गुजरने लगा. महेशचंद की सीधीसादी पत्नी को अपने पति और आशा के संबंधों पर तब शक हुआ, जब आशा महेशचंद के बेटे गौरव की शादी में अपनी मनमरजी चलाने लगी और महेशचंद उस की हां में हां मिलाते रहे.

कोठी की रंगाईपुताई किस रंग की हो, कपड़ेजेवर कैसे खरीदे जाएं, रिसैप्शन के मेन्यू में क्याक्या खास चीजें जरूरी हैं, सब जगह आशा की चल रही थी. हद तो तब हो गई, जब शादी वाले दिन रस्मोरिवाज में मां की जगह आशा ने पूरे रौब के साथ दखलअंदाजी की. मुन्नी देवी का शक तब विश्वास में बदल गया, जब शादी में आए फोटोग्राफर एवं वीडियोग्राफर मदन ने मुन्नी देवी के सामने एक अलग ही हकीकत बयान की. उस ने बताया कि महेशचंद ने आशा को संगम विहार में एक मकान खरीद कर दे रखा है, जहां दोनों अकसर साथसाथ रहते हैं.

मुन्नी के अनुरोध पर मदन ने वह मकान दिखा भी दिया. मुन्नी ने पासपड़ोस के लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वहां एक पतिपत्नी रहते हैं, पति कहीं बिजनैस करता है, जबकि पत्नी बनीठनी घूमती है. मुन्नी ने उन लोगों को महेशचंद और आशा के फोटो दिखाए तो उन्होंने इस बात की तसदीक कर दी कि उस मकान में वह दोनों रहते हैं.

फोटोग्राफर मदन भी रसिया स्वभाव का था. पहले आशा शर्मा उस के पास आती रहती थी, लेकिन जब से वह महेशचंद के संपर्क में आई थी, तब से उस ने मदन को भाव देना बंद कर दिया था. मदन ने उस पर धौंस जमाने की कोशिश की तो आशा ने उसे सीधेसीधे धमकी दे दी. इसी बात को ले कर महेश उस से खार खाता था. यही कारण था, जिस की वजह से उस ने मुन्नी के सामने महेशचंद और आशा शर्मा की हकीकत का भंडाफोड़ किया था.

बाद में मदन ने ही मुन्नी देवी को आशा शर्मा को अपने रास्ते से हटाने का सुझाव दिया था. इस के लिए उस ने एक लाख का खर्चा बताया. मुन्नी तैयार हो गई तो उस ने 20 हजार रुपए एडवांस भी ले लिए. मुन्नी को यह पता नहीं था कि आशा ने उस के घर में भी अपने जासूस लगा रखे हैं. जब मुन्नी और मदन के बीच आशा की हत्या की सौदेबाजी हो रही थी, तभी पड़ोस में ही रहने वाली मुन्नी की देवरानी मधु ने दोनों की बातें सुन ली थीं. उसी ने फोन कर के यह बात आशा शर्मा को बता दी थी. आशा और मधु के संबंध गौरव की शादी में गहराए थे. बाद में वह महेशचंद के घर का हर राज आशा शर्मा को बताने लगी थी.

आशा शर्मा को मुन्नी देवी और मदन के षडयंत्र का पता चला तो उस ने फोन कर के मदन को अपने शास्त्रीनगर वाले घर पर बुलाया. मदन को आशा शर्मा की धमकी याद थी. वैसे भी वह खतरनाक औरत थी. ऊपर से उस के पीछे की शह थी. मदन की उस के पास जाने की हिम्मत न हुई तो वह अपने दोस्त बौबी को साथ ले कर उस के पास पहुंचा. वे दोनों आशा के पास पहुंचे तो आशा ने अपने रूपयौवन के बूते पर पल भर में पूरी बाजी पलट दी.

16 अप्रैल, 2009 को एक्सपोर्टर महेशचंद शर्मा की गांधीनगर स्थित कोठी में मुन्नी देवी और उन की 3 बेटियों की हत्या कर दी गई. तीनों अविवाहित बेटियों में पूनम 22 साल की थी, ममता 20 साल की और कीर्ति 17 साल की. जब ये हत्याएं हुईं, तब महेशचंद और उन का बेटा गौरव इंगलैंड गए हुए थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पूनम और कीर्ति के साथ बलात्कार की भी पुष्टि हुई, जांच में हत्याओं का कारण लूटपाट बताया गया.

थाना गांधीनगर में यह मामला भादंवि की धारा 394, 302, 120बी और 376 के तहत दर्ज हुआ. इस संबंध में पुलिस ने महेशचंद को संदेह के दायरे में रखते हुए इस केस की मास्टरमाइंड आशा शर्मा के अलावा मदन, बौबी, मुन्नी देवी की देवरानी मधु, मनोज और अजीत को गिरफ्तार किया. लेकिन बाद में पुलिस ने महेशचंद को क्लीन चिट दे दी. इस मामले में 3 सालों तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी. बताया जाता है कि क्लीनचिट मिलने के बाद महेशचंद प्रेयसी आशा को छुड़ाने की कोशिश में लग गए.

इस मामले का फैसला आया 21 सितंबर, 2012 को. चूंकि एक ही परिवार के 4 लोगों की नृशंस हत्या हुई थी, इसलिए लोगों को उम्मीद थी कि इस मामले में कम से कम आशा शर्मा को सजाएमौत जरूर मिलेगी. चूंकि यह चर्चित मामला था, इसलिए उस दिन अलीगढ़ कोर्ट में तमाम लोग मौजूद थे. मीडियाकर्मी भी आए हुए थे. एडीजे (तृतीय) इंद्रप्रीत सिंह जोश ने अपने फैसले में मदन, मधु, बौबी, मनोज और अजीत को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. जबकि सबूतों के अभाव में आशा शर्मा को बरी कर दिया गया. न्यायाधीश महोदय ने जांच अधिकारी नवाब सिंह की जांच पर भी सवाल उठाए.

बहरहाल, आशा शर्मा का न्याय खुद ब खुद हो गया. 7 सालों बाद उसी 16 अप्रैल को उस के ही पति ने उस की हत्या कर दी. थाना गांधी पार्क में उस की बेटी प्रियंका ने अपने पिता सुनील कुमार शर्मा पर मां की हत्या का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया. सुनील ने चूंकि खुद ही पुलिस को सूचना दी थी, सो गिरफ्तारी के बाद उस ने अपना जुर्म कबूलने में भी देरी नहीं लगाई. पुलिस ने उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. आश्चर्य की बात यह थी कि जिस तरह मुन्नी देवी और उस की बेटियों की हत्याएं की गईं थीं, वैसे ही आशा शर्मा की हत्या भी हुई. वैसी ही जघन्यता के साथ.

लेखक -कुंवर शैलेश बिट्टन            

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspicious Death Case: दिल्ली मेट्रो के लेडीज वाशरूम में मिला शव, मची सनसनी

Suspicious Death Case: एक हैरान कर देने वाली घटना ने दिल्ली में सनसनी फैला दी है. मेट्रो स्टेशन के एक लेडीज वाशरूम से एक संदिग्ध हालात में शव मिलने की खबर ने हर किसी को चौंका दिया. सूचना मिलते ही लोगों में डर और जिज्ञासा दोनों फैल गए. आखिर यह व्यक्ति कौन था और वह वहां कैसे पहुंचा, यह सवाल सभी के मन में उठने लगे. आइए जानते हैं इस पूरे मामले की पूरी कहानी विस्तार से.

मामला दिल्ली के इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन का है, जहां शनिवार की शाम अचानक हलचल बढ़ गई. स्टेशन के भीतर स्थित लेडीज वाशरूम से एक व्यक्ति का शव बरामद होने की जानकारी सामने आई.
इस घटना के बाद पूरे मेट्रो परिसर में अफरातफरी का माहौल बन गया. मौके पर पहुंची मेट्रो पुलिस ने स्थिति को संभालते हुए जांच प्रक्रिया शुरू कर दी.

पुलिस के अनुसार, 25 अप्रैल, 2026 की शाम लगभग साढ़े 5 बजे मेट्रो थाना नेताजी सुभाष प्लेस (एनएसपी) को एक कौल प्राप्त हुई. कौल करने वाले ने बताया कि इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन के वाशरूम का दरवाजा काफी समय से अंदर से बंद है और वहां से तेज बदबू आ रही है. सूचना मिलते ही पुलिस की टीम बिना देर किए मौके पर पहुंच गई और स्थिति का जायजा लिया. जब पुलिस ने जांच की तो पाया कि वाशरूम अंदर से बंद था. काफी प्रयासों के बावजूद दरवाजा नहीं खुला, जिस के बाद उसे तोड़ना पड़ा.

दरवाजा खुलते ही अंदर का दृश्य देखकर सभी सन्न रह गए. करीब 40 साल के एक व्यक्ति का शव फंदे से लटका हुआ पाया गया, जो बेहद चौंकाने वाला था.
शुरुआती जांच में यह बात सामने आई कि मृतक शायद उसी टायलेट कौंप्लेक्स में काम करने वाला केयरटेकर था.

एक व्यक्ति ने पुलिस को बताया कि उस ने उसे आखिरी बार करीब 2 दिन पहले देखा था. इस के बाद से वह नजर नहीं आया था, जिस से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि शव 2 दिन पुराना हो सकता है. मामले की गंभीरता को देखते हुए क्राइम टीम को भी जांच के लिए बुलाया गया.
फिलहाल पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर दिल्ली के बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर हौस्पिटल की मोर्चरी में 72 घंटे के लिए सुरक्षित रखवा दिया है.

मेट्रो प्रशासन की मदद से मृतक की पहचान की कोशिश जारी है. पुलिस ने भारतीय नागरिक संहिता (BNS) की धारा 194 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि यह आत्महत्या का मामला है या इस के पीछे कोई और रहस्य छिपा हुआ है. Suspicious Death Case

Delhi Crime News: 2 लाख के विवाद में खूनी खेल – टेंट कारोबारी के हाथ काट डाले

Delhi Crime News: एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है. मामूली पैसों के विवाद इतनी खतरनाक हो गया कि एक मेहनतकश कारोबारी की जिंदगी खतरे में पड़ गई. सवाल यही है कि क्या यह हमला सिर्फ बकाया रकम का नतीजा था या इस के पीछे कोई और गहरी रंजिश छिपी हुई है? यह कहानी न सिर्फ डराती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि छोटे विवाद कब खतरनाक मोड़ ले सकते हैं.

यह घटना दक्षिणपश्चिमी दिल्ली के द्वारका क्षेत्र के डाबड़ी स्थित विजय एन्क्लेव की है, जहां 32 वर्षीय टेंट और हलवाई का काम करने वाले लोकेश गुप्ता पर जानलेवा हमला किया गया. आरोप है कि पैसे मांगने पहुंचे लोकेश पर इतनी बेरहमी दिखाई गई कि उन के हाथ तक काट दिए गए. गंभीर हालत में उन्हें पहले पास के अस्पताल ले जाया गया और बाद में बेहतर इलाज के लिए एम्स में भरती कराया गया, जहां उन की हालत नाजुक बनी हुई है.

पुलिस के मुताबिक, 24 अप्रैल, 2026 की रात करीब साढ़े 8 बजे पीसीआर कौल के जरिए घटना की जानकारी मिली. मौके पर पहुंची टीम ने लोकेश को लहूलुहान हालत में पाया. शुरुआती जांच में सामने आया कि अजय पाल नाम के व्यक्ति ने अपनी बेटी की शादी के लिए लोकेश से टेंट का काम कराया था, जिस की कुल रकम करीब ढाई लाख रुपए तय हुई थी. आरोप है कि इस में से करीब 2 लाख रुपए अब भी बाकी थे, जिन्हें लेने के लिए लोकेश आरोपी के घर पहुंचे था.

बताया जा रहा है कि पैसों को ले कर दोनों पक्षों में बहस शुरू हुई, जो देखते ही देखते हिंसक झगड़े में बदल गई. इसी दौरान अजय पाल और उस के साथियों ने मिलकर लोकेश पर हमला कर दिया और धारदार मशीन (ग्राइंडर) से उस के हाथ काट दिए.

पुलिस ने मौके से सबूत जुटाकर मामला दर्ज कर लिया है और आरोपियों की तलाश जारी है. इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है और आगे की जांच जारी है. Delhi Crime News

Social Story: समाज से जुड़ने की चाह में चंबल के डाकू

Social Story: समाज या परिवार के लिए कुछ करने की उम्र में जिन लोगों ने समाज या घर वालों से बगावत कर के बीहड़ में जा कर बंदूक उठाई, अब वही जीवन के अंतिम दौर में समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन समाज आज भी उन से दहशत खाता है, जिस से उन्हें अपने साथ जोड़ने से कतरा रहा है.

आज डाकू भले ही किस्सेकहानियों के पात्र बन कर रह गए हों, लेकिन कभी इन का बोलाबाला था. कुछ डाकुओं का तो इतना आतंक था कि लोग उन के नामों से कांपते थे. कुछ महिलाएं भी डाकू बनीं, जिन्हें आज दस्यु सुंदरी कहा जाता है. डाकुओं और उन की दहशत पर तमाम फिल्में भी बनी हैं, जिन में सब से चर्चित फिल्म शोले रही है.

शोले में दिखाए गए गब्बर सिंह को लोग शायद ही कभी भूल पाएंगे. फिल्म में गब्बर सिंह की भूमिका अभिनेता अमजद खान ने निभाई थी. फिल्म के तमाम डायलौग लोगों की जुबान पर चढ़ गए थे. इस के अलावा भी डाकुओं पर तमाम फिल्में बनीं, लेकिन शोले जैसी सफलता किसी दूसरी फिल्म को नहीं मिली. अब समय बदल गया है, अपराध भले ही पहले से ज्यादा हो रहे हैं, लेकिन आज अपराधों और अपराधियों का ट्रेंड बदल गया है. अब बंदूकों की बदौलत डकैती नहीं, अपहरण होने लगे हैं. डकैत बीहड़ों और जंगलों में रहते थे, जहां रहना खाना पेड़ों के नीचे या छोटीमोटी गुफाओं में होता था.

जबकि अब विकास के नाम पर जंगल उजड़ते जा रहे हैं. डकैतों का लगभग सफाया हो चुका है. अपराधों का स्वरूप बदल गया है तो अपराधी भी सुविधाभोगी हो गए हैं. घोड़ों का प्रचलन लगभग समाप्त हो चुका है, उन की जगह कारों या जीपों ने ले ली हैं.

राजस्थान से ले कर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक पसरी चंबल की घाटी अवैध खनन की वजह से सिमटती जा रही है. जंगल खत्म होते जा रहे हैं. उन की जगह बहुमंजिली इमारतें बनती जा रही हैं यानी हरेभरे जंगलों की जगह कंकरीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं. बीहड़ों और जंगलों को कुख्यात बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली यहां से बहने वाली चंबल नदी है.nमध्य प्रदेश में इंदौर के पास बसे शहर महू से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित विंध्याचल की पहाडि़यों से निकलने वाली यह नदी राजस्थान के कुछ हिस्से से गुजरते हुए मध्य प्रदेश के भिंडमुरैना के इलाके से निकल कर उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की ओर बढ़ जाती है.

पानी के कटाव से चंबल नदी के किनारेकिनारे सैकड़ों मीलों तक ऊंचे घुमावदार बीहड़ों की संरचना हुई है. चंबल के यही बीहड़ डाकुओं के छिपने के अभेद्य ठिकाने रहे हैं. डाकुओं की पहली पीढ़ी में मान सिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लक्का डाकू, सुल्ताना डाकू, पन्नाबाई, पुतलीबाई, पान सिंह तोमर आदि बड़े नाम रहे हैं. इस के बाद मलखान सिंह, माधो सिंह, मोहर सिंह, माखन चिड्डा, बाबा मुस्तकीम, फूलन देवी, विक्रम मल्लाह, श्रीराम, लालाराम और ददुआ जैसे दुर्दांत डाकुओं का चंबल घाटी पर दबदबा रहा है.

डकैत, जो कभी आतंक का पर्याय माने जाते थे, कुछ लोगों की पहल पर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. सजा भुगतने के बाद आज वे समाज की मुख्य धारा से जुड़ गए हैं. दस्यु सुंदरी फूलन देवी 2 बार सांसद बनी थीं. दूसरी बार सांसद बनने के बाद सन 2001 में शेर सिंह राणा ने दिल्ली में उन के आवास पर गोली मार कर उन की हत्या दी थी.  सन 1981 में फूलन देवी तब चर्चा में आई थीं, जब उन के गिरोह पर बेहमई गांव में सवर्ण जाति के 22 लोगों की हत्या का आरोप लगा था.

सालों तक चंबल के बीहड़ों में भटकने वाले पूर्व दस्यु अब जीवन के इस पड़ाव पर समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं. इसी उद्देश्य से 20 मार्च को होली आने से 3 दिन पहले गुलाबी नगर जयपुर में देशभर के नामी डाकू इकट्ठा हुए. सिर पर साफा बांधे, ललाट पर रोली का तिलक लगाए, कंधे पर दुनाली लटकाए ये डकैत यहां कोई अपराध करने नहीं, बल्कि अपने दस्यु जीवन की दास्तां सुनाने और बीहड़ बचाने के लिए इकट्ठा हुए थे.

प्रकृति एवं संस्कृति संरक्षण व संवर्धन को समर्पित जयपुर के श्री कल्पतरू संस्थान ने दस्युओं का यह महाकुंभ विश्व वानिकी दिवस की पूर्व संध्या पर पूर्व आयोजित किया था. जयपुर के इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान औडिटोरियम में आयोजित इस ऐतिहासिक आयोजन का नाम दिया गया था, ‘पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़.’

कभी दस्यु सुंदरी के नाम से मशहूर रही सीमा परिहार भी इस आयोजन में आई थीं. सीमा परिहार अपनी मरजी से डकैत नहीं बनी थीं. उन का अपहरण कर के चंबल में ले जाया गया था. वह पहली दस्यु सुंदरी थीं, जिन्होंने बागी रहते हुए बच्चे को जन्म दिया था. उन के जीवन पर बुंडेड नाम से फिल्म भी बन चुकी है, जल्दी ही उन्होंने एक और फिल्म साइन की है. इस बार वह सलमान खान के साथ फिल्मी परदे पर नजर आएंगी. वह बिग बौस में भी भाग ले चुकी हैं.

सीमा परिहार 13 साल की थीं, तब डाकू उन्हें उठा ले गए थे. डाकुओं के साथ रह कर उन्होंने भी बंदूक उठा ली थी. दस्यु जीवन में उन पर कुल 29 मुकदमे दर्ज हुए, जिन में 4 हत्याओं के थे, बाकी पुलिस मुठभेड़, लूट और अन्य मामलों के थे. 1 दिसंबर, 2000 को उन्होंने अधिकारियों के सामने औरैया जिले में आत्मसमर्पण किया था. कहा जाता है कि उन का इतना खौफ था कि जिस दिन वह जेल गई थीं, वहां सजा काट रहे अन्य कैदी डर के मारे रात को पेशाब करने नहीं निकले थे. उन का बच्चा तब उन की गोद में था. उस समय जेल में 35 अन्य महिला कैदी थीं. वह सन 2004 रिहा हुईं. उन के रिहा होने के बाद सन 2006 में उन के भाई को झूठे एनकाउंटर में मरवा दिया गया था.

सीमा परिहार का कहना था कि चंबल में जो गए थे, वे अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले थे. असली डकैत तो समाज में हैं, वही अपराधी बनाते हैं. दस्यु सुंदरी या डकैत मांबाप के दिए नाम नहीं होते. समाज, पुलिस और सरकार ही उन्हें डकैत बनाती है. सरकार वादे तो बड़ेबड़े करती है, लेकिन वे पूरे नहीं होते. दस्यु सुंदरी सीमा का कहना था कि पेड़पौधों के बारे में जितना दस्यु जानते हैं, उतना कोई और नहीं जान सकता. बीहड़ में डाकुओं को पेड़ की ही छाया मिलती थी, क्योंकि वहां छत नहीं होती. बीहड़ में कभी कोई डकैत सांपबिच्छू के काटने से नहीं मरता. 20 साल पहले जो जंगल थे, अब वे नहीं रहे. जीवन को बचाने के लिए पेड़पौधे लगाना जरूरी है. सरकार इस के लिए मुहिम चला रही है. इस मुहिम में डाकुओं को भी जुड़ना चाहिए. अगर हर कोई चाह ले तो जंगलों को बचाया जा सकता है.

इस आयोजन में आई 28 साल की दस्यु सुंदरी रेणु यादव जब नौवीं क्लास में पढ़ती थीं, तब सन 2003 में 29 नवंबर को बदमाश चंदन यादव ने स्कूल से आते समय उन का अपहरण कर लिया था. उन्हें छोड़ने के लिए उस ने उन के घर वालों से 10 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. उन के पिता किसान थे, 5-6 बीघा जमीन थी. वह 10 लाख रुपए कहां से देते. पैसे नहीं मिले तो बदमाशों ने उन्हें मारापीटा, प्रताडि़त किया और कुछ दिनों बाद उन्हें डाकू बना दिया.

रेणु के पास डाकुओं की बात मानने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. इस के बाद उन्हीं के नाम पर अपराध किए जाने लगे. धीरेधीरे उन का नाम मशहूर हो गया और लोग उन के नाम से खौफ खाने लगे. इस के बाद चंदन यादव द्वारा की गई हत्या, लूट, डकैती और अपहरण जैसे 17 मामलों में उन का नाम बतौर मुलजिम दर्ज हो गया. इसी तरह 4 जनवरी, 2005 तक चलता रहा. उसी बीच एक दिन रामवीर गुर्जर और चंदन यादव में गैंगवार हुई, जिस में चंदन मारा गया. रामवीर गुर्जर ने रेणु को बंधक बना कर गलत नीयत से उन पर हमला किया. उस समय उन के पास एसएलआर थी, जिस की सारी गोलियां उस ने रामवीर के सीने में उतार दीं. इस के बाद 7-8 दिनों तक जंगल में भटकती रही.

उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, कहां जाएं? आखिर वह अपने घर आ गईं. खबर पा कर पुलिस आ गई और उन्हें भरोसे में ले कर कोतवाली ले गई, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर कई आरोप थे. आखिर उन्हें जेल भेज दिया गया. वह 3 अलगअलग जेलों में रहीं. 7 साल 3 महीने 15 दिन तक जेल में रहने के बाद 29 मई, 2012 को लखनऊ के नारी बंधी निकेतन से रेणु रिहा हुईं. जेल से रिहा होने के बाद अब भी कुछ बदमाश उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह वापस आ कर गैंग का मोर्चा संभाल लें, वरना उन्हें मार दिया जाएगा. वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलीं और सुरक्षा की गुहार लगाई. इस के बाद उन्हें गनमैन मुहैया करा दिया गया.

रेणु यादव का कहना था कि पुलिस ने उन्हें डाकू माना, लेकिन न्यायपालिका से उन्हें न्याय मिला. उन पर फिल्म बीहड़ बन रही थी, जो अभी विवादों में फंस गई है. वह न टीवी देखती हैं न फिल्में, लेकिन कोई अच्छा डाइरैक्टर मिल जाए तो वह उस के साथ काम करना चाहती हैं. फिलहाल वह गौ सेवा में लगी हैं. वह गायों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाती हैं. अब तक वह हजारों गायों को कटने से बचा चुकी हैं. उन्हें जेल से बाहर आए 2 साल हो गए हैं. वह एनजीओ चलाती हैं, जिस के माध्यम से वह गायों को बचाने के साथ दानदहेज को ले कर महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने की कोशिश कर रही हैं.

पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़ अभियान का समर्थन करते हुए रेणु ने कहा कि अगर सरकार सहयोग करे तो बीहड़ ही नहीं, पूरे चंबल में पेड़ों की कटाई को छोड़ो, वह किसी को हरा पत्ता तक न तोड़ने दें, अवैध खनन के नाम पर एक पत्थर न उठाने दें और शिकार के नाम पर एक चिडि़या न मारने दें. इस आयोजन में भाग लेने आए डाकुओं में पंचम सिंह एक बड़ा नाम रहा है. उन के नाम से आम आदमी ही नहीं, पुलिस भी खौफ खाती थी. बरसों तक डकैत के रूप में बीहड़ों की खाक छानने वाले और दहशत का पर्याय रहे पंचम सिंह ने अब संन्यास ले लिया है. पीत वस्त्र धारण करने वाले पंचम सिंह की उम्र इस समय 84 साल है, लेकिन उन की आवाज आज भी बुलंद है.

जयप्रकाश नारायण के प्रयास से साढ़े 5 सौ डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया था, उन्हीं में एक पंचम सिंह भी थे. उन्हें दुख इस बात का है कि आज भी डाकुओं को सामाजिक कार्यों से नहीं जोड़ा जाता. वह पूरे 14 साल बीहड़ में रहे. उन्होंने राज सत्ता, डाकू सत्ता और धर्म सत्ता देखी है. पंचम सिंह का कहना था कि डाकुओं के बारे में फिल्मों में जो दिखाया जाता है, वह सब झूठ है. डाकुओं के अपने नियमकानून होते थे. उन में एकता होती थी, जो आज राज सत्ता और धर्म सत्ता में नहीं है. साढ़े 5 सौ डाकुओं ने एकता के दम पर ही भारत सरकार को हिला कर रख दिया था.

पंचम सिंह के गिरोह का सफाया करने के लिए सरकार ने एक करोड़ रुपए का इनाम रखा था. यह तब की बात है, जब सौ रुपए में एक तोला सोना मिलता था. पंचम सिंह ही नहीं, उस समय के लगभग सभी डाकू चरित्रवान थे, किसी की मांबहन को गलत नजर से नहीं देखते थे. पंचम सिंह ने एक बलात्कारी को पेड़ से बांध कर जिंदा जला दिया था. वे अमीरों का धन लूट कर गरीबों में बांटते. यही वजह थी कि किसी डाकू की कोई कोठी नहीं बनी है. पंचम सिंह का 45 जिलों में बोलबाला रहा. उन्हें गाड़ीघोड़ों की कोई कमी नहीं थी. उन का आतंक ऐसा था कि स्टेशन न होने पर भी ट्रेन रुकती थी.

पंचम सिंह चौथी तक पढ़े थे. 14 साल की उम्र में उन की शादी हो गई थी. गांव में हुए एक झगड़े के बाद बदले की भावना से वह चंबल के डाकुओं से जा मिले थे. उस के बाद एक दिन गांव आए और 6 लोगों को मार दिया और डाकू बन गए. वह भले ही पढ़ेलिखे नहीं थे, लेकिन डकैत जीवन में स्कूल बनवाए, हजारों कन्याओं की शादी कराई. जंगल के आदिवासी उन की मदद करते थे. चंबल में उन्होंने जो स्कूल खोला था, उस में 17 मास्टर थे और लगभग 5 सौ बच्चे पढ़ते थे. उन के स्कूल का रिकौर्ड रहा है कि कोई बच्चा फेल नहीं हुआ. मास्टर हो या छात्र, गलती करने पर पंचम सिंह उसे स्कूल में 24 घंटे के लिए बंद कर देते थे.

पंचम सिंह के हथियार हेलीकौप्टर द्वारा बांग्लादेश से आते थे. उन के पास हर तरह के हथियार थे. वह जिस नेता को सपोर्ट करते थे, वही चुनाव जीतता था. वह एक दिन में सरपंच और 3 दिन में एमएलए बनाते थे. आत्मसमर्पण के समय लोकनायक जयप्रकाश नारायण के माध्यम से उन्होंने 8 शर्तें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने रखी थीं. सन 1972 में सरकार ने उन शर्तों को मान लिया तो उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. उन्हें और मोहर सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में राष्ट्रपति ने फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल दी थी.

पंचम सिंह का कहना था कि सन 1972 में समर्पण करने वाले साढ़े 5 सौ डकैतों में करीब 2 सौ डाकू आज भी जीवित हैं. ये डकैत पहले गोलियों से उस के बाद फांसी से बचे. अब जीवन के आखिरी दिनों में वह उस पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेंगे, जिस ने उन्हें मां की तरह रखा. अगर समाज साथ दे तो ये डाकू बलिदान देने को तैयार हैं. डाकू गब्बर सिंह पर बनी थी, वह भी इस महाकुंभ में जयपुर आए थे.

उत्तर प्रदेश के ललितपुर के गांव रामपुर के रहने वाले गब्बर सिंह का असली नाम प्रीतम सिंह है. गब्बर सिंह बीड़ी जरूर पीते हैं, लेकिन फिल्म शोले के गब्बर की तरह तंबाकू नहीं खाते. फिल्म शोले का गब्बर सिंह खूंख्वार था, जबकि असली गब्बर सिंह की छवि उस से बिलकुल अलग है. वह अब तक सैकड़ों लड़कियों का विवाह करवा चुके हैं. गब्बर सिंह 10 साल बीहड़ में रहे. सन 1986 में उन्होंने आत्मसमर्पण किया तो 7-8 साल जेल में रहे. उन्होंने डाकू जीवन में गुनहगारों को ही मारा. गलती से एक बार एक बच्चा और एक औरत मर गई थी, जिस का उन्हें आज भी मलाल है. उन का कहना था कि बागी को दर्द नहीं होता है. उन के पास मारने वाला दिल होता है, रहम का दिल नहीं होता.

सरकार ने डेढ़ सौ से अधिक पुलिस वालों को उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी, लेकिन वे उन्हें पकड़ नहीं पाए. बाद में धीरज सिंह, राम सिंह और रामपाल के साथ उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. सरकार ने उन से जो वादे किए थे, उन में से एक भी पूरे नहीं किए. जेल में अलग रहने और खाने की व्यवस्था जरूर हो गई थी. जेल में रह कर गीतारामायण जैसी धार्मिक किताबें पढ़ कर धीरेधीरे उन्होंने खुद को बदला. उन का कहना था कि अब वह गांव और इलाके के लोगों की सेवा कर के अपराध जीवन के दाग धोने की कोशिश कर रहे हैं.

देशभर में महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचारों से वह काफी दुखी हैं. उन का निशाना आज भी अचूक है. अब वह कानून का सम्मान करते हुए खुद को देश की सेवा में लगाए रखना चाहते हैं. चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे पान सिंह तोमर के भतीजे बलवंत सिंह तोमर का पुलिस रिकौर्ड में नाम बलवंता है. बलवंता इस परिवार के एकमात्र ऐसे सदस्य हैं, जो पुलिस से हुई अंतिम मुठभेड़ में बच गए थे. करीब 13 घंटे तक चली मुठभेड़ में पान सिंह तोमर सहित गैंग के 28 डकैत मारे गए थे. बलवंता पर 70 मुकदमे दर्ज थे, जिन में 30 हत्या के थे.

पान सिंह तोमर भारतीय सेना में थे और अंतर्राष्ट्रीय धावक भी. बाद में वह बागी बन गए. उन के नाम से ही फिल्म भी बनी है. बलवंता का कहना था कि फिल्म में सब कुछ सच दिखाया गया है. अभिनेता इरफान खान ने अच्छा अभिनय किया था, लेकिन फिल्म निर्देशक ने धोखा दिया. फिल्म बनाने की अनुमति के समय उन का इंटरव्यू लिया था. तब जो शर्तें तय हुई थीं, बाद में वह उन से मुकर गया. फिलहाल मामला अदालत में चल रहा है. बलवंता जिन दिनों चंबल में थे, अगर कोई पेड़ काटता था, वह उसे कुल्हाड़ी से मारते थे, क्योंकि बीहड़ में पेड़पौधे ही उन के घर थे.

बलवंता ने जंगलों पर मंडराते खतरे पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि जंगल नहीं रहेगा तो किसान भी नहीं रहेगा. क्योंकि जंगलों के साफ हो जाने से अकाल पड़ेगा. काली मां के अनन्य भक्त बलवंता ने पान सिंह तोमर के समय लूट के पैसों से मंदिर भी बनवाया था. खारिया गांव के रहने वले अध्यापक के बेटे से बागी बने मुन्ना सिंह मिर्धा के लिए एके 47 चलाना खेल था. उन का निशाना अचूक है. बंदूक से उन्हें आज भी मोहब्बत है. वह दद्दा मलखान सिंह गैंग में थे. 18 साल की उम्र में बागी बन कर 12 सालों तक बीहड़ों में राज किया. 1982 से उन्होंने गैंग के साथ आत्मसमर्पण किया था.

उन का कहना था कि जब तक उन के पास बंदूक रही, लोग उन की बात सुनते थे, लेकिन आज हालात बदल गए हैं. अब वह बंदूक साथ नहीं रखते, जिस से उन्हें काम कराने के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं. बागी रहते हुए उन से जो हुआ, उस का उन्हें पछतावा नहीं है. लेकिन जो गलती से मर गया, उस का दुख आज भी है. अब उन की इच्छा है कि वह पर्यावरण के लिए काम करें और अपने गांव को आदर्श गांव बनाएं.

सन 1993 में जेल से बाहर आते ही मुन्ना सिंह ने पहला पेड़ अपनी जन्मभूमि पर लगाया था. वह जेल में जो मांगते थे, वह उन्हें मिलता था. उन के लिए जेल में अलग से खीरपूरी बनाई जाती थी. जेल से ही जिस कागज पर दस्तखत कर के भेज देते थे, तुरंत वह काम हो जाता था. जंगल में रहने पर भी उन की नेताओं से सांठगांठ थी. मुन्ना सिंह पर 135 मुकदमे दर्ज थे. उन में हत्या के कितने थे, पता नहीं. उन के हथियार विदेश से आते थे. उन का कहना था कि शासनप्रशासन अगर उन का साथ दे तो वह पर्यावरण को बचा सकते हैं.

चंबल का शेर कहलाने वाले मलखान सिंह को आज भी लोग दद्दा कहते हैं. मंदिर की सौ बीघा जमीन को मंदिर में मिलाने की मांग को ले कर 26 साल की उम्र में पंच रहते हुए बागी बने मलखान सिंह को बागी रहते हुए जो कुछ हुआ, उस का उन्हें जरा भी मलाल नहीं है.  उन्होंने जो कुछ भी किया, वह अन्याय के खिलाफ किया. वह 15 साल बीहड़ में रहे, वहां उन्हें कोई तकलीफ नहीं हुई. जेल में रहते खाने या किसी तरह की कोई परेशानी हुई तो वह जेलर से भिड़ जाते थे. उन का कहना था कि आज भी जेलों में कैदियों की स्थिति दयनीय है. जेलों में आधे लोग बेकसूर बंद हैं.

अन्याय सहन करने के बजाय बीहड़ को अच्छा बताने वाले मलखान सिंह ने बागी रहते गरीब और जरूरतमंदों के अलावा ईमानदार लोगों की भी मदद की, आदर्श गांव बनाए. उन कहना था कि अगर सरकार सहयोग करे तो वह आज भी आदर्श गांव बनाने की इच्छा रखते हैं. अपने समय में वह गाय काटने वाले को छोड़ते नहीं थे.

मलखान सिंह को बीबीसी लंदन ने कई बार दस्यु सम्राट कह कर संबोधित किया था. उन के जीवन पर आर.के. चौकसे दद्दा मलखान सिंह नाम से फिल्म बना रहे हैं. फिल्म में डिंपल कपाडि़या व मुकेश तिवारी भी अभिनय कर रहे हैं. फिल्म की शूटिंग ग्वालियर की जेल में भी हुई है, जहां मलखान सिंह बंद रहे थे.  मलखान सिंह पर 32 पुलिसकर्मियों सहित 185 हत्याओं और डकैती के सैकड़ों मामले दर्ज थे. उन के गिरोह में 17 लोग थे, जो उन के गांव और आसपास के इलाकों के रहने वाले थे. चंबल घाटी में डेढ़ दशक तक बागी रहने के बाद करीब 32 साल पहले अर्जुन सिंह सरकार के समक्ष उन्होंने आत्मसमर्पण किया था.

दद्दा मलखान सिंह के साथी रहे पूर्व दस्यु रामप्रकाश ने सन 1979 में पहली बार बंदूक उठाई थी और दद्दा की गैंग में शामिल हो गए थे. तब से अब तक वह दद्दा के साथ ही बंदूक लिए खड़े नजर आते हैं. उत्तर प्रदेश के बड़ा कस्ता गांव के रहने वाले रामप्रकाश ने बताया कि बाबू गुर्जर महिलाओं से दुराचार करता था. उन्होंने विरोध किया तो उस ने उन्हें इतना मारा कि वह सिर्फ मरे नही. इस के बाद उन्होंने 3 लोगों की दिनदहाड़े गांव के चौराहे पर गोली मार कर हत्या कर दी और दद्दा की शरण में चले गए. तब से आज तक वह उन्हीं की शरण में हैं. आत्मसमर्पण भी उन्हीं के साथ किया था.

70 के दशक में चंबल घाटी में डाकू सरू सिंह का बड़ा आतंक था. वह 17 साल की उम्र में बागी बने थे. अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और 12 सालों तक बीहड़ों पर राज किया. जयप्रकाश नारायण के समझाने पर सन 1972 में आत्मसमर्पण किया था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी मदद की थी. अदालत से उन्हें आजीवन कारावास हुई थी, लेकिन 8 सालों में ही वह जेल से बाहर आ गए थे. बस्तूरी गांव के रहने वाले सरू सिंह पर 540 केस दर्ज थे. इन में हत्या के 65 मामले थे. उन के गिरोह में 60 लोग थे. एक बार पुलिस से हुई मुठभेड़ में 9 पुलिस वाले तो 4 उन के साथी मारे गए थे. इस मुठभेड़ में सरू सिंह की गर्दन में गोली लगी थी, लेकिन 14 दिनों में ही वह घाव भर गया था.

उस समय जंगल में 11 दिनों तक उन्हें अन्न नहीं मिला था. उन का कहना था कि जंगल में जिस किसी ने उन्हें खाना दिया, वह सुरक्षित रहा. वह खुद को डकैत नहीं बागी कहते हैं. उन का कहना था कि डकैतों के समय में महिलाएं सुरक्षित थीं. मोहर सिंह और उन के नाम की आज भी कसमें खाई जाती हैं. आज भी वे एकदूसरे के लिए बंदूक उठा सकते हैं.

पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़ अभियान में 7 राज्यों के करीब 30 पूर्व दस्युओं ने शिरकत की. उन्होंने वीरान और उजाड़ हो कर अपना अस्तित्व खोते जा रहे बीहड़ों को फिर से हराभरा कर पर्यावरण संरक्षण की शपथ ली, साथ ही लोगों को पेड़ लगाने की मुहिम में शामिल होने का आह्वान किया. अब देखना यह है कि इन डाकुओं ने पर्यावरण की रक्षा का सिर्फ संकल्प ही लिया है या पहले की ही तरह अपने दिए वचन को पूरा भी करेंगे. Social Story

Crime Story: सिपाही ने किया खुद का अपहरण

Crime Story: दिल्ली पुलिस का सिपाही रविंद्र एक समृद्ध परिवार से था. लेकिन अपनी बुरी लतों की वजह से उस पर लाखों रुपए का कर्ज हो गया. इस कर्ज को अदा करने और सुखसुविधाओं वाली जिंदगी जीने के लिए उस ने अपने अपहरण का जो ड्रामा रचा, उस से आखिर उसे क्या मिला…

किसी पुलिस वाले के साथ कोई वारदात पेश आ जाए तो पूरा पुलिस विभाग बिजली की सी गति से सक्रिय हो जाता है. इस की 2 प्रमुख वजहें होती हैं. एक तो यह कि वह विभाग का आदमी होता है, दूसरे प्रतिष्ठा दांव पर लगने के साथ कानूनव्यवस्था पर भी सवालिया निशान लग जाते हैं. सिपाही रविंद्र के मामले में भी ऐसा ही हुआ था. उस के अपहरण की खबर से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था.

उत्तर प्रदेश के कृषि प्रधान जनपद बागपत के एसएसपी रविशंकर छवि ने एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय के निर्देशन में आननफानन में पुलिस टीमों का गठन कर उस की तलाश में लगा दिया था. रविंद्र के अपहरण से न सिर्फ उस के परिवार वाले परेशान थे, बल्कि गांव वाले भी हैरान थे. अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ने के बदले 20 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. सिपाही रविंद्र कुमार जिला बागपत के थाना चांदीनगर के गांव ढिकौली का रहने वाला था. वह दिल्ली पुलिस में था और उस समय दिल्ली के थाना नरेला में तैनात था.

उस का परिवार काफी मजबूत हैसियत और रसूख वाला था. उस के पिता राजकुमार दिल्ली पुलिस से सबइंसपेक्टर सेवानिवृत्त हुए थे. गांव में उन के पास काफी खेतीबाड़ी थी. रविंद्र का एक और भाई था सुधीर, जो गांव में ही रहता था. दिल्ली के थाना नरेला में तैनात रविंद्र, बीचबीच में छुट्टी ले कर घर भी आता रहता था. वह छुट्टी पर घर आया था, तभी 22 फरवरी, 2016 की सुबह रहस्यमय स्थितियों में उस का अपहरण हो गया था. अपहरण की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार पुलिस बल के साथ उस के घर पहुंच गए थे. मामला चूंकि सिपाही के अपहरण का था, इसलिए एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय भी पहुंच गए थे.

रविंद्र के घर वालों ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार रविंद्र सुबह 10 बजे के करीब घर से थोड़ी दूरी पर अपने चचेरे भाई सत्यवीर और पड़ोसी सुकरमपाल से बातें कर रहा था. सत्यवीर और सुकरमपाल अपनेअपने घर चले गए. रविंद्र भी अपने घर की ओर आ रहा था, तभी वह रहस्यमय स्थितियों में गायब हो गया था. वह कहां, किस के साथ गया, इस की किसी को खबर नहीं थी. उस के घर वालों ने सोचा कि वह छुट्टी पर आया है, इसलिए गांव में किसी से मिलने चला गया होगा. लेकिन दोपहर 12 बजे के आसपास सुधीर के मोबाइल पर उस के मोबाइल से फोन आया. सुधीर ने फोन उठा कर पूछा, ‘‘हैलो रविंद्र कहां हो तुम?’’

सुधीर को तब झटका लगा, जब पलभर की खामोशी के बाद दूसरी ओर से रविंद्र के बजाय किसी दूसरे आदमी की आवाज आई, ‘‘रविंद्र हमारे कब्जे में है. अगर तुम उसे सहीसलामत पाना चाहते हो तो बहुत जल्द 20 लाख रुपए का इंतजाम कर लो.’’

यह सुन कर सुधीर के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह सन्न रह गया. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘अ…अ…आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘इस बात पर ज्यादा ध्यान मत दो. जितना कहा है, उतना करो.’’ कुछ पल रुक कर फोन करने वाले ने कहा, ‘‘और हां, पुलिस को खबर करने की गलती मत करना, वरना हम रविंद्र को जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

इतना कह कर फोन करने वाले ने फोन काट दिया. उस ने पलट कर फोन किया तो मोबाइल स्विच्ड औफ हो चुका था. इस से घर वाले घबरा गए. रविंद्र की जान खतरे में थी. अपहर्त्ता उस के साथ कुछ भी कर सकते थे. अपहर्त्ताओं ने पुलिस में न जाने की धमकी दे कर उलझन पैदा कर दी थी. घर वालों ने आपस में विचारविमर्श किया. वे किसी नतीजे पर पहुचं पाते, एक घंटे बाद दोबारा दूसरे नंबर से फोन आया. इस बार उस ने कहा, ‘‘पैसे का इंतजाम जल्द से जल्द करो. पैसा कहां पहुंचाना है, इस के लिए हम दोबारा फोन करेंगे.’’

‘‘रविंद्र को कुछ नहीं होना चाहिए.’’ रविंद्र के घर वालों ने कहा.

‘‘कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर पैसे नहीं मिले और तुम ने पुलिस को खबर कर दी तो हम अपना वादा भूल जाएंगे. फिर वह आप को जिंदा नहीं मिलेगा.’’ अपहर्त्ता ने धमकी भरे लहजे में कह कर फोन काट दिया.

राजकुमार बेटे के अपहरण से बुरी तरह परेशान थे. उन्होंने पुलिस की नौकरी की थी. मामले को छिपाना ठीक नहीं था, इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी. इस के बाद पुलिस उन के घर पहुंच गई. पुलिस को उम्मीद थी कि अपहर्त्ताओं ने रविंद्र को आसपास कहीं खेतों में छिपा दिया होगा, इसलिए पुलिस ने आसपास के खेतों में उस की तलाश शुरू कर दी. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस ने गांव के अन्य लोगों से इस उम्मीद में पूछताछ की कि कोई सुराग या चश्मदीद मिल जाए. लेकिन इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. इस बीच थाने में रविंद्र के भाई सुधीर की तहरीर पर अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस अधिकारी पसोपेश में थे. इस बात का अंदेशा था कि रविंद्र का अपहरण किसी बड़े गिरोह ने किया होगा. अपहर्त्ता उसे नुकसान भी पहुंचा सकते थे. क्राइम ब्रांच की टीम को भी इस मामले में लगा दिया गया. अगले दिन रविंद्र के अपहरण की खबर अखबारों में छपी तो जिले में सनसनी फैल गई. थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार अपने सहयोगियों एसआई सतबीर सिंह भाटी और कर्मवीर सिंह के साथ सुरागरसी में लगे थे. जिस नंबर से अपहर्त्ताओं का फोन आया था, पुलिस ने उस नंबर की जांच की. उस की लोकेशन गाजियाबाद जिले के लोनी इलाके की पाई गई.

तुरंत एक पुलिस टीम गाजियाबाद भेजी गई. पुलिस के साथ रविंद्र के घर वाले और नातेरिश्तेदार भी अपने स्तर से उस की खोजबीन में जुटे थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. दिल्ली पुलिस को भी इस की सूचना दे दी गई थी. अपने सिपाही के अपहरण के बारे में जान कर थाना नरेला पुलिस सन्न रह गई थी. अपहर्त्ताओं ने उस दिन के बाद घर वालों से कोई संपर्क नहीं किया था. इस बात ने पुलिस की चिंता और बढ़ा दी थी. पुलिस रविंद्र की खोजबीन में लगी थी कि एक नाटकीय घटना घट गई. अगले दिन रविंद्र ने शाम को अपने घर वालों को फोन किया कि वह खेकड़ा इलाके में रेलवे स्टेशन के पास है, वे उसे लेने आ जाएं. घर वाले वहां पहुंचे तो रविंद्र डरासहमा खड़ा मिल गया. वे उसे घर ले आए.

इस की सूचना पुलिस को दी गई तो पुलिस उस के घर पहुंच गई. उस की सकुशल रिहाई से घर वाले खुश थे. इस बीच चर्चएं भी चलीं कि घर वाले उसे फिरौती दे कर ले आए हैं. रविंद्र बेहद हताश नजर आ रहा था. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि सुबह जब वह घर की ओर जा रहा था, तभी एक कार उस के पास आ कर रुकी. कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स ने उस की तरफ एक विजिटिंग कार्ड बढ़ा कर कहा, ‘‘भाईसाहब, यह पता बता देंगे?’’

रविंद्र विजिटिंग कार्ड चेहरे के नजदीक ला कर पढ़ने लगा, तभी उसे चक्कर आ गया. बस उतने में ही कार सवार बदमाशों ने उसे खींच कर कार में डाल लिया. रविंद्र के अनुसार, विजिटिंग कार्ड में कोई ऐसा नशीला पदार्थ था, जो सांसों के जरिए शरीर में गया और उसे चक्कर आ गया. बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के उस का मोबाइल छीन लिया. एक बदमाश ने कहा, ‘‘हम ने तुम्हारा अपहरण किया है. अब हम तुम्हें तभी छोडेंगे, जब हमें 20 लाख रुपए मिल जाएंगे.’’

रविंद्र ने पूरी ताकत से विरोध किया, छूटने की भी कोशिश की. इस पर बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के हथियार तान कर कहा, ‘‘जरा भी चालाकी दिखाई तो तुम्हारा काम तमाम कर देंगे.’’

वे कार से उसे कहीं दूर ले गए और खेत में बांध कर बैठा दिया. इस बीच उन्होंने जबरन उसे नशे की गोलियां खिला कर उसे पानी पिला दिया. बीचबीच में उसे होश आता रहा. वह बुरी तरह आतंकित था. अगले दिन बदमाश आपस में बातें कर रहे थे कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है. पुलिस एड़ीचोटी का जोर लगा रही है. इसलिए इसे ज्यादा रखा गया तो खतरा बढ़ सकता है. पुलिस एनकाउंटर के डर से शाम के समय वे उसे कार में डाल कर खेखड़ा कस्बे तक लाए और स्टेशन के पास धकेल कर चले गए.

पुलिस ने रविंद्र से बारीकी से पूछताछ करनी चाही तो उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी तबीयत अभी ठीक नहीं है. मेरे साथ जो हुआ है, मैं उसे भूलना चाहता हूं. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि बदमाश मेरा ही अपहरण कर लेंगे.’’

पुलिस को लगा कि इस की मनोस्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन यह साफ हो गया था कि पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ दिया था. रविंद्र भले ही अपहर्त्ताओं के चंगुल से छूट कर आ गया था, लेकिन पुलिस अपहर्त्ताओं तक पहुंचना चाहती थी. अपहर्त्ताओं के नंबर के साथ पुलिस ने अगले दिन रविंद्र के मोबाइल की भी लोकेशन हासिल कर ली. उसे देख कर पुलिस को हैरानी हुई, क्योंकि रविंद्र के मोबाइल की लोकेशन उन स्थानों से नहीं मिल रही थी, जहांजहां उस ने अपहर्त्ताओं द्वारा ले जाने की बात बताई थी.

अपहरण के बाद उस के मोबाइल की लोकेशन दिल्ली के नांगलोई की भी थी. यह बड़ी अजीब बात थी. पुलिस ने उस से गहराई से पूछताछ करनी चाही तो वह कन्नी काटते हुए बोला, ‘‘सर, जो होना था, सो हो गया. जांच करने से क्या फायदा. बदमाशों ने मुझे जिंदा छोड़ दिया, यही बहुत बड़ी बात है, वरना वे मेरी जान भी ले सकते थे.’’

यह बात पुलिस अधिकारियों को अजीब लगी. क्योंकि रविंद्र खुद पुलिस वाला था. वह पुलिस जांच में सहयोग देने से न जाने क्यों कतरा रहा था. इस से पुलिस को दाल में काला नजर आने लगा. लेकिन कोई पुख्ता वजह पुलिस के हाथ नहीं लगी. इस बीच पुलिस को पता चला कि अपहर्त्ताओं ने जिस नंबर से फिरौती के लिए फोन किया था, वह सिमकार्ड दिल्ली के नरेला से खरीदा गया था. जांच को दिशा मिली तो पुलिस सिम बेचने वाले तक पहुंच गई. पुलिस ने सिम बेचने वाले अबरार को हिरासत में ले लिया.

अबरार नरेला का ही रहने वाला था और मोबाइल की दुकान चलाता था. पुलिस ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, सुन कर पुलिस चकरा गई. पता चला कि वह सिम सिपाही रविंद्र ने ही खरीदा था. जांच नाटकीय मोड़ पर आ गई. पुलिस ने 25 फरवरी को रविंद्र को हिरासत में ले लिया. पहले तो वह सिम खरीदने वाली बात से इनकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने मोबाइल लोकेशन दिखा कर अबरार से उस का सामना कराया तो वह टूट गया. पुलिस ने जब उस से विस्तार से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, वह बेहद चौंकाने वाला था.

बुरी लतों के शिकार रविंद्र ने खुद ही अपने अपहरण की ऐसी पटकथा लिखी थी, जिस से वह अपने ही घर वालों से फिरौती के रूप में मोटी रकम वसूल करना चाहता था. दरअसल, रविंद्र महत्वकांक्षी युवक था. उस ने पुलिस की नौकरी जरूर कर ली थी, लेकिन वेतन के रूप में मिलने वाली रकम से वह संतुष्ट नहीं था. वह तमाम सुखसुविधाओं के बीच ऐश की जिंदगी जीना चाहता था. जल्द अमीर बनने की चाहत में वह पुलिस होने के बावजूद जुएसट्टे की लत का शिकार हो गया था. इस तरह की लत इंसान को बर्बादी की ही ओर ले जाती है. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ.

धीरेधीरे वह करीब 5 लाख रुपए का कर्जदार हो गया था. बड़ा झटका तब लगा, जब जनवरी, 2016 के पहले सप्ताह में वह 44 हजार 600 रुपए सट्टे में हार गया. इस से उसे बड़ा झटका लगा. इस बीच एएसआई बनने के लिए वह एग्जाम भी दे चुका था. रविंद्र ने सोचा था कि वहां भी शायद उसे रकम खर्च करनी पडे, जबकि उस के पास कोई जमापूंजी नहीं थी. वह चाहता था कि उस के पास स्विफ्ट डिजायर कार हो. वह चाहता तो सब्र व समय के साथ घर वालों की मदद से उस की ये इच्छाएं पूरी हो सकती थीं, लेकिन सोच फितरती हो जाए तो बेलगाम हो जाती हैं. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. उस ने सोच लिया कि एक ही झटके में वह अपने सारे सपने पूरे कर लेगा.

कई दिनों की उधेड़बुन के बाद उस ने अपने ही अपहरण का नाटक कर के घर वालों से रुपए वसूलने की योजना बनानी शुरू कर दी. योजना के तहत उस ने अबरार की दुकान से फर्जी पते पर 2 सिमकार्ड खरीद कर एक्टिवेट करा लिए. योजना को अंजाम देने के लिए वह छुट्टी पर घर आ गया. 22 फरवरी की सुबह अपने चचेरे भाई और पड़ोसी से बात करने के बाद वह घर की तरफ चला जरूर, लेकिन उन लोगों के ओझल होते ही चुपचाप गांव से बाहर निकल गया. खेतों के रास्ते से होते हुए उस ने रास्ते से ही आवाज बदल कर अपने मोबाइल से फिरौती के लिए अपने  भाई को फोन कर दिया. आवाज बदलने की वह पहले ही कई दिनों से प्रैक्टिस कर रहा था.

वहां से निकल कर पहले वह लोनी पहुंचा, जहां से नए सिमकार्ड से उस ने एक बार फिर आवाज बदल कर फिरौती की रकम मांगी और धमकाया भी. इस के बाद वह दिल्ली पहुंचा और नांगलोई में रुक गया. रविंद्र को पूरी उम्मीद थी कि उस की जान की कीमत पर घर वाले फिरौती की रकम दे देंगे और उस की धमकी से डर कर पुलिस को सूचना नहीं देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, घर वालों ने पुलिस को सूचना दे दी. उस ने अगले दिन के अखबार देखे तो अपने अपहरण को ले कर पुलिस की सक्रियता की खबर पढ़ कर उस के होश उड़ गए. इस से उसे अपनी योजना धराशाई होती नजर आई.

वह जानता था कि सर्विलांस के जरिए उस की पोल खुल जाएगी. उस ने अपनी योजना बदल दी. वह नहीं चाहता था कि उस के अपहरण की जांच पुलिस आगे बढ़ाए. उस ने सोचा कि अगर वह सकुशल वापस घर पहुंच जाएगा तो मामला अपने आप ठंडे बस्ते में चला जाएगा. पुलिस जांच को आगे नहीं बढाएगी. इसी सोच के तहत वह अगले दिन खेखड़ा पहुंचा और घर वालों को फोन कर के अपने पास बुला लिया. घर आ कर उस ने पुलिस और घर वालों को मनगढंत कहानी सुना दी. पुलिस बारीकियों में न जाए, इस के लिए उस ने पहले तबीयत खराब होने का बहाना और फिर जांच न करने का आग्रह किया. लेकिन वह अपने ही बुने जाल में उलझ गया. पुलिस ने उस के मोबाइल से वह सिमकार्ड बरामद कर लिया.

पूछताछ के बाद एएसपी विद्यासागर मिश्र ने प्रेसवार्ता कर के उसे पत्रकारों के सामने पेश किया. बाद में रविंद्र और अबरार को अदालत में पेश किया. माननीय अदालत ने दोनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में थे. उन की जमानतें नहीं हो सकी थीं. योजना में रविंद्र का कोई साथी तो नहीं शामिल था. पुलिस इस की भी जांच कर रही थी. रविंद्र बुरी लत का शिकार न हुआ होता  और अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखा होता तो आज यह नौबत न आती. बागपत पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली पुलिस ने भी उसे सस्पैंड कर दिया था. हालांकि जेल जाने से पूर्व रविंद्र का कहना था कि उस का अपहरण हुआ था और बदमाशों ने ही फिरौती मांगी थी. उस पर लगे आरोप गलत हैं. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: हौंसले वाली लड़की

Hindi Stories: इंसान की जिंदगी में यादों का खास महत्व होता है. जो यादें मन को सुकून देती हैं, उन्हें कोई भूलना नहीं चाहता. जबकि कड़वी यादों को इंसान भूल से भी याद नहीं करना चाहता. लेकिन यादों की डोर आदमी के अपने वश में नहीं होती. दिमाग के परदे पर गाहेबगाहे हर तरह की यादें दस्तक देती रहती हैं. तकलीफ तब होती है, जब कड़वी यादें वर्तमान को प्रभावित करने लगती हैं.

एक शाम ऐलिशिया कोजाकीविक्ज अपने कमरे में बैठी थी, अनायास ही पुरानी यादें उस के सुकून पर हावी हो गईं. उस ने उन से पीछा छुड़ाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह उन बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ा सकी. जब मन परेशान  होने लगा तो उस ने उन यादों को मन के द्वार से निकाल कर आंखों की ऊपरी सतह पर लाने की सोची, ताकि डरावने दृश्य शब्द बन जाएं.

ऐलिशिया ने उन बुरी यादों की अखबारी कटिंग काट कर एक फाइल बना ली थी. उस फाइल में केवल बुरी यादों की ही खबरें नहीं थीं, बल्कि उस की तारीफ में छपी कुछ खबरें और रिपोर्ताज भी थे. वह उस फाइल को ले कर टेबल पर बैठ गई और एकएक खबर को उचटती नजरों से देखने लगी. सभी ऐसी खबरें थीं, जिन्हें उस ने सैकड़ों बार पढ़ा था, इसलिए जानीपहचानी थीं. मन की दिशा बदलने के लिए उस ने सतही तौर पर खबरें पढ़ीं तो, लेकिन बुरी यादों के किसी भी चित्र को आंखों के द्वार पर दस्तक नहीं देने दी. ऐलिशिया अभी उन खबरों की फाइल को उलटपुलट ही रही थी कि उस ने अपने कंधे पर हाथ का स्पर्श महसूस किया. उस ने पलट कर देखा, पीछे उस की मां मैरी खड़ी थीं.

ऐलिशिया के चेहरे पर नजर पड़ी तो वह उस की उदासी और परेशानी को भांप कर थोड़ी नाराजगी से बोलीं, ‘‘ऐलिशिया बेबी, तुम फिर उन्हीं बुरी यादों में डूबी हो न? इट इज नौट गुड बेबी. अब तुम उस सब से बहुत दूर आ चुकी हो. भूल कर भी तुम्हें उस सब के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए. इस के बजाय तुम्हें यह सोच कर खुश होना चाहिए कि लोग तुम्हें पसंद करते हैं. बच्चों के लिए तुम एक नेक काम कर रही हो.’’

‘‘सौरी मम्मा, बट…’’

मैरी ने उस की बात को बीच में ही काट कर समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘कम औन ऐलिशिया, जो बीत गया सो बीत गया. तुम सिर्फ अपने फ्यूचर पर फोकस करो. हमें नाज है तुम पर. अब तुम्हें गुजरे जमाने की बातों को ले कर बिलकुल नहीं सोचना चाहिए. बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ाओगी तो वे तुम्हें परेशान करती रहेंगी. हम अपनी बेटी के चेहरे पर जरा सी भी उदासी नहीं देखना चाहते.’’

‘‘ओके मम्मा, अब ऐसा नहीं होगा.’’ ऐलिशिया ने मुसकरा कर कहा और खड़ी हो कर मां के गले लग गई.

ऐलिशिया कई साल पहले जिस भयानक हादसे से रूबरू हुई थी, वह उस के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ गया था. उस हादसे में उस का दिल ही नहीं, आत्मा तक घायल हुई थी. ऐलिशिया के दिमाग में एक अंजाना सा डर घर कर गया था. परिवार की सहानुभूति, मनोचिकित्सकों के उपचार और खुशनुमा माहौल दे कर जैसेतैसे उस डर को ऐलिशिया के दिमाग से निकाला गया था.

ऐलिशिया ने खुद भी उस डर से उबरने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन इस सोच के साथ कि वह कुछ ऐसा करे कि जो उस के साथ हुआ, वह किसी दूसरे के साथ न हो. इसी सोच के चलते उस ने अपने साथ हुई भयानक घटना को एक उद्देश्य में बदल दिया. यह सब निस्संदेह आसान नहीं था. लेकिन ऐलिशिया ने मजबूत इरादों के साथ जो मुहिम चलाई, वह काफी हद तक कामयाब रही.

उस की यह मुहिम थी, आधुनिकता की चकाचौंध भरे इस साइबर युग में बच्चों को उन के सिर पर मंडराते खतरों से बचाने की. इस का परिणाम अच्छा ही निकला. जल्दी ही वह बच्चों को जागरूक करने वाली रोल मौडल बन गई. न केवल उस के काम को सराहना मिली, बल्कि सरकार ने उस के नाम पर बच्चों को सुरक्षा देने वाला एक कानून भी बना दिया. ऐलिशिया अब वाकई एक बड़ा नाम है.

ऐलिशिया कमउम्र में जिस घटना का शिकार हुई थी, वह वाकई खौफनाक थी. उस का गुनाह सिर्फ इतना था कि वह इंटरनेट चैटिंग की लत का शिकार थी. भावनाओं में बह कर वह अपनी सोचनेसमझने की क्षमता भी खो बैठी थी. इंटरनेट की सोशल साइट पर एक शख्स पर विश्वास करना उस के लिए बहुत खौफनाक साबित हुआ था.

गनीमत बस इतनी थी कि वह उस शख्स के चंगुल में फंसी होने के बाजवूद जिंदा थी और पुलिस ने वक्त पर पहुंच कर उसे छुड़ा लिया था. ऐलिशिया अमेरिका के पेंसिल्वेनिया राज्य के खूबसूरत शहर पीटर्सबर्ग की रहने वाली थी. उस के पिता चार्ल्स एक समृद्ध कारोबारी थे. परिवार में कुल जमा 4 लोग थे, ऐलिशिया, उस की मां मैरी और एक बड़ा भाई.

घटना के समय ऐलिशिया महज 13 साल की थी. पढ़ाई के दौरान कंप्यूटर इंटरनेट का इस्तेमाल उस की आदत में शुमार था. उस का भाई भी यह सब करता था. ऐलिशिया ने अपने हमउम्र दोस्तों और उन के संपर्क के लोगों से औनलाइन चैटिंग शुरू कर दी. पढ़ाई के बाद उस का ज्यादातर वक्त इसी में बीतता था. कह सकते हैं कि वह इस लत का शिकार हो गई थी. उस के कई दोस्त बने, जिन में एक नया दोस्त स्कौट भी था. स्कौट बातें बनाने में माहिर था. उस की बातों का अंदाज ऐलिशिया को गुदगुदाता था. चैटिंग का दायरा बढ़ा तो ऐलिशिया को अपने नए दोस्त के बारे में बहुत सी बातें पता चलीं. उसे भी वही चीजें पसंद थीं, जो ऐलिशिया को पसंद थीं.

कई बार बच्चों को पता नहीं चलता कि वह स्मार्ट और खूबसूरत हैं. उन्हें तब बहुत खुशी मिलती है, जब कोई दूसरा बताता है कि वे स्मार्ट हैं, सुंदर हैं. ऐलिशिया के साथ भी यही हुआ. स्कौट ने ऐसी बातें कर के कुछ ही दिनों में उस का विश्वास जीत लिया. ऐलिशिया दूसरों पर बहुत जल्द विश्वास करने वाली मासूम लड़की थी. उस का परिवार एकदूसरे के बहुत करीब था. पिता व्यस्त रहते थे, फिर भी परिवार की खुशियों के बीच वक्त जरूर निकाल लेते थे. मैरी दोनों बच्चों को बहुत प्यार करती थीं. बेटी को इंटरनेट पर उलझी देख कर वह उसे अंजान लोगों से सावधान रहने के लिए कहती रहती थीं.

ऐलिशिया का दोस्त स्कौट बहुत दिलचस्प था. उसे गुडमौर्निंग कहने से ले कर गुडनाइट कहने तक वह छोटीछोटी बातों तक का खयाल रखता था. वह कभी भी किसी भी बात पर ऐलिशिया से नाराज नहीं होता था. कभी ऐेलिशिया उस से नाराज हो जाती तो वह उसे मना लेता था. दोनों ही एकदूसरे में दिलचस्पी लेते थे और रोजाना घंटोंघंटों तक चैटिंग करते थे. महीनों तक चली चैटिंग ने दोनों को काफी करीब ला दिया था.

स्कौट के कहने पर ऐलिशिया ने उसे अपनी कई फोटो भेजी थीं. उस के हर फोटो की वह दिल खोल कर तारीफ करता था. इस सब से ऐलिशिया को बहुत खुशी मिलती थी. इस के बावजूद दोनों की कभी मुलाकात नहीं हुई थी. ऐलिशिया ने उसे अपने परिवार के बारे में सारी जानकारियां दे रखी थीं. स्कौट उसे समझाता था कि वह अपनी इस दोस्ती के बारे में किसी को न बताए.

दिसंबर, 2001 में स्कौट ने ऐलिशिया के सामने मिलने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उस ने इनकार कर दिया. इस पर स्कौट ने उस से मीठीमीठी बातें कीं, कसमें दीं, अपनी कई महीनों की दोस्ती का वास्ता दिया. अंतत: किसी तरह वह ऐलिशिया को मनाने में कामयाब हो गया. दोनों ने तय कर लिया कि वे 31 दिसंबर की रात न्यू ईयर पर मिलेंगे. स्कौट ने उसे बताया था कि जिस ब्लौक में उस का घर है, वह वहां से कुछ दूर खड़ा मिल जाएगा. ऐलिशिया इस के लिए तैयार हो गई. उस ने सोशल साइट के उस दोस्त पर पूरा विश्वास कर लिया, जिस से वह पहले कभी नहीं मिली थी. चैटिंग से उपजी भावनाओं और विश्वास ने स्कौट को उस के सपनों का राजकुमार बना दिया था.

31 दिसंबर की रात को न्यू ईयर का जश्न पूरी दुनिया में मनाया जाता है. क्रिसमस के बाद आने वाली 31 दिसंबर की रात अमेरिकियों के लिए तो और भी खास होती है. ऐलिशिया के परिवार के लिए भी वह रात खास थी. लोग नए साल के जश्न की तैयारियों में डूबे थे. छोटीबड़ी इमारतें रोशनी से नहाई हुई थीं.

उस दिन शाम से ही मौसम बेहद सर्द था. रुकरुक कर बर्फ गिर रही थी. ऐलिशिया स्कौट से मिलने की कल्पनाओं में डूबी थी. उस के घर में भी सब खुश थे. सभी ने एकसाथ डिनर किया. 9 बजने वाले थे. ऐलिशिया को सब की नजरों से बच कर घर से निकलना था. उस ने अपनी मां मैरी से कहा, ‘‘मम्मा, आई एम गोईंग. मुझे नींद आ रही है.’’

‘‘ओके, हैप्पी न्यू ईयर बेबी.’’ मां ने प्यार से कहा.

इस के बाद नींद के बहाने ऐलिशिया उन लोगों से अलग हो कर अपने कमरे में चली गई. उम्र के बहाव ने उसे जरूरत से ज्याद चालाक बना दिया था. स्कौट को साढ़े 9, 10 बजे आना था. यह सब गलत था, पर दोस्ती की खातिर वह स्कौट से मिलने के लिए तैयार हो गई थी. साढ़े 9 बजने को आए तो उस ने चुपके से घर का जायजा लिया. घर के सभी लोग डाइनिंग हौल में बैठे टीवी देखने में मशगूल थे. ऐलिशिया चुपके से मुख्य दरवाजा खोल कर घर से बाहर निकल गई.

बाहर बहुत ठंड थी. एकदम सन्नाटा पसरा था. सड़कों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी थी. मौसम से लड़ती स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी भी धुंधलाई हुई थी. ऐलिशिया ने ठंड से बचने के लिए जींस, टौप, जैकेट और स्टालर पहन रखा था. ठंड से बचने की कोशिश करते हुए वह सड़क पर चलने लगी. सन्नाटे में उसे केवल अपने पैरों के नीचे बर्फ के कुचलने की आवाज सुनाई पड़ रही थी.

मन ही मन वह डर भी रही थी. डरावनी खामोशी के साए में वह अपने ब्लौक को पार कर के कोने पर पहुंची. तभी उस के दिल ने कहा कि वह गलत कर रही है, उसे वापस चले जाना चाहिए. अपने इस खयाल पर अमल करने के लिए वह मुड़ी, लेकिन तभी उस के कानों में आवाज पड़ी, ‘‘हाय ऐलिशिया, प्लीज कम.’’

ऐलिशिया ने आवाज की दिशा में पलट कर देखा. आवाज सड़क किनारे खड़ी एक कार से आई थी. ड्राइविंग सीट पर एक शख्स बैठा नजर आ रहा था. उस ने सोचा कि वह स्कौट ही होगा, जो सर्द मौसम में कार लिए उस का इंतजार कर रहा है. वह कार की ओर लपकते हुए ड्राइविंग सीट के बगल वाले दरवाजे के नजदीक पहुंची. कार में ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने उस के वहां पहुंचते ही दरवाजा खोल दिया. ऐलिशिया ने झुक कर देखा तो बुरी तरह चौंकी. कार में बैठा शख्स अधेड़ उम्र का व्यक्ति था. निस्संदेह वह उस का दोस्त स्कौट कतई नहीं था. क्योंकि उस की फोटो उस ने इंटरनेट पर मंगा कर कितनी ही बार देखी थी.

ऐलिशिया कुछ सोचसमझ पाती, इस के पहले ही उस व्यक्ति ने उस का बाजू पकड़ कर खींचा और कार की सीट पर बैठा दिया. ऐलिशिया बुरी तरह डर गई. दिमाग जैसे शून्य हो गया. इसी दरम्यान उस व्यक्ति ने फुरती दिखाते हुए एक रस्सी से उस के हाथ बांध दिए. साथ ही गुर्राया भी, ‘‘शोर मत मचाना वरना मार कर पीछे कार की डिक्की में डाल दूंगा.’’

डरीसहमी ऐलिशिया को जान का खतरा सताने लगा. वह समझ गई कि वह बड़े खतरे में फंस गई है. उस व्यक्ति ने तेजी से कार चलानी शुरू कर दी. सड़क पर पड़ी बर्फ को कुचलती हुई कार पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. कार से ऐलिशिया सड़कों पर लगे साइनबोर्ड्स ही देख पा रही थी. वे उस के रोज के जानेपहचाने थे. उस सड़क पर आगे टोलबूथ पड़ने वाला था. ऐलिशिया को वहां बचने की उम्मीद नजर आई, क्योंकि बूथ के अंदर बैठे कर्मचारी बच्चों को बहुत प्यार करते थे. वे उन का हालचाल पूछते थे और कभीकभी टाफियां भी देते थे. ऐलिशिया जब मातापिता के साथ जाती थी तो भी ऐसा ही होता था. वह सोच रही थी कि जब बूथकर्मी उसे सीट पर रोते हुए देखेंगे तो पूछेंगे कि क्या हुआ?

इस के बाद उस अंजान खतरनाक शख्स का भेद खुल जाएगा. वह पुलिस बुला कर उसे आजाद करा लेंगे. कार बूथ पर पहुंची. लेकिन उसे किसी ने नहीं देखा. ठंडे मौसम की वजह से कर्मचारी एक छोटी खिड़की के जरिए ही टोलटैक्स का लेनदेन कर रहा था. कार आगे बढ़ गई. इस के साथ ही ऐलिशिया की उम्मीद भी टूट गई. ऐलिशिया बुरी तरह डरी हुई थी. उसे लग रहा था कि वह शख्स अब कहीं कार रोकेगा, उसे मारेगा और सड़क किनारे फेंक देगा. रास्ते में टेलीफोन बूथ भी था. वह सोच रही थी कि काश वह अपने घर एक फोन कर पाती तो उसे खतरे से आजादी मिल जाती. वह कसमसाती तो वह व्यक्ति गुर्रा कर उसे जान से मारने की धमकियां दोहराता.

करीब 4 घंटे के सफर के बाद कार एक घर के पोर्च में जा कर रुकी. वह व्यक्ति नीचे उतरा. उतरने से पहले वह फिर गुर्राया, ‘‘चुप रहना, वरना अच्छा नहीं होगा.’’

उस ने ताला खोल कर घर का दरवाजा खोला. इस के बाद उस ने ऐलिशिया को खींच कर नीचे उतारा और उसे धकेलते हुए घर में बने बेसमेंट में ले गया. वहां एक ताला लगा दरवाजा था. वह बोला, ‘‘तुम्हारे साथ इतना बुरा होने जा रहा है, जिस के बारे में तुम ने सोचा भी नहीं होगा. अब तुम जितना चीखना चाहो, चीखो.’’

‘‘प्लीज मुझे छोड़ दो.’’ ऐलिशिया गिड़गिड़ाई.

लेकिन तब तक उस ने दरवाजा खोल कर उसे अंदर खींच लिया. वह हैवान उस के साथ क्रूर ढंग से पेश आ रहा था. उस ने ऐलिशिया के कपड़े उतार कर उस के गले में कुत्ते का पट्टा डाल कर उसे जमीन पर खींचा और फिर खींचते हुए ही बिस्तर पर गिरा दिया. इस के बाद उस ने ऐलिशिया के साथ जबरदस्ती की. ऐलिशिया डर, दहशत और दर्द से बेहाल रोती और तड़पती रही. उस की बातों, उस के गिड़गिड़ाने या रोने का उस पर कोई असर नहीं पड़ा. अगले 3 दिनों तक वह उसे मारतापीटता और उस के साथ जबरदस्ती करता रहा. वह उसे खानेपीने के लिए भी बहुत कम देता था. ऐलिशिया के आंसू खत्म हो चुके थे. उसे विश्वास हो गया था कि जब उस हैवान का मन भर जाएगा तो वह उसे मार ही देगा.

ऐलिशिया भावनाओं में किए गए विश्वास पर पछता रही थी. उसे अपने परिवार की याद भी सता रही थी. वह सोच रही थी कि घर वाले उसे जिंदा रहते या मरने के बाद ढूंढ़ ही लेंगे. चौथे दिन शाम को उस हैवान ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें मारने वाला था, लेकिन मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूं, इसलिए जिंदा रखूंगा. तुम अब सब कुछ भूल कर मेरे साथ रहने की आदत डाल लो.’’

उस आदमी की आंखों में हैवानियत, बातों में कठोरता और चेहरे पर क्रूरता थी. यकीनन वह बेहद खतरनाक किस्म का आदमी था. शाम ढले वह खाना लाने की बात कह कर ऐलिशिया को कमरे में बंद कर के चला गया. प्यार जताने की कोशिश में उस ने ऐलिशिया को पूरी तरह नहीं बांधा था. उस ने बिस्तर पर उसे खुला छोड़ कर बैडरूम के बाहर का ताला लगा दिया था. अलबत्ता जाने से पहले वह उस के हाथ बांधना नहीं भूला था. ऐलिशिया के ऊपरी हिस्से को उस ने बेपर्दा ही रहने दिया था. वह टेलीफोन पर अपने दोस्तों से कहा करता था कि वह जिंदगी के मजे ले रहा है और उन्हें भी मजे करा सकता है. ऐलिशिया को यह डर भी सता रहा था कि वह अपने दोस्तों के सामने उसे शिकार की तरह डाल सकता है.

रात हो चुकी थी. तभी ऐलिशिया ने दरवाजे पर एक साथ कई कदमों की आहट सुनी. वह बुरी तरह डर गई. उस ने सोचा कि वह अपने साथ दोस्तों को लाया होगा. ऐलिशिया बिस्तर से उतर कर बैड के नीचे छिप गई. दरवाजा खुला, उसे बैड के नीचे से कई बूट दिखाई दिए. एक व्यक्ति ने उसे बैड के नीचे से ढूंढ़ निकाला. उस ने कहा, ‘‘बाहर निकल आओ, हम तुम्हें बचाने के लिए आए हैं.’’

डरीसहमी ऐलिशिया बाहर निकली. उस के अर्द्धनग्न बदन पर नजर पड़ते ही सशस्त्र लोगों ने पीठ घुमा ली. उन के हाथों में पिस्तौलें और वर्दी देख कर वह समझ गई कि ये पुलिस वाले हैं. उन में एक महिला पुलिसकर्मी भी थी. उस ने ऐलिशिया के हाथ खोले और सोफे पर पड़ी उस की जैकेट उसे पहनने को दी. उन लोगों के कब्जे में वह हैवान आदमी भी था. उस के हाथों को पीछे कर के हथकडि़यां लगा दी गई थीं, वह कसमसा रहा था.

पुलिस ऐलिशिया को गाड़ी से थाने ले गई. उसे सब से ज्यादा खुशी तब मिली जब उस के मातापिता ने दौड़ कर उसे गले लगा लिया. ऐलिशिया के लिए एक तरह से यह दूसरी जिंदगी थी. नरक से निकल कर मां की बांहों में वह खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थी. पुलिस ने उस आदमी से पूछताछ की तो पता चला कि वह एक हैवान की घिनौनी मानसिकता का शिकार हुईर् थी.

पुलिस ने जिस व्यक्ति को पकड़ा था, उस का नाम टैरी था. 38 वर्षीय टैरी वर्जीनिया का रहने वाला था. किशोर उम्र की लड़कियों को ले कर वह विकृत मानसिकता का शिकार था. वह अकेला रहता था और उस में कई बुरी आदतें थीं. इंटरनेट चैटिंग से वह लड़कियों को अपने जाल में उलझाता था और उन के साथ गंदी बातें किया करता था. टैरी ने कई नामों से अपनी आईडी बनाई हुई थी. उस का ज्यादातर वक्त चैटिंग में ही बीतता था. ऐलिशिया को भी उस ने अपने जाल में उलझा लिया था. अपनी उम्र व पहचान छिपा कर वह खुद को उस का हमउम्र लड़का बन कर चैटिंग करता था. उस ने इंटरनेट से एक किशोर के कई फोटो चुरा लिए थे, जिन्हें वह ऐलिशिया को भेजता था.

ऐलिशिया किशोर थी. उस में बहुत ज्यादा समझ नहीं है, यह बात टैरी चंद रोज की चैटिंग में ही समझ गया था. उसे वह आसान शिकार लगी. उस की भावात्मक बातों से वह उस पर विश्वास करने लगी थी. ऐलिशिया जब पूरी तरह भावात्मक रूप से उस के साथ जुड़ गई तो टैरी ने उसे मिलने के लिए तैयार कर लिया. जब वह उस के कब्जे में आ गई तो वह हैवान बन गया. उधर ऐलिशिया का परिवार उस के रहस्यमय तरीके से गायब होने से बुरी तरह परेशान था. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने स्तर से उन्होंने उस की बहुत खोजबीन की.

परिवार पर नए साल की खुशियों पर गम और परेशानी की धुंध जम गई थी. पूरी रात की परेशानी और उलझन के बाद चार्ल्स ने ऐलिशिया का फोटो दे कर पुलिस में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. पुलिस सक्रिय हो गई और ऐलिशिया के फोटो व पहचानशुदा इश्तहार जारी कर दिए. कोई नहीं जानता था कि ऐलिशिया कहां चली गई. 2 दिनों बाद एक व्यक्ति ने पुलिस को गुप्त सूचना दी कि उस ने इंटरनेट पर औनलाइन एक व्यक्ति को एक बच्ची का यौनशोषण करते देखा है. वह मुसीबत में थी और बचने के लिए छटपटा रही थी. ऐलिशिया लापता थी, पुलिस उसे खोज रही थी. इस बात से उसे लगा कि वह ऐलिशिया भी हो सकती है. ऐलिशिया न भी होती तो भी यह एक बच्ची के शोषण का गंभीर मामला था.

पुलिस ने उस व्यक्ति से पूछताछ कर के पता किया तो उस ने वह इंटरनेट आईडी लिंक पुलिस को दे दी, जिस पर उस ने लाइव वीडियो देखा था. पुलिस सुरागरसी में जुट गई. पुलिस ने उस आईडी का आईपी ऐड्रेस निकलवाया तो वह टैरी का निकला. पुलिस ने टैरी की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की तो वे पूरी तरह संदिग्ध पाई गईं. एक शाम पुलिस टीम उस के घर तक पहुंच गई. इत्तफाक से टैरी तभी खाना पैक करा कर वापस आया था. उसे कब्जे में ले कर ऐलिशिया को बरामद कर लिया गया. ऐलिशिया को उस के परिवार के सपुर्द कर के टैरी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया.

इस घटना के बाद ऐलिशिया को लगने लगा था कि उस के लिए दुनिया में कुछ नहीं बचा है. वह डर का शिकार हो गई थी. दिलोदिमाग पर सिर्फ डर छाया था. बेटी को दर्द से निकालने के लिए उस के मातापिता ने मनोचिकित्सकों का सहारा लिया. खुद भी वह उस का बड़ा सहारा बने. अमूमन ऐसे मामलों में लोग बच्चों को भी दोषी मान लेते हैं, लेकिन चार्ल्स और मैरी ने ऐसा कतई नहीं किया. उन्होंने उसे प्यार से संभाला. लंबे समय के बाद वह स्कूल गई. समय अपनी गति से चलता रहा. ऐलिशिया की कड़वी यादों ने साथ नहीं छोड़ा था. उधर एक साल बाद सन 2003 में अदालत ने टैरी को दोषी पा कर उसे 20 साल कैद की सजा सुनाई.

ऐलिशिया ने पढ़ाई में मन लगाया. अब वह काफी समझदार हो गई थी. वह चाहती थी कि वह बच्चों के लिए ऐसा कुछ करे कि जो उस के साथ हुआ, वह किसी और के साथ न हो. इस के लिए उस ने झिझक छोड़ कर बिना यह सोचे कि लोग क्या कहेंगे, बच्चों को जागरूक करना शुरू किया. उस ने इंटरनेट के खतरों पर सार्वजनिक रूप से बोलना शुरू किया. वह स्कूलों में जाती और अपनी आपबीती बता कर बच्चों को आगाह करती. अभिभावकों, शिक्षकों को भी आगाह करती. वह जानती थी कि इंटरनेट को ले कर ऐसी कोई शिक्षा नहीं दी जाती कि बच्चे इंटरनेट के खतरों से सतर्क रह सकें. अगर उसे भी उदाहरणों के साथ ऐसी शिक्षा दी गई होती, तो शायद वह इस खतरे से बच जाती.

अब वह बच्चों को जागरूक कर के खुद उदाहरण बनना चाहती थी. अपने साथ घटी इस भयानक घटना को उस ने उद्देश्य में बदल दिया. लेकिन पहली बार जब उस ने एक स्कूल में बोलना चाहा तो अपने साथ घटी घटना को पूरी तरह बयान नहीं कर पाई. बस माइक पर खड़ी रोती रही. इस के बावजूद ऐलिशिया ने बच्चों को इंटरनेट के उस जाल से बचाना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया, जिस में वह खुद फंस गई थी. वह चाइल्ड वैलफेयर एक्टीविस्ट बन गई. ऐलिशिया खुद जिस हादसे का शिकार हुई थी, उस में पहचान छिपाने की जरूरत थी. लेकिन ऐलिशिया का मनाना था कि अगर वह ऐसा करेगी तो वे बच्चे खतरे में पड़ जाएंगे, जिन्हें जागरूक कर के वह बचा सकती है.

इस चिंता को उस ने अपने पास नहीं फटकने दिया. मीडिया में ऐलिशिया सुर्खिया बनने लगी. उस के काम की सराहना होती थी. बच्चों के अधिकारों के लिए वह आगे बढ़ कर सरकार तक उन की बात पहुंचाती थी. अब वह अलग किस्म की लड़की बन चुकी थी. ऐलिशिया ने पौइंट पार्क यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया तो उस ने ग्रेजुएशन के लिए फौरेंसिक मनोविज्ञान विषय का चुनाव किया. इस की 2 वजहें थीं. एक तो इस विषय की गहराई में जा कर वह खुद की बुरी यादों को धुंधला कर सकती थी, दूसरे बच्चों को भी वह मनोवैज्ञानिक ढंग से अपनी बात समझा सकती थी. ऐलिशिया के इंटरनेट सिक्योरिटी और बच्चों के मानवाधिकार संरक्षण की पैरोकारी व लापता बच्चों के लिए किए जा रहे उस के काम को बहुत ख्याति मिली.

धीरेधीरे ऐलिशिया एक बड़ा नाम बन गई. सन 2007 में उस ने नेशनल एसोसिएशन प्रोजेक्ट टू चिल्ड्रेन संस्था के साथ मिल कर सरकार के सामने बच्चों को इंटरनेट के खतरों से बचाने, उन्हें शिकार बनाने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाने तथा बच्चों की तस्करी रोकने का मुद्दा उठा कर पुख्ता कानून बनाने की जरूरत के साथ प्रोजैक्ट रखा. अमेरिकी सरकार ने उस पर गंभीरता से विचार कर के ‘इंटरनेट क्राइम्स अगेंस्ट चाइल्ड टास्क फोर्स’ (आईसीएसी) का गठन किया. उस के साथ घटी घटना को उदाहरण बना कर सरकार ने सन 2008 में ‘ऐलिशियाज लौ’ नाम से बच्चों के संरक्षण देने वाला एक कानून भी बना दिया.

इस कानून को वर्जीनिया, टेक्सास, कैलीफोर्निया, टैनिसी व आईदाहो आदि कई राज्यों में लागू कर दिया गया. ऐलिशिया शेष राज्यों में कानून लागू कराने के लिए प्रयासरत है. ऐलिशिया के प्रयासों से न सिर्फ अब तक अनेक बच्चे खतरों से बचे हैं, बल्कि उस की सक्रियता की बदौलत पुलिस भी कई लापता लड़कियों को खोजने में कामयाब रही है.

ऐलिशिया को शहर, राज्य व राष्ट्रीय स्तर के सेमिनारों और सरकार के बड़े आयोजनों में बुलाया जाता है. वह सब जगह अपनी बात रखती है. उस के काम को हर जगह सराहा जाता है. वह जबतब ‘ऐलिशिया प्रोजैक्ट’ नाम से इंटरनेट सिक्योरिटी और जागरूक करने वाला प्रोग्राम करती रहती है. ‘रेडी चिल्ड्रेन’, ‘सेफ कौंफ्रेंस’ नाम से भी ऐलिशिया समयसमय पर प्रोग्राम करती है. इस समय वह फौरेंसिक मनोविज्ञान विषय से मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रही है. ऐलिशिया का कहना है कि वह जिंदगी भर कोशिश करती रहेगी कि कोई भी किशोर उम्र लड़की उस की तरह धोखे और शोषण का शिकार न हो. Hindi Stories

—कथा पात्र से बातचीत पर आधारित

 

ISIS Terrorist Organization: खौंफ का खलीफा आईएसआईएस

ISIS Terrorist Organization: आईएसआईएस एक दुर्दांत और क्रूर आतंकी संगठन है जो पत्रकारों, मानवाधिकार के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधियों को मौत के घाट उतारते हुए जश्न मनाता है और उस की वीडियो बना कर दुनिया को दिखाता है. इस के बावजूद बहुत से देश उसे आतंक फैलाने के लिए फंडिंग तो कर ही रहे हैं, कट्टरपंथी सोच वाले कितने ही युवा और महिलाएं भी इस संगठन से जुड़ने के लिए लालायित हैं.

पहले पेरिस, एक बार फिर पेरिस, उस के बाद बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स. आईएसआईएस ने यूरोप में पिछले 3 सालों में इस तरह की एक दर्जन से ज्यादा खूनखराबे की घटनाओं को अंजाम दिया है, लेकिन इन 3 आत्मघाती हमलों ने यूरोप के समूचे मनोविज्ञान में ही दहशत बैठा दी है. पिछले दिनों यूरोप के कई अखबारों द्वारा अलगअलग देशों में इस खूंखार संगठन को ले कर जाने गए लोगों के मनोविज्ञान का साझा निष्कर्ष यह था कि आज की तारीख में यूरोप के 60 फीसदी से ज्यादा लोग इस वहशी संगठन से बेहद डरे हुए हैं. वे इस से किस कदर भयग्रस्त हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस का डर उन की हड्डियों तक में समा गया है.

सन 2001 में अलकायदा ने अमेरिका के ट्रेड टावर में हवाई जहाजों को मिसाइल की तरह इस्तेमाल करते हुए जो हमला किया था, उस ने अमेरिकियों के दिलोदिमाग में जबरदस्त खौफ पैदा कर दिया था. तकरीबन वैसा ही खौफ और वैसी ही दहशत इन दिनों यूरोपीय लोगों के दिलोदिमाग में घर किए हुए है. यह दहशत कितनी हौलनाक है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंदन के 50 फीसदी से ज्यादा लोग मानते हैं कि सुबह जब वे घर से निकलते हैं तो एक बार सीने में कहीं धक सा कुछ होता है कि क्या शाम को वे सहीसलामत वापस आ पाएंगे?

सवाल है, हथियार, तकनीक, धन और वर्चस्व से लबालब यूरोप जैसे भूखंड में एक जिहादी संगठन ने इस कदर अपना आतंक क्यों मचा रखा है? क्या यह महज संयोग है या फिर खौफ और आतंक कि इस समूची दास्तां में तमाम व्यवस्थित षडयंत्रों का भी गुप्त योगदान है? निश्चित रूप से ऐसा ही है. लेकिन यह सब इतना जटिल है कि आईएसआईएस की शुरू से आखिर तक दास्तां को जाने बिना श्यामश्वेत ढंग से कुछ भी कह देना खतरे से खाली नहीं है. आइए, इस खूंखार संगठन के गठन से ले कर इस के इस भयानक आतंक के सौदागर होने तक के सफर में एक संपूर्ण नजर डालें.

आईएसआईएस कब, कैसे और क्यों बना?

संगठित खौफ के इतिहास में आज तक आईएसआईएस जितना दुर्दांत और मनुष्य को पीड़ा पहुंचाने वाला कोई दूसरा संगठन नहीं हुआ. आईएसआईएस यानी ‘इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया’ नाम से इस संगठन के मौजूदा स्वरूप का गठन अप्रैल, 2013 में हुआ था, लेकिन इस की जड़ें इस से भी एक दशक पुरानी हैं. इब्राहिम अव्वद अल बदरी उर्फ अबु बक्र अल बगदादी इस का मौजूदा मुखिया है, जिसे अब तक के दुनिया के इतिहास का सब से दुर्दांत रक्तपिपासु माना जाता है.

दुनिया के मौजूदा कायदेकानूनों के हिसाब से यह संगठन, जो खुद को इराक और सीरिया के भौगोलिक क्षेत्र को मिला कर इस्लामिक राज्य कहना पसंद करता है, एक अमान्य राज्य तथा इराक एवं सीरिया में सक्रिय जिहादी सुन्नी सैन्य समूह है. अरबी भाषा में इस संगठन का नाम है ‘अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’ जिस का हिंदी में मतलब है, ‘इराक एवं शाम का इस्लामी राज्य’. शाम सीरिया का प्राचीन नाम है.

लेकिन इस के यही 2 नाम भर नहीं हैं. इस दुर्दांत संगठन के और भी कई नाम हैं. मसलन, आईएसआईएल या दाइश इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड लेवांट. पुराने समय में लेवांट उस इलाके को कहा जाता था, जिस में आज सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन आते हैं. कहने का मतलब यह है कि लेवांट एक ऐसे इलाके के रूप में जाना जाता है, जहां दुनिया के लिखित इतिहास में सब से अधिक खूनी संघर्ष हुए हैं. इस संघर्ष के दायरे में दुनिया के जो मौजूदा देश शामिल रहे हैं, वे हैं—जौर्डन, इजरायल, कुवैत, फिलिस्तीन, लेबनान, साइप्रस तथा दक्षिणी तुर्की के कुछ भाग.

खौफ के पर्याय इस संगठन को इराक और सीरिया के लोग इशारों में ‘दौलत’ अर्थात सरकार भी कहते हैं. यह सशस्त्र तकफीरी सलफी और जेहादी संगठन है. इस का घोषित उद्देश्य इस्लामी शासन व्यवस्था और इस्लामी कानून को लागू करना है. इस आतंकी संगठन के गठन, इस के अस्तित्व में आने, इस की गतिविधियों, लक्ष्यों और कौन से देशों से इस के संपर्क हैं, इस बारे में दुनिया के हर देश के पास एकदूसरे से भिन्न यानी विरोधाभासी सूचनाएं हैं, जो खुद एक रणनीति के तहत इस ने और इस संगठन के मददगारों ने फैलाई हैं.

मसलन कुछ लोगों और देशों का मानना है कि यह संगठन सीरिया में अलकायदा की एक शाखा है, जबकि दूसरे लोगों का कहना है कि यह एक स्वतंत्र संगठन है, जो इस्लामी सरकार के गठन का प्रयास कर रहा है. इसी तरह कुछ अन्य सूचना समूहों और देशों का मानना है कि यह सीरिया सरकार के विरोधियों को विभाजित करने के लिए सीरिया की सरकार और पश्चिमी देशों के षडयंत्रों का सांगठनिक विस्तार है. इस की पुष्टि अमेरिका के एक पुराने जासूस एडवर्ड स्नोडेन के इंटरव्यू से होती है, जो उस ने जुलाई, 2014 में ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स को दिया था. गौरतलब है कि एडवर्ड स्नोडेन सन 2013 तक अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी) में था.

सन 2013 में जब उस की सीआईए की नौकरी छूट गई तो वह हांगकांग भाग गया और फिर वहां से रूस. आज भी वह रूस में ही किसी अज्ञात स्थान में छिपा है. स्नोडेन ने अमेरिका की करतूत के बहुत सारे काले चिट्ठे पूरी दुनिया की मीडिया के सामने खोले हैं, जिस से पता चलता है कि कैसे अमेरिका ने ही ओसामा बिन लादेन की तरह खौफ के मौजूदा सौदागर अबू बक्र अल बगदादी को पैदा किया. बहरहाल, स्नोडेन द्वारा तेहरान टाइम्स को दिए गए इंटरव्यू के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल ने मिल कर बगदादी और उस के संगठन आईएसआईएस को खड़ा किया है.

स्नोडेन ने अपनी इस बातचीत में खुलासा किया था कि वह इजरायल ही था, जिस ने बगदादी को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी थी. वास्तव में इस पूरे खुफिया षडयंत्र को जिस कोड नाम से अंजाम दिया गया था, वह था ‘बीहाइव’ यानी मधुमक्खी का छत्ता. स्नोडेन के मुताबिक बगदादी और उस के संगठन को खड़ा करने के पीछे अमेरिका और उस के साथी देशों का मकसद था कि इजरायल के आसपास वाले देशों में आतंकवाद की एक ऐसी ताकत खड़ी कर दी जाए, जिस से इजरायल के दुश्मन उस ताकत से लड़ने में ही उलझ कर रह जाएं और इस तरह इजरायल सुरक्षित रहे.

स्नोडेन के मुताबिक, जहां साल भर से ज्यादा समय तक इस काम को अंजाम देने के लिए इजरायल ने बगदादी को अत्याधुनिक हथियारों को चलाने की ट्रेनिंग दी थी, वहीं खुद अमेरिका ने भारीभरकम आर्थिक सहायता दे कर बगदादी से मिडिल ईस्ट के अपने दुश्मन देशों पर हमला कराया था. वास्तव में इस के पीछे मकसद था कि इस आतंक की दहशत से अमेरिका द्वारा मध्यपूर्व के उन तमाम देशों में भी अपनी सेना की तैनाती थी, जहां फिलहाल वह नहीं है या सन 2012-13 में नहीं था.

यह स्नोडेन का शिगूफा भी हो सकता है, लेकिन जहां तक आईएसआईएस के खौफनाक इतिहास की बात है तो उस की जड़ें हाल के इन सालों से भी कहीं पीछे हैं. वास्तव में इस संगठन के गठन का इतिहास सन 2004 से शुरू होता है. जब खूंखार आतंकवादी अबू मुस्सअब जरकावी ने जमातुत्तवहीद और अल जेहाद नामक संगठनों का गठन किया. जरकावी ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में काम कर चुका था. उस ने ओसामा की मदद से अपने संगठन का इराक में काफी हद तक विस्तार कर लिया था. दरअसल इस संगठन ने इराक में अमेरिका के हमले का बदला लेने की कसम खाई थी.

यही वजह थी कि इस ने इराक के कोनेकोने से नौजवानों को अमेरिकी सैनिकों के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार किया. अपनी आक्रामक अमेरिका विरोधी नीतियों के चलते यह संगठन न सिर्फ बहुत कम समय में ही इराकी युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गया, बल्कि मध्यपूर्व और उस के बाहर के अन्य देशों के युवाओं में भी इस संगठन के प्रति तेजी से झुकाव बढ़ा. सन 2006 में अबू मुस्सअब जरकावी ने अपने एक वीडियो संदेश में अब्दुल्लाह रशीद अल बगदादी के नेतृत्व में मुजाहिदीन परिषद का गठन किया. लेकिन दुर्भाग्य से उसी महीने जरकावी मारा गया, जिस से उस की जगह अबू हमजा अल मुहाजिर को इराक में अलकायदा का मुखिया बना दिया गया.

सन 2006 के अंत तक इराक के और भी कई छोटेछोटे संगठन, जो अमेरिकी हमले के विरोध में छिटपुट मोर्चा संभाले हुए थे, वे सब भी इस से आ मिले और इस तरह इस संगठन का नाम हो गया ‘दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’, जिस का मतलब हम ऊपर ही बता चुके हैं. इस संगठन का मुखिया अबू उमर अल बगदादी था. संगठन का उद्देश्य बिलकुल साफ था, इराक से अमेरिका को उखाड़ फेंकना और इसलाम की पाबंद सरकार का गठन करना.

कौन है अबू बक्र अल बगदादी?

आज पूरी दुनिया जानना चाहती है कि खौफ का सौदागर अबू बक्र अल बगदादी आखिर है कौन और वह आईएसआईएस का मुखिया कब और कैसे बना? पहले यह जानते हैं कि आखिर ईदी अमीन और हिटलर से भी बड़ा खूंखार तानाशाह अबू बक्र अल बगदादी है कौन? बगदादी का जन्म सन 1971 में इराक के सामर्रा शहर में हुआ था. आज की तारीख में इस के कई नाम हैं जैसे, अल बदरी सामर्राई, अबू दुआ, डाक्टर इब्राहिम, अल कर्रार और अबू बक्र अल बगदादी.

बगदादी एक जमाने में दुनिया के आतंकी नंबर एक रहे ओसामा बिन लादेन की ही तरह बेहद पढ़ालिखा शख्स है. सच बात तो यह है कि वह ओसामा से भी ज्यादा पढ़ालिखा है. उस ने इस्लामिक स्टडीज से डाक्टरेट यानी पीएचडी कर रखी है. बगदादी बगदाद के इस्लामी विज्ञान विश्वविद्यालय से इस्लामी विज्ञान में मास्टर की डिग्री हासिल की है और बाद में यहीं से पीएचडी की डिग्री अर्जित की. बगदादी के पिता अल बदरी हैं. वह भी तकफीरी सलफी विचारधारा को मानते हैं. अबू बक्र बगदादी की कट्टरपंथ में आमद धर्म के प्रचार और उस की विधिवत शिक्षा से हुई. बचपन से ही उस में जेहाद के प्रति झुकाव था. इसीलिए वह इराक के दियाला और सामर्रा में जेहादी पृष्ठभूमि के 2 केंद्रों में से एक के रूप में उभरा.

तमाम जेहादी वेबसाइटों के मुताबिक वह अच्छीखासी आर्थिक और प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से है. सन 2003 में जब इराक में अमेरिकी सेनाओं ने घुसपैठ की थी, तभी वह अल जेहाद, जो बाद में अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम बना, संगठन के साथ जुड़ गया था. वह बहुत दिलेरी के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था. उसी दौरान लड़ते हुए अमेरिकी फौजों द्वारा पकड़ लिया गया था, जिस की वजह से उसे सन 2005-09 तक दक्षिणी इराक में अमेरिकी सेना द्वारा बनाए गए गिरफ्तार आतंकी कैंप उर्फ बक्का जेल में रखा गया. सन 2009 में उसे अमेरिकी सेना ने छोड़ दिया, लेकिन अमेरिका के प्रति उस के गुस्से और नफरत में कमी नहीं आई.

वह सन 2010 में फिर से पुराने संगठन में ही लौट गया और पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर ढंग से अमेरिकी फौजों पर हमले किए. इस के बाद की कहानी पूरी दुनिया जानती है कि कैसे उस ने खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का खलीफा घोषित किया और कैसे इराक व सीरिया के तमाम ऐतिहासिक शहरों को खंडहरों में बदल दिया.

कैसे शुरू हुआ आईएसआईएस के खौफ का सफर?

एक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका इराक को सद्दाम हुसैन के चंगुल से आजाद करा चुका था. मगर इस आजादी को हासिल करने के लिए उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. एक तरफ जहां इराक अमेरिकी फौजों के बूटों तले रौंदे जाने से तहसनहस हो चुका था, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी सेनाएं भी युद्ध लड़तेलड़ते पस्त हो चुकी थीं. जब अमेरिकी सेनाओं ने सन 2011 में इराक छोड़ा, तब वे इतनी जर्जर हो चुकी थीं कि उन के सामने ही धीरेधीरे सिर उठा रही फिदायीन ताकतों की अमेरिकी फौजों ने एक तरह से अनदेखी कर दी थी. अब तक सद्दाम हुसैन मारा जा चुका था. लेकिन इराक में आतंक का इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी मौजूद था.

हालांकि यह बात भी थी कि अमेरिकी सेनाओं के जाने के बाद भी संसाधनों की कमी के चलते बगदादी जैसे आतंकी ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे थे. अब तक उस ने अपने संगठन का नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट औफ इराक रख लिया था. बरबाद बगदाद में बड़े पैमाने पर सद्दाम हुसैन की सेना के ऐसे पुराने सैनिक मौजूद थे, जिन के अंदर गहरे तक ग्लानि और अवसाद था कि वे अमेरिकी फौजों को हरा नहीं पाए. अब तक अमेरिकी फौजें जा चुकी थीं, लेकिन उन की नुमाइंदगी कर रहीं मौजूदा इराकी सेनाओं को भी वे पुराने सिपाही देश के गद्दारों में गिनती कर रहे थे. यही कारण थे कि वे उन के खिलाफ लड़ने को बगदादी के आह्वान पर उस के संगठन आईएसआई से जुड़ गए.

बगदादी ने बड़ी ही खुशी और चतुराई से सद्दाम हुसैन की सेना के इन कमांडरों और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया. इस के बाद उस ने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चैक पौइंट्स और भरती दफ्तरों को बनाना शुरू किया. धीरेधीरे उसे सफलताएं मिलने लगीं और उस के लड़ाकों की संख्या कई हजार हो गई.

मगर अब भी बगदादी को इराक में वह कामयाबी नहीं मिल रही थी, जो उस के जेहन में थी. उसे लगा, शायद जर्जर इराक में यह कामयाबी उसे मिलेगी भी नहीं, इसलिए वह थोड़ी निराशा और बड़ी ही चतुराई से इराक छोड़ सीरिया पहुंच गया, जो एक तरह से इराक का पड़ोसी है. सीरिया उन दिनों जबरदस्त गृहयुद्ध की चपेट में था. अलकायदा और फ्री सीरियन आर्मी वहां के 2 सब से बड़े गुट थे, जो सीरियाई राष्ट्रपति असद के विरुद्ध मोर्चा बांधे थे. लेकिन सीरिया में भी घुसते ही उसे कामयाबी नहीं मिल गई. कई सालों तक सीरिया में भी बगदादी का कोई नामलेवा नहीं था.

अलबत्ता उस ने अब तक अपने संगठन का नाम एक बार फिर बदल लिया था और अब की बार वह आईएसआईएस हो चुका था, जोकि अभी तक है. बताने की जरूरत नहीं कि आईएसआईएस का मतलब इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया था. एक  तरफ जहां बगदादी बड़े मंसूबे बांध कर यहां आया था, वहीं दूसरी तरफ असद की सेनाओं से दोदो हाथ कर रही फ्री सीरियन आर्मी जून, 2013 को अपने खस्ता हालत हो चुकने के चलते पहली बार सामने आई और इस के मुखिया ने दुनिया से अपील की कि उसे हथियार दिए जाएं, वरना असद की फौजें उसे नेस्तनाबूद कर देगी और निर्णायक रूप से वे महज एक महीने के अंदर हार जाएंगे.

यहां॒से॒पलटे॒आईएसआईएस॒के॒दिन

इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमेरिका, इजरायल, जौर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी. इन देशों ने बाकायदा सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइलें, गोलाबारूद, सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया. बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए.

दरअसल, हुआ यह कि जो हथियार फ्री सीरियन आर्मी के लिए आ रहे थे, बड़े पैमाने पर उन्हें या तो पहले ही रास्ते में आईएसआईएस के लड़ाकों ने लूट लिया या फ्री सीरियन आर्मी के तमाम कमांडर गुपचुप रूप से आईएसआईएस से जा मिले थे और इस तरह दुनिया भर से आए हथियारों का 90 फीसदी सीरियन आर्मी के पास पहुंचने के बजाय आईएसआईएस के पास पहुंच गए. फ्री सीरियन आर्मी में गहरी निराशा थी, इस का मुख्य कमांडर पहले ही हार की आशंका और हताशा का बयान दे चुका था. नतीजतन बचेखुचे फ्री सीरियन आर्मी के सदस्यों ने आईएसआईएस से लड़ने का इरादा त्याग दिया और ज्यादातर उसी से जा मिले.

अगर कहा जाए उन दिनों तमाम आईएस लड़ाके फ्रीडम फाइटर का नकाब ओढ़ कर हथियार लूटे और अमेरिकी कमांडरों से बेहतरीन ट्रेनिंग हासिल की तो भी गलत नहीं होगा, क्योंकि सीरिया में लड़ रहे संगठन फ्री आर्मी के पीछे अमेरिका की ही ताकत, हथियार और रणनीति रही है. एक बार जब बड़े पैमाने पर आईएसआईएस के पास हथियारों का जखीरा हो गया तो फिर उस ने खौफ का ऐसा कहर बरपाया कि हजारों लोगों को मौत के घाट उतारते हुए महज एक साल के भीतर सीरिया और इराक दोनों ही देशों के एक बड़े हिस्से में कब्जा कर लिया.

इन में इन दोनों देशों के तमाम बड़े शहर भी शामिल थे. इराक में तो आईएसआईएस अब लगातार बगदाद की तरफ कूच कर रहा था. दूसरी तरफ इस ने सीरिया के तमाम प्राचीन शहरों को अपने गोलाबारूद से खंडहरों में बदल दिया था. जून, 2014 से आईएसआईएस की लगातार विजयगाथा में हर रोज कोई न कोई नया पन्ना जुड़ रहा है, जो आज भी बदस्तूर जारी है. आईएसआईएस के आतंकी इराक और सीरिया के तकरीबन आधे से ज्यादा बड़े शहरों में आज की तारीख में कब्जा जमाए हुए हैं और अपनी सरकार चला रहे हैं.

आईएसआईएस ने सीरिया के रक्का, पामयेरा, दियर, इजौर, इसाक्का, एलेप्पो, हम्मास और यारमुक इलाके के तमाम शहरों पर कब्जा कर लिया है. इस ने इराक में भी रमादी, अनबार, तिकरित, मोसुल और फालुजा शहरों को तहसनहस कर दिया है और अब यहां इसी का हुक्म चलता है. मगर सवाल है कि क्या इराक की इस दुर्दशा के लिए यहां का शिया समुदाय दोषी है? एक तरह से देखें तो यही सच है, क्योंकि सद्दाम की मौत के बाद अमेरिका की सरपरस्ती में सन 2006 में यहां एक तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार बनी, जिस के मुखिया शिया समुदाय के नूर अल मलीकी थे.

कहते हैं कि इस शिया सरकार ने इराक के सुन्नियों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया था. जबकि अमेरिका ने न केवल इस ओर से आंखें मूंदे रखीं, बल्कि कहीं न कहीं इस सब को बढ़ावा भी दिया, ताकि इराक में अल्पसंख्यक मलीकी सरकार पर उस का मजबूत कब्जा बना रहे. इस का नतीजा यह निकला कि आईएसआईएस के पक्ष में इराक के ज्यादातर सुन्नी होते चले गए. कोढ़ में खाज की स्थिति यह हुई कि सन 2011 के बाद राष्ट्रपति ओबामा ने इराक से अपनी फौज वापस बुलाने का फैसला कर लिया. अमेरिकी सेनाओं के चले जाने के बाद हर गुजरते दिन के साथ आईएसआईएस इतना मजबूत होता गया कि इराक सरकार कमजोर होती गई.

आईएसआईएस के लड़ाकों की संख्या इसी बीच 10 हजार से बढ़ कर 1 लाख की संख्या भी पार कर गई है. लेकिन जिस समय आईएसआईएस ताबड़तोड़ खौफ की काररवाहियां कर के ज्यादा से ज्यादा इलाकों में कब्जा जमा रहा था, उस समय इराक की सेना उस से कई गुना ज्यादा संख्या में थी और ज्यादा हथियारों से भी लैस थी, फिर भी आईएसआईएस के लड़ाकों ने इराकी सेना से बड़े पैमाने में उस के टैंक, हेलीकौप्टरों और लड़ाकू विमान छीन लिए.

कैसे फंडिंग जुटाता है आईएसआईएस?

अखबार ग्लोबल न्यूज के मुताबिक आईएसआईएस आतंकी संगठन न सिर्फ दुनिया का सब से खूंखार और क्रूर संगठन है, बल्कि यह खर्च के मामले में भी बहुत शाहाना है. यह दुनिया का सब से धनी आतंकी संगठन है. माना जाता है कि इस के पास 1 हजार अरब डौलर से ज्यादा की संपत्ति है, जिस में से 5 सौ अरब डौलर की संपत्ति तो उस ने इराक के विभिन्न शहरों, बैंकों और तेल कुओं को लूट कर हासिल की है. यह आतंकी संगठन तकरीबन 9 हजार बैरल तेल रोज बेचता है और उस से हर दिन 26 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाता है.

जब इराक के मोसुल शहर पर इस ने कब्जा किया था, उन दिनों 7 बैंकों को लूट कर कई करोड़ डौलर अपने खजाने में जमा कर लिए थे. कहते हैं, आईएसआईएस के पास इतना पैसा है कि वह अपने 60 हजार से 90 हजार के बीच लड़ाकों को हर महीने 42 हजार से 50 हजार रुपए महीने की तनख्वाह देता है, जबकि इस में खानापीना, रहना और सैक्स शामिल नहीं होता.

द एक्सप्रैस ट्रिब्यून और न्यूयार्क टाइम्स के हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान, इजिप्ट, जौर्डन, बांग्लादेश, अल्जीरिया, फिलिपींस, इंडोनेशिया, गाजा और लेबनान से न केवल इसे अपने 90 फीसदी लड़ाके मिलते हैं, बल्कि इन देशों से बड़े पैमाने पर हवाला के जरिए फंड भी इसे हासिल होता है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के मुताबिक, 22 देशों से भी ज्यादा के 3 सौ बैंक आईएसआईएस के फंड जुटाने के काम में हाथ बंटाते हैं. इस सब के अलावा आईएसआईएस बडे़ पैमाने पर खुद भी फंड जुटाता है, जिस में एक जरिया है अफगानिस्तान में पैदा होने वाले हेरोइन को अमेरिका और यूरोप के बाजारों में बेचना.

माना जाता है कि आईएसआईएस हर साल तकरीबन 70 अरब रुपए की हेरोइन अकेले अमेरिका के बाजारों में बेच देता है. इस सब के अलावा तमाम मुसलिम देश विशेषकर सुन्नी मुसलमानों वाले देश इस खूंखार संगठन को लड़ने के लिए धन देते हैं. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक आईएसआईएस को फंड देने वाली सरकारों में कतर की सरकार भी शामिल है. हालांकि एडवर्ड स्नोडेन जैसे अमेरिका के भगोड़े जासूसों का तो यह भी कहना है कि एक बड़ी मात्रा में आईएसआईएस को अमेरिका भी फंडिंग करता है. हालांकि अमेरिका इस खुलासे को बकवास बताता है.

आईएसआईएस दुनिया का न सिर्फ पहला ऐसा खूंखार संगठन है, जिस ने तमाम देशों की ताकत को खुलेआम चुनौती दी है, बल्कि यह पहला ऐसा संगठन है, जिस के पास इतना धन है कि वह यूरोप के कई छोटे मगर विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से टक्कर लेता है.

निस्संदेह इस की इस भारीभरकम अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान खुद उन आत्मघाती आतंकियों का है, जो अपनी जान हर समय हथेली पर रख कर दुनिया भर में आईएसआईएस के खौफ का सिक्का जमाते हैं. मसलन जिस आतंकी ने पेरिस में हमले की अगुवाई की थी (जिस हमले में 130 से ज्यादा लोग मारे गए थे) अकेले इस आतंकी ने 30 हजार यूरो या 32 हजार अमेरिकी डौलर का फंड उन आत्मघाती लड़ाकों के लिए इकट्ठा किया था, जिन्होंने इस हमले को अंजाम दिया था. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया का यह खूंखार संगठन क्यों कभी पैसे की दिक्कत महसूस नहीं करता.

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आईएसआईएस का खौफनाक चेहरा आखिर आईएसआईएस के युवा इतने दीवाने क्यों हैं?

एक संगठन, जो हजारों लोगों की मौजूदगी में पिंजरे में जानवरों की तरह बंद कर के बेकसूर पत्रकारों, मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधी संगठनों के सैनिकों पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है और उन के धूधू कर के जलने का सामूहिक उत्सव मनाता है. एक ऐसा संगठन, जो किसी मां के बेटे को ही मजबूर करता हो कि वह अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दे. एक ऐसा संगठन, जो बाकायदा 4-4 कैमरों के सामने इस बर्बरता से विदेशी पत्रकारों की गरदन हलाल करता हो, जैसे बकरे की कुरबानी कर रहा हो.

एक ऐसा संगठन, जो ज्ञानविज्ञान की हजारों किताबों को यह कह कर जला देता हो कि ये युवाओं को इसलाम से विमुख कर रही हैं. सवाल है, ऐसे क्रूर और खौफनाक संगठन में शामिल होने के लिए दुनिया भर से युवक और युवतियां भागे क्यों चले आते हैं? ट्यूनीशिया के गृहमंत्री लोफी बेन जेडौअ के मुताबिक तो उन के देश से हजारों युवतियां सीरिया में विद्रोह की कमान संभाले लड़ाकों को सैक्स सुख देने के लिए तथा उन के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ने के लिए चोरीछिपे देश से भाग रही हैं. ट्यूनीशिया के गृहमंत्री इसे ‘सैक्स जिहाद’ की संज्ञा देते हैं और उन के मुताबिक इसे चला रही हैं खुद ट्यूनीशिया की युवतियां.

यह बात संसद के भीतर कही गई है, जिस से इस की गंभीरता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. बेन के मुताबिक, ‘ये औरतें 20, 30 या 100 के करीब विद्रोहियों के साथ सैक्सुअल रिलेशनशिप बनाती हैं. वे इसे जिहाद-अल-निकाह (सैसुअल होली वार) की संज्ञा देते हैं और प्रैग्नेंट हो कर घर लौट आती हैं.’ इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस संगठन के प्रति युवाओं में चाहे वे लड़कियां हों या लड़के, एक अजीब किस्म की दीवानगी है. पिछले 3 सालों में हिंदुस्तान से भी कई दर्जन युवक चोरीछिपे इस में हिस्सा लेने के लिए जा चुके हैं, जिन में से कइयों को एयरपोर्ट से वापस किया गया है तो कइयों के शहीद होने की खबरें ही लौट कर आई हैं.

जबकि यह संगठन अपने लड़ाकों से भी क्रूरता बरतने में पीछे नहीं रहता. अगर इसे अंदाजा हो गया कि कोई लड़ाका छोड़ कर भागने की फिराक में है तो यह संगठन बहुत नृशंसता से उस लड़ाके को बाकी तमाम लड़ाकों के सामने मौत के घाट उतार देता है, जिस से कि बाकी लड़ाके खौफ से भर जाएं और कभी वापस जाने का साहस न कर सकें.

यह संगठन लड़कियों के साथ तो और भी ज्यादा क्रूर है. यह संगठन लड़कियों को 7 से 9 साल की उम्र में भी शादी को मंजूरी देता है और 16 साल तक में हर हाल में शादी करने की हिदायत देता है. यह संगठन खुलेआम अपने लड़ाकों को सैक्स के लिए महिलाओं की मांग करता है और साफ चेतावनी देता है कि अगर उस की बात अनसुनी की गई तो खैर नहीं. यह हैरानी की ही बात है कि इस के बावजूद इस अमानवीय और बर्बर संगठन के प्रति लड़कियां और लड़के खिंचे चले आते हैं. सवाल है कि आखिर क्यों? उन में इस के लिए इतनी दीवानगी क्यों है?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं, पूरी दुनिया के समाजशास्त्रियों और सरकारों को भी परेशान कर रहे हैं. दि इंस्टीट्यूट फौर स्ट्रैटजिक डायलौग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया या इराक जाने वाले करीब 3 हजार यूरोपीय युवाओं में 5 सौ से ज्यादा युवतियां शामिल हैं. कुछ तो किशोर उम्र की और कुछ भले ही अपवाद के तौर पर हों, मगर 50 साल के पार की प्रौढ़ महिलाएं भी हैं.

‘बिकमिंग मुलान’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये तमाम महिलाएं फिर चाहे वे जिस उम्र समूह से रिश्ता रखती हों, इस बात से प्रभावित होती हैं कि मुसलमानों के लिए नए इलाके का निर्माण हो रहा है. एक नई दुनिया, जहां किसी और के लिए कोई जगह नहीं होगी. यहां तक कि मुसलमानों में भी गैरसुन्नियों के लिए भी नहीं.

इसीलिए तमाम सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और इंग्लैंड की लड़कियां भी रोमांचित हो कर इस सपने वाले देश या भूखंड की तरफ कूच कर रही हैं. जाहिर है, वे उस सपने का हिस्सा होना चाहती हैं. यहां तक कि युद्ध के मोर्चे पर डंट कर भी और लड़ाकों के लिए सेज में बिछ कर भी. सवाल है, क्या ये युवा, खासकर लड़कियां दिमागी रूप से बीमार हैं? समाजशास्त्रियों की मानें तो हां, कुछकुछ ऐसा ही है. इन में से कई युवाओं का व्यक्तित्व कई हिस्सों में बंटा सा लगता है, विशेषकर युवतियों का. ऐसी कुछ महिलाओं, जिन के बारे में माना जाता है कि वे इस वक्त सीरिया या इराक में हैं, के ट्विटर या फेसबुक एकाउंट को देखने पर भी यह बात साफ प्रतीत होती है.

क्योंकि ये महिलाएं जहां एक पल को किसी फिल्म से संबंधित कोई बात कहती हैं या अपने पालतू कुत्ते के बच्चे के साथ अपनी वाल पर तसवीर लगाती हैं, वहीं दूसरे ही पल वे किसी सार्वजनिक जगह पर आईएस के लड़ाकों की किसी का सिर काटते या नृशंसता से पेश आने वाली तसवीरें पोस्ट कर रही होती हैं. सवाल है, आखिर ये महिलाएं ऐसा क्यों कर रही हैं? बहुचर्चित हो रही बिकमिंग मुलान रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये महिलाएं भी वही चाहती हैं, जो इन दिनों आईएसआईएस की तरफ आकर्षित दुनिया भर के खासतौर पर पश्चिम के युवा मुसलिम चाहते हैं या कहें जिन बातों से मुसलिम युवक प्रेरित हैं, उन्हीं से महिलाएं भी प्रेरित हैं.

मुसलिम युवाओं की तरह ही ये मुसलिम महिलाएं भी आईएसआईएस की तरफ खलीफा के शासन की स्थापना, पश्चिम से नफरत, पहचान की तलाश जैसे वैचारिक कारणों से प्रेरित हैं. आईएस के आतंकियों के उन के कब्जे वाले इलाके में, ऐसे ही अफगानिस्तान या बाल्कन में सक्रिय कट्टरपंथियों से इसलिए भूमिका बिलकुल अलग है, क्योंकि आईएस के आतंकी यहां एक राष्ट्र का निर्माण करना चाह रहे हैं. इसलिए यहां स्थानीयता के साथ कोई टकराव नहीं है.

इसीलिए ये गतिविधियां आतंक के मनोविज्ञान से ऊपर उठ कर एक ‘राष्ट्र निर्माण’ की प्रक्रिया का हिस्सा हो जाती हैं. इसीलिए इस में भाग लेते हुए महिलाएं भी इतिहास रचने वालों में शामिल होना चाहती हैं. फिर चाहे भले ही लड़ाकों के लिए सैक्स परोस कर या उन के लिए घर की देखरेख कर के ही क्यों न ये संभव हो. सच तो यह है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी भूमिका घर की देखरेख करने वाले के तौर पर ही देख रही हैं. इसीलिए ये महिलाएं जेहादियों को अपने पति के रूप में चुन रही हैं. कुछ महिलाओं के सोशल मीडिया एकाउंट के अनुसार, जिहादी लड़ाके से शादी करने पर उन्हें घर इत्यादि की सुविधाएं मिलती हैं यानी इस उन्माद में आर्थिक असुरक्षा भी एक कारण है.

इन महिलाओं की मंशा को उजागर करने वाली कई वेबसाइटों के मुताबिक सीरिया में होने का दावा करने वाले कुछ लोग ‘खलीफा के राज्य’ में शादी की संभावना से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं. हालांकि इन में से कई शादियां ज्यादा समय तक नहीं चलतीं, क्योंकि उन के पति लड़ाई में मारे जाते हैं. ऐसे में ये महिलाएं ट्विटर पर अपने पतियों के शहीद हो जाने की घोषणा करती हैं. आईएस से तेजी से जुड़ रही ये महिलाएं एक मामले में पुरुषों से काफी हद तक अलग हैं. इन में से ज्यादातर ने इस्लाम में धर्मांतरण  किया है यानी ये जन्म से मुसलमान नहीं थीं. इसलिए ये इस्लाम से बहुत गहरे तक वाकिफ भी नहीं हैं. शायद यही इस सवाल का जवाब भी है कि कमउम्र की लड़कियां ऐसा माहौल क्यों स्वीकार करना चाहती हैं?

असली सवाल इन के इस्लाम की ओर झुकाव का है. आईएस की तरफ तीव्रता से आकर्षित हो रही ज्यादातर लड़कियों की उम्र 18 से 25 साल के बीच है. इस्लाम ग्रहण करने वाली इन ज्यादातर लड़कियों को इस्लाम धर्म के बारे में बिलकुल भी पता नहीं होता. वास्तव में उन्होंने इंटरनेट पर इस के बारे में सर्च किया होता है, जैसा आम लोग करते हैं.

उन्होंने यूट्यूब पर ऐसे वीडियो देखे होते हैं, जिन में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए होते हैं. धर्म के बारे में जानने के लिए उन के पास यही एक आधुनिक और आसान रास्ता होता है. ऐसी लड़कियां न कभी मसजिद गई होती हैं, न किसी लाइब्रेरी. वे सौ प्रतिशत यूट्यूब, गूगल, सोशल मीडिया पर निर्भर होती हैं. इसीलिए ये इस्लाम की संवेदनशीलता से परिचित नहीं होतीं. ऐसे में ये अपना भी नुकसान करती हैं और इस्लाम को भी बदनाम करती हैं. ISIS Terrorist Organization

 

Hindi Stories: खामियों के बावजूद लहराया परचम

Hindi Stories: लक्ष्य को ध्यान में रख कर अगर मजबूत इरादों के साथ काम किया जाए तो विकलांगता भी बौनी साबित होती है, देखने और सुनने में अक्षम मनीराम शर्मा ने आईएएस अफसर और नेत्रहीन ब्रह्मानंद शर्मा ने जज बन कर यही कर दिखाया.

कहते हैं, आदमी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. अगर वह ठान ले तो कोई भी काम उस के लिए मुश्किल नहीं है. जिन लोगों ने अपनी कमी और कमजोरी को हथियार बना कर मेहनत की, उन्होंने कामयाबी की मंजिल निश्चित रूप से हासिल की. ऐसे अनेक लोगों की कामयाबी के किस्सेकहानियां हमें सुनने को मिलते रहते हैं. जो देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते या बोल नहीं सकते थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और मन की आवाज को सुनी, जुनून के साथसाथ तब तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा, जब तक उन्होंने कामयाबी हासिल नहीं कर ली.

ऐसे दिव्यांग लोगों ने अपनी शारीरिक कमियों को अपनी पढ़ाई या दूसरी विधा पर हावी नहीं होने दिया. अपनी जिद और जज्बे से दुनिया में कामयाबी की कहानी लिखी. शारीरिक रूप से विकलांग ऐसे ही कुछ लोगों की सफलता की कहानी यहां पेश है, जो आज हीरो बन कर समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं. सब से पहले हम भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी मनीराम शर्मा के बारे में बताना चाहेंगे. वह इस समय हरियाणा के मेवात के नूंह जिले में जिला परिषद में मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर तैनात हैं. राजस्थान के जिला अलवर की तहसील कठूमर के बदनगढ़ी गांव के रहने वाले मनीराम शर्मा जन्म से ही न तो पूरी तरह बोल सकते थे और न पूरी तरह सुन सकते थे. उन के पिता मजदूरी करते थे और मां बधिर थीं. पूरा परिवार अनपढ़ था.

घर की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर थी. गुजरबसर मुश्किल से होती थी. ऐसे में बच्चे का इलाज कैसे होता? इलाज न होने से 9 साल की उम्र में मनीराम की सुनने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई, लेकिन उन में पढ़ने की ललक थी. पढ़ाई के लिए उन्होंने तमाम पापड़ बेले. बदनगढ़ी गांव काफी पिछड़ा था, वहां कोई स्कूल नहीं था. आज भी इस गांव में कोई सरकारी स्कूल नहीं है. मनीराम पढ़ने के लिए 3 किलोमीटर पैदल चल कर या कभी किसी की साइकिल पर बैठ कर पास के गांव अखैगढ़ जाते थे. बाद में खेड़ली कस्बे में पढ़ने जाने लगे.

स्कूल के कुछ बच्चे उन के गूंगाबहरा होने का मजाक उड़ाते थे. लेकिन उन्होंने उन की बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया. अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाए रहा. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने सन 1990 में दसवीं की परीक्षा न सिर्फ अच्छे अंकों से पास की, बल्कि प्रदेश में उन की पांचवीं रैंक आई. स्कूल में साथी विद्यार्थी और अध्यापक जो उन्हें गूंगाबहरा कहते थे, इस के बाद उन्होंने उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया. अच्छे अंकों से दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद मनीराम के पिता ने सोचा कि बेटे को कहीं चपरासी की नौकरी ही मिल जाए तो अच्छा रहेगा. चार पैसे मिलेंगे तो घर के हालात में कुछ तो सुधार होगा.

यही सोच कर वह मनीराम को अपने परिचित एक खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के पास ले गए. उन्होंने उन से कहा, ‘‘साहब, बेटा बड़े अच्छे नंबरों से पास हुआ है. इसे कहीं चपरासी ही लगवा दो.’’

बीडीओ को जब पता चला कि मनीराम बोल और सुन नहीं सकता तो उन्होंने कहा, ‘‘यह न तो बोल सकता है और न ही सुन सकता है. ऐसे में इसे कैसे नौकरी पर रखा जा सकता है?’’

बीडीओ की बात सुन कर मनीराम के पिता की आंखों में आंसू आ गए. बापबेटे बीडीओ के औफिस से अपना सा मुंह ले कर लौट आए. घर आ कर मनीराम ने पिता को अपने इशारों से भरोसा रखने को कहा. उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वह अपनी विकलांगता को सीढ़ी बना कर सफलता का मुकाम हासिल करेंगे. इस के बाद वह जीजान लगा कर पढ़ाई करने लगे. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने बारहवीं कक्षा में पूरे प्रदेश में सातवीं रैंक हासिल की. बाद में उन्होंने बीए औनर्स में राजस्थान विश्वविद्यालय में टौप किया और गोल्ड मैडलिस्ट बने. ग्रैजुएट होने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी पाने के प्रयास शुरू किए.

राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) की परीक्षा दी. पहली परीक्षा में ही वह पास हो गए. तब उन्हें अलवर जिले के गंडाला गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौकरी मिली. मनीराम के परिवार में इस से पहले कोई सरकारी नौकरी में नहीं रहा था, इसलिए उन के लिए यही सब से बड़ी नौकरी थी. मनीराम भले ही सरकारी नौकरी पा गए थे, लेकिन उन के सपनों की उड़ान अभी थमी नहीं थी. स्कूल की नौकरी करते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और राजनीति विज्ञान से प्राइवेट एमए किया. इस के बाद परीक्षा पास कर के वह राजकीय महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान के व्याख्याता बन गए. हालांकि कि उन्हें अब पहले से ज्यादा तनख्वाह मिलने लगी थी, लेकिन वह अभी संतुष्ट नहीं थे.

वह प्रशासनिक सेवा की तैयारी में जुट गए. इस के लिए वह अथक परिश्रम करने लगे, जिस की बदौलत उन्होंने सन 2001 में राजस्थान लोक सेवा आयोग की राजस्थान प्रशासनिक सेवा की एलाइड परीक्षा पास की. इस के बाद देवस्थान विभाग में निरीक्षक के पद पर भरतपुर में उन की नियुक्ति हुई. इस बीच उन्होंने एमफिल, नेट, जेआरएफ करने के साथ पीएचडी भी कर ली थी. बाबू से अफसर बनने के बाद भी मनीराम चैन से नहीं बैठे. उन्हें अपनी मंजिल आगे नजर आ रही थी. हर शिक्षित युवा की तरह मनीराम का सपना भी आईएएस औफिसर बनने का था. नौकरी करते हुए वह संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी करने लगे.

उन्होंने सन 2005 में पहली बार यह परीक्षा दी और पहली बार में ही उन्होंने यह परीक्षा पास कर ली. पूरे देश में उन की 27वीं रैंक आई. वह बहुत खुश हुए. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. लेकिन यह खुशियां ज्यादा दिनों की नहीं रहीं. आईएएस परीक्षा का परिणाम आने के कुछ दिनों बाद सरकार ने उन्हें सौ फीसदी डीफनेस (बहरेपन) की वजह से रिजैक्ट कर दिया. रिजैक्ट होने से मनीराम उदास हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बल्कि दोगुने उत्साह से फिर आईएएस परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. सन 2006 में उन्होंने फिर आईएएस परीक्षा पास की. अफसरों ने इस बार भी उन्हें डीफनेस के कारण मैडिकल ग्राउंड पर अनफिट घोषित कर दिया.

मनीराम को फिर झटका लगा. उन का बहरापन उन की आईएएस की नौकरी में आड़े आ रहा था. जबकि वह हर हाल में आईएएस की नौकरी करना चाहते थे. यह तभी संभव था, जब उन के कान का इलाज हो यानी कान का औपरेशन. इस औपरेशन में कई लाख रुपए का खर्चा था और उन के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे. अब तक लोग मीडिया द्वारा इस विलक्षण प्रतिभा के बारे में जान चुके थे. मीडिया में खबरें छपने पर लोगों ने उन के इलाज के लिए पैसे देने शुरू कर दिए.

इस अभियान में 8 लाख रुपए इकट्ठा हुए. इस धनराशि से जून, 2007 में उन के कान का औपरेशन कराया गया. औपरेशन के बाद उन्हें आंशिक रूप से सुनाई देने लगा. डाक्टरों के प्रयास से मनीराम ने बुदबुदा कर थोड़ाबहुत बोलना भी शुरू कर दिया. इस के बाद मनीराम शर्मा ने सन 2009 में तीसरी बार आईएएस की परीक्षा पास की. मैडिकल बोर्ड ने उन की जांच की. उन की विलक्षण लिप रीडिंग देख कर सारे अधिकारी दंग रह गए. मैडिकल जांच की मशीनें उन के सौ फीसदी बहरेपन की पुष्टि कर रही थीं. लेकिन उन की कार्यशैली बता रही थी कि बहरापन आंशिक है.

मैडिकल बोर्ड ने शर्मा को आंशिक डीफनेस का प्रमाणपत्र दे दिया. आंशिक डीफनेस के कारण इस बार भी आईएएस की नौकरी मिलने में तमाम तरह की अड़चनें आईं. काफी भागदौड़ के बाद प्रधानमंत्री औफिस की पहल पर मनीराम को आईएएस की नौकरी के योग्य माना गया. इस तरह बधिर होने वाले वह देश के पहले आईएएस बने. मनीराम को मणिपुर त्रिपुरा कैडर मिला. मणिपुर के तमेंगलोंग तथा चुरा चांदपुर में मनीराम शर्मा ने असिस्टैंट कमिश्नर ऐंड सब डिवीजनल मजिस्ट्रैट के पद पर करीब 5 सालों तक नौकरी की.

उस के बाद जनवरी, 2015 में केंद्रीय कैबिनेट की अपौइंटमेंट कमेटी ने उन के कैडर बदलने को स्वीकृति दे दी. कैडर बदलने पर मनीराम हरियाणा आ गए. हरियाणा सरकार ने उन्हें सब से पहले एडिशनल डिप्टी कमिश्नर एंड डिस्ट्रिक्ट रूरल डैवलपमेंट अथौरिटी का चीफ एक्जीक्यूटिव औफिसर नियुक्त किया. मनीराम शर्मा का कहना है कि बहरापन उन के परिवार में वंशानुगत है. उन की नानी बहरी थीं. नानी के कारण मां और मामा भी बहरे थे. उन के भाईबहन भी बहरे हैं. उन का बेटा भी बहरा था. नानी से चले आ रहे बहरेपन के कारण परिवार में 35 लोग बहरे हैं. लेकिन मनीराम ने अपनी इस कमी को दरकिनार कर हिम्मत और हौसलों के जरिए एक प्रेरणादायक इतिहास रच दिया.

हम आगे बात करते हैं, राजस्थान के पहले दृष्टिहीन जज ब्रह्मानंद शर्मा की. नियति भले ही किसी को कमजोर कर दे, लेकिन मन और हौसला मजबूत हो तो किसी को भी मनचाही ऊंचाई छूने से नहीं रोका जा सकता. अपनी कमजोरी को ताकत बना कर आगे बढ़ने वाले ही सफलता की मंजिल हासिल करते हैं. राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोटरास गांव के रहने वाले ब्रह्मानंद शर्मा ऐसी ही शख्सियत हैं. उन्होंने इसी साल 11 जनवरी को चित्तौड़गढ़ में अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रैट का पद संभाला है. दृष्टिहीनता को मात दे कर वह अब न्यायिक क्षेत्र जैसी महत्त्वपूर्ण सेवा में चयनित हो कर लोगों के लिए न्याय की ज्योति जला रहे हैं. वह राजस्थान न्यायिक सेवा के पहले दृष्टिहीन मजिस्ट्रैट हैं.

ब्रह्मानंद शर्मा जन्म से दृष्टिहीन नहीं थे. वह पहले भलेचंगे थे. उन की नेत्र ज्योति भी ठीक थी. उन के सामने किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने बचपन से ही न्यायाधीश बनने का सपना देखा था. स्कूल और कालेज की पढ़ाई के दौरान वह विभिन्न अदालतों के फैसलों की कतरनें घर ला कर उन का अध्ययन किया करते थे. पिता के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद घर में कुछ आर्थिक परेशानी हुई तो ब्रह्मानंद ने पढ़ाई पूरी कर के सरकारी नौकरी की कोशिश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप सन 1996 में राजस्थान के सार्वजनिक निर्माण विभाग में उन्हें कनिष्ठ लिपिक की नौकरी मिल गई.

उन की पहली पोस्टिंग उन के गृह जनपद भीलवाड़ा में हुई.  लेकिन अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं थे. उन का सपना मजिस्ट्रैट बनने का था. अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह दोगुने उत्साह से जुट गए. इसी बीच कुछ कारणों से उन की आंखों का रेटिना कमजोर होता चला गया, जिस से उन की आंखों की रोशनी कम होती चली गई. आंखों से कम दिखाई देने के कारण उन्हें कामकाज के साथ पढ़ाई करने में परेशानी होने लगी. उन्होंने अपना बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उसी बीच उन्हें तेज बुखार आया. कई दिनों तक बुखार रहने के कारण उन की आंखों की रौशनी पूरी तरह से चली गई. बुखार तो उतर गया, लेकिन उन की आंखों की रौशनी वापस नहीं आ सकी.

आंखों से दिखना बंद होने से ब्रह्मानंद शर्मा की जिंदगी में ही अंधेरा छा गया. उन्हें अपने सपने मिट्टी में मिलते नजर आने लगे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्हें एक ही धुन सवार थी कि उन्हें न्यायाधीश बनना है तो बनना है. इस के लिए कानून की पढ़ाई करनी जरूरी थी. उन्होंने एक लौ कालेज में दाखिला ले लिया. चूंकि वह देख नहीं सकते थे, इसलिए अपनी पत्नी और भतीजे की आवाज में कोर्स को रिकौर्ड करवा कर उसे रात में सुनते थे. इसी तरह उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद उन्होंने पहली बार सन 2008 में राजस्थान न्यायिक सेवा (आरजेएस) की परीक्षा दी, लेकिन इस परीक्षा में वह सफल नहीं हो सके.

उन्हें भीलवाड़ा में पढ़ाई के पूरे संसाधन नहीं मिल रहे थे, इसलिए वह जयपुर आ गए. जयपुर में आरजेएस परीक्षा की कोचिंग करने के लिए जब वह एक कोचिंग सेंटर में गए तो दृष्टिहीन होने की वजह से संचालक ने कहा कि वह एडमिशन ले कर क्या करेंगे, घर जाएं, अपना पैसा और समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं? ब्रह्मानंद शर्मा ने उस से एक मौका देने को कहा. उन का हौसला और जज्बा देख कर कोचिंग संचालक ने कहा, ‘‘एक घंटे में सेक्शन 144 याद कर के आओ, उस के बाद तुम्हारे एडमिशन के बारे में सोचेंगे.’’

ब्रह्मानंद शर्मा ने कोचिंग के बाहर ही भतीजे से सेक्शन 144 सुना और करीब 1 घंटे बाद उन्होंने उसे संचालक को ज्यों का त्यों सुना दिया. उन की बुद्धि को देख कर कोचिंग सेंटर का संचालक हैरान रह गया. इस के बाद उन्हें कोचिंग में दाखिला मिल गया. इस बीच ब्रह्मानंद शर्मा ने राजस्थान न्यायिक सेवा भर्ती परीक्षा 2011 के लिए आवेदन कर दिया और जीजान से परीक्षा की तैयारी में जुट गए. उन की मेहनत रंग लाई और परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो ब्रह्मानंद शर्मा की 83वीं रैंक आई. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. उन्हें अपने सपने पूरे होते नजर आने लगे, लेकिन किस्मत को अभी उन की एक परीक्षा और लेनी थी. राजस्थान में शानदार रैंक आने के बावजूद दृष्टिहीन होने की वजह से उन की ट्रेनिंग पर रोक लगा दी गई.

इस के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा. हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने ब्रह्मानंद शर्मा की नियुक्ति की सिफारिश की. एक साल की ट्रेनिंग के बाद उन्होंने चित्तौड़गढ़ में न्यायिक मजिस्टै्रट का पदभार संभाला. ब्रेल लिपि कंप्यूटर और सहायक की मदद से उन्होंने पहले ही दिन एक अनुभवी जज की तरह सुनवाई कर फैसले भी किए. ब्रह्मानंद शर्मा कहते हैं कि हौसला हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है. किसी को भी विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए. हालात से लड़ कर आगे बढ़ें तो सफलता जरूर आप के कदम चूमेगी.

रंगमंच पर कोई रीटेक नहीं होता. उस समय गलतियां सुधारने का भी मौका नहीं मिलता. मंच पर जो अभिनय किया जाता है, उसे सामने बैठा दर्शक सीधे देखता है. कलाकार के पास या फेल होने का फैसला दर्शक करते हैं. लेकिन जयपुर के दृष्टिहीन बच्चे किस तरह अपने अभिनय की प्रस्तुति करते हैं, उसे देख कर आप चौंके बिना नहीं रह सकते. इन बच्चों को तराशा है मशहूर रंगकर्मी भारतरत्न भार्गव ने. राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर में हिंदी के प्रोफेसर रह चुके भारतरत्न भार्गव संगीत नाटक एकेडमी नई दिल्ली के उपसचिव रहे हैं. थिएटर के क्षेत्र में भारतरत्न भार्गव देशभर की जानीमानी हस्ती हैं. बीबीसी लंदन और आल इंडिया रेडियो के लिए भी वह सेवाएं दे चुके हैं.

आजकल वह कला और रंगमंच को समर्पित जयपुर के संस्थान नाट्यकुलम में कुलगुरु के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ढेर सारे अवार्ड और पुरस्कारों से सम्मानित भारतरत्न भार्गव ने अनेक नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया है. मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर पर उन्होंने एक किताब लिखी है- रंग हबीब, जिसे नैशनल स्कूल औफ ड्रामा ने प्रकाशित किया है.

भारतरत्न भार्गव बताते हैं, ‘मैं करीब डेढ़ साल पहले कुछ दृष्टिबाधित बच्चों के संपर्क में आया. वे खेलखेल में भावभंगिमाएं बना रहे थे. मैं ने तभी ठान लिया कि इन्हें रंगमंच की बारीकियां सिखाऊंगा. शुरुआत की तो लोगों ने मजाक उड़ाया. लोग कहते रहे कि जिन्हें खुद नहीं दिखता, उन्हें देखने कौन आएगा? लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी और ये बच्चे मेरी कल्पना से भी आगे निकले. आम रंगकर्मी जो अहसास व्यक्त नहीं कर पाते, वैसा ये बच्चे कर दिखाते हैं. शायद इन का मन ही वह आंख हैं, जो इन्हें सब कुछ सिखा देता है.

‘शुरुआत में मैं इन बच्चों को भावभंगिमाएं सिखाने के लिए अंगुलियों से इन के चेहरों पर भाव उकेरता था. अभिनय करते समय ये दृष्टिहीन बच्चे स्टेज से गिर न जाएं, इस के लिए संगीत की मदद ली. ढोलक, मंजीरे की ताल आदि सुन कर अब ये बच्चे समझ जाते हैं कि मंच पर कब चलना है, कहां रुकना है. इसलिए अब ये अभिनय करते हुए गिरते नहीं हैं. इन्हीं में से कुछ बच्चों को संगीत का क्लू देने के लिए प्रशिक्षित किया. बेजान आंखों को सपने देने से इन्हें एक नई ऊर्जा मिलती है.’

78 साल के भारतरत्न भार्गव जब इन दृष्टिहीन बच्चों को अभिनय सिखाते हैं तो अच्छाभला अभिनेता भी उन का समर्पण देख कर हैरान रह जाता है. चांदी से चमकते सिर व दाढ़ी के बालों के बीच उन के चेहरे पर वह तेज होता है, जिसे उन के दृष्टिहीन शिष्य भले ही नहीं देख पाते, लेकिन उन की सिखाई बातों को तुरंत ग्रहण कर लेते हैं.

फोटोग्राफी एक ऐसी कला है, जिस में आंखों के द्वारा देखे गए नजारों को कैमरे में कैद किया जाता है. जाहिर है, कोई भी फोटोग्राफर उसी वस्तु के फोटो खींचता है, जो उसे उपयोगी लगती है. लेकिन पश्चिम बंगाल के कुछ फोटोग्राफर ऐसे हैं, जो पूरी तरह दृष्टिहीन हैं. इन दृष्टिहीन बच्चों द्वारा की गई फोटोग्राफी देख कर आप हैरान रह जाएंगे. इन दृष्टिहीन बच्चों को फोटोग्राफी में पारंगत किया है जयपुर की फोटोग्राफर पद्मजा शर्मा उर्फ गुनगुन और चंदन एस. राठौड़ ने. गुनगुन तथा चंदन एस. राठौड़ बताते हैं कि पहले यह प्रयास उन्होंने जयपुर के दृष्टिबाधित बच्चों को ले कर करना चाहा, पर अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल सका. बाद में पश्चिम बंगाल के सियराफुली कस्बे की सोसायटी फौर ब्लाइंड के संपर्क में आए. सन 2014 के अप्रैल महीने में गुनगुन व राठौड़ ने मिल कर इस सोसायटी के 5 बच्चों की फोटोग्राफी कार्यशाला की.

यह कार्यशाला 7 दिनों तक चली. इस कार्यशाला का विचार शिप औफ थीसिस फिल्म देख कर आया था. उस फिल्म में एक दृष्टिहीन फोटोग्राफर होती है. इसी विचार को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने कई ब्लाइंड सेंटरों पर बात की, लेकिन बात नहीं बनी. कुछ लोगों को लगता था कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. कुछ लोग यह कह कर मना कर देते थे कि इस से कोई फायदा नहीं होगा. कुछ लोग कहते थे कि ऐसा हो ही नहीं सकता. कुछ लोग क्राफ्ट या म्यूजिक की क्लास लगवाने की सलाह देते थे. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

पश्चिम बंगाल के सोसायटी फौर ब्लाइंड सेंटर पर ही कार्यशाला की. इस बीच वह ब्लाइंड फोटोग्राफरों के बारे में भी पढ़ते रहे, उन की तसवीरें देखीं, तसवीरों तक पहुंचने की यात्रा को जानने की कोशिश करते रहे. कार्यशाला में पहले दिन उन्होंने सूरदास को पढ़ा. सूरदासजी देख नहीं सकते थे, लेकिन उन्होंने कितने सारे दृश्य लिखे हैं. इसी तरह बच्चों को ध्वनि और अहसास के सहारे फोटो खींचने के बारे में बताया. उन्होंने इन बच्चों के हाथ में औटो मोड डिजिटल कैमरे दे कर उस की सारी तकनीकी प्रक्रिया समझाई. फिर औब्जेक्ट को छू कर उस से एक निश्चित दूरी बना कर फोटो खींचना सिखाया. इस के बाद आवाज सुन कर उस दिशा में क्लिक करना सिखाया. आवाज के आधार पर फोटो खींचने का उन का प्रयास बेहद उत्साहजनक रहा.

ये बच्चे पहले कैमरे को उसी अंदाज में आंख पर लगाते हैं, जैसे आम लोग करते हैं. इस के बाद बटन पर अंगुली सेट करते हैं और उस के बाद आवाज की दिशा में क्लिक कर के दृश्य को कैमरे में कैद कर लेते हैं. अब तो ये बच्चे फोटोग्राफी में इतने पारंगत हो गए हैं कि कभी मैदान, कभी पहाड़, तो कभी पानी के नजारों तक को कैमरे में अपने अंदाज में उतार लेते हैं. सोसायटी फौर ब्लाइंड के 5 बच्चों फणी पाल, मिलन शर्मा, अंजन शेरेन, टिंकू हाजरा और दुलीचंद राय के खींचे गए फोटोग्राफ्स की प्रदर्शनी जयपुर के जवाहर कला केंद्र में इसी साल 12 से 16 फरवरी तक लगाई गई थी.

दृष्टिहीन बच्चों द्वारा अपनी शब्दभेदी ताकत से केवल आवाज सुन कर खींची गई तसवीरों की प्रदर्शनी जयपुर के हजारों लोगों ने देखी. जो भी इस प्रदर्शनी को देखने आया, वह इन बच्चों की अनूठी पहल को देख कर दंग रह गया. दर्शकों के मन में ढेर सारे सवाल और यह जानने की इच्छा थी कि आखिर इन दृष्टिहीन बच्चों ने कैसे इतनी अच्छी तसवीरें खींची? दर्शकों के इन सवालों के जवाब भी वहां मौजूद इन बच्चों ने ही दिए.

कहानी दृष्टिहीन फोटोग्राफरों की चल रही है तो मुंबई में एक ऐसा शख्स भी है, जो नामी फिल्म कलाकारों को उन की महक के सहारे कैमरे में कैद करता है. इस फोटोग्राफर का नाम है भावेश पटेल. हाल ही में बौलीवुड एक्ट्रैस कैटरीना कैफ का एक वीडियो यू ट्यूब पर आया है, जिस में वह एक परफ्यूम के लिए शूट कर रही हैं. इस में कैटरीना की फोटोग्राफी भावेश ने की है. भावेश नेत्रहीन हैं. वह इस वीडियो में कह रहे हैं, ‘मैं जब भी फोटोग्राफ खींचता हूं, वह महक ही होती है, जो उस की तसवीर मेरे मन में बना देती है और उस के बाद मुझे करना होता है बस एक क्लिक.’

वीडियो में दिखाया गया है कि भावेश के खींचे फोटोग्राफ देख कर कैटरीना कैफ मुसकरा कर कहती हैं, ‘दे आर अमेजिंग’. बहरहाल, ये नेत्रहीन, मूकबधिर अपने जज्बे से एक नई कहानी लिख कर लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं. फिर भी यह चिंता की बात है कि भारत में सन 2011 की जनगणना के अनुसार, 50 लाख 32 हजार 463 नेत्रहीन हैं. इन में पुरुषों की संख्या 26 लाख 38 हजार 516 एवं महिलाओं की संख्या 23 लाख 93 हजार 947 है. सरकार को चाहिए कि इन नेत्रहीनों के समुचित विकास के लिए ठोस नीति बनाए. Hindi Stories