Suicide Case: कमला पसंद मालिक की बहू दीप्ति ने किया सुसाइड

Suicide Case: एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने पूरे भारत को झकझोर कर रखा दिया है. जहां देश के मशहूर पान मसाला कंपनी के मालिक ‘कमला पसंद’ और ‘राजश्री’ के मालिक कमल चौरसिया की बहू दीप्ति चौरसिया ने आत्महत्या कर ली. आखिर ऐसी क्या वजह थी कि इतनी बड़ी कंपनी की बहू को आत्महत्या करनी पड़ी. चलिए जानते हैं इस परिवार से जुड़ी पूरी स्टोरी को, जो आप को बताएगी पूरा सच.

यह दर्दनाक घटना दिल्ली के वसंत विहार से सामने आई है. यहां दीप्ति चौरसिया ने अपने घर में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली. शव को सबसे पहले उस के पति हरप्रीत चौरसिया ने फंदे पर लटका देखा. इस के बाद वह पत्नी को अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को दीप्ति के पास एक डायरी मिली, जिस में दीप्ति ने अपने पति से होने वाले झगड़े के बारे में लिखा था.

दीप्ति ने डायरी में लिखा, ‘अगर रिश्ते में प्यार और भरोसा नहीं तो फिर उस रिश्ते में जीने की वजह क्या है. अब मैं और सहन नहीं कर सकती.’

पुलिस के मुताबिक, दीप्ति का पूरा परिवार अलगअलग घरों में रहता है. आप को बता दें कि दीप्ति चौरसिया की शादी 2010 में हरप्रीत चौरसिया से हुई थी. बताया जा रहा है कि हरप्रीत ने 2 शादियां की थीं. दीप्ति का 14 साल का बेटा है. वहीं दूसरी पत्नी दक्षिण सिनेमा में काम करती है. उस की भी एक बेटी है. दीप्ति के भाई ऋषभ ने मीडिया को बताया है कि हरप्रीत के कई महिलाओं से अवैध संबंध हैं. 2011 में पता चला कि बहन के साथ जीजा और सास मारपीट करते थे. जब मारपीट हुई तो हम अपनी बहन को कोलकाता ले आए थे, लेकिन सास उसे वापस ले गई थी. फिर भी उस के साथ मारपीट की.

भाई ने बताया कि बहन मुझ से कहती थी मुझे रोज प्रताड़ित किया जाता है. भाई ने कहा मुझे नहीं पता कि मेरी बहन ने सुसाइड किया या मारी गई है. मैं ने अपनी बहन से 2 दिन पहले बात की थी. मुझे सिर्फ इंसाफ चाहिए. दक्षिणपश्चिम दिल्ली के वसंत विहार थाने की पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है. Suicide Case

Contract Killing: सुहाग मिटाने की सुपारी

Contract Killing: सुमन के संबंध धीरज से बने तो उसे अपना पति कांटे की तरह चुभने लगा. इस कांटे को निकालने के लिए उस ने ऐसी कोन सी चाल चली कि प्रेमी उस के झांसे में आ गया. उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ के थाना मडराक के गांव नोहटी के रहने वाले सरदार सिंह का बड़ा बेटा रामजीलाल पढ़लिख कर जानवरों का इलाज करने लगा था तो उस से छोटा राजवीर खेती के कामों में उन की मदद करने लगा था. रामजीलाल की जानवरों के इलाज की दुकानदारी ठीकठाक चलने लगी तो उस के विवाह के लिए लोग आने लगे.

कई लड़कियां देखने के बाद घर वालों ने उस के लिए अलीगढ़ की सुमन को पसंद किया. शादी के बाद सुमन ससुराल आई तो जल्दी ही उस ने घर की सारी जिम्मेदारियां संभाल लीं. जिस से गांव में उस की गिनती अच्छी बहुओं में होने लगी. उस के बाद राजवीर की भी शादी हो गई. उस की पत्नी तेजतर्रार थी, उस की घर में किसी से नहीं पटी तो राजवीर उसे ले कर अलग मकान में रहने लगा. धीरेधीरे परिवार बढ़ने लगा. रामजीलाल और सुमन 5 बच्चों के मातापिता बने, जिन में 3 बेटियां और 2 बेटे थे. सरदार सिंह गांव के खातेपीते किसान थे. उन के पास खेती की काफी जमीन थी. सुखीसंपन्न होने की वजह से सब कुछ बढि़या चल रहा था.

लेकिन समय कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता. रामजीलाल की डाक्टरी बढि़या चल रही थी. कमाई भी अच्छी थी. बच्चे अच्छे से पढ़लिख रहे थे. लेकिन रामजीलाल ने उसी बीच अधिक कमाई के लिए एक ऐसा काम शुरू किया, जो उन के लिए नुकसानदायक ही नहीं सिद्ध हुआ, बल्कि जिंदगी ले डूबा. साल भर पहले रामजीलाल ने ब्याज पर रुपए देने के लिए अपनी कुछ जमीन 9 लाख रुपए में बेच दी. उसी बीच उस की मुलाकात धीरज से हुई. वह पड़ोसी गांव देदामई के रहने वाले सत्यवीर का बेटा था. वह उस के गांव किसी जानवर के इलाज के लिए गया था.

धीरज को पता था कि रामजीलाल ब्याज पर रुपए देता है. इसलिए उस ने कहा, ‘‘तुम रुपए तो ब्याज पर देते ही हो, मेरी बहन की शादी है, अगर कुछ रुपए मुझे भी ब्याज पर दे देते तो मेरी बहन की शादी अच्छे से हो जाती.’’

रामजीलाल ने कुछ सोचविचार कर कहा, ‘‘इस तरह की बातें यहां नहीं हो सकतीं. ऐसा करो, तुम मेरे घर आ जाओ. वहां बैठ कर आराम से बातें करेंगे.’’

धीरज को लगा कि रामजीलाल उसे पैसा देना चाहता है, इसीलिए उस ने उसे घर बुलाया है. अगले दिन वह रामजीलाल के घर पहुंच गया. उस ने रामजीलाल से पूछा, ‘‘डाक्टर साहब, आप ने कुछ सोचा?’’

‘‘किस बारे में?’’ रामजीलाल ने पूछा.

‘‘अरे वही पैसे के बारे में. मैं ने आप से बहन की शादी के लिए कुछ पैसों के लिए कहा था न.’’

‘‘अच्छा पैसा, वह तो मिल जाएगा. बताओ कितना पैसा चाहिए?’’

‘‘डाक्टर साहब, अगर 3 लाख रुपए मिल जाते तो मेरा काम हो जाता.’’ धीरज ने कहा.

रामजीलाल ने ब्याज पर रुपए देने के लिए ही जमीन बेची थी. रुपए उस के पास थे ही, इसलिए उस ने कहा, ‘‘रुपए तो मैं दे दूंगा, लेकिन समय से ब्याज देने के साथ रुपए भी जल्दी लौटाने की कोशिश करना.’’

‘‘डाक्टर साहब पैसा जल्दी लौटा दूंगा तो मेरा ही फायदा होगा न, इसलिए मैं कोशिश करूंगा कि जितनी जल्दी हो सके, आप के कर्ज से मुक्ति मिल जाए.’’ धीरज बोला.

इस के बाद रामजीलाल ने पत्नी को बुला कर 3 लाख रुपए लाने को कहा तो उस ने पूछा, ‘‘इतने रुपयों का क्या करोगे?’’

रामजीलाल ने धीरज की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘इन्हें पैसों की जरूरत है, इसलिए मैं इन्हें ब्याज पर ये रुपए दे रहा हूं. बहन की शादी करने के बाद धीरेधीरे यह मेरे रुपए लौटा देंगे.’’

रामजीलाल रुपए ब्याज पर देता ही था, इसलिए सुमन ने कोई ऐतराज नहीं किया. वह अंदर गई और रुपए ला कर दे दिए. रामजीलाल ने लिखापढ़ी कर के धीरज को रुपए दे दिए. धीरज का काम हो गया तो वह खुश हो कर चला गया. रामजीलाल को अपनी दुकानदारी से ही समय नहीं मिलता था, इसलिए वह अपने खेतों को पट्टे पर देता था. दूसरी ओर धीरज खेत पट्टे पर ले कर खेती करता था. धीरज से संपर्क बना रहे, इस के लिए रामजीलाल ने अपने खेत उस को पट्टे पर दे दिए. इस तरह उस का रामजीलाल के यहां आनाजाना हो गया.

रामजीलाल सुबह निकल जाता था तो अकसर देर शाम को ही लौटता था. इस बीच घर के काम सुमन और बच्चों को देखने पड़ते थे. लेकिन जब से धीरज उस के घर आनेजाने लगा था, जरूरत पड़ने पर वह उस की मदद कर देता था. बदले में सुमन उसे चायनाश्ता करा देती थी. खाने का समय होता तो खाना भी खिला देती. ऐसे में ही किसी दिन धीरज ने कहा, ‘‘भाभी, आप कितना काम करती हैं. इस के बावजूद डाक्टर साहब आप की परवाह नहीं करते?’’

सुमन ने उसे तिरछी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो वह हमारी परवाह नहीं करते. हमारे लिए ही तो वह सुबह से शाम तक भागते रहते हैं. जब शादी हो जाएगी तो तुम्हें भी अपने परिवार के लिए इसी तरह भागदौड़ करनी पड़ेगी.’’

दरअसल, रामजीलाल के घर आतेजाते धीरज का दिल सुमन पर आ गया था. इसलिए वह उसे फंसाने के लिए चारा डालने लगा था. सुमन की इस बात से वह निराश तो हुआ, लेकिन हिम्मत नहीं हारा. एक दिन सुमन को घर का सामान खरीदने के लिए बाजार जाना था. वह तैयारी कर रही थी कि तभी धीरज आ गया. सुमन को तैयार होते देख उस ने पूछा, ‘‘कहीं जा रही हो क्या भाभी?’’

‘‘घर का सामान खरीदना है, बाजार जा रही हूं. डाक्टर साहब के पास तो समय है नहीं, इसलिए मुझे ही जाना पड़ रहा है.’’ सुमन ने कहा.

‘‘आप अकेली क्यों जा रही हैं. मैं चलता हूं न आप के साथ.’’

सुमन को भला क्यों ऐतराज होता. वह धीरज के साथ मोटरसाइकिल से बाजार पहुंच गईं. सामान खरीद कर थैला धीरज ने उठाया तो सुमन हंसते हुए बोली, ‘‘इतने दिन शादी के हो गए, डाक्टर कभी मेरे साथ बाजार नहीं आए.’’

‘‘आप न होती तो शायद डाक्टर को रोटी भी न मिलती.’’ धीरज ने कहा.

धीरज सुमन को ले कर घर पहुंचा तो सुमन ने कहा, ‘‘मैं खाना बनाने चल रही हूं. अब खाना खा कर जाना.’’

धीरज बाहर बरामदे में पड़ी चारपाई पर लेट गया. सुमन ने उसे पहले चाय पिलाई. उस के बाद खाना बना कर खिलाया. धीरज मन ही मन सोचने लगा कि सुमन के दिल में जरूर उस के लिए कोई नरम कोना है, तभी तो वह उस का इतना खयाल रखती है. सवाल यह था कि वह उस के दिल की बात जाने कैसे? उसी दौरान धीरज अलीगढ़ गया. वहां हाथ से बनी चीजों की प्रदर्शनी लगी थी. वह प्रदर्शनी देखने गया तो वहां उसे एक दुकान पर एक जोड़ी झुमके पसंद आ गए.  उस ने उन्हें खरीद लिया. अगले दिन दोपहर को वह रामजीलाल के घर पहुंचा तो सुमन घर में अकेली मिल गई. सुमन ने धीरज को बैठाया, चायपानी पिलाया. इस के बाद उस ने झुमके की पुडि़या सुमन को थमा दी. सुमन ने पुडि़या खोली, झुमके देख कर बोली, ‘‘झुमके तो अच्छे हैं. किस के लिए लाए हो?’’

‘‘आप भी भाभी कमाल करती हैं. आप के हाथ में दिए हैं तो आप के लिए ही होंगे. कौन मेरी लुगाई बैठी है कि उस के लिए लाऊंगा.’’

‘‘मेरे लिए क्यों खरीद लाए भई?’’ सुमन ने कहा.

‘‘अच्छे लगे, इसलिए खरीद लाया. अब जरा पहन कर दिखाइए.’’

सुमन हंसते हुए अंदर गई और झुमके पहन कर बाहर आई तो धीरज बोला, ‘‘अरे भाभी, यह तो आप पर बहुत फब रहे हैं.’’

‘‘क्यों झूठी तारीफ करते हो.’’ शरमाते हुए सुमन ने कहा.

‘‘सच कह रहा हूं भाभी, डाक्टर साहब देखेंगे तो वह भी यही कहेंगे.’’

सुमन ने आह भरते हुए कहा, ‘‘डाक्टर साहब के पास इतना समय कहां है कि वह मुझे देख कर मेरी तारीफ करें. वह तो सिर्फ जानवरों को देखते हैं और उन्हीं की तारीफ करते हैं.’’

धीरज मुसकराया, क्योंकि सुमन की कमजोर नस उस के हाथ में आ गई थी. उस की समझ में आ गया कि पतिपत्नी के बीच पतली सी दरार है, जिसे वह कोशिश कर के चौड़ी कर सकता है. इस के बाद धीरज सुमन के करीब जाने की कोशिश करने लगा. सुमन को भी उस का आनाजाना और उस से बातें करना अच्छा लगने लगा था. लेकिन धीरज को अपनी मंजिल नहीं मिल रही थी. उसी बीच रामजीलाल ने धीरज से अपने रुपए लौटाने को कहा. धीरज इस से परेशान हो गया, क्योंकि उस के पास लौटाने के लिए रुपए नहीं थे.

सही बात तो यह थी कि अब उस की नीयत खराब हो चुकी थी. वह रामजीलाल के रुपए नहीं लौटाना चाहता था. इसलिए वह सुमन को जरिया बना कर रामजीलाल के रुपए मारने के बारे में सोचने लगा. ऐसा तभी संभव था, जब सुमन उस के कब्जे में आ जाती. लेकिन दिल की बात वह सुमन से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. एक दिन दोपहर को धीरज सुमन के घर पहुंचा तो सुमन ने कहा, ‘‘क्या इधरउधर मारेमारे फिरते हो, शादी क्यों नहीं कर लेते?’’

‘‘शादी…? भाभी अभी कुछ दिनों पहले ही तो मैं ने अपनी बहन की शादी की है. आप को तो पता ही है कि उस के लिए मैं ने डाक्टर साहब से कर्ज लिया था. अभी वही नहीं दे पाया. पहले उस से तो उऋण हो जाऊं, उस के बाद अपने बारे में सोचूं.’’

डाक्टर साहब के पैसों की चिंता मत करो.’’ सुमन ने तिरछी नजरों से ताकते हुए कहा, ‘‘तुम मुझे बहुत डरपोक लगते हो. जो मन में है, वह भी नहीं कह सकते.’’

‘‘भाभी, मैं ने आप की बात का मतलब नहीं समझा.’’

‘‘रात को आना, डाक्टर साहब आज रात घर में नहीं रहेंगे, तब समझा दूंगी.’’ सुमन ने मुसकराते हुए कहा.

धीरज का दिल एकदम से धड़क उठा. वह भाग कर घर गया और नहाधो कर रात होने का इंतजार करने लगा. लेकिन सूर्य था कि अस्त ही नहीं हो रहा था. किसी तरह शाम हुई तो वह गांव से चल पड़ा. नोहटी पहुंचतेपहुंचते अंधेरा हो चुका था. रामजीलाल के घर पहुंच कर उस ने धीरे से दरवाजा खटखटाया. सुमन ने दरवाजा खोला तो वह चोरों की तरह अंदर आ गया. घर में सन्नाटा था. शायद बच्चे सो चुके थे. सुमन उस का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई. वासना से वशीभूत सुमन भूल गई कि वह पति से बेवफाई करने जा रही है. धीरज को पता था कि सुमन ने उसे यहां क्यों बुलाया है. वह पलंग पर बैठ गया तो उस से सट कर बैठते हुए सुमन ने कहा, ‘‘मुझे तुम से प्यार हो गया है धीरज.’’

‘‘लेकिन डाक्टर साहब, अगर उन्हें पता चल गया तो…?’’

‘‘किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. तुम भी तो मुझ से प्यार करते हो न?’’

धीरज ने कुछ कहने के बजाय सुमन को बांहों में समेट लिया तो वह उस से लिपट गई. इस के बाद दोनों ने वह गुनाह कर डाला, जिस का अंजाम आगे चल कर बुरा ही होता है. रात दोनों की अपनी थी, क्योंकि घर का मुखिया घर में नहीं था, इसलिए उन्हें कोई डर नहीं था. लेकिन वे जिस दलदल में उतर गए थे, उस से वे चाह कर भी बाहर नहीं आ सकते थे. सुबह होते ही धीरज चला गया. दोपहर को रामजीलाल आया तो सुमन औंधे मुंह चारपाई पर लेटी थी. उसे समझते देर नहीं लगी कि पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है. उसे क्या पता कि वह रात की थकान उतार रही है.

धीरेधीरे सुमन और धीरज का प्यार परवान चढ़ने लगा. मौकों की कमी नहीं थी. रामजीलाल जानवरों के इलाज के लिए दूसरे गांवों में जाता ही रहता था. उसी बीच सुमन धीरज को घर बुला कर रंगरलियां मना लेती. डाक्टर को भले ही कुछ पता नहीं चल रहा था, लेकिन अगलबगल वाले तो देख ही रहे थे. पड़ोसियों को समझते देर नहीं लगी कि रामजीलाल की गैरमौजूदगी में धीरज के आने का मतलब क्या हो सकता है.

आखिर एक दिन किसी पड़ोसी ने रामजीलाल को रोक कर कह ही दिया, ‘‘भाई, कामकाज में इतना बिजी रहते हो कि घर का भी खयाल नहीं रख सकते?’’

‘‘मैं समझा नहीं, आप कहना क्या चाहते हैं?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘मेरा मतलब धीरज से है, आजकल वह तुम्हारे घर के कुछ ज्यादा ही चक्कर लगा रहा है.’’

पड़ोसी की बात सुन कर रामजीलाल सन्न रह गया. वह तुरंत घर पहुंचा और सुमन से पूछा, ‘‘धीरज यहां आता है क्या?’’

‘‘नहीं तो, किस ने कहा?’’ सुमन ने लापरवाही से कहा.

‘‘अगर अब आए तो उसे मना कर देना. गांव में उसे ले कर तरहतरह की चर्चाए हो रही हैं. मैं नहीं चाहता कि बिना मतलब हमारी बदनामी हो.’’

सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया. रामजीलाल इस बात को ले कर काफी परेशान था. वह महसूस कर रहा था कि पिछले कुछ समय से सुमन का व्यवहार उस के प्रति उपेक्षापूर्ण रहने लगा है. कहीं वह गुमराह तो नहीं हो गई. लेकिन उस ने आंखों से कुछ नहीं देखा था, इसलिए कोई फैसला कैसे कर सकता था. सुमन ने फोन कर के धीरज को सतर्क कर दिया कि वह कुछ दिनों तक उस से मिलने न आए, क्योंकि डाक्टर को शक हो गया है. अगले कुछ दिन ठीकठाक गुजर गए तो रामजीलाल लापरवाह हो गया. इस के बाद सुमन ने एक दिन धीरज को फोन कर के बुला लिया, क्योंकि उस दिन रामजीलाल को बाहर जाना था.

लेकिन रास्ते में रामजीलाल की तबीयत खराब हो गई, जिस से वह आधे रास्ते से ही लौट आया. गांव में घुसते ही पड़ोसी ने बताया कि धीरज घर के अंदर है. बेचैन रामजीलाल पड़ोसी की छत से घर के अंदर घुसा तो सुमन को धीरज की बांहों में पाया. रामजीलाल ने धीरज को पकड़ना चाहा, लेकिन वह छुड़ा कर भाग गया. इस के बाद उस ने सुमन की जम कर पिटाई की. मारपीट कर गुस्सा शांत हुआ तो वह सिर थाम कर बैठ गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह इस चरित्रहीन औरत का क्या करे. अगर वह उसे उस के मायके भेज देता है तो बच्चों का क्या होगा, अपना कामकाज छोड़ कर वह उस की रखवाली भी नहीं कर सकता था.

सुमन ने खुद को संभाला और सोचने लगी कि उसे क्या करना चाहिए? अब वह धीरज को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहती थी और रामजीलाल का घर भी नहीं छोड़ना चाहती थी. क्योंकि जो सुखसुविधा यहां थी, वह धीरज कभी नहीं दे सकता था. वह तो वैसे ही कर्जदार था. उस ने पति से माफी मांगते हुए कहा कि उस से गलती हो गई, अब ऐसी गलती फिर कभी नहीं होगी. रामजीलाल के पास पत्नी को माफ करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था, इसलिए उस ने पत्नी को माफ कर के समझाया कि इस सब से बदनामी तो होगी ही, अपना ही घर बरबाद होगा.

दूसरी ओर धीरज की अब सुमन से मिलने जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन सुमन ने उस से कहा कि वह उस के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती. उस के बिना उस का जीवन नीरस हो जाएगा. दोनों ने अब घर के बाहर मिलनेजुलने का प्रोग्राम बनाया. बहाना कर के सुमन अलीगढ़ चली जाती, जहां उस से मिलने के लिए धीरज आ जाता. लेकिन वहां भी गांव के कई लोगों की नजरों में वे आ गए, जिस से रामजीलाल को इस की जानकारी हो गई. उस का विश्वास पत्नी पर से उठ गया था, वह उस के साथ अक्सर मारपीट करने लगा. इस के बाद रामजीलाल ने धीरज से अपने रुपए लौटाने को कहा. जबकि धीरज अब उस के रुपए लौटाने के मूड में नहीं था. एक दिन सुमन और धीरज मिले तो सुमन ने कहा, ‘‘धीरज, चलो हम कहीं दूर जा कर अपनी दुनिया बसा लेते हैं.’’

‘‘हम अपनी दुनिया तो बसा लेंगे, पर खाएंगेपहनेंगे क्या? इस के लिए हमें कुछ और सोचना होगा.’’ धीरज ने कहा.

रामजीलाल की गृहस्थी में ग्रहण लग चुका था. गांव वाले चुगली करते रहते थे. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी इस चरित्रहीन पत्नी का क्या करे. उसे अपने बच्चों का भविष्य बरबाद होता दिखाई दे रहा था. पतिपत्नी के लड़ाईझगड़े का असर बच्चों पर भी पड़ रहा था. जबकि सुमन रामजीलाल से छुटकारा पाना चाहती थी. उसी बीच एक रात रामजीलाल ने सुमन को फोन से बातें करते सुना तो मोबाइल छीन कर नंबर चैक किया. वह नंबर धीरज का था. उस ने कहा, ‘‘इतना सब होने पर भी तुम बाज नहीं आ रही हो?’’

सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया तो रामजीलाल को गुस्सा आ गया. उस ने सुमन को पीटते हुए कहा, ‘‘चरित्रहीन औरत, अब तू विश्वास लायक नहीं रही.’’

इस के बाद रामजीलाल ने मोबाइल का सिम निकाल कर तोड़ दिया. इस पर सुमन ने कहा, ‘‘यह तुम ने अच्छा नहीं किया.’’

पत्नी की इस हिमाकत से रामजीलाल ने फिर उस की पिटाई कर दी. इस के बाद तो सुमन ने तय कर लिया कि अब वह रामजीलाल को जिंदा नहीं छोड़ेगी. अगले दिन उस ने धीरज को फोन किया, ‘‘अब तुम्हारा क्या इरादा है, साफसाफ बताओ?’’

‘‘मेरी हालत तुम जानती ही हो, तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं? डाक्टर अपने रुपए मांग रहा है. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं?’’

‘‘देखो धीरज, मैं तुम्हारी वजह से रोजरोज तो पिट नहीं सकती, इसलिए अब फैसला लेने का समय आ गया है. या तो तुम मुझे छोड़ दो या फिर कुछ ऐसा करो कि हम चैन से जी सकें.’’

‘‘तुम्हीं बताओ मुझे क्या करना चाहिए?’’ धीरज ने पूछा.

‘‘तुम कुछ ऐसा करो कि तुम्हें डाक्टर के 3 लाख रुपए भी न लौटाने पड़ें और मुझे उस से छुटकारा भी मिल जाए. उस के बाद हम चैन की जिंदगी गुजार सकते हैं.’’

‘‘लेकिन यह होगा कैसे?’’

‘‘सब आराम से हो जाएगा, तुम अपने साथियों के साथ डाक्टर को ठिकाने लगा दो. यह हमारे बीच दीवार की तरह है, यह अब मुझे बरदाश्त नहीं हो रहा है.’’

‘‘लेकिन कोई मुफ्त में यह काम क्यों करेगा. पैसों की जरूरत होगी, जो मेरे पास है नहीं.’’

‘‘पैसे मैं दे दूंगी. ढाई लाख रुपए मेरे पास है.’’

सौदा बुरा नहीं था. धीरज मन ही मन खुश हो गया. कर्ज से भी छुटकारा मिल जाएगा और प्रेमिका के साथ उस की संपत्ति भी मिल जाएगी. वह मजे करेगा. रामजीलाल को जिंदगी से छुटकारा दिलाने की योजना बन गई. धीरज अब ऐसे लोगों को तलाशने लगा, जो उस का साथ दे सकें. उस ने अपने दोस्त दिलीप तोमर को पैसों का लालच दे कर तैयार कर लिया. दिलीप के अलावा उस ने अपने गांव के सौरभ चमन और चरन सिंह को भी शामिल कर लिया. इस के बाद डाक्टर रामजीलाल की मौत का फरमान जारी कर दिया गया. वह इस बात से पूरी तरह बेखबर था. वह तो मोबाइल का सिम तोड़ कर निश्चिंत था कि सुमन अब धीरज से बात नहीं कर पाएगी. लेकिन वह नहीं जानता था कि घायल शेरनी कितनी खतरनाक होती है.

दूसरी ओर सुमन अपने व्यवहार में बदलाव ला कर पति का विश्वास जीतने की कोशिश कर रही थी. रामजीलाल को लगा कि सब कुछ ठीक हो गया है. जबकि अब मामला और बिगड़ गया था. सुमन अब जल्दी से जल्दी रामजीलाल को मरवा कर निश्चिंत हो कर धीरज के साथ मौज करना चाहती थी. 8 फरवरी, 2015 को रामजीलाल घर पर ही था. तभी कुछ लोगों ने आ कर कहा कि नहलोई के रामेश्वर पंडित की भैंस बीमार है. उसे देखने के लिए उसे चलना है. शाम का समय था, रामजीलाल ने कहा, ‘‘आज तो मैं नहीं चल सकता, कल सुबह आ जाऊंगा.’’

‘‘नहीं डाक्टर साहब, भैंस बहुत ज्यादा बीमार है. नहलोई कौन सा ज्यादा दूर है. फिर आप को मोटरसाइकिल से ही तो चलना है.’’ उन्होंने कहा तो रामजीलाल तैयार हो गया. उस ने सुमन से बैग लाने को कहा.

सुमन ने बैग थमाते हुए कहा, ‘‘जितनी जल्दी हो सके लौट आना.’’

दोनों लोग रामजीलाल की मोटरसाइकिल पर बैठ गए. मोटर-साइकिल चल पड़ी तो 2 अन्य लोग दूसरी मोटरसाइकिल से उस के पीछे लग गए. देदामई और नहलोई के बीच एक बंबा है. वहां धीरज को देख कर रामजीलाल का माथा ठनका. साथ आए लोगों ने उस की मोटरसाइकिल रोकवा ली और उसे घेर कर खड़े हो गए.

‘‘यह सब क्या है?’’ रामजीलाल ने पूछा.

लड़कों ने हंसते हुए कहा, ‘‘अभी पता चल जाएगा.’’

रामजीलाल समझ गया कि उस के साथ धोखा हुआ है. उस ने भागने की कोशिश की, लेकिन लड़कों में से किसी ने उस की कनपटी पर गोली मार दी. रामजीलाल गिर गया तो उन्होंने ईंटों से उस की खोपड़ी फोड़ दी. जब रामजीलाल की मौत हो गई तो सभी भाग खड़े हुए. रामजीलाल की लाश रात भर वहीं पड़ी रही. मोटरसाइकिल एक ओर खड़ी थी. सुबह कुछ लोगों ने लाश देखी तो पहचान लिया कि यह तो डा. रामजीलाल की लाश है. तुरंत थाना सासनी पुलिस को सूचना दी गई. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अरविंद प्रताप सिंह पुलिस बल के साथ रवाना हो गए. रामजीलाल के घर वालों को भी सूचना दे दी गई थी. थोड़ी ही देर में पूरा गांव वहां पहुंच गया. लोग हैरान थे कि आखिर रामजीलाल जैसे सीधेसादे आदमी को किस ने मार दिया.

लाश के कपड़ों की तलाशी में पुलिस को कुछ रुपए, गैस की कापी, पर्स आदि मिले, जिस से स्पष्ट हो गया था कि मृतक की हत्या लूट के लिए नहीं की गई थी. उस की मोटरसाइकिल भी खड़ी थी. पंचनामा कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर पुलिस थाने आ गई और मृतक के भाई राजीवर की ओर से हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया. राजवीर से पूछताछ में पता चला कि देदामई के धीरज कश्यप को रामजीलाल ने 3 लाख रुपए उधार दिए थे, जिन्हें वह लौटा नहीं रहा था. इस के लिए रामजीलाल और धीरज में कहासुनी भी हुई थी.

थानाप्रभारी अरविंद प्रताप सिंह को हत्या की वजह काफी नहीं लगी. अंतिम संस्कार के बाद वह रामजीलाल के घर पहुंचे तो सुमन का चेहरा पीला पड़ गया. वह रोने का नाटक करने लगी. सुमन के हावभाव ने उन्हें शक में डाल दिया. अरविंद प्रताप सिंह ने मुखबिरों का सहारा लिया. जिन से पता चला कि धीरज घर से गायब है. उसी बीच एक मुखबिर ने बताया कि रामजीलाल की पत्नी और धीरज के बीच नाजायज संबंध थे, जिस का डाक्टर विरोध कर रहा था. अब थानाप्रभारी को डाक्टर की हत्या का मजबूत कारण मिल गया. धीरज के ठिकानों पर छापा मारा गया, लेकिन वह पकड़ में नहीं आया. कोई अपराधी आखिर पुलिस से कब तक बच सकता है. मुखबिर की सूचना पर 14 फरवरी, 2015 को अलीगढ़ से धीरज और उस के साथी दिलीप तोमर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में पहले तो धीरज पुलिस को गुमराज करता रहा, लेकिन एसपी दीपिका तिवारी ने जब सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि सुमन के साथ उस के नाजायज संबंध थे. उसी ने डाक्टर की हत्या के लिए उकसाया था और ढाई लाख की सुपारी भी दी थी. इस के बाद उस ने दिलीप तोमर, सौरभ चमन और चरन सिंह के साथ मिल कर रामजीलाल की हत्या कर दी थी. सुमन को पता चला कि पुलिस ने धीरज को गिरफ्तार कर लिया है तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. पुलिस उस की गिरफ्तारी के लिए घर पहुंची तो वह रोने का नाटक करने लगी. उसे गिरफ्तार कर के थाने लाया गया तो उस ने भी धीरज के साथ अपने संबंधों को स्वीकार करते हुए बताया कि धीरज और उस के बीच पति कांटे की तरह गड़ रहा था, इसलिए उस ने उस कांटे को निकलवा दिया था.

उसे क्या पता था कि वह मौज करने के बजाय जेल चली जाएगी. पुलिस ने गिरफ्तार सुमन, धीरज और दिलीप तोमर को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया, बाकी अभियुक्तों की तलाश कर रही है. Contract Killing

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: बस एक बेटा चाहिए

Hindi Stories: मेहनतमजदूरी कर के जीविका चलाने वाली शंकरी की 3 बेटियां थीं, चौथा बच्चा पेट में था. आखिर उस की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि वह बच्चे पर बच्चे पैदा किए जा रही थी. जिस तरह उस बूढ़े बरगद के पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था, उसी तरह उस के नीचे बायस्कोप लिए खड़ी उस औरत, जिस का नाम शंकरी था, की उम्र का भी अंदाजा लगाना आसान नहीं था. वह चला तो बायस्कोप रही थी, लेकिन उस का ध्यान लोहे के 4 पाइप खड़े कर के साड़ी से बने झूले में सो रही अपनी 2 साल की बेटी पर था.

अगर झूले में लेटी बेटी रोने लगती तो वह बायस्कोप जल्दीजल्दी घुमाने लगती. बायस्कोप देखने वाले बच्चे शोर मचाते तो वह कहती, ‘‘लगता है, बायस्कोप खराब हो गया है, इसीलिए यह तेजी से घूमने लगा है.’’

बायस्कोप का शो खत्म कर के शंकरी बेटी को गोद में ले कर चुप कराने लगती. लेकिन बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस से झगड़ने लगते. झगड़ते भी क्यों न, उन्होंने जिस आनंद के लिए पैसे दिए थे, वह उन्हें मिला नहीं था. औरत बच्चे के रोने का हवाला देती, फिर भी वे बच्चे न मानते. उन्हें तो अपने मनोरंजन से मतलब था, उस के बच्चे के रोने से उन्हें क्या लेनादेना था. शंकरी उन्हें समझाती, दोबारा दिखाने का आश्वासन भी देती, क्योंकि उसे भी तो इस बात की चिंता थी कि अगर उस के ये ग्राहक बच्चे नाराज हो गए तो उस की आमदनी बंद हो जाएगी. लेकिन उस की परेशानी यह थी कि वह बेटी को संभाले या ग्राहक. बेटी को भी रोता हुआ नहीं छोड़ा जा सकता था.

शंकरी के चेहरे पर मजबूरी साफ झलक रही थी. बच्चों की जिद पर मजबूरन उसे बच्ची को रोता छोड़ कर बायस्कोप के पास जाना पड़ता, क्योंकि बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस का ज्यादा देर तक इंतजार नहीं कर सकते थे. शंकरी की अपनी बच्ची रोती रहती और वह दूसरों के बच्चों का मनोरंजन कराती रहती. बच्ची रोरो कर थक जाती लेकिन वह उसे गोद में न ले पाती. वह उसे तभी गोद में उठा पाती, जब उस के ग्राहकों की भीड़ खत्म हो जाती. ग्राहकों के जाते ही वह दौड़ कर बच्ची को गोद में उठाती, प्यार करती और झट से साड़ी के पल्लू के नीचे छिपा कर दूध पिलाने लगती. तब उस के चेहरे पर जो सुकून होता, वह देखने लायक होता.

शंकरी ने बच्ची को प्यार करने के लिए अपना घूंघट थोड़ा खिसकाया तो थोड़ी दूर पर बेटी को मेला दिखाने आई संविधा की नजर उस के चेहरे पर पड़ी. उस का गोरा रंग धूप की तपिश से मलिन पड़ गया था. अभी भी गरम सूरज की किरणें पेड़ों की पत्तियों के बीच से छनछन कर उस के चेहरे पर पड़ रही थीं. भूरे बालों को उस ने करीने से गूंथ कर मजबूती से बांध रखा था. आंखों में काजल की पतली लकीर, माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी, गोल चेहरा, जिस में 2 बड़ीबड़ी आंखें, जो दूध पीते बच्चे को बड़ी ममता से निहार रही थीं. कभीकभी उस की आंखें बेचैनी से उस ओर भी घूम जातीं, जो उस का बायस्कोप देखने के लिए उस के इंतजार में खड़े थे.

जैसे ही बेटी ने दूध पीना बंद किया, शंकरी के चेहरे पर आनंद झलक उठा. बच्ची अभी भी उस की गोद में लेटी थी और अधखुली आंखों से उसे ताकते हुए अपनी नन्ही हथेलियों से उस के माथे और गालों को सहला रही थी. औरत ने गौर से बच्ची को देखा, उस के चेहरे पर आनंद की जगह दुख की बदली छा गई. उस की आंखों से आंसू की 2 बूंदें टपक पड़ीं, जो बच्चे के चेहरे पर गिरीं. उस ने जल्दी से साड़ी के पल्लू से आंखों को पोंछा. बच्ची अब तक नींद के आगोश में चली गई थी.

शंकरी ने तमाशा देखने वालों को देखा. वे सभी उसे ही ताक रहे थे. उस ने बहुत हलके से बच्ची को झूले में लिटाया. बरगद के नीचे मक्खियों और कीड़ों की भरमार थी, इसलिए बच्ची को उन से बचाने के लिए एक बारीक कपड़ा उस के चेहरे पर डाल दिया, जिस से बच्ची आराम से सोती रहे. जैसे ही वह बच्ची के पास से हटी, बच्ची फिर रोने लगी. उस के रोने से वह बेचैन हो उठी. उस ने बायस्कोप के पास से ही रोती बच्ची को देखा, लेकिन मजबूरी की वजह से वह उसे उठा नहीं सकी. बायस्कोप देखने वाले बच्चों से पैसे ले कर उन्हें बैठा दिया. बच्ची रोती रही, 1-2 बार तो ऐसा लगा जैसे उस की सांस रुक गई है, लेकिन वह रोतीरोती सो गई.

थोड़ी देर बाद एक छोटी लड़की, जो 4 साल के आसपास रही होगी, सो रही बच्ची के पास से गुजरती हुई शंकरी के पास आ कर उस की साड़ी का पल्लू मुंह में डाल कर लौलीपाप की तरह चूसने लगी. वह शायद शंकरी की झूले में लेटी बेटी से बड़ी थी. उस की लार से शंकरी की साड़ी का पल्लू गीला हो गया. शंकरी की यह दूसरी बेटी घुटने तक लाल रंग का फ्रौक पहने थी. उस के पैर धूल से अटे हुए थे, आंखें पीली, मैलेकुचैले बाल, जो बूढ़े टट्टू की पूंछ की तरह बंधे हुए थे. उन में से कुछ खुले बाल उस के मटमैले चेहरे पर बिखरे हुए थे. लड़की ने शंकरी से उस के कान में फुसफुसा कर कुछ कहा. उस ने ऐसा न जाने क्या कहा कि शंकरी ने खीझ कर उसे कोहनी से झटक दिया. लड़की रोते हुए जमीन पर लेट गई, जिस से उस का पूरा शरीर धूल से अट गया.

तमाशा देखने वाले बच्चे इन सभी चीजों से बेपरवाह और बेखबर अपनी आंखें बायस्कोप के छोटे से गोल शीशे पर जमाए बक्से के अंदर का नजारा देख रहे थे, जो शायद उन्हें कुछ इस तरह मजा दे रहा था, जैसे वे सिनेमाहाल में कोई फिल्म देख रहे हों. यह उन के जोश और दीवानगी से पता चल रहा था. झूले में लेटी बच्ची एक बार फिर रोने लगी. शंकरी ने बगल में जमीन पर लोट रही बेटी को 5 रुपए का सिक्का दिखाया तो वह तुरंत  उठ कर खड़ी हो गई और शरीर पर चिपकी धूल को झाड़ते हुए मां के हाथ से सिक्का झपट लिया. उस के चेहरे पर आंसुओं की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं. हाथ में सिक्का आते ही वह उत्साह और खुशी से उछलतीकूदती रोती हुई छोटी बहन के पास आई और उसे झूले से उठा कर अपनी छोटी सी कमर के सहारे गोद में ले कर थोड़ी दूरी पर स्थित एक छोटी सी दुकान की ओर चल पड़ी.

शंकरी बायस्कोप जरूर चला रही थी, लेकिन उस का ध्यान कहीं और ही था. उसी समय उस के पास एक अन्य लड़की आई, जिस की उम्र बामुश्किल 6 साल रही होगी. उस की पीली रंग की सलवारसमीज मैल की वजह से काली पड़ चुकी थी. कुछ पल मांबेटी आपस में कानाफूसी करती रहीं, उस के बाद वह लड़की वहीं मां के पास बैठ गई और अपने धूल भरे पैर मजे से हिलाने लगी. लेकिन उस की पीली आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. वह पैर हिलाते हुए वहां घूमने आए ताजा चेहरे वाले बच्चों और उन के मांबाप को ललचाई नजरों से ताक रही थी, क्योंकि वे अपने बच्चों की बड़ी से बड़ी इच्छाएं पूरी कर रहे थे.

तमाशा देखने वाले बच्चे जब चले गए तो वह आ कर मां के पास बैठ गई. मां उस के सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकराई. बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस में देखे गए तमाशे के बारे में चर्चा करते हुए हंस रहे थे. उसी बीच हवा का एक ऐसा झोंका आया, जिस से उस औरत का आंचल उड़ गया. उस के उभरे हुए पेट पर संविधा की नजर पड़ी, शायद वह गर्भवती थी. संविधा ने उभार से अंदाजा लगाया, कम से कम 6 महीने का गर्भ रहा होगा. अपने कमजोर शरीर के पेट पर उस छोटे से उभार के साथ शंकरी मुश्किल से बेटी के साथ जमीन पर बैठ गई. उस की इस 6 साल की बेटी ने प्यार से उसे मां कहा तो वह बेटी की आंखों में झांकने लगी.

उसी समय धोतीकमीज पहने और सिर पर मैरून रंग की पगड़ी बांधे एक आदमी मांबेटी के पास आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही लड़की उसे बापू कह कर उस से चिपक गई और उस के गालों तथा मूंछों को सहलाने लगी. लेकिन उस आदमी ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. वह शंकरी से बातें करने में व्यस्त था. संविधा को समझते देर नहीं लगी कि वह आदमी शंकरी का पति है. वह आदमी उसी को देख रहा था, जबकि उस की नजरें अपने चारों ओर घूमते लोगों पर टिकी थीं. लड़की अपनी बांहें बापू के गले में डाल कर झूल गई तो वह उसे झटक कर उठ खड़ा हुआ और मेले की भीड़ में गायब हो गया.

लड़की संविधा के पास आ कर खड़ी हो गई. उस की नजरें उस के हाथ में झूल रही पौलीथिन में रखे चिप्स के पैकेट पर जमी थीं. वह उन चीजों को इस तरह ललचाई नजरों से देख रही थी, जैसे जीवन में कभी इन चीजों को नहीं देखा था. उस की तरसती आंखों में झांकते हुए संविधा ने चिप्स का पैकेट उसे थमाते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

अब उस की नजरें संविधा की बेटी के लौलीपाप पर जम गई थीं, जिसे वह चूस रही थी. वह उसे इस तरह देख रही थी, जैसे उस की नजरें उस पर चिपक गई हों. संविधा ने उस का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए कहा, ‘‘लौलीपाप खाओगी?’’

उस ने मुसकराते हुए हां में सिर हिलाया. संविधा ने पर्स में देखा कि शायद उस में कोई लौलीपाप हो, लेकिन अब उस में लौलीपाप नहीं था. संविधा को लगा, अगर उस ने लड़की से कहा कि लौलीपाप नहीं है तो उसे दुख होगा. इसलिए उस ने पर्स से 10 रुपए का नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘जाओ, अपने लिए लौलीपाप ले आओ.’’

लड़की मुसकराते हुए 10 रुपए के नोट को अमूल्य उपहार की तरह लहराती हुई मेले की ओर भागी. लड़की के जाते ही संविधा शंकरी को देखने लगी. वह काफी व्यस्त लग रही थी. वह बायस्कोप देखने वालों को शो दिखाते हुए सामने से गुजरने वालों को बायस्कोप देखने के लिए आवाज भी लगा रही थी. 4 साल की उस की जो बेटी अपनी छोटी बहन को ले कर गई थी, अब तक मां के पास वापस आ गई थी. उस ने बरगद के पेड़ के चारो ओर बने चबूतरे पर छोटी बहन को बिठाया और अपना हाथ मां के सामने कर दिया, जिस में वह खाने की कोई चीज ले आई थी. शायद वह उसे मां के साथ बांटना चाहती थी. अब तक बड़ी बेटी भी आ गई थी. उस ने भी अपनी मुट्ठी मां के सामने खोल कर अंगुली से संविधा की ओर इशारा कर के धीमे से कुछ कहा.

शंकरी ने संविधा की ओर देखा. नजरें मिलने पर वह मुसकराने लगी. उस परिवार को देखतेदेखते अचानक संविधा के मन में उस के प्रति आकर्षण सा पैदा हो गया तो उस के मन में उन लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हो गई. शायद शंकरी के लिए उस के दिल में दया पैदा हो गई थी. उस की स्थिति ही कुछ ऐसी थी, इसीलिए संविधा उस की कहानी जानना चाहती थी. धीरेधीरे संविधा शंकरी की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख शंकरी खड़ी हो गई. उसे लगा, शायद संविधा बेटी को बायस्कोप दिखाने आ रही है, इसलिए उस ने बायस्कोप का ढक्कन खोलने के लिए हाथ बढ़ाया. संविधा ने कहा, ‘‘मुझे इस मशीन में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो आप से मिलने आई हूं.’’

संविधा की इस बात से शंकरी को सुकून सा महसूस हुआ. वह चबूतरे पर खेल रही छोटी बेटी के पास बैठ गई. संविधा ने उस की तीनों बेटियों की ओर इशारा कर के पूछा, ‘‘ये तीनों तुम्हारी ही बेटियां हैं?’’

‘‘जी.’’ शंकरी ने जवाब दिया.

‘‘ये कितनेकितने साल की हैं?’’

शंकरी ने हर एक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘6 साल, 4 साल और सब से छोटी डेढ़ साल की है.’’

इस के बाद उस के उभरे हुए पेट पर नजरें गड़ाते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘शायद तुम फिर उम्मीद से हो?’’

‘‘जी.’’ उस ने लंबी सी सांस लेते हुए कहा.

‘‘कितने महीने हो गए?’’

‘‘6 महीने.’’

संविधा शंकरी को एकटक ताकते हुए उस की दुख भरी जिंदगी के बारे में सोचने लगी, शायद यह बच्चे पैदा करने को मजबूर है. यह कितनी तकलीफ में है. उस की परेशानियों को देखते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी उम्र कितनी होगी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, लेकिन विफल रही तो नजरें झुका लीं.

संविधा को आघात सा लगा. उस ने उस के दुख और मजबूरी भरे जीवन की अपने शानदार और ऐशोआराम वाले जीवन से तुलना की, तब उसे लगा कि इस दुनिया में शायद दुख ज्यादा और सुख कम है. उस ने पूछा, ‘‘आप हर साल एक बच्चा पैदा कर के थकी नहीं?’’

‘‘इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है.’’ शंकरी ने ठंडी आह भरते हुए जवाब दिया.

‘‘आप बहुत बहादुर हैं. मेरे वश का तो नहीं है.’’

‘‘मेरी मजबूरी है. मेरे पति चाहते हैं कि उन का एक बेटा हो जाए, जिस से उन के परिवार का नाम चलता रहे.’’

‘‘नाम चलता रहे..?’’ संविधा ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा. उस पर उसे तरस भी आया. क्योंकि उस की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उस के जो बच्चे थे, उन्हें ही वह ठीक से पालपोस सकती. जबकि सिर्फ नाम चलाने के लिए वह बच्चे पर बच्चे पैदा करने को तैयार थी. संविधा को झटका सा लगा था. वह उस से कहना चाहती थी कि आजकल लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं रहा. दोनों बराबर हैं. उस की केवल एक ही बेटी है, जिस से वह और उस के पति खुश हैं. लड़कियां लड़कों से ज्यादा बुद्धिमान और प्रतिभाशाली निकल रही हैं. वे मातापिता की बेटों से ज्यादा देखभाल करती हैं. देखो न लड़कियां पहाड़ों पर चढ़ रही हैं, उन के कदम चांद पर पहुंच गए हैं.

लेकिन वह कह नहीं पाई. उस के मन में आया कि वह उस से पूछे कि अगर इस बार भी बेटी पैदा हुई तो..? क्या जब तक बेटा नहीं पैदा होगा, वह बच्चे पैदा करती रहेगी? अगर उसे बेटा पैदा ही नहीं हुआ तो वह क्या करेगी? इस तरह के कई सवाल संविधा के मन में घूम रहे थे. उस की गरीबी और बेटा पाने की चाहत के बारे में सोचते हुए उसे लगा, अगर यह इसी तरह बच्चे पैदा करती रही तो इस की हालत तो एकदम खराब हो जाएगी. अचानक उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘वह लोकगीत गाते हैं.’’ शंकरी ने कहा.

‘‘लोकगीतों का कार्यक्रम करते हैं?’’

‘‘नहीं, मेलों या गांवों में घूमघूम कर गाते हैं.’’

संविधा को याद आया कि जब वह मेले में प्रवेश कर रही थी तो कुछ लोग चादर बिछा कर ढोलक और हारमोनियम ले कर बैठे थे. वे लोगों की फरमाइश पर उन्हें लोकगीत और फिल्मी गाने गा कर सुना रहे थे.

संविधा समझ गई कि ये लोग कहीं बाहर से आए हैं. उस ने पूछा, ‘‘लगता है, तुम लोग कहीं बाहर से आए हो? अपना गांवघर छोड़ कर कहीं बाहर जाने में तुम लोगों को बुरा नहीं लगता?’’

‘‘हमारे पास इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है.’’

‘‘क्यों? जहां तुम लोग रहते हो, वहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है?’’

‘‘काम और कमाई होती तो हम लोग इस तरह मारेमारे क्यों फिरते?’’

‘‘लेकिन तुम लोग अपने यहां खेती भी तो कर सकते हो?’’ संविधा ने सुझाव दिया.

‘‘कैसे मैडम, हमारी सारी जमीनों पर दबंगों और महाजनों ने कब्जा कर लिया है. क्योंकि हम ने उन से जो कर्ज लिया था और उसे अदा नहीं कर पाए.’’

‘‘तुम लोगों ने अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए संघर्ष क्यों नहीं किया?’’

‘‘मैडम, हम बहुत कमजोर लोग हैं और वे बहुत शक्तिशाली. उन के पास पैसा भी है और ताकत भी. हम उन से दुश्मनी कैसे मोल ले सकते हैं.’’

‘‘लेकिन तुम लोग यह सब सह कैसे लेते हो?’’ ‘‘हम बहुत ही असहाय और बेबस लोग हैं.’’ शंकरी ने लंबी सांस ले कर जमीन पर खेल रही बच्ची का मुंह साड़ी के पल्लू से साफ करते हुए कहा.

संविधा के दिमाग में तमाम सवाल उठ रहे थे, लेकिन उसे लगा कि बुद्धिमानी इसी में है कि वह उस से उन सवालों को न पूछे. चेहरे से शंकरी अभी जवान लग रही थी, लेकिन हालात की वजह से चेहरा पीला और सूखा हुआ था. शायद ऐसा गरीबी और बच्चे पैदा करने की वजह से था. संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी शादी कितने साल में हुई थी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, मगर नाकाम रही.

‘‘तुम यहां कब आई?’’

‘‘जब यह मेला शुरू हुआ.’’

‘‘तुम लोगों के दिन कैसे गुजरते हैं?’’

‘‘सुबह जहां रहते हैं, वहां की साफसफाई करते हैं. दोपहर को ही रात का भी खाना बना लेते हैं, क्योंकि हमारे पास उजाले की व्यवस्था नहीं है. उस के बाद अपने काम में लग जाते हैं. लड़कियां टोलियों में नाचनेगाने क काम करती हैं. शादीशुदा महिलाएं मेरी तरह बायस्कोप दिखाती हैं तो कुछ कठपुतली का नाच दिखाती हैं. कुछ मेहंदी लगाने का भी काम करती हैं.’’

संविधा ने इधरउधर देखा. दूरदूर तक कोई इमारत नहीं थी. मैदान पर मेले में आए दुकानदारों के तंबू लगे थे. मन में जिज्ञासा जागी तो उस से पूछा, ‘‘तुम पूरे दिन इसी तरह बिना आराम के काम करती हो. ऐसे में तुम्हारे बच्चों की देखभाल कौन करता है?’’

‘‘मेरी बड़ी बेटी इन दोनों बेटियों को संभाल लेती है.’’

‘‘इन का खानापीना और नहानाधोना?’’

‘‘बड़ी बेटी छोटी को नहला देती है, बीच वाली खुद ही नहा लेती है.’’

संविधा ने अपनी 8 साल की बेटी पर नजर डाली, उस के बाद शंकरी की एकएक कर के तीनों बेटियों को देखा. छोटी बेटी अभी भी मां के पास चबूतरे पर खेल रही थी. संविधा ने सोचते हुए एक लंबी सांस ली. कुछ देर वह शंकरी और उस की बेटियों को देखती रही. उस का दिल उन के लिए सहानुभूति से भर गया. उस ने पर्स से 10-10 रुपए के 2 नोट निकाले और खेल रही लड़कियों को थमा दिए. इस के बाद वह चलने लगी तो देखा, कुछ बच्चे उधर आ रहे थे. उन्हें आते देख कर शंकरी अपने बायस्कोप के पास जा कर खड़ी हो गई, लेकिन उस की नजरें चबूतरे पर खेल रही बेटी पर ही जमी थीं.

शाम को संविधा घर पहुंची तो उस के दिलोदिमाग में शंकरी और उस की बेटियां ही छाई थीं. वह भी एक औरत थी, इसलिए उस ने प्रार्थना की कि काश! उस के गमों का सिलसिला खत्म हो जाए और उस की इच्छा पूरी हो जाए. इस बार उसे बेटा पैदा हो जाए. Hindi Stories

अनुवाद: एम.एस. जरगाम

Crime Story Hindi: भैरवी क्रिया के चक्रव्यू में मोनिका

Crime Story Hindi: प्रतिष्ठित परिवार की मोनिका शादी के 5 साल बाद भी मां नहीं बन सकी तो वह एक तथाकथित तांत्रिक के चक्कर में फंस गई. उस तांत्रिक ने उसे भैरवी क्रिया के चक्रव्यूह में ऐसा फांसा कि मोनिका घर की रही न घाट की. अपने घर पर लोहड़ी मनाने के बाद मोनिका 14 जनवरी, 2015 को अपने पति के पास चली गई थी. उस का पति गुरदीप इंडियन नेवी में नौकरी करता था. वह उस समय मुंबई में रह रहा था. ससुराल में केवल सासससुर रह गए थे. मुंबई आने के बाद भी वह सासससुर से फोन पर बात कर के हालचाल लेती रहती थी. मोनिका का मायका राजपुरा की रौशन कालोनी में था. वहां उस की विधवा मां सुनीता रानी रहती थी.

29 जनवरी, 2015 को मोनिका ने अपने ससुर के मोबाइल पर फोन करना चाहा तो उन का फोन स्विच्ड औफ मिला. मोनिका ने कई बार उन का नंबर मिलाया, लेकिन हर बार फोन स्विच्ड औफ ही मिला. इस पर मोनिका ने अपनी मां सुनीता को फोन कर के कहा कि वह किसी मुद्दे पर अपने सासससुर से बात करना चाहती है, मगर उन का मोबाइल स्विच्ड औफ आ रहा है. उस ने अपनी मां से कहा कि वह उस की ससुराल जा कर पता लगाए कि वहां कोई फिक्र वाली बात तो नहीं है. उस वक्त रात काफी हो चुकी थी. सुनीता भी अपने घर में अकेली थीं, इसलिए अकेली होने की वजह से वह बेटी की ससुराल नहीं गईं.

अगले दिन घर और रसोई का काम निपटाने के बाद दोपहर करीब 11 बजे वह अपने समधी के यहां पहुंचीं तो घर के बाहर वाला लकड़ी का दरवाजा खुला था. वह ड्योढ़ी में पहुंचीं तो वहां एक जोड़ी चप्पलें उलटीसीधी पड़ी थीं, वहीं पर एक टोपी भी पड़ी थी. तभी उन्होंने तेज बदबू का भभका महसूस किया. सुनीता ने अपने समधी और समधिन को कई आवाजें दीं. जब अंदर से कोई जवाब नहीं आया तो वह उन के बैडरूम में चली गईं. वहां असहनीय बदबू फैली थी. तभी उन की नजर बैड पर गई तो वह चीख पड़ीं. वहां मोनिका के ससुर खेमचंद और सास कमलेश की लाशें पड़ी थीं. लाशें देखते ही वह तुरंत घर से बाहर निकल आईं और शोर मचा दिया.

शोर सुन कर पासपड़ोस के लोग वहां आ गए. सुनीता ने उन्हें समधी और समधिन की लाशें कमरे में पड़े होने की जानकारी दी. उसी दौरान अपनी बेटी मोनिका और अन्य रिश्तेदारों को भी उन्होंने इस मामले की खबर दे दी. वहां मौजूद लोगों में से किसी ने केएसएम पुलिस चौकी में फोन कर के इस डबल मर्डर की सूचना दे दी. डबल मर्डर की सूचना मिलते ही चौकी प्रभारी महिमा सिंह, हेडकांस्टेबल नाथीराम और भाग सिंह के साथ राजपुरी के बनवाड़ी इलाके में खेमचंद के घर पहुंच गए. वहां एक ही कमरे में 2 लाशें पड़ी देख कर वह भी चौंके. उन्होंने थाना सिटी के थानाप्रभारी शमिंदर सिंह को दोहरे हत्याकांड की जानकारी दी तो वह भी एसआई सतनाम सिंह, एएसआई राकेश कुमार, हेडकांस्टेबल जसविंदर पाल, कुलवंत सिंह और महिला कांस्टेबल परमजीत कौर को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

जिस मकान में यह घटना हुई थी, वह पुराने स्टाइल का मकान था. थानाप्रभारी जैसे ही  लकड़ी के बड़े दरवाजे से मकान में घुसे, असहनीय बदबू से बेहाल हो गए. नाक पर रूमाल रख कर वह आगे बढ़े तो उन्होंने बैडरूम में बिस्तर पर एक आदमी और एक औरत की लाश पड़ी देखी. पूछने पर पता चला कि मृतक 70 वर्षीय खेमचंद और उन की 65 वर्षीया पत्नी कमलेश हैं. लाशों के मुआयने में लग रहा था कि उन दोनों को गला घोंट कर मारा गया था. निस्संदेह उन की हत्या कई दिनों पहले की गई थी, क्योंकि लाशें गलने लगी थीं. बैडरूम का सामान भी इधरउधर बिखरा पड़ा था. अलमारियों का सामान बिखरा होने के साथसाथ लौकर भी खुला पड़ा था, जो पूरी तरह खाली था. पहली ही नजर में लग रहा था कि यह डबल मर्डर लूटपाट की खातिर हुआ होगा.

कमरे में फर्श पर कोल्डड्रिंक के खाली कैन, सिगरेट के टुकड़ों के अलावा वहां एल्युमिनियम की पन्नी भी पड़ी थी. ऐसी पन्नियों का उपयोग नशेड़ी नशीला पदार्थ लेने के लिए करते हैं. इस से यह बात जाहिर हो रही थी कि अपराधी अव्वल दर्जे के नशेड़ी थे. जिस इत्मीनान से यह सब हुआ था, उस से लग रहा था कि अपराधी संभवत: मृतकों के परिचित रहे होंगे. मामला गंभीर था, इसलिए सूचना मिलने पर पटियाला के एसएसपी गुरमीत चौहान, एसपी (डिटेक्टिव) जसकरण सिंह तेजा, डीएसपी (सिटी) राजेंद्र सिंह सोहल और सीआईए इंसपेक्टर विक्रमजीत सिंह बराड़ भी घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने भी लाशों और घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

मौके पर पहुंची डौग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम एवं एफएसएल टीम ने भी मौके की काररवाई पूरी की. घटनास्थल पर मौजूद सुनीता, जो राजपुरा की रौशन कालोनी में रहती थी, बताया कि मरने वाले उन के समधीसमधिन हैं. उन की बेटी मोनिका उन के बेटे कुलदीप से ब्याही है. दोनों की शादी 5 साल पहले हुई थी. सुनीता ने यह भी बताया कि मोनिका का पति गुरदीप इंडियन नेवी में नौकरी करता है और मुंबई में रहता है. मोनिका बीचबीच में अपने सासससुर की सेवा करने के लिए मुंबई से राजपुरा आती रहती थी. गुरदीप चाहता था कि मांबाप भी मुंबई में उस के साथ रहें, लेकिन वे वहां जाने को तैयार नहीं थे.

पुलिस ने पंचनामा कर के दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा कर सुनीता की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया. मौके से कोई ऐसा सुबूत नहीं मिला  था, जिस के सहारे हत्यारों तक पहुंचने में  पुलिस को मदद मिलती. पुलिस के लिए यह एक संगीन मामला था. एसएसपी गुरमीत चौहान ने इसे गंभीरता से लेते हुए एक विशेष टीम का गठन कर के इंसपेक्टर शमिंदर सिंह को आदेश दिया कि वह इस केस को जल्द से जल्द सुलझाए. टीम की अगुवाई डीएसपी राजेंद्र सिंह सोहल कर रहे थे.

घटनास्थल से जो सुबूत मिले थे, उन से घटना में किसी नशेड़ी के शामिल होने की उम्मीद थी, इसलिए पुलिस टीम ने इलाके के तमाम नशेडि़यों को उठा कर उन से पूछताछ शुरू की. मगर वे सब बेकसूर निकले. इस परिवार के अनेक परिचितों को भी संदेह के दायरे में रख कर उन से मनोवैज्ञानिक पूछताछ की गई, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात रहा. गुरदीप को अपने मातापिता की हत्या की खबर मिली तो वह भी पत्नी मोनिका के साथ राजपुरा आ गया. आते ही उस ने जिले के पुलिस अधिकारियों से मुलाकात कर के जल्द से जल्द केस का खुलासा कर हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग की.

पुलिस टीम के ऊपर इस केस को खोलने का काफी दबाव था. काफी कोशिश के बावजूद भी पुलिस को हत्यारों के बारे में कोई पता नहीं लगा तो पुलिस ने अपने मुखबिरों का सहारा लिया. 4 दिनों बाद एक मुखबिर ने पुलिस टीम को एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दी. उस ने बताया कि मोनिका सिकंदर नाम के तांत्रिक के पास जाया करती थी. तांत्रिक भी उस के यहां आता था. कई बार तो वह तांत्रिक देर रात को भी उस के घर आता था और भोर में वहां से चला जाता था. इस जानकारी के बाद इंसपेक्टर शमिंदर सिंह को शक हो गया कि हो न हो, मोनिका और तांत्रिक के बीच कोई चक्कर रहा हो. संभव है, मोनिका ने ही अपने संबंधों में बाधक बने सासससुर को रास्ते से हटवा दिया हो.

इंसपेक्टर ने इस बारे में डीएसपी राजेंद्र सिंह सोहल से बात की तो उन्होंने सिकंदर सिंह को हिरासत में ले कर पूछताछ करने को कहा. सिकंदर सिंह पंजाब के जिला फतेहगढ़ साहिब के कस्बा नारायणगढ़ का रहने वाला था. पुलिस टीम उस के यहां दबिश डालने के लिए निकल गई. लेकिन तांत्रिक अपने घर से गायब मिला. उधर मोनिका भी भूमिगत हो गई थी. इस से ये लोग पूरी तरह शक के दायरे में आ गए. अब पुलिस ने उन्हें सरगर्मी से तलाशना शुरू कर दिया. पुलिस की मेहनत रंग लाई. 5 फरवरी, 2015 को एक गुप्त सूचना के आधार पर राजपुरा के एक मकान में दबिश दे कर वहां छिपे 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. इन में मोनिका भी थी. अन्य 3 लोगों ने अपने नाम सिकंदर, गुरप्रीत और रणजीत बताए.

मौके पर हुई प्रारंभिक पूछताछ में उन तीनों ने खेमचंद व उन की पत्नी कमलेश रानी की हत्या किए जाने की बात भी स्वीकार कर ली. उन्होंने यह भी बताया कि दोनों कत्ल उन्होंने मोनिका के कहने पर ही किए थे  थाने में इन चारों से दोहरे हत्याकांड के बारे में पूछताछ की तो सैक्स अपराध की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली –

सिकंदर सिंह पंजाब के फतेहगढ़ साहिब के कस्बा नारायणगढ़ निवासी दलबीर सिंह का बेटा था. दलबीर सिंह फौजी थे और गांव में उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. वह चाहते थे कि सिकंदर भी भारतीय सेना में भरती हो कर देशसेवा करे. लेकिन सिकंदर को न फौज में जाना पसंद था और न ही खेतों में काम करना. वह आवारा घूमता रहता था. इसी बीच पता नहीं कैसे वह एक तांत्रिक के संपर्क में आया और फिर उस से थोड़ीबहुत तंत्रविद्या सीख कर खुद भी तांत्रिक बन गया. उस ने घर के एक कमरे में अपनी गद्दी जमा ली. पहले उस के पास स्थानीय लोग ही आते थे. धीरेधीरे उस का प्रचार होने लगा तो आसपास के क्षेत्रों से भी लोग अपनी समस्याएं ले कर उस के पास पहुंचने लगे.

मोनिका भी अपनी समस्या ले कर उस के पास आई थी. 5 साल पहले उस की शादी पंजाब के राजपुरा में स्थिति बनवाड़ी इलाके में रहने वाले खेमचंद के बेटे गुरदीप से हुई थी. गुरदीप इंडियन नेवी में नौकरी करता था. मोनिका की शादी हुए 5 साल हो गए थे, लेकिन वह किसी वजह से मां नहीं बन पाई थी. मोनिका और गुरदीप ने अपना इलाज भी कराया और तांत्रिकों, मौलवियों से मिली, लेकिन उस की कोख नहीं भरी. किसी के द्वारा उसे तथाकथित तांत्रिक सिकंदर के बारे में पता चला तो वह अपनी समस्या के समाधान के लिए उस के पास पहुंच गई. खूबसूरत मोनिका को देख कर सिकंदर का मन डोल गया. उस ने पहले तो झाड़फूंक करने के अलावा उस से कुछ उपाय करवाए.

इस से मोनिका को कोई फायदा नहीं हुआ तो सिकंदर ने उसे एक दिन समझाया कि भैरवी क्रिया से वह निश्चित रूप से मां बन जाएगी. मगर यह क्रिया वह उस की अनुमति के बिना नहीं करेगा. इस का असर भी तभी होगा, जब वह उसे पूरा सहयोग करेगी. मोनिका उस की बात समझ तो चुकी थी, फिर भी उस ने उस क्रिया के बारे में उस से पूछा तो सिकंदर ने उसे विस्तारपूर्वक समझा दिया. सिकंदर ने कहा कि इस क्रिया में आधी रात के वक्त विशेष पूजा के दौरान पहले दोनों वस्त्रहीन होंगे, उस के बाद वह इसी अवस्था में उस की सवारी कर के संतान योग की विधि वाला पाठ करेगा.

मोनिका जानती थी कि यह क्रिया कर के वह पति को धोखा दे रही है, लेकिन संतान पाने के लिए वह सब कुछ करने को तैयार थी. लेकिन समस्या यह थी कि घर में सासससुर को छोड़ कर आधी रात में वह सिकंदर के यहां नहीं जा सकती थी. अपनी यह समस्या उस ने सिकंदर को बताई, साथ ही यह भी कहा कि अगर वह भैरवी क्रिया उस के घर पर ही आ कर करे तो ज्यादा ठीक रहेगा. जिस रात वह यह क्रिया करेगा, उस रात वह अपने सासससुर के खाने में नींद की गोलियां मिला देगी. जब वे गहरी नींद में सो जाएंगे तो यह क्रिया बिना किसी रुकावट के पूरी हो जाएगी.

सिकंदर उस की बात मान गया. तब निर्धारित रात को मोनिका ने ऐसा ही किया. सासससुर को नींद की गोली मिला खाना खिलाने के बाद उस ने सिकंदर को फोन कर दिया. जब तक वह मोनिका के घर पहुंचा, सासससुर गहरी नींद के आगोश में जा चुके थे. अब एक कमरे में मोनिका और सिकंदर निर्वस्त्र बैठे थे. कुछ देर मंत्र उच्चारण के बाद सिकंदर भैरवी क्रिया करने में लीन हो गया. क्रिया खत्म होने के बाद मोनिका निश्चिंत हो गई कि अब वह मां बन जाएगी. वह गर्भवती होगी या नहीं? यह बाद की बात थी. फिलहाल इस क्रिया से सिकंदर के लिए मौजमस्ती का एक नया द्वार खुल गया था. सिकंदर ने उसे बता दिया कि जब तक वह गर्भवती न हो जाए, यह क्रिया चलती रहेगी.

मोनिका अपने सासससुर के खाने में जो नींद की गोलियां मिलाती थी, एक रात पता नहीं कैसे उस दवा की मात्रा कम रह गई, जिस से मोनिका के सासससुर आधी रात में उस वक्त जाग गए, जब उन की बहू तांत्रिक सिकंदर के साथ वासना का खेल खेलने में लीन थी. दोनों ने बहू को इस हालत में देखा तो उन के होश उड़ गए. आहट होने पर तांत्रिक वहां से भाग गया. उस के भागने के बाद उन्होंने मोनिका को बहुत बुराभला कहा. साथ ही इस सब के बारे में अपने बेटे गुरदीप को बताने की धमकी भी दी. मोनिका डर गई. अपनी गलती मानते हुए उस ने सासससुर के पैरों पर गिर कर माफी मांगते हुए वादा किया कि वह भविष्य में ऐसी गलती कभी नहीं करेगी. इस सब में उस ने कसूर भी तांत्रिक का ही निकाल दिया.

बात उछलती तो बदनामी अपनी ही होती, यह सोच कर खेमचंद और कमलेश कड़वा घूंट पी कर फिलहाल चुप हो गए. उन्होंने बहू की हरकत बेटे को नहीं बताई. सासससुर तो चुप बैठ गए, मगर मोनिका चुप बैठने वालों में नहीं थी. उसे लगा कि सासससुर उस के रास्ते में बाधक बने रहेंगे. इसलिए उस ने उन्हें ठिकाने लगाने की ठान ली. इस बारे में उस ने सिकंदर से बात की तो वह यह काम करने को तैयार हो गया. क्योंकि उन के न होने पर उसे बेखौफ हो कर अय्याशी करने का मौका मिलता. पड़ोस के गांव बरौंगा के रहने वाले गुरप्रीत सिंह उर्फ काली व रणजीत सिंह से सिकंदर की दोस्ती थी. दोनों ही आवारा थे. पैसों का लालच दे कर सिकंदर ने दोनों को अपनी योजना में शामिल कर लिया.

मोनिका नहीं चाहती थी कि किसी को उस पर शक हो. इसलिए योजना बनाने के बाद वह लोहड़ी से अगले दिन अपने पति के पास मुंबई चली गई. 23 जनवरी, 2015 को सिकंदर ने अपने साथियों के साथ मिल कर खेमचंद व उन की पत्नी कमलेश रानी की हत्या कर दी. हत्या को लूट का रूप देने के लिए उन्होंने अलमारी व तिजोरी में रखे 25-30 हजार रुपयों के अलावा सारी ज्वैलरी भी निकाल ली और घर का सामान बिखेर दिया. वहां नशा लेने में प्रयोग की जाने वाली एल्युमिनियम की पन्नी व सिगरेट के टुकड़े भी डाल दिए. जिस से लगे की लूटपाट नशेडि़यों ने की है. पुलिस ने चारों अभियुक्तों से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर 4 दिनों की पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उन से चोरी किए 2 लाख रुपए के आभूषणों के अलावा नकदी भी बरामद कर ली.

रिमांड अवधि पूरी होने पर उन्हें फिर से न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया. कथा संकलन तक विवेचनाधिकारी इंसपेक्टर शमिंदर सिंह ने इन आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में प्रस्तुत कर दिया था. Crime Story Hindi

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Cyber Fraud: एटीएम कार्डो से ठगी

Cyber Fraud: झारखंड के जिला जामतारा में करीब ढाई हजार ऐसे कोचिंग सेंटर हैं, जहां एटीएम के माध्यम से की जाने वाली ठगी सिखाई जाती है. मुरादाबाद पुलिस ने इस जिले के 2 ठगों को पकड़ा तो यह बात खुली. कृपया सावधान रहें आजकल सब से ज्यादा ठगी एटीएम के जरिए से होती है. कोई भी बड़ा अधिकारी ट्रांसफर के बाद जब नई जगह चार्ज लेता है तो अपने अधीन आने वाले विभागों, अफसरों और विभागीय फाइलों को अपने नजरिए से देखता, समझता है और जरूरी निर्देश देता है. गत दिनों मुरादाबाद आ कर डा. रामसुरेश यादव ने जब एसपी सिटी का पदभार संभाला तो उन्होंने भी यही किया. इस काररवाई में उन्हें पता चला कि मुरादाबाद में कई मामले ऐसे हुए हैं, जिन में ठगों ने फरजी बैंक अफसर बन कर एटीएम के माध्यम से कई लोगों के साथ ठगी की है.

ठगी के इस मामले को पुलिस की साइबर शाखा देख रही थी. डा. रामसुरेश यादव ने इस संबंध में एसएसपी लव कुमार से बात की. वह भी इस बात से सहमत हुए कि पुलिस को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तत्काल काररवाई कर के उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो फरजी बैंक अधिकारी बन कर लोगों से फोन पर उन के बैंक एकाउंट और एटीएम कार्ड की जानकारी लेते हैं और उन के एकाउंट से पैसा निकालते हैं. एसएसपी से बात होने के बाद डा. रामसुरेश यादव ने उन केसों का अध्ययन किया, जिन में लोगों को इस तरह ठगा गया था.

नागफनी थानाक्षेत्र में रहने वाले अधिवक्ता वैभव अग्रवाल और उन की पत्नी हेमलता का आईसीआईसीआई बैंक की सिविल लाइंस ब्रांच में जौइंट एकाउंट था. 14 मई को जब वह कोर्ट जा रहे थे तो करीब सवा 10 बजे उन के मोबाइल पर एक फोन आया. वैभव ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से फोन करने वाले ने खुद को आईसीआईसीआई बैंक का अफसर बता कर कहा कि उन्होंने बैंक को अपना पैन नंबर नहीं दिया है, इसलिए तत्काल पैन कार्ड की कौपी जमा करा दें. इस पर वैभव ने एकदो दिन में कौपी जमा कराने को कह दिया. फोन करने वाले ने कहा कि उन का खाता अपडेट करना है, जिस के लिए उन्हें कुछ जरूरी जानकारी चाहिए. उस वक्त वैभव की कुछ समझ में नहीं आया और उन्होंने पूछने वाले को वांछित जानकारी दे दी.

वैभव ने गाड़ी चलातेचलाते ट्रैपिँक की टेंशन में जानकारी तो दे दी, लेकिन उन्हें कुछ संदेह हुआ. संदेह होते ही वह बैंक की ओर दौड़े. बैंक जा कर उन्होंने मैनेजर फैजान अब्बासी से पूरी बात बता कर तुरंत खाता ब्लौक करने को कहा, लेकिन अब्बासी ने उन की बात पर ध्यान नहीं दिया. इस के बाद वैभव के फोन पर 4 मैसेज आए, जिन में उन के एकाउंट से 50-50 हजार रुपए निकाले जाने की जानकारी दी गई थी. उस समय वैभव के एकाउंट में 2 लाख 10 हजार रुपए पड़े थे, जिन में से 2 लाख रुपए निकाल लिए गए थे. इस के बाद वह फिर बैंक गए और बैंक मैनेजर को मोबाइल के मैसेज दिखा कर अविलंब खाता ब्लौक करने को कहा. आरोप के अनुसार, बैंक मैनेजर ने खाता ब्लौक करने में आनाकानी की.

इस पर वैभव ने अपने साथियों को सूचना दे कर बुला लिया. तत्पश्चात वह अधिवक्ता राकेश वशिष्ठ, धर्मवीर सिंह, आदेश कुमार को साथ ले कर थाना सिविल लाइंस पहुंचे और बैंक प्रबंधक फैजान अब्बासी के खिलाफ धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का आरोप लगा कर आईपीसी की धारा 420, 406 और आइटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. वैभव का कहना था कि अगर समय रहते उन का खाता ब्लौक कर दिया गया होता तो उन के साथ यह धोखाधड़ी नहीं होती. यह मामला चूंकि एक अधिवक्ता से जुड़ा था, इसलिए पुलिस भी तुरंत हरकत में आ गई. पुलिस ने तुरंत बैंक जा कर पूछताछ की तो बैंक ने स्टेट बैंक औफ इंडिया के 4 खातों के नंबर उपलब्ध कराए, जिन में वैभव के खाते से रकम ट्रांसफर की गई थी.

पुलिस ने स्टेट बैंक जा कर पूछताछ की तो पता चला कि उन खातों में ट्रांसफर हुई रकम निकाल ली गई है. ये सभी खाते झारखंड के थे. बाद में यह मुकदमा विवेचना के लिए साइबर सेल को ट्रांसफर कर दिया गया. इस मामले में साइबर विशेषज्ञों का मानना था कि शातिर ठगों ने पहले वैभव अग्रवाल के बैंक खाते में औनलाइन सेंध लगाई होगी, उस के बाद उन का कोड बदलने की प्रक्रिया अपनाई होगी. इस तरह का यह पहला मामला सामने आया था, वरना इस से पहले जो ठगियां हुई थीं, वे एटीएम की जानकारी ले कर हुई थीं.

इस से पहले स्टेशन के सामने रेलवे की डबल स्टोरी बिल्डिंग में रहने वाले नदरुल हसन को एटीएम कार्ड की जानकारी ले कर ठगा गया था. मई के पहले हफ्ते में रेलवे कर्मचारी नदरुल हसन के मोबाइल पर एक महिला का फोन आया. उस ने खुद को बैंक अधिकारी बताते हुए कहा, ‘‘देखिए, आप के बैंक एकाउंट में प्रौब्लम आ गई है. हमें उसे अपडेट करना है, वरना आप का एटीएम कार्ड काम करना बंद कर देगा.’’

यह सुन कर नदरुल घबरा गए. उन्होंने उस महिला को अपने बैंक एकाउंट से संबंधित सारी जानकारी दे दी. एटीएम कार्ड का सीक्रेट कोड भी बता दिया. इस के चंद मिनट बाद नदरुल हसन के मोबाइल पर उन के एकाउंट से 12,300 रुपए कटने का मैसेज आ गया. इस से वह समझ गए कि उन के साथ धोखाधड़ी हुई है. उन्होंने 3 मई, 2015 को इस मामले की रिपोर्ट थाना कोतवाली में लिखा दी. इस से पहले 2 दिसंबर, 2014 को भी थाना कटघर में एक ऐसी ही रिपोर्ट दर्ज हुई थी. यह रिपोर्ट सूरजनगर निवासी वीर सिंह ने लिखाई थी. दरअसल वीर सिंह को मुंबई से एक तथाकथित बैंक अफसर का फोन आया था. उस ने वीर सिंह से कहा था, ‘‘आप का एटीएम बंद होने वाला है. अगर आप चाहते हैं कि एटीएम काम करता रहे तो हमें आप का खाता अपडेट करना पड़ेगा.’’

‘‘इस के लिए मुझे क्या करना होगा?’’ वीर सिंह ने पूछा तो फोन करने वाले ने उन से उन के खाते और एटीएम के बारे में पूरी जानकारी मांग ली, एटीएम का सीक्रेट कोड भी. इस के 5 मिनट बाद ही वीर सिंह के मोबाइल पर उन के खाते से 46,400 रुपए कटने का मैसेज आ गया. ठगे जाने का अहसास हुआ तो वीर सिंह ने थाना कटघर में रिपोर्ट दर्ज करा दी. यही सब अनीता के साथ भी हुआ था. चांदपुर के हिंदू इंटर कालेज की शिक्षिका अनीता मुरादाबाद के जिला चिकित्सालय के परिसर में रहती हैं. 23 फरवरी, 2015 को अनीता के मोबाइल पर किसी तथाकथित बैंक अफसर का फोन आया. उस ने अनीता से कहा, ‘‘आप का एटीएम कार्ड बंद हो गया है. अगर आप चाहती हैं कि आप का एटीएम चालू रहे तो हमें आप का एकाउंट अपडेट करना पड़ेगा.’’

‘‘उस के लिए मुझे क्या करना होगा?’’ अनीता ने पूछा तो फोन करने वाले ने उन से उन का खाता नंबर से ले कर उन के एटीएम कार्ड से जुड़ी सारी जानकारी मांग ली. फोन बैंक से ही आया होगा, यह सोच कर अनीता ने सब कुछ बता दिया. इस के चंद मिनटों बाद ही उन के एकाउंट से 11,300 रुपए कट गए. फोन पर इस रकम के निकलने का मैसेज आया तो अनीता को ठगे जाने का अहसास हुआ. बाद में उन्होंने थाना कोतवाली में इस की रिपोर्ट लिखा दी. एसएसपी लव कुमार के आदेश पर ये सारे मामले जांच के लिए साइबर सेल को सौंप दिए गए थे. साइबर सेल ने अपने स्तर पर जांच की तो पता चला कि जिन नंबरों से फोन किए गए थे, वे सब झारखंड के थे. यानी यह काम झारखंड में बैठेबैठे किया जा रहा था.

जब इन मामलों की फाइलें नवनियुक्त एसपी सिटी रामसुरेश यादव के सामने आईं तो उन्होंने इन मामलों की तह तक जाने का फैसला किया. इस के लिए उन्होंने साइबर सेल और क्राइम ब्रांच की एक संयुक्त टीम बनाई. इस टीम में इंसपेक्टर देवप्रकाश शुक्ल, संजय कुमार सिंह, धर्मेंद्र यादव, एन.के. भटनागर, सबइंसपेक्टर राजकुमार शर्मा, रघुराज सिंह और साइबर सेल के ललित सैनी, दीपक कुमार और अंकित कुमार को शामिल किया गया. इस टीम ने यह पहले ही पता कर लिया था कि जिन नंबरों से ठगे गए लोगों को फोन किए गए थे, वे सब पटना से खरीदे गए थे.

पुलिस टीम 15 मई, 2015 को पटना के लिए रवाना हुई. पटना पहुंच कर मुरादाबाद की इस पुलिस टीम ने पटना रेलवे स्टेशन के सामने एमसी बुद्ध मार्ग पर जनरल स्टोर चलाने वाले यशोवर्धन पंकज को पकड़ा. उस की मोबाइल की दुकान और साइबर कैफे भी था. जिन सिम नंबरों से फोन आए थे, वे यशोवर्धन पंकज की दुकान से ही खरीदे गए थे. यशोवर्धन ने सिम खरीदने वालों के आईडी प्रूफ की कौपी पुलिस को मुहैया करा दी. लेकिन जब पुलिस टीम ने उन आईडी प्रूफों की छानबीन की तो वे सभी फरजी पाए गए. दरअसल पंकज शातिर व्यक्ति था. उस ने पुलिस के पहुंचने से पहले ही एंट्री रजिस्टर और कंप्यूटर रिकौर्ड गायब कर दिया था. बहरहाल पुलिस ने पंकज को पर्सनल बांड पर छोड़ दिया.

जब पंकज से कुछ हासिल नहीं हो सका तो पुलिस टीम ने मुरादाबाद फोन कर के कुछ जानकारियां लीं. पता चला कि रेलवे कालोनी में रहने वाले नदरुल हसन और सूरजनगर निवासी वीर सिंह के बैंक खातों से जो पैसा ट्रांसफर हुआ था, वह झारखंड के जिला जामतारा के करमाटांड स्थित स्टेट बैंक औफ इंडिया के खाताधारक सुधीर मंडल के खाते में औनलाइन गया था. यह सूचना मिलते ही पुलिस टीम जिला जामतारा स्थित करमाटांड जा पहुंची. वहां स्थित स्टेट बैंक औफ इंडिया से सुधीर मंडल का पता मिल गया. वह गांव गुनीडीह का रहने वाला था. हालांकि वह जगह नक्सलवादी क्षेत्र में थी. लेकिन पुलिस टीम ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने गांव गुनीडीह जा कर सुधीर मंडल को धर दबोचा.

प्राथमिक पूछताछ में उस ने बताया कि इस काम में गांव सियाटांड निवासी नेपाल मंडल भी उस का साथ देता था. पुलिस टीम ने सियाटांड जा कर नेपाल मंडल को भी गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों से वे फरजी सिम तो बरामद हो ही गए, जिन से नदरुल हसन और वीर सिंह को फोन किए गए थे, साथ ही 4 मोबाइल फोन और औनलाइन खरीदा गया सोनी कंपनी का एक हैंडीकैम भी बरामद हुआ. साथ ही कई एटीएम कार्ड भी. पुलिस दोनों को जामतारा की अदालत में पेश कर के ट्रांजिट वारंट पर मुरादाबाद ले आई. पूछताछ के बाद दोनों को 21 मई को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. पुलिस के अनुसार, झारखंड के करमाटांड और नारायणपुर थानाक्षेत्र में एटीएम ठगों का गढ़ है. इस क्षेत्र के करीब ढाई हजार युवा एटीएम से ठगी के धंधे में लगे हैं, जिन में लड़कियां भी शामिल हैं.

इन लड़कियों की हिंदी और अंगरेजी पर अच्छी पकड़ है. यह एक ऐसा गढ़ है, जहां एटीएम के माध्यम से ठगी की बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है यानी कोचिंग दी जाती है. कोचिंग में न केवल फोन पर बात करना सिखाया जाता है, बल्कि अफसरों की तरह बात करने के तरीके की बारीकियां भी सिखाई जाती हैं. यह एक ऐसा इलाका है, जहां एटीएम से ठगी कुटीर उद्योग का रूप ले चुकी है. पहले इस क्षेत्र के लोग जहरखुरानी गिरोह के रूप में काम करते थे. इस धंधे में पकड़धकड़ बढ़ गई तो ये लोग एटीएम ठगी के धंधे से जुड़ गए. इस इलाके में 10 साल से ले कर 30-35 साल तक के किशोर, युवा और जवान इस काम में लगे हुए हैं. इन लोगों को यहां एटीएम तोड़ू के नाम से जाना जाता है. सुबूत न होने से स्थानीय पुलिस इन का कुछ नहीं बिगाड़ पाती.

दरअसल, सौफ्टवेयर डेवलपमेंट का मुख्य केंद्र कोलकाता यहां से महज 150 किलोमीटर दूर है. वहां काम की तलाश में गए कुछ युवाओं ने यह तकनीक सीखी और अपने क्षेत्र में लौट कर लोगों को कोचिंग दी. अब ये लोग एयरटेल मनी, औक्सीजन वौलेट, वोडाफोन एमपेसा आदि का प्रयोग कर के एटीएम कार्डधारक के खाते की रकम ट्रांसफर कर लेते हैं. इस क्षेत्र के युवा घर बैठे इसी तरह हर महीने 20-30 हजार रुपए, कभी तो लाखों कमा लेते हैं. इन लोगों का यह धंधा पूरे भारत में चलता है. यही वजह है कि इस इलाके में आए दिन किसी न किसी प्रदेश की पुलिस आरोपियों की तलाश में आती रहती है. वैसे यहां के धंधेबाजों का उस्ताद कोलकाता निवासी पिंटू चौधरी को बताया जाता है, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं लग रहा है. Cyber Fraud

 

UP Crime News: नेतागिरी की आड़ में – पैसों के लालच ने पहुंचाया जेल

UP Crime News: अचानक हुए हजार व 5 सौ के नोटबंदी के फैसले के बाद पूरे देश में अफरातफरी का जो माहौल कायम हुआ, उस से उत्तर प्रदेश का मेरठ शहर भी अछूता नहीं रहा. बैंकों में भीड़ उमड़ पड़ी थी. कोई पुराने नोटों को जमा करना चाहता था तो कोई अपनी जरूरत के हिसाब से नए नोट लेना चाहता था. हर रोज बैंकों में लंबी कतारें लग रही थीं. होने वाली परेशानी से लोगों में गुस्सा भी पनप रहा था. कई दिन बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस थे. पुलिस को भी अतिरिक्त ड्यूटी करनी पड़ रही थी. कानूनव्यवस्था की स्थिति न बिगड़े, इस के लिए बैंकों में पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. ऐसे में ही एसएसपी जे.

रविंद्र गौड़ को सूचना मिली कि कुछ लोग नए नकली नोटों का धंधा कर रहे हैं. इस के लिए उन्होंने पूरा नेटवर्क भी तैयार कर लिया है. सूचना गंभीर थी, लिहाजा जे. रविंद्र गौड़ ने इस की जानकारी एसपी (क्राइम) अजय सहदेव को दे कर सर्विलांस टीम को अविलंब काररवाई करने के आदेश दिए. थाना पुलिस को भी निर्देश दिए गए कि चैकिंग अभियान चला कर संदिग्ध लोगों की तलाश की जाए. सर्विलांस टीम ने कुछ संदिग्ध लोगों के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. 23 दिसंबर, 2016 की रात नेशनल हाइवे संख्या 58 दिल्लीदेहरादून मार्ग स्थित पल्लवपुरम थानाक्षेत्र के मोदी अस्पताल के सामने पुलिस चैकिंग अभियान चला रही थी. आनेजाने वाले संदिग्ध वाहनों की जांच सख्ती से की जा रही थी.

दरअसल पुलिस को सूचना मिली थी कि नकली नोटों का धंधा करने वाले कुछ लोग उधर से निकलने वाले हैं. सीओ वी.एस. वीरकुमार के नेतृत्व में थाना पल्लवपुरम पुलिस और सर्विलांस टीम इस चैकिंग अभियान में लगी थी. पुलिस को एक काले रंग की इंडीवर लग्जरी कार आती दिखाई दी. कार पर किसी पार्टी का झंडा लगा था और उस के अगले शीशे पर बीचोबीच बड़े अक्षरों में वीआईपी लिखा स्टिकर लगा था. पुलिस ने कार को रोका. उस में कुल 3 लोग सवार थे. एक चालक की सीट पर, दूसरा उस की बराबर वाली सीट पर और तीसरा पिछली सीट पर बैठा था. कार रुकवाने पर उस में सवार कुरतापायजामा और जवाहर जैकेट पहने नौजवान ने रौबदार लहजे में पूछा, ‘‘कहिए, क्या बात है, मेरी कार को क्यों रोका?’’

‘‘सर, रूटीन चैकिंग है.’’ एक पुलिस वाले ने कहा.

पुलिस वाले की यह बात उस नौजवान को नागवार गुजरी हो, इस तरह उस ने तंज कसते हुए कहा, ‘‘रूटीन चैकिंग है या आम लोगों को परेशान करने का हथकंडा. आप यह सब करते रहिए और हमें जाने दीजिए.’’

‘‘सौरी सर, हमें आप की कार की तलाशी लेनी होगी.’’ पुलिस वाले ने कहा.

पुलिस वाले का इतना कहना था कि युवक गुस्से में चीखा, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा, हम कोई चोरउचक्के हैं. तुम जानते नहीं मुझे. मैं लोकमत पार्टी का नेता हूं.’’

‘‘वह सब तो ठीक है सर, लेकिन यह हमारी ड्यूटी है. वैसे भी कानून सब के लिए एक है.’’

‘‘पुलिस का काम अपराधियों को पकड़ना है न कि हम जैसे लोगों को परेशान करना. मेरी पहुंच बहुत ऊपर तक है. अगर मैं अपने पावर का इस्तेमाल करने पर आ गया तो एकएक की वरदी उतर जाएगी.’’ युवक ने धमकी दी.

वह युवक चैकिंग का जिस तरह विरोध कर रहा था, उस से पुलिस को उस पर शक हुआ. एक बात यह भी थी कि कई बार शातिर लोग इस तरह की कारों का इस्तेमाल गलत कामों के लिए करते हैं. पुलिस ने तीनों युवकों को जबरदस्ती नीचे उतारा और कार की तलाशी शुरू कर दी. पुलिस को कार में एक बैग मिला. पुलिस ने जब उस बैग को खोला तो उस में 2 हजार और 5 सौ के नए नोट बरामद हुए. उन के मिलते ही पुलिस को धमका रहे युवक के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. पुलिस ने बरामद रकम को गिना तो वह 4 लाख 27 हजार रुपए निकली. पुलिस ने उस के बारे में पूछा, ‘‘यह पैसा कहां से आया?’’

‘‘सर, ये हमारे हैं.’’ जवाब देते हुए युवक सकपकाया.

पुलिस ने नोटों पर गौर किया तो उन का कागज न सिर्फ हलका था, बल्कि रंग भी नए नोटों के मुकाबले थोड़ा फीका था. इस से पुलिस को नोटों के नकली होने का शक हुआ. दूसरी तरफ बरामद रकम के बारे में युवक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. पुलिस ने कार की एक बार फिर तलाशी ली तो उस में से एक तमंचा और 2 चाकू बरामद हुए. पुलिस ने तीनों को हिरासत में लिया और थाने ला कर उन से पूछताछ शुरू कर दी. पहले तो उन्होंने पुलिस को चकमा देने का प्रयास किया, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो उन्होंने जो सच कबूला, उसे सुन कर पुलिस हैरान रह गई. वे तीनों नकली नोट छाप कर उन्हें बाजार में चलाने का धंधा कर रहे थे.

पुलिस से बहस करने वाला युवक ही इस धंधे का मास्टरमाइंड था. वह एक पार्टी का पदाधिकारी था और नेतागिरी की आड़ में ही नकली नोटों के इस धंधे को अंजाम दे रहा था. वह नकली नोटों के बदले जमा होने वाली असली रकम के बल पर चुनाव लड़ना चाहता था. जिन युवकों को गिरफ्तार किया गया था, उन के नाम मोहम्मद खुशी गांधी, ताहिर और आजाद थे. तीनों मेरठ के ही भावनपुर थानाक्षेत्र के गांव जेई के रहने वाले थे. पुलिस ने उन के गांव जा कर उन की निशानदेही पर खुशी के घर से प्रिंटर, स्कैनर, कटर और एक प्लास्टिक के कट्टे में भरी कागज की कतरनें बरामद कीं. बरामद सामान के साथ पुलिस उन्हें थाने ले आई. पुलिस ने तीनों युवकों से विस्तृत पूछताछ की तो एक युवा नेता के गोरखधंधे की ऐसी कहानी सामने आई, जो हैरान करने वाली थी. मुख्य आरोपी खुशी गांधी हनीफ खां का बेटा था.

हनीफ के पास काफी खेतीबाड़ी थी. सुखीसंपन्न होने की वजह से गांव में उन का रसूख था. खुशी अपने 5 भाइयों में चौथे नंबर पर था. उस के बड़े भाई खेती करते थे. लेकिन खुशी का मन खेती में नहीं लगा. गलत संगत में पड़ने की वजह से उस के कदम बहक गए थे. बेटे का चालचलन देख कर हनीफ ने उसे समझाने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन उस के मन में तो कुछ और ही था. खुशी महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह दिन में सपने देखता था और ऊंची उड़ान भरना चाहता था. वह इस सच को स्वीकार नहीं करना चाहता था कि बिना मेहनत के सपनों की इमारत खड़ी नहीं होती.

वक्त के साथ खुशी के रिश्ते जरायमपेशा लोगों से भी हो गए. संगत अपना गुल जरूर खिलाती है. कुछ संगत तो कुछ शौर्टकट से अमीर बनने की चाहत उसे जुर्म की डगर पर ले गई. हर गलत काम दफन ही हो जाए, यह जरूरी नहीं है. आखिर एक मामले में वह पुलिस के शिकंजे में आ गया. दरअसल, 2 साल पहले मेरठ के ही टीपीनगर थानाक्षेत्र के एक तेल कारोबारी के यहां डकैती पड़ी. इस मामले में पुलिस ने खुशी को भी गिरफ्तार कर के जेल भेजा था.

कुछ महीने बाद उस की जमानत हो गई थी. अच्छा आदमी वही होता है, जो ठोकर लगने पर संभल जाए. लेकिन खुशी उन लोगों में नहीं था. अपने जैसे युवकों की उस की मंडली थी. वह छोटेमोटे अपराध करने लगा था. किसी का एक बार अपराध में नाम आ जाए और उस के बाद पुलिस उसे परेशान न करे, ऐसा नहीं होता. खुशी पुलिस के निशाने पर आए दिन आने लगा तो खाकी से बचने के लिए उस ने राजनीति को हथियार बना लिया. इस के लिए उस ने अलगअलग पार्टी के नेताओं से रिश्ते बना लिए. वह रैलियों में भी जाता और लड़कों की टोली अपने साथ रखता. अपना रसूख दिखाने के लिए उस ने एक इंडीवर कार खरीद ली.

उस ने नेशनल लोकमत पार्टी का दामन थाम लिया. खुशी युवा था. पार्टी ने न सिर्फ उसे प्रदेश अध्यक्ष बना दिया, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वह पार्टी का प्रत्याशी भी बन गया. कार में सायरन व पार्टी का झंडा लगाने के साथ उस ने उस पर वीआईपी भी लिखवा दिया था. 8 नवंबर को प्रधानमंत्री की नोटबंदी की घोषणा के बाद पुरानी मुद्रा पर रोक लग गई और नई मुद्रा आनी शुरू हुई. खुशी को लगा कि अमीर बनने का यह अच्छा मौका है. उस ने सोचा कि अगर पैसा होगा तो वह चुनाव भी अच्छे से लड़ सकेगा. पैसों के लिए ही उस के मन में नकली नोट छापने का आइडिया आ गया.

उस ने अपने 2 साथियों ताहिर और आजाद से बात की. वह जानता था कि देहाती इलाकों में नई करेंसी में असली और नकली की पहचान करना आसान नहीं है. क्योंकि नए नोट अभी पूरी तरह प्रचलन में नहीं आए हैं. उस ने शहरी बाजारों में भी नकली नोट चलाने के बारे में सोच लिया. इस खुराफाती काम में उस ने जरा भी देरी नहीं की और बाजार से अच्छे किस्म का स्कैनर, प्रिंटर और कागज खरीद लाया. फिर क्या था, उस ने नए नोटों से नकली नोटों के प्रिंट निकालने शुरू कर दिए. खुशी ने शहर जा कर खरीदारी में वे नोट चलाए तो आसानी से चल गए. इस के बाद उस के हौसले बढ़ गए और वह नकली नोट छापने और चलाने लगा. उन रुपयों से उस ने जम कर शौपिंग की.

देहात के भोलेभाले लोगों को भी उस ने अपना निशाना बनाया. खुशी ने नकली नोट चलाने के लिए कुछ एजेंट बना रखे थे, जिन्हें वह 40 हजार के पुराने नोटों के बदले एक लाख के नए नकली नोट देता था. वह कार का सायरन बजाते हुए पुलिस के सामने से निकल जाता और उस पर किसी को शक नहीं होता. वह खादी की आड़ में खाकी वरदी से बचे रहना चाहता था. खुशी शातिर किस्म का युवक था. वह जानता था कि यह काम ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है, क्योंकि जल्दी ही लोग असलीनकली नोट में फर्क करना सीख जाएंगे, इसलिए वह जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा नोट खपाने की कोशिश कर रहा था. यही वजह थी कि वह पुलिस के निशाने पर आ गया.

पूछताछ के बाद एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने पुलिस लाइन में प्रैसवार्ता कर के युवा नेता के कारनामों का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने खुशी और उस के साथियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: अधूरी मोहब्बत

Love Story: कामरान की शादी उस की चचेरी बहन सदफ से बचपन में ही तय हो गई थी, चाचाचाची भी तैयार थे, अंत में ऐसा क्या हुआ कि उस की शादी सदफ से होने के बजाए किसी और से हो गई, जो उसे जरा भी पसंद नहीं करती थी…

चाय का पहला घूंट लेते हुए मैं ने सदफ से फरमाइश की, ‘‘दुआ करो कि मैं कामयाब हो जाऊं.’’ उस ने गुलाबी होंठों पर शरमीली मुसकराहट लाते हुए कहा, ‘‘आप को यह कहने की जरूरत नहीं है. मैं रातदिन आप के लिए, आप की कामयाबी के लिए दुआ करती रहती हूं.’’

यह सच भी था. मुझे उस से कहने की जरूरत नहीं थी. वह मेरी मंगेतर थी. मेरी दादी ने सदफ के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही ऐलान कर दिया था, ‘‘यह मेरे कामरान की दुलहन बनेगी.’’

दादी की इस बात को भले किसी बंधन में नहीं बांधा गया था, पर सब के दिलों में यह बात बैठ गई थी कि कामरान की शादी सदफ से होगी. मंगनी वगैरह इसलिए नहीं की गई थी, क्योंकि चाचा और हमारा परिवार एक ही मकान में रहता था. हमारे उस पुश्तैनी मकान में ऊपर वाले हिस्से में चाचा रहते थे और नीचे वाले हिस्से में हम लोग. दोनों घरों में बच्चे बराबर थे. हम दो 2 भाई और एक बहन थी. जबकि चाचा की सिर्फ 3 बेटियां थीं. सदफ चाचा की बड़ी बेटी थी. हमारा गुजरबसर आराम से हो रहा था. लेकिन इधर साल भर से हमारे घर के हालात बिगड़ रहे थे. अचानक हार्टअटैक से अब्बा की मौत हो गई थी. वह सरकारी हाईस्कूल में टीचर थे. फंड की रकम और पेंशन मिलने में समय लग रहा था.

घर के हालात रोजबरोज बिगड़ते जा रहे थे. नौकरी की दौड़धूप करने के साथसाथ मैं एक कोचिंग सेंटर में अंग्रेजी और अर्थशास्त्र पढ़ा रहा था, जिस से थोड़ी मदद मिल जाती थी, थोड़ीबहुत मदद चाचा कर देते थे. 8-9 महीने की दौड़भाग के बाद पेंशन मिलने लगी. फंड भी मिल गया था. पर ढेरों खर्च मुंह बाए खड़े थे. छोटा भाई मैट्रिक में था और बहन मिडिल क्लास में थी. किसी तरह काम चल रहा था कि अम्मी बीमार हो गईं. उन्हें बे्रस्ट कैंसर हुआ था. फंड से मिलने वाली रकम उन के इलाज में खर्च हो गई. औपरेशन होने के बाद भी सेहत में कोई खास फर्क नहीं पड़ा. हालात बद से बदतर होते जा रहे थे. चाचा भी परेशान रहते थे. आखिर वह कितनी मदद करते. उन पर भी 3 बेटियों की जिम्मेदारी थी. इस के बावजूद इस मुसीबत में वह पूरा साथ दे रहे थे. चाची ज्यादा वक्त अम्मी के पास ही बिताती थीं. खाना पकाने का काम सदफ संभाल रही थी.

उस रोज नौकरी का इंटरव्यू देने जाना था. सदफ की दुआओं के साथ मैं घर से निकल रहा था तो उस की नजर मेरे जूतों पर पड़ी. उस ने कहा, ‘‘शूज तो बड़े शानदार हैं, ब्रांडेड लगते हैं?’’

मैं बौखला सा उठा. सच था, इतने कीमती ब्रांडेड शूज मेरे पास कहां से आ सकते थे? मैं ने कहा, ‘‘इंटरव्यू के लिए एक दोस्त से मांग कर लाया हूं.’’

यह कहते हुए मेरी नजरें झुक गई थीं. आंख मिला कर झूठ बोलना मेरे बस की बात नहीं थी. एच.एच. बिल्डर्स के औफिस में दाखिल होते हुए मैं उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच झूल रहा था. मैं ने एकाउंट विभाग के लिए आवेदन किया था. 4-5 लोग वहां पहले से बैठे थे. मेरा नाम पुकारा गया. केबिन में पहुंचने पर थ्रीपीस सूट पहने एक व्यक्ति ने कहा, ‘‘प्लीज सिट डाउन.’’

उस की पर्सनालिटी कुछ खास नहीं थी, पर कपड़े व स्टाइल शानदार थी. कुरसी पर बैठ कर मैं ने फाइल उस की ओर बढ़ा दी. उस की नजरें मेरे ऊपर ही टिकी थीं. उस की तेज निगाहों से मुझे घबराहट सी हो रही थी. उस ने ठहरी हुई आवाज में कहा, ‘‘मि. कामरान अहमद, आप ने जो शूज पहने हैं, इन्हें कहां से हासिल किए हैं?’’

मुझे लगा, मेरे कानों में किसी ने बम फोड़ दिया है. पहले की ही तरह मैं उस से झूठ नहीं बोल सका. लेकिन सच बोलना भी आसान नहीं था. मैं ने इंटरव्यू की खूब तैयारी कर रखी थी, पर पहले ही सवाल ने मुझे लाजवाब कर दिया था. मेरे दिमाग में धमाका सा हुआ कि यहां सच बोलना ही बेहतर है. मैं ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘सर, आप का यह सवाल हैरान करने वाला है. क्योंकि आप ने मेरी हैसियत और जूतों के फर्क को समझ लिया. इन्हें खरीदना मेरे वश की बात नहीं है. सर, मैं झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं ने दोस्त से मांगे हैं. क्योंकि दोस्त भी हैसियत के मुताबिक ही होते हैं.’’

जूतों की हकीकत बताने से पहले मैं ने अपनी गरीबी, बाप की मौत, मां की बीमारी और भाईबहन की जिम्मेदारी के बारे में सब संक्षेप में बता कर कहा, ‘‘सर, यह नौकरी मेरे लिए बेहद जरूरी है. विज्ञापन के हिसाब से योग्यता भी थी और तैयारी भी अच्छी थी. बस मुझे अपने आप को सलीके से पेश करना था.’’

‘‘जब हालात ठीक थे, तब का यह सूट था, लेकिन जूते फट चुके थे. कल मैं जुम्मे की नमाज पढ़ने मसजिद गया था, वहां मुझे ये जूते नजर आ गए. मेरा मसला हल हो गया. किसी बुरी नीयत से नहीं, सिर्फ इंटरव्यू के लिए मैं ने ये जूते उठाए थे. इरादा यही था कि इंटरव्यू के बाद इन्हें वहीं रख आऊंगा. पता नहीं था कि अल्लाह के घर से की गई पहली चोरी का हिसाब इतनी जल्दी और इस जगह देना होगा.’’

इंटरव्यू लेने वाले ने मेरी पूरी बात ध्यान से सुनी. कुछ देर खामोशी से मुझे परखता रहा. मैं नजरें झुकाए बैठा था. अचानक उस ने कहा, ‘‘तुम्हारे इस सच ने मुझे खुश कर दिया. तुम कितना भी झूठ बोलते, मुझे धोखा नहीं दे सकते थे. मैं कोई नमाजी आदमी नहीं हूं. लेकिन कल मैं एक पार्टी को प्रोजेक्ट दिखाने गया था, रास्ते में नमाज का समय हो गया. वह नमाज के पाबंद थे, उन के साथ मुझे भी नमाज पढ़ने मसजिद जाना पड़ा. वापस आया तो मेरे जूते गायब थे.’’

वह दोस्तों की तरह अपनी परेशानी बता रहे थे. मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘सौरी सर, मैं ने बड़ी मजबूरी में आप के जूते चुराए थे.’’

‘‘इट्स ओके, जो हुआ सो हुआ. शायद इसी तरह हमारी मुलाकात होनी थी. इस में तुम्हें समझने का मौका तो मिल गया. तुम्हारे सच से मैं प्रभावित हूं. क्या तुम पाबंदी से नमाज पढ़ते हो?’’

‘‘नहीं सर, जुम्मेजुम्मे हाजिरी लगा देता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘मि. कामरान अहमद, तुम से बात कर के मुझे लग रहा है कि तुम ही वह व्यक्ति हो, जिस की मुझे जरूरत है. मैं ने नौकरी के लिए तुम्हें सिलेक्ट कर लिया है. 3 महीने तुम टे्रनिंग पर रहोगे. तुम्हारा काम अच्छा हुआ तो तुम परमानेंट कर दिए जाओगे. तब तुम्हारी तनख्वाह बढ़ने के साथ अन्य सुविधाएं भी मिलने लगेंगी.

मुझे लगा, खुशी से कहीं मेरी धड़कनें न रुक जाएं. जिन जूतों की वजह से मुझे यह नौकरी मिली थी, मेरी नजर उन जूतों पर पड़ी तो मैं ने कहा, ‘‘सर, ये शूज…’’

‘‘अब इन्हें तुम रख लो, तुम्हारे पैरों में ये बहुत जंच रहे हैं.’’ उस ने लापरवाही से कहा.

‘‘तुम थोड़ी देर बाहर बैठो, मैं तुम्हारा अपाइंटमेंट लेटर तैयार कराए देता हूं. लेटर ले कर ही घर जाना.’’

उस दिन एच.एच. बिल्डर्स के औफिस से अपाइंटमेंट लेटर ले कर निकला तो मैं हवा में उड़ रहा था. घर में इस खुशखबरी ने मुसकानें बिखेर दीं. चाचा ने उसी समय मिठाई मंगाई. सदफ का चेहरा खुशी से खिला हुआ था. अम्मी भी खुदा का शुक्र अदा कर रही थीं. रात को हम सभी की चाचा के यहां दावत थी, क्योंकि शाम को चाचा की दूसरे नंबर की बेटी सफिया को देखने कुछ लोग आ रहे थे. वह पूरा दिन बड़े हंगामे और खुशी में गुजरा. अब्बा के मरने के बाद पहली बार हम सभी ने इस तरह खुशी मनाई थी. एच.एच. बिल्डर्स के औफिस में पहला दिन बहुत अच्छा गुजरा. चीक एकाउंटैंट सुहैल साहब बड़े दोस्ताना अंदाज में काम समझाते रहे. तसल्ली भी देते रहे कि आगे भी उन का सहयोग मिलता रहेगा. मैं उन फाइलों को देखनेसमझने में लगा रहा, जो मुझे दी गई थीं. 12 बजे के करीब इंटरकौम बजा. बौस मुझे याद कर रहे थे. मेरे बौस वही थे, जिन के जूते चुरा कर मैं पहने बैठा था.

मैं केबिन में पहुंचा तो उन के बगल में एक 20-21 साल की लड़की बैठी थी. बौस ने हमारा परिचय कराया, ‘‘यह एच.एच. बिल्डर्स की औनर और मेरी भतीजी हानिया हसन हैं.’’

मैं ने जल्दी से सलाम किया. वह लापरवाही से सिर हिला कर खिड़की से बाहर देखने लगी. बौस फसील साहब ने आगे कहा, ‘‘हानिया बीकौम कर रही है. आगे एमबीए करने का इरादा है. अपनी पढ़ाई की वजह से औफिस को ज्यादा समय नहीं दे पाती, इसलिए फिलहाल यहां की सारी जिम्मेदारी मुझे ही संभालनी पड़ती है.’’

मैं मुलाजिम था, मुझे औपचारिकता तो निभानी ही थी. मैं ने कहा, ‘‘आप से मिल कर बड़ी खुशी हुई.’’

उस ने मेरी बात का जवाब देने की कौन कहे, मेरी ओर देखा तक नहीं. बौस ने कहा, ‘‘हानिया, यह कामरान अहमद हैं. इन्हें मैं ने एकाउंट डिपार्टमेंट में रखा है. इन्होंने आज ही ज्वाइन किया है.’’

उस ने बेमन से कहा, ‘‘गुड, अच्छा अंकल अब मैं चलूंगी. मुझे काम से कहीं जाना है.’’

‘‘ठीक है बेटा, जाओ.’’ फसील साहब ने कहा. हानिया चली गई.

उस के जाने के बाद फसील साहब ने कहा, ‘‘मेरे बड़े भाई इनायत हसन की 2 साल पहले एक रोड एक्सीडैंट में मौत हो गई थी. उन की पत्नी हानिया के पैदा होते ही गुजर गई थी. भाई साहब ने दूसरी शादी नहीं की थी. बड़े लाडप्यार से हानिया की परवरिश की. यही वजह है कि उन की मौत के 2 साल के बाद भी हानिया अभी तक संभल नहीं पाई है. उन्हीं की याद में डूबी रहती है. इसलिए हमेशा उखड़ीउखड़ी रहती है. इसे ले कर मैं बहुत परेशान रहता हूं.’’

हानिया ने मेरे साथ जो रूखा व्यवहार किया था, उसी की वजह से वह यह सब बता रहे थे. मैं ने कहा, ‘‘सौरी सर, यह सुन कर बड़ा अफसोस हुआ. हानिया मैडम के लिए मांबाप दोनों को खो देने का बहुत बड़ा सदमा है. लेकिन समय बड़ा मरहम होता है, धीरेधीरे सारे जख्म भर देगा. आप परेशान न हों.’’

‘‘तुम ठीक ही कह रहे हो. मैं सोचता हूं कि कोई अच्छा सा लड़का देख कर इस की शादी कर दूं, ताकि शौहरबच्चों में अपना दुख भूल जाए.’’ फसील साहब ने कहा. इस के बाद हम कामकाज और एकाउंट की बातें करने लगे.

शाम को घर पहुंचा तो सभी ने मुझे अच्छी नौकरी की मुबारकबाद दी. अम्मी बहुत खुश थीं. मैं ने कहा, ‘‘आप सभी दुआएं करें कि मैं खूब तरक्की करूं.’’

रात के खाने के बाद मैं ने चाची से पूछा, ‘‘जो लोग सफिया को देखने आए थे, उन का क्या जवाब आया?’’

कुछ देर चुप रहने के बाद चाची बोलीं, ‘‘बेटा उस में एक पेच फंस गया है.’’

मैं ने कहा, ‘‘चाची, अगर लंबेचौड़े दहेज की डिमांड हो तो आप साफ मना कर दें.’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है. खातेपीते खानदानी लोग हैं. दरअसल बात कुछ और है. वे हमारे घर रिश्ता करने को तैयार तो हैं, लेकिन उन्हें सफिया के बजाय सदफ ज्यादा पसंद है.’’

चाची की बात सुन कर मैं सन्न रह गया. अम्मी के चेहरे पर भी परेशानी झलकने लगी. चाची ने कहा, ‘‘बड़ी होने की वजह से पहला हक सदफ का ही है, पर हम लोग इसलिए सोच में पड़ गए, क्योंकि बड़ी अम्मा ने सदफ का रिश्ता बचपन में तुम्हारे साथ जोड़ दिया था. लेकिन उस के बाद इस बात पर कोई चर्चा ही नहीं हुई. बच्चों के बड़े होने पर उन के खयाल भी बदल जाते हैं, इसलिए हम उलझन में है कि क्या जवाब दें?’’

मेरी अम्मी तड़प उठीं. उन्होंने जल्दी से कहा, ‘‘बच्चों के बड़े होने पर भले रुझान बदल जाते हैं, पर मुझे तो सदफ बहू के रूप में कल भी पसंद थी, आज भी पसंद है. रही बात कामरान की तो सामने बैठा है, अभी पूछ लेते हैं. क्यों कामरान तुम्हारा इस बारे में क्या खयाल है?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं आप बड़ेबुजुर्गों की रजा में राजी हूं. सदफ आप को पसंद है तो वह मेरी भी खुशी है.’’

‘‘जीते रहो बेटा, तुम ने मेरा मान रख लिया. तुम मेरे मरहूम भाई की निशानी हो, किसी और के मुकाबले तुम्हें दामाद बना कर मुझे ज्यादा खुशी होगी.’’ इतना कहते हुए चाचा ने भावुक हो कर मुझे गले लगा लिया.

चाची ने कहा, ‘‘अब साफ हो गया कि सदफ की शादी कामरान से ही होगी. हम उन्हें मना कर देते हैं. कामरान सैटल हो जाए तो मंगनी भी कर देते हैं ताकि सब को इस बात का पता चल जाए.’’

दरवाजे के पीछे सदफ के गुलाबी हुए चेहरे को देख कर मैं निहाल हो गया. एच.एच. बिल्डर्स में मेरी नौकरी बढि़या चल रही थी. मैं अच्छी तरह से ऐडजस्ट हो गया था. काम भी मेहनत और लगन से कर रहा था. मेरे प्रति फसील साहब का व्यवहार अच्छा और नरम था. दिन में एक बार उन से मुलाकात जरूर हो जाती थी. हम दोनों एकदूसरे के हालात से अच्छी तरह वाकिफ थे. मुझे पता चल गया था कि कंपनी में फसील साहब के 10 प्रतिशत शेयर थे. 90 प्रतिशत शेयर के मालिक उन के भाई इनायत हसन थे. दरअसल इनायत हसन को हानिया की मां की ओर से काफी दौलत मिली थी. वह चाहते तो करोबार अलग कर लेते, लेकिन उन्होंने इसी कारोबार में पैसा लगाया, जिस से उन के शेयर बढ़ गए थे. भाई के मरने के बाद वही उन की कंपनी संभाल रहे थे.

उन्हें अपनी भतीजी हानिया से बेहद प्यार था. जल्द ही अच्छा लड़का देख कर वह उस की शादी करना चाहते थे. हानिया जैसी दौलतमंद लड़की से शादी के लिए कोई भी तैयार हो सकता था. खैर, मुझे इन बातों से क्या मतलब था? मेरी अच्छीभली नौकरी चल रही थी, जिस से मेरी जिंदगी खुशी से गुजर रही थी. उस दिन मैं अपनी केबिन में बैठा रोज के काम निपटा रहा था. छुट्टी होने में कुछ ही पल बाकी थे कि फसील साहब ने मुझे अपनी केबिन में बुला कर कहा, ‘‘आओ कामरान, इस वक्त मैं ने तुम्हें एक जरूरी काम से बुलाया है. तुम्हें जरा हानिया के साथ इस के घर तक जाना होगा. दरअसल इस का ड्राइवर आज छुट्टी पर है. वह गाड़ी ड्राइव कर के यहां तक तो आ गई, पर अचानक उस की तबीयत खराब हो गई है, इसलिए मैं नहीं चाहता कि यह अकेली घर जाए. तुम्हें तकलीफ तो होगी, लेकिन…’’

‘‘नो सर, इस में तकलीफ कैसी. मैं इन के साथ चला जाता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘जाओ बेटा हानिया, कामरान के साथ चली जाओ. अब मुझे चिंता नहीं होगी.’’

बिना कुछ कहे हानिया उठी और दरवाजे की तरफ बढ़ गई. मैं उस के पीछेपीछे चल रहा था. ड्राइविंग मुझे आती थी, मगर उस ने मुझे मौका नहीं दिया. खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गईं और सपाट चेहरे से मुझे पीछे बैठने का हुक्म दिया. मुझे गुस्सा तो बहुत आया, पर क्या करता. हानिया ने झटके से गाड़ी आगे बढ़ा दी. साफ लग रहा था कि चाचा के कहने पर मजबूरी में वह मुझे अपने साथ ले जा रही थी. 7-8 मिनट के बाद उस ने गाड़ी रोक दी और दोनों हाथों से सिर थाम कर इस तरह बैठ गई, जैसे उसे चक्कर आ रहे हों. मैं ने कहा, ‘‘आर यू ओके मैम?’’

उस की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. मैं जल्दी से नीचे उतरा और खिड़की से उसे देखा. उस के चेहरे पर पसीना और तकलीफ साफ झलक रही थी. मैं ने कहा, ‘‘मैम, आप को क्या हो रहा है?’’

उस ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘मैं ड्राइव नहीं कर सकूंगी. तुम कार चलाओ.’’

वह पिछली सीट पर चली गई. मैं ने ड्राइविंग सीट संभाल ली. मैं ने हमदर्दी से पूछा, ‘‘आप को किसी डाक्टर के पास ले चलूं?’’

उस ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘नहीं, मैं सीधे घर जाना चाहती हूं.’’

कोठी का रास्ता उस ने गाइड कर दिया. घर पहुंच कर उस ने मुझे जाने की इजाजत दे दी. बाहर निकल कर मैं ने फसील साहब को फोन कर के हालात बता दिए. उन्होंने कहा, ‘‘हानिया का बीपी अकसर लो हो जाता है, इसलिए मैं उसे गाड़ी चलाने की इजाजत नहीं देता. कामरान तुम्हारा बहुतबहुत शुक्रिया. तुम ने उसे खैरियत से घर पहुंचा दिया. अब तुम अपने घर चले जाओ.’’

मुझे कोई आटो वगैरह नहीं मिला तो मैं पैदल चल कर बसस्टाप पर पहुंचा ही था कि मेरे छोटे भाई जिबरान का फोन आ गया, ‘‘भाई, अम्मी की तबीयत खराब हो गई है. हम उन्हें अस्पताल ले आए हैं. आप सीधे यहीं आ जाइए.’’

भाई की आवाज में घबराहट थी. उस ने अस्पताल का नाम बता दिया था. अम्मी की बीमारी का सुन कर मैं परेशान हो गया. आटो पकड़ा और सीधे अस्पताल जा पहुंचा. मेरी छुट्टी के 2 दिन बड़ी मुश्किल में गुजरे, अम्मी की हालत काफी खराब थी. डाक्टर के मुताबिक उन का मर्ज एक बार फिर फैलने लगा था. उन्हें तकलीफ काफी दिनों से थी, पर उन्हें पता था कि फंड का पैसा पहले ही खत्म हो चुका है, इसलिए वह अपना दर्द हम सभी से छिपाती रहीं. जब वह बेसुध हो गईं तो उन्हें अस्पताल लाना पड़ा. उन के इलाज के लिए काफी ज्यादा पैसों की जरूरत थी, जबकि हमारे पास मुश्किल से 4-5 हजार रुपए थे. किसी से कर्ज भी नहीं मिल सकता था. चाचा भी हम जैसे ही थे. नौकरी नई थी. लाखों रुपए एडवांस में कौन देता? जायदाद कुछ नहीं थी, गहने भी ज्यादा नहीं थे. एक यही घर था, जिस में हम रहते थे और उस का ऊपर का हिस्सा चाचा का था.

अगर मैं घर बेचने की सोचता तो चाचा के भी सिर से छत छिन जाती. जवान बेटियों को ले कर वह कहां जाते? इस परेशानी में कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. चाचा ने अस्पताल पहुंच कर मुझे जबरदस्ती घर भेज दिया. मैं चुपचाप जा कर लेट गया. सदफ दूध और खाना ले कर आई, पर मेरी तो भूखप्यास जैसे मर चुकी थी. उस के बहुत आग्रह पर 2-4 निवाले खा सका. सदफ ने कहा, ‘‘मैं आप से कुछ कहना चाहती हूं, पर आप वादा करें कि मेरी बात मान लेंगे. मैं ताई अम्मा के इलाज के लिए कुछ देना चाहती हूं.’’

यह कहते हुए उस ने एक पोटली मेरे सामने रख दी. मैं ने पोटली खोली तो उस में कुछ हजार रुपए, सोने की 4 चूडि़यां और एक सेट था. उस ने ट्यूशन की कमाई से यह सब जमा किया था. उस ने कहा, ‘‘यह सब बेच कर आप ताई अम्मा का औपरेशन करा दीजिए.’’

‘‘सदफ, तुम पागल हो गई हो क्या? मैं तुम्हारी इतनी मेहनत से जोड़ी गई ये चीजें कैसे ले सकता हूं? ट्यूशन के अलावा सिलाईकढ़ाई कर के तुम ने एकएक पाई जोड़ कर यह सब बनवाया है. तुम इसे संभाल कर रखो, चाची ने यह तुम्हारे दहेज के लिए रखा है.’’

‘‘मुझे दहेज का क्या करना है? मुझे कौन सा ब्याह कर के बाहर जाना है? भले रकम कम है, पर कुछ तो मदद मिल ही जाएगी.’’

मुझे उस की मासूमियत पर बड़ा प्यार आया. कितनी ईमानदारी से अपनी सारी पूंजी मेरे हवाले कर रही थी. मैं ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘सदफ, मैं तुम्हारे जज्बों और ईमानदारी की कद्र करता हूं. पर मेरी मोहब्बत में इस हद तक मत जाओ कि रुसवा हो जाओ. मैं तुम्हारे ये गहने नहीं ले सकता.’’

‘‘तो क्या ताई अम्मा का औपरेशन नहीं कराओगे. मुझ से उन की तकलीफ देखी नहीं जाती.’’ सदफ रोते हुए बोली.

अगले दिन औफिस पहुंचा तो मैं काफी परेशान था. फसील साहब ने मुझे देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है कामरान, आज तुम काफी परेशान लग रहे हो? कोई परेशानी है तो मुझे बताओ.’’

किसी हमदर्द को पा कर मेरी बरदाश्त की हद जवाब दे गई. मैं ने उन से अम्मी की हालत और इलाज की समस्या के बारे में बताया तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामरान, तुम्हें मुझ से पहले ही बात करनी चाहिए थी. बेकार ही 2 दिन परेशानी उठाते रहे.’’

मैं उन की इस बात पर हैरान रह गया. उन्होंने मुझे हैरान देख कर कहा, ‘‘हैरान क्यों हो रहे हो? तुम्हारी समस्या हमारी समस्या है. तुम परेशान रहो, यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया सर, 20-25 दिनों की नौकरी में मैं एडवांस मांगने की हिम्मत कैसे कर सकता था? आप ने मेरे दुख को समझ कर मदद के लायक समझा, आप बहुत महान हैं सर.’’

‘‘तुम्हें इतने दिनों में अंदाजा हो जाना चाहिए था कि हमारी नजरों में तुम्हारा एक खास महत्त्व है. दूसरे लोगों के मुकाबले मेरे दिल में तुम्हारी जगह खास है.’’ फसील साहब ने प्यार से कहा.

‘‘यह तो आप की मेहरबानी है सर, वरना मैं किस काबिल हूं?’’ मैं ने बड़ी नम्रता से कहा.

‘‘कामरान, इंटरव्यू में तुम से ज्यादा काबिल लोग थे, पर मैं ने तुम्हें तुम्हारी सच्चाई, ईमानदारी और शराफत की वजह से चुना था. तुम ने सच बोला था, जो मुझे बहुत अच्छा लगा था. मुझे लगा कि तुम वही इंसान हो, जिस की मुझे तलाश है. नौकरी देने का मकसद यह था कि मैं तुम्हें अच्छी तरह से परख सकूं, वरना पहली मुलाकात में ही मैं ने तुम्हें अपनी भतीजी हानिया के लिए पसंद कर लिया था.’’

उन्होंने जैसे मेरे सिर पर बम फोड़ दिया था. मैं बौखला गया, ‘‘सर… सर, आप यह क्या कह रहे हैं?’’

‘‘गलत नहीं कह रहा हूं,’’ हानिया मुझे बहुत प्यारी है. मैं उस का जीवनसाथी एक ऐसे आदमी को बनाना चाहता हूं, जो उस का खूब खयाल रखे और उस की कद्र करे, प्यार करे. ये सारे गुण मुझे तुम्हारे अंदर नजर आए. मुझे यकीन है कि हानिया तुम्हारे साथ बहुत खुश रहेगी.’’

‘‘सर, मैं किसी तरह भी मिस हानिया के काबिल नहीं हूं. मुझ से कहीं ज्यादा अच्छे लोग उन से शादी करने को तैयार हो जाएंगे. उन के आगे मेरी क्या हैसियत है?’’

‘‘मैं जानता हूं, पर उन सब की नजर हानिया से ज्यादा उस की दौलत पर रहेगी. भाई साहब की मौत के बाद वह मानसिक रूप से काफी परेशान रहती है. उसे मैं ने बड़े प्यार से पाला है. बड़ा खयाल रखा है उस का. मुझे तुम्हारे जैसा लड़का चाहिए, जो उस के नाजनखरे उठा सके. इस सब के बदले उस का सब कुछ तुम्हारा है.’’

मैं समझ गया कि उन्हें ऐसा दामाद चाहिए, जो उन की भतीजी के पीछे हाथ बांधे गुलामों की तरह उस का हुक्म बजाता रहे. मेरी स्थिति उन के सामने थी. अम्मी के इलाज के लिए मुझे एक बड़ी रकम की जरूरत थी. मेरी मजबूरी वह जान गए थे. मैं पढ़ालिखा, स्मार्ट, शरीफ और खानदानी था. आसानी से वह मुझे अपने सोशल सर्किल में शामिल कर सकते थे.

‘‘किस सोच में डूब गए कामरान. यह एक बहुत अच्छी औफर है. तुम्हारी सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी. हानिया दौलतमंद और खूबसूरत लड़की है. उस की जिंदगी में आते ही तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी. मां का इलाज, भाई की पढ़ाई और बहन की शादी शानदार तरीके से हो जाएगी. तुम खुद ऐश की जिंदगी जियोगे.’’

‘‘सर, मुझे सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए.’’ आखिर मैं ने हिम्मत कर के कह दिया.

‘‘जितनी मोहलत चाहो, ले सकते हो. लेकिन जितनी देर करोगे, तुम्हारी मां की तकलीफ उतनी ही बढ़ेगी.’’

मैं अपनी केबिन में आ कर बैठ गया. अजीब उलझन थी, कुछ समझ में नहीं आ रहा था. एक ओर मां का इलाज था, दूसरी ओर मेरी मोहब्बत. एक ओर मेरी गरीबी थी, दूसरी ओर दौलत और ऐशभरी जिंदगी. मैं क्या फैसला करूं? औफिस से सीधे अस्पताल पहुंचा. अम्मी की तकलीफ उसी तरह थी. डाक्टरों का कहना था कि ट्रीटमेंट जल्द से जल्द शुरू होना चाहिए. जिस में लाखों रुपए लगने थे. अम्मी की हालत देख कर दिमाग कह रहा था कि फसील साहब का औफर मान लेना चाहिए. पर दिल सदफ के प्यार में रो रहा था. अगर मैं ने राह बदल ली तो उस पर कयामत टूट पड़ेगी. उस की मोहब्बत अनमोल थी.

अस्पताल से घर आ कर मैं सारी रात जागता रहा. दिमागी उलझनों से तंग आ कर मैं ने सुबह चाचा के सामने बैठ कर उन्हें शुरू से अंत तक की सारी बात यानी फसील साहब का औफर, दौलत की रेलमपेल, अम्मी का इलाज, ऐश भरी जिंदगी सब कुछ बता दिया. पूरी बात सुन कर चाचा गंभीर हो गए. काफी देर बाद उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारा क्या फैसला है?’’

मैं ने आंसू भरी आंखों से कहा, ‘‘चाचा, मैं कोई फैसला नहीं कर पा रहा हूं, इसलिए सब कुछ आप से बता दिया है. सदफ से मैं ने जो वादा किया है, उसे तोड़ना बड़ा मुश्किल है. मेरे इस फैसले से वह टूट जाएगी.’’

‘‘कामरान बेटे, सदफ की चिंता तुम बिलकुल मत करो. वह बहादुर लड़की है, सब बरदाश्त कर लेगी. भाभी के इलाज के लिए वह घर बेचने की बात कर रही थी, वह यह सदमा आसानी से सह लेगी. भाभी की जान बचाने के लिए वह कोई भी कुरबानी दे सकती है. भाभी के भले के लिए तुम निश्चिंत हो कर हानिया के हक में फैसला कर दो.’’

‘‘चाचा मैं बहुत मजबूर हूं. अगर मैं ने फसील साहब को मना कर दिया तो मेरी नौकरी भी जाएगी. मैं जानता हूं कि सदफ जान दे देगी, पर उफ न करेगी.’’

‘‘इसीलिए तो मैं कह रहा हूं कि तुम सब भुला कर उन की बात मान लो. हमारी तरफ से बेफिकर हो जाओ. हमें कोई शिकायत नहीं है. वक्त सारे जख्म भर देगा. तुम्हारे और सदफ के रिश्ते की बात अभी घर में ही है, बाहर किसी को मालूम नहीं है, कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

फसील साहब ने ‘हां’ सुनते ही शादी की जल्दी मचा दी. एक हफ्ते के अंदर की तारीख तय कर दी गई. मेरे पास इनकार की गुंजाइश नहीं थी. मेरे हां करते ही अम्मी के इलाज के लिए मनचाहा पैसा फसील साहब ने दे दिया था, जिस से उन का इलाज शुरू हो गया था. इस से इतना फायदा हुआ था कि मेरी शादी में वह घंटे भर के लिए आई थीं. उन की आंखों में खुशी के बजाय उदासी थी, क्योंकि उन्होंने तो सदफ को बहू के रूप में देखा था. सभी दुखी थे, पर मजबूरी ऐसी थी कि कोई भी खुल कर ऐतराज नहीं कर सकता था.

सदफ समेत चाचा के परिवार के सभी लोग शादी में शामिल हुए थे. सभी मेरा हौसला बढ़ाते रहे, सदफ भी आंसू पी कर मुसकराती रही. सचमुच वह बड़ी सब्र और हिम्मत वाली थी. शादी में शहर के तमाम बड़ेबड़े लोग आए थे. मैं ने अपने कुछ ही दोस्तों को भी बुलाया था, क्योंकि हानिया का ताल्लुक जिस क्लास से था, उस में मेरे रिश्तेदार मिसफिट होते. विदाई का वक्त आया तो दुलहन के बजाय दूल्हे की विदाई हुई. विदा हो कर मैं हानिया की शानदार कोठी में आ गया. फसील साहब ने मुझ से कहा था कि मेरी ख्वाहिश पर मेरे परिवार के लिए शानदार मकान का इंतजाम हो जाएगा, क्योंकि मेरे परिवार का उस कोठी में रहना हानिया के नाजुक मिजाज को पसंद नहीं आएगा. इसलिए मुझे अकेले ही उस कोठी में रहना होगा.

कोठी रोशनी से जगमगा रही थी. हानिया की कीमती कार, जिसे शोफर चला रहा था, से उतर कर मैं पोर्च में खड़ा हो गया. दूसरी गाड़ी में फसील साहब, उन की बीवी और खूबसूरत बेटी तूबा थी. तूबा हानिया से एकदम अलग थी. वह हंसमुख और मिलनसार थी. वह मुझ से हंसीमजाक भी कर रही थी. वही हानिया का हाथ पकड़ कर उसे बैडरूम में ले गई. अंदर आ कर फसील साहब ने कहा, ‘‘कामरान, मेरी लाडली भतीजी तुम्हारे हवाले है. तुम इस का खयाल रखना. इस की हर गलती को अनदेखा कर देना. यह घर, कंपनी अब तुम दोनों की है. हम तो मेहमानों की तरह आएंगे और चले जाएंगे. हर काम के लिए नौकर मौजूद हैं. बस तुम्हारी वजह से हानिया को कोई तकलीफ न पहुंचे.’’

‘‘सर, आप तसल्ली रखें. मैं पूरा खयाल रखूंगा.’’

तूबा हंस कर बोली, ‘‘आप अब हमारे रिश्तेदार हैं, सर न कहें. पापा आप के भी अंकल हैं, आप मेरे दूल्हाभाई हैं.’’

उन के जाने के बाद एक नौकरानी मुझे हानिया के बैडरूम में ले गई. कीमती फरनीचर और फूलों से सजा कमरा बेहद रोमांटिक लग रहा था, पर उस खूबसूरत कमरे में दुलहन नहीं थी. 10-12 मिनट बाद वह बाथरूम से बाहर आई. मेरा मुंह खुला का खुला रह गया. उस की सारी सजधज गायब थी. वह नहाईधोई कौटन की नाइटी पहने हुए थी. उस ने मेरी तरफ देखा तक नहीं. डे्रसिंग टेबल के सामने बैठ कर चेहरे व हाथों पर क्रीम लगाने लगी. इस के बाद उठी और बेडरूम से जुड़े दूसरे कमरे में चली गई. उस ने न मुझे देखा, न मुझ से बात की. ऐसा व्यवहार शायद ही किसी दुलहन ने अपने दूल्हे के साथ किया होगा. वह बारबार मेरी तौहीन कर रही थी. अपमान से मैं तिलमिला उठा, पर क्या करता. यह सोच कर दिल को समझाया कि मांबाप के मरने की वजह से ऐसी हो गई है. मुझे ही इसे डिप्रेशन से निकालना है.

मैं ने उठ कर बगल वाला दरवाजा खोला. अंदर हलका उजाला था. वह स्टडीरूम था, जिस में पडे़ सोफे पर हानिया हाथ में एक तसवीर लिए बैठी थी. मैं ने इतने धीरे से दरवाजा खोला था कि उसे पता नहीं चला था. वह तसवीर देखदेख कर रोते हुए उसे प्यार कर रही थी. मुझे लगा कि यह उस के पापा की तसवीर होगी. दिल चाहा कि उसे बांहों में भर कर तसल्ली दूं. मैं आगे बढ़ा तो मेरी आहट पा कर वह ऐसी चौंकी, जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो. हानिया ने मेरा बढ़ा हाथ तेजी से झटकते हुए कहा, ‘‘बिना इजाजत मेरे कमरे में आने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’’

वह गुस्से में बहुत जोर से चिल्लाई थी. तसवीर उस ने सीने से लगा ली थी. मैं ने भी तुनक कर जवाब दिया, ‘‘मैं तुम्हारा शौहर हूं हानिया, जिस से मेरा हक बनता है कि मैं तुम्हारी इजाजत के बिना तुम्हारे कमरे में आ सकता हूं.’’

‘‘किसी गलतफहमी में मत रहिएगा मिस्टर. यह मेरा घर है, जिस पर सिर्फ मेरा हक है. जो यहां रहेगा, मेरी मरजी के मुताबिक रहेगा. जिसे यह न कुबूल हो, वह यहां से जा सकता है.’’ हानिया ने बड़े तैश में बदतमीजी से कहा. अपमान का घूंट पी कर मैं बाहर लौन में चला गया. मेरे वश में होता तो उसी पल मैं हानिया हसन और उस की कोठी को लात मार कर चला आता. पर मेरे पैरों में मजबूरी की जंजीर पड़ी थी. काफी देर तक लौन में टहलता रहा. दिल को समझाया कि अगर अम्मी का इलाज कराना है तो इस बददिमाग, बदमिजाज लड़की को बरदाश्त करना ही पड़ेगा. थोड़ा सह कर कुछ होशियारी से काफी माल समेट कर हानिया को छोड़ दूंगा. उस के बाद अच्छी जिंदगी गुजारूंगा. हो सकता है सदफ भी मुझे मिल जाए.

शाम को फसील साहब परिवार के साथ आए तो उन के सामने हानिया बिलकुल नौर्मल थी, हंसबोल रही थी. फसील साहब ने मुझ से कहा कि मुझे हानिया को अपने घर वालों से मिलाने ले जाना चाहिए. मेरे घर जाते हुए हानिया के चेहरे पर बेजारी थी. रास्ते में ही उस ने कह दिया था, ‘‘मैं वहां ज्यादा देर नहीं ठहरूंगी.’’

जब हम वहां पहुंचे तो कुछ मेहमान आए हुए थे. शीमा, सफिया हमें देख कर बहुत खुश हुईं. आवाज सुन कर चाचा बाहर आए और बड़े मानसम्मान से हमें ड्राइंगरूम में ले गए. वहां 3 औरतें, 2 मर्द बैठे थे, जिन में एक अधेड़ था और एक जवानस्मार्ट युवक. चाचा ने परिचय कराते हुए कहा, ‘‘ये वही लोग हैं, जो सदफ से रिश्ता करने का इसरार कर रहे थे. इन लोगों ने दोबारा फोन कर के आग्रह किया तो मैं ने इन्हें बुला लिया. भाभी की मरजी पूछ ली है, उन का भी कहना है कि आज ही सदफ की मंगनी सादगी से कर दी जाए.’’

मैं सोच रहा था कि हानिया से छुटकारा पा कर सदफ को पा लूंगा, लेकिन मेरा यह ख्वाब टूट कर चकनाचूर हो गया था. अम्मी ने कहा, ‘‘यह सदफ के लिए बहुत अच्छा रिश्ता है. देर करने से क्या फायदा, आज ही मंगनी की रस्म कर लेते हैं.’’

सदफ को ड्राइंगरूम में लाया गया. वह गुलाबी सूट में गजब ढा रही थी. उसे उस खूबसूरत नौजवान, जिस का नाम आतिफ विकास था, के पास बिठा दिया गया. आतिफ की अम्मी ने सदफ को अंगूठी पहना कर मंगनी की रस्म पूरी की. चाचा आतिफ को कैश का लिफाफा देने लगे तो उस ने मना करते हुए कहा, ‘‘मैं मिठाई के सिवा और कुछ नहीं लूंगा.’’

इस के बाद जोरदार खातिर शुरू हुई. मुझे छोड़ कर बाकी सभी खुश थे. मैं वापसी के लिए उठ गया, हानिया तो तैयार ही बैठी थी. एक तसल्ली थी कि सदफ को अच्छा लड़का, तथा शरीफ और बढि़या घरपरिवार मिल गया था. दिन हानिया की बदतमीजी व रुखाई के साथ गुजर रहे थे. मेरे पास 2 ही काम थे, औफिस के काम देखना और अम्मी के इलाज के लिए दौड़धूप करना. मैं ने अम्मी से घर बदलने के बारे में कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया था. वह चाचा के साथ उसी पुराने मकान में रहना चाहती थीं. फसील साहब पहले की ही तरह मेहरबान थे. मैं ने उन्हें हानिया के रूखे और बदतमीजी भरे रवैये के बारे में नहीं बताया था कि अभी हम अजनबी की तरह थे. कभी मुझे लगता कि वह किसी को पसंद करती है. लेकिन वह पूरे दिन अपने कमरे में बंद रहती थी. अचानक एक दिन बिना कुछ बताए वह तूबा के साथ अपनी सहेली की शादी अटैंड करने दुबई चली गई.

सदफ की शादी हो गई थी. आतिफ ने दहेज लेने से साफ मना कर दिया था. हानिया की गैरहाजिरी में मैं ने दुबई में बिजनैस डील का बहाना बनाया. अम्मी का इलाज जारी था. अम्मी के इलाज के अलावा कुछ लाख मैं ने अपने एकाउंट में जमा कर लिए थे. फसील साहब मुझ पर अंधा यकीन करते थे. मैं जी खोल कर पैसे खर्च कर रहा था. अपनी बेइज्जती भुलाने और तनहाई का गम गलत करने के लिए मैं ने शराब पीनी शुरू कर दी थी. आवारागर्दी करते हुए उस रात मैं करीब एक बजे घर पहुंचा तो खास नौकरानी सोनिया जाग रही थी. उस ने खाने के लिए पूछा तो मैं ने कौफी लाने को कहा. जाते हुए सोनिया एक डायरी दे कर बोली, ‘‘यह हानिया बीबी की डायरी है, इसे वह एक सहेली के घर भूल आई थीं. उस ने वापस भेजी है. उन का कमरा बंद है, आप संभाल कर रख दें.’’

पता नहीं मेरे दिल में क्या आया कि मैं डायरी खोल कर पढ़ने लगा. शुरू में हानिया का डैडी से लगाव, उन की मौत के बाद उन के गम में डूबे रहने का विवरण था. सच में वह बाप से बहुत प्यार करती थी. उस के बाद कामरान नाम के किसी लड़के का जिक्र था. वह उस के डैडी के वकील और दोस्त रुस्तम मलिक का बेटा था. कामरान ने उस के दुख में उस का बहुत साथ दिया था. उसे गम से बाहर निकाल कर नई जिंदगी की राह पर लाया था. यही हमदर्दी धीरेधीरे मोहब्बत में बदल गई थी और हानिया कामरान को टूट कर चाहने लगी थी. मोहब्बत इतनी बढ़ी कि जल्दी ही दोनों सारी हदें पार कर गए.

इस का परिणाम यह निकला कि हानिया गर्भवती हो गई. हानिया इस बारे में कामरान से कोई बात कर पाती, कामरान एक रोड एक्सीडेंट में मारा गया. सदमे ने हानिया को दीवाना बना दिया. वह अपने महबूब की जुदाई सह नहीं पा रही थी. उस की कजिन तूबा उस के इस मोहब्बत की राजदार थी. उस के जरिए यह इत्तला चाची को मिली तो उन्होंने अबार्शन की सलाह दी, पर हानिया किसी कीमत पर अपनी मोहब्बत की निशानी मिटाने को तैयार नहीं थी. इस के बाद तय किया गया कि खानदान की इज्जत बचाने के लिए किसी काठ के उल्लू की तलाश की जाए. और उल्लू वही बन सकता था, जो हालात और मजबूरी का मारा हो. चाचा ने लाडली भतीजी का गुनाह छिपाने के लिए बड़ी आसानी से मुझे ढूंढ लिया. इत्तफाक से मेरा नाम भी कामरान था. उस के होने वाले बच्चे को वही नाम मिलता, जो उस के असली बाप का था. इसलिए हानिया मुझ से शादी के लिए राजी हो गई थी.

वह अभी तक अपने महबूब के गम में तड़प रही थी. उस रात तसवीर भी उसी की थी. कितनी आसानी से चाचाभतीजी ने एक ‘गुलाम’ शौहर खरीद लिया था. इस तरह उल्लू बनाए जाने पर मुझे बेहद गुस्सा आया. मैं ने उसी वक्त फसील साहब को फोन किया. फोन उठा कर उन्होंने कहा, ‘‘इतनी रात को फोन, कामरान तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘रात होगी तुम्हारे लिए, मेरी तो अभी आंख खुली है. मैं तुम चाचाभतीजी का दिमाग ठीक करना चाहता हूं. तुम ने मुझे धोखा दिया, बदकिरदार लड़की मुझे पकड़ा दी.’’

गुस्से और नशे से मेरी आवाज फट रही थी. इस के बाद नशे में ही मैं बिस्तर पर ढेर हो गया. सुबह मेरी आंख मुंह पर पानी पड़ने से खुली. कुछ देर तो मामला मेरी समझ में ही नहीं आया. मैं पलकें झपकाझपका कर पुलिस वालों को देख रहा था, जो मुझे घेरे खड़े थे. उन्हीं के साथ गम में डूबे फसील साहब भी थे.

‘‘इसे गिरफ्तार कर लो.’’ मुझे होश में देख कर पुलिस इंसपेक्टर ने कहा.

मैं ने घबरा कर जल्दी से कहा, ‘‘मुझे किस जुर्म में गिरफ्तार किया जा रहा है, अंकल आप मुझे अरैस्ट क्यों करवा रहे हैं? घर की बात घर में ही सुलझ जाती.’’

मुझे रात की बदतमीजी याद आ गई थी.

‘‘बकवास बंद कर कमीने. मैं अपनी भतीजी हानिया का कत्ल किसी सूरत में माफ नहीं कर सकता.’’ फसील साहब मुझे नफरत से देखते हुए दहाड़े. मुझ पर जैसे आसमान टूट पड़ा. हानिया दुबई में थी, यहां उस का कत्ल कैसे हो गया? मैं ने कुछ कहना चाहा, पर पुलिस वाले मुझे घसीटते हुए बाहर ले आए. हवालात के फर्श पर पड़ा मैं बुरी तरह से कराह रहा था. यहां मेरी अच्छीखासी पिटाई की गई थी. यहीं मुझे पता चला कि हानिया आज सुबह ही दुबई से वापस आई थी. मुझ पर इलजाम था कि मैं ने गुस्से और नशे में छुरे से उसे कत्ल कर दिया था, क्योंकि मुझे पता चल गया था कि वह शादी से पहले से गर्भवती थी. किसी और का गुनाह मेरे सिर थोपा जा रहा था. मैं पुलिस वालों से लाख दुहाइयां देता रहा कि कत्ल मैं ने नहीं किया, पर मेरी किसी ने नहीं सुनी. जबकि मैं तो यह भी नहीं जानता था कि वह आज आने वाली थी.

मैं दिन भर भूखाप्यासा, चोटें सहलाता फर्श पर पड़ा रहा. देर रात जब सन्नाटा हो गया तो एक हवलदार ने मेरे पास आ कर धीरे से कहा, ‘‘तुम्हारे चाचा ससुर ने कहा है कि तुम्हारे खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई की जाए. तुम्हारे खिलाफ साजिश रची गई है. कल अदालत में पेश करने के लिए पक्के सुबूत तैयार कर लिए गए हैं, तुम्हें फंसाने की पूरी योजना बना ली गई है.’’

‘‘हवलदार साहब, मैं बेकुसूर हूं. मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? मुझ पर झूठा इलजाम लगाया जा रहा है.’’

‘‘मैं जानता हूं. कल अदालत में पेशी के बाद तुम्हें बचाने की योजना बन गई है, उसे मैं तुम्हें कल बताऊंगा. अभी मैं तुम्हारे लिए खाना लाता हूं.’’

उस ने मुझे भरपेट खाना खिलाया और एक सिगरेट भी पिलाई. चाय और दर्द की गोलियां भी दीं. मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर वह मुझ पर इतना मेहरबान क्यों है? अदालत में जब मेरे मामले की सुनवाई शुरू हुई तो हालात इस तरह से बयान किए गए. एच.एच. बिल्डर्स के शेयर होल्डर फसील हसन ने मुझे एक शरीफ, मेहनती और ईमानदार आदमी समझ कर मुझे नौकरी दी और मेरे साथ भतीजी की शादी कर दी कि मैं हानिया का बहुत खयाल रखूंगा, पर हालात बहुत खराब हो गए. लालच में आ कर मैं मां के इलाज के नाम पर रकम अपने एकाउंट में डालता रहा. हानिया के साथ मेरा व्यवहार बहुत बुरा था. वह तंग आ कर दुबई चली गई. बीवी की गैरमौजूदगी में मैं आवारागर्दी करने लगा और खूब शराब पीने लगा.

घरेलू नौकरानी सोनिया का बयान था कि हादसे की रात मैं नशे में धुत घर आया. जब वह कौफी देने बैडरूम में आई तो उस ने मुझे हानिया की डायरी पढ़ते देखा, जो उस ने रखने को दी थी. वह खामोशी से चली गई. सुबह की फ्लाइट से हानिया लौटी तो उस ने हमारे बैडरूम से लड़नेझगड़ने की आवाजें सुनीं. फिर उसे हानिया की 2 चीखें सुनाई दीं, डर के मारे वह अंदर नहीं आई, पर उस ने फसील साहब को फोन कर दिया. उन के आने पर सभी दरवाजा खोल कर अंदर पहुंचे तो उन्होंने मुझे जूते समेत बिस्तर पर सोता पाया. बेडरूम बुरी तरह अस्तव्यस्त था. फसील साहब ने स्टडीरूम में जा कर देखा तो वहां खून में लथपथ हानिया की लाश पड़ी थी. उन्होंने फौरन पुलिस को फोन किया और पुलिस ने आ कर मुझे गिरफ्तार कर लिया.

मेरे खून की जांच से पता चला कि मैं ने खूब शराब पी रखी थी, इसलिए भागने के बजाय वहीं सो गया था. पुलिस ने डायरी भी सुबूत के रूप में पेश की थी. मैं पत्थर बना सब सुन रहा था. अदालत ने सुबूतों के आधार पर मुझे एक हफ्ते के लिए पुलिस रिमांड पर दे दिया था. पुलिस मुझे बाहर ले आई. वह हमदर्द हवलदार मेरे साथ था. उस ने मेरा हाथ पकड़ कर जोर से कहा, ‘‘मुलजिम को पेशाब करने के लिए टायलेट जाना है.’’

इस के बाद सिपाही मुझे टायलेट की ओर ले कर चल पड़े. उस ने धीरे से कहा, ‘‘टायलेट के रोशनदान की सलाखें निकाल दी गई हैं. उस से पीछे की ओर निकल जाना. बाहर नीले रंग की कार तुम्हारा इंतजार कर रही है. बचने का यही एक मौका है.’’

मैं अंदर चला गया. पर मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? फिर खयाल आया कि फरार हो कर शायद मैं खुद को बचा सकूं. बाहर नीले रंग की कार खड़ी थी. मेरे बैठते ही वह हवा से बातें करने लगी. मेरे लिए यह पहेली थी कि मुझे कौन भगा रहा था और क्यों? पर यह भी सच था कि मेरे खिलाफ भरपूर साजिश रची गई थी. सजा ही मेरा नसीब थी. मैं ने ड्राइवर से कहा, ‘‘भाई, तुम मुझे कहां लिए जा रहे हो?’’

‘‘आप के एक हमदर्द के पास. वहां पहुंच कर आप को सब पता चल जाएगा.’’

अलगथलग इलाके में एक घर के आगे जा कर कार रुकी. दरवाजा एक स्मार्ट सी औरत ने खोला. उस ने शोख रंग की साड़ी पहन रखी थी. माथे पर बिंदिया और मांग में सिंदूर था. वह मुझे ड्राइंगरूम में ले आई, जहां एक स्मार्ट आदमी बैठा पाइप पी रहा था. उस ने मुझे देख कर कहा, ‘‘आओ कामरान अहमद बैठो, मैं हूं रुस्तम मलिक, बैरिस्टर, बदनसीब कामरान मलिक का दुखियारा बाप. मेरे ही कहने पर आप को मुसीबत से निकाल कर यहां लाय गया है.’’

‘‘आप ने मेरी मदद क्यों की, मैं यह जानना चाहता हूं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘इंसानियत के नाते, हमदर्दी की वजह से. मैं नहीं चाहता था कि कोई और बेगुनाह फसील के जाल में फंस कर मेरे बेटे की तरह मारा जाए.’’

‘‘आप के मुताबिक यह सब फसील साहब ने करवाया है?’’

‘‘उस के सिवा और कौन करवाएगा? उसे ही कुरबानी के लिए एक बकरे की जरूरत थी. मेरे दोस्त इनायत हसन की एकलौती बेटी हानिया कंपनी के 90 प्रतिशत शेयर की मालकिन थी. वसीयत के अनुसार हानिया की औलाद कुल जायदाद की मालिक होती. मैं उस का लीगल एडवाइजर था. भतीजी की जायदाद पर कोई हक न मिलने से फसील बहुत गुस्से में था.

‘‘अगर उस का बेटा होता तो वह हानिया की शादी उस से करवा देता. मेरे बेटे कामरान मलिक की बचपन की दोस्ती मोहब्बत में बदल गई. हानिया और कामरान एकदूसरे को टूट कर चाहने लगे. फसील ने इलजाम लगाया कि हानिया को बेटे की मोहब्बत में फंसा कर मैं उस की दौलत पर कब्जा करना चाहता हूं.

‘‘मेरा बेगुनाह बेटा एक रोड एक्सीडेंट में मारा गया. वह बहुत ज्यादा नशे में था. बाद में मुझे पता चला कि एक्सीडेंट के पहले वह फसील के घर पर था, जहां उसे बहुत ज्यादा शराब पिलाई गई थी. पर मैं कुछ नहीं कर सकता था. हानिया कामरान की मौत से पागल सी हो गई. वह कामरान की निशानी को जन्म देना चाहती थी. उस का बच्चा सारी दौलत का मालिक होता. हानिया से तुम्हारी शादी हो गई. हानिया ने शादी सिर्फ इसलिए की थी कि इज्जत के साथ बच्चा इस दुनिया में आ सके. लेकिन तुम्हारे हाथों हानिया के कत्ल का सुन कर मैं हैरान रह गया.

‘‘मुझे पता है कि यह झूठ और साजिश है, इसीलिए मैं ने तुम्हें बाहर निकाला है. पुलिस तुम्हारे पीछे लगी है. अब एक ही रास्ता है कि तुम फसील से सच्चाई निकलवाओ. उस से अपना जुर्म किसी भी सूरत में उगलवाओ. इस काम में मैं तुम्हारी हर तरह से मदद कर सकता हूं, आगे तुम जानो.’’

जब मैं ने सुकून से सोचा तो फसील की सारी साजिश मेरी समझ में आ गई. अब मुझे उस से सच उगलवाना था. मेरी जरूरत का सारा सामान रुस्तम मलिक ने मंगवा दिया, जिस में एक पिस्तौल भी था. रात 12 बजे मैं उस के घर से निकला. मैं फसील के घर 3-4 बार जा चुका था. मैं पीछे की ओर से गया. कुत्तों की हलकी सी आवाज सुन कर मैं ने जहर लगे गोश्त के टुकड़े अंदर उछाल दिए. फिर मैं लौन में कूद गया. कुत्ते जमीन पर पड़े दर्दनाक आवाजें निकाल रहे थे. चौकीदार कुत्तों के पास आया तो उस के पीछे पहुंच कर मैं ने पिस्तौल के हत्थे से मार कर उसे बेहोश कर दिया. उस के हाथपैर रस्सी से बांध दिए. लौन के पास की ग्लासवाल काट कर मैं अंदर पहुंच गया.

पहले मैं तूबा के कमरे में गया. वह सो रही थी. क्लोरोफौर्म में डूबा रूमाल उस की नाक पर रख दिया. इस के बाद फसील के बैडरूम के सामने पहुंचा. दरवाजा लौक था. पिस्तौल की नाल दरवाजे पर रख कर ट्रिगर दबा दिया. दरवाजा खोल कर अंदर घुसा तो दोनों हड़बड़ा कर उठ बैठे. मैं ने पिस्तौल तान दी. वह घबरा कर बोला, ‘‘यह क्या बदतमीजी है कामरान?’’

‘‘तू ने अपनी मासूम भतीजी का जो खून किया है, उस का हिसाब तुझे अभी देना होगा?’’

‘‘बकवास मत करो. हानिया का खून मैं ने नहीं, तू ने किया है. मसजिद से जूते चुराने वाला दो कौड़ी की औकात वाला आदमी मुझ पर इलजाम लगाता है.’’

मैं गुस्से से चीखा, ‘‘यह सारा ड्रामा तेरा रचा है कमीने. तू ने जानबूझ कर सोनिया के हाथों हानिया की डायरी भिजवाई थी. जिस से सुबह उस का कत्ल हो जाए तो पुलिस मुझे कातिल समझे. मुझे तो यह भी पता नहीं था कि हानिया कब दुबई से लौटी? मुझे तो नींद से जगा कर गिरफ्तार किया गया था. तू सच बोल दे, वरना…’’

‘‘बेवकूफ, मैं उसे क्यों मारूंगा?’’

‘‘हानिया के कत्ल के बाद एक तू ही तो उस का सगा चाचा बचता, मुझे फांसी पर लटकवाने के बाद तू ही उस की सारी दौलत और जायदाद का वारिस होता.’’

‘‘नहीं, हानिया के कत्ल के बाद मुझे कुछ नहीं मिल सकता. अगर वह अपने बच्चे के जन्म तक जिंदा रहती तो मुझे फायदा होता, क्योंकि मैं उस के बच्चे का संरक्षक होता. बच्चे और प्रापर्टी की देखभाल मुझे ही करनी होती. अब तो सिवाए 10 प्रतिशत के मुझे कुछ नहीं मिल सकता.’’

मैं सोच में पड़ गया. यानी कि फसील का कत्ल से कोई ताल्लुक नहीं था. तो फिर कातिल कौन हो सकता है? एकदम मुझे सोनिया का खयाल आया. उसी ने उस रात मुझे डायरी दी थी, मेरे खिलाफ झूठा बयान भी दिया था. मैं उस के बारे में सोचने लगा. फसील ने कहा, ‘‘कोठी तो सील है, वह अपने घर पर होगी. और जो कुछ मैं ने किया था, अपने खानदान की इज्जत बचाने को किया था.’’

जैसे ही मैं बंगले से बाहर निकला, चारों ओर से पुलिस ने मुझे घेर लिया. मजबूरन मुझे सरेंडर करना पड़ा. पुलिस वैन की आगे की सीट पर सादा लिबास में चाचा का दामाद यानी सदफ का शौहर आतिफ विकास बैठा था. उसे देख कर मैं दंग रह गया. आतिफ विकास के हाथों गिरफ्तार हो कर मैं थाने पहुंचा. मुझे अलग कमरे में ले जा कर बड़ी नम्रता से उन्होंने कहा, ‘‘आप को इस तरह गिरफ्तार करने के लिए मुझे बड़ा अफसोस है, पर कानूनी तकाजे पूरे करने थे. चाचा आप के लिए बहुत परेशान थे. उन्हीं के कहने पर मैं ने यह केस अपने हाथों में लिया है कि आप पर कत्ल का झूठा इलजाम लगा कर जो साजिश की गई है, उस से आप को बाहर निकाल सकूं.

‘‘लेकिन आप ने अदालत से फरार हो कर केस को खराब कर लिया है. मैं ने मुखबिरों से पता कर लिया था कि आप कहां मिल सकते हैं? मैं फसील के यहां पहुंच गया. आप का केस गौर से स्टडी करने के बाद मुझे नौकरानी सोनिया पर संदेह हो रहा है. आखिर वह आप के खिलाफ क्यों बोल रही थी?

‘‘आप की उस से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. उस की गवाही आप को कातिल साबित कर सकती थी. नशे में आप ने बीवी का कत्ल कर दिया और नशे की ज्यादती की वजह से भाग नहीं सके. मैं इस बात को नहीं मानता. कातिल सब से पहले घटनास्थल से दूर भागता है, पर आप तो पुलिस वालों को अपने बैडरूम में सोए हुए मिले थे.

‘‘बस इसी बुनियाद पर मैं ने सोनिया को गिरफ्तार करवा लिया है. पहले तो वह झूठ बोलती रही, पर उस ने देखा कि बचने का कोई रास्ता नहीं है तो उस ने सच उगल दिया. वह हानिया की खास नौकरानी थी. उसे मालूम था कि हानिया कब दुबई से आ रही है. उसी ने उस आदमी को खबर कर दी थी, जिस से पैसे लिए थे.

‘‘हानिया कत्ल कर दी गई. उस के बाद झूठी गवाही देने पर उसे मजबूर किया गया, तब वह घबराई. इधर आप फसील को कातिल समझ कर उस के बंगले पर पहुंच गए और वहां से मैं ने आप को गिरफ्तार कर लिया, मेरे आदमी आप की तलाश में वहां तैनात थे.’’ आतिफ ने सारी बात डिटेल से बता दी.

‘‘सोनिया को बहकाने वाला आदमी कौन है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अभी यह पता नहीं चला है. सोनिया के अनुसार सारी बात फोन पर हुई थी, रकम एक खास जगह पर रख कर बता दी गई थी. एक बात और बताऊं, हानिया के कत्ल का फैसला बहुत पहले हो चुका था. कुरबानी का बकरा तुम्हें बनाया गया. यह कत्ल बच्चा पैदा होने के बाद होना था, इस से किसे फायदा हो सकता था?’’

‘‘इस में हानिया के अंकल को फायदा था.’’ मैं ने कहा.

‘‘बिलकुल सही, पर उस से पहले किसी और ने काम कर दिखाया. फसील का प्लान फेल हो गया. यह बात मुझे तूबा ने बताई थी कि फसील हानिया को रास्ते से हटा कर बच्चे के जरिए सारी दौलत हासिल करना चाहता था. पर बच्चे के दुनिया में आने से पहले कत्ल किसी और ने कर दिया.’’

‘‘आप के खयाल से उस की मौत से किसे फायदा हो सकता था?’’

‘‘पहले आप यह बताइए कि आप को फरार किस ने करवाया? आप खुद फरार नहीं हो सकते थे.’’ आतिफ ने पूछा.

‘‘मेरी मदद रुस्तम मलिक, जो हानिया के वकील हैं, ने की थी. वह नहीं चाहता था कि उस के बेटे कामरान मलिक की तरह मैं भी बेगुनाह किसी साजिश में फंस कर मारा जाऊं.’’ मैं ने बताया.

‘‘यानी वह अपने बेटे के कातिल को तुम्हारे हाथों सजा दिलवाना चाहता था?’’ आतिफ ने सोच कर कहा.

इस के बाद आतिफ केस सुलझाने में जीजान से जुट गए. उन्होंने मेरे लिए थाने में काफी अच्छा इंजताम करवा दिया था. केस का खुलासा करने के बाद आतिफ ने मुझे जो बताया, वह इस तरह था. हानिया की दौलत के लालच में बैरिस्टर रुस्तम मलिक ने ही अपने बेटे कामरान मलिक को उस के पीछे लगाया था. उस ने उसे मोहब्बत के जाल में फंसा लिया. फसील उस की चालाकी समझ गया था. वह इस शादी के लिए कतई राजी नहीं था. संयोग से वह एक्सीडेंट में मर गया. इस में फसील का हाथ नहीं था.

कामरान की मौत के बाद फसील को सच्चाई का पता चला तो उसने यह योजना बनाई कि हानिया मर जाती है तो मैं फांसी चढ़ जाता. बच्चे के संरक्षक के तौर पर सारी जायदाद वह हासिल कर लेता. यह रुस्तम से बरदाश्त नहीं हुआ. उस ने साजिश रच कर हानिया का पत्ता कटवा दिया. मुझ से हमदर्दी जता कर फसील नाम का कांटा निकालने को भेजा. अगर उस रात मैं फसील को मार देता तो 2 कत्लों के इलजाम में जेल में होता. हानिया के बेऔलाद मरने पर सारी प्रौपर्टी ट्रस्ट में जाती, जिस की देखभाल रुस्तम मलिक करता और उस से पूरा फायदा उठाता. क्योंकि वह बहुत कमीना और शातिर आदमी था. उसे अपने बेटे की निशानी से भी कोई प्यार नहीं था. दौलत के लिए उस ने हानिया का कत्ल करवा दिया था. उस बेचारी ने दौलत की वजह से ही धोखा खाया और मारी भी गई.

मैं अपनी अम्मी को भी नहीं बचा सका. वह कैंसर से नहीं मरी, मेरे ऊपर कत्ल का इलजाम लगने से हार्टफेल की वजह से मरी. आतिफ विकास की मेहनत और केस की सच्चाई के सामने आने से मैं रिहा हो गया. रुस्तम मलिक ने किराए के कातिल से हानिया का कत्ल करवाया था. इस के सुबूत भी मिल गए थे. सोनिया ने भी सच उगल दिया था. शुक्र था कि मैं रुस्तम के जाल में नहीं फंसा. इस घटना को घटे 4 साल हो गए हैं. आतिफ की मदद से मुझे अच्छी नौकरी मिल गई है. सदफ 2 प्यारेप्यारे बच्चों की मां है. मेरा भाई स्कौलरशिप पर मैडिकल कालेज में है. बहन की मंगनी हो गई है. मैं चाचा के साथ हूं, जो पहले की ही तरह मुझ से मोहब्बत करते हैं. शादी करने पर जोर देते हैं, पर अब किसी को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है. Love Story

 

Crime Stories: पहली ही रात भागी दुल्हन

Crime Stories: 26 साल के छत्रपति शर्मा की आंखों में नींद नहीं थी. वह लगातार अपनी नईनवेली बीवी प्रिया को निहार रहा था. जैसे ही प्रिया की नजरें उस से टकराती थीं, वह शरमा कर सिर झुका लेती थी. 20 साल की प्रिया वाकई खूबसूरती की मिसाल थी. लंबी, छरहरी और गोरे रंग की प्रिया से उस की शादी हुए अभी 2 दिन ही गुजरे थे, लेकिन शादी के रस्मोरिवाज की वजह से छत्रपति को उस से ढंग से बात करने तक का मौका नहीं मिला था.

छत्रपति मुंबई में स्कूल टीचर था. उस की शादी मध्य प्रदेश के सिंगरौली शहर के एक खातेपीते घर में तय हुई थी और शादी मुहूर्त 23 नवंबर, 2017 का निकला था. इस दिन वह मुंबई से बारात ले कर सिंगरौली पहुंचा और 24 नवंबर को प्रिया को विदा करा कर वापस मुंबई जा रहा था. सिंगरौली से जबलपुर तक बारात बस से आई थी. जबलपुर में थोड़ाबहुत वक्त उसे प्रिया से बतियाने का मिला था, लेकिन इतना भी नहीं कि वह अपने दिल की बातों का हजारवां हिस्सा भी उस के सामने बयां कर पाता.

बारात जबलपुर से ट्रेन द्वारा वापस मुंबई जानी थी, जिस के लिए छत्रपति ने पहले से ही सभी के रिजर्वेशन करा रखे थे. उस ने अपना, प्रिया और अपनी बहन का रिजर्वेशन पाटलिपुत्र एक्सप्रैस के एसी कोच में और बाकी बारातियों का स्लीपर कोच में कराया था. ट्रेन रात 2 बजे के करीब जब जबलपुर स्टेशन पर रुकी तो छत्रपति ने लंबी सांस ली कि अब वह प्रिया से खूब बतियाएगा. वजह एसी कोच में भीड़ कम रहती है और आमतौर पर मुसाफिर एकदूसरे से ज्यादा मतलब नहीं रखते. ट्रेन रुकने पर बाराती अपने स्लीपर कोच में चले गए और छत्रपति, उस की बहन और प्रिया एसी कोच में चढ़ गए. छत्रपति की बहन भी खुश थी कि उस की नई भाभी सचमुच लाखों में एक थी. उस के घर वालों ने शादी भी शान से की थी.

जब नींद टूटी तो…

कोच में पहुंचते ही छत्रपति ने तीनों के बिस्तर लगाए और सोने की तैयारी करने लगा. उस समय रात के 2 बजे थे, इसलिए डिब्बे के सारे मुसाफिर नींद में थे. जो थोड़ेबहुत लोग जाग रहे थे, वे भी जबलपुर में शोरशराबा सुन कर यहांवहां देखने के बाद फिर से कंबल ओढ़ कर सो गए थे. छत्रपति और प्रिया को 29 और 30 नंबर की बर्थ मिली थी.

जबलपुर से जैसे ही ट्रेन रवाना हुई, छत्रपति फिर प्रिया की तरफ मुखातिब हुआ. इस पर प्रिया ने आंखों ही आंखों में उसे अपनी बर्थ पर जा कर सोने का इशारा किया तो वह उस पर और निहाल हो उठा. दुलहन के शृंगार ने प्रिया की खूबसूरती में और चार चांद लगा दिए थे. थके हुए छत्रपति को कब नींद आ गई, यह उसे भी पता नहीं चला. पर सोने के पहले वह आने वाली जिंदगी के ख्वाब देखता रहा, जिस में उस के और प्रिया के अलावा कोई तीसरा नहीं था.

जबलपुर के बाद ट्रेन का अगला स्टौप इटारसी और फिर उस के बाद भुसावल जंक्शन था, इसलिए छत्रपति ने एक नींद लेना बेहतर समझा, जिस से सुबह उठ कर फ्रैश मूड में प्रिया से बातें कर सके. सुबह कोई 6 बजे ट्रेन इटारसी पहुंची तो प्लैटफार्म की रोशनी और गहमागहमी से छत्रपति की नींद टूट गई. आंखें खुलते ही कुदरती तौर पर उस ने प्रिया की तरफ देखा तो बर्थ खाली थी. छत्रपति ने सोचा कि शायद वह टायलेट गई होगी. वह उस के वापस आने का इंतजार करने लगा.

ट्रेन चलने के काफी देर बाद तक प्रिया नहीं आई तो उस ने बहन को जगाया और टायलेट जा कर प्रिया को देखने को कहा. बहन ने डिब्बे के चारों टायलेट देख डाले, पर प्रिया उन में नहीं थी. ट्रेन अब पूरी रफ्तार से चल रही थी और छत्रपति हैरानपरेशान टायलेट और दूसरे डिब्बों में प्रिया को ढूंढ रहा था. सुबह हो चुकी थी, दूसरे मुसाफिर भी उठ चुके थे. छत्रपति और उस की बहन को परेशान देख कर कुछ यात्रियों ने इस की वजह पूछी तो उन्होंने प्रिया के गायब होने की बात बताई. इस पर कुछ याद करते हुए एक मुसाफिर ने बताया कि उस ने इटारसी में एक दुलहन को उतरते देखा था.

इतना सुनते ही छत्रपति के हाथों से जैसे तोते उड़ गए. क्योंकि प्रिया के बदन पर लाखों रुपए के जेवर थे, इसलिए किसी अनहोनी की बात सोचने से भी वह खुद को नहीं रोक पा रहा था. दूसरे कई खयाल भी उस के दिमाग में आजा रहे थे. लेकिन यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी कि आखिरकार प्रिया बगैर बताए इटारसी में क्यों उतर गई? उस का मोबाइल फोन बर्थ पर ही पड़ा था, इसलिए उस से बात करने का कोई और जरिया भी नहीं रह गया था. एक उम्मीद उसे इस बात की तसल्ली दे रही थी कि हो सकता है, वह इटारसी में कुछ खरीदने के लिए उतरी हो और ट्रेन चल दी हो, जिस से वह पीछे के किसी डिब्बे में चढ़ गई हो. लिहाजा उस ने अपनी बहन को स्लीपर कोच में देखने के लिए भेजा. इस के बाद वह खुद भी प्रिया को ढूंढने में लग गया.

भुसावल आने पर बहन प्रिया को ढूंढती हुई उस कोच में पहुंची, जहां बाराती बैठे थे. बहू के गायब होने की बात उस ने बारातियों को बताई तो बारातियों ने स्लीपर क्लास के सारे डिब्बे छान मारे. मुसाफिरों से भी पूछताछ की, लेकिन प्रिया वहां भी नहीं मिली. प्रिया नहीं मिली तो सब ने तय किया कि वापस इटारसी जा कर देखेंगे. इस के बाद आगे के लिए कुछ तय किया जाएगा. बात हर लिहाज से चिंता और हैरानी की थी, इसलिए सभी लोगों के चेहरे उतर गए थे. शादी की उन की खुशी काफूर हो गई थी.

प्रिया मिली इलाहाबाद में, पर…

इत्तफाक से उस दिन पाटलिपुत्र एक्सप्रैस खंडवा स्टेशन पर रुक गई तो एक बार फिर सारे बारातियों ने पूरी ट्रेन छान मारी, लेकिन प्रिया नहीं मिली. इस पर छत्रपति अपने बड़े भाई और कुछ दोस्तों के साथ ट्रेन से इटारसी आया और वहां भी पूछताछ की, पर हर जगह मायूसी ही हाथ लगी. अब पुलिस के पास जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था. इसी दौरान छत्रपति ने प्रिया के घर वालों और अपने कुछ रिश्तेदारों से भी मोबाइल पर प्रिया के गुम हो जाने की बात बता दी थी.

पुलिस वालों ने उस की बात सुनी और सीसीटीवी के फुटेज देखी, लेकिन उन में कहीं भी प्रिया नहीं दिखी तो उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. इधर छत्रपति और उस के घर वालों का सोचसोच कर बुरा हाल था कि प्रिया नहीं मिली तो वे घर जा कर क्या बताएंगे. ऐसे में तो उन की मोहल्ले में खासी बदनामी होगी. कुछ लोगों के जेहन में यह बात बारबार आ रही थी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रिया का चक्कर किसी और से चल रहा हो और मांबाप के दबाव में आ कर उस ने शादी कर ली हो. फिर प्रेमी के साथ भाग गई हो. यह खयाल हालांकि बेहूदा था, जिसे किसी ने कहा भले नहीं, पर सच भी यही निकला.

पुलिस वालों ने वाट्सऐप पर प्रिया का फोटो उस की गुमशुदगी के मैसेज के साथ वायरल किया तो दूसरे ही दिन पता चल गया कि वह इलाहाबाद के एक होटल में अपने प्रेमी के साथ है. दरअसल, प्रिया का फोटो वायरल हुआ तो उसे वाट्सऐप पर इलाहाबाद स्टेशन के बाहर के एक होटल के उस मैनेजर ने देख लिया था, जिस में वह ठहरी हुई थी. मामला गंभीर था, इसलिए मैनेजर ने तुरंत प्रिया के अपने होटल में ठहरे होने की खबर पुलिस को दे दी.

एक कहानी कई सबक

छत्रपति एक ऐसी बाजी हार चुका था, जिस में शह और मात का खेल प्रिया और उस के घर वालों के बीच चल रहा था, पर हार उस के हिस्से में आई थी. इलाहाबाद जा कर जब पुलिस वालों ने उस के सामने प्रिया से पूछताछ की तो उस ने दिलेरी से मान लिया कि हां वह अपने प्रेमी राज सिंह के साथ अपनी मरजी से भाग कर आई है. और इतना ही नहीं, इलाहाबाद की कोर्ट में वह उस से शादी भी कर चुकी है. बकौल प्रिया, वह और राज सिंह एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं, यह बात उस के घर वालों से छिपी नहीं थी. इस के बावजूद उन्होंने उस की शादी छत्रपति से तय कर दी थी. मांबाप ने सख्ती दिखाते हुए उसे घर में कैद कर लिया था और उस का मोबाइल फोन भी छीन लिया था, जिस से वह राज सिंह से बात न कर पाए.

4 महीने पहले उस की शादी छत्रपति से तय हुई तो घर वालों ने तभी से उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था. लेकिन छत्रपति से बात करने के लिए उसे मोबाइल दे दिया जाता था. तभी मौका मिलने पर वह राज सिंह से भी बातें कर लिया करती थी. उसी दौरान उन्होंने भाग जाने की योजना बना ली थी. प्रिया के मुताबिक राज सिंह विदाई वाले दिन ही जबलपुर पहुंच गया था. इन दोनों का इरादा पहले जबलपुर स्टेशन से ही भाग जाने का था, लेकिन बारातियों और छत्रपति के जागते रहने के चलते ऐसा नहीं हो सका. राज सिंह पाटलिपुत्र एक्सप्रैस ही दूसरे डिब्बे में बैठ कर इटारसी तक आया और यहीं प्रिया उतर कर उस के साथ इलाहाबाद आ गई थी.

पूछने पर प्रिया ने साफ कह दिया कि वह अब राज सिंह के साथ ही रहना चाहती है. राज सिंह सिंगरौली के कालेज में उस का सीनियर है और वह उसे बहुत चाहती है. घर वालों ने उस की शादी जबरदस्ती की थी. प्रिया ने बताया कि अपनी मरजी के मुताबिक शादी कर के उस ने कोई गुनाह नहीं किया है, लेकिन उस ने एक बड़ी गलती यह की कि जब ऐसी बात थी तो उसे छत्रपति को फोन पर अपने और राज सिंह के प्यार की बात बता देनी चाहिए थी.

छत्रपति ने अपनी नईनवेली बीवी की इस मोहब्बत पर कोई ऐतराज नहीं जताया और मुंहजुबानी उसे शादी के बंधन से आजाद कर दिया, जो उस की समझदारी और मजबूरी दोनों हो गए थे.

जिस ने भी यह बात सुनी, उसी ने हैरानी से कहा कि अगर उसे भागना ही था तो शादी के पहले ही भाग जाती. कम से कम छत्रपति की जिंदगी पर तो ग्रहण नहीं लगता. इस में प्रिया से बड़ी गलती उस के मांबाप की है, जो जबरन बेटी की शादी अपनी मरजी से करने पर उतारू थे. तमाम बंदिशों के बाद भी प्रिया भाग गई तो उन्हें भी कुछ हासिल नहीं हुआ. उलटे 8-10 लाख रुपए जो शादी में खर्च हुए, अब किसी के काम के नहीं रहे.

मांबाप को चाहिए कि वे बेटी के अरमानों का खयाल रखें. अब वह जमाना नहीं रहा कि जिस के पल्लू से बांध दो, बेटी गाय की तरह बंधी चली जाएगी. अगर वह किसी से प्यार करती है और उसी से शादी करने की जिद पाले बैठी है तो जबरदस्ती करने से कोई फायदा नहीं, उलटा नुकसान ज्यादा है. यदि प्रिया इटारसी से नहीं भाग पाती तो तय था कि मुंबई जा कर ससुराल से जरूर भागती. फिर तो छत्रपति की और भी ज्यादा बदनामी और जगहंसाई होती.

अब जल्द ही कानूनी तौर पर भी मसला सुलझ जाएगा, लेकिन इसे उलझाने के असली गुनहगार प्रिया के मांबाप हैं, जिन्होंने अपनी झूठी शान और दिखावे के लिए बेटी को किसी और से शादी करने के लिए मजबूर किया. इस का पछतावा उन्हें अब हो रहा है. जरूरत इस बात की है कि मांबाप जमाने के साथ चलें और जातिपांत, ऊंचनीच, गरीबअमीर का फर्क और खयाल न करें, नहीं तो अंजाम क्या होता है, यह प्रिया के मामले से समझा जा सकता है. – कथा में प्रिया परिवर्तित नाम है. Crime Stories

Punjab News: यह कैसी इंसानी फिसरत

 Punjab News: घरपरिवार से दूर अकेला रह रहा राजेश पड़ोस में रहने वाली औरतों को बुरी नजर से ही नहीं देखता था, बल्कि मौका मिलने पर शरीरिक छेड़छाड़ भी कर लेता था. परेशान हो कर महिलाओं ने जब विरोध किया तो ऐसा क्या हुआ कि 3 घर बरबाद हो गए. मैं उन दिनों जिला संगरूर के शहर मलेरकोटला में बतौर थानाप्रभारी तैनात था. मलेरकोटला एक ऐतिहासिक नगर माना जाता है. सिख इतिहास में इस नगर का और नगर के नवाब का विशेष महत्त्व एवं योगदान रहा है. मानवता के रक्षक एवं सिखमुसलिम एकता के प्रतीक माने जाने वाले इस नगर में आज भी अमन और शांति है.

स्वयं को धन्य मानते हुए इस नगर में मैं शांति से नौकरी कर रहा था कि एक दोपहर 12 बजे के आसपास मुझे जो सूचना मिली, मैं उस से बेचैन हो उठा. सूचना के अनुसार बड़ाघर, ईदगाह रोड पर स्थित मामदीन मोहल्ला के वार्ड नंबर 4 में मोहम्मद सादिक, शौकत अली के मकान में हत्याएं हुई थीं. हत्या शब्द से ही डर लगता है, बात हत्याओं की आ जाए तो आम आदमी की छोड़ो, एक इंसपेक्टर होते हुए भी मैं घबरा गया था.

बहरहाल, सूचना मिलते ही मैं एक सबइंसपेक्टर, एक हेडकांस्टेबल और 2 सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गया था. जिस मकान में वारदात हुई थी, उस के सामने मोहल्ले वालों की अच्छीखासी भीड़ जमा थी. मकान किसी परकोटे जैसा था. ऊंचीऊंची दीवारों वाले हवेलीनुमा उस मकान का किले जैसा विशाल फाटक अंदर से बंद था.

फाटक के नीचे से बहा खून बाहर गली तक आ गया था.  मौजूद लोगों से पूछने पर पता चला कि कुछ देर पहले अंदर से मारपीट और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आई थीं. उन आवाजों को सुन कर वे लोग वहां पहुंचे. उन्होंने फाटक खुलवाने के लिए बाहर लगी सांकल बजाई. दरवाजा तो नहीं खुला, फाटक के नीचे से खून जरूर बह कर बाहर आ गया. चूंकि उस मकान में कई लोग रहते थे, अगर कोई जीवित होता तो जरूर फाटक खोलता. इसी से उन लोगों ने अंदाजा लगाया कि लगता है अंदर रहने वाले सभी लोगों को मार दिया गया है. यही सोच कर उन्होंने हत्याओं की सूचना दे दी थी.

मैं ने सिपाहियों से कहा कि मोहल्ले से किसी की सीढ़ी ला कर मकान की दीवार पर लगा कर भीतर जाएं और अंदर से फाटक खोल दें, ताकि अंदर जा कर देखा जा सके कि यहां क्या हुआ था? सिपाहियों ने तुरंत एक सीढ़ी की व्यवस्था कर के फाटक खोल दिया. फाटक खुलते ही मैं ने देखा, फाटक के पास ही अंदर एक औरत की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. फाटक के नीचे से बह कर बाहर आने वाला खून उसी औरत का था. जांच आगे बढ़ाने से पहले मकान की संरचना को समझना जरूरी था. मकान मुगल शासनकाल के किसी मुसलिम अफसर या नगरसेठ की हवेली रहा होगा.

मुख्यद्वार यानी फाटक के बाद एक बेहद खूबसूरत बरामदा था, जिस के खत्म होने से पहले बाईं ओर एक बहुत बड़ा कमरा था. उस के ठीक सामने दाईं ओर भी वैसा ही एक कमरा था. बरामदा खत्म होने के बाद बाईं ओर कमरे के बजाय खुले आंगन में दीवारों के साथ खूबसूरत फूलों की क्यारियां बनी हुई थीं, जबकि दाईं ओर लाइन से 3 कमरे बने हुए थे. उस के बाद छत पर जाने के लिए सीढि़यां बनी थीं. उस के आगे सामने की दीवार से सटा लैट्रीन और बाथरूम बना था. मकान देख कर यही लगता था कि मकान में आनेजाने के लिए फाटक के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. मैं ने इस घटना की जानकारी अधिकारियों को देने के साथ फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया था. इस के बाद मैं घटनास्थल का निरीक्षण करने लगा.

फाटक के पास बरामदे में पड़ी मृतका की उम्र 30-32 साल रही होगी. वह निहायत ही खूबसूरत और सलीके वाली औरत लग रही थी. मृतका के शरीर पर तेज धार वाले हथियार के कई घाव थे, जो काफी गहरे थे. लाश के पास ही चूडि़यों के कुछ टुकड़े पड़े थे. कुछ टुकड़े मृतका की कलाई में भी धंसे हुए थे, जहां से खून रिस रहा था. मृतका के सिर के बाल बिखरे हुए थे, पास ही बालों में लगाई जाने वाली क्लिप पड़ी थी. कुछ बरतन बरामदे में फैले हुए थे. वहां की स्थिति से साफ लग रहा था कि मृतका ने मरने से पहले खुद को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया था. लाश के निरीक्षण के दौरान मृतका की मुट्ठी में भी ढेर सारे बाल दबे दिखाई दिए. जिस कमरे के बाहर बरामदे में लाश पड़ी थी, उस कमरे में भी संघर्ष के निशान नजर आ रहे थे. कमरे के अंदर भी खून फैला हुआ था.

कमरे और बरामदे से खून सने पैरों के निशान दाईं ओर वाले कमरों की ओर गए हुए थे. निशानों का पीछा करते हुए जब मैं दूसरे कमरे में पहुंचा तो वहां भी एक 30-32 साल की महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस महिला के शरीर पर भी तेजधार वाले हथियार के कई घाव थे. फर्श पर खून ही खून फैला था. उस कमरे में भी संघर्ष के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. खून सने पैरों के निशानों के आधार पर मैं तीसरे कमरे में पहुंचा तो वहां खून से लथपथ एक युवक औंधे मुंह फर्श पर पड़ा था. उस के आसपास फर्श पर खून फैला हुआ था. नजदीक से देखने पर उस की गरदन में एक हंसिया फंसा दिखाई दिया. खून गरदन से ही बह रहा था. मुझे उस में कुछ हरकत दिखाई दी तो मैं ने झट से उस की नब्ज पकड़ी. वह चल रही थी. इस का मतलब वह युवक जीवित था. मैं ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया.

मेरी सूचना पर एसपी भूपिंदर सिंह विर्क, डीएसपी (डी) हरमिंदर सिंह, डीएसपी मलेरकोटला गुरप्रीत सिंह, फोरेंसिक टीम के साथ आ गए थे. अधिकारियों की उपस्थिति में फोरेंसिक टीम ने अपना काम कर लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल एवं लाशों का बारीकी से निरीक्षण किया. लाश के पास पड़ी चूडि़यों के टुकड़े, वहां बिखरे बरतनों में से एक लोटे पर खून लगा था, उसे कब्जे में ले लिया था. मृतका की मुट्ठी में दबे बाल भी सुबूत के लिए रख लिए गए थे. खून सने पैरों के जो निशान थे, फोरेसिंक टीम ने उन्हें बड़ी सफाई से उठा लिए थे. इस के अलावा अंगुलियों के निशान भी उठा लिए गए. खून सनी 3 जोड़ी चप्पलें मिली थीं, उन्हें भी जब्त कर लिया गया था. बाकी के सारे सुबूत जुटाने के बाद अन्य जरूरी काररवाई निपटाई और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

पूछताछ द्वारा मिली जानकारी के अनुसार, वह मकान मोहम्मद सादिक का था, जिसे उस ने किराए पर उठा रखा था. जबकि वह खुद लोहभन में गुलजार अस्पताल के पास रहता था. मकान के बरामदे के बाईं ओर फाटक के पास जो लाश पड़ी थी, वह रिंकू की थी. वह बाईं ओर वाले कमरे में पति विजय और 2 बच्चों के साथ रहती थी. बरामदे के दाईं ओर वाले कमरे में 2 भाई रामा मंडल और सागर मंडल रहते थे. उस के आगे वाले कमरे में लालू साहू पत्नी बीना देवी और 4 बच्चों के साथ रहता था. उस कमरे में मिली लाश बीना देवी की थी. उस के आगे वाले तीसरे और अंतिम कमरे में राजेश गुप्ता अकेला ही रहता था. वही अपने कमरे में घायलावस्था में मिला था.

मकान में रहने वाले सारे किराएदार अलगअलग राज्यों के रहने वाले थे, जो कामधंधे की वजह से यहां आ कर रह रहे थे. लालू साहू मध्य प्रदेश का रहने वाला था तो रामा और सागर मंडल पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे. जबकि विजय बिहार के जिला बेगूसराय का रहने वाला था. अपने कमरे में घायल मिला राजेश गुप्ता उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर का रहने वाला था. इस मकान में रहने वाले किराएदार अपनेअपने काम से मतलब रखने वाले लोग थे. इन में राजेश ही एक ऐसा आदमी था, जो दूसरों के मामलों में दिलचस्पी रखता था. खास कर औरतों के मामले में वह कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेता था.

लालू साहू कबाड़ी का काम करता था. वह सुबह अपने गोदाम पर चला जाता था तो देर रात को ही घर लौटता था. विजय किसी फैक्ट्री में काम करता था. उस की 12 घंटे की ड्यूटी थी. वह सुबह साढ़े 7 बजे घर से निकलता तो रात साढ़े 8 बजे तक लौटता था. रामा और सागर मंडल मकानों में टाइल्स लगाने का काम करते थे, जिस से वे सुबह 7 बजे ही घर से निकल जाते थे तो उन के लौटने का कोई निश्चित समय नहीं था.  बाकी बचा राजेश, जो किसी कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड था. वह रात की ड्यूटी करता था, इसलिए जब अन्य पुरुष घर आते थे तो वह ड्यूटी पर चला जाता था और जब सभी अपनेअपने काम पर जाते थे तो वह वापस कमरे पर आ जाता था.

इस तरह दिन में वही अकेला मर्द उस मकान में रहता था. उस हवेलीनुमा मकान में दिन में केवल 3 लोग रहते थे, एक राजेश, दूसरी बीना और तीसरी रिंकू. क्योंकि इन के पति काम पर चले जाते थे तो बच्चे स्कूल चले जाते थे. पूछताछ में पता चला था कि राजेश दिलफेंक किस्म का युवक था, इसलिए ड्यूटी से आने के बाद अपने काम निपटा कर वह बीना और रिंकू के कमरों में ताकझांक किया करता था. वह जब तक जागता रहता, औरतों से छेड़छाड़ किया करता था. अश्लील फब्तियां कस कर दोनों की नाक में दम कर देता था.

राजेश की इन घटिया हरकतों की वजह से बीना और रिंकू ज्यादातर कमरों में बंद रहती थीं. लेकिन जरूरी कामों के लिए उन्हें कमरों से बाहर आना ही पड़ता था. घात लगा कर बैठा राजेश इसी मौके की तलाश में रहता था. पूछताछ में लालू और विजय ने बताया था कि कभीकभी तो वह अपने सारे कपड़े उतार कर अपने कमरे में डांस भी करने लगता था. ऐसा करने के लिए उसे मना किया जाता तो वह बेशरमी से हंसते हुए कहता, ‘‘यह मेरा कमरा है. मैं इस का किराया देता हूं, इसलिए अपने कमरे में मैं चाहे नंगा रहूं या कपड़े पहन कर घूमूं, इस में आप लोगों को क्या परेशानी है? अगर इस स्थिति में मैं आप लोगों को अच्छा लगता हूं तो आप लोग आराम से मेरे कमरे में आ सकती हैं. मैं जरा भी बुरा नहीं मानूंगा. पड़ोसी होने के नाते आप लोगों की सेवा करना मेरा धर्म बनता है.’’

इस तरह की बातें सुन कर रिंकू और बीना का दिमाग भन्ना उठता. उन का मन करता कि ईंट उठा कर उस के सिर पर दे मारें, जिस से उस का गंदा भेजा बाहर आ जाए. लेकिन चाह कर भी वे ऐसा नहीं कर पा रही थीं. वे राजेश की शिकायत अपनेअपने पतियों से भी नहीं कर पा रही थीं. इस की वजह यह थी कि एक तो उन के पतियों का राजेश से झगड़ा हो जाता, जिस में किसी को भी चोट लग सकती थी. अगर चोट उन के पतियों को लग जाती तो उन के लिए मुसीबत खड़ी हो जाती. अगर कहीं चोट राजेश को लग जाती तो वह थाने चला जाता. उस के बाद उन के पतियों को पुलिस पकड़ ले जाती. यह भी उन के लिए मुसीबत बन जाती. इस के अलावा यह भी हो सकता था कि उनके पति उन्हीं पर संदेह करने लगते. दोनों ही औरतें असमंजस की स्थिति में थीं. इसलिए संभलसंभल कर कदम रख रही थीं.

लेकिन उस दिन तो हद ही हो गई. दोपहर का समय था. बीना घर के काम निपटा कर आराम करने के लिए लेट गई. रिंकू अपने कमरे में दरवाजा बंद किए लेटी थी. गरमियों के दिन थे और बिजली नहीं थी, इसलिए बीना ने कमरे का एक किवाड़ खुला छोड़ दिया था. थकी होने की वजह से लेटते ही उस की आंख लग गई. अचानक बीना को लगा कि कोई उस के शरीर से छेड़छाड़ कर रहा है. उस की आंखें खुलीं तो देखा राजेश उस की बगल में लेटा उस से छेड़छाड़ कर रहा था. वह उछल कर उठी और जोरजोर से राजेश को गालियां देने लगी. शोर सुन कर रिंकू भी बाहर आ गई. इस के बाद दोनों औरतें राजेश को भलाबुरा कहने लगीं. तब बेशरमी से हंसते हुए उस ने रिंकू से कहा, ‘‘चिल्लाती क्यों हो, तुम्हारी सहेली ने ही तो मुझे अपने कमरे में बुलाया था. अब इस में मेरा क्या दोष है?’’

राजेश की बात से दोनों के पैरों तले से जमीन खिसक गई. राजेश की धूर्तता से डर कर दोनों ने उस की शिकायत अपनेअपने पतियों से नहीं की. ऐसे आदमी का क्या भरोसा, कब क्या बक दे? डर के मारे दोनों चुप रह गईं. इस से राजेश की हिम्मत बढ़ गई. लेकिन जब राजेश की हरकतें बढ़ती ही गईं तो काफी सोचविचार कर दोनों ने अपनेअपने पतियों से कहा कि दिन में अकेली रहने पर राजेश उन्हें परेशान करता है. उन के साथ बदतमीजी भी करता है. विजय और लाल ने राजेश को समझाना चाहा तो उलटा वह उन्हीं के गले पड़ गया. वह जोरजोर से कहने लगा, ‘‘मैं तुम्हारी बीवियों को परेशान करता हूं या तुम्हारी बीवियां मुझे परेशान करती हैं. उन्हें संभाल कर रखो वरना अच्छा नहीं होगा.’’

दोनों सन्न रह गए. अपनी इज्जत बचाने की खातिर वे आगे कुछ नहीं बोले. इसलिए यह सब यूं ही चलता रहा. बीना और रिंकू काफी परेशान थीं और बेबस भी. आखिर उस दिन छेड़छाड़ की अति हो गई. रोज की तरह राजेश अपने कमरे में था. घर का काम निपटाने के बाद रिंकू नहाने के लिए बाथरूम की ओर जा रही थी. बीना अपने कमरे में कुछ कर रही थी. बाथरूम जाने के लिए राजेश के कमरे के सामने से ही जाना पड़ता था. रिंकू को बाथरूम की ओर जाते देख कर राजेश के शैतानी दिमाग में खुराफात सूझ गई. वह अपने कमरे से निकला और दबेपांव बाथरूम की ओर चल पड़ा.

रिंकू कपड़े उतार कर नहाने के लिए बैठने जा रही थी कि राजेश ने अचानक दरवाजे को इतनी जोर से धक्का दिया कि अंदर की सिटकनी टूट गई और दरवाजा खुल गया. रिंकू को उस हालत में पा कर वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. डर और शरम से रिंकू का बुरा हाल था. पहले तो वह सकपकाई, लेकिन बाद में जोरजोर से चिल्लाने के साथ बाथरूम में रखी कपड़ा धोने वाली मुंगरी उठा कर उसे पीटने लगी. रिंकू की चीखें सुन कर बीना भी कमरे से बाहर आ गई थी. वस्तुस्थिति समझ कर वह भी बाथरूम पहुंची. राजेश का कौलर पकड़ कर बाथरूम से बाहर निकाला और चप्पल से पीटने लगी. तब तक रिंकू भी कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर आ गई थी. दोनों ने मिल कर राजेश की जम कर धुनाई कर दी.

इस तरह रिंकू और बीना इज्जत को बचाना मुश्किल हो गया तो रात में पतियों के वापस आने पर उन्होंने राजेश की अगलीपिछली सारी हरकतें उन से बता दीं. इस के बाद विजय और लालू ने राजेश की जम कर पिटाई की और उस की हरकतों की शिकायत थाने में कर दी. पुलिस राजेश को पकड़ कर थाने ले गई. थाने में भी उस की धुनाई की गई. इस के बाद राजेश ने गलती की लिखित माफी मांगी तो उसे छोड़ दिया गया. इस घटना के बाद कुछ दिनों तक तो राजेश शांत रहा, लेकिन उस के बाद फिर छोटीमोटी हरकतें करने लगा. उस दिन यानी जिस दिन हत्याएं हुई थीं, रोज की तरह सभी अपनेअपने कामों पर चले गए थे. रात की ड्यूटी कर के सुबह साढ़े 8 बजे के करीब राजेश कमरे पर लौटा. 9 बजे तक सभी बच्चे भी स्कूल चले गए. इस के बाद उस हवेलीनुमा मकान में रिंकू, बीना और राजेश ही रह गए. 12 बजे तक घर के काम निपटा कर रिंकू और बीना अपनेअपने कमरों में लेट गईं.

अगस्त का महीना था. हवा बंद थी, इसलिए उमस बहुत ज्यादा थी. ऊपर से बिजली भी नहीं थी. हवा आने के लिए बीना ने अपने कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था. अपने कमरे में बैठे राजेश के मन में न जाने क्या सूझी कि वह कमरे से निकला और बीना के कमरे के सामने जा कर खड़ा हो गया. खुले दरवाजे से उस ने भीतर झांक कर देखा तो बीना गहरी नींद सो रही थी. बेखबरी में उस का पेटीकोट घुटनों के ऊपर तक खिसक गया था. पलक झपकाए बिना राजेश कुछ देर तक बीना की नंगी टांगे देखता रहा. उस के बाद वह इस कदर उत्तेजित हो उठा कि दरवाजा धकेल कर कमरे में जा पहुंचा और भूखे भेडि़ए की तरह बैड पर सो रही बीना पर टूट पड़ा.

अचानक हुए इस हमले से बीना घबरा कर चिल्लाने लगी. राजेश ने जल्दी से अपना एक हाथ उस के मुंह पर रख कर धमकाया, ‘‘चुपचाप मुझे अपने मन की कर लेने दो. अगर चीखीचिल्लाई तो गला दबा कर दम निकाल दूंगा.’’

बीना को धमका कर राजेश उस के शरीर से छेड़छाड़ करने लगा. अचानक बीना ने पूरी ताकत लगा कर राजेश को धक्का दिया तो वह फर्श पर गिर पड़ा. लेकिन फुरती से उठ कर उस ने एक जोरदार थप्पड़ बीना के मुंह पर मारा. राजेश उत्तेजना में इस कदर अंधा हो चुका था कि उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. वह तेजी से बीना के कमरे से निकला और अपने कमरे से सब्जी काटने के लिए रखा हंसिया उठा लाया. बीना को डराने के लिए उस के सामने हंसिया लहराते हुए बोला, ‘‘खामोश, अगर मुंह से आवाज निकाली तो गला काट कर रख दूंगा.’’

लेकिन बीना पर राजेश की धमकी का कोई असर नहीं हुआ. वह खामोशी से अपनी इज्जत नहीं लुटवाना चाहती थी. इसलिए वह इज्जत बचाने के लिए संघर्ष करती रही. वह राजेश के चंगुल से खुद को छुड़ा कर बाहर की ओर भागना चाहती थी. जबकि राजेश की स्थिति यह थी कि जैसे किसी भूखे शेर के मुंह से मांस छीन लिया गया हो. उस ने बाहर की ओर भाग रही बीना पर हंसिये से प्रहार कर दिया. जहां हंसिया लगा था, वहां से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह फर्श पर गिर पड़ी. वह जोरजोर से चिल्लाने लगी. उस के गिरते ही राजेश तो उस पर लगातार कई वार कर दिए. अब तक उस की चीखपुकार सुन कर रिंकू भी आ गई थी. वहां की हालत देख कर उस की घिग्घी बंध गई.

बीना को राजेश से बचाने के लिए रिंकू कोई हथियार लेने के लिए अपने कमरे की ओर भागी. लेकिन राजेश पर उस समय खून सवार था, इसलिए वह भी उस के पीछे दौड़ा. रिंकू कोई चीज उठा पाती, इस का मौका दिए बिना ही राजेश ने हाथ में लिए हंसिये से उस पर वार कर दिया. रिंकू जान बचाने के लिए चीखते हुए कमरे से निकल कर फाटक की ओर भागी. लेकिन काल बने राजेश ने उसे बरामदे में घेर लिया और हंसिये से ताबड़तोड़ वार करने लगा. किसी कटे पेड़ की तरह लहरा कर रिंकू फर्श पर गिर पड़ी और तड़पतड़प कर थोड़ी देर में शांत हो गई. कुछ देर राजेश वहीं खड़ा रहा. इतनी देर में उस का जुनून शांत हो गया था. जब होश आया तो 2-2 लाशें और चारों ओर खून ही खून फैला देख कर उस की आत्मा तक कांप उठी.

वह कोई पेशेवर हत्यारा तो था नहीं, इसलिए यह सब देख कर उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. उसे आंखों के सामने फांसी का फंदा लहराता दिखाई दिया. पलभर में ही एक ऐसा जुनून आया, जो तूफान बन कर अपने पीछे तबाही छोड़ कर चला गया था. भविष्य की कल्पना मात्र से ही राजेश का शरीर कांप उठा. वह मकान के भीतर पागलों की तरह भागभाग कर अपने छिपने के लिए जगह ढूंढने लगा. जब उसे कोई जगह सुरक्षित नहीं दिखाई दी तो पुलिस से बचने के लिए वह हाथ में लिए हंसिये से अपनी गरदन पर वार करने लगा. पहला वार गहरा पड़ा, लेकिन उस के बाद वाले वार हलके होते गए. चौथा वार पहले वार पर पड़ा, जिस से घाव तो गहरा हो ही गया, पीड़ा की वजह से हाथ में ताकत न रहने की वजह से वह हंसिया निकाल नहीं सका, जिस से वह उसी में फंसा रह गया. राजेश बेहोश हो कर फर्श पर औंधे मुंह गिर पड़ा.

अब तक की पूछताछ से पता चला था कि राजेश द्वारा की गई दोनों महिलाओं की हत्याएं और आत्महत्या की कोशिश की वजह दुष्कर्म का प्रयास था. बहरहाल मैं दोनों महिलाओं के पतियों और मोहल्ले वालों के बयान दर्ज करने के बाद अस्पताल के लिए चल पड़ा. अस्पताल में पता चला कि राजेश की हालत काफी गंभीर थी, जिस की वजह से डाक्टरों ने उसे पटियाला के  राजेंद्रा अस्पताल के लिए रेफर कर दिया था. राजेंद्रा अस्पताल के डाक्टरों ने अथक प्रयास कर के राजेश को बचा लिया था. इस पूरे मामले में राजेश ही अकेला दोषी था. अगर उस की मौत हो जाती तो मामले की फाइल उसी दिन बंद हो जाती. लेकिन अब स्थिति बदल गई थी. राजेश बच गया था, इसलिए अब इस मामले को अदालत तक ले जाना था. मामले को मजबूत बनाने के लिए मैं साक्ष्य जुटाने लगा, जिस से मृत महिलाओं के परिजनों को न्याय मिल सके.

सिविल अस्पताल मलेरकोटला से राजेश की जो एमएलसी बनाई गई थी, उस के अनुसार राजेश की गरदन पर बाईं ओर तेजधार हथियार के 5 घाव थे. वह एमएलसी मुझे अधूरी लगी, इसलिए मैं ने पटियाला के राजेंद्रा अस्पताल से एक अन्य एमएलसी बनवाई, जिस में राजेश की बाईं आंख से ले कर गरदन तक तेजधार हथियार की 5 गंभीर चोटें थीं. बाएं हाथ पर कटे के 3 निशान और दाहिने हाथ पर भी चोट का एक निशान था, जो शायद छीनाझपटी में लग गया था. डाक्टरों की कोशिश से राजेश की हालत में तेजी से सुधार हो रहा था. अब वह बिना किसी की मदद के चलनेफिरने लगा था. लेकिन एक समस्या यह खड़ी हो गई थी कि गरदन पर हंसिये की चोट की वजह से उस की आवाज चली गई थी. अब वह बोल नहीं सकता था. आगे चल कर यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन सकती थी. अदालत में वह अपनी बात किस तरह कहेगा, यह सोचसोच कर मैं परेशान था.

बहरहाल, मैं ने रिंकू और बीना की हत्या तथा आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा राजेश के विरुद्ध दर्ज कर के सुबूत जुटाने शुरू कर दिए. एक दिन सवेरे पता चला कि राजेश निगरानी पर तैनात सिपाही को चकमा दे कर फरार हो गया है. मेरे लिए यह बहुत बड़ी परेशानी खड़ी हो गई थी. भले ही राजेश गंभीर रूप से घायल था, लेकिन उस ने जो जघन्य अपराध किया था, उस के लिए उसे सजा मिलनी ही चाहिए थी. मेरी नौकरी खतरे में पड़ गई थी. सब से बड़ी बात यह थी कि मेरी पूरी उम्र की बेदाग नौकरी के अंत में एक ऐसा कलंक लगने वाला था, जो लाख प्रयास के बाद भी नहीं छुड़ाया जा सकता था. मेरे रिटायरमेंट के मात्र 2 साल बाकी थे. बहरहाल अस्पताल में राजेश की निगरानी पर लगे सिपाही को लाइनहाजिर करा कर राजेश की तलाश में जगहजगह दबिश डालनी शुरू कर दी.

राजेश के भाई रामसंजीव गुप्ता को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. वह भी मलेरकोटला में ही रहता था. उस ने बताया कि कई सालों से वह राजेश से नहीं मिला था. राजेश की हरकतों की वजह से वह न तो उसे अपने घर में घुसने देता था और न ही उस से कोई संबंध रखता था. मैं ने राजसंजीव से उस के रिश्तेदारों के पते पूछ कर उन के यहां छापे मारे, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. शहर की मैं ने पहले ही नाकेबंदी करवा दी थी. उस की शिनाख्त के लिए इतना ही काफी था कि उस के सिर से ले कर गरदन तक पट्टियां लिपटी थीं. वह आसानी से पहचाना जा सकता था और शायद इसीलिए 2 दिनों बाद वह मोहम्मद अयूब नामक एक इज्जतदार आदमी के साथ थाने आ कर मेरे सामने खड़ा हो गया. शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था या उसे अपने असहाय होेने का अंदाजा लग गया था.

थाने में मैं ने राजेश से पूछताछ शुरू की. इशारों से उस ने वे सारी बातें बता दीं, जो लोगों ने मुझे जांच के दौरान बताई थीं. बहरहाल मैं ने उस का बयान ले कर 2 गवाहों के सामने उस के दस्तखत करवा लिए. अगले दिन मैं ने उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट श्री पुष्मिंदर सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. हतयाओं का हथियार अभियुक्त की गरदन से बरामद हो गया था. धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान अभियुक्त ने इशारों में दर्ज करवा दिए थे. खून आलूदा एवं फिंगरप्रिंट की रिपोर्ट आने के बाद मैं ने अदालत में आरोपपत्र पेश कर दिया.

लगभग 2 सालों तक तारीखें पड़ने के बाद इस केस की गवाहियां अतिरिक्त सत्र एवं न्यायाधीश श्री बी.के. मेहता की अदालत में शुरू हुईं.  इस मुकदमे में कुल 23 गवाह थे. इस मुकदमे में ठोस सुबूत फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने पेश किए. अभियुक्त के पैरों के निशान इस मुकदमे में सजा दिलाने के लिए अहम सुबूत थे. इस के अलावा अहम सुबूत थे मृतका रिंकू की मुट्ठी में मिले राजेश के सिर के बाल. अभियुक्त राजेश की ओर से मुकदमे की पैरवी मशहूर वकील नरपाल सिंह धारीवाल कर रहे थे, जबकि अभियोजन पक्ष की ओर से अमरजीत शर्मा और हरिंदर सूद थे.

अभियुक्त राजेश गुप्ता ने सफाई में कुछ नहीं कहा था. जज साहब के आदेश पर राजेश को एक प्लेन पेपर दिया गया तो उस ने उस पर अपना अपराध स्वीकार करते हुए पूरी घटना का विवरण लिख कर जज साहब को थमा दिया था कि वह किस प्रकार वासना में अंधे हो कर रिंकू और बीना को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता था. जब वह इस प्रयास में सफल नहीं हुआ तो उन की किस तरह हत्या कर दी. अपने इस अपराध के लिए उस ने अदालत से माफी भी मांगी थी. जज साहब ने इस मुकदमे में अभियुक्त राजेश गुप्ता को रिंकू और बीना की हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद और 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई थी. जुरमाना अदा न करने पर उसे 6 महीने की सजा और भोगनी थी.

जज साहब ने अपने फैसले में कहा था कि राजेश ने अपनी हवस पूर्ति के लिए 2 महिलाओं की हत्या कर के 2 परिवारों को बरबाद किया है. उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए. लेकिन यह अपराध करने के बाद पश्चाताप में अभियुक्त ने आत्महत्या की कोशिश की और स्वयं अपना अपराध स्वीकार करते हुए अदालत से माफी मांगी, इसलिए उस के लिए उम्रकैद की सजा उपयुक्त है. Punjab News

 

Actress Murder Case: टुकड़ों में मिली अभिनेत्री की लाश

Actress Murder Case: राइमा इसलाम शिमू बांग्लादेश की एक जानीमानी अभिनेत्री थीं. उन्होंने न सिर्फ 50 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, बल्कि 2 दरजन से अधिक नाटकों में भी काम कर दर्शकों के दिलों में जगह बनाई. यह महज इत्तफाक की बात है कि जिन दिनों देश भर में अपने दौर की खूबसूरत और लोकप्रिय अभिनेत्री परवीन बाबी की जिंदगी पर बनी वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ की चर्चा हो रही थी, उन्हीं दिनों बांग्लादेश की परवीन जितनी ही सैक्सी, लोकप्रिय और सुंदर एक्ट्रेस राइमा इसलाम शिमू की दुखद हत्या की चर्चा भी उतनी ही शिद्दत से हो रही थी.

फर्क सिर्फ इतना था कि परवीन बाबी की लाश उन के घर में मिली थी, जबकि राइमा की एक सड़क पर मिली थी. यह सड़क बांग्लादेश की राजधानी ढाका के केरानीगंज अलियापुर इलाके में हजरतपुर ब्रिज के नजदीक है, जो कालाबागान थाने के अंतर्गत आता है. 17 जनवरी, 2022 को राइमा की लाश मिली तो बांग्लादेश में सनाका खिंच गया क्योंकि वह कोई मामूली हस्ती नहीं थीं बल्कि घरघर में उन की पहुंच थी. अपनी अभिनय प्रतिभा के दम पर उन्होंने अपना एक बड़ा दर्शक और प्रशंसक वर्ग तैयार कर लिया था.

जिस हाल में राइमा की लाश मिली थी, उस से साफ जाहिर हो रहा था कि उन की बेरहमी से हत्या की गई है. इस हादसे ने एक बार फिर साफ कर दिया कि रील और रियल लाइफ में जमीनआसमान का फर्क होता है और आमतौर पर फिल्म स्टार्स, फिर वे किसी भी देश के हों, की जिंदगी उतनी हसीन और खुशनुमा होती नहीं जितनी कि उन के जिए किरदारों में दिखती है. यही राइमा के साथ हुआ कि हत्यारा कोई और नहीं बल्कि उन का बेहद करीबी शख्स था और हत्या की वजह कोई अफेयर, पैसों का लेनदेन, कोई विवाद या नशे की लत या फिर कोई दिमागी बीमारी भी नहीं थी.

45 वर्षीय राइमा साल 1977 में ढाका के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी थीं, जिन्हें बचपन से ही अभिनय का शौक था. ढाका से स्कूल और कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक्टिंग का कोर्स भी किया था. 19 साल की उम्र में ही उन्हें ‘बर्तमान’ फिल्म में काम करने का मौका मिल गया था. निर्माता काजी हयात की इस कामयाब फिल्म से वह फिल्म इंडस्ट्री में पहचानी जाने लगीं. फिल्म समीक्षकों ने तो उन की एक्टिंग को अव्वल नंबर दिए ही थे, दर्शकों ने भी उन्हें सराहा था. इस की वजह उन का ताजगी से भरा चेहरा और बेहतर एक्टिंग के अलावा उन की कमसिन अल्हड़पन और खूबसूरती भी थी.

पहली फिल्म कामयाब होने के बाद राइमा ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. देखते ही देखते उन्होंने बांग्लादेश के तमाम दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया. इन में इनायत करीम, शरीफुद्दीन खान, दीपू, देलवर जहां झंतु और चाशी नजरूल इसलाम प्रमुख हैं. सभी छोटेबड़े निर्देशकों के साथ राइमा ने 50 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया और टीवी पर भी अपना जलवा बिखेरा.

लोगों के दिलों में बसी थीं राइमा

छोटे परदे पर आना उन की व्यावसायिक मजबूरी भी हो गई थी, क्योंकि बांग्लादेश के लोग भी टीवी धारावाहिकों को ज्यादा तरजीह देने लगे हैं. राइमा ने कोई 25 धारावाहिकों में एक्टिंग की, जिस से घरघर उन की पहुंच और स्वीकार्यता बढ़ती गई. बांग्लादेश फिल्म इंडस्ट्री के लगभग सभी बड़े नायकों के साथ उन्होंने काम किया. खासतौर से अमित हसन, बप्पाराज रियाज, शाकिब खान, जाहिद हसन और मुशर्रफ करीम के साथ उन की जोड़ी खूब जमती थी.

राइमा आला कारोबारी दिमाग की मालकिन थीं, इसलिए उन्होंने खुद का प्रोडक्शन हाउस भी खोल लिया था. जिस के तहत कई टीवी सीरियल बने थे. अलावा इस के वह फिल्म पत्रकारिता भी ‘अर्थ कोथा द नैशनल बिजनैस मैगजीन’ के लिए करती थीं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस एक्ट्रेस को टीवी न्यूज चैनल एटीएन बांग्ला में सेल्स एंड मार्केटिंग में वाईस प्रेसिडेंट भी नियुक्त किया गया था. जल्द ही एक नामी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी टीएन इवेंट्स लिमिटेड के सीईओ की जिम्मेदारी भी उन्हें दी गई थी.

इतना ही नहीं, उन्होंने बांग्लादेश में ही अपना ब्यूटी सैलून भी शुरू कर दिया था, जिस का नाम रोज ब्यूटी सैलून है. ढाका का ग्रीन रोड इलाका राइमा के घर की वजह से भी पहचाना जाने लगा, जो दर्शकों और प्रशंसकों की नजर में किसी मन्नत या जन्नत से कम नहीं था. लेकिन कोई सोच भी नहीं सकता था कि लाखों लोगों का मनोरंजन करने वाली और दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली इस एक्ट्रेस की निजी जिंदगी किसी नर्क से कम बदतर नहीं थी और इस की वजह था उन का पति शखावत अली नोबेल, जो कभी उन पर जान छिड़का करता था. इन दोनों ने 16 साल पहले लव मैरिज की थी.

शौहर ही निकला कातिल

आम दर्शक इस से ज्यादा कुछ नहीं सोच पाता कि उस की चहेती एक्ट्रेस अपने महल जैसे घर के अंदर सदस्यों के साथ हंसखेल रही होगी, रोमांस कर रही होगी या फिर डायनिंग टेबल पर बैठी लंच या डिनर कर रही होगी. और कुछ नहीं तो पति और बच्चों के साथ आंचल हवा में लहराते लौन के झूले पर झूलती गाना गा रही होगी. उस के इर्दगिर्द रंगबिरंगे फूल और चहचहाते पक्षी होंगे. सर के ऊपर नीला खुला आसमान होगा. लेकिन ऐसा कुछ भी कम से कम राइमा की जिंदगी में तो नहीं था.

पिछले कुछ दिनों से वह बेहद घुटन भरी जिंदगी जी रही थीं. आलीशान घर के अंदर कलह स्थायी रूप से पसर चुकी थी जिस से उन के दोनों बच्चे सहमेसहमे से रहते थे. राइमा और शखावत कहने और देखने को ही साथ रहते थे और मियांबीवी कहलाना भी उन की सामाजिक मजबूरी हो चली थी. लेकिन रोजरोज की मारकुटाई और कलह आम बात हो चुकी थी. यह सब कितने खतरनाक मुकाम तक पहुंच चुका था, इस का खुलासा 17 जनवरी, 2022 को राइमा की लाश मिलने के बाद हुआ. अंदर से टूटी और थकी हुई यह एक्ट्रेस 16 जनवरी को मावा एक शूटिंग के लिए गई थी. लेकिन देर रात तक वापस घर नहीं लौटी तो घर वालों को चिंता हुई क्योंकि राइमा का फोन भी बंद जा रहा था.

कालाबागान थाने में उन की गुमशुदगी की सूचना दर्ज हुई. एक रिपोर्ट राइमा की बहन फातिमा निशा ने भी लिखाई थी. पुलिस ने राइमा की ढुंढाई शुरू की, लेकिन देर रात तक कोई कामयाबी नहीं मिली तो मामला सुबह तक के लिए टल गया. इस दौरान उन का भाई शाहिदुल इसलाम खोकान लगातार पुलिस वालों से बहन को ढूंढने की गुजारिश करते खुद भी राइमा की तलाश में इस उम्मीद के साथ लगा रहा कि कहीं से कोई सुराग मिल जाए. लेकिन उस के हाथ भी मायूसी ही लगी. 17 जनवरी की सुबह कुछ राहगीरों ने हजरतपुर ब्रिज के पास एक लावारिस संदिग्ध बोरे को देख इस की खबर पुलिस को दी. पुलिस ने आ कर जैसे ही बोरे को खोला तो उस में से बरामद हुई राइमा की लाश, जो 2 टुकड़े कर बोरे में ठूंसी गई थी.

गले पर चोट के निशान भी साफसाफ दिख रहे थे, जिस से स्पष्ट हो गया कि राइमा की हत्या हुई है और लाश को यहां फेंक दिया गया है. लेकिन हत्यारा कौन हो सकता है, यह सवाल पुलिस को मथे जा रहा था. राइमा की हत्या की खबर जंगल की आग की तरह फैली और फैंस जहांतहां इकट्ठा होने लगे. शव को पोस्टमार्टम के लिए सर सलीमुल्लाह मैडिकल कालेज भेज दिया गया.

पुलिस को शखावत पर शक तो था ही, लेकिन जैसे ही राइमा के भाई शाहिदुल इसलाम खोकान ने यह कहा कि शखावत एक ड्रग एडिक्ट है. वह अकसर मेरी बहन से कलह करता था. मैं ने उस की कार में खून देखा है. वह सुबह 8 से ले कर 10 बजे तक घर पर नहीं था. मुझे लगता है कि उसी दौरान उस ने राइमा की लाश फेंक दी.

फिल्मों जैसा कत्ल

शाहिदुल की शिकायत पर पुलिस ने शखावत को घेरा तो बिना किसी ज्यादा मशक्कत के उस ने सच उगल दिया. अब तक राइमा के फैंस जगहजगह मोमबत्तियां ले कर उन की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने लगे थे. सोशल मीडिया पर भी राइमा छाई हुई थीं. लोग श्रद्धांजलि देते राइमा के हत्यारे को गिरफ्तार करने की मांग और प्रदर्शन कर रहे थे. हिरासत में लिए गए शखावत ने बगैर किसी खास चूंचपड़ के अपना गुनाह कुबूल लिया. उस के बयान की बिनाह पर 6 लोग और गिरफ्तार किए गए, जिन में उन का ड्राइवर और एक नजदीकी दोस्त अब्दुल्ला फरहाद भी था. फरहाद को शखावत ने फोन कर बुलाया था.

पूछताछ में पता चला कि शखावत और फरहाद ने राइमा की हत्या 16 जनवरी को ही कर दी थी. वक्त था सुबह 7 बजे का. इन दोनों ने राइमा की लाश बोरे में भर दी और उसे प्लास्टिक की डोरी से सिल दिया. यह काम इत्मीनान से बिना किसी अड़ंगे के हो सके, इस के लिए उन्होंने घर पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड को नाश्ता लेने भेज दिया था. घटनास्थल से बरामद डोरी शखावत के गले का फंदा बनेगी, यह भी तय दिख रहा है क्योंकि जब पुलिस टीम घर पहुंची थी तो इस डोरी का पूरा बंडल वहां से बरामद हुआ था. जिस से शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी.

ये दोनों लाश को ठिकाने लगाने के पहले उसे मीरपुर ले गए थे, लेकिन वहां कोई उपयुक्त सुनसान जगह नहीं मिली तो वापस घर आ गए थे. राइमा की लाश उन लोगों के लिए बोझ बनती जा रही थी. मीरपुर से वापसी के बाद दोनों रात साढ़े 9 बजे के करीब हजरतपुर ब्रिज पहुंचे और लाश वाले बोरे को वहीं फेंक दिया, लेकिन हड़बड़ाहट और जल्दबाजी में गलती से डोरी वहीं छोड़ दी, जो उन के खिलाफ एक पुख्ता सबूत बन गई. लाश फेंकने के बाद घर आ कर दोनों ने सबूत मिटाने की गरज से कार को धोया और बदबू दूर करने के लिए उस में ब्लीचिंग पाउडर भी छिड़का. लेकिन इस के बाद भी खून के धब्बे पूरी तरह नहीं मिट पाए थे.

यानी राइमा शूटिंग पर गई है, यह झूठ जानबूझ कर फैलाया गया था, जिस से कत्ल को किसी हादसे में तब्दील किया जा सके या उस का ठीकरा किसी और के सिर फूटे, नहीं तो उसे तो ये लोग 16 जनवरी, 2022 को ही ऊपर पहुंचा चुके थे. गलत नहीं कहा जाता कि मुलजिम कितना भी चालाक हो, कोई न कोई सबूत छोड़ ही देता है फिर शखावत और फरहाद तो नौसिखिए थे, जो यह मान कर चल रहे थे कि उन्होंने बड़ी चालाकी से अपने गुनाह को अंजाम दिया है, इसलिए पकडे़ जाने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होगा. कुछ दिन हल्ला मचेगा और फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा.

पुलिस के सामने शखावत ने शरीफ बच्चों की तरह मान लिया कि राइमा से कलह के चलते उस ने उस का कत्ल किया, लेकिन हकीकत में वह अव्वल दरजे का शराबी और ड्रग एडिक्ट था, जो पत्नी को मार कर उस की सारी दौलत हड़प कर लेना चाहता था, जिस से ताउम्र मौज और अय्याशी की जिंदगी जी सके. पर अब उसे जिंदगी भर जेल की चक्की पीसना तय दिख रहा है. हो सकता है अदालत कोई रहम न दिखाते हुए शखावत को फांसी की सजा ही दे दे, जिस का कि वह हकदार भी है. Actress Murder Case