Hindi Stories: हौंसले वाली लड़की

Hindi Stories: इंसान की जिंदगी में यादों का खास महत्व होता है. जो यादें मन को सुकून देती हैं, उन्हें कोई भूलना नहीं चाहता. जबकि कड़वी यादों को इंसान भूल से भी याद नहीं करना चाहता. लेकिन यादों की डोर आदमी के अपने वश में नहीं होती. दिमाग के परदे पर गाहेबगाहे हर तरह की यादें दस्तक देती रहती हैं. तकलीफ तब होती है, जब कड़वी यादें वर्तमान को प्रभावित करने लगती हैं.

एक शाम ऐलिशिया कोजाकीविक्ज अपने कमरे में बैठी थी, अनायास ही पुरानी यादें उस के सुकून पर हावी हो गईं. उस ने उन से पीछा छुड़ाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह उन बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ा सकी. जब मन परेशान  होने लगा तो उस ने उन यादों को मन के द्वार से निकाल कर आंखों की ऊपरी सतह पर लाने की सोची, ताकि डरावने दृश्य शब्द बन जाएं.

ऐलिशिया ने उन बुरी यादों की अखबारी कटिंग काट कर एक फाइल बना ली थी. उस फाइल में केवल बुरी यादों की ही खबरें नहीं थीं, बल्कि उस की तारीफ में छपी कुछ खबरें और रिपोर्ताज भी थे. वह उस फाइल को ले कर टेबल पर बैठ गई और एकएक खबर को उचटती नजरों से देखने लगी. सभी ऐसी खबरें थीं, जिन्हें उस ने सैकड़ों बार पढ़ा था, इसलिए जानीपहचानी थीं. मन की दिशा बदलने के लिए उस ने सतही तौर पर खबरें पढ़ीं तो, लेकिन बुरी यादों के किसी भी चित्र को आंखों के द्वार पर दस्तक नहीं देने दी. ऐलिशिया अभी उन खबरों की फाइल को उलटपुलट ही रही थी कि उस ने अपने कंधे पर हाथ का स्पर्श महसूस किया. उस ने पलट कर देखा, पीछे उस की मां मैरी खड़ी थीं.

ऐलिशिया के चेहरे पर नजर पड़ी तो वह उस की उदासी और परेशानी को भांप कर थोड़ी नाराजगी से बोलीं, ‘‘ऐलिशिया बेबी, तुम फिर उन्हीं बुरी यादों में डूबी हो न? इट इज नौट गुड बेबी. अब तुम उस सब से बहुत दूर आ चुकी हो. भूल कर भी तुम्हें उस सब के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए. इस के बजाय तुम्हें यह सोच कर खुश होना चाहिए कि लोग तुम्हें पसंद करते हैं. बच्चों के लिए तुम एक नेक काम कर रही हो.’’

‘‘सौरी मम्मा, बट…’’

मैरी ने उस की बात को बीच में ही काट कर समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘कम औन ऐलिशिया, जो बीत गया सो बीत गया. तुम सिर्फ अपने फ्यूचर पर फोकस करो. हमें नाज है तुम पर. अब तुम्हें गुजरे जमाने की बातों को ले कर बिलकुल नहीं सोचना चाहिए. बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ाओगी तो वे तुम्हें परेशान करती रहेंगी. हम अपनी बेटी के चेहरे पर जरा सी भी उदासी नहीं देखना चाहते.’’

‘‘ओके मम्मा, अब ऐसा नहीं होगा.’’ ऐलिशिया ने मुसकरा कर कहा और खड़ी हो कर मां के गले लग गई.

ऐलिशिया कई साल पहले जिस भयानक हादसे से रूबरू हुई थी, वह उस के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ गया था. उस हादसे में उस का दिल ही नहीं, आत्मा तक घायल हुई थी. ऐलिशिया के दिमाग में एक अंजाना सा डर घर कर गया था. परिवार की सहानुभूति, मनोचिकित्सकों के उपचार और खुशनुमा माहौल दे कर जैसेतैसे उस डर को ऐलिशिया के दिमाग से निकाला गया था.

ऐलिशिया ने खुद भी उस डर से उबरने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन इस सोच के साथ कि वह कुछ ऐसा करे कि जो उस के साथ हुआ, वह किसी दूसरे के साथ न हो. इसी सोच के चलते उस ने अपने साथ हुई भयानक घटना को एक उद्देश्य में बदल दिया. यह सब निस्संदेह आसान नहीं था. लेकिन ऐलिशिया ने मजबूत इरादों के साथ जो मुहिम चलाई, वह काफी हद तक कामयाब रही.

उस की यह मुहिम थी, आधुनिकता की चकाचौंध भरे इस साइबर युग में बच्चों को उन के सिर पर मंडराते खतरों से बचाने की. इस का परिणाम अच्छा ही निकला. जल्दी ही वह बच्चों को जागरूक करने वाली रोल मौडल बन गई. न केवल उस के काम को सराहना मिली, बल्कि सरकार ने उस के नाम पर बच्चों को सुरक्षा देने वाला एक कानून भी बना दिया. ऐलिशिया अब वाकई एक बड़ा नाम है.

ऐलिशिया कमउम्र में जिस घटना का शिकार हुई थी, वह वाकई खौफनाक थी. उस का गुनाह सिर्फ इतना था कि वह इंटरनेट चैटिंग की लत का शिकार थी. भावनाओं में बह कर वह अपनी सोचनेसमझने की क्षमता भी खो बैठी थी. इंटरनेट की सोशल साइट पर एक शख्स पर विश्वास करना उस के लिए बहुत खौफनाक साबित हुआ था.

गनीमत बस इतनी थी कि वह उस शख्स के चंगुल में फंसी होने के बाजवूद जिंदा थी और पुलिस ने वक्त पर पहुंच कर उसे छुड़ा लिया था. ऐलिशिया अमेरिका के पेंसिल्वेनिया राज्य के खूबसूरत शहर पीटर्सबर्ग की रहने वाली थी. उस के पिता चार्ल्स एक समृद्ध कारोबारी थे. परिवार में कुल जमा 4 लोग थे, ऐलिशिया, उस की मां मैरी और एक बड़ा भाई.

घटना के समय ऐलिशिया महज 13 साल की थी. पढ़ाई के दौरान कंप्यूटर इंटरनेट का इस्तेमाल उस की आदत में शुमार था. उस का भाई भी यह सब करता था. ऐलिशिया ने अपने हमउम्र दोस्तों और उन के संपर्क के लोगों से औनलाइन चैटिंग शुरू कर दी. पढ़ाई के बाद उस का ज्यादातर वक्त इसी में बीतता था. कह सकते हैं कि वह इस लत का शिकार हो गई थी. उस के कई दोस्त बने, जिन में एक नया दोस्त स्कौट भी था. स्कौट बातें बनाने में माहिर था. उस की बातों का अंदाज ऐलिशिया को गुदगुदाता था. चैटिंग का दायरा बढ़ा तो ऐलिशिया को अपने नए दोस्त के बारे में बहुत सी बातें पता चलीं. उसे भी वही चीजें पसंद थीं, जो ऐलिशिया को पसंद थीं.

कई बार बच्चों को पता नहीं चलता कि वह स्मार्ट और खूबसूरत हैं. उन्हें तब बहुत खुशी मिलती है, जब कोई दूसरा बताता है कि वे स्मार्ट हैं, सुंदर हैं. ऐलिशिया के साथ भी यही हुआ. स्कौट ने ऐसी बातें कर के कुछ ही दिनों में उस का विश्वास जीत लिया. ऐलिशिया दूसरों पर बहुत जल्द विश्वास करने वाली मासूम लड़की थी. उस का परिवार एकदूसरे के बहुत करीब था. पिता व्यस्त रहते थे, फिर भी परिवार की खुशियों के बीच वक्त जरूर निकाल लेते थे. मैरी दोनों बच्चों को बहुत प्यार करती थीं. बेटी को इंटरनेट पर उलझी देख कर वह उसे अंजान लोगों से सावधान रहने के लिए कहती रहती थीं.

ऐलिशिया का दोस्त स्कौट बहुत दिलचस्प था. उसे गुडमौर्निंग कहने से ले कर गुडनाइट कहने तक वह छोटीछोटी बातों तक का खयाल रखता था. वह कभी भी किसी भी बात पर ऐलिशिया से नाराज नहीं होता था. कभी ऐेलिशिया उस से नाराज हो जाती तो वह उसे मना लेता था. दोनों ही एकदूसरे में दिलचस्पी लेते थे और रोजाना घंटोंघंटों तक चैटिंग करते थे. महीनों तक चली चैटिंग ने दोनों को काफी करीब ला दिया था.

स्कौट के कहने पर ऐलिशिया ने उसे अपनी कई फोटो भेजी थीं. उस के हर फोटो की वह दिल खोल कर तारीफ करता था. इस सब से ऐलिशिया को बहुत खुशी मिलती थी. इस के बावजूद दोनों की कभी मुलाकात नहीं हुई थी. ऐलिशिया ने उसे अपने परिवार के बारे में सारी जानकारियां दे रखी थीं. स्कौट उसे समझाता था कि वह अपनी इस दोस्ती के बारे में किसी को न बताए.

दिसंबर, 2001 में स्कौट ने ऐलिशिया के सामने मिलने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उस ने इनकार कर दिया. इस पर स्कौट ने उस से मीठीमीठी बातें कीं, कसमें दीं, अपनी कई महीनों की दोस्ती का वास्ता दिया. अंतत: किसी तरह वह ऐलिशिया को मनाने में कामयाब हो गया. दोनों ने तय कर लिया कि वे 31 दिसंबर की रात न्यू ईयर पर मिलेंगे. स्कौट ने उसे बताया था कि जिस ब्लौक में उस का घर है, वह वहां से कुछ दूर खड़ा मिल जाएगा. ऐलिशिया इस के लिए तैयार हो गई. उस ने सोशल साइट के उस दोस्त पर पूरा विश्वास कर लिया, जिस से वह पहले कभी नहीं मिली थी. चैटिंग से उपजी भावनाओं और विश्वास ने स्कौट को उस के सपनों का राजकुमार बना दिया था.

31 दिसंबर की रात को न्यू ईयर का जश्न पूरी दुनिया में मनाया जाता है. क्रिसमस के बाद आने वाली 31 दिसंबर की रात अमेरिकियों के लिए तो और भी खास होती है. ऐलिशिया के परिवार के लिए भी वह रात खास थी. लोग नए साल के जश्न की तैयारियों में डूबे थे. छोटीबड़ी इमारतें रोशनी से नहाई हुई थीं.

उस दिन शाम से ही मौसम बेहद सर्द था. रुकरुक कर बर्फ गिर रही थी. ऐलिशिया स्कौट से मिलने की कल्पनाओं में डूबी थी. उस के घर में भी सब खुश थे. सभी ने एकसाथ डिनर किया. 9 बजने वाले थे. ऐलिशिया को सब की नजरों से बच कर घर से निकलना था. उस ने अपनी मां मैरी से कहा, ‘‘मम्मा, आई एम गोईंग. मुझे नींद आ रही है.’’

‘‘ओके, हैप्पी न्यू ईयर बेबी.’’ मां ने प्यार से कहा.

इस के बाद नींद के बहाने ऐलिशिया उन लोगों से अलग हो कर अपने कमरे में चली गई. उम्र के बहाव ने उसे जरूरत से ज्याद चालाक बना दिया था. स्कौट को साढ़े 9, 10 बजे आना था. यह सब गलत था, पर दोस्ती की खातिर वह स्कौट से मिलने के लिए तैयार हो गई थी. साढ़े 9 बजने को आए तो उस ने चुपके से घर का जायजा लिया. घर के सभी लोग डाइनिंग हौल में बैठे टीवी देखने में मशगूल थे. ऐलिशिया चुपके से मुख्य दरवाजा खोल कर घर से बाहर निकल गई.

बाहर बहुत ठंड थी. एकदम सन्नाटा पसरा था. सड़कों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी थी. मौसम से लड़ती स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी भी धुंधलाई हुई थी. ऐलिशिया ने ठंड से बचने के लिए जींस, टौप, जैकेट और स्टालर पहन रखा था. ठंड से बचने की कोशिश करते हुए वह सड़क पर चलने लगी. सन्नाटे में उसे केवल अपने पैरों के नीचे बर्फ के कुचलने की आवाज सुनाई पड़ रही थी.

मन ही मन वह डर भी रही थी. डरावनी खामोशी के साए में वह अपने ब्लौक को पार कर के कोने पर पहुंची. तभी उस के दिल ने कहा कि वह गलत कर रही है, उसे वापस चले जाना चाहिए. अपने इस खयाल पर अमल करने के लिए वह मुड़ी, लेकिन तभी उस के कानों में आवाज पड़ी, ‘‘हाय ऐलिशिया, प्लीज कम.’’

ऐलिशिया ने आवाज की दिशा में पलट कर देखा. आवाज सड़क किनारे खड़ी एक कार से आई थी. ड्राइविंग सीट पर एक शख्स बैठा नजर आ रहा था. उस ने सोचा कि वह स्कौट ही होगा, जो सर्द मौसम में कार लिए उस का इंतजार कर रहा है. वह कार की ओर लपकते हुए ड्राइविंग सीट के बगल वाले दरवाजे के नजदीक पहुंची. कार में ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने उस के वहां पहुंचते ही दरवाजा खोल दिया. ऐलिशिया ने झुक कर देखा तो बुरी तरह चौंकी. कार में बैठा शख्स अधेड़ उम्र का व्यक्ति था. निस्संदेह वह उस का दोस्त स्कौट कतई नहीं था. क्योंकि उस की फोटो उस ने इंटरनेट पर मंगा कर कितनी ही बार देखी थी.

ऐलिशिया कुछ सोचसमझ पाती, इस के पहले ही उस व्यक्ति ने उस का बाजू पकड़ कर खींचा और कार की सीट पर बैठा दिया. ऐलिशिया बुरी तरह डर गई. दिमाग जैसे शून्य हो गया. इसी दरम्यान उस व्यक्ति ने फुरती दिखाते हुए एक रस्सी से उस के हाथ बांध दिए. साथ ही गुर्राया भी, ‘‘शोर मत मचाना वरना मार कर पीछे कार की डिक्की में डाल दूंगा.’’

डरीसहमी ऐलिशिया को जान का खतरा सताने लगा. वह समझ गई कि वह बड़े खतरे में फंस गई है. उस व्यक्ति ने तेजी से कार चलानी शुरू कर दी. सड़क पर पड़ी बर्फ को कुचलती हुई कार पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. कार से ऐलिशिया सड़कों पर लगे साइनबोर्ड्स ही देख पा रही थी. वे उस के रोज के जानेपहचाने थे. उस सड़क पर आगे टोलबूथ पड़ने वाला था. ऐलिशिया को वहां बचने की उम्मीद नजर आई, क्योंकि बूथ के अंदर बैठे कर्मचारी बच्चों को बहुत प्यार करते थे. वे उन का हालचाल पूछते थे और कभीकभी टाफियां भी देते थे. ऐलिशिया जब मातापिता के साथ जाती थी तो भी ऐसा ही होता था. वह सोच रही थी कि जब बूथकर्मी उसे सीट पर रोते हुए देखेंगे तो पूछेंगे कि क्या हुआ?

इस के बाद उस अंजान खतरनाक शख्स का भेद खुल जाएगा. वह पुलिस बुला कर उसे आजाद करा लेंगे. कार बूथ पर पहुंची. लेकिन उसे किसी ने नहीं देखा. ठंडे मौसम की वजह से कर्मचारी एक छोटी खिड़की के जरिए ही टोलटैक्स का लेनदेन कर रहा था. कार आगे बढ़ गई. इस के साथ ही ऐलिशिया की उम्मीद भी टूट गई. ऐलिशिया बुरी तरह डरी हुई थी. उसे लग रहा था कि वह शख्स अब कहीं कार रोकेगा, उसे मारेगा और सड़क किनारे फेंक देगा. रास्ते में टेलीफोन बूथ भी था. वह सोच रही थी कि काश वह अपने घर एक फोन कर पाती तो उसे खतरे से आजादी मिल जाती. वह कसमसाती तो वह व्यक्ति गुर्रा कर उसे जान से मारने की धमकियां दोहराता.

करीब 4 घंटे के सफर के बाद कार एक घर के पोर्च में जा कर रुकी. वह व्यक्ति नीचे उतरा. उतरने से पहले वह फिर गुर्राया, ‘‘चुप रहना, वरना अच्छा नहीं होगा.’’

उस ने ताला खोल कर घर का दरवाजा खोला. इस के बाद उस ने ऐलिशिया को खींच कर नीचे उतारा और उसे धकेलते हुए घर में बने बेसमेंट में ले गया. वहां एक ताला लगा दरवाजा था. वह बोला, ‘‘तुम्हारे साथ इतना बुरा होने जा रहा है, जिस के बारे में तुम ने सोचा भी नहीं होगा. अब तुम जितना चीखना चाहो, चीखो.’’

‘‘प्लीज मुझे छोड़ दो.’’ ऐलिशिया गिड़गिड़ाई.

लेकिन तब तक उस ने दरवाजा खोल कर उसे अंदर खींच लिया. वह हैवान उस के साथ क्रूर ढंग से पेश आ रहा था. उस ने ऐलिशिया के कपड़े उतार कर उस के गले में कुत्ते का पट्टा डाल कर उसे जमीन पर खींचा और फिर खींचते हुए ही बिस्तर पर गिरा दिया. इस के बाद उस ने ऐलिशिया के साथ जबरदस्ती की. ऐलिशिया डर, दहशत और दर्द से बेहाल रोती और तड़पती रही. उस की बातों, उस के गिड़गिड़ाने या रोने का उस पर कोई असर नहीं पड़ा. अगले 3 दिनों तक वह उसे मारतापीटता और उस के साथ जबरदस्ती करता रहा. वह उसे खानेपीने के लिए भी बहुत कम देता था. ऐलिशिया के आंसू खत्म हो चुके थे. उसे विश्वास हो गया था कि जब उस हैवान का मन भर जाएगा तो वह उसे मार ही देगा.

ऐलिशिया भावनाओं में किए गए विश्वास पर पछता रही थी. उसे अपने परिवार की याद भी सता रही थी. वह सोच रही थी कि घर वाले उसे जिंदा रहते या मरने के बाद ढूंढ़ ही लेंगे. चौथे दिन शाम को उस हैवान ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें मारने वाला था, लेकिन मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूं, इसलिए जिंदा रखूंगा. तुम अब सब कुछ भूल कर मेरे साथ रहने की आदत डाल लो.’’

उस आदमी की आंखों में हैवानियत, बातों में कठोरता और चेहरे पर क्रूरता थी. यकीनन वह बेहद खतरनाक किस्म का आदमी था. शाम ढले वह खाना लाने की बात कह कर ऐलिशिया को कमरे में बंद कर के चला गया. प्यार जताने की कोशिश में उस ने ऐलिशिया को पूरी तरह नहीं बांधा था. उस ने बिस्तर पर उसे खुला छोड़ कर बैडरूम के बाहर का ताला लगा दिया था. अलबत्ता जाने से पहले वह उस के हाथ बांधना नहीं भूला था. ऐलिशिया के ऊपरी हिस्से को उस ने बेपर्दा ही रहने दिया था. वह टेलीफोन पर अपने दोस्तों से कहा करता था कि वह जिंदगी के मजे ले रहा है और उन्हें भी मजे करा सकता है. ऐलिशिया को यह डर भी सता रहा था कि वह अपने दोस्तों के सामने उसे शिकार की तरह डाल सकता है.

रात हो चुकी थी. तभी ऐलिशिया ने दरवाजे पर एक साथ कई कदमों की आहट सुनी. वह बुरी तरह डर गई. उस ने सोचा कि वह अपने साथ दोस्तों को लाया होगा. ऐलिशिया बिस्तर से उतर कर बैड के नीचे छिप गई. दरवाजा खुला, उसे बैड के नीचे से कई बूट दिखाई दिए. एक व्यक्ति ने उसे बैड के नीचे से ढूंढ़ निकाला. उस ने कहा, ‘‘बाहर निकल आओ, हम तुम्हें बचाने के लिए आए हैं.’’

डरीसहमी ऐलिशिया बाहर निकली. उस के अर्द्धनग्न बदन पर नजर पड़ते ही सशस्त्र लोगों ने पीठ घुमा ली. उन के हाथों में पिस्तौलें और वर्दी देख कर वह समझ गई कि ये पुलिस वाले हैं. उन में एक महिला पुलिसकर्मी भी थी. उस ने ऐलिशिया के हाथ खोले और सोफे पर पड़ी उस की जैकेट उसे पहनने को दी. उन लोगों के कब्जे में वह हैवान आदमी भी था. उस के हाथों को पीछे कर के हथकडि़यां लगा दी गई थीं, वह कसमसा रहा था.

पुलिस ऐलिशिया को गाड़ी से थाने ले गई. उसे सब से ज्यादा खुशी तब मिली जब उस के मातापिता ने दौड़ कर उसे गले लगा लिया. ऐलिशिया के लिए एक तरह से यह दूसरी जिंदगी थी. नरक से निकल कर मां की बांहों में वह खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थी. पुलिस ने उस आदमी से पूछताछ की तो पता चला कि वह एक हैवान की घिनौनी मानसिकता का शिकार हुईर् थी.

पुलिस ने जिस व्यक्ति को पकड़ा था, उस का नाम टैरी था. 38 वर्षीय टैरी वर्जीनिया का रहने वाला था. किशोर उम्र की लड़कियों को ले कर वह विकृत मानसिकता का शिकार था. वह अकेला रहता था और उस में कई बुरी आदतें थीं. इंटरनेट चैटिंग से वह लड़कियों को अपने जाल में उलझाता था और उन के साथ गंदी बातें किया करता था. टैरी ने कई नामों से अपनी आईडी बनाई हुई थी. उस का ज्यादातर वक्त चैटिंग में ही बीतता था. ऐलिशिया को भी उस ने अपने जाल में उलझा लिया था. अपनी उम्र व पहचान छिपा कर वह खुद को उस का हमउम्र लड़का बन कर चैटिंग करता था. उस ने इंटरनेट से एक किशोर के कई फोटो चुरा लिए थे, जिन्हें वह ऐलिशिया को भेजता था.

ऐलिशिया किशोर थी. उस में बहुत ज्यादा समझ नहीं है, यह बात टैरी चंद रोज की चैटिंग में ही समझ गया था. उसे वह आसान शिकार लगी. उस की भावात्मक बातों से वह उस पर विश्वास करने लगी थी. ऐलिशिया जब पूरी तरह भावात्मक रूप से उस के साथ जुड़ गई तो टैरी ने उसे मिलने के लिए तैयार कर लिया. जब वह उस के कब्जे में आ गई तो वह हैवान बन गया. उधर ऐलिशिया का परिवार उस के रहस्यमय तरीके से गायब होने से बुरी तरह परेशान था. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने स्तर से उन्होंने उस की बहुत खोजबीन की.

परिवार पर नए साल की खुशियों पर गम और परेशानी की धुंध जम गई थी. पूरी रात की परेशानी और उलझन के बाद चार्ल्स ने ऐलिशिया का फोटो दे कर पुलिस में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. पुलिस सक्रिय हो गई और ऐलिशिया के फोटो व पहचानशुदा इश्तहार जारी कर दिए. कोई नहीं जानता था कि ऐलिशिया कहां चली गई. 2 दिनों बाद एक व्यक्ति ने पुलिस को गुप्त सूचना दी कि उस ने इंटरनेट पर औनलाइन एक व्यक्ति को एक बच्ची का यौनशोषण करते देखा है. वह मुसीबत में थी और बचने के लिए छटपटा रही थी. ऐलिशिया लापता थी, पुलिस उसे खोज रही थी. इस बात से उसे लगा कि वह ऐलिशिया भी हो सकती है. ऐलिशिया न भी होती तो भी यह एक बच्ची के शोषण का गंभीर मामला था.

पुलिस ने उस व्यक्ति से पूछताछ कर के पता किया तो उस ने वह इंटरनेट आईडी लिंक पुलिस को दे दी, जिस पर उस ने लाइव वीडियो देखा था. पुलिस सुरागरसी में जुट गई. पुलिस ने उस आईडी का आईपी ऐड्रेस निकलवाया तो वह टैरी का निकला. पुलिस ने टैरी की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की तो वे पूरी तरह संदिग्ध पाई गईं. एक शाम पुलिस टीम उस के घर तक पहुंच गई. इत्तफाक से टैरी तभी खाना पैक करा कर वापस आया था. उसे कब्जे में ले कर ऐलिशिया को बरामद कर लिया गया. ऐलिशिया को उस के परिवार के सपुर्द कर के टैरी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया.

इस घटना के बाद ऐलिशिया को लगने लगा था कि उस के लिए दुनिया में कुछ नहीं बचा है. वह डर का शिकार हो गई थी. दिलोदिमाग पर सिर्फ डर छाया था. बेटी को दर्द से निकालने के लिए उस के मातापिता ने मनोचिकित्सकों का सहारा लिया. खुद भी वह उस का बड़ा सहारा बने. अमूमन ऐसे मामलों में लोग बच्चों को भी दोषी मान लेते हैं, लेकिन चार्ल्स और मैरी ने ऐसा कतई नहीं किया. उन्होंने उसे प्यार से संभाला. लंबे समय के बाद वह स्कूल गई. समय अपनी गति से चलता रहा. ऐलिशिया की कड़वी यादों ने साथ नहीं छोड़ा था. उधर एक साल बाद सन 2003 में अदालत ने टैरी को दोषी पा कर उसे 20 साल कैद की सजा सुनाई.

ऐलिशिया ने पढ़ाई में मन लगाया. अब वह काफी समझदार हो गई थी. वह चाहती थी कि वह बच्चों के लिए ऐसा कुछ करे कि जो उस के साथ हुआ, वह किसी और के साथ न हो. इस के लिए उस ने झिझक छोड़ कर बिना यह सोचे कि लोग क्या कहेंगे, बच्चों को जागरूक करना शुरू किया. उस ने इंटरनेट के खतरों पर सार्वजनिक रूप से बोलना शुरू किया. वह स्कूलों में जाती और अपनी आपबीती बता कर बच्चों को आगाह करती. अभिभावकों, शिक्षकों को भी आगाह करती. वह जानती थी कि इंटरनेट को ले कर ऐसी कोई शिक्षा नहीं दी जाती कि बच्चे इंटरनेट के खतरों से सतर्क रह सकें. अगर उसे भी उदाहरणों के साथ ऐसी शिक्षा दी गई होती, तो शायद वह इस खतरे से बच जाती.

अब वह बच्चों को जागरूक कर के खुद उदाहरण बनना चाहती थी. अपने साथ घटी इस भयानक घटना को उस ने उद्देश्य में बदल दिया. लेकिन पहली बार जब उस ने एक स्कूल में बोलना चाहा तो अपने साथ घटी घटना को पूरी तरह बयान नहीं कर पाई. बस माइक पर खड़ी रोती रही. इस के बावजूद ऐलिशिया ने बच्चों को इंटरनेट के उस जाल से बचाना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया, जिस में वह खुद फंस गई थी. वह चाइल्ड वैलफेयर एक्टीविस्ट बन गई. ऐलिशिया खुद जिस हादसे का शिकार हुई थी, उस में पहचान छिपाने की जरूरत थी. लेकिन ऐलिशिया का मनाना था कि अगर वह ऐसा करेगी तो वे बच्चे खतरे में पड़ जाएंगे, जिन्हें जागरूक कर के वह बचा सकती है.

इस चिंता को उस ने अपने पास नहीं फटकने दिया. मीडिया में ऐलिशिया सुर्खिया बनने लगी. उस के काम की सराहना होती थी. बच्चों के अधिकारों के लिए वह आगे बढ़ कर सरकार तक उन की बात पहुंचाती थी. अब वह अलग किस्म की लड़की बन चुकी थी. ऐलिशिया ने पौइंट पार्क यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया तो उस ने ग्रेजुएशन के लिए फौरेंसिक मनोविज्ञान विषय का चुनाव किया. इस की 2 वजहें थीं. एक तो इस विषय की गहराई में जा कर वह खुद की बुरी यादों को धुंधला कर सकती थी, दूसरे बच्चों को भी वह मनोवैज्ञानिक ढंग से अपनी बात समझा सकती थी. ऐलिशिया के इंटरनेट सिक्योरिटी और बच्चों के मानवाधिकार संरक्षण की पैरोकारी व लापता बच्चों के लिए किए जा रहे उस के काम को बहुत ख्याति मिली.

धीरेधीरे ऐलिशिया एक बड़ा नाम बन गई. सन 2007 में उस ने नेशनल एसोसिएशन प्रोजेक्ट टू चिल्ड्रेन संस्था के साथ मिल कर सरकार के सामने बच्चों को इंटरनेट के खतरों से बचाने, उन्हें शिकार बनाने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाने तथा बच्चों की तस्करी रोकने का मुद्दा उठा कर पुख्ता कानून बनाने की जरूरत के साथ प्रोजैक्ट रखा. अमेरिकी सरकार ने उस पर गंभीरता से विचार कर के ‘इंटरनेट क्राइम्स अगेंस्ट चाइल्ड टास्क फोर्स’ (आईसीएसी) का गठन किया. उस के साथ घटी घटना को उदाहरण बना कर सरकार ने सन 2008 में ‘ऐलिशियाज लौ’ नाम से बच्चों के संरक्षण देने वाला एक कानून भी बना दिया.

इस कानून को वर्जीनिया, टेक्सास, कैलीफोर्निया, टैनिसी व आईदाहो आदि कई राज्यों में लागू कर दिया गया. ऐलिशिया शेष राज्यों में कानून लागू कराने के लिए प्रयासरत है. ऐलिशिया के प्रयासों से न सिर्फ अब तक अनेक बच्चे खतरों से बचे हैं, बल्कि उस की सक्रियता की बदौलत पुलिस भी कई लापता लड़कियों को खोजने में कामयाब रही है.

ऐलिशिया को शहर, राज्य व राष्ट्रीय स्तर के सेमिनारों और सरकार के बड़े आयोजनों में बुलाया जाता है. वह सब जगह अपनी बात रखती है. उस के काम को हर जगह सराहा जाता है. वह जबतब ‘ऐलिशिया प्रोजैक्ट’ नाम से इंटरनेट सिक्योरिटी और जागरूक करने वाला प्रोग्राम करती रहती है. ‘रेडी चिल्ड्रेन’, ‘सेफ कौंफ्रेंस’ नाम से भी ऐलिशिया समयसमय पर प्रोग्राम करती है. इस समय वह फौरेंसिक मनोविज्ञान विषय से मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रही है. ऐलिशिया का कहना है कि वह जिंदगी भर कोशिश करती रहेगी कि कोई भी किशोर उम्र लड़की उस की तरह धोखे और शोषण का शिकार न हो. Hindi Stories

—कथा पात्र से बातचीत पर आधारित

 

ISIS Terrorist Organization: खौंफ का खलीफा आईएसआईएस

ISIS Terrorist Organization: आईएसआईएस एक दुर्दांत और क्रूर आतंकी संगठन है जो पत्रकारों, मानवाधिकार के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधियों को मौत के घाट उतारते हुए जश्न मनाता है और उस की वीडियो बना कर दुनिया को दिखाता है. इस के बावजूद बहुत से देश उसे आतंक फैलाने के लिए फंडिंग तो कर ही रहे हैं, कट्टरपंथी सोच वाले कितने ही युवा और महिलाएं भी इस संगठन से जुड़ने के लिए लालायित हैं.

पहले पेरिस, एक बार फिर पेरिस, उस के बाद बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स. आईएसआईएस ने यूरोप में पिछले 3 सालों में इस तरह की एक दर्जन से ज्यादा खूनखराबे की घटनाओं को अंजाम दिया है, लेकिन इन 3 आत्मघाती हमलों ने यूरोप के समूचे मनोविज्ञान में ही दहशत बैठा दी है. पिछले दिनों यूरोप के कई अखबारों द्वारा अलगअलग देशों में इस खूंखार संगठन को ले कर जाने गए लोगों के मनोविज्ञान का साझा निष्कर्ष यह था कि आज की तारीख में यूरोप के 60 फीसदी से ज्यादा लोग इस वहशी संगठन से बेहद डरे हुए हैं. वे इस से किस कदर भयग्रस्त हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस का डर उन की हड्डियों तक में समा गया है.

सन 2001 में अलकायदा ने अमेरिका के ट्रेड टावर में हवाई जहाजों को मिसाइल की तरह इस्तेमाल करते हुए जो हमला किया था, उस ने अमेरिकियों के दिलोदिमाग में जबरदस्त खौफ पैदा कर दिया था. तकरीबन वैसा ही खौफ और वैसी ही दहशत इन दिनों यूरोपीय लोगों के दिलोदिमाग में घर किए हुए है. यह दहशत कितनी हौलनाक है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंदन के 50 फीसदी से ज्यादा लोग मानते हैं कि सुबह जब वे घर से निकलते हैं तो एक बार सीने में कहीं धक सा कुछ होता है कि क्या शाम को वे सहीसलामत वापस आ पाएंगे?

सवाल है, हथियार, तकनीक, धन और वर्चस्व से लबालब यूरोप जैसे भूखंड में एक जिहादी संगठन ने इस कदर अपना आतंक क्यों मचा रखा है? क्या यह महज संयोग है या फिर खौफ और आतंक कि इस समूची दास्तां में तमाम व्यवस्थित षडयंत्रों का भी गुप्त योगदान है? निश्चित रूप से ऐसा ही है. लेकिन यह सब इतना जटिल है कि आईएसआईएस की शुरू से आखिर तक दास्तां को जाने बिना श्यामश्वेत ढंग से कुछ भी कह देना खतरे से खाली नहीं है. आइए, इस खूंखार संगठन के गठन से ले कर इस के इस भयानक आतंक के सौदागर होने तक के सफर में एक संपूर्ण नजर डालें.

आईएसआईएस कब, कैसे और क्यों बना?

संगठित खौफ के इतिहास में आज तक आईएसआईएस जितना दुर्दांत और मनुष्य को पीड़ा पहुंचाने वाला कोई दूसरा संगठन नहीं हुआ. आईएसआईएस यानी ‘इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया’ नाम से इस संगठन के मौजूदा स्वरूप का गठन अप्रैल, 2013 में हुआ था, लेकिन इस की जड़ें इस से भी एक दशक पुरानी हैं. इब्राहिम अव्वद अल बदरी उर्फ अबु बक्र अल बगदादी इस का मौजूदा मुखिया है, जिसे अब तक के दुनिया के इतिहास का सब से दुर्दांत रक्तपिपासु माना जाता है.

दुनिया के मौजूदा कायदेकानूनों के हिसाब से यह संगठन, जो खुद को इराक और सीरिया के भौगोलिक क्षेत्र को मिला कर इस्लामिक राज्य कहना पसंद करता है, एक अमान्य राज्य तथा इराक एवं सीरिया में सक्रिय जिहादी सुन्नी सैन्य समूह है. अरबी भाषा में इस संगठन का नाम है ‘अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’ जिस का हिंदी में मतलब है, ‘इराक एवं शाम का इस्लामी राज्य’. शाम सीरिया का प्राचीन नाम है.

लेकिन इस के यही 2 नाम भर नहीं हैं. इस दुर्दांत संगठन के और भी कई नाम हैं. मसलन, आईएसआईएल या दाइश इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड लेवांट. पुराने समय में लेवांट उस इलाके को कहा जाता था, जिस में आज सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन आते हैं. कहने का मतलब यह है कि लेवांट एक ऐसे इलाके के रूप में जाना जाता है, जहां दुनिया के लिखित इतिहास में सब से अधिक खूनी संघर्ष हुए हैं. इस संघर्ष के दायरे में दुनिया के जो मौजूदा देश शामिल रहे हैं, वे हैं—जौर्डन, इजरायल, कुवैत, फिलिस्तीन, लेबनान, साइप्रस तथा दक्षिणी तुर्की के कुछ भाग.

खौफ के पर्याय इस संगठन को इराक और सीरिया के लोग इशारों में ‘दौलत’ अर्थात सरकार भी कहते हैं. यह सशस्त्र तकफीरी सलफी और जेहादी संगठन है. इस का घोषित उद्देश्य इस्लामी शासन व्यवस्था और इस्लामी कानून को लागू करना है. इस आतंकी संगठन के गठन, इस के अस्तित्व में आने, इस की गतिविधियों, लक्ष्यों और कौन से देशों से इस के संपर्क हैं, इस बारे में दुनिया के हर देश के पास एकदूसरे से भिन्न यानी विरोधाभासी सूचनाएं हैं, जो खुद एक रणनीति के तहत इस ने और इस संगठन के मददगारों ने फैलाई हैं.

मसलन कुछ लोगों और देशों का मानना है कि यह संगठन सीरिया में अलकायदा की एक शाखा है, जबकि दूसरे लोगों का कहना है कि यह एक स्वतंत्र संगठन है, जो इस्लामी सरकार के गठन का प्रयास कर रहा है. इसी तरह कुछ अन्य सूचना समूहों और देशों का मानना है कि यह सीरिया सरकार के विरोधियों को विभाजित करने के लिए सीरिया की सरकार और पश्चिमी देशों के षडयंत्रों का सांगठनिक विस्तार है. इस की पुष्टि अमेरिका के एक पुराने जासूस एडवर्ड स्नोडेन के इंटरव्यू से होती है, जो उस ने जुलाई, 2014 में ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स को दिया था. गौरतलब है कि एडवर्ड स्नोडेन सन 2013 तक अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी) में था.

सन 2013 में जब उस की सीआईए की नौकरी छूट गई तो वह हांगकांग भाग गया और फिर वहां से रूस. आज भी वह रूस में ही किसी अज्ञात स्थान में छिपा है. स्नोडेन ने अमेरिका की करतूत के बहुत सारे काले चिट्ठे पूरी दुनिया की मीडिया के सामने खोले हैं, जिस से पता चलता है कि कैसे अमेरिका ने ही ओसामा बिन लादेन की तरह खौफ के मौजूदा सौदागर अबू बक्र अल बगदादी को पैदा किया. बहरहाल, स्नोडेन द्वारा तेहरान टाइम्स को दिए गए इंटरव्यू के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल ने मिल कर बगदादी और उस के संगठन आईएसआईएस को खड़ा किया है.

स्नोडेन ने अपनी इस बातचीत में खुलासा किया था कि वह इजरायल ही था, जिस ने बगदादी को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी थी. वास्तव में इस पूरे खुफिया षडयंत्र को जिस कोड नाम से अंजाम दिया गया था, वह था ‘बीहाइव’ यानी मधुमक्खी का छत्ता. स्नोडेन के मुताबिक बगदादी और उस के संगठन को खड़ा करने के पीछे अमेरिका और उस के साथी देशों का मकसद था कि इजरायल के आसपास वाले देशों में आतंकवाद की एक ऐसी ताकत खड़ी कर दी जाए, जिस से इजरायल के दुश्मन उस ताकत से लड़ने में ही उलझ कर रह जाएं और इस तरह इजरायल सुरक्षित रहे.

स्नोडेन के मुताबिक, जहां साल भर से ज्यादा समय तक इस काम को अंजाम देने के लिए इजरायल ने बगदादी को अत्याधुनिक हथियारों को चलाने की ट्रेनिंग दी थी, वहीं खुद अमेरिका ने भारीभरकम आर्थिक सहायता दे कर बगदादी से मिडिल ईस्ट के अपने दुश्मन देशों पर हमला कराया था. वास्तव में इस के पीछे मकसद था कि इस आतंक की दहशत से अमेरिका द्वारा मध्यपूर्व के उन तमाम देशों में भी अपनी सेना की तैनाती थी, जहां फिलहाल वह नहीं है या सन 2012-13 में नहीं था.

यह स्नोडेन का शिगूफा भी हो सकता है, लेकिन जहां तक आईएसआईएस के खौफनाक इतिहास की बात है तो उस की जड़ें हाल के इन सालों से भी कहीं पीछे हैं. वास्तव में इस संगठन के गठन का इतिहास सन 2004 से शुरू होता है. जब खूंखार आतंकवादी अबू मुस्सअब जरकावी ने जमातुत्तवहीद और अल जेहाद नामक संगठनों का गठन किया. जरकावी ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में काम कर चुका था. उस ने ओसामा की मदद से अपने संगठन का इराक में काफी हद तक विस्तार कर लिया था. दरअसल इस संगठन ने इराक में अमेरिका के हमले का बदला लेने की कसम खाई थी.

यही वजह थी कि इस ने इराक के कोनेकोने से नौजवानों को अमेरिकी सैनिकों के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार किया. अपनी आक्रामक अमेरिका विरोधी नीतियों के चलते यह संगठन न सिर्फ बहुत कम समय में ही इराकी युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गया, बल्कि मध्यपूर्व और उस के बाहर के अन्य देशों के युवाओं में भी इस संगठन के प्रति तेजी से झुकाव बढ़ा. सन 2006 में अबू मुस्सअब जरकावी ने अपने एक वीडियो संदेश में अब्दुल्लाह रशीद अल बगदादी के नेतृत्व में मुजाहिदीन परिषद का गठन किया. लेकिन दुर्भाग्य से उसी महीने जरकावी मारा गया, जिस से उस की जगह अबू हमजा अल मुहाजिर को इराक में अलकायदा का मुखिया बना दिया गया.

सन 2006 के अंत तक इराक के और भी कई छोटेछोटे संगठन, जो अमेरिकी हमले के विरोध में छिटपुट मोर्चा संभाले हुए थे, वे सब भी इस से आ मिले और इस तरह इस संगठन का नाम हो गया ‘दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’, जिस का मतलब हम ऊपर ही बता चुके हैं. इस संगठन का मुखिया अबू उमर अल बगदादी था. संगठन का उद्देश्य बिलकुल साफ था, इराक से अमेरिका को उखाड़ फेंकना और इसलाम की पाबंद सरकार का गठन करना.

कौन है अबू बक्र अल बगदादी?

आज पूरी दुनिया जानना चाहती है कि खौफ का सौदागर अबू बक्र अल बगदादी आखिर है कौन और वह आईएसआईएस का मुखिया कब और कैसे बना? पहले यह जानते हैं कि आखिर ईदी अमीन और हिटलर से भी बड़ा खूंखार तानाशाह अबू बक्र अल बगदादी है कौन? बगदादी का जन्म सन 1971 में इराक के सामर्रा शहर में हुआ था. आज की तारीख में इस के कई नाम हैं जैसे, अल बदरी सामर्राई, अबू दुआ, डाक्टर इब्राहिम, अल कर्रार और अबू बक्र अल बगदादी.

बगदादी एक जमाने में दुनिया के आतंकी नंबर एक रहे ओसामा बिन लादेन की ही तरह बेहद पढ़ालिखा शख्स है. सच बात तो यह है कि वह ओसामा से भी ज्यादा पढ़ालिखा है. उस ने इस्लामिक स्टडीज से डाक्टरेट यानी पीएचडी कर रखी है. बगदादी बगदाद के इस्लामी विज्ञान विश्वविद्यालय से इस्लामी विज्ञान में मास्टर की डिग्री हासिल की है और बाद में यहीं से पीएचडी की डिग्री अर्जित की. बगदादी के पिता अल बदरी हैं. वह भी तकफीरी सलफी विचारधारा को मानते हैं. अबू बक्र बगदादी की कट्टरपंथ में आमद धर्म के प्रचार और उस की विधिवत शिक्षा से हुई. बचपन से ही उस में जेहाद के प्रति झुकाव था. इसीलिए वह इराक के दियाला और सामर्रा में जेहादी पृष्ठभूमि के 2 केंद्रों में से एक के रूप में उभरा.

तमाम जेहादी वेबसाइटों के मुताबिक वह अच्छीखासी आर्थिक और प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से है. सन 2003 में जब इराक में अमेरिकी सेनाओं ने घुसपैठ की थी, तभी वह अल जेहाद, जो बाद में अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम बना, संगठन के साथ जुड़ गया था. वह बहुत दिलेरी के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था. उसी दौरान लड़ते हुए अमेरिकी फौजों द्वारा पकड़ लिया गया था, जिस की वजह से उसे सन 2005-09 तक दक्षिणी इराक में अमेरिकी सेना द्वारा बनाए गए गिरफ्तार आतंकी कैंप उर्फ बक्का जेल में रखा गया. सन 2009 में उसे अमेरिकी सेना ने छोड़ दिया, लेकिन अमेरिका के प्रति उस के गुस्से और नफरत में कमी नहीं आई.

वह सन 2010 में फिर से पुराने संगठन में ही लौट गया और पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर ढंग से अमेरिकी फौजों पर हमले किए. इस के बाद की कहानी पूरी दुनिया जानती है कि कैसे उस ने खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का खलीफा घोषित किया और कैसे इराक व सीरिया के तमाम ऐतिहासिक शहरों को खंडहरों में बदल दिया.

कैसे शुरू हुआ आईएसआईएस के खौफ का सफर?

एक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका इराक को सद्दाम हुसैन के चंगुल से आजाद करा चुका था. मगर इस आजादी को हासिल करने के लिए उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. एक तरफ जहां इराक अमेरिकी फौजों के बूटों तले रौंदे जाने से तहसनहस हो चुका था, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी सेनाएं भी युद्ध लड़तेलड़ते पस्त हो चुकी थीं. जब अमेरिकी सेनाओं ने सन 2011 में इराक छोड़ा, तब वे इतनी जर्जर हो चुकी थीं कि उन के सामने ही धीरेधीरे सिर उठा रही फिदायीन ताकतों की अमेरिकी फौजों ने एक तरह से अनदेखी कर दी थी. अब तक सद्दाम हुसैन मारा जा चुका था. लेकिन इराक में आतंक का इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी मौजूद था.

हालांकि यह बात भी थी कि अमेरिकी सेनाओं के जाने के बाद भी संसाधनों की कमी के चलते बगदादी जैसे आतंकी ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे थे. अब तक उस ने अपने संगठन का नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट औफ इराक रख लिया था. बरबाद बगदाद में बड़े पैमाने पर सद्दाम हुसैन की सेना के ऐसे पुराने सैनिक मौजूद थे, जिन के अंदर गहरे तक ग्लानि और अवसाद था कि वे अमेरिकी फौजों को हरा नहीं पाए. अब तक अमेरिकी फौजें जा चुकी थीं, लेकिन उन की नुमाइंदगी कर रहीं मौजूदा इराकी सेनाओं को भी वे पुराने सिपाही देश के गद्दारों में गिनती कर रहे थे. यही कारण थे कि वे उन के खिलाफ लड़ने को बगदादी के आह्वान पर उस के संगठन आईएसआई से जुड़ गए.

बगदादी ने बड़ी ही खुशी और चतुराई से सद्दाम हुसैन की सेना के इन कमांडरों और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया. इस के बाद उस ने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चैक पौइंट्स और भरती दफ्तरों को बनाना शुरू किया. धीरेधीरे उसे सफलताएं मिलने लगीं और उस के लड़ाकों की संख्या कई हजार हो गई.

मगर अब भी बगदादी को इराक में वह कामयाबी नहीं मिल रही थी, जो उस के जेहन में थी. उसे लगा, शायद जर्जर इराक में यह कामयाबी उसे मिलेगी भी नहीं, इसलिए वह थोड़ी निराशा और बड़ी ही चतुराई से इराक छोड़ सीरिया पहुंच गया, जो एक तरह से इराक का पड़ोसी है. सीरिया उन दिनों जबरदस्त गृहयुद्ध की चपेट में था. अलकायदा और फ्री सीरियन आर्मी वहां के 2 सब से बड़े गुट थे, जो सीरियाई राष्ट्रपति असद के विरुद्ध मोर्चा बांधे थे. लेकिन सीरिया में भी घुसते ही उसे कामयाबी नहीं मिल गई. कई सालों तक सीरिया में भी बगदादी का कोई नामलेवा नहीं था.

अलबत्ता उस ने अब तक अपने संगठन का नाम एक बार फिर बदल लिया था और अब की बार वह आईएसआईएस हो चुका था, जोकि अभी तक है. बताने की जरूरत नहीं कि आईएसआईएस का मतलब इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया था. एक  तरफ जहां बगदादी बड़े मंसूबे बांध कर यहां आया था, वहीं दूसरी तरफ असद की सेनाओं से दोदो हाथ कर रही फ्री सीरियन आर्मी जून, 2013 को अपने खस्ता हालत हो चुकने के चलते पहली बार सामने आई और इस के मुखिया ने दुनिया से अपील की कि उसे हथियार दिए जाएं, वरना असद की फौजें उसे नेस्तनाबूद कर देगी और निर्णायक रूप से वे महज एक महीने के अंदर हार जाएंगे.

यहां॒से॒पलटे॒आईएसआईएस॒के॒दिन

इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमेरिका, इजरायल, जौर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी. इन देशों ने बाकायदा सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइलें, गोलाबारूद, सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया. बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए.

दरअसल, हुआ यह कि जो हथियार फ्री सीरियन आर्मी के लिए आ रहे थे, बड़े पैमाने पर उन्हें या तो पहले ही रास्ते में आईएसआईएस के लड़ाकों ने लूट लिया या फ्री सीरियन आर्मी के तमाम कमांडर गुपचुप रूप से आईएसआईएस से जा मिले थे और इस तरह दुनिया भर से आए हथियारों का 90 फीसदी सीरियन आर्मी के पास पहुंचने के बजाय आईएसआईएस के पास पहुंच गए. फ्री सीरियन आर्मी में गहरी निराशा थी, इस का मुख्य कमांडर पहले ही हार की आशंका और हताशा का बयान दे चुका था. नतीजतन बचेखुचे फ्री सीरियन आर्मी के सदस्यों ने आईएसआईएस से लड़ने का इरादा त्याग दिया और ज्यादातर उसी से जा मिले.

अगर कहा जाए उन दिनों तमाम आईएस लड़ाके फ्रीडम फाइटर का नकाब ओढ़ कर हथियार लूटे और अमेरिकी कमांडरों से बेहतरीन ट्रेनिंग हासिल की तो भी गलत नहीं होगा, क्योंकि सीरिया में लड़ रहे संगठन फ्री आर्मी के पीछे अमेरिका की ही ताकत, हथियार और रणनीति रही है. एक बार जब बड़े पैमाने पर आईएसआईएस के पास हथियारों का जखीरा हो गया तो फिर उस ने खौफ का ऐसा कहर बरपाया कि हजारों लोगों को मौत के घाट उतारते हुए महज एक साल के भीतर सीरिया और इराक दोनों ही देशों के एक बड़े हिस्से में कब्जा कर लिया.

इन में इन दोनों देशों के तमाम बड़े शहर भी शामिल थे. इराक में तो आईएसआईएस अब लगातार बगदाद की तरफ कूच कर रहा था. दूसरी तरफ इस ने सीरिया के तमाम प्राचीन शहरों को अपने गोलाबारूद से खंडहरों में बदल दिया था. जून, 2014 से आईएसआईएस की लगातार विजयगाथा में हर रोज कोई न कोई नया पन्ना जुड़ रहा है, जो आज भी बदस्तूर जारी है. आईएसआईएस के आतंकी इराक और सीरिया के तकरीबन आधे से ज्यादा बड़े शहरों में आज की तारीख में कब्जा जमाए हुए हैं और अपनी सरकार चला रहे हैं.

आईएसआईएस ने सीरिया के रक्का, पामयेरा, दियर, इजौर, इसाक्का, एलेप्पो, हम्मास और यारमुक इलाके के तमाम शहरों पर कब्जा कर लिया है. इस ने इराक में भी रमादी, अनबार, तिकरित, मोसुल और फालुजा शहरों को तहसनहस कर दिया है और अब यहां इसी का हुक्म चलता है. मगर सवाल है कि क्या इराक की इस दुर्दशा के लिए यहां का शिया समुदाय दोषी है? एक तरह से देखें तो यही सच है, क्योंकि सद्दाम की मौत के बाद अमेरिका की सरपरस्ती में सन 2006 में यहां एक तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार बनी, जिस के मुखिया शिया समुदाय के नूर अल मलीकी थे.

कहते हैं कि इस शिया सरकार ने इराक के सुन्नियों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया था. जबकि अमेरिका ने न केवल इस ओर से आंखें मूंदे रखीं, बल्कि कहीं न कहीं इस सब को बढ़ावा भी दिया, ताकि इराक में अल्पसंख्यक मलीकी सरकार पर उस का मजबूत कब्जा बना रहे. इस का नतीजा यह निकला कि आईएसआईएस के पक्ष में इराक के ज्यादातर सुन्नी होते चले गए. कोढ़ में खाज की स्थिति यह हुई कि सन 2011 के बाद राष्ट्रपति ओबामा ने इराक से अपनी फौज वापस बुलाने का फैसला कर लिया. अमेरिकी सेनाओं के चले जाने के बाद हर गुजरते दिन के साथ आईएसआईएस इतना मजबूत होता गया कि इराक सरकार कमजोर होती गई.

आईएसआईएस के लड़ाकों की संख्या इसी बीच 10 हजार से बढ़ कर 1 लाख की संख्या भी पार कर गई है. लेकिन जिस समय आईएसआईएस ताबड़तोड़ खौफ की काररवाहियां कर के ज्यादा से ज्यादा इलाकों में कब्जा जमा रहा था, उस समय इराक की सेना उस से कई गुना ज्यादा संख्या में थी और ज्यादा हथियारों से भी लैस थी, फिर भी आईएसआईएस के लड़ाकों ने इराकी सेना से बड़े पैमाने में उस के टैंक, हेलीकौप्टरों और लड़ाकू विमान छीन लिए.

कैसे फंडिंग जुटाता है आईएसआईएस?

अखबार ग्लोबल न्यूज के मुताबिक आईएसआईएस आतंकी संगठन न सिर्फ दुनिया का सब से खूंखार और क्रूर संगठन है, बल्कि यह खर्च के मामले में भी बहुत शाहाना है. यह दुनिया का सब से धनी आतंकी संगठन है. माना जाता है कि इस के पास 1 हजार अरब डौलर से ज्यादा की संपत्ति है, जिस में से 5 सौ अरब डौलर की संपत्ति तो उस ने इराक के विभिन्न शहरों, बैंकों और तेल कुओं को लूट कर हासिल की है. यह आतंकी संगठन तकरीबन 9 हजार बैरल तेल रोज बेचता है और उस से हर दिन 26 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाता है.

जब इराक के मोसुल शहर पर इस ने कब्जा किया था, उन दिनों 7 बैंकों को लूट कर कई करोड़ डौलर अपने खजाने में जमा कर लिए थे. कहते हैं, आईएसआईएस के पास इतना पैसा है कि वह अपने 60 हजार से 90 हजार के बीच लड़ाकों को हर महीने 42 हजार से 50 हजार रुपए महीने की तनख्वाह देता है, जबकि इस में खानापीना, रहना और सैक्स शामिल नहीं होता.

द एक्सप्रैस ट्रिब्यून और न्यूयार्क टाइम्स के हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान, इजिप्ट, जौर्डन, बांग्लादेश, अल्जीरिया, फिलिपींस, इंडोनेशिया, गाजा और लेबनान से न केवल इसे अपने 90 फीसदी लड़ाके मिलते हैं, बल्कि इन देशों से बड़े पैमाने पर हवाला के जरिए फंड भी इसे हासिल होता है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के मुताबिक, 22 देशों से भी ज्यादा के 3 सौ बैंक आईएसआईएस के फंड जुटाने के काम में हाथ बंटाते हैं. इस सब के अलावा आईएसआईएस बडे़ पैमाने पर खुद भी फंड जुटाता है, जिस में एक जरिया है अफगानिस्तान में पैदा होने वाले हेरोइन को अमेरिका और यूरोप के बाजारों में बेचना.

माना जाता है कि आईएसआईएस हर साल तकरीबन 70 अरब रुपए की हेरोइन अकेले अमेरिका के बाजारों में बेच देता है. इस सब के अलावा तमाम मुसलिम देश विशेषकर सुन्नी मुसलमानों वाले देश इस खूंखार संगठन को लड़ने के लिए धन देते हैं. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक आईएसआईएस को फंड देने वाली सरकारों में कतर की सरकार भी शामिल है. हालांकि एडवर्ड स्नोडेन जैसे अमेरिका के भगोड़े जासूसों का तो यह भी कहना है कि एक बड़ी मात्रा में आईएसआईएस को अमेरिका भी फंडिंग करता है. हालांकि अमेरिका इस खुलासे को बकवास बताता है.

आईएसआईएस दुनिया का न सिर्फ पहला ऐसा खूंखार संगठन है, जिस ने तमाम देशों की ताकत को खुलेआम चुनौती दी है, बल्कि यह पहला ऐसा संगठन है, जिस के पास इतना धन है कि वह यूरोप के कई छोटे मगर विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से टक्कर लेता है.

निस्संदेह इस की इस भारीभरकम अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान खुद उन आत्मघाती आतंकियों का है, जो अपनी जान हर समय हथेली पर रख कर दुनिया भर में आईएसआईएस के खौफ का सिक्का जमाते हैं. मसलन जिस आतंकी ने पेरिस में हमले की अगुवाई की थी (जिस हमले में 130 से ज्यादा लोग मारे गए थे) अकेले इस आतंकी ने 30 हजार यूरो या 32 हजार अमेरिकी डौलर का फंड उन आत्मघाती लड़ाकों के लिए इकट्ठा किया था, जिन्होंने इस हमले को अंजाम दिया था. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया का यह खूंखार संगठन क्यों कभी पैसे की दिक्कत महसूस नहीं करता.

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आईएसआईएस का खौफनाक चेहरा आखिर आईएसआईएस के युवा इतने दीवाने क्यों हैं?

एक संगठन, जो हजारों लोगों की मौजूदगी में पिंजरे में जानवरों की तरह बंद कर के बेकसूर पत्रकारों, मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधी संगठनों के सैनिकों पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है और उन के धूधू कर के जलने का सामूहिक उत्सव मनाता है. एक ऐसा संगठन, जो किसी मां के बेटे को ही मजबूर करता हो कि वह अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दे. एक ऐसा संगठन, जो बाकायदा 4-4 कैमरों के सामने इस बर्बरता से विदेशी पत्रकारों की गरदन हलाल करता हो, जैसे बकरे की कुरबानी कर रहा हो.

एक ऐसा संगठन, जो ज्ञानविज्ञान की हजारों किताबों को यह कह कर जला देता हो कि ये युवाओं को इसलाम से विमुख कर रही हैं. सवाल है, ऐसे क्रूर और खौफनाक संगठन में शामिल होने के लिए दुनिया भर से युवक और युवतियां भागे क्यों चले आते हैं? ट्यूनीशिया के गृहमंत्री लोफी बेन जेडौअ के मुताबिक तो उन के देश से हजारों युवतियां सीरिया में विद्रोह की कमान संभाले लड़ाकों को सैक्स सुख देने के लिए तथा उन के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ने के लिए चोरीछिपे देश से भाग रही हैं. ट्यूनीशिया के गृहमंत्री इसे ‘सैक्स जिहाद’ की संज्ञा देते हैं और उन के मुताबिक इसे चला रही हैं खुद ट्यूनीशिया की युवतियां.

यह बात संसद के भीतर कही गई है, जिस से इस की गंभीरता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. बेन के मुताबिक, ‘ये औरतें 20, 30 या 100 के करीब विद्रोहियों के साथ सैक्सुअल रिलेशनशिप बनाती हैं. वे इसे जिहाद-अल-निकाह (सैसुअल होली वार) की संज्ञा देते हैं और प्रैग्नेंट हो कर घर लौट आती हैं.’ इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस संगठन के प्रति युवाओं में चाहे वे लड़कियां हों या लड़के, एक अजीब किस्म की दीवानगी है. पिछले 3 सालों में हिंदुस्तान से भी कई दर्जन युवक चोरीछिपे इस में हिस्सा लेने के लिए जा चुके हैं, जिन में से कइयों को एयरपोर्ट से वापस किया गया है तो कइयों के शहीद होने की खबरें ही लौट कर आई हैं.

जबकि यह संगठन अपने लड़ाकों से भी क्रूरता बरतने में पीछे नहीं रहता. अगर इसे अंदाजा हो गया कि कोई लड़ाका छोड़ कर भागने की फिराक में है तो यह संगठन बहुत नृशंसता से उस लड़ाके को बाकी तमाम लड़ाकों के सामने मौत के घाट उतार देता है, जिस से कि बाकी लड़ाके खौफ से भर जाएं और कभी वापस जाने का साहस न कर सकें.

यह संगठन लड़कियों के साथ तो और भी ज्यादा क्रूर है. यह संगठन लड़कियों को 7 से 9 साल की उम्र में भी शादी को मंजूरी देता है और 16 साल तक में हर हाल में शादी करने की हिदायत देता है. यह संगठन खुलेआम अपने लड़ाकों को सैक्स के लिए महिलाओं की मांग करता है और साफ चेतावनी देता है कि अगर उस की बात अनसुनी की गई तो खैर नहीं. यह हैरानी की ही बात है कि इस के बावजूद इस अमानवीय और बर्बर संगठन के प्रति लड़कियां और लड़के खिंचे चले आते हैं. सवाल है कि आखिर क्यों? उन में इस के लिए इतनी दीवानगी क्यों है?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं, पूरी दुनिया के समाजशास्त्रियों और सरकारों को भी परेशान कर रहे हैं. दि इंस्टीट्यूट फौर स्ट्रैटजिक डायलौग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया या इराक जाने वाले करीब 3 हजार यूरोपीय युवाओं में 5 सौ से ज्यादा युवतियां शामिल हैं. कुछ तो किशोर उम्र की और कुछ भले ही अपवाद के तौर पर हों, मगर 50 साल के पार की प्रौढ़ महिलाएं भी हैं.

‘बिकमिंग मुलान’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये तमाम महिलाएं फिर चाहे वे जिस उम्र समूह से रिश्ता रखती हों, इस बात से प्रभावित होती हैं कि मुसलमानों के लिए नए इलाके का निर्माण हो रहा है. एक नई दुनिया, जहां किसी और के लिए कोई जगह नहीं होगी. यहां तक कि मुसलमानों में भी गैरसुन्नियों के लिए भी नहीं.

इसीलिए तमाम सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और इंग्लैंड की लड़कियां भी रोमांचित हो कर इस सपने वाले देश या भूखंड की तरफ कूच कर रही हैं. जाहिर है, वे उस सपने का हिस्सा होना चाहती हैं. यहां तक कि युद्ध के मोर्चे पर डंट कर भी और लड़ाकों के लिए सेज में बिछ कर भी. सवाल है, क्या ये युवा, खासकर लड़कियां दिमागी रूप से बीमार हैं? समाजशास्त्रियों की मानें तो हां, कुछकुछ ऐसा ही है. इन में से कई युवाओं का व्यक्तित्व कई हिस्सों में बंटा सा लगता है, विशेषकर युवतियों का. ऐसी कुछ महिलाओं, जिन के बारे में माना जाता है कि वे इस वक्त सीरिया या इराक में हैं, के ट्विटर या फेसबुक एकाउंट को देखने पर भी यह बात साफ प्रतीत होती है.

क्योंकि ये महिलाएं जहां एक पल को किसी फिल्म से संबंधित कोई बात कहती हैं या अपने पालतू कुत्ते के बच्चे के साथ अपनी वाल पर तसवीर लगाती हैं, वहीं दूसरे ही पल वे किसी सार्वजनिक जगह पर आईएस के लड़ाकों की किसी का सिर काटते या नृशंसता से पेश आने वाली तसवीरें पोस्ट कर रही होती हैं. सवाल है, आखिर ये महिलाएं ऐसा क्यों कर रही हैं? बहुचर्चित हो रही बिकमिंग मुलान रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये महिलाएं भी वही चाहती हैं, जो इन दिनों आईएसआईएस की तरफ आकर्षित दुनिया भर के खासतौर पर पश्चिम के युवा मुसलिम चाहते हैं या कहें जिन बातों से मुसलिम युवक प्रेरित हैं, उन्हीं से महिलाएं भी प्रेरित हैं.

मुसलिम युवाओं की तरह ही ये मुसलिम महिलाएं भी आईएसआईएस की तरफ खलीफा के शासन की स्थापना, पश्चिम से नफरत, पहचान की तलाश जैसे वैचारिक कारणों से प्रेरित हैं. आईएस के आतंकियों के उन के कब्जे वाले इलाके में, ऐसे ही अफगानिस्तान या बाल्कन में सक्रिय कट्टरपंथियों से इसलिए भूमिका बिलकुल अलग है, क्योंकि आईएस के आतंकी यहां एक राष्ट्र का निर्माण करना चाह रहे हैं. इसलिए यहां स्थानीयता के साथ कोई टकराव नहीं है.

इसीलिए ये गतिविधियां आतंक के मनोविज्ञान से ऊपर उठ कर एक ‘राष्ट्र निर्माण’ की प्रक्रिया का हिस्सा हो जाती हैं. इसीलिए इस में भाग लेते हुए महिलाएं भी इतिहास रचने वालों में शामिल होना चाहती हैं. फिर चाहे भले ही लड़ाकों के लिए सैक्स परोस कर या उन के लिए घर की देखरेख कर के ही क्यों न ये संभव हो. सच तो यह है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी भूमिका घर की देखरेख करने वाले के तौर पर ही देख रही हैं. इसीलिए ये महिलाएं जेहादियों को अपने पति के रूप में चुन रही हैं. कुछ महिलाओं के सोशल मीडिया एकाउंट के अनुसार, जिहादी लड़ाके से शादी करने पर उन्हें घर इत्यादि की सुविधाएं मिलती हैं यानी इस उन्माद में आर्थिक असुरक्षा भी एक कारण है.

इन महिलाओं की मंशा को उजागर करने वाली कई वेबसाइटों के मुताबिक सीरिया में होने का दावा करने वाले कुछ लोग ‘खलीफा के राज्य’ में शादी की संभावना से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं. हालांकि इन में से कई शादियां ज्यादा समय तक नहीं चलतीं, क्योंकि उन के पति लड़ाई में मारे जाते हैं. ऐसे में ये महिलाएं ट्विटर पर अपने पतियों के शहीद हो जाने की घोषणा करती हैं. आईएस से तेजी से जुड़ रही ये महिलाएं एक मामले में पुरुषों से काफी हद तक अलग हैं. इन में से ज्यादातर ने इस्लाम में धर्मांतरण  किया है यानी ये जन्म से मुसलमान नहीं थीं. इसलिए ये इस्लाम से बहुत गहरे तक वाकिफ भी नहीं हैं. शायद यही इस सवाल का जवाब भी है कि कमउम्र की लड़कियां ऐसा माहौल क्यों स्वीकार करना चाहती हैं?

असली सवाल इन के इस्लाम की ओर झुकाव का है. आईएस की तरफ तीव्रता से आकर्षित हो रही ज्यादातर लड़कियों की उम्र 18 से 25 साल के बीच है. इस्लाम ग्रहण करने वाली इन ज्यादातर लड़कियों को इस्लाम धर्म के बारे में बिलकुल भी पता नहीं होता. वास्तव में उन्होंने इंटरनेट पर इस के बारे में सर्च किया होता है, जैसा आम लोग करते हैं.

उन्होंने यूट्यूब पर ऐसे वीडियो देखे होते हैं, जिन में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए होते हैं. धर्म के बारे में जानने के लिए उन के पास यही एक आधुनिक और आसान रास्ता होता है. ऐसी लड़कियां न कभी मसजिद गई होती हैं, न किसी लाइब्रेरी. वे सौ प्रतिशत यूट्यूब, गूगल, सोशल मीडिया पर निर्भर होती हैं. इसीलिए ये इस्लाम की संवेदनशीलता से परिचित नहीं होतीं. ऐसे में ये अपना भी नुकसान करती हैं और इस्लाम को भी बदनाम करती हैं. ISIS Terrorist Organization

 

Hindi Stories: खामियों के बावजूद लहराया परचम

Hindi Stories: लक्ष्य को ध्यान में रख कर अगर मजबूत इरादों के साथ काम किया जाए तो विकलांगता भी बौनी साबित होती है, देखने और सुनने में अक्षम मनीराम शर्मा ने आईएएस अफसर और नेत्रहीन ब्रह्मानंद शर्मा ने जज बन कर यही कर दिखाया.

कहते हैं, आदमी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. अगर वह ठान ले तो कोई भी काम उस के लिए मुश्किल नहीं है. जिन लोगों ने अपनी कमी और कमजोरी को हथियार बना कर मेहनत की, उन्होंने कामयाबी की मंजिल निश्चित रूप से हासिल की. ऐसे अनेक लोगों की कामयाबी के किस्सेकहानियां हमें सुनने को मिलते रहते हैं. जो देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते या बोल नहीं सकते थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और मन की आवाज को सुनी, जुनून के साथसाथ तब तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा, जब तक उन्होंने कामयाबी हासिल नहीं कर ली.

ऐसे दिव्यांग लोगों ने अपनी शारीरिक कमियों को अपनी पढ़ाई या दूसरी विधा पर हावी नहीं होने दिया. अपनी जिद और जज्बे से दुनिया में कामयाबी की कहानी लिखी. शारीरिक रूप से विकलांग ऐसे ही कुछ लोगों की सफलता की कहानी यहां पेश है, जो आज हीरो बन कर समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं. सब से पहले हम भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी मनीराम शर्मा के बारे में बताना चाहेंगे. वह इस समय हरियाणा के मेवात के नूंह जिले में जिला परिषद में मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर तैनात हैं. राजस्थान के जिला अलवर की तहसील कठूमर के बदनगढ़ी गांव के रहने वाले मनीराम शर्मा जन्म से ही न तो पूरी तरह बोल सकते थे और न पूरी तरह सुन सकते थे. उन के पिता मजदूरी करते थे और मां बधिर थीं. पूरा परिवार अनपढ़ था.

घर की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर थी. गुजरबसर मुश्किल से होती थी. ऐसे में बच्चे का इलाज कैसे होता? इलाज न होने से 9 साल की उम्र में मनीराम की सुनने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई, लेकिन उन में पढ़ने की ललक थी. पढ़ाई के लिए उन्होंने तमाम पापड़ बेले. बदनगढ़ी गांव काफी पिछड़ा था, वहां कोई स्कूल नहीं था. आज भी इस गांव में कोई सरकारी स्कूल नहीं है. मनीराम पढ़ने के लिए 3 किलोमीटर पैदल चल कर या कभी किसी की साइकिल पर बैठ कर पास के गांव अखैगढ़ जाते थे. बाद में खेड़ली कस्बे में पढ़ने जाने लगे.

स्कूल के कुछ बच्चे उन के गूंगाबहरा होने का मजाक उड़ाते थे. लेकिन उन्होंने उन की बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया. अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाए रहा. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने सन 1990 में दसवीं की परीक्षा न सिर्फ अच्छे अंकों से पास की, बल्कि प्रदेश में उन की पांचवीं रैंक आई. स्कूल में साथी विद्यार्थी और अध्यापक जो उन्हें गूंगाबहरा कहते थे, इस के बाद उन्होंने उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया. अच्छे अंकों से दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद मनीराम के पिता ने सोचा कि बेटे को कहीं चपरासी की नौकरी ही मिल जाए तो अच्छा रहेगा. चार पैसे मिलेंगे तो घर के हालात में कुछ तो सुधार होगा.

यही सोच कर वह मनीराम को अपने परिचित एक खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के पास ले गए. उन्होंने उन से कहा, ‘‘साहब, बेटा बड़े अच्छे नंबरों से पास हुआ है. इसे कहीं चपरासी ही लगवा दो.’’

बीडीओ को जब पता चला कि मनीराम बोल और सुन नहीं सकता तो उन्होंने कहा, ‘‘यह न तो बोल सकता है और न ही सुन सकता है. ऐसे में इसे कैसे नौकरी पर रखा जा सकता है?’’

बीडीओ की बात सुन कर मनीराम के पिता की आंखों में आंसू आ गए. बापबेटे बीडीओ के औफिस से अपना सा मुंह ले कर लौट आए. घर आ कर मनीराम ने पिता को अपने इशारों से भरोसा रखने को कहा. उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वह अपनी विकलांगता को सीढ़ी बना कर सफलता का मुकाम हासिल करेंगे. इस के बाद वह जीजान लगा कर पढ़ाई करने लगे. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने बारहवीं कक्षा में पूरे प्रदेश में सातवीं रैंक हासिल की. बाद में उन्होंने बीए औनर्स में राजस्थान विश्वविद्यालय में टौप किया और गोल्ड मैडलिस्ट बने. ग्रैजुएट होने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी पाने के प्रयास शुरू किए.

राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) की परीक्षा दी. पहली परीक्षा में ही वह पास हो गए. तब उन्हें अलवर जिले के गंडाला गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौकरी मिली. मनीराम के परिवार में इस से पहले कोई सरकारी नौकरी में नहीं रहा था, इसलिए उन के लिए यही सब से बड़ी नौकरी थी. मनीराम भले ही सरकारी नौकरी पा गए थे, लेकिन उन के सपनों की उड़ान अभी थमी नहीं थी. स्कूल की नौकरी करते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और राजनीति विज्ञान से प्राइवेट एमए किया. इस के बाद परीक्षा पास कर के वह राजकीय महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान के व्याख्याता बन गए. हालांकि कि उन्हें अब पहले से ज्यादा तनख्वाह मिलने लगी थी, लेकिन वह अभी संतुष्ट नहीं थे.

वह प्रशासनिक सेवा की तैयारी में जुट गए. इस के लिए वह अथक परिश्रम करने लगे, जिस की बदौलत उन्होंने सन 2001 में राजस्थान लोक सेवा आयोग की राजस्थान प्रशासनिक सेवा की एलाइड परीक्षा पास की. इस के बाद देवस्थान विभाग में निरीक्षक के पद पर भरतपुर में उन की नियुक्ति हुई. इस बीच उन्होंने एमफिल, नेट, जेआरएफ करने के साथ पीएचडी भी कर ली थी. बाबू से अफसर बनने के बाद भी मनीराम चैन से नहीं बैठे. उन्हें अपनी मंजिल आगे नजर आ रही थी. हर शिक्षित युवा की तरह मनीराम का सपना भी आईएएस औफिसर बनने का था. नौकरी करते हुए वह संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी करने लगे.

उन्होंने सन 2005 में पहली बार यह परीक्षा दी और पहली बार में ही उन्होंने यह परीक्षा पास कर ली. पूरे देश में उन की 27वीं रैंक आई. वह बहुत खुश हुए. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. लेकिन यह खुशियां ज्यादा दिनों की नहीं रहीं. आईएएस परीक्षा का परिणाम आने के कुछ दिनों बाद सरकार ने उन्हें सौ फीसदी डीफनेस (बहरेपन) की वजह से रिजैक्ट कर दिया. रिजैक्ट होने से मनीराम उदास हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बल्कि दोगुने उत्साह से फिर आईएएस परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. सन 2006 में उन्होंने फिर आईएएस परीक्षा पास की. अफसरों ने इस बार भी उन्हें डीफनेस के कारण मैडिकल ग्राउंड पर अनफिट घोषित कर दिया.

मनीराम को फिर झटका लगा. उन का बहरापन उन की आईएएस की नौकरी में आड़े आ रहा था. जबकि वह हर हाल में आईएएस की नौकरी करना चाहते थे. यह तभी संभव था, जब उन के कान का इलाज हो यानी कान का औपरेशन. इस औपरेशन में कई लाख रुपए का खर्चा था और उन के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे. अब तक लोग मीडिया द्वारा इस विलक्षण प्रतिभा के बारे में जान चुके थे. मीडिया में खबरें छपने पर लोगों ने उन के इलाज के लिए पैसे देने शुरू कर दिए.

इस अभियान में 8 लाख रुपए इकट्ठा हुए. इस धनराशि से जून, 2007 में उन के कान का औपरेशन कराया गया. औपरेशन के बाद उन्हें आंशिक रूप से सुनाई देने लगा. डाक्टरों के प्रयास से मनीराम ने बुदबुदा कर थोड़ाबहुत बोलना भी शुरू कर दिया. इस के बाद मनीराम शर्मा ने सन 2009 में तीसरी बार आईएएस की परीक्षा पास की. मैडिकल बोर्ड ने उन की जांच की. उन की विलक्षण लिप रीडिंग देख कर सारे अधिकारी दंग रह गए. मैडिकल जांच की मशीनें उन के सौ फीसदी बहरेपन की पुष्टि कर रही थीं. लेकिन उन की कार्यशैली बता रही थी कि बहरापन आंशिक है.

मैडिकल बोर्ड ने शर्मा को आंशिक डीफनेस का प्रमाणपत्र दे दिया. आंशिक डीफनेस के कारण इस बार भी आईएएस की नौकरी मिलने में तमाम तरह की अड़चनें आईं. काफी भागदौड़ के बाद प्रधानमंत्री औफिस की पहल पर मनीराम को आईएएस की नौकरी के योग्य माना गया. इस तरह बधिर होने वाले वह देश के पहले आईएएस बने. मनीराम को मणिपुर त्रिपुरा कैडर मिला. मणिपुर के तमेंगलोंग तथा चुरा चांदपुर में मनीराम शर्मा ने असिस्टैंट कमिश्नर ऐंड सब डिवीजनल मजिस्ट्रैट के पद पर करीब 5 सालों तक नौकरी की.

उस के बाद जनवरी, 2015 में केंद्रीय कैबिनेट की अपौइंटमेंट कमेटी ने उन के कैडर बदलने को स्वीकृति दे दी. कैडर बदलने पर मनीराम हरियाणा आ गए. हरियाणा सरकार ने उन्हें सब से पहले एडिशनल डिप्टी कमिश्नर एंड डिस्ट्रिक्ट रूरल डैवलपमेंट अथौरिटी का चीफ एक्जीक्यूटिव औफिसर नियुक्त किया. मनीराम शर्मा का कहना है कि बहरापन उन के परिवार में वंशानुगत है. उन की नानी बहरी थीं. नानी के कारण मां और मामा भी बहरे थे. उन के भाईबहन भी बहरे हैं. उन का बेटा भी बहरा था. नानी से चले आ रहे बहरेपन के कारण परिवार में 35 लोग बहरे हैं. लेकिन मनीराम ने अपनी इस कमी को दरकिनार कर हिम्मत और हौसलों के जरिए एक प्रेरणादायक इतिहास रच दिया.

हम आगे बात करते हैं, राजस्थान के पहले दृष्टिहीन जज ब्रह्मानंद शर्मा की. नियति भले ही किसी को कमजोर कर दे, लेकिन मन और हौसला मजबूत हो तो किसी को भी मनचाही ऊंचाई छूने से नहीं रोका जा सकता. अपनी कमजोरी को ताकत बना कर आगे बढ़ने वाले ही सफलता की मंजिल हासिल करते हैं. राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोटरास गांव के रहने वाले ब्रह्मानंद शर्मा ऐसी ही शख्सियत हैं. उन्होंने इसी साल 11 जनवरी को चित्तौड़गढ़ में अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रैट का पद संभाला है. दृष्टिहीनता को मात दे कर वह अब न्यायिक क्षेत्र जैसी महत्त्वपूर्ण सेवा में चयनित हो कर लोगों के लिए न्याय की ज्योति जला रहे हैं. वह राजस्थान न्यायिक सेवा के पहले दृष्टिहीन मजिस्ट्रैट हैं.

ब्रह्मानंद शर्मा जन्म से दृष्टिहीन नहीं थे. वह पहले भलेचंगे थे. उन की नेत्र ज्योति भी ठीक थी. उन के सामने किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने बचपन से ही न्यायाधीश बनने का सपना देखा था. स्कूल और कालेज की पढ़ाई के दौरान वह विभिन्न अदालतों के फैसलों की कतरनें घर ला कर उन का अध्ययन किया करते थे. पिता के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद घर में कुछ आर्थिक परेशानी हुई तो ब्रह्मानंद ने पढ़ाई पूरी कर के सरकारी नौकरी की कोशिश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप सन 1996 में राजस्थान के सार्वजनिक निर्माण विभाग में उन्हें कनिष्ठ लिपिक की नौकरी मिल गई.

उन की पहली पोस्टिंग उन के गृह जनपद भीलवाड़ा में हुई.  लेकिन अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं थे. उन का सपना मजिस्ट्रैट बनने का था. अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह दोगुने उत्साह से जुट गए. इसी बीच कुछ कारणों से उन की आंखों का रेटिना कमजोर होता चला गया, जिस से उन की आंखों की रोशनी कम होती चली गई. आंखों से कम दिखाई देने के कारण उन्हें कामकाज के साथ पढ़ाई करने में परेशानी होने लगी. उन्होंने अपना बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उसी बीच उन्हें तेज बुखार आया. कई दिनों तक बुखार रहने के कारण उन की आंखों की रौशनी पूरी तरह से चली गई. बुखार तो उतर गया, लेकिन उन की आंखों की रौशनी वापस नहीं आ सकी.

आंखों से दिखना बंद होने से ब्रह्मानंद शर्मा की जिंदगी में ही अंधेरा छा गया. उन्हें अपने सपने मिट्टी में मिलते नजर आने लगे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्हें एक ही धुन सवार थी कि उन्हें न्यायाधीश बनना है तो बनना है. इस के लिए कानून की पढ़ाई करनी जरूरी थी. उन्होंने एक लौ कालेज में दाखिला ले लिया. चूंकि वह देख नहीं सकते थे, इसलिए अपनी पत्नी और भतीजे की आवाज में कोर्स को रिकौर्ड करवा कर उसे रात में सुनते थे. इसी तरह उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद उन्होंने पहली बार सन 2008 में राजस्थान न्यायिक सेवा (आरजेएस) की परीक्षा दी, लेकिन इस परीक्षा में वह सफल नहीं हो सके.

उन्हें भीलवाड़ा में पढ़ाई के पूरे संसाधन नहीं मिल रहे थे, इसलिए वह जयपुर आ गए. जयपुर में आरजेएस परीक्षा की कोचिंग करने के लिए जब वह एक कोचिंग सेंटर में गए तो दृष्टिहीन होने की वजह से संचालक ने कहा कि वह एडमिशन ले कर क्या करेंगे, घर जाएं, अपना पैसा और समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं? ब्रह्मानंद शर्मा ने उस से एक मौका देने को कहा. उन का हौसला और जज्बा देख कर कोचिंग संचालक ने कहा, ‘‘एक घंटे में सेक्शन 144 याद कर के आओ, उस के बाद तुम्हारे एडमिशन के बारे में सोचेंगे.’’

ब्रह्मानंद शर्मा ने कोचिंग के बाहर ही भतीजे से सेक्शन 144 सुना और करीब 1 घंटे बाद उन्होंने उसे संचालक को ज्यों का त्यों सुना दिया. उन की बुद्धि को देख कर कोचिंग सेंटर का संचालक हैरान रह गया. इस के बाद उन्हें कोचिंग में दाखिला मिल गया. इस बीच ब्रह्मानंद शर्मा ने राजस्थान न्यायिक सेवा भर्ती परीक्षा 2011 के लिए आवेदन कर दिया और जीजान से परीक्षा की तैयारी में जुट गए. उन की मेहनत रंग लाई और परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो ब्रह्मानंद शर्मा की 83वीं रैंक आई. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. उन्हें अपने सपने पूरे होते नजर आने लगे, लेकिन किस्मत को अभी उन की एक परीक्षा और लेनी थी. राजस्थान में शानदार रैंक आने के बावजूद दृष्टिहीन होने की वजह से उन की ट्रेनिंग पर रोक लगा दी गई.

इस के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा. हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने ब्रह्मानंद शर्मा की नियुक्ति की सिफारिश की. एक साल की ट्रेनिंग के बाद उन्होंने चित्तौड़गढ़ में न्यायिक मजिस्टै्रट का पदभार संभाला. ब्रेल लिपि कंप्यूटर और सहायक की मदद से उन्होंने पहले ही दिन एक अनुभवी जज की तरह सुनवाई कर फैसले भी किए. ब्रह्मानंद शर्मा कहते हैं कि हौसला हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है. किसी को भी विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए. हालात से लड़ कर आगे बढ़ें तो सफलता जरूर आप के कदम चूमेगी.

रंगमंच पर कोई रीटेक नहीं होता. उस समय गलतियां सुधारने का भी मौका नहीं मिलता. मंच पर जो अभिनय किया जाता है, उसे सामने बैठा दर्शक सीधे देखता है. कलाकार के पास या फेल होने का फैसला दर्शक करते हैं. लेकिन जयपुर के दृष्टिहीन बच्चे किस तरह अपने अभिनय की प्रस्तुति करते हैं, उसे देख कर आप चौंके बिना नहीं रह सकते. इन बच्चों को तराशा है मशहूर रंगकर्मी भारतरत्न भार्गव ने. राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर में हिंदी के प्रोफेसर रह चुके भारतरत्न भार्गव संगीत नाटक एकेडमी नई दिल्ली के उपसचिव रहे हैं. थिएटर के क्षेत्र में भारतरत्न भार्गव देशभर की जानीमानी हस्ती हैं. बीबीसी लंदन और आल इंडिया रेडियो के लिए भी वह सेवाएं दे चुके हैं.

आजकल वह कला और रंगमंच को समर्पित जयपुर के संस्थान नाट्यकुलम में कुलगुरु के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ढेर सारे अवार्ड और पुरस्कारों से सम्मानित भारतरत्न भार्गव ने अनेक नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया है. मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर पर उन्होंने एक किताब लिखी है- रंग हबीब, जिसे नैशनल स्कूल औफ ड्रामा ने प्रकाशित किया है.

भारतरत्न भार्गव बताते हैं, ‘मैं करीब डेढ़ साल पहले कुछ दृष्टिबाधित बच्चों के संपर्क में आया. वे खेलखेल में भावभंगिमाएं बना रहे थे. मैं ने तभी ठान लिया कि इन्हें रंगमंच की बारीकियां सिखाऊंगा. शुरुआत की तो लोगों ने मजाक उड़ाया. लोग कहते रहे कि जिन्हें खुद नहीं दिखता, उन्हें देखने कौन आएगा? लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी और ये बच्चे मेरी कल्पना से भी आगे निकले. आम रंगकर्मी जो अहसास व्यक्त नहीं कर पाते, वैसा ये बच्चे कर दिखाते हैं. शायद इन का मन ही वह आंख हैं, जो इन्हें सब कुछ सिखा देता है.

‘शुरुआत में मैं इन बच्चों को भावभंगिमाएं सिखाने के लिए अंगुलियों से इन के चेहरों पर भाव उकेरता था. अभिनय करते समय ये दृष्टिहीन बच्चे स्टेज से गिर न जाएं, इस के लिए संगीत की मदद ली. ढोलक, मंजीरे की ताल आदि सुन कर अब ये बच्चे समझ जाते हैं कि मंच पर कब चलना है, कहां रुकना है. इसलिए अब ये अभिनय करते हुए गिरते नहीं हैं. इन्हीं में से कुछ बच्चों को संगीत का क्लू देने के लिए प्रशिक्षित किया. बेजान आंखों को सपने देने से इन्हें एक नई ऊर्जा मिलती है.’

78 साल के भारतरत्न भार्गव जब इन दृष्टिहीन बच्चों को अभिनय सिखाते हैं तो अच्छाभला अभिनेता भी उन का समर्पण देख कर हैरान रह जाता है. चांदी से चमकते सिर व दाढ़ी के बालों के बीच उन के चेहरे पर वह तेज होता है, जिसे उन के दृष्टिहीन शिष्य भले ही नहीं देख पाते, लेकिन उन की सिखाई बातों को तुरंत ग्रहण कर लेते हैं.

फोटोग्राफी एक ऐसी कला है, जिस में आंखों के द्वारा देखे गए नजारों को कैमरे में कैद किया जाता है. जाहिर है, कोई भी फोटोग्राफर उसी वस्तु के फोटो खींचता है, जो उसे उपयोगी लगती है. लेकिन पश्चिम बंगाल के कुछ फोटोग्राफर ऐसे हैं, जो पूरी तरह दृष्टिहीन हैं. इन दृष्टिहीन बच्चों द्वारा की गई फोटोग्राफी देख कर आप हैरान रह जाएंगे. इन दृष्टिहीन बच्चों को फोटोग्राफी में पारंगत किया है जयपुर की फोटोग्राफर पद्मजा शर्मा उर्फ गुनगुन और चंदन एस. राठौड़ ने. गुनगुन तथा चंदन एस. राठौड़ बताते हैं कि पहले यह प्रयास उन्होंने जयपुर के दृष्टिबाधित बच्चों को ले कर करना चाहा, पर अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल सका. बाद में पश्चिम बंगाल के सियराफुली कस्बे की सोसायटी फौर ब्लाइंड के संपर्क में आए. सन 2014 के अप्रैल महीने में गुनगुन व राठौड़ ने मिल कर इस सोसायटी के 5 बच्चों की फोटोग्राफी कार्यशाला की.

यह कार्यशाला 7 दिनों तक चली. इस कार्यशाला का विचार शिप औफ थीसिस फिल्म देख कर आया था. उस फिल्म में एक दृष्टिहीन फोटोग्राफर होती है. इसी विचार को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने कई ब्लाइंड सेंटरों पर बात की, लेकिन बात नहीं बनी. कुछ लोगों को लगता था कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. कुछ लोग यह कह कर मना कर देते थे कि इस से कोई फायदा नहीं होगा. कुछ लोग कहते थे कि ऐसा हो ही नहीं सकता. कुछ लोग क्राफ्ट या म्यूजिक की क्लास लगवाने की सलाह देते थे. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

पश्चिम बंगाल के सोसायटी फौर ब्लाइंड सेंटर पर ही कार्यशाला की. इस बीच वह ब्लाइंड फोटोग्राफरों के बारे में भी पढ़ते रहे, उन की तसवीरें देखीं, तसवीरों तक पहुंचने की यात्रा को जानने की कोशिश करते रहे. कार्यशाला में पहले दिन उन्होंने सूरदास को पढ़ा. सूरदासजी देख नहीं सकते थे, लेकिन उन्होंने कितने सारे दृश्य लिखे हैं. इसी तरह बच्चों को ध्वनि और अहसास के सहारे फोटो खींचने के बारे में बताया. उन्होंने इन बच्चों के हाथ में औटो मोड डिजिटल कैमरे दे कर उस की सारी तकनीकी प्रक्रिया समझाई. फिर औब्जेक्ट को छू कर उस से एक निश्चित दूरी बना कर फोटो खींचना सिखाया. इस के बाद आवाज सुन कर उस दिशा में क्लिक करना सिखाया. आवाज के आधार पर फोटो खींचने का उन का प्रयास बेहद उत्साहजनक रहा.

ये बच्चे पहले कैमरे को उसी अंदाज में आंख पर लगाते हैं, जैसे आम लोग करते हैं. इस के बाद बटन पर अंगुली सेट करते हैं और उस के बाद आवाज की दिशा में क्लिक कर के दृश्य को कैमरे में कैद कर लेते हैं. अब तो ये बच्चे फोटोग्राफी में इतने पारंगत हो गए हैं कि कभी मैदान, कभी पहाड़, तो कभी पानी के नजारों तक को कैमरे में अपने अंदाज में उतार लेते हैं. सोसायटी फौर ब्लाइंड के 5 बच्चों फणी पाल, मिलन शर्मा, अंजन शेरेन, टिंकू हाजरा और दुलीचंद राय के खींचे गए फोटोग्राफ्स की प्रदर्शनी जयपुर के जवाहर कला केंद्र में इसी साल 12 से 16 फरवरी तक लगाई गई थी.

दृष्टिहीन बच्चों द्वारा अपनी शब्दभेदी ताकत से केवल आवाज सुन कर खींची गई तसवीरों की प्रदर्शनी जयपुर के हजारों लोगों ने देखी. जो भी इस प्रदर्शनी को देखने आया, वह इन बच्चों की अनूठी पहल को देख कर दंग रह गया. दर्शकों के मन में ढेर सारे सवाल और यह जानने की इच्छा थी कि आखिर इन दृष्टिहीन बच्चों ने कैसे इतनी अच्छी तसवीरें खींची? दर्शकों के इन सवालों के जवाब भी वहां मौजूद इन बच्चों ने ही दिए.

कहानी दृष्टिहीन फोटोग्राफरों की चल रही है तो मुंबई में एक ऐसा शख्स भी है, जो नामी फिल्म कलाकारों को उन की महक के सहारे कैमरे में कैद करता है. इस फोटोग्राफर का नाम है भावेश पटेल. हाल ही में बौलीवुड एक्ट्रैस कैटरीना कैफ का एक वीडियो यू ट्यूब पर आया है, जिस में वह एक परफ्यूम के लिए शूट कर रही हैं. इस में कैटरीना की फोटोग्राफी भावेश ने की है. भावेश नेत्रहीन हैं. वह इस वीडियो में कह रहे हैं, ‘मैं जब भी फोटोग्राफ खींचता हूं, वह महक ही होती है, जो उस की तसवीर मेरे मन में बना देती है और उस के बाद मुझे करना होता है बस एक क्लिक.’

वीडियो में दिखाया गया है कि भावेश के खींचे फोटोग्राफ देख कर कैटरीना कैफ मुसकरा कर कहती हैं, ‘दे आर अमेजिंग’. बहरहाल, ये नेत्रहीन, मूकबधिर अपने जज्बे से एक नई कहानी लिख कर लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं. फिर भी यह चिंता की बात है कि भारत में सन 2011 की जनगणना के अनुसार, 50 लाख 32 हजार 463 नेत्रहीन हैं. इन में पुरुषों की संख्या 26 लाख 38 हजार 516 एवं महिलाओं की संख्या 23 लाख 93 हजार 947 है. सरकार को चाहिए कि इन नेत्रहीनों के समुचित विकास के लिए ठोस नीति बनाए. Hindi Stories

 

Bihar Crime News: क्या सचमुच लौट आया बिहार में जंगलराज

Bihar Crime News: 2 दशक पहले बिहार नक्सलियों के जिस कहर से आतंकित था, आतंक के वही पूत अब फिर से अपने पांव पसारने लगे हैं. कंस्ट्रक्शन कंपनी के 2 इंजीनियरों की हत्या के खौफनाक मंजर से यही लगता है कि बिहार में फिर से जंगलराज लौट आया है.

बिहार के दरभंगा जिले के शिवराम चौक से बरुआर होते हुए रसियारी पुल तक 120 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग-88 का काम पिछले 2 सालों से बड़ी तेजी से चल रहा है. 750 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली इस सड़क का ठेका बीसिनैया प्राइवेट लिमिटेड एंड चड्ढा एवं चड्ढा कंस्ट्रक्शन कंपनियों को दिया गया है. काम की मौनिटरिंग रोडिया कंसल्टैंट कंपनी कर रही है. इस मार्ग के बन जाने से सहरसा से राजधानी पटना की दूरी काफी कम हो जाएगी. वैसे तो सड़क निर्माण का यह काम अक्तूबर, 2015 तक पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन किसी वजह से यह तय समय में पूरा नहीं हो सका.

सरकार की नाराजगी से कंपनियां काम को जल्द से जल्द पूरा करने में लगी थीं. कंस्ट्रक्शन कंपनी के इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह 26 दिसंबर, 2015 की दोपहर को करीब डेढ़ बजे शिवराम चौक पहुंचे और काम की मौनिटरिंग कर के वहां पड़ी प्लास्टिक की कुरसी पर बैठ गए. रोडिया कंसल्टैंट कंपनी के फील्ड इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह उन्हीं के पास खड़े हो कर काम की निगरानी कर रहे थे. राष्ट्रीय राजमार्ग होने की वजह से छोटेबड़े वाहन आजा रहे थे. उसी समय विपरीत दिशा से 2 मोटरसाइकिलें आईं और इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह के पास रुक गईं. दोनों मोटरसाइकिलों पर 4 लोग सवार थे. सभी की उम्र 20-25 साल के बीच थी. उसी समय एक मर्सिडीज कार भी वहां आ कर रुक गई.

मोटरसाइकिलों से आए लड़कों में से एक ने इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह से धमकी भरे अंदाज में कुछ कहा तो उन्होंने भी उसे पलट कर जवाब दे दिया. इस के बाद दोनों में कहासुनी होने लगी. उसी बीच उस लड़के ने पिस्तौल निकाल कर उन के ऊपर 3 गोलियां दाग दीं. एक गोली सिर में और 2 गोलियां उन के पेट में लगीं. गोली चलते ही वहां खड़े इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह और बाकी कर्मचारी अपनी जान बचाने के लिए भागे. लेकिन बाकी के तीनों लड़कों ने दौड़ कर इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह को एके 47 से भून दिया.

इस के बाद उन लड़कों ने वहां एक परची फेंक दी और ‘बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जिंदाबाद’, ‘मुकेश पाठक जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए चले गए. बदमाशों के जाने के बाद इधरउधर दुबके कर्मचारी बाहर निकले. घायल मुकेश और ब्रजेश बुरी तरह से तड़प रहे थे. किसी कर्मचारी ने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के इस लोमहर्षक घटना की सूचना दी. सूचना मिलते ही थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद पुलिस बल ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने दोनों घायल इंजीनियरों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करने से जिले के उच्च पुलिस अधिकारियों को भी इस सनसनीखेज घटना की सूचना मिल गई थी. इसलिए एसएसपी ए.के. सत्यार्थी, एसपी (सिटी) हरकिशोर राय, डीएसपी दिलनवाज अहमद, डीएसपी (बेनीपुर) अंजनी कुमार, थाना सदर के थानाप्रभारी हरिमोहन प्रसाद, थाना बेंता के थानाप्रभारी सुरेंद्र पासवान और डौग स्क्वायड तथा फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंच गई थीं. दिल दहला देने वाली घटना की सूचना प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डीजीपी पी.के. ठाकुर तक भी पहुंच गई थी. एक महीने के भीतर इंजीनियरों के साथ हुई यह दूसरी बड़ी वारदात थी.

पुलिस ने मौके से 9 एमएम और एके 47 के 20 खोखे बरामद किए थे. सड़क निर्माण में जुटे चश्मदीदों से भी पुलिस ने पूछताछ की. घटनास्थल की जांच करने के बाद पुलिस अधिकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे और लाशों का निरीक्षण कर के उन्हें पोस्टमार्टम के लिए दरभंगा के जिला अस्पताल भिजवा दिया. इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह बेगूसराय के थाना सरलाही के गांव सोम्हो के और इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह रोहताश जिले के थाना डेयरी के गांव करमनगंज के रहने वाले थे. पुलिस ने दोनों के घर वालों को घटना की सूचना दे दी थी. ए.के. सत्यार्थी ने थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद को तत्काल निलंबित कर दिया और उन की जगह पर रामशंकर सिंह को बहेड़ी का थानाप्रभारी बनाया.

दरअसल, सीताराम प्रसाद ने बगैर सूचना दिए कंपनी के प्लांट से बीएमपी के जवानों को अचानक एक दिन पहले हटा कर नगर पार्षद के चुनाव की नामांकन ड्यूटी पर लगा दिया था. एसएसपी को इस मामले में उन की भूमिका संदिग्ध लगी, इसलिए उन्होंने उन के खिलाफ तत्काल काररवाई की थी. दिनदहाड़े 2-2 इंजीनियरों की हत्या के इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने डीजीपी पी.के. ठाकुर को आड़े हाथों लिया. उन्होंने सख्त हिदायत दी कि अपराधी कितने भी पावरफुल क्यों न हों, उन की गिरफ्तारी हर हाल में होनी चाहिए. इस के बाद दरभंगा जोन के आईजी अमित कुमार जैन ने पुलिस की 8 टीमें गठित कीं और इन का नेतृत्व एसएसपी शिवदीप लांडे को सौंप दिया.

घटनास्थल से हत्यारों की जो परची मिली थी, शिवदीप लांडे ने उसे जांच के लिए भेज दिया. 24 दिनों पहले 2 दिसंबर, 2015 को जिला शिवहर में इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद की हत्या के बाद पुलिस ने वहां से भी एक परची बरामद की थी. उस परची में भी ‘मुकेश पाठक जिंदाबाद’ का नारा लिखा था. परची की जांच में पता चला कि दोनों घटनाओं को मुकेश पाठक के गैंग ने ही अंजाम दिया था. कहने को तो पिछले 3 सालों से मुकेश पाठक गैंग का सरगना संतोझ झा गया जिले की जेल में बंद था, लेकिन वह जेल से ही अपना नेटवर्क चला रहा था. पिछले एक दशक से कुख्यात संतोष झा और मुकेश पाठक प्रदेश पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए थे.

शिवदीप लांडे ने पता लगा लिया कि मुकेश पाठक के गैंग में कौनकौन शामिल हैं. उन की तलाश में उन के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे मारे जाने लगे. इस का परिणाम यह निकला कि तीसरे दिन यानी 28 दिसंबर को पुलिस ने एक बदमाश पिंटू लालदेव को उस के गांव से गिरफ्तार कर लिया गया. पिंटू लालदेव बहेड़ी की ब्लाक प्रमुख मुन्नी देवी का देवर था. पुलिस को मुन्नी देवी के पति संजय लालदेव की भी तलाश थी, लेकिन वह फरार हो चुका था. मुन्नी देवी कुख्यात डान संतोष झा की बहन थी. पिंटू लालदेव को गिरफ्तार कर के पुलिस थाना बहेड़ी ले आई. सूचना मिलते ही ए.के. सत्यार्थी पूछताछ करने थाने पहुंच गए.

पुलिस ने उसे मुकेश पाठक और विकास झा उर्फ कालिया का फोटो दिखा कर पूछताछ शुरू की तो थोड़ी सख्ती के बाद उस ने स्वीकार कर लिया कि मुकेश पाठक और विकास झा उर्फ कालिया से उस के संबंध हैं और मुकेश पाठक के ही इशारे पर दोनों इंजीनियरों की हत्या की गई थी. पिंटू लालदेव के अपराध स्वीकार करने के बाद उसी दिन शाम को पुलिस लाइंस में ए.के. सत्यार्थी ने पत्रकारवार्ता आयोजित कर पत्रकारों के सामने आरोपी पिंटू लालदेव को पेश किया. इस के बाद उसे कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

पिंटू को जेल भेजने के बाद शिवदीप लांडे ने उसी रात 2 बजे सीतामढ़ी के थाना रुन्नीसैदपुर के गांव कमलदह की घेराबंदी कर के चंद्रकेतु झा को गिरफ्तार कर लिया. चंद्रकेतु भी इस दोहरे हत्याकांड में वांछित था. इस के पहले भी वह आर्म्स एक्ट में जेल जा चुका था.

चंद्रकेतु झा से की गई पूछताछ में उस के कई साथियों के नाम पुलिस को पता चले. इस के बाद उस की निशानदेही पर पुलिस ने अलगअलग जगहों से उस के 3 साथियों चंदन झा, अंचल झा और दिलीप झा को गिरफ्तार किया. सख्ती से की गई पूछताछ में उन्होंने घटना में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली. अंचल झा ने बताया कि इंजीनियरों की हत्या की योजना उसी के घर बनी थी. योजना को अंतिम रूप मुकेश पाठक, विकास झा उर्फ कालिया, टुन्ना झा, सुझोध झा, अभिषेक मिश्र, ऋषि झा, चंद्रकेतु झा, चंदन झा, दिलीप झा, पिंटू लालदेव और उस के बड़े भाई संजय लालदेव ने दी थी.

बदमाशों द्वारा दिए गए बयान के बाद दोहरे इंजीनियर हत्याकांड की तसवीर बिलकुल साफ हो गई. पता चला कि यह खूनी खेल गिरोह के दूसरे नंबर के खतरनाक बदमाश मुकेश पाठक के इशारे पर 75 लाख की रंगदारी न देने के एवज में खेला गया था. गिरोह के शार्प शूटर विकास झा उर्फ कालिया और अभिषेक मिश्र ने इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह और इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह की गोली मार कर हत्या की थी. इस के बाद पुलिस विकास और अभिषेक की तलाश में जुट गई.

पुलिस जांच के अनुसार, कुख्यात बदमाश मुकेश पाठक ने अपने साथियों विकास झा उर्फ कालिया, अभिषेक मिश्र आदि के साथ नेपाल में पनाह ले रखी थी. पुलिस ने इस बारे में नेपाल पुलिस से भी संपर्क किया. ए.के. सत्यार्थी को यह भी पता चला कि बदमाश कंपनी से पिछले 3 महीने से 75 लाख रुपए की रंगदारी की मांग कर रहे थे. घटना से एक सप्ताह पहले कंपनी के मैनेजर देवेश राठौर ने मौखिक रूप से इस की सूचना पुलिस को दी थी. मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने उसी दिन 6 बीएमपी के जवानों को सुरक्षा में लगा दिया था.

लेकिन थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद ने उन जवानों को पंचायत चुनाव की नामांकन ड्यूटी पर लगा दिया. इस के बाद यह घटना घट गई. पुलिस ने गिरफ्तार पांचों बदमाशों को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया था. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. इस कहानी के असली खलनायक माफिया डौन संतोष झा के बारे में जानना जरूरी है कि आखिर वह कौन है? बेहद कमजोर और डरडर कर जिंदगी जीने वाले संतोष झा के साथ ऐसा क्या हुआ कि गांव का एक सीधासादा नौजवान खतरनाक डौन बन गया? यहां उन पहलुओं पर रौशनी डालना बेहद जरूरी है.

37 वर्षीय संतोष झा बिहार के जिला शिवहर के पुरनहिया शहर के दोस्तियां गांव का रहने वाला था. वह एक मजदूर का बेटा था. बात उन दिनों की है, जब बिहार में नक्सलियों का बोलबाला था. इंसान गाजरमूली की तरह काटे जा रहे थे. जिस की लाठी में दम था, जयजयकार उसी की हो रही थी. जिस दोस्तियां गांव का संतोष झा रहने वाला था, उसी गांव में मुखिया नवल राय की तूती बोलती थी. उन की बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी. गांव में एक जमीन को ले कर संतोष के पिता और मुखिया नवल राय के बीच ठन गई. मुखिया उन की जमीन हथियाने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाने लगा.

संतोष उस समय किशोरावस्था की दहलीज पर था. मुखिया का जुल्म जब असहनीय हो गया तो नक्सली नेता गौरीशंकर झा ने संतोष के हाथों में लाल झंडा और बंदूक थमा दी. देखतेदेखते संतोष माओवाद का एक मजबूत स्तंभ बन गया. उसी समय वह माओवादी संगठन की नीतियों को भुला कर अपराध की डगर पर चल निकला.

माओवादियों को संतोष का काम नागवार लगा तो उन्होंने उसे संगठन से निकाल दिया. इस के बाद संतोष ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नामक संगठन बना लिया. इस संगठन से उस ने कमउम्र के अतिमहत्त्वाकांक्षी युवकों को जोड़ा. उन में ज्यादातर पढ़ेलिखे युवा थे. संतोष जिस समय माओवादियों के संगठन से जुड़ा था, उसी समय उस ने परशुराम सेना नामक एक और संगठन बनाया था. उस की कमान भी उसी के हाथ में थी. संगठन जब धन और अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो गया तो संतोष ने अपने दुश्मन मुखिया नवल राय से बदला लेने की योजना बनाई.

सन 1999 में रामनवमी पर नवल राय के घर के बाहर खाली मैदान में रामलीला हो रही थी. उस समय नक्सली नेता गौरीशंकर झा संतोष के साथ था. मौका मिलते ही उस ने नवल राय के ऊपर हमला बोल दिया. लेकिन इस हमले में नवल राय बालबाल बच गया. इस के बाद वह सतर्क हो गया. मगर संतोष मौके की फिराक में था. उस ने साथियों की मदद से 3 मार्च, 2003 को दोस्तियां स्थित नवल राय के मकान को डायनामाइट से उड़ा दिया. संयोग से इस हमले में भी नवल राय और उस का पूरा परिवार बालबाल बच गया.

9 महीने बाद 12 दिसंबर को संतोष ने दोबारा उस पर हमला करने की रणनीति बनाई. वह उसे मारने निकला तो किसी ने इस की मुखबिरी पुलिस से कर दी. जैसे ही वह रीगा के बराही पहुंचा, पुलिस के साथ उस की मुठभेड़ हो गई. इस मुठभेड़ में उसे कई गोलियां लगीं. इस के बावजूद वह भागने में सफल रहा. आज भी उस समय की लगी एक गोली उस के सीने में फंसी है. संतोष की बदले की आग अभी ठंडी नहीं हुई थी. नवल राय की हत्या की फिराक में वह लगा रहा. उस की हत्या तो वह नहीं कर सका, लेकिन सन 2004 में उस ने शिवहर जिले के थाना रीगा के बराही गांव के रहने वाले पूर्व मुखिया दिनेश सिंह को गोलियों से छलनी कर के मौत के घाट उतार दिया.

बेहद कमजोर और बेबस संतोष झा पूर्व मुखिया की हत्या कर के आतंक के पर्याय के रूप में जाना जाने लगा. लोगों के दिलों में उस के नाम का खौफ बैठ गया. लेकिन ज्यादा दिनों तक वह आजाद नहीं घूम पाया. पुलिस ने दिसंबर, 2004 में उसे पटना से गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. 5 साल जेल में रहने के बाद दिसंबर, 2009 में वह जमानत पर रिहा हो कर बाहर आया. जेल से बाहर आते ही वह मुखिया नवल राय के पीछे हाथ धो कर पड़ गया.

आखिरकार 15 जनवरी, 2010 को उस ने नवल राय को उसी के गांव में गोलियों से भून डाला. उस की हत्या करने के बाद जिले के अन्हारी कस्बा स्थित सेंट्रल बैंक के गार्ड की हत्या कर बैंक से लाखों रुपए लूट लिए. इन घटनाओं को अंजाम देने के बाद संतोष झा अपने गुरु और माओवादी नेता गौरीशंकर झा के पास लौट गया. गौरीशंकर झा ने संतोष को संगठन में यह कह कर लेने से मना कर दिया कि वह अपराध की डगर पर चल निकला है. गुरु की यह बात उसे काफी नागवार लगी और फिर 24 नवंबर, 2011 को उस ने अपने साथियों मुकेश पाठक, विकास झा उर्फ कालिया, ऋषि झा और लंकेश के साथ दोस्तियां पहुंच कर माओवादी नेता गौरीशंकर झा को मार दिया.

इस हमले में गांव के पूर्व मुखिया, उन की पत्नी देवता झा और बेटी भी बुरी तरह से घायल हो गई. संतोष झा के संगठन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ताकत उस समय दोगुनी हो गई, जब मुकेश पाठक ने उस के गैंग में कदम रखा. 32 वर्षीय मुकेश पाठक उर्फ चुटुल पाठक मूलरूप से मोतिहारी जिले के थाना मेहसी के मोरियाबाद गांव का रहने वाला था. मुकेश पाठक बचपन से ही काफी दबंग था. बातबात पर लड़ जाना उस की आदत थी. पुसाबाद, बरहरवा गांव के मुखिया चंद्रकिशोर ठाकुर उर्फ चुन्नू ठाकुर मुकेश के गुरु थे.

लेकिन एक किसी बात को ले कर मुखिया चंद्रकिशोर से उस की ठन गई थी. जिद्दी स्वभाव के मुकेश ने अपने साथियों ऋषि झा, श्यामसुंदर पाठक, पवन कुमार, गौतम ठाकुर और निकेश दुबे के साथ 11 दिसंबर, 2010 को मेहसी ब्लाक औफिस जा कर दिनदहाड़े मुखिया चंद्रकिशोर ठाकुर को गोलियों से भून डाला. दिनदहाड़े मुखिया की हत्या कर के मुकेश पाठक भी सुर्खियों में छा गया. संतोष झा की नजर मुकेश पर पड़ी तो उस ने उसे अपने गिरोह में शामिल कर लिया. गैंग में संतोष ने उसे सैकेंड बौस बना दिया.

अब संतोष और मुकेश मिल कर काम करने लगे. उन्होंने तय किया कि वे बड़ी कंपनियों को निशाना बनाएंगे, जहां से एक बार में करोड़ों रुपए वसूले जा सकें. उन्होंने उन बड़ीबड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों को टारगेट पर लिया, जिन के बजट कम से कम 500-600 करोड़ के होते थे. उन कंपनियों से वे उन के बजट का 10 प्रतिशत लेवी (रंगदारी, गुंडा टैक्स) के रूप में वसूलते थे. जिन कंपनियों ने उन की बात नहीं मानी या लेवी नहीं दी, वे उन के बेकसूर इंजीनियरों की हत्या कर के दहशत फैला देते थे. इस तरह इन के गैंग ने अब तक दरजन भर इंजीनियरों को मौत के घाट उतार दिया है.

स्पैशल औपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने आतंक के पर्याय बने संतोष झा और मुकेश पाठक को 17 फरवरी, 2012 को रांची के बूटी मोड़ से गिरफ्तार किया था. दोनों को शिवहर लाया गया था. सरगना संतोष को गया जेल में बंद कर दिया गया, जबकि मुकेश पाठक को शिवहर जेल में. शातिर मुकेश ने जेल में बंद के दौरान बीमारी का बहाना बनाया. जेल अधिकारियों ने इलाज के लिए उसे जिला अस्पताल में दाखिल करा दिया. 15 जुलाई, 2015 को पुलिस को चकमा दे कर वह अस्पताल से भाग गया.

तब से अब तक वह फरार चल रहा है. पुलिस रिकौर्ड में मुकेश पाठक की छवि उत्तर बिहार के शातिर अपराधियों की है. उस ने पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर और मुजफ्फरपुर में तमाम घटनाओं को अंजाम दिया है. 2 इंजीनियरों के हत्याकांड की जांच में बेहद चौंका देने वाली घटना खुल कर सामने यह आई कि इस डबल मर्डर केस के मुख्य अभियुक्त मुकेश पाठक की पत्नी पूजा गर्भवती है. वह भी अपहरण के किसी मामले में जेल में बंद है. पुलिस ने इसे गंभीरता से लिया है.

दरअसल, जेल में रहते हुए मुकेश पाठक ने पूजा से शादी की थी. दोनों की शादी अक्तूबर, 2013 में शिवहर जेल में जेल प्रशासन की निगरानी में हुई थी. पूजा मुकेश पाठक की दूसरी पत्नी थी. उस ने पहली पत्नी की हत्या कर दी थी. शादी के बाद दोनों को अलगअलग वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था. किसान की बेटी पूजा मुजफ्फरपुर के सकरा गांव की रहने वाली थी. पटना में रह कर वह पौलीटैक्निक कर रही थी. पैसों के लिए उस ने सन 2013 में अपने साथी कैलाश फौजी के साथ मिल कर एक दिन में 2 लोगों का अपहरण किया था. कैलाश फौजी भी मुजफ्फरपुर के सकरा का ही रहने वाला था.

अप्रैल में पूजा की डिलीवरी होने वाली थी. वह पुलिस की कड़ी निगरानी में है. पुलिस को लगता है कि पूजा की डिलीवरी के दौरान मुकेश पत्नी से मिलने जरूर आएगा, तभी उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. इसी बीच 3 मार्च, 2016 को पुलिस ने माफिया डौन संतोष झा के खास शूटर विकास झा उर्फ कालिया, करण झा, अभिषेक झा, पिंटु झा उर्फ बाबा और निकेश दूबे को अलगअलग जगहों से गिरफ्तार कर लिया है. विकास झा, पिंटू झा उर्फ बाबा और करण झा की गिरफ्तारी पर सरकार ने एकएक लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था.

पुलिस ने शिवहर की ब्लौक प्रमुख मुन्नी देवी और उस के पति संजय लालदेव को भी भादंवि की धारा 120बी के तहत गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया है. अब पुलिस को मुकेश पाठक की सरगर्मी से तलाश है. कथा लिखे जाने तक वह पुलिस की गिरफ्त से बहुत दूर था. Bihar Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Delhi Crime: मंगोलपुरी में पीजी के बेड बॉक्स में मिली महिला की लाश

Delhi Crime News: किसी सामान की तरह औरतों को इस्तेमाल कर उसे डस्टबीन में फेंक देने की मानसिकता आज भी कई मर्दों में बरकरार है. रेप, यौन-उत्पीड़न और घरेलू हिंसा इस बात का सबूत है. कहीं प्यार के नाम पर तो कहीं जाती के नाम पर औरतों की हत्याएं होती हैं इस मामले में भारत सबसे आगे है. NCRB के 2023 के आंकड़ों को देखें तो औरतों के खिलाफ अपराध के कुल 4,48,211 केस दर्ज हुए. इसमें रेप, उत्पीड़न, दहेज़ हत्या के अलावा मामूली बात पर औरतों की हत्यायों के तक़रीबन 17 हजार मामले हैं. दिल्ली के मंगोलपूरी में हुई यह वारदात भी इसी कड़ी का मामूली उदाहरण है जहाँ मामूली सी बात पर औरत की हत्या कर दी गई.

दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके के PG में एक 35 साल की औरत की लाश मिली. पुलिस जाँच में पता चला की इस औरत के प्रेमी दीपक ने धारदार हथियार से हमला करके घायल किया फिर गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी और हत्या के बाद दीपक ने औरत की लाश को कंबल में लपेटकर डबल बेड के स्टोरेज बॉक्स में छिपा दिया गया.

पुलिस के अनुसार यह औरत 6 अप्रैल की शाम करीब 4 बजे घर से 2 लाख रुपये लेकर घर से निकली थी. वह अपनी बेटी को ट्यूशन छोड़ने जा रही थी.
दीपक और इस औरत के बीच पिछले ढाई सालों से अफेयर था. औरत के घर के पास ही दीपक की मीट की दुकान थी. दीपक ने इस औरत को फोन कर PG में बुलाया. PG कमरे में दोनों के बीच कहासुनी हो गई. दीपक ने पहले धारदार हथियार से हमला किया, फिर गला घोंटकर हत्या कर दी. हत्या के बाद लाश को कंबल में लपेटकर बेड के बॉक्स में छुपा दिया. दीपक के रिश्तेदार सुरेंद्र और दोस्त जोगिंदर ने लाश छिपाने में दीपक की मदद की.

PG कर्मचारी को शक हुआ तो उसने बेड के बॉक्स को खोलकर लाश देख ली और तुरंत पुलिस को सूचना दी. दिल्ली पुलिस ने लाश बरामद की और पोस्टमार्टम के लिए संजय गांधी अस्पताल भेज दिया. हत्या के आरोप में दीपक, सुरेंद्र और जोगिंदर तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया है.

मृतक महिला के परिवार का आरोप है कि दीपक कई साल से महिला को ब्लैकमेल करता था और जबरन मिलने बुलाता था. औरत शादीशुदा थी और दीपक के पडोस में अपने पति, दो बेटों और एक बेटी के साथ रहती थी. Delhi Crime News

Haryana Crime Story: मोहब्बत बनी मौत

Haryana Crime Story: अविवाहित मुकेश की फेसबुक द्वारा 2 बच्चों की मां निशा से दोस्ती हुई तो दोनों एकदूसरे से प्यार ही नहीं करने लगे, बल्कि घर छोड़ कर भाग भी गए. लेकिन निशा को अपनी गलती का अहसास हुआ तो वह वापस आ गई. मुकेश को प्रेमिका की यह बेवफाई पसंद नहीं आई और वह उस का खून कर बैठा….

हरियाणा के जिला पानीपत के थाना शहर की राजीव कालोनी में ज्यादातर वे लोग रहते हैं, जो वहां की छोटीबड़ी कंपनियों में काम करते हैं. यहां की आबादी का एक हिस्सा ऐसा भी है, जो बतौर किराएदार रहता है. चोरीचकारी और मारपीट जैसे अपराधों को छोड़ दें तो इस कालोनी में कभी ऐसी कोई बड़ी वारदात नहीं हुई कि यहां के लोग दहल उठते.

लेकिन कब, कहां और किस प्रकार का अपराध घट जाए, इस बात को पहले से कौन जानता है. 3 फरवरी, 2016 की दोपहर को इस कालोनी में जो सनसनीखेज वारदात हुई, उस ने न सिर्फ पुलिस वालों को हैरान कर दिया, वहां रहने वालों को भी डरा दिया. दरअसल, कालोनी के ही एक सिरफिरे नौजवान ने सरेआम चाकू से एक महिला की गला काट कर बेरहमी से हत्या कर दी थी. हैरानी और खौफ पैदा करने वाली बात यह थी कि हत्यारा महिला की लाश के पास ही कुर्सी डाल कर आराम से बैठा था. लोगों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए वह चाकू लहरा कर अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा था.

दिल दहलाने वाले इस खूनी मंजर और हत्यारे की धमकी के डर का आलम यह था कि कोई भी आगे बढ़ने की हिममत नहीं जुटा पा रहा था. हत्यारा कह रहा था, ‘‘यह सिर्फ मेरे लिए बनी थी, लेकिन इस ने मेरी होने से मना कर दिया, इसलिए इसे जिंदा रहने का कोई हक नहीं रह गया था.’’

घटना की सूचना पा कर थाना शहर के थानाप्रभारी सुरेश कुमार, किला चौकीइंचार्ज प्रवीण कुमार और महिला एसआई नीलम आर्य पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गई थीं. थोड़ी देर में डीएसपी दलबीर सिंह भी आ गए थे. घटनास्थल की हालत देख कर पुलिस वालों के भी रोंगटे खडे़ हो गए थे. मृतका खून से लथपथ पड़ी थी. लाश के पास ही कुर्सी डाले हत्यारा बैठा था. पुलिस को देख कर वह थोड़ा सतर्क हो गया था. पुलिस ने आगे  बढ़ कर कहा, ‘‘चाकू फेंक कर खुद को कानून के हवाले कर दो. यही तुम्हारे लिए ठीक भी रहेगा.’’

इस से युवक को गुस्सा आ गया. उस ने लाश की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘खबरदार, कोई भी आगे बढ़ा तो उस का भी यही अंजाम कर दूंगा, जो इस का किया है.’’

उस की इस धमकी से पुलिसकर्मियों के भी कदम ठिठक गए. थानाप्रभारी ने उसे समझाना चाहा, ‘‘हमारी बात तो सुनो…’’

उन की बात पूरी होती, उस के पहले ही वह चिल्लाया, ‘‘कहा न, कोई आगे नहीं आएगा. अगर कोई आगे आया तो मैं अपनी गर्दन काट लूंगा.’’

कह कर उस ने चाकू अपनी गर्दन पर रख दिया. उस युवक की इस हरकत से पुलिस अधिकारी सकते में आ गए. वे समझ गए कि इस के सिर पर खून सवार है. इस स्थिति में यह कुछ भी कर सकता है. इसलिए पुलिस उसे समझातीबुझाती रही. मृतका की सास और उस का पति जोरजोर से रो रहे थे. जब युवक को लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा तो उस ने कहा, ‘‘चलो, पहले लाश उठाओ.’’

पुलिस जैसे ही आगे बढ़ी, उसी बीच उस ने अपने हाथ की कलाई पर चाकू से वार कर लिया. खून की धार फूट पड़ी. ऐसे में ही पुलिस ने चकमा दे कर उसे पकड़ लिया और फुर्ती से चाकू छीन लिया. इस के बाद तुरंत अपनी जीप से अस्पताल पहुंचाया. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि इतनी बड़ी घटना आखिर घटी क्यों थी? इस बारे में पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि जिस युवक ने खौफनाक तरीके से फिल्मी अंदाज में यह हत्या की थी, उस का नाम मुकेश था. मृतका का नाम निशा था.

जिस समय यह वारदात हुई थी, मृतका निशा छत पर कपड़े फैलाने गई थी. उसी बीच मुकेश चाकू ले कर वहां आ गया. वह सीधे छत पर गया और निशा का हाथ पकड़ कर नीचे खींच लाया. वह उस से साथ चलने को कह रहा था. निशा ने मना किया तो उस ने उस का गला काट दिया. सास ने बहू को बचाने की कोशिश तो की, लेकिन बचा नहीं सकी. बहरहाल, पुलिस ने शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद मृतका के पति संजय वर्मा की तहरीर पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया गया. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने मुकेश को कस्टडी में ले लिया और थाने ला कर विस्तार से पूछताछ की.

मुकेश, निशा के घर वालों और पड़ोसियों से पूछताछ में एक ऐसे सिरफिरे आशिक की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई, जो फेसबुक से करीब आई निशा को हमेशा के लिए अपनी बनाने की जिद पर अड़ा था, जबकि उस के प्यार में पड़ कर वादे करने वाली निशा हालात बदलने पर बदल चुकी थी. खूबसूरत और बनसंवर कर रहने वाली 30 वर्षीया निशा संजय वर्मा की पत्नी थी. संजय एक पावरलूम फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस के 2 बेटे, 8 साल का आदी और 6 साल का वंश था. उस के मातापिता भी साथ रहते थे. वैसे तो ये लोग मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बलरामपुर के रहने वाले थे, लेकिन लगभग 15 सालों से पानीपत में रह रहे थे. परिवार में खुशियों का बसेरा था. वक्त अपनी गति से चल रहा था.

मूलत: बिहार का रहने वाला 22 वर्षीय मुकेश भी कालोनी में किराए पर रहता था और अमन भवन चौक स्थित एक फैक्ट्री में कपड़ा सिलाई का काम करता था. चूंकि वह संजय के घर के नजदीक रहता था, इसलिए अक्सर उस की नजरें निशा पर पड़ जाती थीं. धीरेधीरे उस की खूबसूरती उसे भाने लगी. फिर तो वह उसे देखने के बहाने तलाशने लगा. निशा जल्दी ही उस की मंशा भांप गई. 3 महीने पहले मुकेश ने निशा को फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी तो उस ने सहर्ष स्वीकार कर ली. इस के बाद दोनों एकदूसरे के दोस्त बन गए.

दोनों के बीच चैटिंग होने लगी. निशा किस डगर पर चल चुकी है, यह बात परिवार का कोई नहीं जानता था. चैटिंग और मोबाइल पर होने वाली बातों से दोस्ती गहराई तो मुकेश निशा से प्यार करने लगा. एक दिन मौका पा कर उस ने प्यार का इजहार भी कर दिया. निशा ने नासमझी दिखाई और परिवार के बारे में सोचे बगैर उस के प्यार पर अपने प्यार की मोहर लगा दी. दिलों में प्यार का पौधा अंकुरित हुआ तो वे एकदूसरे के खयालों में डूबे रहने लगे. जल्दी ही चोरीछिपे दोनों की मुलाकातों का सिलसिला भी चल निकला.

मुकेश रसिया किस्म का युवक था. निशा से मुलाकात होती तो वह उस की इतनी तारीफें करता था कि वह खुशी से फूली नहीं समाती. पति और प्रेमी में फर्क होता है. घरपरिवार की जिम्मेदारियों में पति वह प्रेम प्रदर्शित नहीं कर पाता, जो मुकेश करता था. यह एक बड़ी सच्चाई है कि परिवार सिर्फ प्रेम करने से नहीं चलता. उस के लिए पैसों की भी जरूरत पड़ती है, जिसे हासिल करने के लिए काम करना पड़ता है. संजय परिवार के लिए समर्पित था, जिस के लिए वह मेहनत भी खूब करता था. उसी के बलबूते घर चल रहा था.

दूसरी ओर मुकेश अविवाहित था. उस के पास समय ही समय था. वह निशा से मीठीमीठी बातें कर के अपना वक्त बिता रहा था. एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवारें टूट गई. मुकेश और निशा एकदूसरे का सान्निध्य पा कर खुश थे. अनैतिक रिश्तों की गर्त ऐसी होती है, जिस पर कदम बढ़ा कर पीछे हटाना मुश्किल होता है. वक्त के साथ निशा और मुकेश के रिश्ते गहराते गए. ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. उड़तेउड़ते खबर संजय तक पहुंची, पत्नी के किस्से सुने तो उस ने उस से बात की. लेकिन वह साफ मुकर गई.

प्रेमिल रिश्तों में मुकेश और निशा ने साथ जीने और मरने की कसमें खाईं थीं. मुकेश ने तय कर लिया था कि वह निशा से विवाह कर के उसे अपने साथ रखेगा. सोच को साकार करने के लिए 7 दिसंबर, 2015 को वह निशा को ले कर भाग गया. बहू की इस हरकत से वर्मा परिवार को भारी बदनामी का सामना करना पड़ा. संजय ने किला चौकी में निशा की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा कर सच्चाई पुलिस को बता दी. मोबाइल लोकेशन के जरिए 5 दिनों में ही घर वालों और पुलिस ने निशा को खोज निकाला.

दोनों फरीदाबाद में रह रहे थे. 11 दिसंबर को पुलिस दोनों को पकड़ कर ले आई. इस के बाद दोनों पक्षों के लोग इकट्ठा हुए. निशा को भी समझाया गया और मुकेश को भी. दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. तय हुआ कि निशा अपने घर रहेगी और मुकेश उसे परेशान नहीं करेगा. निशा का मन बदल जाए और मुकेश भी उसे परेशान न करे, इस के लिए संजय ने उसे दिल्ली स्थित उस के मायके पहुंचा दिया. लेकिन इस तरह भला कब तक चलता. संजय की मां शीला बुजुर्ग थीं, बच्चे स्कूल जाते थे. घर के तमाम काम होते थे, कौन संभालता.

जनवरी के अंतिम सप्ताह में संजय निशा को घर ले आया. घर वालों ने एक बार फिर उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. उस ने वादा किया कि अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से परिवार की बदनामी हो. उस ने मन ही मन तय भी कर लिया कि अब वह मुकेश से कोई वास्ता नहीं रखेगी. दूसरी ओर मुकेश को पता चला कि निशा आ गई है तो वह उस से मिलने की कोशिश करने लगा. उस ने कई बार मोबाइल से फोन किया, लेकिन निशा ने उस का कोई जवाब नहीं दिया. उस ने निशा को देखने के लिए उस के घर के बाहर के कई चक्कर लगाए, लेकिन निशा की नजर उस पर पड़ती तो वह उसे नजरअंदाज कर देती.

निशा के इस बदलाव ने उसे बेचैन कर दिया. निशा शादीशुदा थी और अपनी गलतियों को सुधार रही थी. मुकेश को भी खुद में सुधार लाना चाहिए था, लेकिन वह निशा पर अपना पूरा हक समझने लगा था. उस ने साथ जीनेमरने की जो कसमें खाई थीं, उन्हें वह भुला नहीं पा रहा था. निशा की उपेक्षा से वह बुरी तरह आहत होता जा रहा था. एक बार मौका देख कर उस ने निशा से कहा, ‘‘निशा, क्या हो गया है तुम्हें, तुम मुझ से बात क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘मुकेश मेरी मजबूरियों को समझो. और मुझे भूल जाओ. अब मैं शादीशुदा हूं.’’

मुकेश तड़प उठा, ‘‘कैसी बात कर रही हो, मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. मुझे तुम्हारा साथ चाहिए.’’

‘‘अब यह नहीं हो सकता मुकेश,’’ कहने के साथ निशा ने चेतावनी दी, ‘‘मुझे आइंदा परेशान करने की कोशिश मत करना, वरना ठीक नहीं होगा.’’

मुकेश बुरी तरह हताश हो गया. उस की हालत हारे हुए जुआरी सी हो गई. निशा की बेरुखी से उस की रातों की नींद उड़ गई. उस के सिर पर निशा को हासिल करने का जुनून सवार था, लेकिन उस के सारे प्रयास विफल हो रहे थे. वह दिनरात इसी बारे में सोचता रहता था. यही वजह थी कि उस ने मन ही मन खतरनाक निर्णय ले लिया कि अगर निशा ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे किसी और की भी नहीं रहने देगा. इस के बाद उस ने एक चाकू का इंतजाम किया और निशा से आखिरी बार बात करने की ताक में रहने लगा.

3 फरवरी की दोपहर निशा नहाधो कर कपड़े फैलाने छत पर गई तो मुकेश की नजर उस पर पड़ गई. अपने कपड़ों में चाकू छिपा कर वह संजय के घर में दाखिल हो गया. उस समय निशा की सास शीला रसोई में थीं. वह सीधे छत पर पहुंच गया. उसे सामने पा कर निशा सकपका गई, ‘‘त…त…तुम यहां कैसे आए?’’

‘‘निशा मुझे तुम से आखिरी बार बात करनी है.’’

‘‘लेकिन मुझे तुम से कोई बात नहीं करनी.’’

मुकेश को गुस्सा आ गया. उस ने ताव में निशा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बात तो तुम्हें करनी होगी. तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूंगा.’’

‘‘छोड़ो मुझे, तुम पागल हो गए हो क्या?’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो गया हूं.’’ कह कर वह निशा को खींच कर नीचे ले आया.

शीला ने यह नजारा देखा तो हक्कीबक्की रह गईं. उन्होंने मुकेश को रोकना चाहा तो उस ने चाकू निकाल कर उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया. इस के बाद उस ने चाकू दिखा कर निशा से पूछा, ‘‘बोलो, साथ चलोगी या नहीं?’’

‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगी, छोड़ो मुझे.’’

निशा ने खुद को उस के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की तो वह आपा खो बैठा और पलक झपकते चाकू से उस की गर्दन पर घातक वार कर दिया. निशा फर्श पर गिर पड़ी और कुछ ही सैकेंड में उस ने दम तोड़ दिया. शीला चीखीचिल्लाईं तो आसपास के लोग आ गए. लेकिन मुकेश हाथ में चाकू लिए कुर्सी डाल कर वहीं बेखौफ हो कर बैठ गया और सब को धमकाने लगा. उस की धमकी से डर कर कोई उसे पकड़ने का साहस नहीं कर सका. उस के बाद सूचना पा कर पुलिस आ गई.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन मुकेश को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. निशा उस के प्यार में न पड़ी होती और अपने बहके कदमों को वक्त रहते संभाल लिया होता तो यह नौबत कभी न आती. मुकेश ने भी निशा को जबरन हासिल करने की कोशिश न की होती तो उस का भविष्य चौपट न होता. अब उस की जिंदगी जेल में ही कटेगी. Haryana Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Real Crime Story: बेवफाई का ऐसा सिला

Real Crime Story: शिवप्रसाद सचमुच अर्शली को बहुत प्यार करता था. यही वजह थी कि उस ने उस के लिए अपने घर वालों तक से बगावत कर दी थी. यही नहीं, अपनी सारी कमाई भी उस पर लुटा दी थी. इस के बावजूद जब अर्शली ने उस से किनारा कर लिया तो प्रेमिका की यह बेवफाई उस से बरदाश्त नहीं हुई और…

सपना 22 वर्षीया अर्शली लौरेंस उर्फ जैनी उर्फ छोटी को बेटी की तरह मानती थी. जब वह उसे 2 दिनों से दिखाई नहीं दी तो उसे चिंता हुई. अर्शली की मां सोफिया भी नजर नहीं आ रही थी. उन के कमरे में बाहर से ताला बंद था. उन की स्कूटी भी गैलरी में नहीं थी. उन का फोन भी बंद था. सपना की समझ में नहीं आ रहा था कि मांबेटी बिना बताए कहां चली गईं. जबकि इस से पहले वे जब भी कहीं बाहर जाती थीं, बता कर जाती थीं. यही नहीं, घर की चाबी दे कर सारी जिम्मेदारी भी उसे ही सौंप जाती थीं.

सपना किन्नर थी और अपनी साथी बौबी के साथ सोफिया के मकान की पहली मंजिल पर किराए पर रहती थी. वह सुबह निकलती थी तो शाम को ही घर आती थी. 3 अप्रैल की दोपहर सपना घर से निकलने लगी तो सोफिया के कमरे से उसे दुर्गंध सी आती महसूस हुई. उस ने खिड़की के पास खड़ी हो कर लंबी सांस ली तो उसे लगा कमरे से मांस के सड़ने की दुर्गंध आ रही है. उस की समझ में नहीं आया कि सोफिया के कमरे से इस तरह की दुर्गंध क्यों आ रही है? चूंकि मांबेटी 3 दिनों से गायब थीं, इसलिए सपना को किसी अनहोनी की आशंका हुई. इस के बाद उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया.

चूंकि यह इलाका थानाकोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने इस की सूचना थानाकोतवाली शाहपुर पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही कोतवाली  प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला एसआई विमलेंद्र कुमार, देवेंद्र कुमार सिंह, सिपाही मनीष सिंह, राजीव शुक्ला, रामविनय, रामनिहाल, संतोष कुमार और शिवानंद उपाध्याय को साथ ले कर बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा स्थित सोफिया लौरेंस के घर पहुंच गए.

चूंकि मोहल्ले वालों को अभी तक कुछ पता नहीं था, इसलिए एकाएक इतने पुलिस वालों को देख कर सब हैरान रह गए. सभी अपनेअपने घरों से निकल कर बाहर आ गए. सपना घर के बाहर ही खड़ी थी. पुलिस वालों ने उस से बात की तो उस ने जो आशंका व्यक्त की, सुन कर पुलिस वालों को भी किसी अनहोनी की आशंका हुई. दरवाजे पर ताला लगा था. आनंद प्रकाश शुक्ला ने दरवाजा खोलने से पहले घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो थोड़ी ही देर में सीओ अभय कुमार मिश्र, एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, एसएसपी अनंतदेव के अलावा कई थानों के थानाप्रभारी भी पुलिस बल के साथ वहां आ गए. इन्हीं के साथ फोरैंसिक टीम भी आ गई थी.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में सोफिया के कमरे के दरवाजे पर लगे ताले को तोड़ कर दरवाजा खोला गया तो तेज दुर्गंध बाहर निकली. दरवाजे के पास खड़े पुलिस अधिकारी पीछे हट गए. थोड़ी देर में दुर्गंध थोड़ी कम हुई तो नाक पर रूमाल रख कर पुलिस अधिकारी कमरे में घुसे. सामने ही बैड पर 2 महिलाओं की लाशें कंबल से ढकी पड़ी थीं. दोनों ही लाशें बुरी तरह से सड़ चुकी थीं. कमरे का सामान यथावत था. बिस्तर पर खून बहा था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों महिलाओं की हत्या की गई थी.

लाशें बुरी तरह सड़ चुकी थीं, इसलिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि हत्याएं कैसे की गई थीं. पूछने पर पता चला कि मरने वाली दोनों महिलाएं मांबेटी थीं. उस समय उन का वहां अपना कोई नहीं था. इसलिए पुलिस ने किराएदार सपना की उपस्थिति में घर की तलाशी ली. घर के आंगन के एक कोने में शराब और बीयर की तमाम बोतलें पड़ी थीं. पूछने पर पता चला कि मांबेटी दोनों शराब और बीयर पीती थीं. चूंकि वे क्रिश्चियन थीं, इसलिए पुलिस के लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. पुलिस ने कमरे में मांबेटी के मोबाइल फोन तलाशे तो वे गायब मिले. इस के अलावा सपना ने बताया था कि उन की स्कूटी थी, जो गैलरी में खड़ी रहती थी, वह भी नहीं थी. इस से पुलिस को लगा कि हत्यारा दोनों के मोबाइल फोन के अलावा स्कूटी भी ले गया था.

फोरैंसिक टीम ने अपना काम निबटा लिया तो पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया. उस समय वहां मृतका सोफिया और उस की बेटी अर्शली के बारे में बताने वाला उन का कोई नहीं था. सोफिया की सास मरियम 3 महीने पहले बड़ी पोती एलिना की हत्या हो जाने के बाद अपनी बेटी सन्नो के पास जौनपुर चली गई थीं. इसलिए इन दोनों हत्याओं की रिपोर्ट किराएदार किन्नर सपना की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई.

मामला गंभीर था, इसलिए इस के खुलासे के लिए एसएसपी अनंतदेव ने अपने औफिस में एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, सीओ अभय कुमार मिश्र, कोतवाली शाहपुर के प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला और क्राइम ब्रांच की एक मीटिंग बुलाई. मीटिंग में उन्होंने हेमराज मीणा के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस ने सीओ अभय कुमार मिश्र की देखरेख में मामले की जांच शुरू की. जांच के लिए पुलिस टीम घटनास्थल पर दोबारा पहुंची तो पता चला कि मकान के भूतल पर सोफिया लौरेंस अपनी बेटी अर्शली के साथ रह रही थीं, जबकि पहली मंजिल के 2 कमरों में एक में किन्नर सपना और बौबी रहती थीं तो दूसरे कमरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी.

इन किराएदारों को सोफिया की सास मरियम लौरेंस ने रखा था. जबकि इस समय मरियम जौनपुर में अपनी बेटी सन्नो लौरेंस के पास थीं. यह भी पता चला कि मरियम लौरेंस की बड़ी पोती यानी मृतका सोफिया की बड़ी बेटी एलिना लौरेंस की 7-8 दिसंबर, 2015 की रात संदिग्ध परिस्थितियों में जहरीला पदार्थ खाने से मौत हो गई थी. वह मोहल्ले के ही अभिषेक मधई से 7 सालों से प्रेम करती आ रही थी. अभिषेक भी उसे प्यार करता था. मरने से 3 महीने पहले वह अभिषेक के साथ लिवइन रिलेशन में रहने उस के घर चली गई थी. यह बात अभिषेक के पिता मोटीन मधई और मां अर्चना लौरेन को पसंद नहीं थी. इसलिए वे बेटे अभिषेक और एलिना को ताने मारते रहते थे.

7 दिसंबर, 2015 की रात अभिषेक और एलिना रात 9 बजे के करीब घर लौटे तो उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे शराब पिए हुए हैं. रात के 3 बजे के करीब अभिषेक के कमरे में किसी चीज के गिरने की तेज आवाज आई तो अर्चना की नींद टूट गई. भाग कर वह अभिषेक के कमरे में पहुंची तो वह बैड पर औंधे मुंह पड़ा उल्टियां कर रहा था, जबकि एलिना फर्श पर निढाल पड़ी थी. पूछने पर अभिषेक ने बताया कि दोनों ने जहरीला पदार्थ खा लिया है.

बेटे की बात सुन कर अर्चना बुरी तरह डर गईं. उस ने पति को जगा कर सारी बात बताई. पतिपत्नी ने तड़पती एलिना को वहीं छोड़ दिया और बेटे को ले कर अस्पताल चले गए. डाक्टरों ने अभिषेक को तो बचा लिया, लेकिन घर में पड़ी एलिना ने दम तोड़ दिया. एलिना की मौत की खबर मरियम और सोफिया को मिली तो वे सन्न रह गईं. पोती की आकस्मिक मौत से मरियम लौरेंस को गहरा सदमा लगा. सोफिया और मरियम ने कोतवाली शाहपुर में मुकदमा दर्ज कराया कि अभिषेक के घर वालों ने एलिना की हत्या की है. मुकदमा दर्ज होने के बाद कोतवाली पुलिस ने एलिना की हत्या के जुर्म में अभिषेक को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

इस के बाद पुलिस यह पता लगाने लगी कि सोफिया के घर किनकिन लोगों का आनाजाना था. इसी बात की जानकारी जुटाने में पुलिस को पता चला कि मोहल्ले के रहने वाले मिंटू के दोस्त शिवप्रसाद का उस के घर काफी आनाजाना था. लोगों का यह भी कहना था कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे. पुलिस ने मिंटू से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे. हत्याएं उस ने की हैं या किसी और ने, इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकता. पुलिस मिंटू को साथ ले कर आम बाजार स्थित शिवप्रसाद के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया.

पुलिस वालों को देख कर जहां शिवप्रसाद के घर वाले हैरान थे, वहीं उस ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास था कि आप लोग जल्दी ही मेरे घर आने वाले हैं. इसीलिए मैं घर छोड़ कर कहीं गया नहीं. क्योंकि अगर मैं घर छोड़ कर कहीं भाग जाता तो आप लोग मेरे घर वालों को परेशान करते. आप लोगों को बता दूं कि मैं ने ही सोफिया और अर्शली की हत्या की है.’’

शिवप्रसाद की बातें हैरान करने वाली थीं. पुलिस को लगा, कहीं यह पागल तो नहीं है. इसलिए उन्हें उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. पुलिस को उस की बातों पर यकीन तब हुआ, जब उस ने अर्शली की स्कूटी, सोफिया तथा अर्शली के मोबाइल फोन और लोहे की वह रौड तथा धारधार रेडियम वाला चाकू बरामद करा दिया, जिस से अर्शली और सोफिया की हत्या की गई थी. आम लोगों के लिए यह हैरान करने वाली ही बात थी. शायद ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई कातिल घर में बैठ कर पुलिस के आने का इंतजार कर रहा था. आनंद प्रकाश शुक्ल शिवप्रसाद और बरामद सामान ले कर कोतवाली आ गए और हत्यारे की गिरफ्तारी की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी.

अधिकारियों की उपस्थिति में शिवप्रसाद ने अर्शली और सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह प्रेम में धोखा खाने के बाद बदला लेने की कहानी थी. अगले दिन 4 अप्रैल को एसएसपी अनंतदेव ने पुलिस लाइंस के मनोरंजन कक्ष में पत्रकारवार्ता आयोजित कर शिवप्रसाद को पत्रकारों के सामने पेश किया तो प्रेमिका की बेवफाई की जो कहानी उस ने पुलिस को बताई थी, वही कहानी पत्रकारों को भी सुना दी. सीधेसादे शिवप्रसाद ने हालात और परिस्थितियों के हाथों मजबूर हो कर प्रेमिका अर्शली और उस की मां सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की थानाकोतवाली शाहपुर के बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा में ज्यादातर ईसाई रहते हैं. इसी मोहल्ले में मरियम लौरेंस भी रहती थी. उन की 2 संतानें थीं, बेटा एलिसिएंस लौरेंस उर्फ पन्नो तथा बेटी सन्नो. मरियम लौरेंस रेलवे अस्पताल में नर्स थीं. उन के पति की बहुत पहले मौत हो चुकी थी. पति की मौत के बाद उन्होंने ही बेटे और बेटी को पालपोस कर बड़ा किया था. पन्नो बड़ा हुआ और उस में दुनियादारी की समझ आई तो उस ने परिवार का सहारा बनना चाहा. मरियम ने अपनी मेहनत की बदौलत काफी चलअचल संपत्ति जुटा रखी थी. पन्नो ने नौकरी करने के बजाय घर के सामने पड़ी अपनी खाली जमीन पर आटा चक्की लगा ली. उस की मेहनत रंग लाई और उस की आटा चक्की चल निकली.

लेकिन जब पन्नो के पास पैसे आए तो एकाएक उस के दोस्तों की संख्या बढ़ गई. इन्हीं दोस्तों की वजह से उसे शराब पीने की बुरी लत लग गई. जब इस की जानकारी मरियम को हुई तो बेटे को लाइन पर लाने के लिए उन्होंने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी. पर पन्नो पर इस सब का कोई असर नहीं हुआ. धीरेधीरे पन्नो की लत बढ़ती गई और उस की आटा चक्की की सारी कमाई शराब में उड़ने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि आटा चक्की बंद हो गई.

मरियम बेटे की आदत से परेशान रहने लगी थीं. उसे सुधारने की उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. आखिर में उन्हें एक रास्ता उस की शादी कर देना नजर आया. मरियम ने खूब सोचसमझ कर उस की शादी सोफिया लौरेंस से कर दी. इस के बाद बेटी सन्नो की शादी जौनपुर में कर के वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गईं. शादी के बाद पन्नो पर गृहस्थी का बोझ पड़ा तो उस ने आटा चक्की की जगह जनरल स्टोर खोल लिया. उस की दुकान चल निकली और ठीकठाक कमाई होने लगी. पन्नो को सोफिया से 2 बेटियां हुई एलिना और अर्शली. इस तरह भरापूरा परिवार हो गया. पोतियों के साथ मरियम का भी समय आराम से कटने लगा.

चूंकि एलिना पहली संतान थी, इसलिए मरियम उसे कुछ ज्यादा ही प्यार करती थीं. अर्शली छोटी थी, इसलिए वह मांबाप को ज्यादा प्यारी थी. वे उसे प्यार से जैनी कहते थे. एलिना और अर्शली बड़ी हुईं तो उन की खूबसूरती में निखार आ गया. दोनों बहनें थीं भी बला की खूबसूरत. पन्नो की बेटियां बड़ी हो रही थीं, जिस से घर का खर्च बढ़ रहा था, लेकिन उस की कमाई घटती जा रही थी. इस की सब से बड़ी वजह थी पन्नो की शराब पीने की आदत. अब तो उस के साथ सोफिया भी बीयर पीने लगी थी. रोजाना शाम को पतिपत्नी शराब और बीयर की बोतलें ले कर बैठ जाते, इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे दुकान की पूजी शराब में उड़ती गई.

मरियम पोतियों का वास्ता दे कर बेटेबहू को समझातीं तो वे उन की बात समझने के बजाय डांट कर उन्हें ही चुप करा देते. जब उन्होंने देखा कि उन की बातों का बेटे और बहू पर कोई असर नहीं हो रहा है तो चुप रहने में ही वह अपनी भलाई समझने लगीं. बेटेबहू के व्यवहार से वह बहुत दुखी रहती थीं. पन्नो की कमाई का एक मात्र जरिया दुकान थी. धीरेधीरे दुकान खाली हो गई. इस तरह कमाई का रास्ता बंद हो गया. बेटियां बड़ी हो रही थीं, उन के भी खर्चे थे. पन्नो और सोफिया को चिंता सताने लगी कि परिवार का खर्च कैसे चलेगा. सोचविचार कर पन्नो ने एक औटो खरीद लिया और उसे चलाने लगा.

उसी बीच एलिना अपने घर के पीछे रहने वाले अभिषेक मधई को दिल दे बैठी. उस समय एलिना 17 साल की थी. दोनों छिपछिप कर मिलने लगे. उन के इस प्यार की जानकारी सिर्फ अर्शली को थी. सोफिया के मकान के बगल में मिंटू रहता था. चूंकि मिंटू सोफिया का पड़ोसी था, इसलिए वह उस के घर भी आताजाता था. मिंटू का दोस्त था शिवप्रसाद, जो कोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आने वाले आम बाजार के रहने वाले रामप्रसाद का बेटा था. रामप्रसाद रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, लेकिन नौकरी से रिटायर हो चुके थे, इसलिए घर खर्च चलाने के लिए शिवप्रसाद औटो चलाता था. उस के परिवार में पिता और 2 बहनें थीं.

मिंटू के यहां आनेजाने में शिवप्रसाद की नजर खूबसूरत अर्शली पर पड़ी तो वह उसे भा गई. उस ने उस के बारे में मिंटू से पूछा तो उस ने उस के बारे में उसे सब कुछ बता दिया. अर्शली शिवप्रसाद को इतनी पसंद आ गई कि ईसाई होने के बावजूद वह उसे दिल दे बैठा. मिंटू के जरिए दोनों का परिचय हुआ तो जल्दी ही उन में दोस्ती हो गई. उन की यह दोस्ती प्यार में बदली तो उन का यह प्यार जुनूनी हो गया. हालत यह हो गई कि दोनों ही रातदिन एकदूसरे के खयालों में खोए रहने लगे. यह करीब 3 साल पहले की बात है.

उसी बीच सोफिया पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. शराब पीने से खोखले हो चुके पन्नो की अचानक मौत हो गई. पति की मौत से जहां सोफिया टूट गई, वहीं अर्शली को भी पिता की मौत का गहरा सदमा लगा था. लेकिन दुख की इस घड़ी में शिवप्रसाद साया की तरह हर घड़ी उस के साथ खड़ा ही नहीं रहा, बल्कि हर तरह से उस की मदद भी की.

उन्हीं दिनों शिवप्रसाद का मकान बन रहा था. उस के पिता रामप्रसाद ने मकान बनवाने के लिए उसे ढाई लाख रुपए दिए थे. अर्शली के प्यार में पागल शिवप्रसाद ने सारे रुपए उस पर लुटा दिए. इन पैसों को ले कर बापबेटे में खूब झगड़ा भी हुआ, लेकिन रामप्रसाद कर ही क्या सकते थे. एकलौती औलाद थी, घर से भी तो नहीं निकाल सकते थे. शिवप्रसाद औटो से जो कमाता था, अर्शली पर खर्च करता था. पिता की मौत के बाद अर्शली की पढ़ाई छूट गई थी. शिवप्रसाद ने उस का दाखिला कराया, इस साल उस ने 12वीं की परीक्षा दी थी, परीक्षा का परिणाम अभी आया नहीं था.

पन्नो की मौत के बाद कमाई का कोई जरिया नहीं रहा तो मरियम ने अपने मकान की पहली मंजिल पर बने 2 कमरों को किराए पर उठा दिया, जिस से सोफिया और अर्शली का खर्च निकल सके. एक कमरे में किन्नर सपना और बौबी रहती थी, जबकि दूसरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी. इसी किराए और मरियम की पेंशन से घर का खर्च चल रहा था. एलिना और अभिषेक का प्रेमप्रसंग पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गया था. इस की वजह यह थी कि बिना ब्याह के ही एलिना प्रेमी के घर रहने चली गई थी, लेकिन 3 महीने बाद ही प्रेमी के घर जहर खाने से एलिना की मौत हो गई. सोफिया ने बेटी की हत्या का आरोप लगा कर अभिषेक को जेल भिजवा दिया.

एलिना की मौत से मरियम को ऐसा आघात लगा कि वह बीमार रहने लगीं. उन की हालत दिन पर दिन बिगड़ती गई तो मां की हालत देख कर सन्नो उन्हें अपने साथ जौनपुर ले गई. मरियम के जाने के बाद घर में सोफिया और अर्शली ही रह गईं. सोफिया को अर्शली और शिवप्रसाद के रिश्ते की जानकारी थी. एलिना की मौत के बाद वह डर गई कि अर्शली के साथ भी कहीं वैसा ही हो गया तो उस का एकमात्र सहारा छिन जाएगा. इस के बाद उस ने एलिना का उदाहरण दे कर अर्शली को समझा कर कहा कि अब उस की शादी उस के पसंद के लड़के के साथ होगी.

अर्शली ने मां की भावना का आदर करते हुए वादा किया कि अब वह उन की मर्जी के खिलाफ कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें परेशानी हो. मां से किए वादे के अनुसार अर्शली ने शिवप्रसाद से अचानक बातचीत बंद कर दी. उस ने उस से कह भी दिया कि वह उस का पीछा करना छोड़ दे. अगर उस ने उस का पीछा नहीं छोड़ा तो वह उस की शिकायत पुलिस से कर देगी. अब वह वहीं शादी करेगी, जहां मां कहेंगी.

अचानक अर्शली में आए इस बदलाव से शिवप्रसाद हैरान रह गया. उस की समझ में नहीं आया कि अर्शली ने अचानक उस से मुंह क्यों मोड़ लिया? वह जब भी उस से बात करने की कोशिश करता, अर्शली पुलिस की धमकी दे कर उसे चुप करा देती. अर्शली की यह बेवफाई शिवप्रसाद को शूल बन कर चुभने लगी. शिवप्रसाद ने अर्शली से प्यार ही नहीं किया था, बल्कि उस पर लाखों रुपए खर्च भी किए थे. एक तरह से उस ने अर्शली के लिए खुद को बरबाद कर लिया था.  घरपरिवार से उस के लिए बगावत की थी. ऐसे में भला वह कैसे चाहता कि अर्शली किसी और की हो जाए.

शायद यही सोच कर शिवप्रसाद ने तय कर लिया कि अर्शली अगर उस की नहीं तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. सोफिया ने अर्शली को उस से दूर किया था, इसलिए शिवप्रसाद की नजरों में असली गुनहगार वही थी. अर्शली को पाने के लिए शिवप्रसाद पागल था. एक दिन वह बहुत बेचैन हुआ तो ‘रौकी हैंडसम’ फिल्म देखने चला गया. फिल्म में हत्या का एक सीन दिखाया गया था, जिस में रेडियम (चमकदार) चाकू से अंधेरे में हत्या की गई थी. फिर क्या था, शिवप्रसाद ने उसी वक्त तय कर लिया था कि उसे क्या करना है.

उस रात वह बिना कुछ खाएपिए ही सो गया. अगले दिन वह कोतवाली शाहपुर के असुरन चौक की एक दुकान से रेडियम वाला चाकू खरीद लाया. 29 मार्च की रात 11 बजे वह अर्शली के घर के पिछवाड़े से छत पर जा कर छिप गया. चूंकि तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए उसे छत पर चढ़ते किसी ने नहीं देखा था. सोफिया और अर्शली रात में सोने से पहले बीयर पीती थीं. उस रात भी मांबेटी ने बीयर पी और खाना खा कर एक ही बैड पर सो गईं. यह बात शिवप्रसाद को पता थी. शिवप्रसाद रात गहराने की प्रतीक्षा करता रहा. रात 3 बजे वह दबे पांव सीढि़यों से नीचे उतरा और सीधे सोफिया के कमरे में जा पहुंचा.

मांबेटी को एक ही बैड पर सोई देख कर उस ने कमरे के एक कोने में रखी लोहे की रौड उठाई और सोफिया के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए. सोफिया चीखी तो अर्शली उठ कर बैठ गई और चिल्लाने लगी. शिवप्रसाद डर गया और उस ने अपने बचाव के लिए चाकू से अर्शली के पेट में ताबड़तोड़ कई वार कर दिए. अर्शली तड़पने लगी तो उस ने खून सने हाथों से उस का गला दबा दिया. मांबेटी मर चुकीं थीं. उन के ऊपर कंबल डाल कर उस ने बैड पर रखे दोनों के मोबाइल फोन उठा कर जेब में डाल लिए.

शिवप्रसाद ने गैलरी में रखी स्कूटी बाहर निकाली और दरवाजे पर ताला बंद कर के उसी स्कूटी से अपने घर चला गया. वह करीब 4 बजे अपने घर पहुंचा और इत्मीनान से सो गया. वह सुबह उठा तो भी घर छोड़ कर कहीं नहीं गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने शिवप्रसाद को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस तरह पुलिस ने 12 घंटे में ही हत्यारोपी शिवप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया था. इस के लिए एसएसपी अनंतदेव ने शिवप्रसाद को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

शिवप्रसाद ने जो किया, शायद अब उसे पछतावा हो रहा होगा. लेकिन अब वह कर ही क्या सकता है. उस की अब बाकी की जिंदगी तो जेल में ही बीतनी है. दुख की बात तो यह है कि सोफिया और अर्शली का अंतिम संस्कार भी करने वाला कोई नहीं था. उन का अंतिम संस्कार पुलिस ने किया था. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Kidnaping Case: छोटी उम्र के बड़े खिलाड़ी

Kidnaping Case: अपहरण कांड के खुलासे के लिए पुलिस की 15 टीमों ने लगभग 7 सौ लोगों से पूछताछ की और 3 लाख रुपए के इनाम की भी घोषणा की. आखिर 2 महीने बाद जब मामला खुला तो पता चला कि अपहर्त्ता पेशेवर नहीं, नौसिखिए थे, जिन्होंने टीवी शो देख कर योजना बनाई थी.

अंकित गुप्ता उत्तरपूर्वी दिल्ली के विक्टोरिया पब्लिक स्कूल में 12वीं में पढ़ता था. 11 फरवरी, 2016 को उस का फिजिकल एजुकेशन का प्रैक्टिकल था. प्रैक्टिकल देने के लिए वह नियत समय से पहले बाबरपुर स्थित अपने घर से बाइक ले कर स्कूल के लिए निकला. जैसे ही वह स्कूल पहुंचा, उसे जानकारी मिली कि स्कूल की टीचर चांदनी के पति की मौत हो गई है.

चांदनी अंकित की प्रिय टीचर थीं, इसलिए दोपहर एक बजे प्रैक्टिकल खत्म हो जाने के बाद वह अपने एक दोस्त के साथ शालीमार गार्डन स्थित चांदनी के घर चला गया. उसी समय उस के पिता अनिल गुप्ता को बाइक से कहीं जाना था. उन्होंने अंकित को फोन कर के पूछा कि वह कितनी देर में घर पहुंच रहा है. तब अंकित ने बताया कि वह शाम 4 बजे तक घर पहुंच जाएगा.

अपनी टीचर के यहां संवेदना प्रकट करने के बाद अंकित शाम 4 बजे अपने घर पहुंच गया. स्कूल की ड्रैस चेंज करने के बाद वह खाना खा रहा था, तभी उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया. फोन पर बात करने के बाद अंकित ने फटाफट खाना खाया और अपनी मां मीरा गुप्ता से बोला, ‘‘मम्मी, मैं कहीं जा रहा हूं और एकडेढ़ घंटे में आ जाऊंगा.’’ इतना कह कर वह खुश होता हुआ पैदल ही घर से निकल गया.

उत्तरपूर्वी दिल्ली के बाबरपुर की गली नंबर 2 में रहने वाले अनिल गुप्ता के 4 बेटों और एक बेटी में अंकित सब से छोटा था. अनिल गुप्ता स्क्रैप व्यापारी थे. उन की अच्छीखासी आमदनी थी, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाया. उन के परिवार का रहनसहन भी अच्छा था. अनिल एकडेढ़ घंटे में घर आने की बात कह कर गया था, लेकिन वह रात 9 बजे तक नहीं आया. वैसे भी वह अपने दोस्तों के साथ कहीं जाता था तो 8-9 बजे तक घर आ जाता था. पर उस दिन वह नहीं आया तो उस की मां ने उस का नंबर मिलाया तो नंबर नहीं मिला. उस का फोन कंप्यूटर द्वारा बंद बताया. अंकित के पास 2 फोन थे, जिन में 3 सिमकार्ड थे. उन्होंने उस के तीनों नंबरों पर बात करने की कोशिश की, लेकिन तीनों ही नंबर स्विच्ड औफ मिले.

अनिल गुप्ता उस समय सोनिया विहार स्थित अपनी दुकान पर थे. मीरा ने फोन कर के उन्हें भी अंकित के घर न लौटने की जानकारी दे दी. अनिल गुप्ता ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया. उन्होंने कहा कि अपने यारदोस्तों के साथ कहीं गपशप मार रहा होगा, जिस की वजह से उस ने अपने फोन बंद कर दिए होंगे या फिर बैटरी डिस्चार्ज हो गई होगी. पति से बात करने के बाद मीरा ने भी सोचा कि अंकित इतना नासमझ नहीं है. थोड़ीबहुत देर में आ ही जाएगा.

अनिल गुप्ता अपनी दुकान बंद कर के घर लौट आए. तब तक अंकित घर नहीं लौटा था. उन्होंने बेटे को कई बार फोन किए, लेकिन उस के फोन बंद ही आ रहे थे. पता नहीं वह कहां चला गया, जो अभी तक नहीं आया, वह बुदबुदा रहे थे. बेटे के जितने दोस्तों को वह जानते थे, उन में से जिनजिन के फोन नंबर उन्हें मिले, उन से उन्होंने बात की. दोस्तों ने यही बताया कि अंकित उन्हें स्कूल में ही मिला था, उस के बाद उन्होंने उसे नहीं देखा. अब तक रात काफी हो चुकी थी. लिहाजा उन्होंने उसे सुबह ढूंढने का फैसला लिया.

अनिल और उन की पत्नी को बेटे की चिंता में रात भर नींद नहीं आई. वह यही सोचते रहे कि पता नहीं अंकित कहां और किस हालत में होगा. सुबह होते ही अनिल अपने छोटे भाई संजीव के साथ बेटे को ढूंढने निकल गए. घरपरिवार के लोग उसे संभावित जगहों पर तलाश करने लगे. दोपहर हो गई लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

दोपहर बाद 2 बजे के करीब अनिल गुप्ता संजीव को ले कर थाना वेलकम पहुंच गए. थानाप्रभारी प्रशांत कुमार को उन्होंने बेटे के गायब होने की बात बताई. अनिल गुप्ता थानाप्रभारी से बात कर ही रहे थे कि उसी समय उन के फोन की घंटी बजी. जैसे ही उन्होंने काल रिसीव की, दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘तुम्हारा लड़का हमारे कब्जे में है. यदि उसे जिंदा चाहते हो तो एक करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो.’’ कहने के बाद उस ने फोन काट दिया.

बेटे के अपहरण की बात सुन कर अनिल घबरा गए. उन्होंने कई बार ‘हैलोहैलो’ कहा, लेकिन वह काल डिसकनेक्ट की चुकी थी. जिस नंबर से वह काल आई थी, अनिल ने वह नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. घबराते हुए उन्होंने थानाप्रभारी को बताया, ‘‘सर, मेरे बेटे का किसी ने अपहरण कर लिया है. अभीअभी किसी ने फोन कर के मुझ से एक करोड़ रुपए मांगे हैं. मेरे बेटे को उन लोगों के चंगुल से छुड़ा लीजिए सर.’’

अनिल गुप्ता की बात सुन कर थानाप्रभारी प्रशांत कुमार भी हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत उन का मोबाइल ले कर उस फोन नंबर को नोट किया, जिस से उन्हें फोन किया गया था. वह नंबर 750363333 एयरसेल कंपनी का था. मामला बेहद गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसीपी शाहदरा और डीसीपी ए.के. सिंगला को दी. उन के निर्देश पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 363 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

डीसीपी ए.के. सिंगला ने शाहदरा क्षेत्र के एसीपी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी प्रशांत कुमार, अतिरिक्त थानाप्रभारी हरेंद्र सिंह, एसआई तेजबीर सिंह, हेडकांस्टेबल पूनमरानी, कांस्टेबल रामप्रसाद आदि को शामिल किया गया.

अपहरण के मामले बड़े ही संवेदनशील होते हैं. इस में पुलिस की यही कोशिश रहती है कि किसी भी तरह अपहृत शख्स को सुरक्षित बरामद किया जाए. पुलिस टीम ने सब से पहले एयरटेल के उस नंबर की जांच करवाई, जिस से फिरौती की काल की गई थी. जांच में पता चला कि वह नंबर वेस्ट ज्योतिनगर के किसी आदमी के नाम से लिया गया था और फिरौती की काल वैशाली, गाजियाबाद इलाके से की गई थी. तुरंत ही 2 पुलिस टीमें उक्त दोनों जगहों पर भेज दी गईं.

वहां जा कर पता चला कि जिस व्यक्ति के नाम पर यह सिमकार्ड खरीदा गया था, उस नाम का कोई शख्स वेस्ट ज्योतिनगर वाले पते पर नहीं रहता था. इस का मतलब अपहर्त्ता ने फरजी आईडी पर वह नंबर खरीदा था. लिहाजा यह टीम वापस आ गई. जो टीम वैशाली गई थी, उसे भी कोई सफलता नहीं मिली, लिहाजा वह भी लौट आई. जिस वक्त पुलिस जांच में लगी थी, उसी दौरान सवा 2 और ढाई बजे के बीच अनिल गुप्ता के मोबाइल पर अपहर्त्ताओं ने 2 बार और फोन किए. उन में भी यही कहा कि पैसों का इंतजाम जितनी जल्दी कर लोगे, उतना ही अच्छा रहेगा. अनिल ने अपहर्त्ता से कहा कि यह रकम बहुत बड़ी है, इंतजाम करने में टाइम तो लगेगा ही. उन्होंने उस से अनुरोध किया कि वह पैसों का इंतजाम कर देंगे, लेकिन बेटे को कुछ न कहें.

अनिल ने यह जानकारी भी पुलिस को दे दी. अपहर्त्ताओं के पास जाने का पुलिस के पास कोई जरिया नहीं था. पुलिस ने अंकित के मांबाप से फिर से बात की. पुलिस ने उन से अंकित के दोस्तों के बारे में जानकारी हासिल की. पता चला कि अंकित स्कूल से लौटने के बाद दोस्तों के साथ क्रिकेट और मौल में पूल खेलने जाता था. जिन दोस्तों के साथ वह यह खेल खेलता था, पुलिस ने उन दोस्तों की भी लिस्ट बनाई. इस के अलावा उन्होंने अनिल से यह भी मालूम किया कि उन्हें किसी पर कोई शक तो नहीं है.

अनिल गुप्ता ने किसी पर कोई शक नहीं जताया, तब पुलिस ने अंकित के दोस्तों से ही जांच शुरू की. एकएक कर उस के साथ पूल और क्रिकेट खेलने वाले बच्चों से पूछताछ की गई, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. अंकित के पास जो 3 फोन नंबर थे, उन तीनों की काल डिटेल्स निकलवाई गई. इस से पता चला कि उस के पास आखिरी बार 880233333 नंबर से काल आई थी. इसी नंबर से आई काल के बाद वह घर से गया था. इतना ही नहीं, इस फोन नंबर पर अंकित की 11 फरवरी को 7 बार और 8 फरवरी को 3 बार बात हुई थी. इस से पहले इस नंबर से अंकित को कोई काल नहीं आई थी.

फोन नंबर हासिल होने पर पुलिस को उम्मीद की किरण दिखाई दी. जांच करने पर पता चला कि यह नंबर अशोकनगर के किसी आदमी का है. फौरन एक टीम अशोकनगर में उस पते पर भेज दी गई. लेकिन वहां जा कर पता चला कि यह सिम भी फरजी आईडी से लिया गया था. लिहाजा पुलिस टीम बैरंग लौट आई. पुलिस उस डीलर के पास पहुंची, जिस की मार्फत इस नंबर को एक्टिवेट कराया गया था. वह दुकानदार कबीरनगर का दानिश था. दानिश से पूछताछ के बाद पता चला कि उस ने फरजी आईडी से यह फोन नंबर एक्टिवेट करा रखा था. लेकिन इस नंबर को उस ने किसे बेचा, यह नहीं बता पाया. चूंकि उस ने फरजी आईडी से सिम एक्टिवेट करा कर के गैरकानूनी काम किया था, इसलिए पुलिस ने उस के खिलाफ काररवाई कर के उसे जेल भेज दिया.

अगले दिन दोपहर बाद 2 बजे अनिल के मोबाइल पर अपहर्त्ता का फिर फोन आया. इस बार उस ने धमकी दी, ‘‘पैसे जल्दी इकट्ठे कर लो, वरना तुम्हारे बेटे को मार दिया जाएगा.’’

‘‘नहीं…नहीं, बेटे को कुछ नहीं कहना, मैं पैसों का जुगाड़ कर रहा हूं.’’ अनिल गुप्ता ने अनुरोध करते हुए कहा, लेकिन उन की बात सुनने से पहले ही अपहर्त्ता ने फोन काट दिया. अपहर्त्ता अपनी बात कहने के बाद फोन काट देता था. पुलिस ने जांच की तो पता चला कि इस बार अपहर्त्ता के फोन की लोकेशन नवीन शाहदरा की आ रही थी. नवीन शाहदरा में किस जगह से उस ने काल की थी, यह पता लगाना आसान नहीं था.

उधर अंकित की चिंता में घर वाले तो परेशान हो ही रहे थे, साथ ही पुलिस की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. क्योंकि उसे ऐसा कोई क्लू नहीं मिल रहा था, जिस से अपहर्त्ताओं के पास पहुंचा जा सके. फिर भी पुलिस अपने हिसाब से काररवाई कर रही थी.

उसी दिन शाम 7 बजे अंकित के ही मोबाइल पर अपहर्त्ता ने फिर से फोन किया, ‘‘पैसों का इंतजाम हुआ या नहीं?’’

‘‘कर रहे हैं. अभी भी मैं पैसों के लिए ही किसी के पास जा रहा हूं.’’ अनिल ने कहा.

‘‘पुलिस को खबर करने की भूल मत करना, वरना…’’ अपहर्त्ता ने चेतावनी दी.

‘‘नहीं, मैं पुलिस को कुछ नहीं बताऊंगा. लेकिन मेरे बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए.’’ अनिल ने कहा पर अपहर्त्ता ने जवाब दिए बिना ही फोन काट दिया.

इस बार अपहर्त्ता के फोन की लोकेशन जीटी रोड, शाहदरा की आ रही थी. पुलिस ने जीटी रोड शाहदरा और नवीन शाहदरा में सड़कों के किनारे जहांजहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे, उन सभी की फुटेज निकलवा कर फोन करते हुए अपहर्त्ता की रिकौर्डिंग ढूंढनी चाही. इस काम में कई पुलिसकर्मियों को लगाया गया, पर पुलिस को ऐसी फुटेज नहीं मिली.

14 फरवरी की शाम को अपहर्त्ता ने अनिल को फोन कर के पैसों के इंतजाम के बारे में पूछा तो अनिल ने बताया कि अभी तक 20 लाख का ही इंतजाम हो पाया है. इस पर अपहर्त्ता ने कहा कि एक बैग में पैसे रख कर बाइक से भजनपुरा रेडलाइट पहुंच जाओ. ध्यान रखना कि साथ में पुलिस न हो.

अपहर्त्ता का जब भी फोन आता, अनिल उस की सूचना पुलिस को जरूर दे देते थे. इस काल की जानकारी के बाद पुलिस ने अपहर्त्ताओं को जाल में फांसने का पुख्ता इंतजाम कर लिया. भजनपुरा रेडलाइट और उस के आसपास सादा कपड़ों में पुलिस तैनात कर दी गई. एक बैग में जीपीएस चिप लगा कर उस में नोटों के आकार की कागज की गड्डियां, फिर उन के ऊपर असली नोट रख कर बाइक से अनिल गुप्ता को रवाना कर दिया गया. उन के पीछे पुलिस टीम की गाड़ी भी लग गई. टीम के सभी लोग सादा लिबास में थे.

भजनपुरा रेडलाइट पर अनिल गुप्ता काफी देर तक खड़े रहे, लेकिन उन के पास बैग लेने कोई नहीं आया. करीब 2-3 घंटे बाद उन के पास अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘मैं ने तुम से पुलिस साथ में लाने को मना किया था ना, पर तुम नहीं माने. अब मूड खराब है, इसलिए घर जाओ बाद में बात करूंगा.’’

अनिल की बात सुने बिना ही उस ने फोन काट दिया था. अनिल से इस बार भी अपनी बात कहने के लिए अपहर्त्ता को फोन लगाया, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. अपहर्त्ता ने गुस्से में बात की थी, इसलिए बेटे की सलामती को ले कर उन की चिंता बढ़ने लगी. इस के बाद 14 फरवरी को अलगअलग जगहों से 6 बार काल आई. इन सब बातों से पुलिस को यकीन हो गया कि अपहर्त्ता बेहद शातिर है. पुलिस ने इस तरह की वारदातों में शामिल रहे अनेक बदमाशों को हिरासत में ले कर पूछताछ की, पर नतीजा कुछ नहीं निकला.

अपहर्त्ता बात करने के लिए केवल एयरटेल के 7503633333 नंबर का ही उपयोग कर रहा था और बात करते ही वह फोन स्विच्ड औफ कर देता था. इस के अलावा इस नंबर से किसी और से बात नहीं करता था. इसलिए पुलिस अपहर्त्ता के पास नहीं पहुंच पा रही थी. 15 फरवरी को अनिल के पास अपहर्त्ता का फिर फोन आया, उस में उन्हें पैसे ले कर एकडेढ़ बजे मोहननगर की रेडलाइट के पास बुलाया गया. अनिल निर्धारित समय से पहले ही बाइक से मोहननगर की रेडलाइट के पास जा कर खड़े हो गए. उन के आसपास दिल्ली पुलिस थी. वहां खड़े हो कर काफी देर इंतजार करने के बाद भी उन से पैसों का बैग लेने तो कोई नहीं आया, पर अपहर्त्ता का फोन जरूर आ गया. उस ने कहा, ‘‘यहां से तुम मेरठ रोड पर आ जाओ.’’

अनिल उस के कहे अनुसार, मेरठ रोड पहुंच गए. वहां भी उन के पास पैसे लेने कोई नहीं आया. अनिल के साथसाथ पुलिस टीम भी परेशान हो रही थी.

एकडेढ़ घंटा इंतजार करने के बाद अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘गुप्ताजी, लगता है तुम्हें अपना बेटा जिंदा नहीं चाहिए, इसलिए तुम हर बार पुलिस को साथ ला रहे हो.’’

‘‘मेरे साथ पुलिस नहीं है. मैं बिलकुल अकेला आया हूं. आप मुझ से पैसे ले लीजिए और बेटे को छोड़ दीजिए.’’ अनिल ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘अब तुम जाओ. आज शाम को बता देंगे कि पैसे कहां पहुंचाने हैं. अबकी बार चालाकी दिखाने की कोशिश मत करना.’’ कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया.

अनिल उदास चेहरा ले कर घर लौट गए. जैसे ही वह घर जाते, उन की पत्नी उन से मालूम करतीं कि अपहर्त्ताओं से क्या बात हुई और बेटा घर कब आएगा, तब अनिल पत्नी को भरोसा दे देते कि चिंता मत करो, बेटा जल्दी ही आ जाएगा. पुलिस जांच में पता चला कि अपहर्त्ता ने उस दिन गाजियाबाद के अलगअलग इलाके से फोन किए थे.15 फरवरी को ही रात 8 बजे फोन कर के अपहर्त्ता ने कहा, ‘‘एक कट्टे (बोरे) में पैसे रख कर उस पर कूड़ा भर कर उसे कर्दमपुरी के कूड़ाघर में रात 9 बजे फेंक आना.’’

‘‘ठीक है, मैं ऐसा ही करूंगा, पर आप कम से कम एक बार मेरे बच्चे से मेरी बात तो करा दीजिए.’’ अनिल ने कहा. लेकिन उन की बात का जवाब दिए बिना ही उस ने फोन काट दिया.

बेटे को ले कर अनिल गुप्ता की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उन की पत्नी मीरा की तो रोरो कर आंखें सूज आई थीं. अपहर्त्ता से बात होते ही अनिल ने चावल के एक खाली कट्टे में केवल कुछ कूड़ा भरा. उन्होंने इस बार उस में रुपए नहीं रखे. फिर उस कट्टे को अपने भाई राजीव के साथ ले जा कर कर्दमपुरी के कूड़ाघर में डाल आए. योजना के अनुसार, पुलिस पहले से उस जगह पर निगाह रख रही थी. कट्टा डालने के कई घंटे बाद भी न तो किसी ने उस बोरे को उठाया और न ही अनिल के पास कोई फोन आया.

अगले दिन सुबह के समय अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘तुझे कई बार मना किया था न कि पुलिस के चक्कर में मत पड़, मगर तू नहीं माना. तू बहुत सयाना बन रहा है, अब तू पुलिस से ही ऐसीतैसी कराते रहना. तू पैसे नहीं दे रहा तो कोई बात नहीं.’’

अनिल ने सफाई देनी चाही, लेकिन उन की बात सुनने से पहले उस ने फोन काट दिया. इस के बाद अनिल के पास अपहर्त्ता का कोई फोन नहीं आया. अनिल ने बेटे का पता लगाने वाले को 2 लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा कर दी. उन्होंने पूरे यमुनापार इलाके में इस तरह के 10 हजार पोस्टर भी छपवा कर चस्पा करवा दिए. पुलिस को भी अंकित के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली.

इस बीच दिल्ली और एनसीआर में अंकित की उम्र के किसी लड़के की अज्ञात लाश बरामद होती तो पुलिस उस के फोटो अनिल गुप्ता को दिखाती. उन में किसी में अंकित की लाश नहीं मिली. ऐसी उन्हें 26 लाशें दिखाई गईं. 14 फरवरी को नोएडा के दादरी क्षेत्र में एक लड़के की डैडबौडी मिली. इस की सूचना दिल्ली पुलिस को मिली तो पुलिस ने उस लाश के फोटो भी अनिल को दिखाए. वह फोटो कुछकुछ अंकित की तरह लग तो रही थी. लेकिन कपड़ों की वजह से उन्होंने उस लाश को पहचानने से इनकार कर दिया. मरने वाला लड़का कत्थई रंग की शर्ट पहने हुए था, जबकि अंकित घर से निकलने समय लाल रंग की शर्ट पहन कर गया था.

तत्कालीन पुलिस आयुक्त बी.एस. बस्सी भी इस केस पर बराबर निगाह रखे हुए थे. वह केस की रोजाना की प्रोग्रैस रिपोर्ट देखते थे. उन्होंने इस केस को सुलझाने के लिए उत्तरपूर्वी दिल्ली के स्पैशल स्टाफ, एएटीएस, एसटीएफ के अलावा क्राइम ब्रांच की एंटी किडनैपिंग सेल, स्पैशल सेल को भी लगा दिया. डीसीपी ए.के. सिंगला के ही निर्देशन में 15 पुलिस टीमें इस केस को सुलझाने में जुट गईं. सभी टीमें अलगअलग दृष्टिकोण से केस को सुलझाने में लगी थीं. इतना ही नहीं, पुलिस आयुक्त ने भी अंकित का पता बताने वाले को एक लाख रुपए इनाम देने की घोषणा कर दी.

एसीपी वाई.के. त्यागी अपनी टीम के इंसपेक्टर के.जी. त्यागी, एसआई मुकेश कुमार, प्रदीप कुमार, नीरज कुमार, पंकज, अमर सिंह, एएसआई ओमेंद्र सिंह, कांस्टेबल नितिन के साथ लगे हुए थे. इस टीम ने अपहृत अंकित के तीनों फोन नंबरों की फिर से जांच की. टीम ने पता लगाया कि वह पूल खेलने कहां जाता था और क्रिकेट किन के साथ खेलता था. टीम को यह पता चला कि वह डांस का भी शौकीन था. वह गोकलपुरी में डांस सीखने जाता था.

पुलिस टीम ने उस के स्कूल के दोस्तों, गली के दोस्तों, रिश्तेदारों के अलावा दुश्मनों की भी लिस्ट बनाई. इस के बाद इन सभी से एकएक कर के पूछताछ करनी शुरू कर दी. टीम ने जिले के आपराधिक तत्वों को भी निशाने पर लिया. करीब 6-7 सौ लोगों से पूछताछ की, लेकिन उन से कोई क्लू नहीं मिला. अंकित को घर से निकलने के बाद किसी ने किसी के साथ जाते हुए नहीं देखा था, इसलिए पुलिस को केस खोलने में सफलता नहीं मिल रही थी.

इंसपेक्टर के.जी. त्यागी ने अब उस फोन नंबर पर अपना ध्यान लगाया, जिसे अपहर्त्ता ने प्रयोग किया था. पता चला कि वह फोन जनवरी, 2016 में एक्टिवेट हुआ था. अंकित जब 11 फरवरी को घर से निकला था, यह कह कर गया था कि वह कहीं जा रहा है और थोड़ी देर में लौट आएगा. इस से उन्होंने यही अनुमान लगाया कि जिस का फोन सुन कर वह घर से निकला था, वह व्यक्ति केवल अंकित का ही परिचित था. उसे अंकित की मां नहीं जानती थीं. अगर वह मां का भी जानने वाला होता तो अंकित सीधे कहता कि मैं फलां के साथ जा रहा हूं. पुलिस ने काफी घोड़े दौड़ाए, पर वह उस व्यक्ति को नहीं पहचान पाई, जिस ने अंकित को फोन कर के बुलाया था.

घूमफिर कर पुलिस उसी फोन नंबर की जांच में लग गई, जिसे अपहर्त्ता ने प्रयोग किया था. इस के अलावा अंकित के तीनों फोन नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन कर के उन नंबरों को छांटा, जिन से अंकित की कभीकभार बात होती थी. ऐसे 50-60 संदिग्ध नंबर पुलिस के सामने आए. इन 50-60 नंबरों में पुलिस को एक नंबर ऐसा मिला, जिस से अंकित की केवल 6 फरवरी, 2016 को ही बात हुई थी. वह फोन नंबर एयरसेल कंपनी का था.

जांच में पता चला कि एयरसेल का यह नंबर अंकित के दोस्त जीशान का था. जीशान विजय पार्क, मौजपुर का रहने वाला था. पुलिस ने जीशान से अभी कुछ नहीं कहा, बल्कि यह पता लगाया कि अपहर्त्ता ने जिन जगहों से फिरौती की काल की थी, उन में से किसी जगह पर एयरसेल का यह नंबर मौजूद था या नहीं. टीम ने आखिर यह पता लगा ही लिया. काल डिटेल्स से इस बात की पुष्टि हो गई कि कई जगहों पर एयरसेल का यह नंबर और अपहर्त्ता के नंबर की लोकेशन एक ही थी. इस से यह बात पता लगी कि दोनों फोन नंबर साथसाथ ही थे. इस जांच से जीशान पुलिस के शक के दायरे में आ गया. फिर 4 अप्रैल, 2016 को उसे उस के घर से पूछताछ के लिए उठा लिया गया.

19 साल के जीशान से पुलिस ने सख्ती के साथ अंकित के बारे में पूछताछ की तो वह पुलिस के सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाया. उस ने बताया कि उस ने अपने दोस्त इलियास (17) के साथ मिल कर अंकित का अपहरण किया था और 11 फरवरी को ही उस की हत्या कर लाश दादरी थाने के बादलपुर इलाके में डाल दी थी. हत्या की बात सुन कर पुलिस सन्न रह गई. फिर पुलिस ने उस की निशानदेही पर उसी दिन यमुनाविहार के रहने वाले इलियास को भी हिरासत में ले लिया.

पुलिस दोनों अभियुक्तों को उसी जगह पर ले गई, जहां उन्होंने लाश फेंकी थी. संपर्क करने पर दादरी पुलिस ने बताया कि 14 फरवरी, 2016 को सुबह करीब 8 बजे बादलपुर से जूट के बोरे में एक लड़के की लाश बरामद की थी, जिस के हाथपैर बंधे हुए थे. शिनाख्त न होने पर पोस्टमार्टम के बाद 16 फरवरी को उस का अंतिम संस्कार करा दिया था. दिल्ली पुलिस ने अनिल गुप्ता को दादरी ले जा कर उस लाश के फोटो दिखाए. उन फोटो को वह पहले भी देख चुके थे. तब उन्होंने शर्ट का रंग दूसरा होने और लाश के फूले होने की वजह से शिनाख्त नहीं की थी. अब गौर से देखा तो लाश उन के बेटे अंकित की ही निकली.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने 5 अप्रैल को अभियुक्त जीशान और इलियास को न्यायालय में पेश कर 3 दिनों का पुलिस रिमांड लिया. रिमांड अवधि में पूछताछ करने पर अंकित के अपहरण की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली. 19 वर्षीय जीशान एक ड्राइवर था. पास के ही रहने वाले इलियास से उस की दोस्ती थी. इलियास नाबालिग था. उस ने 7वीं तक पढ़ाई की थी. दोनों ही आवारा थे. वे जल्द से जल्द मोटा पैसा कमाना चाहते थे. इस के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. दोनों यह जानते थे कि ज्यादा पैसा कमाने के लिए कोई न कोई उल्टासीधा काम तो करना ही पड़ेगा. वह काम कौन सा और क्या किया जाए, इस के लिए वे टीवी पर प्रसारित होने वाले क्राइम पैट्रोल कार्यक्रम को बड़े गौर से देखते थे.

यह कार्यक्रम देखने के बाद उन्होंने किसी का अपहरण करने की योजना बनाई. अब समस्या यह आई कि अपहरण किस का किया जाए. उसी समय इलियास के दिमाग में अपने दोस्त अंकित का चेहरा घूम गया. अंकित बहुत बनठन कर रहता था और दोस्तों पर खुले हाथों से पैसे खर्च करता था. अंकित के अलावा उन्होंने एक और लड़के को टारगेट में रखा. योजना के अनुसार, उन्होंने एक दुकानदार से किसी बहाने से ऐसे 3 सिमकार्ड खरीदे, जो पहले से ही एक्टिवेट थे. कई महीने की प्लानिंग के बाद इलियास ने फरवरी के पहले हफ्ते में अपने एक नाबालिग दोस्त का अपहरण करने के लिए उसे फोन कर के बुलाया, पर वह किसी वजह से नहीं आया तो इलियास ने दूसरे दोस्त अंकित को 11 फरवरी, 2016 को साढ़े 4 बजे दूसरे फोन नंबर 7503633333 से फोन कर के 100 फुटा रोड पर बुलाया.

इलियास अंकित के साथ 7वीं कक्षा तक पढ़ा था. पढ़ाई छोड़ने के बाद भी दोनों मिलते रहते थे. उन की दोस्ती बरकरार थी. इलियास अंकित के घर नहीं जाता था, तभी तो उसे अंकित के घर वाले नहीं जानते थे. इलियास के बात करने के बाद अंकित फटाफट खाना खा कर घर के बाहर आ गया. 100 फुटा रोड पर जीशान और इलियास मारुति आल्टो कार नंबर डीएल9सीएस 9715 में उस का इंतजार कर रहे थे. यह कार जीशान के एक परिचित की थी. जैसे ही अंकित उन के पास पहुंचा, इलियास ने उस का जीशान से परिचय कराया और कहा कि आज एक खुशी है, इसलिए साथ खाएंगेपिएंगे.

तीनों उस आल्टो कार से भजनपुरा पहुंचे. वहां से जीशान ने शराब खरीदी. भजनपुरा के सुभाष मोहल्ले में जीशान के बहनोई का एक फ्लैट था. वह अकसर खाली रहता था. उस की चाबी जीशान के पास ही रहती थी. जीशान अंकित को उसी फ्लैट पर ले आया. वहां उन्होंने अंकित को जम कर शराब पिलाई. जब वह नशे में धुत हो गया तो साथ लाई रस्सी से उन्होंने उस का गला घोंट दिया. उस की पहचान न हो, इसलिए इलियास ने उस की लाल रंग की शर्ट उतार कर अपनी कत्थई रंग की शर्ट पहना दी. उस की जेब में रखा उस का आईडी कार्ड, गले में पड़ा सोने का लौकेट, मोबाइल फोन, जूते, पर्स आदि अपने पास रख लिए.

फिर उस के हाथपैर रस्सी से बांध कर जूट के एक बोरे में भर कर बांध दिया. वह बोरे को ऐसी जगह ठिकाने लगाना चाहते थे, जिस से उस की शिनाख्त न हो. इस के बाद वह उस बोरे को कार में डाल कर गौतमबुद्ध नगर के बादलपुर इलाके में ले गए. उसे दादरी बाईपास के किनारे डाल कर वह रात 11 बजे दिल्ली लौट आए.

लाश ठिकाने लगा कर वे बेफिक्र हो गए थे. अब उन का मकसद उस के घर वालों से फिरौती वसूलना था. अगले दिन से उन्होंने उस के पिता को फोन कर के एक करोड़ रुपए की फिरौती मांगी. वह अलगअलग जगहों से फिरौती की काल करते रहे. उन्होंने उसे पहले इसलिए मार दिया, ताकि उसे बंधक बनाने का झंझट ही न रहे. इन्होंने इतनी फूलप्रूफ योजना बनाई थी कि पुलिस के लिए यह केस एक चुनौती बन गया था. दोनों नौसिखिए एक शातिर अपराधी की तरह पुलिस को करीब 2 महीने तक घुमाते रहे.

दिल्ली पुलिस के तेजतर्रार पुलिस अधिकारी भी उन की शातिराना चाल को नहीं समझ पा रहे थे. बड़ी मशक्कत के बाद आखिर पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार तो कर लिया, लेकिन अंकित के परिजनों का कहना है कि दोनों लड़कों के पीछे किसी शातिर बदमाश का हाथ जरूर रहा होगा. इन की निशानदेही पर पुलिस ने मारुति आल्टो कार, अंकित की शर्ट, पर्स, लौकेट, आईडी कार्ड, जूते, फोन आदि बरामद कर लिए हैं. पुलिस ने 7 अप्रैल को जीशान को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया, जबकि नाबालिग इलियास को बाल न्यायालय में पेश कर बालसुधार गृह भेज दिया. मामले की जांच थानाप्रभारी प्रशांत कुमार कर रहे हैं. Kidnaping Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. इलियास परिवर्तित नाम है.

 

Village Stories: वह पागल नहीं था

Village Stories: मास्टर अब्दुर्रहमान की हरकतों से सभी को यही लगता था कि वह पागल हो गया है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसे उस औरत के धोखा देने का ऐसा सदमा लगा था कि उस की हालत पागलों सी हो गई थी.

अब्दुर्रहमान प्राइमरी स्कूल का अध्यापक था. वह जिस स्कूल में पढ़ाता था, वह शहर के किनारे ऐसी जगह पर था, जहां आसपास जड़ीबूटियों से इलाज करने वाले बंजारे डेरा डाले रहते थे. वह जब भी खाली होता, उन बंजारों के पास चला जाता और कईकई घंटे उन के पास बैठा रहता. कभीकभी वह छुट्टी के दिन भी उन के पास चला जाता और पूरा का पूरा दिन वहीं गुजार देता.

ये बंजारे जड़ीबूटियों से दवाएं बनाते थे और जहां कहीं भी डेरा लगाते, आसपास के रहने वाले लोग उन के पास इलाज के लिए आ जाते थे. उन के पास जड़ीबूटियों के ऐसे नुस्खे और दवाइयां होती थीं, जो बाजार की दुकानों में नहीं मिलती थीं. कुछ बीमारियों में उन की दवाएं इतना सटीक फायदा करती थीं, जिन का इलाज बड़ेबड़े डाक्टर भी नहीं कर पाते थे.

मास्टर अब्दुर्रहमान उन बंजारों के बीच अपना काफी समय बरबाद करता था, इसलिए लोग उस की हंसी उड़ाते थे कि पता नहीं इन बंजारों के बीच इस मास्टर को क्या मिलता है, जो वह अपना इतना समय बरबाद करता है. जबकि अब्दुर्रहमान का कहना था कि इन बंजारों के पास ऐसीऐसी दवाएं हैं, जो मुरदों में भी जान डाल सकती हैं. जब लोग उन से कहते कि अगर ये इतने ही होशियार हैं तो दरदर भटकते क्यों हैं? मास्टर अब्दुर्रहमान के पास उन की इस बात का कोई जवाब नहीं होता था.

कभी मन में आता तो हंसते हुए यह जरूर कह देते, ‘भटकना तो इन का पेशा है. घूमघूम कर ही तो ये जड़ीबूटियां खोज कर लाते हैं और उन से दवाएं बनाते हैं. अगर ये होशियार नहीं हैं तो लोग इन के पास दवा लेने आते क्यों हैं. उन्हें फायदा होता है, तभी तो आते हैं.’ अब्दुर्रहमान की गरमियों की डेढ़ महीने की छुट्टियां और सर्दियों की 10 दिनों की छुट्टियां उन्हीं बंजारों के बीच गुजरती थीं. इस से लोगों ने अंदाजा लगाया कि बंजारों ने उसे अपना चेला बना लिया है. क्योंकि वह उन की बहुत खिदमत करता था. कभी वह उन के लिए गांव से दूध या छाछ ले कर जाता तो कभी सब्जियां.

एक दिन लोगों ने देखा, मास्टर अब्दुर्रहमान के आंगन में उपलों का ढेर जल रहा है. वह उस आग को दूर पलंग पर बैठा ध्यान से देख रहा था. जब लोगों ने पूछा कि यह क्या कर रहे हो तो उस ने कहा, ‘‘दवा बन रही है. इन उपलों के बीच जड़ीबूटियां हैं, जो जल कर भस्म हो जाएंगी. उस के बाद उस भस्म से दवा बनेगी. दवा क्या, अमृत बनेगा. जो उस दवा को पूरे परहेज के साथ एक सप्ताह खा लेगा, उसे कोढ़ और चेचक कभी नहीं होगा.’’

इस के बाद दवाएं बनाना मास्टर अब्दुर्रहमान का शौक ही नहीं रहा, बल्कि जुनून बन गया. वह वैज्ञानिकों की भांति तरहतरह के प्रयोग करता रहता था. मास्टर अब्दुर्रहमान की बीवी ने उस के लगभग सभी दोस्तों से कहा कि वे किसी भी तरह उस का ध्यान इस ओर से हटाएं, पर मास्टर ने किसी की नहीं सुनी. अब्दुर्रहमान ने दवाएं तो तमाम बना डालीं, लेकिन उस से इलाज कराने को कोई तैयार नहीं था. संयोग से एक रात अचानक गांव के एक 2 साल के बच्चे की तबीयत खराब हो गई. वह बारबार सीने पर हाथ रख कर जोरजोर से रो रहा था. ऐसा लग रहा था, जैसे उसे दौरा पड़ा हो.

कोई उपाय न देख बच्चे का बाप उसे मास्टर अब्दुर्रहमान के पास ले गया. उस ने बच्चे की नब्ज देखी, चेहरा देखा उस के बाद कहा कि इसे निमोनिया है. उस ने अपनी बनाई एक दवा उसे दी. 3-4 घंटे बाद बच्चे को ऐसा पसीना आया, जैसे उस के शरीर का सारा पानी निकल गया हो. इस के बाद बच्चे का रोनातड़पना बंद हो गया. मास्टर की दवा से वह बच्चा 3 दिनों में चंगा हो गया. इस के बाद मास्टर के यहां भीड़ लगने लगी. लोगों को फायदा भी हो रहा था.

मास्टर अपने यहां आने वाले मरीजों को जो दवाएं देता था, उन के नुस्खे उस ने उन्हीं बंजारों से सीखे थे. धीरेधीरे उस के यहां सब तरह के मरीज आने लगे. कुछ ही दिनों में मास्टर अब्दुर्रहमान ठीकठाक वैद्य बन गया. लेकिन जब भी उसे पता चलता कि बंजारे आए हैं, वह उन के पास जरूर पहुंच जाता. जब वह अच्छाखासा वैद्य बन गया तो उस ने नौकरी छोड़ दी. उसे पैसा कमाने की उतनी फिक्र नहीं थी, जितनी इल्म हासिल करने की थी. कभी वह किसी जड़ीबूटी की तलाश में निकल जाता तो कईकई दिनों घर से बाहर रहता. और जब वापस आता तो अजीबअजीब तरह की जड़ीबूटियां ले कर आता.

कभीकभी उस के पास कोई ऐसा भी मरीज आ जाता, जिस के मर्ज को वह समझ नहीं पाता. तब वह साफ कह देता कि इसे शहर के अस्पताल ले जाओ, क्योंकि वह रोग के बारे में जाने बिना दवा नहीं देता था. आजकल के डाक्टरों की तरह इंसानों को जानवर नहीं समझता था. सरकारी अस्पताल में पढ़ेलिखे डाक्टर होते थे, इसलिए उन गरीब मरीजों को उन के पास भेज देता था. मास्टर अब्दुर्रहमान का घर एक तरह से दवाखाना बन गया था. दूसरे गांवों से भी मरीज उस के पास दवा लेने आते थे. बगल के गांव की एक बहुत ही खूबसूरत औरत अकसर उस के पास दवा लेने आती थी. उस की उम्र 27-28 साल रही होगी. वह ऊंचे खानदान की शादीशुदा औरत थी.

वह नौकरानी के साथ घोड़ागाड़ी से आती थी. उस औरत को ले कर गांव में तमाम तरह की अफवाहें फैली हुई थीं. उन्हीं अफवाहों में एक यह भी थी कि यह औरत जितनी चालाक और होशियार है, उस का शौहर उतना ही सीधासादा है. मास्टर अब्दुर्रहमान उस की बड़ी तारीफें करता था. ईद पर उस ने मास्टर अब्दुर्रहमान को कपड़ों का जोड़ा और पगड़ी दी थी. उस के बच्चों को भी पैसे दिए थे.

एक दिन सुबहसुबह खबर आई कि उस औरत का शौहर मर गया है. इस में हैरानी की कोई बात नहीं थी, क्योंकि मौत तो किसी की भी हो सकती है. लेकिन यहां हैरानी की बात यह थी कि थोड़ी देर में पुलिस आ गई थी. इस का मतलब था, वह अपनी मौत नहीं मारा था. मामला कुछ गड़बड़ था, तभी पुलिस आई थी. इलाके के दरोगा ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए शहर के अस्पताल भिजवा दिया. पता चला कि मरने वाले के रिश्तेदारों ने शक जाहिर किया था कि वह किसी बीमारी से नहीं मरा, बल्कि उसे जहर दे कर मारा गया है. उस की बीवी की कोशिश थी कि जल्दी से जल्दी उस का अंतिम संस्कार कर दिया जाए, लेकिन मरने वाले के रिश्तेदारों ने लाश का चेहरा देखा तो थाने चले गए और पुलिस को बुला लाए थे.

पुलिस ने शक के आधार पर मृतक की बीवी और नौकरानी को हिरासत में ले लिया था. अगले दिन मास्टर अब्दुर्रहमान को भी थाने बुलाया गया था. शाम को दरोगा सिपाहियों की पूरी टीम के साथ मास्टर अब्दुर्रहमान के घर आया तो पुलिस के साथ वह भी था. उसे हथकड़ी लगी हुई थी. पति को उस हालत में देख कर उस की बीवी और बच्चे रोने लगे. लेकिन मास्टर अब्दुर्रहमान कुछ नहीं बोला.

मास्टर के घर की तलाशी ली गई. लेकिन किसी को पता नहीं चला कि मास्टर के घर क्या मिला. थोड़ी देर बाद पुलिस मास्टर को ले कर चली गई. अगले दिन पता चला कि मास्टर की निशानदेही पर पुलिस ने एक शीशी बरामद की थी. उसी शीशी से उस ने उस खूबसूरत औरत की नौकरानी को जहर दिया था. नौकरानी ने उस से यह कह कर जहर मांगा था कि घर में चूहे बहुत परेशान कर रहे हैं, इसलिए चूहों को मारने वाला जहर चाहिए. मास्टर अब्दुर्रहमान ने 2 लोगों की मौजूदगी में उसे वह जहर दिया था. पुलिस ने उन दोनों को भी इस मामले में गवाह बनाया था. इस से यह बात साफ हो गई थी कि उस औरत ने अपने शौहर को जो जहर दिया था, उसे चूहों को मारने के बहाने मास्टर अब्दुर्रहमान से हासिल किया गया था.

औरत वाकई बहुत हसीन थी. मास्टर अब्दुर्रहमान के पास आती भी रहती थी. मास्टर ऐसा आदमी नहीं था कि वह किसी जवान और हसीन औरत से प्रभावित हो कर कोई उलटासीधा काम कर बैठता. लेकिन कानून की निगाहें कुछ और ही होती हैं. कानून तो यह देखता है कि एक आदमी जहर से मर गया है और जहर देने वाली ने जहर किस आदमी से हासिल किया है.

मास्टर अब्दुर्रहमान का जुर्म यह था कि उस ने जहर दिया था. दूसरे उस ने वैद्यकी की पढ़ाईलिखाई भी नहीं की थी. पुलिस ने चालान बना कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस की वजह यह थी कि उस औरत की नौकरानी ने अपने बयान में कहा था कि मास्टर अब्दुर्रहमान के कहने पर वह जहर ले गई थी. उसे क्या पता था कि उस की मालकिन ने वह जहर किसे दिया, जबकि उस औरत ने नहीं कबूला था कि वह जहर उसी ने शौहर को दिया था.

इस के बाद लोग सोचने लगे कि आखिर उस औरत ने शौहर को जहर क्यों दिया? उन्हें लगता था कि औरत किसी लड़के को चाहती रही होगी, जबकि उस की शादी किसी और से हो गई होगी. लेकिन यहां यह मामला नहीं था. औरत किसी को भी नहीं चाहती थी. उस ने उसे शौहर के रूप में कबूल भी कर लिया था. कोई परेशानी भी नहीं थी. शौहर बिलकुल सीधासादा, एकदम बुद्धू था. बीवी को रौब में रखने के बजाय वह बीवी के रौब में रहना पसंद करता था. उस के पास जमीन भी काफी थी. साथ ही ऊंची जाति वाला भी था.

औरत का शौहर जिस तरह का था, देहातों में इस तरह के लोग सीधेसादे और बुद्धू नहीं होते. वे हुक्म में रहने के बजाय हुक्म चलाते हैं. लेकिन यहां मामला उल्टा था. औरत खूबसूरत, चंचल और जिंदादिल थी. जबकि शौहर में मर्दों वाली रौब और अकड़ नहीं थी. औरत ने किसी तरह 3 साल तो उस के साथ गुजार लिए. आखिर वह अपने इस शौहर से तंग आ गई, क्योंकि उस की सहेलियां उस का मजाक उड़ाती थीं. वह शौहर से खिंचीखिंची रहने लगी. 4 साल बीत गए, कोई बच्चा भी नहीं हुआ. इस के बाद गांव का एक आदमी औरत को अच्छा लगने लगा. वह उस की बिरादरी का भी था.

शौहर को पहले तो पता ही नहीं चला कि उस के घर में क्या हो रहा है? जब उसे पता चला तो उस ने उस आदमी को अपने घर आने से रोक दिया. एकाएक वह मर्द बन गया, जबकि औरत उसे नौकर से ज्यादा कुछ नहीं समझती थी. एक दिन शौहर ने उसे रंगेहाथों पकड़ लिया तो दोनों की जम कर पिटाई की. इस के बाद उस ने औरत पर पाबंदी लगा दी. घर से बाहर जाना बंद कर दिया. नौकरानी उस पर नजर रखती थी. इसी तरह 4-5 महीने बीत गए. औरत को कोई तकलीफ हुई तो शौहर से इजाजत ले कर वह मास्टर अब्दुर्रहमान के पास आनेजाने लगी. नौकरानी उस के साथ आतीजाती थी. इस के बाद उस ने नौकरानी से मास्टर के यहां से जहर मंगा कर एक रात शौहर को दूध में पिला दिया.

वह जिस आदमी से मिलतीमिलाती थी, वह भी पकड़ा गया था. इस तरह पुलिस ने इस मामले में 3 लोगों को मुल्जिम बनाया था, एक वह औरत, मास्टर अब्दुर्रहमान और तीसरा उस का दोस्त, जिसे प्रेमी भी कह सकते हैं. मुकदमा चला, इस्तगासा इतना कमजोर था कि सेशन कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए तीनों को छोड़ दिया. दरअसल बाद में मास्टर पलट गया था. उस ने अदालत में कहा कि उस ने जहर दिया ही नहीं था. वह देसी वैद्य है, दवाएं देता है, जिस से जिंदगी मिलती है. जिंदगी देने वाला जहर दे कर किसी की जिंदगी क्यों लेगा?

मास्टर अब्दुर्रहमान छूट तो गया, लेकिन इस घटना से उसे ऐसा सदमा लगा था कि जेल से आने के बाद वह एकदम खामोश हो गया. गांव के लोगों ने उसे जेल से छूटने की मुबारकबाद दी तो उस ने कहा, ‘‘किस बात की मुबारकबाद? मेरे जहर से एक आदमी की मौत हुई है. मेरे ऊपर एक हत्या का पाप चढ़ गया है.’’

उस ने उन तमाम दवाओं, जिन्हें न जाने कितनी मेहनत से तैयार किया था, उन तमाम जड़ीबूटियों को जिन्हें उस ने न जाने कहांकहां भटक कर इकट्ठा किया था, एक गड्ढा खोद कर गाड़ दिया. हर किसी ने उसे समझाया कि उस ने उस आदमी को मारने के लिए जहर नहीं दिया था, उस ने तो चूहे मारने के लिए जहर दिया था, इस में उस का कोई दोष नहीं है. लेकिन मास्टर ने किसी की एक नहीं सुनी.

गांव का जब भी कोई आदमी बीमार होता, मास्टर के पास आता और दवा बना कर देने को कहता. लेकिन मास्टर तो जैसे किसी की सुनता ही नहीं था. वह जहां भी बैठता, एक ही बात पर दुख जताता रहता कि उसी के जहर से वह आदमी मरा था. नौकरी उस ने पहले ही छोड़ दी थी. दवा दे कर जो 4 पैसे कमाता था, वह भी बंद कर दिया था. खेतीबाड़ी थी नहीं, इसलिए बीवीबच्चे भूखे मरने लगे.

इस के बावजूद मास्टर ने कुछ नहीं किया. मजबूरी में बीवीबच्चों को ले कर मायके चली गई. मास्टर हमेशा गुमसुम बैठा रहता था, कोई कुछ खाने को देता तो ठीक, वरना उसे खाने की भी चिंता नहीं थी. गांव वालों को लगने लगा कि मास्टर पागल हो गया है.

जबकि सही बात यह थी कि वह पागल नहीं था. गांव के एकदो लोगों से वह कभीकभी कुछ बातें कर लेता था. उन्हीं बातों से लगता था कि मास्टर पागल नहीं है. उसे गहरा सदमा लगा है. एक दिन शाम को वह गांव के मुखिया रहमान अली के सामने से गुजर रहा था तो उन्हें देख कर रुक गया. मुखिया से भी वह कभीकभी अपने मन का दुख कह देता था. उस दिन कुरते की जेब से एक शीशी निकाल कर वह मुखिया को दिखाते हुए मरीजों की सी मद्धिम आवाज में धीरे से बोला, ‘‘इस शीशी में जहर है, इसे मैं ने ही तैयार किया है. मैं रोज उधर जाता हूं, लेकिन वह मिलती ही नहीं.’’

‘‘कौन नहीं मिलती?’’ रहमान अली ने पूछा.

‘‘अरे वही, जिस ने अपने पति को जहर दे कर मारा था. ऐसा कर के उस ने मुझे बदनाम कर दिया था न.’’

‘‘वह मिल जाएगी तो क्या करोगे?’’

‘‘यह नहीं बताऊंगा.’’ कह कर मास्टर चला गया.

एक दिन मास्टर उसी औरत के गांव की ओर से चला आ रहा था तो रास्ते में वह मिल गई. मास्टर को देख कर वह उस के पास आ गई. मास्टर भी यही चाहता था. पास आ कर औरत ने पूछा, ‘‘हकीमजी, इधर कहां से आ रहे हैं?’’

‘‘पीर साहब की मजार से आ रहा हूं, उन के पास पानी दम कराने गया था.’’ मास्टर ने जेब से एक शीशी निकालक                                                                                                                                    रदिखाते हुए कहा, ‘‘यह दम किया हुआ पानी है. इसे पीने से सारी मुश्किलें खत्म हो जाती हैं. लो इस में से थोड़ा पानी तुम भी लो. तुम्हारी भी सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी.’’

मास्टर उसे जहर पिला कर मारना चाहता था. सोचा कि इस औरत ने जिस तरह धोखे में रख कर उस पर कलंक का टीका लगाया है, उसी तरह धोखे में रख कर वह इसे खत्म कर देगा. कातिल को मौत की सजा मिलनी ही चाहिए.nऔरत ने हाथ फैलाए तो मास्टर ने उसे वह शीशी दे दी. औरत जैसे ही शीशी मुंह के पास ले गई, मास्टर को न जाने क्या सूझा कि उस ने झपट कर शीशी छीन ली. औरत डर गई. उस ने पूछा, ‘‘आप ने शीशी क्यों छीन ली?’’

मास्टर कुछ नहीं बोला. शीशी का ढक्कन बंद कर के उसे जेब में डाल लिया. औरत ने कहा, ‘‘लगता है, पागल हो गए हो?’’

‘‘आज नहीं तो कल जरूर पागल हो जाऊंगा.’’ मास्टर ने कहा.

शायद मास्टर को लगता था कि उस औरत को मार कर उसे चैन मिल जाएगा. लेकिन उस ने तो उस के मुंह तक पहुंचे जहर को छीन लिया था. अगले दिन सुबह गांव वाले मसजिद से नमाज पढ़ कर निकल रहे थे, तभी पता चला कि मास्टर अपने घर के बरामदे में पड़ा है. मास्टर अकेला ही था, इसलिए गांव का मुखिया होने के नाते रहमान अली गांव के कुछ बुजुर्गों को साथ ले कर उस के घर पहुंच गए. चूंकि उन्हें मास्टर के बारे में सब पता था, इसलिए संदेह होने पर उन्होंने तकिए के नीचे हाथ फेरा. वहां कुछ नहीं मिला. चारपाई के नीचे देखा तो उन्हें वह शीशी नजर आ गई, जिस में जहर था. शीशी खाली थी. इस तरह मास्टर अब्दुर्रहमान ने खुद को बदनामी से मुक्त कर लिया था. Village Stories

 

Bihar Crime News: एमएलए का दबंग पति

Bihar Crime News: बिहार के पूर्णिया जिला के मरंगा थाने में जिंदाबाद और मुरदाबाद के नारे लग रहे थे. थाना कैंपस में काफी गहमागहमी थी. कारण यह था था कि पुलिस जदयू की विधायक बीमा भारती के पति अवधेश मंडल को एक गवाह को धमकाने के आरोप में थाने लाई थी. इसी बात को ले कर अवधेश के समर्थक अपने आका की गिरफ्तारी से नाराज हो कर मरनेमारने पर उतारू थे. वे पुलिस पर इसलिए दबाव बना रहे थे, ताकि अवधेश को बेकसूर मान कर छोड़ दिया जाए. पुलिस वाले उन लोगों को समझाने की कोशिश कर रहे थे. इसी बीच भीड़ और हंगामे का फायदा उठा कर अवधेश थाने से गायब हो गया और पुलिस हाथ मलती रह गई.

दरअसल, सन 2005 में भवानीपुर थाना क्षेत्र के नवगछिया टोला में चंचल पासवान की हत्या कर दी गई थी. इस मामले में चंचल की बीवी सोनिया की अदालत में गवाही चल रही थी. पिछली 17 जनवरी को सोनिया को धमकाने के आरोप में केहट थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी. इसी केस के सिलसिले में अवधेश को गिरफ्तार कर के मरंगा थाना लाया गया था, जहां से वह फरार हो गया था. अवधेश का लंबा आपराधिक रिकौर्ड रहा है, वह कोसी के आतंक के तौर पर कुख्यात था.

अवधेश मंडल रुपौली की जदयू विधायक बीमा भारती का पति और पूर्णिया जिले के भवानीपुर प्रखंड का प्रमुख था. उसे मरंगा थाने से भगाने के मामले में 60 अज्ञात लोगों पर केस दर्ज किया गया. बाद में इस सिलसिले में पुलिस ने जदयू वर्कर टुनटुन आलम को गिरफ्तार किया. अवधेश पर मृतक चंचल की पत्नी सोनिया को तो धमकाने का आरोप था ही, साथ ही उस पर जिला परिषद अध्यक्ष सुनीता देवी, उन के 2 प्राइवेट गार्डों माइकल सिंह और मुकेश सिंह, सोनिया देवी, उन के बेटे सुनील पासवान, रिंकू पासवान और नंदन पासवान पर हमला करने का भी आरोप है.

थाने से 18 जनवरी को फरार होने के बाद अवधेश को 20 जनवरी को तड़के 3 बजे नवगछिया के परबत्ता गांव में बासुकी मंडल के घर से गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया. पुलिस ने अवधेश को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन पुलिस उसे भगाने के मामले में उस की विधायक पत्नी बीमा भारती की भूमिका की जांच कर रही है.

सूबे की सरकार भले ही सुशासन और तरक्की का ढोल पीट रही हो, पर उस के ही विधायक का पति कानून की धज्जियां उड़ा रहा है. अवधेश मंडल की कारगुजारियों का लंबा और पुराना इतिहास है. वह कई बार रंगदारी, मारपीट करने, धमकी देने, लूटपाट करने और मर्डर जैसे गंभीर केसों में जेल जा चुका है. अपनी विधायक पत्नी के पीए के मर्डर केस में फंसा अवधेश हाल में ही जेल से बाहर आया था.

23 अप्रैल, 2013 को बीमा भारती के प्राइवेट सैके्रटरी संतोष मंडल को अपराधियों ने अगवा कर लिया था. उस समय वह अपनी मोटरसाइकिल से बीमा के घर से निकल कर अपने गांव लालगंज जा रहा था. संतोष की मां रेखा देवी लालगंज की मुखिया हैं. तमाम कोशिशों के बाद भी पुलिस संतोष के बारे में कुछ पता नहीं लगा सकी. अगवा होने के 13 दिनों बाद उस की सड़ीगली लाश गंगा नदी में पड़ी मिली थी. बीमा भारती ने इस के लिए अपने पति अवधेश मंडल को ही आरोपी बताया था.

अपने पति के खिलाफ बीमा खुद भी कई बार मोर्चा खोल चुकी हैं. वह कई बार पति की शिकायत ले कर थाने तक भी पहुंची हैं. पति की प्रताड़ना और बेवफाई से तंग आ कर 35 वर्षीया बीमा भारती ने 27 जून, 2012 को पूर्णिया के भवानीपुर थाने में अपने पति अवधेश कुमार मंडल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी.

इस एफआईआर में उन्होंने कहा था कि उन के पति ने गुडि़या नाम की औरत से दूसरा विवाह रचा लिया है. वहीं अवधेश का दावा था कि दूसरी शादी के लिए उस ने अपनी पत्नी बीमा भारती से सहमति पत्र ले लिया था. इस बारे में बीमा ने पुलिस को बताया था कि उन्होंने इस तरह का कोई सहमति पत्र नहीं दिया था. एफआईआर में यह भी कहा गया था कि उन की शादी 19 साल पहले हुई थी और शादी के कुछ दिनों बाद ही उन्हें मानसिक और शारीरिक तौर पर तंग करना शुरू कर दिया गया था.

उस समय बीमा ने पुलिस को बताया था कि उन का पति आपराधिक चरित्र का है और उन से पैसे की मांग करता रहता है. पैसे न देने पर मारपीट करता है, गालियां देता है. करीब 80 हजार रुपए के जेवरों को उस ने चुपचाप बेच दिया था. इस के अलावा घर के कई सामान भी बेच दिए. पति के डर से वह अपने तीनों बच्चों को घर पर नहीं रखतीं. बच्चों को उन्होंने बांका जिला के मंदार हिल स्थित बोर्डिंग स्कूल में दाखिला दिलवा दिया है. गौरतलब है कि 15 दिसंबर, 2010 को बीमा के पति अवधेश ने उन की इस कदर पिटाई की थी कि वह अधमरी हो गई थीं. उन के शरीर में कई जगह फ्रैक्चर आ गए थे. तब उन्हें कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा था. इस सिलसिले में बीमा ने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखवाई थी.

अवधेश के अपराधों की लंबी लिस्ट है. पिछले साल अवधेश मंडल ने पूर्णिया जिले के भवानीपुर अंचल कार्यालय के मुलाजिमों से हर महीने 5-5 हजार रुपए की रंगदारी मांग कर नया बावेला खड़ा कर दिया था. विधायक के साथ सरकार भी अवधेश मंडल की करतूतों को ले कर कई बार पसोपेश में फंस चुकी है. अवधेश मंडल ने अपने 20-25 गुर्गों के साथ अंचल कार्यालय में पहुंच कर रंगदारी की मांग करते हुए धमकी दी थी कि जिस ने रुपया नहीं दिया, उसे कुत्तों से कटवाया जाएगा और गोली मार दी जाएगी. मुलाजिमों में खौफ पैदा करने के लिए उस ने नाजिर अजय सिंह और राजस्व कर्मचारी विनय कुमार मंडल की जूतों और बंदूक के बट से पिटाई की थी.

उस समय तत्कालीन सीओ अनिल कुमार ने अवधेश के खिलाफ थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी. एफआईआर में कहा गया था कि 10 दिसंबर की शाम 4 बजे प्रखंड प्रमुख अवधेश मंडल हथियारों से लैस हो कर अपने समर्थकों के साथ अंचल कार्यालय पहुंचा और कर्मचारियों से गालीगलौज करने लगा. अवधेश ने बंदूक के बट से नाजिर को मारा, साथ ही उन के आदमियों ने राजस्व कर्मचारी की जूते से पिटाई की. उस के बाद उस ने सभी मुलाजिमों को धमकी दी कि हर महीने 5-5 हजार रुपए नहीं दिए तो कुत्ते से कटवाएंगे या गोली मार देंगे. वह अपने साथ काले रंग का कुत्ता भी ले आया था. इस मामले में अवधेश मंडल ने सफाई दी थी कि सीओ और उन के मुलाजिम गरीबों को तंग करते हैं. जब उन लोगों को जनता का काम करने को कहा गया तो उन्होंने उन पर झूठा आरोप मढ़ दिया.

सन 1995 में बीमा का पति अवधेश मंडल भी रुपौली सीट से चुनाव लड़ चुका है, पर उसे हार का मुंह देखना पड़ा था. उस के बाद उस ने इस सीट से अपनी बीवी बीमा को चुनावी मैदान में उतारा था और वह जीत गई थीं. बीमा पर आरोप लगते रहे हैं कि वह अपने पति अवधेश के साम, दाम, दंड, भेद की वजह से चुनाव जीतती रही हैं. बीमा अकसर यह दावा करती रही हैं कि विधानसभा चुनाव में उन्हें पति की दबंगई की वजह से जीत नहीं मिली, बल्कि जनता के स्नेह की वजह से वह विधानसभा में पहुंची हैं. Bihar Crime News