Crime Story: खतरनाक मंसूबे में शामिल लड़की

Crime Story: गलती सुरजीत की बहन सुधा की थी, लेकिन उस की गलती मान कर उसे समझाने के बजाय सुरजीत ने अपने अहं और झूठी शान की खातिर एक निर्दोष को ही फंसाने का खतरनाक मंसूबा बना लिया था.

बात उतनी बड़ी नहीं थी, लेकिन इतनी छोटी भी नहीं थी कि हलके में लिया जाता. उस के पीछे का मकसद और साजिश इतनी खतरनाक थी कि पूरी घटना जानने के बाद मैं दंग रह गया था. इस बात ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि आजकल के बच्चे छोटीछोटी बातों को ले कर इतने बड़ेबड़े मंसूबे कैसे बना लेते हैं?

उस दिन मैं थोड़ी देर से थाने पहुंचा था. इस की वजह यह थी कि मेरे बेटे के स्कूल में सालाना समारोह था, इसलिए मुझे वहां जाना पड़ा था. थाने पहुंच कर मैं ने ड्यूटी अफसर परमजीत सिंह को बुला कर पूछा, ‘‘कोई खास बात तो नहीं है?’’

‘‘जी कोई खास बात नहीं, बस एक…’’

परमजीत बात पूरी कर पाता, मुख्य मुंशी गुरजीत सिंह कुछ फाइलें ले कर हस्ताक्षर कराने आ गया. मैं ने फाइलों पर दस्तखत करते हुए परमजीत सिंह को हाथ से बैठने का इशारा किया. वह मेरे सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गए. सभी फाइलों पर दस्तखत कर के मैं ने मुंशी से 2 चाय भिजवाने को कहा. मुंशी चला गया तो मैं परमजीत से मुखातिब हुआ, ‘‘हां, तो तुम क्या कह रहे थे?’’

‘‘सर, लगभग 12 बजे टोल नाके पर तैनात हमारे थाने के पुलिसकर्मियों के पास एक लड़की भागतीहांफती आई. उस की हालत बता रही थी कि किसी बात को ले कर वह काफी परेशान थी.  पुलिसकर्मियों ने आगे बढ़ कर उस की उस हालत की वजह पूछी तो उस ने हांफते हुए कहा कि वह सतलुज नदी में कोई पूजा सामग्री फेंकने आई थी. सामग्री फेंक कर जैसे ही वह लौटी 2 लड़कों ने उसे पकड़ लिया और जबरदस्ती खींच कर खेतों में ले गए, जहां उन्होंने उस के साथ जबरदस्ती की. लड़कों ने उस का मुंह दबा रखा था, जिस से वह चीख भी नहीं सकी.’’

परमजीत इतनी बात कर चुप हुआ तो पूरी बात जानने के लिए मैं ने कहा, ‘‘आगे क्या हुआ?’’

‘‘लड़की ने अपना नाम जीतो बताया था. उस की बात सुन कर हवलदार चरण सिंह और इंद्र सिंह ने फोन द्वारा मुझे घटना की सूचना दे कर खुद जीतो द्वारा बताए गए खेत की ओर चल पड़े. उन के खेतों में पहुंचने तक मैं भी मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया.’’

जीतो का कहना था कि वे लड़के अभी यहीं कहीं छिपे होंगे, इसलिए हम सभी लड़कों की तलाश करने लगे. थोड़ी तलाश की तो 2 लड़के सतलुज किनारे एक झाड़ी के पास बैठे मिल गए. जीतो ने उन की शिनाख्त करते हुए कहा कि इन दोनों ने उस के साथ दुष्कर्म नहीं किया, इन्होंने केवल छेड़छाड़ की थी. दुष्कर्म करने वाला कोई और लड़का था.

‘‘तो क्या 3 लड़के थे?’’ मैं ने पूछा तो परमजीत ने कहा, ‘‘जी सर, दुष्कर्म करने वाला तीसरा लड़का भाग गया था. सर, मैं जीतो और उन दोनों लड़कों को थाने ले आया हूं. अब आप बताइए कि आगे क्या किया जाए?’’

‘‘अरे भई करोगे क्या, लड़की का मैडिकल कराओ, बयान लो और उस फरार लड़के के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उसे पकड़ो और क्या करोगे. वैसे ये सब रहने वाले कहां के है. दुष्कर्म कर के जो लड़का भागा है, उस का क्या नाम है, वह कहां रहता है?’’ मैं ने पूछा.

मेरी इस बात पर परमजीत कुछ परेशान सा हो गया. मैं ने आंखों से आगे बताने का इशारा किया तो उस ने कहा, ‘‘सर, इन दोनों लड़कों के नाम तो नरेश और कुलदीप हैं. दुष्कर्म कर के जो लड़का भागा है. उस का नाम राज है और वह आप के दोस्त पत्रकार अमन सिंह का बेटा है.’’

‘‘क्या… अमन का बेटा राज?’’ मैं चौंका. पत्रकार अमन सिंह सचमुच मेरा अच्छा दोस्त था. वह निहायत ही शरीफ और शांतिप्रिय आदमी था. झूठ से उसे सख्त नफरत थी. उस ने कभी झूठी खबरें नहीं लिखी थीं.

अपने काम से काम रखने वाला अमन अपनी नेकनीयती की वजह से हमेशा आर्थिक तंगी से जूझता रहता था. उस के सिखाए दर्जनों लड़के दुनियादारी के मजे कर रहे थे, लेकिन वह वैसा नहीं बन पाया था. मैं ने दिमाग पर जोर डाला तो मुझे याद आया कि अमन के बेटे का नाम राज ही है, क्योंकि 2-3 महीने पहले अमन किसी मामले में मुझ से सलाह लेने आया था, तब उस ने बेटे का नाम ले कर कोई चर्चा की थी. तब मुझे पता चला था कि उस के बेटे का नाम राज है.

मैं हैरान था कि अमन जैसे शरीफ आदमी का बेटा इस तरह का काम कैसे कर सकता है? लेकिन आज के समय में किसी के बारे में कोई राय रखना उचित नहीं है. जरूरी नहीं कि बाप शरीफ हो तो बेटा भी शरीफ ही हो. बहरहाल, अमन को उस दिन मेरे पास आना था, क्योंकि उसे कुछ रुपयों की जरूरत थी. 2 दिन पहले उस ने फोन कर के  मुझ से कहा था तो मैं ने उसे उस दिन आ कर रुपए ले जाने के लिए कहा था. वह किसी भी समय आ सकता था. मैं सोचने लगा कि अमन जब अपने बेटे की इस करतूत के बारे में सुनेगा तो उस पर क्या गुजरेगी?

‘‘उन दोनों लड़कों को ले आओ.’’ मैं ने कहा.

मेरे कहने पर परमजीत सिंह ने नरेश और कुलदीप को ला कर मेरे सामने खड़ा कर दिया. दोनों देखने में ही आवारा लग रहे थे. उन्हें देख कर मैं सोच भी नहीं सकता था कि ऐसे घटिया लड़कों से राज की दोस्ती हो सकती है. फिर भी मैं ने पूछा, ‘‘सचसच बताओ, क्या बात है?’’

नरेश थोड़ा तेज दिखाई दे रहा था. उसी ने कहा, ‘‘सर, हम ने उसे मना किया था. कहा कि छेड़छाड़ की बात और है, लेकिन वह नहीं माना. लड़की को पकड़ खेत में ले गया और लड़की की इज्जत खराब कर दी.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन उस लड़के का नाम क्या है, कौन है वह?’’

‘‘सर, उस का नाम राज है. उस के पापा पत्रकार हैं. उन का नाम अमन सिंह है. राज एक फाइनैंस कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर है.’’

इस के बाद उस ने वही सब मुझे भी बताया, जो उस ने परमजीत को बताया था. नरेश के साथी कुलदीप ने भी वही सब बताया था, जो नरेश ने बताया था. मैं उन से पूछताछ कर ही रहा था कि अमन आ पहुंचा. मुझ से हाथ मिला कर वह मेरे सामने कुरसी पर बैठ गया तो मैं ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘तुम्हारे बेटे ने जो किया है, मुझे उस से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी. तुम ने यही सब सिखाया है उसे?’’

‘‘मेरा बेटा… आप मेरे किस बेटे की बात कर रहे हैं?’’

‘‘राज की और किस की..?’’

‘‘क्यों, क्या किया राज ने?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.

‘‘एक लड़की के साथ जबरदस्ती की है.’’

‘‘जबरदस्ती… क्या मतलब?’’

‘‘भई एक लड़की के साथ दुष्कर्म किया है राज ने.’’ मैं ने आवाज पर जोर दे कर कहा.

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं? कहां किस के साथ दुष्कर्म किया है? राज ऐसा कतई नहीं कर सकता.’’ अमन ने जिद सी करते हुए कहा.

‘‘ऐसा नहीं कर सकता तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं. पूछो राज के इन साथियों से.’’ मैं ने नरेश और कुलदीप की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘अपने इन्हीं साथियों के साथ उस ने घटना को अंजाम दिया है. दोनों उसी के दोस्त हैं.’’

‘‘आप यह क्या कह रहे हैं. ये आवारा लड़के राज के दोस्त कतई नहीं हो सकते. राज के सिर्फ 3 दोस्त हैं, जिन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूं. तुम इन सड़कछाप लड़कों को राज का दोस्त कह दोगे तो क्या मैं मान लूंगा.’’

दुष्कर्म के मामले में राज का नाम आने से अमन काफी नाराज था. उस ने खीझते हुए कहा, ‘‘अच्छा, अब बात समझ में आई, मैं ने आप से कुछ रुपए मांगे थे, नहीं देने का मन था तो मना कर देते. मेरे बेटे पर इस तरह का झूठा आरोप लगाने की क्या जरूरत थी? सच ही कहा गया है, पुलिस वाले की न दोस्ती अच्छी होती है और न दुश्मनी.’’

‘‘अमन ये तुम क्या बेकार की बातें कर रहे हो? मैं कुछ भी नहीं कह रहा हूं. जो कुछ भी कह रहे हैं, वह ये लड़के और वह लड़की कह रही है, जिस के साथ राज ने दुष्कर्म किया है. रही बात पैसों की तो उस के लिए मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था. तुम्हें रुपए देने के लिए ही तो मैं ने बुलाया था.’’

‘‘मुझे अब आप की कोई मदद नहीं चाहिए. आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए.’’

मैं खामोश हो गया. अमन सिर झुकाए किसी सोच में डूबा बैठा रहा. कुछ देर बाद मैं ने अमन को प्यार से समझाया. लड़की को बुला कर पूरी बात उस के सामने कहलवाई. नरेश और कुलदीप से भी बात कराई. तब जा कर बात उस की समझ में आई.

वह कुछ देर शांत बैठा रहा. उस के बाद अचानक जेब से मोबाइल फोन निकाला और किसी से बात करने लगा. उस की बातचीत से समझ में आया कि उस ने राज को फोन किया था और अपने 2-4 दोस्तों के साथ आने को कहा था. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अमन करना क्या चाहता है. मैं ने अमन के लिए चाय मंगाई. चाय पी कर हम सभी चुपचाप बैठे रहे. वहां की खामोशी बता रही थी कि कोई किसी से बात नहीं करना चाहता. लगभग आधे घंटे बाद अमन के फोन की घंटी बजी. फोन रिसीव कर के उस ने कहा, ‘‘आ जाओ.’’

इस के बाद अमन उस से मुखातिब हुआ, ‘‘इन तीनों से कहो कि अभी जो लड़के आएंगे, उन में पहचान कर बताएं कि राज कौन है, जिस ने इस लड़की के साथ जबरदस्ती की है.’’

अमन के इतना कहतेकहते 6 लड़के मेरे औफिस में आ कर खड़े हो गए. सभी लड़के नरेश और कुलदीप से एकदम अलग पढ़ेलिखे और अच्छे घरों के लग रहे थे. मैं ने सब से पहले जीतो से कहा, ‘‘बताओ, इन लड़कों में से कौन राज है, जिस ने तुम्हारे साथ जबरदस्ती की है?’’

मेरी बात सुन कर वह बगलें झांकने लगी. मैं ने डांटा तो हड़बड़ा कर उस ने एक लड़के की ओर इशारा कर दिया. मेरे कहने पर परमीत सिंह ने उस लड़के को खड़ा कर दिया. इस के बाद मैं ने नरेश और कुलदीप से कहा कि वे बताएं कि उन में इन का दोस्त राज कौन है?’’

जीतो की तरह वे भी एकदूसरे का मुंह देखने लगे. मैं ने डांटते हुए कहा, ‘‘अब पहचान कर बताओ न तुम्हारा दोस्त राज कौन है?’’

दोनों हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे, ‘‘साहब, हम नहीं जानते कि इन में से राज कौन है? हमें तो राज का नाम लेने के लिए रुपए दिए गए थे.’’

‘‘जी साहब,’’ नरेश और कुलदीप के सच उगलते ही जीतो ने भी बीच में सच उगल दिया, ‘‘ये सच कह रहे हैं साहब. राज को दुष्कर्म के मामले में फंसाने के लिए हम सभी को रुपए दिए गए थे. मैं न तो राज को जानती हूं और न मैं ने कभी उसे देखा है.’’

इस के बाद उन तीनों ने जो बताया, उसे सुन कर मैं हैरान रह गया. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आज की युवा पीढ़ी को यह क्या हो गया है, जो छोटीछोटी बातों पर इतने खतरनाक मंसूबे बना लेती हैं. इस के बाद जीतो, नरेश और कुलदीप से की गई पूछताछ में इस फरजी दुष्कर्म की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी.

राज जिस फाइनैंस कंपनी में काम करता था, उसी में उस के साथ ही किशोरीलाल भी काम करता था. उस का काम लोन पास करवाना था. वह सीधासादा पारिवारिक आदमी था. इसलिए राज उस की बहुत इज्जत करता था. इस के अलावा एक वजह यह भी थी कि वह उस के पिता की उम्र का था.

किशोरीलाल की एक जवान बेटी थी सुधा, जो ग्रैजुएशन कर के उन दिनों घर में बैठी थी. वह पोस्टग्रैजुएशन करना चाहती थी, लेकिन एडमिशन में देरी थी. किशोरीलाल ने सोचा कि सुधा पूरे दिन घर में बैठी बोर होती रहती है, क्यों न इस बीच अस्थाई रूप से उसे अपनी कंपनी में लगवा दे. मन भी बहलता रहेगा, 4 पैसे कमा कर भी लाएगी. उस ने इस विषय पर राज से बात की तो उसे भला क्या ऐतराज होता. जहां 40-50 लड़केलड़कियां काम कर रहे थे, वहां एक और सही. सुधा ने फाइनैंस कंपनी जौइन कर ली. वह खुले विचारों वाली आधुनिक युवती थी. बातचीत में किसी से भी जल्दी घुलमिल जाना और दोस्ती कर लेना उस की फितरत थी.

स्कूल में पढ़ते समय से ही उस की कई लड़कों से दोस्ती थी. उन में से किसी एक ने उसे धोखा भी दिया था. बहरहाल राज को देखते ही वह उस की ओर आकर्षित हो गई थी, क्योंकि राज के खूबसूरत होने के साथसाथ कंपनी में भी उस की बड़ी इज्जत थी. कोई न कोई बहाना बना कर सुधा राज के नजदीक जाने की कोशिश करने लगी. इस कोशिश में उस ने घुमाफिरा कर कई बार उस से प्यार करने का इशारा किया. उस ने उस से यहां तक कह दिया कि वह एक लड़के से प्यार करती थी, लेकिन उस ने उसे धोखा दे दिया था. अब मांबाप उस की शादी करना चाहते हैं, लेकिन वह अभी शादी नहीं करना चाहती.

राज ने उस की कोशिश को नाकाम करते हुए उसे समझाया कि उसे इन बातों पर ध्यान न दे कर अपने काम पर ध्यान देना चाहिए. फिर अभी उसे आगे की पढ़ाई भी करनी है. उसे अपना कैरियर बनाना है. अभी उस का पूरा जीवन पड़ा है. उसे इस तरह की फिजूल की बातें दिमाग में नहीं लाना चाहिए. राज की बातों पर गौर किए बगैर सुधा सुधरने के बजाय मैसेज करने लगी. उन संदेशों में वह राज से सलाह मांगती कि अब उसे क्या करना चाहिए, साथ ही बीचबीच में प्यार के इजहार वाले मैसेज भी कर देती थी.

सुधा के इन संदेशों से परेशान हो कर राज ने उसे संदेश भेजा कि वह उस का समय बरबाद न करे, जैसा उस ने उसे समझाया है, वह वैसा ही करे. संयोग से किसी दिन सुधा का फोन उस के भाई सुरजीत के हाथ लग गया. उस ने मैसेज बौक्स में बहन के भेजे मैसेज देखे तो गुस्से से पागल हो उठा. उस ने बहन को समझाने के बजाय राज को सबक सिखाने का इरादा बना लिया. जबकि राज का इस मामले में कोई दोष नहीं था. बहन से उस ने कुछ कहना इसलिए उचित नहीं समझा, क्योंकि वह उस की फितरत को जानता था. उस ने मैसेज वाली बात मांबाप को भी बता दी थी.

यह सब सुन कर किशोरीलाल तो इतना शर्मिंदा हुए कि उन्होंने नौकरी पर जाना ही बंद कर दिया. सुधा की भी नौकरी छुड़वा दी गई. सुरजीत ने राज को सबक सिखाने के लिए थाने के अपने एक परिचित हवलदार को कुछ रुपए दे कर कहा कि राज उस की बहन से छेड़छाड़ कर के उसे परेशान करता है. वह उसे किसी झूठे मुकदमे में फंसा कर जेल भिजवा दे.

हवलदार, जिस का नाम जसबीर था, ने फोन कर के राज को थाने बुलाया. फोन पर उस ने राज को धमकाते हुए कहा था कि थाने में उस के खिलाफ रेप का मुकदमा दर्ज है. अगर वह थाने नहीं आया तो वह उसे उस के औफिस से गिरफ्तार कर लेगा. समझदारी दिखाते हुए राज ने यह बात अपने पत्रकार पिता अमन सिंह को बता दी, साथ ही सुधा द्वारा भेजे गए संदेशों के बारे में भी बता दिया. अमन इस बारे में मेरे पास सलाह लेने आया. मेरे पास आने से पहले उस ने हवलदार जसबीर सिंह को फोन कर के अपना परिचय दे कर पूछा था कि उस के बेटे राज से उसे ऐसा क्या काम है, जो वह उसे थाने बुला रहा है.

पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने भी फोन कर के हवलदार जसबीर सिंह से यही बात पूछी तो उस दिन के बाद उस ने राज को कभी फोन नहीं किया. इस के बाद अमन सिंह इस मामले को सुलझाने के लिए राज की कंपनी के मैनेजर से मिले. उन्होंने किशोरीलाल को औफिस में बुलवाया, जिस से आमनेसामने बैठ कर बातचीत हो सके और जो भी गलतफहमी हो दूर की जा सके. तय समय पर राज, अमन सिंह और किशोरीलाल मैनेजर की केबिन में इकट्ठा हुए. किशोरीलाल के साथ उस की पत्नी और बेटा सुरजीत भी आया था.

सुरजीत के बारे में जैसा मुझे पता चला था, उस के हिसाब से वह अपनी मां के लाड़प्यार में बिगड़ा आवारा किस्म का लड़का था. वह दिन भर गुंडागर्दी और आवारागर्दी किया करता था. वह खुद को किसी तीसमार खां से कम नहीं समझता था. बातचीत शुरू हुई तो सुरजीत और उस की मां किशोरीलाल को चुप करा कर जोरजोर से बोल कर राज पर झूठे आरोप लगाने लगे. बात यहीं तक सीमित नहीं रही, वे उसे सजा दिलाने की बात कर रहे थे. अंत में मैनेजर साहब को हस्तक्षेप करना पड़ा. उन्होंने कहा, ‘‘मैं राज को 5 सालों से जानता हूं. वह कैसा है, यह तुम लोगों को बताने की जरूरत नहीं है. रही बात सुधा की तो उसे भी 10 दिनों में जान लिया. फायदा इसी में है कि बात को यहीं खत्म कर दिया जाए.’’

उस दिन समझौता तो हो गया, लेकिन जातेजाते सुरजीत ने राज को धमकाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें देख लूंगा.’’

यह बात भी यहीं खत्म हो गई. उस दिन जो समझौता हुआ था, सुरजीत उस से बिलकुल खुश नहीं था. वह राज को सजा दिलाना चाहता था. सजा भी ऐसी कि वह मुंह दिखाने लायक न रहे. 2 महीने तक शांत रहने के बाद सुरजीत ने राज को सबक सिखाने के लिए एक योजना बनाई. उस योजना में उस ने कालगर्ल जीतो और 2 आवारा लड़कों नरेश तथा कुलदीप को शामिल किया. उस ने उन से कहा कि योजना सफल होने पर वह उन्हें मोटी रकम देगा.

उस की योजना के अनुसार, नरेश को किसी सुनसान जगह पर जीतो के साथ शारीरिक संबंध बनाना था. उस के बाद जीतो थाने जा कर शिकायत दर्ज कराती कि उस के साथ दुष्कर्म हुआ है. जीतो पुलिस को उस जगह ले जाती, जहां दुष्कर्म हुआ था. नरेश और कुलदीप वहीं छिपे रहेंगे, जिन्हें पुलिस दुष्कर्म का साथी मान कर थाने ले आती. थाने आ कर जीतो बताती कि इन दोनों ने दुष्कर्म नहीं किया, इन्होंने केवल छेड़छाड़ की थी. दुष्कर्म इन के दोस्त ने किया था, जो भाग गया है. पुलिस जब नरेश और कुलदीप से उन के दोस्त का नाम पूछती तो वे उस का नाम राज बता कर उस का मोबाइल नंबर देते हुए उस के बारे में पूरी जानकारी दे देते.

जीतो के बयान और नरेश तथा कुलदीप की गवाही के आधार पर पुलिस राज के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कर के उसे जेल भिजवा देगी, क्योंकि जीतो के मैडिकल में इस बात की पुष्टि हो जाती कि उस के साथ शारीरिक संबंध बनाया गया है. छेड़छाड़ के आरोप में तुरंत दोनों की जमानत हो जाती, जबकि दुष्कर्म के आरोप में राज को जेल भेज दिया जाता. इस काम के लिए सुरजीत ने नरेश और कुलदीप को 5-5 हजार रुपए तथा जीतो को 10 हजार रुपए एडवांस भी दिए थे. इतने ही रुपए उन्हें तब और मिलने थे, जब वे रिपोर्ट की कौपी सुरजीत को देते. यह सारी कारगुजारी सुरजीत की बनाई थी.

बहरहाल, मैं ने परमजीत सिंह से उन तीनों के बयान दर्ज कर के जीतो को अस्पताल ले जा कर मैडिकल कराने को कहा. इस के बाद मैं ने थाना मानावाला से हवलदार जसबीर को बुलवा कर पूछा, ‘‘यह राज वाला क्या मामला है?’’

उस ने सब कुछ सचसच बता दिया. उस ने कहा कि वह न राज को जानता है और न ही उसे उस के द्वारा की गई किसी छेड़छाड़ की बात मालूम है. सुरजीत ने उसे रुपए दे कर राज पर झूठा मुकदमा दर्ज कराने के लिए कहा था. लेकिन बीच में राज के पत्रकार पिता के आ जाने से वह राज पर कोई काररवाई नहीं कर सका था. जसबीर ने यह भी बताया था कि उस के बाद भी सुरजीत उस के पास आया था और कह रहा था कि वह चाहे जितने रुपए ले ले, लेकिन राज पर दुष्कर्म का केस बना कर उसे जेल भिजवा दे. लेकिन उस ने उसे साफ मना कर दिया था. शायद इसीलिए वह उस का थानाक्षेत्र छोड़ कर अपने मंसूबे को पूरे करने के मेरे थानाक्षेत्र में आया था.

मैं ने जसबीर की मुलाकात राज और अमन सिंह से भी कराई और उसे पूरी कहानी बताई. इस के बाद मैं ने उस से कहा कि सुरजीत ने राज के खिलाफ अपनी बहन से छेड़छाड़ की जो झूठी रिपोर्ट दी थी, उस पर वह उस के खिलाफ काररवाई करे. जसबीर इस के लिए तैयार हो गया.

अब तक परमजीत सिंह जीतो का मैडिकल करवा कर लौट आए थे. इस के बाद मैं ने नरेश, कुलदीप और जीतो से पूछा, ‘‘इस के बाद सुरजीत ने तुम लोगों से क्या करने को कहा था?’’

‘‘उस ने कहा था कि रिपोर्ट दर्ज होने के बाद मैं उसे फोन करूं. इस के बाद वह आता और रिपोर्ट की कापी ले कर मेरे बाकी रुपए देता.’’ जीतो ने कहा.

‘‘ठीक है, तुम उसे फोन कर के बताओ कि रिपोर्ट दर्ज हो गई है. पुलिस राज को पकड़ने उस के औफिस गई है.’’

मेरे कहने पर जीतो ने सुरजीत को फोन कर के वही सब कहा, जो मैं ने उसे समझाया था. सुरजीत ने जीतो से आधे घंटे बाद मेन बाईपास चौक पर मिलने को कहा. मैं ने परमजीत सिंह और जसबीर के नेतृत्व में एक टीम तैयार की और जीतो के साथ सुरजीत को पकड़ने के लिए भेज दी. दरअसल, मुझे सुरजीत पर बहुत गुस्सा आ रहा था. इसलिए नहीं कि राज मेरे दोस्त अमन सिंह का बेटा था, गुस्सा इस बात पर आ रहा था कि बहन की गलती मान कर उसे समझाने के बजाय वह एक निर्दोष को सजा दिलवाना चाहता था, वह भी सिर्फ अपने अहं और झूठी शान के लिए. इस तरह के लोग एक तरह से समाज पर कलंक हैं और घृणा के पात्र बन जाते हैं.

बहरहाल, सुरजीत को पकड़ने गई टीम खाली हाथ लौट आई. वह बाईपास पर नहीं आया. पुलिस टीम उस के घर भी गई, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. जीतो ने कई बार फोन कर के उस से बात करने की कोशिश की, लेकिन उस ने अपना फोन बंद कर दिया था. शायद उसे पुलिसिया काररवाई की भनक लग गई थी. वह फरार हो गया था. बहरहाल, जीतो, नरेश और कुलदीप के खिलाफ मैं ने काररवाई करनी शुरू कर दी. नरेश पर मैं ने जीतो से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करना चाहा तो जीतो और नरेश मेरे पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगे.

नरेश ने जीतो के साथ शारीरिक संबंध तो बनाए ही थे, जो मैडिकल रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गए थे. लेकिन जीतो ने कहा, ‘‘साहब, हम से गलती हो गई है, हमें माफ कर दें. यह संबंध मेरी मरजी से बने थे.’’

जीतो के इस नए बयान पर मैं ने नरेश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करने के बजाय इम्मोरल ट्रैफिकिंग एक्ट (देह व्यापार) का मुकदमा दर्ज कर उन्हें हिरासत में ले लिया. कुलदीप के खिलाफ मैं ने जीतो से छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज किया. अगले दिन तीनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जमानत मिल गई.

यह संयोग की ही बात थी कि राज मेरे पत्रकार दोस्त का बेटा था, वरना सुरजीत अपनी घिनौनी योजना को अंजाम दे कर एक भले लड़के को जेल भिजवा कर उस पर एक ऐसा कलंक का टीका लगा देता, जो पूरी जिंदगी न छूटता. इस से उस का जीवन भी अंधकारमय हो जाता. Crime Story

 

—कथा सत्य घटना पर आधारित, पात्रों के नाम बदले गए हैं.

 

Social Story: पत्नी पर दाव

Social Story: गांव के गरीब मजदूर आसरे की खूबसूरत पत्नी राधा पर छोटे ठाकुर बिच्छू सिंह का दिल आया तो उसे पाने के लिए उस ने आसरे को शराब पीना ही नहीं, जुआ खेलना भी सिखा दिया. क्या जुआ में राधा को जीत कर वह राधा को अपनी अंकशायिनी बना सका?

दिलीप को पता था कि उस के गुरू पं. भगवती प्रसाद चौबे सवेरेसवेरे मोहल्ले के नाई से मालिश करवाते थे. उस वक्त वह फुरसत में होते थे, इसलिए उन से बातचीत की जा सकती थी. वह चोटी के वकील थे. उन की बैठक में पहुंच कर दिलीप ने नमस्ते किया तो वह मुसकुराए.

उन्होंने दिलीप को देखते ही पूछा, ‘‘आओ दिलीप बेटा, सुबहसुबह कैसे?’’

‘‘बाबूजी, मैं ने वकालत तो शुरू कर दी है, पर मेरी मां कहती हैं कि इस पेशे में झूठ बहुत बोलना पड़ता है, जिस से चरित्रहीनता आ जाती है.’’

‘‘बेटे, हर झूठ, झूठ नहीं होता. हमें देखना होता है कि क्या, किस से, कहां और क्यों बोला जा रहा है और कितना बोला जा रहा है.’’

‘‘यानी झूठ कई तरह के होते हैं?’’

‘‘यही तो समझने की बात है. मिसाल के तौर पर एक फौजदारी अदालत में पुलिस ने एक नाजायज तमंचा रखने पर अभियुक्त को न्यायालय में पेश कर दिया. पुलिस ने 4 चश्मदीद गवाह पेश किए, जिन्होंने अभियुक्त के पास से पिस्तौल की बरामदगी की पक्की गवाही दी. जबकि अभियुक्त ने अपने वकील को बताया है कि रंजिश की वजह से उस पर झूठा मुकदमा बनाया गया है और गवाह पुलिस के दबाव से झूठी गवाही दे रहे है. वकील साहब जिरह करतेकरते थक गए, पर कोई गवाह सच नहीं बोला.’’

‘‘इस का मतलब बेगुनाह गया जेल.’’ दिलीप ने कहा.

‘‘अब या तो वकील यह नाइंसाफी देखता रहे या फिर इस की कुछ काट कर के अभियुक्त को बचा ले.’’

‘‘बाबूजी, ऐसी स्थिति में भला क्या हो सकता है?’’

‘‘हो क्यों नहीं सकता.’’ भगवतीप्रसाद चौबे बोले, ‘‘वकील को जैसे का तैसा जवाब देना चाहिए, मतलब उसे भी 4 झूठे गवाह पेश करने चाहिए. यह झूठ चूंकि सच उगलवाने के लिए बोला जाएगा, इसलिए झूठ नहीं कहलाएगा. क्योंकि इस से किसी निर्दोष की जान बचेगी.’’

‘‘ऐसा भी होता है क्या?’’ दिलीप ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा.

‘‘ज्यादातर मामलों में ऐसा ही करना पड़ता है, वरना हमारी तो वकालत ही बंद हो जाएगी.’’

चौबे साहब से बात कर के दिलीप जब वापस अपने औफिस पहुंचा तो वहां करीब 60 साल की उम्र वाला एक व्यक्ति बैठा था. अभिवादन करने के बाद उस ने कहा, ‘‘वकील साहब, मेरा एक औरत भगाने का मुकदमा है. आप उस की पैरवी कर दीजिए. फीस जो आप कहेंगे, मिल जाएगी.’’

‘‘यह तो बहुत गंभीर केस है, इस के लिए किसी सीनियर वकील की सेवाएं लो. मैं तो अभी बहुत जूनियर हूं.’’

‘‘उन लोगों के पास हो कर यहां आया हूं. सब ने इनकार कर दिया है. मेरा यह केस अब आप को ही लड़ना होगा. वकील साहब मैं आप को दोगुनी फीस दूंगा.’’

दिलीप ने उस के कागजात, गवाहों के बयान, एफआईआर तथा डाक्टरी रिपोर्ट देख कर उस के बारे में पूरी जानकारी ली. उस व्यक्ति ने इस मुकदमे के बारे जो बताया, वह कुछ इस तरह था. रायबरेली जिले में एक कस्बा है बछरावां. वहां से 4 किलोमीटर दूर ठाकुरों का एक गांव था, जिस के प्रधान थे रंजीत सिंह. उन का एक बेटा था बिच्छू सिंह, जो 22 साल का दबंग व रंगीला नौजवान था. वह खूब शराब पीता था और अपने साथियों के साथ जुआ खेलने के अलावा मेलेठेले में अपनी पसंद का शिकार करता था.

इसी गांव का एक पुरवा था राधेग्राम, जहां गरीब खेतिहर मजदूर रहते थे. इसी पुरवा में आसरे नाम का एक 20 साल का लड़का रहता था. इस के पास थोड़ी खेती की जमीन थी, बाकी वह मेहनतमजदूरी कर के अपना काम चला लेता था. राधा से उस की नईनई शादी हुई थी. राधा एक सुंदर सुशील लड़की थी. उसने एक गाय पाला रखी थी, जिस का दूध बेच कर कुछ आमदनी हो जाती थी.

बिच्छू सिंह के गुर्गों ने जब उसे राधा की सुंदरता के बारे में बताया तो बिच्छू सिंह उसे पाने के लिए अपने अवारा साथियों से सलाह करने लगा. उस ने आसरे को अपने खेतों पर डबल मजदूरी पर काम दे दिया और उस के साथ देसी शराब के ठेके पर भी जाने लगा. वहां वह एक बोतल शराब और एक प्लेट मछली ले कर उस के साथ खातापीता. कुछ दिनों बाद बिच्छू सिंह ने आसरे से कहा, ‘‘का रे आसरे, ताश खेलना जानता है? हमारे सब साथी तो रात में ताश खेलते है.’’

‘‘छोटे ठाकुर, हम तो ताश कभी देखे भी नहीं, भला खेलेंगे क्या?’’

‘‘लो कर लो बात, इतना बड़ा हो गया और ताश खेलना भी नहीं जानता. चल मैं तुझे सिखाता हूं. पहले तू ताश के पत्ते पहचान ले, बाकी खेल देख कर खुद ही सीख जाएगा.’’

इस तरह छोटे ठाकुर ने आसरे को न केवल शराब का आदी बना दिया, बल्कि जुआ खेलना भी सिखा दिया. वह आसरे के साथ ऐसी तिकड़म से जुआ खेलता कि आसरे हर बार 100-200 रुपए जीत कर नशे की हालत में घर जाता और पत्नी से छोटे ठाकुर की बहुत तारीफ करता.

एक दिन राधा ने उसे समझाया, ‘‘देखो जी, शराब व जुआ बहुत बुरी चीज है. इस से घर बरबाद हो जाते हैं. महाभारत का युद्ध इसी जुए के कारण हुआ था.’’

‘‘मैं क्या तुम्हें बेवकूफ लगता हूं? मुझे जिस काम में फायदा नजर आएगा, वही करूंगा न, तुझे तो पूरा पैसा देता हूं.’’ आसरे ने गुस्से में जवाब दिया.

‘‘मुझे हराम का पैसा नहीं चाहिए. बरकत ईमानदारी के पैसे से होती है. वैसे भी शराब से तुम्हारा शरीर खराब हो रहा है.’’

‘‘तू बड़े आदमियों को नहीं जानती. वे मुझे अपना दोस्त कहते हैं. चल खाना दे, बड़े जोर की भूख लगी है.’’

एक दिन छोटे ठाकुर ने आसरे से कहा, ‘‘आज हम तुम्हारे घर ताश खेलने चलेंगे. वहीं शराब भी चलेगी.’’

आसरे तैयार हो गया और सब को साथ ले कर अपने घर आ गया. सब ने बाहरी कोठरी में अड्डा जमाया. छोटे ठाकुर ने बोतल खोली और आसरे की पत्नी से कुछ नमकीन मांगी. जब वह चना ले कर आई तो बिच्छू सिंह ने कहा, ‘‘तेरी पत्नी तो हीरोइन है आसरे. बहुत किस्मत वाला है. बोल मेरी पत्नी से बदलेगा.’’

इस फूहड़ मजाक पर सब जोरजोर से हंसने लगे. राधा जल्दी से अंदर चली गई. जुआ शुरू हुआ. उस दिन आसरे हारने लगा. जब उस के सारे पैसे खत्म हो गए तो छोटे ठाकुर ने खेलने के लिए उसे कुछ रुपए उधार दे दिए. जब आसरे उन्हें भी हार गया तो उस ने कहा,‘‘छोटे ठाकुर, अब हमारे पल्ले कुछ नहीं बचा. खानेपीने के भी लाले पड़ जाएंगे.’’

‘‘तू घबरा मत, मैं हूं ना. अभी भी तू हारी हुई अपनी सारी रकम जीत सकता है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘एक तगड़ा दाव खेल जा, सब कुछ तेरा.’’

‘‘कैसे खेलूं ठाकुर, मेरे पल्ले तो अब कुछ है नहीं.’’

‘‘जैसे महाभारत में युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगाया था, उसी तरह तू भी लगा दे पत्नी को दांव पर, पत्नी का तो कुछ नहीं होगा. ढेर सारा पैसा जरूर आ जाएगा.’’

एक तो आसरे पहले ही नशे में था, ऊपर से ठाकुर ने उसे चढ़ा दिया. कुछ सोचने के बाद वह उस दांव को खेलने के लिए राजी हो गया. इस बार खेल बड़ा था. वही हुआ, जो ठाकुर चाहता था. आसरे अपनी पत्नी हार गया. उस के हारते ही ठाकुर के तेवर बदल गए. उस ने गुर्रा कर कहा, ‘‘अब राधा मेरी हो गई. तेरा उस पर कोई अधिकार नहीं रहा. रात को इसे खेतों वाले मकान पर पहुंचा देना, नहीं तो जबरदस्ती करनी पड़ेगी.’’

इस के बाद वे भी चले गए, आसरे मुंह लटकाए बाहर बैठा सोचता रहा कि पत्नी को कैसे बचाए. काफी देर बाद जब वह घर के अंदर आया तो राधा गायब थी. उस ने चारों ओर ढूंढा, ठाकुर से पूछा, पर राधा का कुछ पता नहीं चला. राधा के बारे में जैसे ही ठाकुर को पता चला, उस ने साइकिलों से अपने आदमी थानेचौकी व रेलवे स्टेशन की ओर दौड़ाए और खुद बसअड्डे जा पहुंचा. वहीं उस ने राधा को एक तैयार बस में बैठे देख लिया. वह भी उस बस में चढ़ गया और राधा से बहुत प्यार एवं इज्जत से बोला, ‘‘राधा, तुम ख्वाहमख्वाह नाराज हो कर चली आईं. अरे हम तो रामलीला की तरह महाभारत लीला खेल रहे थे. भला आजकल के जमाने में कोई पत्नी को संपत्ति समझ कर जुआ खेल सकता है? पुलिस हमारी हड्डीपसली तोड़ देगी. चलो घर चलो, मजाक को मजाक ही समझा करो.’’

लेकिन राधा इन चिकनीचुपड़ी बातों में नहीं आई. उस ने साफसाफ कहा, ‘‘ठाकुर, तुम नीचे उतरो, वरना हम शोर मचा कर सामने खड़ी पुलिस को बुला लेंगे.’’

ठाकुर बाजी हार कर बस से नीचे उतर आया, बस चली गई. रास्ते में एक शरीफ आदमी मिला तो उस ने राधा के सिर पर हाथ रख कर उस की मदद की जिम्मेदारी ली. राधा के पिता के उम्र का वह आदमी अगले स्टाप पर उसे फुसला कर अपने घर ले गया.

‘‘बेटी, तुम आराम करो. खानापानी कर लो. अभी रात हो गई. सुबह मैं तुम्हें तुम्हारे पिता के पास पहुंचा दूंगा. और हां, दरवाजा अंदर से बंद कर लेना.’’

राधा ने ऐसा ही किया. परंतु राधा के कान तब खड़े हुए, जब वह व्यक्ति अपनी पत्नी से कहने लगा, ‘‘तुम्हारे भाई की शादी कहीं नहीं हो रही है. उस के लिए एक दुलहन ले कर आया हूं. सुबह को इसे तेरे गांव ले जा कर साले से इस की शादी करा दूंगा. लड़की अच्छी है, लगता है घर से भागी है.’’

सुन कर राधा सन्न रह गई. जिस पर विश्वास किया, वही दामन चाक करने को तैयार था. कमरे की पिछली खिड़की खुली थी, उस में सलाखें भी नहीं लगी थीं. राधा धीरे से उस खिड़की से बाहर आई और रात भर सड़क पकड़ कर चलती रही. उसे कुछ पता नहीं था कि वह कहां है और किधर जा रही है. भोर होतेहोते वह एक गांव में पहुंची, जहां लोगों ने उस अजनबी महिला को देख कर चोर समझ लिया, वे उसे ले कर प्रधान के पास पहुंचे, ‘‘वीरजी, यह महिला गांव की नहीं है. चुपकेचुपके गांव में घुस रही थी. हम इसे पकड़ लाए. कोई चोर लगती है. घरों का भेद जान कर यह अपने साथियों को इशारे से बुला लेगी.’’

वीरजी को लड़की परेशान व थकी हुई लगी. उस ने पूछा ‘‘भूखी हो?’’

‘‘हां, लेकिन मैं चोर नहीं, बल्कि एक दुखयारी औरत हूं. मेरे पीछे बदमाश पड़े हैं और मेरी इज्जत खतरे में है. आप मेरी मदद कर के मुझे मेरे पिता के घर पहुंचा दीजिए.’’

वीरजी ने उस से उस के पिता का पता पूछा. फिर कहा कि वह थोड़ा आराम कर ले, कुछ खापी ले. उसे उस के घर पहुंचा दिया जाएगा. अब उसे डरने की जरूरत नहीं है. वीरजी ने राधा की कदकाठी और उम्र देखी तो उस के मुंह में पानी आ गया. उस ने सोचा कि क्यों न इसे पुत्तनबाई के हाथ बेच दिया जाए. वहां से अच्छे पैसे मिल जाएंगे, साथ ही वहां उस का आनाजाना भी होता रहेगा. राधा थकी थी. नाश्ता कर के लेटी तो उसे नींद आ गई. उस की आंख खुली तो देखा वीरजी पास खड़ा उसे ललचाई नजरों से देख रहा है. वह हड़बड़ा कर उठ बैठी तो वीरजी बोले, ‘‘बेटी, बस का समय हो गया है. मैं तुम्हें जगाने आया था. चलो, पास ही बस स्टाप है, वहीं से बस पकड़ लेंगे.’’

राधा अपनी साड़ी ठीक कर के तैयार हो गई. दोनों बसस्टाप पर आ गए. बस आई तो वह वीरजी के साथ बस में बैठ गई. अब वह बहुत चौकन्नी थी. उसे वीरजी अच्छा आदमी नहीं लग रहा था. बस जब फर्रुखाबाद बस अड्डे पर पहुंची तो वीरजी ने राधा को बस से उतारा और बाहर की ओर ले कर चल दिया. वहीं फाटक पर एक सिपाही ड्यूटी पर था. राधा जोर से चिल्लाई तो सिपाही ने पास आ कर पूछा, ‘‘क्या बात है, क्यों शोर मचा रही है?’’

‘‘यह आदमी मुझे घर से भगा कर कहीं खतरे की जगह ले जा रहा है. आप मेरी मदद कीजिए.’’

वीरजी ने पासा पलटते देखा तो धीरे से वहां से खिसक गया. राधा के इशारे पर सिपाही ने उसे रोक लिया और दोनों को सीधे पुलिस थाने ले गया. राधा ने वहां अपना पूरा हाल बताया तो थानेदार ने रिपोर्ट लिख कर वीरजी को लौकअप में डाल दिया और राधा को डाक्टरी मुआएने के लिए भेज दिया. बाद में राधा तो अपने पिता के घर पहुंच गई, परंतु वीरजी को मजिस्ट्रेट ने जेल भेज दिया. वीरजी ने अपने घर वालों को बुला कर जमानत कराई और सीधे रायबरेली पहुंच कर दिलीप के पास पहुंचा. चूंकि मुकदमा इसी जिले का था, इसलिए फर्रुखाबाद थाने ने बछरावां थाने को तफतीश के लिए कागजात भेज दिए. मुकदमा यहीं चलना था.

बछरावां के थानेदार ने बिच्छू सिंह से ले कर वीरजी तक सभी को इस मुकदमे में मुलजिम बनाया और न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर दी. चूंकि मुकदमा भादंवि की धारा 365, 366 के अंतर्गत था, इसलिए निचली अदालत ने इसे सेशन कोर्ट के सुपुर्द कर दिया. जब इस न्यायालय में काररवाई शुरु हुई तो सब से पहले सरकारी वकील ने अभियुक्तों को न्यायालय में हाजिर किया. उस के बाद अभियुक्तों के विरुद्ध अभियोग पढ़ा और बताया कि इसे सिद्ध करने के लिए वकील साहब क्या साक्ष्य पेश करेंगे. न्यायालय ने कागजात और अभियोग को देखते हुए दिलीप से इस पर बहस करने को कहा, पर दिलीप ने इनकार कर दिया.

इस के बाद जज ने अभियुक्तों पर धारा 365, 366, 368 का अभियोग लगाया तो अभियुक्तों ने यह आरोप मानने से इनकार करते हुए मुकदमा लड़ने की प्रार्थना की. इस पर जज साहब ने अगली तारीख पर अभियोजन पक्ष को साक्ष्य पेश करने को कहा. साथ ही उन के गवाहों को सम्मान जारी कर के बुलाया गया.

अगली तारीख पर सरकारी वकील ने 3 गवाह व अन्य सबूत न्यायालय में पेश किए, जिन से दिलीप ने एक ही प्रश्न पूछा, ‘‘क्या आप ने देखा था कि राधा अपने घर से बिच्छू सिंह के साथ जबरदस्ती ले जाई जा रही थी?’’

‘‘जी नहीं, मुझे गांव में पता चला था.’’ गवाह ने जवाब दिया.

‘‘आप राधा को पहचानते हैं?’’ दिलीप का अगला सवाल था.

‘‘जी हां, उसे गांव में देखा था.’’

‘‘बताइए, न्यायालय में हाजिर 4 महिलाओं में राधा कौन है?’’ दिलीप ने पूछा.

गवाहों ने राधा को नहीं पहचाना.

‘‘आप बिच्छू सिंह और वीरजी को इस अदालत में 10 आदमियों के बीच में पहचान सकते हैं?’’

‘‘जी हां.’’

लेकिन उन्होंने 3 गलतियां करने के बाद भी उन्हें नहीं पहचाना.

सरकारी गवाह जब पूरे उतर गए तो दिलीप ने बचाव में कोई गवाह पेश नहीं किया. इस के बाद मुकदमा बहस में पहुंच गया. बहस में सरकारी वकील ने कहा, ‘‘सर, औरत चूंकि 18 साल से अधिक उम्र की है, इसलिए यह अपहरण का मुकदमा बनता है.’’

वकील एक पल रुक कर बोला, ‘‘पहली बात तो यह कि बिच्छू सिंह ने बुरी नीयत से आसरे से राधा को जुए के दांव पर लगवाया और उसे चालाकी से जीत कर अपने खेतों वाले घर पर जबरन बुलाया. यह बात गवाही से साबित हो चुकी है. दूसरे शेष 2 अभियुक्तों, जिन में वीरजी भी शामिल हैं, ने राधा को बुरी नीयत से अपनेअपने घरों में बंद कर के रखा, जो कानूनन उतना ही बड़ा जुर्म है, जितना अपहरण. इतना ही नहीं, राधा को शादी के लिए मजबूर करना भी गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है.’’

सरकारी वकील ने आखिर में कहा कि गवाहों और राधा द्वारा यह आरोप पूरी तरह सिद्ध कर दिए गए हैं कि इन लोगों ने कानूनी अपराध तो किया ही है, एक महिला के साथ दुर्व्यवहार भी किया है, जो एक सामाजिक अपराध है. इसलिए इन्हें सख्त सजा दी जाए.’’

इस के बाद दिलीप ने अपना बचाव पक्ष रखा, ‘‘सर, मैं सच्चाई से पूरा खुलासा करना चाहता हूं ताकि न्यायालय को न्याय करने में आसानी रहे.’’

आरोपियों की ओर देख कर दिलीप ने कहना शुरू किया, ‘‘पहली बात तो यह कि अपहरण का आरोप साबित नहीं हो सका कि बिच्छू सिंह ने राधा को उस के घर से भगाया था. वह उसे बसअड्डे पर मिली थी, वहां भी उस के साथ कोई जोरजबरदस्ती नहीं की गई. वीरजी राधा को उस के पिता के घर ले जा रहा था. वह पुलिस को देख कर डर कर भागा, जो अपराध नहीं है.

‘‘वीरजी के मन की बात सरकारी वकील नहीं साबित कर सके. लिहाजा वही माना जाए, जो उस ने राधा से चलते समय कहा. दूसरे न तो गवाहों ने यह नहीं कहा और न ही राधा ने दुर्व्यवहार की शिकायत की. यह सरकारी वकील का अनुमान ही हो सकता है. तीसरे आसरे को धोखा दे कर जुआ खिलाया गया और शराब पिला कर राधा को दांव पर लगवाया गया. अत: उस की भी गलती सिद्ध नहीं हुई.’’

अंत में दिलीप ने कहा, ‘‘सर, निवेदन है कि अभियुक्तों को बेगुनाह मानते हुए इज्जत के साथ दोषमुक्त कर दिया जाए.’’

अगली तारीख पर जज साहब ने सभी अभियुक्तों को मुक्त कर दिया, पर बिच्छू सिंह को धोखाधड़ी के इलजाम में 6 महीने की सजा बामशक्कत सुनाई गई. Social Story

लेखक – हसन अस्करी एडवोकेट       

Hindi Crime Story: प्रेम में डूबी जब प्रेमलता

Hindi Crime Story: प्रेमलता की अच्छीभली गृहस्थी थी, सरकारी नौकरी वाला पति था. लेकिन बबलू के प्यार और महत्त्वाकांक्षा में वह कुछ इस तरह उलझी कि अपने ही हाथों सुहाग उजाड़ कर गृहस्थी बरबाद कर दी.

अभी सुबह का उजाला भी ठीक से फैला नहीं था कि मैनपुरी कोतवाली के गेट से एक महिला अंदर घुसी. वह काफी अस्तव्यस्त और घबराई हुई लग रही थी,

इसलिए ड्यूटी पर तैनात संतरी ने आगे बढ़ कर पूछा, ‘‘कहो, कैसे आई?’’

‘‘साहब से मिलना है.’’

‘‘क्यों, क्या परेशानी है?’’ संतरी ने पूछा.

संतरी का इतना कहना था कि महिला रोने लगी. संतरी ने उसे चुप कराते हुए कहा, ‘‘साहब तो अभी आए नहीं हैं. तुम अपनी परेशानी बताओ. अगर कोई ज्यादा परेशानी वाली बात होगी तो मैं साहब से जा कर बता दूंगा.’’

‘‘मेरे पति ने रात में आत्महत्या कर ली है. उन की लाश घर में पड़ी है.’’ महिला ने सिसकते हुए कहा.

इस के बाद संतरी महिला को ड्यूटी पर तैनात मुंशी के पास ले गया और उसे पूरी बात बताई. मामला गंभीर था, इसलिए मुंशी ने संतरी से कोतवाली प्रभारी को सूचना देने के लिए कहा.

सूचना पा कर कुछ ही देर में कोतवाली प्रभारी मनोहर सिंह यादव आ गए. उन्होंने महिला को अपने कक्ष में बुला कर पूछा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘जी प्रेमलता, घर में सब पिंकी कहते हैं.’’

‘‘कहां से आई हो?’’

‘‘नगला कीरत से. वहीं अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी.’’

‘‘पति का क्या नाम था?’’

‘‘गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू.’’

‘‘बच्चे कितने हैं?’’

‘‘2, बेटा 8 साल का और बेटी 5 साल की है.’’

प्रेमलता जिस तरह टकरटकर मनोहर सिंह के सवालों का जवाब दे रही थी, उस से उन्हें उस पर संदेह हुआ. जिस औरत का पति मरा हो, वह इस तरह कतई बातें नहीं कर सकती. उन्होंने पूछा, ‘‘यह सब हुआ कैसे?’’

‘‘साहब, हम क्या बताएं. रात को हम सब खाना खा कर सोए और सवेरे उठे तो उन की लाश मिली. आप चलिए और लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम करा दीजिए. हम उन का जल्दी से अंतिम संस्कार करना चाहते हैं.’’

आगे कुछ पूछने के बजाय कोतवाली प्रभारी कुछ सिपाहियों और प्रेमलता को साथ ले कर कीरतपुर नगला जा पहुंचे. प्रेमलता के घर के सामने भीड़ लगी थी. भीड़ को हटा कर मनोहर सिंह अंदर पहुंचे तो कमरे में पड़ी चारपाई अस्तव्यस्त हालत में पड़ी थी.

मनोहर सिंह ने लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर चोट का कहीं कोई निशान नहीं था. गले पर जरूर कुछ इस तरह का निशान था, जो गला दबाने पर पड़ जाते हैं. उन्हें जो आशंका थी, लाश देख कर वह सच नजर आ रही थी. घर में एक ही दरवाजा था, उसी से अंदर आया या बाहर जाया जा सकता था. प्रेमलता का कहना था कि रात में उस ने खुद कुंडी लगाई थी.

मनोहर सिंह ने औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद उन्होंने एक बार फिर प्रेमलता से पूछताछ की. उस का कहना था कि वह रहते भले तनाव में थे, लेकिन ऐसी कोई बात नहीं कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़े. शाम को सब ठीकठाक था. बात भी अच्छी तरह कर रहे थे. कहीं से नहीं लगता था कि वह रात में आत्महत्या कर लेंगे.

पूछताछ में पता चला कि मृतक गवेंद्र सिंह की सरकारी नौकरी थी. वह सरकारी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. वह बहुत खुशदिल था. हर किसी से हमेशा हंस कर मिलता था. मनोहर सिंह को गवेंद्र सिंह की आत्महत्या का यह मामला पूरी तरह से संदिग्ध लग रहा था, लेकिन जब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आ जाती, वह कुछ नहीं कर सकते थे.

प्रेमलता ने 6 बजे ही अपने ससुर रामसेवक को फोन कर के गवेंद्र की मौत की सूचना दे दी थी. उसी सूचना पर रामसेवक 9 बजे घर वालों के साथ नगला कीरतपुर पहुंचे तो पुलिस वहां मौजूद थी. बेटे की लाश देख कर रामसेवक ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरे बेटे ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की हत्या की गई है. आखिर वह आत्महत्या क्यों करेगा, उसे किसी चीज की कमी थोड़े ही थी.’’

‘‘कोई बात नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सब पता चल जाएगा. उस के पहले हम कुछ नहीं कह सकते.’’ मनोहर सिंह ने उसे आश्वासन दिया.

मनोहर सिंह ने मृतक के पिता रामसेवक की ओर से अपराध संख्या 1341/2015 पर अज्ञात लोगों के खिलाफ गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया था. मनोहर सिंह ने मुखबिरों से प्रेमलता के बारे में पता लगाने को कहा, क्योंकि उन्हें उस का चरित्र संदिग्ध लग रहा था. आखिर जब उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो सारा मामला साफ हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक की मौत दम घुटने से हुई थी. उस की गला दबा कर हत्या की गई थी. ऐसे में संदेह प्रेमलता पर ही था, क्योंकि घर में मृतक के साथ वही थी और थाने आ कर उस ने झूठ भी बोला था.

मनोहर सिंह ने पूरे परिवार को इकट्ठा किया तो उन की नजरें मृतक के बच्चों पर जम गईं. हत्या वाली रात वे भी साथ थे. बच्चे डरे हुए लग रहे थे. बेटी तो छोटी थी, लेकिन बेटा उमंग 8 साल का था. वह कुछ बता सकता है, यह सोच कर उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और प्यार से पुचकार कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मम्मी ने बबलू अंकल और 2 लोगों के साथ मिल कर पापा को मारा है.’’

अब क्या था, पुलिस ने तुरंत प्रेमलता उर्फ पिंकी को हिरासत में ले लिया. लेकिन जब उस से हत्या में शामिल बबलू तथा 2 अन्य लोगों के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि न वह बबलू को जानती है और न 2 अन्य लोगों को. उमंग ने बबलू का नाम तो बता दिया था, लेकिन वह कौन था, कहां का रहने वाला था, यह सब वह नहीं बता सका था.

पुलिस बबलू के बारे में पता करने लगी. उसी बीच उसे पता चला कि प्रेमलता इन दिनों आगरा की लायर्स कालोनी स्थित आईआईएमटी से नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थी और वहीं कमरा ले कर रहती थी. इस से पुलिस को लगा कि कहीं बबलू आगरा का ही रहने वाला तो नहीं है. पुलिस वहां जा कर बबलू के बारे में पता लगाने की सोच ही रही थी कि प्रेमलता से मिलने एक लड़का आया. उस ने थानाप्रभारी से प्रेमलता को अपनी बहन बता कर मिलने की गुजारिश की तो मनोहर सिंह ने उसे प्रेमलता से मिलने की इजाजत दे दी.

उन्होंने उस लड़के को प्रेमलता से मिलने की इजाजत तो दे दी, लेकिन महिला सिपाही रेनू सारस्वत को उस के पीछे लगा दिया कि वह किसी भी तरह उन की बातें सुनने की कोशिश करे. रेनू उधर से गुजरी तो लड़का कह रहा था, ‘‘तुम ने ताजमहल वाले फोटो जला दिए हैं न?’’

‘‘हां, जला दिए हैं. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है?’’

यह सुन कर रेनू चौंकी. वह तुरंत मुंशी मंसूर अहमद के पास पहुंची और उन से बता दिया कि प्रेमलता से जो लड़का मिलने आया है, वही बबलू है.

मंसूर अहमद तेजी से बाहर आए. बबलू को शायद शक हो गया था, इसलिए वह तेजी से बाहर की ओर चला जा रहा था. मंसूर अहमद ने संतरी को आवाज देते हुए तेजी से उस की ओर दौड़े. आखिर उन्होंने उसे दबोच ही लिया.

इस के बाद उसे अंदर ला कर पूछताछ की गई तो एक ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस में प्रेम की राह में रोड़ा बनने वाले गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या कर दी गई थी. यह पूरी कहानी इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी का एक गांव है भरथरा, जहां महेशचंद फौजी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटे और 4 बेटियां थीं. प्रेमलता उन में सब से बड़ी थी. उस ने बीए करने के बाद बीएड किया और नौकरी की तलाश में लग गई. इसी के साथ महेशचंद उस की शादी के लिए लड़का ढूंढ़ने लगे.

महेशचंद की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी, बेटी भी पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह उस के लिए खातेपीते परिवार का पढ़ालिखा लड़का तलाश रहे थे. इसी तलाश में उन्हें किसी से जिला एटा के थाना बागवाला के गांव लोहाखार के रहने वाले रामसेवक के बेटे गवेंद्र के बारे में पता चला तो वह उस के घर जा पहुंचे. रामसेवक का खातापीता परिवार था. उस के पास ठीकठाक जमीन थी. गांव में पक्का मकान था, एक मकान मैनपुरी के नगला कीरतपुर में भी था. गवेंद्र ने पौलिटैक्निक करने के साथ बीए भी कर रखा था. वह नौकरी की तलाश में था.

महेशचंद को गवेंद्र प्रेमलता के लिए पसंद आ गया. उसे लगा कि गवेंद्र को जल्दी ही कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. उस के बाद उन की बेटी की जिंदगी संवर जाएगी. उस ने गवेंद्र को प्रेमलता के लिए पसंद कर लिया और उस के साथ प्रेमलता की शादी कर दी. प्रेमलता ससुराल आ गई. रामसेवक का छोटा सा परिवार था. पतिपत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी नीरज थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. इसलिए घर में सिर्फ 4 ही लोग बचे थे. प्रेमलता को पूरा विश्वास था कि उस के पति को जल्दी ही कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल जाएगी. वैसे घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पति की कमाई की बात अलग ही होती है.

गवेंद्र नौकरी की कोशिश में लगा था, लेकिन नौकरी मिल नहीं रही थी. इस बीच वह 2 बच्चों उमंग और तमन्ना का पिता बन गया. प्रेमलता खुद भी बीए, बीएड थी. लेकिन बच्चे छोटे थे, दूसरे गवेंद्र नहीं चाहता था कि वह नौकरी करे, इसलिए प्रेमलता ने अपने लिए कोशिश नहीं की. सन 2012 में गवेंद्र को मैनपुरी के कीरतपुर स्थित सेवाराम जूनियर हाईस्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिल गई. नौकरी भले ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की थी, लेकिन सरकारी थी, इसलिए उस ने इसे जौइन कर लिया.

लेकिन प्रेमलता को यह नौकरी पसंद नहीं थी, वह शायद किसी अधिकारी की बीवी बनना चाहती थी. चपरासी की बीवी कहलवाना उसे बिलकुल भी पसंद नहीं था. इसलिए उस ने सोचा कि अब उसे ही कुछ करना होगा. वह अपने कैरियर के बारे में सोचने लगी. उस के बच्चे भी बड़े हो गए थे, इसलिए वह खुद कुछ कर के समाज में नाम और पैसा कमाना चाहती थी.

उसी बीच ससुराल जाते समय बस में उस की मुलाकात बबलू से हुई. बबलू भी उसी सीट पर बैठा था. रास्ते में बबलू उस के बच्चों से बातें करतेकरते उस से भी बातें करने लगा. उस ने बताया कि वह आगरा के आईआईएमटी कालेज से जीएनएम (जनरल नर्सिंग मिडवाइफरी) का कोर्स कर के आगरा के पुष्पांजलि अस्पताल में नौकरी करता है.

जब प्रेमलता ने कहा कि उस ने भी बीए, बीएड किया है, लेकिन लगता नहीं कि उसे नौकरी मिलेगी तो उस ने कहा, ‘‘अगर तुम जीएनएम का कोर्स कर लो तो जल्दी ही तुम्हें कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी. रही बात दाखिले की तो वह तुम मुझ पर छोड़ दो.’’

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. 2-4 दिन ससुराल में रह कर प्रेमलता पति के पास आई तो उस ने गवेंद्र से कहा, ‘‘भई अब इस तरह काम नहीं चलेगा. बच्चों के भविष्य के लिए मुझे भी कुछ करना होगा. बीए, बीएड से तो नौकरी मिल नहीं सकती, इसलिए मैं जीएनएम का कोर्स करना चाहती हूं. इस से किसी न किसी अस्पताल में नौकरी मिल जाएगी.’’

गवेंद्र को लगा कि अब बच्चे समझदार हो गए हैं. ऐसे में प्रेमलता कुछ करना चाहती है तो इस में बुराई क्या है. वह प्रेमलता को जीएनएम का कोर्स कराने के लिए राजी हो गया. गवेंद्र के पिता रामसेवक रिटायर हो चुके थे. इसलिए अब वह भी उसी के साथ रहने लगे थे.

प्रेमलता ने बबलू की मदद से आईआईएमटी में अपना दाखिला करा लिया.  बबलू उसे सुनहरे भविष्य का सपना दिखाने लगा. प्रेमलता की पढ़ाई शुरू हो गई. बबलू लायर्स कालोनी में कमरा किराए पर ले कर रहता था. प्रेमलता को भी उस ने उसी कालोनी में कमरा दिला दिया. अब दोनों की रोज मुलाकात होने लगी. बबलू प्रेमलता के कमरे पर भी आनेजाने लगा.

लगातार मिलने और कमरे पर आनेजाने से प्रेमलता और बबलू में प्यार ही नहीं हो गया, प्रेमलता ने उस से शारीरिक संबंध बना कर उस ने रिश्तों की मर्यादा भंग कर दी. सपनों को ख्वाहिश बनाया तो तन और मन से पति से ही नहीं, बच्चों से भी दूर हो गई.

बबलू को जब लगा कि प्रेमलता पूरी तरह से उस की हो गई है तो उस ने उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. तब प्रेमलता ने कहा, ‘‘बबलू यह सब इतना आसान नहीं है. क्योंकि गवेंद्र मुझे आसानी से छोड़ने वाला नहीं है.’’

‘‘तो ठीक है, मैं उसे रास्ते से हटाए देता हूं.’’ बबलू ने कहा तो प्रेमलता गंभीर हो कर बोली, ‘‘यह तो और भी आसान नहीं है.’’

प्रेमलता भी अब गवेंद्र से छुटकारा पा कर बाकी की जिंदगी बबलू के साथ बिताना चाहती थी, लेकिन वह उसे छोड़ कर बबलू से शादी नहीं कर सकती थी. क्योंकि ऐसा करने पर मायके वाले उस का साथ न देते. इसलिए वह बड़ी उलझन में फंसी थी. वह इस बारे में कुछ करती, उस के पहले ही उस की पोल खुल गई. स्कूल में छुट्टी होने की वजह से गवेंद्र पत्नी से मिलने आगरा पहुंच गया. उस का वहां आना प्रेमलता को अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन वह उसे भगा भी नहीं सकती थी. रात का खाना खा कर वह सो गया.

अचानक उस की आंख खुली तो उस ने प्रेमलता को मोबाइल पर किसी से हंसहंस कर बात करते पाया. उस की बातचीत सुन कर पता चला कि वह किसी बबलू से बातें कर रही थी. उस ने फोन काटा तो गवेंद्र ने पूछा, ‘‘यह बबलू कौन है, जिस से तुम इतनी रात को बातें कर रही थी?’’

‘‘यहीं पड़ोस में रहता है. उस से किसी काम के लिए कहा था, उसी के बारे में बात कर रही थी.’’

‘‘उस के बारे में तुम सुबह भी तो पूछ सकती थी.’’

‘‘अभी पूछ लिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा.’’ प्रेमलता ने तमक कर कहा.

इस के बाद गवेंद्र को नींद नहीं आई. सुबह दोनों में बबलू को ले कर खूब झगड़ा हुआ. बबलू को पता नहीं था कि गवेंद्र अभी गया नहीं है, इसलिए जब दोनों में झगड़ा हो रहा था तो वह प्रेमलता के कमरे पर आ पहुंचा. उसे देख कर गवेंद्र ने पूछा, ‘‘तो तुम्हीं बबलू हो?’’

गवेंद्र के इस सवाल पर बबलू सिटपिटा गया. घबराहट में बोला, ‘‘जी, हम ही बबलू हैं. पिंकी दीदी से कुछ काम था, इसलिए आ गया. जरूरत पड़ने पर कुछ मदद कर देता हूं.’’

‘‘कोई अपनी दीदी से देर रात को बातें नहीं करता. बबलू यह सब ठीक नहीं है. मेरे खयाल से तुम्हारा यहां आनाजाना ठीक नहीं है. इन की मदद के लिए मैं हूं न.’’

गवेंद्र ने बबलू को दरवाजे से वापस कर दिया. प्रेमलता को यह बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. इसलिए उस ने तय कर लिया कि अब उसे किसी भी तरह गवेंद्र से छुटकारा पाना है.

दूसरी ओर गवेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि वह प्रेमलता के बारे में पिता को बताए या न बताए. उसे लगा कि यह पतिपत्नी के बीच मामला है, इस में पिता को बता कर परेशान करना ठीक नहीं है. इस तरह रामसेवक को कुछ पता नहीं चला. बच्चों की छुट्टियां पड़ गईं तो गवेंद्र ने बच्चों को आगरा पहुंचा दिया. इस बीच बबलू के साथसाथ उस के दोस्तों विनयकांत और सर्वेंद्र का भी प्रेमलता के यहां आनाजाना हो गया. सर्वेंद्र और विनयकांत भी उसी कालेज से बीएमएस कर रहे थे. वहां रहते हुए उमंग और तमन्ना भी बबलू से हिलमिल गए थे.

एक दिन सभी ताजमहल देखने गए, जहां बबलू ने प्रेमलता के साथ फोटो खिंचवाए. इस तरह उन के प्यार का एक प्रमाण भी हो गया. इस के बाद तय हुआ कि गवेंद्र को रास्ते से हटा कर दोनों शादी कर लेंगे. यही नहीं, उस ने पूरी तैयारी भी कर ली. अब उसे मौके की तलाश थी. 30 नवंबर को प्रेमलता ने गवेंद्र को फोन किया तो पता चला कि रामसेवक वोट डालने गांव गए हैं. खेतों की बुवाई भी करानी है, इसलिए वह खेतों की बुवाई कराने तक गांव में ही रहेंगे. प्रेमलता ने बबलू से कहा कि गवेंद्र को निबटाने का यह अच्छा मौका है. बबलू ने अपने दोनों दोस्तों, सर्वेंद्र और विनयकांत को दोस्ती के नाम पर साथ देने के लिए राजी कर लिया. इस तरह गवेंद्र की हत्या की पूरी तैयारी हो गई.

31 दिसंबर, 2015 को प्रेमलता बच्चों के साथ कीरतपुर आ गई. उसे देख कर गवेंद्र ने कहा, ‘‘फोन कर देती तो मैं बच्चों को लेने आ जाता.’’

‘‘मैं ने फोन इसलिए नहीं किया कि यहां आ कर घर भी देख लूंगी और तुम से भी मिल लूंगी.’’ प्रेमलता ने कहा.

योजना के अनुसार, 4 दिसंबर, 2015 को बबलू अपने दोनों दोस्तों, सर्वेंद्र और विनयकांत के साथ मैनपुरी आ गया. कीरतपुर में ही उस का एक दोस्त रहता था, वे उसी के घर ठहर गए. उन का खाना प्रेमलता ने ही उमंग के हाथों भिजवाया था. 5 दिसंबर को गवेंद्र अपनी स्कूल की ड्यूटी कर के घर आया तो प्रेमलता उसे काफी बेचैन लगी. गवेंद्र ने पूछा तो प्रेमलता ने कहा, ‘‘मैं आगरा में रहती हूं तो तुम्हारी और बच्चों की चिंता लगी रहती है.’’

गवेंद्र ने कहा, ‘‘कुछ दिनों की ही तो बात है. पढ़ाई पूरी होने पर मैनपुरी के आसपास नौकरी की कोशिश की जाएगी.’’

प्रेमलता की इन बातों से गवेंद्र का मन साफ हो गया. उसे क्या पता था कि अब उस की जिंदगी कुछ ही घंटों की बची है. रात का खाना बना कर प्रेमलता ने सब को खिलाया. गवेंद्र को खाना खातेखाते ही नींद आने लगी. वह बिस्तर पर जा कर सो गया. प्रेमलता ने बच्चों को भी सुला दिया. जब मोहल्ले में सन्नाटा पसर गया तो उस ने बबलू को फोन कर के आने को कहा. बबलू तो तैयार ही बैठा था. वह अपने दोनों साथियों, सर्वेंद्र और विनयकांत के साथ आ पहुंचा. प्रेमलता उन्हें उस कमरे में ले गई, जहां गवेंद्र सो रहा था. प्रेमलता ने गवेंद्र को खाने में नींद की गोलियां दे कर सुला दिया था, इसलिए सभी उस की ओर से निश्चिंत थे.

बबलू गवेंद्र का गला दबाने लगा तो वह जाग गया. उस के विरोध में हुए शोर से दूसरे कमरे में सो रहे उमंग की नींद टूट गई. शोर क्यों हो रहा है, यह जानने के लिए वह उस कमरे में आया तो देखा 4 लोग उस के पापा को दबोचे हुए थे. लेकिन तब तक गवेंद्र मर चुका था. उमंग को देख कर सभी के होश उड़ गए. जो जहां था, वहीं खड़ा रह गया. अब सब की नजरें उमंग पर टिकी थीं. बबलू एकदम से बोला, ‘‘यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई, इस ने जो देखा है, किसी से भी बता सकता है. अब इसे भी खत्म करना होगा.’’

‘‘नहीं, इसे कोई हाथ नहीं लगा सकता. तुम लोग लाश को इसी तरह पड़ी रहने दो. मैं इसे भी संभाल लूंगी और लाश को भी संभाल लूंगी. आगे क्या करना है, यह तुम मुझ पर छोड़ दो.’’ प्रेमलता ने कहा.

इस के बाद बबलू, सर्वेंद्र और विनयकांत चले गए. उन के जाने के बाद प्रेमलता बेटे को डराती रही कि वह किसी से कुछ नहीं बताएगा. अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो वह उसे भी मार देगी. सवेरा होने पर प्रेमलता ने रोरो कर मोहल्ले वालों को इकट्ठा कर के बताया कि गवेंद्र ने आत्महत्या कर ली है. इस के बाद खुद ही थाने जा कर पति की आत्महत्या की सूचना दे दी. बबलू को उमंग से तो खतरा था ही, ताजमहल में उस ने प्रेमलता के साथ जो फोटो खिंचवाए थे, उन से भी वह पकड़ा जा सकता था. इसीलिए वह उन के बारे में पता करने थाने आ गया और पकड़ा गया.

सर्वेंद्र और विनयकांत भी उमंग से डर रहे थे, इसलिए उन्होंने उस का अपहरण करना चाहा, लेकिन रामसेवक को इस की भनक लग गई तो उन्होंने इस बात की जानकारी थाना विछवां के थानाप्रभारी जी.पी. गौतम को दे दी. जी.पी. गौतम ने उसे पुलिस सुरक्षा मुहैया करा दी. पूछताछ के बाद बबलू और प्रेमलता को जेल भेज दिया गया है. फरार सर्वेंद्र और विनयकांत की पुलिस तलाश कर रही है.

मनोहर सिंह यादव ने इस मामले का खुलासा मात्र 9 दिनों में कर दिया. इस से खुश हो कर एसएसपी ने उन्हें 5 हजार रुपए ईनाम दिया है. रेनू और मंसूर अहमद ने जिस तरह सूझबूझ से पकड़वाया, इस के लिए उन्हें भी ढाईढाई हजार रुपए ईनाम दिया गया है. Hindi Crime Story

 

Meerut Crime: अपराध का सौफ्टवेयर

Meerut Crime: महत्त्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है. बुराई तब आती है जब महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति मेहनत और लगन के बजाय अपराध की डगर पर उतर जाता है. उस स्थिति में इंसान के लिए नातेरिश्ते भी कोई मायने नहीं रखते. प्रतीक और तुषार के साथ भी यही हुआ, जिन्होंने इंजीनियर होने के बावजूद अपना भविष्य अपराध की दलदल में ढूंढने की कोशिश की.

उत्तर प्रदेश, मेरठ शहर के टीपी नगर थानांतर्गत पौश कालोनी पंजाबीपुरा स्थित मयंक जैन की कोठी में 19 फरवरी, 2016 की शाम को अजीब सी हलचल थी. ऐसी हलचल वहां पहले कभी नहीं देखी गई थी. दरअसल इस परिवार का बेटा अतिशय जैन सुबह घर से स्कूल जाने के लिए निकला था. लेकिन शाम तक भी वापस नहीं लौटा था. जैन दंपत्ति के कई नातेरिश्तेदार भी कोठी में मौजूद थे. हर किसी के चेहरे पर चिंता की लकीरें झलक रही थीं. गुरजते वक्त के साथ बीचबीच में सभी की निगाहें दरवाजे की तरफ उठ जाती थीं.

दरअसल, मयंक जैन युवा कारोबारी थे. शहर में ही उन का विवाह मंडप था. उन के परिवार में पत्नी शिखा जैन के अलावा 2 बेटे थे. 13 वर्षीय अतिशय उन का छोटा बेटा था. वह शहर के ही एक स्कूल में कक्षा 6 का छात्र था. वह सुबह को घर से निकल कर करीब 100 मीटर दूर बसस्टाप पर जाता था और वहां से स्कूल बस में बैठ कर स्कूल चला जाता था. उस दिन जब दोपहर में वह वापस नहीं लौटा तो शिखा ने मयंक को फोन कर के बताया. वह तुरंत घर आ गए. पहले उन्होंने सोचा कि अतिशय कहीं किसी दोस्त के पास न चला गया हो. जब घंटों बाद भी वह नहीं आया तो मयंक स्कूल पहुंचे.

स्कूल से पता चला कि वह तो उस दिन स्कूल पहुंचा ही नहीं था. यह सुन कर उन की चिंता बढ़ गई. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने स्तर से वह काफी खोजबीन कर चुके थे. शाम तक कई रिश्तेदार उन के घर पर एकत्र हो गए थे. सभी अतिशय को ले कर फिक्रमंद थे. बेटे के गायब होने से शिखा का रोरो कर बुरा हाल था. अतिशय के इस तरह लापता होने से किसी अनहोनी की आशंकाएं जन्म ले रही थीं. लोगों से विचारविमर्श के बाद मयंक ने थाने में बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी. आशंका अपहरण की थी, सो पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी प्रशांत कपिल ने अतिशय के स्कूल जा कर पूछताछ की. स्कूल बस के चालक परिचालक से भी पूछताछ की. पता चला कि उस दिन बसस्टाप पर उन्होंने अतिशय को नहीं देखा था. जो अन्य छात्र बसस्टाप से बस में बैठते थे, उन्होंने भी अतिशय को नहीं देखा था. अतिशय खुद ही नाराज हो कर कहीं न चला गया हो, इस बिंदु पर भी पुलिस ने जांच की. लेकिन इस बात से घर वालों ने साफ इनकार कर दिया. पुलिस ने शहर के बसअड्डों, सिनेमाघरों व शौपिंग सैंटरों के सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग की भी जांच की. लेकिन कोई सफलता नहीं मिली.

अगर अतिशय का अपहरण हुआ था तो हैरानी की बात यह थी कि अपहर्त्ताओं ने उस के घर वालों से कोई संपर्क क्यों नहीं किया था? सीओ रफीक अहमद भी जांच में लग गए थे. एसएसपी डी.सी. दुबे के निर्देश पर कई स्थानों पर अतिशय की गुमशुदगी से संबंधित पोस्टर चस्पा कर दिए गए. आसपास के जिलों में भी इस की सूचना भेज दी गई. 3 दिन होने को आए थे, लेकिन अतिशय का पता नहीं चल सका था. इस बीच मामला तूल पकड़ने लगा था. 22 फरवरी की रात एक अंजान नंबर से मयंक के मोबाइल पर फोन आया तो उन्होंने काल रिसीव की. दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘बेटे को ले कर परेशान हो न?’’

‘‘आप कौन?’’

‘‘आप का बेटा हमारे कब्जे में है.’’

‘‘कैसा है मेरा बेटा, क्या हुआ उस को?’’ उन्होंने उत्सुकता से पूछा. लेकिन अगले ही पल उन्हें झटका लगा.

‘‘वह बिलकुल ठीक है. हम ने उस का अपहरण कर लिया है.’’ दूसरी ओर से यह कहा गया तो मयंक के पैरों तले से जमीन खिसक गई, चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि अतिशय का इस तरह अपहरण हो जाएगा.

‘‘कौन बोल रहे हैं आप?’’ मयंक ने सहमते पूछा.

‘‘बता देंगे, इतनी भी क्या जल्दी है. हम ने अपहरण उस की रखवाली करने के लिए नहीं, बल्कि फिरौती के लिए किया है. हमें 2 करोड़ रुपए चाहिए, पूरे 2 करोड़. एक बात और बता दूं आप को, हम अच्छे लोग नहीं हैं. पलक झपकते ही जान भी ले सकते हैं. पुलिस को बीच में ला कर बेटे की जान जोखिम में मत डालना, वरना इस गलती की सजा भुगतनी पड़ेगी. इसे मार कर कहीं भी फेंक देंगे, फिर पुलिस से ही जिंदा करा लेना.’’

‘‘प्लीज तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे.’’ मयंक फोन पर गिड़गिड़ाए.

‘‘बताया न, हम कुछ भी कर सकते हैं. हां, अगर तुम चाहोगे तो उसे कुछ नहीं होगा. फिरौती की मांग पूरी होते ही हम उसे छोड़ देंगे. तुम रुपयों का इंतजाम करो. हम तुम्हें बाद में फोन करेंगे.’’ कहने के साथ ही उस ने फोन काट दिया. फिरौती के लिए फोन आने से जैन परिवार में कोहराम मच गया. उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दे दी. बच्चे के अपहरण की सूचना मिलते ही पुलिस विभाग में भागदौड़ शुरू हो गई.

एसएसपी डी.सी. दुबे ने आननफानन में एसपी सिटी ओ.पी. सिंह के निर्देशन में पुलिस की 5 टीमें गठित कर के उन्हें तुरंत काम पर लगा दिया. आला अधिकारियों तक मामला पहुंचा तो आईजी सुजीत पांडेय और डीआईजी लक्ष्मी सिंह भी अतिशय जैन की अविलंब बरामदगी के लिए सक्रिय हो गए. अपहर्त्ताओं का फिर फोन आया तो मयंक ने मजबूरी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘अपना सब कुछ बेच कर भी हम इतनी रकम का इंतजाम नहीं कर सकते.’’ इस पर अपहर्त्ता सौदेबाजी पर उतर आए. मयंक गिड़गिड़ाए, ‘‘मैं जितना भी इंतजाम कर सकता हूं, करूंगा. लेकिन अतिशय को कुछ नहीं होना चहिए’’

‘‘जैन साहब, आप चाहेंगे तो आप के बेटे को कुछ नहीं होगा. लेकिन अपना उसूल है, इस हाथ दो, उस हाथ लो.’’ इतना कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया. इस के बाद अपहर्त्ता लगातार मयंक के संपर्क में बने रहे. इस बीच पुलिस ने अपहर्त्ताओं के मोबाइल नंबर की जांच कराई तो वह बदायूं जनपद के एक गलत पते का निकला. फलस्वरूप पुलिस के लिए अपहर्त्ताओं तक पहुंचने का यह माध्यम भी बंद हो गया.

दूसरी तरफ मयंक जैन ने जैसेतैसे 23 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया. उन्होंने अपहर्त्ताओं से साफ कह दिया कि वह इस से ज्यादा रकम नहीं दे पाएंगे. अपहर्त्ता इतनी ही रकम ले कर अतिशय को लौटाने को तैयार हो गए. अलबत्ता उन्होंने मयंक को एक बार फिर धमकाया, ‘‘अगर तुम ने पुलिस को हमारे पीछे लगाया या चालाकी दिखाई तो बेटे की लाश भी सहीसलामत देखने को नहीं मिलेगी. यह तुम्हें तय करना है कि बेटा जिंदा चाहिए या नहीं?’’ अतिशय उन के कब्जे में है, यह बात साबित करने के लिए अपहर्त्ताओं ने मयंक से उस की बात भी कराई.

‘‘मेरी तरफ से ऐसा नहीं होगा.’’ मयंक ने उन्हें आश्वस्त कर दिया. मयंक जैन को बेटे की चिंता थी, इसलिए उन्होंने अपहर्त्ताओं की बात मान कर पुलिस से दूरी बना ली. उन्होंने पैसा दे कर बेटे को छुड़ाने का फैसला कर लिया. दूसरी ओर पुलिस अपनी जांच में लगी रही. अपहर्त्ताओं ने मयंक जैन से 24 फरवरी की रात गाजियाबाद के वैशाली मैट्रो स्टेशन के बाहर रुपए ले कर पहुंचने को कहा. मयंक वहां पहुंचे भी, लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी कोई रुपए लेने नहीं आया.

अपहर्त्ता अपनी बात कहने के बाद मोबाइल फोन बंद कर देते थे. अगले दिन उन्होंने मयंक को रुपए ले कर दिल्ली के कनाट प्लेस बुलाया. पर वहां भी कोई रुपए लेने नहीं आया. मयंक परेशान थे. अगले दिन अपहर्त्ताओं ने कहा कि पैसा ले कर वह गुड़गांव आएं. मयंक वहां भी पहुंचे, लेकिन अपहर्त्ता पैसा लेने नहीं आए. पुलिस ने सर्विलांस का सहारा भी लिया, लेकिन गच्चा खा गई. क्योंकि अपहर्त्ताओं के मोबाइल की लोकेशन उत्तर प्रदेश के अलावा कभी दिल्ली तो कभी हरियाणा तो कभी बिहार आती थी. पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि अपहर्त्ता आखिर इतने प्रोफेशनल कैसे हो सकते हैं.

इस बीच पुलिस की समझ में यह बात आ गई कि मयंक जानबूझ कर पुलिस से दूरी बनाए हुए हैं और अपहर्त्ताओं से फिरौती का लेनदेन तय हो गया है. पुलिस अधिकारियों ने जैसेतैसे मयंक जैन को इस वादे के साथ विश्वास में लिया कि वह उन के बेटे को कुछ नहीं होने देंगे. इस से पुलिस को पता चला कि 27-28 फरवरी की मध्यरात्रि में अपहर्त्ता फिरौती की रकम लेने के लिए दिल्लीजयपुर हाईवे पर आएंगे.

यह पता चलते ही केस की मौनीटरिंग कर रहे आईजी सुजीत पांडेय और डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने आननफानन में एसपी सिटी ओ.पी. सिंह व एसपी (क्राइम) अजय सहदेव के नेतृत्व में पुलिस की 5 टीमों का गठन कर के उन्हें निगरानी पर लगा दिया. इस के साथ ही 2 दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में भी लगाए गए. पुलिस किसी भी स्थिति में अपहर्त्ताओं को पकड़ कर अतिशय को सकुशल बरामद करना चाहती थी.

पुलिस की टीमें संभावित ठिकानों पर लग गईं. रात करीब 1 बजे अपहर्त्ताओं ने मयंक को एक स्थान पर सड़क किनारे बैग छोड़ कर चले जाने को कहा. उन्होंने ऐसा ही किया. लेकिन पुलिस के वहां पहुंचने से पहले ही एक आईटैन कार में सवार अपहर्त्ता बैग उठा कर चले गए. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि पुलिस देखती ही रह गई. लेकिन पुलिस इस मामले में बेफिक्र थी, क्योंकि उस ने मयंक जैन की सहमति से अपहर्त्ताओं तक पहुंचने के लिए रुपयों वाले बैग में जीपीएस टै्रकिंग सिस्टम लगा दिया था. भागते वक्त अपहर्त्ताओं की कार का रुख दिल्ली की तरफ था. जीपीएस से लोकेट हुआ कि अपहर्त्ता एक स्थान पर ठहर गए हैं. पुलिस पीछा करते हुए वहां पहुंच भी गई, लेकिन पुलिस को तब झटका लगा, जब सड़क किनारे सिर्फ खाली बैग पड़ा मिला.

पुलिस समझ गई कि अपहर्त्ता बेहद शातिर हैं और पुलिस की सर्विलांस की काररवाई के अच्छे जानकार भी. यही वजह थी कि उन्होंने फिरौती की रकम वाले बैग को रास्ते में ही फेंक दिया था. पुलिस ने अपहर्त्ता के मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया हुआ था. सर्विलांस के हिसाब से अब तक कार का रुख दिल्ली से निकल कर देहरादून हाईवे की तरफ हो गया था. मुखबिरों के जरिए चूंकि आईटैन कार चिह्नित हो चुकी थी, इसलिए मेरठ में भी पुलिस टीम को अलर्ट कर दिया गया. मेरठ में वेदव्यासपुरी के पास पुलिस ने घेराबंदी कर के संदिग्ध कार की तलाशी ली तो उस में न केवल अतिशय सकुशल मिल गया, बल्कि उस में सवार 2 युवक व एक युवती भी कब्जे में आ गए. अतिशय बेहद डरासहमा था.

पुलिस सब को थाने ले आई और आला अधिकारियों को खबर कर दी. पुलिस ने उन से पूछताछ की. गिरफ्तार किए गए अपहर्त्ताओं में प्रतीक जैन उर्फ मोनू, तुषार जैन उर्फ नीशू और आस्था विश्वास शामिल थे. पुलिस के लिए नि:संदेह यह बड़ी सफलता थी. उस दिन यानी 28 फरवरी को प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद को नोएडा आना था. तय हुआ कि अपहरण का खुलासा उन्हीं के द्वारा हो. डीआईजी लक्ष्मी सिंह, एसएसपी डी.सी. दुबे व एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह नोएडा पहुंच गए. जावीद अहमद ने प्रैसवार्ता में पूरे केस से पर्दा उठाया. अतिशय के अपहरण में शामिल युवक युवती न केवल हाईप्रोफाइल थे, बल्कि उन में से एक अतिशय के पिता मयंक जैन का रिश्तेदार भी था.

दरअसल, गिरफ्तार अपहर्त्ता तुषार जैन मेरठ शहर की हनी गोल्फ कालोनी की कोठी नंबर-70 में रहता था. उस के पिता सिंचाई विभाग में अधिकारी थे. सन 2012 में उस ने गाजियाबाद के एक इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक किया था. इस के बाद उस ने 2 साल का साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट का डिप्लोमा भी किया था. डिग्रीधारी हो कर भी जब उसे नौकरी नहीं मिली तो उस ने स्वतंत्र एक्सपर्ट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया.

उस ने पुलिस विभाग के लिए भी कई काम किए. बड़ेबड़े केस खोलने में इंटरनेट के जरिए उस ने पुलिस की मदद की. एक तरह से वह साइबर मामलों में पुलिस का एडवाइजर था. समयसमय पर पुलिस उस की मदद लेती रहती थी. साइबर के जो सेमिनार आयोजित किए जाते थे, उन में वह लैक्चर देता था. इस के बाजवूद वह गुजारे लायक ही कमा पाता था. बाद में वह अपनी मौसी के लड़के प्रतीक जैन के पास चला गया था. प्रतीक जैन हरियाणा, गुड़गांव के सेक्टर-82 स्थित प्रथम तल के फ्लैट नंबर-31 में किराए पर रहता था. प्रतीक ने कंप्यूटर साइंस से बीटेक करने के साथ ही लंदन की एक यूनिवर्सिटी से भी इंजीनियरिंग का डिप्लोमा किया था. प्रतीक जयपुर, राजस्थान के जवाहर नगर निवासी कपड़ों के बड़े कारोबारी संजय जैन का बेटा था. प्रतीक के दादा सेवानिवृत्त आईएएस औफिसर थे. पढ़ाई के बाद वह गुड़गांव आ गया था.

गुड़गांव में चूंकि कई नामी कंपनियां थीं, इसलिए उसे उम्मीद थी कि मोटी तनख्वाह की नौकरी मिल जाएगी. लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उस ने कौंटे्रक्ट पर सौफ्टवेयर बनाने शुरू कर दिए थे. वह अच्छा सौफ्टवेयर डेवलपर था. उस ने चूंकि लंदन में पढ़ाई की थी, इसलिए कंपनियां उसे महत्त्व और रकम दोनों देती थी. प्रतीक अपनी कमाई का हिस्सा अपने परिवार को भी भेजता था.

प्रतीक यूं तो हर महीने 5-6 लाख रुपए कमाता था. तुषार भी लाख 2 लाख कमा लेता था. यह बात अलग थी कि इतनी कमाई भी उस के लिए कम पड़ जाती थी. इस की भी एक बड़ी वजह थी. तुषार व प्रतीक दोनों ही लग्जरी लाइफ जीने के आदी थे. इस के अलावा वह अय्याशी भी करते थे. ये लोग अक्सर महंगे होटलों में जा कर मौजमस्ती करते थे. उन की साथी आस्था विश्वास मूलत: कोलकाता, पश्चिमी बंगाल के थाना धानतल क्षेत्र के अंतर्गत कलामपुर की रहने वाली थी. वह एक कंपनी में बतौर एडवाइजर नौकरी करती थी. एक साल पहले प्रतीक से मुलाकात के बाद दोनों की नजदीकियां बढ़ गई थीं.

धीरेधीरे दोनों के बीच प्रेमिल रिश्ते बन गए थे. दोनों ने एकदूसरे से विवाह का वादा भी कर लिया था. आस्था चूंकि परिवार से दूर थी, इसलिए वह प्रतीक के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी. बात यहीं तक होती तो भी ठीक थी. प्रतीक व तुषार होटलों में हाईप्रोफाइल कौलगर्ल के साथ रातें रंगीन किया करते थे.

एकएक रात में वे 50 हजार रुपए से ज्यादा की रकम अपने अय्याशी के शौक पर लुटा देते थे. इंसान यदि बुरी लतों का शिकार हो कर अपनापशनाप खर्च करे तो बड़ी से बड़ी दौलत भी कम पड़ जाती है. इन दोनों के साथ भी ऐसा ही हुआ. प्रतीक और तुषार दोनों ही आर्थिक रूप से परेशान रहने लगे. जब पैसा होता मौज करते और जब पैसा खत्म हो जाता तो परेशान रहने लगते. मयंक जैन रिश्ते में प्रतीक का चाचा था. उन से मिलने के लिए कभीकभी वह मेरठ जाता रहता था.

दोनों महत्त्वाकांक्षी युवक थे. उन के सपने ऊंचे थे और खर्चे बेशुमार. अच्छी नौकरी उन्हें मिल नहीं रही थी. महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने कोई शौर्टकट रास्ता अख्तियार करने का मन बनाया. यह अलग बात थी कि काफी विचारविमर्श के बाद भी वे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाए. कहते हैं कि दिलओदिमाग में कोई खुराफाती विचार पनप जाए और इंसान उस के बारे में लगातार सोचता रहे तो वह अपने हिसाब से कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेता है.

फरवरी, 2016 के पहले सप्ताह में तुषार अपने घर मेरठ आया तो वह अपने साथ प्रतीक को भी ले आया. एक शाम दोनों बैठे तो तुषार ने उस की मुलाकात अपने 2 दोस्तों सोनू और राहुल से कराई. वे भी बीटेक किए हुए थे और उन के जैसी महत्त्वाकांक्षी सोच के शिकार थे. चारों ने बैठ कर अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने पर चर्चा की. सभी ने पैसे का रोना रोया. इसी दौरान प्रतीक ने कहा, ‘‘तुम लोग यदि साथ दो तो मेरे पास रातोंरात करोड़पति बनने का एक सुपर आइडिया है.’’

‘‘क्या?’’ सभी ने जिज्ञासावश पूछा तो उस ने राजदाराना अंदाज में बताया, ‘‘मेरे रिश्ते के चाचा मयंक जैन काफी पैसे वाले हैं.’’

‘‘इस से क्या होगा भाई, क्या वह हमें मालामाल कर देंगे?’’ तुषार के सवाल पर प्रतीक हंस दिया, ‘‘बिलकुल, इतना मालामाल कर देंगे कि सभी के दिन बदल जाएंगे और कभी पैसे की दिक्कत नहीं आएगी.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘अगर हम उन के बेटे का अपहरण कर लें तो वह मुंहमांगी रकम देंगे.’’

‘‘यह काम इतना आसान नहीं है. पुलिस जमीनआसमान एक कर देगी.’’ राहुल ने आशंका जाहिर की तो प्रतीक तुषार की तरफ इशारा कर के बोला, ‘‘इस सब की जरा भी फिक्र मत करो. अपना तुषार साइबर एक्सपर्ट है. सारे हथकंडे जानता है कि पुलिस ऐसे मामलों में कैसे काररवाई करती है. हम पुलिस को बहुत आसानी से नाच नचा देंगे. वह हम तक कभी नहीं पहुंच पाएगी.’’

तुषार ने भी उस की बात का समर्थन किया, ‘‘उस की चिंता तुम छोड़ दो, हम पूरी प्लानिंग से काम करेंगे.’’

काफी विचारविमर्श के बाद उन्होंने मयंक के बेटे अतिशय का अपहरण कर के फिरौती वसूलने की योजना बना ली. प्रतीक ने मयंक को यूं ही टारगेट नहीं बनाया था. इस की एक वजह तो यही थी कि मयंक जैन पैसे वाले थे और प्रतीक को यह बात पता थी. उन्होंने कुछ समय पहले एक महंगी लग्जरी कार भी खरीदी थी. इस से प्रतीक को लगा कि मयंक नोटों में खेल रहे हैं. इसी वजह से उस ने उन के बेटे को निशाने पर ले लिया. अगले कुछ दिनों तक अमीरी के सपने देख कर वह सभी प्लानिंग करते रहे. इस बीच उन्होंने 315 बोर के 2 तमंचों का इंतजाम भी कर लिया. अपनी योजना में उन्होंने आस्था को भी शामिल कर लिया था.

पूरी योजना तैयार कर के 18 फरवरी को वे मेरठ पहुंचे. प्रतीक चूंकि मयंक के घर आताजाता रहता था, इसलिए उसे उन के बेटे अतिशय के आनेजाने का समय और बसस्टाप का पता था. उस दिन अतिशय बसस्टाप पर पहुंचा, लेकिन चूंकि वहां कई बच्चे थे, इसलिए उन्होंने अपहरण का इरादा छोड़ दिया. अगले दिन यानी 19 फरवरी की सुबह तुषार व प्रतीक आईटैन कार संख्या यूपी 12 डब्ल्यू-3273 से फिर मेरठ पहुंच गए. यह कार प्रतीक की थी. तय स्थान पर उन्हें मोनू व राहुल भी मिल गए.

करीब 8 बजे अतिशय रोजाना की तरह स्कूल जाने के लिए बसस्टाप पर पहुंच गया. इत्तेफाक से उस समय अतिशय अकेला था. दूर से निगाह रख रहे वह चारों वहां पहुंचे तो प्रतीक ने अतिशय को बुला कर कहा, ‘‘आओ अतिशय आज मैं तुम्हें स्कूल छोड़ देता हूं.’’

‘‘ओके भैया,’’ कहते हुए अतिशय खुशीख्ुशी कार में बैठ गया. उस के बैठते ही कार नेशनल हाइवे की तरफ जाने लगी तो अतिशय ने उसे टोका, ‘‘आप लोग मुझे कहां ले जा रहे हैं?’’ जवाब में उन लोगों ने उस के  साथ मारपीट कर के उसे डरा दिया और चुप रहने की धमकी दी.

बाद में उन्होंने नशीला पदार्थ सुंघा कर उसे बेहोश कर दिया. गाजियाबाद पहुंच कर सड़क पर उन्होंने एक रिक्शेवाले को मोबाइल पर बात करते देखा. प्रतीक व तुषार कार रोक कर उस के नजदीक पहुंचे और एक अर्जेंट काल करने के लिए उस से मोबाइल मांगा. उन्होंने उसे बताया कि उन के मोबाइल रास्ते में एक होटल में चोरी हो गए हैं. एक काल करने के बदले में उन्होंने रिक्शा वाले को 5 सौ रुपए का नोट निकाल कर दे दिया. रिक्शे वाले ने खुश हो कर उन्हें अपना मोबाइल दे दिया. मोबाइल ले कर दोनों कार से भाग निकले. यह उन की योजना का एक हिस्सा था. कुछ घंटों के सफर में वे अतिशय को गुड़गांव वाले फ्लैट पर ले गए और उस के हाथपैर बांध कर मुंह पर टेप लगा दी. उस की निगरानी का जिम्मा आस्था को सौंप दिया गया. फिरौती के लिए फोन करने में उन्होंने जल्दी नहीं की, बल्कि अखबारों के जरिए हालात पर नजर रखे रहे.

3 दिनों बाद 22 फरवरी को तुषार ने आवाज बदल कर रिक्शेवाले से छीने गए मोबाइल से मयंक को फोन कर के 2 करोड़ की फिरौती मांगी. कई दौर की बातचीत के बाद सौदा 23 लाख रुपए में तय हो गया. प्रतीक ने भी आवाज बदल कर मयंक को फोन किया. 24, 25 व 26 फरवरी को उन्होंने मयंक को रकम ले कर बुलाया. दूर से वह उस पर नजर रखते रहे, परंतु फिरौती नहीं ली.

वे नजर रख कर पूरी चालाकी बरतते हुए आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि मयंक के साथ पुलिस तो नहीं है. पुलिस ने मोबाइल का पता निकलवाया तो वह बदायूं का निकला, लेकिन उस का सिम फर्जी पते पर लिया गया था. तुषार व प्रतीक टैक्नीकली मजबूत थे. वह काल करने में लोकेशन बदलने के लिए एक खास सौफ्टवेयर का इस्तेमाल करते थे. 27-28 फरवरी की रात फिरौती की रकम वसूलने के लिए प्रतीक, तुषार और आस्था कार से अतिशय को साथ ले कर निकले. पहले से तय जगह से रकम का बैग उठा कर उन्होंने कार में रखा. तुषार साइबर एक्सपर्ट था. उस ने सब से पहले रुपए निकाल कर दूसरे बैग में रखे. उसी वक्त उस ने बैग को चैक किया तो पाया कि उस में जीपीएस डिवाइस लगी है. उस ने बैग रास्ते में फेंक दिया.

इस बीच प्रतीक बोला, ‘‘हम लोगों का काम हो गया है. अब वक्त आ गया है, जब अतिशय से पीछा छुड़ा लिया जाए. यह जिंदा रहेगा तो हम सब पकड़े जाएंगे. हम हरिद्वार की तरफ चलते हैं. रास्ते में इसे मार कर कहीं फेंक देंगे और हरिद्वार में गंगा नहा कर इस मामले की इतिश्री कर देंगे.’’ लेकिन वह अपने घृणित मकसद में कामयाब हो पाते, उस से पहले ही पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

पुलिस ने उन के कब्जे से फिरौती के 23 लाख रुपए, 315 बोर के 2 तमंचे, अपहरण में प्रयुक्त कार, नायलौन की रस्सी व सेलो टेप आदि चीजें बरामद कीं. पुलिस ने उन के साथी अपहर्त्ताओं मोनू व राहुल की तलाश की, परंतु वे हाथ नहीं आ सके. पुलिस ने अपहर्त्ताओं पर धारा-364ए, 307, 25 आर्म्स एक्ट व 7/8 पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया. विस्तृत पूछताछ के बाद अगले दिन मेरठ पुलिस ने भी प्रैसवार्ता की और तीनों आरोपियों को अपर जिला जज की विशेष अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की भी जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस बाकी आरोपियों की तलाश कर रही थी.

प्रतीक, तुषार  और उन के साथियों के पास अच्छी डिग्रियां थीं, वे थोड़ा सब्र से काम लेते तो अच्छी नौकरियां पा कर अपना कैरियर बना सकते थे, लेकिन उन की महत्वाकांक्षाओं, शौर्टकट से दौलत कमाने की ललक और खुराफाती दिमाग ने उन का भविष्य चौपट कर दिया. दूसरी ओर केस के खुलासे पर डीजीपी जावीद अहमद ने अधिकारियों को प्रशस्ति पत्र और पुलिस की टीम को 50 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. Meerut Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: ठगी का बड़ा खिलाड़ी

True Crime Story: नौवीं फेल अजय पंडित देश की राजनैतिक पार्टियों के बड़ेबड़े नेताओं और नौकरशाहों से संबंध बना कर सफेदपोश बन गया. वीआईपी सुरक्षा में रह कर उस ने करोड़ों ठगे. जब उस की हकीकत सामने आई तो पता चला कि राजनीति की आड़ में कैसेकैसे लोग पलते हैं.

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक पर स्थित हरियाणा के जिला करनाल की पहचान विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के रूप में तो है ही, इस के अलावा यह धान की खेती के रूप में भी प्रसिद्ध है. यहां पैदा होने वाले उच्च गुणवत्ता वाले धान के चावल को विदेशों तक भेजा जाता है. यहां की दुनार राइस मिल का बड़ा नाम है. जाटान रोड स्थित इस मिल के मालिक सुरेंद्र गुप्ता बहुत ही सधे हुए अदांज में अपनी यह राइस मिल चला रहे हैं. उन की राइस मिल का चावल देशविदेश भेजा जाता है. सुरेंद्र एक बड़ी शख्सियत हैं, लिहाजा उन के संबंध भी वैसे ही लोगों से हैं. वह अपने कारोबार को और ऊंचाई तक ले जाना चाहते थे, जिस के लिए उन्हें करोड़ों रुपए की बड़ी रकम की जरूरत थी.

वैसे तो यह रकम उन्हें बैंकों से कर्ज के रूप में मिल सकती थी, लेकिन एक तो मोटी रकम, दूसरे बैंकों द्वारा लिया जाने वाला मोटा ब्याज, उन्हें परेशान करता था.

इंसान किसी बात की चाहत रखता है तो कई बार उस के रास्ते खुदबखुद खुल जाते हैं. सुरेंद्र गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. उन की मुलाकात एक आदमी और उस के साथियों से हुई तो उन्होंने अपनी समस्या उन से कही, उस आदमी के साथियों में से एक ने कहा, ‘‘गुप्ताजी, सोच लीजिए, आप का काम हो गया.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘आप को मोटा और सस्ती ब्याज दर पर एक आदमी लोन दिला सकता है, क्योंकि उस के लिए यह बाएं हाथ का खेल है.’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘आप ने अजय पंडित का नाम तो सुना ही होगा. वह ऐसे आदमी हैं कि उन के पास पहुंचते ही हर समस्या का हल निकल आता है.’’

इस के बाद उस आदमी और उस के साथियों ने अजय पंडित के बारे में जो कुछ बताया, उसे सुन कर सुरेंद्र गुप्ता हैरान रह गए.

अजय पंडित वह नाम था, जिस के बड़ेबड़े राजनेताओं से सीधे संबंध थे. बड़ेबड़े लोग अपने काम कराने उस के यहां लाइन लगाए खड़े रहते थे. यह बात अलग थी कि अजय सिर्फ करोड़पतियों या अरबपतियों के ही काम कराता था. अजय मूलरूप से रहने वाला तो हरियाणा के सिरसा जिले का था, लेकिन वह दिल्ली के छतरपुर स्थित एक फार्महाउस में रहता था. सुरेंद्र गुप्ता से मिलने वाला वह आदमी और उस के साथियों ने जो बताया था, उस के अनुसार अजय पंडित सोनिया गांधी एसोसिएशन का राष्ट्रीय अध्यक्ष था. इस के अलावा वह अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा का भी अध्यक्ष था.

राजनीतिज्ञों से चूंकि उस के गहरे रिश्ते थे, इसलिए वह लोगों के काम आसानी से करा देता था. वे लोग अजय को जानते ही नहीं थे, बल्कि उस से उन के अच्छे रिश्ते भी थे. इन लोगों से मिलने के बाद सुरेंद्र को लगा कि उन की इच्छा पूरी हो जाएगी. अजय पंडित के बारे में कुछ थोड़ा उन्होंने भी सुन रखा था. वह काफी ऊंची पहुंच वाला आदमी था.

उन लोगों ने सपने दिखाए तो सुरेंद्र अजय से मिलने के लिए ललायित हो उठे. उन्होंने कहा, ‘‘इस से अच्छी बात और क्या हो सकती है. आप लोग उन से मेरी मुलाकात करा दीजिए.’’

‘‘ठीक है, हम कोशिश करते हैं. समय ले कर आप को फोन पर बता देंगे.’’ रितेश और उस के साथियों ने कहा.

इस के बाद वे चले गए, लेकिन उन का संपर्क सुरेंद्र से बना रहा. एक दिन उन्होंने बताया कि सोमवार की दोपहर वह छतरपुर आ जाएं. इस के बाद तय दिन पर सुरेंद्र गुप्ता बताए गए पते पर पहुंच गए.

दिल्ली के छतरपुर इलाके में बड़ी हैसियत वाले नामीगिरामी लोगों के फार्महाउस हैं. उन्हीं में से राधामोहन लेन स्थित एक फार्महाउस पर वह पहुंचे तो वहां की कड़ी सुरक्षा के तामझाम देख कर एकबारगी वह ठिठक गए. मुख्य दरवाजा बंद था और वहां हथियारों से लैस प्राइवेट सुरक्षाकर्मी और पुलिसकर्मी खड़े थे. उन की गाड़ी रुकी तो एक सुरक्षाकर्मी ने उन के नजदीक आ कर पूछा, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘अजयजी से. अपाइंटमेंट है मेरा.’’

‘‘एक मिनट ठहरिए.’’ कह कर सुरक्षाकर्मी पलटा और मुख्यद्वार पर बनी केबिन में जा कर वहां रखे टेलीफोन से बात की. उस ने फोन रख कर दरवाजा खुलवाने के साथ ही उन्हें अंदर जाने का इशारा कर दिया.

फार्महाउस के अंदर का नजारा बड़ा ही आकर्षक था. वहां हर तरफ हरियाली थी. पार्किंग में पहले से ही कई महंगी और लग्जरी कारें खड़ी थीं. उन्होंने भी अपनी कार वहां खड़ी कर दी और उतर कर कोठी की तरफ बढ़े. कोठी के बरामदे में बने औफिसनुमा कमरे में कई लोग बैठे थे. वहां मौजूद लोगों ने उन से आने का कारण पूछा तो उन्होंने बता दिया.

‘‘ठीक है, आप को थोड़ा इंतजार करना होगा, साहब बाहर हैं. कुछ देर में आते ही होंगे.’’ कह कर एक आदमी उन्हें अंदर ड्राइंगरूम में ले गया. वहां पड़े बेशकीमती सोफों पर पहले से ही तमाम लोग बैठे थे. वह भी एक सोफे पर बैठ गए. वहां की भव्यता देख कर उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. चमकदार मार्बल, कालीन, फर्नीचर, दीवारें, उन पर लगी पेंटिंग्स और छत में लटकते झूमर, सभी कुछ भव्यता प्रदर्शित कर रहे थे.

इस के अलावा दीवारों पर नामचीन राजनेताओं के साथ मुसकराते हुए एक ही शख्स के तमाम फोटो टंगे थे. वह समझ गए कि यही अजय पंडित हैं. ड्राइंगरूम की शान भी अलग ही थी. क्लोजसर्किट कैमरे भी वहां लगे थे. इस से भी ज्यादा खास बात यह थी कि वहां बैठे लोग चाय, कौफी, स्नैक्स, फू्रट्स आदि इस अंदाज में खापी रहे थे, जैसे वहां कोई पार्टी चल रही हो. 3-4 वेटर खातिरदारी में लगे थे. एक वेटर उन्हें भी पानी दे गया. उस के बाद उन से और्डर लिया, ‘‘आप के लिए क्या लाएं सर?’’

‘‘कौफी ले आओ.’’ सुरेंद्र ने कहा तो कुछ देर बाद एक वेटर गोल्डन कप में उन्हें कौफी दे गया. वह जिस ड्राइंगरूम में बैठे थे, वहां से बाहर का भी नजारा दिखाई दे रहा था. वहां अनगिनत देशीविदेशी पेड़पौधों ने वातावरण को सुंदर बनाया हुआ था. कुछ ही वक्त बीता था कि वह आदमी और उस के साथी भी आ गए. उन्होंने गर्मजोशी से सुरेंद्र गुप्ता का स्वागत किया. वे भी बातचीत में मशगूल हो गए.

कुछ और वक्त बीता होगा कि सायरन बजाती एक जिप्सी फार्महाउस में दाखिल हुई. उस के ठीक पीछे काले रंग की चमचमाती मर्सिडीज कार थी और उस के पीछे एक और जिप्सी. दोनों जिप्सियों पर बीसियों कमांडों और सुरक्षाकर्मी सवार थे. सभी के पास हथियार और वौकीटौकी थे. एक सुरक्षाकर्मी ने चमचमाती कार का पिछला दरवाजा खोला तो उस में से जो शख्स उतरा, वह निहायत ही आकर्षक था. उस ने नीले रंग का सूट पहना हुआ था. उस ने अपने नजदीक आए स्टाफ से कुछ गुफ्तगू की और ड्राइंगरूम की तरफ बढ़ने लगा. उस की चालढाल में भी रुआब झलक रहा था. उस के चारों ओर सुरक्षाकर्मी इस तरह घेरा सा बनाए चल रहे थे कि कोई परिंदा भी नजदीक नहीं आ सकता था. अंदर पहुंच कर उस ने मुसकरा कर सभी से मुलाकात की.

सुरेंद्र के परिचित ने उन का परिचय कराया, ‘‘सर, आप ही हैं सुरेंद्र गुप्ताजी, जिन के बारे में आप से बात हुई थी.’’

‘‘ओके…ओके… आप के बारे में इन लोगों ने मुझे सब बता दिया है. आप अभी बैठिए, मैं बाकी लोगों से मिल कर आप से बात करता हूं.’’

सभी अपनीअपनी जगह पर बैठ गए. सारा तामझाम देख कर सुरेंद्र समझ गए कि अजय पंडित बहुत पहुंची हुई हस्ती है.

करीब आधे घंटे बाद अजय पंडित से उन के मिलने की बारी आ गई. औपचारिक बातचीत के बाद उस ने पूछा, ‘‘इन लोगों ने बताया तो था आप के काम के बारे में, लेकिन आप खुद विस्तार से मुझे बताइए कि आप चाहते क्या हैं?’’

‘‘सर, मुझे करीब 2 सौ करोड़ का लोन चाहिए.’’

सुरेंद्र की बात पर अजय इस तरह मुसकराया, जैसे यह बहुत छोटी बात हो. उस ने कहा, ‘‘2 सौ ही क्यों, आप 3 सौ करोड़ का लोन ले लीजिए. ऐसी कई विदेशी कंपनियां हैं, जो भारत में अपना पैसा निवेश करना चाहती है. बस, उन्हें गारंटी चाहिए, वह आप के लिए हम ले लेंगे. ब्याज भी केवल 7 प्रतिशत होगा. अभी पिछले महीने उन्होंने दिल्ली की एक पार्टी को 2 सौ करोड़ रुपए दिए भी हैं.’’

यह सुन कर सुरेंद्र गुप्ता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

‘‘बात करोड़ों की है, इसलिए एक बार कल मैं उन लोगों से बात कर लेता हूं. अगर उन्होंने कहीं इन्वैस्टमेंट नहीं किया होगा तो आप अपना काम पक्का समझिए.’’ कुछ पल रुक कर उस ने आगे कहा, ‘‘हां, एक जरूरी बात, कस्टम, पुलिस क्लियररैंस और सभी फाइल चार्ज आप को देने होंगे.’’

‘‘वह मैं दे दूंगा.’’ सुरेंद्र गुप्ता ने उत्साह से कहा. अच्छे माहौल में बातचीत के बाद सुरेंद्र खुशीखुशी वापस आ गए.

अजय के साथियों ने एक सप्ताह बाद ही सुरेंद्र गुप्ता को बता दिया कि उन का काम हो जाएगा. कागजी औपचारिकताओं और कमीशन के नाम पर पहली किश्त के रूप में उन्होंने एक करोड़ रुपए अजय तक पहुंचा दिए. इस के साथ अपने कुछ फोटो, प्रौपर्टी दस्तावेजों की फोटोकौपी भी दे दी थी. अगले कुछ महीनों में कस्टम, पुलिस क्लीयरेंस, सिक्योरिटी और अन्य कमीशन के नाम पर उन्होंने 3 करोड़ रुपए और भी दे दिए. 3 सौ करोड़ के लोन के लिए यह रकम कुछ भी नहीं थी. इतना बड़ा लोन उन्हें मिलने जा रहा था, यही क्या कम था.

इस बीच कई तरह के फार्म जो कस्टम, बैंकों और विदेशी मनी ट्रांसफर की सरकारी परमीशन से संबंधित थे, सुरेंद्र गुप्ता से हस्ताक्षर करा लिए गए थे. कई बार इंसान जैसा सोचता है, वैसा होता नहीं. लोन मिलने की उम्मीद में समय और तारीखें बढ़ती चली गईं. सुरेंद्र बहुत खुश थे, लेकिन उन की खुशी को पहला झटका तब लगा, जब अजय के साथियों ने उन्हें नजरंदाज करना शुरू कर दिया.

आशंकित हो कर सुरेंद्र गुप्ता ने अपने स्तर से अजय पंडित के बारे में पता लगाना शुरू किया, लेकिन उस के रसूख में कहीं कोई शक नहीं हुआ. उन के एक परिचित ने यह जरूर कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें ठग लिया गया हो? यह ख्याल मन में आते ही उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने अजय के साथियों से भी बात की. वे काम के लिए तो हामी भरते रहे, लेकिन टरकाते भी रहे. अजय से मिलने की उन्होंने कई कोशिशें कीं, लेकिन वीआईपी सुरक्षा के चक्रव्यूह में उन का उस से मिलना नहीं हो सका. वह हर बार नाकाम रहे. किसी से बात भी होती तो नेताओं का रौब दिखा दिया जाता.

सुरेंद्र ने जो रकम दी थी, वह कोई छोटी रकम नहीं थी. धीरेधीरे जब विश्वास हो गया कि उन्हें ठग लिया गया है तो वह बेचैन हो उठे. अजय पंडित भले ही रसूख वाला था, लेकिन करोड़ों रुपए की ठगी का मामला था, इसलिए सुरेंद्र भी कैसे चुप बैठते. उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का फैसला कर लिया. इस के बाद वह करनाल के एसपी पंकज नैन से मिले और उन्हें आपबीती सुनाई. पुलिस ने उन्हें शीघ्र काररवाई का आश्वासन दिया.

शिकायत पर गहराई से विचार कर के पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श किया. पुलिस ने अजय के बारे में जानकारियां जुटाईं तो पता चला कि उस के बड़ेबड़े नेताओं से संबंध हैं. वह काफी उच्चस्तर पर संबंध रखने वाला आदमी है. उस की पैठ न केवल हर बड़ी पार्टी में हैं, बल्कि पुलिस प्रशासन, नौकरशाहों और उद्योगपतियों से भी उस के अच्छे रिश्तों की बात सामने आ रही थी. निस्संदेह वह ऊंची पहुंच वाला आदमी था. ऐसे आदमी पर बिना पर्याप्त सबूत या एफआईआर के हाथ डालना संभव नहीं था. इस से पुलिस की काररवाई शुरू होने से पहले ही खत्म हो सकती थी. इसी छानबीन में पुलिस रिकौर्ड से पता चला कि सन 2013 में पानीपत शहर में अजय के खिलाफ नौकरी के नाम पर 20 लाख रुपए की ठगी का एक मामला दर्ज हुआ था.

यह मामला अदालत में चल रहा था. इस से पुलिस का यह शक पुख्ता हो गया कि अजय राजनीतिक संबंधों की आड़ में लोगों के साथ ठगी कर रहा है. इस के बाद थाना मधुबन में सुरेंद्र गुप्ता की तहरीर पर भादंवि की धारा 420 और 506 के तहत मामला दर्ज हो गया. इस के बाद अधिकारियों ने विचारविमर्श के बाद उस की गिरफ्तारी का फैसला कर लिया. प्रदेश पुलिस के मुखिया यशपाल सिंघल और आईजी हनीफ कुरैशी ने भी इस मामले में काररवाई के निर्देश दे दिए. इस के लिए एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम भी बना दी गई. इस टीम में कई तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को शामिल करते हुए इस की कमान डीएसपी जिंतेंद्र गहलावत को सौंप दी गई. अब पुलिस उसे घेरने की कोशिश में जुट गई.

16 जनवरी, 2016 को पुलिस ने चंडीगढ़अंबाला रोड पर अजय को पूछताछ के बहाने बुलाया गया तो उस ने अपनी पहुंच का हवाला दे कर पुलिस को रौब में लेने की कोशिश की. लेकिन पुलिस ने उस के प्रभाव में आए बिना उसे गिरफ्तार कर लिया. जबकि पुलिस ने इस गिरफ्तारी की तत्काल किसी को भनक नहीं लगने दी और अदालत में पेशी के बाद उसे 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. प्राथमिक पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे साथ ले कर छतरपुर स्थित फार्महाउस पर छापा मारा तो वहां से सुरेंद्र गुप्ता द्वारा दिए गए 2 करोड़ रुपए बरामद हो गए. हरियाणा पुलिस के लिए किसी मामले में अब तक बरामद की गई सब से बड़ी रकम थी. इसी के साथ अजय की गिरफ्तारी की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई.

पुलिस तब चौंके बिना नहीं रह सकी, जब उस के सामने 2 और ऐसे शिकायतकर्ता आ गए, जो अजय पंडित की ठगी का शिकार हुए थे. उन में से करनाल के वीरेंद्र सिंह से गैस एजेंसी और पैट्रोल पंप दिलाने के नाम पर डेढ़ करोड़ रुपए ठगे गए थे, जबकि पुणे के आर.एस. यादव से केंद्र सरकार में नेशनल सिक्योरिटी कमीशन में मेंबर बनवाने के नाम पर 50 लाख रुपए की रकम ऐंठी गई थी. पुलिस ने इन दोनों मामलों में भी मुकदमा दर्ज कर लिया और अजय पंडित से विस्तृत पूछताछ की. इस बीच उसे 21 जनवरी को पुन: अदालत में पेश किया गया. इस बार भी उसे 9 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

अजय पंडित से पूछताछ और उस के कारनामों की चर्चाओं एवं जांचपड़ताल में जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इसलिए चौंकाने वाली थी, क्योंकि एक नौवीं फेल शख्स ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और शातिर दिमाग के बल पर इतनी ऊंची पहुंच बना ली थी, जिस की जल्दी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. जानीमानी पार्टियों के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से ले कर वरिष्ठ अधिकारियों से उस के सीधे और मजबूत संबंध थे. उस का रसूख और राजशाही ठाठ देख कर बड़ेबड़े लोग प्रभाव में आ जाते थे.

अजय शर्मा उर्फ सरजू को जानने वाले बताते हैं कि वह नौवीं फेल था. उस के पिता का कभी छोटा सा क्लिनिक हुआ करता था. वह सिरसा में गोदाम रोड पर रहते थे. उस की प्रारंभिक शिक्षा यहीं हुई थी. वह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी था. पढ़ाई में मन नहीं लगा, इस के बावजूद वह ऊंचे सपने देखने लगा. कुछ लोग अपने सपनों को पढ़ाई और काबलियत के बलबूते पूरा करते हैं, परंतु कुछ लोग शौर्टकट के जरिए. फर्क इतना होता है कि जो सपने काबलियत से पूरे होते हैं, वे स्थाई होते हैं, जबकि जिन्हें शौर्टकट के जरिए पूरा किया जाता है, उन की कोई बुनियाद नहीं होती, वे वक्ती होते हैं. यह फर्क कलांतर में आईने की तरह एकदम साफ दिखता है. इस बड़ी हकीकत से अंजान अजय का थकी सी जिंदगी में मन नहीं लगता था.

पढ़ा हुआ वह भले ही कम था, लेकिन दिमाग का तेज था. उस का व्यक्तित्व भी आकर्षक था. उस के आर्थिक हालात कतई अच्छे नहीं थे. उसे लगता था कि हवाई चप्पलों में टहलते हुए उस की उम्र यूं ही कट जाएगी. सन 1997 में ही यह बात उस की समझ में आ गई थी कि आज के जमाने में राजनीतिक ताकत से बड़ी कोई ताकत नहीं है. उस ने राजनीति से जुड़े लोगों से रिश्ते बनाने शुरू कर दिए, साथ ही गुजारे के लिए प्रौपर्टी का छोटामोटा काम करने लगा.

बातों से किसी को भी प्रभावित करने की कला उस में थी ही, उस की पैठ बढ़ी तो उस ने दिल्ली का रुख किया. इस के बाद उस ने कई सालों तक सिरसा की ओर पलट कर नहीं देखा. राजनीतिज्ञों की शागिर्दी के साथ उस ने लोगों के छोटेमोटे काम कराने शुरू किए तो उस के बदले वह पैसे लेने लगा. इसी के साथ प्रौपर्टी के काम में भी वह हाथ आजमाता रहा. कई शराब कारोबारियों से भी उस के रिश्ते बन गए थे. विवादित प्रौपर्टी पर उस की खास नजर होती थी, क्योंकि वहां नेताओं और नौकरशाहों की पौवर का इस्तेमाल कर के वह अपने रिश्तों को भुना लेता था.

हैसियत बढ़ी तो पंजाबी बाग जैसे पौश इलाके में किराए पर रहना शुरू कर दिया. इन्हीं कामों से उस ने इतनी दौलत कमाई कि 10 सालों में वह काफी दौलतमंद हो गया. इस बीच फिल्मों से प्रभावित हो कर उस ने अपना नाम अजय पंडित रख लिया. अजय का काम करने का तरीका एकदम अलग था. उस ने तमाम चेलेचपाटे बना लिए थे, जो पहले शिकार को टारगेट करते थे. इस के बाद उसे शान दिखा कर संपर्क बढ़ा कर उसे राजनीतिक घरानों से ले कर बड़े नौकरशाहों से मिलवा कर अपना विश्वास जमाते. और जब विश्वास जम जाता था तो उसे कोई ख्वाब दिखा कर चाल चलना शुरू कर देते थे.

इस मामले में अजय करिश्माई व्यक्तित्व का स्वामी था. लोग न सिर्फ उस पर भरोसा कर लेते थे, बल्कि उसे काम के बदले मोटी रकम भी दे देते थे. जिन के काम नहीं होते थे, उन के रुपए फंस जाते थे. अजय रसूख की बदौलत तरहतरह के हथकंडे अपना कर ऐसे लोगों को किनारे कर देता था. किसी को राजनीतिक पार्टी का टिकट दिलाने, किसी को नौकरी, किसी को पैट्रोल पंप व गैस एजेंसी का लाइसैंस दिलाने तो किसी को बडे़ काम के ठेके दिलाने का झांसा दे कर वह ठगी करता था. ऐसा भी नहीं था कि वह लोगों के काम बिलकुल नहीं कराता था. लेकिन जिन का काम नहीं होता था, उन के पैसे फंस जाना तय था.

दौलत और ताकत में इजाफा हुआ तो अजय ने छतरपुर में एक फार्महाउस किराए पर ले लिया. उस ने सिरसा के सैक्टर-20 में एक आलीशान कोठी बनवाई. कई लग्जरी गाडि़यां खरीद लीं. राजनीतिक लोगों और नौकरशाहों पर भी उस का दबदबा रहता था. सरकारी सुरक्षा के अलावा प्राइवेट सिक्योरिटी में पहलवान जैसे लड़कों को वह साथ रखता था. अजय खुद को राजशाही घराने का बताता था. उस ने तमाम नामीगिरामी लोगों से संपर्क बना लिए थे. उस के रहनसहन, राजसी ठाटबाट, सुरक्षा तामझाम, लग्जरी गाडि़यों और बड़े संपर्कों को देख कर कोई भी प्रभाव में आ जाता था. वह लोगों से बड़ेबड़े कामों को कराने के बदले मोटी रकम लेता था. राजनीतिक संबंधों को भुनाने का हुनर उसे खूब आता था.

उस ने सोनिया गांधी एसोसिएशन बना ली, जिस का वह खुद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गया. इसी के साथ उस ने ब्राह्मणसभा भी बनाई और उस का भी खुद ही अध्यक्ष बन गया. वह सफेदपोश बन कर ऐशोआराम की जिंदगी जीता था. अजय के जिंदगी जीने का अंदाज एकदम अलग था. वह रौबरुतबे से रहता था. उस का हुक्म बजाने के लिए नौकरों और सुरक्षाकर्मियों की फौज तैयार रहती थी. राष्ट्रीय पहुंच के नेताओं से संबंध बनाए रखने की कला का वह बाजीगर था. लखपति लोगों के काम कराना वह अपनी तौहीन समझता था, इसलिए करोड़पति और अरबपति लोगों को ही अपना निशाना बनाता था. किसी का काम कराने के बदले वह करोड़ो रुपए एडवांस में ले लेता था. शातिर दिमाग अजय ने दिखावटी शान से ही बड़ोंबड़ों को झांसे में लिया था.

दौलत और रसूख हासिल करने के बाद अजय ने सन 2012 से सिरसा आना शुरू किया तो वह जब भी वहां आता, उसे देख कर लोगों की आंखें फटी रह जातीं. कारों और वीआईपी सिक्योरिटी ही नहीं, अजय हैलीकौप्टर से भी आता था. लोगों में जिज्ञासा बढ़ाने के लिए वह शहर के ऊपर हैलीकौप्टर का चक्कर लगवा कर एयरफोर्स स्टेशन पर उतरता था. तब लोगों को पता चल जाता था कि उन का अजय उर्फ सरजू आया है. वह दान भी दोनों हाथों से करता था. यह दान वह धार्मिक आयोजनों, पूजास्थलों से ले कर गरीबों तक में करता था. उस ने दान भी इतना किया था कि उस की पहचान बड़े दानवीरों में होने लगी थी. उस के रसूख और दान देने की दिलदारी को देख कर लोग उसे कार्यक्रमों मे बुलाने लगे थे.

विशेष अवसरों पर जब उस के आने पर गरीबों की लाइन लगती थी तो उस के कारिंदे हजार व 5 सौ के नोटों की गड्डियां खोल कर उसे देते और वह बिना गिने बांटता चला जाता था. गरीबों के प्रति उस की यह दरियादिली जितनी सुर्खियों में आती, वह उतना ही खुश होता और गर्व महसूस करता. उस ने किसी गरीब को कभी हजार या 5 सौ से कम का नोट नहीं दिया, क्योंकि उस से कम देना वह अपनी तौहीन समझता था. उसे ऐसा करते देख बड़ेबड़े रईस भी हैरान रह जाते थे.

अजय को जब भी सिरसा आना होता, उस के स्वागत में शहर में बड़ेबड़े होर्डिंग और बैनर कुछ इस अंदाज में लगाए जाते थे, जैसे किसी बड़ी राजनैतिक हस्ती का स्पैशल दौरा हो. जब सारी तैयारियां पूरी हो जातीं, उस के बाद ही भारी सुरक्षा तामझाम और काफिले के साथ अजय फिल्मी स्टाइल में एंट्री करता था. उस के आगेपीछे पुलिस और कमांडों दस्ते की जिप्सियां चलती थीं. उन के बीच वह महंगी लग्जरी कार में रहता था. लोग उसे देख सकें, इस के लिए कार का शीशा उतार दिया जाता था. जिप्सियों पर 2-2 पुलिसकर्मी गले में कारबाइन डाल कर खड़े हो कर चलते थे. शायद ऐसा इसलिए किया जाता था कि लोग देख सकें कि पुलिस किस मुस्तैदी से उसे वीआईपी सुरक्षा दे रही है. इस सब के पीछे उस की मंशा लोगों को अपना रसूख दिखाने की होती थी. वह हमेशा वीआईपी सिक्योरिटी रखता था.

उस की सुरक्षा में पंजाब, हरियाणा और दिल्ली पुलिस के जवान होते थे. जितनी सुरक्षा उस के पास होती थी, किसी कैबिनेट मंत्री के पास भी नहीं होती थी. सन 2016 के विधानसभा चुनावों के समय सिरसा में चर्चा हो रही थी कि कांगे्रस अजय को अपना उम्मीदवार बनाएगी तो पूर्व मंत्री गोपाल कांडा से उस का कांटेदार मुकाबला होगा. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. अजय की रईसी का आलम यह था कि वह अपने नातेरिश्तेदारों को महंगी कारें तक गिफ्ट करता था. उस के पास जो लग्जरी गाडि़यां थीं, वे उस के नाम नहीं थीं. उस की बीएमडब्ल्यू, मर्सडीज, औडी व हुंडई कारें उस के साथियों और पीए के नाम पर थीं.

अजय की शान से प्रभावित हो कर बड़ेबड़े लोग अपने काम कराने के लिए उस के पास आते और उस के जाल में फंस जाते थे. उन्हीं में पुणे के एक बड़े शिक्षण संस्थान के संचालक आर.एस. यादव भी थे. वह अकसर अपने कामों से दिल्ली आते रहते थे. इसी आनेजाने में उन की मुलाकात अजय से हुई तो उस ने उन्हें ऐसा झांसा दिया कि वह भी उस के जाल में फंस गए. उस ने उन से कहा था कि सरकार एक सिक्योरिटी कमीशन बनाने जा रही है, अगर वह चाहें तो गृह मंत्रालय में सिफारिश कर के उन्हें वह उस में मेंबर बनवा सकता है. उन्हें तमाम सरकारी सुविधाओं के साथ लाल बत्ती लगी गाड़ी और सुरक्षा भी मिलेगी.

आर.एस. यादव इस के लिए सहज ही तैयार हो गए. अजय का रसूख चूंकि वह देख चुके थे, इसलिए शक जैसी कोई बात नहीं थी. उन्होंने 50 लाख रुपए अजय को आने वाले दिनों में दे भी दिए. ऐसा कोई कमीशन बनना ही नहीं था, इसलिए रुपए हाथ में आते ही अजय उन्हें टरकाने लगा. उन्हें लगा कि वह फंस गए हैं तो पैसे वापस मांगे. इस के बाद वह आए दिन रुपए वापसी के लिए चक्कर लगाने लगे तो एक दिन फार्महाउस पर अजय से उन की कहासुनी हो गई. आर.एस. यादव अड़ गए. उन्होंने कहा, ‘‘अजयजी बहुत हो गया, आप मेरा हिसाब कर दीजिए. उस के बाद हमारा आप का रिश्ता खत्म.’’

उन की बात पर अजय ने मुसकरा कर कहा, ‘‘ठीक है, तुम यही चाहते हो तो आज मैं मामला साफ किए देता हूं. आज के बाद तुम मुझ से कभी नहीं मिल सकोगे.’’

इस के बाद अजय ने सुरक्षाकर्मियों को इशारा किया तो उन्होंने उसे धकिया कर फार्महाउस के बाहर कर दिया. उस ने ताकीद भी कर दी थी कि यह आदमी आइंदा कभी कोठी में नहीं दिखना चाहिए. बाहर से ही इसे भगा देना. इस तरह आर.एस. यादव को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया तो वह चाह कर भी कभी उस से नहीं मिल सके. अजय की पहुंच को देखते हुए उन्होंने उस के खिलाफ जान के डर से पुलिस में शिकायत करने की भी हिम्मत नहीं की. कोशिश कर के हरियाणा में शिकायत भी की तो वह दब कर रह गई.

सन 2013 में अजय ने पानीपत के एक आदमी से सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर 20 लाख रुपए ठग लिए थे. ठगी का शिकार हुए आदमी ने चुप बैठने के बजाय उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था. पानीपत में उस के खिलाफ 20 लाख रुपए की ठगी का मुकदमा तो दर्ज हुआ, लेकिन अपनी पहुंच के बल पर वह कानून के शिकंजे में फंसने से बचता रहा. मामला अदालत में पहुंचा. अजय को उम्मीद थी कि एक दिन यह सब रफादफा करा देगा. अजय की ठगी का सिलसिला यहीं नहीं थमा. उस ने करनाल के सेक्टर-1 निवासी वीरेंद्र सिंह से भी पैट्रोल पंप और गैस एजेंसी दिलाने के नाम पर डेढ़ करोड़ रुपए ठग लिए थे. वीरेंद्र को न एजेंसी मिली, न रुपए. अजय की पहुंच के आगे वह भी थक कर बैठ गए थे.

इस के बाद उस ने सुरेंद्र गुप्ता को ठगी का शिकार बनाया. उसे कहीं से पता चला था कि सुरेंद्र को लोन की जरूरत है. यह पता चलते ही उस ने अपने साथियों को उन के पीछे लगा दिया. गुप्ता उन के जाल में एक बार फंसे तो फिर फंसते ही चले गए. अजय के कारनामों का खुलासा हुआ तो हर कोई हैरान था. पुलिस हिरासत में भी वह अपने परिचित नेताओं के नाम ले कर पुलिस को डराता रहा. उस की गिरफ्तारी की सूचना मिलने के बाद गैस एजेंसी के नाम पर डेढ़ करोड़ गंवाने वाले वीरेंद्र सिंह और पुणे के आर.एस. यादव ने भी मुकदमा लिखाया था.

दरअसल, आर.एस. यादव कुछ ऐसे लोगों के बराबर संपर्क में थे, जो अजय को जानते थे. उन्हें गिरफ्तारी की खबर पा कर वह करनाल से आ पहुंचे थे. पुलिस ने कई राज्यों में उस की गिरफ्तारी की सूचना भेज दी है, ताकि अन्य मामले भी पकड़ में आ सकें. 27 जनवरी, 2015 को पुलिस ने अजय के एक साथी रिषी विश्नोई को भी गिरफ्तार किया है. उसी ने डेढ़ करोड़ की ठगी का शिकार हुए वीरेंद्र की मुलाकात अजय से कराई थी और ठगी के इस मामले में अहम भूमिका निभाई थी.

रिमांड अवधि खत्म होने पर पुलिस ने अजय को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस उस के शेष कारनामों की जांच के साथ ही उस के बाकी साथियों की तलाश कर रही थी. पुलिस के पास अजय की ठगी का शिकार हुए लोग पहुंच रहे थे. True Crime Story

 

Hindi Crime Story: एक रसिया ठग की दास्तान – तुझे राम कहें या राहुल

Hindi Crime Story: राम नायडू उर्फ राहुल दीक्षित जैसे लोगों की समाज में कमी नहीं है, जो दूसरों की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. मृणालिनी को हर तरह लूटने वाला राम उर्फ राहुल भले ही पकड़ा गया, लेकिन क्या उसे उतनी सजा मिल पाएगी, जितने घाव उस ने मृणालिनी और दूसरी लड़कियों को दिए हैं?

‘‘बे टी, कब तक मुझ बूढ़ी की तीमारदारी में अपनी जिंदगी खराब करती रहेगी. मेरी मान

तो कोई अच्छा सा लड़का देख कर शादी कर ले और अपना घर बसा ले, मेरा क्या है, आज हूं कल नहीं. मैं चैन से तभी मर पाऊंगी, जब तेरा बसा हुआ घर देख लूंगी.’’

प्रोफेसर मृणालिनी (बदला हुआ नाम) जब थकीहारी कालेज से घर लौटती थीं तो उन्हें रोज किसी न किसी रूप में मां के इसी तरह के शब्द सुनने को मिलते थे. धीरेधीरे स्थिति यह हो गई थी कि मां जिस दिन ऐसी कोई बात नहीं कहती थीं, मृणालिनी को उन की तबीयत खराब होने का अंदेशा होने लगता था. 37 वर्षीया मृणालिनी इंदौर के एक नामी कालेज में प्रोफेसर थीं और एरोड्रम इलाके में रहती थीं.

पिता की मौत के बाद मृणालिनी ने मां की सेवा करने की ठान ली थी. ठान ही नहीं ली थी, बल्कि ऐसा कर भी रही थीं. घर में कोई और नहीं था, जो मां की देखभाल कर पाता. ऐसे में मृणालिनी को यह ठीक नहीं लगा कि वह मां को उन के हाल पर अकेला छोड़ कर शादी कर लें और ससुराल चली जाएं. इसलिए वह शादी, प्यार, रोमांस और घरगृहस्थी जैसे लफ्जों को भूल कर बेटे की भूमिका में आ गईं थीं. उन्होंने मां की सेवा और देखभाल को ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया था.

लेकिन बूढ़ी मां की अपनी अलग परेशानी थी, वह नहीं चाहती थीं कि उन की वजह से अच्छीखासी पढ़ीलिखी और सुंदर बिटिया अविवाहित रह जाए. इसलिए वे तरहतरह से उस पर शादी के लिए दबाव बनाती रहती थीं. मृणालिनी जैसी मिसाल कायम करने वाली दृढ़विश्वासी बेटियों की समाज में कमी नहीं है, जो अपने सुख से ज्यादा मांबाप की सेवा को प्राथमिकता देती हैं, भले ही उन्हें तन्हा जिंदगी क्यों न गुजारनी पड़े. पिछले कुछ दिनों से जैसेजैसे मां की जिद बढ़ती जा रही थी, उसे देख कर मृणालिनी भी सोचने को मजबूर हो गई थीं.

कभी मृणालिनी शादी के बारे में सोचतीं तो वह भी अन्य युवतियों की तरह अल्हड़ युवती में तब्दील हो जातीं. एक ऐसी युवती जो अपने लिए सुहाने सपने देखती है, पति के साथ घूमतीफिरती है, होटलों और मौल में जाती है. दूरदराज के पर्यटनस्थल पर अपने जीवनसाथी के हाथ में हाथ डाले रूमानी बातें करती हैं. मृणालिनी चूंकि परिपक्व और जिम्मेदार थीं, इसलिए जल्द ही ऐसे ख्वाबोंखयालों को झटक देती थीं और मां के पास बैठ कर बतियाने लगती थीं. ज्यादा बोरियत होने पर वह सहेलियों से फोन पर बातें कर लेती थीं या फिर टीवी पर अपने पसंदीदा सीरियल देखने बैठ जाती थीं. उन से भी जी भर जाता था तो वह पत्रपत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगती थीं.

मृणालिनी की सोच में आ रहा यह बदलाव आखिरकार उन के इरादों पर भारी पड़ा. हालांकि उन की सोच यह थी कि कोई कमाऊ जीवनसाथी मिल जाए तो मां की सेवा और देखभाल की जिम्मेदारी भी पूरी होती रहेगी और गृहस्थी भी बस जाएगी. भले ही वह साथ क्यों न रहें. लेकिन यह महज सोचने भर की बात थी, क्योंकि अभी तक कोई ऐसा प्रस्ताव नहीं आया था. खुद मृणालिनी ने भी अपनी तरफ से इस तरह की कोई पहल नहीं की थी.

जब अरमानों और जज्बातों की लड़ाई में अरमान भारी पड़ने लगे तो बीते साल जून के महीने में मृणालिनी ने यह सोचते हुए एक अखबार में अपनी शादी का विज्ञापन दे दिया कि ढंग का कोई जीवनसाथी मिला तो ठीक, नहीं मिला तो कोई बात नहीं. विज्ञापन देते वक्त एक तरह से उन्होंने उम्मीद के साथ नाउम्मीदी के लिए भी खुद को तैयार कर लिया था. विज्ञापन का वाजिब असर हुआ. उस के छपते ही मृणालिनी के मोबाइल पर धड़ाधड़ प्रस्ताव आने लगे. लेकिन हर आने वाले फोन के साथ उन का उत्साह ठंडा पड़ने लगा. वजह यह थी कि आने वाले अधिकांश प्रस्ताव उन की चाहत के अनुरूप नहीं थे. कोई तलाकशुदा था तो कोई विधुर, उन में से भी अधिकतर बच्चों वाले थे.

कुछ प्रस्तावों पर तो उन्होंने साफ महसूस किया कि प्रस्ताव भेजने वाले की नजर उन के अच्छेभले वेतन, पद और घर पर थी. कुछ ऐसे फोन भी आए, जिन में उम्मीदवार करताधरता कुछ नहीं था, बस पुरुष भर होना ही उस की योग्यता थी. सलीके के अगर कुछ प्रस्ताव आए भी तो उन्होंने यह जान कर आगे दिलचस्पी नहीं ली कि मृणालिनी के घर उन के अलावा सिर्फ एक बूढ़ी मां हैं. इस सब से मृणालिनी की समझ में आ गया था कि इस उम्र और हालात में अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करना आसान नहीं है. लिहाजा उन्होंने उम्मीद का दामन छोड़ने की सोच ली. तभी जबलपुर से एक फोन आया. फोन करने वाला राहुल दीक्षित नाम का व्यक्ति था, जिस ने अपना परिचय पूरे आत्मविश्वास और आत्मीयता से दिया था.

राहुल ने खुद को जबलपुर के एक बड़े कारोबारी का एकलौता बेटा बताते हुए मृणालिनी से कहा था कि चूंकि उसे अब तक कोई मनपसंद लड़की नहीं मिली, इसलिए शादी नहीं की. दोनों के बीच इधरउधर की कुछ और भी औपचारिक बातें हुईं. फोन पर मृणालिनी की मां ने भी राहुल से बात की. अब तक आए तमाम प्रस्तावों में से यही एक बेहतर प्रस्ताव था. लिहाजा मांबेटी ने रायमशविरा कर के राहुल को इंदौर आने का न्यौता दे दिया, ताकि आमनेसामने साफसाफ बात हो सकें और वे लड़के को देख भी लें. इस आमंत्रण पर राहुल ने हां करते हुए कहा कि वह जल्द ही इंदौर आएगा.

चंद दिनों के बाद राहुल मृणालिनी के इंदौर स्थित घर जा पहुंचा. जिंदगी में कई बार ऐसा होता है कि आप पहली बार किसी से मिलते हैं तो यही लगता है कि जिस की तलाश थी, वही यह है. ऐसा ही कुछ मृणालिनी और उन की मां के साथ भी हुआ. राहुल से चंद घंटों की बातचीत के बाद दोनों इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने रिश्ते के लिए हां कर दी. पूरी बातचीत में राहुल ने कोई शर्त नहीं रखी थी. न ही मृणालिनी की नौकरी और वेतन पर चर्चा के अलावा लेनदेन की कोई बात की थी. अलबत्ता पढ़ेलिखे आदमी की तरह उस ने सारी जानकारी जरूर ले ली थी. यह कोई काबिलेऐतराज बात नहीं थी, क्योंकि रिश्ते के मामले में ये बातें बेहद आम और जरूरी होती हैं. मां बेटी को राहुल औरों से हट कर लगा.

पहली ही मुलाकात में बात औपचारिक से अनौपचारिक हो गई थी. जातेजाते राहुल इशारा कर गया कि उस की तरफ से तो कोई दिक्कत नहीं है. अब आगे की बात घर वाले करेंगे. इस के बाद जो हुआ, वह आजकल के हिसाब से बहुत सामान्य है. मृणालिनी और राहुल फोन पर लंबीलंबी बातें करने लगे. इन बातों में भविष्य के सपने भी होते थे. मृणालिनी की मां तो राहुल जैसा नेक और शरीफ लड़का पाने की कल्पना से ही खुश थीं. मांबेटी दोनों साथ बैठ कर बातें करती थीं तो यह खुशी दोगुनी हो जाती थी.

मृणालिनी राहुल को चाहने लगी थीं. वह इंतजार कर रही थीं कि उस के कहे मुताबिक उस के घर वाले बात आगे बढ़ाएं. इस बीच उस में काफी बदलाव आया था. वह खुश रहने लगी थीं और फिर से सपने देखने लगी थीं. अधेड़ उम्र की बेटी को मुद्दत बाद यूं खुश देख मां भी फूली नहीं समाती थीं. उन्हें खुशी इस बात की थी कि जीतेजी बेटी का घर बसते देख लेंगी. कुछ दिनों बाद एक दिन अचानक राहुल परेशान और बदहवास सा मृणालिनी के घर आ पहुंचा तो मांबेटी दोनों उस की हालत देख न केवल चौंकीं, बल्कि खुद भी परेशान हो उठीं. बारबार पूछने और कुरेदने पर राहुल ने बड़ी मासूमियत से बताया कि उस के घर वाले इस शादी पर राजी नहीं हैं, इसलिए वह हमेशा के लिए घर छोड़ कर आ गया है.

साथ ही उस ने यह भी बताया कि वह बिजनैस के लिए घर से 20 लाख रुपए ले कर चला था, लेकिन इटारसी जंक्शन पर उस के पैसे और सामान चोरी हो गया. उस ने अपनी बात कुछ इस ढंग से कही थी कि मृणालिनी और उन की मां चाह कर भी उस पर अविश्वास नहीं कर पाईं. राहुल खाली हाथ था, इसलिए उसे घर में रहने की अघोषित अनुमति मिल गई. बातों ही बातों में राहुल ने अपनी आगे की प्लानिंग भी बता दी कि अब वह इंदौर में ही रह कर कोई कारोबार करेगा और काम जमते ही मृणालिनी से शादी कर लेगा. मां तो घरजवांई चाहती ही थीं, लिहाजा उन्होंने तुरंत हां कर दी. दिल के हाथों मजबूर मृणालिनी भी इनकार नहीं कर पाईं. अगले 2 दिनों में ही राहुल ने मृणालिनी को बताया कि वह उस के लिए पिता की करोड़ों की जायदाद छोड़ आया है.

राहुल की लच्छेदार बातों का जादू और उस से भी ज्यादा उस की जरूरत, मांबेटी दोनों के सिर चढ़ कर बोल रही थी, इसलिए दोनों ने आंख मूंद कर उस की बातों पर विश्वास कर लिया. राहुल घर में घुसा तो वहीं का हो कर रह गया. हफ्ते भर में ही फैसला ले लिया गया कि राहुल को बिजनैस शुरू करने के लिए पैसा मांबेटी देंगी. जब राहुल भी दुकान के लिए भागदौड़ करने लगा तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रही. जल्द ही उस ने मृणालिनी को बताया कि न्यू पलासिया इलाके में एक दुकान की बात हो गई है, जिस में वह आटोमोबाइल पार्ट्स का बिजनैस शुरू करेगा.

दुकान का किरायाभाड़ा और पार्ट्स खरीदने के लिए राहुल ने करीब 15 लाख रुपए की जरूरत बताई. अपना सबकुछ राहुल को सौंप चुकी मृणालिनी ने अपनी अब तक की बचत के 5 लाख रुपए और उज्जैन में पड़े एक प्लौट को बेच कर मिले 10 लाख रुपए यानी 15 लाख रुपए राहुल को दे दिए. जून की भीषण गर्मी खत्म हो चुकी थी. ढलती जुलाई की वह उमस भरी 26 तारीख थी, जब सुबहसुबह राहुल ने घर आ कर बताया कि माल आ गया है. मैं सामान का पेमेंट कर के और दुकान पर सामान लगवा कर कुछ घंटों में आता हूं. तैयारी पहले से हो रही थी, इसलिए मां बेटी ने पैसा देने में कोई ऐतराज नहीं किया. राहुल पैसा ले कर गया तो फिर वापस लौट कर नहीं आया.

रविवार 26 जुलाई, 2015 की देर रात तक मृणालिनी और उन की मां राहुल का इंतजार करती रहीं, पर वह घर नहीं लौटा तो वे चिंता में पड़ गईं. मृणालिनी ने राहुल को फोन किया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला, इस से मांबेटी और घबरा उठीं. मन में दबा शक यकीन में बदलने लगा था कि कहीं भोलाभाला, मायूस सा दिखने वाला और मीठीमीठी बातें करने वाला राहुल कोई ठग तो नहीं था, जो उन्हीं के घर में रह कर बड़े इत्मीनान से 15 लाख का चूना लगा गया. जैसेजैसे दोनों इस शक को दबाने की कोशिश करतीं, वैसेवैसे वह उन्हें और ज्यादा डराने लगता.

सदमे की सी हालत में आ चुकीं मृणालिनी बारबार इस उम्मीद के साथ राहुल का नंबर डायल कर रही थीं कि शायद इस बार घंटी जाए और काल रिसीव कर के एक महीने के ही सही राहुल जानेपहचाने अंदाज में कहे कि सौरी मोबाइल खराब हो गया था या उस की बैटरी डिस्चार्ज हो गई थी, इसलिए काल पिक नहीं कर पाया. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. मांबेटी ने सारी रात बुरे खयालों के साथ करवटें बदलते काटी. उन्हें जरा बहुत उम्मीद थी कि शायद सुबह को राहुल वापस आ जाए, लेकिन उसे नहीं आना था, सो नहीं आया. नतीजतन जल्द ही उन के सामने यह सच आ गया कि राहुल वाकई एक नंबर का ठग था और उस की बताई सारी बातें झूठी थीं. 15 लाख का तो दुख अपनी जगह था ही, लेकिन उस से भी बड़ा दुख यह था कि राहुल मृणालिनी को कहीं का नहीं छोड़ गया था.

कुछ दिन मृणालिनी और उन की मां ने राहुल के वापस आने की झूठी उम्मीद में काटे. लेकिन धोखा खाई मृणालिनी का दिल जानता था कि उस पर क्या गुजर रही है. मां की भी हालत ठीक नहीं थी. उन्होंने जिस आदमी पर बेटे जैसा भरोसा किया, वही सब कुछ लूट कर भाग गया था. महिलाओं का अकेलापन कभीकभी कैसे अभिशाप बन जाता है, यह मांबेटी की हालत देख कर समझा जा सकता था.

लेकिन मृणालिनी खामोश नहीं बैठी. कुछ ही दिनों में उन्होंने खुद को संभाल लिया और एक दिन ‘वी केयर फार यू’ के दफ्तर जा पहुंची, जो इंदौर में पीडि़त महिलाओं की मदद के लिए जाना जाता है. ‘वी केयर फार यू’ की इंचार्ज इंस्पेक्टर सीमा मलिक ने मृणालिनी की दास्तान सुनी और लिखित दरख्वास्त ले ली. परेशानी यह थी कि मृणालिनी के पास राहुल की कोई पुख्ता पहचान नहीं थी. ईमेल किया हुआ केवल एक फोटो भर था, जिस के सहारे राहुल को ढूंढ़ पाना भूसे के ढेर में सुई ढूंढ़ने जैसी बात थी. दूसरा जरिया राहुल का मोबाइल नंबर था, जो लगातार बंद जा रहा था.

लंबे वक्त तक जब वी केयर फार यू मृणालिनी के लिए कुछ नहीं कर पाया तो वह अक्तूबर के शुरू में इंदौर के आईजी संतोष कुमार सिंह से मिलीं और सारी बात उन्हें बताईं. संतोष कुमार सिंह ने इस मामले को पूरी गंभीरता से लेते हुए थाना क्राइम ब्रांच के प्रभारी कैलाशचंद पाटीदार को सौंप दिया. कैलाशचंद पाटीदार ने अपनी टीम बना कर ठग राहुल की खोजबीन शुरू कर दी. राहुल तक पहुंचने का एकमात्र जरिया उस का मोबाइल नंबर था, जो 26 जुलाई से ही बंद था.

पुलिस टीम ने जब उस के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो हैरान रह गई, क्योंकि उस में जितने भी नंबर थे, वे सभी ऐसी महिलाओं के थे, जो अधेड़ थीं. इन में से कुछ से बातचीत करने पर राहुल का असली चेहरा सामने आ गया. वह एक पेशेवर और शातिर ठग था, जो अखबारों के वैवाहिक विज्ञापन देख कर उम्रदराज और हालात की मारी महिलाओं से संपर्क कर के शादी की पेशकश करता था और जहां बात जम जाती थी, वहां इसी तरह शादी कर लेता था.

लेकिन शादी कर के वह किसी के साथ जन्म भर नहीं, बल्कि 7 दिनों या 7 सप्ताह तक ही रहता था. इसी बीच वह अपनी बीवियों का मालमत्ता लपेट कर रफूचक्कर हो जाता था. मृणालिनी के मामले में भी उस ने ऐसा ही किया था. ज्यादा हैरान कर देने वाली दूसरी बात यह थी कि वह हर एक लड़की को अलग मोबाइल नंबर देता था, पर फोटो सभी को एक ही भेजता था. हां, अपना नाम जरूर सब को अलगअलग बताता था. पुलिस टीम के सामने नई परेशानी यह थी कि ठगी की शिकार लड़कियां पूरा सच बताने में हिचकिचा रहीं थीं. वजह थी लोकलाज और बदनामी का डर. अधिकांश ने यह भी कहा था कि राहुल ने उन्हें ठगा भर है. उन से शारीरिक संबंध नहीं बनाए थे. जैसे ऐसा कहने भर से उन्हें कोई चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्त हो रहा हो.

जाहिर है, यह खुद को खुद के पाकसाफ होने का दिलासा देने वाली बात थी. बहरहाल, पुलिस के सामने राहुल की असल पहचान का संकट अभी भी मुंह बाए खड़ा था. कोई भी पीडि़ता पुख्ता तौर पर उस के बारे में जानकारी नहीं दे पा रही थी. आखिरकार काल डिटेल्स खंगालते- खंगालते जांच टीम की नजर एक मिसकाल पर पड़ी. इसे छोड़ कर राहुल ने दूसरे सभी नंबरों पर बात की थी. करने को कुछ और था नहीं, लिहाजा पुलिस वालों ने इसी मिसकाल को टारगेट किया. वजह उस के दूसरे तमाम नंबर फर्जी तरीके से हासिल किए गए निकल रहे थे. हर एक को ठगने या शादी करने के बाद वह इस्तेमाल किया नंबर हमेशा के लिए बंद कर देता था.

जब इस मिसकाल वाले नंबर की जांच की गई तो वह विदिशा का निकला. इस की जानकारी ले कर क्राइम ब्रांच ने विदिशा जा कर दबिश दी तो यह नंबर किसी राम नायडू का निकला, जो विदिशा की कृष्णा कालोनी में रहता था. काफी मशक्कत के बाद इस राम नायडू नाम के शख्स को पुलिस टीम ने इंदौर के ही नौलखा इलाके से गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल कर ली. राहुल दीक्षित और राम नायडू का क्या संबंध है यह पहेली सुलझाने में पुलिस को ज्यादा देर नहीं लगी. पता चला कि राम नायडू ही राहुल दीक्षित था, जिस के कई और भी नाम थे.

पूछताछ में पता चला कि राम नायडू के पिता पी. वेंकटेश्वर आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे. पहले वह नागपुर में सेना में नौकरी करते थे. रिटायरमेंट के बाद वह बीएसएनएल में टैक्नीशियन के पद पर काम करने लगे थे. उन्होंने विदिशा में ही मकान बना लिया था. जब पुलिस ने राम नायडू उर्फ राहुल दीक्षित की जन्मकुंडली टटोली तो कई चौंका देने वाली बातें सामने आईं. राम नायडू विदिशा में ही पैदा हुआ था, लेकिन उस के पिता ने पढ़ाई के लिए उसे भोपाल में रहने वाले उस के मामा ईश्वर प्रसाद के पास भेज दिया था. भोपाल में उस का दाखिला एक प्राइवेट स्कूल में करा दिया गया था. पढ़ाई में राम नायडू ठीकठाक था.

स्कूली पढ़ाई के बाद उस ने एम.पी. नगर प्रैस कौंप्लेक्स के पास नवीन कालेज में दाखिला ले लिया था. जब वह बीए के दूसरे साल में था तो उसे रंगमंच का शौक लग गया. अपनी चाहत पूरी करने के लिए वह देशभर में मशहूर भोपाल के कला केंद्र रवींद्र भवन से जुड़ गया. यहां उस की मुलाकात मशहूर कलाकार आलोक चटर्जी से हुई. बड़े और प्रसिद्ध कलाकारों का सान्निध्य और प्रोत्साहन मिला तो उस का ध्यान पढ़ाई से उचट गया. वह मुंबई जा कर फिल्म इंडस्ट्री में जमने के सपने देखने लगा. राम नायडू चूंकि महत्त्वाकांक्षी था, इसलिए वह पढ़ाई अधूरी छोड़ कर मुंबई चला गया.

मुंबई में शायद वह कामयाब हो भी जाता, लेकिन जिन दिनों वह रवींद्र भवन में काम करता था, उन्हीं दिनों उस की मुलाकात इसी इलाके के 2 बदमाशों उजेब और अजीज उल्ला से हुई थी. ये दोनों नशा करने और कराने के लिए रवींद्र भवन के पास ही मंडराते रहते थे. इन दोनों की संगत में पड़ कर राम नशा करने लगा था. लेकिन इस के एवज में उसे अपना शोषण कराना पड़ता था. अजीज और उजेब ने उस का पीछा मुंबई तक किया तो वह परेशान हो उठा. उस में इन बदमाशों से टकराने की हिम्मत नहीं थी.

मुंबई से पहले वह भोपाल आया और फिर भोपाल से विदिशा आ गया. लेकिन इन दोनों बदमाशों से उसे छुटकारा नहीं मिला. ये दोनों विदिशा जा कर उस का शोषण करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. राम नायडू जब बहुत परेशान हो गया तो उस ने अपने भोपाल वाले मामा के साथ मिल कर विदिशा में अजीज उल्ला की हत्या कर दी. यह सन 2003 की बात है. उस का यह जुर्म छुपा नहीं रह सका. पुलिस ने राम नायडू और उस के मामा को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. सन 2006 में हत्या का आरोप साबित होने पर अदालत ने उसे और उस के मामा को आजीवन उम्रकैद की सजा सुनाई.

सन 2011 तक राम नायडू जेल में रहा. इसी बीच ग्वालियर हाईकोर्ट में दायर राम नायडू और उस के मामा की जमानत याचिका मंजूर हो गई. मामाभांजा दोनों जमानत पर जेल से बाहर आ गए. राम नायडू बाहर तो आ गया, पर उस के सामने हजार तरह की दुश्वारियां मुंह बाए खड़ी थीं. उस के ऊपर कातिल का ठप्पा लगा था. ऐसे में उसे नौकरी मिलना मुश्किल था. जबकि कोई कामधंधा वह जानता नहीं था, जिस से अपना गुजरबसर कर लेता. जब आदमी को कोई राह नहीं मिलती तो वह अपने लिए टेढ़ी राह चुन लेता है. यही राम नायडू के साथ हुआ. कामधंधा न होने के बावजूद वह हैरतअंगेज तरीके से अमीर होता गया. उस का रहनसहन ठाठबाट देख कर उसे जानने वाले चकित थे कि जेल से छूटे मुजरिम के पास इतना पैसा कहां से आ रहा है.

पूछने पर वह लोगों को बताता था कि वह प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा कर रहा है, जिस से दलाली में अच्छाखासा पैसा मिल जाता है. इसी दौरान भोपाल के कोलार इलाके में उस ने नगद पैसे दे कर एक महंगा फ्लैट खरीद लिया. उन दिनों राम नायडू की रईसी और अय्याशी शबाब पर थी. हकीकत यह थी कि जेल से जमानत पर छूटने के बाद उस ने नया धंधा चुन लिया था. यह धंधा था उम्रदराज लड़कियों से शादी कर के उन से पैसे झटकने का. मध्य प्रदेश की जिन जगहों में उस ने ठगी की, उन में सागर, ग्वालियर, बीना, छिंदवाड़ा, खंडवा, खरगोन और सीहोर सहित दर्जन भर शहरों की लड़कियां शामिल थीं. राम के निशाने पर वे लड़कियां रहती थीं, जो 40 की उम्र के लगभग थीं और उन के घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं होता था.

धंधा चल निकला तो वह बीवियों के पैसे से अय्याशी करने लगा. जिस को वह ठगता था, वे रिपोर्ट दर्ज नहीं कराती थीं, क्योंकि इस से सिवाय बदनामी के कुछ हासिल नहीं हो सकता था. इस प्लेबौय की कितनी पत्नियां हैं, इस की गिनती कथा लिखे जाने तक जारी थी. लेकिन हैरानी की बात यह है कि तमाम शहरों की लड़कियां यह तो स्वीकार रही हैं कि इस रंगीनमिजाज नटवरलाल ने उन्हें ठगा, पर रिपोर्ट अभी भी दर्ज नहीं करा रहीं.

सिर्फ एक पीडि़ता विजया उस के खिलाफ खुल कर सामने आई, जो जबलपुर मैडिकल कालेज में नर्स है. हैरानी की बात यह है कि उस ने विजया से शादी मृणालिनी को चूना लगाने के बाद बीते 12 नवंबर को भोपाल के आर्यसमाज मंदिर में की थी. शादी के 2-4 दिनों बाद उस ने विजया को समझाबुझा कर या कहें बेवकूफ बना कर इस बात पर राजी कर लिया था कि वह जबलपुर जा कर नौकरी करे. फिर कहीं सेटल होने के बारे में सोचेंगे.

मृणालिनी से ठगे पैसों से उस ने भोपाल के ही नेहरूनगर इलाके में एक और फ्लैट खरीदा था और साथ ही एक पुरानी कार भी खरीद ली थी. इस के बाद भी उस के पास पैसे बच गए थे, जिन से रंगीनमिजाज ठग राम नायडू सीधा बैंकाक जा पहुंचा, जहां वह एक होटल में ठहरा. इस के लिए उस ने जेल से छूटते ही मामा के घर के पते पर पासपोर्ट बनवा लिया था. बैंकाक में उस ने एक कालगर्ल बुक कर रखी थी. यानी शादी की मृणालिनी और विजया सरीखी दर्जनों लड़कियों से और हनीमून मनाने गया विदेश कालगर्ल के साथ.

पूरी तरह फंसने और पुराने पाप उजागर होने के बाद भी राम नायडू ने पूरी बेशर्मी से स्वीकारा कि वह अखबार में वैवाहिक विज्ञापन देख कर शादी का प्रस्ताव भेजता था, शिकार फांसता था, शादी करता था और पत्नियों से शारीरिक संबंध भी बनाता था. भले ही वे इस से मुकरती रहें. उस ने एक अजीब बात और भी मानी कि उस ने भले ही कई शादियां कीं, पर विजया आज भी उस का सच्चा प्यार है. उस से उस की मुलाकात जबलपुर में उस वक्त हुई थी, जब उस का एक दोस्त वहां इलाज के लिए भर्ती था.

कई पत्नियों वाले इस राम का लंबा नपना तय है, क्योंकि उस के खिलाफ पुलिस तमाम पुख्ता सबूत हासिल कर चुकी है. दाद देनी होगी मृणालिनी की हिम्मत की, जिस ने लोकलाज की परवाह न कर के पहल की. नहीं तो यह अय्याश ठग न जाने और कितनी लड़कियों की जिंदगी से खिलवाड़ कर के उन के पैसे लूटता रहता.

देश भर में उम्रदराज लड़कियां तख्तियां हाथ में लटका कर नारे लगा रही हैं कि अकेले हैं पर कमजोर नहीं. उन्हें एक दफा राम नायडू की अय्याशी से सबक लेना चाहिए, वजह उस ने जाने कितनी अधेड़ अविवाहित महिलाओं की इज्जत और जज्बातों से खिलवाड़ कर के उन का पैसा लूटा है. इस मामले से यह भी साबित होता है कि अकेली रह रही उम्रदराज लड़की भावनात्मक रूप से कमजोर होती ही है, जिस का फायदा राम नायडू जैसे ठग आसानी से उठा लेते हैं. Hindi Crime Story

—कथा में लड़कियों के

UP Crime: काली कमाई का कुबेर – यादव सिंह

UP Crime: भ्रष्टाचार की गटरगंगा में मछलियां भी पलती हैं और मगरमच्छ भी. सैकड़ों करोड़ कमाने वाला नोएडा अथौरिटी का चीफ इंजीनियर यादव सिंह॒ऐसा मगरमच्छ था, जिस ने छोटी मछलियों को पनपने भी दिया तो अपने स्वार्थों की खातिर. उस के खिलाफ बारबार जांच हुई लेकिन नतीजा कोई नहीं निकला. आखिर सीबीआई ने इस मगरमच्छ को धर ही दबोचा. दे श की राजधानी दिल्ली के बिलकुल पास स्थित उद्योगों व कौरपोरेट जगत में विश्वस्तरीय पहचान बना चुके नोएडा में छोटेबड़े रईसों की कोई कमी नहीं है.

यहां के विभिन्न सैक्टरों में यूं तो एक से बढ़ कर एक कोठिया बनी हैं, लेकिन सैक्टर-51 स्थित एक बंगलेनुमा कोठी नंबर ए-10 पिछले कुछ समय से खासी चर्चाओं में थी. यह कोठी खास महज इसलिए नहीं थी कि उस की 3 मंजिला बनावट जुदा थी, बल्कि इसलिए कि वह उत्तर प्रदेश सरकार के एक ऐसे अफसर की कोठी थी, जिसे सारा देश उस के कारनामों के लिए जान गया था. आसपास रहने वाले लोग तो चर्चा करते ही थे, उधर से गुजरने वाले लोग भी इस कोठी को अलग नजरिए से देखते थे. पहले वहां पर लालनीली बत्ती वाली गाडि़यों का खूब आवागमन रहता था. इस के बावजूद कम लोग ही कोठी के अंदर जा पाते थे. तगड़ी कदकाठी वाला कोठी का मालिक पूरे रुआब से रहता था. वह आसपास के लोगों से बात तक नहीं करता था.

लेकिन पिछले चंद महीनों में इस कोठी की रौनक जाती रही. लग्जरी गाडि़यां तो दूर गिनेचुने लोग ही वहां आतेजाते थे. लोगों का ध्यान भी इस कोठी की तरफ से हटना शुरू हो गया था, लेकिन 3 फरवरी, 2016 को न सिर्फ कोठी, बल्कि उस का मालिक भी एक बार फिर चर्चाओं में आ गया. इस की वजह यह थी कि कोठी के मालिक को देश की सब से बड़ी जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो औफ इन्वैस्टीगेशन (सीबीआई) ने गिरफ्तार कर लिया था.

गिरफ्तार किए गए शख्स का नाम था यादव सिंह. नोएडा/ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रैसवे अथौरिटी का सस्पैंड चीफ इंजीनियर. वह सरकारी तंत्र का इतना बड़ा भ्रष्ट अफसर था कि उस के कारनामों ने बड़ेबड़े घपलों को भी मात दे दी थी. उस का रसूख और हैसियत ऐसी थी कि आला दर्जे के अधिकारी भी उस से एक मिनट की मुलाकात के लिए तरसते थे. क्या नेता, क्या अधिकारी सब उस के आगेपीछे घूमते थे. यूं तो वह आरोपों और जांच के दायरे में कई बार घिरा, लेकिन उस की पकड़ इतनी मजबूत थी कि कभी उस का बाल भी बांका नहीं हो सका. वह जिसे चाहता था, अपनी अंगुलियों पर नचा देता था. लेकिन वक्त ने उस के रसूख को भी लील लिया.

सीबीआई की एंटीकरैप्शन व एसटीएफ विंग ने यादव सिंह को पूछताछ के लिए अपने लोधी रोड, दिल्ली स्थित हैड क्वार्टर बुलवाया, जहां पूछताछ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पहले से ही सुर्खियों में रहे यादव सिंह के खिलाफ यह बहुत बड़ी काररवाई थी. अगले दिन सीबीआई टीम यादव को ले कर गाजियाबाद स्थित सीबीआई कोर्ट पहुंची तो वहां पहले से मीडियाकर्मियों की भारी भीड़ थी. यादव सिंह का सीबीआई की गिरफ्त में होना ही बड़ी खबर थी.

यादव सिंह सीबीआई की सफेद रंग की टवेरा कार से नीचे उतरा तो लोग उसे सही ढंग से देख पाए. वह काली पैंट, व्हाइट जैकेट और नीली कैप लगाए हुए था. वक्त की चाल का शिकार हुए यादव सिंह की हालत हारे हुए जुआरी जैसी थी. गहमागहमी के बीच सीबीआई ने उसे विशेष जज जे. श्रीदेवी की अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 10 दिनों का रिमांड मांगा. प्राथमिक चार्जशीट के अध्ययन और कुछ देर चली सुनवाई के बाद अदालत ने उसे 6 दिनों के रिमांड पर सीबीआई को सौंप दिया. रिमांड स्वीकृत होते ही टीम उसे ले कर दिल्ली के लिए रवाना हो गई.

काली कमाई से हजारों करोड़ का साम्राज्य खड़ा करने वाला यादव सिंह सीबीआई के शिकंजे में कैसे आया? एक मामूली इंजीनियर अरबपति कैसे बन गया? इस के पीछे भी एक कहानी थी. यादव सिंह मूलत: आगरा का रहने वाला था. मत्त्वकांक्षी यादव सिंह की परवरिश गरीबी में हुई थी. उस का ख्वाब था कि वह बड़ा आदमी बने. इतना बड़ा कि गरीबी उस के आसपास भी न मंडरा सके. उस ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया. इस के बाद सन 1980 में उस की नौकरी नोएडा आथौरिटी में लग गई.

इंसान जितना महत्त्वाकांक्षी होता है, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उस का दिमाग उतना ही तेज चलता है. यादव सिंह के कई साल नौकरी में बीत गए. इस बीच उस ने न सिर्फ अपने काम, बल्कि अथौरिटी के पूरे संचालन को अच्छी तरह से समझ लिया. सरकारी सिस्टम की उन बारीकियों को उस ने बारीकी से समझा, जहां अतिरिक्त आय के स्रोत थे. बात सिर्फ इतनी नहीं थी. उस ने यह भी जान लिया था कि सरकारी तंत्र राजनीतिज्ञों के इशारों के गुलाम होते हैं. नौकरशाह का रसूख ऊपर तक हो तो वह खुल कर खेल सकता है. यादव सिंह इसी राह पर चला और छुटभैये नेताओं से शुरू हुआ उस का सफर एक दिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सत्ता के गलियारों तक जा पहुंचा.

इस का उसे फायदा तब मिला जब सन 1995 में एक दर्जन से ज्यादा इंजीनियरों को नजरअंदाज कर के उसे प्रोजैक्ट इंजीनियर के पद पर प्रमोशन दे दिया गया. यादव सिंह के पास इस पद के हिसाब से डिग्री नहीं थी, लेकिन राजनीतिज्ञों के संरक्षण की वजह से उसे डिग्री हासिल करने के लिए 3 साल का समय दिया गया. बिलकुल उसी तरह जैसे किसी को लाइसेंस देने से पहले ही बंदूक दे दी जाए. इस के बाद यादव सिंह खुल कर खेला. बाद में उस ने डिग्री भी हासिल कर ली.

तनख्वाह भले ही सीमित थी, पर यादव सिंह के ठाठबाट देखते ही बनते थे. उस की किस्मत तब और भी जोरों से जागी, जब सन 2002 में उसे चीफ मैंटीनेंश इंजीनियर के पद पर तैनात किया गया. अथौरिटी में यह बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा पद था. अगले 9 सालों में यादव सिंह ने अपने नेटवर्क को भी मजबूत बनाया और मनमानी दौलत भी एकत्र की. आलम यह था कि यादव सिंह ने नोएडा के ही सैक्टर-51 और सैक्टर-24 में 2 आलीशान कोठियां  खड़ी कर ली थीं. इस के अलावा उस ने अपने परिवार के लिए आगरा में भी देवरी रोड पर बड़ी सी भव्य कोठी बनवा दी थी. इस कोठी में उस के बड़े भाई कपूर सिंह और उन का परिवार रहता था. यह आर्थिक हैसियत सिर्फ प्रत्यक्ष थी, जबकि वास्तव में हकीकत और भी बड़ी थी.

वक्त यादव सिंह का साथ दे रहा था. वह जैसा चाहता था, ठीक वैसा ही होता था. उन दिनों प्रदेश में बसपा की मायावती सरकार थी. यादव सिंह सरकार में मजबूत पकड़ बना चुका था. वह मुख्यमंत्री मायावती तक अपनी पहुंच बताता था. अथौरिटी में चीफ मैंटीनेंस इंजीनियर के और भी पद थे, पर उस ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर के सभी पद न केवल खत्म करा दिए, बल्कि अपने लिए इंजीनियर इन चीफ का पद सृजित करा लिया. यादव सिंह के पास दौलत, ताकत और पहुंच सभी कुछ॒था. आला अधिकारियों से ले कर राजनैतिक आकाओं की उस पर नजरें इनायत थीं.

यादव सिंह को किसी ने कहा कि अगर वह तिलक लगाए और सोना पहने तो समृद्धि और भी बढ़ जाएगी. उस ने ऐसा ही किया. उस के माथे पर तिलक के साथ गले में सोने की चेन और हाथों की अंगुलियों में हीरे जडि़त सोने की कई अंगूठियां दमकने लगीं. सिस्टम पर पकड़ होने की वजह से बसपा सरकार में यादव सिंह की तूती बोलती थी. विरोधी सहकर्मियों ने उसे हटाने के लिए एक बार प्लानिंग भी की, लेकिन यादव सिंह सब पर भारी पड़ा और अपनी ताकत से विरोधियों को आईना दिखा दिया. वे लोग पद पर होते हुए भी काम के लिए तरस गए. यादव सिंह के परिवार में उस की पत्नी कुसुमलता के अलावा बेटा सन्नी और 2 बेटियां थीं करुणा और गरिमा.

सन 2011 से यादव सिंह के खिलाफ घोटाले की आवाज उठनी शुरू हुई. बाद में नवंबर महीने में बीजेपी सांसद किरीट सोमैया ने यादव सिंह के खिलाफ 950 करोड़ का घोटाला उजागर किया. यह बात अलग थी कि यादव सिंह पर तत्काल इस का कोई असर नहीं हुआ. यादव सिंह का सफर बहुजन समाज पार्टी की मायावती सरकार से शुरू हो कर  सन 2012 में समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार तक आ गया था. अखिलेश सरकार आई तो यादव सिंह पर शिकंजा कसने की तैयारी की गई. 950 करोड़ के टेंडर घोटाले में अथौरिटी के चीफ इंजीनियर के खिलाफ 13 जून, 2012 को थाना सैक्टर-39 में विभिनन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस बार यादव सिंह को सस्पैंड कर दिया गया.

विरोधी खुश हुए कि यादव सिंह अब लपेटे में आ जाएगा, क्योंकि मामला काफी बड़ा था. लेकिन यह विरोधियों की सोच थी. उन की खुशफहमी को तब झटका लगा, जब यादव सिंह ने अपने दिमागी गणित का फार्मूला मौजूदा सरकार में भी चला दिया. सस्पैंड होने के बावजूद अथौरिटी में यादव सिंह का हस्तक्षेप बराबर बना रहा. बड़े आवंटनों में यादव सिंह की सहमति ली जाती थी. इस रसूख का नतीजा यह निकला कि नोएडा पुलिस ने यादव सिंह को इस मामले में क्लिनचिट दे दी और अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी.

फिर कभी इस घोटाले पर सवाल खड़ा न हो, इसलिए इस मामले की सीबीसीआईडी जांच भी हुई, लेकिन यादव सिंह इस में भी बच गया. कुछ महीनों की गर्दिशों के बाद यादव सिंह को न केवल बहाल कर दिया गया, बल्कि प्रमोशन भी मिला. उसे यमुना एक्सप्रेस वे अथौरिटी का चीफ इंजीनियर बना दिया गया. एक बार फिर यादव सिंह को पंख लगे. वह अपने रसूख को बरकरार रख कर मजे से नौकरी करने लगा. इस के बाद एक तरह से उस की ताकत और भी बढ़ गई थी. अब उस का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था. यादव सिंह औडी जैसी महंगी लग्जरी गाडि़या रखता था. लेकिन वह अपनी कारों पर सरकारी ड्राइवर नहीं रखता था.

यादव सिंह के रसूख का आलम यह था कि उस से मिलने के लिए लोग तरसते थे. वह कहीं किसी फंक्शन में जाता था तो बड़े अफसर और नेता उस के इर्दगिर्द मंडराते नजर आते थे. यादव सिंह का व्यवहार आला दर्जे के अधिकारी जैसा होता था. फंक्शन किसी का भी हो, लेकिन सारी रौनक यादव सिंह पर आ कर सिमट जाती थी. औफिस आने वाले बड़े बिल्डर और ठेकेदार सब से पहले यादव सिंह को खुश करते थे. अथौरिटी में वही होता था, जो यादव सिंह चाहता था. उस की मर्जी के बिना न कोई ठेका दे सकता था और न ही कोई छोटेबड़े आवंटन हो सकते थे. उस की खुशी और अनुमति दोनों के ही मायने होते थे. सरकारी लोगों को वह अपनी निजी जिंदगी से दूर ही रखता था.

यादव सिंह की दौलत पर किसी को कोई शक नहीं था, लेकिन उस की दौलत का दायरा कितना था, यह कोई नहीं जानता था. इस की भी वजह थी, क्योंकि मोटी डील वह अपने घर और होटलों में करता था. किसी की आर्थिक हैसियत का अंदाजा 2 तरीकों से ही होता है. पहला वह खुद जम कर उस का प्रदर्शन करे या फिर कोई दूसरा मय तथ्यों के उस का खुलासा कर दे. यादव सिंह के मामले में वक्त के साथ दूसरा तरीका अपनाया गया.

वह अकूत दौलत का मालिक है, यह बात 17 नवंबर, 2014 को तब पता चली, जब आयकर महानिदेशक (जांच) कृष्णा सैनी के निर्देश पर आयकर निदेशक (जांच) अशोक कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में आयकर विभाग की कई टीमों ने उस की नोएडा वाली कोठी सहित उस के कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की. इस से उन लोगों की गलतफहमी तो दूर हुई ही, जो उन्हें छोटामोटा अमीर समझते थे, आयकर विभाग भी बुरी तरह चौंक गया. 2 दिनों तक चली इस छापेमारी में यादव सिंह की करोड़ों की संपत्ति पकड़ में आई. प्रौपर्टी के कागजात व अन्य दस्तावेज कई सूटकेसों में भरे हुए थे. कोठी के बाहर खड़ी सफेद रंग की औडी कार की डिग्गी से ही 10 करोड़ रुपए नगद बरामद हुए.

घर में रखी तिजोरियों और अलमारियों को खंगालने के साथ ही आयकर विभाग ने उन के कई बैंकों के लौकर भी खंगाले और वहां से संपत्तियों के पेपर्स के साथसाथ करीब 2 करोड़ रुपए के आभूषण बरामद किए. इन आभूषणों में 9 लखा हार, हीरे के कई सैट, हीरे जड़ाऊ कंगन और गहनों के गिफ्ट आदि थे. घर में ही गहनों का मिनी शोरूम बना था. उस के परिवार और नजदीकियों के नाम करोड़ों की संपत्तियां थीं.

यह बड़ी काररवाई थी. इस से यादव सिंह छटपटा गया. इस के चलते ही यह राज भी खुल गया कि यादव सिंह ने अपनी पत्नी को तलाक दे रखा था. इस की वजह भी पता चल गई. दरअसल यादव सिंह ने पत्नी व बच्चों के नाम पर कारोबारी घरानों के साथ मिल कर 30 से ज्यादा कपंनियां खड़ी कर दी थीं. इन कंपनियों में कुसुम गारमेंट्स प्रा.लि., न्यू एरा सौफ्टवेयर, चाहत टैक्नौलोजी प्रा.लि., केएस अल्ट्राटैक प्रा.लि., क्विक इन्फौटैक सौल्यूशन प्रा.लि. व हिचकी क्रियेशंस प्रा.लि. प्रमुख थीं.

खास बात यह थी कि महज कुछ हजार से शुरू होने वाली ये कंपनियां कुछ ही दिनों में करोड़ों के टर्नओवर तक पहुंच गई थीं. बताते हैं कि यादव सिंह ब्लैकमनी को कंपनियों में लगा कर उसे व्हाइट मनी बनाना चाहता था. वैसे यादव सिंह खुद इन कंपनियों के मालिक नहीं था. इन कंपनियों को उस ने सन    2006 से ही खड़ा करना  शुरू कर दिया.

एक तरफ की काली कमाई दूसरी तरफ जा रही थी. कंपनियों में नोट गिनने की मशीनें थीं. करोड़ों रुपयों की शिफ्टिंग में निजी सुरक्षाकर्मियों का सहारा लिया जाता था. बात यहीं खत्म नहीं हुई. यादव सिंह के यहां से छापे में मिले आभूषणों के आंकलन और परख के लिए सर्राफों को बुलाया गया. आभूषणों को देख कर सर्राफों को भी पसीने आ गए, क्योंकि सभी जेवरात न केवल महंगे थे, बल्कि सौ फीसदी खरे थे. यादव सिंह भ्रष्ष्टाचार का मगरमच्छ बन कर सामने आया था. अपने पद पर रहते हुए उस ने अपने नाते रिश्तेदारों को धड़ाधड़ महंगे प्लाट आवंटित किए थे.

आयकर विभाग ने यादव सिंह का पासपोर्ट भी जब्त कर लिया था. इस सब के बावजूद यादव सिंह बेफिक्र था. इस की वजह थी उन की सियासी पकड़ और पहुंच. चर्चा होने लगी थी कि यादव सिंह आयकर विभाग को टैक्स चुका कर पाकसाफ बच जाएगा. क्योंकि आयकर विभाग को बरामद संपत्तियों, नगदी पर टैक्स से मतलब होता है. बहरहाल, आयकर विभाग ने अपनी जांच जारी रखी. इसी जांच में पता चला कि यादव सिंह के परिवार के नाम जो कंपनियां थीं, उन का लेनदेन विदेशों में भी था. प्रवर्तन निदेशालय को इस से अवगत करा दिया गया. इसी बीच यादव सिंह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भ्रष्टाचार के मामलों को ले कर बनाए गए विशेष जांच दल (एसआईटी) के रडार पर वह आ गया. एसआईटी ने इस मामले को संज्ञान में ले कर काररवाई शुरू कर दी.

यादव सिंह के खिलाफ सरकार ने तत्काल कोई काररवाई नहीं की थी. इस पर राजनीतिक दलों ने घेराबंदी शुरू की. जब सरकार पर सवाल उठने लगे तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साफ किया कि आयकर विभाग और अन्य एजेंसियों की जांच रिपोर्ट आने के बाद सरकार यादव सिंह के खिलाफ कोई काररवाई करेगी. आखिर 8 दिसंबर को यादव सिंह समेत 3 लोगों को सस्पैंड कर दिया गया. यादव सिंह यह सोच कर बेफिक्र था कि इस बार भी वह पुराने फार्मूले अपना कर बच जाएगा.

लेकिन यादव सिंह का समय अनुकूल नहीं था. फिर भी उसे अपनी पहुंच और रसूख पर पूरा भरोसा था. उसे पूरी उम्मीद थी कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. लेकिन यादव सिंह के सितारे गर्दिश में थे. शायद उस का बिगड़ा खेल बन भी जाता, लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश के चर्चित सीनियर आईपीएस अमिताभ ठाकुर की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता डा. नूतन ठाकुर ने 11 दिसंबर को हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दी.

उन्होंने तर्क दिया कि यादव सिंह के यहां आयकर छापों में करोड़ों की अवैध संपत्ति के सुबूत मिले हैं. इसलिए उस के खिलाफ सीबीआई जांच होनी चाहिए. अदालत ने 16 दिसंबर को सरकार से जवाब तलब किया तो सरकार ने इसी बीच 10 फरवरी को यादव सिंह के खिलाफ जांच करने के लिए रिटायर्ड जस्टिस अमरनाथ वर्मा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग गठित कर दिया.

बाद में हुई सुनवाई में याची ने अदालत में तर्क दिया कि राज्य सरकार ने काररवाई करने के बजाय न्यायिक आयोग बना दिया. ऐसा इसलिए किया गया, ताकि सूबे में पूर्व और मौजूदा सरकारों में ऊंची पहुंच रखने वाले यादव सिंह के मामले को रफादफा किया जा सके. आरोप लगाया गया कि सन 2002 से 2014 के बीच यादव सिंह करीब 2 हजार करोड़ की परियोजनाओं से ने बड़ी तादाद में अवैध संपत्ति अर्जित की. याची सीधे तौर पर सीबीआई जांच की मांग की.

इस पर कोर्ट ने एसआईटी से भी जानकारियां हासिल कीं. कई सुनवाइयों के बाद आखिर 16 जुलाई, 2015 की हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के मुख्य न्यायमूर्ति डा. धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति नारायण शुक्ल की खंडपीठ ने सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. हाईकोर्ट ने कहा कि ‘हमारे मतानुसार इस मामले के हालात सीबीआई के सुपुर्द करने लायक हैं. क्योंकि इस में भ्रष्टाचार का मामला बनता है.’ अदालत के हस्तक्षेप के बाद यादव सिंह की बचाव की तैयारियां धरी की धरी रह गई. उस के लिए यह बड़ी मुसीबत थी. इस बुरे वक्त में उस के नातेरिश्तेदारों से ले कर बड़े घरानों और नेताओं ने भी पल्ला झाड़ लिया था. वजह यह थी कि कोई भी जांच के लपेटे में नहीं आना चाहता था.

इस दौरान वह खुद भी सामने नहीं आया. आखिर हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने इस मामले में 30 जुलाई, 2015 को यादव सिंह व उस के साथियों के खिलाफ धारा 120बी, 409, 420, 466, 467, 469, 471 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. इस पूरे प्रकरण की जांच का जिम्मा एसटीएफ व एंटी करैप्शन विंग के सुपुर्द कर दिया गया. सीबीआई जानती थी कि यादव सिंह बड़ा खिलाड़ी है. इसलिए वह उसे बचने का कोई मौका नहीं देना चाहती थी.

4 अगस्त, 2015 को सीबीआई की टीमों ने एक साथ दिल्ली, आगरा, नोएडा व फिरोजाबाद समेत 12 स्थानों पर छापेमारी की और यादव सिंह की 38 प्रौपर्टी का पता लगाने के साथ ही महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद कर लिए. सीबीआई की 14 सदस्यीय टीम ने यादव सिंह की कोठी में घंटों जांचपड़ताल की. आयकर विभाग ने भी सबूत एकत्र किए. अगले कुछ महीनों में जांच में जुटी सीबीआई ने धीरेधीरे टेंडर व जमीनों के आवंटन से जुड़ी 3 हजार फाइलों का जखीरा एकत्र कर लिया. सीबीआई ने इस दौरान कई बार नोएडा अथौरिटी जा कर जांच की और टेंडर से जुड़ी मूल पत्रावलियों को जब्त किया.

यादव सिंह ने सन 2002 से ले कर 1 दिसंबर, 2014 तक विभिन्न कार्यों के हजारों करोड़ रुपए के टेंडर जारी किए थे. सन 2014 में तो महज 8 दिनों के भीतर उस ने 950 करोड़ रुपए के ठेके बांट दिए थे. यह भी साफ हो गया कि यादव सिंह के पास आय से अधिक संपत्ति है. सीबीआई ने इस की भी जांच की कि 950 करोड़ के बड़े घोटाले में आखिर यादव सिंह बच कैसे गया? इस की नए सिरे से जांच हुई. सीबीआई ने बिल्डरों के ठिकानों पर छापेमारी की और दस्तावेज बरामद किए. इस में खुलासा हुआ कि यादव सिंह ने 5 फीसदी कमीशन के बदले टेंडर बांटे थे. 17 दिसंबर को सीबीआई ने नोएडा के सहायक परियोजना अभियंता रामेंद्र को गिरफ्तार कर लिया. उस से कड़ी पूछताछ के बाद सुबूत जुटाए और उसे जेल भेज दिया गया.

इस बीच अथौरिटी से पता किया गया कि यादव सिंह को तैनाती के बाद से कुल कितना वेतन मिला. पता चला कि सैकड़ों करोड़ की प्रौपर्टी जुटाने वाले यादव सिंह को सन 1980 से निलंबन तक की अवधि में वेतन के रूप में 70 लाख रुपए दिए गए थे. सैकड़ों पत्रावलियों और छापेमारी में बरामद दस्तावेजों की जांच में भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत मिले. जांच टीम ने सीबीआई के डायरेक्टर अनिल कुमार सिन्हा से विचारविमर्श के बाद यादव सिंह को गिरफ्तार करने का फैसला किया. आखिरकार सीबीआई ने 3 फरवरी को यादव सिंह को अपने हैड क्वार्टर बुला कर गिरफ्तार कर लिया.

रिमांड अवधि पूरी होने पर सीबीआई ने यादव सिंह को पुन: अदालत में पेश किया और 5 दिनों का रिमांड और ले लिया. यादव सिंह जांच में सहयोग नहीं कर रहा था. फलस्वरूप सीबीआई को उस की रिमांड अवधि बढ़वानी पड़ी. 17 फरवरी को उसे पुन: अदालत पर पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. फिलहाल वह जेल में है. कथा जांच एजेंसियों की काररवाई व जनचर्चाओं पर आधारित. UP Crime

 

Hindi Stories: एक अनूठी प्रेम कहानी – बाजीराव मस्तानी

Hindi Stories: संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ आई और सफल भी रही. निस्संदेह लोगों ने इस प्रेमकहानी को पसंद किया. लेकिन सच यह है कि बाजीराव और मस्तानी के प्रेम को उस जमाने में कोई समझ नहीं पाया था, इसीलिए उन के अपनों ने ही उन्हें एक नहीं होने दिया. फिर भी ये दोनों पात्र ऐतिहासिक आईने में अमर हैं.

प्रेम कहानियां मानव मन को हमेशा से प्रभावित करती रही हैं. कुछ प्रेम कहानियां तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो कर अमर भी हो गई हैं. लेकिन यह दुख की ही बात है कि मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम और उन की प्रेमिका मस्तानी की अद्भुत प्रेम कथा के बारे में हम उतना नहीं जानते, जितना हमें जानना चाहिए 18वीं सदी के इन ऐतिहासिक पात्रों ने भारत के भाग्य का फैसला किया था.

पेशवा बाजीराव मराठा साम्राज्य के ऐसे नायक थे, जिन्होंने अपने बहुत कम समय के शासनकाल में मराठा साम्राज्य को महाराष्ट्र की सीमा से निकाल कर पूरे हिंदुस्तान में फैला दिया था. इस अजेय योद्धा के रणकौशल और वीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 39 साल की उम्र में 41 युद्ध लड़े और किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए. बाजीराव की बहादुरी को देखते हुए उन्हें ‘इंडियन नेपोलियन’ कहना गलत नहीं होगा. वैसे नेपोलियन कई युद्धों में पराजित हुआ था, लेकिन बाजीराव प्रथम हमेशा अजेय रहे.

सन 1720 में मुगल सम्राट औरंगजेब की मौत के बाद उत्तर भारत में ही नहीं दक्खिन में भी राजनीतिक शून्यता का आलम छा गया था, जिसे पेशवा बाजीराव ने एक झटके में दूर कर के दिल्ली पर मराठों का कब्जा कायम कर दिया था. मुगल सम्राट और सूबेदार जिन्हें अपनी बारूदी ताकत पर नाज था, बाजीराव प्रथम के रहमोकरम पर जीने को मजबूर हो गए थे.

मस्तानी के प्रेम में व्याकुल रहे बाजीराव इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने अपने प्रेम को पवित्र रखा, उसे कभी वासना में नहीं डूबने दिया. वह ऐसा दौर था, जब ज्यादातर राजा, नवाब, रासरंग में डूब कर रंगरेलियां मनाने में व्यस्त रहते थे, लेकिन बाजीराव के लिए उन की प्रेमिका मस्तानी कभी भी उन की कमजोरी नहीं बनीं, बल्कि उन के अदम्य साहस, पराक्रम में पलपल की हमसफर और प्रेरणास्रोत रहीं.

बाजीराव और मस्तानी की प्रेम कहानी जानने से पहले हमें उन के बारे में जान लेना चाहिए. बाजीराव प्रथम चितपावन ब्राह्मण कुल के पराक्रमी योद्धा थे, जिन्होंने अपनी वंश परंपरा की उपलब्धियों में चार चांद लगा दिए थे. सन 1707 के बाद छत्रपति मराठा सम्राट की हैसियत दिनोंदिन गिरती जा रही थी. तभी अष्टप्रधान मंत्रिमंडल के प्रधानमंत्री पेशवा सत्ता के सिरमौर बन गए. शिवाजी ने जिस मराठा स्वराज की नींव रखी थी, उन के बाद उन के उत्तराधिकारी उतने योग्य साबित नहीं हो सके. जबकि पेशवाओं ने इन कमियों को अपनी काबिलियत बना लिया था.

बालाजी विश्वनाथ ने जो सपना देखा था, उसे उन के योग्य पुत्र बाजीराव ने तूफान की गति से पूरा कर दिखाया. जब मुगल सत्ता पतन पर थी, तभी सन 1720 में बाजीराव प्रथम ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली. उस समय की स्थिति को देखसमझ कर उन्होंने घोषणा कर दी कि मुगल वृक्ष अब पतन की ओर है, इस की शाखाओं को काटने के बजाय इस की जड़ों पर प्रहार कर के पूरे वृक्ष को ही उखाड़ फेंका जाए तो बेहतर होगा.

इस के बाद मराठा जांबाज सेनापतियों की सैनिक टुकडि़यों ने पूरे उत्तर भारत को रौंदना शुरू कर दिया. मराठा सैनिकों के घोड़ों के टापों से सुदूर उत्तर भारत की रियासतें धूल के गुबार से ढकती चली गईं. मुगल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला, हैदराबाद के पहले निजाम चिन किलीज खां, और अवध के नवाब ने बाजीराव की फौज को दिल्ली की ओर जाने से रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की कोशिश नाकाम रही. बात तब की है जब उत्तर भारत, खासकर मुगल दरबार, जो उस समय के कमजोर शासक की करतूतों से षड्यंत्रों का अड्डा बना हुआ था, की कमजोरी का फायदा उठा कर मुगल सेनापति अन्य रियासतों पर कब्जा करने के मंसूबे पाल रहे थे.

बाजीराव की प्रेमिका मस्तानी को ले कर इतिहास में तरहतरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि मस्तानी छत्रसाल की फारसी बेगम की बेटी थी. कुछ लोग उसे हैदराबाद के नवाब की दरबारी नर्तकी भी मानते हैं. मस्तानी उत्तर मध्यकाल की बहुत ही खूबसूरत शख्सियत थी, जिस की मिसाल कहीं नहीं थी. मस्तानी अपने अद्वितीय सौंदर्य, संगीत और नृत्यकला के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी तीरंदाजी, घुड़सवारी, तलवारबाजी और रणकौशल के लिए भी इतिहास में अमर है. बाजीराव के साथ उस ने तमाम युद्ध अभियानों में अपना पराक्रम दिखाया. युद्ध के मैदान में उस का साहस, वीरता और कौशल बाजीराव जैसा ही था, जो खुद असंभव रणनीति बना कर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में माहिर था.

जाहिर है ऐसी काबिलियत की धनी मस्तानी बाजीराव के दिलोदिमाग में छा गई होगी. पहले परिचय के साथ ही प्रेम की जो कहानी शुरू हुई, वह मरते दम तक जरा भी मंद नहीं पड़ी. दोनों जैसे एकदूसरे को पा कर धन्य हो गए थे. बाजीराव का जीवन युद्धों में बीत रहा था. लेकिन मस्तानी ने महिला हो कर भी उन नाजुक घडि़यों में हमेशा बाजीराव का साथ दिया था. इस प्रेमकथा एक सच यह भी है कि बाजीराव का साथ निभाने के लिए मस्तानी को बहुत कष्ट उठाने पड़े थे.

प्यार अगर सच्चा हो तो उस में कष्ट कोई मायने नहीं रखते. कुछ ऐसी ही बातें बाजीराव और मस्तानी के प्रेम में नजर आती हैं. बारूदों की गंध, तलवारों की टंकारों और खून से लथपथ युद्ध के मैदानों में भी प्रेम की सुकोमल भावनाओं की उपस्थिति सचमुच बहुत विलक्षण लगती है. शायद ऐसे माहौल में भी बाजीराव और मस्तानी कुछ पल निकाल कर एकदूसरे को प्रेमिल सहारा देते थे. मस्तानी ने बाजीराव के सपनों में बाधा खड़ी करने के बजाय मराठा साम्राज्य के चमत्कारिक प्रसार में योगदान किया था. लेकिन 18वीं सदी का रूढि़वादी समाज और शाही सोच प्रेम की भावनाओं को समझने में कतई समर्थ नहीं रहे. इसीलिए उन के रास्तों में लोगों, खासकर करीबी लोगों ने अनगिनत बाधाएं खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

मस्तानी के बारे में एक मान्यता यह भी है कि वह गुजरात के मुगल सूबेदार शुजाअत खां की दरबारी नर्तकी थी. 1724 में जब चिमनाजी अप्पा ने गुजरात पर हमला किया तो वह शुजाअत खां को मार कर मस्तानी को लूट लाया. बाद में मस्तानी को उस ने पेशवा बाजीराव की सेवा में सौंप दिया. गुजराती लोक गीतों में उसे अफगानी गुर्जर नर्तक जाति की माना जाता है. उसे ‘भवन कांचरी’ नृत्यांगना भी कहा जाता है. यहीं से वह छत्रसाल की रक्षा के लिए बाजीराव के साथ बुंदेलखंड गई. जैतपुर के युद्ध में उस के अदम्य साहस से खुश हो कर छत्रसाल ने उसे अपनी बेटी बना लिया था.

दूसरी मान्यता यह है कि मस्तानी राजपूत राजा छत्रसाल की ईरानी बेगम की बेटी थी. बचपन से ही उस ने नृत्य संगीत और शाही जिंदगी के हर रंग और अच्छेबुरे पहलुओं को जिया और सहा. सन 1728 में जब इलाहाबाद के मुगल सूबेदार मुहम्मद खां बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला कर के छत्रसाल के बेटे जगतराज को बंदी बना लिया. इस स्थिति में बुजुर्ग राजपूत शासक ने मुहम्मद खां बंगश के सामने घुटने टेकने के बजाय उसे सबक सिखाने के लिए पेशवा बाजीराव प्रथम को सहायता प्रस्ताव भेजा.

बाजीराव तुरंत अपनी सेना सहित छत्रसाल की मदद के लिए आए और जैतपुर के युद्ध में उन्होंने मुहम्मद खां बंगश को बुरी तरह हरा दिया. इसी युद्ध में पहली बार बाजीराव ने मस्तानी को लड़ते देखा था, उसी समय वह उस के रूपसौंदर्य के साथसाथ उस के हुनर और काबिलियत पर फिदा हो गए थे. पहली नजर का यह प्यार आजीवन चला. छत्रसाल ने झांसी, ओरछा, बांदा की जागीर के साथसाथ बाजीराव के शादी के प्रस्ताव पर अपनी बेटी का हाथ भी उन्हें थमा दिया.

बाजीराव और मस्तानी एकदूसरे पर मर मिटे थे. बाजीराव उसे अपने साथ पूना ले आए, लेकिन मजहब की दीवारों और षड्यंत्रोंकुचक्रों ने उन का जीना मुहाल कर दिया. दोनों का अटूट प्रेम किसी से बरदाश्त नहीं हुआ. सन 1739 में नाना साहेब, चिमना जी अप्पा, राधा देवी और काशीबाई के षड्यंत्र सफल हुए. परिणामस्वरूप पेशवा को युद्ध अभियान में अकेले पूना से बाहर जाना पड़ा. उन की अनुपस्थिति में इन लोगों ने मस्तानी को पूना के पार्वती बाग में कैद कर लिया. बाजीराव इस खबर से भले ही टूट गए, लेकिन मस्तानी ने हिम्मत नहीं हारी.

किसी तरह आजाद हो कर मस्तानी पटास पहुंची. बाजीराव उसे सामने देख कर बहुत खुश हुए. लेकिन यह अंतिम मिलन ज्यादा देर तक नहीं चल सका. मस्तानी के पीछेपीछे पेशवा की मां राधा देवी और पटरानी काशी बाई भी पटास पहुंच गए और बाजीराव प्रथम पर दबाव डालना शुरू किया. एक तरफ मां की डांटफटकार और मराठा साम्राज्य की सौगंध दिलाई जा रही थी तो दूसरी तरफ काशीबाई के अविरल आंसू बाजीराव को धर्मसंकट में डाल रहे थे. भारी मन से बाजीराव ने मस्तानी को खुद से दूर कर के पूना भेज दिया. इस बिछोह का बाजीराव पर गहरा असर पड़ा.

एक ओर युद्ध उन्हें चैन नहीं लेने दे रहे थे, दूसरी ओर परिवार के लोग जिंदगी के खालीपन को बढ़ाने पर आमादा थे. जिन की वजह से बाजीराव को अपनी रूहानी प्रेरणा और ताकत मस्तानी को खुद से अलग करना पड़ा. बाजीराव मस्तानी की प्रेमकहानी ने भारतीय राजनीति को बहुत ही प्रभावित किया है लेकिन दुख की बात यह है कि यह प्रेम कहानी इतिहास के पन्नों में ही दर्ज हो कर खो गई. मस्तानी नफरत की शिकार होती चली गई. पावल में बनी उस की खंडहरनुमा कब्र को देख कर शायद ही कोई विश्वास कर सके कि यहां वह शख्सियत चिर निद्रा में दफन है, जिस की जिंदगी ने हिंदुस्तान के इतिहास की दशा और दिशा को बदल कर रख दिया था.

बाजीराव की मां राधा देवी, पत्नी काशीबाई, भाई चिमनाजी अप्पा और पुत्र अंजाने में इस प्रेम के दुश्मन बन बैठे थे. सच्चा प्यार कभी आसान नहीं होता, इसलिए बाजीराव और मस्तानी ने इस चुनौती को हंसतेहंसते स्वीकार किया था. सभी जानते हैं कि बाजीराव, मस्तानी को बुंदेलखंड से पूना ले आए थे. उस समय पेशवा पूना से और छत्रपति सतारा से अपना काम संभालते थे.

चूंकि मस्तानी की मां छत्रसाल की फारसी मुसलिम बेगम थीं, इसलिए मस्तानी को मराठा समाज कभी स्वीकार नहीं कर पाया. स्वयं बाजीराव का कट्टर ब्राह्मण समाज इस विवाह को मान्यता देने को तैयार नहीं था. बाजीराव के लिए यह स्थिति बहुत कठिन थी. एक ओर घरसमाज का विरोध था, दूसरी ओर मराठा साम्राज्य की पूरी जिम्मेदारी. वह चक्की के 2 पाटों के बीच फंस कर तड़पते रहे. एक तरफ मस्तानी का अनन्य प्रेम था, तो दूसरी ओर मराठा साम्राज्य के सपने थे, जिन्हें पूरा करना उन की सब से बड़ी प्राथमिकता थी. सन 1734 ई में उन्होंने मस्तानी के लिए अलग महल बनवाया. जहां उन्होंने इबादत के लिए मसजिद भी बनवाई थी. यह आज भी देखी जा सकती है.

बाजीराव ने मस्तानी से विवाह कर के उसे ब्याहता पत्नी का सम्मान दिया था. पटरानी चूंकि काशीबाई थी, इसलिए वह अपने ईर्ष्यालु स्वभाव की वजह से बाजीराव के कंधे से कंधा मिला कर साथ नहीं दे पाईं. उस समय समाज को पूरी तरह से दरकिनार करना पेशवा बाजीराव जैसे शक्तिशाली पुरुष के लिए भी संभव नहीं था. अप्रैल 1740 में बाजीराव जब अपने 1 लाख सैनिकों के साथ युद्ध के लिए दिल्ली आ रहे थे तो उन की सेना ने इंदौर के पास खरगोन में पड़ाव डाला. वहीं पर बाजीराव को तेज बुखार आया, जिस की वजह से उन की मृत्यु हो गई. वहीं पर नर्मदा नदी के किनारे उन का अंतिम संस्कार किया गया. बाद में सिंधिया ने वहां उन की याद में छतरी बनवाई.

मातापिता की मौत के बाद शमशेर बहादुर की परवरिश उस की सौतेली मां काशीबाई ने की थी. शमशेर बहादुर ने मराठा साम्राज्य के विस्तार में अपनी वीरता का परिचय भी दिया था. सिर्फ 39 साल की आयु में बाजीराव ने जीवन के सब रंग देख लिए थे. एक तरफ पेशवा के रूप में उन्होंने आकाश की बुलंदियों को छुआ तो दूसरी ओर पारिवारिक अंतर्कलह ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था.

बाजीराव की मौत की खबर को मस्तानी सहन नहीं कर सकी और फिर जल्दी ही उस की भी जीवनलीला समाप्त हो गई. कहा जाता है कि इस दुखद खबर से व्यथित हो कर उस ने हीरा निगल लिया था, जिस से उस की मृत्यु हो गई थी. कुछ इतिहासकार उस की मौत की वजह विषपान मानते हैं. पूना से 65 किलोमीटर दूर पावल में मस्तानी की कब्र आज भी देखी जा सकती है.

इस प्रेम कहानी का दुखद अंत यह साबित करता है कि समाज चाहे कितना भी विकसित हो जाए, लेकिन सोच अथवा नजरिए को बदलने का संघर्ष सभी को करना पड़ता है. योग्यता भी अक्सर दकियानूसी सोच के आगे घुटने टेक देती है. बाजीराव चाहते तो अन्य योद्धाओं की तरह भोगविलास का जीवन व्यतीत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने प्रेम को सम्मान देने की कोशिश की और मरते दम तक इसी संघर्ष में बहादुरी से जूझते रहे.

यह भी दुख की ही बात है कि मस्तानी का चरित्र चित्रण अधूरा है. इतिहास में बहुत कम लोगों ने उस के बारे में लिखा है. उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेज शायद इस घटना को मराठा गौरव के विपरीत मान कर इसे दबाने के लिए मौन रहे, लेकिन इश्क और मुश्क कब छिपे हैं? एक न एक दिन दुनिया उन की हकीकत से रूबरू हो ही जाती है. इसीलिए इतिहास में इन गुम पात्रों को फिल्मी रूपहले परदे पर साकार करने की कोशिशें भी होती रही हैं, लेकिन इस में इतिहास को किस तरह पेश किया जाता है यह अलग विषय है.

यहां काशीबाई के चरित्र की चर्चा किए बगैर यह कहानी अधूरी रहेगी. देखने में तो काशीबाई घोर स्वार्थी और षड्यंत्रकारी लगती थी, लेकिन इस में उस का क्या दोष था? वह बाजीराव की पटरानी थी. पति पर उस का हक था. वह अपने पति के प्रेम को पाने के लिए हमेशा तरसती रही. काशीबाई जिस हक की हकदार थी, वह उसे कभी नहीं मिला.

इसीलिए उस ने जो कुछ भी किया, वह उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल ही था. काशीबाई में मानवीय चरित्र की अनेक कमियां हो सकती हैं, लेकिन यह भी सच है कि उस ने भी बाजीराव को दिल की गहराइयों से चाहा था. लेकिन उस की चाहत की कभी कद्र नहीं हुई. बाजीराव और मस्तानी नायकनायिका बन गए, जबकि काशीबाई खलनायिका बन कर इतिहास के अंधेरों में खो गई. Hindi Stories

Patna News: बुलाया शादी के लिए – मार दी गोली

Patna News: पटना के रहने वाले रजनीश ने शादी डौटकौम पर इंदौर की सृष्टि जैन का प्रोफाइल और फोटो देखा तो उसे मिलने के लिए फ्लाइट का टिकट भेज कर पटना बुला लिया. लेकिन सृष्टि के पटना आने पर ऐसा क्या हुआ कि रजनीश को अपने हाथ उस के खून से रंगने पड़े.

25 जनवरी की सुबह के 10 बज रहे थे. सोमवार का दिन होने की वजह से सड़कों पर कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ थी. पटना के मीठापुर का भी वही हाल था. सड़कों पर भीड़भाड़ की वजह से गाडि़यां सरकसरक कर चल रही थीं. उसी भीड़ में एक औटो भी हौर्न बजाता हुआ आगे निकलने की कोशिश में लगा था. उस में एक लड़की बैठी थी, जो औटो ड्राइवर से बारबार जल्दी से जल्दी पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन पर पहुंचाने को कह रही थी. लेकिन भीड़ की वजह से औटो आगे बढ़ नहीं पा रहा था. औटो में बैठी लड़की कभी अपनी घड़ी देखती तो कभी औटो से सिर बाहर निकाल कर पीछे की ओर देखती.

जैसे ही औटो चाणक्य लौ यूनिवर्सिटी के पास पहुंचा, एक सफेद रंग की बुलेट मोटरसाइकिल पीछे से आ कर औटो के साथसाथ चलने लगी. उस पर 2 युवक सवार थे. उन्हें देख कर लड़की घबरा गई और उस ने ड्राइवर से औटो भगाने को कहा. लेकिन भीड़ की वजह से औटो ड्राइवर औटो भगा नहीं सका. इसी बीच मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे युवक ने पिस्तौल निकाली और औटो में बैठी लड़की को लक्ष्य बना कर 4 गोलियां दाग दीं.

लड़की पर गोलियां दाग कर मोटरसाइकिल सवार जिस तरह पीछे से आराम से आए थे, उसी तरह आराम से आगे बढ़ गए. उन्हें रोकने की कोई हिम्मत भी नहीं कर सका. गोलियां लगने से लड़की चीखी तो औटो ड्राइवर ने औटो रोका और लड़की की मदद करने के बजाय वह औटो ही छोड़ कर भाग गया. गोलियां चलने से बाजार में अफरातफरी मच गई थी. लोग दुकानें बंद करने लगे थे. थोड़ी देर में अफरातफरी थमी तो लोगों को पता चला कि औटो में बैठी लड़की पर गोलियां चलाई गई थीं. वह अभी भी उसी में घायल पड़ी है. कुछ लोगों ने तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

पुलिस को सूचना दी गई. पहले पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, उस के बाद अस्पताल गई. शिनाख्त के लिए लड़की के पर्स और बैग की तलाशी ली गई तो उन में से मिले कागजातों से पता चला कि लड़की का नाम सृष्टि जैन था. वह इंदौर के स्नेहनगर की रहने वाली थी. 23 जनवरी को वह गो एयर की फ्लाइट से दिल्ली से पटना आई थी और मीठापुर के मणि इंटरनेशनल होटल में ठहरी थी. 24 जनवरी को उसे फ्लाइट से दिल्ली जाना था, लेकिन उस ने फ्लाइट का टिकट कैंसिल करा कर 25 जनवरी को पटना से इंदौर जाने के लिए पटनाइंदौर एक्सप्रैस का टिकट करवाया था. 25 जनवरी की सुबह 10 बजे वह होटल छोड़ कर औटो से पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन जा रही थी, तभी रास्ते में उसे गोली मार दी गई थी.

इस के बाद 11 बजे के करीब उस की मां ममता जैन ने सृष्टि के मोबाइल पर फोन कर के पता करना चाहा कि क्या वह ट्रेन में बैठ गई है तो किसी पुलिस वाले ने फोन रिसीव कर के उन्हें बताया कि सृष्टि को गोली मार दी गई है और वह अस्पताल में है. जिस समय सृष्टि को गोली मारी गई थी, औटो ड्राइवर राजकपूर सिंह औटो छोड़ कर भाग गया था. पुलिस ने उस के औटो में लिखे पुलिस कोड जे-647 से उस का मोबाइल नंबर और पता ले कर उसे फोन किया. वह परसा बाजार के पूर्वी रहीमपुर गांव का रहने वाला था. थाने आने पर औटो ड्राइवर राजकपूर सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि लड़की पर गोली चलाए जाने के बाद वह काफी डर गया था.

वह उस लड़की को ले कर स्टेशन जा रहा था, तभी चाणक्य लौ यूनिवर्सिटी के पास बुलेट मोटरसाइकिल से 2 लड़के आए और उन में से पीछे बैठे लड़के ने लड़की को गोली मार दी थी. गोली मार कर वे करबिगहिया की ओर गए थे. पुलिस ने जब सृष्टि के पिता सुशील जैन से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि शादी डौटकौम पर 20 दिनों पहले उन की छोटी बेटी शगुन ने मृतका सृष्टि का प्रोफाइल डाला था. बिहार का कोई लड़का उसे पसंद आ गया था तो वह उसी से मिलने पटना आई थी.

जब सृष्टि की बहन शगुन से पूछताछ की गई तो उस ने बताया था कि शादी डौटकौम पर सृष्टि का प्रोफाइल देख कर पटना के रजनीश की ओर से उस के लिए विवाह का प्रस्ताव आया था. रजनीश सृष्टि को अपने घर वालों से मिलवाना चाहता था, इसीलिए उस ने सृष्टि को पटना बुलवाया था. रजनीश ने ही सृष्टि के लिए फ्लाइट का टिकट भी भेजा था और पटना में ठहरने के लिए होटल का भी इंतजाम किया था. 23 जनवरी की सुबह 11 बज कर 35 मिनट पर वह पटना पहुंची थी और मणि इंटरनेशनल होटल के कमरा नंबर 106 में ठहरी थी.

उसी दिन दोपहर 2 बज कर 10 मिनट पर रजनीश सिंह ने अपने दोस्त राहुल के साथ उसी होटल में कमरा नंबर 107 बुक कराया था. होटल के रजिस्टर में उस ने अपने पिता का नाम राजेश्वर प्रसाद सिंह और पता राघौपुर, जिला वैशाली लिखा था. 24 जनवरी को सभी होटल से निकल गए थे, लेकिन कुछ देर बाद सृष्टि होटल लौट आई थी और इस बार वह कमरा नंबर 103 में ठहरी थी. उस ने होटल मैनेजर को बताया था कि उस का टिकट कंफर्म नहीं हुआ, इसलिए वह वापस आ गई थी.

24 जनवरी को एक बार फिर रजनीश अपने दोस्त राहुल के साथ होटल पहुंचा और सीधे सृष्टि के कमरे में गया. होटल के मैनेजर राजकुमार के अनुसार, इस बार रजनीश सृष्टि के कमरे पर गया तो दोनों के बीच किसी बात को ले कर बहस होने लगी. जल्दी ही इस बहस ने तल्खी का रूप ले लिया. इस कहासुनी में सृष्टि बारबार कह रही थी कि अब वह उस के पीछे नहीं आएगा. जबकि रजनीश उसे धोखेबाज कह रहा था. उस का कहना था कि उस ने उस के 1 लाख रुपए ठग लिए हैं.

रजनीश से मिलने के बाद सृष्टि ने अपने घर वालों को फोन कर के बताया था कि रजनीश उसे ठीक आदमी नहीं लगता. उस के पास पिस्तौल भी है, जिसे ले कर वह घूमता है. वह एयरपोर्ट पर भी पिस्तौल ले कर आया था. वह ऐसे आदमी से कतई विवाह नहीं करेगी, बाकी बातें वह इंदौर लौट कर बताएगी. सृष्टि की मां ममता जैन ने बताया था कि रजनीश ने उन से भी फोन पर मीठीमीठी बातें की थीं. वापस आने के लिए सृष्टि 24 जनवरी को फ्लाइट पकड़ने के लिए एयरपोर्ट पर गई थी, लेकिन फ्लाइट नहीं मिली. इस के बाद उस ने पटनाइंदौर एक्सप्रैस से 25 जनवरी को लौटने का टिकट लिया था.

सृष्टि के पिता सुशील जैन मूलरूप से राजस्थान के उदयपुर के रहने वाले थे. 4 साल पहले ही वह इंदौर आ कर रहने लगे थे. यहां वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी ममता जैन के अलावा 2 बेटियां, बड़ी सृष्टि और छोटी शगुन थी. सृष्टि ने उदयपुर से एमबीए किया था, जबकि शगुन 12वीं में पढ़ रही थी. उन का परिवार इंदौर के स्नेहनगर में रहता था. इस के पहले वह खातीवाला टैंक में अनमोल पैलेस में फ्लैट नंबर 402 में रहते थे. इंदौर की कई कंपनियों में काम करने के बाद सृष्टि दिल्ली में इंडिया बुल्स कंपनी में टीम लीडर के पद पर काम कर रही थी. पिछले महीने उस ने यह नौकरी छोड़ दी थी और दूसरी कंपनी में नौकरी पाने की कोशिश कर रही थी. नौकरी छोड़ने के बाद सृष्टि इंदौर आ कर मांबाप के साथ रह रही थी.

लाश के निरीक्षण के दौरान पुलिस ने देखा था सृष्टि के हाथ पर ‘आर एस’ अक्षर का टैटू बना था, जिस से अंदाजा लगाया कि यह ‘रजनीश सृष्टि’ लिखा है. उस के दूसरे हाथ पर ‘सम लव वन, सम लव यू, आई लव यू, दैट इज यू’ लिखा था. पुलिस ने होटल के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकलवा कर चेक की तो उस में सृष्टि से जुड़ी कई बातें सामने आईं. फ्लाइट न मिलने पर जब वह होटल लौटी तो उस की मुलाकात बंगलुरु के रहने वाले सुरेश रेड्डी से हुई. फुटेज में वह होटल के रिसैप्शन काउंटर के पास वाले सोफे पर रेड्डी के साथ बैठी हुई दिखाई दे रही थी.

सृष्टि ने रेड्डी के साथ सैल्फी लेने की बात कही तो पहले तो उस ने मना कर दिया. बातचीत में सृष्टि ने उसे बताया था कि वह इंदौर से पटना आई है. वह एक मोबाइल फोन खरीदना चाहती है, वह चल कर खरीदवा दे. इस के बाद रेड्डी उसे औटो से बाजार ले गया था. रेड्डी अपनी कंपनी के काम से पिछले 15 दिनों से उस होटल में ठहरा था. फुटेज से यही लगता था कि 24 जनवरी को सृष्टि और रेड्डी की मुलाकात थोड़ी ही देर में दोस्ती में बदल गई थी. होटल से निकलने के बाद उन्होंने 10 हजार रुपए का मोबाइल फोन खरीदा था. मोबाइल का बिल रेड्डी के नाम से बना था. इस के बाद दोनों नाइट शो फिल्म देख कर देर रात होटल लौटे थे. होटल स्टाफ ने भी पुलिस को उन के देर से लौटने की बात बताई थी.

पुलिस सूत्रों के अनुसार, सृष्टि के मोबाइल फोन के मेमोरी कार्ड से पुलिस को कुछ आपत्तिजनक वीडियोज मिले थे, लेकिन पुलिस इस बारे में कुछ नहीं बता रही है. मेमोरी कार्ड से पता चलता है कि सृष्टि विवाहित थी. लेकिन वह औनलाइन साथी की तलाश में थी. रजनीश की तरह सृष्टि ने भी अपने प्रोफाइल में खुद के बारे में गलत जानकारियां दी थीं. सृष्टि के परिवार वालों ने पुलिस को बताया था कि उदयपुर में पढ़ाई के दौरान ही सृष्टि ने प्रेमविवाह कर लिया था, लेकिन वह शादी कुछ समय बाद ही टूट गई थी और सन 2011 में सृष्टि ने अपने पति से तलाक ले लिया था.

सोचने वाली बात यह है कि अगर रजनीश से सृष्टि की पहले से जानपहचान नहीं थी तो किसी अजनबी के बुलाने पर वह इंदौर से पटना कैसे चली गई? रजनीश सृष्टि के पड़ोस वाले कमरे में ही रात में ठहरा था. लेकिन यह बात उस ने अपने घर वालों को नहीं बताई थी. दोनों के बीच कहीं पहले से तो कोई रिश्ता नहीं था? आखिर रजनीश बारबार सृष्टि पर एक लाख रुपए ठगने का आरोप क्यों लगा रहा था? केवल विवाह के प्रस्ताव ठुकराने से कोई किसी लड़की की हत्या क्यों करेगा?

सृष्टि की हत्या के 8 दिनों बाद 2 फरवरी को सृष्टि के हत्यारे रजनीश को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. वह अपनी पत्नी और  दोनों बच्चों के साथ कंकड़बाग में अपने किसी रिश्तेदार के यहां गया था, तभी पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. पुलिस को उस के वहां आने की जानकारी पहले से थी, इसलिए सादे लिबास में वहां पुलिस वालों को तैनात कर दिया गया था. उस के आते ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. वह पटना से हो कर दिल्ली भागने की फिराक में था. पूछताछ में रजनीश ने पुलिस को बताया था कि सृष्टि उसे ब्लैकमेल करने लगी थी. लोगों को ब्लैकमेल करना उस की आदत में शुमार था. इस काम में उस का परिवार भी उस का साथ देता था. पुरुषों को फंसा कर वह रुपए ऐंठती थी. यहां आ कर उस ने उस से गहने खरीदने को कहा था.

सृष्टि के बारबार बदलते बातव्यवहार से ही रजनीश को उस पर शक हो गया था, जिस से उस ने गहने खरीदने से मना कर दिया था, इसी बात से सृष्टि उस से नाराज हो गई और होटल में ही उस से बहस करने लगी, जो जल्दी तल्खी में बदल गई. बात ज्यादा बढ़ी तो वह रजनीश को गालियां देने लगी. इस के बाद सृष्टि ने अपना सामान उठाया और अकेली ही औटो से स्टेशन की ओर चल पड़ी. रजनीश के पास पिस्तौल थी ही, उस ने देखा कि सृष्टि उसे धोखा दे कर जा रही है तो उस ने बुलेट से जा कर रास्ते में उसे गोली मार दी.

राघौपुर के वीरपुर बरारी टोला का रहने वाला रजनीश किसान राजेश्वर प्रसाद सिंह का बेटा है. पुलिस ने उस के गांव वाले घर पर छापा मारा तो वहां से 7.65 बोर की गोलियों के 6 खोखे मिले हैं. रजनीश की 13 साल पहले किरण सिंह से शादी हुई थी. उस के 2 बच्चों में बड़ा बेटा प्रियांशु 12 साल का और छोटा बेटा कुणाल 9 साल का है.  रजनीश की गिरफ्तारी से किरण काफी परेशान है. उस का कहना है कि उस के पति किडनी के मरीज हैं, अगर उन्हें समयसमय पर दवाएं नहीं दी गईं तो उन की जान जा सकती है.

14 दिसंबर, 2007 में किरण ने दिल्ली के अपोलो हौस्पिटल में अपनी किडनी दान की थी. दूसरी किडनी रजनीश के बड़े भाई अनिल ने 4 मार्च, 2015 को दी थी, जिस की वजह से उसे दिन में 3 बार दवा खानी पड़ती है. पीने के लिए उसे मिनरल वाटर दिया जाता है. सृष्टि के पिता का कहना है कि रजनीश पुलिस को बेमतलब की कहानियां गढ़ कर सुना रहा है. हत्या को ले कर भी वह पुलिस को बरगला रहा है. सृष्टि की मां का कहना है कि किसी अनजान लड़की से 5-10 दिनों की बातचीत में रजनीश ने ढाई लाख रुपए से ज्यादा उस पर कैसे और क्यों खर्च कर दिए?

4 जनवरी को सृष्टि की बहन शगुन ने उस की शादी का प्रोफाइल शादी डौटकौम वेबसाइट पर डाला था. उस के 10 दिनों बाद रजनीश की ओर से शादी का प्रस्ताव आया था. रजनीश ने बताया था कि उस के पिता की मोटरसाइकिल की एजेंसी है, जिस का सालाना कारोबार 70-80 लाख रुपए का है. अपने बारे में उस ने बताया था कि वह आईपीएस की तैयारी कर रहा है. उस के इसी प्रोफाइल और प्रस्ताव के बाद ही सृष्टि उस से मिलने पटना आई थी.

पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रजनीश की तरह सृष्टि ने भी शादी के वेबसाइट पर अपने बारे में गलत जानकारियां दे रखी थीं. उस ने पहले विवाह और तलाक के बारे में बिलकुल नहीं बताया था. रजनीश तो गलत था ही, सृष्टि भी अपने बारे में गलत जानकारी दे कर दोबारा शादी की फिराक में थी. पुलिस पूछताछ में रजनीश ने सृष्टि की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. उस ने सृष्टि से हुई जानपहचान के बारे में पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार, उस ने सृष्टि पर काफी रुपए खर्च कर दिए थे. इस के बाद भी वह उस से और कई चीजें खरीदने को कह रही थी. इस से उसे लगा कि यह काफी खर्चीली है. अब तक वह उस से करीब 2 लाख रुपए खर्च करवा चुकी थी.

24 जनवरी को रजनीश ने सृष्टि के पास एक नया मोबाइल फोन देखा, जिस में सृष्टि ने सुरेश रेड्डी के साथ सैल्फी ले रखी थी. वह फोटो देख कर उस के दिल को काफी गहरी ठेस लगी. रजनीश की अपनी पत्नी से बिलकुल नहीं पटती थी, इसीलिए वह दूसरी शादी के बारे में सोच रहा था. पहली नजर में सृष्टि रजनीश को बहुत अच्छी लगी थी, जिस से उस ने उस से विवाह करने का मन बना लिया था. विवाह के बाद वह उस के साथ दिल्ली में रहना चाहता था. लेकिन जब वह उस की ऊलजुलूल मांगों को पूरी नहीं कर सका तो सृष्टि ने उस से विवाह करने से मना कर दिया था.

पुलिस को दिए अपने बयान में रजनीश ने बताया था कि सृष्टि की हत्या कर के वह मीठापुर से सीधा अनीसाबाद होते हुए हाजीपुर चला गया था. रास्ते में महात्मा गांधी पुल से उस ने अपना मोबाइल फोन, टैबलेट और पिस्तौल का लाइसेंस गंगा नदी में फेंक दिया था. इसी के साथ अपनी बुलेट मोटरसाइकिल को नाव पर रख कर गंगा नदी के बीच में डुबो दिया था. इस के बाद वह हाजीपुर, वैशाली और पटना में ठिकाने बदलबदल कर समय गुजारता रहा.

रजनीश के बड़े भाई अनिल सिंह ने पुलिस को दिए बयान में कहा था कि रजनीश की किडनी ट्रांसप्लांट कराई गई है, जिस से वह शारीरिक रूप से काफी कमजोर है. ऐसे में वह किसी की हत्या कैसे कर सकता है? उसे दिन में 4 बार दवाइयां खानी पड़ती हैं और मिनरल वाटर पीना पड़ता है. ट्रांसपोर्टर का कारोबार करने वाले अनिल का कहना है कि तबीयत खराब रहने की वजह से रजनीश गांव पर ही ब्याज पर रुपए देने  का काम करता था. उसे हत्या के इस मामले में फंसाया गया है. बहरहाल, रजनीश पुलिस की गिरफ्त में है और सृष्टि की मौत हो चुकी है. सृष्टि के पिता इस हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं.

पुलिस का कहना है कि रजनीश के तार किडनी बेचने वाले गिरोह से जुड़े हो सकते हैं. शादी के बहाने रजनीश ने अपहरण की नीयत से सृष्टि को पटना बुलाया था, लेकिन उस से बातचीत के बाद सृष्टि को कुछ खतरा महसूस हुआ तो उस ने वापस जाने में ही अपनी भलाई समझी. लेकिन वह लौट नहीं पाई, क्योंकि रजनीश को उस से खतरा था. रजनीश पहले भी एक बच्चे के अपहरण के मामले में जेल जा चुका है. वैशाली के थाना जोरावरपुर में उस पर अपहरण का केस दर्ज है. कुछ दिनों पहले ही वह जमानत पर छूटा था. अगवा किए गए बच्चे का अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है. पुलिस जांच में पता चला है कि बच्चे का अपहरण किडनी निकालने के मकसद से किया गया था.

जांच के बाद पुलिस ने उस का खाता सील कर दिया था, जिस में 90 लाख रुपए जमा थे. उस के घर से फरजी स्टांप और कई सरकारी अफसरों की मुहरें बरामद हुई थीं. रजनीश खुद भी 2 बार किडनी ट्रांसप्लांट करवा चुका है. पुलिस यह पता कर रही है कि जिस डाक्टर ने उस की किडनी ट्रांसप्लांट की थी, कहीं रजनीश उस डाक्टर या अस्पताल के साथ मिल कर किडनी बेचने का रैकेट तो नहीं चला रहा था? पुलिस को जानकारी मिली है कि सृष्टि ने दिल्ली में किसी डाक्टर के यहां भी काम किया था. हो सकता है रजनीश की किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान उन की जानपहचान हुई हो? दोनों के बीच रुपयों को ले कर होटल में हुई बहस कहीं किडनी खरीदबिक्री के रैकेट से तो नहीं जुड़ी थी?

रजनीश भी पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में ही रह रहा था और किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीजों को किडनी मुहैया कराने की दलाली का काम करने लगा था. इस काम से उस ने काफी पैसे कमाए थे. वह जब भी अपने गांव वीरपुर आता था, दोस्तों पर खूब पैसा खर्च करता था. लेकिन सृष्टि के पिता का कहना है कि सृष्टि और रजनीश की पहले से जानपहचान और प्रेम प्रसंग की बात बिलकुल गलत है. एसएसपी मनु महाराज के अनुसार, पुलिस रिकौर्ड के मुताबिक रजनीश का आपराधिक रिकौर्ड रहा है. उस के बीमार और कमजोर होने की वजह से पुलिस उस से फिलहाल सख्ती से पूछताछ नहीं कर पा रही है. Patna News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News: कला का पुजारी, कलाकार का कातिल

Crime News: मौडर्न आर्ट से नाम कमाने वाले चिंतन उपाध्याय ने एक नायक बन कर हेमा हिरानी से प्यार ही नहीं किया, जीवनसाथी भी बनाया. लेकिन जब उन के प्यार में दरार आई तो चिंतन को खलनायक बनते देर नहीं लगी.

21 नवंबर को जयपुर के जवाहर कला केंद्र में जयपुर आर्ट समिट की शुरुआत हुई. समिट के पहले दिन गाय की डमी को एक बैलून के सहारे आसमान में लटकाया गया था. गाय की डमी वाली यह कलाकृति सिद्धार्थ करवाल की थी. जिस समय यह समिट शुरू हुआ था, उस समय देश भर में बीफ को ले कर काफी विवाद चल रहा था. पीपुल फार एनीमल संस्था के संयोजक सूरज सोनी तमाम कार्यकर्ताओं के साथ समिट में पहुंचे और गाय की उस कलाकृति को ले कर हंगामा करने लगे. सूचना मिलने पर थाना बजाजनगर की पुलिस ने वहां जा कर कलाकृति को उतरवा लिया.

पुलिस को हंगामा करने वालों पर काररवाई करनी चाहिए थी, लेकिन पुलिस ने इस के बजाय कलाकारों से ही धक्कामुक्की नहीं की, बल्कि एक कलाकार अनीश अहलूवालिया के तो बाल तक पकड़ कर खींचे. जबकि कलाकार सिद्धार्थ करवाल, जिस की कलाकृति पर यह हंगामा हुआ था, उन का कहना था कि हम ने तो गाय की पीड़ा को दर्शाया है. आज धरती पर गाय को न कच्ची जमीन मुहैया है, न ही चारा. जब तक गाय दूध देती है, तब तक लोग उसे खिलाते हैं, उस के बाद खुला छोड़ देते हैं. हम ने अपनी कलाकृति के माध्यम से यह जताना चाहा है कि अगर यही हालात रहे तो आगे चल कर गाय जमीन छोड़ कर आसमान में रहना पसंद करेगी. हालात बदलने के लिए मैं ने यह बात अपनी कला के माध्यम से कहने की कोशिश की है.

दूसरी ओर पीपुल फौर एनीमल संस्था के संयोजक सूरज सोनी का कहना था कि गाय की डमी को इस तरह आकाश में लटका कर आखिर कलाकार क्या संदेश देना चाहते हैं. इस कृति पर ऐसा कोई स्पष्ट संदेश लिखा भी नहीं गया था. यह जनभावना को आहत करने वाला काम है. गाय को पूजनीय मानने वाला समाज इसे सहन नहीं करेगा. सोनी ने मुख्यमंत्री औफिस को फैक्स भेज कर मामले की जांच की भी मांग की थी.

हंगामे के दौरान कलाकार अनीश अहलूवालिया और चिंतन उपाध्याय ने सिद्धार्थ करवाल की इस कलाकृति को सही ठहराते हुए पुलिस से उलझने की कोशिश की थी. इसलिए पुलिस दोनों कलाकारों को थाने ले गई. लेकिन वहां इन दोनों को यह हिदायत दे कर छोड़ दिया गया कि वे गाय की डमी को दोबारा हवा में नहीं लटकाएंगे. थाना बजाजनगर के थानाप्रभारी महेंद्र कुमार गुप्ता का कहना था कि गाय की डमी उतरवाने के साथ ही विरोध करने वाले शांत हो गए थे. एक तरह से यह विवाद यहीं खत्म हो गया था. बात खत्म हो गई थी सो थाने में कोई मामला भी दर्ज नहीं किया गया. इस के बावजूद यह मामला पूरे देश में मीडिया की सुर्खियां बन गया.

मीडिया द्वारा इस घटना की जानकारी राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को मिली तो उन्होंने ट्वीट कर के कलाकारों के साथ हुई अभद्रता पर दुख जताया. उन्होंने लिखा कि मैं इस घटना से आहत हूं. जयपुर के पुलिस कमिश्नर जंगा श्रीनिवास ने कलाकारों से व्यक्तिगत रूप से बात कर के अभद्रता के लिए माफी मांगी. विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय संयोजक नरपत सिंह ने भी कलाकारों का समर्थन करते हुए कहा कि विरोध का यह तरीका गलत है. विहिप इस विरोध में शामिल नहीं है. कलाकारों से अभद्रता के मामले में थाना बजाजनगर थानाप्रभारी महेंद्र कुमार गुप्ता और कांस्टेबल सुमेर सिंह को लाइन हाजिर कर दिया गया.

यह कहानी ऊपर वाले मामले में विरोधियों का डट कर सामना करने वाले कलाकार चिंतन उपाध्याय की है. उन की आगे की इस कहानी में एक नायिका भी है. वह भी कलाकार है. चिंतन भी मौडर्न आर्ट बनाते हैं और नायिका भी. दोनों की चरचा देश में ही नहीं, विदेशों तक है. चित्र बनातेबनाते ही दोनों के दिल मिल गए. प्यार इतना बढ़ा कि शादी कर ली. लेकिन शादी के बाद धीरेधीरे उन के प्यार का रंग हलका पड़ता गया और आगे चल कर उन की यह प्रेम कहानी खूनी बन गई.

12 दिसंबर को मुंबई के उत्तरी उपनगर कांदीवली की धानुकवाड़ी के एक नाले में गत्ते के डिब्बों में बंद पौलीथिन में लिपटी 2 लाशें मिलीं. नाले में पड़े उन डिब्बों की सूचना किसी सफाई करने वाले ने पुलिस को दी थी. पुलिस ने मौके पर पहुंच कर दोनों लाशें बरामद कीं. इन में एक लाश महिला की थी और दूसरी पुरुष की. लाशों के निरीक्षण में पुलिस को लगा कि दोनों को गला घोंट कर मारा गया है. उस के बाद लाशों को पौलीथिन में लपेट कर डिब्बों में भर कर फेंका गया था. महिला के दोनों हाथ बंधे थे और शरीर पर पूरे कपड़े नहीं थे. वैसी ही हालत पुरुष लाश की भी थी. दोनों लाशें पूरी तरह क्षतविक्षत नहीं हुई थीं, जिस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि  इन की हत्या एक दिन पहले ही हुई है.

अगले दिन यानी 13 दिसंबर को दोनों लाशों की शिनाख्त हो गई. महिला की लाश मशहूर कलाकार चिंतन उपाध्याय की ही तरह प्रसिद्ध कलाकार उन की पत्नी हेमा उपाध्याय की थी, जबकि दूसरी लाश हेमा के वकील हरीश भंबानी की थी. हेमा और हरीश दोनों ही 11 दिसंबर की शाम से लापता थे. हेमा उपाध्याय के घरेलू नौकर हेमंत मंडल ने पुलिस को 11 दिसंबर की शाम को ही हेमा के लापता होने की सूचना दे दी थी. हेमा के घर वालों ने भी उसी दिन पुलिस को उन की गुमशुदगी के बारे में तहरीर दे दी थी. कलाकार हेमा उपाध्याय की लाश मिलने के बाद देश के कला जगत में सनसनी फैल गई थी.

पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या और सबूत मिटाने का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. दोनों लाशों का पोस्टमार्टम करा कर लाशें उन के घर वालों को सौंप दी गई थीं. घर वालों ने उसी दिन यानी 13 दिसंबर को ही उन का अंतिम संस्कार कर दिया था. एक तरफ मृतकों का अंतिम संस्कार हो रहा था तो दूसरी ओर पुलिस ने उन्हें मारने वालों में से 3 लोगों को हिरासत में ले लिया था, जिन के नाम थे, प्रदीप राजभर, विजय राजभर और आजाद राजभर.

इन से की गई पूछताछ के बाद मुंबई पुलिस ने स्पेशल टास्क फोर्स की मदद से उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के थाना बड़ागांव के अंतर्गत आने वाले गांव कविरामपुर से शिवकुमार राजभर उर्फ साधु को गिरफ्तार किया. पुलिस ने गिरफ्तार किए गए लोगों से हेमा और हरीश के कई एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन बरामद कर किए. पुलिस को शुरुआती जांच में ही पता चल गया था कि हेमा उपाध्याय के अपने पति चिंतन उपाध्याय से संबंध अच्छे नहीं थे. पुलिस ने चिंतन उपाध्याय से भी लंबी पूछताछ की थी. लेकिन सबूत न मिलने की वजह से उन्हें छोड़ दिया गया था. जबकि हेमा के घर वालों ने पहले ही चिंतन पर संदेह जताया था. पुलिस ने चिंतन को छोड़ जरूर दिया था, लेकिन चोरीछिपे उन पर नजर रखे हुए थी.

21 दिसंबर की शाम पुलिस ने चिंतन को पूछताछ के लिए एक बार फिर बुलाया. रात भर पूछताछ चलती रही. इस पूछताछ में उस ने जो भी बयान दिया, उन में कुछ बातें विरोधाभासी थीं, जिस के बाद 22 दिसंबर को पुलिस ने उसे भादंवि की धारा 302, 201 एवं 120 के तहत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने चिंतन को उसी दिन अदालत में पेश किया और पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए एक जनवरी, 2016 तक के लिए रिमांड पर ले लिया.

पहले गिरफ्तार किए गए 4 आरोपी भी रिमांड पर चल रहे थे. इन सभी से पूछताछ में मुख्य अभियुक्त के रूप में विद्याधर राजभर उर्फ गोटू का नाम सामने आया. अब पुलिस विद्याधर को पकड़ने की कोशिश करने लगी. लेकिन लाख कोशिश के बाद भी वह पुलिस की पकड़ में नहीं आया. गिरफ्तार लोगों से की गई पूछताछ में इस बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी. हेमा उपाध्याय चिंतन से शादी से पहले हेमा हिरानी थीं. हेमा का जन्म सन 1972 में गुजरात के बड़ौदा में हुआ था. सन 1992 में हेमा जब बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट की बैचलर डिग्री (पेंटिंग) की पढ़ाई कर रही थीं, तभी उन का परिचय चिंतन उपाध्याय से हुआ.

चिंतन उपाध्याय राजस्थान का रहने वाला था. उस का जन्म सन 1972 में बांसवाड़ा जिले के परतापुर गांव में हुआ था. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय विख्यात चित्रकार और सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं. वह नेशलन ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित हैं. पिता की चित्रकारी, कूची और कैनवास को देखदेख कर चिंतन में भी चित्रकारी के प्रति रुचि बढ़ती गई. उस ने भी पेंटिंग में फाइन आर्ट की बैचलर डिग्री के लिए बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी में प्रवेश ले लिया.

चिंतन और हेमा एक ही बैच में पढ़ रहे थे. उन की उम्र भी लगभग बराबर थी. साथसाथ पढ़ाई करते और पेंटिंग बनातेबनाते दोनों एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. उन का प्यार परवान चढ़ता गया. सन 1995 में दोनों ने बैचलर डिग्री की पढ़ाई पूरी कर के पेंटिंग से फाइन आर्ट की मास्टर डिग्री के लिए उसी यूनिवर्सिटी में प्रवेश ले लिया. 2 सालों की मास्टर डिग्री की पढ़ाई के दौरान चिंतन और हेमा अपने प्यार की पेंटिंग को भी अनेक रंगों से सजाते रहे. अपने प्यार की कल्पनाओं को ड्राइंग शीट और कैनवाश पर उतारते रहे.

सन 1997 में दोनों ने मास्टर डिग्री हासिल कर ली. इस बीच उन्होंने अपनी बनाई पेंटिंग से देश के कला जगत में अपनी अच्छी पहचान बना ली थी. अब तक उन का प्यार इतना बढ़ चुका था कि वे एकदूसरे के बिना रह नहीं पाते थे. शायद यही वजह थी कि सन 1998 में हेमा और चिंतन ने शादी कर ली और मुंबई में बस गए. शादी करने के बाद मन को संतोष मिला तो हेमा और चिंतन की कलाकृतियों में और भी निखार आ गया. देश की अनेक ख्यातिनाम आर्ट गैलरियों में उन के चित्रों की प्रदर्शनियां लगने लगीं. उन के चित्रों की सराहना भी खूब होती थी. हेमा उपाध्याय अपनी कलाकृतियों के साथ फोटोग्राफी के लिए भी जानी जाने लगीं.

कला में सफलता मिलने के बाद हेमा और चिंतन आर्थिक रूप से मजबूत हुए तो उन्होंने मुंबई के पौश इलाके जुहू में एक करोड़ 20 लाख रुपए में एक फ्लैट खरीद लिया. इस फ्लैट में हेमा का हिस्सा 15 प्रतिशत और चिंतन का हिस्सा 85 प्रतिशत था. चिंतन ने हेमा के साथ मुंबई में फ्लैट भले ही ले लिया था, लेकिन जयपुर से उन्होंने नाता पहले की ही तरह बनाए रखा. निर्माणनगरी में रहने वाले अपने पिता विद्यासागर उपाध्याय के यहां वह बराबर आतेजाते रहे. इस की एक वजह यह भी थी कि मुंबई और दिल्ली की तरह जयपुर का भी कला की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है. अपने काम के सिलसिले में चिंतन देश के विभिन्न शहरों के अलावा विदेश भी जाते रहते थे.

हेमा और चिंतन का वैवाहिक जीवन हंसीखुशी से बीत रहा था. दोनों अपनेअपने काम से भी खुश थे. इसी बीच गुजरात दंगों के दौरान चिंतन उपाध्याय पूरे देश में उस समय सुर्खियों में आए, जब उन्होंने बड़ौदा की अलकापुरी सृजन आर्ट गैलरी में न्यूड हो कर प्रदर्शन किया. एक तरफ तो हेमा और चिंतन का कैरियर ऊंचाइयां चढ़ रहा था, दूसरी ओर उन के बीच आत्मीयता घटती जा रही थी. चिंतन का कहना था कि उन्हें हेमा से जो शांति और समर्पण मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा था. अब तक दोनों के बीच झगड़े होने लगे थे.

सन 1992 से 1998 के बीच के 6 सालों में प्यार की दीवारें जितनी मजबूत हुई थीं, अब वे दरकने लगी थीं. झगड़े शुरू हुए तो प्यार और विश्वास घटने लगा. शादी के 12 साल बीततेबीतते दोनों के संबंध टूटने की कगार पर आ गए. चिंतन ने पुलिस को बताया कि हेमा उस से हमेशा गाली दे कर बात करती थी. यह अमानवीय तो था ही, दिल को भी गहरा धक्का लगता था. जबकि पुलिस का कहना है कि चिंतन की खुद की सोच बड़ी घटिया थी, जिस से वह हेमा को परेशान करता था. इसी वजह से सन 2010 में हेमा ने मुंबई की अदालत में तलाक का मुकदमा दायर करा दिया था.

इस के बाद मुंबई के जुहू स्थित फ्लैट में चिंतन और हेमा रहते तो एक ही साथ थे, लेकिन अगलअलग कमरों में. हेमा की ओर से तलाक के मुकदमे की पैरवी एडवोकेट हरीश भंबानी कर रहे थे. तलाक के मुकदमे के दौरान ही हेमा ने सन 2013 में चिंतन उपाध्याय के खिलाफ उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी. हेमा ने अरोप लगाया था कि चिंतन उन के कमरे की दीवारों पर अश्लील चित्र बनाते हैं. आरोप के अनुसार चिंतन ने दीवार पर जो अश्लील चित्र बनाए थे, उस में महिला को कुत्ते के साथ अश्लील मुद्रा में दिखाया गया था.

हालांकि बाद में अदालत ने हेमा की इस शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि चिंतन का बैडरूम उन की व्यक्तिगत जगह है, उस में वह कुछ भी कर सकते हैं. हेमा ने अदालत से चिंतन से 2 लाख रुपए महीने गुजाराभत्ता दिलाने का अनुरोध किया था. लेकिन अदालत ने अपने फैसले में चिंतन उपाध्याय को हेमा को गुजारेभत्ते के रूप में हर महीने 40 हजार रुपए देने का आदेश दिया था. जनवरी, 2015 में हेमा ने पारिवारिक अदालत में एक याचिका दायर कर के अनुरोध किया था कि फाइनल सैटलमेंट के रूप में उसे चिंतन से 5 करोड़ रुपए दिलाए जाएं.

अगर चिंतन इतनी रकम एक साथ नहीं दे पाते तो वह 5 लाख रुपए हर महीने दें. दोनों के बीच सन 2014 में तलाक हुआ था, लेकिन भरणपोषण और संपत्ति के हिस्से का विवाद अभी भी अदालतों में चल रहा था. कहा जा रहा है कि अदालतों के चक्कर लगातेलगाते और मुकदमों में लाखों रुपए खर्च होने से चिंतन परेशान था. इसीलिए उस ने हेमा को मारने की साजिश रची. हेमा को मारने के लिए उस ने किराए के हत्यारे के रूप में विद्याधर राजभर को चुना.

विद्याधर राजभर उर्फ गोटू उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. चिंतन पिछले कई सालों से उसे जानता था. मुंबई के कांदिवली में उस की फोटोफ्रेमिंग की वर्कशौप और वेयरहाउस था. वह फाइबर ग्लास बनाने और बेचने का भी काम करता था, साथ ही इमिटेशन ज्वैलरी सहित कई अन्य कामधंधे भी करता था. कई सालों पहले विद्याधर राजभर काम की तलाश में जयपुर आया था, तब चिंतन ने ही उसे काम दिलवाया था. उस ने कई सालों तक जयपुर में काम किया. इसी बीच पेंटिंग से जुड़े कामों की वजह से वह चिंतन के पिता के संपर्क में आया. जयपुर में रहते हुए ही विद्याधर की चिंतन से अच्छी दोस्ती हो गई थी. बाद में विद्याधर मुंबई जा कर बस गया.

चिंतन के माध्यम से ही विद्याधर की मुलाकात मुंबई में हेमा उपाध्याय से हुई थी. चिंतन के साथ हेमा के लिए भी वह पेंटिंग की फोटोफ्रेमिंग का काम करने लगा. इसी वजह से उस का चिंतन हेमा के जुहू स्थित फ्लैट पर आनाजाना था. विद्याधर राजभर का चिंतन और हेमा से कारोबारी लेनदेन भी था. एक बार विद्याधर के पिता गंभीर रूप से बीमार हुए थे तो चिंतन ने दोस्ती के नाते उस की आर्थिक मदद की थी. चिंतन ने उसे 5 लाख रुपए उधार दिए थे. बाद में विद्याधर ने यह रकम नहीं लौटाई. हेमा से भी विद्याधर ने कुछ रकम उधार ले रखी थी. पैसों के लेनदेन को ले कर हेमा और विद्याधर के बीच कई बार विवाद भी हुआ था. हेमा ने कई बार उस से रकम लौटाने को कहा था.

चिंतन उपाध्याय को यह बात पता थी. इसलिए उस ने विद्याधर राजभर से हेमा की हत्या का सौदा किया. विद्याधर ने हेमा की हत्या के लिए पहले 30 लाख रुपए मांगे थे. बाद में वह बाईस लाख रुपए पर आ गया था. चिंतन के दबाव पर वह 10 लाख रुपए नकद और उधारी वाले 5 लाख रुपए के माफ करने पर हेमा की हत्या के लिए राजी हो गया था. इस के बाद चिंतन ने विद्याधर राजभर को हेमा की हत्या की सुपारी देते हुए कुछ रकम एडवांस भी दे दी थी.

यह करीब 3 महीने पहले की बात है. चिंतन ने हेमा की हत्या की साजिश रच कर एक दिन विद्याधर को जयपुर बुलाया. विद्याधर जयपुर के निर्माणनगर स्थित चिंतन के घर आया तो उस ने स्कैच बना कर उसे हत्या की पूरी योजना समझाई कि हेमा की हत्या कैसे करनी है. चिंतन से सौदा तय होने के बाद विद्याधर राजभर ने सब से पहले शिवकुमार राजभर उर्फ साधु से बात की, क्योंकि यह काम उस के अकेले के वश का नहीं था. साधु उस के अच्छे परिचितों में था. वह फाइबर की मूर्तियां बनाने के कारखाने में काम करता था. पिछले कई सालों से वह मुंबई के पश्चिमी कांदीवली इलाके में रहता था. हेमा की हत्या के लिए साधु राजी हो गया तो विद्याधर ने प्रदीप राजभर और आजाद राजभर को भी हेमा की हत्या में साथ देने के लिए राजी कर लिया.

इस के बाद मुंबई में चैंबूर स्थित एक रेस्तरां में चिंतन ने विद्याधर राजभर के साथ मीटिंग कर के हेमा की हत्या की साजिश को अंतिम रूप दिया. इस मीटिंग में टैंपो चालक विजय राजभर भी मौजूद था. विजय राजभर ने ही दोनों लाशों के डिब्बों को ले जा कर नाले में फेंका था. पुलिस ने बाद में इसे भी गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने चैंबूर स्थित उस रेस्तरां की सीसीटीवी फुटेज की भी जांच की थी. येजना के अनुसार, 11 दिसंबर को विद्याधर राजभर ने हेमा को फोन कर के कहा कि उस के पास चिंतन के खिलाफ कुछ अहम सबूत हैं. उन सबूतों को वह उन्हें दिखाना चाहता है. इस के लिए उस ने हेमा को कांदीवली स्थित अपने वेयरहाउस में रात को बुलाया.

सबूत हासिल करने के लिए हेमा अपने वकील हरीश भंबानी को साथ ले कर विद्याधर के वेयरहाउस पहुंचे तो वहां अन्य 3-4 लोगों को देख कर हैरानी हुई, लेकिन उन्हें किसी खतरे का अहसास नहीं था, इसलिए वे दोनों निश्चिंत थे. विद्याधर कुछ देर तक हेमा को अपनी बातों में उलझाए रहा. उस के बाद उस ने अपने साथियों की मदद से हेमा और हरीश को क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश कर दिया. बेहोश होने के बाद दोनों की गला घोंट कर हत्या कर दी गई. दोनों के मर जाने के बाद उन की जेबों का सारा सामान, मोबाइल आदि निकाल कर कपड़े उतार दिए गए, फिर दोनों लाशों के हाथपैर बांध कर पौलीथिन में लपेट कर गत्ते के डिब्बों में भर दिया गया, जिन्हें विजय राजभर टैंपो से उसी रात नाले में फेंक आया.

रिमांड अवधि पूरी होने के बाद पुलिस ने चिंतन और पकड़े गए अन्य अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां पुलिस ने चिंतन का रिमांड बढ़ाने की मांग की तो अदालत ने बाकी लोगों को जेल भेज कर चिंतन का रिमांड 1 जनवरी तक बढ़ा दिया. 1 जनवरी को रिमांड अवधि पूरी होने पर उसे दोबारा अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 11 जनवरी तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. पुलिस ने चिंतन उपाध्याय के दिल्ली स्थित मकान से कई अहम सबूत जब्त किए हैं. इन में पैन ड्राइव, आईपौड और कुछ संदिग्ध पेंटिंग शामिल हैं. पुलिस की एक टीम ने जयपुर जा कर भी जांचपड़ताल की है. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय से निर्माणनगर स्थित घर पर करीब ढाई घंटे तक पूछताछ की गई.

पुलिस जांच में यह बात भी सामने आई है कि दिल्ली शिफ्ट होने के बाद चिंतन उपाध्याय मुंबई में कभी 3 दिन से ज्यादा नहीं रुकता था, लेकिन 2 से 6 दिसंबर के बीच वह मुंबई में ही रहा. इस के अलावा हेमा और हरीश के लापता होने के अगले दिन 12 दिसंबर को उस ने हरीश के घर वालों को फोन कर के उन के बारे में पूछा था. चिंतन ने 6 दिसंबर को विद्याधर राजभर को एक एसएमएस किया था, लेकिन पुलिस के थाने बुलाने से पहले उस ने वह एसएमएस डिलीट कर दिया था.

कथा लिखे जाने तक विद्याधर राजभर पुलिस के हाथ नहीं लगा था. इस के अलावा एक अन्य व्यक्ति के भी इस दोहरे हत्याकांड में शामिल होने की बात सामने आई है. पुलिस का कहना है कि चिंतन उपाध्याय ने ही हेमा की हत्या की साजिश रची थी. उसी साजिश के तहत विद्याधर राजभर ने अपने साथियों के साथ हेमा और उन के एडवोकेट हरीश भंबानी की हत्या की थी. विद्याधर के पकड़े जाने पर ही इस मामले की सारी गुत्थी सुलझेगी.

बहरहाल, हेमा उपाध्याय की हत्या से भारतीय कला जगत में सन्नाटा पसरा हुआ है. कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि चिंतन जैसा प्रतिभाशाली कलाकार एक प्रतिभाशाली कलाकार की हत्या भी करा सकता है. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय का कहना है कि मेरा बेटा बेकसूर है. पुलिस को उस के बारे में गलत जानकारी दी गई है. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित