Social Story: समाज या परिवार के लिए कुछ करने की उम्र में जिन लोगों ने समाज या घर वालों से बगावत कर के बीहड़ में जा कर बंदूक उठाई, अब वही जीवन के अंतिम दौर में समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन समाज आज भी उन से दहशत खाता है, जिस से उन्हें अपने साथ जोड़ने से कतरा रहा है.
आज डाकू भले ही किस्सेकहानियों के पात्र बन कर रह गए हों, लेकिन कभी इन का बोलाबाला था. कुछ डाकुओं का तो इतना आतंक था कि लोग उन के नामों से कांपते थे. कुछ महिलाएं भी डाकू बनीं, जिन्हें आज दस्यु सुंदरी कहा जाता है. डाकुओं और उन की दहशत पर तमाम फिल्में भी बनी हैं, जिन में सब से चर्चित फिल्म शोले रही है.
शोले में दिखाए गए गब्बर सिंह को लोग शायद ही कभी भूल पाएंगे. फिल्म में गब्बर सिंह की भूमिका अभिनेता अमजद खान ने निभाई थी. फिल्म के तमाम डायलौग लोगों की जुबान पर चढ़ गए थे. इस के अलावा भी डाकुओं पर तमाम फिल्में बनीं, लेकिन शोले जैसी सफलता किसी दूसरी फिल्म को नहीं मिली. अब समय बदल गया है, अपराध भले ही पहले से ज्यादा हो रहे हैं, लेकिन आज अपराधों और अपराधियों का ट्रेंड बदल गया है. अब बंदूकों की बदौलत डकैती नहीं, अपहरण होने लगे हैं. डकैत बीहड़ों और जंगलों में रहते थे, जहां रहना खाना पेड़ों के नीचे या छोटीमोटी गुफाओं में होता था.
जबकि अब विकास के नाम पर जंगल उजड़ते जा रहे हैं. डकैतों का लगभग सफाया हो चुका है. अपराधों का स्वरूप बदल गया है तो अपराधी भी सुविधाभोगी हो गए हैं. घोड़ों का प्रचलन लगभग समाप्त हो चुका है, उन की जगह कारों या जीपों ने ले ली हैं.
राजस्थान से ले कर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक पसरी चंबल की घाटी अवैध खनन की वजह से सिमटती जा रही है. जंगल खत्म होते जा रहे हैं. उन की जगह बहुमंजिली इमारतें बनती जा रही हैं यानी हरेभरे जंगलों की जगह कंकरीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं. बीहड़ों और जंगलों को कुख्यात बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली यहां से बहने वाली चंबल नदी है.nमध्य प्रदेश में इंदौर के पास बसे शहर महू से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित विंध्याचल की पहाडि़यों से निकलने वाली यह नदी राजस्थान के कुछ हिस्से से गुजरते हुए मध्य प्रदेश के भिंडमुरैना के इलाके से निकल कर उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की ओर बढ़ जाती है.
पानी के कटाव से चंबल नदी के किनारेकिनारे सैकड़ों मीलों तक ऊंचे घुमावदार बीहड़ों की संरचना हुई है. चंबल के यही बीहड़ डाकुओं के छिपने के अभेद्य ठिकाने रहे हैं. डाकुओं की पहली पीढ़ी में मान सिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लक्का डाकू, सुल्ताना डाकू, पन्नाबाई, पुतलीबाई, पान सिंह तोमर आदि बड़े नाम रहे हैं. इस के बाद मलखान सिंह, माधो सिंह, मोहर सिंह, माखन चिड्डा, बाबा मुस्तकीम, फूलन देवी, विक्रम मल्लाह, श्रीराम, लालाराम और ददुआ जैसे दुर्दांत डाकुओं का चंबल घाटी पर दबदबा रहा है.
डकैत, जो कभी आतंक का पर्याय माने जाते थे, कुछ लोगों की पहल पर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. सजा भुगतने के बाद आज वे समाज की मुख्य धारा से जुड़ गए हैं. दस्यु सुंदरी फूलन देवी 2 बार सांसद बनी थीं. दूसरी बार सांसद बनने के बाद सन 2001 में शेर सिंह राणा ने दिल्ली में उन के आवास पर गोली मार कर उन की हत्या दी थी. सन 1981 में फूलन देवी तब चर्चा में आई थीं, जब उन के गिरोह पर बेहमई गांव में सवर्ण जाति के 22 लोगों की हत्या का आरोप लगा था.
सालों तक चंबल के बीहड़ों में भटकने वाले पूर्व दस्यु अब जीवन के इस पड़ाव पर समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं. इसी उद्देश्य से 20 मार्च को होली आने से 3 दिन पहले गुलाबी नगर जयपुर में देशभर के नामी डाकू इकट्ठा हुए. सिर पर साफा बांधे, ललाट पर रोली का तिलक लगाए, कंधे पर दुनाली लटकाए ये डकैत यहां कोई अपराध करने नहीं, बल्कि अपने दस्यु जीवन की दास्तां सुनाने और बीहड़ बचाने के लिए इकट्ठा हुए थे.
प्रकृति एवं संस्कृति संरक्षण व संवर्धन को समर्पित जयपुर के श्री कल्पतरू संस्थान ने दस्युओं का यह महाकुंभ विश्व वानिकी दिवस की पूर्व संध्या पर पूर्व आयोजित किया था. जयपुर के इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान औडिटोरियम में आयोजित इस ऐतिहासिक आयोजन का नाम दिया गया था, ‘पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़.’
कभी दस्यु सुंदरी के नाम से मशहूर रही सीमा परिहार भी इस आयोजन में आई थीं. सीमा परिहार अपनी मरजी से डकैत नहीं बनी थीं. उन का अपहरण कर के चंबल में ले जाया गया था. वह पहली दस्यु सुंदरी थीं, जिन्होंने बागी रहते हुए बच्चे को जन्म दिया था. उन के जीवन पर बुंडेड नाम से फिल्म भी बन चुकी है, जल्दी ही उन्होंने एक और फिल्म साइन की है. इस बार वह सलमान खान के साथ फिल्मी परदे पर नजर आएंगी. वह बिग बौस में भी भाग ले चुकी हैं.
सीमा परिहार 13 साल की थीं, तब डाकू उन्हें उठा ले गए थे. डाकुओं के साथ रह कर उन्होंने भी बंदूक उठा ली थी. दस्यु जीवन में उन पर कुल 29 मुकदमे दर्ज हुए, जिन में 4 हत्याओं के थे, बाकी पुलिस मुठभेड़, लूट और अन्य मामलों के थे. 1 दिसंबर, 2000 को उन्होंने अधिकारियों के सामने औरैया जिले में आत्मसमर्पण किया था. कहा जाता है कि उन का इतना खौफ था कि जिस दिन वह जेल गई थीं, वहां सजा काट रहे अन्य कैदी डर के मारे रात को पेशाब करने नहीं निकले थे. उन का बच्चा तब उन की गोद में था. उस समय जेल में 35 अन्य महिला कैदी थीं. वह सन 2004 रिहा हुईं. उन के रिहा होने के बाद सन 2006 में उन के भाई को झूठे एनकाउंटर में मरवा दिया गया था.
सीमा परिहार का कहना था कि चंबल में जो गए थे, वे अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले थे. असली डकैत तो समाज में हैं, वही अपराधी बनाते हैं. दस्यु सुंदरी या डकैत मांबाप के दिए नाम नहीं होते. समाज, पुलिस और सरकार ही उन्हें डकैत बनाती है. सरकार वादे तो बड़ेबड़े करती है, लेकिन वे पूरे नहीं होते. दस्यु सुंदरी सीमा का कहना था कि पेड़पौधों के बारे में जितना दस्यु जानते हैं, उतना कोई और नहीं जान सकता. बीहड़ में डाकुओं को पेड़ की ही छाया मिलती थी, क्योंकि वहां छत नहीं होती. बीहड़ में कभी कोई डकैत सांपबिच्छू के काटने से नहीं मरता. 20 साल पहले जो जंगल थे, अब वे नहीं रहे. जीवन को बचाने के लिए पेड़पौधे लगाना जरूरी है. सरकार इस के लिए मुहिम चला रही है. इस मुहिम में डाकुओं को भी जुड़ना चाहिए. अगर हर कोई चाह ले तो जंगलों को बचाया जा सकता है.
इस आयोजन में आई 28 साल की दस्यु सुंदरी रेणु यादव जब नौवीं क्लास में पढ़ती थीं, तब सन 2003 में 29 नवंबर को बदमाश चंदन यादव ने स्कूल से आते समय उन का अपहरण कर लिया था. उन्हें छोड़ने के लिए उस ने उन के घर वालों से 10 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. उन के पिता किसान थे, 5-6 बीघा जमीन थी. वह 10 लाख रुपए कहां से देते. पैसे नहीं मिले तो बदमाशों ने उन्हें मारापीटा, प्रताडि़त किया और कुछ दिनों बाद उन्हें डाकू बना दिया.
रेणु के पास डाकुओं की बात मानने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. इस के बाद उन्हीं के नाम पर अपराध किए जाने लगे. धीरेधीरे उन का नाम मशहूर हो गया और लोग उन के नाम से खौफ खाने लगे. इस के बाद चंदन यादव द्वारा की गई हत्या, लूट, डकैती और अपहरण जैसे 17 मामलों में उन का नाम बतौर मुलजिम दर्ज हो गया. इसी तरह 4 जनवरी, 2005 तक चलता रहा. उसी बीच एक दिन रामवीर गुर्जर और चंदन यादव में गैंगवार हुई, जिस में चंदन मारा गया. रामवीर गुर्जर ने रेणु को बंधक बना कर गलत नीयत से उन पर हमला किया. उस समय उन के पास एसएलआर थी, जिस की सारी गोलियां उस ने रामवीर के सीने में उतार दीं. इस के बाद 7-8 दिनों तक जंगल में भटकती रही.
उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, कहां जाएं? आखिर वह अपने घर आ गईं. खबर पा कर पुलिस आ गई और उन्हें भरोसे में ले कर कोतवाली ले गई, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर कई आरोप थे. आखिर उन्हें जेल भेज दिया गया. वह 3 अलगअलग जेलों में रहीं. 7 साल 3 महीने 15 दिन तक जेल में रहने के बाद 29 मई, 2012 को लखनऊ के नारी बंधी निकेतन से रेणु रिहा हुईं. जेल से रिहा होने के बाद अब भी कुछ बदमाश उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह वापस आ कर गैंग का मोर्चा संभाल लें, वरना उन्हें मार दिया जाएगा. वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलीं और सुरक्षा की गुहार लगाई. इस के बाद उन्हें गनमैन मुहैया करा दिया गया.
रेणु यादव का कहना था कि पुलिस ने उन्हें डाकू माना, लेकिन न्यायपालिका से उन्हें न्याय मिला. उन पर फिल्म बीहड़ बन रही थी, जो अभी विवादों में फंस गई है. वह न टीवी देखती हैं न फिल्में, लेकिन कोई अच्छा डाइरैक्टर मिल जाए तो वह उस के साथ काम करना चाहती हैं. फिलहाल वह गौ सेवा में लगी हैं. वह गायों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाती हैं. अब तक वह हजारों गायों को कटने से बचा चुकी हैं. उन्हें जेल से बाहर आए 2 साल हो गए हैं. वह एनजीओ चलाती हैं, जिस के माध्यम से वह गायों को बचाने के साथ दानदहेज को ले कर महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने की कोशिश कर रही हैं.
पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़ अभियान का समर्थन करते हुए रेणु ने कहा कि अगर सरकार सहयोग करे तो बीहड़ ही नहीं, पूरे चंबल में पेड़ों की कटाई को छोड़ो, वह किसी को हरा पत्ता तक न तोड़ने दें, अवैध खनन के नाम पर एक पत्थर न उठाने दें और शिकार के नाम पर एक चिडि़या न मारने दें. इस आयोजन में भाग लेने आए डाकुओं में पंचम सिंह एक बड़ा नाम रहा है. उन के नाम से आम आदमी ही नहीं, पुलिस भी खौफ खाती थी. बरसों तक डकैत के रूप में बीहड़ों की खाक छानने वाले और दहशत का पर्याय रहे पंचम सिंह ने अब संन्यास ले लिया है. पीत वस्त्र धारण करने वाले पंचम सिंह की उम्र इस समय 84 साल है, लेकिन उन की आवाज आज भी बुलंद है.
जयप्रकाश नारायण के प्रयास से साढ़े 5 सौ डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया था, उन्हीं में एक पंचम सिंह भी थे. उन्हें दुख इस बात का है कि आज भी डाकुओं को सामाजिक कार्यों से नहीं जोड़ा जाता. वह पूरे 14 साल बीहड़ में रहे. उन्होंने राज सत्ता, डाकू सत्ता और धर्म सत्ता देखी है. पंचम सिंह का कहना था कि डाकुओं के बारे में फिल्मों में जो दिखाया जाता है, वह सब झूठ है. डाकुओं के अपने नियमकानून होते थे. उन में एकता होती थी, जो आज राज सत्ता और धर्म सत्ता में नहीं है. साढ़े 5 सौ डाकुओं ने एकता के दम पर ही भारत सरकार को हिला कर रख दिया था.
पंचम सिंह के गिरोह का सफाया करने के लिए सरकार ने एक करोड़ रुपए का इनाम रखा था. यह तब की बात है, जब सौ रुपए में एक तोला सोना मिलता था. पंचम सिंह ही नहीं, उस समय के लगभग सभी डाकू चरित्रवान थे, किसी की मांबहन को गलत नजर से नहीं देखते थे. पंचम सिंह ने एक बलात्कारी को पेड़ से बांध कर जिंदा जला दिया था. वे अमीरों का धन लूट कर गरीबों में बांटते. यही वजह थी कि किसी डाकू की कोई कोठी नहीं बनी है. पंचम सिंह का 45 जिलों में बोलबाला रहा. उन्हें गाड़ीघोड़ों की कोई कमी नहीं थी. उन का आतंक ऐसा था कि स्टेशन न होने पर भी ट्रेन रुकती थी.
पंचम सिंह चौथी तक पढ़े थे. 14 साल की उम्र में उन की शादी हो गई थी. गांव में हुए एक झगड़े के बाद बदले की भावना से वह चंबल के डाकुओं से जा मिले थे. उस के बाद एक दिन गांव आए और 6 लोगों को मार दिया और डाकू बन गए. वह भले ही पढ़ेलिखे नहीं थे, लेकिन डकैत जीवन में स्कूल बनवाए, हजारों कन्याओं की शादी कराई. जंगल के आदिवासी उन की मदद करते थे. चंबल में उन्होंने जो स्कूल खोला था, उस में 17 मास्टर थे और लगभग 5 सौ बच्चे पढ़ते थे. उन के स्कूल का रिकौर्ड रहा है कि कोई बच्चा फेल नहीं हुआ. मास्टर हो या छात्र, गलती करने पर पंचम सिंह उसे स्कूल में 24 घंटे के लिए बंद कर देते थे.
पंचम सिंह के हथियार हेलीकौप्टर द्वारा बांग्लादेश से आते थे. उन के पास हर तरह के हथियार थे. वह जिस नेता को सपोर्ट करते थे, वही चुनाव जीतता था. वह एक दिन में सरपंच और 3 दिन में एमएलए बनाते थे. आत्मसमर्पण के समय लोकनायक जयप्रकाश नारायण के माध्यम से उन्होंने 8 शर्तें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने रखी थीं. सन 1972 में सरकार ने उन शर्तों को मान लिया तो उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. उन्हें और मोहर सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में राष्ट्रपति ने फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल दी थी.
पंचम सिंह का कहना था कि सन 1972 में समर्पण करने वाले साढ़े 5 सौ डकैतों में करीब 2 सौ डाकू आज भी जीवित हैं. ये डकैत पहले गोलियों से उस के बाद फांसी से बचे. अब जीवन के आखिरी दिनों में वह उस पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेंगे, जिस ने उन्हें मां की तरह रखा. अगर समाज साथ दे तो ये डाकू बलिदान देने को तैयार हैं. डाकू गब्बर सिंह पर बनी थी, वह भी इस महाकुंभ में जयपुर आए थे.
उत्तर प्रदेश के ललितपुर के गांव रामपुर के रहने वाले गब्बर सिंह का असली नाम प्रीतम सिंह है. गब्बर सिंह बीड़ी जरूर पीते हैं, लेकिन फिल्म शोले के गब्बर की तरह तंबाकू नहीं खाते. फिल्म शोले का गब्बर सिंह खूंख्वार था, जबकि असली गब्बर सिंह की छवि उस से बिलकुल अलग है. वह अब तक सैकड़ों लड़कियों का विवाह करवा चुके हैं. गब्बर सिंह 10 साल बीहड़ में रहे. सन 1986 में उन्होंने आत्मसमर्पण किया तो 7-8 साल जेल में रहे. उन्होंने डाकू जीवन में गुनहगारों को ही मारा. गलती से एक बार एक बच्चा और एक औरत मर गई थी, जिस का उन्हें आज भी मलाल है. उन का कहना था कि बागी को दर्द नहीं होता है. उन के पास मारने वाला दिल होता है, रहम का दिल नहीं होता.
सरकार ने डेढ़ सौ से अधिक पुलिस वालों को उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी, लेकिन वे उन्हें पकड़ नहीं पाए. बाद में धीरज सिंह, राम सिंह और रामपाल के साथ उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. सरकार ने उन से जो वादे किए थे, उन में से एक भी पूरे नहीं किए. जेल में अलग रहने और खाने की व्यवस्था जरूर हो गई थी. जेल में रह कर गीतारामायण जैसी धार्मिक किताबें पढ़ कर धीरेधीरे उन्होंने खुद को बदला. उन का कहना था कि अब वह गांव और इलाके के लोगों की सेवा कर के अपराध जीवन के दाग धोने की कोशिश कर रहे हैं.
देशभर में महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचारों से वह काफी दुखी हैं. उन का निशाना आज भी अचूक है. अब वह कानून का सम्मान करते हुए खुद को देश की सेवा में लगाए रखना चाहते हैं. चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे पान सिंह तोमर के भतीजे बलवंत सिंह तोमर का पुलिस रिकौर्ड में नाम बलवंता है. बलवंता इस परिवार के एकमात्र ऐसे सदस्य हैं, जो पुलिस से हुई अंतिम मुठभेड़ में बच गए थे. करीब 13 घंटे तक चली मुठभेड़ में पान सिंह तोमर सहित गैंग के 28 डकैत मारे गए थे. बलवंता पर 70 मुकदमे दर्ज थे, जिन में 30 हत्या के थे.
पान सिंह तोमर भारतीय सेना में थे और अंतर्राष्ट्रीय धावक भी. बाद में वह बागी बन गए. उन के नाम से ही फिल्म भी बनी है. बलवंता का कहना था कि फिल्म में सब कुछ सच दिखाया गया है. अभिनेता इरफान खान ने अच्छा अभिनय किया था, लेकिन फिल्म निर्देशक ने धोखा दिया. फिल्म बनाने की अनुमति के समय उन का इंटरव्यू लिया था. तब जो शर्तें तय हुई थीं, बाद में वह उन से मुकर गया. फिलहाल मामला अदालत में चल रहा है. बलवंता जिन दिनों चंबल में थे, अगर कोई पेड़ काटता था, वह उसे कुल्हाड़ी से मारते थे, क्योंकि बीहड़ में पेड़पौधे ही उन के घर थे.
बलवंता ने जंगलों पर मंडराते खतरे पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि जंगल नहीं रहेगा तो किसान भी नहीं रहेगा. क्योंकि जंगलों के साफ हो जाने से अकाल पड़ेगा. काली मां के अनन्य भक्त बलवंता ने पान सिंह तोमर के समय लूट के पैसों से मंदिर भी बनवाया था. खारिया गांव के रहने वले अध्यापक के बेटे से बागी बने मुन्ना सिंह मिर्धा के लिए एके 47 चलाना खेल था. उन का निशाना अचूक है. बंदूक से उन्हें आज भी मोहब्बत है. वह दद्दा मलखान सिंह गैंग में थे. 18 साल की उम्र में बागी बन कर 12 सालों तक बीहड़ों में राज किया. 1982 से उन्होंने गैंग के साथ आत्मसमर्पण किया था.
उन का कहना था कि जब तक उन के पास बंदूक रही, लोग उन की बात सुनते थे, लेकिन आज हालात बदल गए हैं. अब वह बंदूक साथ नहीं रखते, जिस से उन्हें काम कराने के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं. बागी रहते हुए उन से जो हुआ, उस का उन्हें पछतावा नहीं है. लेकिन जो गलती से मर गया, उस का दुख आज भी है. अब उन की इच्छा है कि वह पर्यावरण के लिए काम करें और अपने गांव को आदर्श गांव बनाएं.
सन 1993 में जेल से बाहर आते ही मुन्ना सिंह ने पहला पेड़ अपनी जन्मभूमि पर लगाया था. वह जेल में जो मांगते थे, वह उन्हें मिलता था. उन के लिए जेल में अलग से खीरपूरी बनाई जाती थी. जेल से ही जिस कागज पर दस्तखत कर के भेज देते थे, तुरंत वह काम हो जाता था. जंगल में रहने पर भी उन की नेताओं से सांठगांठ थी. मुन्ना सिंह पर 135 मुकदमे दर्ज थे. उन में हत्या के कितने थे, पता नहीं. उन के हथियार विदेश से आते थे. उन का कहना था कि शासनप्रशासन अगर उन का साथ दे तो वह पर्यावरण को बचा सकते हैं.
चंबल का शेर कहलाने वाले मलखान सिंह को आज भी लोग दद्दा कहते हैं. मंदिर की सौ बीघा जमीन को मंदिर में मिलाने की मांग को ले कर 26 साल की उम्र में पंच रहते हुए बागी बने मलखान सिंह को बागी रहते हुए जो कुछ हुआ, उस का उन्हें जरा भी मलाल नहीं है. उन्होंने जो कुछ भी किया, वह अन्याय के खिलाफ किया. वह 15 साल बीहड़ में रहे, वहां उन्हें कोई तकलीफ नहीं हुई. जेल में रहते खाने या किसी तरह की कोई परेशानी हुई तो वह जेलर से भिड़ जाते थे. उन का कहना था कि आज भी जेलों में कैदियों की स्थिति दयनीय है. जेलों में आधे लोग बेकसूर बंद हैं.
अन्याय सहन करने के बजाय बीहड़ को अच्छा बताने वाले मलखान सिंह ने बागी रहते गरीब और जरूरतमंदों के अलावा ईमानदार लोगों की भी मदद की, आदर्श गांव बनाए. उन कहना था कि अगर सरकार सहयोग करे तो वह आज भी आदर्श गांव बनाने की इच्छा रखते हैं. अपने समय में वह गाय काटने वाले को छोड़ते नहीं थे.
मलखान सिंह को बीबीसी लंदन ने कई बार दस्यु सम्राट कह कर संबोधित किया था. उन के जीवन पर आर.के. चौकसे दद्दा मलखान सिंह नाम से फिल्म बना रहे हैं. फिल्म में डिंपल कपाडि़या व मुकेश तिवारी भी अभिनय कर रहे हैं. फिल्म की शूटिंग ग्वालियर की जेल में भी हुई है, जहां मलखान सिंह बंद रहे थे. मलखान सिंह पर 32 पुलिसकर्मियों सहित 185 हत्याओं और डकैती के सैकड़ों मामले दर्ज थे. उन के गिरोह में 17 लोग थे, जो उन के गांव और आसपास के इलाकों के रहने वाले थे. चंबल घाटी में डेढ़ दशक तक बागी रहने के बाद करीब 32 साल पहले अर्जुन सिंह सरकार के समक्ष उन्होंने आत्मसमर्पण किया था.
दद्दा मलखान सिंह के साथी रहे पूर्व दस्यु रामप्रकाश ने सन 1979 में पहली बार बंदूक उठाई थी और दद्दा की गैंग में शामिल हो गए थे. तब से अब तक वह दद्दा के साथ ही बंदूक लिए खड़े नजर आते हैं. उत्तर प्रदेश के बड़ा कस्ता गांव के रहने वाले रामप्रकाश ने बताया कि बाबू गुर्जर महिलाओं से दुराचार करता था. उन्होंने विरोध किया तो उस ने उन्हें इतना मारा कि वह सिर्फ मरे नही. इस के बाद उन्होंने 3 लोगों की दिनदहाड़े गांव के चौराहे पर गोली मार कर हत्या कर दी और दद्दा की शरण में चले गए. तब से आज तक वह उन्हीं की शरण में हैं. आत्मसमर्पण भी उन्हीं के साथ किया था.
70 के दशक में चंबल घाटी में डाकू सरू सिंह का बड़ा आतंक था. वह 17 साल की उम्र में बागी बने थे. अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और 12 सालों तक बीहड़ों पर राज किया. जयप्रकाश नारायण के समझाने पर सन 1972 में आत्मसमर्पण किया था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी मदद की थी. अदालत से उन्हें आजीवन कारावास हुई थी, लेकिन 8 सालों में ही वह जेल से बाहर आ गए थे. बस्तूरी गांव के रहने वाले सरू सिंह पर 540 केस दर्ज थे. इन में हत्या के 65 मामले थे. उन के गिरोह में 60 लोग थे. एक बार पुलिस से हुई मुठभेड़ में 9 पुलिस वाले तो 4 उन के साथी मारे गए थे. इस मुठभेड़ में सरू सिंह की गर्दन में गोली लगी थी, लेकिन 14 दिनों में ही वह घाव भर गया था.
उस समय जंगल में 11 दिनों तक उन्हें अन्न नहीं मिला था. उन का कहना था कि जंगल में जिस किसी ने उन्हें खाना दिया, वह सुरक्षित रहा. वह खुद को डकैत नहीं बागी कहते हैं. उन का कहना था कि डकैतों के समय में महिलाएं सुरक्षित थीं. मोहर सिंह और उन के नाम की आज भी कसमें खाई जाती हैं. आज भी वे एकदूसरे के लिए बंदूक उठा सकते हैं.
पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़ अभियान में 7 राज्यों के करीब 30 पूर्व दस्युओं ने शिरकत की. उन्होंने वीरान और उजाड़ हो कर अपना अस्तित्व खोते जा रहे बीहड़ों को फिर से हराभरा कर पर्यावरण संरक्षण की शपथ ली, साथ ही लोगों को पेड़ लगाने की मुहिम में शामिल होने का आह्वान किया. अब देखना यह है कि इन डाकुओं ने पर्यावरण की रक्षा का सिर्फ संकल्प ही लिया है या पहले की ही तरह अपने दिए वचन को पूरा भी करेंगे. Social Story


