Uttar Pradesh Crime: अंधविश्वास का नतिजा

Uttar Pradesh Crime: तंत्रमंत्र की क्रियाओं या अंधविश्वास से किसी का भला नहीं होता, फिर भी अंधविश्वासी लोग ऐसे चक्करों में पड़ जाते हैं. अगर वक्त रहते जफर ने तंत्रमंत्र की राह छोड़ कर अपनी घरगृहस्थी पर ध्यान दिया होता तो वह न होता जो हुआ…

जफर हुसैन उर्फ चांद बाबू के सिर पर धर्म का उन्माद सवार रहता था. वह तरहतरह की तंत्र क्रियाएं करता रहता है, यह पूरा गांव जानता था. इसी वजह से कोई उसे तांत्रिक कहता था तो कोई पागल तो कोई कुछ और. गांव के लोगों से उस के ताल्लुकात अच्छे नहीं थे. इस की वजह यह थी कि वह छोटीछोटी बातों पर गुस्सा हो जाता था. वादविवाद की स्थिति में लोगों को तांत्रिक क्रियाओं की धमकी देना उस की आदत में शुमार था. लिबास भी वह ढोंगियों और पाखंडियों जैसा पहनता था. उस की इन अजीबओगरीब हरकतों से गांव वाले भी अंधविश्वास का शिकार हो गए कि उसे नाराज करने से उन का कोई अनिष्ट हो सकता है. यही वजह थी कि लोग उस से मेलजोल बढ़ाने से कतराते थे.

जफर उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के भोजीपुरा थाना के गांव मैमोर में रहता था. उस के परिवार में पत्नी नईम बानो के अलावा 4 बच्चे, 7 साल का फरहान, 5 साल की फरहीन, 4 साल का फयाज और 1 साल का फमान. जफर का वास्ता चूंकि लोगों से कम था, इसलिए दूसरे लोग भी उस पर कम ही ध्यान देते थे. लेकिन एक दोपहर जफर के घर से आने वाली चीखनेचिल्लाने की आवाजों ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया.

उस के दरवाजे पर पहुंचे लोगों ने अंदर का नजारा देखा तो ठिठक गए. उन्होंने बाहर खड़े हो कर देखा, जफर अपनी बेटी फरहीन को बुरी तरह पीट रहा था. डरीसहमी मासूम बच्ची उस के चंगुल के छूटने के लिए छटपटा रही थी. नईम बानो बेटी को बचाने के लिए उस के साथ धक्कामुक्की कर रही थी.

‘‘इस ने मेरी सारी तांत्रिक क्रिया खराब कर दी. मेरा अच्छा वक्त आने वाला था, लेकिन इस ने उसे खत्म कर दिया. यह मेरी बेटी नहीं, बल्कि इस के अंदर किसी शैतानी आत्मा का साया है.’’ जफर फरहीन को प्रताडि़त करते हुए बड़बड़ा रहा था.

‘‘क्या बकवास कर रहे हो तुम?’’ नईम बानो चिल्लाई तो वह उसे समझाने वाले अंदाज में बोला, ‘‘यह हकीकत है बानो, इस ने शैतानी हरकत की है. मैं इसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’ कहते हुए वह बेटी को बेरहमी से पीटने लगा. नईम बानो तेजतेज चिल्लाने लगी. नईम ही नहीं, फरहीन भी चिल्ला रही थी, ‘‘अब्बू, मुझे छोड़ दो, मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘कैसे छोड़ दूं. तू फरहीन नहीं, बल्कि ऐसा शैतान है, जो मेरी जिंदगी को तबाह कर देना चाहता है. मेरी तांत्रिक क्रिया को फेल करना चाहता है. अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूं. चूल्हे के पास ही तेरी कब्र बना दूंगा.’’

जफर गुस्से में बड़बड़ा रहा था. उस के सिर पर जैसे खून सवार था. डर की वजह से जफर के बाकी बच्चे बरामदे में पड़े तख्त के नीचे छिप गए थे. बाप की ही तरह वे भी हरे व काले रंग का खास लिबास पहने हुए थे और उन के सिर पर वैसे ही रंग का कपड़ा बंधा था.

यह नजारा देख रहे लोग चिल्लाए, ‘‘जफर, पागल हो गया है तू. मार ही डालेगा क्या बच्ची को?’’

जफर ने उन की तरफ घूर कर देखते हुए कहा, ‘‘खबरदार, मेरे बीच कोई मत आना वरना भस्म कर दूंगा.’’

इस के साथ ही उस ने मासूम फरहीन का सिर जमीन पर पटकना शुरू कर दिया. उस का दिल जरा भी नहीं पसीजा. नईम बानो हैवान बने शौहर से फरहीन को बचाने आई तो उस ने उसे धक्का दे कर दूर कर दिया. फरहीन के सिर से खून बह निकला. कुछ देर के लिए उस का शरीर छटपटाया और फिर शांत हो गया. यह देख कर नईम बानो बदहवास हो गई. बाहर खड़ा कोई शख्स अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा सका. चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर पड़ोस में रहने वाले जफर के चाचा वली हुसैन भी वहां आ पहुंचे.

उस जगह का नजारा देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह घर के अंदर दाखिल हो कर जफर के नजदीक पहुंचे तो उस ने उन पर चाकू से हमला कर दिया. वली हुसैन वापस दरवाजे पर आ गए. लोग तमाशबीन बने देखते रहे. जबकि जफर पालथी मार कर फरहीन के पास बैठ गया. डरीसहमी पत्नी व दोनों बच्चे भी उस के पास बैठ गए. जफर मन ही मन कुछ बुदबुदाने लगा.

दिल दहला देने वाले इस हैरतअंगेज नजारे ने गांव वालों के रोंगटे खड़े कर दिए. इस बीच घटना की खबर पा कर स्थानीय मीडियाकर्मी भी वहां पहुंच गए. लेकिन कोई भी घर के अंदर घुसने की हिम्मत नहीं जुटा सका. गांव के चौकीदार मुकेश ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी अनिल सिरोही, एसआई अखिलेश सिंह और कुछ अन्य पुलिसकर्मी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने जफर को हिरासत में ले लिया. वह पुलिस की पकड़ से छूटने की कोशिश करते हुए बोला, ‘‘मुझे क्यों पकड़ रहे हो? मैं ने तो शैतान का कत्ल किया है. मेरी बेटी तो अभी कुछ देर में जिंदा हो जाएगी. मैं उसे जिंदा कर दूंगा.’’

मामला संगीन था. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी धर्मवीर को भी दे दी थी. बाद में पुलिस अधीक्षक (देहात) ब्रजेश श्रीवास्तव भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस ने मौका मुआयना किया और पंचनामा भर कर बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. आरोपी के घर का माहौल बिलकुल अजीब था. वहां तंत्र क्रियाओं का कई तरह का सामान मौजूद था. पुलिस ने संदिग्ध चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. फिर उस की पत्नी, बच्चों और गांव वालों से पूछताछ की.

यह घटना किसी को भी झकझोर सकती थी. पुलिस आरोपी को थाने ले आई और उस से विस्तृत पूछताछ की. जफर से हुई पूछताछ व ग्रामीणों के बयानों के बाद अंधविश्वास के साए में जी रहे एक ऐसे शख्स की कहानी निकल कर सामने आई, जिस ने अंधविश्वास में डूब कर अपने परिवार को तो तबाह कर ही दिया था, साथ ही अपना भविष्य भी बरबाद कर लिया था.

जफर उन नौजवानों में से था, जो बिना मेहनत किए बड़ेबड़े ख्वाब देखते हैं. सालों पहले जफर का विवाह नईम बानो के साथ हुआ तो वह परिवार से अलग हो गया. वक्त के साथ वह 3 बच्चों का पिता बन गया. जफर के परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. बस किसी तरह छोटेमोटे काम कर के वह परिवार की गाड़ी खींच रहा था. काम के बाद उस का बाकी का वक्त यारदोस्तों में बीतता था. गनीमत यह थी कि वह किसी बुरी आदत का शिकार नहीं था. जफर जब भी दोस्तों के बीच बैठता था, बड़ीबड़ी खयाली बातें किया करता था.

गांवदेहात के इलाकों में अंधविश्वास के अनेक रोचक किस्से होते हैं. समाज का मनोविज्ञान है कि लोग अंधविश्वास के किस्सों को रहस्य के साथ बड़ी रुचि से सुनाते हैं. इन किस्सों पर लोगों के बीच चर्चा होती है. अंधविश्वास के नकारात्मक पहलुओं पर इतनी चर्चा नहीं होती, जितनी कि इत्तेफाकिया सही हो जाने वाले मामलों की होती है. इसे लोग चमत्कार भी समझते हैं. फलस्वरूप अंधविश्वास की कहानियां बचपन से ही दिमाग में बैठनी शुरू हो जाती हैं. जफर भी अंधविश्वास का शिकार था. दोस्तों के बीच वह ऐसे किस्सों को दिल लगा कर सुनता और दिनचर्या की बातों और जीवन में आने वाली बाधाओं को अंधविश्वास से जोड़ कर देखता है.

जफर किसी भी परेशानी का शिकार होता तो वह सीधा किसी बाबा या तांत्रिक के पास जा पहुंचता. तांत्रिक उस के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उस से रुपए ऐंठ कर कभी ताबीज पकड़ा देते तो कभी भभूत. बच्चों को कोई बीमारी होती तो भी वह चिकित्सकों से ज्यादा बाबाओं पर भरोसा करता था. उसे यह समझाने वाला कोई नहीं था कि अंधविश्वास के आईने में वह यथार्थ को न भुलाए. दरअसल सुझाव का सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान होता है. यह व्यक्ति के उद्देश्य, मत, विचार एवं जीवन में भी परिवर्तन लाता है. बशर्ते सुझाव सही और उसे मानने वाला अच्छेबुरे का फर्क करना जानता हो.

जफर ने आजीविका चलाने के लिए एक बैंडबाजा मंडली में काम करना शुरू कर दिया था. इस से जो कमाई होती थी, उसी से उस का घर चलता था. इस काम में उसे आमदनी कम थी, लिहाजा वह किसी चमत्कार की उम्मीद किया करता था. तांत्रिकों के संपर्क में आने के बाद वह खुद भी अजीब ढंग से जिंदगी जीने लगा था. इस के बावजूद उस के हालत जस के तस थे. वह चाहता था कि उस के हालात अच्छे हों और जिंदगी आसान सी हो जाए.

इंसान का व्यवहार तब बदल जाता है? जब उस की उम्मीदें पूरी नहीं होतीं. जफर जिन उम्मीदों को पाले हुए था, वे मेहनत के बलबूते ही पूरी हो सकती थीं. जबकि वह अंधविश्वास में पड़ कर चमत्कार की चाहत पाले बैठा था. बैंडबाजे के काम से गुजर मुश्किल हो गई, तो जफर ने एक चिटफंड कंपनी में बतौर एजेंट काम करना शुरू कर दिया. इस से उस की पारिवारिक स्थिति थोड़ी सुधरी. उस ने अपनी जानपहचान वाले लोगों का रुपया तो कंपनी में लगवाया ही, अपनी कमाई भी उस में निवेश कर दी. यह कंपनी अपनी आकर्षक स्कीमों के जरिए तय वक्त पर लोगों को उन के निवेश का बड़ा फायदा देने का वादा करती थी. बाजारों में ऐसी चिटफंड कंपनियों की भरमार है, जो लोगों को बड़ेबड़े सपने दिखा कर रुपया बंटोरती हैं.

अधिकांशत: इन का शिकार वे लालची लोग होते हैं, जो कम वक्त में रईस बनने के सपने देखते हैं. उन्हें लगता है कि बैठेबिठाए ही उन की रकम बढ़ जाएगी, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं नहीं है. ऐसी कंपनियां मोटी रकम एकत्र होते ही चंपत हो जाती हैं. जफर जिस कंपनी में काम करता था, उस ने भी एक दिन ऐसा ही किया. कंपनी के लापता होते ही जफर दोराहे पर आ खड़ा हुआ. लोगों ने भी उस से रुपए मांगने शुरू कर दिए. इस से वह परेशान रहने लगा. परेशानी के इसी दौर में अंधविश्वास के शिकार जफर ने फिर पाखंडी तांत्रिकों का सहारा लेने की सोची.

वह तांत्रिकों से मिला तो उन लोगों ने उसे कुछ टोनेटोटके समझा दिए. साथ ही बताया कि वह सब्र से काम ले, बहुत जल्द उस की जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी. जफर के लिए यह सब किसी सुखद सपने जैसा था. इस के बाद वह लोगों से कहने लगा कि अब बहुत जल्द उस का वक्त बदलने वाला है. बेरोजगार होने के बाद जफर के पास कोई काम नहीं बचा था. वह नौजवान था. वह चाहता तो कोई भी काम कर के अपने पारिवारिक हालात को संवार सकता था, लेकिन अंधविश्वास ने उसे बुरी तरह जकड़ रखा था. निठल्ला होने की वजह से वक्त उस के लिए महायातना बन गया. कमाई धेले की नहीं थी, नतीजतन बच्चों के भूखे मरने की नौबत आ गई.

नईम बानो ने अपने पिता को खबर की. उस का मायका पीलीभीत, जहानाबाद क्षेत्र के गांव चका में था. खबर मिलते ही उस के पिता मोहम्मद अनवार मैमोर आ गए. उन्होंने रुपए दे कर मदद तो की ही, साथ ही वह जफर को समझाया भी, ‘‘बेटा, मेरी बात को गलत मत समझना. मेरी सलाह है कि कोई कामधंधा ढूंढ लो.’’

‘‘मैं बहुत जल्द सब ठीक कर दूंगा.’’ जफर ने खयाली अंदाज में आत्मविश्वास से जवाब दिया. मोहम्मद अनवार ने उस से कहा, ‘‘अगर तुम्हें ऐतराज न हो तो मैं बानो और बच्चों को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाता हूं. जब हालात सुधर जाएं तो तुम इन्हें ले आना.’’

इस बात पर जफर भड़क गया, ‘‘नहीं, यह मुझे हरगिज मंजूर नहीं है.’’

अनवार ने अपनी बात पर अडिग रहने की कोशिश की तो जफर ने चेतावनी दी कि अगर वह बच्चों को ले गए तो वह मौत को गले लगा लेगा. दामाद का इस तरह का व्यवहार देख कर अनवार बुझे मन से वापस चले गए. जफर अंधविश्वास में पूरी तरह डूब चुका था. वह तंत्र क्रियाओं में लीन रहता था. उस का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो गया था. कोई उस पर किसी तरह की टिप्पणी कर देता तो वह बुरी तरह भड़क जाता. इस के अलावा वह लोगों से छोटीछोटी बातों पर झगड़ने लगता था.

उस की इस तरह की आदत से एक तरफ जहां लोग उस से कतराने लगे थे, वहीं उस ने भी सब से दूरियां बना ली थीं. लोग तब उस से और भी डरने लगे, जब उस ने अपने चचेरे भाई मोहम्मद हुसैन से झगड़ा होने पर एक रात उस की मोटरसाइकिल को आग लगा दी और प्रचारित किया कि उस ने तंत्रमंत्र के बल पर ऐसा किया है. नईम बानो अनपढ़ महिला थी. जफर ने उसे व बच्चों को भी अपने रंग में रंग लिया था. इसी तरह वक्त बीतता गया. टोनेटोटकों से न हालात सुधरने थे और न सुधरे. जफर अजीब सी गफलत में रहने लगा. उसे लगने लगा कि उस के परिवार पर कोई शैतानी साया है, जो उसे आगे नहीं बढ़ने दे रहा. आर्थिक हालात दिनबदिन बिगड़ते जा रहे थे. जफर के घर के आर्थिक हालात मोहल्ले वालों से भी छिपे नहीं थे. वे मदद करने का प्रयास करते तो जफर उन्हें गालियां दे कर भगा देता.

स्थिति बिगड़ती गई तो उस ने एक तांत्रिक क्रिया करने का फैसला किया. इस के लिए उस ने सब से पहले पूरे परिवार के लिए काले व हरे रंग के कपड़े सिलवाए. इन कपड़ों को सभी को पहना कर वह घर में तरहतरह की क्रियाएं करता. बच्चों के सिर पर वह टोपीनुमा एक कपड़ा बंधवा देता. उस ने एक दिन पत्नी व बच्चों को समझाते हुए कहा, ‘‘किसी के भी सिर से एक सप्ताह तक यह कपड़ा नहीं उतरना चाहिए, वरना बहुत बुरा हो जाएगा. यह कपड़ा बंधा रहा तो जल्द ही मेरा वक्त सुधर जाएगा.’’

घर में पत्नी और बच्चे उस के हुक्म के गुलाम थे. सब ने ऐसा ही किया. वह बच्चों के साथ घर में घंटो बैठ कर अजीबअजीब क्रियाएं करता रहता. बच्चों व पत्नी के घर से निकलने पर भी उस ने पाबंदी लगा दी थी. 2 अक्तूबर, 2015 की दोपहर का वक्त था. जफर अपनी तंत्र क्रिया में लीन था. इसी बीच नईम बानो खाना बनाने लगी. फरहीन घर में खेलते हुए मां के पास रोटी लेने चली गई. जैसे ही वह रोटी लेने के लिए झुकी, उस के सिर से दुपट्टेनुमा बंधा कपड़ा हट गया. जफर की नजर उस पर गई तो वह आगबबूला हो उठा,‘‘यह क्या किया तू ने, सिर से दुपट्टा कैसे हट गया?’’

‘‘गलती हो गई अब्बू.’’ फरहीन ने डर कर जवाब दिया. यह सुन कर जफर गुस्से में बोला, ‘‘तू जरूर वही शैतानी साया है, जो मुझे आगे नहीं बढ़ने दे रहा. अच्छा हुआ तू पकड़ में आ गया. आज मैं तुझे सबक सिखा कर ही दम लूंगा.’’

इस के साथ ही जफर ने मासूम फरहीन को पीटना शुरू कर दिया. उस का भयानक रूप देख कर फरहीन के भाई पिटाई के डर से तख्त के नीचे छिप गए. नईम बानो ने बेटी को बचाने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन जफर ने आखिर उसे बेरहमी से मार ही डाला. पूछताछ में पता चला कि जफर की इस कहानी से पुलिस भी हैरान थी. आर्थिक परेशानियों और अंधविश्वास की वजह से जफर की हालत पागलों जैसी हो गई थी. पुलिस ने उस के खिलाफ गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज किया. अगले दिन उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

जफर ने मेहनत कर के जिंदगी को संवारा होता और अंधविश्वास में न पड़ा होता तो ऐसी नौबत कभी न आती. कथा लिखे जाने तक जफर की जमानत नहीं हो सकी थी. उस की पत्नी व बच्चे नातेरिश्तेदारों की रहमोकरम पर पल रहे थे. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Kahani: गुनाह जो माफी लायक नहीं

Crime Kahani: कोकीन की लत लग जाने से रोनाल्ड के ऊपर काफी कर्ज हो गया था. इस कर्ज को उतारने और अपनी लत को पूरा करने के लिए उस ने प्रेमिका के साथ जो घिनौना अपराध किया, वह सचमुच माफी के लायक नहीं है.

रात के साढ़े 11 बजे बौब फ्लारडे घर लौटा तो दरवाजे पर उस ने पत्नी को इंतजार करते पाया. उसदिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, इसलिए उसे हैरानी हुई. वह कुछ कहता, उस से पहले ही पत्नी ने पूछा, ‘‘तान्या कहां है?’’

‘‘तान्या?’’ फ्लारडे ने जवाब देने के बजाय चौंक कर सवाल किया, ‘‘क्या तान्या अभी तक घर नहीं आई है?’’

‘‘नहीं, मुझे तो लग रहा था कि तुम उसे साथ ले कर आओगे?’’ मिसेज फ्लारडे ने कहा.

‘‘हां, इरादा तो यही था. उसे क्लब के बाहर छोड़ते हुए मैं ने कहा भी था कि पार्टी खत्म होने पर मैं उसे लेने आ जाऊंगा, पर उस ने मना कर दिया था. उस ने कहा था कि वह अपनी किसी सहेली के साथ घर आ जाएगी.’’

‘‘उस का क्या, तुम्हें सोचना चाहिए था. जवान बेटी का इतनी रात गए घर से बाहर रहना क्या ठीक है?’’ मिसेज फ्लारडे ने चिंता व्यक्त की.

‘‘हमारी बेटी समझदार है, किसी सहेली के यहां चली गई होगी. चलो, उस के मोबाइल पर फोन कर के पूछते हैं कि वह कहां है?’’

बौब फ्लारडे ने ड्राइंगरूम में जा कर वहां रखे लैंडलाइन फोन से तान्या के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन उस के मोबाइल का स्विच औफ था, इसलिए बात नहीं हो सकी. उन्होंने कई बार फोन किया, हर बार जवाब यही मिला कि फोन का स्विच औफ है. बौब फ्लारडे परेशान हो उठे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी रात को वह बेटी को ढूंढ़ने कहां जाएं. जवान बेटी थी, कहीं कोई हादसा न पेश आ गया हो?

यह सोच कर उन का कलेजा कांप उठा. उन्होंने तुरंत जूलियन बिस्त्रे क्लब को फोन किया. पार्टी वहीं थी. काफी देर तक घंटी बजने के बाद फोन उठा तो फ्लारडे ने बेचैनी से पूछा, ‘‘हैलो, बिस्त्रे क्लब?’’

‘‘जी, कहिए?’’ दूसरी तरफ से किसी ने कहा.

‘‘तुम्हारे यहां शाम को स्कूली बच्चों की एक पार्टी थी, क्या वह खत्म हो गई?’’

‘‘पार्टी तो कब की खत्म हो गई, सब बच्चे चले भी गए हैं.’’

‘‘क्या कोई लड़की अभी…?’’ फ्लारडे अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए कि दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘अब यहां कोई नहीं है, सिवाय मेरे.’’

‘‘तुम वहां क्या कर रहे हो?’’ फ्लारडे ने पूछा.

‘‘मैं यहां का चौकीदार हूं,’’ उस व्यक्ति ने तल्खी से कहा, ‘‘शायद अब यह बताने की जरूरत नहीं होगी कि मैं यहां क्या कर रहा हूं?’’

‘‘तुम मेरी बात का बुरा मन गए,’’ फ्लारडे ने विनम्रता से कहा, ‘‘माफ करना, मैं अपनी बेटी को ले कर परेशान हूं. उस का नाम तान्या है, क्या उसे किसी के साथ देखा है?’’

‘‘सौरी, पार्टी के बाद कौन किस के साथ गया, इस की जानकारी मुझे नहीं है. मेरी ड्यूटी तो क्लब बंद होने के बाद शुरू होती है.’’ चौकीदार ने कहा और फोन काट दिया.

इस के बाद फ्लारडे को ऐनी की याद आई. वह तान्या के साथ ही पढ़ती थी. पार्टी में वह भी गई थी. वह फ्लारडे के खास दोस्त और उन के रेस्तरां के खानसामा के पार्टनर थौमस को बेटी थी. उन्होंने थौमस को फोन किया. पता चला कि वह तो सवा 11 बजे ही घर आ गई थी. उस समय वह सो रही थी. वहां से भी मायूसी ही हाथ लगी. अब एक और व्यक्ति बचा था, जो तान्या के बारे में जानकारी दे सकता था. वह था स्कूल का वार्डन नेड कैली. उसी की निगरानी में स्कूल के बच्चों की यह फेयरवेल पार्टी आयोजित की गई थी.

फ्लारडे ने नेड को फोन किया. काफी देर बाद उस ने फोन रिसीव किया तो फ्लारडे ने जब उसे बताया कि तान्या अभी तक घर नहीं पहुंची है तो वह चौंका. उस ने हैरानी से कहा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? जब मैं क्लब से घर के लिए निकला था तो वह क्लब में ही थी.’’

‘‘क्या तुम पार्टी खत्म होने से पहले ही चले गए थे?’’

‘‘दरअसल, 11 बजे मेरी पत्नी का फोन आया तो मुझे वहां से निकलना पड़ा. लेकिन तब तक पार्टी खत्म हो चुकी थी. काफी बच्चे जा भी चुके थे. मुझे लगा कि बच्चे समझदार हैं, इसलिए मैं ने उन की सुरक्षा की जरूरत महसूस नहीं की. बहरहाल आप परेशान मत होइए, मैं आ रहा हूं.’’

करीब आधे घंटे बाद नेड आ पहुंचा. इस बीच फ्लारडे ने अपने कुछ परिचितों और तान्या की सहेलियों को फोन कर के उस के बारे में पता किया था, लेकिन कहीं से उस के बारे में कुछ पता नहीं चला था.फ्लारडे नेड को अपना शुभचिंतक मानता था और उस पर विश्वास भी करता था. इसीलिए उसे तान्या का ट्यूटर भी नियुक्त किया था. नेड के आते ही वह अपने आंसू नहीं रोक सका और रोते हुए बोला, ‘‘यह क्या हो गया नेड, कहां है मेरी बेटी?’’

‘‘धीरज रखो मि. फ्लारडे. तान्या मिल जाएगी. मेरे खयाल से पुलिस को इत्तिला कर देनी चाहिए.’’

13 जून, 2003 की रात करीब 3 बजे फ्लारडे और नेड पास ही स्थित हाईवे पुलिस चौकी पहुंचे और ड्यूटी औफिसर को तान्या की फोटो दे कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत शहर के सभी पुलिस स्टेशनों में तान्या का फोटो सहित हुलिया प्रेषित कर उस की तलाश में सहयोग की अपील की. तान्या दक्षिण अफ्रीका के रैडबर्ग सिटी, जोहानेसबर्ग के रहने वाले बौब फ्लारडे की एकलौती संतान थी. 18 साल की खूबसूरत तान्या चंचल और हंसमुख स्वभाव की थी. वह 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. पढ़ाई के साथसाथ वह पिता के रेस्तरां में भी उन का हाथ बंटाती थी.

उस की लगन और कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश को देखते हुए फ्लारडे उसे बतौर मैनेजर ट्रेनिंग दे रहे थे, ताकि वह अपने व्यवसाय को अच्छी तरह संभाल सके. उस के दोस्तों की संख्या ज्यादा नहीं थी. उस का किसी लड़के से प्रेम संबंध भी नहीं था. सुबह 8 बजे फ्लारडे फिर पुलिस स्टेशन जा पहुंचा. उसे उम्मीद थी कि पुलिस को तान्या के बारे में कुछ न कुछ पता चल ही गया होगा. तब तक चौकीइंचार्ज महिला इंसपेक्टर क्रिस्टीले सटीन होवे अपनी ड्यूटी पर आ चुकी थीं. उन्होंने तान्या की गुमशुदगी के बारे में सारी जानकारी ले ली थी. क्रिस्टीले ने फ्लारडे को धीरज बंधाते हुए कहा कि वह तान्या को खोजने की हर मुमकिन कोशिश करेंगी.

ठीक उसी समय किसी हेनीर रीडर ने फोन पर सूचना दी कि डैरनवुड स्थित हिलबरोव झील पर एक पेड़ के नीचे एक लड़की की लाश पड़ी है. क्रिस्टीले तुरंत सहकर्मियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गईं. उन्होंने फ्लारडे को भी साथ ले लिया था. वहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा. वहां एक लड़की की लाश औंधे मुंह पड़ी थी. लाश पर कुछ मिट्टी और पेड़ के सूखे पत्ते पड़े थे, जिन्हें हटा कर क्रिस्टीले लाश का निरीक्षण करने लगीं. मृतका के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. उस की उम्र 17-18 साल थी. उस के पूरे शरीर पर चोटों के निशान थे, गले में नायलौन की रस्सी बंधी थी. संभवत: उसे उसी रस्सी से गला घोंट कर मारा गया था.

मृतका की हालत देख कर ही पता चला रहा था कि उस के साथ हत्या से पूर्व कई लोगों द्वारा दुष्कर्म किया गया था. उस की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. क्रिस्टीले को वह लाश तान्या की लगी, इसलिए उन्होंने अब तक फ्लारडे को लाश नहीं दिखाई थी. लाश को चादर से ढक कर सिर्फ उस का चेहरा फ्लारडे को दिखाया गया तो वह फूटफूट कर रोने लगा. उस के इस तरह रोने से ही साफ हो गया कि लाश उस की बेटी तान्या की थी. आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्टपार्टम के लिए भिजवा दिया गया. इस के बाद फ्लारडे से जब पूछा गया कि उसे किसी पर शक है तो उस ने रोते हुए स्पष्ट कहा कि उसे नहीं लगता कि उस की बेटी ने आज तक किसी का कुछ बिगाड़ा है. वह बेहद मासूम थी. उस की संगत भी गलत नहीं थी. जाने किस ने उस की बेटी के साथ…?

जब तान्या के ट्यूटर नेड कैली के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि वह ऐसा कतई नहीं कर सकता. लेकिन पुलिस को उसी पर शक था. इस का कारण यह था कि उस की उम्र अभी 25-26 साल थी. वह तान्या के स्कूल का वार्डन होने के साथसाथ ट्यूटर भी था. तान्या खूबसूरत लड़की थी. संभव था कि पढ़ाई के दौरान दोनों के बीच नजदीकी बढ़ने के साथ शारीरिक संबंध भी बन गए हों. इस के बाद किसी बात को ले कर दोनों के रिश्ते में खटास आ गई हो और नेड ने दुष्कर्म कर के उस की हत्या कर दी हो. यह भी संभव था कि नेड तान्या से एकतरफा प्रेम करने लगा हो और तान्या ने उस के प्रेम को स्वीकार न किया हो. बदले में उस ने जबरदस्ती कर के उस का कत्ल कर दिया हो?

लेकिन तान्या की हत्या करना अकेले नेड के बस की बात नहीं थी. इसलिए इस मामले में उस के कुछ अन्य साथी भी रहे होंगे. नेड ने उन्हें दौलत और तान्या के कुंवारे जिस्म को भोगने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया होगा. उसी दिन शाम को तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, मरने से पहले तान्या से 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. वह पुरुष संसर्ग की आदी नहीं थी. उस के शरीर पर किसी तेजधार हथियार से वार किए गए थे. उस के साथ मारपीट की गई थी, उस के बाद नायलौन की रस्सी से गला घोंट कर उस की हत्या की गई थी. उस की मौत दम घुटने से हुई थी. उस के गले पर रस्सी के निशान थे.

फ्लारडे को नेड पर विश्वास था. इस के बावजूद नेड को शक के आधार पर पुलिस चौकी बुला कर कई दौर में पूछताछ की गई. इस पूछताछ में कोई भी तथ्य सामने नहीं आया, जिस से उस पर किए जाने वाले शक की पुष्टि होती. पूछताछ में पता चला कि कुछ समय पहले ही उस की शादी हुई थी. उस की पत्नी काफी सुंदर थी. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. नजदीकी होने के बावजूद नेड कभी तान्या के प्रति गलत विचार मन में नहीं लाया. तान्या को ही नहीं, किसी भी लड़की को उस ने बुरी नजरों से नहीं देखा. वह स्कूल का वार्डन था और अपने कर्तव्य का निर्वाह ईमानदारी से कर रहा था. नेड से पता चला कि घटना वाली रात तान्या पार्टी में अकेली आई थी. क्लब से जाते समय उस ने तान्या को पार्टी में देखा था.

तान्या के दुष्कर्म और हत्याकांड की गुत्थी उलझती जा रही थी. अब जांच के लिए 2 ही चीजें बची थीं, एक तान्या का मोबाइल फोन और दूसरा जुलियन बिस्त्रे क्लब. तान्या के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई. उस से पता चला कि घटना की रात तान्या ने न तो किसी को अपने मोबाइल से फोन किया था और न ही उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. हां, उस ने रात करीब डेढ़ बजे अपनी एक सहेली को एसएमएस जरूर भेजा था कि मैं सुरक्षित हूं. वहीं रात भर उस का मोबाइल बंद था, लेकिन उस के मोबाइल सेटर का सिमकार्ड बदला गया था.

इस से भी कोई सार्थक जानकारी नहीं मिली. अब क्लब को जांच का लक्ष्य बनाया गया. जुलियन बिस्त्रे क्लब शहर के बीचोबीच स्थित था. पुलिस टीम ने 13 जून, 2003 को क्लब में हुई पार्टी व अन्य गतिविधियों की जांच की. इस जांच में पता चला कि तान्या ने रात करीब 11 बजे क्लब से एक फोन किया था. टेलीफोन एक्सचेंज से पता चला कि वह फोन रोनाल्ड एडवर्ड ग्रीम्सली को किया गया था. रोनाल्ड का पता भी मिल गया था. वह फोंटने ब्ल्यू स्थित एक छोटे से मकान में रहता था. कुछ पुलिसकर्मी उस के घर भेजे गए तो वहां ताला बंद मिला. आसपड़ोस वालों को भी उस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. उन लोगों को सिर्फ इतना पता था कि वह किसी विज्ञापन फिल्में बनाने वाली कंपनी में काम करता था.

रोनाल्ड पूरी तरह शक के घेरे में आ गया था. फ्लारडे से रोनाल्ड के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया, ‘‘हां, एक बार तान्या ने मुझे उस से मिलवाया था. उस ने कहा था कि वह उस का अच्छा दोस्त है. लेकिन तान्या को मैं ने उस के साथ कहीं आतेजाते नहीं देखा था.’’

शहर भर की सभी उन फिल्म कंपनियों को खंगाला गया, जो मुख्य तौर पर विज्ञापन फिल्में बनाती थीं. इस बीच रोनाल्ड के घर जब भी दबिश दी गई, दरवाजे पर ताला ही लटका मिला. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. आखिर 18 जुलाई, 2003 को वह पुलिस की पकड़ में आ गया. उस से पूछताछ की जाने लगी तो वह चुप रहा. वह एक शब्द भी नहीं बोला. लेकिन उस के चेहरे के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह किसी राज को दिल की गहराई में छिपाए है. जब उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाला गया तो उस ने बेहद गंभीर स्वर में सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘हां, मैं गुनहगार हूं. मैं ने ही तान्या के साथ दुष्कर्म किया है और फिर गला दबा कर उसे मार दिया है.’’

काफी कोशिश के बाद भी उस ने यह नहीं बताया कि उस ने ऐसा क्यों किया? तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया था कि उस के साथ 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. संभवत: वे भी उस की हत्या में शामिल थे. लेकिन रोनाल्ड ने इस बारे में जुबान नहीं खोली. इस से यही लगा कि या तो रोनाल्ड बेहद शातिर है या फि वह किसी से डरासहमा है. खैर, अपराध स्वीकार करने के बाद रोनाल्ड को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. लेकिन तान्या के साथ दुष्कर्म और उस की हत्या का कारण रहस्य ही बना रहा.

रोनाल्ड ने जेल में कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की. एक बार उस ने ब्लेड से अपने हाथ की नसें काट डालीं तो दूसरी बार चादर से गला घोंटने की कोशिश की. दोनों बार उसे बचा लिया गया, लेकिन मानसिक तनाव की वजह से वह कोमा में चला गया. इस के बाद बैरक में रखे उस के सामान की तलाश ली गई तो उस में एक पत्र मिला, जिस में उस ने तान्या के पिता फ्लारडे को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘‘मुझे 13 जून के लिए माफ कर देना. खुद को जीवित रखने के लिए मुझे तान्या की हत्या करनी पड़ी थी.’’

इस पत्र ने केस को और पेचीदा बना दिया था. शायद यह उस का सुसाइड नोट था. इस से लगता था कि रोनाल्ड की कोई मजबूरी रही होगी, जिस की वजह से उस ने तान्या की हत्या की थी, वरना वह ऐसा करना नहीं चाहता था. अब पुलिस को इसी तथ्य को उजागर करना था, लेकिन रोनाल्ड कोमा में था. करीब 2 महीने बाद रोनाल्ड कोमा से बाहर आया तो उसे देख कर लगता था कि वह काफी हताश है, अपराधबोध में जकड़ा हुआ है. उस से जब हमदर्दी जताते हुए उस की दुखती रग को दबाया गया तो सचाई उस के मुंह से बाहर आ गई.

उस ने नजरें नीची कर के कहा, ‘‘मैं पिछले 9 सालों से कोकीन का आदी था. इसी वजह से अकसर मेरे पास पैसों की तंगी रहती थी. नशे के सौदागरों का काफी कर्ज मुझ पर चढ़ गया था.’’ इतना कह कर रोनाल्ड रुका. फिर उस ने एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, ‘‘उस दिन मेरे पास कोकीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे. नशे के बिना मैं काफी बेचैनी महसूस कर रहा था. मैं चुटकी भर कोकीन के लिए कोकीन बेचने वालों के सामने गिड़गिड़ाया, पर उन्होंने नहीं दी. उलटा कर्ज चुकाने को कहा और धमकी दी कि अगर मैं ने उन के पैसे नहीं दिए तो वे मुझे मार डालेंगे. तब कोकीन और कर्ज की खातिर मैं ने उन से एक डील कर ली.’’

‘‘कैसी डील?’’ इंसपेक्टर क्रिस्टीले ने पूछा.

रोनाल्ड ने चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू भरे थे. वह बोझिल आवाज में बोला, ‘‘उन्होंने कहा कि अगर मैं किसी लड़की के साथ अपनी ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे दूं तो न केवल वे मेरा सारा कर्ज माफ कर देंगे, बल्कि मुझे नशे की लत को पूरा करने के लिए काफी पैसे भी देंगे. नशे की लत और जिंदगी की चाहत ने मुझे हैवान बना दिया. मैं ने अपनी ही चाहत को दागदार कर के उस की हत्या कर दी.’’

इतना कह कर रोनाल्ड फफकफफक कर रोने लगा. यहां जानने वाली बात यह है कि लड़कों से दूर भागने वाली तान्या करीब 6 महीने पहले रोनाल्ड से मिली थी. तान्या ने उस में न जाने ऐसा क्या देखा था कि उस के दिल में हलचल सी मच गई थी. उस ने इस के पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था. रोनाल्ड की नजर भी उसी पर जमी थी. पहली नजर और पहली मुलाकात में ही तान्या और रोनाल्ड एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

तान्या की तरह रोनाल्ड भी सभ्य व संस्कारी था, पर उस में एक कमी यह थी कि उसे कोकीन के नशे की लत लग गई थी. बस, इसे छोड़ कर उस में और कोई कमी नहीं थी. उस की इस आदत को तान्या नहीं जान पाई थी. दोनों अकसर मिलने लगे थे. लेकिन मिलने में वे इतनी सावधानी बरतते थे कि कभी किसी को उन के प्यार का पता नहीं चल सका.

रोनाल्ड थोड़ा सामान्य हुआ तो उस ने आगे कहा, ‘‘13 जून को कोकीन न मिलने की वजह से मेरी सांसें घुटी जा रही थीं. हाथपांव कांप रहे थे. मौत नजदीक आती दिखाई दे रही थी. पार्टी के बाद तान्या ने मुझ से मिलने का वादा किया था. रात करीब 11 बजे तान्या का फोन आया तो मुझे जैसे जिंदगी मिलती नजर आई. मेरा जमीर उस पल मर गया और मैं ने एक ऐसा फैसला ले लिया, जिस के बारे में मैं ने कभी सोचा भी नहीं था. मैं इंसान से हैवान बन गया. कुछ सोच कर मैं उसे लेने क्लब चला गया और मैं उसे ले कर अपने घर आ गया.’’

रोनाल्ड ने तान्या के आने की जानकारी कोकीन सप्लाई करने वाले नाइजीरियन सौदागरों को दे दी थी. उस ने कोकीन की एक पुडि़या के लिए उन से वादा कर लिया था कि वह प्रेमिका के साथ ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे देगा. तान्या रोनाल्ड के घर पहुंची तो उन नाइजीरियन युवकों को देख कर डर गई. लेकिन अब तो वह फंस चुकी थी. उन्होंने उस से कपड़े उतारने को कहा तो उस ने अपने प्रेमी रोनाल्ड की तरफ देखा. वह समझ नहीं पा रही थी कि रोनाल्ड को यह क्या हो गया है?

तान्या ने विरोध किया तो नाइजीरियन युवकों ने उस के साथ मारपीट की. इस के बाद चाकू की नोक पर उस के हाथपैर बांध कर सोफे पर डाल दिया. रोनाल्ड उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा तो वे उस की फिल्म बनाने लगे. रोनाल्ड के बाद उन दोनों ने भी तान्या के साथ जबरदस्ती की. अब तक तान्या अधमरी सी हो चुकी थी. उस के जीवित रहने से तीनों फंस सकते थे, इसलिए वहां पड़ी नायलौन की रस्सी से उस का गला घोंट दिया गया.

इस के बाद तीनों रात के अंधेरे में तान्या की लाश को झील के पास स्थित एक पेड़ के नीचे फेंक आए. दोनों नाइजीरियन अपना कैमरा ले कर चले गए तो रोनाल्ड को होश आया. वह कांप उठा कि उस ने यह क्या कर डाला? मगर अब क्या हो सकता था. वह पुलिस के डर से छिपता भागता रहा, लेकिन कब तक भागता फिरता, आखिर पकड़ा गया. इस के बाद पुलिस ने दोनों नाइजीरियन युवकों को पकड़ने की काफी कोशिश की, लेकिन वे पकड़े नहीं जा सके. 2 सालों तक मुकदमा चला.

17 जुलाई, 2005 को जोहानेसबर्ग कोर्ट के जज बेनडस्टन ने दुष्कर्म, हत्या, चोरी और अश्लील फिल्म बनाने के आरोप में रोनाल्ड को 18 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई. इस बीच रोनाल्ड का नशा छुड़ाने का इलाज भी चलता रहा. सजा के दौरान रोनाल्ड की कोकीन की लत छूट गई. जेल में वह ज्यादातर बाइबल पढ़ता रहता था. उस के चालचलन के मद्देनजर जेल प्रशासन ने उस की सजा कम करने की गुजारिश की, लेकिन रोनाल्ड ने अपने ऊपर किसी तरह का रहम न किए जाने की बात कही.

उस का कहना था कि उस ने जो गुनाह किया है, उस के लिए उसे मौत की सजा मिलनी चाहिए.  अब वह आत्मग्लानि का बोझ ले कर जीना नहीं चाहता. उस के चालचलन को देखते हुए फरवरी, 2015 में उस की बाकी सजा माफ करते हुए कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया. लेकिन 25 मार्च, 2015 को उस ने कोर्ट से अपील की कि उसे मौत की सजा दे दी जाए. लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इस के बाद 14 मई, 2015 को उस ने दोबारा अपील की है कि उसे ताउम्र कैद की सजा दी जाए. उस की इस अपील पर अभी तक फैसला नहीं हुआ है. Crime Kahani

 

Hindi Crime Story: आशिकी का अंजाम

Hindi Crime Story: तुलसीराम से शादी हो जाने के बाद भी कीर्तिबाला ने पुराने प्रेमियों से मिलना जारी रखा. 3 बच्चों की मां बनने के बावजूद भी उस ने आशिकी का ऐसा खेल खेला कि उसे जेल जाना पड़ा.

23 सितंबर, 2015 की सुबह इंदौर के थाना ऐरोड्रम के थानाप्रभारी बलजीत सिंह अपने औफिस में पहुंचे ही थे कि लक्ष्मीबाई अपनी 9 साल की भतीजी चांदनी को ले कर उन के पास पहुंची. वह इलाके के ही अखंडनगर में रहती थी. उस का भाई तुलसीराम पिछले कई दिनों से लापता था. तुलसीराम शादीविवाह के कार्यक्रमों में खाना बनाने का ठेका लेता था. लक्ष्मीबाई के अनुसार, उस की भाभी कीर्तिबाला ने उसे बताया था कि तुलसीराम किसी शादी में खाना बनाने की बात कह कर गए हैं. जबकि यह बात सही नहीं है. हकीकत में कीर्तिबाला ने कुछ युवकों के साथ मिल कर तुलसीराम को मार डाला है और लाश को औटो में रख कर कहीं फेंक दिया है. मामला बेहद गंभीर था. थानाप्रभारी ने लक्ष्मीबाई से पूछा, ‘‘तुलसीराम की हत्या होने की बात तुम इतने दावे के साथ कैसे कह रही हो?’’

‘‘मैं यह सब इस आधार पर कह रही हूं कि मुझे इस बच्ची ने बताया है. यह तुलसीराम की बेटी है. इस ने अपनी आंखों के सामने पिता का कत्ल होते देखा है. आप इस से खुद मालूम कर सकते हैं.’’ लक्ष्मीबाई ने थानाप्रभारी को बताया.

बलजीत सिंह ने 9 साल की बच्ची चांदनी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछा तो उस ने पिता की हत्या किए जाने की सच्चाई उन्हें बता दी. इस के बाद बलजीत सिंह ने पूरे मामले से एसपी (सिटी) आर.एस. घुरैया को अवगत करा दिया. उन के निर्देश पर उन्होंने एक पुलिस टीम बनाई. इस पुलिस टीम ने सब से पहले तुलसीराम की पत्नी कीर्तिबाला को हिरासत में ले कर उस से पूछताछ की. पहले तो वह पुलिस को गुमराह करती रही, लेकिन सख्ती करने पर उस ने पति की हत्या का राज उगल दिया. उस से की गई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने उसी दिन उस के प्रेमी विशाल जगताप, संजय सिंघल उर्फ चिंटू, संदीप जाधव और औटोचालक विशाल चालसे को गिरफ्तार कर लिया.

थाने में जब पांचों अभियुक्तों का एकदूसरे से सामना हुआ तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उन की कहानी अब खत्म हो चुकी है. पुलिस ने उन सभी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए तुलसीराम की हत्या की जो कहानी बयां की, वह इस प्रकार थी. कीर्तिबाला मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी. उस के मातापिता दोनों ही काम पर जाते थे. घर की बड़ी बेटी होने की वजह से कीर्ति ही अपने अन्य भाईबहनों की देखभाल करती थी. कीर्ति जब जवानी में पहुंची तो मोहल्ले के आवारा किस्म के कई युवक उस पर डोरे डालने लगे. उन में से एक युवक कीर्ति का दूर का रिश्तेदार भी था. उस युवक का कीर्ति के घर काफी आनाजाना था.

कीर्ति उस पर विश्वास करती थी. वह मौका मिलने पर कीर्ति के साथ छेड़छाड़ करता था. लेकिन रिश्तेदार होने की वजह से कीर्ति ने न तो उस का विरोध किया और न ही इस की शिकायत अपने मांबाप से की. इस से उस युवक की हिम्मत बढ़ती गई. कीर्ति उम्र के जिस पड़ाव से गुजर रही थी, वह बड़ा ही फिसलनभरा होता है. उस रिश्तेदार की बातों में फंस कर कीर्ति फिसल गई. इस के बाद तो वह अपने मोबाइल पर उसे अश्लील फिल्में दिखाने लगा. उसी दौरान उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. इस के बाद यह सिलसिला बन गया.

फिर तो कीर्ति ऐसी बहकी कि उस के मोहल्ले के कई लड़कों से नाजायज संबंध हो गए. लेकिन जब बेटी के बहके कदमों की जानकारी मातापिता को हुई तो उन्होंने बिना देरी किए कीर्ति की शादी तुलसीराम के साथ कर दी. यह 10 साल पहले की बात है. तुलसीराम इंदौर के अखंडनगर में रहता था. वह शादीविवाह में ठेके पर खाना आदि बनवाने का काम करता था. उस के साथ इस काम में और भी लोग जुड़े थे. इसलिए उस के पास साल भर काम रहता था. इस से उसे अच्छीखासी कमाई हो जाती थी. चूंकि अपने काम की वजह से वह रातों को घर से बाहर रहता था, इसलिए कीर्ति को उस का यह काम पसंद नहीं था. वह चाहती थी कि पति ऐसा कोई काम करे, जिस से शाम को वह घर लौट आया करे.

इस बारे में कीर्ति ने बात की तो तुलसीराम कोई दूसरा काम करने के लिए राजी नहीं हुआ. वह अपना वही काम करता रहा. रातरात भर जागने के बाद तुलसी सुबह थकाहारा घर लौटता और गहरी नींद सो जाता. कीर्ति इसे पति की बेरुखी समझती. उसे तो कमउम्र में ही शारीरिक संबंध की लत लग गई थी. पति की बेरुखी पर उस ने जल्द ही अपने मायके के पुराने प्रेमियों से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा. देखतेदेखते कीर्ति एक बेटी और 2 बेटों की मां बन गई. तुलसीराम के साथ कृष्णबाग कालोनी में रहने वाला संजय उर्फ चिंटू भी काम करता था. काम के सिलसिले में वह अकसर तुलसी के घर आताजाता रहता था. चिंटू अविवाहित था. कीर्ति के सौंदर्य ने उसे पहली ही नजर में अपना दीवाना बना दिया था. इसलिए वह जब भी उस के घर आता, उस से अधिक से अधिक बातें करने के फेर में रहता.

कीर्ति तो इस खेल की पुरानी खिलाड़ी थी. इसलिए वह जल्द ही उस की नजरों को भांप गई. ॐस ने भी उसे आमंत्रण देते हुए उस के मन की आग को हवा देनी शुरू कर दी. चिंटू जब कभी कीर्ति के घर आता, उस से हंसीमजाक करता. उस की हंसीमजाक का वह उसी के अंदाज में जवाब देती थी. इस से वे एकदूसरे के करीब आते चले गए और फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों की इच्छाएं पूरी हो गईं. उस दिन के बाद चिंटू और कीर्ति दुनिया से नजरें बचा कर इस अनैतिक रास्ते पर चल पड़े. चिंटू का एक दोस्त था विशाल जगताप. चिंटू ने कीर्ति के साथ अपने संबंधों की कहानी विशाल को सुनाई तो उस ने भी चिंटू के साथ कीर्ति के घर आनाजाना शुरू कर दिया. क्योंकि कीर्ति के किस्से वह भी अन्य लोगों से सुन चुका था.

इसलिए उस से संबंध बनाने की उस की भी लालसा जाग उठी थी. नएनए लड़कों से संबंध बनाने की कीर्ति की लत लग चुकी थी. उस ने जल्द ही विशाल को भी अपने सांचे में उतार लिया. फिर एक समय ऐसा आया कि चिंटू और विशाल अकसर कीर्ति के पास आने लगे. कीर्ति की बेटी चांदनी 9 साल की हो चुकी थी. इतनी बड़ी बेटी से कीर्ति को न कोई शरम थी और न कोई डर. वह बेटी को बाहर के कमरे में बैठा कर अपने प्रेमियों के साथ दरवाजा बंद कर के मौजमस्ती करती थी. लेकिन कहते हैं कि पाप ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता.

आखिर कीर्ति के अवैध संबंधों की जानकारी तुलसीराम को किसी तरह हो ही गई. पत्नी की सच्चाई जान कर तुलसीराम को बड़ा दुख हुआ. उस ने कीर्ति को समझाया. लेकिन वह कहां मानने वाली थी. तुलसीराम को इस बात की चिंता थी कि मां की गलत आदतों का असर बेटी चांदनी पर न पड़े. इसलिए वह बेटी को अकसर समझाता रहता था. चांदनी भी मां की हरकतों की जानकारी तुलसी को देती रहती थी, जिस से वह परेशान रहने लगा. तब उस ने न केवल कीर्ति पर सख्ती बरतनी शुरू की, बल्कि चेतावनी दी कि यदि उस ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह आत्महत्या कर लेगा.

इन बातों का कीर्ति पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था. उस का अपने प्रेमियों से पहले की ही तरह मिलनाजुलना जारी रहा. रोज नए युवकों के साथ वक्त बिताना उस की जैसे आदत बन चुकी थी. पति की रोजरोज की किचकिच से वह उकता गई. एक तरह से उसे अब पति में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी. वह उस से निजात पाना चाहती थी, ताकि उस से कोई टोकाटाकी न कर सके. कीर्ति ने पति की लाखों रुपए की संपत्ति पहले ही अपने नाम करा ली थी. इस के बाद उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए अपने प्रेमी विशाल से बात की. विशाल ने उस से वादा किया कि तुलसीराम की हत्या के बाद वह उस से शादी कर लेगा.

यह काम विशाल अकेले नहीं कर सकता था, लिहाजा उस ने इस काम को अंजाम देने के लिए अपने 2 दोस्तों, चिंटू और संदीप को भी राजी कर लिया. फिर योजना बना कर कीर्ति ने एक दिन विशाल, चिंटू और संदीप को अपने यहां बुला कर एक कमरे में छिपा दिया. रात को तुलसीराम घर लौटा तो खाना खाने के बाद वह बिस्तर पर जा कर लेट गया. थोड़ी देर में उसे नींद आ गई. तभी कीर्ति भी उस के पास जा कर लेट गई. कीर्ति ने पहले तो पति को हिलाडुला कर देखा कि वह सो रहा है या जाग रहा है? जब तुलसीराम ने कोई हरकत नहीं की तो उस ने फटाफट अपना दुपट्टा उतार कर पति के गले में लपेट दिया और उस के दोनों सिरे पलंग के दोनों ओर लटका दिए.

इस के बाद उस के आवाज देने पर उस के दोनों प्रेमी विशाल और चिंटू कमरे में आ गए. आते ही उन्होंने दुपट्टे के दोनों सिरे खींचने शुरू कर दिए तो संदीप तुलसीराम के पैरों पर बैठ गया. उसी समय तुलसीराम की बेटी चांदनी की आंखें खुल गईं. वह उन तीनों को पहचानती थी. पिता को तड़पता देख कर वह चीखी तो कीर्ति ने झट से उस का मुंह बंद कर लिया और 2 थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिए.

इस के बाद वह उसे किचन में ले गई. वह उसे डराते हुए बोली, ‘‘खबरदार, किसी को बताया तो तुझे भी मार डालूंगी.’’

मां की धमकी से बच्ची डर गई. तुलसीराम की हत्या करने के बाद उन्हें लाश ठिकाने लगानी थी. इस के लिए उन्होंने लाश को बांध कर विशाल के औटो में रख दिया. लाश को ये नैनोद के पास ले गए और वहीं पर बने एक ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर लाश उस में डाल दी. इन का सोचना था कि लाश वहां से काफी दूर बह जाएगी और पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाएगी.

बेटी कहीं मुंह न खोल दे, इसलिए कीर्ति अगले दिन भी उसे डराती रही. उसी दिन दोपहर के समय तुलसीराम का भाई शिवकुमार और बहनोई घर आए तो उन्होंने कीर्ति से तुलसीराम के बारे में पूछा. तब कीर्ति ने उन्हें बताया कि वह किसी शादी में खाना बनाने गए हैं. वहां मौजूद चांदनी उन्हें सचाई बताना चाहती थी, लेकिन जब उस ने कीर्ति की तरफ देखा तो मां ने आंखें तरेरी तो वह डर गई. कीर्ति ने पति को ठिकाने लगाने वाली बात अपनी मां वंदना को भी बता दी थी. नानी वंदना ने भी चांदनी को पीटा और कहा कि अगर उस ने किसी से कुछ बोला तो उसे भी मार कर कहीं फेंक देंगे. शाम को तुलसीराम की बहन लक्ष्मीबाई घर आई तो वह चांदनी को अपने घर ले गई. तब चांदनी ने बुआ को सारी बात बता दी.

अगले दिन सुबहसुबह लक्ष्मीबाई चांदनी को ले कर थाना ऐरोड्रम पहुंची और थानाप्रभारी बलजीत सिंह को पूरी कहानी बता दी. हत्या का खुलासा होने पर डीआईजी संतोष कुमार सिंह और एसपी (पश्चिमी) डी. कल्याण चक्रवर्ती भी थाने पहुंच गए. उन्होंने भी अभियुक्तों से पूछताछ की. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर तुलसीराम की लाश बरामद कर ली. पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा संकलन तक तुलसीराम के तीनों बच्चे अपनी बुआ के पास थे. पति की हत्या करने का कीर्ति को तनिक भी अफसोस नहीं था.

जेल जाते समय उस ने कहा कि उसे अब बच्चों से कोई मतलब नहीं है. जेल से छूटने के बाद वह विशाल के साथ शादी कर अपनी गृहस्थी नए सिरे से बसाएगी.

Delhi Crime Story: प्यार में भटका पुजारी

Delhi Crime Story: मंदिर का पुजारी बन कर गजानन ने न जाने कितनी औरतों को पथभ्रष्ट किया, लेकिन जब उन में से एक सुनीता ने उस से अपनी देह की कीमत 10 लाख रुपए वसूल ली तो ऐसा क्या हुआ कि पुजारी को जान गंवानी पड़ी…

दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक नांगली राजपुर स्थित यश गैस्टहाऊस में 27 अक्तूबर, 2015 को एक ऐसी घटना घटी कि गैस्टहाऊस के मैनेजर और कर्मचारी सिहर  उठे. शाम के करीब 4 बजे गैस्टहाऊस के कमरा नंबर 24 से अचानक चीखने की आवाजें आने लगीं. चीखें सुन कर मैनेजर सुमित कटियार 2 कर्मचारियों के साथ उस कमरे की ओर भागे. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि कमरे से धुआं भी निकल रहा है.

उस कमरे में सुबह ही एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया था. कमरे से चीखने की जो आवाज आ रही थी, वह उसी आदमी की थी. मैनेजर की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस आदमी के साथ ऐसा क्या हो गया, जो वह इस तरह चीख रहा है. चीखों और धुआं निकलने से उस ने यही अंदाजा लगाया कि शायद वह आदमी जल रहा है. यह सोच कर सुमित कटियार घबरा गए. कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. उन्होंने दरवाजा थपथपाया, लेकिन वह नहीं खुला. वह परेशान हो उठे. जब उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने अन्य कर्मचारियों के साथ मिल कर कमरे का दरवाजा तोड़ दिया. कमरे के अंदर का खौफनाक दृश्य देख कर सब की घिग्घी बंध गई.

कमरे में पड़े बैड के नीचे एक आदमी आग में जलते हुए तड़प रहा था. उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था. बैड के पास खड़ी उस की पत्नी हैरत से उसे जलता देख रही थी. वह भी उसी हालत में थी. सुमित कटियार ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के इस घटना की सूचना दे दी. थोड़ी ही देर में पुलिस कंट्रोल रूम की गाड़ी वहां पहुंच गई, जिस में 4 पुलिसकर्मी थे. यह क्षेत्र दक्षिणीपूर्वी दिल्ली के थाना सनलाइट कालोनी के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से इस घटना की सूचना थाना सनलाइट कालोनी को भी दे दी गई थी.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल 2 हैडकांस्टेबलों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. निरीक्षण में उन्हें कमरे में एक अधेड़ आदमी फर्श पर झुलसा पड़ा मिला. वह बेहोशी की हालत में लगभग 90 प्रतिशत जला था. उस के कपड़े बैड के पास रखी मेज पर रखे थे. मेज के नीचे एक कोल्डड्रिंक्स की 2 लीटर की खाली बोतल रखी थी, जिस में थोड़ा पैट्रोल था. थानाप्रभारी ने एक हैडकांस्टेबल के साथ उस जले हुए आदमी को इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया.

जिस व्यक्ति के साथ यह घटना घटी थी, वह कौन था, कहां का रहने वाला था और यह घटना कैसे घटी थी, इस बारे में थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने गैस्टहाऊस के मैनेजर सुमित कटियार से पूछा तो उन्होंने बताया कि जो आदमी आग से झुलसा है, उस का नाम गजानन है. वह सुबह साढ़े 10 बजे अपनी पत्नी सुनीता के साथ आया था. उस ने आईडी के रूप में अपने वोटर कार्ड की फोटोकौपी जमा कराई थी.

तब उसे कमरा नंबर 24 दे दिया गया था. इस के बाद अभी थोड़ी देर पहले कमरे से चीखने की आवाज सुनाई दी तो वह कुछ कर्मचारियों के साथ वहां पहुंचा. तब उस ने कमरे से धुआं निकलते देखा. उस ने दरवाजा खुलवाने की कोशिश की. जब दरवाजा नहीं खुला तो उस ने दरवाजा तोड़ दिया. इस के आगे मैनेजर ने बताया कि जब उस ने गजानन की पत्नी सुनीता से आग लगने के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि उस की शादी को 15 साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें संतान नहीं हुई. बड़ेबड़े डाक्टरों को दिखाया, तांत्रिकों के पास भी गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

संतान न होने की वजह से दोनों काफी परेशान थे. एक दिन पहले उस के पति ने उस से कहा कि कल उन्हें महाराष्ट्र के नागपुर शहर चलना है. वहां एक बहुत पहुंचे हुए फकीर हैं, जो दुआ पढ़ा हुआ पानी देते हैं. वह पानी पीने के बाद संतान सुख का लाभ मिलता है. चूंकि जिस ट्रेन से उन्हें नागपुर जाना था, वह रात 9 बजे की थी. इतना टाइम वे सड़क पर नहीं बिता सकते थे, इसलिए आराम करने के लिए इस गैस्टहाऊस में आ गए. शारीरिक संबंध बनाने के बाद पति पर न जाने क्या फितूर सवार हुआ कि उन्होंने साथ लाए कपड़े के बैग से 2 लीटर वाली प्लास्टिक की बोतल निकाली और उस में भरा पैट्रोल खुद पर उड़ेल लिया. वह कुछ समझ पाती पति ने माचिस की तीली जला कर खुद को आग लगा ली.

‘‘कहां है गजानन की पत्नी सुनीता?’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा तो मैनेजर इधरउधर देखने लगा. उस ने पूरा गैस्टहाऊस छान मारा, लेकिन सुनीता कहीं नहीं मिली.

‘‘तुम्हारी लापरवाही की वजह से वह भाग गई,’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने कहा, ‘‘तुम ने गजानन की उस पत्नी की कोई आईडी ली थी?’’

‘‘सर, पति की आईडी मिल गई तो मैं ने उस की आईडी लेना जरूरी नहीं समझा.’’ कह कर मैनेजर ने सिर झुका लिया.

‘‘वह गजानन की पत्नी ही थी, मुझे नहीं लगता. वह मौजमस्ती के लिए उस के साथ यहां आई थी. मुझे पूरा यकीन है कि वह पैट्रोल गजानन नहीं वही लाई थी. अपना काम कर के वह रफूचक्कर हो गई. उस ने तुम्हें झूठी कहानी सुना कर विश्वास में ले लिया और कपड़े पहन कर चली गई. लापरवाही तुम लोग करते हो और भुगतना पुलिस को पड़ता है.’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने  नाराजगी प्रकट करते हुए कहा.

थानाप्रभारी ने गैस्टहाऊस का रजिस्टर चैक किया तो उस में गजानन का पता चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली का लिखा था. जबकि उस ने अपने वोटर आईडी कार्ड की जो छायाप्रति जमा कराई थी, उस में उस का पता गांव कामनवास, सवाई माधोपुर, राजस्थान लिखा था. पुलिस ने गैस्टहाऊस के मैनेजर को वादी बना कर भादंवि की धारा 307 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. गजानन का हाल जानने के लिए ओमप्रकाश लेखवाल अस्पताल पहुंचे तो उन्हें पता चला कि गजानन की मौत हो चुकी है. मरने से पहले उस ने डाक्टरों को बताया था कि उसे सुनीता उर्फ रिंकू ने जलाया था.

गजानन की मौत की खबर उस के घर वालों को देना जरूरी था, इसलिए उस ने गैस्टहाऊस में दिल्ली का जो पता लिखाया था, पुलिस चांदनी चौक स्थित उस पते पर गौरीशंकर मंदिर पहुंची तो वहां से पता चला कि गजानन पहले इसी मंदिर में महंत था. लेकिन कुछ दिनों पहले उसे वहां से हटा दिया गया था. अब वह सवाई माधोपुर स्थित अपने गांव में रहता था. दिल्ली वह 10-15 दिनों में आताजाता रहता था. इस के बाद दिल्ली पुलिस ने राजस्थान पुलिस को गजानन की हत्या की खबर भिजवा कर संबंधित थाने द्वारा उस के घर वालों को उस की हत्या की खबर भिजवा दी. खबर सुन कर गजानन के घर वाले थाना सनलाइट कालोनी पहुंच गए.

डीसीपी संजीव रंधावा ने सुनीता की तलाश के लिए पुलिस की एक टीम बनाई, जिस में एसआई ललित कुमार, हैडकांस्टेबल मान सिंह, कांस्टेबल सूबे सिंह, महिला कांस्टेबल संगीता सिंह को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व ओमप्रकाश लेखवाल को सौंपा गया. गजानन चांदनी चौक के जिस गौरीशंकर मंदिर में महंत था, पुलिस टीम ने वहीं से जांच शुरू की. वहां से पुलिस को कई चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. पता चला कि गजानन 10 साल पहले दिल्ली आया था और गौरीशंकर मंदिर का महंत बन गया था. मंदिर में पूजापाठ कराने के साथसाथ वह ज्योतिषी एवं तंत्रमंत्र का भी काम करता था. उस के पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुरुषों के साथसाथ महिलाएं भी आती थीं.

इन में कुछ महिलाओं से उस की अच्छी जानपहचान हो गई थी. वह शराब भी पीने लगा था. इन में से कुछ महिलाओं से उस के अनैतिक संबंध भी बन गए थे. बाद में जब यह बात गौरीशंकर मंदिर की प्रबंधक कमेटी को पता चली तो कमेटी ने सन 2008 में गजानन को मंदिर से निकाल दिया था. इस के बाद गजानन ने मंदिर के बाहर फूल एवं पूजा सामग्री बेचने की दुकान खोल ली. उस की यह दुकान बढि़या चलने लगी थी. उस ने दुकान पर काम करने के लिए 2 नौकर रख दिए और खुद राजस्थान स्थित अपने घर चला गया. यह 2-3 साल पहले की बात है. वह हफ्तादस दिन में दुकान पर आता और नौकरों से हिसाब कर के चला जाता था. यह जानकारी हासिल कर के पुलिस टीम थाने लौट आई.

उधर पोस्टमार्टम के बाद 20 अक्तूबर, 2015 को लाश गजानन के परिजनों को सौंप दी गई. घर वालों ने निगमबोध घाट पर ही उस की अंत्येष्टि कर दी. एसआई ललित कुमार ने घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी पर शक नहीं जताया. पुलिस ने गैस्टहाऊस में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी. फुटेज में सुनीता उर्फ रिंकू का चेहरा तो नजर आ रहा था, लेकिन पुलिस के लिए मुश्किल यह थी कि इतनी बड़ी दिल्ली में उसे कहां ढूंढ़ा जाए. पुलिस के पास सुनीता का कोई मोबाइल नंबर भी नहीं था, जिस से उस के द्वारा उसे ढूंढने में आसानी हो.

गैस्टहाऊस में गजानन के कपड़ों से एक मोबाइल फोन मिला था. घर वालों ने बताया था कि वह मोबाइल गजानन का ही है. ललित कुमार ने सुनीता का फोन नंबर जानने के लिए गजानन के मोबाइल की काल लौग देखी तो एक नंबर पर उन की नजर टिक गई. क्योंकि वह नंबर ‘माई लव’ के नाम से सेव था. ललित कुमार जानना चाहते थे कि यह नंबर किस का है. उन्होंने अपने सैल फोन से वह नंबर मिलाया. कुछ देर बाद एक महिला ने फोन रिसीव कर के ‘हैलो’ कहा तो ललित कुमार बोले, ‘‘कार में चलने का शौक है तो इस के लोन की किस्तें भी समय से जमा करा दिया करो. 3 महीने हो गए, आप ने अभी तक किश्तें नहीं जमा कीं.’’

‘‘अरे भाई, आप कौन बोल रहे हैं? मैं ने कार के लिए कब लोन लिया?’’ दूसरी ओर से महिला ने कर्कश स्वर में कहा.

‘‘आप रुखसार बोल रही हैं न?’’ ललित कुमार ने पूछा.

‘‘नहीं बाबा, मैं रुखसार नहीं, सुनीता हूं. रौंग नंबर.’’

‘‘सौरी मैडम, गलत नंबर लग गया.’’ ललित कुमार ने कहा. इस के बाद उन्होंने फोन काट दिया. इस बातचीत के बाद उन की आंखों में चमक आ गई. क्योंकि सुनीता के फोन नंबर की पुष्टि हो गई थी.

ललित कुमार ने सुनीता का फोन नंबर सर्विलांस पर लगवाया तो उस की लोकेशन लाल किला, रेलवे कालोनी की मिली. वह टीम के साथ रेलवे कालोनी पहुंचे तो वहां के लोगों से सुनीता के बारे में पूछने पर पता चला कि सुनीता का पति रेलवे में नौकरी करता है. वह पहले इसी कालोनी में पति के साथ रहती थी, पर 4 सालों से वह परिवार के साथ नोएडा में कहीं रहने चली गई है. पता चला कि रेलवे कालोनी का वह क्वार्टर उस ने किसी को किराए पर दे रखा था. किराएदार से वह उस दिन मिलने आई थी. उस से मिल कर वह नोएडा चली गई थी. नोएडा में सुनीता कहां रह रही है, यह बात रेलवे कालोनी में रहने वाला कोई नहीं बता सका.

अलबत्ता सुनीता ने जिस परिवार को अपना क्वार्टर किराए पर दिया था, उस ने पुलिस को बताया कि उस का कुछ जरूरी सामान एक कमरे में रहता है, जिस की चाबी सुनीता के पास रहती है. आज जब वह मिलने आई थी तो वहां से कुछ सामान अपने बैग में भर कर ले गई थी. इतनी जानकारी मिलने के बाद ललित कुमार ने सर्विलांस द्वारा सुनीता के फोन की लोकेशन पता की तो इस बार लोकेशन नोएडा सैक्टर-29 की निकली. 28 अक्तूबर, 2015 की सुबह ललित कुमार ने टीम में शामिल महिला कांस्टेबल के साथ नोएडा के सैक्टर- 29 स्थित एक मकान पर दबिश दी तो वहां सुनीता मिल गई.

थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, ‘‘मेरा गजानन से रिश्ता जरूर था, मगर मैं ने उन्हें जला कर नहीं मारा. उन्होंने खुद ही पैट्रोल डाल कर आग लगाई थी.’’

‘‘तो फिर तुम वहां से भागी क्यों?’’ थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा.

‘‘स…सर, मैं डर गई थी.’’ वह बोली.

‘‘गजानन भला खुद को आग क्यों लगाएगा?’’ ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा.

‘‘सर, बात यह है कि गजानन की पत्नी बीमार रहती है. जब मुझ से उन का रिश्ता बना तो वह मुझ पर शादी करने का दबाव बनाने लगे. मैं 2 बच्चों की मां हूं. बच्चों को छोड़ कर मैं ऐसा कैसे कर सकती थी?’’ कह कर सुनीता सिसकने लगी.

पलभर बाद वह हिचकियां लेते हुए बोली, ‘‘26 अक्तूबर की शाम गजानन ने  फोन कर के कहा कि मुझ से मिलने की उस की काफी इच्छा है. अगले दिन उन्होंने सुबह 10 बजे मुझे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर बुलाया. अगले दिन तयशुदा समय पर मैं स्टेशन के बाहर पहुंची तो उन्हें मैं ने इंतजार करते पाया. उन के कंधे पर कपड़े का एक बैग था.

‘‘गजानन मुझे यश गैस्टहाऊस ले गए. उन्होंने वहां मुझे अपनी पत्नी बताया था. कमरे में जा कर हम ने शारीरिक संबंध बनाए. उस के बाद गजानन ने साथ लाए बैग से प्लास्टिक की 2 लीटर की बोतल निकाली और उस का ढक्कन खोला. उस में पैट्रोल भरा था.

‘‘गजानन ने मुझ से कहा कि वह आखिरी बार पूछ रहा है कि मैं उस से शादी करूंगी या नहीं? मैं ने साफ इनकार कर दिया. तब उन्होंने कहा कि जब तुम नहीं मान रही तो मैं खुदकुशी कर लूंगा, लेकिन पुलिस यही समझेगी कि उसे तुम ने जलाया है. इस के बाद गजानन ने पूरा पैट्रोल अपने शरीर पर छिड़क कर आग लगा ली.’’

फिर सुनीता जोरजोर से रोते हुए बोली, ‘‘सर, मैं ने उन्हें नहीं मारा. मुझे फंसाने के लिए उन्होंने खुदकुशी की थी.’’

ओमप्रकाश लेखवाल को लगा कि सुनीता की आंखों के आंसू घडि़याली हैं, यह जरूर कुछ छिपा रही है. उन्होंने महिला कांस्टेबलों को इशारा किया. महिला कांस्टेबल ने सुनीता को एक अलग कमरे में ले जा कर थोड़ी सख्ती की तो उस ने सहजता से अपना जुर्म कबूल कर लिया. सुनीता उर्फ रिंकू मूलरूप से पटना, बिहार की रहने वाली थी. 13 साल पहले उस की शादी विजय कुमार के साथ हुई थी. विजय कुमार दिल्ली में रहता था और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर बतौर टैक्नीशियन नौकरी करता था. वह पति के साथ खुश थी. वह 2 बच्चों की मां बनी.

विजय कुमार को रेलवे की ओर से जामामस्जिद के पास बनी रेलवे कालोनी में क्वार्टर मिला था. उस में वह पत्नी सुनीता और बच्चों के साथ रहता था. सुनीता आजादखयालों की थी, जबकि विजय कुमार पंरपरावादी. सुनीता को घूमने एवं सिनेमाहौल में फिल्में देखने का शौक था. अपने शौक पूरे करने के लिए वह पति से अनापशनाप खर्च लेती रहती थी. सुनीता अकसर गौरीशंकर मंदिर भी जाया करती थी. वहीं 8 साल पहले उस की मुलाकात मंदिर के महंत गजानन से हुई. गजानन पुजारी होने के साथसाथ ज्योतिषी भी था. यही वजह थी कि उस के पास महिलाओं की भीड़ लगी रहती थी. सुनीता गजानन से मिली तो वह उस का दीवाना हो गया. इस के बाद दोनों के बीच संबंध बन गए.

कुछ दिनों बाद गजानन और सुनीता के संबंधों की बात मंदिर की प्रबंधक कमेटी को पता चली तो उसे मंदिर से निकाल दिया गया. तब वह मंदिर के बाहर फूल व पूजा सामग्री बेचने लगा. सुनीता और गजानन के संबंध पहले की ही तरह जारी रहे. गजानन ने चांदनी चौक में किराए का मकान ले रखा था. जब भी उस की इच्छा होती, वह सुनीता को अपने कमरे पर बुला लेता. वह सुनीता को शौक पूरे करने के लिए अच्छेखासे पैसे भी देता था. सन 2014 के अगस्त महीने में गजानन ने सवाई माधोपुर में अपना एक प्लौट 25 लाख रुपए में बेचा तो सुनीता के मांगने पर उस ने उसे 10 लाख रुपए उधार दे दिए. सितंबर, 2015 के अंतिम दिनों में गजानन ने उस से अपने रुपए मांगे तो सुनीता बहाने बनाने लगी.

दरअसल, अब तक गजानन का मन सुनीता से भर चुका था. वह अपने 10 लाख रुपए ले कर उस से हमेशा के लिए पीछा छुड़ाना चाहता था. लेकिन सुनीता की नीयत में खोट आ गई थी. वह गजानन के 10 लाख रुपए किसी भी सूरत में लौटाना नहीं चाहती थी. वह टालमटोल करने लगी तो गजानन धमकी देने लगा कि उस ने उस के अंतरंग क्षणों की वीडियो बना रखी है. अगर उस ने उस के पैसे नहीं लौटाए तो वह वीडियो उस के पति को दिखा देगा.

सुनीता डर गई. उस ने गजानन की हत्या करने की योजना बना डाली. सुनीता ने 26 अक्तूबर, 2015 की रात गजानन को फोन किया. उस समय गजानन सवाई माधोपुर स्थित अपने घर में था. सुनीता ने कहा, ‘‘कल सुबह तुम हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर 11 बजे मिलना. मैं तुम्हारे 10 लाख रुपए लौटा दूंगी.’’

पैसों के लालच में गजानन रात में ही ट्रेन द्वारा राजस्थान से चल पड़ा और 27 अक्तूबर की सुबह 9 बजे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंच गया. वह स्टेशन के बाहर खड़ा हो कर सुनीता का इंतजार करने लगा. 10 बजे के करीब सुनीता वहां पहुंची. वह गजानन को नांगली राजपुर स्थित यश गैस्टहाऊस ले गई. वहां गजानन ने एक कमरा बुक कराया. जैसे ही वे दोनों कमरे में पहुंचे, तभी सुनीता ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. मौके का फायदा उठाने के लिए गजानन ने उसे आगोश में ले लिया.

इस के बाद दोनों ने कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाए. हसरतें पूरी करने के बाद दोनों बिस्तर पर निर्वस्त्र लेटे थे, तभी गजानन ने उस से अपने 10 लाख रुपए मांगे. तब सुनीता ने कहा, ‘‘पंडितजी, 8-10 सालों से मैं तुम्हारी सेवा करती आ रही हूं. अब तो आप उन पैसों को भूल जाइए.’’

‘‘नहीं सुनीता, घर वालों को इस की जानकारी हो गई है. वे सब मुझ से झगड़ा करते हैं. इसलिए मैं  पैसे मांग रहा हूं.’’ गजानन ने कहा.

सुनीता उठी और साथ लाए बैग से पैट्रोल से भरी बोतल निकाल कर उस के ऊपर उड़ेल दी. इस से पहले कि गजानन कुछ समझ पाता, सुनीता ने उस पर आग लगा दी. जलता हुआ गजानन चीखने लगा. उस की चीख सुन कर गैस्टहाऊस का मैनेजर वहां आ पहुंचा. इस के बाद क्या हुआ, आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं. सुनीता से पूछताछ कर के पुलिस ने 29 अक्तूबर, 2015 को उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Honey Trap Case: सुनहरे जाल में फंसा डीआरडीओ का वैज्ञानिक

Honey Trap Case: धन और सुंदर रूपयौवन का लालच ऐसा है जिस से कोई बच नहीं सकता. शातिर किस्म के लोग कहीं धन दिखा कर तो कहीं सुंदर यौवन दिखा कर सुनहरा जाल फेंकते हैं और मनचाहा शिकार फांस ही लेते हैं. इस जाल में फंसने से विरला ही कोई हो जो बच सके. रामायण की कथा के नायक और त्रिकालदर्शी कहे जाने वाले राम ही जब सोने के हिरण के भ्रम में फंस कर अपनी पत्नी सीता को गंवा बैठे तो आम इंसान की क्या औकात है.

आजकल हनीट्रैप के मामले भी ऐसे ही हैं. आए दिन नए राम फंस रहे हैं पर यह मामला जरा गंभीर किस्म का है. देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. महाराष्ट्र एटीएस ने डीआरडीओ के सीनियर सिस्टम इंजीनियर निशांत अग्रवाल को गिरफ्तार कर पाकिस्तान की आईएसआई के लिए जासूसी करने का खुलासा किया है. निशांत फेसबुक पर पाकिस्तान की फर्जी महिला के जाल में फंस गया था. उसे हाल ही में युवा इंजीनियर का अवार्ड भी मिला था.

निशांत अग्रवाल पाकिस्तान की दो महिलाओं  के फर्जी नाम से बने फेसबुक अकाउंट से उन के जाल में फंसा हुआ था. उस की इन ‘महिलाओं’ से चैटिंग होती थी. चैटिंग के दौरान उस ने अपनी मिसाइल यूनिट से कई गोपनीय जानकारियां जुटानी शुरू कर दीं. इन में से कुछ जानकारियां पाकिस्तान तक पहुंचाने की बात सामने आई है.

निशांत मिसाइल यूनिट में सीनियर सिस्टम इंजीनियर है. वह नागपुर में डीआरडीओ की ब्रह्मोस यूनिट में कार्यरत था. उस के पास यहां की कई तकनीकी गोपनीय जानकारियां रहती थीं. गोपनीय जानकारियों को उस ने अपने निजी लैपटोप और मोबाइल में सेव कर रखा था.

उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र एटीएस उस से पूछताछ कर रही है. निशांत के अलावा जासूसी के शक में डिफेंस मैटेरियल एंड स्टोर्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेबलिशमेंट [डीएमएसआरडीई] कानपुर के दो वैज्ञानिकों से भी पूछताछ की गई. दोनों वैज्ञानिक ब्रह्मोस से संबंधित बेहद संवेदनशील पार्ट्स को विकसित करने वाली तकनीक से जुड़े हैं. एटीएस ने एक महिला वरिष्ठ वैज्ञानिक को हिरासत में लिया है. पूछताछ के बाद उस का लैपटोप भी सीज किया है. संस्थान के इन वैज्ञानिकों को भी फेसबुक के जरिए ट्रैप किया गया. एटीएस को शक है कि ब्रह्मोस से जुड़ी टैक्नोलौजी को लीक किया गया है.

पिछले दिनों बीएसएफ के जवान अच्युतानंद मिश्रा को भी पाकिस्तान के लिए जासूसी के इल्जाम में पकड़ा गया था. उसे इसी तरह जाल में फंसाया गया था. अच्युतानंद की गिरफ्तारी के बाद फेसबुक आईडी से कई दोस्तों की पड़ताल की गई तो निशांत का पता चला. जांच पड़ताल के दौरान पाकिस्तान की दो और महिलाओं के नाम से बनी फर्जी फेसबुक आईडी पर कई राज्यों के और लोग भी चैटिंग कर रहे हैं.

यूपी एटीएस का कहना है कि उस की जांच में पता चला है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई खूबसूरत लड़कियों की फर्जी फेसबुक आईडी बना कर केंद्रीय बलों और वैज्ञानिक संस्थानों के लोगों को प्रेमजाल में फंसा कर जासूसी करा रही है.

आईएसआई के लिए जासूसी करने के आरोप में डीआरडीओ के इंजीनियर निशांत अग्रवाल की गिरफ्तारी एक कर्मचारी पर ही नहीं, सरकार और समूचे समाज व्यवस्था पर सवाल उठाती है? डीआरडीओ देश की रक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान है. इस के एक वरिष्ठ अधिकारी पर जासूसी का आरोप बहुत गंभीर बात है.

सरकारी पद पर बैठने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह के लालच से दूर रहने की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है. ईमानदार, वफादार, कर्तव्यनिष्ठ रहने की न तो हमारे समाज ने ऐसी कोई ट्रेनिंग दी और न ही सरकार ने. कहने को उन के लिए नियमकायदे, आचारसंहिता बनी हुई है पर उस की परवाह कौन करता है.

लालच बुरी बला है, जैसी सूक्तियां सिर्फ दीवारों पर शोभा देती हैं. वास्तविक जीवन में इन सूक्तियों को लोग नहीं अपनाते. गिफ्ट, इनाम, धन दोगुना करने जैसे लालच में लोग आए दिन फंसते हैं.

हालांकि धर्म के प्रवचनों में तमाम तरह की अच्छी सीखें बताई गई हैं पर धर्म की अच्छी सीखें खुद ही एक तरह का जाल ही हैं जो भक्तों को फंसाता है और प्रवचनकर्ता, गुरु को फायदा पहुंचाता है. यह सुनहरी अच्छी सीखों का जाल गुरु, प्रवचनकर्ता ही फेंकता है जो भक्तों को धनदौलत त्याग करने की सलाह देता है और स्वयं स्वर्ण सिंहासन पर बैठता है, एसी गाड़ी में चलता है. धर्म सब से बड़ा सुनहरा जाल है.

जिम्मेदार पद पर बैठे कर्मचारी को कोई भी रूप यौवन, धन का लालच दे कर अपने जाल में फंसा ले, यह शासन, प्रशासन ही नहीं, समाज व देश के लिए भी गंभीरता से सोचने की बात है. Honey Trap Case

Bhopal Crime Story: देवेंद्र से देविका बनने की दर्द भरी दास्तां

Bhopal Crime Story: मुसीबत और परेशानियां ऐसी थीं कि देवेंद्र को उनका कोई हल नहीं सूझ रहा था और जो सूझा वह हैरान कर देने वाला है. साल 2017 तक एक एनजीओ में काम करने बाला यह हट्टा कट्टा  युवा आम लड़कों की तरह ही रहता था लेकिन अब औपरेशन के जरिये लड़की यानि ट्रांसजेंडर बनकर अपने ही शहर भोपाल में किन्नरों की टोली में तालियां बजाता नजर आता है .

आमतौर पर कोई भी लड़का ट्रांसजेंडर तभी बनने की सोचेगा जब उसमें बचपन से ही लड़कियों जैसे लक्षण हों या फिर वह खुद को सेक्स कर पाने में असमर्थ पाये पर देवेंद्र के साथ ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि उसकी कहानी दिल को छू जाने वाली है. खासतौर से उस वक्त जब रक्षा बंधन का त्योहार आने वाला है. देवेंद्र अपनी बहन के लिए देविका बना था जिसका उसे कोई मलाल भी नहीं है, उल्टे वह खुश है कि बलात्कार के झूठे आरोप में फंसने से भी बच गया.

देवेंद्र अपनी बहन को बहुत चाहता था और उसकी विदाई 20 मई 2016 को इन दुआओं के साथ उसने की थी कि बहन ससुराल जाकर खुशहाल ज़िंदगी जिये लेकिन भगवान कहीं होता तो उसकी सुनता. हुआ यूं कि शादी के कुछ दिनों बाद ही बहन की ससुराल वालों ने उस पर तरह तरह के जुल्मों सितम ढाने शुरू कर दिये ठीक वैसे ही जैसे फिल्मों और टीवी सीरियलों में दिखाये जाते हैं. दहेज के लालची ससुराल वालों ने उसकी बहन को इतना सताया कि वह खून के आंसू रो दी .

अब देवेंद्र ने वही गलती की जो आमतौर पर दहेज के लिए सताई जाने वाली लड़कियों के घर वाले करते हैं. यह गलती थी ससुराल वालों के हाथ पैर जोड़ना और अपनी पगड़ी उनके चरणों में रख देना. ऐसे फिल्मी टोटकों से तो फिल्मों में भी बात नहीं बनती फिर यह तो सामने से होकर गुजर रही हकीकत थी. देवेंद्र ने मध्यस्थता करते हर मुमकिन कोशिश की कि जैसे भी हो बगैर किसी झगड़े फसाद विवाद या कोर्ट कचहरी के बहन की ज़िंदगी में खुशियां आ जाएं पर कोई कोशिश कामयाब नहीं हुई तो उसने भी थकहार कर वही रास्ता पकड़ा जो सभी पकड़ते हैं.

ननद की धमकी

लेकिन थाने जाने से पहले उसने बहन की ससुराल बालों को आगाह करना या धोंस देना कुछ भी समझ लें जरूरी समझा कि शायद इससे उनमें अक्ल आ जाए. आमतौर पर ससुराल वाले इस बात से डरते हैं कि अगर बहू या उसके घर वालों ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो कभी कभी जमानत के भी लाले पड़ जाते हैं. यही इस मामले में भी हुआ, शुरू में तो बहन के ससुराल वाले डरे लेकिन जल्द ही बहन की चालाक ननद ने इस का भी तोड़ निकाल लिया और ऐसा निकाला कि देवेंद्र की सारी हेकड़ी तो हेकड़ी मर्दानगी भी हमेशा के लिए हवा हो गई.

इस ननद ने उसे ही यह धमकी देना शुरू कर दिया था कि अगर वह थाने गया तो वह भी थाने जाकर देवेंद्र के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा देगी. इस धमकी का उम्मीद के मुताबिक असर हुआ और देवेंद्र ने बहन की ससुराल जाना बंद कर दिया. लेकिन इससे बहन का कोई भला या मदद नहीं हो पा रही थी इसलिए एक दिन उसने जी कडा करते बचाव का रास्ता ढूंढ़ ही लिया कि अगर वह मर्द ही न रह जाये तो बहन की ननद क्या खाकर उसके खिलाफ बलात्कार की झूठी रिपोर्ट लिखाएगी .

नवंबर 2017 में देवेंद्र ऑपरेशन करा कर लड़की बन गया और अपना नया नाम रखा देविका . अब उसे ननद का डर नहीं रह गया था लिहाजा उसने बहन को बचाने पुलिसिया और कानूनी काररवाई शुरू कर दी . मामला जब विधिक सेवा प्राधिकरण पहुंचा तो उसने बेहिचक सारे पत्ते सचिव आशुतोष मिश्रा के सामने खोलते अपने  मेडिकल दस्तावेज़ भी दिखाये  और बताया कि बहन की ननद की धमकियों से आजिज़ आकर उसने यह फैसला लिया था .

देखते ही देखते बहन को तलाक मिल गया और वह ससुराल नाम की जेल से आजाद हो गई . लेकिन डर के चलते और बहन की सलामती के लिए देविका बन गए देवेंद्र को बहुत बड़ी क़ुर्बानी देनी पड़ी जिसकी मिसाल शायद ही ढूंढे से मिले. साड़ी और सलवार सूट पहने देविका माथे पर बिंदी और बड़ा सा टीका भी लगाती है और चूड़ियां भी पहनती है. उसका मेकअप भी लड़कियों जैसा तड़क भड़क भरा होता है .

देवेंद्र, देविका बनकर खुश है और अब ट्रांसजेंडर्स के भले के लिए काम करना चाहता है . मुमकिन है जल्द ही उसकी ज़िंदगी और बहन के लिए त्याग पर कोई फिल्म निर्माता फिल्म बनाए जिसमें भरपूर मसाला और जायका होगा लेकिन देवेंद्र की ज़िंदगी में जरूर कोई जायका नहीं रह गया है. बेहतर तो यह होगा कि वह फिर से आपरेशन कराके पहले की तरह लड़का बन जाये और ज़िंदगी का भरपूर लुत्फ उठाए.

Gurugram Crime: इश्क जान भी लेता है

Gurugram Crime: अभिषेक उर्फ नीतू पैसे वाले बाप का बेटा था, इसलिए वह दिन भर दोस्तों के साथ कार से आवारागर्दी करने के साथ अय्याशी भी करता था. अय्याशी करने में ही उस ने ऐसा क्या कर डाला कि आज वही नहीं, उस के सारे दोस्त जेल में हैं. ना हर सिंह गुड़गांव के थाना सदर के अंतर्गत आने वाले गांव इसलापुर के रहने वाले थे. गुड़गांव, सोनीपत और हिसार में उन की हार्डवेयर की 3 दुकानें थीं. गांव में भी उन की कई  एकड़ खेती की जमीन थी. इस के अलावा गुड़गांव में उन के 2 आलीशान मकान थे. उन की 3 बहनें थीं, जिन की शादियां हो चुकी थीं.

छोटी बहन विमला की शादी दौलताबाद के रहने वाले देवेंद्र कुमार के साथ हुई थी. देवेंद्र भारतीय सेना में सूबेदार थे. उन की पोस्टिंग सिक्किम में थी. विमला घर पर ही रह कर बच्चों आदि को देखती थी. उन के 2 बेटे थे, सचिन और मोहित. दोनों ही जवान थे. बच्चों की देखरेख के लिए नाहर सिंह भी विमला के यहां ही रहते थे. देवेंद्र को फौज से जब भी छुट्टी मिलती थी, वह अपनी बीवीबच्चों के पास आ जाया करते थे.

25 अगस्त, 2015 की शाम लगभग 5 बजे नाहर सिंह छोटे भांजे मोहित और उस के दोस्त सक्षम के साथ गुड़गांव के सैक्टर-23 स्थित एक कैफे में बैठे कौफी पी रहे थे, तभी वहां अभिषेक उर्फ नीतू अपने दोस्तों मन्ना, दीपांकर और नितेश के साथ आया. आते ही नीतू ने मोहित की मेज पर रखे कौफी के प्याले को उठा कर फेंक दिया. नीतू की इस हरकत से मोहित और सक्षम को गुस्सा आ गया. पास बैठे नाहर सिंह समझ नहीं पाए कि नीतू ने ऐसा क्यों किया. इस से पहले कि नाहर सिंह कुछ कहते, सक्षम ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘लगता है, उस दिन की मार के तेरे निशान ठीक हो गए हैं, जो…’’

उस की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि नीतू के दोस्त नितेश ने सक्षम के गाल पर जोरदार थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘अपनी जुबान बंद रख, वरना अभी काट कर फेंक दूंगा.’’

दोस्त की बेइज्जती मोहित बरदाश्त नहीं कर सका और नितेश से भिड़ गया, ‘‘तू ने इस पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे की?’’

‘‘ओए चल दूर हट यहां से. अब बहुत भौंक चुका तू.’’ नीतू ने अंटी से रिवौल्वर निकाल कर मोहित पर तानते हुए कहा, ‘‘मैं अपना अपमान कभी नहीं भूलता. अपमान का बदला जब तक ले न लूं, चैन की नींद सोना हराम समझता हूं. तेरी कोई आखिरी ख्वाहिश हो तो अपने मामू को बता दे.’’

इसी के साथ नीतू के दोस्तों ने नाहर सिंह को हथियारों के बल पर काबू कर लिया था. नीतू की धमकी पर मोहित आगबबूला हो कर नीतू को पीटने के लिए आगे बढ़ा ही था कि अभिषेक ने उस पर एक के बाद एक कई फायर झोंक दिए. गोलियां मोहित के सीने, पेट व आंख के पास लगीं. मोहित लहूलुहान हो कर नीचे गिर कर कराहने लगा. उस समय कैफे में और भी लोग थे. गोलियों की आवाज सुन कर सभी चौंके. लेकिन हथियारों को देख कर किसी की कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई. वे सुरक्षित स्थान तलाशने लगे. अपने सामने भांजे के साथ हुई इस वारदात पर नाहर सिंह भी कुछ नहीं कर सके. मोहित की हत्या कर हमलावर कार से फरार हो गए.

नाहर सिंह ने तुरंत पुलिस को फोन कर के इस घटना की सूचना दी. गोली मारने की खबर पाते ही थाना पालम विहार के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह राणा पुलिस टीम के साथ थोड़ी ही देर में सैक्टर-23 के उस कैफे में पहुंच गए. मोहित की कुछ देर बाद ही मौत हो चुकी थी. पुलिस ने अपने आला अधिकारियों को भी इस हत्या की सूचना दे दी थी. थानाप्रभारी ने नाहर सिंह से बात की तो उन्होंने पूरा वाकया बता दिया. इस के अलावा थानाप्रभारी ने कैफे के मैनेजर, वेटरों और वहां मौजूद ग्राहकों से भी पूछताछ की. इस के बाद घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. नाहर सिंह की तहरीर पर पुलिस ने नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली.

मामला एकदम स्पष्ट था. कैफे में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में भी साफ नजर आ रहा था कि मोहित पर गोलियां अभिषेक उर्फ नीतू ने चलाई थीं. इसलिए पुलिस को सिर्फ हत्याभियुक्तों को गिरफ्तार करना था. उन की गिरफ्तारी के लिए पुलिस कमिश्नर नवदीप सिंह विर्क ने एसीपी (क्राइम) राजेश कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह राणा, एसआई सुखजीत सिंह, एएसआई सुरेश कुमार, सुनीता कुमार, हैडकांस्टेबल संदीप, धीरज सर्वसुख के अलावा कांस्टेबल धर्मेंद्र, नीति आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन 28 अगस्त को पुलिस ने नामजद अभियुक्तों के घरों पर दबिश दी तो वे सभी अपनेअपने घरों से फरार मिले. फिर उसी दिन शाम के समय एक मुखबिर की सूचना पर गुड़गांव के हिमगिरी चौक से अभिषेक उर्फ नीतू, ब्रजेश उर्फ नोनी, दीपांकर, बौबी तथा आदित्य को गिरफ्तार कर लिया गया. थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने मोहित की हत्या की वजह तो बता ही दी, साथ ही एक ऐसे हत्याकांड से भी परदाफाश किया, जिस की फाइल पुलिस बंद कर चुकी थी.

21 वर्षीय अभिषेक उर्फ नीतू एक अमीर बाप की बिगड़ी औलाद था. उस के पिता भानमल गुड़गांव के धनवापुर गांव में अपने परिवार के साथ रहते थे. करीब 4 साल पहले एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने उन की 5 एकड़ जमीन 22 करोड़ में खरीदी थी. जमीन बेचने के बाद उन्होंने आलीशान मकान बनवाया, नौकर रखे और 2 कारें खरीदीं. तब से यह परिवार ठाठबाट से रह रहा था. अचानक पैसा आता है तो अपने साथ कई बुराइयां भी लाता है. ऐसा ही इस परिवार में भी हुआ. अभिषेक उर्फ नीतू भानमल का एकलौता बेटा था, इसलिए वह उस की हर फरमाइश पूरी करते थे.

अभिषेक अपने यारदोस्तों के साथ कार ले कर दिन भर इधरउधर घूमता और अय्याशी करता. वह अपने पिता से जितने पैसे मांगता, वह उसे मिल जाते थे. जिन्हें वह खुले हाथों से खर्च करता था. इसलिए उस के दोस्त भी उस से खुश रहते थे. उस के खास दोस्तों में 20 वर्षीय ब्रजेश उर्फ नोनी, 19 वर्षीय दीपांकर, 20 वर्षीय बौबी, 18 वर्षीय आदित्य थे. ये सभी उस के घर के आसपास ही रहते थे. ये सभी कार से जब भी घूमने निकलते, इतना ऊधम मचाते थे कि राहगीर भी परेशान हो जाते थे. कोई इन का विरोध करता तो ये उस की पिटाई कर देते. एक तरह से इलाके में इन का आतंक छा चुका था.

पिता ने भी कभी नीतू पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की, जिस से वह और ज्यादा उद्दंड होता चला गया. बातबात पर सीधेसादे लोगों को पीटना, राह चलती लड़कियों को छेड़ना, शराब पी कर हुड़दंग मचाना, हवाई फायर कर के दहशत फैलाना आदि नीतू का जैसे शगल बन गया था. नाहर सिंह ने शादी नहीं की थी. वह अपनी बहनों और भांजों को बेहद चाहते थे. उन की बहनें भी संपन्न थीं. वह खुद भी उन के लिए काफी खर्च करते थे. अपने भांजों को भी वह जेब खर्च के लिए इतने पैसे देते थे, जिन से एक मध्यमवर्गीय परिवार का एक महीने का खर्च चल सकता था.

दरअसल, नाहर सिंह की सोच थी कि पढ़लिख कर उन के भांजों को कोई बहुत अच्छी नौकरी तो मिलेगी नहीं, इसलिए वह उन्हें नेता बनाना चाहते थे. और नेता बनने के लिए शैक्षिक योग्यता की जगह दबंगई होनी चाहिए. अपनी इसी सोच के चलते वह मोहित और सचिन को दबंग बना रहे थे. मामा की शह पर मोहित कुछ ज्यादा ही बिगड़ चुका था. लोगों से मारपीट कर आतंक फैला कर उस ने इलाके में अपनी दबंगई कायम कर ली थी. वह कई संगीन वारदातों को भी अंजाम दे चुका था. दरअसल, मोहित और अभिषेक उर्फ नीतू पहले दोस्त थे. उन के बीच दुश्मनी की शुरुआत सन 2012 में तब हुई थी, जब मानसी से नीतू ने कोर्टमैरिज कर ली थी.

मानसी मूलरूप से बिहार के रहने वाले फकीरेलाल की बेटी थी. फकीरेलाल गुड़गांव की एक कंपनी में काम करते थे और गुड़गांव के सैक्टर- 4 में किराए पर कमरा ले कर अपने बच्चों के साथ सपरिवार रहते थे. मानसी फैशनपरस्त और बिंदास लड़की थी. उस की कई लड़कों से दोस्ती थी. वह उन के साथ कार या बाइक से घूमती, फिल्में देखती और महंगे रैस्टोरैंट में खाना खाती. कई युवकों से उस के शारीरिक संबंध भी थे.

रोजाना नएनए लड़कों के साथ घूमते हुए उसे मोहल्ले के अनेक लोगों ने देखा था. उन्होंने उस की शिकायत फकीरेलाल से की तो उन्होंने उसे डांटा. लेकिन मानसी बहक कर उस ढलान पर पहुंच चुकी थी, जहां से वापस आना उस के लिए आसान नहीं था. इसलिए पिता के समझाने का उस पर जरा भी असर नहीं हुआ. मानसी का अपने पुरुष दोस्तों के साथ घूमनेफिरने का सिलसिला कायम रहा. इस से मोहल्ले में फकीरेलाल की बदनामी हो रही थी. लाख समझाने के बावजूद भी जब मानसी नहीं मानी तो तंग आ कर फकीरेलाल ने उसे घर से निकाल दिया.

घर से निकालने पर मानसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, बल्कि वह सैक्टर-18 में किराए के फ्लैट में रहने लगी. अब उस से कोई टोकाटाकी करने वाला नहीं था, जिस से वह पूरी तरह से आजाद हो गई थी. उसे जब जहां मन होता, जाती थी. वह क्लबों और पबों में डांस भी करने लगी थी. सन 2012 के फरवरी महीने में एक पब में मानसी की मुलाकात विक्की से हुई. पहली ही मुलाकात में मानसी विक्की के दिल में उतर गई. विक्की उस पर खूब रुपए लुटाता था. वह विक्की की गाड़ी में घूमतीफिरती. विक्की उस की हर फरमाइश पूरी करता. विक्की भी गुड़गांव का रहने वाला था. वह भी एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखता था. विक्की और मोहित आपस में गहरे दोस्त थे.

विक्की ने मानसी से साफ कह दिया था, ‘‘मानसी, मैं तुम से शादी तो नहीं कर सकता. पर हां, तुम्हारा सारा खर्च ताउम्र उठाता रहूंगा. तुम्हें जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. परंतु बदले में मुझे तुम से इसी तरह का प्यार चाहिए. तुम एक बात का खास ध्यान रखना कि किसी दूसरे पुरुष ने तुम्हें छुआ भी तो मैं हरगिज बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

मानसी उस की शर्त मानने को तैयार हो गई. तब जिस फ्लैट में मानसी रहती थी, उस का किराया, कार, सौंदर्य प्रसाधन और खानेपीने का सारा खर्च विक्की उठाने लगा. वह हफ्ते में 1-2 बार उस से मिलने उस के फ्लैट पर पहुंच जाता था. विक्की से मुलाकात के बाद मानसी ने अपने और पुरुष दोस्तों से मिलनाजुलना बंद कर दिया. विक्की उस से हफ्ते में 1-2 बार ही मिलने आता था. उस के जाने के बाद मानसी का मन नहीं लगता था. रोजना ही नएनए दोस्त बनाने वाली मानसी भला विक्की के साथ बंध कर कैसे रह सकती थी. लिहाजा उस ने फिर से लोगों से दोस्ती करनी शुरू कर दी.

उसी दौरान उस की मुलाकात अभिषेक उर्फ नीतू से हुई. नीतू की शानोशौकत देख कर मानसी का झुकाव उस की तरफ हो गया. नीतू हर मायने में उसे विक्की से अच्छा लगा.

विक्की को जब यह बात पता चली तो उस ने मानसी से कहा, ‘‘मैं ने कहा था न कि अगर किसी पराए पुरुष ने तुम्हारे शरीर को छुआ भी तो मैं बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

‘‘विक्की, मैं भी इंसान हूं और मेरी भी कुछ भावनाएं हैं,’’ मानसी ने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा, ‘‘मैं भी चाहती हूं कि मेरा पति हो, घर हो, बच्चे हों. यह सब तुम्हारे साथ नहीं हो सकता. इसलिए मैं रखैल नहीं, पत्नी बन कर जीना चाहती हूं.’’

मानसी की बात सुन कर विक्की को गुस्सा आ गया, वह चिल्लाते हुए बोला, ‘‘मानसी, मेरे जीतेजी तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगी.’’

‘‘चिल्लाओ मत. मैं तुम्हारी ब्याहता नहीं हूं, जो इस तरह मुझ पर अपना हक जता रहे हो.’’ मानसी भी गुस्से में आ गई. वह आगे बोली, ‘‘मैं नीतू से शादी कर रही हूं. वह तुम से ज्यादा दौलतमंद है और मेरे सारे अरमान पूरे करने की उस की हैसियत भी है. और सुन लो, आज के बाद मेरा तुम से कोई वास्ता नहीं.’’

विक्की मानसी को धमकाते हुए वहां से चला गया. विक्की का पत्ता काटने के बाद अप्रैल, 2012 में अभिषेक उर्फ नीतू ने मानसी से कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज की बात जब विक्की को पता चली तो उसे बहुत बुरा लगा. गुस्से में तिलमिलाया हुआ वह नीतू से मिला.

‘‘नीतू जब तुम्हें यह बात पता थी कि मानसी मेरी रखैल है तो तुम ने उस से कोर्टमैरिज क्यों कर ली?’’ विक्की ने पूछा.

‘‘विक्की, मैं ने मानसी के साथ कोई जोरजबरदस्ती नहीं की. वह राजी थी, तभी तो शादी हुई. अगर वह मुझे नहीं चाहती तो भला मैं उसे कैसे पा सकता था. उस ने जब अपनी मरजी से शादी की है तो इस में तुम्हारे लिए बुरा मानने वाली क्या बात है.’’ नीतू बोला.

‘‘देख नीतू, तू मेरा दोस्त है, इसलिए तुझे एक बात बता रहा हूं कि मानसी जैसी लड़कियां उसी पर प्यार न्यौछावर करती हैं, जिस के पास दौलत होती है. उस ने तुझ से यह जानने के बाद शादी की है कि तेरे पास मुझ से ज्यादा दौलत है. एक दिन उसे तुझ से ज्यादा पैसे वाला कोई और मिल गया तो वह तुझे भी ठुकरा देगी.

फिर तुझे भी उस की हकीकत पता चलेगी और उस दिन तू बहुत पछताएगा.’’ यह कह कर विक्की वहां से चला गया. समय गुजरता रहा और 2 साल बीत गए. नीतू तो उसे पहले की तरह प्यार करता था, लेकिन मानसी का प्यार जरूर फीका पड़ गया. उस का नीतू से एक तरह से मन भर गया था. हालांकि नीतू उस पर दोनों हाथों से पैसे खर्च कर रहा था. इस के बावजूद वह नए दोस्तों को तलाशने लगी. इस की वजह साफ थी कि उसे अलगअलग लोगों के साथ मौजमस्ती करने की आदत जो पड़ गई थी.

अभिषेक ने जब उसे डांस क्लबों में जाने से मना किया तो मानसी ने साफ कह दिया, ‘‘नीतू, मैं कोई पिंजरे में बंद हो कर रहने वाली चिडि़या नहीं हूं. मेरा जो मन करेगा, मैं वही करूंगी. तुम कभी मुझे रोकने की कोशिश भी मत करना.’’

इस के बाद वह नीतू को छोड़ कर अलग किराए के मकान में रहने लगी. अभिषेक उस से मिलने आता तो वह उसे दुत्कार देती. इस बात का अभिषेक को बड़ा दुख होता था. लाखों रुपए उस पर खर्च करने के बावजूद उसे प्रेमिका की दुत्कार मिलती थी. काफी समझाने के बावजूद भी जब मानसी ने उस की बात नहीं मानी तो अभिषेक उर्फ नीतू ने मानसी को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. उस ने उसे ठिकाने लगाने की योजना बना भी ली.

योजना के तहत 5 जुलाई, 2014 को नीतू अपने 2 दोस्तों खुशीराम और कपिल के साथ गुड़गांव के सैक्टर-17 स्थित गंदे नाले के पास पहुंचा. नीतू मानसी का काम तमाम कर के लाश को उसी नाले में ठिकाने लगाना चाहता था, लेकिन मानसी को नाले के पास बुलाना आसान नहीं था, क्योंकि उस ने उस से संबंध खत्म कर लिए थे.

नीतू जानता था कि मानसी बेहद लालची है. इसलिए उसे वहां बुलाने के लिए उस ने एक चाल चली. उस ने वहीं से मानसी को फोन किया. उस वक्त शाम को 5 बज रहे थे. उस ने कहा, ‘‘मानसी, मैं ने तुम्हारे लिए 8 तोले का एक हार बनवाया है. हार का डिजाइन इतना अच्छा है कि तुम्हें जरूर पसंद आएगा. आज रात ही मैं मुंबई जा रहा हूं. फिर हमारी मुलाकात हो या न हो, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम इस हार को ले लो.’’

मानसी 8 तोला सोने के हार के लालच में आ गई. वह हार लेने के लिए साढ़े 5 बजे गंदे नाले के पास पहुंच गई. नीतू को देखते ही वह चहक कर बोली, ‘‘नीतू, तुम तो मुझे एकदम भूल गए. कभीकभार तो मुझ से मिलने आ जाय करो. मैं तुम्हें बहुत मिस करती हूं.’’

कुछ देर बाद नीतू के दोस्त खुशीराम और कपिल वहां पहुंचे तो वह चौंकी, क्योंकि वह पहले से उन्हें जानती थी. मानसी ने सोचा कि उन से उसे क्या मतलब. उसे तो हार ले कर वहां से निकल जाना है. उस ने नीतू का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘लाओ, वह हार कहां है.’’

नीतू ने जेब से चाकू निकाल कर लहराया, ‘‘अब हार पहन कर क्या करोगी, जब तुम जीवित ही नहीं रहोगी.’’

चाकू देख कर और उस की बातें सुन कर मानसी घबरा गई. इस से पहले कि वह कुछ कह पाती, अभिषेक ने चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए. मानसी वहीं गिर गई और कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. इस के बाद खुशीराम और कपिल ने उस की लाश उठा कर नाले में फेंक दी.4 दिनों बाद 9 जुलाई, 2014 को नाले में महिला की लाश पड़ी होने की सूचना थाना राजेंद्रपार्क पुलिस को मिली तो पुलिस ने नाले से लाश निकलवाई. लाश काफी सड़गल गई थी. वह पूरी तरह कीचड़ में सनी हुई थी. मृतका कौन है, यह जानने के लिए पुलिस ने पहले लाश धुलवाई. उस का चेहरा गल चुका था, इसलिए वहां मौजूद भीड़ में से कोई भी उसे पहचान नहीं सका.

पुलिस को उस की बाईं हथेली पर नीतू नाम गुदा मिला. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और लावारिस मान कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अभिषेक उर्फ नीतू की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को पता चला कि 9 जुलाई, 2014 थाना राजेंद्रपार्क पुलिस ने नाले से जो महिला की लाश बरामद की थी, वह मानसी की थी. अगर नीतू पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ता तो मानसी की हत्या का राज उजागर ही न हो पाता.

एक दिन गुड़गांव के सैक्टर-28 स्थित एक कैफे में मोहित अपने दोस्तों के साथ मौजूद था, तभी अभिषेक उर्फ नीतू अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा. मोहित के दोस्तों ने नीतू का मजाक उड़ाया तो नीतू गालियां बकने लगा. तभी मोहित और उस के दोस्तों ने नीतू और उस के दोस्तों की पिटाई कर दी. उसी पिटाई का बदला लेने के लिए नीतू मौका ढूंढ़ रहा था.

25 अगस्त, 2015 की शाम को उसे यह मौका मिल गया. उसे पता चला कि मोहित अपने दोस्त सक्षम व मामा नाहर सिंह के साथ ओल्ड बौक्स कैफे में है तो वह अपने साथियों के साथ वहां पहुंच गया और मोहित की गोली मार कर हत्या कर दी.

मोहित की हत्या एवं मानसी की हत्या के आरोप में पुलिस ने अभिषेक उर्फ नीतू, ब्रजेश, दीपांकर, बौबी, आदित्य को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर के 2 दिनों की पुलिस रिमांड पर ले कर हत्या में प्रयुक्त रिवौल्वर व मानसी की हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. मानसी की हत्या में शामिल खुशीराम और कपिल को गिरफ्तार करने पुलिस पहुंची तो वे घर से फरार मिले. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं जा सके थे. इस के बाद सभी अभियुक्तों को 29 अगस्त, 2015 को पुन: न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.Gurugram Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bank Robbery: दिल्ली की सबसे बड़ी लूट

Bank Robbery: एटीएम कैश वैन से दिनदहाड़े साढ़े 22 करोड़ रुपए की लूट से पुलिस के हाथपैर फूल गए थे. रात भर चले पुलिस अभियान के बाद लुटेरा पकड़ा गया तो सच्चाई जान कर सभी हैरान रह गए. आखिर क्या निकला दिल्ली की इस सब से बड़ी लूट का राज…

बैंकों ने अपनी एटीएम मशीनों में कैश डालने की जिम्मेदारी विभिन्न निजी एजेंसियों को दे रखी है. उन एजेंसियों ने अलगअलग इलाकों में अपने करेंसी चेस्ट बना रखे हैं. बैंकों से मोटी रकम निकाल कर पहले करेंसी चेस्ट में पहुंचाई जाती है, उस के बाद वह कैश वैनों द्वारा अलगअलग एटीएम बूथों तक पहुंचाया जाता है. सिक्योरिटी एंड इंटेलिजैंस सर्विसेज (एसआईएस) सिक्योरिटी एजेंसी भी पिछले कई सालों से बैंकों की एटीएम मशीनों में पैसे डालने का काम कर रही है.

26 नवंबर, 2015 को पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी स्थित कंपनी के करेंसी चेस्ट पर एसआईएस की कैश वैन पैसे ले जाने के लिए पहुंची. वहां की ऐक्सिस बैंक से 38 करोड़ रुपए निकाल कर करेंसी चेस्ट में मौजूद संदूकों में भर दिए गए. यह कैश वैन द्वारा अलगअलग एटीएम बूथों तक पहुंचाया जाना था. रुपयों से भरे उन संदूकों में से 9 संदूक एसआईएस की एक वैन में रख दिए गए, जिन में साढ़े 22 करोड़ रुपए थे.

ये साढ़े 22 करोड़ रुपए दिल्ली के ओखला स्थित एटीएम मशीनों में रखे जाने थे. इसलिए दोपहर ढाई बजे के करीब एसआईएस की वह वैन ओखला के लिए चल पड़ी. उस वैन को प्रदीप शुक्ला चला रहा था और सुरक्षा के लिए गनमैन विजय कुमार पटेल उस के साथ था. विकासपुरी से चल कर वह वैन करीब साढ़े 3 बजे श्रीनिवासपुरी की रेड लाइट पर पहुंची. गनमैन विजय कुमार को लघुशंका लगी थी, इसलिए वह ड्राइवर से कह कर वैन से उतर गया.

कुछ देर बाद जब वह लौट कर आया तो उसे वहां कैश वैन दिखाई नहीं दी. विजय कुमार ने इधरउधर नजर दौड़ाई कि ड्राइवर ने रेडलाइट पार कर के वैन खड़ी न कर दी हो. लेकिन उसे कहीं भी वैन नहीं दिखी. यह बात करीब पौने 4 बजे की थी. विजय कुमार के पास वैन के ड्राइवर प्रदीप शुक्ला का फोन नंबर था. उस ने उसे फोन किया. कई बार घंटी बजने के बाद प्रदीप ने फोन रिसीव कर के बताया कि रेडलाइट पर ट्रैफिक पुलिस ने वैन खड़ी नहीं होने दी, इसलिए वह इसी रोड पर थोड़ी दूर आगे खड़ा है.

जिस तरफ प्रदीप शुक्ला ने वैन खड़ी होने की बात कही थी, विजय उसी ओर था. लेकिन उसे वैन नजर नहीं आ रही थी. विजय ने थोड़ा आगे बढ़ कर भी देखा लेकिन उसे कहीं भी कैश वैन दिखाई नहीं दी. विजय ने प्रदीप को फिर फोन किया. इस बार उस का फोन बंद था. उस ने कई बार ड्राइवर को फोन किया, लेकिन अब उस का फोन बंद हो चुका था. वह चौंका कि अब फोन बंद क्यों है? आखिर वह उसे छोड़ कर वैन ले कर कहां चला गया?

उस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रदीप वैन ले कर कंपनी के हैडऔफिस चला गया हो. अगर ऐसा हुआ तो उस से जवाबतलब किया जाएगा. कंपनी के अधिकारी उसी से पूछेंगे कि कैश की सुरक्षा की जिम्मेदारी उस की थी तो कैश छोड़ कर वह क्यों गया? एक बार फिर उस ने ड्राइवर प्रदीप को फोन किया, लेकिन इस बार भी उस का फोन बंद ही मिला. विजय कुमार परेशान हो उठा था. वह औफिस फोन कर के पूछना चाहता था कि ड्राइवर प्रदीप वहां तो नहीं आया है, लेकिन डांट पड़ने की वजह से उस ने औफिस में फोन नहीं किया बल्कि सीधे ओखला फेज-1 स्थित कंपनी के औफिस पहुंच गया.

औफिस पहुंच कर पहले उस ने पार्किंग एरिया में कैश वैन को ढूंढा. जब वैन वहां नहीं दिखी तो विजय ने वहां मौजूद कंपनी के कर्मचारियों से प्रदीप के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि प्रदीप शुक्ला यहां नहीं आया है. यह जान कर विजय के होश उड़ गए. उसे लगा कि अब उस की नौकरी गई. लेकिन यह ऐसी बात थी, जिसे छिपाया भी नहीं जा सकता था. वह डरताडराता कंपनी के एरिया मैनेजर आनंद कुमार के पास पहुंचा और जब उन्हें ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के कैश वैन सहित गायब होने की बात बताई तो वह सन्न रह गए, क्योंकि ड्राइवर प्रदीप पूरे साढ़े 22 करोड़ रुपए के साथ गायब था. उन्होंने तुरंत प्रदीप शुक्ला का फोन मिलाया, लेकिन उस का फोन उस समय भी बंद था.

आनंद कुमार के दिमाग में तुरंत आया कि ड्राइवर वह रकम ले कर कहीं भाग तो नहीं गया? अगर ऐसा हुआ तो यह कंपनी के लिए भी बड़ी बदनामी वाली बात होगी. इसलिए मैनेजर ने गार्ड विजय कुमार से कहा कि अभी वह इस बारे में किसी से कोई बात न करे. एरिया मैनेजर आनंद कुमार ने इस बारे में कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की तो सभी में खलबली मच गई. क्योंकि यह कोई छोटीमोटी बात नहीं थी. जिस कैश वैन के साथ प्रदीप शुक्ला लापता था, उस में जीपीएस लगा था. उस के माध्यम से पता लगाया जा सकता था कि वैन उस समय कहां है. इसीलिए उन्होंने उस समय पुलिस को सूचना नहीं दी. कंपनी के अधिकारी खुद ही अपने स्तर से वैन का पता लगाने लगे.

जीपीएस के माध्यम से पता चला कि वह वैन दिल्ली में गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के पास खड़ी है. कंपनी के अधिकारियों की उम्मीद जागी और वे आननफानन गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के नजदीक पहुंचे तो वहां उन्हें सर्विस लेन में वह वैन खड़ी दिखाई दी. जब वे वैन के पास पहुंचे तो उस में कैश से भरे सभी संदूक गायब मिले. अब कंपनी के अधिकारियों को विश्वास हो गया कि ड्राइवर प्रदीप शुक्ला किसी दूसरी गाड़ी में उन संदूकों को ले कर भाग गया है.

अब इस बात को छिपाया नहीं जा सकता था. पुलिस को सूचना देना जरूरी था, इसलिए शाम पौने 6 बजे के करीब उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के कैश वैन के ड्राइवर द्वारा साढ़े 22 करोड़ रुपए ले कर गायब होने की सूचना दे दी. जैसे ही यह सूचना पुलिस के बड़े अधिकारियों तक पहुंची तो उन के होश उड़ गए. क्योंकि नवंबर, 2014 में दिल्ली के कमलानगर में कैश वैन से जो डेढ़ करोड़ रुपए की लूट हुई थी, वह केस अभी तक नहीं खुल पाया था, ऊपर से यह नया केस सामने आ गया.

जिस जगह यह घटना हुई थी, वह इलाका दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना ओखला के अंतर्गत आता था. सूचना पाते ही ओखला के थानाप्रभारी नरेश सोलंकी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा और एसीपी (कालकाजी) जसवीर सिंह भी आ गए. चूंकि लूट का यह बड़ा मामला था, इसलिए जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया भी चल पड़े थे. लूट की खबर मिलते ही पुलिस ने दिल्ली से बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग शुरू कर दी थी. सभी पुलिस अधिकारी उस जगह पहुंच गए, जहां कैश वैन खड़ी मिली थी. इस के बाद उन्होंने उस जगह का भी मुआयना किया, जहां वैन का ड्राइवर गनमैन विजय कुमार पटेल को छोड़ कर चला आया था.

डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा ने जरूरी जांच के लिए फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया था. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने स्पैशल सेल और क्राइम ब्रांच की स्पैशल टीम को भी बुला लिया था. सभी टीमें अपनेअपने स्तर से जांच कर रही थीं. पुलिस अधिकारियों के गले यह बात नहीं उतर रही थी कि जब घटना पौने 4 बजे घटी थी तो कंपनी के अधिकारियों ने 2 घंटे बाद पुलिस को सूचना क्यों दी? आखिर इतनी देर तक वे मामले को क्यों दबाए रहे. इस पर कंपनी के अधिकारी अपनी सफाई में यही कह रहे थे कि जीपीएस के माध्यम से वे पहले खुद ही ड्राइवर और वैन को तलाशने की कोशिश कर रहे थे. यही करने में उन्हें इतना समय लग गया.

बहरहाल, मौके की काररवाई निपटाने के बाद थाना ओखला में ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के खिलाफ अमानत में खयानत का मामला दर्ज कर लिया गया. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने इस केस के खुलासे के लिए स्पैशल सेल, क्राइम ब्रांच, स्पैशल स्टाफ के अलावा थानों के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों को भी लगा दिया. सभी टीमें अलगअलग तरीके से केस की जांच में जुट गई. पुलिस ने पूछताछ के लिए गनमैन विजय कुमार को हिरासत में ले लिया था. इस वारदात के पीछे पुलिस को 3 ऐंगल नजर आ रहे थे. पहला यह कि कैश वैन का ड्राइवर प्रदीप शुक्ला इतनी बड़ी लूट को अकेला अंजाम नहीं दे सकता था. उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर ही वारदात को अंजाम दिया होगा.

दूसरा ऐंगल यह लग रहा था कि किसी प्रोफेशनल गिरोह ने रास्ते में प्रदीप को काबू कर के उस का अपहरण कर लिया होगा और रकम व प्रदीप को वह अपनी गाड़ी में डाल कर ले गए होंगे. अगर ऐसा हुआ तो अपहर्त्ता प्रदीप की हत्या कर सकते थे. तीसरा ऐंगल यह लग रहा था कि गनमैन विजय कुमार ने साजिश रच कर यह वारदात कराई है. गनमैन योजना के तहत लघुशंका के बहाने उतर गया होगा और उस के साथियों ने ड्राइवर का पीछा कर के वारदात को अंजाम दिया होगा. पुलिस इन तीनों संभावनाओं पर तहकीकात कर रही थी.

विकासपुरी से कैश ले कर वैन जिस रूट से होते हुए श्रीनिवासपुरी की रेडलाइट तक पहुंची थी, पुलिस ने यह पता लगाया कि इस रास्ते में कहांकहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पुलिस यह जानना चाहती थी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बदमाश विकासपुरी से ही किसी गाड़ी से कैश वैन का पीछा कर रहे थे. इस के अलावा गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी गई. क्योंकि कैश वैन लावारिस अवस्था में इसी मैट्रो स्टेशन के पास खड़ी मिली थी. पुलिस की एक टीम विकासपुरी स्थित करेंसी चेस्ट पहुंची. वहां से पता चला कि एसआईएस की किसी भी वैन में रोजाना 10 करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं रखे जाते थे तब पुलिस को इस बात पर हैरानी हुई कि उस दिन वैन में साढ़े 22 करोड़ रुपए क्यों रखे गए?

इस के अलावा यहां एक खामी और सामने आई, वह यह थी कि हर दिन हरेक कैश वैन पर 2 गनमैन, एक ड्राइवर और एक कस्टोडियन सवार होता था लेकिन उस दिन कैश वैन में एक गनमैन और एक कस्टोडियन को क्यों नहीं भेजा गया? इतने ज्यादा कैश के साथ केवल एक ही गनमैन क्यों भेजा गया? कस्टोडियन सुरेश कुमार उस वैन में क्यों नहीं गया? इस के अलावा पुलिस को यह भी पता चला कि वैन में रकम रखने की जिम्मेदारी कस्टोडियन की होती है, लेकिन उस वैन में साढ़े 22 करोड़ रुपए कस्टोडियन के बजाय किसी विक्रम नाम के कर्मचारी ने रखे थे.

इन खामियों को देख कर पुलिस को शक हुआ कि लूट की योजना बनाने में यहां के कर्मचारियों का भी हाथ हो सकता है. इसीलिए पुलिस ने विक्रम, कस्टोडियन सुरेश कुमार और अन्य कई कर्मचारियों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. इस से पहले दिल्ली में कैश लूट के जो मामले हुए थे, उन में जिन बदमाशों के शामिल होने की बात सामने आई थी, पुलिस ने उन बदमाशों के डोजियर के आधार पर उन की तलाश शुरू कर दी. उन में से पुलिस के हाथ जितने भी बदमाश लगे, उन से भी सख्ती से पूछताछ की जाने लगी.

प्रदीप शुक्ला नाम का जो ड्राइवर कैश के साथ लापता था, पुलिस ने एसआईएस कंपनी से उस का फोटो और उस की डिटेल हासिल की तो पता चला कि वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिला बलिया का रहने वाला था और उस ने 10 सितंबर, 2015 को ही इस कंपनी में नौकरी जौइन की थी. कंपनी में उस ने दक्षिणी दिल्ली के कोटला मुबारकपुर का पता लिखवाया था. पुलिस की एक टीम उस के कोटला मुबारकपुर वाले पते पर पहुंची तो पता चला कि वह पहले कभी इस पते पर रहता था. मकान मालिक ने पुलिस को बताया कि अब वह ओखला इंडस्ट्रियल एरिया के नजदीक हरकेशनगर में रहता है.

हरकेशनगर का पता ले कर पुलिस टीम जब उस के कमरे पर पहुंची तो वहां उस की पत्नी शशिकला और 3 बच्चे मिले. पुलिस ने जब शशिकला से उस के पति के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह अपनी ड्यूटी गए हैं. पुलिस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रदीप घर में नोटों के बौक्स रख कर कहीं फरार हो गया हो और पत्नी झूठ बोल रही हो. यह शंका दूर करने के लिए पुलिस ने उस के कमरे की तलाशी ली, लेकिन वहां उसे कुछ नहीं मिला. पुलिस वहां से खाली हाथ लौट आई. अब तक पुलिस की किसी भी टीम को ऐसा कोई क्लू नहीं मिल सका था, जिस से प्रदीप के बारे में कोई जानकारी मिल सकती.

अब तक काफी रात हो चुकी थी. लेकिन पुलिस टीमें अपनेअपने काम में लगी थीं. पुलिस ने ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा रखा था, इस से उस की आखिरी लोकेशन अपराह्न पौने 4 बजे श्रीनिवासपुरी की आ रही थी. इस से यही लग रहा था कि वहां से कैश वैन सहित फरार होते समय उस ने अपना फोन बंद कर दिया था. पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि प्रदीप ने उसी दिन 26 नवंबर को आखिरी बार किसी अजीत के फोन पर बात की थी. बाद में पता चला कि अजीत भी हरकेशनगर में रहता है.

पुलिस अजीत के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. उस से प्रदीप के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि प्रदीप से उस की कोई खास बात नहीं हुई थी, लेकिन उस ने प्रदीप को शाम 4-5 बजे के बीच ओखला फेज-3 में देखा था. थानाप्रभारी नरेश सोलंकी अजीत को ले कर ओखला फेज-3 में उस जगह पहुंच गए, जहां उस ने प्रदीप को देखा था. वहां तमाम इंडस्ट्री हैं, इसलिए प्रदीप को ढूंढना आसान नहीं था. थानाप्रभारी ने इस बात से डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा को अवगत कराया तो उन्होंने उस इलाके में सर्च औपरेशन चलाने के निर्देश दिए.

सर्च औपरेशन में सरिता विहार के थानाप्रभारी महिंदर सिंह, नेहरू प्लेस पुलिस चौकी इंचार्ज मनमीत मलिक, एसआई राजेंद्र डागर, जितेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल यतेंद्र आदि को भी लगा दिया गया. इस टीम का निर्देशन कालकाजी के एसीपी जसवीर सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम हर फैक्ट्री में जाती और प्रदीप का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछती. इसी क्रम में पुलिस ओखला फेज-3 स्थित एक ढाबे पर पहुंची. वह ढाबा अजय का था. वह ढाबा देर रात तक खुला रहता था. पुलिस ने ढाबे वाले को प्रदीप का फोटो दिखाया तो उस ने बताया कि इसे उस ने यहीं पर रात साढ़े 9 बजे के करीब देखा था.

ढाबे वाले से बात कर के बाद पुलिस को यकीन हो गया कि प्रदीप जिंदा है. क्योंकि पुलिस को आशंका थी कि अपहर्त्ताओं ने उसे कहीं मार न दिया हो. कैश कहां है, यह बात प्रदीप के मिलने पर ही पता लग सकती थी. इसलिए उसे ढूंढना जरूरी था. पुलिस को लगा कि कुछ घंटे पहले जब प्रदीप यहीं था तो जरूर यहीं कहीं छिपा होगा. इस के बाद पुलिस पूरे उत्साह से एकएक फैक्ट्री में जा कर उसे खोजने लगी. खोजबीन करते हुए पुलिस ढाबे से करीब 50 गज दूर एक फैक्ट्री के गेट पर पहुंची तो उस में अंदर से ताला बंद था. गेट खटखटाने पर गेट पर एक अधेड़ उम्र का आदमी आया. वह उस फैक्ट्री का चौकीदार था. उस का नाम रामसूरत था.

पुलिस ने चौकीदार को ड्राइवर प्रदीप शुक्ला का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछा और गोदाम की तलाशी लेने के लिए कहा. पुलिस को देख कर चौकीदार रामसूरत डर गया. वह गेट की चाबी लेने की बात कह कर अंदर गया और कुछ देर बाद लौट कर गेट खोल कर पुलिस को अंदर ले आया. उस ने एक कमरे का दरवाजा खोल कर कहा, ‘‘सर, जिस की आप को तलाश है, वह यह रहा.’’

पुलिस कमरे में घुसी तो सचमुच वहां फरार ड्राइवर प्रदीप शुक्ला मिल गया. उसी कमरे में कैश से भरे 9 संदूक भी रखे थे. यह सब देख कर पुलिस की बांछें खिल उठीं. पुलिस ने प्रदीप को हिरासत में ले कर उन बक्सों की जांच की तो उन में से केवल एक बक्से की क्लिप हटी थी, बाकी 8 बक्से जैसे के तैसे थे. पुलिस ने प्रदीप शुक्ला और चौकीदार रामसूरत को उसी समय हिरासत में ले लिया. रामसूरत लाख सफाई देता रहा कि उस का इस मामले से कोई संबंध नहीं है, पर पुलिस ने उस की एक न सुनी. हां, पुलिस ने उसे इतना भरोसा जरूर दिया कि अगर वह निर्दोष पाया गया तो उसे छोड़ दिया जाएगा. यह बात 27 नवंबर, 2015 सुबह 3 बजे की है.

एसीपी जसबीर सिंह ने ड्राइवर प्रदीप शुक्ला को गिरफ्तार करने व कैश बरामद होने की जानकारी डीसीपी व अन्य अधिकारियों को दी तो डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा, जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया सहित कई अन्य अधिकारी भी ओखला के उस गोदाम पर पहुंच गए. सभी संदूकों को जब्त करने के बाद पुलिस प्रदीप शुक्ला और चौकीदार रामसूरत को थाने ले आई. पुलिस यही अनुमान लगा रही थी कि इतनी बड़ी रकम को लूटने में जरूर किसी बड़े गैंग का हाथ रहा होगा, लेकिन थाने में प्रदीप शुक्ला से जब पूछताछ की गई तो पता चला कि इस लूट में उस के अलावा कोई दूसरा शामिल नहीं था. और यह लूट भी कोई पहले से बनाई प्लानिंग के तहत नहीं की गई थी, बल्कि अचानक यह सब किया गया था.

प्रदीप शुक्ला ने करीब 3 महीने पहले ही सिक्योरिटी एजेंसी एसआईएस में ड्राइवर की नौकरी जौइन की थी. उस की ड्यूटी विकासपुरी ब्रांच से कैश ले कर कंपनी के ओखला स्थित हैडऔफिस में पहुंचाने की थी. कभीकभी उसे एटीएम मशीनों में पैसे रखने वाली टीम के साथ भी भेज दिया जाता था. प्रदीप ने बताया कि उस से जितना काम लिया जाता था, उस के मुताबिक उसे सैलरी नहीं मिलती थी. मजबूरी में उसे कम पैसों में वहां नौकरी करनी पड़ रही थी. इसीलिए कभीकभी उस के दिमाग में विचार आता था कि जो पैसे वह वैन में ले कर जाता है, अगर उसे मिल जाएं तो उस की पूरी जिंदगी ठाठ से कटेगी.  लेकिन यह उस की केवल सोच थी, उस ने वे पैसे ले कर भागने के बारे में कभी नहीं सोचा. बहरहाल कम वेतन मिलने की वजह से वह मानसिक तनाव में जरूर रहता था.

26 नवंबर को वह साढ़े 22 करोड़ रुपए विकासपुरी के करेंसी चेस्ट से ले कर चला. जब श्रीनिवासपुरी रेडलाइट के पास वैन का गनमैन विजय कुमार पटेल लघुशंका के लिए उतर गया तो अचानक उसे लालच आ गया. उस ने सोचा कि पैसे ले कर भागने का इस से अच्छा मौका उसे फिर कभी नहीं मिलेगा और वह नोटों से भरे उन 9 संदूकों को ले कर सीधे ओखला फेज-3 स्थित रामसूरत के पास पहुंच गया. वह उसे पहले से जानता था.

रामसूरत जिस गोदाम में चौकीदारी करता था, वहां पहले मर्सिडीज कारों का वर्कशाप था. लेकिन कुछ सालों से वहां तार का काम होता था. यह गोदाम धु्रवकुमार नाम के एक बिजनेसमैन का था. रामसूरत धु्रवकुमार के यहां पिछले 22 सालों से नौकरी कर रहा था. प्रदीप की पत्नी शशिकला पहले इसी गोदाम में काम करती थी. तभी से प्रदीप की रामसूरत से जानपहचान थी. रामसूरत ने ही किसी से सिफारिश कर के प्रदीप की नौकरी एसआईएस सिक्योरिटी कंपनी में बतौर ड्राइवर लगवाई थी.

शाम को करीब 5 बजे प्रदीप कैश वैन ले कर रामसूरत के पास गोदाम में पहुंचा. प्रदीप ने रामसूरत को बताया कि उन 9 संदूकों में पन्नी के बंडल हैं. उन्हें वह बनारस ले जाएगा, जिस की एवज में उसे 10 हजार रुपए मिलेंगे. इस के बाद उस ने वैन से नोटों से भरे सारे संदूक उतार कर गोदाम के एक कमरे में रख दिए. फिर मौका मिलने पर उस ने खर्चे के लिए एक संदूक से 11 हजार रुपए निकाल लिए.

इस के बाद वह यह कह कर वैन ले कर चला गया कि थोड़ी देर में लेबर ले कर आ रहा है ताकि सभी संदूकों को पैक करा कर बनारस ले जा सके. इस पर रामसूरत मान गया. इस के बाद प्रदीप वैन को गोविंदपुरी मेट्रो स्टेशन के पास छोड़ कर चला आया. लौटते समय रास्ते भर वह यही सोचता रहा कि इस रकम को ले कर वह कहां जाए. प्रदीप ने खर्चे के लिए एक संदूक से 11 हजार रुपए निकाल लिए थे. खानेपीने का कुछ सामान लेने के लिए वह बाजार चला गया. वहां से उस ने महंगी शराब खरीदी, होटल से चिकन पैक कराया. इस के बाद वह गोदाम लौट आया. उसे अकेले देख कर रामसूरत ने पूछा, ‘‘तुम तो पैकिंग के लिए लेबर लेने गए थे, लेबर कहां है?’’

इस पर प्रदीप ने बताया कि रात की वजह से लेबर नहीं मिली, सुबह को देखूंगा. रामसूरत ने भी उस की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और वह वहां से चला गया. उस के जाने के बाद प्रदीप ने उन संदूकों के पास बैठ कर शराब पी और चिकन खाया. फिर वह कपड़ा बिछा कर वहीं सो गया. रामसूरत भी अपनी जगह पर जा कर सो गया. सुबह 3 बजे के करीब किसी ने गेट खटखटाया तो रामसूरत की नींद खुली. वह गेट पर गया तो बाहर भारी संख्या में पुलिस को देख कर घबरा गया. पुलिस वालों ने जब उसे फोटो दिखाया तो वह समझ गया कि प्रदीप जरूर ही कोई गलत काम कर के भागा है. चाबी लेने के बहाने रामसूरत उस कमरे में आया जहां प्रदीप सो रहा था.

रामसूरत ने प्रदीप को जगा कर कहा, ‘‘ये पन्नी के बौक्स क्या तुम चोरी कर के लाए हो, जो पुलिस यहां आई है.’’

पुलिस का नाम सुनते ही प्रदीप डर गया. वह झट से बोला कि कोई भागने का रास्ता हो तो बताओ. इस से रामसूरत को विश्वास हो गया कि वह जरूर कोई गड़बड़ कर के आया है. इस से पहले कि प्रदीप वहां से भाग पाता, रामसूरत ने कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. प्रदीप मिन्नतें करते हुए दरवाजा खोलने को कहता रहा लेकिन रामसूरत ने उस की एक नहीं सुनी और वह गेट पर खड़े पुलिस वालों को उस कमरे में ले गया जहां प्रदीप था. प्रदीप ने एक संदूक से जो 11 हजार रुपए निकाले थे, उन में से वह साढ़े 10 हजार रुपए खर्च कर चुका था.

उस से पूछताछ के बाद पुलिस को जब यकीन हो गया कि इस लूट के मामले में उस के अलावा किसी और का हाथ नहीं है तो हिरासत में लिए गए बाकी लोगों को छोड़ दिया गया. साथ ही पुलिस ने ईमानदारी से अपना फर्ज निभाने वाले चौकीदार रामसूरत को धन्यवाद भी दिया. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने 10 घंटे के अंदर ही दिल्ली की सब से बड़ी कैश लूट का खुलासा कर रकम बरामद करने वाली पुलिस टीम की सराहना की. प्रदीप से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. मामले की विवेचना थानाप्रभारी नरेश सोलंकी कर रहे हैं. Bank Robbery

—कथा पुलिस सूत्रों

Swachh Bharat: स्वच्छता लाने के लिए

Swachh Bharat: हमारे यहां स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है. इस के लिए सरकार ने टैक्स भी वसूलना शुरू कर दिया है. लेकिन क्या घरों, मोहल्लों और सड़कों की

सफाई से भारत स्वच्छ हो जाएगा? स्वच्छता तभी संभव है, जब हर नागरिक स्वच्छता के महत्व को समझे या फिर दंडात्मक तरीके से इस के महत्त्व को समझाया जाए. अगर बात सड़कों की करें तो सड़कें तो साफ हो जाएंगी, लेकिन उन पर चलने वाले वाहनों का क्या? सड़कों पर अगर आप गौर से देखें तो 20-25 प्रतिशत वाहन ही साफसुथरे नजर आएंगे. ज्यादातर वाहनों पर धूल, मिट्टी या कीचड़ लगी मिलेगी. खासकर नंबर प्लेटों पर. इस के लिए हमारे यहां भी चीन जैसी कोई शुरुआत होनी चाहिए.

चीन के नानजिंग शहर में एक नई शुरुआत हुई है, जिस का आम लोगों ने समर्थन भी किया है और स्वागत भी. वहां जो भी वाहन गंदा नजर आता है, उस के मालिक को जुरमाना भरना होता है. खासतौर पर लोक परिवहन से जुड़े वाहनों को इस नियम का सख्ती से पालन करना होता है. दरअसल, कुछ समय पहले लोगों ने लोक परिवहन से जुड़े वाहनों के फोटो खींच कर औनलाइन कर दिए और लिख दिया, ‘ये वाहन पर्यटकों के बीच देश की छवि खराब कर रहे हैं.’ इस बात को प्रशासन ने गंभीरता से लिया और इस के लिए नियम बना डाला. परिणाम यह निकला कि सड़कों पर दौड़ने वाले सभी वाहन साफसुथरे नजर आने लगे. यह नियम निजी वाहन चालकों पर भी लागू किया गया.

जिस किसी वाहन के पहियों, चेसिस या फिर बौडी पर धूल, मिट्टी अथवा कीचड़ दिखाई देती है, उस पर पहली बार में 11 सौ रुपए जुरमाना लगाया जाता है. इस का पूरा डाटा औनलाइन दर्ज किया जाता है. अगर दूसरी बार वही वाहन नियम तोड़ता मिलता है तो जुरमाने की राशि बढ़ जाती है.

अगर किसी वाहन की नंबर प्लेट धूल या कीचड़ के कारण दिखाई न दे रही हो तो उसे अधिक जुरमाना भरना पड़ता है. सब से ज्यादा जुरमाने का प्रावधान वाहन के बाहरी हिस्से के क्षतिग्रस्त होने या खराब दिखने वाले पेंट वर्क पर लगाया जाता है. इस में ड्राइवर या वाहन मालिक को 5 हजार से ले कर 20 हजार रुपए तक देने पड़ते हैं. अगर बर्फबारी या बारिश के कारण कीचड़ लगता है तो नियम में छूट मिल सकती है. Swachh Bharat

Jinnah Love Story: जिन्ना और रत्ती की प्रेम कहानी

Jinnah Love Story: पाकिस्तान के जनक जिन्ना को भले ही कट्टर माना जाता हो, लेकिन उन के अंदर एक प्यारभरा दिल भी था जो रत्ती यानी रतनबाई के लिए धड़कता था. दोनों में प्यार भी हुआ, परवान भी चढ़ा. लेकिन शादी के बाद…

बात सन 1938 की है. सांप्रदायिक राजनीति पूरे उफान पर थी. इस दौरान मोहम्मद अली जिन्ना देश के सब से बड़े मुसलिम नेता के तौर पर उभर रहे थे. ऐसे नाजुक मौके पर उन की बेटी दीना ने एक गैरमुसलिम युवक नेविल वाडिया के साथ शादी की इच्छा प्रकट की तो जिन्ना का उत्तर अप्रत्याशित नहीं था. उन्होंने पिता के अधिकार से कहा, ‘‘हिंदुस्तान में तुम्हारे लायक लाखों मुसलिम लड़के हैं. उन में से तुम किसी को भी चुन सकती हो.’’

लेकिन दीना अपनी जिद्दी मां और उस से भी ज्यादा अपने जिद्दी पिता की संतान थी. इसलिए उस ने जो जवाब दिया, वह जिन्ना के लिए भी अप्रत्याशित था. दीना ने कहा, ‘‘डैडी, हिंदुस्तान में लाखों मुसलमान लड़कियां थीं, फिर भी आप ने उन में से किसी से शादी नहीं की.’’

जिन्ना को अपनी लाडली एकलौती बेटी के जवाब ने लाजवाब कर दिया. लेकिन वह अपनी बेटी केइशारे को समझ गए थे. उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि 20 साल पहले का उन के अपने जीवन का इतिहास इतनी जल्दी स्वयं को दोहराएगा. उन्होंने भी पारसी खानदान में जन्मी रतनबाई उर्फ रत्ती से प्यार किया था और सारे जमाने से लड़ कर उस से शादी की थी. बहुत अनोखी, मगर बहुत ट्रैजिक थी उन की प्रेम कहानी.

रतनबाई पेटिट का जन्म सन 1900 में मुंबई के समृद्ध और प्रतिष्ठित पारसी पेटिट परिवार में हुआ था. पेटिट परिवार मुंबई के पेडर रोड पर एक विशाल बंगले में रहता था. परिवार के कई बंगले पुणे दार्जिलिंग और कई रमणीक स्थानों पर थे. रत्ती आकर्षक और प्रतिभाशाली लड़की थी. कला और साहित्य में उस की गहरी दिलचस्पी थी. वह देश के स्वतंत्रता संग्राम की लहर से भी अछूती नहीं थी. परिवार में उस जमाने में कई राजनीतिज्ञों और नेताओं का आनाजाना लगा रहता था. रत्ती उन की बातचीत, बहस और चर्चाएं अकसर सुनती रहती थी.

उस की 2 बुआओं की राजनीतिक हलचलों में गहरी दिलचस्पी थी. उन के साथ वह अकसर मुंबई की राजनीतिक सभाओं और मीटिंगों में जाती रहती थी. मुंबई के सामाजिक, राजनीतिक और व्यापारिक क्षेत्र के दिग्गजों के बीच 40 की उम्र पार कर चुके जिन्ना का व्यक्तित्व कई कारणों से विशिष्ट था. जिन्ना तब अपने पेशेवराना और सार्वजनिक जीवन के चरम पर थे. 1915 में मुंबई में जिन्ना के बारे में वोलपर्ट ने लिखा है, ‘‘किचनर की तरह बड़ी मूंछें, स्याह बाल और कटार की तरह पतले जिन्ना रोनाल्ड कोलमैन की तरह बोलते थे और एंथनी इडेन की तरह कपड़े पहनते थे. पहली ही नजर में ज्यादातर महिलाएं उन की प्रशंसक बन जाती थीं तो ज्यादातर पुरुष उन से ईर्ष्या करते थे.’’

सर दिनशा पेटिट से उन की अच्छी मित्रता थी. जिन्ना का उन के घर अकसर आनाजाना होता रहता था. जीवन के सब से खतरनाक माने जाने वाले सोलहवें साल की दहलीज पर खड़ी रत्ती के मन में धीरेधीरे अपने पिता के उम्र के इस सुदर्शन प्रौढ़ के प्रति कहीं न कहीं आकर्षण का अंकुर फूटने लगा था. दूसरी तरफ जिन्ना मनोरम व्यक्तित्व की रत्ती में हो रहे परिवर्तन को अनदेखा करने की स्थिति में नहीं थे.

जिन्ना के व्यक्तित्व से प्रभावित रत्ती उन के हर सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने लगी थी. लेकिन धर्म और उम्र की दूरी के कारण दोनों के बीच पनप रहे प्यार को अभव्यक्त होने का मौका नहीं मिला था. तभी जिन्ना पेटिट परिवार के साथ गर्मियां बिताने के लिए अप्रैल, 1916 में दार्जिलिंग पहुंचे. दार्जिलिंग की वादियों में दोनों को पहली बार एकदूसरे की कोमल भावनाओं का अहसास हुआ. जब वे वापस लौटे तो दोनों के मन में एक साथ जीवन बिताने के खूबसूरत सपने पल रहे थे.

जनवरी, 1917 की एक शाम सर दिनशा पेटिट के बंगले पर विभिन्न धार्मिक समुदायों की एकता पर चर्चा के दौरान जिन्ना ने उन से विभिन्न समुदायों के बीच वैवाहिक रिश्तों के बारे में उन की राय जाननी चाही. सर पेटिट की राय इस के लिए अनुकूल थी. इस मौके का लाभ उठाते हुए जिन्ना ने थोड़ा झिझकते हुए उन की बेटी रत्ती के साथ शादी का प्रस्ताव रख दिया.

कुछ समय पहले व्यक्त किए गए अपने उदार विचार की ऐसी परिणति से सर पेटिट चौंक गए और गुस्से से उबल पड़े. उन से केवल 3 साल छोटे एक प्रौढ़ से अपनी 16 साल की किशोर बेटी की शादी की बात उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोची थी. परिवार की मेहमाननवाजी और मैत्री संबंध का लाभ उठाते हुए किशोर बेटी के साथ प्रेमसंबंध बढ़ाने की जिन्ना की कोशिश उन्हें अनैतिक लग रही थी. उन्होंने जिन्ना के इस असंस्कृत प्रस्ताव को गुस्से के साथ खारिज कर दिया.

प्रेमबद्ध बैरिस्टर जिन्ना की सारी दलीलें और अपीलें बेकार गई थीं. इस के बाद जिन्ना और पेटिट की दोस्ती तो दूर रही, बातचीत भी बंद हो गई थी. पेटिट ने शादी की मंजूरी तो दूर रही, रत्ती के जिन्ना से मिलने पर भी रोक लगा दी थी. फिर उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया. उन के आवेदन पर पारसी विवाह कानून के प्रावधान के तहत रत्ती के जिन्ना से मिलने पर सख्त रोक लगा दी गई थी और रत्ती को अपने विवाह के बारे में फैसला लेने के लिए अक्षम घोषित कर दिया था. कानून का सम्मान करने वाले जिन्ना ने रत्ती से तब तक मुलाकात नहीं की, जब तक 20 फरवरी, 1918 को वह 18 साल की नहीं हो गईं.

रत्ती ने 19 अप्रैल, 1918 को जिन्ना के साथ मुंबई की जामिया मसजिद में जा कर मौलाना नजीर अहमद खोजांदी की मौजूदगी में इसलाम कबूल कर लिया और फिर शिया रस्मोरिवाज के मुताबिक शादी की. शादी के गवाहों में मजमूदाबाद के राजा शामिल थे, जो दुलहन की शादी की अंगूठी ले कर आए थे. जिन्ना जब लंदन में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, तब उन की इच्छा थी कि शेक्सपियर के रोमानी नाटक रोमियो जूलियट में रोमियो की भूमिका निभाएं. नाटक में रोमियो का रोल करने का तो उन्हें अवसर नहीं मिल पाया, लेकिन वास्तविक जिंदगी में कुछ वैसा ही रोल करने का मौका जरूर मिला. उन की जूलियट ने 2 साल उन का इंतजार किया.

बाद में जब वह 18 साल की हुई और घर में उस की सालगिरह मनाने की तैयारियां चल रही थीं. उसी दिन वह पिता का घर छोड़ कर जिन्ना के घर चली गईं. सर पेटिट इस घटना से इतने क्षुब्ध थे कि उन्होंने बेटी की मौत की सूचना छपवा कर उस का उठावना तक कर दिया था. इस के बाद उन्होंने रत्ती से कभी कोई संबंध नहीं रखा.

कुछ दिनों बाद अखबार में रत्ती के इसलाम कबूल करने और जिन्ना के साथ उन की शादी की खबर छपी. धर्म परिवर्तन के बाद रत्ती का नाम मरियम रखा गया. रत्ती के साथ शादी में जिन्ना को सर पेटिट के ऐतराज के अलावा भी कई रुकावटें आईं. जिन्ना को अपने इस्माइली शिया समुदाय के विरोध का भी सामना करना पड़ा. असल में इस विवाह को ले कर जिन्ना और पेटिट के परिवार में ही नहीं वरन पारसी और इस्माइली शिया समुदाय में भी तनाव पैदा हो गया था.

जिन्ना एक जानेमाने राजनीतिज्ञ और चोटी के वकील थे, इस के बावजूद इस्माइली जमात की सर्वोच्च सभा रत्ती को अपने समाज में शामिल करने से हिचकिचा रही थी. इस्माइली  समाज मुख्य रूप से व्यापारियों का समाज था. पारसी मुंबई के व्यापार और उद्योग पर छाए हुए थे और पेटिट इस समाज के प्रतिष्ठित सदस्य थे. वे दूसरे धर्म के अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ जो कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, अपने समाज की किशोर लड़की की शादी को पचा नहीं पा रहे थे.

वे इस बात से और भी खफा थे कि मुसलिम कानून धर्म परिवर्तन के बिना उस विवाह को कबूल नहीं कर सकता था. इस के अलावा इस्माइली समाज के लोग रत्ती को अपने धर्म में शामिल कर के पारसियों को नाराज नहीं करना चाहते थे. लेकिन आखिरकार जिन्ना ने इन सारी समस्याओं को अपने तरीके से हल कर लिया. उन्होंने इस्माइली समाज से नाता तोड़ लिया और असरी जमात के अनुसार विवाह किया.

निकाह में मेहर की रकम 1001 रुपए तय की गई, लेकिन जिन्ना ने फौरन 1 लाख 25 हजार रुपए का तोहफा दिया. जिन्ना सिविल मैरिज कर के ज्यादा खुश हो सकते थे, लेकिन उस जमाने के कानून के मुताबिक कोर्टमैरिज का विकल्प चुनने वाले लोगों को यह ऐलान करना होता था कि वे किसी मजहब को नहीं मानते. जिन्ना मुसलिम निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे और इस तरह की घोषणा से उन का चुनाव निरस्त हो जाता.

ख्वाजा रजी हैदर लिखते हैं कि मुंबई के पारसी इस धर्मांतरण से काफी नाराज थे. पारसी अखबारों ने शादी के दिन को काला शुक्रवार घोषित कर दिया. अपहरण का मामला दर्ज किया गया और जब यह मामला अदालत पहुंचा तो न्यायाधीश ने पूछा कि क्या जिन्ना ने पैसे के लिए शादी की है. इस से नाराज जिन्ना ने कहा कि इस सवाल का जवाब केवल उन की पत्नी ही दे सकती हैं. पत्नी आगे आईं और उन्होंने अदालत को बताया कि वह प्यार की खातिर मुसलमान बनीं और न तो वह और न ही उन के पति उन के पिता की दौलत में हिस्सा चाहते हैं.

डा. सैय्यद महमूद को लिखे पत्र में सरोजिनी नायडू ने इस विवाह की बहुत अच्छी तसवीर पेश की है, ‘‘सो, जिन्ना ने आखिरकार अपने मन का नीला फूल तोड़ लिया. यह सब बहुत अचानक हुआ और इस का जबरदस्त विरोध भी हुआ. पारसियों में काफी नाराजगी थी. लेकिन मुझे लगता है कि उस लड़की ने बड़ी कुरबानी दी है और अभी तक उसे इस का अहसास नहीं है. जिन्ना इस सब के लायक हैं, वह प्यार करते हैं. ऐसा प्यार जो वास्तव में इंसानी है और उन के अंतर्मुखी एवं आत्मकेंद्रित प्रकृति का वास्तविक भाव है.’’

शादी के बाद जिन्ना और रत्ती सुहागरात मनाने नैनीताल गए. वे वहां एक हफ्ता रहे. जिन्ना के रेतीले जीवन में पहली बार कोई रसधार फूटी थी. वह उस की हर बूंद को आत्मसात कर लेना चाहते थे. नैनीताल से वे कार से दिल्ली आए. वहां नए बने मेरीडियन होटल में रुके. इस होटल के वातावरण और साजसज्जा में मुगलकाल के साथसाथ ब्रिटिश सुखसुविधाओं का सुंदर समन्वय था.

जिन्ना और रत्ती की उम्र में 2 दशक का लंबा फासला होने के बावजूद दोनों अपने समय में भारत के सब से चर्चित दंपति थे तो उस की वजह यह थी कि अपने गोरे रंग, लंबी छरहरी देहयष्टि, कीमती सूट, आत्मविश्वास से भरी तेजस्वी आंखें, पश्चिमी शिष्टाचार, अंगरेजी पर जबरदस्त अधिकार, आकर्षक व्यक्तित्व, एक सफल वकील की छवि और राजनीति में प्रखर सेक्युलर और राष्ट्रवादी नेता की छवि से महिमामंडित जिन्ना के साथ ग्लैमर जुड़ा हुआ था. रत्ती के जिन्ना के प्रति आकर्षण में इस ग्लैमर की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. पर रत्ती खुद भी कम नहीं थीं.

अभिजात्य वर्ग की रत्ती किशोरावस्था से यौवन की तरुणाई की ओर बढ़ते सौंदर्य की मिसाल थीं. उन के तीखे ईरानी नाकनक्श, लंबोतरा चेहरा, गुलाब पंखुड़ी जैसे होंठ, सुडौल ग्रीवा उन के सौंदर्य को विशिष्ट बनाते थे. पर सौंदर्य की बाहरी चमकदमक के पीछे रत्ती बेहद संवेदनशील और कुशाग्र बुद्धि वाली स्वाभिमानी युवती थीं. मुंबई की सब से मशहूर और खूबसूरत दुलहन के तौर पर रत्ती अपने बालों में ताजे फूल, हीरे जडि़त गहने पहनती थीं. हाथी के दांत के होल्डर में रखी अंगरेजी सिगरेट पीती थीं. माणिक, पन्ने और गले के काफी नीचे तक के रेशमी परिधान पहनती थीं, जिस से बुजुर्ग महिलाएं दंग रहती थीं. इस के  अलावा अपने समय के मुंबई की सब से स्वच्छंद और ग्रंथिमुक्त व्यक्तित्व थीं. जिन्ना ने भी रत्ती के उन्मुक्त जीवन में कभी हस्तक्षेप नहीं किया, न करने दिया.

जिन्ना दंपति के हनीमून से मुंबई लौटने के बाद मुंबई के गवर्नर लौर्ड विलिंगडन ने रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया. उस दिन रत्ती ने गले से बहुत नीचे कट वाला फैशनेबल गाउन पहन रखा था, जिस से उन की मेजबान खुश नहीं थीं. जब वे सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे, तब लेडी विलिंगडन ने एक एडीसी से कहा कि मिसेज जिन्ना को ठंड लग रही होगी, उन के लिए एक शाल ले आएं.

बताया जाता है कि जिन्ना खड़े हो गए और बोले, ‘‘जब मिसेज जिन्ना को ठंड लगेगी तो वह खुद बताएंगी और खुद ढकने के लिए कपड़ा मांगेंगी.’’

और फिर लौर्ड विलिंगडन जब तक गवर्नर रहे, तब तक जिन्ना गवर्नर हाउस दोबारा नहीं गए. रत्ती स्वभाव से आजादखयाल थीं. एक बार कश्मीर में वह एक फार्म से परेशान हो गईं, जिस में उन की यात्रा का मकसद दर्ज करने को कहा गया था. उन्होंने लिखा, ‘राजद्रोह फैलाने के लिए’.

शिमला के वाइसराय लौर्ड चेम्सफोर्ड ने जिन्ना दंपति के सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया था. जब रत्ती का परिचय कराया गया तो उन्होंने पश्चिमी ढंग से झुक कर अभिवादन करने के बजाय दोनों हाथ जोड़ कर सम्मान प्रकट किया. वाइसराय को यह नागवार गुजरा. भोजन के बाद उन्होंने रत्ती को अपने पास बुलवाया और सख्त आवाज में कहा, ‘‘आप के पति का राजनीतिक भविष्य उज्जवल है. आप को अपने व्यवहार से इसे खराब नहीं करना चाहिए. ‘इन रोम यू मस्ट डू ऐज रोमंस डू’ यह उन का अंतिम वाक्य था.’’

रत्ती ने विनम्र हो कर कहा, ‘‘ठीक वही तो किया है महामहिम. मैं हिंदुस्तान में हूं और हिंदुस्तानी अंदाज में ही मैं ने आप का अभिवादन किया है.’’

चेम्सफोर्ड निरुत्तर हो चुके थे. उस के बाद रत्ती उन के किसी आयोजन में शामिल नहीं हुईं. रत्ती से शादी के पहले जिन्ना के मुंबई आवास साउथ कोर्ट पर उन की बहन फातिमा का कब्जा था. रत्ती के प्रवेश से उन का एकछत्र राज टूटा. इस से पहले जिन्ना रत्ती को भी वक्त नहीं दे पा रहे थे. राजनीतिक व्यस्तताओं ने उन्हें रत्ती से दूर कर दिया. रत्ती खुद को उपेक्षित महसूस करने लगीं. जनवरी, 1928 में उन्होंने जिन्ना से अलग रहने का फैसला किया. उन्होंने मुंबई में समंदर किनारे बने ताज होटल में एक सुइट बुक करा लिया था. यही वह वक्त था जब उदारवादी और सेक्युलर जिन्ना का नया अवतार सामने आया. वह था मुसलिम सांप्रदायिक नेता का.

उधर रत्ती जिन्ना से अलग भले ही हो गई थीं, लेकिन जिन्ना के प्रति आत्मीय भाव बना हुआ था. वह बदलते जिन्ना को देख कर व्यथित थीं. धीरेधीरे पहले से खराब तबीयत और खराब होने लगी. अप्रैल, 1928 में वह इलाज के लिए मां के साथ पेरिस रवाना हुईं. जिन्ना भी रत्ती से मिलने के लिए पेरिस के अस्पताल पहुंचे. उन्होंने डाक्टरों से मशविरा कर रत्ती के लिए बेहतर डाक्टर और नर्स की व्यवस्था की. वह एक महीना साथ रहे, देखभाल से रत्ती ठीक होने लगी थीं.

फिर अचानक दोनों में झगड़ा हुआ और रत्ती मां के साथ मुंबई लौट गई. कुछ समय ठीक रहने के बाद स्वास्थ्य फिर गिरने लगा. 18 फरवरी, 1929 को रत्ती ने जिन्ना के लिए लिखा—

मेरे प्रिय,

मैं ने तुम्हें इतना प्यार किया, जितना कभी किसी पुरुष को नहीं किया. यही प्रार्थना है कि जिस ट्रैजेडी का प्रारंभ प्रेम से हुआ था, उस का अवसान भी प्रेम से ही हो. गुडनाइट… गुडबाय. 2 दिनों बाद अपने जन्मदिन पर रतनबाई ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं. तब पहली बार सर पेटिट ने जिन्ना से बात की. केवल इतना ही कहा कि रत्ती बहुत बीमार है. यहां आ जाओ. परीकथा की इस हसीन नायिका का अंत सुखद नहीं था.

रत्ती इस दुनिया से जरूर चली गई थीं, लेकिन जिन्ना के दिल से नहीं जा पाई. जिन्ना पाकिस्तान जाने से पहले जब भी मुंबई में होते थे, हर बृहस्पतिवार को रतनबाई जिन्ना की मजार पर फातिहा पढ़ने जाते थे. कुछ लोग तो उन के पीछे मजाक में यहां तक कहने लगे थे, ‘कायद रतनबाई के मरने के बाद कुछ ज्यादा ही मोहब्बत करने लगे हैं.’ Jinnah Love Story.

 लेखक – सतीश पेडणेकर