Crime Stories: बेईमान हुए इमानदार रिश्ते

Crime Stories: ताऊ और ताई तो शालू को पढ़ालिखा कर उस की जिंदगी रौशन करना चाहते थे जबकि वह कशिश के प्यार में पड़ कर अपने शुभचिंतक ताऊ और ताई को धोखा दे रही थी. इस के बाद उस ने क्या किया…

बच्चे पढ़लिख कर कामयाबी के शिखर पर पहुंच जाएं हर मातापिता के लिए यह बेहद खुशी की बात होती है. उन्हें लगता है कि उन की जिंदगी भर की मेहनत कामयाब हो गई. उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता शनसवीर सिंह और उन की पत्नी निर्मला खुश थीं कि उन का युवा बेटा पुलकित सिंह भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में सलैक्शन के बाद लेफ्टिनेंट बन गया था.

11 जून, 2015 को देहरादून आयोजित पासिंग आउट परेड में जब उन्होंने अपनी आंखों से बेटे के कंधों पर स्टार लगते देखे तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. शिक्षा के बल पर उन्होंने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचा दिया था. मृदुभाषी शनसवीर खुद तो उच्च शिक्षित थे ही, उन की पत्नी निर्मला भी उच्च शिक्षित थीं. उन्होंने एमएससी (फिजिक्स) व बीएड की डिग्रियां ली थीं और शिक्षिका रही थीं, लेकिन सन 2000 में उन्होंने पारिवारिक कारणों से नौकरी को अलविदा कह दिया था.

शनसवीर जनपद मेरठ की मवाना रोड स्थित पौश कालोनी डिफैंस कालोनी की कोठी नंबर सी-53 में रहते थे. उन के 2 ही बच्चे थे, बड़ी बेटी प्रिंसी और उस से छोटा पुलकित. प्रिंसी ने एमबीबीएस, एमडी किया था, जिस का उन्होंने विवाह कर दिया था. प्रिंसी के पति भी डाक्टर थे. प्रिंसी दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर सीनियर रेजीडेंट डाक्टर नियुक्त थीं. शनसवीर सिंह मूलरूप से मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के गांव जंघेड़ी के रहने वाले थे. उन के पिता वेद सिंह किसान थे. शनसवीर 5 भाइयों में चौथे नंबर पर थे. उन के अन्य भाई गांव में ही रहते थे. इन में सुभाष की तबीयत खराब रहती थी, उन का नियमित उपचार चल रहा था.

शारीरिक कमजोरी की वजह से वह ठीक से चलफिर नहीं पाते थे. कुछ महीने पहले शनसवीर ने मेरठ में ही उन का औपरेशन कराया था. कुछ दिन मेरठ रह कर वह गांव चले गए थे. जबकि उन की पत्नी सविता शनसवीर के साथ ही रह रही थीं. उन के सब से छोटे भाई सुखपाल की युवा बेटी शालू सिंह उन्हीं के पास रह कर पढ़ रही थी. वह एक इंजीनियरिंग कालेज से बीबीए कर रही थी. शनसवीर की पोस्टिंग वर्तमान में जिला संभल में थी. वह वहीं रहते भी थे. हफ्ते-10 दिन में घर आ जाया करते थे.

शनसवीर परिवार के अपने नजदीकी लोगों को साथ ले कर चलने वाले व्यक्ति थे. यही वजह थी कि वह एक भाई का इलाज करा रहे थे तो दूसरे भाई की बेटी को अपने पास रख कर पढ़ा रहे थे. दरअसल निर्मला चाहती थीं कि उन के बच्चों की तरह शालू भी पढ़ाई कर के कुछ बन जाए. वह शालू को बहुत प्यार करती थीं. प्रिंसी और पुलकित के बाद शालू ही उन के प्यार की एकलौती हकदार थी. निर्मला उस की सभी जरूरतें बिना किसी भेदभाव के पूरा करती थीं.

सिंह दंपति बेटे की पासिंग आउट परेड देखने के लिए देहरादून गए थे. 14 जून को वापस आए तो पुलकित भी उन के साथ था. अगले दिन शनसवीर अपनी ड्यूटी पर चले गए, जबकि पुलकित एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली और वहां से चंडीगढ़ चला गया. शनसवीर के ड्यूटी पर चले जाने के बाद कोठी में 3 लोग ही रह गए थे. एक उन की पत्नी निर्मला, दूसरी निर्मला की देवरानी सविता और तीसरी उन की भतीजी 20 वर्षीया शालू.

शनसवीर आदतन प्रतिदिन संभल से पत्नी को फोन करते रहते थे. 17 जून को भी उन्होंने दिन में 2 बार उन से बात की. इस के बाद रात 10 बजे उन्होंने पत्नी का मोबाइल मिलाया तो वह स्विच औफ आया. इस पर उन्होंने घर का लैंडलाइन फोन मिलाया तो फोन भतीजी शालू ने उठाया. आवाज पहचान कर वह बोले, ‘‘अपनी ताई से बात कराओ.’’

‘‘नमस्ते ताऊजी, वह तो घर पर नहीं हैं.’’ शालू ने कहा तो शनसवीर चौंके. क्योंकि उस वक्त निर्मला को घर पर ही होना चाहिए था.

‘‘कहां हैं वह?’’

‘‘पता नहीं, मुझे तो बहुत फिक्र हो रही है.’’ शालू के जवाब से उन की चिंता बढ़ी तो उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘वह मिठाई ले आने की बात कह कर करीब 7 बजे गई थीं, लेकिन अभी तक आई नहीं हैं.’’

‘‘और तुम मुझे अब बता रही हो?’’ उन्होंने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा और शालू से निर्मला को आसपड़ोस में देखने को कहा.

उन्होंने सोचा कि हो सकता है, कहीं उन्हें बातों में वक्त लग गया हो. यह बात सच थी कि निर्मला को मिठाई लेने दुकान पर जाना था, क्योंकि उन्होंने फोन पर यह बात दिन में उन्हें बताई थी कि मोहल्ले के कुछ लोगों को बेटे के अफसर बनने की खुशी में मिठाई दे कर आनी है. इस तरह बिना बताए इतनी देर तक निर्मला कहां हैं, इस बात ने शनसवीर को चिंता में डाल दिया था. कुछ देर बाद उन्होंने शालू को पुन: फोन किया. उस ने बताया कि वह पड़ोस में सब के यहां पूछ आई है, वह किसी के यहां नहीं हैं.

शनसवीर ने फोन पर शालू से ही बात की, क्योंकि जेठ होने की वजह से सविता उन से टेलीफोन पर भी बात नहीं करती थी. उन्होंने शालू से पुन: फोन कर के कहा, ‘‘मनोरमा के यहां देख आओ, शायद वहां हों?’’

‘‘नहीं ताऊजी, वह तो खुद ही उन्हें पूछने आई थीं. वह इंतजार कर के चली गईं.’’

शालू के इस जवाब से वह और भी चिंतित हो गए. दरअसल मनोरमा पड़ोस में ही साकेत में ही रहती थीं और निर्मला की सहेली थीं. परेशान हाल शनसवीर ने प्रिंसी को इस उम्मीद में फोन किया कि शायद मां ने बेटी को ही कुछ बताया हो. डा. प्रिंसी ने बताया कि उस की मां से दिन में बात हुई थी शाम को नहीं हुई. शनसवीर ने मनोरमा को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वह निर्मला से मिलने गई थीं, लेकिन वह घर पर नहीं मिली थीं.

परेशान शनसवीर आधी रात के बाद संभल से चल कर मुंहअंधेरे मेरठ पहुंच गए. इस बीच न तो निर्मला घर आई थीं और न ही उन का मोबाइल औन हुआ था. निर्मला के इस तरह गायब होने से घर में शालू व सविता भी परेशान थीं. शनसवीर के आने पर उन दोनों ने उन्हें बता दिया कि उन्हें निर्मला के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है. निर्मला के बैडरूम में ताला लगा हुआ था. शालू ने बताया कि चाबी वह साथ ले गई हैं. बैडरूम में ताला लगाने का औचित्य शनसवीर की समझ में नहीं आया. उन्होंने किसी तरह दरवाजा खोला. बैडरूम बिलकुल सामान्य था. पत्नी कहीं किसी दुर्घटना की शिकार न हो गई हों, यह सोच कर उन्होंने शहर के अस्पतालों में भी पता किया. लेकिन उन का कोई पता नहीं चल सका. इस बात का पता चलने पर उन के कई परिचित भी आ गए थे.

शनसवीर ने पुलिस कंट्रोल रूम को पत्नी के लापता होने की सूचना दे दी थी. पुलिस उन के घर आई और थाने चल कर गुमशुदगी दर्ज कराने को कहा. वह अपने परिचित महेश बालियान के साथ थाना लालकुर्ती पहुंचे और पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने पत्नी का एक फोटो भी पुलिस को दे दिया. निर्मला रहस्यमयी ढंग से कहां लापता हो गई थीं, कोई नहीं जानता था. उन के अपहरण की आशंका जरूर थी, लेकिन शनसवीर के पास कोई भी संदिग्ध फोन नहीं आया था. अगले दिन शनसवीर की बेटी डा. प्रिंसी व दामाद भी घर आ गए. इस बीच पुलिस अधिकारियों को यह बात पता चली तो डीआईजी रमित शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे ने अधीनस्थों को इस मामले में जल्द काररवाई करने के निर्देश दिए.

एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह व एसपी संकल्प शर्मा के निर्देशन में थाना लालकुर्ती के थानाप्रभारी विजय कुमार पुलिस टीम के साथ शनसवीर के घर पहुंचे. निर्मला के लापता होने के वक्त चूंकि उन की देवरानी सविता व भतीजी शालू ही घर पर थे, इसलिए पुलिस ने दोनों से पूछताछ कर के उन के लापता होने का पूरा घटनाक्रम पता लगाया. पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए निर्मला और परिवार के अन्य सदस्यों के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उन सभी नंबरों की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के प्रभारी श्यामवीर सिंह व उन की टीम को लगा दिया गया.

जांच में अगले दिन पता चला कि निर्मला के फोन की अंतिम लोकेशन कालोनी की ही थी. इस के बाद उन का मोबाइल बंद हो गया था. एक और खास बात यह थी कि शालू का भी मोबाइल निर्मला के लापता होने के बाद से लगातार बंद था. पुलिस को निर्मला के लापता होने की कोई खास वजह समझ में नहीं आ रही थी. इसलिए उस ने अपनी जांच परिवार के इर्दगिर्द ही समेट दी. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थाना की थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने एकएक कर के परिवार के सभी सदस्यों से पूछताछ की. सविता घर में ही रहती थी, बाहरी दुनिया से उसे ज्यादा मतलब नहीं था. निर्मला को ले कर वह अपने बयान पर कायम थी कि उसे नहीं पता कि वह कहां चली गईं.

पुलिस ने शालू से उस का मोबाइल बंद होने की वजह पूछी तो वह कोई खास जवाब नहीं दे सकी. जबकि इस के पहले प्रतिदिन उस के मोबाइल का जम कर इस्तेमाल होता था. पुलिस ने उसे शक के दायरे में ले लिया. शालू तेजतर्रार युवती थी. शालू निर्मला की सगी भतीजी थी. उन के गायब होने में उस का कोई हाथ हो सकता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता था. लेकिन मोबाइल उस की चुगली कर रहा था. अपने इस शक को पुलिस ने शनसवीर को भी बता दिया.

शनसवीर के पास भतीजी पर शक करने की कोई वजह तो नहीं थी, लेकिन उस की एक बात में उन्हें भी झोल नजर आ रहा था. दरअसल उस ने बताया था कि निर्मला की सहेली मनोरमा जब घर आई थीं तो बैठ कर इंतजार कर के चली गई थीं. जबकि मनोरमा का कहना था कि वह निर्मला को पूछने के लिए आईं तो शालू ने बिना दरवाजा खोले ही कह दिया था कि पता नहीं वह कब आएंगी, आप कब तक बैठ कर इंतजार करेंगी. दोनों की बातों में भिन्नता थी. सविता से इस बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह घर के अंदर थी. मनोरमा कब आई थीं, उसे पता नहीं. मामला परिवार का था, इसलिए सभी ने शालू से पूछताछ की, लेकिन उस ने निर्मला के बारे में कोई जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया.

इस बीच पुलिस ने शालू के मोबाइल की काल डिटेल्स में मिले एक ऐसे नंबर को जांच में शामिल कर लिया, जिस पर वह सब से ज्यादा बातें करती थी. वह नंबर कशिश पुत्र चंद्रपाल निवासी गांव सलारपुर का था. यह गांव मेरठ के ही थाना इंचौली के अंतर्गत आता था. इस में चौंकाने वाली बात यह थी कि घटना वाली शाम इस नंबर की लोकेशन कालोनी की ही पाई गई थी. इस से पहले भी कई बार इस की लोकेशन कालोनी की पाई गई थी. इस का मतलब वह शालू के पास आता रहता था. अब शालू पूरी तरह शक के दायरे में आ गई थी. निस्संदेह कुछ ऐसा जरूर था, जो वह सभी से छिपा रही थी.

पुलिस एक बार फिर 20 जून को शनसवीर के घर पूछताछ करने पहुंच गई. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने शालू से पूछताछ की, ‘‘तुम कशिश को जानती हो?’’

इस पर वह चौंकी जरूर, लेकिन बहुत जल्दी उस ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, ‘‘जी हां, वह मेरे साथ पढ़ता है.’’

‘‘17 तारीख को क्या वह यहां आया था?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

पुलिस जानती थी कि उस का यह जवाब बिलकुल झूठ है.

‘‘सोच कर बताओ?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

सविता ने भी घर में किसी के आने से इनकार कर दिया था. अलबत्ता चिंतामग्न जरूर थी. पुलिस ने अपना सारा ध्यान शालू पर जमा दिया. पुलिस समझ गई थी कि शालू जरूरत से ज्यादा चालाक लड़की है. पुलिस सख्ती नहीं दिखाना चाहती थी. ऐसी स्थिति में उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लेना जरूरी था. पुलिस ने शनसवीर को असलियत बता कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस अब उस के जरिए ही कशिश तक पहुंचना चाहती थी. उस शाम एक और नंबर की लोकेशन भी कालोनी में थी. उस नंबर पर भी कशिश की बातें होती थीं. वह नंबर गौरव उर्फ राजू पुत्र चंद्रसेन का था. वह भी गांव सलारपुर का रहने वाला था.

पुलिस समझ गई कि इस तिगड़ी के बीच ही निर्मला के लापता होने का राज छिपा है. सविता गांव की भोली सूरत वाली औरत थी. पुलिस को उस पर ज्यादा शक नहीं था. पुलिस शालू को ले कर कशिश की तलाश में कालेज पहुंची. कशिश उस दिन कालेज नहीं आया था. पुलिस ने शालू से कशिश को फोन कर के कालेज बुलाने को कहा. उस की बात तो हुई, लेकिन कशिश ने बताया कि वह मोदीनगर में है. इसलिए अभी नहीं आ सकता. पुलिस ने कशिश की लोकेशन पता लगाई तो पता चला कि वह गांव में ही है. पुलिस उस के गांव पहुंची और कशिश के साथसाथ गौरव को भी हिरासत में ले लिया.

तीनों को थाने ला कर अलगअलग बैठा कर पूछताछ की गई तो उन के बयानों में भिन्नता नजर आई. इस के बाद पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने ऐसे चौंकाने वाले राज से पर्दा उठाया, जिसे सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. ये लोग निर्मला की हत्या कर के उन की लाश को ठिकाने लगा चुके थे. इस हत्या में उन का साथ भोली दिखने वाली निर्मला की देवरानी सविता ने भी दिया था. वह पूरे राज को छिपाए हुए थी. पुलिस ने उसे भी हिरासत में ले लिया.

निर्मला की हत्या का पता चला तो परिवार में कोहराम मच गया. पुलिस ने कशिश की निशानदेही पर डिफैंस कालोनी से करीब 20 किलोमीटर दूर मोदीपुरम-ललसाना मार्ग पर एक स्थान से निर्मला का शव बरामद कर लिया. उन के गले में अभी भी दुपट्टा कसा हुआ था और हाथ बंधे हुए थे. पुलिस ने शव का पंचनामा कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने पकड़े गए लोगों के खिलाफ शनसवीर की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को विधिवत गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद सभी से विस्तृत पूछताछ की गई. निर्मला शालू को बहुत प्यार करती थीं. ऐसी स्थिति में आखिर सगी भतीजी ही उन की कातिल क्यों बनी, इस के पीछे एक चौंकाने वाली कहानी थी.

लोक निर्माण विभाग में नौकरी लगने के साथ ही शनसवीर परिवार को साथ रखने लगे थे. बाद में उन की तैनाती मेरठ में हुई तो उन्होंने डिफैंस कालोनी में अपनी कोठी बना ली. शनसवीर और उन की पत्नी उस सोच के व्यक्ति थे, जो परिवार को साथ ले कर चलते हैं और सभी की कामयाबी का ख्वाब देखते हैं. कई साल पहले वह छोटे भाई सुभाष की बेटी शालू को अपने साथ मेरठ ले आए कि शहर में अच्छी पढ़ाई कर के वह कुछ बन जाएगी. शालू बचपन से तेजतर्रार थी, यह बात सिर्फ उस की आदतों में लागू होती थी न कि पढ़ाई के मामले में. शनसवीर के परिवार में रह कर उस ने 8वीं तक की पढ़ाई की. बाद में वह गांव वापस चली गई. वहां रह कर उस ने मुजफ्फरनगर से इंटर किया. आगे की पढ़ाई वह अच्छे से कर सके, इसलिए निर्मला जून, 2013 में उसे अपने पास मेरठ ले आईं.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मेरठ के एक इंस्टीट्यूट में उस का दाखिला करा दिया गया. इस बीच निर्मला की बेटी प्रिंसी ने सीपीएमटी का एग्जाम पास कर लिया. इस के बाद उस ने एमबीबीएस और एमडी किया. बाद में उस का विवाह हो गया और वह राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर चिकित्सक अपनी सेवाएं देने लगी. साल 2014 में शनसवीर का बेटा पुलकित भी आईएमए में प्रशिक्षण के लिए चला गया.

इस बीच शनसवीर का स्थानांतरण संभल हो गया था. वहां से वह घर आते रहते थे. निर्मला भी कभीकभी उन के पास चली जाया करती थीं. रिश्तों में कोई दूरी महसूस न हो, इसलिए निर्मला शालू का हर तरह से खयाल रखती थीं. शालू उन लड़कियों में से थी, जो आजादी का नाजायज फायदा उठाती हैं. उस ने भी ऐसा ही किया. उस की दोस्ती अपने ही कालेज में पढ़ने वाले कशिश से हो गई. उन के बीच मोबाइल से ले कर घरेलू फोन तक पर बातों का लंबा सिलसिला चलने लगा.

निर्मला जब पति के पास संभल चली जातीं तो शालू की आजादी और बढ़ जाती. कुछ महीने पहले शनसवीर अपने भाई सुभाष का औपरेशन कराने के लिए मेरठ ले आए. उन के साथ उन की पत्नी सविता भी आई. औपरेशन के बाद सुभाष कुछ दिनों कोठी में रहे, उस के बाद गांव चले गए, जबकि सविता वहीं रहती रही. उधर शालू की कशिश से दोस्ती प्यार में बदल गई. दोस्ती और प्यार तक तो ठीक था, लेकिन दोनों के कदम मर्यादा की दीवारों को लांघ चुके थे. हालात बिगड़ने तब शुरू हुए, जब कशिश उस से मिलने कोठी पर भी आने लगा. अभी तक उस के और शालू के संबंध निर्मला से पूरी तरह छिपे थे. सविता यह बात किसी को न बताए. शालू ने निर्मला की बुराइयां कर के उसे अपने पक्ष में कर लिया था.

निर्मला व सविता की आर्थिक स्थिति में जमीनआसमान का अंतर था. यह बात सविता को अंदर ही अंदर कचोटती थी. जलन की यही भावना थी, जो उस ने शालू की हरकतों को निर्मला से पूरी तरह छिपा लिया था और उसे बिगड़ने की पूरी छूट दे दी थी. वह नहीं जानती थी कि बाद में इस का अंजाम भयानक भी हो सकता है. निर्मला सभी का भला करने की सोच रही थीं. उन के मन में अविश्वास जैसी कोई बात नहीं थी. लेकिन वह नहीं जानती थीं कि उन के लिए दोनों के दिलों में जहर भरा  है. निर्मला बहुत सुलझी हुई महिला थीं, पर रिश्तों के विश्वास के मामले में वह अपने ही घर में धोखा खा रही थीं.

शालू इंस्टीट्यूट जाने के बहाने न सिर्फ कशिश के साथ घूमतीफिरती थी, बल्कि निर्मला के पति के पास संभल चले जाने या बाजार आदि जाने के बाद उसे घर में ही बुला कर उस के साथ वक्त बिताती थी. निर्मला कभी सविता से शालू के बारे में कुछ पूछतीं तो वह उस की कोई शिकायत नहीं करती थी. ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं. एक दिन निर्मला को यह बातें किसी तरह पता चलीं तो उन्होंने शालू को जम कर लताड़ा और उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. शालू ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि कशिश केवल उस का सहपाठी है, इसलिए कभीकभी कालेज की कापीकिताब देनेलेने के लिए आ जाता है.

देवर की बेटी को वह उस के अच्छे भविष्य के लिए अपने साथ रख कर पढ़ा रही थीं. सामाजिक व नैतिक रूप से उसे सही रास्ते पर रखने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. उन्होंने ऐसा ही किया भी. शालू ने कशिश से अपने रिश्ते खत्म करने की बात कह कर झूठी कसमें भी खा लीं. कसमें खाने व झूठ बोलने से शालू का गहरा नाता था. पकड़ में आई शालू की पहली गलती थी, इसलिए उन्होंने यह बातें पति व अन्य से छिपा लीं. शालू ने वादा तो किया, लेकिन वह उस पर लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी.

कशिश ने फिर से घर आना शुरू किया तो निर्मला ने परिवार के लोेगों को यह बात बता दी. सभी ने शालू को समझाया. गैर युवक घर में आता है, सविता ही इस बारे में कुछ बता सकती थी. लेकिन उस का कहना था कि शालू उस के सो जाने के बाद उसे बुलाती होगी. इसलिए उसे पता नहीं चलता. जबकि यह कोरा झूठ था. सविता जानती थी कि कशिश कब आताजाता था. शालू की हरकतें पता चलने पर शनसवीर उसे मेरठ में रखने के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने अपना इरादा बताया तो निर्मला शालू के पक्ष में आ गईं. उन्होंने कहा कि उसे एक आखिरी मौका देना चाहिए. दरअसल वह नहीं चाहती थीं कि शालू की पढ़ाई बीच में छूटे और उस का भविष्य खराब हो.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन शालू ने फिर से पुराना ढर्रा अख्तियार कर लिया. वह फोन पर अकसर लंबीलंबी बातें करती, जिस के लिए निर्मला उसे डांट देती थीं. उसी बीच शनसवीर मेरठ आए और निर्मला को ले कर बेटे की परेड में शामिल होने देहरादून चले गए. वहां से वापस आ कर वह संभल चले गए. एक दिन निर्मला शालू की अलमारी में किताबें देखने लगीं तो उन्हें अलमारी में छिपा कर रखे गए कुछ ऐसे कागज मिले, जिन्हें देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे महिला चिकित्सकों की रिपोर्टें थीं. उन पर शालू का नाम भी लिखा था. दरअसल शालू प्यार में नैतिकता की सारी हदें लांघ गई थी. शालू इस हद तक गिर जाएगी, निर्मला को कतई उम्मीद नहीं थी.

उन्होंने उसे बुला कर न सिर्फ थप्पड़ जड़ दिया, बल्कि इस बारे में पूछा तो रिपोर्ट देख कर उस के होश उड़ गए. उस के मुंह से शब्द नहीं निकले. निर्मला गुस्से में थीं. उस दिन उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें बरदाश्त नहीं कर सकती. सब को तुम्हारी असलियत बता कर गांव भेज दूंगी. तूने अब मेरा भरोसा तोड़ दिया है.’’

शालू की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. वह चालाक तो थी ही, उस ने रोने का नाटक किया और निर्मला के पैर पकड़ कर माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने अब सही रास्ते पर चलने की कसमों की झड़ी लगा दी. यह 16 जून, 2015 की बात थी. शालू अपनी हरकत पकड़े जाने से बहुत डर गई. सविता से भी यह बातें छिपी नहीं थीं. उस ने शालू से कहा कि अब उसे कोई नहीं बचा सकता. शालू अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी.

इसलिए मन ही मन उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया और वह फैसला कशिश को फोन पर बता कर कहा, ‘‘कशिश मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती. ताई ने अगर ये बातें सब को बता दीं तो मुझे हमेशा के लिए गांव जाना पड़ जाएगा. तुम किसी भी तरह उन्हें रास्ते से हटा दो. उन के मरने के बाद कोठी में तुम आजादी से आ सकोगे. वैसे भी उन के बाद यहां सब मेरा है.’’

कशिश के सिर पर भी शालू के प्यार का जुनून सवार था. दोनों ने निर्मला को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. अपनी इस योजना में कशिश ने गांव के ही अपने दोस्त गौरव को भी शामिल कर लिया. उधर शालू ने सविता को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया. सविता ने भी सोचा कि निर्मला के दुनिया से चले जाने के बाद घर पर उस का एकक्षत्र राज हो जाएगा. इस बीच शालू निर्मला पर उस वक्त नजर रखती थी, जब वह फोन पर पति व बेटी से बातें करती थीं. उन्होंने शालू की हरकत किसी को नहीं बताई थी. जब वह बात करती थीं तो शालू हाथ जोड़ कर उन के सामने खड़ी हो जाती थी. यह शालू की योजना का हिस्सा था.

योजना के अनुसार 17 जून को कशिश कालोनी में आया. शालू बहाने से बाहर आ कर उस से मिली तो वह नींद की गोलियां उसे देते हुए बोला, ‘‘जब अपना काम कर लेना तो फोन कर देना.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हें फोन कर दूंगी.’’

दोपहर बाद निर्मला अपने बैडरूम में थीं, तभी शालू उन के लिए शरबत बना कर ले आई. उस में उस ने नींद की कई गोलियां मिला दी थीं. निर्मला को चूंकि मालूम नहीं था, इसलिए उन्होंने शरबत पी लिया. शरबत ने अपना असर दिखाया और वह जल्दी ही सो गईं. नींद की गोलियां ज्यादा डाली गई थीं. इसलिए कुछ देर में उन की नाक से खून और मुंह से झाग आने लगा. यह देख कर शालू खुश थी. उस ने कशिश को फोन किया और उस के आने का इंतजार करने लगी. कशिश व गौरव वैगनआर कार से घर आ गए. सविता ने गला दबाने के लिए उन दोनों को दुपट्टा ला कर दे दिया. कशिश व गौरव ने दुपट्टे से निर्मला का गला दबा दिया.

इस दौरान शालू व सविता ने निर्मला के पैरों को जकड़ लिया था. निर्मला गोलियों की हैवी डोज के चलते विरोध के काबिल नहीं बची थीं. हत्या के बाद चारों ने मिल कर निर्मला के शव को कार में रख दिया. कार कोठी के अंदर आ गई थी. सविता घर पर ही रही, जबकि कशिश, गौरव व शालू एक सुनसान स्थान पर शव को छिपा कर लौट गए. कशिश व गौरव अपने घर चले गए. जबकि शालू ने वापस आ कर निर्मला के बैडरूम को साफ कर के बाहर से ताला लगा दिया. उस ने उन के मोबाइल का स्विच्ड औफ कर के उसे छिपा दिया. उस ने अपना भी मोबाइल बंद कर दिया. उस ने कशिश को समझा दिया था कि यहां वह सब संभाल लेगी और अपने हिसाब से उस से बात करेगी.

शाम को निर्मला की सहेली मनोरमा उन्हें पूछने के लिए आई तो बिना दरवाजा खोले ही शालू ने उन के घर में न होने की बात कह कर उन्हें लौटा दिया. शालू व सविता ने राज छिपाए रहने की पूरी योजना बना ली थी. शालू ने सविता को समझा दिया था कि वह अपनेआप ही सब संभाल लेगी. 10 बजे शनसवीर का फोन आया तो शालू ने उन से निर्मला के लापता होने की बात बता दी. शालू व सविता ने हत्या के राज को पूरी तरह छिपाए रखा. वह अपने इस झूठ के नाटक में कामयाब रही थी, लेकिन मोबाइल ने उस की पोल खोल दी. पुलिस ने वैगनआर कार भी बरामद कर ली. सभी आरोपियों को पुलिस ने अगले दिन यानी 21 जून को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

रिश्तों की इस हत्या से हर कोई हैरान था. खून के रिश्तों में मदद का ऐसा अंजाम होगा, यह शनसवीर ने कभी नहीं सोचा था. वैसे भी रिश्तों में हुई घटनाएं बहुत दर्द देती हैं. यह दर्द तब और भी बढ़ जाता है, जब उसे देने वाले अपने होते हैं. शालू ने अपनी आजादी का नाजायज फायदा न उठा कर केवल पढ़ाई पर ध्यान लगाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

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साफ था उस गठरी में लाश थी, इसलिए वहां एकत्र लोगों में से किसी ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलैस द्वारा प्रसारित कर दी, इसलिए इस बात की जानकारी सभी पुलिस थानों और पुलिस अधिकारियों को हो गई.

चूंकि घटनास्थल नवी मुंबई के वाशी एपीएमसी थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा मिली सूचना के आधार पर थाना एपीएमसी की सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे ने चार्जरूम में तैनात असिस्टैंट पुलिस इंसपेक्टर डी.डी. चासकर को बुला कर मामले की शिकायत दर्ज कर के शीघ्र घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. डी.डी. चासकर ने तुरंत शिकायत दर्ज की और सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से 3-4 किलोमीटर दूर था, इसलिए थोड़ी ही देर में यह पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच गई.

घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस टीम ने नाले में पड़ी गठरी को निकलवा कर खोला तो उस में महिला की लाश थी. मृतका 25 साल से ज्यादा की नहीं लगती थी. उस के गले में काले रंग का धागा बंधा था, जिस में एक लौकेट भी पड़ा था. कपड़ों में उस के शरीर पर गुलाबी रंग का सलवारसूट था. हाथों में नए जमाने की अंगूठियां और स्टील की चूडि़यां थीं. शक्लसूरत और पहनावे से वह मध्यमवर्गीय परिवार की कामकाजी महिला लग रही थी. लाश अकड़ चुकी थी. बारीकी से देखा गया तो उस के गले पर हलके रंग का नीला निशान दिखाई दिया. इस तरह नाले में लाश मिलने और गले पर नीला निशान होने से पुलिस को मामला हत्या का लगा.

डी.डी. चासकर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर के शिनाख्त कराने की कोशिश कर रहे थे, तभी नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर के.एस. प्रसाद, अपर पुलिस कमिश्नर फत्ते सिंह पाटिल, एडिशनल पुलिस कमिश्नर के.एल. शहाजी उपाय, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर अरुण वालतुरे, सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे, इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत, प्रमोद रोमण, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रणव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, प्रैस फोटोग्राफर तथा फिंगरप्रिंट ब्यूरो के सदस्य पहुंच गए.

प्रैस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने अपना काम निपटा लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद डी.डी. चासकर से अब तक की प्रगति के बारे में पूछा. सारी जानकारी लेने के बाद इंसपेक्टर माया मोरे को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर सभी अधिकारी चले गए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद माया मोरे ने एक बार फिर लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. लेकिन उस भीड़ में से कोई भी मृतका की पहचान नहीं कर सका. इस से यह बात साफ हो गई कि मृतका वहां आसपास की रहने वाली नहीं थी.

हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी महानगर पालिका के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. यह घटना 11 फरवरी, 2015 की सुबह की थी. थाने लौट कर थानाप्रभारी माया मोरे ने हत्याकांड के खुलासे के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर प्रमोद रोमण, उल्हास कदम, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रताप राव कदम, डी.डी. चासकर, सिपाही लहू भोसले, परदेशी, नितिन सोनवणे, सुधीर चव्हाण, देव सूर्यवंशी, पंकज पवार, रामफेतले फुड़े और चिकणे को शामिल किया गया.

इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए सब से जरूरी था मृतका की शिनाख्त, जो इस जांच टीम के लिए एक चुनौती थी. जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, उसी तरह इस टीम ने भी सभी थानों से पता किया कि कहीं उस हुलिए कि किसी महिला की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. टीम की यह कोशिश बेकार गई, क्योंकि इस तरह की महिला की कहीं किसी थाने में कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. इस कोशिश में असफल होने के बाद पुलिस लाश का फोटो ले कर थाणे के साथसाथ मानपाड़ा, चेंबूर, उल्हासनगर और नवी मुंबई के सभी बीयर बारों और गेस्टहाऊसों में गई कि शायद कहीं कोई उस की पहचान कर दे. इस बार पुलिस टीम को सफलता तो मिल गई, लेकिन पूरी तरह नहीं.

पुलिस को जो जानकारी मिली, उस के अनुसार मृतका बारमेड थी और उस का नाम शिल्पा उर्फ किस्मत था. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं चला कि वह रहने वाली कहां की थी? यह पता करने के लिए पुलिस टीम ने अधिकारियों की सलाह पर मृतका शिल्पा उर्फ किस्मत की लाश के फोटो सभी प्रमुख अखबारों में छपवाने के साथसाथ स्थानीय चैनलों पर भी प्रसारित कराए. इस का फायदा यह हुआ कि पुलिस को मृतका के बारे में सारी जानकारी मिल गई, जिस के बाद मामले का खुलासा कर के पुलिस ने हत्यारे को पकड़ लिया.

15 फरवरी, 2015 को राजस्थान के शकरपुरा के रहने वाले शाबीर गुदड़ावत अपनी पत्नी के साथ थाना वाशी एपीएमसी पहुंचे और इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत को बताया कि टीवी चैनलों एवं अखबारों में जिस लाश की फोटो दिखाई गई हैं, वह उन की बेटी शिल्पा उर्फ किस्मत से काफी मिलतीजुलती हैं. उस से उन की कई दिनों से बात भी नहीं हो सकी है. बालकृष्ण सावंत शाबीर गुदड़ावत और उन की पत्नी को वाशी महानगर पालिका के अस्पताल ले गए, जहां शिल्पा उर्फ किस्मत का शव रखा था. जब उन्हें लाश और उस के कपड़े दिखाए गए तो शाबीर जहां सिसक उठे, वहीं उन की पत्नी छाती पीटपीट कर रोने लगीं. बालकृष्ण सावंत ने उन्हें धीरज बंधाया और जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश कब्जे में ले ली.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद अब पुलिस को हत्यारे की खोज करनी थी. शाबीर गुदड़ावत के अनुसार, शिल्पा की हत्या की सूचना उस की सहेली रिया ने दी थी. वह यहां उस के साथ करीब 4 सालों से रह रही थी. शाबीर गुदड़ावत से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने शिल्पा की सहेली रिया को थाने बुलाया. वह थाणे पश्चिम के लोकमान्य तिलक नगर की चाल नंबर 4 में रहती थी. वह बार में डांस करती थी. शिल्पा से उस की मुलाकात थाणे के रेडबुल बीयर बार में हुई थी. वहां शिल्पा बारमेड का काम करती थी. पहले दोनों  का परिचय हुआ, उस के बाद दोस्ती हुई. दोस्ती गहरी हुई तो दोनों साथसाथ रहने लगीं.

पूछताछ में रिया ने जो बताया, उस के अनुसार, 10 फरवरी, 2015 की रात 8 बजे के करीब शिल्पा यह कह कर घर से निकली थी कि उस के किसी ग्राहक का फोन आया है. वह उस से मिल कर थोड़ी देर में आ जाएगी. लेकिन वह गई तो लौट कर नहीं आई. उस ने उसे फोन किया तो उस का मोबाइल बंद बता रहा था. उस के न आने और मोबाइल बंद होने से वह परेशान हो उठी. वह उस की तलाश करने लगी, लेकिन जब कई दिनों तक उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो वह थाने जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज कराने के बारे में सोचने लगी. वह थाने जाती, उस के पहले ही उसे अखबारों और टीवी चैनलों से उस की हत्या की सूचना मिल गई. इस के बाद उस ने इस बात की जानकारी उस के पिता शाबीर गुदड़ावत को दे दी.

जिस तेजी से जांच आगे बढ़ी थी, उसी तेजी से रुक भी गई. क्योंकि पुलिस को जो उम्मीद थी, रिया से वे जानकारियां नहीं मिल सकीं. पुलिस को उम्मीद थी कि रिया से कोई न कोई ऐसी जानकारी मिल जाएगी, जिस के सहारे वह शिल्पा के हत्यारे तक पहुंच जाएगी. मगर ऐसा नहीं हो सका. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस को अभी और पापड़ बेलने की जरूरत थी. जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस टीम ने एक बार फिर शिल्पा के पिता शाबीर को थाने बुला कर शिल्पा के बारे में एकएक बात बताने को कहा. क्योंकि पुलिस को लग रहा था कि उन से मिली जानकारी में जरूर कोई ऐसा आदमी मिल सकता है, जिस पर संदेह किया जा सके.

और हुआ भी वही. शाबीर गुदड़ावत ने जो बताया, उस के अनुसार शिल्पा का पूर्व पे्रमी और मंगेतर दंगल सिंह संदेह के घेरे में आ गया. दंगल सिंह और शिल्पा के प्यार की एक लंबी कहानी थी, जो घर वालों ने उन के बचपन में ही लिख दी थी. दंगल सिंह की 2 बहनें थीं, जो थाणे में रहती थीं और बारों में डांस करती थीं. वह जब कभी मुबंई आता था, अपनी दोनों बहनों के पास ही रहता था. इसलिए पुलिस को लगा कि उस की बहनों से दंगल सिंह के बारे में जानकारी मिल सकती है. लेकिन जब पुलिस टीम उन के घर पहुंची तो वहां ताला बंद था.

पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि उन के आने के कुछ घंटे पहले ही वे ताला बंद कर के गांव चली गई हैं. उन के इस तरह चले जाने से पुलिस टीम को लगा कि जरूर दाल में कुछ काला है. इस के बाद बालकृष्ण सावंत ने अपनी जांच तेज कर दी. उन्होंने शिल्पा के पिता शाबीर गुदड़ावत से दंगल सिंह के बारे में पूरी जानकारी ले कर असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रतापराव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, सिपाही नितिन सोनवणे, देव सूर्यवंशी, खेतले और लहु भोसले की टीम बना कर दंगल सिंह को गिरफ्तार करने के लिए उस के गांव भेज दिया.

मुंबई पुलिस की यह टीम दंगल सिंह के घर उस की बहनों के पहुंचने से पहले ही पहुंच जाना चाहती थी, क्योंकि पुलिस को जो जानकारी मिली थी, उस के अनुसार दंगल सिंह जिस गांव में रहता था, वह गांव काफी खतरनाक था. वह ऐसा गांव था, जहां स्थानीय पुलिस जाने से घबराती थी. अगर दंगल सिंह को पता चल जाता कि मुंबई पुलिस उसे गिरफ्तार करने गांव आ रही है तो वह बचने के लिए कुछ भी कर सकता था. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. स्थानीय पुलिस का सहयोग न मिलने के बावजूद मुंबई पुलिस ने अपनी सूझबूझ से दंगल सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने दंगल सिंह से मिली जानकारी के आधार पर उस की दोनों बहनों को झांसी के बसअड्डे से गिरफ्तार किया और सभी को ले कर नवी मुंबई आ गई.

पूछताछ में दंगल सिंह ने तो शिल्पा की हत्या का जुर्म स्वीकार कर ही लिया. उस की दोनों बहनों ने भी स्वीकार कर लिया कि उन्हें शिल्पा की हत्या की जानकारी हो गई थी. डर की वजह से वे इस बात की सूचना पुलिस को देने के बजाय घर में ताला बंद कर के गांव के लिए रवाना हो गई थीं. क्योंकि उन्हें आशंका हो गई थी कि पुलिस उन के यहां कभी भी पहुंच सकती थी. इस पूछताछ में शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

बेडि़या समाज का 29 वर्षीय दंगल सिंह मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित जिला शिवपुरी के गांव डबरापुर का रहने वाला था. उस के पिता का नाम भूप सिंह कर्मावत था, जो परिवार के साथ गांव में ही रहते थे. उन के परिवार में पत्नी, 3 बेटियां और एक बेटा दंगल सिंह था. भूप सिंह की 2 बेटियां महाराष्ट्र के जनपद थाणे में रहती थीं और मुंबई के बीयर बारों में डांस करती थीं. छोटी बेटी और बेटा दंगल सिंह गांव में ही रहता था. भूप सिंह की 2 बेटियां मुंबई में कमा रही थीं, इसलिए उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. दंगल सिंह उन का एकलौता वारिस था, इसलिए घर के सभी लोग उसे बड़ा प्यार करते थे.

गांव में भूप सिंह के पास ठीकठाक खेती की जमीन थी. फिर भी उस ने अपना नाचगाने का पेशा नहीं छोड़ा था. पहले इन की लड़कियां मुजरा करती थीं. अब मुजरे का चलन रहा नहीं, इसलिए इन की लड़कियां मुंबई जा कर बीयर बारों में डांस करने लगीं. भूप सिंह और शाबीर गुदड़ावत की पुरानी रिश्तेदारी थी. इसी वजह से भूप सिंह के घर बेटा और शाबीर गुदड़ावत के घर बेटी पैदा हुई तो दोनों ने बचपन में ही उन की शादी तय कर दी. शिल्पा शाबीर की सब से छोटी बेटी थी. अपने पेशे के हिसाब से वह भी नाचगाने में निपुण थी.

परिवार में छोटी होने की वजह से शिल्पा पर काम की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. सुंदर वह थी ही, स्वभाव से भी चंचल थी. सयानी होने पर जब उसे पता चला कि दंगल सिंह से उस की शादी तय हो चुकी है तो वह उस से प्यार करने लगी. उन्हें मिलने में भी कोई परेशानी नहीं होती थी. क्योंकि दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. उन के मिलने में भी किसी को कोई ऐतराज नहीं था.

इस का नतीजा यह सामने आया कि शादी के पहले ही शिल्पा गर्भवती हो गई. बच्चा दंगल सिंह का है, यह जानते हुए भी उस के घर वालों ने शादी से मना कर दिया. शिल्पा और दंगल सिंह की शादी तो टूटी ही, दोनों परिवारों के संबंध भी टूट गए. दंगल सिंह ने घर वालों को बहुत समझाया, पर घर वाले किसी भी कीमत पर शादी के लिए राजी नहीं हुए. उन्होंने उसे शिल्पा से मिलने पर पाबंदी भी लगा दी. यह सन 2013 की बात है.

शिल्पा ने समय पर बेटी को जन्म दिया. बेडि़या समाज में बेटी का जन्म बहुत शुभ माना जाता है. इस की वजह यह है कि बेटी को ये लोग कमाई का जरिया मानते हैं. इस के बावजूद दंगल सिंह के घर वाले शिल्पा को अपनाने को तैयार नहीं हुए. शिल्पा की बेटी जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसे उस के भविष्य को ले कर चिंता हुई. इसलिए वह बेटी को मातापिता के पास छोड़ कर मुंबई आ गई. मुंबई में उस के गांव की कई लड़कियां रहती थीं, जो मुंबई और नवी मुंबई में बीयर बारों में डांसर या बारमेड का काम कर के अच्छा पैसा कमा रही थीं. उन्हीं की मदद से शिल्पा को भी बीयर बार में बारमेड का काम मिल गया.

उस ने थाणे के रेडबुल बीयर बार में नौकरी शुरू की थी, तभी उस की मुलाकात रिया से हुई थी. रिया बार डांसर थी. दोनों में दोस्ती हुई तो वे थाणे के लोकमान्य तिलक नगर में किराए का मकान ले कर एक साथ रहने लगीं. शिल्पा के प्यार में पागल दंगल सिंह को जब पता चला कि शिल्पा मुंबई चली गई है तो वह उस से मिलने मुंबई आनेजाने लगा. उस की बहनें वहां रहती ही थीं, इसलिए उसे न वहां रहने में परेशानी हुई थी और न शिल्पा से मिलने में.

समय अपनी गति से चलता रहा. दंगल सिंह जब भी मुंबई आता, शिल्पा से मिलता और उस के साथ घूमताफिरता. उस के अब भी शिल्पा के साथ पहले जैसे ही संबंध थे. इस बार दंगल सिंह मुंबई आया तो उस ने अपनी बहनों से कहा कि वह शिल्पा से शादी कर के उसे अपने साथ ले जाएगा. तब उस की बहनों ने कहा कि शिल्पा बहुत ही स्वाभिमानी लड़की है. वह अपने मातापिता और समाज के खिलाफ कोई भी काम नहीं करेगी. इस के अलावा उस के मातापिता ने उस से विवाह के लिए जो रकम तय की थी, उसे वह कहां से देगा.

दंगल सिंह ने बहनों की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने प्यार पर विश्वास कर के रात 8 बजे शिल्पा को फोन कर के मिलने के लिए बुलाया. शिल्पा दंगल सिंह से मिलने आई तो वह उसे नवी मुंबई के कोपर खैरणे स्थित अपनी बहनों के घर ले आया. यह घर उस समय खाली पड़ा था. दंगल सिंह ने यहां आ कर पहले शिल्पा के साथ शारीरिक संबंध बनाए, उस के बाद वह शिल्पा पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा. शिल्पा इस के लिए राजी नहीं थी. उस का कहना था कि वह समाज और घर वालों के खिलाफ जा कर उस से शादी नहीं कर सकती. अगर वह उस से शादी करना चाहता है तो अपने घर वालों को राजी कर के समाज के हिसाब से शादी करे.

बेडि़यों में शादी के लिए लड़कों की ओर से लड़की वालों को काफी दानदहेज दिया जाता है. दंगल सिंह के घर वाले राजी नहीं थे, जबकि उस के पास देने के लिए कुछ नहीं था. उस ने शिल्पा को समझाया कि वह समाज के हिसाब से शादी नहीं कर सकता, क्योंकि उस के पास देने को कुछ नहीं है. वह उसे प्यार करता था और अभी भी करता है. वह उस के बिना नहीं रह सकता. वह उस से शादी कर के समाज और घर वालों से दूर जा कर उस के साथ रहेगा. वह उस से बीयर बार की नौकरी छोड़ कर अपने साथ चलने को कहने लगा, पर शिल्पा इस के लिए राजी नहीं हुई.

काफी कहनेसुनने और समझाने पर भी जब शिल्पा नहीं मानी तो दंगल सिंह को गुस्सा आ गया. पहले तो उस ने उस की काफी पिटाई की. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने उस का गला दबा दिया. सांस रुक जाने से शिल्पा मर गई. गुस्से में दंगल सिंह ने शिल्पा को मार तो दिया, लेकिन जब गुस्सा शांत हुआ तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. पुलिस और कानून से बचने के लिए दंगल सिंह शिल्पा की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को बैडशीट में लपेट कर बांधा और औटोरिक्शा से ले जा कर कोपर गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले नाले में फेंक आया.

लाश को ठिकाने लगा कर दंगल सिंह अपनी बहनों के पास गया और गांव जाने की तैयारी करने लगा. जब उस की बहनों ने शिल्पा से शादी के बारे में पूछा तो उस ने रात घटी सारी घटना बता दी. हत्या की बात सुन कर बहनें डर गईं. दंगल सिंह तो उसी सुबह कुर्ला रेलवे स्टेशन से तुलसी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव चला गया, जबकि बहनें 10 फरवरी को निकलीं. पूछताछ के बाद पुलिस ने दंगल सिंह की बहनों को निर्दोष मान कर छोड़ दिया, जबकि उस के खिलाफ शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के नवी मुंबई के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. इंसपेक्टर बालकृष्ण अपने सहयोगियों की मदद से आरोप पत्र तैयार कर रहे थे. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story: नहीं था वह कोई करिश्मा

Suspense Story: बच्चे को पूंछ निकली देख कर लोगों ने उसे हनुमानजी का अवतार मान लिया और उस के दर्शन के लिए आने ही नहीं लगे, बल्कि उस पर चढावा भी चढ़ाने लगे. लेकिन जब उस पूंछ की वजह से बच्चे को परेशानी हुई तो उस की असलियत सब के सामने आ गई और सभी ने मान लिया कि वह कोई करिश्मा नहीं था.

सरहिंद से पश्चिम की ओर कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गांव पड़ता है संगतपुर सोढियां. इसी  गांव में रहते थे पंजाब के जानेमाने संगीतकार मास्टर जाने खान. उन की संतानों में 5 बेटियां और 2 बेटे थे, जिन में चौथे नंबर पर था इकबाल कुरैशी. इकबाल बचपन से ही गानेबजाने का शौकीन था. वह गीतगजल लिखता और खुद ही गाता. उस के कुछ गीत काफी लोकप्रिय हुए, जिस से उसे लोग गीतकार और गायक के रूप में जाननेपहचानने लगे. अपनी इस शोहरत से वह कुछ इस तरह उत्साहित हुआ कि गीतसंगीत को ही उस ने अपनी आजीविका का साधन बना लिया.

शादी लायक हुआ तो सन 1970 में सुरैया बेगम से उस का निकाह हो गया. सुरैया से उसे 5 बच्चे हुए. बेटियों में उषा,सलमा, शहनाज और बेटों में साहिब अली तथा अमानत अली. पहले इकबाल कुरैशी दूसरी जगह रहते थे, सन 1978 में वह सपरिवार जिला फतेहगढ़ साहिब के गांव नबीपुर में आ कर रहने लगे थे. बच्चे बड़े हुए तो उषा की शादी मलेरकोटला के एक गांव में कर दी. सन 1997 में सलमा का निकाह साहनेवाल के रहने वाले राज मोहम्मद से कर दिया. राज मोहम्मद एक हलवाई के यहां नौकरी करता था. सलमा को बीवी के रूप में पा कर वह बहुत खुश था.

लेकिन राज मोहम्मद की खुशी तब काफूर हो गई, जब उसे किसी ढोंगी तांत्रिक ने बताया कि उस की शरीकेहयात बच्चा जनते ही अल्लाह को प्यारी हो जाएगी. उस तांत्रिक पर राज मोहम्मद को गहरी आस्था थी, इसलिए उस की बात को उस ने पूरी तरह सच मान लिया. यह बात उस ने घर वालों को बताई तो सभी को जैसे सांप सूंघ गया. तांत्रिक की बात को गंभीरता से ले कर सब आपस में सलाहमशविरा करने लगे. परिवार के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘आजकल बड़ा बुरा समय चल रहा है. बहू अगर ससुराल में मर जाती है तो ससुराल वालों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है.’’

‘‘तुम्हारी यह बात एकदम सही है. औरत भले ही अपनी मौत मरी हो, लेकिन पुलिस आ कर सब को पकड़ ले जाती है. तब लड़की के घर वाले भी कहने लगते हैं कि उन की बेटी को दहेज के लालच में ससुराल वालों ने मार दिया है.’’ किसी दूसरे बुजुर्ग ने उस की हां में हां मिलाते हुए कहा.

इस मुद्दे पर काफी विचारविमर्श करने के बाद नतीजा यह निकाला गया कि जब ऐसी स्थिति आएगी तो सलमा को उस के मायके पहुंचा दिया जाएगा. प्रसव के समय अगर वह मायके में मर भी जाती है तो उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं आएगी. इस के बाद वही किया गया. सलमा गर्भवती थी ही, प्रसव का समय नजदीक आया तो राज मोहम्मद ने उसे उस के मायके नबीपुर पहुंचा दिया. समय पर सलमा को बेटा पैदा हुआ. बेटा एकदम स्वस्थ था तो सलमा को भी न प्रसव से पहले कोई परेशानी हुई थी न प्रसव के दौरान और न ही प्रसव के बाद. बच्चे को जन्म देते समय उस के मर जाने की बात तो दूर, उसे कोई ज्यादा तकलीफ भी नहीं हुई थी. कुछ दिनों बाद सलमा पहले की तरह घरबाहर के सभी काम भी करने लगी थी.

सलमा को बेटा हुआ है, इस बात की सूचना देने के बावजूद भी उस की ससुराल से न कोई आया और न किसी तरह की खुशी मनाई. तांत्रिक की बातों पर विश्वास करते हुए ससुराल वाले सलमा की मौत का इंतजार करते रहे. समय अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा. सलमा सहीसलामत अपने बच्चे की परवरिश करती रही. उसे तांत्रिक की भविष्यवाणी की जानकारी नहीं थी. हां, यह सोच कर वह जरूर परेशान हो रही थी कि उस की ससुराल वाले उसे और बच्चे को देखने क्यों नहीं आए. उसे क्या पता कि ससुराल वाले उस के मरने का इंतजार कर रहे हैं. उसे तो इस बात की कल्पना तक नहीं थी.

इसी तरह कुछ दिन और बीते. जब सलमा को कुछ नहीं हुआ तो उस की ससुराल वाले बारीबारी से आ कर बच्चे को देख गए. जब उन्हें विश्वास हो गया कि सलमा को कुछ नहीं होने वाला तो एक दिन राज मोहम्मद आ कर सलमा को लिवा ले गया. दरअसल, इस बीच राज मोहम्मद ने तांत्रिक से मिल कर इस बारे में बात कर ली थी. तब उस ढोंगी तांत्रिक ने उस से अच्छेखासे पैसे ले कर कहा था कि इस बार का खतरा उस ने अपनी शक्ति से टाल दिया है. लेकिन दूसरा बच्चा निश्चित ही उस के लिए परेशानी खड़ी करेगा. सलमा का दूसरा बच्चा पैदा होगा तो वह कहीं की न रहेगी. दूसरे बच्चे के जन्म के समय वह मर जाएगी. अगर मरी नहीं तो निश्चित पागल हो जाएगी.

खैर, सलमा ससुराल पहुंच गई. बेटे के साथ वह दिन भर मस्त और व्यस्त रहती. हमेशा खुशी का आलम बना रहता था. पहले उसे इस बात की शिकायत थी कि बेटा पैदा होने पर ससुराल से तुरंत कोई क्यों नहीं आया था, लेकिन धीरेधीरे उस ने इसे भी भुला दिया. किसी दिन सलमा ने घर वालों के बीच हो रही बातचीत सुन ली तो उसे तांत्रिक वाली बात मालूम हो गई. सच्चाई जान कर उसे बहुत दुख हुआ. उस का मन चाहा कि वह इस बारे में सब से चीखचीख कर पूछे, लेकिन उस ने समझदारी से काम लिया. किसी भी तरह का बखेड़ा खड़ा किए बगैर वह शांत रही. यही नहीं, इस बात को मन से निकालने का भी प्रयास किया. आखिर कुछ दिनों बाद इसे भूल भी गई.

वक्त पंख लगा कर उड़ता रहा. सलमा का बेटा साल भर का हो गया. सलमा ने अपनी हैसियत के मुताबिक बच्चे का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया. उन्होंने उस बच्चे का नाम रखा था मनी मोहम्मद. मनी मोहम्मद अभी कुल सवा साल का हुआ था कि सलमा के पैर फिर से भारी हो गए. समय के साथ वह फिर उस स्थिति में आ गई कि किसी भी समय बच्चा पैदा हो सकता है तो बहाना बना कर राज मोहम्मद उसे एक बार फिर उस के मांबाप के पास नबीपुर छोड़ आया. इस बार सलमा को तांत्रिक की बताई हर बात मालूम थी. उस ने यह बात पिता को ही नहीं, अन्य लोगों को भी बता दी थी. लेकिन किसी ने उस की इस बात पर ध्यान नहीं दिया. तब सब ने यही कहा कि हो सकता है पिछली बार की तरह इस बार भी मायके में प्रसव होने से अनहोनी टल जाए.

सलमा का मन इस तरह की बातों से काफी खिन्न था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. उस ने अब्बू से बात की तो उन्होंने भी उसे समझाते हुए कहा, ‘‘जैसा लोग सोचते हैं, उन्हें सोचने दो. तुम अपने दिमाग पर किसी तरह का बोझ मत डालो. पिछली बार तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी न, देखना इस बार भी कोई परेशानी नहीं होगी.’’

पिता कुछ भी कहते, कितना भी समझाते, लेकिन सलमा के मनमस्तिष्क पर इन बातों का गहरा असर पड़ चुका था. ससुराल वालों का व्यवहार भुला पाना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. लिहाजा वह उदास रहने लगी थी. जैसेतैसे दिन गुजरते गए. नबीपुर से एक किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव जलवेड़ा की दाई शिब्बो को पहले ही सहेज दिया गया था. शिब्बो दाई 100 साल की उम्र पार कर चुकी थी. अपने फन में माहिर शिब्बो ने यही काम कर के एक तरह से इतिहास रचा था. अपनी पूरी तैयारी कर के उस ने वक्त पर पहुंचने का आश्वासन दिया था. 15 फरवरी, 2001 की शाम को शिब्बो का बुलावा आया तो पहले से ही तैयार बैठी शिब्बो नबीपुर पहुंच गई.

पहले बच्चे की तरह सलमा ने इस बार भी स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. इस बार भी उस का प्रसव शिब्बो ने करवाया था. शिब्बो बच्चे की सफाई करने लगी तो उस का स्वरूप देख कर चौंकी. अब तक के जीवन में हजारों बच्चों को जन्म दिलवाया था, लेकिन इस तरह का बच्चा उस ने पहले कभी नहीं देखा था. इस बच्चे का स्वरूप उसे चमत्कारिक लगा. शक्लसूरत से बच्चा भले ही इंसानी लग रहा था, लेकिन उस के शरीर में विलक्षण चीजों की कमी नहीं थी.

शिब्बो ने नाल काटने के बाद बच्चे को नहला कर लिटा दिया और उसे एकटक देखने लगी. पल भर बाद अचानक वह जोर से चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे कहां है बच्चे का बाप, बुलाओ उसे? हजारों बच्चे पैदा किए हैं, लेकिन ऐसा बच्चा पहले कभी नहीं देखा. कोई कुछ भी कहे, लेकिन मैं कहती हूं कि यह बच्चा बजरंग बली का अवतार है. इस की पूंछ देखो, बाजू और हाथपैर देखो, इस के जिस्म का एकएक अंग कह रहा है कि यह पवनपुत्र का अवतार है.’’

बच्चा देखने में खूबसूरत था और पूरी तरह स्वस्थ भी. इस के बावजूद उस के समूचे जिस्म में अनेक विलक्षणताएं थीं. सब से बड़ी विलक्षणता तो यह थी कि उसे डेढ़दो इंच लंबी पूंछ थी. इस के अलावा बच्चे के शरीर में कुछ अन्य निशान भी अन्य बच्चों से अलग थे. उस समय कमरे में सलमा और नवजात शिशु के अलावा शिब्बो दाई ही थी. अपने काम के लिए शिब्बो को आज तक किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी थी. उस की अलाप सुन कर घर की महिलाएं दौड़ कर कमरे में आ गईं. उन्होंने भी बच्चे को देखा तो दांतों तले अंगुली दबा ली. कुछ ही देर में पासपड़ोस के लोग भी पहुंच गए. उन में गांव के एक जानेमाने पुजारी भी थे.

उन्होंने बच्चे के जिस्म की विलक्षणताओं को परखने का प्रयास किया. बच्चा पलक नहीं झपका रहा था. उस के बाएं बाजू पर गोल निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना सीता माता की मोहर से की. बाएं पांव पर तीर का निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना राजा भरत के तीर मारने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उसी तीर का निशान है. उसी पांव पर टखने के पास कुंडल का निशान था. पुजारीजी ने कहा कि हनुमानजी जो कुंडल पहनते थे, यह उसी का निशान है. दाएं पैर के नीचे क्रौस का निशान था. इसे पुजारीजी ने पद्म का निशान बताया. उन का कहना था यह निशान उन्हीं लोगों को होता है, जो ईश्वर को बहुत प्यारे होते हैं.

इस के अलावा बच्चे के बाएं कंधे पर रौकेट जैसे तीर का निशान था. कमर में धागा बांधने का भी निशान था. इस के बाद पुजारीजी ने सलमा और बच्चे का पैर छू कर अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कहा, ‘‘यह बच्चा बजरंगबली का अवतार है. सभी लोग सिर झुका कर इस अवतार को प्रणाम करें. इसी के साथ मैं सलमा बेटी से एक बात कहना चाहूंगा. जब तक यह बच्चा सवा साल का न हो जाए, वह पति को अपने पास बिलकुल न आने दें. वह खुद भी पति का मुंह न देखें. साथ ही यह भी कोशिश करें कि उस का पति भी बच्चे का मुंह भी न देखे.’’

इस के बाद तो वहां का माहौल ही बदल गया. बच्चे का नाम रख दिया गया बालाजी. ‘जय बालाजी’ और ‘जय बजरंग बली’ के जयकारे लगने लगे. धीरेधीरे यह समाचार आसपास फैला तो उस के दर्शन के लिए लोग आने लगे. बात मीडिया तक पहुंची तो अगले दिन यह समाचार क्षेत्रीय अखबारों में छप गया. इस के बाद सैंकड़ों लोग बच्चे के दर्शन के लिए पहुंचने लगे. शाम को दर्शनार्थियों की भीड़ कम हुई तो इकबाल कुरैशी ने चढ़ाया गया चढ़ावा समेटा.

इकबाल कुरैशी ने दरजनों गीत लिखे थे. सरदूल सिकंदर और अमर नूरी द्वारा गाए उन के गीत तो इस कदर लोकप्रिय हुए थे कि इकबाल कुरैशी नाम पंजाब के हर शहर, हर मोहल्ले में गूंज गया था. लेकिन इतनी प्रसिद्धि हासिल कर लेने के बाद भी लक्ष्मी कभी उन पर मेहरबान नहीं हुई थी. चूंकि गाने लिखने और गाने के अलावा अन्य कोई धंधा उन के पास नहीं था, इसलिए वह हमेशा ही मुफलिसी से घिरे रहते थे. लेकिन आज उन के यहां जैसे नोटों की बरसात हुई थी. यह सिलसिला केवल एक दिन का नहीं था. जितने लोग पहले दिन आए थे, उस से कहीं ज्यादा लोग अगले दिन आए थे. फिर तो यह संख्या बढ़ती ही गई. आने वाले बढ़ते गए तो चढ़ावे की राशि भी बढ़ती गई.

लोग नन्हे बालाजी के सामने हाथ जोड़ कर मनौती भी मांगने लगे. काम हो जाने के बाद गाजेबाजे के साथ चढ़ावा ले कर आने लगे. कुछ ही दिनों में नबीपुर की अलग ही महिमा हो गई. श्रद्धालुओं ने पैसा इकट्ठा कर के नबीपुर में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीद लिया. उस पर धार्मिक स्थल का निर्माण भी शुरू करवा दिया. इधर सलमा के मायके में यह सब चल रहा था, उधर ससुराल में इस मुद्दे पर कई दिनों तक विचारविमर्श किया गया. इस के बाद एक दिन वे सलमा और उस के बच्चों को ले जाने के लिए नबीपुर आ पहुंचे. लेकिन इकबाल कुरैशी ने उन्हें सलमा से मिलने नहीं दिया. इस के बाद बात पंचायत तक पहुंची. पंचायत को जब पुजारी की बात बताई गई तो पंचायत ने फैसला दिया कि जब तक बच्चा सवा साल का नहीं हो जाता, राज मोहम्मद उस का और पत्नी का मुंह नहीं देखेगा.

बच्चे के सवा साल होने के बाद वह इन्हें ले जा सकता है. इस बीच राज मोहम्मद को प्रत्येक सप्ताह चढ़ावे की राशि से 2 हजार रुपए मिलेंगे. इस तरह बच्चे की वजह से उस की महीने में 8 हजार रुपए की कमाई होने लगी. पंचायत का यह फैसला सभी को जंच गया और सलमा की ससुराल वाले खुशीखुशी वापस लौट गए. यह सिलसिला चलते एक साल से अधिक बीत गया. इस बीच बच्चे के जिस्म के निशान जहां मिटने लगे थे, वहीं उस की पूंछ बढ़ कर 6 इंच हो गई थी. धीरेधीरे मामला पंजाब में चर्चा का विषय बन गया. कोई इसे अद्भुत चमत्कार कहता था तो कोई कुदरत का अनूठा करिश्मा कहता था. तमाम लोगों की धार्मिक भावनाएं बच्चे के साथ जुड़ गईं तो कुछ लोगों ने इसे अंधविश्वास कहा.

डाक्टरों ने इसे न चमत्कार माना, न कोई करिश्मा. उन का कहना था कि बच्चे की पूंछ तत्काल कटवा देनी चाहिए, वरना यह पूंछ उस के लिए भारी परेशानी बन जाएगी. उन्होंने इसे चाइल्ड एब्यूज का मामला माना है. तर्कशील सोसायटी वालों ने भी आ कर इकबाल कुरैशी को उन्हें समझाया कि वे अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन उस समय किसी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया. तब घर के सभी लोग इस बात पर अड़े रहे कि उन के यहां पवनपुत्र का अवतार हुआ है. कहा जाता है कि अपने देश में आज शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों से कई गुना ज्यादा धार्मिकस्थल हैं. कहा तो यह भी जाता है कि इन्हीं की वजह से इस से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होने लगी है. क्योंकि अधिकांश लोग धर्म के मामले में संवेदनशील तो हैं ही, धर्मांध की तरह व्यवहार भी करते हैं.

यही वजह है कि कुकुरमुत्तों की तरह कथित धर्मस्थल पनपने लगे हैं. ऐसे में हनुमानजी के इस कथित अवतार वाला यह नया कथित धर्मस्थल भी न केवल अस्तित्व में आ गया, बल्कि धर्मभीरू लोगों के आकर्षण और उन की अंधश्रद्धा का केंद्र भी बन गया. झंडे लहरा उठे, घंटियां बजने लगीं. हनुमानजी के विभिन्न स्वरूपों वाले चित्रों का सहारा लिया जाने लगा. भीड़ जुट रही थी, पैसा बरस रहा था. लेकिन 2 साल बीततेबीतते स्थिति यह बन गई कि बालाजी नामक इस बालक की पूंछ की लंबाई 7 इंच पर पहुंच कर रुक गई. इसी के साथ बच्चे के जिस्म के सारे निशान मिट गए. इसी के साथ तमाम अंगों का विकास रुकने लगा. इस के अलावा उसे अन्य कई तरह की परेशानियां भी होने लगीं. तब उसे डाक्टरों के पास ले जाया गया.

डाक्टरों ने उस की परेशानियों का इलाज करते हुए बताया कि इस सब की वजह बच्चे के जिस्म पर उगी पूंछ है. लेकिन उन्होंने पूंछ काटने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. बच्चे की पूंछ कटवाने को ले कर परिवार में 2 राय थी. पूंछ के कटते ही सारा खेल खत्म हो जाता, लेकिन कुछ समय बाद इस विकृति ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. बच्चा देखने में अपनी उम्र से छोटा तो लग ही रहा था, उस के निचले अंगों में खासी परेशानी होने लगी. वह चलनेफिरने में अक्षम होने लगा. हाजत होने के साथ पेशाब तुरंत निकल जाती. फिर भी जैसेतैसे समय आगे सरकता गया और अजीब शारीरिक परेशानियों से ग्रस्त बच्चे को हनुमानजी का अवतार कहते धर्म की दुकानदारी चलती रही.

यहां एक बात बताना जरूरी होगा कि एक ढोंगी तांत्रिक ने इस बच्चे के जन्म के बाद उस की मां की मौत हो जाने की ‘भविष्यवाणी’ की थी. मगर मां को तो कुछ नहीं हुआ, बच्चा 4 साल का हुआ तो उस के पिता की मौत जरूर हो गई. इस के बाद बच्चे की मां ने दूसरा निकाह कर लिया. खैर, बच्चे के भीतर पैदा हुए विकारों में बढ़ोत्तरी होती जा रही थी. धर्मभीरु लोग उस के आगे हाथ जोड़ कर खड़े आशीर्वाद की दरकार कर रहे होते और उस की पेशाब निकल कर उन भक्तों की ओर बढ़ने लगती. धीरेधीरे लोगों के मनों में यह धारणा बैठने लगी कि बच्चे के केवल पूंछ निकल आने से ही उसे भगवान कह कर कहीं उन्हें मूर्ख तो नहीं बनाया जा रहा. उन का विश्वास डगमगाने लगा. बच्चा पहले ही से बीमार लग रहा था, अब अभिभावक भी उसे बीमार कह कर पेशाब निकलने की बात कहने लगे.

जब भगवान ही बीमार पड़ गए तो भक्तों का क्या भला करेंगे, यह सोच कर बच्चे के दर्शन के लिए आने वाले लोग कम होने लगे. भीड़ छंटी तो चढ़ावा भी कम हो गया. आखिर एक स्थिति ऐसी आ गई कि तमाम लोगों का वहां आना बंद हो गया. इसी के साथ आय का अच्छाखासा स्रोत बंद हो गया. बालाजी के परिवार वालों के पास जो जमापूंजी थी, वह धीरेधीरे खत्म होने लगी. बच्चे की हालत अलग से बिगड़ती जा रही थी. बहरहाल, किसी के कहने पर बालाजी को मोहाली स्थित फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया. फरवरी, 2015 में न्यूरोसर्जरी विभाग के डायरैक्टर डा. आशीष पाठक ने बालाजी की गहन जांच की तो पाया कि कथित पूंछ की वजह से बच्चे की रीढ़ की हड्डी में बदलाव आने लगा था, जो उस के लिए बहुत खतरनाक हो सकता था.

डा. पाठक के अनुसार, बच्चा क्लबफुट डिफौर्मिटी का शिकार हो गया था. उन्होंने बच्चे को यूरोलौजिस्ट के पास भेजा, जहां डा. मनीष आहूजा ने उसे क्लीन इंटरिमिटैंट केथेराइजेशन सिखाते हुए उस का ब्लैडर पूरी तरह खाली करवाया. 3 महीनें तक बच्चे को दवाएं देते हुए उस के टेस्ट किए गए. इकबाल कुरैशी ने पहले ही अपनी मजबूरी डाक्टरों को बता दी थी कि बच्चे का इलाज कराने के लिए उन के पास पैसे नहीं है. इस के बाद अस्पताल से जुड़ी एक गैरसरकारी संस्था ने उस के इलाज का खर्च अपने ऊपर ले लिया.

डा. आशीष पाठक के बताए अनुसार, यह एक निहायत जटिल एवं कठिन औपरेशन था. मगर उन्होंने अपनी टीम के योग्य सदस्यों की मदद से 7 घंटे तक जटिल सर्जरी कर के बच्चे की पूंछ हटा कर उसे भगवान से आम इंसान बना दिया. महीना भर बालाजी को औब्जर्वेशन में रखने के बाद डा. पारुल व डा. आहूजा ने 1 जुलाई, 2015 को एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर पत्रकारों के सामने पेश किया. बच्चे से पत्रकारों ने खूब बातें कीं. डाक्टरों को विश्वास है कि बालाजी पर किया जा रहा उन का उपचार पूरी तरह कामयाब रहेगा. Suspense Story

Romantic Story: मोहब्बत पर भारी पड़े अरमान

Romantic Story: शाम सुरमई हो चली थी. थकाथका सा निढाल सूरज धीरेधीरे पश्चिम दिशा में डूब रहा था. उस की सिंदूरी किरणें वातावरण में फैली हुई थीं. तहसील बिलाईगढ़ के एक गांव के बाहर अमराई में 2 युवा जोड़े प्रेमालाप में मशगूल थे. आम के दरख्तों की टहनियों में बौर निकल आए थे. टहनियों के बीच कंचे के बराबर अमियां हवा के झोंके से झूम उठा करती थीं. कोयलों की कूक और अमियों की सुगंध से नंदिनी खगेश्वर के प्यार में बढ़ोत्तरी ही हुई थी.

नंदिनी खगेश्वर की बांहों से खुद को आजाद करती हुई हांफ उठी थी. खुद को संभालते हुए और अपनी अनियंत्रित सांसों को काबू करती हुई फुसफुसा कर खगेश्वर प्रसाद से बोली, ‘‘तोषू (खगेश्वर को वह प्यार से तोषू कहती थी), बहुत देर हो गई है, अब मुझे जाने दो. घर वालों को कहीं शक न हो जाए. तुम्हें पता नहीं कि मैं दिशामैदान के बहाने बड़ी मुश्किल से निकल पाई हूं.

‘‘जब भी दिशामैदान की बात आती है, घर वाले कहा करते हैं कि घर में शौचालय स्नानागार की पूरी सुविधा है, इस के बावजूद भी तुम नहाने तालाब पर और दिशामैदान के लिए बाहर जाती हो. ऐसा क्यों करती हो. बस, यही कहती हूं कि घर में रहेरहे हाथपैरों की वर्जिश नहीं हो पाती, इसलिए इसी बहाने बाहर हो आया करती हूं. अब तुम बताओ कि हमेशा तो मैं ऐसा कर नहीं पाऊंगी.’’

खगेश्वर उर्फ तोषू ने फिर से नंदिनी को अपनी बांहों में लेना चाहा, लेकिन नंदिनी खुद को बचाती हुई बोली, ‘‘किसी रोज हम पकड़े जाएंगे, मुझे हमेशा अनजाना सा डर लगा रहता है. आखिर हम कब तक ऐसे ही लुकछिप कर मिला करेंगे?’’

‘‘कुछ महीनों की बात है, मैं ने कुछ रुपए इकट्ठे कर रखे हैं. कुछ रुपए और हो जाएं तो यह लुकछिप कर मिलने वाली बात ही नहीं रहेगी. हम यहां से निकल कर कहीं भी जाएंगे तो सब से पहले सिर ढकने को छत चाहिए. 2-4 महीने के खर्च के लिए रुपए भी चाहिए. इस के लिए मैं कोशिश कर रहा हूं. रायपुर के जयहिंद चौक शीतला मंदिर के पीछे लोधी पारा में मैं ने सभी सुविधाओं वाला एक घर देख रखा है.’’ तोषू गंभीर होता हुआ बोला.

नंदिनी जरा नागवारी के अंदाज में बोली, ‘‘महीनों से सुन रही हूं घर रुपए, घर रुपए. तुम मुझे यहां से ले चलो, दोनों इकट्ठे मिल कर कमाएंगे, 12वीं तक मैं भी तो पढ़ी हूं. 12-15 हजार रुपए मैं खुद कमा सकती हूं. 10-12 हजार तुम कमा लोगे. 20-25 हजार में दालरोटी तो चल ही जाएगी.’’

तोषू बोला, ‘‘मेरा वादा है, अगले महीने की 25 तारीख को हम दोनों यहां से निकल चलेंगे. लेकिन मेरी शर्त है, मैं अपने वादे पर तभी अमल करूंगा जब तुम मुझे…’’ कहते हुए तोषू ने निश्चिंत खड़ी नंदिनी के मुखड़े को हथेलियों के बीच लेते हुए भरेभरे होंठों का चुंबन लिया, गहरा और चटख चुंबन.

‘‘अब मैं तुम से 25 तारीख को ही मिलूंगी,’’ नंदिनी मीठी झिड़की लगाती हुई बोली.

‘‘25 तारीख आने में अभी एक महीना बाकी है मेरी जान, तब तक मैं कैसे गुजारूंगा?’’ तोषू तुरंत मनुहार करते हुए बोला.

‘‘ये तुम जानो, मैं चली. याद रखना, 25 यानी 25.’’

फिर नंदिनी वहां रुकी नहीं. तोषू पीछे से पुकारता रह गया, ‘‘सुनो तो…सुनो नंदिनी.’’

नंदिनी को रुकना नहीं था, वह वहां रुकी नहीं. इस के बाद नंदिनी ने किसी भी बहाने अब घर से निकलना बंद कर दिया.

नंदिनी कोसरिया और खगेश्वर कोसरिया उर्फ तोषू छत्तीसगढ़ के जिला बलौदाबाजार के कस्बा बिलाईगढ़ के रहने वाले थे. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे. लेकिन मुलाकात न हो पाने की वजह से तोषू अधजले परवाने की तरह छटपटाने लगा. नंदिनी भी अंदर ही अंदर छटपटाती रही लेकिन तोषू से मिलना उचित नहीं समझा. ऐसा उस ने इसलिए किया कि यदि वह तोषू से मिल लेती तो तोषू फिर अपने वादे पर कायम नहीं रह पाता. प्यार में तड़प जरूरी थी. भले ही वह तोषू से मिलने के लिए मन ही मन व्याकुल हुए जा रही थी.

नंदिनी से मुलाकात करने के लिए उस ने बहुतेरे प्रयास किए लेकिन असफल ही रहा. तोषू अपने घर के बरामदे में उदास बैठा हुआ था कि एक 10-12 साल की एक लड़की दौड़ती हुई आई और तोषू के हाथ में एक कागज थमा गई. उसी पैर लौटने हुए वह बोली, ‘‘नंदिनी दीदी ने तुम्हें देने को कहा है.’’

फिर वह अबोध लड़की वहां ठहरी नहीं, कुलांचे भरती हुई वहां से निकल गई. तोषू वापस लौट कर बरामदे में बैठा और तह किए हुए उस कागज की परतें खोलीं. उस खत में कुछ ही लाइनें लिखी थीं. वह इस राइटिंग को बखूबी पहचानता था. वह उस की प्रेमिका नंदिनी की थी. लिखा था, ‘तोषू जान, जुदाई के ये पल आत्मा को लहूलुहान कर रहे हैं. मुझे अहसास है कि इस पीड़ा से तुम भी घायल जरूर हो गए होगे. 23 तारीख को वहीं मुलाकात होगी. उम्मीद है भविष्य में साथ रह सकें, तैयारी तुम्हारी ओर से पूरी हो गई होगी. मैं ने अभी से पैकिंग करनी शुरू कर दी है. बस, मुझे तुम्हारे पैरों के निशां पर कदम बढ़ाना है. तुम्हारी नंदिनी.’

तोषू की आंखों में आंसू झिलमिला उठे. खत में उसे नंदिनी का चेहरा उभरता दिख रहा था. उस ने कई बार खत को उस रात पढ़ा. नंदिनी के शब्दों पर उस ने दीवानों की तरह चुंबन लगाए. 2 दिन बचे थे. नंदिनी के दिए गए समय को आने में 2 दिन उस ने जैसे अंगारों पर लोट कर समय गुजारा. इस बीच उसे अपनी शेव करने का खयाल भी नहीं आया. पहले से मुकर्रर मिलने की जगह पर तोषू पहुंच कर प्रेमिका का इंतजार करने लगा. उस ओर टकटकी लगाए हुए निहार रहा था, जिस रास्ते से नंदिनी को वहां पहुंचना था.

शाम को धुंधलका काबिज हो चुका था. कोहरे ने बिलाईगढ़ कस्बे को अपने में समेटने का भरसक प्रयास किया था. शाम होने के पहले ही शाम का आभास वातावरण में व्याप्त था. उस ने देखा, कोहरे की धुंध को चीरती हुई कोई चली आ रही है. कदकाठी और चलने के अंदाज ने उसे इस बात का अहसास करा दिया कि आने वाली उस की जाने जिगर, जाने तमन्ना नंदिनी है. तोषू ने कोहरे में ही हाथ हिला कर अपनी मौजूदगी का भान नंदिनी को करवाने का प्रयास किया. नंदिनी दूर से ही तोषू को पहचान चुकी थी. पहचानती भी क्यों नहीं, 7 महीने से दोनों प्रेम के झूले में जो झूल रहे थे.

नंदिनी तोषू के करीब पहुंची. दौड़ कर नंदिनी अपने तोषू के कंधे से जा लगी. सिसक जो पड़ी नंदिनी. अनायास तोषू के हाथ गर्दिश करने लगे. सुबकती हुई नंदिनी बोली, ‘‘कैसे मैं ने इतने दिन गुजारे तोषू, अब मैं तुम से एक पल को अलग नहीं रहूंगी. तुम्हारी कसम तोषू, जुदाई के पल कितने गहन और भयावह हुआ करते हैं, सोचने से ही कलेजा मुंह को आ जाता है.’’

अपने से दूर करता हुआ भर्राई आवाज में तोषू बोला, ‘‘मेरी भी स्थिति तुम से अलग नहीं रही है. जुदाई के गम को किसी तरह बरदाश्त करता रहा हूं.’’

दोनों वहीं एक पत्थर की आड़ ले कर बैठ गए. उन दोनों में भविष्य को ले कर बातचीत होने लगी. बातचीत में यह बात उन लोगों के बीच मुख्य रही कि कब, कहां और कितने बजे मिलना है. उस दिन लुकाछिपी का उन का यह मिलन आखिरी था. रात के चौथे पहर में नंदिनी घर छोड़ कर निकल गई. अलसुबह आवागमन का साधन तो था नहीं, पहले से ही खगेश्वर ने अपने दोस्त से एक बाइक की व्यवस्था कर ली थी.

बाइक पर सवार हो कर वह बिलाईगढ़ से बलौदा बाजार पहुंचा. बाइक को वह कहां खड़ी करेगा, कहां रखेगा, बाइक की चाबी किस को सौंपेगा, यह सब उस ने अपने दोस्त को पहले से ही बता दिया था. बलौदा बाजार से सुबहसुबह बस पकड़ कर वे दोनों रायपुर पहुंचे. यहां पर खगेश्वर उर्फ तोषू ने पहले से ही लोधीपारा शीतला मंदिर के पास किराए का कमरा ले रखा था. लिहाजा खगेश्वर को नंदिनी को यहांवहां ले कर भटकना नहीं पड़ा.

मकान मालिक अरुण जहोल को उस ने नंदिनी का परिचय अपनी पत्नी के रूप में कराया. पहचान के लिए उस ने मकान मालिक को आधार कार्ड दिखाया. संतुष्ट होने के बाद अरुण जहोल ने किराए पर उन दोनों को कमरे की चाबी दे दी. हफ्ते 15 दिन तक दोनों भयभीत रहे. दोनों के घर वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि दोनों गांव छोड़ कर चल गए हैं. थोड़ा होहल्ला हुआ गांव में.

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चूंकि दोनों एक ही जाति के थे, इसलिए यह मामला विशेष तूल नहीं पकड़ा. दोनों के घर वालों को यह समझने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई कि नंदिनी खगेश्वर के साथ भाग गई है. नंदिनी के पिता ने बेटी के गायब होने की थाने में रिपोर्ट तक नहीं लिखाई. जो होना था, वह हो चुका था. सांप निकल चुका था. लकीर पीटने से हालात सुधर नहीं सकते थे. लिहाजा दोनों पक्षों ने खामोशी से समझौता कर लिया था.

इधर दूसरी ओर खगेश्वर कब तक घर में बैठा रहता. उस ने एक कपड़े की दुकान में नौकरी कर ली. खगेश्वर जब काम पर चला जाता, तब नंदिनी घर में अकेली बैठी बोर होती. खगेश्वर से उस ने एक बार कहा, ‘‘तुम्हारे काम पर चले जाने के बाद घर में मैं अकेली बोर हो जाया करती हूं. अगर तुम कहो तो मैं भी कहीं कुछ काम कर लूं. इस से आमदनी तो बढ़ेगी, साथ ही मेरी बोरियत भी दूर हो जाएगी.’’

पहले तो खगेश्वर ने उसे नौकरी के लिए मना किया लेकिन नंदिनी के काफी मनुहार और बोरियत का हवाला देने पर किसी तरह से वह राजी हो गया. इस दिशा में नंदिनी को बहुत ज्यादा भटकना नहीं पड़ा. उसे सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई. आय का जरिया भी बढ़ गया और नंदिनी की बोरियत भी दूर हो गई. सब कुछ अच्छाअच्छा गुजरने लगा. दोनों को साथ रहते हुए एक साल गुजरने को था. दोनों के घर वाले भी कभीकभी उन से मिलने लोधीपारा आनेजाने लगे थे. उन के घर वालों को यह देख कर संतोष मिलता था कि चलो दोनों कमाखा रहे हैं, सुखी हैं.

दोनों के घरवालों को किसी तरह का किसी से कोई गिलाशिकवा नहीं रह गया था. जब सब कुछ अच्छा गुजरने लगा तो एक नया ही फितूर नंदिनी पर काबिज होता चला गया. जब भी वह टीवी पर शादी से संबंधित रस्मोरिवाज होते हुए देखती तो उसे खुद से मलाल होने लगता था. अकसर वह खगेश्वर उर्फ तोषू से इस बात का जिक्र कर बैठती कि काश! हमारी भी ऐसी ही धूमधड़ाके से शादी हुई होती. तुम बारात ले कर आते, मंडप सजा होता, सहेलियों के बीच मैं छिपी होती. एक रस्म तुम्हें मालूम है तोषू, जिस पत्तल पर वधू खाना खाती है, उसी पत्तल को लपेट कर छिप कर उस से वर को मारती भी है.

‘‘जब होना था, तब तो हुआ नहीं और अब लाख चाहने के बावजूद यह संभव नहीं है. ऐसी बातें सोच कर क्यों अपना दिल दुखाती हो और मेरा मूड भी खराब करती हो.’’ खगेश्वर ने समझाया.

दोनों के बीच और कई तरह के मुद्दों को ले कर अकसर तकरार होने लगती थी. मोहल्ले के लोग समझाबुझा कर दोनों को शांत करा दिया करते थे. अकसर उन दोनों में इन्हीं बातों को ले कर जबतब कलह हो जाती थी. एक रोज खगेश्वर अपने दोस्त की शादी में गया हुआ था. अपने मोबाइल पर उस ने शादी के रस्मोरिवाजों को शूट किया. शूट किए हुए मोबाइल की वीडियो उस ने नंदिनी को दिखाईं तो उस के सोए अरमान फिर जाग उठे. उसी मुद्दे को ले कर वह तकरार करने लगी.

उस ने उलाहना देते हुए खगेश्वर से कहा, ‘‘लोग अपनी माशूका के लिए चांदसितारे तोड़ लाने का माद्दा रखते हैं और तुम हो कि मेरी एक इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते.

‘‘सुनो, मैं आसमां को बांहों में समेटने को नहीं कह रही हूं. सिर्फ इतना चाहती हूं कि हम दोनों एक बार रस्मोरिवाजों के मुताबिक शादी कर लेते. अच्छी सी पार्टी देते. ढेर सारे मेहमान आते. कितना अच्छा लगता.’’

तोषू दिन भर का थकामांदा आया था. इस वक्त दोनों खाना खा कर बैड पर लेटे हुए बातें कर रहे थे, ‘‘यार, तुम समझती नहीं हो. अब न तुम माशूका रह गई और न मैं आशिक. हम दोनों का रिश्ता पतिपत्नी का हो चुका है.’’

‘‘वक्त गुजर गया, इन सब बातों के लिए. कैसी बातें कर रहे हो. कौन सा हम लोग बुड्ढे हो गए हैं या हमारे 4-6 बच्चे हो गए हैं. सच्ची कह रही हूं तोषू, मेरी यह इच्छा पूरी कर दो.’’ वह मनुहार से बोली, ‘‘2 ही साल तो हुए हैं हमें पतिपत्नी बने हुए.’’

‘‘यार, मेरा मूड खराब मत किया करो.’’

‘‘मैं कहां खराब कर रही हूं. पैसों को ले कर तुम चिंता मत करो, मेरे पास पैसे हैं. बस तुम हां कह दो.’’

माहौल तल्ख होता चला गया. तूतूमैंमैं पर दोनों उतर आए. दोनों के बीच तकरार इतनी बढ़ गई कि हालात बेकाबू होते चले गए. बात 2 मार्च, 2022 की है. जिले के थाना पंडरी के थानाप्रभारी उमाशंकर राठौर के पास एक युवक बदहवास सा तेजी के साथ थाने में आया. ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उस युवक को रोकना चाहा लेकिन वह रुका नहीं. युवक सीधे थानाप्रभारी उमाशंकर राठौर के सामने जा कर बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम खगेश्वर कोसरिया है. मैं ने अपनी पत्नी नंदिनी को मार डाला. मैं बीवी का हत्यारा हूं. उस की लाश कमरे में पड़ी है.’’

उस की बात सुन कर थानाप्रभारी चौंक गए. उन्होंने उस से पूरी बात विस्तार से बताने को कहा. इस के बाद खगेश्वर उर्फ तोषू सब कुछ सिलसिलेवार बताता चला गया.

पूरी बात सुनने के बाद राठौर ने यह बात एसपी प्रशांत अग्रवाल एएसपी तारकेश्वर पटेल को भी बता दी. उन के निर्देश पर खगेश्वर को गिरफ्तार कर लिया.

इस के बाद पुलिस खगेश्वर को साथ ले कर उस के कमरे पर पहुंची तो वहां नंदिनी की लाश पड़ी थी. खगेश्वर ने बताया कि उस ने नंदिनी का गला घोटा था. सामाजिक रीतिरिवाज से शादी करने को ले कर उस ने उस का जीना हराम कर दिया था, इसलिए गुस्से में उसे मार डाला.

पुलिस ने मौके की काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और खगेश्वर उर्फ तोषू से पूछताछ के बाद उसे हत्या के  आरोप में 2 मार्च, 2022 को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Romantic Story

Allahabad Crime: बेबी को पति नहीं प्रेमी पसंद है

Allahabad Crime: 14 नवंबर, 2016 की शाम उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के थाना नैनी के मोहल्ला करबला का रहने वाला मोहम्मद हुसैन रोज की अपेक्षा आज कुछ जल्दी ही घर आ गया था. हाथमुंह धोने के बाद वह चाय पी कर टीवी देखते हुए 2 साल की बेटी शैजल के साथ खेलने लगा तो पत्नी बेबी ने पास आ कर कहा, ‘‘लगता है, अब आप को कहीं नहीं जाना?’’

‘‘क्यों, कोई काम है क्या?’’

‘‘हां, अगर आप को कहीं नहीं जाना तो चल कर मेरे मोबाइल का चार्जर खरीदवा लाओ. कितने दिनों से खराब पड़ा है. दूसरे का चार्जर मांग कर कब तक काम चलेगा.’’

हुसैन बेबी की बात को टाल नहीं सका और फौरन तैयार हो गया. बेबी को भी साथ जाना था, इसलिए वह भी फटाफट तैयार हो गई. बेटी को उस ने सास के हवाले किया और पति के साथ बाजार के लिए चल पड़ी.

मोबाइल शौप उन के घर से महज 2 सौ मीटर की दूरी पर थी. जैसे ही दोनों दुकान के सामने पहुंचे, एक मोटरसाइकिल उन के सामने आ कर रुकी. मोटरसाइकिल सवार हेलमेट लगाए था, इसलिए कोई उसे पहचान नहीं सका. पतिपत्नी कुछ समझ पाते, उस के पहले ही उस ने कमर में खोंसा तमंचा निकाला और हुसैन के सीने पर रख कर गोली दाग दी.

गोली लगते ही हुसैन जमीन पर गिर पड़ा. शाम का समय था इसलिए बाजार में काफी भीड़भाड़ थी. पहले तो लोगों की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ. लेकिन जैसे ही लोगों को सच्चाई का पता चला, बाजार में अफरातफरी मच गई. धड़ाधड़ दुकानों के शटर गिरने लगे. इस अफरातफरी का फायदा उठा कर बदमाश भाग गया. कोई भी उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सका.

हुसैन का घर घटनास्थल के नजदीक ही था, इसलिए उसे गोली मारे जाने की सूचना जल्दी ही उस के घर तक पहुंच गई. खून से लथपथ जमीन पर पड़ा हुसैन तड़प रहा था. बेबी उस का सिर गोद में लिए रो रही थी.

सूचना मिलते ही आननफानन में हुसैन के घर वाले और पड़ोसी आ गए थे. घटना की सूचना पा कर थाना नैनी की पुलिस भी आ गई थी. चूंकि हुसैन की सांसें चल रही थीं, इसलिए पुलिस और घर वाले उसे उठा कर पास के एक नर्सिंगहोम में ले गए. उस की हालत काफी नाजुक थी, इसलिए नर्सिंगहोम के डाक्टरों ने उसे स्वरूपरानी नेहरू जिला चिकित्सालय ले जाने की सलाह दी. लेकिन हुसैन की हालत प्रति पल बिगड़ती ही जा रही थी.

पुलिस हुसैन को ले कर जिला अस्पताल ले गई लेकिन वहां पहुंचतेपहुंचते उस की मौत हो चुकी थी. वहां के डाक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया. हुसैन की मौत की जानकारी होते ही उस के घर में कोहराम मच गया. मां और पत्नी का रोरो कर बुरा हाल था. इस हत्या की सूचना पा कर एसपी (गंगापार) ए.के. राय, सीओ करछना बृजनंदन एवं नैनी समेत कई थानों की पुलिस आ गई थी.

हुसैन के बड़े भाई नफीस की तहरीर पर थाना नैनी पुलिस ने हुसैन की बीवी बेबी और उस के प्रेमी सल्लन मौलाना के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर बेबी को तुरंत हिरासत में ले लिया था.

अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद हुसैन का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया था. उस के अंतिम संस्कार के बाद बेबी से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह खुद को निर्दोष बताती रही, लेकिन जब पुलिस ने मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए सवालों की झड़ी लगाई तो वह असलियत छिपा नहीं सकी. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने पति की हत्या उस के दोस्त सल्लन मौलाना से कराई थी. इस के बाद पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर 16 नवंबर को छिवकी जंक्शन से सल्लन को भी गिरफ्तार कर लिया था.

थाना नैनी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अवधेश प्रताप सिंह और अन्य पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में मृतक हुसैन की पत्नी बेबी बेगम और दोस्ती में दगा देने वाले सल्लन ने हुसैन की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

इलाहाबाद में यमुनापार स्थित थाना नैनी के मुरादपुर करबला निवासी मोहम्मद हुसैन का निकाह सन 2013 में कोरांव गांव की रहने वाली बेबी के साथ हुआ था. हुसैन औटो चलाता था. वह इतना कमा लेता था कि परिवार हंसीखुशी से रह रहा था. शादी के करीब साल भर बाद ही वह बेटी शैजल का बाप बन गया तो उस का परिवार भरापूरा हो गया.

हुसैन की दोस्ती मोहल्ला लोकपुर के रहने वाले सल्लन से थी, जो थाना नैनी का हिस्ट्रीशीटर था. मुरादपुर अरैल में उस की तूती बोलती थी. वह मौलाना के नाम से मशहूर था. सल्लन मोहम्मद हुसैन के घर भी आताजाता था. इसी आनेजाने में कब सल्लन और हुसैन की पत्नी बेबी की आंखें चार हो गईं, हुसैन को पता नहीं चला. क्योंकि वह तो अपने दोस्त सल्लन पर आंखें मूंद कर विश्वास करता था.

आंखें चार होने के बाद सल्लन अपने दोस्त हुसैन की अनुपस्थिति में भी उस के घर आनेजाने लगा. जैसे ही हुसैन औटो ले कर घर से निकलता, बेबी सल्लन को फोन कर के घर बुला लेती. इस के बाद दोनों ऐश करते. ऐसी बातें छिपी तो रहती नहीं, सल्लन और बेबी के संबंधों की जानकारी पहले मोहल्ले वालों को, उस के बाद हुसैन तथा उस के घर वालों को हो गई.

लेकिन सल्लन के डर से कोई सीधे उस से कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. लेकिन जब मोहल्ले वाले हुसैन और उस के घर वालों पर तंज कसने लगे तो घर वालों ने हुसैन पर सल्लन से दोस्ती खत्म कर के उस के घर आनेजाने पर पाबंदी लगाने को कहा. उन का कहना था कि अगर इसी तरह चलता रहा तो बेबी नाक कटवा सकती है.

उस समय तो हुसैन कुछ नहीं बोला, लेकिन पत्नी की बेवफाई पर वह तड़प कर रह गया. दोस्त सल्लन की करतूत सुन कर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. इतना सब जानने के बाद भी उस ने सल्लन से कुछ नहीं कहा. इसलिए उस की और सल्लन की दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा. अलबत्ता हुसैन ने बेबी पर जरूर शिकंजा कसा. उस ने उसे समझाया कि वह जो कर रही है, वह ठीक नहीं है.

बेबी ने हुसैन को सफाई दी कि लोग उसे बिनावजह बदनाम कर रहे हैं. कभीकभार सल्लन उसे पूछने घर आ जाता है तो क्या वह उसे घर से भगा दे. बेबी ने सफाई भले दे दी, लेकिन वह समझ गई कि पति को उस के और सल्लन के संबंधों का पता चल गया है. यही नहीं, उसे यह भी पता चल गया था कि इस की शिकायत हुसैन के भाई हसीन ने की थी. इसलिए उस ने सल्लन से उसे सबक सिखाने के लिए कह दिया ताकि दोनों आराम से मौजमस्ती कर सकें.

हसीन ने जो किया था, वह सल्लन को बुरा तो बहुत लगा लेकिन न जाने क्यों वह शांत रहा. शायद ऐसा उस ने हुसैन की वजह से किया था. उस के बाद उस ने हुसैन के घर भी आनाजाना कम कर दिया था. लेकिन मौका मिलते ही बेबी से मिलने जरूर आ जाता था. इसी का नतीजा यह निकला कि एक दिन हुसैन दोपहर में घर आ गया और उस ने बेबी व सल्लन को रंगेहाथों पकड़ लिया.

सल्लन तो सिर झुका कर चला गया, लेकिन बेबी कहां जाती. पत्नी की कारगुजारी आंखों से देख कर हुसैन का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. क्योंकि उस पर भरोसा कर के उस ने घर वालों तक की बात नहीं मानी थी. उस गुस्से में हुसैन ने बेबी की जम कर पिटाई कर दी. इस के बाद बेबी ने कान पकड़ कर माफी मांगी कि अब वह इस तरह की गलती दोबारा नहीं करेगी.

हुसैन ने पत्नी को माफ तो कर दिया, लेकिन अब उसे न तो पत्नी पर भरोसा रहा और न दोस्त सल्लन पर. इसलिए वह दोनों पर नजर रखने लगा. बेबी ने पति से माफी जरूर मांग ली थी, लेकिन अपनी हरकतों से बाज नहीं आई.

चोरीछिपे वह सल्लन से फोन पर बातें करती रहती. इस का नतीजा यह निकला कि सन 2016 के जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह में वह सल्लन के साथ भाग गई. इस से मोहल्ले और रिश्तेदारी में काफी बदनामी हुई. इस के बाद दोनों के घर वालों के बड़ेबुजुर्गों के हस्तक्षेप के बाद हुसैन और उस के घर वाले बेबी को अपने घर ले आए.

दरअसल, बेबी के मायके वालों को उस की यह हरकत काफी बुरी लगी थी. वे नहीं चाहते थे कि बेबी अपना अच्छाखासा बसाबसाया घर बरबाद कर के एक गुंडे के साथ रहे. क्योंकि इस से उन की भी बदनामी हई थी. सब के दबाव में हुसैन बेबी को घर तो ले आया था लेकिन घर आने के बाद उस ने उस की जम कर धुनाई की थी.

महीने, 2 महीने तक तो सब ठीक रहा, लेकिन इस के बाद बेबी फिर पहले की तरह फोन पर अपने यार सल्लन से बातें करने लगी. शायद उसी के कहने पर सल्लन ने हुसैन के छोटे भाई पर गोली चलाई थी, जिस में वह बालबाल बच गया था. हसीन ने इस वारदात की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो इस बार भी बड़ेबुजुर्गों ने बीच में पड़ कर दोनों पक्षों का थाने में समझौता करा दिया.

बेबी से सल्लन की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही थी. यही हाल सल्लन का भी था. दोनों ही एकदूसरे के बिना रहने को तैयार नहीं थे. लेकिन बेबी ऐसा नाटक कर रही थी, जैसे हुसैन ही अब उस का सब कुछ है.

पत्नी में आए बदलाव से हुसैन पिछली बातें भूल कर उसे माफ कर चुका था. हुसैन की यह अच्छी सोच थी, जबकि बेबी कुछ और ही सोच रही थी. अब वह पति को राह का कांटा समझने लगी थी, जिसे वह जल्द से जल्द निकालने पर विचार कर रही थी. क्योंकि अब वह पूरी तरह सल्लन की होना चाहती थी.

मन में यह विचार आते ही एक दिन उस ने प्रेमी से बातें करतेकरते रोते हुए कहा, ‘‘सल्लन, अब मुझ से तुम्हारी जुदाई बरदाश्त नहीं होती. हुसैन मुझे छूता है तो लगता है कि मेरे शरीर पर कीड़े रेंग रहे हैं. अब तुम मुझे हुसैन से मुक्त कराओ या मुझे मार दो. ये दोहरी जिंदगी जीतेजीते मैं खुद तंग आ गई हूं.’’

बेबी की बातें सुन कर सल्लन तड़प उठा. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें मरने की क्या जरूरत है. मरेंगे तुम्हारे दुश्मन. बेबी, जो हाल तुम्हारा है, वही मेरा भी है. तुम कह रही हो तो मैं जल्दी ही प्यार की राह में रोड़ा बन रहे हुसैन को ठिकाने लगाए देता हूं.’’

इस के बाद बेबी और सल्लन ने मोबाइल फोन पर ही हुसैन को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. उसी योजना के अनुसार, 14 नवंबर, 2016 की शाम बेबी हुसैन को चार्जर खरीदवाने के बहाने लोकपुर मोहल्ला स्थित मोबाइल शौप पर ले आई, जहां पहले से घात लगाए बैठे सल्लन मौलाना ने गोली मार कर हुसैन की हत्या कर दी.

सल्लन की निशानदेही पर थाना नैनी पुलिस ने 315 बोर का देसी पिस्तौल और एक जिंदा कारतूस बरामद कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने सल्लन और बेबी को इलाहाबाद अदालत में पेश किया था, जहां से दोनों को जिला कारागार, नैनी भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की जमानत नहीं हुई थी. Allahabad Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: ख्वाहिश की खूनी उड़ान

Crime Story: राजेश मास्टर गोवर्धनदास को इस बात की सजा देना चाहता था कि उस बूढ़े मास्टर ने उस की पत्नी को खराब किया था. उस ने पत्नी की मदद से मास्टर को सजा तो दे दी, लेकिन नतीजा क्या निकला…

मैं उन दिनों पंजाब के जिला पटियाला का एसएसपी था, जब यह लोमहर्षक हत्याकांड घटित हुआ था. 1994 में आईपीएस अधिकारी के रूप में मैं ने पंजाब पुलिस जौइन की थी. अपनी 21 साल की नौकरी में कत्ल की ऐसी दास्तान मेरे सामने इस के पहले नहीं आई थी. 2 दिनों के कस्टडी रिमांड में थाना पुलिस के साथ मैं ने भी इस हत्याकांड के अभियुक्तों सुदीप कौर और राजेश से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की थी. इस पूछताछ में उन लोगों ने हमें जो कुछ बताया था और पुलिस जांच में जो तथ्य सामने आए थे, उस से अपराध की एक ऐसी कहानी सामने आई थी, जो काल्पनिक अपराध कथाओं से भी कहीं ज्यादा रोचक एवं अविश्वसनीय थी.

जाट सुरजीत सिंह पटियाला के एक अस्पताल में नौकरी करता था, जबकि उस की पत्नी दलजीत कौर घर की जिम्मेदारी संभालती थी. उन के यहां बच्चों में एक बेटा और 3 बेटियां थीं. दलजीत चाहती थी कि उस की सभी संतानें खूब पढ़लिख कर अच्छी नौकरियां हासिल कर के अपना भविष्य बनाएं. यह परिवार मूलरूप से जिला पटियाला के एक गांव का रहने वाला था. बच्चों की पढ़ाई की खातिर पटियाला शहर आ गया था और राजपुरा कालोनी में किराए का मकान ले कर रहने लगा था.

एक समस्या ने यहां भी इस का पीछा नहीं छोड़ा था. वह समस्या थी सुरजीत सिंह का नियमित शराब पीना. इसी वजह से घर में काफी लड़ाईझगड़ा होता रहता था. ऐसे माहौल में बच्चों के लिए पढ़ाई कर पाना मुश्किल हो जाता था. बच्चों में सब से बड़ी बेटी सुदीप कौर पढ़ाई में काफी होशियार थी. पटियाला आने के बाद सुदीप को मास्टर गोवर्धनदास के बारे में पता चला तो वह उन से मिलने उन के घर गई. पहले वह अर्थशास्त्र के अध्यापक थे और अपने विद्यार्थियों में वह काफी प्रसिद्ध थे. पढ़ाने में उन का कोई जवाब नहीं था. कुछ सालों पहले नौकरी से रिटायर होने के बाद वह घर पर ट्यूशन पढ़ाने लगे थे. गरीब विद्यार्थियों को वह मुफ्त ट्यूशन पढ़ाते थे.

पटियाला के पुराने एरिया में मास्टर गोवर्धनदास का बहुत बड़ा मकान था. पूछतेपूछते सुदीप भी उन के यहां जा पहुंची थी. मास्टरजी को लगा कि लड़की पढ़ाईलिखाई में होशियार है, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति पढ़ाई में बाधा बन रही है तो उन्होंने उसे मुफ्त में ट्यूशन पढ़ाने के लिए हामी भर दी. मास्टर गोवर्धनदास की छत्रछाया में सुदीप ने इकोनौमिक्स से एमए किया. वह एलएलबी कर के वकील बनना चाहती थी. लेकिन वह वकील बन पाती, घर वालों ने पहले ही उस की शादी कर दी. सुदीप पढ़लिख तो गई ही थी, उस की उम्र भी शादी लायक हो गई थी, इसलिए घर वालों ने अच्छा रिश्ता देख कर उस की शादी कर दी थी.

अब तक मास्टर गोवर्धनदास को भी अपनी इस लायक शिष्या से काफी लगाव हो गया था. उस की पारिवारिक स्थिति भी उन से छिपी नहीं थी, इसलिए उन्होंने उस की शादी में दिल खोल कर खर्च किया था. सुदीप के पति का नाम था राजेश. उस के साथ सुदीप जब कभी गोवर्धनदास के यहां जाती, वह उन की आवभगत बेटी और दामाद की तरह ही करते थे.

एक दिन गोवर्धनदास के परिवार के सभी लोग कहीं गए हुए थे. घर में वह और उन का बेटा अशोक था. दोपहर को मास्टरजी के लिए किसी का फोन आया. फोन पर बात करने के बाद उन्होंने बेटे से कहा, ‘‘अशोक, सुदीप के पति के काम से मुझे अभी दिल्ली जाना होगा. तुम मेरी अटैची तैयार कर दो, मैं 2-4 दिनों बाद लौटूंगा.’’

पिता के स्वभाव को अशोक बखूबी जानता था. जब भी किसी को उन की जरूरत पड़ती थी, वह न वक्त की परवाह करते थे और न खर्चे की. क्योंकि उन के पास पैसों की कमी तो थी नहीं. पैंशन मिल ही रही थी, अच्छे और संपन्न घरों के बच्चे उन के यहां ट्यूशन पढ़ने आते थे, जिन से वह मोटी फीस वसूल करते थे. चूंकि इस उम्र में भी वह बढि़या कमा रहे थे, इसलिए घर में किसी की ओर से उन पर कोई बंदिश नहीं थी. वह जहां चाहे जा सकते थे, मर्जी के हिसाब से खर्च कर सकते थे.

पिता के कहने पर अशोक ने तुरंत उन की अटैची तैयार कर दी और अपनी स्कूटर से उन के कहे अनुसार गुरुद्वारा दुख निवारण के पास छोड़ दिया. गोवर्धनदास के जाने के बाद उन के बेटे अशोक को भी किसी काम से पटियाला से बाहर जाना पड़ गया. 3 दिनों बाद लौट कर जब उस ने पिता के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अभी दिल्ली से लौट कर नहीं आए हैं. उन का कोई फोन भी नहीं आया है. अशोक ने पिता को फोन किया तो उन का मोबाइल स्विच्ड औफ बता रहा था. अशोक ने सोचा कि बैटरी वगैरह डिस्चार्ज हो गई होगी. इसलिए ऐसा हो रहा है.

लेकिन जब अगले दिन भी उन का फोन बंद बताता रहा तो अशोक को पिता की चिंता हुई. वह सुदीप के पति का काम कराने की बात कह कर दिल्ली गए थे, इसलिए उन के बारे में सुदीप से ही कुछ पता चल सकता था. अशोक तुरंत उस के घर जा पहुंचा. सुदीप और उस का पति घर पर ही थे. अशोक ने जब उन से पिता के बारे में पूछा तो उन्होंने एक साथ कहा, ‘‘मास्टरजी हमारे किसी काम से दिल्ली नहीं गए. हम ने उन्हें किसी काम के लिए कहा ही नहीं था. हमें तो यह भी पता नहीं कि मास्टरजी दिल्ली गए हुए हैं.’’

उन के इनकार करने से अशोक निराश हो कर घर लौट आया. इस के बाद परिवार के सभी लोग गोवर्धनदास की तलाश में जुट गए. काफी कोशिश के बाद भी जब कोई सफलता हाथ नहीं लगी तो अशोक अगले दिन सुबह अर्बन एस्टेट पुलिस चौकी जा कर चौकीप्रभारी एसआई बलविंदर सिंह से मिला. उन से पूरी बात बताई तो उन्होंने मास्टर गोवर्धनदास की गुमशुदगी दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी. गोवर्धनदास के दामाद दलीप कुमार वर्मा ने देखा कि मास्टरजी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही है तो उन्होंने थाना सदर में तहरीर दी कि ‘मैं गोवर्धनदास की बेटी सीमा का पति हूं. मेरे ससुरजी सरकारी स्कूल से रिटायर होने के बाद घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे. उन्हीं में एक सुदीप कौर भी थी, जिसे मेरे ससुरजी बेटी की तरह मानते थे. 2-3 महीने पहले उस की शादी राजेश से हो गई थी.

‘जब वह कुंवारी थी तो गुरमेज सिंह निवासी गांव मिदड़ो व जगबीर सिंह निवासी गांव लहरां अकसर उसे मेरे ससुरजी के यहां छोड़ने आते थे. इस पर मेरे ससुरजी ने ऐतराज किया. इस बात को ले कर एक बार मेरी भी उन से तकरार हुई. बाद में मैं ने सुदीप और उन दोनों लड़कों के संबंधों के बारे में पता लगाया.

‘पता चला कि उन दोनों लड़कों से सुदीप के नाजायज संबंध थे. वह उन लड़कों के साथ होटलों में भी जाया करती थी. जब इस बात की जानकारी मेरे ससुरजी को हुई तो उन्होंने उसे समझाते हुए चेतावनी दी कि वह उन लड़कों से अपने संबंध हमेशा के लिए खत्म कर ले.

‘इस बात से नाराज हो कर गुरमेज और जगबीर ने मेरे ससुरजी को धमकी भी दी थी. इस के बाद सुदीप की शादी हो गई तो बात आईगई हो गई. शादी के बाद सुदीप कभी अकेली तो कभी अपने पति राजेश के साथ मेरे ससुरजी के यहां आती रहती थी.

‘अब तक गुरमेज और जगबीर की बात सब के दिमाग से निकल गई. इस के बाद सुदीप के पति का काम करवाने के लिए दिल्ली जाने की बात कह कर मेरे ससुरजी घर से निकले थे. लेकिन वह गए तो लौट कर नहीं आए.

‘घर से जाते समय मेरे ससुरजी स्टेट बैंक औफ पटियाला का अपना एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन साथ ले गए थे. जब कई दिनों तक उन का मोबाइल फोन बंद बताता रहा तो चौकी पुलिस की मदद से मैं ने अपने ससुरजी का खाता चैक करवाया, तब बैंक से पता चला कि उस में से 75 हजार रुपए निकाले गए हैं. खाते में ढाई लाख रुपए और बचे थे. इसलिए मैं ने खाते को सील करवा दिया.

‘मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे ससुरजी को साजिश के तहत गुरमेज और जगबीर ने ही अगवा किया है. इस की वजह यह हो सकती है कि उन दोनों के सुदीप से नाजायज संबंध थे और मेरे ससुरजी इन की राह का रोड़ा बने हुए थे. उन्हीं लोगों ने मेरे ससुरजी को मौत के घाट उतारने के लिए अपहरण किया है.

‘यह भी हो सकता है कि उन लोगों ने मेरे ससुरजी को मौत के घाट उतारने के बाद उन की लाश को ठिकाने लगा दिया हो. आप से विनती है कि तीनों के खिलाफ मामला दर्ज कर सख्त काररवाई करें.’

थानाप्रभारी मनजीत सिंह बराड़ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दलीप वर्मा की इस तहरीर पर भादंवि की धारा 364 के तहत मामला दर्ज करा दिया और वांछित मुजरिमों की तलाश में उन के ठिकानों पर छापामारी शुरू कर दी. छापेमारी में जगबीर और गुरमेज ही नहीं, सुदीप और राजेश भी अपनेअपने घरों से नदारद मिले. 2 दिनों तक इन चारों के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली. पटियाला के फोकल पौइंट इलाके में एक फर्म है, जिस के मालिक व्यापारी होने के साथसाथ समाजसेवी भी हैं. एक दिन उन्होंने सुदीप और राजेश को थानाप्रभारी मनजीत सिंह बराड़ के सामने पेश कर के कहा कि मास्टर गोवर्धनदास का कत्ल इन्हीं लोगों ने किया है. यह अपना अपराध स्वीकार कर रहे हैं.

जब कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति इस तरह के दोषी को पुलिस के सामने पेश करता है तो इस प्रक्रिया को एक्स्ट्रा जूडीशियल कन्फैशन कहा जाता है. इस के अधीन पुलिस मुजरिम को पेश करने वाले व्यक्ति का सीआरपीसी की धारा 161 के तहत बयान दर्ज कर के अपराधियों को विधिवत गिरफ्तार कर के आगे की काररवाई करती है. इस मामले में भी मनजीत सिंह ने ऐसा ही किया. इधर पुलिस की काररवाई शुरू हुई, उधर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से आए वारंट औफिसर ने थाने में छापा मार दिया. उन का कहना था कि थाना पुलिस राजेश और सुदीप को गलत तरीके से हिरासत में रख कर उन पर झूठा केस बनाने की कोशिश कर रही है. इस संबंध में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी.

मनजीत सिंह बराड़ को समझते देर नहीं लगी कि जिन 2 मुजरिमों को उन की अपराध स्वीकृति की पेशकश के साथ ला कर उन के समक्ष पेश किया गया था, दोनों बहुत ही शातिर और अव्वल दर्जे के चालाक थे. लेकिन मनजीत सिंह भी कम चालाक नहीं थे. उन्होंने सारी कानूनी काररवाई बड़ी तेजी से की थी. अगर उन्होंने ऐसा न किया होता तो वारंट अधिकारी सुदीप और राजेश को अपने साथ ले जाता तो फिर शायद वे दोनों जल्दी उन की पकड़ में न आ पाते.

मनजीत सिंह ने सारी जानकारी डीएसपी गुरमीत चौहान को उन के मोबाइल पर दी तो वह भी तत्काल थाने आ गए. सुदीप और राजेश के अपराध और उन की गिरफ्तारी के सारे कागजात देख कर वारंट औफिसर संतुष्ट हो कर चले गए. यह मामला पहले ही मेरी नोटिस में आ चुका था. लेकिन जब डीएसपी गुरमीत चौहान ने यह सब मुझे विस्तार से बताया तो इस केस में मेरी रुचि और बढ़ गई. शुरू में ही अच्छाखासा झटका लग गया था, इसलिए आगे हर कदम फूंकफूंक कर रखने की जरूरत थी. उस दिन सुदीप और राजेश से कोई खास पूछताछ नहीं हो सकी. दोनों को हवालात में अलगअलग बंद कर दिया गया था. रात में भी खाना खा कर उन्हें सोने दिया गया.

अगले दिन थाना पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान इंसपेक्टर मनजीत सिंह, डीएसपी गुरमीत चौहान और सीआईए पुलिस के अलावा मैं ने भी दोनों से मनोवैज्ञानिक तरीके से व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में राजेश और सुदीप ने हमें जो कुछ बताया, उस से अपराध की एक अलग तरह की जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी. कहानी का कुछ हिस्सा ऊपर आ ही चुका है. आगे की कहानी कुछ इस तरह थी. सुदीप जब मास्टर गोवर्धनदास के यहां ट्यूशन पढ़ने आने लगी तो वह अकेली ही आतीजाती थी. ऐसे में रास्ते में कुछ लड़के उस से छेड़खानी करते थे.

उन में कुछ लड़के ऐसे भी थे, जो उसे अपनी कार में लिफ्ट देने की कोशिश करते थे. उन्हीं लड़कों में गुरमेज और जगबीर भी थे. ये अन्य लड़कों की अपेक्षा कुछ होशियार थे. जल्दी ही सुदीप इन के जाल में फंस गई. दोनों सुदीप को अपनी कार से घुमाने लगे और उस पर दिल खोल कर पैसे लुटाने लगे. बदले में सुदीप उन की बांहों में सिमट कर उन्हें खुश करने लगी थी. एक बार वह किसी होटल के कमरे में गुरमेज के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ी गई तो यह बात उस के घर तक जा पहुंची. इस के बाद उस के पिता ने उस की बहुत पिटाई की. पिता उस की पढ़ाई बंद करा देना चाहते थे, लेकिन मास्टर गोवर्धनदास के बीच में आ जाने से उस की पढ़ाई जारी रही.

अब सुदीप एक तरह से मास्टर गोवर्धनदास की पनाह में आ गई थी. मास्टरजी उस का भला चाहते थे, इसलिए उसे उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते थे. सुदीप की मां की तरह वह भी चाहते थे कि सुदीप पढ़लिख कर कुछ बन जाए. इसीलिए उन्होंने गुरमेज और जगबीर से संबंध तोड़ कर ठीक से पढ़ने को कहा. अब सुदीप का ज्यादा समय मास्टरजी के यहां ही बीतने लगा था. कभीकभी वह रात में भी उन के यहां रुक जाती थी. एक रात मास्टरजी घर पर अकेले थे. उस रात भी देर होने की वजह से सुदीप उन के घर रुक गई तो उस के सामने मास्टरजी के ‘सज्जन’ होने का भेद खुल गया.

भेड़ की खाल में वह पूरे भेडि़या निकले. उन्होंने सुदीप को इमोशनली ब्लैकमेल कर के उस से शारीरिक संबंध बना लिए. शुरुआत होने के बाद यह रोज का सिलसिला बन गया. सुदीप को वह अकेली ही पढ़ाते थे. उसी बीच वह कमरे का दरवाजा बंद कर के अपनी ‘फीस’ वसूल लेते थे. एक तो गोवर्धनदास अध्यापक थे, दूसरे बुजुर्ग, इसलिए उन के और सुदीप के बीच बने इस अनैतिक संबंधों पर किसी को संदेह नहीं हुआ. यही वजह थी कि वह अपनी इस शिष्या से संबंध बनाए रहे. एमए करने के बाद सुदीप ने गोवर्धनदास से इच्छा जताई कि वह एलएलबी कर के वकील बनना चाहती है तो मास्टरजी ने उसे पूरा सहयोग करने का आश्वासन दिया. लेकिन उसी बीच सुदीप की शादी की बात चलने लगी तो आगे की पढ़ाई खटाई में पड़ गई.

सुदीप ने अपनी शादी की बात मास्टरजी से बताई तो उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे घर वाले जहां चाहते हैं, तुम वहां शादी कर लो. जिस लड़के से तुम्हारी शादी होगी, वह तो तुम्हारा नाम का पति होगा. क्योंकि तुम्हें तो मेरे साथ संबंध बनाए रखना है. अगर शादी के बाद भी तुम मुझ से संबंध बनाए रहोगी तो तुम्हारा ही नहीं, तुम्हारे पति का भी हर तरह से खयाल रखूंगा.’’

सुदीप की शादी के लिए उस के मांबाप के पास उतने पैसे नहीं थे, जितने की जरूरत थी. इस के बावजूद वह उस की शादी जल्दी से जल्दी कर देना चाहते थे. इस की वजह यह थी कि शायद उन्हें मालूम हो चुका था कि उन की बेटी के कदम बहक चुके हैं. ऐसे में समय रहते उस पर नकेल न कसी गई तो वह जिस लड़के के साथ होटल में पकड़ी गई है, उस के साथ कोई नया गुल खिला सकती है. यही सब सोच कर उस के मांबाप पूरी तरह से इस कोशिश में लग गए कि जितनी जल्दी हो सके, कोई शरीफ लड़का ढूंढ़ कर उस की शादी कर दें. आखिर उन्हें राजेश मिल गया, जिस के साथ उन्होंने सुदीप की शादी कर दी.

राजेश के पिता का नाम अचित्तर सिंह और मां का सुरजीत कौर था. खेतीकिसानी करने वाला यह परिवार संगरूर के गांव माजरा का रहने वाला था. राजेश ने 10वीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी थी. उसे गाने का बहुत शौक था. उसे लगता था कि अगर वह अपने इस शौक को थोड़ा निखार ले तो प्रोफेशनल सिंगर बन कर नाम और पैसा, दोनों कमा सकता है. यही वजह थी कि 10वीं पास कर के वह गांव छोड़ कर संगरूर के मशहूर गायकों की शरण में आ गया था और गायकी के हुनर सीखने लगा था. सीखने के साथसाथ वह उन गायकों के साथ स्टेज शो भी करने लगा था.

उसी दौरान उस ने कुछ वीडियो अलबम्स में छोटेमोटे रोल भी किए थे. इसी बीच उसे एक लड़की से प्रेम हो गया तो उस ने उस के साथ विवाह कर लिया था. लेकिन जल्दी ही उस की पत्नी की मौत हो गई. इस के बाद उस की शादी सुदीप से हो गई थी. शादी के बाद राजेश ने अपने गायक बनने के सपने के बारे में सुदीप को बताया तो वह उसे मास्टरजी के पास ले गई. मास्टर गोवर्धनदास ने न केवल राजेश को उत्साहित किया, बल्कि सुदीप के हाथ पर 10 हजार रुपए रखते हुए कहा, ‘‘जरूरत पड़ी तो आगे भी मैं तुम्हारी इसी तरह मदद करता रहूंगा. मैं तुम्हारे पति का यह सपना जरूर पूरा करूंगा.’’

मास्टरजी ने जिस तरह 10 हजार रुपए सुदीप के हाथ पर रख दिए थे, राजेश हैरान रह गया. सुदीप मास्टरजी से केवल ट्यूशन पढ़ती थी. शादी में मास्टरजी का आना अलग बात थी. लेकिन बिना किसी वजह के इतनी बड़ी रकम देना उसे हैरान करने वाली बात लगी. बस यहीं से उस की सोच बदल गई. राजेश को पूरा विश्वास हो गया कि सुदीप और मास्टर गोवर्धनदास के बीच जरूर कुछ ऐसा है, जिस का खुलासा होने पर दिल बेचैन हो सकता है. उस समय तो उस ने कुछ नहीं कहा, लेकिन घर आ कर उस ने सुदीप पर भावुकता का ऐसा मनोवैज्ञानिक शिकंजा कसा कि उसने रोते हुए मास्टरजी से शारीरिक संबंध होने की बात स्वीकार ली.

इस के बाद उस ने राजेश के पैर छू कर वादा भी किया कि अब आगे वह मास्टरजी से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं रखेगी. सुदीप ने संबंध खत्म करने का भले ही वादा कर लिया, लेकिन राजेश को इतने में संतोष नहीं हुआ. उस ने कहा, ‘‘नहीं, बात इतने में ही खत्म नहीं होती. उस आदमी ने तुम्हें खराब किया है, इसलिए उसे इस की सजा मिलनी चाहिए. मैं उस जलील आदमी को जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

सुदीप ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, नादान मत बनो. मास्टरजी के पास लाखों रुपए हैं और मैं उस के ये रुपए आसानी से हथिया सकती हूं. उन रुपयों से हम तुम्हारे गानों का अलबम तैयार कर के मार्केट में उतारेंगे. तुम्हारा नाम चमकाने में मैं कोई कसर नहीं छोड़ूंगी. तुम्हारे भविष्य के लिए मैं अपना कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार रहूंगी.’’

दरअसल, इस तरह की बातें कर के सुदीप मास्टरजी की ओर से राजेश का ध्यान हटाना चाहती थी. सुदीप इस में कामयाब भी हो गई, क्योंकि उस की बातों में उसे वजन लगा था. इस रास्ते से उस के पास इतना पैसा आ सकता था कि उस के गीतों की अलबम भले ही न सही, कैसेट तो निकाली ही जा सकती थी. इस के बावजूद राजेश के दिमाग से यह बात नहीं निकल रही थी कि बुड्ढे मास्टर ने उस की पत्नी से नाजायज संबंध बनाए थे. इस की सजा उसे हर हालत में मिलनी चाहिए. सजा भी ऐसीवैसी नहीं, सीधे मौत. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह मास्टर को इस दुनिया से विदा तो करेगा ही, उस का सारा पैसा भी हथिया लेगा.

इस के बाद राजेश और सुदीप किसी न किसी बहाने गोवर्धनदास से पैसा ऐंठने लगे. मास्टरजी न केवल उन के हाथों ब्लैकमेल होते रहे, बल्कि सुदीप से उस के पति के गीतों की कैसेट निकलवाने का वादा भी करते रहे. मास्टरजी को काबू में रखने के लिए सुदीप अभी भी उन के साथ अवैध संबंध बनाए रही. कुछ ही दिनों में सुदीप ने मास्टरजी से इतने पैसे ऐंठ लिए कि राजेश ने अपने लिए मारुति कार खरीद ली. लेकिन इतने में भी उसे तसल्ली नहीं हुई. उस ने और सुदीप ने योजना बनाई कि रिकौर्डिंग कंपनी वालों से मिलने का बहाना कर के मास्टरजी को दिल्ली चलने के लिए तैयार किया जाए और रास्ते में उन का सारा पैसा ले कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए. योजना बनाने के बाद सुदीप ने यह बात मास्टरजी से कही तो वह उन लोगों के साथ दिल्ली जाने को तैयार हो गए.

राजेश और सुदीप ने मास्टर गोवर्धनदास को अपने साथ दिल्ली चलने के लिए तैयार कर के उन्हें गुरुद्वारा दुख निवारण के नजदीक बुला लिया. यहां से दोनों उन्हें अपनी मारुति कार से माता काली देवी मंदिर के नजदीक के स्टेट बैंक औफ पटियाला के एटीएम पर ले गए, जहां उन से 1 हजार रुपए निकालने को कहा. राजेश भी मास्टरजी के साथ एटीएम केबिन में घुस गया और उन के पिन दबाते समय उन का पिन नंबर याद कर लिया था. वहां से सभी जीटी रोड आ गए. आगे के लिए राजेश ने बेहोशी की दवा पहले से ही खरीद कर रख ली थी. मास्टरजी को साथ ले कर वे लुधियाना पहुंचे. वहां रेलवे स्टेशन की एक फ्रूट जूस की दुकान से उन्होंने संतरे का जूस खरीदा और उस में बेहोशी की दवा मिला कर उसे मास्टरजी को पिला दिया.

इस के बाद वे ब्राऊन रोड पर स्थित एक होटल में रुके तो वहां से वे शाम को निकले. अब तक मास्टरजी पर दवा का असर होने लगा था. मास्टरजी को ले कर वे चंडीगढ़ रोड पर पहुंचे. अब तक वह दिल्ली जाने के बारे में कई बार पूछ चुके थे. राजेश ने उन से कहा था कि कैसेट कंपनी वाले आज पंजाब आए हैं. संभव है कि उन से यहीं मुलाकात हो जाए, फिर दिल्ली नहीं जाना पड़ेगा. चंडीगढ़ रोड पर एक ढाबे पर वे खाना खाने के लिए रुके. वहां भी मास्टरजी की नजरें बचा कर उन की दाल में दवा डाल दी. खाना खाने के बाद वे कार में बैठे तो बैठते ही मास्टरजी पर बेहोशी छाने लगी.

मास्टर गोवर्धनदास कार की पिछली सीट पर बैठे थे. थोड़ी देर में वह एक ओर लुढ़क गए. सुदीप और राजेश को इसी का इंतजार था. कार को नहर के किनारे चलाते हुए वे कटानी गुरुद्वारा की ओर चल पड़े. दोराहे के पास एक जगह कार रोक कर राजेश ने गोवर्धनदास की जेबों से उन का एटीएम कार्ड, मोबाइल और पर्स निकाल कर उन के गले में रस्सी बांध कर नहर तक घसीट कर लाया और फिर उन्हें उठा कर नहर में फेंक दिया. अपना काम कर के दोनों लुधियाना चले गए, जहां भारतनगर चौक पर स्थित स्टेट बैंक औफ पटियाला के एटीएम से मास्टरजी के कार्ड से उन के खाते से 15 हजार रुपए निकाले. वह रात उन्होंने लुधियाना के एक होटल में गुजारी. अगले दिन दोनों लुधियाना में मौजमस्ती करते रहे. इस बीच उन्होंने गोवर्धनदास के एटीएम कार्ड के जरिए कई बार पैसे निकलवाए.

वे 75 हजार रुपए ही निकाल पाए थे कि खाता सील हो गया. पैसे मिलने का रास्ता बंद हो गया तो वे घर लौट आए. राजेश और सुदीप को मालूम था कि मास्टरजी घर नहीं लौटेंगे तो उन के यहां से कोई न कोई पूछने जरूर आएगा. हुआ भी वही. मास्टर का बेटा अशोक जब उन के घर पूछने आया तो उन्होंने अपनी बातों से उसे यकीन दिला दिया कि वे मास्टरजी के बारे में कुछ नहीं जानते. बाद में जब उन्हें मुकदमा दर्ज होने की सूचना मिली तो वे भूमिगत हो गए. घर से फरार होने के बाद उन्हें अपने आप को पुलिस से बचाए रखने में काफी मुश्किल हो रही थी.

लिहाजा सोचसमझ कर उन्होंने एक चाल चली.  एक वकील के जरिए उन्होंने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करते हुए आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें नाजायज हिरासत में रख कर टौर्चर करते हुए किसी झूठे गंभीर केस में फंसाने की कोशिश कर रही है. इसलिए उन्हें पुलिस की गलत हिरासत से छुड़ाया जाए. अपील दाखिल होने के बाद जब उन्हें हाईकोर्ट से वारंट औफिसर के पटियाला पहुंचने की जानकारी मिली तो दोनों ने किसी के माध्यम से पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. हमारी पूछताछ में पैसों के बारे में सुदीप और राजेश ने बताया कि उन में से 27 हजार रुपए उन्होने अपने ऊपर खर्च कर दिए थे. बाकी के पैसे राजेश के गांव वाले घर से बरामद हो गए थे. रिमांड समाप्त होने पर दोनों अभियुक्तों को फिर से अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

विवेचक मनजीत सिंह बराड़ ने उन के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर के समय से इलाका मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश कर दिया, जहां से मामला सेशन कमिट हो कर पटियाला के जिला एवं सत्र न्यायाधीश की कोर्ट में चला गया. वहां से दोनों को उम्रकैद की सजा हुई, आजकल दोनों पटियाला की सेंट्रल जेल में अपनी सजा काट रहे हैं. मेरे कैरियर का यह एक ऐसा केस था, जिसे मैं शायद ही कभी भूल पाऊं. Crime Story

 

Motivational Story: जिन्होंने तूफान में उतार दी कश्ती

Motivational Story: पूरी तरह दृष्टिहीन होने के बावजूद बेनो जहां भारत की सब से कठिन और सर्वोच्च परीक्षा पास कर के आईएफएस बनीं, वहीं स्कोलिओसिस जैसी बीमारी से पीडि़त होने के बावजूद इरा ने इस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान ला कर सब को चौंका दिया. अक्षमता इन दोनों की राह में बाधा नहीं बनी.

तमिलनाडु के एक साधारण परिवार में बेटी का जन्म हुआ तो पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार बधाई देने आए. बेटी पैदा होने की खुशी मनाई जाती, उस के पहले ही मां ने बेटी के चेहरे को गौर से देखा. उन्हें बच्ची में कुछ गड़बड़ लगा. उन्हें जो गड़बड़ लगा था, उस ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था. बच्ची जिस तरह देख रही थी, उस से मां को लगा कि बच्ची की आंखों में रौशनी नहीं है. डाक्टरों को दिखाया गया तो उन्होंने कहा कि बच्ची पूरी तरह दृष्टिहीन है. इस का कोई इलाज भी नहीं है.

मातापिता अवाक रह गए. अब उन के वश में कुछ नहीं था. लेकिन यह कोई पहली घटना नहीं थी, जो वे इस का मातम मनाते. दुनिया में तमाम दृष्टिहीन लोग हैं और बढि़या जीवन जी रहे हैं. यही सोच कर मां ने बेटी को गले से लगाते हुए तय किया कि वह उस के जीवन को प्यार से इस तरह रौशन कर देंगी कि उसे कभी अहसास नहीं होगा कि वह देख नहीं सकती. आखिर उन्होंने किया भी वही. उस दृष्टिहीन बच्ची के पिता ल्यूक एंटोनी चार्ल्स रेलवे में नौकरी करते थे. मां पद्मजा पढ़ीलिखी थीं, लेकिन घर में रह कर घरगृहस्थी संभालती थीं. दोनों ने बड़े प्यार से बेटी का नाम बेनो जेफाइन रखा.

बेनो का मतलब है ईश्वर और जेफाइन का मतलब है खजाना यानी ईश्वर का खजाना. मांबाप ने जैसा नाम रखा, वैसा ही उसे माना भी. सचमुच बेनो मम्मीपापा के लिए कुदरत का खजाना थी. मांबाप ने जो प्यार दिया, उस से उस का बचपन तमाम खुशियों से रौशन रहा. परिवार ने कभी उसे इस बात का अहसास नहीं होने दिया कि वह दृष्टिहीन है. वह 4 साल की हुई तो मम्मीपापा ने उस का दाखिला लिटिल फ्लावर कौनवेंट स्कूल में करा दिया. यह दृष्टिहीन बच्चों का स्कूल था. बेनो स्कूल जाने लगी.

बेनो शुरू से ही पढ़ाई में तेज थी. स्वभाव से बातूनी होने की वजह से बेनो के ढेर सारे दोस्त बन गए थे. अपने इस गुण की वजह से बच्चों से ही नहीं, तमाम अध्यापकों से भी उस की अच्छी दोस्ती हो गई थी. सभी उस के बेबाक अंदाज के कायल थे. क्लास में जब भी कुछ पूछा जाता, वह बेहिचक बोलना शुरू कर देती. उन दिनों वह अपर केजी में थी, जब उस के अध्यापक ने कहा कि स्टेज पर जाओ और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में कुछ कहो.

बेनो तेजी से स्टेज की ओर बढ़ी. माइक पकड़ा और धाराप्रवाह बोलने लगी. गजब का आत्मविश्वास था उस में. उस के इस भाषण ने उसे प्रथम पुरस्कार दिलाया. इनाम में उसे स्टील की प्लेट मिली. यह उस का पहला इनाम था. इस पहले इनाम को वह आज भी नहीं भूल पाई है. इस के बाद जीत का सिलसिला सा चल पड़ा. प्रतियोगिता स्कूल की हो या स्कूल के बाहर की, अगर बेनो ने उस में हिस्सा लिया है तो उन का अव्वल आना तय था. समय के साथसाथ उन की भाषण शैली और बोलने की क्षमता निखरती गई. वह पहले लिख कर भाषण देती थीं, बाद में बिना लिखे बोलने लगीं. बचपन में उन के विषय हुआ करते थे नेहरू, गांधी जैसे महान नेता. बड़ी और समझदार हुईं तो पर्यावरण, कैंसर, जल संरक्षण जैसे गंभीर विषयों पर भाषण देने लगीं.

बेनो के कोर्स की किताबें तो ब्रेल लिपि में होती थीं, उन्हें वह पढ़ लेती थीं, लेकिन भाषण के लिए पापा किताबें ला कर देते थे. मम्मी पढ़ कर सुनाती थीं. उन के भाषण जानकारीपूर्ण और प्रेरक होते थे, इसलिए हर कोई उन्हें सुनना चाहता था. वह 10वीं में पढ़ रही थीं, तब उन का सोचना था कि वह शिक्षक या वकील बनेंगी, लेकिन 10वीं के बाद अचानक इरादा बदल गया. दरअसल, वह जल संरक्षण पर काफी कुछ अपनी मां से सुन चुकी थीं. कई बार इस विषय पर भाषण भी दिया था, इसलिए जब एक दिन बेनो पड़ोसियों से जल संरक्षण पर चर्चा करने लगीं तो किसी पड़ोसन चिढ़ कर बोली, ‘‘लो आ गई कलेक्टर साहिबा, हम को समझाने.’’

इस के बाद बेनो के मन में आया कि अब वह कलेक्टर यानी आईएएस बनेंगी. स्कूल से कालेज तक पढ़ाई बेनो के लिए कभी बोझ नहीं रही. उन्हें पढ़ना अच्छा लगता था. उन की हर विषय में रुचि थी. पढ़ाई उन का सब से बड़ा शौक था. इसलिए किताबें उन के लिए बेहतरीन उपहार थीं. कालेज में दाखिला लिया तो माहौल एकदम अलग था. पहले बेनो जिस स्कूल में पढ़ती थीं, वहां सिर्फ दृष्टिहीन बच्चे ही पढ़ते थे. लेकिन कालेज में तो सब सामान्य बच्चे थे. बेनो में आत्मविश्वास भी था और हिम्मत भी, इसलिए उन्हें यहां भी कुछ मुश्किल नहीं लगा.

मद्रास यूनिवर्सिटी के स्टेला मेरिस कालेज से बीए करने के बाद लायला कालेज से बेनो ने अंगरेजी साहित्य से एमए किया. इस के बाद उन्होंने पीओ की परीक्षा दी. इस में उन्हें सफलता मिली और 2013 में स्टेट बैंक औफ इंडिया में बतौर प्रोबेशनरी अफसर नौकरी मिल गई. बेनो कहती हैं, ‘‘नौकरी मिलने के बाद मुझे लगा कि अब मैं बच्ची नहीं रही, बड़ी हो गई हूं. पहली बार मुझे जिम्मेदारी का अहसास हुआ. पहले वेतन से मैं ने पापा के लिए सोने की चेन और मां के लिए कान के झुमके खरीदे.’’

बैंक में उन्हें डूबे हुए कर्ज की वसूली का काम सौंपा गया. काम चुनौतीपूर्ण था, लेकिन इस जिम्मेदारी को उन्होंने बखूबी निभाया. जल्द ही वह वसूली रानी के नाम से मशहूर हो गईं. वह जिस तरह अपना काम जिम्मेदारी और निष्ठा से करती थीं, लोगों को यही लगता था कि वह बहुत सख्त हैं, पर ऐसा नहीं था. बात सिर्फ इतनी थी कि वह अपने मूल्यों से समझौता नहीं करती थीं और पूरी ईमानदारी से अपना काम करती थीं. इस के बाद बेनो ने यूपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. उन्हें बचपन से रेडियो पर खबरें सुनने की आदत थी. इस से उन्हें सामान्य ज्ञान बढ़ाने में मदद मिली. अन्य विषयों की पढ़ाई के लिए किताबों को स्कैन करवा कर कंप्यूटर पर रखा और फिर उसे एक सौफ्टवेयर की मदद से पढ़ने की कोशिश की.

जो किताबें स्कैन नहीं हो पाईं, उन्हें मां ने अपनी जिंदगी का सब से महत्त्वपूर्ण और जरूरी समय खराब कर के बेनो के भविष्य को बनाने के लिए कोर्स की किताबें पढ़ कर सुनाने में लगा दिया. दिन भर काम करने के बाद पिता और मां उन के लिए जोरजोर से उन की किताबें पढ़ते. इस तरह मम्मीपापा उन की आंखें बन गए. उन की आंखों से बेनो ने अपनी पढ़ाई की. उन के पिता के पास 2 ही काम थे, औफिस का काम करना और उन के लिए किताबें ढूंढना तथा यह पता लगाना कि किस तकनीक की मदद से बेनो अधिक से अधिक आसानी से अपनी पढ़ाई कर सकती है. पहली कोशिश में कामयाबी नहीं मिली, पर मजबूत इरादों वाली बेनो निराश नहीं हुईं.

उन्होंने दोबारा परीक्षा दी और इस बार उन की 343वीं रैंक आई. पैनल इंटरव्यू के दौरान उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वह विदेश विभाग में सेवा करना चाहती हैं. विदेश विभाग ने इस से पहले किसी ऐसे अफसर को नियुक्त नहीं किया था, जो सौ फीसदी दृष्टिहीन रहा हो. इसलिए बेनो को नियुक्ति के लिए एक साल का इंतजार करना पड़ा. इस बीच नियमों में बदलाव किए गए और फिर उन्हें पद ग्रहण के लिए विदेश मंत्रालय की ओर से पत्र भेजा गया कि 60 दिनों में वह अपना पद ग्रहण करें. बेनो देश की पहली दृष्टिहीन आईएफएस अफसर हैं. वह कहती हैं कि यह कामयाबी उन के मातापिता की मेहनत और आशीर्वाद का फल है.

राह में अनेक दिक्कतें थीं, पर असंभव जैसा कुछ नहीं था. मन में कुछ करने का जज्बा और मजबूत इरादे का ही नतीजा था कि अब बेनो जेफाइन भारतीय विदेश सेवा अफसर बन गई हैं. बेनो सभी चुनौतियों का सामना करने को तैयार हैं. अपनी इस नौकरी को ले कर वह काफी उत्साहित हैं. आईएफएस के लिए वह पूरी तरह से पात्र थीं, लेकिन ब्लाइंडनेस के चलते पहले पद नहीं दिया गया था. एक साल के इंतजार के बाद विदेश मंत्रालय ने पिछले हफ्ते उन्हें आदेश भेजा है. 25 साल की जेफाइन देश की पहली पूरी तरह से दृष्टिहीन आईएफएस अफसर हैं. पूरी तरह से दृष्टिबाधित आईएफएस अधिकारी एन.एल. बेनो जेफाइन अपने कैरियर में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं. अब वह भारत का विश्व भर में प्रतिनिधित्व करने को उत्सुक हैं.

इस साल संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा में आल इंडिया टौप करने वाली इरा सिंघल के आईएएस बनने के सफर पर नजर डालें तो वह ऐसी शख्सियत हैं, जिन्हें तूफान में कश्ती उतारने की आदत है. मेरठ में जन्मी इरा जन्म के समय सामान्य बच्चों जैसी थीं, लेकिन कुछ समय बाद उन की रीढ़ की हड्डी का आकार बिगड़ने लगा. कई डाक्टरों को दिखाया गया. शुरू में कुछ समझ में नहीं आया, बाद में पता चला कि उन्हें स्कोलिओसिस है. इस की वजह से उन की रीढ़ की हड्डी सीधी होने के बजाय ‘एस’ आकार की हो गई है. डाक्टरों ने औपरेशन की सलाह देने के साथ यह चेतावनी भी दी कि इस में बच्ची की जान को खतरा है. खतरे की आशंका के चलते मातापिता औपरेशन कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाए.

इरा बड़ी होने लगीं. सिंघल परिवार का आंगन उन की मासूम बातों और दिल छू लेने वाली शरारतों से रौशन रहने लगा. 4 साल की हुईं तो पिता राजेंद्र सिंघल को उन की पढ़ाई को ले कर चिंता हुई. शहर के एक मशहूर स्कूल में बेटी को ले कर एडमिशन कराने पहुंचे तो स्कूल ने बच्ची को देखते ही दाखिला देने से इनकार कर दिया. पेशे से बिजनैसमैन राजेंद्र सिंघल को प्राइमरी स्कूल से ले कर सेकैंडरी स्कूल तक इरा को एडमिशन दिलाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा. शारीरिक दिक्कत की वजह से स्कूल प्रबंधन उन्हें दाखिला देने को तैयार नहीं होता था.

दाखिला भले ही मुश्किल से मिला हो, मगर स्कूल जाने के बाद इरा छा गईं. कुछ ही दिनों में वह क्लासटीचर की सब से चहेती छात्रा बन गईं. चाहे पढ़ाई हो या फिर सांस्कृतिक कार्यक्रम, इरा सब में आगे रहती थीं. मेरठ के सोफिया गर्ल्स स्कूल से पढ़ाई शुरू करने के बाद उन्होंने दिल्ली के लोरेटो कौनवेंट स्कूल और आर्मी स्कूल से स्कूली पढ़ाई की. क्योंकि इस बीच उन का परिवार दिल्ली आ गया था. स्कूल के दिनों से ही उन के अंदर लोगों की मदद करने का जज्बा रहा. जिन दिनों वह कक्षा 3 में थीं, तब वह करीब 8 साल की रही होंगी. घर में लोग उत्तरकाशी के भूकंप पीडि़तों की चर्चा कर रहे थे. तब नन्ही इरा ने पापा से कहा था कि उन के गुल्लक के पैसे उन लोगों को दे दो.

गुल्लक में कुल 91 रुपए थे. उन्होंने वे रुपए भूकंप पीडि़तों को भिजवा दिए. हाईस्कूल पास करने के बाद इरा ने डाक्टर बनने की इच्छा जाहिर की, लेकिन राजेंद्र सिंघल राजी नहीं हुए. इसीलिए उन्होंने इरा को जीवविज्ञान विषय नहीं लेने दिया. उन्हें लगा कि शारीरिक दिक्कत बेटी के डाक्टर बनने की राह में रोड़ा बन सकती है. उन्हें लगता था कि इरा मैडिकल की पढ़ाई तो कर लेगी, लेकिन उसे खड़े हो कर सर्जरी करने में परेशानी होगी. मजबूरी में इरा को इंजीनियरिंग में दाखिला लेना पड़ा. पापा ने उन्हें डाक्टरी नहीं पढ़ने दी थी, जिस की वजह से उन के मन में बड़ा गुस्सा था.

यही वजह थी कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई उन्होंने बेमन से की. कई बार तो उन्होंने परीक्षा के मात्र 10 घंटे पहले पढ़ाई शुरू की. इस के बाद भी हर बार उन के अच्छे अंक आए. शारीरिक दिक्कत ने कभी इरा के हौसले को नहीं तोड़ा. यह उन की हिम्मत ही थी कि उन्होंने अपनी बीमारी को कभी कमी नहीं माना. दिल्ली के द्वारका स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस टैक्निकल यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर इंजीनियरिंग से बीई करने के बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रतिष्ठित फैकल्टी औफ मैनेजमेंट स्टडीज से फाइनैंस व मार्केटिंग में एमबीए किया.

इस के बाद चौकलेट बनाने वाली कैडबरी कंपनी में उन्हें नौकरी मिल गई. कालेज के दिनों में वह थिएटर ग्रुप में शामिल हो गई थीं. अभिनय के अलावा उन्हें साहित्य पढ़ने और कविताएं लिखने का भी शौक है. इरा को लगता है कि साहित्यिक किताबें इंसान को जीना सिखाती हैं. कालेज कैंपस में उन्होंने तमाम नाटकों में हिस्सा लिया. इस दौरान कई विदेशी भाषाएं भी सीखीं. स्पैनिश, फ्रेंच, इटालियन और अंगरेजी की उन्हें अच्छी समझ है. मातापिता के प्रोफेशनल होने की वजह से अकसर घर में वह अकेली होती थीं. इस स्थिति में उपन्यास उन के अच्छे दोस्त रहे. खाना बनाना भी उन्हें खूब भाता था. जहां तक मनमौजी रवैए की बात है, वह जब मन में आता है बिना बताए घूमने निकल जाती हैं.

इरा के ज्यादातर दोस्त इंजीनियर हैं और कारपोरेट सैक्टर में नौकरी करते हैं. परिवार या रिश्तेदारी में कोई भी सिविल सर्विस में नहीं है. पर नौकरी के दौरान इरा के मन में सिविल सेवा में जाने का ख्याल आया. उन्होंने भूगोल को मुख्य विषय बनाया और जम कर पढ़ाई की. सन 2010 में पहली कोशिश में ही वह सफल रहीं. इस में उन्हें 815 रैंक मिली. उन्हें भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी बनने का अवसर मिला. लेकिन मैडिकल स्तर पर उन्हें पोस्टिंग नहीं दी गई. सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद बीमारी की वजह से उन्हें अयोग्य करार दे दिया गया. इरा की लंबाई ज्यादा नहीं है. इस के बाद उन्होंने अपने साथ हुए इस अन्याय के खिलाफ सेंट्रल एडमिनिस्टै्रटिव ट्रिब्यूनल (कैट) का रुख किया.

वहां से उन्हें जीत हासिल हुई तो इस समय वह हैदराबाद में राजस्व अधिकारी की ट्रेनिंग कर रही थीं. 2012 में शुरू हुई इस लड़ाई का नतीजा 2014 में आया. इस दौरान उन्होंने सन 2012 और 2013 में भी यूपीएससी की परीक्षा में सफलता हासिल की. लेकिन हर बार रैंक बहुत ज्यादा आती रही. इस बीच उन के एक दोस्त ने सलाह दी कि आईएएस बनने के लिए उन्हें चौथी बार कोशिश करनी चाहिए. नौकरी की ट्रेनिंग के साथसाथ वह तैयारी में जुट गईं. इस बार जब नतीजा आया तो उन्होंने सब को चौंका दिया, क्योंकि इस बार उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में टौप किया था.

आज पूरे देश में उन की चर्चा हो रही है. इरा की मां अनीता सिंघल का कहना है कि वह कभी किताबों से चिपकी नहीं रहीं. एक बार पढ़ लेने से उन्हें सब याद हो जाता था. इरा की मानें तो उन्होंने कभी 4-5 घंटे से ज्यादा पढ़ाई नहीं की. उन का कहना है कि जो भी करो, मन से करो. किसी को दिखाने के लिए मत पढ़ो. पढ़ने से ज्यादा जरूरी है समझना. ऐसा नहीं है कि इरा ने कभी हताशा नहीं झेली. परीक्षा पास करने के बाद भी पोस्टिंग न मिलना यकीनन कठिन रहा. कानूनी लड़ाई भी आसान नहीं थी. पर वह निराश नहीं हुईं. उन का कहना है कि सफलता को जीवन या मरण का विषय नहीं बनाना चाहिए.

पास नहीं हुए तो इस का यह मतलब कतई नहीं हुआ कि जीवन खत्म हो गया. एक काम में सफल नहीं हुए तो दूसरा करना चाहिए. लेकिन जो भी करना चाहिए, मन से करना चाहिए. यूपीएससी के नतीजे बताते हैं कि महिलाएं पुरुषों से कंधे से कंधा मिला कर नहीं चल रहीं, बल्कि अब उन्हें पीछे कर रही हैं. यह अच्छी बात है. कोई भी दबाकुचला आजाद होता है तो वह इसी तरह उछाल मारता है. यह उन्हें इतनी आसानी से नहीं मिला. इस के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है.

महिलाओं को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) समेत किसी भी तरह की नागरिक सेवा का पात्र 67 साल पहले माना गया था. उस के बाद 1951 में भारत की अन्ना राजम मल्होत्रा पहली आईएएस तो 1972 में किरण बेदी पहली आईपीएस अधिकारी बनीं. Motivational Story

 

Uttar Pradesh Crime: रहस्य में दफन हो गई सारा की मौत

Uttar Pradesh Crime: अमनमणि त्रिपाठी ने घर वालों की मरजी के बिना संभ्रांत परिवार की लड़की सारा सिंह से कोर्टमैरिज तो कर ली लेकिन बाद में ऐसे क्या हालात हुए कि वह उस से किनारा करने की सोचने लगा? फिर एक दिन…

पौ फटते ही सूरज की किरणें धरती को चूमने लगी थीं. चिडि़यों के मधुर कलरव से फिजाएं गूंज उठी थीं. कलियां भी मुसकान बिखरने लगी थीं तो वहीं चंचल मकरंद कलियों पर मंडराने लगे थे. चिडि़यों के मीठे स्वर जब सारा के कानों से टकराए तो वह अंगड़ाइयां लेती हुई बिस्तर से उतरी और तरोताजा होने के लिए गुसलखाने की ओर बढ़ी. कुछ देर बाद वहां से लौटी तो दीवार पर टंगी घड़ी पर नजर दौड़ाई. उस वक्त सुबह के साढ़े 6 बज रहे थे. फिर एक नजर घर में दौड़ाई, घर के बाकी लोग सो रहे थे.

फटाफट तैयार हो कर उस ने नाश्ता किया. उस समय वह बहुत खुश थी. बारबार दीवार घड़ी पर नजर डाल कर वह दरवाजे से ही सड़क की तरफ इस तरह से देखती जैसे उसे किसी के आने का इंतजार हो. दरवाजे से आ कर वह बेचैनी से लौन में चहलकदमी कर ने लगती. उस की जूतियों की खटपट से सारा की मां सीमा सिंह की नींद टूट गई.

बेटी को अलसुबह तैयार हुआ देख कर उन्होंने उस से पूछा, ‘‘बेटी, इतनी जल्दी तैयार हो कर कहां जा रही हो? रात तुम ने मुझे बताया नहीं कि सुबह तुम्हें कहीं जाना है?’’

‘‘जी मां, मैं बताना भूल गई थी. दरअसल बात यह है कि शादी की दूसरी सालगिरह पर अमन ने दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला जाने का कार्यक्रम बनाया है. आज हम पहले दिल्ली जाएंगे. फिर वहां से आगे की तैयारी करेंगे.’’

‘‘ठीक है, बेटा. जाओ, पर इतना लंबा सफर तुम कैसे तय करोगे?’’ सीमा सिंह बोलीं.

‘‘मां, हम ने इस बार कार से जाने का मन बनाया है.’’ सारा मां को बता रही थी कि उसी समय उसे दरवाजे के बाहर किसी गाड़ी के आने की आवाज आई. वह कमरे से दरवाजे की तरफ गई. वहीं से वह चहक कर बोली, ‘‘मां गाड़ी आ गई.’’

सीमा सिंह ने बाहर की तरफ देखा तो एक कार के पास सफेद कमीज पहने दामाद अमनमणि त्रिपाठी खड़ा था. सारा अपना सूटकेस उठा कर मां को ‘बाय’ कहती हुई घर से निकल कर सफेद रंग की मारुति स्विफ्ट कार नंबर यूपी-53-बीआर-0060 में जा कर बैठ गई. सास को बायबाय कर के अमनमणि वहां से चला गया. इस के बाद अमनमणि ने कार दिल्ली की ओर दौड़ा दी. यह बात 9 जुलाई, 2015 की है. सीमा सिंह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर के घोसडि़या चौराहे के पास स्थित आलीशान कोठी में अपने परिवार के साथ रहती थीं.

उन के परिवार में 4 बच्चे थे, जिन में बेटी सारा तीसरे नंबर की थी. सीमा सिंह के पति अशोक कुमार सिंह की कई साल पहले स्वाभाविक मौत हो चुकी थी. उन की मौत के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी सीमा सिंह के कंधों पर आ गई थी. सीमा सिंह कोई मामूली हैसियत वाली महिला नहीं थीं. वह अधिवक्ता के अलावा अखिल भारतीय कांगे्रस पार्टी की सदस्य भी थीं. वह एक रईस खानदान की बहू थीं. धनदौलत की उन के घर में कोई कमी नहीं थी. बेटी सारा चंचल और बला की खूबसूरत थी. अपने आजादखयाल के चलते ही सारा सिंह ने कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी से अलीगंज स्थित आर्य समाज मंदिर में 27 जुलाई, 2013 को शादी की थी.

शादी की दूसरी सालगिरह को यादगार बनाने के लिए वह पति के साथ घूमने निकली थी. वैसे सारा लंबी दूरी की यात्रा हवाई जहाज से ही करती थी. लेकिन आज लंबे सफर के लिए कार से निकलने पर सीमा सिंह को हैरानी हुई. उसी दिन सीमा सिंह अपने बच्चों के साथ दोपहर का खाना खा रही थीं कि उसी बीच उन के छोटे बेटे सिद्धार्थ सिंह के मोबाइल पर किसी अंजान नंबर से काल आई. सिद्धार्थ ने जैसे ही उस काल को रिसीव किया, काल डिसकनैक्ट हो गई. कुछ क्षण बाद उसी नंबर से फिर काल आई. सिद्धार्थ ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘तुम्हारे बहनोई का एक्सीडैंट हो गया है.’’ इतना कहने के बाद दूसरी ओर से फोन डिसकनैक्ट हो गया.

सिद्धार्थ कुछ समझ नहीं पाया. उस ने मोबाइल मां की तरफ बढ़ाते हुए कहा कि किसी ने फोन कर के बताया है कि बहनोई का एक्सीडैंट हो गया है. बेटे के मुंह से एक्सीडैंट की बात सुन कर सीमा अचंभित हुई. क्योंकि अमनमणि के साथ उन की बेटी सारा भी थी.

बेटी की चिंता करते हुए वह उसी नंबर को रिडायल करने लगीं, जिस नंबर से बेटे के मोबाइल पर फोन आया था. वह नंबर मिला ही रही थीं कि उसी दौरान उन के मोबाइल पर सारा के मोबाइल से काल आई. सीमा सिंह ने झट काल रिसीव कर के कहा, ‘‘हैलो, बेटा सारा, क्या हुआ?’’

‘‘मम्मी सारा नहीं, मैं अमन बोल रहा हूं,’’ रोते हुए अमन बोला, ‘‘मम्मी हमारे साथ बड़ी दुर्घटना घट गई है.’’

‘‘रोओ मत बेटा, बताओ क्या हुआ?’’ सीमा सिंह बोलीं.

‘‘मम्मीजी, सारा अब इस दुनिया में नहीं रही. मैं इस के बिना कैसे जीऊंगा.’’ इतना कह कर अमनमणि बिलख-बिलख कर रोने लगा.

बेटी की मौत की खबर सुन कर सीमा सिंह एकदम सन्न रह गईं. वह बोलीं, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’

रोतेरोते अमनमणि त्रिपाठी ने उन्हें बताया कि फिरोजाबाद के पास सिरसागंज इलाके में उस की कार का एक्सीडैंट हो गया.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, यह झूठ है.’’ कहते हुए वह भी रोने लगीं. बहन की मौत की खबर पर सिद्धार्थ की आंखों से भी आंसू टपकने लगे.

सिद्धार्थ ने यह खबर बड़े भाई हर्ष को भी फोन कर के दे दी. वह शहर में किसी काम से निकला था. बड़े बेटे के घर आने के बाद सीमा सिंह बेटे व अपने शुभचिंतकों के साथ फिरोजाबाद के लिए रवाना हो गईं. शाम करीब 6-7 बजे वह फिरोजाबाद के सिरसागंज थाने पहुंच गईं. थानाप्रभारी अतर सिंह से उन्होंने बेटी और दामाद के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि एक्सीडैंट बहुत खतरनाक था. सारा की मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी. उस की डेडबौडी पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी गई है और अमनमणि को ऋषि कुमार पांडेय के अपहरण वाले मामले में हिरासत में ले लिया गया है. सीमा सिंह दामाद से मिलना चाहती थीं, लेकिन थानाप्रभारी ने मिलने से मना कर दिया.

सीमा सिंह की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि पुलिस उन्हें दामाद से मिलने क्यों नहीं दे रही है? वह अमनमणि से मिल कर जानना चाहती थीं कि आखिर यह दुर्घटना कैसे हुई? उन के काफी अनुरोध करने के बाद पुलिस ने उन्हें अमनमणि से मिलने की इजाजत दी. अमन को एक कमरे में कैद कर के रखा गया था. अमन ने सीमा सिंह को बताया कि गाड़ी तेज गति से जा रही थी कि अचानक सामने से साइकिल सवार एक लड़की आ गई. उस लड़की को बचाने के चक्कर में गाड़ी पलटी खा कर गिर गई और सारा सदा के लिए चिरनिद्रा में चली गई.

दामाद की बात सीमा सिंह के गले नहीं उतर रही थी. क्योंकि दुर्घटना में अमनमणि को भी थोड़ीबहुत चोट आनी चाहिए थी, लेकिन उस के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी. उस के कपड़ों पर धूलमिट्टी ही लगी हुई थी, जबकि वह खुद भी उसी कार में था. सीमा सिंह को तब और आश्चर्य हुआ, जब उन्हें थाने में ही अमनमणि त्रिपाठी के बाबा पूर्व विधायक श्यामनारायणमणि त्रिपाठी सहित गोरखपुर के उस के तमाम शुभचिंतक मिले. यह आश्चर्य की बात इसलिए थी कि गोरखपुर से फिरोजाबाद वे लोग इतनी जल्दी कैसे पहुंच गए? इस से सीमा सिंह को लगने लगा कि यह दुर्घटना नहीं हो सकती, बल्कि उन की बेटी सारा को सुनियोजित तरीके से मारा गया है.

अमनमणि त्रिपाठी समाजवादी पार्टी का नेता था, इसलिए सूचना मिलते ही मीडिया से जुड़े लोग वहां पहुंच गए. मीडिया ने इस मामले को खूब उछाला, जिस से यह मामला हाई प्रोफाइल बन गया. घटना की सूचना मिलते ही सारा के मामा एस.के. रघुवंशी, जो अखिलेश सरकार में गृहसचिव के पद पर तैनात हैं, वह भी मौके पर पहुंच गए. उन्हें भी कार दुर्घटना पर संदेह हो रहा था. सारा सिंह के मायके वाले उस की मौत को साजिश के तहत की गई हत्या मान रहे थे. 2 दिनों बाद सारा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली, जिस में सारा की मौत की वजह सिर और छाती में आई बड़ी चोट बताई गई.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के 9 दिनों बाद सीमा सिंह ने फिरोजाबाद के एसएसपी पीयूष श्रीवास्तव से मुलाकात की. उन्होंने उन्हें एक तहरीर देते हुए कहा कि उन की बेटी को इन लोगों ने एक साजिश के तहत मारा है. उस तहरीर के आधार पर एसएसपी ने सिरसागंज थाने में भादंवि की धारा 498ए, 302, 120बी के तहत अमनमणि त्रिपाठी, उस के पिता अमरमणि त्रिपाठी, मां मधुमणि त्रिपाठी आदि के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया. सपा के युवा नेता अमनमणि त्रिपाठी और रसूख खानदान की बेटी सारा सिंह की दोस्ती कैसे हुई? दोस्ती के रास्ते वे पतिपत्नी के रिश्ते में कैसे बंधे? इन सवालों के जवाब पाने के लिए हमें इन के अतीत के पन्नों में झांकना होगा.

30 वर्षीय अमनमणि त्रिपाठी पूर्व मंत्री और मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन सजा काट रहे सपा के कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी का बेटा है. अमनमणि के अलावा उन की 2 बेटियां थीं. अमनमणि दूसरे नंबर का था. अमरमणि त्रिपाठी की दोनों बेटियों को राजनीति से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन बेटा अमनमणि त्रिपाठी पिता की राजनीतिक विरासत को आगे संभाल कर रखना चाहता था. पिता से ही उस ने राजनीति के सारे गुर सीख लिए थे. इस में उस के बाबा पूर्व मंत्री श्याम-नारायणमणि त्रिपाठी भीष्मपितामह के रूप में उस के साथ रहे.

धीरेधीरे अमनमणि का राजनीतिक कद बढ़ता गया. वह भी पिता के विधानसभा क्षेत्र लक्ष्मीपुर में लोगों का चहेता बनता गया. इस से अमनमणि लोकसभा चुनाव लड़ने की जुगत में लग गया. उस की मेहनत रंग लाई और पिछले लोकसभा चुनाव में उसे टिकट भी मिल गया. लेकिन उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा. उस के पिता के राजनीतिक बैरी कांगे्रस के कद्दावर नेता अखिलेश सिंह ने बाजी मार ली. चुनावी जंग में अमनमणि के साथ उस के खास दोस्त अमित कुमार उर्फ मानू पांडेय, संदीप त्रिपाठी, रवि शुक्ला, गौरव त्रिपाठी, संतोषमणि त्रिपाठी, आशीष शाही, राज त्रिवेदी, त्रिपुरारी मिश्रा, अनूप शंकर पांडेय, पंकज तिवारी, राजीव ऋषि तिवारी, के. सी. पांडेय, अरुण शुक्ला और अमरदीप शुक्ला ने जीजान से मेहनत की. ये हर वक्त साए की तरह उस के पीछेपीछे चलते रहे.

अमनमणि त्रिपाठी फेसबुक का शौकीन था. बात वर्ष 2012-13 की है. फुरसत के समय वह अपना काफी समय सोशल साइट फेसबुक पर बिताता था. सारा सिंह भी फेसबुक पर दोस्तों से बातें करती रहती थी. अमनमणि त्रिपाठी ने फेसबुक पर सारा सिंह का फोटो देखा तो उस की खूबसूरती पर वह ऐसा लट्टू हुआ कि उस ने उसी समय उसे अपने दिल में बसा लिया. अमनमणि त्रिपाठी के सब से करीबी कहे जाने वाले व्यवसाई मित्र दयालमुनि पांडेय थे. उस ने दयालमुनि पांडेय को सारा सिंह का फोटो दिखाते हुए अपने मन की बात बताई. दयालमुनि पांडेय सारा सिंह को अच्छी तरह से जानते थे. लिहाजा एक दिन उन्होंने सारा सिंह और अमनमणि का आमनेसामने परिचय करा दिया. उस के बाद अमनमणि और सारा सिंह के बीच दोस्ती हो गई.

बताया जाता है कि सारा सिंह की एक व्यवसाई से शादी पक्की हो चुकी थी. उसी बीच अमनमणि और सारा सिंह के बीच दोस्ती की जड़ें गहराई तक पहुंच रही थीं. लखनऊ में अमरमणि त्रिपाठी की लारेंस टैरेस, हजरतगंज में आलीशान कोठी थी.  गोरखपुर छोड़ कर अमनमणि त्रिपाठी लखनऊ रहने लगा. उन दोनों की दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी. अमनमणि सारा को पागलपन की हद तक चाहने लगा था. सारा भी उस पर जान छिड़कती थी. पैसों की उस के पास कोई कमी नहीं थी. वह उस पर दोनों हाथों से पानी की तरह दौलत बहाने लगा था. उस पर इतना पैसा खर्च कर दिया कि उस का हाथ खाली हो गया. वह उसे बहुत ज्यादा चाहता था.

उस से सारा की दूरियां सही नहीं जाती थीं. वह जल्द से जल्द उस से शादी करना चाहता था. सारा का भी हाल कुछ ऐसा ही था. सारा ने अपनी प्रेम कहानी मां से बताई तो सीमा सिंह चौंक गईं. उन्होंने बेटी से कहा, ‘‘क्या तुम अमरमणि त्रिपाठी के बारे में जानती हो? वह मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है. ऐसे आदमी से मैं रिश्ता कतई नहीं जोड़ सकती.’’

मां का टका सा जवाब सुन कर सारा असमंजस में पड़ गई कि वह क्या करे? उस ने यह बात अमनमणि को बताई तो उस ने साफ तौर पर कह दिया कि लोग उस के परिवार के बारे में बिना सिरपैर की बातें करते हैं. उसने सारा से कह दिया कि वह उसे बेपनाह मोहब्बत करता है और शादी उसी से करेगा. उस के बाद वह सारा पर शादी का दबाव बनाने लगा. सारा भी अमनमणि को चाहती थी, लेकिन मां वाली बात से वह फैसला नहीं ले पा रही थी. अंत में उस ने अमनमणि के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर ही लिया. इस के बाद 27 जुलाई, 2013 को अलीगंज के आर्य समाज मंदिर में अमनमणि ने सारा सिंह से विवाह कर लिया. उस विवाह में अमनमणि के गांव के 2 दोस्त गवाह के रूप में मौजूद थे. दोनों ने ही इस शादी की भनक अपने घर वालों तक को नहीं लगने दी.

शादी के 10 दिनों बाद अमनमणि त्रिपाठी सारा से मिलने उस की आलीशान कोठी पर पहुंचा. उस वक्त सीमा सिंह घर पर मौजूद थीं और सारा अपने कमरे में थी. अपने यहां अमनमणि को देख कर सीमा चौंक गईं. वह सीमा सिंह से बोला, ‘‘आंटी सारा कहां है? मैं उसे लेने आया हूं.’’

‘‘लेने.’’ सीमा सिंह चौंकते हुए बोलीं, ‘‘तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे तुम्हारा उस पर कोई अधिकार हो.’’

‘‘हां अधिकार है, तभी तो कह रहा हूं. वह मेरी पत्नी है, यकीन न हो तो यह देख लो.’’ कह कर उस ने अपनी पैंट की जेब से मोबाइल फोन निकाला और उस ने मंदिर में सारा के साथ की गई शादी की फोटो दिखाए, जिस में वह सारा की मांग में सिंदूर भरता हुआ नजर आ रहा था.

फोटो देख कर सीमा सिंह को विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सारा को आवाज दी. मां की आवाज सुन कर सारा आई. उन्होंने अमनमणि द्वारा दिखाए फोटो के बारे में पूछा तो सारा ने सारी बात बता दी. बेटी का जवाब सुन कर उन्होंने अपना माथा पकड़ लिया. बेटी को जो करना था, सो वह कर चुकी थी. बात को तूल देने के बजाय सीमा चुप रहीं और अंत में उन्होंने उस रिश्ते को मजबूरी में स्वीकार कर लिया. लेकिन बेटी के इस फैसले से वह खुश नहीं थीं. समाज में सीमा सिंह की भी अपनी इज्जत थी. इस इज्जत को बनाए रखने के लिए वह सामाजिक रीतिरिवाज से यह शादी करना चाहती थीं.

इस संबंध में बात करने के लिए वह गोरखपुर पहुंच कर मैडिकल कालेज में अमनमणि के मातापिता अमरमणि त्रिपाठी और उन की पत्नी मधुमणि से मिलीं. सीमा सिंह ने उन से अमनमणि और सारा द्वारा कोर्ट में शादी करने की बात बताई तो वे भड़क गए. उन्होंने साफ कह दिया कि यह शादी हरगिज मंजूर नहीं है. सीमा के साथ अमनमणि भी था. बेटे की इस करतूत पर अमरमणि ने वहीं पर बेटे के 2-4 थप्पड़ भी जड़ दिए. बात न बनने पर सीमा सिंह वहां से वापस लखनऊ लौट गईं. अमनमणि भी उन्हीं के साथ लखनऊ आ गया. मांबाप से नाखुश अमनमणि 4 महीने तक गोरखपुर नहीं लौटा.

बेटे के इस कदम को अमरमणि त्रिपाठी अपनी बेइज्जती समझ रहे थे. उन्होंने और उन के रिश्तेदारों ने अमनमणि को समझाते हुए सारा से रिश्ता तोड़ने के लिए दबाव डाला, पर अमनमणि सारा को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ. संकट की इस घड़ी में अमनमणि के नजदीकी दोस्त मानू पांडेय ने उस की सब से ज्यादा मदद की. बाद में अमरमणि त्रिपाठी और मधुमणि को जब पता चला कि मानू ही अमनमणि की आर्थिक मदद कर रहा है तो अमरमणि ने मानू को आगाह करते हुए बेटे से दूर रहने की हिदायत दी. ऐसा न करने पर उसे मधुमिता शुक्ला जैसा हश्र करने की चेतावनी भी दे डाली.

मानू पांडेय अमरमणि त्रिपाठी के रुतबे से अच्छी तरह परिचित था. डर की वजह से उस ने अपने जिगरी दोस्त अमनमणि का साथ छोड़ दिया. वह उस से दूर हो गया. मानू के दूर होते ही अमनमणि की आर्थिक तंगी बढ़ गई. अमनमणि को पता नहीं था कि मानू उस से दूरी क्यों बना रहा है? वह मानू को जब भी बुलाता, वह कोई न कोई काम का बहाना बना देता था. मानू का यह व्यवहार उसे कतई पसंद नहीं था. इसी बात पर अमनमणि मानू से खफा हो गया.

दरअसल मानू पांडेय गोरखपुर जिले के थरुवापार गांव के रहने वाले ऋषि कुमार पांडेय का बेटा था. वैसे उस का नाम अमित कुमार पांडेय था, लेकिन प्यार से सब उसे मानू कहते थे. ऋषिकुमार पांडेय नगर निगम के रजिस्टर्ड ठेकेदार थे. मानू छात्र जीवन से ही नेता था. उसी दौरान वह बसपा के कद्दावर नेता रामभुआल निषाद के संपर्क में आया. इस के बाद उस का अनेक राजनीतिज्ञों के संपर्क होता गया. मानू पांडेय और अमनमणि के बीच दोस्ती होने की भी एक अलग कहानी है. बात 7 मई, 2012 की है. दोपहर के समय बाहुबली पप्पू निषाद नाम का प्रौपर्टी डीलर अपने मुकदमे की तारीख निपटा कर स्कौर्पियो से कचहरी से लौट रहा था. उस की गाड़ी में 5-6 लोग और सवार थे.

वह कचहरी से करीब 500 मीटर पूरब दिशा में पहुंचा था कि तभी 3 मोटरसाइकिलों पर सवार 6 जनों ने उस की कार को चारों तरफ से घेर लिया. उन के हाथों में हथियार थे. इस से पहले कि पप्पू निषाद कुछ समझ पाता, उन लोगों ने उस की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. अपनी जान बचाने के लिए पप्पू निषाद गाड़ी से कूद कर छात्रसंघ चौराहे के पास स्थित मेगामार्ट में फिल्मी स्टाइल में शीशा तोड़ कर घुस गया. तब कहीं जा कर उस की जान बची. पप्पू निषाद ने इस मामले में पूर्व मंत्री रामभुआल निषाद, उस के भाई मनोज निषाद के अलावा सूरज निषाद, मनीष कन्नौजिया, रामजीत यादव, गुड्डू कटाई और दिनेशचंद यादव को नामजद किया था.

लेकिन पुलिस तफ्तीश में अमित कुमार पांडेय उर्फ मानू पांडेय का नाम भी सामने आ रहा था. पुलिस ने नामजद आरोपियों को तो गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था, लेकिन मानू पांडेय का कहीं पता नहीं लग पा रहा था. उस की तलाश में पुलिस जीजान से जुटी थी. पुलिस से बचने के लिए मानू इधरउधर छिप रहा था. उसी दौरान उस के दोस्तों ने सलाह दी कि समाजवादी पार्टी के किसी कद्दावर नेता की मदद ली जाए तो बात बन सकती है. क्योंकि प्रदेश में सपा की सरकार थी. मानू सोचने लगा कि वह किस नेता से संपर्क करे. मानू के नाना हड़बड़ शुक्ला अमरमणि त्रिपाठी का कारोबार पिछले 25 सालों से देख रहे थे. उन दिनों अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी की राजनीति भी चमक रही थी. मानू अमनमणि से परिचित तो था, लेकिन संबंध ज्यादा गहरे नहीं थे.

नाना की मार्फत मानू की जब अमनमणि से मुलाकात हुई तो मानू ने उसे अपनी परेशानी बताते हुए मदद मांगी. बताया जाता है कि अमनमणि के संपर्क में आने के बाद पुलिस मानू को गिरफ्तार नहीं कर पाई. इस के बाद उन दोनों की दोस्ती काफी मजबूत हो गई थी. लेकिन इस गलतफहमी की वजह से उन के बीच दूरियां बढ़ गई थीं. उसी दौरान एक नई घटना घट गईं अमनमणि और सारा की शादी के समय मांग में सिंदूर भरते हुए फोटो फेसबुक पर किसी ने डाल दी. फिर वहीं से वह फोटो स्थानीय अखबार हिंदुस्तान ने अपने सभी संस्करणों में छाप दी. फोटो छपते ही अमनमणि बौखला गया.

उसे पता था कि शादी की यह फोटो मानू के अलावा और कि॒सी के पास नहीं है. इसलिए उसे विश्वास हो गया कि यह सब मानू पांडेय ने ही किया होगा. उस ने तय कर लिया कि वह उसे इस का सबक जरूर सिखाएगा. मानू पांडेय और अमनमणि त्रिपाठी की दोस्ती में दरार पड़ चुकी थी. यह दरार उन्हें दुश्मनी के मुकाम तक ले गई. अमनमणि त्रिपाठी एक रसूखदार बाप की औलाद था. बताया जाता है कि मानू की हत्या के लिए उस ने शूटर लगा दिए. अपनी जान की सलामती के लिए मानू और उस के घर वाले भूमिगत हो गए. उन के इधरउधर रहने के बाद उन का अंधियारीबाग वाला मकान खाली पड़ा था.

मौके का फायदा उठाते हुए अमनमणि ने उस मकान पर कब्जा जमा लिया. मानू को जब पता चला तो वह उस से अपना मकान खाली कराने में लग गया. एक साल की कड़ी मशक्कत के बाद उसे अपना मकान वापस मिला. उसी दौरान मानू की मां शीला पांडेय की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई. उन्हें एक गंभीर बीमारी हुई थी. मानू पांडे और उस का बड़ा भाई अनुराग पांडेय दिल्ली में अपनी बहन के पास थे. दोनों भाइयों ने अपने पिता से कह दिया कि वह मां को दिल्ली ले कर आ जाएं. तब ऋषि पांडेय अपनी स्कौर्पियो से पत्नी को दिल्ली के लिए ले कर चल दिए.

5 अगस्त, 2014 की रात को मानू की मां शीला की तबीयत बेहद नाजुक हो गई. उस समय ऋषि पांडेय और उन की बड़ी बहू प्रियंका ही घर पर थे, वे उन्हें ले कर दिल्ली के लिए निकल गए. उन्होंने आक्सीजन मास्क लगवा दिया था, ताकि रास्ते में शीला को कोई परेशानी न हो. कहीं से यह सूचना अमनमणि त्रिपाठी को मिल गई तो वह अपने साथियों संदीप त्रिपाठी व रवि शुक्ला के साथ लालबत्ती लगी फौरच्यूनर गाड़ी से निकल गया. रात डेढ़ बजे के करीब लखनऊ के आवास विकास मुख्यालय के सामने उस ने अपनी गाड़ी ऋषि पांडे की गाड़ी के सामने रोक दी और पिस्टल की नोक पर ऋषि पांडेय का अपहरण कर के अपनी गाड़ी में बैठा लिया.

पत्नी की सीरियस हालत का हवाला देते हुए ऋषि पांडेय ने छोड़ने की काफी मनुहार की, लेकिन अमनमणि का दिल नहीं पसीजा. वह उन्हें हजरतगंज में स्थित अपनी कोठी में ले गया. वहां ले जा कर उस ने ऋषि पांडेय को एक कमरे में बंद कर दिया. उन तीनों ने उन की जम कर धुनाई की. फिर अमनमणि ने उन से 1 लाख रुपए की मांग की. वह जानता था कि पत्नी के इलाज के लिए दिल्ली जा रहे हैं तो उन के पास पैसे जरूर होंगे. अमनमणि त्रिपाठी उन पर पैसों के लिए दबाव बना रहा था कि तभी पता नहीं उस के दिमाग में क्या बात आई कि उस ने उन्हें अपने घर में रखना उचित नहीं समझा. उसी वक्त उन्हें गाड़ी में बैठा कर दूसरे ठिकाने पर ले जाने लगा. वह बीच रास्तें में था कि उस के किसी दोस्त का फोन आया.

उस ने बताया कि पुलिस को तुम्हारे बारे में पता चल चुका है. फोन आते ही अमनमणि ने अपनी योजना बदल दी. उस ने अपनी गाड़ी का रुख वीवीआईपी इलाके की तरफ कर दिया और वहीं पर चलती गाड़ी से धक्का मार कर उन्हें गिरा दिया और साथियों सहित फरार हो गया. उधर अनुराग पांडेय की पत्नी प्रियंका ने अपने ससुर के अपहरण की खबर पुलिस के अलावा दिल्ली में मौजूद अपने पति और देवर को दे दी थी. पिता के अपहरण की सूचना मिलते ही अनुराग और मानू रात में ही कार से लखनऊ के लिए रवाना हो गए. पुलिस भी ऋषि पांडेय को खोजने में जुट गई.

आखिर रात 3 बजे के करीब ऋषि पांडेय वीवीआईपी इलाके में सड़क के किनारे पड़े मिल गए. उन्होंने पुलिस को बता दिया कि अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी ने ही अपने साथियों के साथ मिल कर उन का अपहरण किया था. जिस इलाके में ऋषि पांडेय मिले थे, वह इलाका थाना कैंट क्षेत्र में आता था. इसलिए वहीं पर अमनमणि त्रिपाठी, रवि शुक्ला और एक अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 304, 386, 323, 504, 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने थोड़े प्रयास के बाद रवि शुक्ला को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. 30 अगस्त, 2014 को पुलिस ने उस के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया. पुलिस की पकड़ से अमनमणि त्रिपाठी और संदीप त्रिपाठी अभी भी दूर थे. पुलिस संदीप त्रिपाठी के ऊपर 5 हजार रुपए इनाम भी घोषित कर चुकी थी. 20 दिसंबर, 2014 को उत्तर प्रदेश एसटीएफ की गोरखपुर इकाई के प्रभारी सत्यप्रकाश सिंह ने संदीप त्रिपाठी को गोरखपुर के खोराबार इलाके के खिरवनिया गांव के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस के अन्य साथी भागने में सफल रहे.

टीम ने उस के कब्जे से एक पिस्टल, 5 कारतूस, 3 मोबाइल फोन और 6 सिम बरामद किए. 22 दिसंबर, 2014 को पुलिस ने उस के खिलाफ भी न्यायलय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया. तीसरे आरोपी अमनमणि की पुलिस सरगर्मी से तलाश कर रही थी. मार्च, 2015 में विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पांडेय का एक कार्यक्रम सिद्धार्थनगर जिले में आयोजित हुआ. वहां प्रदेश के बड़ेबड़े नेता पहुंचे थे. मंत्री शिवपाल यादव के ठीक बगल वाली सीट पर अमनमणि त्रिपाठी भी नजर आया तो प्रैस फोटोग्राफरों ने उस का फोटो खींच लिया.

दूसरे दिन समाचार पत्रों में इस तसवीर को प्रमुखता से छापा गया. पुलिस फिर उसे गिरफ्तार करने के लिए सक्रिय हुई तो वह फिर से भूमिगत हो गया. अदालत ने अमनमणि त्रिपाठी को भगोड़ा घोषित कर दिया. इस के बाद पुलिस ने अदालत से उस के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 82/83 (कुर्की) आदेश करा कर उस के गोरखपुर के कोतवाली इलाके के दुर्गाबाड़ी रोड आवास पर नोटिस चस्पा कर दिया. इस बीच सारा, पति की हकीकत जान चुकी थी. उसे जब पता चला कि उस का पति आपराधिक छवि का है तो उस के दिल को काफी ठेस पहुंची.

उस ने पति को समझाने की काफी कोशिश की कि वह गुनाह के रास्ते से तौबा कर के अच्छे रास्ते पर चले, पर वह पत्नी की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देता. जब वह यही बात बारबार कहती तो वह उस की पिटाई कर देता. सारा यह सारी बातें मां से कह देती थी, तब सीमा सिंह नाराज होते हुए अमनमणि को फटकार सुनाती थी. ऐसा कई बार हुआ था. जब वह सारा की आए दिन पिटाई करने लगा तो सीमा सिंह ने गोमतीनगर में एक फ्लैट किराए पर दिलवा दिया और कहा कि जब तक तुम्हारे मांबाप इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक तुम सारा को ले कर वहां रह सकते हो. लेकिन अमनमणि ने ऐसा नहीं किया.

वह इधरउधर रह कर सिर छिपाता रहा तो सारा मायके में रही. धीरेधीरे सारा और अमन के बीच दूरियां बढ़ती गईं. दूरियां बढ़ने की एक वजह यह भी थी कि अमन उस पर शक करने लगा था कि उस की पत्नी का झुकाव कहीं उसी व्यवसाई की ओर तो नहीं हो रहा है, जिस से उस की शादी होने वाली थी. शक के दौरान वह मौका मिलने पर पत्नी के दोनों मोबाइल के चारों नंबरों की काल डिटेल्स चेक करता रहता था. कोई भी नंबर उसे अंजान लगता तो वह उसे ले कर सारा के साथ झगड़ा और मारपीट करता. इन सब के पीछे खास वजह यह थी कि वह जान चुका था कि उस की सच्चाई पत्नी के सामने खुल चुकी है. वह उस की आपराधिक छवि को जान चुकी है.

पति से आजिज हो कर सारा मां से कहने लगी कि वह किसी तरह से अमनमणि से तलाक दिला दें. वह उस के साथ जीवन नहीं बिता सकेगी. रातरात भर वह अवारा दोस्तों के साथ घूमता है. बेटी की बात सुन कर सीमा सिंह को काफी आघात पहुंचा था. उन्होंने बेटी को तलाक दिलाने का फैसला ले लिया. बेटी ने जो गलती की थी, उस की सजा उसे मिल चुकी थी. इसलिए एक दिन उन्होंने अमनमणि को समझाते हुए कहा कि वह सारा को तलाक दे दे. अमनमणि ने उस समय तो उन की बात का जवाब नहीं दिया, पर बाद में उस ने सारा से कह दिया कि वह चाहे जो कर ले, पर उसे किसी कीमत पर तलाक नहीं देगा. यह बात जून, 2015 की थी.

उस के बाद पता नहीं क्या हुआ कि अचानक अमनमणि के व्यवहार में परिवर्तन आ गया. उस ने सीमा सिंह से वादा किया कि वह सारा को अब कोई परेशानी नहीं होने देगा, उसे बड़े प्यार से रखेगा. उस पर कभी हाथ भी नहीं छोड़ेगा. यही नहीं, उस ने हमेशाहमेशा के लिए अपने मांबाप का घर छोड़ने का भी वादा कर लिया. पति के अंदर आए इस बदलाव से सारा काफी खुश हुई. कोमल दिल की सारा ने पति को माफ कर दिया और नए तरीके से जिंदगी शुरू करने के ख्वाब देखने लगी.

अमन ने उस से कहा कि वह पिछली सालगिरह पर कोई खुशी नहीं मना पाया. उन की खुशियों में कोई भी शामिल नहीं हुआ. इस बार वह सालगिराह बड़ी धूमधाम से मनाएगा. उस ने इस मौके पर दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला घूमने का प्रस्ताव सारा के सामने रखा तो सारा ने हां कर दी. वह बड़ी खुश थी. लेकिन उसे क्या पता था कि जो खुशी पाने के लिए वह फूली नहीं समा रही, वह खुशी उसे कभी नहीं मिलेगी. पूरी योजना बनाने के बाद 9 जुलाई, 2015 की सुबह सफेद कलर की मारुति स्विफ्ट कार ले कर अमनमणि सारा की कोठी के सामने पहुंच गया. सारा चहकते हुए उस में बैठ गई.

अमनमणि उसे ले कर लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए कह कर निकला. और दिन के एक बजे के करीब फिरोजाबाद के सिरसागंज इलाके में एक लड़की को बचाने के चक्कर में एक्सीडैंट हो गया. सारा की घटनास्थल पर ही मौत हो गई, लेकिन अमन को एक खरोंच तक नहीं आई. बहरहाल, घटना के बाद पुलिस ने अमनमणि त्रिपाठी को ऋषिकुमार पांडेय के अपहरण के केस में गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस को उस की पिछले 11 महीने से तलाश थी. मृतका सारा सिंह की मां सीमा सिंह से टेलीफोन पर बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि सारा की दुर्घटना में हुई मौत एक बड़ा षडयंत्र है.

यह स्वाभाविक मौत नहीं, बल्कि सीधेसीधे हत्या है. यह हत्या पूर्व मंत्री और आपराधिक छवि के सपा नेता अमरमणि त्रिपाठी और उन की पत्नी मधुमणि त्रिपाठी ने मिल कर की है. जिस क्षेत्र में घटना घटी है, उस के आसपास का क्षेत्र अमरमणि के प्रभाव वाला है. उस क्षेत्र में बड़ी संख्या में अमरमणि के रिश्तेदार भी रहते हैं. उन्होंने इस की सीबीआई जांच कराने की मांग की है.

कथा लिखे जाने तक मामले की जांच थाना पुलिस कर रही थी. कथा संकलन तक प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की संस्तुति नहीं की थी. Uttar Pradesh Crime

—कथा में दयालमुनि पांडेय परिवर्तित नाम है, कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Faridabad Crime: नकली नोट बनाने व चलाने में 2 गिरफ्तार

Faridabad Crime: एक ऐसा मामला सामने आया जहां अपराधी नकली नोट बनाकर खुलेआम चला रहे थे. आखिर पुलिस को कैसे पता चला इन शातिरों का और कैसे अपराधी कर रहे थे इन नोटों का इस्तेमाल. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी जो खोलेगी अनेक राज.

यह मामला हरियाणा के फरीदाबाद से सामने आया है, जहां पुलिस ने कम समय में अमीर बनने के लालच में नकली नोट छापने वाले 2 युवकों को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने उन के कब्जे से अलगअलग कीमत के नकली नोट और एक आधुनिक प्रिंटर बरामद किया है, जिस का इस्तेमाल नकली नोट छापने में किया जा रहा था. यह काररवाई शहर में चल रही सतर्कता के दौरान की गई.

पुलिस के मुताबिक, बरामद नकली नोटों में 500 रुपए का एक, 200 रुपए के 5 नोट और 100 रुपए के 10 नोट शामिल हैं. पुलिस ने जब आरोपियों से पूछताछ की तो नकली नोटों के पूरे गिरोह का खुलासा हुआ. एक आरोपी नकली नोट छापता था, जबकि दूसरा उन्हें बाजार में चलाता था. दोनों को अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. Faridabad Crime

Gurugram Crime: प्रेमी संग पति पर किया जानलेवा हमला

Gurugram Crime: कब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे, जहां महिलाएं अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की जान लेने पर उतारू हो जाती हैं. ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां बौयफ्रेंड के प्यार में पत्नी ने अपने ही पति पर जानलेवा हमला कर दिया. आखिर क्यों? क्या प्रेम में जान लेना ही आखिरी रास्ता था? पत्नी का यह कदम कई सवाल खड़े करता है. चलिए जानते हैं इस पूरी घटना की विस्तार से कहानी, जो आप को सोच ने पर मजबूर कर देगी.

यह हैरान कर देने वाली घटना दिल्ली से सटे गुरुग्राम से सामने आई है, जहां अवैध संबंधों के चलते पत्नी पूनम ने अपने प्रेमी मनखुश के साथ मिलकर अपने ही पति शिव शंकर पर कुल्हाड़ी से जानलेवा हमला कर दिया. पुलिस के अनुसार, पूनम ने अपने पति शिव शंकर को मंदिर दर्शन के बहाने घर से बुलाया था. फिर रास्ते में वीपीएस स्कूल के पास पति को स्कूटी से गिराकर उस पर हमला किया गया.
वहां पर मौजूद पूनम का प्रेमी मनखुश उर्फ मिंटू भी मौजूद था. दोनों वारदात को अंजाम दे कर मौके से फरार हो गए.

यह मामला तब सामने आया जब पुलिस को खोह गांव में एक स्कूल के पास एक व्यक्ति के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना मिली. मौके पर पहुंची पुलिस टीम को पता चला कि घायल व्यक्ति को इलाज के लिए फरीदाबाद के अस्पताल में भरती कराया गया है. पुलिस ने दोनों आरोपियों को अरेस्ट कर लिया है. दोनों बिहार के रहने वाले हैं और उन के बीच पिछले 6 महीनों से अवैध संबंध थे.