Love Story: अधूरी मोहब्बत

Love Story: कामरान की शादी उस की चचेरी बहन सदफ से बचपन में ही तय हो गई थी, चाचाचाची भी तैयार थे, अंत में ऐसा क्या हुआ कि उस की शादी सदफ से होने के बजाए किसी और से हो गई, जो उसे जरा भी पसंद नहीं करती थी…

चाय का पहला घूंट लेते हुए मैं ने सदफ से फरमाइश की, ‘‘दुआ करो कि मैं कामयाब हो जाऊं.’’ उस ने गुलाबी होंठों पर शरमीली मुसकराहट लाते हुए कहा, ‘‘आप को यह कहने की जरूरत नहीं है. मैं रातदिन आप के लिए, आप की कामयाबी के लिए दुआ करती रहती हूं.’’

यह सच भी था. मुझे उस से कहने की जरूरत नहीं थी. वह मेरी मंगेतर थी. मेरी दादी ने सदफ के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही ऐलान कर दिया था, ‘‘यह मेरे कामरान की दुलहन बनेगी.’’

दादी की इस बात को भले किसी बंधन में नहीं बांधा गया था, पर सब के दिलों में यह बात बैठ गई थी कि कामरान की शादी सदफ से होगी. मंगनी वगैरह इसलिए नहीं की गई थी, क्योंकि चाचा और हमारा परिवार एक ही मकान में रहता था. हमारे उस पुश्तैनी मकान में ऊपर वाले हिस्से में चाचा रहते थे और नीचे वाले हिस्से में हम लोग. दोनों घरों में बच्चे बराबर थे. हम दो 2 भाई और एक बहन थी. जबकि चाचा की सिर्फ 3 बेटियां थीं. सदफ चाचा की बड़ी बेटी थी. हमारा गुजरबसर आराम से हो रहा था. लेकिन इधर साल भर से हमारे घर के हालात बिगड़ रहे थे. अचानक हार्टअटैक से अब्बा की मौत हो गई थी. वह सरकारी हाईस्कूल में टीचर थे. फंड की रकम और पेंशन मिलने में समय लग रहा था.

घर के हालात रोजबरोज बिगड़ते जा रहे थे. नौकरी की दौड़धूप करने के साथसाथ मैं एक कोचिंग सेंटर में अंग्रेजी और अर्थशास्त्र पढ़ा रहा था, जिस से थोड़ी मदद मिल जाती थी, थोड़ीबहुत मदद चाचा कर देते थे. 8-9 महीने की दौड़भाग के बाद पेंशन मिलने लगी. फंड भी मिल गया था. पर ढेरों खर्च मुंह बाए खड़े थे. छोटा भाई मैट्रिक में था और बहन मिडिल क्लास में थी. किसी तरह काम चल रहा था कि अम्मी बीमार हो गईं. उन्हें बे्रस्ट कैंसर हुआ था. फंड से मिलने वाली रकम उन के इलाज में खर्च हो गई. औपरेशन होने के बाद भी सेहत में कोई खास फर्क नहीं पड़ा. हालात बद से बदतर होते जा रहे थे. चाचा भी परेशान रहते थे. आखिर वह कितनी मदद करते. उन पर भी 3 बेटियों की जिम्मेदारी थी. इस के बावजूद इस मुसीबत में वह पूरा साथ दे रहे थे. चाची ज्यादा वक्त अम्मी के पास ही बिताती थीं. खाना पकाने का काम सदफ संभाल रही थी.

उस रोज नौकरी का इंटरव्यू देने जाना था. सदफ की दुआओं के साथ मैं घर से निकल रहा था तो उस की नजर मेरे जूतों पर पड़ी. उस ने कहा, ‘‘शूज तो बड़े शानदार हैं, ब्रांडेड लगते हैं?’’

मैं बौखला सा उठा. सच था, इतने कीमती ब्रांडेड शूज मेरे पास कहां से आ सकते थे? मैं ने कहा, ‘‘इंटरव्यू के लिए एक दोस्त से मांग कर लाया हूं.’’

यह कहते हुए मेरी नजरें झुक गई थीं. आंख मिला कर झूठ बोलना मेरे बस की बात नहीं थी. एच.एच. बिल्डर्स के औफिस में दाखिल होते हुए मैं उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच झूल रहा था. मैं ने एकाउंट विभाग के लिए आवेदन किया था. 4-5 लोग वहां पहले से बैठे थे. मेरा नाम पुकारा गया. केबिन में पहुंचने पर थ्रीपीस सूट पहने एक व्यक्ति ने कहा, ‘‘प्लीज सिट डाउन.’’

उस की पर्सनालिटी कुछ खास नहीं थी, पर कपड़े व स्टाइल शानदार थी. कुरसी पर बैठ कर मैं ने फाइल उस की ओर बढ़ा दी. उस की नजरें मेरे ऊपर ही टिकी थीं. उस की तेज निगाहों से मुझे घबराहट सी हो रही थी. उस ने ठहरी हुई आवाज में कहा, ‘‘मि. कामरान अहमद, आप ने जो शूज पहने हैं, इन्हें कहां से हासिल किए हैं?’’

मुझे लगा, मेरे कानों में किसी ने बम फोड़ दिया है. पहले की ही तरह मैं उस से झूठ नहीं बोल सका. लेकिन सच बोलना भी आसान नहीं था. मैं ने इंटरव्यू की खूब तैयारी कर रखी थी, पर पहले ही सवाल ने मुझे लाजवाब कर दिया था. मेरे दिमाग में धमाका सा हुआ कि यहां सच बोलना ही बेहतर है. मैं ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘सर, आप का यह सवाल हैरान करने वाला है. क्योंकि आप ने मेरी हैसियत और जूतों के फर्क को समझ लिया. इन्हें खरीदना मेरे वश की बात नहीं है. सर, मैं झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं ने दोस्त से मांगे हैं. क्योंकि दोस्त भी हैसियत के मुताबिक ही होते हैं.’’

जूतों की हकीकत बताने से पहले मैं ने अपनी गरीबी, बाप की मौत, मां की बीमारी और भाईबहन की जिम्मेदारी के बारे में सब संक्षेप में बता कर कहा, ‘‘सर, यह नौकरी मेरे लिए बेहद जरूरी है. विज्ञापन के हिसाब से योग्यता भी थी और तैयारी भी अच्छी थी. बस मुझे अपने आप को सलीके से पेश करना था.’’

‘‘जब हालात ठीक थे, तब का यह सूट था, लेकिन जूते फट चुके थे. कल मैं जुम्मे की नमाज पढ़ने मसजिद गया था, वहां मुझे ये जूते नजर आ गए. मेरा मसला हल हो गया. किसी बुरी नीयत से नहीं, सिर्फ इंटरव्यू के लिए मैं ने ये जूते उठाए थे. इरादा यही था कि इंटरव्यू के बाद इन्हें वहीं रख आऊंगा. पता नहीं था कि अल्लाह के घर से की गई पहली चोरी का हिसाब इतनी जल्दी और इस जगह देना होगा.’’

इंटरव्यू लेने वाले ने मेरी पूरी बात ध्यान से सुनी. कुछ देर खामोशी से मुझे परखता रहा. मैं नजरें झुकाए बैठा था. अचानक उस ने कहा, ‘‘तुम्हारे इस सच ने मुझे खुश कर दिया. तुम कितना भी झूठ बोलते, मुझे धोखा नहीं दे सकते थे. मैं कोई नमाजी आदमी नहीं हूं. लेकिन कल मैं एक पार्टी को प्रोजेक्ट दिखाने गया था, रास्ते में नमाज का समय हो गया. वह नमाज के पाबंद थे, उन के साथ मुझे भी नमाज पढ़ने मसजिद जाना पड़ा. वापस आया तो मेरे जूते गायब थे.’’

वह दोस्तों की तरह अपनी परेशानी बता रहे थे. मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘सौरी सर, मैं ने बड़ी मजबूरी में आप के जूते चुराए थे.’’

‘‘इट्स ओके, जो हुआ सो हुआ. शायद इसी तरह हमारी मुलाकात होनी थी. इस में तुम्हें समझने का मौका तो मिल गया. तुम्हारे सच से मैं प्रभावित हूं. क्या तुम पाबंदी से नमाज पढ़ते हो?’’

‘‘नहीं सर, जुम्मेजुम्मे हाजिरी लगा देता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘मि. कामरान अहमद, तुम से बात कर के मुझे लग रहा है कि तुम ही वह व्यक्ति हो, जिस की मुझे जरूरत है. मैं ने नौकरी के लिए तुम्हें सिलेक्ट कर लिया है. 3 महीने तुम टे्रनिंग पर रहोगे. तुम्हारा काम अच्छा हुआ तो तुम परमानेंट कर दिए जाओगे. तब तुम्हारी तनख्वाह बढ़ने के साथ अन्य सुविधाएं भी मिलने लगेंगी.

मुझे लगा, खुशी से कहीं मेरी धड़कनें न रुक जाएं. जिन जूतों की वजह से मुझे यह नौकरी मिली थी, मेरी नजर उन जूतों पर पड़ी तो मैं ने कहा, ‘‘सर, ये शूज…’’

‘‘अब इन्हें तुम रख लो, तुम्हारे पैरों में ये बहुत जंच रहे हैं.’’ उस ने लापरवाही से कहा.

‘‘तुम थोड़ी देर बाहर बैठो, मैं तुम्हारा अपाइंटमेंट लेटर तैयार कराए देता हूं. लेटर ले कर ही घर जाना.’’

उस दिन एच.एच. बिल्डर्स के औफिस से अपाइंटमेंट लेटर ले कर निकला तो मैं हवा में उड़ रहा था. घर में इस खुशखबरी ने मुसकानें बिखेर दीं. चाचा ने उसी समय मिठाई मंगाई. सदफ का चेहरा खुशी से खिला हुआ था. अम्मी भी खुदा का शुक्र अदा कर रही थीं. रात को हम सभी की चाचा के यहां दावत थी, क्योंकि शाम को चाचा की दूसरे नंबर की बेटी सफिया को देखने कुछ लोग आ रहे थे. वह पूरा दिन बड़े हंगामे और खुशी में गुजरा. अब्बा के मरने के बाद पहली बार हम सभी ने इस तरह खुशी मनाई थी. एच.एच. बिल्डर्स के औफिस में पहला दिन बहुत अच्छा गुजरा. चीक एकाउंटैंट सुहैल साहब बड़े दोस्ताना अंदाज में काम समझाते रहे. तसल्ली भी देते रहे कि आगे भी उन का सहयोग मिलता रहेगा. मैं उन फाइलों को देखनेसमझने में लगा रहा, जो मुझे दी गई थीं. 12 बजे के करीब इंटरकौम बजा. बौस मुझे याद कर रहे थे. मेरे बौस वही थे, जिन के जूते चुरा कर मैं पहने बैठा था.

मैं केबिन में पहुंचा तो उन के बगल में एक 20-21 साल की लड़की बैठी थी. बौस ने हमारा परिचय कराया, ‘‘यह एच.एच. बिल्डर्स की औनर और मेरी भतीजी हानिया हसन हैं.’’

मैं ने जल्दी से सलाम किया. वह लापरवाही से सिर हिला कर खिड़की से बाहर देखने लगी. बौस फसील साहब ने आगे कहा, ‘‘हानिया बीकौम कर रही है. आगे एमबीए करने का इरादा है. अपनी पढ़ाई की वजह से औफिस को ज्यादा समय नहीं दे पाती, इसलिए फिलहाल यहां की सारी जिम्मेदारी मुझे ही संभालनी पड़ती है.’’

मैं मुलाजिम था, मुझे औपचारिकता तो निभानी ही थी. मैं ने कहा, ‘‘आप से मिल कर बड़ी खुशी हुई.’’

उस ने मेरी बात का जवाब देने की कौन कहे, मेरी ओर देखा तक नहीं. बौस ने कहा, ‘‘हानिया, यह कामरान अहमद हैं. इन्हें मैं ने एकाउंट डिपार्टमेंट में रखा है. इन्होंने आज ही ज्वाइन किया है.’’

उस ने बेमन से कहा, ‘‘गुड, अच्छा अंकल अब मैं चलूंगी. मुझे काम से कहीं जाना है.’’

‘‘ठीक है बेटा, जाओ.’’ फसील साहब ने कहा. हानिया चली गई.

उस के जाने के बाद फसील साहब ने कहा, ‘‘मेरे बड़े भाई इनायत हसन की 2 साल पहले एक रोड एक्सीडैंट में मौत हो गई थी. उन की पत्नी हानिया के पैदा होते ही गुजर गई थी. भाई साहब ने दूसरी शादी नहीं की थी. बड़े लाडप्यार से हानिया की परवरिश की. यही वजह है कि उन की मौत के 2 साल के बाद भी हानिया अभी तक संभल नहीं पाई है. उन्हीं की याद में डूबी रहती है. इसलिए हमेशा उखड़ीउखड़ी रहती है. इसे ले कर मैं बहुत परेशान रहता हूं.’’

हानिया ने मेरे साथ जो रूखा व्यवहार किया था, उसी की वजह से वह यह सब बता रहे थे. मैं ने कहा, ‘‘सौरी सर, यह सुन कर बड़ा अफसोस हुआ. हानिया मैडम के लिए मांबाप दोनों को खो देने का बहुत बड़ा सदमा है. लेकिन समय बड़ा मरहम होता है, धीरेधीरे सारे जख्म भर देगा. आप परेशान न हों.’’

‘‘तुम ठीक ही कह रहे हो. मैं सोचता हूं कि कोई अच्छा सा लड़का देख कर इस की शादी कर दूं, ताकि शौहरबच्चों में अपना दुख भूल जाए.’’ फसील साहब ने कहा. इस के बाद हम कामकाज और एकाउंट की बातें करने लगे.

शाम को घर पहुंचा तो सभी ने मुझे अच्छी नौकरी की मुबारकबाद दी. अम्मी बहुत खुश थीं. मैं ने कहा, ‘‘आप सभी दुआएं करें कि मैं खूब तरक्की करूं.’’

रात के खाने के बाद मैं ने चाची से पूछा, ‘‘जो लोग सफिया को देखने आए थे, उन का क्या जवाब आया?’’

कुछ देर चुप रहने के बाद चाची बोलीं, ‘‘बेटा उस में एक पेच फंस गया है.’’

मैं ने कहा, ‘‘चाची, अगर लंबेचौड़े दहेज की डिमांड हो तो आप साफ मना कर दें.’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है. खातेपीते खानदानी लोग हैं. दरअसल बात कुछ और है. वे हमारे घर रिश्ता करने को तैयार तो हैं, लेकिन उन्हें सफिया के बजाय सदफ ज्यादा पसंद है.’’

चाची की बात सुन कर मैं सन्न रह गया. अम्मी के चेहरे पर भी परेशानी झलकने लगी. चाची ने कहा, ‘‘बड़ी होने की वजह से पहला हक सदफ का ही है, पर हम लोग इसलिए सोच में पड़ गए, क्योंकि बड़ी अम्मा ने सदफ का रिश्ता बचपन में तुम्हारे साथ जोड़ दिया था. लेकिन उस के बाद इस बात पर कोई चर्चा ही नहीं हुई. बच्चों के बड़े होने पर उन के खयाल भी बदल जाते हैं, इसलिए हम उलझन में है कि क्या जवाब दें?’’

मेरी अम्मी तड़प उठीं. उन्होंने जल्दी से कहा, ‘‘बच्चों के बड़े होने पर भले रुझान बदल जाते हैं, पर मुझे तो सदफ बहू के रूप में कल भी पसंद थी, आज भी पसंद है. रही बात कामरान की तो सामने बैठा है, अभी पूछ लेते हैं. क्यों कामरान तुम्हारा इस बारे में क्या खयाल है?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं आप बड़ेबुजुर्गों की रजा में राजी हूं. सदफ आप को पसंद है तो वह मेरी भी खुशी है.’’

‘‘जीते रहो बेटा, तुम ने मेरा मान रख लिया. तुम मेरे मरहूम भाई की निशानी हो, किसी और के मुकाबले तुम्हें दामाद बना कर मुझे ज्यादा खुशी होगी.’’ इतना कहते हुए चाचा ने भावुक हो कर मुझे गले लगा लिया.

चाची ने कहा, ‘‘अब साफ हो गया कि सदफ की शादी कामरान से ही होगी. हम उन्हें मना कर देते हैं. कामरान सैटल हो जाए तो मंगनी भी कर देते हैं ताकि सब को इस बात का पता चल जाए.’’

दरवाजे के पीछे सदफ के गुलाबी हुए चेहरे को देख कर मैं निहाल हो गया. एच.एच. बिल्डर्स में मेरी नौकरी बढि़या चल रही थी. मैं अच्छी तरह से ऐडजस्ट हो गया था. काम भी मेहनत और लगन से कर रहा था. मेरे प्रति फसील साहब का व्यवहार अच्छा और नरम था. दिन में एक बार उन से मुलाकात जरूर हो जाती थी. हम दोनों एकदूसरे के हालात से अच्छी तरह वाकिफ थे. मुझे पता चल गया था कि कंपनी में फसील साहब के 10 प्रतिशत शेयर थे. 90 प्रतिशत शेयर के मालिक उन के भाई इनायत हसन थे. दरअसल इनायत हसन को हानिया की मां की ओर से काफी दौलत मिली थी. वह चाहते तो करोबार अलग कर लेते, लेकिन उन्होंने इसी कारोबार में पैसा लगाया, जिस से उन के शेयर बढ़ गए थे. भाई के मरने के बाद वही उन की कंपनी संभाल रहे थे.

उन्हें अपनी भतीजी हानिया से बेहद प्यार था. जल्द ही अच्छा लड़का देख कर वह उस की शादी करना चाहते थे. हानिया जैसी दौलतमंद लड़की से शादी के लिए कोई भी तैयार हो सकता था. खैर, मुझे इन बातों से क्या मतलब था? मेरी अच्छीभली नौकरी चल रही थी, जिस से मेरी जिंदगी खुशी से गुजर रही थी. उस दिन मैं अपनी केबिन में बैठा रोज के काम निपटा रहा था. छुट्टी होने में कुछ ही पल बाकी थे कि फसील साहब ने मुझे अपनी केबिन में बुला कर कहा, ‘‘आओ कामरान, इस वक्त मैं ने तुम्हें एक जरूरी काम से बुलाया है. तुम्हें जरा हानिया के साथ इस के घर तक जाना होगा. दरअसल इस का ड्राइवर आज छुट्टी पर है. वह गाड़ी ड्राइव कर के यहां तक तो आ गई, पर अचानक उस की तबीयत खराब हो गई है, इसलिए मैं नहीं चाहता कि यह अकेली घर जाए. तुम्हें तकलीफ तो होगी, लेकिन…’’

‘‘नो सर, इस में तकलीफ कैसी. मैं इन के साथ चला जाता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘जाओ बेटा हानिया, कामरान के साथ चली जाओ. अब मुझे चिंता नहीं होगी.’’

बिना कुछ कहे हानिया उठी और दरवाजे की तरफ बढ़ गई. मैं उस के पीछेपीछे चल रहा था. ड्राइविंग मुझे आती थी, मगर उस ने मुझे मौका नहीं दिया. खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गईं और सपाट चेहरे से मुझे पीछे बैठने का हुक्म दिया. मुझे गुस्सा तो बहुत आया, पर क्या करता. हानिया ने झटके से गाड़ी आगे बढ़ा दी. साफ लग रहा था कि चाचा के कहने पर मजबूरी में वह मुझे अपने साथ ले जा रही थी. 7-8 मिनट के बाद उस ने गाड़ी रोक दी और दोनों हाथों से सिर थाम कर इस तरह बैठ गई, जैसे उसे चक्कर आ रहे हों. मैं ने कहा, ‘‘आर यू ओके मैम?’’

उस की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. मैं जल्दी से नीचे उतरा और खिड़की से उसे देखा. उस के चेहरे पर पसीना और तकलीफ साफ झलक रही थी. मैं ने कहा, ‘‘मैम, आप को क्या हो रहा है?’’

उस ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘मैं ड्राइव नहीं कर सकूंगी. तुम कार चलाओ.’’

वह पिछली सीट पर चली गई. मैं ने ड्राइविंग सीट संभाल ली. मैं ने हमदर्दी से पूछा, ‘‘आप को किसी डाक्टर के पास ले चलूं?’’

उस ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘नहीं, मैं सीधे घर जाना चाहती हूं.’’

कोठी का रास्ता उस ने गाइड कर दिया. घर पहुंच कर उस ने मुझे जाने की इजाजत दे दी. बाहर निकल कर मैं ने फसील साहब को फोन कर के हालात बता दिए. उन्होंने कहा, ‘‘हानिया का बीपी अकसर लो हो जाता है, इसलिए मैं उसे गाड़ी चलाने की इजाजत नहीं देता. कामरान तुम्हारा बहुतबहुत शुक्रिया. तुम ने उसे खैरियत से घर पहुंचा दिया. अब तुम अपने घर चले जाओ.’’

मुझे कोई आटो वगैरह नहीं मिला तो मैं पैदल चल कर बसस्टाप पर पहुंचा ही था कि मेरे छोटे भाई जिबरान का फोन आ गया, ‘‘भाई, अम्मी की तबीयत खराब हो गई है. हम उन्हें अस्पताल ले आए हैं. आप सीधे यहीं आ जाइए.’’

भाई की आवाज में घबराहट थी. उस ने अस्पताल का नाम बता दिया था. अम्मी की बीमारी का सुन कर मैं परेशान हो गया. आटो पकड़ा और सीधे अस्पताल जा पहुंचा. मेरी छुट्टी के 2 दिन बड़ी मुश्किल में गुजरे, अम्मी की हालत काफी खराब थी. डाक्टर के मुताबिक उन का मर्ज एक बार फिर फैलने लगा था. उन्हें तकलीफ काफी दिनों से थी, पर उन्हें पता था कि फंड का पैसा पहले ही खत्म हो चुका है, इसलिए वह अपना दर्द हम सभी से छिपाती रहीं. जब वह बेसुध हो गईं तो उन्हें अस्पताल लाना पड़ा. उन के इलाज के लिए काफी ज्यादा पैसों की जरूरत थी, जबकि हमारे पास मुश्किल से 4-5 हजार रुपए थे. किसी से कर्ज भी नहीं मिल सकता था. चाचा भी हम जैसे ही थे. नौकरी नई थी. लाखों रुपए एडवांस में कौन देता? जायदाद कुछ नहीं थी, गहने भी ज्यादा नहीं थे. एक यही घर था, जिस में हम रहते थे और उस का ऊपर का हिस्सा चाचा का था.

अगर मैं घर बेचने की सोचता तो चाचा के भी सिर से छत छिन जाती. जवान बेटियों को ले कर वह कहां जाते? इस परेशानी में कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. चाचा ने अस्पताल पहुंच कर मुझे जबरदस्ती घर भेज दिया. मैं चुपचाप जा कर लेट गया. सदफ दूध और खाना ले कर आई, पर मेरी तो भूखप्यास जैसे मर चुकी थी. उस के बहुत आग्रह पर 2-4 निवाले खा सका. सदफ ने कहा, ‘‘मैं आप से कुछ कहना चाहती हूं, पर आप वादा करें कि मेरी बात मान लेंगे. मैं ताई अम्मा के इलाज के लिए कुछ देना चाहती हूं.’’

यह कहते हुए उस ने एक पोटली मेरे सामने रख दी. मैं ने पोटली खोली तो उस में कुछ हजार रुपए, सोने की 4 चूडि़यां और एक सेट था. उस ने ट्यूशन की कमाई से यह सब जमा किया था. उस ने कहा, ‘‘यह सब बेच कर आप ताई अम्मा का औपरेशन करा दीजिए.’’

‘‘सदफ, तुम पागल हो गई हो क्या? मैं तुम्हारी इतनी मेहनत से जोड़ी गई ये चीजें कैसे ले सकता हूं? ट्यूशन के अलावा सिलाईकढ़ाई कर के तुम ने एकएक पाई जोड़ कर यह सब बनवाया है. तुम इसे संभाल कर रखो, चाची ने यह तुम्हारे दहेज के लिए रखा है.’’

‘‘मुझे दहेज का क्या करना है? मुझे कौन सा ब्याह कर के बाहर जाना है? भले रकम कम है, पर कुछ तो मदद मिल ही जाएगी.’’

मुझे उस की मासूमियत पर बड़ा प्यार आया. कितनी ईमानदारी से अपनी सारी पूंजी मेरे हवाले कर रही थी. मैं ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘सदफ, मैं तुम्हारे जज्बों और ईमानदारी की कद्र करता हूं. पर मेरी मोहब्बत में इस हद तक मत जाओ कि रुसवा हो जाओ. मैं तुम्हारे ये गहने नहीं ले सकता.’’

‘‘तो क्या ताई अम्मा का औपरेशन नहीं कराओगे. मुझ से उन की तकलीफ देखी नहीं जाती.’’ सदफ रोते हुए बोली.

अगले दिन औफिस पहुंचा तो मैं काफी परेशान था. फसील साहब ने मुझे देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है कामरान, आज तुम काफी परेशान लग रहे हो? कोई परेशानी है तो मुझे बताओ.’’

किसी हमदर्द को पा कर मेरी बरदाश्त की हद जवाब दे गई. मैं ने उन से अम्मी की हालत और इलाज की समस्या के बारे में बताया तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामरान, तुम्हें मुझ से पहले ही बात करनी चाहिए थी. बेकार ही 2 दिन परेशानी उठाते रहे.’’

मैं उन की इस बात पर हैरान रह गया. उन्होंने मुझे हैरान देख कर कहा, ‘‘हैरान क्यों हो रहे हो? तुम्हारी समस्या हमारी समस्या है. तुम परेशान रहो, यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया सर, 20-25 दिनों की नौकरी में मैं एडवांस मांगने की हिम्मत कैसे कर सकता था? आप ने मेरे दुख को समझ कर मदद के लायक समझा, आप बहुत महान हैं सर.’’

‘‘तुम्हें इतने दिनों में अंदाजा हो जाना चाहिए था कि हमारी नजरों में तुम्हारा एक खास महत्त्व है. दूसरे लोगों के मुकाबले मेरे दिल में तुम्हारी जगह खास है.’’ फसील साहब ने प्यार से कहा.

‘‘यह तो आप की मेहरबानी है सर, वरना मैं किस काबिल हूं?’’ मैं ने बड़ी नम्रता से कहा.

‘‘कामरान, इंटरव्यू में तुम से ज्यादा काबिल लोग थे, पर मैं ने तुम्हें तुम्हारी सच्चाई, ईमानदारी और शराफत की वजह से चुना था. तुम ने सच बोला था, जो मुझे बहुत अच्छा लगा था. मुझे लगा कि तुम वही इंसान हो, जिस की मुझे तलाश है. नौकरी देने का मकसद यह था कि मैं तुम्हें अच्छी तरह से परख सकूं, वरना पहली मुलाकात में ही मैं ने तुम्हें अपनी भतीजी हानिया के लिए पसंद कर लिया था.’’

उन्होंने जैसे मेरे सिर पर बम फोड़ दिया था. मैं बौखला गया, ‘‘सर… सर, आप यह क्या कह रहे हैं?’’

‘‘गलत नहीं कह रहा हूं,’’ हानिया मुझे बहुत प्यारी है. मैं उस का जीवनसाथी एक ऐसे आदमी को बनाना चाहता हूं, जो उस का खूब खयाल रखे और उस की कद्र करे, प्यार करे. ये सारे गुण मुझे तुम्हारे अंदर नजर आए. मुझे यकीन है कि हानिया तुम्हारे साथ बहुत खुश रहेगी.’’

‘‘सर, मैं किसी तरह भी मिस हानिया के काबिल नहीं हूं. मुझ से कहीं ज्यादा अच्छे लोग उन से शादी करने को तैयार हो जाएंगे. उन के आगे मेरी क्या हैसियत है?’’

‘‘मैं जानता हूं, पर उन सब की नजर हानिया से ज्यादा उस की दौलत पर रहेगी. भाई साहब की मौत के बाद वह मानसिक रूप से काफी परेशान रहती है. उसे मैं ने बड़े प्यार से पाला है. बड़ा खयाल रखा है उस का. मुझे तुम्हारे जैसा लड़का चाहिए, जो उस के नाजनखरे उठा सके. इस सब के बदले उस का सब कुछ तुम्हारा है.’’

मैं समझ गया कि उन्हें ऐसा दामाद चाहिए, जो उन की भतीजी के पीछे हाथ बांधे गुलामों की तरह उस का हुक्म बजाता रहे. मेरी स्थिति उन के सामने थी. अम्मी के इलाज के लिए मुझे एक बड़ी रकम की जरूरत थी. मेरी मजबूरी वह जान गए थे. मैं पढ़ालिखा, स्मार्ट, शरीफ और खानदानी था. आसानी से वह मुझे अपने सोशल सर्किल में शामिल कर सकते थे.

‘‘किस सोच में डूब गए कामरान. यह एक बहुत अच्छी औफर है. तुम्हारी सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी. हानिया दौलतमंद और खूबसूरत लड़की है. उस की जिंदगी में आते ही तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी. मां का इलाज, भाई की पढ़ाई और बहन की शादी शानदार तरीके से हो जाएगी. तुम खुद ऐश की जिंदगी जियोगे.’’

‘‘सर, मुझे सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए.’’ आखिर मैं ने हिम्मत कर के कह दिया.

‘‘जितनी मोहलत चाहो, ले सकते हो. लेकिन जितनी देर करोगे, तुम्हारी मां की तकलीफ उतनी ही बढ़ेगी.’’

मैं अपनी केबिन में आ कर बैठ गया. अजीब उलझन थी, कुछ समझ में नहीं आ रहा था. एक ओर मां का इलाज था, दूसरी ओर मेरी मोहब्बत. एक ओर मेरी गरीबी थी, दूसरी ओर दौलत और ऐशभरी जिंदगी. मैं क्या फैसला करूं? औफिस से सीधे अस्पताल पहुंचा. अम्मी की तकलीफ उसी तरह थी. डाक्टरों का कहना था कि ट्रीटमेंट जल्द से जल्द शुरू होना चाहिए. जिस में लाखों रुपए लगने थे. अम्मी की हालत देख कर दिमाग कह रहा था कि फसील साहब का औफर मान लेना चाहिए. पर दिल सदफ के प्यार में रो रहा था. अगर मैं ने राह बदल ली तो उस पर कयामत टूट पड़ेगी. उस की मोहब्बत अनमोल थी.

अस्पताल से घर आ कर मैं सारी रात जागता रहा. दिमागी उलझनों से तंग आ कर मैं ने सुबह चाचा के सामने बैठ कर उन्हें शुरू से अंत तक की सारी बात यानी फसील साहब का औफर, दौलत की रेलमपेल, अम्मी का इलाज, ऐश भरी जिंदगी सब कुछ बता दिया. पूरी बात सुन कर चाचा गंभीर हो गए. काफी देर बाद उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारा क्या फैसला है?’’

मैं ने आंसू भरी आंखों से कहा, ‘‘चाचा, मैं कोई फैसला नहीं कर पा रहा हूं, इसलिए सब कुछ आप से बता दिया है. सदफ से मैं ने जो वादा किया है, उसे तोड़ना बड़ा मुश्किल है. मेरे इस फैसले से वह टूट जाएगी.’’

‘‘कामरान बेटे, सदफ की चिंता तुम बिलकुल मत करो. वह बहादुर लड़की है, सब बरदाश्त कर लेगी. भाभी के इलाज के लिए वह घर बेचने की बात कर रही थी, वह यह सदमा आसानी से सह लेगी. भाभी की जान बचाने के लिए वह कोई भी कुरबानी दे सकती है. भाभी के भले के लिए तुम निश्चिंत हो कर हानिया के हक में फैसला कर दो.’’

‘‘चाचा मैं बहुत मजबूर हूं. अगर मैं ने फसील साहब को मना कर दिया तो मेरी नौकरी भी जाएगी. मैं जानता हूं कि सदफ जान दे देगी, पर उफ न करेगी.’’

‘‘इसीलिए तो मैं कह रहा हूं कि तुम सब भुला कर उन की बात मान लो. हमारी तरफ से बेफिकर हो जाओ. हमें कोई शिकायत नहीं है. वक्त सारे जख्म भर देगा. तुम्हारे और सदफ के रिश्ते की बात अभी घर में ही है, बाहर किसी को मालूम नहीं है, कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

फसील साहब ने ‘हां’ सुनते ही शादी की जल्दी मचा दी. एक हफ्ते के अंदर की तारीख तय कर दी गई. मेरे पास इनकार की गुंजाइश नहीं थी. मेरे हां करते ही अम्मी के इलाज के लिए मनचाहा पैसा फसील साहब ने दे दिया था, जिस से उन का इलाज शुरू हो गया था. इस से इतना फायदा हुआ था कि मेरी शादी में वह घंटे भर के लिए आई थीं. उन की आंखों में खुशी के बजाय उदासी थी, क्योंकि उन्होंने तो सदफ को बहू के रूप में देखा था. सभी दुखी थे, पर मजबूरी ऐसी थी कि कोई भी खुल कर ऐतराज नहीं कर सकता था.

सदफ समेत चाचा के परिवार के सभी लोग शादी में शामिल हुए थे. सभी मेरा हौसला बढ़ाते रहे, सदफ भी आंसू पी कर मुसकराती रही. सचमुच वह बड़ी सब्र और हिम्मत वाली थी. शादी में शहर के तमाम बड़ेबड़े लोग आए थे. मैं ने अपने कुछ ही दोस्तों को भी बुलाया था, क्योंकि हानिया का ताल्लुक जिस क्लास से था, उस में मेरे रिश्तेदार मिसफिट होते. विदाई का वक्त आया तो दुलहन के बजाय दूल्हे की विदाई हुई. विदा हो कर मैं हानिया की शानदार कोठी में आ गया. फसील साहब ने मुझ से कहा था कि मेरी ख्वाहिश पर मेरे परिवार के लिए शानदार मकान का इंतजाम हो जाएगा, क्योंकि मेरे परिवार का उस कोठी में रहना हानिया के नाजुक मिजाज को पसंद नहीं आएगा. इसलिए मुझे अकेले ही उस कोठी में रहना होगा.

कोठी रोशनी से जगमगा रही थी. हानिया की कीमती कार, जिसे शोफर चला रहा था, से उतर कर मैं पोर्च में खड़ा हो गया. दूसरी गाड़ी में फसील साहब, उन की बीवी और खूबसूरत बेटी तूबा थी. तूबा हानिया से एकदम अलग थी. वह हंसमुख और मिलनसार थी. वह मुझ से हंसीमजाक भी कर रही थी. वही हानिया का हाथ पकड़ कर उसे बैडरूम में ले गई. अंदर आ कर फसील साहब ने कहा, ‘‘कामरान, मेरी लाडली भतीजी तुम्हारे हवाले है. तुम इस का खयाल रखना. इस की हर गलती को अनदेखा कर देना. यह घर, कंपनी अब तुम दोनों की है. हम तो मेहमानों की तरह आएंगे और चले जाएंगे. हर काम के लिए नौकर मौजूद हैं. बस तुम्हारी वजह से हानिया को कोई तकलीफ न पहुंचे.’’

‘‘सर, आप तसल्ली रखें. मैं पूरा खयाल रखूंगा.’’

तूबा हंस कर बोली, ‘‘आप अब हमारे रिश्तेदार हैं, सर न कहें. पापा आप के भी अंकल हैं, आप मेरे दूल्हाभाई हैं.’’

उन के जाने के बाद एक नौकरानी मुझे हानिया के बैडरूम में ले गई. कीमती फरनीचर और फूलों से सजा कमरा बेहद रोमांटिक लग रहा था, पर उस खूबसूरत कमरे में दुलहन नहीं थी. 10-12 मिनट बाद वह बाथरूम से बाहर आई. मेरा मुंह खुला का खुला रह गया. उस की सारी सजधज गायब थी. वह नहाईधोई कौटन की नाइटी पहने हुए थी. उस ने मेरी तरफ देखा तक नहीं. डे्रसिंग टेबल के सामने बैठ कर चेहरे व हाथों पर क्रीम लगाने लगी. इस के बाद उठी और बेडरूम से जुड़े दूसरे कमरे में चली गई. उस ने न मुझे देखा, न मुझ से बात की. ऐसा व्यवहार शायद ही किसी दुलहन ने अपने दूल्हे के साथ किया होगा. वह बारबार मेरी तौहीन कर रही थी. अपमान से मैं तिलमिला उठा, पर क्या करता. यह सोच कर दिल को समझाया कि मांबाप के मरने की वजह से ऐसी हो गई है. मुझे ही इसे डिप्रेशन से निकालना है.

मैं ने उठ कर बगल वाला दरवाजा खोला. अंदर हलका उजाला था. वह स्टडीरूम था, जिस में पडे़ सोफे पर हानिया हाथ में एक तसवीर लिए बैठी थी. मैं ने इतने धीरे से दरवाजा खोला था कि उसे पता नहीं चला था. वह तसवीर देखदेख कर रोते हुए उसे प्यार कर रही थी. मुझे लगा कि यह उस के पापा की तसवीर होगी. दिल चाहा कि उसे बांहों में भर कर तसल्ली दूं. मैं आगे बढ़ा तो मेरी आहट पा कर वह ऐसी चौंकी, जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो. हानिया ने मेरा बढ़ा हाथ तेजी से झटकते हुए कहा, ‘‘बिना इजाजत मेरे कमरे में आने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’’

वह गुस्से में बहुत जोर से चिल्लाई थी. तसवीर उस ने सीने से लगा ली थी. मैं ने भी तुनक कर जवाब दिया, ‘‘मैं तुम्हारा शौहर हूं हानिया, जिस से मेरा हक बनता है कि मैं तुम्हारी इजाजत के बिना तुम्हारे कमरे में आ सकता हूं.’’

‘‘किसी गलतफहमी में मत रहिएगा मिस्टर. यह मेरा घर है, जिस पर सिर्फ मेरा हक है. जो यहां रहेगा, मेरी मरजी के मुताबिक रहेगा. जिसे यह न कुबूल हो, वह यहां से जा सकता है.’’ हानिया ने बड़े तैश में बदतमीजी से कहा. अपमान का घूंट पी कर मैं बाहर लौन में चला गया. मेरे वश में होता तो उसी पल मैं हानिया हसन और उस की कोठी को लात मार कर चला आता. पर मेरे पैरों में मजबूरी की जंजीर पड़ी थी. काफी देर तक लौन में टहलता रहा. दिल को समझाया कि अगर अम्मी का इलाज कराना है तो इस बददिमाग, बदमिजाज लड़की को बरदाश्त करना ही पड़ेगा. थोड़ा सह कर कुछ होशियारी से काफी माल समेट कर हानिया को छोड़ दूंगा. उस के बाद अच्छी जिंदगी गुजारूंगा. हो सकता है सदफ भी मुझे मिल जाए.

शाम को फसील साहब परिवार के साथ आए तो उन के सामने हानिया बिलकुल नौर्मल थी, हंसबोल रही थी. फसील साहब ने मुझ से कहा कि मुझे हानिया को अपने घर वालों से मिलाने ले जाना चाहिए. मेरे घर जाते हुए हानिया के चेहरे पर बेजारी थी. रास्ते में ही उस ने कह दिया था, ‘‘मैं वहां ज्यादा देर नहीं ठहरूंगी.’’

जब हम वहां पहुंचे तो कुछ मेहमान आए हुए थे. शीमा, सफिया हमें देख कर बहुत खुश हुईं. आवाज सुन कर चाचा बाहर आए और बड़े मानसम्मान से हमें ड्राइंगरूम में ले गए. वहां 3 औरतें, 2 मर्द बैठे थे, जिन में एक अधेड़ था और एक जवानस्मार्ट युवक. चाचा ने परिचय कराते हुए कहा, ‘‘ये वही लोग हैं, जो सदफ से रिश्ता करने का इसरार कर रहे थे. इन लोगों ने दोबारा फोन कर के आग्रह किया तो मैं ने इन्हें बुला लिया. भाभी की मरजी पूछ ली है, उन का भी कहना है कि आज ही सदफ की मंगनी सादगी से कर दी जाए.’’

मैं सोच रहा था कि हानिया से छुटकारा पा कर सदफ को पा लूंगा, लेकिन मेरा यह ख्वाब टूट कर चकनाचूर हो गया था. अम्मी ने कहा, ‘‘यह सदफ के लिए बहुत अच्छा रिश्ता है. देर करने से क्या फायदा, आज ही मंगनी की रस्म कर लेते हैं.’’

सदफ को ड्राइंगरूम में लाया गया. वह गुलाबी सूट में गजब ढा रही थी. उसे उस खूबसूरत नौजवान, जिस का नाम आतिफ विकास था, के पास बिठा दिया गया. आतिफ की अम्मी ने सदफ को अंगूठी पहना कर मंगनी की रस्म पूरी की. चाचा आतिफ को कैश का लिफाफा देने लगे तो उस ने मना करते हुए कहा, ‘‘मैं मिठाई के सिवा और कुछ नहीं लूंगा.’’

इस के बाद जोरदार खातिर शुरू हुई. मुझे छोड़ कर बाकी सभी खुश थे. मैं वापसी के लिए उठ गया, हानिया तो तैयार ही बैठी थी. एक तसल्ली थी कि सदफ को अच्छा लड़का, तथा शरीफ और बढि़या घरपरिवार मिल गया था. दिन हानिया की बदतमीजी व रुखाई के साथ गुजर रहे थे. मेरे पास 2 ही काम थे, औफिस के काम देखना और अम्मी के इलाज के लिए दौड़धूप करना. मैं ने अम्मी से घर बदलने के बारे में कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया था. वह चाचा के साथ उसी पुराने मकान में रहना चाहती थीं. फसील साहब पहले की ही तरह मेहरबान थे. मैं ने उन्हें हानिया के रूखे और बदतमीजी भरे रवैये के बारे में नहीं बताया था कि अभी हम अजनबी की तरह थे. कभी मुझे लगता कि वह किसी को पसंद करती है. लेकिन वह पूरे दिन अपने कमरे में बंद रहती थी. अचानक एक दिन बिना कुछ बताए वह तूबा के साथ अपनी सहेली की शादी अटैंड करने दुबई चली गई.

सदफ की शादी हो गई थी. आतिफ ने दहेज लेने से साफ मना कर दिया था. हानिया की गैरहाजिरी में मैं ने दुबई में बिजनैस डील का बहाना बनाया. अम्मी का इलाज जारी था. अम्मी के इलाज के अलावा कुछ लाख मैं ने अपने एकाउंट में जमा कर लिए थे. फसील साहब मुझ पर अंधा यकीन करते थे. मैं जी खोल कर पैसे खर्च कर रहा था. अपनी बेइज्जती भुलाने और तनहाई का गम गलत करने के लिए मैं ने शराब पीनी शुरू कर दी थी. आवारागर्दी करते हुए उस रात मैं करीब एक बजे घर पहुंचा तो खास नौकरानी सोनिया जाग रही थी. उस ने खाने के लिए पूछा तो मैं ने कौफी लाने को कहा. जाते हुए सोनिया एक डायरी दे कर बोली, ‘‘यह हानिया बीबी की डायरी है, इसे वह एक सहेली के घर भूल आई थीं. उस ने वापस भेजी है. उन का कमरा बंद है, आप संभाल कर रख दें.’’

पता नहीं मेरे दिल में क्या आया कि मैं डायरी खोल कर पढ़ने लगा. शुरू में हानिया का डैडी से लगाव, उन की मौत के बाद उन के गम में डूबे रहने का विवरण था. सच में वह बाप से बहुत प्यार करती थी. उस के बाद कामरान नाम के किसी लड़के का जिक्र था. वह उस के डैडी के वकील और दोस्त रुस्तम मलिक का बेटा था. कामरान ने उस के दुख में उस का बहुत साथ दिया था. उसे गम से बाहर निकाल कर नई जिंदगी की राह पर लाया था. यही हमदर्दी धीरेधीरे मोहब्बत में बदल गई थी और हानिया कामरान को टूट कर चाहने लगी थी. मोहब्बत इतनी बढ़ी कि जल्दी ही दोनों सारी हदें पार कर गए.

इस का परिणाम यह निकला कि हानिया गर्भवती हो गई. हानिया इस बारे में कामरान से कोई बात कर पाती, कामरान एक रोड एक्सीडेंट में मारा गया. सदमे ने हानिया को दीवाना बना दिया. वह अपने महबूब की जुदाई सह नहीं पा रही थी. उस की कजिन तूबा उस के इस मोहब्बत की राजदार थी. उस के जरिए यह इत्तला चाची को मिली तो उन्होंने अबार्शन की सलाह दी, पर हानिया किसी कीमत पर अपनी मोहब्बत की निशानी मिटाने को तैयार नहीं थी. इस के बाद तय किया गया कि खानदान की इज्जत बचाने के लिए किसी काठ के उल्लू की तलाश की जाए. और उल्लू वही बन सकता था, जो हालात और मजबूरी का मारा हो. चाचा ने लाडली भतीजी का गुनाह छिपाने के लिए बड़ी आसानी से मुझे ढूंढ लिया. इत्तफाक से मेरा नाम भी कामरान था. उस के होने वाले बच्चे को वही नाम मिलता, जो उस के असली बाप का था. इसलिए हानिया मुझ से शादी के लिए राजी हो गई थी.

वह अभी तक अपने महबूब के गम में तड़प रही थी. उस रात तसवीर भी उसी की थी. कितनी आसानी से चाचाभतीजी ने एक ‘गुलाम’ शौहर खरीद लिया था. इस तरह उल्लू बनाए जाने पर मुझे बेहद गुस्सा आया. मैं ने उसी वक्त फसील साहब को फोन किया. फोन उठा कर उन्होंने कहा, ‘‘इतनी रात को फोन, कामरान तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘रात होगी तुम्हारे लिए, मेरी तो अभी आंख खुली है. मैं तुम चाचाभतीजी का दिमाग ठीक करना चाहता हूं. तुम ने मुझे धोखा दिया, बदकिरदार लड़की मुझे पकड़ा दी.’’

गुस्से और नशे से मेरी आवाज फट रही थी. इस के बाद नशे में ही मैं बिस्तर पर ढेर हो गया. सुबह मेरी आंख मुंह पर पानी पड़ने से खुली. कुछ देर तो मामला मेरी समझ में ही नहीं आया. मैं पलकें झपकाझपका कर पुलिस वालों को देख रहा था, जो मुझे घेरे खड़े थे. उन्हीं के साथ गम में डूबे फसील साहब भी थे.

‘‘इसे गिरफ्तार कर लो.’’ मुझे होश में देख कर पुलिस इंसपेक्टर ने कहा.

मैं ने घबरा कर जल्दी से कहा, ‘‘मुझे किस जुर्म में गिरफ्तार किया जा रहा है, अंकल आप मुझे अरैस्ट क्यों करवा रहे हैं? घर की बात घर में ही सुलझ जाती.’’

मुझे रात की बदतमीजी याद आ गई थी.

‘‘बकवास बंद कर कमीने. मैं अपनी भतीजी हानिया का कत्ल किसी सूरत में माफ नहीं कर सकता.’’ फसील साहब मुझे नफरत से देखते हुए दहाड़े. मुझ पर जैसे आसमान टूट पड़ा. हानिया दुबई में थी, यहां उस का कत्ल कैसे हो गया? मैं ने कुछ कहना चाहा, पर पुलिस वाले मुझे घसीटते हुए बाहर ले आए. हवालात के फर्श पर पड़ा मैं बुरी तरह से कराह रहा था. यहां मेरी अच्छीखासी पिटाई की गई थी. यहीं मुझे पता चला कि हानिया आज सुबह ही दुबई से वापस आई थी. मुझ पर इलजाम था कि मैं ने गुस्से और नशे में छुरे से उसे कत्ल कर दिया था, क्योंकि मुझे पता चल गया था कि वह शादी से पहले से गर्भवती थी. किसी और का गुनाह मेरे सिर थोपा जा रहा था. मैं पुलिस वालों से लाख दुहाइयां देता रहा कि कत्ल मैं ने नहीं किया, पर मेरी किसी ने नहीं सुनी. जबकि मैं तो यह भी नहीं जानता था कि वह आज आने वाली थी.

मैं दिन भर भूखाप्यासा, चोटें सहलाता फर्श पर पड़ा रहा. देर रात जब सन्नाटा हो गया तो एक हवलदार ने मेरे पास आ कर धीरे से कहा, ‘‘तुम्हारे चाचा ससुर ने कहा है कि तुम्हारे खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई की जाए. तुम्हारे खिलाफ साजिश रची गई है. कल अदालत में पेश करने के लिए पक्के सुबूत तैयार कर लिए गए हैं, तुम्हें फंसाने की पूरी योजना बना ली गई है.’’

‘‘हवलदार साहब, मैं बेकुसूर हूं. मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? मुझ पर झूठा इलजाम लगाया जा रहा है.’’

‘‘मैं जानता हूं. कल अदालत में पेशी के बाद तुम्हें बचाने की योजना बन गई है, उसे मैं तुम्हें कल बताऊंगा. अभी मैं तुम्हारे लिए खाना लाता हूं.’’

उस ने मुझे भरपेट खाना खिलाया और एक सिगरेट भी पिलाई. चाय और दर्द की गोलियां भी दीं. मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर वह मुझ पर इतना मेहरबान क्यों है? अदालत में जब मेरे मामले की सुनवाई शुरू हुई तो हालात इस तरह से बयान किए गए. एच.एच. बिल्डर्स के शेयर होल्डर फसील हसन ने मुझे एक शरीफ, मेहनती और ईमानदार आदमी समझ कर मुझे नौकरी दी और मेरे साथ भतीजी की शादी कर दी कि मैं हानिया का बहुत खयाल रखूंगा, पर हालात बहुत खराब हो गए. लालच में आ कर मैं मां के इलाज के नाम पर रकम अपने एकाउंट में डालता रहा. हानिया के साथ मेरा व्यवहार बहुत बुरा था. वह तंग आ कर दुबई चली गई. बीवी की गैरमौजूदगी में मैं आवारागर्दी करने लगा और खूब शराब पीने लगा.

घरेलू नौकरानी सोनिया का बयान था कि हादसे की रात मैं नशे में धुत घर आया. जब वह कौफी देने बैडरूम में आई तो उस ने मुझे हानिया की डायरी पढ़ते देखा, जो उस ने रखने को दी थी. वह खामोशी से चली गई. सुबह की फ्लाइट से हानिया लौटी तो उस ने हमारे बैडरूम से लड़नेझगड़ने की आवाजें सुनीं. फिर उसे हानिया की 2 चीखें सुनाई दीं, डर के मारे वह अंदर नहीं आई, पर उस ने फसील साहब को फोन कर दिया. उन के आने पर सभी दरवाजा खोल कर अंदर पहुंचे तो उन्होंने मुझे जूते समेत बिस्तर पर सोता पाया. बेडरूम बुरी तरह अस्तव्यस्त था. फसील साहब ने स्टडीरूम में जा कर देखा तो वहां खून में लथपथ हानिया की लाश पड़ी थी. उन्होंने फौरन पुलिस को फोन किया और पुलिस ने आ कर मुझे गिरफ्तार कर लिया.

मेरे खून की जांच से पता चला कि मैं ने खूब शराब पी रखी थी, इसलिए भागने के बजाय वहीं सो गया था. पुलिस ने डायरी भी सुबूत के रूप में पेश की थी. मैं पत्थर बना सब सुन रहा था. अदालत ने सुबूतों के आधार पर मुझे एक हफ्ते के लिए पुलिस रिमांड पर दे दिया था. पुलिस मुझे बाहर ले आई. वह हमदर्द हवलदार मेरे साथ था. उस ने मेरा हाथ पकड़ कर जोर से कहा, ‘‘मुलजिम को पेशाब करने के लिए टायलेट जाना है.’’

इस के बाद सिपाही मुझे टायलेट की ओर ले कर चल पड़े. उस ने धीरे से कहा, ‘‘टायलेट के रोशनदान की सलाखें निकाल दी गई हैं. उस से पीछे की ओर निकल जाना. बाहर नीले रंग की कार तुम्हारा इंतजार कर रही है. बचने का यही एक मौका है.’’

मैं अंदर चला गया. पर मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? फिर खयाल आया कि फरार हो कर शायद मैं खुद को बचा सकूं. बाहर नीले रंग की कार खड़ी थी. मेरे बैठते ही वह हवा से बातें करने लगी. मेरे लिए यह पहेली थी कि मुझे कौन भगा रहा था और क्यों? पर यह भी सच था कि मेरे खिलाफ भरपूर साजिश रची गई थी. सजा ही मेरा नसीब थी. मैं ने ड्राइवर से कहा, ‘‘भाई, तुम मुझे कहां लिए जा रहे हो?’’

‘‘आप के एक हमदर्द के पास. वहां पहुंच कर आप को सब पता चल जाएगा.’’

अलगथलग इलाके में एक घर के आगे जा कर कार रुकी. दरवाजा एक स्मार्ट सी औरत ने खोला. उस ने शोख रंग की साड़ी पहन रखी थी. माथे पर बिंदिया और मांग में सिंदूर था. वह मुझे ड्राइंगरूम में ले आई, जहां एक स्मार्ट आदमी बैठा पाइप पी रहा था. उस ने मुझे देख कर कहा, ‘‘आओ कामरान अहमद बैठो, मैं हूं रुस्तम मलिक, बैरिस्टर, बदनसीब कामरान मलिक का दुखियारा बाप. मेरे ही कहने पर आप को मुसीबत से निकाल कर यहां लाय गया है.’’

‘‘आप ने मेरी मदद क्यों की, मैं यह जानना चाहता हूं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘इंसानियत के नाते, हमदर्दी की वजह से. मैं नहीं चाहता था कि कोई और बेगुनाह फसील के जाल में फंस कर मेरे बेटे की तरह मारा जाए.’’

‘‘आप के मुताबिक यह सब फसील साहब ने करवाया है?’’

‘‘उस के सिवा और कौन करवाएगा? उसे ही कुरबानी के लिए एक बकरे की जरूरत थी. मेरे दोस्त इनायत हसन की एकलौती बेटी हानिया कंपनी के 90 प्रतिशत शेयर की मालकिन थी. वसीयत के अनुसार हानिया की औलाद कुल जायदाद की मालिक होती. मैं उस का लीगल एडवाइजर था. भतीजी की जायदाद पर कोई हक न मिलने से फसील बहुत गुस्से में था.

‘‘अगर उस का बेटा होता तो वह हानिया की शादी उस से करवा देता. मेरे बेटे कामरान मलिक की बचपन की दोस्ती मोहब्बत में बदल गई. हानिया और कामरान एकदूसरे को टूट कर चाहने लगे. फसील ने इलजाम लगाया कि हानिया को बेटे की मोहब्बत में फंसा कर मैं उस की दौलत पर कब्जा करना चाहता हूं.

‘‘मेरा बेगुनाह बेटा एक रोड एक्सीडेंट में मारा गया. वह बहुत ज्यादा नशे में था. बाद में मुझे पता चला कि एक्सीडेंट के पहले वह फसील के घर पर था, जहां उसे बहुत ज्यादा शराब पिलाई गई थी. पर मैं कुछ नहीं कर सकता था. हानिया कामरान की मौत से पागल सी हो गई. वह कामरान की निशानी को जन्म देना चाहती थी. उस का बच्चा सारी दौलत का मालिक होता. हानिया से तुम्हारी शादी हो गई. हानिया ने शादी सिर्फ इसलिए की थी कि इज्जत के साथ बच्चा इस दुनिया में आ सके. लेकिन तुम्हारे हाथों हानिया के कत्ल का सुन कर मैं हैरान रह गया.

‘‘मुझे पता है कि यह झूठ और साजिश है, इसीलिए मैं ने तुम्हें बाहर निकाला है. पुलिस तुम्हारे पीछे लगी है. अब एक ही रास्ता है कि तुम फसील से सच्चाई निकलवाओ. उस से अपना जुर्म किसी भी सूरत में उगलवाओ. इस काम में मैं तुम्हारी हर तरह से मदद कर सकता हूं, आगे तुम जानो.’’

जब मैं ने सुकून से सोचा तो फसील की सारी साजिश मेरी समझ में आ गई. अब मुझे उस से सच उगलवाना था. मेरी जरूरत का सारा सामान रुस्तम मलिक ने मंगवा दिया, जिस में एक पिस्तौल भी था. रात 12 बजे मैं उस के घर से निकला. मैं फसील के घर 3-4 बार जा चुका था. मैं पीछे की ओर से गया. कुत्तों की हलकी सी आवाज सुन कर मैं ने जहर लगे गोश्त के टुकड़े अंदर उछाल दिए. फिर मैं लौन में कूद गया. कुत्ते जमीन पर पड़े दर्दनाक आवाजें निकाल रहे थे. चौकीदार कुत्तों के पास आया तो उस के पीछे पहुंच कर मैं ने पिस्तौल के हत्थे से मार कर उसे बेहोश कर दिया. उस के हाथपैर रस्सी से बांध दिए. लौन के पास की ग्लासवाल काट कर मैं अंदर पहुंच गया.

पहले मैं तूबा के कमरे में गया. वह सो रही थी. क्लोरोफौर्म में डूबा रूमाल उस की नाक पर रख दिया. इस के बाद फसील के बैडरूम के सामने पहुंचा. दरवाजा लौक था. पिस्तौल की नाल दरवाजे पर रख कर ट्रिगर दबा दिया. दरवाजा खोल कर अंदर घुसा तो दोनों हड़बड़ा कर उठ बैठे. मैं ने पिस्तौल तान दी. वह घबरा कर बोला, ‘‘यह क्या बदतमीजी है कामरान?’’

‘‘तू ने अपनी मासूम भतीजी का जो खून किया है, उस का हिसाब तुझे अभी देना होगा?’’

‘‘बकवास मत करो. हानिया का खून मैं ने नहीं, तू ने किया है. मसजिद से जूते चुराने वाला दो कौड़ी की औकात वाला आदमी मुझ पर इलजाम लगाता है.’’

मैं गुस्से से चीखा, ‘‘यह सारा ड्रामा तेरा रचा है कमीने. तू ने जानबूझ कर सोनिया के हाथों हानिया की डायरी भिजवाई थी. जिस से सुबह उस का कत्ल हो जाए तो पुलिस मुझे कातिल समझे. मुझे तो यह भी पता नहीं था कि हानिया कब दुबई से लौटी? मुझे तो नींद से जगा कर गिरफ्तार किया गया था. तू सच बोल दे, वरना…’’

‘‘बेवकूफ, मैं उसे क्यों मारूंगा?’’

‘‘हानिया के कत्ल के बाद एक तू ही तो उस का सगा चाचा बचता, मुझे फांसी पर लटकवाने के बाद तू ही उस की सारी दौलत और जायदाद का वारिस होता.’’

‘‘नहीं, हानिया के कत्ल के बाद मुझे कुछ नहीं मिल सकता. अगर वह अपने बच्चे के जन्म तक जिंदा रहती तो मुझे फायदा होता, क्योंकि मैं उस के बच्चे का संरक्षक होता. बच्चे और प्रापर्टी की देखभाल मुझे ही करनी होती. अब तो सिवाए 10 प्रतिशत के मुझे कुछ नहीं मिल सकता.’’

मैं सोच में पड़ गया. यानी कि फसील का कत्ल से कोई ताल्लुक नहीं था. तो फिर कातिल कौन हो सकता है? एकदम मुझे सोनिया का खयाल आया. उसी ने उस रात मुझे डायरी दी थी, मेरे खिलाफ झूठा बयान भी दिया था. मैं उस के बारे में सोचने लगा. फसील ने कहा, ‘‘कोठी तो सील है, वह अपने घर पर होगी. और जो कुछ मैं ने किया था, अपने खानदान की इज्जत बचाने को किया था.’’

जैसे ही मैं बंगले से बाहर निकला, चारों ओर से पुलिस ने मुझे घेर लिया. मजबूरन मुझे सरेंडर करना पड़ा. पुलिस वैन की आगे की सीट पर सादा लिबास में चाचा का दामाद यानी सदफ का शौहर आतिफ विकास बैठा था. उसे देख कर मैं दंग रह गया. आतिफ विकास के हाथों गिरफ्तार हो कर मैं थाने पहुंचा. मुझे अलग कमरे में ले जा कर बड़ी नम्रता से उन्होंने कहा, ‘‘आप को इस तरह गिरफ्तार करने के लिए मुझे बड़ा अफसोस है, पर कानूनी तकाजे पूरे करने थे. चाचा आप के लिए बहुत परेशान थे. उन्हीं के कहने पर मैं ने यह केस अपने हाथों में लिया है कि आप पर कत्ल का झूठा इलजाम लगा कर जो साजिश की गई है, उस से आप को बाहर निकाल सकूं.

‘‘लेकिन आप ने अदालत से फरार हो कर केस को खराब कर लिया है. मैं ने मुखबिरों से पता कर लिया था कि आप कहां मिल सकते हैं? मैं फसील के यहां पहुंच गया. आप का केस गौर से स्टडी करने के बाद मुझे नौकरानी सोनिया पर संदेह हो रहा है. आखिर वह आप के खिलाफ क्यों बोल रही थी?

‘‘आप की उस से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. उस की गवाही आप को कातिल साबित कर सकती थी. नशे में आप ने बीवी का कत्ल कर दिया और नशे की ज्यादती की वजह से भाग नहीं सके. मैं इस बात को नहीं मानता. कातिल सब से पहले घटनास्थल से दूर भागता है, पर आप तो पुलिस वालों को अपने बैडरूम में सोए हुए मिले थे.

‘‘बस इसी बुनियाद पर मैं ने सोनिया को गिरफ्तार करवा लिया है. पहले तो वह झूठ बोलती रही, पर उस ने देखा कि बचने का कोई रास्ता नहीं है तो उस ने सच उगल दिया. वह हानिया की खास नौकरानी थी. उसे मालूम था कि हानिया कब दुबई से आ रही है. उसी ने उस आदमी को खबर कर दी थी, जिस से पैसे लिए थे.

‘‘हानिया कत्ल कर दी गई. उस के बाद झूठी गवाही देने पर उसे मजबूर किया गया, तब वह घबराई. इधर आप फसील को कातिल समझ कर उस के बंगले पर पहुंच गए और वहां से मैं ने आप को गिरफ्तार कर लिया, मेरे आदमी आप की तलाश में वहां तैनात थे.’’ आतिफ ने सारी बात डिटेल से बता दी.

‘‘सोनिया को बहकाने वाला आदमी कौन है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अभी यह पता नहीं चला है. सोनिया के अनुसार सारी बात फोन पर हुई थी, रकम एक खास जगह पर रख कर बता दी गई थी. एक बात और बताऊं, हानिया के कत्ल का फैसला बहुत पहले हो चुका था. कुरबानी का बकरा तुम्हें बनाया गया. यह कत्ल बच्चा पैदा होने के बाद होना था, इस से किसे फायदा हो सकता था?’’

‘‘इस में हानिया के अंकल को फायदा था.’’ मैं ने कहा.

‘‘बिलकुल सही, पर उस से पहले किसी और ने काम कर दिखाया. फसील का प्लान फेल हो गया. यह बात मुझे तूबा ने बताई थी कि फसील हानिया को रास्ते से हटा कर बच्चे के जरिए सारी दौलत हासिल करना चाहता था. पर बच्चे के दुनिया में आने से पहले कत्ल किसी और ने कर दिया.’’

‘‘आप के खयाल से उस की मौत से किसे फायदा हो सकता था?’’

‘‘पहले आप यह बताइए कि आप को फरार किस ने करवाया? आप खुद फरार नहीं हो सकते थे.’’ आतिफ ने पूछा.

‘‘मेरी मदद रुस्तम मलिक, जो हानिया के वकील हैं, ने की थी. वह नहीं चाहता था कि उस के बेटे कामरान मलिक की तरह मैं भी बेगुनाह किसी साजिश में फंस कर मारा जाऊं.’’ मैं ने बताया.

‘‘यानी वह अपने बेटे के कातिल को तुम्हारे हाथों सजा दिलवाना चाहता था?’’ आतिफ ने सोच कर कहा.

इस के बाद आतिफ केस सुलझाने में जीजान से जुट गए. उन्होंने मेरे लिए थाने में काफी अच्छा इंजताम करवा दिया था. केस का खुलासा करने के बाद आतिफ ने मुझे जो बताया, वह इस तरह था. हानिया की दौलत के लालच में बैरिस्टर रुस्तम मलिक ने ही अपने बेटे कामरान मलिक को उस के पीछे लगाया था. उस ने उसे मोहब्बत के जाल में फंसा लिया. फसील उस की चालाकी समझ गया था. वह इस शादी के लिए कतई राजी नहीं था. संयोग से वह एक्सीडेंट में मर गया. इस में फसील का हाथ नहीं था.

कामरान की मौत के बाद फसील को सच्चाई का पता चला तो उसने यह योजना बनाई कि हानिया मर जाती है तो मैं फांसी चढ़ जाता. बच्चे के संरक्षक के तौर पर सारी जायदाद वह हासिल कर लेता. यह रुस्तम से बरदाश्त नहीं हुआ. उस ने साजिश रच कर हानिया का पत्ता कटवा दिया. मुझ से हमदर्दी जता कर फसील नाम का कांटा निकालने को भेजा. अगर उस रात मैं फसील को मार देता तो 2 कत्लों के इलजाम में जेल में होता. हानिया के बेऔलाद मरने पर सारी प्रौपर्टी ट्रस्ट में जाती, जिस की देखभाल रुस्तम मलिक करता और उस से पूरा फायदा उठाता. क्योंकि वह बहुत कमीना और शातिर आदमी था. उसे अपने बेटे की निशानी से भी कोई प्यार नहीं था. दौलत के लिए उस ने हानिया का कत्ल करवा दिया था. उस बेचारी ने दौलत की वजह से ही धोखा खाया और मारी भी गई.

मैं अपनी अम्मी को भी नहीं बचा सका. वह कैंसर से नहीं मरी, मेरे ऊपर कत्ल का इलजाम लगने से हार्टफेल की वजह से मरी. आतिफ विकास की मेहनत और केस की सच्चाई के सामने आने से मैं रिहा हो गया. रुस्तम मलिक ने किराए के कातिल से हानिया का कत्ल करवाया था. इस के सुबूत भी मिल गए थे. सोनिया ने भी सच उगल दिया था. शुक्र था कि मैं रुस्तम के जाल में नहीं फंसा. इस घटना को घटे 4 साल हो गए हैं. आतिफ की मदद से मुझे अच्छी नौकरी मिल गई है. सदफ 2 प्यारेप्यारे बच्चों की मां है. मेरा भाई स्कौलरशिप पर मैडिकल कालेज में है. बहन की मंगनी हो गई है. मैं चाचा के साथ हूं, जो पहले की ही तरह मुझ से मोहब्बत करते हैं. शादी करने पर जोर देते हैं, पर अब किसी को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है. Love Story

 

Crime Stories: पहली ही रात भागी दुल्हन

Crime Stories: 26 साल के छत्रपति शर्मा की आंखों में नींद नहीं थी. वह लगातार अपनी नईनवेली बीवी प्रिया को निहार रहा था. जैसे ही प्रिया की नजरें उस से टकराती थीं, वह शरमा कर सिर झुका लेती थी. 20 साल की प्रिया वाकई खूबसूरती की मिसाल थी. लंबी, छरहरी और गोरे रंग की प्रिया से उस की शादी हुए अभी 2 दिन ही गुजरे थे, लेकिन शादी के रस्मोरिवाज की वजह से छत्रपति को उस से ढंग से बात करने तक का मौका नहीं मिला था.

छत्रपति मुंबई में स्कूल टीचर था. उस की शादी मध्य प्रदेश के सिंगरौली शहर के एक खातेपीते घर में तय हुई थी और शादी मुहूर्त 23 नवंबर, 2017 का निकला था. इस दिन वह मुंबई से बारात ले कर सिंगरौली पहुंचा और 24 नवंबर को प्रिया को विदा करा कर वापस मुंबई जा रहा था. सिंगरौली से जबलपुर तक बारात बस से आई थी. जबलपुर में थोड़ाबहुत वक्त उसे प्रिया से बतियाने का मिला था, लेकिन इतना भी नहीं कि वह अपने दिल की बातों का हजारवां हिस्सा भी उस के सामने बयां कर पाता.

बारात जबलपुर से ट्रेन द्वारा वापस मुंबई जानी थी, जिस के लिए छत्रपति ने पहले से ही सभी के रिजर्वेशन करा रखे थे. उस ने अपना, प्रिया और अपनी बहन का रिजर्वेशन पाटलिपुत्र एक्सप्रैस के एसी कोच में और बाकी बारातियों का स्लीपर कोच में कराया था. ट्रेन रात 2 बजे के करीब जब जबलपुर स्टेशन पर रुकी तो छत्रपति ने लंबी सांस ली कि अब वह प्रिया से खूब बतियाएगा. वजह एसी कोच में भीड़ कम रहती है और आमतौर पर मुसाफिर एकदूसरे से ज्यादा मतलब नहीं रखते. ट्रेन रुकने पर बाराती अपने स्लीपर कोच में चले गए और छत्रपति, उस की बहन और प्रिया एसी कोच में चढ़ गए. छत्रपति की बहन भी खुश थी कि उस की नई भाभी सचमुच लाखों में एक थी. उस के घर वालों ने शादी भी शान से की थी.

जब नींद टूटी तो…

कोच में पहुंचते ही छत्रपति ने तीनों के बिस्तर लगाए और सोने की तैयारी करने लगा. उस समय रात के 2 बजे थे, इसलिए डिब्बे के सारे मुसाफिर नींद में थे. जो थोड़ेबहुत लोग जाग रहे थे, वे भी जबलपुर में शोरशराबा सुन कर यहांवहां देखने के बाद फिर से कंबल ओढ़ कर सो गए थे. छत्रपति और प्रिया को 29 और 30 नंबर की बर्थ मिली थी.

जबलपुर से जैसे ही ट्रेन रवाना हुई, छत्रपति फिर प्रिया की तरफ मुखातिब हुआ. इस पर प्रिया ने आंखों ही आंखों में उसे अपनी बर्थ पर जा कर सोने का इशारा किया तो वह उस पर और निहाल हो उठा. दुलहन के शृंगार ने प्रिया की खूबसूरती में और चार चांद लगा दिए थे. थके हुए छत्रपति को कब नींद आ गई, यह उसे भी पता नहीं चला. पर सोने के पहले वह आने वाली जिंदगी के ख्वाब देखता रहा, जिस में उस के और प्रिया के अलावा कोई तीसरा नहीं था.

जबलपुर के बाद ट्रेन का अगला स्टौप इटारसी और फिर उस के बाद भुसावल जंक्शन था, इसलिए छत्रपति ने एक नींद लेना बेहतर समझा, जिस से सुबह उठ कर फ्रैश मूड में प्रिया से बातें कर सके. सुबह कोई 6 बजे ट्रेन इटारसी पहुंची तो प्लैटफार्म की रोशनी और गहमागहमी से छत्रपति की नींद टूट गई. आंखें खुलते ही कुदरती तौर पर उस ने प्रिया की तरफ देखा तो बर्थ खाली थी. छत्रपति ने सोचा कि शायद वह टायलेट गई होगी. वह उस के वापस आने का इंतजार करने लगा.

ट्रेन चलने के काफी देर बाद तक प्रिया नहीं आई तो उस ने बहन को जगाया और टायलेट जा कर प्रिया को देखने को कहा. बहन ने डिब्बे के चारों टायलेट देख डाले, पर प्रिया उन में नहीं थी. ट्रेन अब पूरी रफ्तार से चल रही थी और छत्रपति हैरानपरेशान टायलेट और दूसरे डिब्बों में प्रिया को ढूंढ रहा था. सुबह हो चुकी थी, दूसरे मुसाफिर भी उठ चुके थे. छत्रपति और उस की बहन को परेशान देख कर कुछ यात्रियों ने इस की वजह पूछी तो उन्होंने प्रिया के गायब होने की बात बताई. इस पर कुछ याद करते हुए एक मुसाफिर ने बताया कि उस ने इटारसी में एक दुलहन को उतरते देखा था.

इतना सुनते ही छत्रपति के हाथों से जैसे तोते उड़ गए. क्योंकि प्रिया के बदन पर लाखों रुपए के जेवर थे, इसलिए किसी अनहोनी की बात सोचने से भी वह खुद को नहीं रोक पा रहा था. दूसरे कई खयाल भी उस के दिमाग में आजा रहे थे. लेकिन यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी कि आखिरकार प्रिया बगैर बताए इटारसी में क्यों उतर गई? उस का मोबाइल फोन बर्थ पर ही पड़ा था, इसलिए उस से बात करने का कोई और जरिया भी नहीं रह गया था. एक उम्मीद उसे इस बात की तसल्ली दे रही थी कि हो सकता है, वह इटारसी में कुछ खरीदने के लिए उतरी हो और ट्रेन चल दी हो, जिस से वह पीछे के किसी डिब्बे में चढ़ गई हो. लिहाजा उस ने अपनी बहन को स्लीपर कोच में देखने के लिए भेजा. इस के बाद वह खुद भी प्रिया को ढूंढने में लग गया.

भुसावल आने पर बहन प्रिया को ढूंढती हुई उस कोच में पहुंची, जहां बाराती बैठे थे. बहू के गायब होने की बात उस ने बारातियों को बताई तो बारातियों ने स्लीपर क्लास के सारे डिब्बे छान मारे. मुसाफिरों से भी पूछताछ की, लेकिन प्रिया वहां भी नहीं मिली. प्रिया नहीं मिली तो सब ने तय किया कि वापस इटारसी जा कर देखेंगे. इस के बाद आगे के लिए कुछ तय किया जाएगा. बात हर लिहाज से चिंता और हैरानी की थी, इसलिए सभी लोगों के चेहरे उतर गए थे. शादी की उन की खुशी काफूर हो गई थी.

प्रिया मिली इलाहाबाद में, पर…

इत्तफाक से उस दिन पाटलिपुत्र एक्सप्रैस खंडवा स्टेशन पर रुक गई तो एक बार फिर सारे बारातियों ने पूरी ट्रेन छान मारी, लेकिन प्रिया नहीं मिली. इस पर छत्रपति अपने बड़े भाई और कुछ दोस्तों के साथ ट्रेन से इटारसी आया और वहां भी पूछताछ की, पर हर जगह मायूसी ही हाथ लगी. अब पुलिस के पास जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था. इसी दौरान छत्रपति ने प्रिया के घर वालों और अपने कुछ रिश्तेदारों से भी मोबाइल पर प्रिया के गुम हो जाने की बात बता दी थी.

पुलिस वालों ने उस की बात सुनी और सीसीटीवी के फुटेज देखी, लेकिन उन में कहीं भी प्रिया नहीं दिखी तो उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. इधर छत्रपति और उस के घर वालों का सोचसोच कर बुरा हाल था कि प्रिया नहीं मिली तो वे घर जा कर क्या बताएंगे. ऐसे में तो उन की मोहल्ले में खासी बदनामी होगी. कुछ लोगों के जेहन में यह बात बारबार आ रही थी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रिया का चक्कर किसी और से चल रहा हो और मांबाप के दबाव में आ कर उस ने शादी कर ली हो. फिर प्रेमी के साथ भाग गई हो. यह खयाल हालांकि बेहूदा था, जिसे किसी ने कहा भले नहीं, पर सच भी यही निकला.

पुलिस वालों ने वाट्सऐप पर प्रिया का फोटो उस की गुमशुदगी के मैसेज के साथ वायरल किया तो दूसरे ही दिन पता चल गया कि वह इलाहाबाद के एक होटल में अपने प्रेमी के साथ है. दरअसल, प्रिया का फोटो वायरल हुआ तो उसे वाट्सऐप पर इलाहाबाद स्टेशन के बाहर के एक होटल के उस मैनेजर ने देख लिया था, जिस में वह ठहरी हुई थी. मामला गंभीर था, इसलिए मैनेजर ने तुरंत प्रिया के अपने होटल में ठहरे होने की खबर पुलिस को दे दी.

एक कहानी कई सबक

छत्रपति एक ऐसी बाजी हार चुका था, जिस में शह और मात का खेल प्रिया और उस के घर वालों के बीच चल रहा था, पर हार उस के हिस्से में आई थी. इलाहाबाद जा कर जब पुलिस वालों ने उस के सामने प्रिया से पूछताछ की तो उस ने दिलेरी से मान लिया कि हां वह अपने प्रेमी राज सिंह के साथ अपनी मरजी से भाग कर आई है. और इतना ही नहीं, इलाहाबाद की कोर्ट में वह उस से शादी भी कर चुकी है. बकौल प्रिया, वह और राज सिंह एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं, यह बात उस के घर वालों से छिपी नहीं थी. इस के बावजूद उन्होंने उस की शादी छत्रपति से तय कर दी थी. मांबाप ने सख्ती दिखाते हुए उसे घर में कैद कर लिया था और उस का मोबाइल फोन भी छीन लिया था, जिस से वह राज सिंह से बात न कर पाए.

4 महीने पहले उस की शादी छत्रपति से तय हुई तो घर वालों ने तभी से उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था. लेकिन छत्रपति से बात करने के लिए उसे मोबाइल दे दिया जाता था. तभी मौका मिलने पर वह राज सिंह से भी बातें कर लिया करती थी. उसी दौरान उन्होंने भाग जाने की योजना बना ली थी. प्रिया के मुताबिक राज सिंह विदाई वाले दिन ही जबलपुर पहुंच गया था. इन दोनों का इरादा पहले जबलपुर स्टेशन से ही भाग जाने का था, लेकिन बारातियों और छत्रपति के जागते रहने के चलते ऐसा नहीं हो सका. राज सिंह पाटलिपुत्र एक्सप्रैस ही दूसरे डिब्बे में बैठ कर इटारसी तक आया और यहीं प्रिया उतर कर उस के साथ इलाहाबाद आ गई थी.

पूछने पर प्रिया ने साफ कह दिया कि वह अब राज सिंह के साथ ही रहना चाहती है. राज सिंह सिंगरौली के कालेज में उस का सीनियर है और वह उसे बहुत चाहती है. घर वालों ने उस की शादी जबरदस्ती की थी. प्रिया ने बताया कि अपनी मरजी के मुताबिक शादी कर के उस ने कोई गुनाह नहीं किया है, लेकिन उस ने एक बड़ी गलती यह की कि जब ऐसी बात थी तो उसे छत्रपति को फोन पर अपने और राज सिंह के प्यार की बात बता देनी चाहिए थी.

छत्रपति ने अपनी नईनवेली बीवी की इस मोहब्बत पर कोई ऐतराज नहीं जताया और मुंहजुबानी उसे शादी के बंधन से आजाद कर दिया, जो उस की समझदारी और मजबूरी दोनों हो गए थे.

जिस ने भी यह बात सुनी, उसी ने हैरानी से कहा कि अगर उसे भागना ही था तो शादी के पहले ही भाग जाती. कम से कम छत्रपति की जिंदगी पर तो ग्रहण नहीं लगता. इस में प्रिया से बड़ी गलती उस के मांबाप की है, जो जबरन बेटी की शादी अपनी मरजी से करने पर उतारू थे. तमाम बंदिशों के बाद भी प्रिया भाग गई तो उन्हें भी कुछ हासिल नहीं हुआ. उलटे 8-10 लाख रुपए जो शादी में खर्च हुए, अब किसी के काम के नहीं रहे.

मांबाप को चाहिए कि वे बेटी के अरमानों का खयाल रखें. अब वह जमाना नहीं रहा कि जिस के पल्लू से बांध दो, बेटी गाय की तरह बंधी चली जाएगी. अगर वह किसी से प्यार करती है और उसी से शादी करने की जिद पाले बैठी है तो जबरदस्ती करने से कोई फायदा नहीं, उलटा नुकसान ज्यादा है. यदि प्रिया इटारसी से नहीं भाग पाती तो तय था कि मुंबई जा कर ससुराल से जरूर भागती. फिर तो छत्रपति की और भी ज्यादा बदनामी और जगहंसाई होती.

अब जल्द ही कानूनी तौर पर भी मसला सुलझ जाएगा, लेकिन इसे उलझाने के असली गुनहगार प्रिया के मांबाप हैं, जिन्होंने अपनी झूठी शान और दिखावे के लिए बेटी को किसी और से शादी करने के लिए मजबूर किया. इस का पछतावा उन्हें अब हो रहा है. जरूरत इस बात की है कि मांबाप जमाने के साथ चलें और जातिपांत, ऊंचनीच, गरीबअमीर का फर्क और खयाल न करें, नहीं तो अंजाम क्या होता है, यह प्रिया के मामले से समझा जा सकता है. – कथा में प्रिया परिवर्तित नाम है. Crime Stories

Punjab News: यह कैसी इंसानी फिसरत

 Punjab News: घरपरिवार से दूर अकेला रह रहा राजेश पड़ोस में रहने वाली औरतों को बुरी नजर से ही नहीं देखता था, बल्कि मौका मिलने पर शरीरिक छेड़छाड़ भी कर लेता था. परेशान हो कर महिलाओं ने जब विरोध किया तो ऐसा क्या हुआ कि 3 घर बरबाद हो गए. मैं उन दिनों जिला संगरूर के शहर मलेरकोटला में बतौर थानाप्रभारी तैनात था. मलेरकोटला एक ऐतिहासिक नगर माना जाता है. सिख इतिहास में इस नगर का और नगर के नवाब का विशेष महत्त्व एवं योगदान रहा है. मानवता के रक्षक एवं सिखमुसलिम एकता के प्रतीक माने जाने वाले इस नगर में आज भी अमन और शांति है.

स्वयं को धन्य मानते हुए इस नगर में मैं शांति से नौकरी कर रहा था कि एक दोपहर 12 बजे के आसपास मुझे जो सूचना मिली, मैं उस से बेचैन हो उठा. सूचना के अनुसार बड़ाघर, ईदगाह रोड पर स्थित मामदीन मोहल्ला के वार्ड नंबर 4 में मोहम्मद सादिक, शौकत अली के मकान में हत्याएं हुई थीं. हत्या शब्द से ही डर लगता है, बात हत्याओं की आ जाए तो आम आदमी की छोड़ो, एक इंसपेक्टर होते हुए भी मैं घबरा गया था.

बहरहाल, सूचना मिलते ही मैं एक सबइंसपेक्टर, एक हेडकांस्टेबल और 2 सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गया था. जिस मकान में वारदात हुई थी, उस के सामने मोहल्ले वालों की अच्छीखासी भीड़ जमा थी. मकान किसी परकोटे जैसा था. ऊंचीऊंची दीवारों वाले हवेलीनुमा उस मकान का किले जैसा विशाल फाटक अंदर से बंद था.

फाटक के नीचे से बहा खून बाहर गली तक आ गया था.  मौजूद लोगों से पूछने पर पता चला कि कुछ देर पहले अंदर से मारपीट और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आई थीं. उन आवाजों को सुन कर वे लोग वहां पहुंचे. उन्होंने फाटक खुलवाने के लिए बाहर लगी सांकल बजाई. दरवाजा तो नहीं खुला, फाटक के नीचे से खून जरूर बह कर बाहर आ गया. चूंकि उस मकान में कई लोग रहते थे, अगर कोई जीवित होता तो जरूर फाटक खोलता. इसी से उन लोगों ने अंदाजा लगाया कि लगता है अंदर रहने वाले सभी लोगों को मार दिया गया है. यही सोच कर उन्होंने हत्याओं की सूचना दे दी थी.

मैं ने सिपाहियों से कहा कि मोहल्ले से किसी की सीढ़ी ला कर मकान की दीवार पर लगा कर भीतर जाएं और अंदर से फाटक खोल दें, ताकि अंदर जा कर देखा जा सके कि यहां क्या हुआ था? सिपाहियों ने तुरंत एक सीढ़ी की व्यवस्था कर के फाटक खोल दिया. फाटक खुलते ही मैं ने देखा, फाटक के पास ही अंदर एक औरत की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. फाटक के नीचे से बह कर बाहर आने वाला खून उसी औरत का था. जांच आगे बढ़ाने से पहले मकान की संरचना को समझना जरूरी था. मकान मुगल शासनकाल के किसी मुसलिम अफसर या नगरसेठ की हवेली रहा होगा.

मुख्यद्वार यानी फाटक के बाद एक बेहद खूबसूरत बरामदा था, जिस के खत्म होने से पहले बाईं ओर एक बहुत बड़ा कमरा था. उस के ठीक सामने दाईं ओर भी वैसा ही एक कमरा था. बरामदा खत्म होने के बाद बाईं ओर कमरे के बजाय खुले आंगन में दीवारों के साथ खूबसूरत फूलों की क्यारियां बनी हुई थीं, जबकि दाईं ओर लाइन से 3 कमरे बने हुए थे. उस के बाद छत पर जाने के लिए सीढि़यां बनी थीं. उस के आगे सामने की दीवार से सटा लैट्रीन और बाथरूम बना था. मकान देख कर यही लगता था कि मकान में आनेजाने के लिए फाटक के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. मैं ने इस घटना की जानकारी अधिकारियों को देने के साथ फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया था. इस के बाद मैं घटनास्थल का निरीक्षण करने लगा.

फाटक के पास बरामदे में पड़ी मृतका की उम्र 30-32 साल रही होगी. वह निहायत ही खूबसूरत और सलीके वाली औरत लग रही थी. मृतका के शरीर पर तेज धार वाले हथियार के कई घाव थे, जो काफी गहरे थे. लाश के पास ही चूडि़यों के कुछ टुकड़े पड़े थे. कुछ टुकड़े मृतका की कलाई में भी धंसे हुए थे, जहां से खून रिस रहा था. मृतका के सिर के बाल बिखरे हुए थे, पास ही बालों में लगाई जाने वाली क्लिप पड़ी थी. कुछ बरतन बरामदे में फैले हुए थे. वहां की स्थिति से साफ लग रहा था कि मृतका ने मरने से पहले खुद को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया था. लाश के निरीक्षण के दौरान मृतका की मुट्ठी में भी ढेर सारे बाल दबे दिखाई दिए. जिस कमरे के बाहर बरामदे में लाश पड़ी थी, उस कमरे में भी संघर्ष के निशान नजर आ रहे थे. कमरे के अंदर भी खून फैला हुआ था.

कमरे और बरामदे से खून सने पैरों के निशान दाईं ओर वाले कमरों की ओर गए हुए थे. निशानों का पीछा करते हुए जब मैं दूसरे कमरे में पहुंचा तो वहां भी एक 30-32 साल की महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस महिला के शरीर पर भी तेजधार वाले हथियार के कई घाव थे. फर्श पर खून ही खून फैला था. उस कमरे में भी संघर्ष के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. खून सने पैरों के निशानों के आधार पर मैं तीसरे कमरे में पहुंचा तो वहां खून से लथपथ एक युवक औंधे मुंह फर्श पर पड़ा था. उस के आसपास फर्श पर खून फैला हुआ था. नजदीक से देखने पर उस की गरदन में एक हंसिया फंसा दिखाई दिया. खून गरदन से ही बह रहा था. मुझे उस में कुछ हरकत दिखाई दी तो मैं ने झट से उस की नब्ज पकड़ी. वह चल रही थी. इस का मतलब वह युवक जीवित था. मैं ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया.

मेरी सूचना पर एसपी भूपिंदर सिंह विर्क, डीएसपी (डी) हरमिंदर सिंह, डीएसपी मलेरकोटला गुरप्रीत सिंह, फोरेंसिक टीम के साथ आ गए थे. अधिकारियों की उपस्थिति में फोरेंसिक टीम ने अपना काम कर लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल एवं लाशों का बारीकी से निरीक्षण किया. लाश के पास पड़ी चूडि़यों के टुकड़े, वहां बिखरे बरतनों में से एक लोटे पर खून लगा था, उसे कब्जे में ले लिया था. मृतका की मुट्ठी में दबे बाल भी सुबूत के लिए रख लिए गए थे. खून सने पैरों के जो निशान थे, फोरेसिंक टीम ने उन्हें बड़ी सफाई से उठा लिए थे. इस के अलावा अंगुलियों के निशान भी उठा लिए गए. खून सनी 3 जोड़ी चप्पलें मिली थीं, उन्हें भी जब्त कर लिया गया था. बाकी के सारे सुबूत जुटाने के बाद अन्य जरूरी काररवाई निपटाई और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

पूछताछ द्वारा मिली जानकारी के अनुसार, वह मकान मोहम्मद सादिक का था, जिसे उस ने किराए पर उठा रखा था. जबकि वह खुद लोहभन में गुलजार अस्पताल के पास रहता था. मकान के बरामदे के बाईं ओर फाटक के पास जो लाश पड़ी थी, वह रिंकू की थी. वह बाईं ओर वाले कमरे में पति विजय और 2 बच्चों के साथ रहती थी. बरामदे के दाईं ओर वाले कमरे में 2 भाई रामा मंडल और सागर मंडल रहते थे. उस के आगे वाले कमरे में लालू साहू पत्नी बीना देवी और 4 बच्चों के साथ रहता था. उस कमरे में मिली लाश बीना देवी की थी. उस के आगे वाले तीसरे और अंतिम कमरे में राजेश गुप्ता अकेला ही रहता था. वही अपने कमरे में घायलावस्था में मिला था.

मकान में रहने वाले सारे किराएदार अलगअलग राज्यों के रहने वाले थे, जो कामधंधे की वजह से यहां आ कर रह रहे थे. लालू साहू मध्य प्रदेश का रहने वाला था तो रामा और सागर मंडल पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे. जबकि विजय बिहार के जिला बेगूसराय का रहने वाला था. अपने कमरे में घायल मिला राजेश गुप्ता उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर का रहने वाला था. इस मकान में रहने वाले किराएदार अपनेअपने काम से मतलब रखने वाले लोग थे. इन में राजेश ही एक ऐसा आदमी था, जो दूसरों के मामलों में दिलचस्पी रखता था. खास कर औरतों के मामले में वह कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेता था.

लालू साहू कबाड़ी का काम करता था. वह सुबह अपने गोदाम पर चला जाता था तो देर रात को ही घर लौटता था. विजय किसी फैक्ट्री में काम करता था. उस की 12 घंटे की ड्यूटी थी. वह सुबह साढ़े 7 बजे घर से निकलता तो रात साढ़े 8 बजे तक लौटता था. रामा और सागर मंडल मकानों में टाइल्स लगाने का काम करते थे, जिस से वे सुबह 7 बजे ही घर से निकल जाते थे तो उन के लौटने का कोई निश्चित समय नहीं था.  बाकी बचा राजेश, जो किसी कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड था. वह रात की ड्यूटी करता था, इसलिए जब अन्य पुरुष घर आते थे तो वह ड्यूटी पर चला जाता था और जब सभी अपनेअपने काम पर जाते थे तो वह वापस कमरे पर आ जाता था.

इस तरह दिन में वही अकेला मर्द उस मकान में रहता था. उस हवेलीनुमा मकान में दिन में केवल 3 लोग रहते थे, एक राजेश, दूसरी बीना और तीसरी रिंकू. क्योंकि इन के पति काम पर चले जाते थे तो बच्चे स्कूल चले जाते थे. पूछताछ में पता चला था कि राजेश दिलफेंक किस्म का युवक था, इसलिए ड्यूटी से आने के बाद अपने काम निपटा कर वह बीना और रिंकू के कमरों में ताकझांक किया करता था. वह जब तक जागता रहता, औरतों से छेड़छाड़ किया करता था. अश्लील फब्तियां कस कर दोनों की नाक में दम कर देता था.

राजेश की इन घटिया हरकतों की वजह से बीना और रिंकू ज्यादातर कमरों में बंद रहती थीं. लेकिन जरूरी कामों के लिए उन्हें कमरों से बाहर आना ही पड़ता था. घात लगा कर बैठा राजेश इसी मौके की तलाश में रहता था. पूछताछ में लालू और विजय ने बताया था कि कभीकभी तो वह अपने सारे कपड़े उतार कर अपने कमरे में डांस भी करने लगता था. ऐसा करने के लिए उसे मना किया जाता तो वह बेशरमी से हंसते हुए कहता, ‘‘यह मेरा कमरा है. मैं इस का किराया देता हूं, इसलिए अपने कमरे में मैं चाहे नंगा रहूं या कपड़े पहन कर घूमूं, इस में आप लोगों को क्या परेशानी है? अगर इस स्थिति में मैं आप लोगों को अच्छा लगता हूं तो आप लोग आराम से मेरे कमरे में आ सकती हैं. मैं जरा भी बुरा नहीं मानूंगा. पड़ोसी होने के नाते आप लोगों की सेवा करना मेरा धर्म बनता है.’’

इस तरह की बातें सुन कर रिंकू और बीना का दिमाग भन्ना उठता. उन का मन करता कि ईंट उठा कर उस के सिर पर दे मारें, जिस से उस का गंदा भेजा बाहर आ जाए. लेकिन चाह कर भी वे ऐसा नहीं कर पा रही थीं. वे राजेश की शिकायत अपनेअपने पतियों से भी नहीं कर पा रही थीं. इस की वजह यह थी कि एक तो उन के पतियों का राजेश से झगड़ा हो जाता, जिस में किसी को भी चोट लग सकती थी. अगर चोट उन के पतियों को लग जाती तो उन के लिए मुसीबत खड़ी हो जाती. अगर कहीं चोट राजेश को लग जाती तो वह थाने चला जाता. उस के बाद उन के पतियों को पुलिस पकड़ ले जाती. यह भी उन के लिए मुसीबत बन जाती. इस के अलावा यह भी हो सकता था कि उनके पति उन्हीं पर संदेह करने लगते. दोनों ही औरतें असमंजस की स्थिति में थीं. इसलिए संभलसंभल कर कदम रख रही थीं.

लेकिन उस दिन तो हद ही हो गई. दोपहर का समय था. बीना घर के काम निपटा कर आराम करने के लिए लेट गई. रिंकू अपने कमरे में दरवाजा बंद किए लेटी थी. गरमियों के दिन थे और बिजली नहीं थी, इसलिए बीना ने कमरे का एक किवाड़ खुला छोड़ दिया था. थकी होने की वजह से लेटते ही उस की आंख लग गई. अचानक बीना को लगा कि कोई उस के शरीर से छेड़छाड़ कर रहा है. उस की आंखें खुलीं तो देखा राजेश उस की बगल में लेटा उस से छेड़छाड़ कर रहा था. वह उछल कर उठी और जोरजोर से राजेश को गालियां देने लगी. शोर सुन कर रिंकू भी बाहर आ गई. इस के बाद दोनों औरतें राजेश को भलाबुरा कहने लगीं. तब बेशरमी से हंसते हुए उस ने रिंकू से कहा, ‘‘चिल्लाती क्यों हो, तुम्हारी सहेली ने ही तो मुझे अपने कमरे में बुलाया था. अब इस में मेरा क्या दोष है?’’

राजेश की बात से दोनों के पैरों तले से जमीन खिसक गई. राजेश की धूर्तता से डर कर दोनों ने उस की शिकायत अपनेअपने पतियों से नहीं की. ऐसे आदमी का क्या भरोसा, कब क्या बक दे? डर के मारे दोनों चुप रह गईं. इस से राजेश की हिम्मत बढ़ गई. लेकिन जब राजेश की हरकतें बढ़ती ही गईं तो काफी सोचविचार कर दोनों ने अपनेअपने पतियों से कहा कि दिन में अकेली रहने पर राजेश उन्हें परेशान करता है. उन के साथ बदतमीजी भी करता है. विजय और लाल ने राजेश को समझाना चाहा तो उलटा वह उन्हीं के गले पड़ गया. वह जोरजोर से कहने लगा, ‘‘मैं तुम्हारी बीवियों को परेशान करता हूं या तुम्हारी बीवियां मुझे परेशान करती हैं. उन्हें संभाल कर रखो वरना अच्छा नहीं होगा.’’

दोनों सन्न रह गए. अपनी इज्जत बचाने की खातिर वे आगे कुछ नहीं बोले. इसलिए यह सब यूं ही चलता रहा. बीना और रिंकू काफी परेशान थीं और बेबस भी. आखिर उस दिन छेड़छाड़ की अति हो गई. रोज की तरह राजेश अपने कमरे में था. घर का काम निपटाने के बाद रिंकू नहाने के लिए बाथरूम की ओर जा रही थी. बीना अपने कमरे में कुछ कर रही थी. बाथरूम जाने के लिए राजेश के कमरे के सामने से ही जाना पड़ता था. रिंकू को बाथरूम की ओर जाते देख कर राजेश के शैतानी दिमाग में खुराफात सूझ गई. वह अपने कमरे से निकला और दबेपांव बाथरूम की ओर चल पड़ा.

रिंकू कपड़े उतार कर नहाने के लिए बैठने जा रही थी कि राजेश ने अचानक दरवाजे को इतनी जोर से धक्का दिया कि अंदर की सिटकनी टूट गई और दरवाजा खुल गया. रिंकू को उस हालत में पा कर वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. डर और शरम से रिंकू का बुरा हाल था. पहले तो वह सकपकाई, लेकिन बाद में जोरजोर से चिल्लाने के साथ बाथरूम में रखी कपड़ा धोने वाली मुंगरी उठा कर उसे पीटने लगी. रिंकू की चीखें सुन कर बीना भी कमरे से बाहर आ गई थी. वस्तुस्थिति समझ कर वह भी बाथरूम पहुंची. राजेश का कौलर पकड़ कर बाथरूम से बाहर निकाला और चप्पल से पीटने लगी. तब तक रिंकू भी कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर आ गई थी. दोनों ने मिल कर राजेश की जम कर धुनाई कर दी.

इस तरह रिंकू और बीना इज्जत को बचाना मुश्किल हो गया तो रात में पतियों के वापस आने पर उन्होंने राजेश की अगलीपिछली सारी हरकतें उन से बता दीं. इस के बाद विजय और लालू ने राजेश की जम कर पिटाई की और उस की हरकतों की शिकायत थाने में कर दी. पुलिस राजेश को पकड़ कर थाने ले गई. थाने में भी उस की धुनाई की गई. इस के बाद राजेश ने गलती की लिखित माफी मांगी तो उसे छोड़ दिया गया. इस घटना के बाद कुछ दिनों तक तो राजेश शांत रहा, लेकिन उस के बाद फिर छोटीमोटी हरकतें करने लगा. उस दिन यानी जिस दिन हत्याएं हुई थीं, रोज की तरह सभी अपनेअपने कामों पर चले गए थे. रात की ड्यूटी कर के सुबह साढ़े 8 बजे के करीब राजेश कमरे पर लौटा. 9 बजे तक सभी बच्चे भी स्कूल चले गए. इस के बाद उस हवेलीनुमा मकान में रिंकू, बीना और राजेश ही रह गए. 12 बजे तक घर के काम निपटा कर रिंकू और बीना अपनेअपने कमरों में लेट गईं.

अगस्त का महीना था. हवा बंद थी, इसलिए उमस बहुत ज्यादा थी. ऊपर से बिजली भी नहीं थी. हवा आने के लिए बीना ने अपने कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था. अपने कमरे में बैठे राजेश के मन में न जाने क्या सूझी कि वह कमरे से निकला और बीना के कमरे के सामने जा कर खड़ा हो गया. खुले दरवाजे से उस ने भीतर झांक कर देखा तो बीना गहरी नींद सो रही थी. बेखबरी में उस का पेटीकोट घुटनों के ऊपर तक खिसक गया था. पलक झपकाए बिना राजेश कुछ देर तक बीना की नंगी टांगे देखता रहा. उस के बाद वह इस कदर उत्तेजित हो उठा कि दरवाजा धकेल कर कमरे में जा पहुंचा और भूखे भेडि़ए की तरह बैड पर सो रही बीना पर टूट पड़ा.

अचानक हुए इस हमले से बीना घबरा कर चिल्लाने लगी. राजेश ने जल्दी से अपना एक हाथ उस के मुंह पर रख कर धमकाया, ‘‘चुपचाप मुझे अपने मन की कर लेने दो. अगर चीखीचिल्लाई तो गला दबा कर दम निकाल दूंगा.’’

बीना को धमका कर राजेश उस के शरीर से छेड़छाड़ करने लगा. अचानक बीना ने पूरी ताकत लगा कर राजेश को धक्का दिया तो वह फर्श पर गिर पड़ा. लेकिन फुरती से उठ कर उस ने एक जोरदार थप्पड़ बीना के मुंह पर मारा. राजेश उत्तेजना में इस कदर अंधा हो चुका था कि उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. वह तेजी से बीना के कमरे से निकला और अपने कमरे से सब्जी काटने के लिए रखा हंसिया उठा लाया. बीना को डराने के लिए उस के सामने हंसिया लहराते हुए बोला, ‘‘खामोश, अगर मुंह से आवाज निकाली तो गला काट कर रख दूंगा.’’

लेकिन बीना पर राजेश की धमकी का कोई असर नहीं हुआ. वह खामोशी से अपनी इज्जत नहीं लुटवाना चाहती थी. इसलिए वह इज्जत बचाने के लिए संघर्ष करती रही. वह राजेश के चंगुल से खुद को छुड़ा कर बाहर की ओर भागना चाहती थी. जबकि राजेश की स्थिति यह थी कि जैसे किसी भूखे शेर के मुंह से मांस छीन लिया गया हो. उस ने बाहर की ओर भाग रही बीना पर हंसिये से प्रहार कर दिया. जहां हंसिया लगा था, वहां से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह फर्श पर गिर पड़ी. वह जोरजोर से चिल्लाने लगी. उस के गिरते ही राजेश तो उस पर लगातार कई वार कर दिए. अब तक उस की चीखपुकार सुन कर रिंकू भी आ गई थी. वहां की हालत देख कर उस की घिग्घी बंध गई.

बीना को राजेश से बचाने के लिए रिंकू कोई हथियार लेने के लिए अपने कमरे की ओर भागी. लेकिन राजेश पर उस समय खून सवार था, इसलिए वह भी उस के पीछे दौड़ा. रिंकू कोई चीज उठा पाती, इस का मौका दिए बिना ही राजेश ने हाथ में लिए हंसिये से उस पर वार कर दिया. रिंकू जान बचाने के लिए चीखते हुए कमरे से निकल कर फाटक की ओर भागी. लेकिन काल बने राजेश ने उसे बरामदे में घेर लिया और हंसिये से ताबड़तोड़ वार करने लगा. किसी कटे पेड़ की तरह लहरा कर रिंकू फर्श पर गिर पड़ी और तड़पतड़प कर थोड़ी देर में शांत हो गई. कुछ देर राजेश वहीं खड़ा रहा. इतनी देर में उस का जुनून शांत हो गया था. जब होश आया तो 2-2 लाशें और चारों ओर खून ही खून फैला देख कर उस की आत्मा तक कांप उठी.

वह कोई पेशेवर हत्यारा तो था नहीं, इसलिए यह सब देख कर उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. उसे आंखों के सामने फांसी का फंदा लहराता दिखाई दिया. पलभर में ही एक ऐसा जुनून आया, जो तूफान बन कर अपने पीछे तबाही छोड़ कर चला गया था. भविष्य की कल्पना मात्र से ही राजेश का शरीर कांप उठा. वह मकान के भीतर पागलों की तरह भागभाग कर अपने छिपने के लिए जगह ढूंढने लगा. जब उसे कोई जगह सुरक्षित नहीं दिखाई दी तो पुलिस से बचने के लिए वह हाथ में लिए हंसिये से अपनी गरदन पर वार करने लगा. पहला वार गहरा पड़ा, लेकिन उस के बाद वाले वार हलके होते गए. चौथा वार पहले वार पर पड़ा, जिस से घाव तो गहरा हो ही गया, पीड़ा की वजह से हाथ में ताकत न रहने की वजह से वह हंसिया निकाल नहीं सका, जिस से वह उसी में फंसा रह गया. राजेश बेहोश हो कर फर्श पर औंधे मुंह गिर पड़ा.

अब तक की पूछताछ से पता चला था कि राजेश द्वारा की गई दोनों महिलाओं की हत्याएं और आत्महत्या की कोशिश की वजह दुष्कर्म का प्रयास था. बहरहाल मैं दोनों महिलाओं के पतियों और मोहल्ले वालों के बयान दर्ज करने के बाद अस्पताल के लिए चल पड़ा. अस्पताल में पता चला कि राजेश की हालत काफी गंभीर थी, जिस की वजह से डाक्टरों ने उसे पटियाला के  राजेंद्रा अस्पताल के लिए रेफर कर दिया था. राजेंद्रा अस्पताल के डाक्टरों ने अथक प्रयास कर के राजेश को बचा लिया था. इस पूरे मामले में राजेश ही अकेला दोषी था. अगर उस की मौत हो जाती तो मामले की फाइल उसी दिन बंद हो जाती. लेकिन अब स्थिति बदल गई थी. राजेश बच गया था, इसलिए अब इस मामले को अदालत तक ले जाना था. मामले को मजबूत बनाने के लिए मैं साक्ष्य जुटाने लगा, जिस से मृत महिलाओं के परिजनों को न्याय मिल सके.

सिविल अस्पताल मलेरकोटला से राजेश की जो एमएलसी बनाई गई थी, उस के अनुसार राजेश की गरदन पर बाईं ओर तेजधार हथियार के 5 घाव थे. वह एमएलसी मुझे अधूरी लगी, इसलिए मैं ने पटियाला के राजेंद्रा अस्पताल से एक अन्य एमएलसी बनवाई, जिस में राजेश की बाईं आंख से ले कर गरदन तक तेजधार हथियार की 5 गंभीर चोटें थीं. बाएं हाथ पर कटे के 3 निशान और दाहिने हाथ पर भी चोट का एक निशान था, जो शायद छीनाझपटी में लग गया था. डाक्टरों की कोशिश से राजेश की हालत में तेजी से सुधार हो रहा था. अब वह बिना किसी की मदद के चलनेफिरने लगा था. लेकिन एक समस्या यह खड़ी हो गई थी कि गरदन पर हंसिये की चोट की वजह से उस की आवाज चली गई थी. अब वह बोल नहीं सकता था. आगे चल कर यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन सकती थी. अदालत में वह अपनी बात किस तरह कहेगा, यह सोचसोच कर मैं परेशान था.

बहरहाल, मैं ने रिंकू और बीना की हत्या तथा आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा राजेश के विरुद्ध दर्ज कर के सुबूत जुटाने शुरू कर दिए. एक दिन सवेरे पता चला कि राजेश निगरानी पर तैनात सिपाही को चकमा दे कर फरार हो गया है. मेरे लिए यह बहुत बड़ी परेशानी खड़ी हो गई थी. भले ही राजेश गंभीर रूप से घायल था, लेकिन उस ने जो जघन्य अपराध किया था, उस के लिए उसे सजा मिलनी ही चाहिए थी. मेरी नौकरी खतरे में पड़ गई थी. सब से बड़ी बात यह थी कि मेरी पूरी उम्र की बेदाग नौकरी के अंत में एक ऐसा कलंक लगने वाला था, जो लाख प्रयास के बाद भी नहीं छुड़ाया जा सकता था. मेरे रिटायरमेंट के मात्र 2 साल बाकी थे. बहरहाल अस्पताल में राजेश की निगरानी पर लगे सिपाही को लाइनहाजिर करा कर राजेश की तलाश में जगहजगह दबिश डालनी शुरू कर दी.

राजेश के भाई रामसंजीव गुप्ता को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. वह भी मलेरकोटला में ही रहता था. उस ने बताया कि कई सालों से वह राजेश से नहीं मिला था. राजेश की हरकतों की वजह से वह न तो उसे अपने घर में घुसने देता था और न ही उस से कोई संबंध रखता था. मैं ने राजसंजीव से उस के रिश्तेदारों के पते पूछ कर उन के यहां छापे मारे, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. शहर की मैं ने पहले ही नाकेबंदी करवा दी थी. उस की शिनाख्त के लिए इतना ही काफी था कि उस के सिर से ले कर गरदन तक पट्टियां लिपटी थीं. वह आसानी से पहचाना जा सकता था और शायद इसीलिए 2 दिनों बाद वह मोहम्मद अयूब नामक एक इज्जतदार आदमी के साथ थाने आ कर मेरे सामने खड़ा हो गया. शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था या उसे अपने असहाय होेने का अंदाजा लग गया था.

थाने में मैं ने राजेश से पूछताछ शुरू की. इशारों से उस ने वे सारी बातें बता दीं, जो लोगों ने मुझे जांच के दौरान बताई थीं. बहरहाल मैं ने उस का बयान ले कर 2 गवाहों के सामने उस के दस्तखत करवा लिए. अगले दिन मैं ने उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट श्री पुष्मिंदर सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. हतयाओं का हथियार अभियुक्त की गरदन से बरामद हो गया था. धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान अभियुक्त ने इशारों में दर्ज करवा दिए थे. खून आलूदा एवं फिंगरप्रिंट की रिपोर्ट आने के बाद मैं ने अदालत में आरोपपत्र पेश कर दिया.

लगभग 2 सालों तक तारीखें पड़ने के बाद इस केस की गवाहियां अतिरिक्त सत्र एवं न्यायाधीश श्री बी.के. मेहता की अदालत में शुरू हुईं.  इस मुकदमे में कुल 23 गवाह थे. इस मुकदमे में ठोस सुबूत फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने पेश किए. अभियुक्त के पैरों के निशान इस मुकदमे में सजा दिलाने के लिए अहम सुबूत थे. इस के अलावा अहम सुबूत थे मृतका रिंकू की मुट्ठी में मिले राजेश के सिर के बाल. अभियुक्त राजेश की ओर से मुकदमे की पैरवी मशहूर वकील नरपाल सिंह धारीवाल कर रहे थे, जबकि अभियोजन पक्ष की ओर से अमरजीत शर्मा और हरिंदर सूद थे.

अभियुक्त राजेश गुप्ता ने सफाई में कुछ नहीं कहा था. जज साहब के आदेश पर राजेश को एक प्लेन पेपर दिया गया तो उस ने उस पर अपना अपराध स्वीकार करते हुए पूरी घटना का विवरण लिख कर जज साहब को थमा दिया था कि वह किस प्रकार वासना में अंधे हो कर रिंकू और बीना को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता था. जब वह इस प्रयास में सफल नहीं हुआ तो उन की किस तरह हत्या कर दी. अपने इस अपराध के लिए उस ने अदालत से माफी भी मांगी थी. जज साहब ने इस मुकदमे में अभियुक्त राजेश गुप्ता को रिंकू और बीना की हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद और 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई थी. जुरमाना अदा न करने पर उसे 6 महीने की सजा और भोगनी थी.

जज साहब ने अपने फैसले में कहा था कि राजेश ने अपनी हवस पूर्ति के लिए 2 महिलाओं की हत्या कर के 2 परिवारों को बरबाद किया है. उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए. लेकिन यह अपराध करने के बाद पश्चाताप में अभियुक्त ने आत्महत्या की कोशिश की और स्वयं अपना अपराध स्वीकार करते हुए अदालत से माफी मांगी, इसलिए उस के लिए उम्रकैद की सजा उपयुक्त है. Punjab News

 

Actress Murder Case: टुकड़ों में मिली अभिनेत्री की लाश

Actress Murder Case: राइमा इसलाम शिमू बांग्लादेश की एक जानीमानी अभिनेत्री थीं. उन्होंने न सिर्फ 50 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, बल्कि 2 दरजन से अधिक नाटकों में भी काम कर दर्शकों के दिलों में जगह बनाई. यह महज इत्तफाक की बात है कि जिन दिनों देश भर में अपने दौर की खूबसूरत और लोकप्रिय अभिनेत्री परवीन बाबी की जिंदगी पर बनी वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ की चर्चा हो रही थी, उन्हीं दिनों बांग्लादेश की परवीन जितनी ही सैक्सी, लोकप्रिय और सुंदर एक्ट्रेस राइमा इसलाम शिमू की दुखद हत्या की चर्चा भी उतनी ही शिद्दत से हो रही थी.

फर्क सिर्फ इतना था कि परवीन बाबी की लाश उन के घर में मिली थी, जबकि राइमा की एक सड़क पर मिली थी. यह सड़क बांग्लादेश की राजधानी ढाका के केरानीगंज अलियापुर इलाके में हजरतपुर ब्रिज के नजदीक है, जो कालाबागान थाने के अंतर्गत आता है. 17 जनवरी, 2022 को राइमा की लाश मिली तो बांग्लादेश में सनाका खिंच गया क्योंकि वह कोई मामूली हस्ती नहीं थीं बल्कि घरघर में उन की पहुंच थी. अपनी अभिनय प्रतिभा के दम पर उन्होंने अपना एक बड़ा दर्शक और प्रशंसक वर्ग तैयार कर लिया था.

जिस हाल में राइमा की लाश मिली थी, उस से साफ जाहिर हो रहा था कि उन की बेरहमी से हत्या की गई है. इस हादसे ने एक बार फिर साफ कर दिया कि रील और रियल लाइफ में जमीनआसमान का फर्क होता है और आमतौर पर फिल्म स्टार्स, फिर वे किसी भी देश के हों, की जिंदगी उतनी हसीन और खुशनुमा होती नहीं जितनी कि उन के जिए किरदारों में दिखती है. यही राइमा के साथ हुआ कि हत्यारा कोई और नहीं बल्कि उन का बेहद करीबी शख्स था और हत्या की वजह कोई अफेयर, पैसों का लेनदेन, कोई विवाद या नशे की लत या फिर कोई दिमागी बीमारी भी नहीं थी.

45 वर्षीय राइमा साल 1977 में ढाका के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी थीं, जिन्हें बचपन से ही अभिनय का शौक था. ढाका से स्कूल और कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक्टिंग का कोर्स भी किया था. 19 साल की उम्र में ही उन्हें ‘बर्तमान’ फिल्म में काम करने का मौका मिल गया था. निर्माता काजी हयात की इस कामयाब फिल्म से वह फिल्म इंडस्ट्री में पहचानी जाने लगीं. फिल्म समीक्षकों ने तो उन की एक्टिंग को अव्वल नंबर दिए ही थे, दर्शकों ने भी उन्हें सराहा था. इस की वजह उन का ताजगी से भरा चेहरा और बेहतर एक्टिंग के अलावा उन की कमसिन अल्हड़पन और खूबसूरती भी थी.

पहली फिल्म कामयाब होने के बाद राइमा ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. देखते ही देखते उन्होंने बांग्लादेश के तमाम दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया. इन में इनायत करीम, शरीफुद्दीन खान, दीपू, देलवर जहां झंतु और चाशी नजरूल इसलाम प्रमुख हैं. सभी छोटेबड़े निर्देशकों के साथ राइमा ने 50 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया और टीवी पर भी अपना जलवा बिखेरा.

लोगों के दिलों में बसी थीं राइमा

छोटे परदे पर आना उन की व्यावसायिक मजबूरी भी हो गई थी, क्योंकि बांग्लादेश के लोग भी टीवी धारावाहिकों को ज्यादा तरजीह देने लगे हैं. राइमा ने कोई 25 धारावाहिकों में एक्टिंग की, जिस से घरघर उन की पहुंच और स्वीकार्यता बढ़ती गई. बांग्लादेश फिल्म इंडस्ट्री के लगभग सभी बड़े नायकों के साथ उन्होंने काम किया. खासतौर से अमित हसन, बप्पाराज रियाज, शाकिब खान, जाहिद हसन और मुशर्रफ करीम के साथ उन की जोड़ी खूब जमती थी.

राइमा आला कारोबारी दिमाग की मालकिन थीं, इसलिए उन्होंने खुद का प्रोडक्शन हाउस भी खोल लिया था. जिस के तहत कई टीवी सीरियल बने थे. अलावा इस के वह फिल्म पत्रकारिता भी ‘अर्थ कोथा द नैशनल बिजनैस मैगजीन’ के लिए करती थीं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस एक्ट्रेस को टीवी न्यूज चैनल एटीएन बांग्ला में सेल्स एंड मार्केटिंग में वाईस प्रेसिडेंट भी नियुक्त किया गया था. जल्द ही एक नामी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी टीएन इवेंट्स लिमिटेड के सीईओ की जिम्मेदारी भी उन्हें दी गई थी.

इतना ही नहीं, उन्होंने बांग्लादेश में ही अपना ब्यूटी सैलून भी शुरू कर दिया था, जिस का नाम रोज ब्यूटी सैलून है. ढाका का ग्रीन रोड इलाका राइमा के घर की वजह से भी पहचाना जाने लगा, जो दर्शकों और प्रशंसकों की नजर में किसी मन्नत या जन्नत से कम नहीं था. लेकिन कोई सोच भी नहीं सकता था कि लाखों लोगों का मनोरंजन करने वाली और दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली इस एक्ट्रेस की निजी जिंदगी किसी नर्क से कम बदतर नहीं थी और इस की वजह था उन का पति शखावत अली नोबेल, जो कभी उन पर जान छिड़का करता था. इन दोनों ने 16 साल पहले लव मैरिज की थी.

शौहर ही निकला कातिल

आम दर्शक इस से ज्यादा कुछ नहीं सोच पाता कि उस की चहेती एक्ट्रेस अपने महल जैसे घर के अंदर सदस्यों के साथ हंसखेल रही होगी, रोमांस कर रही होगी या फिर डायनिंग टेबल पर बैठी लंच या डिनर कर रही होगी. और कुछ नहीं तो पति और बच्चों के साथ आंचल हवा में लहराते लौन के झूले पर झूलती गाना गा रही होगी. उस के इर्दगिर्द रंगबिरंगे फूल और चहचहाते पक्षी होंगे. सर के ऊपर नीला खुला आसमान होगा. लेकिन ऐसा कुछ भी कम से कम राइमा की जिंदगी में तो नहीं था.

पिछले कुछ दिनों से वह बेहद घुटन भरी जिंदगी जी रही थीं. आलीशान घर के अंदर कलह स्थायी रूप से पसर चुकी थी जिस से उन के दोनों बच्चे सहमेसहमे से रहते थे. राइमा और शखावत कहने और देखने को ही साथ रहते थे और मियांबीवी कहलाना भी उन की सामाजिक मजबूरी हो चली थी. लेकिन रोजरोज की मारकुटाई और कलह आम बात हो चुकी थी. यह सब कितने खतरनाक मुकाम तक पहुंच चुका था, इस का खुलासा 17 जनवरी, 2022 को राइमा की लाश मिलने के बाद हुआ. अंदर से टूटी और थकी हुई यह एक्ट्रेस 16 जनवरी को मावा एक शूटिंग के लिए गई थी. लेकिन देर रात तक वापस घर नहीं लौटी तो घर वालों को चिंता हुई क्योंकि राइमा का फोन भी बंद जा रहा था.

कालाबागान थाने में उन की गुमशुदगी की सूचना दर्ज हुई. एक रिपोर्ट राइमा की बहन फातिमा निशा ने भी लिखाई थी. पुलिस ने राइमा की ढुंढाई शुरू की, लेकिन देर रात तक कोई कामयाबी नहीं मिली तो मामला सुबह तक के लिए टल गया. इस दौरान उन का भाई शाहिदुल इसलाम खोकान लगातार पुलिस वालों से बहन को ढूंढने की गुजारिश करते खुद भी राइमा की तलाश में इस उम्मीद के साथ लगा रहा कि कहीं से कोई सुराग मिल जाए. लेकिन उस के हाथ भी मायूसी ही लगी. 17 जनवरी की सुबह कुछ राहगीरों ने हजरतपुर ब्रिज के पास एक लावारिस संदिग्ध बोरे को देख इस की खबर पुलिस को दी. पुलिस ने आ कर जैसे ही बोरे को खोला तो उस में से बरामद हुई राइमा की लाश, जो 2 टुकड़े कर बोरे में ठूंसी गई थी.

गले पर चोट के निशान भी साफसाफ दिख रहे थे, जिस से स्पष्ट हो गया कि राइमा की हत्या हुई है और लाश को यहां फेंक दिया गया है. लेकिन हत्यारा कौन हो सकता है, यह सवाल पुलिस को मथे जा रहा था. राइमा की हत्या की खबर जंगल की आग की तरह फैली और फैंस जहांतहां इकट्ठा होने लगे. शव को पोस्टमार्टम के लिए सर सलीमुल्लाह मैडिकल कालेज भेज दिया गया.

पुलिस को शखावत पर शक तो था ही, लेकिन जैसे ही राइमा के भाई शाहिदुल इसलाम खोकान ने यह कहा कि शखावत एक ड्रग एडिक्ट है. वह अकसर मेरी बहन से कलह करता था. मैं ने उस की कार में खून देखा है. वह सुबह 8 से ले कर 10 बजे तक घर पर नहीं था. मुझे लगता है कि उसी दौरान उस ने राइमा की लाश फेंक दी.

फिल्मों जैसा कत्ल

शाहिदुल की शिकायत पर पुलिस ने शखावत को घेरा तो बिना किसी ज्यादा मशक्कत के उस ने सच उगल दिया. अब तक राइमा के फैंस जगहजगह मोमबत्तियां ले कर उन की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने लगे थे. सोशल मीडिया पर भी राइमा छाई हुई थीं. लोग श्रद्धांजलि देते राइमा के हत्यारे को गिरफ्तार करने की मांग और प्रदर्शन कर रहे थे. हिरासत में लिए गए शखावत ने बगैर किसी खास चूंचपड़ के अपना गुनाह कुबूल लिया. उस के बयान की बिनाह पर 6 लोग और गिरफ्तार किए गए, जिन में उन का ड्राइवर और एक नजदीकी दोस्त अब्दुल्ला फरहाद भी था. फरहाद को शखावत ने फोन कर बुलाया था.

पूछताछ में पता चला कि शखावत और फरहाद ने राइमा की हत्या 16 जनवरी को ही कर दी थी. वक्त था सुबह 7 बजे का. इन दोनों ने राइमा की लाश बोरे में भर दी और उसे प्लास्टिक की डोरी से सिल दिया. यह काम इत्मीनान से बिना किसी अड़ंगे के हो सके, इस के लिए उन्होंने घर पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड को नाश्ता लेने भेज दिया था. घटनास्थल से बरामद डोरी शखावत के गले का फंदा बनेगी, यह भी तय दिख रहा है क्योंकि जब पुलिस टीम घर पहुंची थी तो इस डोरी का पूरा बंडल वहां से बरामद हुआ था. जिस से शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी.

ये दोनों लाश को ठिकाने लगाने के पहले उसे मीरपुर ले गए थे, लेकिन वहां कोई उपयुक्त सुनसान जगह नहीं मिली तो वापस घर आ गए थे. राइमा की लाश उन लोगों के लिए बोझ बनती जा रही थी. मीरपुर से वापसी के बाद दोनों रात साढ़े 9 बजे के करीब हजरतपुर ब्रिज पहुंचे और लाश वाले बोरे को वहीं फेंक दिया, लेकिन हड़बड़ाहट और जल्दबाजी में गलती से डोरी वहीं छोड़ दी, जो उन के खिलाफ एक पुख्ता सबूत बन गई. लाश फेंकने के बाद घर आ कर दोनों ने सबूत मिटाने की गरज से कार को धोया और बदबू दूर करने के लिए उस में ब्लीचिंग पाउडर भी छिड़का. लेकिन इस के बाद भी खून के धब्बे पूरी तरह नहीं मिट पाए थे.

यानी राइमा शूटिंग पर गई है, यह झूठ जानबूझ कर फैलाया गया था, जिस से कत्ल को किसी हादसे में तब्दील किया जा सके या उस का ठीकरा किसी और के सिर फूटे, नहीं तो उसे तो ये लोग 16 जनवरी, 2022 को ही ऊपर पहुंचा चुके थे. गलत नहीं कहा जाता कि मुलजिम कितना भी चालाक हो, कोई न कोई सबूत छोड़ ही देता है फिर शखावत और फरहाद तो नौसिखिए थे, जो यह मान कर चल रहे थे कि उन्होंने बड़ी चालाकी से अपने गुनाह को अंजाम दिया है, इसलिए पकडे़ जाने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होगा. कुछ दिन हल्ला मचेगा और फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा.

पुलिस के सामने शखावत ने शरीफ बच्चों की तरह मान लिया कि राइमा से कलह के चलते उस ने उस का कत्ल किया, लेकिन हकीकत में वह अव्वल दरजे का शराबी और ड्रग एडिक्ट था, जो पत्नी को मार कर उस की सारी दौलत हड़प कर लेना चाहता था, जिस से ताउम्र मौज और अय्याशी की जिंदगी जी सके. पर अब उसे जिंदगी भर जेल की चक्की पीसना तय दिख रहा है. हो सकता है अदालत कोई रहम न दिखाते हुए शखावत को फांसी की सजा ही दे दे, जिस का कि वह हकदार भी है. Actress Murder Case

Love Story: अंधेरे में डूबी जिंदगी

   लेखक – अशोक कुमार प्रजापति, Love Story:  मिताली ने मेरी मंगेतर होते हुए भी मेरे लिए वह कुछ किया था, जो मांबाप भी नहीं कर सकते थे. लेकिन सूर्यबाला के चक्कर में मैं ने उसे इतना बड़ा धोखा दिया कि मेरी जिंदगी ही मेरे लिए धोखा बन गई. बात उन दिनों की है जब मैं भी लाखों युवकों की तरह बेरोजगार था और एक अदद नौकरी की तलाश में दिल्ली की सड़क से ले कर गलियों तक की खाक छान रहा था. नवंबर के शुरुआती दिन थे. खाड़ी देश से मिताली के भेजे रुपए लगभग खत्म हो चुके थे. मतलब जल्दी ही मेरे फाकाकशी के दिन शुरू होने वाले थे. थकहार कर कनाट प्लेस के पालिका बाजार की कछुए की पीठ जैसी उथली पश्चिमी ढलान पर बैठ कर सितारों भरे आसमान को देखना मेरी कई फालतू आदतों में शुमार था. यह काम मैं बिना नागा करता था.

भीड़भाड़ से थोड़ा अलग इन चमकते आकाशीय पिंडों से बातें करना मुझे अनोखा सुकून देता था. मुझे दिन की अपेक्षा रातें कुछ ज्यादा लुभाती थीं. कभीकभी मैं सोचता कि रातें तो तारे गिनने के लिए होती हैं, जबकि लोग इस बढि़या काम से विमुख हो कर अपनेअपने दड़बों में बंद हो कर विभिन्न कामों में वक्त जाया करते हैं.

खैर, मैं ही कौन सा तुर्रम खां था कि तारे गिन डाले हों. मैं न तो कोई ‘एस्ट्रोलोजर’ था और न ही मुझे ऐसे बेढब आकाशीय पिंडों की खोज करनी थी, जो निकट भविष्य में धरती को नेस्तनाबूद करने के लिए इस की ओर भागे आ रहे हों. यह काम तो खगोलवेत्ताओं का है, जो आकाश पर आंख जमाए रातदिन ब्रह्मांड में टकटकी लगाए रहते हैं. बहरहाल, उस सुहानी शाम को भूखे पेट मैं सिर्फ यही कामना कर रहा था कि चांद अपने ही शक्ल की बेहिसाब रोटियां धरती पर फेंके या फिर पास की चमचमाती सड़क पर खनखनाते हुए चांदी के सिक्के बरस पड़े या तारे पिघल कर हीरेमोती में तब्दील हो जाएं और महुए की तरह टपकने लगें. मैं खाहमख्वाह नामुमकिन ख्यालों में खोया था. वैसे खुली आंखों से ख्वाब देखने के लिए वह जगह बुरी नहीं थी.

शाम के धुंधलके में पेड़ों की छाया और झाडि़यों के पीछे रूपसियों की रूमानी हरकतें शुरू हो गई थीं. लोहे के पाइपों पर लगे रोशनी के गोलाकार लैंप जल उठे थे. लोग अपनेअपने भावशून्य चेहरे संभाले कठपुतलियों की तरह इधरउधर आजा रहे थे. पार्क धीरेधीरे खाली होता जा रहा था, सिर्फ मुझ जैसे चंद निखट्टू मिट्टी के लोंदे की तरह जहांतहां पसरे पड़े थे. मेरी नजरें नीली जींस और झकाझक सफेद टौप पहने एक युवती पर जमी थीं. वह भी रहरह कर तिरछी निगाहों से मुझे देख लेती थी. लग रहा था जैसे शाम की ठंडाती हवा को अपनी बांहों में समेटे वह किसी की प्रतीक्षा में खड़ी हो.

अचानक आइस्क्रीम पार्लर से शंकुनुमा आइस्क्रीम खरीद कर खाते हुए वह लापरवाही से पालिका बाजार की ओर चली आई. मैं चारों ओर से खुद को समेटे जेब में पड़े सिर्फ 5 सौ रुपए के नोट को खर्चने के अर्थशास्त्र से जूझने लगा. अगले हफ्ते तक मिताली ने अगर खाते में 8-9 हजार रुपए न डाले तो मकानमालिक मेरा सामान सड़क पर फेंक देगा. इस के बाद बेटिकट यात्रा कर के गांव पहुंचने के अलावा मेरे पास कोई उपाय नहीं रहेगा. मेरा संघर्ष अंतहीन होता जा रहा था.

मिताली मेरी मंगेतर थी. वह बगदाद के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में नर्स थी. वह एक साल के अनुबंध पर वहां गई थी. लौट कर आने पर हमारी शादी होने वाली थी. उसी की सलाह पर मैं नौकरी की तलाश में दिल्ली आया था. मैं सायकोलौजी से पोस्टग्रेजुएट था, वह भी यूनिवर्सिटी टौपर गोल्ड मेडलिस्ट. लेकिन यह सब किसी काम का साबित नहीं हो रहा था. रोटी के लिए मेडल बेचने की नौबत आती दिख रही थी. मेडल का कोई बाजार भाव था या वह भी फालतू चीज थी, बाजार से ही पता चल सकता था.

‘‘दिल्ली में बहुत गरमी पड़ती है?’’ पीछे से खनकती आवाज आई तो मैं ने पलट कर देखा. आइस्क्रीम ले कर जाने वाली वही लड़की मेरे पीछे खड़ी थी.

‘‘हां, यह तो है, लेकिन दिल्ली में गरमी से राहत देने वाली चीजें भी खूब मिलती हैं.’’ मैं ने उस की बात के जवाब में कहा.

‘‘आप तो बड़े दिलचस्प आदमी लगते हैं.’’ अजीब सी नजरों से घूरते हुए वह मेरे बगल में बैठ गई.

‘‘और आप उतनी ही दिल्लगी पसंद भद्र युवती.’’

‘‘यह जगह है ही बड़ी रोमांटिक, आप का क्या ख्याल है?’’

‘‘हां, है तो, शायद आप की खूबसूरती से ही यहां की रूमानियत जिंदा है.’’ मैं कुछ गलत तो नहीं कह रहा?’’

मेरी इस बात पर वह लड़की शरमा कर झेंप गई. ऐसी ही बातों में हम ने लगभग घंटा समय गुजार दिया. इस बीच हमारे बीच तमाम तरह की बातें हुईं, परिचय भी. मुझे वह बड़े जटिल चरित्र की लड़की लग रही थी.

‘‘रात बहुत हो गई है, अब हमें ‘रोटी’ रेस्टोरेंट चलना चाहिए, कुछ खानापीना हो जाए न.’’ वह एकाएक इस तरह बोली जैसे घंटे भर की रोमांटिक बातों से मेरा जी बहलाने के बदले अपना मेहनताना मांग रही हो.

उस की इस चौंकाने वाली सलाह पर मेरे ऊपर बज्रपात सा हुआ. ‘रोटी’ जाने का मतलब था 7-8 सौ रुपए खर्च होना. जबकि मेरी जेब में सिर्फ 5 सौ रुपए का एक नोट था. 30-40 रुपए फुटकर भी रहे होंगे. मुझे आनंद विहार जाने वाली अंतिम मैट्रो भी पकड़नी थी.

‘‘मैं रोटी नहीं खाता. हमारे यहां लोग सुबहशाम भात खाते हैं. वैसे भी मैं ने पिज्जा खा लिया है, इसलिए अब कुछ खाने का मन नहीं है.’’ मैं ने उस बला से छुटकारा पाने की कोशिश में कहा.

‘‘तुम झूठ बोल रहे हो. दिल्ली में बेरोजगारों को बहुत भूख लगती है, वह भी कई तरह की. तुम ने अभीअभी बताया है कि तुम बेरोजगार हो.’’

‘‘केवल बेरोजगार ही नहीं, बिना किसी ठौरठिकाने का भी. मुझे रातें यहीं कहीं फुटपाथ पर गुजारनी है, सो कहीं जाने की जल्दी नहीं है. इसलिए कृपया आप जाइए, आप को देर हो रही होगी. देर रात तक लड़कियों का घर से बाहर रहना वैसे भी सुरक्षित नहीं है.’’ मैं ने पिंड छुड़ाने की गरज से बहाना बनाते हुए कहा.

‘‘लड़कियों जैसे नखरे मत दिखाओ. मुझे भूख लगी है, सो तुम्हें चलना ही पड़ेगा. आखिर हम घंटे भर पुराने दोस्त हैं, मेरी खातिर इतना भी नहीं कर सकते? अब इस पर भी नहीं माने तो मैं शोर मचा दूंगी कि तुम मेरे साथ छेड़खानी कर रहे हो. तुम जानते ही हो कि रेप कांड को ले कर दिल्ली सहित पूरे देश में लोग किस तरह उबल रहे हैं.’’ उस ने कुटिलता से मुसकराते हुए मेरी चेतना को झकझोर दिया.

‘‘बात यह है मिस कि मेरी जेब में सिर्फ 5 सौ रुपए ही हैं और इसी से न जाने कब तक मुझे काम चलाना पड़े. ऐसे में मैं किसी होटल रेस्टोरेंट की गद्दीदार कुर्सी पर बैठ कर गुलछर्रे उड़ाने की बिलकुल नहीं सोच सकता. और ‘रोटीबोटी’ खाने के बाद होटल वालों के जूते खाना मुझे बिलकुल पसंद नहीं है.’’

‘‘बस, इतनी सी बात है. 5 सौ का नोट ले कर मजनुओं के इस टीले पर दिल्ली के रंगीन नजारों का लुत्फ उठाने के लिए आ कर बैठ गए हो. कोई बात नहीं. मेरे पास पैसे हैं, आज तुम्हें मेरा साथ देना ही होगा. लाखों की आबादी वाली इस बेदिल दिल्ली में मैं निहायत अकेली हूं. तनहाई काटने को दौड़ती है. तुम मेरी मजबूरी समझते क्यों नहीं?’’ उदासी से उस ने कहा, ‘‘और हां, मैं रेडलाइट वाली पंछी नहीं हूं, जैसे कि तुम्हारे दिल में खयाल आ रहे होंगे.’’

कुछ मिनट बाद मैं ऊहापोह की स्थिति में उस की तलहथी की मुलायमियत का अनुभव करते हुए धीरेधीरे ‘रोटी’ की ओर चला जा रहा था. सड़क के दोनों ओर अंगे्रजों के जमाने की बनी इमारतों के बुर्ज में कबूतर आशियाना बनाए दुबके बैठे थे. इन पुरानी इमारतों में अजीब तरह की जर्जर भव्यता व्याप्त थी, जो अब इन की विशिष्ट पहचान बन चुकी थी.

‘‘रात गहरा चुकी है. मैं अकेली हूं, तुम चाहो तो मेरे फ्लैट पर रात बिता सकते हो, इतनी रात गए वैसे भी उतनी दूर जाना ठीक नहीं है. दिल्ली में इन दिनों कुछ भी सुरक्षित नहीं है.’’ रोटी रेस्टोरेंट से निकलते ही उस ने बड़ी साफगोई से कहा.

थोड़ी नानुकुर के बाद मैं उस के साथ औटो में बैठ गया. इस के बाद हम दोनों की खूब जम गई. नतीजतन मेरी कई रातें सूर्यबाला के फ्लैट पर गुजरीं. जल्दी उस का एक जोड़ी नाइट सूट मेरे र्क्वाटर पर भी रखा रहने लगा. इसी सब के चलते एक व्यस्त दोपहर को मिताली ने फोन द्वारा सूचना दी कि उस की एक सहेली का कांट्रैक्ट पूरा हो गया है. वह इंडिया जा रही है. उस के हाथों वह मेरे लिए एक उपहार और कुछ सूखे मेवे भेज रही है, दिल्ली रेलवे स्टेशन से ‘कलेक्ट’ कर लूं. मैं ने ऐसा ही किया. मिताली का भेजा गिफ्ट मुझे मिल गया. कमरे पर आ कर मैं ने पैकेट खोला तो उस में एक कीमती मोबाइल फोन था, जिस में ढेर सारे नए फीचर मौजूद थे. नेट और फेसबुक के साथसाथ फोटो भेजने वाली सुविधा भी थी. मिताली ने मेरे लिए एक पत्र भी भेजा था. जिस में उस ने लिखा था कि उस ने गुड़गांव में 70 लाख का एक फ्लैट बुक करा लिया है. उस की किस्तें भी कटने लगी हैं. लेकिन उसे दूसरे तरीके से इस की कीमत चुकानी पड़ेगी.

दरअसल, इस के लिए उस ने 2 साल के लिए अपना कांट्रैक्ट बढ़वा लिया था, जिस से कर्ज अधिक से अधिक भरा जा सके. वह शादी के बाद नए फ्लैट में रहने का अरमान पाले हुए थी. मुझे ‘नेट’ की तैयारी करने की सख्त हिदायत के साथ उस ने आश्वस्त किया था कि जरूरत पड़े तो मैं कोचिंग ज्वाइन कर लूं, पैसे वह भेज देगी. सूर्यबाला को मैं ने ये बातें जानबूझ कर नहीं बताईं. मैं अपने रोमांस और रोमांच भरे आनंदमय जीवन का इतनी जल्दी अंत नहीं करना चाहता था. सूर्यबाला के भी दिन अच्छे नहीं चल रहे थे. वह अपनी प्यारी अम्मा की दयादृष्टि पर दिल्ली में रह रही थी. सूर्यबाला के 27वें जन्मदिन पर मैं ने अपनी मंगेतर द्वारा भेजा गया फोन उसे भेंट कर दिया. मेरे लिए वह किसी काम का था भी नहीं. उसे रिचार्ज कराने के लिए मेरे पास पैसे ही नहीं होते थे.

सूर्यबाला के 27वें जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए मैं ने उसे साथ ले कर नवंबर की उस सुबह काठगोदाम जाने वाली गाड़ी पकड़ ली और नैनीताल पहुंच गया. हमारा तीन दिन का प्रोग्राम था. वहां एक ठंडी शाम में हम नैनी झील के किनारे नैना देवी मंदिर की एक संगमरमरी बेंच पर बैठे पहाड़ से सूर्य का लुढ़कना देख रहे थे. उस के पहाड़ के पीछे छिपने के बाद भी घाटी आलोकित रही, हवा के झोंके झील को स्पर्श करते हुए मल्लीताल की ओर चले जा रहे थे.

‘‘एक बात बताओ सूर्यबाला, तुम ने ऐसी कौन सी गलती कर दी कि तुम्हारे पिता ने एकाएक तुम्हें पैसे देने बंद कर दिए?’’

‘‘पापा मुझे सिविल सेवा में भेजना चाहते थे. मैं पढ़ाई में साधारण थी, इस के बावजूद बोर्ड में जुगाड़ से मेरे अच्छे नंबर आ गए थे. लेकिन नंबरों का प्रतिशत कम होने की वजह से मेरा एडमीशन किसी नामी गिरामी कालेज में नहीं हो सका. परिणामस्वरूप मुझे डीयू के नार्थ ब्लाक के एक साधारण से कालेज में एडमीशन ले कर पढ़ाई करनी पड़ी.

‘‘ग्रैजुएशन के बाद मैं महत्त्वाकांक्षी बाप के दबाव में सिविल सर्विस की तैयारी करने लगी. लाख कोशिश के बाद भी मैं प्रारंभिक परीक्षा तक नहीं पास कर सकी. मेरी असफलता से नाराज हो कर पापा ने एक अरबपति सांसद के बेटे से मेरी शादी तय कर दी. शादी का यह सौदा 3 करोड़ में तय हुआ था.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात थी. बाप अरबपति था तो लड़का भी कम से कम करोड़पति तो रहा ही होगा. स्विस बैंक में भी कुछ जमा होंगे. इतना होने के बावजूद समस्या क्या थी? तुम तो वहां ऐश करतीं.’’

‘‘ऐश क्या करती, लड़के पर 3-3 हत्याओं और 2 दुष्कर्म के केस दर्ज थे. उस का एक पैर जेल में तो दूसरा कोर्ट में रहता था. क्या तुम ऐसे लड़के के साथ शादी की सलाह दे सकते हो?’’

‘‘कदापि नहीं, लेकिन यहां मामला कुछ अलग है. ऐसे लोगों के लिए यह अपराध नहीं है. उन के लिए यह राजनीतिक जीवन की योग्यता है. ऐसे लोगों के खिलाफ कभी गवाहसबूत नहीं मिलते, सो सजा भी नहीं होती. अगर सजा हो भी गई तो तुम्हारे ऊपर क्या फर्क पड़ता, उस की दौलत की मालकिन तो तुम ही होती न, इस दुनिया में मर्दों की कमी तो है नहीं?’’

‘‘बात यहीं खत्म नहीं हुई थी सुशांत. मेरे पिता ने मेरे बौयफ्रैंड के हाथपैर तुड़वा दिए थे. वह बेचारा आज तक लापता है. पता नहीं जीवित भी है या नहीं? मैं इस घटना के बाद डिप्रेस हो गई थी और शादी से साफ मना कर दिया था. बस उस के बाद उन्होंने मुझे खर्च देना बंद कर दिया था. मम्मी चोरीछिपे कुछ पैसे भेज देती हैं.’’

तुम्हारी कहानी तो बड़ी ही दुखद है सूर्यबाला. खैर, तुम्हारा एक अंतिम चांस बचा है, तुम तैयारी शुरू कर लो. जनरल और औप्शनल पेपर की कोचिंग कर लो. सायकोलौजी मैं तैयार करा दूंगा.’’

‘‘क्या मास्टर डिग्री में तुम्हारा सब्जेक्ट सायकालौजी रहा है?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘हां, मैं यूनिवर्सिटी टौपर हूं और गोल्डमेडलिस्ट भी. मेरे पास अच्छे नोट्स हैं.’’

‘‘अरे, पहले कभी नहीं बताया?’’ वह प्यार से मेरे सीने पर मुक्का जमा कर बोली.

‘‘लेकिन कोचिंग के लिए 78 हजार रुपए कहां से आएंगे?’’

‘‘तुम्हें इस की चिंता करने की जरूरत नहीं है. उस का इंतजाम मैं कर लूंगा.’’

‘‘तो ठीक है, मैं एक कोशिश और करती हूं. तुम्हारे साथ होने से शायद सफलता मिल ही जाएं.’’

मैं ने मिताली से नेट की तैयारी के लिए कोचिंग करने की इच्छा जताई तो अगले सप्ताह ही उस ने मेरे खाते में 90 हजार रुपए डलवा दिए. मैं ने पैसे सूर्यबाला को दे दिए. इस के बाद उस ने कोचिंग ज्वाइन कर ली और मैं शिक्षा व्यवस्था को कोसता घर पर ही तैयारी करने लगा. इस बीच मैं ने एक स्कूल में टीचर की नौकरी कर ली थी. 15 हजार हर महीने वेतन का एग्रीमेंट हुआ था. लेकिन बेईमान स्कूल प्रबंधन सिर्फ 12 हजार रुपए ही देता था. जो कुछ मिल रहा था, कम से कम इस से मेरी बेरोजगारी कुछ हद तक दूर हो गई थी, साथ ही मेरी मटरगश्ती पर बे्रक भी लग गई थी. तारों की गिनती भूल गया था और चांद भी मेरे आकाश से कब का गायब हो गया था.

परीक्षा समाप्त होने पर सूर्यबाला मेरे साथ रहने लगी. मैं स्कूल से लौटता तो वह युवाओं के आजकल के खिलौने से खेलती मिलती. वह उस में इस तरह डूबी रहती कि मेरे कदमों की आहट तक उसे सुनाई न देती. खाते समय या बिस्तर पर वह बताती रहती कि उस ने आज कहांकहां, कितनों को एड किया, उस की पोस्ट को कितने लोगों ने लाइक किया. उस के लाइक करने वालों की संख्या 25 हजार के ऊपर हो चुकी थी और उस के डेढ़ हजार फालोवर थे. दुनिया का शायद ही कोई देश बचा हो, जहां उस के स्त्रीपुरुष मित्र न रहे हों. उन दिनों वह उसी में खोई रहती थी. मैं रोजाना उस में आने वाले बदलावों को समझने की नाकाम कोशिश कर रहा था. हमारे बीच का शारीरिक आकर्षण और यौन आवेश लगभग ठंडा पड़ चुका था. उपहार में उसे मोबाइल देना मुझ पर भारी पड़ता जा रहा था.

गरमी की छुट्टियां चल रही थीं. मेरा अधिकतर समय घर पर ही बीत रहा था. उन्हीं दिनों इराक में शिया अलगावादियों ने अपने ही देश के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था. कई शहर और तेल कुओं पर उन का कब्जा हो गया था. वे तेजी से बगदाद की ओर बढ़ रहे थे. सारे संपर्क लगभग टूट चुके थे. कई दिनों की लगातार कोशिश के बाद मिताली से कुछ मिनट के लिए संपर्क हुआ. मैं ने उसे सब कुछ छोड़ कर जितनी जल्दी हो सके, किसी तरह घर लौट आने की सलाह दी. लेकिन उधर से सिर्फ उस की गहरी सिसकियां सुनाई देती रहीं.

कुछ मिनट बाद संपर्क फिर से टूट गया. अगले दिन अखबार में खबर आई कि जिस अस्पताल में वह नौकरी करती थी, उस के बाहर भारी गोलाबारी हो रही थी. नर्सें बेसमेंट में छिपी थी. 2 दिनों बाद पता चला कि नर्सों को विद्रोही अगवा कर के कहीं दूसरी जगह ले जा रहे थे. चिंता के मारे मेरी रातों की नींद उड़ गई थी. मैं अपना यह दुख सूर्यबाला से शेयर भी नहीं कर सकता था. मुझे उदास देख कर वह भी उदास हो जाती थी. लेकिन उस ने मेरी उदासी का कारण नहीं पूछा.

चंद दिनों बाद एक अखबार ने रहस्योद्घाटन किया कि कुछ नर्सें इसलिए वापस नहीं आना चाहतीं, क्योंकि उन्होंने बड़े शहरों में फ्लैट के लिए भारी कर्ज ले रखा है और गल्फ कंट्री की मोटी तनख्वाह वाली नौकरी के बगैर उन का कर्ज अदा करना संभव नहीं है. गोलीबारी में 2 नर्सें मारी भी गई थीं. घायल तो कई नर्सें हुई थीं. अपने घर वालों के दबाव में ज्यादातर नर्सें लौटना चाहती थीं. अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की नीति के अनुसार, इराकी सरकार की मदद के लिए फौज भेजने के निर्णय के बाद तो स्थिति और भी विस्फोटक हो गई, हालात बिगड़ने लगे थे.

इसी बीच भारत सरकार की मदद से तमाम लोग वापस भी आ गए थे. उन से भी कोई पक्की खबर नहीं मिल सकी थी. वहां के समाचार के लिए हम पूरी तरह से मीडिया के मोहताज थे. मिताली और मेरे परिवार वाले भी परेशान थे. लोग सरकार से लगातार नर्सों की सुरक्षित वापसी के लिए गुहार लगा रहे थे. इस से अधिक वे लोग कर भी क्या सकते थे? मेरे दिन उदासी में कट रहे थे. उसी बीच एक दिन सूर्यबाला ने खुशखबरी सुनाई कि वह प्रारंभिक परीक्षा में पास हो गई थी. उस दिन हमारे सपनों को पंख लग गए थे. हालांकि वे पंख इतने मजबूत नहीं थे कि मैं उन की बदौलत आकाश की असीम ऊंचाइयों तक उड़ान भर सकूं. हम ने यादगार बनाने के लिए वह शाम एक पांचसितारा होटल में बिताई. एग्जाम की कौपी जांचने के मानदेय रूप में मिले 8 हजार रुपए वहां हवा हो गए.

4 दिनों बाद खबर छपी कि अगवा भारतीय नर्सों का उपयोग विद्रोही ढाल के रूप में कर रहे हैं. उन्होंने धमकी दी थी कि अगर उन पर अमेरिकी या पश्चिमी देशों द्वारा सैन्य कारवाई की गई तो वे उन्हें मार डालेंगे. यह खबर पढ़ कर मेरा दिमाग सुन्न हो गया. परिवार वालों के होश फाख्ता हो गए. नर्सों को न जाने कितनी मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी जा रही होंगी. मैं उस दिन को कोसने लगा, जब मंगनी के 2 दिनों बाद ही मिताली बगदाद जाने की जिद करने लगी थी. मेरे लाख मना करने के बावजूद कसमोंवादों की घुट्टी पिला कर वह अपनी महत्वाकांक्षा की भारी भरकम गठरी लिए दूर देश चली गई थी. जैसेतैसे दिन तनावपूर्ण वातावरण में कट रहे थे. नर्सों की वापसी की उम्मीद धूमिल पड़ती जा रही थी. मैं भीषण मानसिक द्वंद्व में जी रहा था, साथ ही बड़ी निर्लज्जता से सोच रहा था कि मिताली का जो भी होना हो, जरा जल्दी हो जाए.

उन दिनों मेरा सारा ध्यान सूर्यबाला पर केंद्रित होता जा रहा था. हालांकि एक अनजान डर दिल में बसा था. सूर्यबाला की बोल्डनेस और एकदम खुले विचार पर मैं मुग्ध था. उस की अत्याधुनिक पश्चिमी सोच का कोई भी कायल हो सकता था. संकीर्णता उस के दिमाग में रत्ती भर भी नहीं दिखाई देती थी. उस की मुसकराहट ऐसी थी कि दुश्मन भी फिदा हो जाए. नेट क्वाईलीफाई करते ही मेरा आत्मविश्वास सातवें आसमान पर जा पहुंचा. फटाफट मैं ने 6-7 जगहों पर प्रवक्ता के लिए आवेदन कर दिया था. सूर्य बाला मुख्य परीक्षा की तैयारी में लगी थी. उस के हिस्से की घरेलू जिम्मेदारी मैं ने अपने जिम्मे ले ली थी. खाना बनाने से ले कर उस के कपड़े तक मैं धोता था. मैं चाहता था कि अंतिम चांस में वह निश्चित रूप से सफलता हासिल कर ले.

वक्त अपनी गति से बीत रहा था. जाड़ा, गरमी और बरसात अपनेअपने तामझाम के साथ आतेजाते रहे. बगदाद से किसी भी तरह की खबर मिलनी बंद हो चुकी थी. मीडिया वाले ऊब चुके थे. हम पर निराशा के बादल गहराते जा रहे थे. सूर्यबाला का अधिकतर समय बाहर घूमनेफिरने या नेट पर चैट में गुजरता था. धीरेधीरे हमारे बिस्तर अलग हो गए. हम मशीनी जिंदगी से ऊब से गए थे. एक शाम लंबे अंतराल के बाद हम दोनों आमनेसामने बैठे थे. उस ने अपने हाथों को कैंची की तरह बांध रखा था. उस के खुले चमकीले रेशमी बाल लहरा रहे थे. उस के चेहरे पर एक बेबसी भरी लाचारी छाई थी.

मैं ने बात शुरू करने की गरज से कहा, ‘‘आज रात की हवा में ठंडक है, अक्तूबर बीता जा रहा है.’’ मैं सोचता हूं कि अब हमें शादी कर लेनी चाहिए या यह कहें कि अपने रिश्ते को नाम दे दिया जाए.

‘‘आज यह बचकाना विचार तुम्हारे दिमाग में कहां से आ गया.’’ उस ने कहा.

‘‘देखो सूर्यबाला, हमारे बीच अब किसी तरह की दूरी नहीं बची है. फिर शादी तो हमें एक न एक दिन करनी ही है इसलिए जितनी जल्दी हो सके, हमें विवाह कर लेना चाहिए. क्योंकि इस में सब से बड़ी मुश्किल यह है कि हम अलगअलग जाति से हैं, इसलिए तमाम रुकावटें आएंगी.’’

‘‘यह सच है कि हमारे बीच शारीरिक संबंध हैं, लेकिन यह एक तरह की भूख है. किसी भी तरह की भूख को शांत करने के लिए जातिधर्म की बातें एकदम बेमानी हैं. हम ने एक दूसरे को भोगा है और एक जैसा आनंद प्राप्त किया है, सो हिसाबकिताब बराबर रहा. हमारे पास अब खोनेपाने को कुछ नहीं बचा. इस तरह के संबंधों पर हायतौबा मचाना बेकार है. शाम होने को है, घर में सब्जी का एक टुकड़ा नहीं है. इन अर्थहीन बातों में समय गंवाने के बजाय बाजार से सामान लाना ज्यादा महत्वपूर्ण है.’’ सूर्यबाला ने बेरुखी से कहा.

‘‘आई एम सीरियस सूर्यबाला, जबकि तुम मेरी बात का मजाक उड़ा रही हो? हम एकदूसरे से प्रेम करते हैं. जिस मोड़ पर हम पहुंच चुके हैं, वहां से पीछे लौटना संभव नहीं है.’’ मैं ने मन की बात कह दी.

‘‘लेकिन मैं ऐसी बेतुकी बातों को सीरियसली नहीं लेती. हुंह… प्रेम, हमबिस्तर होने का मतलब कब से प्रेम हो गया? हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं है. शारीरिक, आर्थिक या बौद्धिक आकर्षण और स्वार्थ सिद्धि के दांवपेंच को प्रेम कहना उस की तौहीन है. हमारातुम्हारा प्रेम सिर्फ ढोंग है, एक्साइटिंग फन, एक साथ मल्टीपल एंड प्लांड रोमांसभोग का खूब मजेदार और उत्तेजनापूर्ण गेम. इस में थ्रिल भी है और सस्पेंस भी. हमारा रोमांटिक सफर यहीं तक था. इस मोड़ से आगे 2 रास्ते हैं, जिन पर हम अलगअलग चलते हुए अपना सफर जारी रख सकते हैं.’’ उस ने बेबाकी से कहा.

‘‘तुम कल की प्रशासक हो. तुम्हें तो कम से कम ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए. ईमानदारी और सचरित्रता एक अच्छे प्रशासक की पहली शर्त है. देश की सेवा का व्रत लेने वाले का चरित्र अनुकरणीय होना चाहिए.’’

‘‘कोई सेवावेवा के लिए सिविल सर्विस में नहीं जाता, मि. सुशांत. उन के दिमाग में दंभपूर्ण और दूर का शातिराना लक्ष्य होता है, पावर और पैसा. सेवा भावना सिर्फ नैतिक पाखंड है, कंप्लीट हिपोक्रेसी. वैसे अपवाद तो सब जगह होते हैं.’’

‘‘तुम सही हो सकती हो, लेकिन वह अलग मसला है. हमारे बीच लंबे समय से शारीरिक संबंध रहे हैं. इसलिए विवाह हमारी नैतिक जिम्मेदारी बन गई है.’’ मैं ने उसे समझाना चाहा.

‘‘तुम झूठ बोल रहे हो. तुम भी मेरी तरह कपटपूर्ण जीवन जी रहे हो. आज के अधिकतर युवा गलाकाट प्रतियोगिता में तनावग्रस्त हैं. वे इस से मुक्ति के लिए शराब, सिगरेट और मादक पदार्थों का प्रयोग करते हैं, जो अंततोगत्वा उन्हें बरबाद कर देता है.

‘‘मैं ने शारीरिक संबंध को तनाव दूर करने के लिए खुराक के रूप में प्रयोग किया है और इस काम में बराबर का साथ देने के लिए मैं तुम्हें धन्यवाद देती हूं. इस से अधिक कुछ नहीं है. और तुम यौन संबंध और विवाह को एकदूसरे का पूरक मान बैठे हो. लेकिन इन दोनों में दूरदूर तक कोई संबंध नहीं है.

‘‘जिस्मानी संबंध स्थापित करना एक बात है और उसी पार्टनर से विवाह करना बिलकुल अलग बात होती है. एक का संबंध शारीरिक भूख से है, जबकि दूसरा अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है. भूख की आंच में घृणा, आस्था, विश्वासअंधविश्वास, मानसम्मान सब जल कर खाक हो जाते हैं. विवाह के लिए कई सामाजिक शर्तें होती हैं, जिसे हमतुम पूरा नहीं करते. हम अलगअलग जाति से ताल्लुक रखते हैं. मैं विजातीय विवाह कर के जीवन में किसी तरह का टंटाबखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहती. इसलिए तुम भी इस तरफ सोचना बंद कर दो.’’

इतना कह कर वह सब्जी लाने के लिए थैला ढूंढ़ने किचन में चली गई.

‘‘तो मैं इतने दिनों तक नाहक ही पैसे और वक्त बरबाद करता रहा?’’ उस के वापस आने पर मैं ने पूछा.

‘‘बरबाद करना मत कहो, इंजौय करना कहना उपयुक्त होगा.’’ थैला उठाते हुए उस ने कहा. मानो यह सब उस के प्लान के अनुसार हो रहा था. सूर्यबाला की 2 टूक बातों से मैं भौंचक रह गया था. मेरे दिमाग में जैसे भूसा भर गया था. वह अकेली ही बाजार चली गई. मेरे मन में सूर्यबाला की महीनों से बनी छवि एकबारगी ध्वस्त हो गई. मैं अचानक आकाश से जमीन पर आ गिरा और मिताली के प्रति विश्वासघात के दर्द से कराह उठा. सूर्यबाला के जाल में फंस कर मैं मिताली को लगभग भूल चुका था. अचानक बेतरह उस की यादें सताने लगीं. सूर्यबाला बेहद खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन उस के बदन की स्त्रैण खुशबू अद्वितीय थी, जिस के जादू से मैं बच नहीं सका था. मेरी वह रात जैसेतैसे करवट बदलते गुजरी.

अगले दिन स्कूल से लौटा तो सूर्यबाला घर में नहीं थी. वह अपना सामान पैक कर के जा चुकी थी. उस का मोबाइल भी बंद था. दिल तो टूटने के लिए ही बना है और वह टूट चुका था. मैं कई दिनों तक ऊहापोह की स्थिति में जीता रहा.  इसी तरह कई महीने बीत गए. जब नहीं रहा गया तो एक दोपहर को अंतिम उम्मीद ले कर मैं उस के बदरपुर स्थित फ्लैट पर पहुंच गया. संयोग से वह फ्लैट पर ही थी. मुझे सामने पा कर वह चौंकी और देर तक मुझे चुपचाप घूरती रही.

‘‘कैसी हो? अंदर आने को नहीं कहोगी?’’ मैं ने ढिठाई से कहा.

‘‘ठीक है, आ जाओ. लेकिन मुझे जरूरी काम से कहीं जाना है, इसलिए जो कुछ भी कहना है, जरा जल्दी कहो.’’ उस ने चाय का पानी इंडक्शन चूल्हे पर चढ़ाते हुए कहा.

मैं ने कमरे में इधरउधर नजर डाली. खूंटी पर 3-4 मर्दाना कपड़े टंगे थे, जहां कभी मेरे टंगे होते थे. मेज पर सुनहरे फ्रेम में जड़ी एक नवयुवक की तस्वीर रखी थी.

‘‘तुम्हारे सिविल सर्विस के रिजल्ट का क्या हुआ?’’ मैं ने उत्सुकतावश पूछा.

‘‘होना क्या था, नहीं हुआ.’’ शीशे की तिपाई पर चाय रखते हुए बिना किसी लागलपेट के उस ने कहा.

‘‘अब आगे क्या करोगी?’’

‘‘अभी कुछ सोचा नहीं. वर्षों की थकी हूं, कुछ दिन आराम करूंगी. उस के बाद डिसाइड करूंगी कि क्या करना है. और तुम?’’

‘‘अभी कहीं से काललेटर नहीं आया है. प्रतीक्षा कर रहा हूं. और अब यह नया शिकार कौन है?’’ मैं ने फोटो की ओर इशारा कर के पूछा.

‘‘यह मेरा दूर का रिश्तेदार है. अब हम ‘लिवइन रिलेशन’ में हैं और जल्दी ही शादी करने वाले हैं. एमएनसी में सौफ्टवेयर इंजीनियर है, 7 लाख का पैकेज है. यह तुम्हारे मोबाइल का ही कमाल है, उसी ने हमें मिलाया है, तुम्हें कैसा लगा?

‘‘देखने में तो ठीकठाक है, बिस्तर पर कैसा व्यवहार करता है, यह तो तुम जानो.’’ मैं ने इर्ष्यावश उसे चिढ़ाने की नीयत से कहा.

अंतिम कोशिश का विकल्प समाप्त हो चुका था. अब वहां एक पल के लिए भी रुकना मुश्किल हो रहा था. चाय के लिए थैंक्स बोल कर मैं सीढि़यां उतरने लगा. मैं ने अपने पीछे खटाक से दरवाजा बंद होने की कर्कश आवाज सुनी. वह गुस्से में थी. मैं तेजतेज कदमों से 3-4 पतली गलियों को पार कर के सड़क पर आ गया. कनेर की छांव में पल भर रुक कर गहरीगहरी सांसें लीं, सिर उठा कर ढलते सूरज को देखा और उस के अस्त होने की दिशा में चल पड़ा.

वक्त रुका नहीं था. रूस ने अंतरिक्ष में 5 सितारा होटल बना लिया, पश्चिमी वैज्ञानिकों ने कमजोर दिल को मजबूत करने वाली कोशिकाएं विकसित कर लीं. उधर अमेरिका ने अपने हथियारों के जखीरे में चंद महाघातक हथियार और शामिल कर लिए. भारत में कुछ करोड़ और बच्चे पैदा हो गए. यही नहीं भारत ने मंगल की ओर कदम बढ़ा दिए. समाज में मल्टीपल लिवइनरिलेशन का आगाज हो चुका था.

मैं एक मौकापरस्त युवती की चालाकी से आहत अपनी बेवकूफी पर लज्जित था. अपने मिथ्या प्रेम की अप्रत्याशित परिणति पर उतना ही हैरान भी. स्कूल में होली की लंबी छुट्टियां चल रही थीं. लगभग साल भर के अंतराल के बाद एक शाम मैं ने अपने गांव जाने वाली ट्रेन पकड़ ली. घर पर किसी ने उत्साह से मेरा स्वागत नहीं किया. मां के चेहरे पर मेरे लिए अतिरिक्त सहानुभूति थी और पिता 2 दिनों बाद पहला वाक्य बोले, ‘‘कब लौटना है?’’

दिल्ली के मेरे कृत्यों की जानकारी सब को हो चुकी थी. होली के 3 दिनों बाद निर्लज्जता की सफेद खाल ओढ़ कर मैं ने एक बार मंगेतर के गांव जाने का निश्चय ही नहीं किया बल्कि अगले दिन 3 घंटे की बस यात्रा कर के वहां पहुंच भी गया. मुझे अपने दरवाजे पर देख कर मेरी भावी सास रोनेपीटने लगी. मैं समझ रहा था कि शायद मिताली को कुछ हो गया है, सो मेरी सूरत रोनी हो गई.

‘‘युद्ध के खत्म होते ही वह लौट आई थी, पर अब वह पहले वाली मिताली नहीं रही. तुम चाहो तो एक बार मिल सकते हो, लेकिन मुझे लगता है कि कोई फायदा नहीं होने वाला. वह तुम्हारे बारे में सब कुछ जान चुकी है.’’ सिगरेट की खाली डिबिया पर भद्दे अक्षरों में लिखा पता थमाते हुए मिताली के बूढ़े पिता बोले और लाठी उठा कर खेतों की ओर चले गए. 2-4 कदम जा कर वह पलट कर बोले, ‘‘और हां, अब तुम्हें मेरे यहां आने की जरूरत नहीं है. समाज में मेरी भी कुछ मानमर्यादा है.’’

दरवाजे के पीछे से मिताली की छोटी बहन रुआंसा चेहरा लिए सब देखसुन रही थी. मैं तकरीबन 20 मिनट से खड़ा था, पर किसी ने बैठने तक को नहीं कहा. अपनी निरर्थक उपस्थिति को समेट कर मैं ने एक नजर उस छोटी लड़की पर डाली और चुपचाप स्टेशन जाने वाली राह पर चल पड़ा. दिल्ली पहुंचने के तीसरे दिन डाकिया 2 नियुक्ति पत्र दे गया. एक जेएनयू से था और दूसरा पटना स्थित एक बी ग्रेड कालेज का. मुझे थोड़ी खुशी हुई, पर जल्दी ही इन में से एक का चुनाव करना था. मेरे पास 2 ही सप्ताह का समय था. मैं ने जेएनयू का औफर स्वीकार कर लिया. देखतेदेखते लंबा समय गुजर गया.

साल भर बाद अप्रैल की पहली तारीख को मैं ने स्कूल के प्रिंसिपल को अपना इस्तीफा सौंप दिया और अपना हिसाबकिताब कर के दिल्ली से सदा के लिए विदा लेने का फैसला कर लिया. लेकिन जाने से पहले भीषण मानसिक कशमकश और ऊहापोह की स्थित में मैं ने एक बार अपनी मंगेतर से मिलने का फैसला किया. उस का पता मेरे पास था ही. गरमी तेज हो चुकी थी, इसलिए सुबह जल्दी ही उस के फ्लैट पर पहुंच गया और घंटी बजा कर दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करने लगा. दरवाजा खुला तो मैं ने कहा, ‘‘कैसी हो, अंदर आने को नहीं कहोगी?’’

‘‘मैं तुम्हें अंदर आने को क्यों कहूं? कोई वजह बची है क्या?’’ नाराज हो कर उस ने कहा.

‘‘क्यों, हमारी मंगनी हो चुकी है. यह वजह कम है क्या?’’ मैं ने अपने होंठों पर मुसकान लाने की कोशिश करते हुए बेशरमी से कहा.

‘‘अरे वाह, निर्लज्जता की किस मिट्टी के बने हो तुम? अगर तुम मेरे मंगेतर हो तो मंगेतर का मोबाइल तो दिखाओ.’’ हाथ कंगन को आरसी क्या वाली कहावत के अंदाज में उस ने हाथ नचाते हुए कहा.

‘‘वह दूसरी कहानी है, वही तो बताने आया हूं.’’

‘‘अच्छा. आओ अंदर आ जाओ. मैं भी तो सुनूं तुम्हारी वह दर्द भरी कहानी. लेकिन मुझ से किसी स्वागतसत्कार की आशा मत करना. और अगर यहां कुछ लेने आए हो तो निराश ही होना पड़ेगा. समझ गए न? मैं पहले ही काफी बेवकूफी कर चुकी हूं. अब कोई बेवकूफी नहीं करूंगी.’’

‘‘मैं समझता हूं कि जो कुछ कहनेसुनने आया था, वह सब तुम्हें पहले से ही पता है. अब कुछ भी कहना बेकार है. मुझे अफसोस है कि मैं तुम्हारे विश्वास पर खरा नहीं उतर सका. इस के लिए पूरी तरह से मैं ही जिम्मेदार हूं.

‘‘तुम्हारा वह बेशकीमती मोबाइल फोन तुम तक पहुंच गया है. तुम ने उस के अंदर स्वर्णाक्षरों में अपना नामपता लिखवा रखा था, यह सब सूर्यबाला ने मुझे बता दिया था. मैं उस के बारे में कुछ भी कहने की बेशर्मी नहीं कर सकता. मुझे खेद है कि मैं तुम्हारे विश्वास का कत्ल कर के तुम्हारे खूनपसीने की कमाई एक धूर्त और मक्कार लड़की पर लुटाता रहा, उसे बदचलन नहीं कहूंगा. हां, इतना जरूर कहूंगा कि मंगनी के बाद डेढ़ साल की प्रतीक्षा किसी लड़के के लिए बेसब्र कर देने वाली होती है. इसे मेरा इजहार मत समझना.’’

हम टेबल के आरपार बैठे थे और हमारे बीच लंबी असहजता पसरी थी. सड़क किनारे नंगे शीशम पर एक अबाबील चिडि़या बैठी अपने पर खुजला रही थी. हम एकदूसरे के दिल में अभी भी जिंदा थे. मैं ने कहा, ‘‘मंगनी के बाद तुम ने अपने दिल के दरवाजे बंद कर लिए, पर मैं वैसा नहीं कर सका. खैर, अब वक्त काफी पीछे रह गया है. मेरी वजह से तुम्हें जो पीड़ा पहुंची है, उस के लिए माफी ही मांग सकता हूं. अब इस के सिवा मैं और कुछ कर भी तो नहीं सकता.’’

वह उठ कर अंदर चली गई. किचन से बर्तन के खनकने की उदास आवाज आती रही. कुछ मिनट बाद वह एक प्याली चाय बना लाई और चुपचाप मेरे सामने रख दी. निश्चित रूप से वह एक दयालु युवती थी. वह कुछ देर पहले कही अपनी ही कठोर बातों पर अडिग नहीं रह सकी. उस के चेहरे से अब तक मेरे प्रति उपजी घृणा तिरोहित हो चुकी थी और उस की जगह गंभीर औपचारिकता और शांति ने ले ली थी.

‘‘इराक युद्ध में तबाही के सिवा उस देश को कुछ भी हासिल नहीं हुआ, लेकिन उस की बड़ी कीमत मुझे चुकानी पड़ी.’’ उस की आवाज लगभग फुसफुसाहट जैसी थी.

मैं चाय की चुस्की के लिए प्याले को होंठों से कुछ दूरी पर थामे रहा. रोकने की लाख कोशिश के बावजूद मेरी आंखों से दो बूंद आंसू प्याले में टपक पड़े. मैं ने प्याला टेबल पर वहीं रख दिया, जहां से उठाया था और नि:शब्द बैठा रहा. मेरे होंठ कांप रहे थे. मिताली निहायत उदासी में डूबी मुझे पढ़ने की कोशिश में लगी थी. मैं ने उठते हुए कहा, ‘‘चाय के लिए धन्यवाद, पर मुझे अफसोस है कि अपनी ही वजहों से मैं तुम्हारे अनुपम और अंतिम उपहार को भी संभाल न सका. अच्छा, अब मैं चलूं प्रिय, धूप तेज हो रही है?’’

‘‘क्या कहा… प्रिय?’’ वह जरा तल्खी से बोली.

‘‘हां, और शायद अंतिम बार. मुझे जेएनयू और पटना के कालेज में प्रवक्ता की नौकरी का औफर मिला है. न मालूम क्यों, मैं दिल्ली छोड़ रहा हूं. पटना का औफर स्वीकार कर लिया है. मेरे मातापिता बूढ़े हो चले हैं. मैं उन के पास रहना चाहता हूं. कुछ सामान पैक करना है, भारीभरकम वस्तुएं बेच दूंगा. और ये रुपए रख लो. तुम ने बड़े कठिन समय में मेरी सहायता की थी, 75 हजार हैं. मंगनी की अंगूठी और बाकी रुपए बाद में भेज दूंगा.’’

रुपयों से भरा लिफाफा मेज पर रख कर मैं ने अलविदा के लिए हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘हो सके तो मेरी नादानियों को माफ कर देना.’’

मिताली बिना कुछ बोले आंचल में मुंह दबा कर तेजी से बेडरूम की ओर भागी, जहां से उस के सुबकने की आवाज आ रही थी. मैं आहिस्ता से फ्लैट से बाहर आया, दरवाजा भेड़ा और मुख्य सड़क पर निकल आ गया. मैं ने एक बार पलट कर उस तिमंजिले भवन की ओर देखा, बालकनी में मिताली खड़ी थी. क्रोटन की सुनहरी पत्तियों और बेला के सफेद फूलों के बीच से उस का उदास चेहरा अंतिम बार देख रहा था.

औटो पर सवार हो कर मैं ने ड्राइवर से कहा, ‘‘आनंद विहार.’’ Love Story

 

UP News: मोहब्बत की बुनियाद पर रची साजिश

UP News: सना ने प्यार की बुनियाद रखी तो थी प्रेमी सौरभ सक्सेना के साथ, लेकिन महत्त्वाकांक्षाओं ने उस के कदम खुरशीद आलम की तरफ मोड़ दिए. फिर सना ने सौरभ को रास्ते से हटाने के लिए खुरशीद के साथ मिल कर ऐसी साजिश रची कि…

मुरादाबाद शहर की रामगंगा विहार फेज-2 कालोनी का रहने वाला सौरभ सक्सेना रोज की तरह 6 फरवरी, 2015 को भी सुबह साढ़े 6 बजे मौर्निंग वौक के लिए घर से निकला. वह घूमटहल कर घंटे-2 घंटे में घर लौट आता था, लेकिन उस दिन वह 2-3 घंटे तक नहीं लौटा तो पिता के.सी. सक्सेना  ने यह जानने के लिए उसे फोन लगाया कि वह कहां है और अब तक घर क्यों नहीं लौटा? लेकिन उस का फोन बंद था. घर वालों ने सौरभ के दोस्तों को फोन किया तो पता चला कि वह उन के पास भी नहीं गया. उस का कहीं पता न चलने पर घर वाले परेशान हो गए.

सौरभ ने कुछ दिनों पहले ही आशियाना मोहल्ले में स्थित बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी जिम जाना शुरू किया था. यह बात उस के बड़े भाई गौरव को पता थी. सौरभ जिम गया था या नहीं, यह जानने के लिए वह वहां गया तो उस के गेट पर ताला लटका मिला. वहां से वह निराश हो कर घर लौट आया. दोपहर के समय के.सी. सक्सेना के फोन पर सौरभ का फोन आया तो वह खुश हुए कि बेटे का फोन आ गया. उन्होंने जैसे ही हैलो कहा, दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘पापा, मैं इस समय नवीननगर में हूं.’’

इस के बाद दूसरी तरफ से फोन काट दिया गया. के.सी. सक्सेना उस आवाज को सुन कर हैरान थे, क्योंकि वह आवाज सौरभ की नहीं थी. वह सोच में पड़ गए कि आखिर कौन है, जो सौरभ बन कर बात कर रहा है. उसी दिन सौरभ के फोन से हिमांशु के फोन पर भी फोन आया था कि उस के पास पापा का फोन तो नहीं आया था? हिमांशु सौरभ का दोस्त था. वह आवाज सुन कर हिमांशु भी चौंका था, क्योंकि वह आवाज सौरभ की नहीं थी. हिमांशु ने यह बात सौरभ के पिता के.सी. सक्सेना को बता दी थी. के.सी. सक्सेना अब और ज्यादा परेशान हो गए कि उन का जवान बेटा न जाने कहां है और उस के फोन से न जाने कौन बात कर रहा है? वह अपने परिचितों को ले कर थाना सिविल लाइंस पहुंचे और बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

सौरभ की चिंता में उस के घर वाले रात भर परेशान रहे. अगले दिन के.सी. सक्सेना एसएसपी लव कुमार से मिले. मामले की गंभीरता को समझते हुए एसएसपी ने उसी समय एसपी (सिटी) प्रदीप गुप्ता को अपने औफिस में बुलवाया और इस मामले में आवश्यक काररवाई करने को कहा. के.सी. सक्सेना ने एसपी (सिटी) प्रदीप गुप्ता को विस्तार से पूरी बात बता कर कहा कि जिस शख्स ने सौरभ के फोन से बात की थी, वह उस शख्स को नहीं जानते. उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि उन की किसी से कोई रंजिश वगैरह भी नहीं है. जिस समय के.सी. सक्सेना के फोन पर सौरभ के फोन से बात की गई थी, उस समय उस की लोकेशन कहां थी, यह जानने के लिए एसपी (सिटी) प्रदीप गुप्ता ने सौरभ के फोन की काल डिटेल्स निकलवाने के साथ उस के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया.

एसपी (सिटी) के निर्देश पर सिविल लाइंस के सीओ मोहम्मद इमरान ने सौरभ की काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो पता चला कि 6 फरवरी को उस के फोन से दोपहर एक बजे के करीब मुरादाबाद शहर के ही पीली कोठी इलाके से बात की गई थी. इसी के साथ एक फोन नंबर ऐसा भी मिल गया, जिस से सौरभ के मोबाइल पर 6 फरवरी को सुबह 6 बज कर 25 मिनट पर बात की गई थी. उसी नंबर से 26 जनवरी, 2015 से 7 फरवरी, 2015 तक सौरभ के मोबाइल पर 6 बार बात हुई थी. यह फोन नंबर यूनिनार कंपनी का था.

यूनिनार कंपनी का यह फोन नंबर पुलिस के शक के दायरे में आ गया. मोहम्मद इमरान ने यूनिनार कंपनी के इस फोन नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई. इस में पुलिस को चौंकाने वाली यह जानकारी मिली कि इस नंबर से केवल सौरभ के मोबाइल पर ही बातें की गई थीं. इस से पुलिस को यह समझने में देर नहीं लगी कि यह नंबर केवल सौरभ से बात करने के लिए ही लिया गया था. अब पुलिस यह जानने में लग गई कि यूनिनार कंपनी का यह नंबर किस के नाम से लिया गया था. पुलिस को यूनिनार कंपनी से जो जानकारी मिली, उस से पता चला कि वह नंबर रेलवे हरथला कालोनी के दुकानदार मुन्ना पहाड़ी से खरीदा गया था. नंबर लेते समय 2-2 आईडी प्रूफ लगे थे.

ताज्जुब की बात यह थी कि दोनों आईडी पर अलगअलग लोगों के फोटो लगे थे. एक आईडी संभल के किसी आदमी की थी तो दूसरी मुरादाबाद के आदमी की थी. दोनों ही पतों पर पुलिस टीमें भेजी गईं, लेकिन दोनों पते फरजी निकले. इस से पुलिस की जांच जहां की तहां रुक गई. कहीं से कोई सुराग मिले, इस के लिए पुलिस टीम फिर से यूनिनार के उस फोन नंबर की काल डिटेल्स खंगालने लगी. पता चला कि इस नंबर की 3 दिन पहले की लोकेशन आशियाना इलाके की थी. सीओ मोहम्मद इमरान ने के.सी. सक्सेना से पूछा कि आशियाना इलाके में सौरभ का कोई परिचित तो नहीं रहता? इस पर उन्होंने बताया कि आशियाना इलाके के बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी नाम के जिम में सौरभ जाता था.

सौरभ के गायब होने का राज कहीं इस जिम में तो नहीं छिपा, यह जानने के लिए मोहम्मद इमरान बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी नाम के उस जिम में पहुंचे. वहां जिम संचालक खुरशीद आलम और जिम की रिसैप्शनिस्ट सना उर्फ सदफ मिली. उन्होंने दोनों से सौरभ के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि सौरभ उन के जिम में आता तो था, लेकिन 6 फरवरी से वह जिम नहीं आ रहा है. उन से बात करने के बाद सीओ साहब अपने औफिस लौट आए. कई दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस को सौरभ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी. उस का मोबाइल फोन बंद था. सौरभ अगवानपुर के एक इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहा था. मोहल्ले में और कालेज में उस के जो भी नकदीकी दोस्त थे, पुलिस ने उन सब से पूछताछ की. उन से भी सौरभ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

11 फरवरी, 2015 को मुरादाबाद के ही थाना मझोला के अंतर्गत आने वाले भोला सिंह की मिलक के पास नाले में एक ड्रम देखा गया. ड्रम का आधा भाग पानी में डूबा था और आधा पानी के ऊपर दिखाई दे रहा था. शक होने पर किसी ने इस की सूचना थाना मझोला पुलिस को दे दी. मझोला पुलिस ने मौके पर पहुंच कर उस ड्रम को नाले से निकलवाया तो उस में से प्लास्टिक के बोरे में बंद एक युवक की लाश निकली. वह युवक ट्रैक सूट और स्पोर्ट्स शूज पहने था. मझोला पुलिस ने लाश का हुलिया बताते हुए इस बात की सूचना वायरलैस द्वारा जिला पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी.

सिविल लाइंस के थानाप्रभारी ने वायरलैस की यह सूचना सुनी तो वह चौंके, क्योंकि लाश का जो हुलिया बताया गया था, वही हुलिया उन के क्षेत्र के गायब युवक सौरभ सक्सेना का था. थानाप्रभारी ने फोन कर के तुरंत सौरभ के पिता को थाने बुलाया और उन्हें ले कर भोला सिंह की मिलक के पास उस जगह पहुंच गए, जहां ड्रम में लाश मिली थी. जैसे ही के.सी. सक्सेना ने लाश देखी, वह दहाड़ें मार कर रोने लगे. क्योंकि वह लाश उन के 19 वर्षीय बेटे सौरभ की ही थी. उस का सिर फूटा हुआ था. उस के मुंह में एक लंगोट ठूंसा हुआ था और दूसरे लंगोट से उस की नाकमुंह को कवर करते हुए गले को बांधा गया था. देख कर ही लग रहा था किसी भारी चीज से उस के सिर पर कई वार किए गए थे. सौरभ की हत्या की खबर मिलते ही उस के घर में कोहराम मच गया. परिवार के लोग और संबंधी रोतेबिलखते घटनास्थल पर पहुंच गए.

सूचना मिलने के बाद एसएसपी लव कुमार और अन्य पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए थे. जरूरी काररवाई के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. 11 फरवरी की शाम को ही डाक्टरों के एक पैनल ने सौरभ सक्सेना की लाश का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार सौरभ की हत्या करीब 5 दिनों पहले की गई थी यानी जिस दिन वह गायब हुआ था, उस के कुछ घंटे बाद ही उसे मार दिया गया था. हत्यारों ने लोहे की रौड जैसी किसी भारी चीज से उस के सिर पर 18 वार किए थे. वार इतनी ताकत से किए गए थे कि उस के सिर की हड्डियां तक टूट गई थीं. इस के बाद सिर को बुरी तरह कुचला गया था. डाक्टरों ने मौत की वजह हेड इंजरी बताया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारों ने सौरभ के मुंह में लंगोट ठूंस कर दूसरे लंगोट से जिस तरह उस की नाक और मुंह को बांधा था, हत्या करने वालों की संख्या 2 से अधिक रही होगी. ऐसा उन्होंने इसलिए किया होगा, ताकि उस की चीख न निकल सके. यह सब किस ने किया था, यह पता लगाना पुलिस के लिए आसान नहीं था. लाश के पास ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला था, जिस से हत्यारों तक जल्दी पहुंचा जा सके. लंगोट और ड्रम के सहारे पुलिस ने जांच आगे बढ़ाने की कोशिश शुरू की. सब से पहले पुलिस ने के.सी. सक्सेना से पूछा कि सौरभ लंगोट बांधता था क्या?

‘‘नहीं, वह घर पर कभी लंगोट नहीं बांधता था. हो सकता है कि जिम में एक्सरसाइज करते समय लंगोट बांधता रहा हो.’’ के.सी. सक्सेना ने बताया तो सीओ मोहम्मद इमरान के नेतृत्व में एक पुलिस टीम एक बार फिर आशियाना कालोनी स्थित जिम बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी पहुंची. उस जिम के बाईं ओर रेड सफायर नाम का बैंक्वेट हाल था. उस के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. जिम के दाईं ओर एक अस्पताल था, उस के बाहर भी सीसीटीवी कैमरे लगे थे. 6 फरवरी को सौरभ जिम में आया था या नहीं, यह बात सीसीटीवी फुटेज से पता लग सकती थी. पुलिस ने बैंक्वेट हाल और अस्पताल के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो उस में 6 फरवरी की सुबह सौरभ एक लड़की के साथ जिम की तरफ आता दिखाई दिया.

सौरभ के भाई गौरव ने उस लड़की को तुरंत पहचान कर बताया कि यह लड़की उस के घर में काम करने वाली नौकरानी की बेटी सना उर्फ सदफ है. यह बौडी फ्यूल फिटनेस जिम में नौकरी करती है. फुटेज देखने के बाद पुलिस को इस बात पर हैरानी हुई कि जिम संचालक खुरशीद आलम और सना ने उस से यह झूठ क्यों बोला कि 6 फरवरी को सौरभ जिम नहीं आया था. जबकि फुटेज में वह सना के साथ जिम में जाता दिखाई दिया था. पुलिस टीम खुरशीद आलम के जिम पहुंची. सीओ मोहम्मद इमरान को देखते ही खुरशीद घबरा गया. उस से बात किए बिना ही पुलिस ने जिम की तलाशी ली तो वहां उसी तरह के लंगोट टंगे हुए मिले, जिस तरह के मृतक सौरभ के मुंह और गरदन पर बंधे मिले थे. उसी दौरान खुरशीद ने मोहम्मद इमरान से पूछा, ‘‘सर, सौरभ के हत्यारों का कुछ पता चला?’’

‘‘देखो, अभी पता चल जाएगा,’’ कह कर उन्होंने एक थप्पड़ खुरशीद आलम के गाल पर जड़ दिया.

खुरशीद को ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह हक्काबक्का रह गया. उस के मुंह से कोई जवाब नहीं निकला. सीओ ने पूछा, ‘‘तुम लोगों ने सौरभ को क्यों मारा?’’

रिसैप्शनिस्ट सना उर्फ सदफ यह देख कर घबरा गई. सीओ के निर्देश पर महिला पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. दोनों को हिरासत में ले कर इमरान मोहम्मद ने उन से सौरभ की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि सौरभ की हत्या उन्होंने ही इसी जिम में की थी. उन्होंने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. मुरादाबाद महानगर के सिविल लाइंस में है एक कालोनी रामगंगा विहार फेज-2. इसी कालोनी में के.सी. सक्सेना अपनी पत्नी अलका सक्सेना और 3 बच्चों के साथ रहते थे. बच्चों में बेटा गौरव, सौरभ और बेटी साक्षी थी. के.सी. सक्सेना प्रथमा बैंक में शाखा प्रबंधक थे और उन की पोस्टिंग महानगर से 10 किलोमीटर दूर पाकबड़ा शाखा में थी. अपने छोटे परिवार के साथ वह हंसीखुशी से रह रहे थे.

पढ़ाई पूरी करने के बाद बड़ा बेटा गौरव सक्सेना चड्ढा ग्रुप के मुरादाबाद स्थित वेब मौल में नौकरी करने लगा था, जबकि सौरभ अभी अगवानपुर के एक कालेज से 12वीं की पढाई कर रहा था. के.सी. सक्सेना के यहां किसी तरह की आर्थिक समस्या नहीं थी. लेकिन वह शारीरिक रूप से अस्वस्थ थे. वह हार्ट पेशेंट थे. उन की 2 बार हार्ट सर्जरी हो चुकी थी. उन के साथसाथ उन की पत्नी अलका भी अकसर बीमार रहती थीं. जिस से उन्हें घर के काम करने और खाना बनाने में परेशानी होती थी. घर के काम करने और खाना बनाने के लिए उन्होंने शबनम को रख लिया था.

शबनम रामगंगा विहार की ही ईडब्ल्यूएस कालोनी में रहने वाले मोहम्मद इमरान की पत्नी थी. मोहम्मद इमरान टूव्हीलर मैकेनिक था और उस की 2 बीवियां थीं. शबनम उस की दूसरी बीवी थी. कभीकभी शबनम अपनी बेटी सना उर्फ सदफ को भी ले आती थी. सना के.सी. सक्सेना की बेटी साक्षी की ही उम्र की थी, इसलिए उन दोनों में दोस्ती हो गई थी. सना भी पढ़ाई कर रही थी. कभी शबनम को के.सी. सक्सेना के यहां आने में देर हो जाती तो सौरभ बाइक से उस के घर पहुंच जाता और उसे बाइक पर बैठा कर ले आता. शबनम की बेटी सना जवान और सुंदर थी. वह महानगर के ही दयानंद डिग्री कालेज से बीए की पढ़ाई कर रही थी.

घर आनेजाने की वजह से सौरभ और सना के बीच दोस्ती हो गई. धीरेधीरे यही दोस्ती प्यार में बदल गई. प्यार जब परवान चढ़ा तो उन के बीच जिस्मानी संबंध भी बन गए. हालांकि दोनों के सामाजिक स्तर में जमीनआसमान का अंतर था. इस के अलावा वे अलगअलग धर्मों से भी थे, फिर भी उन्होंने शादी कर के जिंदगी भर साथ रहने की कसमें खाईं. काफी दिनों तक उन के संबंधों की भनक किसी को नहीं लगी. सना सौरभ पर शादी के लिए दबाव डालने लगी तो वह बोला, ‘‘सना, हमारे और तुम्हारे बीच सब से बड़ी बाधा धर्म की है. तुम मुसलिम हो और मैं हिंदू.’’

सौरभ की बात पूरी होने से पहले ही सना ने कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो सौरभ? यह बात तो तुम्हें पहले सोचनी चाहिए थी.’’

‘‘सना, तुम नाराज मत होओ. देखो, जब तक बड़े भाई गौरव की शादी नहीं हो जाती, तब तक इस बारे में घर वालों से बात करना बेकार है. गौरव की शादी के बाद मैं घर वालों को समझाने की कोशिश करूंगा.’’ सौरभ ने सना को सममझाया.

झूठी दिलासा के सहारे 3 साल गुजर गए. सना मन ही मन यही सपना संजोए बैठी थी कि सौरभ से शादी करने के बाद वह ऐश की जिंदगी जिएगी. लेकिन प्रेमी के झूठे वादों से उसे अपने सपने धूमिल होते नजर आ रहे थे. इसलिए उस ने सौरभ से दूरी बनानी शुरू कर दी.

सना पढ़ीलिखी खूबसूरत युवती थी. उसे अब अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. अपने पैरों पर खड़ी होने के लिए उस ने नौकरी तलाशनी शुरू कर दी. कोशिश करने पर उसे महानगर में कांठ रोड पर स्थित एक जिम में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई. बाद में वह उसी जिम में ट्रेनर हो गई. वहां नौकरी पर लगे उसे कुछ ही दिन हुए थे कि उसे पता चला कि आशियाना कालोनी में बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी नाम का एक नया जिम खुला है और वहां रिसैप्शनिस्ट की जगह खाली है. यह खबर मिलते ही वह नौकरी के लिए उस जिम में पहुंच गई, ताकि वहां उसे ज्यादा तनख्वाह मिल सके. वहां उस की बात बन गई. यानी बौडी फ्यूल जिम में उसे रिसैप्शनिस्ट व महिला ट्रेनर की नौकरी मिल गई. यह जिम हरथला कालोनी के रहने वाले खुरशीद आलम का था.

जब लोगों को पता चला कि जिम में महिला ट्रेनर भी है तो वहां महिलाओं ने भी आना शुरू कर दिया, जिस से जिम की आमदनी बढ़ने लगी. दिन भर जिम में साथ रहने की वजह से सना और खुरशीद एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए. उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. खुरशीद की बांहों में जाने के बाद सना सौरभ को भूल चुकी थी. वह खुरशीद के साथ ही बाइक पर घूमती. चूंकि दोनों एक ही धर्म के थे, इसलिए खुरशीद ने सना से शादी का वादा किया. उधर जब सौरभ को सना और खुरशीद के संबंधों के बारे में पता चला तो उसे बहुत दुख हुआ. उस ने इस बारे में सना से फोन पर बात करनी चाही, लेकिन सना ने उस का फोन रिसीव नहीं किया. जबकि इस से पहले उस की सना से फोन पर कभीकभार बात हो जाया करती थी.

तब सौरभ उस से मिलने के लिए बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी जिम जाने लगा. इतना ही नहीं, वह सना पर जिम की नौकरी छोड़ने के लिए दबाव भी बनाने लगा. लेकिन सना ऐसा करने को तैयार नहीं थी. सौरभ के बारबार जिम जाने पर खुरशीद को शक हो गया. खुरशीद ने सना से सौरभ के बारे में पूछा. तब सना ने खुरशीद को सौरभ के साथ रहे अपने संबंधों के बारे में बता दिया. उस ने यह भी बता दिया कि सौरभ उस पर जिम से नौकरी छोड़ने को कह रहा है. सना ने सौरभ से जिम आने से मना करते हुए कहा कि बेहतर यही होगा कि वह उसे भूल जाए. पर सौरभ उसे भूलने को तैयार नहीं था. उस ने कहा कि वह उस के बिना जिंदा नहीं रह सकता. इतना ही नहीं, उस ने सना को धमकी भी दे दी कि अगर उस ने खुरशीद से शादी कर ली तो वह उस के अश्लील फोटो इंटरनेट पर डाल देगा.

इस धमकी से सना डर गई. उस ने फोटो वाली बात खुरशीद को बता कर इस का कोई वाजिब हल निकालने को कहा. खुरशीद सना के प्यार में पागल था. वह उस पर अंधाधुंध पैसे खर्च कर रहा था. अकसर सना के साथ घूमनेफिरने से उस के धंधे पर भी असर पड़ना शुरू हो गया था. उस का लगातार नुकसान हो रहा था, जिस से वह लोगों का कर्जदार भी हो गया था. पिछले 2 महीने से उस ने सना की तनख्वाह और बिल्डिंग का किराया भी नहीं दिया था. लगातार हो रहे घाटे से वह परेशान रहने लगा था. खुरशीद ने एक दिन अपनी परेशानी सना को बताई और कहा कि वह कोई ऐसा काम करना चाहता है, जिस में एक ही झटके में लाखों रुपए आ सकें.

सना ने सौरभ के घरपरिवार के बारे में खुरशीद को पहले ही बता दिया था. इसलिए दोनों ने प्लान बनाया कि अगर सौरभ का अपहरण कर लिया जाए तो उस के घर वालों से लाखों रुपए की फिरौती मिल सकती है. क्योंकि उस के पिता बैंक में मैनेजर हैं. खुरशीद का बचपन का एक दोस्त था निहाल जैदी. निहाल जैदी के पिता सैयद अली आजम जैदी व खुरशीद के पिता निजामुद्दीन अंसारी दोनों ही रेलवे में टीटीई थे और एक साथ मुरादाबाद मंडल में रह चुके थे. दोनों के घर वालों का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. इसीलिए खुरशीद और निहाल जैदी में गहरी दोस्ती थी.

सैयद अली आजम जैदी मूलरूप से मुफ्तीगंज लखनऊ के रहने वाले थे. रिटायर होने के बाद वह लखनऊ चले गए थे. निहाल जैदी आवारा किस्म का था, इसलिए घर वालों ने उसे घर से निकाल दिया था. लखनऊ से वह अपने दोस्त खुरशीद के पास चला आया और उसी के साथ ही रह रहा था. निहाल जैदी भी जिम का काम देखता था. सना और खुरशीद ने निहाल को भी अपनी योजना में शामिल कर लिया था. तीनों ने योजना बनाई थी कि सौरभ का अपहरण कर उस के घर वालों से 10 लाख रुपए की फिरौती वसूल कर उसे ठिकाने लगा देंगे. योजना को सुरक्षित ढंग से अंजाम देने के लिए खुरशीद ने फरजी आईडी पर एक सिम खरीदा. यह सिम उस ने महानगर की ही रेलवे हरथला कालोनी के दुकानदार मुन्ना पहाड़ी से खरीदा था. उस सिम को उस ने अपने फोन में डालने के बजाय इस के लिए एक चाइनीज फोन खरीदा.

इस के बाद सौरभ को झांसे में लेने की जिम्मेदारी सना को सौंप दी गई. सना ने 26 जनवरी, 2015 से इसी नए नंबर से सौरभ से बात करनी शुरू कर दी. सौरभ ने फिर उस से नौकरी छोड़ने की बात कही. 26 जनवरी को सना ने सौरभ को फोन कर के कहा था, ‘‘सौरभ, मैं काम छोड़ने को तैयार हूं, लेकिन खुरशीद ने 2 महीने से मेरी तनख्वाह नहीं दी है. ऐसा करो, तुम भी जिम जौइन कर लो. हम यहीं पर मिलते रहेंगे और जैसे ही मेरी तनख्वाह मिल जाएगी, मैं नौकरी छोड़ दूंगी.’’

यह बात सौरभ की समझ में आ गई और उस ने बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी जौइन कर ली. यह बात घटना से 4 दिन पहले की थी. जिम जाने की बात उस ने अपने बड़े भाई गौरव को बता दी थी. 6 फरवरी, 2015 को सुबहसुबह सौरभ के मोबाइल पर सना का फोन आया, ‘‘सौरभ, तुम अभी तक जिम नहीं आए. जल्दी आ जाओ. इस समय यहां कोई नहीं है.’’

‘‘बस, मैं थोड़ी देर में पहुंच रहा हूं.’’ सौरभ ने कहा.

सौरभ मौर्निंग वौक के लिए निकलता था. इस के बाद वह उधर से ही जिम चला जाता था. लेकिन उस दिन उस का फोन आने पर वह सीधा जिम चला गया था. जिम के पास सना उस का पहले से ही इंतजार कर रही थी. उसे देखते ही सौरभ खुश हो गया. सना ने गर्मजोशी से उस का स्वागत किया और उसे अपने साथ जिम ले गई. जिम में पहुंच कर सना ने कहा, ‘‘सौरभ, तुम चेंजिंग रूम में कपड़े बदल लो, मैं यहीं बैठी हूं. सौरभ चेंजिंग रूम में गया तो वहां पहले से ही खुरशीद और निहाल जैदी मौजूद थे. दोनों ने उस की पिटाई शुरू कर दी. सौरभ चीखने लगा तो उन्होंने जिम में रखा एक लंगोट उस के मुंह में ठूंस दिया और दूसरा उस के मुंह और नाक में लपेट कर गले में बांध दिया.

इस के बाद भी वह हाथपैर चलाने लगा तो खुरशीद ने लोहे की रौड से उस के सिर पर कई वार कर दिए, जिस से उस का सिर फट गया और खून बहने लगा. इस के बाद सौरभ उन का मुकाबला नहीं कर सका और जमीन पर गिर गया. उधर सना ने डेक बजा कर उस की आवाज तेज कर दी थी, जिस से सौरभ चीखचिल्लाहट की आवाज बाहर किसी को सुनाई नहीं दी. खुरशीद और निहाल ने देखा कि सौरभ मर गया है तो उन्होंने सना को बुला लिया. सना ने कहा कि किसी भी हालत में अब यह जिंदा नहीं बचना चाहिए. वह एक सीरिंज में बाथरूम में रखा तेजाब भर लाई और तेजाब का इंजेक्शन उस के सीने में लगा दिया.

तीनों को लगा कि सौरभ मर गया है तो उन्होंने उस की लाश पहले से ला कर रखे पौलीथिन के एक बैग में भर दी. अब उन के सामने समस्या यह थी कि वह लाश को ठिकाने लगाने के लिए बाहर कैसे ले जाएं. हरथला में ही खुरशीद के बहनोई नदीम रहते थे. उन का वहीं पर एक कौनवेंट स्कूल था. उन्होंने ही खुरशीद को यशवीर चौधरी का बड़ा हौल किराए पर दिलवाया था, जिस का किराया 20 हजार रुपए महीना था. लाश ठिकाने लगाने के लिए तीनों ने एक प्लान तैयार कर लिया. प्लान के अनुसार खुरशीद अकेला जिम से चला गया और अपने एक परिचित की माल ढोने वाली छोटी टाटा मैजिक गाड़ी ले आया.

जिम के बराबर वाली इमारत में यशवीर चौधरी का प्रौपर्टी डीलिंग का औफिस था. उन्होंने जिम के बाहर माल ढोने वाली टाटा मैजिक गाड़ी देखी तो उन्हें लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि खुरशीद उन का किराया दिए बिना हौल खाली कर के जा रहा है. क्योंकि खुरशीद ने उन का 2 महीने का किराया नहीं दिया था, इसलिए जब उन्होंने जिम के सामने गाड़ी खड़ी देखी तो खुरशीद से पूछा. तब खुरशीद ने बताया कि दौड़ने वाली मशीन खराब हो गई है, उसे ठीक कराने ले जाना है. खुरशीद, सना और निहाल ने मिल कर एक इलैक्ट्रौनिक मशीन जिम से निकाल कर उस गाड़ी में रख दी. उसे खुरशीद व निहाल ले कर चले गए.

करीब आधे घंटे बाद खुरशीद और निहाल जैदी उस मशीन को ले कर वापस आ गए. वह अपने साथ एक ड्रम भी ले आए थे. वह ड्रम एक निर्माणाधीन इमारत से लाए थे. मशीन और ड्रम को वह जिम में ले गए. उस ड्रम में उन्होंने सौरभ की लाश डाल दी. फिर उस ड्रम को उसी टाटा मैजिक गाड़ी में रख लिया. पुन: गाड़ी देख कर मकान मालिक यशवीर चौधरी ने खुरशीद से ड्रम के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि कुछ मशीनों के पार्ट्स खराब हो गए हैं. इस ड्रम में वही खराब पार्ट्स हैं, जिन्हें सही करा कर लाना है. यशवीर चौधरी को उस पर विश्वास नहीं हुआ तो उस ने खुरशीद के बहनोई नदीम को फोन किया, जिन की जमानत पर चौधरी ने उसे कमरा किराए पर दिया था.

नदीम ने भी उसे यही बताया कि उस की कुछ मशीनें खराब हो गई हैं. नदीम के कहने पर यशवीर चौधरी को विश्वास हो गया. वह अपने औफिस में बैठ कर पार्टी से बात करने लगे. खुरशीद, सना और निहाल लाश वाला ड्रम गाड़ी में रख कर निकल गए और जिम में ताला लगा दिया. वहां से खुरशीद सीधे हरथला स्थित अपने बहनोई के स्कूल पहुंचा. स्कूल के कंप्यूटर लैब में उस ने लाश वाला ड्रम रखवा दिया. बहनोई को भी उस ने यही बताया कि ड्रम में मशीनों के पुरजे हैं. अगले दिन 7 फरवरी, 2015 की रात को वह टाटा मैजिक गाड़ी से वह उस ड्रम को ले कर निकल गया और उसे भोला सिंह की मिलक के पास नाले में फेंक आया. लाश ठिकाने लगा कर वह अपने घर चला गया. डर की वजह से उन्होंने घर वालों को फिरौती के लिए फोन नहीं किया.

सना और खुरशीद से पूछताछ के बाद पुलिस ने तीसरे अभियुक्त निहाल जैदी की तलाश शुरू कर दी. पता चला कि वह लखनऊ भाग गया है. एक पुलिस टीम निहाल जैदी की तलाश में लखनऊ भेजी गई, लेकिन वह वहां भी नहीं मिला. पुलिस ने सना और खुरशीद को मुरादाबाद के एसीजेएम प्रथम की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीसरा अभियुक्त निहाल जैदी गिरफ्तार नहीं हो सका था. UP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Romantic Story: खिड़की मोहब्बत वाली

लेखक – सलोनी खान, Romantic Story: नीचे खड़े हो कर फरजान रोजाना बारबार मेरे बेडरूम की खिड़की की ओर देखा करता था. धीरेधीरे मैं उसे प्यार करने लगी. लेकिन मेरी मनोदशा भांप कर जब पापा ने उस से बात की तो पता चला कि वह मुझे नहीं देखता था बल्कि मेरे घर में लगे वाईफाई से अपने फोन की कनेक्टिविटी मिलाया करता था. फिर भी जो हुआ, अच्छा ही हुआ.  शा म का समय था. मैं ने देखा कि एक लड़का मेरे घर के सामने खड़ा था. मैं खिड़की के पास गई, बाहर झांक  कर देखा. वह ऊपर खिड़की की ओर ही देख रहा था. मैं वहां से हट गई. अगले दिन से उस लड़के की यह

रोजाना की आदत सी बन गई. वह वहां आता और घंटों खड़ा रहता. कभीकभी वह मुंह उठा कर मेरे बैडरूम की खिड़की की ओर देख लेता तो कभी अपने मोबाइल पर लगा रहता. मुझे लगता कि शायद वह मुझे फोन करने की कोशिश कर रहा है. मैं नहीं जानती थी कि उस के पास मेरा फोन नंबर है भी या नहीं वह बहुत ही सुंदर सजीला जवान था. मुझे लगता था कि उस का संबंध किसी बहुत अच्छे परिवार से रहा होगा. 10 दिन तक ऐसा ही चलता रहा.

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, कुछ भी नहीं. मैं जानना चाहती थी कि आखिर यह मामला क्या है. सच कहूं तो उसे ले कर मेरे दिल में कुछ भावनाएं उभर रही थीं. मैं मन ही मन सोचती थी कि कहीं मुझे उस से प्यार तो नहीं हो गया है?

‘हां…हां…, मुझे उस से प्यार हो गया है.’ मेरे दिल से आवाज उठती.

‘लेकिन क्या वह भी मुझ से प्यार करता है? शायद नहीं…’ मेरे अंदर कई तरह के अंदेशे जन्म लेते.

यही सब सोचतेसोचते मेरे मन में कई तरह की आशंकाएं पैदा हो जातीं.

अपनी सोच, अपने अस्तित्व को समेट कर मैं ने साहस बटोरा और फैसला किया कि इस बारे में मुझे अपनी मां से बात करनी चाहिए. और मैं ने ऐसा ही किया भी.

‘‘अम्मी…अम्मी… आप कहां हैं? जरा जल्दी से यहां आइए. मैं आप को एक बहुत मजेदार दृश्य दिखाना चाहती हूं. सच में बहुत मजेदार.’’ एक दिन उसे बाहर खड़ा देख कर मैं ने बेसब्री से अपनी मां को पुकारा.

‘‘अच्छा, मैं आ रही हूं.’’ कहते हुए कुछ मिनट में ही मां मेरे पास आ गईं. आते ही मां ने पूछा, ‘‘हां, अब बताओ क्या दिखाना चाह रही थी तुम मुझे?’’

मैं अपनी अम्मी को खिड़की के पास ले गई और उन्हें बाहर नीचे खड़े लड़के को दिखाया. मैं ने अपनी अम्मी को सारा किस्सा सुनाया कि वह लड़का कैसे घंटों यहां खड़ा रहता है और ऊपर खिड़की की ओर देखता रहता है.

मां ने मेरी आंखों में झांका. फिर मुसकराकर कहा, ‘‘तो, इस में खास बात क्या है?’’ मम्मी की मुसकराहट में एक रहस्य सा छिपा था.

‘‘अम्मी, मैं यही आप को दिखाना चाहती थी. अब सोचें और बताएं कि हमें क्या करना चाहिए?’’ मैं ने अपने दिल की बात उन के सामने रखी.

अम्मी मुसकरा कर बोलीं, ‘‘इस में करना क्या है?’’ बड़ी लापरवाही से अपनी बात कह कर वह चली गईं. अगली सुबह सूरज में कुछ तेजी थी, खिड़की से धूप आ रही थी. पेड़ों पर चिडि़या चहचहा रही थीं. मैं बिस्तर पर बैठी थी और मेरे हाथ में कौफी का मग था. मेरे बाल खुले हुए थे. अचानक अम्मी ने मुझे आवाज दी. वह मुझे बुला रही थीं. नीचे जाने से पहले मैं ने खिड़की से बाहर झांक कर देखा कि वह लड़का वहां खड़ा है या नहीं? वह वहीं खड़ा था. मुझे शर्म सी आ गई और मैं नीचे भाग गई. मुझे लगता था कि मैं उस के प्यार में गिरफ्तार हो चुकी हूं.

मेरी अम्मी और पापा नीचे ड्राइंगरूम में खड़े थे और उन के चेहरों पर मुसकराहट फैली थी, रहस्यमय मुसकराहट.

‘‘हां अम्मी, बोलो क्या हुआ? मुझे क्यों बुलाया?’’  मैं ने पूछा.

‘‘हां बेटी,’’ अम्मी बोलीं, ‘‘मैं ने तुम्हें एक जरूरी काम से बुलाया है.’’

‘‘तो बताइए?’’

‘‘दरअसल, मैं ने तुम्हारे पापा से उस लड़के का जिक्र किया था, इसलिए आज सुबह वह बाहर जा कर उस से मिले. उस के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त की. कुछ बातें कहीं भी.’’

‘‘क्या?’’ मैं बहुत जोर से बोल पड़ी.

‘‘हां, यह सही है मेरी बच्ची. उस का नाम फरजान है और वह एक बहुत ही अच्छे परिवार से संबंध रखता है. उस के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं और इस वक्त वह नौकरी की तलाश में है. फरजान तुम्हारे लिए बहुत ही सही लड़का है.’’ पापा ने गंभीरता से कहा.

शादी के मुद्दे पर मेरे दिल में तुरंत यह बात आई कि मैं उस लड़के से प्यार करने लगी हूं. मैं मन ही मन सोचने लगी कि या खुदा अब मुझे क्या करना चाहिए.

‘‘मैं बाहर जा कर उसे अंदर बुला लाता हूं. उस के साथ बैठ कर कौफी पिएंगे. तब ही बातोंबातों में हम उस से अपनी बेटी की शादी के बारे मे ंबात कर लेंगे.’’ कह कर पापा बाहर चले गए. मैं शांत खड़ी देखती रही. थोड़ी देर बाद पापा उसे अंदर ले आए. उस ने हम सब को बड़े अदब के साथ सलाम किया. पापा ने उसे ड्राइंगरूम में बैठा कर अम्मी से कौफी लाने को कहा. वे दोनों मुसकराते हुए बातें कर रहे थे. घर में सेल फोन पर वाईफाई लगा हुआ था. कुछ देर बाद उस के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून महसूस होने लगा. वहां बैठेबैठे भी वह मोबाइल पर लगा रहा. साथ ही कौफी पीतेपीते बातें भी करता रहा. लेकिन जल्दी ही उस के चेहरे पर जाने की बेचैनी नजर आने लगी. वह ऐसा दिखाने की कोशिश कर रहा था, जैसे कि वह बहुत व्यस्त हो और उसे टे्रन पकड़ने की जल्दी हो.

उस ने जल्दीजल्दी कौफी के घूंट लेने शुरू किए.

‘‘कौफी के लिए धन्यवाद अंकल.’’ फरजान ने कहा.

‘‘धन्यवाद किस लिए?’’ पापा ने पूछा.

‘‘आप ने मुझे घर के अंदर बुलाया, क्योंकि…’’ फरजान बोला.

‘‘यह भी कोई बात है.’’ हम सब हंसने लगे.

‘‘अच्छा, यह बताओ कि हम तुम्हारी अम्मी से इस बारे में बात कर सकते हैं?’’ पापा ने अपनी खुशी का इजहार करते हुए पूछा.

‘‘किस बारे में?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘तुम रोज हमारे घर के सामने आ कर खड़े होते हो और लैला को देखते हो इसलिए…’’ पापा के चेहरे पर कुछ चिंता सी झलकने लगी थी.

फरजान के हाथ में कौफी का मग कांपा और उस की कौफी छलक पड़ी. वह घबरा कर जल्दी से उठ खड़ा हुआ.

‘‘नहीं, नहीं प्लीज, मेरी अम्मी से कुछ मत कहना अंकल,’’ उस ने डरते हुए कहा.

‘‘लेकिन क्यों बेटा?’’

‘‘वह मुझ पर नाराज होंगी.’’

‘‘वह क्यों नाराज होंगी? उन्हें तो यह सुन कर बहुत खुशी होगी कि उन के बेटे ने शादी के लिए लड़की पसंद कर ली है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘हां, क्या तुम्हें मेरी बेटी पसंद नहीं है? मैं लैला की बात कर रहा हूं. यह मेरी बेटी लैला.’’ पापा ने मेरी ओर इशारा कर के कहा.

‘‘क्या मजाक कर रहे हैं अंकल. मैं लैला नाम की किसी लड़की को नहीं जानता. आप की बेटी को भी नहीं, न यह कि इन का नाम लैला है.’’

‘‘क्या?’’ पापा भी आश्चर्य से उछल पडे़.

‘‘हां, यही सच है. मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता है.’’ फरजान ने जोर दे कर कहा.

‘‘तो फिर मेरे घर के पास आ कर क्या करते थे और ऊपर लैला की खिड़की में क्या देखते रहते थे?’’

फरजान कुछ देर सोचता रहा. फिर बोला, ‘‘ओह! अब समझ में आया. मैं आप को सच बताता हूं. दरअसल, बात यह है कि मैं वहां खड़े हो कर वाईफाई कनेक्शन का इस्तेमाल करता था और जब भी मेरा फोन हिलता था, कनेक्टीविटी टूट जाती थी. तब स्थिति ठीक करने के लिए मैं ऊपर की ओर देखता था. कभीकभी कनेक्टीविटी आती थी और कभीकभी गायब हो जाती थी. इसी चक्कर में मैं ऊपर देखा करता था. लेकिन लैला की खिड़की की ओर नहीं, यहां खड़े हो कर मैं बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपना सीवी भेजता था.’’ फरजान ने विस्तार से अपनी बात बताई.

‘‘तो फिर मेरे बुलाने पर तुम अंदर क्यों आ गए और यहां आ कर तुम ने धन्यवाद भी किया?’’ मेरे पापा ने एक और सवाल दाग दिया.

‘‘दरअसल, आज मुझे सही तरह से कनेक्टीविटी नहीं मिल रही थी. मैं परेशान था और उसी समय आप ने मुझे घर के अंदर आने को कहा तो मुझे बहुत खुशी हुई. क्योंकि यहां अंदर मुझे बेहतर कनेक्टीविटी मिल सकती थी.’’

‘‘और तुम यहां पर बैठ कर अपना सीवी भेजने में व्यस्त थे, क्यों क्या मैं सही कह रहा हूं?’’

‘‘हां.’’

‘‘ओह! मेरे खुदाया.’’ हम में से हर एक के मुंह से बस यही निकला.

इतनी देर में इतने उतारचढ़ाव आ गए थे. हम पता नहीं कहां से कहां तक की सोचने लगे थे.

‘‘तो… अंकल, अब मैं जाऊं? मेरी मम्मी मेरा इंतजार कर रही होंगी.’’

‘‘हां, हां बेटा, क्यों नहीं.’’

मैं अभी भी आश्चर्यचकित थी. मुझे बहुत गहरी चोट पहुंची थी, मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मैं ने उसे प्यार करना शुरू कर दिया था. मैं सोचती थी कि शायद वह भी मुझ से प्यार करता है. लेकिन वह मेरे लिए नहीं, बल्कि केवल वाईफाई कनेक्टीविटी उपयोग करने के लिए मेरी खिड़की के पास आता था. उस की इस हरकत ने मेरे दिल के टुकड़े कर दिए थे. लगभग 6 महीने बाद एक महिला हमारे घर आई और हमें आश्चर्य में डालते हुए उस ने अपना परिचय फरजान की मां के रूप में दिया. फरजान को एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई थी और वह उस दिन की बात नहीं भूल पाया था.

उस ने अपने दिल के किसी कोने में मुझे भी जगह दे दी थी. हां, यह सच है कि उसे भी मुझ से प्यार हो गया था. और अब हम दोनों की शादी हो चुकी है और हम एक सुखद और सुंदर जीवन गुजार रहे हैं. मैं जब भी जिंदगी के उस नाटकीय मोड़ को याद करती हूं तो सोचती हूं कि कोई जरूरी नहीं कि दिल के अरमान दिल में ही घुट कर रह जाएं. Romantic Story

Social Story : पुरुष वेश्यावृत्ति जिस्म के बाजार में जिगोलो

Social Story : देह व्यापार का एक बाजार ऐसा भी है, जहां के सैक्सवर्कर औरतें नहीं बल्कि मर्द होते हैं. जिन्हें जिगोलो कहा जाता है. उन्हें यौन पिपासा से भरी औरतों को हर तरह से खुश करना होता है. आजकल जिगोलो की मांग लगातार बढ़ती जा रही है. इस धंधे में मोटी कमाई तो होती ही है साथ ही…

भरे बदन वाली एक अधेड़ महिला कमसिन दिखने की अदाओं के साथ ड्राइंगरूम में खड़ी थी. वहीं कुछ दूसरी महिलएं सिगरेट का धुंआ उड़ाती कुछ दूरी बना कर सोफे पर क्रास टांगों के साथ बैठी थीं. सभी के बीच अपनेअपने सैक्स अपील वाले यौवन को दर्शाने की होड़ सी दिख रही थी. इसी बीच बलिष्ठ चुस्त टीशर्ट और टाइट पाजामे में एक युवक वहां आया. वहां वह सिर्फ उसी माहिला को पहचानता था, जो खड़ी थी. वह महिला उस के पास आई और बोली, ‘‘तुम को मालूम है कि तुम कहां खड़े हो. यहां जिस्म का बाजार लगता है.’’

यह सुनते ही युवक चौंक पड़ा,‘‘क्या?’’

महिला उस की कान के पास मुंह लगा कर बोली, ‘‘यहां तुम मेरे रिश्तेदार नहीं, केवल एक मर्द हो. नीले, गुलाबी बल्बों की रोशनी में तुम्हें अपनी अदाएं बिखेरनी हैं. बैठी महिलाओं को अट्रैक्ट करना है. बदले में तुम्हें ये अमीर महिलाएं मुहमांगी कीमत देंगी. आज तुम एक बिकाऊ मर्द होे, देखती हूं तुम्हारी कौन कितनी बोली लगाती है…’’

युवक चुपचाप महिला की बातें सुनता रहा. उस ने इसी क्रम में कुछ हिदायतें भी दीं. बोली, ‘‘तुम्हें यहां सभी के चेहरे पर सैक्स के भूख की एक ललक साफ तौर पर दिख रही होगी. याद रखना ये ललक जब तक दिखती रहेगी तब तक तुम्हारी मांग बनी रहेगी.’’

‘‘जी भाभी,’’ युवक बोला.

‘‘नहींनहीं, यह नाम नहीं, यहां मैं तुम्हारी मैडम हूं, मैडम एम.’’

‘‘जी समझ गया.’’ युवक बोला.

‘‘आओ, तुम्हारा सभी से परिचय करवाती हूं. उन की तारीफ मैडम के साथ एक अक्षर जोड़ कर करना.’’ कहती हुई मैडम एम ने पास बैठी महिला की ओर इशारा किया, ‘‘ये हैं मैडम एस… और ये हुई मैडम डी, ये हैं मैडम एक्स, वाई और…’’

इस तरह से मैडम एम ने युवक का हाथ पकड़ कर वहां बैठीं 8 महिलाओं से उस का परिचय करवा दिया. फिर सब की ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘मैडमों, अब खेल शुरू किया जाए, जिसे जो ड्रिंक लेना है, प्लीज किचन से जा कर ले सकती हैं…सेल्फ सर्विस है…ग्लास खाली होने पर उसे भरने के लिए ये है ही…’’ युवक की ओर उंगली उठाती हुई बोली. मैडम एम ने सेंटर टेबल के नीचे से रिमोट निकाला और धीमी चल रही म्यूजिक की वौल्यूम बढ़ा दी. म्यूजिक तेज होते ही कइयों के पैरों की थिरकन बढ़ गई, जबकि कुछ महिलाएं बैठेबैठे ही अपने हाथों को नृत्य की मुद्रा में लहराने लगीं. एक महिला सोफे से उठी और कमर को डांस के मोड में लचकाती हुई किचन की तरफ बढ़ गई.

इस तरह से मर्द वेश्यावृत्ति के लिए छोटी सी मंडी सज गई, जिसे अज्ञात महिला की देखरेख में आयोजित किया गया था. ऐसा वह हर सप्ताह के वीकेंड पर करती थी. अमीर घरों की औरतें ग्राहक हुआ करती थीं. वे हर सप्ताह कुछ नया पाने की ललक लिए आती थीं और आधी रात तक मौजमजा करती थीं. इस मंडी के लिए हर बार किसी नए मर्द की तलाश की जाती थी. उसे बदले में अच्छी रकम मिल जाती थी. उस रोज मैडम एम यानी मालती को कोई युवक नहीं मिल पाया था. वह इस के लिए शनिवार की सुबह तक बहुत बेचैन थी. उसी दौरान पीजी में रहने वाला उस के दूर के एक रिश्तेदार ने फोन पर अपनी समस्या बताई. पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उस ने कहीं पार्टटाइम जौब दिलवाने की रिक्वेस्ट की.

थोड़ी देर सोचने के बाद मालती ने उसे ही जिगोलो बनने के लिए राजी कर उसी शाम सजने वाली देह की मंडी में बुला लिया. साथ ही युवक से कुछ वादे भी लिए. दिल्ली में अपने दम पर पढ़ाई का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा था. उसे कोचिंग के लिए मोटी रकम की भी जरूरत थी. मालती का प्रस्ताव सुन कर उसे लगा कि उस का जमीर मर रहा है. फिर उस के मन में अपने परिवार का भी खयाल आया, जहां कोई सोच भी नहीं सकता कि वह ऐसा भी कर सकता है. उस ने पैसे की जरूरत पूरी करने के लिए अपना जमीर बेच डाला. युवक मालती से केवल इतना पूछ पाया, ‘‘मुझे कब तक रुकना होगा, पढ़ाई भी करनी है.’’

इस का जवाब मालती ने दे दिया. वह खुश हो गई उसे एक नया माल… एक नया छैला मिल गया था. अब उसे ग्राहकों की बुकिंग नहीं लौटानी पड़ेगी. इसी के साथ मालती ने उस की कुछ तसवीरें मंगवाईं.  तसवीर की मांग पर युवक सोच में पड़ गया कि कोई रिश्तेदार देख लेगा तो उस के भविष्य का क्या होगा. इस की चिंता भी मालती ने दूर कर दी. तुरंत अपने फ्लैट पर बुलाया. चेहरे की पहचान छिपा कर अपने मोबाइल से कुछ तसवीरें खींच लीं. पहले दाईं तरफ से, फिर बाईं तरफ से और उस के बाद सामने से तसवीर खींची गई. सभी तसवीरें अंडरगारमेंट में थीं. युवक को उस की 3 आकर्षक फोटो दिखा कर बाकी डिलीट कर दी गईं. उन में युवक को पहचानना मुश्किल था.

उस के सामने तसवीरों को वाट्सऐप पर भेज दिया गया. तसवीरों के साथ लिख दिया गया, ‘‘नया माल है, रेट ज्यादा लगेगा. कम पैसे का चाहिए तो दूसरे को भेजती हूं.’’

एक से बढ़ कर एक खूसबूरत महिलाएं युवक की बोली लगाने लगीं, जो अंत में 5 हजार रुपए में तय हुई. इस में युवक को क्लाइंट के लिए सब कुछ करना था. इस बारे में युवक ने अपना अनुभव शेयर करते हुए नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर बताया, ‘‘मैं जिंदगी में पहली बार ये करने जा रहा था. बिना प्यार, इमोशंस के कैसे करता. एक अंजान के साथ करना होगा, यह सोच कर मेरा दिमाग चकरा रहा था.’’

उस ने आगे बताया, ‘‘वो शायद 32-34 साल की शादीशुदा महिला थी. बातें शुरू हुईं और उस ने कहा कि वह गलत जगह फंस चुकी है. पति गे है. वह अमरीका में रहता है. तलाक दे नहीं सकती. फिर एक तलाकशुदा औरत से कौन शादी करेगा. मेरा भी अलगअलग चीजों का मन होता है, बताओ क्या करूं.’’

उस के बाद महिला ने हिंदी गाने लगवाए और डांस करने लगी. थोड़ी देर में शुरू किया. हम दोनों डाइनिंग रूम से बैडरूम गए. अब तक उस ने मुझ से प्यार से बात की थी. काम जैसे ही खत्म हुआ, पैसे दे कर बोली, ‘‘चल कट ले, निकल यहां से.’’

उस ने मुझे टिप भी दी. मैं ने उस से कहा, ‘‘मैं ये सब पैसों की मजबूरी की वजह से कर रहा हूं.’’

उस ने कहा, ‘‘तेरी मजबूरी को तेरा शौक बना दूंगी.’’

मेरी मजबूरी जो दिल्ली से सैकड़ों किलोमीटर दूर मेरे घर से शुरू हुई थी. मेरी लोअर मिडिल क्लास फैमिली को मैं अनलकी लगता था, क्योंकि मेरे जन्म के बाद ही पिता की नौकरी चली गई. वक्त के साथ ये दूरियां बढ़ती गईं. मेरा सपना एमबीए करने का था लेकिन इंजीनियरिंग करने को मजबूर किया गया. नौकरी नहीं लगी. फिर कंपटीशन की तैयारी कर दी. उस के लिए अतिरिक्त खर्च से मैं परेशान रहने लगा. उन्हीं दिनों डिफेंस कालोनी में रहने वाली दूर की रिश्तेदार के बारे में मालूम हुआ. उन से मिला. वह तलाकशुदा महिला निकली, लेकिन अपने दम पर छोटा सा बुटीक चला रही थी. पति अपने मातापिता के साथ बंगलुरु में शिफ्ट हो चुका था, उस से कोई बच्चा नहीं था.

हर छोटीबड़ी परेशानी में वह मेरा आत्मविश्वास बढ़ा देती थी. उस ने कई बार डिप्रेशन से बाहर निकाला था. हालांकि मुझे इंटरनेट पर मेल एस्कार्ट यानी जिगोलो के बारे में थोड़ीबहुत जानकारी थी. ऐसा फिल्मों में देखा था. कुछ वैसी वेबसाइट्स के बारे में भी जानकारी थी. जहां जिगोलो बनने के लिए प्रोफाइल बनाई जा सकती थी. संयोग कहें या फिर मेरी किस्मत कि मैं जिस्म की बोली लगने वाली महिलाओं के बीच आ गया था. उस रात मैं ने जिगोलो बनने की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास कर ली. ऐसा मैडम एम ने आधी रात को मेरी पीठ थपथापते हुए कहा. मैं वहीं थका हुआ सो गया. सुबह कालबैल की आवाज से नींद खुली. दरवाजे पर मालती को मुसकराते हुए देखा. मैं झेंप गया और फ्रैश होने के लिए बाथरूम में घुस गया.

उस के बाद मैं दुविधा से घिर गया. यह कहें मैं 2 विचारों की दहलीज पर खड़ा था. एक, दहलीज से पीछे हट कर सुसाइड कर लूं. दूसरा, दहलीज के पार जा कर जिगोलो बन जाऊं. अंतत: मैं ने दहलीज को लांघने का फैसला कर लिया. मैं जिन औरतों से मिला, उन में शादीशुदा तलाकशुदा, विधवा और सिंगल लड़कियां भी शामिल थीं.  इन में से ज्यादातर के लिए मैं एक इंसान नहीं माल था. जब तक उन की इच्छाएं पूरी न हो जातीं, सब अच्छे से बात करतीं. कहती कि मैं अपने पति को तलाक दे कर तुम्हारे साथ रहूंगी. लेकिन बैडरूम में बिताए कुछ वक्त के बाद सारा प्यार खत्म हो जाता. सुनने को मिलता, ‘‘चल निकल यहां से. पैसा उठा और भाग.’’

और कई बार गालियां भी सुनने को मिलतीं. ये सोसाइटी हम से मजे भी लेती है और हम ही को प्रास्टीट्यूट कह कर गालियां भी देती है. एक बार एक पतिपत्नी ने साथ में बुलाया. पति सोफे पर बैठा शराब पीते हुए हमें देखता रहा. मैं उसी के सामने पलंग पर उस की पत्नी के साथ था. ये काम दोनों की रजामंदी से हो रहा था. शायद दोनों की ये कोई डिजायर रही हो. इसी बीच 50 साल से ज्यादा उम्र की महिला भी मेरी क्लाइंट बनी. वह मेरी जिंदगी का सब से अलग अनुभव था. पूरी रात वह बस मुझ से बेटाबेटा कह कर बात करती रहीं. बताती रहीं कि कैसे उन का बेटा और परिवार उन की परवाह नहीं करता. वे उन से दूर रहते हैं.

वो मुझ से भी बोलीं, ‘‘बेटा, इस धंधे से जल्दी निकल जाओ, सही नहीं है ये सब.’’

उस रात हमारे बीच सिवाय बातों के कुछ नहीं हुआ. सुबह उन्होंने बेटा कहते हुए मुझे तय रुपए भी दिए. मुझे वाकई उस महिला के लिए दुख हुआ. फिर एक रोज जब मैं ने शराब पी हुई थी और जिंदगी से थकान महसूस कर रहा था, मैं ने मां को फोन किया. उन्हें गुस्से में कहा, ‘‘तुम पूछती थी न कि अचानक ज्यादा पैसे क्यों भेजने लगे. मां मैं धंधा करता हूं… धंधा.’’

वो बोलीं, ‘‘चुप कर. शराब पी कर कुछ भी बोलता है तू.’’ यह कह कर मां ने फोन रख दिया. मैं ने मां को अपना सच बताया था लेकिन उन्होंने मेरी बात को अनसुना कर दिया. मेरे भेजे पैसे वक्त से घर पहुंच रहे थे न… मैं उस रात बहुत रोया. क्या मेरी वैल्यू बस मेरे पैसों तक ही थी? इस के बाद मैं ने मां से कभी ऐसी कोई बात नहीं की. मैं इस धंधे में बना रहा, क्योंकि मुझे इस से पैसे मिल रहे थे. मार्केट में मेरी डिमांड थी. लगा कि जब तक कोलकाता में नौकरी करनी पड़ेगी और एमबीए में एडमिशन नहीं ले लूंगा, तब तक ये करता रहूंगा. लेकिन इस धंधे में कई बार अजीब लोग मिलते हैं. शरीर पर खरोंच छोड़ देते थे. ये निशान शरीर पर भी होते थे और आत्मा पर भी.

और इस दर्द को दूसरा जिगोलो ही समझ पाता था, सोसाइटी चाहे जैसे देखे, इस प्रोफेशन में जाने का मुझे कोई अफसोस नहीं है. हां, अतीत के बारे में सोचूं तो कई बार चुभता तो है. ये एक ऐसा चैप्टर है, जो मेरे मरने के बाद भी कभी नहीं बदलेगा. यह एक ऐसा व्यवसाय है जिस में जोरजबरदस्ती नहीं बल्कि स्वेच्छा से लोग शामिल होते हैं और इन की खरीदफरोख्त भी स्वेच्छा से ही की जाती है. यानी कि यह पुरुष वेश्यावृत्ति औरतों की वेश्यावृत्ति की तरह तकलीफदेह नहीं है. यूं तो यह बेहद संभ्रांत परिवार की औरतों का महंगा शौक है जो मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और दिल्ली जैसे महानगर में तेजी से फलफूल रहा है. इस में लड़कियों की वेश्यावृत्ति की तरह से इस पेशे में धकेला नहीं जाता, बल्कि लड़के खुद अपनी स्वेच्छा से अपने शौक को पूरा करने के लिए, कभीकभी मस्ती करने के लिए या बेरोजगार होने की हालत में इसे रोजगार की तरह अपना लेते हैं.

रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक जिगोलो की मंडियां सजती हैं और बड़ीबड़ी लग्जरी कारों में संभ्रांत कहे जाने वाले परिवारों से औरतें, लड़कियां और उम्रदराज औरतें भी अपने लिए जिगोलो नामक खिलौना चुनती हैं. रात भर या फिर घंटे के हिसाब से उस से खेलती हैं और सुबह की रोशनी के पहले ही वापस अपने घर को चली जाती हैं. कभीकभी शहर से बाहर आउटहाउस पर जाने का भी इंतजाम होता है. लेकिन इन्हें पाना सब के बस की बात नहीं है. यह 3 हजार से ले कर 8 हजार तक के मिलते हैं, एक रात में 8 हजार तक की कमाई की वजह से यह फायदेमंद सौदा बन चुका है. ऐसे लोगों की धमक छोटे शहरों तक में हो चुकी है. गठीला शरीर ,फर्राटेदार अंगरेजी और लिंग के साइज से ही उस की कीमत तय होती है. उन के गले में खास पहचान देने वाला पट्टा लगा होता है, जो उस के सैक्सी होने के बारे में बताता है.

किसी पब में, डिस्को में और बड़े होटलों में जिगोलो अकसर मिलते हैं. इस में काम करने वाले 18 साल के लड़के से ले कर 50 साल के पुरुष भी हो सकते हैं. यह कहें कि अब इस बारे में लोगों को बहुत जानकारी है. दिल्ली के कई पौश इलाके पुरुष वेश्यावृति के लिए कुख्यात कहे जा सकते हैं. इस में रुचि रखने वाली रईस तबके की औरतों के अलावा गे समुदाय के लोग भी होते हैं. इन के खरीददार अथाह पैसा रखने वाली वे औरतें होती हैं, जिन की शारीरिक जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं. उन के लिए अधिक समय तक सैक्स को दबा कर रखना आसान नहीं होता या इन में वैसी औरतें भी होती हैं, जो चेंज में विश्वास करती हैं.

यह किसी मजबूरीवश नहीं सिर्फ मजे के लिए किया जाने वाला महंगा शौक है. शराब पीना, सिगरेट पीना और फिर जिगोलो संग कामाग्नि को बुझाना, यह फैशन सा बन गया है. हैरत की बात तो यह है कि ऐसी महिलाएं अपने निजी शौक की पूर्ति के लिए 2 हजार से 20 हजार रुपए न्यौछावर कर देती हैं. मर्दों की मंडी में पुरुषों के जिस्म की नुमाइश होती है. औरतें इन्हें छू कर और परख कर अपने लिए पसंद करती हैं और फिर कुछ घंटे शराब सिगरेट और मदहोशी के नशे में बिता कर मुंह अंधेरे ही वापस सफेद उजाले में आने के लिए तैयार हो जाती हैं. कुछ घंटे के लिए 3 हजार रुपए देने को तैयार हो जाती हैं. एक मर्द सेक्स वर्कर पर औसतन 12 से 15 हजार रुपए तक लुटाना आम बात मानी जाती है.

कई बार बड़ेबड़े हाई क्लास के अड्डे में जिगोलो महिलाओं के बीच अपनी नुमाइश करते हैं. वहां जो सैक्स संबंध बनाते हैं उस के पैसे मिलते हैं. यह जिगोलो पर निर्भर करता है कि वह कितना अपने क्लाइंट को संतुष्ट कर पाता है. ऐसे में किसी महिला को कोई जिगोलो पसंद आ जाता है तो वह उस की बोली लगा कर पूरी रात के लिए अपने साथ ले जाती है. जिगोलो को तलाशने से ले कर उस के नुमाइश के ठिकाने बनाने के काम में बिचौलिए की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है. उन की बदौलत जिगोलो से ले कर महिला ग्राहक तक की सभी जानकारी गुप्त बनी रहती है. इस काम को करने वाले अधिकतर कम उम्र के लड़के ही होते हैं. यानी 18 से 30 वर्ष के जिन की डिमांड भी ज्यादा रहती है. जिगोलो को जो पैसा मिलता है, उस का 20 प्रतिशत कमीशन एजेंट या बिचौलिए को देना होता है.

यानी कि जिगोलो बनने के लिए 2500 से 3000 रुपए तक चुका कर बाकायदा रजिस्ट्रेशन करवाना होता है. उस के बाद ट्रेनिंग देनी होती है. ट्रेनिंग के दौरान उन्हें खास किस्म के पहनावे से ले कर चलनेफिरने, उठनेबैठने के ढंग और एक सीमा तक यौनांगों के साथ अश्लील हरकत करना आदि सिखाया जाता है.  उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि वे किस तरह से किसी महिला के सामने ज्यादा समय तक टिके रह सकते हैं. उन्हें स्ट्रिपर की भी अच्छीखासी ट्रेनिंग दी जाती है. वे अपनी नुमाइश के दौरान जैसेजैसे कपड़े उतारते जाते हैं, वैसेवैसे सामने बैठी महिलाओं की कामाग्नि भड़कती चली जाती है. बताते हैं जिगोलो में हर पेशे से जुड़े लोग होते हैं. वे जिम की बदौलत तराशे हुए बदन को खूबसूरती के साथ प्रदर्शित करते हैं, जिन्हें देख कर महिला की आह निकल पड़ती है. कई बार अपने प्रोफेशन में यह अच्छे कौन्टैक्ट्स पाने के लिए भी इस काम को करते हैं.

वैसे लोग सड़क किनारे कुछ इलाके की चर्चित बाजारों के पास खड़े हो जाते हैं. लग्जरी गाडि़यां रुकती हैं और सौदा तय होने पर अपने क्लाइंट के पास पहुंच जाते हैं. होटलों में यह काम थोड़ा आसान हो जाता है, क्योंकि वहां उन्हीं के कमरों में इस काम को अंजाम दिया जाता है.  ऐसे कई लोग एक अलग से पहनावे और परफ्यूम लगाए रेस्टोरेंट में बैठ कर ग्राहक के बिचौलिए का इंतजार करते हैं. जिगोलो के धंधे में उतरने वाले शुरू में भले ही अपनी जरूरतों को पूरी करने के लिए ऐसा करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें लत लग जाती है. इस पेशे में आने वाले मनोरंजन और मौडलिंग के पेशे के लोग आसानी से घुलमिल जाते हैं. Social Story

 

Social Story : सोशल मीडिया के जरिए अनसोशल का काम

Social Story :  जल्दी और आसान तरीके से ज्यादा पैसे कमाने के लालच में आजकल उच्चशिक्षित युवा भी सैक्सौर्शन के धंधे में उतर आए हैं. झांसी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे 3 छात्रों ने सोशल मीडिया के जरिए जो अनसोशल काम किया वह…

सैयद नासिर हुसैन अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे. यूनिवर्सिटी द्वारा मिले क्वार्टर में वह में परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी, एक बेटा और बेटी थी. बेटी की शादी हो चुकी थी. बेटा इंजीनियरिंग कर के गुड़गांव की एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी कर रहा था. बेटी ससुराल चली गई, बेटा गुड़गांव तो अलीगढ़ में सिर्फ प्रोफेसर साहब और उन की पत्नी ही रह गईं. इस कोरोना काल में यूनिवर्सिटी बंद ही चल रही है, इसलिए प्रोफेसर साहब का ज्यादा से ज्यादा वक्त घर पर ही बीतता था. अपना मन बहलाने के लिए वह फेसबुक पेज खोल कर बैठ जाते.

वह खुद प्रोफेसर थे, इसलिए उन के दोस्त भी उसी तरह के थे. उन के फेसबुक फ्रैंड्स अच्छीअच्छी पोस्ट डालते थे, इसलिए वह उन्हें पढ़ते और उन पर अपनी प्रतिक्रिया भी देते. फेसबुक पर उन के मित्रों की संख्या काफी हो चुकी थी. फिर भी उन के पास फ्रैंड रिक्वेस्ट आती रहती थीं. जो उन्हें ठीकठाक लगती, उसे कन्फर्म कर देते, बाकी डिलीट कर देते. इसी तरह एक दिन उन के फेसबुक एकाउंट पर एक फ्रैंड रिक्वेस्ट आई, जिस की प्रोफाइल में सुंदर लड़की की फोटो लगी थी. रिक्वेस्ट भेजने वाली का नाम सपना चौहान था. अधेड़ हो चुके प्रोफेसर साहब सुंदर लड़की की फोटो देख कर झूम उठे.

फोटो थोड़ा सैक्सी भी था. उन्होंने उस की प्रोफाइल खोल कर देखी, दोस्त भी. उस में उन का कोई कौमन फ्रैंड नहीं था. उन्होंने झट से वह रिक्वेस्ट कन्फर्म कर दी. मजे की बात यह हुई कि उन के रिक्वेस्ट कन्फर्म करते ही उन के मैसेंजर पर उस का मैसेज आ गया, ‘‘हाय.’’

लड़की की ओर से ‘हाय’ का मैसेज आते ही प्रोफेसर साहब रंग में आ गए. उन्होंने तुरंत जवाब में मैसेज भेजा, ‘‘जी, हैलो.’’

दूसरी ओर जैसे उन के जवाब का इंतजार हो रहा था. तुरंत मैसेज कर के पूछा गया, ‘‘आप करते क्या हैं?’’

‘‘आप ने मेरी प्रोफाइल नहीं देखी क्या? उस में तो सब कुछ दिया है.’’ प्रोफेसर साहब ने मैसेज किया.

‘‘प्रोफाइल की छोडि़ए जनाब, ऐसे ही बता दीजिए न कि आप क्या करते हैं?’’

‘‘मैं अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हूं.’’

‘‘ओह सर, तब तो आप से खूब पटेगी. मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ती हूं. क्या पढ़ाते हैं आप बच्चों को?’’ दूसरी ओर से मैसेज द्वारा पूछा गया, ‘‘बच्चों को सैक्स के बारे में भी कुछ पढ़ाते हैं या नहीं?’’

‘‘मैं मनोविज्ञान का प्रोफेसर हूं, जो जरूरी होता है जरूर बताता हूं.’’

‘‘तब तो आप इंसान को देख कर या बातचीत कर के उस के मन की बात जान लेते होंगे. इतनी बातचीत से आप को पता चल ही गया होगा कि मैं क्या चाहती हूं? आप सिर्फ बताते ही हैं या प्रैक्टिकल भी कर के दिखाते हैं?’’

‘‘मैं प्रोफेसर हूं, अंतरयामी नहीं, जो चार मैसेज से आप के मन की बात जान लूं. कभी प्रैक्टिकल का मौका ही नहीं मिला. अगर मिला तो जरूर कर के दिखाऊंगा.’’ प्रोफेसर साहब ने मैसेज किया.

वह दूसरी ओर से मैसेज आने का इंतजार कर ही रहे थे कि उन की पत्नी चाय ले कर कमरे में आ गईं. सुबहसुबह प्रोफेसर साहब को फोन में डूबे देख कर उन्हें गुस्सा आ गया. उन्होंने थोड़ी तेज आवाज में कहा, ‘‘सुबहसुबह ही फोन में लग गए. आप के पास और कोई काम नहीं है क्या?’’

पत्नी को नाराज होते देख प्रोफेसर साहब ने जवाब देखे बगैर ही फोन रख दिया और कप उठा कर चाय पीने लगे. वह चाय जरूर पी रहे थे, पर उन के दिमाग में एक ही बात घूम रही थी कि उस ने पता नहीं क्या जवाब दिया है. पत्नी जैसे ही खाली कप उठा कर किचन में रखने गई, उन्होंने झट फोन उठा कर मैसेज देखा. दूसरी ओर से मैसेज आया था, ‘‘आप कैसे मर्द हैं जो एक लड़की के मन की बात भी नहीं जान पाते. आप की उम्र कितनी है?’’

प्रोफेसर साहब ने जब उस के इस मैसेज का जवाब नहीं दिया तो दूसरी ओर से फिर मैसेज किया गया , ‘‘अरे, कहां चले गए?’’

इन दोनों संदेशों के जवाब में प्रोफेसर साहब ने मैसेज किया, ‘‘अभी नहीं, तुम दोपहर में औनलाइन रहना, उस समय बात करेंगे. अभी वाइफ बगल में बैठी हैं, इसलिए बात नहीं कर सकते.’’

दूसरी ओर से तुरंत जवाब आ गया, ‘‘ओके.’’

प्रोफेसर साहब अपनी इस फेसबुक फ्रैंड से बात करने को बेचैन थे. पर मजबूर थे. इसलिए किसी तरह दोपहर तक का समय बिताया. पर बीचबीच में वह फोन उठा कर देख जरूर लेते थे. आखिर किसी तरह तरह दोपहर हुई. खाना खा कर वाइफ आराम करने के लिए लेट गईं तो प्रोफैसर सैयद नासिर हुसैन जी फोन ले कर फिर बैठ गए. उन्होंने फोन खोल कर देखा तो सपना चौहान नाम की वह लड़की औनलाइन थी. इतनी देर में उस ने अपनी प्रोफाइल फोटो बदल दी थी. इस बार उस ने बड़ी ही अश्लील फोटो लगा रखी थी. प्रोफेसर साहब वह प्रोफाइल फोटो देख कर ही उत्तेजित हो उठे. उन्होंने मैसेज किया, ‘‘हाय.’’

दूसरी ओर से जवाब आया, ‘‘हाय प्रोफेसर साहब, आप ने तो बड़ा इंतजार कराया. आप ने बताया नहीं जो मैं ने पूछा था?’’

‘‘क्या?’’

‘‘यही कि आप मर्द हो कर भी एक लड़की के मन की बात नहीं जान पाते. जबकि आप मनोविज्ञान के प्रोफेसर हैं.’’

‘‘हर बात कहनी जरूरी नहीं है. मेरी और तुम्हारी उम्र में बड़ा अंतर है. प्यार की बात मैं कर नहीं सकता. मेरी उम्र 55 साल है. प्रोफाइल के अनुसार तुम 22 साल की हो. मेरा और तुम्हारा कोई जोड़ नहीं है. इसलिए मैं तुम्हारे मन की बात जान कर भी क्या करूंगा.’’ प्रोफेसर साहब ने मैसेज भेजा.

‘‘मैं प्यार की बात नहीं कर रही. आप सैक्स तो कर सकते हैं. मुझे बड़ी उम्र के लोग बहुत पसंद हैं. वे अनुभवी होते हैं. फिर आप तो काफी स्मार्ट हैं. आप के साथ सैक्स करने में बड़ा मजा आएगा. आप करेंगे मेरे साथ सैक्स?’’ दूसरी ओर से सपना चौहान ने खुलेआम सैक्स करने की बात कही तो प्रोफेसर साहब का मन हिलोरें लेने लगा. उन की आंखों के सामने प्रोफाइल में लगी अश्लील फोटो तैरने लगी.

प्रोफेसर साहब ने मैसेज भेजा, ‘‘आप कहां रहती हैं?’’

‘‘यह जान कर क्या करेंगे? पहले आप यह बताइए कि मेरे साथ करेंगे न…?’’ सपना की ओर से मैसेज आया.

‘‘यह मेरा सौभाग्य होगा. मैं खुद को बड़ा भाग्यशाली समझूंगा तुम से मिल कर.’’ प्रोफेसर साहब ने जवाब दिया.

‘‘तो फिर आप अपना वाट्सऐप नंबर दीजिए.’’ सपना ने मैसेज द्वारा प्रोफसर साहब का नंबर मांगा. 22 साल की खूबसूरत लड़की 55 साल के आदमी के साथ सैक्स करने को तैयार थी. वह भी बिना किसी लालच या शर्त के. प्रोफेसर साहब से वह कुछ मांग भी नहीं रही थी. ऐसे में भला प्रोफेसर साहब उसे अपना नंबर क्यों न देते. झट से उन्होंने अपना नंबर इनबौक्स में टाइप किया और बिना कुछ सोचेविचारे सेंड कर दिया. मैसेज भेजने के थोड़ी देर बाद ही उन के इनबौक्स में मैसेज आया कि अब आप वाट्सऐप पर आइए. मैं ने आप के वाट्सऐप पर मैसेज भेज दिया है.

प्रोफेसर साहब ने वाट्सऐप खोला तो देखा एक नंबर से मैसेज आया हुआ था. प्रोफेसर साहब अब तक सपना की बातों से उस के लिए पागल हो चुके थे. उन्होंने झट मैसेज भेजा, ‘‘जी कहिए.’’

सपना की ओर से मैसेज आया, ‘‘मैं आप को वीडियो काल कर रही हूं. आप अपने कपड़े उतारिए, मैं भी अपने कपड़े उतार रही हूं.’’

यह मैसेज पढ़ कर तो प्रोफेसर साहब की धड़कनें बढ़ गईं. अपनी धड़कनों पर काबू पाते हुए प्रोफेसर साहब ने जवाब दिया, ‘‘पहले आप अपनी फोटो तो भेजिए. मैं आप को देखना चाहता हूं.’’

‘‘वीडियो काल कीजिए. आप शक्ल देखने की बात कर रहे हैं. मैं तो आप को सब कुछ दिखाने को तैयार हूं. जन्नत की सैर कराना चाहती हूं मैं आप को.’’ सपना का मैसेज आया. प्रोफेसर साहब सपना को देखने के लिए जितना बेचैन थे, उतनी ही बेचैनी सपना अपना सब कुछ दिखाने के लिए दिखा थी. इस बेचैनी को शांत करने के लिए प्रोफेसर साहब ने आखिर वीडियो काल कर ही दिया. दूसरी ओर से फोन उठ भी गया. पर आवाज म्यूट कर दी थी. प्रोफेसर साहब की नजरें स्क्रीन पर ही जमी थीं. दूसरी ओर से किसी लड़की की धुंधली सी तसवीर दिखाई दी. वह लड़की अपने कपड़े उतार रही थी. पर वह कपड़े उतारती, उस के पहले ही फोन काट दिया गया.

फोन काट कर सपना ने मैसेज भेजा, ‘‘आप तो केवल देख रहे हैं. कपड़े उतार ही नहीं रहे हैं. आप भी अपने कपड़े उतारिए न.’’

‘‘ठीक है, मैं कपड़े उतार कर काल करता हूं.’’ प्रोफेसर साहब ने तुरंत मैसेज किया. प्रोफेसर साहब पूरे जोश में थे.

वीडियो काल में सपना को कपड़े उतारते देख कर अब तक वह उत्तेजित भी हो चुके थे. उन्होंने झट कमरे का दरवाजा बंद किया और कपड़े उतारने लगे. अभी वह कपड़े उतार ही रहे थे कि सपना ने फोन कर दिया. उन्होंने झट से पायजामा और अंडरवियर उतार कर फेंकी और फोन रिसीव कर के फोन के कैमरे के सामने खड़े हो गए. फोन उन्होंने कमरे में रखी मेज पर सीधा कर के रख दिया और उस के सामने खड़े हो कर अपनी मर्दानगी की नुमाइश करने लगे. दूसरी ओर से भी वीडियो में एक लड़की अपने कपड़े उतारती दिखाई दे रही थी.

चूंकि दूसरी ओर फोन करने वाली सपना ने आवाज म्यूट कर रखी थी, इसलिए न उधर से कोई आवाज आ रही थी और न प्रोफेसर साहब की आवाज जा रही थी. करीब डेढ़ मिनट तक यह खेल चलता रहा. प्रोफेसर साहब खुश थे कि उन्होंने 22 साल की एक लड़की को बिना कपड़ों में देखा और उसे अपनी मर्दानगी भी दिखाई. लेकिन उन की यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी. इस की वजह यह थी कि अभी अपने सारे कपड़े पहन कर बैड पर बैठे ही थे कि उन के फोन पर सपना का मैसेज आ गया. उन्होंने सोचा सपना ने कोई सैक्सी मैसेज भेजा होगा. पर उन्होंने जब मैसेज खोल कर देखा तो सन्न रह गए. सपना ने एक वीडियो भेजी थी, जिस में दूसरी ओर से एक लड़की कपड़े उतार रही थी. उसी वीडियो में एक कोने में प्रोफेसर साहब अपनी मर्दानगी की नुमाइश कर रहे थे.

यह वीडियो देख कर प्रोफेसर साहब के होश उड़ गए. वह समझ गए कि वीडियो भेजने वाले का इरादा नेक नहीं है. वह फंस चुके हैं. क्योंकि अगर यह वीडियो उन का कोई भी परिचित या रिश्तेदार या दोस्त देख लेता तो वह किसी को मुंह दिखाने लायक न रहते. वह इसी तरह की बातें सोच रहे थे कि सपना का मैसेज आ गया, ‘‘कैसा लगा वीडियो? मेरे खयाल से वीडियो अच्छा लगा होगा. आप तो जानते ही हैं कि अगर यह वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंच गया तो आप का क्या हाल होगा. अगर आप चाहते हैं कि आप का यह वीडियो मेरे और आप के अलावा कोई तीसरा न देखे तो आप मुझें 25 हजार रुपए मेरे बैंक एकाउंट में डाल दीजिए.’’

प्रोफेसर साहब की हालत खस्ता हो चुकी थी. काटो तो खून नहीं वाली स्थिति में वह सिर पर हाथ रखे बैठे थे. वह सोच ही रहे थे कि अब क्या करें, तभी दूसरी ओर से फिर स्क्रीन शौट के साथ मैसेज आ गया, ‘‘क्या निर्णय लिया आप ने? पैसे देंगे या फिर आप की वीडियो फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर अपलोड कर दूं.’’

थोड़ी देर पहले जिसे प्रोफेसर नासिर हुसैन खुश हो कर धड़ाधड़ मैसेज कर रहे थे, अब वह उन्हें खलनायिका नजर आ रही थी. अब वह फोन उठाने से भी घबरा रहे थे. समाज में उन की एक प्रतिष्ठा थी, इज्जत थी. जोश में आ कर वह ऐसी गलती कर बैठे थे, जिसे वह किसी से कह भी नहीं सकते थे. वह मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे. फिर भी वह सचमुच उस लड़की के मन की बात नहीं जान पाए. तभी उन के मन में आया कि यह लड़की कतई नहीं हो सकती. यह कोई लड़का है, जिस ने लड़की के नाम की आईडी बना कर लड़की का फोटो लगा कर उन्हें फंसाया है. लेकिन अब तो वह फंस ही चुके थे. इस जाल से निकलें कैसे. उन्होंने जवाब भेजा, ‘‘थोड़ा सोचनेविचारने का मौका दो. आप ने मेरे साथ जो किया है, ठीक नहीं किया है.’’

‘‘यह आप को पहले सोचना चाहिए था. अब तो आप को रुपए देने के बारे में सोचना है. आप जल्दी रुपए भेजिए, वरना मैं वीडियो अपलोड करने जा रही हूं.’’

मरता क्या न करता. अपनी इज्जत बचाने के लिए प्रोफेसर साहब ने 25 हजार रुपए सपना द्वारा दिए एकाउंट नंबर पर ट्रांसफर कर दिए. उन्होंने सोचा 25 हजार रुपए दे कर इज्जत बच रही है तो कोई बुरा नहीं है. पैसे भेजने के साथ ही उन्होंने मैसेज किया, ‘‘मैं ने आप को मुंहमांगे रुपए दे दिए हैं. अब आप मेरी वीडियो अपने फोन से डिलीट कर दीजिएगा.’’

कथित सपना चौहान ने जवाब में मैसेज भेजा, ‘‘आप तो बड़ी जल्दी हार मान बैठे. एक ही बार के सैक्स में आप की सारी मर्दानगी हवा हो गई, जबकि अभी तो मुझे मजा ही नहीं आया. जब तक आप मुझे पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर देंगे, तब तक मैं आप का पीछा छोड़ने वाली नहीं हूं.’’

प्रोफेसर साहब समझ गए कि वह बुरी तरह फंस चुके हैं. इस जाल से निकलने का उन्हें कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा था. अपनी यह विपत्ति वह किसी से कह भी नहीं सकते थे. अपनी इस विपत्ति के बारे में वह किसी से भी कुछ कहते, वह उन्हें चार बात तो सुनाता ही, उन की पोल भी खोल देता. इसी डर से वह पुलिस के पास भी नहीं जा रहे थे. धीरेधीरे प्रोफेसर साहब ने 3 लाख 13 हजार रुपए सपना को दे दिए. इस के बावजूद सपना उन का पीछा नहीं छोड़ रही थी. वह और पैसे मांग रही थी. प्रोफेसर सैयद नासिर हुसैन को लगा कि अब वह इस सपना नाम की चुड़ैल से पैसे दे कर पीछा नहीं छुड़ा पाएंगे तो उन्होंने पुलिस के पास जाने का निर्णय ले लिया.

यह साइबर क्राइम का मामला था. इसलिए प्रोफेसर साहब सीधे अलीगढ़ के थाना साइबर क्राइम पहुंचे. थानाप्रभारी सुरेंद्र सिंह से मिल कर उन्होंने अपनी सारी परेशानी बताई, साथ ही निवेदन भी किया कि किसी भी तरह उन का नाम सामने न आने पाए, वरना वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. सुरेंद्र सिंह ने प्रोफेसर साहब से प्रार्थना पत्र ले कर अज्ञात के खिलाफ आईपीसी की धारा 384, 419, 420 और आईटी एक्ट 66डी, 66ई के तहत मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी. उन्होंने प्रोफेसर साहब से वह नंबर भी ले लिया था, जिस नंबर से उन्हें फोन किया जाता था.

कुल 3 नंबर थे, जिन से प्रोफेसर साहब को फोन किए जा रहे थे. उन्हीं नंबरों पर उन्होंने कुछ पैसे भी भेजे थे. इस का मतलब था कि वे नंबर किसी फरजी आईडी पर नहीं लिए गए थे. थानाप्रभारी सुरेंद्र सिंह ने सारे नंबरों को सर्विलांस पर लगवाने के साथ उन की डिटेल्स भी निकलवाई. पता चला कि वे नंबर उत्तर प्रदेश के जिला झांसी में ऐक्टिव थे. इस का मतलब प्रोफेसर साहब को जो लोग ब्लैकमेल कर रहे थे, वे झांसी में रह रहे थे. जिन 3 नंबरों से प्रोफेसर साहब को फोन किए जा रहे थे, वे तीनों नंबर अलगअलग मोबाइलों में चल रहे थे. इस से सुरेंद्र सिंह को लगा कि इस मामले में एक से अधिक लोग शामिल हैं. उन्होंने तीनों नंबरों की आईडी निकलवाई, जिस से उन्हें उन नंबरों को चलाने वाले के नाम और पते मिल गए.

सारे सबूत जुटा कर अलीगढ़ साइबर क्राइम पुलिस ने झांसी के थाना सिपरी बाजार पुलिस की मदद से अशफाक खान निवासी नानकगंज, मोहम्मद जावेद खान और मोहम्मद शोएब निवासी चमनगंज को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने इन के पास से सबूत के तौर पर मोबाइल फोन, बैंक खाते का विवरण, चैकबुक और इंटरनेट का सामान बरामद कर लिया. पुलिस ने यह सारा सामान जब्त कर लिया. कंप्यूटर की हार्डडिस्क सीज कर दी थी. पूछताछ में तीनों आरोपियों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. तीनों आरोपियों ने पूछताछ में जो बताया, उस के अनुसार तीनों युवक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. घर से खर्च के लिए जो पैसे मिलते थे, उस से उन का खर्च पूरा नहीं होता था. क्योंकि यह फिजूलखर्ची हो चुके थे.

अपने शौक पूरे करने के लिए ही ये तीनों ब्लैकमेलिंग का यह अपराध करने लगे थे. उन्होंने बताया कि इन्होंने उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड आदि राज्यों के लोगों से भी इसी तरह लाखों रुपए की ठगी की है. मजे की बात यह है कि इन लोगों ने अब तक जितने लोगों से लाखों रुपए ठगे हैं, उन में से अभी तक किसी ने खुद के ठगे जाने की कहीं शिकायत नहीं की थी. इसीलिए इन की हिम्मत बढ़ी हुई थी. प्रोफेसर साहब अगर हिम्मत न करते तो इन का यह गोरखधंधा अभी भी चल रहा होता.

पूछताछ में गिरफ्तार तीनों अभियुक्तों ने बताया कि ये लोगों को फंसाने के लिए सब से पहले अलगअलग सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर लड़की के नाम से फरजी आईडी बनाते थे. उस आईडी पर किसी सुंदर लड़की का या फिर आपत्तिजनक फोटो लगाते थे. उसी सोशल मीडिया आईडी से अधेड़ या बुजुर्गों को फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजते थे. वीडियो काल के दौरान ये आपत्तिजनक वीडियो दिखाते थे. दूसरी ओर काल रिसीव करने वाला व्यक्ति जब अपने कपड़े उतारता तो पहले से लगाए स्क्रीन सेवर की वजह से उस की आपत्तिजनक स्थिति की वीडियो भी बन जाती थी. उसी वीडियो के द्वारा वह उस की जेब ढीली करते.

छोटीमोटी रकम होती तो ये पेटीएम में डलवाते थे और बड़ी रकम सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर करवाते थे. ऐसा ही इन्होंने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सैयद नासिर हुसैन के साथ भी किया था. पूछताछ के बाद थानाप्रभारी सुरेंद्र सिंह ने तीनों आरोपियों को अलीगढ़ की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Social Story

 

Crime Stories : लड़कियों को किडनैप कर जबरन कराया जाता था जिस्मफरोशी धंधा करवाया

Crime Stories : औनलाइन सैक्स रैकेट चलाने वाले गिरोह से 12 साल की मानसी को बरामद करने पर पुलिस को ऐसी चौंकाने वाली जानकारी मिली कि…

22  जनवरी, 2021 की बात है. 12 साल की मानसी पास की दुकान से चिप्स लेने गई थी. जब वह काफी देर बाद भी घर नहीं लौटी तो घर वालों को उस की चिंता हुई. घर वाले उस दुकानदार के पास पहुंचे, जिस के पास वह अकसर खानेपीने का सामान लाती थी. उन्होंने उस दुकानदार से मानसी के बारे में पूछा तो दुकानदार ने बताया कि मानसी तो काफी देर पहले ही चिप्स का पैकेट ले कर जा चुकी है. जब वह चिप्स ले कर जा चुकी है तो घर क्यों नहीं पहुंची, यह बात घर वालों की समझ में नहीं आ रही थी. उन्होंने आसपास के बच्चों से उस के बारे में पूछा, लेकिन उन से भी मानसी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानसी गई तो गई कहां. उन्होंने उसे इधरउधर तमाम संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. तब उन्होंने इस की सूचना पश्चिमी दिल्ली के थाना राजौरी गार्डन में दे दी. चूंकि मामला एक नाबालिग लड़की के लापता होने का था, इसलिए पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया. पुलिस ने मानसी के पिता की तरफ से गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. डीसीपी (पश्चिमी दिल्ली) उर्विजा गोयल को जब 12 वर्षीय मानसी के गायब होने की जानकारी मिली तब उन्होंने थाना पुलिस को इस मामले में तीव्र काररवाई करने के आदेश दिए. डीसीपी का आदेश पाते ही थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच के लिए एएसआई विनती प्रसाद के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी.

एएसआई विनती प्रसाद ने सब से पहले लापता बच्ची के घर वालों से उस के बारे में विस्तार से जानकारी ली. इतना ही नहीं, उन्होंने घर वालों से यह भी जानना चाहा कि उन की किसी से कोई रंजिश तो नहीं है. घर वालों ने उन से साफ कह दिया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से मानसी को तलाशने लगी. जिस जगह से मानसी गायब हुई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस के अलावा स्थानीय लोगों से भी बच्ची के बारे में जानकारी हासिल की. पुलिस ने सोशल मीडिया पर भी निगरानी कर दी, लेकिन कहीं से भी मानसी के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस टीम को जांच करतेकरते करीब 2 महीने बीत चुके थे. जब बच्ची कहीं नहीं मिली तो पुलिस ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल को ध्यान में रखते हुए केस की जांच शुरू कर दी. यानी पुलिस को यह शक होने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्ची जिस्मफरोशी गैंग के चंगुल में फंस गई हो. इस बिंदु पर जांच करतेकरते पुलिस टीम ने कई जगहों पर दबिशें दीं, लेकिन लापता बच्ची का सुराग नहीं मिला. करीब 2 महीने बाद पुलिस को सूचना मिली कि मानसी का अपहरण करने के बाद उसे दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में रखा गया है और वहीं पर उस से जिस्मफरोशी का धंधा कराया जा रहा है. यह सूचना रोंगटे खड़े कर देने वाली थी.

क्योंकि मानसी की उम्र केवल 12 साल थी और इस उम्र में उस बच्ची के साथ जिस तरह का कार्य कराने की जानकारी मिली, वह मानवता को शर्मसार करने वाली ही थी. जांच अधिकारी विनती प्रसाद ने यह खबर अपने उच्चाधिकारियों को दी फिर उन्हीं के दिशानिर्देश पर पुलिस टीम ने 17 मार्च, 2021 को मजनूं का टीला इलाके में एक घर पर दबिश दी. मुखबिर की सूचना सही निकली. मानसी वहीं पर मिल गई. पुलिस ने मानसी को सब से पहले अपने कब्जे में लिया. इस के बाद पुलिस ने वहां 2 महिलाओं सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया.

पुलिस ने उन सभी से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे बड़े स्तर पर एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराते थे और उन का धंधा ज्यादातर वाट्सऐप ग्रुप और इंटरनेट के माध्यम से चलता है. उन के पास से पुलिस ने 5 मोबाइल फोन बरामद किए. फोनों की जांच की गई तो तमाम वाट्सऐप ग्रुप में ऐसी लड़कियों के अनेक फोटो मिले, जिन से वे जिस्मफरोशी कराते थे. पुलिस ने गिरफ्तार किए हुए उन चारों लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से संजय राजपूत और कनिका राय मजनूं का टीला के रहने वाले थे जबकि अंशु शर्मा  मुरादाबाद का और सपना गोयल मुजफ्फरनगर की.

ये सभी औनलाइन सैक्स रैकेट चलाते थे. जांच में पता चला कि इन लोगों के काम करने का तरीका एकदम अलग था. यह गिरोह सोशल साइट पर ज्यादा सक्रिय था. गैंग के लोग 150 से ज्यादा वाट्सऐप ग्रुप में सक्रिय थे. एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराने वाली लड़की के फोटो ये वाट्सऐप ग्रुप में शेयर करते थे. इस के बाद ग्रुप से जो कस्टमर इन के संपर्क में आता था, उस से यह पर्सनल चैटिंग करने के बाद पैसों की डील फाइनल करते थे. फिर औनलाइन ही पेमेंट अपने खाते में ट्रांसफर कराने के बाद कस्टमर के बताए गए स्थान पर ये लड़की को सप्लाई करते थे.

इस तरह यह गैंग देश के अलगअलग बड़े शहरों में लड़कियों की सप्लाई करते था. इतना ही नहीं, फाइव स्टार होटलों में भी इन के पास से लड़कियां सप्लाई की जाती थीं. आरोपियों ने बताया कि उन के गैंग के सदस्य अलगअलग जगहों से लड़कियां उन के पास लाते थे. मानसी का भी गैंग के 2 लोगों ने अपहरण उस समय किया था, जब वह दुकान पर गई थी. उस का अपहरण करने के बाद वह उसे अपने घर पर ले गए थे. उन्होंने मानसी से कहा था कि आज उन के यहां पर जन्मदिन है इसलिए वह बच्चों को इकट्ठा कर के केक काटेंगे. उन्होंने मानसी को केक खाने को दिया. केक खाते ही मानसी को नशा हो गया. इस के बाद दोनों मानसी को मजनूं का टीला ले गए, वहां पर संजय राजपूत, अंशु शर्मा, सपना गोयल और कनिका राय मिली.

12 साल की बच्ची को देख कर ये चारों खुश हो गए कि अब इस से मोटी कमाई की जा सकती है. क्योंकि वह तो उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझ रहे थे. जब मानसी पर हल्का नशा सवार था, तभी उस के साथ रेप किया गया. होश आने पर मानसी दर्द से कराहती रही. इस के बाद भी इन लोगों को उस पर दया नहीं आई. उन्होंने उसी रात उसे किसी दूसरे ग्राहक के सामने पेश किया. इस तरह वह मानसी का शारीरिक शोषण करते रहे. जब वह विरोध करती तो ये लोग उसे प्रताडि़त करते थे. इस तरह मानसी इन लोगों के चंगुल में बुरी तरह फंस चुकी थी. वहां से निकलने का उस के पास कोई उपाय नहीं था.

आरोपियों के 2 अन्य साथी फरार हो चुके थे. पुलिस ने उन की तलाश में अनेक स्थानों पर दबिश दी, लेकिन उन का पता नहीं चला. आरोपी 35 वर्षीय संजय राजपूत, 21 वर्षीय अंशु शर्मा, 24 साल की सपना गोयल और 28 साल की कनिका राय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभियुक्तों के पास से बरामद की गई 12 वर्षीय मानसी को पुलिस ने उपचार के लिए अस्पताल में भरती करा दिया. मानसी ने अपने साथ घटी सारी घटना पुलिस को बता दी.    आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस गंभीरता से इस बात की जांच करने में जुट गई. इस गैंग के तार देश में किनकिन लोगों से जुड़े थे और इन्होंने अब तक कितनी लड़कियों का अपहरण किया था. Crime Stories

(कथा में मानसी परिवर्तित नाम है)