UP News: तमाशा इंजीनियर की लाइव मौत का

UP News: खुद को उत्तर प्रदेश का ‘शो-विंडो’ कहने वाला गौतमबुद्धनगर (नोएडा) आपदा के समय कितना असहाय है, युवराज मेहता की मौत ने ये साबित कर दिया. करीब 2 घंटे तक रेस्क्यू मिशन के नाम पर चले ड्रामे के दौरान तो जिला प्रशासन का कोई बड़ा अधिकारी मौके पर पहुंचा और ही नोएडा प्राधिकरण का. पुलिस, एनडीआरएफ और दमकल विभाग के जो कर्मचारी मौके पर पहुंचे भी, वे सिर्फ तमाशबीन बने रहे और बल्कि उन की लापरवाही ने इंजीनियर की मौत को ऐसा लाइव शो बना दिया कि…

गलगोटिया कालेज से 2022 में बीटेक की पढ़ाई करने वाले 27 साल के युवराज मेहता मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले थे. वह पढ़ाई में शुरू से ही अच्छे थे. पढ़ाई के बाद युवराज मेहता गुरुग्राम स्थित डनहमबी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर कार्यरत थे. डनहमबी एक जानीमानी डेटा साइंस और कस्टमर एनालिटिक्स कंपनी है, जो दुनिया भर में रिटेल और टेक्नोलौजी सेक्टर में काम करती है.

युवराज की मम्मी का 2 साल पहले देहांत हो गया था. युवराज की बहन ब्रिटेन में रहती हैं. वह भी शादी के बाद ब्रिटेन में ही जा कर बसने की योजना बना रहे थे. उन के पिता राजकुमार मेहता भी एक कंपनी में नौकरी करते थे. नौकरी लगने के बाद युवराज पहले वह गाजियाबाद में रहते थे. वहां से वह रोजाना मेट्रो के जरिए गुरुग्राम स्थित अपने औफिस आतेजाते थे. मेट्रो कनेक्टिविटी होने की वजह से उन का सफर आसान था, लेकिन नवंबर 2024 में वह ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी में आ कर रहने लगे.

ग्रेटर नोएडा शिफ्ट होने के बाद चूंकि वहां से सीधे कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट या मेट्रो जैसा साधन नहीं था, इसलिए वह अपनी नई ब्रिजा कार से ही गुरुग्राम आनेजाने लगे. 16 जनवरी, 2026 की रात के करीब 12 बज रहे थे. युवराज अपनी कंपनी से शिफ्ट खत्म होने के बाद कुछ देर दोस्तों से गप्पें लड़ाने के बाद अपनी कार द्वारा गुरुग्राम से ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित अपने घर की तरफ निकले.

उस वक्त रात के करीब 12 बज रहे थे, जब युवराज की कार नोएडा के सेक्टर 150 में 90 डिग्री कोण वाली मोड़ पर पहुंची. उस समय दिल्ली एनसीआर में सुबह और शाम के समय घने कोहरे का प्रकोप चल रहा था. युवराज भी इसी घने कोहरे की वजह से उस बाउंड्री वाल को नहीं देख पाए, जो सड़क के मोड़ पर बनी थी. कार की स्पीड भी थोड़ी ज्यादा थी, जिस से उन की कार उस मामूली से सीमेंटिंड रेलिंग को तोड़ती हुई पानी से भरे गहरे गड्ढे में जा गिरी.

एक ही क्षण में युवराज को अहसास हो गया कि वह कार समेत सड़क के किनारे बने पानी से भरे बेसमेंट के लिए बनाए गए गड्ढे में जा गिरे हैं. दरअसल, यह सब कुछ ही सेकेंडों में हो गया था. कार के भीतर पानी तेजी से भरने लगा. युवराज ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला. शीशा तोडऩे की कोशिश की, लेकिन उस पल जान जाने के डर से उस के हाथ कांप गए. ताकत होते हुए भी हिम्मत जवाब दे रही थी.

युवराज पूरी ताकत से चीखेचिल्लाए, लेकिन उन की आवाज कार के भीतर ही दबी रह गई. किसी तरह हिम्मत जुटा कर सनरूफ खोला और कार की छत पर आ गए. मौत के उस पल में उन्हें अपने पापा की याद आई. कांपते हाथों से पापा को फोन किया. बस इतना कहा, ‘मैं गड्ढे में फंस गया हूं, जल्दी आइए. कार धीरेधीरे डूब रही है.’

पानी तेजी से युवराज को अपनी चपेट में ले रहा था. आंखों के सामने फेमिली वालों और दोस्तों के चेहरे तैरने लगे. लगा कि अब जिंदगी नहीं बचेगी. कुछ ही देर में पापा राजकुमार मेहता सड़क के पास पहुंच गए. उन्हें करीब 20 मिनट लगे. वह जोरजोर से चीखने लगे. पानी में डूबते युवराज को लगा कि अब मदद आ जाएगी. युवराज ने मोबाइल की टौर्च जलाई ताकि पापा को उन की लोकेशन दिख जाए. लेकिन मदद सिर्फ सड़क तक आई थी, गड्ढे के अंदर नहीं उतरी. युवराज बेबस और असहाय सा मौत को करीब आते हुए मदद का इंतजार करता रहा. कार और नीचे धंसती जा रही थी. जैसेतैसे युवराज कार की छत पर इधर से उधर पहलू बदलता रहा. कार की छत से ही वो ‘हेल्प…हेल्प’ चीखते हुए मदद की गुहार लगाने लगा.

चूंकि राजकुमार मेहता ने डायल 112 पर फोन कर दिया था, इसलिए थोड़ी ही देर में पुलिस और दमकलकर्मी व उस के बाद एसडीआरफ के कर्मचारी भी पहुंच गए. युवराज की उम्मीद फिर जागी, सोचा अब तो बच ही जाऊंगा. लेकिन यही उन की सब से बड़ी भूल थी. उन्हें पानी में डूबते हुए कुछ आकृतियां दिखीं. वे सब लोग ऊपर खड़े थे. लेकिन नीचे उतरने को कोई तैयार नहीं था. पानी करीब 70 फुट गहरा था. ‘जोखिम है,’ कह कर सरकारी एजेंसियों के अधिकारी व कर्मचारी संसाधन आने का इंतजार करते रहे. रस्सी आई… मगर इस में काफी देर हो गई. उपकरण देर से पहुंचे और वक्त हाथ से निकलता चला गया.

वह सड़क, जिस पर न बैरिकेड था, न चेतावनी बोर्ड, न लाल झंडी, वहां युवराज की मौत इस की गवाह बन रही थी. पूरा सिस्टम मौके पर था, लेकिन संवेदना नहीं थी. तिलतिल कर के मौत युवराज के करीब आ रही थी और लंबे इंतजार के बाद उन की उम्मीद भी डूबने लगी थी. क्योंकि पानी उन की छाती तक आ चुका था, सांसें टूटने लगीं और आवाज गले में अटकने लगी थी. जब तक वह पूरी तरह पानी में डूब नहीं गया, तब तक सड़क पर वह उम्मीद और हसरतभरी नजरों से देखते रहे. नाकारों की भीड़ के बीच युवराज के पापा खुद को असहाय महसूस कर रहे थे और हृदयविदारक चीखों के साथ वहां खड़े सिस्टम से जुड़े लोगों से हाथ जोड़ कर कहते रहे, ‘सर, कुछ तो कीजिए.’

वरदीधारी लोग, सरकारी गाडिय़ां और एक ऐसा सिस्टम जो फाइलों में तो तेज है, लेकिन इंसान को बचाने के लिए पानी में उतरने से डरता है, वह सिर्फ यही कहता रहा, ‘सर, पानी बहुत गहरा और ठंडा है. भीतर बहुत से सरिए भी हैं.’ राजकुमार मेहता को उस वक्त लगा कि काश! उस सड़क पर पहले ही बैरिकेड लगा होता. काश! उस गड्ढे को ढक दिया गया होता. काश! सिस्टम हादसे से पहले जागा होता तो उन का बेटा जिंदा पानी भरे गड्ढे में न होता. मदद सामने थी, लेकिन सिस्टम के नकारेपन, अधिकारियों और कर्मचारियों की संवेदनहीनता के आगे उन के बेटे की जिंदगी हार गई.

कुछ देर बाद जब पानी भरे बेसमेंट से चीखनेचिल्लाने और मदद की पुकार करने वाली आवाजें आनी बंद हो गईं तो राजकुमार मेहता को अहसास हो गया कि अब बेटा उन से दूर जा चुका है.

तमाशबीन सिस्टम

युवराज करीब 2 घंटे तक संषर्ष करते रहे, सिस्टम वहां खड़ा हो कर देखता भी रहा, इस के बाद बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. जब ये सारी कवायद चल रही थी, उस वक्त एक फूड कंपनी का डिलीवरी बौय मुनेंद्र जरूर गाडिय़ों व लोगों की भीड़ देख कर वहां रुका था. जब मुनेंद्र को पता चला कि एक युवक गाड़ी समेत उस पानी भरे बेसमेंट में डूब गया है तो उस ने एसडीआरएफ वालों से लाइफ सेविंग जैकेट ले कर उस पानी भरे गड्ढे में छलांग लगाई थी. उस ने करीब आधा घंटा प्रयास भी किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

राजकुमार मेहता ने तब तक अपने कुछ रिश्तेदारों और पहचान वालों को फोन कर दिया तो वे भी मौके पर आ गए, लेकिन वहां खड़ा सिस्टम का कोई भी इंसान दिन निकलने से पहले उन की मदद नहीं कर सका. सुबह करीब 6 बजे सुबह रेस्क्यू औपरेशन शुरू हुआ. तब करीब एक घंटे बाद युवराज की डैडबौडी को बाहर निकाला जा सका. चूंकि दिन का उजाला हो चुका था. युवराज की मौत का मामला इस दौरान सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा. सुबह जब लोग वहां पहुंचे तो उन्हें पूरे घटनाक्रम की जानकारी मिली और उन्होंने घटना की वीडियो क्लिप बना कर उसे सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर दिया.

चूंकि ये मामला नालेज पार्क थाने के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस ने दुर्घटना का मामला दर्ज कर लिया और शव को पेास्टमार्टम के लिए भेज दिया. लेकिन राजकुमार मेहता व उन के साथ जुटे लोग तब तक समझ चुके थे कि युवराज की मौत सिर्फ हादसा नहीं है, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुई हत्या है. लिहाजा उन्होंने पुलिस को नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की तहरीर दे कर मुकदमा दर्ज करने जिद पकड़ ली.

संयोग से दिन चढ़तेचढ़ते युवराज की मौत का मामला तूल पकडऩे लगा था. मुनेंद्र नाम के उस डिलीवरी बौय का बयान भी सोशल मीडिया की सुर्खी बन चुका था, जिस ने पूरे सरकारी तंत्र की मौजूदगी के बावजूद खुद जान पर खेल कर युवराज को बचाने का असफल प्रयास किया था. पुलिस महकमा समझ गया कि उन से भूल हुई है, लिहाजा उच्चाधिकारियों का निर्देश मिलने पर नालेज पार्क पुलिस ने आननफानन में बीएनएस की धारा में गैरइरादतन हत्या की धारा 105, लापरवाही से मौत 106(1) और जीवन को खतरे में डालने वाले कार्य की धारा 125 को जोड़ कर उन 2 बिल्डरों को नामजद कर दिया, जिन की जमीन पर बेसमेंट की खुदाई के बाद ये पानी भरा था.

दूसरी तरफ युवराज के शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया गया. उसी दिन कुछ फेमिली वालों, सोसाइटी के लोगों व युवराज के मित्रों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार कर दिया गया. लेकिन 17 जनवरी, 2026 की शाम होतेहोते युवराज की मौत का मामला नोएडा शहर से निकल कर देशव्यापी स्तर पर मीडिया की सुर्खी बन चुका था. चारों तरफ हाइटेक कहे जाने वाले नोएडा के प्रशासन, शहर के सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और मामले पर उस की चुप्पी को ले कर लताड़ लगाई जाने लगी.

यह घटना जरूर साधारण थी, लेकिन इस ने पूरे सरकारी तंत्र पर इतने सवाल खड़े कर दिए थे कि उन का जवाब देने के लिए सरकार को ही डैमेज कंट्रोल के लिए सामने आना पड़ा.

एसआईटी जुटी जांच में

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उसी शाम को इस दुघर्टना पर स्वत:संज्ञान लेते हुए एक 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन कर दिया, जिस की कमान मेरठ जोन के एडीजी (पुलिस) भानु भास्कर को सौंपी गई. एसआईटी में मेरठ मंडल के आयुक्त भानु गोस्वामी को भी शामिल किया गया. सीएम ने एसआईटी को निर्देश दिया कि 5 दिनों में जांच कर यह पता लगाया जाए कि इस में किन सरकारी विभागों की लापरवाही रही, किन अधिकारियों की संवेदनहीनता के कारण युवराज की जान गई.

हालांकि पुलिस ने विशटाउन और लोटस ग्रीन नाम के जिन 2 बिल्डरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी, उस में विशटाउन के बिल्डर अभय कुमार को उसी रात गिरफ्तार कर अपनी पारदर्शिता को स्पष्ट करने की कोशिश की. अगले दिन फरीदाबाद के लोटस ग्रीन बिल्डर से जुड़े डाइरेक्टर रवि बंसल व सचिन कर्णवाल को भी गिरफ्तार कर लिया गया. हादसे के दूसरे ही दिन नोएडा अथौरिटी के सीईओ एम. लोकेश को उन के पद से हटा दिया गया और उन की जगह करुणेश कुमार को नया सीईओ बना दिया गया.

इतना ही नहीं, अथौरिटी के एक जूनियर इंजीनियर गौरव को बरखास्त कर शासन ने डैमेज कंट्रोल करने की भी कोशिश की, लेकिन तब तक इतने सवाल खड़े हो चुके थे कि प्रशासन का कोई भी अंग आरोपों की जद में आए बिना बच नहीं सका. सरकार की तरफ से एसआईटी गठन के बाद मीडिया ने भी युवराज की मौत के मामले में समानांतर जांच शुरू कर दी और आए दिन नए तरह के सवाल उठाए जाने लगे थे.

सब से पहला सवाल तो नोएडा की डीएम मेधा रूपम को ले कर ही खड़ा होने लगा था, जो एसडीआरफ या एनडीआरएफ के काम काज को नियंत्रित करने वाले आपदा प्रबंधन ग्रुप की चेयरमैन होती है. उत्तर प्रदेश के महत्त्वपूर्ण जिले गौतमबुद्ध नगर की कमान संभालने वाली आईएएस अधिकारी मेधा रूपम के बारे में चर्चा होने लगी कि उन्होंने हादसे के बाद न तो कोई संवेदनशीलता दिखाई, न ही किसी की जिम्मेदारी तय की.

चूंकि डीएम मेधा रूपम के फादर ज्ञानेश कुमार वर्तमान में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर तैनात हैं, इसलिए उन्हें बचाने की कवायद होने लगी. सोशल मीडिया पर डीएम मेधा रूपम के प्रति नाराजगी जाहिर की जाने लगी. एसआईटी की जांच शुरू होते ही युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले ने पूरे प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया. एसआईटी ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए नोएडा अथौरिटी के अधिकारियों से ले कर पुलिस और फायर ब्रिगेड तक को लपेटे में ले लिया. फोरैंसिक टीम ने मौके से अहम सबूत जुटाने शुरू कर दिए. नोएडा पुलिस के साथ नोएडा अथौरिटी के अधिकारी भी एसआईटी के साथ कोऔर्डिनेशन करने लगे.

लोग युवराज मेहता की मौत के मामले में गंभीर सवाल खड़े कर रहे थे. उन का कहना था कि अगर उस ने पुलिस को काल न कर के अपने दोस्तों को बुलाया होता तो शायद युवराज की जान बच सकती थी. घटना के कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि रात 12:20 बजे पहली पीसीआर मौके पर पहुंची, कुछ देर बाद दूसरी पीसीआर भी आ गई. इस बीच युवराज के पापा भी मौके पर पहुंच गए थे. दोनों पीसीआर में 10 से 12 पुलिसकर्मी मौजूद थे, लेकिन उन के पास न तो रस्सा था और न ही कोई जरूरी रेस्क्यू उपकरण.

युवराज मेहता की मौत के मामले की जांच कर रही एसआईटी टीम ने कई बार घटनास्थल का मुआयना किया और दरजनों लोगों के साथ संबंधित विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों से पूछताछ कर उन के बयान दर्ज किए. जिस के बाद संबंधित प्लौट के दोनों बिल्डर अभय कुमार और निर्मल सिंह के कारपोरेट औफिस को पुलिस ने सील कर दिया. एसआईटी को यह भी पता चला कि जिस प्लौट पर इस बेसमेंट की खुदाई कर पानी भरा छोड़ दिया गया था, वह स्पोट्र्स सिटी घोटाले का हिस्सा है. इसी प्लौट को विशटाउन बिल्डर ने खरीदा था और सीबीआई स्पोट्र्स सिटी घोटाले की पहले से जांच कर रही है.

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल नोएडा स्पोट्र्स सिटी घोटाले की जांच सीबीआई और ईडी को सौंपने का आदेश दिया था. इस केस में सीबीआई ने लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की थी, जिस की जांच सीबीआई कर रही है. इसी प्रकार कंपनी के निदेशक निर्मल सिंह, विदुर भारद्वाज, सुरप्रीत सिंह सूरी, नोएडा प्राधिकरण के अज्ञात अधिकारी और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया था. इस में लोटस ग्रीन के साथसाथ इस की लगभग 24 सब लीज वाली कंपनियों को भी जोड़ा गया है.

जिस निर्माणाधीन साइट पर भरे पानी में डूब कर युवराज की मौत हुई, वह स्पोट्र्स सिटी के प्लौट नंबर-2 (ए-3) का हिस्सा है. वह भूखंड लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने नोएडा प्राधिकरण से प्राप्त किया था. वर्ष 2020 में विशटाउन प्लानर्स ने इसे लोटस ग्रीन से खरीदा, जिस में लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन की भी शेयर होल्डिंग है. इस में विशटाउन के बिल्डर अभय कुमार की 32.20 फीसदी, संजय कुमार की 27.30 फीसदी, मनीष कुमार, आंचल बोहरा की 3.5 फीसदी और निर्मल कुमार (लोटस ग्रीन) की 30 फीसदी है.

वास्तव में, यह प्लौट एक कंसोर्टियम का हिस्सा है. सेक्टर 150 का प्लौट नंबर 2 (ए 3) कुल 27,185 वर्गमीटर क्षेत्र का है, जिस का भू उपयोग स्पोट्र्स सिटी लेआउट में व्यावसायिक निर्धारित है. हिस्सेदारी के हिसाब से सभी लोग इस मामले के आरोपी हैं.

इस प्लौट को लीड डेवलपर लोटस ग्रीन ने विज टाउन प्लानर्स नामक बिल्डर कंपनी को सबडिवीजन करा कर सौंपा था. वर्ष 2017 में इस के लिए एक नक्शा भी प्राधिकरण से स्वीकृत करवाया गया था. बिल्डर ने इसे मौल जैसा शौपिंग कौंप्लेक्स बनाने की योजना बनाई और फिर बेसमेंट के लिए खुदाई भी शुरू कर दी. बाद में संशोधित नक्शे का आवेदन दिया गया, लेकिन प्राधिकरण ने मई 2022 में इसे खारिज कर दिया. कारण बताया कि भूमि पर प्रो शौप्स (खेल सामग्री दुकानें) और फूड बेवरेज की दुकानों की अनुमति है, न कि पूर्ण शौपिंग कौंप्लेक्स की. इस के बाद बिल्डर ने साइट पर कोई आगे काम नहीं किया.

नोएडा प्राधिकरण ने एसआईटी को बताया कि बिल्डर अपने लेआउट के मुताबिक एक मौल जैसी संरचना बनाना चाहता था. एसआईटी के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि अखिर किस वजह से बेसमेंट के लिए गहरा गड्ढा खोद कर उसे भरा नहीं गया? जांचपड़ताल में इस का भी जवाब मिल गया.

करोड़ों का हुआ खनन

दरअसल, नोएडा सेक्टर 150 के इस बेसमेंट से अरबों रुपए का अवैध खनन कर रोजाना 200 डंपर रेत निकाली गई थी. अवैध खनन पर निगरानी की सीधी जिम्मेदारी खनन विभाग की है, जबकि नोएडा अथौरिटी की यह जिम्मेदारी बनती है कि उस के आवंटित प्लौट पर निर्माण कार्य बिल्डिंग बायलौज के अनुसार हो. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी देखना होता है कि पर्यावरण नियमों के तहत काम हो रहा हो. अवैध जलदोहन को भी रोकना होता है.

बेसमेंट के लिए जमीन के अंदर से करीब 2 साल तक पानी निकाल कर सीवर में बहाया गया. लिहाजा इस प्रोजेक्ट के एक तरफ यमुना और दूसरी तरफ हिंडन नदी होने के बावजूद जमीन का जलस्तर नीचे चला गया और आसपास मौत के कुएं बना कर छोड़ दिए गए. इस के बावजूद किसी ने समय रहते काररवाई नहीं की. बेसमेंट के नाम पर जमीन को इतना खोखला कर दिया गया कि बाद में वहां निर्माण कार्य भी नहीं हुआ. न तो सुरक्षा घेरा लगाया गया, न चेतावनी बोर्ड.

यही गड्ढा 16 जनवरी, 2026 की रात युवराज मेहता की मौत का कारण बना, जब उन की कार पानी से भरे गहरे गड्ïढे में गिर गई. हादसे के बाद अब अधिकारियों की लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. सेक्टर 150 ही नहीं, बल्कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कई इलाकों में सैकड़ों ऐसे प्लौट हैं, जहां इसी तरह बेसमेंट के नाम पर खनन कर गड्ïढे छोड़ दिए गए हैं. इन में से कई गड्ïढे आबादी और सड़कों के बेहद करीब हैं, जहां कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है. यह प्लौट नोएडा अथौरिटी ने लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन को आवंटित किया था, जिसे बाद में अन्य डेवलपर्स को बेच दिया गया.

हालांकि नियमों के तहत यहां सीमित खुदाई की अनुमति होती है, लेकिन इस से कहीं अधिक गहराई तक खनन किया गया. यहां बेहतरीन गुणवत्ता की बालू निकली, जिसे खुलेआम बेचा गया. लोगों का कहना है कि रोजाना करीब 200 डंपर रेत इस प्रोजेक्ट से बाहर भेजी जाती थी. उस समय एक डंपर की कीमत करीब 15 हजार रुपए थी, जिसे बाजार में लगभग दोगुने दाम पर बेचा जाता था. यह सिलसिला एक से डेढ़ साल तक चला और करीब 70 फीट तक जमीन खोद दी गई.

युवराज की मौत के मामले की जांच कर रही एसआईटी को 5 दिन की जांच के दौरान नोएडा अथौरिटी और पुलिस ने अपने जवाब सौंप दिए. अथौरिटी ने करीब 150 और पुलिस ने 450 पेज की रिपोर्ट में सारे फैक्ट शामिल किए. इस जवाब में घटनाक्रम, काररवाई, ड्यूटी रोस्टर, कंट्रोल रूम रिकौर्ड, काल डिटेल, रेस्पांस टाइम को रखा गया है. चश्मदीद मुनेंद्र व उस के परिवार के बयान भी लिए गए.

युवराज की गड्ढे में डूबने से हुई मौत के मामले में कई पेंचीदे पहलू हैं. एसआइटी ने जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है, जिस में एसडीआरएफ, नोएडा अथौरिटी, नोएडा पुलिस, दमकल विभाग, जलकल विभाग, प्रदूषण विभाग और परियोजना विभाग जैसे कई महकमे निशाने पर आए, जिन की लापरवाही से मौत का ये गड्ढा खुदा था. लेकिन देखना होगा कि शासन इस रिपोर्ट पर संज्ञान ले कर क्या काररवाई करता है.

डेथ जोन हैं खुले नाले

सेक्टर 150 में हाल ही में एक इंजीनियर की खुले तालाब में डूबने से हुई मौत ने न केवल सुरक्षा दावों की पोल खोली है, बल्कि स्पोट्र्स सिटी परियोजना के नाम पर चल रहे अरबों के खेल को भी फिर से चर्चा में ला दिया है. यह हादसा उस स्थान पर हुआ है, जिसे कागजों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्पोट्र्स हब बनना था, लेकिन असलियत में वह प्रशासनिक लापरवाही और बिल्डर की धोखाधड़ी का खूनी दलदल बन चुका है. 300 एकड़ में फैली इस स्पोट्र्स सिटी की कहानी 3सी ग्रुप के मुखिया निर्मल सिंह से शुरू होती है. आरोप है कि निर्मल सिंह ने कौडिय़ों के भाव जमीन आवंटित कराई और फिर उसे 24 अन्य बिल्डरों (सबलेसी) को बेच कर गायब हो गया.

जमीन गिरवी रख कर करोड़ों का कर्ज लिया गया, जिसे चुकाने के बजाय डकार लिया गया. हालत यह है कि बैंक का कर्ज, फ्लैट खरीदारों का पैसा और प्राधिकरण का बकाया सब कुछ मुकदमों के जाल में फंसा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बिल्डरों ने एक बार फिर स्पोट्र्स सिटी का संशोधित मास्टर प्लान नोएडा अथौरिटी को सौंपा है. अब इसे बोर्ड बैठक में निर्णय के लिए रखा जाएगा. हालांकि, इस हादसे के बाद इस योजना को मंजूरी मिलना कई गंभीर सवाल खड़े करता है. स्पोट्र्स सिटी में व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता देने की कोशिशें नई नहीं है. साल 2022 में नोएडा अथौरिटी ने विशटाउन प्लानर्स के संशोधित लेआउट को सिरे से खारिज कर दिया था.

कंपनी ने खेल सुविधाओं के बजाय दुकानें और फूड आउटलेट्स के लिए भारीभरकम एफएआर का प्रस्ताव रखा था, जो स्वीकृत सीमा से कहीं अधिक था. स्पोट्र्स सिटी के मूल ब्रोशर के अनुसार, व्यावसायिक गतिविधियों के लिए केवल 0.5 प्रतिशत क्षेत्र ही आवंटित था, लेकिन बिल्डरों ने खेल को दरकिनार कर इस प्रोजेक्ट को शौपिंग कौंप्लेक्स बनाने की हर मुमकिन कोशिश की. इतना ही नहीं, शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के बड़ेबड़े दावों के बीच एक ऐसी डरावनी हकीकत सामने आई है, जो किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकती है.

जनपद में खुले नाले और असुरक्षित तालाब भी अब लोगों के लिए डेथ जोन साबित हो रहे हैं. पुलिस रेकौर्ड के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि पिछले 2 सालों में 11 मौतें सीधे तौर पर खुले नालों में गिरने और डूबने की वजह से हुई है. हैरानी की बात यह है कि सड़कों के किनारे बहते ये नाले खुलेआम मौत को दावत दे रहे है, लेकिन संबंधित विभाग गहरी नींद में सोए हुए हैं. न तो इन नालों को ढका गया है और न ही इन के किनारों पर सुरक्षा के लिए रेलिंग लगाई गई है.

जांच में सामने आया है कि कई हादसों में लोग बाइक चलाते समय संतुलन बिगडऩे या मोबाइल पर बात करते वक्त पैर फिसलने से इन गहरे नालों में जा गिरे हैं. नोएडा के सेक्टर-150 में युवराज मेहता की मौत के बाद नोएडा प्राधिकरण ने सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जब जांच शुरू की तो 65 ब्लैक स्पाट्स की पहचान की गई. इन में 50 ब्लैक स्पाट्स बिल्डरों को 5 दिनों के अंदर सुधारने होंगे, वरना उन पर भारी जुरमाना किया जाएगा. बाकी 15 ब्लैक स्पाट्स प्राधिकरण खुद 15 दिनों में ठीक करेगा. अब इन पर कितना अमल होगा, ये देखने वाली बात है या फिर किसी नए हादसे का इंतजार होगा.

इस के अलावा जलभराव की समस्या रोकने को 20 गांवों में ड्रेनेज व्यवस्था बेहतर की जाएगी और पूरे नोएडा का विस्तृत सर्वेक्षण होगा. इस का आदेश नोएडा प्राधिकरण के नए सीईओ कृष्णा करुणेश ने जारी किया है.  बता दें कि कि युवराज की मौत से पहले भी गड्ढों व नालों में गिरने से कई लोगों की मौत हो चुकी है. 18 दिसंबर, 2024 को सेक्टर 73 सर्फाबाद गांव में एक व्यक्ति बाइक सहित नाले में जा गिरा, जहां नाले में भरे पानी में डूबने की वजह से उस की मौत हो गई थी.

इस से पहले पहली अक्तूबर, 2024 को सेक्टर 126 के पास एक्सप्रैसवे सर्विस रोड पर एक तेज रफ्तार बुलेट नाली में जा गिरी, जिस से बाइक पर सवार 3 युवकों में से एक की मौत हो गई. 28 सितंबर, 2024 को भी सेक्टर 52 स्थित खुले नाले में टहलने निकले एक युवक की अचानक गिर कर डूबने से मौत हो गई थी.

मेरे बेटे को बेबस छोड़ दिया गया पिता राजकुमार मेहता

ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 में बेसमेंट के लिए खोदे गए पानी से भरे गड्ढे में गिरने के बाद मेरा बेटा दो घंटे तक संघर्ष करता रहा. उसे बचाने का पर्याप्त समय था लेकिन बचाव दल ने लापरवाही दिखाई. मेरे बेटे को भगवान भरोसे छोड़ दिया. अगर ठीक से प्रयास किया जाता तो उसे आसानी से बचाया जा सकता था. सेक्टर-150 के टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी में आयोजित हुई शोक सभा में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता के पिता राज कुमार मेहता ने भीगी आंखों और टूटे दिल से मनोहर कहानियां के समक्ष अपनी ये व्यथा व्यक्त की. उनकी आवाज में दर्द और आक्रोश दोनों थे.

उन्होंने कहा कि हम युवराज को न्याय नहीं दिला सकते क्योंकि वह अब वापस नहीं आ सकता. अब वे यह चाहते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम में लापरवाही बतरने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए. यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में कोई दूसरा युवराज इस तरह की त्रासदी का शिकार न हो. राज कुमार बोले, ‘प्रशासनिक लापरवाही ने मेरे बेटे की जान ले ली. मैं उन सभी का आभारी हूं जिन्होंने हमारी आवाज बुलंद की, हमें ताकत दी और इस विषय को सही दिशा दी. बेटे की मौत ने मुझे तोड़ दिया, लेकिन समाज, मीडिया और जनता ने मुझे संभाला. सभी ने मिलकर इस लापरवाही को देश और सरकार तक पहुंचाया.’

उन्होंने डिलीवरी बॉय मोनिंदर का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि उसने किसी की परवाह किए बगैर नाले में छलांग लगाई. मेरे बेटे को बचाने की कोशिश की. उन्होंने घटना का संज्ञान लेते हुए एसआईटी गठित करने पर यूपी सरकार का भी आभार जताया. इस शोकसभा के दौरान सांसद डॉ. महेश शर्मा, दादरी विधायक तेजपाल नागर, भाजपा जिलाध्यक्ष अभिषेक शर्मा और एडीसीपी ग्रेनो सुधीर कुमार समेत बड़ी संख्या में सोसाइटी निवासी मौजूद थे. ग्रेटर नोएडा में सोसाइटी के क्लब हाउस में आयोजित सभा की युवराज की शोक सभा के दौरान परिजन, युवराज के दोस्त, पड़ोसी भी पहुंचे. इस दौरान सभी की आंखें नम दिखी.

शोक सभा के दौरान लोगों ने सवाल किया कि जिले में पुलिस के अधीन ही डायल-112, पीसीआर, दमकल, ट्रैफिक पुलिस आदि की टीम आती है. इसी तरह प्राधिकरण के वर्क सर्किल प्रबंधक, ट्रैफिक सेल के जिम्मेदारों और जिला प्रशासन के अधीन आने वाले खनन विभाग, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य विभाग, परिवहन विभाग आदि के जिम्मेदार भी युवराज की मौत पर खामोश है.

जिला प्रशासन भी ये स्पष्ट नहीं कर पाया कि एनडीआरएफ और एसडीआरएफ से संपर्क करने में देरी क्यों हुई. शोक सभा में गुस्से में भरे लोगों के सवाल थे कि अगर सभी विभाग मिलकर काम करते तो शायद युवराज जिंदा होगा. शोक सभा में आए लोगों ने प्रशासन के रेस्क्यू औपरेशन और समय-समय पर आपदा प्रबंधन के लिए होने वाली मॉकड्रिल को भी दिखावटी और नाटक बताया.

सिस्टम से ज्यादा जांबाज तो गरीब मुनेंद्र निकला

नोएडा के सेक्टर 150 में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले में एक तरफ पूरा सिस्टम था, जो एक बेगुनाह की मौत का तमाशा मूकदर्शक बन कर देखता रहा तो वहीं एक गरीब परिवार में जन्मा डिलवरी बौय मुनेंद्र है, जिस ने अपनी जान की बाजी लगा कर युवराज को बचाने का प्रयास किया. मुनेंद्र इस हादसे में चश्मदीद गवाह भी है. सेक्टर 150 स्थित गढ़ी में रहने वाले बिहार के समस्तीपुर निवासी मुनेंद्र ने बताया कि वह डिलीवरी बौय का काम करता है. 16 जनवरी की रात वह करीब पौने 2 बजे घटनास्थल पर पहुंचा. 2 मिनट के अंदर ही उस ने फैसला कर लिया कि वह पानी के अंदर जाएगा. वहां मौजूद टीम से पानी में जाने की बात कही तो वे लोग घबरा गए.

मुनेंद्र बचपन से तैरना जानता है. मौके पर मौजूद टीम ने उसे सेफ्टी जैकेट दी, जिसे पहन कर वह पानी में उतरा. करीब 40 मिनट तक पानी में रहने के दौरान भी वह युवराज को नहीं खोज सका. जबकि बाहर खड़े लोगों और युवराज के पिता को उम्मीद थी कि शायद मुनेंद्र का प्रयास सफल होगा. युवराज को बचाने के लिए वह अपनी जान की बाजी लगा कर पानी में उतरा था. अफसोस कि वह उन की जान नहीं बचा सका. युवराज का कहना है कि अगर वह 5 मिनट पहले आ गया होता या प्रशासन की मौजूद टीम ने लापरवाही न बरती होती तो युवराज हम सब के बीच होते.

युवराज चिल्ला रहे थे और बारबार यही कह रहे थे कि मुझे बचा लो. मुनेंद्र ने बताया कि वह एक बेहद गरीब परिवार से है, लेकिन बावजूद इस के वह अपनी जान की परवाह किए बगैर करीब 40 मिनट तक ठंडे और गहरे पानी में युवराज को खोजने की कोशिश करते रहे. पानी बेहद ठंडा था, वहां पर कोई रोशनी नहीं थी. इस के बावजूद उस ने हिम्मत नहीं हारी. लगातार पुलिस के सामने बारबार युवराज को बचाने की कोशिश कर रहा था.

मुनेंद्र के मुताबिक घटना के अगले दिन पुलिस उसे अपने साथ ले गई. उस के साथ करीब 5 घंटे तक पूछताछ की. फिर उसे यह कह कर छोड़ दिया कि किसी के सामने कोई भी सच बात मत बताना, लेकिन मुनेंद्र ने इंसानियत दिखाते हुए उस रात जो देखा, सब कुछ मीडिया के सामने बता दिया. जब उस ने शासनप्रशासन और पुलिस की पोल खोली तो पुलिस ने उस से कहा कि अपना बयान बदल दो, लेकिन वह लगातार सच बोलता रहा.

इस पूरी घटना में बिल्डर की गिरफ्तारी के बाद मुनेंद्र को इस बात का डर लगने लगा कि कहीं बिल्डर उस के खिलाफ कोई गलत कदम न उठा ले. उसे लगने लगा कि ऐसे लोग जो पहले से ही लापरवाह हैं, अपने को बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. इसीलिए उस ने अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए पुलिस से गुहार लगाई.

वह अपने घर को छोड़ कर कुछ शुभचिंतकों के पास रहने लगा. उस ने नौकरी तक छोड़ दी. उसे देर रात घर से बाहर निकलने में डर लगने लगा. लेकिन मुनेंद्र की बहादुरी और सच का साथ देने के संकल्प से ही शायद युवराज को इंसाफ मिलने का दरवाजा खुल रहा है, क्योंकि एसआईटी के समक्ष उसी की गवाही से जांच दल व्यवस्था की लापरवाही के ठोस नतीजे तक पहुंच सका.

व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है शासन को सौंपी गई एसआईटी जांच रिपोर्ट

नोएडा के सेक्टर 150 में बिल्डर के निर्माणाधीन इमारत के कई फुट गहरे गड्ïढे में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार डूबने से हुई मौत के मामले में गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने अपनी अंतिम रिपोर्ट शासन को सौंप दी है. यह गहन जांच 7 दिन तक चली है, जिस में सैकड़ों दस्तावेजों की पड़ताल और लगभग 30 अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ की गई. इस के बाद यह अंतिम रिपोर्ट तैयार की गई.

यह रिपोर्ट प्रशासनिक सिस्टम की गंभीर चूक की तरफ इशारा करती है. रिपोर्ट में बचाव दल की चूक को स्वीकार करते हुए प्राधिकरण, एसडीआरएफ, दमकल, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया है. अब प्रदेश सरकार के निर्णय का इंतजार है. अगर सब कुछ ईमानदारी से हुआ तो रिपोर्ट के आधार पर बड़े स्तर पर सख्त काररवाई हो सकती है.

योगी सरकार द्वारा युवराज की मौत के बाद स्वत:संज्ञान लेते हुए गठित की गई 3 सदस्यीय एसआईटी का नेतृत्व मेरठ जोन के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) भानु भास्कर को सौंपा था. टीम में मेरठ मंडल के मंडलायुक्त भानुचंद्र गोस्वामी और लोक निर्माण विभाग के चीफ इंजीनियर अशोक कुमार द्विवेदी बतौर सदस्य एसआईटी में शामिल रहे.

नोएडा प्राधिकरण, पुलिस और जिला प्रशासन ने एसआईटी को करीब 550 पन्नों का विस्तृत लिखित बयान सौंपा था. इस में जलभराव की पहले से मिली सूचना, स्टार्म वाटर ड्रेनेज की योजना, कंट्रोल रूम का संचालन, ड्यूटी चार्ट, कौल रिकौर्डिंग्स, बचाव कार्यों का प्रतिक्रिया समय और घटनास्थल पर तैनात अधिकारियों की भूमिकाओं का पूरा ब्यौरा दर्ज है. टीम ने सभी दस्तावेजों की जांचपड़ताल कर उन्हें अपनी रिपोर्ट में शामिल किया. जांच के दौरान सब से बड़ा सवाल यह उठा कि युवराज को बाहर निकालने में करीब 4 घंटे क्यों लगे.

एसआईटी को पता चला कि हादसे के तुरंत बाद शुरुआत के समय में बचाव तंत्र पूरी तरह से सक्रिय नहीं हुआ. एसडीआरएफ, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल की गंभीर कमी बनी रही. कंट्रोल रूम से समय रहते निर्देश जारी नहीं हुए और घटनास्थल पर मौजूद टीमें स्थिति की गंभीरता न समझ सकीं. रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि हादसे वाले प्लौट पर जल निकासी की स्थाई व्यवस्था पहले ही प्रस्तावित थी, मगर वह केवल कागजों पर रह गई.

प्लौट आवंटन से ले कर हादसे तक ड्रेनेज सिस्टम पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. एसआईटी ने उस दौरान तैनात वरिष्ठ अधिकारियों, जूनियर इंजीनियरों और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी को जांच के केंद्र में रखा है. एसआईटी रिपोर्ट में लापरवाही करने वाले करीब 20 अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम साफतौर पर दर्ज हैं. रिपोर्ट मिलते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद इस का गहन अध्ययन करेंगे. अनुमान है कि दोषियों के खिलाफ निलंबन, विभागीय जांच के अलावा आपराधिक केस दर्ज करने के आदेश जारी हो सकते हैं. युवराज मेहता की मौत अब केवल हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन गई है.

एसआईटी रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया कि सही समय पर योजना, निगरानी और रेस्क्यू सिस्टम सक्रिय होता तो यह मौत टाली जा सकती थी. फिलहाल सभी की नजर अब प्रदेश सरकार के निर्णय पर टिकी है. UP News

 

Maharashtra Crime News : सूटकेस में पैक जिंदा गौरी

 Maharashtra Crime News : 26 वर्षीय गौरी अनिल सांब्रेकर और 36 वर्षीय सौफ्टवेयर इंजीनियर राकेश खेडेकर रिश्ते में ममेरेफुफेरे भाईबहन थे, लेकिन साथसाथ स्टडी करने के दौरान उन में प्यार हो गया. प्यार भी ऐसा कि दोनों ने अपने पेरेंट्स की मरजी के खिलाफ लव मैरिज कर ली. दोनों बेहद खुश थे. फिर एक दिन राकेश ने पत्नी गौरी को चाकू से गंभीर रूप से घायल कर जिंदा ही सूटकेस में पैक कर दिया. आखिर राकेश ने ऐसा क्यों किया?

राकेश खेडेकर अपनी पत्नी गौरी अनिल सांब्रेकर से परेशान आ गया था. वह उस के मम्मीपापा का बहुत अपमान करती थी. इतना ही नहीं, वह अपनी ननद को भी बहुत परेशान किया करती थी. आए दिन घर में झगड़ा रहता था. जिंदगी एक तरह से नरक बन कर रह गई थी. राकेश के मम्मीपापा के लिए तो गौरी गले की ऐसी हड्डी बन गई थी, जिसे न वह उगलने के थे और न ही निगलने के. राकेश उन का इकलौता बेटा था. उस के मम्मीपापा और बहन उसे बहुत प्यार करते थे. फेमिली के लोगों में बहुत सामंजस्य था. गौरी से शादी के बाद जीवन में रोज किचकिच होने लगी.

आपसी झगड़े में एक दिन गौरी ने राकेश की मम्मी यानी अपनी सास पर हाथ उठा दिया. इस से राकेश को इतना गहरा आघात लगा कि उस ने अपनी पत्नी गौरी को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. गौरी एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करती थी. राकेश भी नौकरीपेशा था. दोनों के सामने कोई आर्थिक संकट भी नहीं था. फरवरी, 2025 में राकेश ने अपनी पत्नी को बताया कि उसे बेंगलुरु से एक औफर मिला है. बेंगलुरु में उसे अच्छे पैकेज पर भेजा जा रहा है, इसलिए अब महाराष्ट्र छोड़ कर बेंगलुरु जाना पड़ेगा.

गौरी को राकेश की नीयत पर शक नहीं हुआ. घर के झगड़े से गौरी भी परेशान थी. वह भी चाहती थी कि वह राकेश के साथ अलग मकान में रह कर जवानी के बचे लम्हों का भरपूर आनंद उठाए. गौरी ने भी उसे कह दिया, ”चलो, मैं यह नौकरी छोड़ कर आप के साथ बेंगलुरु चलने को तैयार हूं, लेकिन आप वादा करो कि मुझे वहां कोई न कोई नौकरी तलाश कर के देंगे.’’

गौरी के पिता

”यह कौन सी बड़ी बात है.’’ राकेश ने कहा, ”बेंगलुरु बहुत बड़ा शहर है. व्यावसायिक केंद्र है. यहां नौकरियों की कोई कमी नहीं है. आप ने मास मीडिया और कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर रखी है, हो सकता है कोई पत्रकारिता क्षेत्र में भी अच्छी जौब मिल जाए.’’

”चलो, देखते हैं.’’ दोनों हंसीखुशी के साथ महाराष्ट्र से बेंगलुरु पहुंच गए. यहां पर हुलीमाबु थाना क्षेत्र के डोडा कम्मनहल्ली में स्थित एक कालोनी में फ्लैट किराए पर ले कर रहने लगे. 36 वर्षीय राकेश दिन भर घर पर ही रह कर कंपनी का काम किया करता था. वह अपनी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर प्रमोट हो कर गया था.

पत्नी को मारने के लिए ले गया बेंगलुरु

26 वर्षीय गौरी घर पर रह कर बोर होती रहती थी, लेकिन उस ने राकेश से कभी कोई शिकायत नहीं की. उस ने अपना बायोडाटा कई जगह नौकरी के लिए भेजा, लेकिन कोई सफलता हासिल नहीं हुई. राकेश बहुत परेशान था. गौरी उस से अब कोई झगड़ा नहीं कर रही थी. राकेश को फ्लैट से बाहर निकलने का मौका मिलता नहीं था. किचन में जाने का यहां उस का कोई काम भी नहीं था. किचन पूरी तरह से गौरी संभाल रही थी. राकेश के मन में यह बात बैठ चुकी थी कि किसी तरह गौरी को खत्म करना ही है. वह उसे ठिकाने लगाने के नएनए तरीके खोजता.

एक दिन राकेश के दिमाग में आया कि कोई जहरीला पदार्थ ला कर गौरी को चाय में मिला कर पिला दिया जाए, जिस से उस की जिंदगी तमाम हो जाए. लेकिन ऐसा कोई मौका यहां उस के हाथ नहीं लग रहा था. शहर में जानपहचान के अभाव में कहीं से जहरीला पदार्थ ले कर आ नहीं सकता था. यदि किसी तरह ले भी आता तो गौरी को उस के किचन में जाने से ही शक हो जाता. गौरी से राकेश चिड़चिड़ा कर भी बातें करता था. गौरी उस के गुस्से को नौर्मल कर के अपनी बाहों में ले लेती. यहां किसी का कोई आनाजाना भी नहीं था. मस्ती में दिन कट रहे थे.

राकेश संबंधों में थोड़ी सी खटास पैदा होने की प्रतीक्षा कर रहा था. तभी अचानक गौरी ने एक दिन आरोप लगाया कि तुम मेरी नौकरी लगवाने के लिए जरूरी कोशिश नहीं कर रहे हो. इस तरह उसे तकरार करने का बहाना मिल गया. वह घर से 700 किलोमीटर दूर सिर्फ पत्नी गौरी को ठिकाने लगाने के इरादे से आया था, वरना अपने बूढ़े मम्मीपापा को इस हालत में अकेला छोड़ कर इतनी दूर नौकरी करने क्यों आता. यहां आने के लिए कंपनी को रिक्वेस्ट राकेश ने ही की थी. 26 मार्च, 2025 को दोनों ने दिनभर मस्ती से गुजारा. शाम को शहर में टहलने चले गए. घर लौटते समय उन्होंने शराब और नाश्ते का सामान खरीदा. रात साढ़े 7 बजे के आसपास वे घर पहुंचे. रात को गौरी ने खाना बनाया.

राइस और एक सब्जी बनाई. राइस उस ने कुकर में बनाए थे. डाइनिंग टेबल पर रात को दोनों बैठे. राकेश ने पैग बनाए. दोनों ने कांच के गिलासों को टकरा कर शराब पीने की शुरुआत करने की परंपरा पूरी की. घूंटघूंट कर के दोनों मस्ती में पीते रहे. डाइनिंग टेबल पर बैठे गौरी और राकेश को हलकाहलका सुरूर आने लगा. राकेश के दिल में जो कुछ चल रहा था, वह उसे अंजाम तक पहुंचाने के बारे में सोचने लगा. इसी बीच गौरी से उस की नौकरी न लगवाए जाने की बात को ले कर तकरार शुरू हो गई. गौरी ने अचानक उठ कर राकेश के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया. राकेश जैसे ही उठने को हुआ, गौरी किचन में चली गई.

राकेश को अपनी तरफ आता देख गौरी ने सब्जी काटने वाला चाकू राकेश को मारने की नीयत से फेंका. चाकू राकेश की कलाई से टकरा कर जमीन पर गिर गया. कलाई में खरोंच से हलकी चोट भी आ गई. राकेश ने चाकू उठाया और अपनी योजना को अंजाम देते हुए गौरी के पेट में घुसेड़ दिया, जिस से वह गंभीर रूप से घायल हो गई. दरअसल, गौरी राकेश की फुफेरी बहन थी. दोनों परिवारों में मधुर संबंध थे. गौरी के पेरेंट्स ने पढ़ाई करने के लिए उसे उस के मामा के घर भेज दिया. उन दिनों राकेश भी पढ़ाई कर रहा था. दोनों एक ही कमरे में बैठ कर स्टडी करते थे.

दोनों में भाईबहन जैसा अटूट रिश्ता था. वह हर रक्षाबंधन पर भाइयों की तरह राकेश की कलाई पर राखी बांधा करती थी. राकेश भी अपनी बहन गौरी का हर तरह से खयाल रखता. रक्षाबंधन के वचन को भी निभाता. दोनों का भाईबहन का प्रेम और पढ़ाई सब कुछ सही तरह से चल रहा था. गौरी अनिल सांब्रेकर महाराष्ट्र की मिट्टी से जुड़ी एक ऐसी शख्सियत थी, जिस में सादगी और आकर्षण का अनूठा संगम था. उस की शारीरिक बनावट मध्यम कदकाठी की थी, जो भारतीय महिलाओं की पारंपरिक सुंदरता को दर्शाती थी. उन का रंग गोरा गुलाबी मिश्रित था, जो सूरज की किरणों में और भी निखर उठता था. गौरी की बड़ीबड़ी आंखें उन की आत्मा का आईना थीं, जिन में कभी हंसी की चमक तो कभी विचारों की गहराई झलकती थी.

उस के लंबे, घने और काले बाल उस की कमर तक लहराते थे, जो उस की सादगी में एक शाही अंदाज शामिल था. गौरी जब अपने बालों को खुला छोड़ती थी तो हवा में लहराते उस के बाल किसी चित्रकार को चित्र बनाने का एक नया आइडिया प्रदान करते. उस की मुसकान में एक अनकहा जादू था, जो सामने वाले को सहज ही आकर्षित कर लेता था. गौरी के होंठ पतले और नाजुक थे, जिन पर हलकी गुलाबी लिपस्टिक उस की सुंदरता को और उभार देती थी. गौरी जब चलती थी तो शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति दे रही हो. उस की चाल में आत्मविश्वास झलकता था, जो उस की मजबूत और स्वतंत्र सोच को दर्शाता था. गौरी की हंसी और बातचीत का अंदाज बेहद जीवंत था.

उस के चाहने वालों की भी कोई कमी नहीं थी. जिधर से भी वह गुजरती, युवाओं की आंखें उस का दूर तक पीछा करतीं. लेकिन वह किसी युवक को भी पास फटकने भी नहीं देती. उस की कामुक जवानी ऐसे ही व्यतीत हो रही थी. पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और उसे जौब भी मिल गई थी. राकेश खेडकर का व्यक्तित्त्व बाहरी रूप से शांत और सधा हुआ लगता था. राकेश की कदकाठी औसत से थोड़ी ऊंची लगभग 5 फीट 10 इंच थी. उस का शरीर न तो बहुत भारी था और न ही बहुत पतला, उस की आंखें गहरी भूरी थीं, जिन में हमेशा एक सोचती हुई झलक दिखाई देती थी. बाल करीने से कटे हुए और भौहें घनी और थोड़ी उलझी हुई थीं, जो उन के चिंतनशील स्वभाव को दर्शाती थीं.

उस के चेहरे पर एक ऐसा भाव रहता था, जिसे देख कर कोई भी सोचता कि यह युवक काफी पढ़ालिखा, शांत और संवेदनशील होगा. लड़कियों के लिए वह आकर्षण का केंद्र हुआ करता था, लेकिन किसी लड़की से उस की करीबी दोस्ती नहीं हुई. यह कहिए कि पढ़ाई की धुन में वह प्यारव्यार के चक्कर से दूर ही रहना चाहता था. कोई लड़की करीब आना भी चाहती थी तो वह उसे बहुत नौर्मल तरीके से टाल दिया करता था और उस से किनारा कर लेता था. भरपूर जवानी चेहरे से झलकती थी. फिल्मी हीरो के स्टाइल में रहा करता था. पढ़ाई पूरी करने के बाद राकेश की भी नौकरी लग चुकी थी. दोनों ही अब जवानी के उफान पर थे.

एक दिन अचानक भाईबहन के रिश्ते का भरम खत्म हो गया. बात करीब 6 साल पहले की है. कहते हैं कि मानव जीवन की 2 आवश्यकताएं होती हैं. पहली पेट पूजा और दूसरी सैक्स. यह दोनों भाईबहन एकदूसरे को सैक्स की आवश्यकता की नजर से देखने लगे थे. यह अहसास दोनों को ही था. दोनों के अंदर प्यार का अंकुर फूट चुका था. अंदर ही अंदर ज्वालामुखी की तरह प्यार का शोला दोनों के दिलों में धधक रहा था. पहल कौन करे, दोनों ही इस कशमकश में दिन बिता रहे थे. एक दिन गौरी राकेश के पास आ कर लेट गई. राकेश गहरी नींद में सो रहा था. गौरी की आंखों से नींद कोसों दूर थी. उस दिन वह प्यार का इजहार करने का इरादा कर चुकी थी.

पुरानी कहावत है कि फूस और चिंगारी यदि संपर्क में आ जाए तो आग लगने और भड़कने से कोई नहीं रोक सकता. एक बार रात को गौरी राकेश के बिस्तर पर चली गई और उस के अंगों से छेड़छाड़ करने लगी. राकेश अपना संयम खो बैठा. उस ने करवट बदल कर गौरी को अपनी बाहों में कस लिया और देखते ही देखते भाईबहन का पवित्र रिश्ता तारतार हो गया.

सासससुर की गौरी करने लगी बेइज्जती

कहते हैं कि इश्क और मुश्क को छिपाया नहीं जा सकता. बात राकेश के फेमिली वालों को पता चली और फिर गौरी के पेरेंट्स तक भी पहुंच गई. दोनों ने ही अपनेअपने बच्चों को समझाने की कोशिश की, लेकिन दोनों पर कोई असर नहीं हुआ. इस तरह से दोनों 4 साल तक दोनों रिलेशनशिप में रहते रहे. गौरी ने राकेश पर दबाव बनाया कि वैवाहिक जीवन में हमें शामिल हो जाना चाहिए. राकेश ने अपने पेरेंट्स के सामने गौरी से विवाह करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन राकेश के पेरेंट्स यह सुन कर आगबबूला हो गए. कहने लगे कि हम समाज को क्या मुंह दिखाएंगे.

दोनों ने अपने लाडले बेटे को बुरी तरह से लताड़ा और शादी करने से साफ इनकार कर दिया. इसी तरह गौरी ने भी अपने पेरेंट्स से राकेश से विवाह करने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने भी साफ इनकार कर दिया. फेमिली वालों परिवार की रजामंदी के बिना दोनों ने विवाह कर लिया. यह एक प्रेम विवाह था. विवाह के बाद घर में लड़ाईझगड़ा रहने लगा. गौरी के साथ राकेश के पेरेंट्स का बरताव सही नहीं था. गौरी उन्हें एक आंख नहीं भाती थी. इस से गौरी का भी रवैया आक्रामक हो गया. वह भी ईंट का जवाब पत्थर से देने लगी. राकेश को यह बात अच्छी नहीं लगती थी. वह अपने मम्मीपापा और बहन का इतना अपमान सहन नहीं कर सकता था. तब उस ने गौरी की हत्या करने का इरादा बना लिया.

सूटकेस में मिली गौरी की लाश

एक दिन मकान मालिक ने दक्षिणपूर्व पुलिस कंट्रोल रूम को हत्या की जानकारी दी. कंट्रोल रूम से थाना हुलिमाबू को सूचित किया गया. दक्षिणपूर्व बेंगलुरु के हुलिमाबु थाना क्षेत्र का इस इलाके में डोडा कंबन हल्ली एक जगह लगती है, यहीं पर स्थित एक फ्लैट में राकेश और गौरी करीब डेढ़ महीने पहले शिफ्ट हुए थे. इस फ्लैट को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया. भारी पुलिस बल देख कर आसपास के लोग हैरान हो गए. पुलिस ने मकान मालिक को बुलाया. उस ने पुलिस को बताया कि सूचना मिली है कि इस में रहने वाले किराएदार ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी है. मकान में बाहर से ताला लगा था. उस की चाबी मकान मालिक के पास नहीं थी.

पुलिस ने ताला तुड़वा कर अंदर प्रवेश किया. मकान साफसुथरा नजर आया. घर में ऐसा कोई संकेत नहीं मिला, जिस से लगे कि यहां कोई हत्या की गई है. पुलिस के साथ आसपास के लोग भी घर में आ गए थे. उन्हें भी बड़ा आश्चर्य हुआ. तभी पुलिस ने बाथरूम का दरवाजा खोला. उस में एक बड़ा सा, नया सा, साफसुथरा सूटकेस रखा हुआ था. पुलिस को यह अंदाजा नहीं था कि इस में लाश हो सकती है. फिर भी पुलिस को शक हुआ कि इतना बड़ा सूटकेस बाथरूम में क्यों रखा है. उस का करीब से मुआयना किया तो उस का हैंडल टूटा हुआ था. पुलिसकर्मियों ने सूटकेस को बाथरूम से बाहर निकाला और खोल कर देखा तो उस में महिला की लाश पैक कर के रखी गई मिली, जिस की उम्र लगभग 32 साल थी.

पुलिस उपायुक्त (दक्षिणपूर्वी) सारा फातिमा भी मौके पर पहुंचीं और जांच की. उन्होंने अधीनस्थ पुलिसकर्मियों को आवश्यक निर्देश दिए. पंचनामा भरने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस कमिश्नर (बेंगलुरु) बी. दयानंद भी महिला की निर्मम हत्या से काफी चिंतित थे. वे मामले की पलपल की जानकारी अधिकारियों से प्राप्त करते रहे. फ्लैट के मालिक से मरने वाली युवती की पहचान हो गई. पता चला कि गौरी अनिल सामब्रेकर राकेश की पत्नी है. मूलरूप से महाराष्ट्र के ही रहने वाले थे. दोनों डेढ़ महीने पहले बेंगलुरु में शिफ्ट हुए थे. राकेश यहां एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करता था.

लेकिन फिर सवाल यह था कि आखिर गौरी का कत्ल किस ने किया? उस के पति राकेश ने या फिर किसी और ने? मकान मालिक से पूछने पर पता चला कि उसे घर में गौरी की लाश पड़ी होने की जानकारी खुद उस के पति राकेश ने किसी के जरिए फोन पर दिलवाई थी. बेंगलुरु की पुलिस इस खोज में लगी थी कि हत्या करने वाला व्यक्ति कौन है और कहां का है. पुलिस कंट्रोल रूम में जिस नंबर से फोन आया था, पुलिस उस फोन करने वाले तक पहुंच गई. उस व्यक्ति को जिस ने फोन कर हत्या की सूचना दी थी, उस के पास तक पुलिस पहुंचने में लगी हुई थी. इसी बीच महाराष्ट्र के एक थाने से बेंगलुरु पुलिस को फोन द्वारा सूचना मिली कि बेंगलुरु के हुलिमाबु थानाक्षेत्र में गौरी नाम की युवती का हत्यारा पकड़ लिया गया है. यह बात 27 मार्च, 2025 की है.

यह सूचना मिलते ही बेंगलुरु पुलिस महाराष्ट्र पहुंच गई और उस ने राकेश को अपनी कस्टडी में ले लिया. फिर वह उसे स्थानीय कोर्ट में पेश कर ट्रांजिट रिमांड पर ले कर बेंगलुरु लौट आई. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में सामने आया कि राकेश ने 3 बार चाकू से गौरी पर वार किया, जिस के बाद गौरी का बहुत ज्यादा खून निकल गया और गौरी की तड़पतड़प कर वहीं पर मौत हो गई. हत्या के बाद राकेश ने अच्छी तरह मकान की साफसफाई की. खून के धब्बे साफ कर दिए गए.

फिर गौरी की लाश को ठिकाने लगाने की कोशिश की. गौरी की डैडबौडी को सूटकेस में भी पैक कर दिया, लेकिन मुश्किल यह थी कि राकेश को बेंगलुरु के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. वर्क फ्रौम होम होने की वजह से वह घर से बाहर नहीं जाता था. इसलिए उसे यह आइडिया नहीं आया कि डैडबौडी को कहां ठिकाने लगाया जाए. राकेश को खयाल आया कि किसी न किसी किराए की कार में सूटकेस रख कर घर से निकला जाए और अंधेरे में कहीं सुनसान जगह पर कार रुकवा कर सूटकेस ठिकाने लगा दिया जाए.

आखिर में राकेश ने गौरी की लाश वाले सूटकेस को फ्लैट से बाहर निकालने के लिए सूटकेस का हैंडल पकड़ कर खींचा तो सूटकेस तो नहीं खिंचा, उलटा उस का हैंडल टूट कर हाथ में आ गया. अब तो राकेश के होश उड़ गए. हैंडल टूटते ही वह परेशान हो गया. वह इतना भारी सूटकेस उठा कर नहीं ले जा सकता था और दूसरा सूटकेस इतनी रात में कहीं मिलेगा नहीं. इसलिए वहां से अकेले ही निकल कर भागने में भलाई समझी. फिर वह सूटकेस को बाथरूम में छोड़ कर घर में ताला लगा कर वह बेंगलुरु से बाहर चला गया.

करीब 700 किलोमीटर दूर पहुंचने के बाद उस को खयाल आया कि गौरी की लाश अगर घर वालों को, परिवार वालों को, पुलिस वालों को या आसपास के लोगों को 7-8 दिन के बाद या 10 दिन के बाद मिलेगी तो लाश पूरी तरह से खराब हो जाएगी. आखिर वो थी तो उस की बीवी ही, इसलिए उस ने परिवार वालों को सूचना दे देना उचित समझा, ताकि वह उस का अंतिम संस्कार कर सकें. वह बेंगलुरु से महाराष्ट्र के सतारा आया. वहां से उस ने अपने मकान मालिक को फोन किया और पत्नी की हत्या की बात कबूल करते हुए इस की जानकारी पुलिस को देने को कहा. इस के बाद राकेश ने अपने पापा को फोन किया और वारदात की पूरी डिटेल बता दी.

राकेश ने की आत्महत्या की कोशिश

उस ने अपने पापा से यह भी कह दिया कि वह गौरी के पेरेंट्स को भी यह खबर दे दें. इस के बाद राकेश ने अपने पापा से कहा कि वह सरेंडर करने पुलिस स्टेशन जा रहा है और हो सकता है थाने पहुंचने से पहले वह सुसाइड कर ले. पिता ने उसे ऐसा करने से मना किया, लेकिन राकेश ने फोन काट दिया. उसी दिन महाराष्ट्र के सतारा जिले की पुलिस को सूचना मिली कि शिरवल क्षेत्र में होंडा सिटी कार के अंदर एक व्यक्ति बेहोशी जैसी हालत में है, कार न तो कोई मूवमेंट कर रही है. कार ऐसी जगह पर आ कर खड़ी है, जिस से लोगों को आनेजाने में दिक्कत हो रही है.

तभी स्थानीय शिरवल थाने की पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिसकर्मियों ने कार में बैठे हुए व्यक्ति को आवाज लगाई, लेकिन वह सुन नहीं पा रहा था. पुलिस ने किसी तरह दरवाजा खोला तो पता चला कि कोई व्यक्ति ड्राइविंग सीट पर बेहोशी सी हालत में बैठा है, जिस की उम्र लगभग 36 साल के आसपास है. पुलिस उसे तुरंत नजदीकी डीन ससून अस्पताल ले कर पहुंची. वहां उस का इलाज शुरू हुआ. डाक्टरों ने बताया कि इस ने फिनाइल जैसा कोई जहरीला पदार्थ पी लिया है, जिस की वजह से इस की तबीयत बिगड़ रही है.

आखिरकार उसे होश आया तो पता चला कि उस का नाम राकेश खेडेकर है, जो बेंगलुरु में अपनी पत्नी गौरी सांब्रेकर की हत्या कर के आया है. राकेश को पुणे में 27 मार्च, 2025 की शाम को गिरफ्तार कर लिया गया. वह बारबार अपनी पत्नी के पास जाने की बात कह रहा था. डा. एकनाथ पवार ने राकेश का इलाज किया था. उन के अनुसार वह मानसिक रूप से परेशान होने का नाटक कर रहा था, लेकिन वह बिलकुल ठीक था और सहानुभूति पाने की कोशिश कर रहा था. उधर गौरी की पोस्टमार्टम से पता चला कि चाकू के 2 वार उस की गरदन पर, एक वार पेट में किया गया था. सूटकेस में बलगम की मौजूदगी से पता चला कि गौरी उस समय जीवित थी, जब उसे पैक किया गया. उस की मृत्यु सूटकेस में दम घुटने से हुई.

एक पढ़ालिखा सौफ्टवेयर इंजीनियर अपनी बीवी को मारने, उस का कत्ल करने से देशभर में चर्चा में है. फिर एक पति के हाथों पत्नी की हत्या हो गई. ऐसी खबरें आए दिन अखबारों और सोशल मीडिया पर सुर्खियां बन रही हैं. सब से दुखद बात यह है कि इस तरह की खबरें अब किसी को चौंकाती नहीं हैं. जीवन भर साथ निभाने का वादा करने वाले छोटीछोटी बात पर एकदूसरे की जान ले रहे हैं. सब से खास बात यह है कि लव मैरिज में भी अब यह मामले होने लगे हैं. अरेंज मैरिज को पिछड़ा मौडल मान कर आधुनिक जीवन पद्धति में प्रवेश करने वाले लोग अब चिंतित हैं.

कहीं पत्नी किसी से लव कर के पति की हत्या कर रही है. जबकि इन लव रिलेशन के बाद कई साल तक एकदूसरे को परखने बरतने और प्रैक्टिकल से गुजरने के बाद पति राकेश ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी, समाज के लिए यह विचारणीय प्रश्न है. सौफ्टवेयर इंजीनियर जैसे उच्चशिक्षित व्यक्ति ने इतना जघन्य अपराध किया, पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया. पुलिस ने राकेश खेडकर को जेल भेज दिया है. Maharashtra Crime News

 

 

Bihar Crime News : थानेदार ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर को पीट-पीटकर मार डाला

Bihar Crime News : जहां थानेदार रंजीत कुमार जैसे खूंखार पुलिस वाले हों, वहां की पुलिस की बदनामी स्वाभाविक ही है. आश्चर्य की बात यह है कि जहां की पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अपने एक थानेदार को पकड़ने में अक्षम हैं, सारे साधनों के बाद, वहां की जनता का क्या हाल होगा. क्या वाकई रंजीत को पकड़ने की…

बिहार में एक बड़ा जिला है भागलपुर. इसी जिले के बिहपुर इलाके में एक गांव है मड़वा. इस गांव के रहने वाले आशुतोष पाठक सौफ्टवेयर इंजीनियर थे. इंजीनियरिंग करने के बाद वह बेंगलुरु जा कर नौकरी करने लगे. इसी साल लौकडाउन में वह बेंगलुरु से नौकरी छोड़ आए. बाद में उन्होंने अपने ही जिला मुख्यालय भागलपुर में नौकरी कर ली, लेकिन गांव से उन का मोह नहीं छूटा था. इसलिए जब भी मौका मिलता, परिवार के साथ गांव चले जाते. इसी 24 अक्तूबर की बात है. उस दिन दुर्गाष्टमी थी. वह दुर्गा पूजा के लिए परिवार के साथ भागलपुर से गांव आ गए थे.

दोपहर करीब साढ़े 3 बजे वह अपनी पत्नी स्नेहा और 2 साल की बेटी मारवी के साथ भ्रमरपुर दुर्गा मंदिर में पूजा कर बाइक से गांव जा रहे थे. एनएच 31 पर महंथ चौक के पास आशुतोष की साइड में चलने की बात पर एक आदमी से झड़प हो गई. पढ़ेलिखे आशुतोष बाइक रोक कर उस आदमी को समझा रहे थे, लेकिन वह आदमी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था. झड़प होते देख आसपास के लोग एकत्र हो गए. उन लोगों ने भी उस आदमी को समझाया. समझाईबुझाई चल रही थी कि बिहपुर के थानेदार रंजीत कुमार पुलिस की जीप से उधर से निकले. उन्होंने भीड़ देख कर गाड़ी रोक ली. रंजीत ने आशुतोष और उन से झगड़ा कर रहे आदमी से झगड़ने का कारण पूछा.

रंजीत कुकर बन कूदा बीच में थानेदार रंजीत कुमार पूरी बात सुन कर आशुतोष की गलती बता कर उसे धमकाने लगे. थानेदार ने आशुतोष से बाइक के कागजात मांगे. उन्होंने कागजात दिखा दिए. इसी दौरान किसी बात पर आशुतोष से थानेदार की बहस हो गई. उन्हें बहस करते देख कर थानेदार रंजीत कुमार आगबबूला हो गए. उन्होंने पत्नी और बेटी के सामने ही सरेआम आशुतोष की पिटाई शुरू कर दी. आशुतोष कहते रहे कि थानेदार साहब, आप यह गलत कर रहे हो. मैं पढ़ालिखा इंसान हूं. सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं. आशुतोष की बात पर थानेदार का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उन्होंने अपने जीप चालक और साथ में मौजूद पुलिस वालों से कहा कि इसे जीप में डालो और थाने ले चलो.

थानेदार साहब का हुकम था. पुलिस वालों ने आशुतोष को जबरन जीप में डाला और थाने की ओर चल दिए. आशुतोष की पत्नी स्नेहा पाठक थानेदार और पुलिस वालों के आगे हाथ जोड़ कर अपने पति को छोड़ने की गुहार लगाती रही. आशुतोष की 2 साल की बेटी रोतीबिलखती रही, लेकिन पुलिस वालों का कलेजा नहीं पसीजा. वहां मौजूद लोगों की भी हिम्मत नहीं हुई कि थानेदार का विरोध करें. बिहपुर थाने ले जा कर थानेदार ने आशुतोष के कपड़े उतरवा दिए. उन को डंडों से बेरहमी से पीटा गया. इतने पर भी थानेदार रंजीत का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तो पुलिस वालों से जूतों से उन की जम कर पिटाई कराई. फिर शौचालय में बंद कर खूब पिटाई की गई.

आशुतोष खून से लथपथ हो गए. उन की नाक और शरीर से कई जगह खून बहने लगा. इस बीच स्नेहा ने फोन कर मड़वा गांव में अपने घर वालों को सारी बात बता दी. गांव से आशुतोष के घरवाले बिहपुर थाने आ गए. थानेदार ने उन से भी बदसलूकी की और उन्हें आशुतोष से नहीं मिलने दिया. घर वाले थानेदार के सामने गुहार लगाते रहे, लेकिन उस ने किसी की नहीं सुनी. पुलिस वालों की पिटाई से शाम करीब 7 बजे आशुतोष मरणासन्न हो गए, तब उन्हें घर वालों को सौंप दिया गया. सौंपने से पहले एक कागज पर यह भी लिखवा लिया गया कि हम आशुतोष को सहीसलामत थाने से ले जा रहे हैं.

आशुतोष की हालत खराब थी. पुलिस वालों ने उन्हें बुरी तरह पीटा था. डंडों, जूतों और बेल्ट के साथ थप्पड़घूंसों से भी पिटाई की गई थी. जगहजगह चोटें लगने से उन के शरीर से खून रिस रहा था. जिंदगी की जंग हार गए आशुतोष घर वाले उन्हें बिहपुर के ही निजी अस्पताल में ले गए. डाक्टरों ने प्राथमिक इलाज के बाद गंभीर हालत देख कर उन्हें भागलपुर के जवाहर लाल नेहरू मैडिकल कालेज एंड अस्पताल में रैफर कर दिया. अस्पताल में दूसरे दिन इलाज के दौरान उन की मौत हो गई. वे करीब 33 साल के थे. आशुतोष की मौत का पता चलने पर बिहपुर थानेदार और उस के साथी पुलिस वाले थाने से फरार हो गए.

उस दिन दशहरा था. बिहार में विधानसभा के चुनाव भी हो रहे थे. सौफ्टवेयर इंजीनियर आशुतोष पाठक की मौत से लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. दोपहर करीब 12 बजे लोगों ने आशुतोष की लाश महंथ चौक पर रख कर एनएच 31 जाम कर दिया और पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. पता चलने पर पुलिस और प्रशासन के अफसर मौके पर पहुंचे और उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने डीएम को मौके पर बुलाने, मृतक के आश्रितों को नौकरी, मुआवजा, दोषी पुलिस वालों को गिरफ्तार करने की मांग की. इस दौरान लोगों ने नवगछिया डीएसपी और एसडीपीओ से धक्कामुक्की भी की. कई घंटों की समझाइश और आश्वासन के बाद शाम 5 बजे लोग शांत हुए और शव का पोस्टमार्टम कराने की सहमति दी.

बाद में 3 डाक्टरों के मैडिकल बोर्ड से शव का पोस्टमार्टम कराया गया. इस की वीडियोग्राफी भी कराई गई. पोस्टमार्टम कराने के बाद शव उन के घरवालों को सौंप दिया गया. मृतक आशुतोष के चाचा प्रफुल्ल पाठक ने झंडापुर ओपी थाने में बिहपुर थानाप्रभारी रंजीत कुमार, पुलिस जीप के निजी चालक, बिहपुर थाने में मौजूद पुलिस वालों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस घटना से बिहार पुलिस का अमानवीय चेहरा सामने आ गया था. विधानसभा चुनाव का माहौल था. पूरे इलाके के लोगों में आक्रोश था. इसलिए मुख्यमंत्री ने डीजीपी को घटना की जांच कराने के निर्देश दिए. जिला प्रशासन ने भी मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए.

बिहार के राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले में शिकायत दर्ज कर ली. घटना की गंभीरता को देखते हुए नवगछिया की एसपी स्वप्नाजी मेश्राम ने आरोपी थानाप्रभारी रंजीत कुमार को निलंबित कर दिया. सिर्फ जांच ही जांच एसपी ने मामले की जांच के लिए एसडीपीओ दिलीप कुमार के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया. एफएसएल टीम ने बिहपुर थाने से घटना के साक्ष्य जुटाए. इस के लिए पिटाई में इस्तेमाल डंडे, हथियारों के बट, शौचालय के दरवाजे का रौड, फर्श, पुलिस थाने की जीप आदि से सैंपल एकत्र किए गए. इंजीनियर आशुतोष की मौत को ले कर सोशल मीडिया पर जस्टिस फौर आशुतोष कैंपेन शुरू हो गया. इस में सांसद, विधायक से ले कर बिहार और झारखंड तक के लोग जुड़ गए.

आशुतोष के ननिहाल गोड्डा से ले कर उन के गांव मड़वा तक के लोग सोशल मीडिया के जरिए बिहपुर के थानेदार और उस की टीम के पुलिस वालों को फांसी देने की मांग करने लगे. लोगों का कहना था कि थानेदार रंजीत कुमार पहले भी बेवजह लोगों की पिटाई करते थे. एसपी से लोगों ने शिकायतें भी की थीं, लेकिन कभी काररवाई नहीं हुई. इस से थानेदार के अत्याचार बढ़ते गए. बिहपुर पुलिस थाने में पहले से ही सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. इन कैमरों में पूरी घटना कैद हो गई थी. इसलिए इन की फुटेज जब्त कर अधिकारियों ने उन की जांच शुरू कर दी.

प्रारंभिक जांच में इंजीनियर आशुतोष की मौत पुलिस की पिटाई से होने की बात ही सामने आई. जांच में एसआईटी को बिहपुर थाने में एक प्रार्थनापत्र और थाने की डायरी में एक एंट्री मिली. प्रार्थनापत्र आशुतोष के रिश्तेदार संजय पाठक की ओर से बिहपुर थानाध्यक्ष के नाम था. इस में लिखा था कि वह आशुतोष को थाने से सहीसलामत ले जा रहे हैं. पुलिस स्टेशन की डायरी में इस प्रार्थनापत्र की एंट्री की गई थी. पुलिस की बर्बर पिटाई से इंजीनियर की मौत का मामला तूल पकड़ता जा रहा था. विभिन्न संगठनों के लोग जिला प्रशासन को आंदोलन की चेतावनी देने लगे. लोगों के गुस्से को देखते हुए डीआईजी सुजीत कुमार ने इस मामले की मौनिटरिंग की कमान संभाल ली.

उन्होंने नवगछिया एसपी को थानेदार सहित अन्य आरोपी पुलिस वालों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी करने को कहा. अधिकारियों के झूठे आश्वासन डीआईजी ने इस मामले में नवगछिया जिला पुलिस की मदद के लिए भागलपुर साइबर सेल के प्रभारी और एक तकनीकी विशेषज्ञ को डेपुटेशन पर अगले आदेश तक बिहपुर लगा दिया. 28 अक्तूबर को मड़वा और भ्रमरपुर गांव के लोगों ने आशुतोष की आत्मा की शांति के लिए कैंडल मार्च निकाला. लोगों ने मामले की न्यायिक जांच कराने, दोषी पुलिस वालों की गिरफ्तारी और उन्हें बर्खास्त करने के अलावा मृतक के परिवार को सरकारी नौकरी देने की मांग की.

आरोपी थानेदार और उस के साथी पुलिस वालों की तलाश में एसआईटी ने कई जगह छापे मारे. साइबर सेल के पुलिस अधिकारियों ने आरोपी पुलिस वालों की मोबाइल लोकेशन की टोह ली, लेकिन सुराग नहीं मिला. लोगों के आक्रोश को देखते हुए नवगछिया एसपी ने भागलपुर के डीएम को पत्र लिख कर मामले की न्यायिक जांच कराने का अनुरोध किया. भागलपुर डीएम प्रवीण कुमार ने इस के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश को पत्र लिख कर आग्रह किया. एसपी ने इंजीनियर आशुतोष की पिटाई में थानेदार का साथ देने वाले 2 होमगार्ड जवानों की सेवाएं समाप्त करने के लिए भागलपुर डीएम को पत्र लिखा. इस के आधार पर डीएम ने दोनों आरोपी होमगार्ड जवानों की सेवा समाप्त कर दी.

प्रारंभिक जांच में सामने आया था कि आशुतोष की बर्बरता से पिटाई करने में थानेदार के अलावा पुलिस जीप का निजी चालक जहांगीर, एक एएसआई शिवबालक प्रसाद और 2 होमगार्ड जवान राजू पासवान व मनोज कुमार चौधरी आदि शामिल थे. एसआईटी भी कुछ नहीं कर पाई इस मामले में लगातार हो रहे लोगों के प्रदर्शनों को देखते हुए एसआईटी के अधिकारी आरोपी पुलिस वालों की तलाश में रोजाना छापे मार रहे थे, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चल रहा था. इस से लोग यह कहने लगे कि पुलिस अपने साथियों का बचाव कर रही है.

लोगों के दबाव में भागदौड़ के बाद पुलिस ने आशुतोष की मौत के मामले में 30 अक्तूबर को बिहपुर थाने के एएसआई शिवबालक प्रसाद और बर्खास्त किए गए दोनों होमगार्ड जवान राजू पासवान व मनोज कुमार को गिरफ्तार कर लिया. आरोपी एएसआई पटना जिले के पुनपुन थाना इलाके के पोथही गांव का रहने वाला था. इसी दिन मड़वा गांव के लोगों ने नवगछिया एसपी स्वप्नाजी मेश्राम से मुलाकात कर आरोपी थानेदार की गिरफ्तारी नहीं होने पर गुस्सा जताया और ज्ञापन दिया. इस में आरोपी पुलिस वालों पर सख्त काररवाई और पीडि़त परिवार को 25 लाख रुपए मुआवजे के अलावा आश्रित को सरकारी नौकरी दिलाने की मांग की. लोगों के आक्रोश को देखते हुए बिहपुर पुलिस थाने पर अर्धसैनिक बल तैनात कर दिया गया.

31 अक्तूबर को पुलिस को इंजीनियर आशुतोष की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. इस में उन्हें अंदरूनी चोटें लगने की बात कही गई थी. इस रिपोर्ट से यह बात तय हो गई कि पुलिस ने आशुतोष की बेरहमी से पिटाई की थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद डीआईजी सुजीत कुमार ने बिहपुर थाने पहुंच कर एकएक बिंदु पर मातहत अफसरों से चर्चा की. इसी दिन पुलिस ने गिरफ्तार एएसआई और बर्खास्त होमगार्ड जवानों को पूछताछ और बयान लेने के बाद अदालत में पेश किया. अदालत ने तीनों को 31 अक्तूबर को जेल भेज दिया.

चूंकि इस दौरान बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे थे. इसलिए पुलिस की पिटाई से इंजीनियर आशुतोष की मौत के मामले को चुनाव आयोग ने गंभीरता से लिया. आयोग ने एक नवंबर को भागलपुर की प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए. उन्हें अपनी रिपोर्ट एक सप्ताह में चुनाव आयोग को सौंपने को कहा गया. सिर्फ आश्वासन चुनाव आयोग के निर्देश पर प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी ने 2 नवंबर को ही बिहपुर पहुंच कर मामले की जांच शुरू कर दी. उन्होंने एसपी स्वप्नाजी मेश्राम और एसडीपीओ दिलीप कुमार की मौजूदगी में थाने में पुलिसकर्मियों से आशुतोष के साथ हुई घटना के बारे में पूछताछ की.

उन्होंने कहा कि आरोपी थानाध्यक्ष को जल्दी ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा और उस की बर्खास्तगी का प्रस्ताव सरकार को भेजा जाएगा. एसपी ने उन्हें बताया कि फरार आरोपी थानेदार की संपत्ति की कुर्की के लिए अदालत में प्रार्थनापत्र लगाया गया है. वंदना किन्नी ने उसी दिन भागलपुर डीएम के साथ मड़वा गांव जा कर मृतक इंजीनियर आशुतोष के घर वालों को सांत्वना दी और उन से घटना के बारे में जानकारी ली. 3 नवंबर को अदालत के आदेश पर बिहपुर के निलंबित थानेदार रंजीत कुमार के मुंगेर स्थित मकान की कुर्की कर ली गई. एसआईटी ने एसडीपीओ दिलीप कुमार के नेतृत्व में थानेदार के मकान से सारा सामान जब्त कर लिया.

इस के अलावा एक और आरोपी जहांगीर को भी एसआईटी ने गिरफ्तार कर लिया. जहांगीर बिहपुर पुलिस थाने की जीप का निजी चालक था. आरोप है कि थानेदार के कहने पर उस ने भी आशुतोष की बेरहमी से पिटाई की थी. आश्वासनों का अंबार उसी दिन केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने आशुतोष के घर वालों से मुलाकात कर शोक संवेदना जताई. उन्होंने कहा कि दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा. यह घटना हृदयविदारक है. इस मामले में उन्होंने पीडि़त परिवार को 50 लाख रुपए मुआवजा दिलाने और आशुतोष की पत्नी को सरकारी नौकरी दिलाने की बात भी कही.

प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी मामले की जांच के लिए 6 नवंबर को दोबारा बिहपुर पहुंची. उन्होंने एनएच 31 पर महंथ चौक पर दुकानदारों और प्रत्यक्षदर्शियों से 24 अक्तूबर को आशुतोष के साथ हुई घटना के बारे में पूछताछ की. इस के बाद वह बिहपुर थाना इलाके के ही कोरचक्का गांव पहुंची. इसी गांव के देवेंद्र सिंह से साइड में चलने की बात पर आशुतोष की उस दिन झड़प हुई थी. इसी झड़प के दौरान बिहपुर थानेदार रंजीत वहां पहुंच गया और आशुतोष को धमकाने के बाद पीटते हुए थाने ले गया था. आयुक्त को देवेंद्र गांव में नहीं मिला. वह नेपाल गया हुआ था. बाद में आयुक्त वंदना किन्नी ने नवगछिया में एसपी से इस मामले की जांचपड़ताल के बारे में पूछा.

भागलपुर के जिलाधिकारी प्रवीण कुमार की अनुशंसा पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार पांडेय ने 9 नवंबर को आशुतोष की मौत के मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए. इस मामले की जांच नवगछिया सिविल कोर्ट के एसीजेएम-3 प्रमोद कुमार पांडेय को सौंपी गई. उन्हें एक महीने में जांच पूरी कर रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंपने को कहा गया. नवगछिया एसपी स्वप्नाजी मेश्राम ने बिहपुर के निलंबित थानेदार रंजीत कुमार की बर्खास्तगी की अनुशंसा डीआईजी से की. एसपी की अनुशंसा पर थानेदार की बर्खास्तगी की काररवाई विभागीय स्तर पर शुरू हो गई.

इंजीनियर आशुतोष के पिता अजय पाठक गोड्डा कालेज में प्रोफेसर थे. आशुतोष के दादा प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य और स्वतंत्रता सेनानी थे. उन के मातापिता का निधन हो चुका था. गोड्डा में आशुतोष का ननिहाल है. उन्होंने गोड्डा से ही पढ़ाई की थी. वह अच्छे क्रिकेटर भी थे. सौफ्टवेयर इंजीनियर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई शहरों में नौकरी की. कई साल तक वह बेंगलुरु में नौकरी करते रहे. लौकडाउन होने पर वे बेंगलुरु छोड़ कर अपने गांव आ गए और भागलपुर में नौकरी करने लगे थे. अभी तक आंसू बहा रही है स्नेहा आशुतोष की शादी करीब 3 साल पहले स्नेहा से हुई थी. उन के 2 साल की एक बेटी है. उस के ससुर कटिहार पुलिस में दरोगा हैं.

कथा लिखे जाने तक आरोपी थानेदार रंजीत कुमार की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. वह पुलिस की पकड़ से बच कर अपने दांवपेच लगाने में जुटा था. माना यह जा रहा था वह पुलिस से कितनी भी आंख मिचौली करे, एक न एक दिन उसे अपने किए की सजा जरूर मिलेगी. नेताओं और अफसरों के वादे के बावजूद मृतक आशुतोष के घर वालों को न तो कोई आर्थिक मदद मिली थी और न ही आश्रित को नौकरी. आशुतोष की मौत से स्नेहा की मांग का सिंदूर उजड़ गया. 2 साल की मासूम बेटी मारवी के सिर से पिता का साया छिन गया. पति की मौत के गम से स्नेहा अभी उबर नहीं पा रही है. वह रात को सोते हुए उठ बैठती है और उस दिन की घटना को याद कर आंसू बहाती है.

बहरहाल, इस घटना से बिहार पुलिस का अमानवीय चेहरा उजागर हुआ है. पुलिस पहले ही बदनाम रही है, इस घटना ने आम लोगों में पुलिस का भरोसा कम किया है. देश में जहां रोजाना नए कानून बन रहे हैं. शिकायतों के लिए सरकार और अफसर हैं. इंसाफ देने के लिए अदालतें है. संविधान ने लोगों को कई तरह की आजादी और अधिकार दिए हैं. फिर भी इस तरह की हो रही घटनाएं देशवासियों का सिर शर्म से झुकाने को मजबूर कर देती हैं.

 

अपने ही परिवार के खून से रंगे हाथ

अपने ही परिवार के खून से रंगे हाथ – भाग 4

सुमित ने अपने कनफेशन वीडियो में भी इस सच को स्वीकार किया था कि उसे ड्रग्स की लत है. दरअसल, सुमित बीटेक की पढ़ाई के दौरान ही ड्रग्स की लत का शिकार हो गया था. लेकिन उस के परिवार को ये बात कभी पता नहीं चली.

बीटेक की पढ़ाई के दौरान जब सुमित हौस्टल में रहता था तब उसे दोस्तों की संगत में ड्रग्स लेने, चरस की सिगरेट पीने और शराब पीने की आदत पड़ गई थी. इसी दौरान जब उस की शादी हो गई तो उस की नशे की लत कुछ कम जरूर हो गई, मगर उस के बाद भी चोरी छिपे वह ड्रग्स लेता रहता था.

1-2 बार उस की पत्नी अंशुबाला को उस पर शक हुआ तो उस ने इधर उधर की बात बना कर पत्नी को बहका दिया. डेढ़ साल पहले सुमित की नशे की लत उस वक्त फिर बढ़ गई जब वह गुरुग्राम की आईटी कंपनी में नौकरी करता था. वहां उस के 1-2 साथी भी नशा करते थे.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – मदहोश बाप : मौत के निशाने पर आया बेटा

एक साल पहले अंशु ने सुमित के कपड़ों की जेब से नशे की गोलियां पकड़ीं तो दोनों के बीच पहली बार इस बात को ले कर झगड़ा हुआ था. अंशुबाला ने तब ये बात सुमित की बड़ी बहन गुड्डी को बताई थी. गुड्डी ने भी सुमित को डांटते हुए नशा न करने की हिदायत दी थी.

चूंकि सुमित अच्छा कमाता था और पैसे की कोई कमी नहीं थी इसलिए उस ने सोचा ही नहीं कि जब नशा करने के लिए उस के पास पैसा नहीं होगा तो वह क्या करेगा. जनवरी में जब सुमित की नौकरी चली गई तो एक महीना तो सब ठीक रहा. लेकिन जैसे जैसे वक्त बीतने लगा, उस का डिप्रेशन और नशे की लत दोनों बढ़ते गए. जाहिर है नशे की लत के साथ खर्चा भी बढ़ने लगा. जबकि आमदनी कुछ थी नहीं.

सुमित को खुद भी और परिवार को भी ठाठ की जिंदगी जीने की आदत थी. धीरेधीरे उसे लगने लगा कि आने वाले दिनों में पैसे के अभाव में उस की जिंदगी बेहद मुश्किल भरी हो जाएगी. इस बात को ले कर वह चिड़चिड़ा रहने लगा. अब पत्नी से भी उस की बातबात पर झड़प हो जाती थी.

अंशु भी बारबार उसे नशा करने को ले कर ताने देती थी कि नशे में अपना वक्त खराब करने से अच्छा है कि वह नौकरी तलाश करने में वक्त लगाए. दूसरी ओर भरी हुई सिगरेट पीने और नशे की गोलियां लेने की सुमित की क्षमता भी बढ़ चुकी थी. वह हुकुम मैडिकल स्टोर से ही लाखों रुपए की नशे की दवाएं ले कर खा चुका था. अब धीरेधीरे वहां भी उस का उधार खाता शुरू हो गया था.

इस दौरान 8 अप्रैल, 2019 को आरव व आकृति का जन्मदिन मनाने के अगले दिन जब सुमित के सासससुर किसी शादी के लिए बिहार गए तो एक दिन अंशु ने सुमित पर ऐसा तंज कसा कि बात उस के दिल पर लगी. अंशु ने सुमित से कह दिया कि अगर ऐसा नशेड़ी पति ही किस्मत में लिखा था तो भगवान उसे कुंवारी ही रहने देता.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – ताबीज का रहस्य : मूर्ति की मौत का खुलासा

सुमित को उस दिन लगा कि उस के इतना करने के बावजूद घर में अगर उस की यही कदर है तो ऐसे परिवार से परिवार का न होना बेहतर है. उस दिन की बात सुमित के दिल में ऐसी बैठ गई कि वह दिनरात नशा करता और एक ही बात सोचता कि ऐसे परिवार की फिक्र करने से क्या फायदा जहां इंसान की कदर न हो, इस से तो अच्छा है कि बिना परिवार अकेले रहो और मस्ती से जियो.

एक बार दिमाग में इस विचार ने घर कर लिया तो बस वह इसी बात पर सोचने लगा. उस ने इरादा कर लिया कि वह पूरे परिवार को खत्म कर देगा और अकेला ऐश की जिंदगी जीएगा.

अंशु सुमित को नशे की हालत में देख कर उसे ताने मारती थी. इस से सुमित का इरादा और भी ज्यादा मजबूत होता चला गया. सुमित के पास जमापूंजी भी खत्म होने लगी थी, इसलिए वह और ज्यादा तनाव में रहने लगा था. उस ने परिवार को खत्म करने का पूरा मन बना लिया था.

18 अप्रैल, 2019 को वह अपनी नशे की दवा और पोटैशियम साइनाइड लेने के लिए मुकेश के मैडिकल स्टोर पर गया. दवा लेने के बाद उस ने पेमेंट की. वहां मुकेश के कहने पर उस ने किसी दवा व्यापारी को औनलाइन पेमेंट करने में उस की मदद की. उसी दौरान उस ने मुकेश के खाते से एक लाख रुपए अपने खाते में भी ट्रांसफर कर लिए.

वह जानता था कि 1-2 दिन में मुकेश को यह बात पता चल जाएगी कि चोरीछिपे उस ने उस के खाते से एक लाख रुपए ट्रांसफर कर लिए हैं. लिहाजा उसी दिन सुमित ने चाकुओं का एक सेट भी खरीद लिया. घर आ कर उस ने जब अंशु को चाकुओं का वह सेट दिया तो उस ने इस बात पर भी सुमित को फटकारा कि जिस चीज की जरूरत नहीं थी उसे वह क्यों लाया.

फिर 20 अप्रैल की वो रात आ गई जब उस ने परिवार को खत्म करने की ठानी. रात को उस ने पहले परिवार के सभी लोगों को खाने के बाद पीने के लिए कोल्डड्रिंक दी जिसमें उस ने नींद की दवा मिला रखी थी. बच्चों पर दवा का असर जल्दी हो गया और वे कोल्डड्रिंक पी कर बेसुध हो गए. लेकिन अंशु पर नशे का असर धीरेधीरे हो रहा था.

सुमित ने सब से पहले अपने बड़े बेटे प्रथमेश का गला काटा. क्योंकि वह प्रथमेश को सब से ज्यादा प्यार करता था. उसे मालूम था कि अगर उस ने प्रथमेश की हत्या पहले कर दी तो वह परिवार के दूसरे सदस्यों को आसानी से मार देगा. क्योंकि सब से ज्यादा प्यारी चीज को खत्म करने के बाद इंसान के लिए कम महत्व की चीजों को मिटाना ज्यादा आसान होता है.

प्रथमेश की हत्या के बाद सुमित अंशुबाला की हत्या करने के लिए उस के पास पहुंचा तो संयोग से तब तक अंशुबाला के ऊपर कोल्डड्रिंक में मिली दवा का असर कम हो चुका था. इसलिए उस ने सुमित का प्रतिरोध शुरू कर दिया.

यही कारण था कि सुमित ने उस का गला काटने से पहले चाकू के कई वार गले के अलावा शरीर के दूसरे अंगों पर भी किए. इस से अंशुबाला के शरीर पर कई जगह खरोचों के निशान आ गए थे. आखिर वह पत्नी की हत्या करने में सफल हो गया. इस के बाद उस ने बारीबारी से जुड़वां बेटा बेटी आरव और आकृति का भी गला काट कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया.

हत्या करने के बाद उस ने हत्या में इस्तेमाल चाकुओं को बाथरूम में जा कर धो दिया. उस ने अपने खून से लथपथ कपड़ों को बाथरूम में जा कर बदला और रात भर घर में बैठ कर अपने किए पर सोचता विचारता रहा.

उस के मन में विचार आया कि वह खुद भी आत्महत्या कर ले. लेकिन कई घंटे सोचविचार के बाद सुमित ने सुबह करीब 3 बजे एक बैग में कपड़े और घर में रखे गहने व नकदी रखे और घर का ताला लगा कर घर से निकल गया.

रास्ते में उसे गार्ड मिला तो सुमित ने उस से कह दिया कि वह थोड़ी देर में वापस लौट आएगा. घर के बाहर आ कर उस ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए ओला कैब बुक की और वहां से स्टेशन पर पहुंच कर तत्काल टिकट ले कर त्रिवेंद्रम जाने के लिए तैयार खड़ी राजधानी एक्सप्रेस में चढ़ गया.

घर से चलते वक्त सुमित अपने घर के दोनों फोन भी साथ ले गया था. उस ने उन दोनों फोनों को ट्रेन में चढ़ते ही बंद कर दिया था. ट्रेन में ही सुमित ने अपना कनफेशन वीडियो बनाया और उसे अपने परिवार के वाट्सगु्रप में डाल दिया. 6 बजे ये वीडियो भेजने के बाद उस ने अपना फोन भी बंद कर दिया था.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – बंद बोरे का खुला राज : आशिकी में की पति की हत्या

सुमित ने बताया कि पहले तो वह आत्महत्या करना चाहता था, लेकिन जब ट्रेन में बैठ गया तो उस का इरादा बदल गया. उस ने तय किया कि वह कहीं दूर जा कर अपनी पहचान छिपा कर साधु संत बन कर जिंदगी गुजार लेगा ताकि उस की नशे की लत भी पूरी होती रहे. पुलिस ने पूछताछ के बाद सुमित को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

— कथा पुलिस की जांच और आरोपी से पूछताछ पर आधारित

अपने ही परिवार के खून से रंगे हाथ – भाग 3

अंतिम संस्कार के बाद अंशुबाला के मातापिता व परिवार के अन्य लोग इंदिरापुरम थाने पहुंचे और वहां उन्होंने थानाप्रभारी संदीप कुमार को बताया कि घर में कोई आर्थिक तंगी नहीं थी. सुमित ने सामूहिक हत्या कर घर में लूटपाट की है. वह गहने और नकदी ले कर फरार हुआ है.

परिजनों का तर्क था कि यदि उसे आत्महत्या करनी होती तो वह पत्नी और बच्चों के साथ ही जान दे देता. परिजनों ने हत्यारोपी सुमित के भाई और बहन को गिरफ्तार करने की मांग की.

परिजनों ने यह भी बताया कि 8 अप्रैल को ही आकृति व आरव का जन्मदिन हंसीखुशी मनाया गया था. अंशुबाला के पिता बी.एन. सिंह ने पुलिस को बताया कि वह चूंकि अपनी पत्नी मीरा सिंह के साथ बेटी अंशुबाला के साथ ही रहते थे, इसलिए उन्होंने देखा कि सुमित अकसर अंशु से लड़ाई करता था. वह उस से बार बार रुपए मांगता था. रुपए न देने पर पिटाई करता था.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – खतरनाक औरत : गांव की गलियों से निकली माया के सपने

बी.एन. सिंह का यह भी कहना था कि सुमित हर महीने एक लाख रुपए से अधिक कमाता था. उस ने नौकरी जरूर छोड़ दी थी लेकिन घर परिवार चलाने के लिए उसे कोई परेशानी नहीं थी. जबकि सुमित ने वीडियो में आर्थिक तंगी के चलते पत्नी और बच्चों की हत्या करने का दावा किया था.

लेकिन पुलिस ने पूरी कालोनी के लोगों के अलावा किराना, कौस्मेटिक की दुकान और प्रैस वाले से पूछताछ की तो उन्होंने परिवार पर किसी प्रकार का उधार होने से साफ इनकार कर दिया. सभी का कहना था कि सामान खरीदने के बाद तुरंत भुगतान कर दिया जाता था.

सोसायटी में कपड़े प्रेस करने वाले रामलाल ने पुलिस को बताया कि सुमित के घर से उस के पास प्रतिदिन छह जोड़ी कपड़े प्रैस होने आते थे. शुक्रवार सुबह भी कपड़े प्रैस होने आए थे.

कपड़े प्रैस करने के एवज में प्रतिमाह सुमित के घर से 1500 रुपए मिलते थे. परिवार ने कभी रुपए उधार नहीं किए. सोसायटी के पास स्थित किराना दुकान संचालक ने बताया कि अंशुबाला प्रतिमाह 8 हजार रुपए का घरेलू सामान नकद ले कर जाती थी.

कपड़े प्रैस करने वाले धोबी रामलाल ने यह भी बताया कि सुमित जब भी यहां रहता था, घर के नीचे या सोसाइटी में घूम कर सिगरेट पीता था. वह सिगरेट पीने का इतना आदी था कि एक दिन में 3 से 4 डिब्बी सिगरेट पी जाता था. पूछने पर सुमित कहता था कि सिगरेट पर उस का महीने का खर्च 10 हजार रुपए से ज्यादा आता है.

इस पूरी पूछताछ से यह बात तो साफ हो गई कि आर्थिक तंगी की जो बात सामने आ रही थी, उस में बहुत ज्यादा दम नहीं था. इसलिए पुलिस ने अंशुबाला के परिजनों द्वारा हत्याकांड में सुमित के भाई और बहन के शामिल होने और उन्हें गिरफ्तार करने की मांग को दरकिनार कर दिया.

क्योंकि यह बात साफ हो चुकी थी कि परिवार न तो किसी आर्थिक मुसीबत में था न ही परिवार के दूसरे लोगों का सुमित के घर बहुत आनाजाना था. इसलिए पुलिस ने अब अपना सारा ध्यान सुमित की तलाश पर केंद्रित कर दिया.

पुलिस ने सुमित के मोबाइल नंबर की सीडीआर निकाल ली थी. उस में पुलिस को करीब आधा दरजन ऐसे नंबर मिले, जिन पर सुमित की बात होती थी. ये नंबर बिहार, बेंगलुरु, मध्य प्रदेश, दिल्ली समेत अन्य कई स्थानों के थे. पुलिस ने संदिग्ध नंबरों की एकएक कर जांच पड़ताल शुरू कर दी.

सर्विलांस टीम को अचानक उस वक्त सुमित की लोकेशन मिल गई, जब उस ने कुछ देर के लिए अपना मोबाइल औन किया. उस वक्त उस की लोकेशन मध्य प्रदेश के रतलाम में थी. सुमित ने अपनी पत्नी के दोनों मोबाइल तो औन नहीं किए थे. हां, इस दौरान 1-2 बार उस ने अपने भाई अमित से बात करने के लिए अपना फोन खोला तो उस की लोकेशन ट्रेस हो गई.

उस की लोकेशन रतलाम की आ रही थी. सुमित ने जब भी अपने भाई से बात की तो उस ने यह तो नहीं बताया कि वह कहां है लेकिन उस ने बारबार यहीं कहा कि वह बहुत परेशान था, इसलिए उस ने इतना बड़ा कदम उठा लिया.

एसएसपी उपेंद्र अग्रवाल ने इस दौरान मोबाइल की लोकेशन मिलने वाले स्थानों पर वहां की जीआरपी को सुमित के फोटो के साथ जानकारी भेजी ताकि वह किसी को दिखे तो उसे पुलिस हिरासत में लिया जा सके.

आननफानन में एसआई प्रह्लाद व इजहार अली और कांस्टेबल रवि कुमार की टीम को रतलाम रवाना कर दिया गया. साथ ही उन्होंने सर्विलांस टीम को उन के साथ बराबर संपर्क बना कर सुमित की लोकेशन का अपडेट देने के भी आदेश दिया.

चूंकि सुमित के कई रिश्तेदार व जानने वाले मध्य प्रदेश में रहते थे, इसलिए आशंका थी कि वह वहां पर अपनी पहचान छिपा कर कहीं छिपा होगा. भले ही उस ने वीडियो में कहा था कि वह 5 मिनट में आत्महत्या कर लेगा, लेकिन रतलाम में उस की लाकेशन मिलने और अभी तक की जांच से ऐसा नहीं लग रहा था कि वह मौत को गले लगा चुका होगा.

इस दौरान 22 अप्रैल, 2019 की शाम को अचानक इंदिरापुरम पुलिस ने औषधि विभाग के निरीक्षक वैभव बब्बर के साथ न्याय खंड 3 में स्थित हुकुम मैडिकल स्टोर पर छापा मारा. सुमित ने भेजे गए वीडियो में इसी मैडिकल स्टोर का जिक्र किया था.

पुलिस ने मैडिकल स्टोर के संचालक मुकेश जो मकनपुर का रहने वाला था, को गिरफ्तार कर लिया. छापा मार कर जब पड़ताल की गई तो पता चला कि उस ने 2 सालों से मैडिकल स्टोर के लाइसैंस का नवीनीकरण नहीं कराया था. उस से पूछताछ में पता चला कि सुमित 2 साल में एक लाख रुपए की नशीली दवाइयां खरीद कर खा चुका था.

सुमित कुमार ने वीडियो में बताया था कि वह पोटैशियम साइनाइड खा कर 5 मिनट में अपनी जिंदगी भी खत्म कर लेगा. मगर हुकुम मैडिकल स्टोर के संचालक मुकेश से जब पूछताछ हुई तो उस ने बताया कि उस के पास पौटैशियम साइनाइड नहीं था. सुमित काफी जिद कर रहा था, जिस की वजह से उस ने पोटैशियम साइनाइड बता कर उसे दूसरी दवा दे दी थी.

विश्वास दिलाने के लिए उस ने नशीली दवाओं के एवज में उस से 22,500 रुपए वसूले थे. पुलिस को भी तलाशी में उस की दुकान से पोटैशियम साइनाइड नहीं मिला, अलबत्ता उस की दुकान की तलाशी में कई नशीली व प्रतिबंधित दवाइयां जरूर बरामद हुईं. पुलिस ने मैडिकल स्टोर से ऐसी 2 पेटी दवाइयां कब्जे में लीं.

पुलिस ने औषधि निरीक्षक की शिकायत पर मुकेश के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया और दुकान सील कर दी. लेकिन सुमित की गिरफ्तारी व उस के परिवार के चारों सदस्यों की मौत की गुत्थी अभी तक उलझी थी.

इस दौरान पुलिस को मिली फोरैंसिक रिपोर्ट से पता चला कि सुमित ने पत्नी व बच्चों की हत्या के लिए 2 चाकुओं का प्रयोग किया था. बाथरूम से जो चाकू बरामद हुए थे, उन्हें पानी से साफ किया गया था.

जांच पड़ताल में ये भी पता चला कि सुमित वारदात वाली रात 2 बजे तक वाट्सऐप पर औनलाइन था. यह बात पुलिस को उस ग्रुप से जुडे़ लोगों की मदद से पता चली. सुमित की लोकेशन ट्रेस करने के लिए पुलिस ने उस का फेसबुक अकाउंट खंगाला तो पता चला कि सुमित फेसबुक पर ज्यादा एक्टिव नहीं था.

इस दौरान पुलिस को अचानक एक सफलता  मिली. कर्नाटक के उडुपी शहर में रेलवे पुलिस के एक कांस्टेबल ने टीवी चैनलों पर गाजियाबाद में हुए चौहरे हत्याकांड से जुड़ी खबर देखी थी. इस खबर में हत्या के बाद लापता सुमित की तसवीर भी दिखाई गई थी.

उसी तसवीर के हुलिए से मिलतेजुलते एक शख्स को जब जीआरपी के जवान ने स्टेशन पर देखा तो संदिग्ध मान कर वह उसे थाने ले आया. उस की आईडी चैक करने पर जब उस का संबंध गाजियाबाद से जुड़ा पाया गया तो उडुपी जीआरपी ने इस की सूचना गाजियाबाद पुलिस को दी.

उडुपी पुलिस ने वाट्सऐप के जरिए उस की वीडियो गाजियाबाद पुलिस को भेजी. उस वीडियो को जब गाजियाबाद पुलिस ने पीडि़त परिजनों को दिखाया गया तो उन्होंने तसदीक कर दी कि वह सुमित ही है. इस के बाद तो पुलिस के लिए सब कुछ आसान हो गया. एसएसपी ने रतलाम में सुमित को खोज रही पुलिस टीम को फ्लाइट पकड़ कर उडुपी पहुंचने के आदेश दिए.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – 18 टुकड़ों में मिली लाश का रहस्य

वहां पहुंच कर इंदिरापुरम पुलिस ने सुमित को अपनी कस्टडी में ले लिया. सुमित कुमार को उसी दिन उडुपी की कोर्ट में पेश कर पुलिस ने उस का ट्रांजिट रिमांड लिया और उसे ले कर अगले दिन यानी 24 अप्रैल को गाजियाबाद लौट आई. सुमित को अदालत में पेश करने के बाद पुलिस ने 2 दिन के रिमांड पर लिया जिस के बाद खुलासा हुआ कि सुमित ने किस वजह से और क्यों इस वारदात को अंजाम दिया था.

अपने ही परिवार के खून से रंगे हाथ – भाग 2

घर में 4 हत्याएं होने की खबर जल्द ही पूरी कालोनी में फैल गई. सुमित के घर के बाहर लोगों की भीड़ उमड़ने लगी. इस बीच किसी के कहने पर पंकज ने पुलिस को सूचना दे दी थी. उस समय शाम के 7 बजे थे. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना अभयखंड चौकी को दी गई. सुमित का घर इसी चौकी के क्षेत्र में आता था.

अभय खंड चौकीप्रभारी एसआई प्रह्लाद सिंह 2-3 सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने घर में एक साथ 4 लाशें देखीं तो इंदिरापुरम थानाप्रभारी संदीप कुमार को फोन कर के जानकारी दी. वैसे तो हत्या की वारदात ही पुलिस के लिए बड़ी बात होती है लेकिन यहां तो एक साथ 4 हत्याओं की बात थी.

इंसपेक्टर संदीप कुमार ने इंदिरापुरम क्षेत्र की एएसपी अपर्णा गौतम, एसपी (सिटी) श्लोक कुमार व गाजियाबाद के एसएसपी उपेंद्र कुमार अग्रवाल को इस घटना से अवगत करा दिया.

8 बजते बजते इंदिरापुरम का ज्ञान खंड 4 पुलिस छावनी में तब्दील हो गया. जिले का हर छोटा बड़ा अधिकारी और फोरैंसिक टीम वहां पहुंच कर जांचपड़ताल में जुट गई.

पंकज ने अपने मातापिता के साथ दिल्ली में रहने वाले अपने भाई व अन्य रिश्तेदारों को इस घटना से अवगत करा दिया था. पंकज के मोबाइल फोन पर सुमित की बहनों व भाई अमित के भी लगातार फोन आ रहे थे, उन्होंने उन्हें भी वास्तविकता से अवगत करा दिया.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – दरोगा की कातिल पत्नी : मां-बेटी बने पिता के कातिल

इंदिरापुरम पुलिस के साथ दूसरे तमाम अधिकारी जब घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि 2 कमरों के फ्लैट में अंदर ड्राइंगरूम में खून से लथपथ प्रथमेश का शव पड़ा था. अंशुबाला का शव बेडरूम में जमीन पर पड़ा मिला. जबकि दोनों जुड़वां बच्चों के शव बेड पर पड़े थे. ऐसा लगता था जैसे उन्हें सोते समय बेहोशी की अवस्था में मारा गया था.

anshu

                                                                 अंशुबाला

फर्श व बैड पर तथा 1-2 जगह दीवारों पर खून के निशान थे. बिस्तर पर पड़ा खून सूख कर काला पड़ने लगा था. तीनों बच्चों और अंशु के गले पर धारदार हथियार के निशान थे. अंशुबाला के पेट और छाती के अलावा हाथ पर भी कई जगह धारदार हथियारों के निशान थे. शरीर पर कई जगह खरोंचे भी थीं और कपड़े भी अस्तव्यस्त थे.

इस से पहली नजर में प्रतीत होता था कि मरने से पहले कातिल से उस की झड़प हुई थी और उस ने अपने बचाव में काफी संघर्ष किया था. शव को सब से पहले देखने वाले पंकज ने पुलिस को बताया कि तीनों बच्चों के मुंह के ऊपर तकिए  रखे हुए थे.

सुमित ने शायद परिवार के सभी लोगों को खाने की किसी चीज में कोई नशा दे कर बेहोश कर दिया था. इसीलिए जब उन की हत्या की गई तो आसपड़ोस के किसी भी व्यक्ति ने कोई चीखपुकार नहीं सुनी.

थानाप्रभारी संदीप कुमार ने फोरेंसिक टीम के साथ जब घर की छानबीन शुरू की तो उन्हें रसोई घर में सहजन की सब्जी के टुकड़े मिले. कोल्ड ड्रिंक की 2 खाली बोतलें व नशे की गोलियों के कुछ खाली पैकेट भी मिले. सभी चीजों को पुलिस ने जांच के लिए अपने कब्जे में ले लिया. क्योंकि पुलिस को शक था कि सब्जी में नशीली गोली या पदार्थ मिलाया गया था.

घर की तलाशी में पुलिस को अलगअलग साइज के 5 चाकू भी मिले, जिन में 3 एकदम नए थे. जबकि 2 चाकुओं का इस्तेमाल हत्या में किया गया था, क्योंकि धोने या कपड़े से साफ करने के बावजूद उन पर कहीं कहीं खून के निशान साफ दिखाई दे रहे थे. फोरैंसिक टीम ने जांच के बाद ये सभी सामान कब्जे में ले लिए.

कई घंटे की मशक्कत और घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद पुलिस ने तीनों बच्चों व अंशुबाला के शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिए. रात में पंकज के भाई मनीष व दूसरे रिश्तेदार भी गाजियाबाद पहुंच गए.

अंशुबाला के भाई पंकज की शिकायत के आधार पर इंदिरापुरम पुलिस ने 21 अप्रैल, 2019 को ही भादंवि की धारा 302 के तहत हत्या का मामला दर्ज कर लिया था. जांच का काम खुद थानाप्रभारी संदीप कुमार कर रहे थे.

सुबह होते ही पुलिस ने सुमित की खोजखबर लेने के लिए चौतरफा कोशिशें शुरू कर दीं. चूंकि सुमित का मोबाइल नंबर बंद था. इसलिए उस तक पहुंचने का जरिया सिर्फ उस का मोबाइल नंबर ही था.

हैरानी की बात यह थी कि घर में सुमित के अलावा 2 मोबाइल फोन और थे. इन में एक फोन अंशुबाला का था और दूसरा घर में रहता था. वे दोनों फोन भी घर की तलाशी में पुलिस को नहीं मिले थे. यह भी नहीं पता था कि सुमित जिंदा है या मर चुका है.

इसलिए एसएसपी उपेंद्र अग्रवाल से साइबर शाखा की टीम से सुमित व अंशुबाला के दोनों मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिए. इन मोबाइल नंबरों की लोकेशन के बारे में मिलने वाली पलपल की जानकारी इंदिरापुरम पुलिस को देने का काम सौंप दिया.

एसपी (सिटी) श्लोक कुमार व एएसपी अपर्णा गौतम ने थानाप्रभारी संदीप कुमार, एसआई प्रह्लाद सिंह और रामप्रस्थ चौकीप्रभारी इजहार अली के नेतृत्व में 3 टीमें बनाईं. पुलिस की टीमों ने सुबह होते ही सब से पहले घटनास्थल पर पहुंच कर आसपड़ोस के लोगों और सुमित कुमार के सभी रिश्तेदारों से बातचीत और पूछताछ करने का काम शुरू किया.

पड़ोसियों से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि मृतक परिवार काफी मिलनसार था. पड़ोसियों से अंशुबाला और सुमित का बहुत अच्छा व्यवहार था.

कालोनी के गार्ड इंद्रजीत ने बताया कि सुबह 3 बजे सुमित यह कह कर बाहर गया था कि वह थोड़ी देर में आ रहा है. वह किस काम से और कहां गया, इस के बारे में उसे पता नहीं था. गार्ड का कहना था कि सुमित के चेहरे से यह आभास नहीं हुआ कि उस ने 4 हत्याएं की हैं.

पड़ोसियों ने 21 अप्रैल की सुबह से सुमित के परिवार के किसी भी सदस्य को नहीं देखा था. अलबत्ता 20 अप्रैल की शाम को अंशुबाला का बड़ा बेटा प्रथमेश अपनी मां के साथ बाहर जरूर देखा गया था. दोनों एकदम नार्मल थे. पता चला कि सुमित भी अकसर बच्चों के साथ बाहर खेला करता था.

22 अप्रैल की दोपहर तक पुलिस ने अंशुबाला व उस के तीनों बच्चों का पोस्टमार्टम करवा कर चारों के शव उन के परिजनों को सौंप दिए. 21 अप्रैल की रात में ही पंकज ने अपने पिता को फोन कर के इस हादसे की सूचना दे दी थी.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – हसबैंड बनाम बौयफ्रैंड : सबक सिखाने के लिए रची साजिश

बेटी और नाती नातिन की हत्या की खबर सुनते ही अंशुबाला के मातापिता अगली सुबह बिहार के सारण से फ्लाइट पकड़ कर दोपहर तक दिल्ली और फिर दिल्ली से गाजियाबाद पहुंच गए. सुमित के भाई अमित व 2 बहनें भी दोपहर तक गाजियाबाद आ गए. दोनों परिवारों ने मिल कर चारों शवों का अंतिम संस्कार किया.

पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल चुकी थी, जिस में अंशु के गले के साथ शरीर के अन्य हिस्सों पर चाकू के 6 निशान पाए गए थे. वहीं, बच्चों की मौत गला रेतने से बताई गई थी. हत्या का समय 20 व 21 अप्रैल की रात 12 बजे के बाद का बताया गया. नशीले पदार्थ या नींद की गोली दिए जाने की पुष्टि नहीं होने के कारण चारों के बिसरा को सुरक्षित कर जांच के लिए भेज दिया गया.

अपने ही परिवार के खून से रंगे हाथ – भाग 1

नशे की लत इंसान के सोचने समझने की शक्ति ही नहीं छीनती, बल्कि उसे अपना गुलाम भी बना लेती है. नशे की लत में डूबा इंसान कभी कभी ऐसे खतरनाक कदम उठा लेता है, जिस के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. ऐसा ही कुछ सुमित के साथ भी हुआ.

सुमित गाजियाबाद के इंदिरापुरम ज्ञानखंड-4 में अपने परिवार के साथ टू बैडरूम फ्लैट में रहता था. परिवार में उस की पत्नी अंशुबाला के अलावा 3 बच्चे थे. बच्चों में बड़े बेटे प्रथमेश के बाद 4 साल के 2 जुड़वां बच्चे आकृति और आरव थे.

प्रथमेश रिवेरा पब्लिक स्कूल में पहली कक्षा में पढ़ रहा था. जबकि उस की पत्नी अंशुबाला इंदिरापुरम के मदर्स प्राइड स्कूल में टीचर थी. दोनों जुड़वां बच्चे इसी स्कूल में मां अंशु के साथ पढ़ने जाते थे. स्कूल से लौटने के बाद अंशुबाला घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी.

बिहार के सारण जिले के गांव अंजनी मकेर के रहने वाले बी.एन. सिंह सेना से रिटायर हो चुके थे. उन्होंने सन 2011 में बेटी अंशुबाला उर्फ पूजा की शादी झारखंड के सिंहभूम के गांव आदित्यपुर के रहने वाले सुमित के साथ की थी. सुमित ने बीटेक कर रखा था.

सुमित के पिता सर्वानंद सिंह व मां की सन 2012 में मृत्यु हो गई थी. परिवार में कुल 4 बहनभाई थे. बड़ा भाई अमित बेंगलुरु में एक आईटी कंपनी में इंजीनियर था और अपने परिवार के साथ वहीं रहता था. 4 बहनें थीं. बड़ी किरन व गुड्डी और 2 छोटी बेबी व रिंकी. 3 बहनों की शादी हो चुकी थी. सब से छोटी बहन रिंकी बड़े भाई अमित के साथ रह कर पढ़ रही थी.

अंशुबाला के परिवार में उस के मातापिता के अलावा 2 भाई थे पंकज और मनीष, दोनों ही शादीशुदा थे. पंकज गाजियाबाद वसुंधरा के सैक्टर 15 में अपने परिवार के साथ रहता था. जबकि छोटा भाई अपने परिवार के साथ दिल्ली के रोहिणी इलाके में रहता था.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – चाची की यारी में कर दिया चाचा का कत्ल

अंशुबाला के पिता बी.एन. सिंह और मां मीरा देवी पिछले 4 सालों से बेटी अंशुबाला के साथ रह रहे थे. इस की वजह यह थी कि सुमित का औफिस के काम से बाहर आनाजाना लगा रहता था.

सेना से रिटायर बी.एन. सिंह इंदिरापुरम की एक सिक्योरिटी कंपनी में सिक्योरिटी औफिसर की नौकरी कर रहे थे. हालांकि वह बेटी के पास रहते थे, लेकिन अपना व पत्नी का खर्च खुद उठाते थे. बेटी के पास रहने की वजह बस यही थी कि दामाद सुमित अकसर घर से बाहर रहता था.

बच्चे छोटे होने के कारण बेटी को किसी की मदद की जरूरत थी. बेटी के पास रहते हुए बी.एन. सिंह व उन की पत्नी मीरा देवी दोनों बेटों के पास आते जाते रहते थे. दोनों बेटे भी जब तब उन से व बहन अंशु से मिलने के लिए आते रहते थे.

अक्तूबर 2018 तक सुमित गुरुग्राम की आईटी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी पर था. इस के तुरंत बाद उस ने बेंगलुरु की अमेरिकन बेस आईटी कंपनी यूएसटी ग्लोबल में नौकरी शुरू कर दी थी. 14 लाख रुपए के पैकेज पर उस ने बतौर एप्लीकेशन मैनेजर जौइन किया था.

यूएसटी ग्लोबल कंपनी ने 2 महीने बाद अपना सिस्टम अपग्रेड किया तो सुमित काम नहीं कर पाया. नतीजतन बीती जनवरी में उस ने इस्तीफा दे दिया, लेकिन घर वालों को इस बारे में पता नहीं था. परिवार को इस सब की जानकारी तब लगी जब वह मार्च में बेंगलुरु छोड़ कर हमेशा के लिए दिल्ली आ गया. बेंगलुरु में वह अपने भाई अमित के पास रहता था.

जनवरी में नौकरी छोड़ने के बाद से ही सुमित लगातार दूसरी नौकरी के लिए प्रयास कर रहा था. लेकिन उसे सफलता नहीं मिल रही थी. अंशुबाला का वेतन बहुत ज्यादा तो नहीं था, लेकिन वह अपने व बच्चों के छोटेमोटे खर्च पूरा करने लायक कमा ही लेती थी.

अब तक सुमित भी अच्छी कमाई कर रहा था. सासससुर भी घर के खर्चों में सुमित व अंशु की मदद करते थे, इसलिए ऐसा कोई कारण नहीं था कि 3 महीने की नौकरी के कारण सुमित या परिवार के लोग परेशान होते. कुल मिला कर सब कुछ ठीक चल रहा था. इन दिनों बेरोजगारी के कारण सुमित भी पूरे दिन परिवार के साथ ही रहता था.

बिहार के सारण जिले में एक करीबी रिश्तेदार की बेटी की शादी थी, लिहाजा 7 अप्रैल, 2019 को बी.एन. सिंह अपनी पत्नी के साथ शादी में शामिल होने के लिए सारण चले गए थे.

सुमित के सभी भाईबहन दूरदूर व अलग रहते थे. सभी की खैरखबर मिलती रहे इस के लिए उन्होंने माई फैमिली नाम से एक वाट्सएप ग्रुप बना रखा था. 21 अप्रैल की शाम करीब 6 बजे इस वाट्सऐप ग्रुप पर सुमित ने एक ऐसा वीडियो डाला जिसे देख कर पूरे परिवार में हाहाकार मच गया.

ये वीडियो सब से पहले सुमित की बिहार में रहने वाली बहन गुड्डी ने देखा था. वीडियो में सुमित जो कुछ बोल रहा था उसे सुन कर गुड्डी के पांव तले से जमीन खिसक गई.

दरअसल इस वीडियो में सुमित बता रहा था, ‘मैं ने पत्नी और बच्चों की हत्या कर दी है. मैं खुद भी आत्महत्या करने जा रहा हूं. ये मेरा आखिरी वीडियो है. मैं दुकान से पोटैशियम साइनाइड ले कर आया हूं. अब मैं परिवार पालने लायक नहीं रहा, इसलिए मैं ने सब को जान से मार दिया है. जाओ जा कर शव ले लो. 5 मिनट में मैं पोटैशियम साइनाइड खा लूंगा.’

वीडियो में ही उस ने बताया कि उस ने न्याय खंड के हुकुम मैडिकल स्टोर से 22 हजार रुपए में पोटैशियम साइनाइड खरीदा है, जिसे खा कर वह मरने जा रहा है. सुमित ने वीडियो में यह भी बताया कि वह नशे के लिए ड्रग्स भी हुकुम मैडिकल स्टोर से लेता था.

मैडिकल स्टोर के मालिक मकनपुर निवासी मुकेश ने ड्रग्स के नाम पर उसे काफी लूटा था, जिस के चलते उस पर लाखों का कर्ज हो गया था. उस ने भी मुकेश के खाते से मोबाइल बैंकिंग के जरिए एक लाख रुपए अपने खाते में ट्रांसफर कर लिए हैं.

2.40 मिनट के वीडियो में सुमित ने बताया कि वह इस समय काफी डिप्रेस है और उस ने अपने परिवार की हत्या कर दी है. ये पूरी वीडियो जैसे ही गुड्डी ने देखी तो उस ने बेंगलुरु में रह रहे अपने बडे़ भाई अमित को फोन पर सारी बात बताई तो वह भी बेचैन हो गया. अमित ने गुड्डी से बात करने के बाद खुद भी फैमिली ग्रुप पर डाली गई वह वीडियो देखी और गुड्डी से बात की.

अमित ने गुड्डी से कहा कि वह तुरंत अंशुबाला के भाई पंकज को बता दे. क्योंकि वही एक ऐसा शख्स था, जो सुमित के घर के सब से नजदीक रहता था. भाई की सलाह के बाद गुड्डी ने सुमित द्वारा ग्रुप में डाला गया वीडियो पंकज को भेज दिया और उस से फोन पर बात की. गुड्डी ने पंकज को सारी बात बताई तो पंकज का भी सिर घूम गया.

तब तक हकीकत किसी को मालूम नहीं  थी, इसलिए गुड्डी ने पंकज को सलाह दी कि वह तत्काल सुमित के घर जा कर देखे कि माजरा क्या है. तब तक किसी को यकीन नहीं हो रहा था, वे लोग सोच रहे थे कि सुमित ने कहीं मजाक तो नहीं किया.

हालांकि अमित, गुड्डी और पंकज सभी लोगों को जैसे ही इस वीडियो मैसेज के बारे में पता चला उन्होंने सुमित के मोबाइल फोन पर संपर्क करना चाहा ताकि उस से बात कर असलियत जान सकें. लेकिन सभी को उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. इस से सभी को शंका होने लगी.

लिहाजा उन्होंने अंशु बाला व घर के दूसरे मोबाइल फोन पर भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन दोनों फोन स्विच्ड औफ मिले तो पंकज का मन शंका से भर उठा.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – बदनामी का दाग जिसने सब तबाह कर दिया

पंकज ने यह सब सुनने के बाद अपने आसपड़ोस के एक दो लोगों को साथ लिया और ज्ञान खंड-4 में सुमित के मकान पर पहुंच गए. लेकिन वहां ताला लटका देख उन का दिल आशंका से भर गया. उन्होंने सुमित के पड़ोस में रहने वाले और कालोनी के कुछ लोगों को एकत्र कर उन्हें अपने बहनोई द्वारा भेजे गए वीडियो के बारे में बताया तो सभी ने सलाह दी कि घर का ताला तोड़ कर चैक किया जाए.

फलस्वरूप सुमित के घर का ताला तोड़ दिया गया. दरवाजा खोल कर अंदर का नजारा देखा तो सभी दंग रह गए. अंदर ड्राइंगरूम से ले कर बेडरूम तक तीनों बच्चों और अंशुबाला के खून से लथपथ शव पड़े थे. जबकि सुमित का कहीं अता पता नहीं था.