Hindi stories: जुर्म का रिश्ता

Hindi stories: चोरीडकैती करने वाली लैला को रौनी से प्यार हुआ तो वह साथियों से धोखा करने लगी. भला उस के साथी यह धोखेबाजी कैसे बरदाश्त करते, परिणामस्वरूप वह मारी गई.

सीनियर पुलिस इंसपेक्टर से मिलने का समय ले कर मैं ने फोन रखा ही था कि रौनी आ गया. उस का चेहरा उतरा हुआ था. इस का मतलब था कि वह किसी मुसीबत में था. उस ने आते ही कहा, ‘‘कौफी का वक्त है, मंगवा लो.’’

मैं ने कौफी का और्डर दे दिया. उस ने कुरसी पर करवट बदलते हुए कहा, ‘‘दोस्त, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं, जिस से मेरा दिल हलका हो जाए.’’

रौनी ऊंचा, स्मार्ट और पूरा आदमी था. वह काला सूट पहने था. रौनी अपनी बात कहे, उस से पहले मैं थोड़ा अपने बारे में बता दूं. मैं एक प्राइवेट डिटैक्टिव हूं. इस इमारत की दूसरी मंजिल पर मेरा औफिस है. उसी मंजिल पर रौनी का भी औफिस है. वह एक साइकियाट्रिस्ट था. उस के पास ज्यादा लोग नहीं आते थे, पर जो आते, वे बड़े लोग होते थे. वह उन्हीं लोगों से इतनी रकम ऐंठ लेता था कि उसे पैसों की कोई तकलीफ नहीं होती थी, क्योंकि उन के सेशन काफी चलते थे.

रौनी अपने काम में परफेक्ट था, क्योंकि जो लोग उस के पास आते थे, वे कहीं और नहीं जाते थे. उस के पास समय की कमी नहीं होती थी, इसलिए दिन में 1-2 चक्कर वह मेरे औफिस के जरूर लगा लेता था. उस की बातें बड़ी दिलचस्प और असरदार होती थीं. उस के न आने पर मुझे उस की कमी महसूस होती थी. आज मैं थोड़ा मसरूफ था. मेरा दिमाग एक उलझन में फंसा था. उस समय मेरे सामने सब से बड़ा मसला गहनों की दुकानों में होने वाली डकैतियां थीं. मेरे एक ज्वैलर क्लाइंट ने अपनी दुकान पर होने वाली डकैती के बारे में पता लगाने का काम मुझे सौंप रखा था.

इसी बात को ले कर मैं ने सीनियर पुलिस इंसपेक्टर मेहता से बात की थी. उस ने आज ही मुझे थाने बुलाया था. रौनी ने मुझे सोच में डूबा देख कर कहा, ‘‘सच में मैं बहुत परेशान हूं. मेरी दोस्त लैला का कुछ पता नहीं चल रहा है, न कोई फोन, न कोई सूचना.’’

लैला काम क्या करती थी, यह मुझे पता नहीं था, लेकिन इतना जरूर पता था कि वह क्रिस्टल बौल में लोगों को उन का भविष्य बता कर बेवकूफ बनाया करती थी. वह बेहद खूबसूरत और हंसमुख लड़की थी. हां, उस की ड्रैसिंग कुछ अजीब होती थी. वह काला या सुरमई रंग का रेशमी लबादानुमा चोंगा पहनती थी. उस के बाल पौनीटेल में बंधे होते थे. हाथों में ढेर सी मोटीमोटी चांदी की चूडि़यां कानों में बड़ीबड़ी बालियां और हमेशा होंठों पर गहरी लिपस्टिक लगाए रहती थी.

मैं ने रौनी से कहा, ‘‘हो सकता है रौनी, वह किसी काम से कहीं बाहर चली गई हो और तुम्हें बता न पाई हो?’’

‘‘नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे बिना बताए वह कहीं नहीं जा सकती.’’

‘‘यह भी हो सकता है कि वह किसी क्लाइंट को प्रभावित करने के लिए कुछ खास कर रही हो और उसे फुरसत न मिल रही हो.’’

मैं ने यह बात इसलिए कही थी, क्योंकि मुझे पता चला था कि वह भविष्य बता कर अच्छेभले लोगों को उल्लू बना रही थी. मेरा तो यह भी सोचना था कि वह रौनी को भी उल्लू बना रही थी. प्यार वगैरह सब ढोंग था. रौनी का प्यार तो सच्चा था, पर मुझे लैला पर जरा भी भरोसा नहीं था.

लेकिन यह सब मैं रौनी से नहीं कह सकता था. मैं ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘तुम परेशान बिलकुल मत हो, निश्चित वह कहीं काम में फंसी है. जल्दी ही वह तुम्हें खबर देगी.’’

‘‘नहीं, मेरा दिल बेचैन है. परसों रात हम मिलने वाले थे. मैं उस के फ्लैट पर गया, लेकिन वह वहां नहीं मिली. कल और आज मैं ने कई बार उसे फोन किया, पर उस ने फोन नहीं उठाया. पता नहीं क्या बात है? तुम प्राइवेट जासूस हो, मेरी गुमशुदा महबूबा को ढूंढने का केस ले लो प्लीज.’’

‘‘क्या तुम ने लैला की गुमशुदगी थाने में दर्ज करा दी है?’’

‘‘नहीं, क्या मुझे उस की गुमशुदगी की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए?’’

‘‘अगर, सच में वह गायब है तो अवश्य दे देनी चाहिए.’’ मैं ने कहा.

दरअसल, मैं उस का केस लेना नहीं चाहता था, क्योंकि मेरा खयाल था कि लैला जानबूझ कर उस से मिलना नहीं चाह रही है. नहीं तो वह जरूर खबर करती. जाहिर है, ऐसी सूरत में मेरी भागदौड़ बेकार जाती. रौनी ने कहा, ‘‘यह मत समझना कि मैं मुफ्त में काम कराऊंगा. मैं तुम्हें इस की पूरी फीस दूंगा.’’

‘‘मेरा खयाल है कि हमें जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए. हो सकता है, जल्द ही वह तुम्हें सूचना दे.’’

मेरा इंसपेक्टर से मिलने का समय हो गया था, इसलिए मैं ने खड़े होते हुए कहा, ‘‘मुझे एक जरूरी काम से पुलिस स्टेशन जाना है. मैं वहां पता करूंगा कि उस के साथ कोई हादसा तो नहीं हो गया. इस बीच तुम उस के दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन कर के पता कर लो.’’

उस ने इत्मीनान की सांस ली. हकीकत में मैं इस मामले को ले कर जरा भी परेशान नहीं था. मैं पुलिस स्टेशन चला गया. इंसपेक्टर मेहता ने मुझे बैठा कर कहा, ‘‘मि. रुस्तम, मसला यह है कि गहनों की दुकानों में लगातार होने वाली चोरियों ने हमें परेशान कर रखा है. मेरा खयाल है, ये सारी वारदातें एक ही सिलसिले की कडि़यां हैं, पर ऐसा कोई सबूत नहीं मिल रहा है, जिस से तफतीश आगे बढ़ सके.’’

‘‘यह अंदाजा आप ने कैसे लगा लिया कि ये वारदातें एक ही सिलसिले की कडि़यां हैं? यह भी तो हो सकता है कि कोई एक ही आदमी हो, जो अलगअलग जगहों पर वारदात कर रहा हो?’’

‘‘ऐसा सोचने की वजह यह है कि एक तो ये सारी वारदातें दिन में हुई हैं, दूसरे लूटे गए गहने एकदम से गायब हो गए हैं. उन्हें कहीं बेचा भी नहीं गया. हम इस पर कड़ी नजर रखे हुए हैं. इस से यही लगता है कि यह किसी एक गिरोह का या एक आदमी का काम है.’’

इंसपेक्टर मेहता होशियार और तेजतर्रार पुलिस अफसर थे. वह जरा भी घमंडी और मगरूर नहीं थे. प्राइवेट जासूसों से भी अच्छे से मिलते थे, इसलिए मेरी उन से अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. आज हमारी मुलाकात का यही मकसद था कि वह इस उलझे हुए केस में मेरी सलाह और मदद चाहते थे. मैं ने पूछा, ‘‘मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं?’’

‘‘मैं ने कुछ लोगों को पकड़ रखा है. वे इन डकैतियों में शामिल हो सकते हैं, पर काफी कोशिश के बाद भी मैं उन से कुछ मालूम नहीं कर सका हूं. शायद आप उन से काम की कोई बात उगलवा सकें.

उन के औफिस से निकल कर मैं हवालात की ओर बढ़ा था कि बरामदे में पड़ी बैंच पर मुझे रौनी की महबूबा लैला बैठी दिखाई दी. 2-3 बार वह रौनी के साथ मेरे औफिस में आई थी, इसलिए मैं उसे पहचानता था. वह थोड़ी तिरछी बैठी थी, इसलिए शायद उस ने मुझे नहीं देखा. मैं ने मेहता से पूछा, ‘‘इस औरत को जानते हो?’’

‘‘नहीं, पहले कभी नहीं देखा.’’

पहले जिस आदमी को मेरे सामने लाया गया, उस का नाम नरेन था. वह ज्वैलरी की एक दुकान में काम करता था. उस दुकान में भी डकैती हो चुकी थी. उस ने वारदात के 2 दिन पहले वहां से नौकरी छोड़ दी थी. उस से पूछताछ करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस का डकैती से कोई संबंध नहीं है. दूसरा आदमी सीधासादा नौजवान बब्बन था, बातचीत से ही वह बेकसूर लग रहा था. तीसरा आदमी लंबे चेहरे वाला जिमी था. उस का कहना था कि इस शहर में आए उसे बस 2 हफ्ते ही हुए हैं. वह यहां अपनी बीमार मां को देखने आया था, जो एक नर्सिंगहोम में एडमिट थी. उस ने मेरी हर बात के जवाब ठीक दिए थे, इसलिए उस पर शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

फिर भी मैं ने नर्सिंगहोम में भरती उस की मां से मिलने का फैसला किया. लेकिन इस से कुछ खास फायदा नहीं हुआ. उस की मां काफी बूढ़ी थी. वह व्हीलचेयर पर बैठी थी, जिसे एक नर्स धकेल रही थी. मैं ने अपना परिचय दिया तो वह मुसकराने लगी. मैं ने कहा, ‘‘मिसेज जेसिका मैं यहां सिर्फ यह पता करने आया हूं कि यहां आप की ठीक से देखभाल हो रही है या नहीं?’’

वह सिर्फ मुसकराती रही.

मैं ने आगे पूछा, ‘‘आप के कितने बच्चे हैं, क्या आप को देखने आते हैं?’’

उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, मेरे 6 बच्चे हैं.’’

‘‘क्या आप उन के नाम बता सकती हैं.’’

‘‘जौर्ज, साबू, सरीन, रौकी, मेरिन और पवन.’’

‘‘क्या उन में किसी का नाम जिमी भी है?’’

‘‘हां है न, वह बहुत अच्छा लड़का है.’’

‘‘लेकिन अगर जिमी को मिला लेते हैं तो आप के 7 बच्चे हो जाते हैं.’’

‘‘तो फिर 7 ही होंगे.’’

‘‘अच्छा, एक बार उन के नाम फिर से बताइए.’’

‘‘जिमी, पवन, जौन, सुरेश, बाबू, रीता, मेरिन.’’

मैं समझ गया कि बुढि़या का दिमाग ठीक नहीं है. मैं ने नर्सिंगहोम के रिसेप्शन से पता किया तो बताया गया कि जिमी के हुलिए का एक आदमी अकसर उस से मिलने आता रहता था. यह भी पता चला कि बुढि़या से मिलने तमाम लोग आते रहते थे. वह किसी को बेटा कहती थी तो किसी को बेटी.

जवान पोतेपोतियां भी उस से मिलने आते थे. इन की सारी तादाद पता नहीं थी. मेरे खयाल में जेसिका इस मामले में खुशनसीब थी. इतने लोग उस से मिलने आते थे और उस का खयाल रखते थे. शायद बुढ़ापे की वजह से उस की याददाश्त ठीक नहीं थी. कई बार तो उसे मिलने आने वाले बेटेबेटी या पोते का नाम क्या है, यही नहीं याद होता था? सब का प्यार मिलने की वजह से हर वक्त उस के होंठों पर मुसकान खिली रहती थी.

मैं रौनी से बचता हुआ अपने औफिस पहुंच गया. अगर मैं उसे यह बता देता कि मैं ने लैला को थाने में बैठी देखा था तो वह मेरी जान खा लेता. सवाल करकर के परेशान कर देता, इसलिए मैं उस से नहीं मिला.

रात को मैं अपने अपार्टमैंट में सो रहा था कि फोन की घंटी बजी. आंख खुली तो देखा रात के 2 बज रहे थे. फोन उठाना मेरी मजबूरी थी. दूसरी तरफ से रौनी की परेशान आवाज सुनाई दी, ‘‘रुस्तम, पुलिस मेरे अपार्टमैंट की तलाशी ले रही है, तुम जल्दी से आ जाओ.’’

‘‘क्यों, पुलिस तुम्हारे अपार्टमेंट की तलाशी क्यों ले रही है?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘पता नहीं, ये लोग कुछ बता भी नहीं रहे हैं. दोस्त तुम फौरन आ जाओ. तुम पुलिस के साथ काम करते हो, मुमकिन है तुम इस मामले में मेरी कुछ मदद कर सको. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है?’’

यह बात मेरी भी समझ में नहीं आई थी. आखिर पुलिस रौनी के फ्लैट की तलाशी क्यों ले रही थी? मैं उसे अच्छी तरह से जानता था, वह एक शरीफ आदमी था.

उस की मदद करना जरूरी था, इसलिए मैं उसी वक्त घर से निकल पड़ा. 10 मिनट में मैं उस की बिल्डिंग में पहुंच गया. उस समय इंसपेक्टर मेहता फ्लैट से निकल रहा था. मुझे देख कर बोला, ‘‘हैलो रुस्तम, आखिरकार हम ने इसे पकड़ ही लिया?’’

‘‘क्या…?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, पूरा माल तो नहीं, फिर भी अलगअलग दुकानों से चोरी के कुछ गहने जरूर बरामद हुए हैं. समझ लो केस खुल गया. पुलिस स्टेशन आ जाओ, मैं तुम्हें सब विस्तार से बता दूंगा.’’

मैं कुछ कहना चाहता था, तभी एएसआई और सिपाही रौनी को हथकड़ी लगा कर मेरे सामने से गुजरे, उस ने नाइटसूट पर कोट पहन रखा था, पैरों में स्लीपर थे. मुझे देख कर वह दुखी हो कर बोला, ‘‘प्लीज, मेरी मदद करो, मैं बेकसूर हूं रुस्तम.’’

पुलिस वाले उसे ले कर चले गए. मैं ने इंसपेक्टर मेहता से कहा, ‘‘मुझे लगता है, आप ने गलत आदमी को पकड़ लिया है?’’

‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो? इस के फ्लैट से चोरी का कुछ माल बरामद हुआ है.’’

‘‘एक बात मेरी समझ में यह नहीं आ रही है कि तुम्हें  इस पर क्यों शक हुआ?’’

‘‘रौनी के घर में जो औरत साफसफाई का काम करती है, उस ने अखबारों में गहनों की दुकानों में होने वाली डकैतियों के बारे में पढ़ा था. आज शाम को थाने आ कर उसी ने बताया कि उस ने रौनी के घर में कई जगहों पर गहनों के डिब्बे छिपे हुए देखे हैं, जिन में गहने रखे हैं.’’

मैं ने मेहता से कहा कि रौनी इस तरह का आदमी नहीं है. वह शरीफ और कानून पसंद आदमी है. इंसपेक्टर मेहता भी मुझ से सहमत थे, पर गहने उस के घर से बरामद हुए थे. हो सकता था, इस में उस का हाथ न हो. मैं ने कहा, ‘‘मुझे लगता है, उसे किसी ने फंसाने की कोशिश की है?’’

‘‘पर वह कौन हो सकता है? उस ने ऐसा क्यों किया?’’

उसी समय मेरी जेहन में लैला का खयाल आया. उसे मैं ने थाने के बरामदे में बैठी देखा था. मैं ने यह बात मेहता से पूछी तो उस ने कहा, ‘‘हां, सुबह जब तुम ने उस के बारे में पूछा था तो मैं ने पता किया कि वह थाने क्यों आई थी? उस ने बताया कि वह जिमी का इंतजार कर रही थी. मेरा खयाल है कि वह जिमी की गर्लफ्रैंड है, क्योंकि जब जिमी पहुंचा था तो उन दोनों में बातचीत भी हुई थी. झगड़े जैसी आवाजें भी आई थीं. बाद में वह उसी के साथ चली गई थी.’’

‘‘मुझे यकीन था कि वह रौनी और इस केस के बीच की कड़ी थी. हमें सख्त पूछताछ करनी होगी.’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं अपने आदमियों को लैला और जिमी की तलाश में भेजता हूं.’’ मेहता ने कहा.

रौनी को पुलिस से रिहा करा कर मैं घर आ गया. मैं ने मेहता से वादा किया था कि किसी भी वक्त रौनी को हाजिर करने की जिम्मेदारी मेरी है. उस ने भी कहा था कि लैला के मिलते ही वह मुझे सूचना देगा.

दूसरे दिन रौनी जब मेरे औफिस आया तो उस की हालत काफी खराब थी. उस के बाल बिखरे हुए थे, चेहरा  उजड़ा हुआ था. वह दुखी हो कर बोला, ‘‘यह कितनी खराब बात थी कि पुलिस वाले मुझे मुजरिमों की तरह हथकड़ी लगा कर ले गए.’’

‘‘रौनी, तुम्हारे घर से चोरी के गहने बरामद हुए थे. उन्हें यह तो करना ही था. शुक्र करो कि तुम्हें रिहाई मिल गई, सवाल यह है कि तुम्हारे घर चोरी के गहने आए कैसे?’’

‘‘मुझे इस बारे में कुछ खबर नहीं है. तुम्हें तो पता है कि मैं ज्यादातर घर से बाहर रहता हूं. मुझे खुद हैरानी हो रही है कि मेरे घर किस ने और क्यों वे गहने रखे?’’

‘‘लैला के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है, क्या यह मुमकिन है?’’

उस ने मेरी बात काट कर कहा, ‘‘नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकती. उस के पास चोरी के गहने कहां से आएंगे? तुम उस पर क्यों शक कर रहे हो?’’

‘‘क्या तुम उस के अतीत के बारे में जानते हो? उस की हर गतिविधि की जानकारी तुम्हें रहती है?’’

‘‘क्यों, उस की ऐक्टीविटीज जानना जरूरी है?’’

‘‘तभी तो कोई बात तुम दावे से कह सकते हो. किसी इंसान के बारे में कुछ कहने के लिए उस का अतीत, वर्तमान और बैकग्राउंड जानना जरूरी है और उसे गहनों का शौक भी बहुत है.’’

‘‘मैं उस के बारे में बस इतना जानता हूं कि उस की बूढ़ी मां यहां के एक नर्सिंगहोम में भरती है.’’

‘‘एक मिनट, उस की मां का नाम क्या है? और वह किस नर्सिंगहोम में भरती है?’’

उस ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘न तो मुझे उस की मां का नाम पता है, न नर्सिंगहोम का.’’

‘‘क्या  उस के बहुत सारे भाईबहन हैं?’’

‘‘भाईबहन का उस ने जिक्र ही नहीं किया मुझ से.’’

मेरे दिमाग में अजीब सी हलचल मची हुई थी, जिस ने मुझे बेचैन कर रखा था.

दोपहर को एक संदिग्ध आदमी से पूछताछ चल रही थी. मुझे देखते ही मेहता ने कहा, ‘‘पिछली रात तुम्हारे दोस्त के फ्लैट से जो गहने हमें मिले थे, उन्हें 2-3 दुकानदारों ने पहचान लिया है. उन्हीं की दुकान के थे. बस इस के आगे तफतीश नहीं बढ़ रही है.’’

‘‘लैला का क्या हुआ? उस से कोई काम की बात पता चली?’’

‘‘नहीं, हम उसे अभी तक तलाश नहीं सके.’’

‘‘तुम ने कहा था कि कल उस ने जिमी से बात की थी और उसी के साथ गई थी तो जिमी को पकड़ कर उस से लैला के बारे में क्यों नहीं पूछते?’’

‘‘मेरे दिमाग में यह बात आई तो थी, लेकिन जिमी भी लापता है.’’ मेहता ने कहा.

मैं ने उसे जिमी की मां से मुलाकात के बारे में बता कर कहा कि रौनी बता रहा था कि लैला की मां भी किसी नर्सिंगहोम में भरती है. तभी फोन बज उठा. उस के चेहरे पर चिंता उभर आई. कुछ अच्छी खबर नहीं थी. बताया गया कि लैला की लाश एक कूड़ेदान में पड़ी मिली है, उसे पिछली रात ही मारा गया है. मैं एक ठंडी सांस भर कर रह गया. यकीनन लैला की मौत रौनी के लिए एक बड़ा सदमा थी. उस ने आगे कहा, ‘‘उस की मां का नाम जेसिका है. वह यहां एक नर्सिंगहोम में भरती है, मेरा खयाल है हमें उस से मिलना चाहिए. शायद उस से कुछ काम की बातें पता चल सकें. उसे उस की बेटी की मौत की इत्तला भी देनी है.’’

जेसिका से काम की कोई बात पता चल सकेगी, मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी. हो सकता है बेटी की मौत की खबर सुन कर वह कुछ कहे या नौर्मल हो जाए. जब हम नर्सिंगहोम पहुंचे, जेसिका के कमरे में ताला लगा था. हम ने नर्स से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘वह यहीं कहीं घूम रही होगी. थोड़ी देर पहले अपनी व्हीलचेयर पर यहीं बरामदे में घूम रही थी.’’

पर हमें जेसिका कहीं नहीं मिली. हम ने उन से डुप्लीकेट चाबी ले कर कमरा खोला तो कमरे की सारी चीजें बिखरी पड़ी थीं, मेज की दराजें खुली थीं, सामान बाहर पड़ा था. 2 दिन पहले उस ने जो गाउन पहन रखा था, वह भी फर्श पर पड़ा था. बिस्तर भी अस्तव्यस्त था. हम सब हैरान थे, क्योंकि वह तो डिसएबल थी. वह ऐसा कर नहीं सकती थी. किसी की मदद के बगैर उसे कुछ करना मुमकिन नहीं था. अचानक मेरे दिमाग में एक बात कौंधी, मैं तेज कदमों से नर्सिंगहोम के सामने की तरफ बढ़ा. सीढि़यों के करीब पहुंच कर मैं ने खिड़की से बाहर झांका. उस समय हम दूसरी मंजिल पर थे.

नीचे इमारत के सामने मुझे जेसिका दिखाई दे गई. वह जल्दीजल्दी 2 सूटकेस एक टैक्सी के पिछले दरवाजे से ठूंसने की कोशिश कर रही थी. जल्दी से वह टैक्सी की पिछली सीट पर बैठ गई. इस बीच मेहता और नर्स भी मेरे करीब आ गए थे. उन दोनों ने भी जेसिका को देख लिया था.

मेहता ने पूछा, ‘‘क्या यही जेसिका है?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां, यही जेसिका है.’’

नर्स दांत भींचते हुए गुस्से में बोली, ‘‘मैं इस कमबख्त को मजबूर समझ कर 2 महीने से इस की व्हीलचेयर धकेल रही थी. यह तो मुझ से भी तेज चल सकती है.’’

मेहता ने मोबाइल निकाल कर टैक्सी के औफिस फोन कर के पूछा कि जो टैक्सी इरोज नर्सिंगहोम से सवारी उठा रही है, वह कहां के लिए बुक की गई है?

पता चला कि वह टैक्सी एयरपोर्ट जाने के लिए बुक की गई थी. उन्होंने उसी समय थाने फोन कर के ड्यूटी औफिसर से कहा कि इस नंबर की टैक्सी का तुरंत पीछा किया जाए, साथ ही बारीकी से मिसेज जेसिका का हुलिया बता कर कहा गया कि जैसे ही यह औरत टैक्सी से उतरे, उस की निगरानी की जाए.’’

इस में कोई शक नहीं कि मेहता एक जहीन अफसर थे. उन्होंने बड़ी होशियारी से पूरी सिचुएशन को हैंडल किया और उन्होंने तुरंत एयरपोर्ट फोन कर के वहां के सिक्यूरिटी अफसर से बात की. उन्होंने जेसिका का हुलिया बता कर कहा कि इसे या इस के किसी साथी को प्लेन में सवार न होने दिया जाए. मेहता की ज्यादा दिलचस्पी उन दोनों सूटकेसों में थी, जो जेसिका ने कार में ठूंसे थे. नर्सिंगहोम से निकल कर मेहता की गाड़ी एयरपोर्ट के लिए चल पड़ी थी. मुझे उम्मीद थी कि हम टाइम पर एयरपोर्ट पहुंच जाएंगे और हमेशा मुसकराने वाली बुढि़या का ड्रौपसीन देख लेंगे, जिस की बेजान टांगे एकदम ठीक हो गई थीं.

मेहता ने वायरलैस स्विच औन कर लिया था और अपने आदमियों से मिलने वाली खबरें एयरपोर्ट के सिक्यूरिटी अफसर को देने लगा कि जेसिका की टैक्सी एयरपोर्ट पार्किंग में दाखिल हो रही है. उस का स्वागत करने को तैयार रहें. हम खुशनसीब निकले कि जब हम लोग एयरपोर्ट पहुंचे, मिसेज जेसिका टैक्सी से उतर रही थीं, साथ ही मेहता के बंदे भी पहुंच चुके थे. जेसिका दोनों हाथों से सूटकेस संभाले टिकट काउंटर की ओर बढ़ी. उस के बाद वह वेटिंग लाउंज की ओर बढ़ी. वहां भीड़ में मिसेज जेसिका की उस के बच्चों से मुलाकात हो गई. वे सब के सब जवान और अधेड़ उम्र के थे.

जैसे ही स्पीकर पर कहा गया कि मुसाफिर जहाज पर पहुंच जाएं, वे सब लाउंज के दरवाजे की तरफ बढ़े. उसी समय मेहता के सहयोगियों और एयरपोर्ट के सिक्यूरिटी अफसर ने आगे बढ़ कर उस हंसतीमुसकराती फैमिली को अपने घेरे में ले लिया. उन में से 1-2 ने भागने की कोशिश की, लेकिन वे पकड़ लिए गए. उसी समय हम सब भी वहां पहुंच गए. मैं ने उन में से कुछ को पहचान लिया. जिमी और नरेन, उस में वह आदमी भी था, जिस ने चोरी से पहले नौकरी छोड़ दी थी और बब्बन भी था. बाकी लोगों को मेहता ने पहचान लिया. ज्वैलरी डकैती के केस में वह उन से पूछताछ कर चुका था और उन्हें बेगुनाह समझ कर छोड़ दिया था.

बूढ़ी जेसिका के होंठों की मुसकराहट गायब हो चुकी थी. वह गालियां बकते हुए अपनी औलादों को डांट रही थी कि उन लोगों की लापरवाही की वजह से पुलिस उन के पीछे लग गई, यह उन की भूल थी. मेहता के सिपाहियों ने सूटकेस अपने कब्जे में ले लिए. सूटकेस जाते देख कर जेसिका गुस्से से पागल हो उठी. वह पुलिस वालों के विरोध में बोल रही थी. उन के खिलाफ कानूनी काररवाई की धमकी दे रही थी. हमें यकीन था कि शहर की दुकानों से लूटे गए गहने उन्हीं दोनों सूटकेसों में हैं. इसलिए इन सब को गिरफ्तार करने के लिए कहा गया. अंदाजा था, लैला का मर्डर भी उन्हीं लोगों ने किया था.

जब उन सब को हथकडि़यां पहनाई जाने लगीं तो वे सब खुद को बेगुनाह साबित करते हुए बुरी तरह चीखनेचिल्लाने लगे. उन की मां बचीखुची गालियां दे कर उन्हें चुप कराने लगी. पुलिस स्टेशन पहुंच कर बारीबारी से सब से अलगअलग पूछताछ की गई. पता चला कि लैला के कत्ल के बाद जिमी ने ही जेसिका और अन्य लोगों को वहां से भाग चलने के लिए मजबूर किया था. जब जेसिका सारे गहने समेट कर भाग रही थी, तभी हमारी नजर उस पर पड़ गई थी, सारे साथी एयरपोर्ट पर मिल कर फरार होने वाले थे.

अब मेरी सब से बड़ी मुश्किल यह थी कि पेपर में खबर छपने से पहले ये सारी बातें रौनी को कैसे बताऊं? यह सब जान कर उसे कितना दुख होगा और लैला की मौत की खबर तो उसे पागल कर देगी. मैं ने अपने औफिस में उसे बुला कर अच्छे तरीके से सारी बातें बताईं. यह सब सुन कर वह एकदम से शौक्ड रह गया था. उस ने अपने आप पर कंट्रोल किया, दुखी हो कर बोला, ‘‘रुस्तम, मैं ने जिंदगी में पहली बार किसी से मोहब्बत की थी, वह भी बहुत ज्यादा. उस का अंजाम कितना दुखद हुआ. मुझे पता नहीं था कि वह ऐसी होगी और इस तरह मारी जाएगी.’’

मैं जानता था कि उसे बड़ा गहरा सदमा लगेगा. इस क्राइसिस से निकलने में उसे वक्त लगेगा. फिर भी मैं ने उस का दुख कम करने के लिए कहा, ‘‘हो सकता है, उस का बचपन गरीबी में गुजरा हो, हालात से तंग आ कर उस ने चोरी के रास्ते पर कदम बढ़ाए हो, हम कह नहीं सकते. वह किन हालात में चोर बनी, अब उसे भूलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.’’

रौनी ने एक ठंडी सांस भर कहा, ‘‘हां, शायद तुम ठीक कह रहे हो. वह दिल की बहुत अच्छी थी, बहुत चाहने वाली. पता नहीं किस मजबूरी ने उसे गलत राह पर डाल दिया था.’’

पर यह हकीकत अपनी जगह थी कि वह एक मुजरिम थी. मजे की बात यह थी कि उन सारे लोगों में किसी का किसी से कोई आपसी रिश्ता नहीं था. ये सभी गहनों की दुकानों को लूटने के लिए आपस में मिल बैठे थे. वे अन्य शहरों में भी इसी किस्म की वारदात कर चुके थे. उन सभी को एक गिरोह में समेटने वाली जेसिका थी. वह इस गिरोह की सरगना थी. उस की प्लानिंग और हिदायत पर ही वे वारदात करते थे. गिरोह में कुल 10 लोग थे. लैला भी इस गिरोह में शामिल थी. लेकिन यहां आने के बाद उस की नीयत बदल गई. वह अपने हिस्से के गहने नर्सिंगहोम में भरती जेसिका के पास जमा कराने के बजाय गायब करने लगी. गहने जमा करने के लिए उन्होंने कितनी सेफ जगह ढूंढी थी-नर्सिंगहोम.

लैला की इस हरकत की वजह शायद रौनी था, वह उस से सचमुच मोहब्बत करने लगी थी. वह कुछ माल जमा कर के रौनी को अपनी मोहब्बत से मजबूर कर के किसी अंजान शहर भाग जाना चाहती थी, जहां वह चैन की जिंदगी गुजार सके. चोरी के गहने बेच कर उसे अच्छीखासी रकम मिल सकती थी. लेकिन उस ने अभी तक रौनी को अपने मंसूबे से आगाह नहीं किया था. उसे यह भी नहीं बताया था कि वह चोरी किए गए गहने उस के फ्लैट में छिपा रही है. जेसिका को शक हो गया था कि लैला चोरी किए गए पूरे गहने उस के पास जमा नहीं कर रही है.

उस ने गैंग के दूसरे आदमियों को उस की निगरानी पर लगा दिया था. जिमी ने गहनों के बारे में पता लगाने के लिए सख्ती की तो लैला अपनी जान से हाथ धो बैठी. जुर्म करने के लिए ये सभी एक रिश्ते में बंधे थे. उन की सरगना जेसिका उन की मां का रोल एक अपाहिज औरत के रूप में बहुत अच्छे से कर रही थी. पकड़े जाने पर सारे रिश्ते बिखर गए. Hindi stories

 

Crime Story: अपमान के बदले – ले ली भाई, भाभी और पत्नी की जान

Crime Story: रामप्रकाश को जब पता चला कि उस की पत्नी के बड़े भाई से संबंध हैं तो उसे पत्नी से ही नहीं, बड़े भाई से भी नफरत हो गई. लेकिन उस ने जो किया, क्या वैसा करना ठीक था. रामप्रकाश जैसे ही घर के पीछे की ओर गया, पीछे से रामपाल ने आ कर बड़े भाई को अकेले में पा कर लगभग फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘भइया, आज मैं आप से बड़े भइया राजकुमार के बारे में कुछ बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘अंबर (रामपाल को घर में सभी अंबर कहते थे) तुम्हारे और बड़े भइया के बीच हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है, अब क्या हो गया?’’ रामप्रकाश ने पलट कर जवाब में कहा.

‘‘पहले तो वह कह रहे थे कि मेरी शादी में सारा खर्च वह करेंगे. लेकिन गहने बनवाने लगे तो 40 हजार रुपए मुझ से ले लिए. उस समय मैं ने पिंटू से 70 हजार रुपए ले कर उस में से 40 हजार रुपए उन्हें दिए थे. अब वह अपने पैसे मांग रहा है. मैं ने भइया से कुछ रुपए देने को कहा तो उन्होंने मुझे गाली दे कर भगा दिया.’’

‘‘अंबर, तुम भइया का स्वभाव अच्छी तरह जानते हो. उन की आदत ही ऐसी है. इस में नाराज होने की कोई बात नहीं है.’’ रामप्रकाश ने छोटे भाई रामपाल को समझाने के उद्देश्य से कह.

लेकिन रामपाल समझने के बजाय रामप्रकाश को भी बड़े भाई राजकुमार के खिलाफ भड़काते हुए बोला, ‘‘तुम भइया को जितना सीधा समझते हो, वह उतने सीधे हैं नहीं. तुम तो उन की ओर से आंखें मूंदे हुए हो, इसलिए उन की बुराई तुम्हें दिखाई नहीं देती. गांव वाले क्या कहते हैं, तुम्हें पता है? पूरे गांव में चर्चा है कि रंजना भाभी और बड़े भइया के बीच गलत संबंध है.’’

रामपाल का इतना कहना था कि रामप्रकाश को गुस्सा आ गया. वह थोड़ी ऊंची आवाज में बोला, ‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है अंबर, तुम झूठ कह रहे हो. भइया ऐसा काम नहीं कर सकते. उन पर इस तरह का घिनौना आरोप लगा कर तुम मेरी नजरों में गिर गए.’’

‘‘अगर तुम सच देखना चाहते हो तो जब बड़े भइया तुम्हें और आशा भाभी को किसी रिश्तेदार के यहां भेजें तो रात में अचानक आ कर तुम देख लेना, बड़े भइया और भाभी रंजना एक साथ मिलेंगी.’’ रामपाल ने ने भी थोड़ी ऊंची आवाज में कहा.

छोटे भाई उस की इस बात से नाराज हो कर पैर पटकता हुआ रामप्रकाश चला गया. उस के पीछेपीछे रामपाल भी चला गया. रामपाल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना माल के गांव थावर में अपने बड़े भाइयों राजकुमार और रामप्रकाश के साथ रहता था. राजकुमार मूलरूप से लखनऊ के ही थाना मलिहाबाद के गांव चौसझा का रहने वाला था. 20 साल पहले वह अपना गांव छोड़ कर थावर आ गया था और यहीं रहने लगा था. यहां वह अपनी क्लिनिक चलाता था. उस ने बीयूएमएस की डिग्री ले रखी थी.

उस की क्लिनिक ठीकठाक चलने लगी थी तो उस ने अपने दोनों भाइयों रामप्रकाश और रामपाल को भी यहीं बुला लिया था. इस तरह तीनों भाई एक साथ रहने लगे थे. राजकुमार ही पूरे परिवार की देखभाल करता था. उस के दोनों ही भाई उम्र में उस से काफी छोटे थे.

राजकुमार की शादी आशा के साथ हुई थी. शादी के कई सालों के बाद भी जब उसे खुद की कोई संतान नहीं हुई तो उस ने सन 2006 में अपनी साली रंजना की शादी अपने छोटे भाई रामप्रकाश से करा दी थी. शादी के बाद रंजना को 2 बेटे, 6 साल का तुषार, 3 साल का ईशान और 4 माह की एक बेटी अनिष्का थी. रंजना ब्यूटीपार्लर का कोर्स किए हुए थी, इसलिए राजकुमार ने उसे घर के ही एक कमरे में ब्यूटीपौर्लर खुलवा दिया था.

कुछ दिनों पहले राजकुमार ने अपने सब से छोटे भाई रामपाल की शादी कराई थी. उस की शादी में उन्होंने करीब एक लाख रुपए के गहने बनवाए थे. शादी के समय राजकुमार ने रामपाल से कहा था कि शादी के खर्च में वह भी कुछ मदद करे. तब राजपाल ने इधरउधर से पैसों का जुगाड़ कर के राजकुमार को दिए थे.

न जाने क्यों राजकुमार और उस की पत्नी आशा रामपाल को पसंद नहीं करते थे. रामपाल को इस बात का अहसास भी था. भाईभाभी के इस व्यवहार से उसे लगता था कि भइया मंझले भाई रामप्रकाश और उस की पत्नी रंजना को ही अपनी सारी जायदाद देंगे. रामपाल में कुछ बुरी आदतें थीं, जिस की वजह से उस ने कई लोगों से कर्ज ले रखा था. कर्ज चुकाने के लिए वह जब भी बड़े भाई राजकुमार से पैसे मांगता, वह उसे बेइज्जत कर के भगा देता था.

रामपाल ने मंझले भाई रामप्रकाश के मन में शंका का बीज डाल दिया था. एक दिन रामप्रकाश की रिश्तेदारी में शादी थी. राजकुमार ने अपनी पत्नी आशा से कहा कि वह रामप्रकाश और दोनों बेटों को ले कर शादी में चली जाए. आशा ने वैसा ही किया. रामप्रकाश ने अपनी पत्नी रंजना से भी शादी में चलने को कहा तो उस ने सुबह ब्यूटीपौर्लर खोलने का बहाना कर के शादी में जाने से मना कर दिया.

इस बात से रामप्रकाश की शंका यकीन में बदल गई. उसे रामपाल की बात सच लगी. वह भाभी आशा और दोनों बेटों को ले कर शादी में चला तो गया, लेकिन सभी को वहां छोड़ कर रात में चुपके से घर आ गया. घर पहुंच कर उस ने पत्नी रंजना और बड़े भाई राजकुमार को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. इस के बाद उसे पत्नी रंजना और बड़े भाई से नफरत हो गई.

इस के बाद वह बड़े भाई से बदला लेने के लिए छोटे भाई रामपाल से मिल गया. अपने अपमान का बदला लेने के लिए दोनों भाइयों ने बड़े भाई की हत्या की योजना बना डाली. 5 नवंबर की रात करीब ढाई बजे रामपाल मोटरसाइकिल से थावर पहुंचा. योजना के अनुसार, रामप्रकाश ने घर का दरवाजा पहले से ही खोल रखा था. रामपाल घर में घुसा और क्लीनिक में हंसिया और बांका ले कर छिप गया.

इस के बाद रामप्रकाश ने पीठ में दर्द होने की बात कह कर रंजना को इंजेक्शन लाने के लिए कहा. रंजना जैसे ही उठ कर क्लीनिक की ओर गई, वहां छिपे रामपाल ने उसे पकड़ लिया और ब्यूटीपौर्लर वाले कमरे में घसीट ले गया. उस के पीछेपीछे रामप्रकाश भी वहां पहुंच गया. इस के बाद दोनों ने उसे खत्म कर दिया. इस के बाद दोनों पहली मंजिल पर गए, जहां राजकुमार पत्नी आशा के साथ सो रहा था.

दोनों ने पहले आशा पर वार किया. आशा की चीख से राजकुमार जाग गया तो दोनों उस पर टूट पड़े. जब रामपाल और रामप्रकाश को लगा कि दोनों मर गए हैं तो रामप्रकाश ने बांका और हंसिया घर के बाहर फेंक दिया और रामपाल को भाग जाने के लिए कहा. जब रामपाल भाग गया तो वह दरवाजा खोल कर चिल्लाने लगा कि घर में बदमाश घुस आए हैं. शोर सुन कर गांव वाले इकट्ठा हो गए. उस समय राजकुमार कराह रहा था, लेकिन अस्पताल ले जाते समय उस की मौत हो गई. रामप्रकाश ने गांव के ही 2 लोगों, राजाराम और प्रेमरैदास के खिलाफ हत्या का शक जताते हुए मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने जांच की तो नामजद लोगों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला.

मोहनलालगंज के सांसद कौशल किशोर ने तो इस हत्याकांड का परदाफाश करने के लिए पुलिस पर दबाव डाला तो गांव वालों ने भी सड़क जाम कर के पुलिस के खिलाफ नारेबाजी की. तब लखनऊ के एसएसपी राजेश कुमार पांडेय ने थाना माल के थानाप्रभारी विनय तिवारी, एसएसआई गणेश तिवारी, क्राइम ब्रांच के भगवान सिंह, अनिल सिंह चंदेल और हमीदउल्ला की एक टीम बनाई, जिस का नेतृत्व मलिहाबाद के सीओ जावेद खान को सौंपा.

आखिर 4 दिनों के बाद 9 नवंबर को इस टीम ने राजकुमार, आशा और रंजना की हत्या के आरोप में राजकुमार के दोनों सगे भाई रामप्रकाश और रामपाल को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में रामपाल और रामप्रकाश ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दरअसल, जब पुलिस घटनास्थल पर पहुंची थी तो वहां लूट का कोई सबूत नहीं मिला था. आसपड़ोस वालों ने बदमाशों के आनेजाने की भी आवाज नहीं सुनी थी. रामपाल जब वहां पहुंचा था तो उसे देख कर ही लग रहा था कि वह अभीअभी नहा कर आया है. उस के बाल भी गीले थे. नहाने वाली जगह पर भीगा तौलिया मौजूद था. उस पर खून के कुछ दाग भी लगे थे.

रामप्रकाश ने बताया था कि बदमाशों ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया था, लेकिन जब पुलिस ने गांव वालों से पूछा कि घर का दरवाजा किस ने खोला था तो कोई सामने नहीं आया. इस से पुलिस को लगा कि हत्या में घर वालों का ही हाथ है. बाद में पूछताछ में ये बातें सामने आ गईं.

पूछताछ में रामप्रकाश ने कहा, ‘‘मैं भाभी आशा को बहुत मानता था. वह हमें भी बेटे की तरह मानती थीं. रंजना उन की सगी छोटी बहन थी. उन्हें रंजना की हत्या में मेरे शामिल होने का पता चलता तो वह हमारे खिलाफ हो जातीं. रंजना ने जो किया था, मुझे उस बात से उस से चिढ़ हो गई थी. इस हालत में न चाहते हुए भी मुझे भाभी की हत्या करनी पड़ी.’’

पूछताछ के बाद पुलिस ने रामपाल और रामप्रकाश को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था, कथा लिखे जाने तक दोनों भाई जेल में थे. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Terrorism News: शूट आउट लश्करेतैयबा

Terrorism News: लश्करेतैयबा का आतंकी अबु कासिम धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को तो भटकाता ही था, खुद भी आतंकी वारदातों को अंजाम देता था. अपने आतंकी कारनामों की ही वजह से वह लश्करेतैयबा के चीफ हाफिज सईद का खास बन गया था. आखिर भारतीय सुरक्षा बलों ने उसे मार गिराया

जम्मूकश्मीर में पाकिस्तान की ओर से नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे गांवों की ओर की जाने वाली फायरिंग से भारतपाक सीमा पर हलचल बढ़ी हुई थी. पाकिस्तान कभी गोलियां दाग रहा था तो कभी मोर्टार. इस तरह पाकिस्तान द्वारा इस साल अब तक करीब 300 बार सीज फायर का उल्लंघन किया जा चुका था. इस तरह की फायरिंग के पीछे 2 प्रमुख वजहें होती हैं. एक बौखलाहट और दूसरी भारतीय सेना का ध्यान बंटा कर दुर्गम पहाड़ी इलाकों से हथियारों के जखीरे से लैश प्रशिक्षित आतंकवादियों को सीमा पार कराना.

भारतीय सुरक्षा बलों के लिए कुख्यात व प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्करेतैयबा के आतंकी एक बड़ी चुनौती बने हुए थे. जम्मूकश्मीर पुलिस व सेना के जवान उन का मुकाबला कर रहे थे. इस के चलते जंगलों में चलाए गए औपरेशन के तहत सुरक्षा बलों ने लश्कर के कई आतंकियों को मार गिराया था और 2 को जिंदा पकड़ने में सफलता हासिल की थी.

जम्मूकश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों की कमान लश्कर के टौप कमांडर अबु कासिम उर्फ अब्दुल रहमान के हाथों में थी. अबु शातिर और बेहद खूंखार किस्म का था. उस के दिलोदिमाग में हिंदुस्तान के प्रति नफरत का जहर भरा था. सुरक्षाबलों को चकमा देने में माहिर अबु खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों का दुश्मन नंबर वन था. वह आतंकी हमलों का न सिर्फ प्लानर था, बल्कि खुद भी हमले करने से नहीं चूकता था. पाकिस्तान की पनाह में बैठे एक करोड़ डौलर के इनामी रहे लश्कर के चीफ मोस्ट वांटेड आतंकवादी हाफिज सईद व हिज्बुल मुजाहिदीन के सुप्रीमो सैयद सलाहुद्दीन से उस का सीधा संपर्क था.

अबु कासिम धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को भड़का कर न सिर्फ ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भेजता था, बल्कि हिज्बुल मुजाहिदीन व अन्य आतंकी संगठनों के बीच तालमेल की भूमिका भी निभाता था. प्रशिक्षित आतंकियों को भारत की सीमा में घुसपैठ कराने में उस की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी. अबु कासिम के कारनामों के चलते उस के सिर पर नेशनल इन्वैस्टीगेशन एजेंसी (आईएनए) व जम्मूकश्मीर पुलिस ने 10-10 लाख रुपए का इनाम घोषित किया हुआ था. 5 सालों से आतंक का पर्याय बने 20 लाख के इनामी कासिम को सुरक्षा बलों ने घेरने की कोशिशें तो कई बार कीं, लेकिन हर बार वह अत्याधुनिक हथियारों से बारूद उगलता चकमा दे कर फरार हो गया था.

एक बात और, खुद को महफूज रखने के लिए अबु कासिम अपने इर्दगिर्द चौबीसों घंटे हथियारबंद आतंकियों की एक टीम रखता था. 28 अक्तूबर, 2015 के आखिरी सप्ताह में भारतीय खुफिया एजेंसियों को जो पुख्ता इनपुट मिलने शुरू हुए थे, वे चौंकाने वाले थे. पता चला था कि लश्कर के जेहादी आतंकी अबु कासिम के इशारे पर किसी बड़े हमले की फिराक में हैं. सूचना के अनुसार अबु कासिम अपने 7-8 साथियों के साथ उत्तरी कश्मीर के बंडीपोरा जिले से करीब 5 किलोमीटर दूर बुटु के जंगलों में छिपा था. एजेंसियों के लिए यह चिंता की बात थी.

आईएनए चीफ शरद कुमार, सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह, बीएसएफ के डाइरेक्टर जनरल शरद कुमार पाठक व सीआरपीएफ के डीजी प्रकाश मिश्रा जम्मूकश्मीर के डीजीपी के. राजेंद्र कुमार व आईजी एस.जे.एम. गिलानी ने अपने अधीनस्थों के साथ एक मीटिंग की. इस के बाद शाम 5 बजे सेना की एक बटालियन, सीआरपीएफ की 18वीं बटालियन और जम्मूकश्मीर पुलिस ने संयुक्त रूप से फूलपू्रफ प्लानिंग के साथ विशेष सर्च औपरेशन शुरू कर दिया.

पहाड़ी इलाके में घेराबंदी करनी शुरू कर दी गई. लेकिन आतंकियों को शायद इस की भनक लग गई, इसलिए उन्होंने सुरक्षा बलों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं. जवानों ने भी इस का मुंहतोड़ जवाब देते हुए फायरिंग शुरू कर दी. फिजाओं में गोलियों की गूंज बहने लगी. सेना की 14 राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) बटालियन के जवान समोद चौधरी जांबाजी दिखा कर आतंकियों से नजदीक से लोहा ले रहे थे. भारतीय जवान का यह कदम आतंकियों पर भारी पड़ रहा था, लेकिन उसी दौरान आतंकियों की तरफ से आई कई गोलियां समोद के शरीर में समा गईं.

गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद समोद मुकाबला करते रहे. अंत में जब शरीर ने साथ नहीं दिया तो वह गिर पड़े. उन्हें तत्काल चिकित्सा के लिए ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन की सांसें थम गईं. आतंकियों की तरफ से कुछ देर के लिए गोलियों की तड़तड़ाहट बंद हो गई. सुरक्षा बल अबु कासिम की चकमा देने की फितरत से वाकिफ थे. लेकिन इस बार वह उस की चालाकियों को नाकाम कर देना चाहते थे. औपरेशन लंबा चल सकता था. धरपकड़ के लिए पैरा कमांडों, खोजी कुत्ते और हैलीकौप्टर भी लगा दिए गए थे. रात भर रहरह कर गोलियां चलती रहीं.

आतंकी गोलियां चलाते हुए आगे बढ़ रहे थे. इसी तरह वे समीपवर्ती कुलगाम के जंगलों तक पहुंच गए. वे पहाडि़यों व पेड़ों की आड़ से चकमा दे रहे थे. रुकरुक कर रातभर मुठभेड़ चलती रही. तड़के आतंकियों की तरफ से गोलियां चलनी बिल्कुल बंद हो गईं. इस के बावजूद कवरिंग फायर के बीच सुरक्षा बल आगे बढ़ते रहे. वहीं पर उन्हें एक आतंकी की लाश पड़ी मिली. उस पर नजर पड़ते ही टीम कैप्टन खुशी से चिल्ला पड़े, ‘‘वैलडन सर, औपरेशन सफल रहा.’’

उन की खुशी का मतलब था कि मारा गया आतंकवादी कोई और नहीं, अबु कासिम था. उस के साथी भाग निकले थे. कासिम लश्कर का बड़ा कमांडर था. लिहाजा उस की मौत बहुत बड़ी कामयाबी थी. इस सूचना का सुरक्षा बलों के हैडक्वार्टर तक फ्लैश कर दिया गया. कासिम की मौत लश्कर चीफ का दायां हाथ टूटने जैसी थी. उस के शव को कब्जे में ले लिया गया. सूचना मिलने पर राजधानी दिल्ली से खुफिया एजेंसियों की टीमें भी कश्मीर के लिए रवाना हो गईं. उस दिन कासिम के अन्य साथियों की तलाश में सर्चिंग औपरेशन चलाया गया, लेकिन वे हाथ नहीं आ सके.

मुठभेड़ में मारे गए अबु कासिम के गुनाहों की फेहरिश्त बहुत लंबी थी. वह दरजनों आतंकी वारदातों में शरीक होने के साथ उन का मास्टरमाइंड रहा था. पाकिस्तान के बहावलपुर का रहने वाला कासिम कई सालों पहले आतंकी संगठन लश्करेतैयबा में शामिल हुआ था और वहां से प्रशिक्षण हासिल कर के आतंक फैलाने के लिए भारत की सीमा में दाखिल हो गया था. कासिम तेजतर्रार व टीम पर नियंत्रण रखने वाला युवक था. अपनी इसी विशेषता से उस ने कश्मीर के कुछ युवकों को भी संगठन में शामिल कर लिया था. हाफिज सईद उस के कामों से खुश हो कर उस की तारीफें कर के उस के दिल में नफरत के शोले भड़काता रहता था.

अबु कासिम घुसपैठ कर के भारत आता और दोगुनी ताकत से अपने मिशन में जुट जाता. सुरक्षा बल उस के दुश्मन नंबर वन थे. वह उन पर गोलियां चलाने में जरा भी देर नहीं करता था. उस के आतंक का लंबाचौड़ा काला इतिहास है. सन 2012 में उस का नाम सुर्खियों में तब आया था, जब पंथा चौक बेमिना बाईपास पर उस ने अपने साथियों के साथ एक सैन्य काफिले पर हमला कर दिया था. इस के बाद वह ताबड़तोड़ हमले करने व कराने लगा. लश्कर चीफ हाफिज सईद यही चाहता था. उस के कारनामों से खुश हो कर सईद ने उसे कश्मीर का टौप कमांडर बना दिया था.

इस के अलावा अबु कासिम को हिज्बुल मुजाहिदीन व अन्य आतंकी संगठनों के आतंकियों के बीच तालमेल बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंप दी थी, जिसे वह बखूबी निभा रहा था. कासिम की ताकत बढ़ी तो उस ने वारदातें भी बढ़ा दीं. साथियों के पकड़े जाने पर भारतीय खुफिया एजेंसियों तक भी उस के कमांडर बनने की खबर पहुंच गई. 24 जून, 2013 को कासिम ने साथियों के साथ श्रीनगरबारामूला हाईवे पर फिर से सेना के काफिले पर हमला किया, जिस में 8 जवान शहीद और 11 जवान घायल हो गए. कासिम ही निर्देश पर पाकिस्तानी आतंकी अबु हमजा व अबु उस्मान ने कदलबल इलाके में 18 जुलाई, 2013 को शेरे कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान, सौरा के पूर्व निदेशक डा. जलालुद्दीन व उन के अंगरक्षक की हत्या कर दी.

13 अगस्त, 2013 को कासिम के डिप्टी कमांडर अबु दुजाना ने शौकत अहमद लोन के साथ मिल कर पांपोर के गालंदर इलाके में पुलिस दल पर गोलियां चलाईं, जिस में 2 पुलिसकर्मी शहीद हो गए. आतंकी उन की एक एके-47 राइफल भी ले गए. कासिम के इशारे पर ही बड़गाम में 2 दिसबर, 2013 को आतंकी लतीफ, रियाज व अबु उमर ने चाडूरा के तत्कालीन थानाप्रभारी को मौत के घाट उतार दिया था. उस का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा था. उसी के इशारे पर लश्कर आतंकी अबु हांजुला ने 4 मार्च, 2014 को पुलवामा अदालत परिसर में कई पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी.

इस के बाद अबु कासिम ने 11 अगस्त, 2014 को पांपोर के निकट बीएसएफ के काफिले पर हमला कर दिया था. इस हमले में एक डिप्टी कमांडेंट समेत 6 जवान घायल हुए थे. सन 2014 में ही उस ने कैसर मौला में एक सैनिक और एक पुलिसकर्मी की हत्या कर दी थी. कासिम के आतंकी मंसूबे बढ़ रहे थे. वह धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को भी बरगला कर आतंकवाद की टे्रनिंग के लिए लश्कर के शिविरों में भेज रहा था. उस की बढ़ती गतिविधियों के चलते एनआईए व कश्मीर पुलिस ने उसे जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 10 लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया था.

शातिर कासिम ने भी अपनी रणनीति में बदलाव कर दिया. अब वह हमलों की प्लानिंग तैयार करने लगा. प्लानिंग के तहत ही उस ने अपने साथी नावेद उस्मान उर्फ कासिम व मोमीन उर्फ मोहम्मद नौमान याकूब को सुरक्षा बल के किसी काफिले पर हमला करने के लिए तैयार किया. 5 अगस्त, 2015 को सुबह तकरीबन 7 बजे ऊधमपुर स्थित उत्तरी कमांड मुख्यालय से बीएसएफ की बस जम्मूश्रीनगर हाईवे पर जा रही थी. बस में कई जवान सवार थे. बस जैसे ही नरसू नाले के नजदीक पहुंची, सड़क किनारे घात लगाए बैठे नावेद व मोमीन अचानक सामने आ गए.

पहले उन्होंने बस के दाएं टायरा पर गोली मार कर पंक्चर किया, उस के बाद औटोमैटिक राइफल से बस पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी. पंक्चर हो जाने की वजह से बस रुक गई थी. उसी बीच उन्होंने हैंडग्रेनेड से बस पर हमला कर दिया. इस से बस के शीशे चूर हो कर हवा में बिखर गए. बस चालक घायल हो गया. इस अप्रत्याशित हमले ने सुरक्षा बलों को संभलने का मौका नहीं दिया. बस में सवार जवान रौकी के पास राइफल थी. हैंडग्रेनेड से उस के कई साथी जख्मी हो गए थे. आतंकियों के इरादे वह भांप चुका था. इसलिए तेजी से खड़े हो कर उस ने बस का दरवाजा बंद कर लिया और उस की आड़ में खिड़की से मोर्चा ले कर जवाबी फायरिंग शुरू कर दी, जिस में एक आतंकी मारा गया.

मरने वाला आतंकी मोहम्मद नौमान याकूब उर्फ मोमीन था. दूसरा आतंकी गोलियां बरसता रहा. उस की कई गोलियां रौकी के शरीर में भी धंस चुकी थीं. वह सुरक्षा बलों पर गोलियां चला जरूर रहा था, लेकिन साथी की मौत पर उस के मन में भी डर बैठ गया था, इसलिए वह गोलियां चलातेचलाते भाग गया. साहस का परिचय देते हुए रौकी ने अपने साथियों को बचा लिया था, लेकिन वह खुद और एक अन्य जवान शुभेंदु राय इस मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हो गए थे. आननफानन में हैडक्वार्टर व स्थानीय थाना चिनैनी को सूचना दी गई. घायल जवानों को अविलंब अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन दोनों की ही मौत हो गई.

सुरक्षा बलों ने फरार हुए आतंकी की तलाश शुरू कर दी. यह बड़ा हमला था. इस ने खुफिया एजेंसियों व सुरक्षा बलों को दहला कर रख दिया था. बीएसएफ के आईजी राकेश शर्मा, डीआईजी पुलिस सुरेंद्र गुप्ता, एसएसपी सुलेमान चौधरी समेत पुलिस प्रशासनिक व सैन्य अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए थे. विशेष कमांडो दस्ते को भी बुला लिया गया था, जो हेलीकौप्टर से फरार हुए आतंकी को खोजने लगे. आतंक नावेद गांव के रास्ते की तरफ भागा था. उस ने रास्ते में मिले 2 ग्रामीणों देशराज व रमेश को राइफल की नोक पर अपने बस में कर के कहा, ‘‘चुपचाप मुझे रास्ता दिखाओ, वरना यहीं मार डालूंगा.’’

उस की धमकी से दोनों ग्रामीण बुरी तरह डर गए थे. वे नावेद को पहाड़ी की तरफ ले जाने लगे. थोड़ा आगे पहुंच कर नावेद ने 2 और युवकों, राकेश शर्मा और विक्रमजीत शर्मा को अपने कब्जे में ले लिया. आगे चल कर एक और युवक नावेद के कब्जे में आ गया. यह नावेद की रणनीति का हिस्सा था. उस का सोचना था कि यदि उस की घेराबंदी होगी तो बंधक ग्रामीणों की आड़ उसे बचा लेगी.

तकरीबन 2 किलोमीटर चल कर नावेद अचानक रुक गया. आसमान में मंडराते हैलीकौप्टर की आवाज सुन कर उसे रुकना पड़ा. वह हैलीकौप्टर विशेष कमांडो दस्ते का था. इस बीच बंधक बने 3 लोग चकमा दे कर भाग निकले थे. इस बीच राकेश और विक्रमजीत समझ गए थे कि आतंकी के हाथ में हथियार जरूर है, लेकिन वह घबराया हुआ है. शरीर से भी वह ज्यादा ताकतवर नहीं दिखता था.

आंखों ही आंखों में दोनों ने इशारा किया और हिम्मत दिखा कर नावेद पर टूट पड़े. उस की रायफल छीन कर उन्होंने एक तरफ फेंक दी और शोर मचाना शुरू कर दिया. उन्होंने नावेद को पकड़ कर पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस के पहुंचने तक उन्होंने उसे पकड़े रखा. पुलिस ने नावेद को अपने कब्जे में ले लिया. नावेद ने ही पुलिस को बताया कि मारा गया आतंकी मोमीन पाकिस्तान के बहावलपुर निवासी मोहम्मद याकूब का बेटा था.

नावेद का जिंदा पकड़ा जाना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि थी. भारत में 26 नवंबर, 2008 को मुंबई हमलों के आतंकी अजमल आमिर कसाब के बाद जिंदा पकड़ा गया दूसरा आतंकी नावेद था. बाद में नावेद को जम्मू स्थित जौइंट इंट्रोगेशन सेंटर (जेआईसी) लाया गया, जहां उस से सुरक्षा एजेंसियों व पुलिस ने हर एंगल से संयुक्त पूछताछ की. एनआईए चीफ शरद कुमार ने भी कश्मीर पहुंच कर नावेद से पूछताछ की. इस पूछताछ में सामने आया कि आतंकी नावेद भी धर्म के नाम पर भटका हुआ युवक था.

20 वर्षीय नावेद पाकिस्तान के फैसलाबाद जिले का रहने वाला था. वह आवारा किस्म का युवक था. आवारगी के चलते वह कुछ युवकों के माध्यम से लश्कर में शामिल हो गया था. नावेद की उम्र कम थी. आतंकी संगठनों को जल्दी बहकावे मे आने वाले ऐसे युवकों की तलाश रहती है. नावेद को रुपएपैसे का लालच दे कर धर्म के नाम पर जुनूनी बना दिया गया. जब वह दिमागी तौर पर पूरी तरह संगठन का हिस्सा बन गया तो परिवार से नाता तोड़ कर आतंकी ट्रेनिंग कैंप में चला गया. मोमीन से उस की मुलाकात वहीं हुई. मोमीन हाफिज सईद का सुरक्षागार्ड रह चुका था. बाद में उसे युवकों को ट्रेनिंग देने का काम सौंपा गया था.

मोमीन और नावेद अन्य साथियों के साथ कश्मीर में पुंछ सेक्टर से दाखिल हुए थे और यहां आ कर कासिम के इशारे पर काम करने लगे थे. पुलिस ने नावेद से पूछताछ के बाद बुलेटपू्रफ वाहन से उसे विशेष अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस हमले का मास्टरमाइंड अबु कासिम था. वह सुरक्षा बलों के निशाने पर था. सरगरमी से उस की तलाश की जाने लगी. तमाम जांच एजेंसियां कासिम के पीछे लग गई थीं. सूचना मिल रही थी कि कुछ आतंकवादी कासिम के इशारे पर बड़ी वारदात को अंजाम देने के इरादे से सीमा में दाखिल हो चुके हैं. इस के मद्देनजर जंगलों में सघन सर्चिंग औपरेशन शुरू कर दिया गया.

इसी कड़ी में बारामूला जिले के रफियाबाद के हमाम मरकूट के जंगलों में एक बार फिर 26 अगस्त को कासिम से सुरक्षा बलों की मुठभेड़ हो गई. 20 घंटे तक चली इस भीषण मुठभेड़ में अगले दिन तक 3 आतंकवादियों को मार गिराया गया. एक आतंकवादी की गोलियां खत्म हो गईं. साथियों के शव देख कर वह घबरा गया और बचने के लिए जंगल में पहाड़ों के बीच बनी एक गुफा के अंदर छिप गया. सुरक्षा बलों के लिए अच्छी बात यह थी कि वह फिदायीन नहीं था, वरना खुद को भी गोली या बम से उड़ा सकता था. जिस गुफा में वह घुसा था, सुरक्षा बलों ने उस गुफा को घेर लिया. गुफा के दूसरी तरफ कोई रास्ता नहीं था. उसे बाहर निकालने के लिए गुफा के अंदर आंसू गैस का गोला व मिर्ची बम फेंके गए.

इन के धुंए से आंखों में तेज जलन के साथ आंसू निकलते हैं और सांस लेना मुश्किल हो जाता है. करीब 10 मिनट बाद अपने हाथ ऊपर किए सलवारकुरती पहने वह आतंकी बाहर निकल आया. उस की आंखों से आंसू निकल रहे थे. उसे हिरासत में ले लिया गया. मुठभेड़स्थल से 5 एके 47 राइफलें, 2 यूबीजीएल (ग्रेनेड लांचर), 2 जीपीएस, एक नक्शा और स्मार्टफोन सहित भारी मात्रा में गोलाबारूद बरामद हुआ.

लेकिन कासिम इस बार भी भाग निकला. चंद दिनों के अंदर एक और जिंदा आतंकवादी को पकड़ने की यह बड़ी कामयाबी थी. उच्च सैन्यधिकारी व उत्तरी कश्मीर के डीआईजी गरीबदास भी मौके पर पहुंचे. उस ने अपना नाम सज्जाद अहमद उर्फ अबु उबैदुल्ला उर्फ फहदुल्ला उर्फ अब्दुल्ला बताया. उस की उम्र 22 साल थी.  पूछताछ में इस आतंकी ने कई बड़े खुलासे किए. उस के अनुसार सैन्य शिविरों पर जो 3 आतंकवादी मारे गए थे, उन के नाम अबुतल्लाह, अबु कातल व अबु उस्मान थे. सज्जाद को कई दौर की पूछताछ के बाद अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. उस से भी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलीं.

अबु कासिम अभी भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए सब से बड़ा खतरा बना था. राज्य पुलिस के आतंकरोधी दस्ते के होनहार इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ डार कासिम के खिलाफ चल रहे मिशन के तहत उस के मूवमैंट को ट्रैक कर रहे थे. इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ डार आतंकियों से लोहा लेने के लिए चर्चित थे.

2 महीने बाद 7 अक्तूबर को उन्हें सूचना मिली कि कासिम बांदीपोरा के जंगलों में छिपा है. वह पुलिस दल के साथ वहां पहुंच गए. उसे घेरने व जिंदा पकड़ने का प्रयास किया गया. जबरदस्त मुठभेड़ हुई, लेकिन वह चकमा देने में कामयाब रहा. इस मुठभेड़ में इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ शहीद हो गए. अल्ताफ की शहादत के बाद उस के खिलाफ सघन अभियान जारी रहा. आखिर में वह मारा गया.

अब सुरक्षा बलों को उम्मीद है कि कासिम जैसे आतंकी के मारे जाने पर लश्कर गुट की कमर टूटेगी. आतंकियों के ऐसे अंजाम से युवा भी उस के बहकावे में आने से बचेंगे. जम्मू कश्मीर के डीजीपी के. राजेंद्र कुमार ने बताया कि कासिम का मारा जाना आतंकवाद पर काफी प्रभाव डालेगा. कथा लिखे जाने तक पुलिस पकड़े गए आतंकवादियों के खिलाफ चार्जशीट तैयार कर रही थी और संयुक्त औपरेशन के जरिए अन्य आतंकियों की खोजबीन में जुटी थी. Terrorism News

—कथा पुलिस व सैन्य सूत्रों पर आध

Crime Story: नकली नोटों को असली बनाने की शातिर चाल

Crime Story: कोलकाता में पिछले दिनों नकली नोटों का एक बड़ा और अनोखा मामला सामने आया. गिरफ्तार चंद्रशेखर जायसवाल पुराने और सड़ेगले असली नोटों के ‘सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड’ को निकाल कर उस से नकली नोट तैयार करता था. एक और बड़ी बात यह कि चंद्रशेखर न केवल नकली भारतीय करेंसी तैयार करता था, बल्कि डौलर, यूरो समेत कई अन्य देशों की भी नकली करेंसियां उस के यहां से बरामद हुई हैं. यह तो थी एक खबर.

आइए, अब देखते हैं नकली नोटों का कारोबारी चंद्रशेखर जायसवाल अपना यह कारोबार किस तरह चला रहा था. मध्य कोलकाता के बऊबाजार में 2 लाख रुपए के नकली नोटों के साथ चंद्रशेखर जायसवाल नामक एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई. इस के बाद कांकुड़गाछी स्थित उस के घर से 10 करोड़ रुपए के नकली नोट बरामद हुए. इस से पहले नकली नोटों के ऐसे कई मामले सामने आए हैं.

इन मामलों से पता चला है कि बरामद नकली नोट की छपाई पाकिस्तान व बंगलादेश में होती है और पाकिस्तान, बंगलादेश और नेपाल की सीमा से हमारे देश में ये नकली नोट पहुंचाए जाते हैं. लेकिन चंद्रशेखर जायसवाल का मामला कई माने में अनोखा साबित हो रहा है. चूंकि यह मामला नकली विदेशी करेंसी से भी जुड़ा है, इसीलिए जांच एजेंसी की नजर में यह मामला देश की आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है.

गिरफ्तार चंद्रशेखर जायसवाल ने कबूल किया कि सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड उसे रिजर्व बैंक की पटना शाखा के एक ठेकेदार की मारफत मिला करते थे. हावड़ा जिले के डोमजुड़ में चंद्रशेखर जायसवाल बाकायदा नकली नोटों का एक बड़ा कारखाना चलाता था. स्पैशल टास्क फोर्स ने इसी कारखाने के गोदाम में छापेमारी कर के नकली नोट बनाने के तमाम सामान बरामद किए हैं. 

टस्क फोर्स के अधिकारी अमित जावलगी के अनुसार, छापेमारी में सब से चौंकाने वाला जो सामान बरामद हुआ है वह पुराने खस्ताहाल, सड़ेगले असली पुराने नोटों की 20 बोरियां हैं. पूछताछ में चंद्रशेखर ने एजेंसी के अधिकारियों के सामने कबूल किया कि इस की आपूर्ति रिजर्व बैंक का एक ठेकेदार किया करता था. कारखाने से पुराने असली नोटों के अलावा नोट छापने वाले कागज, स्टैंप, स्याही के साथ 450 नकली नोटों की बोरियां भी बरामद हुई हैं. बरामद हुए नकली नोटों में केवल 500 और 1000 रुपए के नोट थे. 

आयरन स्क्रैप के कारोबारी चंद्रशेखर का यह कारखाना स्थानीय रूप से लोहे की कील बनाने वाले कारखाने के रूप में जाना जाता था. स्थानीय लोगों को कारखाने की चारदीवारी के उस पार लोहे के स्क्रैप का ढेर दिखता था. स्थानीय रूप से प्रचारित यही किया गया था कि कारखाने में स्क्रैप को गला कर विभिन्न साइज की कीलें तैयार की जाती हैं. लेकिन इस कारखाने में पिछले 2 साल से नकली नोट छापे जा रहे थे.

मामले की जांच कर रही स्पैशल टास्क फोर्स की जांच से खुलासा हुआ कि गिरफ्तार चंद्रशेखर के नकली नोटों का कारोबार खास कोलकाता और डोमजुड़ के बीच फलफूल रहा था. छापेमारी में इस कारखाने से न केवल नकली भारतीय नोट बरामद हुए, बल्कि डौलर और यूरो समेत टर्की, जिम्बाब्वे व अन्य कई देशों की करेंसियों के भी नकली नोट बरामद हुए. जाहिर है इस कारखाने से चंद्रशेखर विदेश में भी अपना कारोबार चला रहा था. इसीलिए इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दिया गया.

रिजर्व बैंक की सुरक्षा में सेंध

नकली नोट में सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल अपनेआप में एक अनोखा खुलासा था. चंद्रशेखर के कारखाने में तैयार नकली नोटों को ‘ग्रेड वन’ नकली नोट बताया गया. इस की वजह, नकली नोट में बाकायदा सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल है. नकली नोट की जांच का काम जितना आगे बढ़ता गया, जांच अधिकारी के आगे एक से बढ़ कर एक चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. अब तक नकली नोट तैयार करने का जितना भी खुलासा हुआ है उस में असली नोट जैसे कागज का इस्तेमाल करने, वाटर मार्क की नकल और उम्दा स्याही के इस्तेमाल की बातें सामने आई थीं.

सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल पहली बार हुआ है. इसीलिए यह रिजर्व बैंक की सुरक्षा में सेंध का मामला बन गया. टास्क फोर्स के अधिकारी बताते हैं कि नकली नोट छापने के लिए भी विशेष रूप से प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होती है. कारखाने में 20 कर्मचारी अत्याधुनिक मशीन पर नकली नोट छापते थे. चंद्रशेखर के पास ऐसे 3 प्रशिक्षित कर्मचारी थे, जिन्हें वह मुंबई से ले कर आया था.

चूंकि इस से पहले ऐसा कोई मामला टास्क फोर्स के सामने नहीं आया था इसीलिए टास्क फोर्स ने रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों से भी पत्र लिख कर जानना चाहा कि पुराने असली नोट के ‘सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड’ का इस्तेमाल नकली नोटों में कैसे किया जा सकता है? मजेदार बात यह कि रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों के लिए भी यह बड़ा चौंकाने वाला मामला था. रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों की राय में सिक्योरिटी थ्रेड को निकाल कर फिर से इस्तेमाल करना कोई नामुमकिन बात भी नहीं है.

दरअसल, यह सिक्योरिटी थ्रेड चांदी की पन्नी हुआ करती थी. नोट भले ही सड़ जाए, लेकिन चांदी की पन्नी को फिर भी निकाला जा सकता है. रिजर्व बैंक के अनुसार, पन्नी का फिर से इस्तेमाल पूरी तरह से भले ही नहीं किया जा सकता हो लेकिन आंशिक तौर पर किया ही जा सकता है. रिजर्व बैंक ने यह भी माना कि हर रोज कोलकाता के तमाम बैंकों से बड़े पैमाने पर नकली नोट पकड़े जा रहे हैं.

जांच में पता चला कि नकली नोट का कारोबार करने वालों में से अब तक किसी ने सिक्योरिटी थे्रड का इस्तेमाल नहीं किया है. नकली नोटों में असली सिक्योरिटी थे्रड का इस्तेमाल इतनी सफाई से किया गया था कि नकली नोटों की शिनाख्त लगभग नामुमकिन ही थी. 

कोलकाता पुलिस के इतिहास में नकली नोट का इतना बड़ा कारोबार इस से पहले कभी नहीं पकड़ा गया था. जब इस मामले का खुलासा हुआ तो सब से पहले मध्य कोलकाता के बड़ा बाजार में आतंक का माहौल देखा गया. रुपए का लेनदेन मुश्किल हो गया. गौरतलब है कि बड़ाबाजार के थोक कारोबार का एक बड़ा हिस्सा नकदी में चलता है. जांच कर रही टास्क फोर्स का कहना है कि बैंकों के जरिए नकली नोट कोे लंबे समय तक चलाते जाना इतना भी सहज नहीं है. नकली नोट का कारोबार थोक बाजार में अधिक होता है, क्योंकि थोक बाजार से ये नोट आसानी से बैंकों तक पहुंच जाते हैं.

पुराने नोट का निबटारा

रिजर्व बैंक के एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि पहले रिजर्व बैंक द्वारा पुराने, फटे, सड़ेगले नोटों को एक तय समय के बाद जला कर नष्ट कर दिया जाता था. इस के बाद कुछ वर्ष पहले पुराने नोटों को नीलाम करने का चलन शुरू हुआ. इस के लिए पहले पेपर कटर मशीन में डाल कर उस के टुकड़ेटुकड़े करना जरूरी है. इस के बाद ही इन्हें नीलाम किया जा सकता है.

नियमानुसार इन स्क्रैप नोटों को कटर मशीन में डाल कर इन में रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर समेत नोटों में वाटर मार्क और सिक्योरिटी थ्रेड वाले हिस्से कुछ इस तरह नष्ट करना जरूरी है, ताकि उन का फिर से इस्तेमाल न किया जा सके.

टास्क फोर्स अधिकारी अमित जावलगी ने बताया कि रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर, वाटर मार्क और सिक्योरिटी थ्रेड नष्ट करने के बाद ही सड़ेगले, पुराने नोटों की नीलामी होती है. नीलामी में रिजर्व बैंक में पंजीकृत कंपनी ही भाग ले सकती है. पंजीकृत कंपनी ही रिजर्व बैंक का ठेकेदार कहलाती है.

ठेकेदार कंपनी इन सड़ेगले नोटों का व्यवहार अपने तरीके से कर सकती है. पर पुराने नोट का ठेकेदार कंपनी कुछ भी करे, उस का पूरा दायित्व ठेकेदार कंपनी का होता है. लेकिन नियमानुसार रिजर्व बैंक से प्राप्त सड़ेगले नोट ठेकेदार कंपनी के मारफत किसी भी सूरत में बाहरी लोगों के हाथों तक पहुंचना गैरकानूनी है. 

रिजर्व बैंक के ऐसे ही एक ठेकेदार की मारफत चंद्रशेखर असली नोट का सिक्योरिटी थे्रड हासिल किया करता था. नीलामी से प्राप्त असली नोट से सिक्योरिटी थे्रड को निकाल कर उस का इस्तेमाल बड़ी सफाई से नकली नोटों में किया जाता था. यही कारण है कि कभीकभी असलीनकली नोट की परखने वाली मशीन भी गच्चा खा जाया करती है.

बहरहाल, ठेकेदार की शिनाख्त हो चुकी है और उस से पूछताछ में पता चला कि सिक्योरिटी थे्रड प्राप्त करने के लिए चंद्रशेखर पुराने नोट खरीदने में उस के मूल्य से दोगुना पैसा खर्च किया करता था. 50 हजार रुपए से भी कम कीमत के सड़ेगले खस्ताहाल नोटों को चंद्रशेखर 1 लाख रुपए में खरीद लेता था. कारखाने में नकली नोटों पर यह सिल्वर थ्रेड बिठा दिया जाता था. 

टास्क फोर्स के अधिकारी का कहना है कि इस से पहले पश्चिम बंगाल में जो भी नकली नोट बरामद हुए हैं, उन में से ज्यादातर पाकिस्तान व बंगलादेश में छपे थे. पाकिस्तान में छपे नोट असली नोट के काफी करीब हुआ करते हैं. डोमजुड़ से बरामद हुए नकली नोट असली भारतीय नोट के करीब तो नहीं, लेकिन पाकिस्तान में तैयार किए गए भारतीय नोट के ज्यादा करीब थे.

छोटे नोटों की किल्लत

जांच में जो तथ्य निकल कर सामने आया है वह यह कि छोटे नोटों की किल्लत के बीच नकली बड़े नोटों का बाजार चलता है. गौरतलब है कि कोई भी राज्य क्यों न हो, हर राज्य के बड़े शहरों से ले कर गांवदेहात और कसबे में 20 और 50 रुपए के नोटों की किल्लत आम है. वहीं, ज्यादातर एटीएम में 100, 500 और 1000 रुपए के ही नोट मिलते हैं. दरअसल, बड़े नोटों का छुट्टा 50-100 रुपए की खरीदारी में आसानी से हो जाता है. ये नोट दुकानदार की मारफत हाथोंहाथ हर जगह पहुंच जाते हैं.

जहां तक छोटे नोटों की किल्लत का सवाल है, राष्ट्रीयकृत बैंक सारा दोष यह कह कर रिजर्व बैंक के मत्थे मढ़ देते हैं कि वहां से पर्याप्त मात्रा में छोटे नोट नहीं आते. एक अधिकारी का कहना है कि शालबनी, देवास और नासिक से नोट रिजर्व बैंक की विभिन्न शाखाओं में पहुंचते हैं. नोट का शालबनी कारखाना रिजर्व बैंक के अधीन है, लेकिन देवास और नासिक के कारखानों पर मालिकाना हक केंद्रीय वित्त मंत्रालय का है.

रिजर्व बैंक की किसी शाखा को किस डिनौमिनेशन यानी किस मूल्य का कितना नोट भेजा जाए, वित्त वर्ष की शुरुआत में ही यह मुंबई स्थित रिजर्व बैंक के मुख्यालय में तय हो जाता है. अब इस बारे में रिजर्व बैंक के एक सूत्र का कहना है कि 50 और 20 रुपए के नोट की किल्लत के कई कारण हैं. इन का आवंटन 10 रुपए, 100 रुपए, 500 रुपए और 1000 रुपए के नोट की तुलना में महज 10 से 20 प्रतिशत होने के कारण इन की किल्लत बनी रहती है.

साल के दौरान समयसमय पर 20 और 50 रुपए का संकट बना रहता है. लेकिन इस तरह की किल्लत की समस्या हर वित्त वर्ष के अंत में अधिक देखी जाती है. इस की वजह यह है कि जिस तरह के कागज में 20 और 50 रुपए के नोटों की छपाई होती है, उस के आयात में कभीकभी दिक्कत पेश आती है.

वहीं एटीएम में 100 रुपए का नोट न मिलने के बारे में आईसीआईसीआई बैंक के एक अधिकारी का कहना है कि किसी एटीएम में रुपए स्टोर करने की जो जगह है उस में एक बार में अधिकतम 50 लाख रुपए से अधिक नहीं डाले जा सकते.  अब अगर मशीन में 100 रुपए के नोट डाले जाएं तो 50 लाख रुपए से कम राशि ही डाली जा सकेगी. यही कारण है कि ज्यादातर एटीएम में 500 और 1000 रुपए के ही नोट डाले जाते हैं. 100 रुपए के नोट भी एटीएम में डाले जाते हैं लेकिन कम संख्या में. साफ है, इन्हीं स्थितियों का लाभ उठा कर नकली नोटों का कारोबार फलताफूलता है. Crime Story

Crime Stories: ममता, मजहब और माशूक

crime stories: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाली धार्मिक नगरी चित्रकूट में यों तो साल भर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है, लेकिन तीजत्यौहार के दिनों में भक्तों का जो रेला यहां उमड़ता है, उसे संभालने में पुलिस प्रशासन के पसीने छूट जाते हैं. ऐसे में यदि व्यवस्था में जरा सी चूक हो जाए तो पुलिस प्रशासन के लिए समस्या खड़ी कर सकती है. लिहाजा पुलिस व प्रशासन भीड़भाड़ वाले दिनों में अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं कि व्यवस्था और सुविधाओं में कोई कमी न रह जाए.

इस साल भी जनवरी के दूसरे सप्ताह से ही चित्रकूट में श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था, जिन का इंतजार पंडेपुजारियों के अलावा स्थानीय व्यापारी भी करते हैं. कहा जाता है कि मकर संक्रांति की डुबकी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक लाभ पहुंचाती है और यदि डुबकी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के समय लगाई जाए तो हजार गुना ज्यादा पुण्य मिलता है.

14 जनवरी, 2018 को मकर संक्रांति की डुबकी लगाने के लिए लाखों लोग चित्रकूट पहुंच चुके थे. श्रद्धालु अपनी हैसियत के मुताबिक लौज, धर्मशाला व मंदिर प्रांगणों में ठहरे हुए थे. वजह कुछ भी हो पर यह बात दिलचस्प है कि चित्रकूट आने वालों में बहुत बड़ी तादाद मामूली खातेपीते लोगों यानी गरीबों की रहती है. उन्हें जहां जगह मिल जाती है, ठहर जाते हैं और डुबकी लगा कर अपने घरों को वापस लौट जाते हैं.

चित्रकूट में दरजनों प्रसिद्ध मंदिर और घाट हैं, जिन का अपना अलगअलग महत्त्व है. हर एक मंदिर और घाट की कथा सीधे राम से जुड़ी है. कहा यह भी जाता है कि चित्रकूट में राम और तुलसीदास की मुलाकात हुई थी. इन्हीं सब बातों की वजह से यहां लगने वाले मेले में देश के दूरदराज के हिस्सों से श्रद्धालु आते हैं.

मेले में आए लोग श्री कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा भी जरूर करते हैं. लगभग 7 किलोमीटर की यह पदयात्रा करीब 4 घंटे में पूरी हो जाती है. 14 जनवरी को भी श्रद्धालु श्री कामदगिरि की परिक्रमा कर रहे थे, तभी कुछ ने यूं ही जिज्ञासावश पहाड़ी के नीचे झांका तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं.

इस की वजह यह थी कि पहाड़ी के नीचे की तरफ लगे बिजली के एक खंभे पर एक लड़की की लाश लटकी थी. शोर हुआ तो देखते ही देखते परिक्रमा करने वाले लोग वहां रुक कर लाश देखने लगे.

पुलिस को बुलाने या सूचना देने के लिए किसी को कहीं दूर नहीं जाना पड़ा. क्योंकि भीड़ जमा होने पर परिक्रमा पथ पर तैनात पुलिस वाले खुद ही वहां पहुंच गए. पुलिस वालों ने जब खंभे पर लटकी लड़की की लाश देखी तो उन्होंने तुरंत इस की खबर आला अफसरों को दी. कुछ ही देर में थाना नयापुरा के थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. पुलिस लाश उतरवाने में लग गई.

पुलिस काररवाई के चलते भीड़ यह निष्कर्ष निकाल चुकी थी कि लड़की अपने घर वालों के साथ आई होगी और खाईं में गिर गई होगी. लेकिन पुलिस ने जब खंभे से लाश उतारी तो न केवल पुलिस वाले बल्कि मौजूद भीड़ भी हैरान रह गई. क्योंकि तकरीबन 11-12 साल की लग रही उस लड़की के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था.

मुंह में कपड़ा ठूंसा होने पर मामला सीधेसीधे हत्या का लगने लगा. पुलिस भी यह मानने लगी कि हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी होगी. क्योंकि अभी तक आसपास के किसी थाने से किसी लड़की की गुमशुदगी की खबर नहीं आई थी.

चित्रकूट में लड़की की लाश मिलने की खबर आग की तरह फैली तो लोग तरहतरह की बातें करने लगे. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में बताया गया कि उस लड़की की हत्या गला घोंट कर की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302 और 201 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

उस वक्त चित्रकूट में बाहरी लोगों की भरमार थी. इसी वजह से लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. फिर भी पुलिस कोशिश में लग गई कि शायद कोई सुराग मिल जाए. अब तक की जांच से यह स्पष्ट हो गया था कि मृतका चित्रकूट की न हो कर कहीं बाहर की रही होगी.

इस तरह के ब्लाइंड मर्डर पुलिस के लिए न केवल चुनौती बल्कि सरदर्द भी बन जाते हैं. इस मामले में भी यही हो रहा था. हत्यारों तक पहुंचने के लिए लाश की शिनाख्त जरूरी थी.

पुलिस वालों ने सब से पहले सीसीटीवी फुटेज देखने का फैसला लिया, लेकिन यह भी आसान काम नहीं था, क्योंकि मकर संक्रांति के वक्त चित्रकूट में सैकड़ों कैमरे लगे हुए थे. यह जरूरी नहीं था कि सभी फुटेज देखने के बाद भी इतनी भीड़भाड़ में वह लड़की दिख जाए. पर सीसीटीवी फुटेज देखने के अलावा पुलिस के पास कोई और रास्ता भी नहीं था.

चित्रकूट में इस हत्या की चर्चा तेज होने लगी तो सतना के एसपी राजेश हिंगणकर ने मामला अपने हाथ में ले लिया. उन्होंने जांच में जुटी पुलिस के साथ बैठक की और कुछ दिशानिर्देश दिए. पुलिस टीम के लिए यह काम भूसे के ढेर से सुई ढूंढने जैसा था. पुलिस टीम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने में जुट गई. पुलिस की मेहनत रंग लाई.

12 जनवरी, 2018 की एक फुटेज में एक युवक और युवती के साथ वह लड़की दिखी तो पुलिस वालों की आंखें चमक उठीं.

उत्साहित हो कर पुलिस ने और फुटेज खंगालीं तो इस बात की पुष्टि हो गई कि जिस लड़की की लाश पुलिस ने बरामद की थी, वह वही थी जो फुटेज में युवकयुवती के साथ थी. यह फुटेज जानकीकुंड अस्पताल की थी, जहां युवक व युवती मरीजों वाली लाइन में लगे थे.

उस दिन स्नान के लिए वहां लाखों लोग आए थे. इसलिए यह पता लगाना आसान नहीं था कि वह युवक और युवती कहां के रहने वाले थे, इसलिए पुलिस ने ये फुटेज सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिए, जिस से उन तक जल्द से जल्द पहुंचा जा सके.

फुटेज सोशल मीडिया पर डालने के बाद भी पुलिस को उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर हत्यारे का सुराग देने पर 10 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया गया. इसी दौरान पुलिस वालों ने जानकीकुंड अस्पताल के रजिस्टर की जांच भी शुरू कर दी थी.

अस्पताल में आए मरीज का नामपता जरूर लिखा जाता है लेकिन हजारों की भीड़ में यह पता लगा पाना मुश्किल काम था कि जो चेहरे कैमरे में दिख रहे थे, उन के नाम क्या थे. इस के बाद भी पुलिस वाले नामपते छांटछांट कर अंदाजा लगाने में लगे रहे कि वे कौन हो सकते हैं. इस प्रक्रिया में 25 दिन निकल चुके थे और लाख कोशिशों के बाद भी पुलिस के हाथ कामयाबी नहीं लग रही थी.

चित्रकूट के लोगों की दिलचस्पी भी अब मामले में बढ़ने लगी थी. उन्हें सस्पेंस इस बात को ले कर था कि देखें पुलिस कैसे हत्यारों तक पहुंचती है और पहुंच भी पाती है या नहीं.

अस्पताल के रजिस्टर में दर्ज जिन नामों पर पुलिस ने शक किया और जांच की, उन में एक नाम उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के विजय और उस की पत्नी आरती का भी था. एसपी के निर्देश पर एक पुलिस टीम विजय के गांव ऐंझी पहुंच गई.

विजय से सीधे पूछताछ करने के बजाय पुलिस ने पहले उस के बारे में जानकारी हासिल की तो एक जानकारी यह मिली कि उस की 10-11 साल की एक बेटी नेहा भी थी, जो लगभग एक महीने से नहीं दिख रही है.

पुलिस ने चित्रकूट से लड़की की जो लाश बरामद की थी, उस की उम्र भी 10-12 साल थी. यह समानता मिलने पर पुलिस की जिज्ञासा बढ़ गई. इस के बाद पुलिस विजय के घर पहुंच गई. उस समय उस की पत्नी आरती भी घर पर मौजूद थी. पुलिस ने जब उन दोनों से उन की बेटी नेहा के बारे में पूछा तो वह बोले कि उन की कोई बेटी नहीं थी, केवल एक बेटा ही है.

उन की बातों से लग रहा था कि वह झूठ बोल रहे हैं क्योंकि उनके पड़ोसियों ने बता दिया था कि इन की 10-11 साल की एक बेटी नेहा थी, जो पता नहीं कहां चली गई है. इसी शक के आधार पर पुलिस विजय और उस की पत्नी आरती को चित्रकूट ले आई.

थाने में उन दोनों से जब पूछताछ शुरू हुई तो दोनों साफ मुकर गए कि उन की कोई बेटी भी है. तब पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई, जिस में उन के साथ 10-11 साल की बच्ची थी. फुटेज देखते ही दोनों बगले झांकने लगे. उसी समय दोनों ने आंखों ही आंखों में कुछ बात की और चंद मिनटों में ही बेटी की हत्या का राज उगल दिया.

पुलिस वाले यह जान कर आश्चर्यचकित रह गए कि आरती का असली नाम सबीना शेख है और वह मुसलमान है. सबीना की शादी सन 2006 में उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के ही निवासी जाहिद अली से हुई थी. जाहिद से उसे 2 बच्चे हुए, पहली बेटी सिमरन और दूसरा बेटा साजिद जो 5 साल का है.

सबीना जाहिद के साथ रह जरूर रही थी, लेकिन उस के साथ उस की कभी पटरी नहीं बैठी, क्योंकि सबीना किसी और को चाहती थी.

दरअसल सबीना और विजय एकदूसरे को बचपन से चाहते थे, लेकिन सबीना की शादी घर वालों ने उस की मरजी के खिलाफ जाहिद से कर दी थी, इसलिए सबीना जाहिद के साथ रह जरूर रही थी, लेकिन उसे वह दिल से नहीं चाहती थी.

उस ने तो अपने दिल में विजय को बसा रखा था. जब दिल नहीं मिले तो उन के बीच बातबेबात झगड़ा रहने लगा. अपनी कलह भरी जिंदगी सुकून से गुजारने की गरज से सबीना ने शादी के 9 साल बाद विजय को टटोला. उसे यह जान कर खुशी हुई कि विजय उसे आज भी पहले की तरह चाहता है और उसे बच्चों सहित अपनाने को तैयार है.

बस फिर क्या था बगैर कुछ सोचेसमझे एक दिन वह पति को बिना बताए विजय के साथ भाग गई. यह सन 2015 की बात है.  योजनाबद्ध तरीके से दोनों भाग कर ऐंझी गांव आ कर रहने लगे. सबीना अपने बच्चों को भी साथ ले आई थी, जिस पर विजय को कोई ऐतराज नहीं था.

अपने पुराने और पहले आशिक के साथ रह कर सबीना खुश थी. उधर जाहिद ने भी बीवी के गायब होने पर कोई भागदौड़ नहीं की, क्योंकि वह तो खुद सबीना से छुटकारा पाना चाहता था. सबीना अब हिंदू के साथ रह रही थी, इसलिए उस ने खुद का नाम आरती सिंह, बेटी सिमरन का नाम नेहा सिंह और बेटे साजिद का नाम बदल कर आशीष सिंह रख लिया था.

नए पति के साथ खुशीखुशी रह रही सबीना को थोड़ाबहुत डर अपने मायके वालों से लगता था कि अगर उन्हें पता चला तो वे जरूर फसाद खड़ा कर सकते हैं. साजिद उर्फ आशीष ने तो विजय को पापा कहना शुरू कर दिया था, लेकिन सिमरन विजय को पिता मानने को तैयार नहीं थी. सिमरन उर्फ नेहा चूंकि 10-11 साल की हो चुकी थी, इसलिए वह दुनियाजहान को समझने लगी थी. उस का दिल और दिमाग दोनों विजय को पिता मानने को तैयार नहीं थे.

आरती की बड़ी इच्छा थी कि नेहा विजय को पापा कहे. इस बाबत शुरू में तो आरती और विजय ने उसे बहुत बहलायाफुसलाया, लेकिन इस्लामिक माहौल में पली सिमरन हमेशा विजय को मामू ही कहती थी. जब इस संबोधन पर सबीना ने सख्ती से पेश आना शुरू किया तो वह सिमरन के इस मासूमियत भरे सवाल का कोई जवाब वह नहीं दे पाई कि आप ही तो कहती थीं कि ये मामू हैं, अब इन्हें पापा कैसे कह दूं. मेरे अब्बू तो दूसरे गांव में रहते हैं.

इस से विजय और सबीना की परेशानी बढ़ने लगी थी. वजह मामू और अब्बा के मुद्दे पर सिमरन बराबरी से विवाद और तर्क करने लगी थी. दोनों को डर था कि यह उजड्ड और बातूनी लड़की कभी भी उन का राज खोल सकती है क्योंकि गांव में कोई इन की असलियत नहीं जानता था. अगर गांव वाले सच जान जाएंगे तो धर्म के ठेकेदार इन का रहना और जीना मुहाल कर देते.

जब लाख समझाने और धमकाने से भी बात नहीं बनी यानी सिमरन विजय को पिता मानने को तैयार नहीं हुई तो खुद सबीना ने विजय को इशारा किया कि इस से तो अच्छा है कि सिमरन का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए. विजय भी इस के लिए तैयार हो गया.

दोनों ने मकर संक्रांति पर चित्रकूट जाने की योजना बनाई और सिमरन से कहा कि वहां तुम्हारी आंखों की जांच भी करा देंगे. सिमरन जिद्दी जरूर थी, पर इतनी समझदार अभी नहीं हुई थी कि सगी मां के मन में पनप रही खतरनाक साजिश को भांप पाती.

12 जनवरी, 2018 को चित्रकूट आ कर दोनों ने जानकीकुंड अस्पताल में सिमरन उर्फ नेहा की आंखों की फ्री जांच करवाई और उस दिन उन्होंने विभिन्न मंदिरों में दर्शन किए. 13 जनवरी, 2018 को इस अंतरधर्मीय परिवार ने चित्रकूट में परिक्रमा की और रात में नरसिंह मंदिर के प्रांगण में आ कर सो गए.

2 दिन घूमनेफिरने के बाद थकेहारे दोनों बच्चे तो जल्द सो गए, लेकिन दुनिया के सामने दोहरी जिंदगी जीते विजय और आरती उर्फ सबीना की आंखों में नींद नहीं थी. रात 12 बजे के लगभग दोनों ने गहरी नींद में सोई नेहा उर्फ सिमरन का गला मफलर से घोंट डाला.

उस के मर जाने की तसल्ली होने के बाद दोनों यह सोच कर लाश को झाडि़यों में फेंक आए कि सिमरन की लाश को जल्द ही चीलकौए और जानवर नोचनोच कर खा जाएंगे और उन के जुर्म की भनक किसी को भी नहीं लगेगी. लाश खाईं में गिराने के बाद वे दोनों बेटे को ले कर गाजियाबाद भाग गए और कुछ दिन इधरउधर भटकने के बाद ऐंझी पहुंच गए.

पहाड़ी से लाश गिराते समय इत्तफाक से नेहा की लाश का बायां पांव खंभे में उलझ गया और लाश लटकी रह गई.

9 फरवरी, 2018 को जब सारे राज खुले तो हर किसी ने इसे वासना के लिए ममता का गला घोंटने वाली शर्मनाक वारदात कहा. बात सच भी थी, जिस का दूसरा पहलू सबीना और विजय की यह बेवकूफी थी कि वे नाम बदल कर चोरीछिपे रह रहे थे.

सबीना जाहिद से तलाक ले कर सीना ठोंक कर विजय से शादी करती तो शायद सिमरन भी विजय को पिता के रूप में स्वीकार कर लेती, पर इसे इन दोनों की बुजदिली ही कहा जाएगा कि धर्म और समाज के दबाव से लड़ने के बजाय उन्होंने एक मासूम की हत्या कर के अपनी जिंदगी खुशहाल बनने का ख्वाब देख डाला. कथा संकलन तक दोनों जेल में थे. Crime Stories

Hindi stories: औरतें अपने पैरों पर खड़ी हों – प्रज्ञा भारती

Hindi stories: साल 2003 में हैल्थ सैक्टर से समाजसेवा का काम शुरू करने वाली प्रज्ञा भारती आज बिहार में अच्छीखासी पहचान और इज्जत हासिल कर चुकी हैं. प्रज्ञा भारती साल 2005 से औरतों की तरक्की के लिए भी लगातार काम कर रही हैं. वे अब तक बिहार के 10 जिलों में 5 हजार औरतों को हुनरमंद बना चुकी हैं और 2 हजार औरतों को रोजगार दिला चुकी हैं. वे ‘परिहार सेवा संस्थान’ के तले औरतों को हुनरमंद बनाने के साथसाथ उन्हें रोजगार देने की मुहिम में लगी हुई हैं. साथ ही, वे पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभा रही हैं.

प्रज्ञा भारती कहती हैं कि औरतों को हुनरमंद बनाने के साथसाथ उन्हें रोजगार से जोड़ना जरूरी है. जब तक काम करने के बाद औरतों के हाथ में पैसा नहीं आएगा, तब तक उन के मन में अपने पैरों पर खड़ा होने का भाव नहीं आएगा.

फिलहाल प्रज्ञा भारती ‘वुमन फूड वैंडर योजना’ पर काम कर रही हैं. इस योजना में औरतों को ही रखा गया है. कैटरिंग से ले कर सर्विस तक के काम में औरतों को ही लगाया गया है. औरतें ही खाना पकाएंगी, परोसेंगी, पैक करेंगी और उसे पहुंचाएंगी. इस के लिए फिलहाल सौ औरतों को ट्रेंड किया गया है.

प्रज्ञा भारती कहती हैं कि घरेलू औरतों को उन के घर में ही काम देने की जरूरत है. इस से वे कमाई के साथसाथ अपने बच्चों और परिवार की भी देखरेख कर सकेंगी. प्रज्ञा भारती बाल सुधारगृह के बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए स्पैशल ट्रेनिंग देने में लगी हुई हैं. इस से बाल सुधारगृह से बाहर निकल कर बच्चे रोजगार में लग सकेंगे.

प्रज्ञा भारती बताती हैं कि उन्होंने पटना कालेज से बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद मास कम्यूनिकेशन में एमए किया था. उस के बाद कुछ दिनों तक पत्रकारिता की, पर उस में मन नहीं रमा, क्योंकि वे समाजसेवा और औरतों को मजबूत करने की दिशा में कुछ ठोस काम करने के सपने देख रही थीं और साल 2003 में वे इस मुहिम में लग गईं.

सब से पहले उन्होंने पटना के स्लम एरिया कमला नेहरू नगर, कौशल नगर और कुम्हार टोली की औरतों के हालात का जायजा लिया और उन्हें हुनरमंद बनाने के काम में लग गईं. इस के बाद प्रज्ञा भारती जहानाबाद और अरवल जैसे नक्सली पैठ वाले इलाकों में भी अपने दलबल के साथ पहुंच गईं और वहां की औरतों को काम सिखाने लगीं.

सिकरिया जैसे नक्सली इलाके, जहां पुलिस भी जाने से खौफ खाती थी, में पहुंच कर प्रज्ञा भारती ने औरतों के मन से मर्द के भरोसे बैठ कर जिंदगी गुजार देने के भाव को मिटाने में कामयाबी हासिल की. प्रज्ञा भारती को औरतों और कमजोर लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने की सीख अपने मातापिता से मिली. उन के पिता बचपन से ही पोलियो के शिकार हो गए थे, इस के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और सांख्यिकी महकमे के डायरैक्टर पद तक पहुंचे.

प्रज्ञा भारती की मां ने भी शारीरिक रूप से कमजोर होने के बावजूद अपना कारोबार खड़ा किया. ह्वीलचेयर पर बैठ कर ही उन्होंने अपने कारोबार को आगे बढ़ाने में कामयाबी पाई. उन की मां की सोच है कि वे किसी के सहारे जिंदगी न गुजारें. इसी सोच ने प्रज्ञा भारती को. Hindi stories

Rajasthan News: पुलिस वाले ने पुलिस से परेशान हो कर खुदकुशी की

Rajasthan News: राजस्थान के नागौर जिले के सुरपालिया थाने के तहत आने वाले एक गांव बाघरासर में रविवार, 21 जनवरी, 2018 की सुबह डीडवाना एएसपी दफ्तर के ड्राइवर कांस्टेबल गेनाराम मेघवाल ने अपनी पत्नी संतोष और बेटे गणपत व बेटी सुमित्रा के साथ फांसी के फंदे पर झूल कर जान दे दी.

21 जनवरी, 2018 को सुबह के 4 बजे गेनाराम के लिखे गए सुसाइड नोट को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया. उस सुसाइड नोट पर गेनाराम समेत परिवार के सभी सदस्यों के दस्तखत थे. 5 पन्नों के उस सुसाइड नोट में एक पुलिस एएसआई राधाकिशन समेत 3 पुलिस वालों पर चोरी के आरोप में फंसाने, सताने व धमकाने को ले कर यह कदम उठाने का आरोप लगाया गया था.

सुसाइड नोट में लिखा था कि मार्च, 2012 में नागौर पुलिस लाइन में रहने वाले एएसआई राधाकिशन सैनी के घर में चोरी हुई थी. राधाकिशन ने गेनाराम, उस के बेटे गणपत और बेटे के दोस्तों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था. उन दिनों गेनाराम नागौर में तैनात था. इस मामले में 2 बार एफआईआर हो चुकी थी. लेकिन तीसरी बार यह मामला फिर खुलवा लिया गया. इस के बाद गेनाराम ने कोर्ट में एफआईआर रद्द करने की याचिका लगाई, मगर वह कोर्ट से खारिज हो गई थी.

गेनाराम अपने आखिरी समय में एएसपी दफ्तर, डीडवाना में तैनात था. वहां वह दफ्तर के पास बने सरकारी क्वार्टर में परिवार के साथ रहता था. जांचपड़ताल में यह भी सामने आया  कि गेनाराम और राधाकिशन के बीच गांव ताऊसर में 18 बीघा जमीन को ले कर भी झगड़ा चल रहा था. इस मामले में भी अजमेर पुलिस के अफसरों ने जांच की थी. गेनाराम और उस के परिवार के तनाव की एक खास वजह यह भी थी.

गेनाराम का पिछले कुछ सालों में कई बार तबादला हुआ था. इस के चलते भी वह परेशान था. अपने सुसाइड नोट में उस ने एएसआई राधाकिशन सैनी पर बेवजह परेशान करने का आरोप लगाया था. गेनाराम के खिलाफ चोरी के मामले की जांच कर रहे नागौर सीओ ओमप्रकाश गौतम का कहना है कि मार्च, 2012 के इस मामले की जांच पहले भी सीओ लैवल के कई अफसर कर चुके थे. 2 बार एफआईआर भी कराई गई थी, लेकिन पिछले दिनों यह मामला फिर से खुलवाया गया था.

गेनाराम ने हाईकोर्ट में अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कराने के लिए भी याचिका लगाई थी, लेकिन 8 जनवरी, 2018 को कोर्ट ने उस की यह याचिका खारिज कर दी थी. अपने सुसाइड नोट में गेनाराम ने परेशान करने के लिए जिस भंवरू खां का जिक्र किया है, वह रिटायर हो चुका है. गेनाराम के परिवार वालों ने राधाकिशन, उस की पत्नी, भंवरू खां और रतनाराम समेत 3-4 दूसरे लोगों के खिलाफ खुदकुशी करने के लिए उकसाने और दलित उत्पीड़न अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज कराया था.

लोगों ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराने और ताऊसर की 18 बीघा जमीन को सीज करने की मांग की है. यहां यह भी बताना जरूरी है कि राधाकिशन के घर में मार्च, 2012 में जब पुलिस लाइन, नागौर में चोरी हुई थी. तब राधाकिशन को गेनाराम की पत्नी संतोष ने ही चोरी होने की खबर दी थी. पर राधाकिशन और उस के परिवार ने गेनाराम और उस के बेटे गणपत व उस के साथियों पर ही चोरी करने का आरोप लगा दिया और मुकदमा दर्ज करा दिया.

जुर्म साबित नहीं होने के बाद भी दुराचरण रिपोर्ट भेजी गई. गेनाराम ने सुसाइड नोट में लिखा था, ‘हमारी किसी ने नहीं सुनी.’

इस मामले में तब सीओ द्वारा तलबी लैटर जारी किया गया था. दफ्तर पहुंचने पर राधाकिशन ने गेनाराम को फिर धमकाया. राधाकिशन कई सालों से एक ही दफ्तर में तैनात है. गेनाराम एएसपी दफ्तर में ड्राइवर था. नागौर जिला एसपी दफ्तर में मीटिंग होती थी, तो वही एएसपी को ले कर जाता था. एसपी दफ्तर में ही एएसआई राधाकिशन का दफ्तर था. वह गेनाराम को देखते ही धमकाता था. गेनाराम इस वजह से परेशान हो गया था.

गेनाराम और उस के बीवीबच्चे पढ़ेलिखे थे. उन्होंने क्यों नहीं कानूनी लड़ाई लड़ी? शायद उन की उम्मीद जवाब दे गई थी, तभी उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने में ही भलाई समझी और जहर पीने के बाद फांसी के फंदे पर झूल कर मौत के मुंह में जा पहुंचे. सुसाइड नोट में लिखी बातें पढ़ कर लोग हैरान रह गए कि पुलिस वाला भी पुलिस के कहर से नहीं बच सका. ऐसे पुलिस वालों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई इस तरह पूरा परिवार खत्म न हो.

गेनाराम के बेटे गणपत और बेटी सुमित्रा ने सीकर से पौलीटैक्निक का कोर्स किया था. इस के बाद से वे दोनों मातापिता के साथ डीडवाना में ही रह रहे थे. इस परिवार के बाकी सदस्यों का कहना है कि सुमित्रा की सगाई गांव धीरजदेसर में हुई थी, जबकि बेटे गणपत की सगाई गांव सोमणा में की गई थी.

कांस्टेबल गेनाराम के 10 सवाल, जो उस ने अपने सुसाइड नोट में लिखे थे, अब जवाब मांग रहे हैं :

* चोरी का सारा सामान मिल जाना और एफएसएल भी नहीं उठाना घटना का बनावटी होना जाहिर करता है.

* तांत्रिक के कहने, कांच में चेहरा देखने की बात के आधार पर अनुसंधान करना क्या सही है?

* जांच अधिकारी के सामने राधाकिशन द्वारा गणपत के साथ मारपीट की गई. गवाह होने के बाद भी एफआईआर दर्ज करा देना.

* एसपी दफ्तर में नियम विरुद्ध नौकरी करना.

* पुत्र के साथ मारपीट और बिना वारंट 2 दिन थाने में रखना सचाई पर कुठाराघात है.

* पुत्र गणपत अपराधी था तो उसे थाने में रख कर छोड़ा क्यों गया?

* अनुसंधान अधिकारी राजीनामे का दबाव बनाने में जुटे थे. मामला इसी के चलते पैंडिंग रखा गया.

* जांच में पहले पुत्र और फिर पूरे परिवार पर आरोप लगाना शक पैदा करता है.

* चोरी के सामान में मंगलसूत्र गायब बताया जो महिला हमेशा पहने रहती है.

* महिला ने मंगलसूत्र पहन रखा था तो उसे चोरी हो जाना क्यों बताया?

गेनाराम के पूरे परिवार समेत खुदकुशी करने का पता चला तो राधाकिशन, भंवरू खां और रतनाराम फरार हो गए.

कांग्रेस के संसदीय सचिव रह चुके गोविंद मेघवाल ने बताया, ‘‘दलितों पर जोरजुल्म बढ़ रहे हैं. समाज को एकजुट होना पड़ेगा. यह पुलिस और वसुंधरा सरकार की नाकामी है. हमारा समाज इस पर विचार कर रहा है.’’ Rajasthan News

Domestic Dispute: स्पीड पोस्ट से आया तलाक

Domestic Dispute: यह जनवरी, 2016 की दोपहर की बात है. कड़ाके की सर्दी पड़ने की वजह से आफरीन रहमान जयपुर स्थित अपने घर पर ही थीं. उन का खाना खाने का मन नहीं था, इसलिए कुरसी पर बैठ कर वह सोचने लगीं कि अब क्या किया जाए, क्योंकि घर के सारे काम वह पहले ही निपटा चुकी थीं. वह कुरसी पर बैठी थीं कि तभी उन की नजर सामने सैंटर टेबल पर पड़ी पत्रिका पर पड़ गई.

उसे एक दिन पहले ही वह बाजार से खरीद कर लाई थीं. रात को वह उसे पढ़ रही थीं, तभी उन्हें नींद आ गई थी. तब मैगजीन सैंटर टेबल पर रख कर वह सो गई थीं. मैगजीन देख कर आफरीन को उस कहानी की याद आ गई, जिसे वह पढ़ रही थीं. वह एक महिला की कहानी थी, जिसे पति ने घर से निकाल दिया था. इस समय वह महिला मायके में भाइयों के साथ रह रही थी.

आफरीन ने उसी कहानी को पढ़ने के लिए मैगजीन उठा ली. वह पन्ने पलट रही थीं, तभी डोरबैल बजी. आफरीन सोच में पड़ गईं कि इस समय दोपहर में कौन आ गया? उन्होंने बैठेबैठे ही आवाज लगाई, ‘‘कौन..?’’

बाहर से जवाब आने के बजाय दोबारा डोरबैल बजी तो आफरीन मैगजीन मेज पर रख कर अनमने मन से उठीं और दरवाजे पर जा कर दरवाजा खोलने से पहले एक बार फिर पूछा, ‘‘कौन है?’’

‘‘मैडम, मैं पोस्टमैन.’’ बाहर से आवाज आई.

आफरीन ने दरवाजा खोला तो बाहर खाकी वर्दी में पोस्टमैन खड़ा था. उस ने एक लिफाफा आफरीन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप के यहां आफरीन रहमान कौन हैं? यह स्पीड पोस्ट आई है.’’

‘‘मैं ही आफरीन रहमान हूं.’’ उन्होंने कहा.

‘‘मैडम,’’ पोस्टमैन ने एक कागज आफरीन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘इस पर दस्तखत कर दीजिए.’’

कागज थाम कर आफरीन ने पोस्टमैन की ओर देखा तो उस ने अपनी जेब से पैन निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया. आफरीन ने उस कागज पर दस्तखत कर दिए तो पोस्टमैन ने एक लिफाफा उन्हें थमा दिया. आफरीन ने दरवाजा बंद किया और कमरे में आ कर उस लिफाफे को उलटपलट कर देखने लगी. वह स्पीड पोस्ट उन्हीं के नाम थी. पत्र भेजने वाले की जगह अशहर वारसी, इंदौर लिखा था.

society

इंदौर से अशहर का पत्र देख कर आफरीन खुश हो गईं लेकिन तुरंत ही अपनी उस खुशी को झटक कर वह सोचने लगीं कि अगर अशहर को उस की जरूरत होती तो वह खुद आता या फोन करता. पत्र भेजने की क्या जरूरत थी? आफरीन के मन में तरहतरह की आशंकाएं उपजने लगीं. 5-6 महीने बाद उस ने इस तरह क्यों याद किया? यह चिट्ठी क्यों भेजी, वह भी स्पीड पोस्ट से?

आफरीन का मन बैठने सा लगा. उन्होंने कांपते हाथों से स्पीडपोस्ट का वह लिफाफा खोला. उस में से एक कागज निकला. उन्होंने वह कागज खोला तो उस पर लिखा था ‘तलाक…तलाक… तलाक…’. उन्होंने एक बार फिर उस कागज पर लिखी इबारत पढ़ी. उस पर वही लिखा था, जो उन्होंने पहले पढ़ा था.

आफरीन ने उस कागज पर लिखे शब्दों को कई बार पढ़ा. उस तलाकनामा को देख कर उन की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. वह कुरसी पर बैठ गईं. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि उन की खुशियों को इतनी जल्दी ग्रहण कैसे लग गया? उन्हें जो खुशियां मिली थीं, वे इतनी जल्दी कैसे छिन गईं?

उन्होंने तो ऐसी कोई गलती भी नहीं की थी कि उस गलती की इतनी बड़ी सजा मिल रही हो. करीब डेढ़, दो साल पहले अशहर से रिश्ता तय होना, उस की बेगम बन कर जयपुर से इंदौर जाना, कुछ ही दिनों में ससुराल वालों की ओर से दहेज के लिए उन पर अत्याचार करना और फिर एक दिन उन्हें घर से निकाल देने की एकएक घटना उस के जेहन में फिल्म की तरह चलने लगी.

सन 2014 के मईजून महीने की बात रही होगी. जयपुर की रहने वाली 23 साल की आफरीन रहमान अपनी एमबीए की पढ़ाई पूरी कर नौकरी तलाश रही थी. उस के पिता मोहम्मद नसीर की सन 2009 में कौर्डियक अटैक से मौत हो गई थी. उस के बाद परिवार की जिम्मेदारी आफरीन के 2 भाइयों पर आ गई थी.

परिवार में आफरीन, मां और 2 भाई थे. भाई चाहते थे कि आफरीन का जल्द से जल्द निकाह हो जाए. वैसे भी आफरीन शादी लायक हो चुकी थी. उस की पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी. भाई उस के लिए रिश्ता तलाश रहे थे. उसी बीच एक मैट्रीमोनियल वेबसाइट के माध्यम से अशहर वारसी और आफरीन में जानपहचान हुई.

अशहर वारसी मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के रहने वाले थे. वह वकालत करते थे. जानपहचान हुई तो बात शादी की चली. अशहर ने आफरीन को देखा और आफरीन ने अशहर को. दोनों ही एकदूसरे को पसंद आ गए. इस के बाद घर वालों की रजामंदी से नातेरिश्तेदारों की मौजूदगी में रिश्ता तय हो गया.

रिश्ता तय होने पर आफरीन अपने सपनों के राजकुमार अशहर के साथ भविष्य के सपने बुनने लगी. अशहर जवान थे और खूबसूरत भी. आफरीन ने पहले ही तय कर लिया था कि वह किसी अच्छे पढ़ेलिखे लड़के से ही शादी करेगी. अशहर वकालत की पढ़ाई कर के प्रैक्टिस कर रहे थे.

सब कुछ ठीकठाक था, इसलिए आफरीन के भाई और मां इस बात से बेफिक्र थे कि नाजनखरों में पली उन की लाडली को ससुराल में कोई परेशानी नहीं होगी. आफरीन की मां को केवल इसी बात का दुख था कि आफरीन जयपुर से सैकड़ों किलोमीटर दूर इंदौर चली जाएगी.

मां की इस बात पर आफरीन के भाई यह कह कर उन्हें सांत्वना देते थे कि आजकल इतनी दूरी कुछ भी नहीं है. सुबह जा कर रात में जयपुर आया जा सकता है. अशहर के घर वाले चाहते थे कि निकाह धूमधाम से हो. उन की चाहत को देखते हुए आफरीन के भाइयों ने शादी की तैयारी शुरू कर दी.

बहन की शादी के लिए उन्होंने इधरउधर से कर्ज भी लिया. लेकिन भाइयों ने शादी 4 सितारा होटल में की. 24 अगस्त, 2014 को आफरीन रहमान और अशहर वारसी की शादी धूमधाम से हो गई. आफरीन की शादी में उस के भाइयों ने अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया, ताकि उन की बहन को ससुराल में कोई परेशानी न हो.

शादी के बाद आफरीन इंदौर चली गई. शुरुआती दिन हंसीखुशी में निकल गए. अशहर भी खुश था और आफरीन भी. आफरीन को अपने शौहर के वकील होने का फख्र था तो अशहर को भी अपनी बेगम के उच्च शिक्षित होने की खुशी थी. न तो आफरीन को कोई गिलाशिकवा था और ना ही अशहर को.

दोनों मानते थे कि पढ़ालिखा होने से वे अपनी जिंदगी को खुशहाल बना लेंगे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. लेकिन आफरीन की खुशियां ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं रह सकीं. शादी के 3-4 महीने बाद ही अशहर और उस के घर वालों का व्यवहार बदलने लगा. जो अशहर आफरीन से प्यारमोहब्बत की बातें करते नहीं थकता था, वह उसे आंखें तरेर कर बातें करने लगा.

ससुराल वालों का भी व्यवहार बदल गया था. वे दहेज और अन्य बातों को ले कर ताने मारने लगे थे. आफरीन समझ नहीं पा रही थीं कि यह सब क्यों होने लगा? मौका मिलने पर वह अशहर को समझाने की कोशिश करती, लेकिन अशहर समझने के बजाय उन्हें ही दोषी ठहराता.

आफरीन पढ़ीलिखी और समझदार थीं. वह जानती थीं कि इन बातों का परिणाम अच्छा नहीं होगा. वह भाइयों की स्थिति को भी जानती थीं. अब वे इस हालत में नहीं थे कि बहन की ससुराल वालों की दहेज की मांग पूरी कर सकते. वह यह भी जानती थीं कि अगर एक बार इन की दहेज की मांग पूरी भी कर दी गई तो क्या गारंटी कि ये आगे कुछ नहीं मांगेंगे. उन्हें परेशान नहीं करेंगे.

society

यही सोच कर आफरीन ससुराल वालों के अत्याचार सहती रहीं. वह जब भी अकेली होतीं, उस समय को कोसती रहतीं, जब उन की अशहर से जानपहचान हुई थी. उन का सोचना था कि शायद कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. ससुराल वालों के अत्याचार लगातार बढ़ते ही गए. अब उन के साथ मारपीट भी होने लगी थी, जिसे वह यह सोच कर सहन करती रहीं कि एक न एक दिन यह सब ठीक हो जाएगा.

अशहर घर वालों के कहने पर चल रहा था. वह आफरीन से सीधे मुंह बात भी नहीं करता था. बात सिर से गुजरने लगी तो आफरीन ने अपनी परेशानी भाइयों को बताई. भाई इंदौर गए और अशहर तथा उस के घर वालों को समझाया. अपनी आर्थिक स्थिति भी बताई.

इस के बाद महीना, 15 दिन तक आफरीन के प्रति ससुराल वालों का रवैया ठीक रहा, पर इस के बाद फिर वे उसे परेशान करने लगे. यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा. शादी के करीब एक साल बाद अगस्त, 2015 में अशहर और उस के घर वालों ने पैसे और कई तरह का अन्य सामान लाने की बात कह कर आफरीन से मारपीट की और उन्हें घर से धक्के मार कर निकाल दिया.

आफरीन सब के सामने गिड़गिड़ाती रहीं और कहती रहीं कि उन के भाइयों की इतनी हैसियत नहीं है कि वे उन की मांगें पूरी कर सकें. ससुराल वालों ने उन की एक भी बात नहीं सुनी. आफरीन क्या करती? वह जयपुर भाइयों के पास आ गईं. भाइयों ने अशहर और उन के घर वालों से बात की. नातेरिश्तेदारों से दबाव डलवाया.

आखिर 7-8 दिनों बाद आफरीन के ससुराल वाले आ कर उन्हें इंदौर ले गए. आफरीन भी यह सोच कर उन के साथ चली गईं कि शायद अब इन्हें अक्ल आ गई होगी. लेकिन जल्दी ही ससुराल में उन के साथ फिर वैसा ही व्यवहार होने लगा. अशहर और उन के घर वाले फिर दहेज की मांग करते हुए उन के साथ मारपीट करने लगे. ऐसा कोई दिन नहीं होता था, जिस दिन उन्हें ससुराल न मारा जाता रहा हो.

आफरीन ने एक बार फिर अशहर को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. सितंबर, 2015 में अशहर और उस के घर वालों ने एक बार फिर मारपीट कर आफरीन को घर से निकाल दिया. आंखों से आंसू लिए आफरीन एक बार फिर जयपुर स्थित अपने मायके आ गईं. आफरीन अपने भाइयों पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं.

आफरीन पढ़ीलिखी थीं, इसलिए अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थीं. जयपुर में वह नौकरी की तलाश करने लगीं. उसी बीच उन पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पड़ा. अक्तूबर, 2015 में जयपुर से जोधपुर जाते समय सड़क दुर्घटना में आफरीन की मां की मौत हो गई. हादसे में उन्हें भी चोटें आई थीं.

आफरीन की ससुराल वालों को सूचना भेजी गई. अशहर जयपुर आया जरूर, लेकिन 2-3 दिन रुक कर चला गया. उस ने आफरीन को ले जाने की बात एक बार भी नहीं की. आफरीन के भाइयों ने कहा भी तो उस ने कोई जवाब नहीं दिया. आफरीन जयपुर में रहते हुए अपने भविष्य के बारे में सोच रही थीं.

कभीकभी उन्हें लगता था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. अशहर को जिस दिन उस की अहमियत का अहसास होगा, वह जयपुर आ कर उसे ले जाएगा. लेकिन उन का यह सोचना केवल मन को तसल्ली देने वाली बात थी. जयपुर में रहते हुए आफरीन को पता नहीं था कि उस के शौहर अशहर के मन में क्या चल रहा है? जनवरी, 2016 के आखिरी सप्ताह में स्पीडपोस्ट से अशहर का भेजा तलाकनामा आ गया.

तलाकनामा में 3 बार लिखे ‘तलाक…तलाक…तलाक…’ को पढ़ कर आफरीन की आंखों में आंसू आ गए. वह सोचने लगीं कि अब क्या किया जाए? उन्होंने अपने भाइयों तथा मिलनेजुलने वालों से राय ली. सभी ने उन की हिम्मत बढ़ाई. वह कुछ महिला संगठनों, मुसलिम संगठनों एवं वकीलों से मिलीं. आखिर उन्होंने 3 तलाक के सिस्टम को ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया.

इस बीच, अप्रैल 2016 में आफरीन के बड़े भाई फहीम की दुर्घटना में मौत हो गई. एक तरफ आफरीन का विवाह टूट रहा था और दूसरी ओर 7 महीने के अंदर मां और बड़े भाई की हादसों में हुई मौत ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था. परिवार में भाभी और एक छोटा भाई ही बचा था.

इस के बावजूद आफरीन ने अपना दिल कड़ा किया. 3 तलाक के खिलाफ अपने वकील के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2016 में आफरीन की यह याचिका स्वीकार कर ली.

3 तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली आफरीन देश की दूसरी महिला थीं.

इस से पहले उत्तराखंड के काशीपुर की शायरा बानो ने फरवरी, 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 3 तलाक और बहुविवाह को खत्म करने का आग्रह किया था.

society

आफरीन का कहना है कि 3 तलाक पूरी तरह से नाइंसाफी है. उन की तलाक की इच्छा थी या नहीं, यह उन से एक बार भी नहीं पूछा गया. इस तरह चिट्ठी के जरिए तलाक देना अपने आप में क्रूरता है. इस तरह तलाक दे कर महिलाओं के अधिकारों और इच्छाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब आफरीन पति से मेहर की रकम और गुजारा भत्ता चाहती हैं.

दर्द के दरिया में डूबी मुमताज

उत्तर प्रदेश के झांसी के थाना सीपरी के इलाके की आवास विकास कालोनी की रहने वाली मुमताज बेगम का निकाह 21 दिसंबर, 2003 को वहीं के रहने वाले वारिस उज्जमा के साथ हुआ था. शादी के बाद वह जल्दी ही गर्भवती भी हो गई. लेकिन उस के पति और ससुराल वालों ने कहना शुरू कर दिया कि उन्हें बेटा चाहिए.

जब दिसंबर, 2004 में मुमताज बेटी की मां बनी तो उस पर मुसीबतें टूट पड़ीं. उत्पीड़न के साथ पति और ससुराल वाले उस पर यह कह कर मायके से 5 लाख रुपए लाने के लिए दबाव डालने लगे कि उस की बेटी मायके की है. उस की शादी के लिए पैसे की जरूरत पड़ेगी.

बात बेटी की शादी बचाने की थी. पूरा हालहवाल जान कर मायके वालों ने यह कह कर कि जब बेटी बड़ी हो जाए तो प्लौट बेच कर उस की शादी कर दी जाएगी. मुमताज के नाम एक प्लौट की रजिस्ट्री करा दी गई. कुछ समय शांति रही. इस बीच मुमताज एक बेटे और एक बेटी की मां बनी. इस के बावजूद फिर से मुमताज के साथ बदसलूकी शुरू हो गई. मारपीट भी होने लगी.

जल्दी ही वह दिन भी आ गया, जब 3 तलाक कह कर वारिस उज्जमा ने उसे घर से निकाल दिया. बाद मे उस ने बाकायदा लिख कर शरिया हिसाब से उसे तलाक दे दिया.

मुमताज ने समाज के ठेकेदारों से न्याय दिलाने की मांग की. मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड  से संबंद्ध अदालत के काजी (जज) से संपर्क किया.  लेकिन सब ने एक ही बात कही कि यह धर्म का मामला है, तलाक हो चुका है. इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता. औल इंडिया पर्सनल लौ बोर्ड से संबंद्ध दारुल कजा शरई अदालत के मुफ्ती सिद्दीकी नकवी ने कहा कि बेशक तलाक का तरीका गलत है, पर तलाक तो हो ही गया है, इसलिए कुछ नहीं किया जा सकता.

अब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद मुमताज को न्याय मिल सकेगा. अभी तक वह न्याय के लिए धर्म के ठेकेदारों के पास भटकती रही, जिन्होंने उसे दिलाशा देना तक उचित नहीं समझा. Domestic Dispute

Bihar News: बेटे के कातिल पर आया मां को रहम

Bihar News: बिहार के गया शहर के हाईप्रोफाइल आदित्य मर्डर केस में अदालत ने हत्यारे रौकी उर्फ राकेश रंजन यादव (25 साल), उस के साथी टेनी यादव उर्फ राजीव कुमार (23 साल), उस की मां मनोरमा देवी के सरकारी बौडीगार्ड राजेश कुमार (32 साल) को उम्रकैद तथा रौकी के पिता बिंदी यादव (55 साल) को 5 साल की कैद की सजा सुनाई है.

जदयू की निलंबित एमएलसी मनोरमा देवी और पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष बिंदी यादव के बिगड़ैल बेटे रौकी उर्फ राकेश रंजन यादव ने पिछले साल 7 मई को गया के बड़े कारोबारी श्याम सचदेवा के बेटे आदित्य सचदेवा की गोली मार कर हत्या कर दी थी. आदित्य की गलती सिर्फ इतनी थी कि वह रौकी की लैंडरोवर कार को ओवरटेक कर के आगे निकल गया था. सत्ता और दौलत के नशे में चूर रौकी को आदित्य की इस हरकत पर इतना गुस्सा आया कि उस ने उसे गोली मार दी थी.

मृतक आदित्य की मां चंदा सचदेवा ने अदालत से अनुरोध किया था कि उन के मासूम बेटे के हत्यारों को फांसी की सजा न दी जाए. वह नहीं चाहतीं कि फांसी दे कर उन की तरह एक और मां की गोद सूनी कर दी जाए. 31 अगस्त को जब आदित्य की हत्या के मामले में रौकी और उस के साथियों को दोषी ठहरा दिया गया तो चंदा सचदेवा ने रोते हुए कहा था कि आखिर उन के बेटे का क्या कसूर था, जो उसे इस तरह मार दिया गया? उस ने तो अभी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी. बेटे की मौत के बाद से आज तक उन के आंसू नहीं थमे हैं.

society

शायद जिंदा रहने तक थमेंगे भी नहीं, इसीलिए वह नहीं चाहती थीं कि ऐसा दर्द किसी अन्य मां को मिले. उन्होंने अदालत का फैसला आने से पहले ही कहा था, ‘‘मेरा बेटा तो चला गया, पर मैं किसी और मां को ऐसा दर्द देने या दिलाने के बारे में कतई नहीं सोच सकती. रौकी को अदालत कड़ी से कड़ी सजा दे, पर फांसी न दे.’’ बाद में फैसला आने पर उन्होंने कहा, ‘‘अदालत ने जो फैसला सुनाया है, उस से मैं संतुष्ट हूं.’’

चंदा सचदेवा का कहना सही भी है. जवान बेटे के खोने का दर्द उन से बेहतर और कौन जान सकता है. वह अपना दर्द कम करने के लिए अन्य मां का बेटा नहीं छीनना चाहती थीं. सरकारी वकील सरताज अली ने बहस के दौरान कहा था कि यह बहुत जघन्यतम मामला है, इसलिए हत्यारे रौकी को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए. जज ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा था कि यह मामला रेयरेस्ट औफ रेयर नहीं है, इसलिए 3 आरोपियों को उम्रकैद और एक को 5 साल की कैद की सजा दी जाती है.

आदित्य के पिता श्याम सचदेवा कहते ने कहा कि सरकार, पुलिस और प्रशासन ने उन का पूरा साथ दिया. इसी का नतीजा है कि आज उन्हें इंसाफ मिला है. इस हत्याकांड की जांच और सुनवाई के दौरान तमाम उतारचढ़ाव आए. वारदात के 3 दिनों बाद 10 मई को रौकी को गिरफ्तार किया गया था. 6 जून को सभी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी. मुख्य आरोपी रौकी की जमानत की अर्जी को गया सिविल कोर्ट ने खारिज कर दिया था. इस के बाद रौकी ने पटना हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की थी.

19 अक्तूबर, 2016 को वहां से जमानत मिल गई थी. हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने के विरोध में बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, जहां रौकी की जमानत रद्द कर दी गई तो उसे दोबारा जेल जाना पड़ा. इस मामले में 29 लोगों की गवाही हुई थी.

क्यों मारा गया आदित्य

पिछले साल 7 मई की रात 8-9 बजे के बीच गया के कारोबारी श्याम कुमार सचदेवा का बेटा आदित्य सचदेवा अपने दोस्त की मारुति स्विफ्ट कार बीआर-02ए सी2699 से बोधगया से गया स्थित अपने घर की ओर आ रहा था. वह अपने दोस्तों के साथ बर्थडे पार्टी में बोधगया गया था. रास्ते में जेल के पास ही सत्तारूढ़ दल जदयू की एमएलसी मनोरमा देवी के बेटे रौकी अपनी लैंडरोवर कार से आदित्य की कार को ओवरटेक करने की कोशिश करने लगा.

काफी देर तक आदित्य ने उसे आगे नहीं जाने दिया. जब खाली सड़क मिली, रौकी ने उस की कार को ओवरटेक कर के आदित्य की कार रुकवा ली. इस के बाद उस ने उसे कार से उतार कर जम कर पिटाई की. पिटाई के बाद आदित्य और उस के साथियों ने उन से माफी मांग ली. वे अपनी कार की अेर जाने लगे तो बाहुबली बाप के बिगड़ैल बेटे रौकी ने पीछे से गोली चला दी, जो आदित्य के सिर में जा लगी. वह जमीन पर गिर पड़ा. थोड़ी देर तक वह तड़पता रहा, उस के बाद प्राण त्याग दिए.

आदित्य के दोस्तों के बताए अनुसार, रात पौने 8 बजे के करीब उन की कार ने एक लैंडरोवर एसयूवी कार को ओवरटेक किया. इस के बाद वह कार उन की गाड़ी के आगे जाने के लिए रास्ता मांगने लगी. उस कार से आगे निकल कर उन की कार सिकरिया मोड़ से गया शहर में पुलिस लाइन की ओर मुड़ गई.

इस के कुछ देर बाद लैंडरोवर कार आदित्य की स्विफ्ट कार के बगल में आई तो उस में बैठे लोगों ने शोर मचाते हुए कार रोकने का इशारा किया. कार चला रहे नासिर ने गाड़ी रोक दी तो उस कार से 4 लोग नीचे उतरे. उन में रौकी, बौडीगार्ड, ड्राइवर और एक अन्य आदमी था, जिसे वे नहीं पहचानते थे.

society

रौकी ने आदित्य की पिटाई तो की ही, पिस्तौल की बट से नासिर पर भी हमला किया, जिस से उस ने गाड़ी को भगाने की कोशिश की. गाड़ी कुछ ही दूर गई थी कि पीछे से गोली चलने की आवाज आई. वह गोली आदित्य को लगी, जिस वह सीट पर ही लुढ़क गया.

हत्यारे की गिरफ्तारी

हत्या के इस मामले में पुलिस ने रौकी उर्फ राकेश रंजन यादव, उस के पिता और मनोरमा देवी के पति बिंदेश्वरी यादव उर्फ बिंदी यादव को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. मनोरमा देवी का सरकारी बौडीगार्ड राजेश कुमार भी हत्या के इस मामले में शामिल था. पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया था. उस के पास से 70 राउंड गोली और कारबाइन जब्त कर ली गई थी. उस पर आरोप था कि उस ने रौकी को गोली चलाने से रोका नहीं था.

एडीजे मुख्यालय सुनील कुमार ने बताया था कि हथियार की फोरैंसिक जांच में पता चला था कि बौडीगार्ड के हथियार से गोली नहीं चलाई गई थी. पूछताछ में बौडीगार्ड ने बताया था कि रौकी ने ही आदित्य पर गोली चलाई थी. रौकी के पिता बिंदी यादव का पुराना आपराधिक रिकौर्ड रहा है. वह और उस का बेटा रौकी, दोनों ही रिवौल्वर रखते थे. गया के थाना रामपुर में आदित्य के भाई आकाश सचदेवा की ओर से आदित्य की हत्या का मुकदमा अपराध संख्या 130/2016 पर आईपीसी की धारा 341, 323, 307, 427, 120बी और 27 आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज किया गया था.

जबकि पुलिस यह मुकदमा दर्ज करने में टालमटोल कर रही थी. लेकिन आदित्य के घर वालों का कहना था कि जब तक मुकदमा दर्ज नहीं होगा, वे लाश का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे. सियासी और प्रशासनिक दांवपेच चलते रहे. पुलिस ने 5 बार मुकदमे का मजमून बदलवाया. आदित्य के पिता श्याम कुमार सचदेवा गया के बड़े कारोबारी हैं. वह मूलरूप से पंजाब के रहने वाले हैं. थाना कोतवाली के स्वराजपुरी रोड पर महावीर स्कूल के पास उन की सचदेवा इंटरप्राइजेज के नाम से पाइप की दुकान है.

कौन था आदित्य

आदित्य ने गया के नाजरथ एकेडमी कौनवेंट स्कूल से 12वीं की परीक्षा दी थी. उस की मौत के बाद उस का परीक्षाफल आया था. आदित्य के चाचा राजीवरंजन के अनुसार, उन का परिवार करीब 65 साल पहले पाकिस्तान से आ कर गया में बसा था. आदित्य से पहले उन के परिवार के एक अन्य सदस्य की हत्या हो चुकी थी. सन 1987 में उन के बड़े भाई हरदेव सचदेवा के बेटे डिंपल की हत्या पतरातू में कर दी गई थी. इस के बाद उन के छोटे भाई के छोटे बेटे को मार दिया गया.

7 मई को आदित्य की हत्या हुई थी. 10 और 11 मई की रात 2 बजे के करीब रौकी को उस के पिता बिंदी यादव के मस्तपुरा स्थित मिक्सचर प्लांट से गिरफ्तार किया गया था. उस के पास से हत्या में इस्तेमाल की गई विदेशी रिवौल्वर और गोलियों से भरी मैगजीन बरामद की गई थी. उस के पिस्तौल का लाइसैंस दिल्ली से जारी किया गया था. पूछताछ में रौकी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. लेकिन बाद में वह अपने अपराध से मुकर गया था. उस का कहना था कि उस ने आदित्य की हत्या नहीं की. घटना के समय वह दिल्ली में था. वह तो मां के बुलाने पर गया आया था. अपनी मां के कहने पर ही उस ने आत्मसमर्पण किया था, पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया.

जबकि एसएसपी का कहना था कि रौकी को गिरफ्तार किया गया था. आदित्य की हत्या के बाद एमएलसी मनोरमा देवी का पूरा परिवार और राजनीति चौपट हो गई. पहले बेटा रौकी हत्या के मामले में जेल गया, उस के बाद उस के पति बिंदी यादव को भी पुलिस ने हत्यारों को छिपाने और भगाने के आरोप में सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था.

इस के बाद रौकी की खोज में जब पुलिस ने मनोरमा के घर छापा मारा तो रौकी तो वहां नहीं मिला, लेकिन उन के घर से विदेशी शराब की 6 बोतलें बरामद हुई थीं. राज्य में शराबबंदी के बाद सत्तारूढ़ दल के एमएलसी के घर से शराब की बोतलें मिलने से सरकार को छीछालेदर से बचाने के लिए तुरंत मनोरमा देवी को जदयू से निलंबित कर दिया गया था.

हत्यारे की मां भी जेल में

मनोरमा देवी के घर से शराब मिलने के बाद आननफानन उन की गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया गया था. 11 मई को जिला प्रशासन, पुलिस और उत्पाद विभाग के अफसरों की मौजूदगी में मनोरमा देवी के घर को सील कर दिया गया था, जबकि वह फरार थीं. जिस घर से शराब बरामद हुई थी, वह मनोरमा देवी के नाम था, इसलिए इस मामले में उन्हें आरोपी बनाया गया. बाद में उन्हें गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया था. पुलिस जांच से पता चला था कि रौकी ने जिस रिवौल्वर से आदित्य की हत्या की थी, वह इटली की बरेटा कंपनी का था. वह .380 बोर का था. पुलिस सूत्रों के अनुसार, आदित्य की हत्या करने के बाद रौकी पटना समेत राज्य के कई स्थानों पर छिपता रहा.

हत्या करने के तुरंत बाद रौकी भाग गया था. इस के बाद वह दिल्ली जाना चाहता था, लेकिन अचानक उस का प्लान बदल गया और वह गया चला गया. गिरफ्तारी के बाद उसे गया सैंट्रल जेल में रखा गया था, जहां उसे कैदी नंबर 22774 की पहचान मिली थी. उस के बाहुबली पिता बिंदी यादव को कैदी नंबर 22758 की पहचान मिली थी. दोनों को जेल के एक ही वार्ड में रखा गया था. आदित्य हत्याकांड की जांच के दौरान यह भी खुलासा हुआ था कि देशद्रोह के आरोपी बिंदी यादव को किस तरह से सरकारी बौडीगार्ड मुहैया कराया गया था.

जिला सुरक्षा समिति ने 9 फरवरी, 2016 को बिंदी यादव को भुगतान के आधार पर एक पुलिसकर्मी मुहैया कराया था. बिंदी पर आरोप था कि उस ने प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा-माओवादी को प्रतिबंधित बोर की कई हजार गोलियां और हथियार उपलब्ध कराए थे. इस मामले में वह लंबे समय तक गया जेल में बंद रहा था.

Pune Crime News: रासिला ने ऐसा सोचा भी न था

Pune Crime News: आईटी क्षेत्र में बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी का एक बड़ा नाम है. केरल की रहने वाली रासिला ओ.पी. इसी कंपनी के पुणे फेज-2 स्थित कंपनी में नौकरी करती थी. वह सौफ्टवेयर इंजीनियर थी. इस कंपनी के प्रोजेक्ट इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों को कभीकभी 24-24 घंटे तक काम करना पड़ता है. 29 जनवरी को रविवार था.

शहर के अधिकांश औफिस और प्रतिष्ठान बंद थे. लेकिन इंफोसिस कंपनी का एक प्रोजेक्ट इतना अर्जेंट था कि उसे पूरा करने के लिए कर्मचारियों को रविवार को भी औफिस आना पड़ा था. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी पुणे और बंगलुरु टीम को सौंपी गई थी. रासिला भी उस दिन इसी प्रोजेक्ट की वजह से औफिस आई थी. बंगलुरु में कुछ कर्मचारी अपनेअपने घरों में बैठ कर उस की मदद कर रहे थे.

कंपनी का प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया था. केवल कुछ ही औपचारिकताएं बाकी रह गई थीं कि शाम 7 बजे अचानक रासिला और बंगलुरु टीम के बीच फोन और ईमेल से होने वाली बातचीत बंद हो गई. बंगलुरु के कर्मचारी समझ नहीं पाए कि अचानक यह क्या हो गया.

तमाम कोशिशों के बाद भी रासिला और बंगलुरु के कर्मचारियों के बीच जब संपर्क नहीं हो पाया तो उन के मन में तरहतरह की आशंकाएं जन्म लेने लगीं. उन्होंने पुणे के बड़गांव में रहने वाले इंफोसिस सौफ्टवेयर के सीनियर एसोसिएट कंसलटेंट और रासिला के प्रोजेक्ट रिपोर्टिंग मैनेजर अभिजीत कोठारी को फोन किया.

उन्हें सारी बातें बता कर रासिला के विषय में पता लगाने के लिए कहा. अभिजीत ने उसी वक्त रासिला को फोन लगाया. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, पर वह फोन नहीं उठा रही थी. इस के बाद उन्होंने पुणे फेज-2 स्थित कंपनी के औफिस के लैंडलाइन पर फोन किया.

फोन एक सिक्योरिटी गार्ड ने उठाया. उस ने अभिजीत को बताया कि वह ड्यूटी पर अभीअभी आया है. उस के पहले ड्यूटी पर सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया था. वह अपनी ड्यूटी पूरी कर के अपना चार्ज उसे दे कर चला गया है. अभिजीत कोठारी ने जब ड्यूटी पर मौजूद गार्ड से रासिला के बारे में पूछा तो गार्ड रासिला की केबिन में गया. इस के बाद उस गार्ड ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

फिर क्या था, कुछ ही देर में अभिजीत कोठारी इंफोसिस के औफिस पहुंच गए. उन्होंने देखा कि औफिस के अंदर रासिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. शव के आसपास काफी खून फैला था. चेहरा पूरी तरह किसी भारी और ठोस वस्तु से कुचला गया था. अभिजीत कोठारी ने मामले की जानकारी कंपनी के प्रमुख अधिकारियों और रासिला के परिवार वालों को देने के बाद थाना हिंजवाली पुलिस को दे दी थी.

थाना हिंजवाली के थानाप्रभारी अरुण वायकर अपने सहायकों के साथ तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. हत्या की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे कर वह मामले की जांच में जुट गए. वह घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि पुणे शहर के डीसीपी गणेश शिंदे, एसीपी वैशाली जाधव भी घटनास्थल पर आ गईं.

उन के साथ डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के अधिकारी भी आए थे. सभी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि रासिला की हत्या की बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले में एक पीले रंग का तार लपेटा हुआ था. वह कंप्यूटर का तार था. पुलिस यह जानने की कोशिश करने लगी कि ऐसा कौन व्यक्ति हो सकता है, जिस ने इस की हत्या के बाद चेहरा तक कुचल दिया.

घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए पुणे के मसन अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत कोठारी की ओर से रासिला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. शुरुआती जांच में पुलिस को पता चला कि रासिला जिस केबिन में बैठती थी, वह बेहद सुरक्षित थी.

उस का दरवाजा एक विशेष कार्ड के टच होने पर ही खुलता था. इस से पुलिस को यही लगा कि उस की हत्या में किसी ऐसे आदमी का हाथ है, जिस का उस केबिन में आनाजाना था. इस संबंध में पुलिस ने कंपनी के कर्मचारियों से पूछताछ की तो कंपनी का सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया पुलिस के शक के दायरे में आ गया. इस के बाद कंपनी के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई तो स्पष्ट हो गया कि सिक्योरिटी गार्ड भावेन ने ही रासिला की हत्या की थी.

एसीपी वैशाली जाधव के निर्देशन में जब पुलिस टीम सिक्योरिटी गार्ड भावेन के घर पर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. उस के घर के दरवाजे पर ताला लगा था. पड़ोसियों ने बताया कि भावेन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह अपने गांव चला गया है. जिस सिक्योरिटी एजेंसी में उस की नियुक्ति थी, उस से संपर्क कर पुलिस ने भावेन के बारे में सारी जानकारी ले ली.

जहांजहां से भावेन के गांव जाने के साधन मिलते थे, उन सभी रास्तों पर नाकेबंदी करवा दी गई. इस के अलावा जांच टीम को 7 भागों में विभाजित कर उन्हें महानगर मुंबई और पुणे के विभिन्न इलाकों के लिए रवाना कर दिया गया. रासिला की हत्या पुणे पुलिस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी थी. क्योंकि पिछले साल आईटी प्रोफेशनल महिला ज्योति कुमारी, नयना पुजारी, दर्शना टोगारी और अंतरा दास की कंपनी के सिक्योरिटी गार्डों द्वारा जिस तरह हत्याएं की गई थीं, उसे देख कर आईटी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के भीतर डर का माहौल बन गया था.

इसलिए इस मामले का खुलासा करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर दबाव बढ़ गया था. यही वजह थी कि एसीपी वैशाली जाधव ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली थी. आखिरकार एसीपी वैशाली जाधव और उन की टीम की मेहनत रंग लाई और 8 घंटे की कोशिश के बाद सौफ्टवेयर इंजीनियर रासिला के हत्यारे भावेन सैकिया को महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस टीम जिस समय छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंची थी, उस समय रात के लगभग 3 बज रहे थे. भावेन सैकिया अपना पूरा चेहरा कंबल के नीचे ढक कर टिकट खिड़की के पास बैठा खिड़की के खुलने का इंतजार कर रहा था. मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया को ले कर पुलिस पुणे आ गई. उस से थोड़ी पूछताछ कर के उसे पुणे के प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी ए.एस. वारूलकर के सामने पेश कर 4 फरवरी, 2017 तक की रिमांड पर ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने इस हत्याकांड की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली.

27 वर्षीय भावेन सैकिया मूलरूप से असम के गांव ताती विहार का रहने वाला था. उस के पिता ने 3 शादियां की थीं. भावेन सैकिया उन की तीसरी पत्नी का बेटा था. भावेन महत्त्वाकांक्षी के साथ पढ़ाईलिखाई में भी होशियार था.

उस का स्वभाव उग्र था. इस वजह से उस की अपने सौतेले भाइयों से नहीं पटती थी. 12वीं कक्षा में अच्छे अंक पाने के बाद उस ने स्नातक की पढ़ाई करनी चाही पर उस के सौतेले भाई नहीं चाहते थे कि वह पढ़े. किसी न किसी बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगते थे. फिर एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि सन 2013 में उस ने अपने सौतेले भाई की हत्या कर दी. हत्या के बाद वह घर से फरार हुआ तो वापस गांव नहीं लौटा.

सन 2014 में वह पुणे पहुंच गया और वहां की एक सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर उस की नौकरी लग गई. कंपनी की तरफ से भावेन की तैनाती इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी के औफिस में हो गई. उस ने औफिस के पास ही हिजवाड़ी जयरामनगर के फेज-3 में एक कमरा किराए पर ले लिया.

नौकरी के दौरान उस में काफी परिवर्तन आ गया था. औफिस में काम करने वाली लड़कियों को वह चाहत की निगाहों से देखता. खूबसूरत लड़कियां उस की कमजोरी बन गई थीं. किसी न किसी बहाने वह उन से बातें करता और उन्हें छूने की कोशिश करता था. इसी प्रकार की कोशिश जब उस ने रासिला ओ.पी. के साथ की तो उस ने भावेन की बात अनदेखी नहीं की, बल्कि उस से अपनी नाराजगी भी जता दी.

घटना के 2 दिन पहले रासिला ने भावेन सैकिया को अपने केबिन में बुला कर काफी डांटाफटकारा और उस की हरकतों की शिकायत ईमेल द्वारा उस की सिक्योरिटी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से करने की भी धमकी दी. इस धमकी से भावेन काफी डर गया था. उसे लग रहा था कि रासिला उस की शिकायत जरूर कर देगी. उस की शिकायत पर उसे अपनी नौकरी जाने का डर था.

24 वर्षीय रासिला ओझम पोईल पुराईत उर्फ रासिला ओ.पी. मूलरूप से केरल राज्य के कालीकट जिले के गांव कुदमंगलम की रहने वाली थी. उस के पिता ओझम पोईल पुराईत उर्फ राजू ओ.पी. होमगार्ड में एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे. परिवार में उस के और पिता के अलावा एक बड़ा भाई तेजस कुमार ओ.पी. था. मां पुष्पलता का देहांत उस समय हो गया, जब छोटी थी. दोनों भाईबहन का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता था. पिता से ही दोनों को मां का प्यार मिला था. घर की परिस्थतियों को देखते हुए दोनों बच्चों ने मन लगा कर पढ़ाई की.

रासिला और तेजस कुमार दोनों ने 98 प्रतिशत अंकों से 12वीं की परीक्षा पास की. इंजीनियरिंग की परीक्षाएं भी दोनों ने प्रथम श्रेणी से पास की थीं. इंजीनियरिंग के बाद तेजस कुमार को आबूधाबी की एयरलाइंस कंपनी में और रासिला की बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी में असिस्टैंट इंजीनियर के पद पर नौकरी लग गई. अपने बच्चों को अच्छी जगह और अच्छे पद पर देख कर राजू ओ.पी. की सारी चिंताएं दूर हो गईं. रासिला की अच्छी पोस्ट देख कर तो उस की शादी के रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे.

रासिला खूबसूरत तो थी ही, साथ ही वह कंपनी की जिस पोस्ट पर काम करती थी, उस की जिम्मेदारी भी अच्छी तरह निभा रही थी. अपने काम और व्यवहार से उस ने कंपनी के कई वरिष्ठ अधिकारियों के दिल में एक खास जगह बना ली थी. इस श्रेणी में एक बड़ा अधिकारी ऐसा था जो रासिला को अपने दिल में एक खास जगह देना चाहता था, पर रासिला को वह पसंद नहीं था. जिस के कारण वह अधिकारी रासिला से चिढ़ गया और उसे किसी न किसी बहाने परेशान करने लगा.

उस अधिकारी से परेशान हो कर रासिला ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से उस की शिकायत कर दी. साथ ही अपना इस्तीफा भी दे दिया. लेकिन कंपनी ने उस का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. बल्कि कंपनी ने रासिला का ट्रांसफर इंफोसिस कंपनी की पुणे ब्रांच में कर दिया और पुणे के हिजवाड़ी के जयरामनगर फेज-1 में उस के रहने की व्यवस्था भी कर दी. पुणे ब्रांच में रासिला को आए अभी 5 महीने ही हुए थे कि उसे औफिस के सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया से दोचार होना पड़ा.

घटना के दिन सारा औफिस बंद होने के बावजूद भी कंपनी द्वारा सौंपे गए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रासिला को अपने औफिस आना पड़ा था. दिन के 2 बजे जब वह अपने औफिस में पहुंची तो काफी खुश थी. उस समय सिक्योरिटी गार्ड भावेन अपनी ड्यूटी पर तैनात था. रासिला ने अपने एक्सेस कार्ड से केबिन का लौक खोला और केबिन के अंदर जा कर अपने बंगलुरु ब्रांच के कुछ साथियों के साथ औनलाइन जुड़ कर अपने प्रोजेक्ट की तैयारी में जुट गई थी.

इधर रासिला की धमकी और अपनी नौकरी को ले कर भावेन काफी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या न करे. शिकायत को अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक जाने से कैसे रोके इसी बारे में वह सोचने लगा. सोचविचार करने के बाद उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.

उस समय रासिला औफिस में अकेली थी. बातचीत करने के लिए मौका अच्छा था. अपनी हरकतों की माफी मांगने के बहाने वह रासिला के केबिन में जाने में कामयाब हो गया. केबिन के अंदर पहुंचते ही उस ने रासिला से कहा, ‘‘मैडम, आप मेरी शिकायत मेरे अधिकारियों से नहीं करना वरना मेरी नौकरी चली जाएगी और मैं बेकार हो जाऊंगा.’’ वह गिड़गिड़ाया.

रासिला ने एक बार गार्ड के चेहरे को देखा. जिस पर मिलेजुले खौफ का असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था. हालांकि रासिला ने उस की हरकतों को नजरअंदाज कर दिया था. लेकिन वह उसे थोड़ा और सबक सिखाना चाहती थी, जिस से वह सुधर जाए. इसलिए वह गंभीर होते हुए बोली, ‘‘नौकरी चली जाएगी, बेकार हो जाओगे तो मैं क्या करूं. तुम्हें  लड़कियों को परेशान करने का बड़ा शौक है न, अब भुगतो, मैं ने तो तुम्हारी शिकायत तुम्हारी कंपनी के सीनियर अधिकारियों को ईमेल से कर दी है. अब जाओ गांव में ही बैठना.’’

यह सुन कर भावेन का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा. अपने आपे से बाहर होते हुए उस ने इंटरनेट का वायर खींच कर रासिला के गले में डालते हुए कहा, ‘‘मैडम, यह तुम ने अच्छा नहीं किया. अब तुम्हें इस की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी.’’

रासिला उस का इरादा जान कर अपने बचाव के लिए काफी चीखीचिल्लाई. पर उस वक्त उस की मदद के लिए वहां कोई नहीं था. उस ने उस इंटरनेट वायर से रासिला का गला घोंट दिया. उस की हत्या करने के बाद उस ने अपने बूटों से ठोकरें मारमार कर उस का चेहरा लहूलुहान कर दिया.

रासिला की हत्या करने के बाद जब भावेन का गुस्सा शांत हुआ तो वह बाहर आ कर आराम से अपनी जगह बैठ गया. उसे पुलिस और कानून का डर लगने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब कहां जाए. गांव जा नहीं सकता था, क्योंकि उस पर सौतेले भाई की  हत्या का आरोप था. पुणे और गांव की पुलिस से बचने के लिए उस के पास कोई रास्ता नहीं था. ऐसे में उसे बस आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं दिखा.

उस की ड्यूटी का टाइम भी पूरा हो चुका था. जैसे ही दूसरा सिक्योरिटी गार्ड शिफ्ट बदलने आया तो उसे जिम्मेदारी सौंप कर भावेन औफिस से निकल गया. आत्महत्या करने के लिए वह पुणे रेलवे स्टेशन पर पहुंचा ताकि किसी टे्रेन के सामने कूद कर जीवनलीला खत्म कर ले लेकिन ऐसा करने की उस की हिम्मत नहीं हुई.

फिर उस ने आत्महत्या करने के बजाय किसी दूसरे शहर में जाने का इरादा बनाया. अपने कमरे से उसे कुछ जरूरी सामान भी साथ लेना था. इसलिए कमरे पर पहुंच कर उस ने पड़ोसियों से झूठ कह दिया कि उस की मां की तबीयत खराब है. बैग में कपड़े आदि भर कर वह महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंचा. वहां से टिकिट ले कर उसे अपनी किसी मंजिल की ओर रवाना होना था. पर इस के पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. भावेन मराली सैकिया से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने न्यायालय में पेश कर उसे जेल भेज दिया.

पुलिस ने रासिला ओ.पी. के शव को पोस्टमार्टम के बाद उस के पिता राजू ओ.पी. और परिजनों को सौंप दिया. पिता और परिवार वालों का कहना था कि रासिला की हत्या एक साजिश के तहत इंफोसिस कंपनी के ही एक बड़े अधिकारी ने कराई है, जिस की शिकायत उन्होंने हिजवाड़ी पुलिस थाने में दर्ज करवा दी.

पुलिस ने उन्हें भरोसा दिया कि रासिला की हत्या के मामले में जो भी दोषी होगा, उस के खिलाफ सख्त काररवाई की जाएगी. मामले की जांच थानाप्रभारी अरुण वायकर कर रहे थे. कथा लिखे जाने तक भावेन सैकिया की जमानत नहीं हो सकी थी. Pune Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित