प्यार ने बना दिया नागिन – भाग 4

पिता और भाई के पकड़े जाने पर मोहर सिंह इंसपेक्टर उदयराज सिंह से मिला. उस ने उन्हें बताया कि जब वह अपने भांजे पूरन के साथ रचना को विदा करा कर ले आ रहा था तो रचना एक बैग लिए थी, उस में उस ने सफेद कपड़े लपेट कर कोई चीज रख रखी थी. उस बैग को उस ने किसी को छूने नहीं दिया था. उस बैग को ला कर उस ने घर की उस अलमारी में रख दिया था, जिस में 3 हजार रुपए और चांदी के कुछ गहने रखे थे. रचना के साथसाथ रुपए और गहने भी गायब हैं.

मोहर सिंह की बात सुन कर इंसपेक्टर उदयराज सिंह को यह सारा मामला रहस्यमय लगा. इसलिए रहस्य को उजागर करने की जिम्मेदारी उन्होंने एसएसआई शंभू सिंह को सौंप दी.

शंभू सिंह मामले की जांच शुरू करते उस के पहले ही बिहारी को पता चल गया कि जिस दिन से रचना गायब है, उसी दिन से उस का भांजा रामेश्वर भी गायब है. बिहारी को रचना और रामेश्वर के संबंधों का पता था ही, इसलिए उसे लगा कि रचना रामेश्वर के साथ ही भाग गई है.

उस ने यह बात घर वालों को बताई तो घर वाले कुछ लोगों को ले कर रामेश्वर के घर पहुंचे. तब रामेश्वर के घर वालों ने साफ कह दिया कि अब वे लोग रचना को भूल जाएं. इस से साफ हो गया कि रचना रामेश्वर के साथ भागी थी. तब उन्होंने पूरी बात जांच अधिकारी शंभू सिंह को बताई तो उन्होंने अपनी जांच का केंद्र रामेश्वर को बना लिया.

शंभू सिंह ने रामेश्वर का मोबाइल फोन सर्विलांस पर लगवा दिया. पता चला कि रामेश्वर घर वालों से लगातार बातें कर रहा है. इस से साफ हो गया कि रामेश्वर ने जो भी किया है, वह घर वालों को पता है. सर्विलांस से पुलिस ने पता कर लिया कि रामेश्वर भोपाल में है.

शंभू सिंह ने रामेश्वर के 2 भाइयों को तो हिरासत में ले ही लिया था, इंसपेक्टर उदयराज सिंह ने एसआई चंद्रभान के नेतृत्व में 2 सिपाही तथा एक महिला सिपाही पवित्रा शर्मा की टीम को भी भोपाल रवाना कर दिया. भोपाल में रामेश्वर और रचना कहां रह रहे हैं, यह पता लगाने में उन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी.

दरअसल, रामेश्वर रचना के साथ जिस मकान में रह रहा था, वह एक सिपाही ब्रजेश कुमार का था. रचना की हरकतों से ब्रजेश कुमार को संदेह हो गया था कि यह ये दोनों घर से भागे हुए हैं. कमरा किराए पर देते समय उस ने रामेश्वर से उस के बारे में पूरी जानकारी ले ली थी, इसलिए उस ने मथुरा पुलिस को उन के वहां होने की जानकारी दे दी थी.

मथुरा से गई पुलिस टीम ने भोपाल पुलिस की मदद से सिपाही ब्रजेश कुमार के घर छापा मारा. रामेश्वर तो भागने में सफल हो गया, लेकिन रचना को पुलिस ने पकड़ लिया. शायद रामेश्वर को संदेह हो गया था.

21 अक्तूबर, 2014 को पुलिस रचना को थाना गोवर्धन ले आई. जब रचना के आने की जानकारी लोगों को हुई तो उस की एक झलक पाने के लिए वहां भीड़ इकट्ठा हो गई. थाने में की गई पूछताछ में रचना ने रामेश्वर के साथ भागने की जो कहती सुनाई, वह इस प्रकार थी.

रचना रामेश्वर से प्यार करती थी और उसी से शादी भी करना चाहती थी. लेकिन जब उस की शादी बिहारी से हो गई तो उस ने सोचा कि शायद उस के नसीब में बिहारी ही था. संयोग से बिहारी रामेश्वर का मामा था. शादी के बाद रचना ने सोचा था कि अब वह रामेश्वर से बात नहीं करेगी. लेकिन लगातार मिलते रहने की वजह से रामेश्वर ने उस के दिल में फिर वही जगह बना ली, जो पहले थी.

रामेश्वर और रचना को एकदूसरे से चिपके देख कर बिहारी पत्नी के साथ मारपीट करने लगा. परेशान हो कर उस ने रामेश्वर के साथ भाग जाने का फैसला कर लिया. पकड़े जाने के डर से उस ने लोगों को भ्रमित करने के लिए नागिन बनने का ड्रामा रचा था.

पूरी योजना बना कर रामेश्वर ने एक संपेरे से नागिन खरीदी. उसे छोड़ कर वे भाग गए. बाद में पता चला कि वह नागिन नहीं, नाग है. उसी की वजह से बात पुलिस तक पहुंची.

पूछताछ के बाद पुलिस ने रचना को अदालत में पेश किया, जहां मजिस्ट्रेट के सामने उस के बयान हुए. चूंकि उस ने ऐसा कोई अपराध नहीं किया था कि उसे जेल भेजा जाता, इसलिए मजिस्ट्रेट के आदेश पर उसे मांबाप के हवाले कर दिया गया. पुलिस को अब रामेश्वर की तलाश है. अब देखना यह है कि रचना की आगे की जिंदगी पति के साथ बीतती है या प्रेमी के साथ.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अधिवक्ता पत्नी की जिंदगी की वैल्यू पौने 6 करोड़

एक जवान औरत की नौटंकी – भाग 2

चूंकि नीरू का पति फिर से जेल चला गया था, इसलिए उस ने गौरव से फिर मिलना शुरू का दिया. यह खबर राजा को जेल में मिली तो वह सुन कर तिलमिला उठा. 6 फरवरी, 2014 की रात 10 बजे गौरव अपने घर पर ही था. उसी समय उस के पास किसी का फोन आया कि केबिल खराब है, आ कर देख लो. फोन आने के फौरन बाद गौरव बाइक ले कर निकल पड़ा. वह अभी सेंटर पार्क फजलगंज के पास पहुंचा था कि उसे कुछ लड़कों ने घेर लिया.

इस से पहले कि गौरव कुछ समझ पाता, उन लड़कों ने उस पर लातघूंसों और चाकू से हमला कर दिया. उन के पास तमंचे भी थे. कुछ लोगों ने यह नजारा देखा, लेकिन उन लोगों के हथियारों को देख कर किसी ने पास जाने की हिम्मत नहीं की. उसी दौरान किसी व्यक्ति ने 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस को सूचना दे दी कि सेंटर पार्क में एक युवक को कुछ लोग बुरी तरह मार रहे हैं.

सूचना पा कर फजलगंज पुलिस मौके पर पहुंची तो हमलावर फरार हो गए. वहां एक युवक की लहूलुहान लाश पड़ी थी. पुलिस उसे हैलट अस्पताल ले गई. लेकिन तब तक वह मर चुका था. पुलिस ने जब तलाशी ली तो जेब में एक आइडेंटी कार्ड मिला. जिस में गौरव कपूर नाम लिखा था. आईडी कार्ड पर लगी फोटो मरने वाले युवक के चेहरे से मेल खा रही थी, इसलिए पुलिस को लगा कि मरने वाले का नाम गौरव कपूर ही है.

पुलिस ने आइडेंटिटी कार्ड में लिखे फोन नंबर पर काल किया तो पता चला कि वह फोन नंबर गौरव के घर का है. पुलिस ने उस के घर वालों को इस हादसे की सूचना दे दी. घर के लोग तत्काल अस्पताल आ गए. उस के घर वालों को सांत्वना देने के बाद थानाप्रभारी अनिल कुमार शाही ने मृतक के पिता राजेश कपूर से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि उन के बेटे की रंजिश राजा यादव से थी.

पिछले साल भी राजा ने गौरव पर जानलेवा हमला किया था. राजा को शक है कि उस की पत्नी नीरू के अवैध संबंध उस के बेटे से थे. राजा ने खुद या फिर अपने गुर्गों से उन के बेटे की हत्या कराई है. अभी पिछले महीने भी खोया मंडी में उस के गुर्गों ने गौरव पर हमला किया था, जिस की सूचना थाने में दर्ज कराई गई थी.

9 फरवरी, 2014 को गौरव का पोस्टमार्टम कराने के बाद उस की लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि गौरव की बाईं कनपटी पर गोली मारी गई थी. वह गोली दाईं आंख के नीचे से निकल गई थी. उस की नाक की हड्डियां भी टूटी मिलीं थीं. उस के शरीर पर धार और नोंकदार हथियार के कुल 10 घाव मिले.

एक गहरा वार दिल तक गया था, जबकि दूसरे वार से किडनी को क्षति पहुंची थी. इस के अलावा उस के चेहरे, हिप और छाती पर भी धारदार हथियारों के कई घाव मिले. डाक्टर ने उस की मौत का कारण अधिक खून बह जाना माना था.  राजेश कपूर की तहरीर पर पुलिस ने राजा यादव के अलावा रानी गंज निवासी अभिलाष द्विवेदी और 4 अन्य लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया था.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने तहकीकात की तो पता चला कि राजा यादव पहले से ही जेल में है. थानाप्रभारी अनिल कुमार शाही ने मुखबिर व सर्विलांस के जरिए अभिलाष और अमित को दबोच लिया. पूछताछ में दोनों ने बताया कि राजा यादव को शक था कि गौरव कपूर के उस की पत्नी नीरू यादव से नाजायज संबंध हैं. इसी वजह से उस ने गौरव को मारने की सुपारी उन्हें दी थी.

फजलगंज पुलिस अभी इस मामले की जांच कर रही थी कि किसी ने 12 फरवरी, 2014 को नजीराबाद थाना क्षेत्र में शिवधाम अपार्टमेंट में रह रही राजा यादव की बूढ़ी मां मीरा यादव की दिनदहाड़े बेरहमी से हत्या कर दी. पुलिस को यह खबर मृतका की बहू नीरू यादव ने दी.

खबर पा कर नजीराबाद थानाप्रभारी सैय्यद मोहम्मद अब्बास अपने साथ सबइंसपेक्टर राजबहादुर सिंह, हरीशंकर मिश्रा, राजेश कुमार, कांस्टेबल नागेश कुमार, धर्मेश कुमार, श्यामा देवी व प्रीति शाक्य को ले कर घटनास्थल पर पहुंचे. पुलिस ने देखा कि सोफे पर एक बूढ़ी औरत खून से लथपथ पड़ी थी. मृतका 60 वर्षीया मीरा यादव थी. उस की सांस चल रही थी. आननफानन में फोन कर के एंबुलेंस बुला कर उसे हैलट अस्पताल पहुंचाया गया. डाक्टरों ने उस का तुरंत इलाज शुरू कर दिया. लेकिन वह बोलने की स्थिति में नहीं थीं. देर रात को उस ने दम तोड़ दिया.

पुलिस ने नीरू यादव से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की ननद रीता नर्सिंगहोम में अपनी ड्यूटी पर गई थी. जबकि वह बाजार गई हुई थी. देर शाम जब वह बाजार से लौटी तो सास को बुरी तरह घायल पाया. सास को उस हालत में देख कर वह घबरा गई और उस ने यह सूचना पुलिस को दे दी. थानाप्रभारी सैयद मोहम्मद अब्बास ने जब उस से पूछा कि उस समय तुम्हारा बेटा कहां था तो नीरू ने बताया कि वह मोबाइल रिचार्ज कराने गया था.

थानाप्रभारी को इस बात पर हैरानी हुई कि घर में खतरनाक कुत्ता होते हुए भी कोई अनजान व्यक्ति वहां कैसे आ गया. जबकि कुत्ता खुला हुआ था. इस से पुलिस को लगा कि हत्या में जरूर किसी परिचित का हाथ है. क्षेत्राधिकारी नजीराबाद ममता कुरील भी मौके पर पहुंच गईं. उन्होंने नीरू से बात की तो उन्हें भी लगा कि वारदात में जरूर किसी जानने वाले का हाथ है.

पुलिस दोनों हत्याओं की गुत्थी सुलझाने में लगी थी कि 12 फरवरी की देर रात मीरा की बेटी रीता यादव ने पुलिस को लिखित तहरीर दी, जिस में लिखा था कि उस की मां की हत्या उस की भाभी नीरू ने गौरव कपूर के चचेरे भाई दीपक कपूर के साथ मिल कर की है. रीता ने पुलिस को बताया कि रात में जब वह ड्यूटी से घर लौटी तब नीरू और दीपक घर की सीढि़यों से उतर रहे थे. वह दीपक को अपने घर में देख कर चौंकी भी. बाद में जब वह घर के अंदर पहुंची तो मां खून से लथपथ पड़ी थी.

अनुराधा रेड्डी हत्याकांड : सीसीटीवी फुटेज से खुली मर्डर मिस्ट्री – भाग 2

सीसीटीवी फुटेज से मिला सुराग

पुलिस इस बात पर खास तवज्जो दे रही थी कि कोई व्यक्ति उस स्थान पर हाथ में काले रंग की पौलीथिन ले कर पहुंचा तो नहीं है? अगर पहुंचा है तो कैसे पहुंचा है, पैदल अथवा किसी वाहन से? अगर वाहन से पहुंचा तो उस वाहन का नंबर, रंग, मौडल और ब्रांड क्या है?

पुलिस बारीकी से और पूरी एकाग्रता से जांच में जुटी थी, लगभग सभी कैमरों की फुटेज की जांच के बाद 90 से ज्यादा गाडिय़ों और 100 से ज्यादा लोगों को शार्टलिस्ट किया गया और जांच चलती रही, लेकिन कहीं से कोई सुराग हाथ नहीं लगा. अंत में कैमरे में कैद एक शख्स पर शक हुआ, उस ने मुंह पर मास्क और सिर पर टोपी लगा रखी थी.

आमतौर पर जब कोई अपराध करता है या मौका ए वारदात पर जाता है तो उस की कोशिश होती है कि उसे कहीं भी अपना चेहरा न दिखाना पड़े. उस ने भी ऐसा ही किया था. उस शख्स की ये हरकत पुलिस को अजीब लगी, लेकिन उस का चेहरा सीसीटीवी फुटेज में कहीं साफ दिख नहीं रहा था. वह सीसीटीवी कैमरे से बारबार अपना मुंह छिपा रहा था.

उस के दाहिने हाथ में एक काले रंग की पौलीथिन थी, जब वह टैंपो से नीचे उतरा. यह वही काली पौलीथिन थी, जो मौके से बरामद की गई थी. वह रहस्यमय शख्स वहां से रेस्टोरेंट की ओर बढ़ा. वहां से (रेस्टोरेंट) उस ने पानी की एक बोतल खरीदी और दुकानदार को नकद पैसे देने के बजाय उस ने यूपीआई से पेमेंट किया और फिर कूड़ाघर की ओर वापस आया. वहां खड़े हो कर इधरउधर देखा, फिर पौलीथिन झटके से फेंक कर भीड़ में कहीं गुम हो गया.

ये क्लू पुलिस के लिए खाद जैसा काम कर गया. 23 मई की सुबह करीब 10 बजे पुलिस की टीम उस रेस्टोरेंट पर पहुंच गई थी, जहां उस संदिग्ध व्यक्ति ने 15 मई की दोपहर साढ़े 12 बजे पानी की बोतल खरीदी थी और यूपीआई से पेमेंट किया था. रेस्टोरेंट वाले से पूछताछ करने के बाद आखिरकार उस संदिग्ध शख्स तक पहुंच ही गई. उस का नाम बी. चंद्रमोहन था और पता चला कि वह दिलसुख नगर थानाक्षेत्र के चैतन्यपुर में रहता है.

संदिग्ध व्यक्ति के घर पहुंची पुलिस

24 मई, 2023 की सुबह मलकापेट पुलिस बी. चंद्रमोहन के घर चैतन्यपुर मोहल्ले में पहुंच गई और दरवाजे पर दस्तक दी. भीतर से एक शख्स ने दरवाजा खोला और सामने पुलिस को देख कर सहज भाव में पूछा, “आप किस से मिलना चाहते हैं?”

“चंद्रमोहन आप हो?” एसआई एल. भास्कर रेड्डी ने शख्स से सवाल किया.

“हां, मैं ही हूं चंद्रमोहन, क्या बात है? आप मुझ से क्यों मिलना चाहते हैं?” चंद्रमोहन से पूछा.

“बताता हूं, बताता हूं. सारे सवाल यहीं दरवाजे पर खड़ेखड़े पूछ लोगे, अंदर आने के लिए नहीं कहोगे?” इस बार इंसपेक्टर के. श्रीनिवास ने कहा.

“नहीं नहीं जी. मैं तो भूल ही गया था. आइए…आइए, अंदर आइए. फिर उस ने इंसपेक्टर के. श्रीनिवास और एसआई रेड्डी को अंदर बुलाया और ड्राइंगरूम में उन्हें बैठा दिया, बाकी पुलिस टीम घर के बाहर मुस्तैदी से तैनात रही.

“क्या लेंगे सर, चाय या पानी?” चंद्रमोहन ने सम्मानजनक तरीके से और बड़े अदब से पूछा.

“हम यहां चायपानी पीने नहीं आए हैं, बल्कि तुम से कुछ पूछताछ करने आए हैं,” इस बार इंसपेक्टर श्रीनिवास का चेहरा सख्त हो गया था.

“थीगालगुडा रोड पर डंपिंग ग्राउंड स्थित मुसी नदी के किनारे एक सीसीटीवी कैमरे में नकाबपोश के रूप में तुम्हें देखा गया है. क्या कहना चाहते हो?”

“सर, मैं स्टौक ब्रोकर हूं. शहर में बहुतेरा काम होता है. लोगों से मिलनाजुलना होता है. हो सकता है उस राह से गुजरते हुए सीसीटीवी में फोटो आ गई हो? कोई ताज्जुब की बात नहीं इस में,” चंद्रमोहन ने बड़े आत्मविश्वास के साथ पुलिस के सवाल का जवाब दिया था.

“तो तुम कहते हो, सीसीटीवी फुटेज में जो तसवीरें दिख रही हैं, वे तुम्हारी नहीं हैं किसी और की हैं.”

“मैं कब इस बात से इंकार करता हूं कि सीसीटीवी फुटेज में दिखने वाली फोटो मेरी नहीं हैं, लेकिन मैं ये भी एक्सेप्ट नहीं करता कि…”

“महिला के कटे सिर वाली लाश वाली काली पौलीथिन तुम ने नहीं किसी और ने फेंकी थी?” बीच में बात काटते हुए इंसपेक्टर के. श्रीनिवास बोले.

“हां, सच यही है, मैं ने कोई कटा हुआ सिर नहीं फेंका था.”

हाथ की चोट ने खोला हत्या का राज

बी. चंद्रमोहन के आत्मविश्वास भरे जवाब सुन कर पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि वो किसी गलत घर में पूछताछ करने आ गई, जबकि उस लाश से इस का कोई लेनादेना नहीं है. वहां से पुलिस बाहर निकलने के लिए जैसे ही उठी, तभी अचानक इंसपेक्टर श्रीनिवास की नजर चंद्रमोहन की बाईं कलाई पर पड़ी तो वह ठिठक गए और चोट के बारे में उस से पूछ बैठे, “बाई द वे, तुम्हारे हाथ में ये चोट कैसे लगी?”

“ज…ज… जी… सब्जी काटने वाले चाकू से. मैं सब्जी बनाने के लिए आलू काट रहा था, तभी छिटक कर चाकू कलाई पर लग गया और हाथ कट गया. ये जख्म उसी चाकू से बने हैं.”

“बरखुरदार, तुम्हारी जुबान तुम्हारा साथ नहीं दे रही है. और तुम सच भी नहीं बोल रहे हो?” इस बार उन्होंने अंधेरे में तीर चलाया था.

“नहीं तो, सच कह रहा हूं मैं. सब्जी काटते वक्त कलाई कट गई थी.”

“तो तुम सच ऐसे नहीं कबूलोगे, तुम्हें पुलिस की खातिरदारी की जरूरत है.” कहते हुए इंसपेक्टर श्रीनिवास ने उस के गाल पर झन्नाटेदार एक थप्पड़ जड़ा. उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया और कानों में सीटियां बजने लगीं. कुछ पल के लिएवह जैसे बहरा हो गया था, उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.

फ्रिज के अंदर मिले डैडबौडी के पाट्र्स

जब वह थोड़ा सामान्य स्थिति में हुआ तो घुटने दोहरा करते हुए नीचे फर्श पर बैठ गया. और कहा, “हां सर, मैं ने ही कल्ल किया था और उस का सिर काट कर नदी में फेंकना चाहा था, पर बदकिस्मती ने दगा दे दी और मैं आखिरकार पकड़ लिया गया.” चंद्रमोहन के चेहरे पर कोई पश्चाताप नहीं था.

“कौन थी वो? और तुम ने उस की हत्या क्यों की?” श्रीनिवास ने सवाल दागा.

“अनुराधा, यारम अनुराधा रेड्डी नाम था उस का.” बुत बना चंद्रमोहन आगे कहता गया, “क्या करता. उस ने हालात ही ऐसे बना दिए थे कि उसे मारने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था. और मैं ने उस की हत्या कर दी.”

“बाकी शरीर के अंग को कहां फेंका है तुम ने?”

“कहीं नहीं, घर में हैं.” चंद्रमोहन समझ चुका था कि उस के गुनाहों का घड़ा फूट चुका है और वह बेनकाब हो चुका है. अब सच बता देने में ही भलाई है और फिर वहां से उठा फिर पुलिस को साथ ले कर किचन में पहुंचा, जहां फ्रिज रखा था. उस ने फ्रिज खोल कर पुलिस को दिखा दिया. फ्रिज के अंदर का नजारा देख कर दोनों पुलिस अधिकारी भौचक रह गए थे.

फ्रिज के अंदर कटे हुए दोनों हाथ और पैर रखे हुए थे. यह दृश्य देख कर दोनों की जैसे रूह कांप उठी.

यही नहीं, ट्रंक के भीतर उस ने धड़ (साबूत) रखा था, जिस में से सड़ांध उठ रही थी. बदबू छिपाने के लिए, उस ने कमरे में परफ्यूम स्प्रे किया था, अगरबत्तियां भी जला रखी थीं ताकि बदबू बाहर न जा सके और उस का गुनाह पिटारे के अंदर बंद रहे.

कुल मिलाजुला कर चंद्रमोहन ने दिल्ली के श्रद्धा मर्डर कांड का रिमेक किया था और उसी की तर्ज पर मृतका के एकएक अंग को शहर के विभिन्न इलाकों में फेंक कर हमेशाहमेशा के लिए राज दफन कर एक नई जिंदगी बिताना चाहता था, लेकिन शातिर चंद्रमोहन की चालाकी चल न सकी और कानून के लंबे हाथों से धर दबोचा गया.

8 दिनों से रहस्य बनी सिर कटी लाश का परदाफाश हो चुका था और मृतका की पहचान यारम अनुराधा रेड्डी के रूप में की जा चुकी थी. मृतका कोई और नहीं, बल्कि आरोपी चंद्रमोहन की प्रेमिका थी. आखिरकार उस ने अपनी प्रेमिका की हत्या बड़ी बेरहमी से क्यों की? पुलिस पूछताछ में उस ने सारा राज उगल दिया था.

मिसकाल का प्यार – भाग 4

रूबी के बहनोई के पास रूबी का फोटो मौजूद था. फोटो के सहारे पुलिस होटलों और गेस्टहाउसों का कोनाकोना छान रही थी. कुछ देर की सर्चिंग के बाद पुलिस को एक गेस्टहाउस में रूबी मिल गई. उस के साथ एक युवक भी था. पुलिस के साथ अपने जीजा को देख कर रूबी थोड़ा चौंकी जरूर, लेकिन उसे देख कर ऐसा नहीं लग रहा था, जैसे उस का अपहरण हुआ हो. यानी उस के चेहरे पर कोई डर नहीं था.

कर्नाटक पुलिस ने रूबी को अपनी हिफाजत में लेने के बाद जब उस के किडनैप होने की बाबत पूछा तो उस ने साफ कहा कि उस का किसी ने अपहरण नहीं किया, बल्कि वह अपने घर से खुद अपने प्रेमी के पास आई है. रूबी के पिता के पास काल तो अपहरण की गई थी, लेकिन यहां बात दूसरी सामने आ रही थी.

पुलिस ने रूबी के साथ जिस युवक को हिरासत में लिया था, पूछताछ करने पर पता चला कि उस का नाम सुजाय डे है. वह पश्चिम बंगाल के 24 परगना के गांव गोबरडंग का रहने वाला है और वह रूबी से प्यार करता था. रूबी ने भी उसी समय सुजाय की बात की पुष्टि कर दी.

पुलिस ने रूबी के साथ जिस युवक को हिरासत में लिया था, पूछताछ करने पर पता चला कि उस का नाम सुजाय डे है. वह पश्चिम बंगाल के 24 परगना के गांव गोबरडंग का रहने वाला है और वह रूबी से प्यार करता था. रूबी ने भी उसी समय सुजाय की बात की पुष्टि कर दी.

पुलिस ने जब उस की तलाशी ली तो उस के पास वह मोबाइल सिम कार्ड मिल गया, जिस से रूबी के पिता को 10 लाख रुपए की फिरौती की काल की गई थी.

इस से कर्नाटक पुलिस को विश्वास हो गया कि सुजाय ने ही फिरौती की काल की होगी. जबकि रूबी प्रेमी का पक्ष लेते हुए कहती रही कि सुजाय ऐसा नहीं कर सकता. उस ने अपने जीजा से कह दिया कि वह बालिग है, सुजाय के साथ ही शादी करेगी और अब अपने घर नहीं लौटेगी.

पुलिस ने उसी के सामने जब सुजाय डे से पूछताछ की तो उस के पास सच उगलने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं था. क्योंकि पुलिस उस का सिमकार्ड बरामद कर चुकी थी. इस बात को वह झुठला नहीं सकता था. इसलिए उस ने रूबी के पिता को फिरौती के लिए फोन करने की बात स्वीकार कर ली.

फिर रूबी को प्यार के जाल फांसने से ले कर उस के पिता से फिरौती मांगने तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

27 साल का सुजाय डे कोई बड़ा बिजनैसमैन नहीं था, बल्कि उस के यहां टीशर्ट और अंडरगारमेंट्स सिलने का छोटामोटा काम होता था. इंटरमीडिएट पास करने के बाद वह भी पिता के साथ इस काम में थोड़ाबहुत सहयोग कर देता था. वह हमेशा कम समय में ज्यादा पैसे कमाने के सपने देखा करता था.

6-7 महीने पहले गलती से उस ने किसी नंबर पर मिस काल की. इत्तफाक से वह काल रूबी के मोबाइल पर लग गई. रूबी ने उस नंबर पर कालबैक की. बातों ही बातों में सुजाय ने उस पर प्यार के डोरे डालने शुरू कर दिए. उसी बातचीत में उसे रूबी के घरपरिवार, हैसियत आदि की जानकारी हो गई. प्यार के जाल में फांस कर वह उस से ज्यादा से ज्यादा पैसे ऐंठना चाहता था. तभी तो उस के कहने पर रूबी अपने मांबाप के यहां से 10 तोला सोने की ज्वैलरी और साढ़े 3 लाख रुपए नकद ले कर बंगलुरु एयरपोर्ट पहुंच गई थी.

सुजाय ने पहले ही बंगलुरु से दिल्ली जाने वाली जेट एयरवेज की 2 टिकटें बुक करा ली थीं. दिल्ली के महिपालपुर स्थित एक गेस्टहाउस में उस ने एक कमरा बुक करा लिया था.

उसे जब वहां पता चला कि रूबी अपने साथ साढ़े 3 लाख रुपए नकद और 10 तोला सोने की ज्वैलरी ले कर आई है तो वह काफी खुश हुआ. उस ने उसे शादी का झांसा दे ही रखा था, इसलिए रूबी ने उस के साथ शारीरिक संबंध बनाते समय कोई आनाकानी नहीं की. सुजाय को अब यह पता लग चुका था कि रूबी के पिता बहुत पैसे वाले हैं, रूबी के घर वालों के फोन नंबर उस के पास थे, इसलिए गेस्टहाउस के बाहर आ कर उस ने उस के पिता को 10 लाख रुपए की फिरौती का फोन कर दिया.

उन्होंने रूबी के गायब होने की सूचना पहले ही पुलिस को दे रखी थी. फिरौती की काल मिलने पर इलकल थाने की पुलिस हरकत में आ गई और दिल्ली पुलिस के सहयोग से रूबी को बरामद कर सुजाय को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने रूबी के पास से साढ़े 3 लाख रुपए नकद और सोने की वह ज्वैलरी भी बरामद कर ली थी, जो वह अपने घर से ले कर आई थी.

रूबी और सुजाय डे को कर्नाटक पुलिस 23 फरवरी को ही दिल्ली से कर्नाटक ले गई. पुलिस ने सुजाय डे को कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया तथा रूबी को उस के पिता के सुपुर्द कर दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित और रूबी परिवर्तित नाम है.

होली पर मंगेतर को मौत का अबीर – भाग 2

क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम द्वारा अपना काम निपटाने के बाद थानाप्रभारी ने लाश का मुआयना किया तो उस के गले और मुंह पर लगे निशानों से लग रहा था कि उस की हत्या शायद गला घोंट कर की गई होगी.

बेडशीट और तकिया के कवर पर खून के निशान मिले. बेड के ऊपर और नीचे बंदूक के कुछ कारतूस भी पड़े हुए थे. प्रियंका के शरीर पर गोली लगने का कोई निशान नहीं था तो वहां कारतूस कैसे आ गए यह बात थानाप्रभारी नहीं समझ पा रहे थे.

थानाप्रभारी ने गेस्ट हाउस के मैनेजर सुनील से पूछा कि प्रियंका यहां कब और किस के साथ आई थी? इस पर उस ने बताया, ‘‘सर, यह कल शाम करीब 8 बजे मोहित नाम के एक युवक के साथ आई थी. मोहित ने इसे अपनी पत्नी बताया था. रात करीब पौने 11 बजे मोहित किसी काम से गेस्ट हाउस से बाहर गया था. आज 11 बजे गेस्ट हाउस का एक कर्मचारी इस कमरे पर आया तो कमरा बाहर से बंद था. उस कर्मचारी ने यह बात मुझे बताई.

‘‘मैं ने सब से पहले एंट्री रजिस्टर देखा कि कहीं मोहित पत्नी को ले कर यहां से चला तो नहीं गया. रजिस्टर में उस के द्वारा कमरा खाली करने का कोई जिक्र नहीं था. तब मैं यहां आया. दरवाजे का ताला बंद देख कर मैं भी चौंक गया. मैं ने दरवाजा खटखटा कर कई आवाजें दीं. कोई जवाब नहीं मिला तो मैं ने सोचा कि कहीं मोहित के जाने के बाद मौका पा कर उस की पत्नी भी तो यहां से नहीं खिसक गई.

‘‘फिर मैं ने सोचा कि एक बार रोशनदान से कमरे में भी देख लिया जाए. मैं ने ऐसा किया तो यह युवती बेड पर लेटी हुई दिखी. इस के मुंह में ठुंसा तौलिया और बेडशीट पर खून देख कर मुझे कुछ अनहोनी का अंदेशा हुआ. इस के बाद मैं ने पुलिस को फोन कर दिया.’’

टै्रफिक पुलिस की एक कांस्टेबल की हत्या की सूचना थानाप्रभारी ने जब उच्चाधिकारियों को दी तो डीसीपी सुमन गोयल और एसीपी ओमप्रकाश भी नीलगगन गेस्ट हाउस पहुंच गए. उन्होंने भी कमरे का बारीकी से मुआयना किया. और गेस्ट हाऊस के मैनेजर से भी पूछताछ की.

पुलिस ने लाश का पंचनामा और जरूरी काररवाई पूरी करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल, हरि नगर भिजवा दिया.

पुलिस को यह जानकारी मिल चुकी थी कि प्रियंका अपने मंगेतर मोहित के साथ ही गेस्ट हाउस में आई थी. वह गेस्ट हाउस से फरार हो चुका था. इस के अलावा प्रियंका की बहन शिक्षा ने भी मोहित पर शक जताया था इसलिए पुलिस का शक भी मोहित पर बढ़ गया.

मोहित की तलाश के लिए डीसीपी सुमन गोयल ने एसीपी ओमप्रकाश के निर्देशन में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानप्रभारी रिछपाल सिंह, एसआई मदन, अनुज यादव, चेतन, एएसआई यादराम, हेडकांस्टेबल दशरथ, सुमेर सिंह, राजकुमार, कांस्टेबल सुरेंद्र, नरेंद्र कुमार आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम मोहित की तलाश में जुट गई. एएसआई मदन के नेतृत्व में एक पुलिस टीम मोहित के गांव छापर भेज दी गई. वहां पता चला कि वह घर पहुंचा ही नहीं है. उस के मोबाइल फोन पर बात करने की कोशिश की गई तो मोबाइल भी स्विच औफ मिला.

कहीं वह दिल्ली से बाहर न भाग गया हो, पुलिस को इस बात की आशंका थी. जब मोहित तक पहुंचने का कोई रास्ता न दिखा तो पुलिस ने अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया.

अगले दिन यानी 18 मार्च, 2014 को एक मुखबिर की सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने मोहित को सागरपुर से सटे द्वारका क्षेत्र से हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से प्रियंका उर्फ प्रिया की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो वह मर्डर करने की बात तो दूर, नीलगगन गेस्ट हाउस में ठहरने वाली बात को ही नकारता रहा. लेकिन जब पुलिस ने उस से कहा कि गेस्ट हाउस के रजिस्टर में तुम्हारे साइन हैं, साथ ही वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में फोटो भी हैं.

सच्चाई की नदी में झूठ की नाव जल्द ही डूब जाती है. मोहित जानता था कि वह मंगेतर प्रियंका को ले कर नीलगगन गेस्ट हाउस में गया था. इसलिए थानाप्रभारी के सवालों के आगे उस का झूठ ज्यादा देर तक नहीं टिक सका. आखिर उस ने स्वीकार कर लिया कि प्रियंका की हत्या उस ने ही की थी. अपनी मंगेतर की हत्या की उस ने जो कहानी बताई वह इस प्रकार निकली.

मूल रूप से राजस्थान के झुंझनू जिले के थाना सूरजगढ़ के तहत आने वाले गांव चिमकावास के रहने वाले हरिसिंह के परिवार में 4 बेटियां और एक बेटा प्रवीण था. हरि सिंह भारतीय सेना में नौकरी करते थे जो फिलहाल रिटायर हो चुके हैं. उन्होंने अपने सभी बच्चों को उच्च शिक्षा हासिल करवाई. इस का नतीजा यह हुआ कि उन के 3 बच्चों की दिल्ली पुलिस में नौकरी लग गई. उन की बेटी शिक्षा दिल्ली पुलिस में सबइंस्पेक्टर, दूसरी प्रियंका कांस्टेबल हो गई तो बेटा भी दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भरती हो गया.

तीनों भाईबहन दिल्ली पुलिस में नौकरी करने लगे तो दक्षिणपश्चिमी दिल्ली के सागरपुर (पश्चिमी) के आई ब्लौक में उन्होंने अपनी रिहाइश बना ली. परिवार के बाकी लोगों को भी उन्होंने दिल्ली बुला लिया. सभी साथसाथ रहने लगे. हरिसिंह सभी बच्चों की शादी कर के फारिग हो जाना चाहते थे.

वह प्रियंका के लिए उपयुक्त लड़का देखने लगे. तभी उन्हें किसी ने मोहित के बारे में बताया. मोहित हरियाणा के भिवानी जिले की दादरी तहसील के छापर गांव के रहने वाले धर्मपाल का बेटा था और भारतीय नेवी में नौकरी करता था. हरिसिंह ने मोहित को देखा तो उन्हें वह पसंद आ गया. बाद में प्रियंका ने भी अपनी सहमति जता दी. इस के बाद उन्होंने मोहित के घरवालों से बात की. फिर दोनों तरफ से रिश्ता पक्का हो गया. यह अक्तूबर, 2013 की बात है.

रिश्ता तय हो जाने के बाद मोहित और प्रियंका फोन पर बातें करते रहते थे और कभीकभी इधरउधर घूमने का प्रोग्राम भी बना लेते थे. प्रियंका के घरवालों को इस पर कोई ऐतराज नहीं था क्योंकि कुछ दिनों में उस की मोहित से शादी होने ही वाली थी. साथ रहने की वजह से दोनों खूब घुलमिल गए थे.

बताया जाता है कि मोहित कुछ शक्की मिजाज का था. उस ने प्रियंका के मोबाइल से उस के अधिकांश रिश्तेदारों के फोन नंबर हासिल कर लिए थे. प्रियंका की गैरमौजूदगी में वह उन रिश्तेदारों को फोन कर के प्रियंका के बारे में छानबीन करता रहता था. रिश्तेदारों द्वारा यह बात जब हरिसिंह को पता लगी तो उन्हें होने वाले दामाद द्वारा इस तरह से छानबीन करना अच्छा नहीं लगा.

हालांकि उन्होंने इस बारे में मोहित से कुछ नहीं कहा. वह जानते थे कि जब उन की बेटी में किसी तरह का खोट नहीं है तो उन्हें छानबीन से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. उन्होंने यह भी सोचा कि शादी से पहले इस तरह की बातें तो चलती ही रहती हैं, जब दोनों की शादी हो जाएगी तो सारी बातें अपने आप बंद हो जाएंगी.

प्यार ने बना दिया नागिन – भाग 3

रचना और रामेश्वर इसी निश्चिंतता का फायदा उठा रहे थे. लेकिन रचना को भगा ले जाना रामेश्वर के लिए आसान नहीं था. रचना को भगा कर ले जाने से एक तो उस के ननिहाल वाले दुश्मन बन जाते, दूसरे पकड़े जाने पर वह जेल भी जा सकता था.

रचना और रामेश्वर के प्रेमसंबंधों से रचना की ससुराल वाले पूरी तरह बेखबर थे. वे मामी भांजे के इस संबंध के बारे में सोच भी नहीं सकते थे. रचना और रामेश्वर ने एक होने की जो योजना बनाई थी, धीरेधीरे वह सफलता की ओर बढ़ रही थी. रचना ससुराल वालों को लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रही थी कि वह पूर्व जन्म में नागिन थी. इसलिए नाग उस के सपनों में आते हैं.

रचना जल्दी से जल्दी रामेश्वर के साथ कहीं दूर निकल जाना चाहती थी. वह हमेशा इसी उधेड़बुन में लगी रहती थी, इसलिए उस का किसी काम में मन नहीं लगता था. उस के इस रवैए से परेशान हो कर अकसर सास बिहारी से शिकायत करती. तब बिहारी रचना को डांटता. लेकिन रचना पर इस सब का कोई असर नहीं हो रहा था.

रचना की सास देखती थी कि जब भी उस का नवासा रामेश्वर घर आता है, वह रचना के आगेपीछे ही घूमता रहता है. यह बात उसे अच्छी नहीं लगती थी, इसलिए एक दिन उस ने टोका, ‘‘रामेश्वर, तू कोई कामधंधा क्यों नहीं करता. इधरउधर बेमतलब घूमता रहता है.’’

‘‘नानी, आप चिंता न करें, एक दिन मैं ऐसा काम करूंगा कि आप हैरान रह जाएंगी.’’ रामेश्वर ने कहा.

रचना और रामेश्वर की मुलाकातें चोरीछिपे होती थीं. लेकिन उन के बातव्यवहार, हावभाव और हरकतों से घर वालों को संदेह होने लगा था. इस के बावजूद कोई उन पर नजर नहीं रख रहा था. सभी को लगता था कि दोनों हमउम्र हैं और उन का हंसीमजाक का रिश्ता है, इसलिए थोड़ा खुल गए हैं.

लेकिन एक दिन दोपहर में बिहारी ने रचना और रामेश्वर को जिस हालत में देखा, वह हैरान करने वाला था. रचना रामेश्वर की बांहों में समाई थी. संदेह तो पहले से ही था, उस दिन अपनी आंखों से पत्नी को भांजे की बांहों में देख कर बिहारी के शरीर में आग लग गई. वह रामेश्वर की ओर लपका, लेकिन वह भाग खड़ा हुआ. इस के बाद बिहारी ने अपना सारा गुस्सा रचना पर उतार दिया.

पति के पिटने के बाद रचना के प्यार का जुनून कम होने के बजाय पहले से ज्यादा बढ़ गया. पत्नी की घिनौनी हरकत बिहारी घर वालों से नहीं बता सका, इसलिए वह अंदर ही अंदर घुटने लगा. इस का नतीजा यह निकला कि वह बातबात में रचना की पिटाई करने लगा. दोनों के बीच एक दरार पैदा हो गई, जो दिनोंदिन चौड़ी होती जा रही थी. एक दिन ऐसा भी आ गया, जब परेशान हो कर रचना अपने मायके चली गई.

रचना के मायके जाने से पतिपत्नी के बीच पैदा हुए तनाव की जानकारी बिहारी के घर वालों को तो हो ही गई, ससुराल वालों को भी हो गई थी. सभी ने सोचा कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा. लेकिन हाकिम सिंह की परेशानी तब बढ़ गई, जब कई महीने बीत जाने के बाद भी रचना को कोई विदा कराने नहीं आया.

उन्होंने समधी को फोन किया तो पतिराम ने कहा, ‘‘परेशान मत होइए समधीजी, जल्दी ही मैं बहू को विदा कराने के लिए बिहारी को भेज रहा हूं.’’

पतिराम ने अच्छी तरह बात की थी, इसलिए हाकिम सिंह को लगा कि चिंता की कोई बात नहीं है. जब सब ठीकठाक है तो अगर उस की ससुराल से कोई नहीं आता तो वह स्वयं ही रचना को छोड़ आएगा. लेकिन उसे ऐसा नहीं करना पड़ा, क्योंकि पतिराम ने अपने यहां देवी जागरण कराया तो रचना का जेठ मोहर सिंह भांजे पूरन के साथ रचना को विदा कराने मांगरौली जा पहुंचा.

रचना ससुराल जाना तो नहीं चाहती थी, लेकिन वह देख रही थी कि उस की वजह से मम्मीपापा बहुत परेशान है, इसलिए वह मना नहीं कर सकी और जेठ के साथ ससुराल आ गई.

रचना काफी दिनों बाद ससुराल आई थी, इसलिए सास ने उसे हाथोंहाथ लिया. बिहारी को भी लगा कि अब रचना को अपनी गलती का अहसास हो गया होगा, इसलिए उस ने भी उस से प्यार से बात की. रचना का भी व्यवहार सामान्य था. देवी जागरण का जो आयोजन था, वह भी धूमधाम से हो गया. लेकिन इस के बाद उस घर में जो कुछ हुआ, वह काफी हैरान करने वाला था.

31 मई, 2014 की रात पतिराम का पूरा परिवार खापी कर आराम से सोया. जब अगले दिन सुबह बिहारी सो कर उठा तो रचना बिस्तर से गायब थी. वह घर में भी कहीं नहीं थी. बिहारी को याद आया कि वह रात में किसी से फोन पर बात कर रही थी. उस ने करवट ले कर वहां देखा, जहां रचना सोती थी तो वहां उस के वे कपड़े, चूडि़यां और मंगलसूत्र पड़ा दिखाई दिया, जिसे वह रात में पहन कर सोई थी. उसी के साथ एक चिट्ठी भी रखी थी.

बिहारी ने चिट्ठी खोली. रचना ने उस में लिखा था, ‘‘मैं नागिन बन चुकी हूं. सुबह मैं जिस हालत में मिलूं, मुझे जंगल में छोड़ दिया जाए.’’

चिट्ठी पढ़ कर बिहारी सन्न रह गया. उस ने इधरउधर देखा तो कमरे में उसे एक काला सांप दिखाई दिया. वह चीखा तो पूरा घर इकट्ठा हो गया. उस ने पूरी बात घर वालों को बताई तो सभी हैरान रह गए. कुछ ही देर में यह बात पूरे गांव में फैल गई. इस के बाद पूरा गांव पतिराम के घर इकट्ठा हो गया.

पतिराम ने हाकिम सिंह को फोन किया कि उन की बेटी रचना नागिन बन गई है. हाकिम सिंह भी हैरान रह गया. वह पत्नी रामवती को ले कर बेटी की ससुराल पहुंचा. पूरी हकीकत जानने के बाद वह उस नागिन को अपने साथ ले आया, जिस के बारे में बताया गया था कि सुबह यही कमरे में मिली थी.

रचना के नागिन बन जाने की बात आसपास फैली तो दूरदूर से लोग उस नागिन को देखने हाकिम सिंह के घर आने लगे. उत्सुकतावश बगल के गांव के रहने वाले सपेरे सोना और अमर भी नागिन को देखने हाकिम सिंह के घर आ पहुंचे. उन्होंने उस नागिन को देखा तो उन्होंने बताया कि यह नागिन नहीं, बल्कि नाग है और इस की जहर की थैली निकाल दी गई है, इसलिए यह किसी को काट नहीं रहा है.

यह जान कर हाकिम सिंह को लगा कि रचना की ससुराल वालों ने उस की बेटी को गायब कर के अपने गुनाहों पर परदा डालने के लिए यह षडयंत्र रचा है कि उस की बेटी नागिन बन गई है.

बात विश्वास करने लायक नहीं थी, इसलिए हाकिम सिंह ने थाना गोवर्धन जा कर रचना की ससुराल वालों के खिलाफ भादंवि की धारा 498, 506, 354 और 314 दहेज ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

इंसपेक्टर उदयराज सिंह भी नागिन वाली कहानी से हैरान थे. जब रचना की ससुराल वालों को पता चला कि हाकिम ने उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी है तो वे परेशान हो उठे. इंसपेक्टर उदयराज सिंह ने पतिराम के घर छापा मारा तो बाकी लोग तो फरार हो गए, लेकिन पतिराम और रोहतान उन की पकड़ में आ गए.

दूसरा पहलू : अपनों ने बिछाया जाल – भाग 5

अंत में वही हुआ, जिस का डर था. अचानक दोपहर को सुरेंद्र के मोबाइल पर अहमदाबाद के एक पुलिस स्टेशन से फोन आया. फोन करने वाले इंसपेक्टर ने उसे धमकाते हुए कहा था कि उस का भाई यहां की एक लड़की को भगा ले गया है. उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है. वह सब कुछ सचसच बता दे, वरना मुसीबत में पड़ सकता है.

सुरेंद्र ने कहा था कि उस के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने वाले आज भी उसे नहीं पहचानते. वह उन से कभी मिला ही नहीं है. यह उस के छोटे भाई की ससुराल वालों की किसी रंजिश का मामला है, जिस में उस का भाई मोहरा बना है. अगर लड़की के मांबाप के फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की जाए तो सारी हकीकत पता चल जाएगी.

अब तक बात और भी बिगड़ चुकी थी. रिश्तेदारी दुश्मनी में बदलने लगी थी. सुरेंद्र के घर वालों पर चारों ओर से दबाव पड़ रहा था. अच्छा था कि सुकृति साथ थी, वरना पुलिस कब का उसे अंदर कर चुकी होती.

सुरेंद्र को अपने वकील से जो पता चला, वह हैरान करने वाला था. अहमदाबाद से जो फोन सुरेंद्र को किया गया था, वह किसी पुलिस थाने से नहीं था. क्योंकि अहमदाबाद के किसी भी थाने में किसी लड़की की भगाने की कोई रिपोर्ट अभी तक दर्ज नहीं थी. यह सुरेंद्र और उस के घर वालों को डरानेधमकाने के लिए किया गया था. जिस से वह सीधेसीधे सौदेबाजी के लिए मजबूर हो जाए.

नाटकीय ढंग से एक दिन अचानक मनु और मिंटू अहमदाबाद में रश्मि के सामने प्रकट हो गए. इस के बाद रश्मि के फोन लगातार सुरेंद्र के पास आने लगे. जल्दी आओ, वरना मामला पुलिस में गया तो फिर कुछ नहीं हो सकेगा. सुरेंद्र को वकीलों ने मना किया कि कानूनी तौर पर उस का जाना ठीक नहीं है. बात उस पर भी थोपी जा सकती है.

लेकिन सुरेंद्र ने रिस्क लेना ही ज्यादा उचित समझा. फ्लाइट पकड़ कर वह मातापिता को साथ ले कर अहमदाबाद जा पहुंचा.

रश्मि ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, लेकिन थी बहुत बड़ी खिलाड़ी. उस ने बड़े प्रोफेशनली ढंग से बात को टैकल किया. एक तरफ वह केस दर्ज कराने की बात कर के डरा रही थी तो दूसरी ओर मामला रफादफा करने का लालच भी दे रही थी. बात वाकई गंभीर थी. मनु सिर झुकाए मौन खड़ा था.

कुल मिला कर बात लेनदेन पर आ गई. आंटी की ओर से एक मुश्त 20 लाख रुपए की मांग की गई. मांग भी इस ढंग से की गई कि कम ज्यादा करने की कोई गुंजाइश नहीं थी. मनु जैसे मन ही मन तौबा करते हुए अपनी बातों से संकेत कर रहा था कि इस बार बचा लो, भविष्य में इन लोगों से कोई संपर्क नहीं रखेगा. मां और सुरेंद्र ने अकेले में मनु से बात की. मनु ने सारी घटना संक्षेप में बता दी. पहले भी वे लोग उस से काफी पैसे इसी तरह ऐंठ चुके थे.

घर से भागने की योजना रश्मि की थी. दरअसल उसी ने सारी व्यवस्था की थी. इस बीच फोन पर वह उन्हें वापस न लौटने की बात कहती रही. उस की योजना थी कि वह अपनी बेटी की शादी मनु से कर देगी. तलाक की भी उसे कोई जरूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन सुकृति ने धैर्य से काम लिया, इसलिए उस की योजना फेल हो गई. उस ने सोचा था कि नाराज हो कर सुकृति मांबाप के घर चली जाएगी. लेकिन सुकृति ने ऐसा नहीं किया, यहीं बात बिगड़ गई.

मनु कब तक घर से भागता फिरता. इसलिए रश्मि के जाल से मुक्त होने के लिए एक दिन वह वापस आ गया. रश्मि एक तीर से 2 शिकार करना चाहती थी. एक तरफ ऐसा कर के वह मिंटू को मनु के साथ ब्याह देना चाहती थी. क्योंकि उसे पता था कि मनु का परिवार काफी समृद्ध है. दूसरे इस घटना से उस के जेठ का घर भी तबाह हो जाने वाला था. अनजाने में वह अपनी 4 बीघा जमीन की कीमत वसूल कर सकती थी. अगर यह सब पूरे न भी हुए तो अंत में होने वाले समझौते से उसे ही लाभ होने वाला था.

मोलभाव के बाद अंत में 15 लाख रुपए पर समझौता हो गया. सब वापस लौट गए. लेकिन इस घटना ने सभी को ऐसा सबक सिखा दिया, जिस की कल्पना करना असंभव था. दूसरी ओर पैसों के लिए खून के रिश्तों को तारतार कर दिया था.

एक जवान औरत की नौटंकी – भाग 1

कानपुर के थाना नजीराबाद के लाजपत नगर का रहने वाला राजा यादव अपने इलाके का माना हुआ बदमाश था. उस के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे और थाने में उस की हिस्ट्रीशीट खुली हुई थी. इस वजह से वह या तो अकसर घर से फरार रहता था या फिर जेल में. ऐसे बदमाश जमाने के सामने खुद को भले ही दबंग समझते हों, लेकिन सच्चाई यह है कि जब वे जेल से बाहर होते हैं तो उन के घर वालों का अमन चैन गायब रहता है. आए दिन उन्हें पुलिस से अपमानित होना पड़ता है.

राजा यादव के परिवार में पत्नी नीरू यादव और 3 वर्षीय बेटे कशिश के अलावा मां मीरा यादव थीं. उस के पिता केदारनाथ की कुछ दिनों पहले मौत हो चुकी थी. पति के अकसर जेल में बंद होने की वजह से उस की पत्नी नीरू को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ रही थी. वह चूंकि पढ़ीलिखी थी, इसलिए एक जीवन बीमा कंपनी में एजेंट बन गई. इस काम में वह जीजान से मेहनत करने लगी तो उसे ठीकठाक आमदनी होने लगी.

नीरू जो काम करती थी वह ऐसा था, जिस की वजह से उसे दिन में अकसर बाहर रहना पड़ता था. उस की सास मीरा यादव को यह पसंद नहीं था कि बहू घर से बाहर घूमे. लेकिन वह यह भी समझती थी कि बहू के कमाने से ही घर का खर्च चल रहा है, इसलिए वह चाहते हुए भी नीरू को घर से बाहर घूमने से मना नहीं कर पाती थी.

मीरा यादव की 2 बेटियां थीं, जिन में से एक नवाबगंज, कानपुर में ब्याही थी, जबकि छोटी रीता यादव की शादी देहरादून में हुई थी. लेकिन पति से विवाद के चलते वह पिछले एक साल से मायके में रह रही थी. किसी पर बोझ न बने, इसलिए वह एक प्राइवेट नर्सिंगहोम में नौकरी करती थी.

कानपुर के ही थाना फजलगंज के अंतर्गत दर्शनपुरवा के रहने वाले राजेश कपूर के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे गौरव उर्फ गगन कपूर और प्रतीक कपूर थे. प्रतीक 8वीं में पढ़ता था जबकि गौरव बीए सेकेंड ईयर में. गौरव पढ़ाई के साथसाथ अपने चाचा के काम में हाथ बंटाता था. उस के चाचा केबिल औपरेटर थे. पूरे इलाके में उन के ही केबिल की सर्विस थी. गौरव कंप्लेंट डील करता था. कंज्यूमर की शिकायत आने पर वही शिकायत करने वाले के घर जा कर केबिल वगैरह चेक कर के शिकायत का निपटारा करता था.

पिछले साल जनवरी की बात है. नीरू के टीवी पर कोई भी चैनल नहीं आ रहा था. उस ने गौरव कपूर को फोन कर के शिकायत की कि उस के यहां केबिल नहीं आ रहा है. कंप्लेंट मिलने पर गौरव नीरू यादव के घर गया. उस समय नीरू की सास मीरा यादव कहीं गई हुई थीं और बेटा कशिश स्कूल में था. घर पर नीरू अकेली थी. 34 साल की नीरू भले ही एक बच्चे की मां थी, लेकिन अभी भी वह जवान थी. पति के अकसर घर से बाहर रहने की वजह से उस की शारीरिक भूख पूरी नहीं हो पाती थी.

गौरव कपूर गोराचिट्टा औसत कदकाठी का बलिष्ठ युवक था. वह पढ़ालिखा भी था. उसे देख कर उस की कामना जागी तो उस ने गौरव को अपने मन में बसा लिया. गौरव ने जब केबिल ठीक कर दिया तो नीरू ने उस की खूब खातिर की और प्यार भरी बातें भी. चायपानी के बाद गौरव जब वहां से जाने लगा तो नीरू बोली, ‘‘अब कब आओगे?’’

‘‘जब भी आप के यहां केबिल न आने की शिकायत मिलेगी, चला आऊंगा. हम तो आप के नौकर हैं.’’

‘‘मैं तुम्हें नौकर नहीं समझती, यह तो तुम्हारा काम है. तुम मुझे यह बताओ कि क्या केबिल ठीक करने ही आ सकते हो या ऐसे भी? अरे, मैं भी पंजाबन कुड़ी हूं. राजा से लवमैरिज की तो यादव बन गई. कम से कम अपना समझ कर ही आ जाया करो.’’ नीरू ने कहा तो गौरव बोला, ‘‘ठीक है, आप जब भी बुलाएंगी, मैं चला आऊंगा.’’

नीरू गौरव से जिस तरह अपनेपन से बातें कर रही थी, उस से उस ने यही अनुमान लगाया कि शायद वह उस का बीमा करना चाहती है. 2 दिनों बाद ही नीरू ने गौरव को अपने यहां बुलाया और बीमा की बातों के बजाय और बहुत सारी बातें कीं. इस के बाद नीरू जब भी अकेली होती, उसे बुला कर प्यार भरी बातें करती. इस से गौरव समझ गया कि नीरू का इरादा कुछ और ही है. फिर क्या था, गौरव ने भी खुद को नीरू के रंग में रंगना शुरू कर दिया. यानी उस का झुकाव भी नीरू की तरफ हो गया.

इस के बाद दोनों के मिलने का सिलसिला शुरू हो गया. नीरू गौरव को कभी रेस्टोरेंट में ले जाती तो कभी उसे अपने घर बुला कर उस के साथ घंटों तक बातें करती. मीरा यादव को बहू की यह आदत अच्छी नहीं लगती थी. उस ने नीरू को कई बार समझाया भी, लेकिन उस ने गौरव से मिलना नहीं छोड़ा. इस पर मीरा यादव बहू पर बदचलनी का लांछन लगाने लगी. लेकिन नीरू ने सास की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, वह गौरव से लगातार मिलती रही.

धीरेधीरे दोनों बेहद करीब आ गए. इस बीच मीरा ने बहू की बातें जेल में बंद अपने बेटे राजा यादव तक पहुंचा दी थीं. पत्नी की बदचलनी की बात सुन कर राजा को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन जेल में बंद होने की वजह से वह कड़वा घूंट पी कर रह गया.

कुछ दिनों बाद जब राजा जेल से जमानत पर बाहर आया तो सब से पहले उस ने पत्नी की खबर ली. फिर वह गौरव की तलाश में लग गया. अक्तूबर, 2013 में एक दिन लाजपत नगर में उसे गौरव दिख गया तो राजा ने उसे जम कर पीटा और गोली मार दी. गोली लगने से गौरव बुरी तरह घायल हो गया. उसे उस के घर वालों ने अस्पताल में भरती कराया. गौरव के बयान के आधार पर थाना नजीराबाद में राजा यादव के खिलाफ जान से मारने की कोशिश की रिपोर्ट दर्ज हुई. पुलिस ने राजा को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. अस्पताल में कुछ दिनों इलाज कराने के बाद गौरव कपूर ठीक हो कर घर आ गया.

3 मालियों की एक माला

माला भले ही 30 की उम्र पार कर चुकी थी, लेकिन अपने रंगरूप और बनसंवर कर रहने की वजह से वह 24-25 साल  से अधिक की नहीं लगती थी. 1 बच्चे की मां बनने के बावजूद उस की सुंदरता और स्वाभाविक चंचलता में कोई कमी नहीं आई थी. वह जिस की तरफ देख कर मुसकरा देती थी, वह उस का दीवाना हो जाता था.

सरोज उपेंद्र कामथी पहली ही नजर में माला का दीवाना हो गया था. वह काफी दिनों बाद मुंबई से अपने गांव आया था. एक दिन जब वह गांव के लोगों और अपने दोस्तों से मिलने के लिए घर से निकला तो अचानक उस की नजर अपने दोस्त राजेश के दरवाजे पर खड़ी माला से लड़ गई. उस ने माला को देखा तो देखता ही रह गया. राजेश उस वक्त घर में नहीं था.

सरोज कामथी औरतों के मामले में काफी अनुभवी था. वह माला के हावभाव देख कर काफी कुछ समझ गया. लेकिन वह चूंकि उस के दोस्त की पत्नी थी और गांव का मामला था, इसलिए वह बिना उस से बात किए अपने घर वापस लौट आया.

उस रात सरोज कामथी रात को सो नहीं पाया. रहरह कर उस की आंखों में नींद की जगह माला का मुसकराता चेहरा घूमता रहा. रात किसी तरह कट गई तो सुबह को वह मौका देख कर फिर राजेश के घर पहुंच गया. माला उस वक्त घर में अकेली थी. उस ने दरवाजे पर दस्तक दी तो दरवाजा माला ने ही खोला.

सरोज कामथी को आया देख वह चौंकी. वह कुछ कहती, इस के पहले सरोज ने अपना परिचय दे कर कहा, ‘‘मेरा नाम सरोज है, मैं इसी गांव का रहने वाला हूं. राजेश मेरा दोस्त है. मुंबई में रहने की वजह से कभीकभी गांव आना होता है. गांव वालों से मिलनाजुलना भी कम ही होता है.’’

माला ने सरोज कामथी को अंदर आने को कहा तो वह शरीफ इंसान की तरह अंदर आ गया. माला ने उस से उस के कामधंधे के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि मुंबई में उस की खानेपीने के सामान की दुकान है. जिस से उसे अच्छीभली कमाई हो जाती है.

‘‘मुंबई का बड़ा नाम सुना है. कैसा शहर है मुंबई?’’ माला ने पूछा तो सरोज बोला, ‘‘बहुत अच्छा और सुंदर शहर है. गगनचुंबी इमारतें, रानी बाग, मछली घर, नेशनल पार्क, समुद्र का किनारा बहुत कुछ है मुंबई में देखने के लिए. जुहू चौपाटी पर तो अच्छाभला मेला लगा रहता है, सुबहशाम.’’

सरोज को लंबाचौड़ा बखान करता देख माला बोली, ‘‘ये सब मुझे बताने से क्या फायदा? मेरे ऐसे नसीब कहां कि मुंबई जैसा खूबसूरत शहर देखने का मौका मिले. बस बच्चों, पति और घरपरिवार में ही जिंदगी गुजरती जा रही है.’’

सरोज की बातों में मायूसी भरी चाहत थी. सरोज ने अच्छा मौका देख उस की भावनाओं को भड़काने के लिए कहा, ‘‘इतना मायूस मत होइए. भाभी, आप चाहें तो मैं आप को मुंबई घुमा सकता हूं. एकएक चीज दिखाऊंगा आप को.’’

‘‘सच.’’ माला ने चौंक कर मुसकराते हुए कहा. फिर दूसरे पल ही वह गंभीर हो गई.

‘‘कितना अच्छा सपना है, लेकिन पति और बच्चों का क्या करूंगी?’’

माला को भावनात्मक स्तर पर बहकते देख सरोज तरंग में आ गया. उसे कमजोर पड़ते देख बोला, ‘‘कुछ पाने के लिए कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं. एक बार घर से निकल कर देखो तो पता चलेगा, दुनिया कितनी रंगीन है. मुंबई देख लिया तो सब भूल जाओगी. वैसे भी तुम्हारी जैसी खूबसूरती को शहर की शान होना चाहिए, यहां गांव में क्या रखा है?’’

माला सरोज की नजरों में चढ़ गई थी. उसे लग रहा था कि थोड़ा सा प्रयास किया जाए तो वह लाइन पर आ जाएगी. इसीलिए वह इसी कोशिश में लग गया.

उस दिन के बाद सरोज माला से मिलने रोज उस के घर जाने लगा. वह ऐसे समय पर जाता, जब उस का पति खेतों पर गया होता और बच्चे स्कूल. माला को वह भी अच्छा लगने लगा था और उस की बातें भी. नतीजतन जल्दी ही दोनों एकदूसरे से घुलमिल गए. दोनों के बीच पहले प्यारीप्यारी बातें, छेड़छाड़ और हंसीमजाक शुरू हुई. ऐसे में दोनों एकदूसरे के करीब आते गए. आखिर वही हुआ जो सरोज चाहता था. माला उस की बाहों में आ गई. इस के बाद यह सिलसिला सा बन गया.

माला सरोज कामथी के रंग में कुछ ऐसी रंगी कि घरपरिवार और बच्चों को छोड़ कर उस के साथ मुंबई जाने को तैयार हो गई. सरोज यही चाहता था. मौका मिलते ही वह उसे भगा कर अपने साथ मुंबई ले आया. सरोज उपेंद्र कामथी मूलत: बिहार के जिला दरभंगा के गांव विलौर का रहने वाला था. उस का परिवार खेतीबाड़ी करता था. उस का विवाह बचपन में ही रिंकू से हो गया था.

सरोज कामथी ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. इस के बावजूद वह महत्त्वाकांक्षी था और शहर जा कर खूब पैसा कमाना चाहता था. सरोज के गांव के कई लोग मुंबई में रहते थे. वह भी उन लोगों की बदौलत मुंबई चला आया. कुछ दिनों तक वह अपने गांव वालों के साथ रह कर अपने लिए नौकरी ढूंढ़ता रहा. जब उसे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली तो वह किसी दूसरे धंधे की तलाश में लग गया.

इसी तलाश में उसे एक अच्छी जगह मिल गई. वह अंधेरी की इनफिनिटी मौल के सामने इडली सांभर, मसाला डोसा और वड़ापाव की दुकान लगाने लगा. महानगर मुंबई में इडली सांभर, मसाला डोसा और वड़ापाव का धंधा बड़ी तेजी से पांव पसारता है. जल्दी ही सरोज कामथी का काम जम गया. उसे अच्छीभली कमाई होने लगी. जब काम चल निकला तो सरोज कामथी मुंबई के उपनगर जोगेश्वरी पश्चिम, न्यू लिंक रोड, न्यू शक्तिनगर की वर्मा चाल के रूम नंबर 5 में रहने लगा. बाद में वह अपनी पत्नी और बच्चों को भी मुंबई ले आया था.

सरोज कामथी अपने परिवार के साथ मुंबई में भले ही बस गया था. लेकिन कभीकभी वह अपने गांव जाता रहता था. अच्छी कदकाठी, बढि़या रहनसहन और हृष्टपुष्ट शरीर की वजह से गांव के लोग उस से प्रभावित होते थे. वह गांव जाता था तो सभी से मिलता था. मिलनेजुलने के इसी सिलसिले में उस की मुलाकात माला से हुई थी.

माला भी सरोज की तरह महत्त्वाकांक्षी औरत थी. सरोज के सामने उसे अपना सीधासादा पति राजेश बहुत बौना लगा था. इसीलिए वह सन  2010 में अपने पति और बेटे को छोड़ कर सरोज के साथ मुंबई चली आई थी.

सरोज कामथी जिस चाल में रहता था, उस ने उसी के पीछे चाल का ऊपर वाला कमरा ले कर माला के रहने का इंतजाम कर दिया. इस के बाद दोनों उसी कमरे में पतिपत्नी की तरह साथ रहने लगे. जब इस बात का पता सरोज कामथी की पत्नी रिंकू को चला तो उस ने पति से काफी लड़ाईझगड़ा किया. लेकिन सरोज कामथी और माला पर इस का कोई फर्क नहीं पड़ा. आखिरकार थकहार कर रिंकू को हालात से समझौता करना पड़ा.

माला को मुंबई लाने के बाद सरोज कामथी कुछ दिनों तक तो उसे मुंबई घुमाताफिराता रहा, उस के साथ मौजमस्ती करता रहा. माला भी अपने घर, गांव, पति और बच्चे भूल कर आसमान में उड़ने लगी. लेकिन जब उसे पता चला कि सरोज कामथी अपने बीवीबच्चों के साथ उसी चाल के आगे वाले हिस्से में रहता है, वह पर कटे पक्षी की तरह फड़फड़ा कर रह गई. लेकिन अब क्या हो सकता था. फलस्वरूप दोनों के बीच झगड़े होने लगे.

जब बात बढ़ी तो सरोज कामथी शराब पी कर माला के साथ मारपीट करने लगा. उस के बदले हुए व्यवहार को देख कर माला को अपना पति, गांव और बच्चे की याद आने लगी. लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी. वह अब अपने घर नहीं लौट सकती थी. सरोज कामथी उस के लिए एक मजबूरी बन गया था.

वह हर रात शराब के नशे में माला के पास आता. उस के साथ मौजमस्ती करता, वह कुछ कहती तो उस के साथ मारपीट करता. रोजरोज की इस मारपीट से माला तंग आ गई थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे.  जिस कमरे में माला रह रही थी, उस के ठीक सामने वाले कमरे में महेश और सुरेश रहते थे.

वे उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के गांव बकराबाद के रहने वाले थे और अंधेरी स्थित लक्ष्मी इंडस्ट्रियल एस्टेट की वाटर सप्लाई कंपनी बिसलरी में काम करते थे. ये दोनों शादीशुदा थे, लेकिन इन की पत्नियां अपने बच्चों के साथ गांव में रहती थीं. महेश और सुरेश माला के साथ होने वाली ज्यादती को देखा करते थे. उन्होंने माला से सहानुभूति जतानी शुरू कर दी. समय बे समय वह उस की आर्थिक मदद भी करते थे.

सरोज कामथी से परेशान माला को जब सुरेश और महेश की सहानुभूति मिली तो धीरेधीरे उस का झुकाव उन दोनों की तरफ हो गया. नतीजा यह हुआ कि जिस तरह माला सरोज कामथी के करीब आने के बाद अपनी सारी मर्यादाएं भूल गई थी. उसी तरह उस ने अपने और सुरेश व महेश के बीच की सारी दीवारें तोड़ दीं.

जल्दी ही उस के महेश और सुरेश के साथ संबंध बन गए. जब सरोज कामथी अपने काम पर चला जाता तो मौका देख सुरेश और महेश कभी अपने घर में तो कभी माला के घर में जा कर उस के साथ मौजमस्ती करते. इस तरह लगभग 2 सालों तक माला और सुरेश व महेश की रासलीला चोरीछिपे चलती रही. बाद में जब सुरेश और महेश के माला से आंतरिक संबंधों की जानकारी सरोज कामथी को मिली तो वह माला के प्रति और भी ज्यादा कू्रर हो गया.

सुरेश और महेश जबजब माला को सरोज कामथी के हाथों मार खाते देखते थे, तबतब उन का खून खौल जाता था. लेकिन वे चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे. क्योंकि माला उसी के साथ रहती थी और वही उस का खर्चा भी उठा रहा था. वे कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहते थे, जिस से माला मुसीबत में पड़ जाए. दूसरी ओर माला की सहनशक्ति जवाब दे चुकी थी. आखिरकार एक दिन उस ने सुरेश और महेश से कह दिया कि अब वह सरोज कामथी को और ज्यादा बरदाश्त नहीं कर सकती.

3 नवंबर, 2013 को दीपावली थी. उस रात सब के घरों में रोशनी बिखरी हुई थी. लेकिन माला के कमरे में अंधेरा था. उस दिन सुरेश जब माला के घर के अंदर गया तो वह बिस्तर पर पड़ी दर्द से कराह रही थी. सुरेश ने घर की लाइट जला कर उस से कारण पूछा तो माला की आंखों में आंसू भर आए. उस ने बताया कि सरोज ने उस के साथ मारपीट की है और अब यह सब उस की बरदाश्त के बाहर हो गया है.

माला की बात सुन कर सुरेश के तनबदन में आग सी लग गई. उस ने यह बात महेश को बताई तो उसे भी बहुत गुस्सा आया. उन दोनों ने आपस में बात कर के फैसला किया कि जैसे भी हो सरोज कामथी को अपने और माला के बीच से हटा दिया जाए. उन्होंने अपने मन की बात माला से बताई तो वह भी उन का साथ देने के लिए तैयार हो गई.

6 नवंबर, 2013 को सुबह के लगभग 8 बजे 2 युवक जोगेश्वरी के ओसिवारा पुलिस थाने पहुंचे और ड्यूटी पर मौजूद सबइंस्पेक्टर योगेश धारे को बताया कि वे लोग जिस कमरे में रहते हैं, उस के ऊपर वाले कमरे में कुछ गड़बड़ है. 2 दिनों पहले उन के कमरे की लकड़ी की छत से खून की कुछ बूंदें टपकी थीं और अब उस कमरे से अजीब तरह की दुर्गंध आ रही है.

सबइंसपेक्टर योगेश धारे ने उन दोनों की बातें बड़े ध्यान से सुनीं और इस मामले की जानकारी तुरंत अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. इस के बाद वह अपने साथ पुलिस टीम ले कर उन दोनों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. उन लोगों द्वारा बताई गई जगह पर पहुंच कर पुलिस ने देखा कि उन्होंने जिस कमरे का जिक्र किया था, उस के दरवाजे पर ताला लटक रहा था.

उस कमरे का ताला तुड़वाया गया तो अचानक तेज दुर्गंध का झोंका आया. अंदर जा कर देखा गया तो पुलिस टीम स्तब्ध रह गई. कमरे में एक आदमी का निर्वस्त्र शव पड़ा था, जिस में सड़न शुरू हो चुकी थी. लाश के आसपास ढेर सारा खून फैला था, जो सूख चुका था. मृतक के सिर पर गहरा घाव और गले में नीला निशान था. लग रहा था कि उस की हत्या सिर पर किसी वजनी चीज से प्रहार कर के और गला दबा कर की गई थी.

मृतक कौन था, उस के साथ कौनकौन रहता था? योगेश धारे अभी इस की जांच कर रहे थे कि पुलिस उपायुक्त छेरिंग दोरजे, सहायक पुलिस आयुक्त शेर खान थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक नासिर पठान, पुलिस निरीक्षक बाबूराव मुखेड़कर, सहायक पुलिस निरीक्षक रवींद्र पाटिल, हेडकांस्टेबल गोरखनाथ पवार, सिपाही प्रवीण धार्गे और विकास पोल भी वहां पहुंच गए.

मृतक की शिनाख्त के लिए पुलिस को कोई माथापच्ची नहीं करनी पड़ी, क्योंकि मृतक की पत्नी रिंकू अपने बच्चों के साथ वहां पहुंच गई. उस ने रोते बिलखते बताया कि मृतक उस का पति सरोज कामथी है. रिंकू ने अपने पति की हत्या का आरोप सीधेसीधे माला पर लगाया. उस ने यह भी बताया कि माला पिछले 3 सालों से उस की सौतन बन कर उस के पति के साथ रह रही थी.

पूछताछ में यह बात भी पता चली कि माला दीपावली के दूसरे दिन से गायब है. यह भी जानकारी मिली कि माला के बाजू वाले कमरे में रहने वाले 2 युवक सुरेश और महेश भी शामिल हैं. रिंकू के बयान और घर से गायब होने के कारण वे दोनों भी संदेह के घेरे में आ गए.

रिंकू के बयान और घटनास्थल की प्राथमिक जांच व काररवाई के बाद मृतक सरोज कामथी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए कूपर अस्पताल भेज दिया गया. थाने लौट कर सीनियर इंसपेक्टर नासिर पठान ने तीनों संदिग्धों की गिरफ्तारी के लिए 3 पुलिस टीमें तैयार कीं. पुलिस की तीनों टीमों ने माला, सुरेश और महेश की सरगरमी से तलाश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप शीघ्र ही कामयाबी भी मिल गई. महेश को अंधेरी में उस के एक दोस्त के यहां से गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में महेश ने अपना गुनाह कुबूल कर लिया. उस से पता चला कि सुरेश और माला हत्या के बाद अपनेअपने गांव भाग गए थे. महेश के बयान के बाद सहायक पुलिस निरीक्षक रवींद्र पाटिल के निर्देशन में पुलिस की एक टीम सुरेश के इलाहाबाद स्थित गांव और एक टीम माला के दरभंगा स्थित गांव भेजी गई.

12 नवंबर, 2013 को मोबाइल फोन की लोकेशन से सुरेश को इलाहाबाद स्टेशन के मुसाफिरखाना से गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन माला की तलाश में गई पुलिस टीम दरभंगा से खाली हाथ लौट आई.

मुंबई पहुंच कर सुरेश ने अपना गुनाह कबूल करते हुए पुलिस को बताया कि उन दोनों के माला से अवैध संबंध थे. इसी वजह से सरोज कामथी माला को प्रताडि़त करता था, जो उन से बरदाश्त नहीं होता था. इसलिए जब माला ने उन से कहा कि वह सरोज कामथी से छुटकारा पाना चाहती है तो उन लोगों ने उस के साथ मिल कर उस की हत्या की योजना बना डाली. उस की हत्या में माला भी शामिल थी.

सुरेश के अनुसार 4 नवंबर, 2013 को दीवाली के दूसरे दिन सरोज कामथी शराब के नशे में घर आया और सो गया. यह बात माला ने फोन कर के उन्हें बताई तो वे बिना देर किए उस के पास पहुंच गए. अपनी योजना के अनुसार सुरेश ने सरोज कामथी के सीने पर चढ़ कर उस का गला पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया. महेश ने उस के दोनों पैर पकड़े और माला ने मसाला पीसने वाले पत्थर से उस के सिर पर वार किया. सरोज कामथी की हत्या करने के बाद कमरे में ताला लगा कर तीनों से फरार हो गए थे.

सुरेश और महेश से विस्तृत पूछताछ के बाद जांच अधिकारी बाबूराव मुखेड़कर और रविंद्र पाटिल ने तीनों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मामला दर्ज कर के उन्हें अंधेरी कोर्ट के मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. माला अभी फरार है.