Inspiring Story : वीडियो में छिपा मौत का रहस्य

Inspiring Story : महंत नरेंद्र गिरि का शिष्य आनंद गिरि बेहद शातिर था. उस की नजर मठ बाघंबरी गद्दी के साथसाथ मठ की करोड़ों की संपत्ति पर थी. तभी तो वह अपने गुरु महंत नरेंद्र गिरि को मानसिक रूप से प्रताडि़त करता रहता था. लेकिन अब उस के पास अपने गुरु का ऐसा कौन सा वीडियो था, जिस के वायरल होने से पहले ही महंत नरेंद्र गिरि ने दुनिया ही छोड़ दी. शिष्यों और महंतों के बीच तिकड़म को ले कर अयोध्या में एक संत ने कविता लिखी थी, ‘पैर दबा कर संत बने और गला दबाए महंत’. उन की कविता शिष्यों और महंतों के बीच आए दिन होने वाले विवादों पर पूरी तरह से खरी उतरती है.

मंदिर हो, मठ हो या आश्रम, सभी जगहों पर जमीन, जायदाद और सैक्स को ले कर षडयंत्र चलते रहते हैं. महंत नरेंद्र गिरि को डर था कि किसी लड़की के साथ उन की फोटो लगा कर बदनाम किया जा सकता है. इस के पहले भी वह डांस करने वाली लड़कियों पर पैसे लुटाते चर्चा में आ चुके थे. मानसम्मान का डर महंत की मौत का कारण बना. धर्म के नाम पर जहां जनता अपनी मेहनत का पैसा चढ़ावे में चढ़ाती है, वहां के लोग उस का किस तरह से भोग करते हैं, महंत की मौत के पीछे की कहानी से इसे समझा जा सकता है.

‘‘प्रकाश, महंतजी अभी अपने कमरे से बाहर नहीं आए. देख तो क्या बात है,’’ बाघंबरी मठ के सेवादार बबलू ने अपने साथी से कहा. बाघंबरी मठ प्रयागराज के अल्लापुर में स्थित है. यह प्रयागराज का सब से प्रभावशाली मठ है. प्रकाश और बबलू यहां सेवादार के रूप में काम करते हैं. ये दोनों अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और 75 वर्षीय महंत नरेंद्र गिरि के बारे में बात कर रहे थे. यह 20 सितंबर, 2021 के शाम लगभग 5 बजे की बात है.

‘‘बबलू, मैं कमरे के पास गया और आवाज दी. पर महंतजी ने कमरा नहीं खोला, न ही अंदर से कोई आवाज आ रही है.’’ प्रकाश वापस आ कर बोला. इस के बाद प्रकाश और बबलू अपने कुछ और सेवादार साथियों से इस बात को ले कर बात करने लगे. सेवादार साथी सोच रहे थे कि एसी की आवाज में महंतजी बाहर की आवाजें नहीं सुन पा रहे होंगे. इन लोगों ने सोचा कि यदि कमरे का एसी बंद कर दिया जाए तो शायद महंतजी उठ सकते हैं. यही सोच कर उन्होंने महंतजी के कमरे का एसी बाहर से बंद कर दिया. इस के बाद भी जब कोई हलचल कमरे के अंदर से नहीं हुई तो एक शिष्य बोला, ‘‘मंहतजी के मोबाइल पर काल करो.’’

‘‘नहीं, ऐसा मत करो, क्योंकि महंतजी ने फोन करने से मना किया था.’’ दूसरा साथी बोला.

‘‘कोई बात नहीं, अब उन के मोबाइल पर फोन कर के ही उन्हें जगाने का रास्ता बचता है. कहीं महंतजी किसी दिक्कतपरेशानी में न हों.’’ कह कर एक शिष्य ने उन के मोबाइल पर काल की. इस के बाद भी कोई जवाब नहीं मिला. ऐसे में अब शिष्यों के लिए धैर्य रखना संभव नहीं था. महंत नरेंद्र गिरि हर दोपहर करीब 12 बजे अपने शिष्यों के साथ पंगत करते थे. इस के बाद वह आश्रम में जाते थे. शाम 5 बजे वह वापस आते थे. 20 सितंबर, 2021 को भी यही सब हुआ था. शिष्यों  के साथ पंगत के बाद नरेंद्र गिरि अपने आश्रम में गए. वहां उन्होंने कुछ कागज लिए. अपने शिष्यों से कहा कि उन से मिलने कोई गेस्टहाउस में आ रहा है. इसलिए उन्हें फोन कर के परेशान न किया जाए.

दोपहर में सभी को लगा कि वह आराम कर रहे होंगे. जब शाम करीब 5 बजे तक उन का कोई हाल नहीं मिला तो मंदिर में खलबली मचने लगी. फोन करने पर कोई जवाब नहीं मिला. पहले शिष्यों ने दरवाजा खटखटाया. बाहर से एसी बंद कर दिया. इस के बाद भी जब वह बाहर नहीं निकले तो कमरे के दरवाजे को धक्का दे कर खोल दिया गया. कमरे का दृश्य देख कर शिष्यों की चीख निकल गई. कमरे के अंदर छत में लगे हुक में रस्सी के सहारे महंतजी लटके हुए थे. थोड़ी देर में वहां सन्नाटा छा गया. शिष्य बदहवास हालत में इधर से उधर भागने लगे. शिष्यों ने महंतजी के शव को शीघ्र ही उतार कर जमीन पर लिटा दिया, ताकि उन के जीवित बचने की संभावना तलाशी जा सके.

इस के बाद पुलिस को सूचना दी गई. करीब साढ़े 5 बजे वहां भारी संख्या में पुलिस पहुंच गई. आश्रम का मुख्यद्वार बंद कर दिया गया. महंत नरेंद्र गिरि के गले में फांसी के फंदे का निशान था. डीएम और एसएसपी ने पंचनामा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. जार्जटाउन थाने के इंसपेक्टर महेश सिंह ने बताया कि मठ से सूचना मिलने पर पुलिस आई. शव के पास ही पुलिस को सल्फास की गोलियां रखी मिलीं. उसे खोला नहीं गया था. शव के पास ही 13 पन्ने का एक सुसाइड नोट वसीयत की तरह लिखा मिला, जिसे पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. महंत नरेंद्र गिरि बहुत पंहुच वाले व्यक्ति थे. ऐसे में आईजी के.पी. सिंह, डीआईजी सर्वश्रेष्ठ त्रिपाठी और डीएम संजय खत्री भी वहां पहुंच गए थे. 6 बजे तक पूरे शहर और शहर के बाहर यह सूचना फैल गई थी.

वहां डेढ़ घंटे तक पुलिस ने छानबीन की. सुसाइड नोट के बारे में पुलिस ने बताया कि इस में महंतजी ने अपने सम्मान से जीने की बात कही है. महंत नरेंद्र गिरि का सुसाइड नोट मीडिया में वायरल हो गया. वसीयतनुमा सुसाइड नोट महंत नरेंद्र गिरि का यह सुसाइड नोट अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के लेटरहैड पर लिखा गया था. पहले 13 सितंबर, 2021 की तारीख लेटरहैड पर पड़ी थी. बाद में इसे काट कर नीचे 20 सितंबर किया गया था. टूटीफूटी हिंदी में यह लिखा गया था. इस में कई जगहों पर कटिंग भी हुई थी. अपने सुसाइड नोट में महंत नरेंद्र गिरि ने लिखा, ‘मैं महंत नरेंद्र गिरि मठ बाघंबरी गद्दी, बड़े हनुमान मंदिर (लेटे हनुमानजी) वर्तमान में अध्यक्ष, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद अपने होशोहवास में बगैर किसी दबाव के यह पत्र लिख रहा हूं.

‘जब से आंनद गिरि ने मेरे ऊपर असत्य, मिथ्या और मनगढं़त आरोप लगाए हैं, तब से मैं मानसिक दबाव में जी रहा हूं. जब भी मैं एकांत में रहता हूं, मर जाने की इच्छा होती है. आनंद गिरि, आद्या तिवारी और उन के बेटे संदीप तिवारी ने मिल कर मेरे साथ विश्वासघात किया है.

‘सोशल मीडिया, फेसबुक और समाचार पत्रों में आनंद गिरि ने मेरे चरित्र पर मनगढं़त आरोप लगाए हैं. मैं मरने जा रहा हूं. सत्य बोलूंगा. मेरा घर से कोई संबंध नहीं है. मैं ने एक भी पैसा घर पर नहीं दिया है. मैं ने एकएक पैसा मंदिर और मठ में लगाया है. 2004 में मैं महंत बना. 2004 से अब तक मंदिर मठ का जो विकास किया, सभी भक्त जानते हैं.

‘आनंद गिरि के द्वारा मेरे ऊपर जो आरोप लगाए गए, उस से मेरी और मठ मंदिर की बदनामी हुई. मेरे मरने की संपूर्ण जिम्मेदारी आनंद गिरि, आद्या प्रसाद तिवारी जो मंदिर के पुजारी हैं और आद्या प्रसाद तिवारी के बेटे संदीप तिवारी की होगी. मैं समाज में हमेशा  शान से जीया. आनंद गिरि ने मुझे गलत तरह से बदनाम किया.

‘मुझे जान से मारने का प्रयास भी किया गया. इस से मैं बहुत दुखी हूं. प्रयागराज के सभी पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों से अनुरोध करता हूं कि मेरी आत्महत्या के जिम्मेदार उपरोक्त लोगों पर कानूनी काररवाई की जाए. जिस से मेरी आत्मा को शांति मिले.

‘प्रिय बलवीर गिरि, मठ मंदिर की व्यवस्था का प्रयास करना. जिस तरह से मैं ने किया, इसी तरह से करना. नितीश गिरि और मणि सभी महात्मा बलवीर गिरि का सहयोग करना. परमपूज्य महंत हरिगोबिंदजी एवं सभी से निवेदन है कि मठ का महंत बलवीर गिरि को बनाना. महंत रवींद्र गिरि जी (सजावटी मढ़ी) आप ने हमेशा साथ दिया. मेरे मरने के बाद बलवीर गिरि का साथ दीजिएगा. सभी को ओम नमो नारायण.

‘मै महंत नरेंद्र गिरि 13 सितंबर को ही आत्महत्या करने जा रहा था, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया. आज हरिद्वार से सूचना मिली कि एकदो दिन में आनंद गिरि कंप्यूटर के द्वारा मोबाइल से किसी लड़की या महिला के साथ मेरी फोटो लगा कर गलत काम करते हुए फोटो वायरल कर देगा.

‘मैं ने सोचा कहांकहां सफाई दूंगा. एक बार तो बदनाम हो जाऊंगा. मैं जिस पद पर हूं वह गरिमामयी पद है. सच्चाई तो लोगों को बाद में पता चल ही जाएगी, लेकिन मैं तो बदनाम हो जाऊंगा. इसलिए मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं.

‘बलवीर गिरि मेरी समाधि पार्क में नीम के पेड़ के पास दी जाए. यही मेरी अंतिम इच्छा है. धनजंय विद्यार्थी मेरे कमरे की चाबी बलवीर महराज को दे देना. बलवीर गिरि एवं पंच परमेश्वर निवेदन कर रहा हूं कि मेरी समाधि पार्क में नीम के पेड़ के नीचे लगा देना.

‘प्रिय बलवीर गिरि ओम नमो नारायण. मैं ने तुम्हारे नाम एक रजिस्टर्ड वसीयत की है. जिस में मेरे ब्रह्मलीन हो जाने के बाद तुम बड़े हनुमान मंदिर एवं मठ बाघंबरी गद्दी के महंत बनोगे. तुम से मेरा अनुरोध है कि मेरी सेवा में लगे विद्यार्थी जैसे मिथिलेश पांडेय, रामकृष्ण पांडेय, मनीष शुक्ला, शिवेष कुमार मिश्रा, अभिषेक कुमार मिश्रा, उज्जवल द्विवेदी, प्रज्जवल द्विवेदी, अभय द्विवेदी, निर्भय द्विवेदी, सुमित तिवारी का ध्यान देना.

‘जिस तरह से हमेशा मेरी सेवा और मठ की सेवा की है उसी तरह से बलवीर गिरि महराज और मठ मंदिर की सेवा करना. वैसे हमें सभी विद्यार्थी प्रिय हैं. लेकिन मनीष शुक्ला, शिवम मिश्रा और अभिषेक मिश्रा मेरे अति प्रिय हैं.

‘कोरोना काल में जब मुझे कोरोना हुआ मेरी सेवा सुमित तिवारी ने की. मंदिर में मालाफूल की दुकान मैं ने सुमित तिवारी को किरायानामा रजिस्टर किया है. मिथिलेश पांडेय को बड़े हनुमान रुद्राक्ष इंपोरियम की दुकान किराए पर दी है. मनीष शुक्ला, शिवम मिश्रा और अभिषेक मिश्रा को लड्डू की दुकान किराए पर दी है.’ महंत की मौत का हंगामा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की मौत की खबर जंगल में आग की तरह पूरे देश में छा गई. सोशल मीडिया, टीवी और अखबारों में प्रमुखता के साथ इस को दिखाया जाने लगा. महंत नरेंद्र गिरि को जानने वाले लोग यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठा सकते थे. महंत की मौत हत्या और आत्महत्या के बीच झूलने लगी और लोग सीबीआई जांच की मांग करने लगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा नेता अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही साथ बसपा नेता मायावती, सपा नेता अखिलेश यादव आदि नेताओं के शोक संदेश ट्विटर पर आने लगे. पुलिस ने सुसाइड नोट में लिखे नामों को आधार मान कर आनंद गिरि, आद्या तिवारी और संदीप तिवारी को हिरासत में ले लिया. इन पर धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप) लगाया गया. यह सभी महंत नरेंद्र गिरि के करीबी थे. इधर कुछ दिनों से आपस में इन का विवाद चल रहा था. आनंद गिरि, आद्या तिवारी और संदीप तिवारी का कहना था कि महंतजी से हमारा कोई झगड़ा नहीं था. उन की मौत के बाद हमें फंसा कर दोषियों को बचाने का काम किया जा रहा है.

नरेंद्र सिंह से महंत नरेंद्र गिरि का सफर बात 1984 की है जब प्रयाग में संगम के किनारे कुंभ का मेला लगा था. लाखोंकरोड़ों की भीड़ रोज गंगा स्नान कर रही थी. 20 साल का युवक भी इस भीड़ का हिस्सा बन कर संगम नहाने के लिए आया. संगम पर संतों की चकाचौंध को देख कर युवक के मन में यहीं बस जाने का मन करने लगा. वह संगम किनारे निरंजनी अखाडे़ के संत कोठारी दिव्यानंद गिरि के पास आया. यहीं साथ में रह कर उन की सेवा करने लगा. कुंभ खत्म हो गया तो भी युवक अपने घर जाने को तैयार नहीं हुआ. तब दिव्यानंद उस युवक को ले कर हरिद्वार चले गए. वहां उस का संपूर्ण भाव देख कर दिव्यानंद ने 1985 मे नरेंद्र गिरि को संन्यास की दीक्षा दी और उस का नामकरण नरेंद्र गिरि के रूप में कर दिया.

इस के बाद श्रीनिरंजनी अखाड़े के महात्मा व श्रीमठ बाघंबरी गद्दी के महंत बलवंत गिरि ने गुरुदीक्षा दी. बलवंत गिरि के न रहने के बाद नरेंद्र गिरि 2004 में श्रीमठ  बाघंबरी गद्दी के पीठाधीश्वर तथा बडे़ हनुमान मंदिर के महंत का पद संभाला. इस के बाद वह मठ और मंदिर को भव्य स्वरूप दिलाने का काम करने लगे. 2014 में उन को संतों की सब से बड़ी संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया. अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि मूलरूप से प्रयागराज के सराय ममरेज के करीब छतौना गांव के रहने वाले थे. उन के पिता का नाम भानुप्रताप सिंह था. वह आरएसएस में थे. पिता का प्रभाव नरेंद्र गिरि पर था. नरेंद्र गिरि का असली नाम नरेंद्र सिंह था.

वह 4 भाई थे. उन के भाइयों के नाम अशोक कुमार सिंह, अरविंद कुमार सिंह और आंनद सिंह थे. नरेंद्र गिरि यानी नरेंद्र सिंह ने बाबू सरजू प्रसाद इंटर कालेज से हाईस्कूल की परीक्षा पास की थी. 1980 में नरेंद्र सिंह 20 साल की उम्र में संन्यासी बन गए थे. वह प्रयाग के निरजंनी अखाडे़ में रहने लगे. अपने मधुर स्वभाव और मेहनती होने के कारण जल्द ही उन का नाम अखाड़े के प्रमुख लोगों में शामिल हो गया. अखाड़े में शामिल होने के 6 साल के अंदर ही नरेंद्र गिरि पदाधिकारी बन गए थे. निरंजनी अखाड़े का पदाधिकारी बनने के बाद नरेंद्र गिरि ने अखाडे़ के विस्तार पर काम करना शुरू किया. बातचीत में अच्छा होने के कारण जल्द ही वह लोकप्रिय होने लगे.

उन के संपर्क के बाद मठ की जायदाद और संपत्ति बढ़ने लगी, जिस की वजह से नरेंद्र गिरि का नाम केवल निरंजनी अखाड़े में ही नहीं, बाकी अखाड़ों में भी सम्मान से लिया जाने लगा. 1998 में नरेंद्र गिरि का नाम संतों की सब से बड़ी अखाड़ा परिषद के पदाधिकारी के रूप मे लिया जाने लगा. अखाड़ा परिषद का पदाधिकारी बनने के बाद नरेंद्र गिरि की अलग पहचान बनने लगी. साजिश दर साजिश नरेंद्र गिरि को सब से बड़ी सफलता तब मिली, जब वर्ष 2014 में अयोध्या निवासी संत ज्ञानदास की जगह पर उन्हें संतों की सब से बड़ी संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुन लिया गया. उस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और नरेंद्र गिरि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के करीबी हो गए.

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुने जाने के बाद नरेंद्र गिरि का कद तेजी से बढ़ने लगा. उन से मिलने वालों में नेताओं और अधिकारियों की लाइन लगने लगी. जिस निरंजनी अखाडे़ में वह हाशिए पर रहते थे, वहां भी उन का महत्त्व बढ़ गया था. अखाड़े के तमाम प्रभावशाली लोग किनारे हो गए थे. ऐसे लोगों को नरेंद्र गिरि का बढ़ता कद अखरने लगा था. नरेंद्र गिरि ने तमाम ऐसे फैसले करने शुरू कर दिए, जो लोगों को नागवार गुजरने लगे थे. अखाड़ा परिषद का प्रमुख कार्य संतों के अलगअलग अखाड़ों को मान्यता देने का होता है. ऐसे में नरेंद्र गिरि ने 2017 में किन्नर और परी अखाडे़ को मान्यता देने से इंकार कर दिया था.

अखाड़ा परिषद में नरेंद्र गिरि की छवि कड़े फैसले लेने वाले अध्यक्ष की बन गई थी. महंत नरेंद्र गिरि ने फरजी संतों की एक लिस्ट जारी कर दी थी. इस में 19 संतों के नाम शामिल थे, जिस की वजह से वह काफी चर्चा में रहे थे. मीडिया में यह सूची जारी करने के बाद उन पर दबाव पड़ रहा था कि वह इस सूची को वापस ले लें, लेकिन नरेंद्र गिरि सूची वापस लेने को तैयार नहीं थे. ऐसे में उन के खिलाफ विरोधियों की साजिश शुरू हो गई. नरेंद्र गिरि का एक वीडियो वायरल किया गया, जिस में वह एक शादी समारोह में डांस करने वाली लड़कियों पर नोट लुटा रहे थे.

नरेंद्र गिरि की तरफ से सफाई देते यह कहा गया था कि वह शादी रिश्तेदारी में थी, जिस में वह खुशीखुशी डांस करने वाली लड़कियों को नोट दे रहे थे. इस वीडियो के वायरल होने के बाद से नरेंद्र गिरि की छवि को काफी धक्का लगा था. जायदाद और जमीन से जुडे़ विवाद बाघंबरी गद्दी मठ और निरजंनी अखाड़े के पास अकूत धन और संपदा है. इसे ले कर साजिशों का दौर चल रहा था. प्रभावशाली लोग संतों के साथ मिल कर इस की जायदाद पर कब्जा करने का काम कर रहे थे. संतमहंत ही नहीं सेवादार भी अपने परिजनों के नाम जमीनें खरीद रहे थे. इस तरह की बातों को ले कर ही नरेंद्र गिरि का अपने ही शिष्य आंनद गिरि के साथ विवाद शुरू हो गया. मठ मंदिर से जुडे़ लोग किसी न किसी तरह से ऐसे मसले तलाश करने लगे, जिस से वह नरेंद्र गिरि से अपनी बात मनवा सकें.

आनंद गिरि मूलरूप से उत्तराखंड के रहने वाले थे. किशोरावस्था में ही वह हरिद्वार के आश्रम में नरेंद्र गिरि को मिले थे. इस के बाद नरेंद्र गिरि उन को प्रयागराज ले आए थे. 2007 में आनंद गिरि निरजंनी अखाड़े से जुड़े और महंत भी बने. गुरु के करीबी होने के कारण लेटे हनुमान मंदिर के छोटे महंत के नाम से भी उन्हें जाना जाता था. यह मंदिर भी बाघंबरी ट्रस्ट के द्वारा ही संचालित होता था. आनंद गिरि को योग गुरु के नाम से भी जाना जाता था. वह देशविदेश में योग सिखाने के लिए भी जाता था. महत्त्वाकांक्षी आनंद गिरि ने खुद को नरेंद्र गिरि का उत्तराधिकारी भी घोषित कर लिया था. बाद में विवाद होने के बाद नरेंद्र गिरि ने इस का खंडन किया था.

आनंद गिरि ने गंगा सफाई के लिए गंगा सेना भी बनाई थी. वह हरिद्वार में एक आश्रम भी बना रहा था. इस के बाद नरेंद्र गिरि के साथ उन का विवाद बढ़ गया था. दूसरे शिष्य भी खफा रहते थे आनंद गिरि से महत्त्वाकांक्षी आनंद गिरि दूसरे शिष्यों की आंखों में खटकता था. ऐसे में उस को ले कर सभी इस कोशिश में रहते थे कि वह नरेंद्र गिरि से दूर हो जाए. आनंद गिरि के विरोधियों को तब मौका मिल गया, जब आनंद गिरि 2016 और 2018 के पुराने मामलों में अपनी ही 2 शिष्याआें के साथ मारपीट और अभद्रता को ले कर 2019 में सुर्खियों में आया था. मई, 2019 में उसे जेल भी जाना पड़ा था. इस के बाद सितंबर माह में सिडनी कोर्ट ने उसे बाइज्जत बरी कर दिया था. इस के बाद उस का पासपोर्ट भी रिलीज कर दिया गया था. तब आनंद गिरि भारत आ गया.

आनंद गिरि का हवाई जहाज में शराब पीते हुए एक फोटो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. आंनद गिरि ने इसे शराब नहीं जूस बताया था. आनंद गिरि शौकीन किस्म का था. महंगी कार, बाइक और ऐशोआराम का उसे शौक था. नरेंद्र गिरि से पहले भी ऐसे ही विवादों के बीच ही मठ के 2 महंतों की संदिग्ध हालत में मौत हो चुकी है. नरेंद्र गिरि का अपने ही षिष्य आनंद गिरि के साथ विवाद की वजह 80 फीट चौड़ी और 120 फीट लंबी गौशाला की जमीन का टुकड़ा बना. आनंद गिरि के नाम यह जमीन लीज पर थी. यहां पर पेट्रोल पंप बनना था. कुछ दिनों के बाद महंत नरेंद्र गिरि ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया कि यहां पर पेट्रोल पंप नहीं चल सकता. उन का कहना था कि यहां पर मार्केट बना दी जाए, जिस से मठ की आमदनी बढ़ेगी.

आनंद गिरि का कहना था कि नरेंद्र गिरि उस जमीन को बेचना चाहते हैं. इस कारण लीज कैंसिल कराई गई थी. मठ की इस करोड़ों रुपए की जमीन को ले कर नरेंद्र गिरि और उन के शिष्य आनंद गिरि के बीच घमासान इस कदर बढ़ गया कि नरेंद्र गिरि ने आनंद गिरि को निरंजनी अखाड़े और मठ से निकाल दिया था. इस के बाद आंनद गिरि भाग कर हरिद्वार पहुंच गया था. आनंद गिरि ने इस के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह के ऐसे वीडियो वायरल किए, जिन में नरेंद्र गिरि के शिष्यों के पास करोड़ों की संपत्ति होने का दावा किया गया था. नरेंद्र गिरि ने इन मुद्दों पर सफाई देते कहा था कि ये आरोप बेबुनियाद हैं. उन की छवि को धूमिल करने के लिए यह काम किया गया है. कुछ समय के बाद आनंद गिरि ने अपने गुरु नरेंद्र गिरि से माफी मांग ली थी. माफी मांगने के वीडियो भी खूब वायरल हुए थे.

नरेंद्र गिरि का एक और विवाद लेटे हनुमान मंदिर के मुख्य पुजारी आद्या तिवारी और उस के बेटे संदीप तिवारी के साथ बताया जाता है. लेनेदेन के इस विवाद की वजह से दोनों के बीच बातचीत बंद थी. जायदाद के ऐसे विवादों के अलावा भी नरेंद्र गिरि कई तरह के दूसरे विवादों में भी घिरे थे. नरेंद्र गिरि के करीबी रहे शिष्य और निरंजनी अखाड़े के सचिव महंत आशीष गिरि ने 17 नवंबर, 2019 को गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी. आशीष गिरि ने जमीन बेचने का विरोध किया था. दारागंज स्थित अखाड़े के आश्रम में आशीष गिरि ने गोली मार कर आत्महत्या की थी. इस की वजह यह बताई जा रही थी कि 2011 और 2012 में बाघंबरी गद्दी की जमीन समाजवादी पार्टी के नेता को बेची जा रही थी. पुलिस ने आशीष गिरि की आत्महत्या का कारण डिप्रेशन बताया था.

वीडियो में छिपे राज जानकार लोगों का मानना है कि नरेंद्र गिरि का कोई ऐसा वीडियो था, जिस के वायरल होने से उन को अपने मानसम्मान के धूमिल होने का डर लग रहा था. एक ऐसा ही वीडियो पहले भी वायरल हो चुका था, जिस में वह डांस करने वाली लड़कियों पर रुपए लुटा रहे थे. यह माना जा रहा है कि उस की तरह का या उस से अधिक घातक वीडियो और भी हो सकता है. जिस की आड़ में उन को ब्लैकमेल किया जा रहा था. ऐसे में अपना मानसम्मान खोने के डर से नरेंद्र गिरि ने आत्महत्या जैसा फैसला कर लिया. उत्तर प्रदेश सरकार ने नरेंद्र गिरि की मौत की जांच कराने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है. 18 सदस्यों वाली इस जांच टीम की निगरानी 4 अफसरों को सौंपी.

पुलिस ने गिरफ्तार किए गए आरोपी आनंद गिरि, आद्या तिवारी और उन के बेटे संदीप तिवारी को भादंवि की धारा 306 के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर नैनी जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक इस केस की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी. नरेंद्र गिरि ने सुसाइड नोट लिखने के अलावा अपना बयान रिकौर्ड कर के भी मोबाइल में रखा है. मौत की वजह जायदाद और मठ के महंत पद का लालच है. महंत नरेंद्र गिरि की मौत से पता चलता है कि मंदिर और मठ कितनी भी धर्म की बातें कर लें पर वहां भी लालच और एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र हावी रहता है, जिस की वजह से ऐसी घटनाएं घटती रहती है.

Hindi love Story : अधेड़ उम्र का इश्क

Hindi love Story : 45 साल की जसवंती विधवा जरूर थी, लेकिन अपनी कदकाठी की वजह से वह 35 की दिखती थी. वह अपने दोनों बच्चों की शादी कर चुकी थी. इस के बावजूद भी मदन सेन से उस के संबंध हो गए. अधेड़ उम्र का यह इश्क जब सार्वजनिक हो गया तो एक दिन…

रवि को मदन सेन के साथ अपनी मां जसवंती के अवैध संबंधों की पूरी जानकारी थी. वह यह भी जानता था मदन अब उस की मां से तंग आ चुका था. इसलिए रवि ने अपनी मां को मौत के घाट उतारने के लिए मदन से संपर्क किया तो वह भी जसवंती की हत्या में शामिल हो गया. 15 मार्च, 2021 की सुबह 10 बजे का वक्त था. जब बैतूल जिले की मुलताई थाने की सीमा में बसे छोटे से गांव काथम की रहने वाली जसवंती और उस की 11 वर्षीया नातिन लविशा की हत्या की खबर गांव में आग की तरह फैली थी, जिस से घटना की जानकारी लगने पर टीआई मुलताई सुरेश सोलंकी भी कुछ देर में टीम ले कर मौके पर पहुंच गए.

कमरे के अंदर बिछे पलंग पर जसवंती और उस की नातिन के शव खून से लथपथ पडे़ थे. दोनों के सिर पर घातक चोटें थीं. टीआई सोलंकी ने घटना की जानकारी बैतूल एसपी सिमला प्रसाद के अलावा एएसपी श्रद्धा जोशी और एसडीपीओ नम्रता सोधिया को भी दे दी. जिस से कुछ ही देर में उक्त अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. शुरुआती पूछताछ में पता चला कि पति की मौत के बाद जसवंती अपने बेटे रवि और बहू के साथ रहती थी. वह स्थानीय कलारी की रसोई में खाना बनाने का काम करती थी. कुछ दिनों में उस की नातिन लविशा भी आ कर उस के साथ रहने लगी.

जबकि घटना से 4 दिन पहले ही जसवंती ने लड़झगड़ कर बेटेबहू को उन के ढाई महीने के बच्चे के साथ घर से निकाल दिया था. जिस से रवि अपनी पत्नी को ले कर पास के गांव परसोडी में रहने वाले अपने मामा ससुर के घर जा कर रहने लगा था. जसवंती का हालिया विवाद बेटे से हुआ था. इस के अलावा गांव में उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. लेकिन छोटी बात पर बेटा मां की हत्या करेगा, इस बात पर आसानी  से भरोसा नहीं किया जा सकता था. इसलिए पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड में दूसरे एंगल से जांच करनी शुरू कर दी, जिस में पता चला कि जसवंती 45 की जरूर थी, लेकिन शारीरिक बनावट और खूबसूरती के चलते वह 35 से अधिक नहीं दिखती थी.

उस के पति की मौत कई साल पहले हो चुकी थी. इसलिए पुलिस जसंवती के अवैध संबंधों की जानकारी जुटाने में लग गई. जांच में पता चला कि जसवंती का प्रेम प्रसंग कई सालों से कलौरी में काम करने वाले मदन सेन के साथ चल रहा था. मदन सेन मूलरूप से सागर जिले के बंडा का रहने वाला था. लेकिन कलारी में नौकरी के चलते यहां जसवंती के घर के पास ही किराए पर रहने लगा था. पूरे गांव को मदन और जसवंती के इश्क की जानकारी थी. लेकिन उन के बीच विवाद का कोई वाकया सामने नहीं आया था. पुलिस ने मदन से पूछताछ की, जिस में उस ने कबूल कर लिया कि उस के जसंवती से संबंध थे, किंतु उस की हत्या में उस ने अपना हाथ होने से मना कर दिया.

इसलिए एसपी सिमला प्रसाद ने इस दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए एएसपी श्रद्धा जोशी के निर्देशन में और एसडीपीओ सोधिया के नेतृत्व में थानाप्रभारी मुलताई सुरेश सोलंकी की एक टीम गठित कर दी. टीम ने जांच शुरू करते हुए चौतरफा प्रयास शुरू कर दिए, लेकिन जब इस में सफलता मिलती नहीं दिखाई दी तो एसपी सिमला प्रसाद ने साइबर सेल के एसआई राजेंद्र राजवंशी को मदन सेन के अलावा मृतक के बेटे रवि के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकालने के निर्देश दिए. काल डिटेल्स में चौंका देने वाली जानकारी निकल कर सामने आई कि घटना के 2 दिन पहले से ही अचानक जसवंती के प्रेमी मदन की उस के बेटे से फोन पर कई बार बात हुई थी.

इतना ही नहीं, घटना की रात को रवि और उस के मामा ससुर दिलीप के मोबाइल की लोकेशन गांव में मदन सेन के मोबाइल के पास मिल रही थी. उस रात भी मदन और रवि के बीच कई बार बात हुई थी. जबकि 15 मार्च के बाद से मदन और रवि के बीच इक्कादुक्का बार बात हुई थी, वह भी बहुत कम समय के लिए. साइबर सेल को रवि के मोबाइल की लोकेशन 15 मार्च को कामथ में मिली थी. इस का सीधा मतलब था कि वह घटना वाली रात को कामथ आया था. इसलिए रवि पर अपना शक पुख्ता करने के लिए टीआई सोलंकी ने रवि को थाने बुला कर बातोंबातों मे उस से पूछा, ‘‘जिस रात तुम्हारी मां का कत्ल हुआ, उस रात तुम कहां थे?’’

‘‘कहां होता साहब, मां ने घर से धक्का मार कर निकाल दिया था. इसलिए मैं अपने मामा ससुर के यहां जा कर रहने लगा. उस रात भी वहीं था.’’ रवि ने बताया.

‘‘ठीक है. इस मदन सेन के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है? लोग बताते हैं कि मदन की तुम्हारी मां के साथ अच्छी दोस्ती थी.’’ टीआई ने कहा.

‘‘आप ने सही सुना है, साहब. मुझे तो अपनी मां कहने में भी शर्म आने लगी थी. मदन हमारे घर के पास ही रहता है. कई बार वही आधी रात में भी मेरी मां से मिलने आया करता था. यह सब मेरी पत्नी ने अपनी आंखों से देखा था. इसलिए वह इस बात को ले कमुझे ताने दिया करती थी.’’ रवि बोला.

‘‘तुम ने मदन को रोका नहीं?’’ टीआई ने पूछा.

‘‘रोका था साहब. हमारे बीच काफी झगड़ा भी हो चुका है. लेकिन खुद मेरी मां ही उसे घर बुलाती थी.’’ वह बोला.

‘‘मदन से तुम्हारी बात होती थी कभी?’’

‘‘पहले होती थी, लेकिन जब पता चला कि उस के मेरी मां से अवैध संबंध हैं, तब हमारे बीच झगड़ा हुआ था. फिर उस से बातचीत बंद हो गई थी.’’

‘‘फोन पर तो होती होगी बात तुम्हारी मदन से.’’

‘‘नहीं, कभी नहीं.’’

जैसे ही रवि ने मदन से फोन पर बात होने से इनकार किया. तभी पुलिस ने उस के साथ थोड़ी सख्ती दिखाई तो वह टूट गया. फिर उस ने इस दोहरे हत्याकांड का राज उगल दिया. उस ने बताया कि इस हत्याकांड में मामा ससुर दिलीप के अलावा मां का प्रेमी मदन भी शामिल था. रवि की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त मूसल एवं हथौड़ी भी बरामद कर ली. पुलिस ने रवि के मामा ससुर दिलीप व मां के प्रेमी मदन सेन को भी गिरफ्तार कर लिया. हत्या करने के बाद वह जसवंती का मंगलसूत्र और लविशा की पायल ले गए थे, इसलिए पुलिस ने आरोपियों से ये दोनों जेवर भी बरामद कर लिए. उन से पूछताछ के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

पति की मृत्यु के बाद जसवंती ने न केवल परिवार संभाला, बल्कि बेटे की शादी भी धूमधाम से की. रवि मां का हाथ बंटाने के लिए छोटामोटा काम किया करता था, लेकिन लौकडाउन में काम छूट जाने से वह घर में कुछ महीनों से बैठा था. जसवंती पिछले 5 सालों से कलारी के औफिस में खाना बनाने का काम करती थी. जसवंती सुंदर तो थी ही, साथ ही आकर्षक भी थी. कलारी में सागर जिले का मदन सेन मैनेजर की हैसियत से पूरा हिसाबकिताब देखता था. मदन यहां अकेला रहता था, इसलिए उसे एक औरत की और जवानी में पति की मौत हो जाने से जसवंती को एक मर्द की आवश्यकता यदाकदा महसूस होती रहती थी.

ऐसे में मदन की नजर जसवंती पर थी. वह जानता था कि जसंवती का पति नहीं है, इसलिए उस तक पहुंचना उस के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं था. उस ने काफी सोचसमझ कर ही जसवंती के पड़ोस में किराए का मकान ले कर उस में रहना शुरू किया. कुछ समय बाद मदन ने धीरेधीरे जसवंती की तरफ बढ़ना शुरू किया तो अपनी खुद की जरूरतों से परेशान जसवंती ने भी अपने मन की लगाम ढीली छोड़ दी और मदन को अपनी मौन स्वीकृति दे दी, जिस से एक रोज आधी रात में मदन शराब पी कर जसवंती के घर पहुंचा तो जसवंती ने भी पहली मुलाकात में उस के सामने समर्पण कर दिया.

कहना नहीं होगा कि दोनों को एकदूसरे की जरूरत थी, इसलिए मदन और जसवंती दोनों ही कुछ दिनों बाद खुल कर अपनी प्रेम लीला करने लगे. जसवंती की बेटी की शादी पहले ही हो चुकी थी. सो वह अपनी ससुराल में थी. बेटा रवि अपनी मां के साथ रहता था, उसे काबू में रखने के लिए मदन ने रवि को शराब पीने की आदत डाल दी और रोज ही उसे कलारी में शराब पीने के लिए पैसे देने लगा. मदन के साथ मां के संबंध की बात पता होने के बाद भी शराब के लालच में रवि ने उस का कोई विरोध नहीं किया. यहां तक कि 2 साल पहले रवि की शादी हो जाने के बाद बहू के आ जाने पर भी मदन और जसवंती के संबंधों पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

लेकिन कहते हैं कि अवैध संबंधों की एक उम्र होती है. क्योंकि वक्त के साथ जहां औरत अपने प्रेमी पर ज्यादा अधिकार जताने लगती है, वहीं पे्रमी का मन उस से ऊबने लगता है. यही इस मामले में होने लगा था. जसवंती मदन पर पूरा हक जमाने लगी थी. यहां तक कि वह उस पर दबाव बनाने लगी थी कि वह गांव में रहने वाली अपनी पत्नी को छोड़ कर उस के साथ उस के घर में पति की तरह रहे. लेकिन मदन इस के लिए राजी नहीं था. इस से मदन और जसंवती के बीच विवाद होने लगा. लौकडाउन में काम बंद हो जाने से रवि पूरी तरह मां पर निर्भर हो गया. इसलिए वह जब भी मां से खर्च के पैसे मांगता तो मां उसे खरीखोटी सुना देती थी.

ढाई महीने पहले ही रवि की पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया था, जिस से जसवंती रवि पर रोज कोई न कोई काम करने के लिए उस पर दबाव बनाने लगी थी. लेकिन रवि को कोई काम नहीं मिल पा रहा था. इस दौरान जसवंती की बेटी की बेटी लवीशा भी उस के साथ आ कर रहने लगी, जिस से जसंवती रवि को खर्च के पैसे देने में और आनाकानी करने लगी. इस से रवि अपनी भांजी से भी नफरत करने लगा. घटना के 4 दिन पहले रवि ने अपनी मां से खर्च के लिए पैसे मांगे तो जसवंती ने उसे बुरी तरह झिड़का ही नहीं, बल्कि पत्नी और बच्चे के साथ घर से निकलने का फरमान भी सुना दिया. जिस से गुस्से में आ कर रवि अपनी पत्नी और बच्चे को ले कर अपने मामा ससुर दिलीप के वहां चला गया.

रवि को इस बात का डर था कि कहीं मां पूरी जायदाद भांजी लवीशा के नाम न लिख दे, जो उस के साथ आ कर रहने लगी थी. इसलिए उस ने मामा ससुर के साथ मिल कर मां की हत्या की योजना बना कर मदन को फोन किया. वास्तव में रवि को पता था कि मां का प्रेमी मदन सेन भी अब उस से तंग आ चुका है. इसलिए रवि ने मदन को अपनी योजना बताई तो मदन इस में साथ देने को राजी हो गया. जिस के बाद घटना वाले दिन मामा ससुर दिलीप और रवि गांव पहुंचे तो वहां से मदन भी उन के साथ हो गया. आधी रात के बाद तीनों ने चुपचाप घर में घुस कर सो रही जसवंती और उस की नातिन के सिर पर मूसल और हथौड़ी से वार कर उन की हत्या कर दी.

पुलिस इस घटना को लूट की वारदात समझे, इसलिए रवि हत्या के बाद जसवंती का मंगलसूत्र और लविशा की पायल उतार कर साथ ले गया. तीनों को भरोसा था कि पुलिस उन पर कभी शक नहीं करेगी. लेकिन पुलिस ने 7 दिनों में ही मामले का खुलासा कर दिया. Hindi love Story

Crime Stories in Hindi : जायदाद के लिए बेटे ने मूसल से वार कर मां की कर दी हत्या

Crime Stories in Hindi : 45 साल की जसवंती विधवा जरूर थी, लेकिन अपनी कदकाठी की वजह से वह 35 की दिखती थी. वह अपने दोनों बच्चों की शादी कर चुकी थी. इस के बावजूद भी मदन सेन से उस के संबंध हो गए. अधेड़ उम्र का यह इश्क जब सार्वजनिक हो गया तो एक दिन…

रवि को मदन सेन के साथ अपनी मां जसवंती के अवैध संबंधों की पूरी जानकारी थी. वह यह भी जानता था मदन अब उस की मां से तंग आ चुका था. इसलिए रवि ने अपनी मां को मौत के घाट उतारने के लिए मदन से संपर्क किया तो वह भी जसवंती की हत्या में शामिल हो गया. 15 मार्च, 2021 की सुबह 10 बजे का वक्त था. जब बैतूल जिले की मुलताई थाने की सीमा में बसे छोटे से गांव काथम की रहने वाली जसवंती और उस की 11 वर्षीया नातिन लविशा की हत्या की खबर गांव में आग की तरह फैली थी, जिस से घटना की जानकारी लगने पर टीआई मुलताई सुरेश सोलंकी भी कुछ देर में टीम ले कर मौके पर पहुंच गए.

कमरे के अंदर बिछे पलंग पर जसवंती और उस की नातिन के शव खून से लथपथ पडे़ थे. दोनों के सिर पर घातक चोटें थीं. टीआई सोलंकी ने घटना की जानकारी बैतूल एसपी सिमला प्रसाद के अलावा एएसपी श्रद्धा जोशी और एसडीपीओ नम्रता सोधिया को भी दे दी. जिस से कुछ ही देर में उक्त अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. शुरुआती पूछताछ में पता चला कि पति की मौत के बाद जसवंती अपने बेटे रवि और बहू के साथ रहती थी. वह स्थानीय कलारी की रसोई में खाना बनाने का काम करती थी. कुछ दिनों में उस की नातिन लविशा भी आ कर उस के साथ रहने लगी.

जबकि घटना से 4 दिन पहले ही जसवंती ने लड़झगड़ कर बेटेबहू को उन के ढाई महीने के बच्चे के साथ घर से निकाल दिया था. जिस से रवि अपनी पत्नी को ले कर पास के गांव परसोडी में रहने वाले अपने मामा ससुर के घर जा कर रहने लगा था. जसवंती का हालिया विवाद बेटे से हुआ था. इस के अलावा गांव में उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. लेकिन छोटी बात पर बेटा मां की हत्या करेगा, इस बात पर आसानी  से भरोसा नहीं किया जा सकता था. इसलिए पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड में दूसरे एंगल से जांच करनी शुरू कर दी, जिस में पता चला कि जसवंती 45 की जरूर थी, लेकिन शारीरिक बनावट और खूबसूरती के चलते वह 35 से अधिक नहीं दिखती थी.

उस के पति की मौत कई साल पहले हो चुकी थी. इसलिए पुलिस जसंवती के अवैध संबंधों की जानकारी जुटाने में लग गई. जांच में पता चला कि जसवंती का प्रेम प्रसंग कई सालों से कलौरी में काम करने वाले मदन सेन के साथ चल रहा था. मदन सेन मूलरूप से सागर जिले के बंडा का रहने वाला था. लेकिन कलारी में नौकरी के चलते यहां जसवंती के घर के पास ही किराए पर रहने लगा था. पूरे गांव को मदन और जसवंती के इश्क की जानकारी थी. लेकिन उन के बीच विवाद का कोई वाकया सामने नहीं आया था. पुलिस ने मदन से पूछताछ की, जिस में उस ने कबूल कर लिया कि उस के जसंवती से संबंध थे, किंतु उस की हत्या में उस ने अपना हाथ होने से मना कर दिया.

इसलिए एसपी सिमला प्रसाद ने इस दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए एएसपी श्रद्धा जोशी के निर्देशन में और एसडीपीओ सोधिया के नेतृत्व में थानाप्रभारी मुलताई सुरेश सोलंकी की एक टीम गठित कर दी. टीम ने जांच शुरू करते हुए चौतरफा प्रयास शुरू कर दिए, लेकिन जब इस में सफलता मिलती नहीं दिखाई दी तो एसपी सिमला प्रसाद ने साइबर सेल के एसआई राजेंद्र राजवंशी को मदन सेन के अलावा मृतक के बेटे रवि के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकालने के निर्देश दिए. काल डिटेल्स में चौंका देने वाली जानकारी निकल कर सामने आई कि घटना के 2 दिन पहले से ही अचानक जसवंती के प्रेमी मदन की उस के बेटे से फोन पर कई बार बात हुई थी.

इतना ही नहीं, घटना की रात को रवि और उस के मामा ससुर दिलीप के मोबाइल की लोकेशन गांव में मदन सेन के मोबाइल के पास मिल रही थी. उस रात भी मदन और रवि के बीच कई बार बात हुई थी. जबकि 15 मार्च के बाद से मदन और रवि के बीच इक्कादुक्का बार बात हुई थी, वह भी बहुत कम समय के लिए. साइबर सेल को रवि के मोबाइल की लोकेशन 15 मार्च को कामथ में मिली थी. इस का सीधा मतलब था कि वह घटना वाली रात को कामथ आया था. इसलिए रवि पर अपना शक पुख्ता करने के लिए टीआई सोलंकी ने रवि को थाने बुला कर बातोंबातों मे उस से पूछा, ‘‘जिस रात तुम्हारी मां का कत्ल हुआ, उस रात तुम कहां थे?’’

‘‘कहां होता साहब, मां ने घर से धक्का मार कर निकाल दिया था. इसलिए मैं अपने मामा ससुर के यहां जा कर रहने लगा. उस रात भी वहीं था.’’ रवि ने बताया.

‘‘ठीक है. इस मदन सेन के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है? लोग बताते हैं कि मदन की तुम्हारी मां के साथ अच्छी दोस्ती थी.’’ टीआई ने कहा.

‘‘आप ने सही सुना है, साहब. मुझे तो अपनी मां कहने में भी शर्म आने लगी थी. मदन हमारे घर के पास ही रहता है. कई बार वही आधी रात में भी मेरी मां से मिलने आया करता था. यह सब मेरी पत्नी ने अपनी आंखों से देखा था. इसलिए वह इस बात को ले कर मुझे ताने दिया करती थी.’’ रवि बोला.

‘‘तुम ने मदन को रोका नहीं?’’ टीआई ने पूछा.

‘‘रोका था साहब. हमारे बीच काफी झगड़ा भी हो चुका है. लेकिन खुद मेरी मां ही उसे घर बुलाती थी.’’ वह बोला.

‘‘मदन से तुम्हारी बात होती थी कभी?’’

‘‘पहले होती थी, लेकिन जब पता चला कि उस के मेरी मां से अवैध संबंध हैं, तब हमारे बीच झगड़ा हुआ था. फिर उस से बातचीत बंद हो गई थी.’’

‘‘फोन पर तो होती होगी बात तुम्हारी मदन से.’’

‘‘नहीं, कभी नहीं.’’

जैसे ही रवि ने मदन से फोन पर बात होने से इनकार किया. तभी पुलिस ने उस के साथ थोड़ी सख्ती दिखाई तो वह टूट गया. फिर उस ने इस दोहरे हत्याकांड का राज उगल दिया.

उस ने बताया कि इस हत्याकांड में मामा ससुर दिलीप के अलावा मां का प्रेमी मदन भी शामिल था. रवि की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त मूसल एवं हथौड़ी भी बरामद कर ली. पुलिस ने रवि के मामा ससुर दिलीप व मां के प्रेमी मदन सेन को भी गिरफ्तार कर लिया. हत्या करने के बाद वह जसवंती का मंगलसूत्र और लविशा की पायल ले गए थे, इसलिए पुलिस ने आरोपियों से ये दोनों जेवर भी बरामद कर लिए. उन से पूछताछ के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

पति की मृत्यु के बाद जसवंती ने न केवल परिवार संभाला, बल्कि बेटे की शादी भी धूमधाम से की. रवि मां का हाथ बंटाने के लिए छोटामोटा काम किया करता था, लेकिन लौकडाउन में काम छूट जाने से वह घर में कुछ महीनों से बैठा था. जसवंती पिछले 5 सालों से कलारी के औफिस में खाना बनाने का काम करती थी. जसवंती सुंदर तो थी ही, साथ ही आकर्षक भी थी. कलारी में सागर जिले का मदन सेन मैनेजर की हैसियत से पूरा हिसाबकिताब देखता था. मदन यहां अकेला रहता था, इसलिए उसे एक औरत की और जवानी में पति की मौत हो जाने से जसवंती को एक मर्द की आवश्यकता यदाकदा महसूस होती रहती थी.

ऐसे में मदन की नजर जसवंती पर थी. वह जानता था कि जसंवती का पति नहीं है, इसलिए उस तक पहुंचना उस के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं था. उस ने काफी सोचसमझ कर ही जसवंती के पड़ोस में किराए का मकान ले कर उस में रहना शुरू किया. कुछ समय बाद मदन ने धीरेधीरे जसवंती की तरफ बढ़ना शुरू किया तो अपनी खुद की जरूरतों से परेशान जसवंती ने भी अपने मन की लगाम ढीली छोड़ दी और मदन को अपनी मौन स्वीकृति दे दी, जिस से एक रोज आधी रात में मदन शराब पी कर जसवंती के घर पहुंचा तो जसवंती ने भी पहली मुलाकात में उस के सामने समर्पण कर दिया.

कहना नहीं होगा कि दोनों को एकदूसरे की जरूरत थी, इसलिए मदन और जसवंती दोनों ही कुछ दिनों बाद खुल कर अपनी प्रेम लीला करने लगे. जसवंती की बेटी की शादी पहले ही हो चुकी थी. सो वह अपनी ससुराल में थी. बेटा रवि अपनी मां के साथ रहता था, उसे काबू में रखने के लिए मदन ने रवि को शराब पीने की आदत डाल दी और रोज ही उसे कलारी में शराब पीने के लिए पैसे देने लगा. मदन के साथ मां के संबंध की बात पता होने के बाद भी शराब के लालच में रवि ने उस का कोई विरोध नहीं किया. यहां तक कि 2 साल पहले रवि की शादी हो जाने के बाद बहू के आ जाने पर भी मदन और जसवंती के संबंधों पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

लेकिन कहते हैं कि अवैध संबंधों की एक उम्र होती है. क्योंकि वक्त के साथ जहां औरत अपने प्रेमी पर ज्यादा अधिकार जताने लगती है, वहीं पे्रमी का मन उस से ऊबने लगता है. यही इस मामले में होने लगा था. जसवंती मदन पर पूरा हक जमाने लगी थी. यहां तक कि वह उस पर दबाव बनाने लगी थी कि वह गांव में रहने वाली अपनी पत्नी को छोड़ कर उस के साथ उस के घर में पति की तरह रहे. लेकिन मदन इस के लिए राजी नहीं था. इस से मदन और जसंवती के बीच विवाद होने लगा. लौकडाउन में काम बंद हो जाने से रवि पूरी तरह मां पर निर्भर हो गया. इसलिए वह जब भी मां से खर्च के पैसे मांगता तो मां उसे खरीखोटी सुना देती थी.

ढाई महीने पहले ही रवि की पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया था, जिस से जसवंती रवि पर रोज कोई न कोई काम करने के लिए उस पर दबाव बनाने लगी थी. लेकिन रवि को कोई काम नहीं मिल पा रहा था. इस दौरान जसवंती की बेटी की बेटी लवीशा भी उस के साथ आ कर रहने लगी, जिस से जसंवती रवि को खर्च के पैसे देने में और आनाकानी करने लगी. इस से रवि अपनी भांजी से भी नफरत करने लगा. घटना के 4 दिन पहले रवि ने अपनी मां से खर्च के लिए पैसे मांगे तो जसवंती ने उसे बुरी तरह झिड़का ही नहीं, बल्कि पत्नी और बच्चे के साथ घर से निकलने का फरमान भी सुना दिया. जिस से गुस्से में आ कर रवि अपनी पत्नी और बच्चे को ले कर अपने मामा ससुर दिलीप के वहां चला गया.

रवि को इस बात का डर था कि कहीं मां पूरी जायदाद भांजी लवीशा के नाम न लिख दे, जो उस के साथ आ कर रहने लगी थी. इसलिए उस ने मामा ससुर के साथ मिल कर मां की हत्या की योजना बना कर मदन को फोन किया. वास्तव में रवि को पता था कि मां का प्रेमी मदन सेन भी अब उस से तंग आ चुका है. इसलिए रवि ने मदन को अपनी योजना बताई तो मदन इस में साथ देने को राजी हो गया. जिस के बाद घटना वाले दिन मामा ससुर दिलीप और रवि गांव पहुंचे तो वहां से मदन भी उन के साथ हो गया. आधी रात के बाद तीनों ने चुपचाप घर में घुस कर सो रही जसवंती और उस की नातिन के सिर पर मूसल और हथौड़ी से वार कर उन की हत्या कर दी.

पुलिस इस घटना को लूट की वारदात समझे, इसलिए रवि हत्या के बाद जसवंती का मंगलसूत्र और लविशा की पायल उतार कर साथ ले गया. तीनों को भरोसा था कि पुलिस उन पर कभी शक नहीं करेगी. लेकिन पुलिस ने 7 दिनों में ही मामले का खुलासा कर दिया. Crime Stories in Hindi

Family Crime : दामाद ने संपत्ति हड़पने के लिए सास, ससुर और सालियों की डंडे से पीट कर की हत्या

Family Crime : नरेंद्र गंगवार बेहद शातिर इंसान था. सब से पहले उस ने हीरालाल की बड़ी बेटी लीलावती को फांस कर उस से लवमैरिज की. फिर ससुर की संपत्ति हड़पने के लिए ससुराल के सभी लोगों की हत्या कर उन्हें घर में ही दफना दिया. 15 महीने बाद जब इस सनसनीखेज राज से परदा…

25 अगस्त, 2020 को नरेंद्र गंगवार अपने ससुर हीरालाल के पैतृक गांव पैगानगरी पहुंचा. यह गांव बरेली जिले की तहसील मीरगंज के अंतर्गत आता है. गांव पहुंचते ही वह हीरालाल के नाती दुर्गा प्रसाद से मिला. उस ने दुर्गा प्रसाद को बताया कि वह अपने ससुर की जमीन की पैदावार की बंटाई का हिस्सा लेने आया है. दरअसल, इस गांव में हीरालाल की 16 बीघा जमीन थी जो उन्होंने बंटाई पर दे रखी थी. वह खेती की पैदावार का हिस्सा लेने गांव आते रहते थे. दुर्गा प्रसाद नरेंद्र को अच्छी तरह जानते थे. हीरालाल दुर्गा प्रसाद के रिश्ते के नाना लगते थे. नरेंद्र कई बार अपने ससुर के साथ गांव आया था. दुर्गा प्रसाद ने उस से नाना की कुशलक्षेम पूछी.

इस पर नरेंद्र ने कहा, ‘‘दुर्गा प्रसादजी, बहुत ही दुखद खबर है. आप के नाना हीरालालजी अब इस दुनिया में नहीं रहे. 22 अप्रैल, 2020 को उन की मंझली बेटी दुर्गा और हीरालालजी ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लौकडाउन के चलते हम किसी को उन की मृत्यु की खबर तक नहीं दे पाए. कोरोना महामारी के चलते मैं ने अपनी बीवी लीलावती, किराएदार विजय व कुछ अन्य लोगों के सहयोग से नारायण नंगला किचा नदी में उन का दाहसंस्कार करा दिया था. पति के वियोग में उन की पत्नी हेमवती भी अपनी बेटी पार्वती को ले कर अचानक कहीं चली गईं. मैं ने और लीलावती ने उन्हें सब जगह ढूंढा, लेकिन उन का भी कहीं पता न चल सका.’’

हीरालाल की मृत्यु की खबर सुन कर दुर्गा प्रसाद को झटका लगा. वहां बैठे गांव के कई लोग भी हैरत में पड़ गए. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जो इंसान अपनी औलाद के सुनहरे भविष्य का सपना ले कर गांव छोड़ शहर जा बसा था, उस का परिवार इस तरह टूट कर बिखर जाएगा. हीरालाल के मरने की खबर सुन कर गांव के लोग तरहतरह की बातें करने लगे. दुर्गा प्रसाद को बहुत दुख हुआ. लेकिन एक बात उन की समझ में नहीं आ रही थी कि जब पति और बेटी खत्म हो गए तो हेमवती को अपनी बेटी को साथ ले कर कहीं चली गई. अगर उसे वहां से जाना था तो गांव में उस के पति की 16 बीघा जमीन पड़ी थी, जिस के सहारे हीरालाल के घर का खर्च चलता था. गांव में उस का मकान भी था. वह गांव आ कर रह सकती थी.

उसी समय नरेंद्र ने दुर्गाप्रसाद को बताया कि ससुर के घर के पास ही मेरा भी मकान है. जिस पर एकमात्र बची बेटी लीलावती का मालिकाना हक कराने के लिए मुझे हीरालालजी के मृत्यु प्रमाण पत्र की जरूरत है. आप लोग उन के परिवार के लोग हो, यह काम आप ही करा सकते हो. दुर्गा प्रसाद को विश्वास नहीं हुआ नरेंद्र की बात सुनते ही दुर्गा प्रसाद का दिमाग घूम गया. उन्हें उस की बात में कुछ झोल नजर आया. दुर्गा प्रसाद ने यह बात हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन के घर जा कर उन्हें बताई. साथ ही नरेंद्र की बातों पर कुछ शक भी जाहिर किया. यह बात सुन कर कुंवर सैन ने उसे बंटाई का हिस्सा देने से भी साफ मना कर दिया तो नरेंद्र वापस अपने घर चला आया.

नरेंद्र की बातों पर शक हुआ तो 27 अगस्त, 2020 को दुर्गा प्रसाद हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन को साथ ले कर उन की मौत की सच्चाई जानने के लिए रुद्रपुर ट्रांजिट कैंप पहुंचे. हीरालाल के घर पर ताला लगा हुआ था. यह देख कर उन्होंने पड़ोसियों से उन के बारे में जानकारी लेनी चाही तो पता चला कि हीरालाल के घर पर पिछले 15 महीने से ताला लटका हुआ है. इस दौरान उन्होंने कभी भी हीरालाल और उन के परिवार वालों को यहां आतेजाते नहीं देखा. यह बात सामने आते ही दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन को हैरानी हुई, क्योंकि नरेंद्र ने उन्हें बताया था कि हीरालाल ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लेकिन उस के पड़ोसियों को इस बात की जानकारी तक नहीं थी.

नरेंद्र का झूठ सामने आते ही दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन समझ गए कि हीरालाल की संपत्ति हड़पने की मंशा से उन के दामाद नरेंद्र ने कोई चक्रव्यूह रच कर उन्हें मौत Family Crime के घाट उतार दिया. हीरालाल के परिवार के साथ किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन उसी दिन ट्रांजिट कैंप थाने पहुंच गए. यह बात उन्होंने थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी को बताई. मामला एक ही परिवार के 4 लोगों के लापता होने का था, इसलिए उन्होंने इसे गंभीरता से लिया. दुर्गाप्रसाद और कुंवर सैन से जरूरी जानकारी लेने के बाद उन्हें घर भेज दिया गया. फिर थानाप्रभारी जोशी ने इस मामले की सच्चाई जानने के लिए गुप्तरूप से जांचपड़ताल करानी शुरू की. सादे वेश में जा कर पुलिस ने नरेंद्र गंगवार को अपने कब्जे में लिया, ताकि वह फरार न हो सके.

थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी ने नरेंद्र से हीरालाल और उन के परिवार के सदस्यों के बारे में कड़ी पूछताछ की. पुलिस पूछताछ के दौरान नरेंद्र शुरू में तो इधरउधर की कहानी गढ़ता रहा. लेकिन जैसे ही पुलिस की सख्ती बढ़ी तो उस का धैर्य जवाब दे गया. उस के बाद उस ने अपने ससुराल वालों की हत्या अपने किराएदार विजय के सहयोग से करने की बात स्वीकार कर ली. पूछताछ के दौरान नरेंद्र गंगवार ने बताया कि 20 अप्रैल, 2019 को सुबह साढ़े 5 बजे उस ने अपने किराएदार विजय के साथ मिल कर सासससुर और 2 सालियों को डंडे से पीट कर मौत के घाट उतारा. फिर उन की लाशों को उन्हीं के मकान में गड्ढा खोद कर दफन कर दिया.

नरेंद्र द्वारा 4 लोगों की हत्या कर घर में ही दफनाने वाली बात सामने आते ही थानाप्रभारी भी आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने इस बात की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दी. थानाप्रभारी ने आननफानन में तत्परता से नरेंद्र के सहयोगी रहे उस के किराएदार विजय को भी हिरासत में ले लिया. यह जानकारी मिलते ही ट्रांजिट कैंप के साथसाथ थाना पंतनगर, थाना रुद्रपुर और थाना किच्छा से भी पुलिस टीमें हीरालाल के मकान पर पहुंच गईं. देखते ही देखते आजादनगर की मुख्य सड़क पुलिस छावनी में तब्दील हो गई. आजादनगर के आसपास यह नजारा देख लोग हैरत में पड़ गए. घटना की जानकारी मिलते ही एसएसपी दिलीप सिंह व आईजी (कुमाऊं) अजय कुमार रौतेला भी घटनास्थल पर पहुंचे.

पुलिस द्वारा हीरालाल के घर का दरवाजा खोलने से पहले ही वहां तमाशबीनों का जमावड़ा लग गया. पुलिस ने नरेंद्र की निशानदेही पर मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में दिन के 3 बजे 4 मजदूरों को लगा कर खुदाई शुरू कराई. लगभग 2 घंटे के अथक प्रयास के बाद पुलिस लाशों तक पहुंची. लगभग साढ़े 4 फीट की गहराई में एक के ऊपर एक 4 लाशें पड़ी मिलीं, जो प्लास्टिक की थैलियों में पैक थीं. इस हृदयविदारक दृश्य को देख कर लोगों के होश उड़ गए. लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो उन के सामने है वह सच है या सपना. पुलिस ने थैलियों को खोल कर लाशों की जांचपड़ताल की. लाशों को देख कर पुलिस हैरान थी कि सभी लाशें अभी तक अच्छी हालत में थीं. पुलिस को उम्मीद थी कि 15 महीनों के लंबे अंतराल के दौरान लाशें कंकाल में बदल चुकी होंगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसी गड्ढे से पुलिस ने लकड़ी के डंडे के आकार की एक फंटी बरामद की. नरेंद्र ने उसी फंटी से चारों को मारने की बात स्वीकार की थी.

घटनास्थल पर पहुंची फोरैंसिक टीम ने सैंपल एकत्र किए. फिर उन्हें जांच के लिए सुरक्षित रख लिया. पुलिस ने चारों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं और इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 4 डाक्टरों के पैनल द्वारा वीडियोग्राफी के साथ पोस्टमार्टम कराया. यह कुमाऊं का पहला ऐसा सनसनीखेज  मामला था, जिस ने तहलका मचा दिया था. हीरालाल का अपना कोई बेटा नहीं था तो उन्होंने बेटियों का ही पालनपोषण अच्छे से किया था. बड़ी बेटी लीलावती ने गलत कदम उठाया तो उसे भी सहन करते हुए उन्होंने उस के पति नरेंद्र को बेटे का दरजा दे कर उसे अपने घर में शरण दी. इस के बावजूद उस ने ऐसा कदम उठाया कि ससुराल का वजूद ही खत्म कर डाला. यह कहानी जितनी सनसनीखेज थी, उस से कहीं ज्यादा हृदयविदारक भी थी.

हीरालाल का परिवार उत्तर प्रदेश के जिला बरेली, तहसील मीरगंज के गांव पैगानगरी में रहता था गांव में उन का परिवार सुखीसंपन्न माना जाता था. गांव में उन की जुतासे की करीब 60 बीघा जमीन थी. औलाद के नाम पर 3 बेटियां थीं लीलावती उर्फ लवली, पार्वती और सब से छोटी दुर्गा. उन की पत्नी हेमवती सहित घर में कुल 5 सदस्य थे. घर में सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. हीरालाल की बस एक ही परेशानी थी कि उन का कोई बेटा नहीं था. जो घर धनधान्य से भरपूर हो और घर में उस का कोई वारिस न हो तो चिंतित रहना स्वभाविक ही है. हीरालाल ने बेटे की चाह के चलते इधरउधर काफी हाथपांव मारे. कई डाक्टरों और तांत्रिकों से मिले लेकिन उन की बेटे की इच्छा पूरी न हो सकी.

बाद में इस सोच को बदल कर उन्होंने अपना पूरा ध्यान बेटियों की परवरिश में लगा दिया. समय के साथ बेटियां समझदार हुईं तो हीरालाल ने सोचा कि उन्हें अपनी बेटियों को गांव के माहौल से बचा कर शहर में अच्छी शिक्षा दिलानी चाहिए. जिस से वे पढ़लिख कर कुछ बन जाएं. इसी सोच के चलते हीरालाल ने सन 2007 में अपनी खेती की जमीन में से 44 बीघा जमीन बेच दी. उस पैसे को ले कर हीरालाल अपने परिवार के साथ गांव से रुद्रपुर के ट्रांजिट कैंप थानांतर्गत राजा कालोनी में आ कर रहने लगे. उन्होेंने अपना मकान बना लिया था. रुद्रपुर आ कर हीरालाल ने अपनी तीनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए अच्छे स्कूल में दाखिला दिला दिया था.

बेटियों की तरफ से निश्चिंत हो कर हीरालाल ने बाकी बचे पैसों से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू कर दिया. जमीन के पैसे से ही उन्होंने आसपास कई प्लौट खरीद कर डाल दिए थे. उसी दौरान हीरालाल की मुलाकात नरेंद्र गंगवार से हुई. राहु बन कर कुंडली में बैठा नरेंद्र नरेंद्र गंगवार रामपुर जिले के थाना ऐरो बिलासपुर के गांव खेड़ासराय का रहने वाला था. वह उसी मोहल्ले में किराए के मकान में रहता था. नरेंद्र गंगवार सिडकुल की एक फैक्ट्री में काम करता था. उस ने हीरालाल से एक प्लौट खरीदने की इच्छा जताई. इस पर हीरालाल ने उसे अपने घर के सामने पड़ा प्लौट दिखाया तो वह नरेंद्र को पसंद आ गया. उस ने हीरालाल से वह प्लौट खरीद कर उस की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली.

प्लौट के चक्कर में नरेंद्र की हीरालाल से जानपहचान हुई तो वह उन के संपर्क में रहने लगा था. इसी बहाने वह हीरालाल के घर भी आनेजाने लगा था. घर आनेजाने के दौरान ही नरेंद्र की नजर हीरालाल की बड़ी बेटी लीलावती पर पड़ी. लीलावती देखनेभालने में सुंदर थी और उस समय पढ़ भी रही थी. उस की सुंदरता को देखते ही नरेंद्र उसे पाने के लिए लालायित हो उठा. वह जब भी हीरालाल के घर जाता तो उस की निगाहें उसी पर टिकी रहती थीं. लीलावती नरेंद्र के बारे में पहले ही सब कुछ जान चुकी थी. जब उस ने नरेंद्र को अपनी ओर आकर्षित होते देखा तो उस के दिल में भी चाहत पैदा हो गई.

दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति प्यार उमड़ा तो वे प्रेम की राह पर बढ़ चले.  लीलावती स्कूल जाती तो नरेंद्र घंटों तक उस की राह तकता रहता. उस के स्कूल जाने का फायदा उठाते हुए वह घर से बाहर ही उस से मुलाकात करने लगा. प्रेम बेल फलीफूली तो मोहल्ले वालों की नजरों में किरकरी बन कर चुभने लगी. कुछ ही समय बाद दोनों की प्रेम कहानी हीरालाल के सामने जा पहुंची. अपनी बेटी की करतूत सुन कर हीरालाल को बहुत दुख हुआ. वह अपनी बेटियों को बेटा समझ पढ़ालिखा रहे थे, ताकि वे किसी काबिल बन जाएं. लेकिन बड़ी बेटी की करतूत सुन कर उसे गहरा सदमा पहुंचा. यह जानकारी मिलने पर उस ने लीलावती को समझाया और नरेंद्र के घर आने पर पाबंदी लगा दी. इस पर दोनों मोबाइल पर बात कर अपने दिल की पीड़ा एकदूसरे से साझा करने लगे.

इस प्रेम कहानी के चलते लीलावती ने सन 2008 में घर वालों को बिना बताए नरेंद्र से लव मैरिज कर ली. शादी के बाद लीलावती उस के साथ किराए के मकान में रहने लगी. लीलावती की इस करतूत से हीरालाल और उन की पत्नी हेमवती दोनों को जबरदस्त आघात पहुंचा. बेटी के कारण मियांबीवी मोहल्ले में सिर उठा कर चलने लायक नहीं रहे. इसी वजह से हीरालाल ने अपनी बेटी लीलावती से संबंध खत्म कर दिए. लेकिन हेमवती मां थी. मां का दिल तो वैसे भी बहुत कोमल होता है. भले ही लीलावती ने नरेंद्र के साथ शादी कर अपनी दुनिया बसा ली थी, लेकिन मां होने के नाते हेमवती उस के लिए परेशान रहने लगी थी. जब बेटी के बिना उस से नहीं रहा गया तो वह पति को बिना बताए उस से मिलने लगी.

हेमवती जब कभी घर में कुछ अच्छा बनाती, चुपके से लीलावती को पहुंचा आती. साथ ही वह उस की आर्थिक मदद भी करने लगी थी. धीरेधीरे यह बात हीरालाल को भी पता चल गई. शुरूशुरू में तो इस बात को ले कर दोनों में विवाद हो गया. लेकिन हीरालाल भी दिल के कमजोर इंसान थे. बेटी की परेशानी को देखते हुए उन का दिल भी पसीज गया. नरेंद्र बना घरजंवाई शादी के कुछ समय बाद ही हीरालाल ने नरेंद्र को अपने दामाद के रूप में स्वीकार कर लिया और बेटीदामाद दोनों को घर ले आए. नरेंद्र घरजंवाई की हैसियत से ससुर हीरालाल के मकान में ही रहने लगा. उसी दौरान नरेंद्र कई बार हीरालाल के साथ उन के गांव पैगानगरी भी गया था. हीरालाल का गांव में मकान था, जो खाली पड़ा था.

साथ ही उन की बची हुई 16 बीघा जमीन भी थी, जिसे उन्होंने बंटाई पर दे रखा था. इस जमीन से उन्हें हर साल इतना रुपया मिल जाता था कि उन के परिवार की गुजरबसर ठीक चल रही थी. वह प्रौपर्टी खरीदबेच कर जो कमाते थे वह अलग था. ससुर के साथ रह कर नरेंद्र उन की एकएक बात अपने दिमाग में उतारने लगा. मम्मीपापा के घर पर रहते हुए ही लीलावती 4 बच्चों, 2 बेटियों और 2 बेटों की मां बनी. हीरालाल के घर पर रहते हुए नरेंद्र नौकरी करने के साथसाथ उन के काम में भी हाथ बंटाने लगा था. हालांकि नरेंद्र के चारों बच्चों का खर्च भी हीरालाल स्वयं ही वहन कर रहे थे. इस के बावजूद नरेंद्र अपने खर्च के लिए हीरालाल से पैसे ऐंठता रहता था.

हीरालाल की अभी 2 बेटियां शादी के लिए बाकी थीं. वह समय से उन की शादी करना चाहते थे. लेकिन जब से नरेंद्र इस घर में आया था, अपनी सालियों को फूटी आंख नहीं देखना चाहता था. नरेंद्र तेजतर्रार और चालाक था. लीलावती से शादी करने के बाद उस की निगाह हीरालाल की संपत्ति पर जम गई थी. जिसे देख वह भविष्य के सुनहरे सपनों में खोया रहता था. उसी दौरान उस ने हीरालाल पर उस के हिस्से की संपत्ति उस के नाम कराने का दबाव बनाना शुरू किया. लेकिन हीरालाल का कहना था कि जब तक उन की दोनों बेटियां विदा नहीं हो जातीं, वह अपनी किसी भी संपत्ति का बंटवारा नहीं करेंगे. हीरालाल जब नरेंद्र की हरकतों से परेशान हो उठे तो उन्होंने नरेंद्र के प्लौट पर मकान बनवा दिया. बाद में नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को साथ ले कर नए मकान में चला गया.

हीरालाल ने सोचा था कि नरेंद्र अपने घर में जाने के बाद सुधर जाएगा. लेकिन घर आमनेसामने होने के कारण उस के बीवीबच्चे हीरालाल के घर पर ही पड़े रहते थे. बच्चों के सहारे आ कर वह फिर से बदतमीजी पर उतर आता था. लेकिन ससुर होने के नाते हीरालाल सब कुछ सहन करते रहे. उसी दौरान नरेंद्र ने अपने मकान में विजय नाम का एक किराएदार रख लिया. विजय गंगवार जिला बरेली के थाना देवरनियां के गांव दमखोदा का रहने वाला था. विजय गंगवार से नरेंद्र पहले से ही परिचित था. दोनों में खूब पटती थी. विजय गंगवार अभी कुंवारा था. नरेंद्र ने विजय गंगवार के सामने अपने ससुर की सारी संपत्ति की पोल खोल कर दी, जिस की वजह से उस के मन में भी लालच जाग उठा. उस ने भी नरेंद्र की तरह हीरालाल की मंझली बेटी पार्वती पर निगाहें गड़ा दीं. लेकिन पार्वती समझदार थी. विजय के लाख कोशिश करने के बाद भी वह उस के प्रेम जाल में नहीं फंसी.

जम गई नजर ससुर की संपत्ति पर मन में संपत्ति का लालच आते ही वह अपने ससुर के साथसाथ बाकी लोगों को भी मौत के घाट उतारने के लिए षडयंत्र रचने लगा. लेकिन वह अपनी किसी भी योजना में सफल नहीं हो पा रहा था. नरेंद्र को यह भी पता लग गया था कि विजय उस की साली के पीछे पड़ा है. तभी उस के दिमाग में एक आइडिया आया. उस ने वह बात विजय को बताते हुए धमकाया कि जो वह कर रहा है वह ठीक नहीं है. अगर इस बात का पता उस के ससुर को चल गया तो परिणाम बहुत गलत होगा. नरेंद्र की बात सुन कर विजय घबरा गया. इस के बाद विजय नरेंद्र की हां में हां मिलाने लगा. फिर आए दिन नरेंद्र अपने घर पर विजय की दावत करने लगा. उस समय तक हीरालाल का परिवार हंसीखुशी से रह रहा था. लेकिन नरेंद्र को उन के परिवार की खुशियां कचोटती थीं.

वह मन ही मन अपने ससुराल वालों से खार खाने लगा था. उसी दौरान उस ने विजय को अपने ससुर की संपत्ति Family Crime से कुछ हिस्सा देने की बात कहते हुए अपनी षडयंत्रकारी योजना में शामिल कर लिया. फिर 17 अप्रैल, 2019 को नरेंद्र ने अपने किराएदार विजय के साथ मिल कर ससुराल वालों की हत्या की योजना को अंतिम रूप दे दिया. इस योजना के बनते ही नरेंद्र ने अपने बीवीबच्चों को देवरनियां बरेली में अपने फूफा के घर भेज दिया ताकि उन्हें उस की साजिश का पता न चल सके. बीवीबच्चों को बरेली भेजने के बाद वह विजय के साथ मिल कर इस घटना को अंजाम देने के लिए मौके की तलाश में लग गया. लेकिन उसे मौका नहीं मिल पा रहा था. नरेंद्र और विजय को यह भी डर था कि अगर इस योजना में वे किसी तरह से फेल हो गए तो न घर के रहेंगे न घाट के.

नरेंद्र जानता था कि उस की सास सुबह दूध लेने जाती है. उस वक्त उस का ससुर और दोनों सालियां सोई रहती हैं. घर का गेट खुला रहता है. उस वक्त तक पड़ोसी भी सोए होते हैं. घटना को अंजाम देने के लिए नरेंद्र को यह समय सही लगा. 20 अप्रैल, 2019 को नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार सुबह जल्दी उठ गए थे. दोनों हेमवती के दूध लेने जाने का इंतजार करने लगे. हेमवती उस दिन सुबह के साढ़े 5 बजे अपनी बेटी पार्वती को साथ ले कर दूध लाने के लिए घर से निकली. उन के घर से निकलते ही नरेंद्र विजय को साथ ले कर ससुर हीरालाल के घर में घुस गया. उस समय तक हीरालाल सो कर उठ गए थे. सुबहसुबह दोनों को अपने घर में आया देख हीरालाल ने नरेंद्र से आने का कारण पूछा तो उस ने कहा कि आज मैं आखिरी बार आप से पूछने आया हूं कि आप मेरे हिस्से की संपत्ति मुझे देते हो या नहीं.

पूरे परिवार की हत्या सुबहसुबह दामाद के मुंह से इस तरह की बात सुन हीरालाल का पारा चढ़ गया. दोनों के बीच विवाद बढ़ा तो पूर्व योजनानुसार नरेंद्र ने वहां रखी लकड़ी की फंटी से पीटपीट कर बड़ी ही बेरहमी से हीरालाल की हत्या कर दी. अपने पापा के चीखने की आवाज सुन कर बेटी दुर्गा उन के बचाव में आई तो दोनों ने उसे भी फंटी से पीटपीट कर मार डाला. दोनों को मौत की नींद सुलाने के बाद नरेंद्र और विजय हेमवती और पार्वती के आने का इंतजार करने लगे. जैसे ही उन दोनों ने घर में प्रवेश किया दरवाजे के पीछे खड़े नरेंद्र और विजय ने उन्हें भी पीटपीट कर मार डाला. सासससुर और दोनों सालियों को खत्म करने के बाद नरेंद्र और विजय ने चारों को घसीट कर एक कमरे में ले जा कर डाल दिया.

कमरे में ले जाने के बाद भी नरेंद्र और विजय को उन की मौत पर विश्वास नहीं हुआ तो दोनों ने एकएक कर सब की नब्ज चैक की. जब उन्हें पूरा यकीन हो गया कि चारों मौत की नींद सो चुके हैं, तो दोनों ने मकान में फैले खून को धो कर साफ किया और घर के बाहर ताला लगा कर अपने घर आ गए. इस खूनी वारदात को अमलीजामा पहनाने के बाद दोनों ने उन लाशों को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. नरेंद्र जानता था कि उन की लाश को घर से बाहर ले जा कर ठिकाने लगाना उन के लिए खतरे से खाली नहीं है. इसलिए दोनों ने तय किया कि बाजार से प्लास्टिक शीट ला कर लाशों को उस में लपेटा घर में ही गड्ढा खोद कर दफन कर दिया जाए. लाशों पर प्लास्टिक शीट लिपटी होने के कारण उन के सड़ने के बाद भी बदबू बाहर नहीं निकल पाएगी.

20 अप्रैल, 2019 को ही नरेंद्र बाजार से प्लास्टिक शीट खरीद लाया. उसी रात दोनों ने ससुर हीरालाल के मकान में जा कर चारों लाशों को प्लास्टिक शीट में पैक कर दिया. अगले दिन 21 अप्रैल, 2019 की सुबह नरेंद्र विजय को साथ ले कर ससुर के घर में गया. फिर दोनों ने अपनी योजना के मुताबिक जीने के नीचे गड्ढा खोदना शुरू किया. कुछ पड़ोसियों ने नरेंद्र से हीरालाल के घर में अचानक काम कराने के बारे में पूछा तो नरेंद्र ने कहा कि वह मकान बेच कर कहीं दूसरी जगह चले गए. घर में रिपेयरिंग का काम चल रहा है. वैसे भी उस मोहल्ले में नरेंद्र से कोई ज्यादा मतलब नहीं रखता था. यही कारण था कि हीरालाल के परिवार के बारे में किसी ने भी नरेंद्र से ज्यादा पूछताछ नहीं की. नरेंद्र ने विजय के साथ मिल कर लगभग 6 घंटे में एक गहरा गड्ढा खोदा. उस के बाद दोनों ने प्लास्टिक में पैक चारों लाशें गड्ढे में डाल दीं.

चारों लाशों को गड्ढे में दफन कर के उन्होंने वहां पर पक्का फर्श बना दिया. चारों लाशों को ठिकाने लगाने के बाद नरेंद्र ने हीरालाल के घर के मुख्य दरवाजे पर ताला डाल दिया. घर के अंदर कब्रिस्तान हीरालाल के घर पर अचानक ताला देख लोगों को हैरत तो जरूर हुई. लोग समझ नहीं पा रहे थे कि हीरालाल रात ही रात में अपने परिवार को ले कर अचानक कहां गायब हो गए. लेकिन नरेंद्र से किसी ने पूछने की हिम्मत नहीं की. ससुराल वालों को ठिकाने लगा कर नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को बरेली से घर ले आया. घर आते ही लीलावती की नजर पिता के मकान की ओर गई, जहां पर ताला लगा था.

लीलावती ने उन के बारे में पति से पूछा, तो उस ने बताया कि उस के पापा अपना मकान बेच कर हल्द्वानी चले गए हैं. उन्होंने वहां पर ही अपना प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया है. यह सुन कर लीलावती चुप हो गई. इस के आगे उसे नरेंद्र से ज्यादा पूछने की हिम्मत नहीं थी. उसे पता था कि उस के पिता और नरेंद्र की आपस में नहीं बनती है. नरेंद्र ने हीरालाल के पूरे परिवार को मौत की नींद सुला दिया था, इस के बाद भी उस के मन में किसी तरह का खौफ नहीं था. इस घटना को अंजाम देने के बाद नरेंद्र ने हीरालाल के मकान को किराए पर उठा दिया. लेकिन कुछ समय बाद किराएदार मकान छोड़ कर चला गया तो उस ने मकान पर फिर से ताला लगा दिया.

उस दिन के बाद उस ने कभी भी उस मकान का ताला नहीं खोला था. अगर नरेंद्र संपत्ति हड़पने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में जल्दबाजी न करता तो यह राज शायद राज ही बन कर रह जाता. इस केस के खुलते ही पुलिस ने आरोपी नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार को भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. चारों शवों के पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने शव उन के रिश्तेदार दुर्गा प्रसाद को सौंप दिए थे. उन का दाह संस्कार बरेली के मीरगंज गांव पैगानगरी के पास भाखड़ा नदी किनारे किया गया. नरेंद्र गंगवार इतना शातिर इंसान था कि उस ने दुर्गा प्रसाद को इस केस में फंसाने की कोशिश की. लेकिन सच्चाई सामने आते ही पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया.

हालांकि इस केस की रिपोर्ट दुर्गा प्रसाद की ओर से ही दर्ज कराई गई थी. फिर भी इस केस के खुल जाने के बाद पुलिस दुर्गा प्रसाद और अन्य के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच में जुटी थी. पुलिस ने लीलावती से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया था. वह नरेंद्र के फूफा के साथ बहेड़ी चली गई थी. केस की जांच थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

UP Crime News : पति को टुकड़े कर सीमेंट से ड्रम में जमाया

UP Crime News : सौरभ राजपूत मर्डर केस के बाद प्लास्टिक का नीला ड्रम चर्चा में गया है. 27 वर्षीय मुसकान रस्तोगी ने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ सिर्फ विदेश में नौकरी करने वाले पति सौरभ राजपूत की क्रूरतम तरीके से हत्या की, बल्कि उस की लाश के टुकड़े कर ड्रम में डाल कर ऊपर से सीमेंट कंक्रीट का घोल भर दिया. जिस सौरभ के साथ उस ने घर से भाग कर शादी की थी, आखिर उसी के प्रति इतनी क्रूर कैसे हो गई मुसकानï? पढ़ें, लव क्राइम की यह चौंकाने वाली कहानी.

”साहिल, तुम्हें तो पता ही है कि हमारे प्यार की जानकारी पति सौरभ को हो चुकी है.

वह लगातार निगरानी कर रहा है. उस ने एक बार पहले तो किसी तरह तलाक का केस वापस ले लिया था, लेकिन इस बार वह लंदन से लौटने के बाद क्या गुल खिलाएगा, कुछ पता नहीं. मुझे तो लग रहा है कि उस के रहते हमारी प्रेम कहानी अधूरी रह जाएगी या फिर यह कोई ऐसा मोड़ न ले ले, जिस से हमारी जिंदगी नरक बन जाए. इस से बेहतर तो यही है कि सौरभ को ही ठिकाने लगा दिया जाए क्योंकि इस के अलावा अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं है.’’ मुसकान ने प्रेमी से कहा.

”किस तरह ठिकाने लगाया जाए?’’ साहिल ने सवाल दाग दिया.

”अरे, किसी सुपारी किलर से बात करो.’’

”मेरठ में इस तरह का कोई गैंग मेरी जानकारी में नहीं है और भाड़े के हत्यारे रकम भी बहुत मांगते हैं.’’ साहिल बोला, ”इतने हाईप्रोफाइल मर्डर के पता नहीं 10 लाख की डिमांड करें या 20 लाख की.’’

”जानू, फिर तुम्हीं कोई रास्ता बताओ. यह काम क्या तुम नहीं कर सकते?’’

साहिल शुक्ला ने इस पर चुप्पी साध ली.

”बोलते क्यों नहीं? बुजदिल हो क्या? मैं तुम्हारे लिए सब कुछ छोडऩे को तैयार हूं और तुम डर रहे हो. सौरभ लंदन से घर आने वाला है, इसलिए यह काम जल्द करना होगा.’’

यह बात नवंबर 2024 की है. मुसकान रस्तोगी इसी तरह प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ पति सौरभ की हत्या की प्लानिंग कर रही थी कि उस की हत्या भी हो जाए और कोई उन पर शक भी न करे. उसी दौरान सौरभ राजपूत का नवंबर 2024 में लंदन से भारत आने का कार्यक्रम स्थगित हो गया. सौरभ ने सोचा कि फरवरी 2025 में ही अपने घर जाएगा, क्योंकि इसी महीने उस की पत्नी मुसकान और बेटी का जन्मदिन था. सौरभ का घर लौटने का कार्यक्रम स्थगित हो जाने पर दोनों प्रेमी युगल बहुत उदास हुए. जैसेतैसे दोनों मौजमस्ती करते रहे. साथ जीने की कसमें दोहराते रहे.

इस तरह साल 2024 गुजर गया. फिर अचानक फोन पर सौरभ राजपूत ने पत्नी मुसकान रस्तोगी को बताया, ”जानू, मैं फरवरी, 2025 में निश्चित रूप से मेरठ आ रहा है. तुम्हारा जन्मदिन भी सेलिब्रेट होगा और हम दोनों के प्यार की निशानी बेटी के जन्मदिन पर भी पार्टी करेंगे.’’

यह खबर मिलने पर फिर से मुसकान और साहिल सौरभ कुमार की हत्या करने की साजिश बुनने में सक्रिय हो गए. इस के बाद उन्होंने तय कर लिया कि वह सौरभ की हत्या किसी किलर से नहीं कराएंगे, क्योंकि किसी बाहरी व्यक्ति से हत्या कराने का राज कुछ दिनों में खुल ही जाता है. इसलिए उन्होंने खुद ही उस की हत्या करने का प्लान बनाया, जिस से उस की हत्या राज ही बन कर रह जाए. मुसकान और साहिल ने ये प्लान बनाया कि हत्या के बाद या तो लाश के टुकड़े कर के अलगअलग जगहों पर फेंक देंगे या फिर लाश को कहीं सुनसान जगह पर दबा देंगे. ऐसी सुनसान जगह भी वह खोजने लगे.

साहिल शुक्ला ऐसी जगह तलाशने लगा, जहां हिंदू मृतक बच्चों या मृत पशुओं को दफनाते हों. दोनों ने शव को दफनाने के लिए एक जगह की तलाश की. वे एक गांव पहुंचे, जहां मृत जानवरों को दफनाया जाता था. सौरभ के शव को ठिकाने लगाने के लिए उन्हें यही जगह सही नजर आई.

मुसकान ने कैसे बनाया हत्या का प्लान

अपनी योजना के अनुसार 22 फरवरी, 2025 को मुसकान मेरठ के शारदा रोड पर एक डाक्टर के पास गई. यहां उस ने डाक्टर को बताया कि वह डिप्रेशन का शिकार है. रात को उसे नींद नहीं आती, सिर मैं दर्द रहता है. डाक्टर ने परची पर दवाइयां लिख दीं. डाक्टर की लिखी हुई दवाइयों से वह संतुष्ट नहीं हुई. इस के बाद उस ने गूगल का सहारा लिया. उस ने नींद की दवा और नशीली दवाओं के बारे में जानकारी हासिल की. इस के बाद उस ने डाक्टर की लिखी हुई परची पर ही उसी की राइटिंग से मेल खाती राइटिंग में अतिरिक्त दवाओं के नाम भी जोड़ दिए.

इस के बाद वह और साहिल खैरनगर गए. योजनानुसार वहां उन्होंने नींद की गोलियों के अलावा कुछ और भी दवाइयां खरीदीं. दोनों ने इस के बाद 800 रुपए की कीमत वाले 2 ऐसे चाकू खरीदे, जो चाकू पशु वध करने वाले कसाई प्रयोग करते हैं. दुकानदार ने पूछा किस काम के लिए छुरा चाहिए तब मुसकान ने बताया कि कभीकभी मुरगा काटने के लिए काम में लेना है. ब्लीचिंग पाउडर, परफ्यूम और पौलीथिन कट्टा खरीदा. 2 मजबूत किस्म के टूरिस्ट बैग भी खरीदे गए. साहिल ने कहा कि सौरभ को शराब पीने का शौक है. उसे शराब में नशे की गोलियां मिला कर दे देना. फिर मुझे फोन करना, मैं आ जाऊंगा. दोनों मिल कर सौरभ की गरदन काट कर हत्या कर देंगे. लाश के टुकड़े कर के इन बैगों में भर लेंगे और उन्हें इस गांव में गड्ïढा खोद कर दबा देंगे.

25 फरवरी, 2025 की रात को मुसकान का जन्मदिन था. इसलिए 24 फरवरी, 2025 को सौरभ लंदन से मेरठ अपने घर आ गया. 25 फरवरी को पतिपत्नी और बेटी ने मिल कर मुसकान के जन्मदिन को सादा तरीके से ही सेलिब्रेट किया, क्योंकि 28 फरवरी को बेटी का छठा जन्मदिन था. उस के जन्मदिन को बड़े उत्साह और जोशोखरोश के साथ मनाए जाने की लालसा के साथ सौरभ राजपूत मेरठ स्थित अपने घर आया था. दूसरे यह कि उस के पासपोर्ट की डेट भी एक्सपायर होने जा रही थी, उस का रिन्यूअल भी कराना था. बेटी का जन्मदिन उन्होंने बड़े उत्साह के साथ मनाया. पतिपत्नी और बेटी ने जम कर डांस भी किया, यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. अच्छे होटल से मनपसंद खाने का और्डर किया गया.

सब कुछ टेबल पर सजा दिया गया था. केक काटने के बाद सब से पहले बेटी को केक खिला कर जन्मदिन सेलिब्रेट किया गया. तीनों खाने की टेबल पर पहुंचे, तभी मुसकान ने अंगरेजी शराब का क्र्वाटर ला कर टेबल पर रख दिया. यह उच्च क्वालिटी की शराब  सौरभ लंदन से ही शौकिया इस्तेमाल करने के लिए लाया था. गिलास में नशीली गोलियां पीस कर डाल रखी थीं, जिस में शराब डाल कर सौरभ को दी जानी थी. लेकिन शराब का क्वार्टर देख कर ही सौरभ ने शराब पीने से इनकार कर दिया. उस ने कहा कि तबीयत ठीक नहीं है.

यह सुन कर मुसकान को गहरा धक्का लगा. इस से मुसकान रस्तोगी को लगा कि शायद सौरभ को उस पर कोई शक हो गया है. उस ने जल्दी से किचन में जा कर गिलास को धोया. 3 गिलास पानी ला कर टेबल पर रख दिए. उधर साहिल शुक्ला मुसकान का फोन न आने से बेचैन था. रात भर वह प्रेमिका मुसकान रस्तोगी के फोन का इंतजार करता रहा. नींद आंखों से कोसों दूर थी. अपनी तरफ से वह फोन कर नहीं सकता था, न ही कोई मैसेज भेज सकता था. वह जानता था, यदि सौरभ कुमार बेहोश नहीं हुआ होगा और उस ने फोन कर दिया तो सारी प्लानिंग फेल हो जाएगी. इधर मुसकान रस्तोगी की रात भी करवट बदलबदल कर ही कटी. फरवरी का महीना 28 दिन का था.

पहली मार्च को पतिपत्नी और बेटी ने शौपिंग की. घर पर मौजमस्ती की. रात को खाना होटल से ही मंगाया और खाना खा कर सो गए. 2 मार्च, 2025 को दोनों में तनातनी की बातें होने लगीं, लेकिन मुसकान ने उसे बहुत खूबसूरत अंदाज में टाल दिया. कहने लगी कि जानू, पुरानी बातों को भूल जाओ. मेरा इस संसार में तुम्हारे अलावा कोई नहीं है. मैं जिंदगी भर सिर्फ तुम्हारी ही बन कर रहूंगी. हम दोनों के बीच कभी कोई तीसरा नहीं आएगा. ऐसी प्यार भरी बातें सुन कर सौरभ राजपूत का दिल पिघल गया. उस ने आगे कोई मनमुटाव वाली बात नहीं की. मुसकान के दिमाग में तो अपनी योजना को पूरी करने का खाका घूम रहा था.

2 मार्च, 2025 का दिन मुसकान ने अपने पति से प्यार का नाटक कर के गुजार दिया. 3 मार्च को मुसकान ने कहा कि मैं मायके जा रही हूं. बेटी को भी मम्मी के पास छोड़ आऊंगी. फिर हम दोनों ही जवानी के इन खूबसूरत पलों का आनंद लेंगे. सौरभ इनकार नहीं कर सका. बात में कोई झोल भी नहीं थी. कोई साजिश भी नजर नहीं आ रही थी. यह बात 3 मार्च को दोपहर के खाना खाने के बाद की है.

सीने पर बैठ कर गोदा पति को

कुछ देर घर रुकने के बाद सौरभ राजपूत ने भी सोचा कि वह भी अपनी मम्मी के घर घूम आए. यहां उस की मम्मी बेचैनी से उस का इंतजार कर रही थी. क्योंकि करीब 2 साल बाद उन का बेटा लंदन से वापस मेरठ आया था. सौरभ को देखते ही मम्मी की आंखें भर आईं. मम्मी ने उस की पसंदीदा सब्जी लौकी के कोफ्ते बनाए. काफी शाम हो चुकी थी. उस की मम्मी बोली, ”खाना खा ले बेटा!’’

सौरभ कहने लगा, ”मम्मी, आप ऐसा करो कि लौकी के कोफ्ते की सब्जी मुसकान को भी बहुत पसंद है. आप पैक कर दो. हम दोनों साथ ही खा लेंगे.’’

उधर मुसकान ने प्रेमी से कह दिया कि हमारी योजना आज अंजाम तक पहुंच जाएगी. तुम तैयार रहना, मैं ने बेटी को भी अपनी मम्मी के घर छोड़ दिया है. कोशिश करूंगी कि आज रात को खाने में उस को नींद की गोलियां मिला कर दे दूं. सौरभ राजपूत अपनी मां के घर से लौकी के कोफ्ते पैक करा कर लाया था, मुसकान ने उस की सब्जी में नींद की गोलियां मिला कर उसे खिला दीं. इस तरह मुसकान ने अपने पति को बेहोश कर दिया. रात लगभग 11 बजे सौरभ गहरी नींद में सो गया. लगभग 12 बजे मुसकान ने प्रेमी साहिल शुक्ला को मुसकान ने फोन किया. साहिल करीब साढ़े 12 बजे मुसकान के घर पहुंच गया. साहिल शुक्ला ने भी चैक कर के देखा कि सौरभ राजपूत बेहोश है या नहीं.

पूरा यकीन हो जाने पर साहिल शुक्ला ने मुसकान को इशारा किया. इशारा पाते ही मुसकान सौरभ के सीने पर आ कर बैठ गई. तभी बाजार से लाया गया छुरा पति के सीने में घुसेड़ दिया. सौरभ की तेज चीख निकली, लेकिन नींद में होने की वजह से वह कोई विरोध नहीं कर सका. दूसरे साहिल ने उस के पैर दबोच रखे थे. इस के बाद जिस ने पैर पकड़े हुए थे, उस ने उस छुरे को पकड़ लिया और जिस ने छुरा पकड़ा हुआ था, उस ने पैरों को पकड़ लिया. फिर साहिल ने एक के बाद एक छुरे से सीने पर वार किए. सौरभ रो रहा था. गिड़गिड़ा रहा था. कह रहा था कि जैसा तुम कहोगे, मैं वैसा करूंगा. मुझे माफ कर दो, मुझे छोड़ दो. मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा. मैं तुम से बहुत दूर चला जाऊंगा. तुम्हारी जिंदगी में कभी लौट कर नहीं आऊंगा. वह इस तरह से गिड़गिड़ाता चला गया, लेकिन दोनों पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ रहा था.

यह आवाज, दवाओं के नशे में दबी उस की चीखपुकार दोनों कातिलों के कानों तक पहुंच तो रही थी. मगर उस की चीख और उस की इल्तेजा का दोनों पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. वह अपना काम बड़े इत्मीनान से बहुत आराम से कर रहे थे. आखिरकार लगभग 25 से 30 मिनट तक वह व्यक्ति ऐसे ही दर्द से तड़पता रहा और फिर दम तोड़ दिया. उस की नब्ज को टटोल कर देखने के बाद सौरभ राजपूत की लाश को दोनों खींच कर बाथरूम में ले गए. उस के हाथों को काट दिया गया. गरदन धड़ से अलग कर दी गई. ब्लीचिंग पाउडर से सब धो कर साफ किया गया.

उस के बाद साहिल शुक्ला जो बैग खरीद कर लाया था, उस में गरदन और हाथों को रख कर ठिकाने लगाने के लिए अपने साथ अपने घर ले गया. मुसकान कटे हुए शरीर के शेष भाग को डबल बैड में डाल कर उसी बैड पर लेटी रही. साहिल शुक्ला बैग ले कर वापस मुसकान के पास आया 4 मार्च की बात है. उस ने कहा कि कहीं दूर ले जा कर फेंकने का मौका नहीं लगा, इसलिए इसे ठिकाने लगाने का कोई और तरीका सोचते हैं. नई योजना के तहत दोनों ने घंटाघर से प्लास्टिक का एक बड़ा नीला ड्रम और स्थानीय बाजार से सीमेंट खरीदा.

हत्या के बाद शादी कर मनाया हनीमून

मुसकान के घर लौट कर उन्होंने धड़ को ड्रम में डाल दिया. उस के बाद साहिल ने सिर और हाथ निकाल कर सीमेंट और कंक्रीट का घोल ड्रम में डाल दिया. सीमेंट और कंक्रीट के घोल से उन्होंने ड्रम को सील कर दिया. इस तरह सौरभ के क्षतविक्षत शरीर को कंक्रीट की कब्र में दफना दिया गया. हत्या के बाद हिल स्टेशन घूमने का प्रोग्राम बनाया. साहिल ने एक ट्रैवल एजेंसी से हिमाचल के 15 दिनों के टूर के लिए 54 हजार रुपए में एक टैक्सी बुक की. ट्रैवल एजेंसी को सािहल ने अपना नाम विकास बताया था. मुसकान ने पड़ोसियों को बताया था कि वह कई दिन के टूर पर हिमाचल घूमने जा रही है.

4 मार्च, 2025 को टैक्सी ड्राइवर अजब सिंह की स्वीट डिजायर कार से मुसकान और टूर पर निकल गए. वह सब से पहले शिमला पहुंचे. वहां पर दोनों ने एक मंदिर में शादी की. उस के बाद हनीमून मनाने के लिए मनाली चले गए. शिमला के एक होटल में साहिल का जन्मदिन मनाने की मुसकान ने प्लानिंग की. मुसकान ने ड्राइवर अजब सिंह से एक केक मंगाया. उस से कहा गया कि इस बात को गुप्त रखना, क्योंकि वह साहिल को सरप्राइस देना चाहती थी. साहिल का जन्मदिन मनाया गया. इस दौरान उन्होंने केक काटा और डांस किया. केक काटते और किस करते दोनों का एक वीडियो भी वायरल हुआ है.

दोनों ने कसोल में होटल पूर्णिमा में 10 मार्च को चैकइन करने के बाद 16 मार्च तक वहां रहे. 6 दिनों तक ठहरने के दौरान उन्होंने ज्यादातर समय कमरे में ही बिताया. ड्राइवर को जितना भी पेमेंट किया, मुसकान ने ही अपने यूपीआई से किया था. साहिल ने पेमेंट कभी नहीं किया. कुल मिला कर टोटल जितने दिन वे टूर पर रहे, सभी पेमेंट मुसकान के मोबाइल से औनलाइन ही किया गया. सौरभ का मोबाइल भी मुसकान के पास ही था. वह लगातार उसी के मोबाइल से अपनी बेटी और अपने मम्मीपापा से भी कांटेक्ट कर रही थी और सौरभ के घर वालों से भी कांटेक्ट में थी. दोनों परिवारों को उस ने फोन से गुमराह किया.

शिमला की हसीन वादियों की तसवीर और वीडियो देख कर ये लोग समझते रहे कि सौरभ अपनी पत्नी मुसकान के साथ शिमला की वादियों में मौजमस्ती कर रहा है. 17 मार्च को रात के 10 -11 बजे के करीब शिमला से लौटे, तब मुसकान और साहिल एक साथ ही मुसकान के कमरे पर रुके. उन्हें अब तो किसी तरह का खौफ नहीं था. मुसकान का पति सौरभ अब ड्रम में कैद था. वह भी इस तरह से जो बाहर न निकल सके.

पेरेंट्स ने किया बेटी को पुलिस के हवाले

दोनों ने ड्रम का मुआयना किया. ड्रम इतना भारी था कि उन से खिसक नहीं रहा था. इस में से हलकीहलकी बदबू भी आ रही थी. सुबह उठ कर साहिल ने 3-4 मजदूरों की व्यवस्था की, जिस से ड्रम को कहीं ठिकाने लगाया जा सके. मजदूर इस मकान के दूसरे गेट से बुलाए गए, जोकि कभी प्रयोग में नहीं आता था. यह रास्ता एक पतली गली में खुलता है. मजदूरों ने ड्रम को निकालने की कोशिश की, लेकिन बहुत भारी होने तथा बदबू आने के कारण वे ड्रम को घर से बाहर नहीं निकाल सके. सो वे वापस चले गए. इस से मुसकान और साहिल दोनों घबरा गए. दोनों ने काफी  चिंतन किया कि अब क्या किया जाए. तो मुसकान ने कहा कि मैं अब अपने मम्मीपापा से सलाह करती हूं. उस के बाद सोचेंगे कि क्या करना है.

यह कह कर मुसकान ने अपनी मम्मी को फोन किया. फिर उस के बाद मायके पहुंची. मुसकान ने मम्मीपापा को पति सौरभ की हत्या करने की बात बताई. प्रमोद रस्तोगी और उन की पत्नी कविता रस्तोगी 18 मार्च, 2025 को मुसकान रस्तोगी उर्फ शोभी (27 साल) को साथ ले कर मेरठ के थाना ब्रह्मïपुरी पहुंच गए. वहां मौजूद एसएचओ रमाकांत पचेरी को उन्होंने बताया कि इस लड़की ने मेरे दामाद सौरभ राजपूत को बहुत बुरी तरह से मार दिया है. इस को गिरफ्तार कर के जेल भेज दो. उस के बाद इसे फांसी चढ़ा दो. हम अपनी इस बेटी को कभी देखना नहीं चाहते.

एसएचओ ने जैसे ही ये बात सुनी, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ. वह सोचने पर मजबूर हो गए कि शायद ये भारत के पहले ऐसे मांबाप होंगे जो अपनी ही बेटी को फांसी चढ़ते हुए देखना चाहते हैं और ये पहले ही ऐसे मांबाप होंगे, जो अपनी बेटी का हाथ पकड़ कर थाने लाए हैं. एसएचओ रमाकांत पचेरी ने शुरुआती पूछताछ के बाद मामले की जानकारी उच्च अधिकारियों को दी. एसएचओ पुलिस फोर्स ले कर उस स्थान पर पहुंचे, जहां पर मुसकान रस्तोगी ने अपने प्रेमी साहिल शुक्ला के ठहरे होने का पता बताया था.

साहिल शुक्ला उस स्थान पर आराम से बेखौफ बैठा था. किसी तरह की घबराहट व शिकन उस के चेहरे पर नहीं थी. 2 सिपाहियों ने आगे बढ़ कर उसे हिरासत में ले लिया. आराम से बिना किसी झंझट के पुलिस साहिल शुक्ला को पकड़ कर थाने ले आई. साहिल शुक्ला ने भागने की भी कोई कोशिश नहीं की. उच्च अधिकारी भी सक्रिय हो गए. फिर दोनों से पूछताछ शुरू की गई. मैराथन पूछताछ के बाद एक नए तरह की हत्या का मामला सामने आया. किसी की हत्या कर के तंदूर, फ्रिज, सूटकेस, ईंट भट्ठा, डबल बैड, सेफ्टी टैंक आदि में लाश छिपाने के अनेक मामले देश में चर्चित हो चुके हैं. अब यह मामला सीमेंट ड्रम किलर के नाम से जाना जाएगा. दोनों ने पहले तो पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन अलगअलग पूछताछ हुई तो उन्होंने पूरा सच उगल दिया.

हत्या के इस खुलासे ने मेरठ ही नहीं, पूरे प्रदेश और देश के लोगों की दिमाग की चूलें हिला दीं. पुलिस का अनुमान है कि यह तरीका शायद फिल्म देख कर दोनों को आया होगा. इतनी जानकारी मिलने पर पुलिस ने छापा मार कर ड्रम बरामद किया. उस में से  शव निकालने की कोशिश की. लेकिन कामयाबी नहीं मिली. पंचनामा भर कर उसे ऐसे ही पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया गया. ड्रम मेरठ के एक सरकारी अस्पताल के मुर्दाघर पहुंचा. ड्रम जरूरत से ज्यादा भारी था, न यह ड्रम खुल पा रहा था, न ही इसे तोड़ा जा सका था. लिहाजा पुलिस ने तय किया कि इस ड्रम को मशीन से काटा जाए. कुछ देर में ही मशीन और मैकेनिक मुर्दाघर में बुला लिए गए. अब बारी ड्रम को काटने की थी.

बड़ी मशक्कत के बाद आखिरकार ड्रम को काटने में कामयाबी मिली. दरअसल, इस ड्रम के अंदर सीमेंट कंक्रीट का घोल भर दिया गया था, जिस की वजह से वह जम कर पत्थर की तरह सख्त हो चुका था. अब ड्रम काटने के बाद उस के अंदर जमे हुए सीमेंट के टुकड़ों को भी मशीन से काटने का काम शुरू हो गया. थोड़ी देर बाद सारे टुकड़े अलग हो गए. फिर उन्हीं टुकड़ों में से 4 टुकड़ों में बिखरी सौरभ राजपूत की लाश निकली. ड्रम में टुकड़ों में बंद होने के पूरे 14 दिन बाद काली पौलीथिन में सौरभ की लाश के 4 टुकड़े निकले. डाक्टरों की एक टीम द्वारा पोस्टमार्टम किया गया.

सीएमओ अशोक कटारिया ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा कि शव की हालत काफी खराब थी. बौडी को गलाने के लिए सीमेंट से प्लास्टर किया गया था. दांत हिल रहे थे. स्किन ढीली पड़ गई थी. गरदन के चारों तरफ घाव थे. दाएं कान से 7 सेंटीमीटर नीचे घाव मिला. जबड़े के दाईं ओर 4 सेंटीमीटर का घाव मिला. ठोड़ी से 6 सेंटीमीटर नीचे जख्म था. बाएं कान से 8 सेंटीमीटर नीचे और जबड़े के बाएं कोने से 4 सेंटीमीटर नीचे जख्म मिले. 3 जख्म बाईं छाती पर मिले. एक जख्म 6 सेंटीमीटर गहरा था. छुरी दिल को चीरते हुए निकल गई थी. सौरभ के पैर धड़ की तरफ मुड़े थे, जिन्हें सीधा करना मुश्किल हो गया था.

इस तरह दोनों शातिर कातिलों की गिरफ्तारी होने के बाद सौरभ हत्याकांड का खुलासा हुआ. इस सनसनीखेज मामले ने मेरठ को ही नहीं, बल्कि देश भर के लोगों को सन्न कर दिया. यह कहानी प्यार, धोखे और अपराध की एक दुखद मिसाल है, जहां एक प्रेम प्रसंग ने एक निर्दोष की जान ले ली. मुसकान उत्तर प्रदेश के महानगर मेरठ की मास्टर कालोनी, ब्रह्मपुरी क्षेत्र की रहने वाली थी. उस के परिवार में पेरेंट्स के अलावा एक छोटा भाई है. मुसकान के पापा प्रमोद रस्तोगी मेरठ में किराने की दुकान चलाते थे. मम्मी कविता रस्तोगी एक गृहिणी थीं, जो परिवार की देखभाल करती थीं. परिवार की आर्थिक स्थिति औसत है, न ज्यादा अमीर न ही गरीब.

मुसकान ने सौरभ से भाग कर की थी शादी

मुसकान अपने परिवार में सब से बड़ी संतान थी और शुरू में उसे घर में काफी लाड़प्यार मिला. पड़ोसियों के अनुसार, वह बचपन में शांत और आज्ञाकारी थी, लेकिन किशोरावस्था में आते ही उस का व्यवहार बदलने लगा. उस की पढ़ाई मेरठ के विवेकानंद स्कूल से शुरू हुई. मुसकान के नाना ज्योतिषी थे और सौरभ के परिवार के लोग मुसकान के घर जाते थे. इस दौरान दोनों में प्रेम प्रसंग हुआ. 2015 में जब मुसकान की सौरभ से दोस्ती हुई. दोनों के दिलों में प्यार का अंकुर फूटा और देखते ही देखते विशाल वृक्ष के रूप में फैल गया.

मुसकान की सुंदरता, बौडी लैंग्वेज व फिगर किसी फिल्मी हीरोइन से कम नहीं थी. सौरभ के शरीर से भी उस का यौवन छलक रहा था. इन के प्रेम प्रसंग की बात दोनों के परिवारों को पता लगी. अब दोनों ही ने अपनेअपने बच्चों को इस संबंध को खत्म करने की सलाह दी, लेकिन इन दोनों पर तो प्यार का भूत सवार हो चुका था. इन्होंने अपने घर वालों की कोई बात नहीं मानी और विवाह के लिए दबाव बनाने लगे. सौरभ एक राजपूत परिवार से था, जबकि मुसकान रस्तोगी थी. इस अंतरजातीय विवाह को ले कर दोनों परिवारों में असहमति थी. प्यार की खातिर मुसकान और सौरभ ने अपनेअपने परिजनों से बगावत कर दी और दोनों घर छोड़ कर फरार हो गए.

दोनों ही अपने घर वालों के लिए बहुत ही दुलारे और प्यारे थे. इसलिए दोनों को तलाश कर के घर बुला लिया गया. सौरभ राजपूत और मुसकान रस्तोगी के बीच प्रेम प्रसंग चलता रहा. सौरभ के घर वाले किसी भी कीमत पर मुसकान से विवाह करने के लिए राजी नहीं थे. अंजाम यह हुआ कि दोनों ने खुद निर्णय लेते हुए सन 2016 में प्रेम विवाह कर लिया. हालांकि मुसकान की जिद के आगे उस के पेरेंट्स को झुकना पड़ा. लेकिन सौरभ के परिवार ने इस शादी को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था.

शादी के बाद मुसकान सौरभ के साथ इंदिरानगर फेज वन में किराए के मकान में रहने लगी. शादी के समय सौरभ मर्चेंट नेवी में दुबई में नौकरी कर रहा था. हालांकि शादी के एक साल बाद ही नौकरी छोड़ कर सौरभ राजपूत मेरठ वापस आ गया और यहीं दिल्ली रोड पर एक प्लाईवुड कंपनी में नौकरी करने लगा. अब उस की माली हालत पहले जैसी नहीं रही. दुबई में नेवी की नौकरी में खूब पैसा मिलता था. दुबई के रुपए की वैल्यू भी अथिक थी, जिस से भारतीय रुपए काफी मिल जाते थे. आर्थिक तंगी से जूझ रहे सौरभ ने अपने पेरेंट्स से संबंध नौरमल किए. समय के साथ स्थिति सामान्य हो गई. सौरभ के फेमिली वाले भी धीरेधीरे सामान्य हो गए, क्योंकि सौरभ अपनी मां से मिलने अकसर जाता रहता था. इस तरह मुसकान को ले कर अपने घर वापस आ गया.

2019 में उन की एक बेटी हुई. शुरुआती सालों में उन की गृहस्थी ठीक चली, लेकिन बाद में रिश्तों में दरारें आने लगीं. बेटी की पैदाइश के बाद मुसकान ने घर में कोहराम मचाना शुरू कर दिया. आए दिन सासससुर से झगड़ा होने लगा. सौरभ की स्थिति गले में हड्ïडी अटकने जैसी हो गई, जिसे न उगल सकता था न निगल सकता था. मुसकान को समझाने के सभी प्रयास विफल हो गए. तंग आ कर उस के मम्मीपापा ने दोनों को घर से निकालने की चेतावनी दे दी. मुसकान यही चाहती थी. इसी बात को ले कर झगड़ा और कोहराम मचाया करती थी.

सौरभ राजपूत के पिता का नाम मुन्नालाल राजपूत है. सौरभ का एक भाई राहुल उर्फ बबलू है. मां रेणु देवी हैं. परिवार मेरठ के ही ब्रह्मपुरी में रहता है. सौरभ के घर वालों ने मुसकान रस्तोगी के पेरेंट्स पर भी सौरभ हत्याकांड में शामिल होने का आरोप लगाया है. इन का कहना है कि जब उस की शादी हुई, हमारे घर में आ कर वो 2 साल तक बहुत अच्छे से रही. घर में हर चीज उसे हम ने उपलब्ध कराई. उस की दुबई में जौब थी. मुसकान का जैसे ही अपने मायके आनाजाना शुरू हुआ तो उस के तेवर बदलने लगे.

सौरभ दुबई चला गया था. उस के बाद मुसकान ने घर में बातबात पर लड़ाईझगड़ा शुरू कर दिया. कहने लगी कि तुम्हारे घर में भूत हैं, बलाएं हैं. हम उसे हमेशा टाल देते थे. मम्मी को बहुत परेशान करती थी. कभी भी रात में उठ जाती थी, सारे बरतन फेंकने लग जाती थी. 6 महीने की बेटी को भी जमीन पर रख कर धमकी देती थी कि मैं इसे फेंक दूंगी. उस की एक ही रट थी, मैं घर छोड़ कर जाऊंगी. मुझे जाने दो. तभी उस ने ये लाइन बोली थी कि मैं तुम्हें तुम्हारे लड़के का मुंह नहीं देखने दूंगी.

सौरभ अपनी पत्नी मुसकान के साथ मेरठ के इंदिरा नगर में किराए पर रहने लगा. मुसकान के महंगे शौक थे, जिस के चलते उस ने परिवार से दूरी बना ली. एक बार की बात है. करीब एक साल की उस की बच्ची लगातार रो रही थी. रोतेरोते काफी देर हो गई. उस के रोने की आवाजें मकान मालिक तक पहुंचीं. मकान मालिक जब उस बच्ची के पास पहुंचा तो उस ने उस की मम्मी को ढूंढना शुरू किया. उसे मुसकान एक पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में मिली. मकान मालिक को उसे बहुत बुरा लगा. हालांकि मुसकान को भी यह बात पता चल गई थी कि मकान मालिक ने उसे इस हालत में देख लिया है.

बाद में उस ने मकान मालिक को शांत करने की कोशिश की. उस के हाथपैर जोड़े, लेकिन मकान मालिक शांत नहीं हुआ. बल्कि उस ने सीधे सौरभ को फोन मिलाया और कहा कि तुम्हारी पत्नी को मैं ने किसी दूसरे मर्द के साथ आपत्तिजनक हालत में देखा है. तुम अपना घर बिगडऩे से बचा सकते हो तो बचा लो. सौरभ ने अपनी पत्नी को डांटाफटकारा. मुसकान ने भी कसम खाई कि ऐसी गलती कभी दोबारा नहीं करेगी. यह बात आईगई हो गई.

पेरेंट्स के प्यार से अछूता रहा साहिल

साहिल शुक्ला मेरठ के ब्रह्मपुरी इलाके का रहने वाला था. उस की पारिवारिक स्थिति काफी अस्थिर रही. साहिल की नानी सरोजनी शुक्ला के बयान के अनुसार, उस की मम्मी ज्योति का निधन 18 साल पहले हो चुका था, जब वह काफी छोटा था. उस के पापा नोएडा में काम करते थे. उन्होंने दूसरी शादी कर ली थी. इस तरह साहिल का बचपन मम्मी की गैरमौजूदगी और पिता की कम मौजूदगी के बीच बीता, जिस ने शायद उस के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला. वह अपने नानानानी के साथ रहता था. साहिल की नानी सरोजिनी शुक्ला ने बताया कि साहिल ऊपर के कमरे में रहता था. लैपटाप पर कुछ काम करता रहता था. उन्हें उस के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उस की पढ़ाई का खर्चा उस के पापा कभीकभी भेज दिया करते थे.

साहिल और मुसकान की दोस्ती स्कूल के दिनों से शुरू हुई थी. दोनों मेरठ के विवेकानंद स्कूल में आठवीं कक्षा तक साथ पढ़े थे. इस के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए. लेकिन सालों बाद विवेकानंद स्कूल में आठवीं तक साथ पढऩे वाले स्टूडेंट्स ने एक वाट्सऐप ग्रुप बनाया. साहिल और मुसकान भी उस ग्रुप में मेंबर बने थे. यहां से दोनों की फिर से बातचीत शुरू हुई. मुसकान की शिक्षा ज्यादा आगे नहीं बढ़ी. वह आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी थी. वहीं साहिल ने अपनी पढ़ाई जारी रखी.

साहिल के कमरे में पुलिस को शराब की बोतलें, बिखरे कपड़े और दीवारों पर तंत्रमंत्र से जुड़ी अजीबोगरीब तसवीरें मिलीं. कमरे में भगवान शिव की तसवीरों के साथसाथ साधना और तंत्र से जुड़े चित्र मिले, जो उस ने खुद बनाए थे. मुसकान ने इस कमजोरी का फायदा उठाया और स्नैपचैट पर फरजी आईडी बना कर साहिल को यह विश्वास दिलाया कि उस की मृत मम्मी की आत्मा उस से बात कर रही है और सौरभ की हत्या का आदेश दे रही है.

साहिल इस बहकावे में आ गया, जो उस की आसानी से प्रभावित होने वाली मानसिकता को दिखाता है. पुलिस का मानना है कि वह इस बहाने खुद को कानूनी सजा से बचाने की कोशिश भी कर रहा है. पुलिस ने साहिल शुक्ला और मुसकान उर्फ शोभी से पूछताछ करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. सीमेंट ड्रम किलर की पूरी कमान एसपी (सिटी) मेरठ आयुष विक्रम सिंह संभाले हुए हैं. पूरे मामले की हर पहलू से जांच कराई जा रही है. मुसकान रस्तोगी और साहिल शुक्ला जेल में बंद हैं. अभी तक कोई भी दोनों के परिवार में से जेल में उन से मुलाकात करने नहीं गया.

बेटी इस समय अपनी नानी के घर है. क्योंकि सौरभ राजपूत के अपने घर वालों से संबंध ज्यादा अच्छे नहीं थे. पापा ने तो अपनी चलअचल संपत्ति से भी सौरभ राजपूत को बेदखल कर दिया था. घटना की खबर भाई को भी लाश मिलने के बाद हुई थी. भाई राहुल की तहरीर पर ही मुकदमा दर्ज किया गया था. UP Crime News

मां ने बेटे की हत्या कर आंगन में दफनाया

नशेड़ी निरमैल सिंह मां को मारतापीटता ही नहीं था, बल्कि सीधेसीधे कहता था कि उस के अपने ही किराएदार रविंद्र सिंह से नाजायज संबंध हैं. बेटे की इन्हीं हरकतों से एक ममतामयी मां मजबूर हो कर हत्यारिन बन गई पंजाब के जिला तरनतारन के थाना सरहाली का एक गांव है शेरों. इसी गांव की रहने वाली मनजीत कौर के पति बलवंत सिंह की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी. बलवंत सिंह की गांव में खेती की थोड़ी सी जमीन और रहने का अपना मकान था. कुल इतनी जायदाद मनजीत कौर को पति से मिली थी. इस के अलावा वह उसे 2 बेटे और 1 बेटी भी दे गया था.

जब बलवंत सिंह की मौत हुई थी, मनजीत कौर के तीनों बच्चे काफी छोटे थे. पति की मौत के बाद बड़ी मुश्किलों से उस ने तीनों बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया. उस का भविष्य और उम्मीदें इन्हीं बच्चों पर टिकी थीं. उस ने सोचा था कि बच्चे बड़े हो कर उस का सहारा बनेंगे. बच्चे किसी लायक हो जाएंगे तो उस के दिन बदल जाएंगे. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. क्योंकि एक चीज चुपके से खलनायक की तरह मनजीत कौर के घर में दाखिल हो गई, जो उस के घरपरिवार को तबाही के रास्ते पर ले गई. वह चीज कुछ और नहीं, नशा था, हेरोइन, स्मैक और कैप्सूलों का. यह घातक नशा वैसे भी पंजाब के गांवों में कहर बरपा रहा है. मनजीत कौर के दोनों बेटे बड़े हुए तो उन्हें मेहनत और मशक्कत कर के कमाई करने का नशा लगने के बजाय घर को बरबाद करने वाला नशा लग गया

इसी नशे की वजह से मनजीत कौर का एक बेटा बेवक्त काल के गाल में समा गया. बेटे की बेवक्त मौत ने मनजीत कौर को तोड़ कर रख दिया. एक जवान बेटे की बेवक्त मौत से डरी और घबराई मनजीत कौर को दूसरे बेटे निरमैल सिंह की चिंता सताने लगी. क्योंकि निरमैल सिंह भी नशे का आदी था. चिंतित मनजीत कौर को अचानक खयाल आया कि अगर वह बेटे की शादी कर दे तो शायद उस की नशा करने की आदत छूट जाए. यह खयाल आते ही मनजीत कौर बेटे की शादी के लिए दौड़धूप करने लगी. उस की दौड़धूप का नतीजा यह निकला कि नशेड़ी निरमैल सिंह की गुरप्रीत कौर से शादी हो गई. शादी के बाद निरमैल सिंह में कुछ सुधार नजर आया तो मनजीत कौर को लगा कि धीरेधीरे बेटा सुधर जाएगा. वह नशे के बजाय अपनी शादीशुदा जिंदगी का आनंद लेता दिखाई दिया.

यह देख कर मनजीत कौर ने काफी राहत महसूस की. मगर इस राहत की उम्र बहुत लंबी नहीं थी. शादी के कुछ दिनों बाद तक बीवी के जिस्म की गर्मी में डूबे रहने के बाद निरमैल सिंह फिर से नशे की ओर मुड़ा तो पहले से भी ज्यादा शिद्दत के साथ. इस से घर में जबरदस्त कलहक्लेश रहने लगा. मनजीत कौर की जान आफत में पड़ गई. पहले तो वह अकेली किसी तरह नशेड़ी बेटे से निपट लेती थी, लेकिन घर में बहू के आने से वह कुछ कमजोर सी पड़ गई थी. घर का खर्चा वैसे ही बढ़ गया था, इस के बावजूद अपनी जिम्मेदारियों से लापरवाह निरमैल सिंह जो भी कमाता था, अपने नशे में उड़ा देता था. इस से घर में अशांति और कलह का माहौल बनना स्वाभाविक था. घर के लगातार बिगड़ते माहौल से परेशान मनजीत कौर ने किसी तरह अपनी एकलौती बेटी राज कौर के हाथ पीले कर के उसे विदा कर दिया.

राज कौर की शादी से घर के हालात सुधरने के बजाय और खराब हो गए. उसी बीच नशेड़ी निरमैल एकएक कर के 2 बच्चों का बाप बन गया. बच्चों की जिम्मेदारी कंधों पर आने के बाद भी निरमैल में कोई बदलाव नहीं आया. उस की नशा करने की आदत वैसी की वैसी ही बनी रही. ऐसी हालत में घर का खर्चा कैसे चल सकता था. घर को आर्थिक तंगी से उबारने के लिए चिंतित मनजीत कौर ने घर के एक हिस्से को रविंद्र सिंह को किराए दे दिया.

मां का यह कदम नशेड़ी निरमैल को बिलकुल पसंद नहीं आया. नाराज हो कर उस ने घर में जबरदस्त क्लेश किया. लेकिन जब मनजीत कौर ने किराएदार रखने का अपना फैसला नहीं बदला तो वह खामोश हो गया. अब उस की गिद्धदृष्टि किराए की रकम पर जम गई. किराए से आने वाले पैसे जहां मनजीत कौर का सहारा बन गए थे, वहीं यह बात निरमैल को बरदाश्त नहीं हो रही थीवह किराएदार रविंद्र सिंह से भी इस बात को ले कर झगड़ा करने लगा. वह किराया खुद लेना चाहता था, जबकि रविंद्र किराया मनजीत कौर को देता था. निरमैल की नशे की लत से वाकिफ रविंद्र सिंह किसी भी कीमत पर किराया उसे देने को तैयार नहीं था.

दूसरी ओर नशे में डूबे रहने वाले निरमैल का दिमाग इस तरह खराब रहने लगा था कि वह रिश्तों की मर्यादा तक भूल गया था. वह खीझ और हताशा में किराएदार रविंद्र सिंह और अपनी मां को ले कर उन के चरित्र पर अंगुली उठाने लगा था. मनजीत कौर के लिए यह जीतेजी मरने वाली बात थी. वह एक विधवा औरत थी और उस की उम्र 60 साल के ऊपर हो गई थी. अब इस उम्र में अगर मनजीत कौर के चरित्र पर उस की कोख से जन्मा बेटा ही अंगुली उठाए तो उस के लिए मरने वाली बात थी. बेटे द्वारा चरित्र पर अंगुली उठाने से मनजीत कौर इतनी आहत हुई कि उस ने गुस्से में कहा, ‘‘दुनिया से डर बेटा, इतना भी हद से मत गुजर कि एक दिन मैं यह भी भूल जाऊं कि मैं तेरी मां हूं.’’

मनजीत कौर की इस चेतावनी को निरमैल समझ नहीं सका. नशे ने निरमैल को पूरी तरह नकारा बना दिया था. उस ने कामधंधा करना लगभग बंद कर दिया था. उसे नशे की तलब लगती तो उस की हालत पागलों जैसी हो जाती. वह नशे के लिए मां और पत्नी से पैसे मांगता. पैसे मिलते तो वह उन दोनों से झगड़ा और मारपीट करता. यही नहीं, अंत में वह घर का कोई कीमती सामान उठा ले जाता और बाजार में बेच कर नशे का सामान खरीद लेता. इस हालत में मनजीत कौर के दिल से बेटे के लिए बददुआएं ही निकलतीं. निरमैल के साथ रहना मनजीत कौर की मजबूरी थी. वह तो अपना घर छोड़ सकती थी और अपने नशेड़ी बेटे को. उस से घर से निकलने के लिए जरूर कहती थी. जबकि निरमैल से 2 बच्चों की मां बन चुकी गुरप्रीत कौर के लिए ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी. नशेड़ी और निखट्टू पति के दुर्व्यवहार और मारपीट से परेशान हो कर गुरप्रीत कौर एक दिन दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई

मनजीत कौर ने बहू को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. उस ने कहा, ‘‘आप का बेटा इंसान नहीं, जानवर है. मुझे अपने बच्चों के भविष्य को देखना है. इस नरक में एक जानवर की बीवी बन कर रहने से कहीं अच्छा होगा कि मैं खुद को बेवा मान कर मायके में ही रहूं.’’ गुरप्रीत कौर चली गई. उस के बाद घर में रह गई मनजीत कौर, निरमैल सिंह और किराएदार रविंद्र सिंह. पत्नी और बच्चों के घर छोड़ कर चले जाने की हताशा में नशेड़ी निरमैल सिंह हिंसक हो उठा. अब उस के निशाने पर सीधे मनजीत कौर और रविंद्र सिंह थे.

मनजीत कौर के चरित्र पर एक बार फिर अंगुली उठा कर निरमैल सिंह किराएदार रविंद्र सिंह को घर से निकालने के लिए कहने लगा. इस पर मनजीत कौर ने बेटे को खरीखोटी सुनाते हुए कहा, ‘‘तुझ जैसे निखट्टू और ऐबी को जोरू तो पहले ही छोड़ कर चली गई. अब किराएदार को भी निकाल दिया तो गुजारा कैसे होगा? 2 वक्त की रूखीसूखी रोटी से भी जाएंगे.’’

‘‘अगर किरादार को नहीं निकालना तो जमीन बेच दो.’’ निरमैल ने कहा.

निरमैल की बात सुन कर मनजीत कौर के शरीर में जैसे आग लग गई. उस ने कहा, ‘‘पुरखों की मेहनत से बनाई गई जमीन तेरे नशे के लिए बेच दूं? ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होगा. अब कभी मुझ से जमीन के बारे में बात मत करना. मैं तुझे बेच दूंगी, पर जमीन नहीं बेचूंगी’’

‘‘लगता है, यह जमीन अपने किराएदार यार के लिए रखेगी.’’ निरमैल ने कहा.

बेटे के मुंह से निकले इन शब्दों से मां का कलेजा छलनी हो गया. वह एक तरह से इंत्तहा थी. जिस हृदय में बेटे के लिए लबालब ममता होती है, मां के उसी हृदय में भयानक नफरत पैदा हो गई. ऐसी भयानक नफरत, जिस के चलते मां वह सब सोचने को मजबूर हो गई, शायद ही कोई विरली जन्म देने वाली मां सोचती है. बेटे के प्रति नफरत से भरी मनजीत कौर के मन में जो सोच पैदा हुई, उसे परिपक्व हो कर इरादे में बदलने में थोड़ा समय लगा. इस बीच वह खुद से ही लड़ती रही. वह जो कुछ करने की सोच रही थी, एक मां के लिए वैसा करना असान नहीं था.

दूसरी ओर मां के अंदर चल रहे अंतर्द्वंद्व से अनजान निरमैल उसे सताने से बाज नहीं रहा था. मां पर हाथ उठाना और उसे गालियां देना उस के लिए आम बात हो गई थी. घर की ऐसी कोई चीज नहीं बची थी, जिसे निरमैल ने अपनी नशे की भट्ठी में स्वाहा नहीं कर दिया था. निरमैल की कोशिश अब यही थी कि किसी भी तरह मनजीत कौर गांव में मौजूद पुरखों की जमीन बेच दे. ऐसा करने के लिए वह उसे मजबूर भी कर रहा था. इस के लिए वह कुछ भी करने को अमादा दिखता था. मनजीत कौर को लगने लगा कि जमीन की खातिर किसी दिन नशेड़ी बेटा उस का गला घोंट देगा

ऐसा खयाल आते ही वह सोच उस पर हावी होने लगी, जिस से वह पिछले काफी दिनों से लड़ रही थी. रिश्ते का मोह टूटते ही मनजीत कौर का दिमाग एक अपराधी की तरह काम करने लगा. जब उस के दिमाग में योजना का एक अस्पष्ट खाका तैयार हो गया तो उस ने अपनी उस योजना में शामिल करने के लिए बेटी राज कौर और दामाद किशन सिंह को अपने घर बुला लिया. अपने भयानक इरादे से बेटी और दामाद को अवगत करा कर मनजीत कौर ने कहा, ‘‘मेरी कोख ही मेरी सब से बड़ी दुश्मन बन गई है. इस ने केवल मुझे सताया है, बल्कि मेरी ममता को भी जलील किया है. नशे ने इसे इंसान से हैवान बना दिया है. लगता है नशे की ही वजह से यह किसी दिन मेरी जान लेने से भी परहेज नहीं करेगा. लेकिन मैं इस के हाथों से मरना नहीं चाहती. जबकि मैं इस की नौबत ही नहीं आने देना चाहती.

ऐसे बेटे के होने और होने से क्या फर्क पड़ता है. मैं ने तुम लोगों को इसलिए  बुलाया है कि अगर मेरा इंसान से हैवान बना बेटा नहीं रहेगा तो मेरे बाद मेरी जमीन और घर के मालिक तुम लोग होगे. अब तुम लोगों को इस बात पर विचार करना है कि मैं जो करने जा रही हूं, उस में मेरा साथ देना है या नहीं?’’ मनजीत कौर क्या चाहती है, यह बेटी और दामाद को समझते देर नहीं लगी. उन्होंने मनजीत कौर का साथ देने की हामी भर दी. बेटे को खत्म करने की अपनी योजना में मनजीत कौर ने बेटी और दामाद को ही नहीं, किराएदार रविंद्र सिंह को भी शामिल कर लिया. इस के बाद में निरमैल को खत्म करने की पूरी योजना बन गई.

हमेशा की तरह 5 सितंबर की रात निरमैल सिंह नशे में डूबा घर आया और रोज की तरह मां से झगड़ा करने के घर के बाहर खुले आंगन में बेसुध सो गया. जब मनजीत कौर को यकीन हो गया कि निरमैल सिंह गहरी नींद सो गया है तो उस ने बड़ी ही खामोशी से बेटी राज कौर, दामाद किशन सिंह और किराएदार रविंद्र सिंह की मदद से गला घोंट कर अपने ही बेटे की हत्या कर दी. अपने इस बेटे से वह इस तरह परेशान और दुखी थी कि उसे मारते हुए उस के हाथ बिलकुल नहीं कांपे. निरमैल की हत्या कर सब ने आंगन की कच्ची जमीन में गड्ढा खोद कर उसी में उस की लाश को गाड़ दिया.

जब कई दिनों तक निरमैल सिंह दिखाई नहीं दिया तो गांव वाले उस के बारे में पूछने लगे. इस तरह निरमैल सिंह का एकाएक गायब हो जाना गांव में चर्चा का विषय बन गया. जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं. कोई कहता था कि निरमैल मां से झगड़ा कर के घर छोड़ चला गया है तो कोई कहता कि वह कामधंधे के सिलसिले में कहीं बाहर गया है. लेकिन कुछ लोग दबी जुबान से कुछ दूसरा ही कह रहे थे. जब निरमैल के बारे में कोई सही बात सामने नहीं आई तो गांव के ही किसी मुखबिर ने थाना सरहाली पुलिस को खबर कर दी कि निरमैल का कत्ल हो चुका है और उस के कत्ल में किसी बाहरी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस के घर वालों का ही हाथ है.

मुखबिर की इस खबर पर थाना सरहाली के थानाप्रभारी सर्वजीत सिंह मामले की तफ्तीश में जुट गए. तफ्तीश की शुरुआत में ही उन्हें लगा कि मुखबिर की खबर में दम है. उन्होंने शक के आधार पर 7 सितंबर को मनजीत कौर को हिरासत में ले लिया और थाने ला कर पूछताछ शुरू कर दी. पहले तो मनजीत कौर झूठ बोल कर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही, लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सी सख्ती की तो उस ने अपने बेटे के कत्ल की बात स्वीकार कर ली. उस ने कहा, ‘‘हां, मैं ने ही अपने बेटे को मारा है और मुझे इस का जरा भी अफसोस नहीं है. क्या करती, नशे ने उसे आदमी से हैवान बना दिया था. उस का मर जाना ही बेहतर था.’’

इस के बाद मनजीत कौर ने निरमैल की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. पूरी कहानी सुनने के बाद पुलिस ने मजिस्ट्रेट सुखदेव सिंह की मौजूदगी में आंगन की खुदाई कर के निरमैल सिंह की लाश बरामद कर के पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. हत्या में सहयोग करने वाली राज कौर, उस के पति किशन सिंह, किराएदार रविंद्र सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने सभी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

   — कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित