Family Dispute: भाभी के लिए भाई बना दुश्मन

Family Dispute: निठल्ले अंग्रेज सिंह की नीयत अपनी खूबसूरत भाभी पर ही नहीं, भाई की दौलत पर भी खराब थी. यह सब पाने के लिए उस ने दोस्तों की सलाह पर जो किया, वह किसी भी कीमत पर उचित नहीं था.  सखेतों का काम निपटा कर सुखविंदर सिंह ने दोपहर का खाना खाने के लिए घर जाने से पहले जानवरों के कमरे में जा कर उन का चारा वगैरह देख लिया था. पूरी तरह संतुष्ट हो कर वह घर के लिए चल पड़ा. उस के खेतों से कुछ दूरी पर कुलदीप सिंह के खेत थे. उस के आगे लखविंदर और जसबीर के खेत थे.

चूंकि कुलदीप दूर के रिश्ते में उस का भाई लगता था और गांव जाने का रास्ता उस के खेतों से था, इसलिए उस ने सोचा कि वह उस से भी पूछ ले कि अगर वह भी घर चल रहा है तो दोनों साथसाथ बातचीत करते चले जाएंगे. यही सोच कर सुखविंदर खेतों में बने कुलदीप के नलकूप वाले कमरे की ओर बढ़ा. जैसे ही वह नलकूप की टंकी के पास पहुंचा, उस के पैर जहां थे, वहीं रुक गए. उस का शरीर कांप उठा और मारे डर के उस का चेहरा पीला पड़ गया. एकाएक उस के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली.

नलकूप वाले कमरे के दरवाजे के ठीक बीचोबीच कुलदीप सिंह की लहूलुहान लाश पड़ी थी. उस के सिर, पेट और शरीर के अन्य अंगों से खून अभी भी रिस रहा था. कुलदीप को उस हालत में देख कर सुखविंदर घबरा गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह तेजी से गांव की ओर भागा. गांव पहुंच कर सीधे वह कुलदीप के घर पहुंचा और एक ही सांस में उस की पत्नी करमजीत कौर को पूरी बात बता दी. संयोग से उस समय करमजीत कौर का भाई रछपाल सिंह भी बहन से मिलने आया था. सुखविंदर की बात सुन कर करमजीत कौर भाई रछपाल, सुखविंदर और गांव के कुछ अन्य लोगों के साथ खेतों की ओर भागी.

नलकूप पर इन लोगों ने जो देखा, सब की सांसें अटक गईं. करमजीत तो दहाड़ मार कर पति के ऊपर गिर पड़ी. कुछ लोगों ने कुलदीप की नाड़ी देखी तो पता चला कि वह मर चुका है. तुरंत इस बात की जानकारी पुलिस को दी गई. यह घटना 9 सितंबर, 2015 की है. हत्या की सूचना मिलते ही थाना सुलतानपुर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह, एसआई जसप्रीत सिंह, एएसआई लखविंदर सिंह, हैडकांस्टेबल जसविंदर सिंह, वतन सिंह, सुखदेव सिंह और कमलजीत सिंह के साथ गांव माछीछोआ पहुंच गए. अब तक वहां लगभग पूरा गांव जमा हो चुका था.

हत्या की सूचना मिलने के तुरंत बाद हरप्रीत सिंह ने घटना की सूचना एसपी (डी) जगजीत सिंह सरोआ के साथसाथ क्राइम टीम को भी दे दी थी. इसलिए उन के घटनास्थल पर पहुंचतेपहुंचते क्राइम टीम भी पहुंच गई थी. हरप्रीत सिंह ने लाश का गहराई से निरीक्षण किया तो मृतक के सिर और पेट पर चोटों के गंभीर निशान नजर आए. शायद वे किसी तेजधार हथियार से किए गए थे. यही गंभीर चोटें मौत का कारण बनी थीं. उन्होंने आसपास का भी निरीक्षण किया कि शायद कोई ऐसी चीज मिल जाए, जिस की मदद से जांच आगे बढ़ सके.

बहरहाल, क्राइम टीम को जो सबूत मिले, उन्हें कब्जे में ले लिए तो हरप्रीत सिंह ने अन्य औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाना लौट कर उन्होंने मृतक की पत्नी करमजीत कौर की ओर से कुलदीप सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर दिया. इस के बाद इस अंधे कत्ल के खुलासे के लिए एसएसपी राजेंद्र सिंह ने सीआईए स्टाफ की एक टीम गठित कर दी.

काफी प्रयास के बाद भी पता नहीं चला कि कुलदीप की हत्या किस ने और क्यों की थी? पहले पुलिस ने इस हत्या को अवैध संबंधों से जोड़ कर देखा और अपने कुछ मुखबिरों को करमजीत कौर पर नजर रखने के लिए लगा दिया. मृतक कुलदीप की भी कुंडली खंगाली गई. पुलिस को संदेह था कि अवैध संबंधों में रोड़ा बनने की वजह से करमजीत कौर ने ही पति को मरवा दिया होगा. इस बात पर भी गौर किया जा रहा था कि कहीं कुलदीप के ही किसी से नाजायज संबंध न रहे हों और उस के घर वालों ने कुलदीप को रास्ते से हटा दिया हो.

थाना सुलतानपुर लोधी पंजाब के जिला कपूरथला के अंतर्गत आता है. इसी थाने का एक गांव है माछोछीआ, जिस में सरदार समुंद्र सिंह परिवार के साथ रहते थे. उन के पास काफी उपजाऊ जमीन थी, गांव में पक्का मकान था. खेतों से इतनी पैदावार हो जाती थी कि साल का खर्च निकालने के बाद भी उन के पास काफी कुछ बच जाता था, जिस में से गुरु का आदेश ‘वंड छक्को’ मान कर काफी पैसा वह गरीबों और जरूरतमंदों को दे देते थे. कुल मिला कर समुंद्र सिंह अपने नाम की ही तरह नेकदिल और दरियादिल थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे थे. बड़ा कुलदीप सिंह, उस से छोटा अंग्रेज सिंह और सब से छोटा रणजीत सिंह.

रणजीत सिंह थोड़ा मंदबुद्धि था. जबकि अंग्रेज सिंह काफी चालाक और शातिरदिमाग था. वह जिस तरह का दिखाई देता था, उस तरह का था नहीं. बड़ा कुलदीप सिंह पिता की ही तरह धार्मिक सोच वाला सीधासादा नेक इंसान था. दूसरों और जरूरतमंदों के काम आना उसे अच्छा लगता था. उस की व्यवहार कुशलता और स्वभाव की वजह से गांव में उस की बड़ी इज्जत थी. सभी उस से प्यार भी करते थे. जबकि उस के छोटे अंग्रेज सिंह को गांव का कोई भी आदमी पसंद नहीं करता था. तीनों भाई अपने पुश्तैनी मकान में एक साथ रहते थे.

हरप्रीत सिंह ने मृतक की पत्नी करमजीत कौर और गांव वालों से पूछाताछ की. सब का यही कहना था कि कुलदीप की किसी से न कोई दुश्मनी थी और न अदावत. वह सब के काम आने वाला इंसान था. लोग उस की बहुत इज्जत करते थे. मुखबिरों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मृतक और उस की पत्नी करमजीत कौर का चरित्र एकदम पाकसाफ था. ना तो मृतक के किसी औरत से नाजायज संबंध थे और न ही करमजीत कौर की किसी अन्य मर्द से बोलचाल थी. कुलदीप पूरा दिन अपने खेतों में व्यस्त रहता था. फालतू बातों के लिए पतिपत्नी के पास जरा भी समय नहीं था. मुखबिरों ने यह भी बताया था कि यह काम किसी बाहरी आदमी ने किया है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के रिश्तेदारों तथा अगलबगल के गांव वालों से भी पूछताछ की. लेकिन इस का भी कुछ नतीजा नहीं निकला. हर किसी ने मृतक की तारीफ ही की. किसी ने उस के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा. जब इस मामले की जांच आगे नहीं बढ़ सकी तो एसएसपी राजेंद्र कुमार ने तीन टीमें बना कर जांच में लगा दीं. थानाप्रभारी हरप्रीत सिंह ने इस मामले को चुनौती के रूप में लिया. उन्हें लगता था कि कहीं कोई ऐसी बात है, जो उन की नजरों के सामने नहीं आ रही है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के छोटे भाई अंग्रेज सिंह को बुला कर पूछाताछ की तो उस के बयानों में तमाम बातें विरोधाभासी मिलीं. वह किसी भी सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहा था. वह हर बात को घुमाफिरा कर ही कहता था. पूछताछ के बाद उन्होंने उसे जाने तो दिया, लेकिन उस पर नजर रखने के लिए अपने कुछ चालाक मुखबिरों को लगा दिया. 2 दिनों बाद ही मुखबिरों ने अंग्रेज सिंह के बारे में जो सूचनाएं दीं, उसे सुन कर हरप्रीत सिंह को लगा कि अब हत्यारे उन की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं हैं.

हरप्रीत सिंह अंग्रेज सिंह को पकड़ कर थाने ले आए और सख्ती से पूछताछ शुरु कर दी. हर अपराधी की तरह अंग्रेज सिंह भी खुद को निर्दोष बताता रहा. लेकिन हरप्रीत सिंह के पास जो सबूत थे, उन्हें सामने रख कर जब पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने भाई की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने कहा कि उसी ने अपने दोस्तों, बगीचा सिंह पुत्र निम्मा सिंह निवासी गांव थेहवाला, जसवंत सिंह पुत्र गुरबचन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, राजू पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, परविंदर सिंह पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव मुहालम, जिला फिरोजपुर तथा चरणजीत सिंह पुत्र सुच्चा सिंह निवासी गांव थेहवाला के साथ मिल कर भाई की हत्या की थी.

इस के लिए उस ने अपने इन दोस्तों को 2 लाख रुपए देने का वादा किया था, जिस में से एक लाख रुपए उस ने किसी से उधार ले कर दे भी दिए थे. उसी दिन हरप्रीत सिंह ने इस हत्या में शामिल लोगों के घरों पर छापे मारे, जिस में से बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पकड़ लिए गए. बाकी के 3 लोग फरार होने में सफल रहे. शायद उन्हें पुलिस की काररवाई की भनक लग गई थी. गिरफ्तार किए गए तीनों अभियुक्तों से पूछताछ में कुलदीप सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह हीनभावना से ग्रस्त एक ईर्ष्यालु भाई की घृणित मानसिकता का परिणाम था. कुलदीप सिंह और उस के छोटे भाई अंग्रेज सिंह की सोच में जमीनआसमान का अंतर था.

कुलदीप सिंह जहां धार्मिक सोच वाला दयालु आदमी था, वहीं अंग्रेज सिंह शैतानी सोच वाला ईर्ष्यालु आदमी था. तीसरा भाई रणजीत सिंह मंदबुद्धि था, इसलिए उसे परिवार की किसी चीज से कोई मतलब नहीं था. उस का ज्यादातर समय गुरुद्वारा में बीतता था. गांव वाले अकसर कुलदीप सिंह की बड़ाई किया करते थे. यह बात अंग्रेज को बिलकुल नहीं भाती थी. गांव में कोई समारोह होता तो कुलदीप सिंह को उस में सब से आगे रखा जाता. यह सब देख कर अंग्रेज सिंह जल उठता था. उसे इस बात पर गुस्सा आता था कि कुलदीप सिंह की तरह लोग उस की इज्जत क्यों नहीं करते.

एक दिन शराब पीते समय यही बात उस ने अपने दोस्त बगीचा सिंह से कही तो उस ने कहा, ‘‘उस के रहते तुझे कोई नहीं पूछेगा भाई, इसलिए तू उसे खत्म क्यों नहीं कर देता.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ अंग्रेज सिंह ने हैरानी से कहा.

‘‘भाई बढि़या आइडिया दे रहा हूं. तुझे भाभी बहुत अच्छी लगती है न? कब से तू उस के पीछे पड़ा है, लेकिन वह तुझे हाथ नहीं रखने दे रही है. कुलदीप को मार देगा तो वह तेरी हो जाएगी. इस के अलावा उस की जमीन भी तेरी हो जाएगी. तेरा छोटा भाई पागल ही है, उस के हिस्से की भी जमीन तुझे ही मिलेगी. इस तरह पूरी प्रौपर्टी का मालिक तू अकेला हो जाएगा.’’ बगीचा सिंह ने कहा.

अंग्रेज सिंह की आंखे हैरानी से फैल गईं. उस ने कहा, ‘‘यार बगीचा, तू ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई. तू ने कितनी सच बात कही है, भाई के न रहने पर भाभी करमजीत कौर न खुद को संभाल पाएगी और न इतनी जमीन को. मजबूरन उसे मेरा सहारा लेना पड़ेगा. फिर तो मेरी चांदी ही चांदी हो जाएगी.’’

यह बात दिमाग में आते ही अंग्रेज सिंह भाई कुलदीप की हत्या की योजना बनाने लगा. 2 बार तो उस ने नलकूप की मोटर के स्टार्टर में बिजली का नंगा तार बांध दिया कि कुलदीप मोटर स्टार्ट करने आए तो करंट से उस की मौत हो जाए. लेकिन तार पर नजर पड़ जाने की वजह से कुलदीप बच गया. इस के बाद अंग्रेज ने कुएं के ऊपर रखा लकड़ी का पटरा हटा कर पतली सी प्लाई रख दी, जिस से कुलदीप उस पर चढ़े तो वह टूट जाए और कुलदीप सीधे कुएं में गिर जाए. नीचे पंखा लगा था, अगर कुलदीप उस पर गिरता तो मर जाता. लेकिन उस पर भी कुलदीप की नजर पड़ गई. उस ने उसे हटा कर मोटा पटरा रख दिया.

इस तरह कुलदीप सिंह को मारने की अंग्रेज सिंह की सारी कोशिशें विफल हो गईं. अपनी इन कोशिशों में असफल होने के बाद अंग्रेज सिंह ने कुलदीप की हत्या पैसे ले कर हत्या करने वालों से कराने पर विचार किया और बगीचा सिंह के माध्यम से उस ने राजू, परविंदर और चरणजीत सिंह को 2 लाख रुपए में बड़े भाई की हत्या की सुपारी दे दी. एक लाख रुपए उस ने एक आदमी से उधार ले कर एडवांस भी दे दिए. रुपए देने के बाद अंग्रेज सिंह ने पांचों को पिस्तौल खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश भेजा. ये सभी बरेली, अलीगढ़ आदि शहरों में घूम कर 7 सितंबर को लौट आए. इन्हें कहीं पिस्तौल नहीं मिली. आखिर में तय हुआ कि किसी तेजधार हथियार से कुलदीप सिंह की हत्या कर दी जाए.

9 सितंबर की दोपहर को जब कुलदीप सिंह खेतों का काम निपटा कर मोटर बंद करने के लिए नलकूप के कमरे में गया तो वहां बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पहले से बैठे थे. कुलदीप मोटर बंद करने के लिए जैसे ही कमरे में घुसा, दोनों ने एकदम से कुलदीप पर हंसिया और चाकू से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से कुलदीप चकरा कर जमीन पर गिर पड़ा और कुछ देर तड़प कर मर गया. कुलदीप सिंह मर गया तो अंग्रेज सिंह बगीचा और परविंदर को अपनी मोटरसाइकिल से सुलतानपुर लोधी छोड़ आया. इस के बाद घर लौट कर वह इस तरह सामान्य बना रहा, जैसे उसे किसी बात का पता ही नहीं है.

इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह ने मुखबिरों को तो अंग्रेज सिंह के पीछे लगाया ही था, उसी समय उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवा ली थी. इसी काल डिटेल्स से पता चला था कि कुलदीप के कत्ल वाले दिन 9 सितंबर को कुलदीप की हत्या से कुछ देर पहले और बाद में अंग्रेज सिंह ने 4-5 लोगों से 60-70 बार बात की थी. उन्हीं पांचों नंबरों से ही अंग्रेज सिंह के पांचों साथियों का पता चला था. बहरहाल, गिरफ्तार अंग्रेज सिंह, बगीचा सिंह और परविंदर का बयान लेने के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान बगीचा सिंह और परविंदर की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया और चाकू बरामद कर लिया गया.

रिमांड खत्म होने पर 15 सितंबर को तीनों अभियुक्तों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में थे, किसी की जमानत नहीं हुई थी. बाकी बचे तीनों अभियुक्तों की पुलिस तलाश कर रही थी. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं गए थे. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: इश्क की राह में भटकी औरत

Love Story: जिस महेश के लिए राधा ने पति से बेवफाई की, उसी महेश की नीयत जब उस की 14 साल की बेटी पर बिगड़ी तो भला राधा इस बात को कैसे बरदाश्त करती. फिर उस ने जो किया, क्या वह ठीक था

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर देहात के थाना झीझंक का एक गांव है महेवा. इसी गांव में राम सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और एक बेटी राधा थी. राम सिंह घी का कारोबार करता था. वह गांवगांव जा कर लोगों के यहां से घी खरीदता और उसे ले जा कर कानपुर में बेच आता. इस से उसे जो फायदा होता, उसी से उस के परिवार की गुजरबसर होती थी.

राम सिंह की बेटी राधा सुंदर होने के साथसाथ थोड़ी चंचल भी थी. इसलिए सयानी होने पर गांव का हर लड़का उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में लग गया था. जब यह सब राम सिंह ने देखा तो उसे लगा कि अब जल्दी ही राधा की शादी कर देनी चाहिए. उस ने उस के लिए लड़के की तलाश शुरू की तो उसे गांव बेलूपुर में एक लड़का मिल गया.

लड़के का नाम अजय था. उस के पिता लाखन सिंह के पास 10 बीघा खेती की जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. इसी वजह से उस की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी. बातचीत शुरू हुई तो राधा और अजय का रिश्ता तय हो गया. इस रिश्ते में अगर कोई खटकने वाली बात थी तो यह कि अजय सांवला था, जबकि राधा गोरी थी. इस के बावजूद अजय का पलड़ा भारी था, क्योंकि उस के पास 10 बीघा जमीन थी. जल्दी ही दोनों की शादी हो गई.

अजय तो सुंदर पत्नी पा कर खुश था, जबकि राधा अपने सांवले पति से खुश नहीं थी. शादी के पहले उस के मन में पति की जो छवि थी, अजय उस में कहीं भी फिट नहीं बैठता था. लेकिन अब विवाह हो गया था, इसलिए साथ तो रहना ही था. धीरेधीरे राधा एक बेटी अर्पिता और 2 बेटों जय तथा विजय की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी राधा में कोई बदलाव नहीं आया था. उस के मन में न तो बच्चों के प्रति वह मोह जागा था, जो एक मां को अपने बच्चों के प्रति होता है और न ही पति के प्रति वह चाहत जागी थी, जो जागनी चाहिए थी. पत्नी की इस उपेक्षा से अजय काफी दुखी था.

इस दुख को कम करने के लिए वह शराब पीने लगा. जब वह पक्का शराबी हो गया तो खेतीकिसानी से उस का मन हट गया. उसे लगता था कि आखिर वह किस के लिए मेहनत करे. जब वह पूरी तरह से निठल्ला हो गया तो मांबाप ने उसे अलग कर दिया. गांव में अजय का एक और अन्य मकान था, इसलिए मांबाप से अलग होने पर उसे कोई परेशानी नहीं हुई. वह पत्नी और बच्चों के साथ उसी मकान में रहने लगा. वह मेहनत कर नहीं सकता था, इसलिए बाप से मिली जमीन उस ने बटाई पर दे दी.

राधा 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन अब भी उस की सुंदरता में जरा भी कमी नहीं आई थी. बल्कि शरीर भर गया था, इसलिए वह पहले से भी ज्यादा सुंदर लगने लगी थी. स्वभाव से हंसमुख और चंचल राधा का मन घरगृहस्थी में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि वह कभी अजय को पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाई. शायद इसी वजह से उस का मन भटकता रहता था. राधा की सुंदरता और चंचलता की वजह से गांव के महेश का दिल उस पर आ गया था. वह उस तक पहुंचने का तिकड़म भिड़ाने लगा था.

3 भाइयों में महेश सब से बड़ा था. उस के पिता भवानी सिंह ने उस का विवाह शिवली कस्बा की रहने वाली रजनी से कर दिया था. लेकिन अपनी आशिकमिजाजी की वजह से वह पत्नी का हो कर नहीं रह सका. वह इधरउधर मुंह मारता फिरता था. गांव की कई महिलाओं से उस के संबंध थे. लेकिन उन के बारे में कोई नहीं जान सका. राधा पर वह पूरी तरह से मोहित था. इसलिए उस तक पहुंचने के लिए उस ने उस के खेत बटाई पर ले लिए. इस से उसे राधा के घर आनेजाने में आसानी हो गई थी. वह जब भी राधा के घर जाता, मौका मिलने पर उस से हंसीमजाक करने से नहीं चूकता.

राधा भी उस से खुल कर हंसीमजाक करती थी. एक दिन महेश आया तो अजय घर में नहीं था. राधा को अकेली पा कर उस के दिल की धड़कन बढ़ गई. वैसा ही कुछ हाल राधा का भी था. उस ने इठलाते हुए कहा, ‘‘आओ देवरजी, कैसे आना हुआ?’’

‘‘खेतों पर काम कर रहा था, अचानक तुम्हारी याद आई तो मन मचल उठा. पहले तो उसे मनाने की कोशिश की, जब वह नहीं माना तो यह सोच कर चला आया कि चल कर प्यारी भाभी का दीदार कर लूं. कभीकभी सोचता हूं कि इतनी सुंदर भाभी कालेकलूटे अजय भैया के पल्ले कैसे पड़ गईं?’’

‘‘अपनाअपना नसीब है देवरजी. मेरी तकदीर में यही लिखा था.’’ राधा ने लंबी सांस ले कर कहा.

राधा के इस जवाब से महेश को लगा कि उस का तीर सही निशाने पर लगा है. वह उस के एकदम करीब आ कर बोला, ‘‘नसीब अपने हाथ में होता है भाभी, मैं आप से प्यार करता हूं. मैं कोई पराया तो हूं नहीं. वैसे भी मैं न जाने कब से तुम्हारी खूबसूरती का दीवाना हूं.’’

‘‘देवरजी, यह दीवानापन छोड़ो और अब चुपचाप चले जाओ. कहीं वह आ गए तो पता नहीं क्या सोचेंगे?’’ राधा ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

महेश ने उसे बांहों में भर कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चला तो जाऊंगा, पर खाली हाथ नहीं जाऊंगा. आज तो तुम्हारा प्यार ले कर ही जाऊंगा.’’

राधा को बांहों में भरते ही उस ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी. राधा ने उस की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया. इस की वजह यह थी कि वह भी यही चाहती थी. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भूखे भेडि़ए की तरह क्यों टूटे पड़ रहे हो, थोड़ा सब्र से काम लो, दरवाजा खुला है. वैसे भी तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक नहीं है.’’

महेश समझ गया कि राधा को कोई आपत्ति नहीं है. इस का उस ने पूरा फायदा उठाया और अपने तथा राधा के बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. इस तरह राधा के कदम एक बार बहके तो बहकते चले गए. मौका मिलते ही महेश राधा के घर आ जाता. राधा भी हर तरह से उस का सहयोग कर रही थी. इस की वजह यह थी कि वह उस के पति से हर मायने में इक्कीस था. महेश और राधा का यह अवैध संबंध चोरीछिपे सालों तक चलता रहा, किसी को पता नहीं चला. आखिर कब तक उन का यह गलत संबंध छिपा रहता. वे समय के साथ लापरवाह होते गए, परिणामस्वरूप एक दिन अजय ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उन के बीच यह खेल काफी दिनों से चल रहा है.

महेश चूंकि दबंग स्वभाव का था, इसलिए अजय ने उस से सीधे टकराना ठीक नहीं समझा. उस के जाने के बाद उस ने राधा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘शरम आनी चाहिए तुम्हें यह सब करते हुए. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद तुम नीचता पर उतर आई हो.’’

इस के बाद जब दोनों में तूतूमैंमैं शुरू हुई तो बात बढ़ती गई. इस के बाद अजय ने राधा की जम कर पिटाई कर दी. लेकिन इस पिटाई के बाद भी राधा ने महेश को नहीं छोड़ा. वह महेश की इतनी दीवानी हो चुकी थी कि जब उसे घर में उस से मिलने का मौका नहीं मिलता तो वह किसी न किसी बहाने खेतों पर जा कर उस से मिल लेती. जब इस का पता अजय को चलता तो वह शराब पी कर राधा और महेश को खूब गालियां देता.

ज्यादा शराब पीने की वजह से अजय बीमार पड़ गया. राधा ने कानपुर ले जा कर उस का इलाज कराया. समय पर सही इलाज मिलने से अजय ठीक हो गया. उस के इलाज में सारा पैसा महेश ने लगाया था, इसलिए वह उस के एहसान तले दब गया. अब उस ने महेश से समझौता कर लिया कि वह उस के और राधा के बीच में बाधा नहीं बनेगा. इस के बाद महेश ने उस की नौकरी झीझंक कस्बा में एक आढ़ती के यहां लगवा दी. अजय सुबह 11 बजे घर से निकलता तो शाम को ही वापस आता. कभीकभी काम ज्यादा होता तो वह आढ़त पर ही रुक जाता.

अब तक राधा की बेटी अर्पिता 14 साल की हो चुकी थी. वह भी मां की तरह सुंदर और चंचल थी. गांव के रिश्ते के नाते वह महेश को भइया कहती थी. मां और महेश के संबंधों की उसे जानकारी थी. लेकिन मां के डर की वजह से वह विरोध नहीं कर पाती थी. इस की एक वजह यह भी थी कि स्कूल की फीस से ले कर बाकी के उस के सारे खर्च महेश ही उठाता था. शायद इसीलिए वह अपनी जुबान बंद रखती थी.

एक दिन अजय ने घर से जाते समय राधा से कहा कि रात को वह घर नहीं आ पाएगा, इसलिए वह बच्चों के साथ खाना खा कर सो जाए. शाम ढलते ही राधा ने महेश को फोन कर के बता दिया कि वह जल्दी से घर आ जाए. आज की पूरी रात उन की अपनी है. क्योंकि अजय घर नहीं आएगा. राधा की बात सुन कर महेश बहुत खुश हुआ. रात 10 बजे के आसपास वह शराब के नशे में झूमता हुआ राधा के घर पहुंचा. अब तक राधा ने बच्चों को खिलापिला कर दूसरे कमरे में सुला दिया था. महेश ने आते ही राधा को बांहों में भरा और उस के साथ कमरे में चला गया.

आधी रात के बाद महेश लघुशंका के लिए कमरे से बाहर निकला तो उस की नजर दूसरे कमरे में सो रही अर्पिता पर पड़ी. उस को उस रूप में देख कर महेश की सांसें तेज हो गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा. उस के बाद लघुशंका कर के लौटा तो एक बार फिर उस की नजरें अर्पिता कर टिक गईं.

उस की नीयत खराब  होने लगी. वह राधा के कमरे में आया तो देखा राधा सो रही थी. अब तक उस की नीयत पूरी तरह खराब हो चुकी थी. वह लौटा और जा कर अर्पिता के बगल में लेट गया. उस ने अर्पिता से छेड़छाड़ की तो उस की नींद खुल गई. उस ने चीखना चाहा. लेकिन महेश ने उस के मुंह पर हाथ रख कर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘चुप रह, मैं हूं महेश.’’

‘‘महेश भइया तुम? यह क्या कर रहे हो?’’

‘‘चुप रह, मैं जो करने जा रहा हूं, इस में बड़ा मजा आएगा.’’

‘‘नहीं भइया, यह गलत है. आप को जो करना है, मम्मी के साथ करो. मेरे साथ कुछ किया तो शोर मचा दूंगी.’’ अर्पिता ने धमकाया तो महेश डर गया और चुपचाप राधा के कमरे में चला गया.

अर्पिता राधा से ज्यादा सुंदर थी, इसलिए वह महेश के दिलोदिमाग में बस गई. अर्पिता को पाने के लिए वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. इस छेड़छाड़ का परिणाम यह निकला कि अर्पिता को भी मजा आने लगा. अब वह भी महेश के आने का इंतजार करने लगी. महेश अर्पिता के साथ कुछ कर पाता, इस से पहले ही एक दिन राधा ने उसे अर्पिता से छेड़छाड़ करते देख लिया. उस के बाद तो राधा महेश पर बिफर पड़ी, ‘‘मेरी फूल सी बच्ची को बरगलाने में तुम्हें शरम नहीं आई, मैं ने पति से बेवफाई कर के तुम्हारा साथ दिया, जबकि तुम मेरी ही बेटी को बरबाद करने पर तुले हो. कान खोल कर सुन लो, आज के बाद तुम ने उसे बरगलाने की कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा.’’

राधा की धमकी का महेश पर कोई असर नहीं हुआ. उसे जब भी मौका मिलता, वह अर्पिता के साथ छेड़खानी कर बैठता. एक दिन तो हद हो गई, महेश ने राधा के सामने ही अर्पिता को अपनी बांहोें में भर लिया. इस के बाद तो राधा आपा खो बैठी. उस ने महेश और अर्पिता दोनों की पिटाई कर दी. इस के बाद राधा और महेश में जम कर कहासुनी हुई. राधा की समझ में आ गया कि महेश ऐसा सांप है, जो किसी भी दिन उस की बेटी को डंस सकता है, इसलिए उस ने इस सांप का फन कुचलने का निश्चय कर लिया.

14 दिसंबर, 2015 की सुबह राधा थाना झीझंक पहुंची और थानाप्रभारी आर.के. सिंह को बताया कि बेलूपुर के रहने वाले महेश ने उस के घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. उस की इस सूचना पर आर.के. सिंह पुलिस बल के साथ उस के घर जा पहुंचे. उस समय राधा के घर के बाहर भीड़ लग चुकी थी. भीड़ को हटा कर थानाप्रभारी वहां पहुंचे, जहां महेश फांसी के फंदे से झूल रहा था. महेश जीने की ग्रिल से लटका था. उस के पैर जमीन को छू रहे थे. पहली ही नजर में फांसी लगाने जैसा कोई लक्षण नजर नहीं आ रहा था. न तो उस के मुंह से झाग निकला था और न ही मलमूत्र निकला था. शक होने पर आर.के. सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

उन्होंने राधा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि महेश ने उस के खेत बटाई पर ले रखे हैं, इसलिए उस का उस के घर आनाजाना था. उस के पति अजय के नौकरी पर जाने के बाद महेश आया और उस की साड़ी का फंदा बना कर ग्रिल से झूल गया. उस ने महेश को न आते देखा और न फांसी पर झूलते देखा. आर.के. सिंह ने मृतक महेश के पिता भवानी सिंह से पूंछतांछ की तो फफकफफक कर रोते हुए उस ने बताया कि महेश की हत्या राधा और उस के पति अजय ने की है. पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश को फंदे पर लटकाया गया है. हत्या की वजह राधा और मेहश के बीच अवैध संबंध हैं.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो आर.के. सिंह चौंके. क्योंकि महेश की मौत गला दबाने से हुई थी. उस ने आत्महत्या नहीं की थी. चूंकि शक के घेरे में राधा और उस का पति अजय था, इसलिए वह उन्हें हिरासत में ले कर थाने ले आए और पूछताछ की. अजय ने बताया कि वह घर पर नहीं था, इसलिए महेश की हत्या किस ने की, उसे पता नहीं है. अजय ने हत्या करने से साफ मना कर दिया तो आर.के. सिंह ने राधा से पूछताछ की. पहले तो वह उन्हें गुमराह करती रही, लेकिन जब उस से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और महेश की हत्या का अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि उस के और महेश के बीच पिछले कई सालों से संबंध थे. उस के प्यार में अंधी हो कर उस ने पति तक से बेवफाई कर डाली. तब उसे पता नहीं था कि उस की यह बेवफाई उस की बेटी की जिंदगी पर भारी पड़ जाएगी. महेश उस की बेटी अर्पिता पर बुरी नजर डाल रहा था. राधा ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं माना. मजबूर हो कर उस ने साजिश रच कर 14 दिसंबर की सुबह 4 बजे जब अजय काम पर चला गया तो महेश को बुला लिया. आते ही महेश ने जैसे ही उसे पकड़ा, उस ने उस के नाजुक अंग को दांतों से काट लिया.

वह दर्द से तड़पने लगा तो वह उस की छाती पर सवार हो गई और साड़ी से उस का गला घोंट दिया. पुलिस को गुमराह करने के लिए उस ने उस की लाश को फंदे से जीने की ग्रिल से लटका दिया. उस के बाद थाने जा कर पुलिस को सूचना दे दी. राधा के इसी बयान के आधार पर आर.के. सिंह ने मृतक के पिता भवानी सिंह की ओर से अपराध संख्या 347/2015 पर महेश की हत्या का मुकदमा राधा के खिलाफ दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

17 दिसंबर, 2015 को थाना झीझंक पुलिस ने राधा को कानपुर देहात की माती अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. चूंकि अजय निर्दोष था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया. Love Story

 

Crime Story: हम मर जाएंगे – परिवार वालों ने किया जुदा

Crime Story: 22 फरवरी की सुबह 6 बजे रामपुर गांव के कुछ लोग मार्निंग वाक पर निकले तो उन्होंने पानी की टंकी के पास लिंक मार्ग से 50 मीटर दूर खेत में एक युवक को बुरी तरह से जख्मी हालत में पड़े देखा. युवक की जान बचाने के लिए उन में से किसी ने थाना खानपुर पुलिस को सूचना दे दी.

सूचना प्राप्त होते ही खानपुर थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचित कर दिया था. विश्वनाथ यादव जिस समय वहां पहुंचे, उस समय ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. भीड़ को परे हटाते हुए वह खेत में पहुंचे, जहां युवक जख्मी हालत में पड़ा था. युवक की उम्र 24 साल के आसपास थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी, जो आरपार हो गई थी. उस के एक हाथ में पिस्टल थी तथा दूसरी पिस्टल उस के पैर के पास पड़ी थी.

जामातलाशी में उस के पास से 2 मोबाइल फोन, आधार कार्ड तथा पुलिस विभाग का परिचय पत्र मिला, जिस में उस का नामपता दर्ज था. परिचय पत्र तथा आधार कार्ड से पता चला कि युवक का नाम अजय कुमार यादव है तथा वह बभरौली गांव का रहने वाला है. तुरंत उस के घर वालों को सूचना दे दी गई.

इंसपेक्टर विश्वनाथ यादव अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह, एएसपी गोपीनाथ सोनी तथा डीएसपी राजीव द्विवेदी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा युवक के पास से बरामद सामान का अवलोकन किया. देखने से ऐसा लग रहा था कि युवक ने आत्महत्या का प्रयास किया था. अब तक अजय के पिता रामऔतार यादव भी घटनास्थल आ गए थे. वह आत्महत्या की बात से सहमत नहीं थे.

चूंकि अजय यादव मरणासन्न स्थिति में था, अत: पुलिस अधिकारियों ने उसे इलाज हेतु तत्काल सीएचसी (सैदपुर) भिजवाया लेकिन वहां के डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और उसे बीएचयू ट्रामा सेंटर रैफर कर दिया. इलाज के दौरान अजय यादव की मौत हो गई. चूंकि अजय यादव सिपाही था, अत: उस की मौत को एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह ने गंभीरता से लिया. उन्होंने जांच के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में क्राइम ब्रांच, सर्विलांस टीम तथा स्वाट टीम को शामिल किया गया.

इस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर बरामद सामान को कब्जे में लिया. सर्विलांस सेल प्रभारी दिनेश यादव ने अजय के पास से बरामद दोनों फोन की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि 22 फरवरी की रात 3 बजे एक फोन से अजय के फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भेजा गया था, जिस में लिखा था, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

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जिस मोबाइल फोन से मैसेज भेजा गया था, उस फोन की जानकारी की गई तो पता चला कि वह मोबाइल फोन इचवल गांव निवासी राजेश सिंह की बेटी सोनाली सिंह के नाम दर्ज था. जबकि फोन मृतक अजय की जेब से बरामद हुआ था. अजय और सोनाली का क्या रिश्ता है? उस ने 3 बजे रात को अजय को मैसेज क्यों भेजा? जानने के लिए पुलिस टीम सोनाली सिंह के गांव इचवल पहुंची और उस के पिता राजेश सिंह से पूछताछ की.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह आज सुबह से गायब है. हम ने सैदपुर कैफे से उस की औनलाइन एफआईआर भी कराई है. राजेश सिंह ने एफआईआर की कौपी भी दिखाई. राजेश सिंह की बात सुन कर पुलिस टीम का माथा ठनका. राजेश सिंह को गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करानी थी, तो थाना खानपुर में करानी चाहिए थी. आनलाइन रिपोर्ट क्यों दर्ज कराई? दाल में जरूर कुछ काला था. यह औनर किलिंग का मामला हो सकता था. संभव था अजय और सोनाली सिंह प्रेमीप्रेमिका हों और इज्जत बचाने के लिए राजेश सिंह ने अपनी बेटी की हत्या कर दी हो.

ऐसे तमाम प्रश्न टीम के सदस्यों के दिमाग में आए तो उन्होंने शक के आधार पर राजेश सिंह के घर पर पुलिस तैनात कर दी. साथ ही पुलिस सानिया उर्फ सोनाली सिंह की भी खोज में जुट गई. अजय का मोबाइल फोन खंगालने पर उस का और सोनाली सिंह का विवाह प्रमाण पत्र मिला, जिस में दोनों की फोटो लगी थी.

प्रमाण पत्र के अनुसार दोनों 5 नवंबर, 2018 को कोर्टमैरिज कर चुके थे. इस प्रमाण पत्र को देखने के बाद पुलिस टीम का शक और भी गहरा गया. पुलिस टीम ने सोनाली सिंह के पिता राजेश सिंह व परिवार के 4 अन्य सदस्यों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. 23 फरवरी, 2021 की सुबह पुलिस टीम को इचवल गांव में राजेश सिंह के खेत में एक युवती की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. पुलिस टीम तथा अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे और लाश का निरीक्षण किया.

मृतका राजेश सिंह की 25 वर्षीय बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी. चेहरे को भी कुचला गया था. निरीक्षण के बाद पुलिस ने सोनाली सिंह के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गाजीपुर भेज दिया. शव के पास से पिस्टल या तमंचा बरामद नहीं हुआ, लेकिन एक जोड़ी मर्दाना चप्पल तथा टूटी हुई चूडि़यां जरूर मिलीं. चप्पलों की पहचान मृतक सिपाही अजय के घर वालों ने की. उन्होंने पुलिस को बताया कि चप्पलें अजय की थीं.

पुलिस टीम ने हिरासत में लिए गए राजेश सिंह से बेटी सोनाली सिंह की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो वह टूट गया और उस ने सोनाली सिंह तथा उस के प्रेमी अजय यादव की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. यही नहीं, उस ने हत्या में इस्तेमाल अजय यादव की बाइक यूपी81 एसी 5834 भी बरामद करा दी.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया सिपाही अजय यादव से प्यार करती थी और दोनों ने कोर्ट में शादी भी कर ली थी. तब अपनी इज्जत बचाने के लिए उस ने दोनों को मौत की नींद सुलाने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम सिंह को शामिल किया. इस के बाद पहले सानिया की हत्या की फिर अजय की. उस के बाद दोनों के शव अलगअलग जगहों पर डाल दिए.

पुलिस अजय की हत्या को आत्महत्या समझे, इसलिए उस के एक हाथ में पिस्टल थमा दी तथा बेटी का मोबाइल फोन अजय की जेब में डाल दिया, ताकि लगे कि अजय ने पहले सोनाली सिंह की गोली मार कर हत्या की फिर स्वयं गोली मार कर आत्महत्या कर ली. बेटी के शव के पास अजय की चप्पलें छोड़ना, सोचीसमझी साजिश का ही हिस्सा था. राजेश के बाद अन्य आरोपियों ने भी जुर्म कबूल कर लिया.

थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने डबल मर्डर का परदाफाश करने तथा आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थिति सभागार में प्रैसवार्ता की और आरोपियों को मीडिया के समक्ष पेश कर डबल मर्डर का खुलासा कर दिया.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने मृतक के पिता रामऔतार यादव की तहरीर पर धारा 302 आईपीसी के तहत राजेश सिंह, अवधराज सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह तथा नीलम सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, उस में दोनों की हत्याओं की वजह मोहब्बत थी.

गाजीपुर जिले के खानपुर थाना अंतर्गत एक गांव है इचवल कलां. इसी गांव में ठाकुर राजेश सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी नीलम सिंह के अलावा बेटा दीपक सिंह तथा बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. राजेश सिंह के पिता अवधराज सिंह भी उन के साथ रहते थे. पितापुत्र दबंग थे. गांव में उन की तूती बोलती थी. उन के पास उपजाऊ जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

राजेश सिंह की बेटी सोनाली उर्फ सानिया सुंदर, हंसमुख व मिलनसार थी. पढ़ाई में भी तेज थी. वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजकीय डिग्री कालेज सैदपुर से बीए की डिग्री हासिल कर चुकी थी और बीएड की तैयारी कर रही थी. दरअसल, सानिया टीचर बन कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. इसलिए वह कड़ी मेहनत कर रही थी.

सानिया उर्फ सोनाली के आकर्षण में गांव के कई युवक बंधे थे. लेकिन अजय कुमार यादव कुछ ज्यादा ही आकर्षित था. सानिया भी उसे भाव देती थी. सानिया और अजय की पहली मुलाकात परिवार के एक शादी समारोह में हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हो गए थे. इस के बाद जैसे जैसे उन की मुलाकातें बढ़ती गईं, वैसेवैसे उन का प्यार बढ़ता गया.

अजय कुमार यादव के पिता रामऔतार यादव सानिया के पड़ोस के गांव बभनौली में रहते थे. वह सीआरपीएफ में कार्यरत थे. लेकिन अब रिटायर हो गए थे और गांव में रहते थे. उन की 5 संतानों में 4 बेटियां व एक बेटा था अजय कुमार. बेटियों की वह शादी कर चुके थे और बेटा अजय अभी कुंवारा था. रामऔतार यादव, अजय को पुलिस में भरती कराना चाहते थे, सो वह उस की सेहत का खास खयाल रखते थे. अजय बीए पास कर चुका था और पुलिस भरती की तैयारी कर रहा था. उस ने पुलिस की परीक्षा भी दी.

एक दिन अजय ने सानिया के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह गहरी सोच में डूब गई. कुछ देर बाद वह बोली, ‘‘अजय, मुझे तुम्हारा शादी का प्रस्ताव तो मंजूर है, लेकिन मुझे डर है कि हमारे घर वाले शादी को कभी राजी नही होंगे.’’

‘‘क्यों राजी नही होंगे?’’ अजय ने पूछा.

‘‘क्योंकि मैं ठाकुर हूं और तुम यादव. मेरे पिता कभी नहीं चाहेंगे कि ठाकुर की बेटी यादव परिवार में दुलहन बन कर जाए. मूंछ की लड़ाई में वह कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं.’’

‘‘घर वाले राजी नहीं होंगे, फिर तो एक ही उपाय है कि हम दोनों कोर्ट में शादी कर लें.’’

‘‘हां, यह हो सकता है.’’ सानिया ने सहमति जताई.

इस के बाद 5 नवंबर, 2018 को सानिया उर्फ सोनाली और अजय कुमार ने गाजीपुर कोर्ट में कोर्टमैरिज कर के विवाह प्रमाण पत्र हासिल कर लिया. कोर्ट मैरिज करने की जानकारी सानिया के घर वालों को नहीं हुई, लेकिन अजय के घर वालों को पता था. उन्होंने सानिया को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया.

दिसंबर, 2018 में अजय का चयन सिपाही के पद पर पुलिस विभाग में हो गया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग अमेठी जिले के गौरीगंज थाने में हुई. अजय और सानिया की मुलाकातें चोरीछिपे होती रहती थीं. मोबाइल फोन पर भी उन की बातें होती रहती थीं. कोर्ट मैरिज के बाद उन का शारीरिक मिलन भी होने लगा था. इस तरह समय बीतता रहा.

जनवरी, 2021 के पहले हफ्ते में राजेश सिंह को अपनी पत्नी नीलम सिंह व बेटे दीपक सिंह से पता चला कि सानिया पड़ोस के गांव बभनौली के रहने वाले युवक अजय यादव से प्रेम करती है और दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली है. दरअसल, नीलम सिंह ने बेटी को देर रात अजय से मोबाइल फोन पर बतियाते पकड़ लिया था. फिर डराधमका कर सारी सच्चाई उगलवा ली थी. यह जानकारी नीलम ने पति व बेटे को दे दी थी.

राजेश सिंह ठाकुर था. उसे यह गवारा न था कि उस की बेटी यादव से ब्याही जाए, अत: उस ने सानिया की जम कर पिटाई की और घर से बाहर निकलने पर सख्त पहरा लगा दिया. नीलम हर रोज डांटडपट कर तथा प्यार से बेटी को समझाती लेकिन सानिया, अजय का साथ छोड़ने को राजी नहीं थी. 21 फरवरी को अजय की चचेरी बहन की सगाई थी. वह 15 दिन की छुट्टी ले कर अपने गांव बभनौली आ गया. सिपाही अजय के आने की जानकारी राजेश सिंह को हुई तो उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम के साथ गहन विचारविमर्श किया.

जिस में तय हुआ कि पहले अजय व सानिया को समझाया जाए, न मानने पर दोनों को मौत के घाट उतार दिया जाए. अवैध असलहा घर में पहले से मौजूद था. योजना के तहत 22 फरवरी की रात 3 बजे राजेश सिंह व नीलम सिंह ने सानिया को धमका कर सिपाही अजय यादव के मोेबाइल फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भिजवाया, जिस में लिखा, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

अजय ने मैसेज पढ़ा, तो उसे लगा कि सानिया मुसीबत में है. अत: वह अपनी मोटरसाइकिल से सानिया के गांव इचबल की ओर निकल पड़ा. इधर मैसेज भिजवाने के बाद राजेश सिंह, नीलम सिंह, दीपक सिंह, अवधराज सिंह व अंकित सिंह ने सानिया उर्फ सोनाली को अजय का साथ छोड़ने के लिए हर तरह से समझाया. लेकिन जब वह नहीं मानी तो राजेश सिंह ने उसे गोली मार दी. फिर लाश को घर में छिपा दिया.

कुछ देर बाद अजय आया, तो उसे भी समझाया गया. लेकिन वह ऊंचे स्वर में बात करने लगा. इस पर वे सब अजय को बात करने के बहाने गांव के बाहर अंबिका स्कूल के पास ले गए. वहां अजय सानिया को अपनी पत्नी बताने लगा तो उन सब ने उसे दबोच लिया और पिस्टल से उस के सिर में गोली मार दी और मरा समझ कर रामपुर गांव के पास सड़क किनारे खेत में फेंक दिया. एक पिस्टल उस के हाथ में पकड़ा दी तथा दूसरी उस के पैर के पास डाल दी. सानिया का मोबाइल फोन भी अजय की पाकेट में डाल दिया. इस के बाद वे सब वापस घर आए और सानिया का शव घर के पीछे गेहूं के खेत में फेंक दिया. अजय की चप्पलें भी शव के पास छोड़ दीं.

सुबह राजेश व नीलम ने पड़ोसियों को बताया कि उन की बेटी सानिया बिना कुछ बताए घर से गायब है. फिर सैदपुर कस्बा जा कर कैफे से औनलाइन एफआईआर दर्ज करा दी. उधर रामपुर गांव के कुछ लोगों ने युवक को मरणासन्न हालत में देखा तो पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने काररवाई शुरू की तो डबल मर्डर की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

24 फरवरी, 2021 को थाना खानपुर पुलिस ने अभियुक्त राजेश सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह, अवधराज सिंह तथा नीलम सिंह को गाजीपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: जिद्दी बीवी – पत्नी का कातिल पति

चेतन घोरपड़े और अर्चना घोरपड़े कोई नवदंपति नहीं थे. कई साल हो गए थे दोनों की शादी को. पतिपत्नी पिछले 3 सलों से कोल्हापुर जिले के तालुका शिरोल बाईपास स्थित जयसिंह सोसायटी में रह रहे थे. दोनों ही एमआईडीसी परिसर की एक गारमेंट कंपनी में काम करते थे.

कंपनी 2 शिफ्टों में चलती थी इसलिए उन दोनों का काम अलगअलग शिफ्टों में था. अर्चना सुबह 8 बजे काम पर जाती और शाम 5 बजे तक घर आ जाती थी. लेकिन चेतन का काम ऐसा नहीं था. उस को कभीकभी दोनों शिफ्टों में काम करना पड़ता था. दोनों खुश थे. उन की लवमैरिज की जिंदगी सुकून से गुजर रही थी. मगर इसी बीच कुछ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था. दरअसल, 20 फरवरी, 2021 को अचानक 2 बजे के करीब एक ऐसी लोमहर्षक घटना घटी कि जिस ने भी देखा, उस का कलेजा मुंह को आ गया. कामकाज का दिन होने की वजह से सोसायटी के सभी पुरुष और महिलाएं अपनेअपने कामों के कारण घरों से बाहर थे.

सोसायटी में सिर्फ बच्चे, कुछ बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष ही थे. दोपहर का खाना खा कर सभी अपनेअपने घरों में आराम कर रहे थे कि तभी चीखनेचिल्लाने और बचाओ… बचाओ की आवाजें आने लगीं. आवाजें पड़ोस के रहने वाले चेतन घोरपड़े के घर से आ रही थीं. लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि पतिपत्नी दोनों अकसर अपने काम पर रहते थे. अर्चना घोरपड़े के चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर लोग अपनेअपने घरों से बाहर आए तो उन्होंने देखा कि दरवाजा अंदर से बंद था. लोगों ने दरवाजा थपथपाया, आवाजें दीं. लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.

इस से लोगों ने समझा कि हो सकता है पतिपत्नी का कोई मामला हो, जिसे ले कर दोनों के बीच झगड़ा हो गया हो. वैसे भी पतिपत्नी के झगड़े आम बात होते हैं. बहरहाल, उन्होंने पतिपत्नी का आपसी मामला समझ कर खामोश ही रहना उचित समझा. तभी बाहर शांति देख कर चेतन घोरपड़े ने धीरे से दरवाजा खोला. उस के कपड़ों पर खून लगा था. इस के पहले कि पड़ोसी कुछ समझ पाते, चेतन दरवाजे की कुंडी लगा कर तेजी से सोसायटी के बाहर निकल  गया और वहां से सीधे शिरोल पुलिस थाने पहुंचा.

थाने की ड्यूटी पर तैनात एपीआई शिवानंद कुमार और उन के सहायकों ने थाने में चेतन घोरपड़े को देखा तो वह स्तब्ध रह गए. उस का हुलिया और उस के कपड़ों पर पड़े खून के छींटे किसी बड़ी वारदात की तरफ इशारा कर रहे थे. एपीआई शिवानंद कुमार उस से कुछ पूछते, उस के पहले ही उस ने उन्हें जो कुछ बताया, उसे सुन कर उन के होश उड़ गए.

मामला काफी गंभीर था. एपीआई शिवानंद कुमार और उन के सहायकों ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. साथ ही साथ उन्होंने इस की जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों के साथ पुलिस कंट्रोल रूम जयसिंहपुर को भी दे दिया.

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शिवानंद पुलिस टीम ले कर घटनास्थल की ओर निकल ही रहे थे कि अचानक चेतन घोरपड़े की तबीयत बिगड़ने लगी. उस की बिगड़ती तबीयत को देख कर एपीआई शिवानंद कुमार ने अपने सहायकों के साथ उसे तुरंत स्थानीय अस्पताल भेज दिया और खुद हैडकांस्टेबल डी.डी. पाटिल और सागर पाटिल को ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

जिस घर में घटना घटी थी, वहां पर काफी भीड़ एकत्र थी, जिसे हटाने में पुलिस टीम को काफी मशक्कत करनी पड़ी. भीड़ को हटा कर इंसपेक्टर शिवानंद कुमार जब घर के अंदर गए तो वहां का दृश्य काफी मार्मिक और डरावना था. फर्श पर एक लहूलुहान युवती का शव पड़ा था. उस के पास ही 2 महिलाएं बैठी छाती पीटपीट कर रो रही थीं. पूछताछ में मालूम हुआ कि वे दोनों महिलाएं मृतका की मां और सास थीं, जिन का नाम वसंती पुजारी और आशा घोरपड़े था. पुलिस टीम ने दोनों महिलाओं को सांत्वना दे कर घर से बाहर निकला और अपनी काररवाई शुरू कर दी.

अभी पुलिस घटना के विषय में पूछताछ कर ही रही थी कि वारदात की जानकारी पा कर कोल्हापुर के एसपी शैलेश वलकवड़े मौकाएवारदात पर आ गए. उन के साथ 2 फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के लोग भी थे. घर के अंदर का मंजर दिल दहला देने वाला था. पूरे फर्श पर खून ही खून फैला हुआ था. बैडरूम में युवती का शव पड़ा था, जिस की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस की कलाई और गालों पर किसी तेज धारदार वाले हथियार से वार किए गए थे.

गले में मोबाइल चार्जर का वायर लिपटा था, जिसे देख कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस का गला घोंटने में इसी वायर का इस्तेमाल किया गया था. फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो का काम खत्म होने के बाद एसपी शैलेश वलकवड़े ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल की बारीकी से जांच की. इस के बाद उन्होंने जांचपड़ताल की सारी जिम्मेदारी एपीआई शिवानंद कुमार को सौंपते हुए उन्हें जरूरी निर्देश दिए.

एपीआई शिवानंद कुमार ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल पर पड़े ब्लेड और मोबाइल चार्जर के वायर को अपने कब्जे में ले लिया और मृतका अर्चना घोरपड़े के शव को पोस्टमार्टम के लिए जयसिंहपुर के जिला अस्पताल भेज दिया. वहां की सारी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के शिवानंद पुलिस थाने आ गए. साथ ही घटनास्थल पर आई मृतका की मां बसंती पुजारी को भी पुलिस थाने ले आए और उन की शिकायत पर अर्चना घोरपड़े के पति चेतन घोरपड़े के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया.

आगे की जांच के लिए उन्हें चेतन घोरपड़े के बयान का इंतजार था जो अभी अस्पताल में डाक्टरों की निगरानी में था. पत्नी की हत्या के बाद अपराधबोध के कारण उस ने आत्महत्या के लिए घर में रखा कीटनाशक फिनायल पी लिया था और फिर पुलिस थाने आ गया था. डाक्टरों के अथक प्रयासों के बाद चेतन घोरपड़े को जब होश आया तो उस से पूछताछ की गई. उस ने जो कुछ बताया, उस से घटना का विवरण सामने आया.

25 वर्षीय अर्चना पुजारी जितनी सुंदर और स्वस्थ थी, उतनी ही खुले मन और आधुनिक विचारों वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें करती और उस के साथ घुलमिल जाती थी, लेकिन अपनी हद में रह कर. उस की मीठी और सीधीसरल बातें हर किसी के मन को मोह लेती थीं. यही वजह थी जो उस की मौत का कारण बनी. उस के पिता रामा पुजारी की मृत्यु हो गई थी. घर की सारी जिम्मेदारी मां बसंती पुजारी के कंधों पर थी. घर की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी, इसलिए उस की शिक्षादीक्षा ठीक से नहीं हो पाई थी.

30 वर्षीय चेतन मनोहर घोरपड़े ने सजीसंवरी अर्चना पुजारी को अपने एक दोस्त की पार्टी में देखा था और उस का दीवाना हो गया था. जब तक वह उस पार्टी में रही, तब तक चेतन की आंखें उसी पर टिकी रहीं.

देर रात पार्टी खत्म होने के बाद चेतन घोरपड़े ने जब घर के लिए आटो लिया तब अपने दोस्त के कहने पर अर्चना पुजारी को उस के घर तक छोड़ते हुए गया. उस रात आटो के सफर में दोनों ने एकदूसरे को जानासमझा. दोनों ने बेझिझक एकदूसरे से बातें कीं. घर पहुंचने के बाद अर्चना पुजारी ने चेतन का शुक्रिया अदा किया और अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया और उस का भी ले लिया.

घर पहुंचने के बाद दोनों की एक जैसी ही स्थिति थी. रात भर दोनों सोच के दायरे में एकदूसरे के व्यक्तित्व को अपनेअपने हिसाब से टटोलते, तौलते रहे. दोनों की ही आंखों से नींद कोसों दूर थी. सारी रात उन की आंखों के सामने एकदूसरे का चेहरा नाचता रहा, जिस का नतीजा यह हुआ कि वे दोनों जल्दी ही एकदूसरे के करीब आ गए. फोन पर लंबीलंबी बातों के बाद मुलाकातों से शुरू हुई दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई और कुछ महीनों बाद दोनों ने शादी का निर्णय ले लिया.

उन के इस निर्णय से अर्चना पुजारी की मां को तो कोई ऐतराज नहीं था लेकिन चेतन की मां को इस शादी से आपत्ति थी. वह गैरजाति की लड़की को अपनी बहू बनाने के पक्ष में नहीं थी, लेकिन चेतन घोरपड़े की पसंद के कारण मां की एक नहीं चली. 2013 के शुरुआती महीने में अर्चना बहू बन कर चेतन के घर आ गई. चेतन ने अपने कुछ रिश्तेदारों की उपस्थिति में अर्चना से लवमैरिज कर ली.

लवमैरिज के बाद दोनों का सांसारिक जीवन हंसीखुशी से शुरू तो जरूर हुआ लेकिन कुछ ही दिनों के लिए. शादी के बाद से ही अर्चना और चेतन की मां की किचकिच शुरू हो गई थी. चेतन अकसर दोनों को समझाबुझा कर शांत कर देता था. लेकिन कब तक, आखिरकार उन के झगड़ों से परेशान हो कर चेतन घोरपड़े अपनी मां का घर छोड़ कर अर्चना के साथ जयसिंहपुर में किराए के घर में आ कर रहने लगा.

किराए के घर में आने के बाद अर्चना भी उसी कंपनी में सर्विस करने लगी, जिस में चेतन काम करता था. इस घर में आने के कुछ दिन बाद ही अर्चना का रहनसहन बदल गया था. हाथों में महंगा मोबाइल फोन, महंगे कपड़े उस के शौक बन गए. घूमनाफिरना, शौपिंग करना, ज्यादा समय फोन पर बातें करना उस की हौबी बन गई थी. चेतन जब भी उसे समझाने की कोशिश करता तो वह उस से उलझ जाती और उस की बातों पर ध्यान नहीं देती थी.

अर्चना की आए दिन की इन हरकतों से परेशान हो कर चेतन को लगने लगा था जैसे वह अर्चना से शादी कर के फंस गया है. अर्चना जैसी दिखती थी, वैसी थी नहीं. यह सोचसोच कर उस का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा था, जिसे शांत करने के लिए वह दोस्तों के साथ शराब पीने लगा था. इस से उस के घर का माहौल और खराब होने लगा था. अर्चना का खुले विचारों का होना और कंपनी के लोगों से हिलमिल जाना आग में घी का काम कर रहा था, जो अर्चना के चरित्र को कठघरे में खड़ा करता था.

इसी सब को ले कर चेतन घोरपड़े शराब के नशे में अर्चना के साथ अकसर झगड़ा और मारपीट करने लगा था. इस से परेशान हो कर अर्चना अपने मायके शिरोल चली जाती थी और वहीं से काम पर कंपनी आती थी. यह दूरियां तब और बढ़ गईं जब अर्चना अपनी शादी की सालगिरह के एक हफ्ते पहले चेतन से लड़ कर अपनी मां के पास चली गई और फिर वापस नहीं आई. इस बार चेतन घोरपड़े ने अर्चना से माफी मांग कर उसे घर लौट आने के लिए कहा लेकिन अर्चना ने उसे इग्नोर कर दिया.

वह अपने मायके शिरोल से लंबी दूरी तय कर के कंपनी आती थी लेकिन चेतन घोरपड़े की लाख मिन्नतों के बाद भी उस के पास नहीं आई और न ही शादी की सालगिरह की बधाई का फोन ही उठाया. लाचार हो कर चेतन घोरपड़े ने अर्चना को शादी की सालगिरह का मैसेज भेज कर शुभकामनाएं दीं. लेकिन उस का भी कोई जवाब नहीं आया तो मजबूरन शादी की सालगिरह के 2 दिन बाद वह अर्चना के मायके गया. जहां उस का स्वागत अर्चना की मां बसंती पुजारी ने किया और चेतन को काफी खरीखोटी सुनाई. साथ ही उसे पुलिस थाने तक ले जाने की धमकी भी दी.

फिर भी चेतन घोरपड़े ने अर्चना से अपनी गलतियों की माफी मांगते हुए उसे अपने घर चलने के लिए कहा. मगर अर्चना पर उस की माफी का कोई असर नहीं पड़ा. नाराज हो कर चेतन अपने घर लौट आया. जब इस बात की जानकारी उस के दोस्तों को हुई तो उन्होंने उस के जले पर नमक छिड़क दिया, जिस ने आग में घी का काम किया था. उन्होंने बताया कि अर्चना का किसी कार वाले से अफेयर चल रहा है जो उसे अपनी कार से कंपनी लाता और ले कर जाता है. इस से चेतन के मन में अर्चना के प्रति उपजे संदेह को और हवा मिल गई.

वह जितना अर्चना के बारे में गहराई से सोचता, उतना ही परेशान हो जाता. इस का नतीजा यह हुआ कि उस के मन में अर्चना के प्रति घोर नफरत भर गई. उसके प्यार का दर्द छलक गया और उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया. अपने निर्णय के अनुसार, घटना वाले दिन चेतन कंपनी में गया और अर्चना को कंपनी के बाहर बुला कर कुछ जरूरी काम के लिए घर चलने के लिए कहा. कंपनी में तमाशा न बने, इसलिए अर्चना बिना कुछ बोले उस के साथ घर आ गई.

घर आने के बाद दोनों के बीच जोरदार झगड़ा हुआ तो पहले से ही तैयार चेतन ने अपनी जेब से ब्लेड निकाल कर अर्चना के हाथों की कलाई काट दी. जब अर्चना चिल्लाई तो उस के गालों पर भी ब्लेड मार कर पास पड़े मोबाइल चार्जर से उस का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. अर्चना घोरपड़े की जीवनलीला खत्म करने के बाद अब उस के जीने का कोई मकसद नहीं बचा था. उस ने अपने जीवन को भी खत्म करने का फैसला कर अपनी चाची को फोन कर सारी कहानी बताई. फिर साफसफाई के लिए घर में रखी फिनायल पी कर पुलिस थाने पहुंच गया.

जांच अधिकारी एपीआई शिवानंद कुमार और उन की टीम ने चेतन मनोहर घोरपड़े से विस्तृत पूछताछ करने के बाद मामले को भादंवि की धारा 302, 34 के तहत दर्ज कर के चेतन को न्यायिक हिरासत में जयसिंहपुर जेल भेज दिया. Hindi Crime Story

Dehradun Crime News: डॉक्टर का काला धंधा

Dehradun Crime News: 14 सितंबर, 2017 को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित पुलिस मुख्यालय में चल रही उस बैठक में कई पुलिस अधिकारी मौजूद थे. इस मीटिंग में 11 सितंबर को फरार हुए देश के सब से बड़े किडनी सौदागर डा. अमित की गिरफ्तारी को ले कर रायमशविरा हो रहा था.

डा. अमित की सैकड़ों करोड़ की संपत्ति थी और वह हाईप्रोफाइल लाइफ जीता था. उसे विश्व की 14 भाषाओं का ज्ञान था, सैकड़ों बार विदेश यात्रा कर चुका था. उस के व्यावसायिक तार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े थे. खाड़ी देशों के अमीर शेखों से ले कर कई देशों के लोग उस के क्लाइंट रह चुके थे. वह अपने देश के गरीबों को रुपयों का लालच दे कर उन की किडनी खरीद कर अमीरों को बेचता था. डा. अमित राउत किडनी सौदागर भी था और किडनी ट्रांसप्लांट करने वाला डाक्टर भी. इस काम में वह लाखों के वारेन्यारे करता था.

विचारविमर्श के बाद मीटिंग खत्म हो गई. डीजीपी अनिल कुमार रतूड़ी के निर्देशन में डीआईजी पुष्पक ज्योति और एसएसपी निवेदिता कुकरेती इस पूरे मामले की मौनिटरिंग कर रही थीं. सभी की नजर डा. अमित राउत पर टिकी थी.

दरअसल, 11 सितंबर, 2017 की सुबह देहरादून की एसएसपी निवेदिता कुकरेती को सूचना मिली थी कि डोईवाला थाना क्षेत्र के लाल तप्पड़ स्थित उत्तराखंड डेंटल कालेज में बने गंगोत्री चैरिटेबल हौस्पिटल में किडनी निकालने और ट्रांसप्लांट करने का अवैध कारोबार किया जा रहा है. यह भी पता चला था कि जो 4 लोग किडनी बेचने के लिए आए थे, वे हरिद्वार के रास्ते दिल्ली जाने वाले हैं.

एसएसपी ने अविलंब एक पुलिस टीम का गठन कर दिया, जिस में थाना डोईवाला के इंसपेक्टर ओमबीर सिंह रावत, हरिद्वार के इंसपेक्टर प्रदीप बिष्ट, एसआई सुरेश बलोनी, दिनेश सती, राकेश पंवार, महिला एसआई मंजुल रावत, आदित्या सैनी, कांस्टेबल गब्बर सिंह, भूपेंद्र सिंह, विनोद, नीरज और राजीव को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने सप्तऋषि चौकी के पास चैकिंग अभियान शुरू कर दिया. इसी बीच पुलिस ने एक इनोवा कार नंबर यूए 08 टीए 5119 को रोका. कार की चालक सीट पर एक युवक बैठा था, जबकि कार की पिछली सीट पर 2 महिलाएं व 3 पुरुष बैठे थे.

पुलिस को देख कर पीछे बैठे लोगों में से एक व्यक्ति बुरी तरह घबरा गया और उस ने भागने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया.

पुलिस पूछताछ में उन लोगों ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिसकर्मियों के रोंगटे खड़े हो गए. कार चालक का नाम दीपक था, जिसे किराए पर बुलाया गया था. जबकि अन्य लोगों में जावेद खान निवासी एस.बी. रोड सांताकु्रज, मुंबई, भावजी भाई निवासी जिला खेड़ा, गुजरात, शेखताज अली, 42 साल की सुसामा बनर्जी और 32 साल की कृष्णा दास. सुसामा बनर्जी और कृष्णा दास दक्षिण परगना, वेस्ट बंगाल की रहने वाली थीं.

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इन लोगों ने पुलिस को बताया कि अस्पताल का एजेंट जावेद खान उन्हें 3 लाख रुपए में किडनी खरीदने का वादा कर के अस्पताल लाया था. अस्पताल में कृष्णा दास व शेखताज अली की किडनी निकाल ली गई थी.

भावजी भाई और सुसामा बनर्जी को किडनी निकालने के लिए ले जाया गया. उन की किडनी निकालने की तैयारियां शुरू कर दी गई थीं. उसी बीच ठीक होने पर कृष्णा दास व शेखताज ने किडनी के बदले रुपए देने की मांग की तो एजेंट व अस्पताल संचालकों ने टालमटोल शुरू कर दी. यह देख कर भावजी भाई व सुसामा ने किडनी देने से इनकार कर दिया. हंगामा बढ़ता देख अस्पताल वालों ने उन्हें एजेंट के साथ वापस भेज दिया. पैसों को ले कर हुए इस झगड़े की भनक किसी तरह सनीपुर कोतवाली में तैनात कांस्टेबल पंकज कुमार को लग गई थी.

झगड़ा किस बात को ले कर था, यह राज भी पता चल गया था. इस के बाद उस ने जरूरी जानकारियां जुटा कर एसएसपी निवेदिता कुकरेती को इस की सूचना दे दी थी. पुलिस ने कार की तलाशी ली तो उस में से ओमान सहित कुछ देशों के एयर टिकट मिले, जिस से पता चलता था कि गिरोह के तार विदेशों तक जुड़े हैं. पुलिस ने जावेद खान से पूछताछ की तो उस ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि वह हौस्पिटल के संचालक डा. अमित के लिए काम करता था. वह देश के अलगअलग हिस्सों से गरीब लोगों को रुपयों का लालच दे कर देहरादून लाता था. किडनी देने वालों को 3 लाख रुपए मिलते थे, जबकि उसे कमीशन मिलता था.

जावेद ने यह भी बताया कि हौस्पिटल के संचालक किडनी की खरीदफरोख्त करने के साथसाथ किडनी ट्रांसप्लांट भी करते थे. इस काम में उन्हें मोटी कमाई होती थी. यह खबर डीजीपी अनिल रतूड़ी, एडीजे (कानून व्यवस्था) राम सिंह मीना, डीआईजी पुष्पक ज्योति को मिली तो उन्होंने एसएसपी को इस मामले में तत्काल सख्त काररवाई करने के निर्देश दिए. एसएसपी के निर्देशन में एसपी देहात सरिता डोभाल, एएसपी लोकेश्वर सिंह, मंजूनाथ टीसी सहित कई थानों की पुलिस टीम ने हौस्पिटल में रेड की, लेकिन तब तक अस्पताल का ज्यादातर स्टाफ और डा. अमित फरार हो चुका था.

स्वास्थ्य विभाग व एफएसएल की टीमों को भी मौके पर बुलवा लिया गया था. जांच के दौरान कई ऐसी दवाइयां मिलीं, जो किडनी ट्रांसप्लांट में काम आती थीं. औपरेशन थिएटर में भी ऐसे इंस्ट्रूमेंट मौजूद थे. पुलिस ने जरूरी रिकौर्ड व सबूतों को कब्जे में ले कर अस्पताल को सील कर दिया.

केस दर्ज कर के कार्रवाई

पुलिस ने इस संबंध में थाना डोईवाला में जावेद के अलावा डा. अमित कुमार, डा. अक्षय उर्फ राउत, डा. संजय दास, सुषमा कुमारी, राजीव चौधरी, चंदना गुडि़या के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 120बी, 370, 342 और मानव अंगों के प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 की धारा 18, 19, 20के  अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया.

डा. अमित के अलावा अन्य लोग उस की टीम का हिस्सा थे. पुलिस ने भावजी भाई, शेखताज अली, सुसामा बनर्जी और कृष्णा दास को मैडिकल परीक्षण हेतु अस्पताल में भर्ती करा दिया. बाद में उन्हें कोर्ट में पेश कर के धारा 164 के तहत उन के बयान दर्ज कराए गए. पुलिस ने जरूरी पूछताछ के बाद जावेद को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. पुलिस जांच के साथ ही डा. अमित और उस के साथियों की तलाश में जुट गई. विवेचना के दौरान पुलिस ने अमित के साथियों अनुपमा, नसीम, प्रदीप उर्फ बिल्लू, सरला व अभिषेक को भी आरोपी बनाया.

किडनी के अवैध कारोबार के अब तक के सब से बड़े खुलासे ने पुलिस से ले कर सुरक्षा एजेंसियों तक को सकते में डाल दिया था. जो गंभीर बातें सामने आईं, उन के अनुसार, पिछले कुछ समय में खाड़ी देशों के शेखों के अलावा यूरोप व एशियाई देशों के विदेशी डा. अमित के यहां किडनी ट्रांसप्लांट करा कर जा चुके थे. ऐसे लोग टूरिस्ट वीजा ले कर उत्तराखंड घूमने के बहाने आते थे, लेकिन उन का वास्तविक मकसद किडनी ट्रांसप्लांट कराना होता था.

5 टीमें लगाई गईं

मामला गंभीर था, लिहाजा प्रदेश सरकार के प्रवक्ता कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने भी इस मामले में विस्तृत जांच करने के आदेश दे दिए. डा. अमित व उस के साथियों की गिरफ्तारी के लिए 5 पुलिस टीमों का गठन किया गया. 48 घंटे बीत चुके थे, लेकिन डाक्टर का कुछ पता नहीं चल रहा था. आरोपी विदेश भाग सकता था, इसलिए लुकआउट नोटिस जारी कर के हवाई अड्डों को भी सूचना दे दी गई थी. इसी बीच 13 सितंबर को पुलिस को सूचना मिली कि आरोपी डाक्टर डोईवाला इलाके के ही नेचर विला रिसौर्ट में रुका हो सकता है. पुलिस टीम सर्च वारंट ले कर वहां पहुंची. वहां की तलाशी ले कर पुलिस ने एंट्री रजिस्टर को अपने कब्जे में ले लिया. लेकिन आरोपी वहां नहीं मिला.

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पुलिस ने कमरा नंबर 103 की खासतौर पर तलाशी ली और जरूरी चीजों की जांच पड़ताल की. पुलिस डा. अमित व उस के साथियों की सरगर्मी से तलाश में जुटी थी. उस के करीबियों को उठा कर पूछताछ की जा रही थी. डा. अमित सहित सभी फरार आरोपियों के मोबाइल भी स्विच्ड औफ  आ रहे थे. पुलिस उन की काल डिटेल्स हासिल कर चुकी थी, लेकिन उस से भी कोई मदद नहीं मिल रही थी.

इस बीच पुलिस ने डा. अमित से जुडे़ 9 बैंक खातों को सीज करा दिया. डा. अमित की फरारी पुलिस के लिए चुनौती बन गई थी. पुलिस टीमों के काम की मौनिटरिंग आला अधिकारी खुद कर रहे थे. 14 सितंबर को एएसपी लोकेश्वर सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम डा. अमित के करीबियों की मोबाइल सर्विलांस व मुखबिरों से मिली सूचना के जरिए दिल्ली होते हुए पहले चंडीगढ़ और फिर पंचकूला पहुंची. दरअसल, डा. अमित के एक मोबाइल नंबर की लास्ट लोकेशन वहीं मिली थी, इसलिए पुलिस ने अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया था.

देहरादून से पंचकूला

इस पुलिस टीम मे एसओजी प्रभारी पी.डी. भट्ट, थानाप्रभारी रानीपोखरी धर्मेंद्र सिंह, एसएसआई मनोज रावत, रायवाला थानाप्रभारी आशीष गोसाई, एसआई ब्रजपाल सिंह, भुवनचंद्र पुजारी, मंजुल रावत, दिनेश सिंह सती, योगेश कुमार व दीपक सिंह पंवार आदि शामिल थे. पुलिस के पास सूचना थी कि डा. अमित व उस के साथी पंचकूला की साहिलपुरी कालोनी के सैक्टर-8 स्थित एक घर में छिपे हैं, लेकिन पुलिस ने वहां दबिश दी तो घर बंद मिला. अगले दिन यानी 15 सितंबर को पुलिस टीम सैक्टर-18 स्थित फाइव स्टार होटल पल्लवी पहुंची. होटल की पार्किंग में एक बीएमडब्ल्यू कार नंबर-डीएल 3 एफटी 5000 व मर्सिडीज कार नंबर यूपी 16 एआर 1100 खडी थीं, जिन्हें देख कर पुलिस को शक हुआ.

पुलिस टीम ने होटल का रजिस्टर देख कर और डा. अमित का फोटो दिखा कर होटल के स्टाफ से पूछमाछ की तो उन्होंने ऐसे व्यक्ति का अपने यहां ठहरना बताया. पुलिस ने एक कमरे मे दस्तक दी तो दरवाजा एक युवती ने खोला. पुलिस को देख कर युवती बुरी तरह घबरा गई. पुलिस उसे किनारे कर के अंदर दाखिल हो गई. डा. अमित कमरे में आराम से बैड पर लेटा विदेशी खजूर खा रहा था. पुलिस को देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

पुलिस ने डा. अमित के साथसाथ युवती व दूसरे कमरे में रुके उन के 2 साथियों को गिरफ्तार कर लिया. डा. अमित कसमसा कर रह गया. पकड़े गए लोगों में नर्स सरला, जीवन और मैनेजमैंट का काम देखने वाला प्रदीप शामिल था. पुलिस ने उन के कब्जे से दोनों कारों के अलावा 5 मोबाइल फोन, जिन में 2 आईफोन थे और 33 लाख 73 हजार रुपए नकद बरामद किए. डा. अमित 2 हजार के नए नोटों की गड्डियां बैग में लिए घूम रहा था. पुलिस टीम सभी को गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई.

डा. अमित सहित अन्य से पुलिस ने गहराई से पूछताछ की. जांच व पूछताछ में डा. अमित के किडनी के गोरखधंधे की ऐसी कहानी निकल कर सामने आई, जिस ने पुलिस के आला अधिकारियों को भी चौंका दिया. कालाधंधा करने वाला यह डाक्टर देश का सब से बड़ा किडनी सौदागर निकला.

64 वर्षीय अमित राउत मूलरूप से महाराष्ट्र का रहने वाला था और पिछले कई सालों से इस काम में लिप्त था. बताते हैं कि एक नेफ्रोलौजिस्ट के अधीन काम कर के उस ने किडनी ट्रांसप्लांट में महारथ हासिल की और फिर राह से भटक कर रैकेट चलाना शुरू कर दिया. सन 1993 में उस पर मुंबई में किडनी ट्रांसप्लांट का पहला केस दर्ज हुआ. उसे जेल जाना पड़ा. तब तक देश में न तो कोई ऐसा कानून था और न ही ऐसी कोई परिभाषा कि मानव अंगों का प्रत्यारोपण किन मामलों में सही है.

सरकार ने इसे गंभीरता से ले कर मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम बना दिया, जिस में स्पष्ट किया गया कि डोनर कौन हो सकता है और ब्लड रिलेशन की परिभाषा क्या है. जेल से जमानत पर आ कर अमित जयपुर गया और फिर से इसी काम में जुट गया.

ठिकाने बदलबदल कर वह अपना काम करता रहा. जिस शहर या राज्य में भी वह पकड़ा जाता, उसे हमेशा के लिए छोड़ देता. न उसे कानून का डर था और न शर्म. उत्तराखंड उसे अपने लिए सुरक्षित ठिकाना लगा. कई साल पहले उस ने अपने एक दोस्त राजीव चौधरी के साथ मिल कर उत्तराखंड के डेंटल कालेज के अंदर 50 लाख रुपए की सालाना लीज पर जगह ले कर गंगोत्री चैरिटेबल हौस्पिटल खोल लिया. चैरिटेबल की आड़ भर थी, वास्तव में अमित का असली धंधा कुछ और था. कई लोगों की अच्छेबुरे कामों को ले कर अपनी धारणा होती है.

किडनी ट्रांसप्लांट को ले कर डा. अमित की धारणा थी कि यह सामाजिक काम है. इस से लोगों की जिंदगी बचती है. कानून से खेलने की उस की जैसे आदत बन चुकी थी. क्योंकि इस में मोटी कमाई थी. वह जरूरतमंद गरीब लोगों की किडनी 2 से 3 लाख रुपए में लेता था, जबकि उसे 40 से 50 लाख रुपए में ट्रांसप्लांट करता था. अपने इस काम का वह इतना एक्सपर्ट हो चुका था कि उस का कभी भी कोई औपरेशन असफल नहीं हुआ.

दूसरे डाक्टरों को इस काम में 6 घंटे लगते थे, जबकि यह काम वह महज 2 से ढाई घंटे में कर देता था. वह देशभर में फैले अपने एजेंटों के जरिए कई बार डोनरों को हवाईजहाज की यात्रा कराता था. गरीब डोनर स्वेच्छा से किडनी देते थे और ट्रांसप्लांट कराने वाले विदेशी होते थे, इसलिए मामला खुलता नहीं था. अमित का पूरा स्टाफ उस के इस धंधे को जानता था. लेकिन वह उन्हें न सिर्फ अच्छा पैसा देता था, बल्कि अपने धंधे को समाज सेवा बताता था. अमित शातिर दिमाग था, वह 5 मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करता था. इन में देशी एजेंटों, विदेशी एजेंटों, डाक्टरों व खरीददारों के लिए अलगअलग नंबर थे.

अरबों की संपत्ति का मालिक

अमित का अंतरराष्ट्रीय मैनेजमेंट नेटवर्क अमेरिका, श्रीलंका, नेपाल, तुर्किस्तान, ओमान, दुबई, इंग्लैंड समेत एक दर्जन से भी ज्यादा देशों में फैला हुआ था. विदेशी एजेंटों से संपर्क के लिए उस ने औनलाइन सिस्टम बनाया हुआ था. वह बड़े रईसों के औपरेशन के लिए विदेश भी जाता था. डा. अमित दिमाग का इतना तेज था कि उस की 14 भाषाओं पर पकड़ थी. इसी धंधे से अमित ने कई सौ करोड़ की संपत्ति जुटा ली थी.

भारत के दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, पंजाब, पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु राज्यों के अलावा कनाडा, आस्ट्रेलिया, ग्रीस, नेपाल व हौंगकौंग में भी उस की संपत्तियां हैं.

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देहरादून में ही उस की 50 बीघा से ज्यादा जमीन है. मनी लौंड्रिंग के केस में प्रवर्तन निदेशालय उस की संपत्तियों को जब्त भी करता रहा है. लेकिन डा. अमित की कमाई ही इतनी थी कि उस पर कोई असर नहीं पड़ा. 11 सितंबर को पैसों को ले कर डोनर से झगड़ा न हुआ होता तो शायद ही उस की पोल खुलती.

पुलिस द्वारा एजेंट के पकड़े जाने की खबर लगते ही वह अपने खास स्टाफ के साथ फरार हो गया था. अमित जानता था कि पुलिस उसे भूखे शेर की तरह ढूंढ रही है. वह छिपताछिपाता पंचकूला के होटल में जा कर रुका. डा. अमित पूरी तरह आश्वस्त था कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी. वहां से उस का इरादा नेपाल भागने का था, लेकिन उस से पहले ही वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

किडनी रैकेट के सरगना डा. अमित की फैमिली लाइफ भी अजीब निकली. उस की पहली शादी सुनीता के साथ हुई थी, जबकि दूसरी बीवी पूनम कनाडा में है. उस ने तीसरी शादी बुलबुल नाम की महिला से करने की बात पुलिस को बताई.

खुद को समाज सेवी समझता था डाक्टर

खास बात यह थी कि वह चौथी शादी करने की भी तैयारी में था, लेकिन किडनी कांड के उछलने के बाद उस की योजना पर पानी फिर गया. डा. अमित की पहली पत्नी का बेटा अक्षय एमबीबीएस और एमडी डिग्री धारक है और अमेरिका में रहता है. अपने काले धंधे को ले कर अमित को कोई अफसोस नहीं है. उस का कहना था कि कानून की नजर में वह भले ही अपराधी हो, लेकिन उस ने सैकड़ों जिंदगियां बचाई हैं. उन सब की दुआएं उस के साथ हैं.

पुलिस ने अमित सहित सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक अमित की जमानत नहीं हो सकी थी. जबकि पुलिस उस के अन्य साथियों को तलाश रही थी.

17 सितंबर को पुलिस ने अमित के दोस्त राजीव चौधरी (जो अस्पताल के संचालन का काम देखता था) की पत्नी अनुपमा, मैडिकल स्टोर संचालक अभिषेक व अमित के एक अन्य साथी जगदीश को भी गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. राजीव के साथ अनुपमा भी हौस्पिटल का काम देखती थी. इतना ही नहीं, सर्जरी के लिए खरीदी जाने वाली दवाओं का भुगतान अनुपमा के खातों से ही होता था. पूछताछ के दौरान इन लोगों ने भी अमित के गोरधखंधे की पोल खोली है. Dehradun Crime News

–  कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: 100 लाशों के साथ सेक्स करने वाला इलेक्ट्रीशियन

Crime Story: इंग्लैड के ईस्ट ससेक्स राज्य में ब्रिटिश पुलिस को 34 सालों से 2 युवतियों के हत्यारे की तलाश थी. इस के लिए पुलिस ने जबरदस्त जाल बिछा रखा था. फिर भी हत्यारे पकड़ से बाहर थे. इस कारण पुलिस ने जासूसों की टीम भी लगाई.

मामला 25 वर्षीया वेंडी नेल और 20 साल की कैरोलिन पियर्स की हत्याओं का था. उन के साथ दुष्कर्म भी हुआ था. दोनों टुगब्रिज वेल्स में रहती थीं और अलगअलग वारदातों में 1987 में दोनों की हत्या कर दी गई थी. उस हत्याकांड को ‘बेडसिट मर्डर्स’ के रूप में जाना गया था. नेल गिल्डफोर्ड रोड स्थित अपने अपार्टमेंट में 23 जून, 1987 को मृत पाई गई थी. पुलिस को इस की सूचना उस के मंगेतर ने दी थी. उस के शरीर पर कई जख्म थे. जबकि पियर्स की लाश उसी साल 5 महीने बाद 24 नवंबर को उन के घर से 40 मील दूर बांध के पानी में तैरती हुई बरामद हुई थी.

उन की मौत के सिलसिले में हुई जांच में हत्या और दुष्कर्म के जो सुराग मिले थे, उस के अनुसार मृतकों के शरीर, अंगवस्त्र, तौलिए, बैडशीट आदि से मिले एक जैसे डीएनए को सबूत का आधार बनाया गया था. उस डीएनए वाले व्यक्ति का पता लगाने के लिए 15 दिसंबर, 1987 को अदालती आदेश के बाद ब्रिटिश पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी थी. फोरैंसिक वैज्ञानिकों द्वारा 1999 में डीएनए जांच के आधुनिक तरीके अपनाए गए थे और इस के लिए एक नैशनल लेवल पर डेटाबेस तैयार किया गया था.

दोनों लड़कियों के सैकड़ों करीबियों से पूछताछ के साथसाथ उन के डीएनए की भी जांच की गई थी. रिश्तेदारों, दोस्तों और फिर उन के करीबियों से जांच के सिलसिले में डेविड फुलर के घर वालों के डीएनए की भी जांच हुई, जिसे हत्या के आरोप में पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका था.

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इस तरह पुलिस को अंतत: 2019 में सफलता मिल गई, लेकिन कोरोना संक्रमण की वजह से उस की गिरफ्तारी 3 दिसंबर, 2020 को हो पाई. 67 वर्षीय डेविड फुलर को ईस्ट ससेक्स के हीथफील्ड स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उस का डीएनएन मृतकों से प्राप्त नमूने से मेल खाता था. इसी के साथ जब उस के घर की गहन तलाशी ली गई, तब यौन अपराध का जो राज खुला, वह जितना चौंकाने वाला था, उतना ही घिनौना भी था.

फुलर के अनगिनत कुकर्मों का खुलासा उस के घर और घर के कार्यालय की तलाशी के बाद हुआ. पुलिस को कंप्यूटर हार्ड ड्राइव, सीडी, डीवीडी और फ्लौपी डिस्क में 14 मिलियन से अधिक अश्लील तसवीरें भरी मिलीं. उन में बच्चों की लाश के साथ अश्लील वीडियो भी थे. सभी अलगअलग फोल्डर में रखे गए थे और उन पर नाम का लेबल भी लगाया गया था. साथ ही एक डायरी में यौन अपराधों का काला चिट्ठा दर्ज था.

उसी आधार पर पुलिस ने पाया कि फुलर अपनी वासना की आग बुझाने के लिए 2 मुर्दाघरों में महिलाओं की लाशों के साथ दुष्कर्म किया करता था. यह कुकर्म वह करीब 100 लाशों के साथ कर चुका था, जिन में 9 साल की बच्ची से ले कर 100 साल की वृद्धा तक की लाशें शामिल थीं. यह सब उस ने तब किया था, जब वह हीथफील्ड अस्पताल में इलैक्ट्रीशियन की नौकरी करता था.

ये सारी बातें फुलर ने मेडस्टोन क्राउन अदालत में दोनों लड़कियों की हत्या को ले कर हुई सुनवाई के दौरान स्वीकार की. उस ने यह भी बताया कि दोनों की बेरहमी से हत्या करने के बाद उस की लाश के साथ दुष्कर्म किया था. तभी नेल के तौलिए, अंडरगारमेंट, और लार में फुलर का डीएनए पाया गया था. फुलर के जुर्म से इंग्लैंड की अदालत भी दंग थी. कोर्ट ने माना कि ब्रिटेन या कहें कि दुनिया के इतिहास में इतना खौफनाक और दर्दनाक वाकया शायद कभी नहीं गुजरा, लिहाजा कोर्ट ने इस मामले को बेहद संजीदगी से लेते हुए उसे अपराधी ठहरा दिया.

न्यायाधीश चीमा ग्रव ने फुलर को उन की हत्याओं के अलावा 51 अलगअलग मामलों के अपराधों का भी दोषी करार दिया, जिस में 44 मामले लाशों से छेड़छाड़ के थे. साथ ही मुर्दाघरों में 78 लाशों की भी पहचान कर ली गई. उसे 2 लड़कियों नेल और पियर्स की हत्या के लिए भी दोषी ठहराया गया. कैरोलीन पियर्स का फुलर ने 24 नवंबर, 1987 को उस के घर के बाहर ग्रोसवेन पार्क से अपहरण कर लिया था. वहीं उस की हत्या कर लाश के साथ दुष्कर्म किया था.

पड़ोसियों ने उस के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुनी थी. एक हफ्ते बाद उस की लाश उन के घर से 40 मील दूर मिली थी, जिस की सूचना पुलिस को एक खेतिहर मजदूर ने दी थी. पुलिस ने अदालत में बताया कि फुलर दोनों लड़कियों को पहले से जानता था. वह उसी फोटो डेवलपमेंट चेन का ग्राहक था, जहां नेल काम करती थी. इस के अलावा फुलर की पियर्स से जानपहचान बस्टर ब्राउन रेस्टोरेंट में हुई थी, जहां वह मैनेजर थी.

इन वारदातों के 24 साल बाद फुलर की सितंबर 2011 में गिरफ्तारी हुई थी. तब वह सबूत नहीं मिलने के कारण छूट गया था. उस ने अदालत में बताया कि वह 1989 से 12 साल तक हीथफील्ड अस्पताल के 2 मुर्दाघरों में बिजली संबंधी समस्याओं की देखभाल के लिए अकसर आताजाता था. वह वहां के रखरखाव का सुपरवाइजर था. मुर्दाघर के फ्रीजर के देखभाल की जिम्मेदारी उसी पर थी. इस के लिए उसे वहां प्रवेश के

लिए निजी एक्सेस स्वाइप कार्ड मिला हुआ था. मुर्दाघर में कुल 5 कर्मचारी काम करते थे, जिन की ड्यूटी सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक की होती थी. फुलर की ड्यूटी दिन के 11 बजे से शाम के 7 बजे तक की थी. इस कारण दूसरे कर्मचारियों के चले जाने के बाद भी वह मुर्दाघर में रुका रहता था. अपनी शिफ्ट के अखिरी 3 घंटों में ही उस ने यह घिनौने काम किए थे. वैसे अस्पताल के कुली किसी भी समय नए शवों के साथ मुर्दाघर में आ सकते थे. यह फुलर के लिए पोस्टमार्टम कक्ष में प्रवेश करने का अच्छा मौका होता था. फुलर पोस्टमार्टम कक्ष में चला जाता था. ऐसा करते हुए किसी का ध्यान उस पर नहीं जाता था.

मुर्दाघर के अन्य हिस्सों की तुलना में शवों की गरिमा को ध्यान में रखते हुए पोस्टमार्टम कक्ष में कोई सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाए गए थे. हालांकि  मुर्दाघर की ओर जाने वाले गलियारों सहित अन्य क्षेत्रों पर निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगे थे. इस नतीजे तक पहुंचने में इंग्लैंड पुलिस को 2.5 मिलियन यूरो यानी 21.42 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े थे. फुलर के अपराध मुर्दाघर की लाशों के साथ यौनाचार तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इसे यादगार बनाए रखने के लिए  उस ने एक डायरी भी बना रखी थी.

वह लाशों के साथ यौन संबंध बनाने के बाद बाकायदा उस घटना को अपने अनुभवों के साथ डायरी में नोट करता था. यही नहीं, उस ने सैक्स की फ्यूचर प्लानिंग तक कर रखी थी. Crime Story

UP Crime News: झाड़ फूंक के जरिए 7 करोड़ के लालच में फंसी युवती

UP Crime News: एक ऐसा खौफनाक मामला सामने आया है, जिस ने सभी को सकते में डाल दिया. एक युवती झाड़फूंक के बहाने 7 करोड़ रुपए के लालच ऐसी फंस गई कि उसे अपनी इज्जत भी गंवानी पड़ी. सवाल यह है कि आखिर उसे कैसे फंसाया गया और इस दौरान उस के साथ किस तरह के अपराध किए गए. चलिए जानते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से

यह खौफनाक मामला उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले से सामने आया है, जिस ने सभी को सकते में डाल दिया. आरोप है कि एक युवती झाड़फूंक के बहाने 7 करोड़ रुपए के लालच में फंस गई और उस की इज्जत पर ठेस पहुंची. नासिर अली ने उसे भरोसे में लेने के लिए नकली नोट दिखाते हुए वह असली बताए और दावा किया कि पूजापाठ के बाद रकम दोगुनी हो जाएगी. इसके लिए उस ने पांच हजार रुपये भी लिए.

इस के बाद उस ने युवती को नशीला पदार्थ पिला कर उस के साथ दुष्कर्म किया और इस का वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने लगा. दिसंबर 2024 से जून 2025 तक यह अत्याचार चलता रहा. पीड़िता ने स्वार थाने में शिकायत दर्ज कराई और पुलिस ने जांच शुरू की.

जांच में सामने आया कि नासिर के परिवार में बेटी, बेटा और दामाद भी इस में शामिल थे और उन्होंने युवती से नकदी भी लूट ली. पुलिस ने दुष्कर्म, लूट और धोखाधड़ी जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर नासिर अली को गिरफ्तार किया. यह घटना रिश्तों में अविश्वास और लालच के खतरनाक परिणाम की कड़वी सीख देती है. UP Crime News

Gurugram Crime: इश्क जान भी लेता है

Gurugram Crime: अभिषेक उर्फ नीतू पैसे वाले बाप का बेटा था, इसलिए वह दिन भर दोस्तों के साथ कार से आवारागर्दी करने के साथ अय्याशी भी करता था. अय्याशी करने में ही उस ने ऐसा क्या कर डाला कि आज वही नहीं, उस के सारे दोस्त जेल में हैं. ना हर सिंह गुड़गांव के थाना सदर के अंतर्गत आने वाले गांव इसलापुर के रहने वाले थे. गुड़गांव, सोनीपत और हिसार में उन की हार्डवेयर की 3 दुकानें थीं. गांव में भी उन की कई  एकड़ खेती की जमीन थी. इस के अलावा गुड़गांव में उन के 2 आलीशान मकान थे. उन की 3 बहनें थीं, जिन की शादियां हो चुकी थीं.

छोटी बहन विमला की शादी दौलताबाद के रहने वाले देवेंद्र कुमार के साथ हुई थी. देवेंद्र भारतीय सेना में सूबेदार थे. उन की पोस्टिंग सिक्किम में थी. विमला घर पर ही रह कर बच्चों आदि को देखती थी. उन के 2 बेटे थे, सचिन और मोहित. दोनों ही जवान थे. बच्चों की देखरेख के लिए नाहर सिंह भी विमला के यहां ही रहते थे. देवेंद्र को फौज से जब भी छुट्टी मिलती थी, वह अपनी बीवीबच्चों के पास आ जाया करते थे.

25 अगस्त, 2015 की शाम लगभग 5 बजे नाहर सिंह छोटे भांजे मोहित और उस के दोस्त सक्षम के साथ गुड़गांव के सैक्टर-23 स्थित एक कैफे में बैठे कौफी पी रहे थे, तभी वहां अभिषेक उर्फ नीतू अपने दोस्तों मन्ना, दीपांकर और नितेश के साथ आया. आते ही नीतू ने मोहित की मेज पर रखे कौफी के प्याले को उठा कर फेंक दिया. नीतू की इस हरकत से मोहित और सक्षम को गुस्सा आ गया. पास बैठे नाहर सिंह समझ नहीं पाए कि नीतू ने ऐसा क्यों किया. इस से पहले कि नाहर सिंह कुछ कहते, सक्षम ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘लगता है, उस दिन की मार के तेरे निशान ठीक हो गए हैं, जो…’’

उस की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि नीतू के दोस्त नितेश ने सक्षम के गाल पर जोरदार थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘अपनी जुबान बंद रख, वरना अभी काट कर फेंक दूंगा.’’

दोस्त की बेइज्जती मोहित बरदाश्त नहीं कर सका और नितेश से भिड़ गया, ‘‘तू ने इस पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे की?’’

‘‘ओए चल दूर हट यहां से. अब बहुत भौंक चुका तू.’’ नीतू ने अंटी से रिवौल्वर निकाल कर मोहित पर तानते हुए कहा, ‘‘मैं अपना अपमान कभी नहीं भूलता. अपमान का बदला जब तक ले न लूं, चैन की नींद सोना हराम समझता हूं. तेरी कोई आखिरी ख्वाहिश हो तो अपने मामू को बता दे.’’

इसी के साथ नीतू के दोस्तों ने नाहर सिंह को हथियारों के बल पर काबू कर लिया था. नीतू की धमकी पर मोहित आगबबूला हो कर नीतू को पीटने के लिए आगे बढ़ा ही था कि अभिषेक ने उस पर एक के बाद एक कई फायर झोंक दिए. गोलियां मोहित के सीने, पेट व आंख के पास लगीं. मोहित लहूलुहान हो कर नीचे गिर कर कराहने लगा. उस समय कैफे में और भी लोग थे. गोलियों की आवाज सुन कर सभी चौंके. लेकिन हथियारों को देख कर किसी की कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई. वे सुरक्षित स्थान तलाशने लगे. अपने सामने भांजे के साथ हुई इस वारदात पर नाहर सिंह भी कुछ नहीं कर सके. मोहित की हत्या कर हमलावर कार से फरार हो गए.

नाहर सिंह ने तुरंत पुलिस को फोन कर के इस घटना की सूचना दी. गोली मारने की खबर पाते ही थाना पालम विहार के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह राणा पुलिस टीम के साथ थोड़ी ही देर में सैक्टर-23 के उस कैफे में पहुंच गए. मोहित की कुछ देर बाद ही मौत हो चुकी थी. पुलिस ने अपने आला अधिकारियों को भी इस हत्या की सूचना दे दी थी. थानाप्रभारी ने नाहर सिंह से बात की तो उन्होंने पूरा वाकया बता दिया. इस के अलावा थानाप्रभारी ने कैफे के मैनेजर, वेटरों और वहां मौजूद ग्राहकों से भी पूछताछ की. इस के बाद घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. नाहर सिंह की तहरीर पर पुलिस ने नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली.

मामला एकदम स्पष्ट था. कैफे में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में भी साफ नजर आ रहा था कि मोहित पर गोलियां अभिषेक उर्फ नीतू ने चलाई थीं. इसलिए पुलिस को सिर्फ हत्याभियुक्तों को गिरफ्तार करना था. उन की गिरफ्तारी के लिए पुलिस कमिश्नर नवदीप सिंह विर्क ने एसीपी (क्राइम) राजेश कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह राणा, एसआई सुखजीत सिंह, एएसआई सुरेश कुमार, सुनीता कुमार, हैडकांस्टेबल संदीप, धीरज सर्वसुख के अलावा कांस्टेबल धर्मेंद्र, नीति आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन 28 अगस्त को पुलिस ने नामजद अभियुक्तों के घरों पर दबिश दी तो वे सभी अपनेअपने घरों से फरार मिले. फिर उसी दिन शाम के समय एक मुखबिर की सूचना पर गुड़गांव के हिमगिरी चौक से अभिषेक उर्फ नीतू, ब्रजेश उर्फ नोनी, दीपांकर, बौबी तथा आदित्य को गिरफ्तार कर लिया गया. थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने मोहित की हत्या की वजह तो बता ही दी, साथ ही एक ऐसे हत्याकांड से भी परदाफाश किया, जिस की फाइल पुलिस बंद कर चुकी थी.

21 वर्षीय अभिषेक उर्फ नीतू एक अमीर बाप की बिगड़ी औलाद था. उस के पिता भानमल गुड़गांव के धनवापुर गांव में अपने परिवार के साथ रहते थे. करीब 4 साल पहले एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने उन की 5 एकड़ जमीन 22 करोड़ में खरीदी थी. जमीन बेचने के बाद उन्होंने आलीशान मकान बनवाया, नौकर रखे और 2 कारें खरीदीं. तब से यह परिवार ठाठबाट से रह रहा था. अचानक पैसा आता है तो अपने साथ कई बुराइयां भी लाता है. ऐसा ही इस परिवार में भी हुआ. अभिषेक उर्फ नीतू भानमल का एकलौता बेटा था, इसलिए वह उस की हर फरमाइश पूरी करते थे.

अभिषेक अपने यारदोस्तों के साथ कार ले कर दिन भर इधरउधर घूमता और अय्याशी करता. वह अपने पिता से जितने पैसे मांगता, वह उसे मिल जाते थे. जिन्हें वह खुले हाथों से खर्च करता था. इसलिए उस के दोस्त भी उस से खुश रहते थे. उस के खास दोस्तों में 20 वर्षीय ब्रजेश उर्फ नोनी, 19 वर्षीय दीपांकर, 20 वर्षीय बौबी, 18 वर्षीय आदित्य थे. ये सभी उस के घर के आसपास ही रहते थे. ये सभी कार से जब भी घूमने निकलते, इतना ऊधम मचाते थे कि राहगीर भी परेशान हो जाते थे. कोई इन का विरोध करता तो ये उस की पिटाई कर देते. एक तरह से इलाके में इन का आतंक छा चुका था.

पिता ने भी कभी नीतू पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की, जिस से वह और ज्यादा उद्दंड होता चला गया. बातबात पर सीधेसादे लोगों को पीटना, राह चलती लड़कियों को छेड़ना, शराब पी कर हुड़दंग मचाना, हवाई फायर कर के दहशत फैलाना आदि नीतू का जैसे शगल बन गया था. नाहर सिंह ने शादी नहीं की थी. वह अपनी बहनों और भांजों को बेहद चाहते थे. उन की बहनें भी संपन्न थीं. वह खुद भी उन के लिए काफी खर्च करते थे. अपने भांजों को भी वह जेब खर्च के लिए इतने पैसे देते थे, जिन से एक मध्यमवर्गीय परिवार का एक महीने का खर्च चल सकता था.

दरअसल, नाहर सिंह की सोच थी कि पढ़लिख कर उन के भांजों को कोई बहुत अच्छी नौकरी तो मिलेगी नहीं, इसलिए वह उन्हें नेता बनाना चाहते थे. और नेता बनने के लिए शैक्षिक योग्यता की जगह दबंगई होनी चाहिए. अपनी इसी सोच के चलते वह मोहित और सचिन को दबंग बना रहे थे. मामा की शह पर मोहित कुछ ज्यादा ही बिगड़ चुका था. लोगों से मारपीट कर आतंक फैला कर उस ने इलाके में अपनी दबंगई कायम कर ली थी. वह कई संगीन वारदातों को भी अंजाम दे चुका था. दरअसल, मोहित और अभिषेक उर्फ नीतू पहले दोस्त थे. उन के बीच दुश्मनी की शुरुआत सन 2012 में तब हुई थी, जब मानसी से नीतू ने कोर्टमैरिज कर ली थी.

मानसी मूलरूप से बिहार के रहने वाले फकीरेलाल की बेटी थी. फकीरेलाल गुड़गांव की एक कंपनी में काम करते थे और गुड़गांव के सैक्टर- 4 में किराए पर कमरा ले कर अपने बच्चों के साथ सपरिवार रहते थे. मानसी फैशनपरस्त और बिंदास लड़की थी. उस की कई लड़कों से दोस्ती थी. वह उन के साथ कार या बाइक से घूमती, फिल्में देखती और महंगे रैस्टोरैंट में खाना खाती. कई युवकों से उस के शारीरिक संबंध भी थे.

रोजाना नएनए लड़कों के साथ घूमते हुए उसे मोहल्ले के अनेक लोगों ने देखा था. उन्होंने उस की शिकायत फकीरेलाल से की तो उन्होंने उसे डांटा. लेकिन मानसी बहक कर उस ढलान पर पहुंच चुकी थी, जहां से वापस आना उस के लिए आसान नहीं था. इसलिए पिता के समझाने का उस पर जरा भी असर नहीं हुआ. मानसी का अपने पुरुष दोस्तों के साथ घूमनेफिरने का सिलसिला कायम रहा. इस से मोहल्ले में फकीरेलाल की बदनामी हो रही थी. लाख समझाने के बावजूद भी जब मानसी नहीं मानी तो तंग आ कर फकीरेलाल ने उसे घर से निकाल दिया.

घर से निकालने पर मानसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, बल्कि वह सैक्टर-18 में किराए के फ्लैट में रहने लगी. अब उस से कोई टोकाटाकी करने वाला नहीं था, जिस से वह पूरी तरह से आजाद हो गई थी. उसे जब जहां मन होता, जाती थी. वह क्लबों और पबों में डांस भी करने लगी थी. सन 2012 के फरवरी महीने में एक पब में मानसी की मुलाकात विक्की से हुई. पहली ही मुलाकात में मानसी विक्की के दिल में उतर गई. विक्की उस पर खूब रुपए लुटाता था. वह विक्की की गाड़ी में घूमतीफिरती. विक्की उस की हर फरमाइश पूरी करता. विक्की भी गुड़गांव का रहने वाला था. वह भी एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखता था. विक्की और मोहित आपस में गहरे दोस्त थे.

विक्की ने मानसी से साफ कह दिया था, ‘‘मानसी, मैं तुम से शादी तो नहीं कर सकता. पर हां, तुम्हारा सारा खर्च ताउम्र उठाता रहूंगा. तुम्हें जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. परंतु बदले में मुझे तुम से इसी तरह का प्यार चाहिए. तुम एक बात का खास ध्यान रखना कि किसी दूसरे पुरुष ने तुम्हें छुआ भी तो मैं हरगिज बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

मानसी उस की शर्त मानने को तैयार हो गई. तब जिस फ्लैट में मानसी रहती थी, उस का किराया, कार, सौंदर्य प्रसाधन और खानेपीने का सारा खर्च विक्की उठाने लगा. वह हफ्ते में 1-2 बार उस से मिलने उस के फ्लैट पर पहुंच जाता था. विक्की से मुलाकात के बाद मानसी ने अपने और पुरुष दोस्तों से मिलनाजुलना बंद कर दिया. विक्की उस से हफ्ते में 1-2 बार ही मिलने आता था. उस के जाने के बाद मानसी का मन नहीं लगता था. रोजना ही नएनए दोस्त बनाने वाली मानसी भला विक्की के साथ बंध कर कैसे रह सकती थी. लिहाजा उस ने फिर से लोगों से दोस्ती करनी शुरू कर दी.

उसी दौरान उस की मुलाकात अभिषेक उर्फ नीतू से हुई. नीतू की शानोशौकत देख कर मानसी का झुकाव उस की तरफ हो गया. नीतू हर मायने में उसे विक्की से अच्छा लगा.

विक्की को जब यह बात पता चली तो उस ने मानसी से कहा, ‘‘मैं ने कहा था न कि अगर किसी पराए पुरुष ने तुम्हारे शरीर को छुआ भी तो मैं बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

‘‘विक्की, मैं भी इंसान हूं और मेरी भी कुछ भावनाएं हैं,’’ मानसी ने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा, ‘‘मैं भी चाहती हूं कि मेरा पति हो, घर हो, बच्चे हों. यह सब तुम्हारे साथ नहीं हो सकता. इसलिए मैं रखैल नहीं, पत्नी बन कर जीना चाहती हूं.’’

मानसी की बात सुन कर विक्की को गुस्सा आ गया, वह चिल्लाते हुए बोला, ‘‘मानसी, मेरे जीतेजी तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगी.’’

‘‘चिल्लाओ मत. मैं तुम्हारी ब्याहता नहीं हूं, जो इस तरह मुझ पर अपना हक जता रहे हो.’’ मानसी भी गुस्से में आ गई. वह आगे बोली, ‘‘मैं नीतू से शादी कर रही हूं. वह तुम से ज्यादा दौलतमंद है और मेरे सारे अरमान पूरे करने की उस की हैसियत भी है. और सुन लो, आज के बाद मेरा तुम से कोई वास्ता नहीं.’’

विक्की मानसी को धमकाते हुए वहां से चला गया. विक्की का पत्ता काटने के बाद अप्रैल, 2012 में अभिषेक उर्फ नीतू ने मानसी से कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज की बात जब विक्की को पता चली तो उसे बहुत बुरा लगा. गुस्से में तिलमिलाया हुआ वह नीतू से मिला.

‘‘नीतू जब तुम्हें यह बात पता थी कि मानसी मेरी रखैल है तो तुम ने उस से कोर्टमैरिज क्यों कर ली?’’ विक्की ने पूछा.

‘‘विक्की, मैं ने मानसी के साथ कोई जोरजबरदस्ती नहीं की. वह राजी थी, तभी तो शादी हुई. अगर वह मुझे नहीं चाहती तो भला मैं उसे कैसे पा सकता था. उस ने जब अपनी मरजी से शादी की है तो इस में तुम्हारे लिए बुरा मानने वाली क्या बात है.’’ नीतू बोला.

‘‘देख नीतू, तू मेरा दोस्त है, इसलिए तुझे एक बात बता रहा हूं कि मानसी जैसी लड़कियां उसी पर प्यार न्यौछावर करती हैं, जिस के पास दौलत होती है. उस ने तुझ से यह जानने के बाद शादी की है कि तेरे पास मुझ से ज्यादा दौलत है. एक दिन उसे तुझ से ज्यादा पैसे वाला कोई और मिल गया तो वह तुझे भी ठुकरा देगी.

फिर तुझे भी उस की हकीकत पता चलेगी और उस दिन तू बहुत पछताएगा.’’ यह कह कर विक्की वहां से चला गया. समय गुजरता रहा और 2 साल बीत गए. नीतू तो उसे पहले की तरह प्यार करता था, लेकिन मानसी का प्यार जरूर फीका पड़ गया. उस का नीतू से एक तरह से मन भर गया था. हालांकि नीतू उस पर दोनों हाथों से पैसे खर्च कर रहा था. इस के बावजूद वह नए दोस्तों को तलाशने लगी. इस की वजह साफ थी कि उसे अलगअलग लोगों के साथ मौजमस्ती करने की आदत जो पड़ गई थी.

अभिषेक ने जब उसे डांस क्लबों में जाने से मना किया तो मानसी ने साफ कह दिया, ‘‘नीतू, मैं कोई पिंजरे में बंद हो कर रहने वाली चिडि़या नहीं हूं. मेरा जो मन करेगा, मैं वही करूंगी. तुम कभी मुझे रोकने की कोशिश भी मत करना.’’

इस के बाद वह नीतू को छोड़ कर अलग किराए के मकान में रहने लगी. अभिषेक उस से मिलने आता तो वह उसे दुत्कार देती. इस बात का अभिषेक को बड़ा दुख होता था. लाखों रुपए उस पर खर्च करने के बावजूद उसे प्रेमिका की दुत्कार मिलती थी. काफी समझाने के बावजूद भी जब मानसी ने उस की बात नहीं मानी तो अभिषेक उर्फ नीतू ने मानसी को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. उस ने उसे ठिकाने लगाने की योजना बना भी ली.

योजना के तहत 5 जुलाई, 2014 को नीतू अपने 2 दोस्तों खुशीराम और कपिल के साथ गुड़गांव के सैक्टर-17 स्थित गंदे नाले के पास पहुंचा. नीतू मानसी का काम तमाम कर के लाश को उसी नाले में ठिकाने लगाना चाहता था, लेकिन मानसी को नाले के पास बुलाना आसान नहीं था, क्योंकि उस ने उस से संबंध खत्म कर लिए थे.

नीतू जानता था कि मानसी बेहद लालची है. इसलिए उसे वहां बुलाने के लिए उस ने एक चाल चली. उस ने वहीं से मानसी को फोन किया. उस वक्त शाम को 5 बज रहे थे. उस ने कहा, ‘‘मानसी, मैं ने तुम्हारे लिए 8 तोले का एक हार बनवाया है. हार का डिजाइन इतना अच्छा है कि तुम्हें जरूर पसंद आएगा. आज रात ही मैं मुंबई जा रहा हूं. फिर हमारी मुलाकात हो या न हो, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम इस हार को ले लो.’’

मानसी 8 तोला सोने के हार के लालच में आ गई. वह हार लेने के लिए साढ़े 5 बजे गंदे नाले के पास पहुंच गई. नीतू को देखते ही वह चहक कर बोली, ‘‘नीतू, तुम तो मुझे एकदम भूल गए. कभीकभार तो मुझ से मिलने आ जाय करो. मैं तुम्हें बहुत मिस करती हूं.’’

कुछ देर बाद नीतू के दोस्त खुशीराम और कपिल वहां पहुंचे तो वह चौंकी, क्योंकि वह पहले से उन्हें जानती थी. मानसी ने सोचा कि उन से उसे क्या मतलब. उसे तो हार ले कर वहां से निकल जाना है. उस ने नीतू का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘लाओ, वह हार कहां है.’’

नीतू ने जेब से चाकू निकाल कर लहराया, ‘‘अब हार पहन कर क्या करोगी, जब तुम जीवित ही नहीं रहोगी.’’

चाकू देख कर और उस की बातें सुन कर मानसी घबरा गई. इस से पहले कि वह कुछ कह पाती, अभिषेक ने चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए. मानसी वहीं गिर गई और कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. इस के बाद खुशीराम और कपिल ने उस की लाश उठा कर नाले में फेंक दी.4 दिनों बाद 9 जुलाई, 2014 को नाले में महिला की लाश पड़ी होने की सूचना थाना राजेंद्रपार्क पुलिस को मिली तो पुलिस ने नाले से लाश निकलवाई. लाश काफी सड़गल गई थी. वह पूरी तरह कीचड़ में सनी हुई थी. मृतका कौन है, यह जानने के लिए पुलिस ने पहले लाश धुलवाई. उस का चेहरा गल चुका था, इसलिए वहां मौजूद भीड़ में से कोई भी उसे पहचान नहीं सका.

पुलिस को उस की बाईं हथेली पर नीतू नाम गुदा मिला. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और लावारिस मान कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अभिषेक उर्फ नीतू की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को पता चला कि 9 जुलाई, 2014 थाना राजेंद्रपार्क पुलिस ने नाले से जो महिला की लाश बरामद की थी, वह मानसी की थी. अगर नीतू पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ता तो मानसी की हत्या का राज उजागर ही न हो पाता.

एक दिन गुड़गांव के सैक्टर-28 स्थित एक कैफे में मोहित अपने दोस्तों के साथ मौजूद था, तभी अभिषेक उर्फ नीतू अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा. मोहित के दोस्तों ने नीतू का मजाक उड़ाया तो नीतू गालियां बकने लगा. तभी मोहित और उस के दोस्तों ने नीतू और उस के दोस्तों की पिटाई कर दी. उसी पिटाई का बदला लेने के लिए नीतू मौका ढूंढ़ रहा था.

25 अगस्त, 2015 की शाम को उसे यह मौका मिल गया. उसे पता चला कि मोहित अपने दोस्त सक्षम व मामा नाहर सिंह के साथ ओल्ड बौक्स कैफे में है तो वह अपने साथियों के साथ वहां पहुंच गया और मोहित की गोली मार कर हत्या कर दी.

मोहित की हत्या एवं मानसी की हत्या के आरोप में पुलिस ने अभिषेक उर्फ नीतू, ब्रजेश, दीपांकर, बौबी, आदित्य को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर के 2 दिनों की पुलिस रिमांड पर ले कर हत्या में प्रयुक्त रिवौल्वर व मानसी की हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. मानसी की हत्या में शामिल खुशीराम और कपिल को गिरफ्तार करने पुलिस पहुंची तो वे घर से फरार मिले. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं जा सके थे. इस के बाद सभी अभियुक्तों को 29 अगस्त, 2015 को पुन: न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.Gurugram Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bank Robbery: दिल्ली की सबसे बड़ी लूट

Bank Robbery: एटीएम कैश वैन से दिनदहाड़े साढ़े 22 करोड़ रुपए की लूट से पुलिस के हाथपैर फूल गए थे. रात भर चले पुलिस अभियान के बाद लुटेरा पकड़ा गया तो सच्चाई जान कर सभी हैरान रह गए. आखिर क्या निकला दिल्ली की इस सब से बड़ी लूट का राज…

बैंकों ने अपनी एटीएम मशीनों में कैश डालने की जिम्मेदारी विभिन्न निजी एजेंसियों को दे रखी है. उन एजेंसियों ने अलगअलग इलाकों में अपने करेंसी चेस्ट बना रखे हैं. बैंकों से मोटी रकम निकाल कर पहले करेंसी चेस्ट में पहुंचाई जाती है, उस के बाद वह कैश वैनों द्वारा अलगअलग एटीएम बूथों तक पहुंचाया जाता है. सिक्योरिटी एंड इंटेलिजैंस सर्विसेज (एसआईएस) सिक्योरिटी एजेंसी भी पिछले कई सालों से बैंकों की एटीएम मशीनों में पैसे डालने का काम कर रही है.

26 नवंबर, 2015 को पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी स्थित कंपनी के करेंसी चेस्ट पर एसआईएस की कैश वैन पैसे ले जाने के लिए पहुंची. वहां की ऐक्सिस बैंक से 38 करोड़ रुपए निकाल कर करेंसी चेस्ट में मौजूद संदूकों में भर दिए गए. यह कैश वैन द्वारा अलगअलग एटीएम बूथों तक पहुंचाया जाना था. रुपयों से भरे उन संदूकों में से 9 संदूक एसआईएस की एक वैन में रख दिए गए, जिन में साढ़े 22 करोड़ रुपए थे.

ये साढ़े 22 करोड़ रुपए दिल्ली के ओखला स्थित एटीएम मशीनों में रखे जाने थे. इसलिए दोपहर ढाई बजे के करीब एसआईएस की वह वैन ओखला के लिए चल पड़ी. उस वैन को प्रदीप शुक्ला चला रहा था और सुरक्षा के लिए गनमैन विजय कुमार पटेल उस के साथ था. विकासपुरी से चल कर वह वैन करीब साढ़े 3 बजे श्रीनिवासपुरी की रेड लाइट पर पहुंची. गनमैन विजय कुमार को लघुशंका लगी थी, इसलिए वह ड्राइवर से कह कर वैन से उतर गया.

कुछ देर बाद जब वह लौट कर आया तो उसे वहां कैश वैन दिखाई नहीं दी. विजय कुमार ने इधरउधर नजर दौड़ाई कि ड्राइवर ने रेडलाइट पार कर के वैन खड़ी न कर दी हो. लेकिन उसे कहीं भी वैन नहीं दिखी. यह बात करीब पौने 4 बजे की थी. विजय कुमार के पास वैन के ड्राइवर प्रदीप शुक्ला का फोन नंबर था. उस ने उसे फोन किया. कई बार घंटी बजने के बाद प्रदीप ने फोन रिसीव कर के बताया कि रेडलाइट पर ट्रैफिक पुलिस ने वैन खड़ी नहीं होने दी, इसलिए वह इसी रोड पर थोड़ी दूर आगे खड़ा है.

जिस तरफ प्रदीप शुक्ला ने वैन खड़ी होने की बात कही थी, विजय उसी ओर था. लेकिन उसे वैन नजर नहीं आ रही थी. विजय ने थोड़ा आगे बढ़ कर भी देखा लेकिन उसे कहीं भी कैश वैन दिखाई नहीं दी. विजय ने प्रदीप को फिर फोन किया. इस बार उस का फोन बंद था. उस ने कई बार ड्राइवर को फोन किया, लेकिन अब उस का फोन बंद हो चुका था. वह चौंका कि अब फोन बंद क्यों है? आखिर वह उसे छोड़ कर वैन ले कर कहां चला गया?

उस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रदीप वैन ले कर कंपनी के हैडऔफिस चला गया हो. अगर ऐसा हुआ तो उस से जवाबतलब किया जाएगा. कंपनी के अधिकारी उसी से पूछेंगे कि कैश की सुरक्षा की जिम्मेदारी उस की थी तो कैश छोड़ कर वह क्यों गया? एक बार फिर उस ने ड्राइवर प्रदीप को फोन किया, लेकिन इस बार भी उस का फोन बंद ही मिला. विजय कुमार परेशान हो उठा था. वह औफिस फोन कर के पूछना चाहता था कि ड्राइवर प्रदीप वहां तो नहीं आया है, लेकिन डांट पड़ने की वजह से उस ने औफिस में फोन नहीं किया बल्कि सीधे ओखला फेज-1 स्थित कंपनी के औफिस पहुंच गया.

औफिस पहुंच कर पहले उस ने पार्किंग एरिया में कैश वैन को ढूंढा. जब वैन वहां नहीं दिखी तो विजय ने वहां मौजूद कंपनी के कर्मचारियों से प्रदीप के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि प्रदीप शुक्ला यहां नहीं आया है. यह जान कर विजय के होश उड़ गए. उसे लगा कि अब उस की नौकरी गई. लेकिन यह ऐसी बात थी, जिसे छिपाया भी नहीं जा सकता था. वह डरताडराता कंपनी के एरिया मैनेजर आनंद कुमार के पास पहुंचा और जब उन्हें ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के कैश वैन सहित गायब होने की बात बताई तो वह सन्न रह गए, क्योंकि ड्राइवर प्रदीप पूरे साढ़े 22 करोड़ रुपए के साथ गायब था. उन्होंने तुरंत प्रदीप शुक्ला का फोन मिलाया, लेकिन उस का फोन उस समय भी बंद था.

आनंद कुमार के दिमाग में तुरंत आया कि ड्राइवर वह रकम ले कर कहीं भाग तो नहीं गया? अगर ऐसा हुआ तो यह कंपनी के लिए भी बड़ी बदनामी वाली बात होगी. इसलिए मैनेजर ने गार्ड विजय कुमार से कहा कि अभी वह इस बारे में किसी से कोई बात न करे. एरिया मैनेजर आनंद कुमार ने इस बारे में कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की तो सभी में खलबली मच गई. क्योंकि यह कोई छोटीमोटी बात नहीं थी. जिस कैश वैन के साथ प्रदीप शुक्ला लापता था, उस में जीपीएस लगा था. उस के माध्यम से पता लगाया जा सकता था कि वैन उस समय कहां है. इसीलिए उन्होंने उस समय पुलिस को सूचना नहीं दी. कंपनी के अधिकारी खुद ही अपने स्तर से वैन का पता लगाने लगे.

जीपीएस के माध्यम से पता चला कि वह वैन दिल्ली में गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के पास खड़ी है. कंपनी के अधिकारियों की उम्मीद जागी और वे आननफानन गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के नजदीक पहुंचे तो वहां उन्हें सर्विस लेन में वह वैन खड़ी दिखाई दी. जब वे वैन के पास पहुंचे तो उस में कैश से भरे सभी संदूक गायब मिले. अब कंपनी के अधिकारियों को विश्वास हो गया कि ड्राइवर प्रदीप शुक्ला किसी दूसरी गाड़ी में उन संदूकों को ले कर भाग गया है.

अब इस बात को छिपाया नहीं जा सकता था. पुलिस को सूचना देना जरूरी था, इसलिए शाम पौने 6 बजे के करीब उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के कैश वैन के ड्राइवर द्वारा साढ़े 22 करोड़ रुपए ले कर गायब होने की सूचना दे दी. जैसे ही यह सूचना पुलिस के बड़े अधिकारियों तक पहुंची तो उन के होश उड़ गए. क्योंकि नवंबर, 2014 में दिल्ली के कमलानगर में कैश वैन से जो डेढ़ करोड़ रुपए की लूट हुई थी, वह केस अभी तक नहीं खुल पाया था, ऊपर से यह नया केस सामने आ गया.

जिस जगह यह घटना हुई थी, वह इलाका दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना ओखला के अंतर्गत आता था. सूचना पाते ही ओखला के थानाप्रभारी नरेश सोलंकी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा और एसीपी (कालकाजी) जसवीर सिंह भी आ गए. चूंकि लूट का यह बड़ा मामला था, इसलिए जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया भी चल पड़े थे. लूट की खबर मिलते ही पुलिस ने दिल्ली से बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग शुरू कर दी थी. सभी पुलिस अधिकारी उस जगह पहुंच गए, जहां कैश वैन खड़ी मिली थी. इस के बाद उन्होंने उस जगह का भी मुआयना किया, जहां वैन का ड्राइवर गनमैन विजय कुमार पटेल को छोड़ कर चला आया था.

डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा ने जरूरी जांच के लिए फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया था. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने स्पैशल सेल और क्राइम ब्रांच की स्पैशल टीम को भी बुला लिया था. सभी टीमें अपनेअपने स्तर से जांच कर रही थीं. पुलिस अधिकारियों के गले यह बात नहीं उतर रही थी कि जब घटना पौने 4 बजे घटी थी तो कंपनी के अधिकारियों ने 2 घंटे बाद पुलिस को सूचना क्यों दी? आखिर इतनी देर तक वे मामले को क्यों दबाए रहे. इस पर कंपनी के अधिकारी अपनी सफाई में यही कह रहे थे कि जीपीएस के माध्यम से वे पहले खुद ही ड्राइवर और वैन को तलाशने की कोशिश कर रहे थे. यही करने में उन्हें इतना समय लग गया.

बहरहाल, मौके की काररवाई निपटाने के बाद थाना ओखला में ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के खिलाफ अमानत में खयानत का मामला दर्ज कर लिया गया. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने इस केस के खुलासे के लिए स्पैशल सेल, क्राइम ब्रांच, स्पैशल स्टाफ के अलावा थानों के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों को भी लगा दिया. सभी टीमें अलगअलग तरीके से केस की जांच में जुट गई. पुलिस ने पूछताछ के लिए गनमैन विजय कुमार को हिरासत में ले लिया था. इस वारदात के पीछे पुलिस को 3 ऐंगल नजर आ रहे थे. पहला यह कि कैश वैन का ड्राइवर प्रदीप शुक्ला इतनी बड़ी लूट को अकेला अंजाम नहीं दे सकता था. उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर ही वारदात को अंजाम दिया होगा.

दूसरा ऐंगल यह लग रहा था कि किसी प्रोफेशनल गिरोह ने रास्ते में प्रदीप को काबू कर के उस का अपहरण कर लिया होगा और रकम व प्रदीप को वह अपनी गाड़ी में डाल कर ले गए होंगे. अगर ऐसा हुआ तो अपहर्त्ता प्रदीप की हत्या कर सकते थे. तीसरा ऐंगल यह लग रहा था कि गनमैन विजय कुमार ने साजिश रच कर यह वारदात कराई है. गनमैन योजना के तहत लघुशंका के बहाने उतर गया होगा और उस के साथियों ने ड्राइवर का पीछा कर के वारदात को अंजाम दिया होगा. पुलिस इन तीनों संभावनाओं पर तहकीकात कर रही थी.

विकासपुरी से कैश ले कर वैन जिस रूट से होते हुए श्रीनिवासपुरी की रेडलाइट तक पहुंची थी, पुलिस ने यह पता लगाया कि इस रास्ते में कहांकहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पुलिस यह जानना चाहती थी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बदमाश विकासपुरी से ही किसी गाड़ी से कैश वैन का पीछा कर रहे थे. इस के अलावा गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी गई. क्योंकि कैश वैन लावारिस अवस्था में इसी मैट्रो स्टेशन के पास खड़ी मिली थी. पुलिस की एक टीम विकासपुरी स्थित करेंसी चेस्ट पहुंची. वहां से पता चला कि एसआईएस की किसी भी वैन में रोजाना 10 करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं रखे जाते थे तब पुलिस को इस बात पर हैरानी हुई कि उस दिन वैन में साढ़े 22 करोड़ रुपए क्यों रखे गए?

इस के अलावा यहां एक खामी और सामने आई, वह यह थी कि हर दिन हरेक कैश वैन पर 2 गनमैन, एक ड्राइवर और एक कस्टोडियन सवार होता था लेकिन उस दिन कैश वैन में एक गनमैन और एक कस्टोडियन को क्यों नहीं भेजा गया? इतने ज्यादा कैश के साथ केवल एक ही गनमैन क्यों भेजा गया? कस्टोडियन सुरेश कुमार उस वैन में क्यों नहीं गया? इस के अलावा पुलिस को यह भी पता चला कि वैन में रकम रखने की जिम्मेदारी कस्टोडियन की होती है, लेकिन उस वैन में साढ़े 22 करोड़ रुपए कस्टोडियन के बजाय किसी विक्रम नाम के कर्मचारी ने रखे थे.

इन खामियों को देख कर पुलिस को शक हुआ कि लूट की योजना बनाने में यहां के कर्मचारियों का भी हाथ हो सकता है. इसीलिए पुलिस ने विक्रम, कस्टोडियन सुरेश कुमार और अन्य कई कर्मचारियों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. इस से पहले दिल्ली में कैश लूट के जो मामले हुए थे, उन में जिन बदमाशों के शामिल होने की बात सामने आई थी, पुलिस ने उन बदमाशों के डोजियर के आधार पर उन की तलाश शुरू कर दी. उन में से पुलिस के हाथ जितने भी बदमाश लगे, उन से भी सख्ती से पूछताछ की जाने लगी.

प्रदीप शुक्ला नाम का जो ड्राइवर कैश के साथ लापता था, पुलिस ने एसआईएस कंपनी से उस का फोटो और उस की डिटेल हासिल की तो पता चला कि वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिला बलिया का रहने वाला था और उस ने 10 सितंबर, 2015 को ही इस कंपनी में नौकरी जौइन की थी. कंपनी में उस ने दक्षिणी दिल्ली के कोटला मुबारकपुर का पता लिखवाया था. पुलिस की एक टीम उस के कोटला मुबारकपुर वाले पते पर पहुंची तो पता चला कि वह पहले कभी इस पते पर रहता था. मकान मालिक ने पुलिस को बताया कि अब वह ओखला इंडस्ट्रियल एरिया के नजदीक हरकेशनगर में रहता है.

हरकेशनगर का पता ले कर पुलिस टीम जब उस के कमरे पर पहुंची तो वहां उस की पत्नी शशिकला और 3 बच्चे मिले. पुलिस ने जब शशिकला से उस के पति के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह अपनी ड्यूटी गए हैं. पुलिस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रदीप घर में नोटों के बौक्स रख कर कहीं फरार हो गया हो और पत्नी झूठ बोल रही हो. यह शंका दूर करने के लिए पुलिस ने उस के कमरे की तलाशी ली, लेकिन वहां उसे कुछ नहीं मिला. पुलिस वहां से खाली हाथ लौट आई. अब तक पुलिस की किसी भी टीम को ऐसा कोई क्लू नहीं मिल सका था, जिस से प्रदीप के बारे में कोई जानकारी मिल सकती.

अब तक काफी रात हो चुकी थी. लेकिन पुलिस टीमें अपनेअपने काम में लगी थीं. पुलिस ने ड्राइवर प्रदीप शुक्ला के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा रखा था, इस से उस की आखिरी लोकेशन अपराह्न पौने 4 बजे श्रीनिवासपुरी की आ रही थी. इस से यही लग रहा था कि वहां से कैश वैन सहित फरार होते समय उस ने अपना फोन बंद कर दिया था. पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि प्रदीप ने उसी दिन 26 नवंबर को आखिरी बार किसी अजीत के फोन पर बात की थी. बाद में पता चला कि अजीत भी हरकेशनगर में रहता है.

पुलिस अजीत के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. उस से प्रदीप के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि प्रदीप से उस की कोई खास बात नहीं हुई थी, लेकिन उस ने प्रदीप को शाम 4-5 बजे के बीच ओखला फेज-3 में देखा था. थानाप्रभारी नरेश सोलंकी अजीत को ले कर ओखला फेज-3 में उस जगह पहुंच गए, जहां उस ने प्रदीप को देखा था. वहां तमाम इंडस्ट्री हैं, इसलिए प्रदीप को ढूंढना आसान नहीं था. थानाप्रभारी ने इस बात से डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा को अवगत कराया तो उन्होंने उस इलाके में सर्च औपरेशन चलाने के निर्देश दिए.

सर्च औपरेशन में सरिता विहार के थानाप्रभारी महिंदर सिंह, नेहरू प्लेस पुलिस चौकी इंचार्ज मनमीत मलिक, एसआई राजेंद्र डागर, जितेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल यतेंद्र आदि को भी लगा दिया गया. इस टीम का निर्देशन कालकाजी के एसीपी जसवीर सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम हर फैक्ट्री में जाती और प्रदीप का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछती. इसी क्रम में पुलिस ओखला फेज-3 स्थित एक ढाबे पर पहुंची. वह ढाबा अजय का था. वह ढाबा देर रात तक खुला रहता था. पुलिस ने ढाबे वाले को प्रदीप का फोटो दिखाया तो उस ने बताया कि इसे उस ने यहीं पर रात साढ़े 9 बजे के करीब देखा था.

ढाबे वाले से बात कर के बाद पुलिस को यकीन हो गया कि प्रदीप जिंदा है. क्योंकि पुलिस को आशंका थी कि अपहर्त्ताओं ने उसे कहीं मार न दिया हो. कैश कहां है, यह बात प्रदीप के मिलने पर ही पता लग सकती थी. इसलिए उसे ढूंढना जरूरी था. पुलिस को लगा कि कुछ घंटे पहले जब प्रदीप यहीं था तो जरूर यहीं कहीं छिपा होगा. इस के बाद पुलिस पूरे उत्साह से एकएक फैक्ट्री में जा कर उसे खोजने लगी. खोजबीन करते हुए पुलिस ढाबे से करीब 50 गज दूर एक फैक्ट्री के गेट पर पहुंची तो उस में अंदर से ताला बंद था. गेट खटखटाने पर गेट पर एक अधेड़ उम्र का आदमी आया. वह उस फैक्ट्री का चौकीदार था. उस का नाम रामसूरत था.

पुलिस ने चौकीदार को ड्राइवर प्रदीप शुक्ला का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछा और गोदाम की तलाशी लेने के लिए कहा. पुलिस को देख कर चौकीदार रामसूरत डर गया. वह गेट की चाबी लेने की बात कह कर अंदर गया और कुछ देर बाद लौट कर गेट खोल कर पुलिस को अंदर ले आया. उस ने एक कमरे का दरवाजा खोल कर कहा, ‘‘सर, जिस की आप को तलाश है, वह यह रहा.’’

पुलिस कमरे में घुसी तो सचमुच वहां फरार ड्राइवर प्रदीप शुक्ला मिल गया. उसी कमरे में कैश से भरे 9 संदूक भी रखे थे. यह सब देख कर पुलिस की बांछें खिल उठीं. पुलिस ने प्रदीप को हिरासत में ले कर उन बक्सों की जांच की तो उन में से केवल एक बक्से की क्लिप हटी थी, बाकी 8 बक्से जैसे के तैसे थे. पुलिस ने प्रदीप शुक्ला और चौकीदार रामसूरत को उसी समय हिरासत में ले लिया. रामसूरत लाख सफाई देता रहा कि उस का इस मामले से कोई संबंध नहीं है, पर पुलिस ने उस की एक न सुनी. हां, पुलिस ने उसे इतना भरोसा जरूर दिया कि अगर वह निर्दोष पाया गया तो उसे छोड़ दिया जाएगा. यह बात 27 नवंबर, 2015 सुबह 3 बजे की है.

एसीपी जसबीर सिंह ने ड्राइवर प्रदीप शुक्ला को गिरफ्तार करने व कैश बरामद होने की जानकारी डीसीपी व अन्य अधिकारियों को दी तो डीसीपी मनदीप सिंह रंधावा, जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया सहित कई अन्य अधिकारी भी ओखला के उस गोदाम पर पहुंच गए. सभी संदूकों को जब्त करने के बाद पुलिस प्रदीप शुक्ला और चौकीदार रामसूरत को थाने ले आई. पुलिस यही अनुमान लगा रही थी कि इतनी बड़ी रकम को लूटने में जरूर किसी बड़े गैंग का हाथ रहा होगा, लेकिन थाने में प्रदीप शुक्ला से जब पूछताछ की गई तो पता चला कि इस लूट में उस के अलावा कोई दूसरा शामिल नहीं था. और यह लूट भी कोई पहले से बनाई प्लानिंग के तहत नहीं की गई थी, बल्कि अचानक यह सब किया गया था.

प्रदीप शुक्ला ने करीब 3 महीने पहले ही सिक्योरिटी एजेंसी एसआईएस में ड्राइवर की नौकरी जौइन की थी. उस की ड्यूटी विकासपुरी ब्रांच से कैश ले कर कंपनी के ओखला स्थित हैडऔफिस में पहुंचाने की थी. कभीकभी उसे एटीएम मशीनों में पैसे रखने वाली टीम के साथ भी भेज दिया जाता था. प्रदीप ने बताया कि उस से जितना काम लिया जाता था, उस के मुताबिक उसे सैलरी नहीं मिलती थी. मजबूरी में उसे कम पैसों में वहां नौकरी करनी पड़ रही थी. इसीलिए कभीकभी उस के दिमाग में विचार आता था कि जो पैसे वह वैन में ले कर जाता है, अगर उसे मिल जाएं तो उस की पूरी जिंदगी ठाठ से कटेगी.  लेकिन यह उस की केवल सोच थी, उस ने वे पैसे ले कर भागने के बारे में कभी नहीं सोचा. बहरहाल कम वेतन मिलने की वजह से वह मानसिक तनाव में जरूर रहता था.

26 नवंबर को वह साढ़े 22 करोड़ रुपए विकासपुरी के करेंसी चेस्ट से ले कर चला. जब श्रीनिवासपुरी रेडलाइट के पास वैन का गनमैन विजय कुमार पटेल लघुशंका के लिए उतर गया तो अचानक उसे लालच आ गया. उस ने सोचा कि पैसे ले कर भागने का इस से अच्छा मौका उसे फिर कभी नहीं मिलेगा और वह नोटों से भरे उन 9 संदूकों को ले कर सीधे ओखला फेज-3 स्थित रामसूरत के पास पहुंच गया. वह उसे पहले से जानता था.

रामसूरत जिस गोदाम में चौकीदारी करता था, वहां पहले मर्सिडीज कारों का वर्कशाप था. लेकिन कुछ सालों से वहां तार का काम होता था. यह गोदाम धु्रवकुमार नाम के एक बिजनेसमैन का था. रामसूरत धु्रवकुमार के यहां पिछले 22 सालों से नौकरी कर रहा था. प्रदीप की पत्नी शशिकला पहले इसी गोदाम में काम करती थी. तभी से प्रदीप की रामसूरत से जानपहचान थी. रामसूरत ने ही किसी से सिफारिश कर के प्रदीप की नौकरी एसआईएस सिक्योरिटी कंपनी में बतौर ड्राइवर लगवाई थी.

शाम को करीब 5 बजे प्रदीप कैश वैन ले कर रामसूरत के पास गोदाम में पहुंचा. प्रदीप ने रामसूरत को बताया कि उन 9 संदूकों में पन्नी के बंडल हैं. उन्हें वह बनारस ले जाएगा, जिस की एवज में उसे 10 हजार रुपए मिलेंगे. इस के बाद उस ने वैन से नोटों से भरे सारे संदूक उतार कर गोदाम के एक कमरे में रख दिए. फिर मौका मिलने पर उस ने खर्चे के लिए एक संदूक से 11 हजार रुपए निकाल लिए.

इस के बाद वह यह कह कर वैन ले कर चला गया कि थोड़ी देर में लेबर ले कर आ रहा है ताकि सभी संदूकों को पैक करा कर बनारस ले जा सके. इस पर रामसूरत मान गया. इस के बाद प्रदीप वैन को गोविंदपुरी मेट्रो स्टेशन के पास छोड़ कर चला आया. लौटते समय रास्ते भर वह यही सोचता रहा कि इस रकम को ले कर वह कहां जाए. प्रदीप ने खर्चे के लिए एक संदूक से 11 हजार रुपए निकाल लिए थे. खानेपीने का कुछ सामान लेने के लिए वह बाजार चला गया. वहां से उस ने महंगी शराब खरीदी, होटल से चिकन पैक कराया. इस के बाद वह गोदाम लौट आया. उसे अकेले देख कर रामसूरत ने पूछा, ‘‘तुम तो पैकिंग के लिए लेबर लेने गए थे, लेबर कहां है?’’

इस पर प्रदीप ने बताया कि रात की वजह से लेबर नहीं मिली, सुबह को देखूंगा. रामसूरत ने भी उस की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और वह वहां से चला गया. उस के जाने के बाद प्रदीप ने उन संदूकों के पास बैठ कर शराब पी और चिकन खाया. फिर वह कपड़ा बिछा कर वहीं सो गया. रामसूरत भी अपनी जगह पर जा कर सो गया. सुबह 3 बजे के करीब किसी ने गेट खटखटाया तो रामसूरत की नींद खुली. वह गेट पर गया तो बाहर भारी संख्या में पुलिस को देख कर घबरा गया. पुलिस वालों ने जब उसे फोटो दिखाया तो वह समझ गया कि प्रदीप जरूर ही कोई गलत काम कर के भागा है. चाबी लेने के बहाने रामसूरत उस कमरे में आया जहां प्रदीप सो रहा था.

रामसूरत ने प्रदीप को जगा कर कहा, ‘‘ये पन्नी के बौक्स क्या तुम चोरी कर के लाए हो, जो पुलिस यहां आई है.’’

पुलिस का नाम सुनते ही प्रदीप डर गया. वह झट से बोला कि कोई भागने का रास्ता हो तो बताओ. इस से रामसूरत को विश्वास हो गया कि वह जरूर कोई गड़बड़ कर के आया है. इस से पहले कि प्रदीप वहां से भाग पाता, रामसूरत ने कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. प्रदीप मिन्नतें करते हुए दरवाजा खोलने को कहता रहा लेकिन रामसूरत ने उस की एक नहीं सुनी और वह गेट पर खड़े पुलिस वालों को उस कमरे में ले गया जहां प्रदीप था. प्रदीप ने एक संदूक से जो 11 हजार रुपए निकाले थे, उन में से वह साढ़े 10 हजार रुपए खर्च कर चुका था.

उस से पूछताछ के बाद पुलिस को जब यकीन हो गया कि इस लूट के मामले में उस के अलावा किसी और का हाथ नहीं है तो हिरासत में लिए गए बाकी लोगों को छोड़ दिया गया. साथ ही पुलिस ने ईमानदारी से अपना फर्ज निभाने वाले चौकीदार रामसूरत को धन्यवाद भी दिया. जौइंट सीपी रणवीर सिंह कृष्णैया ने 10 घंटे के अंदर ही दिल्ली की सब से बड़ी कैश लूट का खुलासा कर रकम बरामद करने वाली पुलिस टीम की सराहना की. प्रदीप से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. मामले की विवेचना थानाप्रभारी नरेश सोलंकी कर रहे हैं. Bank Robbery

—कथा पुलिस सूत्रों