Social Story: शमशाद हैदर उस मुल्क में लोगों को योग सिखा रहे हैं, जहां योग को मजहबी आईने से देखा जाता है. कट्टरपंथियों ने उन्हें योग न सिखाने की धमकियां भी दीं लेकिन…
भोर होते ही शमशाद हैदर हरेभरे पेड़ों के बीच बने ग्राउंड में पहुंच गए. पूरे ग्राउंड पर हरी मखमली घास थी. उस पर जमी शबनम की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं. पक्षियों की चहचहाहट भी शुरू हो गई थी. भोर का वक्त वाकई अंतरमन को सुकून पहुंचाता है. उस वक्त हवाएं ताजगी से लबरेज होती हैं और फिजा बिलकुल शांत. लगता है कि जैसे प्रकृति बांहें फैला कर इंसान का इस्तकबाल कर रही हो. वक्त का दायरा बढ़ना शुरू हुआ तो उस मैदान में लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया. आने वाले ज्यादातर शख्स कुरतापाजामा पहने हुए थे. उन के चेहरे पर दाढ़ी थी और सिर पर जालीदार टोपी. वहां जो भी आ रहा था वही हैदर को बड़े अदब के साथ अस्सलामु अलैकुम कर रहा था.
हैदर भी मुसकरा कर उन का स्वागत करते हुए ‘वालेकुम अस्सलाम मियां, तशरीफ लाइए,’ कह रहे थे. दुआसलाम के दौरान वह लोगों की खैरखबर भी पूछ रहे थे. आगंतुकों में युवा व अधेड़ परदानशीं महिलाएं व चंद बच्चे भी शरीक थे. कुछ ही देर में वहां आए सभी लोग 4-5 कतारों में साथ लाई चटाई व चादर बिछाने के बाद उस पर पालथी लगा कर बैठ गए. इन कतारों में से एक अलग कतार महिलाओं की भी थी. हैदर भी एक सफेद चादर बिछा कर ठीक उन के सामने बैठ गए थे और अनुलोम विलोम व प्राणायाम के बाद उन्होंने विभिन्न आसन करने शुरू कर दिए. वह जैसा करते, लोग भी वैसा कर रहे थे. करीब एक घंटे बाद यह सिलसिला थम गया. लोग जाने लगे, तो एक बुजुर्ग शख्स शमशाद हैदर के नजदीक आ कर समझाने वाले अंदाज में बोले, ‘‘खबरदार भी रहा कीजिए हैदर मियां.’’
‘‘इंसानियत के दुश्मनों से क्या डरना चचा. फिर मैं तो नेकी की राह पर चल रहा हूं.’’ हैदर ने मुसकरा कर जवाब दिया, तो बुजुर्ग थोड़ा उत्तेजित हो गए. वैसे उन का यह अंदाज हैदर के लिए तो कतई नहीं था.
उन्होंने हाथ नचा कर कहा, ‘‘अरे यही नेकियां तो जालिमों के दिलों में छाले पैदा करती हैं. अब, सलीम का ही मसला लो, उस का क्या कुसूर था कि उन जालिमों ने उसे मारापीटा और उस के घर को भी आग के हवाले कर दिया. यह तो शुक्र है कि उस बेचारे की किसी तरह जान बच गई. वो तो ऐलानिया तौर पर कह रहे थे कि किसी को ऐसा नहीं करने देंगे. उन्हें लगता है कि योग पर हिंदुस्तान की मजहबी मुहर लगी है.’’
‘‘यही तो गलतफहमी है चचा. हकीकत में तो योग मजहबी बंदिशों से आजाद कला और विज्ञान है.’’ हैदर बोले.
‘‘ठीक है हैदर मियां अब चलता हूं. तुम्हें समझाना मैं ने अपना फर्ज समझा.’’ कहते हुए बुजुर्ग वहां से रुखसत हो गए.
दरअसल इस तरह का योगाभ्यास करना या सिखाना हिंदुस्तान में तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन जिस जगह हैदर यह सब करा रहे थे वह आतंकपरस्त पाकिस्तान के प्रमुख शहर इस्लामाबाद की सरजमीं थी. कट्टरपंथी ताकतें इस के सख्त खिलाफ थीं. यही वजह थी कि लोगों को योग से जोड़ने की कोशिश करने वाले लाहौर के बाशिंदे सलीम के साथ कट्टरपंथियों ने एक दिन न केवल मारपीट की बल्कि उस के आशियाने को भी आग के हवाले कर दिया.
यूं तो हैदर भी कुछ ऐसे लोगों की धमकियों के शिकार थे, लेकिन इस के बावजूद भी वह न केवल खुद योग कर रहे थे बल्कि लोगों को भी सिखा रहे थे. उस रोज भी वह इस्लामाबाद शहर के उस ग्राउंड में लोगों को योग सिखाने पहुंच गए थे. योग से अनेक लोगों को लाभ हो रहा था, इसलिए उन के शिविर में लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही थी. कट्टरपंथी योग को भी हिंदुस्तानी देन समझते थे, इसलिए वे इस का विरोध कर रहे थे. जबकि शमशाद हैदर की फितरत अलग थी. वह नहीं मानते थे कि योग पर सिर्फ हिंदुस्तान का हक है. उन्होंने मजहबी मुकाम से ऊपर उठ कर विज्ञान के नजरिए से उसे देखा था.
पहले उन्होंने हिंदुस्तान, नेपाल, तिब्बत जा कर खुद योग की बारीकियों को सीखा था. फिर अपने मुल्क में आ कर लोगों को सिखाने लगे. शुरुआती दिक्कतों के बाद हजारों लोग उन से जुड़ गए और वह बन गए योगा टीचर. शमशाद हैदर ने कभी खुद भी नहीं सोचा था कि वह ऐसे मुकाम पर पहुंच जाएंगे. दरअसल मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे शमशाद हैदर पाकिस्तान के पंजाब सूबे के बाशिंदे थे. लेकिन वर्षों पहले उन के वालिदैन रावलपिंडी के नजदीकी शहर इस्लामाबाद में आ कर बस गए थे.
मर्गल्ला पहाड़ी के किनारे बसे करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस शहर को पाकिस्तान के महंगे शहर के रूप में जाना जाता है. इस शहर को पार्कों का नगर भी कहा जाता है. मशहूर पार्क फातिमा जिन्ना, जापानी पार्क, शकरपडि़आ यहीं पर हैं. यहां प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय भी है. सन 1992 के बाद की बात है. हैदर अपेंडिक्स के दर्द से पीडि़त हो गए. उन्होंने डाक्टरों को दिखाया. डाक्टरों द्वारा दी गई दवा से दर्द तो कुछ वक्त के लिए ठीक हो जाता था, लेकिन स्थाई समाधान नहीं हुआ. उस से वह तनावग्रस्त रहने लगे. वह आधाशीशी के दर्द से भी पीडि़त हो गए.
हैदर के लिए यह तकलीफों का दौर था. एक दिन उन्हें एक चिकित्सक ने बताया कि यदि वह अपने दिमाग और शरीर पर नियंत्रण कर लें, तो उन्हें समस्या से स्थाई राहत मिल सकती है. चिकित्सक ने सलाह तो दे दी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था. उन्होंने इस की पुरजोर कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सके. उन्हें किसी ने बताया कि योग एक ऐसी कला है, जिस के द्वारा इस तरह के मरीजों को लाभ मिल जाता है. पाकिस्तान में लोग योग को जानते तक नहीं थे. उन्होंने योग के बारे में थोड़ाबहुत पढ़ कर अपने स्तर से जैसा हो सकता था योग किया, इस से उन्हें फौरी राहत मिली, तो उन्होंने फैसला कर लिया कि वह न सिर्फ योग सीखेंगे बल्कि लोगों को भी सिखा कर उन्हें बीमारियों से निजात दिलाएंगे.
यह फैसला लेने के बाद उन्होंने योग विषय को पढ़ना शुरू किया. उन्होंने योग सीखने के लिए सब से पहले नेपाल और तिब्बत का रुख किया. वहां रह कर योग सीखा. इस से कुछ ही दिनों में उन्हें अपने अंदर ढेरों बदलाव महसूस हुए. योग के मामले में संस्कृति व आयुर्वेद प्रधान भारत देश आगे था. इस का एक बड़ा इतिहास था. यह बात उन्हें पता चल चुकी थी. हैदर की सोच थी कि इल्म जहां से भी मिले, उसे ले लेना चाहिए. नतीजतन उन्होंने योग की गहराइयों को जानने के लिए वीजा बनवा कर भारत का रुख किया. सन 2005 में वह विश्वविख्यात आध्यात्मिक गुरु सत्य नारायण गोयनका के नासिक के इगतपुरी स्थित सेंटर में आ गए.
भारत के अलावा कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड, बर्मा (अब म्यांमार), नेपाल समेत कई देशों में गोयनका के सेंटर थे. किसी पाकिस्तानी की योग में इस तरह रुचि देख कर वह भी हैरान हुए. उन्होंने उन्हें योग की बारीकियां पूरे मनोयोग से सिखाईं. नतीजतन एक दिन हैदर एक अच्छे योगी बन गए. पाकिस्तान आ कर हैदर चंद लोगों को योगासन सिखाने लगे. उन्हें लगा था कि यह बात किसी को नागवार नहीं गुजरेगी, लेकिन जब कट्टरपंथी लोगों को यह पता चला कि हैदर पड़ोसी मुल्क से योग सीख कर आए हैं तो उन के प्रति दिलों में नाराजगी बढ़ गई. कट्टरपंथियों के लिए जैसे यह नाकाबिले बरदाश्त था.
इंसान के पास ऐसा कोई हुनर नहीं होता कि वह लोगों के दिलों की बात जान कर हर किसी को खुश रख सके. हैदर को भी लगा कि सभी उन से संतुष्ट कैसे हो सकते हैं. परेशानी तब हुई जब एक दिन कुछ लोगों ने हैदर को बीच राह रोक लिया. पहली ही नजर में वह जान गए कि उन के इरादे नेक नहीं हैं. उन में से एक हैदर से मुखातिब हुआ, ‘‘सुना है आजकल लोगों को कुछ सिखा रहे हो मियां.’’
हैदर ने शांत अंदाज में जवाब दिया, ‘‘जी.’’ इतने में दूसरा शख्स सख्त लहजे में बोला, ‘‘जानते हो, तुम ऐसे मुल्क की बातें सिखा रहे हो जो हमारा सब से बड़ा दुश्मन है.’’
‘‘ऐसा नहीं है. लोगों को जो सिखा रहा हूं वह सिर्फ हिंदुस्तान की बात नहीं बल्कि सेहत को दुरुस्त रखने की एक कला है. अब आप ही बताओ कि अपनी सेहत को दुरुस्त रखना कौन सा गुनाह है?’’
‘‘जो भी हो सुधर जाओ हैदर मियां वरना यह तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा.’’ उन्होंने धमकी दी.
उन लोगों से ज्यादा उलझना हैदर ने ठीक नहीं समझा. इसलिए वह वहां से चुपचाप चले गए. लोग इस इतिहास को भी नहीं जानते थे कि योग के पुरातन गुरु पतंजलि का जन्म पाकिस्तान के ही मुलतान इलाके में हुआ था. हैदर ने कट्टरपंथियों के खौफ को अपने ऊपर काबिज नहीं होने दिया. उन्होंने ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी और अपने साथ अमन व सेहतमंद लोगों को जोड़ना शुरू कर दिया. धीरेधीरे उन्होंने एक समूह बना लिया. योग से लोगों को फायदा होना शुरू हुआ, तो वह हैदर की प्रशंसा करने लगे. एकएक कर के वह उन से जुड़ते चले गए.
समूह चीटियों का हो या इंसानों का, वह हमेशा ताकतवर होता है. हैदर के मामले में भी ऐसा ही हुआ. उन की पहचान बढ़ने लगी और वह छोटे पार्कों से ले कर बड़े ग्राउंड में जा कर योग सिखाने लगे. फिर उन्होंने इसे पेशे के तौर पर भी अपना लिया. जो लोग निजी तौर पर उन से योग सीखना चाहते थे, उन से उन्होंने फीस लेनी शुरू कर दी. हैदर से पुरुषों के अलावा कई महिलाएं व लड़कियां भी योग सीखती थीं. उन की शख्सियत एक अच्छे इंसान के रूप में थी. मोहब्बत का कोई वक्त, उम्र या जगह पहले से मुकर्रर नहीं होती. यह अपने आप हो जाया करती है.
योग सिखाने के दौरान ही हैदर की मुलाकात एक युवती शुमाइला से हुई. शुमाइला अस्थमा से पीडि़त थी और हर सुबह उन से योग सीखने आती थी. हैदर ने अपना ध्यान उन पर लगा दिया. शुमाइला को कुछ दिनों में बीमारी से निजात मिल गई. हैदर से वह खासी प्रभावित हुई. वक्त की रफ्तार के बीच दोनों ने एकदूसरे के दिलों पर कब चुपके से दस्तक दे दी इस का खुद उन्हें भी तब पता चला जब दीदार की चाह में उन की नजरें बेकरार रहने लगीं और दिलोदिमाग में बारबार एकदूसरे के खयाल आने लगे. मुलाकात के दौरान उन के दिल की धड़कनों में इजाफा हो जाता. चाहतों का अंदाज कभी बातों से तो कभी आंखों की गहराइयों से होता है.
आंखें अल्फाज नहीं देतीं, लेकिन बेजुबान हो कर भी बहुत कुछ बयां कर जाती हैं. बेकरारी बरदाश्त से बाहर होने लगी तो एक दिन दोनों ने इजहार भी कर दिया. दोनों के बीच मोहब्बत का पौधा खिला, तो हसरतों में ऐसा इजाफा हुआ कि उन्हें एकदूसरे में अपनी दुनिया नजर आने लगी. बेकरारी के करार के लिए दोनों परिवारों की रजामंदी से हैदर ने शुमाइला को सन 2012 में अपनी शरीक-ए-हयात बना लिया. अब उन की जिंदगी में जैसे खुशियों का दरख्त लहरा गया था. शुमाइला चूंकि खुद अच्छे से योग सीख चुकी थीं इसलिए उन्होंने भी महिलाओं को योग सिखाना शुरू कर दिया. योग को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने एक संस्था बना ली. फिर वक्त ने उन की ख्याति को एक बड़ा मुकाम बख्श दिया.
45 वर्षीय शमशाद की ख्याति मुसलिम योग अध्यापक के रूप में हो गई. उन की शोहरत योग गुरू के रूप में इतनी बढ़ गई कि अब संभ्रांत तबके के हजारों लोग उन से योग सीख रहे हैं. इन में कई विभागों के अधिकारी, इंजीनियर, डाक्टर, व्यवसाई व आम आदमी शामिल हैं. वह स्कूलों में जा कर भी बच्चों को योग की शिक्षा देते हैं. 10 हजार से ज्यादा छात्र उन से योग सीख कर आगे बढ़ रहे हैं. उन से योग सीखने वालों में राजनीतिज्ञ व पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के खिलाड़ी भी हैं. हैदर के शिष्यों में सिंध प्रांत चीफ मिनिस्टर सैयद कईम अली शाह और गवर्नर गुलाम मुस्तफा खार भी शामिल हैं.
इस्लामाबाद व लाहौर जैसे शहरों के पार्कों में मुसलिम लोगों का योग करना अब आम बात है. हजारों लोगों को योग सिखा कर पाकिस्तान में बड़ा नाम बन चुके अमनपसंद योगी शमशाद हैदर कहते हैं कि शह और मात व दुश्मनी का खेल कोई मजहब नहीं सिखाता. विज्ञान और प्रकृति कभी मजहबी नहीं होते. लोगों को मोहब्बत से रहना चाहिए. Social Story
—कथा पात्रों से बातचीत पर आधारित॒॒॒॒॒॒






