Bihar Crime News: 2 दशक पहले बिहार नक्सलियों के जिस कहर से आतंकित था, आतंक के वही पूत अब फिर से अपने पांव पसारने लगे हैं. कंस्ट्रक्शन कंपनी के 2 इंजीनियरों की हत्या के खौफनाक मंजर से यही लगता है कि बिहार में फिर से जंगलराज लौट आया है.
बिहार के दरभंगा जिले के शिवराम चौक से बरुआर होते हुए रसियारी पुल तक 120 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग-88 का काम पिछले 2 सालों से बड़ी तेजी से चल रहा है. 750 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली इस सड़क का ठेका बीसिनैया प्राइवेट लिमिटेड एंड चड्ढा एवं चड्ढा कंस्ट्रक्शन कंपनियों को दिया गया है. काम की मौनिटरिंग रोडिया कंसल्टैंट कंपनी कर रही है. इस मार्ग के बन जाने से सहरसा से राजधानी पटना की दूरी काफी कम हो जाएगी. वैसे तो सड़क निर्माण का यह काम अक्तूबर, 2015 तक पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन किसी वजह से यह तय समय में पूरा नहीं हो सका.
सरकार की नाराजगी से कंपनियां काम को जल्द से जल्द पूरा करने में लगी थीं. कंस्ट्रक्शन कंपनी के इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह 26 दिसंबर, 2015 की दोपहर को करीब डेढ़ बजे शिवराम चौक पहुंचे और काम की मौनिटरिंग कर के वहां पड़ी प्लास्टिक की कुरसी पर बैठ गए. रोडिया कंसल्टैंट कंपनी के फील्ड इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह उन्हीं के पास खड़े हो कर काम की निगरानी कर रहे थे. राष्ट्रीय राजमार्ग होने की वजह से छोटेबड़े वाहन आजा रहे थे. उसी समय विपरीत दिशा से 2 मोटरसाइकिलें आईं और इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह के पास रुक गईं. दोनों मोटरसाइकिलों पर 4 लोग सवार थे. सभी की उम्र 20-25 साल के बीच थी. उसी समय एक मर्सिडीज कार भी वहां आ कर रुक गई.
मोटरसाइकिलों से आए लड़कों में से एक ने इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह से धमकी भरे अंदाज में कुछ कहा तो उन्होंने भी उसे पलट कर जवाब दे दिया. इस के बाद दोनों में कहासुनी होने लगी. उसी बीच उस लड़के ने पिस्तौल निकाल कर उन के ऊपर 3 गोलियां दाग दीं. एक गोली सिर में और 2 गोलियां उन के पेट में लगीं. गोली चलते ही वहां खड़े इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह और बाकी कर्मचारी अपनी जान बचाने के लिए भागे. लेकिन बाकी के तीनों लड़कों ने दौड़ कर इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह को एके 47 से भून दिया.
इस के बाद उन लड़कों ने वहां एक परची फेंक दी और ‘बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जिंदाबाद’, ‘मुकेश पाठक जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए चले गए. बदमाशों के जाने के बाद इधरउधर दुबके कर्मचारी बाहर निकले. घायल मुकेश और ब्रजेश बुरी तरह से तड़प रहे थे. किसी कर्मचारी ने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के इस लोमहर्षक घटना की सूचना दी. सूचना मिलते ही थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद पुलिस बल ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने दोनों घायल इंजीनियरों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करने से जिले के उच्च पुलिस अधिकारियों को भी इस सनसनीखेज घटना की सूचना मिल गई थी. इसलिए एसएसपी ए.के. सत्यार्थी, एसपी (सिटी) हरकिशोर राय, डीएसपी दिलनवाज अहमद, डीएसपी (बेनीपुर) अंजनी कुमार, थाना सदर के थानाप्रभारी हरिमोहन प्रसाद, थाना बेंता के थानाप्रभारी सुरेंद्र पासवान और डौग स्क्वायड तथा फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंच गई थीं. दिल दहला देने वाली घटना की सूचना प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डीजीपी पी.के. ठाकुर तक भी पहुंच गई थी. एक महीने के भीतर इंजीनियरों के साथ हुई यह दूसरी बड़ी वारदात थी.
पुलिस ने मौके से 9 एमएम और एके 47 के 20 खोखे बरामद किए थे. सड़क निर्माण में जुटे चश्मदीदों से भी पुलिस ने पूछताछ की. घटनास्थल की जांच करने के बाद पुलिस अधिकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे और लाशों का निरीक्षण कर के उन्हें पोस्टमार्टम के लिए दरभंगा के जिला अस्पताल भिजवा दिया. इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह बेगूसराय के थाना सरलाही के गांव सोम्हो के और इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह रोहताश जिले के थाना डेयरी के गांव करमनगंज के रहने वाले थे. पुलिस ने दोनों के घर वालों को घटना की सूचना दे दी थी. ए.के. सत्यार्थी ने थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद को तत्काल निलंबित कर दिया और उन की जगह पर रामशंकर सिंह को बहेड़ी का थानाप्रभारी बनाया.
दरअसल, सीताराम प्रसाद ने बगैर सूचना दिए कंपनी के प्लांट से बीएमपी के जवानों को अचानक एक दिन पहले हटा कर नगर पार्षद के चुनाव की नामांकन ड्यूटी पर लगा दिया था. एसएसपी को इस मामले में उन की भूमिका संदिग्ध लगी, इसलिए उन्होंने उन के खिलाफ तत्काल काररवाई की थी. दिनदहाड़े 2-2 इंजीनियरों की हत्या के इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने डीजीपी पी.के. ठाकुर को आड़े हाथों लिया. उन्होंने सख्त हिदायत दी कि अपराधी कितने भी पावरफुल क्यों न हों, उन की गिरफ्तारी हर हाल में होनी चाहिए. इस के बाद दरभंगा जोन के आईजी अमित कुमार जैन ने पुलिस की 8 टीमें गठित कीं और इन का नेतृत्व एसएसपी शिवदीप लांडे को सौंप दिया.
घटनास्थल से हत्यारों की जो परची मिली थी, शिवदीप लांडे ने उसे जांच के लिए भेज दिया. 24 दिनों पहले 2 दिसंबर, 2015 को जिला शिवहर में इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद की हत्या के बाद पुलिस ने वहां से भी एक परची बरामद की थी. उस परची में भी ‘मुकेश पाठक जिंदाबाद’ का नारा लिखा था. परची की जांच में पता चला कि दोनों घटनाओं को मुकेश पाठक के गैंग ने ही अंजाम दिया था. कहने को तो पिछले 3 सालों से मुकेश पाठक गैंग का सरगना संतोझ झा गया जिले की जेल में बंद था, लेकिन वह जेल से ही अपना नेटवर्क चला रहा था. पिछले एक दशक से कुख्यात संतोष झा और मुकेश पाठक प्रदेश पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए थे.
शिवदीप लांडे ने पता लगा लिया कि मुकेश पाठक के गैंग में कौनकौन शामिल हैं. उन की तलाश में उन के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे मारे जाने लगे. इस का परिणाम यह निकला कि तीसरे दिन यानी 28 दिसंबर को पुलिस ने एक बदमाश पिंटू लालदेव को उस के गांव से गिरफ्तार कर लिया गया. पिंटू लालदेव बहेड़ी की ब्लाक प्रमुख मुन्नी देवी का देवर था. पुलिस को मुन्नी देवी के पति संजय लालदेव की भी तलाश थी, लेकिन वह फरार हो चुका था. मुन्नी देवी कुख्यात डान संतोष झा की बहन थी. पिंटू लालदेव को गिरफ्तार कर के पुलिस थाना बहेड़ी ले आई. सूचना मिलते ही ए.के. सत्यार्थी पूछताछ करने थाने पहुंच गए.
पुलिस ने उसे मुकेश पाठक और विकास झा उर्फ कालिया का फोटो दिखा कर पूछताछ शुरू की तो थोड़ी सख्ती के बाद उस ने स्वीकार कर लिया कि मुकेश पाठक और विकास झा उर्फ कालिया से उस के संबंध हैं और मुकेश पाठक के ही इशारे पर दोनों इंजीनियरों की हत्या की गई थी. पिंटू लालदेव के अपराध स्वीकार करने के बाद उसी दिन शाम को पुलिस लाइंस में ए.के. सत्यार्थी ने पत्रकारवार्ता आयोजित कर पत्रकारों के सामने आरोपी पिंटू लालदेव को पेश किया. इस के बाद उसे कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया.
पिंटू को जेल भेजने के बाद शिवदीप लांडे ने उसी रात 2 बजे सीतामढ़ी के थाना रुन्नीसैदपुर के गांव कमलदह की घेराबंदी कर के चंद्रकेतु झा को गिरफ्तार कर लिया. चंद्रकेतु भी इस दोहरे हत्याकांड में वांछित था. इस के पहले भी वह आर्म्स एक्ट में जेल जा चुका था.
चंद्रकेतु झा से की गई पूछताछ में उस के कई साथियों के नाम पुलिस को पता चले. इस के बाद उस की निशानदेही पर पुलिस ने अलगअलग जगहों से उस के 3 साथियों चंदन झा, अंचल झा और दिलीप झा को गिरफ्तार किया. सख्ती से की गई पूछताछ में उन्होंने घटना में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली. अंचल झा ने बताया कि इंजीनियरों की हत्या की योजना उसी के घर बनी थी. योजना को अंतिम रूप मुकेश पाठक, विकास झा उर्फ कालिया, टुन्ना झा, सुझोध झा, अभिषेक मिश्र, ऋषि झा, चंद्रकेतु झा, चंदन झा, दिलीप झा, पिंटू लालदेव और उस के बड़े भाई संजय लालदेव ने दी थी.
बदमाशों द्वारा दिए गए बयान के बाद दोहरे इंजीनियर हत्याकांड की तसवीर बिलकुल साफ हो गई. पता चला कि यह खूनी खेल गिरोह के दूसरे नंबर के खतरनाक बदमाश मुकेश पाठक के इशारे पर 75 लाख की रंगदारी न देने के एवज में खेला गया था. गिरोह के शार्प शूटर विकास झा उर्फ कालिया और अभिषेक मिश्र ने इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह और इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह की गोली मार कर हत्या की थी. इस के बाद पुलिस विकास और अभिषेक की तलाश में जुट गई.
पुलिस जांच के अनुसार, कुख्यात बदमाश मुकेश पाठक ने अपने साथियों विकास झा उर्फ कालिया, अभिषेक मिश्र आदि के साथ नेपाल में पनाह ले रखी थी. पुलिस ने इस बारे में नेपाल पुलिस से भी संपर्क किया. ए.के. सत्यार्थी को यह भी पता चला कि बदमाश कंपनी से पिछले 3 महीने से 75 लाख रुपए की रंगदारी की मांग कर रहे थे. घटना से एक सप्ताह पहले कंपनी के मैनेजर देवेश राठौर ने मौखिक रूप से इस की सूचना पुलिस को दी थी. मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने उसी दिन 6 बीएमपी के जवानों को सुरक्षा में लगा दिया था.
लेकिन थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद ने उन जवानों को पंचायत चुनाव की नामांकन ड्यूटी पर लगा दिया. इस के बाद यह घटना घट गई. पुलिस ने गिरफ्तार पांचों बदमाशों को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया था. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. इस कहानी के असली खलनायक माफिया डौन संतोष झा के बारे में जानना जरूरी है कि आखिर वह कौन है? बेहद कमजोर और डरडर कर जिंदगी जीने वाले संतोष झा के साथ ऐसा क्या हुआ कि गांव का एक सीधासादा नौजवान खतरनाक डौन बन गया? यहां उन पहलुओं पर रौशनी डालना बेहद जरूरी है.
37 वर्षीय संतोष झा बिहार के जिला शिवहर के पुरनहिया शहर के दोस्तियां गांव का रहने वाला था. वह एक मजदूर का बेटा था. बात उन दिनों की है, जब बिहार में नक्सलियों का बोलबाला था. इंसान गाजरमूली की तरह काटे जा रहे थे. जिस की लाठी में दम था, जयजयकार उसी की हो रही थी. जिस दोस्तियां गांव का संतोष झा रहने वाला था, उसी गांव में मुखिया नवल राय की तूती बोलती थी. उन की बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी. गांव में एक जमीन को ले कर संतोष के पिता और मुखिया नवल राय के बीच ठन गई. मुखिया उन की जमीन हथियाने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाने लगा.
संतोष उस समय किशोरावस्था की दहलीज पर था. मुखिया का जुल्म जब असहनीय हो गया तो नक्सली नेता गौरीशंकर झा ने संतोष के हाथों में लाल झंडा और बंदूक थमा दी. देखतेदेखते संतोष माओवाद का एक मजबूत स्तंभ बन गया. उसी समय वह माओवादी संगठन की नीतियों को भुला कर अपराध की डगर पर चल निकला.
माओवादियों को संतोष का काम नागवार लगा तो उन्होंने उसे संगठन से निकाल दिया. इस के बाद संतोष ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नामक संगठन बना लिया. इस संगठन से उस ने कमउम्र के अतिमहत्त्वाकांक्षी युवकों को जोड़ा. उन में ज्यादातर पढ़ेलिखे युवा थे. संतोष जिस समय माओवादियों के संगठन से जुड़ा था, उसी समय उस ने परशुराम सेना नामक एक और संगठन बनाया था. उस की कमान भी उसी के हाथ में थी. संगठन जब धन और अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो गया तो संतोष ने अपने दुश्मन मुखिया नवल राय से बदला लेने की योजना बनाई.
सन 1999 में रामनवमी पर नवल राय के घर के बाहर खाली मैदान में रामलीला हो रही थी. उस समय नक्सली नेता गौरीशंकर झा संतोष के साथ था. मौका मिलते ही उस ने नवल राय के ऊपर हमला बोल दिया. लेकिन इस हमले में नवल राय बालबाल बच गया. इस के बाद वह सतर्क हो गया. मगर संतोष मौके की फिराक में था. उस ने साथियों की मदद से 3 मार्च, 2003 को दोस्तियां स्थित नवल राय के मकान को डायनामाइट से उड़ा दिया. संयोग से इस हमले में भी नवल राय और उस का पूरा परिवार बालबाल बच गया.
9 महीने बाद 12 दिसंबर को संतोष ने दोबारा उस पर हमला करने की रणनीति बनाई. वह उसे मारने निकला तो किसी ने इस की मुखबिरी पुलिस से कर दी. जैसे ही वह रीगा के बराही पहुंचा, पुलिस के साथ उस की मुठभेड़ हो गई. इस मुठभेड़ में उसे कई गोलियां लगीं. इस के बावजूद वह भागने में सफल रहा. आज भी उस समय की लगी एक गोली उस के सीने में फंसी है. संतोष की बदले की आग अभी ठंडी नहीं हुई थी. नवल राय की हत्या की फिराक में वह लगा रहा. उस की हत्या तो वह नहीं कर सका, लेकिन सन 2004 में उस ने शिवहर जिले के थाना रीगा के बराही गांव के रहने वाले पूर्व मुखिया दिनेश सिंह को गोलियों से छलनी कर के मौत के घाट उतार दिया.
बेहद कमजोर और बेबस संतोष झा पूर्व मुखिया की हत्या कर के आतंक के पर्याय के रूप में जाना जाने लगा. लोगों के दिलों में उस के नाम का खौफ बैठ गया. लेकिन ज्यादा दिनों तक वह आजाद नहीं घूम पाया. पुलिस ने दिसंबर, 2004 में उसे पटना से गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. 5 साल जेल में रहने के बाद दिसंबर, 2009 में वह जमानत पर रिहा हो कर बाहर आया. जेल से बाहर आते ही वह मुखिया नवल राय के पीछे हाथ धो कर पड़ गया.
आखिरकार 15 जनवरी, 2010 को उस ने नवल राय को उसी के गांव में गोलियों से भून डाला. उस की हत्या करने के बाद जिले के अन्हारी कस्बा स्थित सेंट्रल बैंक के गार्ड की हत्या कर बैंक से लाखों रुपए लूट लिए. इन घटनाओं को अंजाम देने के बाद संतोष झा अपने गुरु और माओवादी नेता गौरीशंकर झा के पास लौट गया. गौरीशंकर झा ने संतोष को संगठन में यह कह कर लेने से मना कर दिया कि वह अपराध की डगर पर चल निकला है. गुरु की यह बात उसे काफी नागवार लगी और फिर 24 नवंबर, 2011 को उस ने अपने साथियों मुकेश पाठक, विकास झा उर्फ कालिया, ऋषि झा और लंकेश के साथ दोस्तियां पहुंच कर माओवादी नेता गौरीशंकर झा को मार दिया.
इस हमले में गांव के पूर्व मुखिया, उन की पत्नी देवता झा और बेटी भी बुरी तरह से घायल हो गई. संतोष झा के संगठन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ताकत उस समय दोगुनी हो गई, जब मुकेश पाठक ने उस के गैंग में कदम रखा. 32 वर्षीय मुकेश पाठक उर्फ चुटुल पाठक मूलरूप से मोतिहारी जिले के थाना मेहसी के मोरियाबाद गांव का रहने वाला था. मुकेश पाठक बचपन से ही काफी दबंग था. बातबात पर लड़ जाना उस की आदत थी. पुसाबाद, बरहरवा गांव के मुखिया चंद्रकिशोर ठाकुर उर्फ चुन्नू ठाकुर मुकेश के गुरु थे.
लेकिन एक किसी बात को ले कर मुखिया चंद्रकिशोर से उस की ठन गई थी. जिद्दी स्वभाव के मुकेश ने अपने साथियों ऋषि झा, श्यामसुंदर पाठक, पवन कुमार, गौतम ठाकुर और निकेश दुबे के साथ 11 दिसंबर, 2010 को मेहसी ब्लाक औफिस जा कर दिनदहाड़े मुखिया चंद्रकिशोर ठाकुर को गोलियों से भून डाला. दिनदहाड़े मुखिया की हत्या कर के मुकेश पाठक भी सुर्खियों में छा गया. संतोष झा की नजर मुकेश पर पड़ी तो उस ने उसे अपने गिरोह में शामिल कर लिया. गैंग में संतोष ने उसे सैकेंड बौस बना दिया.
अब संतोष और मुकेश मिल कर काम करने लगे. उन्होंने तय किया कि वे बड़ी कंपनियों को निशाना बनाएंगे, जहां से एक बार में करोड़ों रुपए वसूले जा सकें. उन्होंने उन बड़ीबड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों को टारगेट पर लिया, जिन के बजट कम से कम 500-600 करोड़ के होते थे. उन कंपनियों से वे उन के बजट का 10 प्रतिशत लेवी (रंगदारी, गुंडा टैक्स) के रूप में वसूलते थे. जिन कंपनियों ने उन की बात नहीं मानी या लेवी नहीं दी, वे उन के बेकसूर इंजीनियरों की हत्या कर के दहशत फैला देते थे. इस तरह इन के गैंग ने अब तक दरजन भर इंजीनियरों को मौत के घाट उतार दिया है.
स्पैशल औपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने आतंक के पर्याय बने संतोष झा और मुकेश पाठक को 17 फरवरी, 2012 को रांची के बूटी मोड़ से गिरफ्तार किया था. दोनों को शिवहर लाया गया था. सरगना संतोष को गया जेल में बंद कर दिया गया, जबकि मुकेश पाठक को शिवहर जेल में. शातिर मुकेश ने जेल में बंद के दौरान बीमारी का बहाना बनाया. जेल अधिकारियों ने इलाज के लिए उसे जिला अस्पताल में दाखिल करा दिया. 15 जुलाई, 2015 को पुलिस को चकमा दे कर वह अस्पताल से भाग गया.
तब से अब तक वह फरार चल रहा है. पुलिस रिकौर्ड में मुकेश पाठक की छवि उत्तर बिहार के शातिर अपराधियों की है. उस ने पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर और मुजफ्फरपुर में तमाम घटनाओं को अंजाम दिया है. 2 इंजीनियरों के हत्याकांड की जांच में बेहद चौंका देने वाली घटना खुल कर सामने यह आई कि इस डबल मर्डर केस के मुख्य अभियुक्त मुकेश पाठक की पत्नी पूजा गर्भवती है. वह भी अपहरण के किसी मामले में जेल में बंद है. पुलिस ने इसे गंभीरता से लिया है.
दरअसल, जेल में रहते हुए मुकेश पाठक ने पूजा से शादी की थी. दोनों की शादी अक्तूबर, 2013 में शिवहर जेल में जेल प्रशासन की निगरानी में हुई थी. पूजा मुकेश पाठक की दूसरी पत्नी थी. उस ने पहली पत्नी की हत्या कर दी थी. शादी के बाद दोनों को अलगअलग वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था. किसान की बेटी पूजा मुजफ्फरपुर के सकरा गांव की रहने वाली थी. पटना में रह कर वह पौलीटैक्निक कर रही थी. पैसों के लिए उस ने सन 2013 में अपने साथी कैलाश फौजी के साथ मिल कर एक दिन में 2 लोगों का अपहरण किया था. कैलाश फौजी भी मुजफ्फरपुर के सकरा का ही रहने वाला था.
अप्रैल में पूजा की डिलीवरी होने वाली थी. वह पुलिस की कड़ी निगरानी में है. पुलिस को लगता है कि पूजा की डिलीवरी के दौरान मुकेश पत्नी से मिलने जरूर आएगा, तभी उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. इसी बीच 3 मार्च, 2016 को पुलिस ने माफिया डौन संतोष झा के खास शूटर विकास झा उर्फ कालिया, करण झा, अभिषेक झा, पिंटु झा उर्फ बाबा और निकेश दूबे को अलगअलग जगहों से गिरफ्तार कर लिया है. विकास झा, पिंटू झा उर्फ बाबा और करण झा की गिरफ्तारी पर सरकार ने एकएक लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था.
पुलिस ने शिवहर की ब्लौक प्रमुख मुन्नी देवी और उस के पति संजय लालदेव को भी भादंवि की धारा 120बी के तहत गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया है. अब पुलिस को मुकेश पाठक की सरगर्मी से तलाश है. कथा लिखे जाने तक वह पुलिस की गिरफ्त से बहुत दूर था. Bihar Crime News
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






