Real Love Story Hindi: पाकिस्तान की रहने वाली ताहिरा ने मकबूल से निकाह के लिए लंबा इंतजार तो किया ही, पति के साथ रहने के लिए उन्होंने वह हर शर्त मान ली थी, जो भारत सरकार ने उन पर थोपी थी. उन में एक यह भी थी कि जब तक उन्हें भारतीय नागरिकता नहीं मिल जाती, वह कादियां से बाहर नहीं जाएंगी. आखिर उन्हें 13 सालों बाद अब जा कर नागरिकता मिली है.

100 बरस से ज्यादा पुरानी अहमदिया जमात का एक ही नारा है- ‘मोहब्बत सबलिए, नफरत किसी से नहीं.’ पाकिस्तान में इस संप्रदाय को इस्लामपरस्त नहीं माना जाता, जबकि भारत में इस जमात का अपना अहम रुतबा है. संयुक्त भारत के जिला स्यालकोट के रहने वाले चौधरी मंजूर अहमद इसी जमात के थे. इतना ही नहीं, वह दिनरात इस के प्रचारप्रसार में लगे रहते थे. वह अविवाहित थे और घरपरिवार की तरफ से उन के ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी. इसलिए उन का समय जमात के प्रचारप्रसार में ही गुजारता था.

भारतपाक विभाजन के समय चौधरी मंजूर अहमद अपने 313 साथियों को ले कर कादियां (भारत) आ गए थे. यहां आने के बाद भी वह अपने साथियों के साथ अपनी जमात का प्रचारप्रसार करने में लगे थे. देखतेदेखते 10 बरस का लंबा दौर गुजर गया. बात सन 1957 की है. धर्मप्रचार के एक कार्यक्रम के तहत मंजूर अहमद का लखनऊ जाना हुआ. वहीं पर बनारस के अब्दुल हकीम आए हुए थे. उस पहली मुलाकात में उन्हें मंजूर अहमद इस कदर भा गए कि उन्होंने अपनी बेटी खुर्शीदा हकैया का उन से निकाह करने का फैसला कर लिया.

बात चली तो सिरे चढ़ते देर नहीं लगी. इस तरह जल्दी ही उन दोनों का निकाह हो गया. खुर्शीदा से मंजूर अहमद को 2 बेटियों सलीमा व आतिया के अलावा 2 बेटे मकबूल अहमद और मंसूर अहमद हुए. इन में दूसरे नंबर पर पैदा हुए मकबूल का जन्म सन 1968 में हुआ था. अपने 4 बच्चों के साथ मंजूर अहमद बहुत खुश थे. बच्चों को दीनी तालीम के अलावा स्कूली शिक्षा भी दिलाई. मंजूर अहमद का इंतकाल हो जाने के बाद घरपरिवार की तमाम जिम्मेदारी उन के बेटे मकबूल अहमद के कंधों पर आ गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया भी.

इस बीच बड़ी बहन सलीमा का निकाह इंगलैंड में रहने वाले अहमद उर्फ मुन्नू के साथ हो गया था. मकबूल पत्रकारिता के क्षेत्र में आना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की. विभाजन के समय मंजूर अहमद के अधिकांश करीबी रिश्तेदार पाकिस्तान में ही रह गए थे. इसी वजह से मंजूर अहमद पत्नी के साथ कभीकभी पाकिस्तान भी जाते रहते थे. पति के इंतकाल के बाद खुर्शीदा बेगम भी अपने उन रिश्तेदारों से मिलने कई बार पाकिस्तान जा चुकी थीं. कई बार मकबूल भी उन के साथ पाकिस्तान गए थे. सन 1999 में भी मकबूल अहमद पाकिस्तान गए. इस बार उन के साथ उन की छोटी बहन अतिया भी थी.

मकबूल के एक फूफा डा. मोहम्मद अनवर फैसलाबाद में अपना क्लीनिक चलाते थे. वह कई बार इस बात की शिकायत कर चुके थे कि मकबूल पाकिस्तान आता है तो उन के घर नहीं ठहरता. लिहाजा मकबूल अहमद इस बार अतिया को ले कर सीधे उन्हीं के यहां चले गए. उस वक्त उन के यहां दावत चल रही थी, जिस में शरीक होने के लिए काफी लोग आए थे. उन्हीं में एक युवती भी थी, जिस की खूबसूरती ने मकबूल अहमद के दिल में खलबली मचा दी. बाद में पता चला कि वह युवती फैसलाबाद में निजी प्रैक्टिस करने वाले डा. जहूर अहमद की बेटी थी. डा. जहूर अहमद डा. मोहम्मद अनवर के करीबी दोस्त थे.

पहली नजर में दोनों एकदूजे के हो गए. मकबूल की बुआ नुसरत बेगम की अनुभवी आंखों ने झट से ताहिरा और मकबूल के दिलों का हाल पढ़ लिया था. उस वक्त ताहिरा की अम्मी नसीरा बेगम भी वहां मौजूद थीं. 5 बहनों और 3 भाइयों में ताहिरा छठे नंबर की थी. उन दिनों वह बीएससी में पढ़ रही थी. पार्टी खत्म होते ही ताहिरा अपनी अम्मी के साथ अपने घर चली गई. मकबूल को अपने फूफा के यहां ही रुकना था. मकबूल के लिए वह रात बितानी मुश्किल हो गई. रात भर उस की आंखों के आगे ताहिरा का ही चेहरा घूमता रहा. यही हाल ताहिरा का भी था.

हालांकि इस के बाद दोनों की छिटपुट मुलाकातें तो हुईं, लेकिन वे एकदूसरे से अपनी मोहब्बत का इजहार नहीं कर सके. वीजा अवधि खत्म होने के बाद मकबूल वापस भारत लौट तो आए, पर उन का दिल पाकिस्तान में ही रह गया. उसी दौरान मकबूल की बड़ी बहन सलीमा अपने शौहर के साथ कादियां आई. एक दिन इधरउधर की बातें चल रही थीं तो बात मकबूल के निकाह पर आ कर रुक गई. सलीमा ने कुछ लड़कियों की बातें अभी छेड़ी ही थीं कि मकबूल ने सीधे ताहिरा का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘आपा, आप लोग एक बार पाकिस्तान जा कर उसे देख आएं. उस के बाद आप जो फैसला करेंगी, मैं मान लूंगा.’’ इस के बाद ऐसा ही किया गया.

सलीमा और उस के पति अहमद उर्फ मुन्नू ताहिरा को देखने पाकिस्तान गए. ताहिरा की खूबसूरती और उस के व्यवहार ने उन दोनों का मन मोह लिया. ताहिरा उन्हें खूब पसंद आई. यह बात उन्होंने भारत लौट कर सभी को बता दी. ताहिरा के अब्बूअम्मी को भी जानकारी हो गई थी कि सलीमा उन की बेटी को अपने भाई के लिए पसंद करने आई थी. डा. जहूर अहमद और नसीरा बेगम को भी मकबूल पसंद था. लिहाजा इस रिश्ते को दोनों तरफ से मंजूरी मिल गई. ताहिरा और मकबूल की मुराद पूरी हो रही थी, इसलिए दोनों बहुत खुश थे.

इस के बाद ताहिरा और मकबूल अहमद फोन पर बातें करने लगे. दूसरी ओर खुर्शीदा बेगम पाकिस्तान जाने की योजना बनाने लगीं. आखिर मार्च, 2001 में खुर्शीदा बेगम मकबूल और अतिया को ले कर पाकिस्तान पहुंच गईं. इस बार ये लोग फैसलाबाद न जा कर लाहौर में अपनी एक रिश्तेदार आबिदा बेगम के यहां रुके थे. यह खबर उन्होंने डा. जहूर अहमद को भिजवाई तो वह अपनी पत्नी और बेटी ताहिरा को ले कर लाहौर पहुंच गए. वहीं पर एक सादा रस्म में मकबूल और ताहिरा की सगाई कर दी गई. इसी के साथ यह बात तय हो गई कि कादियां में निकाह पढ़वाया जाएगा. कादियां अहमदिया संप्रदाय का एक पवित्र स्थान है.

सगाई के बाद मकबूल अपनी अम्मी और बहन के साथ भारत लौट आए. ताहिरा भी फैसलाबाद चली गई. अब ताहिरा का पासपोर्ट बनना जरूरी था, जिसे बनने में करीब 9 महीने लग गए. मकबूल के परिवार वालों ने दिसंबर, 2001 में निकाह करने का फैसला करते हुए ताहिरा को हिंदुस्तान आने का न्योता भिजवा दिया. ताहिरा के परिवार वालों ने भी निकाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं. ताहिरा अपने घर वालों के साथ हिंदुस्तान के लिए रवाना होती, उस से पहले 13 दिसंबर को भारतीय संसद पर आतंकी हमला हो गया.

पुलिस के हाथ लगे सबूतों से यह बात सिद्ध हो गई कि हमला करने वाले आतंकवादियों का संबंध पाकिस्तान से था. इस के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ राजनैतिक व व्यापारिक संबंध तोड़ने के अलावा यातायात से जुड़े सभी रास्ते सील कर दिए. रास्ते सील होने से न कोई भारत से पाकिस्तान जा सकता था और न ही कोई पाकिस्तान से भारत की सीमा में दाखिल हो सकता था. इस से ताहिरा की भारत आने की तैयारी धरी की धरी रह गई. उस ने तत्काल मकबूल को फोन किया. इस के बाद दोनों 3 दिनों तक एकदूसरे को बारबार फोन कर के आश्वस्त करते रहे कि उन का प्यार सच्चा है, उन्हें अपना मुकाम जरूर हासिल होगा.

16 दिसंबर को जब भारतपाकिस्तान के बीच दूरसंचार पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया तो दोनों प्रेमी तड़प कर रह गए. वे जो फोन द्वारा बातचीत कर लेते थे, वह भी बंद हो गई. अब तड़पने के अलावा वे कुछ नहीं कर सकते थे. अपना दर्द एकदूसरे से कहने का भी उन के पास कोई जरिया नहीं रह गया था. मकबूल और ताहिरा ने यादों में तड़प कर 2 बरस का लंबा अरसा गुजार दिया. इस के बावजूद भी उन के दिलों में पुनर्मिलन की आस बरकरार थी. मगर उन के घर वालों को अब इस बात का कतई भरोसा नहीं रहा था कि आगे यह निकाह कभी हो सकेगा.

उन्होंने इसे कुदरत के अजब संयोग का खेल मान लिया. लिहाजा दोनों के घर वालों ने उन्हें समझाना भी शुरू कर दिया कि वे एकदूसरे को भूल कर कहीं और निकाह कर लें. पर इस के लिए न तो ताहिरा राजी हुई और न ही मकबूल. दोनों ने साफ कह दिया कि वे भले उम्र भर कुंवारे बैठे रहेंगे, लेकिन किसी अन्य से निकाह करने की बाबत सोच भी नहीं सकते.

सरहद पर लगी तमाम पाबंदियों को देखते हुए मकबूल ने अपनी महबूबा तक पहुंचने का दूसरा जरिया खोजा. उन्होंने अपने हिस्से की कुछ जमीन बेच दी और वह यूरोप पहुंच गए. लेकिन वहां से भी उन्हें पाकिस्तान जाने की अनुमति नहीं मिल पाई तो वह इंगलैंड में रह रही अपनी बड़ी बहन सलीमा के पास पहुंच गए. यह बात जुलाई, 2002 की है.

इंगलैंड से मकबूल ने ताहिरा को फोन किया. फोन पर उन की काफी दिनों बाद बात हुई थी. इसलिए अपने दिलों का हाल बयां करते समय उन की आंखें छलक आईं. उसी समय मकबूल ने ताहिरा को सुझाव दिया, ‘‘ताहिरा मुझे नहीं लगता कि हमारे मुल्कों के रिश्तों में जल्दी कोई सुधार होगा. इसलिए मेरी मानो, तुम पाकिस्तान में ही किसी अच्छे लड़के से निकाह कर लो.’’

इतना कह कर मकबूल ने फोन बंद कर दिया. मकबूल की बात सुन कर ताहिरा तड़प कर रह गई. इस के बाद तो मकबूल को पाने का उस का इरादा और भी पुख्ता हो गया. उसी दौरान सितंबर, 2002 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने की फिर से पहल की. उसी साल नवंबर में एक और बात हुई. ‘इंडो-पाक दोस्ती मंच’ का सेमिनार हुआ तो इस में पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल, पत्रकार कुलदीप नैयर और पंजाब के तत्कालीन वनमंत्री तृप्त राजेंद्र सिंह के अलावा मकबूल अहमद भी शिरकत करने पहुंचे.

दोनों देशों के बीच तनाव के चलते आने वाली परेशानियों के विषय पर बातचीत करते हुए मकबूल ने अपनी प्रेमकहानी की अधूरी दास्तान का भी शिद्दत से बखान कर डाला. इस का नतीजा यह निकला कि ताहिरा और मकबूल की प्रेमकथा मीडिया की जानकारी में आ गई. फलस्वरूप तमाम अखबारों ने इसे त्रासद कथा के रूप में प्रमुखता से छापा. भारतपाकिस्तान के अलावा अन्य देशों की मीडिया को भी इस अनूठी प्रेमगाथा ने आकृष्ट किया. इसी दौरान दोनों देशों के बीच चलने वाली सदभावना बस सदा-ए-सरहद फिर से शुरू कर दी गई और दूरभाष सेवा पर लगा प्रतिबंध भी हटा दिया गया. इन युवा प्रेमियों के लिए यह खबर बहुत अच्छी रही. मकबूल ने ताहिरा से कह दिया कि वह तुरंत उसी बस से भारत चली आए.

मकबूल का निमंत्रण पाते ही ताहिरा ने पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास से वीजा के लिए संपर्क किया. पर दूतावास ने यह कहते हुए ताहिरा को कादियां का वीजा देने से मना कर दिया कि अभी उस की वहां शादी नहीं हुई है. ताहिरा ने उसी दिन यह बात मकबूल को बता दी. मकबूल ने समय गंवाए बिना किसी तरह गृह मंत्रालय से संपर्क किया तो उसे बताया गया कि अगर वह अपनी जिम्मेदारी पर ताहिरा को कादियां लाना चाहता है तो गृह मंत्रालय से उसे विशेष अनुमति मिल सकती है, अलबत्ता अनुमति मिलने में खासा वक्त लगेगा. मकबूल अब और ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहते थे, लिहाजा उन्होंने इस संबंध में अपनी लिखित फरियाद विभिन्न विभागों के उच्चाधिकारियों के अलावा कई राजनेताओं एवं अखबारों को भी भेज दी.

उन्होंने पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास में भी यह फरियाद भिजवाई. इस के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल से मकबूल ने खुद मुलाकात की. इंद्रकुमार गुजराल ने उन की मदद करने का आश्वासन दिया. मकबूल की अपनी कोशिश जारी थी तो वहां पाकिस्तान में ताहिरा भी चुप नहीं बैठी थी. वह भी लगातार भारतीय दूतावास के अधिकारियों से मिल कर अपनी समस्या का हल निकालने की कोशिश कर रही थी.

आखिर उन की कोशिशें रंग लाईं. ताहिरा को 14 अक्तूबर, 2003 से ले कर 14 दिसंबर, 2003 यानी 2 महीने का कादियां में रहने का वीजा मिल गया. लेकिन आगे एक नई समस्या और उन के सामने आ खड़ी हुई. समस्या यह थी कि सद्भावना बस ‘सदा-ए-सरहद’ में अगले 2 महीने तक एक भी सीट खाली नहीं थी. इस के बावजूद ताहिरा ने उम्मीद नहीं छोड़ी. इत्तेफाक से एक शख्स ने किसी वजह से इस बस का अपना टिकट एक दिन पहले निरस्त करा लिया. इस के बाद वह सीट ताहिरा को अलौट कर दी गई.

ताहिरा ने इस बात की खबर मकबूल को दे दी. अब ताहिरा की खुशी का ठिकाना नहीं था. वह भारत आने की तैयारी में जुट गई. आखिर 28 अक्टूबर, 2003 की सुबह करीब 6 बजे हिंद-पाक के बाघा बौर्डर पर सदभावना बस आ कर रुकी तो मकबूल की खुशी का पारावार न रहा. बस नंबर एलएक्सएक्स 2425 से उतर कर ताहिरा मकबूल की बगल में आ खड़ी हुई तो वहां 2 देशों की सुकोमल भावनाओं के अनूठे दृश्य का अद्भुत मंजर पैदा हो गया. कुछ लोगों ने आगे बढ़ कर उन्हें फूलमालाएं पहनाते हुए उन का अभिनंदन किया तो अनेक प्रैस फोटोग्राफरों ने उन्हें अपने कैमरों में कैद कर लिया.

‘सदा-ए-सरहद’ बस लाहौर और दिल्ली के बीच चलती है. बाघा बौर्डर पर यह कस्टम क्लीयरेंस के लिए रुकती जरूर है, लेकिन इस का कोई भी यात्री वहां उतारा नहीं जाता. सुरक्षागाडि़यों के बीच चलने वाली इस बस पर सवार सभी सवारियों को बस के अंतिम पड़ाव पर ही उतारा जाता है. मकबूल के साथ बाघा बौर्डर पर हुई कुछ देर की मुलाकात के बाद ताहिरा फिर से बस में बैठ गई. बस के चलते ही मकबूल ने अपने भाई मंसूर अहमद को भी टैक्सी से दिल्ली के लिए रवाना कर दिया.

दिल्ली में बस से उतरते ही ताहिरा को पत्रकारों ने घेर लिया. उस दिन सभी चैनलों पर ताहिरा ही छाई रही. 28 अक्तूबर को वह दिल्ली में रुकी. इस के अगले दिन मंसूर अहमद उसे शताब्दी एक्सप्रैस से अमृतसर ले गया. अमृतसर से ये लोग टैक्सी कर के कादियां पहुंचे. वहां ताहिरा को अतिया के साथ रखा गया. दोनों घरों के बुजुर्गों ने अलगअलग देशों में बैठे होने पर भी ताहिरा और मकबूल के निकाह की तारीख 7 नवंबर, 2003 मुकर्रर कर दी. लेकिन लाख चाहने के बावजूद इस तारीख को भी निकाह नहीं हो पाया, क्योंकि ताहिरा के घर वालों को भारत आने के लिए वीजा नहीं मिल पाया था.

लिहाजा यह तारीख मुल्तवी कर दी गई और ईद के तुरंत बाद दोनों का निकाह करना तय किया गया. ईद भी 26 नवंबर, 2003 की थी. ईद के बाद भी उन का निकाह नहीं हो सका. वजह वही थी, ताहिरा के घर वालों को वीजा न मिलना. उधर ताहिरा के वीजा की अवधि समाप्त होने के दिन तेजी से नजदीक आ रहे थे. आखिर दोनों परिवारों की सहमति से यही तय किया गया कि ताहिरा के अभिभावकों की गैरमौजूदगी में ही 7 दिसंबर, 2003 को उस का निकाह मकबूल से कर दिया जाए. इस के लिए स्थानीय अभिभावकों की व्यवस्था की गई.

उसी दिन कादियां में स्थानीय लोगों को एक अलग ही नजारा देखने को मिला. निकाह के मौके पर मकबूल अहमद ने बिसकुटी रंग का कुरतापायजामा पहन रखा था, ऊपर से आकर्षक जालीदार टोपी भी पहन रखी थी. आकर्षक लिबास पहने और हाथों में मेहंदी रचाए ताहिरा भी किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. सभी धर्मों के लोग इस खुशी में शरीक होने को इकट्ठा थे. कादियां निवासी डा. बशीर अहमद के घर बाराती मेहमानों के खानपान का इंतजाम था. ताहिरा के पिता डा. जहूर अहमद की गैरमौजूदगी में उन के वकील के रूप में हिंदुस्तानी जमाते अहमदिया के मुख्य सचिव साहिबजादा मिर्जा वसीम अहमद ने 25 हजार रुपए की हक मेहर की जमानत पर रस्म अदायगी के तहत हामी भरी.

इन्हीं मिर्जा साहिब ने निकाह कुबूल करवाया और पढ़वाया भी. ऐसा लग रहा था, जैसे निकाह की यह रस्म 2 इंसानों के बीच न हो कर, 2 मुल्कों के बीच संपन्न हो रही हो. इस में कोई शुबहा भी नहीं था. दुलहन पाकिस्तान की थी और दूल्हा हिंदुस्तानी. इस निकाह से 2 देशों का मिलन ही तो हो रहा था. कादियां की मसजिद मुबारक में संपन्न इस ऐतिहासिक निकाह और दूल्हादुलहन के अटूट बंधन की खातिर सैकड़ों लोगों ने नमाज अता की और दुआ मांगी. कादियां के अहमदिया ग्राउंड में हिंदू भाइयों ने कादियां पहुंचे हर शख्स के लिए खानपान की अच्छी व्यवस्था कर रखी थी.

अनूठे निकाह के इस अवसर पर साहिबजादा मिर्जा वसीम अहमद की बेगम अमतुल कदूस ने ताहिरा की मां की भूमिका अदा की. अमृतसर की डा. हरसुचेतन, डा. दलजीत कौर व सलीमा बानो ने ताहिरा की बहनों की भूमिका निभाई. इस तरह तमाम रस्में पूरी कर दोपहर के भोजन के बाद ताहिरा की डोली कादियां के जानेमाने समाजसेवी डा. बशीर अहमद के घर से उठी. मकबूल के घर पर दुलहन के इंतजार में सब पलकें बिछाए खड़े थे. इस मौके पर दुनिया भर से कादियां पहुंचे पत्रकारों से ताहिरा ने नम आंखों से इतना ही कहा था, ‘‘हिंदुस्तानियों जैसी मोहब्बत की मिसाल कहीं नहीं मिल सकती. मेरे परिवार का एक भी सदस्य यहां न होने के बावजूद मुझे अहसास तक नहीं हुआ कि मैं यहां अकेली हूं.’’

मगर यह खुशनसीबी फिलहाल एक हफ्ते की थी. 14 दिसंबर को वीजा की अवधि समाप्त होने पर ताहिरा को भरे मन से वापस पाकिस्तान लौट जाना पड़ा. इस के बाद कुछेक बार अपनी दुलहन से मिलने मकबूल पाकिस्तान गया और कुछेक बार ताहिरा हिंदुस्तान आई. यह वाजिब हल नहीं था. मुस्तकिल तौर पर एकसाथ रहने को जरूरी था कि दोनों में से कोई एक अपने मुल्क की नागरिकता छोड़ कर दूसरे मुल्क की नागरिकता हासिल कर ले. ताहिरा ने ससुराल में रहने के लिए हिंदुस्तान की नागरिकता लेने की इच्छा जताई. इस संबंध में उस ने कागजी काररवाई शुरू कर दी.

लेकिन उस के आवेदन पर आपत्ति लग गई. इस की वजह यह थी कि नागरिकता हासिल करने की अर्जी दाखिल करने से पहले ताहिरा को एक साल का वीजा ले कर इतने समय तक लगातार कादियां में रहना था. पर उस ने ऐसा नहीं किया था. बाद में अर्जी स्वीकार हुई तो उस के सामने शर्त रखी गई कि आगे वह कम से कम 7 सालों तक हिंदुस्तान में रहेगी. वीजा की शर्तों के मुताबिक वह कादियां से बाहर नहीं जा सकेगी और अगर वह कादियां से बाहर गई तो उसे गिरफ्तार कर वापस पाकिस्तान भेज दिया जाएगा. ताहिरा पति के साथ रहने के लिए हर शर्त मानने को तैयार थी. वह नियमानुसार कादियां पहुंच गई.

सभी शर्तों का उस ने बड़ी शिद्दत से पालन किया. एक लंबे अरसे तक वह कादियां की चारदीवारी के भीतर अपने पत्नी धर्म का पालन करती रही, साथ ही उस ने भारतीय नागरिकता हासिल करने के अपने प्रयास भी जारी रखे. इस संबंध में मकबूल अहमद लगातार भागदौड़ कर रहे थे. इस दौरान ताहिरा 2 बेटियों समायला मकबूल व सूफिया मकबूल के अलावा बेटे मग्फर मकबूल की मां बन गई. ताज्जुब की बात यह रही कि जहां इन तीनों बच्चों को भारतीय नागरिकता हासिल हो गई थी, वहीं ताहिरा अभी भी पाकिस्तानी नागरिक थी.

खैर, इन की मेहनत रंग लाई. करीब 13 सालों के लंबे इंतजार के बाद 11 अप्रैल, 2016 को ताहिरा को भारत के गृह मंत्रालय से सूचना मिली कि उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान करने संबंधी उपायुक्त, गुरदासपुर को लिख दिया गया है. इस संबंध में वह सीधे जा कर उन से मिल सकती हैं. उपायुक्त अभिनव त्रिखा पहले ही इस दंपति का सहयोग कर रहे थे. उन के पास संबंधित पत्र पहुंचा भी नहीं था कि गुरदासपुर से उन का तबादला हो गया. उपायुक्त के रूप में आए प्रदीप सब्बरवाल को गृह मंत्रालय का पत्र मिला तो उन्होंने ताहिरा को बताया कि अब बहुत जल्दी उन्हें भारत की नागरिकता का प्रमाण पत्र दे दिया जाएगा. इस के आधार पर वह अपना भारतीय पासपोर्ट भी बनवा सकेंगी.

खुद को खुशनसीब मानते हुए अब ताहिरा बेहद उत्साहित हैं. उन का कहना है कि भारतीय नागरिकता का प्रमाण पत्र हासिल होते ही वह कादियां से निकल कर सब से पहले मोहब्बत के प्रतीक ताजमहल का दीदार करेंगी. इस के बाद भारत के अन्य दर्शनीय स्थलों को देखने जाएंगी. भारतीय पासपोर्ट बन जाने पर वह पति व बच्चों के साथ पाकिस्तान का भी चक्कर लगा कर आएंगी. ताहिरा इस बात पर गर्वित भी थीं कि भले 13 सालों बाद ही सही, आखिर वह हिंदुस्तानी तो बन ही गईं. Real Love Story Hindi

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