Social Story. एक समय था जब 20 साल विधायक रहे बाहुबली विजय मिश्रा की पूरे इलाके में तूती बोलती थी और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से गहरी नजदीकियां थीं. उस के अपराधों का घड़ा फूटते ही वह सजा के भंवर में फंसता जा रहा है. विजय मिश्रा ही नहीं बल्कि उस का पूरा परिवार पत्नी रामलली, बेटा विष्णु मिश्रा और बहू रूपा अलगअलग जेलों में ऐसेऐसे अपराधों की सजा काट रहे हैं कि…
उत्तर प्रदेश के जिला भदोही का एक गांव है धानापुर, जो वाराणसी से लगभग 50 किलोमीटर दूर है. इसी गांव में बाहुबली विजय मिश्रा का जन्म हुआ था. तब भदोही जिला नहीं था. भदोही वाराणसी का एक हिस्सा था. यह कालीन उद्योग के लिए जाना जाता था. भदोही-मीरजापुर मंडल से लगा है, इसलिए यहां खनन माफिया भी खूब हैं.
विजय मिश्रा तेज तो बहुत था, लेकिन गरीब परिवार में पैदा होने की वजह से ज्यादा पढ़ नहीं पाया. बचपन से उस ने देखा था कि जिस की बांहों में दम है, वह यहां मजे कर रहा है. विजय ने भी हिम्मत दिखाई और ट्रांसपोर्ट के कारोबार के साथ खनन के ठेके लेने लगा.
विजय को पाने की अपेक्षा छीनने में ज्यादा विश्वास था. उसी का परिणाम है कि आज पूरा का पूरा परिवार जेल में है, क्योंकि उस की इस छीनने की प्रवृत्ति में पूरे परिवार ने उस का साथ दिया था.
उस की इसी प्रवृत्ति का नतीजा है कि 15 मई, 2026 को भदोही की एमपी-एमएलए अदालत ने पूरे परिवार को सजा सुनाई है. उस में घर के मुखिया विजय मिश्रा, उस की पत्नी रामलली और बहू रूपा मिश्रा शामिल हैं. सजा सुनाए जाने के बाद रामलली और रूपा को ज्ञानपुर जेल भेजा गया है. जबकि विजय मिश्रा आगरा और उस का बेटा विष्णु लखीमपुर जेल में पहले से बंद है.
मामला 4 अगस्त, 2020 का है. विजय मिश्रा के एक रिश्तेदार कृष्ण मोहन तिवारी ने थाना गोपीगंज में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि विजय मिश्रा और उस के परिवार ने उन के साथ 1,500 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करने के साथ उन की 50 बीघा जमीन, 6,000 स्क्वायर फुट का मकान, करीब एक बीघे में बनी बैठक हथिया ली है.
इस मामले में अदालत ने विजय मिश्रा और उस के परिवार को दोषी मानते हुए सभी को सजा सुनाने के साथ सभी पर 50-50 हजार रुपए का जुरमाना भी लगाया.
इस मामले के अलावा साल 2017 में विजय मिश्रा और उस की पत्नी पर आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप लगा था. जांच में पता चला कि साल 2002 से 2017 के बीच यानी 15 सालों में कुल आय 2 करोड़ 32 लाख 33 हजार 593 रुपए की पाई गई. जबकि इस दौरान इन्होंने 32 करोड़ 81 लाख 98 हजार 284 रुपए की संपत्ति अर्जित की थी.
एक समय भदोही जिले की पहचान विजय मिश्रा के नाम से होती थी. बाहुबली विजय मिश्रा का रसूख ऐसा था कि वह लगातार 20 सालों तक विधायक बनता रहा. विजय भदोही और मिर्जापुर की सियासत में उस मुकाम पर था कि अपनी सीट जीतने के साथ दूसरी अन्य सीटों पर भी पार्टी को जिताने का वादा मुख्यमंत्री से कर लेता था. फिर जो वादा करता था, उसे पूरा कर के भी दिखाता था. इस दबदबे के पीछे अगर कुछ था तो वह था उस का आपराधिक चेहरा.
एकएक कर के उस पर 65 मामले दर्ज हो चुके थे, लेकिन मजे की बात यह थी कि उत्तर प्रदेश के अन्य बाहुबलियों की तरह उसे भी पुलिस सजा नहीं दिला पा रही थी. लेकिन जब आदमी का बुरा समय आता है तो उसे कोई नहीं बचा पाता. यही हाल विजय मिश्रा का भी हुआ.
आज विजय तो उम्रकैद की सजा काट ही रहा है, उस का पूरा परिवार जेल में है. बेटा रेप केस में 10 साल की सजा काट रहा है तो पत्नी को भी 10 साल की सजा हुई है. बहू रूपा भी 4 साल के लिए जेल भेज दी गई है.
इस तरह परिवार का कोई भी सदस्य जेल के बाहर नहीं है. जिस विजय मिश्रा का पूर्वांचल की सियासत में एक समय दबदबा था, वह आज पूरी तरह बिखर गया है.
ऐसे बढ़ता गया रुतबा
बात साल 1980 की है. तब भदोही जिला नहीं बना था. यह इलाका वाराणसी जिले में आता था. यहां रहने वाले कमलापति त्रिपाठी साल 1971 से 1973 तक कांग्रेस पार्टी से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे.
ब्राह्मण वर्ग में उन का बहुत सम्मान था, लेकिन दबदबा नहीं था. राजनीति में ब्राह्मणों का फिर से दबदबा हो, इस के लिए इलाके के लोग विजय मिश्रा को आगे लाना चाहते थे. क्योंकि तब विजय ने इलाके में अपना दबदबा कायम कर लिया था. वह खनन के ठेके लेने के साथ ट्रक चलवाता था, साथ ही उस के कई पेट्रोल पंप भी थे.
पहले तो उस ने अपने कारोबार के चलते राजनीति में आने से मना कर दिया, लेकिन जब कमलापति त्रिपाठी ने खुद उस से राजनीति में आने को कहा तो वह चुनाव लडऩे को तैयार हो गया. उस समय ब्लौक प्रमुख के चुनाव हो रहे थे. डीघ ब्लौक से बाहुबली उदयभान सिंह उर्फ डौक्टर के खास अभय राज सिंह चुनाव लड़ रहे थे. यह चुनाव अभय राज सिंह 2 वोट से जीत गए.
इस के बाद जब जीत का जश्न मनाया गया तो ब्राह्मणों को लक्ष्य करते हुए काफी अपशब्द बोले गए. यह इलाका भूमिहार बाहुल्य है. भूमिहार संपन्न भी हैं और दमदार भी. उस समय उदयभान सिंह उर्फ डौक्टर का दबदबा था, इसलिए विरोध में कोई कुछ बोल नहीं सका.
अब तक विजय मिश्रा भी राजनीति में आ चुका था, इसलिए ब्राह्मणों को लगने लगा था कि अभय का मुकाबला विजय मिश्रा ही कर सकता है. इसलिए सारे ब्राह्मण विजय के समर्थन में कूद पड़े. विजय खेतीकिसानी के बाद ट्रांसपोर्ट और खनन का कारोबार करने लगा था.
विजय मिश्रा ने 90 के दशक में पहली बार ब्लौक प्रमुख का चुनाव लड़ा. विजय के पास पैसा था ही, इसलिए पैसा पानी की तरह बहाया. पैसे के बल पर सारे बीडीसी प्रत्याशियों को उठवा लिया और एकतरफा चुनाव जीत लिया.
ब्लौक प्रमुख बनने के बाद उस का कौन्फिडेंस बढ़ गया. ब्लौक प्रमुख का चुनाव जीत कर उस ने तय किया कि अब वह जिला पंचायत अध्यक्ष की कुरसी पर बैठेगा. इस में रुतबा भी है और पैसा भी. क्योंकि जिले के विकास का जितना पैसा आता है, वह जिला परिषद के माध्यम से ही खर्च होता है.
साल 1994 में भदोही जिला बन गया था. उस समय शिवकरण यादव उर्फ काके जिला पंचायत अध्यक्ष था. वह अकसर मुलायम सिंह यादव को उलटासीधा बोला करता था, इसलिए मुलायम सिंह ने विजय मिश्रा पर बड़ा दांव खेलते हुए उस के मुताबिक जिला पंचायत सदस्यों के 3 टिकट दे दिए. विजय ने भी नेताजी को निराश नहीं किया.
उस ने वे तीनों सीटें सपा की झोली में डाल दीं. यही नहीं, उस ने पूरा समीकरण ऐसा घुमाया कि सपा का जिला पंचायत अध्यक्ष भी बनवा दिया. इस के बाद मुलायम सिंह की नजरों में विजय मिश्रा की इज्जत बढ़ गई.
साल 2002 में मुलायम सिंह ने विजय मिश्रा को लखनऊ बुलाया. तब बातचीत के दौरान विजय मिश्रा ने मुलायम सिंह से कहा कि वह ज्ञानपुर से विधायक का चुनाव लडऩा चाहता है. तब मुलायम सिंह ने कहा कि अगर वह अपनी सीट के साथ हंडिया से महेश नारायण सिंह और मिर्जापुर से कैलाश चौरसिया को भी जीत दिलवाने का वादा करे, तब वह उसे टिकट दे सकते हैं.
विजय मिश्रा सक्षम था और खुद पर पूरा विश्वास था, इसलिए उस ने वादा कर लिया. चुनाव हुआ तो विजय ने ज्ञानपुर की विधानसभा सीट से भाजपा के गोरखनाथ पांडेय को 7,652 वोटों से हरा दिया. खुद तो चुनाव जीता ही, हंडिया से महेश नारायण सिंह और मिर्जापुर से कैलाश चौरसिया को भी बड़े अंतर से चुनाव जितवा दिया.
हत्या का लगा आरोप
विजय मिश्रा चुनाव तो जीत गया, लेकिन यहां एक पेंच भी फंस गया. जिस दिन वोट पड़ रहे थे, उसी दिन एक बूथ पर भाजपा प्रत्याशी गोरखनाथ पांडेय के भाई रामेश्वर पांडेय की हत्या हो गई.
हत्यारे गोरखनाथ पांडेय को मारने आए थे. उन की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग की गई, लेकिन उस दिन उस गाड़ी में रामेश्वर पांडेय बैठे थे और गोरखनाथ पीछे वाली गाड़ी में बैठे थे. इसलिए गोरखनाथ बच गए और रामेश्वर पांडेय मारे गए.
रामेश्वर पांडेय की हत्या का आरोप विजय मिश्रा पर लगा, लेकिन सबूत न मिलने पर अदालत ने विजय को बाइज्जत बरी कर दिया था. गोरखनाथ ने भाई के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए काफी संघर्ष किया.
मानवाधिकार आयोग ने दोबारा फाइल खोल दी है, जिस की जांच अभी भी चल रही है. विजय मिश्रा के पास 2 नंबर का पैसा था. खनन के ठेकों से अंधाधुंध पैसा आ रहा था. उस इलाके में क्या मजाल कि कोई दूसरा ठेका ले ले.
वह पैसा दोनों हाथों से खर्च करता था, इसलिए उस का रसूख बढ़ता ही जा रहा था. वह मंच पर नेताओं को फूलों की माला नहीं, बल्कि सोने की चेन पहनाता था. चेन का वजन नेता के कद के अनुरूप होता था. विजय के रुतबे की झलक उस की चुनावी रैलियों में दिखाई देती थी.
मजे की बात यह थी कि वह अपने कीपैड फोन में किसी का नंबर सेव नहीं करता था, वह सारे नंबर याद रखता था. वह कीपैड वाला ही फोन चलाता था. वह बहुत कम लोगों के नंबर सेव करता था. इस की वजह यह थी कि उसे ज्यादातर नंबर याद रहते थे. लोगों का कहना है कि उसे 1500 से ज्यादा लोगों के नंबर याद थे.
विजय पत्रकारों का बहुत खयाल रखता था. इसी वजह से लोकल अखबारों में उस के खिलाफ कभी कोई खबर नहीं छपती थी. कहा जाता है कि वह पत्रकारों के लिए 30 से 40 हजार रुपए किलोग्राम वाली गुच्छी की सब्जी बनवाता था. उसे वह खुद या फिर उस की पत्नी रामलली बनाती थी.
विजय के इस प्रोग्राम में जो शख्स नहीं आता था, उसे फोन कर के वह कहता था कि नहीं आओगे तो डांड़ (जुरमाना) लगेगा. साल 2007 तक विजय स्थापित ब्राह्मण नेता बन गया था. यानी साल 2007-2008 तक विजय पूर्वांचल में ब्राह्मण समाज के बड़े नेता की तरह स्थापित हो चुका था.
विजय नवरात्र में 9 दिन का व्रत रखता था. उस के यहां 11 पंडित लगातार 9 दिनों तक जाप करते थे. आखिरी दिन हवन होता था और उस में आहुति देने के लिए विजय इलाके के लोगों को बुलाता था, जिस में करीब 40 हजार लोग आते थे.
जाप करने वाले ब्राह्मïणों को पैसे, अनाज के साथ एकएक गाय भी दी जाती थी. विजय को धर्मकर्म पर इतना भरोसा था कि कई बार कुछ अमंगल होने पर वह रास्ता बदल देता था. कहता था कि देवी का इशारा है कि उधर जाने पर दुर्घटना हो सकती है.
जाप और हवन के साथ उस के यहां नवरात्र में 9 दिन भंडारा होता था. विंध्यवासिनी मां का वह पक्का भक्त था. उस का कहना था कि यह जो कुछ भी है, उन्हीं की कृपा से है.
साल 2007 में यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी, लेकिन ज्ञानपुर सीट से विजय मिश्रा ही चुनाव जीता था. साल 2009 में भदोही सीट पर उपचुनाव होना था. यह सीट बसपा किसी भी कीमत पर जीतना चाहती थी.
इसलिए मायावती ने चुनाव प्रचार में अपने 30 मंत्रियों को लगा दिया था. सभी मंत्री हर दिन इलाके में प्रचार करते थे. उस समय मंत्रियों ने मायावती से कहा कि इलाके में विजय मिश्रा की पकड़ काफी मजबूत है. अगर उसे अपने पाले में कर लिया जाए तो जीत आसानी से हो सकती है.
बताया जाता है कि मायावती ने विजय के पास बसपा में आने के लिए संदेश भेजा, लेकिन विजय मिश्रा ने मुलायम सिंह का साथ छोडऩे से साफ मना कर दिया.
विजय का मना करना मायावती को अजीब भी लगा और बुरा भी. उस समय तक विजय के खिलाफ करीब 40 मुकदमे दर्ज हो चुके थे. मायावती मुख्यमंत्री थीं. उन्होंने विजय के पीछे पुलिस लगा दी.
मुलायम सिंह जब भदोही प्रचार करने पहुंचे तो विजय उन की रैली में पहुंचा. उस ने हाथ जोड़ कर कहा कि उन्हें उस की पत्नी रामलली के सिंदूर का वास्ता, उसे बचा लें, वरना मायावती उसे छोड़ेंगी नहीं.
ले उड़े मुलायम सिंह
तब मुलायम सिंह ने विजय मिश्रा से कहा था कि किसी माई के लाल में दम नहीं, जो उन के रहते विजय मिश्रा को गिरफ्तार कर सके. इस के बाद मुलायम ने विजय को हेलीकौप्टर में बैठाया और उड़ गए. विजय मिश्रा के प्रयागराज के बाहुबली अतीक अहमद से भी अच्छे संबंध थे. विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और बड़े कोयला कारोबारी नंद किशोर रुंगटा का वाराणसी से अपहरण हुआ, जिस में 2 करोड़ की फिरौती मांगी गई थी. जब फिरौती नहीं मिली तो नंद किशोर की हत्या कर लाश को प्रयागराज के झूंसी में फेंक दिया गया था.
इस मामले में विजय मिश्रा और मुख्तार अंसारी का नाम सामने आया था. दोनों को पकड़ा गया. इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी. इस का मुकदमा भी सीबीआई कोर्ट में चला, लेकिन पर्याप्त सबूत न होने की वजह से दोनों छूट गए थे.
जैसेजैसे विजय का रुतबा बढ़ता गया, वैसेवैसे खनन के ठेकों में उस का एकछत्र राज होता गया. 1995 से 2010 तक तो 20 किलोमीटर के एरिया में खनन ठेका विजय के अलावा किसी दूसरे की मजाल ही नहीं थी कि ले ले. विजय के ट्रक निकलते तो किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि टोल मांग ले.
12 जुलाई, 2010 को बसपा सरकार के कैबिनेट मंत्री रहे नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदीÓ मंदिर गए थे. मंदिर के बाहर स्कूटी में बम था. जैसे ही नंदी मंदिर पहुंचे, रिमोट से बम धमाका किया गया.
धुएं का गुबार छंटा तो इंडियन एक्सप्रैस के पत्रकार विजय प्रताप सिंह, राकेश मालवीय और मंत्री के गनर की लाश पड़ी मिली. नंदी का पेट फट गया था और आंतें बाहर आ गई थीं. नंदी किसी तरह भाग कर एक घर में घुस गए थे.
इस के बाद दूसरे ड्राइवर ने सीधे रास्ते के बजाए पूरा शहर घुमाते हुए उन्हें अस्पताल पहुंचाया था. 8 दिनों तक नंदी को होश नहीं आया था. इस हमले के बाद विजय मिश्रा, ब्लौक प्रमुख दिलीप मिश्रा और 2 अन्य लोगों का नाम आया. दिलीप तो पकड़ा गया, लेकिन विजय फरार हो गया.
वह गेरुआ वस्त्र पहन कर यानी साधु के भेष में कर्नाटक, कोलकाता, मुंबई घूमता रहा. दाढ़ीमूंछ बढ़ा ली थी. पुलिस ने उस पर ढाई लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया था.
8 फरवरी, 2011 को एसटीएफ ने दिल्ली के हौजखास से विजय मिश्रा को गिरफ्तार किया था. पकड़े जाने के बाद विजय को जेल भेज दिया गया. इस के बाद 2012 का विधानसभा का चुनाव हुआ.
जेल में होने के बावजूद मुलायम सिंह ने फिर उसे ही टिकट दिया. इस बार विजय की पत्नी रामलली और बेटियों ने प्रचार किया, क्योंकि वह जेल में था. नतीजा आया तो विजय ने 37,604 वोट से जीत हासिल की थी.
सपा की सरकार बनी और विजय जेल से बाहर आ गया. इस बार अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने थे. उन से सामंजस्य नहीं बना तो विजय ने अपनी छवि सुधारने की कोशिश की. लेकिन अखिलेश का खास नहीं बन पाया.
साल 2017 के चुनाव में अखिलेश ने विजय मिश्रा का टिकट काट दिया. उस वक्त विजय ने कहा था कि नेताजी (मुलायम सिंह यादव) को जब तक विजय से काम था, तब तक मैं बाहुबली नहीं था. काम हो गया तो हम बाहुबली हो गए.
अगर बाहुबली ही थे तो 2012 में टिकट क्यों दिया? 2014 में मेरी बेटी को लोकसभा का टिकट क्यों दिया? 2016 में मेरी पत्नी को एमएलसी का टिकट क्यों दिया?
हालांकि विजय को इस का जवाब नहीं मिला. इस के बाद विजय मिश्रा ने निषाद पार्टी से चुनाव लड़ा. भाजपा के महेंद्र बिंद को 20,230 वोटों से हरा दिया. हालांकि कुछ दिनों बाद निषाद पार्टी ने विजय को बाहर का रास्ता दिखा दिया. यहीं से विजय के बुरे दिन शुरू हो गए.
विजय मिश्रा के एक रिश्तेदार कृष्ण मोहन तिवारी ने 4 अगस्त, 2020 को उस के खिलाफ थाना गोपीगंज में मामला दर्ज करवाया था कि विजय मिश्रा ने उन की 50 बीघा जमीन, एक 6,000 स्क्वायर फुट का मकान, एक बीघे में बैठक के लिए बना हौल कब्जाने का आरोप लगाया. इन सब की कीमत करीब 1,500 करोड़ रुपए की बताई गई थी.
पुलिस ने मामला दर्ज किया और 14 अगस्त, 2020 को विजय मिश्रा को मध्य प्रदेश के आगर जिले से गिरफ्तार कर लिया. इस बार उसे जेल भेजा गया तो आज तक जेल से बाहर नहीं आया.
पूरी फेमिली को सजा
15 मई को प्रयागराज की एमपी-एमएलए कोर्ट ने विजय मिश्रा को इस मामले में 10 साल की सजा सुनाई. पत्नी रामलली मिश्रा और बेटे विष्णु मिश्रा को भी 10 साल की सजा हुई. बहू रूपा मिश्रा को 4 साल की सजा सुनाई है.
रामलली ने भी पति के अपराधों में सहयोग किया और अवैध संपत्तियां अर्जित की, इसलिए उसे सजा सुनाई गई है.
विजय मिश्रा पर गैंग-30 का सदस्य होने के आरोप में गैंगस्टर ऐक्ट का तहत मुकदमा दर्ज हुआ था. आरोप था कि फरजी दस्तावेजों के जरिए उस ने जमीन अपने नाम कराई. इस के अलावा उस पर कई सरकारी और निजी जमीनों से जुड़े केस भी दर्ज थे.
सजा सुनाए जाने से 2 दिन पहले यानी 13 मई, 2026 को विजय मिश्रा को 1980 के एक हत्या के मामले में भी दोषी पाया गया. उस मामले में भी उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.
11 फरवरी, 1980 को कचहरी परिसर में प्रकाश नारायण पांडेय की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. इस में मुख्य आरोपी विजय मिश्रा ही था. उस के साथ जीत नारायण, संतराम और बलराम को भी सजा मिली है.
वाराणसी की एक लोक गायिका ने 2020 में विजय के खिलाफ रेप का मामला दर्ज करवाया था. इस मामले की जांच के बाद 4 नवंबर, 2023 को भदोही एमपी-एमएलए कोर्ट ने विजय मिश्रा को 15 साल सख्त कारावास की सजा सुनाई थी. इस मामले में विजय के बेटे विष्णु और नाती विकास मिश्रा भी आरोपी थे, लेकिन बाद में उन्हें बरी कर दिया गया था.
माफिया विजय मिश्रा के बेटे विष्णु मिश्रा ने वाराणसी की एक सिंगर को ब्लैकमेल किया था. कृष्ण मोहन तिवारी की जमीन कब्जा मामले में भी वह नामजद है. इस के अलावा विजय के गैंग को आर्थिक मदद पहुंचाई थी. इस के साथ व्यापारियों से रंगदारी मांगने के आरोप में भी भदोही और प्रयागराज में कई केस उस पर दर्ज हुए थे. विजय मिश्रा को आम्र्स ऐक्ट में भी 2 बार सजा हो चुकी है. पहली बार भदोही की अदालत ने 17 अक्तूबर, 2022 को 2 साल की सजा सुनाई थी.
दूसरी बार प्रयागराज कोर्ट ने 18 मार्च को 5 साल की सजा सुनाई थी. दोनों ही बार 10-10 हजार रुपए का जुरमाना भी लगाया गया था. साल 2022 में विजय मिश्रा के पेट्रोल पंप से हथियारों का जखीरा मिला था.
पुलिस ने उस के बेटे विष्णु मिश्रा को पुणे से गिरफ्तार किया था. उस की निशानदेही पर पुलिस ने उस के पेट्रोल पंप से एक एके-47 राइफल, 4 एके-47 की मैगजीन, 375 एके-47 के कारतूसों के अलावा एक 9 एमएम पिस्टल, एक उस की मैगजीन तथा 9 कारतूस बरामद किए थे.
इस तरह कुल मिला कर विजय मिश्रा की सियासत, रसूख, दबदबा सब कुछ खत्म हो चुका है. प्रयागराज और भदोही में उस की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चल चुका है. जो मामले पेंडिंग हैं, उन पर भी तेजी से सुनवाई हो रही है.
एक के बाद एक फैसले आ रहे हैं. जिस विजय मिश्रा के पीछे आज से 15 साल पहले पार्टियां टिकट ले कर घूमती थीं, आज उस का नाम लेने तक से बचती हैं.
बाहुबली विजय मिश्रा की बहू रूपा मिश्रा ने फरजी आईडी से सिम खरीदा था. फरारी और जेल जाने के दौरान विजय और विष्णु की मदद की थी. गवाहों को धमकाया था. केस वापस लेने के लिए दबाव बनाया था. इस सब के खिलाफ भदोही में रिपोर्ट दर्ज हुई थी.
इन सभी मामलों में उसे भी सजा सुनाई गई है. जिस विजय मिश्रा की कभी पूरे इलाके में तूती बोलती थी, आज उस का पूरा परिवार जेल में है. Social Story






