Family Crime Story. बलराम ने जिस छोटे भाई को बेटे की तरह पालपोस कर पढ़ायालिखाया, ब्याह किया, कारोबार कराया, बाद में वही उन से ईर्ष्या ही नहीं करने लगा, बल्कि उस ने उन के साथ जो किया, क्या कोई भाई ऐसा कर सकता है?

शाम के साढ़े 7 बज रहे थे. नाभा पुलिस कंट्रोल रूम को किसी औरत ने फोन कर के बताया कि अनाज मंडी के आढ़ती बलराम खन्ना की कोठी में भीषण आग लगी है. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना संबंधित थाना सदर को देने के अलावा फायर ब्रिगेड स्टेशन को भी दे दी थी.

सूचना मिलते ही थाना सदर के थानाप्रभारी मनिंदर सिंह बेदी पुलिस बल के साथ बलराम की कोठी पर पहुंच गए थे. कोठी की पहली मंजिल धूधू कर जल रही थी. कुछ ही देर में फायर ब्रिगेड की 2 गाडि़यां भी पहुंच गईं.

फायर ब्रिगेडकर्मियों ने कुछ ही देर में आग पर काबू पा लिया. आग बुझने के बाद जांच के लिए पुलिस कोठी के अंदर पहुंची तो देखा कि पहली मंजिल का ज्यादातर हिस्सा जल चुका था, लेकिन बीच के 2 कमरे, एक बैडरूम और ड्राइंगरूम एकदम सुरक्षित था.

पहली मंजिल पर कुल 5 कमरे थे. एक किचन और टौयलेटबाथरूम था. कमरों के बाद सड़क की ओर लगभग 80 फुट का चौकोर टैरिस था. पुलिस ने कमरों की तलाशी ली तो उन्हें किचन में एक औरत झुलसी मिली, जिस की उम्र 40 साल के करीब रही होगी.

एक अन्य कमरे से 13-14 साल का बच्चा बेहोश पड़ा था, वह भी झुलसा हुआ था. टैरिस पर 10-11 साल की एक बच्ची बेहोश पड़ी थी. औरत और बच्चा जले तो काफी थे, लेकिन उन की सांसें चल रही थीं. मनिंदर सिंह ने तीनों को तुरंत अस्पताल भिजवाया.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए मनोहर कहानियां का चैनल सब्सक्राइब करें

थोड़ी ही देर में बलराम के भाई अमित, संजय और अमित की पत्नी सुजाता भी आ गई थी. इन्हीं लोगों से पता चला था कि आग से झुलसे लोगों में बलराम की पत्नी शांति, बेटा रमन और बेटी स्वाति थी. कमरों की तलाशी से पता चला कि यह घटना लूटपाट की वजह से नहीं घटी थी, क्योंकि अलमारी में गहने व नकदी सुरक्षित थी.

बलराम के भाइयों के अलावा पड़ोस के भी काफी लोग जमा थे. मनिंदर सिंह ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि घर के सभी लोगों में आपस में काफी प्यार था, लेकिन कभीकभी किसी औरत को ले कर बलराम और उन की पत्नी शांति में झगड़ा होता रहता था.

इस की पुष्टि के लिए उन्होंने बलराम के भाइयों से पूछा तो पहले तो उन्होंने इस बारे में कुछ कहने से इंकार किया. लेकिन बाद में बताया कि उन के बड़े भाई बलराम के किसी सिमरन नाम की महिला से संबंध थे. इस बात की जानकारी भाभी को हुई तो दोनों के बीच झगड़ा होने लगा था. ‘‘सिमरन कहां रहती है?’’ मनिंदर सिंह ने पूछा तो अमित ने सिमरन का पता बता दिया.

बलराम पुश्तैनी रईस थे. उन के पिता रामजीलाल का पंजाब में आढ़त का बहुत बड़ा कारोबार था. उन की मौत के बाद सारा कारोबार बलराम ने संभाल लिया था. क्योंकि उस समय उन के दोनों भाई अमित और संजय छोेटे थे. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभाई. उन्होंने दोनों भाइयों को अच्छी तरह पढ़ायालिखाया ही नहीं, कारोबार को भी खूब बढ़ाया.

बलराम की शादी पिता ही शांति से कर गए थे. उन के 2 बच्चे थे, बेटा रमन और बेटी स्वाति. भाइयों की पढ़ाई पूरी हो गई तो उन्होंने अमित की शादी पठानकोट के गल्ला व्यापारी सज्जन सिंह की बेटी सुजाता से कर दी थी.

बलराम अपने भाइयों को बेटों की तरह मानते थे. उन का सब से छोटा भाई संजय कालेज टाइम से ही गलत संगत में पड़ गया था. शराब पीना और अय्याशी करना उस की आदत बन गई थी. बलराम ने उसे लाइन पर लाने की बहुत कोशिश की, लेकिन जब वह नहीं माना तो उन्होंने उसे फिजूलखर्ची के लिए पैसे देने बंद कर दिए. उसे हर महीने एक सीमित रकम दे कर उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

मंझले भाई अमित ने शादी के बाद अलग रहने और अपना अलग कारोबार करने की इच्छा जाहिर की तो बलराम ने उसे अलग कोठी खरीद कर कारोबार के लिए पैसे दे दिए. अमित के साथ संजय भी चला गया.

अमित को अलग हुए लगभग 5 साल हो चुके थे. इन 5 सालों में उस का कारोबार जम नहीं पाया. लेकिन उस की आर्थिक स्थिति बहुत बुरी भी नहीं थी. भाई अपनेअपने काम से मतलब रखने लगे थे. अब उन के बीच प्यार कम, औपचारिकताएं ज्यादा रह गई थीं.

थानाप्रभारी की समझ में नहीं आ रहा था कि घर में आग लगी कैसे? जिस समय बलराम की कोठी में आग लगी, उस समय वह घर में नहीं थे. उस समय वह कहां थे? अभी तक उन का कुछ पता नहीं था. उन्होंने अमित और संजय से उन के बारे में पूछा तो वे उन के बारे में कुछ नहीं बता पाए. बलराम का फोन भी बंद था.

मनिंदर सिंह ने तुरंत बलराम का फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा दिया. इस के बाद कोठी से जिन 3 लोगों को अस्पताल भेजा गया था, उन के बारे में पता करने के लिए वह अस्पताल पहुंचे. वहां पता चला कि गंभीर हालत में झुलसी शांति और उन के 13 साल के बेटे रमन की मौत हो चुकी थी. 10 साल की स्वाति खतरे से बाहर थी, लेकिन अभी उसे होश नहीं आया था.

मनिंदर सिंह ने जरूरी काररवाई कर के शांति और रमन की लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद वह वहां से सिमरन के घर जा पहुंचे. वह उन्हें घर पर ही मिल गई.

पूछताछ में उस ने बताया कि बलराम से उस की केवल दोस्ती थी. लेकिन मनिंदर सिंह ने देखा कि उस के बैडरूम में बलराम के साथ उस के कई फोटो लगे थे. उन में दोनों एकदूसरे को बांहों में लिए थे. वे फोटो कुछ और ही कहानी बयां कर रहे थे.

सिमरन 30-32 साल की छरहरे बदन की खूबसूरत औरत थी. उस के चेहरे और शरीर में ऐसा आकर्षण था कि कोई भी उस की ओर आकर्षित हो सकता था.

बहरहाल, मनिंदर सिंह ने सिमरन से कहा कि जब तक यह मामला सुलझ नहीं जाता, वह शहर छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. उन्हें शक था कि इस पूरे मामले में इस का किसी न किसी रूप में हाथ जरूर है. लेकिन उन के पास इस का कोई ठोस सबूत नहीं था.

मनिंदर सिंह सिमरन के घर से निकल रहे थे, तभी उन के मोबाइल पर किसी महिला का फोन आया. महिला ने बताया कि अवैध संबंधों के चलते ही बलराम ने सिमरन के साथ मिल कर अपने परिवार को आग के हवाले किया है.

मनिंदर सिंह को भी यही शक था, लेकिन समस्या यह थी कि बलराम का कुछ पता नहीं चल रहा था. उन की तलाश में शहर से बाहर जाने वाली सभी सीमाओं पर जांच शुरू कर दी गई थी. शहर में भी उन की तलाश जारी थी. मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया गया था.

पुलिस को अब स्वाति से ही कुछ उम्मीद थी. इसलिए पुलिस उस के होश में आने का इंतजार कर रही थी. इस बीच पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई थी. उस से पता चला कि शांति और रमन को पहले जहर दिया गया था.

अब सवाल यह था कि उन्हें जहर किस ने दिया? ऐसा कौन है, जिसे इन की हत्या से फायदा हो सकता था? यह काम वही व्यक्ति कर सकता था, जिस का बलराम के घर काफी आनाजाना रहा होगा. एक अनुमान यह भी लगाया गया कि कहीं बलराम ने ही तो प्रेमिका सिमरन के चक्कर में पत्नी और बच्चों को नहीं मार दिया?

मनिंदर सिंह इस केस की कडि़यां जोड़ने का प्रयास कर रहे थे कि एक बार फिर उन के मोबाइल पर उसी महिला का फोन आया, जिस ने पहले बलराम और सिमरन के अवैध संबंधों की बात की थी. इस बार उस ने बताया कि बलराम इस समय जालंधर के एक होटल के कमरा नंबर 107 में छिपा बैठा है.

काफी पूछने पर भी उस महिला ने अपना नाम नहीं बताया था. मनिंदर सिंह जानना चाहते थे कि आखिर यह महिला है कौन? जिस फोन से उस ने फोन किया था, उन्होंने उस की जांच कराई तो पता चला कि वह पब्लिक बूथ का नंबर था.

मनिंदर सिंह की समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर वह महिला इस मामले में इतनी रुचि क्यों ले रही है, उस का मकसद क्या है, उसे ये सूचनाएं कहां से मिल रही हैं?

बहरहाल, उन्होंने पुलिस टीम के साथ उस होटल में छापा मारा, जहां बलराम के छिपे होने की सूचना मिली थी. लेकिन वह वहां नहीं मिले. होटल के मैनेजर ने बताया कि बलराम कमरा नंबर 107 में ठहरे तो थे, लेकिन कल रात ही वह बिना बताए कमरा खाली कर के चले गए.

मनिंदर सिंह को बलराम पर जो शक था, अब वह विश्वास में बदलने लगा था. वह इसी बारे में सोच रहे थे कि एक हवलदार ने आ कर बताया, ‘‘सर, बलराम का फोन ऐक्टिव हो गया है और उस की लोकेशन भी पता चल गई है.’’

हवलदार की बात सुन कर मनिंदर सिंह टीम के साथ फोन की लोकेशन का पीछा करते हुए जिस कोठी के सामने पहुंचे, वह कोठी सिमरन की थी. दोबारा पुलिस को देख कर सिमरन भड़क उठी.

Sarita

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
आपके लिए स्पेशल छूट

पुलिस ने उस के घर की तलाशी लेने की बात की तो उस ने अपने वकील को बुलाने की धमकी दी. लेकिन पुलिस जबरदस्ती उस की कोठी में घुस कर तलाशी लेने लगी. पुलिस बलराम के उस फोन को ढूंढ़ रही थी, जिस की लोकेशन उस की कोठी की आ रही थी. अंत में वह फोन सिमरन के घर से ड्राइंगरूम में रखी सेंटर टेबल के नीचे से मिल गया.

‘‘बलराम का फोन तुम्हारे घर में कैसे आया?’’ मनिंदर सिंह ने बरामद फोन सिमरन की आंखों के आगे नचाते हुए पूछा. ‘‘मैं इस फोन के बारे में कुछ नहीं जानती.’’ उस ने दो टूक कहा. ‘‘यह ऐसे नहीं मानेगी सुरजीत, इसे थाने ले चलो, वहीं बताएगी.’’ मनिंदर सिंह ने बगल में खड़े हैडकांस्टेबल से कहा.

हैडकांस्टेबल सुरजीत कौर ने सिमरन को खींच कर जीप में बैठा लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ की जाने लगी. लेकिन वह अपनी बात पर अड़ी रही. वह यही कहती रही कि उसे नहीं मालूम कि यह फोन उस के घर में कैसे और कब आया?

उसी बीच एक सिपाही ने मनिंदर सिंह को बताया कि अस्पताल से डा. जैन का फोन आया है कि स्वाति को होश आ गया है. सिमरन को सुरजीत के हवाले कर के मनिंदर सिंह अस्पताल जा पहुंचे. अस्पताल में बलराम के दोनों भाई अमित और संजय भी मौजूद थे.

स्वाति को होश तो आ गया था, लेकिन वह बहुत डरीसहमी थी. उस का डर दूर करने के लिए मनिंदर सिंह ने पहले उसे प्यार किया, उसे चौकलेट वगैरह खाने को दी. काफी अपनत्व दिखा कर उन्होंने पूछा, ‘‘बेटा स्वाति, जरा याद कर के बताओ कि उस दिन तुम्हारे यहां क्या हुआ था?’’

‘‘अंकल, मम्मी शारदा आंटी के साथ घर में पूजा कर रही थीं और मैं शारदा आंटी के घर खेल रही थी. पूजा खत्म होने के बाद शारदा आंटी अपने घर चली गईं तो मैं भी अपने घर आ गई. मैं ने देखा, मां किचन में फर्श पर पड़ी सो रही थीं. मैं उन्हें उठाने की कोशिश करने लगी, तभी किसी ने पीछे से मेरा मुंह दबा दिया. इस के बाद क्या हुआ, मुझे कुछ पता नहीं?’’

दरअसल, उस दिन करवाचौथ था. बाजारों और गलियों में काफी भीड़भाड़ थी. शाम होते ही ज्यादातर औरतें पूजा करने मंदिरों, रिश्तेदारों या पड़ोसियों के घर चली गई थीं. शारदा भी पूजा करने शांति के घर आई थी.

‘‘स्वाति बेटा, तुम ने वहां कुछ और देखा था?’’ मनिंदर सिंह ने पूछा तो कुछ पल सोच कर स्वाति ने बताया, ‘‘हां अंकल, जब मैं अपने घर जा रही थी, तब मुझे कोठी के कंपाउंड में काले रंग की एक होंडा सिटी कार खड़ी दिखाई दी थी.’’

इस पर मनिंदर सिंह चौंके. उन्हें याद आया कि काले रंग की होंडा सिटी कार तो उन्होंने सिमरन के यहां भी देखी थी. घूमफिर कर उन के शक की सुई सिमरन पर ही ठहर जा रही थी. वह अस्पताल से थाने पहुंचे और सुरजीत से पूछा कि सिमरन ने कुछ बताया या नहीं?

‘‘सर, बड़ी कोशिश की, पर वह कुछ नहीं बता रही है.’’ मनिंदर सिंह ने सिमरन से पूछा, ‘‘घटना वाले दिन शाम को तुम अपनी कार से बलराम के यहां गईं थी न?’’ हर बार की तरह इस बार भी सिमरन ने कहा, ‘‘नहीं, मैं वहां बिलकुल नहीं गई थी.’’

मनिंदर सिंह पसोपेश में पड़ गए. सिमरन के चेहरे पर किसी तरह का कोई डर नहीं था. वह इस का क्या करें, यही सोच रहे थे कि उन के किसी मुखबिर ने उन्हें बताया कि बलराम का सब से छोटा भाई संजय एक महंगे क्लब में जुआ खेल रहा है. जुआ खेलते हुए लड़कियों पर ढेरों रुपए उड़ा रहा है.

मनिंदर सिंह टीम के साथ क्लब पहुंच गए. संजय वहीं मिल गया. उस समय वहां जुआ नहीं हो रहा था. उन्होंने संजय से पूछा, ‘‘जहां तक मैं जानता हूं कि तुम्हें सिर्फ मामूली जेब खर्च मिलता था, फिर ये लाखों रुपए तुम्हारे पास कहां से आए?’’

संजय उस समय नशे में था. नशे की झोंक में ही उस ने अकड़ कर कहा, ‘‘आप से क्या मतलब? ये रुपए मुझे अमित भैया ने दिए हैं. उन्हें बिजनैस में बहुत बड़ा लाभ हुआ है, साथ ही बड़े भैया ने पिताजी वाली कोठी और आढ़त वाला कारोबार भी उन के नाम कर दिया है. इसी खुशी में उन्होंने मुझे 10 लाख रुपए खर्च के लिए दिए हैं.’’

‘‘बलराम ने अपनी कोठी और कारोबार अमित के नाम कर दिया है,’’ मनिंदर सिंह ने हैरानी से पूछा, ‘‘यह कब की बात है?’’ ‘‘यह मैं नहीं जानता.’’ संजय ने लापरवाही से कहा.

वह संजय को ले कर थाने आ गए. इस के बाद के घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदले. पड़ोस के थाने से सूचना मिली कि उन्हें व्यास नदी के किनारे जंगल में एक अधजली लाश मिली है. लाश के पास अधजला ड्राइविंग लाइसैंस मिला है, जिस पर नाम के पहले 2 शब्द ‘बल’ लिखा है. लाश झुलसी हुई है, इसलिए उस की शिनाख्त नहीं हो पाई है.

मनिंदर सिंह थाने पहुंचे तो जले हुए ड्राइविंग लाइसैंस को देख कर उन्हें लगा कि कहीं यह बलराम का तो नहीं? उन्होंने शिनाख्त के लिए संजय को बुला लिया.

उस झुलसी हुई लाश के नीचे का हिस्सा आग की चपेट में नहीं आया था. इसलिए संजय ने पैर के चोट के निशान को देख कर कहा, ‘‘सर, यह बलराम भैया की लाश है.’’

चूंकि बलराम की पत्नी और बेटे की हत्या की जांच थाना सदर पुलिस कर रही थी, इसलिए एसपी के निर्देश पर मनिंदर सिंह ने जरूरी काररवाई कर के बलराम की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. लेकिन उन्होंने डीएनए सैंपल सुरक्षित करा लिया था.

मनिंदर सिंह को अब यह मामला उलझता दिखाई दे रहा था, क्योंकि पहले उन्हें बलराम पर ही शक हो रहा था. लेकिन उन की हत्या हो जाने से उन की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा कौन हो सकता है, जिस ने यह सब किया? अगले दिन बलराम की भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, बलराम की भी मौत जहर से हुई थी. मरने के बाद लाश को जलाया गया था. उस के शरीर में भी वही जहर पाया गया था, जो उस की पत्नी और बेटे को दे कर मारा गया था.

रिपोर्ट में सब से अहम बात यह थी कि बलराम की हत्या 5 दिनों पहले ठीक उसी समय की गई थी, जिस समय उन की पत्नी और बेटे की हत्या की गई थी.

अब साफ हो चुका था कि बलराम और उन के परिवार की हत्या में सिमरन का हाथ नहीं था. इसलिए मनिंदर सिंह ने सिमरन को छोड़ दिया. इस के बाद वह संजय और अमित को थाने ले आए और अलगअलग पूछताछ करने लगे. मनिंदर सिंह ने अमित से पूछा, ‘‘बलराम ने अपनी कोठी और कारोबार तुम्हारे नाम कब और क्यों करवाया था?’’

‘‘आप मुझ से अचानक यह क्यों पूछ रहे हैं?’’ अमित ने घबरा कर कहा. ‘‘जो पूछा है, उस का जवाब दो?’’ मनिंदर सिंह ने डांटते हुए पूछा. ‘‘जी लगभग 15 दिनों पहले उन्होंने यह सब मेरे नाम किया था. क्योंकि अब वह कनाडा में बसना चाहते थे.’’ ‘‘मैं वे कागजात देखना चाहता हूं. जब तक मुझे तसल्ली नहीं हो जाएगी, वे कागजात मेरे पास रहेंगे.’’

अमित ने पुलिस के साथ घर जा कर पावर आफ अटौर्नी के कागजात पुलिस को दे दिए. पुलिस के मांगने पर अमित ने अपना एक फोटोग्राफ भी दे दिया. मनिंदर सिंह उस का फोटो ले कर उस होटल में गए, जहां बलराम ठहरा था. उन्होंने मैनेजर को वह फोटो दिखाई तो उस ने कहा, ‘‘सर, यही बलराम हैं, जो मेरे होटल में ठहरे थे.’’

होटल से लौट कर थानाप्रभारी ने अमित के बारे में पता किया तो जो जानकारी मिली, उस के अनुसार, इधर अमित के पास न जाने कहां से इतना पैसा आ गया था कि वह दोनों हाथों से खर्च कर रहा था. अमित ने एक नई सफेद रंग की होंडा सिटी कार भी खरीदी थी.

मनिंदर सिंह को याद आया, होंडा सिटी कार तो उन्होंने सिमरन के यहां भी देखी थी. स्वाति ने भी घटना वाले दिन काले रंग की होंडा सिटी कार अपनी कोठी के कंपाउंड में खड़ी देखी थी. उन्होंने अपने स्टाफ और मुखबिरों को बुला कर कहा कि वे शहर के तमाम कार डेंटपेंट करने वालों के पास जा कर पता लगाएं कि पिछले एक सप्ताह में उन्होंने किसी होंडा सिटी कार का रंग तो नहीं बदला?

मुखबिरों से पता चला कि अब्बास नामक डेंटरपेंटर ने पिछले दिनों एक होंडा सिटी कार का रंग सफेद से काला किया था. मनिंदर सिंह तुरंत अब्बास के पास पहुंचे. उस ने बताया कि करवाचौथ से एक दिन पहले एक आदमी ने अपनी सफेद होंडा सिटी कार पर काला रंग करवाया था.

मजे की बात यह थी कि अगले ही दिन उसी आदमी ने आ कर अपनी होंडा सिटी कार पर काले रंग की जगह पहले की तरह सफेद रंग करवाया था. उस का कहना था कि काला रंग उस की बीवी को पसंद नहीं है.

अब्बास की बात सुन कर मनिंदर सिंह को इस हत्याकांड की सारी कडि़यां जुड़ती नजर आईं. उन्होंने अमित से पूछताछ शुरू कर दी, लेकिन वह खुद को बेकसूर बताते हुए सारे आरोपों से इंकार करता रहा. उस की पत्नी सुजाता को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया था.

दोनों से जब अलगअलग थोड़ा सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने ही स्वीकार कर लिया कि एक साजिश के तहत उन्होंने ही इस वारदात को अंजाम दिया था. इस के बाद उन से पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह ईर्ष्या से भरी एक बीमार मानसिकता वाले भाई की कहानी थी.

अपने बड़े भाई बलराम से कारोबार और रिहाइश अलग करने के बाद अमित ने अपना कारोबार शुरू तो किया, लेकिन ज्यादातर वह अपनी पत्नी और अय्याश सालों में ही उलझा रहा, जिस से कुछ ही समय में उस का कारोबार डूबने लगा. एक समय ऐसा आया, जब वह कंगाली की कगार पर पहुंच गया.

जबकि बलराम का कारोबार इतना बढ़ गया कि पंजाब के लगभग हर शहर की मंडियों में उस के गोदाम हो गए. यह सब देख कर अमित और सुजाता को बड़ी जलन होती थी. जिस के पास पैसा आता है, उस का रुतबा भी बढ़ जाता है. यही बलराम के साथ भी हुआ. शहर के लगभग सभी सामाजिक कार्यक्रमों और रिश्तेदारों में बलराम की पूछ होने लगी, जबकि अमित को कोई नहीं पूछता था.

इन्हीं बातों से अमित धीरेधीरे हताश होता गया. वह कोई ऐसा उपाय ढूंढने लगा, जिस से समाज में उस का भी रुतबा बलराम जैसा हो जाए. ऐसे में ही एक दिन एक ऐसी घटना घटी, जिस ने आग में घी डालने का काम किया.

अमित ने करवाचौथ से कुछ दिनों पहले एक कार खरीदी. कार खरीदने की खुशी सैलिबे्रट करने वह पत्नी और छोटे भाई अमित के साथ बलराम के घर गया. चायनाश्ते के बाद तीनों भाई समय बिताने के लिए ताश खेलने लगे. संजय के पास पैसा होता नहीं था, इसलिए 3-4 बाजी खेल कर वह बैठ गया, लेकिन अमित खेलता रहा.

इस बीच शराब का भी दौर चलता रहा. संजय लगातार हार रहा था, क्योंकि वह दिमाग से नहीं, बल्कि जोश में खेल रहा था. नतीजा यह निकला कि कुछ ही देर में उस की जेब खाली हो गई. बलराम तो केवल भाइयों का मन बहलाने के लिए खेल रहे थे, लेकिन अमित का जुनून देख कर वह दुखी हो गए.

वह अमित से जीते हुए सभी रुपए लौटाना चाहते थे, लेकिन उस का रूप देख कर उसे सबक सिखाने के लिए उन्होंने उस के रुपए नहीं लौटाए. हारने के बाद अमित काफी बेइज्जती महसूस कर रहा था. तैश में आ कर उस ने जेब से अपनी नई खरीदी होंडा सिटी कार की चाबी निकाली और टेबल पर रख कर बोला, ‘‘भैया एक बाजी और, मैं अपनी नई कार दांव पर लगा रहा हूं.’’

अमित की इस बात पर बलराम को बहुत गुस्सा आया. उन्होंने उस समझाते हुए कहा, ‘‘अमित, यह ठीक नहीं है. अब तुम घर जाओ और खुशियां मनाओ.’’

लेकिन अमित नहीं माना. दोनों भाइयों की पत्नियों ने भी समझाया, पर अमित अपनी जिद पर अड़ा रहा. आखिर वह कार भी हार गया. इस के बाद मुंह लटका कर वह टैक्सी से घर चला गया, लेकिन अगले दिन बलराम खुद जा कर अमित की कार दे आए.

उस दिन वह खुद को बड़ा गिरा हुआ महसूस कर रहा था. इसी के बाद भाई बलराम के प्रति ईर्ष्या बदले की भावना में बदल गई. उस ने बलराम को परिवार सहित खत्म कर के उस का सब कुछ हथियाने की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, सब से पहले उस ने अपनी सफेद होंडा सिटी कार का रंग काला कराया. इस के बाद करवाचौथ की शाम वह पत्नी के साथ पूजा की मिठाई देने बलराम के घर गया. उसी मिठाई में उस ने जहर मिला दिया था. बलराम के पांव छू कर उस ने अपने हाथों से उन्हें जहर मिली वह मिठाई खिला दी.

बलराम उस समय ड्राइंगरूम में बैठे टीवी देख रहे थे. मिठाई खाते ही वह बेहोश हो कर सोफे पर गिर पड़े. उसी बीच सुजाता ने किचन में जा कर जेठानी शांति को मिठाई खिला दी थी. शांति भी किचन में गिर गई. इस के बाद अमित ने भतीजे रमन को मिठाई खिला कर उसे भी बेहोश कर दिया.

इस के बाद पतिपत्नी स्वाति को ढूंढ़ने लगे. तभी पड़ोस के घर से खेल कर स्वाति भी लौट आई. आते समय उस ने कंपाउंड में काले रंग की होंडा सिटी कार देखी थी. अपनी मां को फर्श पर लेटी देख कर वह उसे उठाने की कोशिश करने लगी. उसी समय अमित ने पीछे से उस का मुंह दबोच लिया. वह बेहोश हो गई तो उसे मरा समझ कर उस ने उसे छोड़ दिया.

सब को बेहोश कर के अमित और सुजाता ने अलमारी से गहने और 2 ब्रीफकेसों में रखा लगभग डेढ़ करोड़ रुपया कब्जे में कर लिया. चोरी का पता न चले, इस के लिए उन्होंने कुछ लाख रुपए और गहने अलमारी में छोड़ दिए.

इस के बाद दोनों ने बलराम की लाश को अपनी कार की डिक्की में डाला और उसे ले कर जंगल में पहुंच गए, जहां लाश पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी. जाने से पहले उन्होंने बलराम के घर में भी आग लगा दी थी.

इन कामों से निपट कर अमित ने 2 काम किए. पहला यह कि उस ने जालंधर के एक होटल में बलराम के नाम से एक कमरा बुक कराया और आईडी पू्रफ की जगह पैन कार्ड दिया. मैनेजर ने पैन कार्ड की फोटो देख कर कहा भी था कि यह आप की फोटो नहीं लगती. अमित ने सफाई देते हुए कहा था कि फोटो 10 साल पुरानी है, चेंज तो होगी ही. उस ने यह सब पुलिस की तफ्तीश भटकाने के लिए किया था.

पुलिस को गुमराह करने के लिए अमित ने सुजाता से ही थानाप्रभारी को फोन करवाए थे. अमित ने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि पुलिस का सीधा शक सिमरन पर जाए. पुलिस को दिखाने के लिए ही उस ने जब पुलिस सिमरन के घर गई थी तो उस ने अपनी काले रंग की कार को वहां पहले ही खड़ी कर दी थी. पुलिस को भटकाने के लिए ही उस ने सिमरन के घर जा कर बड़ी चालाकी से बलराम का फोन सिमरन के ड्राइंगरूम में रखी सैंटर टेबल के नीचे डाल दिया था.

इस के बाद उस ने फिर अपनी कार का रंग सफेद करा दिया था. अपनी तरफ से तो अमित ने बड़े भाई बलराम के पूरे परिवार को समाप्त कर दिया था, पर किसी तरह स्वाति बच गई थी. संजय को जब अमित और उस की पत्नी की करतूत का पता चला तो उस ने उन्हें नफरत भरी नजरों से देखा और फैसला कर लिया कि अब वह इन दोनों से कोई संबंध नहीं रखेगा.

पूछताछ के बाद मनिंदर सिंह ने अमित और सुजाता को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. यह मुकदमा 3 सालों तक चला. मुकदमे के गवाह और सबूत पुख्ता थे, इसलिए अदालत ने अमित और सुजाता को बलराम और उस की पत्नी शांति, बेटा रमन की हत्या और स्वाति की हत्या की कोशिश तथा घर में चोरी कर के आग लगाने के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई. अपराध चाहे कितना भी छिपा कर क्यों न किया जाए, वह कभी न कभी उजागर हो ही जाता है. Family Crime Story

(कहानी सत्य घटना पर आधारित है. गोपनीयता बनाए रखने के लिए पात्रों के नाम व स्थान बदल दिए

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...