पिंड दान : प्रेमी के प्यार में पति का कत्ल – भाग 1

23 नवंबर,की दोपहर के बाद का वक्त था. उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में  काफी भीड़ जमा थी. आश्चर्य की बात यह थी कि इन लोगों को रायबरेली के पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय ने खुद बुलाया था. वहां मौजूद लोगों में वकील और पत्रकार भी बड़ी तादाद में थे. दरअसल राजेश पांडेय आज बहुचर्चित कालिका सिंह हत्याकांड से परदा हटाने वाले थे.

रायबरेली के मोहल्ला रानानगर में रहने वाले कालिका सिंह की 21 अक्तूबर, 2013 को हत्या हो गई थी. हत्या के साथ उस के घर में लूटपाट भी हुई थी. लुटेरों ने उस की पत्नी योगिता सिंह को भी घायल कर दिया था. जिस की वजह से उसे अस्पताल ले जाना पड़ा था. कालिका सिंह रायबरेली के ही महाराजगंज में अपना एक स्कूल चलाता था. साथ ही वह रायबरेली में प्रौपर्टी डीलिंग का काम भी करता था. पुलिस पिछले एक महीने से इस घटना की जांच कर रही थी. यह मामला पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ था.

रायबरेली के स्थानीय अखबार कालिका सिंह हत्याकांड को ले कर अलगअलग नजरिए से खबरें छाप रहे थे. एकदो अखबार ऐसे भी थे जो कालिका सिंह की हत्या के लिए उस की पत्नी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे. जबकि कुछ का कहना था कि कालिका सिंह की हत्या प्रौपर्टी विवाद की वजह से हुई है. एक वकील के बेटे का नाम भी इस मामले में उछल रहा था. जिस की वजह से वकीलों का संगठन पुलिस पर दबाव बना रहा था कि उस परिवार के लोगों को न फंसाया जाए. इसी के मद्देनजर एसपी राजेश पांडेय ने इस मामले की जांच में जिले के काबिल पुलिस वालों को लगा रखा था.

पुलिस ने कालिका सिंह की पत्नी और वकील के पुत्र के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा कर एक महीने तक निगाह रखी. तब जा कर वह किसी नतीजे पर पहुंची. चूंकि सुबूत मिल चुके थे, इसलिए पुलिस आश्वस्त थी. इसी के मद्देनजर राजेश पांडेय ने योजना बना कर संबंधित पक्षों को पुलिस औफिस में बुलाया था. उन सब को अलगअलग हौल में बैठाया गया. ऐसा इसलिए किया गया, ताकि अंदर बैठे आरोपियों से जो बात हो, टीवी कैमरों के जरिए उसे बाहर बैठे लोग स्क्रीन पर देखसुन सकें.

इस के लिए पहले ही कैमरों और टीवी स्क्रीन की व्यवस्था कर ली गई थी. ऐसा करना इसलिए जरूरी था, जिस से किसी पक्ष को यह न लगे कि उन के साथ विश्वासघात हुआ है. तय समय पर पुलिस ने आरोपियों को अंदर बैठा कर पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में कालिका सिंह हत्याकांड की परतें एकएक कर खुलती गईं. बाहर बैठे लोग सारी बातें देखसुन रहे थे. इस पूरी कवायत में कालिका सिंह हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी.

24 अक्तूबर, 2013 की रात को 1 बजे रायबरेली कोतवाली के फोन की घंटी बजी तो नाइट ड्यूटी पर मौजूद एसएसआई मोहम्मद सुरखाब खान ने फोन उठाया. दूसरी ओर से रोती हुई एक औरत की आवाज आई, ‘‘साहब जल्दी आइए, हमारे घर लूटपाट हो गई है. लुटेरों ने मेरे पति को मार डाला है. मैं भी बुरी तरह घायल हूं.’’ उस महिला से उस का पता पूछ कर एसएसआई मोहम्मद सुरखाब खान कुछ सिपाहियों को साथ ले कर उस के घर पहुंच गए.

वहां पहुंच कर पता चला मरने वाला प्रौपर्टी डीलर कालिका सिंह था और पुलिस को फोन उस की पत्नी योगिता सिंह ने किया था. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था. इस घटना की सूचना पा कर इंसपेक्टर कोतवाली संतोष कुमार द्विवेदी, सीओ सिटी पंकज पांडेय और एसपी राजेश पांडेय भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए थे. घायल योगिता सिंह की हालत ज्यादा गंभीर नहीं थी, फिर भी पुलिस ने उपचार के लिए उसे अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने कोतवाली रायबरेली में अज्ञात लोगों के विरुद्ध लूटपाट और हत्या का मुकदमा दर्ज कर के मामले की जांच शुरू कर दी. इस के लिए डौग स्क्वायड और क्राइम टीम के फिंगरप्रिंट विशेषज्ञों को भी बुलाया गया. प्रारंभिक काररवाई के बाद कालिका सिंह की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया. शुरुआती जांच में पुलिस को कुछ संदेह तो हुआ, लेकिन इस मामले की एकमात्र गवाह योगिता सिंह के अस्पताल में होने की वजह से वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. क्योंकि उस से पूछताछ के बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचा जा सकता था.

पुलि अधीक्षक राजेश पांडेय ने इस मामले की जांच के लिए शहर कोतवाल संतोष कुमार द्विवेदी, सर्विलांस प्रभारी संतोष शुक्ला, सबइंसपेक्टर संजय सिंह, अनिल सिंह, महिला थानाप्रभारी कंचन सिंह, सिपाही अरुण कुमार और मनोज सिंह की एक टीम बनाई. इस टीम का इंचार्ज बनाया गया सीओ संजय पांडेय को. जबकि पुलिस अधीक्षक राजेश पांडे इस मामले में मिली जानकारी को ध्यान में रख कर खुद रणनीति बनाने में लग गए. कालिका सिंह के बच्चों से बात करने पर पुलिस को पता चला कि घटना की रात गौरव शर्मा उन के घर आया था. गौरव कालिका सिंह के स्कूल में पढ़ाता था. बच्चों की इस बात की पुष्टि मोहल्ले वालों ने भी की थी.

गौरव शर्मा इस घटना के बाद गुजरात चला गया था. पुलिस की सर्विलांस टीम ने योगिता और गौरव के फोन नंबरों की जांच शुरू की तो कुछ बेहद चौंकाने वाली बातें पता चलीं. इसी को आधार बना कर जब जांच आगे बढ़ाई गई तो पुलिस को पता चला कि योगिता ने 1 जनवरी, 2013 से 24 अक्तूबर, 2013 के बीच 15 मोबाइल सेट इस्तेमाल किए थे. इन मोबाइलों में अलगअलग समय पर 32 सिम कार्ड लगाए गए थे. खास बात यह थी कि ये सभी सिम कार्ड फर्जी पतों पर लिए गए थे.

15 अगस्त, 2013 की ही बात है. कालिका सिंह के स्कूल ‘सूबेदार मेजर रामफल सिंह विद्यालय’ महाराजगंज, रायबरेली में स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था. झंडारोहण का कार्यक्रम खत्म हो चुका था. तभी स्कूल की प्रिंसिपल योगिता सिंह ने अपने पति और स्कूल के प्रबंधक कालिका सिंह से कहा, ‘‘कक्षा 3 को पढ़ाने वाली टीचर ठीक से काम नहीं कर रही है. स्कूल के किसी कार्यक्रम में भी हिस्सा नहीं लेती. कुछ समझाने पर समझती भी नहीं है. अब तो उस ने मेरी बात भी सुनना बंद कर दिया है.’’

‘‘ठीक है, मैं उस से बात कर के उसे समझा दूंगा.’’ कालिका सिंह ने पत्नी की बात को नजरअंदाज करते हुए कहा तो योगिता सिंह थोड़ा गुस्से में बोली, ‘‘मैं जब भी किसी टीचर के गलत व्यवहार की बात करती हूं, तुम नजरअंदाज कर जाते हो. कुछ टीचरों को तुम ने सिर पर चढ़ा रखा है.’’

‘‘देखो, बात का बतंगड़ मत बनाओ.’’ कालिका सिंह ने कहा तो योगिता चिढ़ कर तीखे शब्दों में बोली,

‘‘नहीं, मैं बात का बतंगड़ नहीं बना रही हूं, बल्कि तुम मेरा अपमान कर रहे हो. प्रिंसिपल बनाया है तो मुझे अपने ढंग से काम करने दो. मैं इस तरह तुम्हारी चहेती टीचरों से अपमानित नहीं हो सकती. मैं इस तरह से काम नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘तो ठीक है, तुम कल से स्कूल आना बंद कर दो. मैं किसी और को स्कूल की जिम्मेदारी सौंप देता हूं.’’ कालिका सिंह ने गुस्से में कहा.

‘‘तुम चाहते ही हो कि मैं किसी तरह यहां से हट जाऊं, ताकि तुम्हारी रासलीला शुरू हो जाए.’’ कह कर योगिता गुस्से में पैर पटकती स्कूल से चली गई.

इस घटना के बाद योगिता और कालिका के रिश्तों में दरार पड़ गई. बातचीत होती भी तो नाम मात्र की.

पति पत्नी और वो – भाग 1

‘‘मम्मी, मैं जानता हूं कि आप को मेरी एक बात बुरी लग सकती है. वो यह कि सुमन आंटी जो आप की सहेली  हैं, उन का यहां आना मुझे अच्छा नहीं लगता.  और तो और मेरे दोस्त तक कहते हैं कि वह पूरी तरह से गुंडी लगती हैं.’’ बेटे यशराज की यह बात सुन कर मां दीपा उसे देखती ही रह गई.

दीपा बेटे को समझाते हुए बोली, ‘‘बेटा, सुमन आंटी अपने गांव की प्रधान है. वह ठेकेदारी भी करती है. वह आदमियों की तरह कपड़े पहनती है, उन की तरह से काम करती है इसलिए वह ऐसी दिखती है. वैसे एक बात बताऊं कि वह स्वभाव से अच्छी है.’’

मां और बेटे के बीच जब यह बहस हो रही थी तो वहीं कमरे में दीपा का पति बबलू भी बैठा था. उस से जब चुप नहीं रहा गया तो वह बीच में बोल उठा,‘‘दीपा, यश को जो लगा, उस ने कह दिया. उस की बात अपनी जगह सही है. मैं भी तुम्हें यही समझाने की कोशिश करता रहता हूं लेकिन तुम मेरी बात मानने को ही तैयार नहीं होती हो.’’

‘‘यश बच्चा है. उसे हमारे कामधंधे आदि की समझ नहीं है. पर आप समझदार हैं. आप को यह तो पता ही है कि सुमन ने हमारे एनजीओ में कितनी मदद की है.’’ दीपा ने पति को समझाने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘मदद की है तो क्या हुआ? क्या वह अपना हिस्सा नहीं लेती है? और 8 महीने पहले उस ने हम से जो साढ़े 3 लाख रुपए लिए थे. अभी तक नहीं लौटाए.’’ पति बोला.

मां और बेटे के बीच छिड़ी बहस में अब पति पूरी तरह शामिल हो गया था.

‘‘बच्चों के सामने ऐसी बातें करना जरूरी है क्या?’’ दीपा गुस्से में बोली.

‘‘यह बात तुम क्यों नहीं समझती. मैं कब से तुम्हें समझाता आ रहा हूं कि सुमन से दूरी बना लो.’’ बबलू सिंह ने कहा तो दीपा गुस्से में मुंह बना कर दूसरे कमरे में चली गई. बबलू ने भी दीपा को उस समय मनाने की कोशिश नहीं की. क्योंकि वह जानता था कि 2-4 घंटे में वह नार्मल हो जाएगी.

बबलू सिंह उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के इस्माइलगंज में रहता था. कुछ समय पहले तक इस्माइलगंज एक गांव का हिस्सा होता था. लेकिन शहर का विकास होने के बाद अब वह भी शहर का हिस्सा हो गया है. बबलू सिंह ठेकेदारी का काम करता था. इस से उसे अच्छी आमदनी हो जाती थी इसलिए वह आर्थिकरूप से मजबूत था.

उस की शादी निर्मला नामक एक महिला से हो चुकी थी. शादी के 15 साल बाद भी निर्मला मां नहीं बन सकी थी. इस वजह से वह अकसर तनाव में रहती थी. बबलू सिंह को बैडमिंटन खेलने का शौक था. उसी दौरान उस की मुलाकात लखनऊ के ही खजुहा रकाबगंज मोहल्ले में रहने वाली दीपा से हुई थी. वह भी बैडमिंटन खेलती थी. दीपा बहुत सुंदर थी. जब वह बनठन कर निकलती थी तो किसी हीरोइन से कम नहीं लगती थी.

बैडमिंटन खेलतेखेलते दोनों अच्छे दोस्त बन गए. 40 साल का बबलू उस के आकर्षण में ऐसा बंधा कि शादीशुदा होने के बावजूद खुद को संभाल न सका. दीपा उस समय 20 साल की थी. बबलू की बातों और हावभाव से वह भी प्रभावित हो गई. लिहाजा दोनों के बीच प्रेमसंबंध हो गए. उन के बीच प्यार इतना बढ़ गया कि उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया.

दीपा के घर वालों ने उसे बबलू से विवाह करने की इजाजत नहीं दी. इस की एक वजह यह थी कि एक तो बबलू दूसरी बिरादरी का था और दूसरे बबलू पहले से शादीशुदा था. लेकिन दीपा उस की दूसरी पत्नी बनने को तैयार थी. पति द्वारा दूसरी शादी करने की बात सुन कर निर्मला नाराज हुई लेकिन बबलू ने उसे यह कह कर राजी कर लिया कि तुम्हारे मां न बनने की वजह से दूसरी शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. पति की दलीलों के आगे निर्मला को चुप होना पड़ा क्योंकि शादी के 15 साल बाद भी उस की कोख नहीं भरी थी. लिहाजा न चाहते हुए भी उस ने पति को सौतन लाने की सहमति दे दी.

घरवालों के विरोध को नजरअंदाज करते हुए दीपा ने अपनी उम्र से दोगुने बबलू से शादी कर ली और वह उस की पहली पत्नी निर्मला के साथ ही रहने लगी. करीब एक साल बाद दीपा ने एक बेटे को जन्म दिया जिस का नाम यशराज रखा गया. बेटा पैदा होने के बाद घर के सभी लोग बहुत खुश हुए. अगले साल दीपा एक और बेटे की मां बनी. उस का नाम युवराज रखा. इस के बाद तो बबलू दीपा का खास ध्यान रखने लगा. बहरहाल दीपा बबलू के साथ बहुत खुश थी.

दोनों बच्चे बड़े हुए तो स्कूल में उन का दाखिला करा दिया. अब यशराज जार्ज इंटर कालेज में कक्षा 9 में पढ़ रहा था और युवराज सेंट्रल एकेडमी में कक्षा 7 में. दीपा भी 35 साल की हो चुकी थी और बबलू 55 का. उम्र बढ़ने की वजह से वह दीपा का उतना ध्यान नहीं रख पाता था. ऊपर से वह शराब भी पीने लगा. इन्हीं सब बातों को देखने के बाद दीपा को महसूस होने लगा था कि बबलू से शादी कर के उस ने बड़ी गलती की थी. लेकिन अब पछताने से क्या फायदा. जो होना था हो चुका.

बबलू का 2 मंजिला मकान था. पहली मंजिल पर बबलू की पहली पत्नी निर्मला अपने देवरदेवरानी और ससुर के साथ रहती थी. नीचे के कमरों में दीपा अपने बच्चों के साथ रहती थी. उन के घर से बाहर निकलने के भी 2 रास्ते थे. दीपा का बबलू के परिवार के बाकी लोगों से कम ही मिलनाजुलना  होता था. वह उन से बातचीत भी कम करती थी.

बबलू को शराब की लत हो जाने की वजह से उस की ठेकेदारी का काम भी लगभग बंद सा हो गया था. तब उस ने कुछ टैंपो खरीद कर किराए पर चलवाने शुरू कर दिए थे. उन से होने वाली कमाई से घर का खर्च चल रहा था.

शुरू से ही ऊंचे खयालों और सपनों में जीने वाली दीपा को अब अपनी जिंदगी बोरियत भरी लगने लगी थी. खुद को व्यस्त रखने के लिए दीपा ने सन 2006 में ओम जागृति सेवा संस्थान के नाम से एक एनजीओ बना लिया. उधर बबलू का जुड़ाव भी समाजवादी पार्टी से हो गया. अपने संपर्कों की बदौलत उस ने एनजीओ को कई प्रोजेक्ट दिलवाए.

इसी बीच सन 2008 में दीपा की मुलाकात सुमन सिंह नामक महिला से हुई. सुमन सिंह गोंडा करनैलगंज के कटरा शाहबाजपुर गांव की रहने वाली थी. वह थी तो महिला लेकिन उस की सारी हरकतें पुरुषों वाली थीं. पैंटशर्ट पहनती और बायकट बाल रखती थी. सुमन निर्माणकार्य की ठेकेदारी का काम करती थी. उस ने दीपा के एनजीओ में काम करने की इच्छा जताई. दीपा को इस पर कोई एतराज न था. लिहाजा वह एनजीओ में काम करने लगी.

पबजी गेम की आड़ में की मां की हत्या

गलत आदतों से हुई सजा ए मौत – भाग 4

पुलिस के गले नहीं उतरा नौकरानी का बयान

अम्माजी के कमरे में शोर सुन कर वह वहां पहुंची तो देखा कि उन के बिस्तर पर खून फैला हुआ था और वह मरी पड़ी थीं. वाश बेसिन का कांच टूटा पड़ा था. उस ने शोर मचाने की कोशिश की तो उसे भी कांच के टुकड़े से घायल कर दिया और शोर मचाने पर हत्या की धमकी दी. बदमाश अलमारी से जेवर व नकदी लूट कर भाग गए. उन के जाने के बाद उस ने शोर मचाया, तब पड़ोसी आए.

नौकरानी रेनू शर्मा की यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. वृद्धा की हत्या व लूट की गुत्थी नौकरानी रेनू के बयानों से उलझ गई थी. जिस तरह से कमला देवी की हत्या की गई, उस से यह बात समझ नहीं आ रही थी कि हत्यारों ने वाश बेसिन पर लगा शीशा तोड़ कर उस से हत्या क्यों की? यदि हत्यारे हत्या व लूट करने ही आए थे तो अपने साथ कोई हथियार क्यों नहीं लाए?

कमला देवी ने रेनू से चाय बनाने को कहा तो जरूर परिचित ही होंगे. फिर बदमाश कमला देवी की हत्या और लूट करने के बाद प्रत्यक्षदर्शी गवाह रेनू को जिंदा क्यों छोड़ गए? रेनू की बातों से पुलिस का शक उसी पर बढ़ता गया.

पुलिस को लगा कि घटना को अंजाम देने वाले जरूर उस के परिचित हैं और उस ने ही उन्हें बुलाया होगा. ये बात पुलिस ने रेनू से कही तो वह घबरा गई और अपने को निर्दोष बताने लगी. कई घंटों की पूछताछ व पुलिस द्वारा आश्वासन देने पर कि तुम्हें कुछ नहीं होगा, रेनू टूट गई और उस ने अंत में पूरे घटनाक्रम की सही जानकारी पुलिस को दे दी.

रेनू ने बताया कि अम्माजी के धेवता दामाद तरुण गोयल, जिसे वह पहले से जानती है, ने इस घटना को अंजाम दिया था. उस ने ही डरा दिया था कि वह सभी को 2 बदमाशों के आने की बात कहे. ऐसा न करने पर उस की भी हत्या कर दी जाएगी. इसी डर के चलते वह सही बात बताने से बच रही थी और पुलिस को घुमा रही थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने 2 अप्रैल, 2022 को लोहिया नगर स्थित घर से हत्यारोपी तरुण गोयल को गिरफ्तार करने के साथ ही उस के बिस्तर के नीचे से लूटे गए 77,620 रुपए तथा ज्वैलरी जिस में सोने की 4 चूडिय़ां, कानों के टौप्स, 2 अंगूठियां, चांदी के नोट के साथ आलाकत्ल पेचकस भी बरामद कर लिया.

तरुण ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया था. कमला देवी की हत्या लूट के उद्देश्य से की गई थी. पुलिस को वारदात के दूसरे दिन ही आरोपी को गिरफ्तार करने में सफलता मिल गई थी.

सट्टे में हार गया था 50-60 लाख रुपए

हत्या व लूट के आरोपी तरुण गोयल की गिरफ्तारी के बाद 2 अपै्रल को ही एसएसपी आशीष तिवारी ने प्रेस कौन्फ्रैंस बुला कर इस सनसनीखेज हत्या व लूट की घटना का परदाफाश करते हुए जानकारी दी कि कर्ज में डूबे रिश्तेदार तरुण गोयल ने ही हत्या व लूट की घटना को अंजाम दिया था.

बदमाश 2 नहीं एक ही था. वह भी कोई बाहरी व्यक्ति न हो कर मृतका की बेटी रंजना उर्फ पिंकी का दामाद तरुण गोयल था. दामाद होने के कारण उस का उस घर में आनाजाना था उसे सभी सम्मान देते थे. नौकरानी रेनू शर्मा उसे पहले से ही जानती थी. हत्या व लूट की वारदात को तरुण गोयल ने अंजाम दिया था. वह मूलरूप से मेरठ के सदर बाजार थाना क्षेत्र के बंगला एरिया के मकान नंबर 195 का निवासी है.

तरुण मेरठ में सेनेटरी का काम करता था. उस का अच्छा कारोबार था. औनलाइन सट्टा खेलने के कारण उस पर 50-60 लाख रुपए का कर्ज हो गया था. लौकडाउन के समय वह मेरठ से भाग कर फिरोजाबाद आ गया था. जहां वह फिरोजाबाद के थाना उत्तर के लोहिया नगर की गली नंबर 2 में घरजमाई बन कर रहने लगा था. यहां रह कर वह सेनेटरी का काम करता था. ससुरालीजन उस की आर्थिक रूप से भी मदद करते थे.

तरुण को पता था कि उस के और नानी सास के परिजन शुक्रवार को एक साथ फिल्म देखने गए हैं और नानी सास घर पर अकेली हैं. उस की नजर नानी सास कमला देवी के रुपयों व आभूषणों पर थी. उसे पता था कि लोकेश का कोयले का बड़ा व्यवसाय है. उस ने सुनियोजित षडयंत्र रचा और पहली अप्रैल, 2022 की अपराह्नï सवा 2 बजे आर्यनगर में उन के घर पर पहुंच गया.

फैसले से परिजन दिखे संतुष्ट

डोरबैल बजाने पर रेनू ने दरवाजा खोल दिया. घर पर नौकरानी रेनू को देख कर उसे अपनी योजना पर पानी फिरते दिखा. लेकिन लालच में वशीभूत हो कर वह अपने को रोक नहीं सका. वह रेनू को पहले से ही जानता था, रेनू भी तरुण को जानती थी कि घर के दामाद हैं. तरुण रेनू से बिना कुछ कहे कमला देवी के कमरे में चला गया.

तरुण ने घटना को अंजाम दिया. रेनू द्वारा टोकने पर उस ने उसे भी घायल कर दिया. गर्भवती रेनू ने जब अपनी जान बख्शने की गुहार लगाई तो उसे धमकी दी कि घर में 2 बदमाशों द्वारा घटना करने की बात सभी को बताए और उस का नाम अपनी जुबान पर भूल से भी न लाए वरना उस का भी यही अंजाम कर देगा. इस के बाद अलमारी से नकदी व जेवर लूट कर वह भाग गया था.

तत्कालीन थाना उत्तर फिरोजाबाद के एसएचओ संजीव कुमार दुबे ने विवेचना कर आरोपी तरुण गोयल के खिलाफ कोर्ट में भादंवि की धारा 394, 302, 307, 506, 411 के अंतर्गत आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल की थी. लगभग एक साल तक चले इस मुकदमे में अभियोजन पक्ष से 7 गवाहों को पेश किया गया. चश्मदीद गवाह रेनू शर्मा जो स्वयं भी पीडि़त थी, ने कोर्ट में अहम गवाही दी. फैसले में आरोपी तरुण गोयल को फांसी की सजा के बाद जेल भेज दिया गया.

अपर जिला एवं सत्र न्यायालय के विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावी क्षेत्र) आजाद सिंह ने अपने जजमेंट में लिखा है कि इस संबंध में मुजरिम तरुण गोयल से जब पूछा गया कि उस ने ये अपराध क्यों किया तो उस ने कहा, ‘मैं कर्ज के बोझ में दबा हुआ था और उस वक्त मेरे ऊपर शैतान हावी था.’

बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता लियाकतत अली (विधि सहायक) ने जबकि अभियोजन पक्ष की ओर से डीजीसी (क्राइम) राजीव प्रियदर्शी तथा विशेष लोक अभियोजक अजय कुमार शर्मा ने पैरवी की. हत्यारे को फांसी की सजा दिलाने के लिए कमला देवी के परिवार के सदस्यों ने संघर्ष किया था.

फिलहाल तरुण गोयल जिला जेल में अपने किए की सजा भुगत रहा है. तरुण द्वारा घटना को अंजाम दिए जाने के बाद से उस के किसी भी परिजन ने अब तक उस की ओर से मुकदमे में पैरवी नहीं की और न जमानत कराई, साथ ही कोई भी परिजन उस से मिलने कोर्ट तक नहीं आया. घटना के बाद एक साल से वह जेल में ही था.

कथा न्यायालय के जजमेंट और जिला लोक अभियोजक (क्राइम) राजीव प्रियदर्शी व विशेष लोक अभियोजक (क्राइम) अजय कुमार शर्मा से बातचीत पर आधारित.

गलत आदतों से हुई सजा ए मौत – भाग 3

नौकरानी के गले में घुसेड़ दिया था कांच

आवाज सुन कर रेनू कमरे में आ गई. अम्माजी को निर्जीव बिस्तर पर पड़े देख उस ने तरुण से कहा, “ये तुम ने क्या किया?”

इस पर तरुण ने रेनू को दबोच लिया और मारपीट करते हुए टूटे हुए कांच से उस के शरीर पर वार कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया. उस समय तरुण के सिर पर खून सवार हो चुका था. तरुण ने रेनू की हत्या करने के लिए उस के गले में शीशा फंसा दिया. मगर रेनू गिड़गिड़ाई और पेट में पल रहे बच्चे की दुहाई दी. इस पर तरुण ने रेनू को धमकी देते हुए कहा, “मेरा नाम अपनी जुबान पर हरगिज न लाना वरना तेरा भी यही अंजाम होगा.”

अपनी जान बचाने के लिए रेनू ने उस के कहे अनुसार हामी भर दी.

कमला देवी की हत्या तथा नकदी व जेवर लूटने के साथ ही नौकरानी रेनू शर्मा को गंभीर रूप से घायल कर तरुण गोयल शाम 4 बजे घर से निकल गया. अम्माजी की हत्या व अपने साथ हुई मारपीट से रेनू बदहवास हो कर मूर्छित हो गई थी. कुछ देर बाद जब उसे होश आया तो वह उठी और रोते हुए पड़ोसी भाटियाजी को घटना की जानकारी दी.

इस पर शाम 5 बजे भाटियाजी ने फोन कर के शोभाजी को जानकारी देते हुए बताया, “आप लोगों के घर कोई घटना हो गई है, आप तुरंत घर चले आएं.”

इसी बीच किसी ने थाना उत्तर पुलिस को घटना की जानकारी दे दी. हत्या व लूट की सूचना मिलते ही तत्कालीन एसएचओ संजीव कुमार दुबे मय फोर्स के घटनास्थल पर पंहुच गए थे. तब तक वहां भीड़ एकत्र हो चुकी थी. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने उच्चाधिकारियों को घटना से अवगत करा दिया था.

घर पर घटना होने की जानकारी मिलते ही परिजन घबरा गए और मूवी बीच में ही छोड़ कर दौड़ेदौड़े घर आ गए. घर पर पुलिस व भीड़ देखते ही सभी के पसीने छूट गए. वे समझ गए कोई बड़ी घटना हो गई है. परिजन जब अम्माजी के कमरे में पहुंचे तो वहां का दृश्य देखते ही सिर पकड़ कर बैठ गए. इस बीच पुलिस ने गंभीर रूप से घायल नौकरानी रेनू से पूछताछ कर उसे उपचार के लिए अस्पताल भिजवा दिया.

घटना से इलाके में मची सनसनी

इसी बीच एसएसपी आशीष तिवारी, तत्कालीन एसपी (सिटी) मुकेश चंद्र मिश्र व अन्य पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. एसएसपी आशीष तिवारी ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया. टीम ने मौके से जरूरी साक्ष्य जुटाए.

उन्होंने देखा कि कमला देवी की मौत हो चुकी थी. कमरे में सामान बिखरा पड़ा था. अलमारी खुली पड़ी थी. वाश बेसिन का शीशा टूटा पड़ा था. मृतका के गले, छाती व पेट पर चोट के निशान थे. बैड के नीचे खून से सना तकिया पड़ा था. जरूरी काररवाई निपटाने के बाद कमला देवी के शव को मोर्चरी भिजवा दिया.

इस संबंध में अर्पित जिंदल ने थाना उत्तर में रिपोर्ट दर्ज कराई. रिपोर्ट में कहा कि वह अपनी मां शोभा जिंदल, चचेरा भाई चंदन अग्रवाल, चचेरी बहन आस्था, आकांक्षा मित्तल, ताई सरिता अग्रवाल, भांजा अर्नव गोयल, अंशुमान मित्तल के साथ 3 से 6 बजे का शो देखने गए थे, तभी यह घटना घटी.

उन्होंने बताया कि घर में रखी नकदी करीब 70-75 हजार रुपए, सोनेे के जेवरात, चांदी के सिक्के व नोटों की गड्डी जो दादी संभाल कर रखती थीं, को कोई अज्ञात बदमाश घर में घुस कर दादी की हत्या कर लूट कर ले गया है, साथ ही नौकरानी को घायल कर गया.

शहर के व्यस्ततम और तंग गलियों वाले आर्यनगर में दिनदहाड़े दिल दहलाने वाली घटना से उस समय सनसनी फैल गई थी. आर्य नगर निवासी घटना को ले कर तरहतरह की अटकलें लगा रहे थे. कुछ का कहना था कि इस घटना में नौकरानी रेनू शर्मा का ही हाथ है. उसे आज ही घर व अम्माजी की देखरेख के लिए परिजन छोड़ गए थे. उन के जाने के बाद ही घटना हो गई.

रेनू ने अनजान के लिए घर का दरवाजा क्यों खोला? जितने मुंह उतनी बातें. गुस्साए लोगों को एसएसपी आशीष तिवारी ने भरोसा दिया कि इस जघन्य घटना का शीघ्र खुलासा कर आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें कड़ी सजा दिलाई जाएगी. पुलिस की 5 टीमें जुटीं जांच में

मुकदमा दर्ज होने के बाद एसएसपी आशीष तिवारी ने इस सनसनीखेज घटना के खुलासे के लिए एसओजी के साथ ही 3 थानों की 5 टीमें गठित कीं. पुलिस ने बदमाशों तक पहुंचने के लिए क्षेत्र में लगे सीसीटीवी कैमरे खंगालने के साथ ही आसपास के लोगों से घटना के बारे में पूछताछ की.

बताते चलें कि कोयला कारोबारी लोकेश जिंदल घटना से 15 दिन पहले व्यापार के सिलसिले में गुवाहाटी गए हुए थे. घर पर उन की पत्नी शोभा व बेटा अर्पित व मां कमला देवी थीं. अर्पित अपनी मां, चाचा व बुआ के परिवार के साथ मूवी देखने चला गया था. नौकरानी रेनू उन के यहां स्थाई रूप से काम नहीं करती थी. नौकरानी को जरूरत पडऩे पर बुलाया जाता था. बीचबीच में वह अपनी मरजी से आतीजाती थी. शुक्रवार को पिक्चर देखने जा रहे थे, इसलिए कमला देवी की देखभाल के लिए उसे बुला लिया था.

ऐसा लगता था कि वारदात को अंजाम देने वाले बदमाशों को पहले से घर की पूरी स्थिति का पता था. पुलिस समझ गई थी कि घटना को अंजाम परिचितों द्वारा ही दिया गया है. उन्हें इस बात की जानकारी थी कि परिजन पिक्चर देखने गए हैं. सीसीटीवी खंगालने के बाद भी पुलिस के हाथ खाली थे. पुलिस को अगर उम्मीद थी तो नौकरानी रेनू शर्मा से ही थी. वही मौके की प्रत्यक्षदर्शी थी. घटना के तुरंत बाद पुलिस को पूछताछ में रेनू ने 2 बदमाशों द्वारा घटना किए जाने की बात बताई थी.

पुलिस ने अस्पताल पहुंच कर घायल रेनू से पूछताछ शुरू की. उस समय तक रेनू पूरी तरह से सामान्य हो चुकी थी. रेनू ने पुलिस को बताया कि परिजनों के जाने के बाद लगभग सवा 2 बजे दरवाजे पर लगी घंटी किसी ने बजाई. जब उस ने दरवाजा खोला तो 2 लोग खड़े थे. अर्पित बाबूजी को पूछते हुए दोनों अंदर आ गए और अम्माजी के कमरे में जा कर उन के पास बैठ कर बातें करने लगे.”

रेनू ने बताया कि वह युवकों को नहीं जानती थी. अम्माजी ने मुझ से उन के लिए चाय बनाने को कहा. इस से मुझे लगा कि वे लोग घर वालों के परिचित हैं. मैं किचन में जा कर चाय बनाने लगी.

                                                                                                                                            क्रमशः

जिन्दा दफन की आंगन की किलकारी

जनवरी, 2014 को मुरादाबाद जिले के गुरेठा गांव में 2 व्यक्ति  पहुंचे. उन में से एक की गोद में एक बच्चा था. वह बोला, ‘‘तीर्थांकर महावीर मैडिकल कालेज में मेरी पत्नी ने एक बेटी को जन्म दिया था. बच्ची मर गई है. अब इसे दफनाना है. दफनाने के लिए हमें फावड़ा चाहिए. हमें श्मशान बता दो, इस बच्ची को हम वहां दफना देंगे.’’

ऐसे दुख में लोग हर तरह से सहयोग करने की कोशिश करते हैं. इसलिए फावड़ा आदि ले कर गांव के कई लोग उन दोनों के साथ गांव के पास ही बहने वाली गांगन नदी की ओर चल दिए. गांव का एक आदमी दुकान से बच्ची के लिए कफन भी खरीद लाया.

गांगन नदी के आसपास के गांवों के लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार नदी के किनारे स्थित श्मशान में करते थे. इसलिए वे भी बच्ची को कफन में लपेट कर नदी की तरफ चल दिए. नदी किनारे पहुंच कर गांव के एक आदमी ने बच्ची की लाश को दफनाने के लिए एक गड्ढा भी खोद दिया. वह उसे दफनाने ही वाले थे कि उसी समय बच्ची रोने लगी.

बच्ची के रोने की आवाज सुन कर गांव वाले चौंक गए क्योंकि उस बच्ची को तो उन दोनों लोगों ने मरा हुआ बताया था. बच्ची के जीवित होने पर उस के पिता और साथ आए युवक को खुश होना चाहिए था लेकिन वे घबरा रहे थे. उन के चेहरे देख कर गांव वालों को शक हो गया. वे समझ गए कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है.

लिहाजा उन्होंने उन दोनों को घेर लिया और हकीकत जानने की कोशिश करने लगे. लेकिन वे यही कहते रहे कि डाक्टर ने बच्ची को मृत बताया था. इस के बाद ही तो वे उसे दफनाने के लिए आए थे. यह बात गांव वालों के गले नहीं उतर रही थी. शोरशराबा सुन कर आसपास खेतों में काम करने वाले लोग भी वहां पहुंच गए. भीड़ बढ़ती देख वे दोनों वहां से भागने का मौका ढूंढ़ने लगे. लोगों ने उन्हें दबोच लिया और उसी समय पाकबड़ा थाने में फोन कर दिया.

सूचना पा कर थानाप्रभारी तेजेंद्र यादव सबइंसपेक्टर सहदेव सिंह के साथ श्मशान घाट पहुंच गए. उन्होंने दोनों लोगों से पूछताछ की तो एक ने अपना नाम राजेश और दूसरे ने दिनेश बताया. उन्होंने जब बच्ची को देखा तो वह जीवित थी. वह 5-6 दिनों की लग रही थी.

पता चला कि वह राजेश की बेटी है और दूसरा युवक उस का साला है. पास में ही तीर्थंकर महावीर मैडिकल कालेज था. पुलिस ने उस बच्ची को अविलंब मैडिकल कालेज में भरती करा दिया जिस से उस की जान बच सके.

डाक्टरों ने जब उस बच्ची को देखा तो वे चौंक गए क्योंकि वह बच्ची वहीं पैदा हुई थी और उस की मां उस समय वहीं भरती थी. डाक्टरों ने पुलिस को बताया कि बच्ची को उस का पिता राजेश जीवित अवस्था में ही ले गया था, उस के मरने का तो सवाल ही नहीं है.

मामला गंभीर लग रहा था इसलिए थानाप्रभारी ने यह सूचना नगर पुलिस अधीक्षक महेंद्र यादव को दे दी. उधर डाक्टरों ने भी बच्ची को आईसीयू में भरती कर के इलाज शुरू कर दिया. नगर पुलिस अधीक्षक महेंद्र भी थाना पाकबड़ा पहुंच गए. थानाप्रभारी ने उन के सामने राजेश से जब पूछताछ की तो बच्ची को जिंदा दफन करने की एक चौंकाने वाली कहानी सामने आई.

राजेश मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के हाफिजगंज का रहने वाला था. वह मोटर मैकेनिक का काम करता था. पिता रामभरोसे को जब लगा कि राजेश अपना घर चलाने लायक हो गया है तो उन्होंने बरेली के ही नवाबगंज में रहने वाले मुक्ता प्रसाद की बेटी सुनीता से उस की शादी कर दी.

शादी हो जाने के बाद राजेश के खर्चे बढ़ गए थे इसलिए राजेश कहीं दूसरी जगह अपने लिए नौकरी ढूंढ़ने लगा. इसी दौरान उत्तरांचल के रुद्रपुर शहर स्थित एक फैक्ट्री में उस की नौकरी लग गई. उस फैक्ट्री में बाइकों की चेन बनती थीं.

कुछ दिनों बाद राजेश पत्नी सुनीता को भी रुद्रपुर ले गया. वहां हंसीखुशी के साथ उन का जीवन चल रहा था. इसी दौरान सुनीता गर्भवती हो गई. इस से पतिपत्नी दोनों ही खुश थे. पहली बार मां बनने पर महिला को कितनी खुशी होती है, इस बात को सुनीता महसूस कर रही थी. राजेश भी सुनीता की ठीक से देखभाल कर रहा था. सुनीता को 7 महीने चढ़ गए. अब सुनीता को कुछ परेशानी होने लगी थी. क्योंकि डाक्टर ने भी सुनीता को कुछ ऐहतियात बरतने की हिदायत दे रखी थी. सावधानी बरतने के बाद भी अचानक एक दिन सुनीता को प्रसव पीड़ा हुई.

जिस डाक्टर से सुनीता का इलाज चल रहा था, राजेश पत्नी को तुरंत उसी डाक्टर के पास ले गया. सुनीता का चैकअप करने के बाद डाक्टर ने स्थिति गंभीर बताई क्योंकि सुनीता के पेट में 7 महीने का बच्चा था. यदि वह आठ साढ़े आठ महीने से ऊपर का होता तो डिलीवरी कराई जा सकती थी, समय से 2 महीने पहले डिलीवरी कराना उस डाक्टर की नजरों में मुनासिब नहीं था.

ऐसी हालत में सुनीता को किसी अच्छे अस्पताल या नर्सिंगहोम में ले जाना जरूरी था. रुद्रपुर में कई नर्सिंगहोम ऐसे थे जहां सुनीता को ले जाया जा सकता था लेकिन वे महंगे होने की वजह से राजेश के बजट से बाहर थे. लिहाजा वह पत्नी को ले कर मुरादाबाद आ गया और उसे तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के मैडिकल कालेज में भरती करा दिया.

वहां 4 जनवरी, 2014 को सुनीता ने एक बेटी को जन्म दिया. बच्ची 7 महीने में पैदा हुई थी इसलिए वह बेहद कमजोर थी. उसे इनक्यूबेटर में रखा जाना बहुत जरूरी था लेकिन मैडिकल कालेज में जो इनक्यूबेटर थे, उन में पहले से ही दूसरे बच्चे रखे हुए थे.   ऐसी स्थिति में मैडिकल कालेज के जौइंट डाइरैक्टर डा. विपिन कुमार जैन ने राजेश को सलाह दी कि वह अपनी बच्ची को किसी अन्य नर्सिंगहोम या अस्पताल या फिर दिल्ली ले जाए. क्योंकि बच्ची की हालत ठीक नहीं है.

उधर इतनी कमजोर बच्ची को देख कर वार्ड में भरती मरीजों के तीमारदारों ने राजेश के मुंह पर ही कह दिया कि ये बच्ची बचेगी नहीं और यदि बच भी गई तो पूरी जिंदगी अपंग रहेगी. लेकिन राजेश ने उन की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

बेटी की जान बचाने के लिए राजेश उसे ले कर मुरादाबाद के साईं अस्पताल पहुंचा. राजेश के साथ उस का साला दिनेश भी था. साईं अस्पताल में बच्ची को भरती करने से पहले 10 हजार रुपए जमा कराने को कहा गया. उस के पास उस समय इतने रुपए नहीं थे. राजेश ने अस्पतालकर्मियों से कहा भी कि वह पैसे बाद में जमा करा देगा, पहले बेटी का इलाज तो शुरू करो. लेकिन उस के अनुरोध को उन्होंने अनसुना कर दिया.

राजेश बेटी को हर हाल में बचाना चाहता था. इसलिए उस ने अपने कई सगेसंबंधियों और रिश्तेदारों को फोन कर के अपनी स्थिति बताई और उन से पैसे मांगे लेकिन किसी ने भी उस की सहायता करने के बजाए कोई न कोई बहाना बना दिया. राजेश बहुत परेशान हो गया था. ऐसी हालत में उस की समझ मेें नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

चारों ओर से हताश हो चुके राजेश के कानों में तीमारदारों के शब्द गूंज रहे थे कि बच्ची जिंदा नहीं बचेगी और अगर बच भी गई तो विकलांग रहेगी. निराशा और हताशा के दौर से गुजर रहे राजेश ने सोचा कि जब बच्ची पूरी जिंदगी विकलांग रहेगी तो इस की जान बचाने से क्या फायदा? इस से अच्छा तो यही है कि ये मर जाए.

इस के अलावा उस के मन में एक बात यह भी घूम रही थी कि यदि बच्ची नहीं मरी तो वह उस की वजह से पूरी जिंदगी परेशान रहेगा. लिहाजा उस ने बेटी को खत्म करने की सोची. इस बारे में उस ने अपने साले दिनेश से बात की तो उस ने भी जीजा की हां में हां मिलाते हुए 6 दिन की बच्ची को खत्म करने को कहा.

दोनों ने बच्ची को मारने का फैसला तो कर लिया लेकिन अपने हाथों से दोनों में से किसी की भी उस का गला दबाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. फिर उन्होंने तय किया कि बच्ची को जिंदा ही गड्ढे में दफना देंगे और जब सुनीता पूछेगी तो कह देंगे कि बच्ची की मौत हो गई थी और उसे दफना आए हैं.

गड्ढा खोदने के लिए उन के पास कोई चीज नहीं थी इसलिए वह फावड़ा मांगने के लिए गुरेठा गांव पहुंचे. ऐसी हालत में गांव वालों ने उन की सहायता करना मुनासिब समझा और उन के साथ गांगन नदी के किनारे उस जगह पर पहुंच गए जहां लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता था.

उस की नन्हीं सी जान की आंखें ठीक से खुली भी नहीं थीं. दुनियादारी से तो उसे कोई मतलब भी नहीं था. मां की गोद से पिता के मजबूत हाथों में वह इसलिए आई थी कि वह उस का इलाज कराएंगे. लेकिन उसे क्या पता था कि कन्यादान करने वाले हाथ ही उसे जिंदा दफनाने के लिए आगे बढ़ेंगे.

लेकिन जैसे ही उसे गड्ढे में ठंडी रेत पर लिटाया गया वह हाथपैर चलाते हुए जोरजोर से रोने लगी. जैसे वह रोतेरोते अपने जन्मदाता से पूछ रही हो कि मेरा कुसूर क्या है. मुझे मत मारो. एक दिन मैं ही तुम्हारा सहारा बनूंगी और घर में उजियारा फैलाऊंगी. लेकिन उस समय पिता की संवेदनशीलता नदारद हो चुकी थी.

अचानक बच्ची की आवाज सुन कर राजेश और दिनेश घबरा गए. वे सोचने लगे कि काश ये 2 मिनट और न रोती तो…

बहरहाल, उस की आवाज सुन कर गांव वाले चौंक गए और उन्होंने पुलिस बुला ली. दोनों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. पुलिस ने उस बच्ची को तीर्थांकर महावीर यूनिवर्सिटी के मैडिकल कालेज में भरती करवा दिया था. वहां उसे इनक्यूबेटर में रख दिया गया था. उस की हालत में भी सुधार होने लगा था.

उधर सुनीता को इस बात का पता नहीं था कि उस ने जिस बच्चे को जन्म दिया, उस की हत्या की कोशिश करने वाला उस का पति जेल में है. इलाके के लोगों को जब एक पिता के यमराज बनने की जानकारी हुई तो लोग बच्ची की लंबी उम्र के लिए दुआएं करने लगे. बच्ची के इलाज के लिए कई लोगों ने अस्पताल में पैसे भी जमा कराए लेकिन एक सप्ताह बाद ही उस बच्ची ने अस्पताल में दम तोड़ दिया.

वैसे यहां एक बात बताना जरूरी है कि राजेश की नीयत बेटी की हत्या करने की नहीं थी बल्कि वह तो उस की सुरक्षा के लिए ही मैडिकल कालेज लाया था और मैडिकल कालेज के डाक्टर के कहने पर वह बेटी को ले कर कई अस्पतालों में घूमा भी. उस की मजबूरी यह थी कि इलाज के लिए उस के पास पैसे नहीं थे और जिन संबंधियों और रिश्तेदारों से उस ने मदद की गुहार लगाई, उन्होंने भी मुंह मोड़ लिया था, जिस से वह निराश और हताश हो चुका था.

अस्पताल के वार्ड में मरीजों के तीमारदारों ने बच्ची के बारे में गलत धारणाएं राजेश के मन में भर दी थीं. इन्हीं धारणाओं ने उसे यमराज बनने के लिए मजबूर किया. इन्हीं बातों ने उस की संवेदनशीलता को हर लिया था. कहते हैं कि मां का दूसरा रूप मामा होता है लेकिन उस समय दिनेश का दिल भी नहीं पसीजा था. वह भी कंस मामा बन गया था.

पिता से यमराज बनने के हालात राजेश के सामने चाहे जो भी रहे हों लेकिन इस में अकेला वही दोषी नहीं है. इस में दोष उन लोगों का भी है जिन्होंने उसे इस रास्ते पर जाने के लिए मजबूर किया. वह इतना संवेदनहीन हो गया था कि जीवित बेटी को कब्र में रखते समय उस के हाथ तक नहीं कांपे.

बेटियों पर खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है. बेटे की चाहत में तमाम लोग उन्हें कोख में ही खत्म करा देते हैं. हम भले ही 21वीं सदी में पहुंचने की बात कर रहे हों लेकिन सोच अभी भी वही पुरानी है तभी तो भ्रूण हत्याओं में कमी नहीं आ रही. इस का उदाहरण यह है कि जहां सन 1990 में प्रति 1000 पुरुषों के अनुपात में 906 महिलाएं थीं, सन 2005 में इतने ही पुरुषों के अनुपात में केवल 836 महिलाएं रह गई थीं. बात 2014 की करें तो अब यह आंकड़ा 1000 पुरुषों पर 940 स्त्रियों का है.

कह सकते हैं कि लोगों में काफी हद तक जागृति आई है और भ्रूण हत्याओं का ग्राफ गिरा है. यह खुशी की बात है. लेकिन इस मामले को देख कर लगता है कि हमें अभी भी पुरुष की सोच को बदलने की जरूरत है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

गलत आदतों से हुई सजा ए मौत – भाग 2

फैसले में सुनाई सजा ए मौत

पीडि़त व बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं की दलीलों को गौर से सुनने के बाद अब फैसले की बारी थी. कोर्ट रूम में मौजूद सभी की नजरें न्यायाधीश पर टिकी हुई थीं. सामने रखी फाइल के पृष्ठों को पलटने के कुछ समय बाद विद्वान न्यायाधीश ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा-

“तमाम गवाहों और सबूतों को मद्देनजर रखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पंहुची है कि सारे सबूत और एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी गवाह घर की नौकरानी रेनू शर्मा की अहम गवाही घटना को सच साबित करती है. दोष सिद्ध अपराधी तरुण गोयल जनपद मेरठ का मूल निवासी है. उस ने स्वयं स्वीकार किया है कि वह मेरठ में सट्टे में पैसे हार गया था. उस के पिता से उस का कोई संबंध नहीं है. इसी कारण अपनी ससुराल फिरोजाबाद में आ गया था. फिरोजाबाद में उस के ससुरालीजनों ने उस का सहयोग किया.

“मृतका कमला देवी भी दोषसिद्ध अपराधी की पत्नी की नानी हैं और उन के यहां मुजरिम का सामान्य आवागमन था. घटना के दिन तरुण गोयल का पुत्र अर्नव गोयल व परिवार के अन्य सदस्य भी फिल्म देखने फिरोजाबाद के डीडी भारत सिनेमा में अर्पित जिंदल के परिवार के साथ गए थे. मृतका कमला देवी के घर पर अकेले रहने की जानकारी अपराधी को थी. इसी अवसर का लाभ उठा कर वह मृतका के घर गया.

“मुजरिम घरेलू नौकरानी रेनू शर्मा की मौजूदगी में मृतका के कमरे में लगभग सवा 2 बजे अपराह्न गया और 4 बजे के लगभग रेनू शर्मा ने उसे हाथ में पेचकस लिए तथा श्रीमती कमला देवी का शव बैड पर पड़ा देखा. इस के बाद उस ने रेनू शर्मा पर भी जान से मारने के आशय से वार किए ताकि कोई साक्ष्य शेष न रहे.

“मुजरिम तरुण गोयल का अपने मूल परिवार से कोई संबंध नहीं है. न्यायिक काररवाई के दौरान उस के परिवार का कोई सदस्य न्यायालय नहीं आया. अपने मूल परिवार से संबंध न होने के कारण उसे उस की ससुराल पक्ष द्वारा सहारा दिया गया.

“जिस परिवार द्वारा उसे सहारा दिया गया, उसी परिवार की वृद्ध महिला कमला देवी की लूट के आशय से पेचकस द्वारा वार कर के दर्द व पीड़ा दे कर नृशंस हत्या कर दी. यह परिस्थिति दर्शाती हैं कि रिहाई के बाद उस के सुधार की कोई संभावनाएं नहीं हैं.

“माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्णित विधि व्यवस्था में दिए गए दिशानिर्देशों को दृष्टिगत रखते हुए मृतका श्रीमती कमला देवी की जघन्य हत्या विरल से विरलतम श्रेणी का मामला है और इस के लिए दोषसिद्ध अपराधी तरुण गोयल मृत्युदंड पाने का अधिकारी है. उसे भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत मृत्युदंड से दंडित किया जाता है और उसे फांसी पर तब तक लटकाया जाए, जब तक उस की मृत्यु न हो जाए. इस के अलावा उसे 20 हजार रुपए अर्थदंड से दंडित किया जाता है. अर्थदंड अदा न करने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास और भोगेगा.

“इस के अलावा भादंवि की धारा 307 के तहत आजीवन कारावास और 20 हजार रुपए अर्थदंड से दंडित किया जाता है. अर्थदंड अदा न करने पर भविष्यवर्ती परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भोगेगा. भादंवि की धारा 394 के अंतर्गत आजीवन कारावास और 20 हजार रुपए अर्थदंड तथा इसे अदा न करने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भोगेगा.

“भादंवि की धारा 411 के अंतर्गत 3 वर्ष कारावास और 5 हजार रुपए अर्थदंड, जिस के अदा न करने पर 3 माह का अतिरिक्त कारावास भोगेगा. भादंवि की धारा 506 के अंतर्गत 7 वर्ष कारावास और 5 हजार रुपए अर्थदंड, इसे अदा न करने पर 3 माह का अतिरित कारावास भोगेगा. दोषसिद्ध अपराधी की सभी सजाएं एक साथ चलेंगी.”

लोकेश जिंदल थे संपन्न व्यवसायी

आइए आप को बताते हैं कि एक साल पहले यह घटना कैसे हुई थी-

कांच की चूडिय़ों के लिए फिरोजाबाद शहर विश्व भर में प्रसिद्ध है. अब यहां चूडिय़ों के साथ ही कांच के अन्य सामान झाड़ (झूमर), लैंप, रंगबिरंगे खिलौने आदि भी बनाए जाने लगे हैं. आर्यनगर घनी आबादी वाला मोहल्ला है. आर्यनगर मोहल्ले की गली नंबर 9 में अपने पुश्तैनी मकान में कोयला व्यवसायी लोकेश जिंदल उर्फ बबली अपनी पत्नी शोभा, बेटे अर्पित व वृद्ध मां कमला देवी के साथ रहते थे.

असली कहानी एक साल पहले शुरू होती है. उस दिन शुक्रवार 1 अप्रैल, 2022 का दिन था. अर्पित अपनी मां, बुआ व चाचा के परिवार के सदस्यों के साथ अपने घर से करीब 6 किलोमीटर दूर आसफाबाद स्थित डीडी भारत टाकीज में फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ का इवनिंग शो देखने गए थे.

घर पर 70 वर्षीय वृद्धा कमला देवी रह गई थीं. वह अस्वस्थ चल रही थीं. इसलिए जाने से पहले उन की देखभाल के लिए घर की नौकरानी रेनू शर्मा को फोन कर के बुला लिया था. अपराह्न 2 बजे रेनू घर आ गई थी. रेनू के आते ही सभी लोग घर से निकल गए थे.

रेनू को आए अभी मात्र 15 मिनट ही हुए थे कि डोरबैल बज उठी. घंटी की आवाज सुन कर नौकरानी रेनू ने दरवाजा खोला. दरवाजे पर तरुण गोयल खड़ा था. रेनू तरुण को अच्छी तरह जानती थी. क्योंकि वह घर का दामाद था. तरुण रेनू से बिना कुछ बोले कमला देवी के कमरे में चला गया.

उस समय कमला देवी सो रही थीं. कुछ देर बैठने के बाद तरुण ने रेनू को बुलाया और चाय बनाने के लिए कहा. उस ने रेनू से कहा, “अम्माजी सो रही हैं इसलिए चाय बना कर वहीं रख देना, मैं ले लूंगा.”

रेनू किचन में चाय बनाने चली गई.

उस समय कमला देवी सो रही थीं. तरुण ने जैसे ही कमरे में रखी अलमारी को खोला. आहट सुन कर कमला देवी जाग गईं. इस पर कमला देवी ने टोकते हुए कहा, “कौन है?”

तभी तरुण ने कहा, “नानी सास, कोई नहीं, मैं हंू.”

उन्होंने तेज आवाज में कहा, “अलमारी क्यों खोल रहे हो?”

इस पर तरुण ने कमरे में रखे पेचकस से उन के गले, छाती व पेट पर वार करने शुरू कर दिए. अचानक हुए हमले से कमला देवी की चीख निकल गई. उन्होंने शोर मचाया इस पर तरुण ने वाशबेसिन का शीशे को तोड़ दिया और उस के कांच से कमला देवी पर हमला कर उन्हें लहूलुहान कर दिया. हमले से बैड की चादर खून से रंग गई.

                                                                                                                                                क्रमशः

मंगेतर की कब्र पर रासलीला

गलत आदतों से हुई सजा ए मौत – भाग 1

25 अप्रैल, 2023 को उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अपर जिला एवं सत्र न्यायालय के कक्ष-6 में गहमागहमी कुछ अधिक ही दिखाई दे रही थी. विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावी क्षेत्र) आजाद सिंह की अदालत में साल 2022 में फिरोजाबाद नगर में हुए बहुचर्चित कमला देवी मर्डर व लूट के संबंध में फैसला आने वाला था.

पूरे न्यायालय परिसर में पुलिस और अधिवक्ताओं की भीड़ दिखाई दे रही थी. प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया के पत्रकार भी वहां उत्सुकता से फैसले का इंतजार कर रहे थे. क्योंकि फैसला आते ही उन्हें ब्रेकिंग न्यूज जो बनानी थी.

न्यायाधीश ने दोपहर साढ़े 12 बजे जैसे ही न्यायालय में प्रवेश किया तो वहां मौजूद सभी लोग सम्मानस्वरूप अपनी जगह पर खड़़े हो गए. न्यायाधीश के कुरसी पर बैठते ही अदालत में मौजूद लोगों ने अपना स्थान ग्रहण कर लिया. कुरसी पर बैठते ही न्यायाधीश ने अदालत के रीडर को इस केस से संबंधित पत्रावली पेश करने का आदेश दिया. दोनों ही पक्षों के वकील न्यायालय कक्ष में मौजूद थे. आरोपी तरुण गोयल को जेल से अदालत लाया गया था.

वकीलों की हुई जोरदार बहस

न्यायाधीश ने विशेष लोक अभियोजक अजय कुमार शर्मा को अपनी दलीलें पेश करने को कहा. इस पर शासन की ओर से पैरवी करते हुए अजय कुमार शर्मा ने कहा कि वे अब तक माननीय न्यायालय में 6 गवाहों को पेश कर चुके हैं. इन में चश्मदीद गवाह घर की नौकरानी रेनू शर्मा की गवाही शेष है.

अब तक के गवाहों के बयानों व अन्य सबूतों से साफ जाहिर है कि कोर्ट के कटघरे में तरुण गोयल नाम का जो व्यक्ति खड़ा है, उस ने ही रुपयों व गहनों के लालच में अपनी नानी सास 70 वर्षीय कमला देवी की उन के घर में घुस कर नृशंस तरीके से हत्या की थी. साथ ही घटना के समय घर में मौजूद नौकरानी रेनू शर्मा द्वारा विरोध करने पर उसे भी गंभीर रूप से घायल कर दिया और नकदी व गहने लूट कर ले गया.

घटना के समय मृतका के घर वाले पिक्चर देखने गए थे. इस बात की जानकारी आरोपी को थी, क्योंकि आरोपी के घर वाले भी उन के साथ गए थे.

“ये आरोप गलत है हुजूर. मेरे मुवक्किल को झूठा फंसाया जा रहा है,” बचाव पक्ष के अधिवक्ता लियाकत अली (विधि सहायक) ने अभियुक्त का बचाव करते हुए कहा, “अभियुक्त और घटना की रिपोर्ट लिखाने वाले अर्पित जिंदल आपस में रिश्तेदार हैं. अभियुक्त सैनेट्री का बिजनैस करता है और अर्पित ने अभियुक्त से पैसे उधार लिए थे और अब वह सैनेट्री के पूरे बिजनैस पर कब्जा करना चाहता है. इसी कारण अभियुक्त को झूठा फंसाया गया है.”

बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने अपने मुवक्किल का बचाव करते हुए कहा, “अभियुक्त से दर्शाई गई बरामदगी के समय रिपोर्टकर्ता अर्पित जिंदल घटनास्थल पर उपस्थित नहीं था. सर्वप्रथम घटना देखने वाले पड़ोसी भाटियाजी को परीक्षित नहीं कराया गया है. घटना में बरामदशुदा नोट (रुपए) आदि की द्वितीय प्रति नहीं बनाई गई है. साथ ही प्रथम सूचना रिपोर्टकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए नोट व जेवरात का मिलान नहीं होता है.

“अभियुक्त का इस घटना से कोई संबंध नहीं है. इस के साथ ही विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट को किसी गवाह से पुष्ट नहीं कराया गया है. घटना के समय अभियुक्त अपने बिजनैस के सिलसिले में मार्केट गया हुआ था. इस प्रकार अभियोजन अपने बयान को संदेह से परे सिद्ध करने में पूरी तरह असफल रहा है. इसलिए अदालत से गुजारिश की जाती है कि आरोप से अभियुक्त तरुण गोयल को दोषमुक्त किया जाए.”

“मी लार्ड, मेरे पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि कमला देवी की नृशंस हत्या उन के दामाद तरुण गोयल ने जेवरात व रुपए लूटने के उद्देश्य से ही की थी. विरोध करने पर नौकरानी रेनू शर्मा को गंभीर रूप से घायल कर दिया था.”

“अदालत का वक्त जाया न करें. आप के पास इस केस से संबंधित जो भी सबूत हैं, पेश किए जाएं,” न्यायाधीश ने आदेश दिया.

“मी लार्ड, मैं इस केस की एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह रेनू शर्मा को अदालत में पेश करने की अनुमति चाहता हंू,” पीडि़त की ओर से पैरवी कर रहे विशेष लोक अभियोजक अजय कुमार शर्मा ने अदालत से दरख्वास्त करते हुए कहा.

“इजाजत है,” न्यायाधीश ने कहा.

नौकरानी की रही अहम गवाही

रेनू शर्मा गवाह के कटघरे में आ कर खड़ी हो गई. तभी विशेष लोक अभियोजक अजय कुमार शर्मा ने उस से पूछा, “रेनू शर्मा, क्या आप बता सकती हैं कि जिस दिन तुम्हारी मालकिन का मर्डर हुआ था, उस समय तुम क्या कर रही थीं और तुमने क्या देखा?”

“जी, सर. घटना पहली अप्रैल, 2022 की है. मुझे कमला देवी ने फोन कर के बुलाया था. मैं घर पर दोपहर 2 बजे पहुंच गई थी. उस समय घर के लोग पिक्चर देखने भारत टाकीज गए हुए थे. मुझ से यह कह कर गए थे कि हम लोग जा रहे हैं, हमारे पीछे अम्मा का ध्यान रखना. इन लोगों के जाने के बाद सवा 2 बजे तरुण गोयल वहां आए थे, जोकि अम्माजी के धेवते दामाद लगते हैं. मैं ने ही दरवाजा खोला था. मैं इन्हें पहले से ही जानती थी. जब यह आए तो सीधे अम्माजी के कमरे में चले गए.

“तरुण गोयल ने मुझ से कहा कि चाय बना लो. फिर मैं किचन में चाय बनाने चली गई. उन्होंने कहा कि चाय वहीं रख दो मैं ले जाऊंगा, अम्मा सो रही हैं. चाय बनाने के बाद मैं दूसरे रूम में आराम करने चली गई. घटना के समय मैं गर्भवती थी, लेकिन बाद में हुए एक हादसे में मेरे पेट का बच्चा खराब हो गया.

“तरुण को अम्मा की हत्या करते देखने पर मैं वहां पहुंची और मैं ने तरुण से कहा, ‘तुम ने यह क्या कर दिया?’ इस पर तरुण ने मुझ से कहा, ‘तू अपना मुंह बंद रख, नहीं तो मैं तुझे भी मार दूंगा.’ फिर तरुण ने मुझ से कहा कि तुझे जिंदा छोडऩा बेकार है. तरुण गोयल ने मेरे सिर, बाजुओं व गले पर शीशा मार दिया, जिस से मेरे भी चोटें आईं. इस घटना में मुझे भी मारा और अम्माजी को भी मारा, जिस से चारों तरफ कपड़ों पर, बिस्तरों पर खून फैल गया था. मेरी चुन्नी व सूट पर खून फैल गया था.

“तब मैं ने तरुण गोयल से कहा कि मुझे छोड़ दो मेरी क्या गलती है तो तरुण गोयल ने कहा कि तुझे कैसे छोड़ सकता हंू तू तो असली गवाह है और तू तो गवाही दे देगी. चोट लगने से मैं जमीन पर बेसुध हो कर गिर पड़ी. तरुण गोयल वहां से चला गया. जब मुझे होश आया तो किचन से ही छज्जे के लिए जो रास्ता है वहां से पड़ोसी अंकल भाटियाजी का घर दिखाई देता है, मैं ने उन्हें आवाज दे कर बुलाया.”

“औब्जेक्शन मी लार्ड,” बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा, “क्या रेनू यह बता सकती हैं कि घर के लोग कौन सा शो देखने गए थे?”

इस पर रेनू शर्मा ने कहा कि मुझे नहीं पता कि ये लोग फिल्म का कौन सा शो देखने गए थे, न मैं ने उन से पूछा था. क्योंकि मैं घर की नौकरानी थी, मालिक नहीं.

“मी लार्ड मैं अदालत से दरख्वास्त करता हंू कि कमला देवी की हत्या व लूट तथा रेनू शर्मा को गंभीर रूप से घायल करने के आरोपी तरुण गोयल को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए.” सरकारी वकील अजय कुमार शर्मा इतना कह कर अपने स्थान पर बैठ गए.

                                                                                                                                         क्रमशः

पबजी गेम की आड़ में की मां की हत्या – भाग 3

दक्ष को इंसपेक्टर धर्मपाल ने कस्टडी में ले लिया था और उसे कोतवाली पीजीआई ले आए थे. यहां लखनऊ के एडिशनल डीसीपी (नार्थ) एस.एम. कासिम आबिदी मौजूद थे.

उन के सामने दक्ष से एक बार फिर पूछा गया, ‘‘दक्ष अपनी मां की हत्या तुम ने की है, क्या तुम इसे कुबूल करते हो?’’

‘‘हां, मैं ने ही अपनी मौम की हत्या की है.’’

‘‘क्यों?’’ कासिम आबिदी ने गंभीरता से पूछा.

‘‘मैं पबजी गेम में बहुत ज्यादा उलझा रहता था. मौम चाहती थी कि मैं अपनी पढ़ाई पर ध्यान दूं. मैं उन की बात अकसर अनसुनी करता था, इस के लिए मौम मुझे गालियां देती थी, पीटती थी. कई बार वह मुझे कमरे में बंद कर देती थी और खाना भी नहीं देती थी. मेरे मन में धीरे धीरे मौम के प्रति नफरत भरती चली गई.’’ उस ने बताया.

‘‘जिस रात तुम ने मां की हत्या की, उस रात का चुनाव तुम ने पहले से कर रखा था’ किसी बात से रुष्ट हो कर तुम ने डैड की रिवौल्वर अलमारी से निकाल कर मां पर गोली चला दी थी?’’

‘‘वह 3 जून, 2022 का मनहूस दिन था सर. मैं अपने स्टडी रूम में बैठा पढ़ रहा था. मौम अचानक आई और मुझे मारने लगी थी कि मैं ने उन के 10 हजार रुपए चोरी कर के पबजी  गेम में उड़ा दिए हैं. मैं ने पापा की कसमें खाईं, बहुत कहा कि मैं ने 10 हजार नहीं चुराए हैं, लेकिन मौम का गुस्सा शांत नहीं हुआ.

उन्होंने मुझे पीटपीट कर अधमरा कर दिया, फिर स्टोर रूम में बंद कर दिया. मैं रोता गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन मौम को मुझ पर दया नहीं आई. तभी मैं ने निर्णय ले लिया कि मौम को जिंदा नहीं छोड़ूंगा. दूसरी रात मैं ने पापा की रिवौल्वर निकाली और सो रही मौम के सिर में गोली मार दी.’’

‘‘अपनी मां की हत्या कर के तुम ने उन की लाश को बैडरूम में ही पड़े रहने दिया, तुम ने ऐसा किस के कहने पर किया?’’ कासिम आब्दी ने दक्ष के चेहरे पर नजरें जमा कर पूछा.

‘‘मुझे किसी ने कुछ नहीं सिखाया. बस मेरे मन में आया कि मौम की हत्या की बात लोगों से छिपा कर रखूं. मुझे पापा के फोन आते रहे, वह मौम का फोन न लगने से परेशान थे. वह मुझ से पूछते रहे कि तुम्हारी मौम काल रिसीव क्यों नहीं कर रही है?

मैं ने पहले दिन बताया कि मौम फोन घर में रख कर बिजली का बिल जमा कराने चली गई है. दूसरे दिन पापा ने फिर मौम के विषय में पूछा तो मैं ने उन से झूठ बोला कि मौम बाजार गई है.’’

दक्ष कुछ क्षण को चुप रहा फिर उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं ने 2 दिन तक मौम की हत्या करने और लाश घर में होने की बात बड़ी सफाई से छिपा कर रखी. मैं सोमवार को अपने एक दोस्त को घर लाया ताकि आसपास वाले समझें कि मेरे घर में सब सामान्य है. मैं ने जोमैटो कस्टमर सर्विस से दोस्त और अपने लिए खाना मंगवाया था. मंगलवार को मैं अपने दूसरे दोस्त को घर ले कर आया. उसे मैं ने घर में ही अंडा करी बना कर खिलाई थी.’’

‘‘ओह!’’ एडिशनल डीसीपी दक्ष के शातिर दिमाग पर हैरान हो गए. इंसपेक्टर धर्मपाल भी हैरान थे कि इस छोटी उम्र में दक्ष कितनी सफाई से मां की हत्या की बात पर परदा डालने की कोशिश करता रहा.

‘‘दक्ष,’’ इंसपेक्टर धर्मपाल ने एक विचार मन में आने पर पूछा, ‘‘2 दिन में तो तुम्हारी मां की लाश सडऩे लगी होगी, क्या तुम्हारे दोस्तों या पड़ोसियों को लाश से उठने वाली बदबू महसूस नहीं हुई?’’

‘‘कैसे होती सर, मैं रूम फ्रैशनर का छिडक़ाव पूरे कमरे में लगातार कर रहा था ताकि बाहर बदबू न जा सके. सर, मेरे दोस्तों ने पूछा था तुम्हारी मौम नजर नहीं आ रही है दक्ष. मैं ने बहाना बना दिया था कि वह दादी के पास गई है. दादा की तबीयत ठीक नहीं चल रही है इसलिए मौम 2-4 दिन वहीं रहेंगी. यही नहीं सर, पड़ोसियों को शक न हो इस कारण मैं क्रिकेट किट ले कर क्रिकेट खेलने भी जाता रहा. घर से बाहर भी मैं टहला ताकि आसपास वाले सब कुछ सामान्य समझें.’’

‘‘हूं, बहुत तेज दिमाग है तुम्हारा.’’ एडिशनल डीसीपी एस.एम. कासिम आबिदी ने होंठों को चबाया, ‘‘यह दिमाग तुम गेम्स में न लगा कर यदि देशहित के काम में लगाते तो तुम्हारे मौमडैड का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता. तुम पबजी एडिक्ट बन गए, घर का पैसा भी उड़ाने लगे, इन फिजूल के गेम्स में. तुम्हारी मौम अगर तुम पर नाराज होती थीं तो वह गलत नहीं थी.

‘‘हर मांबाप चाहते हैं उन का बेटा पढ़लिख कर लायक बने. किंतु अधिकांश बच्चे इन पबजी जैसे गेम्स में अपना जीवन बरबाद करने पर तुले हुए हैं. शायद तुम नहीं जानते, हमारी भारत सरकार ने इन गेम्स में उलझे बच्चों द्वारा अपना और अपने परिवार का अहित करने वाली अनेक वारदातों को देखते हुए 2 सितंबर, 2020 को अनेक चीनी ऐप और अन्य कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे ऐसे 177 गेम्स पर पूरी तरह बैन लगा दिया था.

‘‘इस के बावजूद आज भी तुम्हारे जैसे बच्चे इंटरनेट की मदद से ऐसे हानि पहुंचाने वाले गेम खेलते हैं. इस का परिणाम तुम खुद देख लो, तुम ने इसी गेम्स के खेलने पर रोकाटोकी करने वाली अपनी प्यारी माम की हत्या कर दी.’’

‘‘मुझे अपनी मौम की हत्या करने का जरा भी अफसोस नहीं है.’’ दक्ष दृढ़ स्वर में बोला, ‘‘उस का कत्ल हो जाना ही ठीक था.’’

उस के हावभाव और आखिरी शब्दों ने एडिशनल डीसीपी और इंसपेक्टर धर्मपाल को चौंकाया. उन्होंने एकदूसरे की आंखों में देखा. इन आंखों की भाषा से तय हो गया कि दक्ष के मन में कोई ऐसा राज दफन है, जिसे वह होंठों पर नहीं लाना चाहता. वह राज क्या है, इस के लिए इस नाबालिग की काउंसलिंग होनी जरूरी थी.’’

‘‘एक आखिरी सवाल और मन में है दक्ष,’’ एडिशनल डीसीपी ने कहा.

‘‘पूछिए सर.’’

‘‘तुम ने अपनी मां को गोली मारी थी, तब तुम्हारी बहन भी घर में ही होगी?’’

‘‘घर में ही थी सर. मौम के साथ ही सो रही थी मेरी बहन. गोली की आवाज सुन कर वह घबरा कर उठी. मौम के माथे से खून निकलते देख कर वह चीखने को हुई थी, लेकिन मैं ने रिवौल्वर उस पर तान कर उसे डरा दिया. मैं ने उसे उस रात दूसरे कमरे में बंद कर दिया. दूसरे दिन मैं ने उसे बता दिया कि मैं ने मौम को मार डाला है. वह शांत और सामान्य रहे, किसी को उस के व्यवहार से शक हुआ तो वह उसे गोली मार देगा. सर, मेरी बहन प्रियांशी ने डर के मारे जुबान नहीं खोली है.’’

‘‘ठीक है, तुम्हें अब हमारे साथ घर चलना पड़ेगा. तुम्हारी मौम का मोबाइल, तुम्हारा मोबाइल और घर में रखा लैपटाप हमें कब्जे में लेना है.’’ इंसपेक्टर धर्मपाल ने कहा.

दक्ष उन के साथ जाने के लिए कुरसी से उठ खड़ा हुआ. उस का हाथ पकड़ कर इंसपेक्टर धर्मपाल कक्ष से बाहर आ गए. कुछ ही देर में उन की गाड़ी नवीन कुमार सिंह के घर से कोतवाली की ओर जा रही थी.

बुधवार 8 जून, 2023 को नवीन कुमार सिंह पत्नी की हत्या की खबर सुन कर आसनसोल से लखनऊ आ गए. ट्रेन से उतर कर वह इंद्रापुरी कालोनी में अपनी मां मिरजा देवी और छोटे भाई नीतीश से मिले. उन्हें साधना सिंह की बेटे दक्ष द्वारा हत्या का समाचार दे कर कुछ देर रुके. दक्ष नाबालिग था. नवीन कुमार जानते थे, उसे जुवेनाइल कोर्ट से अधिक से अधिक 5 साल की सजा होगी. फिर भी वह बेटे के लिए अच्छे सा अच्छा वकील खड़ा करना चाहते थे.

पत्नी बेशक बेटे के हाथों मारी गई थी, अब वह इस दुनिया में नहीं रही थी, लेकिन बेटा था इकलौता बेटा. वह उसे खोना नहीं चाहते थे. भाई के साथ वह कोतवाली थाना पीजीआई पहुंचे और इंसपेक्टर धर्मपाल सिंह से मिले. इंसपेक्टर धर्मपाल ने नवीन कुमार सिंह को बताया कि दक्ष को उन्होंने बाल कल्याण समिति के हवाले सौंप दिया है. दक्ष की काउंसलिंग की गई है और अब इस कहानी में नया मोड़ आ गया है.

दक्ष ने खुलासा किया है कि उन के घर में मौम से मिलने प्रौपर्टी डीलर और इलैक्ट्रीशियन आकाश का वक्त बेवक्त आनाजाना लगा रहता था, जो उसे पसंद नहीं था. उस के बर्थडे पर प्रौपर्टी डीलर बहुत बड़ा गिफ्ट ले कर आया था, यह बात उस ने डैडी को बता दी थी. उस रात मौम और डैडी के बीच बहुत झगड़ा हुआ था.

मौम का इन दोनों से मेलजोल बढ़ता जा रहा था. एक दिन जब वह अपनी बहन प्रियांशी के साथ दादी के घर गया था तो मौम ने प्रौपर्टी डीलर को घर में सुलाया था. यह बात उस ने डैडी को बताई और पूछा कि उसे क्या करना चाहिए, तब उन्होंने गुस्से में कहा था, ‘‘दक्ष, मैं वहां होता तो तुम्हारी मौम को गोली मार देता.’’

दक्ष ने कहा था, ‘‘क्या मुझे भी यही करना चाहिए?’’

तो डैडी ने कहा था, ‘‘जो तुम्हें उचित लगे, वह करो.’’

इंसपेक्टर धर्मपाल ने ये सारी बातें नवीन कुमार सिंह के सामने रख कर उन से पूछा, ‘‘क्या दक्ष को आप इस बात के लिए गाइड कर रहे थे कि वह अपनी मौम को गोली मार दे.’’

‘‘नहीं, मैं ऐसा क्यों चाहूंगा. यदि मेरे और मेरी पत्नी के बीच कोई विवाद होता तो उस का फैसला मैं करता. बेटे को नहीं कहता कि वह मां को गोली मार दे.’’ नवीन कुमार सिंह गंभीर स्वर में बोले, ‘‘दक्ष क्या कह रहा है, क्यों कह रहा है, मैं नहीं जानता. मैं इतना जानता हूं कि दक्ष पबजी गेम्स एडिक्ट है. वह इंस्टाग्राम पर ऐक्टिव था. साधना को यह पसंद नहीं था, वह उसे पीटती थी इसी से क्षुब्ध हो कर दक्ष ने उस की हत्या कर दी.’’

‘‘हूं.’’ इंसपेक्टर धर्मपाल ने सिर हिलाया, ‘‘एक बात और है नवीन कुमार जी. हमें आप की पत्नी के मोबाइल और लैपटाप में सभी काल और चैटिंग मैसेज डिलीट मिले हैं, उन्हें दक्ष ने उड़ा दिया है ताकि हम उस शख्स तक न पहुंच सकें, जो उसे इस हत्या के लिए गाइड कर रहा था. खैर, हम ने सभी चीजें फोरैंसिक जांच के लिए लैब में भेज दी है, आज नहीं तो कल सच्चाई सामने आ ही जाएगी.’’

साधना सिंह का शव पोस्टमार्टम के बाद नवीन कुमार सिंह को सौंप दिया गया. उन्होंने बुधवार की शाम को उस का अंतिम संस्कार कर दिया. तीसरे दिन वह उस की अस्थियां ले कर पैतृक गांव चंदौली चले गए. उन की बेटी, मां नीरजा देवी और भाई नीतीश उन के साथ में थे.

दक्ष को जुवेनाइल कोर्ट मे पेश कर दिया गया था, जहां से उसे बाल सुधार गृह में भेज दिया गया.

पुलिस साधना सिंह की हत्या के असली कारण को जानने का प्रयास कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में दक्ष और प्रियांशी नाम परिवर्तित हैं.