MP Murder Mystery. चौथी शादी की चाह में तीसरे पति की हत्या

MP Murder Mystery. शादी का रिश्ता भरोसे और साथ निभाने का प्रतीक माना जाता है. आमतौर पर पतिपत्नी जीवनभर एकदूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश से सामने आए एक मामले ने इस रिश्ते को शर्मसार कर दिया. यहां एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ नई जिंदगी बसाने के चक्कर में अपने ही तीसरे पति की हत्या की साजिश रच डाली. वारदात के खुलासे के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई.

यह मामला मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले का है. पुलिस जांच के अनुसार, बहोरीपार निवासी तुलसीराम मेहरा की हत्या उन की पत्नी सरोज मेहरा ने कथित तौर पर अपने प्रेमी महेंद्र मेहरा और उस के साथी विष्णु रजक के साथ मिलकर की.

शुरुआती जांच में सामने आया कि सरोज अपने प्रेमी से शादी करना चाहती थी, लेकिन उस का पति तुलसीराम इस रिश्ते में सबसे बड़ी बाधा बन रहा था. इसी वजह से तीनों ने मिलकर उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाई.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, साजिश के तहत तुलसीराम को बहाने से घर से बाहर ले जाया गया. बाद में उसे वारुरेवा नदी पुल के पास राष्ट्रीय राजमार्ग-44 से कुछ दूरी पर स्थित झाड़ियों की ओर ले जाया गया, जहां रस्सी से गला घोंटकर उस की हत्या कर दी गई. वारदात को अंजाम देने के बाद सभी आरोपी मौके से फरार हो गए.

कुछ समय बाद झाड़ियों में एक शव पड़ा होने की सूचना पुलिस को मिली. सूचना मिलते ही कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल की मोर्चरी भेज दिया.

जांच के दौरान मृतक की पहचान बहोरीपार निवासी तुलसीराम मेहरा के रूप में हुई. इस के बाद पुलिस ने परिजनों से पूछताछ की और मामले की जांच तेज कर दी.

एसपी ने प्रैस कौंफ्रेंस में बताया कि जांच के दौरान कई अहम सुराग मिले, जिन के आधार पर सरोज मेहरा, उस के प्रेमी महेंद्र मेहरा और विष्णु रजक से पूछताछ की गई. पूछताछ में मिले तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई रस्सी और एक मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया.

पुलिस का कहना है कि आरोपियों के खिलाफ हत्या सहित अन्य संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

फिलहाल पुलिस पूरे घटनाक्रम की गहराई से जांच कर रही है, ताकि हत्या के पीछे की सभी परिस्थितियों और संभावित कारणों का पूरी तरह खुलासा किया जा सके. यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि जब रिश्तों में विश्वास खत्म हो जाता है तो विवाद अपराध का रूप ले लेता है, फिर उस के परिणाम बेहद दुखद और भयावह हो सकते हैं.

Murder for Diamond : कलयुग की सीता

Murder for Diamond. हीरा कारोबारी रतन जडि़या को जहां सीता की खूबसूरत देह भा गई थी, वहीं सीता उन के पास रखा बेशकीमती हीरा पाना चाहती थी. दोनों के ही अपनेअपने स्वार्थ थे. लेकिन मजे की बात यह रही कि दोनों के ही स्वार्थ पूरे नहीं हुए.

25 फरवरी, 2016 की बात है. दोपहर के एक बजे पन्ना कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक आर.एन. खातरकर किसी पुराने केस की फाइल को देख रहे थे, तभी कलेक्टर औफिस के पास स्थित धाम कालोनी में रहने वाले एक व्यक्ति ने उन्हें फोन कर जो जानकारी दी, उसे सुन कर उन्होंने फाइल टेबल पर उसी तरह छोड़ दी और सहयोगियों को ले कर मौके पर पहुंच गए.

वहां एक कोठी के बाहर कुछ लोग जमा थे. पता चला कि कोठी के एक कमरे का ताला बंद था और उस से दुर्गंध आ रही थी. वह कोठी शहर के प्रसिद्ध हीरा व्यापारी और कांग्रेस के पुराने नेता रतन जडि़या की थी. उस में वह अपनी पत्नी और 28 वर्षीया एकलौती बेटी के साथ रहते थे.

कमरे से जिस तरह की दुर्गंध आ रही थी, उस से मामला संदिग्ध लग रहा था. इसलिए आर.एन. खातरकर ने अपने साथ आए स्टाफ से दरवाजा तोड़ने को कहा. दरवाजा तोड़ने का शोर सुन कर कोठी के एक हिस्से में रहने वाले किराएदार की बेटी बाहर आ गई. कोतवाली प्रभारी ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि आंटी और दीदी यानी रतन जडि़या की पत्नी और बेटी 20 फरवरी को भोपाल चली गई थीं. उन की गैरमौजूदगी में वही रतन जडि़या के खानेपीने का ध्यान रखती थी.

उस ने आगे बताया कि 2 दिनों पहले यानी 23 फरवरी की रात लगभग साढ़े 8 बजे वह उन्हें खाना देने आई तो रतन जडि़या टीवी देख रहे थे. उन्होंने बाद में खाना खाने की बात कह कर खाना टेबल पर रखवा लिया था. खाना रख कर वह चली गई. उस के बाद से वह दिखाई नहीं दिए. किराएदार की बेटी की बातें सुन कर कोतवाली प्रभारी के दिमाग में कहानी घूमने लगी.

थोड़ी देर में दरवाजा तोड़ कर पुलिस कमरे के अंदर पहुंची तो व्यापारी रतन जडि़या का शव पलंग पर पड़ा मिला. गरमी की वजह से वह सड़ने लगा था. चूंकि दरवाजा बाहर से बंद था, इसलिए पहला शक हत्या का ही लग रहा था. उन की नाक और मुंह से जो खून बहा था, वह सूख कर काला पड़ चुका था. आर.एन. खातरकर ने यह जानकारी एसपी ओ.पी. त्रिपाठी और एएसपी आर.डी. प्रजापति को देने के साथ एफएसएल टीम को मौके पर बुला लिया.

घटनास्थल की जांच में पुलिस ने पाया कि जिस पलंग पर रतन जडि़या का शव पड़ा था, उस के पास चाय के 2 खाली कप और एक स्टील का गिलास रखा था. वहीं पर वोदका शराब की एक बोतल भी रखी थी, जो थोड़ी खाली थी. जांच में एफएसएल टीम ने पाया कि शव के पैरों के दोनों अंगूठे बुरी तरह काले पड़ चुके थे. उन पर तारों के लपेटे जाने के निशान भी पाए गए थे.

कोठी के अन्य कमरों में बनी अलमारियों का सामान बिखरा पड़ा था. इस से लगा कि हत्यारों की संख्या 2 या इस से अधिक थी और उन्होंने उन कमरों में कोई चीज ढूंढने की कोशिश की थी. चूंकि बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट के रतन जडि़या की मौत को सीधे हत्या का मामला नहीं माना जा सकता था, इसलिए कोतवाली प्रभारी ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

2 दिनों बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो मौत की वजह दम घुटना बताया गया था. हत्या की पुष्टि हो जाने के बाद अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उन की तलाश शुरू कर दी गई.

रतन जडि़या कांग्रेस पार्टी के नेता थे. वह चुनाव भी लड़ चुके थे, साथ ही हीरा उत्खनन के काम में भी उन का अच्छा नाम था. इसलिए एसपी ओ.पी. त्रिपाठी ने इस मामले को गंभीरता से लिया और इस के खुलासे के लिए पुलिस की 3 टीमें गठित कीं.

पहली टीम को रतन जडि़या के हीरा के कारोबार संबंधी, दूसरी टीम को उन के मकान के आसपास रहने वाले लोगों से पूछताछ करने और तीसरी टीम को उन के दोस्तों तथा दुश्मनों के बारे में जानकारी जुटाने के काम में लगा दिया गया.

इस बीच घटना की खबर पा कर रतन जडि़या की पत्नी और बेटी भोपाल से वापस आ गई थीं. घर से क्याक्या सामान गायब है, इस बारे में पुलिस ने उन से पूछा तो उन्होंने बताया कि घर से लगभग 10 हजार रुपए नकद, सोने और चांदी के कुछ गहने गायब हैं.

रतन जडि़या का मोबाइल फोन कोठी में ही मिल गया था. उसे किसी चीज से चकनाचूर किया गया था. इस से यही लगा कि हत्या का कोई राज मोबाइल में होगा, तभी उसे इस तरह नष्ट किया गया था. जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस ने उन के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाने की काररवाई शुरू कर दी.

इस बारे में जब उन के मकान में रहने वाले किराएदार की बेटी से बात की गई तो उस ने बताया कि उस रात साढ़े 8 बजे जब वह रतन जडि़या के कमरे में खाना रख कर लौट रही थी तो उसे एक महिला एक लड़के के साथ आती दिखाई दी थी. शायद वह उन से मिलने आई थी.

रतन जडि़या के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स पुलिस को मिली तो उस से पता चला कि पत्नी और बेटी के घर से जाने के बाद रतन जडि़या की एक फोन नंबर पर कई बार बात हुई थी. वह नंबर पुलिस के लिए खास हो गया. एसपी ओ.पी. त्रिपाठी के निर्देश पर आर.एन. खातरकर ने उस नंबर पर फोन लगाया. पर वह नंबर बंद मिला. जांच में वह नंबर सीता नाम की एक महिला का निकला, जो पन्ना के ही टिकुरिया मोहल्ले में रहती थी.

रतन जडि़या के किराएदार की बेटी ने भी पुलिस को बताया था कि घटना की रात एक महिला किसी युवक के साथ उन से मिलने आई थी. शक की बात यह थी कि इसी महिला से रतन जडि़या की तब से लगातार बातें हो रही थीं, जब से वह घर में अकेले थे.

उन की हत्या के बाद से सीता का यह नंबर बंद हो गया था. उस के यहां जाने से पहले पुलिस ने सीता के बारे में पता किया तो पता चला कि वह मूलरूप से पन्ना जिले के थाना ब्रजपुर के मोहल्ला हाटपुर की रहने वाली थी. वह भी रतन जडि़या की तरह हीरे की खानों का ठेका लेती थी. उस के बारे में यह भी पता चला कि वह ठेका तो केवल 1-2 खानों का लेती थी, लेकिन उस की आड़ में वह कई खानों में हीरा उत्खनन का अवैध काम करती थी.

चूंकि रतन जडि़या भी हीरा खनन के ठेकेदार थे, इसलिए पुलिस को लगा कि घटना का संबंध हीरे की खानों से जुड़ा हो सकता है. सीता के बारे में पुलिस को एक खास जानकारी यह मिली कि सीता की उम्र केवल 35 साल थी, जबकि उस का पति 60 साल का बूढ़ा था, सो सीता के शहर में तमाम दीवाने थे.

लेकिन पुलिस को इस दूसरी बात में इसलिए दम नजर नहीं आया, क्योंकि रतन जडि़या के चरित्र के बारे में अभी तक ऐसी कोई बात पुलिस के सामने नहीं आई थी. बहरहाल सच क्या था और कातिल कौन है, इस बात का पता लगाने के लिए पुलिस को सीता की तलाश थी.

कोतवाली निरीक्षक आर.एन. खातरकर, थानाप्रभारी अमानगंज अरविंद दांगी, थानाप्रभारी पवई उदयभान सिंह यादव, थानाप्रभारी रैपुरा सुधीर बेगी, थानाप्रभारी ब्रजपुर जसवंत सिंह, एसआई मधु पटेल आदि अधिकारियों की टीम सीता की तलाश में जुट गई.

उन की मेहनत रंग लाई और घटना के 10 दिनों बाद टीम ने आखिर सीता को खोज निकाला. थाने ला कर सीता से पूछताछ शुरू हुई. तो पहले वह इस संबंध में कुछ भी जानकारी होने से मना करती रही, लेकिन जब उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो वह टूट गई.

उस ने रतन जडि़या की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि इस हत्या में ओमप्रकाश, तोतू मामा उर्फ राजपाल सिंह तथा रिंकू उर्फ करन राजपूत शामिल थे. सीता की निशानदेही पर पुलिस ने इन सभी को गाजियाबाद से गिरफ्तार कर लिया. इन सब से पूछताछ के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और हीरा व्यापारी रतन जडि़या के कत्ल की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

रतन जडि़या ही नहीं, उन के दादा, परदादा भी हीरा के कारोबार से जुड़े थे. वे भी हीरा की खानों का ठेका लेते थे. बताया जाता है कि पन्ना की खानों से निकलने वाला जितना हीरा सरकार की नजरों में आता है, उस से कई गुना ज्यादा हीरा खान के ठेकेदार चोरीछिपे बड़े व्यापारियों को बेच देते हैं. कारोबार में आमदनी अच्छी थी, इसलिए रतन जडि़या भी इसी कारोबार में लग गए थे.

रतन जडि़या ने अपने इस कारोबार को और आगे बढ़ाया. वह खनन विभाग के अधिकारियों से सांठगांठ कर के कईकई खानों का ठेका ले लेते थे. इस के अलावा कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़ कर वह राजनीति में भी सक्रिय हो गए.

पन्ना के धाम मोहल्ले में उन्होंने एक आलीशान कोठी बनवाई, जिस में वह पत्नी और एकलौती बेटी के साथ रहते थे. करीब 15 साल पहले उन्होंने कांग्रेस पार्टी के सहयोग से पन्ना नगर निगम अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था, जिस में वह हार गए थे.

रतन जडि़या हत्याकांड की बिसात उसी समय बिछ गई थी, जब कोई 15 साल पहले पास के गांव हाटपुर की रहने वाली 20 वर्षीया सीता ठाकुर अपने 45 वर्षीय पति के साथ टिकुरिया मोहल्ले में रहने आई थी. सीता और उस के पति की उम्र में दोगुने से भी ज्यादा का अंतर था.

उस की जोड़ी बेमेल तो थी, लेकिन 45 साल का उस का पति किसी तरह 20 साल की अपनी नवयौवना चंचल पत्नी को इतना सुख देने में सक्षम था कि वह मर्यादा में बनी रहे. लेकिन जब सीता 25 साल की हुई तो उस का पति 50 पार कर गया तो अब उम्र का अंतर दोनों के संबंधों में आड़े आने लगा.

यही वह उम्र होती है, जब नारी की भौतिक इच्छाएं चरम पर होती हैं. सीता पति से बहुत कुछ चाहती थी, लेकिन पति अब वह सब देने में सक्षम नहीं था. इस में ‘कोढ़ में खाज’ वाली हालत तब बन गई, जब सीता की भाभी की छोटी बहन अपने 20 वर्षीय पति ओमप्रकाश के साथ आ कर पड़ोस में रहने लगी. सीता का झुकाव ओमप्रकाश की ओर हो गया. ओमप्रकाश देख रहा था कि सीता का पति बूढ़ा है, इसलिए उस ने भी सीता की ओर कदम बढ़ा दिए. इस के बाद जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. सीता को प्रेमी मिला तो उस के सपने भी नए सिरे से सजने लगे.

सीता अब ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना चाहती थी. क्योंकि अब वह खूब पैसा कमा कर ओमप्रकाश के साथ दिल्ली जैसे बड़े शहर में जा कर बस जाना चाहती थी, क्योंकि ओमप्रकाश पहले गाजियाबाद में काम कर चुका था और उस के कई दोस्त अभी भी वहां रह रहे थे.

इसीलिए सीता ने भी ओमप्रकाश की मदद से हीरे की खानें ले कर काम शुरू कर दिया. इतना ही नहीं, ज्यादा पैसा कमाने के लिए उस ने एक वैध खान की आड़ में चोरीछिपे घने जंगल में कई खानों में काम करना शुरू कर दिया. लेकिन उसे इतना हीरा नहीं मिला, जितनी उसे उम्मीद थी, फिर भी गांव की रहने वाली सीता अब एक हीरा व्यापारी बन चुकी थी.

इस के बाद उस का रहनसहन काफी बदल गया था. वह बड़े लोगों में अपनी घुसपैठ बनाने लगी, जिस के लिए उसे कई तरह के समझौते करने पड़े. वह सुंदर और जवान तो थी ही, इसलिए कई शौकीनमिजाज हीरा व्यापारियों के बीच सीता का देर रात तक उठनाबैठना शुरू हो गया. उस के इस उठनेबैठने पर ओमप्रकाश को जरा भी ऐतराज नहीं था. इस के पीछे उस की सोच थी कि सीता के पास पैसे आंएगे तो वह भी ऐश करेगा.

सीता का यह क्रियाकलाप पति को जरूर बुरा लगता था. लेकिन बुढ़ापे की वजह से वह सब कुछ देखते हुए भी अनदेखा करने को मजबूर था. सीता की जानपहचान शहर के पुराने और नामी हीरा कारोबारी रतन जडि़या से भी हो गई थी. रतन जडि़या और सीता की खानें पासपास थीं, इसलिए उन की मुलाकातें अकसर होती रहती थीं.

वैसे तो रतन जडि़या के बारे में कहा जाता था कि वह भले और चरित्रवान इंसान थे. लेकिन यह भी सच है कि अगर आग और फूस मिल जाएं तो आग लगने में देर नहीं लगती. यही हाल इस मामले में हुआ. सीता से अकसर होने वाली मुलाकातों की वजह से 62 वर्षीय रतन जडि़या के मन में भी हलचल होने लगी. वह कई बार अपने मन की बात सीता से जाहिर भी कर चुके थे. लेकिन सीता को अगर किसी बूढ़े की ही संगत करनी होती तो उस का पति तो अभी भी रतन जडि़या से कम उम्र का था.

लेकिन यह भी सच है कि जो होना होता है, उस के लिए कोई न कोई वजह बन ही जाती है. यही इस मामले में भी हुआ. हुआ यह कि घटना से लगभग 2 महीने पहले रतन जडि़या को अपनी खान में एक बेशकीमती हीरा मिल गया. किसी तरह यह बात सीता को पता लग गई.

सरकारी नियम तो यह है कि खान मालिक को जो हीरा मिलता है, उसे हीरा संबंधित अधिकारी के औफिस में जमा करना पड़ता है. बाद में सरकार उसे नीलाम करती है तो नीलामी से जो रकम मिलती है, उस में से तय हिस्सा खान मालिक को दे दिया जाता है. लेकिन ज्यादातर खान मालिक खान से मिले हीरों की वास्तविक संख्या सरकार से छिपा लेते हैं.

वे संख्या कम बताते हैं. बाकी हीरों को वे मुंबई, गुजरात जैसे शहरों से आने वाले व्यापारियों को बेच देते हैं. रतन जडि़या को भी जो बेशकीमती हीरा खान से मिला था. उन्होंने सरकार से छिपा कर चोर बाजार में बेचने के लिए अपने पास रख लिया था.

रतन जडि़या के पास बेशकीमती हीरा होने की बात जान कर सीता के मन में लालच आ गया. उस ने सोचा कि क्यों न बूढ़े रतन को खुश कर के उस का वह हीरा हड़प लिया जाए. वह हीरा चोरी की रिपोर्ट भी नहीं कर पाएगा. यही सोच कर सीता अपनी तरफ से लगाम ढीली छोड़ कर रतन जडि़या के करीब जाने की कोशिश करने लगी.

इसी दौरान 20 फरवरी, 2016 को रतन जडि़या की पत्नी और बेटी किसी काम से भोपाल चली गईं. पत्नी और बेटी के जाने के बाद रतन जडि़या घर में अकेले रह गए. ऐसे समय में उन्हें सीता का ध्यान आया. उन्हें लगा कि मौका अच्छा है. अगर सीता उन के घर आ जाती है तो किसी को कोई शक नहीं होगा. उन्होंने सीता को फोन लगा कर कहा, सीता, आजकल मैं घर पर अकेला हूं. अगर वक्त निकाल कर आ सको तो दोचार घड़ी साथ बिता लेंगे.

सीता को भी ऐसे ही मौके की तलाश थी. इसलिए उस ने ओमप्रकाश के साथ मिल कर योजना बनाई कि वह रात में रतन से मिलने के बहाने उस के घर जाए और उस की कहानी खत्म कर के वह बेशकीमती हीरा हालिस कर ले.

सीता को लगता था कि यह काम एकदो लोगों के वश का नहीं है, इसीलिए इस बारे में उस ने ओमप्रकाश से बात की थी. इस पर उस ने गाजियाबाद के रहने वाले अपने दोस्त तोतू मामा से बात की. तोतू मामा तैयार हो गया और वह अपने साथ रिंकू राजपूत को ले कर पन्ना पहुंच गया.

इन सभी के पन्ना पहुंचने पर काम को कैसे अंजाम देना है, इस बारे में सीता ने सब को समझाया. इस के बाद सीता ने रतन को फोन लगाया तो उस ने कहा, क्यों टाइम बरबाद कर रही हो. जल्द आ जाओ, वरना एकदो दिन में घर वाले वापस आ जाएंगे, उस के बाद कुछ नहीं हो पाएगा. अरे सेठजी, चिंता मत करो. मैं आज पूरी रात तुम्हारे साथ ही रहूंगी. तुम दरवाजे की कुंडी खोल कर रखना.

सीता की बात सुन कर रतन जडि़या खुश हो गए और शाम होते ही सीता के आने का इंतजार करने लगे. इसी बीच उन के किराएदार की बेटी उन के लिए खाना ले कर आई तो उन्होंने खाना बाद में खाने की बात कह कर थाली टेबल पर रखवा ली.

योजना के अनुसार, सीता ओमप्रकाश को साथ ले कर रात में रतन जडि़या की कोठी पर पहुंची तो उस के साथ ओमप्रकाश को देख कर उन का मूड खराब हो गया. सीता शायद रतन के मन की बात समझ गई, इसलिए उस ने दबे स्वर में कहा, नाराज मत हो यार, यह अभी चला जाएगा. सोचो, मैं यहां अकेली आती तो देखने वाले पचास बातें करते.

चलो ठीक है, इसे चाय तो पिला दो. रतन जडि़या ने संतोष भरी सांस ले कर कहा तो सीता घर की मालकिन की तरह किचन में जा कर 2 कप चाय बना लाई. आप तो चाय पिएंगे नहीं. पलंग के नीचे रखी शराब की बोतल देख कर सीता ने कहा. हां, मैं चाय नहीं पीऊंगा. रतन जडि़या ने कहा.

चाय पीने के दौरान ही सीता ने कोठी के बाहर खड़े अपने साथियों को इशारा किया तो बाहर खड़े तोतू मामा और रिंकू भी अंदर आ गए. रतन जडि़या कुछ समझ पाते, उस के पहले ही उन लोगों ने तकिया से रतन जडि़या का मुंह दबा कर सांस रोक दी, जिस से कुछ देर छटपटाने के बाद उन की मौत हो गई. उन की मौत को निश्चित करने के लिए उन्होंने उन के पैरों के अंगूठों में बिजली के तार लपेट कर करंट भी लगाया. जब तय हो गया कि वह मर चुके हैं तो सभी घर में वह हीरा तलाशने लगे, जिस के लिए वे आए थे, लेकिन वह नहीं मिला.

तलाशी के दौरान घर में 9-10 हजार रुपए नकद और कुछ सोनेचांदी के गहने जरूर मिल गए. उन्हें समेट कर वे सभी भाग निकले. जाते समय वे दरवाजे पर ताला जरूर लगा गए. पूछताछ के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर रतन जडि़या के घर से लूटी गई नकदी और गहने बरामद कर लिए. इस के बाद सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

दूसरी ओर रतन जडि़या के घर वालों का कहना था कि आरोपी अपना अपराध कम करने के लिए उन पर झूठा और गंदा आरोप लगा रहे हैं. दरअसल आरोपियों को उन के घर पर अकेले होने की बात मालूम हो गई थी, जिस का फायदा उठा कर उन्होंने घर में लूटपाट करने के इरादे से हत्या कर दी तथा पकड़े जाने पर उन पर गंदा आरोप लगा दिया. Murder for Diamond

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Crime: बदचलन बहू

Family Crime: न जाने कितनों को हवालात की हवा खिलाने वाले मोहन सक्सेना बहू की बदचलनी से इस कद्र आजिज आ गए कि यह जानते हुए भी कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, उन्होंने कानून हाथ में ले ही लिया. नतीजतन अब वह बेटे के साथ जेल में है.

मध्य प्रदेश पुलिस में असिस्टैंट सबइंसपेक्टर मोहन सक्सेना के दिन का चैन और रातों की नींद गायब थी. सोतेजागते, उठतेबैठते उन्हें एक ही शख्स नजर आता था, वह था उन का पुराना ड्राइवर अंकित चौरसिया. अंकित बिना किसी डर और लिहाज के उन के घर की इज्जत से खिलवाड़ कर रहा था. गुस्से, खीझ और बेबसी में मोहन सक्सेना दांत पीस कर रह जाते थे. उन्हें कभीकभी इस बात का डर सताने लगता कि कहीं उन्हें इस तनाव में फिर से लकवा न मार जाए या  हार्टअटैक न आ जाए.

59 वर्षीय मोहन सक्सेना की तैनाती शाजापुर की पुलिस लाइन में थी. वह अगले ही साल रिटायर होने वाले थे. एक उम्र पुलिस की नौकरी करने वाले मोहन सक्सेना की जिंदगी में कई तरह के उतारचढ़ाव आए. लेकिन जिंदगी की ढलती शाम में वह जो कुछ देख रहे थे, वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था. इस की वजह थी उन की बहू नेहा. शाजापुर में उन का अपना अलग रुतबा था, जिस की वजह वरदी या पुलिस की नौकरी ही नहीं, बल्कि एक इज्जतदार कायस्थ परिवार का मुखिया होना भी था. बहू द्वारा किए जा रहे कृत्य से उन्हें अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती नजर आ रही थी. लेकिन वह करें क्या उन की समझ में नहीं आ रहा था.

क्योंकि लाख समझानेबुझाने और चेतावनी देने पर भी न नेहा मान रही थी और न ही अंकित रास्ते पर आ रहा था. उन के सुनने में तो यहां तक आया कि अंकित ने अपने मोबाइल फोन में नेहा के साथ बिताए अंतरंग दृश्यों की कुछ फोटो तक खींच रखी हैं जिन्हें वह अपने दोस्तों को दिखाता रहता है. ऐसी बेबसी में अकसर वह उस घड़ी को कोसते थे, जब उन्होंने अंकित को शरीफ मानते हुए अपने यहां ड्राईवरी की नौकरी पर रखा था. दरअसल मोहन सक्सेना का बेटा नितिन दिमागी तौर पर कुछ कमजोर है. यह बात सारा शाजापुर जानता था.

अपने रिटायर होने से पहले उन्होंने उस की शादी अपने बराबर वाले घर में कर दी थी. बेटा कुछ करता है, यह दिखाने के लिए उन्होंने एक कार खरीद ली थी, जो बतौर टैक्सी चलती थी. अंकित को यही गाड़ी चलाने के लिए रखा गया था. शुरूशुरू में तो सबकुछ ठीकठाक चला. सवारियां मिल जातीं तो अंकित गाड़ी ले कर चला जाता और न मिलती तो शहर में इधरउधर घूम कर वक्त काटता. उधर नितिन को अपने लिए जमाए जा रहे इस ट्रैवलिंग के कारोबार से कोई खास लेनादेना नहीं था. इतना ही नहीं, उस की दिलचस्पी तो अपनी पत्नी में भी नहीं थी, जो खासी खूबसूरत, आकर्षक और चंचल थी. उस की पति से बिलकुल पटरी नहीं बैठती थी.

अंकित ने इसी बात का फायदा उठाया. वह नेहा को चाहने लगा और उस से करीबी संबंध बनाने की जुगत में लग गया. अपने बातूनी स्वभाव से उस ने उसे प्रभावित करना शुरू कर दिया. बातों का दायरा बढ़तेबढ़ते प्यार के मुकाम तक पहुंच गया और फिर एक दिन ऐसा भी आ गया, जब दोनों के संबंध बन गए. इस के बाद सिलसिला बन गया. दोनों ने ही बूढ़े मोहन सक्सेना का किसी भी स्तर पर कोई लिहाज नहीं किया.

पिछले साल एकाएक मोहन सक्सेना को लकवा मार गया तो अंकित को उन के घर आनेजाने के ज्यादा मौके मिल गए. सक्सेना परिवार के सारे काम वह वक्त पर ईमानदारी से कर देता था. लेकिन नेहा के आकर्षण से खुद को नहीं बचा सका. नेहा भी खूबसूरत और मजाकिया स्वभाव के अंकित के प्रेमजाल में फंसने से खुद को नहीं रोक पाई थी. उस के संस्कार इस कथित प्यार या व्यभिचार के आगे ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाए.

लकवाग्रस्त मोहन सक्सेना का लंबा इलाज चला तो उस बुरे वक्त में कई मामलों में नितिन की भूमिका अंकित निभा रहा था, इसलिए मोहन उस के एहसान तले दबते जा रहे थे. इलाज के अलावा वह झाड़फूंक और तंत्रमंत्र का भी सहारा ले रहे थे. यानी वह हर हालत में ठीक हो जाना चाहते थे. और इस सब से जल्द ही वह ठीक भी हो गए.

शाजापुर एक छोटा सा कस्बा है, इसलिए मोहन सक्सेना की बहू के प्रेमसंबंधों की चर्चा लोग चटकारे लेले कर करने लगे. यह बात जब मोहन सक्सेना के कानों में पड़ी तो वह बौखला उठे. एक बार तो उन्हें कान सुनी बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि नेहा शरीफ घर की थी. उस के मांबाप ने उसे बेहतर संस्कार दिए थे. रही बात अंकित की तो कल के इस छोकरे की क्या मजाल जो उन की बहू की तरफ आंख उठा कर भी देखे. लेकिन पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने कई संस्कारवान बहूबेटियों का त्रियाचरित्र देखा था और अंकित जैसे रंगीले मजनूं भी देखे थे.

लिहाजा दिमाग में आया शक दूर करने के लिए उन्होंने खुद चोरीछिपे दोनों की निगरानी शुरू कर दी. नितिन से तो उन्हें कोई उम्मीद करना बेकार लग रहा था. दिमागी कमजोरी के चलते वह गुस्से और जल्दबाजी में बगैर सोचेसमझे कोई ऐसा कदम उठा सकता था, जो काफी महंगा पड़ता. इसलिए उन्होंने इस बारे में नितिन को कुछ नहीं बताया. आखिर एक दिन उन्होंने खुद अपनी आंखों से अंकित और बहू नेहा को अपने ही घर में आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया तो मारे गुस्से के उन का शरीर जल उठा. उन्हें विश्वास हो गया कि बाहर उन के बहू और अंकित के बारे में जो बातें की जा रही हैं, निराधार नहीं थीं. उन का मन कर रहा था कि वह अंकित को ऐसी सजा दें कि कोई भी उन के घर की तरफ नजर उठाने की हिम्मत न करे.

लेकिन वह कानून को अपने हाथ में लेना नहीं चाहते थे और अदालत या बाहर की दुनिया तक खुद बात ले जाएं तो जगहंसाई के साथ उन की जिंदगी भर की कमाई इज्जत मिट्टी में मिला देने वाली बात होती. किसी तरह जहरीला घूंट पी कर वह चुप रहे. लेकिन अगले दिन उन्होंने दोनों को खूब लताड़ा. अंकित को उन्होंने नौकरी से हटा दिया, साथ ही नेहा को भी सख्त लहजे में समझा दिया कि आइंदा वह उस लड़के से मिलेगी तो अच्छा नहीं होगा.

ससुर के गुस्से को देख कर नेहा उस समय सहम जरूर गई थी, लेकिन अंकित की यादों को वह दिल से निकाल नहीं पाई. वह ससुर से नजरें बचा कर उस से घर से बाहर मिलने लगी. यानी आशिक का लगाव ससुर की वरदी पर भारी पड़ा. आशिक से बाहर मिलने की बात भी मोहन सक्सेना से ज्यादा दिनों तक छिप नहीं सकी. वह परेशान थे कि बहू का क्या करें, जो यह उस लड़के का पीछा छोड़ दे. उसी समय अचानक मोहन सक्सेना के दिमाग में तांत्रिक बाबा उर्फ संजय व्यास का खयाल आया. उन्हें उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी. वह खुद भी मानते थे कि उन का लकवा तांत्रिक बाबा ने ही ठीक किया था.

कुछ साल पहले तक संजय व्यास शाजापुर के ही एक सरकारी बैंक में चपरासी था. बाद में वह नौकरी छोड़ कर कस्बे में छोटे किले के पास स्थित बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर तंत्रक्रियाओं द्वारा लोगों का इलाज करने लगा था. इस तरह तथाकथित तांत्रिक बन कर वह लोगों की जेबें ढीली करने लगा था. इस से उसे अच्छी कमाई होने लगी थी. देखते ही देखते वह शहर में इतना मशहूर हो गया कि हर गुरुवार को उस के पास हैरानपरेशान लोगों की भीड़ लगने लगी थी. संजय का यह कारोबार चल निकला तो उस ने हुलिया भी बदल लिया. वह हरे रंग के कपड़े पहनने लगा. उस के गले में तरहतरह की मालाएं और अंगुलियों में हरे, काले, लाल आदि रंगों वाले  नगों की अंगूठियां चमकने लगीं.

अपनी परेशानी से छुटकारा पाने के लिए मोहन उस तथाकथित तांत्रिक उस की शरण में आने लगे. उन्होंने बहू के देहरी लांघने वाली बात तांत्रिक को बता कर कहा कि किसी भी तरह वह कुछ ऐसा कर दें कि बहू का प्रेमी अंकित की तरफ से मन उचट जाए. तांत्रिक संजय ने उन्हें भरोसा दिया कि वह अपनी सिद्धियों के बल पर ऐसा कर देगा कि नेहा उस लड़के का नाम तक नहीं लेगी. इस काम के लिए उस ने मोहन सक्सेना से मोटी रकम भी ली.

इसी तांत्रिक के पास अंकित भी पहुंच गया. अंकित ने उस से कहा कि उस की प्रेमिका नेहा अब उस से दूरियां बना रही है. वह ऐसा कुछ कर दे कि वह पति को छोड़ कर उस के पास आ जाए. बातचीत से तांत्रिक को पता लग गया कि इस का चक्कर मोहन सक्सेना की बहू से चल रहा है. वह उस के पास इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए आए थे. तांत्रिक के लिए मोहन सक्सेना या अंकित में से कोई भी उस का सगा नहीं था. उस का मकसद तो दोनों से पैसे कमाना था. इसलिए उस ने अंकित से भी मोटे पैसे ले लिए. इस तरह तांत्रिक संजय दोनों से ही पैसे ऐंठता रहा.

बाद में मोहन को पता चला कि अंकित भी संजय बाबा के पास आता है तो उन का माथा ठनका. वह भागेभागे संजय बाबा के पास पहुंचे. उन्होंने पैसों का लालच दे कर बाबा से अंकित के बारे में पूछा तो उस ने मनुहार के बाद बता दिया कि अंकित नेहा को अपने वश में करवाने के लिए आता है. मोहन सक्सेना अब अंकित से तुरंत छुटकारा पाना चाहते थे. इस बारे में उन्होंने तांत्रिक संजय से बात की. बातचीत के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब तंत्रमंत्र से तो बात संभलने वाली नहीं, लिहाजा अंकित की हत्या कर दी जाए.

वैसे कई बार यह बात मोहन सक्सेना के मन में आई थी, लेकिन अपने पुलिसिया तजुर्बे से वह जानते थे कि किसी का कत्ल कर कानून से बच पाना आसान काम नहीं होता. इसलिए वह यह अपराध नहीं करना चाहते थे. पर अब उन्हें तांत्रिक संजय का साथ मिल रहा था, इसलिए वह तैयार हो गए. तांत्रिक संजय व्यास अंकित की हत्या के लिए तैयार हो गया. इस के लिए उस ने मोहन सक्सेना से 15 हजार रुपए की मांग की तो उन्होंने झट से पैसे दे दिए. क्योंकि जिस काम के लिए वह अपनी अब तक की सारी कमाई खर्च करने को तैयार थे, वह काम काफी सस्ते में हो रहा था.

दूसरी ओर अंकित को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि संजय और मोहन के बीच क्या खिचड़ी पक चुकी है. वह तो यह सोच कर खुश हो रहा था कि तांत्रिक की वशीकरण क्रिया के बाद नेहा हमेशा के लिए उस के पास चली आएगी. इसलिए तांत्रिक उस से जोजो काम करने के लिए कहता था, वह वैसा ही कर रहा था. एक दिन संजय बाबा ने उस से कहा कि एक विशेष तांत्रिक क्रिया करनी जरूरी है, जो शाजापुर में नहीं, बल्कि दूसरी किसी जगह पर करनी होगी. अंकित तुरंत तैयार हो गया. उसे लगा कि इस क्रिया के बाद नेहा उस के साथ भागने को तैयार हो जाएगी. फिर दोनों कहीं दूर जा कर शादी कर लेंगे.

संजय ने उसे बताया था कि यह काम 16 जनवरी शनिवार को करना ठीक रहेगा. अंकित तैयार हो गया. उस ने संजय को बताया कि वह ठीक वक्त पर गाड़ी ले कर आ जाएगा. इस के बाद पूजा के लिए चले चलेंगे. अंकित उस समय शाजापुर की ही एक संभ्रांत महिला निर्मला गौर के यहां ड्राइवर की नौकरी कर रहा था. उस दिन उस ने निर्मला से यह कह कर उन की कार मांग ली कि वह कुछ दोस्तों के साथ उज्जैन जाना चाहता है. निर्मला को इस पर कोई ऐतराज नहीं हुआ. उन्होंने कार की चाबियां अंकित को दे दीं.

16 जनवरी की सुबह अंकित तांत्रिक बाबा के पास पहुंच गया. तांत्रिक उसे बैरसिया होते हुए विदिशा रोड पर स्थित भोजापुरा के जंगल में ले गया. यह जंगल आमतौर पर सुनसान रहता है. इस जंगल में हत्या करने की सलाह दरअसल में मोहन सक्सेना ने ही दी थी, ताकि इतनी दूर लाश मिलने पर उस की शिनाख्त न हो सके. जंगल में एक जगह पर बैठ कर संजय व्यास अंकित से पूजा करवाने लगा. कुछ देर बाद तांत्रिक संजय ने कहा, ‘‘इस सिद्धि के लिए तुम्हें अपने सारे कपड़े उतारने पड़ेंगे.’’

पहले तो अंकित तांत्रिक की इस बात पर चौंका, पर यह क्रिया प्रेमिका को पाने के लिए की जा रही थी, इसलिए वह तैयार हो गया. पूजा वाली जगह से कुछ दूरी पर मोहन सक्सेना अपने बेटे नितिन के साथ छिपे बैठे थे. अंकित जब पूरी तरह पूजा में डूब गया तो तांत्रिक संजय का इशारा पा कर दोनों आहिस्ते से अंकित के पीछे आ गए. मोहन ने मौके का फायदा उठाते हुए लोहे की रौड का एक भरपूर वार उस के सिर पर कर दिया, इस के बाद नितिन और तांत्रिक भी उस पर टूट पड़े. तीनों को जब उस के मरने की तसल्ली हो गई तो योजना के मुताबिक उन्होंने एक बड़े पत्थर से उस का चेहरा कुचल दिया, जिस से लाश की पहचान न हो पाए.

अंकित की हत्या करने के बाद तांत्रिक संजय और नितिन बैरसिया होते हुए वापस आए तो मोहन पहले इंदौर गए, फिर शाजापुर आए. इस दौरान तीनों ने अपने मोबाइल बंद रखे. क्योंकि मोहन सक्सेना जानते थे कि जांचपड़ताल में मोबाइल की लोकेशन पता चल जाती है. इसलिए उन्होंने यह अहतियात बरती थी. 17 जनवरी, 2016 की सुबह गांव वाले जंगल की तरफ गए तो उन्होंने वहां लाश देखी. इस की खबर उन्होंने बैरसिया थाने को दी तो एसडीओपी बीना सिंह के निर्देश पर पुलिस टीम घटनास्थल के लिए रवाना हो गई. मौके पर जितने लोग खड़े थे, पुलिस ने उन से उस निर्वस्त्र लाश की शिनाख्त करानी चाही, पर चेहरा कुचला हुआ होने की वजह से कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. वहां कोई ऐसा सामान भी नहीं मिला, जिस से लाश की शिनाख्त हो सकती.

पुलिस को लाश से कुछ दूरी एक आई-20 कार लावारिस हालत में खड़ी मिली. पर उस की नंबर प्लेट्स गायब थीं. कार खोल कर तलाशी ली गई तो उस के दस्तावेज मिल गए. कागजों से पता चला कि वह कार शाजापुर की निर्मला गौर नाम की महिला के नाम है. कार की नंबर प्लेट गायब होने पर पुलिस को शक हुआ कि हो न हो, कार का इस हत्या के मामले से जरूर कोई संबंध है.

पुलिस जब शाजापुर में निर्मला गौर के पास पहुंची तो उन्होंने बता दिया कि कार उन का ड्राइवर अंकित ले गया था. उन्होंने ड्राइवर अंकित का हुलिया पुलिस को बताया तो कदकाठी से वह लाश के हुलिए जैसा ही था. उन्होंने पुलिस को अंकित का पता बताया तो पुलिस अंकित के घर पहुंच गई और लाश की शिनाख्त के लिए उस के घर वालों को पोस्टमार्टम स्थल पर ले गई. घर वालों ने लाश की शिनाख्त अंकित के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस हत्यारों का पता लगाने में जुट गई. जांच में पुलिस को मृतक जानकारी मिली. उन के ही महकमे के एएसआई मोहन सक्सेना के यहां नौकरी करता था और उस का उन की बहू नेहा के साथ चक्कर चल रहा था. पुलिस को मुखबिर से यह भी जानकारी मिली थी कि 16 जनवरी, 2016 की रात तांत्रिक बाबा संजय व्यास को कार में अंकित के साथ देखा गया था.

तांत्रिक संजय को पुलिस ने थाने बुलवा लिया. उस से अंकित के बारे में पूछताछ की गई तो वह किसी तरह की जानकारी होने से इंकार करता रहा. पर जैसे ही उसे यह बताया गया कि पिछली रात उस के मोबाइल की लोकेशन बैरसिया के आसपास थी तो वह घबरा गया. इस के बाद उस ने अंकित की हत्या की सच्चाई बता दी. तांत्रिक के बयान पर पुलिस ने मोहन और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अंकित नेहा से शादी करने की हसरत दिल में लिए दुनिया से चला गया और नेहा अब मायके में है. शाजापुर में किसी को उस से सहानुभूति नहीं है, उलटे लोग उसे ही इस कांड की वजह मान रहे हैं. अपनी सेवा अवधि में कइयों को हवालात पहुंचा चुके मोहन सक्सेना अब खुद अपने बेटे नितिन के साथ जेल की हवा खा रहे हैं, साथ में तथाकथित तांत्रिक संजय व्यास भी है, जिस की कलई खुलने पर लोग उसे भी कोस रहे हैं. Family Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, नेहा परिवर्तित नाम है)

 

ExtraMarital Affair: अवैध संबंधों ने उजाड़ दिया परिवार

ExtraMarital Affair: विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.

बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.

यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.

मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.

लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.

पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.

इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.

लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.

विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.

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अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.

लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.

ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.

ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.

पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.

शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.

कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.

यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.

यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.

जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.

इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.

ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.

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वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.

अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.

हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.

दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.

दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.

धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.

जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.

तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.

वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.

अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.

बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.

सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.

यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.

पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.

दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी. ExtraMarital Affair

Bhopal Crime News: जब एक मजबूर मर्द से हो गई एक बड़ी गलती

Bhopal Crime News: 21 अप्रैल, 2017 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के थाना मिसरोद के थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह कुशवाह गश्त से लौट कर क्वार्टर पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि 35-36 साल का एक आदमी उन के सामने आ खड़ा हुआ. उस के सीने से खून रिस रहा था. ऐसा लग रह था, जैसे उसे चाकू मारे गए हों, पर ठीक से लगे न हों. वहां गहरे घाव के बजाय गहरे खरोंच के निशान थे. उसे देख कर राजबहादुर सिंह को यह आपसी मारपीट का मामला लगा.

उस व्यक्ति ने अपना नाम सौदान सिंह कौरव बताया था. राजबहादुर सिंह ने थाने आने की वजह पूछी तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं कौशलनगर के पास रहता हूं. आज रात 3 बजे 4 लोग मेरे घर में घुस आए और मेरी पत्नी मंगला से जबरदस्ती करने लगे. मैं ने और मेरी पत्नी ने विरोध किया तो उन्होंने हम दोनों की बुरी तरह से पिटाई कर दी. उस मारपीट में मेरी पत्नी को अधिक चोट लगी, जिस से वह बेहोश हो गई है.’’

घायल मंगला की मौत हो सकती थी, इसलिए थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह ने तुरंत एसआई राजकुमार दांगी को कौशलनगर भेजा. वहां पहुंच कर पता चला कि मकान की दूसरी मंजिल पर सौदान सिंह पत्नी मंगला और 2 बच्चों के साथ रहता था. राजकुमार कमरे पर पहुंचे तो देखा सामने पलंग पर मंगला लेटी थी. उन्होंने उसे नजदीक से देखा तो लगा वह मर चुकी है.

उन्होंने इधरउधर देखा तो कमरे की स्थिति देख कर कहीं से नहीं लगता था कि वहां किसी तरह का झगड़ा या मारपीट हुई थी. संदेह हुआ तो उन्होंने फोन द्वारा इस बात की जानकारी थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह को दे दी. मामला लूट और दुष्कर्म की कोशिश के साथ हत्या का था, इसलिए राजबहादुर सिंह ने तुरंत यह बात एसपी सिद्धार्थ बुहुगुणा एवं एसडीओपी अतीक अहमद को बताई और खुद सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी.

राजबहादुर सिंह ने एक गहरी नजर सौदान सिंह के चेहरे पर डाली तो उन्हें उस के चेहरे पर छाए दुख के बादल बनावटी लगे. उन्हें अब तक की अपनी पुलिस की नौकरी में इतना तो अनुभव हो ही चुका था कि आदमी पत्नी के मरने पर किस तरह दुखी होता है.

उन्होंने सौदान सिंह के शरीर पर लगे चाकू के घावों को ध्यान से देखा तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यह आदमी बहुत चालाक और मक्कार है. उस के घाव किसी दूसरे द्वारा मारे गए चाकू के नहीं हैं, इन्हें उस ने खुद चाकू मार कर बनाया है. लेकिन उन्होंने उस पर कुछ जाहिर नहीं होने दिया.

उन्होंने मकान का निरीक्षण किया तो 2 कमरों के उस के मकान में बाहर के कमरे में डबलबैड के आकार का लंबाचौड़ा बिस्तर जमीन पर था. इस के अलावा किचन में भी एक बिस्तर जमीन पर ही लगा था. उस की ओर इशारा करते हुए राजबहादुर सिंह ने पूछा, ‘‘इधर कौन सोया था?’’

‘‘साहब, मैं यहीं सोता हूं.’’ सौदान सिंह ने कहा.

‘‘तुम यहां सोए थे तो तुम्हें घटना के बारे में कैसे पता चला?’’crime news

‘‘साहब, बाहर के कमरे में शोर हुआ तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं उठ कर वहां पहुंचा तो देखा 4 युवक मेरी पत्नी के साथ जबरदस्ती कर रहे थे. वह उन का विरोध कर रही थी. मैं ने मंगला को बचाने की कोशिश की तो उन्होंने चाकू से मेरे ऊपर हमला कर दिया. अपने मकसद में सफल होते न देख उन्होंने मंगला पर भी हमला कर दिया.’’ सौदान ने कहा.

‘‘तुम्हारे बच्चे कहां हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, वे तो मेरे मातापिता के पास लटेरी में हैं.’’

सौदान सिंह के इतना कहते ही थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि मंगला की हत्या का आरोपी उन के सामने खड़ा है. क्योंकि बच्चे घर में होते तो वह पत्नी की हत्या नहीं कर सकता था. इस के अलावा उस ने जो अलग बिस्तर लगाया था, बच्चों के होने पर माना जाता कि एकांत पाने के लिए लगाया होगा. लेकिन जब बच्चे घर पर नहीं हैं तो अलग बिस्तर लगाने की क्या जरूरत थी?

पड़ोसियों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि रात में किसी ने किसी तहर का शोरशराबा या चीखपुकार नहीं सुनी थी. राजबहादुर सिंह ने एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा को सारी जानकारी दी तो उन्होंने सौदान सिंह को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया.

राजबहादुर सिंह ने सौदान सिंह के मातापिता तथा मंगला के घर वालों को उस की हत्या की खबर दे दी थी. इस के बाद लाश का बारीकी से निरीक्षण कर घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. मंगला की हत्या की खबर पा कर सौदान सिंह का बड़ा भाई गोपाल सिंह तो भोपाल आ गया था, लेकिन मंगला के मायके से कोई नहीं आया था. राजबहादुर सिंह ने एक बार फिर सौदान सिंह से पूछताछ की, लेकिन मंझे हुए खिलाड़ी की तरह उस ने इस बार भी वही सारी बातें दोहरा दीं, जो वह पहले बता चुका था.

राजबहादुर सिंह ने कमरों के निरीक्षण में देखा था कि जिस कमरे में मंगला सोई थी, उस की कुंडी सहीसलामत थी. उसे बाहर से हाथ डाल कर नहीं खोला जा सकता था. सौदान सिंह ने बताया था कि रात को सोते समय बाहर वाला दरवाज अंदर से बंद था. राजबहादुर सिंह ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘रात को सोते समय दरवाजा अंदर से बंद था न?’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘दरवाजा अंदर से बंद था तो वे लोग अंदर कैसे आए, क्या तुम ने दरवाजा खोल कर उन्हें अंदर बुलाया था?’’

‘‘नहीं…नहीं साहब, मैं तो अंदर वाले कमरे में सो रहा था.’’ सौदान सिंह ने घबरा कर कहा.

‘‘तो क्या दरवाजा मंगला ने खोला था?’’

‘‘हो सकता है, उसी ने खोला हो?’’ सौदान सिंह के मुंह से यह जवाब सुन कर राजबहादुर सिंह ने कहा, ‘‘इस का मतलब उन चारों को मंगला ने बुलाया था. अगर उन्हें उस ने बुलाया था तो उस ने शोर क्यों मचाया, उस की रजामंदी से चारों चुपचाप अपना काम कर के जा सकते थे.’’

सौदान सिंह थानाप्रभारी की इस बात का जवाब नहीं दे सका तो उन्होंने डांट कर कहा, ‘‘जो सच्चाई है, उसे खुद ही बता दो, वरना पुलिस सच्चाई उगलवाएगी तो तुम्हारी क्या हालत होगी, शायद तुम नहीं जानते. वैसे सच्चाई का पता हम सभी को चल चुका है. लेकिन हम तुम्हारे मुंह से हकीकत सुनना चाहते हैं कि तुम ने अपनी पत्नी की हत्या क्यों और कैसे की है?’’

सौदान सिंह तुरंत राजबहादुर सिंह के पैरों पर गिर कर रोते हुए बोला, ‘‘साहब, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं ने ही मंगला की हत्या की है. साहब उस ने मुझे इस तरह मजबूर कर दिया था कि हत्या के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय ही नहीं बचा था. मैं मर्द हूं साहब, कितनी बेइज्जती सहता. बेइज्जती से तंग आ कर ही मैं ने उस की हत्या की है.’’

इस के बाद सौदान सिंह ने मंगला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

सौदान सिंह मध्य प्रदेश के जिला विदिशा के थाना लटेरी के गांव सुनखेड़ा का रहने वाला था. प्राइमरी तक पढ़ा सौदान गांव में पिता के सथ कारपेंटर का काम करता था. इस के अलावा खेती की थोड़ी जमीन भी थी. इस तरह कुल मिला कर उस के परिवार की आराम से गुजरबसर हो जाती थी. सौदान सिंह मातापिता के साथ खुश था. कोई 12 साल पहले उस की शादी भिंड की रहने वाली मंगला के साथ हो गई. पत्नी ने आते ही उस की जिंदगी बदल दी. वह इंटर तक पढ़ी थी. वह थी भी थोड़ी खूबसूरत. इसलिए उस के मित्र उस से जलने लगे थे.

जबकि सौदान उस से शादी कर के पछता रहा था. इस की वजह यह थी कि मंगला स्वच्छंद विचारों वाली थी. वह आजादी में विश्वास करती थी और ऐश की जिंदगी जीने की शौकीन थी. मंगला को अपनी सुंदरता का अहसास तब हुआ, जब गांव के लड़के उस के घर के चक्कर लगाने लगे. अपनी खूबसूरती का अहसास होते ही वह उन्हें अपनी खूबसूरती की झलक दिखा कर परेशान करने लगी थी. तभी घर वालों ने उस की शादी कर दी थी और इस तरह वह ससुराल आ गई.

ससुराल में मंगला सासससुर के रहते बिना सिर ढके से बाहर नहीं निकल सकती थी. जबकि स्वच्छंदता के लिए घर से बाहर जाना जरूरी था. इस के लिए मंगला ने अपने लिए पति के साथ शहर जाने का रास्ता निकाला. सौदान सिंह से ज्यादा पढ़ीलिखी और उस से अधिक सुंदर होने की धौंस दे कर मंगला ने कहा, ‘‘मैं इस गांव में तुम्हारे साथ कब तक रह कर अपनी जिंदगी बेकार करूंगी. शहर चलो, गांव में कुछ नहीं रखा है. यहां रह कर हम न अपने लिए और न बच्चों के लिए 2 पैसे बचा पाएंगे. शहर में कमा कर कुछ जमा कर लेंगे.’’

लेकिन सौदान सिंह गांव में रहने वाले अपने मांबाप को छोड़ कर शहर नहीं जाना चाहता था. पर मंगला की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. पत्नी के कहने पर 3 साल पहले सौदान सिंह भोपाल आ गया और कौशलनगर में किराए का मकान ले कर रहने लगा. उस ने टाइल्स लगाने का काम सीखा और इसे ही रोजीरोटी का साधन बना लिया.

सौदान सिंह अपने इस काम से इतना कमा लेता था कि उस की गृहस्थी अच्छे से चल रही थी. उस का सोचना था कि गांव से शहर आ कर मंगला सुधर जाएगी, लेकिन हुआ इस का उलटा. मंगला भोपाल आ कर सुधरने की कौन कहे, शहर आ कर उस की चाहतों ने और भी ऊंची उड़ान भरनी शुरू कर दी. उसे यहां कोई कुछ कहने टोकने वाला नहीं था.

2 बच्चों की मां होने के बावजूद उसे जवानी के न याद आ गए थे. एक ही इशारे में वह मनचलों को घायल कर देती थी. वहां भी मंगला ने अपने चाहने वालों की लाइन लगा दी थी. इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं. सौदान सिंह को जब पत्नी की हरकतों का पता चला तो उस ने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी, पर उस पर न पति के समझाने का असर हुआ न डांटनेफटकारने का. क्योंकि वह तो उसे गंवार, जाहिल और मंदबुद्धि ही नहीं समझती थी, बल्कि बातबात में कम पढ़ेलिखे होने का ताना भी मारती थी.

दरअसल, मंगला पति पर हावी हो कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहती थी. लेकिन सौदान सिंह अकसर मंगला को टोकता रहता था.  आखिर खीझ कर मंगला ने सौदान सिंह को नीचा दिखाने का निर्णय कर अपने आशिकों को उस के सामने ही घर बुलाने लगी. यही नहीं, उस के सामने वह प्रेमियों के साथ बैडरूम में चली जाती थी.

इतने से भी उसे संतोष नहीं होता था. वह उसी के सामने मोबाइल पर अपने चाहने वालों से अश्लील बातें करती थी. सौदान सिंह मर्द था, पत्नी की इन गिरी हुई हरकतों से उसे गुस्सा तो बहुत आता था, पर बच्चों के बारे में सोच कर उस गुस्से को पी जाता था. पहले मंगला पति की ही उपेक्षा करती थी, लेन बाद में वह बच्चों की भी उपेक्षा करने लगी थी. वह सुबह ही काम पर चला जाता था. उस के जाने के बाद मंगला आशिकों के साथ घूमने निकल जाती थी. अगर बाहर नहीं जाती तो मोबाइल पर ही घंटों अपने चाहने वालों से बातें करती रहती थी.

ऐसे में मंगला को बच्चों के खानेपीने की भी चिंता नहीं रहती थी. अगर सौदान सिंह कुछ कहता तो वह उस से मारपीट करने पर उतारू हो जाती थी. कई बार तो उस पर हाथ भी उठा दिया था. मंगला को प्रेमियों से मिलने में किसी तरह की परेशानी न हो, इस के लिए उस ने नौकरी कर  ली. यह नौकरी उस के एक प्रेमी चंदेश ने लगवाई थी.

चंदेश हीरा कटाई की उस कंपनी में पहले से नौकरी करता था, उसी की सिफारिश पर मंगला को यह नौकरी मिली थी. इसी नौकरी की आड़ में मंगला और चंदेश की रासलीला आसानी से चल रही थी.

नौकरी लग जाने के बाद मंगला सौदान सिंह को और भी ज्यादा जलील करने लगी थी. वह उस से कहती थी कि हीरे की कद्र जौहरी ही करते हैं.

इधर मंगला का एक पुराना प्रेमी अमन भी आने लगा था. वह उस का शादी से पहले का प्रेमी था. शादी से पहले ही उस के मंगला से अवैध संबंध थे. अमन जब भी आता था, उस के घर पर ही रुकता था. मंगला के बारे में जब मोहल्ले की महिलाओं को पता चला तो वे उस के बारे में तरहतरह की बातें करने लगीं.

इस बदनामी से बचने के लिए सौदान सिंह ने मंगला से गांव चलने को कहा तो उस ने उसे धकियाते हुए कहा, ‘‘तुझे गांव जाना हो तो जा, मैं अब यहीं रहूंगी. मुझे अब तेरी जरूरत भी नहीं है.’’

धीरेधीरे मंगला की तानाशाही बढ़ती जा रही थी, जिस से सौदान सिंह काफी परेशान रहने लगा था. वह कईकई दिनों तक उसे अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह जब भी उस के पास जाता, वह डांट कर कहती, ‘‘गंदे, जाहिल, तेरे शरीर से बदबू आती है. तू मेरे पास मत आया कर.’’crime news

सौदान सिंह को दुत्कार कर उस के सामने ही मंगला अपने प्रेमियों से हंसहंस कर अश्लील बातें करने लगी. पत्नी की इन हरकतों से तंग आ कर सौदान सिंह ने प्रण कर लिया कि अब इसे खत्म कर देगा. क्योंकि अगर अब यह उस की नहीं रही तो वह उसे किसी और के लिए भी नहीं छोड़ेगा. यही सोच कर उस ने 5 दिन पहले बच्चों को दादादादी के पास लटेरी पहुंचा दिया.

20 अप्रैल की रात खाना खा कर पतिपत्नी लेट गए. बच्चे घर पर नहीं थे, इसलिए सौदान सिंह ने मंगला से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. लेकिन तभी मंगला के किसी प्रेमी का फोन आ गया. सौदान ने मंगला के हाथ से मोबाइल छीन कर फोन काटना चाहा तो उस ने उसे तमाचा मार दिया. पतिपत्नी में झगड़ा होने लगा. सौदान सिंह ने गलती स्वीकार करते हुए एक बार फिर उस से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. इस पर मंगला ने कहा, ‘‘अपनी औकात देखी है गंदी नाली के कीड़े. मेरे साथ संबंध बनाने के बारे में तूने सोच कैसे लिया. मैं तुझे अपना शरीर अब कभी नहीं छूने दूंगी.’’

मंगला की इस बात से सौदान सिंह हैरान रह गया. उस ने उसी समय तय कर लिया कि आज ही वह उसे खत्म कर देगा. उस ने लेट कर आंखें मूंद लीं. उस के बगल में लेटी मंगला अपने प्रेमी से फोन पर अश्लील बातें करती रही. करीब 45 मिनट तक मंगला ने फोन पर गंदीगंदी बातें कीं, जिन्हें सौदान सिंह सुनता रहा. मंगला फोन काट कर सो गई. करीब 3, साढे़ 3 बजे सौदान उठा और पलंग के नीचे छिपा कर रखी लोहे की रौड निकाल कर पूरी ताकत से उस के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में वह बेहोश हो गई. उसी बेहोशी की हालत में मंगला के सीने पर बैठ कर उस ने उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

पुलिस से बचने के लिए सौदान सिंह ने सीने पर चाकू मार कर घाव किए और थाने पहुंच कर पुलिस को लूट और जबरदस्ती की झूठी कहानी सुना दी. अपने बचाव के लिए उस ने दूसरे कमरे में खुद ही बिस्तर बिछाया था. थानाप्रभारी ने सौदान सिंह की निशानदेही पर वह रौड बरामद कर ली थी, जिस से मंगला की हत्या की गई थी. पूछताछ और सारे साक्ष्य जुटा कर थाना मिसरौद पुलिस ने पत्नी के हत्यारे सौदान सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Bhopal Crime News

MP News: लालची मामा का शिकार हुई एक भांजी

MP News: मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले की सोहागपुर तहसील में जमीनों के दाम उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़े हैं, क्योंकि यह सैरसपाटे की मशहूर जगह पचमढ़ी के नजदीक है. इस के अलावा सोहागपुर से चंद किलोमीटर की दूरी पर एक और जगह मढ़ई तेजी से सैलानियों की पसंद बनती जा रही है. इस की वजह वाइल्ड लाइफ का रोमांच और यहां की कुदरती खूबसूरती है. सैलानियों की आवाजाही के चलते सोहागपुर में धड़ल्ले से होटल, रिसोर्ट और ढाबे खुलते जा रहे हैं.

दिल्ली के पौश इलाके वसंत विहार की रहने वाली 40 साला लीना शर्मा का सोहागपुर अकसर आनाजाना होता रहता था, क्योंकि यहां उस की 22 एकड़ जमीन थी, जो उस के नाना और मौसी मुन्नीबाई ने उस के नाम कर दी थी.

लीना शर्मा की इस जमीन की कीमत करोड़ों रुपए में थी, लेकिन इस में से 10 एकड़ जमीन उस के रिश्ते के मामा प्रदीप शर्मा ने दबा रखी थी. 21 अप्रैल, 2016 को लीना शर्मा खासतौर से अपनी जमीन की नपत के लिए भोपाल होते हुए सोहागपुर आई थी. 23 अप्रैल, 2016 को पटवारी और आरआई ने लीना शर्मा के हिस्से की जमीन नाप कर उसे मालिकाना हक सौंपा, तो उस ने तुरंत जमीन पर बाड़ लगाने का काम शुरू कर दिया.

दरअसल, लीना शर्मा 2 करोड़ रुपए में इस जमीन का सौदा कर चुकी थी और इस पैसे से दिल्ली में ही जायदाद खरीदने का मन बना चुकी थी. 29 अप्रैल, 2016 को बाड़ लगाने के दौरान प्रदीप शर्मा अपने 2 नौकरों राजेंद्र कुमरे और गोरे लाल के साथ आया और जमीन को ले कर उस से झगड़ना शुरू कर दिया.

प्रदीप सोहागपुर का रसूखदार शख्स था और सोहागपुर ब्लौक कांग्रेस का अध्यक्ष भी. झगड़ा इतना बढ़ा कि प्रदीप शर्मा और उस के नौकरों ने मिल कर लीना शर्मा की हत्या कर दी. हत्या चूंकि सोचीसमझी साजिश के तहत नहीं की गई थी, इसलिए इन तीनों ने पहले तो लीना शर्मा को बेरहमी से लाठियों और पत्थरों से मारा और गुनाह छिपाने की गरज से उस की लाश को ट्रैक्टरट्रौली में डाल कर नया कूकरा गांव ले जा कर जंगल में गाड़ दिया.

लाश जल्दी गले, इसलिए इन दरिंदों ने उस के साथ नमक और यूरिया भी मिला दिया था. हत्या करने के बाद प्रदीप शर्मा सामान्य रहते हुए कसबे में ऐसे घूमता रहा, जैसे कुछ हुआ ही न हो. जाहिर है, वह यह मान कर चल रहा था कि लीना शर्मा के कत्ल की खबर किसी को नहीं लगेगी और जब उस की लाश सड़गल जाएगी, तब वह पुलिस में जा कर लीना शर्मा की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा देगा. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया.

लीना शर्मा की जिंदगी किसी अफसाने से कम नहीं कही जा सकती. जब वह बहुत छोटी थी, तभी उस के मांबाप चल बसे थे, इसलिए उस की व उस की बड़ी बहन हेमा की परवरिश मौसी ने की थी.

मरने से पहले ही मौसी ने अपनी जमीन इन दोनों बहनों के नाम कर दी थी. बाद में लीना शर्मा अपनी बहन हेमा के साथ भोपाल आ कर परी बाजार में रहने लगी थी. लीना शर्मा खूबसूरत थी और होनहार भी. लिहाजा, उस ने फौरेन ट्रेड से स्नातक की डिगरी हासिल की और जल्द ही उस की नौकरी अमेरिकी अंबैसी में बतौर कंसलटैंट लग गई. लेकिन अपने पति से उस की पटरी नहीं बैठी, तो तलाक भी हो गया. जल्द ही अपना दुखद अतीत भुला कर वह दिल्ली में ही बस गई और अपनी खुद की कंसलटैंसी कंपनी चलाने लगी.

40 साल की हुई तो लीना शर्मा ने दोबारा शादी करने का फैसला कर लिया, लेकिन शादी के पहले वह सोहागपुर की जमीन के झंझट को निबटा लेना चाहती थी, पर रिश्ते के मामा प्रदीप शर्मा ने उस के मनसूबों पर पानी फेर दिया. लीना शर्मा की हत्या एक राज ही बन कर रह जाती, अगर उस के दोस्त उसे नहीं ढूंढ़ते. जब लीना शर्मा तयशुदा वक्त पर नहीं लौटी और उस का मोबाइल फोन बंद रहने लगा, तो भोपाल में रह रही उस की सहेली रितु शुक्ला ने उस की गुमशुदगी की खबर पुलिस कंट्रोल रूम में दी.

पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रदीप शर्मा से संपर्क किया, तो वह घबरा गया और भांजी के गुम होने की रिपोर्ट सोहागपुर थाने में लिखाई, जबकि वही बेहतर जानता था कि लीना शर्मा अब इस दुनिया में नहीं है. देर से रिपोर्ट लिखाए जाने से प्रदीप शर्मा शक के दायरे में आया और जमीन के झगड़े की बात सामने आई, तो पुलिस का शक यकीन में बदल गया.

मामूली सी पूछताछ में प्रदीप शर्मा ने अपना जुर्म कबूल कर लिया, लेकिन शक अब लीना शर्मा की बहन हेमा पर भी गहरा रहा है कि वह क्यों लीना शर्मा के गायब होने पर खामोश रही थी? कहीं उस की इस कलयुगी मामा से किसी तरह की मिलीभगत तो नहीं थी? इस तरफ भी पुलिस पड़ताल कर रही है, क्योंकि अब उस पर सच सामने लाने का दबाव बढ़ता जा रहा है.

लीना शर्मा के दिल्ली के दोस्त भी भोपाल आ कर पुलिस के आला अफसरों से मिले और सोहागपुर भी गए. हेमा के बारे में सोहागपुर के लोगों का कहना है कि वह एक निहायत ही झक्की औरत है, जिस की पागलों जैसी हरकतें किसी सुबूत की मुहताज नहीं. खुद उस का पति भी स्वीकार कर चुका है कि वह एक मानसिक रोगी है. अब जबकि आरोपी प्रदीप शर्मा अपना जुर्म कबूल कर चुका है, तब कुछ और सवाल भी मुंहबाए खड़े हैं कि क्या लीना शर्मा का बलात्कार भी किया गया था, क्योंकि उस की लाश बिना कपड़ों में मिली थी और उस के जेवर अभी तक बरामद नहीं हुए हैं?

आरोपियों ने यह जरूर माना कि लीना शर्मा का मोबाइल फोन उन में से एक ने चलती ट्रेन से फेका था. लाश चूंकि 15 दिन पुरानी हो गई थी, इसलिए पोस्टमार्टम से भी बहुत सी बातें साफ नहीं हो पा रही थीं. दूसरे सवाल का ताल्लुक पुश्तैनी जायदाद के लालच का है कि कहीं इस वजह से तो लीना शर्मा की हत्या नहीं की गई है?

प्रदीप शर्मा ने अपनी भांजी के बारे में कुछ नहीं सोचा कि उस ने अपनी जिंदगी में कितने दुख उठाए हैं और परेशानियां भी बरदाश्त की हैं. लीना शर्मा अगर दूसरी शादी कर के अपना घर बसाना चाह रही थी तो यह उस का हक था, लेकिन उस की दुखभरी जिंदगी का खात्मा भी दुखद ही हुआ. MP News

MP Crime: वासना की भूख ने जूली को कातिल बना दिया

MP Crime: वह सैक्स की आग में कई सालों से झुलस रही थी. उस का पति पिछले 2 सालों से दोहरे हत्याकांड के आरोप में जेल में बंद था. पति की गैरहाजिरी में उसे जिस्मानी सुख नहीं मिल पा रहा था. आखिर में उस ने एक रास्ता निकाल ही लिया. वह दोहरी जिंदगी जीने लगी. दिन के उजाले में वह घर वालों के सामने घूंघट ओढ़े आदर्श बहू की तरह रहती और जैसे ही रात का अंधेरा घिरता, वह आदर्श बहू का चोला उतार कर ऐयाशी में रम जाती. यह सिलसिला पिछले एक साल से चल रहा था. बहू की इस दोहरी जिंदगी का राज एक दिन घर वालों के सामने उजागर हो गया. एक रात दादी सास सुशीला राजावत ने बहू को किसी पराए मर्द के साथ सैक्स संबंध बनाते देख लिया. इस के बाद से दादी सास उस पर कड़ी नजर रखने लगीं.

इस से खफा उस औरत ने रची एक खौफनाक साजिश, जो दिल दहला देने वाली थी. यह मामला मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के हजारी इलाके के बिरला मंदिर का है. जूली अपनी दादी सास सुशीला राजावत और अपने 6 साल के बेटे के साथ रहती थी. पुलिस अधीक्षक हरिनारायणचारी मिश्र के मुताबिक, पिछले 3 साल से जूली का पति शिवा राजावत दोहरे हत्याकांड के आरोप में अपने पिता और छोटे भाई के साथ जेल में बंद है. पति के जेल चले जाने के बाद से जूली अकेली हो गई. पति के बिना उस का मन नहीं लगता था. वह अकसर अपनी दादी सास के सामने रोती रहती थी.

शिवा राजावत के कुछ करीबी दोस्त थे, जो जेल से उस की खबर ले कर उस के घर पर आते रहते थे. इसी दौरान जूली उन में से एक दोस्त की ओर आकर्षित हो गई. जल्दी ही दोनों नजदीक आ गए और चोरीछिपे मिलने लगे. जूली काफी समय से सैक्स की भूखी थी. अपनी भूख मिटाने के लिए वह प्रेमी को रात के समय अपने कमरे पर बुलाने लगी. वह शख्स रात में उस के पास आता और सुबह होने से पहले ही वहां से निकल जाता. रात के अंधेरे में चलने वाले ऐयाशी के इस खेल के बारे में किसी को पता नहीं था.

एक रात दादी सास सुशीला राजावत ने जूली को पराए मर्द के साथ मस्ती करते देख लिया. उस रात जूली कुछ ज्यादा ही उतावली थी. इस चक्कर में कमरे का दरवाजा बंद करना भूल गई. रात के समय दादी सास सुशीला राजावत की नींद खुल गई. उन्हें बहू के कमरे से सिसकारियों की आवाज सुनाई दी. उन के कान खड़े हो गए. वे दबे कदमों से कमरे के पास पहुंचीं. अंदर का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. जूली अपने यार के साथ सैक्स में इतनी खोई हुई थी कि उसे कमरे में किसी के आने का एहसास तक न हुआ. दादी सास ने उसी वक्त दोनों को काफी खरीखोटी सुनाई.

वह शख्स बिना कुछ बोले सिर नीचे कर के वहां से भाग गया, लेकिन उस दिन से जूली घर में कैद हो कर रह गई. दादी सास उस पर कड़ी निगाह रखने लगीं. उसे बाहर के किसी शख्स से बात करने, घर के बाहर कहीं जाने, यहां तक कि मोबाइल फोन से बात करने पर भी रोक लगा दी. जूली अपने प्रेमी से मिलने के लिए तड़पने लगी. उस ने सास की नजरों से बच कर घर से बाहर निकलने की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली. नतीजा यह हुआ कि वह गुस्से से बौखला गई. उस ने सास को ही खत्म करने का खतरनाक प्लान बना लिया.

5 अगस्त की सुबह 8 बजे अपने बेटे को स्कूल भेजने के बाद जूली ने इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया. जूली ने चाय में ढेर सारी नींद की गोलियां मिला कर अपनी दादी सास सुशीला को पिला दी. चाय पीने के कुछ समय बाद ही सुशीला राजावत को नींद आने लगी. वे अपने कमरे में जा कर सो गईं. मौका पा कर जूली ने तौलिया से गला दबा कर उन की हत्या कर दी. सास की हत्या के बाद उस ने कमरे का सारा सामान इस तरह से बिखेर दिया, ताकि मामला लूटपाट का लगे. तकरीबन 12 बजे जूली ‘मैं लुट गई… बरबाद हो गई’ चिल्लाने लगी. आवाज सुन कर आसपास के लोग जमा हो गए. पुलिस भी वहां पहुंच गई.

जूली ने पुलिस को बताया, ‘‘3 लोग उस के पति शिवा के दोस्त बता कर घर में घुसे. तीनों अंदर कमरे में कुरसी पर बैठ कर सास से बातें करने लगे. मैं उन के लिए अंदर रसोई में चाय बनाने चली गई.

‘‘थोड़ी देर में 2 लोग रसोई में आ गए. उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ लिया. एक ने मेरे सिर पर पिस्टल अड़ा दिया. दूसरे ने मेरा पेटीकोट उठा कर रेप करने की कोशिश की.

‘‘वह कुछ करने में कामयाब होता, उस बीच किसी ने दरवाजे पर आवाज दी. आवाज सुन कर तीनों भाग निकले. जाने से पहले वे अलमारी में रखा सोना लूट कर ले गए और उन्होंने सास की हत्या भी कर दी.’’

जूली ने पुलिस को जो कहानी सुनाई थी, पुलिस द्वारा अंदर तहकीकात करने पर झूठी निकली, जिस की वजह से जूली शक के घेरे में आ गई.

जूली ने तीनों लुटेरों को सामने कमरे में रखी कुरसियों पर बैठ कर सास से बातें करने की बात कही थी, जबकि कमरे में कुरसियां एक के ऊपर एक रखी थीं. दूसरी बात, जूली ने हत्यारे द्वारा उस का दुपट्टा ले जाने की बात कही थी, पर वह दुपट्टा अंदर कमरे में लाश के पास मिला. तीसरी बात, जो सोना लुटेरों द्वारा लूट कर ले जाने की बात की थी, जांच में पता चला कि वह सोना बैंक में गिरवी रखा हुआ है. उस पर लोन लिया गया था. इस के अलावा जूली अपना बयान बारबार बदल रही थी. पुलिस द्वारा कड़ाई से पूछताछ करने पर जूली ने दादी सास की हत्या करने की बात कबूल ली और सारी असलियत बयान कर दी.

जूली ने पुलिस को बताया कि वह पिछले 5 महीने से अपनी दादी सास की हत्या की साजिश रचने में लगी थी. उस ने टैलीविजन सीरियल देख कर हत्या करने व उस से बचने की प्लानिंग बनाई थी. उस ने सीरियल के द्वारा छोटेबड़े अपराध के बारे में जानकारी हासिल की थी. पहले उस ने बदमाशों द्वारा रेप किए जाने की कहानी पुलिस के सामने सुनाने की सोची थी, लेकिन रेप के मामले में मैडिकल एंगल को देखते हुए उस ने पिस्टल अड़ा कर रेप करने की कोशिश, लूट और हत्या की कहानी सुनाई.

जूली को यकीन था कि उस के द्वारा बताई गई सारी बातें पुलिस मान लेगी और वह साफतौर पर बच जाएगी, पर ऐसा हुआ नहीं. पुलिस ने तहकीकात कर उस की सारी पोल खोल कर रख दी. जूली ने बताया कि उसे अपनी दादी सास की हत्या करने का कोई मलाल नहीं है, क्योंकि वे उसे प्रेमी से मिलने नहीं दे रही थीं. सैक्स के माहिर डाक्टरों का कहना है कि इनसान के लिए सैक्स की भूख जिस्मानी जरूरत है. इस पर रोक लगाने पर औरत हो या मर्द, हत्या करने जैसा खौफनाक कदम उठा सकते हैं. MP Crime

MP News : यूट्यूब से सीखी ट्रिक, पोस्ट औफिस के 9 ताले काट उड़ाए लाखों रुपए

MP News : एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है. रतलाम के मुख्य डाकघर में एक चोर ने ग्राइंडर से ताले काटकर लौकर से 7 लाख रुपए से ज्यादा की चोरी कर डाली. पुलिस ने 3 दिन की कड़ी मशक्कत के बाद आरोपी को पकड़ लिया है. खुलासा हुआ कि आरोपी ने वेब सीरीज और यूट्यूब देखकर चोरी की ट्रिक सीखी थी और वारदात को अंजाम देने के लिए इलेक्ट्रिक ग्राइंडर औनलाइन खरीदा था. चलिए जानते हैं इस क्राइम से जुड़ी पूरी स्टोरी को विस्तार से

यह घटना 28 अगस्त, 2025 को रतलाम शहर कोतवाली क्षेत्र के बंगालीपुरा स्थित मुख्य डाकघर की है. आरोपी ने यूट्यूब और वेब सीरीज से चोरी के तरीके सीखकर औनलाइन इलेक्ट्रिक ग्राइंडर खरीदा और पोस्ट औफिस की बाउंड्री कूदकर भीतर दाखिल हुआ. उस चोर  ने शटर पर लगे 9 ताले काटे और लौकर की खिड़की की जाली तोड़कर अंदर घुस गया. वहां से चोर 7 लाख 4 हजार 339 रुपए कैश चुरा कर फरार हो गया.

पुलिस ने करीब एक हजार सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली और 3 दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद आरोपी को पकड़ लिया. एसपी अमित कुमार ने बताया कि आरोपी ने पूरी वारदात फुलप्रूफ प्लानिंग से की थी.

पुलिस ने इस सनसनीखेज चोरी का खुलासा करते हुए गांव बिनौली थाना रिंगनोद निवासी अमृत सिंह (28)  को गिरफ्तार किया. जांच में सामने आया कि चोरी के बाद अमृत ने नकदी घर में छिपाई, जिस में उस की बहन पपीता (22) और पत्नी अनीता (22) ने सक्रिय सहयोग किया. दोनों ने चोरी की रकम को छिपाने और सुरक्षित रखने में मदद की. पुलिस ने इन दोनों को भी अपराध में सहभागी मानते हुए गिरफ्तार कर लिया है. इस तरह मुख्य आरोपी के साथ परिवार के 2 सदस्य भी गिरफ्त में आ गए, जिस से मामले का पूरा राज खुल गया.

पूछताछ में आरोपी अमृत सिंह ने खुलासा किया कि उस ने 3 महीने पहले ही इस चोरी की प्लानिंग शुरू कर दी थी. यूट्यूब से ताले काटने की तकनीक सीखी और एक ई-कौमर्स साइट से बैटरी औपरेटेड इलेक्ट्रिक ग्राइंडर खरीदा.

वारदात से एक दिन पहले वह रतलाम पहुंचा और मैंडिकल कालेज के पास रुका. घटना वाली रात करीब 3 बजे वह बाइक से एमसीएच हौस्पिटल पहुंचा और वहां से पैदल पोस्ट औफिस गया. चोरी करने के बाद पैदल रेलवे स्टेशन पहुंचा, फिर औटो से एमसीएच हौस्पिटल लौटा और बाइक ले कर फरार हो गया. पूरी वारदात को उसने बेहद सोचीसमझी रणनीति से अंजाम दिया.

एसपी अमित कुमार ने बताया कि आरोपी ग्रैजुएट है. उस की मम्मी बीमार रहती है, उस ने कर्ज के दबाव में चोरी की योजना बनाई. बैंक में चोरी करने की सोची, लेकिन वहां की सुरक्षा कड़ी देख पोस्ट औफिस को निशाना बनाया, जहां उस का खाता भी है. MP News

Crime News : 5 लोगों को मौत के घाट उतारकर लाशें जमीन में दफनाईं

Crime News : सुरेंद्र सिंह ने दोस्त की बहन रूपाली से न सिर्फ प्यार किया, बल्कि उस के साथ लिवइन रिलेशन में भी रहने लगा था. इस बीच आखिर उन दोनों के बीच ऐसा क्या हो गया कि सुरेंद्र सिंह ने रूपाली सहित परिवार के 5 सदस्यों की हत्या कर शव जमीन में दफना दिए…

भारती ने अपनी मां को फोन मिलाया. 20 सेकेंड तक रिंग बजती रही. उस की मां ने फोन रिसीव नहीं किया. ऐसा पहली बार हुआ, जब उस की मां ममता कास्ते ने फोन नहीं उठाया हो. वह चिंतित हो गई. ममता अपनी 2 बेटियों रूपाली (20 साल) और दिव्या (16 साल) के साथ मध्य प्रदेश के देवास जिले के नेमावर में अकेली रहती थी. ममता के पति अपने बेटे संतोष और बड़ी बेटी भारती के साथ पीथमपुर में रहते थे. यह सब काम की तलाश में नेमावर से यहां आए थे. तीनों ही अलगअलग जगहों पर काम कर रहे थे. भारती वहीं एक फैक्ट्री में काम करती थी. अपनी मां और 2 बहनों के अलग रहने के कारण भारती दिन में एकदो बार उन का हालचाल पूछ लिया करती थी.

हालांकि भारती की मौसी की एक 16 वर्षीय बेटी पूजा और 14 वर्षीय बेटा पवन भी ममता के साथ नेमावर में रहते थे. उस रोज 13 मई, 2021 को भी भारती ने हमेशा की तरह मां से हालचाल जानने के लिए फोन किया था. लेकिन मां के फोन नहीं उठाए जाने पर भारती ने परिवार के दूसरे लोगों को भी फोन किया, उन के फोन बंद मिलने पर भारती और भी परेशान हो गई. कारण, न तो मां उस का फोन उठा रही थी और न ही परिवार के दूसरे लोगों से बात हो पा रही थी. भारती के सामने ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं आई थी. घबराहट में उस का मन विचलित होने लगा था. मन में कई तरह के विचार उठने लगे थे. अनहोनी की आशंकाओं से उस का दिमाग झनझना उठा था.

आखिर भारती अपने मन को कब तक समझाती. एकदो नहीं, बल्कि 5 दिन गुजर चुके थे. भारती को उस की मां या परिवार के किसी भी सदस्य से बात नहीं हो पाई थी. वह 13 मई से लगातार अपनी मां से संपर्क करने की कोशिश करती रही. कोई सूचना नहीं मिलने पर वह अपने भाई संतोष के साथ 17 मई को नेमावर जाने के लिए पीथमपुर से रवाना हो गई. वह इसी आशा में थी कि नेमावर में सब कुछ ठीक होगा, लेकिन वहां पहुंच कर देखा तो पाया कि उस के मकान पर ताला लगा हुआ था. परिवार के 5 लोग थे लापता यह देख कर दोनों भाईबहन की परेशानियां और भी बढ़ गईं. भारती ने आसपास रहने वालों से पूछताछ की. किसी ने भी कोई जानकारी नहीं दी.

घर पर ताला लगा देख घबराई भारती तुरंत नेमावर स्थित पुलिस थाने गई. टीआई अविनाश सिंह सेंगर को उस ने पूरी कहानी सुना दी. एक ही परिवार के 5 लोग लापता थे, इसलिए मामले की गंभीरता को देखते हुए सेंगर ने तत्काल भारती की रिपोर्ट पर ममता, रूपाली, दिव्या, पवन और पूजा की गुमशुदगी दर्ज कर ली. टीआई ने इस की जानकारी एसपी डा. शिवदयाल एवं एएसपी सूर्यकांत शर्मा को भी दे दी. मामला आदिवासी समाज का था. इस कारण इसे गंभीरता से लिया जाने लगा. लापता सभी 5 सदस्यों में से सिर्फ रूपाली का मोबाइल ही चालू था, जिस की लोकेशन लगातार बदल रही थी. रूपाली अपने मोबाइल से भारती को लगातार मैसेज कर खुद की सलामती की जानकारी दे रही थी, लेकिन उसे खोजने की कोशिश नहीं करने की भी हिदायत मिल रही थी.

ताज्जुब की बात यह थी कि वह मैसेज द्वारा बात तो कर रही थी लेकिन भारती अथवा परिवार के किसी भी सदस्य का फोन नहीं उठा रही थी. लापता सदस्यों में 2 रूपाली की मौसी के बच्चे थे. इस की जानकारी भारती की मौसी को मिली तो वह भी भागीभागी नेमावर आ गईं. उन्होंने रूपाली पर अपने बच्चों के अपहरण का आरोप लगाना शुरू कर दिया. उन का कहना था कि रूपाली की हरकतें ठीक नहीं थीं. उसी ने हमारे बच्चों का अपहरण किया है. मामले को उलझता देख एसपी ने उज्जैन जोन के आईजी योगेश देशमुख से संपर्क किया. देशमुख नेमावर पहुंच कर एसपी देवास को आवश्यक निर्देश दिए. उस के मुताबिक एसपी ने मामले की जिम्मेदारी एएसपी सूर्यकांत शर्मा को सौंप कर 5 टीमों को फील्ड में उतार दिया.

इस के साथ ही टीआई (नेमावर) अविनाश सिंह सेंगर के अलावा आधा दरजन से अधिक पुलिसकर्मी जांच मे जुट गए. मामले को सुलझाने की पहली जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए नेमावर पुलिस लापता सदस्यों के परिवार की कुंडली बनाने में जुट गई. इस के लिए मुखबिरों की मदद ली गई. पुलिस ने रूपाली के मोबाइल फोन की भी डिटेल्स निकाली, जिस से रूपाली के फोन पर कई युवकों से बात होने की जानकारी मिली. उन में एक नेमावर का रहने वाला युवक सुरेंद्र सिंह पुत्र लक्ष्मण सिंह भी था. जबकि बाकी के युवक हरदा और उस के आसपास के इलाके के थे.

सुरेंद्र रूपाली के भाई संतोष का पुराना दोस्त था, जो पड़ोस में ही रहता था. वह संतोष के साथ रूपाली और परिवार के बाकी लोगों की खोजखबर लेने के लिए हमेशा उस के साथ थाने भी आता था. पूछताछ में उस ने बताया कि संतोष उस का दोस्त है. संतोष के पीथमपुर जाने के बाद उस के परिवार का हालचाल जानने के लिए आताजाता था. उस की रूपाली के अलावा परिवार के अन्य लोगों से भी बातचीत होती रहती थी. पुलिस को मिली महत्त्वपूर्ण जानकारी रूपाली की काल डिटेल्स में कई लोगों के साथ बातचीत की भी जानकारी मिली. उन में सुरेंद्र के अलावा दूसरे लोग हरदा इलाके के रहने वाले थे. उन के साथ रूपाली की जानपहचान संदिग्ध लगने के संदर्भ में पुलिस इंसपेक्टर शिवमुराद यादव  को एक चौंकाने वाली जानकारी मालूम हुई.

वह यह कि रूपाली ने घर वालों की बिना जानकारी के हरदा में एक किराए का कमरा ले रखा था. वह अकसर उसी कमरे में ठहरती थी. वहीं सुरेंद्र भी नेमावर से हरदा जा कर उस से मिलता था. सुरेंद्र के अलावा दूसरे युवक भी रूपाली के पास आतेजाते देखे गए थे. पुलिस को रूपाली के बारे में सब से महत्त्वपूर्ण जानकारी यह भी पता चली कि उस ने पड़ोसियों से सुरेंद्र का परिचय अपने पति के रूप में करवाया था. इन जानकारियों के आधार पर रूपाली परिवार के लापता सदस्यों के सिलसिले में इकलौता सूत्र बन गई थी. एक तरफ जहां रूपाली की संदिग्ध गतिविधियां सामने आ चुकी थीं, वहीं उस के मोबाइल से बदले हुए लोकेशनों के साथ मैसेज भेजे जा रहे थे.

सिर्फ मैसेज आने की स्थिति में पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि रूपाली का मोबाइल कोई और इस्तेमाल कर रहा है. इस मामले में रूपाली की भूमिका महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद पुलिस उस तक नहीं पहुंच पा रही थी. समय बीतता जा रहा था. पुलिस को केस के बारे में कोई ठोस जानकारी हाथ नहीं लग पा रही थी. सुरेंद्र से भी कई बार पूछताछ की जा चुकी थी, लेकिन उस से भी कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई थी. हां, उस ने इतना जरूर बताया था कि वह रूपाली से प्यार करता था. पुलिस ने जब जांच का दायरा बढ़ाया तब मालूम हुआ कि 13 मई, 2021 को ममता रूपाली और दिव्या के अलावा पूजा और पवन भी शाम तक नेमावर में ही देखे गए थे. उसी दिन रूपाली और सुरेंद्र को भी गहराती शाम नर्मदा में तैरती नाव में एकदूसरे के साथ देखा गया था.

पुलिस को सुरेंद्र भी संदिग्ध लगा. दूसरे सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सुरेंद्र हरदा में किराए के कमरे पर रूपाली के पास जाता था. यह बात उस ने पूछताछ में नहीं बताई थी. वहां के पड़ोसियों के अनुसार वह रूपाली का कथित पति भी था. सुरेंद्र और रूपाली के बीच के संबंधों का पता लगने पर पुलिस ने जांच का रुख बदल दिया. जल्द ही मालूम हो गया कि उन के बीच काफी गहरा संबंध था. ऐसे में निश्चित तौर पर रूपाली ने नेमावर से अचानक कहीं जाने से पहले इस की जानकारी सुरेंद्र को दी होगी.

पुलिस ने इस का अंदाजा लगाते हुए संदेह के आधार पर 2 बातों पर गौर किया. पहला, रूपाली के गायब हो जाने पर सुरेंद्र ने कभी उस के मोबाइल पर फोन क्यों नहीं किया? दूसरा,  रूपाली के नंबर से उस के मोबाइल पर कोई काल या मैसेज क्यों नहीं आया? पुलिस की नजर में इस का मतलब साफ था कि मामले में कोई सुरेंद्र को दूर रखने की कोशिश कर रहा था या फिर सुरेंद्र एक साजिश के तहत पुलिस के सामने आ कर अपना और रूपाली का बचाव कर रहा था. इस शक को ध्यान में रख कर नेमावर पुलिस सुरेंद्र को मामले का सब से बड़ा संदिग्ध मानते हुए उस पर नजर रखने लगी. उस के बारे में जानकारियां जुटाई जाने लगीं.

मिली जानकारी के अनुसार सुरेंद्र सिंह नेमावर में एक अच्छे धमकदार परिवार का था. उस के दादा होकम सिंह के अलावा उस के पिता लक्ष्मण सिंह भी नामदार रहे हैं. कुछ साल पहले इस परिवार की जमीन हाइवे निर्माण के लिए शासन ने अधिग्रहीत कर ली थी. बदले में परिवार को मुआवजे की मोटी रकम मिली थी. पैसा आने पर सुरेंद्र और उस के छोटे भाई वीरेंद्र का समाज में रौबरुतबा बढ़ गया था. दोनों भाई शराब की लत के लिए भी चर्चित हो गए थे. पुलिस सुरेंद्र के बारे में हर स्तर की जानकारियां जुटाने में लगी हुई थी, जबकि लापता रूपाली, ममता, दिव्या, पवन और पूजा का डेढ़ महीने से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद कुछ नहीं पता चल पाया था.

इंस्टाग्राम की पोस्ट ने बढ़ाया शक एक दिन सुरेंद्र के बारे में एक नई जानकारी मिली. वह जानकारी सोशल मीडिया की तरफ से मिली थी. इंस्टाग्राम पर सुरेंद्र की मंगेतर को ले कर एक पोस्ट किया गया था. उस के जरिए रूपाली द्वारा आपत्ति जताई गई थी. यह पोस्ट सुरेंद्र की शादी नसरूलागंज निवासी एक युवती के साथ तय होने के जवाब के तौर पर की गई थी. इस से स्पष्ट था कि सुरेंद्र के रूपाली से संबंध टूट गए थे. इस जानकारी के आधार पर इंसपेक्टर शिवमुराद यादव ने रूपाली के लापता होने के मामले को सुरेंद्र की सगाई से जोड़ कर देखा. उन्होंने अपने सहकर्मियों को पता लगाने के लिए कहा कि जिस रोज रूपाली और उस के परिवार के दूसरे 4 सदस्य लापता हुए, उस रोज सुरेंद्र कहां था?

संयोग से उसी दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिस से मामले में पूरी तरह से सुरेंद्र का हाथ होने का शक और मजबूत हो गया. पुलिस ने पाया कि भारती और संतोष के मोबाइल पर बारबार रूपाली के मोबाइल से आने वाले मैसेज जांच की दिशा भटकाने के लिए किए जा रहे थे. 40 दिन बाद आए मैसेज को टारगेट कर इंसपेक्टर यादव ने मोबाइल की लोकेशन मालूम की, जो चोरल डैम के इलाके की थी. चोरल डैम नेमावर से बहुत नजदीक नहीं तो बहुत दूर भी नहीं है. लोग वहां घूमने जाते हैं. पुलिस ने अब पूरा मामला एक बड़ी साजिश में उलझा हुआ महसूस किया. उस दिशा में नेमावर पुलिस ने अपनी जांच और भी तेज कर दी.

कुछ दिनों बाद ही पुलिस को एक ढाबे पर कुछ लोगों के द्वारा रूपाली के परिवार के गायब होने की बात करने की जानकारी मिली. उन में 2 लोग सुरेंद्र के खेत पर काम करते थे. पुलिस संदेह के आधार पर उन्हें थाने लाई. उन से पूछताछ के क्रम में सुरेंद्र के 2 करीबी दोस्तों विवेक तिवारी और राकेश के बारे में भी जानकारी मिली. उन्हें भी थाने बुलवा लिया गया. आखिर में पुलिस सुरेंद्र और उस के भाई वीरेंद्र को भी पूछताछ के लिए थाने ले आई. इंसपेक्टर यादव ने दोनों भाइयों से अलगअलग पूछताछ की और उन के दोस्तों के बयान के साथ तार जोड़ा, तब यह समझते देर नहीं लगी कि लापता परिवार के पीछे इन्हीं लोगों का हाथ है.

उन पर जब सख्ती बरती गई और सच छिपाने एवं झूठे बयान देने की भी सजा का डर दिखाया गया, तब वे टूट गए. उन से मिली अहम जानकारियों के आधार पर पुलिस के आला अधिकारी जेसीबी मशीन ले कर सुरेंद्र के खेत पर जा पहुंचे. तब तक गांव वालों की काफी भीड़ वहां जमा हो गई थी. कुछ ही देर में खेत की खुदाई शुरू की गई. जैसेजैसे बड़े गड्ढे से मिट्टी निकलती गई, वैसेवैसे अपराधियों का कृत्य सामने आता चला गया. कुछ देर में ही जो मंजर सामने आया, सब की रूह कांप उठी. खेत में से एक के बाद एक कर सड़ेगले 5 लाशों के कंकाल निकाले गए. उन की पहचान ममता, रूपाली, दिव्या, पूजा और पवन के रूप में हुई. पुलिस को हैरत हुई कि जिस के मोबाइल से लगातार मैसेज आ रहे थे, उस की मौत हो चुकी थी.

इस नृशंस हत्याकांड को ले कर पूरे मध्य प्रदेश में सनसनी फैल गई. सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने इसे दलित अत्याचार का रंग देने की कोशिश की. हालांकि मामला कैसे अलग तरह का था, इस का खुलासा आरोपियों ने गहन पूछताछ के बाद किया. इस दिल दहला देने वाले सनसनीखेज हत्याकांड की कहानी इस प्रकार सामने आई—

रूपाली के पिता मूलरूप से खंडवा स्थित खलावा के रहने वाले थे. लेकिन पूरा परिवार काम की तलाश में देवास जिले के नेमावर के वार्ड नंबर 10 में आ कर बस गया था. रूपाली के घर के बिलकुल नजदीक सुरेंद्र सिंह का मकान था. रूपाली के भाई संतोष से उस की दोस्ती थी. दोनों एक ही उम्र के थे. दोस्ती होने के कारण सुरेंद्र का रूपाली के घर आनाजाना लगा रहता था. रूपाली किशोरावस्था की उम्र लांघ चुकी थी. वह काफी आकर्षक और सुंदर दिखने लगी थी. उस की सुंदरता को देख कर सुरेंद्र दंग था. मन ही मन वह उसे अपना दिल दे बैठा था. किसी न किसी बहाने से वह संतोष के घर जाने लगा था.

कुछ समय बाद रूपाली की बड़ी बहन भारती, पिता और संतोष खराब आर्थिक स्थिति के चलते रोजगार के सिलसिले में पीथमपुर जा कर रहने लगे. जबकि रूपाली अपनी मां और बहन के साथ वहीं नेमावर में ही रहती थी. सुरेंद्र के साथ लिवइन में रहने लगी रूपाली संतोष के जाने के बाद सुरेंद्र ही एक तरह से उन की देखभाल करने वाला बन गया था. वह छोटीमोटी मदद भी कर दिया करता था रूपाली भी सुरेंद्र के हावभाव को समझ गई थी. ऊपर से वह पैसे वाला संपन्न परिवार से था. रूपाली ने महसूस किया कि उस की मनमांगी मुराद पूरी होने वाली है. वह सुरेंद्र में पलकों पर बिठा कर रखने वाले सपनों के राजकुमार की छवि देखने लगी.

लगभग 4 साल पहले शुरू हुई दोनों की पे्रम कहानी दिनप्रतिदिन मधुरता से भरती चली गई. इसी बीच सुरेंद्र ने रूपाली से शादी करने का वादा किया. रूपाली ने भी हां करते हुए अपना सब कुछ उसे न्यौछावर कर दिया. दोनों शादी से पहले ही शारीरिक संबंध कायम करते रहे. रूपाली प्यार के मामले में सुरेंद्र से भी ज्यादा हिम्मती थी. नेमावर छोटी जगह थी, जिस कारण उसे सुरेंद्र से मिलते रहने में बाधा आती थी. इसे देखते हुए रूपाली ने एक योजना के तहत हरदा में एक कमरा किराए पर ले लिया. वहीं वह सुरेंद्र के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगी. उन्हीं दिनों इलाके के हाइवे निर्माण से सुरेंद्र के परिवार को अच्छा मुआवजा मिला. अचानक आए पैसे से सुरेंद्र को शराब की लत लग गई.

दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हुए रूपाली चमकदमक और यौनसुख की भूखी बन चुकी थी. उस ने सुरेंद्र के अलावा कई युवकों से दोस्ती कर ली. उन में ज्यादातर युवक हरदा व उस के आसपास के रहने वाले थे. सुरेंद्र को रूपाली के दूसरे दोस्तों से मिलने वाली बात मालूम थी. फिर भी वह इसलिए चुप रहता था, क्योंकि उस के लिए भी रूपाली महज मनोरंजन का साधन भर थी. वह उस के प्यार से कहीं अधिक वासना के नशे में खोया रहता था. जबकि रूपाली सुरेंद्र के द्वारा किए गए वादे को सच मान बैठी थी. लेकिन इस कहानी में नया मोड़ तब आया, जब कुछ समय पहले सुरेंद्र के परिवार वाले उस की शादी के लिए तैयारी करने लगे थे. इस बात की जानकारी रूपाली को लगी.

इस बात से वह नाराज हो गई और उस ने इंस्टाग्राम पेज पर अपनी अंतरंग तसवीरें पोस्ट कर सुरेंद्र को बदनाम कर दिया. वह उस पर दबाव बनाने लगी कि वह अपनी सगाई तोड़ कर उस के साथ ही शादी करे. रूपाली की छोटी बहन दिव्या को भी दोनों के संबंधों की जानकारी थी, इसलिए वह भी रूपाली का ही साथ देती थी. सुरेंद्र की सगाई तोड़ने के लिए रूपाली ने करीब 20 दिन पहले ही इंस्टाग्राम पर उस की होने वाली पत्नी को काफी गंदी टिप्पणियां कर दी थीं, जब सुरेंद्र ने उसे ऐसा करने से मना किया तो उस का कहना था कि यह तो शुरुआत है. अगर उस के साथ शादी नहीं की तो पूरे परिवार का जीना हराम कर देगी.

उस के द्वारा दी गई धमकियों से सुरेंद्र को लग गया कि वह अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. इसलिए उस ने उसे खत्म कर देने का फैसला कर लिया. उस ने अपनी योजना में दोस्त विवेक तिवारी के अलावा छोटे भाई वीरेंद्र, राजकुमार, मनोज, करण व राकेश को शामिल कर लिया. सुरेंद्र ने अपने खेत में ट्रांसफार्मर लगाने के नाम पर गहरा गड्ढा करवा लिया. इस के बाद योजना के अनुसार उस ने 13 मई, 2021 को रूपाली को शाम के समय फोन कर के खेत पर बुलाया. वह खुशीखुशी अपनी गाड़ी ले कर खेत पर आ गई. उस समय तक सुरेंद्र और उस के साथी शराब के नशे मे चूर हो गए थे. रूपाली ने आते ही शादी की बात शुरू कर दी तो सुरेंद्र ने उसे उसी समय अपने साथ सुहागरात मनाने की जिद की.

रूपाली ने सब के सामने ऐसा करने से मना किया तो सुरेंद्र ने जबरदस्ती सब के सामने उस के साथ संबंध बनाए और जब वह उठ कर अपने कपड़े पहनने लगी. तभी सुरेंद्र ने उस का गला दबा दिया. इस के बाद उन सभी ने लोहे की रौड से पीटपीट कर उस की हत्या कर दी. फिर शव गड्ढे में डाल दिया. रूपाली और सुरेंद्र के संबंधों के बारे में उस की मां ममता व बहन दिव्या सब कुछ जानती थीं, इसलिए रूपाली के घर वापस नहीं पहुंचने पर सुरेंद्र को पकड़े जाने का पूरापूरा डर था. इसलिए उन में से एक व्यक्ति रूपाली के घर जा कर उस की मां और बहन को शादी की बात करने के नाम पर खेत पर ले आया, जहां उन्होंने उन दोनों की भी हत्या कर दी.

सुरेंद्र को यह पता चला कि रूपाली के घर उस की मौसी के बच्चे भी आए हुए हैं. दोनों पुलिस को पूरी कहानी बता सकते थे. इसलिए  मौसी के दोनों बच्चों को खेत पर इस बहाने से बुला लिया कि खेत पर उन्हें उन की मौसी बुला रही हैं. बच्चे खेत पर गए तो उन की भी हत्या कर लाश को गड्ढे में दफन कर दिया. गड्ढे को नमक, यूरिया व मिट्टी डाल कर भर दिया. धीरेधीरे घटना को डेढ़ माह से अधिक समय बीत जाने पर भी जब पुलिस के हाथ कुछ भी नहीं लगा था. तब सुरेंद्र और उस के साथियों को भरोसा हो गया कि अब पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाएगी.

एसपी (देवास) शिवदयाल के निर्देशन और एएसपी सूर्यकांत शर्मा के नेतृत्व में नेमावर थाने की टीम में शामिल टीआई शिवमुराद यादव, एसआई शिवपाल सिंह, मनीष मीणा के साथ आरक्षक भरत शर्मा व अर्पित जायसवाल की टीम ने दिनरात मेहनत कर आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. पुलिस ने युवती के प्रेमी सुरेंद्र सिंह चौहान व उस के भाई वीरेंद्र सिंह चौहान सहित विनय तिवारी, राजकुमार,  करण, मनोज को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया. Crime News

MP News : सरकारी नौकरी की चाहत में पत्नी ने प्रेमी संग मिलकर ले ली पति की जान

MP News : सोशल मीडिया कुछ नासमझ औरतों के लिए जहर की तरह है. मनीषा भी उन्हीं में थी. फेसबुक पर उस ने खेमचंद उर्फ राज से जो दोस्ती की, उस ने उस का घर तो उजाड़ ही दिया. साथ ही…

अरविंद राजपूत का घर मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर के घमापुर इलाके में सरकारी कुआं के पास था. 49 साल का अरविंद राजपूत जबलपुर नगर निगम के आधारताल जोन में बतौर डाक रनर काम करता था. उस के परिवार में 30 साल की पत्नी मनीषा, 7 साल की बेटी और 5 साल का एक बेटा था. करीब 10 साल पहले जब अरविंद के मातापिता जीवित थे तो घर की माली हालत अच्छी नहीं थी. घर अरविंद के बड़े भाई की कमाई से चलता था. जब बड़े भाई की शादी हो गई तो वह अपनी पत्नी के साथ अलग रहने लगा. हायर सेकेंडरी तक पढ़े अरविंद की उम्र बढ़ती जा रही थी, पर न ही उसे कहीं कामधंधा मिल रहा था और न ही उस की शादी हो पा रही थी.

आखिरकार 2012 में अरविंद को जबलपुर नगर निगम में दैनिक वेतन पर काम मिल गया. अरविंद जब  40 साल का था तो सन 2012 में उस की शादी मनीषा ठाकुर से हो गई, जिसे बबली भी कहते थे. उस की उम्र 21 साल थी. मनीषा की मां का बचपन में ही निधन हो गया था. उस के पिता ने उस की सगी मौसी से शादी कर ली थी, जिसे उस ने सगी बेटी की तरह पाला था. मैट्रिक तक पढ़ी मनीषा सुडौल काया और सुंदर आंखों की वजह से बहुत सुंदर लगती थी. मनीषा के 2 भाई थे. छोटा ग्वारीघाट में रेस्टोरेंट चलाता था, जबकि बड़े भाई ने दूसरी जाति की लड़की से लव मैरिज कर ली थी. वह परिवार से अलग रहता था.

अरविंद मनीषा का बहुत खयाल रखता. मनीषा चंचल और खुले विचारों वाली लड़की थी उसे सजनासंवरना और घूमनाफिरना पसंद था. लेकिन अपने से दोगुनी उम्र के पुराने खयालात के सादगी पसंद पति अरविंद के साथ वह मन मार कर दिन काट रही थी. सन 2016 में नगर निगम ने अरविंद की डाक रनर की नौकरी स्थाई कर दी. वक्त के साथ अरविंद के परिवार में एक बेटी और एक बेटा आ गया. जब तक घर में अरविंद के मातापिता जीवित रहे, मनीषा उन की देखरेख में लगी रही. अरविंद टिफिन ले कर सुबह औफिस निकल जाता तो शाम को ही लौटता. मनीषा का जब भी मन होता अपने बच्चों को ले कर अपने रिश्तेदारों और परिचितों के यहां चली जाती.

जब वह लोगों को स्मार्टफोन पर फेसबुक, यूट्यूब चलाते देखती तो उस का मन भी करता कि उस के पास भी स्मार्टफोन होता तो कितना अच्छा होता. एक दिन उस ने अरविंद से स्मार्टफोन की डिमांड रख दी. अरविंद के पास कोई सेलफोन नहीं था, न ही ऐसी हैसियत थी कि महंगा स्मार्टफोन खरीद सके. इस के बावजूद उस ने पत्नी को खुश रखने के लिए स्मार्टफोन ला कर दे दिया. अरविंद ने मनीषा को औफिस के अपनेएकदो साथियों के नंबर भी दे दिए .जब भी मनीषा को अरविंद से बात करनी होती वह उस के दोस्तों के फोन पर काल कर के पति से बात कर लेती. मनीषा की अंगुलियां पूरे दिन स्मार्टफोन पर घूमती रहतीं.

उस ने फेसबुक पर अपना एकाउंट बनाया और प्रोफाइल में अपनी खूबसूरत अदाओं वाली तसवीरें अपलोड कर दीं. उसे बहुत सारे लाइक और कमेंट्स मिलने लगे. उस ने बहुत सारे लोगों की फ्रैंड रिक्वेस्ट भी स्वीकार कर ली थी. अरविंद थकाहारा जब काम से लौटता तो घर पर मनीषा को बच्चों के साथ मोबाइल में बिजी देख कर खुश हो जाता. अरविंद 49 साल की उम्र पार कर चुका था, जबकि मनीषा अभी 29 साल की जवान औरत थी. बढ़ती उम्र, शराब की लत और नौकरी के बोझ ने अरविंद को जिस्मानी तौर पर  कमजोर बना दिया था. उसे महसूस होने लगा था कि अब वह मनीषा को शारीरिक रूप से संतुष्ट नहीं कर पा रहा है.

औरत की शारीरिक जरूरतें पति पूरी करने में सक्षम न हो तो कई बार औरत के कदम बहक जाते हैं. ऐसा ही मनीषा के साथ हुआ. मनीषा फेसबुक की दुनिया में इस तरह खो गई थी कि वह बिना जांचपड़ताल के किसी भी लड़के को अपना फ्रैंड बना लेती थी. फेसबुक पर नएनए दोस्त बनाना और सोशल मीडिया पर चैटिंग करना उस का शगल बन गया था . 2019 के मार्च महीने में एक दिन मनीषा दोपहर में घर के कामकाज से निपट कर बिस्तर पर लेटी थी. तभी उस के मोबाइल की घंटी बजी. उस ने जैसे ही हैलो बोला दूसरी तरफ से किसी लड़के की आवाज आई, ‘‘हाय मनीषा, मैं राज बोल रहां हूं.’’

‘‘कौन राज?’’ मनीषा ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मनीषा, मैं राज यादव हूं. फेसबुक पर तुम्हें फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी थी, जिसे तुम ने स्वीकार कर लिया था.’’

‘‘पर तुम्हें मेरा मोबाइल नंबर किस ने दिया?’’ मनीषा ने हैरानी से पूछा .

‘‘हम जिसे दिल से चाहते हैं, उस का मोबाइल नंबर तो क्या उस की पूरी खोजखबर रखते हैं.’’ राज ने दीवानगी के साथ जवाब दिया. मनीषा को किसी अपरिचित लड़के का इस तरह बात करना अच्छा नहीं लगा. उस ने थोड़ी सी बात कर के फोन काट दिया. फिर उसे याद आया कि कुछ दिन पहले उस ने राज यादव नाम के लड़के की फ्रैंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की थी. उसे यह उम्मीद कतई नहीं थी कि कोई फेसबुक फ्रैंड उसे फोन मिला कर इस तरह बातचीत करेगा. मनीषा की फेसबुक की यह दोस्ती धीरेधीरे मनोरंजन का साधन बन गई. पति अरविंद दिन भर औफिस में रहता और मनीषा का समय सोशल मीडिया पर बीतता. उस ने उस दिन भले ही फोन डिसकनेक्ट कर के राज से तौबा कर ली थी, लेकिन वह हाथ धो कर उस के पीछे पड़ गया था.

वह रोज ही किसी न किसी बहाने उसे फोन करने लगा. वह मनीषा के फेसबुक मैसेंजर पर कभी प्यारभरी शेरोशायरी भेजता तो कभी उस की पोस्ट पर कमेंट कर के प्यार जताता. धीरेधीरे मनीषा को भी राज से फोन पर बातचीत करने में मजा आने लगा. फोन पर शुरू हुआ बातचीत का यह सिलसिला कब प्यार में बदल गया, मनीषा को पता ही नहीं चला. अब वह रोज राज के फोन का इंतजार करती. कभी राज फोन करना भूल जाता तो मनीषा उसे काल कर के उस से प्यार भरी बातें करती. कभीकभी दोनों वीडियो काल के जरिए भी एकदूजे का दीदार करके मस्तीभरी बातें कर लेते थे.

राज और मनीषा का प्यार परवान चढ़ा तो एक दिन वह मनीषा से मिलने जबलपुर आ गया. उस समय अरविंद काम पर गया हुआ था और उस के दोनों बच्चे अरविंद के बड़े भाई के घर गए हुए थे. मनीषा ने 25 साल के गोरेचिट्टे गबरू जवान राज को देखा तो पलभर के लिए तो वह सपनों की दुनिया में खो गई. राज ने बताया कि उस का नाम खेमचंद यादव है, लेकिन उसे घर वाले राज कहते हैं. राज ने मनीषा से फेसबुक मैसेंजर और वीडियो काल के जरिए तो कई बार बातें की थी, लेकिन खूबसूरत मनीषा को पहली बार नजरों के सामने देखा तो अपना आपा खो बैठा.

मनीषा कब से उस से मिलने के सपने संजोए थी, उसे मौका मिला तो उस ने भी राज का पूरे मन से साथ दिया. शाम को जब अरविंद काम से घर लौटा तो घर में नए मेहमान को देख मनीषा से पूछा, ‘‘अरे मनीषा, मेहमान कहां से आए हैं?’’

मनीषा ने खेमचंद का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘ये मेरी बचपन की सहेली के जीजा हैं. नाम है राज यादव. यूपी के बांदा से किसी काम के सिलसिले में जबलपुर आए हैं.’’ अरविंद ने गर्मजोशी से राज का स्वागत किया और उस की खूब मेहमाननवाजी भी की. दूसरे दिन अरविंद उसे भेड़ाघाट घुमाने ले गया और वहां का धुआंधार जलप्रपात दिखाया. शाम को बैठ कर दोनों ने जाम छलकाए. राज यादव महीने दो महीने में काम का बहाना बना कर मनीषा से मिलने जबलपुर आने लगा. जब वह जबलपुर आता तो अरविंद के साथ  बैठ कर खूब शराब पीता और मनीषा के बच्चों पर पैसे खर्च करता.

लेकिन मनीषा और राज की प्रेम कहानी समाज की नजरों से ज्यादा दिनों तक न छिप सकी. जब अरविंद के बड़े भाई को इस बात का पता चला तो उस ने राज के इस तरह मनीषा से मिलनेजुलने पर आपत्ति उठाई. अरविंद के मन में भी शक का कीड़ा कुलबुलाता था, लेकिन वह यह सोच कर तसल्ली कर लेता कि मनीषा उसे और उस के बच्चों को कितना प्यार करती है. 22 जनवरी, 2021 सुबह के 9 बजे थे. कैंट पुलिस थाने में फोन द्वारा सूचना मिली कि सदर इलाके के मुर्गी मैदान पर कोई युवक नशे में बेसुध पड़ा है. कैंट थाने में इस तरह की सूचनाएं आए दिन मिलती रहती थीं, इसलिए ड्यूटी पर मौजूद एसआई कन्हैया चतुर्वेदी अपने एक साथी पुलिसकर्मी के साथ मुर्गी मैदान की ओर रवाना हो गए.

वह मुर्गी मैदान पहुंचे तो उन्होंने देखा कि 24-25 साल का एक युवक औंधे मुंह जमीन पर पड़ा है. पुलिस टीम ने पास जा कर जैसे ही उसे सीधा किया तो युवक का चेहरा और सिर खून से सना हुआ है. वह मर चुका था. स्थिति को समझ कर कन्हैया चतुर्वेदी ने तत्काल टीआई विजय तिवारी समेत पुलिस के आला अधिकारियों को सूचना दी और आसपास के लोगों से पूछताछ करने लगे. कुछ ही देर में फोरैंसिक टीम के साथ टीआई विजय तिवारी घटनास्थल पहुंच गए. घटनास्थल पर शराब की बोतल और पानी के पाउच के साथ चखना के खाली पैक पड़े थे. डैडबौडी के पास ही एक बड़ा सा पत्थर पड़ा मिला, जिस पर खून के निशान थे. शायद इसी पत्थर से सिर पर वार कर युवक की हत्या की गई थी.

घटनास्थल पर अब तक लोगों की काफी भीड़ जमा थी, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका. एसआई कन्हैया चतुर्वेदी ने मृतक के कपड़ों की तलाशी ली तो उन्हें मृतक की पैंट की जेब में नगर निगम की डाकबुक मिली. डाकबुक को उलटपलट कर देखा गया तो परची पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. परची में लिखे मोबाइल नंबर पर टीआई विजय तिवारी ने फोन लगाया तो फोन रिसीव करने वाले ने अपना नाम मलखान और पता ग्वारघाट बताया. टीआई तिवारी ने जब उसे बताया कि मुर्गी मैदान पर एक डैडबौडी मिली है. उसी के कपड़ों की जांच में नगर निगम की डाकबुक और यह मोबाइल नंबर मिला है.

तब मलखान ने पुलिस को बताया कि उस का जीजा अरविंद राजपूत नगर निगम में डाक लाने ले जाने का काम करता था. मलखान ने जब मनीषा को फोन लगा कर बातचीत की तो उस ने बताया कि वह कल अरविंद को बता कर बच्चों के साथ एक गमी के कार्यक्रम में वेहिकल फैक्ट्री इलाके में आई है. मलखान ने मनीषा से अरविंद के साथ किसी अनहोनी की आशंका व्यक्त की तो वह फोन पर रोने लगी. मलखान ने उसे समझाते हुए उस के साथ तत्काल मुर्गी मैदान चलने को कहा. मलखान कुछ ही देर में मनीषा और एक रिश्तेदार को आटो में बिठा कर सदर के मुर्गी मैदान पहुंच गया. वहां पहुंच कर मनीषा ने पति अरविंद को पहचान लिया.

लाश की पहचान होने पर पुलिस टीम ने शव पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दिया और आगे की काररवाई में जुट गई. स्थिति के मद्देनजर पुलिस मनीषा के बयान नहीं ले सकी. घटना को बीते 3 दिन हो चुके थे. इसी दौरान मनीषा ने एक बार घर पर आत्महत्या करने का प्रयास किया, जिस की जानकारी कैंट पुलिस को मिल गई थी. पुलिस सहानुभूति की वजह से उस के बयान नहीं ले पा रही थी. एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा के निर्देश पर नगर की सीएसपी भावना मरावी ने हत्या का राज जानने के लिए कैंट थाना पुलिस की एक टीम तैयार की. कैंट पुलिस थाना के टीआई विजय तिवारी ने जब मनीषा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो 2 मोबाइल नंबर संदिग्ध पाए गए.

इन मोबाइल नंबरों की लोकेशन सर्च करने पर पुलिस को एक नंबर आकाश विनोदिया, सिविल लाइंस, जबलपुर का और दूसरा नंबर खेमचंद यादव, बांदा, उत्तर प्रदेश का था. कैंट पुलिस ने सब से पहले राज यादव के मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया तो घटना वाले दिन 21 जनवरी को उस की लोकेशन सुबह के 6 बजे से रात के 9 बजे तक जबलपुर की मिली. पुलिस की टीम जब खेमचंद की खोजबीन के लिए बांदा पहुंची, तब तक वह अपने गांव बेनीपुर पहुंच चुका था. पुलिस ने उस की लोकेशन ट्रेस कर उस के घर पर मुंहअंधेरे दबिश तो यह पिछले दरवाजे से भाग निकला. आसपास के इलाकों में दिन भर उस की तलाश की गई, मगर राज नहीं मिला. उस के पिता ने बताया कि वह अपने बड़े भाई के पास सूरत जा सकता है.

पिता को राज और मनीषा के प्रेम संबंधों की पूरी जानकारी थी. पता चला कि मनीषा जून, 2020 में आंखों का इलाज करवाने के बहाने चित्रकूट आई थी और दोनों 5 दिनों तक एक होटल में रुके थे. तब उस ने मनीषा को समझाया था कि अपना वैवाहिक जीवन बरबाद न करे. मगर वह राज के प्यार में पागल हो गई थी. राज अपना मोबाइल घर पर छोड़ गया था, ऐसे में राज को खोजना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था. पुलिस उस का मोबाइल जब्त कर खाली हाथ लौट आई.

कैंट पुलिस पर जब पुलिस अधिकारियों का दबाव पड़ा तो आकाश विनोदिया की मोबाइल लोकेशन पर पहुंच गई. जबलपुर के सिविल लाइंस जा कर पता चला वह नंबर एक रिटायर्ड मैडिकल नर्स का है जो काफी बूढ़ी हो गई थीं. उन्होंने खुद को इलाके की भजन मंडली का अध्यक्ष बताते हुए मनीषा और अरविंद से किसी तरह की जानपहचान होने से इनकार किया. उन्होंने यह भी बताया कि यह सिमकार्ड उस के भतीजे आकाश ने ला कर दिया था, लेकिन इस सिमकार्ड का उपयोग आकाश कभी नहीं करता. पुलिस की समझ नहीं आ रहा था कि आखिर अरविंद के मर्डर से नर्स का क्या कनेक्शन हो सकता है. पुलिस ने जब उन से पूछा, ‘‘आप के मोबाइल से कोई और शख्स बात तो नहीं करता?’’

उन्होंने बताया, ‘‘हां उन की भजन मंडली में ढोलक बजाने वाला विक्की पंडा अकसर उन के फोन से बात करता है. कभीकभी तो वह घंटे भर के लिए मोबाइल मांग कर ले जाता है.’’

पुलिस ने जब विक्की पंडा के बारे में पता किया तो शाम के समय विक्की पंडा देवी मंदिर की आरती के कार्यक्रम में मिल गया. उस ने मनीषा को अपनी ममेरी बहन बताया. पुलिस को अब दोनों पर अरविंद की हत्या का पूरा यकीन हो गया. पुलिस टीम ने विक्की पंडा और मनीषा को थाने बुला कर पूछताछ की तो पहले तो वे अनजान बने रहे. जब पुलिस टीम ने उन से अलगअलग कमरे में ले जा कर सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने सारा सच उगल दिया. मनीषा और विक्की के बताए अनुसार अरविंद की हत्या छतरपुर जिले के खेमचंद यादव उर्फ राज ने की थी.

घटना वाले दिन शाम को अरविंद को औफिस में फोन कर के मनीषा ने बुलाया था और विक्की पंडा हत्या के समय राज के साथ था. दोनों से पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह मानवीय रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली थी. खेमचंद गुड़गांव की एक कंपनी में नौकरी करता था. मनीषा की बुआ का लड़का प्रदीप ठाकुर उर्फ विक्की पंडा सिविल लाइंस के उपहार अपार्टमेंट में रहता था. वह अपने आप को देवी का भक्त बताता था. धार्मिक कर्मकांड और तंत्रमंत्र का झांसा दे कर लोगों से पैसे ऐंठ कर वह घर का खर्च चलाता था. वह स्थानीय भजन मंडली में ढोलक बजाता था.

विक्की पंडा अपनी ममेरी बहन मनीषा से 20 हजार रुपए और जीजा अरविंद से 13 हजार रुपए उधार ले चुका था, मगर लौटाने का नाम ही नहीं ले रहा था. जब भी अरविंद और मनीषा उस से पैसे वापस मांगते, वह अपनी तंगहाली का बहाना बना देता था. मनीषा और खेमचंद के नाजायज संबंधों की भनक विक्की को थी. एक बार तो उस ने मनीषा को चेतावनी भी दी थी कि यदि उस से पैसे मांगे तो वह उस के और राज के संबंधों की पूरी सच्चाई जीजा को बता देगा. इस डर से मनीषा उस से पैसा मांगने में संकोच करने लगी थी. अब मनीषा राज के साथ विक्की पंडा से मिलनेजुलने लगी थी. मनीषा और राज विक्की से शादी करने की बात बताते रहते थे. एक दिन विक्की पंडा ने मंदिर में पूरे विधिविधान से राज से मनीषा की मांग में सिंदूर भरवा कर शादी करा दी .

मनीषा और राज प्रेम में इस कदर अंधे हो चुके थे कि देह सुख के लिए किसी भी हद तक जाने तैयार थे. कभीकभी उन के मन में विचार आता कि दोनों घर से भाग जाएं, लेकिन मनीषा सोचती कि राज बेरोजगार है. आखिर उसे कितने दिनों तक बैठा कर खिलाएगा. मनीषा को अरविंद से ज्यादा अपने बच्चों की भी चिंता थी. वह जानती थी कि यदि वह बच्चों को छोड़ कर राज के साथ भाग गई तो अरविंद बच्चों का खयाल नहीं रख पाएगा और उस के बच्चे अनाथ हो जाएंगे. मनीषा के मन में कई बार अरविंद की हत्या करने का विचार आता, मगर अगले ही पल वह डर जाती.

आखिरकार मनीषा इस निर्णय पर पहुंच गई कि वह राज की मदद से अरविंद को रास्ते से हटा देगी. उस का सोचना था कि पति की मौत के बाद उस की सरकारी नौकरी उसे अनुकंपा नियुक्ति के रूप में मिल जाएगी और वह राज के संग अपनी जिंदगी खुशी से बिता सकेगी. बातचीत के बाद पहले अरविंद की हत्या के लिए उन्होंने पूजा के प्रसाद में जहर मिलाने की योजना बनाई, पर विक्की पंडा ने यह कह कर इस योजना को निरस्त कर दिया कि प्रसाद और भी लोग मांग सकते हैं. बाद में अरविंद को शराब पिला कर हत्या करने की योजना बनाई गई.

प्रदीप उर्फ विक्की पंडा अरविंद की हत्या की योजना में इसलिए शामिल हो गया क्योंकि वह चाहता था कि मनीषा और अरविंद से लिए गए 33 हजार रुपए के कर्ज से उसे मुक्ति मिल जाएगी. योजना के मुताबिक मनीषा ने राज को पूरी योजना समझाई और उस का बांदा से जबलपुर आने जाने का रिजर्वेशन करवा दिया. 21 जनवरी, 2021 की सुबह राज जबलपुर आ गया. दोपहर में टैगोर गार्डन में मनीषा राज और विक्की पंडा ने काफी देर बैठ कर अरविंद की हत्या की योजना को अंतिम रूप दिया. तय हुआ कि पहले अरविंद को शराब पिलाई जाए और फिर उस की किसी तरह हत्या कर दी जाए.

योजना बनने के बाद विक्की अपने घर चला गया. जबकि मनीषा और राज आटो रिक्शा ले कर रेलवे स्टेशन आ गए. कुछ दिनों पहले अरविंद ने जबलपुर की एक मोबाइल शौप से किस्तों में राज को एक महंगा मोबाइल फोन दिलवाया था, जिस की किस्त वह हर महीने आ कर दे जाता था. रेलवे स्टेशन से ही मनीषा ने अरविंद के औफिस में फोन कर के कहा कि राज मोबाइल की किस्त देने जबलपुर आया है. वह रात की ट्रेन से निकल जाएगा, उस से जबलपुर स्टेशन जा कर मिल लो. जब अरविंद को राज के जबलपुर आने की खबर मिली, तब वह अधारताल जोनल औफिस में था. उस ने औफिस जा कर जल्दी से डाक वितरण का काम निपटाया और 5 बजे रेलवे स्टेशन पहुंच गया.

रेलवे स्टेशन पर उस की मुलाकात राज से हो गई. राज ने उसे बताया कि वह रात 9 बजे चित्रकूट एक्सप्रैस से वापस चला जाएगा. तब राज ने अरविंद के सामने प्रस्ताव रखा कि कहीं बैठ कर शराब पीते हैं फिर खाना खाने के बाद उसे स्टेशन छोड़ कर घर चले जाना. शराब पीने की बात पर अरविंद राजी हो गया. दोनों पैदल ही रेलवे स्टेशन से सदर की ओर आ गए. तब तक अंधेरा होने लगा था. एक वाइन शौप से राज ने शराब की बोतल खरीदी. पास की दुकान से पानी की बोतल, डिस्पोजल गिलास, चखना के पाऊच ले कर दोनों पैट्रोल पंप के पीछे मुर्गी मैदान में सुनसान जगह पर शराब पीने बैठ गए. तभी विक्की पंडा भी पहुंच गया.

सीधेसादे अरविंद को यह भान नहीं था कि जिस नौकरी को पाने के लिए उस ने जी तोड़ मेहनत की थी और कितने ही साल बेरोजगारी में काटे थे, वही नौकरी उस की जान की दुश्मन बन जाएगी. राज और विक्की चालाकी से इस तरह पैग बना रहे थे कि अरविंद ज्यादा से ज्यादा पी सके. शराब पीतेपीते लगभग साढ़े 7 का समय हो गया. इस बीच अरविंद का नशा पूरे शबाब पर पहुंच गया था, तभी राज ने पास में पड़े एक बड़े से पत्थर से अरविंद के सिर पर हमला कर दिया. उस के सिर से खून की धारा बहने लगी और थोड़ी देर तड़फड़ाने के बाद वह ढेर हो गया. जब दोनों को तसल्ली हो गई कि अरविंद मर चुका है तो राज और विक्की वहां से भाग निकले.

राज जल्दी से रेलवे स्टेशन आ गया. प्लेटफार्म पर चित्रकूट एक्सप्रैस लग चुकी थी. वह ट्रेन में सवार हो गया. रात 9 बजे ट्रेन जबलपुर स्टेशन से रवाना हो गई. 29 जनवरी, 2021 को जबलपुर के एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर अरविंद की हत्या का खुलासा कर दिया. प्रैस कौन्फ्रैंस में बताया गया कि अरविंद की हत्या मनीषा के इशारे पर विक्की की मदद से राज यादव ने की थी. एसपी ने अरविंद की हत्या के मुख्य आरोपी राज यादव को जल्द गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया. इस के बाद कैंट थाना पुलिस ने मनीषा और विक्की पंडा को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

मनीषा और विक्की को जेल भेजने के बाद जबलपुर पुलिस राज की तलाश में जुट गई. राज के घर से जब्त उस के मोबाइल की जांच की तो मोबाइल में मनीषा और उस के आपत्तिजनक हालत में फोटो मिले, जो उन के नाजायज संबंधों की कहानी बयां कर रहे थे. पुलिस टीम राज के पिता से सूरत में रहने वाले उस के बड़े बेटे का मोबाइल नंबर ले कर आई थी. पुलिस ने जब राज के भाई से बात की तो पहले तो उस ने राज के सूरत में न होने की जानकारी दी. जब पुलिस ने डर दिखाया तो उस ने पुलिस को भरोसा दिलाया कि वह जल्द ही राज को ले कर जबलपुर आएगा.

राज और उस का बड़ा भाई 3-4 दिनों तक पुलिस टीम को गुमराह करते रहे. इस पर जबलपुर पुलिस की टीम ने सूरत जा कर छापामारी की तो राज यादव पुलिस की गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने राज से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अरविंद की हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता दी. पुलिस ने अरविंद की हत्या के आरोपी खेमचंद यादव उर्फ राज पर आईपीसी की धारा 302,120 के तहत मामाला दर्ज कर उसे जेल भेज दिया. अरविंद और मनीषा के दोनों बच्चों को जबलपुर के ग्वारीघाट में रहने वाली उस की नानी के सुपुर्द कर दिया गया. नौकरी की चाहत में अपने पति की हत्या करने वाली मनीषा का नौकरी पाने का सपना धरा का धरा रह गया.

क्षणिक शारीरिक सुख और सोशल मीडिया की चकाचौंध में अपने मासूम बच्चों को बेसहारा करने वाली मनीषा अपने प्रेमी खेमचंद और भाई प्रदीप उर्फ विक्की पंडा के साथ जेल में है. MP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित