Film: सलमान खान का नया रूप – बजरंगी भाईजान

Film: बड़े फिल्म स्टार तो कई हैं, लेकिन सलमान खान की बात ही अलग है, जब भी उन की कोई नई फिल्म आती है तो दर्शक उत्साह से भर उठते हैं. ईद पर आई उन की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ को ले कर वह खुद भी उत्साहित हैं और उन के चाहने वाले भी…

शाहरुख खान, आमिर खान, रितिक रोशन, अजय देवगन, अक्षय कुमार और रणबीर कपूर सभी बड़े फिल्मी सितारे हैं. इन सभी की फिल्मों ने 100-100 करोड़ से ज्यादा कमाए हैं लेकिन लोगों में जो क्रेज सलमान खान का है, वह किसी का नहीं. इस मामले में बौलीवुड के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख खान भी कहीं पीछे छूट जाते हैं. इस की वजह शायद यह है कि जो इंसानियत, सहृदयता, संस्कार, मासूमियत, दूसरों की मदद करने का जज्बा, सुगठित बदन, जबरदस्त अभिनय क्षमता और खूबसूरती सलमान में है, वैसा पूरा पैकेज किसी दूसरे हीरो में नजर नहीं आता. इस से भी बड़ी बात है उन की स्क्रिप्ट की समझ, जो शायद उन्होंने अपने पिता सलीम खान से सीखी, जो फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज लेखक रहे हैं.

शायद इन्हीं खूबियों की वजह से सलमान खान की फिल्म ‘वांटेड’ के बाद लगभग सभी फिल्मों ने सौ करोड़ से ज्यादा कमाए. उन की 2009 में आई ‘वांटेड’, 2010 में आई ‘दबंग’ 2011 में आई ‘रेडी’ और ‘बौडीगार्ड’ ने बहुत मोटी कमाई की. ये सभी उन की सुपरहिट फिल्में थीं.

आजकल बड़े सितारों की फिल्मों का 100-200 और 300 करोड़ क्लब में शामिल होने का क्रेज सा बन गया है. सलमान की लगातार हिट हुई फिल्मों की बात करें तो उन की ‘एक था टाइगर’ ने 198 करोड़, ‘दबंग’ ने 145 करोड़, ‘दबंग-2’ ने 158 करोड़, ‘बौडीगार्ड’ ने 142 करोड़, ‘रेडी’ ने 120 करोड़, ‘जय हो’ ने 111 करोड़ और ‘किक’ ने 233 करोड़ रुपए कमाए. ‘किक’ उन की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म थी. इस मामले में शाहरुख खान की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ 226 करोड़ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ भी 203 करोड़ पर सिमट कर रह गई थीं. हां, आमिर खान की ‘धूम-3’ ने 280 करोड़ और ‘पीके’ ने 339 करोड़ की कमाई कर के जरूर सलमान खान से बाजी मारी.

अब जब सलमान की ‘बजरंगी भाईजान’ रिलीज हो गई है तो उन की चाहत है कि उन की यह फिल्म ‘पीके’ की तरह 300 करोड़ क्लब में शामिल हो. दर्शकों ने जिस तरह फिल्म को हाथोंहाथ लिया है, उस से यह असंभव भी नहीं लगता. निस्संदेह ‘बजरंगी भाईजान’ बहुत अच्छी फिल्म है. इस फिल्म के डाइरैक्टर कबीर खान और सलमान खान इस से पहले भी फिल्म ‘एक था टाइगर’ में साथसाथ काम करचुके हैं, जो इन दोनों की सुपरहिट फिल्म थी. वहीं से दोनों की कैमिस्ट्री भी बनी.

कबीर खान की बात करें तो डाक्युमेंट्री फिल्मों की दुनिया से व्यावसायिक सिनेमा में आए कबीर खान ‘एक था टाइगर’ के अलावा ‘काबुल एक्सप्रेस’ और ‘न्यूयार्क’ फिल्में बना चुके हैं जो हिट फिल्में थीं. कबीर खान पहले यशराज फिल्म्स के लिए काम कर रहे थे. स्वतंत्र रूप से यह उन की पहली फिल्म है, जिस के निर्माता खुद सलमान खान हैं. फिल्म का टाइटल भी कबीर खान ने ही फाइनल किया है. इस फिल्म के लेखक हैं दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक बी. विजेंद्र प्रसाद.

बी. विजेंद्र प्रसाद दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध निर्देशक राजमौली के पिता हैं, जिन की फिल्म ‘बाहुबली’ ने पिछले दिनों उत्तर और दक्षिण भारत में ही नहीं, विदेशों तक में खूब धूम मचाई. यह शायद पहली ऐसी भारतीय फिल्म थी जिस का पहले दिन का ही कलेक्शन 60 करोड़ रहा. उम्मीद है यह फिल्म 500 करोड़ तक कमाएगी. यहां यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब फिल्म की कहानी इतनी अच्छी थी तो बी. विजेंद्र प्रसाद ने इसे अपने बेटे राजमौली को क्यों नहीं दिया? दरअसल इस के पीछे भी एक कहानी है.

असल में ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी कुछ इस तरह की थी कि विजेंद्र प्रसाद चाहते थे कि यह फिल्म पहले हिंदी में बने, इस के बाद तमिल या तेलुगू में. विजेंद्र प्रसाद को लग रहा था कि इस फिल्म में हीरो की भूमिका सलमान खान ज्यादा बेहतर ढंग से निभा सकते हैं, इसलिए वह पहले सलमान खान से ही मिले. सलमान को कहानी बहुत पसंद आई क्योंकि इस में हीरो की भूमिका रियल करेक्टर जैसी थी. वह इस कहानी को मुंहमांगी कीमत पर खरीदने को तैयार हो गए, लेकिन विजेंद्र प्रसाद ने शर्त रखी कि वह इस फिल्म में सहनिर्माता बनना चाहते हैं.

यह बात सलमान को मंजूर नहीं थी, सो बात नहीं बनी. इस के बाद विजेंद्र प्रसाद राकेश रोशन से मिले. कहानी उन्हें भी पसंद आई पर बात सहनिर्माता बनने पर अटक गई. अलबत्ता राकेश रोशन कहानी की पूरी कीमत चुकाने को तैयार थे. दोनों जगह बात न बनती देख अंतत: विजेंद्र प्रसाद ने फैसला किया कि जब कहानी ही देनी है तो क्यों न सलमान खान को दी जाए जो कहानी के नायक के किरदार के हिसाब से एकदम फिट हैं. और इस तरह विजेंद्र प्रसाद की कहानी सलमान के हाथों में आ गई. चूंकि स्क्रिप्ट दमदार थी इसलिए सलमान ने इसे खुद ही बनाने का फैसला किया. इस के लिए उन्होंने बतौर डाइरैक्टर चुनाव किया कबीर खान का, जो ‘एक था टाइगर’ के समय से उन के अच्छे दोस्त बन गए थे.

फिल्म की स्टार कास्ट में उन्होंने करीना कपूर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, 6 वर्षीय बच्ची हर्षाली मल्होत्रा, नजीम खान, अलीकुली मिर्जा, दीप्ति नवल, ओम पुरी और शरत सक्सेना का चुनाव किया. फिल्म में अदनान सामी की एक कव्वाली के अलावा उन्होंने उन का स्पैशल अपीयरेंस भी रखा. वैसे फिल्म की बात करें तो इस की पूरी कहानी सलमान खान यानी (फिल्म में) पवन कुमार  चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी और हर्षाली मल्होत्रा यानी मुन्नी के ही इर्दगिर्द घूमती है. यह एक ऐसे साधारण युवक की कहानी है जो अजीब हालात में फंस कर असाधारण काम कर गुजरता है. हर्षाली मल्होत्रा यानी मुन्नी इस फिल्म का अहम किरदार है. फिल्म में यह ऐसी अनपढ़ पाकिस्तानी गूंगी बच्ची है जो भारत में अपनी मां से बिछुड़ गई है. उस के पास कोई पहचान भी नहीं है.

सलमान खान यानी पवन कुमार चतुर्वेदी मुन्नी को कैसे उस के घर वालों तक पहुंचाते हैं, यही फिल्म की कहानी है. मानवीय  रिश्तों वाली इस कहानी को इतनी खूबसूरती से गढ़ा गया है कि ज्यादातर बातें हास्यरस की चाशनी में लपेट कर कही गई हैं ताकि दर्शक बोर न हो और बात सीधे उस के दिल तक जाए. भारत-पाकिस्तान के रिश्ते राजनैतिक स्तर पर भले ही कैसे भी हों, आतंकवाद के समर्थक भले ही भारत में तबाही मचाने के मंसूबे बांधते हों, लेकिन हकीकत यह है कि आम हिंदुस्तानी या आम पाकिस्तानी के मन में किसी तरह का वैरभाव नहीं है.

वैसे भी मेहनत से रोजीरोटी का जुगाड़ करने वालों के पास बिना वजह की दुश्मनी का समय नहीं होता. न ही वे एकदूसरे का बुरा सोचते हैं. उन के बीच इंसानियत का रिश्ता हमेशा कायम रहता है. ‘बजरंगी भाईजान’ में भी इस हकीकत को समझाने का प्रयास किया गया है. इस फिल्म के टाइटल ‘बजरंगी भाईजान’ को ले कर भी खूब होहल्ला मचा. कई शहरों में इस फिल्म का प्रदर्शन रोकने के लिए अदालतों में अर्जियां दी गईं. कई जगह सुनवाई भी हुई. यह सोचेसमझे या देखे बिना ही कि फिल्म में क्या है? बात सिर्फ इतनी सी कि बजरंगी के साथ भाईजान क्यों जोड़ा गया.

जैसे बजरंगी के सारे कौपीराइट हिंदुओं के पास हों और भाईजान मुस्लिमों की प्रौपर्टी. मसलन जैसे मुट्ठी भर कुछ लोग भाईजान जैसे मीठे शब्द, जो शब्द नहीं बल्कि एक भावनात्मक रिश्ता है, को भी मजहबी रंग में रंग देना चाहते हों तो कुछ बजरंगी (हनुमानजी) नाम रखने पर भी पाबंदी लगा देना चाहते हों. यह अलग बात है कि 2-4 बजरंगी हर गांव, कस्बे और शहर में मिल जाएंगे. और भाईजान तो हिंदू और मुस्लिम दोनों में चलता है. वैसे यह सब इसलिए बेकार की बातें हैं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही निर्देश दे रखा है कि सेंसर द्वारा पास की गई फिल्म का प्रदर्शन रोकने की अपीलों पर ध्यान न दिया जाए.

बहरहाल, तमाम तरह की अफवाहों और विवादों के बावजूद बजरंगी भाईजान पूरी भव्यता से प्रदर्शित हुई और सफल भी रही. लेकिन इस फिल्म का एक भावनात्मक पहलू और भी है, जिसे शायद ही कोई जानता हो. दरअसल, सलमान खान अपने पिता का न केवल बहुत ज्यादा सम्मान करते हैं, बल्कि उन से घबराते भी हैं. उन से पूछे बिना वह कोई भी बड़ा काम नहीं करते. सर्वविदित है कि सलमान के पिता सलीम खान विख्यात पटकथा लेखक रहे हैं, जिन्होंने ‘शोले’ जैसी कालजयी फिल्म लिखी. ऐसे में पटकथा पर उन की गहरी पैठ होना स्वाभाविक ही है. इसी के मद्देनजर सलमान उन से अपनी फिल्म की पटकथाओं पर उन की राय जरूर लेते हैं. इतना ही नहीं, फिल्म बन जाने के बाद प्रीमियर से पहले उन्हें दिखाते भी हैं ताकि उन की राय जानी जा सके.

जब ‘बजरंगी भाईजान’ बन गई तो कबीर खान और सलमान ने घर पर यह फिल्म सलीम साहब को दिखाई. फिल्म देखने के बाद कबीर खान ने सलीम साहब से उन की राय पूछी तो वह बोले, ‘‘यह फिल्म सलमान के 25 साल के कैरियर की सब से बेहतरीन फिल्म है. लेकिन फिल्म के अंत में सलमान और करीना पर जो गाना फिल्माया गया है, वह अनावश्यक है. इस गाने से फिल्म का प्रभाव खत्म हो रहा है.’’ बहरहाल, सलीम साहब की राय मान कर कबीर खान और सलमान ने वह गाना हटा दिया. अब यह फिल्म 2 घंटे 40 मिनट की रह गई है.

‘बजरंगी भाईजान’ भले ही दिल्ली बेस्ड है, लेकिन इसे पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और कश्मीर में फिल्माया गया है. भारत-पाक का बौर्डर होने की वजह से सब से ज्यादा शूटिंग राजस्थान में हुई. फिल्म में सब से खूबसूरत लोकेशन कश्मीर की हैं. यहां गुलमर्ग में ऐसी जगह शूटिंग की गई है, जहां आज तक कोई फिल्मकार नहीं गया था. साथ ही पहलगाम और सोनमर्ग में भी कई सीन फिल्माए गए हैं. फिल्म के लिए अलगअलग जगह शूटिंग इसलिए की गई क्योंकि फिल्म में सलमान बच्ची को उस के घर पहुंचाने के लिए उसे ले कर जगहजगह घूमते हैं.

सलमान खान को दर्शक एक्शन हीरो के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन बजरंगी भाईजान की कहानी एकदम अलग तरह की है, दिल को छू जाने वाली. करीब 2 घंटे 40 मिनट की इस फिल्म में दर्शक आखिर तक बंधा रहता है तो इस की वजह सलमान का रियल कैरेक्टर जैसा अभिनय है. फिल्म के निर्देशक कबीर खान ने भी अपने निर्देशन से कहानी पर कुछ ऐसी पकड़ बनाए रखी है कि पूरी फिल्म में हर वर्ग के दर्शक कहानी के किरदारों से बखूबी बंधे रहते हैं. दरअसल, पाकिस्तान के छोटे से गांव की रहने वाली सईदा (हर्षाली मल्होत्रा) जन्म से गूंगी है. उस के पिता पाकिस्तानी आर्मी में हैं और मां घरेलू महिला. सईदा बोल तो कुछ नहीं सकती लेकिन समझती सब कुछ है.

गांव के कुछ लोग सईदा के अब्बूअम्मी को बताते हैं कि अगर वह दिल्ली जा कर निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करे तो उन की बच्ची की जुबान लौट सकती है. परेशानी यह है कि सईदा के अब्बू को पाक आर्मी में होने की वजह से भारत का वीजा नहीं मिल सकता. ऐसी स्थिति में सईदा की अम्मी बेटी को ले कर समझौता एक्सप्रेस से दिल्ली आती है. दरगाह पर सजदा करने के बाद जब वह समझौता एक्सप्रेस से वापस लौटती है तो जरा सी देर के लिए एक सुनसान जगह पर ट्रेन रुकती है. इसी दौरान सईदा मां को छोड़ कर ट्रेन से उतर जाती है. तभी टे्रन चल पड़ती है और सईदा वहीं खड़ी रह जाती है.

सईदा की मां सीमा पार जा कर अपनी बेटी को ढूंढने के लिए भारत आना चाहती है, पर दो देशों की सीमा आड़े आ जाती है जिस की वजह से वह भारत नहीं आ पाती. दूसरी ओर सईदा एक मालगाड़ी में सवार हो कर कुरुक्षेत्र जा पहुंचती है. कुरुक्षेत्र में हनुमान जयंती पर विशाल जुलूस निकल रहा है. इस जुलूस में बजरंगबली के पक्के भक्त पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी (सलमान खान) भी शामिल हैं. इसी जुलूस के दौरान सईदा की मुलाकात बजरंगी से होती है लेकिन गूंगी और अनपढ़ होने की वजह से वह अपने बारे में कुछ भी नहीं बता पाती.

बजरंगी सईदा को ले कर स्थानीय पुलिस स्टेशन में जाता है, लेकिन यह जान कर कि बच्ची गूंगी और अनपढ़ है, पुलिस बजरंगी को हिदायत दे कर वापस भेज देती है. बजरंगी अजीबोगरीब स्थिति में फंस जाता है. उसे न बच्ची का नाम पता होता है, न धर्म और न यह कि वह कहां की रहने वाली है. वह कई तरह के इशारों से उस की हकीकत जानने की कोशिश करता है, लेकिन बच्ची न कुछ समझ पाती है न बता पाती है. बजरंगी दिल्ली में अपने पिता के दोस्त त्रिपाठीजी (शरत सक्सेना) के घर रहता है. त्रिपाठीजी की बेटी रसिका (करीना कपूर) स्कूल टीचर है और बजरंगी से प्यार करती है.

बजरंगी त्रिपाठी और रसिका को बताता है कि वह बच्ची उसे कुरुक्षेत्र में मिली है और हिंदू है. रसिका भी इशारोंइशारों में बच्ची से उस की हकीकत पता लगाने की कोशिश करती है, पर नाकाम रहती है. इस के बाद बजरंगी बच्ची को उस के मांबाप तक पहुंचाने के मिशन में जुट जाता है. अपनी सुविधा के लिए बजरंगी और रसिका बच्ची को मुन्नी कह कर बुलाने लगते हैं. कहानी में मोड़ तब आता है जब बजरंगी और रसिका को पता चलता है कि वह बच्ची पाकिस्तानी है. बजरंगी बच्ची को उस के मांबाप तक पहुंचाने के लिए वीजा लेने की कोशिश करता है लेकिन उसे वीजा नहीं मिलता. इस के बाद वह बच्ची को बिना पासपोर्ट वीजा के ही पाकिस्तान पहुंचाने का फैसला करता है.

बजरंगी बच्ची को ले कर बौर्डर पार भी कर जाता है पर पकड़ा जाता है. यहीं पर उस की मुलाकात पाकिस्तान के लोकल टीवी चैनल के खोजी पत्रकार चांद नवाज (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) से होती है. चांद नवाज को बजरंगी में सच्चाई और इंसानियत का जज्बा नजर आता है. वह हर तरह से बजरंगी की मदद करने का फैसला करता है. अंतत: चांद नवाज की मदद से बजरंगी छिपतेछिपाते सईदा के घर तक पहुंचता है और बच्ची को उस के मांबाप को सौंप देता है. बजरंगी जब सईदा को उस के मातापिता के पास छोड़ कर जाने लगता है और वह उसे माता कह कर पुकारती है तो हर दर्शक भावुक हो जाता है. यानि अंतिम दृश्य में बच्ची बोलने लगती है.

बजरंगी की भूमिका में सलमान खान ने जबरदस्त अभिनय किया है. उन के लिए वाकई यह चैलेंजिंग कैरेक्टर था, जिसे उन्होंने अपने अभिनय से जीवंत बना दिया. एक्टिंग के मामले में नवाजुद्ीन सिद्दीकी भी पीछे नहीं हैं. कई जगह तो वह सलमान पर भी हावी रहे. वह चूंकि फिल्म में सलमान को भाईजान बोलते हैं, इसलिए फिल्म का नाम ‘बजरंगी भाईजान’ रखा गया. हर्षाली मल्होत्रा भले ही 6 साल की बच्ची रही हों पर एक्टिंग के मामले में उस ने कमाल किया है. देखा जाए तो यह पूरी फिल्म सलमान खान, हर्षाली मल्होत्रा और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के ही कंधों पर टिकी है. भारतपाक के रिश्ते भले ही चाहे जैसे भी हों लेकिन इस फिल्म के माध्यम से इंसानियत का जो मैसेज दिया गया है, वह दिल को छू लेने वाला है. Film

 

 

 

UP News: पालतू कुत्ते के लिए 2 बहनों ने किया सुसाइड

UP News: एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे देख लोग भी हैरान हैं. उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में एक कुत्ते के प्यार में 2 बहनों ने आत्महत्या करके जान दे दी. आखिर ऐसा क्या था कि कुत्ते के प्यार ने दोनों बहनों को सुसाइड करने के लिए मजबूर कर दिया था. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से.

यह दर्दनाक घटना  लखनऊ के पारा की जलालपुर दौदा खोड़ा कालोनी से सामने आई है. यहां एक महीने से पालतू कुत्ता बीमार था. इसी के चलते 22 और 24 साल की दो संगी बहनों जिया सिंह व राधा सिंह ने फिनायल पी कर जान दे दी.

राधा और जिया अपने डॉग से बहुत ही प्यार करती थीं. उस की तबियत में कोई भी सुधार न होने के कारण दोनों ने यह कदम उठा लिया. दोनों को अस्पताल ले जाया गया. जहां पर बड़ी बहन और बाद में छोटी बहन ने दम तोड़ दिया. इन दोनों बहनों ने जरमन शेफर्ड नस्ल का एक डॉग पाल रखा था. उस डॉग का नाम टोनी था और वह एक महीने से बीमार चल रहा था. दोनों बहनों के माइंड में चल रहा था टोनी अब कभी ठीक नहीं होगा. इसी वजह से दोनों डिप्रेशन में चल रही थीं.

बताया जा रहा है कि छोटी बहन की मानसिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी. बुधवार को दोनों ने फिनायल पी ली और अपनी मम्मी गुलाबो देवी को बताया. इस के बाद गुलाबो देवी ने अपने बड़े बेटे वीर सिंह को इस की सूचना दी. भाई के घर पहुंचने से पहले पड़ोसी दोनों को लक्ष्मी बाई अस्पताल ले जाया गए थे. इसी दौरान राधा ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. और जिया की अस्पताल में मौत हो गई.

पड़ोसियों ने बताया कि, राधा के पिता कैलाश सिंह रुई धुनाई का काम करते थे. वह 6 महीने से भी ज्यादा समय से बीमार हैं और घर पर बिस्तर पर पड़े रहते हैं. उन का भी इलाज चल रहा है. भाई वीर सिंह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता है. उनका एक छोटा भाई भी था, जिस की 7 साल पहले ब्रेन हेमरेज से मौत हो चुकी थी.

इन दोनों बहनों ने क्या सोच कर ऐसा कदम उठा लिया, कुछ पता नहीं चल पा रहा है. राधा और जिया अपने डॉगी टोनी को बहुत प्यार किया करती थीं. टोनी खाना न खाए तो वे दोनों भी खाना छोड़ दिया करती थीं.  पिछले दिनों से जब से कुत्ता बीमार था, तब से वे दोनों बहनें ज्यादा ही डिप्रेशन में रह रही थीं.

इंसपेक्टर सुरेश ने बताया कि कुत्ता 15 दिन से बीमार था, जिस की वजह से दोनों बहनें डिप्रेशन में थीं. उन्होंने अपनी मम्मी से अंतिम समय मे कहा था कि उन के मरने के बाद कुत्ते को घर से बाहर न निकलें. पुलिस मामले की जांच कर रही है. UP News

Hindi Stories: शौक की कोई सीमा नहीं

Hindi Stories: रवि भसीन ने जो काम शौक में शुरू किया था, धीरेधीरे वह उन का जुनून बन गया. इसी का नतीजा है कि आज उन की कोठी दुर्लभ और बेशकीमती चीजों का संग्रहालय बन गई है.

पाकिस्तान में जिला झेलम के गांव लिल्ले खिऊड़ा निवासी बख्शी गोपाल दास भसीन काले नमक की खानों के मालिक थे. इलाके के नामीगिरामी व्यक्ति. इस जगह तैयार होने वाले काले नमक की सप्लाई पूरी दुनिया में होती थी. भसीन साहब के बेटे थे बख्शी ईश्वर दास. कौशल्या देवी से शादी कर के वह 4 लड़कों व 4 लड़कियों के पिता बने. इन में से चौथे नंबर के थे 1945 में जन्मे रविकांत. विभाजन के बाद यह परिवार हिंदुस्तान आ कर शाहाबाद मारकंड में बस गया. यहां परिवार के लोगों ने प्रौपर्टी डीलिंग का व्यवसाय शुरू किया जो खूब फलाफूला. यहीं रहते रविकांत ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की.

इस बीच ईश्वर दास ने मनीमाजरा क्षेत्र में चूने के भट्ठे लगा लिए थे. उन का यह काम भी अच्छा चल निकला था. 1964 में ये लोग चंडीगढ़ शिफ्ट कर के सेक्टर-22बी में रहने लगे. जिन दिनों रविकांत कक्षा 8 में था उस के दादा बख्शी गोपालदास ने उसे मुगलकालीन चांदी के कुछ सिक्के दे कर समझाया था, ‘‘इन्हें न खर्च करना न किसी को देना, हमेशा संभाल कर रखना. इतना ही नहीं, बल्कि और भी कोई दुर्लभ वस्तु कहीं से मिले तो उसे भी सहेज कर रखना. ऐसा करने से तुम्हें बड़ा संतोष मिलेगा.’’

रवि पर जुनून की तरह जैसे यही धुन सवार होने लगी. उस के कब्जे में जो भी एंटीक चीजें आईं, उन्हें वह संभालतासहेजता रहा. धीरेधीरे यह उस का शौक बन गया. एक तरह से कारोबार का हिस्सा भी. देखतेदेखते इस तरह की चीजों के संग्रह से रवि भसीन का एक कमरा भर गया. इस संग्रह में पुरातन सिक्कों के अलावा अनेक ऐसी दुर्लभ वस्तुएं भी थीं, जिन्हें देख कर सामने वाला आश्चर्यचकित रह जाता था. 1973 में रविकांत की पूनम से शादी हो गई. पूनम को पति के शौक का पता चला तो उन्होंने भी इसे अपनी पसंद बना कर सहयोग देना शुरू कर दिया. रविकांत ने अब तक अपना अलग प्रौपर्टी डीलिंग का व्यवसाय शुरू कर लिया था. इस के साथ ही एंटीक वस्तुओं की खोज में वह यहांवहां भ्रमण भी किया करते थे.

ऐसी किसी वस्तु की जहां कहीं होने की उन्हें खबर मिलती, वह तुरंत वहां के लिए रवाना हो जाते. आने वाले कुछ ही समय में वह पूरा हिंदुस्तान तो घूम ही लिए, चीन, इंग्लैंड, अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया, हांगकांग, कुवैत व पाकिस्तान जा कर भी वहां से दुर्लभ वस्तुएं एकत्रित कर लाए. इस के बाद तो उन का घर एंटीक वस्तुओं का अजायबघर सा बन गया. इस के लिए उन्होंने भारी रकम खर्च की थी. इन दुर्लभ वस्तुओं में पाषाण प्रतिमाएं, पैडल से चलने वाला हारमोनियम, केरोसीन से चलने वाले पंखे व रूम हीटर, इटली की पुरातनकालीन पेंटिंग्स, शाही दरबार की क्रौकरी और 1×4 इंच चौड़ी व 3×4 इंच लंबाई वाली हैंडलिथो बुक जैसी पुरानी, लेकिन महत्त्वपूर्ण चीजें घर की शोभा बढ़ाने लगीं

. हैंडलिथो बुक में 56 पन्ने हैं. जिन्हें पढ़ने के लिए कछुए की हड्डी के फ्रेम में लगा मैग्नीफाइंग ग्लास इस्तेमाल किया जाता है. भसीन के पास यह ग्लास भी उपलब्ध है. इस किताब में यूरोप की महान हस्तियों का वर्णन है. सन 1838 में प्रकाशित हुई इस छोटी सी पुस्तक में जहां 6 महान शख्सियतों की जीवनी प्रकाशित की गई है, वहीं इस में हाथ से बनी 8 कलाकृतियां भी मौजूद हैं. इस पुस्तक को पीतल के फोल्डिंग कवर से ढंका गया है. महाराजा रंजीत सिंह के दौर की सिख घड़ी, 200 साल पुराना कैंपर लकड़ी का संदूक व मुगलों के जमाने का हुक्का भी भसीन के संग्रह के बेमिसाल तोहफे हैं. सिख घड़ी आज भी चलती है. इस की अलग तरह की आवाज कानों में मधुर रस घोल देती है.

रवि भसीन के पास फिएट टोपोलेनो 2 सीटर कार भी थी जो उन्होंने सन् 1994 में महाराजा ग्वालियर से खरीदी थी. अभी कुछ साल पहले यह कार उन से अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने खरीद ली थी. रवि के संग्रह में पौन इंच की ‘द इंग्लिश बिजौयस’ बुक भी है तो 1 इंच के आकार की कुरान भी है. उन के पास मुगलकाल, रजवाड़ों और अंगे्रजों के जमाने की अति दुर्लभ वस्तुएं हैं. धातु व कांच के बने बर्तन, शोपीस, ऐतिहासिक ग्रंथ, किताबें, हस्तलिखित धार्मिक पुस्तकें, पुरातनकाल के हथियार, पेंटिंग्स व फर्नीचर वगैरह भी उन के संग्रह में शामिल हैं.

भसीन के पास हाथ से सुनहरी अक्षरों में उर्दू में लिखी खास किस्म के पन्नों वाली ऐसी अद्भुत किताब भी है जिस के बारे में उन का दावा है कि यह कुर्बानी के बकरे की आंतों से निर्मित पन्नों पर सोने की स्याही से लिखी गई है. इस के अलावा उन के पास महाराजा नाभा की सवा 200 साल पुरानी व 36 फीट लंबी जन्मपत्रिका है जिस की बेजोड़ कारीगरी देखते ही बनती है. एक सदी पुराना हस्तलिखित शिवपुराण व 200 साल पहले लिखा गया 7 पन्नों का हस्तलिखित महासार भी उन के संग्रह के नायाब तोहफे हैं. इस की पृष्ठभूमि के बारे में भसीन बताते हैं कि किसी जानवर की हड्डी को घिस कर बनाए गए पत्थरनुमा पन्नों पर गोमूत्र व फूलों से बनी स्याही से लिखा गया है, यह महाभारत सार.

मुगल बादशाहत के दौरान जब किसी को मृत्युदंड दिया जाता था तो अपना हुक्म सुनाते वक्त बादशाह खास किस्म की अंगूठी पहन कर हुक्म सुनाया करता था. अपने हुक्मनामे पर वह इसी अंगूठी को मोहर के रूप में इस्तेमाल कर के ठप्पा लगाता था. यह खास अंगूठी भी रवि भसीन के पास मौजूद है. भसीन के यहां अंगे्रजों के जमाने की बड़ीबड़ी दीवार घडि़यों का तो अच्छाखास संग्रह है. इन में कुकु क्लौक व ग्रैंडफादर क्लौक बहुत मशहूर घडि़यां हैं. ग्रैंडफादर क्लौक वजन से चलती है, जो 7 दिन बाद बंद हो जाती है. इसे फिर से चालू करने के लिए वजन ऊपर खिसकाने पड़ते हैं. पहाड़ी राजा पीतल की जिन बड़ीबड़ी दूरबीनों का इस्तेमाल किया करते थे, वे भी अच्छीखासी मात्रा में रवि भसीन के एंटीक कलैक्शन में शामिल हैं.

इन के अलावा राजाओं द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले पीतल के हमाम, बाएं हाथ का विशाल शंख, गऊमुखी शंख व अंग्रेजों के जमाने के मैडल ही नहीं, बकरे की आंतों की सुराही भी भसीन के यहां आने वालों को सहज ही आकर्षित कर लेती है. अंगे्रजों के जमाने में अंबाला जेल में कैदियों पर चमड़े के जो कोड़े बरसाए जाते थे, उन में से 2 कोड़े व अंगे्रजों के जमाने के अनेक टेलीफोन सेट्स के अलावा रवि भसीन के पास पुरातनकाल के ऐसे वुडन बौक्स भी हैं जो मुस्काफुर (कैंफर) की लकड़ी के बने हैं. आज भी इन के करीब बैठो तो इन में से निकलती भीनीभीनी सुगंध मनमस्तिष्क छा कर मंत्रमुग्ध कर देती है.

भसीन के पास पुरातन तलवारों का भी जखीरा है तो आदिकाल से 20वीं सदी तक के सिक्कों का विशाल संग्रह भी है. सिक्कों का पूरा इतिहास भी रवि भसीन को मालूम है. वह बताते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता के दौरान जो सिक्के मिले थे और जिन का जिक्र वैदिक ग्रंथों में है, उस से यह बात सामने आई है कि मौखरी, प्रतिहार, कलेचेरी, चालुक्य, चोल, राष्ट्रकूट, पांड्या, गुप्त, मौर्य, कौसल व मुगल शासकों ने अपनी सुविधा, प्रतिष्ठा व संपन्नता के अनुसार सिक्कों में सभी तरह की धातुओं का प्रयोग किया था. इतिहास साक्षी है कि कुषाण शासकों ने सर्वथा पहली दफा यूनानी शैली में सोने का ढला हुआ सिक्का प्रचलित किया. मौर्य शासकों ने पहले टुकड़ों को जोड़ कर, फिर ठप्पे वाले और फिर ढलाई के सिक्के जारी किए.

यह वंश जब तहसनहस हुआ तो अलगअलग तरीकों से अस्तित्व में आईं रियासतों के शासकों ने अपने काल की मुद्राएं भी अलगअलग तरीकों से निकालीं. यहीं से सिक्कों पर राजा के नाम के साथ उस का फोटो उकेरने का प्रचलन शुरू हुआ. कुछ शासकों ने अपने सिक्कों पर धार्मिक चित्र भी उकेरे. 12वीं सदी में तोमरवंश का विनाश करने के बाद मोहम्मद गोरी ने अपना अलग सिक्का जारी किया. मुगल शासन के 1206 ई. से 1526 ई. के कार्यकाल में भी हर शासक ने अपना अलग सिक्का चलाया. इल्तुतमिश ने सिक्कों पर कलमा खुदवाना शुरू किया. फिर टकसाल का नाम व सिक्का बनाने की तिथि अंकित करना शुरू की.

बलवन ने शासन संभालते ही सिक्कों पर से हर तरह के हिंदू चिह्न हटवा दिए. अलाउद्दीन खिलजी का शासन आया तो उस ने सिकंदर द्वितीय की उपाधि सिक्कों पर खुदवा दी. उस वक्त तक मिश्रित धातुओं के सिक्कों का दौर था. शेरशाह सूरी ने यह चलन बंद करवा कर शुद्ध चांदी व तांबे के सिक्के प्रचलित करवाए. पानीपत की ऐतिहासिक लड़ाई में इब्राहीम लोदी को पराजित करने के बाद बाबर ने हिंदुस्तान में मुगल साम्राज्य की नींव रखते ही स्वर्णमुद्रा चलाना आरंभ की और इसे नाम दिया. अशर्फी सम्राट अकबर का दौर आने पर उन्होंने मेहराबी मोहरें चलाईं. जहांगीर ने हिंदू चक्रचिह्न वाला सिक्का चलाया था, मुगलों ने ‘अल्लाह हू अकबर’ भी लिखवाया. उल्लेखनीय है कि जहांगीर काल में नूरजहां के नाम से भी सिक्का चला था.

ब्रिटिश काल में पहले अशर्फी पर और फिर सिक्कों पर ब्रिटिश चिह्न उभारे जाने लगे. महारानी विक्टोरिया के नाम से 1940 ई. में सोनेचांदी के सिक्के प्रचलन में आए. 1876 में भी सिक्कों पर तिथियां उकेरी गई थीं. इस के बाद 1906 में धातु गिलट से सिक्के बनाए जाने लगे. फिर तो पाई, धेला, आना, दुअन्नी, चवन्नी और अठन्नी वगैरह भी अस्तित्व में आ गए. इतनी सारी मुद्राओं का चलन जार्ज सप्तम के कार्यकाल में आम लोगों की सुविधा के लिए किया गया था.

बकौल रवि भसीन उन के पास इस तरह के अनेक सिक्के मौजूद हैं. इतना ही नहीं, अकबर के शासनकाल वाला तांबे का 40 ग्राम के वजन का दमड़ा और महाराजा रंजीत सिंह द्वारा जारी प्रथम सिख सिक्का जिस पर कुछ शब्द अंकित थे, के अलावा उन के संग्रह में तुगलक, अलाउद्दीन खिलजी, बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह, बाबर, अकबर, जहांगीर व शाहजहां के शासनकाल के निहायत ही दुर्लभ सिक्के भी सुरक्षित हैं. इस के अलावा रवि भसीन के पास ईरान का 27 ग्राम का चांदी का सिक्का, पूर्वी अफ्रीका का 1 रुपए का सिक्का व फ्रांस में सन् 1901 व 1906 में जारी हुए सोने के सिक्के भी मौजूद हैं.

अपने इस शौक को समृद्ध बनाने के लिए रवि भसीन ने निरंतर 40 सालों तक बहुत भागदौड़ की, देशदुनिया की खाक छानी, हालांकि इस दौरान उन की सेहत उन्हें धोखा देने लगी थी. वह कई तरह की बीमारियों से घिरने लगे थे. 1985 में उन्हें शुगर की समस्या ने परेशान करना शुरू कर दिया था. 1997 आतेआते उन की किडनियां जवाब देने लगीं. 1999 में उन की दोनों किडनियां फेल होने की रिपोर्ट आ गई. तब रवि की शरीकेहयात पूनम भसीन ने उन्हें अपनी 1 किडनी दे कर उन की जान बचाई. भसीन दंपत्ति का एक ही बेटा है, करन. वह पिछले 5 सालों से ब्रिस्बेन की 1 हास्पिटैलिटी फर्म में अकाउंट्स मैनेजर है. भसीन दंपति पंचकूला के सेक्टर-11बी की अपनी कोठी में रह रहे हैं.

पतिपत्नी दोनों अपने इसी संग्रह को समर्पित हैं. इस के चलते उन की कोठी का नजारा देखते ही बनता है. उन के घर का हर कमरा, फर्श, दीवार यहां तक कि छत और रसोईघर भी उन के इस बेशकीमती खजाने से अटे पड़े हैं. कोठी के मुख्यद्वार के बाहर बागीची में रौक गार्डन निर्माता पदमश्री नेकचंद द्वारा रवि भसीन को भेंट की गई उन की 1 कृति मौजूद है. यहीं 300 साल पुरानी पीतल की बैलगाड़ी रखी है. जहां एक ओर पत्थर की चौखटें व हवेली के स्तंभ जमीन पर लेटाए गए हैं, वहीं गैलरी में लकड़ी का सीलिंगफैन टंगा है. यहीं एक कोने में मिट्टी के तेल से बर्फ जमाने वाला फ्रिज रखा है. भसीन की कोठी के भीतर जा कर इंसान तिलिस्म सरीखी दुनिया से घिर जाता है. Hindi Stories

 

Crime Story: पुलिस इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या

Crime Story: इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना ने अपने भांजे राजीव सक्सेना की पढ़ाईलिखाई से ले कर हर तरह से मदद की थी. एक दिन इसी भांजे ने आस्तीन का सांप बन कर उन्हें ऐसा डंसा कि उन की दुनिया ही उजड़ गई…

मुरादाबाद के एसएसपी कार्यालय में तैनात इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना 11 अगस्त को अपनी ड्यूटी खत्म कर के शाम करीब साढ़े 4 बजे घर पहुंचे तो उन्हें मेन गेट खुला मिला. इस तरह गेट खुला देख कर वह थोड़े चौंके, क्योंकि उन की पत्नी सरोज अकसर ही गेट बंद रखती थी. उन का घर सिविल लाइंस क्षेत्र के चंद्रनगर कालोनी में था. जैसे ही वह घर में घुसे, उन्हें रूम का दरवाजा भी खुला दिखा. अंदर से टीवी चलने की तेज आवाज भी आ रही थी.

उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई. 4 साल पहले उन्हें पैरालाइसिस हुआ था, जिस की वजह से वह ठीक से चल नहीं पाते थे. इसलिए घर के अंदर से जब कोई जवाब नहीं आया तो वह ड्राइंगरूम में जा कर कुरसी पर बैठ गए और अपने जूते उतारे. उन्होंने सोचा कि सरोज शायद पास की दुकान से कोई सामान वगैरह लेने गई होगी, तभी तो टीवी भी चालू छोड़ गई है. वह कुरसी पर बैठे हुए पत्नी के लौटने का इंतजार करने लगे. कुछ देर इंतजार करने के बावजूद भी जब पत्नी नहीं आई तो वह धीरेधीरे बेड की तरफ बढ़े तो उन्हें पत्नी फर्श पर अस्तव्यस्त हालात में औंधे मुंह पड़ी दिखी.

वह इस हालत में क्यों पड़ी है, सोचते हुए उन्होंने आवाज देते हुए उसे हिलायाडुलाया. उस का बेजान शरीर देख कर उन की चीख निकल गई. वह मृत अवस्था में थीं. रामबाबू सक्सेना रोतेचीखते हएु बाहर सड़क पर आ गए और लोगों को पत्नी की हत्या हो जाने की खबर दी. उन के चिल्लाने की आवाज सुन कर आसपास के लोग उन के घर में आ गए. उन की पत्नी की हत्या की बात सुन कर लोग चौंके. उन्हें इस बात का ताज्जुब हो रहा था कि एक पुलिस अधिकारी के यहां यह वारदात करने की हिम्मत किस ने की? उन में से किसी ने पुलिस को फोन कर के इंसपेक्टर रामबाबू की पत्नी की हत्या की खबर दे दी. थाना सिविल लाइंस वहां से कुछ ही दूरी पर था, इसलिए कुछ ही देर में थानाप्रभारी ब्रह्मपाल व चौकीइंचार्ज धीरज सिंह मौके पर पहुंच गए.

मामला एक पुलिस अधिकारी की पत्नी की हत्या का था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. मामला विभाग के ही एक पुलिस इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या का था और वह इंसपेक्टर भी एसएसपी कार्यालय में तैनात थे, इसलिए 15-20 मिनट के अंदर ही डीआईजी ओमकार सिंह, एसएसपी लव कुमार, एसपी सिटी डा. रामसुरेश यादव, सीओ सिविल लाइंस महेश कुमार भी मौके पर पहुंच गए. मौके पर खोजी कुत्ता और विधि विज्ञान प्रयोगशाला के डा. अरुण कुमार को भी घटनास्थल पर बुला लिया गया, ताकि वहां से कुछ सबूत जुटाए जा सकें.

खोजी कुत्ता सरोज के शव को सूंघने के बाद घर के बाहर सड़क पर पहुंच कर भौंकने लगा. इस से पुलिस को कोई खास मदद नहीं मिली. डा. अरुण कुमार ने भी मौके का बारीकी से निरीक्षण किया. उन का काम निपट जाने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतका सरोज के बाएं हाथ की मुट्ठी में बालों का गुच्छा मिला. लाश के पास बैंगनी रंग का एक बटन भी पड़ा था. इस से साफ पता चल रहा था कि मृतका की हत्यारे से हाथापाई हुई थी. सरोज ने अपना बचाव करते हुए हत्यारे के बाल पकड़ लिए होंगे. उसी दौरान उस की शर्ट का भी बटन टूट गया होगा.

डबल बैड के गद्दे भी इस तरह से उलटेपलटे पड़े थे, जैसे किसी ने उन के नीचे कुछ ढूंढने की कोशिश की थी. बेडरूम में जो सेफ रखी थी, उस के हैंडल भी मुड़े हुए थे. उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें तोड़ने के लिए उन पर किसी भारी चीज से वार किया गया था, लेकिन हैंडल टूटे नहीं थे. हैंडल न टूटने की वजह से अलमारी में रखा कीमती सामान सुरक्षित था. इस से लग रहा था कि हत्या केवल लूटपाट के लिए ही की गई थी. ड्राइंगरूम में जो मेज रखी थी, उस पर 2 गिलास रखे थे. उन से एक गिलास में कुछ पानी भी था. किचन में गैस चूल्हे पर सौस पैन में 2 कप पानी चढ़ा हुआ था. वहीं स्लैब पर 2 खाली कप, अदरक, चायपत्ती भी रखी थी. लेकिन गैस बंद थी. वह शायद 2 कप चाय बनाने की तैयारी कर रही थी.

चाय के पानी की मात्रा और ड्राइंगरूम में रखे पानी के गिलासों से यही अनुमान लगाया गया कि हत्यारों की संख्या एक या 2 रही होगी और वह इन के परिचित होंगे, क्योंकि मृतका ने उन्हें पानी पिलाया था और उन्हीं के लिए चाय बनाने के लिए किचन में गई थी. मृतका के गले पर मिले निशानों से लग रहा था कि उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी.

मौके की छानबीन करने के बाद एसएसपी ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना से ही पूछा कि उन की किसी से कोई रंजिश वगैरह तो नहीं है.

‘‘सर मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. मैं सुबह पत्नी को घर पर ठीकठाक छोड़ कर गया था. चूंकि पैरालाइसिस की वजह से मैं अपने काम ठीक से नहीं कर पाता, इसलिए उन्होंने ही मुझे खाना खिलाया, अपने हाथ से कपड़े और जूते पहनाए. फिर मुझे सहारा दे कर औफिस के लिए एक रिक्शे पर बैठाया. मेन गेट को वह हमेशा बंद रखती थीं, जब कोई कालबेल बजाता था तो गेट खोलने से पहले वह देख लेती थीं. अपरिचित के लिए वह गेट नहीं खोलती थीं.’’ कहतेकते इंसपेक्टर रामबाबू सुबकने लगे. एसएसपी ने उन्हें ढांढस बंधाया और भरोसा दिया कि वह केस का खुलासा करने में दिनरात एक कर देंगे. जल्द ही हत्यारे भी गिरफ्तार कर लिए जाएंगे. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने सरोज सक्सेना की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

एसएसपी लव कुमार ने तुरंत शहर के तेजतर्रार अधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई. मामला उन के ही औफिस के इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या का था, इसलिए केस का जल्द से जल्द खुलासा करने के लिए उन्होंने 4 पुलिस टीमों का गठन किया. कई बिंदुओं को ध्यान में रख कर पुलिस टीमें जांच में लग गईं. मौके की जांच करने के बाद यही लग रहा था कि सरोज सक्सेना की हत्या या तो चोरी के इरादे से की गई होगी या फिर किसी दुश्मनी से. लूट की वजह इसलिए लग रही थी कि हत्यारे ने सेफ को खोलने की कोशिश की थी. किंतु इसी बात पर यहीं एक सवाल यह भी उठ रहा था कि मृतका के शरीर पर सोने की ज्वैलरी थी तो हत्यारे वह ज्वैलरी क्यों नहीं ले गए.

चंद्रनगर से सटी हुई भांतू कालोनी है. इस जाति के अनेक लोग लूट की वारदातें करते हैं. यह वारदात कहीं इन्हीं लोगों ने तो नहीं की. यह पता लगाने के लिए इंसपेक्टर ब्रह्मपाल अपनी टीम को ले कर भांतू कालोनी गए और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को उठा कर थाने ले आए. उन से सख्ती से पूछताछ की, लेकिन सरोज सक्सेना की हत्या के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. आसपास रहने वाले लोगों से मृतका के बारे में पता किया तो पता चला कि वह अकसर अपना गेट बंद कर के रखती थी. किसी से वह फालतू बात तक नहीं करती थी. पड़ोसियों ने बताया कि घटना वाले दिन उन्हें दोपहर के समय उस समय देखा गया था, जब वह दूधिए से दूध लेने आई थी.

उन के यहां जो दूधिया आता था, वह छजलैट के पास बदावली गांव का रहने वाला था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. मुखबिरों से खबर के बाद पुलिस चंद्रनगर के ही 2 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस की इस काररवाई का मोहल्ले के लोगों ने विरोध किया और सैकड़ों लोग उन दोनों युवकों को छोड़ने की मांग करने लगे. लोगों के विरोध को देखते हुए पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इस के अलावा पुलिस ने इलाके के अनेक आपराधिक लोगों से भी पूछताछ की, परंतु नतीजा वही ढाक के तीन पात. नतीजा निकलता न देख नगर पुलिस अधीक्षक डा. रामसुरेश यादव ने सीओ महेश कुमार के साथ विचारविमर्श किया. उन्होंने कहा कि मुझे पूरा शक है कि इस हत्या का कारण पारिवारिक विवाद ही हो सकता है.

एक पुलिस इंसपेक्टर की बीवी का कत्ल बाहरी व्यक्ति भला क्यों करेगा. कोई भी बदमाश यह काम करने से पहले 10 बार सोचेगा. उन्होंने कहा कि हो न हो, इस मामले में इन का कोई न कोई परिचित ही शामिल रहा होगा. पुलिस ने मृतका के फोन की काल डिटेल्स निकाल कर जांच की. लेकिन उस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. फिर पुलिस ने 11 अगस्त के उन फोन नंबरों को जांच के दायरे में लिया, जो उस दिन दोपहर ढाई बजे से शाम 4 बजे तक चंद्रनगर इलाके में सक्रिय रहे थे. पता चला कि ढाई सौ फोन उस दौरान उस इलाके में सक्रिय रहे. उन सभी नंबरों की जांच की. लेकिन कोई फायदा नहीं निकला.

पुलिस जिस बिंदु पर जांच कर रही थी, निराशा ही हाथ लग रही थी. इस तरह यह केस पुलिस टीम के लिए एक चुनौती से कम नहीं था. हालांकि यह भी मर्डर का केस था, लेकिन यह केस और केसों की तरह सामान्य नहीं था. क्योंकि यह विभाग के ही एक पुलिस अधिकारी की पत्नी का मामला था. अगले दिन पोस्टमार्टम कराने के बाद लाश रामबाबू को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि सरोज के गले, कोहनी, होंठ, बाएं हाथ की अंगुली, सीने और गाल पर जख्मों के निशान थे. मौत की वजह सांस नली का दबाव के कारण अवरुद्ध होना बताया गया. नाखूनों में स्किन के टुकड़े भी मिले, जिन्हें डीएनए जांच के लिए भेज दिया.

सरोज सक्सेना की हत्या के बाद से अंतिम संस्कार तक उन के यहां आनेजाने वाले नजदीकियों पर सीओ महेश कुमार नजर रखे हुए थे. उन का अंतिम संस्कार होने के बाद सीओ महेश कुमार ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना से बात कर के यह पता लगाने की कोशिश की कि ऐसा उन का कौन सा रिश्तेदार या नजदीकी है, जो इस दुखद घटना की जानकारी मिलने के बावजूद उन के यहां नहीं आया. तब उन्होंने बताया कि शाहबाद (रामपुर) में रहने वाली उन की बहन का बेटा राजीव सक्सेना उन के पास नहीं आया. वह केवल पोस्टमार्टम हाउस पर कुछ देर के लिए आया था. यहां तक कि वह अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुआ. जबकि वह शहर के ही मोहल्ला कटघर (मेहबुल्लागंज) में रहता है.

मोहल्ले वालों से भी पुलिस को पता चला कि राजीव सक्सेना अकसर अपने मामा रामबाबू सक्सेना के घर पर ही रहता था. यह जानकारी पुलिस के लिए खास थी कि जब राजीव सक्सेना अपने मामा के यहां रहता था तो मामी की हत्या की खबर मिलने के बाद भी वह और रिश्तेदारों की तरह उन के यहां क्यों नहीं आया. तीजे की रस्म खत्म होने के बाद पुलिस टीम 14 अगस्त, 2015 की शाम को शहर के मोहल्ला कटघर (मेहबुल्लागंज) पहुंच गई. वह वहां पर मिल गया. अपने घर पर पुलिस को देखते ही वह घबरा गया. पुलिस उसे थाने ले आई. थाने में वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष उस से सरोज सक्सेना की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने आसानी से अपना अपराध स्वीकार कर लिया. फिर उस ने अपनी मामी सरोज की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

रामबाबू सक्सेना मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के सहसवान थाने के अंतर्गत आने वाले छोटे से गांव अकौराबाद के रहने वाले थे. गांव में रहने के बाद भी उन का परिवार सुशिक्षित था. उन के 2 भाई और थे. उन में से एक दिनेश सक्सेना उत्तर प्रदेश पुलिस में इंसपेक्टर हैं, जो आजकल बरेली जिले में तैनात हैं, जबकि दूसरे भाई श्यामबाबू सक्सेना बदायूं के एक ला कालेज में प्रोफेसर हैं. रामबाबू शर्मा भी उत्तर प्रदेश पुलिस में भरती हो गए थे. बाद में प्रमोशन से वह इंसपेक्टर हो गए. इन के परिवार में पत्नी सरोज सक्सेना के अलावा 2 बेटे थे. दोनों बेटों की वह शादी कर चुके हैं. बड़ा बेटा राजीव सक्सेना छत्तीसगढ़ पावर कार्पोरेशन में इंजीनियर है.

वह पत्नी और 2 बच्चों के साथ वहीं रहता है. जबकि छोटा बेटा संदीप सक्सेना बरेली के पास मीरगंज स्थित एक शुगर मिल में इंजीनियर है. वह भी पत्नी व 2 बच्चों के साथ बरेली में रहता है.  पैरालाइसिस हो जाने के बाद से इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना के हाथपैर ठीक से काम नहीं करते थे, इसलिए उन की पत्नी सरोज उन्हें खाना खिलाने, कपड़े पहनाने, नहाने आदि में उन का सहयोग करती थीं. उन्होंने घर के काम करने के लिए नौकरानी रखने की बात कई बार पत्नी से कही, लेकिन सरोज ने मना कर दिया. रामबाबू सक्सेना ने मुरादाबाद के चंद्रनगर कालोनी में एक आलीशान मकान बना रखा था, जहां वह पत्नी के साथ रहते थे. शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने की वजह से उन की तैनाती एसएसपी कार्यालय में कर दी गई थी.

वैसे वह शहर की ही कांशीराम कालोनी में स्थित एक डाक्टर के पास फिजियोथेरैपी के लिए जाते थे, जिस से उन्हें कुछ फायदा भी हो रहा था. राजीव सक्सेना इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना का सगा भांजा था. वैसे वह शाहबाद (रामपुर) का रहने वाला था, लेकिन बचपन से ही वह मुरादाबाद में ही रहा है. यहीं से उस ने अपनी पढ़ाई की थी. उस का रामबाबू सक्सेना से ज्यादा लगाव था. इस की वजह यह थी कि उन्होंने उस की पढ़ाईलिखाई में काफी सहयोग किया था. वह अकसर उन के यहां आताजाता था. सक्षम होने की वजह से रामबाबू कभीकभी राजीव की पैसों से मदद कर दिया करते थे.

पढ़ाई पूरी करने के बाद राजीव सक्सेना एक दवा कंपनी में मैडिकल रिप्रिजेंटेटिव बन गया था. लेकिन करीब 4 साल पहले उस की यह नौकरी छूट गई. जिस से वह परेशान रहने लगा. बेरोजगार होने के बाद राजीव सक्सेना पर करीब 80 हजार रुपए कर्ज हो गया था. कहते हैं कि खाली समय में परेशान इंसान के दिमाग में ऊलजुलूल विचार आते हैं. कुछ लोग उन विचारों को अनुसरण कर लेते हैं, जिस से वही विचार उन के लिए दुखदाई बन जाते हैं. घटना के कुछ दिनों पहले राजीव ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना को अपनी परेशानी और कर्ज से लदे होने की पीड़ा बताई थी. उस ने कहा था कि जिन लोगों का कर्ज है, वह उसे परेशान और बेइज्जत करते हैं. उस ने मामा से 50 हजार रुपए मांगे और कहा कि जब नौकरी लग जाएगी तो वह उन के पैसे लौटा देगा.

तब रामबाबू सक्सेना ने उस से कहा, ‘‘राजीव मैं इस बारे में तुम्हारी मामी से बात करूंगा. अगर उस के पास पैसे होंगे तो मैं तुम्हारी मदद कर दूंगा.’’

10 अगस्त, 2015 को राजीव सक्सेना पैसे के लिए अपने मामा के घर पहुंचा. उस समय घर पर मामी सरोज ही थी. राजीव ने उन से कहा, ‘‘मामी मेरी मामा से बात हो गई है, आप मुझे 50 हजार रुपए दे दोगी तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘तेरे मामा ने मुझ से इस बारे में कोई बात नहीं बताई है. मैं उन से पूछ लूं, वह कह देंगे तो मैं पैसे दे दूंगी.’’ सरोज ने कहा.

मामी का जवाब सुन कर राजीव निराश हो कर घर लौट गया. अगले दिन 11 अगस्त, 2015 को राजीव सक्सेना फिर से अपनी मामी के घर यह सोच कर चला गया कि रात को मामी ने मामा से इस बारे में बात कर ली होगी. इस बार भी घर पर सरोज ही मिली. उस ने फिर से अपनी समस्या बताते हुए मामी से 50 हजार रुपए की डिमांड की तो सरोज ने साफ मना करते हुए कहा, ‘‘देखो राजीव, इस समय घर में पैसे नहीं हैं. तेरे मामा के इलाज पर काफी पैसे खर्च हो रहे हैं. सारी तनख्वाह ऐसे ही खर्च हो जाती है. अब उन्हें इलाज के लिए दिल्ली भी ले जाना है. वहां भी पता नहीं कितना खर्च आएगा. अब हमें अपना खर्च चलाना ही मुश्किल हो रहा है.

तुझे मालूम ही है कि तेरे मामा ने बच्चों की पढ़ाईलिखाई और उन की शादी में कितना पैसा खर्च किया था. अपाहिज हो कर भी वह अपनी ड्यूटी कर रहे हैं. जब वह ड्यूटी से वापस आएंगे तो मैं उन से बात करूंगी. जैसा वे कहेंगे कर दूंगी.’’

इस पर राजीव ने कहा कि देखो मामी तुम अलमारी खोल कर मुझे 50 हजार रुपए दे दो. मेरी मामा से बात हो गई है.

बात करतेकरते ही सरोज ने फ्रिज से बोतल निकाल कर राजीव को एक गिलास पानी पीने को दे दिया.

बाद में वह चाय बनाने के लिए किचन में चली गई. उन्होंने सौस पैन में 2 कप पानी भी रख दिया तभी राजीव पीछेपीछे किचन में पहुंच गया. उस ने बिना किसी संकोच के मामी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मामी, अगर तुम ने आज मुझे पैसे नहीं दिए तो अनर्थ हो जाएगा.’’

राजीव की इस हरकत पर सरोज गुस्से में बोलीं, ‘‘यह क्या बदतमीजी है? क्या अनर्थ हो जाएगा, तू हट्टाकट्टा है. कोई काम क्यों नहीं करता. और तेरी मजाल मेरा हाथ पकड़ने की कैसे हुई? चल पीछे हट. बड़ा आया पैसे लेने वाला.’’

उस समय राजीव के सिर पर खून सवार था. सरोज चाय छोड़ कर ड्राइंगरूम में आ गई. राजीव सरोज पर भूखे भेडि़ए की तरह टूट पड़ा. वह लातघूसों से मामी पर प्रहार करने लगा. अपना बचाव करते हुए वह राजीव को धक्का दे कर अपनी जान बचाने के लिए बैडरूम की तरफ भागी कि वहां जा कर वह बैडरूम बंद कर लेगी. राजीव नीचे गिर चुका था. वह खुद को संभालते हुए उठ खड़ा हुआ. तब सरोज ने घर में रखी टौर्च से उस पर किया था. इस के बाद सरोज तुरंत बैडरूम का दरवाजा बंद करने लगी, लेकिन बैडरूम के दरवाजे में रस्सी बंधी हुई थी, जिस से दरवाजा बंद नहीं हो सका.

इतनी देर में राजीव भी बैडरूम में पहुंच गया. वह फिर से मामी से गुत्थमगुत्था हो गया. सरोज ने अपना बचाव करते हुए राजीव के बाल पकड़ लिए और नाखूनों से उस का मुंह नोच लिया, जिस से उस के नाखूनों में स्किन के टुकड़े फंस गए थे. 53 साल की सरोज भला एक जवान युवक का सामना कैसे कर सकती थीं. अंत में राजीव उन्हें बैड पर लिटा कर उन के सीने पर बैठ गया. तब सरोज ने उस के सामने हाथ जोड़ते हुए जीवन की भीख मांगी और कहा, ‘‘राजीव मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हें पैसे दिलवा दूंगी.’’

मगर राजीव पर खून सवार था. बोला कि मामी अब बहुत देर हो चुकी है. तुझे छोड़ने का मतलब है खुद को फांसी के फंदे तक पहुंचाना. इस के बाद उस ने उन का गला दबोच लिया. वह सरोज का गला तब तक दबाए रखा जब तक उन के प्राण निकल नहीं गए. जब राजीव ने देख लिया कि वह मर चुकी है तो वह पलंग के गद्दों को उलटपलट कर सेफ की चाबियां ढूंढने लगा. जब उसे सेफ की चाबियां नहीं मिलीं तो उस ने घर में रखा टीवी चालू कर के उस की आवाज बढ़ा दी और सेफ के कुंडों को तोड़ने लगा, ताकि उस में रखी नगदी, ज्वैलरी आदि को वह ले जा सके. ऐसा करने से कुंडे मुड़ जरूर गए, लेकिन खुले नहीं.

सेफ नहीं खुली तो वह दबे पांव वहां से बाहर आ गया. फिर औटो पकड़ कर वह कटघर में अपने कमरे पर आ गया. राजीव सक्सेना से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. लोगों को जब पता चला कि राजीव ही मामी का हत्यारा है तो लोग दांतों तले अंगुली दबा गए. Crime Story

 

Hindi Crime Story: पति की मौत का फरमान

Hindi Crime Story: कामिनी गांव के ही रहने वाले मार्तंड यादव से शादी करना चाहती थी. लेकिन घर वालों ने उस की शादी पवन से कर दी. इस का परिणाम यह निकला कि निर्दोष पवन मारा गया.

गांव में भागवत कथा होने की वजह से काफी चहलपहल थी. कथा में जाने के लिए हर कोई उत्साहित था, क्योंकि वहां बहुत ही सुंदर कथा होती थी. उस के बाद हवन होता था. कामिनी भी वहां रोजाना अपनी सहेली मीना के साथ कथा सुनने जाती थी. उस दिन वह मीना के साथ कथा सुनने पहुंची तो वहां का नजारा ही कुछ और था. गांव के कई लोग पंडितों द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चारण के साथ हवन कर रहे थे. उस से जो धुआं उठ रहा था, वातावरण सुगंधित हो रहा था. कामिनी और मीना ने हाथ जोड़ कर सिर झुकाया और वहां बिछी दरी पर बैठ गईं. अचानक कामिनी की नजर दूसरी ओर बैठे एक युवक पर पड़ी, जो एकटक उसी को ताक रहा था. वह कोई और नहीं, उसी के गांव का मार्तंड यादव उर्फ पिंकू था.

कामिनी उम्र के उस दौर में पहुंच गई थी, जब लड़कों का इस तरह ताकना लड़कियों को अच्छा लगता है. यही वजह थी कि कामिनी ने भी उस की ओर उसी तरह ताका. नजरें मिलीं तो मार्तंड मुसकराया, लेकिन कामिनी ने नजरें झुका लीं. लेकिन यह भी सच है कि इस स्थिति में लड़की पहली बार भले ही नजरें झुका ले, लेकिन पलट कर जरूर देखती है. और कहते हैं कि अगर पलट कर देख लिया तो समझो मामला फिट है यानी वह भी चाहती है. कामिनी से रहा नहीं गया, उस ने नजरें उठाईं तो मार्तंड को अपनी ओर ताकते पाया. उसे उस तरह ताकते देख कामिनी को हंसी आ गई.

बस, फिर क्या था, कामिनी की इस हंसी पर मार्तंड मर मिटा. एक तो कामिनी ने पलट कर देखा था, दूसरे हंसी थी, इसलिए मार्तंड को लगा, अब मामला फिट है. अब वह सबकुछ भूल कर सिर्फ कामिनी को ही देख रहा था. कामिनी का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उसे इस तरह बारबार उधर देखते देख कर मीना ने पूछा, ‘‘क्या बात है, जो तू बारबार उधर लड़कों की ओर देख रही है?’’

कामिनी इस तरह सिटपिटा गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उसे जवाब तो देना ही था, इसलिए उस ने मीना को प्यार से झिड़कते हुए कहा, ‘‘यार, तुम भी न जाने क्याक्या सोचती रहती हो? इस तरह की जगहों पर कोई क्या देखेगा? तुम्हारे दिमाग में हमेशा खुराफात ही चलता रहता है.’’

अब तक हवन खत्म हो गया था. प्रसाद ले कर कामिनी मंडप से बाहर आई तो मार्तंड भी उस के पीछेपीछे बाहर आ गया. वह उस से थोड़ी दूरी बना कर चल रहा था. उसे अपने पीछे आते देख कामिनी का दिल तेजी से धड़कने लगा कि मीना के सामने ही वह उसे कुछ कह न दे. अब वह उसे अपना सा लग रहा था. कुछ ऐसा ही मार्तंड को भी महसूस हो रहा था. वह उस से अपने दिल की बेचैनी कहना तो चाहता था, लेकिन मीना की उपस्थिति उसे ऐसा करने से रोक रही थी. कुछ भी रहा हो, मार्तंड की नजरें उसी पर टिकी थीं. कामिनी भी बारबार पलट कर उसे देख रही थी. आखिर मीना ने उस की चोरी पकड़ ही ली. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अच्छा तो यह बात है, अब समझ में आया, यह महाशय हमारे पीछेपीछे क्यों चले आ रहे हैं?’’

‘‘क्या बकवास कर रही है? कोई पीछेपीछे आ रहा है तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि मैं उस पर मर मिटी हूं. चलो, घर चलो, नहीं तो तुम इसी तरह बकवास करती रहोगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘मैं कहां कह रही हूं कि तुम यहीं रुको. चलो न घर.’’ मीना ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा और तेजी से घर की ओर चल पड़ी.

मार्तंड कामिनी को तब तक देखता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. घर पहुंच कर कामिनी मार्तंड के खयालों में डूब गई. पता नहीं क्यों वह उस के दिल में बस गया था, जबकि वह बहुत खूबसूरत भी नहीं था. गांव में उस से भी खूबसूरत लड़के थे, जो उस पर मरते थे. लेकिन उस ने कभी किसी को भाव नहीं दिया था. दूसरी ओर मार्तंड भी कामिनी के खयालों में डूबा था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कामिनी जैसी खूबसूरत लड़की का दिल उस के लिए धड़क सकता है. इसलिए अगले दिन के इंतजार में उसे नींद नहीं आई. वह जानता था कि कामिनी रोज कथा सुनने आती है. इसलिए उस ने तय कर लिया था कि अगर अगले दिन कामिनी मिल गई तो कैसे भी वह उस से अपने दिल की बात जरूर कह देगा.

संयोग से अगले दिन कामिनी अकेली ही वहां आई. शायद उसे विश्वास था कि उस के सपनों का राजकुमार मार्तंड अवश्य वहां आएगा और उस से बात करने की कोशिश भी करेगा. उसे बात करने में कोई संकोच न हो, यही सोच कर वह मीना को साथ नहीं लाई थी. जब वह वहां पहुंची तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि मार्तंड वहीं बैठा था, जहां कामिनी एक दिन पहले बैठी थी. शायद वह उसी का इंतजार कर रहा था. मार्तंड की नजरें उस से मिलीं तो दोनों के होठों पर मुसकान तैर उठी. कामिनी आ कर उस से थोड़ी दूरी पर महिलाओं के झुंड में बैठ गई. दोनों बैठे तो भागवत कथा सुनने थे, लेकिन दोनों के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

आखिर  नहीं रहा गया तो मार्तंड ने कुछ इशरा किया. उस के बाद कामिनी उठ कर चल पड़ी. लोगों की नजरें बचा कर मार्तंड भी उस के पीछेपीछे चल पड़ा. सुरक्षित स्थान पर आ कर जरा भी संकोच किए मार्तंड ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘कामिनी, अब मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है कि मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम्हारे हावभाव से ही मुझे पता चल गया है कि तुम भी मुझे प्यार करती हो, इसलिए चलो एकांत में कहीं बैठ कर बातें करते हैं.’’

गांवों में एकांत कहां होता है, बागों या खेतों के बीच. दोनों गेहूं के खेतों के बीच बैठ कर बातें करने लगे. मार्तंड ने उस एकांत में कामिनी के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामिनी, यह जिंदगी हमारी है, इसलिए इस के बारे में सिर्फ हमें ही निर्णय लेने का हक है. तुम मुझ से मिलने के लिए रोज यहीं आना. यहां लोगों की नजर हम पर नहीं पड़ेगी. बोलो, आओगी न?’’

‘‘मैं जरूर आऊंगी मार्तंड. तुम मेरा इंतजार करना.’’ कामिनी ने कहा और अपने घर चली गई.

मनचाहा प्रेमी मिल जाने से कामिनी खुश थी. वह मार्तंड की यादों में खोई रहने लगी. अब उसे हमेशा उस समय का बेसब्री से इंतजार रहता, जब उसे मार्तंड से मिलने जाना होता. मार्तंड उस से जब भी रोमांटिक बातें करता, वह शरमा जाती. वह उस की सुंदरता की तारीफें करते हुए कहता, ‘‘तुम्हारी इसी सुंदरता ने मेरा दिल चुरा लिया है. अब मेरे इस दिल को तुम संभाल कर रखना, इसे कभी तोड़ना मत.’’

कामिनी कहती, ‘‘तुम भी कैसी बातें करते हो, मैं भला तुमरे दिल को क्यों तोड़ूंगी, अब तो वह हमारा हो चुका है.’’

‘‘मैं कितना भाग्यशाली हूं, जो तुम जैसी प्यार करने वाली मिल गई. शायद तुम मेरे भाग्य में लिखी थी.’’

ऐसी ही बातें कर के मार्तंड ने कामिनी को लुभा कर उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. दोनों मन से तो एक थे ही, तन से भी एक हो गए. उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना शिवगढ़ के निमडवल गांव में रहते थे रामेश्वर प्रसाद. वह खेती कर के अपना गुजरबसर करते थे. उन के परिवार में पत्नी रमा और 2 बेटियां तथा 2 बेटे थे. कामिनी उन के बच्चों में सब से छोटी थी. उन के बाकी बच्चों का विवाह हो चुका था. कामिनी ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसे मार्तंड से प्यार हो गया.

कामिनी ने गांव के ही सरकारी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की थी. वह खूबसूरत थी, इसलिए जवान होते ही गांव के मनचले लड़के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगे थे. उन्हीं में मार्तंड भी था. आखिर में उसी ने बाजी मार ली थी. वह प्रभाकर यादव का बेटा था. वह नल वगैरह ठीक करने का काम करता था. गांवों में इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह पातीं, इसलिए मार्तंड और कामिनी के संबंध भी उजागर हो गए. जब बेटी की करतूत का पता रामेश्वर प्रसाद को चला तो उन्होंने कामिनी की खूब पिटाई की और सख्त हिदायत दी कि अब वह मार्तंड से बिलकुल नहीं मिलेगी. उस के घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी गई.

इस हालत में रामेश्वर जल्द से जल्द कामिनी की शादी के बारे में सोचने लगा. क्योंकि उस की वजह से उन की गांव में बदनामी हो रही थी. रामेश्वर का एक रिश्तेदार हरभजन लखनऊ के थाना नगराम के गांव सेंधूमऊ में रहता था. सेंधूमऊ के बगल में ही एक गांव है बघौली. उसी गांव में ललई प्रसाद अपने परिवार के साथ रहता था. वह भी खेती करता था. उस के परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 2 बेटियां और एकलौता बेटा पवन था. उस ने दोनों बेटियों की शादी कर दी थी. बेटे की अभी शादी नहीं हुई थी. वह गोसाईगंज के दयाल इंस्टीट्यूट से बीबीए कर रहा था.

हरभजन पवन से परिचित था. वह जानता था कि पवन बहुत ही नेक और पढ़ालिखा लड़का है. इसलिए उस ने उस से कामिनी से रिश्ते की बात चलाई तो वह बात आगे बढ़ाने को राजी हो गया. उस ने अपने पिता से बात की तो उन की सहमति मिलने के बाद सभी कामिनी को देखने गए. कामिनी के घर वालों को भी पवन और उस का घरपरिवार पसंद था, इसलिए बातचीत के बाद शादी तय हो गई. कामिनी ने पवन के सामने ही विवाह से मना कर दिया था, लेकिन रामेश्वर प्रसाद ने किसी तरह बात संभाल ली थी. 20 मई, 2015 को कामिनी और पवन का विवाह धूमधाम से हो गया. कामिनी को न चाहते हुए भी पवन से विवाह करना पड़ा. जबकि वह मार्तंड से शादी करना चाहती थी.

शादी के बाद भी वह उसे एक पल के लिए नहीं भूल पा रही थी. क्योंकि उस ने उसी के साथ जिंदगी गुजारने का सपना जो देखा था. लेकिन घर वालों ने उस के सपनों को तोड़ दिया था. पग फेरा में कामिनी मायके आई तो मार्तंड से मिली. तब वह उस से गले मिल कर बिलखबिलख कर रोई. मार्तंड की भी आंखें नम हो गईं. कामिनी की हालत देख कर वह बेचैन हो उठा. उस ने कामिनी को ढांढ़स बंधा कर कहा, ‘‘कामिनी हम कभी अलग नहीं होंगे, कोई भी हमें जुदा नहीं कर सकता. हम हमेशा इसी तरह मिलते रहेंगे.’’

इस के बाद मार्तंड ने एक सस्ता सा मोबाइल फोन खरीद कर कामिनी को दे दिया, जिस से उन में बराबर बातें हो सकें. कामिनी जब तक मायके में रही, मार्तंड से बराबर मिलती रही. ससुराल आने पर मिलना तो बंद हो गया, लेकिन मोबाइल से सब की चोरी वह उस से बातें कर लेती थी. 12 अगस्त, 2015 की शाम साढ़े 6 बजे पवन घर लौटा और कपड़े बदल कर आराम करने लगा. रात 8 बजे कामिनी ने उसे सौ रुपए का नोट देते हुए कहा कि उसे कोल्ड ड्रिंक पीनी है, जा कर ला दे. पवन उन्हीं कपड़ों में दहेज में मिली हीरो पैशन प्रो बाइक से कोल्ड ड्रिंक लेने चला गया.

कोल्ड ड्रिंक की दुकान उस के घर से लगभग 3 सौ मीटर की दूरी पर थी. थोड़ी देर बाद पवन का फोन आया कि गांव के बाहर उस की बाइक खड़ी है, किसी से मंगवा लें. वह किसी जरूरी काम से जा रहा है. इस के बाद पवन के पिता वहां गए और गांव के एक लड़के से कह कर बाइक ले आए. सुबह गांव के कुछ बच्चे गांव के बाहर तालाब पर शौच के लिए गए तो उन्होंने वहां झाडि़यों में पवन की लाश पड़ी देखी. बच्चों ने यह बात तुरंत पवन के घर वालों को बताई तो घर वाले रोतेबिलखते वहां पहुंचे. पवन के पिता ललई प्रसाद ने इस घटना की सूचना थाना नगराम पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद थाना नगराम के थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक पवन ने नीले रंग पर सफेद धारी वाली कैपरी और सफेद शर्ट पहन रखी थी. उस के गले और मुंह पर किसी तेज धारदार हथियरा के घाव थे. सुधीर कुमार सिंह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ राकेश नायक भी आ गए. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मैडिकल कालेज भिजवा कर पूछताछ शुरू की. इस के बाद थाने आ कर सुधीर कुमार सिंह ने मृतक के पिता ललई प्रसाद की ओर से अज्ञात के खिलाफ पवन की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. थानाप्रभारी मामले की जांच के लिए बघौली गांव जाने की तैयारी कर रहे थे कि किसी ने फोन कर के उन्हें बताया कि मृतक पवन की पत्नी कामिनी अपना सामान बांध कर कहीं जाने की तैयारी कर रही है.

यह सुन कर सुधीर कुमार सिंह को हैरानी हुई. जिस औरत के पति की हत्या हुई हो, अभी उस की लाश भी न दफनाई गई हो, इस दुख की घड़ी में ससुराल वालों का साथ देने के बजाय वह घर से जाने की तैयारी कर रही है. उन्हें लगा, कहीं ऐसा तो नहीं कि इस घटना के पीछे उसी का हाथ हो. सीओ राकेश नायक भी थाने में मौजूद थे. कामिनी के बारे में सीओ साहब को बताया तो उन्होंने भी कामिनी पर शक जाहिर किया. फिर क्या था, थानाप्रभारी ललई प्रसाद के घर जा पहुंचे. उन्हें जो सूचना मिली थी, वह सही थी. कामिनी अपना बैग तैयार कर के बैठी थी. शक के आधार पर सुधीर कुमार सिंह ने बैग की तलाशी ली तो उस में से कपड़ों और व्यक्तिगत सामान के अलावा 1 हजार रुपए, एक सिम और एक युवक की फोटो बरामद हुई. उन्होंने बैग में नीचे लगे पैड के अंदर हाथ डाला तो उस में से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ.

घर वालों से उस मोबाइल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. इस के पास जो मोबाइल था, उसे तो पवन ने पहले ही ले लिया था.

सुधीर कुमार सिंह ने जब कामिनी से उस के पास मिले फोटो के बारे में पूछा तो वह काफी देर तक उस फोटो को देखती रही, उस के बाद बोली, ‘‘यह युवक उस के गांव का रहने वाला है.’’

पुलिस कामिनी को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में महिला कांस्टेबल के जरिए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कई नाम बताए. उन सभी को पुलिस ने थाने ला कर पूछताछ की तो पता चला कि वे निर्दोष थे. कामिनी ने जो नाम बताए थे, वे उस के पुराने आशिक थे, जिन्हें वह फंसाना चाहती थी. सुधीर कुमार सिंह ने कामिनी का मोबाइल खंगाला तो उस में सिर्फ एक ही नंबर मिला, जिस से उस में लगभग रोज ही फोन आए थे. घटना वाले दिन भी उस नंबर से अंतिम बार रात 11 बजे फोन आया था. जब उस नंबर के बारे में कामिनी से सख्ती से पूछा गया तो उस ने बताया कि उस नंबर से फोन करने वाला और फोटो वाला युवक एक ही है. उस का नाम मार्तंड यादव उर्फ पिंकू है, जो उस के मायके निमडवल में रहता है.

सुधीर कुमार सिंह ने उसी मोबाइल से उस नंबर पर स्पीकर औन कर  के कामिनी से बात करने को कहा. कामिनी ने उस नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन रिसीव करने वाले ने कहा, ‘‘सब ठीक कर दिया मैं ने, किसी को शक भी नहीं हुआ.’’

‘‘क्या कह…’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि सुधीर कुमार सिंह ने उसे कुछ भी बताने से मना कर दिया.

‘‘मैं ने अपने दोस्तों के साथ सब कुछ बहुत सही ढंग से कर दिया है. अब हम एक साथ रह सकेंगे.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘लेकिन यह सब कर के तुम ने मुझे फंसा दिया. पुलिस मुझ पर शक कर रही है. तुम आ कर मुझे बचाओ. तुम कहां हो?’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि मार्तंड को शायद शक हो गया. उस ने तुरंत फोन काट दिया. दोबारा फोन किया गया तो फोन बंद हो चुका था. इस के बाद मार्तंड के घर छापा मारा गया, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. तब उस के पिता को हिरासत में ले कर थाने लाया गया. लेकिन वह भी मार्तंड के बारे में कुछ नहीं बता सका. उसी दिन यानी 14 अगस्त को एक मुखबिर की सूचना पर दोपहर साढे़ 12 बजे सुधीर कुमार सिंह ने मार्तंड यादव और उस के दोस्त विक्रम यादव को समेसी के पास एक नहर के किनारे से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद 15 अगस्त को पुलिस ने मार्तंड के एक अन्य दोस्त सूरजलाल को छतौनी से गिरफ्तार कर लिया. मार्तंड से की गई पूछताछ में पवन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

मार्तंड द्वारा दिए गए मोबाइल से कामिनी चोरीछिपे उस से बात कर लिया करती थी, लेकिन किसी दिन पवन ने कामिनी को मोबाइल पर बात करते देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि कामिनी का किसी के साथ चक्कर चल रहा है. उसी ने यह मोबाइल कामिनी को दिया है. पवन ने कामिनी को मारापीटा ही नहीं, उस का मोबाइल भी छीन लिया. कामिनी वैसे ही मार्तंड से दूर हो कर तड़प रही थी. ऐसे में बात करने का जरिया मोबाइल भी छिन गया तो वह गुस्से से भर उठी. आग में घी का काम किया पवन की पिटाई ने. कामिनी ने किसी तरह मार्तंड तक मोबाइल छिन जाने की बात पहुंचा दी.

इसी के साथ यह भी कहा कि अगर वह किसी तरह पवन को ठिकाने लगा दे तो वह हमेशाहमेशा के लिए उस की हो जाएगी. उस के बाद उन्हें मिलने से कोई नहीं रोक पाएगा. मार्तंड तो हर हाल में कामिनी को अपनी बनाना चाहता था. उस ने कामिनी से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं जल्द ही उसे ठिकाने लगा दूंगा.’’

मार्तंड ने अपने 2 दोस्तों, विक्रम और सूरजलाल को दोस्ती का वास्ता दे कर पवन की हत्या में साथ देने को कहा तो वे तैयार हो गए. इस के बाद योजना भी बन गई. अपनी उसी योजना के अनुसार, मार्तंड अपने दोस्तों के साथ 2 मोटरसाइकिलों से कामिनी की ससुराल उस समय पहुंचा, जब पवन घर पर नहीं था. यह बात कामिनी ने मार्तंड को पहले ही बता दी थी. जब तीनों वहां पहुंचे तो कामिनी ने अपनी सास रामकली को बताया कि तीनों उस की सगी मौसी के बेटे हैं. रामकली के हटते ही मार्तंड ने एक मोबाइल फोन कामिनी को दे दिया और पूरी योजना बता दी. इस के बाद वह दोस्तों के साथ चला आया.

13 अगस्त की शाम मार्तंड ने कामिनी को फोन किया कि वह रात 8 बजे तक दोस्तों के साथ उस के गांव के बाहर पहुंच जाएगा. शाम साढ़े 6 बजे तक पवन घर आ जाता था. रात 8 बजे जब मार्तंड गांव के बाहर आ गया तो उस ने कामिनी को फोन कर के पवन को भेजने को कहा. इस के बाद कामिनी ने पवन को कोल्डड्रिंक लाने के बहाने बाहर भेज दिया. पवन मोटरसाइकिल से कोल्डड्रिंक ले कर लौट रहा था तो रास्ते मे दोस्तों के साथ मार्तंड ने उसे हाथ दे कर रोक कर कहा, ‘‘भाई मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई है. जरा देख लीजिए.’’

पवन ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर के जेब में पड़ी टौर्च निकाली. उस ने टौर्च जलाई तो मार्तंड के चेहरे पर पड़ी. उस का चेहरा देख कर पवन ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें पहचानता हूं, तुम तो मेरी ससुराल के हो, यहां कैसे, कामिनी से मिलने आए थे क्या?’’

‘‘नहीं, यहीं पास में मेरी एक रिश्तेदारी है, वहीं आया था. लेकिन यहां पहुंचते ही मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई.’’

इस के बाद उन में बातें होने लगीं. उसी बीच मार्तंड ने शौच जाने की बात कही तो पवन उसे तालाब की तरफ टौर्च की रोशनी में ले जाने लगा. इस के पहले उस ने फोन कर के अपनी मोटरसाइकिल मंगवा लेने के लिए घर वालों को कह दिया था. मार्तंड पवन से बातें करते हुए तालाब की ओर जा रहा था, तभी पीछेपीछे चल रहे विक्रम ने कपड़ों में छिपा हंसिया निकाल कर पवन की गरदन पर पूरी ताकत से प्रहार कर दिया. अचानक हुए इस हमले से पवन लड़खड़ा कर गिर पड़ा. वह संभल पाता, उस के पहले ही मार्तंड ने विक्रम से हंसिया ले कर पवन पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

पवन तड़पने लगा. और फिर बिना चीखेचिल्लाए मौत के मुंह में समा गया. इस के बाद तीनों उसे घसीट कर झाडि़यों में ले गए. वहां उस की जेब से दोनों मोबाइल निकाल कर तालाब में फेंक दिए. हत्या में प्रयुक्त हंसिया भी वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. इस के बाद वे मोटरसाइकिल से चले गए. उन्होंने सोचा था कि वे पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ ही लिया. सुधीर कुमार सिंह ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया, तीनों मोबाइल, दोनों मोटरसाइकिलें बरामद कर ली थीं. इस के बाद पुलिस ने मुकदमे में धारा 120बी तथा 34 के अलावा एससी/एसटी की धारा 3(2)5 भी बढ़ा दी थी.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi crime story: नीली फिल्मों का बूढ़ा नायक

Hindi crime story: अय्याश कुंदन कुमार को कमउम्र की लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने का शौक तो लग ही गया था, दुर्भाग्य से उसे उन के साथ अपने संबंधों की फिल्म बना कर देखने का भी चस्का लग गया था. उस के इसी शौक ने उसे उस की असली जगह तक पहुंचा दिया. पहाड़ों की रानी कहलाने वाले पर्यटनस्थल शिमला के रहने वाले थे सेठ दसौंधामल. मूलरूप से जिला कांगड़ा के गांव काशनी के रहने वाले दसौंधामल ने बरसों पहले शिमला में हार्डवेयर का व्यापार शुरू किया था. उन का यह धंधा इतना बढि़या चला कि उन्होंने शिमला में अपार ख्याति और संपत्ति अर्जित की.

दसौंधामल के परिवार में पत्नी कंचनबाला के अलावा एक बेटा और 6 बेटियां थीं. बेटियों को पढ़ालिखा कर उच्च घरानों में उन की शादियां कर दी गईं, जिन में से 3 तो आज विदेशों में रह रही हैं. 6 बेटियों के बाद एकलौता बेटा था कुंदन कुमार. पढ़लिख कर वह इंडियन एयरफोर्स में पायलट औफिसर बन गया था. साल भर बाद ही मैडिकल ग्राउंड पर नौकरी छोड़ दी और अपने पुश्तैनी धंधे में पिता का हाथ बंटाने के साथसाथ शिमला स्थित पंजाब विश्वविद्यालय से बीए करने लगा. दौरान दिल्ली निवासी मधुपलाल की उच्चशिक्षित बेटी मालारानी से कुंदन कुमार की शादी हो गई, जिस से उसे 3 बेटियां और एक बेटा हुआ.

कहते हैं, जब तक दसौंधामल जिंदा थे, तब तक तो उस पर अंकुश रहा. पिता के मरते ही उस के पंख निकल आए. पैसों का लेनदेन और पूरा कारोबार अब उस के हाथों में था. उस के पास इतना पैसा था कि दोनों हाथों से लुटाता तो भी खत्म होने वाला नहीं था. जमेजमाए कारोबार के अलावा दसौंधामल इतनी प्रौपर्टी छोड़ गए थे कि उस का किराया ही हर महीने लाखों में आता था. इस सब के अलावा कुंदन कुमार की पत्नी मालारानी ऊंचे ओहदे पर सरकारी नौकरी में थीं. उन्हें भी वेतन में मोटी रकम मिलती थी. इसलिए पैसों के लिए उन्हें कभी पति की ओर देखने की जरूरत नहीं थी. 4 बच्चे होने के बाद वह उन का भविष्य संवारने में व्यस्त हो गई थीं.

पिता का अंकुश हटते ही कुंदन क्लबों की रंगीनियों में खोया रहने लगा था. इस के बाद उस की अय्याशी के तार देहधंधा करने वाली औरतों से जुड़ गए. इसी के साथा उस ने कमउम्र की लड़कियों से शारीरिक संबंध बनाने का शौक पाल लिया. बढ़ती उम्र में यौन क्षमता बढ़ाने के लिए वह दवाओं का सहारा ले रहा था. कामवासना से कभी उस का जी नहीं भरता था, इसलिए बिजनैस को नौकरों के सहारे छोड़ कर वह सिर्फ लड़कियां पटाने के तरीके सोचा करता था. धंधेबाज औरतों से मौजमस्ती से जी भर गया तो नौकरी का लालच दे कर कुंदन ने न जाने कितनी लड़कियों को बरबाद किया.

ऐसे में उसे न जाने क्या सूझी कि 4 लड़कियों के साथ के शारीरिक संबंध की उस ने फिल्में बना लीं. इन में एक लड़की अनु थी, जिस के साथ बनाई गई ब्लूफिल्म ने उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. उस समय यह मामला अखबारों में खूब उछला था. शहर का हर अखबार इस मामले से जुड़ी खबरों से भरे होते थे. उन दिनों शिमला के एडीशनल एसपी थे कुंवर वीरेंद्र सिंह. कुंदन के इस मामले की विवेचना का जिम्मा उन्हें ही सौंपा गया था. यह मामला पुलिस से पहले मीडिया के पास पहुंच गया था. स्थानीय अखबारों में एक समाचार जोरोंशोरों से छप रहा था कि शिमला के बाजारों में एक अश्लील सीडी धड़ल्ले से बिक रही है, जिस में शहर के एक प्रतिष्ठित घराने के बूढ़े को एक नवयौवना से यौनाचार करते दिखाया गया है.

समाचारों में नीचे यह भी लिखा होता था कि वह बूढ़ा काफी प्रभावशाली है, इसलिए पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर रही है. पुलिस के लिए परेशानी की बात यह थी कि इस मामले में किसी ने कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई थी. बिना शिकायत के पुलिस किसी के खिलाफ क्या और कैसे काररवाई कर सकती थी. फिर भी सीआईडी के तत्कालीन आईजी आई.डी. भंडारी ने उन खबरों को गंभीरता से लेते हुए मामले की गहराई में जाने की जिम्मेदारी सीआईडी स्पैशल ब्रांच के इंसपेक्टर कुशल कुमार को सौंप दी. कुशल कुमार ने अखबार वालों से संपर्क कर खूब दौड़भाग की. मामले की गहराई में जाने के लिए उन्होंने दिनरात एक कर दिया. जांच के लिए वह सीडी जरूरी थी. बाजार में सीडी होने की चर्चा तो खूब थी, लेकिन वह सीडी कुशल कुमार के हाथ नहीं लगी. 3 दिन इसी तरह निकल गए.

चौथे दिन संयोग से किसी अनजान आदमी ने उन्हें फोन कर के बताया, ‘‘सर, आप जिस सीडी के लिए दिनरात परेशान हो रहे हैं, उस की एक कौपी रिज के पास टका बैंच पर रखी है. आप उसे देख कर छानबीन करें तो सारी असलियत सामने आ जाएगी. आप से आग्रह है कि मेरे बारे में पता लगाने की कोशिश मत कीजिएगा.’’

अंधा क्या चाहे, 2 आंखें. कुशल कुमार तुरंत रिज मैदान पहुंच गए. टका बैंच पर उन्हें दीवार के पास कागज का पुराना सा लिफाफा दिखाई दिया. उठा कर देखा तो उस में सीडी थी. अपने औफिस आ कर कंप्यूटर पर उन्होंने उस सीडी को चलाया. सीडी में 15 मिनट की अश्लील फिल्म थी, जिस में एक बूढ़ा एक लड़की के साथ शारीरिक संबंध बना रहा था. सीडी देखने के बाद कुशल कुमार उसे ले कर आईजी श्री भंडारी के पास गए. सीडी देख कर उन्होंने शिमला के पुलिस अधीक्षक जोगराज ठाकुर को एफआईआर दर्ज कर के तत्काल काररवाई करने के आदेश दे दिए.

जोगराज ठाकुर ने कुशल कुमार की ओर से एफआईआर दर्ज करने की संस्तुति कर के मामले की फाइल थाना सदर भेज दी. इसी के साथ एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह को इस मामले की विवेचना की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी. थाना सदर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर बृजेश सूद ने भादंसं की धारा 292 के तहत मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी गोबिंदराम को सौंप दी थी. गोबिंदराम ने सब से पहले शहर के कुछ गणमान्य लोगों को बुला कर उन के सामने उस सीडी को चला कर दिखाया. इस का उद्देश्य ब्लूफिल्म के नायक की पहचान करना था. आखिर उस आदमी की पहचान हो गई. वह कोई और नहीं, कुंदन कुमार था.

उन लोगों ने बताया कि इस की गिनती शहर के प्रमुख कारोबारियों में होती है. इस की पत्नी सरकारी अधिकारी है और इस के बच्चे इंग्लैंड, अमेरिका में पढ़ रहे हैं. सीडी की अश्लील फिल्म के नायक की पहचान हो जाने के बाद पुलिस टीम ने कुंदन कुमार के भव्य निवास पर छापा मारा. उस समय घर पर नौकर मोतीलाल के अलावा और कोई नहीं था. पुलिस ने उसे थाने ला कर गहन पूछताछ की. इस पूछताछ में मोतीलाल ने बताया कि उस का मालिक शराब और शबाब का शौकीन है. पैसे की उसे कोई कमी नहीं है. शिमला में प्रौपर्टी से ही उसे लाखों रुपए महीने किराया आता है. उस की उम्र काफी हो गई है, लेकिन बिना मेहनत के आने वाले पैसों की वजह से इस उम्र में भी उस की आदतें खराब हैं.

मोतीलाल को जब सीडी की फिल्म दिखाई गई तो उस ने उस फिल्म के बूढ़े नायक की पहचान अपने मालिक कुंदन कुमार के रूप में कर दी. लड़की के बारे में उस ने कहा, ‘‘अरे यह तो अनु है. यह साहब के औफिस में नौकरी करती थी.’’

‘‘इस समय यह कहां है?’’ मोतीलाल से पूछा गया.

‘‘अब कहां है, यह मुझे पता नहीं. क्योंकि इस ने साहब के यहां से नौकरी छोड़ दी है.’’ मोतीलाल ने कहा.

इस के बाद मोतीलाल को यह संदेश दे कर छोड़ दिया गया कि वह अपने साहब से कह देगा कि वह खुद थाने आ कर पुलिस जांच में शामिल हो जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा, वरना उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. इस का असर यह हुआ कि पुलिस का संदेश मिलते ही कुंदन कुमार अपने वकील के साथ थाना सदर आ पहुंचा. पुलिस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखाते हुए उस के बारे में स्पष्टीकरण मांगा तो उस ने कहा, ‘‘अनु मेरे औफिस में नौकरी करती थी. अपनी खूबसूरती के जाल में फंसा कर वह मुझ से पैसे ऐंठती थी. उस के फरेब में आ कर मैं उस के हुस्न के जाल में फंस गया था. जब भी मौका मिलता था, हम संबंध बना लेते थे.

कभीकभी औफिस में भी यह सब हो जाता था. एक दिन मेरे मन में न जाने क्या आया कि मैं ने वैब कैमरे से यह फिल्म बना ली.’’

‘‘फिल्म की सीडी मार्केट में कैसे आई?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में कुंदन ने कहा, ‘‘कुछ दिनों पहले मेरा कंप्यूटर खराब हो गया था. मिडिल बाजार में मुकेश की कंप्यूटर रिपेयर की दुकान है. अपना कंप्यूटर ठीक करवाने के लिए मैं ने उसे अपने घर बुलवाया. लेकिन घर में कंप्यूटर ठीक नहीं हुआ तो वह सीपीयू अपने साथ ले गया.’’

इतना कह कर कुंदन ने पानी मांगा. 2 गिलास पानी पीने के बाद उस ने आगे कहा, ‘‘अगले दिन मैं मुकेश की दुकान पर गया तो उस ने कहा कि हार्डडिस्क क्रैश हो गई है, इसलिए बदलनी पड़ेगी. मेरे कहने पर उस ने हार्डडिस्क बदल दी. पुरानी हार्डडिस्क उस के पास ही रह गई. मुझे लगता है कि पुरानी हार्डडिस्क को नई में लोड करते समय उस ने मेरी इस फिल्म को देख लिया. उस के बाद पैसा कमाने के लिए उस की सीडी बना कर बाजार में पहुंचा दिया.’’

बृजेश सूद ने कुंदन को अपनी बातों में उलझा लिया और गोबिंदराम 2 सिपाहियों को साथ ले कर कुंदन कुमार की पुरानी हार्डडिस्क बरामद करने मुकेश की दुकान पर जा पहुंचे. कुछ देर बाद आ कर उन्होंने बताया कि दुकान बंद है. लेकिन उन्होंने दुकान सील कर के अपने दोनों सिपाही वहां बैठा दिए हैं. इस के बाद एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह के आदेश पर पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस और घर को सील कर दिया. अगले दिन 2 पार्षदों की उपस्थिति में मुकेश की दुकान खुलवाई गई. कुंदन कुमार भी पुलिस के साथ वहां मौजूद था. उस से दुकान में मिली हार्डडिस्कों से अपनी हार्डडिस्क पहचानने को कहा गया. उस ने इधरउधर देख कर कहा, ‘‘मेरी हार्डडिस्क दुकान में नहीं है.’’

मुकेश भी वहां मौजूद था. जब उस से कहा गया तो उस ने दुकान से 3 हार्डडिस्कें निकाल कर पुलिस के हवाले करते हुए कहा कि ये तीनों हार्डडिस्कें कुंदन कुमार की हैं. साथ ही उस ने यह भी कहा कि उसे नहीं पता कि इन सब में क्या था. उस ने इन के अंदर ताकझांक करने की कोई कोशिश नहीं की थी. पुलिस ने तीनों हार्डडिस्कें कब्जे में ले कर मुकेश की दुकान की गहन तलाशी ली. दुकान में कोई भी आपत्तिजनक चीज नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस की तलाशी ली, जहां पुलिस को पुरानी हार्डडिस्कें तो मिली हीं, 87 सीडीज और 25 फ्लौपीज भी मिलीं. जब उन सब को देखा गया तो उन सभी में अश्लील फिल्में थीं. यही नहीं, 4 ब्लूफिल्मों का हीरो खुद कुंदन कुमार था.

अनु के अलावा 3 अन्य लड़कियों के साथ भी उस ने अश्लील फिल्में बना रखी थीं. जिन फिल्मों में कुंदन कुमार खुद हीरो था, उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें औफिस में ही बनाया गया था. इसलिए फिल्म में दिखाई देने वाला सामान यानी चादर, कुशन, गिलाफ, तकिए और गिलासों के अलावा लकड़ी का वह छोटा सा दीवान भी कब्जे में ले लिया गया, जिस पर शारीरिक संबंध बनाया गया था. इसी के साथ कुंदन कुमार की निशानदेही पर उस के घर से वे कपड़े भी बरामद कर लिए गए थे, जिन्हें उस ने शारीरिक संबंध बनाने से पहले पहन रखे थे. बाद में तो उस ने कपड़े उतार दिए थे. कुंदन चूंकि गंजा था, जवान लड़की को शायद यह बात खल जाती, इसलिए पूरे कपड़े उतारने के बाद भी उस ने सिर पर आकर्षक कैप पहन रखी थी. वह कैप भी पुलिस ने जब्त कर ली थी.

सारी चीजों को कब्जे में लेने के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार को थाने ला कर पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में उस ने यह तो खुलासा कर दिया कि वह शराब और शबाब का शौकीन था, खासकर कमउम्र की लड़कियों के साथ उसे बहुत मजा आता था. इसी के साथ उस की एक कमजोरी भी सामने आई कि अकसर वह कमउम्र लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाते समय वैब कैमरे से उन की फिल्में बना लिया करता था. इस के लिए उस ने अपने औफिस के निजी कमरे में एक वैबकैम लगवा रखा था. बाद में वह अपनी उन फिल्मों को देख कर रोमांचित होता था.

कुंदन कुमार ने अपनी सारी कमजोरियों को बता कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया था, लेकिन किसी भी लड़की के बारे में उस ने कुछ नहीं बताया था. शायद बताना नहीं चाहता था. उस ने पुलिस से कहा, ‘‘ये पेशेवर लड़कियां थीं, जो पैसे के लिए मेरे पास आती थीं. खायापिया, मुझे खुश करने का पैसा लिया और चलती बनीं.’’

‘‘लेकिन अनु तो तुम्हारे यहां नौकरी करती थी?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी, मैं ने उसे नौकरी पर रखा था, लेकिन वह भी अन्य लड़कियों की तरह पैसे ऐंठने के लिए खुशीखुशी मेरे साथ संबंध बनाने को राजी हो गई थी.’’ कुंदन कुमार ने कहा.

‘‘वह सब छोड़ो, फिलहाल यह बताओ कि अनु जब नौकरी करने आई थी तो उस का बायोडाटा तो तुम ने लिया ही होगा?’’ पुलिस ने थोड़ा सख्त लहजे में पूछा.

कुंदन कुमार ने घबरा कर कहा, ‘‘जी हां, लिया था.’’

इस के बाद पुलिस कुंदन कुमार को उस के औफिस ले गई और अनु का बायोडाटा बरामद कर लिया. उस पर उस का फोटो लगा था. फोटो में वह वाकई निहायत खूबसूरत लग रही थी. वह कस्बा रहेड़ू की रहने वाली थी. बायोडाटा से उस का पता ही नहीं, फोन नंबर भी मिल गया था. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो फोन अनु के पिता ने रिसीव किया. उन्होंने बताया कि अनु पिछले कई दिनों से कहीं गई हुई है. कहां गई है, इस बारे में वह कुछ नहीं बता पाए. पुलिस ने अनु की तलाश में अपना पूरा जाल बिछा दिया. इसी के साथ उस के घर वालों के अलावा कुंदन कुमार पर पुलिसिया शिकंजा कसा गया तो 2 दिनों में सोलन जिले के कनलख कस्बा के एक घर में अनु मिल गई. पिछले कुछ दिनों से वह वहां छिप कर रह रही थी.

शिमला ला कर पुलिस ने अनु से पूछताछ की तो अनु ने बताया कि एक भाई और 3 बहनों में वह सब से बड़ी थी. 12वीं पास करने के बाद वह पुलिस में भरती हो गई. लेकिन वहां दिल नहीं लगा तो जल्दी ही उस ने वह नौकरी छोड़ दी. इस के बाद वह किसी औफिस में नौकरी तलाश करने लगी. इस के लिए उस ने कंप्यूटर कोर्स भी कर लिया था. एक दिन उसे उस की एक सहेली ने कुंदन कुमार के बारे में बता कर कहा कि उसे औफिस में काम करने के लिए एक लड़की की जरूरत है. कुंदन कुमार के औफिस जा कर अनु उस से मिली तो उस ने उस का बायोडाटा और फोटो लेने के अलावा उस का इंटरव्यू भी लिया. इस के बाद उस से कहा कि वह एक हफ्ते बाद आ कर मिले. हफ्ते भर बाद अनु गई तो उसे अगले हफ्ते आने को कहा.

महीना भर इसी तरह टरकाने के बाद एक दिन कुंदन कुमार ने कहा, ‘‘ऐसा है बेटा, तुम्हारी परफौरमेंस तो अच्छी नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें नौकरी पर रखने के बारे में सोच रहा हूं.’’

‘‘थैंक्यू सर,’’ अनु ने चहकते हुए कहा, ‘‘आप ने मुझे यह नौकरी दे दी न सर तो देखिएगा, आप को मेरी तरफ से शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा. मुझे नौकरी की जरूरत तो है ही, इस के अलावा मैं अपनी मेहनत से जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं.’’

कुंदन कुमार उठे और अनु की पीठ थपथपा कर बोले, ‘‘मैं तुम्हारी भावना से बहुत खुश हूं बेटी. लेकिन पहले मेरी एक बात ध्यान से सुन लो. अभी मैं तुम्हें रैग्युलर नौकरी पर न रख कर ट्रेनी के रूप में रखूंगा. 3 महीने तुम्हें औफिस के कामों की, कंप्यूटर की, सेल्स टैक्स व इनकम टैक्स संबंधी रिटर्न भरने और चुस्तदुरुस्त बनी रहने की ट्रेनिंग दी जाएगी. इस बीच तुम्हें 12 सौ रुपए महीने मिलेंगे. इस बीच तुम ने बढि़या काम किया तो तुम्हारी नौकरी रैग्युलर कर के तुम्हें 5 हजार रुपए महीने तनख्वाह दी जाएगी. हर साल 5 सौ रुपए का इन्क्रीमेंट के अलावा हर साल दीवाली पर 1 महीने की तनख्वाह बोनस में मिला करेगी.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा है सर.’’

‘‘नहीं, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई. पहले पूरी बात सुन लो.’’

‘‘देखो, तुम्हारा जो ट्रेनिंग पीरियड है, अगर यह संतोषजनक नहीं रहा तो तुम्हें नौकरी से हटा दिया जाएगा या फिर 3 महीने के लिए तुम्हारा ट्रेनिंग पीरियड और बढ़ा दिया जाएगा. अब फैसला तुम्हें करना है.’’

अनु कुछ देर सोचती रही, फिर बोली, ‘‘ठीक है सर, मुझे मंजूर है.’’

इस के बाद अनु मालरोड स्थित कुंदन कुमार के औफिस में नियमित ड्यूटी पर जाने लगी. औफिस में जहां कुंदन कुमार बैठता था, वहीं बगल में कंप्यूटर टेबल रखी थी. उसी पर अनु को बैठना था. वहीं बगल में दीवार से सटा कर छोटा सा दीवान रखा था, जिस पर लेट कर कुंदन कुमार आराम किया करता था. औफिस में कोई खास काम तो था नहीं, लिहाजा कुंदन कुमार बैठा अनु से गप्पें हांकता रहता था. कभीकभी उसे औफिस के कामों के बारे में समझाने बैठ जाता. वह जब भी बैंक में पैसा जमा करने अथवा निकलवाने के लिए जाता, अनु को भी साथ ले जाता. रुपए भी वह उसी से गिनवाता.

औफिस में छोटा सा किचन था. उस में रखे फ्रिज में कई तरह के जूस मौजूद रहते थे. चाय बनाने की भी व्यवस्था थी. कुंदन का जब भी मन होता, अनु से चाय बनवा कर अथवा फ्रिज से जूस मंगवा कर पीता. उस ने अनु से भी कह रखा था कि जब भी उस का मन हो, वह चाय या जूस पी लिया करे. इसी तरह 2 महीने बीत गए. एक दिन कुंदन कुमार बाहर से आया. उस समय अनु कंप्यूटर पर गेम खेल रही थी. कुंदन ने आते ही उस के गाल को गर्मजोशी से चूम कर कहा, ‘‘आज मैं बहुत खुश हूं अनु.’’

अनु ने उस की बात पर ध्यान न देते हुए कुंदन पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा, ‘‘मुझे आप से यह उम्मीद नहीं थी सर. आप ने मुझे किस कर के बहुत गलत किया. आप को ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था.’’

कुंदन कुमार ने भी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारा गाल चूम लिया तो कौन सा गजब कर दिया. मुझे एक खुशखबरी मिली थी. इसी वजह से खुश हो कर मैं ने तुम्हें अपनी बेटी की तरह किस कर लिया. इस का तुम्हें बुरा लगा तो आगे से मैं ध्यान रखूंगा.’’

अनु के बताए अनुसार, यह बात आईगई हो गई. उसे भी लगा कि शायद कुंदन अपनी जगह ठीक था. वैसे भी उम्र में वह उस के पिता से भी कहीं ज्यादा का था. इसलिए अनु ने उस की ओर से अपना मन साफ कर लिया. मगर इस के लगभग 10 दिनों बाद कुंदन ने अचानक अनु को अपनी बांहों में कस कर भींच लिया. इस बार अनु ने पहले से भी कहीं ज्यादा सख्त लहजे में ऐतराज जताया. यहां तक कि नौकरी छोड़ देने की धमकी भी दी. कुंदन ने इस बार भी उसे यह कह कर मना लिया कि उस की शक्ल हूबहू उस की बेटी जैसी है. जिस तरह ज्यादा खुश होने पर वह अपनी बेटी को बांहों में ले कर प्यार करता था, उसी तरह उस से भी कर बैठा.

इसी के साथ कुंदन कुमार ने कान पकड़ कर अनु से माफी भी मांगी. हालांकि जिस तरह कुंदन कुमार ने अनु को अपनी बांहों में भर कर भींचा था, हर तरह से ऐतराज वाली बात थी. इस के बाद भी कुंदन की बात पर भरोसा कर के अनु ने इस बार भी उस की गलती माफ कर दी थी. कुछ दिनों बाद तो हद ही हो गई. कुंदन कुमार अनु को ले कर बैंक गया था. वहां से कोई फाइल लेने का बहाना कर के उसे अपने घर ले गया. उस समय घर में कोई नहीं था. ताला खोलने के बाद कुंदन कुमार ने उसे ले जा कर एक ऐसे कमरे में बैठा दिया, जहां कंप्यूटर लगा था. उस पर सीडी लगा कर वह बोला, ‘‘मैं अभी आया, तब तक तुम यह फिल्म देखो.’’

इस के बाद वह कमरे से चला गया. अनु ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नजरें जमा दीं. कुछ देर में फिल्म चलने लगी. कंप्यूटर स्क्रीन पर जो दृश्य उभरे, उन्होंने अनु के होश उड़ा दिए. वह एक ब्लूफिल्म थी. फिल्म के अश्लील दृश्यों को देख कर अनु घबरा गई, उस का हलक सूख गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह दरवाजा खोल कर भागी. इस के बाद अनु ने कुंदन कुमार के यहां नौकरी पर जाना बंद कर दिया. वह अपनी तनख्वाह भी लेने नहीं गई. कुंदन कुमार ने भी उस से संपर्क करने की कोशिश नहीं की. इसी तरह करीब 2, ढाई महीने बीत गए. इस बीच अनु कहीं और नौकरी तलाश करती रही, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली.

संयोग से एक दिन लोअर बाजार में कुंदन कुमार से अनु की मुलाकात हो गई. कुंदन कुमार उस की बांह पकड़ कर एक किनारे ले गया और वात्सल्य भरे लहजे में उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘मुझे गलत न समझ बेटी, उस दिन मैं ने तुम्हारे लिए अपनी ओर से वह हिंदी फिल्म लगाई थी, जो उस सुबह ही मैं ने देखी थी. मुझे इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी कि उस सीडी में ब्लूफिल्म है. मेरा यकीन करो बेटी, इस में मेरा जरा भी कुसूर नहीं है.’’

‘‘कुसूर नहीं है तो इस तरह की गंदी फिल्म घर पर ला कर रखी ही क्यों?’’ अनु ने तल्खी से कहा, ‘‘ऐसी फिल्में देखने के बाद, वह भी इस उम्र में, आप क्या समझते हैं कि आप अच्छे कैरेक्टर के मालिक होंगे, कतई नहीं.’’

‘‘अब तुम्हें कैसे समझाऊं बेटी. दरअसल हम जैसे हाईसोसायटी वालों के घरों में यह सब आम बात है. हमारे यहां बच्चे, औरतें सब इस तरह की फिल्में देख कर मनोरंजन करते हैं. तुम मिडिल क्लास की हो, इसलिए तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है. उस दिन गलती से ब्लूफिल्म लग गई थी तो कंप्यूटर बंद कर देती या आवाज दे कर मुझे बुला लेती. तुम तो सिर पर पांव रख कर ऐसे भागी, जैसे कोई बम फट गया हो.’’

अनु कुंदन कुमार को बीचबीच में टोकने का प्रयास करती रही, लेकिन कुंदन उसे नजरअंदाज कर के अपनी बात कहता रहा. अंत में उस ने कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें कभी बेटी भी नहीं कहूंगा. जब तुम्हें मेरे दिमाग में, मेरे काम में और मेरी हर हरकत में गंदगी ही दिखाई दे रही है तो फिर इस रिश्ते को बदनाम क्यों किया जाए. बस मेरी एक बात ध्यान से सुन लो अनु कि मैं आज भी तुम्हें अपनी बेटी की तरह ही मानता हूं.

‘‘मैं ने जानबूझ कर कोई गलती नहीं की. बेकसूर होते हुए भी मैं तुम्हारी नफरत का शिकार हो गया. अब इस की सजा मैं अपने आप को यह देना चाहता हूं कि तुम्हारे ट्रेनिंग पीरियड का वेतन 2 हजार रुपए महीने कर दूंगा. 3 महीने के बाद नौकरी रैग्युलर कर के तनख्वाह 8 हजार रुपए महीने और हर साल बोनस भी इतना ही दूंगा. ठीक लगे तो कल से औफिस आना शुरू कर दो. तुम्हारी सीट आज भी खाली है.’’

अपनी बात पूरी कर के कुंदन कुमार क्षण भर के लिए भी वहां नहीं रुका. तेज कदमों से चलता हुआ वह पलभर में अनु की नजरों से ओझल हो गया. अनु उस के झांसे में आ कर अगले दिन से उस के औफिस में काम करने लगी. कुछ दिन तो ठीकठाक बीते. एक दिन दोपहर को कुंदन कुमार ने फ्रिज से फ्रूटजूस के 2 टेट्रापैक निकाल कर एक उसे पीने को दिया और एक खुद पीने लगा. जूस पीते ही अनु पर नशा सा छाने लगा. जल्दी ही वह अर्धबेहोशी की हालत में पहुंच गई. कुंदन कुमार ने उसे उठा कर दीवान पर लिटा दिया. इस के बाद कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाने लगा.

अनु के साथ कुछ हो रहा है, इस बात की जानकारी तो उसे थी, लेकिन वह विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. शाम 6 बजे वह होश में लौटी तो उसे उस सब का कुछकुछ याद आने लगा. उस ने इस बारे में कुंदन कुमार से पूछा तो उस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखा दी. साथ ही धमकी दी कि इस सब के बारे में किसी को कुछ बताया तो वह उस की ब्लूफिल्म की सीडी बाजार में उतार देगा.  इस से अनु बुरी तरह डर गई. इस के बाद जब भी कुंदन कुमार का मन होता, उस से अपने मन की कर लेता. इस के एवज में वह उस की हर छोटीबड़ी जरूरत का ध्यान रखने लगा. वह सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस बारे में कुंदन कुमार और अनु ने कुछ भी मालूम होने से मना कर दिया. जैसे ही यह सब अखबारों में छपना शुरू हुआ, उस ने काफी पैसे दे कर अनु को छिपा दिया था.

अनु से पूछताछ के बाद कुंदन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उस हवालात में बंद कर दिया गया. इस के बाद वह पुलिस को धमकियां देने लगा कि वह सभी पुलिस वालों को देख लेगा. लेकिन पुलिस के पास पुख्ता सबूत थे. इस पर भी वह खुद को बेकसूर बता रहा था, साथ ही कह रहा था कि उसे किसी साजिश के तहत फंसाया जा रहा है. उस ने थाने की मैस का खाना खाने से इनकार कर दिया था. कह रहा था कि उस का खाना किसी बढि़या होटल से मंगवाया जाए. एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह ने कहा कि जब तक वह यहां है, उसे यहीं का खाना मिलेगा. जैसेतैसे उस ने थोड़ा सा खाना खा लिया तो आधी रात में दिल का दौरा पड़ने का शोर मचाने लगा. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां चैकअप के बाद डाक्टरों ने उसे पूरी तरह स्वस्थ बताया.

अगले दिन पुलिस ने उसे न्यायिक दंडाधिकारी के सम्मुख पेश कर के 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर विस्तारपूर्वक पूछताछ की. रिमांड अवधि में भी वह कभी सीने में दर्द का तो कभी किसी और तरह की परेशानी का ढोंग कर के पुलिस वालों को अस्पतालों के चक्कर लगवाता रहा. आखिर उस की सारी नौटंकियां फ्लौप साबित हुईं. जैसेतैसे पुलिस रिमांड की अवधि समाप्त हुई और पुलिस ने उसे फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया, जहां से उसे सजा सुनाए जाने तक जमानत नहीं मिली.

चार्जशीट दाखिल होने के बाद इस केस की सुनवाई 2 सालों तक चली. इस मामले में उसे 10 सालों की कैद की सजा हुई. सजा सुनाए जाने के समय विद्वान जज महोदय ने टिप्पणी करते हुए उसे लताड़ा था कि जिस लड़की से दुष्कर्म के आरोप में उसे यह सजा दी जा रही है, वह उस की बेटी से भी कम उम्र की थी. ऐसे में उस के इस घिनौने अपराध के प्रति देश की कोई भी अदालत नरम रवैया अपनाने के बारे में शायद ही सोच सके. खैर, पुलिस ने तो कुंदन को उस के अपराध की सजा दिला दी, लेकिन वह अश्लील सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस रहस्य की तह तक अंत तक नहीं पहुंच सकी और न ही उन 3 अन्य लड़कियों का पता लगा सकी, जिन के साथ कुंदन कुमार की अश्लील फिल्मों की कई सीडी बरामद हुई थीं.

इस मामले से मिडिल क्लास की उन बेरोजगार लड़कियों को सावधान हो जाना चाहिए, जिन्हें नौकरी देने के नाम पर नोचने के लिए इस तरह के कामुक भेडि़ए घात लगाए बैठे रहते हैं. Hindi crime story

—कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

Delhi News: घर छिनने की नौबत पर मां और 2 बेटों ने दी जान

Delhi News: राजधानी दिल्ली से एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिस ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है. यहां मां और 2 बेटों ने फंदा लगाकर जान दे दी. क्या वजह थी कि परिवार इतना परेशान था कि अपनी जान देनी पड़ी. क्या है इस परिवार की दर्दनाक घटना, जो आप को भी सोचने पर मजबूर कर देगी. चलिए जानते हैं, इस पूरी स्टोरी को विस्तार से.

यह हैरान कर देने वाली घटना दिल्ली के कालकाजी क्षेत्र से सामने आई है. यहां मानसिक तनाव और पैसों की तंगी से परेशान अनुराधा कपूर नाम की महिला और उस के 2 बेटों आशीष कपूर और चैतन्य कपूर ने 19 दिसंबर, 2025 को फांसी लगाकर जान दे दी.

पुलिस के अनुसार, तीनों के शव उन के घर में पंखे से लटके मिले. सूचना मिलने पर कालकाजी थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शवों को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए सुरक्षित रख लिया. शुरुआती जांच में पुलिस को कमरे से एक सुसाइड नोट मिला जिस में लिखा था कि तीनों पैसों की तंगी और घर टूटने की वजह से मानसिक तनाव में थे. वे कालकाजी इलाके के जी ब्लौक के मकान नंबर B-70 में रहते थे. पुलिस ने बताया कि दोपहर करीब पौने 3 बजे एक पुलिसकर्मी कोर्ट का नोटिस ले कर उन के घर पहुंचा था.

कई बार गेट और डोरबेल बजाई, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं मिल पाया था. शक होने पर उस ने मामले की सूचना कालकाजी पुलिस स्टेशन को दे दी थी. इस के बाद पुलिस पहुंची, तो घर का गेट अंदर से बंद था. इस के बाद चाबी वाले को बुलाकर डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. पुलिस घर के अंदर गई तो मां और उस के दोनों बेटे फंदे से लटके हुए थे. इस के बाद तीनों को नीचे उतारकर अस्पताल भेजा, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया.

एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि घर से एक सुसाइड नोट मिला है, जिस में परिवार की परेशानी का जिक्र है. पुलिस का कहना है कि शुरुआती जांच में सामने आया है कि परिवार लंबे समय से पैसों की तंगी से जूझ रहा था. जिस घर में वे रहते थे, उसे ले कर पड़ोसी से विवाद चल रहा था. दूसरी पार्टी ने कोर्ट में केस जीत लिया था, जिस के बाद घर खाली करने का आदेश दिया गया.

सूत्रों के मुताबिक, 19 दिसंबर, 2025 को पुलिसकर्मी घर खाली करने का कोर्ट नोटिस देने पहुंचा था. फिलहाल पुलिस पूरे मामले की विस्तार से जांच कर रही है. Delhi News

Delhi Crime: डांस विवाद बना जानलेवा, युवक की चाकू मारकर हत्या

Delhi Crime: एक ऐसी घटना सामने आई है, जिस में डांस को ले कर हुए मामूली विवाद ने एक युवक की जान ले ली. आखिर ऐसा क्या विवाद था, जिस में एक युवक को अपनी जान गंवानी थी. क्या है इस पूरी घटना का सच? आइए जानते हैं इस क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो छोटे विवादों से सतर्क और सावधान रहने की सीख देती है.

यह हैरान कर देने वाली वारदात पूर्वी दिल्ली से सामने आई है. शकरपुर इलाके में 20 दिसंबर, 2025 की रात एक नाबालिग ने अपने दोस्त के साथ मिलकर चाकू से गोदकर बहन के कथित प्रेमी विशाल की हत्या कर दी. शादी समारोह में डांस करने को ले कर दोनों नाबालिगों और विशाल के बीच विवाद हुआ था, जिस के बाद घर के बाहर उस की जान ले ली गई.

विशाल अपने परिवार के साथ शकरपुर के स्कूल ब्लौक में रहता था. उस के परिवार में पापा के अलावा 4 बहनें और एक भाई है. विशाल पेशे से औटो ड्राइवर था. परिवार के अनुसार, शनिवार रात विशाल की बहन पूजा की सहेली प्रियंका की शादी पास के शिव मंदिर में थी, जिस में पूरा परिवार शामिल हुआ था.

रात करीब 11 बजे विशाल शादी में पहुंचा. उस ने पहले खाना खाया और फिर डांस करने लगा. वहां पहले से 2 नाबालिग भी डांस कर रहे थे. इसी दौरान विशाल का उन से विवाद हो गया, जो देखते ही देखते गंभीर हो गया. विवाद के बाद विशाल घबराई हुई हालत में अपनी बहनों के पास पहुंचा और उन्हें साथ ले कर घर आ गया. रास्ते में उस ने बताया कि नाबालिगों के पास चाकू था और वे उसे जान से मारने की धमकी दे रहे थे. बहनें घर के अंदर चली गईं और विशाल बाहर अपने एक परिचित से बात करने लगा.

इसी दौरान दोनों नाबालिग वहां पहुंचे और उन्होनेवविशाल पर 5 से ज्यादा बार चाकू से वार किए. शोर सुनकर जब फेमिली वाले बाहर आए, तब तक आरोपी मौके से फरार हो चुके थे. घायल विशाल को एलबीएस अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर दोनों आरोपियों की पहचान कर उन्हें पकड़ लिया.

पुलिस के अनुसार, एक आरोपी को शक था कि विशाल उस की बहन से प्रेम करता है, इसी नाराजगी में उस ने इस वारदात को अंजाम दिया. Delhi Crime

Family Dispute: नाकाम साजिश : बहू ने बनाई सास की हत्या की योजना

Family Dispute: कुलदीप कौर पिछले कई महीनों से परेशान थी, लेकिन परेशानी की वजह उस की समझ में नहीं आ रही थी. उस का मन हर समय बेचैन रहता था. अजीबोगरीब विचार मन को उलझाए रखते थे. वह कितना भी अच्छा सोचने की कोशिश करती, मन सकारात्मक सोच की ओर न जा कर नकारात्मक सोच में ही डेरा जमाए रहता था.

बुरे विचारों से जैसे कुलदीप का नाता जुड़ गया था. मन को समझाने और बुरे विचारों से दूर रहने के लिए वह अपना अधिकांश समय गुरुद्वारे में व्यतीत करने लगी थी. कुलदीप कौर की चिंता का विषय सात समंदर पार पंजाब में बैठी अपनी मां राजविंदर कौर थीं. हालांकि 57 वर्षीय राजविंदर कौर की देखभाल के लिए गांव के घर में उस की भाभी शगुनप्रीत कौर थी, लेकिन भाभी पर उसे भरोसा नहीं था.

कुलदीप के पति मनमोहन सिंह ने उसे कई बार समझाया भी था कि बेकार में चिंता करने से कोई फायदा नहीं है. अगर मन इतना ही परेशान है तो इंडिया का चक्कर लगा आओ. वहां अपनी मां से मिल लेना. लेकिन समस्या यह थी कि उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी. डाक्टरों ने ऐसी हालत में हवाई यात्रा करने से मना कर रखा था. बहरहाल, इसी उधेड़बुन में कुलदीप कौर के दिन गुजर रहे थे.

भरापूरा परिवार था बलदेव सिंह का

कुलदीप कौर मूलत: गांव बुट्टर सिविया, थाना मेहता, जिला अमृतसर, पंजाब की रहने वाली थी. उस के जीवन के 16 बसंत भी अपने गांव बुट्टर में ही गुजरे थे. गांव में रहते ही उस ने जवानी की दहलीज पर पांव रखे थे. कुलदीप का छोटा सा परिवार था. पिता बलदेव सिंह और मां राजविंदर कौर के अलावा उस के 2 भाई थे गगनदीप सिंह और सरबजीत सिंह. तीनों भाईबहनों का आपस में बहुत प्यार था. वे तीनों बहनभाई कम दोस्त ज्यादा लगते थे. आपस में इन की कोई बात एकदूसरे से छिपी नहीं रहती थी.

बलदेव सिंह जाट सिख किसान थे. उन के पास खेती की ज्यादा जमीन तो नहीं थी, पर जितनी थी वह परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए काफी थी. इसीलिए बलदेव सिंह ने अपने तीनों बच्चों को सिर उठा कर आजादी से जीना सिखाया था. उन्होंने तीनों बच्चों को अपनी हैसियत के हिसाब से पढ़ाया था. बच्चों के लिए अभी वह और भी बहुत कुछ करना चाहते थे, पर साल 2002 में उन की मौत हो गई. बलदेव सिंह की मौत के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारियां राजविंदर कौर के कंधे पर आ गई थीं. उस वक्त उन का बड़ा बेटा गगनदीप जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका था. वह मां का हाथ बंटा कर उस का सहारा बन गया. घर की गाड़ी फिर से अपनी स्पीड से दौड़ने लगी थी.

साल 2008 इस परिवार के लिए अच्छा साबित हुआ. इसी साल कुलदीप कौर के लिए एक अच्छे परिवार का रिश्ता आया, लड़के का नाम मनमोहन सिंह था. वह अच्छे घर का पढ़ालिखा गबरू जाट था और आस्ट्रेलिया में अपना कारोबार करता था. राजविंदर कौर को मनमोहन और उस का परिवार कुलदीप के लिए पसंद आया. कुलदीप को भी मनमोहन सिंह पसंद था. दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद सन 2008 में कुलदीप कौर और मनमोहन सिंह की शादी धूमधाम से संपन्न हो गई. इस शादी से सभी लोग खुश थे.

अचानक हो गई गगनदीप की मौत

खुशी का माहौल था, पर कहीं अनहोनी मुंह पसारे इस परिवार की खुशियों को लीलने के लिए घात लगाए बैठी थी. कुलदीप की शादी के कुछ दिनों बाद ही इस परिवार को तब बड़ा झटका लगा, जब अचानक गगनदीप की मौत हो गई.

गगनदीप की मौत का सदमा उस की मां राजविंदर कौर और उस के छोटे भाईबहन को भीतर तक तोड़ गया. कुलदीप की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे नाजुक मौके पर वह अपनी मां और छोटे भाई सरबजीत को अकेला छोड़ कर पति के साथ आस्ट्रेलिया जाए या यहीं रह कर उन का साथ दे.
संसार का नियम है, यहां लोग आतेजाते हैं, सब कुछ समय की गति से चलता रहता है. जबकि समय का चक्र और संसार के कामकाज कभी नहीं रुकते. वक्त का मरहम बड़े से बड़ा घाव भर देता है. बहरहाल, अपनी मां और भाई को दिलासा दे कर कुलदीप कौर अपने पति मनमोहन सिंह के साथ आस्ट्रेलिया चली गई. कुलदीप को आस्ट्रेलिया गए 10 साल बीत गए थे.

इस बीच वह सरताज सिंह और सम्राट सिंह 2 बच्चों की मां बन गई थी. उस के पीछे मायके में छोटे भाई सरबजीत सिंह की भी शगुनप्रीत कौर के साथ शादी हो गई थी. सरबजीत भी 2 बच्चों बेटी मनतलब कौर और बेटे वारिसदीप सिंह का बाप बन गया था. कुलदीप की अपनी मां और भाई से हर हफ्ते फोन पर बातें होती रहती थीं. सभी अपनीअपनी जिंदगी में मशगूल थे कि साल 2015 की एक मनहूस खबर ने कुलदीप को अंदर तक तोड़ कर रख दिया. इस घटना से राजविंदर कौर की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई थी. उसे अपने पति और बड़े बेटे गगनदीप की मौत का इतना दुख नहीं हुआ था, जितना दुख सरबजीत की मौत का हुआ.

सरबजीत की मौत बड़े रहस्यमय तरीके से हुई थी. वह रात को खाना खा कर ऐसा सोया कि सोता ही रह गया. सरबजीत अपने परिवार का एकमात्र सहारा था. उस की मौत से परिवार की गाड़ी पूरी तरह लड़खड़ा गई. वक्त ने ताजा जख्मों पर एक बार फिर से मरहम लगाया. राजविंदर कौर ने अपने आप को पूरी तरह से अकेला मान कर जीना सीख लिया था. समय का चक्र फिर से अपनी रफ्तार से चलने लगा. कुलदीप मां को फोन करकर के सांत्वना देती रहती थी. सैकड़ों मील दूर बैठी कुलदीप और कर भी क्या सकती थी. इसी तरह दिन गुजरते गए थे और साल 2016 आ गया.
दूसरे बेटे की मौत से टूट गई मां

कुलदीप कौर ने महसूस किया कि सरबजीत सिंह की मौत के बाद गांव से उस की मां के जो फोन आते थे, वह काफी मायूसी भरे होते थे. सुन कर कुलदीप को ऐसा लगता था, जैसे उस की मां बहुत परेशान और दुखी हैं. उस ने बहुत बार मां से इस बारे में पूछा भी था, पर मां ने उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था. वह बहुत दुखी लग रही थीं. ज्यादा कुरेद कर पूछने पर राजविंदर ने सिर्फ इतना ही बताया कि पिछले कुछ समय से शगुन का चालचलन ठीक नहीं है.

कुलदीप कौर ने जब शगुन से इस बारे में बात की तो उस ने बताया, ‘‘दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है. बीजी को एक तो बेटे की मौत का सदमा है, ऊपर से अकेलापन परेशान करता है. कभीकभी शुगर की बीमारी की वजह से भी उन्हें घबराहट होने लगती है. आप चिंता न करें, मैं सब संभाल लूंगी.’’

शगुन की गोलमोल बातें कुलदीप की समझ से बाहर थीं. वह अच्छी तरह जानती थी कि शगुन बहुत चालाक है. वह सच्ची बात कभी नहीं बताएगी. इसीलिए कुलदीप ने अपने गांव के कुछ खास लोगों को फोन कर के विनती की कि वे उस के घर हो रहे क्रियाकलापों पर नजर रखें. गांव के जानकार लोगों ने कुलदीप कौर की बात मान कर राजविंदर के घर पर नजर रखनी शुरू कर दी.

बाद में उन्होंने कुलदीप को बताया कि उस की मां के घर में सामने से तो सब कुछ ठीक नजर आता है. शगुन लोगों के सामने तो राजविंदर कौर का बहुत खयाल रखती है. बाकी उन की पीठ पीछे घर में सासबहू का आपस में कैसा बर्ताव है, कुछ कहा नहीं जा सकता. बहरहाल, ऐसा जवाब सुन कर कुलदीप कौर मन मसोस कर रह जाती थी और अपनी मां की सलामती की दुआ करती थी.

29 अक्तूबर, 2016 को शगुन ने कुलदीप कौर को आस्ट्रेलिया फोन कर के खबर दी कि बीजी का देहांत हो गया है. शगुन ने मौत की वजह राजविंदर का शुगर लेवल कम हो जाना बताया था. उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी, डाक्टरों ने उसे यात्रा के लिए मना कर रखा था सो अपने घर के एकांत में कुलदीप ने छाती पीट कर मां की मौत का मातम मना लिया. अब उस के मायके के परिवार में सिवाय उस के कोई और नहीं बचा था. राजविंदर की मौत के बाद 2-4 बार शगुन के फोन उसे आए थे, पर वह बिना सिरपैर की बातें ही किया करती थी. एक बात थी जो हर समय कुलदीप को परेशान कर रही थी. उसे हर समय ऐसा लगता था जैसे उस की मां की मौत स्वाभाविक नहीं थी. जरूर उस के साथ कोई अनहोनी घटी थी, पर क्या हुआ और कैसे यह बात उस की समझ में नहीं आती थी.

मां सरबजीत की मौत के बाद शगुन गांव की कोठी और सारी जमीन की मालकिन बन गई थी. कुलदीप अकसर यह भी सोचा करती थी कि कहीं उस की मां की मौत किसी षडयंत्र की वजह से तो नहीं हुई.
बहरहाल, कुलदीप ने एक बार फिर से अपने गांव के भरोसेमंद लोगों से अपनी मां की मौत से परदा उठाने के लिए विनती की. इस बात का पता लगाने में गांव के कुछ खास लोगों को पौने 2 साल का समय लग गया.

जुलाई 2018 में कुलदीप कौर को सूचना मिली थी कि उस की मां राजविंदर कौर की मौत में उस की भाभी शगुन का हाथ था. यह सुन कर वह ज्यादा हैरान नहीं हुई, क्योंकि उसे शगुन पर शुरू से ही शक था. यह तो दूर का मामला था, अगर वह कहीं पास होती तो कब की अपनी मां की मौत से परदा उठा देती.
खैर, अब भी देर नहीं हुई थी और अब वह पूरी तरह से यात्रा करने लायक थी. बीती जुलाई के दूसरे सप्ताह में वह आस्ट्रेलिया से भारत अपने गांव पंजाब पहुंच गई. जब अपने मायके के घर पहुंच कर उस ने वहां का नजारा देखा तो हैरान रह गई. उस की मां के घर 2 अनजान आदमी बैठे शगुन के साथ हंसीमजाक कर रहे थे.

गुस्से से बिफरते हुए जब कुलदीप कौर ने पूछा, ‘‘भाभी, ये लोग कौन हैं?’’ तो शगुन ने मिमियाते हुए जवाब दिया, ‘‘दीदी, तुम्हारे भाई की मौत के बाद ये दोनों खेतों में काम करने में मदद करते हैं.’’

कुलदीप को शक हुआ भाभी पर

कुलदीप अच्छी तरह जानती थी कि शगुन जो बता रही है, बात वह नहीं है. पर उस वक्त उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा. कुलदीप के आने की वजह से वे दोनों व्यक्ति वहां से चले गए. अगले दिन सुबह उठ कर कुलदीप नहाईधोई और गुरुद्वारे चली गई. अरदास के बाद वह अपने मौसा हरदयाल सिंह को साथ ले कर सीधे एसएसपी (देहात) अमृतसर परमपाल सिंह के पास जा पहुंची. कुलदीप ने अपनी मां की हत्या का शक जताते हुए उन्हें बताया कि मां की मौत में उस की भाभी और कुछ अन्य लोगों का हाथ है.

एसएसपी परमपाल सिंह ने कुलदीप द्वारा दिए प्रार्थनापत्र पर नोट लिख कर उसे संबंधित थाना मेहता भेज दिया. साथ ही उन्होंने थानाप्रभारी अमनदीप सिंह को फोन कर आदेश दिया कि इस मामले की गुत्थी जल्द से जल्द सुलझाएं. कुलदीप कौर ने उसी दिन थानाप्रभारी अमनदीप से मिल कर आस्ट्रेलिया जाने से ले कर अपनी गैरहाजिरी में अपने भाई और मां की मौत का सारा हाल विस्तार से कह सुनाया. कुलदीप कौर की पूरी बात सुनने के बाद अमनदीप सिंह ने तत्काल अपने खास मुखबिरों को शगुन और उस के साथियों की कुंडली खंगालने के काम पर लगा दिया. जल्दी ही उन्हें रिपोर्ट भी मिल गई.

एसएसपी के आदेश पर उन्होंने कुलदीप कौर की शिकायत को आधार बना कर उसी दिन यानी 30 जुलाई, 2018 को राजविंदर कौर की हत्या का मुकदमा भादंसं की धारा 302, 201, 120बी और 34 पर दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी. अमनदीप सिंह ने उसी दिन एएसआई कमलबीर सिंह, हवलदार जतिंदर सिंह, महिंदरपाल सिंह, कांस्टेबल महकप्रीत सिंह और लेडी हवलदार हरजिंदर कौर को साथ ले कर बुट्टर गांव पहुंचे और देर शाम शगुनप्रीत कौर और उस के आशिक सतनाम सिंह को हिरासत में ले लिया.

हत्या के इस मामले का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह भाग निकला था. संभवत: उसे पुलिस काररवाई की भनक लग गई थी. जसबीर की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही थी, पर वह पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस ने की काररवाई

थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने जब शगुनप्रीत और सतनाम सिंह से पूछताछ की तो दोनों आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. इस के बाद उसी दिन राजविंदर कौर की हत्या के आरोप में शगुन और सतनाम सिंह को अदालत में पेश कर आगामी पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान पूछताछ में राजविंदर की मौत की जो कहानी पता चली, वह कुछ इस तरह थी—
शगुनप्रीत कौर बचपन से ही दिलफेंक और महत्त्वाकांक्षी थी. शादी से पहले अपने गांव में उस के कई युवकों के साथ नाजायज संबंध थे.

अपने पति सरबजीत की मौत से पहले भी उस का गांव के कई युवकों के साथ नैनमटक्का चल रहा था, पर परदे के पीछे. क्योंकि तब उसे अपने पति का डर था.
लेकिन पति की मौत के बाद उस ने सरेआम यारियां जोड़नी शुरू कर दी थीं. अब उसे रोकनेटोकने वाला नहीं था. शगुन के अपने गांव के ही एक युवक सतनाम सिंह के साथ नाजायज संबंध बन गए थे. सतनाम आवारा आदमी था और नशीली वस्तुएं बेचता था.

शगुन ने प्रेमी के साथ बनाई योजना

जसबीर सिंह सतनाम के नशे के धंधे में उस का भागीदार था. उसे जब शगुन और सतनाम के संबंधों का पता चला तो बहती गंगा में हाथ धोने के लिए वह भी मचलने लगा. शगुन को इस बात से कोई ऐतराज नहीं था, बल्कि वह खुश थी कि उस के 2-2 चाहने वाले हैं. सरबजीत की मौत के बाद सतनाम सिंह शगुन के ही घर पर रहने लगा था.

यह बात राजविंदर को मंजूर नहीं थी. सतनाम के वहां रहने का वह विरोध करती थी. शगुन अपनी मनमानी पर उतर आई थी. उसे न तो सास का कोई डर था और न शरम. वह तो बस हवा में उड़ी चली जा रही थी.
जब राजविंदर कौर का विरोध बढ़ गया तो शगुन ने उसे रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. इस के 2 फायदे थे, एक तो राजविंदर की मौत के बाद उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं रहता और दूसरे सारी जमीनजायदाद उस के नाम हो जाती.

यह अलग बात थी कि राजविंदर की मौत के बाद सब कुछ उसे ही मिलने वाला था, पर उसे सब्र नहीं था. दूसरे उसे यह भी डर था कि मरने से पहले राजविंदर जायदाद किसी और के नाम न कर जाएं.
शगुनप्रीत और उस के आशिक सतनाम सिंह ने मिल कर राजविंदर कौर की हत्या की योजना बनाई. इस के लिए उन्होंने गांव के ही जसबीर सिंह को चुना और उसे ढाई लाख रुपए देने का वादा कर के तैयार कर लिया.

अपनी योजना के अनुसार, 28 अक्तूबर 2016 की आधी रात को तीनों ने मिल कर सोते समय राजविंदर कौर को गला दबा कर मार डाला. अगली सुबह योजना के तहत शगुन ने कुछ देर गांव वालों के सामने राजविंदर की बीमारी का नाटक रचा और बाद में शोर मचा कर यह खबर फैला दी कि शुगर लेवल कम होने की वजह से राजविंदर की मौत हो गई है. इतना ही नहीं, वह इतनी शातिर निकली कि रिश्तेदारों को बताए बिना ही जल्दबाजी में गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर सास का अंतिम संस्कार भी करा दिया. बाद में उस ने कुलदीप कौर को भी फोन कर के इस की खबर दे दी थी.

राजविंदर कौर की हत्या की योजना में शगुन और सतनाम सिंह ने ढाई लाख रुपए की सुपारी दे कर जसबीर को अपने साथ शामिल तो कर लिया था, पर हत्या के बाद उन्होंने उसे पैसे देने से इनकार कर दिया था. जसबीर काफी समय तक उन से पैसे मांगता रहा, जब उन्होंने पैसे देने से बिलकुल इनकार कर दिया तो गुस्से में आ कर उस ने गांव के कुछ लोगों के सामने इस बात का खुलासा कर दिया. गांव वाले पहले से ही तीनों पर नजर रखे हुए थे, सो उन्होंने यह खबर फोन द्वारा कुलदीप को दे दी.

रिमांड की अवधि समाप्त होने पर थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने शगुनप्रीत कौर और उस के प्रेमी सतनाम सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. इस अपराध का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह फरार था. Family Dispute

पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories: आखिरी फैसला – साधना बनी अपनों की कातिल

Crime Stories: उस दिन सितंबर, 2020 की 10 तारीख थी. साधना ने फैसला कर रखा था कि मां का बताया व्रत जरूर रखेगी. मां के अनुसार, इस व्रत से सुंदर स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति होती है. लेकिन व्रत रखने से पहले ही लेबर पेन शुरू हो गया.

इस में उस के अपने वश में कुछ नहीं था, क्योंकि उसे 2 दिन बाद की तारीख बताई गई थी. निश्चित समय पर वह मां बनी, लेकिन पुत्र नहीं पुत्री की. तीसरी बार भी बेटी आई है, सुन कर सास विमला का गुस्से से सिर भन्ना गया. वह सिर झटक कर वहां से चली गई. बच्ची के जन्म पर मां बिटोली आ गई थी. उस ने साधना को समझाया, ‘‘जी छोटा मत कर. बेटी लक्ष्मी का रूप होती है. क्या पता इस की किस्मत से मिल कर तेरी किस्मत बदल जाए.’’बेटी के मन पर छाई उदासी पर पलटवार करने के लिए मां बिटोली बोली, ‘‘आजकल बेटेबेटी में कोई फर्क नहीं होता. तेरी सास के दिमाग में पता नहीं कैसा गोबर भरा है जो समझती ही नहीं या जानबूझ कर समझना नहीं चाहती.’’

साधना क्या कर सकती थी. 2 की तरह तीसरी को भी किस्मत मान लिया. उसे भी बाकी 2 की तरह पालने लगी. वह भी बहनों की तरह बड़ी होने लगी.उस दिन अक्तूबर 2020 की पहली तारीख थी. सेहुद गांव निवासी कुलदीप खेतों से घर लौटा, तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खुलवाने के लिए कुंडी खटखटाई, पर पत्नी ने दरवाजा नहीं खोला. घर के अंदर से टीवी चलने की आवाज आ रही थी. उस ने सोचा शायद टीवी की तेज आवाज में उसे कुंडी खटकने की आवाज सुनाई न दी हो. उस ने एक बार फिर कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी लगाई. पर अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. कुलदीप का माथा ठनका. मन में घबराहट भी होने लगी.

उस के घर के पास ही भाई राहुल का घर था तथा दूसरी ओर पड़ोसी सुदामा का घर. भाई घर पर नहीं था. वह सुदामा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘चाचा, साधना न तो दरवाजा खोल रही है और न ही कोई हलचल हो रही है. मेरी मदद करो.’’

कुलदीप पड़ोसी सुदामा को साथ ले कर भाई राहुल के घर की छत से हो कर अपने घर में घुसा. दोनों कमरे के पास पहुंचे तो मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर छत की धन्नी से लोहे के कुंडे के सहारे चार लाशें फांसी के फंदे पर झूल रही थीं. लाशें कुलदीप की पत्नी साधना और उस की बेटियों की थीं. कुलदीप और सुदामा घर का दरवाजा खोल कर बाहर आए और इस हृदयविदारक घटना की जानकारी पासपड़ोस के लोगों को दी. उस के बाद तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई और लोग कुलदीप के घर की ओर दौड़ पड़े. देखते ही देखते घर के बाहर भीड़ उमड़ पड़ी. जिस ने भी इस मंजर को देखा, उसी का कलेजा कांप उठा.

कुलदीप बदहवास था, लेकिन सुदामा का दिलोदिमाग काम कर रहा था. उस ने सब से पहले यह सूचना साधना के मायके वालों को दी, फिर थाना दिबियापुर पुलिस को.पुलिस आने के पहले ही साधना के मातापिता, भाई व अन्य घर वाले टै्रक्टर पर लद कर आ गए. उन्होंने साधना व उस की मासूम बेटियोें को फांसी के फंदे पर झूलते देखा तो उन का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने कुलदीप व उस के पिता कैलाश बाबू के घर जम कर उत्पात मचाया. घर में टीवी, अलमारी के अलावा जो भी सामान मिला तोड़ डाला. साधना के सासससुर, पति व देवर के साथ हाथापाई की.

साधना के मायके के लोग अभी उत्पात मचा ही रहे थे कि सूचना पा कर थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा पुलिस टीम के साथ आ गए. उन्होंने किसी तरह समझाबुझा कर उन्हें शांत किया. चूंकि घटनास्थल पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, अत: थानाप्रभारी मिश्रा ने इस घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी और घटनास्थल पर अतिरिक्त पुलिस बल भेजने की सिफारिश की. इस के बाद वह भीड़ को हटाते हुए घर में दाखिल हुए. घर के अंदर आंगन से सटा एक बड़ा कमरा था. इस कमरे के अंदर का दृश्य बड़ा ही डरावना था. कमरे की छत की धन्नी में लोहे का एक कुंडा था. इस कुंडे से 4 लाशें फांसी के फंदे से झूल रही थीं.

मरने वालो में कुलदीप की पत्नी साधना तथा उस की 3 मासूम बेटियां थीं. साधना की उम्र 30 साल के आसपास थी, जबकि उस की बड़ी बेटी गुंजन की उम्र 7 साल, उस से छोेटी अंजुम थी. उस की उम्र 5 वर्ष थी. सब से छोेटी पूनम की उम्र 2 माह से भी कम लग रही थी. साड़ी के 4 टुकड़े कर हर टुकड़े का एक छोर कुंडे में बांध कर फांसी लगाई गई थी. कमरे के अंदर लकड़ी की एक छोटी मेज पड़ी थी. संभवत: उसी मेज पर चढ़ कर फांसी का फंदा लगाया गया था.

थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी सुनीति तथा एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित कई थानों की पुलिस ले कर घटनास्थल आ गए.उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने तनाव को देखते हुए सेहुद गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया. उस के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया. मां सहित मासूमों की लाश फांसी के फंदे पर झूलती देख कर एसपी सुनीति दहल उठीं. उन्होंने तत्काल लाशों को फंदे से नीचे उतरवाया. उस समय माहौल बेहद गमगीन हो उठा.मृतका साधना के मायके की महिलाएं लाशों से लिपट कर रोने लगीं. सुनीति ने महिला पुलिस की मदद से उन्हें समझाबुझा कर शवों से दूर किया.

फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. घटनास्थल पर मृतका का भाई बृजबिहारी तथा पिता सिपाही लाल मौजूद थे. पुलिस अधिकारियों ने उन से पूछताछ की तो बृजबिहारी ने बताया कि उस की बहन साधना तथा मासूम भांजियों की हत्या उस के बहनोई कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू, भाई राहुल तथा मां विमला देवी ने मिल कर की है.जुर्म छिपाने के लिए शवों को फांसी पर लटका दिया है. अत: जब तक उन को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक वे शवों को नहीं उठने देंगे. सिपाही लाल ने भी बेटे की बात का समर्थन किया.

बृजबिहारी की इस धमकी से पुलिस के माथे पर बल पड़ गए. लेकिन माहौल खराब न हो, इसलिए पुलिस ने मृतका के पति कुलदीप, ससुर कैलाश बाबू, सास विमला देवी तथा देवर राहुल को हिरासत में ले लिया तथा सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें थाना दिबियापुर भिजवा दिया. सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप के पड़ोसी सुदामा से पूछताछ की. सुदामा ने बताया कि कुलदीप जब खेत से घर आया था, तो घर का दरवाजा बंद था. दरवाजा पीटने और आवाज देने पर भी जब उस की पत्नी साधना ने दरवाजा नहीं खोला, तब वह मदद मांगने उस के पास आया. उस के बाद वे दोनों छत के रास्ते घर के अंदर कमरे में गए, जहां साधना बेटियों सहित फांसी पर लटक रही थी.

सुदामा ने कहा कि कुलदीप ने पत्नी व बेटियों को नहीं मारा बल्कि साधना ने ही बेटियों को फांसी पर लटकाया और फिर स्वयं भी फांसी लगा ली. निरीक्षण और पूछताछ के बाद एसपी सुनीति ने मृतका साधना व उस की मासूम बेटियों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए औरैया जिला अस्पताल भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने कड़ी सुरक्षा के बीच चारों शवों का पोस्टमार्टम किया, वीडियोग्राफी भी कराई गई. इस के बाद रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मासूम गुंजन, अंजुम व पूनम की हत्या गला दबा कर की गई थी, जबकि साधना ने आत्महत्या की थी. रिपोर्ट से स्पष्ट था कि साधना ने पहले अपनी तीनों मासूम बेटियों की हत्या की फिर बारीबारी से उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया. उस के बाद स्वयं भी उस ने फांसी के फंदे पर लटक कर आत्महत्या कर ली. उस ने ऐसा शायद इसलिए किया कि वह मरतेमरते भी जिगर के टुकड़ों को अपने से दूर नहीं करना चाहती थी.

थाने पर पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप तथा उस के मातापिता व भाई से पूछताछ की. कुलदीप के पिता कैलाश बाबू ने बताया कि कुलदीप व साधना के बीच अकसर झगड़ा होता था, जिस से आजिज आ कर उन्होंने कुलदीप का घर जमीन का बंटवारा कर कर दिया था. वह छोटे बेटे राहुल के साथ अलग रहता है. उस का कुलदीप से कोई वास्ता नहीं था. पूछताछ के बाद पुलिस ने कैलाश बाबू उस की पत्नी विमला तथा बेटे राहुल को थाने से घर जाने दिया, लेकिन मृतका साधना के भाई बृजबिहारी की तहरीर पर कुलदीप के खिलाफ भादंवि की धारा 309 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में घर कलह की सनसनीखेज घटना सामने आई.

गांव अमानपुर, जिला औरेया का सिपाही लाल दिबियापुर में रेलवे ठेकेदार के अधीन काम करता था. कुछ उपजाऊ जमीन भी थी, जिस से उस के परिवार का खर्च आसानी से चलता था. सिपाही लाल की बेटी साधना जवान हुई तो उस ने 12 फरवरी, 2012 को उस की शादी सेहुद गांव निवासी कैलाश बाबू के बेटे कुलदीप के साथ कर दी. लेकिन कुलदीप की मां विमला न बहू से खुश थी, न उस के परिवार से.

साधना और कुलदीप ने जैसेतैसे जीवन का सफर शुरू किया. शादी के 2 साल बाद साधना ने एक बेटी गुंजन को जन्म दिया. गुंजन के जन्म से साधना व कुलदीप तो खुश थे, लेकिन साधना की सास विमला खुश नहीं थी, क्योंकि वह पोते की आस लगाए बैठी थी. बेटी जन्मने को ले कर वह साधना को ताने कसने लगी थी. घर की मालकिन विमला थी. बापबेटे जो कमाते थे, विमला के हाथ पर रखते थे. वही घर का खर्च चलाती थी. साधना को भी अपने खर्च के लिए सास के आगे ही हाथ फैलाना पड़ता था. कभी तो वह पैसे दे देती थी, तो कभी झिड़क देती थी. तब साधना तिलमिला उठती थी. साधना पति से शिकवाशिकायत करती, तो वह उसे ही प्रताडि़त करता.

गुंजन के जन्म के 2 साल बाद साधना ने जब दूसरी बेटी अंजुम को जन्म दिया तो लगा जैसे उस ने कोई गुनाह कर दिया हो. घर वालों का उस के प्रति रवैया ही बदल गया. सासससुर, पति किसी न किसी बहाने साधना को प्रताडि़त करने लगे. सास विमला आए दिन कोई न कोई ड्रामा रचती और झूठी शिकायत कर कुलदीप से साधना को पिटवाती. विमला को साधना की दोनों बेटियां फूटी आंख नहीं सुहाती थीं. वह उन्हें दुत्कारती रहती थी.

बेटियों के साथसाथ वह साधना को भी कोसती, ‘‘हे भगवान, मेरे तो भाग्य ही फूट गए जो इस जैसी बहू मिली. पता नहीं मैं पोते का मुंह देखूंगी भी या नहीं.’’

धीरेधीरे बेटियों को ले कर घर में कलह बढ़ने लगी. कुलदीप और साधना के बीच भी झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साधना मायके चली गई. जब कई माह तक वह ससुराल नहीं आई, तो विमला की गांव में थूथू होने लगी. बदनामी से बचने के लिए उस ने पति कैलाश बाबू को बहू को मना कर लाने को कहा. कैलाश बाबू साधना को मनाने उस के मायके गए. वहां उन्होंने साधना के मातापिता से बातचीत की और साधना को ससुराल भेजने का अनुरोध किया, लेकिन साधना के घर वालों ने प्रताड़ना का आरोप लगा कर उसे भेजने से साफ मना कर दिया.

मुंह की खा कर कैलाश बाबू लौट आए. उन्होंने वकील से कानूनी सलाह ली और फिर साधना को विदाई का नोटिस भिजवा दिया. इस नोटिस से साधना के घर वाले तिलमिला उठे और उन्होंने साधना के मार्फत थाना सहायल में कुलदीप तथा उस के घर वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के अलावा औरैया कोर्ट में कुलदीप के खिलाफ भरणपोषण का मुकदमा भी दाखिल कर दिया. जब कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू को घरेलू हिंसा और भरणपोषण के मुकदमे की जानकारी हुई तो वह घबरा उठे. गिरफ्तारी से बचने के लिए कैलाश बाबू समझौते के लिए प्रयास करने लगे. काफी मानमनौव्वल के बाद साधना राजी हुई. कोर्ट से लिखापढ़ी के बाद साधना ससुराल आ कर रहने लगी.

कुछ माह बाद कैलाश बाबू ने घर, जमीन का बंटवारा कर दिया. उस के बाद साधना पति कुलदीप के साथ अलग रहने लगी. साधना पति के साथ अलग जरूर रहने लगी थी, लेकिन उस का लड़नाझगड़ना बंद नहीं हुआ था. सास के ताने भी कम नहीं हुए थे. वह बेटियों को ले कर अकसर ताने मारती रहती थी. कभीकभी साधना इतना परेशान हो जाती कि उस का मन करता कि वह आत्महत्या कर ले. लेकिन बेटियों का खयाल आता तो वह इरादा बदल देती.

10 सितंबर, 2020 को साधना ने तीसरी संतान के रूप में भी बेटी को ही जन्म दिया, नाम रखा पूनम. पूनम के जन्म से घर में उदासी छा गई. सब से ज्यादा दुख विमला को हुआ. उस ने फिर से साधना को ताने देने शुरू कर दिए. छठी वाले दिन साधना की मां विटोली भी आई. उस रोज विमला और विटोली के बीच खूब नोंकझोंक हुई. सास के ताने सुनसुन कर साधना रोती रही. विटोली बेटी को समझा कर चली गई. उस के बाद साधना उदास रहने लगी. वह सोचने लगी क्या बेटी पैदा होना अभिशाप है? अब तक साधना सास के तानों और पति की प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी.

अत: वह आत्महत्या करने की सोचने लगी. लेकिन खयाल आया कि अगर उस ने आत्महत्या कर ली तो उस की मासूम बेटियों का क्या होगा. उस का पति शराबी है, वह उन की परवरिश कैसे करेगा. वह या तो बेटियों को बेच देगा या फिर भूखे भेडि़यों के हवाले कर देगा. सोचविचार कर साधना ने आखिरी फैसला लिया कि वह मासूम बेटियों को मार कर बाद में आत्महत्या करेगी.1 अक्तूबर, 2020 की सुबह 7 बजे कुलदीप खेत पर काम करने चला गया. उस के जाने के बाद साधना ने मुख्य दरवाजा बंद किया और टीवी की आवाज तेज कर दी. फिर उस ने साड़ी के 4 टुकड़े किए और इन के एकएक सिरे को मेज पर चढ़ कर छत की धन्नी में लगे लोहे के कुंडे में बांध दिया.

साड़ी के टुकड़ों के दूसरे सिरे को उस ने फंदा बनाया. उस समय गुंजन और अंजुम चारपाई पर सो रही थीं. साधना ने कलेजे पर पत्थर रख कर बारीबारी से गला दबा कर उन दोनों को मार डाला फिर उन के शवों को फांसी के फंदे पर लटका दिया. 21 दिन की मासूम पूनम का गला दबाते समय साधना के हाथ कांपने लगे आंखों से आंसू टपकने लगे. लेकिन जुनून के आगे ममता हार गई और उस ने उस मासूम को भी गला दबा कर मार डाला और फांसी के फंदे पर लटका दिया. इस के बाद वह स्वयं भी गले में फंदा डाल कर झूल गई.

घटना की जानकारी तब हुई जब कुलदीप घर वापस आया. पड़ोसी सुदामा ने घटना की सूचना मोबाइल फोन द्वारा थाना दिबियापुर पुलिस को दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा आ गए. उन्होंने शवों को कब्जे में ले कर जांच शुरू की तो घर कलह की घटना प्रकाश में आई. 2 अक्टूबर, 2020 को थाना दिबियापुर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को औरैया कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Crime Stories