Property Dispute: परिवार के 5 जनों को डसने वाला आस्तीन का सांप

Property Dispute: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मुरादनगर से सटा गांव है बसंतपुर सैंथली. यहां भी तेजी से शहरीकरण के चलते जमीनों के दाम आसमान छूने लगे हैं. बिल्डर आते हैं, किसानों को लुभाते हैं और उस भाव में खेतीकिसानी की जमीनों के सौदे करते हैं, जिस की उम्मीद किसानों ने कभी सपने में भी नहीं की होती.

एक बीघा के 50 लाख से ले कर एक करोड़ रुपए सुन कर किसानों का मुंह खुला का खुला रह जाता है कि इतना तो वे सौ साल खेती कर के भी नहीं कमा पाएंगे. और वैसे भी आजकल खेतीकिसानी खासतौर से छोटी जोत के किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित होने लगी है. लिहाजा वे एकमुश्त मिलने वाले मुंहमांगे दाम का लालच छोड़ नहीं पाते और जमीन बेच कर पास के किसी कसबे में बस जाते हैं. इसी गांव का एक ऐसा ही किसान है 48 वर्षीय लीलू त्यागी, जिस के हिस्से में पुश्तैनी 15 बीघा जमीन में से 5 बीघा जमीन आई थी. बाकी 10 बीघा 2 बड़े भाइयों सुधीर त्यागी और ब्रजेश त्यागी के हिस्से में चली गई थी.

जमीन बंटबारे के बाद तीनों भाई अपनीअपनी घरगृहस्थी देखने लगे और जैसे भी हो खींचतान कर अपने घर चलाते बच्चों की परवरिश करने लगे. बंटवारे के समय लीलू की शादी नहीं हुई थी, लिहाजा उस पर घरगृहस्थी के खर्चों का भार कम था. गांव के संयुक्त परिवारों में जैसा कि आमतौर पर होता है, दुनियादारी और रिश्तेदारी निभाने की जिम्मेदारी बड़ों पर होती है, इसलिए भी लीलू बेफिक्र रहता था और मनमरजी से जिंदगी जीता था. साल 2001 का वह दिन त्यागी परिवार पर कहर बन कर टूटा, जब सुधीर अचानक लापता हो गए. उन्हें बहुत ढूंढा गया पर पता नहीं चला कि उन्हें जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

कुछ दिनों की खोजबीन के बाद त्यागी परिवार ने तय किया कि सुधीर की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी जाए. लेकिन इस पर लीलू बड़ेबूढ़ों के से अंदाज में बोला, ‘‘इस से क्या होगा. उलटे हम एक नई झंझट में और फंस जाएंगे. पुलिस तरहतरह के सवाल कर हमें परेशान करेगी. हजार तरह की बातें समाज और रिश्तेदारी में होंगी. उस से तो अच्छा है कि उन का इंतजार किया जाए. हालांकि वह किसी बात को ले कर गुस्से में थे और मुझ से यह कह कर गए थे कि अब कभी नहीं आऊंगा.’’

परिवार वालों को लीलू की सलाह में दम लगा. वैसे भी अगर सुधीर के साथ कोई अनहोनी या हादसा हुआ होता तो उन की लाश या खबर मिल जानी चाहिए थी और वाकई पुलिस क्या  कर लेती. वह कोई दूध पीते बच्चे तो थे नहीं, जो घर का रास्ता भूल जाएं.  यह सोच कर सभी ने मामला भगवान भरोसे छोड़ दिया.  उन्हें चिंता थी तो बस उन की पत्नी अनीता और 2 नन्हीं बेटियों पायल और पारुल की, जिन के सामने पहाड़ सी जिंदगी पड़ी थी.

यह परेशानी भी वक्त रहते दूर हो गई, जब गांव में यह चर्चा शुरू हुई कि अब सुधीर के आने की तो कोई उम्मीद रही नहीं, अनीता कब तक उस की राह ताकती रहेगी. इसलिए अगर लीलू उस से शादी कर ले तो उन्हें सहारा और बेटियों को पिता मिल जाएगा. घर की खेती भी घर में रहेगी. गांव और रिश्ते के बड़ेबूढ़ों का सोचना ऐसे मामले में बहुत व्यावहारिक यह रहता है कि जवान औरत कब तक बिना मर्द के रहेगी. आज नहीं तो कल उस का बहकना तय है, इसलिए बेहतर है कि अगर देवरभाभी दोनों राजी हों तो उन की शादी कर दी जाए.

बात निकली तो जल्द उस पर अमल भी हो गया. एक सादे समारोह में लीलू और अनीता की शादी हो गई जो कोई नई बात भी नहीं थी. क्योंकि गांवों में ऐसी शादियां होना आम बात है, जहां देवर ने विधवा भाभी से शादी की हो. इतिहास भी ऐसी शादियों से भरा पड़ा है. देखते ही देखते अपने देवर की पत्नी बन अनीता विधवा से फिर सुहागन हो गई और वाकई में पारुल और पायल को चाचा के रूप में पिता मिल गया. इस के बाद तो बड़े भाई सुधीर की जमीन भी लीलू की हो गई. जल्द ही लीलू और अनीता के यहां बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम विभोर रखा गया. घर में सब उसे प्यार से शैंकी कहते थे.

कभीकभार जरूर गांव के कुछ लोगों में यह चर्चा हो जाती थी कि चलो जो हुआ सो अच्छा हुआ, लेकिन कभी सुधीर अगर वापस आ गया तो क्या होगा. मुमकिन है जी उचट जाने से वह साधुसंन्यासियों की टोली में शामिल हो गया हो और वहां से भी जी उचटने के कारण कभी घर आ जाए. फिर अनीता किस की पत्नी कहलाएगी? सवाल दिलचस्प था, जिस का मुकम्मल जबाब किसी के पास नहीं था. पर एक शख्स था जो बेहतर जानता था कि सुधीर अब कभी वापस नहीं आएगा. वह शख्स था लीलू.

इसी तरह 5 साल गुजर गए. अब सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही साल 2006 में पारुल की मृत्यु हो गई. घर और गांव वाले कुछ सोचसमझ पाते, इस के पहले ही लीलू ने कहा कि उसे किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था और आननफानन में उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया. गांवों में ऐसे यानी सांप वगैरह के काटे जाने के हादसे भी आम होते हैं, इसलिए कोई यह नहीं सोच पाया कि यह कोई सामान्य मौत नहीं, बल्कि सोचसमझ कर की गई हत्या है. और आगे भी त्यागी परिवार में ऐसी हत्याएं होती रहेंगी, जो सामान्य या हादसे में हुई मौत लगेंगी और हैरानी की बात यह भी रहेगी किसी भी मामले में न तो लाश मिलेगी और न ही किसी थाने में रिपोर्ट दर्ज होगी.

इस के 3 साल बाद ही पायल भी रहस्यमय ढंग से गायब हो गई तो मानने वाले इसे होनी मानते रहे. लेकिन अनीता अपनी दोनों बेटियों की मौत का सदमा झेल नहीं पाई और बीमार रहने लगी, जिस का इलाज भी लीलू ने कराया. अब सुधीर की जमीन का कोई वारिस नहीं बचा था, सिवाय अनीता के, जो अब हर तरह से लीलू और बड़े होते शैंकी की मोहताज रहने लगी थी. लीलू की तो जान ही अपने बेटे में बसती थी और वह उसे चाहता भी बहुत था. लेकिन यह नहीं देख पा रहा था कि उस के लाड़प्यार के चलते शैंकी गलत राह पर निकल पड़ा है.

और देख भी कैसे पाता क्योंकि वह खुद ही एक ऐसे रास्ते पर चल रहा था, जिसे कलयुग का महाभारत कहा जा सकता है और वह उस का धृतराष्ट्र है, जो पुत्र मोह में अंधा हो गया था. इसी अंधेपन का नतीजा था कि बीती 9 जुलाई को लीलू गाजियाबाद के सिहानी गेट थाने में पुलिस वालों के सामने खड़ा गिड़गिड़ा रहा था कि शैंकी मेरा इकलौता बेटा है, आप जितने चाहो पैसे ले लो लेकिन उसे छोड़ दो. बेटा छूट जाए, इस के लिए वह 10 लाख रुपए देने को तैयार था. लेकिन जुर्म की दुनिया में दाखिल हो चुके बिगड़ैल शैंकी ने जुर्म भी मामूली नहीं किया था, लिहाजा उस का यूं छूटना तो नामुमकिन बात थी.

दरअसल, शैंकी ने केन्या की एक लड़की, जिस का नाम रोजमेरी वाजनीरू है, से 7 जुलाई को 12 हजार रुपए नकद और एक मोबाइल फोन लूटा था. रोजमेरी से उस का संपर्क सोशल मीडिया के जरिए हुआ था. जब वह दिल्ली आई तो शैंकी बहाने से उसे अपनी कार में बैठा कर गाजियाबाद ले गया और हथियार दिखा कर लूट की इस वारदात को अंजाम दिया. दूसरे दिन सुबह रोजमेरी ने सिहानी गेट थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई तो शैंकी पकड़ा गया. वारदात में उस का साथ देने वाला शुभम भी गिरफ्तार किया गया था. वह भी मुरादनगर का रहने वाला है.

दोनों से वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार, 11 हजार रुपए नकद और वह कार भी बरामद की गई थी, जिस में बैठा कर रोजमेरी से लूट की गई थी. कुछ दिनों बाद दोनों को अदालत से जमानत मिल गई थी. लेकिन अब खुद जेल में बंद लीलू को जमानत मिल पाएगी, इस में शक है. क्योंकि उस के गुनाहों के आगे तो बेटे का गुनाह कुछ भी नहीं. बीती 24 सितंबर को लीलू को गाजियाबाद पुलिस ने अपने भतीजे रेशू की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया तो सख्ती से पूछताछ में उस ने खुलासा किया कि उस ने कोई एकदो नहीं बल्कि 20 साल में एकएक कर 5 हत्याएं की हैं. और ये पांचों ही उस के अपने सगे हैं.

यह सुन कर पुलिस वालों के मुंह तो खुले के खुले रह गए, साथ ही जिस ने भी सुना उस के भी होश उड़ गए कि कैसा कलयुग आ गया है, जिस में जमीन के लालच में एक सगे भाई ने दूसरे सगे बड़े भाई और 2 भतीजियों जो अनीता से शादी के बाद उस की बेटियां हो गई थीं, सहित 2 सगे भतीजों को भी इतनी साजिशाना और शातिराना तरीके से मारा कि किसी को उस पर शक भी नहीं हुआ. रेशू की हत्या के आरोप में वह कैसे पकड़ा गया, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस के पहले की 4 हत्याएं उस ने कैसे की थीं. इन में से 2 का जिक्र ऊपर किया जा चुका है.

अपने बड़े भाई सुधीर की हत्या लीलू ने एक लाख की सुपारी दे कर मेरठ में करवाई थी और लाश को नदी में बहा दिया था. इसलिए अनीता से शादी करने के बाद वह बेफिक्र था कि सुधीर आएगा कहां से, उसे तो मौत की नींद में वह सुला चुका है. यह कातिल कितना खुराफाती है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 20 साल पहले ही अपने गुनाहों की स्क्रिप्ट लिख चुका था और हरेक कत्ल के बाद किसी को शक न होने पर उस के हौसले बढ़ते जा रहे थे.

जब शैंकी पैदा हुआ तो उसे लगा कि सुधीर की जमीन उस की बेटियों के नाम हो जाएगी, लिहाजा पहले उस ने पारुल को खाने में जहर दे कर मारा और फिर पायल की भी हत्या कर उस की लाश को नदी में बहा दिया. इस दौरान जमीनजायदाद का धंधा करने के लिए उस ने अपने हिस्से की जमीन बेच दी और मुरादनगर थाने के सामने एक आलीशान मकान भी बनवा लिया. जब इस निकम्मे और लालची से दलाली का धंधा नहीं चला तो उस की नजर दूसरे भाई ब्रजेश की जमीन पर जा टिकी. उसे लगा कि अगर ब्रजेश और उस के बेटों व पत्नी को भी इसी तरह ठिकाने लगा दिया जाए तो उस की ढाई करोड़ की जमीन भी उस की हो जाएगी.

नेकी तो नहीं बल्कि बदी और पूछपूछ की तर्ज पर उस ने साल 2013 में  ब्रजेश के छोटे बेटे 16 वर्षीय नीशू की भी हत्या कर लाश नदी में बहा दी और अपनी गोलमोल बातों से पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से ब्रजेश को रोक लिया था. यह उस के द्वारा की गई चौथी हत्या थी. अब तक उसे समझ आ गया था कि और साल, 2 साल या 4 साल लगेंगे, लेकिन जमीन तो उस की हो ही जाएगी. असल में वह चाहता था कि पूरे कुटुंब की जमीन उस के बेटे शैंकी को मिल जाए, जिस से उसे जिंदगी में मेहनत ही न करनी पड़े जैसे कि उसे नहीं करनी पड़ी थी. जाहिर है रेशू की हत्या के बाद वह ब्रजेश और उन की पत्नी को भी ऊपर पहुंचा देने का मन बना चुका था.

ब्रजेश का बेटा 24 वर्षीय रेशू बीती 8 अगस्त को गायब हो गया था. यह उन के लिए एक और सदमे वाली बात थी. क्योंकि नीशू को गुजरे 8 साल बीत गए थे, अब रेशू ही उन का आखिरी सहारा बचा था जिस की सलामती के लिए वे दिनरात दुआएं मांगा करते थे. लेकिन यह अंदाजा दूसरों की तरह उन्हें भी नहीं था कि परिवार को डसने वाला सांप आस्तीन में ही है. लीलू ने इस बाबत और लोगों को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया था. उस ने योजना के मुताबिक रेशू को फोन कर गांव के बाहर मिलने बुलाया और घूमने चलने के बहाने कार में बैठा लिया. इस आई ट्वेंटी कार में इन दोनों के अलावा विक्रांत, सुरेंद्र त्यागी, राहुल और लीलू का भांजा मुकेश भी मौजूद था.

चलती कार में ही इन लोगों ने रेशू की हत्या रस्सी और लोहे की जंजीर से गला घोंट कर दी और उसे सीट पर जिंदा लोगों की तरह बिठा कर बुलंदशहर की तरफ चल पड़े. कहीं किसी को शक न हो जाए, इसलिए कुछ दूर जंगल में कार रोक कर इन्होंने रेशू की लाश को कार की डिक्की में डाल दिया. असल काम हो चुका था, बस लाश और ठिकाने लगानी बाकी थी. इस के लिए मूड बनाने के लिए इन लोगों ने बुलंदशहर में विक्रांत के ट्यूबवैल पर जोरदार पार्टी की. जब रात गहराने लगी तो इन वहशियों ने रेशू की लाश को एक बोरे में ठूंसा और बोरा पहासू इलाके में ले जा कर गंगनहर में बहा दिया. इस के बाद सभी अपनेअपने रास्ते हो लिए.

आरोपियों में से सुरेंद्र त्यागी हापुड़ का रहने वाला है और पुलिस में दरोगा पद से रिटायर हुआ है जबकि राहुल उस का नौकर था. लीलू ने सुरेंद्र को रेशू की हत्या की सुपारी दी थी, जिस ने बुलंदशहर के आदतन अपराधी विक्रांत को भी इस वारदात में शामिल कर लिया था. इन दोनों का याराना विक्रांत के एक जुर्म में जेल में बंद रहने के दौरान हुआ था. लीलू ने हत्या के एवज में 4 लाख रुपए नकद दिए थे और बाकी बाद में एक बीघा जमीन बेचने के बाद देने का वादा किया था. रेशू के लापता होने के बाद ब्रजेश ने बेटे को काफी खोजा और फिर थकहार कर 15 अगस्त को मुरादनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. हालांकि लीलू ने इस बार भी उन्हें यह कह कर रोकने की कोशिश की थी कि पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से क्या फायदा होगा.

लेकिन फायदा हुआ. 24 सितंबर को वह पकड़ा गया और अपने साथियों सहित जेल में है. लीलू इत्तफाकन पकड़ा गया, नहीं तो पुलिस भी हार मान चुकी थी कि अब रेशू नहीं मिलने वाला. पुलिस के पास रेशू को ढूंढने का कोई सूत्र नहीं था, सिवाय इस के कि उस के और लीलू के फोन की लोकेशन एक ही जगह की मिल रही थी, जो उसे हत्यारा मानने के लिए पर्याप्त नहीं था. लेकिन इनवैस्टीगेशन के दौरान एक औडियो रिकौर्डिंग पुलिस के हत्थे लग गई, जिस में लीलू रेशू की हत्या का प्लान बाकी चारों में से किसी को बता और समझा रहा था. फिर लीलू ने 5 हत्याओं की बात कुबूली. हत्याओं में 2-3 साल का गैप वह इसीलिए रखता था कि हल्ला न मचे और लोग पिछली हत्या का दुख भूल जाएं.

पुलिस हिरासत में लीलू कभी यह कहता रहा कि उसे उन हत्याओं का कोई मलाल नहीं. तो कभी यह कहता रहा कि सजा भुगतने के बाद वह भाईभाभी की सेवा कर किए गए जुर्म का प्रायश्चित करना चाहता है. हैरानी की बात सिर्फ यह है कि 5 हत्याओं का यह गुनहगार लीलू जेल से छूट जाने की उम्मीद पाले बैठा है. वह शायद इसलिए कि 5 में से एक भी लाश बरामद नहीं हो सकी. लेकिन अब लोगों की मांग है कि ऐसे आस्तीन के सांप का जिंदा रहना ठीक नहीं है, लिहाजा उसे फांसी की सजा मिलनी चहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह जरूर एक बड़ी कानूनी खामी साबित होगी. Property Dispute

Crime Kahaniyan: मामी की बेवफाई – लता बनी परिवार की बर्बादी का कारण

Crime Kahaniyan: 19वर्षीया काजल बेचैन हो कर अपने घर में टहल रही थी. वह बारबार रो रहे अपने छोटे भाई शिवम को चुप कराती थी, मगर शिवम मां को याद कर के बारबार रोने लगता था. हरिद्वार जिले के गांव हेतमपुर की रहने वाली काजल व शिवम की मां लता चौहान (38) गत शाम को पास के ही कस्बे बहादराबाद में सब्जी खरीदने के लिए घर से निकली थी, मगर आज तक वह वापस घर नहीं लौटी थी.

उस का मोबाइल भी स्विच्ड औफ आ रहा था. मां के वापस न लौटने व मोबाइल के स्विच्ड औफ होने से काजल व शिवम का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. दोनों भाईबहन पिछली शाम से ही अपने सभी रिश्तेदारों को फोन कर कर के अपनी मां के बारे में जानकारी कर रहे थे, मगर उन की मां के बारे में सभी रिश्तेदारों ने मोबाइल पर अनभिज्ञता जताई. इस के बाद सूचना पा कर कुछ रिश्तेदारों व कुछ पड़ोसियों का भी उन के घर पर आना शुरू हो गया था. सभी भाईबहन को दिलासा दे कर चले जाते.

इसी प्रकार 3 दिन बीत गए थे, लेकिन काजल व शिवम को अपनी मां के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिली. इस के बाद अब उन के रिश्तेदार काजल पर लता की गुमशुदगी थाने में दर्ज कराने पर जोर देने लगे. लेकिन थाने जाने के नाम से काजल को एक अंजाना सा डर लग रहा था. वह 14 जून, 2021 का दिन था. आखिर उस दिन काजल हरिद्वार के थाना सिडकुल पहुंच ही गई. वह थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला से मिली और उन्हें अपनी मां लता चौहान के गत 4 दिनों से लापता होने की जानकारी दी.

जब थानाप्रभारी बुटोला ने काजल से उस के पिता के बारे में पूछा तो काजल ने बताया, ‘‘सर पिछले 2-3 सालों से मेरे पिता चंदन सिंह नेगी व मां लता चौहान के बीच अनबन चल रही है. मेरे पिता फरीदाबाद (हरियाणा) में रह कर ड्राइवरी करते हैं. यहां पर 2 साल पहले मेरे फुफेरे भाई अंकित चौहान ने हमें एक मकान खरीद कर दिया था. इस मकान में हम तीनों रहते हैं. घर से चलते समय मेरी मां हरे रंग का सूट सलवार व पैरों में सैंडिल पहने थी.’’

इस के बाद काजल ने मां का मोबाइल नंबर भी थानाप्रभारी बुटोला को नोट करा दिया. फिर थानाप्रभारी के कहने पर काजल वापस घर आ गई. काजल की तहरीर पर थानाप्रभारी बुटोला ने लता की गुमशुदगी दर्ज कर ली और इस केस की जांच एसआई अमित भट्ट को सौंप दी. लता की गुमशुदगी का केस हाथ में आते ही अमित भट्ट सक्रिय हो गए. उन्होंने सब से पहले लता के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाने के लिए साइबर थाने से संपर्क किया था और थाने के 2 सिपाहियों को लता चौहान की डिटेल्स का पता करने के लिए सादे कपड़ों में गांव हेतमपुर में तैनात कर दिया.

उसी दिन शाम को थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला ने लता की गुमशुदगी की सूचना एएसपी डा. विशाखा अशोक भडाने व एसपी (सिटी) कमलेश उपाध्याय को दी. 2 दिनों में पुलिस को लता के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स मिल गई थी. काल डिटेल्स के अनुसार 10 जून, 2021 की शाम को लता चौहान व उस के भांजे अंकित चौहान की लोकेशन हेतमपुर से सलेमपुर की गंगनहर तक एक साथ थी. इस से पहले दोनों में बातें भी हुई थीं. इस के अलावा लता के मोबाइल पर अंतिम काल अंकित चौहान के ही मोबाइल से आई थी. इस के कुछ समय बाद लता चौहान व अंकित चौहान की लोकेशन भी अलगअलग हो गई थी. काल डिटेल्स की यह जानकारी तुरंत ही थानाप्रभारी ने एसपी (सिटी) कमलेश उपाध्याय को दी.

एसपी उपाध्याय ने थानाप्रभारी बुटोला व एसआई अमित भट्ट को अंकित चौहान से पूछताछ करने के निर्देश दिए. बुटोला व भट्ट ने जब अंकित चौहान से संपर्क करने का प्रयास किया, तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. पुलिस ने जब अंकित चौहान के बारे में जानकारी की तो पता चला कि वह लता का सगा भांजा था. अंकित मूलरूप से बिजनौर जिले के गांव मानपुर शिवपुरी का रहने वाला था. अंकित एमएससी करने के बाद किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था.  3 साल पहले जब लता के अपने पति से संबंध बिगड़ गए थे, तब से अंकित की लता से नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस दौरान अंकित लता व उस के दोनों बच्चों का पूरापूरा खयाल रखता था. लता के रहनेखाने से ले कर वह उन्हें हर चीज मुहैया कराता था.

यह जानकारी प्राप्त होने पर बुटोला व अमित भट्ट ने अंकित की तलाश में धामपुर व हेतमपुर में कुछ मुखबिर सतर्क कर दिए थे. विवेचक अमित भट्ट ने भी अंकित की तलाश में उस के धामपुर स्थित गांव मानपुर शिवपुरी में कई बार दबिश दी, मगर अंकित उन्हें न मिल पाया. इसी प्रकार 9 दिन बीत गए तथा पुलिस को अंकित चौहान के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई. वह 27 जून, 2021 का दिन था. शाम के 7 बज रहे थे. तभी श्री बुटोला के मोबाइल पर उन के खास मुखबिर का फोन आया. मुखबिर ने उन्हें बताया कि सर, जिस अंकित को तलाश कर रहे हो, वह इस समय यहां हरिद्वार के रोशनाबाद चौक पर खड़ा है. यह सुनते ही बुटोला की बांछें खिल गईं.

बुटोला ने इस मामले में विलंब करना उचित नहीं समझा. उन्होंने तुरंत अपने साथ विवेचक अमित भट्ट व फोर्स को साथ लिया और 5 मिनट में ही रोशनाबाद चौक पर पहुंच गए. मुखबिर के इशारे पर उन्होंने वहां से अंकित को हिरासत में ले लिया. वह उसे थाने ले आए. यहां पर जब बुटोला व भट्ट ने उस से लता के लापता होने के बारे में पूछताछ की, तो पहले तो वह पुलिस को गच्चा देने की कोशिश करता रहा. वह पुलिस को बताता रहा कि लता उस की मामी अवश्य थी, मगर अब वह कहां है, उस की उसे कोई जानकारी नहीं है. लेकिन सख्ती करने पर वह टूट गया और बोला, ‘‘साहब, अब लता इस दुनिया में नहीं है. 10 जून, 2021 की रात को मैं ने अपने दोस्त अमन निवासी कस्बा शेरकोट जिला बिजनौर, उत्तर प्रदेश के साथ मिल कर उस की

गला घोंट कर हत्या कर दी थी तथा उस की लाश हम ने गांव सलेमपुर स्थित गंगनहर में फेंक दी थी. लता को मैं घुमाने की बात कह कर सलेमपुर गंगनहर तक लाया था.’’

अंकित के मुंह से लता की हत्या की बात सुन कर थानाप्रभारी बुटोला तथा वहां मौजूद अन्य पुलिस वाले सन्न रह गए. पूछताछ में उस ने लता की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

अंकित गांव मानपुर में अपने पिता हरगोविंद, मां सरोज तथा छोटे भाई अनुज के साथ रहता था. उस ने बताया कि 3 साल पहले जब लता का अपने पति के साथ विवाद हुआ था तो उस दौरान उस ने ही लता की काफी मदद की थी. उसी दौरान लता उस की ओर आकर्षित हो गई थी. लता और अंकित के बीच अवैध संबंध बन गए थे. फिर अंकित ने लता को हेतमपुर में एक मकान खरीद कर दे दिया था. सब कुछ ठीक चल रहा था कि करीब 2 महीने पहले अंकित ने लता को उस के पड़ोसी के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिया था. यह देख कर अंकित को गुस्सा आ गया था. गुस्से में उस ने लता को उसे खरीद कर दिया हुआ मकान अपने नाम वापस करने का कहा तो वह टालने लगी और 2 लाख रुपए की मांग करने लगी.

लता की इस हरकत से अंकित परेशान हो गया था और अंत में वह उस की हत्या की योजना बनाने लगा. यह बात उस ने अपने दोस्त अमन को बताई तो वह भी अंकित का साथ देने को राजी हो गया. दोनों ने इस की योजना बनाई. योजना के अनुसार 10 जून, 2021 को अंकित अमन के साथ रात 8 बजे लता के घर पहुंचा था. इस के बाद उसे घुमाने की बात कह कर वह लता को ले कर गंगनहर किनारे गांव सलेमपुर पहुंचा था. उस समय वहां रात का अंधेरा छाया था.

मौका मिलने पर अमन ने तुरंत ही लता को पकड़ कर उस का गला घोंट दिया था. लता के मरने के बाद दोनों ने उस की लाश गंगनहर में फेंक दी थी. उस समय रात के 11 बज चुके थे. इस के बाद अमन वापस अपने घर चला गया था. लता का मोबाइल उस समय अंकित के पास ही था. जब उस ने 12 जून, 2021 को मोबाइल औन किया तो उस में फोन आने शुरू हो गए थे. तब अंकित ने उस में से सिमकार्ड निकाल कर मोबाइल व सिम को सिंचाई विभाग की गंगनहर में फेंक दिया था. इस के बाद पुलिस ने अंकित के बयान दर्ज कर लिए और लता की गुमशुदगी के मुकदमे को हत्या में तरमीम कर दिया.

पुलिस ने इस केस में आईपीसी की धाराएं 302 व 120बी और बढ़ा दी थीं. 2 जुलाई, 2021 को पुलिस ने अंकित को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक आरोपी अंकित जेल में ही बंद था. थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला द्वारा गंगनहर में लता के शव को तलाश किया जा रहा था. दूसरी ओर पुलिस दूसरे आरोपी अमन की तलाश में जुटी थी.

छाया : सोहेब मलिक

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Illicit Relationship: दिलबर ने ली जान

Illicit Relationship: कमलेश और जीरा के बीच भले ही शादी से पहले के संबंध रहे थे, लेकिन जीरा की शादी के बाद दोनों को यह गलती दोहरानी नहीं चाहिए थी. उन दोनों की इस गलती ने जब विकराल रूप ले लिया तो फिर खून की नदी तो बहनी ही थी, भले ही उस में लाश जीरा की बहती या कमलेश की.

खिदिरपुर गांव से सटा हुआ गांव है ताजपुर माझा. 23 जुलाई, 2015 की सुबह का उजाला फैला तो ताजपुर माझा के लोगों ने खेतों का रुख किया. एक ग्रामीण ने सिट्टू राय के खेत के पास की झाड़ी में एक जवान युवक को रक्तरंजित पड़ा देखा तो उस की घिग्गी बंध गई. उस ने हिम्मत कर के उस युवक के जिस्म पर नजर डाली तो उसे समझते देर नहीं लगी कि वह जीवित नहीं है. वह ग्रामीण चिल्लाता हुआ वहां से भागा, ‘‘झाडि़यों में लाश है, झाडि़यों में लाश है.’’

उस की आवाज सुन कर लोग खेतों के पास खड़ी झाडि़यों की तरफ दौड़ पड़े. देखते ही देखते लाश के पास काफी लोग जमा हो गए. मृतक जवान युवक था. उस के शरीर पर नई पैंट शर्ट और जूते थे, ऐसा लगता था जैसे वह किसी रिश्तेदारी में आया था. क्योंकि गांव के ज्यादातर लोग कहीं बाहर या रिश्तेदारी में आनेजाने पर ही नए कपड़े पहनते हैं. मृतक का सिर फटा हुआ था, जिस से बहा खून उस के चेहरे और शर्ट के काफी हिस्से पर फैल गया था.

खून चूंकि जम कर काला पड़ गया था, इस से लग रहा था कि उसे मरे हुए काफी समय हो गया है. आसपास एकत्र भीड़ में तरहतरह की चर्चाएं हो रही थीं, उसे पहचानने की कोशिश भी की गई, लेकिन कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. इसी बीच किसी ने थाना जमानियां की पुलिस को फोन कर के युवक की लाश मिलने की सूचना दे दी. कुछ ही देर में थानाप्रभारी जमानियां अवधेश नारायण सिंह पुलिस टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए. उन्हें देख कर भीड़ लाश के पास से हट गई. अवधेश नारायण सिंह ने युवक की लाश का निरीक्षण किया. उस के फटे सिर को देख कर ही उन्हें अनुमान हो गया कि उस की मौत ज्यादा खून बह जाने की वजह से हुई है.

मृतक के शरीर पर चोट के भी निशान नजर आ रहे थे. मरने से पहले शायद उसे काफी पीटा गया था. अवधेश नारायण सिंह को उस की जेबों की तलाशी में जो पर्स मिला, उस में केवल कुछ रुपए थे. इस के अलावा उस के पास से ऐसा कोई सामान नहीं मिला, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. लाश की पहचान के लिए उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछा तो सभी ने उसे पहचानने से मना कर दिया. लोगों ने यही शंका जाहिर की कि हो सकता है यह आसपास के किसी गांव का रहने वाला हो. इस पर अवधेश नारायण सिंह ने एक सिपाही को भेज कर पड़ोसी गांव खिदिरपुर से वहां के चौकीदार राममिलन को बुलवा लिया.

राममिलन ने युवक की लाश को देखते ही बता दिया कि मृतक राधोपुर गांव का कमलेश यादव है. राममिलन ने यह भी बताया कि कमलेश यादव का खिदिरपुर में जीरा देवी के पास काफी आनाजाना था. दोनों के अवैधसंबंधों के बारे में पूरा खिदिरपुर जानता है. इस महत्वपूर्ण जानकारी को सुन कर अवधेश नारायण सिंह को पक्का यकीन हो गया कि कमलेश यादव की हत्या अवैधसंबंधों के कारण ही हुई है और इस के सूत्र खिदिरपुर में जीरा देवी के घर से ही मिलेंगे. उन्होंने लिखापढ़ी कर के कमलेश की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया, साथ ही अपने मातहतों को निर्देश दिया कि वे कमलेश यादव के गांव राधोपुर खबर भेज कर उस के घर वालों को थाने बुला लें.

तत्पश्चात अवधेश नारायण सिंह 2 सिपाहियों और चौकीदार के साथ गांव खिदिरपुर की ओर रवाना हो गए. खिदिरपुर वहां से ज्यादा दूर नहीं था. जब वह जीरा देवी के दरवाजे पहुंचे तो अंदर तेजी से हलचल हुई, लगा कोई भागा है. दरवाजा खुला था. अवधेश नारायण सिंह धड़धड़ाते हुए अंदर चले गए. घर के आंगन में एक युवती घबराई हुई खड़ी थी. वही जीरा देवी थी. घर में पुलिस को देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

अवधेश नारायण सिंह की पैनी नजरों ने घर के आंगन में पड़े खून के उन धब्बों को देख लिया, जिन्हें साफ करने की कोशिश की तो गई थी, पर वे पूरी तरह से साफ नहीं हो पाए थे. श्री सिंह ने जीरा देवी को घूरते हुए पूछा, ‘‘अंदर कौन भागा है?’’

‘‘ज…जी… मेरी सास अंदर गई है.’’ जीरा देवी ने घबराई हुई आवाज में कहा और अंदर की तरफ जाने लगी. अवधेश सिंह ने उसे रोका नहीं, बल्कि उस के पीछे हो लिए. जीरा देवी जिस कमरे में गई, उस में कमलेश यादव की हत्या के पुख्ता सबूत मौजूद थे. कमरे में जीरा देवी की सास संधारी देवी खड़ी मिली, उस के हाथ में लोहे की खून सनी रौड थी, जिसे वह एक गीले कपड़े से साफ करने की कोशिश कर रही थी.

अब कुछ भी पूछने की आवश्यकता नहीं थी, उन्होंने वहां मौजूद सबूतों को अपने कब्जे में ले लिया और जीरा देवी व संधारी देवी को साथ ले कर थाने लौट आए. एक आदमी की हत्या और कुछ लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी मिलने पर पुलिस अधीक्षक वैभव कृष्ण भी आ गए थे. उन की और मीडिया की उपस्थिति में दोनों से सख्ती से पूछताछ हुई. आखिरकार जीरा देवी पुलिस की सख्ती के आगे टूट गई. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुए जो कुछ बताया, उस से कमलेश की हत्या की पूरी कहानी साफ हो गई. जीरा देवी ने बताया, ‘‘कमलेश अकसर मेरे साथ अनैतिक संबंध बनाने के लिए दबाव बनाता था. इस से मेरी ससुराल वालों की बहुत बदनामी हो रही थी.

अपने पड़ोसी प्यारेलाल के कहने पर कल रात मैं ने उसे घर पर बुलाया. कमलेश मुझ से मिलने के लिए घर आया तो मैं ने और मेरी सास ने लोहे की रौड और लाठी से उस पर वार कर के उसे मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद हम ने उस की लाश पास के गांव ताजपुर के एक खेत के पास खड़ी झाड़ी में फेंक दी. इस में मेरे पति का कोई हाथ नहीं है.’’

अवधेश सिंह जानते थे कि कमलेश की लाश को 2 औरतें पास के गांव के खेतों में ले जा कर नहीं फेंक सकतीं, इस में अवश्य ही किसी पुरुष का भी हाथ रहा होगा. उन्होंने अपनी पुलिस टीम को जीरा के पति करिमन यादव उर्फ करिया और उस के पड़ोसी प्यारेलाल को पकड़ कर लाने के आदेश दिए. गाजीपुर जिले के जमानियां थाना क्षेत्र का एक गांव है राधोपुर. इस गांव के एक छोटे से किसान रामअधार यादव की बेटी थी जीरा. रामअधार के पास खेती लायक इतनी जमीन थी कि वह अपने परिवार का भरणपोषण अच्छे से कर लेता था. जीरा बचपन से ही नटखट और चंचल स्वभाव की थी. पढ़ाईलिखाई के साथ खेतखलिहान और गांव की गलियों में खेलतेकूदते जीरा कब जवान हो गई, उसे पता ही नहीं चला.

उसे अपनी जवानी का अहसास तब हुआ, जब उस के जीवन में प्यार का एक मदहोश कर देने वाला झोंका आया. वह मदमस्त कर देने वाला आवारा झोंका था कमलेश. वह भी इसी गांव में जवान हुआ था. उस के पिता रामविलास यादव भी किसान थे. कमलेश की पढ़ने में ज्यादा रुचि नहीं थी. सारा दिन अपने दोस्तों के साथ गांव की गलियों में घूमना, फिल्मी गाने गुनगुना कर खुद को हीरो साबित करने की कोशिश करना उस का काम था. एक दिन वह अपनी साइकिल से कस्बे की ओर जा रहा था, तभी उस की नजरें सामने से आती हुई जीरा पर पड़ गईं.

19 वर्षीया कमसिन, अल्हड़, खूबसूरत जीरा की बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, कमर तक लहराते काले बाल, पतली छरहरी कंचन सी काया किसी भी युवा दिल को आकर्षित करने के लिए काफी थी. उस के चेहरे पर ऐसा चुंबकीय आकर्षण था कि कमलेश अपनी आंखें तक झपकाना भूल गया. उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उस का दिल सीने से निकल कर बाहर आ गया हो.

‘‘हाय, इतनी दिलकश हसीना मेरे गांव में रहती है और मुझे पता ही नहीं चला.’’ कमलेश ने सर्द आह भर कर कहा तो जीरा ने आंखें तरेरते हुए जवाब दिया, ‘‘अच्छा, अगर पहले पता चल जाता तो क्या कर लेते?’’

‘‘कसम पैदा करने वाले की, मैं तुम्हारा हाथ मांगने खुद ही तुम्हारे दरवाजे पर आ जाता.’’

जीरा थोड़ी शरमाई, फिर झेंप कर बोली, ‘‘क्यों घर में मांबाप नहीं हैं क्या तुम्हारे?’’

‘‘हैं, कहो तो भेज दूं अपने बाप को?’’ कमलेश ने शरारत से पूछा.

‘‘धत!’’ जीरा लाज से दोहरी हो कर तेजी से कमलेश की बगल से निकल गई.

‘‘उफ, यह शरमाना…’’ कमलेश ने फिर ठंडी सांस भरी और बोला, ‘‘अरे नाम तो बताती जाओ.’’

‘‘जीरा नाम है मेरा.’’ जीरा ने पलट कर बड़ी अदा से बताया और फिर लहराती हुई चली गई. कमलेश तब तक वहां खड़ा रहा, जब तक जीरा उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. उसे लगा जैसे आज उस का दिल उस के पास नहीं है, उसे जीरा चुरा कर ले गई है. वह उस दिन बेमन से कस्बे के बाजार गया.

इत्तफाक से दूसरे दिन जीरा उसे खेत में मिल गई. उस दिन सांझ ढल रही थी. जीरा ने जानवरों के लिए घास का गट्ठर तैयार कर लिया था और उसे उठाने का प्रयास कर रही थी, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. गट्ठर भारी था और आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था. तभी कमलेश वहां पहुंच गया. उस ने जीरा को देखा तो उस के पास चला आया.

‘‘क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं?’’ कमलेश ने प्यार से पूछा.

‘‘ना बाबा?’’ जीरा ने अपनी मुसकराहट छिपा कर घबराने का अभिनय किया, ‘‘तुम से उठवाऊंगी तो दंड भोगना पड़ेगा.’’

‘‘दंड.’’ कमलेश चौंका, ‘‘कैसा दंड?’’

‘‘मैं जानती हूं, फोकट में मुझ पर एहसान नहीं करोगे. बोझ उठवा दिया तो कहोगे, मुझ पर उपकार किया है, अब बापू को भेजूं तो ‘हां’ बोल देना.’’

कमलेश हंस पड़ा, ‘‘वह तो तुम्हें वैसे भी बोलना पड़ेगा जीरा. जानती हो तुम्हें जब से देखा है न दिन को चैन है, न रात को ठीक से सो पाया हूं. पता नहीं कैसा जादू कर दिया है तुम ने मुझ पर.’’

‘‘जादू तो तुम ने भी चला दिया मुझ पर.’’ जीरा सिर झुका कर लजाते हुए बोली, ‘‘लड़की हूं न, अपने दिल की बात होंठों पर लाते हुए झिझक होती है.’’

कमलेश ने प्यार से उस की कलाई थाम ली, ‘‘तुम्हारी हां की गवाही तुम्हारी शरम से झुकी आंखें भी दे रही है जीरा. मेरा यकीन करो, मैं ने तुम्हें अपना बनाया तो है रानी बना कर रखूंगा… तुम राज करोगी मेरे दिल पर.’’

जीरा ने आंखें तरेरी, ‘‘तुम्हारी रानी तो मैं तब बनूंगी, जब मुझे ब्याह लोगे. अगर मेरा ब्याह किसी और से हो गया तो मैं तुम्हारी रानी…’’

कमलेश ने जल्दी से उस की बात काट दी, ‘‘गलती से कह दिया पगली, तुम तो हर तरह से मेरी रानी रहोगी, शादी मुझ से हुई तब भी और नहीं हुई तब भी.’’

‘‘शादी तो तुम से ही होगी मेरी.’’ जीरा हंस कर बोली, ‘‘कोई और मुझे ब्याह कर ले जाए, मैं ऐसा होने नहीं दूंगी.’’

‘‘इतना चाहती हो मुझे?’’ कमलेश ने भावविभोर हो कर जीरा को अपने सीने से लगा लिया. क्षणभर के लिए तो जीरा भी कमलेश के सीने से लग कर अपनी सुधबुध भूल गई, लेकिन जल्दी ही वह संभल कर उस से अलग हटते हुए इधरउधर देखने लगी.

‘‘कोई नहीं है जीरा, बस यहां मैं हूं और तुम हो.’’ कमलेश ने अपनी उखड़ी सांसों को व्यवस्थित करते हुए कहा.

‘‘तुम पुरुष हो कमलेश, मैं स्त्री हूं और स्त्री को अपनी सीमा में रहने का पाठ पढ़ाया जाता है. अभी कोई देख लेता तो मेरी बदनामी हो जाती.’’

‘‘आगे से ध्यान रखूंगा जीरा.’’ कमलेश सिर झुका कर धीरे से बोला, ‘‘लेकिन तुम्हें इस बेचैन दिल को सुकून देने का वादा करना पड़ेगा.’’

‘‘स्त्री मन से कुछ छिपा नहीं रहता, वह पुरुष की नजरों को पल भर में पढ़ लेती है. मैं जान चुकी हूं कि तुम मुझे बेइंतहा प्यार करते हो और मुझे धोखा नहीं दोगे. औरत को अगर इतना विश्वास हो जाए तो वह पुरुष को बेझिझक अपना तनमन समर्पित कर देती है. मैं भी तुम्हारी बांहों में समा कर अपना सबकुछ तुम्हें सौंपने को आतुर हूं, लेकिन इस के लिए सही वक्त का इंतजार करना होगा.’’

‘‘ठीक है.’’ कमलेश ने ठंडी आह भर कर कहा, ‘‘मैं उस समय की प्रतीक्षा करूंगा.’’ इस के बाद कमलेश ने जीरा का घास का गट्ठर उठवा दिया. फिर दोनों अपनेअपने रास्ते घर चले गए.

जीरा कमलेश के मन में इस कदर समा गई थी कि वह जब तक दिन में एक बार उस का दीदार नहीं कर लेता था, उसे चैन नहीं पड़ता था. उसे देखे बिना जीरा का खाना भी गले से नीचे नहीं उतरता था. एक ही गांव के होने के कारण, कभी गली, कभी तालाब तो कभी खेत में उन्हें एकदूसरे का दीदार करने का अवसर मिल ही जाता था. वह एकदूसरे को देख कर आंखों की प्यास बुझा लेते थे, लेकिन उन के तन की प्यास उन्हें बेचैन कर रही थी.

एक दिन कमलेश को अपने खेत से लौटते वक्त देर हो गई. सांझ ढल गई थी और हलका अंधेरा जमीन पर उतर आया था. तभी एकाएक आसमान में काले बादलों के साए मंडराए और देखते ही देखते तेज बारिश होने लगी. कमलेश तेजी से दौड़ पड़ा. अभी वह कुछ ही दूर पहुंचा था कि उसे बरगद के पेड़ के नीचे जीरा नजर आई. वह पेड़ के नीचे खड़ी बारिश से बचने का प्रयास कर रही थी. वहां दूरदूर तक कोई नहीं था. कमलेश दौड़ता हुआ जीरा के पास पहुंच गया.

‘‘आज तुम्हें देर हो गई जीरा?’’ कमलेश ने सिर का पानी पोंछते हुए जीरा के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा तो जीरा उस के करीब सरक आई. ‘‘आज तुम्हारे लिए मैं ने देर कर दी है. मुझे मालूम था तुम अभी खेत में ही हो.’’

‘‘तुम्हारा इरादा नेक नहीं है?’’ कमलेश उस के और करीब आ कर फुसफुसाया.

‘‘तुम्हारा कौन सा नेक है.’’ जीरा को अपनी आवाज हलक में फंसती महसूस हुई. दोनों अब इतना करीब थे कि उन्हें एकदूसरे के दिलों की धड़कनें स्पष्ट सुनाई देने लगीं. कमलेश ने अपनी बांहों को आगे बढ़ाया तो जीरा उन में सिमट गई. तूफानी बारिश में दोनों के जिस्म सुलगने लगे. कमलेश ने जीरा का चेहरा दोनों हथेलियों में समेट कर उस के गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

जीरा की पूरी काया कसमसा उठी, वह कमलेश से कस कर लिपट गई. कमलेश ने उसे जकड़ लिया और अपने में समेटने लगा. जीरा ने अपना तन ढीला कर के मौन स्वीकृति दी तो कमलेश उसे ले कर जमीन पर झुकता चला गया. उस बारिश में दो तन एक हुए तो दोनों की आंखों में अजीब चमक और चेहरे पर तृप्ति के भाव थे. उस दिन के बाद जीरा अकसर खेतों से घर लौटने में देर करने लगी. कमलेश के साथ प्यार का अनैतिक खेल खेलने के लिए जीरा ने उपयुक्त स्थान और समय खोज निकाला था. सांझ के धुंधलके में जब खेतों में सन्नाटा व्याप्त हो जाता था, दोनों प्रेमी अपने तनमन की प्यास बुझाते थे.

जैसेजैसे यह खेल आगे बढ़ रहा था, उन के प्यार का बंधन भी मजबूत होता जा रहा था. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां है? एक दिन कमलेश और जीरा को एक आदमी ने बरगद के पेड़ के नीचे आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया तो बात जीरा के बाप को पता लगने में देर नहीं लगी. जीरा की पिटाई तो हुई ही, उस के घर से बाहर जाने पर भी पाबंदी लगा दी गई. जीरा के बाप ने आननफानन में उस के लिए वर की तलाश की और उसे शादी के बंधन में बांध कर राधोपुर से खिदिरपुर भेज दिया. जीरा चाह कर भी विरोध नहीं कर पाई. सब कुछ इतनी जल्दी से हुआ कि कमलेश भी मूकदर्शक बना रह गया.

2 प्यार करने वालों के दरमियान समाज ने एक ऐसी रेखा खींच दी, जिसे लांघना जीरा और कमलेश के लिए नामुमकिन तो नहीं था, लेकिन मुश्किल जरूर था. उधर जीरा लोकलाज के डर से ससुराल में अपने मन पर पत्थर रख कर बैठ गई. प्रेमिका की जगहंसाई न हो, इसलिए कमलेश भी खामोश हो कर रह गया. लेकिन अधिक समय तक ऐसा नहीं हो सका. 2 दिलों में धधक रही प्रीत और कामना की ज्वाला ने सारे बंधन तोड़ डाले. एक दिन जीरा ने ही कमलेश को अपनी ससुराल आने का न्योता दे दिया. कमलेश को उस ने ससुराल वालों के सामने मुंहबोले भाई के रूप में पेश कर दिया. परिणामस्वरूप जीरा की ससुराल में कमलेश की खूब आवभगत हुई. इसी की आड़ में कमलेश और जीरा की देह का मिलन भी हुआ.

दोनों तृप्त हुए तो इस रिश्ते की आड़ में कमलेश बारबार खिदिरपुर आने लगा. धीरेधीरे पहले गांव में, फिर जीरा की ससुराल वालों में भी इस रिश्ते को ले कर चर्चाएं होने लगीं. इन चर्चाओं में विश्वास कम, शक अधिक था. जीरा और कमलेश को इस की भनक लगी तो दोनों घर से भाग गए. कमलेश अपनी प्रेमिका जीरा को ले कर दिल्ली आ गया. यहां उस ने एक वर्ष तक जीरा को पत्नी के रूप में रखा. उस ने किराए का कमरा ले लिया था और एक कंपनी में काम करने लगा था. यह बात 2013 की है.

इधर जीरा के ससुराल वाले खुद और पुलिस की मदद से उन दोनों की तलाश करते रहे और अंत में दोनों को दिल्ली से ढूंढ़ निकाला. पुलिस उन्हें पकड़ कर खिदिरपुर ले आई. जीरा ने कोतवाली जमानियां में बयान दे कर कहा कि वह खुद कमलेश को ले कर दिल्ली गई थी. इस तरह उस ने कमलेश को सजा से तो बचा लिया, लेकिन पुलिस के और ससुराल वालों के समझाने पर उस ने कसम खाई कि अब वह पति की वफादार बन कर रहेगी. उस ने कमलेश को स्पष्ट रूप से कह दिया कि अब वह उस की वैवाहिक जिंदगी में दखल देने की कोशिश न करें, वह उसे भूल कर अपना विवाह कर ले और पत्नी के साथ राधोपुर में रहे.

कमलेश ने इसे प्यार भरी झिड़की समझ कर एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया. वह थोड़े दिनों तक तो शांत रहा, लेकिन फिर जीरा की याद आई तो शराब पी कर उस की ससुराल खिदिरपुर पहुंच गया. जीरा घर में अकेली मिली, उस ने कमलेश को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन कमलेश अपनी मनमानी कर के ही वहां से गया. ऐसा बारबार होने लगा. यह बात जीरा की ससुराल वालों को मालूम हुई तो वह कमलेश को सबक सिखाने की योजना बनाने लगे. जीरा भी चाहती थी कि कमलेश को अब उस की वैवाहिक जिंदगी से दूर कर दिया जाए. इस परिवार के पड़ोस में प्यारेलाल रहता था, वह भी उन का साथ देने को तैयार हो गया. उसी ने अपने फोन से जीरा की बात कमलेश से करवाई.

योजना के अनुसार जीरा ने उस दिन एक प्रेमिका का सच्चा अभिनय किया. उस ने मोबाइल पर कमलेश का नंबर मिला कर सुरीली आवाज में कहा, ‘‘कमलेश मैं तुम्हारी जीरा बोल रही हूं, कैसे हो तुम?’’

‘‘तुम पूछ रही हो जीरा,’’ कमलेश गहरी सांस भर कर बोला, ‘‘मैं तो तुम्हारे प्रेम के सहारे जिंदा रहना चाहता था, लेकिन तुम ही बेवफाई पर उतर आई हो. तुम्हारे पास आता हूं तो तुम बेरुखी से मुंह मोड़ लेती हो. अब तुम मेरी वाली जीरा नहीं रह गई.’’

‘‘नहीं कमलेश, जीरा तुम्हारी थी, तुम्हारी ही रहेगी.’’ जीरा गंभीर हो कर बोली, ‘‘मुझे अपनी ससुराल वालों के दबाव में तुम से बेरुखी करनी पड़ी थी. लेकिन वह सब नाटक था, हकीकत नहीं. मैं तुम्हें आज भी बहुत चाहती हूं.’’

‘‘सच,’’ कमलेश खुश हो कर बोला, ‘‘कहो कैसे फोन किया?’’

‘‘आज घर के सब लोग एक शादी में जा रहे हैं, तुम रात को खिदिरपुर आ जाओ, खूब मौजमस्ती करेंगे.’’

‘‘मैं आऊंगा जीरा, तुम दरवाजा खुला रखना.’’ कमलेश खुशी से चहका और फोन बंद कर के खिदिरपुर जाने की तैयारी करने लगा. उस दिन 22 जुलाई, 2015 का दिन था.

रात गहराने पर कमलेश ने जीरा के दरवाजे पर पहुंच कर हलकी सी दस्तक दी और हौले से दरवाजा धकेला. दरवाजा खुद ही अंदर की तरफ खुल गया. कमलेश के दिल की धड़कनें बेकाबू होने लगीं. वह उस पल की कल्पना कर के ही रोमांचित होने लगा, जब जीरा उस की बांहों के समाने वाली थी. अब वह पल बहुत करीब था. कमलेश ने उन्माद में अपने कदम आगे बढ़ा दिए. छोटी सी गली पार कर के जैसे ही उस ने आंगन में कदम रखा, उस के सिर पर एक भरपूर प्रहार हुआ. उस के मुंह से दर्दभरी हलकी चीख निकली और वह लहराता हुआ नीचे झुकता चला गया. बस इस के बाद उस पर रौड और डंडों से वार पर वार होने लगे. अचेत अवस्था में ही इस जानलेवा हमले में कब उस के प्राण निकल गए, पता ही नहीं चला. कुछ देर बाद हमलावरों का जुनून शांत हुआ तो जीरा की सास संधारी ने कमलेश की सांसे टटोलीं.

‘‘मर गया कमीना.’’ वह नफरत से थूकती हुई बोली.

‘‘हमारे रास्ते का कांटा निकल गया, चलो अब इसे ठिकाने लगा देते हैं.’’ जीरा के पति करिमन उर्फ करिया यादव ने अपने पास खड़ी अपनी पत्नी जीरा और मां संधारी की तरफ देख कर कहा.

इस के बाद 22 जुलाई की रात में ही उन लोगों ने कमलेश की लाश को पास के गांव ताजपुर माझा में सिट्टू राय के खेत की झाड़ी में ले जा कर छिपा दिया. उन्हें लगा था, दूसरे गांव में इस की पहचान नहीं हो पाएगी तो मामला रफादफा हो जाएगा. लेकिन कोतवाली जमानियां के प्रभारी अवधेश नारायण सिंह ने पहली इन्वैस्टीगेशन में ही कातिलों के गिरेबान पर हाथ डाल दिया. बेशक करिमन यादव भाग निकला, लेकिन थानाप्रभारी को विश्वास था कि वह जल्द ही पकड़ में आ जाएगा. प्यारेलाल को भी पकड़ लिया गया था.

कमलेश की हत्या का जुर्म जीरा और संधारी देवी कबूल कर चुकी थीं. थानाप्रभारी सिंह ने कमलेश के पिता रामविलास यादव को वादी बना कर हत्यारों के नाम एक तहरीर लिखवा ली और उन के विरुद्ध अपराध भा.दं.वि. की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर के तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर दिया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कमलेश की हत्या में शामिल प्यारेलाल पकड़ में आ गया था, जबकि करिमन की तलाश जारी थी. Illicit Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: बदनामी की चुभन

Hindi Stories: कोईकोई औरत बहती नदी सी होती है, जिधर रास्ता मिला उधर ही बह निकली. प्रियंका भी ऐसी ही औरत थी. वह भूल गई कि वह जीतीजागती औरत है, नदी नहीं. इसी का उसे ऐसा अंजाम भोगना पड़ा कि…

उत्तर प्रदेश के शहर बरेली में 30 अगस्त, 2015 की शाम एक महिला की हत्या की जानकारी होते ही शहर में सनसनी फैल गई. यह हत्या बारादरी थाना के मोहल्ला खुर्रम गौटिया में हुई थी. सूचना मिलने पर थानाप्रभारी मोहम्मद कासिम सहयोगियों के साथ मौके पर पहुंच गए. थानाप्रभारी की सूचना पर कुछ देर बाद एसपी (सिटी) समीर सौरभ और सीओ (तृतीय) असित श्रीवास्तव भी आ पहुंचे. मृतका का नाम प्रियंका गुप्ता था. उसे दुपट्टे से गला घोंट कर मारा गया था. लाश रसोई में पड़ी थी और अभी भी उस के गले में दुपट्टा लिपटा था.

उस की उम्र 30 साल के पास रही होगी. रसोई में स्लैब पर प्लेट में खाना रखा था, जो बाहर से पैक हो कर आया था. इस से अनुमान लगाया गया कि जब मृतका खाना खाने की तैयारी कर रही थी, तभी हत्यारों ने उस की हत्या कर दी थी. उस का मोबाइल भी खाने के पास रखा था. घर की अलमारियों में ताले लगे थे. घर में लूटपाट का कहीं कोई निशान नजर नहीं आ रहा था. इस से यह बात साफ हो गई कि हत्यारों का मकसद सिर्फ हत्या करना था. पुलिस को मौके से कोई भी अहम सबूत नहीं मिला था. जांच के लिए पुलिस ने मोबाइल और अन्य जरूरी चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम को भी मौके पर बुलवा लिया गया था. टीम ने आ कर फिंगर प्रिंट उठा लिए.

घर के बाहर काफी भीड़ जमा थी. मृतका का पति, उस के 2 भाई भी वहां मौजूद थे. सभी दुखी और परेशान थे. जिस घर में हत्या हुई थी, मृतका वहां पति के साथ किराए पर रहती थी. पूछताछ में पुलिस को पता चला कि मृतका के पति अजय गुप्ता का लकड़ी का कारोबार था. हत्या का सब से पहले पता उस के पति अजय को ही चला था. उस ने पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार वह उस मकान में पत्नी के साथ लगभग 2 सालों से रह रहा था. उस की पत्नी प्रियंका घरेलू औरत थी. 29 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन वह बरेली के ही सीबीगंज में रह रहे अपने भाइयों विकास और सचिन को राखी बांधने गई थी. साथ में अजय भी था.

भाइयों को राखी बांध कर कुछ देर बाद प्रियंका वहां से वापस आ गई थी. चूंकि अजय को उस दिन कारोबार के सिलसिले में बदायूं जिले के दातागंज जाना था, इसलिए लगभग साढ़े 12 बजे वह पत्नी को कार से घर के बाहर उतार कर खुद दातागंज चला गया था. शाम को उस ने प्रियंका को फोन किया तो घंटी बजती रही, लेकिन फोन नहीं उठाया गया. रात में भी बात नहीं हो सकी. अगले दिन भी अजय ने फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला तो उस के मन में आशंका हुई. शाम को लौटा तो घर का दरवाजा बंद था. दीवार फांद कर वह अंदर पहुंचा तो प्रियंका को मृत पाया.

इस के बाद उस ने प्रियंका के भाइयों और रुद्रपुर में रहने वाली अपनी साली अंजलि को फोन कर के उस के कत्ल की सूचना दी. जब प्रियंका के भाई आ गए तो उस ने पुलिस को सूचना दी. अजय के अनुसार, प्रियंका के कान से सोने के टौप्स, गले की चेन, अंगूठियां और हाथों के कड़े गायब थे. इस के अलावा घर का कोई अन्य सामान गायब नहीं हुआ था. घटनास्थल की स्थिति और अजय के बयान से पुलिस अधिकारियों ने अंदाजा लगाया कि प्रियंका की हत्या करने वाले एक से अधिक थे, क्योंकि प्रियंका खुद काफी तनदुरुस्त थी. उसे कोई एक आदमी आसानी से काबू नहीं कर सकता था, दूसरे हत्यारों को वह अच्छी तरह जानती थी. इस की वजह यह थी कि प्रियंका किसी अंजान के लिए दरवाजा नहीं खोलती थी.

पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और थाने आ कर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने मृतका और उस के पति अजय का मोबाइल नंबर ले लिया. एसएसपी धरमवीर यादव ने इस मामले का जल्द से जल्द खुलासा करने को कहा. एसपी समीर सौरभ ने सीओ असित श्रीवास्तव के नेतृत्व में मामले के खुलासे के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी मोहम्मद कासिम, एसआई अजब सिंह, अनिल कुमार, शाहिद चौहान, बृजपाल सिंह, कांस्टेबल वारिस, अशोक व मोहम्मद यामीन आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन इस पुलिस टीम को मृतका प्रियंका और अजय के बारे में जो जानकारियां मिलीं, वे चौंकाने वाली थीं. पता चला कि प्रियंका अजय की असली पत्नी नहीं थी. वह एक हाईप्रोफाइल कौलगर्ल थी और अजय के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. एक बार वह देहव्यापार के मामले में जेल भी जा चुकी थी. अजय गुप्ता शादीशुदा था और उस की पत्नी पैतृक घर में रहती थी. इस जानकारी के बाद पुलिस को अजय गुप्ता पर ही शक हुआ, क्योंकि बातें छिपाने के अलावा एक बात और भी थी, जो शक पैदा करती थी. वह बात यह थी कि शाम से ले कर जब अगली दोपहर तक प्रियंका ने फोन नहीं उठाया था तो उस ने यह बात उस के भाइयों को क्यों नहीं बताई.

उन्हें बता दिया जाता तो वे जा कर देख सकते थे. अजय एक दिन के लिए बाहर गया था और प्रियंका की हत्या हो गई थी. यह इत्तफाक भी हो सकता था और साजिश भी. एक बात यह भी थी कि अजय शादीशुदा था, इसलिए संभव था कि वह प्रियंका से पीछा छुड़ाना चाहता हो. हत्या वह खुद भी कर सकता था और किसी से करा भी सकता था. पुलिस ने उसे थाने बुला कर पूछताछ की तो उस ने हत्या में अपना हाथ होने से साफ मना कर दिया. पूछने पर प्रियंका के भाइयों ने भी बताया था कि रक्षाबंधन पर प्रियंका के साथ अजय भी उन के यहां आया था और दोनों खुश लग रहे थे.

अजय की भूमिका की जांच के लिए एक पुलिस टीम बदायूं रवाना की गई. वहां से पता चला कि अजय वास्तव में काम के सिलसिले वहां गया था. उस के मोबाइल की लोकेशन भी इस की तसदीक कर रही थी. दूसरी ओर पुलिस को प्रियंका के मोबाइल की जो काल डिटेल्स मिली, उस में कई रसूखदार लोगों के नंबर थे. पुलिस ने उन नंबरों में हत्या का राज तलाशने की कोशिश की. पुलिस ने प्रियंका के भाइयों को भी शक के दायरे में रख कर पूछताछ की. बदनामी के चलते वे भी ऐसा कर सकते थे. लेकिन इस पूछताछ में हत्या का कोई राज पता नहीं लग सका.

पुलिस के लिए मामला पेचीदा हो गया था. प्रियंका के बारे में चौंकाने वाली जानकारियां मिल रही थीं. पुलिस ने प्रियंका की बहन अंजलि से भी पूछताछ की. उस ने बताया कि वह बहन के पास आती रहती थी. हत्या से कुछ दिनों पहले ही वह अपने घर गई थी. पुलिस इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थी कि हत्यारे जानकार थे. इस के बाद पुलिस ने शक के आधार पर ऐसे जानकार लोगों की सूची बनाई, जिन का प्रियंका के घर आनाजाना था. इन में एक नाम निश्चल गुप्ता उर्फ सोनू का भी था. निश्चल अजय की बुआ का बेटा था. पुलिस को यह भी पता चला कि प्रियंका उसे कतई पसंद नहीं करती थी. पुलिस ने निश्चल का नंबर हासिल कर के जांच की तो 27 अगस्त को उस की लोकेशन बरेली में मिली.

इस के बाद अजय और प्रियंका के भाइयों से पूछताछ की गई तो सचिन ने बताया कि उस दिन निश्चल अपने दोस्तों के साथ दीदी के घर आया था. पूछने पर उस ने कहा था कि वह मिलने के लिए आया है. वह कुछ देर रुक कर चला गया था. पुलिस ने उस के मोबाइल की 30 अगस्त की लोकेशन चेक की तो चौंकी, क्योंकि उस दिन उस का मोबाइल पूरे दिन बंद रहा था. इस बात ने उसे शक के घेरे में ला दिया. उस की काल डिटेल्स में 2 अन्य नंबर भी थे. उन पर भी निश्चल की बातें होती रहती थीं, लेकिन 30 अगस्त को वे भी बंद थे. 3 सितंबर को पुलिस टीम ने निश्चल और उस के 2 संदिग्ध दोस्तों गवेंद्र और मंगतराम को हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने तीनों को थाने ला कर पूछताछ की. निश्चल पहले तो पुलिस को बरगलाता रहा, लेकिन जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि प्रियंका की हत्या उसी ने अपने 2 दोस्तों के साथ मिल कर की थी. निश्चल ने पुलिस को हत्या की ऐसी वजह बताई, जिसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. दरअसल, प्रियंका उर्फ पूजा रिश्तों और काम की ऐसी दलदल में उलझ चुकी थी, जिस से महत्त्वाकांक्षाओं के चलते उस का निकलना मुश्किल हो गया था. उस की जिंदगी नदी में डोलती उस नाव की तरह थी, जो बिना मांझी के खुद के इशारों पर तैरती है.

प्रियंका उत्तराखंड स्थित रुद्रपुर के भाटवाड़ा मंडी में रहने वाले प्यारेलाल गुप्ता की बड़ी बेटी थी. युवावस्था से ही प्रियंका न सिर्फ बनसंवर कर रहती थी, बल्कि अपनी मर्जी की जिंदगी जीती थी. प्रियंका चाहती थी कि वह शानदार जिंदगी जीए, लेकिन परिवार के हालात इतने बेहतर नहीं थे. परिवार की आर्थिक तंगियां उसे कांटे की तरह चुभती थीं. करीब 9 साल पहले घर वालों ने प्रियंका का विवाह दिल्ली के मंडावली, हसनपुर डिपो के रहने वाले सत्यप्रकाश के साथ कर दिया था. प्रियंका इस विवाह से काफी खुश थी. उस ने अच्छी जिंदगी के सपने सजा लिए थे. उस की परवरिश साधारण परिवार में हुई थी. उस ने सोचा था कि विवाह के बाद उस के सभी अरमान पूरे हो जाएंगे और पति उस का हर शौक पूरा कर देगा.

लेकिन ऐसा नहीं हो सका. क्योंकि सत्यप्रकाश रेलवे स्टेशन पर स्टौल लगाता था. उस की सीमित आय थी. उस की कमाई में दिल्ली जैसे महंगे शहर में जरूरतें ही पूरी हो सकती थीं, ख्वाहिशें नहीं. प्रियंका के लिए यह बड़ा झटका था. उस के ख्वाब चकनाचूर हुए तो उस ने अपने अरमानों को वक्ती तौर पर दफन कर दिया. वह चाहती थी कि उस का पति उसे सिनेमा दिखाए और खूब शौपिंग कराए, लेकिन सत्यप्रकाश के लिए यह संभव नहीं था.

समय अपनी गति से चलता रहा. प्रियंका 2 बच्चों, एक बेटे और बेटी की मां बनी. बाद में उस की बेटी की बीमारी के चलते मौत हो गई. अच्छा इंसान वही होता है, जो हालातों से समझौता कर के जिंदगी को उस के असल रूप में स्वीकार कर ले, लेकिन प्रियंका विपरीत विचारधारा की थी. खर्चों के मुद्दे पर उस की सत्यप्रकाश से अनबन रहने लगी. सत्यप्रकाश ने उसे बहुत समझाया, लेकिन छोटीछोटी बातों पर झगड़ा होना आए दिन की बात हो गई, तो रिश्तों में कड़वाहट बढ़ने लगी. आए दिन रिश्तों में शिकायतों की आंधियां चलने लगें तो उन का चलना मुश्किल हो जाता है.

प्रियंका और सत्यप्रकाश के मामले में भी ऐसा ही हुआ. शिकवेशिकायतों के बीच 2 साल पहले दोनों एकदूसरे से अलग हो गए. बेटे को सत्यप्रकाश ने अपने पास ही रख लिया. प्रियंका की जिंदगी किस दिशा में जाने वाली थी, यह वह खुद भी नहीं जानती थी. लेकिन यह भी सच था कि वह आजादी की जिंदगी चाहती थी. पति से अलगाव के बाद वह मायके आ गई. उस का यह कदम घर वालों को रास नहीं आया. लेकिन प्रियंका अपने सामने किसी दूसरे की चलने नहीं देती थी. उसी बीच वह एक युवक के संपर्क में आ गई. कुछ समय वह दिल्ली में उस के साथ रही. प्रियंका के खर्चीले स्वभाव से अजिज आ कर उस युवक ने भी उस से किनारा कर लिया.

प्रियंका के खर्चे बड़े थे, जबकि कमाई का कोई जरिया नहीं था. अपने खर्चों को पूरा करने के लिए उस ने देहव्यापार को अपना लिया. बाद में एक परिचित के माध्यम से वह बरेली आ कर गोल्डन ग्रीन पार्क कालोनी में किराए पर मकान ले कर रहने लगी. प्रियंका के कदम पूरी तरह बहक चुके थे. बेटी की हरकतों से अजिज आ कर पिता ने भी उस से किनारा कर लिया. इस के बाद उस ने खुद भी उन के पास जाना बंद कर दिया. उसे लगता था कि वह जो कर रही है, वह ठीक है. बरेली में उस के संपर्क में एक के बाद एक कई रसूखदार लोग आ गए. इन में रईसजादे भी थे और राजनीतिक लोग भी.

प्रियंका महत्वाकांक्षी तो थी ही. ऐसे लोग खुशियों के बदले उस की हसरतों को पूरा करते थे. वह नोटों में खेलने लगी. उस ने अपनी जैसी युवतियों का ग्रुप बना लिया. सभी मिल कर धंधा करती थीं. प्रियंका के यहां अकसर लोगों का आनाजाना लगा रहता था. वह भी बनसंवर कर उन के साथ जाती थी. इन सब बातों से लोगों को उस की गतिविधियों पर शक हुआ. लोग विरोध करते थे, लेकिन प्रिंयंका के संबंध चूंकि रसूखदार लोगों से थे, इसलिए सीधे विरोध की कोई हिम्मत नहीं कर पाया था. एक बार इस की भनक पुलिस को लग गई तो अगस्त, 2013 में जाल बिछा कर पुलिस ने उस के कौलगर्ल रैकेट का परदाफाश कर दिया.

पुलिस ने उसे 2 अन्य युवतियों के साथ गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. इस गिरफ्तारी के दौरान उस ने पुलिस से अपना असली नाम छिपा लिया. उस ने पुलिस को अपना नाम पल्लवी गुप्ता बताया था. कुछ दिनों बाद प्रियंका को अपने चाहने वालों की मदद से जमानत मिल गई. इस के बाद उस की मुलाकात अजय गुप्ता से हुई. अजय गुप्ता का लकड़ी का कारोबार था. विवाहित अजय का परिवार बरेली के ही सहसवानी टोला में रहता था. प्रियंका और अजय चंद मुलाकातों में एकदूसरे के नजदीक आ गए. उन के बीच प्यार हो गया.

प्रियंका को अजय के सहारे की जरूरत थी. प्रियंका जहां रहती थी, वहां उस के पास काफी लोगों का आनाजाना बढ़ गया था. वह ठिकाना भी बदलना चाहती थी. अजय की मदद से उस ने मोहल्ला खुर्रम गोटिया में बीना मिश्रा का मकान किराए पर ले लिया. अजय ने खुद को उस का पति बताया. यह बात अलग थी कि दोनों का रिश्ता लिवइन रिलेशन का था. अजय का दामन थामने के बाद भी प्रियंका ने अपना असल धंधा नहीं छोड़ा. अजय भी उस की असलियत जानता था. यह प्यार था या कुछ और, अजय ने उसे उसी रूप में स्वीकार कर लिया. प्रियंका का लाइफस्टाइल हाईप्रोफाइल था.

अजय के साथ आए दिन सिनेमा हौल जा कर फिल्में देखना और शौपिंग करना उस की आदत में शुमार था. कई रईसजादे प्रियंका के पास आतेजाते थे. वह भी अकसर ऐसे लोगों के साथ घूमने जाया करती थी. पुलिस को शक न हो, इसलिए प्रियंका कुछ महीने में अपना नंबर बदल देती थी. इस दौरान वह नशा करने की भी आदी हो गई थी. प्रियंका के 2 भाई विकास और सचिन बरेली के सीबीगंज इलाके में रहते थे. समय के साथ उस ने परिवार से भी औपचारिक रिश्ते बनाने शुरू कर दिए थे. 5 महीने पहले प्रियंका के पैर में फैक्चर हो गया था. औपरेशन के बाद वह बिस्तर पर पड़ गई थी. परेशानी में इंसान को अपनों की ही याद आती है. प्रियंका को बुरे वक्त में अपनी छोटी बहन अंजलि की याद आई.

उस ने फोन पर आग्रह किया तो वह देखभाल के लिए बरेली आ गई. अजय गुप्ता के घर उस के फुफेरे भाई निश्चल गुप्ता उर्फ सोनू का भी आनाजाना  था. निश्चल उत्तराखंड के ऊधमसिंह-नगर का रहने वाला था. वहां उस की मुलाकात अंजलि से हुई तो दोनों के बीच दोस्ती हो गई. निश्चल नौजवान युवक था और विवाहित भी. वह प्रियंका की हकीकत जानता था, इसलिए उसे ज्यादा पसंद नहीं करता था. प्रियंका भी इस बात को जानती थी, लिहाजा वह भी निश्चल को ज्यादा महत्व नहीं देती थी. यहां तक कि उसे उस का अपने घर आना भी पसंद नहीं था.

प्रियंका को अंजलि से उस की दोस्ती खटकती थी. निश्चल को पता चला कि प्रियंका अंजलि को भी अपने पेशे में उतारना चाहती है तो उस ने अंजलि को सख्ती से मना कर दिया. प्रियंका को भी पता चल गया कि अंजलि निश्चल की बातों में आ गई है. एक दिन किसी बात पर निश्चल का प्रियंका से झगड़ा हो गया. निश्चल ने प्रियंका को झिड़क दिया, ‘‘तुम ज्यादा बोलने लायक नहीं हो. मैं तुम्हारी हकीकत जानता हूं. अंजलि तुम्हारे पास रहेगी तो तुम उसे भी अपने जैसा कर दोगी.’’

प्रियंका ने उसे आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा अंजलि से क्या मतलब, तुम कौन होते हो हमारे मामले में दखल देने वाले.’’

‘‘वह मेरी दोस्त है.’’ निश्चल ने कहा.

‘‘दूसरों को सिखाने के बजाय अपने दामन में झांक कर देखो. अपनी पत्नी को ही ले लो?’’

‘‘मेरी पत्नी में क्या कमी है? वह तुम से लाख गुना अच्छी है.’’

‘‘वह खुद भी कौलगर्ल है.’’ प्रियंका ने कहा.

यह सुन कर निश्चल को गुस्सा आ गया, ‘‘तुम्हें शरम आनी चाहिए ऐसी बकवास करते हुए. आइंदा ऐसी बात की तो अच्छा नहीं होगा.’’

‘‘पत्नी के बारे में सुन कर इतना बुरा लगा? मैं एक नहीं, हजार बार कहूंगी.’’

बात बढ़ गई. अंजलि ने किसी तरह दोनों को समझा कर मामला शांत किया. इस घटना के बाद दोनों के रिश्ते और भी कड़वे हो गए.

प्रियंका निश्चल को फूटी आंख पसंद नहीं करती थी. निश्चल को प्रियंका की बातें कांटे की तरह चुभी थीं. बाद में उसे पता चला कि वह उस की पत्नी को बेवजह बदनाम कर रही है. ऐसी बातों के बाद निश्चल ने प्रियंका के घर आनाजाना कम कर दिया, लेकिन इस के बाद भी उसे ऐसी बातें पता चलीं तो उस ने सोच लिया कि वह प्रियंका को इस बार धमकी भरे अंदाज में समझाएगा. अगस्त के पहले सप्ताह में अंजलि वापस अपने घर रुद्रपुर चली गई. निश्चल अंजलि से बातें किया करता था. एक दिन बातोंबातों में अंजलि ने निश्चल को बताया कि उस की पत्नी के बारे में अंजलि अजीब बातें कर रही थी. इस बात ने निश्चल के दिल में प्रियंका के प्रति पनप रहे गुस्से की आग में घी का काम किया.

वह उस से नफरत करने लगा. निश्चल की दोस्ती अपने ही जिले के नारायन कालोनी निवासी गवेंद्र गुप्ता और गदरपुर सिमैनी निवासी मंगतराम से थी. निश्चल ने एक दिन अपने दोस्तों को बैठा कर कहा, ‘‘तुम मेरे दोस्त हो, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए.’’

‘‘कैसी मदद?’’ मंगतराम ने पूछा तो निश्चल ने प्रियंका की कड़वी बातें और उस की हकीकत बता कर कहा, ‘‘जो भी हो, मैं उसे एक बार समझाना चाहता हूं. मान गई तो अच्छा है वरना उस का किस्सा खत्म कर दूंगा. तुम लोगों को भी मेरे साथ चलना होगा.’’

‘‘ठीक है, हम तुम्हारा साथ देंगे.’’ दोनों दोस्तों ने कहा.

26 अगस्त को निश्चल अपने घर बुआ के घर जाने का बहाना कर के बरेली आ गया. उस रात वह अजय गुप्ता के पैतृक घर पर रुका. अगले दिन उस ने प्रियंका के घर जाने की ठान ली. निश्चल जानता था कि प्रियंका दिन में घर में अकेली ही होती है. उस के कहने पर अगले दिन यानी 27 अगस्त को उस के दोनों दोस्त भी मोटरसाइकिल से बरेली आ गए. निश्चल रुद्रपुर जाने की बात कह कर बुआ के घर से चला गया. तीनों स्टेशन के बाहर एकत्र हुए और वहां से वे प्रियंका के घर पहुंचे. इत्तफाक से उस समय प्रियंका का छोटा भाई सचिन उस से मिलने आया था. उसे देख कर उन का इरादा बदल गया. निश्चल के साथ चूंकि उस के दोस्त भी थे, इसलिए प्रियंका ने कड़वाहट जाहिर नहीं कि और उन्हें चायनाश्ता कराया. इस के बाद तीनों चले गए.

उस दिन की योजना फेल होने के बाद निश्चल किसी और मौके की तलाश में लग गया. 29 अगस्त को रक्षाबंधन का त्योहार था. निश्चल को पता चला कि अजय गुप्ता उस दिन काम के सिलसिले में बदायूं जाने वाला है. निश्चल को लगा कि यह अच्छा मौका है. 29 अगस्त को अजय गुप्ता प्रियंका को कार से सीबीगंज उस के भाइयों के पास ले गया. वहां प्रियंका ने अपने भाइयों को राखी बांधी. इस के बाद अजय गुप्ता उसे खुर्रम गौटिया वाले घर पर छोड़ कर खुद बदायूं चला गया. दोपहर करीब ढाई बजे निश्चल अपने दोस्तों के साथ मोटरसाइकिल से प्रियंका के घर पहुंचा. खतरे से अंजान प्रियंका ने उन के लिए दरवाजा खोल दिया. उस वक्त वह अकेली थी. तीनों अंदर आ कर बैठे तो निश्चल मुद्दे की बात पर आ गया.

वह धमकी भरे लहजे में प्रियंका से बोला, ‘‘तुम अपनी आदत से बाज नहीं आ रही हो और मेरी पत्नी को बदनाम कर रही हो. मैं तुम्हें आखिरी बार समझा रहा हूं, अगर आज के बाद मैं ने कुछ सुना तो अच्छा नहीं होगा.’’

उस की बात सुन कर प्रियंका भड़क उठी, ‘‘तेरा दिमाग खराब हो गया है, जो मुझे धमका रहा है. तू जानता नहीं मैं क्या चीज हूं?’’

‘‘बकवास बंद कर, मैं तुझे भी जानता हूं और तेरी औकात भी. एक कौलगर्ल है तू, इस से ज्यादा कुछ नहीं.’’

यह कहने के साथ ही आवेश में निश्चल कुर्सी से खड़ा हो गया. प्रियंका आगबबूला हो उठी. वह गालियां देते हुए बोली, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत. रुक मैं अभी अजय को फोन कर के बताती हूं.’’

इस के साथ वह रसोई की ओर बढ़ी. उस का मोबाइल रसोई में रखा था, क्योंकि जिस समय निश्चल आया था, वह रसोई में अपने लिए खाना लगा रही थी. निश्चल समझ गया कि प्रियंका मानने वाली नहीं है. बात और बिगड़ सकती थी. वह अजय को फोन करती उस से पहले ही तीनों उस के पीछे रसोई में पहुंच गए. औपरेशन के बाद प्रियंका का पैर अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था. लंगड़ाते हुए ठोकर लगने से वह रसोई में गिर गई. निश्चल ने अपने दोस्तों से कहा, ‘‘इसे निपटा देते हैं, वरना यह हमें फंसवा देगी.’’

तीनों तुरंत सहमत हो गए. निश्चल ने उठने की कोशिश कर रही प्रियंका को पलक झपकते दबोच कर उस के गले में पड़ा दुपट्टा पकड़ कर कस दिया. उस ने हाथपैर चलाए तो दोनों दोस्तों ने पकड़ लिए. प्रियंका ज्यादा विरोध नहीं कर पाई और जिंदगी से हाथ हाथ धो बैठी. प्रियंका के मरने के बाद तीनों ने उस के गहने उतार लिए. हत्या के बाद निश्चल ने घर में रखा ताला उठाया और बाहर लगा दिया. तीनों वापस चले गए. इस बीच रास्ते में उन्होंने घर की चाबी एक नाले में फेंक दी. पुलिस की जांच से बचने के लिए उन्होंने उस दिन अपने मोबाइल बंद कर रखे थे.

तीनों को उम्मीद थी कि प्रियंका की हत्या पहेली बन कर रह जाएगी और वे कभी पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन मोबाइल औफ करने वाली गलती उन्हें भारी पड़ गई. उधर अगले दिन अजय गुप्ता वापस आया तो हत्या का पता चला. इस बीच उस ने कई बार प्रियंका को फोन किया था, लेकिन कोई काल रिसीव नहीं हुआ था. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने निश्चल और उस के साथियों के कब्जे से प्रियंका के लूटे गए गहने और हत्या में प्रयुक्त मोटरसाइकिल बरामद कर ली. उन के पकड़े जाने के बाद अजय गुप्ता ने राहत की सांस ली, क्योंकि पुलिस उस पर संदेह कर रही थी. पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत तें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक किसी की भी जमानत नहीं हो सकी थी. प्रियंका ने महत्वाकांक्षाओं व आजादियों में न पड़ कर समय रहते खुद को संभाल लिया होता और विश्वास कर के निश्चल के लिए दरवाजा नहीं खोला होता तो ऐसी नौबत नहीं आती. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: बदनामी का दाग

True Crime Story: शादी के बाद भी सरोज अपने प्रेमी सूरज को भुला नहीं पाई थी. फिर एक दिन वह मायके में आई तो प्रेमी के साथ भाग गई. बदनामी के इस दाग को धोने के लिए सरोज की ससुराल और मायके वालों ने ऐसी खौफनाक साजिश को अंजाम दिया कि…

उ त्तर प्रदेश के लखनऊ-हरदोई मार्ग पर थाना कस्बा मलिहाबाद बसा है, जो आमों के लिए भी मशहूर है. इसी थाने के गांव वंशीगढ़ी से थोड़ा आगे निकलते ही जंगल शुरू हो जाता है. 26 जुलाई की सुबह गांव के कुछ लोग जानवरों को चराने इसी जंगल में गए तो उन्हें वहां एक लड़के और एक लड़की की लाश पड़ी दिखाई दी. उन्होंने यह बात गांव के चौकीदार निहाल पासी को बताई तो उस ने यह सूचना थाना मलिहाबाद पुलिस को दे दी.

लाशें पड़ी होने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सुधाकर पांडेय, एसएसआई अमरनाथ और कुछ सिपाहियों को साथ ले कर बंशीगढ़ी के जंगल पहुंच गए. जंगल में काफी अंदर एक जवान लड़के और लड़की की क्षतविक्षत लाश पड़ी थी. सबूत की तलाश में सुधाकर पांडेय ने आसपास की झाडि़यों में ताकझांक की तो उन्हें एक हैंडबैग मिला. उस की तलाशी ली गई तो उस में लड़की के कुछ कपड़े और एक पहचानपत्र मिला.

वह पहचानपत्र मृतक युवक का था. उस के अनुसार मृतक सूरज धानुक था, जो थाना मलिहाबाद के गांव सिरगामऊ का रहने वाला था. घर वालों से उस की पहचान हो सकती थी. इसलिए सुधाकर पांडेय ने लाशों की फोटोग्राफी करा कर मृतकों का सामान कब्जे में ले लिया और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ भिजवा दिया. थाने लौट कर थानाप्रभारी ने चौकीदार निहाल की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

सुधाकर पांडेय ने पहचानपत्र से मिले पते पर एक सिपाही को भेजा तो वहां उस की मां गुडि़या मिली. जब उस से सूरज की हत्या के बारे में बताया गया तो वह अपने देवर के बेटे के साथ रोते हुए थाना मलिहाबाद पहुंची. गुडि़या ने लाशों के फोटो देखने के बाद रोते हुए बताया कि सूरज के साथ जिस युवती की लाश मिली है, वह लड़की सरोज है. दोनों एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. कुछ दिनों पहले सूरज सरोज को उस की ससुराल से ले कर भाग गया था, जिस की वजह से सरोज की ससुराल तथा मायके वाले काफी नाराज थे. 18 जुलाई को सरोज के पति मंजेश ने हरदोई के थाना संडीला में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. उसे पूरा यकीन है कि दोनों की हत्या उन्हीं लोगों ने की है.

गुडि़या के बताए अनुसार, मृतका का नाम सरोज था. वह उसी के गांव के रहने वाले रामऔतार पाल की बेटी थी, जो हरदोई के थाना संडीला के गांव ककराली के रहने वाले मंजेश के साथ ब्याही थी. गुडि़या ने यह भी बताया कि थाना संडीला में सरोज को भगाने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. उन्होंने पता किया तो सचमुच वहां रिपोर्ट दर्ज थी. उन्होंने इस मामले को वहां ट्रांसफर करने की कोशिश शुरू कर दी. लेकिन अधिकारियों के आदेश के बाद मुकदमा ट्रांसफर नहीं हो सका.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, सूरज और सरोज की मौत बेरहमी से मारपीट और गला घोंटने से हुई थी. पोस्टमार्टम के बाद लाशें सौंपने की बात आई तो सूरज के घर वाले तो उस की लाश ले गए, लेकिन सरोज की लाश लेने न तो उस की ससुराल से कोई आया और न ही मायके से. काफी देर बाद उस की मां और बहनें आईं तो पुलिस ने सरोज की लाश उन के हवाले कर दी. पुरुषों के न आने से पुलिस को संदेह हुआ. सुधाकर पांडेय सरोज के पति मंजेश की तलाश में उस के घर पहुंचे तो मंजेश ही नहीं, घर के अन्य पुरुष भी गायब थे. इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि दोनों हत्याएं इन्हीं लोगों ने की होंगी.

मंजेश की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने उस के सभी रिश्तेदारों के घर छापा मारा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. पुलिस ने मंजेश के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि सरोज जब ससुराल से भागी थी, तभी से मंजेश अपने दोनों सालों दिनेश उर्फ तिवारी और शिवकुमार के संपर्क में था. इस के बाद सुधाकर पांडेय सिरगामऊ स्थित सरोज के मायके पहुंचे तो उस के भाई दिनेश और शिवकुमार भी घर से गायब मिले.

5 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने मुखबिर की सूचना पर दिनेश और शिवकुमार को उन के घरों से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर की गई पूछताछ में दिनेश और शिवकुमार ने अपना जुर्म कबूल करते हुए इस सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड के बारे में पुलिस के सामने जो बयान दिया, उस में औनर किलिंग की एक खौफनाक कहानी सामने आई, जो इस प्रकार थी. लखनऊ की थानाकोतवाली मलिहाबाद का एक गांव है सिरगामऊ. इसी गांव में शुकुल धानुक  अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी गुडि़या, 2 बेटे सूरज, रोहित और 2 बेटियां थीं. शुकुल धानुक खेतीबाड़ी कर के गुजारा करता था. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, जिस की वजह से वह बच्चों को पढ़ालिखा नहीं सका.

22 साल का सूरज खेती करने के साथसाथ आम के बागों की देखभाल करता था. बेटियां और दूसरा बेटा अभी छोटे थे. इसी गांव में रामऔतार भी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रूपमती, 3 बेटियां तथा 2 बेटे दिनेश और शिवकुमार थे. रामऔतार लखनऊ में सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी करता था. बड़ा बेटा दिनेश एक स्कूल की बस चलाता था. गांव में थोड़ीबहुत जमीन थी, जिस से खानेपीने भर का अनाज पैदा हो जाता था. इस तरह परिवार का गुजारा आराम से हो रहा था. रामऔतार और शुकुल धानुक के घर अगलबगल थे. लेकिन अलगअलग जाति के होने की वजह से दोनों परिवारों में ज्यादा मेलजोल नहीं था. हां, उन के बच्चे जातिपांत को न मानते हुए आपस में मेलजोल रखते थे.

सूरज और रामऔतार की तीसरे नंबर की बेटी सरोज हमउम्र थे, इसलिए बचपन से साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे. सूरज को सरोज बहुत अच्छी लगती थी. जब भी वह सरोज को देखता, उस की आंखों में अनोखी चमक आ जाती. इसलिए वह उसे हमेशा देखते रहना चाहता था. सरोज ने भी इस बात को महसूस किया तो उस के मन में भी सूरज के लिए कोमल भावनाएं अंगड़ाई लेने लगीं. इस का परिणाम यह निकला कि दोनों एकदूसरे को चाहने लगे.

सरोज उर्फ बउवा गोरे रंग की खूबसूरत लड़की थी. शोख, चंचल और मिलनसार स्वभाव की होने की वजह से सभी उसे प्यार करते थे. सूरज का घर बगल में ही था, इसलिए वह जैसे ही घर से बाहर निकलता, सरोज को पता चल जाता. इस के बाद किसी बहाने से वह सूरज से मिलने बागों की ओर निकल जाती, जहां दोनों घंटों अकेले में बैठ कर प्यार की मीठीमीठी बातें करते और एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाते. लेकिन जब शादी की बात आई तो सूरज ने कहा कि वह छोटी जाति का है, इसलिए उस के घर वाले इस शादी के लिए कभी तैयार नहीं होंगे.

इस बात से सरोज उदास हो गई. उसे उदास देख कर सूरज ने कहा कि वह उस के बिना जीने की बात सोच नहीं सकता, इसलिए गांव से भाग कर कहीं दूर चले जाएंगे, जहां उन के घर वाले उन्हें खोज नहीं पाएंगे. इस के बाद कुछ पैसे ले कर दोनों भाग गए. शाम को जब सरोज के घर से भाग जाने का पता चला तो बदनामी के डर से रामऔतार बेटों के साथ चोरीछिपे उस के बारे में पता लगाने लगा. उस ने थाने में सूरज के खिलाफ रिपोर्ट भी नहीं दर्ज कराई. उस के घर जा कर धमकी जरूर दे आए कि अगर सूरज ने सरोज को जल्दी घर ला कर नहीं छोड़ा तो इस का परिणाम बहुत भयानक होगा.

शुकुल धानुक और गुडि़या वैसे भी सीधेसादे स्वभाव के थे, उन्होंने इस मामले में चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. दूसरी ओर जीनेमरने की योजना बना कर भागे सूरज और सरोज के पास जब तक पैसे रहे, तब तक पतिपत्नी के रूप में अपनी ही दुनिया में डूबे रहे. लेकिन जब पैसे खत्म हो गए तो आटेदाल के भाव का पता चला. सूरज ने कामधंधे की बहुत तलाश की, लेकिन जहां भी काम मिलता, वेतन इतना कम होता कि दोनों का गुजारा होना मुश्किल था. जब उन के भूखों मरने की नौबत आ गई तो घर लौटने के अलावा उन के पास कोई उपाय नहीं बचा. आखिर हिम्मत कर के दोनों घर लौट आए. उन का सोचना था कि वे घर वालों से कह कर शादी कर लेंगे.

सरोज के लौटने पर पहले तो घर वालों ने उसे जी भर कर कोसा, उस के बाद उस के लिए लड़के की तलाश करने लगे. इसी के साथ उस के घर से बाहर निकलने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई. सरोज समझ गई कि अब सूरज के साथ जिंदगी बिताने का उस का सपना सपना ही बन कर रह जाएगा, क्योंकि उस के घर वाले किसी भी हालत में उस की शादी सूरज के साथ नहीं करेंगे. काफी दौड़धूप के बाद रामऔतार को पड़ोस के गांव ककराली में मिश्रीलाल का बेटा मंजेश सरोज के लिए पसंद आ गया. इस के बाद मंजेश से उस की शादी हो गई. यह सन 2012 की बात है.

शादी के बाद सरोज ससुराल चली गई. मंजेश सरोज जैसी सुंदर पत्नी पा कर बेहद खुश था. यही वजह थी कि वह पत्नी की हर इच्छा का खयाल रखता था. इस के बावजूद सरोज सूरज को भुला नहीं पाई. वह जब भी अकेली होती, सूरज को याद कर के आंसू बहाती रहती. धीरेधीरे ढाई साल गुजर गए. इस बीच वह मंजेश के बेटे की मां बन गई. सूरज भी सरोज को नहीं भुला सका था. दिनरात सरोज उस के खयालों में छाई रहती. शायद वह अपनी जिंदगी सरोज की यादों में काटना चाहता था. इसीलिए अभी तक उस ने शादी नहीं की थी. उसी बीच उस के पिता की मौत हो गई तो परिवार चलाने की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ गई.

एक दिन वह बागों से लौटा तो पता चला कि सरोज मायके आई है. उस ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो भी हो, वह सरोज से जरूर मिलेगा और उस के दिल का हाल पूछेगा. अब तक सरोज के घर वालों को लगने लगा था कि सरोज सूरज को भूल चुकी होगी, इसलिए उन्होंने उसे गांव में किसी के घर आनेजाने की छूट दे दी होगी. सूरज मौके की तलाश में रहने लगा. एक दिन दोनों मिले तो एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. सरोज ने सूरज का नंबर सहेली के नाम से सेव कर लिया. इस बीच दोनों सब की नजरें बचा कर कई बार मिले. इन मुलाकातों में जब सरोज ने बताया कि वह इस शादी से जरा भी खुश नहीं है तो सूरज चौंका. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सरोज अब भी उसे अपने दिल में बसाए है. उसे लगता था कि सरोज उसे भुला कर अपने परिवार में रम गई होगी.

सूरज ने पूछा, ‘‘क्या तुम अब भी मेरे साथ जिंदगी गुजारने को तैयार हो.’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए अपना बसा-बसाया घर छोड़ने को लिए तैयार हूं.’’

इस के बाद दोनों ने खूब सोचविचार कर योजना बना डाली. मायके से सरोज का भागना ठीक नहीं था. वैसे भी उस के घर वाले ज्यादा देर तक बाहर रहने पर चौकन्ने हो जाते थे. इसलिए उस ने कहा कि ससुराल जाने के कुछ दिनों बाद वह बच्चे को छोड़ कर अकेली सूरज के साथ भाग जाएगी. सरोज के साथ घर से भागने की योजना बनाने के बाद सूरज पैसों का इंतजाम करने लगा. कुछ दिनों बाद मंजेश आया तो सरोज ससुराल चली गई. ससुराल में किसी को भी उस के घर से भाग जाने का अंदाजा नहीं था, इसलिए उस के घर से बाहर आनेजाने की पूरी छूट थी.

16 जुलाई को सूरज सरोज से संडीला कस्बे में शीतला देवी के मेले में मिला तो कहा कि रात में वह गांव के बाहर आ कर उसे फोन कर देगा. उस के बाद वह तुरंत घर से निकल कर उस के पास आ जाए. सरोज ने हामी भर दी. रात में सूरज ने फोन किया तो अपने 8 महीने के बेटे को सोता छोड़ कर सरोज गांव के बाहर इंतजार कर रहे सूरज के पास आ गई. सूरज सरोज को साथ ले कर मन में नई जिंदगी बसाने के सतरंगी सपने देखता हुआ लखनऊ की ओर चल पड़ा. कुछ देर बाद बच्चे का रोना सुन कर उस की सास सोमा देवी ने सरोज को आवाज देते हुए बच्चे को चुप कराने को कहा. जब बच्चा चुप नहीं हुआ तो वह बहू सरोज के कमरे में गई. लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. सोमा को चिंता हुई कि इतनी रात में बहू कहां चली गई. उस ने बेटे को जगाया. इस के बाद सभी सरोज को तलाशने लगे.

सरोज के न मिलने पर घर वालों को शक हो गया कि जरूर वह किसी के साथ भाग गई होगी. इस के बाद मंजेश ने सरोज के घर छोड़ कर कहीं जाने की बात अपने साले दिनेश को बता कर पूछा कि कहीं सरोज वहां तो नहीं गई है. दिनेश ने कह दिया कि वह यहां नहीं आई है. बहन की करतूत सुन कर दिनेश ने अपना सिर पीट लिया. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि शादी के ढाई, तीन साल बाद सरोज इस तरह घर छोड़ कर चली जाएगी. उन्होंने मंजेश से कहा कि वह पता लगाए कि सरोज को जाते हुए किसी ने देखा तो नहीं, वह किस के साथ गई है.

काफी खोजबीन के बाद भी जब सरोज का कुछ पता नहीं चला तो 2 दिन बाद मंजेश ससुराल आ कर गांव में हो रही अपनी बदनामी के बारे में बता कर गालीगलौच करने लगा. रामऔतार का परिवार बेटी की इस करतूत से काफी दुखी था. दामाद की पीड़ा को समझते हुए उन्होंने उसे सब कुछ बता दिया. तब 18 जुलाई को मंजेश ने संडीला कोतवाली में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ अपनी पत्नी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. संडीला पुलिस ने काररवाई करते हुए सूरज के घर जा कर पूछताछ की तो वे उस के बारे में कुछ नहीं बता सके. सूरज का दोस्त धर्मेंद्र घर में ही मिल गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह सूरज और सरोज के प्रेमसंबंधों के बारे में तो जानता था, लेकिन वे कहां हैं, इस बात की जानकारी उसे नहीं है.

पूछताछ के बाद धर्मेंद्र को छोड़ दिया गया. इधर पुलिस ने सूरज और सरोज के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था. दूसरी ओर मंजेश अपने साले दिनेश, शिवकुमार तथा अन्य कुछ रिश्तेदारों के साथ सरोज की तलाश में लगा था. मंजेश के गांव ककराली में उस की पत्नी सरोज के घर से भाग जाने की बात चर्चा का विषय बनी हुई थी. लोग चटखारे लेले कर आपस में तरहतरह की बातें कर रहे थे, जिस से घर वालों का बाहर निकलना दूभर हो गया था. 26 जुलाई की शाम मंजेश अपने चचेरे चाचा राकेश के साथ अपनी ससुराल पहुंचा, तभी उस के मोबाइल पर सरोज का फोन आया कि वह इस समय दुबग्गा में है और उस के साथ घर चलना चाहती है.

सरोज का फोन सुन कर मंजेश ने दिनेश से कहा कि गांव में उस की इतनी बदनामी हो चुकी है कि अब वह सरोज को अपने घर नहीं ले सकता. दिनेश और शिवकुमार भी उसे अपने घर में नहीं रखना चाहते थे. तुरंत सभी ने सरोज की हत्या की योजना बना डाली. इस में दिनेश और शिवकुमार ने अपने चचेरे भाई हिन्ना उर्फ सुनील को भी शामिल कर लिया. वे भी चाहते थे कि किसी तरह सूरज मिल जाए तो वे उस का भी काम तमाम कर दें. मंजेश की मोटरसाइकिल पर राकेश और हिन्ना और दिनेश व शिवकुमार अपनी मोटरसाइकिल से रात 11 बजे अंधे की चौकी के पास कलामंडी होते हुए दुबग्गा में सरोज द्वारा बताए स्थान पर पहुंच गए. सरोज वहां मिल गई.

सरोज से सूरज के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले वह उसे छोड़ कर बालागंज की ओर गया है. दिनेश के चचेरे भाई सुनील उर्फ हिन्ना ने राकेश को तुरंत अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और बालागंज की ओर चल पड़ा. थोड़ी दूर जाने पर सूरज दिखाई दे गया. हिन्ना उसे गांव में पंचायत के सामने सरोज से उस की शादी करवाने का झांसा दे कर मोटरसाइकिल पर बीच में बैठा लिया और उसे भी वहां ले आया जहां मंजेश, राकेश और दिनेश सरोज को ले कर उस का इंतजार कर रहे थे.

सरोज ने डरते हुए चोर नजरों से सब की ओर देखा. उन के चेहरों के भाव देख कर वह कांप उठी. लेकिन अब बाजी उस के हाथ से निकल चुकी थी. दोनों को ले कर वे माल की ओर जाने वाली रोड पर चलते हुए वंशीगढ़ी के जंगल में पहुंचे. जंगल में सन्नाटा छाया था. राकेश सूरज को पकड़ कर एक जगह खड़ा हो गया तो मंजेश सरोज को ले कर जंगल के अंदर चला गया. उस के पीछेपीछे सरोज के दोनों भाई दिनेश और शिवकुमार भी थे. मंजेश ने सरोज को पकड़ने का इशारा किया तो दिनेश और शिवकुमार ने सरोज के हाथ और पैर कस कर पकड़ लिए. इस के बाद मंजेश ने सरोज के गले में पड़ी चुन्नी से उस का गला कस दिया. सरोज के बेहोश होने पर मंजेश ने डंडे से तो दिनेश, हिन्ना और शिवकुमार ने उसे लातघूंसों से मारना शुरू किया. थोड़ी देर में सरोज की मौत हो गई.

सरोज को मार कर वे सूरज के पास पहुंचे. सूरज अब तक समझ चुका था कि उन लोगों ने सरोज की हत्या कर दी होगी, अब उस की बारी है. सरोज को भी वे उसी जगह ले गए, जहां सरोज की लाश पड़ी थी. दिनेश ने उस के दोनों हाथ पकड़े तो राकेश ने उस का मुंह दबाया. हिन्ना और शिवकुमार ने उस के पैर पकड़ लिए. सूरज के बैग से शर्ट निकाल कर उसे वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. शर्ट से हिन्ना और शिवकुमार ने सूरज का गला कस दिया, जिस से वह भी बेहोश हो गया. इस के बाद उसे भी डंडे और लातघूंसों से पीटपीट कर मार दिया गया.

दोनों की हत्या करने के बाद मंजेश और उस के चाचा राकेश अपने गांव ककराली चले गए तो सरोज के भाई दिनेश, शिवकुमार तथा हिन्ना अपने गांव सिरगामऊ लौट आए. हत्या के 2 दिनों बाद जब उन्हें पता चला कि मलिहाबाद पुलिस लाशों को बरामद कर के जांच कर रही है तो सभी अपनेअपने घरों से फरार हो गए. लेकिन पुलिस के हाथ उन के गिरेबान तक पहुंच ही गए. शिवकुमार की  मोटरसाइकिल यूपी32-ईएल 3768 पुलिस ने बरामद कर ली थी. सूरज एसपी था, इसलिए मुकदमे में धारा 147 और 3(2)5 एससी/एसटी एक्ट की धारा और बढ़ा दी गई थी.

6 अगस्त को इंसपेक्टर सुधाकर पांडेय ने इस दोहरे हत्याकांड के आरोपी दिनेश उर्फ तिवारी तथा शिवकुमार को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 7 अगस्त को सरोज के पति मंजेश ने भी न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. 11 अगस्त को सुबह 10 बजे पुलिस ने हिन्ना उर्फ सुनील को कुशनगरी गांव के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपनी मोटरसाइकिल से कहीं जाने की फिराक में था. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हिन्ना की मोटरसाइकिल यूपी32- डीएच3125 भी अपने कब्जे में ले ली. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया.

21 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने अभियुक्तों की निशानदेही पर आलाकत्ल वे लाठीडंडे भी बरामद कर लिए गए, जिन से सूरज और सरोज की हत्या की गई थी. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी राकेश फरान था. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Kahani: सगुन असगुन

Hindi Kahani: जिस दिन सेहर के मांबाप ने रिश्ता मंजूर किया, उस के तीसरे रोज हमारे तायाजान का इंतकाल हो गया. वह साल भर से बीमार थे और उन की उम्र भी सत्तर से ऊपर थी. मैं ने हर मुमकिन कोशिश की कि यह खबर सेहर तक न पहुंचे. लेकिन सेहर से यह बात भला कैसे छिप सकती थी?

मैं अपने दोस्त वाजिद के ड्राइंगरूम में बैठा उस से गप्पें लड़ा रहा था. पास ही उस का छोटा भाई हामिद भी बैठा था. हम तीनों इंतजार में थे कि भीतरी दरवाजे का परदा हटे और वाजिद की बहन अपनी चंचल मुसकराहट के साथ हमें चाय पेश करे. इसी बीच बाहरी दरवाजे की घंटी बजी. हामिद उठ कर दरवाजा खोलने गया. फिर जनाना सैंडिलों की टकटक की आवाज आई तो मेरी नजर बेअख्तियार उसी तरफ चली गई. दरवाजे का परदा फर्श से करीब एक फुट ऊंचा था और उस के पास से गुजरने वाले के सिर्फ पैर नजर आते थे. अचानक मेरी नजर उन पैरों पर पड़ी. उफ मेरे खुदा, इतने खूबसूरत पांव शायद ही पहले कभी देखे हों. सफेद हील की सैंडिलों में उस के गुलाबी पांव बहुत भले लग रहे थे.

नाखूनों पर नफासत से लगी नेलपौलिश और गजब ढा रही थी. वह चली गइ, लेकिन मैं बहुत देर तक नजरें जमाए वहीं देखता रहा. उस के खूबसूरत पांव देख कर मुझे यकीन हो चला था कि वह खुद भी बेहद हसीन होगी. न जाने कब तक मैं सोचों में गुम रहता कि वाजिद की आवाज ने मुझे चौंका दिया, ‘‘यार हैदर, अब वापस आ जाओ. वह तो कब की जा चुकी है.’’

कुछ ही देर बाद वाजिद की बड़ी बहन चाय की ट्रे लिए कमरे में दाखिल हुई. मैं वाजिद का बेतकल्लुफ दोस्त था और इस नाते हम दोनों के घर वाले भी एकदूसरे से बखूबी वाकिफ थे. इसलिए मैं भी उन्हें वाजिद की तरह बाजी ही कहता था और वह भी मुझ से बड़ी बहन की तरह सलूक करती थीं. उन के हाथ में चाय की ट्रे देख कर मुझे थोड़ी सी हैरत हुई और मैं कह उठा, ‘‘अरे बाजी, आप ने क्यों तकलीफ की? हमें ही आवाज दे ली होती.’’

‘‘तुम खुद तो यहां छिपे बैठे हो. आवाज किसे देती? और जितनी देर में आवाज यहां तक पहुंचती, उतनी देर में मैं खुद ही पहुंच गई.’’

‘‘मैं तो इसलिए कह रहा था कि शायद आप के यहां मेहमान आए हुए हैं. आप उन्हें अटैंड कर रही होंगी.’’

‘‘मेहमान, मेहमान तो कोई नहीं आया.’’ वह चौंकते हुए बोलीं, फिर जैसे उन्हें कुछ याद आ गया, हंसते हुए कहने लगीं, ‘‘अच्छा, तुम शायद सेहर की बात कर रहे हो. अरे भई, वह तो शबनम की सहेली है और उसी के कमरे में बैठी है. मगर तुम मेहमानों के बारे में इतने फिक्रमद क्यों हो, क्या इरादे हैं?’’

‘‘कुछ नहीं, मेरा क्या इरादा हो सकता है? वह तो मैं ने घंटी की आवाज सुनी थी, इसलिए पूछ लिया.’’ मैं ने झेंपते हुए कहा.

बाजी वापस चली गईं और मैं सेहर के बारे में सोचने लगा. पैरों की झलक तो मैं ने देख ही ली थी. अब नाम भी मालूम हो गया था. बाजी ने तो मजाक में एक बात कही थी, लेकिन मैं सेहर के बारे में संजीदा होता गया.  मुझे यकीन था कि सेहर और उस के घर वाले मेरा रिश्ता कबूल कर लेंगे. लेकिन इस यकीन की दीवार में उस वक्त दरारें पड़ जातीं, जब मैं अपनी कटी हुई अंगुलियों के बारे में सोचता. जी हां, यही वह कमी थी, जिस के कारण मैं अपना सपना सच कर पाने में नाकाम रहा था. वह मनहूस दिन मैं कभी न भूलूंगा, जब एक हादसे ने मेरी शख्सियत को ग्रहण लगा दिया था.

अपिया दीदी के जन्म के 5 साल बाद मैं पैदा हुआ था. मेरे जन्म पर खूब खुशियां मनाई गईं. अम्मी, पापा और अपिया, सभी मुझे उठाएउठाए फिरते. मैं उन दिनों शायद डेढ़, 2 साल का था, जब बकरीद के मौके पर पापा ने कुछ रोज पहले ही बकरा ला कर घर में बांध दिया. मैं सारा दिन उस से खेलता रहता. उसे जबरदस्ती ठूंसठूंस कर घास खिलाता. हमारे यहां ईद के तीसरे दिन कुरबानी हुआ करती थी. जब पापा कसाई को ले कर आए तो मैं वहीं खड़ा रहा और कसाई की एकएक हरकत देखता रहा. इस दौरान अम्मी ने कई बार मुझे आवाजें दीं, मगर मैं ने वहां से हिलने का नाम न लिया.

बोटियां बनाने के बाद कसाई ने बकरे की सिरी अपने सामने रखी तो मैं ने उस पर सवालों की बौछार कर दी, ‘‘आप इस का क्या करेंगे?’’

‘‘अब इसे भी काटेंगे.’’ कसाई ने अपना छुरा ऊपर उठाया.

उसी लम्हे मैं ने अपना बायां हाथ बकरे की सिरी पर रख दिया और बोला, ‘‘इस को न काटें.’’

मगर उस वक्त तक देर हो गई थी. कसाई को अंदाजा नहीं था कि मैं अपना हाथ बीच में ले आऊंगा. उस का छुरा नीचे आया और मेरे बाएं हाथ की तीन अंगुलियों को काटता हुआ सिरी की हड्डी पर पड़ा. सिरी के तो 2 टुकड़े हो गए, मगर इस के साथ ही मेरी अंगुलियां हाथ से जुदा हो कर दूर जा गिरीं. मेरी चीखें सुन कर सब लोग आ गए. पापा मुझे ले कर अस्पताल की तरफ दौड़े. त्यौहार का मौका था. इसलिए बड़ी मुश्किल से डाक्टर मिला. उस ने खून साफ कर के मेरे हाथ की डे्रसिंग की और इंजेक्शन लगा दिया. डे्रसिंग के बाद पापा मुझे घर ले आए.

बचपन तो जैसेतैसे बीत गया, मगर जवानी में कदम रखते ही मुझे अपनी इस कमी का तीखा अहसास होने लगा. मैं अच्छी शख्सियत का मालिक होने के बावजूद इस अहसास से पीछा छुड़ाने में नाकाम रहा. बस, यही खयाल हर सोच पर छा जाता कि मेरा हाथ देख कर कौन मुझे अपनी लड़की देगा. सेहर के बारे में जानने के बाद मैं अजीब दुविधा की हालत में फंस गया था. इस से पहले जब भी अम्मी ने मेरे रिश्ते की बात चलानी चाही, मैं ने उन्हें मना कर दिया. मैं नहीं चाहता था कि मेरे मांबाप जिस घर में रिश्ता ले कर जाएं, वहां इनकार हो जाए. लेकिन अब मैं ने फैसला कर लिया था कि सेहर के मामले में यह खतरा उठा कर ही रहूंगा.

दूसरे दिन मैं फिर वाजिद के यहां गया. वह घर पर मौजूद नहीं था. बाजी मेरी हालत देख कर हैरानी से बोलीं, ‘‘यह तुम ने क्या हालत बना रखी है? तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं बिलकुल ठीक हूं बाजी. आप से एक बात करनी है. वह सेहर है न, उस के पांव…’’

मेरी बात सुन कर बाजी खिलखिला कर हंसते हुए बोलीं, ‘वाह जनाब, न सूरत देखी न जानपहचान हुई, सिर्फ पांवों पर मर मिटे?

‘‘बाजी, मैं संजीदा हूं.’’

‘‘मेरे भैया, मैं ने कब कहा कि तुम संजीदा नहीं हो, लेकिन पहले उस से मिल तो लो.’’

‘‘जाहिर है, यह काम भी आप को ही कराना होगा.’’

अभी यह बातचीत हो ही रही थी कि अचानक मुझे खयाल आया और मैं माथे पर हाथ मारते हुए बोला, ‘‘अरे बाजी, मैं तो भूल ही गया. इतवार को अपिया की मंगनी है. अम्मी ने आप सब लोगों को बुलाया है. आप के लिए तो खास तौर पर ताकीद की है कि शबनम को ले कर जरा जल्दी आ जाएं.’’

‘‘कहो तो सेहर को भी साथ ले आऊं? इसी बहाने मुलाकात भी हो जाएगी.’’ बाजी मुझे छेड़ते हुए बोलीं.

मंगनी वाले दिन हमारे घर बड़ी चहलपहल थी. सारे मेहमान आ गए थे. मगर मुझे बाजी का इंतजार था. खुदाखुदा कर के वह और शबनम आई. सेहर उन के साथ नहीं थी. हंगामे में उन से कुछ पूछना बेकार था. जलसा खतम होते ही मैं अपिया के कमरे की तरफ लपका. बाजी ने मेरी बेचैनी भांप ली थी. मैं ने सारे लिहाज को ताक पर रख कर उन से पूछा, ‘‘बाजी, कुछ मालूम हुआ?’’

‘‘आराम से बैठो. अभी बताती हूं.’’

मैं उन के करीब कालीन पर बैठ गया. वह प्यार से मेरे सिर में अंगुलियां फेरते हुए बोलीं, ‘‘मेरे भैया, हर बात को दिमाग पर सवार नहीं कर लेते.  इस तरह जिंदगी बहुत कठिन हो जाती है.’’

बाजी की यह बात सुन कर मैं चौंक उठा. जरूर कोई ऐसी बात थी, जिसे बाजी बताने में हिचक रही थीं. मेरे दिल की धड़कन तेज होने लगी. शायद सेहर ने मुझे कबूल करने से इनकार कर दिया था और इसलिए वह बाजी के साथ हमारे घर नहीं आई.

मगर मैं अपने होशोहवास काबू में रखते हुए बोला, ‘‘बाजी, आप बेफिक्र हो कर मुझे सब कुछ बता दें. मैं बुरी से बुरी खबर सुनने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘सेहर शबनम की बहुत करीबी सहेली है. इसलिए मैं ने पहले शबनम से बात करना मुनासिब समझा और यह एक तरह से अच्छा ही हुआ,’’

बाजी लम्हा भर रुकीं और फिर मेरे चेहरे को गौर से देखते हुए बोलीं, ‘‘सेहर की 2 बहनें और भी हैं. वह सब से बड़ी है. बहुत छोटी उम्र में सेहर के लिए पहला रिश्ता आया और उस की मंगनी कर दी गई, लेकिन मंगनी के दूसरे ही दिन लड़के के किसी करीबी रिश्तेदार की मौत हो गई और उन लोगों ने सेहर को मनहूस मान कर मंगनी तोड़ दी.

‘‘कुछ दिनों बाद दूसरा रिश्ता आया. मंगनी की रस्म एक बार फिर धूमधाम से अदा की गई. लेकिन बदकिस्मती कि वहां भी किसी की मौत हो गई और वह मंगनी भी टूट गई. इन 2 इत्तफाकों ने सेहर को इतना मायूस कर दिया कि अब वह शादी के नाम से ही डर जाती है. उस की दोनों छोटी बहनों की शादी हो चुकी है. लोगों की बातें सुनसुन कर वह खुद भी अपने आप को मनहूस समझने लगी है.’’ यह कह कर बाजी ने गहरी सांस ली और खामोश हो गईं.

मेरे दिल में एक बार फिर उम्मीद के चिराग जल उठे. मैं ने कहा, ‘‘बाजी, यह तो कोई खास बात नहीं. सेहर जैसी पढ़ीलिखी लड़कियों को ऐसा नहीं सोचना चाहिए. मेरा खयाल है, आप सेहर से सीधे तौर पर बात करें और उसे मेरे बारे में सब कुछ बता दें.’’

‘‘वह तो मैं कर ही लूंगी, लेकिन पहले तुम्हारी अम्मी की रजामंदी तो ले लूं. ऐसा न हो कि वह भी सेहर को मनहूस समझ कर इनकार कर दें.’’

‘‘यह काम भी आप ही को करना होगा. मेरी तो हिम्मत नहीं पड़ती कि अम्मी से अपनी शादी की बात करूं.’’

बाजी मेरी बात पर हंस कर बोलीं, ‘‘खुद कुछ मत करना. हर काम में मुझे ही आगे कर देना. वैसे यह तो बताओ कि इस सारी भागदौड़ का मुझे क्या इनाम मिलेगा?’’

‘‘एक अदद प्यारसा दूल्हा, जो मैं तलाश करूंगा.’’

बाजी ने मेरे सिर पर हलकीसी चपत लगाई. दूसरे दिन अपिया ने मुझे बताया कि अम्मी इस रिश्ते के लिए तैयार हैं और एकदो रोज में वह सेहर को देखने जाएंगी. अपिया की जबानी यह खुशखबरी सुन कर मैं खुशी से झूम उठा. तभी मेरी नजर अपने हाथ पर गई, ‘‘अपिया, मेरे हाथ के बारे में उन लोगों को साफसाफ बता देना. हो सकता है…’’ मेरे अंदर के खौफ ने मुझे जुमला पूरा न करने दिया. अपिया ने बढ़ कर मेरे हाथ थाम लिए और प्यार से बोलीं, ‘‘मेरे प्यारे भाई, यह कोई ऐसी बड़ी बात नहीं, जिसे तुम ने अपने दिमाग पर सवार कर रखा है. तुम बेफिक्र रहो. इंशाअल्लाह, सब ठीक हो जाएगा.’’

दूसरे दिन शाम को बाजी और शबनम हमारे घर आईं. फिर अम्मी और अपिया को साथ ले कर सेहर के यहां गईं. उन के जाते ही मैं बेचैन हो गया. न जाने कैसेकैसे खयाल दिल में आ रहे थे. घबरा कर मैं बाहर निकल आया और इधरउधर भटकता रहा. काफी देर बाद घर लौटा. सब लोग वापस आ गए थे. अपिया किचन में थीं. मैं सीधा वहीं पहुंचा. अपिया के चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं था, जिस से मैं नतीजे के बारे में अंदाजा लगा पाता.

आखिर अपिया खुद ही बोलीं, ‘‘सेहर बड़ी प्यारी लड़की है. तुम्हारी पसंद की दाद देनी पड़ेगी. उन लोगों ने जवाब देने के लिए कुछ मोहलत मांगी है.’’

‘‘आप ने उन्हें मेरे हाथ के बारे में बता दिया था न?’’

‘‘हां बाबा, सब कुछ बता दिया. वे लोग बड़े रोशन खयाल हैं. उन्होंने इस बात को कोई अहमियत नहीं दी, बल्कि खुद ही सेहर के बारे में भी सब कुछ बता दिया. अम्मी ने भी उन लोगों से कह दिया कि ये सब जाहिलाना बातें हैं. इस में सेहर का क्या कसूर?’’

मैं खुशी से दीवाना हो गया और बेअख्तियार दौड़ता हुआ अम्मी के पास चला गया. अम्मी मुझे देखते ही मुसकरा दीं और मेरे सिर पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘खुश रहा करो बेटा. अल्लाह ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा. अब दुआ करो कि सेहर भी अपने खौफ से छुटकारा हासिल कर ले और इस रिश्ते के लिए हामी भर ले.’’

‘‘अम्मी, पापा ने तो कुछ नहीं कहा?’’ मैं ने डरतेडरते पूछा.

‘‘नहीं बेटा, वह क्या कहेंगे? हम सब तुम्हारी खुशी में खुश हैं.’’

कई दिन बीत गए, लेकिन उन लोगों की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. मेरी बेचैनी दिनबदिन बढ़ती जा रही थी. अपिया भी फिक्रमंद नजर आ रही थीं. उन का खयाल था कि एक बार फिर याद दिलाने के लिए सेहर के घर जाना चाहिए. मगर अम्मी का कहना था कि कुछ दिन और देख लो. इसी दौरान एक रोज शबनम का फोन आया. संजोग से मैं घर पर ही था. शबनम ने बताया कि सेहर उस के पास ही बैठी है और मुझ से कुछ बात करना चाहती है. मेरे कहने पर शबनम ने फोन का रिसीवर सेहर को थमा दिया.

‘‘हैदर साहब, शबनम के बेहद इसरार पर में ने अपने आप को बड़ी मुश्किल से रजामंद किया है कि आप से सीधे तौर पर बातचीत करूं. सब से पहले तो मैं यह कहना चाहूंगी कि आप अपने दिमाग से यह खयाल निकाल दें कि हाथ की मामूली सी खराबी की वजह से कोई लड़की आप को कबूल करने को तैयार नहीं होगी. मर्द की खूबसूरती उस की शराफत और काबिलियत होती है और ये खूबियां आप में मौजूद हैं. वह लड़की बेहद खुशनसीब होगी, जिसे आप जैसा हमसफर मिलेगा. लेकिन मैं अपने मामले में यही चाहती हूं कि आप मेरा खयाल दिल से निकाल दें. मेरा तो नाम लेने वाला भी मुश्किलों में घिर जाता है.’’

‘‘सेहर साहिबा, इस मेहरबानी का बेहद शुक्रिया. आप ने जो कुछ मेरे बारे में कहा है, वह मुझ जैसे इंसान को शर्मिंदा करने के लिए काफी है, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि जो मशविरा आप मुझे दे रही हैं, अगर वही मैं आप को दूं तो?’’

‘‘जी, मैं समझी नहीं…’’

‘‘बिलकुल सामने की बात है सेहर,’’ मैं बेतकल्लुफी पर उतर आया, ‘‘जिस तरह आप की नजर में मेरे हाथ की खराबी की कोई अहमियत नहीं है, ठीक उसी तरह आप को भी बेकार का वहम दिमाग से निकाल देना चाहिए. कुदरत के कामों में इंसान का क्या दखल? मुझे हैरत है कि आप समझदार और पढ़ीलिखी होने के बावजूद ऐसे वहमों में उलझी हुई हैं. जरूरी तो नहीं कि हर बार ऐसा ही हो. अगर खुदा न करे, ऐसी कोई बात हुई तो आप को उस से कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा. यह मेरा वादा है.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि आप अपनी जिद नहीं छोड़ेंगे?’’

‘‘सवाल ही नहीं पैदा होता. मैं हर कीमत पर आप को अपनाने का इरादा कर चुका हूं.’’

‘‘तो फिर अच्छी तरह सुन लीजिए. मेरे मांबाप पहले ही मेरी वजह से बहुत दुख उठा चुके हैं. अब मैं उन्हें और दुखी नहीं करना चाहती. अगर आप लोगों ने रिश्ता खत्म किया तो मैं जबरदस्ती आप के घर चली आऊंगी और फिर सारी उम्र वहां से निकलने का नाम नहीं लूंगी, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाए.’’ उस के लहजे में झुंझलाहट थी.

‘‘आप अभी तशरीफ ले आएं. अच्छा है, दोनों तरफ का खर्च बच जाएगा.’’ मैं ने हंसते हुए कहा.

फिर वही हुआ, जिस का सेहर को शुबहा था. जिस दिन सेहर के मांबाप ने रिश्ता मंजूर किया, उस के तीसरे रोज हमारे तायाजान का इंतकाल हो गया. वह साल भर से बीमार थे और उन की उम्र भी 70 से ऊपर थी. मैं ने हर मुमकिन कोशिश की कि यह खबर सेहर तक न पहुंचे. लेकिन सेहर से यह बात भला कैसे छिप सकती थी?

फिर एक दिन शबनम का फोन आया और मुझे मौजूद पा कर उस ने रिसीवर सेहर को थमा दिया.

‘‘मैं ने आप से कहा था न कि मेरा खयाल दिल से निकाल दें. क्या अब भी आप मुझे मनहूस नहीं कहेंगे?’’ सेहर भर्राई हुई आवाज में बोली.

‘‘पहले यह बताएं कि यह खबर आप तक कैसे पहुंची?’’ मैं ने कुछ तेज लहजे में पूछा.

‘‘इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. आज नहीं तो कल, यह खबर मुझे मिलनी ही थी.’’

‘‘देखो सेहर, तायाजान पिछले एक साल से बीमार थे. अब अगर उन का वक्त पूरा हो गया तो इस में तुम्हारा क्या कुसूर? फिर तुम्हें परेशान होने की जरूरत भी क्या है? तुम तो पहले ही धमकी दे चुकी हो कि हर हालत में हमारे ही घर आओगी.’’

मेरी यह बात सुनते ही वह खिलखिला कर हंस दी और रिसीवर शबनम को पकड़ा दिया.

‘‘हैदर भाई, अभी कुछ देर पहले तो यहां सावनभादो की झड़ी लगी हुई थी. आप ने क्या कह दिया कि यहां तो मौसम ही बदल गया है?’’

‘‘तुम कहां से आ गई कबाब में हड्डी बन कर… 2 मिनट चैन से बात भी नहीं करने देती.’’

‘‘बस जी, अब कोई बात नहीं होगी. वह कह रही है… ऐसे जिद्दी इंसान से तो मैं इकट्ठे ही बात करूंगी.’’

मेरे दिमाग से बहुत बड़ा बोझ उतर गया. सेहर का खौफ दूर हो गया था और वह मजबूती के साथ जिंदगी का सफर तय करने के लिए तैयार थी. मैं ने बाजी और अपिया को इस बात पर तैयार कर लिया कि हमारी शादी जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही बेहतर होगा. क्या मालूम कल कोई और हादसा हो जाए और सेहर के लिए नई मुश्किल पैदा हो. आखिर वह दिन भी आ गया, जिस का हम सब को शिद्दत से इंतजार था.

धड़कते दिल के साथ मैं दुलहन के कमरे में दाखिल हुआ. सेहर सिर झुकाए मसहरी पर बैठी थी. मेरी नजर सब से पहले उस के पांवों पर गई. उस के गुलाबी पांवों में सुर्ख मेंहदी और भी गजब ढा रही थी. जब मैं ने उस का घूंघट उठाया तो मुझे अपनी किस्मत पर यकीन हो आया. वह मेरे तसव्वुर से कहीं ज्यादा हसीन निकली.

‘‘सेहर, तुम जानती हो कि मैं ने सिर्फ तुम्हारे पांव देख कर ही तुम्हें पसंद कर लिया था? है न अजीब बात?’’

‘‘सारी बातें ही अजीब हुई हैं. मुझे तो अब भी यकीन नहीं आ रहा.’’ उस ने हौले से जवाब दिया.

‘‘यकीन तो दिला दूं, लेकिन मुझे क्या मिलेगा, बोलो?’’ मैं ने कहा तो वह लजा कर रह गई.

मजे की बात तो यह देखिए कि तब से अब तक हमारे घर न तो कोई गमी हुई और न दूसरी कोई बिपदा आई. सेहर के कदम बहुत अच्छे सगुन साबित हुए. Hindi Kahani

 

Domestic Dispute: रिश्तों का एक रंग ऐसा भी

Domestic Dispute: इंसपेक्टर अमित कुमार की पत्नी दीपमाला ने अपनी छोटी बहन मधु और बहनोई दीपक के बीच बनी खटास को दूर करने की कोशिश की. लेकिन उन्हें क्या पता था कि रिश्तों का यह बदरंग चेहरा एक दिन उन के ही परिवार के लिए खौफनाक बन जाएगा.

अमित कुमार आबकारी विभाग में इंसपेक्टर थे, उन के पास अपनी कार थी. औफिस टाइम के बाद वह शाम 7 बजे तक उत्तमनगर स्थित अपने घर पहुंच जाते थे. उस दिन भी वह रोजाना की तरह 7 बजे घर पहुंच गए थे. कार गैरेज में खड़ी कर के उन्होंने पत्नी दीपमाला को फोन किया कि मार्केट से कुछ मंगाना तो नहीं है. पत्नी के फोन पर घंटी तो जा रही थी, लेकिन वह फोन नहीं उठा रही थी. अमित ने सीढि़यां चढ़तेचढ़ते उन्हें दोबारा फोन किया. लेकिन इस बार भी पत्नी ने फोन नहीं उठाया. उन का फ्लैट दूसरी मंजिल पर था. सीढि़यां चढ़ कर वह फ्लैट के दरवाजे पर पहुंच गए.

उन के फ्लैट का ताला बंद था. दरवाजे पर ताला लगा देख कर उन्होंने सोचा कि दीपमाला शायद बच्चों के साथ बाजार गई होंगी. दीपमाला के पास २ फोन थे. अमित ने दूसरे नंबर पर भी २ बार फोन किया, लेकिन दीपमाला ने फोन रिसीव नहीं किया. अमित कुमार दिल्ली के आईटीओ पर स्थित चीफ कमिश्नर एक्साइज एंड सर्विस टैक्स कार्यालय में इंसपेक्टर थे. इस से पहले उन की पोस्टिंग दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर थी. वहां से 4-5 महीने पहले ही उन का कमिश्नर औफिस में ट्रांसफर हुआ था. वह अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ उत्तमनगर के मोहनगार्डन  के जे ब्लौक के एक फ्लैट में किराए पर रह रहे थे. उन की गृहस्थी हंसीखुशी के साथ चल रही थी.

अमित के एक जानकार दीपक अरोड़ा थे, जो उसी बिल्डिंग में तीसरी मंजिल पर रहते थे. वह उन्हीं के घर जा कर बैठ गए. उन्होंने दीपक से अपनी पत्नी और बच्चों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. थोड़ी देर में दीपमाला घर लौट आएगी, यह सोच कर अमित कुमार  काफी देर तक  दीपक अरोड़ा और उन की पत्नी से बातें करते रहे. बीचबीच में वह पत्नी को फोन भी मिलाते रहे, लेकिन उन की बात नहीं हो पाई.  वह यह सोच कर परेशान हो रहे थे कि आखिर दीपा ऐसी कौन सी जगह गई है कि फोन तक रिसीव नहीं कर रही है. वह वहां बैठे जरूर थे, लेकिन उन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

हालांकि दीपक अरोड़ा उन्हें बारबार समझाने की कोशिश कर रहे थे कि चिंता न करें, वह थोड़ी बहुत देर में आ जाएंगी. मगर उन के दिल को तसल्ली नहीं हो रही थी. दीपक के घर एक घंटे तक इंतजार करने के बाद दीपक फिर अपने फलैट के दरवाजे पर आ गए. उन्होंने एक बार फिर से पत्नी का फोन मिलाया. इस बार भी उन्हें निराशा ही मिली. अमित को औफिस से लौटे हुए एक घंटे से ज्यादा हो चुका था. अगर दीपमाला बाजार गई होती तो उसे लौट आना चाहिए था. जब अंधेरा घिरने लगा तो अमित का धैर्य जवाब देने लगा. वह अपने फोन की टौर्च जला कर दरवाजे की जाली से कमरे में रौशनी डालते हुए आंख लगा कर कमरे में झांकने लगे.

टौर्च की रौशनी कमरे में अंदर तक पहुंच रही थी, क्योंकि मेन गेट का लकड़ी का दरवाजा खुला था. इस के अलावा अन्य कमरों के दरवाजे भी खुले दिखे. यह देख कर अमित चौंके, क्योंकि दीपा जब भी कहीं जाती थी, लकड़ी और जाली के दोनों दरवाजे बंद कर के जाती थी. ऐसे में अमित की परेशानी बढ़नी स्वभाविक थी. लेकिन समस्या यह थी कि  दरवाजे पर ताला लगा हुआ था और वह अंदर नहीं जा सकते थे. फ्लैट के पीछे वाली साइड बालकनी थी. बालकनी में पड़ोसी के फलैट  से जाया जा सकता था. अमित को परेशान देख कर उन के पड़ोसी भी आ गए थे, अमित का दिल नहीं माना तो वह पड़ोसी के फलैट से हो कर अपने फलैट की बालकनी में पहुंच गए.

फलैट में अंधेरा था. मोबाइल टौर्च की मदद से वह लाइटें जलाने के  लिए स्विच बोर्ड के पास जा रहे थे कि तभी उन्हें बाथरूम के बाहर खून के निशान दिखाई दिए. घर में खून देखकर वह चौंक गए. किचन के साथ बाथरूम था. उस बाथरूम के बराबर में एक बैडरूम था. इस के अलावा एक और बैडरूम था, जिस में बाथरूम अटैच्ड था. इस बैडरूम की अलग से एक लौबी थी. घर में खून कहां से आया, जानने के लिए अमित ने बाथरूम की लाइट जलाई. लाइट जलते ही उन की चीख निकल गई, क्योंकि वहां उन के 9 वर्षीय बेटे सक्षम की लाश पड़ी थी. उस के पास ही उन की 7 साल की बेटी शैली की भी लाश थी. दोनों के गले कटे हुए थे. पूरे बाथरूम में खून ही खून फैला हुआ था.

अपने दोनों बच्चों की यह दशा देख कर अमित जोरजोर से रोने लगे. फ्लैट के अंदर अमित के चीखने और रोने की आवाज सुन कर दरवाजे के बाहर खड़े पड़ोसी समझ गए कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. झांक कर उन्होंने अमित से रोने की वजह पूछी तो अमित ने रोतेरोते बताया कि वह बरबाद हो गए, किसी ने उस के दोनों बच्चों को मार डाला है. अमित की बात सुन कर लोग दंग रह गए. वह भी फ्लैट में घुसना चाहते थे, लेकिन दरवाजे पर ताला लगा था. आपस में बात कर के लोगों ने वह ताला तोड़ना शुरू कर दिया. एकदो लोग उसी तरह पड़ोसी के फलैट से बालकनी में चले गए, जैसे अमित गए थे.

उधर अमित पत्नी को तलाशने के लिए एकएक कमरा देखने लगे. जब अटैच्ड बाथरूम वाले कमरे में पहुंचे तो वह एक बार फिर जोरों से चीखे, क्योंकि उस कमरे में बिछे फोल्डिंग पलंग पर उनकी पत्नी दीपमाला उर्फ दीपा की लाश पड़ी थी. दीपा का भी गला कटा हुआ था. उन के पैर पलंग से लटके हुए थे और एक पैर फर्श को छू रहा था. उन का कुर्ता वक्षों तक फटा हुआ था. अमित ने रोतेरोते पत्नी के कपड़े संभाले. तब तक लोगों ने दरवाजे का ताला तोड़ दिया था. वे सब अंदर पहुंचे तो अंदर 3-3 लाशें देख कर हैरान रह गए.

अमित का रोरो कर बुरा हाल था. कुछ लोग उन्हें दिलासा देने लगे. लेकिन यह संभव नहीं था, क्योंकि उन की बसीबसाई गृहस्थी बरबाद हो गई थी. पता नहीं उन से किस ने दुश्मनी निकाली थी. घटना के समय अमित अपने औफिस में थे, इसलिए वह बच गए थे. अगर वह भी घर पर होेते तो शायद जिंदा नहीं बच पाते. इसी दौरान किसी ने इस तिहरे हत्याकांड की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी थी. मोहनगार्डन इलाका पश्चिमी दिल्ली के उत्तमनगर थाने के अंतर्गत आता था. इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना थाना उत्तमनगर को दे दी गई. थोड़ी देर में इस तिहरे हत्याकांड की खबर पूरे मोहनगार्डन इलाके में फैल गई. रात होने के बावजूद तमाम लोग अमित कुमार के फ्लैट के पास जुटने लगे.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी भगवान सिंह, एसआई गोविंद सिंह, दीपक कुमार, कमल आदि के साथ रामा रोड पर स्थित मोहनगार्डन के जे ब्लौक में पहुंच गए. वहां काफी संख्या में लोग खड़े थे. भगवान सिंह अपनी टीम के साथ अमित के फ्लैट में पहुंचे. उन्होंने सब से पहले वह जगह देखी, जहां लाशें पड़ी थीं. यह बात पहली जून, 2015 की है. एक ही परिवार के 3 लोगों की हत्या पर थानाप्रभारी भी हैरत में रह गए. उन्होंने इस की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दी, साथ ही उन्होंने घटनास्थल की जांच होने तक अमित के अलावा सभी लोगों को फ्लैट से बाहर जाने के लिए कह दिया. मामला बड़ा था, इसलिए ज्वांइट सीपी दीपेंद्र पाठक, डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार, एडिशनल डीसीपी मोनिका भारद्वाज, एसीपी ओमवती मलिक भी घटनास्थल पर पहुंच गई.

मामले की गंभीरता को देखते हुए डीसीपी ने सीबीआई की सीएफएसएल टीम, एफएसएल टीम, क्राइम इनवैस्टिगेशन टीम को भी बुला लिया. सभी जांच टीमों ने घटनास्थल से जरूरी सबूत जुटाए. उन का काम निपटने के बाद पुलिस अधिकारियों ने पूरे फ्लैट का बारीकी से निरीक्षण किया. इस से पता चला कि दीपमाला उर्फ दीपा और उन के दोनों बच्चों की हत्या किसी तेज धार वाले हथियार से की गई थी. उन तीनों की गरदन एक ही तरह से काटी गई थी. इस से यही अनुमान लगाया गया कि तीनों का हत्यारा एक ही रहा होगा. जिस कमरे में दीपा की लाश पलंग पर पड़ी थी, उस में एक अलमारी भी रखी थी. जिस पलंग पर लाश पड़ी थी, उस पर कुछ कपड़े भी पड़े थे. उन कपड़ों पर भी खून के छींटे पड़े थे.

दीपा के फटे कपड़े और खुले बालों से लग रहा था कि उन्होंने हत्यारे का काफी विरोध किया था. उन की उंगलियों पर भी जख्म था. बाथरूम में 2 बच्चों का गला काटा गया था, वहां पूरे फर्श  पर खून फैला हुआ था. दोनों भाईबहनों की लाशें पासपास ही पड़ी थीं. सक्षम के दाएं  हाथ पर भी तेज धार हथियार की चोट दिख रही थी. बाथरूम के बाहर खून से सने पैरों के निशान थे. जिन की डाइरेक्शन बाथरूम से बाहर आने की थी. पुलिस और एक्सपर्ट टीम यह पता लगाने में जुट गई कि हत्यारे ने सब से पहले किसे मारा. दरअसल बाथरूम से बाहर खून से सने पैरों के निशानों से लग रहा था कि हत्यारे ने पहले बाथरूम में ले जा कर दोनों बच्चों का कत्ल किया होगा. संभावना थी कि उस ने यह सब मां के सामने ही किया होगा. उसी दौरान वह हत्यारे से भिड़ गई होंगी.

ड्राइंगरूम में चाय के 2 खाली कप भी रखे थे. जांच के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची की हत्यारा चाहे जो भी रहा होगा, वह कोई परिचित ही होगा. क्योंकि उस की फ्लैट में फ्रेंडली एंट्री हुई थी. वह पहले भी इस फ्लैट में आताजाता रहा होगा. टेबल पर रखे खाली कपों से पता चल रहा था कि दीपा ने उसे चाय पिलाई थी. जिस वक्त पुलिस जांच कर रही थी, उसी समय अमित का भाई जो नोएडा की किसी कंपनी में सीए है, वह भी अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंच गए. पुलिस ने उन से कुछ पूछताछ करनी चाही, लेकिन वह इतने दुखी थे कि कुछ नहीं बोले.

पुलिस अधिकारियों ने अमित से प्रारंभिक पूछताछ की तो उन्होंने पूरी कहानी बता दी. पुलिस ने उन से उन सभी लोगों के नामपते मालूम किए, जिन का उन के फ्लैट में आनाजाना था. हालांकि अमित भी पुलिस के शक के घेरे में थे, लेकिन उस समय पुलिस ने उन से ज्यादा पूछताछ करनी जरूरी नहीं समझी. पुलिस ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि किसी ने अमित के फ्लैट से रोने या चीखने की आवाज नहीं सुनी थी. पुलिस को यह भी पता चला कि अमित का 9 वर्षीय बेटा सक्षम और 7 वर्षीय बेटी शैली शाम को अन्य बच्चों के साथ नीचे जा कर खेलते थे. उस दिन भी वह शाम 5 बजे तक बच्चों के साथ खेले थे. इस से पुलिस ने यही अंदाजा लगाया कि वारदात शाम 5 बजे के बाद हुई थी.

दीपा के दोनों फोन कमरे में ही मिले थे. इस के अलावा कमरे का सारा सामान अपनी अपनी जगह पर था. इससे यही लगा कि हत्यारे का मकसद फ्लैट में लूटपाट करना नहीं था, बल्कि वह सिर्फ हत्या करने के लिए आया था और अपना काम कर के चला गया. दीपा के साथ सैक्सुअल अटैक जैसी आशंका भी नहीं दिखाई दी थी. घटनास्थल की प्रारंभिक काररवाई करने के बाद पुलिस ने तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल भिजवा दिया और अमित की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. केस की जांच थानाप्रभारी भगवान सिंह ने अपने हाथ में ले ली.

अगले दिन सहारनपुर से दीपा के मांबाप भी दिल्ली आ गए. पुलिस ने उन से पूछताछ  की तो उन्होंने बताया कि दीपा अपने पति के साथ हंसीखुशी से रह रही थी. उसे पति से कोई शिकायत नहीं थी. 3 जून को वह बच्चों को ले कर मायके आती, मगर उस से पहले ही यह सब हो गया. अमित को उन के सासससुर ने भले ही क्लीन चिट दे दी थी, पर पुलिस को अब भी उन पर शक था. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने तीनों शव घर वालों के हवाले कर दिए. तीनों लाशों को उन के घर सहारनपुर ले जाया गया. डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार ने इस तिहरे हत्याकांड को सुलझाने को 2 पुलिस टीमें बनाईं, पहली टीम विकासपुरी क्षेत्र की एसीपी ओमवती मलिक के नेतृत्व में बनी, जिस में थानाप्रभारी भगवान सिंह, एसआई गोविंद सिंह, दीपक कुमार, हेडकांस्टेबल महावीर सिंह, अजीत सिंह, कांस्टेबल हरीश कुमार और रामकुमार आदि को शामिल किया गया.

दूसरी पुलिस टीम स्पेशल स्टाफ के इंसपेक्टर सुरेंद्र राठी के नेतृत्व में बनी, जिस में एसआई ईश्वर सिंह, चरण सिंह आदि तेजतर्रार पुलिस अफसरों को शामिल किया गया. इस टीम को निर्देशित करने का दायित्व एसीपी औपरेशन दिनेश तिवारी का था. पुलिस को पहला शक आबकारी इंसपेक्टर अमित कुमार पर ही था. इस संदेह को दूर करने के लिए पुलिस ने अमित के फोन की काल डिटेल्स निकलवाईं तो घटना वाले दिन उन के फोन की लोकेशन औफिस के समय तक आईटीओ इलाके में ही मिली. इससे संतुष्टी नहीं हुई तो जांच टीम अमित की गैरमौजूदगी में उनके औफिस पहुंच गई. औफिस में काम करने वालों ने बताया कि पहली जून को अमित सुबह से शाम तक औफिस में ही थे.

अमित पत्नी व बच्चों के अंतिम संस्कार के लिए सहारनपुर गए हुए थे. इस बीच पुलिस ने दीपा के दोनों फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा ली थी. अमित के दिल्ली लौटने पर पुलिस ने उन से पत्नि व बच्चों की हत्या की बाबत पूछताछ की तो वह खुद को निर्दोष बताते रहे. थानाप्रभारी भगवान सिंह ने जब उन से पूछा कि उन की किसी से कोई रंजिश या दुश्मनी तो नहीं है? यह सुन कर अमित कुछ सोचने लगे, फिर कुछ देर बाद बोले, ‘‘हमारी किसी से दुश्मनी तो नहीं है, लेकिन हमारा छोटा साढू़ दीपक हम लोगों से खुश नहीं था. दूसरे वह पत्नी और बच्चों के अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखाई दिया.’’

अमित ने यह भी बताया कि दीपा के मायके वालों को दीपक जब अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखा तो उन्होंने उस के घर जा कर पूछताछ की. उस के घर वालों ने बताया कि वह पहली जून को दिल्ली गया था और वहां से रात पौने 12 बजे घर लौटा था. उस समय दीपक दूसरे कमरे में था. दीपा के मायके वालों ने जब दीपक को बुला कर पूछताछ की तो वह इस बात का जवाब नहीं दे पाया कि वह दिल्ली क्यों गया था. वह दिल्ली जाने की बात से साफ नकारता रहा. तब दीपा के मायके वालों ने उस से कह दिया कि वह कहीं नहीं जाए, क्योंकि दिल्ली पुलिस कभी भी उस से पूछताछ करने के लिए आ सकती है.

उन लोगों के जाने के थोड़ी देर बाद दीपक भी अपने घर से निकल गया. दीपक भी सहारनपुर में रहता था. इस से दीपा की छोटी बहन मधु की शादी हुई थी. 5 जून को दीपक की तलाश में एक पुलिस टीम सहारनपुर गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. उसे ढूंढने के लिए यह टीम सहारनपुर में ही डेरा डाले रही. अगली सुबह यानी 6 जून को दीपक के घर सहारनपुर के ही थाना कुतुबशेर से फोन आया. बताया गया कि अंबाला रेलवे लाइन पर बड़ी नहर के पास दीपक नाम के एक व्यक्ति की लाश मिली है. उस की जेब से जो परची मिली है, उसी पर एक फोन नंबर लिखा था, उसी नंबर पर काल की गई थी.

यह खबर मिलते ही दीपक के घर वाले रोतेबिलखते थाना कुतुबशेर पहुंच गए. वहां से पुलिस उन्हें उस जगह ले गई, जहां रेलवे लाइन के किनारे एक युवक की लाश पड़ी थी. उन लोगों ने उस की शिनाख्त दीपक के रूप में की. लाश का सिर ही क्षतिग्रस्त था. इससे यह पता लगाना मुश्किल था कि उस ने आत्महत्या की थी या फिर उस की साजिशन हत्या कर के लाश को वहां डाला गया था. बहरहाल थाना कुतुबशेर पुलिस ने दीपक की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. मृतका दीपा के मायके वालों को इस बात का गहरा सदमा पहुंचा. पहली जून को बड़ी बेटी दीपा और उस के दोनों बच्चों को किसी ने मार दिया. इस घटना को अभी हफ्ता भी नहीं हुआ था कि छोटी बेटी मधु भी 25 साल की उम्र में विधवा हो गई थी.

सहारनपुर में मौजूद दिल्ली पुलिस की टीम को जब यह बात पता चली कि जिस दीपक की उन्हें तलाश थी, उस की मौत हो गई है तो टीम को भी निराशा हुई. वह थाना कुतुबशेर पहुंच गई और थानाप्रभारी से बातचीत कर के दिल्ली लौट आई. डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार को जब दीपक की मौत की जानकारी मिली तो उन्हें भी लगा कि कहीं उसे किसी साजिश के तहत तो नहीं मार दिया गया. क्योंकि सामने ऐसा कोई क्लू नहीं था, जिस पर काम कर के तफतीश आगे बढ़ाई जा सकती.

डीसीपी ने पुलिस टीम को मृतक दीपक के फोन की काल डिटेल्स खंगालने के  निर्देश दिए. आदेश मिलते ही पुलिस ने दीपक के फोन की काल डिटेल्स निकलवाईं. उस में पहली जून को उस के फोन की लोकेशन दिल्ली की नहीं निकली. जिन लोगों से उस की फोन पर आखिरी मर्तबा बात हुई थी. पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. वे थे राजेश कुमार और गुलशन. दोनों ही सहारनपुर के रहने वाले थे. पुलिस ने दोनों से दीपा ओर उस के दोनों बच्चों की हत्या और दीपक की रेलवे ट्रैक पर मिली लाश के बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि दीपक उन का दोस्त था, लेकिन इन चारों की मौत के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता.

उन दोनों की बातों से पुलिस को लग रहा था कि ये लोग सच्चाई छिपाने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने दीपा और उस के दोनों बच्चों की हत्या की पूरी कहानी पुलिस के सामने बयां कर दी. सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स इंसपेक्टर अमित कुमार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के रहने वाले थे. करीब 12 साल पहले उन की शादी सहारनपुर के दूसरे मोहल्ले में रहने वाली दीपमाला उर्फ दीपा से हुई थी. दीपा भी खूबसूरत और पढ़ीलिखी लड़की थी. कालांतर में दीपा एक बेटे और एक बेटी की मां बनीं.

अमित और दीपा अपने बच्चों की परवरिश पर ध्यान देने लगे. अमित सरकारी अफसर थे. उन के यहां किसी भी चीज का अभाव नहीं था. सुखसुविधाओं के बीच बच्चों की परवरिश हो रही थी. उन्होंने मोहनगार्डन स्थित एक अच्छे स्कूल में उन का दाखिला भी करा दिया था. अमित दिल्ली के आइजीआई एयरपोर्ट पर तैनात थे. उन्होंने पश्चिमी दिल्ली के उत्तमनगर स्थित मोहनगार्डन के जे ब्लौक में एक फ्लैट किराए पर ले रखा था. दीपा हाउस वाइफ थीं. वह बच्चों पर पूरा ध्यान देती थीं. उन का फ्लैट दूसरी मंजिल पर था. शाम को वह बच्चों को पार्क में ले जाती थीं. दीपा एक व्यावाहारिक महिला थीं, इसलिए उस ब्लौक में रहने वाली कई महिलाओं से उन की दोस्ती हो गई थी. कुल मिला कर उन की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी.

दीपा से 10 साल छोटी उन की बहन मधु की शादी सहारनपुर के ही रहने वाले दीपक से हुई थी. दीपक एक जूता फैक्ट्री में काम करता था. इसके खिलाफ कुतुबशेर थाने में कई मामले दर्ज थे. जिसकी वजह से उसे 2014 में जिलाबदर कर दिया गया था. शादीशुदा होते हुए भी उस के संबंध दूसरे मोहल्ले की रहने वाली विमला से थे. एक बार मधु ने दीपक और विमला को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. उस वक्त दीपक ने पत्नि से माफी मांगी तो उसने उसे माफ कर दिया था. लेकिन दीपक ने विमला का साथ नहीं छोड़ा. वह उस से मिलता रहा.

मधु ने इस की शिकायत अपने मांबाप और बहन दीपा से की. सभी ने दीपक को समझाया, पर दीपक पर विमला के इश्क का ऐसा भूत सवार था कि वह विमला को नहीं भुला सका. इसी स्थिति के चलते एक दिन अमित कुमार और दीपा ने सहारनपुर पहुंच कर दीपक को अन्य रिश्तेदारों के सामने चेतावनी दी कि अगर वह नहीं माना तो मधु की तरफ से उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी जाएगी. रिश्तेदारों के सामने खुद की बेइज्जती दीपक को बुरी लगी. इस के बाद वह दीपा और उस के पति से खुन्नस रखने लगा. पति के अच्छे पद पर होने की वजह से दीपा बनठन कर रहती थी. नएनए डिजाइन के गहने पहनती थी. जबकि दीपक की तनख्वाह मामूली थी. वह जैसेतैसे घर चला रहा था. उसे अमित और दीपा से ईर्ष्या थी. वह उन्हें सबक सिखाना चाहता था.

जिस जूता फैक्ट्री में दीपक नौकरी करता था, उसी में उस के 2 दोस्त राजेश और गुलशन भी नौकरी करते थे. वे भी सहारनपुर में ही रहते थे. इन से दीपक की ऐसी दोस्ती थी कि वह उन्हें हर बात बता देता था. उस ने अपनी बेइज्जती की बात भी उन दोनों को बताई. उस ने उन से कहा कि दीपा के पास बहुत पैसा है और गहने भी हैं. अगर उसे उस के फ्लैट में मार कर पैसा और ज्वैलरी लूट ली जाए तो इस से एक पंथ दो काज हो जाएंगे. लोग यही सोचेंगे कि किसी ने लूट का विरोध करने पर हत्या की है. राजेश और गुलशन ने यह काम करने के लिए हामी भर दी.

लेकिन योजना को अंजाम देने के लिए दीपक राजेश और गुलशन को बिना बताए पहली जून, 2015 को दिल्ली आ गया. उस के मोबाइल की लोकेशन दिल्ली न आए, इसलिए उस ने अपने फोन को स्विच्ड औफ कर दिया. वह जानता था कि उस के साढू ड्यूटी पर होंगे, जिस से वह अपना काम आसानी से निपटा देगा. शाम 4 बजे वह अमित के फ्लैट पर पहुंचा. घंटी बजने पर दीपा ने दरवाजा खोला. ड्राइंगरूम में बिठा  कर वह उस से बातें कर ने लगी. उन्होंने उसे चाय बना कर पिलाई. दीपक की योजना से अनभिज्ञ दीपा उस दिन भी उसे समझा रही थीं. उस समय उन का 9 वर्षीय बेटा सक्षम और 7 वर्षीय बेटी वैष्णवी उर्फ शैली नीचे बच्चों के साथ खेल रहे थे.

दीपा से बातचीत करते समय दीपक मौके की तलाश में था. जैसे ही दीपा ड्राइंगरूम से उठ कर किचन में गइर्ं तो वह भी उन के पीछे पीछे वहां पहुंच गया. तभी उस ने दीपा के गले में पड़े दुपट्टे को कसना शुरू कर दिया. दीपा भी हट्टीकट्टी थीं. अचानक गला कसने से दीपा घबरा गई. उन्होंने पूरी ताकत लगाते हुए अपनी सुरक्षा करने की कोशिश की. उस समय उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था. शोर मचाते हुए वह अपनी जान बचाने के लिए कमरे की तरफ भागीं.

इस से दीपक घबरा गया. इसलिए वह भी उन के पीछेपीछे कमरे में पहुंच गया और कोई भारी चीज उनक के सिर पर मारी, जिस से वह फोल्डिंग पलंग पर गिर गईं. उन के गिरते ही उस ने साथ लाए चाकू से उन का गला रेत दिया. गला कटते ही खून का फव्वारा फूट पड़ा. जिस से पलंग पर रखे कपड़ों पर भी छींटे पड़ गए. कुछ देर छपपटाने के बाद दीपा का शरीर शांत हो गया. उन के मरने के बाद उस ने उस की अंगूठी और कानों की बालियां निकाल लीं. नीचे शैली और सक्षम अन्य बच्चों के साथ खेल रहे थे, खेलतेखेलते शैली के हाथ में किसी चीज से खरोंच लग गई. उस खरोंच को अपनी मम्मी को दिखाने के लिए वह रोती हुई ऊपर आई. कमरे का दरवाजा बंद था.

शैली ने जैसे ही घंटी बजाई, दीपक डर गया कि पता नहीं कौन आया है. उस ने आने वाले से निपटने की सोच ली. दीपक ने दरवाजा खोला तो बच्ची को देख कर उसे तसल्ली हुई. शैली दीपक को जानती थी. मौसा को देखते ही उसने मुसकराते हुए नमस्ते किया और फिर वह उस से पूछने लगी, ‘‘मौसाजी मम्मी कहां हैं?’’

दीपक ने उस से कहा कि वह बाथरूम में है, वह शैली को हाथ पकड़ कर बाथरूम में ले गया. उस बच्ची को क्या पता था कि उस के साथ क्या होने वाला है. बाथरूम में जाते ही उस ने शैली का गला काट दिया. इसी दौरान अचानक मौसम बदल गया. आंधी आने की वजह से नीचे खेल रहे सभी बच्चे अपनेअपने घर चले गए. सक्षम भी ऊपर अपने घर आ गया. दरवाजा बंद होने पर उस ने घंटी बजाई तो दीपक फिर घबरा गया. उसने सोचा कि इस बार शायद अमित आ गया है. उस ने तय कर लिया था कि इस दौरान जो भी आएगा, वह उस का काम तमाम कर देगा. उस ने दूसरी बार दरवाजा खोला तो सामने सक्षम था.

मौसा को देखते ही सक्षम ने उस के पैर छुए. उस का आदर भाव देख कर दीपक उसे मारना नहीं चाहता था, लेकिन उस को जिंदा छोड़ने पर उस के फंसने की संभावना थी. इसलिए उसे ठिकाने लगाने के लिए वह सक्षम को भी बाथरूम में ले गया. वहां छोटी बहन की लाश देख कर सक्षम घबरा गया. इस बारे में वह अपने मौसा से कुछ पूछने की हिम्मत जुटा पाता, इस से पहले ही दीपक ने उस का भी गला काट दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद उस का भी शरीर ठंडा हो गया. 3 हत्याएं करने के बाद दीपक ने बाथरूम में ही खून से सने हाथ धोए और जल्दबाजी में केवल जाली वाले दरवाजे पर ताला लगा कर चला गया.

रात करीब 12 बजे वह अपने घर पहुंचा. अगले दिन उसने फोन कर के अपने दोस्तों राजेश और गुलशन को एक जगह बुला लिया और दीपा व उस के दोनों बच्चों की हत्या करने की पूरी बात बता दी. उसने दीपा की अंगूठी और बालियां उन दोनों को देते हुए कहा कि यह बात किसी से न बताएं. उधर दीपा और उस के बच्चों की हत्या की बात सुन कर दीपा के मायके वाले और दीपक के मातापिता दिल्ली पहुंच गए, लेकिन दीपक का साढू़ के घर नहीं गया. न ही वह उन तीनों के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ. इस से दीपा के मातपिता को उस पर शक हो गया. वे दीपक से पूछने उस के घर भी गए. इस के बाद दीपक को लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा. शायद इसीलिए उसने रेलवे ट्रैक पर जा कर ट्रेन के आगे आत्महत्या कर ली.

पुलिस ने राजेश और गुलशन को भादंवि की धारा 120 बी के तहत गिरफ्तार कर के 9 जून को तीस हजारी न्यायालय में ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 3 दिनों के  पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उन की निशानदेही पर उन से दीपक द्वारा दी गई दीपा की ज्वैलरी बरामद की गई. इस के बाद उन्हें 12 जून को पुन: न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. Domestic Dispute

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, कथा में विमला परिवर्तित नाम है

Motivational Story: वन लैग डांसर की प्रेरक कहानी

Motivational Story: एक टांग कटने के बाद भी शुभरीत ने हार नहीं मानी और एक टांग से ही अब वह ऐसा डांस करती है कि दो टांगों वाले देख कर हैरान रह जाते हैं….

कुछ दिनों पहले तक पंजाब के जिला संगरूर के छोटे से गांव झुंडा के बारे में कोई कुछ    नहीं जानता था. शायद ही    किसी ने इस गांव का नाम सुना हो.  लेकिन आज इस गांव की एक बेटी की वजह से झुंडा गांव को देश के लोग ही नहीं, पूरी दुनिया के लोग जानने लगे हैं. झुंडा गांव में ही रहते थे सरदार परमजीत सिंह घुम्मण. उन के परिवार में धर्मपत्नी चरणजीत कौर के अलावा 2 बेटियां थीं, शुभरीत कौर और सुरमीत कौर. बड़ी बेटी शुभरीत कौर का जन्म 22 अप्रैल, 1986 को हुआ था.

अपनी पढ़ाई गांव के प्राइमरी स्कूल से शुरू कर के शुभरीत ने अमरगढ़ के सरकारी सीनियर सेकैंडरी स्कूल से दसवीं पास की. इस के बाद कस्बा गज्जण माजरा के पायनियर पब्लिक स्कूल से बारहवीं किया और जीएनएम का कोर्स करने चंडीगढ़ से आ गई. अपना यह कोर्स पूरा करने के बाद उस ने बीएससी (नर्सिंग) में दाखिला ले लिया. सरदार परमजीत सिंह का सन 2000 में देहांत हो गया. इस तरह पति के अचानक साथ छोड़ देने से चरणजीत कौर को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. फिर भी हर परेशानी का उन्होंने डट कर मुकाबला किया. वह अपनी बेटियों को उन की रुचि के अनुरूप पढ़ालिखा कर समाज में उचित स्थान दिलाना चाहती थीं. उन्हें अपनी बड़ी बेटी शुभरीत से बहुत उम्मीदें थीं.

लेकिन मंजिल के बीच रास्ते में ही शुभरीत के साथ एक दर्दनाक हादसा हो गया. सन 2009 की बात है. शुभरीत उन दिनों चंडीगढ़ में बीएससी (नर्सिंग) कर रही थी. एक दिन स्पीड बे्रकर पर स्लिप हो जाने की वजह से उस की स्कूटी पलट गई, उसे बाईं टांग में चोट लगी. कुछ लोग उसे उठा कर नजदीक के एक अस्पताल ले गए. शुभरीत के अनुसार, चोट इतनी गंभीर नहीं थी, लेकिन डाक्टरों की लापरवाही की वजह से इलाज के दौरान इन्फैक्शन हो गया, जो बाद में गैंगरीन में बदल गया. डाक्टरों ने शंका व्यक्त की कि यह इन्फैक्शन शरीर में फैल कर उस की जान ले सकता है. शुभरीत न हिम्मत हारने वाली लड़कियों में थी, न डरने वाली लड़कियों में.

उस की हिम्मत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस बात को सुनने के बाद घबराने के बजाय उस ने इसे सकारात्मक लहजे में लिया. उस ने कहीं सुना था कि कुदरत अगर एक राह बंद करती है तो दूसरी तमाम राहें खोल देती है. उसे लगा कि कुदरत अगर उस से उस की एक टांग वापस लेना चाहती है तो यह भी संभव है कि यह सब उस के भले के लिए ही हो रहा हो. उस ने डाक्टरों से अपनी टांग काटने के लिए कह दिया. डाक्टर शुभरीत की टांग को एकदम ऊपर से काटने के लिए कह रहे थे, जिस के लिए शुभरीत राजी नहीं थी. वह अपनी बात पर अड़ गई कि टांग तो कटेगी, लेकिन एकदम ऊपर से नहीं.

डाक्टरों की टीम इस बात पर सहमत नहीं थी, क्योंकि उन्हें इस में काफी खतरा दिखाई दे रहा था. उन्होंने शुभरीत को समझाने की बहुत कोशिश की, पर शुभरीत राजी नहीं हुई. इस के बाद उस ने उन डाक्टरों से अपनी टांग कटाने के बजाय अन्य डाक्टरों से संपर्क किया. वे डाक्टर शुभरीत के अपने ऊपर खतरा लेने पर उस के हिसाब से उस की टांग काटने को तैयार हो गए. शुभरीत की इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के आगे डाक्टर झुक गए और उन्होंने उस का औपरेशन कर के उस की इच्छा के अनुसार उस की टांग काट दी.

अपाहिज हो जाने के बाद शुभरीत ने महसूस किया कि अब उस की दुनिया पहले जैसी नहीं रही. लोग उस से कन्नी काटने लगे हैं. अगर कोई उस से बात करता भी है तो जैसे उस पर तरस खा रहा है. समय बीतता रहा और इस बीच उस का कहीं भी आनाजाना एकदम कम हो गया था. इस तरह उस का एक साल घर पर ही बीता. इस बीच उस ने अपने बारे में सोचते हुए एक अहम फैसला यह लिया कि कुदरत ने उस के साथ भले ही कैसा भी खेल खेला हो, अब वह अपनी आत्मशक्ति से कुछ ऐसा करेगी, जो असंभव शब्द को हमेशा के लिए उस के शब्दकोश से हटा देगा.

शुभरीत ने काफी सोचविचार कर ऐलान कर दिया कि वह डांस सीखेगी और एक टांग से ही नाचने में ऐसी महारत हासिल करेगी, जैसी महारत 2 टांगों वाला भी जल्दी नहीं हासिल कर सकता. थोड़ाबहुत डांस वह पहले से करती आ रही थी, लेकिन अब उस ने इसे गंभीरता से लेते हुए लगन से डांस सीखना शुरू कर दिया. डांस सिखाने वालों ने शुभरीत की हालत देख कर पहले तो उसे डांस सिखाने से मना कर दिया, लेकिन जब उस के हौंसले और जज्बात और जिद को देखा तो उन्हें झुकना पड़ा.

शुभरीत ने अपनी एक टांग से दिनरात डांस की प्रैक्टिस शुरू कर दी. इस से उसे एक नुकसान यह हुआ कि कटी हुई टांग में कुछ ऐसी समस्या आ गई कि उसे एक बार फिर उस का औपरेशन करवाना पड़ा. डक्टरों ने 3 महीने तक उसे डांस करने से एकदम मना कर दिया था. 3 महीने तक की उसे फुल बैड रेस्ट की सलाह दी थी. इस से शुभरीत के शुभचिंतकों का यही मानना था कि अब वह कभी डांस नहीं कर पाएगी. लेकिन डाक्टरों की हिदायत के अनुसार, 3 महीने तक आराम करने के बाद शुभरीत ने एक बार फिर अपनी डांस की प्रैक्टिस शुरू कर दी. इसी के साथ वह उस ‘दि चैलेंजर्स वर्ल्ड’ संस्था से जुड़ गई, जिस के संचालक कारगिल जंग में अपनी एक टांग गंवा देने के बाद देश के पहले ब्लेड रनर बने मेजर डी.पी. सिंह हैं.

खैर, लगातार प्रैक्टिस करने की वजह से जल्दी ही वह समय आ गया, जब शुभरीत अपनी नृत्यकला से अपने साथ के तमाम डांसरों को पछाड़ने लगी. अभी तक वह संगरूर के नृत्य स्कूलों में ही डांस करती थी, लेकिन जब उसे पता चला कि चंडीगढ़ की रौक स्टार अकैडमी के जरिए वह अपना कोई अलग स्थान बना सकती है तो उस ने अकैडमी के संचालक से संपर्क किया. संचालक शुभरीत के जज्बे से इस तरह प्रभावित हुआ कि उस ने उसे अपने अकैडमी में दाखिला तो दे ही दिया, उसे नृत्य की खास तरह की ट्रेनिंग भी देनी शुरू कर दी. फिर क्या था, शुभरीत की ऐसी प्रतिभा निखर कर सामने आई कि संचालक ने उसे किसी बड़ी स्पर्धा में ले जाने का विचार कर लिया.

मां चरणजीत कौर शुरू ही से बेटी के साथ थीं. उन्होंने भी शुभरीत को किसी बड़े मुकाम तक ले जाने का विचार बना रखा था. इसलिए जहां भी जाना होता था, वह बेटी के साथ जाने को तैयार रहती थीं. आखिर सभी का सहयोग और शुभकामनाएं रंग लाईं और शुभरीत का नाम ‘इंडियाज गौट टैलेंट सीजन-5’ के उम्मीदवारों में शामिल हो गया, जहां वह सभी पड़ाव पार करते हुए सैमीफाइनल तक पहुंच गई. अंतिम रूप से इस मुकाबले में वह भले ही फर्स्ट रनरअप रही, लेकिन अपनी अद्भुत प्रतिभा से उस ने जज किरन खेर, मलाइका अरोड़ा खान और करण जौहर के अलावा अमिताभ बच्चन जैसे मुख्य मेहमानों का भी दिल जीत लिया.

यही नहीं, फिनाले में टीवी एक्टर गुरमीत के साथ कपल डांस कर के उस ने अनूठा समां बांध दिया. उस ने अमिताभ बच्चन के साथ भी ‘कजरारेकजरारे, तेरे कालेकाले नैनां’ गाने पर डांस किया. शुभरीत मेकअप आर्टिस्ट तो है ही, भविष्य में अपनी प्रोफैशनल डांस अकैडमी खोलना चाहती है. दरअसल अपने साथ हुए हादसे के दौरान समय बिताने के लिए उस ने मेकअप आर्टिस्ट का कोर्स कर लिया था. फिलहाल शुभरीत मुंबई में रह कर अकेले शो करते हुए इस मायानगरी में अपना विशेष स्थान बनाने में जुटी है. साथ ही वह ‘झलक दिखला जा’ सीजन-8 की तैयारी में व्यस्त हैं. उल्लेखनीय है कि ‘कलर्स’ चैनल पर प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम के लिए शुभरीन का सिलेक्शन हो चुका है. शुभरीत इस शो को ले कर बहुत उत्साहित हैं. वह अपने कोरियोग्राफर के साथ अलग अंदाज का नृत्य करते हुए अपनी अनूठी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगी. Motivational Story

कथा शुभरीत के साक्षात्कार पर आधारित

Hindi Stories: अंजानों पर विश्वास का नतीजा

Hindi Stories: संजय गुप्ता सोनू की फितरत समझ नहीं पाए और उस पर विश्वास कर के उस का पुलिस वेरीफिकेशन भी नहीं कराया. शातिर सोनू ने इसी का फायदा उठा कर ऐसा क्या कर डाला कि अब संजय गुप्ता को पछतावा हो रहा है.

उत्तर प्रदेश का नोएडा शहर देश की राजधानी दिल्ली की सीमा से सटे तेजी से विकसित व्यावसायिक नगर के रूप में जाना जाता है. यह शहर एशिया के बड़े औद्योगिक उपनगरों में से एक है. यहां की अधिकांश जमीनों पर बड़ीबड़ी इमारतें बन गईं हैं. विकास की पगडंडियों के बीच यहां रहने वालों की अपनीअपनी जिंदगियां हैं. सेक्टर-41 की कोठी नंबर बी-169 में रहने वाले संजय गुप्ता की पत्नी श्रीमती राखी गुप्ता अच्छी चित्रकार थीं. उन्होंने सैंकड़ों पेंटिंगें बनाई थीं. यह उन का पेशा नहीं, बल्कि शौक था, जिसे पूरा करने के लिए वह कैनवास पर जिंदगी के रंगों को अक्सर उकेरा करती थीं. अभिव्यक्ति के अपने मायने होते हैं, उसे प्रदर्शित करने का सभी का अपना अलगअलग अंदाज होता है.

उस दिन भी सफेद कैनवास पर अपनी अंगुलियों से ब्रश के जरिए जो चित्र उन्होंने उकेरा था, वह एक खुशहाल परिवार का था, जिस में पतिपत्नी और उन के 2 बच्चे प्रसन्न मुद्रा में नजर आ रहे थे. सभी की बांहें एकदूसरे के गले में थीं. ब्रश को किनारे रख कर राखी पेंटिंग को निहारने लगीं. काफी देर तक अपलक निहारने के बाद उन की आंखों में अचानक आंसू छलक आए. आंसुओं ने लुढ़क कर अपना सफर शुरू किया तो राखी ने साड़ी के पल्लू से उन के वजूद को मिटाने की कोशिश की. सोफे पर बैठे संजय की नजर पत्नी पर गई तो नजदीक जा कर उन के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘‘तुम बारबार परेशान क्यों हो जाती हो?’’

‘‘मेरा दुख तुम जानते हो, फिर भी…’’

‘‘हम कोशिश तो कर रहे हैं. इस तरह हिम्मत नहीं हारते, एक दिन हमारा बेटा अवश्य ठीक हो जाएगा.’’

‘‘पता नहीं कैसा संयोग है. मेरा फूल सा बेटा बिस्तर पर पड़ा है. इंजीनियर बनना था, कितने सपने थे हमारे. काश, इस की जगह मेरी यह हालत हो जाती.’’

‘‘मैं तुम्हारा दर्द समझता हूं राखी. लेकिन इस तरह परेशान होने से भी तो काम नहीं चलेगा.’’ संजय ने कहा.

‘‘फिर भी मैं ने कभी नहीं सोचा था कि हमारा होनहार बेटा इस हाल में होगा. मैं मां हूं, इस का दर्द महसूस करती हूं. वह सब जानतासमझता है, लेकिन अपनी वेदना व्यक्त करने में नाकाम है. जब उस की आंखों में छटपटाती बेबसी देखती हूं तो तड़प कर रह जाती हूं. हर पल इसी के बारे में सोचती रहती हूं. मुझे जिंदगी में कुछ नहीं चाहिए, बस मेरा बेटा ठीक हो जाए.’’ कहने के साथ ही राखी फफक कर रो पड़ीं.

‘‘भरोसा रखो, एक दिन सब ठीक हो जाएगा.’’ संजय ने प्यार से समझाया तो राखी ने हर बार की तरह उस दिन भी सुखद उम्मीदों के साथ अपने दिल को समझाने की नाकाम कोशिश की.

यह एक कड़वी हकीकत है कि जिंदगी कई बार इंसान के साथ बहुत सख्ती से पेश आती है. बेबसी तब तूफान की तरह और भी बढ़ जाती है, जब उसे संभालने की सभी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं. इस दर्द को वह शख्स बखूबी महसूस कर सकता है, जो इस से रूबरू हुआ हो. संजय गुप्ता और उन की पत्नी भी पलपल ऐसी पीड़ा से गुजर रहे थे, जहां उन की कोशिशों को ग्रहण सा लग गया था. संजय गुप्ता रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े थे. वह मूलरूप से उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रहने वाले थे, लेकिन वर्षों पहले वह वहां से चले आए थे. वह अहमदाबाद में इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन (इसरो) में वैज्ञानिक थे, परंतु कई सालों पहले नौकरी छोड़ कर वह नोएडा में प्रौपर्टी का काम करने लगे थे.

बच्चों को उन्होंने शुरू से ही साथ रखा था. उन के परिवार में पत्नी राखी के अलावा 2 बच्चे थे, जिन में बड़ा बेटा जितार्थ और उस से छोटी बेटी स्मिति. दोनों ही बच्चे पढ़ने में होनहार थे. स्मिति दिल्ली के एक फैशन इंस्टीट्यूट में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी, जबकि जितार्थ मणिपाल यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. संजय के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. एक साल पहले तक उन की जिंदगी बहुत खुशहाल थी. किसी की हंसतीखेलती जिंदगी में कब गमों का दरिया बहने लगे, इस बात को कोई नहीं जानता.

3 मार्च, 2013 को गुप्ता परिवार में भी ऐसा ही एक दरिया बह निकला. संजय को सूचना मिली कि उन का बेटा गोवा में एक रोड ऐक्सीडेंट का शिकार हो गया है. संजय वहां पहुंचे. जितार्थ को बे्रन हेमरेज हुआ था. लंबे उपचार के बाद वह हेमरेज से उबरा जरूर, लेकिन उस के चलनेफिरने, बोलने की शक्ति जाती रही.  जितार्थ स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया. वह कब तक ऐसा ही रहेगा, इस का जवाब किसी के पास नहीं था. संजय और उन की पत्नी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. संजय बेटे को नोएडा ले आए और बेहतर से बेहतर इलाज कराया. लेकिन उस की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ.

लिहाजा डाक्टरों की सलाह पर वह उसे घर ले आए. घर के एक कमरे में उस के लिए बैड लगवा दिया गया. वह कोमा जैसी स्थिति में था. सभी दैनिक क्रियाएं वह बिस्तर पर ही करता था. बेटे को ले कर संजय भी परेशान थे और राखी भी. बेटा स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया था. उस की देखभाल जरूरी थी, इसलिए संजय ने अक्टूबर, 2014 में उस के लिए नर्सिंग का काम जानने वाले 2 अटेंडैंट रख लिए, क्योंकि 24 घंटे किसी एक अटेंडैंट को घर पर रखा नहीं जा सकता था. दोनों अटेंडैंट की ड्यूटी 12-12 घंटे की हुआ करती थी. सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक अटेंडैंट सोनू जितार्थ की देखभाल करता था तो रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक रहता दूसरा लड़का था. सोनू ने खुद को बदायूं का रहने वाला बताया था. नोएडा में वह मोरना में कहीं किराए पर रहता था.

संजय के पास दौलतशोहरत सब कुछ था, लेकिन बेटे के लिए वह कुछ नहीं कर पा रहे थे. बेटे को ले कर राखी अक्सर परेशान हो जाती थीं. उस दिन भी वह चित्रकारी करतेकरते बेटे के बारे में सोच कर रोने लगी थीं. संजय ने किसी तरह समझा कर उन्हें चुप कराया था. उन का परिवार जिस कोठी में रह रहा था, वह सीमा खन्ना की थी. सीमा खन्ना ग्राउंड फ्लोर पर रहती थीं, जबकि संजय का परिवार पहली मंजिल पर किराए पर रहता था.

बेटे की वजह से राखी पूरे वक्त घर पर ही रहती थीं. वह संवेदनशील महिला थीं. खाली वक्त में वह ऐसे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया करती थीं, जो पैसे दे कर ट्यूशन नहीं पढ़ सकते थे. ये बच्चे 3 से साढ़े 3 बजे के बीच राखी के यहां आते थे. राखी का सोचना था कि शिक्षा जीवन का प्राथमिक आधार है, इसलिए सभी को शिक्षित होना चाहिए. राखी गरीबों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहती थीं. मेल नर्स सोनू के आने के बाद संजय सुबह अपने औफिस चले जाते थे. बेटी स्मिति कालेज चली जाती थी. सुबह घर में एक नौकरानी सुनीता काम करने आती थी. 12 बजे तक वह भी चली जाती थी.

इस के बाद घर में राखी गुप्ता, मेल अटेंडैंट सोनू और बेटा जितार्थ ही रह जाते थे. रोज की लगभग यही दिनचर्या थी. किसी शहर के विकास के बीच अपराध की भी अपनी एक चाल होती है. आम दिनों की भांति 6 अप्रैल, 2015 को भी सेक्टर-41 शांत था. लोगों की आवाजाही और उन के काम जारी थे. राजेंद्र प्रसाद के 2 बच्चे राखी के यहां ट्यूशन पढ़ने आते थे. लगभग 3 बजे बच्चे कोठी की पहली मंजिल पर पहुंचे तो दरवाजा खुला हुआ था. वे रोज आते थे, इसलिए उन्हें लगा कि राखी मैडम दरवाजा बंद करना भूल गई होंगी.

वे अंदर दाखिल हुए तो वहां का नजारा देख कर बुरी तरह डर गए. वे उलटे पांव सीधे अपने घर पहुंचे और उन्होंने वहां जो देखा था, पिता राजेंद्र प्रसाद को बताया. बच्चों की बात से वह हैरान रह गए. राजेंद्र तुरंत संजय के घर पहुंचे और पूरी बात मकान मालकिन सीमा खन्ना और आसपास के लोगों को बताई. आपस में विचारविमर्श कर के कुछ लोग हिम्मत कर के पहली मंजिल पर पहुंचे तो वहां की हालत देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. 45 वर्षीया राखी गुप्ता खून से लथपथ फर्श पर पड़ी थीं. उन के आसपास खून ही खून फैला था. किसी ने उन की नब्ज टटोली तो वह थम चुकी थी. उन का बीमार बेटा जितार्थ भी नीचे पड़ा था. लेकिन वह ठीक था.

सीमा खन्ना ने तुरंत इस मामले की खबर संजय गुप्ता को दी तो वह कुछ ही देर में घर आ गए. राखी की मौत हो चुकी थी. किसी ने उन की गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर नुकीली चीज से प्रहार किए थे. जितार्थ चूंकि बिस्तर से गिर गया था, इसलिए वह दर्द से छटपटा रहा था. उस के सिर में चोट लगी थी. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. इस बीच पुलिस को भी घटना की सूचना दे दी गई थी. सूचना पा कर कोतवाली सेक्टर-39 के थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान तुरंत पुलिस बल के साथ मौके पर आ पहुंचे. मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों को दे दी. सूचना पा कर एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह और एएसपी विजय ढुल भी मौके पर आ पहुंचे थे.

पुलिस ने मौकामुआयना किया तो हत्या की वजह समझ में नहीं आई. लेकिन यह जरूर लगा कि कातिल का मकसद सिर्फ राखी की हत्या करना नहीं था. क्योंकि थोड़ी नकदी और राखी का मोबाइल गायब था लेकिन घर में रखे अन्य लाखों रुपए बच गए थे. हालांकि जिस लौकर में नकदी रखी थी, उसे तोड़ने की कोशिश जरूर की गई थी. राखी पर किसी नुकीली चीज से प्रहार किए गए थे, लेकिन हत्या में प्रयुक्त वह नुकीली चीज मौके से बरामद नहीं हुई थी. पुलिस ने डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम को मौके पर बुलवा लिया था. चौंकाने वाली बात यह थी कि मेल अटेंडैंट सोनू लापता था, जबकि उस समय उसे ड्यूटी पर होना चाहिए था.

पुलिस ने निरीक्षण के बाद पूछताछ शुरू की, ‘‘सब से पहले इस घटना की जानकारी किसे हुई?’’

‘‘मुझे साहब.’’ राजेंद्र प्रसाद ने आगे बढ़ कर कहा.

‘‘कैसे?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में राजेंद्र प्रसाद ने अपने बच्चों के वहां ट्यूशन पढ़ने आने की बात बता दी.

पुलिस ने संजय गुप्ता से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्होंने किसी से भी अपनी दुश्मनी होने से इनकार कर दिया. जितार्थ घटना का चश्मदीद तो था, लेकिन वह कुछ भी बताने लायक नहीं था. हैरानी की बात यह थी कि पड़ोस में भी किसी को घटना के बारे में कुछ पता नहीं चला था. वैसे भी आजकल शहरी जीवनशैली में लोगों की दुनिया अपने तक ही सिमट गई है. संजय गुप्ता के सेक्टर-2 स्थित अपने औफिस चले जाने के बाद घर में कुल 3 लोग ही रह जाते थे. एक राखी गुप्ता, दूसरा उन का 22 वर्षीया बेटा जितार्थ और तीसरा 25 वर्षीय अटेंडैंट सोनू. मकान के जिस हिस्से में संजय गुप्ता का परिवार रहता था, उस में मुख्य दरवाजे पर जाली वाला दरवाजा भी लगा हुआ था.

जाहिर है, अंजान आदमी के लिए दरवाजा नहीं खोला जा सकता था. पुलिस ने सोनू के मोबाइल पर फोन किया तो वह बंद था. इस से उस पर शक हुआ. जबकि संजय यह मानने को तैयार नहीं थे कि सोनू इस तरह हत्या कर सकता है. हत्या के बाद जिस तरह वह गायब था, उसी से संदेह हो रहा था. मकान मालकिन सीमा खन्ना ने पुलिस को बताया कि उन्होंने सोनू को चुपचाप जाते देखा था. उस की तलाश में एक पुलिस टीम मोरना भेजी गई तो उस के मकान मालिक ने बताया कि 1 अप्रैल को वह उन का घर छोड़ कर चला गया था. सवाल यह था कि अगर सोनू ने राखी की हत्या की थी तो इस की वजह क्या थी?

इस बीच पुलिस ने राखी गुप्ता के शव का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और संजय गुप्ता की तहरीर पर सोनू के खिलाफ राखी की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. दिनदहाड़े हुई हत्या की इस घटना से समूचे इलाके में हड़कंप मच गया था. लोग पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाने लगे थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में राखी के शरीर पर नुकीली चीज के 8 घाव पाए गए थे. ये घाव उन के गले, हाथ और कंधे पर थे. ये संभवत: किसी सर्जिकल चीज के थे. मैडिकल ट्रीटमेंट के कुछ सामान जितार्थ के कमरे में रहते थे. हाथों पर घाव पाए जाने से एक बात साफ थी कि राखी ने मरने से पहले संघर्ष किया था. दूसरी ओर गिरने की वजह से जितार्थ के सिर में चोट आई थी. डाक्टरों ने उस का सीटी स्कैन कराया. वह नौर्मल था.

पुलिस का सोनू तक पहुंचना जरूरी था. हैरानी की बात यह थी कि सोनू का कोई स्थाई पता या फोटो गुप्ता परिवार के पास नहीं था. संजय ने पुलिस को बताया कि सोनू का फोटो राखी के मोबाइल में था, जबकि उन के मोबाइल को वह साथ ले गया था. घटना क्यों और कैसे घटी, सोनू ही इस से परदा उठा सकता था. एसएसपी ने एएसपी विजय ढुल के निर्देशन में मामले के खुलासे के लिए 3 पुलिस टीमों को गठन किया. पुलिस ने सोनू के मोबाइल की काल डिटेल्स व लोकेशन निकलवाई. उस की आखिरी लोकेशन सेक्टर-39 की मिली थी. इस के बाद उस का मोबाइल बंद हो गया था.

पुलिस ने सोनू के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटानी शुरू की. पता चला कि संजय ने सोनू को अपने यहां इस के पहले काम करने वाले राजकुमार के माध्यम से नौकरी पर रखा था. पुलिस राजकुमार तक पहुंच गई. राजकुमार से पता चला कि सोनू पहले नोएडा के सेक्टर-40 स्थित एक अस्पताल में 2 साल और एक डाक्टर दंपत्ति के घर करीब एक साल तक काम कर चुका था. उसी बीच उस की उस से मुलाकात हुई थी. इस से ज्यादा उस के बारे में वह भी कुछ नहीं जानता था.

पुलिस ने उस की बताई दोनों जगहों पर जा कर पूछताछ की तो पता चला कि सोनू झगड़ालू स्वभाव का था. एक बार उस ने एक नर्स को जान से मारने की धमकी भी दी थी. हैरानी की बात यह थी कि दोनों ही जगहों पर सोनू का फोटो और पता नहीं मिल सका. इन सभी जगहों पर उसे सोनू शेख या सोनू राघव के नाम से जाना जाता था. यही उस का असली नाम था, यह भी किसी को पता नहीं था. घटना को घटे 2 दिन बीत गए, लेकिन संदिग्ध हत्यारे का कोई सुराग नहीं लग सका. पुलिस ने सोनू के फोटो की तलाश के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का भी सहारा लिया. जिस मोबाइल नंबर का इस्तेमाल सोनू करता था, वह फर्जी आईडी पर लिया गया था. इस से उस का पता मिलने की संभावना भी खत्म हो चुकी थी.

सोनू की जो काल डिटेल्स मिली थी, उस में एक नंबर पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर पर बात की तो वह नंबर कर्नाटक की एक युवती रीतू (परिवर्तित नाम) का था. उस युवती ने बताया कि 2 महीने पहले मिसकाल के जरिए सोनू उस के संपर्क में आया था, तभी से उस से बातें होने लगी थीं. उस के बारे में वह ज्यादा कुछ नहीं जानती. युवती को उस ने अपना नाम सोनू शर्मा बताया था. इलेक्ट्रौनिक सर्विलांस से पुलिस को पता चला कि सोनू ने अपने मोबाइल में नए नंबर का सिम डाल लिया है. उस नंबर की लोकेशन के अनुसार, सोनू नोएडा से दिल्ली होते हुए पश्चिमी बंगाल चला गया था. उस की लोकेशन पुलिस को वहां के मुर्शिदाबाद जिले की मिल रही थी.

उस नंबर से उस ने दिल्ली के एक नंबर पर बात की थी. पुलिस उस नंबर तक पहुंची तो वह नंबर उस की मौसी का निकला. उस से पता चला कि सोनू की मां दिल्ली में ही रहती थी, लेकिन उस ने दूसरा विवाह कर लिया था, इसलिए उस का अपने परिवार से अब कोई ताल्लुक नहीं था. वह लोगों के घरों में साफसफाई का काम करती थी. उस से पुलिस को सोनू के घर का पता मिल गया. वह पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद का रहने वाला था. डीआईजी रमित शर्मा पूरे मामले पर नजर रखे हुए थे. एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह से उन्होंने केस की प्रगति की पूरी जानकारी ली और एक पुलिस टीम पश्चिम बंगाल रवाना करने के आदेश दिए.

एसएसपी ने थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान के नेतृत्व में 9 अप्रैल को एक पुलिस टीम वहां के लिए रवाना कर दी. इस पुलिस टीम में सबइंसपेक्टर पतनीश यादव, आलोक सिंह और कांस्टेबल अशोक यादव आदि शामिल थे. अगले दिन पुलिस मुर्शिदाबाद स्थित सोनू के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और अपने साथ नोएडा ले आई. पुलिस के लिए यकीनन यह बड़ी सफलता थी. नोएडा ला कर पुलिस ने उस से पूछताछ की तो राखी की हत्या की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

सोनू मूलरूप से पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद निवासी जिल्ले का बेटा था. जिल्ले मेहनतमजदूरी किया करता था. कई सालों पहले सोनू नौकरी की तलाश में दिल्ली चला आया. कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद वह नोएडा आ गया और छोटेमोटे काम करने लगा. इस के बाद वह एक अस्पताल में वार्डबौय का काम करने लगा. समय के साथ वह काम सीख गया. कुछ अस्पतालों में नौकरी करने के बाद उस ने एक डाक्टर दंपत्ति के यहां भी नौकरी की. सोनू शातिर दिमाग युवक था. वह मुसलमान था, लेकिन किसी को वह अपना नाम सोनू शर्मा तो किसी को सोनू शेख तो किसी को सोनू राघव बताता था.

अपना असली नामपता वह किसी को नहीं बताता था. इस के पीछे वजह यह थी कि वह रातोरात अमीर बनने के सपने देखा करता था और किसी अच्छे मौके की तलाश में था. वह नोएडा में ही किराए का कमरा ले कर रहता था. सन 2015 में गुप्ता परिवार को जितार्थ के लिए मेल अटेंडैंट की जरूरत पड़ी तो राजकुमार ने सोनू के बारे में बताया. उन्होंने बेटे की देखभाल के लिए सोनू से बात की तो वह तैयार हो गया. इस के बाद वह उन के घर आने लगा. गुप्ता परिवार सोनू को परिवार के सदस्य की तरह मानता था. उसे 9 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन पर रखा गया था, लेकिन 2 महीने में ही संजय ने उस की तनख्वाह बढ़ा कर 11 हजार रुपए कर दी थी.

सोनू होशियार तो था ही. वह जानता था कि सब से पहले हर किसी का विश्वास जीतना चाहिए. इसलिए उस ने बातों और काम से पूरे परिवार का विश्वास जीत लिया. वह ड्यूटी के समय जितार्थ के पास ही रहता था. इस बीच या तो टीवी वह देखता था या राखी से बातें कर लिया करता था. शुरू में तो सोनू मन लगा कर काम करता रहा. लेकिन झूठ और दिखावे की चमक बहुत लंबे समय तक बरकरार नहीं रहती. समय के साथ राखी की समझ में आने लगा कि वह दिखावा ज्यादा करता है, काम कम. संजय सोनू को 11 हजार रुपए अपने बेटे की पूरी तरह से देखभाल के लिए दे रहे थे. धीरेधीरे सोनू देखभाल में लापरवाही करने लगा. इस की भी एक वजह थी. दरअसल सोनू इस काम से परेशान हो गया था. वह अमीर बनने के सपने देखता था, लेकिन सपने पूरे होने की उसे कोई राह नहीं दिख रही थी.

3 महीने पहले सोनू का संपर्क मोबाइल के जरिए गलत नंबर लग जाने से कोलकाता की रहने वाली रीतू से हो गया, जो कर्नाटक में रहती थी. वह उस से बातें करने लगा. वह उस से आधाआधा घंटे मोबाइल पर बातें करता रहता. राखी को उस की यह लापरवाही बहुत अखरती थी. शुरूशुरू में तो उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा, लेकिन धीरेधीरे उन्होंने सोनू को टोकना शुरू कर दिया. उस का किसी ने पुलिस वेरीफिकेशन नहीं कराया था. संजय गुप्ता ने भी यही गलती की. इस बात से सोनू खुश था.

सोनू की लापरवाही से बेटे की जान भी जा सकती थी. एक दिन राखी ने लापरवाही पर सोनू को न सिर्फ जम कर फटकरा, बल्कि उसे थप्पड़ भी मार दिया. सोनू ने आगे से लापरवाही न करने का वादा किया. वह कभी धोखा दे कर भाग न जाए, इस के लिए राखी ने अपने मोबाइल में उस का फोटो खींच लिया. कुछ समय बाद राखी ने महसूस किया कि सोनू लापरवाही के मामले में बदला नहीं है. जब देखो तब वह मोबाइल पर बातें करने में लगा रहता है. जितार्थ को प्रतिदिन दवाइयां व इंजेक्शन देने होते थे. सोनू इस में भी लापरवाही करने लगा था. सोनू की इस लापरवाही पर राखी उसे खरीखोटी सुना कर थप्पड़ जड़ दिया करती थीं. इस पर सोनू खून का घूंट पी कर रह जाता था.

वक्त के साथ सोनू को राखी का डांटना अखरने लगा. थप्पड़ को ले कर उस के मन में नफरत पैदा होने लगी. सोनू शातिर तो था ही, वह राखी को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगा. मन ही मन उस ने सोच लिया कि एक दिन वह राखी के घर को लूट लेगा. इस से उस के थप्पड़ का बदला भी पूरा हो जाएगा और वह मालामाल भी हो जाएगा. सोनू को इस बात का डर नहीं था कि वह पकड़ा जाएगा, क्योंकि उस का रिकौर्ड किसी के पास नहीं था. उस ने अपने मन के गुस्से को जाहिर नहीं होने दिया और आराम से रहता रहा. सोनू का जितार्थ की देखभाल से मन उचट गया था.

वह काम में लापरवाही करने के साथ ही रीतू से मोबाइल पर बातें भी किया करता था. इस पर राखी की सोनू से अकसर नोंकझोंक हो जाया करती थी. सोनू ने लूटने की योजना मन ही मन बना ली थी. इसलिए 1 अप्रैल को उस ने किराए का मकान भी खाली कर दिया. इस के बाद वह उचित मौके की तलाश में रहने लगा. 6 अप्रैल को भी सोनू ने लापरवाही की और मोबाइल पर बातें करने के चक्कर में जितार्थ के गले में कफ निकालने के लिए लगने वाली नली ठीक से नहीं लगाई. इसी बीच राखी कमरे में आ गईं. यह देख कर वह भड़क गईं, ‘‘तुम से कोई भी काम ठीक से नहीं किया जाता?’’

‘‘सौरी मैडम वह…’’ सोनू अपनी बात कह पाता, उस से पहले ही राखी ने उस के गाल पर तमाचा रसीद कर दिया. सोनू पहले ही खार खाए बैठा था. उस दिन वह आगबबूला हो उठा. उस का खून खौल गया. उस ने गालियां देते हुए राखी का हाथ झटक दिया, ‘‘तुम्हारे हाथ बहुत चलते हैं, आज मैं सब से पहले इन का चलना बंद किए देता हूं.’’

कह कर सोनू ने जितार्थ की दवाइयों की ट्रे में रखा सर्जिकल चाकू उठा लिया और राखी की गर्दन पर वार कर दिया. इस अप्रत्याशित हमले से राखी तड़प उठीं. उन्होंने विरोध किया, लेकिन सोनू नौजवान था. उस ने एक के बाद एक राखी पर कई वार कर दिए. राखी नीचे गिर कर तड़पने लगीं. जितार्थ यह सब देख रहा था. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था, लेकिन अंदर ही अंदर घुट रहा था. मां को बचाने के लिए उस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी तो हिलने डुलने से बिस्तर से नीचे गिर गया. सोनू ने इस की परवाह नहीं की. राखी के बचने की कोई गुंजाइश न रहे, उस ने और कई वार कर दिए. राखी की मौत हो गई.

इस के बाद सोनू ने राखी का मोबाइल, घड़ी, डीवीडी व सेफ में रखे करीब 10 हजार रुपए उठा कर एक बैग में रख लिए. सोनू जानता था कि राखी के मोबाइल में उस का फोटो है, इसलिए उस ने उसे भी ले लिया था. उस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू भी अपने पास रख लिया. हत्या के दौरान उस की कमीज पर थोड़ा खून लग गया था. लगभग साढ़े 12 बजे वह वहां से चला गया. उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया और चालू किया तो नया सिमकार्ड उस में डाल लिया. उस रात वह अपने दोस्त के घर रुका. इस से पहले उस ने सर्जिकल चाकू और कमीज को सेक्टर-41 में एक स्थान पर छिपा दिया था.

अगले दिन वह दिल्ली पहुंचा और कालका मेल से कोलकाता होते हुए मुर्शिदाबाद स्थित अपने घर चला गया. सोनू ने सोचा था कि उस का असली नामपता चूंकि किसी के पास नहीं है, इसलिए पुलिस पश्चिम बंगाल तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. वह आराम से रह रहा था कि इसी बीच वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू और खून से सनी कमीज बरामद कर ली थी. पूछताछ और जरूरी कागजी काररवाई कर के पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

गुप्ता परिवार ने सोनू की फितरत को समझने की भूल कर दी. उस का पुलिस वैरीफिकेशन न करा कर भी उन्होंने भूल की. सोनू जैसे लोगों पर विश्वास और गुस्सा दोनों ही खतरनाक साबित हुए. कथा लिखे जाने तक सोनू जेल में था. 28 मई को पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया था. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: ‘मैं आज भी अब्बू की बेटी हूं’ – अंजुम आरा

Hindi Stories: अंजुम आरा देश की दूसरी मुसलिम आईपीएस महिला हैं, जो बड़ी बात है. पढि़ए अंजुम के आईपीएस बनने की कहानी उन्हीं की जुबानी  उस रोज मेरे घर में खुशी का माहौल था. मेरे वालिदैन बहुत खुश थे. कुछ इस तरह जैसे कोई नाविक अपनी कश्ती को उस के मुकाम पर पहुंचा कर खुश होता है. मैं भी बहुत खुश थी. खुशी स्वाभाविक ही थी, क्योंकि मुझे मेरी मेहनत का फल मिल गया था और अब्बूअम्मी को अपनी अच्छी परवरिश का. मेरी सफलता का पता चलने के साथ ही नातेरिश्तेदारों के फोन आने शुरू हो गए थे. आसपास के कई लोग ऐसे भी थे, जिन्हें मेरे बारे में पता चल गया था और वे मुबारकबाद देने के लिए सीधे घर चले आए थे.

यूं तो जिंदगी के सफर में छोटीबड़ी खुशियों की लहरें आतीजाती रहती हैं, लेकिन उस रोज उन लहरों की ऊंचाई काफी ऊंची थी. मेरे अब्बू अयूब शेख का चेहरा खुशी से दमक रहा था. उन की आंखों की चमक कुछ जुदाजुदा सी थी. उन के लहजे में गुरूर के बजाय एक पिता के फर्ज का वजन नजर आ रहा था. वह खुद ही लोगों को बता रहे थे कि मेरी बेटी अंजुम आईपीएस बन गई है. यूं भी कामयाबी का यह गुल उन की मेहनत और हौसलाअफजाई की शाख पर ही खिला था.

यकीनन अब्बू के लिए फख्र की बात थी, क्योंकि हमारी पढ़ाई के दरमियान उन्होंने बहुत सी ऐसी बातें सुनी थीं, जो बंदिशें लगाने वाली थीं. लोग खराब जमाने की दुहाई देते थे. कुछ लोगों ने उन्हें उकसाया भी था कि बेटियों को इतना पढ़ा कर कौन से आसमान की सैर कराओगे. लेकिन मेरे अब्बू दकियानूसी सोच वाले नहीं थे. उन्होंने बेटी समझ कर हमारी पढ़ाई और परवरिश में कभी कोई भेदभाव नहीं किया था. वे जानते थे कि दुनिया की किसी भी किताब में यह नहीं लिखा है कि लड़कियों को ऊंची तालीम नहीं दिलाई जा सकती. फिर भी हमारे धर्म में कई लोग बेटियों को ऊंची तालीम दिलाने में परहेज करते हैं, ऐसा हम सुनते आए थे. लेकिन अब्बू ने इस की परवाह नहीं की और हमें ऊंची तालीम दिलाई.

हम ने भी उन की सोच को दिलोदिमाग में गहराई तक बैठा लिया था. पढ़ाई से जुनून की हदों के पार जा कर हम ने खूब मेहनत की थी. यही वजह थी कि जब मेरा रिजल्ट आया था तो मैं ने सब से पहले यह खुशी अब्बू को ही सुनाई थी. मैं ने उन्हें इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था. वह पुरानी बातों में जान फूंक कर मेरी अम्मी मोमिना से कह उठे थे, ‘‘देखा, मैं कहता था न कि एक दिन अंजुम हमारा नाम रौशन करेगी. अरे आईपीएस बन गई वह.’’ उन की बात पर अम्मी के दोनों हाथ खुदबखुद इबादत की मुद्रा में उठ गए थे.

अब्बू और अम्मी दोनों के चेहरों पर साफसाफ लिखा था कि उन्हें मुझ पर नाज है. ऐसी खुशियों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. हमारे परिवार में अम्मीअब्बू के अलावा हम चार भाई बहन थे. मेरे अलावा सब से बड़े भाई परवेज शेख, 2 बहनें सलमा और रेशमा. मैं भाई के बाद दूसरे नंबर पर आती थी, जबकि सब से छोटी रेशमा थी. मेरे भाई इंजीनियर थे. उन की तालीम धीरेधीरे कमाई का जरिया भी बन गई थी. जबकि सलमा एमबीए और रेशमा एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी. हमारे वालिद ने हमें न सिर्फ आजादी से पढ़ने दिया था, बल्कि घर में पढ़ाई का माहौल भी दिया था. बेटियों के साथ जरा भी सौतेला व्यवहार नहीं किया. सचमुच इस मामले में हम खुशनसीब थे.

बेटियों के मामले में वालिदैन का ऐसा रुख खास मायने रखता है. हमारे अब्बू बेटियों को न तो बेटों से जुदा मानते थे और न ही पुरानी सोच के वारिस बन कर हमारी पहरेदारी करते थे. अब्बू तालीम की ताकत को बखूबी जानते थे. वह अकसर कहते थे, ‘‘एक बात हमेशा जेहन में रखो, जो शख्स तालीम की रोशनी में नहाया हो उसे जिंदगी की हर फिक्र से आजाद रहना चाहिए.’’ साथ ही वह ताकीद भी किया करते थे, ‘‘तालीम की रोशनी वाले चिराग को हासिल करने के लिए सब्र का इम्तिहान दे कर बहुत मेहनत करनी पड़ती है.’’

मेरा ख्वाब सिविल सर्विसेज में जाने का था. लंबे इंतजार के बाद 2011 में मेरा यह ख्वाब पूरा हो गया था. सिविल सर्विसेज एग्जामिनेशन का रिजल्ट आने के साथ ही घर में खुशियां पसर गई थीं. हमारी खुशियां रिजल्ट वाले दिन और रात तक ही नहीं सिमटी थीं, बल्कि उन में अगले दिन तब और भी इजाफा हो गया, जब मीडिया में खबरें आईं. खबरों में बताया गया कि अंजुम आरा देश की दूसरी मुसलिम लड़की है, जो आईपीएस बनी है. मैं ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मेरे लिए खुशियों की इतनी बड़ी सौगात ले कर भी आएगा. कई दिनों तक मुबारकबाद का सिलसिला चलता रहा. कोई घर आता तो अब्बू हमारी तारीफें करते नहीं थकते. अम्मी भी ऐसा ही करतीं. दरअसल मेरे परिवार के इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे भी एक कहानी थी.

मेरे अब्बू इंजीनियर थे. यह नौकरी उन्होंने बड़ी मुश्किल से पाई थी. 1992 में उन की तैनाती उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुई. यह जिला लकड़ी के सामान बनाने और उस पर नक्काशी करने के लिए खास माना जाता है. अब्बू गंगोह कस्बे में रहते थे. मेरा जन्म भी वहीं हुआ. मेरी पढ़ाई यहीं हुई. हम 4 भाईबहन थे. परिवार का खर्च चलाने के लिए अब्बू को बहुत काम करना होता था. ड्यूटी से फारिग हो कर वह हमें पढ़ाने के लिए बैठ जाया करते थे. दरअसल वह बचपन के उसी मुकाम पर हमारी बुनियाद को मजबूत कर देना चाहते थे. सहारनपुर के शिशु लोक विद्यामंदिर में प्राथमिक पढ़ाई के बाद मैं ने आर्य कन्या इंटर कालेज से हाईस्कूल व एचआर इंटर कालेज से इंटर तक की पढ़ाई की.

2006 में अब्बू का तबादला लखनऊ हो गया तो वह परिवार के साथ वहीं शिफ्ट हो गए. भाई वहां इंजीनियर की पढ़ाई करने लगा. मैं ने बीटेक की पढ़ाई के लिए अच्छे कालेज में दाखिला ले कर पढ़ाई शुरू कर दी थी. बहनें भी पढ़ रही थीं. सही कहूं तो हमारी पढ़ाई के मामले में हमारे वालिदैन ने कभी कोई समझौता नहीं किया. हमारा ध्यान पढ़ाई पर ही रहे, इसलिए बहुत से मसलों से हमें दूर ही रखा जाता था. लखनऊ की आबोहवा सहारनपुर से जुदा थी. तहजीब का यह शहर हमें बहुत पसंद आया. चूंकि हम बाहरी माहौल से ज्यादा वास्ता नहीं रखते थे, इसलिए हमारा वहां भी मन लग गया. कालेज, घर, भाईबहन इसी में दिन और रात बीत जाते थे.

लेकिन इस का मतलब यह नहीं था कि हम बाहरी दुनिया से कतई अलग हो कर कैद से हो गए थे. मुझे भी आम लड़कियों की तरह घूमनाफिरना, शौपिंग करना पसंद था. इस मामले में अब्बू से इजाजत लेने के लिए हम भाईबहन एक हो जाया करते थे. हमारा ताल्लुक मुसलिम धर्म से था. लिहाजा घर में उस का गहराई से पालन किया जाता था. हम भी उस से रूबरू थे. हमें अदब, फितरत, आदतें, लिबास, इबादत, हुक्म, हिम्मत, फर्ज, तारीफ, इकरार, हद और पाकीजगी की वे बातें समझाई जाती थीं, जिन का जिक्र मजहबी किताबों में होता था. बड़ों को इज्जत दें और अदब से पेश आएं, इस के साथ ही नेकनीयत का सबक भी दिया था. सही मायने में यह मुकम्मल परवरिश थी.

अम्मीअब्बू की तरह हम भाईबहन भी अमन और इबादत पसंद थे. मुझे याद नहीं पड़ता कि अब्बू का कभी किसी से कोई झगड़ा वगैरह हुआ हो. सब का अपनेअपने नजरिए से जिंदगी गुजारने का तरीका होता है, फिर इंसान की अपनी फितरत भी होती है. बड़ी हो कर जब मैं जमाने को थोड़ा जाननेसमझने लगी तो बखूबी समझ में आ गया था कि बेटियों के मामले में भरोसा व चट्टान जैसी मजबूत सोच को कायम रखना बड़ा मुश्किल होता है. वक्तबेवक्त आप को कुछ बातें बेवजह न चाहते हुए भी परेशान करती हैं. अब्बू के साथ भी कुछकुछ ऐसा होता था.

जब हमारी तालीम हो रही थी तो बहुत लोगों को यह बात शायद कांटे की तरह चुभती थी. कई मर्तबा ऐसा भी हुआ, जब अब्बू के साथ टोकाटाकी की गई. लेकिन हमें अपने अब्बू पर फख्र था, जो जमाने से बेपरवाह हो कर भी हमारे ऊपर भरोसा करते थे. वह इस सोच के कतई शिकार नहीं थे कि बेटियों को पढ़ाई से महरूम रखा जाए. वह बेटेबेटियों को बराबर का हक देना चाहते थे. उन की आंखों में बेटियों की कामयाबी के सुनहरे ख्वाब तैरते थे.

सच कहूं तो अब्बू ने अपने दिलोदिमाग में हमारी कामयाबी के ख्वाबों की जैसे एक खूबसूरत सी मीनार बनाई हुई थी. हम भी किसी सूरत में उस मीनार को गिराना नहीं चाहते थे. जब हम भाईबहन आपस में बातें किया करते तो यह भी चर्चा होती थी कि हमें अपने लिए बेहतर मुकाम बनाना ही है. और यह अच्छी तालीम से ही संभव था. इसलिए हम लोग अपना वक्त जाया नहीं करते थे. हमारा ज्यादातर वक्त पढ़ाई में ही बीतता था. हमारा घर किसी जन्नत से कम नहीं था. भाईबहनों अब्बूअम्मी के साथ गुजारे लम्हें कौन भूलना चाहता है. वैसे भी खूबसूरत यादों की उम्र बहुत लंबी होती है. घर में नमाज होती थी. रमजान के पाक महीने में इबादतों का दौर चलता था.

कई मर्तबा ऐसा भी हुआ, जब हम अब्बू के साथ उन के पुश्तैनी गांव कम्हरिया गए. तब हम काफी छोटे थे. यह गांव लखनऊ से दूर आजमगढ़ जिले में था. गांव साधारण था और लोग भी. हम शहर में रहते थे लिहाजा गांव के बच्चों से हमारी रंगत थोड़ा जुदा थी. हमारे दादू इस्माइल शेख और दादी सितारूनिशां गांव में ही रहते थे. हां, बीचबीच में वे हम लोगों के पास भी आया करते थे. दादू को गांव में इज्जत की नजरों से देखा जाता था. गांव की हरियाली, बागबगीचे, खेतखलिहान बहुत कुछ अच्छा तो था, लेकिन हमारा मन वहां कम ही लगता था. अब्बू गांव में घुमाने ले जाते थे तो एक 2-3 कमरों के बरामदे वाले स्कूल की तरफ अंगुली उठा कर बताते थे कि कभी तख्तीबस्ते के साथ उन्होंने भी यहां तालीम ली थी.

तख्ती, लकड़ी की कलम व स्लेट चौक से लिखने जैसी बातें वह बताते थे. राइटिंग को सुधारने का अभ्यास भी उन्होंने इन्हीं चीजों से किया था. हमें यह बेहद रोमांचक लगता था, क्योंकि अपने जमाने में हम ने ये चीजें नहीं देखी थीं. वह बताते थे कि उन्होंने ढिबरी और लालटेन की टिमटिमाती रोशनी में पढ़ाई की थी. अब्बू यह भी बताते थे कि उन्होंने खेतों में काम किया है. पढ़ाई के साथ वह किसानी का काम करते थे. तब हमें यह सब रोमांचक किस्सा ही लगता था. क्योंकि अपनी पैदाइस के बाद हम ने अब्बू को नौकरी करते ही  पाया था. इसलिए हमें उन की नौकरी की बदौलत थोड़ी बेहतर परवरिश मिल गई थी.

गांव के अन्य बच्चों, उन के रहनसहन व लिबास को देख कर हमें अपनी अहमियत का अंदाजा भी हो जाता था. उम्र बढ़ने के साथ ही समझ आ गया था कि अब्बू हमें ऐसी बातें इसलिए बताते थे कि तालीम को ले कर हमारे हौंसले और भी मजबूत हो जाएं. हम उस की अहमियत को जान सकें. वह बताना चाहते थे कि छोटे से गांव से निकल कर उन्होंने किस तरह संघर्ष किया था. अब्बू दादू और दादी को बहुत चाहते थे. उन्होंने उन की जिंदगी में तालीम का चिराग रोशन न किया होता तो शायद कुछ भी मुमकिन नहीं होता. अब्बू की काबिलियत और परिवार को देख कर दादू की आंखों में चमक आ जाती थी. शयद ऐसी बातें हम भाईबहनों के दिमाग में बैठ गई थीं कि हमारे अब्बू इतना कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं.

समय के साथ भाई की इंजीनियरिंग की पढ़ाई कंपलीट हो गई थी. मैं ने बीटेक में फर्स्ट डिवीजन हासिल की थी. मेरी ख्वाहिश थी कि सिविल सर्विस में जाऊं. इस के पीछे एक वजह यह भी थी कि मुझे ज्यादा से ज्यादा लोगों को उन का हक दिलाने और उन की मदद करने का मौका मिल सके. ऐसी ख्वाहिश कभी मेरे दिल में पैदा नहीं हुई थी कि कोई ऐसा पेशा चुना जाए, जिस में खूब पैसा मिले. मैं ने सुना था कि दौलत की चकाचौंध इंसान को कई बार गुमराह भी कर देती है. मैं ने पुलिस सेवा में जाने के अपने इरादे परिवार में जाहिर किए तो सभी को खुशी हुई. अब्बू ने मुझे समझाते हुए कहा, ‘‘मुझे तुम पर नाज है अंजुम, जो ऐसा सोचती हो, लेकिन एक बात का खयाल रखना, इस के लिए तुम्हें मेहनत करनी होगी.’’

‘‘वह मैं कर लूंगी.’’ मैं ने अब्बू को आश्वस्त किया. पढ़ाई के मामले में मैं बचपन से ही अव्वल थी. हाईस्कूल और इंटर भी मैं ने  फर्स्ट डिवीजन से पास किया था. मैं जानती थी कि यह इतना आसान नहीं है. लेकिन परिवार का सपोर्ट था और मैं पढ़ाई के लिए दिमाग को खाली रखती थी. मैं ने कोचिंग लेनी शुरू की.

उस दौरान मेरे दिमाग में देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी का किरदार भी होता था. मैं कामयाब लड़कियों के बारे में सोचती थी कि उन्होंने भी आखिर अपनी मेहनत से ऊंचे मुकाम पाए थे. मैं ने दिनरात एक कर के तैयारी की थी. संघ लोक सेवा आयोग ने एग्जाम कराया. मेरी मेहनत ने गुल खिलाया. उसी का तकाजा था कि मैं ने मनचाहा मुकाम हासिल कर लिया. इंडियन पुलिस सर्विस (आईपीएस) में चयन के बाद मैं ट्रेनिंग के लिए चली गई. एक साल तक ट्रेनिंग चली, ट्रेनिंग लगभग आखिरी मुकाम तक पहुंची तो मेरे लिए रिश्ते की तलाश शुरू हुई. मुझे मणिपुर में पोस्टिंग मिली. दूसरी तरफ मेरे लिए डा. यूनुस को पसंद कर लिया गया. यूनुस खुद भी आईएएस अधिकारी थे और पंजाब प्रांत के रहने वाले थे. रिश्ता सभी को पसंद था. मैं ने भी उन्हें पसंद किया.

शादी की बातों का सिलसिला चला और बहुत जल्द निकाह की तारीख भी मुकर्रर कर दी गई. मैं छुट्टी ले कर घर आई. घर में खुशियों का माहौल था. जम कर खरीदारी हुई. खुशनुमा माहौल के दरमियान 26 मई, 2013 को मैं और डा. यूनुस मुस्लिम रस्मोरिवाज से शौहरबीवी के रिश्ते में बंध गए. यूनुस हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में अतिरिक्त उपायुक्त (एडीसी) थे. बाद में मेरी पोस्टिंग भी शिमला में बतौर असिस्टेंट सुपरिटेंडेट औफ पुलिस (एएसपी) हो गई. इस दरमियान हमारी खुशहाल जिंदगी में 7 मार्च, 2014 को बेटा अरहान आ गया. हम दोनों मिल कर अरहान की देखभाल करते हैं. जिंदगी बिना शिकवाशिकायत के पुरसुकून है. मेरी बेटी होगी तो मैं उसे भी बेटे जैसी परवरिश दे कर ऊंची तालीम दूंगी.

मेरी जिंदगी का सितारा तालीम से चमका और यह मुमकिन हुआ मेरे वालिदैन की सोच और विश्वास से. मनचाही तालीम और मेहनत इंसान को किसी भी मुकाम पर पहुंचा सकती है. मैं अच्छी तरह समझती हूं कि तालीम की रोशनी कभी जाया नहीं जाती. आज सब अब्बू की मिसाल देते हैं कि ‘अयूब तुम ने अपनी बेटियों को कामयाब बना दिया.’ मेरी एक बहन सलमा एमबीए कर रही है, जबकि सब से छोटी रेशमा एमबीबीएस के आखिरी दौर में है.

पुलिस की नौकरी में मैं अपने फर्ज को ले कर हमेशा सजग रहती हूं. ड्यूटी और परिवार के बीच तालमेल बैठाने में थोड़ी मुश्किल जरूर आती है, लेकिन ऐसी सभी मुश्किलें उन तकलीफों से बहुत कम हैं, जो हमारे लिए वालिदैन ने कभी देखी थीं. मेरे पास कोई फरियादी आता है तो उस की बात गहराई से सुनती हूं. फिर कोशिश करती हूं कि उसे राहत मिले और मसला हल हो जाए. क्योंकि पुलिस के पास कोई उसी सूरत में आता है, जब वह निराश होता है. वह चाहता है कि उस की समस्या का समाधान हो.

व्यावहारिक तौर पर फौरी राहत पहुंचाना भी हर पुलिसकर्मी का फर्ज है. सोशल प्रोग्राम होते हैं तो मैं उन में लोगों को समझाती हूं कि तालीम के मामले में वह बेटाबेटी में फर्क न करें. बेटियों को आगे बढ़ने का मौका दें. लोग उन्हें इज्जत दें. यह हकीकत है कि मेरे वालिदैन ने भरोसा कर के मुझे नहीं पढ़ाया होता तो इस मुकाम पर कभी नहीं पहुंचती. Best Stories

—कथा अंजुम आरा से बातचीत पर आधारित