Love Story: प्रेमिका की खातिर – अपने ही परिवार का कातिल

Love Story: ठीक 3 साल पहले 26 अप्रैल, 2018 की सुबह के करीब साढ़े 11 बज रहे थे. उत्तर प्रदेश के कासगंज में थाना ढोलना क्षेत्र के पास रेलवे ट्रैक पर बकरियां चराते हुए एक आदमी चला जा रहा था. ट्रैक के दोनों ओर झाड़जंगल की वजह से वह आदमी लगभग हर दिन इसी ट्रैक के पास अपनी बकरियां चराने के लिए आता था.

लेकिन उस दिन उस ने कुछ ऐसा देखा जिस से उस की रूह कांप गई थी. रेलवे ट्रैक पर एक व्यक्ति की लाश पड़ी थी. उस लाश की स्थिति इतनी भयानक थी, जिसे देख कर उस का दिल दहशत से भर गया था. उस लाश का न तो सिर था और न ही दोनों हाथों की हथेलियां. यह देख बकरियां चराता हुआ यह शख्स अपनी बकरियां उसी ट्रैक पर छोड़ कर सीधा अपने घर की ओर भागा. उस लाश को देख कर वह इतना डर गया था कि उस के गले से आवाज तक नहीं निकल रही थी.

थोड़ा समय बीता तो वह उसी ट्रैक पर ढोलना थाने के पुलिसकर्मियों की टीम को ले कर पहुंचा और उस ने पुलिसकर्मियों को दूर से उस जगह की ओर इशारा कर के दिखाया, जहां पर वह लाश पड़ी थी. ढोलना थाने की पुलिस लाश के पास पहुंची और उन्हें भी अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. वैसे भी बिना गरदन और हथेलियों वाली डैड बौडी हर दिन देखने को नहीं मिलती. मौके पर पहुंची पुलिस की टीम ने आसपास के इलाके की घेराबंदी कर तुरंत जांच शुरू कर दी.

कुछ ही देर में देखते ही देखते उस इलाके में और अधिक पुलिसकर्मी आ पहुंचे और उन के साथ फोरैंसिक की पूरी टीम आ पहुंची. नियमित छानबीन करते हुए पुलिस को लाश के शरीर पर पहने कपड़ों की जेब से एक आधार कार्ड और एलआईसी का एक कागज भी मिला. आधार कार्ड पर मृत शख्स का नाम राकेश था. आधार कार्ड को बेस बना कर पुलिस ने जल्द ही आधार कार्ड पर दिए पते पर संपर्क साधा और मृत व्यक्ति के पिता बनवारी लाल को लाश की पहचान करने के लिए जल्द से जल्द आने के लिए कहा.

कुछ ही घंटों में बनवारी लाल अपने 2 बेटों, राजीव और प्रवेश के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. तीनों का शरीर पसीने से लथपथ था. बनवारी लाल एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी होने के नाते मामले की गंभीरता को बहुत अच्छे से समझ सकते थे. लेकिन बात लाश की पहचान की थी, वह भी तब जब उन्हें अपने बेटे की लाश की पहचान करनी थी तो उन का दिल जोरों से धड़क रहा था.

वह घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मियों से हांफते हुए बोले, ‘‘साहब, आप ने मुझे याद किया?’’

ढोलना थानाप्रभारी ने बनवारी लाल से कहा, ‘‘जी हां, आप को एक लाश की पहचान करने के लिए बुलाया गया है. क्योंकि मृत व्यक्ति की जेब से बरामद आधार कार्ड में राकेश का नाम दिया हुआ था और कुछ एलआईसी के कागजात भी थे.’’

बनवारी लाल हांफते स्वर में डरते हुए बोले, ‘‘जी साहब, आप हमें लाश के पास ले कर चलिए.’’

यह कहते हुए वह पुलिस टीम के साथ चल दिए. पुलिस की एक टीम बनवारी लाल और उन के दोनों बेटों को वहां ले गई, जहां पर मृत लाश को नीले रंग की प्लास्टिक की शीट में लपेट कर रखा गया था.

बनवारी लाल ने की लाश की शिनाख्त

लाश के पास खड़े व्यक्ति ने बनवारी लाल और अन्य 2 लोगों को आते हुए देख कर नीली शीट में लगी चेन को नीचे की ओर पैरों तक खींचा और बनवारी लाल को मृतक को देखने देने के लिए खुद साइड में खड़ा हो गया. मृत व्यक्ति का सिर नहीं होने की वजह से बनवारी लाल उसे एक नजर देख कर डर से कांप गए. लेकिन अगले ही पल उन का डर शोक में तब तब्दील हो गया, जब उन्होंने मृत व्यक्ति की लाश के पहने कपड़ों को देखा. ये वही कपड़े थे जो बनवारी लाल ने कुछ महीनों पहले अपने बेटे राकेश को उस के जन्मदिन पर गिफ्ट किए थे.

कपड़े देख कर बनवारी लाल अचानक से फूटफूट कर रोनेबिलखने लगे और जोर से चिल्लाचिल्ला कर राकेश का नाम ले कर चीखने लगे. अपने भाई की लाश की ऐसी हालत और पिता को रोताबिलखता देख कर राजीव और प्रवेश की आंखों से आंसू रोके नहीं रुके. लेकिन फिर भी पिता का सहारा बनते हुए दोनों ने बनवारी लाल को लाश से दूर किया. कुछ देर में थानाप्रभारी वहां आए और उन्होंने रोते हुए बनवारी लाल को ढांढस बंधाया. उन्होंने बनवारी लाल से कहा, ‘‘मुझे अफसोस है आप के बेटे की मौत पर. हमारी तफ्तीश जारी है. केस को सुलझाने के लिए हमें आप से राकेश को ले कर कुछ जरूरी सवाल करने हैं. आप थाने में पहुंचिए हम यहां पर अपनी जांच कर के थाने लौट कर आप से बात करेंगे.’’

सिर और हथेलियां कटी लाश को पहचानना किसी के वश की बात नहीं थी, इसलिए थानाप्रभारी ने लाश की पहचान को पुख्ता करने के लिए लाश की डीएनए जांच करवाना जरूरी समझा. उन्होंने जल्द ही राकेश के मातापिता से संपर्क कर उन का डीएनए सैंपल लिया और उसे आगरा स्थित विधि विज्ञान प्रयोगशाला में भेज दिया. इस घटना को तीन साल हो गए और साल 2021 की अगस्त में एक दिन अचानक से कासगंज के ढोलना थाने में आगरा के विधि विज्ञान प्रयोगशाला से डीएनए रिपोर्ट का रिजल्ट आया.

डीएनए रिपोर्ट ने बढ़ाई पुलिस की बेचैनी

रिपोर्ट खोल कर जब थानाप्रभारी ने देखा तो उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. उन के मन में हजारों सवाल तूफान की तरह खड़े हो उठे. 3 साल से ठंडे बस्ते में पड़ा मामला अचानक से अब एक नया मोड़ ले चुका था. दरअसल, जिस डीएनए रिपोर्ट का इतने लंबे समय से इंतजार हो रहा था, उस रिपोर्ट में मृत व्यक्ति का डीएनए बनवारी लाल और इंद्रावती के डीएनए से कोई मैच ही नहीं था. यह देख कर थानाप्रभारी ने 3 साल पुरानी इस केस की फाइलें निकलवाईं. मृत व्यक्ति की पहचान का पता लगाने के लिए उन्होंने अप्रैल, 2018 में उस इलाके से गुमशुदा लोगों की लिस्ट निकलवाई.

राकेश की उम्र के लोगों में उस इलाके से सिर्फ एक ही आदमी गायब हुआ था, वह था गांव नौगवां, थाना गंगीरी, अलीगढ़ का रहने वाला राजेंद्र उर्फ कलुआ. बिलकुल समय न गंवाते हुए पुलिस तुरंत कलुआ के घर पहुंची और उन से कलुआ के बारे में पूछताछ की. कलुआ तो नहीं मिला लेकिन पुलिस को कई ऐसे तार मिल गए जोकि इस केस से जुड़े हो सकते थे. कलुआ के मातापिता ने बताया कि उन के बेटे की दोस्ती राकेश के साथ थी. 25 अप्रैल को गायब होने के एक दिन पहले राकेश कलुआ को ले कर अपने बीवीबच्चों को ढूंढने का नाम ले कर उसे अपने साथ ले गया था. जिस के बाद कलुआ फिर कभी घर नहीं लौटा.

कलुआ के मांबाप से उन का डीएनए का सैंपल ले कर पुलिस ने फिर से आगरा स्थित विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया. इस बार डीएनए की रिपोर्ट जल्द ही आ गई थी. रिपोर्ट से यह साफ हो गया था कि 3 साल पहले रेलवे ट्रैक पर मरने वाला व्यक्ति राकेश नहीं बल्कि राजेंद्र उर्फ कलुआ था, क्योंकि डीएनए के सैंपल कलुआ के मांबाप से मिल गए थे. पूरे मामले में कुछ इस तरह से मोड़ आना किसी को भी अपना सिर पकड़ने पर मजबूर कर सकता था जोकि थानाप्रभारी ने किया भी.

थानाप्रभारी ने 3 साल पहले अपने मन में उठने वाले सवालों को एक बार फिर से महसूस किया. उन्हें अचानक से वह सवाल याद आया कि सिर कटी लाश को देख कर बनवारी लाल ने एक पल में कैसे पहचान लिया कि यह उन के बेटे की लाश थी? कलुआ से किस की कैसी दुश्मनी हो सकती थी? इस के अलावा इसी तरह के और भी कई सवाल थानाप्रभारी के मन में उठने लगे थे. इन सभी सवालों को ढूंढने के लिए पुलिस की टीम ने तत्परता से काम करना शुरू कर दिया था.

अगस्त के आखिरी दिनों तक पुलिस ने इस मामले की छानबीन के लिए प्रदेश में अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया था. उसी दौरान 31 अगस्त, 2021 के दिन पुलिस के एक ऐसे ही मुखबिर ने बताया कि वे जिस व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं, उसे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा से 10 किलोमीटर दूर बिसरख गांव में देखा गया है. यह व्यक्ति खुद राकेश ही था. ढोलना पुलिस बिना किसी देरी के मुखबिर की दी हुई सूचना पर बिसरख गांव जाने के लिए निकल पड़ी. उसी बीच ढोलना थानाप्रभारी ने बिसरख थाने की पुलिस को इस की सूचना दी.

करीब 2 घंटे बाद मुखबिर के बताए हुए पते पर छापा मार कर पुलिस की टीम ने दिलीप शर्मा नाम के एक शख्स को पकड़ लिया, जिस का हुलिया काफी हद तक राकेश की तरह था. दिलीप नाम का यह शख्स इलाके में प्रेमिका रूबी के घर में मौजूद था और वे दोनों कमरे में बंद हो कर एकदूसरे के साथ प्रेम प्रसंग में लीन थे. मामले की गंभीरता को देखते हुए ढोलना थानाप्रभारी बिसरख थाने में दिलीप को पूछताछ के लिए ले आए.

पूछताछ के दौरान पहले तो दिलीप ने खुद की पहचान दिलीप के नाम से बताई, लेकिन जब पुलिस की टीम ने उस की फोन लोकेशन, वाट्सऐप चैट इत्यादि के रिकौर्ड के आधार पर पूछताछ करनी शुरू की तो वह चारों खाने चित्त हो गया और अपना असली नाम राकेश बताते हुए पुलिस के सामने अपना गुनाह कुबूल कर लिया. उस ने सिर्फ अपने दोस्त कलुआ की ही हत्या नहीं, बल्कि अपनी पत्नी और 2 बच्चों की हत्या का जुर्म भी कुबूल कर लिया, जिसे सुन कर सब की आंखें खुली की खुली रह गईं. इस शातिर कातिल के कत्ल की कहानी सुन कर किसी की भी रूह कांप जाए.

नौगवां, गंगीरी अलीगढ़ का रहने वाला राकेश ग्रेटर नोएडा में एक डाइग्नोसिस सेंटर में लैब टेक्नीशियन था. वह अपने छोटे से परिवार, जिस में उस की पत्नी रत्नेश, 3 साल की बेटी अवनि और डेढ़ साल के बेटे अर्पित के साथ ग्रेटर नोएडा से 10 किलोमीटर दूर चिपयाना गांव की पंचविहार कालोनी में रहता था. यह उस का अपना घर था. उस के छोटे से परिवार में खुशियों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन राकेश अपने शादीशुदा जीवन से खुश नहीं था. राकेश की शादी साल 2012 में उत्तर प्रदेश के एटा की रहने वाली रत्नेश से हुई थी. लेकिन यह शादी उस ने अपने परिवार के दबाव में की थी.

राकेश प्रेमिका से करना चाहता था शादी

दरअसल, राकेश बिसरख गांव की रहने वाली रूबी को अपनी शादी से पहले से प्यार करता था. दोनों किसी समय में साथ में पढ़ते थे. लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ की वजह से उस ने पहले प्राइवेट इंस्टीट्यूट से लैब टेक्नीशियन का कोर्स किया और ग्रेटर नोएडा में जौब करने लगा. परिवार के दबाव में उस ने रत्नेश से शादी तो कर ली लेकिन रूबी के साथ उस का प्रेम संबंध खत्म नहीं हुआ, बल्कि वक्त के साथ उन का प्यार परवान चढ़ता गया. इसी दौरान रुबी की उत्तर प्रदेश में कांस्टेबल के पद पर नौकरी लग गई. राकेश के रत्नेश के साथ बच्चे भी हो गए. पहले अवनि फिर अगले साल अर्पित.

अपने परिवार में इतना उलझा हुआ होने के बावजूद वह रूबी से मिलने के लिए समय निकाल लिया करता था. रूबी और राकेश अकसर वाट्सऐप के जरिए अश्लील चैट भी किया करते थे, जिस से राकेश के मन में रूबी के लिए प्यार का तूफान उमड़ पड़ता था. साल 2018 की वैलेनटाइंस डे (14 फरवरी) के दिन जब राकेश इसी तरह से रूबी के साथ वाट्सऐप पर सैक्स चैट में लीन था तो उस की पत्नी रत्नेश ने राकेश को उसे पीछे से रंगेहाथों पकड़ लिया. उस दिन राकेश और रत्नेश का खूब झगड़ा भी हुआ.

प्रेमिका की खातिर पत्नी व 2 बच्चों की हत्या कर आंगन में गाड़ा

दोनों के बीच झगड़ा अपने चरम पर पहुंच चुका था और राकेश ने अपना आपा खो दिया. राकेश ने आव देखा न ताव, रत्नेश पर लोहे की रौड से वार कर उस का सिर फाड़ दिया. रत्नेश की वहीं मौके पर मौत हो गई. लेकिन रत्नेश की मौत के बाद मामला यहीं ठंडा नहीं हुआ. उस ने इस मौके का फायदा उठाया और अपने बच्चों से भी अपना पिंड छुड़ाने के बारे में विचार किया. उस ने जिस लोहे की रौड से रत्नेश की हत्या की थी, उसी से अपने दोनों बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया.

उस ने रातोंरात उन तीनों के लाशों को छिपाने के लिए अपने ही घर के आंगन में गहरा गड्ढा खोद दिया और उन तीनों को उसी में दफना दिया. अगले दिन उस ने मजदूरों को बुलवा कर अपने घर के आंगन में सीमेंट की पुताई कर फर्श बनवा दिया. यही नहीं, उस ने उसी दिन अपने स्थानीय इलाके के पुलिस थाने में जा कर अपने बीवी बच्चों की गुमशुदगी की सूचना भी दर्ज करवा दी. और यह सब उस ने अकेले नहीं किया, बल्कि अपनी प्रेमिका कांस्टेबल रूबी के दिए प्लान के अनुसार किया.

कुछ दिनों बाद जब रत्नेश के मायके से राकेश को फोन आने लगे तो पहले तो राकेश उन की बात यूं ही टालता रहा, लेकिन जब मायके वालों की तरफ से जोर बढ़ता गया तो उस ने अपनी प्रेमिका रूबी को यह बात बताई. रूबी ने इस से बचने के लिए एक और प्लान सुझाया. जिस को सफल बनाने के लिए राकेश को एक और कत्ल करना था, जोकि उसी की उम्र और कदकाठी का होना चाहिए था. इस के लिए उस ने अपने गांव के बचपन के दोस्त राजेंद्र उर्फ कलुआ को चुना.

वह अगले दिन गांव जा कर अपनी बीवीबच्चों की तलाश करने के बहाने अपने साथ कलुआ को ले कर निकल गया. उस ने कलुआ को रास्ते में दारू भी पिलाई और खाना भी खिलाया. जब वे रेलवे ट्रैक के पास सुनसान इलाके में पहुंचे तो राकेश ने मौका देख कर पहले से जंगलों में छिपा कर रखे गंडासे से कलुआ पर प्रहार कर दिया. कलुआ राकेश के पहले ही हमले को नहीं सह पाया और बेहाल हो कर नीचे गिर पड़ा.

राकेश ने घर वालों को किया साजिश में शामिल

राकेश ने मौके का फायदा उठा कर कलुआ पर इतने वार कर दिए कि उस की जान वहीं पर ही निकल गई. राकेश ने उस के बाद कलुआ का सिर और हाथ के पंजे काट दिए ताकि लाश की पहचान न हो सके. अपने इस काले कत्ल की दास्तान में उस ने अपने घरवालों को भी शरीक कर लिया. राकेश ने अपने घर वालों को लालच दिया कि अगर उस की शादी रूबी से हो गई तो मोटा पैसा दहेज में मिलेगा. उस ने लाश की पहचान करने के लिए अपने पिता को राजी कर लिया. जिस के बाद ये सारी कहानी शुरू हुई.

इस बीच राकेश ने अपनी पहचान छिपाने के लिए एक फरजी आधार कार्ड भी बनवा लिया, जिस में उस ने अपना नाम दिलीप शर्मा रखा. रूबी की मदद से उस ने प्राइवेट अस्पताल से कुछ दिनों में कहीं बाहर जा कर अपने नाक की प्लास्टिक सर्जरी भी करवा ली. लेकिन अंत में वह पकड़ा ही गया. पकड़े जाने के बाद पुलिस ने राकेश की निशानदेही पर पंचविहार कालोनी में उस के घर के आंगन में गड्ढा खुदवा कर उस की पत्नी और दोनों बच्चों के कंकाल और उस लोहे की रौड को बरामद कर लिया, जिस से उस ने अपने पूरे परिवार का खात्मा कर दिया था.

उस के बाद राकेश को साथ ले कर रेलवे स्टेशन के पास उस जगह पर छापा मारा, जहां पर उस ने कलुआ का कत्ल कर गंडासा छिपाया था. पुलिस ने इस पूरे मामले में अभी तक कुल 6 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. जिन में राकेश, उस की प्रेमिका रूबी, पिता बनवारी लाल, माता इंद्रावती व दोनों भाई राजीव और प्रवेश शामिल हैं. वे सभी फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे हैं. Love Story

Family Crime: काली नजर का प्यार – वर्षा ने क्यों किया पति पर वार

Family Crime: जिला हमीरपुर का एक बड़ा कस्बा है राठ. मूलत: मध्य प्रदेश के गांव सरमेड़ के रहने वाले मूलचंद्र अनुरागी का परिवार राठ के मोहल्ला भटियानी में रहता था. परिवार में पत्नी सरस्वती के अलावा 2 बेटे वीरेंद्र व अनिल थे. गांव में मूलचंद्र का पुश्तैनी मकान व जमीन थी. वह खुद गांव में रह कर घरजमीन की देखरेख करता था.

पत्नीबच्चों से मिलने वह राठ आताजाता रहता था. मूलचंद्र की पत्नी सरस्वती, राठ स्थित नवोदय विद्यालय में रसोइया थी. वह छात्रावास में रहने वाले छात्रों के लिए खाना बनाती थी. सरस्वती का बड़ा बेटा वीरेंद्र मिठाई की एक दुकान में काम करता था. वीरेंद्र बताशा बनाने का उम्दा कारीगर था, जबकि छोटा बेटा अनिल राठ की ही एक जूता बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी कर रहा था. चूंकि सरस्वती और उस के दोनों बेटे कमाते थे, सो घर की आर्थिक स्थिति ठीक थी.

सरस्वती बेटों के साथ खुशहाल तो थी, लेकिन घर में बहू की कमी थी. वह वीरेंद्र की शादी को लालायित रहती थी. वीरेंद्र अनुरागी जिस दुकान में काम करता था, उसी में अशोक नाम का एक युवक काम करता था. अशोक राठ कस्बे से आधा किलोमीटर दूर स्थित सैदपुर गांव का रहने वाला था. अशोक की छोटी बहन वर्षा अकसर उसे लंच देने आया करती थी. जयराम की 2 ही संतानें थीं अशोक और वर्षा. कुछ साल पहले जयराम की मृत्यु हो चुकी थी. मां चंदा देवी ने उन दोनों को तकलीफें सह कर बड़ा किया था. आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण अशोक और वर्षा ज्यादा पढ़लिख नहीं सके थे.

अशोक 10वीं कक्षा छोड़ कर नौकरी करने लगा था, जबकि वर्षा 10वीं कक्षा पास करने के बाद मां के घरेलू कामों में हाथ बंटाने लगी थी. 20 वर्षीय वर्षा गोरीचिट्टी, छरहरी काया की युवती थी. नैननक्श भी तीखे थे. सब से खूबसूरत थी उस की आंखें. खुमार भरी गहरी आंखें. उस की आंखों में ऐसी कशिश थी कि जो उन में देखे, खो सा जाए.

एक दिन वर्षा अपने भाई अशोक को लंच देने दुकान पर आई. वीरेंद्र की नजरें वर्षा की नजरों से मिलीं, तो वह उन में मानो डूब सा गया. जी में आया, उन्हीं खुमार भरी आंखों की अथाह गहराइयों में पूरी उम्र डूबा रहे. खुद भी उबरना चाहे तो उबर न सके. कुछ पल के लिए आंखों से आंखें मिली थीं, लेकिन उन्हीं लम्हों में वीरेंद्र वर्षा की आंखों पर फिदा हो गया. इस के बाद वर्षा की आंखें उस की सोच की धुरी बन गईं. उस दिन के बाद वीरेंद्र को वर्षा के आने का इंतजार रहने लगा. हालांकि अशोक से बोलचाल पहले से थी, लेकिन वर्षा तक पहुंच बनाने के लिए उस ने उस से संबंध प्रगाढ़ बना लिए. इन्हीं संबंधों की आड़ में उस ने वर्षा से परिचय भी कर लिया.

वर्षा से परिचय हुआ तो बेइमान कर देने वाली उस की नजरें वीरेंद्र का दिल और तड़पाने लगीं. अब वीरेंद्र को इंतजार था उस पल का, जब वर्षा अकेले में मिले और वह उस से अपने दिल की बात कह सके.
किस्मत ने एक रोज उसे यह मौका भी मुहैया करा दिया. उस रोज वर्षा भाई को खाना खिला कर जाने लगी, तो ताक में बैठा वीरेंद्र उस के पीछेपीछे चल पड़ा. तेज कदमों से वह वर्षा के बराबर में पहुंचा. वर्षा ने सिर घुमा कर वीरेंद्र को देखा और मुसकराने लगी.

वीरेंद्र बोला, ‘‘मुझे तुम से एक जरूरी बात कहनी है.’’

वर्षा के कदम पहले की तरह बढ़ते रहे, ‘‘बोलो.’’

‘‘मुझे जो कहना है, सड़क चलते नहीं कह सकता.’’

सहसा वीरेंद्र की नजर कुछ दूर स्थित पार्क पर पड़ी, ‘‘चलो, वहां पार्क में बैठते हैं. सुकून से बात हो जाएगी.’’
‘‘चलो,’’ वर्षा मुसकराई, ‘‘तुम्हारी बात सुन लेती हूं.’’

वे दोनों पार्क में जा कर बैठ गए. उस के बाद वर्षा वीरेंद्र से मुखातिब हुई, ‘‘अब बोलो, क्या कहना है?’’
वीरेंद्र के पास भूमिका बनाने का समय नहीं था. अत: उस ने सीधे तौर पर अपनी बात कह दी, ‘‘तुम्हारी आंखें बहुत हसीन हैं.’’

वर्षा की मुसकराहट गाढ़ी हो गई, ‘‘और मैं?’’
‘‘जिस की आंखें इतनी हसीन हैं, कहने की जरूरत नहीं कि वह कितनी हसीन होगी.’’
वर्षा ने उसे गहरी नजरों से देखा, ‘‘तुम मेरे हुस्न की तारीफ करने के लिए यहां ले कर आए हो या कुछ और कहना है?’’

वीरेंद्र ने महसूस किया कि वर्षा प्यार का सिलसिला शुरू करने के लिए उकसा रही है. अत: उस के दिल की बात जुबान से बयां हो गई, ‘‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मुझे तुम से प्यार हो गया है.’’

कुछ देर तक वर्षा उस की आंखों में देखती रही, फिर आहिस्ता से बोली, ‘‘प्यार ही तो ऐसी चीज है, जिस पर न दुनिया का कोई कानून लागू नहीं होता, न इसे दबाया या छिपाया जा सकता है. लेकिन प्यार के कुछ तकाजे भी होते हैं.’’

वीरेंद्र ने धड़कते दिल से पूछा, ‘‘कैसे तकाजे?’’

‘‘वफा, ईमानदारी और जिंदगी भर साथ निभाने का जज्बा.’’

वीरेंद्र समझ गया कि वर्षा कहना चाहती है कि वह उस का प्यार कबूल तो कर सकती है, मगर शर्त यह है कि उसे शादी करनी होगी. उस वक्त वीरेंद्र के सिर पर वर्षा को पाने का जुनून था, सो उस ने कह दिया, ‘‘मैं टाइमपास करने के लिए तुम्हारी तरफ प्यार का हाथ नहीं बढ़ा रहा हूं, बल्कि संजीदा हूं. मैं तुम से शादी कर के वफा और ईमानदारी से साथ निभाऊंगा.’’

दरअसल वर्षा अपनी मां की मजबूरियां जानती थी. चंदा देवी ने बहुत तकलीफें उठा कर पति का इलाज कराया था. इलाज में उस पर जो कर्ज चढ़ा था, उस की भरपाई होने में बरसों लग जाने थे. परिवार में कोई ऐसा न था जो युवा हो चुकी वर्षा के भविष्य के बारे में सोचता. मां बेटी को दुलहन बना कर विदा कर पाने की हैसियत में नहीं थी. छोटा भाई अशोक खुद अपनी जिम्मेदारियों से जूझ रहा था. अत: वर्षा को अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करना था.

वर्षा 20 साल की भरीपूरी युवती थी. उस के मन में किसी का प्यार पाने और स्वयं भी उसे टूट कर चाहने की हसरत थी. मन में इच्छा थी कि कोई उसे चाहने वाला मिल जाए, तो वह जीवन भर के लिए उस का हाथ थाम ले. इस तरह उस का भी जीवन संवर जाएगा और वह भी अपनी गृहस्थी, पति व बच्चों में रमी रहेगी. लोग गलत नहीं कहते, इश्क पहली नजर में होता है. वर्षा के दिल में भी तब से हलचल मचनी शुरू हो गई थी, जब वीरेंद्र से पहली बार उस की नजरें मिली थीं.

वर्षा की आंखें खूबसूरत थीं, तो वीरेंद्र की आंखों में भी प्यार ही प्यार था. उस पल से ही वीरेंद्र वर्षा की सोच का केंद्र बन गया था. वर्षा ने जितना सोचा, उतना ही उस की ओर आकर्षित होती गई. वर्षा का मानना था कि वीरेंद्र अच्छा और सच्चा आशिक साबित हो सकता है. उस के साथ जिंदगी मजे से गुजर जाएगी. वर्षा ने यह भी निर्णय लिया कि जब कभी भी वीरेंद्र प्यार का इजहार करेगा, तो वह मुहब्बत का इकरार कर लेगी. उम्मीद के मुताबिक उस दिन वीरेंद्र ने अपनी चाहत जाहिर की, तो वर्षा ने उस का प्यार कबूल कर लिया. उस दिन से वर्षा और वीरेंद्र का रोमांस शुरू हो गया.

वर्षा के प्रेम की जानकारी उस की मां चंदा देवी और भाई अशोक को भी हो गई थी. चूंकि वर्षा और वीरेंद्र शादी करना चाहते थे, सो उन दोनों ने उन के प्यार पर ऐतराज नहीं किया. एक प्रकार से वर्षा को मां और भाई का मूक समर्थन मिल गया था. दूसरी ओर वर्षा वीरेंद्र के जितना करीब आ रही थी, उतना ही उसे लग रहा था कि अभी वह वीरेंद्र को ठीक से समझ नहीं पाई, अभी उसे और समझना बाकी है. अत: वीरेंद्र को समझने के लिए वर्षा ने उस के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने का मन बना लिया. सोचा वीरेंद्र उस की अपेक्षाओं के अनुरूप साबित हुआ, तो उस से शादी कर लेगी. कसौटी पर खरा न उतरा, तो दोनों अपने रास्ते अलग कर लेंगे.

वर्षा को लिवइन रिलेशनशिप में भी दोहरा लाभ नजर आ रहा था. पहला लाभ यह है कि वीरेंद्र को ठीक से समझ लेगी. दूसरा लाभ यह कि अपनी जवानी को घुन नहीं लगाना पड़ेगा. वीरेंद्र उस की देह का सुख भोगेगा, तो वह भी वीरेंद्र के जिस्म से आनंद पाएगी.

एक रोज जब वर्षा और वीरेंद्र का आमनासामना हुआ और बातचीत का सिलसिला जुड़ा तो वीरेंद्र ने जल्द शादी करने का प्रस्ताव रखा. इस पर वर्षा बोली, ‘‘मुझे शादी की जल्दी नहीं है बल्कि हमें अभी एकदूसरे को समझने की जरूरत है.’’

‘‘6 महीने से हमारा रोमांस चल रहा है,’’ वीरेंद्र के शब्दों में हैरानी थी, ‘‘और अब तक तुम मुझे समझ नहीं पाई.’’

‘‘समझी तो हूं, लेकिन उतना नहीं जितना जीवन भर साथ रहने के लिए समझना चाहिए.’’

‘‘पूरी तरह समझने में कितना वक्त लगेगा?’’ वीरेंद्र ने उदास मन से पूछा.

कुछ देर गहरी सोच में डूबे रहने के बाद वर्षा ने जवाब दिया, ‘‘शायद 6 महीने और.’’

‘‘और इस दौरान मेरा क्या होगा?’’ वीरेंद्र ने पूछा.

वर्षा के होंठों पर मुसकान आई, ‘‘तुम्हारे साथ मैं भी रहूंगी.’’

वीरेंद्र के सिर पर हैरत का पहाड़ टूट पड़ा, ‘‘बिन ब्याहे मेरे साथ रहोगी.’’

‘‘इस में बुरा क्या है?’’ वर्षा मुसकराई, ‘‘नए जमाने के साथ लोगों की सोच और जिंदगी के तरीके भी बदलते रहते हैं. शहरों कस्बों में बहुत सारे लोग लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, हम भी रह लेंगे.’’
‘‘यानी कि शादी किए बिना ही तुम घर रहोगी.’’

वर्षा ने वीरेंद्र की ही टोन में जवाब दिया, ‘‘बेशक.’’

चूंकि वीरेंद्र वर्षा का दीवाना था. अत: जब वर्षा ने वीरेंद्र के सामने लिवइन रिलेशनशिप का प्रस्ताव रखा तो वह फौरन राजी हो गया. इधर वीरेंद्र ने अपने व वर्षा के प्रेम संबंधों की जानकारी मां को दी तो सरस्वती भड़क उठी. उस ने वीरेंद्र से साफ कह दिया कि वह बिनब्याही लड़की को घर में नहीं रख सकती. उस ने कोई बवाल कर दिया तो हम सब फंस जाएंगे. बदनामी भी होगी.

इस पर वीरेंद्र ने मां को समझाया कि वे दोनों एकदूसरे से प्रेम करते हैं. 6 महीने बीतते ही शादी कर लेंगे. वर्षा के घर वालों को भी साथ रहने में कोई ऐतराज नहीं है. इस बीच हम लोग वर्षा को परख भी लेंगे कि वह घर की बहू बनने लायक है भी या नहीं. सरस्वती देवी का मन तो नहीं था, लेकिन बेटे के समझाने पर वह राजी हो गई. इस के बाद वीरेंद्र ने 5 जून, 2020 को वर्षा को राठ स्थित शीतला माता मंदिर बुला लिया. यहां उस ने उस की मांग में सिंदूर लगाया. फिर उसे अपने घर ले आया. सरस्वती ने आधेअधूरे मन से बिनब्याही दुलहन का स्वागत किया और घर में पनाह दे दी.

वर्षा महीने भर तो मर्यादा में रही, उस के बाद रंग दिखाने लगी. वह न तो घर का काम करती और न ही खाना बनाती. सरस्वती देवी उस से कुछ कहती तो वह उसे खरीखोटी सुना देती. देवर अनिल के साथ भी वह दुर्व्यवहार करती. पति वीरेंद्र को भी उस ने अंगुलियों पर नचाना शुरू कर दिया. वर्षा मनमानी करने लगी तो घर में कलह होने लगी. कलह का पहला कारण यह था कि वर्षा को संयुक्त परिवार पसंद नहीं था. वह सास देवर के साथ नहीं रहना चाहती थी. कलह का दूसरा कारण उस की स्वच्छंदता थी. जबकि सरस्वती देवी चाहती थी कि वर्षा मर्यादा में रहे.

उधर वर्षा को घर की चारदीवारी कतई पसंद न थी. वह स्वच्छंद विचरण चाहती थी. तीसरा अहम कारण पति का वेतन था. वर्षा चाहती थी कि वीरेंद्र जो कमाए, वह उस के हाथ पर रखे. जबकि वीरेंद्र अपना आधा वेतन मां को दे देता था. इस बात पर वह झगड़ा करती थी. 10 नवंबर, 2020 की शाम 4 बजे सरस्वती देवी खाना तैयार करने नवोदय विद्यालय छात्रावास चली गई. अनिल व वीरेंद्र भी काम पर गए थे. घर में वर्षा ही थी. शाम 5 बजे वीरेंद्र घर आ गया. आते ही वर्षा ने वीरेंद्र से वेतन के संबंध में पूछा. वीरेंद्र ने बताया कि उसे वेतन मिल तो गया है. लेकिन उसे पैसा मां को देना है. क्योंकि दीपावली का त्यौहार नजदीक है और मां को घर का सारा सामान लाना है.

यह सुनते ही वर्षा गुस्से से बोली, ‘‘शारीरिक सुख मेरे से उठाते हो और पैसा मां के हाथ में दोगे. यह नहीं चलेगा. आज रात मां के कमरे में ही जा कर सोना, समझे.’’

वर्षा की बात सुन कर वीरेंद्र तिलमिला उठा और उस ने गुस्से में वर्षा के गाल पर एक तमाचा जड़ दिया. वर्षा गम खाने वाली कहां थी, वह वीरेंद्र से भिड़ गई. दोनो में मारपीट होने लगी. इसी बीच वर्षा की निगाह सिलबट्टे पर पड़ी. उस ने सिल का बट्टा उठाया और वीरेंद्र के सिर पर प्रहार कर दिया. बट्टे के प्रहार से वीरेंद्र का सिर फट गया और वह जमीन पर गिर पड़ा. इस के बावजूद वर्षा का हाथ नहीं रुका और उस ने उस के सिर व चेहरे पर कई और वार किए. जिस से वीरेंद्र की मौत हो गई. कथित पति की हत्या करने के बाद वर्षा ने घर पर ताला लगाया और फरार हो गई.

इधर रात 8 बजे सरस्वती देवी नवोदय विद्यालय छात्रावास से खाना बना कर घर आई तो घर के दरवाजे पर ताला लटक रहा था. सरस्वती ने वर्षा के मोबाइल फोन पर काल की तो उस का मोबाइल फोन बंद था.
फिर उस ने अपने छोटे बेटे अनिल को फोन कर घर पर बुला लिया. अनिल ने भी वर्षा को कई बार काल की लेकिन उस से बात नहीं हो पाई. सरस्वती और उस के बेटे अनिल ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वर्षा बदहवास हालत में घर के बाहर निकली थी. ताला लगाने के बाद वह बड़बड़ा रही थी कि सास और पति उसे प्रताडि़त करते हैं. वह रिपार्ट लिखाने पुलिस चौकी जा रही है. पड़ोसियों की बात सुन कर सरस्वती का माथा ठनका. किसी अनिष्ट की आशंका से उस ने राठ कोतवाली को सूचना दी.

सूचना पाते ही कोतवाल के.के. पांडेय पुलिस टीम के साथ आ गए. पांडेय ने दरवाजे का ताला तुड़वा कर घर के अंदर प्रवेश किया. उन के साथ सरस्वती व अनिल भी थे. कमरे में पहुंचते ही सरस्वती व अनिल दहाड़ मार कर रो पड़े. कमरे के फर्श पर 22 वर्षीय वीरेंद्र की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. सरस्वती ने पांडेय को बताया कि यह उन के बड़े बेटे की लाश है. चूंकि हत्या का मामला था. अत: के.के. पांडेय ने सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी. कुछ ही देर में एसपी नरेंद्र कुमार सिंह, एएसपी संतोष कुमार सिंह, तथा डीएसपी अखिलेश राजन घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

वीरेंद्र की हत्या सिल के बट्टे से सिर पर प्रहार कर के की गई थी. उस की उम्र 22-23 वर्ष के बीच थी. खून से सना आलाकत्ल बट्टा शव के पास ही पड़ा था, जिसे अधिकारियों ने सुरक्षित करा लिया. निरीक्षण के बाद अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल हमीरपुर भिजवा दिया. उस के बाद मृतक की मां व भाई से घटना के बारे में पूछताछ की. सरस्वती देवी ने बताया कि वर्षा उस के बेटे वीरेंद्र के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही थी. उसी ने वीरेंद्र की हत्या की है. उस का मायका राठ कोतवाली के गांव सैदपुर में है. सरस्वती देवी की तहरीर पर थानाप्रभारी के.के. पांडेय ने भादंवि की धारा 302 के तहत वर्षा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उस की तलाश शुरू कर दी.

रात 11 बजे थानाप्रभारी ने पुलिस टीम के साथ सैदपुर गांव में चंदा देवी के घर छापा मारा. घर पर उस की बेटी वर्षा मौजूद थी. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उसे थाना राठ कोतवाली लाया गया.
थाने पर जब उस से वीरेंद्र की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि वीरेंद्र से रुपए मांगने पर उस का झगड़ा हुआ था. गुस्से में उस ने वीरेंद्र पर सिल के बट्टे से प्रहार किया. जिस से उस का सिर फट गया और उस की मौत हो गई. पुलिस से बचने के लिए वह घर में ताला लगा कर मायके चली गई थी, जहां से वह पकड़ी गई.

11 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्ता वर्षा को हमीरपुर की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Family Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime: फोन से फिक्स मौत

 UP Crime: सुमित ने आरती को समझाया कि अब उस की शादी हो गई है, इसलिए वह किसी पराए मर्द से फोन पर बातें करना बंद कर दे. आरती नहीं मानी तो सुमित ने उसे सबक सिखाने के लिए ऐसा क्या किया कि….  उ त्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद से करीब 20 किलोमीटर दूर थाना छजलैट के अंतर्गत आता है एक गांव कुरीखाना. अंकित वर्मा इसी गांव में परिवार के साथ रहता था. गांव में ही उस की ज्वैलरी की दुकान थी. उसी पर वह अपने भाई के साथ बैठता था.

16 अपै्रल, 2015 की दोपहर वह भाई को दुकान पर छोड़ कर खाना खाने के लिए घर गया. उस के लिए खाना परोस कर आया, तभी उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया. पता नहीं वह फोन किस का था कि अंकित खाना खाए बगैर ही 15-20 मिनट में लौटने को कह कर चला गया. उस की भाभी बारबार कहती रहीं कि खाना खा ले, लेकिन वह नहीं माना और मोटरसाइकिल ले कर चला गया. अंकित 15-20 मिनट में ही लौटने को कह कर गया था, लेकिन डेढ़, दो घंटे बाद भी वह घर नहीं लौटा तो घर वालों को चिंता हुई. उसे फोन किया गया तो पता चला कि वह बंद है. घर वाले इधरउधर फोन कर के उस के बारे में पता लगाने लगे.

दोपहर करीब 3 बजे पड़ोस के गांव भीकनपुर निवासी जय सिंह टै्रक्टर ले कर अपने खेतों की तरफ गया तो उस ने खेत में एक आदमी की खून से लथपथ लाश देखी. खेत में लाश देख कर वह चौंका. उस ने आसपास के खेतों में काम कर रहे लोगों को आवाज दे कर बुला लिया. किसी ने इस बात की सूचना अंकित के घर वालों को दे दी तो वे रोतेबिलखते घटनास्थल पर पहुंच गए. अंकित की रक्तरंजित लाश देख घर वालों का बुरा हाल था. सूचना मिलने के बाद थाना छजलैट के थानाप्रभारी मुश्तकीम अली भी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लाश के पास ही एक मोटरसाइकिल और एक मोबाइल फोन पड़ा था. पता चला कि वह मोटरसाइकिल और फोन मृतक के ही थे.

थानाप्रभारी ने इस हत्या की सूचना जिले के पुलिस अधिकारियों को दी तो एसएसपी लव कुमार और एसपी (देहात) प्रबल प्रताप सिंह भी मौके पर पहुंच गए. लाश का मुआयना करने के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि अंकित की हत्या रंजिश की वजह से की गई है न कि लूट के इरादे से. लाश का पंचनामा कर के पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी ने 26 वर्षीय अंकित वर्मा की हत्या के मामले को सुलझाने के लिए थाना छजलैट के थानाप्रभारी मुश्तकीम अली के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई पी.के. चौहान, संध्या रावत, कांस्टेबल राजीव राठी, दिलशाद, तेजेंद्र, सौरभ आदि को शामिल किया गया. टीम ने जांच की शुरुआत मृतक के घर से की.

पुलिस पूछताछ में घर के सभी लोगों ने अंकित की किसी से कोई दुश्मनी होने से मना कर दिया तो पुलिस ने अंकित के दोस्तों के बारे में पूछा. थानाप्रभारी को यह मालूम ही था कि अंकित के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. उस के बाद ही वह मोटरसाइकिल ले कर गया था. वह फोन किस का था, यह जानने के लिए पुलिस ने अंकित के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि उस के मोबाइल पर अंतिम बार जिस फोन नंबर से फोन आया था. वह फोन नंबर बिजनौर जिले के चांदपुर के रहने वाले सुमित वर्मा का था.

जांच के लिए सुमित वर्मा से पूछताछ करनी जरूरी थी, इसलिए पुलिस टीम आननफानन में चांदपुर स्थित सुमित वर्मा के घर पहुंच गई. लेकिन सुमित वर्मा घर पर नहीं मिला. पुलिस ने उस की पत्नी आरती से उस के मायके के बारे में पूछ लिया. पुलिस का अंदाजा था कि कहीं वह ससुराल में तो नहीं छिपा बैठा. जानने के लिए पुलिस टीम आरती के मायके धामपुर की टीचर कालोनी जा पहुंची, लेकिन वह वहां नहीं मिला. पुलिस को आरती और उस के भाई राजीव की बातों से लगा कि इन्हें सुमित के बारे में पता है, लेकिन ये नहीं बता रहे हैं. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने आरती और उस के भाई राजीव को हिरासत में ले लिया.

सुमित वर्मा अलीगढ़ में अपनी एक रिश्तेदारी में छिपा था. उसे जब पता चला कि पुलिस ने उस की पत्नी और साले को हिरासत में ले लिया है तो वह परेशान हो उठा. वह वहां से उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर चला गया और वहीं से अपने परिचितों को फोन कर के पत्नी व साले को थाने से छुड़ाने की कोशिश करने लगा. इसी चक्कर में वह अपने दोस्त अंकित कर्णवाल के साथ रुद्रपुर से 21 अप्रैल, 2015 को मुरादाबाद आ गया. पुलिस ने उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा रखा था, वह उस की लोकेशन पर नजर रखे हुए थी. पुलिस टीम ने उस के मुरादाबाद आते ही धरदबोचा.

दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस छजलैट आ गई. थाने में दोनों से अंकित वर्मा के बारे में पूछताछ की तो वे इधरउधर की बातें करने लगे. लेकिन जब सुमित के सामने उस की पत्नी और साले को लाया गया तो वह थोड़ा परेशान हो गया. थानाप्रभारी को लगा कि सुमित आसानी से सच्चाई बताने वाला नहीं है. तब उन्होंने एक चाल चली. उन्होंने सुमित से कहा, ‘‘तुम्हारी पत्नी और साले ने बताया है कि अंकित की हत्या में वे भी शामिल थे.’’

इतना सुनते ही सुमित लाइन पर आ गया. उस ने कहा, ‘‘नहीं सर, अंकित की हत्या में इन लोगों का कोई हाथ नहीं है. उस की हत्या तो मैं ने की थी. ये लोग तो बेकुसूर हैं.’’

थानाप्रभारी यही बात उस के मुंह से सुनना चाहते थे. उन्होंने बेवकूफ बना कर सुमित के मुंह से सच्चाई उगलवा ली थी. इस के बाद सुमित और अंकित कर्णवाल ने अंकित वर्मा की हत्या की जो कहानी बताई, वह प्रेमप्रसंग से लबरेज निकली. सुमित वर्मा बिजनौर जिले के चांदपुर कस्बे की श्रीराम कालोनी में रहता था. उस की बिजनौर के ही फीना कस्बे में सर्राफा की दुकान थी. फरवरी, 2014 में उस की शादी धामपुर के रहने वाले रामकिशन वर्मा की बेटी आरती के साथ हुई थी. दोनों की हंसीखुशी से जिंदगी कट रही थी.

सुमित कभीकभी देखता था कि उस की पत्नी फोन पर किसी से काफीकाफी देर तक बातें करती है. कोई भी आदमी इस तरह अपने किसी नजदीकी से ही बातें करेगा. सुमित को लगा था कि वह अपने घर वालों से बातें करती होगी. लेकिन जब उस ने एक दिन पत्नी को फोन पर रोमांटिक बातें करते सुना तो उस ने पत्नी से पूछा, ‘‘आरती, तुम अभी किस से बातें कर रही?’’

आरती ने कहा, ‘‘मेरा रिश्ते का एक भाई है. उसी से बातें कर रही थी.’’

‘‘कौन सा ऐसा भाई है, जो तुम से फोन पर घंटों तक बातें करता है, जबकि तुम्हारे घर वालों के इतने फोन नहीं आते. आरती अब तुम्हारी शादी हो चुकी है, इसलिए तुम्हें अपने घर की तरफ ध्यान देना चाहिए.’’ सुमित ने पत्नी को समझाया.

‘‘ठीक है, मैं उस से अब ज्यादा बातें नहीं करूंगी.’’ आरती ने कहा.

आरती ने पति से वादा तो कर लिया, लेकिन उस ने उस भाई से बातें करनी कम नहीं कीं. इस पर सुमित ने पत्नी से कहा तो कुछ नहीं, लेकिन उस के मोबाइल की काल डिटेल्ट जरूर देखी. इस से पता चला कि आरती एक ही फोन नंबर पर दिन में कईकई बार लंबीलंबी बातें करती थी. जिस नंबर पर उस की बातें होती थीं, एक दिन उस ने उसी नंबर पर अपने फोन से बात की तो दूसरी ओर से जो आदमी बोला, उस ने अपना नाम अंकित वर्मा बताया. पूछने पर अंकित ने बताया, ‘‘सुमितजी आप का साला राजीव है न वह मेरा दोस्त है. उस के यहां मेरा वर्षों से आनाजाना है. मैं आरती को बहन मानता हूं, इसलिए उस से बातें कर लेता हूं.’’

‘‘जितने फोन तुम उसे करते हो, उतने फोन तो उस का सगा भाई भी उसे नहीं करता. आरती का कोई बड़ा बिजनैस भी नहीं है, जिस से समझ सकूं कि तुम बिजनैस के सिलसिले में उस से बातें करते हो.’’ सुमित थोड़ा गुस्से में बोला.

‘‘लगता है, आप को यह सब बुरा लगा.’’ अंकित ने कहा.

‘‘बिलकुल बुरा लग रहा है. आरती मेरी पत्नी है, इसलिए बुरा तो लगेगा ही. अब मैं कह देता हूं कि तुम उसे फोन हरगिज नहीं करोगे.’’ सुमित ने उस से दो टूक कह दिया.

मगर इस चेतावनी के बाद भी आरती और अंकित वर्मा आए दिन फोन पर बातें करते रहे. इस से सुमित को शक हुआ कि इन दोनों के बीच कोई न कोई चक्कर जरूर है, जिस से ये बातें करना बंद नहीं कर रहे हैं.

एक दिन सुमित वर्मा ने आरती को विश्वास में ले कर और कसम दे कर पूछा, ‘‘आरती, तुम्हारा और तुम्हारे मुंह बोले भाई का क्या चक्कर है, जो एकदूसरे को नहीं भूल पा रहे?’’

तब आरती ने बताया, ‘‘अंकित वर्मा से मेरी कालेज के समय की दोस्ती है. उस का हमारे घर भी आनाजाना था.’’

दोस्ती की बात सुन कर सुमित का दिमाग घूम गया. अगले दिन वह अपनी ससुराल पहुंच गया. उस ने अपने साले राजीव से पूछा, ‘‘यह अंकित वर्मा कौन है और उस का तुम लोगों से क्या संबंध है?’’

इस पर राजीव ने हंस कर कहा कि अंकित ने यहीं रह कर अपनी पढ़ाई की थी. उस से थोड़ीबहुत जानपहचान थी. वैसे वह कुरीखाना गांव का रहने वाला है. अब उस ने वहीं पर सर्राफे की दुकान खोल ली है. पहले आरती की शादी अंकित से ही तय हुई थी. लेकिन उस से शादी के लिए हमारे पिता तैयार नहीं थे, जिस से शादी नहीं हो सकी. इतनी जानकारी मिलने पर सुमित समझ गया कि जब इन की बात शादी तक पहुंच गई थी तो जरूर इन के बीच कोई चक्कर रहा होगा. वह उसी समय घर लौट आया. घर आ कर उस ने आरती को डांटा कि उस ने उस से झूठ क्यों बोला. अंकित वर्मा से शादी की बात चलने वाली बात उसने क्यों छिपाए रखी? जब अंकित उस का भाई है तो उस से शादी की बात कैसे चली?

आरती समझ गई कि सुमित को शायद सच्चाई का पता चल गया है. इसलिए वह कुछ नहीं बोली. बहरहाल सुमित ने उसे एक बार और चेतावनी दी कि वह अंकित से हरगिज बात न करे, वरना उसे सख्त कदम उठाने पड़ेंगे. सच्चाई यह थी कि अंकित वर्मा और आरती के बीच शादी से पहले से ही गहरी दोस्ती थी. आरती के पिता की नाराजगी से जब आरती और अंकित वर्मा की शादी नहीं हो सकी तो दोनों कसमसा कर रह गए. तब आरती ने अंकित से वादा किया कि भले ही उस की शादी किसी और से हो जाए, उस के संबंधों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

यही वजह थी कि सुमित वर्मा से शादी हो जाने के बाद भी आरती और अंकित फोन पर बातें करते रहते थे और मौका मिलने पर मुलाकात भी कर लेते थे. अब पति को शक होने पर आरती परेशान हो उठी. उस ने इस बारे में अंकित से बात की. तब दोनों ने तय किया कि सुमित के अपनी दुकान पर जाने के बाद दोनों कहीं बाहर मिल लिया करेंगे. इस के बाद सुमित जैसे ही फीना की अपनी ज्वैलरी की दुकान के लिए निकलता, आरती अंकित को फोन कर देती. इस के बाद दोनों किसी रेस्टोरेंट में मुलाकात कर लेते. आरती अपने प्रेमी से मिलने में काफी एहतियात बरतती थी. इस के बावजूद भी उस के पति को किसी के द्वारा पता लग गया कि उस के निकलते ही उस की पत्नी घंटों के लिए घर से गायब हो जाती है.

सुमित वर्मा समझ गया कि वह अपने यार से ही मिलने जाती होगी. उस ने न तो आरती से कुछ कहा और न ही अंकित से, बल्कि इस समस्या से निदान पाने के लिए उस ने अंकित वर्मा को ठिकाने लगाने की ठान ली. उस ने सोचा कि ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी. अपनी योजना को आसानी से अंजाम तक पहुंचाने के लिए उस ने अंकित से दोस्ती करनी उचित समझी. करीब 5 महीने पहले वह एक दिन अंकित के घर पहुंचा. अचानक अपने घर सुमित को देख कर अंकित चौंका तो सुमित ने कहा, ‘‘मैं मुरादाबाद जा रहा था, तुम जब मेरे साले के दोस्त हो तो सोचा तुम से मिलता हुआ ही निकल जाऊं.’’

‘‘यह तो आप ने बहुत अच्छा किया, आप हमारे रिश्तेदार हैं. इसलिए जब कभी मन हो, आ जाया करें.’’ अंकित ने कहा.

अंकित ने उस वक्त सुमित की बहुत खातिरदारी की. अंकित की मेज पर उस का एक फोटो फ्रेम में लगा रखा था. किसी बहाने से सुमित ने वह फोटो उस से ले लिया और जाते समय बोला, ‘‘अंकित आज से हम दोस्त हैं. तुम भी हमारे यहां आते रहना.’’

यह सुन कर अंकित वर्मा फूला नहीं समाया कि अब आरती से मिलने का रास्ता साफ हो गया. एकदो बार अंकित वर्मा सुमित के सामने उस के घर आरती से मिलने गया. सुमित का एक दोस्त था, अंकित कर्णवाल उर्फ फौलादी, जो चांदपुर में रहता था. सुमित ने अंकित को ठिकाने लगाने वाली बात उसे बताई. अंकित कर्णवाल दोस्त का साथ देने को तैयार हो गया. योजना के अनुसार, 16 अप्रैल, 2015 को सुमित वर्मा और अंकित कर्णवाल सुबह के समय चांदपुर से मोटरसाइकिल द्वारा अंकित वर्मा के गांव कुरीखाना जा पहुंचे. मेन रोड पर एक होटल के नजदीक पहुंच कर सुमित ने अंकित को फोन किया. अंकित उस समय खाना खाने जा रहा था कि उस के फोन की घंटी बजी.

स्क्रीन पर सुमित का नंबर देख कर वह खुश हो गया. तभी सुमित ने कहा, ‘‘कुरीखाना के लिए जो सड़क जाती है, मैं वहीं होटल पर बैठा हूं, साथ में मेरा एक दोस्त भी है. उसे तुम से ज्वैलरी के विषय में कुछ बात करनी है. इस की बहन की शादी है.’’

‘‘जब यहां तक आ गए हो तो घर आ जाओ. एकएक कप चाय भी हो जाएगी. घर में बैठ कर इत्मीनान से बात करेंगे.’’ अंकित ने कहा.

‘‘नहीं, इस समय हम घर नहीं आ सकते क्योंकि हमें अभी मुरादाबाद जाना है. वहां से इसे शादी के लिए बरतन वगैरह भी खरीदने हैं, तुम 2 मिनट के लिए यहां आ जाओ.’’

अंकित अपनी भाभी से यह कह कर घर से निकल गया कि वह अभी 10-15 मिनट में लौट कर खाना खाएगा. अंकित के होटल पर पहुंचने से पहले ही सुमित ने योजना के तहत अंकित को भीकमपुर वाली रोड पर राजेंद्र एकैडमी के पास गन्ने के खेत में छिपने के लिए भेज दिया. अंकित उस होटल पर पहुंच गया, जहां सुमित उस का इंतजार कर रहा था. उस होटल पर दोनों ने चाय पी. तभी सुमित ने बताया कि मेरा दोस्त गन्ने के खेत में लघुशंका के लिए गया हुआ था. उसे गए बहुत देर हो गई है. चलो पहले उसे बुला लें, बाद में बातें करेंगे.

सुमित ने अपनी मोटरसाइकिल वहीं खड़ी कर दी और अंकित की मोटरसाइकिल पर बैठ कर उस गन्ने के खेत की तरफ चल पड़ा जहां अंकित कर्णवाल छिपा था. गन्ने के खेत के नजदीक पहुंच कर सुमित ने आवाज दी तो अंकित कर्णवाल खेत से निकल आया. मोटरसाइकिल अंकित चला रहा था. योजना के तहत अंकित कर्णवाल बाइक पर बीच में बैठ गया. कुछ दूर चलते ही सुनसान जगह देख कर अंकित कर्णवाल ने अंकित वर्मा के दाहिनी तरफ कमर में चाकू घोंप दिया. चाकू लगते ही अंकित वर्मा लड़खड़ा कर मोटरसाइकिल सहित गिर गया.

तभी फुरती से अंकित कर्णवाल ने उस के हाथ पकड़ लिए तो सुमित ने उस की गरदन, पेट आदि पर चाकू के 7-8 वार कर दिए. थोड़ी देर तड़पने के बाद ही उस की मौत हो गई. फिर दोनों ने उस की लाश पापुलर के बाग में खींच कर डाल दी. इस के बाद वे उसी होटल पर पहुंचे, जहां उन की मोटरसाइकिल खड़ी थी. वहां से उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और चांदपुर के लिए चल दिए. रास्ते में नूरपुर चांदपुर के बीच पड़ने वाली नदी में उन्होंने खून से सने कपड़े धोए.

सुमित को पता था कि लाश मिलने पर पुलिस उस के पास पहुंच जाएगी, इसलिए वह अपने घर से फरार हो गया था. उस ने बचने की लाख कोशिश की, लेकिन आखिर वह पुलिस के शिकंजे में फंस ही गया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. सुमित वर्मा और अंकित कर्णवाल से पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. UP Crime

कथा में मोनिका परिवर्तित नाम है कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Hindi Stories: ख्वाब जब ख्वाहिशें बन जाएं

Hindi Stories: साधारण परिवार की असमा जावेद प्रोफेसर बनना चाहती थी. अपने ख्वाबों को ख्वाहिशों में बदलने के लिए उस ने पीएचडी भी पूरी की. इसी बीच ऐसा क्या हुआ कि उस के ख्वाब हकीकत नहीं बन सके?

इंटरमीडिएट पास करने के बाद असमा जावेद अपने कैरियर को ऊंचाईयों पर ले जाना चाहती थी. इस के लिए वह चाहती थी कि कोई प्रोफेशनल कोर्स करे, लेकिन उस के पिता की हालत ऐसी नहीं थी कि वह उसे कोई कोर्स करा सकें. उस के पिता हामिद जावेद उत्तर प्रदेश परिवहन निगम में कंडक्टर थे. उन्हें जो तनख्वाह मिल रही थी, उसी से घर चला रहे थे और बच्चों को पढ़ालिखा रहे थे. असमा के अलावा उन के 2 बेटे और एक बेटी थी. वह बड़ी बेटी की शादी कर चुके थे.

जब पिता ने प्रोफेशनल कोर्स कराने में असमर्थता जताई तो काफी सोचनेसमझने के बाद असमा ने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने की सोची. मगर वहां दाखिला मिलना इतना आसान नहीं था. खैर उस ने मेहनत की. इस का नतीजा यह निकला कि उस ने प्रवेश परीक्षा पास कर ली और उसे बीए में दाखिला मिल गया. उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले की रहने वाली असमा नामी यूनिवर्सिटी में दाखिला मिलने पर बहुत खुश थी. उसे रहने के लिए महिला हौस्टल में कमरा भी मिल गया. चूंकि उस की ख्वाहिशें ऊंचीं थीं, इसलिए वह मन लगा कर पढ़ाई कर रही थी.

सभी कुछ ठीक चल रहा था. उन्हीं दिनों यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर से असमा की मुलाकात हुई. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता गया तो वे बेहद करीब आ गए.  फिर पता नहीं अचानक क्या हुआ कि एक दिन असमा ने प्रोफेसर पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए इस की शिकायत यूनिवर्सिटी प्रशासन से कर दी. किसी तरह बात मीडिया तक पहुंची तो असमा जावेद अचानक सुर्खियों में आ गई. असमा के मातापिता ने जब मीडिया में बेटी की इस तरह की खबरें देखीं तो वे चिंतित हो गए. उन्होंने फोन कर के असमा से पूरी हकीकत जानी. यूनिवर्सिटी प्रशासन ने किसी तरह से असमा जावेद और उस प्रोफेसर के बीच समझौता करा दिया.

बेशक यह मामला रफादफा हो गया था, लेकिन असमा जावेद यूनिवर्सिटी के छात्रों की नजरों में एक खास लड़की बन गई. इस घटना के बाद अचानक असमा अपने घर बलरामपुर चली गई. पिता हामिद जावेद इस घटना से काफी परेशान थे. उन्हें इस बात की फिक्र थी कि कहीं असमा के लिए लड़का ढूंढने में उन्हें परेशानी न आए. वह उस की जल्द से जल्द शादी करनी चाहते थे. उन्होंने उस के लिए ठीक सा रिश्ता तलाशना शुरू कर दिया.

किसी रिश्तेदार के माध्यम से हामिद जावेद को असमा के लिए रिश्ता मिल गया. असमा के लिए आदिल अंसारी नाम का जो लड़का बताया था, वह लखनऊ का रहने वाला था और चेन्नै के किसी कालेज में प्रोफेसर था. जावेद उस लड़की को देखने के लिए लखनऊ चले गए. उन्हें आदिल पसंद आ गया. दोनों तरफ से बात होने के बाद असमा का आदिल अंसारी के साथ रिश्ता तय कर दिया गया और निर्धारित तिथि पर उन का निकाह भी हो गया. निकाह के बाद वह पति के साथ चेन्नै चली गई.

शादी के बाद असमा खुश थी. उसे उम्मीद थी कि उस की ख्वाहिशों में अब पति प्यार के रंग भर देगा, पर ऐसा नहीं हुआ. पता नहीं गृहस्थी में कैसे तनाव ने प्रवेश कर लिया. जिस की वजह से उन दोनों के रिश्तों में कड़वाहट पैदा हो गई. तनाव इतना बढ़ गया कि जिंदगी को चलाना भी मुश्किल होने लगा. अंत में असमा ने अपने मायके में लौटने का फैसला कर लिया. पिता के यहां आ कर वह फिर से पढ़ाई में जुट गई. उस का आदिल से तलाक हुआ या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन आदिल अंसारी देश छोड़ कर साऊथ अमेरिका में जा कर बस गया.

पहले एक प्रोफेसर पर यौनशोषण का आरोप, फिर दांपत्य के टूटने का असमा को गहरा आघात पहुंचा. किसी तरह वह इस आघात से उबरी और दोबारा से पढ़ाई पर ध्यान देने लगी. उस ने यूनिवर्सिटी में छात्राओं के हकों के लिए मोर्चा खोल कर आवाज उठानी शुरू कर दी. इस के बाद एक दबंग लड़की के रूप में उस की छवि सामने आ गई. बीए करने के बाद उस ने उसी यूनिवर्सिटी से हिंदी में एमए किया. वह भी प्रोफेसर बनना चाहती थी. इसलिए अच्छे अंक लाने के लिए खूब मेहनत कर रही थी. यूनिवर्सिटी में उस के कई दोस्त थे. उन सभी से उस के संबंध पढ़ाई की बातों तक ही सीमित थे. वह मर्यादा में रह कर ही उन से बात करती थी.

एक बार अपने एक रिश्तेदार की शादी में असमा की मुलाकत सुलेमान नाम के एक धनाढ्य युवक से हुई, जो एक रेस्टोरेंट का मालिक था. असमा और सुलेमान के बीच फोन पर बातें होने लगीं. दोस्ती बढ़ी तो वे होटल में मुलाकात करने लगे. सुलेमान होटल में बढि़या खाना खिलाने के अलावा उसे महंगे गिफ्ट भी देने लगा. असमा ऐसी ही जिंदगी जीना चाहती थी. मुलाकातों का यह सिलसिला चलने लगा. असमा और सुलेमान के रिश्ते गहरे होने लगे. लेकिन एक दिन जब असमा को पता चला कि सुलेमान शादीशुदा है तो उसे अपने सपनों की खूबसूरत इमारत ढहती नजर आई. यह बात उस ने अपनी एक खास सहेली को बताई तो उस ने असमा को समझाया कि मजहब के मुताबिक सुलेमान 3 शादियां कर सकता है. यह बात असमा की समझ में आ गई.

उसे लगा कि यदि वह सुलेमान पर शादी के लिए दबाव डालेगी तो वह उसे दूसरी बीवी बना सकता है. असमा से नजदीकी बढ़ने पर सुलेमान का पत्नी के प्रति व्यवहार भी बदल गया था. पत्नी को शक हो गया तो वह इस की वजह ढूंढने लगी. जब उसे पता चला कि उस का पति असमा नाम की एक लड़की के साथ घूमताफिरता है तो वह भड़क उठी. उस ने पति से साफ कह दिया कि यह सब नहीं चल पाएगा. तुम अपना रास्ता बदलो, वरना ठीक नहीं होगा.

असमा की वजह से सुलेमान की गृहस्थी में कलह रहने लगी. रोजरोज के क्लेश से सुलेमान को लगने लगा कि दांपत्य में आने वाली दरार का असर जीवन में गलत होगा. घर वालों ने भी उसे असमा से दूर रहने की सलाह दी. लिहाजा उस ने असमा से दूरी बनानी उचित समझी. लेकिन यह बात उस ने असमा को जाहिर नहीं होने दी.

लेकिन असमा तो उसे दिलोजान से चाहने लगी थी. एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘सुलेमान, अब हमें शादी कर लेनी चाहिए.’’

‘‘यह क्या कह रही हो तुम? मैं तो पहले से शादीशुदा हूं.’’ वह चौंकते हुए बोला.

‘‘जानती हूं, पर हमारे संबंध भी तो बहुत गहरे हो चुके हैं. इसलिए मैं चाहती हूं कि हमारे रिश्ते को अब नाम मिल जाना चाहिए.’’ असमा ने कहा.

‘‘यह तो नहीं हो सकता. असमा बात दरअसल यह है कि मैं अपने घर वालों की मरजी के बिना कुछ नहीं कर सकता.’’ सुलेमान ने उसे टालने की कोशिश की.

‘‘मुझ से संबंध बनाते वक्त तो तुम ने घर वालों से सलाह नहीं ली थी. और फिर तुम कोई बच्चे तो हो नहीं.’’ असमा ने गुस्से में कहा.

‘‘देखो असमा, दोस्ती की बात और है, पर सच यह है कि मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ सुलेमान ने साफ बता दिया.

‘‘तो क्या तुम मुझे बड़ेबड़े सपने दिखा कर केवल इस्तेमाल कर रहे थे. मैं एक बात बताए देती हूं कि मेरी भावनाओं के साथ खेलने का अंजाम अच्छा नहीं होगा सुलेमान.’’

असमा के तेवर देख कर सुलेमान डर गया. उस ने असमा से किनारा करने की सोच ली. उसी दौरान असमा का रिजल्ट आ गया. उस ने एमए प्रथम श्रेणी में पास कर लिया. मंजिल पाने के लिए वह पीएचडी में प्रवेश की तैयारी करने लगी. आखिर उस की मेहनत रंग लाई और प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद वह संस्कृत विभाग के प्रोफेसर आर.एन. शुक्ला के अंडर में रिसर्च करने लगी. उस का विषय था प्रेमचंद के उपन्यासों में मध्यम वर्ग की दिशा और दशा. असमा प्रो. शुक्ला के निर्देशन में रिसर्च कर रही थी. उस की मेहनत से प्रो. शुक्ला काफी खुश थे. सुलेमान से वह खफा जरूर थी, पर आर्थिक सहायता की भी जरूरत थी. पढ़ाई काफी खर्चीली थी. जबतब सुलेमान से मुलाकात होती तो वह आर्थिक सहयोग कर देता था. लेकिन संबंधों में पहले जैसी मधुरता नहीं थी.

सुलेमान के व्यवहार से असमा टूट सी गई थी. मगर उस से मिलने की उस की मजबूरी थी. सुलेमान की बेवफाई उसे कचोटती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अपना दर्द किस के साथ बांटे. यूं तो उस के कई दोस्त थे पर कोई ऐसा करीबी नहीं था, जो उस के दर्द को बांट सके. सन 2010-12 में यूनिवर्सिटी में छात्र संघ के चुनाव होने थे. असमा ने तय किया कि वह चुनाव लड़ेगी. सुर्खियों में बने रहने के लिए असमा ने अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल करा दिया. यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने वाली वह अकेली लड़की थी. इसी वजह से वह मीडिया के जरिए सुर्खियों में आने लगी.

असमा सोच रही थी कि यदि वह चुनाव जीत गई तो पूरी यूनिवर्सिटी पर उस की दबंगई चलेगी. पर ऐसा हुआ नहीं. वह चुनाव हार गई. इसे वह अपने जीवन की बड़ी हार मान रही थी. उसे लगने लगा कि वह हर क्षेत्र में हारी हुई लड़की है. अब वह एक ऐसे मजबूत सहारे की तलाश में थी, जो खंबे की तरह उस के साथ खड़ा रहे. जिंदगी ने एक बार फिर करवट ली और उस की मुलाकात जावेद नाम के एक प्रौपर्टी डीलर से हुई. जावेद उल हसन उर्फ जावेद अलीगढ़ की एडीए कालोनी शाहजमाल का रहने वाला था. उस की शादी करीब 11 साल पहले हो चुकी थी और वह 3 बच्चों का पिता था. असमा से मुलाकात के बाद जावेद उस से दोस्ती बढ़ाने की कोशिश करने लगा. इसी बीच असमा की रिसर्च भी पूरी हो गई और उस को डिग्री भी मिल गई.

पीएचडी पूरी करने के बाद उसे हौस्टल छोड़ना था. नौकरी मिलने तक वह अलीगढ़ में ही रहना चाहती थी. उस के सामने समस्या यह थी कि हौस्टल छोड़ने के बाद वह कहां रहे. इस बारे में उस ने जावेद से बात की. जावेद ने कोशिश कर के उसे सिविल लाइंस इलाके में स्थित अल हम्द अपार्टमेंट में एक फ्लैट किराए पर दिला दिया. उसे उम्मीद थी कि पीएचडी पूरी होने के बाद जल्द ही अच्छी नौकरी मिल जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. काफी भागदौड़ के बाद भी उसे कहीं नौकरी नहीं मिली. वह जिंदगी में जिस स्थिरता को पाना चाहती थी, वह उसे नहीं मिल रही थी.

सन 2014 में वह जावेद के साथ लैक्चरार पद की परीक्षा देने के लिए इलाहाबाद गई. बाद में इस परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ तो उसे असफलता मिली. ज्योंज्यों समय गुजर रहा था, असमा निराश होती जा रही थी. अपने घर से दूर अकेली वह परेशानियों से जूझ रही थी. दोस्तों में भी कोई वफादार नहीं दिख रहा था. जावेद थोड़ाबहुत खर्चा उठा रहा था. इस की वजह यह थी कि वह उस से प्यार करता था. असमा की जावेद के साथ नजदीकियां तो थीं, पर वह उस के प्रति ज्यादा गंभीर नहीं थी. काफी सोचविचार के बाद असमा ने बीटीसी ट्रैनिंग करने की सोची. क्योंकि बीटीसी करने के बाद नौकरी मिलनी तय थी. उस ने बीटीसी करने के लिए हाथरस में दाखिला ले लिया. असमा को लगने लगा कि अब मंजिल से वह ज्यादा दूर नहीं है.

जावेद ही उसे सुबहशाम अपनी बाइक से बसअड्डे तक पहुंचाने और वहां से लाने का काम करता था. वह अपनी कोशिशों से असमा के दिल में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था. इस के लिए उस ने असमा को एक टैबलेट भी भेंट में दिया था. बीवीबच्चों के होते हुए भी वह उस के साथ अपनी दुनिया बसाना चाहता था. पर उस के बारे में असमा की क्या सोच थी, उसे पता नहीं था. असमा के जीवन में जो कुछ घटित हुआ था, उस से उस के मन में कभीकभी घोर निराशा पैदा हो जाती थी. जिन ख्वाबों को उस ने ख्वाहिश बना लिया था, उस का पता दूरदूर तक नहीं था.

यूनिवर्सिटी के साथियों का साथ छूट चुका था. अब जो दोस्त थे, वे विश्वसनीय नहीं थे. इसलिए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस पर विश्वास करे, किस पर नहीं. पुराने दोस्त सुलेमान से भी वह कभीकभी मिल लेती थी. लेकिन मुलाकात में पहले जैसी शिद्दत नहीं होती थी. जावेद का भी अजीब हाल था. वह जानता था कि असमा अभी भी सुलेमान से मिलतीजुलती है. वह सुलेमान को छोड़ नहीं पा रही थी. जबकि जावेद नहीं चाहता था कि असमा सुलेमान से मिले. वह उन दोनों के बीच दूरी बढ़ाना चाहता था, ताकि असमा का झुकाव पूरी तरह से उस की तरफ हो जाए.

एक दिन उस ने असमा से कहा, ‘‘असमा, सुलेमान ने तुम्हें धोखा दिया है. तुम उसे सबक क्यों नहीं सिखाती?’’

‘‘मैं क्या कर सकती हूं? वह बड़ा आदमी है.’’

‘‘तभी तो कह रहा हूं, उसे ऐसे मामले में फंसा दो कि उसे अपनी औकात समझ में आ जाए.’’

सुलेमान का खयाल आते ही असमा का दिलोदिमाग गुस्से में उबलने लगता था. क्योंकि सुलेमान ने उसे धोखा दिया था और वह उस के खिलाफ कुछ भी नहीं कर पा रही थी. जावेद की बातों में आ कर असमा ने 20 जनवरी, 2015 को सिविल लाइंस थाने में सुलेमान और उस के बड़े भाई के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी. बदनामी की वजह से सुलेमान डर गया. बाद में असमा ने सुलेमान से 5 लाख रुपए ले कर समझौता कर लिया. असमा को मोटी रकम मिलने के बाद उस के तेवर भी बदल गए. उस की अन्य जनों से भी दोस्ती हो गई. जावेद को शक होने लगा कि असमा दूसरे लोगों से देर तक बातें करती है. जबकि उस से बात करने के लिए उस के पास टाइम नहीं होता. एक दिन उस ने उस से कह भी दिया, ‘‘असमा, आजकल तुम मेरा फोन अटैंड नहीं करती हो. जब मैं तुम्हें फोन मिलाता हूं, तुम्हारा फोन अकसर बिजी होता है.’’

‘‘जिस समय तुम ने फोन मिलाया होगा, किसी से बात कर रही होऊंगी.’’ असमा ने लापरवाही से कहा.

‘‘देखो, यह सब ठीक नहीं है.’’ जावेद बोला.

‘‘क्या ठीक नहीं है. तुम कहना क्या चाहते हो?’’ इस बार उस के स्वर बदले हुए थे.

‘‘तुम छुट्टी वाले दिन कहां जाती हो? अकसर फ्लैट पर ताला लगा मिलता है.’’ उस ने पूछा.

‘‘क्या मैं तुम्हारी खरीदी हुई हूं? जावेद, तुम मेरे दोस्त हो, शौहर नहीं. इसलिए यह बात दिमाग से निकाल दो कि एक बीवी की तरह मैं तुम्हारी गुलामी करूंगी.’’

यह बात जावेद के दिल को चुभ गई. वह मन ही मन कसमसाने लगा. वह असमा को दिलोजान से चाहता था. वह नहीं चाहता था कि असमा उस के अलावा किसी और से मिले. उसे इस बात का शक था कि उस के किसी और से भी संबंध हैं, इसलिए वह उस से रूखी बातें कर रही है. जावेद उस के दोस्तों के बारे में जानना चाहता था. इस के लिए उस ने कई बार चाहा कि उस का टैबलेट चैक करे, पर असमा ने उसे टैबलेट नहीं दिया. 8 मई, 2015 की शाम को जावेद ने असमा को अलीगढ़ बसअड्डे से रिसीव किया और उस के फ्लैट पर ले गया. थकी होने की वजह से वह पलंग पर लेट गई. तभी जावेद बोला, ‘‘असमा, मैं तुम्हारा टैबलेट देखना चाहता हूं.’’

‘‘क्यों?’’ वह बोली.

‘‘बस यूं ही.’’ जावेद ने कहा.

‘‘तुम बड़े शक्की आदमी हो और शक्की लोग मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं हैं.’’ असमा ने मन की बात कह दी.

‘‘असमा, तुम जानती हो कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूं. लेकिन तुम ने जिस अंदाज में मुझ से बात की, वह मुझे अच्छी नहीं लगी.’’

‘‘अजीब आदमी हो. तुम तो बात के पीछे पड़ गए. अच्छा यह बताओ कि तुम मेरी जासूसी करने वाले होते कौन हो? मेरा जिस से दिल चाहेगा मिलूंगी, बोलूंगी और दोस्ती करूंगी. आज तक मेरे बाप ने मुझ पर शक नहीं किया तो तुम कौन हो शक करने वाले.’’

अब जावेद अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पा रहा था. असमा की एकएक बात दिल में तीर की तरह चुभती जा रही थी. उस ने असमा को पकड़ कर झिझोड़ दिया. असमा ने गुस्से में उसे धक्का दिया तो जावेद का गुस्सा और बढ़ गया. उस ने दोनों हाथों से असमा का गला दबा दिया. असमा कुछ ही देर में लुढ़क गई. असमा की हालत देख कर जावेद के पसीने छूटने लगे. उसे यह भी डर लग रहा था कि अगर वह जिंदा बच गई तो उसे जेल भिजवा कर ही रहेगी. इसलिए उस ने उस के सिर पर किसी भारी चीज से कई वार किए. जब उसे विश्वास हो गया कि वह मर गई है तो उस ने उस का पर्स टटोला और उस का एटीएम कार्ड निकाला. टैबलेट और मोबाइल भी अपने कब्जे में लिया फिर बाहर निकल गया. जाते समय उस ने फ्लैट का ताला बंद कर दिया.

8 मई, 2015 को असमा के भाई सलमान ने उसे फोन किया, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ जा रहा था. अगले 3 दिनों तक जब असमा का फोन नहीं मिला तो घर वाले परेशान हो गए. तब असमा के घर वाले 11 मई          को बलरामपुर से अलीगढ़ आ गए. उन्हें उस के फ्लैट का पता मालूम ही था. इसलिए वे सीधे फ्लैट पर पहुंचे. फ्लैट पर ताला लगा देख कर उन्होंने पड़ोसियों से पूछा तो कोई कुछ बता नहीं पाया.  घर वाले थाना सिविल लाइंस पहुंच गए. इंसपेक्टर सूर्यकांत से मिले और सारी बात बता कर असमा के अपहरण की आशंका जताई. सलमान की तहरीर पर पुलिस ने असमा के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस 12 मई को असमा के फ्लैट पर पहुंची तो वहां से बदबू आ रही थी.

अड़ोसीपड़ोसी इस बदबू से परेशान थे. पुलिस ने ताला तोड़ा तो अंदर पलंग पर असमा की लाश मिली. लाश देख कर घर वालों की चीख निकल गई. बिस्तर पर खून के धब्बे थे. मृतका के गले पर गहरे निशान थे और सिर पर चोट थी. पुलिस ने पड़ोसियों से बात करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. मृतका के पिता हामिद जावेद ने अपना शक सुलेमान पर जताया. जावेद एक हमदर्द की तरह हामिद के साथ था. उधर सुलेमान को पता चला कि उस पर असमा की हत्या का इलजाम थोपने का प्रयास किया जा रहा है तो वह परिजनों के साथ थाने पहुंच गया. उस ने पुलिस को बताया कि उसे इस मामले की कोई जानकारी नहीं है.

असमा के घर वालों के साथ लगे हुए जावेद की हरकतें पुलिस को संदिग्ध लग रही थीं. एसएसपी जे रविंद्र गौड़ ने थानाप्रभारी को जल्द से जल्द केस खोल कर हत्यारे को गिरफ्तार किए जाने के आदेश दिए. दबाव बढ़ने पर पुलिस भी केस की खोलने में जुट गई. पुलिस ने असमा के मोबाइल की काल डिटेल्स की जांच की तो पता चला कि उस की एक फोन नंबर पर ज्यादा बातें होती थीं, वह नंबर जावेद का निकला. पुलिस ने पूछताछ के लिए जावेद को हिरासत में ले लिया. पुलिस की हिरासत में आते ही जावेद के पैरों तले से जमीन खिसकने लगी. क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि इस मामले में वह सुलेमान को फंसा देगा. उस ने सुलेमान के खिलाफ असमा के पिता और भाई के कान भी भरे थे. तभी तो उन्होंने सीधे सुलेमान पर शक जताया था.

पांसा पलटता देख वह घबराने लगा. पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने कबूल कर लिया कि उसी ने असमा की हत्या की थी. उस ने यह भी बताया कि उस की हत्या करने का उस का कोई इरादा नहीं था, लेकिन हालात ऐसे बन गए कि गुस्से में उस का गला दबा दिया. उस ने बताया कि वह असमा से प्यार करता था और उस पर खूब पैसे खर्च करता था. उसे इस बात का शक था कि असमा उस के अलावा किसी और के चक्कर में थी. इस बारे में वह उस से बात कर रहा था कि असमा उस के ऊपर भड़क गई. गुस्से में वह भी नियंत्रण खो बैठा और गला दबा कर उस की हत्या कर दी.

जावेद की निशानदेही पर पुलिस ने असमा का टैबलेट, फ्लैट की चाबियां, एटीएम कार्ड व 2 सिमकार्ड बरामद कर लिए. असमा के एटीएम कार्ड से उस ने 2 दिनों में 20 हजार रुपए निकाल लिए थे. उन में से पुलिस ने उस से 13 हजार रुपए बरामद कर लिए. असमा यदि सही रास्ते पर चलती तो उस का भविष्य उज्ज्वल हो सकता था. मगर हसरतों ने उसे बेकाबू कर दिया था. Hindi Stories

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित सुलेमान परिवर्तित नाम है.

Motivational Story: मानवी बंधोपाध्याय – उम्मीद की नई किरण

Motivational Story: मानवी की हिम्मत की दाद देनी होगी कि तमाम सामाजिक बाधाएं पार करते हुए वह कालेज की प्रिंसिपल बनने के साथसाथ अभिनेत्री और लेखिका भी है…

पुरुष से महिला बनी देश की पहली ट्रांसजेंडर मानवी बंद्योपाध्याय ने 10 जून, 2015 को जब नदिया जिले के कृष्णानगर महिला कालेज की प्रिंसिपल का कार्यभार संभाला तो एक बार वह फिर चर्चा में आ गईं. चर्चा में आएं भी क्यों नहीं, किसी ट्रांसजेंडर की इस महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्ति का यह देश का ही नहीं, संभवत: दुनिया का पहला मामला है. मानवी को यह सम्मानजनक पद इतनी आसानी से नहीं मिला, बल्कि बचपन से ले कर अब तक उन्हें तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ा. समाज के लोगों ने उन्हें तरहतरह से प्रताडि़त किया. उन का जीना तक दूभर कर दिया, लेकिन मानवी ने हर समस्या का डट कर मुकाबला किया. आइए जानें, दुनिया भर में चर्चा का विषय बनीं मानवी बंद्योपाध्याय आखिर हैं कौन?

मानवी का जन्म एक लड़के के रूप में पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के नेहारी कस्बा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. 2 बेटियों के बाद बेटे के जन्म पर मातापिता फूले नहीं समा रहे थे. उन्होंने उस का नाम सोमनाथ बंद्योपाध्याय रखा. बेटा 5 साल का हुआ तो पिता ने उसे स्कूल भेजना शुरू किया. मोहल्ले के अन्य लड़कों की तरह सोमनाथ भी मछली पकड़ने जाता, पेड़ पर चढ़ता और फुटबाल खेलता. इन सब के अलावा वह पढ़ाई में भी होशियार था.

उस की एक आदत थोड़ा हट कर थी. वह लड़कों के कपड़े पहनने के बजाय लड़कियों के कपड़े पहनना पसंद करता था. उसे जब भी मौका मिलता, वह अपनी बहनों की फ्रौक पहन लेता या मां की साड़ी लपेट लेता. उस की इस हरकत पर घर वाले हंसते. वह अपने लिए भी फ्रौक लाने की जिद करता. इस पर मांबाप उसे समझाते कि वह लड़का है, इसलिए लड़कों के कपड़े पहने. उन्होंने बेटे की इस आदत को गंभीरता से नहीं लिया.

सोमनाथ कुछ और बड़ा हुआ तो उस ने डांस सीखने की इच्छा जाहिर की. घर वालों ने समझाया कि डांस तो लड़कियों का शौक है, तुम्हें सीखना है तो कुछ और सीखो. पर वह नहीं माना. वह जिद पर अड़ गया कि डांस ही सीखेगा. वह डांस भी लड़कों की तरह नहीं, बल्कि लड़कियों की तरह करता था. उस के डांस पर लोग हंसते थे. घर वाले उसे लड़कियों की तरह डांस करने के लिए मना करते. वह नहीं मानता तो उसे डांटा जाता. लेकिन मांबाप की डांट का उस पर कोई असर नहीं पड़ता था.

सोमनाथ को न जाने क्यों लगता था कि वह लड़का नहीं, लड़की है. लेकिन उस के मन की बात को कोई भी समझने को तैयार नहीं था. सोमनाथ ज्योंज्यों बड़ा होता गया, त्योंत्यों उसे लड़कियों का साथ प्यारा लगने लगा. गलीमोहल्ले, स्कूल सभी जगह उस की दोस्ती लड़कियों से ही होती थी. उस की इस आदत से उस के घर वाले परेशान रहते थे. वे उसे मनोचिकित्सक के पास भी ले गए, पर वहां इस का कोई हल नहीं निकला. लेकिन तमाम दुविधा के बीच उस की पढ़ाई जारी रही.

सोमनाथ के हावभाव, चलने का ढंग, बातचीत का तरीका, सबकुछ लड़कियों की तरह था. अकसर कमरा बंद कर के वह डे्रसिंग टेबल के आदमकद आईने के सामने अपनी मां के कपड़े पहन कर खुद को निहारता. मां के कपड़े पहन कर उस के दिल को बड़ी शांति मिलती. वह बहुत खुश होता. जाधवपुर विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एमए करने के बाद एमफिल की डिग्री ली. सोमनाथ की इच्छा प्रोफेसर बनने की थी, इसलिए कल्याणी यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने लगे. पीएचडी करने को लिए उन्होंने जो विषय चुना, वह सब से अलग था. उन का विषय था बांग्ला भाषा और साहित्य में थर्डजेंडर. मां और बहनों ने पढ़ाई में उन का काफी सहयोग किया था.

उसी दौरान उन की झाड़ग्राम विवेकानंद कालेज में प्राध्यापक के पद पर नौकरी लग गई. सोमनाथ बंद्योपाध्याय देखने में भले ही एक युवक थे, लेकिन उन के दिल और दिमाग में क्या है, इसे कोई नहीं जानता था. उन्हें अपने पुरुष रूप से प्यार नहीं था, क्योंकि दिल और दिमाग से वह पूरी तरह महिला थे. उन्हें खुद को मर्द के बजाय औरत के रूप में देखना ज्यादा अच्छा लगता था. मगर यह काम इतना आसान नहीं था. क्या कोई मर्द से पूरी तरह औरत बन सकता है? इस प्रश्न का वह जवाब ढूंढने में लग गए.

यह जानने के लिए सोमनाथ ने कालेज की लाइबे्ररी में रखी सैकड़ों किताबें छान मारीं. इन किताबों को पढ़ने के बाद भी मन को संतुष्टि नहीं मिली तो अलीपुर नेशनल लाइबे्ररी, कोलकाता के अलावा देशी और विदेशी मैडिकल जरनलों में अपने जेहन में उभरे सवाल का हल ढूंढा. और तो और सैक्सोलौजी, ट्रांससैक्स सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी के लेखों में भी अपनी जिज्ञासा का हल ढूंढने की कोशिश की. एक दिन वह अपनी जिज्ञासा का समाधान पाने के लिए एक मनोचिकित्सक के पास जा पहुंचे.

सोमनाथ अब कोई नासमझ नहीं थे. इसलिए मनोचिकित्सक उन की बात सुनने के बाद समझ गए कि सोमनाथ का यह फैसला दिल से लिया हुआ है. यानी यह मानसिक तौर पर पूरी तरह से महिला हैं. इसलिए उन्होंने उन्हें सलाह दी कि इस इच्छा को ज्यादा समय तक दबाए रखना ठीक नहीं है. क्योंकि अधिक दिनों तक इसे अपने दिल में दबा कर रखा गया तो आत्महत्या करने तक की नौबत आ सकती है. सोमनाथ के मन में जो भी उथलपुथल हो रही थी, उसे उन्होंने सार्वजनिक करने का फैसला कर लिया. वह क्लास में एक महिला की तरह बात करने लगे.

महिला बनने की उन की इच्छा तीव्र होती गई. वह महिला की तरह रहने भी लगे. और तो और साड़ी पहन कर क्लास में जाने लगे. उन के इस रूप को देख कर साथी प्राध्यापक चौंके. उन के कई साथी तो उन की खिल्ली उड़ाने लगे. कुछ प्राध्यापकों ने उन के खिलाफ प्रिंसिपल के कान भरे. वह कहने लगे कि सोमनाथ बंद्योपाध्याय की वजह से कालेज की बदनामी हो रही है. लोग कहते हैं कि कालेज में हिजड़ा पढ़ाता है. छात्रों पर भी इस का गलत प्रभाव पड़ेगा. ऐसे किन्नर प्राध्यापक की जगह इस कालेज में नहीं होनी चाहिए.

इस पर कालेज के प्रिंसिपल ने सोमनाथ से कहा कि उन की नियुक्ति कालेज में एक पुरुष के रूप में हुई है न कि महिला के रूप में. इसलिए वह मर्दों के कपड़े पहन कर ही स्कूल आएं. अगर उन्हें औरतों के कपड़े पहनने का शौक है तो वह इन्हें अपने घर पर पहनें, क्योंकि इस से कालेज की बदनामी हो रही है. सोमनाथ ने प्रिंसिपल की इन बातों पर ध्यान नहीं दिया. वह गीदड़ भभकी में नहीं आए. उन्होंने भी कह दिया कि उन्हें क्या पहनना है, क्या नहीं, इस बात को वह अच्छी तरह से समझते हैं. कोई भी उन के कपड़े पहनने की आजादी पर रोक नहीं लगा सकता. उधर उन की पढ़ाई से छात्र खुश थे, इसलिए उन्होंने उन के बदले रूप पर कोई ऐतराज नहीं किया.

प्रिंसिपल को जब लगा कि सोमनाथ उन की बात नहीं मान रहे हैं तो उन्होंने उन्हें स्टाफ क्वार्टर से निकाल दिया. वह किराए के मकान में रहने लगे तो वहां भी उन पर हमला कराया गया. न्याय पाने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की शरण ली. लेकिन उन्हें कहीं से भी न्याय नहीं मिला. उधर मोहल्ले के लोग भी उन की मजाक उड़ाते हुए फबितयां कसते थे. इन सब बातों के होते हुए भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने फैसला कर रखा था कि भले ही लोग उन के बारे में कुछ भी कहें, वह अपने दिल की बात पूरी कर के ही रहेंगे. उसी दौरान न्यूयार्क के माउंट सेनाय हौस्पिटल ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट से प्रकाशित जरनल की एक प्रति उन के हाथ लग गई. वह प्रति हाथ में आते ही उन्हें जैसे एक नई दिशा मिल गई. उन्हें पता चल गया कि पुरुष से नारी बना जा सकता है.

उन्हें पता चला कि बोस्टन की वेनस, न्यूजर्सी की ऐना, टेक्सर की ऐंजेलिना पहले हरमोपोडाइट (उभयलिंग जिस के शरीर में पुरुष और नारी दोनों के यौनांग मौजूद होते हैं) थीं. ये तीनों भी ट्रांससैक्स सर्जरी के जरिए हरमोपोडाइट से एक पूर्ण नारी बनीं थीं. महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलने के बाद सोमनाथ के चेहरे पर आशा की किरणें चमकने लगीं. उन्हें लगा कि उन की ख्वाहिश अब पूरी हो सकती है. ट्रांससैक्स के संबंध में उन्होंने डाक्टरों के जितने भी लेख पढ़े थे, उन सब की उन्होंने फोटोकौपी करा कर रख ली थी.

उसी दौरान उन्हें पता चला कि ट्रांससैक्स सर्जन डा. मनोज खन्ना विदेश से पढ़ाई कर के कोलकाता लौटे हैं. डा. खन्ना ने भले ही ट्रांससैक्स की डिग्री हासिल की थी, लेकिन उन्हें ट्रांससैक्स की सर्जरी का अनुभव नहीं था. सोमनाथ ने डा. खन्ना से मुलाकात कर अपने मन की बात बताई. उन के पास जितने भी लेख थे, वे सब भी उन्हें दिखाए. सोमनाथ की औरत बनने की इच्छा जानकर डा. खन्ना चौंके. उन की ख्वाहिश ने डा. खन्ना को उन का औपरेशन करने के लिए मजबूर कर दिया.

डा. खन्ना का यह पहला औपरेशन था और यह सफल रहा. उन्होंने सोमनाथ बंद्योपाध्याय को पांव से ले कर सिर तक औरत में तबदील कर दिया. इस काम में प्लास्टिक सर्जन डा. मुरारी मुखर्जी की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण रही. डा. खन्ना ने औपरेशन के जरिए सोमनाथ में जहां नारी यौनांग प्रतिस्थापित किया, वहीं डा. मुरारी मुखर्जी ने औपरेशन से नारी सौंदर्य के प्रतीक सुडौल स्तन तैयार किए. उन्होंने सोमनाथ के दोनों हाथ लड़कियों की तरह कोमल बनाए.

इस के बाद बारी आई उन के हारमोंस को बदलने की. हारमोंस स्पेशलिस्ट की मदद से सोमनाथ की त्वचा से मर्दों जैसे रोएं साफ करने के बाद उन की दाढ़ीमूंछों के निशान भी हमेशा के लिए खत्म कर दिए गए. काम यहीं खत्म नहीं हुआ, हेयर ट्रांसप्लांटेशन के जरिए सिर पर उगे काले लंबे घुंघराले बालों ने सोमनाथ को खूबसूरत नारी में तब्दील कर दिया. यह सारा काम बेहद पेचीदा था, मगर सफल रहा. इस सफलता पर डाक्टर भी खुश थे. संपूर्ण नारी बनने के बाद सोमनाथ ने खुद को आदमकद आईने के सामने निहारा तो उन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. नारी बनने के बाद उन्होंने अपना नाम मानवी बंद्योपध्याय रख लिया.

उस वक्त मानवी झाड़ग्राम विवेकानंद कालेज में प्राध्यापक थीं. घने घुंघराले बाल, गोरी रंगत, कसे बदन वाली मानवी बेहद खूबसूरत लग रही थीं. तब उन की उम्र 40 साल के करीब थी, लेकिन अपने कसे बदन की वजह से वह 27-28 साल की दिखती थीं. उन्हें देख कर कोई भी मर्द आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता था. मानवी को गाने का भी शौक था. इस के अलावा वह एक अच्छी अदाकारा भी थीं. पहली मंजिल हासिल करने के बाद उन की दूसरी जंग शुरू हुई, वह जंग थी यूनिवर्सिटी से. उन के सारे शैक्षणिक प्रमाण पत्रों में सोमनाथ बंद्योपध्याय नाम था.

पीएचडी भी वह इसी नाम से कर रही थीं. लेकिन वह पीएचडी की डिग्री मानवी बंद्योपाध्याय के नाम से लेना चाहती थीं. इस के लिए उन्होंने एफिडेविट और अपने मैडिकल सर्टिफिकेट भी यूनिवर्सिटी में जमा कराए. लेकिन यूनिवर्सिटी के नजरिए से वे काफी नहीं थे. मानवी अपने बूढ़े मांबाप के साथ रहती थीं. उन का नारी बनना उन की मां को हरगिज मंजूर नहीं था. तनाव और मानसिक दबाव की वजह से वह दिल की मरीज बन गईं. मोहल्ले और पासपड़ोस के लोगों ने भी मानवी का पुरुष से नारी बन जाना नहीं कबूला. इतना ही नहीं, रिश्तेदारों, मोहल्ले वालो और सहकर्मियों ने भी उन्हें अपने से अलग कर दिया. पर मानवी ने इन बातों की कोई परवाह नहीं की.

सन 2005 में मानवी के जीवन में अभिजीत नाम के एक युवक ने प्यार की दस्तक दी. वह मानवी की खूबसूरती पर मर मिटा. उन दिनों मानवी झाड़ग्राम के विवेकानंद कालेज में प्राध्यापिका थीं. उम्र का तकाजा था, इसलिए पहले प्यार की दस्तक ने उन्हें बेचैन कर दिया और 2005 में ही मानवी और अभिजीत शादी के बंधन में बंध गए. लेकिन शादी हुए एक महीना भी नहीं हुआ था कि मानवी की वैवाहिक जिंदगी में ऐसा तनाव आया कि संबंध तलाक तक पहुंच गए. मानवी से शादी कर के अभिजीत बहुत खुश था. उसे तो जैसे चांद मिल गया था.

उन्होंने अपने हनीमून के लिए झाड़ग्राम के ही राजा वीरेंद्र विजय मल्लादार के आलीशान महल को चुना. सालपियाल के घने जंगल से घिरे इस महल में उन की मोहब्बत ने भरपूर अंगड़ाई ली. अभिजीत को पा कर मानवी भी खुश थीं कि दुनिया से जूझने के लिए उन्हें एक साथी मिल गया था. प्यार के उन्हीं लम्हों के दौरान मानवी ने धीरेधीरे अपनी बीती जिंदगी की दर्दभरी दास्तान पति को सुना दी. उन्होंने अनूठे चिकित्सा विज्ञान की करामात भी बता दी थी. तब उन्हें क्या पता था कि उन की यही कहानी उसी के लिए मुसीबत बन  जाएगी.

मानवी की दास्तान सुनने के बाद अभिजीत गुमसुम सा हो गया. कुछ देर पहले अभिजीत एकदम सामान्य था तो अब उसे क्या हो गया? यह बात मानवी ने उस से पूछी तो वह बात को टालने की कोशिश करने लगा.  मानवी ने जिद की तो अभिजीत ने मन की बात कह दी, ‘‘मानवी, मुझे अब खुद से ही घृणा हो रही है. मुझे पता नहीं था कि तुम पहले मर्द थीं.’’

यह सुन कर मानवी घबरा गईं कि उस का पति यह किस तरह की बातें कर रहा है? वह बोलीं, ‘‘मैं ने शादी से पहले आप को जो पत्र लिखा था, उस में अपने ट्रांससैक्स का जिक्र किया था न?’’

‘‘मैं तो उसे मजाक समझ रहा था. मुझे क्या पता था कि वह हकीकत है.’’ अभिजीत ने कहा.

‘‘अभिजीत, मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं. मेरे प्यार में रत्ती भर संदेह नहीं है. तभी तो मैं ने तुम्हें अपने अतीत से अवगत कराया था. मैं भी तन और मन से आम औरतों की तरह ही हूं. मुझे लगता है कि तुम्हें कोई गलतफहमी हो रही है.’’

‘‘नहीं, मुझे गलतफहमी नहीं, दुख हो रहा है, क्योंकि मैं ने ही प्यार की शुरुआत की थी.’’ अभिजीत बुझे मन से बोला.

‘‘अभिजीत, मैं तुम्हें किसी भी तरह की शिकायत का मौका नहीं दूंगी. मेरा विश्वास करो.’’ मानवी ने उसे समझाया.

उस की बात का अभिजीत ने कोई जवाब नहीं दिया. उस की चुप्पी के बाद मानवी ने भी बात आगे बढ़ानी उचित नहीं समझी.

अभिजीत पढ़ालिखा होने के बावजूद दकियानूसी विचारों वाला था. उस के दिमाग में पत्नी के प्रति नफरत पैदा हो गई. दोनों के बीच कहासुनी शुरू हो गई. इतना ही नहीं, वह मानवी से व्यावहारिक रूप से भी उखड़ाउखड़ा रहने लगा. उन के पारिवारिक रिश्तों पर भी बर्फ जमने लगी. मनमुटाव से होती हुई बात हाथापाई तक पहुंच गई. इस का नतीजा यह निकला कि शादी के डेढ़ महीने बाद ही उन दोनों के बीच तलाक हो गया.

शादीशुदा जिंदगी खत्म होने के बाद मानवी फिर से लोगों का मजाक बन गई. पति द्वारा दी गई जलालत से उबर कर वह जीने की ख्वाहिश लिए फिर से मैदान में उतर पड़ी. अभिजीत से शादी के बाद मानवी ने सोचा था कि उसे दुखदर्द बांटने वाला हमसफर मिल गया है. लेकिन तलाक के बाद उस की समझ आ गया कि खुद को नारी के रूप में स्थापित करने के लिए उसे अकेले ही जंग लड़नी पड़ेगी. वह अदालत, चुनाव आयोग, विश्वविद्यालय जैसे सरकारी प्रतिष्ठानों में अपने नारी होने के कागजातों को ले कर चक्कर काटने लगी.

मानवी ने कसम खा ली थी कि वह सफलता न मिलने तक अपनी जंग जारी रखेगी. अपने हक के लिए उन्होंने कोर्ट की शरण ली. लंबी लड़ाई लड़ने के बाद सन 2005 में आखिर अदालत ने मानवी के नारीत्व को स्वीकृति दे दी. अदालत की स्वीकृति मानवी की बहुत बड़ी जीत थी. जिला निर्वाचन अधिकारी के औफिस में दरख्वास्त दे कर उन्होंने निर्वाचन सूची में अपना नाम और लिंग बदलवाने की मांग की. अदालत के आदेश को जिला निर्वाचन अधिकारी भी नकार नहीं सकते थे. मजबूरन जिला निर्वाचन अधिकारी ने मतदाता सूची में सोमनाथ बंद्योपाध्याय की जगह उन का नया नाम मानवी बंद्योपाध्याय, लिंग – स्त्री दर्ज कर लिया. मतदाता परिचयपत्र में भी मानवी नारी बन गई.

इस तरह सामाजिक न्याय पाने के लिए उन्होंने अदालत के ही नहीं, मानवाधिकार आयोग के भी दरवाजे खटखटाए. इस बीच उन्होंने ‘अबा मनाव’ नाम की पत्रिका भी निकाली. इस के जरिए उन्होंने ट्रांसजेंडरों की व्यथा समाज के सामने रखी. उन्होंने एंडलेस बांडेज नाम का उपन्यास भी लिखा है, जो खूब चर्चित हुआ है. चुनाव आयोग के बाद पश्चिम बंगाल सरकार के शिक्षा विभाग ने भी नौकरी के रिकौर्ड में सोमनाथ की जगह मानवी कर दिया. मानवी के पास कोलकाता की तापसी मंडल और 24 परगना की तिस्ता आईं. इन दोनों ने भी पुरुष से नारी बनने की लड़ाई छेड़ी हुई थी. वे अपनी लड़ाई में मानवी को भी शामिल करना चाहती थीं.

मानवी ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए दोनों को हर तरह से सहयोग करने का वादा किया. इन तीनों के संघर्ष के बाद कोलकाता महानगर में पुरुष से नारी बनी महिलाओं का ‘मानवी’ नाम का संगठन ही तैयार हो गया. मानवी की इस जंग का एक युवक बहुत कायल हुआ. उस युवक का नाम था विश्वजीत. एक प्रशंसक के रूप में विश्वजीत ने उस के जीवन में दस्तक दी. मानवी भी उस से बहुत प्रभावित हुई. बाद में यही विश्वजीत उन का हमसफर बन गया. लेकिन मानवी ने उस से शादी नहीं की. वह उस के साथ लिविंग टूगेदर में रह रही है.

उधर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मानवी को पश्चिम बंगाल ट्रांसजेंडर विकास बोर्ड का उपाध्यक्ष नियुक्त किया है. उन की शिक्षा और काबिलियत को देखते हुए हाल ही में उन्हें कृष्णानगर महिला कालेज का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया है. मानवी की यह सब से बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि वह देश की पहली ट्रांसजेंडर कालेज प्रिंसिपल बन गई हैं. मानवी का कहना है, ‘‘इस पद पर नियुक्ति हो जाने के बाद मेरी जिम्मेदारी अब और बढ़ गई है. मेरे जैसे लोगों के लिए संघर्ष की शुरुआत परिवार से होती है, क्योंकि सब से पहले तो परिवार में कहा जाने लगता है कि यह बच्चा हिजड़ा है. इसे घर से बाहर कर दो.’’

यानी बाहर वालों से पहले घर वाले ही उस बच्चे का मानसिक उत्पीड़न करना शुरू कर देते हैं. ऐसे में वह बच्चा स्कूल तो नहीं पहुंच पाता, साथ ही वह परिवार के प्यार से भी वंचित रह जाता है. इसी कुंठा के चलते उस का जीवन बेकार हो जाता है. मानवी का कहना है, ‘‘मेरे लिए कालेज प्रिंसिपल की जिम्मेदारी मिलना बहुत बड़ी बात है. मेरी कोशिश रहेगी कि मैं अपने छात्रों को बेहतरीन शिक्षा और संस्कार दूं.’’

वह ट्रांसजेंडर लोगों की शिक्षा के लिए भी कुछ करना चाहती हैं. अनगिनत यातनाएं सहने के बाद मानवी सम्मानजनक मुकाम पर पहुंची हैं. अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए संघर्ष किया. उन के बारे में कौन क्या कह रहा है, इस बात पर उन्होंने गौर नहीं किया. अगर वह लोगों की बातों में उलझ जातीं तो शायद तकलीफों के पहाड़ को पार नहीं कर पातीं. बहरहाल जो लोग पहले उन का मजाक उड़ाते थे, उन पर हंसते हुए तरहतरह की बातें करते थे, आज वही लोग उन की सफलता पर उन्हें बधाइयां दे रहे हैं.

 

Shocking Crime Story: 7 फेरों पर हावी मोहब्बत

Shocking Crime Story: विमला ने जिस प्रेमी को पाने के लिए पति का खून किया, क्या अब जेल जाने के बाद वह उसे मिल सकेगा? दुख की बात तो यह है कि अपने इस स्वार्थ में उस ने मासूम बेटे को भी कातिल बना दिया.

लंच में राजनलाल खाना खाने घर आया तो उस की नजर पलंग पर रखी घड़ी पर पड़ी तो वह चौंका.

उस ने कहा, ‘‘यह घड़ी तो सुमन की है, यहां कैसे आई है?’’

विमला हड़बड़ा उठी. उस ने झपट कर घड़ी उठाते हुए कहा, ‘‘लगता है, सोनी यहां रख गई है.’’

‘‘तो इस में इतना हड़बड़ाने की क्या जरूरत है?’’ राजनलाल ने कहा और खाने बैठ गया. लेकिन लंच कर के जब वह नौकरी पर वापस जाने लगा तो रास्ते में जब उस ने इस बात पर गहराई से विचार किया तो उसे पत्नी की हड़बड़ाहट पर संदेह हो गया. राजनलाल उत्तर प्रदेश के जिला हाथरस के थाना शादाबाद के गांव बिसावर का रहने वाला था. इंटर पास करने के बाद वह पिता भगवान सिंह के साथ खेती करने लगा था. लेकिन जल्दी ही उस का मन खेती के काम से ऊब गया तो वह कहीं बाहर जा कर नौकरी करने के बारे में सोचने लगा. उसने पिता से बात की तो उन्होंने इजाजत दे दी.

गांव के तमाम लड़के मथुरा, आगरा और दिल्ली में नौकरी करते थे. राजनलाल ने उन लड़कों से बात की तो मथुरा में रहने वाला उस का एक दोस्त अपने साथ लिवा ले गया. वहां उस ने साड़ी की छपाई के कारखाने में उस की नौकरी लगवा दी. राजनलाल की नौकरी लग गई तो उस के लिए रिश्ते आने लगे. घर वालों ने उस के लिए राजस्थान के हिंडोन के रहने वाले मथुराप्रसाद की बेटी विमला को पसंद कर लिया. उसे भी लड़की दिखाई गई. उसे भी लड़की पसंद आ गई तो दोनों का ब्याह हो गया.

विमला के रूप में भगवान सिंह के घर खुशियों ने कदम रख दिया. विमला के पायलों की रुनझुन से उस का आंगन गुलजार हो गया. राजनलाल को जब भी मौका मिलता, घर आ जाता, क्योंकि मथुरा और बिसावर के बीच ज्यादा दूरी नहीं है. समय के साथ राजनलाल 3 बेटों का बाप बन गया. बच्चों को पढ़ानेलिखाने की बात आई तो राजनलाल ने पत्नी और बच्चों को मथुरा में साथ रखने का विचार किया. उस ने परिवार के साथ रहने लायक किराए का मकान लिया और पत्नी तथा बेटों को ले आया.

घर में सब ठीकठाक था. विमला एक अच्छी पत्नी की तरह घर संभाल रही थी. धीरेधीरे बच्चे बड़े हो रहे थे. उसी बीच राजनलाल के पिता की मौत हो गई और घर में जमीन का बंटवारा हो गया तो राजनलाल ने बड़े बेटे विकास को गांव भेज दिया, जिस से वह उस के हिस्से की खेती करा सके. विकास दादी के साथ रह कर अपने हिस्से की खेती कराने लगा. राजनलाल पुष्पविहार कालोनी में किराए पर रहता था. इसी मकान में 2 किराएदार और रहते थे. उन में एक उस के साढ़ू की बेटी पूजा थी और दूसरा था ऋषिपाल, जो अलीगढ़ का रहने वाला था और यहां वह भी किसी साड़ी के छपाई के कारखाने में नौकरी करता था. उस की पत्नी सोनी और 2 बच्चे भी साथ ही रहते थे.

पूजा विधवा थी. उस के 3 बच्चे थे, जिन के पालनपोषण के लिए वह यहां मथुरा में रहती थी. वह सूरी सुपारी की फैक्ट्री में पैकिंग का काम करती थी. पूजा भले ही विमला की सगी बहन की बेटी थी, लेकिन उस की पूजा की अपेक्षा पड़ोसन किराएदार सोनी से ज्यादा पटती थी. इस की वजह यह थी कि एक तो दोनों घरेलू महिलाएं थीं, दूसरे विमला पूजा से कुछ जलती थी. इस के अलावा पूजा सुबह चली जाती थी तो शाम को ही लौटती थी. आने पर वह घर के कामों और बच्चों की देखभाल में लग जाती थी. उस के पास किसी से मिलनेजुलने का समय ही नहीं रहता था.

सोनी का भाई सुमन भी उस के साथ रहता था. वह फिरोजाबाद के थाना टुंडला के गांव मोरेला का रहने वाला था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. वह काफी खुशमिजाज था. बहन की वजह से उस की भी जानपहचान विमला से हो गई थी. वह कुछ करताधरता नहीं था, इसलिए विमला से घंटों बातें करता रहता था. कभीकभी विमला के साथ खरीदारी करने भी चला जाता था. विमला की बातचीत से सुमन को लगा कि विमला पति से खुश नहीं है. राजनलाल शाम को नौकरी से लौट कर आता तो पत्नी और बच्चों से चिढ़ा सा रहता. दरअसल उसे बगल में एक घाव हो गया था, जो ठीक नहीं हो रहा था. इस शारीरिक तकलीफ की वजह से वह चिड़चिड़ा हो गया था.

इसी वजह से पतिपत्नी के बीच कहासुनी होती रहती थी, जिस से उन की आपस में दूरी बढ़ती जा रही थी. राजनलाल अकसर पूजा से हालचाल पूछने उस के कमरे में चला जाता था. वहां वह घंटों बैठा रहता, उस के बच्चों को खिलातापिलाता भी था. पूजा विमला की सगी बहन कृष्णा की बेटी थी. पति की मौत के बाद वह मथुरा में नौकरी कर के किसी तरह बच्चों को पाल रही थी. राजनलाल का पूजा के यहां इस तरह उठनाबैठना विमला को जरा भी नहीं सुहाता था. उसे लगता था कि राजनलाल पूजा की रुपयोंपैसों से मदद करता है. इस से उसे पति पर संदेह होने लगा. इन बातों को ले कर घर में अकसर क्लेश होता रहता.

घर में रोजरोज के क्लेश से तंग आ कर राजनलाल शराब पीने लगा. पतिपत्नी के इस क्लेश के बारे में जान कर सुमन को लगा कि अगर वह चाहे तो इस मौके का फायदा उठा सकता है. इस के बाद उस ने कोशिश भी शुरू कर दी. एक दिन उस ने विमला से कहा, ‘‘भाभी, आप खूबसूरत भी हैं और घर का इतना काम भी करती हैं, इस के बावजूद भाई साहब न आप की इज्जत करते हैं और न आप से खुश रहते हैं.’’

विमला ने सुमन की आंखों में झांक कर हंसते हुए कहा, ‘‘इसी खूबसूरती की वजह से तो तुम्हारे भाई साहब ने मुझे पसंद किया था. लेकिन लगता है अब उन का मन मुझ से भर गया है.’’

‘‘लेकिन हैं तो आप अभी भी उतनी ही सुंदर. कोई भी देखे तो देखता ही रह जाए. उन्हीं में एक मैं भी हूं. मेरा तो मन करता है कि मैं बैठा सिर्फ आप को ही देखता रहूं.’’ सुमन ने विमला के चेहरे को एकटक ताकते हुए कहा.

‘‘देखने का मन होता है तो देखो न, कौन मना करता है.’’ विमला ने शरारती लहजे में कहा.

‘‘भाभी, देखने से मन खराब होता है. फिर और किसी चीज का मन होने लगा तो…?’’‘‘अच्छा,’’ विमला ने मुसकरा कर उस के गाल में चिकोटी काटते हुए कहा, ‘‘लगता है, जवानी उबाल मार रही है. चलो, अब मुझे खाना बनाना है.’’

सुमन उठ कर अपनी बहन के कमरे में चला आया. लेकिन उस की समझ में आ गया कि अगर उस ने विमला पर हाथ डाला तो वह मना नहीं करेगी. उस के स्पर्श ने उसे उत्तेजित कर दिया था. दूसरी ओर उस की बातों ने विमला के मन में भी हलचल मचा दी थी. सुमन विमला से एकांत में मिलने का मौका तलाश रहा था कि उसी बीच उस की नौकरी लग गई. इस के बाद उस के बहनोई ऋषिपाल ने उसे अलग कमरा दिला दिया. लेकिन विमला की वजह से वह बहन के कमरे में अड्डा जमाए रहता और जब देखो तब विमला के कमरे में घुसा रहता.

सुमन का जब विमला के कमरे में कुछ ज्यादा ही आनाजाना हो गया तो एक दिन राजनलाल ने विमला को टोका, ‘‘सोनी से कहो कि वह अपने भाई को संभाले, वरना ठीक नहीं होगा.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ, क्या किया है उस ने?’’ विमला ने हैरानी से पूछा.

‘‘देखो विमला, वह लड़का मुझे जरा भी पसंद नहीं, फिर उस से हमारा लेनादेना ही क्या है. जब देखो तब वह हमारे कमरे में पड़ा रहता है.’’

‘‘बस, इतनी सी बात को ले कर इतना गुस्सा, ठीक है मैं मना कर दूंगी.’’ विमला ने पति को शांत किया.

विमला ने पति से कह तो दिया कि वह सुमन को कमरे में आने से मना कर देगी, लेकिन उस ने कहा कुछ नहीं. वह खुद ही चाहती थी कि सुमन उस के आगेपीछे घूमता रहे. संयोग से उसी दिन सुमन दोपहर को बहन के घर आया तो वह बाजार गई थी. बच्चे स्कूल गए थे, इसलिए घर पर विमला अकेली थी. सुमन के लिए यह अच्छा मौका था. वह विमला के कमरे में पहुंचा तो विमला ने उसे बैठा कर कहा, ‘‘तुम बैठो, मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’

सुमन ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चाय पीने नहीं, दिल में लगी आग बुझाने आया हूं.’’

विमला का दिल धड़क उठा. मन में तो उस के भी लड्डू फूट रहे थे. जबकि वह कुछ कह नहीं पा रही थी. लेकिन उस की आंखों में जो भाव आए, उसे देख कर सुमन ने आगे बढ़ कर उसे बांहों में भर लिया. बाहर के दरवाजे में वह कुंडी लगा ही आया था, इसलिए उसे किसी तरह का डर नहीं था. इस के बाद तो उस दिन उस ने विमला के कपोलों पर ही नहीं, पूरे जिस्म पर अपने प्यार की मुहर लगा दी. उस दिन सुमन ने विमला को अनैतिकता के जिस दलदल में डाल दिया, दिनोंदिन वह उस में धंसती चली गई. जिस्म की भूख ने उसे अनैतिकता की राह पर चलने को मजबूर कर दिया. सुमन से संबंध बनने के बाद राजनलाल से उसे वितृष्णा होती गई. कभी राजनलाल उस के करीब आने की कोशिश करता तो वह उसे झटक देती.

राजनलाल की समझ में नहीं आ रहा था कि विमला हो क्या गया है? विमला का बेटा आकाश 13 साल का हो गया था. वह सुमन और मां के संबंधों को समझ रहा था. सुमन को उस से डर भी लगता था, इसलिए उसे खुश रखने के लिए वह उसे पैसे तो देता ही था, उस की अन्य जरूरतें भी पूरी करता था. इस से आकाश को लगने लगा कि राजनलाल बाप हो कर भी उस की जो जरूरतें नहीं पूरी करता, सुमन उस का कोई नहीं है, फिर भी उस की हर जरूरत का खयाल रखता है. इसलिए उसे भी पिता से नफरत हो गई. मां तो उसे झिड़क ही रही थी.

इस का नतीजा यह निकला कि आकाश भी बाप को हर बात में जवाब देने लगा. इस पर नाराज हो कर राजनलाल उस की पिटाई कर देता, जिस से बापबेटे के बीच खाई चौड़ी होती गई, जो सुमन के लिए फायदेमंद साबित हो रही थी. सुमन विमला के साथ खुल कर मजे ले रहा था. सोनी को सब पता था, लेकिन पति के डर की वजह से वह चुप थी, क्योंकि बात खुल जाती तो सालेबहनोई में खटक जाती. विमला भले ही पति की चोरी से सुमन के साथ मजे ले रही थी, लेकिन एक दिन राजनलाल को सच्चाई का पता चल ही गया. उस ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया था.

सुमन तो भाग गया था, लेकिन राजनलाल ने विमला की जम कर पिटाई कर दी थी. इस के बाद उस ने विमला को धमकाते हुए कहा, ‘‘अब अगर सुमन कमरे में दिखाई दे गया तो उस का खून कर दूंगा.’’

शाम को राजनलाल ने यह बात ऋषिपाल को बताई तो उस ने राजनलाल को आश्वासन दिया कि वह सुमन को समझाएगा. लेकिन इस के बाद भी विमला और सुमन का मिलना बंद नहीं हुआ. विमला अब राजनलाल के साथ रहना नहीं चाहती थी. दोनों की जाति अलग थी, लेकिन ऐसे संबंधों में जाति की चिंता कौन करता है. सुमन ने उसे विश्वास भी दिला रखा था कि कुछ भी हो, वह उसे अपनी बना कर रहेगा. विमला किसी भी तरह राजनलाल से छुटकारा पाना चाहती थी. पितापुत्र के बीच भी उस ने दरार पैदा कर दी थी. 25 मई, 2015 को किसी बात पर विमला और राजनलाल में झगड़ा हुआ तो राजनलाल ने उस की पिटाई कर दी.

एक तो राजनलाल की वजह से विमला प्रेमी से नहीं मिल पा रही थी, दूसरी ओर जब देखो तब वह उस की पिटाई कर देता था. इन बातों से तंग आ कर उस ने पति नाम के इस कांटे को निकालने का इरादा बना लिया.

राजनलाल के ड्यूटी पर जाने के बाद उस ने सुमन को फोन किया. सुमन मिलने आया तो उस ने कहा, ‘‘अब मैं राजनलाल की मार सहन नहीं कर सकती, चलो कहीं भाग चलते हैं.’’

‘‘तुम पागल हो गई हो क्या? गांव में तुम्हारी इतनी जमीन है. अगर हम भाग जाएंगे तो हमारे हाथ क्या लगेगा? ऊपर से पुलिस मेरी बहन और बहनोई को परेशान करेगी. फिर मेरे पास पैसे कहां हैं, जो मैं तुम्हें भगा ले चलूं. मेरा मन तो कहता है कि मैं राजनलाल को ठिकाने लगा दूं. उस के बाद तुम ही नहीं, उस का सब कुछ मेरा हो जाएगा.’’

विमला को भी लगता था कि राजनलाल के न रहने पर वह सुकून से रह सकेगी. इसलिए उस ने सुमन के साथ मिल कर राजनलाल को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. विमला यह काम जल्दी से जल्दी कर डालना चाहती थी. उस समय राजनलाल की रात की ड्यूटी चल रही थी, इसलिए उस ने उसे दिन में ही मार देने का मन बना लिया. 28 मई, 2015 को खाना खाने के बाद राजनलाल सो गया. सोनी अपने बच्चों के साथ कहीं गई हुई थी. ऋषिपाल और पूजा अपनीअपनी ड्यूटी पर थे. घर में विमला और उस के दोनों बेटे थे. मोहित को सुमन के कमरे पर भेज कर विमला ने सुमन को फोन किया.

राजनलाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पत्नी उस की जान भी ले सकती है. राजनलाल आराम से सो रहा था कि रात को ड्यूटी पर जाना है. सुमन के आते ही विमला ने उसे गंडासा थमा दिया. इस के बाद एक ही झटके में उस ने राजनलाल का सिर धड़ से अलग कर दिया. आकाश ने अपनी आंखों से अपने बाप का कत्ल होते देखा. राजनलाल मर गया. उस के खून के छीटों से दीवारें रंग गईं. अब सवाल यह उठा कि लाश का क्या किया जाए? तय हुआ कि लाश के टुकड़े कर के बोरे में डाल कर इसी समय कहीं बाहर फेंक दिया जाए. उस समय दिन के ढाई बज रहे थे. सुमन ने लाश के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. वे लाश के टुकड़ों को बोरे में भर पाते, किसी ने दरवाजा खटखटा दिया. दरवाजा नहीं खुला तो वह बाहरी दरवाजे की कुंडी हाथ डाल कर खोल कर अंदर आ गया. वह कोई और नहीं, सुमन का बहनोई ऋषिपाल था.

अब तक खून बह कर दरवाजे से बाहर आ गया था. उस ने राजनलाल के दरवाजे पर खून देखा तो डर गया. खटखटाने पर भी विमला ने दरवाजा नहीं खोला तो ऋषिपाल को मामला गड़बड़ लगा. उस ने बाहर आ कर शोर मचा दिया. सारे पड़ोसी इकट्ठा होते, उस के पहले ही विमला प्रेमी सुमन और बेटे आकाश के साथ पीछे के दरवाजे से निकल गई. ऋषिपाल ने थाना गोविंदनगर पुलिस को सूचना दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी हरीशवर्धन एसएसआई सलीम अहमद, एसआई विनोद कुमार, एसआई विजय सिंह और कुछ सिपाहियों के साथ पुष्पविहार कालोनी पहुंच गए. थाना पुलिस ने घटनास्थल पर जो देखा, उस की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी. इस के बाद एसपी सिटी शैलेश कुमार पांडेय, सीओ (सिटी) चक्रपाणि त्रिपाठी भी घटनास्थल पर आ गए.

कमरा खोला गया तो राजनलाल के शरीर का हर अंग कटा हुआ बिस्तर पर पड़ा था. पुलिस लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रही थी कि सूचना पा कर राजनलाल का भाई मुकेश आ गया. भाई की लाश देख कर वह फूटफूट कर रोने लगा. शायद लाश के टुकड़ों को बोरी में भरने की कोशिश की गई थी. लेकिन बोरी छोटी थी, इसलिए कोशिश सफल नहीं हुई. राजनलाल के शरीर के टुकड़ों को समेट कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. इस के बाद मुकेश की ओर से थाना गोविंदनगर में विमला, उस के बेटे आकाश और प्रेमी सुमन के खिलाफ राजनलाल की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस तीनों आरोपियों की तलाश में जुट गई. तीनों मथुरा से भाग पाते, उस के पहले ही पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया. पूछताछ में विमला ने सहज ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. अपना यह अपराध स्वीकार करते समय उस के चेहरे पर न जरा सी शिकन थी और न पति के कत्ल करने का जरा भी पछतावा. उस का कहना था कि वह सुमन से प्यार करती थी, इसलिए प्यार में आड़े आ रहे पति को उस ने मार दिया. सुमन ने भी अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि राजनलाल की हत्या उस ने विमला के साथ मिल कर की थी. आकाश ने बताया कि पिता उसे बहुत मारते थे और उन का अपनी एक विधवा रिश्तेदार औरत से संबंध था, जिसे उस ने कई बार अपनी आंखों से देखा था. इसलिए उसे पिता से नफरत हो गई थी. पिता के मरने का उसे कोई अफसोस नहीं है.

पूछताछ के बाद विमला और उस के प्रेमी सुमन को अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के जेल भेज दिया गया. जबकि आकाश को बालसुधार गृह भेज दिया गया. आखिर विमला ने जिस प्रेमी को पाने के लिए पति को मार दिया, अब जेल जाने के बाद क्या वह मिलेगा? शायद अब दोनों की सारी उम्र जेल में ही कटेगी. Shocking Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: ऐसी बहन किसी की न हो

Hindi Crime Story: कोई बहन गलतियों का पिटारा बनने के बावजूद इतनी खुदगर्ज हो सकती है कि लालच में अपने ही एकलौते भाई की जान ले ले, सोचा भी नहीं जा सकता. लेकिन रचना तो ऐसी ही निकली. उसे क्या सजा मिलेगी, यह अलग बात है, लेकिन उस ने अपनी मां का आंचल तो सूना कर ही दिया. काले रंग की वह लेंसर कार बड़ी तेजी से लुधियानाअमृतसर मार्ग पर जालंधर बाईपास की ओर भागी चली जा रही थी. कार में करीब 60 साल की एक औरत और 26-27 साल का एक लड़का सवार थे. दोनों बहुत घबराए हुए लग रहे थे. लड़का कार चलाते हुए बारबार पीछे मुड़ कर देख रहा था. इस की वजह यह थी 3 मोटर साइकिलों पर सवार लोग कार का पीछा कर रहे थे और उसे लगातार ललकारते हुए रुकने को कह रहे थे.

जिस तरह कार भाग रही थी, उस से यही लग रहा था कि कार चलाने वाला लड़का काफी होशियार है, लेकिन जीटी रोड पर वाहनों की आवाजाही काफी थी, जिस की वजह से उसे कार भगाने में परेशानी हो रही थी. कई बार उस की कार दुर्घटनाग्रस्त होतेहोते बची थी. लेकिन उस कार चालक लड़के को संभवत: दुर्घटना की उतनी चिंता नहीं थी, जितनी पीछा करने वालों की थी. शायद इसीलिए वह किसी भी तरह उन की पकड़ से दूर निकल जाना चाहता था.

बगल वाली सीट पर बैठी औरत लड़के के कंधे पर अपना हाथ रख कर बारबार उसे सांत्वना दे रही थी. तभी कार अचानक झटका खा कर हिचकौले लेने लगी. इस से लड़के के चेहरे पर घबराहट झलकने लगी. उस ने फ्यूल गेज पर नजर डाली. सुई एकदम नीचे बैठ चुकी थी. उस ने बगल में बैठी औरत से कहा, ‘‘अब क्या होगा? कार का पैट्रोल खत्म हो गया है?’’

यह सुन कर महिला घबरा गई. अचानक चालक लड़के के दिमाग में न जाने क्या आया कि उस ने बड़ा खतरा उठाते हुए बगल में चल रहे ट्रक को एकदम से ओवरटेक किया और कार बाईं ओर वाले पेट्रौल पंप में घुसा दी. इस तरह वह मोटरसाइकिल सवारों को चकमा देने में सफल हो गया, क्योंकि ट्रक की वजह से मोटरसाइकिल सवार यह नहीं देख पाए कि कार किधर गई.

कारचालक लड़के ने जल्दीबाजी में पेट्रौल भरवाया. लेकिन जैसे ही वह पेट्रौल पंप से बाहर निकल कर कुछ दूर आगे सब्जी मंडी के पास पहुंचा, मोटरसाइकिल सवारों ने रास्ता रोक कर कार रुकवा ली. कार रुक गई तो मोटरसाइकिलों से आए लोग उसे घेर कर दरवाजा खोलने की कोशिश करने लगे. लेकिन लौक होने की वजह से दरवाजे नहीं खुले. तब उन्होंने बाहर से ही कार पर धावा बोल दिया. वे लोग इतने उत्तेजित थे कि राहगीरों की परवाह किए बगैर कार पर अंधाधुंध ईंटपत्थर बरसाने लगे. लड़के और महिला ने मदद के लिए शोर भी मचाया, लेकिन हमलावर जिस तरह उत्तेजित और गुस्से में थे, उसे देख कर किसी की भी बचाव के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं हुई.

कार के शीशे टूट गए तो हमलावरों द्वारा फेंके जाने वाली ईंटें चालक और महिला को लगने लगीं. हमलावरों में एक औरत भी थी, जो सब से ज्यादा पत्थर फेंक रही थी. उसे उस तरह पत्थर फेंकते देख कार में बैठी औरत हाथ जोड़ कर चीखचीख कर कहने लगी, ‘‘यह क्या कर रही है बेटी, यह तेरा भाई है.’’

लेकिन इस बात का न तो उस औरत पर कोई असर हुआ, न ही उस के साथी हमलावरों पर. तभी उस औरत द्वारा फेंकी एक ईंट ड्राइविंग सीट पर बैठे लड़के के माथे पर आ लगी. ईंट लगते ही खून का फव्वारा फूट पड़ा. चालक लड़का कार की सीट पर बैठेबैठे ही छटपटाने लगा. इस के बावजूद ईंटपत्थर फेंकने वालों के हाथ नहीं रुके. उन के हाथ तभी रुके, जब उस लड़के की गरदन सीट पर ही एक ओर लुढ़क गई. इस के बाद वे सब मोटरसाइकिलों पर बैठ कर भाग निकले.

इस बीच किसी ने फोन कर के इस घटना की सूचना थाना सलेम टाबरी को दे दी थी. खबर मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी, सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह, एएसआई सुखपाल सिंह, कमलजीत सिंह, परमजीत सिंह, हेडकांस्टेबल अमरीक सिंह, बलविंदर राम और गुरजीत सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए थे. हमलावर चूंकि भाग चुके थे, इसलिए उन के बारे में बाद में भी पता किया जा सकता था. पहले घायलों का इलाज कराना जरूरी था. इसलिए मनिंदर सिंह औरत और लड़के को अविलंब अस्पताल ले गए.

डाक्टरों ने लड़के को तो देखते ही मृत घोषित कर दिया, जबकि महिला को इलाज के लिए भरती कर लिया. यह घटना 9 मई, 2015 दोपहर 2 बजे की थी. मनिंदर सिंह बेदी के आदेश पर सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह ने इलाज के दौरान औरत का बयान लिया तो पता चला कि उस का नाम रेनू अरोड़ा है और मृतक उस का एकलौता बेटा हरीश अरोड़ा था. हमलावरों में जो औरत शामिल थी, वह उस की बेटी रचना थी. उसी ने अपने प्रेमी मनोज कुमार और उस के घर वालों के साथ मिल कर मां और भाई पर हमला किया था.

रेनू अरोड़ा ने पुलिस को बताया कि वह विधवा है और अपने बेटे हरीश के साथ लुधियाना  के दुगेड़ी में धांधरा रोड पर मानकपाल गेट के पास जीएसवी में रहती है. उस के 3 बच्चों में 2 बेटियां थीं रचना और ज्योति तथा एक बेटा था हरीश. दोनों बेटियों की शादियां हो चुकी थीं. रेनू की बड़ी बेटी रचना प्रौपर्टी में हिस्सा मांग रही थी. इस के लिए रेनू ने कुछ शर्तें रख दी थीं, जिस की वजह से विवाद हो गया था. उस के बाद रचना ने अपने प्रेमी मनोज कुमार, उस की मां बलराज कौर, ह्यूमन राइट्स संस्था के प्रधान नवनीत सिंह, प्रवीन कुमार, दीपू, राकेश, करन और शमी के साथ उन पर हमल कर दिया था.

रेनू अरोड़ा के इस बयान के आधार पर सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह ने उसी दिन यानी 9 मई, 2015 को भादंसं की धारा 302/323, 342, 327, 149, 120बी के तहत 9 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उसी दिन ह्यूमन राइट्स के प्रधान नवनीत सिंह, करन और शमी को गिरफ्तार कर लिया. प्राथमिक उपचार के बाद रेनू अरोड़ा को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. हरीश की लाश का पोस्टमार्टम हो गया तो उसे रिश्तेदारों को सौंप दिया गया. इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी ने एसआई दलबीर सिंह, एएसआई सुखपाल सिंह, परमजीत सिंह और कमलजीत सिंह के नेतृत्व में पुलिस की टीमें बना कर नामजद लोगों की तलाश में लगा दिया था.

दिनदहाड़े शहर के बीचोबीच मुख्यमार्ग पर घटी इस घटना से स्थानीय लोगों में दहशत भी थी और पुलिस के प्रति आक्रोश भी. कोई अनहोनी न हो, इस के लिए पुलिस टीमें अभियुक्तों की तलाश में दिनरात एक किए हुए थीं. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और 12 मई, 2015 को एसआई दलबीर सिंह ने 3 अभियुक्तों दीपू, राकेश कुमार उर्फ गोगी को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद 24 मई को रचना और मनोज कुमार को भी बड़े नाटकीय ढंग से गिरफ्तार कर लिया गया. इस पूरे मामले में अहम भूमिका निभाने वाली मनोज कुमार की मां बलराज कौर को एसआई दलबीर सिंह ने बड़ी मुश्किल से काफी दिनों बाद 23 जुलाई को गिरफ्तार किया.

लगभग 2, ढाई महीने चली भागदौड़ और गिरफ्तारियों के बाद अभियुक्तों से सिलसिले वार की गई पूछताछ में जो कानी प्रकाश में आई, वह एक ऐसी खुदगर्ज औरत की कहानी थी, जिस ने अपनी मौजमस्ती के लिए अपने ही सगे भाई को मौत के घाट उतार दिया था. लुधियाना के दुगड़ी में रहते थे अशोक कुमार अरोड़ा. उन के परिवार में पत्नी रेनू अरोड़ा के अलावा 2 बेटियां रचना, ज्योति और एकलौता बेटा हरीश था. अशोक अरोड़ा टैक्सियां चलवाते थे. वह कोई बड़े आदमी तो नहीं थे, लेकिन घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.

अशोक कुमार ने अपने तीनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई थी. बड़ी बेटी रचना पढ़लिख तो जरूर गई थी, लेकिन उस में वे संस्कार नहीं आ पाए थे, जिन से घरपरिवार की मानमर्यादा बनती है. वह बचपन से ही हठी और महत्त्वकांक्षी प्रवृत्ति की थी. उम्र के साथसाथ उस का हठ और महत्त्वाकांक्षा बढ़ती गई. समय रहते ही अशोक कुमार ने रचना की शादी हैबोवाल निवासी विनय कुमार से कर दी. शादी के बाद जल्दी ही वह एक बेटी की मां भी बन गई. इसी बीच अशोक कुमार की मौत हो गई. उन की मौत के बाद घरपरिवार की पूरी जिम्मेदारी रेनू और हरीश पर आ गई. पिता की मौत के बाद टैक्सियां चलवाने का काम हरीश करने लगा. उस ने छोटी बहन ज्योति की भी शादी कर दी. अब घर में सिर्फ मांबेटे रह गए. सब ठीकठाक चल रहा था.

हरीश ने ड्राइवर तो रख ही रखे थे, खुद भी टैक्सी चलाता था. उस का एक ड्राइवर था मनोज, जिस से उस की कुछ ज्यादा ही पटती थी. इसी वजह से वह उस के घर भी आताजाता था. हरीश की बड़ी बहन रचना की ससुराल ठीकठाक थी. वहां उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. पति भी प्यार करने वाला था. इस के बावजूद उस का मन ससुराल में नहीं लगता था. वह अकसर मायके आ जाया करती थी. वह जब भी मायके आती, महीनों रहती.

मायके में रहते हुए ही उस की मुलाकात ड्राइवर मनोज कुमार से हुई. उस ने उस में न जाने ऐसा क्या देखा कि वह उस पर मर मिटी. एक तरह से वह मनोज की दीवानी सी हो गई. मनोज भी उसे अपनी ओर आकर्षित होते देख उस के गदराए शरीर पर फिदा हो गया. हालांकि वह शादीशुदा और एक बेटी का बाप था. उस की शादी सन 2012 में चंडीगढ़ के रहने वाले रामदेव की बेटी मोनिका से हुई थी. लेकिन वह उतनी सुंदर नहीं थी, जितनी सुंदर रचना थी.

इस बीच रचना की शादी को 12 साल हो गए थे और उस की बेटी भी 11 साल की हो गई थी. इतनी बड़ी बेटी की मां होने के बावजूद उस ने मनोज से नाजायज संबंध बना लिए. कुछ दिनों तक तो यह सब चोरीछिपे चला, लेकिन रचना को चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगा तो वह मां और पति का घर छोड़ कर मनोज के साथ रहने लगी. रेनू अरोड़ा को इस बात की भी जानकारी कई दिनों बाद मिली.

दरअसल, उस समय रचना मायके में थी. उस ने मां और भाई से कहा कि वह ससुराल जा रही है लेकिन वह ससुराल जाने के बजाय मनोज के घर चली गई. कई दिनों बाद जब विनय ने आ कर बताया कि रचना उस के घर पहुंची ही नहीं है तो उस की तलाश शुरू हुई. उस समय तो उस का पता नहीं चला, लेकिन इस बात की जानकारी जरूर हो गई है कि जाते समय रचना अपने साथ मां के करीब डेढ़ लाख रुपए, 5 तोला सोने के गहने और कुछ अन्य कीमती सामान ले गई है. यह जानकारी होने पर रेनू अरोड़ा ने थाना दुगड़ी में रचना के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के पहले भी हरीश और मनोज के बीच रचना को ले कर झगड़ा हुआ था. हरीश ने इस झगड़े की रिपोर्ट थाना डिवीजन नंबर 4 में दर्ज कराई थी. रचना मनोज के साथ छावनी क्षेत्र में किराए का मकान ले कर रह रही थी. इस बात का पता चलने पर हरीश और रेनू ने वहां जा कर उसे समझाया कि जो हुआ, वह उसे भूल जाए और अपनी ससुराल में जा कर शांति से रहे. लेकिन रचना ने उन की सलाह मानने से साफ मना करते हुए कहा कि अब वह मनोज को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. तब रेनू और हरीश ने उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

इस बीच हरीश ने टैक्सियां चलवाने का काम बंद कर के जालंधर बाईपास पर मोटर गैराज खोल लिया. इस के बाद रेनू ने हरीश की सगाई कर दी थी और उस के विवाह की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं. जब इस बात की जानकारी रचना को हुई तो वह तिलमिला उठी. वह मायके पहुंची और मां तथा भाई से अपना हिस्सा मांगने लगी. वैसे तो उस स्थिति में उस का कोई हिस्सा नहीं बनता था, इस के बावजूद रेनू और हरीश उसे हिस्सा देने को तैयार हो गए. लेकिन उन्होंने शर्त रख दी कि वे उसे हिस्सा तभी देंगे, जब वह मनोज को छोड़ कर ससुराल चली जाएगी.

रचना मनोज को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. इस बात को ले कर उस का मां और भाई से आए दिन झगड़ा होने लगा. मनोज और उस के घर वाले भी रचना का साथ दे रहे थे. एक तरह से उस ने मां और भाई का जीना हराम कर दिया था. 8 मई को 2 लोग रेनू के घर आए और उन्होंने कहा कि रचना और मनोज से उन का जो विवाद चल रहा है, अगर वह उन के औफिस आ जाएं तो वे इस विवाद को खत्म करा देंगे. आने वालों ने अपना नाम करन और शमी बताया था. वे छावनी मोहल्ला स्थिति डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स औफिस से आए थे.

अगले दिन यानी 9 मई की दोपहर को समझौते की गरज से रेनू बेटे हरीश को ले कर छावनी स्थित डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स के औफिस पहुंची तो वहां करन और शमी के अलावा उन की मुलाकात डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स के प्रधान नवनीत सिंह से हुई, उन्होंने जिन शर्तों के तहत रचना और मनोज से उन का समझौता कराना चाहा, वे रेनू और हरीश को मंजूर नहीं थीं. रेनू और हरीश ने समझौता करने से मना किया तो वे बहस कर के दबाव में समझौता कराने की कोशिश करने लगे. जब रेनू और हरीश ने समझौता करने से मना कर दिया तो वे लड़ाईझगड़े और मारपीट पर उतारू हो गए. किसी तरह वे दोनों बाहर आए तो वहां रचना अपने प्रेमी मनोज कुमार, मनोज की मां बलराज कौर के साथ खड़ी थी.

उन दोनों के साथ और भी कई लोग थे. सभी ने उन्हें घेर लिया और मारपीट करने लगे. रेनू और हरीश किसी तरह अपनी कार तक पहुंचे और जान बचाने के लिए कार में बैठ कर वहां से भाग निकले. बाद में रचना और उस के साथियों ने मोटरसाइकिलों से पीछा कर के उन्हें पकड़ लिया और ईंटपत्थरों से उन पर हमला कर दिया. इस हमले में रेनू जहां घायल हो गई, वहीं उस के बेटे हरीश की मौत हो गई. पुलिस ने जैसेजैसे जिस को पकड़ा था, पूछताछ कर के अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. कथा लिखे जाने तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: जब बोझिल लगने लगा सुहाग

Crime Story: 2 बच्चों की मां बनने के बाद दिव्या की सोच में बदलाव आया और वह पति की जगह चचेरे देवर को पसंद करने लगी. दोनों के बीच अनैतिक संबंध भी बन गए. जब यह बात उस के पति राजेश को पता चली तो घर में कलह रहने लगी. किसे पता था कि यह कलह एक मौत की आहट है.

सुबहसुबह बहू के रोने की आवाज सुन कर अजय वर्मा का माथा ठनका. वह मन ही मन सोचने लगे कि ऐसी कौन सी आफत आ गई कि बहू छाती पीटपीट कर रो रही है. वजह जानने के लिए वह तेज कदमों से उस के कमरे की तरफ बढ़े. कमरे का दरवाजा भिड़ा हुआ था, जो दस्तक देने पर खुल गया. ससुर को सामने देख कर दिव्या और जोरों से चीखने लगी, ‘‘मैं तो लुट गई, बरबाद हो गई. अब मैं कहां जाऊंगी, मेरा और मेरे बच्चों का क्या होगा?’’

‘‘बहू आखिर हुआ क्या, यह तो बताओ?’’ अजय वर्मा ने दिव्या से पूछा.

‘‘पिताजी, ये मेरा साथ छोड़ गए.’’ वह रोते हुए बोली.

बेटे के मरने की बात सुनते ही अजय वर्मा को धक्का सा लगा, वह बोले, ‘‘यह तू क्या कह रही है, ऐसा कैसे हो गया? कल रात भलाचंगा था, उसे कोई बीमारी भी नहीं थी.’’

‘‘पता नहीं, यह सब कैसे हुआ? रात में इन्होंने शराब पी, फिर खाना खा कर सो गए. सुबह देखा तो यह इस हालत में मिले. मुझे तो लग रहा है, ज्यादा शराब पीने से इन की मौत हो गई.’’ बहू रोते हुए बोली.

जवान बेटे की लाश देख कर अजय वर्मा भी रोने लगे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक यह सब कैसे हो गया. जरा सी देर में पूरे मोहल्ले में राजेश की मौत की खबर फैल गई. तमाम लोग अजय वर्मा के घर पहुंच गए. वहां पर जितने मुंह, उतनी तरह की बातें हो रही थीं. इसी बीच किसी ने थाना उमरदा में फोन कर के खबर दे दी कि उमरदा में ही राजेश की रहस्यमय परिस्थिति में मौत हो गई है. यह बात 13 अगस्त, 2015 की थी. सुबह 8 बजे के करीब जब उमरदा थाने के थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव को यह खबर मिली, तब रिमझिम बारिश हो रही थी. फिर भी जल्दी से वह अपने अधीनस्थों के साथ राजेश के घर की तरफ रवाना हो गए.

जब वह उस के घर पहुंचे तो उस की पत्नी दिव्या पति की लाश से लिपट कर विलाप कर रही थी. पुलिस को देख कर वह और ज्यादा जोर से रोने लगी. थानाप्रभारी की आंखें ताड़ गईं कि यह जानबूझ कर लोगों को दिखाने के लिए जरूरत से ज्यादा रोनेधोने का नाटक कर रही है. थानाप्रभारी ने कमरे में तख्त पर पड़ी राजेश की लाश का मुआयना किया तो उस के शरीर पर कोई जख्म नहीं था. हां, गले को ध्यान से देखने पर गरदन के चारों तरफ रगड़ के निशान जरूर नजर आए. ऐसा लग रहा था, जैसे उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी. मुंह से झाग भी निकला हुआ था. जिस से जहर देने की आशंका हो रही थी.

कमरे में शराब की 2 खाली बोतलें पड़ी थीं. थानाप्रभारी ने राजेश के पिता अजय वर्मा से बात की तो उन्होंने बताया कि कल रात राजेश ठीकठाक था, पता नहीं रात को उस के साथ यह क्या हो गया? इस के बाद उन्होंने दिव्या से बात की तो उस ने भी यही बात बताई. उस समय मामला गमगीन था, इसलिए उन्होंने उन लोगों से बहुत ज्यादा बात नहीं की और घटनास्थल की औपचारिकताएं पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. मृतक के पिता अजय वर्मा ने श्रीप्रकाश यादव को बताया कि अजय की मौत शराब पीने से नहीं हुई, बल्कि उस की किसी ने हत्या की है. मृतक के पिता अजय वर्मा की तहरीर पर उन्होंने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

इस मामले की जांच श्रीप्रकाश यादव ने खुद अपने हाथों में ली. उन्हें लगा कि जब हत्या उसी के कमरे में हुई है तो यह काम कोई बाहर वाला तब तक नहीं कर सकता, जब तक घर का कोई व्यक्ति इस में शामिल न रहा हो. राजेश और उस के घर वालों के बारे में और ज्यादा जानकारी लेने के लिए वह उस के पड़ोसियों से मिले. उन से उन्हें महत्त्वपूर्ण जानकारी यह मिली कि राजेश की पत्नी दिव्या के अवैधसंबंध उस के घर के सामने रहने वाले चचेरे देवर रवि वर्मा के साथ थे.

यह जानकारी मिलने के बाद श्रीप्रकाश अजय वर्मा के घर पहुंचे. वहां दिव्या का रोनाधोना अभी भी जारी था. पुलिस को देख कर उस ने और जोरजोर से रोना शुरू कर दिया. उन्होंने उसे सांत्वना दे कर चुप कराया. उस के शांत होने के बाद उन्होंने उस से पूछा, ‘‘अब बताओ कि रात में क्या हुआ था, क्या तुम अपने पति के हत्यारे के बारे में कुछ जानती हो?’’

‘‘साहब, रात को वह 10 बजे घर आए थे. उस समय नशे में चूर होने के बाद भी उन्होंने घर में बैठ कर शराब पी, फिर खाना खाया. उन्हें खाना खिलाने के बाद मैं दूसरे कमरे में जा कर बच्चों के साथ सो गई. सुबह जब मैं उन के कमरे में गई तो वह तख्त पर मृत पड़े थे. उन की मौत कैसे हुई, मैं नहीं जानती.’’

श्रीप्रकाश को दिव्या की बात पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ. उन्हें लगा कि वह आसानी से सही बात नहीं बताएगी. इसलिए वह दिव्या को थाने ले आए. अब तक पुलिस के पास पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई थी. रिपोर्ट में बताया गया था कि राजेश की मौत गला कसने से हुई थी. जहर की आशंका को देखते हुए उस का बिसरा सुरक्षित कर लिया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद श्रीप्रकाश यादव ने दिव्या से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई. उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने पति की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली.

उत्तर प्रदेश के जनपद कन्नौज के इंदरगढ़ थाने के अंतर्गत एक गांव पड़ता है असैनी. रामस्वरूप वर्मा इसी गांव में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रजनी के अलावा 3 बेटे व 2 बेटियां थीं. दिव्या उसी की छोटी बेटी थी. रामस्वरूप वर्मा अपनी बड़ी बेटी का विवाह करने के बाद दिव्या के लिए भी लड़का देखने लगे. इसी भागदौड़ में एक रिश्तेदार ने उन्हें राजेश वर्मा के बारे में बताया. राजेश कन्नौज जनपद मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित उमरदा कस्बे के अजय वर्मा का बेटा था.

अजय वर्मा के 2 ही बच्चे थे. एक बेटी और एक बेटा. बेटी का वह विवाह कर चुके थे. राजेश टैंपो चलाता था. वह उस की शादी कर के निश्चित होना चाहते थे. इसलिए जब दिव्या का रिश्ता राजेश के लिए आया तो अजय वर्मा ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया. जल्दी ही दोनों की शादी हो गई. दिव्या से शादी कर के राजेश खुश था, पर दिव्या राजेश से खुश नहीं थी. चूंकि वह दिव्या की कल्पना के अनुरूप नहीं था, इसलिए उस के अरमान चकनाचूर हो गए थे. पर अब वह कर भी क्या सकती थी. आखिरकार वह इसे ही अपना नसीब समझ कर गृहस्थी में रम गई. विवाह के लगभग 2 सालों बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम पंकज रखा गया.

पंकज के जन्म के बाद दिव्या के यौवन का निखार और बढ़ गया. स्वभाव से चंचल दिव्या का मन अब गृहस्थी से उचटने लगा था. इस की वजह यह थी कि राजेश ने शराब पीनी शुरू कर दी थी. एक तरफ वह उदास रहती थी तो दूसरी तरफ उस का मन भटकता रहता था. इसी बीच दिव्या ने एक बच्ची को जन्म दिया. राजेश के घर के सामने उस का चचेरा भाई रवि वर्मा रहता था. रवि की परचून की दुकान थी. राजेश अपने घर का सामान रवि की दुकान से ही खरीदता था. कभीकभी रवि खुद सामान पहुंचाने उस के घर चला जाता तो उस की मुलाकात दिव्या से हो जाती. दिव्या मन ही मन रवि को चाहती थी. लेकिन वह पहल नहीं कर पा रही थी.

राजेश को शराब पीने की लत थी. रवि भी शराब पीता था, इसलिए वह राजेश के साथ शराब पीने के लिए अकसर उस के यहां आने लगा. रवि और दिव्या के बीच देवर भाभी का रिश्ता था. उस रिश्ते का फायदा उठाते हुए दिव्या उस के साथ हंसीमजाक करती. रवि भी जवान था. इसलिए भाभी के मजाक का वह उसी के अंदाज में जवाब देता. इस से दोनों का हौसला बढ़ता गया. इस का नतीजा यह हुआ कि एक दिन मौका मिलने पर दोनों ने हदें लांघ कर अपनी हसरतें पूरी कर लीं.

इस के बाद रवि मौका ढूंढ़ कर जबतब दिव्या के यहां जाने लगा. रवि का सान्निध्य पा कर दिव्या भी खुश रहने लगी. अब वह खिलीखिली सी रहती थी. उस ने पति की परवाह करनी छोड़ दी थी. उसे वह बातबात पर झिड़क देती थी. एक घर में रहने के बावजूद दोनों नदी के दो किनारों की तरह थे. राजेश पत्नी में आए इस बदलाव को महसूस तो कर रहा था, लेकिन समझ नहीं पा रहा था कि वह उस की इतनी उपेक्षा क्यों करने लगी है. माजरा उसे उस दिन समझ में आया, जब उस ने उसे अपने चचेरे भाई रवि के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. फिर तो घर में कोहराम मच गया. उस रोज राजेश ने दिव्या की जम कर पिटाई की. ससुर अजय वर्मा ने भी दिव्या को खूब खरीखोटी सुनाई.

रंगेहाथों पकड़े जाने के बाद दिव्या सतर्क हो गई. अब चूंकि पति और ससुर उस की निगरानी करने लगे थे, इसलिए उस का रवि से मिलना मुश्किल हो गया. लेकिन सख्त पाबंदी के बावजूद दोनों किसी न किसी तरह मिल ही लेते थे. धीरेधीरे देवरभाभी के नाजायज संबंधों की बात पूरे मोहल्ले में फैल गई थी. महिलाएं जहां भी बैठतीं, चटकारे ले कर उन के संबंधों की चर्चा करतीं. ज्योंज्यों समय बीतता गया, घर में कलह बढ़ती गई. दिव्या रवि के बिना रह नहीं पा रही थी. इसलिए शराब पीने के बाद राजेश उस की पिटाई करता था. दिव्या भले ही राजेश के 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन उसे पसंद नहीं करती थी. आखिर आजिज आ कर उस ने एक भयानक योजना बना डाली.

इस फैसले से उस ने अपने प्रेमी रवि को भी अवगत करा दिया. रवि उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने राजेश को रास्ते से हटाने की उस योजना पर काम शुरू कर दिया. योजना के अनुसार रवि ने बाजार से एक कीटनाशक दवा ला कर दिव्या को दे दी. 12 अगस्त, 2015 को रात 10 बजे राजेश घर लौटा और रोज की तरह शराब की बोतल ले कर बैठ गया. शराब पीने के दौरान जब वह उठ कर लघुशंका के लिए गया तो दिव्या ने मौका देख कर कीटनाशक दवा जल्दी से उस के शराब के गिलास में मिला दी.

लौट कर राजेश ने दवा मिली शराब का गिलास एक ही बार में अपने गले से नीचे उतार लिया. दवा मिली शराब ने राजेश के ऊपर जल्दी ही असर करना शुरू कर दिया. थोड़ी ही देर में वह तख्त पर बेहोश हो कर लुढ़क गया. इसी बीच घर में रवि आ गया. दिव्या ने अपना दुपट्टा राजेश के गले में लपेटा. दुपट्टे का एक छोर खुद पकड़ा और दूसरा रवि ने. वे दुपट्टे को तब तक खींचते रहे, जब तक राजेश का दम नहीं घुट गया. पति की हत्या के बाद दिव्या ने शराब की बोतल तख्त के नीचे लुढ़का दी और गिलास साफ कर के रसोई में रख दिया. कीटनाशक दवा की शीशी उस ने कूड़ेदान में फेंक दी और दुपट्टा घर में छिपा दिया. राजेश की मौत के बाद रवि अपने घर चला गया.

खुद को बचाने के लिए दिव्या ने सुबह होते ही छाती पीटपीट कर रोना शुरू कर दिया. उस के रोने की आवाज सुन कर अजय वर्मा आ गए. उस के बाद घर में कोहराम मच गया. राजेश की हत्या में दिव्या का प्रेमी रवि वर्मा भी शामिल था. इसलिए पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने के लिए उस के घर दविश दी, लेकिन वह घर से फरार हो चुका था पुलिस ने उस के मिलने के संभावित ठिकानों पर छापे मारे. तब वह तिर्वा में अपनी बहन की ससुराल में मिल गया. उसे गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. उस ने भी पूछताछ में राजेश वर्मा की हत्या करने की बात कबूल कर ली.

14 अगस्त, 2015 को पुलिस ने अभियुक्त रवि वर्मा और दिव्या वर्मा को कन्नौज कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक दोनों जेल में बंद थे. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Mumbai Crime: ममता की चोरी

Mumbai Crime: एक गलती कर के कल्पना अपनी गृहस्थी में आग लगा चुकी थी. बाद में उस ने आशुतोष दामले से दूसरी शादी कर ली. लेकिन यहां भी वह एक पेच में फंस गई. उस पेच से निकलने के लिए उस ने ममता की चोरी की, लेकिन…

मुंबई महानगर का सीएसटी एक ऐसा रेलवे स्टेशन है, जहां देश के हर कोने से आनेजाने वाले मुसाफिरों की भीड़भाड़ रहती है. मुसाफिरों की उसी भीड़ में एक परिवार अब्दुल करीम शेख का भी था, जो हैदराबाद जाने के लिए पिछले 3 दिनों से मुसाफिरखाने में ठहरा हुआ था. वह मुंबई महानगर से सटे जनपद ठाणे के उपनगर कल्याण का रहने वाला था और वहां लगने वाले पटरी बाजार में फड़ लगाता था. उस के परिवार में पत्नी रुखसाना के अलावा 2 बेटियां थीं. छोटी बेटी आरिजा 4 माह की थी. कुछ दिन पहले उस के साले को किसी आरोप में हैदराबाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, जिस की जमानत कराने के लिए यह परिवार हैदराबाद जाना चाहता था, लेकिन जाने के लिए उस के पास किराए तक के पैसे नहीं थे.

इस के लिए उस ने अपने एक परिचित सलीम से मदद मांगी थी तब सलीम ने उस से कहा था कि वह सीएसटी रेलवे स्टेशन पर आ कर पैसे दे देगा. लेकिन 2 दिन बीत जाने के बाद भी सलीम पैसे देने वहां नहीं आया था. उसी के इंतजार में वह मुसाफिरखाने में चादर बिछा कर लेटा हुआ था. वहां पर इंतजार करते हुए 2 दिन बीत गए. सलीम नहीं आया तो अब्दुल करीम की चिंता बढ़ती जा रही थी कि वह हैदराबाद कैसे जाए? उस ने तय कर लिया कि यदि सलीम कल तक पैसे ले कर नहीं आया तो वह हैदराबाद जाने वाली गाड़ी के जनरल डिब्बे में बिना टिकट बैठ कर चला जाएगा. यही सोच कर वह रात को सो गया. उसी चादर पर उस की पत्नी और बच्चे भी सो गए.

आधी रात के बाद अचानक उस की पत्नी रुखसाना की आंख खुली तो उस के होश उड़ गए. उस के बगल में सो रही उस की 4 महीने की बच्ची आरिजा गायब थी. उस ने उसी समय पति को उठाया. दोनों बेटी को इधरउधर देखने लगे. 4 महीने की बच्ची चल भी नहीं सकती थी जिस से समझा जाता कि कि वह इधरउधर चली गई होगी. आशंका यही थी कि कोई उसे उठा कर ले गया है. पतिपत्नी दोनों उसे स्टेशन पर ही इधरउधर ढूंढ रहे थे. रुखसाना रो रही थी, उस के रोने की आवाज सुन कर कुछ और लोगों की भी नींद टूट गई. छोटी बच्ची के गायब होने पर सभी हैरान थे. उस के साथ कुछ और लोग भी बच्ची को ढूंढने लगे. उन्हें ढूंढतेढूंढते सुबह हो चुकी थी. कुछ लोग रुखसाना को तसल्ली दे रहे थे.

स्टेशन पर रोने की आवाज और वहां की भीड़ को देख कर उधर से गुजर रहे राजकीय रेलवे पुलिस के 2 कांस्टेबल वहां आ गए. अब्दुल करीम शेख ने अपनी बेटी के गायब हो जाने की बात उन्हें बताई तो वह अब्दुल शेख को सीएसटी रेलवे स्टेशन से सटे लोहमार्ग जीआरपी थाने ले गए. यह घटना 24 अप्रैल, 2015 की थी. उन दोनों ने थानाप्रभारी शिवाजी शिंदे को पूरी जानकारी देने के बाद अब्दुल करीम की बेटी को तलाश करवाने की मांग की. थानाप्रभारी ने अब्दुल करीम की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद आश्वासन दिया कि वह उन की बेटी को जल्द से जल्द ढूंढने की कोशिश करेंगे. साथ ही उन्होंने इस मामले की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी.

ऐसी भीड़भाड़ वाली जगह से मांबाप के बीच से बच्ची का गायब होना वाकई एक गंभीर मामला था. इसलिए जीआरपी के कमिश्नर मधुकर पांडेय, एडिशनल पुलिस कमिश्नर रूपाली खैरमोडे़ अंवुरे भी अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंच गईं. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर लोगों से घटना के बारे में पूछताछ की. लेकिन बच्ची किस ने चुराई, यह पता नहीं लग सका. तब पुलिस कमिश्नर से विचारविमर्श करने के बाद एडिशनल पुलिस कमिश्नर रूपाली खैरमोड़े ने यह केस अपने हाथ में ले लिया. अब्दुल करीम शेख गरीब था. इस से इस बात की आशंका नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए बच्ची का अपहरण किया होगा. निस्संदेह यह किसी दुश्मन या फिर किसी बच्चा चोर गिरोह का काम हो सकता था.

अब्दुल करीम शेख से बात की गई तो उस ने किसी से कोई दुश्मनी और विवाद होने की बात से इनकार किया. इस से साफ हो गया कि यह काम किसी बच्चा चोर या फिर किसी निस्संतान महिला का है. इस के बाद पुलिस ने क्षेत्र के बच्चा चोर गिरोहों की तलाश शुरू कर दी. उन्होंने बच्ची की तलाश के लिए एक पुलिस टीम बनाई. जिस में पुलिस इंसपेक्टर माणिक साठे, योगेंद्र पांचे, असिस्टैंट इंसपेक्टर सुभाष रामण और उन के सहायक गांवकर, शोलके, निकम, पंवार, सालवी, महिला कांस्टेबल परकाले आदि को शामिल किया. उन्होंने सीएसटी रेलवे स्टेशन के सभी सीसीटीवी कैमरों को भी खंगालना शुरू कर दिया.

कैमरों की फुटेज से पुलिस को कुछ सुराग मिले. उस में एक महिला आरिजा को उस की मां रुखसाना के पास से उठा कर एक दूसरी महिला को देती हुई दिखी. दूसरी महिला उस बच्ची को अपनी गोदी में छिपा कर स्टेशन के मेन गेट से बाहर निकली और सामने से आती हुई टैक्सी पकड़ कर निकल गई. उस के जाने के बाद पहली महिला अपने एक साथी के साथ दूसरे गेट से निकल कर कोलकाता जाने वाली ट्रेन में बैठ गई. दोनों महिलाएं कहां से आई थीं और कहां चली गईं. यह पता लगाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर थी.

अब पुलिस का निशाना वह टैक्सी थी जिस में बैठ कर महिला बच्चे को ले कर गई थी. लेकिन मुंबई शहर में चल रही हजारों टैक्सियों में से उसे तलाशना आसान नहीं था. क्योंकि फुटेज में टैक्सी का नंबर भी दिखाई नहीं दे रहा था. पुलिस टीम इसे ले कर परेशान जरूर थी लेकिन निराश नहीं हुई. उन्होंने उस सीसीटीवी फुटेज की कई कौपियां कर के मुंबई सेंट्रल, कुर्ला और सीएसटी रेलवे स्टेशनों पर भी भेज दीं. इस के बाद पुलिस की अलगअलग टीमें इन स्टेशनों पर जा कर ड्राइवरों आदि से बच्ची को ले जाने वाली महिला के बारे में पूछने लगे. आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई.

उसे जिस टैक्सी ड्राइवर की तलाश थी इत्तफाक से वह सीएसटी रेलवे स्टेशन पर ही मिल गया. दरअसल पुलिस ने उस ड्राइवर को जब बच्ची ले जाने वाली महिला की फोटो दिखाई तो वह उस महिला को पहचान गया. उस ने बताया कि उस ने उस औरत को मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी में छोड़ा था. यह जानकारी पुलिस के लिए महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस टीम मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी पहुंच गई. उस समय रात के लगभग 2 बज रहे थे. पूरा इलाका सुनसान था और लोग अपने घरों में सो रहे थे. टैक्सी ड्राइवर ने जिस जगह पर उस महिला को छोड़ा था, वहां 8-10 इमारतें थीं, जिन में 1100 से 1200 फ्लैट थे. टैक्सी से उतर कर वह महिला किस इमारत में और किस फ्लैट में गई, पता लगाना कठिन था.

रात के समय टीम को उन इमारतों के काफी लोगों की बातें सुननी और उन की नाराजगी झेलनी पड़ सकती थी. लेकिन पुलिस को यह काम रात में ही करना था क्योंकि सुबह होने पर वह महिला शायद कहीं भी जा सकती थी इसलिए लोगों के विरोध की परवाह न करते हुए पुलिस ने अपना बच्चा चोर ढूंढने का औपरेशन शुरू कर दिया. पुलिसकर्मी एकएक इमारत के फ्लैटों की कालबेल बजा कर उस महिला और बच्चे के बारे में पूछताछ करने लगे. पुलिस का यह औपरेशन रात भर चला लेकिन उस महिला का पता नहीं लगा जो बच्ची के साथ टैक्सी से वहां उतरी थी. सुबह करीब 7 बजे पुलिस की मेहनत रंग लाई.

वहीं के एक फ्लैट में रहने वाले डाक्टर माने ने बताया कि इस बारे में अधिक जानकारी तो मुझे नहीं है लेकिन कल रात इस इमारत में रहने वाले दामले परिवार के यहां एक बच्चे का नामकरण और वारसा की पार्टी का आयोजन किया गया था. हालांकि वारसा बच्चे के पैदा होने के बारहवें दिन होता है लेकिन उन के यहां जो बच्चा था वह 3-4 महीने का दिखाई पड़ रहा था. वह बच्चा कुछ बीमार सा भी लग रहा था. जब मैं ने उस बच्चे को करीब से देखने की कोशिश की तो उस की मां ने यह कह कर मना कर दिया था कि छूने से बच्चे को संक्रमण हो सकता है.

डाक्टर माने से दामले का फ्लैट नंबर मालूम कर के पुलिस उस के यहां पहुंच गई. कालबेल बजाने पर एक महिला ने अपनी आंखें मलते हुए दरवाजा खोला तो वह महिला पुलिस को देख कर घबराते हुए बोली, ‘‘कहिए, क्या बात है?’’

‘‘माफ करना मैडम, हम ने सुबहसुबह आप को तकलीफ दी. दरअसल हम लोग एक बच्ची ढूंढ रहे हैं, जो कल सुबह सीएसटी रेलवे स्टेशन से चोरी हो गई थी. हमें खबर मिली कि उस बच्ची को इसी कालोनी में एक औरत ले कर आई है.’’ महिला कांस्टेबल ने उस से कहा.

इस से पहले कि वह महिला कुछ जवाब देती तब तक फ्लैट में से ही एक आदमी निकल कर वहां आ गया. वह बोला, ‘‘बच्ची के विषय में हम लोग कुछ नहीं जानते. हमारे घर में एक छोटा सा लड़का है. जो अभी 12 दिन का हुआ है.’’

वह आदमी उस महिला का पति था.

‘‘आप बच्चे को हमें दिखा सकते हैं?’’ इंसपेक्टर माणिक साठे ने कहा.

यह सुन कर महिला का चेहरा सफेद पड़ गया. लेकिन उस के पति ने कह दिया, ‘‘ठीक है आप उस बच्चे को शौक से देख सकते हैं.’’ कहते हुए वह व्यक्ति पुलिस को फ्लैट के अंदर ले गया. महिला कांस्टेबल ने जब बच्चे को देखा और उस का डायपर हटाया तो वह हैरान रह गई क्योंकि वह बच्चा नहीं बल्कि बच्ची थी और वह भी 12 दिन की नहीं बल्कि 3-4 महीने की थी. साथ में खड़े अब्दुल करीम शेख ने उस बच्ची को पहचानते हुए कहा, ‘‘यही मेरी बच्ची है साहब.’’

पुलिस का यह औपरेशन सफल रहा.  पुलिस टीम भी खुश हो गई. 24 घंटों के अंदर ही बच्ची मिल गई थी. अब उस महिला से कुछ बोलते नहीं बन रहा था. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस ने अपना नाम कल्पना परमार आशुतोष दामले बताया. उसे गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. औपरेशन सफल होने की जानकारी कमिश्नर मधुकर पांडेय को दी गई तो वह भी थाने आ गए. कल्पना परमार को मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 7 दिन के रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान पता चला कि कल्पना परमार ने अपना दांपत्य जीवन बचाने और अपना सच छिपाने के लिए ही बच्ची चोरी करने जैसा जघन्य अपराध किया था. उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार से थी:

39 वर्षीय कल्पना परमार एक साधारण और सभ्य महिला थी. समाज में उस के परिवार की अच्छी प्रतिष्ठा थी. कल्पना के हाईस्कूल पास करते ही मातापिता ने अपने ही समाज के एक युवक के साथ उस का विवाह कर दिया था. अपने भविष्य के सारे सपनों को आंचल में समेट कर कल्पना अपनी ससुराल चली गई. ससुराल में वह काफी खुश थी क्योंकि वहां उसे किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी. पति की अच्छी नौकरी थी, इसलिए उस का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से चल रहा था. समय के साथ वह एक बेटे की मां भी बन गई. बेटे के जन्म के बाद परिवार में खुशी और बढ़ गई. लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. कुछ दिनों बाद ही उस के परिवार में विवाद शुरू हो गया.

इस की वजह यह थी कि कल्पना अब और बच्चा नहीं चाहती थी. इसलिए उस ने ससुराल वालों को बिना बताए अपनी नसबंदी करवा ली. पति और सासससुर को जब यह पता चला तो उन्हें कल्पना की यह बात अच्छी नहीं लगी. इसी बात पर घर में विवाद रहने लगा. आखिरकार परिवारिक झगड़ा इतना बढ़ गया कि पति ने कल्पना को तलाक दे दिया. तलाक के बाद कल्पना मायके आ गई. कुछ दिनों बाद उस की मुलाकात आशुतोष दामले से मुंबई के एक अस्पताल में हुई थी. कल्पना उस अस्पताल में अपनी दवा लेने जाती थी. आशुतोष दामले उस अस्पताल में पर्यवेक्षक था. आशुतोष दामले अपने मातापिता और भाईबहन के साथ मुंबई के सायन इलाके में रहता था. उस की कहानी भी कल्पना जैसी ही थी.

उस का भी पत्नी से तलाक हो चुका था. पत्नी उसे छोड़ कर अपने मायके में रह रही थी. कल्पना परमार जब भी दवा लेने अस्पताल जाती तो आशुतोष दामले उस की काफी मदद करता और उस से सहानुभूति दिखाता था. उस की इसी आदत से कल्पना प्रभावित हो गई और उन के बीच दोस्ती हो गई. इसलिए उन की मुलाकातें बढ़ती गईं. यह दोस्ती प्यार में बदल गई. फिर वे साथसाथ घूमतेफिरते और मौजमस्ती करते. बात यहां तक पहुंच गई कि एक दिन दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. जब दोनों ने शादी की बात अपने घरवालों को बताई तो कल्पना के घरवाले इस रिश्ते से सहमत हो गए लेकिन आशुतोष के घरवालों ने मना कर दिया. पर कल्पना के प्यार में पागल आशुतोष ने अपने घरवालों की बात नहीं मानी और उस ने कल्पना के साथ कोर्ट मैरिज कर ली.

घरवालों को शादी की पता न लगे इस के लिए आशुतोष मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी में एक फ्लैट किराए पर ले कर रहने लगा. अपने घरवालों को आशुतोष ने यह बता दिया था कि वह अधिक पैसा कमाने के लिए दूसरी जगह पार्टटाइम नौकरी करता है. समय अपनी गति से बीतता रहा. कल्पना और आशुतोष दामले का दांपत्य जीवन बड़े आराम से बीत रहा था. मगर कल्पना के प्यार भरे दांपत्य जीवन में भूकंप उस समय आया जब आशुतोष दामले ने कल्पना से अपनी बढ़ती हुई उम्र की चिंता जताते हुए बच्चे की इच्छा जताई. इतना सुन कर कल्पना एकदम से घबरा गई. क्योंकि वह अपनी नसबंदी करवा चुकी थी, जिस से वह अब कोई बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी.

नसबंदी करवा लेने की बात उस ने आशुतोष से छिपा रखी थी. नसबंदी के कारण ही उस का पहला दांपत्य जीवन टूट गया था. इसीलिए वह डर गई थी कि नसबंदी की बात जान कर कहीं आशुतोष भी उसे तलाक न दे दे. वह दूसरी बार अपना परिवार उजड़ने देना नहीं चाहती थी. औलाद के लिए आशुतोष दामले का बढ़ता दबाव देख कर कल्पना परेशान हो गई. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह आशुतोष को यह बात कैसे बताए कि वह उस की यह इच्छा पूरी नहीं कर सकती. अब वह ऐसा उपाय तलाशने लगी कि घर में बच्चा भी आ जाए और उस का परिवार भी बचा रहे. काफी सोचनेसमझने के बाद उस ने इस समस्या के समाधान का जो रास्ता निकाला वही रास्ता उसे जुर्म तक ले गया.

एक दिन कल्पना ने पति को बता दिया कि अब उस की इच्छा पूरी होने वाली है. वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है. पत्नी के गर्भवती होने की बात जान कर आशुतोष खुश हो गया. वह कल्पना का और ज्यादा ध्यान रखने लगा. कल्पना भी समय के अनुसार अपनेआप को ढालने लगी थी. पूरे 9 महीने वह इस प्रकार से रही कि पति के अलावा आसपास वालों को भी उस पर कोई संदेह न हो. जैसेजैसे समय गुजरता जा रहा था, कल्पना अपने शरीर की बनावट भी वैसी ही कर रही थी. पेट आगे आने के लिए वह कपड़ों का सहारा ले रही थी. यह बात राज ही रहे, इस के लिए उस ने पति को अपने से दूर ही रखा. आसपास वालों को भी खुद को गर्भवती बताती थी.

बच्चे की डिलीवरी में जब कुछ दिन शेष रह गए तो अपना नाटक सफल बनाने के लिए वह चेकअप करवाने के बहाने बच्चे की तलाश में निकल जाती थी और हाल ही में जन्मे बच्चे को तलाश करती. इस बारे में उस ने 1-2 नर्सों से भी बात की. जब वहां बात नहीं बनी तो वह मुंबई के उन अनाथालयों में गई, जहां से बच्चे गोद लिए जाते थे. वहां उसे नवजात शिशु मिल तो रहे थे लेकिन उन के गोद लेने की प्रक्रिया जटिल थी. प्रक्रिया देख कर उस की हिम्मत पस्त हो गई. इस के बाद कल्पना ने उन महिलाओं से संपर्क किया, जो रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक जगहों पर बैठ कर छोटे बच्चे को ले कर भीख मांगती थीं. उन महिलाओं से उस ने बात की तो उन्होंने भी उसे अपना बच्चा देने से मना कर दिया.

उस की तथाकथित डिलीवरी का समय पूरा हो चुका था लेकिन अभी तक बच्चे के बारे में उस की किसी से बात नहीं बन पाई. वह परेशान हो गई कि अब वह पति को बच्चा कहां से ला कर देगी. कहीं से कोई बच्चा मिलता न देख आखिरकार उस ने कोई नवजात शिशु चोरी करने की योजना बनाई. उस ने सोचा कि कहीं न कहीं से उसे कोई नवजात मिल जाएगा तो वह किसी तरह उसे चुरा कर ले जाएगी. एक दिन वह घर से अस्पताल जाने को कह कर घर से निकल गई. पति अपनी ड्यूटी पर निकल गया. कल्पना ने उस दिन पति को फोन कर के यह खुशखबरी दे दी कि उस ने एक लड़के को जन्म दिया है.

बेटा पैदा होने की खबर पा कर आशुतोष दामले बहुत खुश हुआ. लेकिन उस दिन आशुतोष दामले का यह दुर्भाग्य ही था कि एक इमरजेंसी केस में 24 घंटे की ड्यूटी लग जाने की वजह से अपने बच्चे को देखने के लिए नहीं जा सका. अगले दिन वह पत्नी द्वारा बताए अस्पताल पहुंचा तो कल्पना उसे उस अस्पताल के बाहर ही मिल गई. पति को उस ने बताया कि बच्चा किसी खतरनाक बीमारी से ग्रस्त है. इसलिए डाक्टरों ने उसे 10-12 दिनों के लिए किसी दूसरे अस्पताल में भेज दिया है. डिलीवरी नार्मल हुई थी. इसलिए डाक्टरों ने उसे डिस्चार्ज कर घर जाने के लिए कह दिया. सीधेसाधे आशुतोष ने कल्पना की बातों पर विश्वास कर लिया और पत्नी के साथ घर लौट आया. अपने कामों में व्यस्त होने के कारण आशुतोष ने बच्चे का सारा काम पत्नी पर ही छोड़ दिया था.

इसी बीच कल्पना को बच्चे की व्यवस्था करनी थी. यह उस के लिए बड़ी ही मुश्किल घड़ी थी. बच्चा कहां से लाए यह समस्या उस के सामने अब भी खड़ी थी. अगर इन 10-12 दिनों में बच्चे का बंदोबस्त नहीं हुआ तब वह क्या करेगी. आखिरकार धीरेधीरे वह समय भी नजदीक आ गया, जब उसे बच्चा घर लाना था. उस दिन वह सुबहसुबह पति के साथ ही घर से बाहर निकली. बच्चा चोरी करने के इरादे से पहले वह विरार के एक मंदिर गई. लेकिन वहां भीड़भाड़ को देख कर वह घबरा गई. वहां अपनी दाल गलते हुए न देख वह विरार से सीधे ट्रेन पकड़ कर मुंबई के चर्चगेट स्टेशन आ गई. वहां से टैक्सी की और सीएसटी रेलवे स्टेशन पहुंच गई. अब तक काफी रात हो गई थी. लेकिन यहां भी उस की हिम्मत फेल हो गई थी.

अपने वादे के मुताबिक कल्पना को सुबह बच्चा ले कर घर पहुंचना था. परेशान कल्पना थक कर मुसाफिरखाने में खाली पड़ी एक बेंच पर बैठ गई. उसी बेंच पर कुछ समय बाद एक महिला और एक पुरुष आ कर बैठ गए. उस महिला ने कल्पना का उदास चेहरा देखा तो उस से बातचीत शुरू कर दी. उस ने कल्पना को अपना नाम सुनंदा और साथ में आए युवक को अपना देवर बताया था. सुनंदा पर विश्वास हो जाने के बाद कल्पना ने उसे अपनी दुखभरी कहानी सुना दी. उस की कहानी सुन कर उस महिला ने इधरउधर देखा. और निडर भाव में कहा, ‘‘देख तेरे सामने ही एक सुंदर सी बच्ची सोई हुई है. उस की मां तो जैसे घोड़े बेच कर सो रही है.

जा, उसे उठा ले और ले कर निकल जा. अगर तेरी हिम्मत नहीं पड़ रही है तो मुझे बता. मैं तेरी मदद कर दूंगी. लेकिन इस के बदले में तू मुझे क्या देगी? मुझे कोलकाता जाना है.’’

वह 4 महीने की बच्ची अब्दुल करीम शेख की थी जो अपनी मां रुखसाना के बगल में सो रही थी. कोई नवजात न मिलने पर कल्पना उस बच्ची को ही ले जाने के लिए तैयार हो गई. सुनंदा की यह बात सुन कर कल्पना कुछ समय तक खामोश रही. फिर बताया कि उस के पास इस समय सिर्फ 15 हजार रुपए हैं. सुनंदा ने कल्पना से वह 15 हजार रुपए लिए और इधरउधर देख कर रुखसाना की 4 माह की बच्ची को उठा कर उस की गोदी में डाल कर कहा, ‘‘अब तू जल्दी निकल जा यहां से. मैं भी निकलती हूं. मेरी ट्रेन जाने वाली है.’’

कल्पना बच्ची को गोदी में छिपा कर सीएसटी स्टेशन के मैन गेट से निकल कर टैक्सी द्वारा अपने घर पहुंच गई. सुनंदा नामक औरत अपने देवर के साथ दूसरे गेट से चली गई थी. कल्पना जिस समय बच्चे को ले कर घर पहुंची उस समय उस का पति आशुतोष दामले घर पर ही था. वह कल्पना को देख कर काफी खुश हुआ था. बच्चे के घर आने की खुशी में आशुतोष ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी और रात को बड़ी धूमधाम से बच्चे का वारसा और नामकरण की पार्टी का आयोजन किया. उस पार्टी में उस ने अपने जानपहचान वालों को भी बुलाया था. उस कार्यक्रम में उसी बिल्डिंग में रहने वाले डाक्टर माने का भी परिवार आया था.

कल्पना का सच तो सामने आ गया. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं लग सका कि सुनंदा नाम की महिला जिस ने बच्ची चुरा कर दी थी वह कहां की रहने वाली है. कल्पना से पूछताछ के बाद पुलिस ने सुनंदा का एक स्कैच तैयार करवा कर मुंबई तथा कोलकाता में सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवा दिए हैं ताकि उस के बारे में सुराग मिल सके. रिमांड अवधि पूरी होने से पहले ही पुलिस ने कल्पना परमार को न्यायालय में फिर से पेश किया जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस मामले में कल्पना के पति की कोई गलती नहीं थी इसलिए पुलिस ने उस के बयान ले कर उसे घर भेज दिया.

कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद पुलिस ने बच्ची उस के मांबाप को सुपुर्द कर दी. सुनंदा का अभी तक कोई पता नहीं चल सका. मामले की तफ्तीश सीनियर पुलिस इंसपेक्टर शिवाजी शिंदे कर रहे हैं. Mumbai Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jaunpur Crime: मुसलिम गर्लफ्रेंड के लिए मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला

Jaunpur Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है जिस ने रिश्तों को तारतार कर रख दिया है. एक प्रेमी ने मुसलिम प्रेमिका के लिए अपने मांबाप को 6 टुकड़ों में काट डाला. आखिर ऐसा क्या था उस प्रेमिका में जिस से एक इंजीनियर बेटा ने मांबाप को इतनी बेरहमी से मार डाला?  क्या है इस मर्डर का पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं आगे जो आप को करेगा होने वाली घटना से सचेत और सावधान?

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश के जौनपुर से सामने आई है. यहां एक इंजीनियर बेटे अम्बेश कुमार ने अपने मांबाप की हत्या कर दी. अम्बेश ने मांबाप का सिर लोहे के खलबट्टे से कूच दिया था. फिर आरी से उन के 6 टुकडे कर डाले. इस के बाद उन टुकड़ों को बोरियों में भर कर गोमती नदी में बारीबारी से फेंक आया.

पुलिस के अनुसार, अम्बेश बीटेक की डिग्री लेने के बाद कोलकाता में एक कंपनी में बतौर क्वालिटी इंजीनियर कार्यरत था. वहां उसे 25 हजार की सैलरी मिलती थी. इसी जौब के दौरान उस की मुलाकात एक मुसलिम युवती से हुई. दोनों की नजदीकियां बढ़ी और 2019 में दोनों ने लव मैरिज शादी कर ली. दोनों के 2 बेटे हैं, जिन की उम्र 5 साल और 11 महीने है.

अम्बेश की लव मैरिज से परिवार खुश नहीं था. इसी को ले कर उस के पापा श्याम बहादुर और मम्मी बबीता के बीच बहस हो जाया करती थी. इसी बात को ले कर दोनों के बीच 8 दिसंबर, 2025 को झगड़ा हुआ  तो गुस्से में उस ने अपने मम्मीपापा की खलबट्टे से कूच कर हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद अम्बेश ने अपनी बहन को फोन कर बताया कि मम्मी और पापा  कहीं चले गए हैं. वह इसी तरह नाटक करता रहा. 12 दिसंबर, 2025 को अचानक वह भी लापता हो गया. इस के बाद अम्बेश की बड़ी बहन वंदना ने उसे फोन मिलाया तो उस का कुछ पता नहीं चल सका. तब वंदना ने फिर अम्बेश की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

पुलिस को उस ने बताया कि  उस के मम्मीपापा पहले गायब हो गए, अब भाई भी लापता है. इस के बाद पुलिस ने इस मामले की गंभीरता से जांच की तो पुलिस को अम्बेश मिल गया. उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

एएसपी आयुष श्रीवास्तव ने बताया कि अम्बेश ने बताया कि मम्मीपापा मेरी शादी तुड़वाना चाहते थे. वे चाहते थे कि वह दूसरी शादी कर ले. अम्बेश मुसलिम पत्नी को तलाक देने के लिए तैयार भी था, लेकिन उसे गुजारा भत्ता देना पड़ता. मम्मीपापा गुजारा भत्ता देने के लिए तैयार नहीं थे. तो उस ने पत्नी को तलाक देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद मम्मी ने अम्बेश से घर से निकल जाने को कहा. तब अम्बेश ने कहा कि यह तो मेरी नानी का घर है. मुझे नेवासा में दिया था. इसी बात को ले कर मम्मी ने अम्बेश को धक्का मार दिया और कहा कि इसी समय घर से निकल जा. इसी बात को ले कर अम्बेश गुस्सा आ गया. पास में रखा टेबल के लोहे का खलबट्टा था. उस का मूसल उठाया और मम्मी के सिर पर मार दिया. इस के बाद पापा भी वहां आ गए.  वह पुलिस को फोन करने की धमकी देने लगे. वह पुलिस को फोन कर ही रहे थे तभी अम्बेश ने उन को भी मूसल मार दिया.

पापा और मम्मी चिल्लाए. दोनों फर्श पर जा गिरे. इस के बाद उन की सांसें थम चुकी थीं. दोनों की हत्या करने के बाद अम्बेश की समझ में नहीं  आ रहा था कि वह क्या करे.

यह अपराध छिपाने के लिए उस के दिमाग में एक आईडिया आया. वह बेसमेंट से सरिया काटने वाली इलेक्ट्रिक आरी ले आया और दोनों की लाशों के 3-3 टुकड़े कर दिए. फिर 6 को प्लास्टिक की बोरी में भर कर गोमती नदी में फेंक आया.

पुलिस ने आरोपी अम्बेश को अरेस्ट कर लिया है. पुलिस उस के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर काररवाई कर रही है. Jaunpur Crime