Bihar Crime Story: शहाबुद्दीन – आतंक का अंजाम

Bihar Crime Story: कभी बिहार के सीवान में आतंक की बदौलत अपनी सरकार चलाने वाले शहाबुद्दीन के लिए कहा जाता है कि अपराध उन के लिए धंधा नहीं, मनोरंजन था. शायद इसीलिए वहां के लोग उन का नाम लेने से डरते थे. अगर कभी जरूरत पड़ती थी तो लोग उन्हें साहब कहते थे. आज वही साहब अपने किए की सजा जेल में भुगत रहे हैं.

11 दिसंबर, 2015 को सीवान की जिला जेल की विशेष अदालत के बाहर सुबह से ही काफी गहमागहमी थी. जेल परिसर से 300 मीटर की दूरी तक पुलिस फैली हुई थी. शहर में भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. इस की वजह यह थी कि उस दिन 11 साल पहले सीवान में दिल दहला देने वाले तेजाब कांड का फैसला आने वाला था. इस दोहरे हत्याकांड में सीवान के बाहुबली शहाबुद्दीन प्रमुख अभियुक्त थे.

पीडि़त चंद्रकेशर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू, उन की पत्नी कलावती, अभियुक्तों के घर वाले, तमाम पत्रकार और फोटोग्राफर जेल के बाहर बेचैनी से टहल रहे थे. इस हत्याकांड में सीवान के बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन उर्फ शहाबु उर्फ साहब के अलावा 10 अन्य लोग शामिल थे, जिन में से 7 अभियुक्तों के फैसले सुरक्षित रखे गए थे. साढ़े 11 बजे विशेष अदालत के चतुर्थ अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अजय कुमार श्रीवास्तव जेल पहुंचे. विशेष लोक अभियोजक जयप्रकाश सिंह और बचाव पक्ष के वकील अभय कुमार राजन भी समय से पहुंच गए थे. अभियुक्त शहाबुद्दीन और उन के 3 साथी शेख असलम, शेख आरिफ हुसैन उर्फ मुन्ना मियां उर्फ सोनू और राजकुमार साह, जिन्हें सजा सुनाई जानी थी, अदालत के कटघरे में खड़े थे.

इस मामले की सारी काररवाई पहले ही पूरी हो चुकी थी, सिर्फ फैसला सुनाना बाकी था. इसलिए अदालती काररवाई पूरी कर के न्यायाधीश अजय कुमार श्रीवास्तव ने फैसला सुना दिया. विशेष लोक अभियोजक जयप्रकाश सिंह ने पत्रकारों को फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को भादंवि की धारा 302/364ए/201/120बी का दोषी तथा अन्य अभियुक्तों शेख असलम, शेख आरिफ हुसैन उर्फ मुन्ना मियां उर्फ सोनू और राजकुमार साह को भादंवि की धारा 364ए व 323 (फिरौती के लिए अपहरण व मारपीट) का दोषी मानते हुए सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है.

जबकि बाकी बचे सातों अभियुक्तों आफताब मियां, मकसूद मियां, झब्बू मियां, अजमेर मियां, नगेंद्र तिवारी, मदन शर्मा उर्फ छोटेलाल शर्मा और कन्हैयालाल का फैसला सुरक्षित रख लिया गया था. फैसला आते ही अभियुक्तों के घर वालों के चेहरे उतर गए. वहीं पीडि़त चंद्रकेश्वर प्रसाद और कलावती की बूढ़ी आंखों में खुशी के आंसू छलक आए. इस फैसले से वे खुश तो थे, लेकिन अभी उन के एक और बेटे की हत्या का फैसला आना बाकी है, जिसे जेल में बंद मोहम्मद शहाबुद्दीन के इशारे पर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.

आखिर 11 साल पहले ऐसा क्या हुआ था, जिस की वजह से सीवान के सांसद शहाबुद्दीन और उन के सहयोगियों को चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के बेटों की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. छपरा जिले के नटवर सेमरिया में रहते थे चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू. वहां उन का छोटामोटा व्यवसाय था. अपनी छोटी सी गृहस्थी में वह खुश थे. उन के परिवार में पत्नी कलावती के अलावा 6 बच्चे थे, जिन में 2 बेटियां मंजरीरानी, प्रीति और 4 बेटे राजीव रोशन, गिरीशराज उर्फ निक्कू, सतीशराज उर्फ सोनू तथा नितीशराज उर्फ मोनू थे. इन में नितीशराज विकलांग था.

चंद्रकेश्वर प्रसाद ने परिवार सहित छपरा के उस छोटे से गांव से निकल कर सीवान में रहने का मन बना लिया था. इस की वजह यह थी कि सीवान के दरौली थानाक्षेत्र के कुमटी भिटौली के रहने वाले जिन रमाशंकर प्रसाद के यहां उन की ससुराल थी, उन की सिर्फ 3 बेटियां ही थीं. रमाशंकर प्रसाद सीवान में पेशकार थे. रिटायर होने के बाद उन्होंने अपने दूसरे नंबर की बेटी कलावती और उस के पति चंद्रकेश्वर प्रसाद को अपने पास रहने के लिए कुमटी भटौली बुला लिया था. वजह यह थी कि उन की देखभाल के लिए किसी का पास रहना जरूरी था. चंद्रकेश्वर प्रसाद सीवान आए तो उन के ससुर ने उन के लिए वहां के नया बाजार की गल्ला पट्टी में एक दुकान खरीद दी.

उसी में उन्होंने किराना की दुकान खोल ली थी. धीरेधीरे दुकान चल निकली तो चंद्रकेश्वर प्रसाद की गृहस्थी फिर से जम गई. बात सन 1996 की है. चंद्रकेश्वर प्रसाद के पास रुपए इकट्ठा हुए तो उन्होंने सीवान शहर में डहरिया स्टैंड के पास रामनाथ गौड़ से एक कट्ठा 9 धूर जमीन खरीद ली. यह रामनाथ गौड़ का पुराना कटरा था. इस में 7 दुकानें थीं, जो किराए पर उठी हुई थीं. रामनाथ गौड़ ने अपनी यह जमीन और दुकानें इसलिए बेच दी थीं, क्योंकि किराएदार उन्हें समय पर किराया नहीं दे रहे थे. उन में से एक किराएदार नागेंद्र तिवारी ने तो एक दुकान पर कब्जा ही कर रखा था. उन्होंने उस के खिलाफ न्यायालय में मुकदमा भी दायर कर रखा था.

चंद्रकेश्वर प्रसाद ने कटरा खरीदा तो उन्होंने सभी दुकानदारों से दुकानें खाली करने को कहा. 5 दुकानदानों ने तो दुकानें खाली कर दीं, लेकिन नागेंद्र तिवारी ने दुकान खाली नहीं की. चंद्रकेश्वर प्रसाद ने वहां एक और दुकान खोली, बाकी में गोदाम बना दिए. इस दुकान का कामधाम उन का बड़ा बेटा गिरीशराज उर्फ निक्कू देखने लगा. इस दुकान का उद्घाटन उन्होंने सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन और मंत्री अवधबिहारी चौधरी से कराया था. उस समय शहर की और भी बड़ीबड़ी हस्तियां वहां मौजूद थीं.

इस के करीब 4 साल बाद चंद्रकेश्वर ने उस जमीन पर नए सिरे से निर्माण कराने का फैसला किया, लेकिन नागेंद्र तिवारी का कब्जा उन के रास्ते का रोड़ा बन गया. उन्होंने उस से कई बार दुकान खाली करने को कहा, लेकिन वह उन की बात सुन ही नहीं रहा था. नागेंद्र को डर सता रहा था कि कहीं दुकान उस के कब्जे से निकल न जाए. इसी डर की वजह से उस ने साजिश रच कर फरजी कागजात तैयार कराए और वह विवादित दुकान मदन शर्मा को बेच दी. इस से वह दुकान मदन शर्मा के कब्जे में आ गई.

मदन शर्मा मोटर मैकेनिक था. लेकिन उस के संबंध शहर के बड़ेबड़े दबंगों से थे. शहाबुद्दीन का तो वह खास चेला था. चंद्रकेश्वर प्रसाद को जब पता चला कि नागेंद्र तिवारी ने दुकान मदन शर्मा को बेच दी है और उस ने दुकान पर कब्जा कर लिया है तो उन्होंने दुकान पर अपना ताला लगा दिया. मदन को यह बात बहुत खराब लगी. अगस्त, 2004 के पहले सप्ताह में चंद्रकेश्वर प्रसाद के पास फोन आया कि वह दुकान का ताला खोल दें, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा. धमकी के अगले दिन इस का नतीजा भी सामने आ गया. मदन शर्मा करीब आधा दरजन लोगों को साथ ले कर चंद्रकेश्वर प्रसाद की दुकान पहुंच ॒या और चाबी मांगने लगा.

चंद्रकेश्वर प्रसाद ने चाबी देने से मना किया तो उस ने जबरदस्ती चाबी छीन ली और जा कर दुकान खोल ली. मदन शर्मा ने कहा कि अगर दुकान नहीं देना चाहते तो उसे 2 लाख रुपए दें. यह साहब (सांसद शहाबुद्दीन) का हुक्म है. साहब यानी शहाबुद्दीन का नाम सामने आया तो चंद्रकेश्वर प्रसाद को लगा, अब उन का काम आसान हो गया, क्योंकि उन्होंने ही उन की दुकान का उद्घाटन किया था. उन दिनों शहाबुद्दीन सीवान जेल में बंद थे. 12 अगस्त, 2004 को चंद्रकेश्वर प्रसाद शहाबुद्दीन से मिलने सीवान जेल पहुंचे और पूरी बात बता कर कहा कि वह न दुकान छोड़ेंगे और न 2 लाख रुपए देंगे. दुकान किराए पर दे सकते हैं, इस पर शहाबुद्दीन ने नाराज हो कर उन्हें भगा दिया.

चंद्रकेश्वर प्रसाद शहाबुद्दीन के पास से अपना सा मुंह ले कर वापस आ गए. घर में तय हुआ कि वह न रुपए देंगे और न दुकान छोड़ेंगे. 2 दिनों बाद 14 अगस्त की सुबह पता चला कि चंद्रकेश्वर प्रसाद के पटना वाले भाई के यहां बेटा पैदा हुआ है. घर में पत्नी और बेटे थे ही, वह भाई के पास पटना चले गए. तब क्या पता था कि उन के लौटने तक यहां कयामत आ जाएगी. उन के जाने के 2 दिनों बाद यानी 16 अगस्त की सुबह करीब 10 बजे मदन शर्मा आफताब, झब्बू मियां, राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू उर्फ आरिश हुसैन, मसकूद मियां को साथ ले कर चंद्रकेश्वर प्रसाद की दुकान पर पहुंचा. दुकान पर उस समय राजीव रोशन उर्फ बंटू और सतीश राज उर्फ सोनू मौजूद थे. राजीव ने सभी को इज्जत के साथ बैठा कर चायपानी पिलाया.

चायपानी के बाद जब इन लोगों ने 2 लाख रुपए मांगे तो राजीव को लगा बात बिगड़ सकती है. चालाकी से उस ने मामले को निपटाने की गरज से कहा कि इस समय वह ज्यादा से ज्यादा 25 हजार रुपए दे सकता है. उस के पास इस से ज्यादा पैसे नहीं हैं. उस ने इतना ही कहा था कि आफताब ने उसे ऐसा थप्पड़ मारा कि राजीव की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. इस के बाद तो उस की लाठीडंडों, लातजूते से पिटाई होने लगी.

भाई को पिटता देख कर सतीश डर गया और रोने लगा. भाई को कैसे बचाए, उस की समझ में नहीं आ रहा था. वह भाग कर गोदाम में गया तो वहां बोतल में भर कर रखे टौयलेट साफ करने वाले तेजाब पर उस की नजर पड़ी. एक बोतल तेजाब ले कर वह वापस लौटा और उसे प्लास्टिक के एक मग में डाल कर भाई को पीट रहे बदमाशों को लक्ष्य बना कर हवा में उछाल दिया. इस के छींटें बदमाशों पर भी पड़े और राजीव पर भी. तेजाब की जलन से बदमाशों की पकड़ ढीली पड़ी तो वह भाग कर एक मकान के पीछे छिप गया. इस के बाद बदमाशों ने सतीश को पकड़ लिया और बोलेरो में डाल कर गए.

इस बात की जानकारी जेल में बंद सांसद शहाबुद्दीन को हुई तो उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि सभी को उठा लो. अब तेजाब का बदला तेजाब से ही लिया जाएगा. शहाबुद्दीन का फरमान जारी होते ही उन के गुर्गों ने राजीब की तलाश शुरू कर दी. राजीव जब नहीं मिला तो चंद्रकेश्वर प्रसाद का बड़हरिया स्थित गोदाम लूट लिया गया और पूरे कटरे में आग लगा दी गई. इस के बाद वे चंद्रकेश्वर की दुकान पर पहुंचे. जहां गिरीश बैठा मिल गया. गिरीश कुछ समझ पाता, इस से पहले ही शहाबुद्दीन के लोगों ने उसे खींच कर मोटरसाइकिल पर बैठाया और ले कर चले गए.

शहाबुद्दीन के आदमी सतीश और गिरीश का अपहरण कर के ले जा रहे थे तो संयोग से रामराज मोड़ के पास राजीव भी मिल गया. उन लोगों ने उसे भी पकड़ लिया और तीनों को शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर ले गए. तीनों भाइयों को एक कमरे में बंद कर दिया गया. रात को जेल में बंद शहाबुद्दीन प्रतापपुर पहुंचे तो राजीव, गिरीश और सतीश को उन के सामने पेश किया गया. शहाबुद्दीन ने राजीव को एक किनारे खड़ा कर दिया. उन्होंने गिरीश और सतीश को एक साथ खड़ा कराया. इस के बाद तेजाब से भरे 2 बड़े गैलन ला कर वहां रख दिए गए. राजीव की आंखों के सामने ही शहाबुद्दीन के कहने पर दोनों गैलन का तेजाब गिरीश और सतीश के ऊपर उड़ेल दिया गया. तेजाब की जलन से तड़पतड़प कर दोनों भाइयों ने दम तोड़ दिया.

शहाबुद्दीन ने राजीव को इसलिए जिंदा रखा कि जब उस का बाप आएगा और बड़हरिया वाली जमीन की रजिस्ट्री करेगा, तब उसे छोड़ा जाएगा. गिरीश और सतीश की लाशों को ईंटभट्ठे की चिमनी के हवाले कर दिया गया, जिस में वे जल कर स्वाहा हो गईं. शहाबुद्दीन वापस जेल चले गए. राजीव के दोनों हाथ बांध कर उसे कमरे में बंद कर के उन के आदमी वापस चले गए. रात को बेटे घर नहीं आए तो कलावती परेशान हुईं. चंद्रकेश्वर प्रसाद भी नहीं थे जो पता करते कि बच्चे घर क्यों नहीं आए. अगले दिन जब चंद्रकेश्वर प्रसाद के बेटों की निर्मम हत्या की दबी जुबान से चर्चा होने लगी तो मुसाफिर चौधरी खुल कर शहाबुद्दीन के विरोध में उतर आए. इस पर शहाबुद्दीन के गुरगों ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी.

बेटों की हत्या की खबर पटना गए चंद्रकेश्वर प्रसाद को मिली तो वह सन्न रह गए. वह सीवान लौटे तो सचमुच उन की दुनिया उजड़ चुकी थी. कलावती की ओर से थाना मुफस्सिल में नागेंद्र तिवारी और मदन शर्मा के खिलाफ तहरीर दी गई. इस पर अपराध संख्या 131/2004, पर भादंवि की धारा 341, 323, 380, 435, 364/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने जब इस मामले की जांच की तो इस कांड में मदन शर्मा और नागेंद्र तिवारी के साथसाथ सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन, राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू उर्फ सोनू उर्फ आरिफ हुसैन, आफताब मियां, मकसूद मियां, झब्बू मियां और अजमेर मियां शामिल पाए गए. घटना को सांसद शहाबुद्दीन की शह पर अंजाम दिया गया था.

मदन शर्मा और नागेंद्र तिवारी के साथ मुकदमे में इन नामों को भी जोड़ दिया गया. 6 सालों बाद अचानक राजीव घर लौटा, तो उसे जिंदा देख कर घर वाले दंग रह गए. उस ने मांबाप को बताया कि वह शहाबुद्दीन और उस के गुरगों के डर से छिप कर रह रहा था. यही नहीं, उस ने दोनों भाइयों की सांसद शहाबुद्दीन की शह पर अपने सामने दर्दनाक मौत देने की बात बताई तो मांबाप का कलेजा कांप उठा.

राजीव राज को अदालत में पेश कर के बयान दिलाया गया तो साफ हो गया कि दिल दहला देने वाली इस घटना को शहाबुद्दीन की शह पर अंजाम दिया गया था. राजीव के बयान के आधार पर विशेष अदालत ने इस मुकदमे में 4 जून, 2010 को भादंवि की धारा 120बी और 364ए भी जोड़ दी. बाद में पटना हाईकोर्ट के आदेश पर 1 मई, 2014 को इस मामले में भादंवि की धारा 302, 201 और 120बी के अंतर्गत मुकदमा चलाए जाने का आदेश हुआ.

राजीव ही एकमात्र पूरी घटना का चश्मदीद गवाह था. उस के इस तरह जिंदा वापस आने और बयान देने से शहाबुद्दीन की नींद उड़ी हुई थी. आखिरकार वही हुआ, जिस का सभी को डर था. 16 जून, 2014 को राजीव की गोली मार कर हत्या कर के रास्ते का कांटा साफ कर दिया गया. मोहम्मद शहाबुद्दीन, उस के बेटे ओसामा और अज्ञात के खिलाफ थाना सीवान नगर में राजीव की हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया. आगे क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के बारे में जान लें, जिसे कभी बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव एके 47 कहते थे और अपना दाहिना हाथ बताते थे.

48 वर्षीय मोहम्मद शहाबुद्दीन मूलरूप से सीवान के थाना हुसैनगंज के गांव प्रतापपुर के रहने वाले हैं. उन के पिता का नाम मोहम्मद हसीबुल्लाह था. शरारती और उद्दंड शहाबुद्दीन में बचपन से ही किसी चीज को पाने की सनक पैदा हो जाती तो वह उसे पा कर ही दम लेता था. शहाबुद्दीन के पिता हसीबुल्लाह एक वेंडर थे. परिवार बड़ा था, जबकि घर में कमाने वाला सिर्फ एक था. इसलिए सब की जरूरतें पूरी नहीं होती थीं. अपनी जरूरतों को पूरी करने के लिए छोटेमोटे अपराध करते हुए शहाबुद्दीन बड़ा हुआ, लेकिन पढ़ाई में वह ठीक था. उस ने राजनीति विज्ञान में एमए और पीएचडी की. इस के बाद हिना शहाब से उस का निकाह हुआ. इस समय उन के मोहम्मद ओसामा नाम का एक बेटा और 2 बेटियां हैं.

शहाबुद्दीन 18 साल का था, तभी से अपराध की राह पर चल पड़ा था. थाना सीवान में 6 मई, 1985 को उस के नाम पहला मुकदमा दर्ज हुआ. इस के 4 दिनों बाद ही हत्या के प्रयास, आर्म्स एक्ट और अन्य कई मामले भी दर्ज हुए. एक बार अपराध की डगर पर पांव पड़ा, तो फिर उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन नाम का सिक्का चला तो वह अपराधियों की आंखों का तारा बन गया. धनबाद के कोयला माफिया और तत्कालीन बाहुबली विधायक सूर्यदेव सिंह ने उसे अपने यहां पनाह दी. सूर्यदेव सिंह का साथ छोड़ने के बाद लोजपा के विधायक रामा सिंह के साथ जुगसलाई थानाक्षेत्र में तिहरा हत्याकांड में उस का नाम आया तो वह सुर्खियों में आ गया.

सन 1987 से 1990 तक शहाबुद्दीन ने झारखंड के कोयलांचल में काम किया. उस के बाद सीवान लौट कर अपना एक गैंग बनाया. इस के बाद तो शहाबुद्दीन के नाम से सीवान की जनता कांपने लगी. जब हद हो गई तो शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया. जेल में रहते हुए उन्होंने 1989 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते. अब वह अपराधी से माननीय बन गए. इस के बाद तो उन की ताकत दोगुनी हो गई. सन 1995 में वह जनता दल के टिकट से जीरादेई से विधानसभा का चुनाव जीते. हत्या और अपराध के क्षेत्र में नाम कमा कर 1996 में वह सांसद चुने गए. इस के बाद लालूप्रसाद यादव ने उन्हें अपनी पार्टी में शामिल किया. लेकिन उसी बीच मुन्ना चौधरी के अपहरण से पूरा सीवान इलाका हिल गया.

सीवान के थाना मुफस्सिल में सांसद शहाबुद्दीन सहित कई लोगों के खिलाफ अवध चौधरी ने अपने बेटे मुन्ना चौधरी के अपहरण और हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था. उन्होंने हिम्मत कर के सांसद शहाबुद्दीन के खिलाफ मुकदमा तो दर्ज करा दिया, लेकिन हुआ वही, जिस का डर था. अंत में शहाबुद्दीन के डर से वह वही करने को तैयार हो गए, जो वह चाहते थे. अवध चौधरी और उन की पत्नी चंबा देवी ने दिल पर पत्थर रख कर सांसद शहाबुद्दीन के पक्ष में गवाही दी. इस तरह मांबाप की गवाही से मुन्ना के अपहरण और हत्या का मुकदमा कमजोर हो गया.

लेकिन यह भी सच है कि पाप का घड़ा एक न एक दिन भर कर फूट जाता है. शहाबुद्दीन के पापों का भी घड़ा भर गया था. आखिर उन्हें सीवान के छोटेलाल साह के अपहरण के मामले में आजीवन करावास की सजा हुई. वह जेल भेज दिए गए. शहाबुद्दीन के जेल जाते ही उन के सताए लोग सीना तान कर पुलिस के सामने आ गए. मुन्ना चौधरी के मांबाप और गवाह शहाबुद्दीन के खिलाफ गवाही देने को तैयार हो गए  शहाबुद्दीन के खिलाफ गवाहों को दोबारा गवाही देने की हिम्मत राजकुमार शर्मा ने दिखाई. राजकुमार शर्मा मुन्ना चौधरी का अजीज दोस्त था. वह उसी के गांव में रहता था. जिस समय मुन्ना का अपहरण हुआ था, उस समय वह भी उस के साथ था. शहाबुद्दीन के गुरगों ने उसे भी पकड़ना चाहा था, लेकिन वह भागने में कामयाब हो गया था.

लेकिन शहाबुद्दीन भी राजकुमार शर्मा के पीछे हाथ धो कर पड़ गए थे. उस समय बिहार में राजद यानी लालू प्रसाद की सरकार थी. शहाबुद्दीन को उन का दाहिना हाथ माना जाता था. लालू प्रसाद की सरकार पर दबाव डाल कर उन्होंने राजकुमार शर्मा पर 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित करवा दिया. हालांकि विपक्षियों ने इस का घोर विरोध किया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. राज्य में जनता दल (युनाइटेड) की सरकार बनी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने तो शहाबुद्दीन की उलटी गिनती शुरू हो गई, क्योंकि वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभते थे. उन पर पुलिस और अदालत का शिकंजा कसने लगा. मौके का फायदा राजकुमार ने उठाया और सरकारी गवाह बन गया. उसे सरकारी गवाह बनाने में सीवान के अनुमंडल आरक्षी उपाधीक्षक सुधीर कुमार ने अहम भूमिका निभाई.

अवध चौधरी के बयान के बाद शहाबुद्दीन के साथियों रामा चौधरी, मनोजदास, जवाहर चौधरी, मुन्नू चौधरी और पप्पू श्रीवास्तव के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था. यही नहीं, 2 बार बयान दर्ज कराने के बाद अवध चौधरी को धमकी भी मिली थी. यह धमकी सियाड़ी मठिया निवासी मुखिया हरेंद्र चौधरी और गोपालगंज जिले के बरी निवासी अजय चौधरी ने विशुनपुरा निवासी हरेराम चौधरी के जरिए दिलाई थी. हरेराम चौधरी शहाबुद्दीन के खासमखास थे. पुलिस ने धमकी देने पर तीनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद तीनों को जेल भेज गया था.

शबाहुद्दीन को जिस छोटेलाल साह के अपहरण में आजीवन कारावास की सजा हुई थी, वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माले) का कार्यकर्ता था. सीवान के थाना असंवा के नोनिया टोला निवासी दीनानाथ साह के 35 वर्षीय बेटे छोटेलाल साह को शहाबुद्दीन ने 2 मई, 1999 की शाम साढ़े 3 बजे आंदर ढाला के पास उस समय अगवा कर लिया था, जब वह शीतल पासवान के साथ अपने घर जा रहा था. शहाबुद्दीन उस से इसलिए नाराज था, क्योंकि उस ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के पक्ष में प्रचार तो किया ही, मतगणना केंद्र पर माले एजेंट के रूप में शहाबुद्दीन का विरोध भी किया था. जब इस की जानकारी शहाबुद्दीन को मिली तो उन्होंने उसे सबक सिखाने के लिए उस का अपहरण कर लिया था. आज तक उस का पता नहीं चला है.

छोटेलाल साह के अपहरण के 8 साल बाद जो फैसला आया, उस में सत्र न्यायाधीश ज्ञानेश्वर श्रीवास्तव ने शहाबुद्दीन को आजीवन कारावास के साथ 10 हजार रुपए आर्थिक दंड की सजा भी सुनाई थी. जब बिहार का डीजीपी डी.पी. ओझा को बनाया गया तो उन्होंने शहाबुद्दीन के अपराध की सभी फाइलों को इकट्ठा कर 30 जुलाई, 2003 को गिरफ्तारी का आदेश जारी कर दिया. आदेश होते ही वह फरार हो गए. 12 अगस्त, 2003 को उन्होंने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया लेकिन इस का परिणाम अच्छा नहीं आया. डीजीपी ओझा को पद से हटा दिया गया.

31 मार्च, 2007 को दिनदहाड़े एक ऐसी घटना घटी, जिस ने सीवान को ही नहीं, पूरे बिहार को हिला कर रख दिया था. हुआ यह कि उस दिन सीवान के अति व्यस्त क्षेत्र तीनमुहाने पर स्थित लोकनायक जयप्रकाश की प्रतिमा के ठीक सामने कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी (लिबरेशन) के 2 कामरेड युवा नेता चंद्रशेखर और श्यामनारायण बिहार में फैली अराजकता और हिंसा के खिलाफ 2 अप्रैल, 2007 को बिहार बंद के पक्ष में नुक्कड़ सभा कर रहे थे. दोपहर का समय था. वहां हजारों की भीड़ जमा थी.

उसी समय अत्याधुनिक हथियारों से लैस गाडि़यों से कुछ बदमाश आए और चंद्रशेखर तथा श्यामनारायण को गोलियों से छलनी कर दिया. बदमाशों के भागते समय एक रिक्शाचालक भूटाली मियां सामने आ गया, तो बदमाशों ने उसे भी गोलियों से भून दिया. इस के बाद भाकपा माले लिबरेशन के सीवान जिला प्रभारी रमेश सिंह कुशवाहा ने शहाबुद्दीन और उन के साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया. इस मामले में भी शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा हुई है. सत्ता बदलते ही शहाबुद्दीन का आतंक खत्म होता गया. सजा होने की वजह से वह सन 2009 का चुनाव भी नहीं लड़ पाए. अपनी जगह उन्होंने पत्नी हिना शहाब को चुनाव लड़ाया, लेकिन लोगों ने उसे नकार दिया और नतीजा यह निकला कि हिना चुनाव हार गईं.

तेजाब हत्याकांड में काल डिटेल्स, शहाबुद्दीन के अपराधों और राजीवराज रोशन की गवाही पर शहाबुद्दीन को भादंसं की धारा 302, 201, 364ए व 120बी का दोषी पाया गया था. अन्य अभियुक्तों राजकुमार साह, आरिफ और शेख असलम को भादंसं की धारा 302 व 201 से मुक्त करते हुए अपहरण का दोषी माना गया था. इस के अलावा इस मामले के बाकी 7 अभियुक्तों का फैसला सुरक्षित रखा गया है. उन का फैसला आगामी दिनों में सुनाया जाएगा.

सजा पाए शहाबुद्दीन के अधिवक्ता अभय कुमार राजन का कहना है कि हम इस फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में अपील करेंगे. हमें उम्मीद है कि वहां से हमें न्याय मिलेगा. इस मामले में सच्चाई यह है कि शहाबुद्दीन 13 अगस्त, 2003 से जेल में बंद थे. घटना वाले दिन वह बाहर कैसे आ गए. अगर इस मामले में शहाबुद्दीन दोषी हैं तो जेल प्रशासन भी बराबर का दोषी है. जबकि जेल प्रशासन का कहना है कि शहाबुद्दीन जेल से बाहर नहीं गए थे. ऐसे में उन्होंने घटना को अंजाम कैसे दिया? इस के साथ पैसे मांगने वाली काल डिटेल्स भी पूरी नहीं है.

अपने 3 बेटों को खोने वाले चंद्रकेश्वर प्रसाद का कहना है कि उन का तो वैसे भी सब कुछ लुट चुका है. अब उन के पास बरबाद होने को बचा ही क्या है. लेकिन शहाबुद्दीन और उन के साथियों को सजा मिलने से सुकून जरूर मिला है.

कहा जाता है कि शहाबुद्दीन के लिए अपराध धंधा नहीं, बल्कि मनोरंजन भी था. किसी की हत्या करने में उन्हें मजा आता था. बिहार के सीवान में आतंक की बदौलत उन की अपनी सरकार चलती थी. आतंक इतना था कि लोग उन का नाम लेने में डरते थे. पहली बात तो कोई उन का नाम लेना ही नहीं चाहता था. अगर जरूरत भी पड़ती तो नाम लेने के बजाय साहब कहता था. आज वही साहब अपनी करनी की सजा जेल की सलाखों के पीछे भुगत रहा है. कानून को अपनी जागीर समझने वालों का अंत में यही हश्र होता है. Bihar Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Stories: रोहित वेमुला – दलित छात्र की बेबस मौत  

Hindi Crime Stories: हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की गूंज पूरे देश में सुनाई दी. इस के लिए तथाकथित रूप से जिम्मेदार भाजपा यह सोच कर परेशान है कि क्या एक छात्र की मौत इतनी हंगामाखेज हो सकती है. आखिर कौन जिम्मेदार है रोहित की आत्महत्या का?

निजाम का शहर कहिए या नवाबों का, हैदराबाद दक्षिण भारत का एक महत्त्वपूर्ण शहर है. एक ओर विश्वप्रसिद्ध चारमीनार इस शहर की ऐतिहासिक पहचान है तो दूसरी ओर संभवत: विश्व का यह अकेला ऐसा शहर है, जिस में 9 सरकारी विश्वविद्यालय हैं.  इन्हीं 9 विश्वविद्यालयों में एक है केंद्रीय विश्वविद्यालय, जो इस शहर की गहमागहमी से दूर, शांत इलाके गाची बावली में स्थित है.

17 जनवरी की आधी रात बीत चुकी थी. तभी गाची बावली पुलिस स्टेशन को सूचना मिली कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के न्यू रिसर्च हौस्टल में एक छात्र ने आत्महत्या कर ली है. गाची बावली थाने के इंसपेक्टर जे. रमेश कुमार तुरंत अपने सहयोगियों के साथ न्यू रिसर्च हौस्टल पहुंच गए. हौस्टल के कमरा नंबर 207 में उन्हें एक छात्र फंदे से लटका हुआ मिला जिस की पहचान रोहित वेमुला के रूप में हुई. उन्होंने अपनी काररवाई शुरू कर दी. जैसेजैसे छात्रों को कैंपस में पुलिस की मौजूदगी और रोहित वेमुला की आत्महत्या की सूचना मिलती गई, वे हौस्टल में एकत्र होते गए.

पुलिस रोहित की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजना चाहती थी, मगर छात्रों की मांग थी कि पहले रोहित को आत्महत्या के लिए उकसाने वाले लोगों के विरुद्ध काररवाई की जाए. छात्रों का आक्रोश बढ़ता जा रहा था. उन के आक्रोश की जानकारी पा कर पुलिस के बड़े अफसर भी पहुंच गए. छात्रों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए रैपिड एक्शन फोर्स के 200 जवानों को बुला लिया गया. तब तक सुबह के 7 बज चुके थे. काफी कोशिशों के बाद पुलिस रोहित की लाश को पोस्टमार्टम के लिए उस्मानिया जनरल अस्पताल ले जाने में सफल हो पाई.

जैसेजैसे दिन चढ़ता गया, रोहित की आत्महत्या का समाचार फैलता गया. इस के साथसाथ हैदराबाद से ले कर दिल्ली, चेन्नै और कश्मीर तक राजनीतिक भूचाल आ गया. आखिर रोहित वेमुला को आत्महत्या क्यों करनी पड़ी, यह एक बड़ा सवाल है. गुंटूर के एक कस्बे गुरुतला के रहने वाले मनीकुमार और राधिका की 3 संतानों में से दूसरे नंबर का था रोहित वेमुला. रोहित जाति से दलित था. लेकिन पढ़ाई में बहुत तेज. अपनी स्कूली शिक्षा अच्छे नंबरों से पास करने के बाद उस ने स्नातक की डिग्री भी गुंटूर से ही ली थी. इस के बाद उस ने सन 2012 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में एमएससी लाइफ साइंस में प्रवेश लिया. अप्रैल 2014 में उसे सीएसआईआर द्वारा जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए चुन लिया गया.

रोहित वेमुला पढ़ाई के साथसाथ सामाजिक गतिविधियों में भी भाग लेता था. इस के साथ ही वह दलित व पिछड़ों के हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी संघर्षरत था. वह अंबेडकर छात्र संगठन से भी जुड़ा हुआ था. अंबेडकर छात्र संगठन विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के हितों के लिए संघर्ष करने वाली एक संस्था है. इस संगठन का भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ हमेशा टकराव रहता है. अंबेडकर छात्र संगठन जहां एक ओर दलित छात्रों के हितों को प्राथमिकता देता है, वहीं दूसरी ओर एबीवीपी हिंदूवादी छात्रों के हितों के रक्षक के तौर पर काम करता है.

जिस समय रोहित वेमुला को स्कौलरशिप मिली, तब भारतीय राजनीति एक बार फिर करवट ले रही थी. देश में आम चुनाव हो रहे थे. 16 मई, 2014 को घोषित चुनाव परिणाम में भाजपा विजयी हुई थी. सन 2014 के आम चनुव में भाजपा को मिली विजय के बाद भाजपा के समर्थकों और उस से संबंधित संगठनों में एक विचित्र सी उग्रता आ गई है. सोशल मीडिया हो या संचार का कोई और माध्यम, ये लोग विरोध का स्वर सुनना पसंद नहीं करते. मई, 2014 के बाद से देश में कई घटनाएं ऐसी हुईं, जिस में आम जनता को इन की असहिष्णुता का सामना करना पड़ा. यहां तक कि केंद्र में भाजपा सरकार के कुछ मंत्री भी इस का समर्थन करते नजर आए.

जुलाई, 2015 में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज में एक डाक्युमेंट्री ‘मुजफ्फरनगर अभी बाकी’ का छात्रों के लिए प्रदर्शन किया जा रहा था. जैसे ही यह सूचना अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नवनिर्वाचित छात्र यूनियन के अध्यक्ष सनी डेडा को मिली, वह यूनियन कार्यकर्ताओं के साथ वहां पहुंच गए और जबरन डाक्युमेंट्री का प्रदर्शन रुकवा दिया. सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई यह दबंगई कोई मामूली घटना नहीं थी. इस से यह उजागर होता था कि आने वाले दिनों में विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों आदि में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा का समर्थक वर्ग अपने विरोधियों के स्वर दबाने का प्रयास करेगा.

ऐसे लोगों को अपरोक्ष रूप से शह मिल रही थी भाजपा के केंद्रीय नेताओं व मंत्रियों के बयानों से, जो समयसमय पर अपने बयानों से विषवमन कर रहे थे. इन लोगों में प्रमुख थे योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज व महेश शर्मा आदि. यह सिलसिला अभी थमा नहीं है, शायद थमेगा भी नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन लोगों को रोकने का कोई प्रयास नहीं करते. किरोड़ीमल कालेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की दबंगई का समाचार जब दूसरे शिक्षण संस्थानों में पहुंचा तो अंबेडकर छात्र संगठन ने इस के विरोध में प्रदर्शन किया. ऐसा ही प्रदर्शन हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय में 3 अगस्त, 2015 को किया गया था. इस प्रदर्शन को भी एबीवीपी ने रोकने का प्रयास किया था.

रोहित वेमुला इस के पहले से ही केंद्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद प्रशासन के निशाने पर था, क्योंकि वह अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के बैनर तले छात्रों के हितों से संबंधित मसले जोरशोर से उठाता रहता था. जबकि यह भाजपा की विचारधारा के विरुद्ध था. इस के चलते ही विश्वविद्यालय ने जुलाई, 2015 से रोहित की 25 हजार रुपए प्रतिमाह की छात्रवृत्ति कागजी काररवाही पूरी न होने का बहाना बना कर रोक दी थी, जो अभी तक रुकी हुई थी. यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि जब से स्मृति ईरानी ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पदभार संभाला है, शिक्षा संस्थानों में सरकारी दखल बढ़ा है. इस से पहले की ही एक घटना थी, चेन्नै स्थित भारतीय तकनीकी संस्थान की.

मद्रास आईआईटी ने एक शिकायत के आधार पर छात्र संगठन अंबेडकर पेरियार सर्किल की मान्यता समाप्त कर दी थी, जिस में कहा गया था कि यह संगठन केंद्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध कार्य करने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदुओं के विरुद्ध घृणा फैला रहा है. इस मामले में भी स्मृति ईरानी का नाम आया था और कहा गया था कि मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की संस्तुति और परोक्ष हस्तक्षेप के कारण ही आईआईटी प्रशासन ने दलित छात्रों के संगठन अंबेडकर पेरियार सर्किल की मान्यता रद्द की थी.

केंद्र सरकार का शिक्षा संस्थानों व शिक्षा नीतियों में दखलंदाजी करने का यह कोई पहला मामला नहीं था. नोबेल पुरस्कार विजेता और महान अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी इसीलिए नालंदा विश्वविद्यालय के उपकुलपति का पद त्याग दिया था. यही बात हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के मामले में सामने आई. 3 अगस्त, 2015 को हुए प्रदर्शन के दौरान एबीवीपी और एएसए के बीच हुई झड़प को संज्ञान में लेते हुए एबीवीपी नेता सुशील कुमार के इस बयान के आधार पर कि रोहित और उस के साथियों ने उसे चोट पहुंचाई है, जिस के कारण उसे अस्पताल में भरती होना पड़ा, के आधार पर रोहित और उस के 4 साथियों के विरुद्ध जांच बैठा दी गई.

17 अगस्त, 2015 को केंद्रीय श्रम मंत्री व सिकंदराबाद के सांसद बंडारू दत्तात्रेय, जोकि भाजपा में शामिल होने से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रह चुके हैं, ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक पत्र लिखा. इस पत्र में कहा गया था कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय पिछले कुछ समय से जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों की पनाहगाह बन गया है, इसलिए यहां पर ऐसा करने वालों के विरुद्ध काररवाई की जाए.

यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि एबीवीपी का नेता होने के कारण सुशील कुमार के श्रम मंत्री से अच्छे संबंध हैं. बंडारू दत्तात्रेय के पत्र के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय जिस की प्रमुख स्मृति ईरानी हैं, ने 3 सितंबर को विश्वविद्यालय को पत्र लिख कर एएसए के खिलाफ काररवाई करने को कहा. इस पत्र के मिलते ही विश्वविद्यालय ने रोहित वेमुला सहित 5 छात्रों को जांच पूरी होने तक के लिए निलंबित कर दिया. मगर मानव संसाधन मंत्रालय की दखलंदाजी यहीं नहीं रुकी और 14 सितंबर, 6 अक्तूबर, 20 अक्तूबर और 19 नवंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन को एक के बाद एक 5 रिमाइंडर भेज कर दोषियों के विरुद्ध शीघ्र काररवाई की बात दोहराई गई.

अंतत: विश्वविद्यालय की ओर से 7 जनवरी को मंत्रालय के पत्र पर काररवाई करते हुए पांचों छात्रों को विश्वविद्यालय से निष्काषित कर के तुरंत हौस्टल छोड़ने का फरमान जारी कर दिया गया. इस फरमान के जरिए इन पांचों छात्रों को निष्काषित करने के साथ ही प्रशासनिक बिल्डिंग, लाइब्रेरी, मैस, विश्वविद्यालय कैंपस और वहां के सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया. विश्वविद्यालय प्रशासन के इस फरमान के विरोध में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इन प्रदर्शनों को धार देने के लिए छात्रों ने जौइंट कमेटी फौर सोशल एक्शन बना ली.

7 जनवरी को जिस दिन रोहित का निष्कासन हुआ था, उस दिन से ही वह अपने चारों अन्य साथियों के साथ धरना देते हुए कैंपस में खुले में रात गुजार रहा था. 17 जनवरी को रविवार का दिन था. सभी छात्र बैठे बातें कर रहे थे. रोहित भी वहां मौजूद था. बातोंबातों में जिक्र निकला कि 30 जनवरी को रोहित का जन्मदिन है, वह 27 साल का हो जाएगा. इस पर रोहित ने कहा कि उस की छात्रवृत्ति गत जुलाई से रुकी हुई है और उस पर काफी कर्ज हो गया है. उस के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह अपने जन्मदिन की पार्टी  कर सके.

उस के लहजे से मायूसी झलक रही थी. प्रशासन व एबीवीपी के समर्थकों द्वारा किया गया अपमान उसे दुखी कर रहा था. शाम साढ़े 7 बजे वह सब की नजरें बचा कर न्यू रिसर्च हौस्टल के कमरा नंबर 207 में गया, जहां उस ने एक पत्र लिखा—

‘मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था. विज्ञान का लेखक, कार्ल सगन की तरह.

मैं विज्ञान से, तारों से, प्रकृति से प्रेम करता हूं, लेकिन इस के बाद भी मैं लोगों से प्यार करता हूं. यह जाने बिना भी कि मेरे लोगों को दूसरे से अलगथलग कर दिया गया है. हमारी भावनाओं को महत्त्व नहीं दिया जाता. हमारा प्रेम बनावटी है. हमारे विश्वास अंधे हैं. हमारी पहचान झूठी प्रथाओं द्वारा बनाई जाती है. वास्तव में यह बहुत कठिन हो गया है कि बिना दुख का सामना किए प्रेम किया जाए. मानव की योग्यता उस की तात्कालिक पहचान और निकट संभावनाओं तक सीमित कर दी गई है. वोट के तौर पर, गिनती के तौर पर, वस्तु के तौर पर. मनुष्य को एक विचार के तौर पर कतई नहीं लिया जाता. हर क्षेत्र में, शिक्षा में, सड़कों पर, राजनीति में और मरने व जीने में हमें अलग कर दिया गया है.

मैं इस प्रकार का पत्र पहली बार लिख रहा हूं. यह पहल भी है और अंत भी, मेरे अंतिम पत्र का. अगर आप के अनुकूल बात मैं नहीं लिख सका तो मुझे क्षमा करना. मेरा जन्म एक खतरनाक दुर्घटना थी. मैं जीवन भर अपने बचपन की तनहाई से निकल नहीं पाया. मैं एक ऐसा बच्चा था, जिसे बचपन से ही दुत्कारा गया. हो सकता है मैं गलत होऊं. मैं सारी जिंदगी संसार को नहीं समझ पाया हूं. नहीं समझ सका हूं प्यार, दर्द, जीवन और मृत्यु को. इस की कोई जल्दी भी नहीं थी. मगर इस पूरे समय में मैं ने पाया कि कुछ लोगों के लिए जीवन अभिशाप है. मुझे इस समय की चोट नहीं पहुंची, न मैं दुखी हूं. बस मेरे पास कुछ नहीं है, अपने बारे में कोई चिंता नहीं है, यह दयनीय है. यही कारण है जो मैं ऐसा कर रहा हूं.

लोग मुझे स्वार्थी, मूर्ख समझ सकते हैं, परंतु मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे बारे में लोग क्या सोचते हैं. मैं मौत के बाद की कहानियों में या भूतप्रेत में विश्वास नहीं करता. अगर इस संसार में कुछ है, जिस पर मेरा विश्वास है, वह यह कि मैं तारों की यात्रा कर सकता हूं और दूसरी दुनिया को जान सकता हूं. अगर कोई मेरे लिए कुछ कर सकता है तो वह जान ले कि पिछले 7 माह से मुझे छात्रवृत्ति नहीं मिली, जोकि 1 लाख 75 हजार रुपए बनती है. अगर हो सके तो यह मेरे परिवार को दिलवा देना. मेरे ऊपर 40 हजार रुपए रामजी के उधार हैं. उस ने कभी भी मुझ से रुपए नहीं मांगे. मेरा अंतिम संस्कार शांति से और सादे तरीके से करना, ठीक उसी तरह से जिस तरह मैं इस दुनिया में आया और इस दुनिया से जा रहा हूं. मेरे लिए कोई आंसू नहीं बहाना. जान लें कि जिंदा रहने के मुकाबले मर कर मैं खुश हूं.

भाई उमा, मैं यह सब तुम्हारे कमरे में कर रहा हूं इस के लिए मुझे माफ करना. एएसए परिवार से भी उन्हें मायूस करने के लिए माफी चाहता हूं. आप सब मुझ से बहुत प्यार करते हैं, यह मैं जानता हूं. मैं कामना करता हूं कि आप सब का भविष्य सुनहरा हो. अंतिम बार जय भीम.

हां, मैं औपचारिकताएं लिखना भूल गया. मेरी आत्महत्या के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है. किसी ने भी मुझे ऐसा करने के लिए नहीं उकसाया, न अपने कृत्यों से, न शब्दों से. यह मेरा निर्णय है. इस के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं. मेरे दोस्तों और दुश्मनों को परेशान मत करना, मेरे जाने के बाद.’ इस के बाद रोहित वेमुला ने एएसए के नीले झंडे को अपने शरीर पर लपेट कर छत में लगे कुंडे से लटक कर अपना जीवन समाप्त कर लिया. आधी रात के बाद जब उमा, प्रशांत के साथ कमरा नंबर 207 में आया तो उसे रोहित द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने का पता चला, जिस की सूचना पुलिस को दे दी गई.

रोहित के साथी प्रशांत ने थाना गाची बावली में उस की आत्महत्या के लिए 3 लोगों को जिम्मेदार ठहराते हुए एफआईआर दर्ज कराई. इन के नाम हैं—केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, उपकुलपति अप्पा राव और एबीवीपी नेता सुशील कुमार. 18 जनवरी को जैसे ही यह समाचार देश में फैला, इस मामले की परतें उधड़ने लगीं. एक कमजोर शिक्षा मंत्री की काररवाई के नतीजे के तौर पर इसे आत्महत्या न मान कर हत्या माना गया. क्योंकि शिक्षा से संबंधित शिकायतों पर जो मंत्रालय काररवाई नहीं करता, उसी ने एक दूसरे मंत्री के पत्र पर ताबड़तोड़ पत्र लिख कर काररवाई करने की मांग की.

यह पहला अवसर नहीं है जब बंडारू दत्तात्रेय जैसे केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता ने विरोधी विचारधारा के लोगों व छात्रों को राष्ट्रदोही व अवांछित तत्व करार दिया हो. 14 मई, 2014 के बाद से भाजपा नेता कई विश्वविद्यालयों के बारे में कह चुके हैं कि ये राष्ट्रद्रोही तत्वों की पनाहगाह हैं. मजे की बात यह कि ये सारे विश्वविद्यालय वे हैं, जिन की शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान है. आईआईटी मद्रास हो, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय हो या अब हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, भाजपाइयों को इस प्रकार के सारे संस्थान राष्ट्रद्रोहियों के गढ़ नजर आते हैं.

रोहित की आत्महत्या केवल एक छात्र की मौत नहीं है. यह मौत दर्शाती है दलित छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को. भाजपा के शासनकाल में यह भेदभाव अपने चरम की ओर अग्रसर है. कहने को तो मोदीजी अंबेडकर को महान नेता बताते हुए उन का गुणगान करते हैं, मगर उन के अधीनस्थ मंत्री व नेता अंबेडकरवादियों को राष्ट्रविरोधी कहते नहीं थक रहे हैं.

क्या यह असहिष्णुता नहीं है कि कालेज में हुए विरोध प्रदर्शन के कारण एक समुदाय को राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाए, उन का भविष्य चौपट कर दिया जाए? और अब जब इस मामले में सीधे तौर पर बंडारू दत्तात्रेय और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की भूमिकाएं शक के दायरे में हों तो भाजपा कह रही है कि इस मामले को तूल नहीं दिया जाए, यह तो छात्र के मन में उपजी निराशा का परिणाम था. इस का दलित या गैरदलित राजनीति से कोई संबंध नहीं है.

अपनी बात को सही साबित करने के लिए 20 जनवरी को स्मृति ईरानी ने प्रेस कौन्फ्रैंस की, जिस में कहा गया कि रोहित के निष्कासन का निर्णय जिस उपसमिति ने किया था, उस का मुखिया एक दलित ही था और यह एक दलित द्वारा दलित के विरुद्ध की गई काररवाई थी. स्मृति ईरानी के इस बयान को दिए 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित प्रोफेसरों ने ईरानी के बयान का खंडन करते हुए कहा कि जिस उपसमिति ने रोहित और उस के 4 साथियों के निष्कासन का निर्णय लिया था, उस में कोई भी दलित नहीं था, सारे के सारे सदस्य गैरदलित थे.

यहां तक कि स्मृति ईरानी के बयान को भ्रामक बताते हुए विश्वविद्यालय के 15 प्रोफेसरों ने अपने प्रशासनिक पदों से त्यागपत्र दे दिया. उन्होंने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्री का यह कहना कि उपरोक्त निर्णय में दलित फैकल्टी की सहमति शामिल थी, एकदम निराधार और झूठ है. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि विश्वविद्यालय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में किसी भी दलित को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है. मंत्री महोदया देश को गुमराह कर रही हैं. मुद्दों को भटका कर अपनी जिम्मेदारी से भाग रही हैं.

बात को बढ़ती देख दलित छात्रों के समर्थन में राजनीतिक दल भी कूद गए. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कम्युनिस्ट ए. राजा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी छात्रों के समर्थन में हैदराबाद विश्वविद्यालय पहुंचे. साथ ही रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले को ले कर देश भर में विरोध प्रदर्शन किए गए. विश्व भर के 150 से ज्यादा विख्यात शिक्षाविदों ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा की गई काररवाही की कड़े शब्दों में निंदा की.

जहां एक ओर प्रधानमंत्री अपने भाषण में भारत को विश्वगुरु बनाने की जोरशोर से घोषणा करते हैं, वहीं दूसरी ओर देश में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, जो एक सभ्य समाज के लिए कलंक है. गाहेबगाहे ऐसी घटनाओं के पीछे अधिकतर प्रधानमंत्री के सिपहसालारों की कारगुजारियां नजर आती हैं. पुलिस ने केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और 2 अन्य के खिलाफ भादंवि की धारा 306 के तहत केस दर्ज कर लिया है. अब देखना यह है कि कानून आगे का अपना काम करता है या नहीं? मोदीजी अपने उतावले मंत्रियों के विरुद्ध काररवाई करने का मन बनाते हैं या नहीं? वैसे इस की उम्मीद कम ही है कि प्रधानमंत्री इस बार भी कोई कदम उठाएंगे.

लगता है, जिस प्रकार रोहित ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि मेरे ऊपर इस का कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई मेरे बारे में क्या सोचता है, ठीक उसी प्रकार मोदीजी भी सोचते हैं कि कोई कुछ भी कहता रहे, उन पर इस का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वैसे बताते चलें कि 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ की अंबेडकर यूनिवर्सिटी में भाषण देते हुए भावुक हो कर रोहित वेमुला का नाम ले कर कहा है कि भारत मां ने एक लाल खोया है. लेकिन उन वे आंसू राजनीति से प्रेरित थे. उस राजनीति से प्रेरित जिस का कोई चालचरित्र और चेहरा नहीं होता, जो गिरगिट की तरह रंग बदलता है.

हालांकि सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक आयोग भी बैठा दिया है और रोहित वेमुला के परिवार को 8 लाख रुपए सहायता राशि देने की भी घोषणा की है. जबकि धरना और विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने रोहित वेमुला के परिवार को 50 लाख रुपए और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग की है. बौक्स 3 अगस्त को जब इस घटनाक्रम की शुरुआत हुई तो उस समय केंद्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति आर.पी. शर्मा थे. कहा जाता है कि उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने जो जांच कमेटी बनाई थी, उस ने पांचों दलित छात्रों को क्लीन चिट दे दी थी. क्योंकि एबीवीपी से जुड़ा छात्र सुशील कुमार जिस अस्पताल में दाखिल हुआ था, उस के रिकौर्ड के अनुसार वह वहां पर अपेंडीसाइटिस के औपरेशन के लिए दाखिल हुआ था, उस के शरीर पर कोई चोट का निशान नहीं था.

23 सितंबर, 2015 को नए उपकुलपति अप्पा राव ने इस विश्वविद्यालय का कार्यभार संभाल लिया है. उसी समय मानव संसाधन विकास मंत्रालय बहुत गतिशील हो गया. 24 सितंबर को ही रिमाइंडर भेज दिया कि जवाब दें कि दलित छात्र रोहित वेमुला और उस के साथियों के विरुद्ध क्या काररवाई हुई. इस के बाद एक के बाद एक पांच रिमाइंडर भेजे गए. आखिरकार 7 जनवरी को इन पांचों छात्रों रोहित वेमुला, डी प्रशांत, पी. विजय कुमार, शैषैया चेमुदुगुंटा और सुकन्ना को निलंबित कर दिया गया था, जिस के परिणामस्वरूप रोहित ने आत्महत्या की थी.

Bollywood News: सितारों की हलचल

Bollywood News: दीपिका पादुकोण बौलीवुड की पहली पंक्ति की हीरोइनों में हैं. उन्हें ले कर फिल्म बनाने वाला कोई भी निर्माता उसी तरह खुद पर गर्व कर सकता है, जैसे शाहरुख, सलमान या आमिर खान के साथ काम करने पर गर्व करता है. दीपिका खूबसूरत ही नहीं, बहुत अच्छी अदाकारा भी हैं. ‘ओम शांति ओम’ के बाद उन्होंने अलगअलग नायकों के साथ आधा दरजन हिट और सुपरहिट फिल्में दी हैं. उन की हालिया रिलीज संजय लीला भंसाली की ‘बाजीराव मस्तानी’ भी हिट फिल्म में है, जिस में उन्होंने मस्तानी की भूमिका निभाई है.

इतनी बड़ी हीरोइन होते हुए भी दीपिका के पास फिल्में नहीं हैं तो इस का कारण वह खुद हैं. उन का कहना है कि कोई जरूरी नहीं कि आप फिल्मों में ही काम करते रहें. आखिर जिंदगी में और भी तो काम होते हैं. इंसान को व्यस्त रहना चाहिए, जो मैं हूं. वैसे इस की वजह यह भी है कि दीपिका बड़े प्रोजैक्ट में बड़े सितारों के साथ काम करना चाहती हैं, जबकि चोटी का कोई भी सितारा फिलहाल खाली नहीं है.

वैसे बौलीवुड में अटकलें लग रही हैं कि दीपिका प्रियंका चोपड़ा की तरह हौलीवुड का रुख करना चाहती हैं. चर्चा है कि वह हौलीवुड की फिल्म सीरीज ‘एक्सएक्सएक्स’ की अगली फिल्म में काम करने जा रही हैं. इस सीरीज की फिल्में हौलीवुड अभिनेता विन डीजल की एक्शन से भरपूर फिल्में होती हैं. वैसे बताते चलें कि इस सीरीज की फिल्मों को दोयम दरजे की माना जाता है.

दीपिका के इस कदम को बौलीवुड में हैरानी से देखा जा रहा है. कारण यह कि जिस बुलंदी पर वह हैं, वहां रहते उन्हें किसी भी बड़ी हौलीवुड फिल्म में आसानी से काम मिल सकता था. इस से पहले उन्हें ब्लौकबस्टर हौलीवुड फिल्म सीरीज ‘फास्ट ऐंड फ्यूरियस’ में काम करने का औफर भी मिला था. लेकिन डेट्स की प्रौब्लम की वजह से उन्होंने इनकार कर दिया था.

ज्ञातव्य हो बौलीवुड के कई सितारे हौलीवुड की फिल्मों में काम कर चुके हैं. हीरोइनों की बात करें तो नरगिस फाखरी ने हौलीवुड फिल्म ‘स्पाई’ में और प्रियंका चोपड़ा ने अमेरिकी धारावाहिक ‘क्वांटिको’ में काम किया है. जाहिर है, दीपिका को हौलीवुड में इस से भी बड़ा औफर मिल सकता था. लेकिन उन्होंने ऐसे किसी औफर का इंतजार न कर के ट्रिपल एक्स सीरीज की फिल्म में काम करना स्वीकार कर लिया, जो ताज्जुब की बात है. इस बात पर मुहर लगाने के लिए उन्होंने हाल ही में इंटरनेट पर विन डीजल के साथ अपनी एक तसवीर भी पोस्ट की है.

ट्रिपल एक्स सीरीज की फिल्में अकसर हीरो केंद्रित होती हैं, हीरोइन का इन में नाममात्र का रोल होता है. बेशक इस सीरीज की फिल्म में दीपिका का रोल बड़ा हो न हो, इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह फिल्म बड़ी हिट होगी. क्योंकि विन डीजल की सभी हालिया फिल्मों ने बहुत अच्छा बिजनैस किया है. Bollywood News

 

 

 

 

 

 

Cyber Crime: एमबीए ठगों का जाल

Cyber Crime: रिहान के पास एमबीए की डिग्री थी. वह कोई अच्छी नौकरी या काम कर सकता था, लेकिन उस के फितरती दिमाग में इंटरनेट के जरिए लोगों को ठगने का ऐसा आइडिया आया, जिस ने उसे साथियों के साथ जेल पहुंचा दिया. समाज में ऐसे युवाओं की कमी नहीं है, जो आधुनिकता की चकाचौंध से प्रभावित हो कर बहुत कम समय में सफलताओं की इमारत खड़ी करने के सपने देखते हैं. वे सोचते हैं कि उन के पास सभी भौतिक सुविधाएं और ढेर सारी दौलत हो.

महत्त्वाकांक्षाओं की हवाएं जब उन के दिलोदिमाग में सनसनाती हैं तो सोच खुदबखुद इस की गुलाम हो जाती है. सोच की यह गुलामी उन्हें इसलिए बुरी भी नहीं लगती, क्योंकि इस से उन्हें ख्वाबों में कल्पनाओं के खूबसूरत महल नजर आने लगते हैं. रिहान भी कुछ ऐसी ही सोच का शिकार था.

एमबीए पास कंप्यूटर एक्सपर्ट रिहान का ख्वाब था कि किसी भी तरह उस के पास इतनी दौलत आ जाए कि जिंदगी ऐशोआराम से बीते. यह कैसे हो, इस के लिए वक्त के दरिया में तैराकी करते हुए वह दिनरात अपने दिमाग को दौड़ाता रहता था. कुछ विचार उसे सही नजर आए, मगर उन विचारों को क्रियान्वित करने के लिए पैसों की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थे. क्योंकि वह बेरोजगारी की गर्दिश झेल रहा था. लिहाजा उन विचारों का उस के लिए कोई महत्त्व नहीं रहा.

फिलहाल उस के सामने सब से बड़ी समस्या पैसों की थी, इसलिए वह अपने लिए सही नौकरी तलाशने लगा. इस के लिए उस ने कई जगह हाथपैर मारे, लेकिन जब उसे मन मुताबिक नौकरी नहीं मिली तो उस ने सन 2014 में एक फाइनैंस कंपनी में नौकरी कर ली. यह कंपनी लोगों को विभिन्न बैंकों से लोन दिलाने का काम करती थी. इस के बदले वह लोन लेने वालों से तयशुदा कमीशन लेती थी.

रिहान उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर स्थित कोतवाली क्षेत्र की पुरानी तहसील मोहल्ले का रहने वाला था. उस के पिता अख्तर नवाज का कई सालों पहले इंतकाल हो गया था. पति की मौत के सदमे में मां का साया भी उस के सिर से उठ गया. रिहान उन का एकलौता बेटा था. बाद में उस के चाचा मजहर ने न सिर्फ उस की परवरिश की, बल्कि उन्होंने उसे बेहतर तालीम भी दिलाई. रिहान लंबातगड़ा, आकर्षक कदकाठी का युवक था. उस का लाइफस्टाइल भी आधुनिक था. वह जितना कमाता था, उस से उस के महंगे शौक भी मुश्किल से पूरे होते थे. महत्त्वाकांक्षी होने के साथसाथ वह तेजतर्रार भी था.

जिस फाइनैंस कंपनी में वह नौकरी कर रहा था, वहां काम करतेकरते उसे यह बात समझ में आ गई थी कि यह कंपनी पाकसाफ काम नहीं करती, बल्कि लोगों को सपनों में उलझा कर उन के साथ ठगी करती है. एक दिन औफिस में उस के सामने जो वाकया पेश आया, उस से इस बात की पुष्टि तो हो ही गई, साथ ही उसे भी कुछ ऐसा ही काम करने की प्रेरणा मिल गई. दरअसल, एक दिन औफिस में एक ग्राहक आ कर झगड़ने लगा. लोन पास कराने के लिए उस ने कंपनी को 25 हजार रुपए फाइल खर्च व अन्य खर्चों के नाम पर जमा कर दिए थे. इस के बावजूद भी कंपनी वाले उसे लोन नहीं दिला रहे थे. इस के लिए वह पहले भी कई बार औफिस के चक्कर लगा चुका था, लेकिन उस दिन वह गुस्से में दिखाई पड़ रहा था.

औफिस में आते ही वह रिसैप्शनिस्ट के सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गया. फिर उस से मुखातिब होते हुए बोला, ‘‘आज तो मैं कुछ फैसला कर के ही जाऊंगा. पैसे लेने के बावजूद भी मुझे लोन नहीं दिलाया जा रहा, मेरा काम नहीं हो रहा है तो मेरे पैसे वापस करो.’’

उस के तीखे तेवर देख कर रिसैप्शनिस्ट ने उसे समझाने की नाकाम कोशिश की, ‘‘सर, हम कोशिश कर रहे हैं.’’

इस पर वह और भी भड़क गया, ‘‘कोशिश तो आप कई महीनों से कर रहे हैं. बताओ उस का क्या नतीजा निकला? आप को पता है मैं पंजाब से यहां आताजाता हूं. कितने पैसे तो मैं किराए में ही खर्च कर चुका हूं, लेकिन आप लोग मेरी बात को समझ ही नहीं रहे.’’

शोर सुन कर रिहान भी वहीं आ कर खड़ा हो गया था. ग्राहक को समझाते हुए रिसैप्शनिस्ट बोली, ‘‘सौरी सर, आज तो बौस यहां नहीं हैं.’’

यह सुन रिहान को झटका लगा, क्योंकि कंपनी का बौस तो उस समय औफिस में बने अपनी केबिन में ही था.

रिसैप्शनिस्ट की बात से नाराज ग्राहक सख्ती से बोला, ‘‘मैं आज यहां से जाने वाला नहीं हूं. आप उन्हें अभी फोन मिलाइए और पूछिए कि मेरे पैसे कब मिलेंगे?’’

‘‘ओके सर,’’ उस के अडि़यल रुख को देखते हुए रिसैप्शनिस्ट ने तुरंत ही टेबल पर रखे टेलीफोन का स्पीकर औन कर के एक नंबर डायल कर दिया. तभी दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘उपभोक्ता का मोबाइल अभी स्विच औफ है. कृपया थोड़ी देर बाद डायल करें.’ इस के बाद रिसैप्शनिस्ट उस ग्राहक से शांत लहजे में बोली, ‘‘सर, आप फिर कभी आइए, अभी तो सर से बात नहीं हो पा रही है. मैं आप के सामने ही नंबर मिला रही हूं. उन का मोबाइल अभी बंद है.’’

‘‘ओजी ठीक है. मैं फिर आऊंगा और अब की बार अपने पैसे ले कर ही जाऊंगा.’’ खड़े होते हुए वह पंजाबी लहजे में बोला और गुस्से से पैर पटकता हुआ औफिस से निकल गया.

यह सब देख कर रिहान सोच में पड़ गया. इस की वजह भी थी क्योंकि कंपनी के बौस उस समय औफिस में ही थे और दूसरे उन का मोबाइल कभी बंद ही नहीं रहता था. इस बात को भी वह अच्छी तरह से जानता था. जिज्ञासावश उस ने रिसैप्शनिस्ट से पूछा, ‘‘मैडम, बौस का मोबाइल तो कभी बंद नहीं रहता, फिर यह सब…’’

उस की बात पर पहले वह खिलखिला कर हंसी, फिर रहस्यमय अंदाज में बोली, ‘‘रिहान अभी तुम नहीं समझोगे ये सब बातें.’’

‘‘मतलब… अब तो मैडम आप को बताना ही होगा.’’ रिहान ने जिद की.

उस की जिद पर रिसैप्शनिस्ट ने टेबल पर रखे फोन की तरफ इशारा करते हुए बताया, ‘‘रिहान, जब हम इस से बौस का नंबर डायल करते हैं तो हमेशा यही संदेश सुनने को मिलेगा. दरअसल बौस ने अपने मोबाइल में औटोमैटिक सौफ्टवेयर डाला हुआ है. ऐसे ग्राहकों से पीछा छुड़ाने के लिए यही तरीका अपनाना पड़ता है.’’

इन सब बातों से रिहान का दिमाग घूम गया. वह तुरंत एक फाइल के बहाने बौस के केबिन में दाखिल हुआ. उस समय बौस फोन से किसी से बातें कर रहे थे. अब उसे पक्का विश्वास हो गया कि रिसैप्शनिस्ट जो कह रही थी, बिलकुल सच था. उस दिन के बाद रिहान ने कंपनी के काम को और भी जिज्ञासा से समझना शुरू कर दिया. कुछ ही दिनों में पूरी तरह उस की समझ में आ गया कि कंपनी वास्तव में लोगों को लोन दिलाने का ख्वाब दिखा कर ठगी का धंधा करती है. उस के दिमाग में विचार आया कि जिस तरह से यह कंपनी लोगों को बेवकूफ बना कर पैसे ठग रही है, इसी तरह से वह भी लाखों रुपए कमा सकता है.

कंपनी जिस तरह से लोगों को झांसे में लेती थी, उस तरीके को वह यहां काम करते हुए अच्छी तरह से जान गया था. वह इस काम की बारीकियों को भी समझ चुका था. इस कंपनी में सैयद बिलाल उर्फ समी मलिक व अब्दुल बारी भी नौकरी करते थे. ये दोनों युवक भी मेरठ के ही रहने वाले थे. सैयद बिलाल तो उसी की तरह एमबीए पास था. रिहान के पास भी ऊंची तालीम थी. वह चाहता तो कोई अच्छी नौकरी या व्यवसाय कर सकता था, लेकिन उस का दिमाग गलत दिशा में दौड़ने लगा. उस ने मन ही मन सोच लिया कि वह भी अपनी खुद की ऐसी कंपनी खड़ी कर के करोड़ों रुपए कमाएगा.

इस मुद्दे पर रिहान अपने साथियों सैयद बिलाल और अब्दुल बारी से बात की तो वे भी उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. जल्दी ही ज्यादा पैसे कमाने के लालच में तीनों ने एक साथ उस फाइनैंस कंपनी से नौकरी छोड़ दी. लोगों को कंपनी के जाल में उलझाया जा सके, इस के लिए इंटरनेट वेबसाइट का रजिस्ट्रेशन जरूरी था. कंपनी को चूंकि धंधा ही ठगी का करना था, इसलिए वे रजिस्ट्रेशन अपने असली नाम से नहीं कराना चाहते थे.

रिहान ने आकाश शिंदे के नाम से फरजी प्रमाणपत्र बनवाए और उन के माध्यम से एडिशन कारपोरेशन फाइनैंस डौट काम नाम की वेबसाइट बनवाई. इस के बाद उन्होंने शहर के वैस्टर्न कचहरी मार्ग पर कंपनी का एक औफिस भी खोल लिया. औफिस में उन्होंने जरूरी स्टाफ भी रख लिया. यह जनवरी, 2015 की बात थी. उन्होंने वेबसाइट पर दावा किया कि कंपनी विभिन्न बैंकों से हर तरह के लोन दिलाती है. कंपनी का सब से आकर्षक औफर न्यूनतम 4 प्रतिशत ब्याज दर पर लोन दिलाने का था. समाज में ऐसे जरूरतमंद लोगों की कमी नहीं, जिन्हें लोन की जरूरत रहती है.

कंपनी की वेबसाइट पर फरजी नामों से लिए गए मोबाइल नंबर भी दिए गए थे. उन्होंने वेबसाइट पर योजनाबद्ध तरीके से प्रचार किया था. इस का नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में उन के पास लोगों के फोन आने शुरू हो गए. फोनकर्त्ताओं से बेहद लुभावनी बातें की जातीं. उन से कहा जाता कि उन की कंपनी खुद भी लोन देती है और बैंकों से भी दिलाती है. चूंकि बैंकों के साथ उन का करार है, इसलिए उन के माध्यम से बैंक सस्ती ब्याज दरों पर लोन पास कर देती हैं. इन्हीं चिकनीचुपड़ी बातों में लोग फंसते गए. वे लोगों से फाइल चार्ज के नाम पर 5 से 25 हजार रुपए वसूलने लगे. लोगों को चूंकि बिना सख्त नियमों और आधेअधूरे कागजों के साथ मनचाहा लोन मिल जाने की उम्मीद होती थी, लिहाजा वह खुशीखुशी पैसे दे देते थे.

सपनों को बेचने का रिहान का यह धंधा ऐसा चमका कि उस की दुनिया ही बदल गई. फाइल चार्ज के नाम पर ही उन्होंने लाखों रुपए कमा लिए. इस के बाद उन्होंने धीरेधीरे कंपनी का नेटवर्क दूसरे राज्यों में फैलाना शुरू कर दिया. रिहान ने फरजी पहचानपत्रों के आधार पर बैंकों में भी खाते खुलवा लिए थे. उन्हीं खातों में वे लोगों से रकम जमा करवाते थे. उन्होंने जो वेबसाइट बनवाई थी, उस पर कंपनी का पता नहीं दिया था. वे फोन पर ही लोगों से बातें करते थे. उन की कोशिश यही होती थी कि पूरी काररवाई इंटरनेट के जरिए ही हो.

वे नजदीकी राज्यों के लोगों के बजाय उड़ीसा, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, छत्तीसगढ़, आसाम, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों के लोगों को ही अपने झांसे में लेने की कोशिश करते थे, ताकि ठगे जाने के बाद वे उन के औफिस के ज्यादा चक्कर न लगा सकें. जिस शख्स के ये पैसे ठगते, वह शख्स बारबार इन के पास फोन करता तो वे अपने फोन नंबर बदल देते थे. ठगी का अहसास होने के बावजूद कोई चाहते हुए भी इन के औफिस नहीं आ पाता था, क्योंकि औफिस उन के यहां से काफी दूर था और जो कोई इन के औफिस में कभी आ भी जाता तो उसे कोई न कोई बहाना बना कर चलता कर दिया जाता था. जो लोग इन के ऊपर ज्यादा दबाव बनाते थे, उन में से जिन लोगों के बैंक में दिए जाने वाले कागजात पूरे होते थे, उन का लोन पास करा देते थे.

धंधे में चमक आई तो उन्होंने समाचार पत्रों में भी विज्ञापन देने शुरू कर दिए. इस का भी उन्हें फायदा मिला. कंपनी का धंधा बढ़ने पर उन्होंने कई बैंकों में फरजी नामपतों पर एक दरजन से ज्यादा खाते खुलवा लिए. वे अलगअलग राज्यों के लोगों को पैसा जमा करने के लिए अलगअलग खाता नंबर देते थे. पैसे जमा होते ही वे तुरंत एटीएम कार्ड से निकाल लेते थे. ग्राहकों को उन के काम पर भरोसा रहे, इसलिए दिखावे के लिए वे अलगअलग राज्यों के स्टांप पेपर और बैंकों के फरजी चैक टेबल रखते थे. जिन्हें दिखा कर वे ग्राहकों को आश्वस्त करते थे कि कई ग्राहकों के चेक उन के यहां तैयार रखे हैं. औफिस को उन्होंने इस ढंग से सुसज्जित किया था, जिस से लगे कि यह कोई बड़ी लोन कंपनी का औफिस है.

इस बीच उन्होंने एक टेलीफोन कंपनी से सिम कार्ड बिक्री के लिए भी अनुबंध कर लिया. स्टाफ रखने में वे अधिकांश लड़कियों को प्राथमिकता देते थे, ताकि कोई ग्राहक उन से ज्यादा लड़ेझगड़े नहीं.

एक दिन 3 लोग कंपनी के औफिस पहुंचे. देखने और पहनावे से वे गुजराती लग रहे थे. रिसैप्शनिस्ट के पास पहुंचते ही एक ने कहा, ‘‘हमें प्रौपर्टी के लिए लोन चाहिए. हम लोग बहुत दूर से आए हैं.’’

‘‘आप लोग कहां से आए हैं?’’ रिसैप्शनिस्ट बोली.

‘‘जी गुजरात से.’’ उन में से एक आदमी बोला.

‘‘कितना लोन चाहिए आप को?’’ रिसैप्शनिस्ट ने पूछा.

‘‘5 करोड़.’’ उस शख्स ने कहा तो रिसैप्शनिस्ट थोड़ा चकरा गई.

‘‘इतना बड़ा लोन. इस का फाइल चार्ज भी काफी लगेगा.’’ वह बोली.

‘‘कोई बात नहीं मैडम, जो भी चार्ज होगा हम देने को तैयार हैं.’’ कहने के साथ ही उस शख्स ने जेब में हाथ डाल कर 50 हजार रुपए की गड्डी निकाल कर रिसैप्शनिस्ट के सामने रख दी.

तभी रिसैप्शनिस्ट बोली, ‘‘नहींनहीं, अभी रहने दीजिए, यह तो बाद में जमा करना होगा. आप रुकिए, मैं आप को बौस से मिलवाती हूं.’’ कह कर वह केबिन में चली गई.

इस के बाद उन तीनों गुजरातियों को भी बौस के औफिस में ले गई. उस केबिन में रिहान और बिलाल बैठे थे. उन दोनों को जब पता चला कि मोटे लोन के लिए वे लोग गुजरात से उन के पास आए हैं तो वे बहुत खुश हुए. लोन लेने के लिए जो लोग आए थे, उन्होंने यह भी बता दिया था कि उन के कुछ पेपर कम पड़ सकते हैं.

बिलाल को जब विश्वास हो गया कि पार्टी पक्की है तो वह बोला, ‘‘पेपरों की आप फिक्र न करें, उन्हें हम पूरे करा देंगे. लेकिन पेपर तैयार करने से पहले आप को फाइल चार्ज वगैरह के पैसे पहले जमा कराने होंगे.’’

‘‘ठीक है, आप जितना बोलेंगे हम कर जमा कर देंगे.’’ उन में से एक ने कहा.

बिलाल ने उन्हें एक सप्ताह के बाद अपने पेपरों के साथ आने को कहा. इस के बाद वे चले गए.

इसी बीच 2 नवंबर, 2015 को उन की कंपनी की वेबसाइट अचानक बंद हो गई. रिहान ने पहले इसे इंटरनेट व कंप्यूटर का कोई टैक्निकल फौल्ट समझा. कई घंटे बाद भी जब वह नहीं चली तो वे समझ गए कि यह वेब निर्माता कंपनी के स्तर से बंद हुई है. तब रिहान ने वेब निर्माता कंपनी के औफिस फोन किया. उन्होंने भी इसे टैक्निकल दिक्कत बताया. वेबसाइट चल पाती, उस से पहले ही 3 नवंबर को पुलिस वहां दनदनाती हुई पहुंच गई. पुलिस को देख कर औफिस में बैठे सभी लोगों के होश फाख्ता हो गए. पुलिस टीम में वे लोग भी शरीक थे, जो गुजराती क्लाइंट बन कर उन के पास आए थे. रिहान समझ गया कि उस का खेल खत्म हो चुका है.

पुलिस ने मौके से रिहान, बिलाल व अब्दुल बारी को गिरफ्तार कर लिया. औफिस की तलाशी ली गई तो वहां से 3 लैपटौप, 6 मोबाइल फोन, 2 लैंडलाइन फोन, 18 एटीएम कार्ड, 2 शौपिंग कार्ड, 6 पैन कार्ड, आधार कार्ड, 15 चैकबुक, विभिन्न राज्यों के लोगों के भरे हुए करीब साढ़े तीन सौ फार्म, 21 छोटीबड़ी मोहरें, कई राज्यों के स्टांप पेपर व अन्य कागजी सामग्री मिली. पुलिस आरोपियों को बरामद सामान के साथ थाना सिविल लाइंस ले आई और उन से पूछताछ की. पूछताछ के दौरान उन्होंने इंटरनेट के जरिए ठगी का अपना सारा खेल पुलिस को बता दिया. पुलिस ने बेहद चतुराई से उन पर शिकंजा कसा था.

दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक के एक पत्र के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय में तैनात पुलिस महानिरीक्षक (अपराध) मनोज कुमार झा ने मेरठ पुलिस को सितंबर महीने में इस संबंध में काररवाई करने के निर्देश दिए थे. एसएसपी डी.सी. दुबे ने मामले की जांच थाना सिविल लाइंस पुलिस को करने के निर्देश दिए, साथ ही उन्होंने साइबर यूनिट के प्रभारी कर्मवीर सिंह को भी इस काम में लगा दिया.

जांच में पता चला कि यह कंपनी वास्तव में लोगों के साथ ठगी का धंधा कर रही है. जो मोबाइल नंबर वेबसाइट पर दिए गए थे, जांच में वह भी फरजी आईडी प्रूफ पर लिए हुए पाए गए. जांचपड़ताल में वेबसाइट निर्माता कंपनी का पता भी लग गया. वह कंपनी मेरठ की ही थी. वेबसाइट रजिस्ट्रेशन के समय जो कागजात जमा किए थे, उन की जांच की तो वह भी फरजी पाए गए. वह कागजात आकाश शिंदे के नाम पर थे.

पुलिस को पता चल गया कि कंपनी का संचालन वैस्टर्न कचहरी रोड के एक कार्यालय से किया जा रहा है. जब साइबर युनिट प्रभारी कर्मवीर सिंह को विश्वास हो गया कि कंपनी की बुनियाद फरजीवाड़े पर टिकी है तो उन्होंने अपनी जांच से पुलिस अधीक्षक (अपराध) टी.एस. सिंह, पुलिस उपाधीक्षक एस. वीर कुमार को अवगत करा दिया. पुख्ता जानकारी मिलने के बाद एसएसपी डी.सी. दुबे ने ठगों की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया. इस टीम में थाना सिविल लाइंस प्रभारी इकबाल अहमद कलीम, सबइंसपेक्टर महेश कुमार शर्मा, कर्मवीर सिंह, कांस्टेबल अरविंद कुमार, विजय कुमार, आनंद कुमार व उमेश वर्मा को शामिल किया गया.

एक दिन पुलिस टीम के 3 सदस्य छद्म गुजराती क्लाइंट बन कर उन के औफिस पहुंचे. सदस्यों ने औफिस में जो बात की, उस से पूरा विश्वास हो गया कि ये लोग लोन दिलाने के नाम पर बहुत बड़ी ठगी कर रहे हैं. इस के बाद पुलिस ने उन ठगों की वेबसाइट ब्लौक करा दी और अगले दिन उन के औफिस में छापा मार दिया. विस्तार से की गई पूछताछ में पता चला कि रिहान और उस के साथी लाखों रुपए की ठगी कर चुके हैं. अगले दिन पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अच्छी डिग्री होने के बावजूद रिहान और उस के साथियों ने लोगों को ठगने की फितरती सोच बनाई थी, उसी सोच ने उन के भविष्य को चौपट कर दिया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. Cyber Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Suspense Hindi Story: पश्चताप की आग

Suspense Hindi Story: जिस सेठ गणपत राव की कंपनी से यशवंत राव 5 लाख रुपए गबन करना चाहता था, मरने से पहले उस ने अपनी पूरी संपत्ति उस के नाम कर दी थी.

औफिस में घुसते ही सेठ गणपत राव ने सामने कुरसी पर बैठे एकाउंटैंट यशवंत से पूछा,

‘‘कोई चैक है?’’

‘‘एक नहीं, कई हैं सर,’’ यशवंत ने मुसकरा कर कहा, ‘‘छोटीमोटी रकमों के कुल आधा दर्जन चेक हैं, एक तो काफी बड़ी रकम का है. आखिरकार चौहान ने पैसे दे ही दिए.’’

सेठ गणपत राव ने दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में उलझा कर हंसते हुए कहा, ‘‘चमत्कार हर युग में हुए हैं. उन्होंने पूरी रकम अदा कर दी है क्या?’’

‘‘जी, 50 लाख 59 हजार 6 सौ 40 रुपए का चेक है. पूरी रकम अदा कर दी है.’’

‘‘बहुत अच्छा, तब तो तुम बैंक जाने की तैयारी कर रहे होगे? बैंक जा रहे हो तो 20 लाख रुपए निकलवा लेना, मुझे गजेंद्र के यहां जाना है, वहां से लौट कर लोनावला वाली जमीन देखने जाऊंगा. हो सकता है, कुछ एडवांस देना पड़े. चेक पर तुम खुद ही दस्तखत कर लेना. तब तक मैं एक जरूरी काम निपटाए लेता हूं.’’

‘‘ठीक है, सर.’’

हमेशा से ऐसा ही होता आया था. उन दिनों से जब यशवंत नवयुवक था और यहां काम करने आया था. शुरूशुरू में इस कंपनी में केवल गणपत राव थे और सारा काम वह खुद ही देखते थे. जबकि इस समय उन की कंपनी में काफी लोग काम कर रहे थे. आजकल उन का कारोबार भी काफी अच्छा चल रहा था. वह जिस चीज में हाथ लगा देते थे, वह सोना हो जाती थी. यशवंत को उन के एकएक पैसे के बारे में पता था. सेठ गणपत राव के पास अरबों की दौलत थी. यशवंत इस बात से हैरान था कि इतनी दौलत का वह करेंगे क्या? दुनिया में उन का एक भी रिश्तेदार नहीं है. आखिर यह दौलत वह किस के लिए जमा कर रहे हैं?

सेठ गणपत राव को कामों से ही फुरसत नहीं थी. वह पैसा कब और कहां खर्च करते? वह तो बस काम करने और व्यस्त रहने के आदी थे. शायद इसीलिए यशवंत को यह कहने में जरा भी हिचक नहीं होती थी कि यह आदमी केवल काम करने के लिए जी रहा है. गणपत राव के जाते ही यशवंत ने मेज पर पड़े अखबार को उठाया तो उस की नजर सीधे आधे पृष्ठ के एक विज्ञापन पर जा कर ठहर गई, ‘‘द फ्लाइंग एज…’’

उस ने विज्ञापन की हैडिंग एक बार फिर से पढ़ी, ‘‘धूप में चमकते हिंद महासागर पर सुंदर उड़ान… मेडागास्कर की सुंदर धरती की यात्रा, जहां फूलों की सुगंध आप का स्वागत करती हैं, वहां जीवन एक नई छटा बिखेरता है.’’

विज्ञापन देख कर यशवंत के दिल में वर्षों से सोई एक चाहत अचानक अंगड़ाई ले कर जाग उठी. विदेश की अनोखी धरती की यात्रा उस की इच्छा ही नहीं थी, बल्कि जीवन का एक सपना था. लेकिन उसे गणपत राव के यहां जो वेतन मिलता था, उस में ऐसी जगहों का सिर्फ सपना ही देखा जा सकता था. इस वेतन से वह केवल शहर के ही मामूली मनोरंजन स्थलों तक जा सका था. शायद यही वजह थी कि विज्ञापन देख कर उस का मन मचल उठा था. वहां जाने की इच्छा तीव्र हो उठी थी. उस ने हमेशा की तरह इस बार भी इस इच्छा को दबाने की कोशिश की, लेकिन इस बार दबने के बजाय वह उभरती जा रही थी. शायद वह विद्रोह पर उतर आई थी.

वह उसे जितना दबाने की कोशिश कर रहा था, वह उतना ही उग्र होती जा रही थी. आखिर क्यों उस के दिमाग में यह विचार बारबार आ रहा था? क्या वह अपनी यह इच्छा पूरी नहीं कर सकता? उसे सेठ गणपत राव की ओर से चेक पर दस्तखत करने का अधिकार मिला हुआ था. बूढ़े सेठ को तो यह भी नहीं मालूम था कि उन के किस एकाउंट में कितना पैसा है. उन्होंने न जाने कितने समय से बैंक स्टेटमैंट भी नहीं देखा था. वह इधर सिर्फ तरहतरह की जायदादों में रुचि ले रहे थे या फिर निवेश के बारे में सोचते रहते थे.

यशवंत का मन ज्यादा बेचैन हुआ तो वह उठ कर टहलने लगा. उसे घूमने जाने के लिए जितने पैसों की जरूरत थी, वह उन्हें फितरत से पाना चाहता था, जिसे गबन कहा जाता है. लेकिन यह अपराध था. उस ने सोचा कि जैसे भी हो, उसे हर हालत में अपनी इस इच्छा का गला घोंट देना चाहिए. लेकिन लाख कोशिश के बावजूद वह ऐसा नहीं कर सका. इच्छा दबने के बजाय और बलवती होती जा रही थी, साथ ही पैसे हासिल करने का तरीका भी उस के दिमाग में आने लगा था. उसे लगा, जैसे कोई उस के कान में कह रहा है कि उसे घूमने जाने में परेशानी क्या है? उसे केवल एक चेक पर दस्तखत ही तो करने हैं और दस्तखत करने का अधिकार उसे सेठ गणपत राव ने दे ही दिया है.

उस ने सोचा कि मोटी रकम निकाल कर वह किसी अंजान शहर में जा कर कोई छोटामोटा कारोबार कर लेगा. इतना तो वह कमा ही लेगा, जितना सेठ गणपत राव देते हैं. उस के दिल ने कहा कि वह 3 सप्ताह की यात्रा पर जाने के लिए अगर कंपनी के एकाउंट से कुछ लाख रुपए निकाल लेता है तो परेशानी क्या है? लेकिन दिमाग ने कहा, ‘‘यह धोखेबाजी होगी. सेठ गणपत राव ने हमेशा उस से अच्छा व्यवहार किया है, आंख मूंद कर विश्वास किया है. उसी का नतीजा है कि चेक पर उसे हस्ताक्षर करने का अधिकार दिया है.’’

‘‘लेकिन गधों की तरह काम भी तो लेता है. उसे जितना वेतन मिलना चाहिए, वह भी तो नहीं देता.’’ दिल ने कहा.

‘‘फिर भी यह गलत है. अगर वह कम वेतन देता है तो उसे उस से कह देना चाहिए. उसे इस तरह चोरी नहीं करना चाहिए.’’

‘‘आखिर कुछ लाख रुपए ले लेने से उस का क्या बिगड़ जाएगा?’’

‘‘जब स्वाति बीमार हुई थी तो गणपत राव ने उस की कितनी मदद की थी.’’ दिमाग ने सलाह दी.

‘‘स्वाति? शायद वह भूल रहा है कि उस औरत की चीखों ने उसे कितना दुखी किया था. अच्छी बात यह है कि उस का कोई बच्चा नहीं है, वरना वह क्या करता? उसे इस मौके का फायदा उठा लेना चाहिए. स्वाति से भी पीछा छूट सकता है.’’ दिमाग ने तर्क किया.

यशवंत की नजरें मेज पर टिकी थीं. उस के दिल और दिमाग में द्वंद्व चल रहा था. लेकिन वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा था. आज उसे लग रहा था कि किसी ईमानदार आदमी के लिए किसी को धोखा देना कितना कठिन काम होता है. अगर सेठ गणपत राव की ओर से चेकों पर दस्तखत करने का अधिकार न मिला होता तो शायद वह उन के फरजी दस्तखत कर के रुपए निकलवा लेता. यही वजह थी कि वह उस के विश्वास की हत्या नहीं करना चाहता था.

मन था कि मान ही नहीं रहा था. उस के तर्क थे कि बस छोटे से खतरे की बात है. इच्छा पूरी करने के लिए छोटामोटा खतरा तो उठाना ही पड़ता है. लेकिन दिमाग का कहना था कि पता चलने पर गणपत राव पुलिस में रिपोर्ट कर देगा. यह भी हो सकता है कि अखबारों में विज्ञापन दे दे कि ‘तुम जहां कहीं भी हो वापस आ जाओ, तुम्हें कुछ नहीं कहा जाएगा.’

यशवंत ने पूरी ताकत से अपने मन में उठी इस इच्छा को दबाना चाहा, तब दिमाग ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम ऐसा नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, कम से कम ट्रैवेल एजेंसी तक तो जा ही सकते हो. वहां से जो प्रचार सामग्री मिलेगी, उसे तो देख ही लोगे.’’

‘‘बहुत अच्छा,’’ यशवंत धीरे से बुदबुदाया, ‘‘मैं ऐसा ही करूंगा.’’

उस पूरे सप्ताह वह काफी खुश रहा. उस ने कई ट्रैवेल एजेंसियों के चक्कर लगाए और वहां से तमाम प्रचार सामग्री ले आया. उस ने उन्हें ध्यान से और इतनी बार देखा कि उन के एकएक फोटो उस की आंखों में बस गए. अब उन तसवीरों को देखते ही उसे लगता कि वह वहां घूम रहा है. एक दिन वह अपनी सीट पर बैठा सीटी बजाते हुए उन प्रचार सामग्री को पलट रहा था कि सेठ गणपत राव उस के सामने आ कर खड़े हो गए. वह एकदम से शांत हो गया. गणपत राव ने उस की पीठ पर हाथ रख कर कहा, ‘‘क्या बात है बेटा, आज बहुत खुश नजर आ रहे हो, कहीं से दौलत तो हाथ नहीं लग गई?’’

‘‘अभी तो कुछ हाथ नहीं लगा सेठजी.’’ यशवंत ने झेंपते हुए कहा.

‘‘लौटरी वगैरह के चक्कर में मत पड़ना,’’ सेठ गणपत राव ने कहा, ‘‘अगर तुम्हें दौलत ही चाहिए तो मेहनत से कमाना. सुकून मिलेगा. गलत रास्ते से आने वाली दौलत से कभी सुकून नहीं मिलता.’’

यशवंत के दिमाग में गणपत राव की ये बातें गूंजने लगीं. इन बातों से वह नर्वस होने लगा. गणपत राव यह बात अपने स्टाफ के हर आदमी से कह चुके थे. वह मेहनत पर विश्वास करते थे और दूसरों से भी मेहनत करने के लिए कहते थे.

यशवंत बड़बड़ाया, ‘यह आदमी न जाने किस मिट्टी का बना है. हमेशा काम की ही बातें करता है. आखिर कोई आदमी जीवन में कितना काम कर सकता है? इसे तो आदमी नहीं चींटी के रूप में जन्म लेना चाहिए था, जो हमेशा काम में लगी रहती है.’

सेठ गणपत राव के बारे में दिमाग में जैसे ही कड़वाहट पैदा हुई, मन ने कहा, ‘‘अरे चेक कैश कराने के बारे में क्या सोचा? मैं कब से समझा रहा हूं कि सीधी अंगुली घी नहीं निकलता.’’

‘‘अभी बहुत समय पड़ा है.’’ दिमाग ने कहा.

‘‘मूर्ख, तुम डर रहे हो, अभी एक चेक भरो और उस पर दस्तखत कर के बैंक से कैश करा लो. आखिर इस में बुराई क्या है?’’

‘‘ठीक है, यही करता हूं.’’ दिमाग ने हार मान ली.

यशवंत का दिमाग राजी हो गया तो वह उचित मौके की तलाश में लग गया. 2 दिनों बाद सेठ गणपत राव को अपने वकील से मिलने जाना पड़ा. यशवंत को लगा, वह इस मौके का फायदा उठा सकता है. उन के आने के पहले वह चैक तैयार कर के कैश करा सकता है. वह औफिस में नहीं रहेंगे तो कोई पूछेगा भी नहीं. किसी को शक भी नहीं होगा कि कुछ गलत हुआ है.

यशवंत ने चेक बुक निकाली. उस पर तारीख डाल कर ‘पे कैश’ लिखा. लेकिन इसी के साथ डर के मारे रीढ़ की हड्डी पर छिपकली सी रेंगती महसूस हुई. क्योंकि उस ने चेक पर पहले कभी यह शब्द नहीं लिखा था. उसे लगा, चेक पर लिखे शब्द उस की विवशता पर हंस रहे हैं. वह चेक मेज पर रख कर उठ खड़ा हुआ. शायद कोई बात उसे विचलित कर रही थी.

वह अपनी केबिन में टहलने लगा. उसे लगा, स्टाफ के लोग उसे घूर रहे हैं. तो क्या उन्हें उस की नीयत का पता चल गया है? उन लोगों को कैसे पता चला कि वह धोखेबाजी करने जा रहा है? उस ने सिर झटका और भ्रम को दूर किया. उस के माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई थीं. एक बार उस ने फिर से चेक को देखा. वह सोचने लगा कि इस में कितनी रकम भरी जाए. ट्रैवेल एजेंसी से मिली प्रचार सामग्री से पता चल चुका था कि पसंदीदा जगहों पर घूमने के लिए उसे कम से कम 5 लाख रुपए की जरूरत पड़ेगी. उस ने तुरंत चेक में यह रकम भर दी.

‘‘लानत है मुझ पर.’’ उस ने खुद को कोसा, ‘‘मुझे 10 लाख रुपए लिखना चाहिए था, जब बेईमानी ही कर के घूमने जा रहा है तो मौज से घूमना चाहिए.’’

उसे हैरानी हो रही थी कि लोग लाखोंकरोड़ों का फ्रौड कैसे कर लेते हैं, जबकि वह केवल 10-5 लाख के बारे में ही सोच रहा है. उसे लगा कि अब उस ने जो रकम भर दी है, उसी में संतोष करना चाहिए. उस ने चेक पर दस्तखत किए और केबिन से बाहर आ गया.

‘‘मैं बैंक जा रहा हूं,’’ उस ने चलतेचलते साथियों से कहा. औफिस से बाहर आ कर वह पल भर के लिए रुका. बैंक पहुंचने में उसे ज्यादा समय नहीं लगता था, लेकिन आज वह सीधे बैंक जाने के बजाय इधरउधर घूमते हुए बैंक जा रहा था. वह पलटपलट कर देख भी रहा था कि कोई उसे देख तो नहीं रहा है.

उस ने किताबों की दुकान के सामने गाड़ी रोक दी और उस के ऊपर लगे बोर्ड को घूरने लगा. इस के बाद गाड़ी से उतर कर एक खोखे से सिगरेट खरीद कर सुलगाई और धीरेधीरे कश लगाते हुए गाड़ी आगे बढ़ा दी. लेकिन एक अनजान भय उसे घेरे था. उसे लग रहा था कि लोग उसे घूर रहे हैं. नजरों से ही उस की लानतमलामत कर रहे हैं. उस से कह रहे हैं कि ईमानदार होते हुए भी वह चोरी कर के बहुत बड़ा अपराध करने जा रहा है.

उस के दिमाग में आया कि उसे चेक कैश कराने में देर नहीं करनी चाहिए. जब तक वह चेक कैश नहीं करा लेता, तब तक उस के दिमाग में इसी तरह की बातें चलती रहेंगी. वह लपक कर बैंक पहुंचा. उस ने कैशियर के सामने चेक रख कर उसे नोट गिनते हुए देखने लगा. अचानक उस का दिल उछल कर हलक में आ गया. किसी ने नाम ले कर उसे पुकारा. बराबर वाले क्लर्क ने उस की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘आप को मैनेजर साहब बुला रहे हैं.’’

यशवंत का पूरा शरीर पसीने से तर हो गया. एक बार तो उस का मन किया कि वह भाग निकले. लेकिन उसे लगा कि उस की टांगों में भागने की ताकत नहीं है. मैनेजर के केबिन की चंद गज की दूरी उसे बहुत लंबी लग रही थी. मन वहां जाने का नहीं हो रहा था. उसे लगा कि कहीं सेठ गणपत राव को वकील ने यहां किसी फाइल की जरूरत तो नहीं पड़ गई. वह अपना मोबाइल औफिस में ही छोड़ आया था. औफिस में फोन किया होगा तो उन्हें बताया गया होगा कि वह बैंक गया है.

हिम्मत कर के वह मैनेजर की केबिन में दाखिल हुआ. अब तक वह काफी हद तक संभल चुका था. अभी उस ने कैशियर से रुपए लिए नहीं थे, इसलिए वह अपराधी नहीं था. इस बात ने उस का हौसला बढ़ाया. उस के केबिन में दाखिल होते ही मैनेजर ने कहा, ‘‘वकील के औफिस में सेठ गणपत राव की तबीयत अचानक खराब हो गई है. आप तुरंत लीलावती अस्पताल पहुंचिए.’’

यशवंत जैसे एक भयानक सपने से जागा. उस ने कुछ कहना चाहा, लेकिन जुबान ने साथ नहीं दिया. वह खामोशी से घूमा और दरवाजे की ओर बढ़ा. तभी कैशियर ने कहा, ‘‘यशवंत, कैश तो लेते जाइए.’’

कैशियर की बात का जवाब दिए बगैर वह कार में जा बैठा. कार तेजी से अस्पताल की ओर चल पड़ी. अगला एक घंटा उस का बेचैनी से गुजरा. वह अस्पताल पहुंचा तो सेठ गणपत राव की मौत हो चुकी थी. वकील के औफिस में उन्हें हार्टअटैक आ गया था. अस्पताल से उसे वकील के औफिस जाना पड़ा. वहां वह काफी डरा हुआ था. उसे यही लग रहा था कि वकील उसे अर्थपूर्ण नजरों से देख रहा है.

अनायास ही उस का हाथ अपने हैंड बैग की ओर बढ़ा. उस ने इत्मीनान की सांस ली कि उस ने कैशियर से पैसे नहीं लिए थे. अचानक वकील की नजरें बदल गईं. वकील ने कहा, ‘‘तुम्हें पता है सेठ गणपत राव आज मेरे औफिस क्यों आए थे?’’

‘‘नहीं…’’ वह थूक निगल कर बोला.

‘‘वह यहां वसीयतनामे पर दस्तखत करने आए थे. जैसे ही उन्होंने दस्तखत किए, उन पर दिल का दौरा पड़ गया. वह अपनी तमाम जायदाद और धनदौलत तुम्हारे नाम कर गए हैं.’’

यशवंत को अपना दिल सीने से बाहर आता महसूस हुआ. वह फटीफटी नजरों से वकील को घूरता रह गया. वकील ने उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘मुझे लगता है, तुम्हें उन की मौत का गहरा सदमा पहुंचा है. लेकिन होनी को कौन टाल सका है.’’

यशवंत ने सहमति में सिर हिलाया. वह दिल ही दिल में सोच रहा था कि उस ने बैंक से वे पांच लाख रुपए नहीं लिए, वरना शायद वह जीवन भर पश्चाताप की आग में जलता रहता. Suspense Hindi Story

Mumbai Crime Story: प्यार में उजड़ी गृहस्थी

Mumbai Crime Story: अगर कोई किसी पर सब से ज्यादा विश्वास करता है तो पहले नंबर पर आती है पत्नी और उस के बाद दोस्त. लेकिन कभीकभी ये दोनों भी दगा करने से नहीं चूकते.

मुंबई से सटे जिला थाणे की तहसील अंबरनाथ के गांव नेवाली आकृति चाल में रहने वाले कुछ लोग सुबह काम के लिए निकले तो गांव से कुछ दूरी पर घनी झाडि़यों के बीच उन्हें प्लास्टिक का एक सुंदर और बड़ा सा कैरीबैग पड़ा दिखाई दिया. तेज बारिश होने के बावजूद उस पर खून के धब्बे दिखाईं दे रहे थे. इसलिए लोगों को यही लगा कि इस में किसी की लाश भरी है. मामला गंभीर था, इसलिए थोड़ी ही देर में वहां भीड़ लग गई. किसी ने इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. वह इलाका थाना हिल लाईन के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना हिल लाईन पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के बाद ड्यूटी पर तैनात असिस्टैंट इंसपेक्टर पढ़ार ने काररवाई करते हुए सच्चाई का पता लगाने के लिए नेवाली गांव स्थित पुलिस चौकी पर तैनात सबइंसपेक्टर दंगड़ू शिवराम अहिरे और पुलिस कांस्टेबल शेषराव वाघ को घटनास्थल पर भेज दिया. सबइंसपेक्टर दगड़ू शिवराम अहिरे और कांस्टेबल शेषराव वाघ गांव नेवाली पहुंचे तो गांव से कुछ दूरी पर उन्हें भीड़ लगी दिखाई दी. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि लाश वहीं पर पड़ी है.

उन्होंने वहां जा कर सब से पहले तो उस कैरीबैग को झाडि़यों से बाहर निकलवाया. गांव वालों की मौजूदगी में जब उसे खोला गया तो उस में प्लास्टिक की मोटी थैली में एक युवक की लाश को तोड़मरोड़ कर भरा गया था. लाश बाहर निकाली गई. मृतक 27-28 साल का युवक था. किसी तेज धार वाले चाकू से उस का गला काट कर हत्या की गई थी. सांवले रंग का वह युवक शरीर से ठीकठाक था. इस का मतलब हत्या में एक से अधिक लोग शामिल रहे होंगे.

दगड़ू शिवराम अहिरे और शेषराव वाघ ने इस बात की जानकारी सीनियर इंसपेक्टर मोहन बाघमारे को दी तो वह तुरंत इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर, असिस्टैंट इंसपेक्टर मनोज सिंह चौहान, महिला सबइंसपेक्टर वी.एस. शेलार, कांस्टेबल के.बी. जाधव, दिनेश कुभारे, जी.एस. मोरे और महिला कांस्टेबल पेड़वाजे को ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.  उन के पहुंचने तक प्रैस फोटोग्राफर, डाग स्क्वायड, फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम के अलावा एडीशनल पुलिस कमिश्नर बसंत जाधव और असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर डी. जगताप वहां पहुंच चुके थे.

डाग स्क्वायड, प्रैस फोटोग्राफर और फिंगर प्रिंट ब्यूरो का काम खत्म हो गया तो घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया गया. इस के बाद लाश की शिनाख्त की बात आई तो भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने मृतक की शिनाख्त कर दी. मृतक का नाम संजय हजारे थे. वह अपनी पत्नी अनुभा, एक बच्ची और दोस्त दीपांकर पात्रा के साथ कुछ दिनों पहले ही वहां रहने आया था. मृतक की शिनाख्त होते ही मोहन बाघमारे ने एक सिपाही भेज कर मृतक की पत्नी अनुभा को घटनास्थल पर बुलवा लिया. अनुभा पति की लाश देखते ही फूटफूट कर रोने लगी. पुलिस ने उसे समझाबुझा कर शांत कराया और वहां की सारी औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला मध्यवर्ती अस्पताल भिजवा दिया.

इस के बाद पुलिस थाने लौट आई थी. थाने लौट कर मोहन बाघमारे ने अपने स्टाफ के साथ सलाहमशविरा कर के हत्या के इस मामले की जांच इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर को सौंप दी. जितेंद्र आगरकर ने सहयोगियों के साथ जांच शुरू की तो उन्हें मृतक संजय हजारे की पत्नी अनुभा और साथ रहने वाले उस के दोस्त दीपांकर पात्रा पर शक हुआ. क्योंकि घटनास्थल पर जब अनुभा रो रही थी तो उन्होंने महसूस किया था कि पति की मौत पर कोई पत्नी जिस तरह रोती है, वैसा दर्द अनुभा के रोने में नहीं था. वह दिखावे के लिए रो रही थी. इसलिए उन्होंने जांच की शुरुआत अनुभा और दीपांकर से शुरू की.

उन्होंने दोनों को थाने बुला कर पूछताछ शुरू कर दी. पुलिस ने जब अनुभा से पूछा कि यह सब कैसे हुआ तो नजरें चुराते हुए उस ने कहा कि कल रात उन का अंडे खाने का मन हुआ तो वह अंडे लेने निकले. लेकिन वह गए तो लौट कर नहीं आए. मुझे लगा कि बारिश तेज हो रही है, इसलिए वह कहीं रुक गए होंगे. रात 12 बजे तक मैं ने उन का इंतजार किया. उतनी रात तक भी वह नहीं आए तो मैं बेटी के साथ सो गई. दीपांकर पात्रा के बारे में पूछा गया तो उस ने उसे अपना मुंहबोला भाई बताया. उस से भी पूछताछ की गई. उस ने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए खुद को निर्दोष बताया.

अनुभा का बयान जितेंद्र आगरकर के गले नहीं उतर रहा था. जिस औरत का पति रात को घर न आए, भला वह निश्चिंत हो कर कैसे सो सकती है? इस के अलावा दीपांकर ने पूछताछ में जो बयान दिया था, वह अनुभा के बयान से एकदम अलग था. अनुभा ने उसे मुंहबोला भाई बताया था, जबकि दीपांकर ने खुद को उस का दूर का रिश्तेदार बताया. इसी वजह से अनुभा शक के घेरे में आ गई थी. पुलिस को लग रहा था कि किसी न किसी रूप में अनुभा पति की हत्या में शामिल है. लेकिन पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत न होने की वजह से पुलिस उस पर सीधा आरोप नहीं लगा पा रही थी.

पुलिस सबूत जुटाने के लिए वहां पहुंची, जहां संजय अनुभा के साथ पहले रहता था. क्योंकि शिनाख्त के दौरान लोगों ने बताया था कि मृतक यहां कुछ दिनों पहले ही रहने आया था. अनुभा और दीपांकर ने पूछताछ में बताया था कि यहां आने से पहले वे अंधेरी (पूर्व) के गौतमनगर में रहते थे. जितेंद्र आगरकर ने अपने सहयोगियों को गौतमनगर भेज कर संजय और उस की पत्नी के बारे में पता किया तो वहां से पता चला कि संजय और उस की पत्नी अनुभा के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था. झगड़े की वजह थी अनुभा के संजीव शिनारौय के साथ के अवैध संबंध.

संजीव पहले उन के साथ ही रहता था. बाद में उसे अलग कर दिया गया था. इस के बावजूद अनुभा उस से मिलती रहती थी. जांच टीम के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस ने तुरंत संजीव को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो हर अभियुक्त की तरह उस ने भी पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस को पूरा विश्वास था कि हत्या इसी ने की है, इसलिए पुलिस ने उस से सच उगलवा ही लिया. इस के बाद अनुभा को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में अनुभा और संजीव ने संजय की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस तरह थी.

संजय हजारे पश्चिम बंगाल के जिला 24 परगना के वीरभूम का रहने वाला था. चूंकि उस के यहां सोनेचांदी के गहने बनाने और उन पर नक्काशी करने का काम होता आया था, इसलिए थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के वह भी यही काम करने लगा था. गांव में उस की एक छोटी सी दुकान थी, जिस से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि परिवार का गुजरबसर आराम से होता. मुंबई मेहनती और महत्त्वाकांक्षी युवकों के सपनों की नगरी है. संजय भी घर वालों से इजाजत ले कर सन 2005 में मुंबई आ गया था.

मुंबई में उस के गांव के कई लड़के पहले से ही रहते थे, इसलिए मुंबई में संजय को किसी तरह की परेशानी नहीं हुई. वह उन्हीं के साथ रह कर सोनेचांदी के गहने बनाने और उन पर नक्काशी का काम करने लगा. कुछ दिनों तक इधरउधर काम करने के बाद बोरीवली की एक बड़ी फर्म में उसे काम मिल गया. यहां उसे ठीकठाक पैसे मिलने लगे. ठीकठाक कमाई होने लगी तो पैसे इकट्ठा कर के उस ने अंधेरी (पूर्व) के गौतमनगर में एक मकान खरीद लिया.

वह अकेला ही रहता था, इसलिए दीपांकर और संजीव को भी उस ने अपने साथ रख लिया. संजीव उसी के गांव का रहने वाला था, जबकि दीपांकर पात्रा दूसरे गांव का रहने वाला था, बाद में दीपांकर ने ही उस की शादी अपनी दूर की रिश्तेदार अनुभा से करा दी. वह उस का रिश्तेदार हो गया. यह सन 2001 की बात है. चूंकि संजय के पास अपना मकान था, इसलिए शादी के बाद वह पत्नी अनुभा को मुंबई ले आया. उस के मकान में 2 कमरे थे. इसलिए अनुभा के आने के बाद भी उस के दोनों दोस्त भी उसी के साथ रहते रहे. साल भर बाद अनुभा ने एक बेटी को जन्म दिया. सभी उस बच्ची को खूब प्यार करते थे. उन के लिए वह खिलौने की तरह थी, इसलिए वे उसे खूब खेलाया करते थे.

कहा जाता है कि आदमी की नीयत कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता है. ऐसा ही संजीव के साथ हुआ. इस की नीयत अनुभा पर बिगड़ने लगी. उस की नीयत खराब हुई तो वह उस के नजदीक जाने की कोशिश करने लगा. देखने में भले ही सब कुछ पहले की तरह ठीकठाक लग रहा था, लेकिन ऐसा था नहीं. अब अनुभा को देखते ही संजीव का मन मचल उठता था. उसे संजय से ईर्ष्या होने लगी थी. जल्दी ही अनुभा को भी संजीव के दिल की बात का आभास हो गया. संजीव उस के ज्यादा से ज्यादा नजदीक आने की कोशिश में लगा था. सभी सुबह काम पर जाते तो शाम को ही आते. सब साथसाथ खाना खाते हंसीमजाक करते और फिर सो जाते.

2 कमरे के उस मकान में एक कमरे में संजय अपनी पत्नी के साथ सोता था तो दूसरे कमरे में दीपांकर और संजीव. संजीव संजय और अनुभा की बातें तथा हंसीठिठोली सुनता तो उस के सीने पर सांप लोटने लगता. उसे संजय से जलन होने लगती. वह सोचता कि काश संजय की जगह अनुभा उस की बांहों में होती. आखिर संजीव का यह सपना पूरा हो ही गया. अनुभा गर्भवती हुई थी तो संजय से ज्यादा संजीव उस का खयाल रखता था. जब कभी संजय काम अधिक होने की वजह से देर में आता तो संजीव समय पर घर आ कर घर के कामों में अनुभा की मदद ही नहीं करता, बल्कि उस के खानेपीने का भी ध्यान रखता.

उस की इस सेवा का अनुभा पर खासा असर पड़ा और न चाहते हुए भी वह उस की ओर खिंचती चली गई. बेटी पैदा होने के बाद कुछ ऐसा संयोग बना कि दोनों के बीच की मर्यादा की दीवार ही ढह गई. पहली बार मर्यादा की दीवार टूटी थी तो दोनों को अपने किए पर पछतावा हुआ था. लेकिन जो नहीं होना चाहिए था, वह हो चुका था. भले ही उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ था, लेकिन उन के कदम यहीं रुके नहीं. आगे भी अनुभा और संजीव को जब भी मौका मिला, वे संजय के साथ विश्वासघात करने से नहीं चूके.

अनुभा और संजीव जो भी करते थे, पूरे चौकस हो कर करते थे, लेकिन उन के ये संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. संजय को पत्नी और संजीव के संबंधों के बारे में पता चल ही गया. काम पर तो तीनों साथसाथ जाते थे, लेकिन कोई न कोई बहाना कर के संजीव बीच में आ जाता था. अनुभा के साथ मौजमस्ती कर के वह फिर काम पर पहुंच जाता. ऐसे में पड़ोसियों को शक हुआ तो उन्होंने यह बात संजय को बताई. संजय को उन की बात पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि उसे अपने दोस्तों और पत्नी पर पूरा भरोसा था.

अनुभा और संजीव संजय के इसी विश्वास का फायदा 3 सालों तक उठाते रहे. आखिर एक दिन जब उस ने अपनी आंखों से दोनों को एकदूसरे की बांहों में देख लिया तो उसे अनुभा और संजीव की इस बेवफाई से गहरा आघात लगा. उस ने संजीव को खूब खरीखोटी सुनाई और उसी समय घर से निकाल दिया. पत्नी को भी उस ने खूब धिक्कारा. संजीव ने संजय का घर भले छोड़ दिया, लेकिन अनुभा को नहीं छोड़ा. अनुभा से अपने संबंध रखे रहा. मौका मिलते ही वह अनुभा के पास आ जाता और इच्छा पूरी कर के चला जाता. इस में अनुभा भी उस की मदद करती थी.

इस बात को ले कर संजय और अनुभा के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था. बात बढ़ जाती तो संजय अनुभा की पिटाई भी कर देता था. लेकिन मारनेपीटने और समझाने का अनुभा पर कोई असर नहीं हुआ. तब संजय ने अनुभा को संजीव से अलग करने का दूसरा उपाय सोचा. परिचितों की मदद से उस ने अपना गौतमनगर वाला मकान बेच दिया और अंबरनाथ तहसील के नेवाली गांव की आकृति चाल में एक अच्छा सा मकान खरीद लिया. 12 नवंबर, 2015 को पूजापाठ करा कर वह पत्नी अनुभा, बेटी और दीपांकर के साथ उस में रहने आ गया.

नेवाली आने के बाद संजय को लगा कि अब संजीव अनुभा की जिंदगी से निकल जाएगा. अनुभा भी धीरेधीरे उसे भूल जाएगी. यह सोच कर संजय अपने काम में व्यस्त हो गया. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. न तो संजीव अनुभा को भूल पाया और न अनुभा ही उसे दिल से निकाल पाई. अनुभा से अलग हुए संजीव को 10 दिन भी नहीं हुए थे कि वह उस के लिए तड़प उठा. यही हाल अनुभा का भी था. दीपावली का त्योहार नजदीक था, इसलिए काम ज्यादा था. संजय को रात में भी काम करना पड़ता था. इस बात की जानकारी संजीव को थी ही, इसलिए जब संजय रात को काम के लिए कंपनी में रुक जाता तो संजीव उस के घर पहुंच जाता.

एक रात तबीयत खराब होने पर संजय अचानक घर पहुंचा तो वहां संजीव को देख कर दंग रह गया. संजय को देख कर संजीव और अनुभा के जहां होश उड़ गए, वहीं संजय का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा. उस के गुस्से को देख कर संजीव तो भाग गया, लेकिन अनुभा कहां जाती. संजय ने सारा गुस्सा उसी पर उतार दिया. उस ने उस दिन उस की जम कर पिटाई की. पत्नी को मारपीट कर वह घर से बाहर निकल गया. संजय के घर से बाहर जाने के बाद कुछ देर तक तो अनुभा रोती रही, उस के बाद उसे अपने और संजीव के बीच रोड़ा बनने वाले संजय से इस तरह नफरत हुई कि उस ने तुरंत एक खतरनाक फैसला ले लिया.

उस ने उसी समय संजीव को फोन कर के कहा, ‘‘संजीव, अब बहुत हो चुका. संजय को अपने रास्ते से हटाना ही होगा. हमारे संबंधों को ले कर जब देखो तब वह मुझे मारता रहता है. शहर से ले कर गांव तक मुझे बदनाम भी कर दिया है. मेरा जीना हराम हो गया है. उस ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा है. लोग मुझ पर थूक रहे हैं. इसलिए मैं चाहती हूं इस किस्से को ही खत्म कर दिए जाए.’’

अनुभा की बात सुन कर संजीव का दिमाग घूम गया. उस ने अनुभा को धीरज बंधाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, मैं उस की व्यवस्था कर दूंगा.’’

‘‘तुम कल साढ़े 8 बजे आ जाना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ अनुभा ने कहा और फोन काट दिया.

23 नवंबर, 2015 को संजीव ने बाजार जा कर एक तेज धार वाला चाकू खरीदा और ठीक समय पर संजय के घर पहुंच गया. संजय उस समय तक घर नहीं आया था. अनुभा ने उसे पीछे वाले कमरे में छिपा दिया और संजय के आने का इंतजार करने लगी. उस समय दीपांकर घर पर नहीं था. वह अपने एक दोस्त के यहां गया था. रात 10 बजे के करीब संजय घर आया तो अनुभा मुंह फुलाए बैठी थी. संजय ने उस से खाना मांगा तो खाना देने के बजाय वह उस से उलझ पड़ी और उसे कस कर पकड़ लिया. इस के बाद अंदर छिपा बैठा संजीव एकदम से बाहर आया और साथ लाए चाकू से उस के गले पर हमला कर दिया.

चाकू लगने से संजय चीखा और जमीन पर गिर पड़ा. दोनों ने उसे तब तक दबोचे रखा, जब तक वह मर नहीं गया. संजय मर गया तो वे उस की लाश को ठिकाने लगाने की तैयारी करने लगे. संयोग से उसी समय मौसम खराब हो गया और तेज बारिश होने लगी. बरसात की वजह से बस्ती के लोग अपनेअपने घरों में बंद हो गए तो उन्हें लाश को ठिकाने लगाने का अच्छा मौका मिल गया. दोनों ने लाश को एक प्लास्टिक की मोटी थैली में लपेट कर कैरीबैग में भरा और रात करीब 2 बजे उसी बारिश में ले जा कर बस्ती से लगभग 2 सौ मीटर की दूरी पर स्थित घनी झाडि़यों में फेंक दिया.

पूछताछ के बाद जितेंद्र आगरकर ने हत्या के इस मामले को अपराध संख्या 346/2015 पर दर्ज करा कर अनुभा और संजीव को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में बंद थे. Mumbai Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Punjab National Bank Scam: पीएनबी घोटाला – मिलीभगत की असली कहानी

Punjab National Bank Scam: किसी हिंदी फिल्म की शुरुआत के लिए भी शायद यह अति नाटकीय सीन लगे और निर्देशक आंख में इतने धूलझोंकू सीन को फिल्माने से मना कर दे, जैसी हकीकत पंजाब नैशनल बैंक की मुंबई स्थित ब्रेडी हाउस ब्रांच घोटाले से सामने आई है. जैसा कि बैंक के एमडी सुनील मेहता बताते हैं, ‘यह सब 2011 से ही चल रहा था और 3 जनवरी 2018 को 11,360 करोड़ रुपए के घोटाले के रूप में सामने आया.’

अब सामने कैसे आया, जरा यह भी देख लीजिए. कई महीने पहले नीरव मोदी के कुछ अधिकारी पंजाब नैशनल बैंक की ब्रैंडी हाउस शाखा पहुंचे. उन्होंने बैंक के मैनेजर से कहा कि उन्हें हांगकांग से कुछ सामान मंगाना है. सामान मंगाने के लिए उन्होंने बैंक से एलओयू यानी लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी करने को कहा. उन्होंने ये लेटर औफ अंडरटेकिंग हांगकांग में मौजूद इलाहाबाद बैंक और एक्सिस बैंक के नाम पर जारी करने की गुजारिश की.

भारत में लेटर औफ अंटरटेकिंग का मतलब यह होता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय बैंक या किसी भारतीय बैंक की अंतरराष्ट्रीय शाखा कारोबारी का अपना बैंक का साखपत्र जारी करता है, जिस का मतलब यह होता है कि आप इन साहब को इन की बताई हुई पार्टी को इतनी रकम का भुगतान कर दें. ये यह रकम 90 दिनों या अधिकतम 180 दिनों में लौटा देंगे. अगर ऐसा नहीं होता तो इस की भरपाई हम (यानी एलओयू या साखपत्र जारी करने वाला वाला बैंक) कर देंगे. यह शौर्ट टर्म लोन होता है.

इस लेटर के आधार पर कोई भी कंपनी दुनिया के किसी भी हिस्से में राशि को निकाल सकती है. इन एलओयू का इस्तेमाल ज्यादातर आयात करने वाली कंपनियां, विदेशों में भुगतान के लिए करती हैं. लेटर औफ अंडरटेकिंग किसी भी कंपनी को लेटर औफ कंफर्ट के आधार पर दिया जाता है. लेटर औफ कंफर्ट का मतलब होता है कि उसे कंपनी के स्थानीय बैंक की ओर से जारी किया गया है,यह उस कारोबार के लिए होता है, जो हो रहा होता है. यहां पीएनबी से यह गारंटी देने को कहा गया कि वह हांगकांग स्थित उन बैंकों को दे दे जिन का नाम ऊपर लिखा गया है.

पीएनबी ने हांगकांग में मौजूद इलाहाबाद बैंक को 5 और एक्सिस बैंक को 3 लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी कर दिए. हांगकांग से करीब 280 करोड़ रुपए का सामान इंपोर्ट किया गया. कुछ महीने गुजर गए यानी वह पीरियड निकल गया, जितने दिनों बाद एलओयू के आधार पर भुगतान होना था.

अब 18 जनवरी को नीरव मोदी के कुछ अधिकारियों के साथ जिन बैंकों को एलओयू जारी किया गया था, उन के कुछ लोग बैंक पहुंचते हैं. वे अपने इंपोर्ट दस्तावेज दिखाते हुए कहते हैं कि पैसों का भुगतान कर दिया जाए. लेकिन अब वह बैंक मैनेजर नहीं है, जो इन के जारी करने के समय था. अत: वह कहता है कि जितना भी पैसा विदेश में भेजना है, उतना नकद जमा करना पड़ेगा.

कंपनियों के अधिकारियों ने फिर लेटर औफ अंडरटेकिंग दिखाया और उस के आधार पर पेमेंट करने को कहा. बैंक ने जब इन एलओयू की जांच शुरू की तो उन के होश उड़ गए. क्योंकि बैंक के रिकौर्ड में तो इन 8 लेटर औफ अंडरटेकिंग का कहीं जिक्र ही नहीं था. मतलब बैंक ने बिना कोई गारंटी लिए, बिना कुछ गिरवी रखे लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी कर दिए थे. संक्षेप में यही पीएनबी घोटाला है, जिसे हीरा व्यापारी नीरव मोदी और उस के मामा मेहुल चौकसी ने अंजाम दिया है.

हकीकत पता चली तो मालूम हुआ घोटाला अरबों का है

बहरहाल, इस हकीकत के उजागर होने के बाद पीएनबी को तात्कालिक रूप से 280 करोड़ और जब पूरे मामले को खंगाला गया तो पता चला कि 11,360 करोड़ रुपए की चपत लग चुकी थी. इस के पता चलते ही पीएनबी के एमडी के मुताबिक, तुरंत संबंधित जांच एजेंसियों को इस की जानकारी दी गई. मगर सवाल यह है कि जब एलओयू मुंहजुबानी वायदे पर नहीं जारी किए जाते, बल्कि इस के पीछे कोई मजबूत गारंटी होती है तो फिर नीरव मोदी के मामले में ऐसा कैसे हुआ? आखिर कौन है ये नीरव मोदी?

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नीरव मोदी हीरे की ज्वैलरी का बहुत बड़ा कारोबारी है, जोकि इस खुलासे के पहले ही समझा जाता है कि 1 जनवरी 2018 को 4 बड़े बड़े सूटकेसों के साथ हिंदुस्तान छोड़ चुका है, जिस के बारे में भारत सरकार के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि वह गया कहां या कहां है?

यह अलग बात है कि वह बैंक को लेटर भी लिख रहा है और धमकी भी दे रहा है. बहरहाल, ग्लैमर की दुनिया में भी इस 48 वर्षीय शख्स की खूब धाक थी. उस के नाम यानी ‘नीरव मोदी’ के नाम से हीरों का बड़ा ब्रांड है. कहा जाता है कि मेहमानों को लुभाने के लिए वह पेड़ों को भी हीरों से जड़ देता है. मौडल्स नीरव मोदी के करोड़ों के गहने पहन कर इतराती हैं. फिल्म एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा से ले कर सिद्धार्थ मल्होत्रा तक नीरव मोदी के लिए विज्ञापन कर चुके हैं.

48 साल के नीरव की तीन कंपनियां हैं, जिन में एक हीरों का कारोबार करने वाली ‘फायरस्टार डायमंड’और दूसरी खुद उसी के नाम की ‘नीरव मोदी’. इन्हीं 2 कंपनियों के जरिए ये घोटाला हुआ, जिस की तह में है महत्त्वाकांक्षा.

नीरव अपने ब्रांड, नीरव मोदी को दुनिया का सब से बड़ा लग्जरी ब्रांड बनाना चाहता था. वह दुनिया की डायमंड कैपिटल कहे जाने वाले बेल्जियम के एंटवर्प शहर के मशहूर डायमंड ब्रोकर परिवार से ताल्लुक रखता है. एक वक्त ऐसा था कि वह खुद ज्वैलरी डिजाइन नहीं करना चाहता था, लेकिन पहली ज्वैलरी डिजाइन करने के बाद उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

नीरव मोदी भारत की उस एकमात्र भारतीय ज्वैलरी ब्रांड का मालिक है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है. उस के डिजाइन किए गए गहने हौलीवुड की हस्तियों से ले कर देशी धनकुबेरों की पत्नियों तक की शोभा बढ़ाते रहे हैं. उस के द्वारा डिजाइन किया गया गोलकोंडा नेकलेस 2010 में नीलामी के जरिए 16.29 करोड़ में बिका था. जबकि 2014 में उस के द्वारा डिजायन किया एक हीरा 50 करोड़ रुपए में नीलाम हुआ था.

अपनी ज्वैलरी ब्रांड के दम पर ही वह फोर्ब्स की भारतीय धनकुबेरों की 2017 की सूची में 84वें नंबर पर मौजूद था. उस की माली हैसियत लगभग 12 हजार करोड़ रुपए की है, जबकि माना जा रहा है कि उस की निजी कंपनी 149 अरब रुपए के आसपास की है. दिल्ली में नीरव मोदी का शोरूम डिफेंस कालोनी में है.

इस धनकुबेर ने जो घोटाला किया, उस के संबंध में पंजाब नैशनल बैंक से जो हकीकत बाहर आई है, वह यह है कि बैंक ने एलओयू जारी नहीं किए, बल्कि बैंक के 2 कर्मचारियों ने चोरी से फरजी एलओयू बना कर दिए. इन कर्मचारियों के पास स्विफ्ट सिस्टम का कंट्रोल था, जो 200 देशों की बैंकिंग गतिविधियों के लिए आधिकारिक तकनीक है.

बैंकों की दुनिया का यह एक अति सीक्रेट अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन सिस्टम है. यह दुनिया के सभी बैंकों को आपस में जोड़ता है. इस स्विफ्ट सिस्टम से जो संदेश जाते हैं, वो उत्कृष्ट तकनीक का इस्तेमाल करते हुए कोड में भेजे जाते हैं. एलओयू भेजना, खोलना, उस में बदलाव करने का काम इसी सिस्टम के जरिए किया जाता है. इसी कारण से जब इस सिस्टम के जरिए किसी बैंक को संदेश मिलता है तो उस बैंक को पता होता है कि ये आधिकारिक और सही संदेश है.

लेकिन नीरव को भेजे गए दस्तावेजों में असल में बैंक का कोई दस्तावेज था ही नहीं यानी इस के साथ बैंक ने उस व्यापारी को कोई लिमिट नहीं दी थी, ब्रांच मैनेजर ने स्विफ्ट सिस्टम से इसे भेजने वाले को कोई कागज हस्ताक्षर कर के नहीं दिया कि इसे आगे भेजा जाए. उन्होंने चुपचाप एलओयू भेज दिया. जबकि इस माध्यम से आए किसी संदेश पर कभी कोई बैंक शक नहीं करता. लेकिन बात यह है कि किसी सिस्टम को संभालने वाला आखिर कोई न कोई व्यक्ति ही तो होता है.

सब कुछ हुआ बैंककर्मियों की मदद से

माना जा रहा है कि पीएनबी में इस काम को करने वाले 2 लोग थे, एक क्लर्क जो इस में डेटा डालता था और दूसरा अधिकारी जो इस जानकारी की आधिकारिक पुष्टि करता था. दोनों मिल कर नीरव के लिए काम करते थे. यही नहीं अब पता चला है कि ये दोनों कई सालों तक इसी डेस्क पर काम कर रहे थे, जोकि नहीं होना चाहिए था. इस पद पर काम करने वालों की अदलाबदली होती रहनी चाहिए.

एक और बात है कि स्विफ्ट सिस्टम कोर बैंकिंग से नहीं जुड़ा था. क्योंकि कोर बैंकिंग में पहले एलओयू बनाया जाता है और फिर वह स्विफ्ट के मैसेज से चला जाता है. इस कारण कोर बैंकिंग में एक कौन्ट्रा एंट्री बन जाती है कि अमुक दिन बैंक ने अमुक राशि का कर्ज देने की मंजूरी दी है तो अगले दिन जब बैंक का मैनेजर अपनी फाइलें यानी बैलेंसशीट देखता तो उसे पता चल जाता है कि बैंक ने बीते दिन कितने कर्जे की मंज़ूरी दी है.  लेकिन इस मामले में स्विफ्ट कोर बैंकिंग से जुड़ा हुआ नहीं था.

इन दोनों ने फरजी मैसेज को स्विफ्ट से भेजा, मैसेज भी गायब कर दिया और इस की कोर बैंकिंग में एंट्री नहीं की तो कुछ पता भी नहीं चला.  बैंक का पूरा सिस्टम कैसे बाईपास हो गया, अगर कोई चोर कोई निशान या सबूत ना छोड़े तो उसे पकड़ना बहुत मुश्किल होता है. खासकर तब जब कोई संदेह भी नहीं कर रहा है.

कोई संदेह करे तो इस मामले में जांच की जा सकती है, लेकिन ऐसा कुछ हुआ ही नहीं. वो एक बैंक से पैसे लेते रहे और दूसरे को चुकाते रहे. आज 50 मिलियन के एलओयू खोले, जब तक अगले साल इसे चुकाने की बारी आई तो उन्होंने तब तक 100 मिलियन के और करा लिए. अब उन्होंने पहले लिए गए 50 मिलियन चुका दिए और अगला कर्ज़ किसी और बैंक से ले लिया गया.  इस प्रकार से ये लेनदेन महीनों तक चलता रहा.

सवाल है कि इस पूरे खेल का माटरमाइंड कौन है? जैसेजैसे जांच आगे बढ़ रही है पता चल रहा है कि इस घोटाले का सूत्रधार नीरव मोदी नहीं बल्कि कोई और ही था. यह नीरव की अमेरिकन पत्नी एमी थी, जिस ने इस बड़े घोटाले की साजिश रची. यही नहीं, घोटाले का मास्टरमाइंड होने के साथ साथ नीरव के अमेरिका भागने के साजिश के पीछे भी एमी का ही दिमाग बताया जा रहा है.

माना जा रहा है कि यह बैंकिंग घोटाला हनीट्रैप के जरिए अंजाम दिया गया है. कुछ मौडल्स के जरिए बैंक के उच्च अधिकारियों को घोटाले में शामिल किया गया था. इन मौडल्स को हनीट्रैप के लिए कोऔर्डिनेट करने का काम एमी मोदी का था, जो नीरव मोदी और बौलीवुड के बीच एक कड़ी का काम कर रही थी.

वास्तव में पीएनबी की ब्रेडी फोर्ड ब्रांच के जिस पूर्व डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी को 17 फरवरी, 2018 को गिरफ्तार किया गया, 2013 में उस का ट्रांसफर इस ब्रांच से किया जाना था, जिसे रुकवा दिया गया. इस के बाद  2015 में 5 साल पूरे होने पर भी उस का ट्रांसफर ब्रांच से नहीं किया गया. सीबीआई अब ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि किस के इशारे पर शेट्टी का ट्रांसफर रोका गया.

वास्तव में गोकुलनाथ शेट्टी के ट्रांसफर को रुकवाने में भी मौडल्स और हनीट्रैप का इस्तेमाल हुआ. गोकुलनाथ शेट्टी ने एक बड़ा खुलासा किया है. उस के मुताबिक यह पूरा मामला पीएनबी के बड़े अधिकारियों की जानकारी में था. सीबीआई की तरफ से डायमंड किंग नीरव मोदी और गीतांजलि जेम्स के प्रमोटर मेहुल चौकसी के खिलाफ शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज की गई है.

नीरव मोदी और मेहुल चौकसी इस घोटाले के मुख्य आरोपी हैं और उन्हें देखते ही पकड़ने के लिए लुकआउट नोटिस भी जारी किया जा चुका है. विदेश मंत्रालय ने नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का पासपोर्ट निलंबित कर दिया है और इन के विदेशों के आउटलेट्स पर भी कारोबार न करने का आदेश दिया जा चुका है. रिजर्व बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि इस घोटाले में फंसी राशि का बोझ पीएनबी को खुद उठाना पड़ेगा.

सीबीआई जांच तो कर सकती है, पर पैसा नहीं ला सकती

यह मामला जनवरी में पकड़ा गया और 29 जनवरी, 2018 को इस की जांच सीबीआई से करवाने का अनुरोध किया गया. दूसरे सभी बैंकों ने सारी जिम्मेदारी पीएनबी पर ही डाली है कि उस की तरफ से जारी लेटर औफ अंडरटेकिंग (एलओयू) को सही मानते हुए नियमों के मुताबिक, संबंधित उद्योगपतियों की कंपनियों को फंड उपलब्ध कराए जा रहे थे. ऐसे में घाटा पूरी तरह से पीएनबी को उठाना पड़ेगा.

आरबीआई के सूत्रों का कहना है कि पीएनबी पर सख्ती दिखा कर देश के सभी बैंकों के सामने एक उदाहरण पेश करने की जरूरत है.

अगर यह मान भी लिया जाए कि दूसरे बैंक इस में शामिल थे, तब भी इस की शुरुआत पीएनबी की उस शाखा से हो रही थी, जहां से नीरव मोदी व अन्य रत्न व आभूषण कारोबारियों को नियमों की अनदेखी कर के हीरेमोती आयात करने के लिए लेटर औफ अंडरटेकिंग (एलओयू) जारी किए जा रहे थे. इसलिए यह घाटा पीएनबी को ही उठाना चाहिए. घोटाले की राशि 11,360 करोड़ रुपए की है, जो पीएनबी के पूरे बाजार पूंजीकरण का तकरीबन एक तिहाई है.

नीरव ने राजस्थान में बिखेरी हीरों की चमक

देश के सब से बड़े बैंकिंग घोटाले को अंजाम देने वाले नीरव मोदी का राजस्थान से गहरा नाता रहा है. नीरव मोदी की कंपनी गीतांजलि जेम्स की जयपुर में 3 फैक्ट्रियां हैं. इन में 2 फैक्ट्रियां जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में और एक सीतापुरा सेज में है. इन में आभूषण बनाने का काम होता है.

इस कंपनी के प्रमोटर मेहुल चौकसी हैं. इन फैक्ट्रियों पर 15 फरवरी को ईडी ने छापे मारे. इस के अगले दिन जयपुर में 2 अन्य ठिकानों पर ईडी ने छापे मारे. इन पांचों जगहों से 10 करोड़ 44 लाख करोड़ रुपए के हीरे, रंगीन रत्न, जवाहरात और आभूषण जब्त किए गए. साथ ही महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी जब्त किए गए. कंपनी का एक बैंक खाता फ्रीज किया गया. इस खाते में एक करोड़ से ज्यादा की रकम जमा थी.

इस बैंकिंग घोटाले में भरतपुर की लक्ष्मण मंदिर शाखा के मुख्य प्रबंधन आर.के. जैन और सर्किल कार्यालय में कार्यरत अधिकारी पी.सी. सोनी को भी निलंबित कर दिया गया है. ये दोनों अधिकारी मुंबई की ब्रेडी हाउस शाखा में कार्यरत रहे थे. बैंक प्रबंधन उन सभी अधिकारियों पर काररवाई कर रहा है, जो 2011 से अब तक मुंबई की ब्रेडी हाउस शाखा में कार्यरत रहे हैं.

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बैंक प्रबंधन को शक है कि इन में कोई अधिकारी भले ही घोटाले में शामिल न हो, लेकिन जांच को प्रभावित कर सकता है. आर.के. जैन ब्रेडी हाउस शाखा में सन 2012 से 2015 तक सेकंड इंचार्ज के रूप में कार्यरत रहे थे. वे भरतपुर की रणजीत नगर कालोनी के रहने वाले हैं. पी.सी. मीणा अप्रैल, 2011 से नवंबर 2011 तक मुंबई की इसी शाखा में कार्यरत थे. वहां वे कौन्ट्रैक्टर औडिटर के पद पर कार्यरत थे. ये दोनों अधिकारी स्केल 4 के थे.

हीरे के कारोबार में पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाला नीरव मोदी भव्य पार्टियों व रईसों के साथ रहने का शौकीन है. उस ने करीब 2 साल पहले जोधपुर में अपने हीरों की चमक से लोगों को चकाचौंध कर दिया था. नीरव मोदी ने अपने ब्रांड के 5 साल पूरे होने पर मारवाड़ के ताज के रूप में मशहूर जोधपुर के उम्मेद भवन में देशविदेश की नामी हस्तियों के साथ 2 दिन के जश्न का आयोजन किया था.

इस आयोजन में फैशन डिजाइनर राघवेंद्र, कविता राठौड़, मनीष मल्होत्रा, योहानन, मिशेल पूनावाला, इशिता, राज, दीप्ति सालगांवकर, चिराग, तनाज जोशी, लीजा हेडन, निखिल व इलिना मेशवानी सहित देशविदेश की नामी मौडल्स ने भाग लिया था. इस जश्न में जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह भी खासतौर से शरीक हुए थे. नीरव मोदी ने इस मौके पर अपने ब्रांड के तहत तैयार किए गए हीरों के आभूषणों की प्रदर्शनी भी लगाई थी. इस प्रदर्शनी के दौरान देशविदेश की टौप मौडल्स ने नीरव के हीरे के आभूषण पहन कर कैटवाक किया था.

काश ! तभी चेत जाते

वैसे देश के बैंकिंग क्षेत्र को हिला देने वाले पीएनबी घोटाले की शुरुआत 2013 में इलाहाबाद बैंक की निदेशक मंडल की बैठक में ही हो गई थी. नई दिल्ली में हुई उस बैठक में गीतांजलि ज्वैलर्स के मालिक मेहुल चौकसी को 550 करोड़ रुपए देने को मंजूरी दी गई थी. मेहुल चौकसी रिश्ते में घोटालेबाज नीरव मोदी के मामा हैं.

बाद में मामाभांजे ने मिल कर बैकों को हजारों करोड़ का चूना लगाया. चौकसी को बैंक की हांगकांग शाखा से भुगतान किया गया था. इलाहाबाद बैंक पीएनबी सहित देश के 4 अन्य सरकारी बैंकों को लीड करता है. आभूषण कारोबारी नीरव मोदी और गीतांजलि, नक्षत्र और गिन्नी ज्वैलरी चेन चलाने वाले मेहुल चौकसी मूलत: गुजरात के हैं. दोनों मुंबई में रहते हैं.

नई दिल्ली के होटल रेडिसन में 14 सितंबर, 2013 को इलाहाबाद बैंक के निदेशक मंडल की बैठक हुई. इस में भारत सरकार की ओर से नियुक्त निदेशक दिनेश दुबे ने चौकसी को 550 करोड़ लोन देने का विरोध किया.

16 सितंबर को इस बैठक की जानकारी दुबे ने भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर के.सी. चक्रवर्ती को दी. इस के बाद बैंक अधिकारियों को तलब भी किया गया, लेकिन इस के बावजूद मेहुल चौकसी को बैंक की हांगकांग शाखा से भुगतान कर दिया गया.

सवाल है अब पीएनबी एक झटके में इस राशि को किस तरह से उठाएगा. पीएनबी को इस राशि को इसी तिमाही में अपनी बैलेंसशीट में दिखाना होगा. इस बारे में पीएनबी, वित्त मंत्रालय और आरबीआई के बीच विचारविमर्श शुरू हो चुका है.

सूत्रों के मुताबिक एक सीधा उपाय यह है कि फिलहाल सरकार की तरफ से पीएनबी को दी जाने वाली पूंजीकरण की राशि बढ़ा दी जाए. दूसरा रास्ता यह है कि केंद्रीय बैंक की तरफ से पीएनबी के लिए विशेष उपाय किए जाएं.

क्योंकि छापों से जो 5100 और इस के बाद 650 करोड़ पकडे़ जाने के दावे किए गए वे सब झूठे हैं. मुश्किल से 1000 करोड़ ही बरामद होंगे.

रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी भी आए सीबीआई के शिकंजे में

डायमंड कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के बाद कानपुर की रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी भी अचानक सुर्खियों में आ गए. आरोप है कि उन्होंने कई बैंकों को अरबों रुपए का चूना लगाया था.

रोटोमैक एक जानीमानी कंपनी है. इस कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी ने इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, बैंक औफ इंडिया सहित कई सरकारी बैंकों से करीब 2919 करोड़ रुपए का लोन लिया था. यह लोन लेने के बाद उन्होंने न तो इस का ब्याज चुकाया और न ही मूलधन. बल्कि वह खुद भी सामने आने से बचते रहे. पिछले कुछ दिनों से इस बात की भी खबरें आनी शुरू हो गई थीं कि विक्रम कोठारी देश छोड़ कर जा चुके हैं.

सूद और मूलधन न मिलने पर पिछले साल बैंक औफ बड़ौदा ने विक्रम कोठारी को विलफुल डिफाल्टर घोषित कर दिया था. जब विक्रम कोठारी को इस बात की जानकारी हुई तो वह इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी.बी. भोसले और जस्टिस यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने उन की याचिका मंजूर कर ली.

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने बैंक को आदेश दिया कि विक्रम कोठारी की कंपनी को विलफुल डिफाल्टर लिस्ट से बाहर किया जाए. बैंक को माननीय हाईकोर्ट का आदेश मानने के लिए बाध्य होना पड़ा.

विक्रम कोठारी के खिलाफ बैंक द्वारा सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई जा चुकी थी. सीबीआई को कोठारी की तलाश थी. 18 फरवरी को विक्रम कोठारी कानपुर में एक वैवाहिक समारोह में शामिल होने के लिए आए थे. सीबीआई को पता चला तो उस ने 19 फरवरी की रात 1 बजे उन के घर पर छापा मार कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

2500 करोड़ का विलफुल डिफाल्टर चढ़ा सीबीआई के हत्थे

बैंकों से हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लो और विदेश भाग जाओ. इस तरह की प्रवृत्ति वाले उद्योगपतियों की संख्या भारत में बढ़ती जा रही है. ऐसे उद्योगपति यह काम एक सोचीसमझी साजिश के तहत करते हैं. उन के फरार हो जाने के बाद बैंक और सरकार लकीर पीटती रह जाती हैं.

जिस तरह विजय माल्या बैंकों के 5600 करोड़ रुपए ले कर फरार हो गया, उसी तरह भारत के ही एक और उद्योगपति कैलाश अग्रवाल भी बैंकों से करीब ढाई हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले कर फरार हो गए थे. देश के सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर्स में से एक कैलाश अग्रवाल को सीबीआई ने 5 अगस्त, 2017 को गिरफ्तार किया था.

वरुण इंडस्ट्रीज के प्रमोटर्स कैलाश अग्रवाल और उन के पार्टनर किरण मेहता ने चेन्नै स्थित इंडियन बैंक से 330 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था. इस के अलावा उन्होंने एक सोचीसमझी साजिश के तहत अन्य बैंकों से भी 1593 करोड़ रुपए कर्ज लिए. सन 2007 से 2012 के बीच इन्होंने कई बैंकों से वरुण इंडस्ट्रीज और इस की सहयोगी कंपनी वरुण जूल्स के नाम पर 10 सरकारी बैंकों से करीब 1242 करोड़ रुपए का कर्ज लिया.

कैलाश अग्रवाल और किरण मेहता ने सरकारी बैंकों के अलावा प्राइवेट बैंक्स, फाइनेंस कंपनियों से भी लोन लिया. शेयर्स के बदले बाजार से भी इन्होंने काफी पैसा उठा लिया. लोन की राशि उन्होंने नहीं चुकाई, जिस से सन 2013 में ये डिफाल्टर हो गए. बैंकों ने इन के पास कई नोटिस भेजे, पर ये दोनों यहां होते, तब तो मिलते. दोनों कभी के विदेश जा चुके थे. मार्च 2013 में इंडियन बैंक एंप्लाइज एसोसिएशन द्वारा तैयार की गई विलफुल डिफाल्टर्स की सूची में इन दोनों उद्योगपतियों का नाम भी शामिल था. इंडियन बैंक की शिकायत पर सीबीआई ने वरुण इंडस्ट्रीज के प्रमोटर कैलाश अग्रवाल और किरण मेहता के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और फरजीवाड़े का केस दर्ज कर लिया.

सीबीआई ने जांच की तो पता चला कि ये दोनों सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर्स में से हैं. सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर सूरत के डायमंड कारोबारी हैं, जिन पर 7 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है. दूसरे नंबर पर लंदन भागे विजय माल्या का नाम आता है, जिन पर 5600 करोड़ रुपए का कर्ज है. कैलाश अग्रवाल भी अपने साथी किरण मेहता के साथ दुबई भाग गए थे. तब से सीबीआई इन के पीछे लगी थी. 5 अगस्त, 2017 को कैलाश अग्रवाल जब दुबई से भारत लौटे, तो सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

सरकार बैंकों को दे चुकी है ढाई लाख करोड़ से ज्यादा

कारपोरेट फ्रौड और बैड लोन की वजह से बैंकों की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है. पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए सरकार प्रयासरत है. सरकार पिछले 11 सालों में बैंकों को ढाई लाख करोड़ से ज्यादा दे चुकी है, इस के बावजूद बैंक एनपीए से उबर नहीं पा रहे हैं.

बजट बनाते समय वित्त मंत्रियों के सामने 2 बड़ी समस्याएं होती हैं. पहली खर्च की जरूरत पूरी करना जिस से सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं को सुधारा जा सके और दूसरी  राजकोषीय घाटे को कम करना. क्योंकि टैक्स का कलेक्शन काफी नहीं होता. इन के अलावा हाल के सालों में वित्त मंत्रालय के सामने एक और नई चुनौती उभर कर सामने आई है और वह चुनौती है सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संभालने की.

पिछले 11 सालों में देश के 3 वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, पी. चिदंबरम और अरुण जेटली पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपए दे चुके हैं. यह राशि सरकार द्वारा इस साल ग्रामीण विकास के लिए आवंटित की गई राशि के दोगुने से ज्यादा है.

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एसबीआई सहित अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एनपीए के कारण पिछले 2 वित्त वर्ष से घाटे में हैं. बताया जाता है कि इस वित्त वर्ष में भी बैंकों के हालात सुधरते नहीं दिख रहे. भारतीय स्टेट बैंक ने पिछले 18 सालों में पहली बार तिमाही घाटा दर्ज किया.

यही हाल बैंक औफ बड़ौदा का है. सरकारी बैंकों का मानना है कि मुद्रा समेत कई सरकारी योजनाओं के लिए कर्ज देना पड़ रहा है, इस से भी स्थिति बिगड़ी है. जबकि आम लोगों का मानना है कि जब करोड़ों रुपए कर्ज के बकाएदार बैंकों को कर्ज नहीं लौटाएंगे तो बैंकों की स्थिति दयनीय तो होगी ही. Punjab National Bank Scam

Serial Killer: खौफनाक इरादों वाले सीरियल किलर्स

Serial Killers: भारत के कुछ खौफनाक सीरियल किलर्स के अपराधों के तौर तरीके और उन के द्वारा अंजाम दी गई वारदातों के बारे में सुन कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उन्होंने अपने शैतानी दिमाग से डर की जो दहशत फैलाई थी, उस से न केवल सामान्य लोगों की जिंदगी आतंक और भय से गुजरने लगी थी, बल्कि पुलिस महकमा भी सकते में आ गया था.

वैसे अपराधियों को कानूनी शिकस्त मिली, वे सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए. बावजूद इस के नए सिरे से अपराध की घटनाएं होती रहीं. वैसे खूंखार अपराधियों की बात करें तो उन में रमन राघव, चार्ल्स शोभराज, साइनाइड मोहन, देवेंद्र शर्मा, मोहिंदर सिंह पंढेर, एम. जयशंकर, डाक्टर डेथ और संतोष पोल के नाम प्रमुख हैं.

इन  में से कई अपराधियों पर फीचर फिल्में और टीवी सीरियल भी बन चुके हैं. जबकि एक सच्चाई तो यह भी है कि फिल्मों में उन के कुकर्मों और अपराधों को जितनी शिद्दत के साथ फिल्माया गया, वे उस से कहीं अधिक खूंखार और खौफनाक थे.

वैसे अपराधी देश के विभिन्न हिस्सों के रहे हैं. महानगर से ले कर छोटेमोटे कस्बाई इलाकों तक में उन का खौफ बना रहा है. उन में अधिकतर के अपराध सैक्स, हत्या और रेप जैसी वारदातों के रहे हैं.

रमन राघव : एक साइको किलर

मुंबई में 1960 के दशक का दौर था. तब बंबई नाम के इस महानगर में देश के कोनेकोने से लोग रोजगार की तलाश के लिए लगातार आ रहे थे. उन का वहां कोई ठौरठिकाना नहीं था, फिर भी उन के आने का सिलसिला बना हुआ था. वे महानगर में जहांतहां किसी तरह से रहने की जगह बनाते जा रहे थे, जहां सिर्फ सिर छिपाने की जगह थी. दैनिक क्रिया के लिए सार्वजनिक शौचालय थे. नहानेधोने के लिए भी वैसी खुले में कोई जगह थी. सोने के लिए सड़कों का फुटपाथ भी उन के लिए कम पड़ने लगा था.

रोजगार का इंतजाम हो जाने के बाद लोग जैसेतैसे चकाचौंध की जिंदगी में किसी तरह से गुजारा कर ले रहे थे. उन में अधिकतर गरीब और मजदूर किस्म के लोगों के छोटेछोटे परिवार थे. उन के नसीब में घरेलू परदा और सुरक्षा नाम मात्र की थी. वे कब किसी घटना या दुर्घटना के शिकार हो जाएं, कहना मुश्किल था. उन में या फिर उन से बाहर अपराधी किस्म के लोग भी थे, जिन की नजर भोलीभाली लड़कियों और अकेली औरतों पर रहती थी. ऐसा ही एक व्यक्ति रमन राघव था.

उस के बारे में बहुत अधिक रिकौर्ड तो नहीं है, सिवाय इस के कि उस ने कई जघन्य अपराध किए. हालांकि तब यह माना गया था कि वह दक्षिण भारत का रहने वाला था. 1965-66 के समय में मुंबई में फुटपाथ पर सोने वाले लोगों की हत्याओं की खबरों ने मुंबई पुलिस की नाक में दम कर रखा था. गरीब बस्तियों में उस के नाम का भय बना हुआ था. उस के ताबड़तोड़ अपराध ने सभी को सन्न कर दिया था. पुलिस उस के हुलिए तक से अनजान थी.

रात के अंधेरे में जब किसी बेसहारे की मौत हो जाती थी, तब पुलिस मरने वाले की शिनाख्त तो कर लेती थी, लेकिन उस हत्यारे तक नहीं पहुंच पाती थी. पुलिस को सभी कत्ल में एक जैसे तरीके के अलावा और कुछ नहीं मालूम हो पाया था. वह तरीका था लोगों के सिर पर किसी भारी चीज से हमला किया जाना. हत्यारा एक ही वार में व्यक्ति को मौत की नींद सुला देता था.

सिर्फ एक साल के अंदर ही करीब डेढ़ दरजन लोगों पर इस तरह के जानलेवा हमले हुए थे, जिन में 9 लोग मारे गए थे. इस अनजान हमलावर को पकड़ने में मुंबई पुलिस पूरी तरह से नाकाम थी. लोग शाम होते ही अपनेअपने घरों की ओर लौटने लगे थे. स्थिति यहां तक आ गई थी कि लोग अपनी सुरक्षा के लिए साथ में लकड़ी या डंडा रखने लगे थे. उस के बाद कुछ समय तक वारदातें नहीं हुईं.

पुलिस जांच में जुटी थी और कई घायलों की मदद से इस हमलावर का स्केच बनवाया गया, जिस के आधार पर मुंबई क्राइम ब्रांच पुलिस के 27 अगस्त, 1968 को इस खूंखार हत्यारे रमन राघव को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की. पुलिस पूछताछ में उस ने बताया कि 3 साल के अपने आपराधिक जीवन में करीब 40 लोगों को मौत के घाट उतार चुका था. जबकि पुलिस का मानना था कि यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है. पुलिस ने पूछताछ में यह भी पाया कि रमन ने फुटपाथ पर सोए बुजुर्ग महिला, पुरुष, युवा और बच्चों सभी को अपना शिकार बनाया.

पूछताछ के दौरान पुलिस ने जब उस की मैडिकल जांच करवाई, तब डाक्टरों के पैनल ने उसे मानसिक रूप से विकृत बताया. फिर निचली अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद उसे मौत की सजा सुना दी. इस सब के बीच रमन राघव ने सजा के खिलाफ कोई अपील भी नहीं की. हाईकोर्ट ने 3 मनोवैज्ञानिकों के पैनल से उस के मानसिक स्तर की फिर से जांच कराई.

मनोचिकित्सकों के पैनल द्वारा किए गए कई घंटों के इंटरव्यू के बाद निष्कर्ष निकला कि वह दिमागी रूप से बीमार है. ऐसे में उस की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया. इस के बाद उसे पुणे की यरवदा जेल में भेज दिया गया, जहां कई सालों तक उस का इलाज भी चला. साल 1995 में साइको किलर रमन राघव की किडनी की बीमारी के चलते सस्सून अस्पताल में मौत हो गई.

साल 2016 में उस की जीवनी पर एक हिंदी फिल्म ‘रमर 2.0’ भी बनी थी, जिस में मुख्य भूमिका रघुवीर यादव ने निभाई थी. फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी एक अहम किरदार में थे.

डा. देवेंद्र शर्मा : बेरहमी से 100 जानें लेने वाला हैवान

सीरियल किलर डा. देवेंद्र शर्मा की हैवानियत को दिल्ली, गुड़गांव, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोग 2 दशक बाद भी याद कर सिहर जाते हैं. उस के खौफनाक किस्सों में किडनी रैकेट, फरजी गैस एजेंसी और कारों की चोरी के कारनामे आज भी सब की जुबान पर हैं. लोगों का कहना है कि उस ने 100 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, जिन में कैब ड्राइवर और दूसरी गाडि़यों के ड्राइवर थे. उन की लाशों को यूपी की मगरमच्छों वाली नहर में फेंक दिया था.

साल 2002 और 2004 के बीच उस के कारनामे ज्यादा चर्चित हुए. वह कारें और दूसरे वाहनों को चुराया करता था. उस ने करीब 40 ड्राइवरों को मौत के घाट उतार दिया था. हैरानी की बात यह थी कि वह एक आयुर्वेदिक चिकित्सक था. अपने पेशे से अलग लगातार आय के अन्य साधनों पर नजर रखे हुए था. हत्याओं में से 50 को कुबूल करने के बाद उसे 2008 में मौत की सजा सुना दी गई थी. वह ऐसा सीरियल किलर था, जो 50 कत्ल करने के बाद उस की गिनती भूल गया था. बाद में उस ने माना कि वह 100 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है.

वह 2004 में पकड़ा गया था. फिर जेल में अच्छे बर्ताव के कारण उसे जनवरी 2020 में 20 दिन की पैरोल मिली थी. पैरोल खत्म होने के बाद भी वह जेल नहीं पहुंचा बल्कि वह दिल्ली के मोहन गार्डन में छिप कर रहने लगा. यहां वह एक बिजनसमैन को चूना लगाने वाला था, लेकिन पुलिस को उस के यहां होने की भनक लगी और आखिर में उसे पकड़ लिया गया. दिल्ली में पकड़े गए देवेंद्र को किडनी मामले का अपराधी करार दिया गया था.

देवेंद्र शर्मा डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजस्थान में निजी प्रैक्टिस करता था. उस में उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी, जितने कि वह उम्मीद किए हुए था. साल 1984 में देवेंद्र शर्मा ने आयुर्वेदिक मेडिसिन में अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर के राजस्थान में क्लीनिक खोला था. फिर 1994 में उस ने गैस एजेंसी के लिए एक कंपनी में 11 लाख रुपए का निवेश किया था. लेकिन कंपनी अचानक गायब हो गई, फिर नुकसान के बाद उस ने 1995 में फरजी गैस एजेंसी खोल ली.

उस के बाद शर्मा ने एक गैंग बनाया, जो एलपीजी सिलेंडर ले कर जाते ट्रकों को लूट लेता था. इस के लिए वे लोग ड्राइवर को मार देते और ट्रक को भी कहीं ठिकाने लगा देते. इस दौरान उस ने गैंग के साथ मिल कर करीब 24 मर्डर किए. वह अपने पेशे से ही जुड़ कर पैसा कमाने का काम करने लगा. उस के पास उन मरीजों की संख्या अच्छीखासी थी, जिन की किडनी खराब हो चुकी थी. उन्हें वह आयुर्वेदिक दवाइयां दिया करता था. उस ने उपचार करते हुए देखा कि बहुतों की दोनों किडनियां खराब हैं, जिसे ट्रांसप्लांट करने की जरूरत है.

फिर क्या था, देवेंद्र शर्मा किडनी ट्रांसप्लांट गिरोह में शामिल हो गया. वह किडनी डोनर का इंतजाम करने लगा. कार के ड्राइवर को इस का निशाना बनाया और उन्हें मार कर जरूरतमंदों को उस की किडनी बेच कर मोटा पैसा बनाने लगा. इस काम में उसे दोहरा लाभ हुआ. किडनी बेचने के साथसाथ देवेंद्र शर्मा ने लूटी हुई कारों से भी पैसे कमाए. उस ने 7 लाख रुपए प्रति ट्रांसप्लांट के हिसाब से 125 ट्रांसप्लांट करवाए. ड्राइवर की बौडी को नहर में फेंकने के बाद कैब को यूज्ड कार बता कर बेच देता.

वह फरजी गैस एजेंसी भी चलाने लगा. अपनी फरजी गैस एजेंसी के लिए जब उसे सिलेंडर चाहिए होते तो वह गैस डिलिवरी ट्रक को लूट लेता था और उस के ड्राइवर को मार देता था. देवेंद्र ने पूरी गैंग तैयार कर रखी थी. वे गाडि़यों की लूट से ले कर लाश को  ठिकाने लगाने के लिए उसे उत्तर प्रदेश में कासगंज स्थित हजारा नहर में फेंक दिया करता था. इस नहर में बड़ी संख्या में मगरमच्छ रहते हैं.

साइनाइड किलर मोहन : 20 महिलाओं की हत्या

सीरियल किलर मोहन कुमार को साइनाइड किलर के नाम से भी जाना जाता है. मोहन कुमार को 20 महिलाओं की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाने के बाद, वह उन्हें गर्भनिरोधक गोलियां खिलाता था. दरअसल, वे गर्भनिरोधक गोलियां नहीं, बल्कि साइनाइड की गोलियां हुआ करती थीं. उस ने ये जुर्म साल 2005 से 2009 के बीच किए थे. उस के बारे में कहा जाता है कि वह कई बैंक धोखाधड़ी और वित्तीय घोटालों में भी शामिल था. उसे दिसंबर 2013 में मौत की सजा सुनाई गई थी.

मोहिंदर सिंह पंढेर : निठारी हत्याकांड

साल 2005 और 2006 के बीच दिल्ली के नोएडा इलाके में निठारी हत्याकांड काफी चर्चा में रहा था. इस खौफनाक घटना की पूरे देश में बहुत चर्चा हुई. मोहिंदर सिंह पंढेर और सुरिंदर कोली दोनों पर निठारी में 16 से अधिक बच्चों की हत्या और बलात्कार का आरोप था.मोहिंदर सिंह पंढेर दिल्ली के नोएडा का एक धनी व्यापारी था. 2005 से 2006 के बीच निठारी गांव के 16 लापता बच्चों की खोपड़ी उस के घर के पीछे एक नाले में मिली थी. उस इलाके के सभी लापता बच्चों की लाशें पंढेर के घर के पास ही मिली थीं.

पुलिस ने पंढेर और उस के नौकर सुरिंदर कोली को गिरफ्तार कर लिया. दोनों पर रेप, नरभक्षण और मानव अंगों की तस्करी का आरोप लगाया गया था. कुछ आरोप सही थे तो कई अफवाहें भी थीं. कोली और पंढेर दोनों को 2017 में मौत की सजा सुनाई गई थी.

एम. जयशंकर : रेप और मर्डर

एम. जयशंकर पर 30 महिलाओं से रेप और 15 महिलाओं की हत्या का आरोप था. उस ने 2008 से 2011 के बीच रेप और हत्या की घटनाओं को अंजाम दिया था. उस ने तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में 30 बलात्कार, 15 हत्याएं और कई डकैती की घटनाओं को अंजाम दिया था. गिरफ्तारी के बाद उसे बंगलुरु की एक जेल में बंद कर दिया गया था. हालांकि उसे  मानसिक रूप से बीमार भी बताया गया था. बाद में जेल से भागने के कई असफल प्रयासों के बाद एम. जयशंकर ने 2018 में आत्महत्या कर ली थी.

डाक्टर डेथ : महिलाओं को जिंदा दफनाने वाला

वैसे दुनिया भर में डाक्टर को प्राणरक्षक माना जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के सातारा में एक ऐसा डाक्टर सामने आया, जिसे ‘डाक्टर डेथ’ का नाम दिया गया. इस डाक्टर की कहानी इतनी खौफनाक थी कि उस के कारनामे उजागर होते ही सभी चौंक पड़े थे. डाक्टर ने पुलिस को बताया कि उस ने 5 औरतों को जिंदा दफना दिया था उन की कब्रों के ऊपर नारियल के पेड़ भी लगा दिए थे.

डाक्टर डेथ के इस सनकी रवैए का खुलासा 2016 में तब हुआ, जब उसे पुलिस ने एक कत्ल के मामले में गिरफ्तार किया था. महाराष्ट्र के पुणे से करीब 120 किलोमीटर दूर सातारा में रहने वाले इस कातिल डाक्टर की पहचान संतोष पोल के रूप में की गई थी. कातिल डाक्टर ने पुलिस को अपने कुबूलनामे में बताया कि वह साल 2003 से ऐसी वारदातों को अंजाम देता आया है.

संतोष पोल पेशे से एलेक्ट्रोपैथ डाक्टर था और उस के पास बैचलर औफ इलैक्ट्रोहोमियोपैथी मैडिसिन एंड सर्जरी (बीईएमएस) की डिग्री थी. इस के अलावा उस ने मुंबई के घोटवडेकर अस्पताल में 8 साल तक नौकरी भी की थी. वहां काम करने वाले वरिष्ठ डाक्टरों का मानना था कि वह मैडिकली सर्टिफाइड नहीं था. संतोष खुद को डाक्टर बताने के साथसाथ समाजसेवी और आरटीआई एक्टिविस्ट भी बताता था.

साल 2016 में वेलम गांव की आंगनबाड़ी कार्यकत्री मंगला जेधे लापता हो गई. उस के परिजनों ने इस का आरोप संतोष पर लगा दिया था. शिकायत में नामजद होने के बाद पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन सबूत नहीं होने की वजह से उसे छोड़ दिया गया. मामले की चल रही जांच में सामने आया कि मंगला के फोन की आखिरी लोकेशन संतोष पोल के फार्महाउस के पास दिखी और मंगला का फोन ज्योति नाम की नर्स के पास से बरामद किया गया.

इस के बाद पूछताछ में ज्योति ने बताया कि संतोष पोल ने ही मंगला जेधे की हत्या की और उस के शव को दफना दिया. उधर संतोष को जैसे ही यह सब पता चला तो वह मुंबई भाग गया. ज्योति के द्वारा बताई गई जगह पर खुदाई की गई, तो एक कंकाल बरामद हुआ और लैब रिपोर्ट्स में साबित हो गया कि वह कंकाल मंगला जेधे का ही था. गिरफ्तारी के बाद संतोष ने बताया कि उस ने 13 सालों में 5 महिलाओं और एक पुरुष की हत्या की है. इस के बाद पुलिस के जरिए चारों महिलाओं के कंकाल बरामद कर लिए गए, लेकिन एक पुरुष का कंकाल बरामद नहीं हुआ.

संतोष ने उस की लाश नदी में फेंक दी थी. उस ने बताया कि वह महिलाओं को नशे का इंजेक्शन देता था, फिर नशे की हालत में रहने के दौरान ही उन्हें फार्महाउस में दफना देता था. साथ ही लाशों के सड़ने की गंध छिपाने के लिए उस ने कुछ मुर्गियां भी पाल रखी थीं. पुलिस ने इस ‘डाक्टर डेथ’ के घर से नशीली दवाएं, इंजेक्शन, ईसीजी मशीन और आरटीआई से जुड़े कुछ दस्तावेज बरामद किए थे.

संतोष ने बताया था कि वह हर हत्या के बाद एक जेसीबी बुलाता था और नारियल के पेड़ों को लगाने के लिए गड्ढे खुदवाता था, लेकिन इन गड्ढों में लाशें दफना कर उन के ऊपर नारियल के पेड़ लगा दिया करता था. Serial Killer

Canada: प्यार पर कोई जोर नहीं

Canada: विदेश में रह रहे गुरजिंदर ने अगर भारतीय सभ्यता से इतर वेस्टर्न कल्चर अपना कर अपनी प्रेमिका मेपल को उसी नजरिए से देखा होता तो आज मेपल जिंदा होती और उसे जेल में उम्रकैद भी न काटनी पड़ती. लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया और…

रोज की तरह 28 सितंबर, 2011 को भी मेपल बटालिया सुबह यूनिवर्सिटी जाने के लिए तैयार हुई तो बड़ी बहन रोजलीन ने कहा, ‘‘आज मैं ने कार अच्छे से साफ कर दी है, कई दिनों से साफ नहीं हुई थी न. तू मेरा एमपी-3 प्लेयर भी ले जा. म्यूजिक सुनते हुए ड्राइविंग में बड़ा मजा आता है.’’

‘‘ठीक है दीदी, लेकिन मुझे यूनिवर्सिटी जल्दी पहुंचना है. क्लास से पहली स्टडी भी करनी है. मुझे म्यूजिक का ज्यादा शौक है नहीं, सिर्फ खाली समय में खुद को हल्का महसूस करने के लिए सुन लेती हूं.’’ मेपल ने कहा.

‘‘चल ठीक है, अब देर मत कर.’’ रोजलीन ने कहा.

मेपल किताबें और पर्स ले कर कार में बैठी और यूनिवर्सिटी चली गई. वह कनाडा के सुर्रे की साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी में हेल्थ साइंस ग्रैजुएशन की प्रथम वर्ष की छात्रा थी.  मेपल ही नहीं, उस का पूरा परिवार कनाडा का नागरिक था. लेकिन वे मूलरूप से भारत के रहने वाले थे. मेपल भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में पैदा हुई थी. उस के परिवार में पति हरकीरत उर्फ हैरी बटालिया, मां सरबजीत, 2 बड़ी बहनें रोजलीन उर्फ रोजी और सिमरन थीं.

मुंबई में रहने के दौरान हरकीरत ड्राइवर की नौकरी कर के किसी तरह परिवार को पाल रहे थे. आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी. मेपल 3 महीने की थी, तभी हरकीरत के किसी दोस्त ने उस से कहा कि यहां रह कर उस की आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं होने वाला है. उस की 3 बेटियां हैं, उन्हें पढ़ानेलिखाने और शादी करने में ही उस की जिंदगी खप जाएगी. फिर भी वह पैसों के अभाव में न बेटियों को अच्छी शिक्षा दिला पाएगा और न अच्छे घरों में उन की शादियां कर पाएगा.

‘‘तो फिर क्या करूं?’’ हरकीरत ने पूछा था.

‘‘तू कनाडा चला जा. उसे तो मिनी पंजाब कहा जाता है. तुझे वहां कोई न कोई रोजगार मिल ही जाएगा. कुछ नहीं होगा तो टैक्सी चला कर अच्छी कमाई कर लेगा. वहां रह कर बेटियों को अच्छी तरह पढ़ा भी लेगा और अच्छे घरों में उन की शादियां भी कर देगा.’’ दोस्त ने कहा.

‘‘भाई, तू कह तो ठीक रहा है, मेरे कई रिश्तेदार वहां हैं. जब वे गए थे, खस्ताहाल थे, अब दौलत में खेल रहे हैं. मैं भी कोशिश करता हूं.’’ हरकीरत ने कहा.

और फिर किसी तरह कोशिश कर के हरकीरत परिवार सहित कनाडा चला गया. कुछ दिनों तक उस ने वहां टैक्सी चलाई, उस के बाद अपना रोजगार कर लिया. धीरेधीरे रोजगार बढ़ा तो आर्थिक स्थिति बेहतर होती गई. बेटियों का अच्छे स्कूल में एडमिशन करा दिया. उस की दोनों बड़ी बेटियां पढ़ाई में बस ठीकठाक कही जा सकती थीं. लेकिन सब से छोटी मेपल काफी तेज दिमाग की थी. वह स्कूल की हर तरह की गतिविधियों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. हरकीरत को अपनी इस बेटी से काफी उम्मीदें थीं. मेपल पढ़ाई में जितनी तेज थी, उतनी ही खूबसूरत भी थी. हंसमुख और खुले विचारों की भी थी.

अपनी दोनों बहनों के मुकाबले मेपल का हाथ भी ज्यादा खुला था. वह खुल कर खर्च करती थी. उस का कहना था कि जिंदगी खुल कर जीने के लिए है. एकएक पल ऐसा जीना चाहिए कि यादगार बन जाए. स्कूल में उस की दोस्ती लड़कियों से ही नहीं, तमाम लड़कों से भी थी. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मेपल ने डाक्टर बनने के लिए हेल्थ साइंस में एडमिशन लिया था. लेकिन वह सिर्फ स्टूडेंट ही नहीं थी, मौडल और अभिनेत्री भी थी. वह मौडलिंग तो कर ही रही थी, ‘डायरी औफ विंपी किड’ फिल्म में छोटी सी भूमिका भी की थी. सेंट्रल सिटी मौल द्वारा आयोजित मौडल खोज प्रतियोगिता में हिस्सा ले कर वह फाइनल राउंड तक पहुंच गई थी. उस का फाइनल होना अभी बाकी था.

मेपल यूनिवर्सिटी पहुंची तो पार्किंग में ही उस की एक दोस्त मिल गई. दोनों पार्किंग की एक बैंच पर बैठ कर पढ़ाई कर करने लगीं. अचानक मेपल किताब ले कर उठी और टहलते हुए पढ़ने लगी. उसी बीच उस से कूछ दूरी पर एक कार आ कर रुकी. कार से 2 लड़के उतरे. कार चला रहे युवक ने इधरउधर देखा और स्वचालित आधुनिक रिवौल्वर से मेपल पर गोलियां चला दीं. गोलियों की गूंज से कैंपस गूंज उठा. गोलियों की आवाज सुन कर मेपल की सहेली दौड़ कर जब तक उस के पास पहुंचती, वह लहूलुहान हो जमीन पर गिर चुकी थी. गोलियां चलाने वाला लड़का अपने साथी के साथ कार से भाग गया था.

यूनिवर्सिटी स्टाफ, प्रोफेसर, स्टूडेंट एकत्रित हो गए. घटना की सूचना पुलिस को भी दे दी गई थी. सुर्रे सिटी के तमाम पुलिस अधिकारी कुछ ही मिनटों में वहां पहुंच गए थे. एंबुलैंस द्वारा मेपल को सिटी अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. घटना की सूचना मेपल के पिता हरकीरत को भी दे दी गई थी. वह पत्नी और बड़ी बेटी रोजलीन के साथ अस्पताल पहुंचे. इस के बाद लाश का पोस्टमार्टम कराया गया. उस के बाद लाश उन्हें सौंप दी गई. 8 अक्तूबर को उन्होंने डल्टास रिवर के किनारे उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पूरा परिवार मेपल की मौत से काफी दुखी था.

पुलिस को मिली पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, गोलियां थोड़ी दूर से चलाई गई थीं. 2 गोलियां उस के दिल के करीब, एक पेट में, एक माथे पर तथा एक गरदन पर लगी थी. ये पांचों गोलियां एक ही रिवौल्वर से चलाई गई थीं. हमलावर कौन थे? यह किसी को पता नहीं था. उस समय यूनिवर्सिटी कैंपस स्थित पार्किंग में खास चहलपहल नहीं थी. 2-4 स्टूडेंट ही इधरउधर थे. क्योंकि उस समय यूनिवर्सिटी के क्लास शुरू होने में काफी देर थी. मेपल, उस की सहेली और जो अन्य स्टूडेंट थे, वे पढ़ने की गरज से समय से पहले आ गए थे. वहां के शांत वातावरण में ठीक से पढ़ाई हो जाती थी.

मेपल की सहेली बस इतना ही बता पाई थी कि पढ़तेपढ़ते अचानक मेपल उठी और टहलते हुए पढ़ने लगी. अचानक गोलियां चलने की आवाज से वह चौंकी. जब उसे लगा कि गोलियां उसी पर चलाई गई हैं तो वह उस की ओर भागी. जब उस ने पलट कर देखा तो हमलावर कार में बैठ रहे थे. इसलिए उस ने सिर्फ उन की पीठ देखी थी, शक्ल नहीं. करीब 50 पुलिस अधिकारी इस मामले की जांच में लगे थे. मेपल के दोस्त सायर से पूछताछ की गई. उस ने बताया, ‘‘मेपल समझदार और खुशमिजाज लड़की थी. सालों से उस का प्रेमसंबंध पंजाबी समुदाय के गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी से था, जो उस की हत्या के कुछ दिनों पहले ही टूटा था. गुरजिंदर उस का पहला प्रेम था.

प्रेमसंबंध टूटने के बाद दोनों के बीच तनाव चल रहा था. गुरजिंदर अकसर उस का पीछा करता था. हत्या से पहले 24 सितंबर, 2011 को मेपल ने सुर्रेटिम होर्टंस में गुरजिंदर धालीवाल पर हमले का आरोप लगाया था. उस ने अपने बयान में कहा था कि जिस समय वह अपने एक बौयफ्रैंड के साथ कौफी शौप में थी तो गुरजिंदर वहां पहुंच गया था. लड़ाईझगड़ा करते हुए वह मारपीट पर उतारू हो गया था. उस ने उसे देख लेने की धमकी भी दी. बाद में मेपल ने अपने बयान वापस ले लिए थे, जिस से गुरजिंदर पर कोई केस नहीं चला था.’’

हरकीरत ने भी गुरजिंदर पर शक जाहिर किया था. गुरजिंदर शक के दायरे में था. लेकिन उस से पूछताछ से पहले पुलिस यूनिवर्सिटी में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देख लेना चाहती थी. फुटेज में यह तो दिख रहा था कि मेपल की हत्या में 2 युवकों का हाथ है, जो कार से वहां आए थे. लेकिन उस फुटेज से उन की पहचान करना आसान नहीं था.

पुलिस ने गुरजिंदर को हिरासत में ले लिया. उस से लंबी पूछताछ की गई, लेकिन उस के चेहरे के हावभाव और बातों से जरा भी नहीं लग रहा था कि उस ने किसी की हत्या की है. पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत भी नहीं थे, इसलिए उसे छोड़ दिया गया. लेकिन पुलिस उस की चोरीछिपे निगरानी करती रही. पुलिस ने मेपल और गुरजिंदर के मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स भी निकलवाई थी. इस से भी किसी खास आधार पर गुरजिंदर को दोषी करार नहीं दिया जा सकता था.

हालांकि कामयाबी नहीं मिल रही थी, फिर भी पुलिस हार मानने को तैयार नहीं थी. मेपल जिस मौडल खोज प्रतियोगिता में भाग ले रही थी, उस का फिनाले 15 अक्टूबर, 2011 को होना था. मेपल के विजेता बनने की संभावना थी. कहीं किसी प्रतिद्वंद्वी ने उस की हत्या न करा दी हो, पुलिस ने इस की भी जांच की. दूसरी ओर आयोजकों ने मेपल की हत्या से दुखी हो कर प्रतियोगिता को जनवरी तक के लिए टाल दिया था.

धीरेधीरे 5 महीने बीत गए, मेपल की हत्या की गुत्थी नहीं सुलझी. पुलिस ने तमाम अपराध करने वालों से भी पूछताछ कर ली थी, ड्रग्स रैकट से भी जोड़ कर छानबीन की गई थी, पर कोई तथ्य हाथ नहीं लगा था. न तो मेपल किसी तरह के ड्रग्स की आदी थी और न ही उस के किसी दोस्त के ड्रग्स गिरोह से किसी प्रकार के संबंध थे. कहीं ये सैक्स माफियाओं का काम न हो, इस दृष्टि से भी जांच की गई थी, लेकिन सारी कोशिशें बेकार गई थीं.

मेपल की हत्या को एक साल गुजर गया. 28 सितंबर, 2012 को उस की पहली बरसी थी. बरसी वाले दिन सुर्रे पार्क में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया, जिस में करीब 2 सौ लोगों ने भाग ले कर मेपल को श्रद्धांजलि दी. इस सभा में लोगों ने कामना की कि उस का हत्यारा जल्द से जल्द पकड़ा जाए, ताकि उस की आत्मा को शांति मिल सके.

इसी आयोजन में हरकीरत बटालिया ने बटालिया परिवार की ओर से मेपल स्कौलरशिप मेमोरियल फंड्स की स्थापना की घोषणा की. इस संस्था की ओर से साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी, जिस में मेपल पढ़ती थी, में आर्ट्स और हेल्थ साईंस पढ़ने वाली आर्थिक रूप से कमजोर लड़कियों की अर्थिक मदद का ऐलान किया गया. बटालिया परिवार की ओर से इस संस्था में 50 हजार डालर की राशि दान स्वरूप दी गई. इस संस्था में सामाजिक कार्य करने वाले तथा व्यवसाई भी दान कर सकते थे.

इस के अलावा उन्होंने पुलिस से लिखित रूप से मेपल के हत्यारे को पकड़ने की अपील करने के साथ अब तक की गई कोशिशों के लिए धन्यवाद भी दिया. पुलिस के लिए मेपल हत्याकांड पहेली बना हुआ था. पुलिस ने हर तरकीब अपना ली थी, पर कोई सुराग नहीं मिला था. लेकिन उस के मुखबिर अब भी मुस्तैद थे और गुरजिंदर तथा उस के खास दोस्तों की अभी तक निगरानी रखी जा रही थी. आखिर पुलिस को एक दिन सफलता मिल ही गई. 1 दिसंबर की रात गुरजिंदर का 22 वर्षीय दोस्त गुरसिमर बेदी एक बार में दोस्तों के साथ शराब पी रहा था. तभी उस के मुंह से निकला, ‘‘देखो, एक साल पहले हम ने कितनी होशियारी से मेपल की हत्या की कि आज तक पुलिस कोई सुराग नहीं लगा पाई.’’

अगली ही टेबल पर बैठे पुलिस के मुखबिर ने यह बात सुन ली. उस ने तुरंत पुलिस को फोन कर के बुला लिया. मुखबिर के इशारे पर गुरसिमर को पकड़ लिया गया. खुद को पुलिस से घिरा देख वह घबरा गया और उस का सारा नशा उतर गया. उस की समझ में आ गया कि अब बचना मुश्किल है. उसे पुलिस स्टेशन लाया गया, जहां सीधे पूछा गया कि मेपल बटालिया की हत्या किस ने की और क्यों की?

बिना किसी लागलपेट के गुरसिमर ने सच बोल दिया, ‘‘मेपल की हत्या गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी ने की थी. उस के साथ मैं भी था. मैं ने ही उसे वह रिवौल्वर उपलब्ध कराई थी, जिस से मैपल को गोली मारी गई थी. उस ने यह हत्या क्यों की, यह मुझे मालूम नहीं. मैं तो उस का साथ दोस्ती की वजह से देने को तैयार हो गया था. मेरी समझ में अभी तक नहीं आया कि दोनों गहरे दोस्त थे, एकदूसरे को प्यार भी करते थे, इस के बावजूद उस ने मेपल की हत्या कर दी?’’

‘‘इस समय वह कहां मिलेगा?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘अपने घर पर.’’ गुरसिमर ने कहा.

गुरसिमर बेदी को साथ ले कर पुलिस ने गुरजिंदर के घर छापा मारा. उस समय रात के साढ़े 12 बज रहे थे. वह अपने बैडरूम में सो रहा था. उस के घर वालों से उस के बारे में पूछा गया तो उन्होंने पूछा, ‘‘आप लोग उसे क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘एक साल पहले उस ने एक लड़की की हत्या की थी. उसी अपराध में उसे गिरफ्तार करना है.’’ एक पुलिस अधिकारी ने कहा.

‘‘वह ऐसा कतई नहीं कर सकता, आप को कोई गलतफहमी हुई है. वह एक होनहार और नेक चालचलन वाला लड़का है.’’ उस के पिता ने कहा.

घरवालों की लाख कोशिश के बावजूद पुलिस गुरजिंदर को गिरफ्तार कर के पुलिस स्टेशन ले आई. वह बारबार कहता रहा, ‘‘मैं ने मेपल की हत्या नहीं की. मैं तो उसे दिल की गहराई से प्यार करता था. भला मैं उस की हत्या कैसे कर सकता हूं.’’

गुरसिमर को उस के सामने बैठा कर एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘इस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और सबूत भी दे दिए हैं. तुम्हारे पास बचाव का अब कोई रास्ता नहीं है. सच्चाई स्वीकार करने में ही तुम्हारी भलाई है.’’

‘‘मैं ने किसी की हत्या नहीं की.’’ गुरजिंदर अपनी बात पर अड़ा रहा.

‘‘ठीक है, अब लाई डिटेक्टर से ही पता चलेगा कि तुम सच बोल रहे हो या झूठ?’’ पुलिस अधिकारी ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया.

इस के बाद गुरजिंदर घबरा गया. झूठ के सहारे आगे चलना उसे कठिन लगा. ऐसे में उसे सच बोल देना ही ठीक लगा. उस ने कहा, ‘‘हां, मैं ने ही की है मेपल की हत्या. मैं उस की हत्या करना नहीं चाहता था. मैं तो उस के साथ सारी जिंदगी बिताना चाहता था, लेकिन उस ने काम ही ऐसा किया कि मजबूर हो कर मुझे उस की हत्या करनी पड़ी.’’

19 वर्षीया मेपल बटालिया जिस एंवर करिक सैकेंडरी स्कूल में पढ़ती थी, उसी में गुरजिंदर भी पढ़ता था. मेपल जब हाईस्कूल में पढ़ रही थी, तभी उस की मुलाकात गुरजिंदर से हुई थी. दोनों ने एकदूसरे को आकर्षित किया तो उन के बीच दोस्ती हो गई. बाद में उन्हें पता चला कि उन के परिवार एकदूसरे से परिचित हैं. इस से दोस्ती और भी गहरी हो गई. दोनों का एकदूसरे के घर भी आनाजाना होने लगा. दोनों की मम्मियां अकसर साथसाथ शौपिंग के लिए जाती थीं.

मेपल चंचल स्वभाव की थी, जबकि गुरजिंदर गंभीर और शर्मीला. विपरीत स्वभाव का होने के बावजूद दोनों में खूब पटती थी. मेपल सैकेंडरी में पहुंची तो दोनों का आकर्षण और बढ़ गया. गुरजिंदर यूनिवर्सिटी में पहुंच गया था. नजदीकी तो पहले से ही थी. अब दोनों इस दोस्ती को एक रिश्ते का नाम देना चाहते थे. गुरजिंदर शर्मीले स्वभाव की वजह से दिल की बात जुबान पर नहीं ला पाया. पर मेपल ने पहल करते हुए एक दिन प्रपोज कर दिया, ‘‘क्या मेरे साथ डेट पर चलोगे?’’

दोनों अकसर साथसाथ घूमते थे, पर डेट पर जाने का अर्थ दूसरा ही था. इसलिए मेपल के प्रस्ताव पर गुरजिंदर शरमा गया. उस ने मुसकरा कर सिर हिला दिया. छुट्टी के दिन दोनों ने डेट पर जाने का प्रोग्राम बनाया. गुरजिंदर अपनी कार से उसे डोनियाल पार्क ले गया, जहां वे एकांत में बैठ कर बातें करने लगे. अचानक मेपल ने पूछा, ‘‘क्या तुम मुझ से प्यार करते हो?’’

गुरजिंदर इधरउधर देखने लगा. उसे जवाब न देते देख मेपल ने अपना प्रश्न दोहराया. इस पर उस ने सिर्फ यही कहा, ‘‘क्या तुम…?’’

‘‘पहले तुम बताओ, सवाल पहले मैं ने किया है तो जवाब पहले तुम दोगे.’’ मेपल ने शरारती अंदाज में कहा.

‘‘अगर मैं हां कहूं तो.’’ गुरजिंदर ने कहा.

‘‘ऐसे नहीं, मुझे प्रपोज करो.’’ मेपल बोली.

‘‘मुझे प्रपोज करना नहीं आता.’’ गुरजिंदर अब भी शरमा रहा था.

‘‘अच्छा बाबा, मैं ही प्रपोज करती हूं, मैं तुम से बेहद बेहद प्यार करती हूं.’’ मेपल ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘मैं भी तुम से प्यार करता हूं. साथ ही वादा करता हूं कि हमेशा इसी तरह प्यार करता रहूंगा.’’ गुरजिंदर ने कहा.

इस के बाद दोनों एकदूसरे से खुल गए. उन की बातचीत का अंदाज बदल गया. उन के होंठ भी कई बार आपस में टकराए, पर उन्होंने इस से आगे की हद पार नहीं की. इस के बाद मेपल और गुरजिंदर ज्यादा से ज्यादा एकदूसरे के करीब रहने लगे. उन के घर वालों को उन के प्यार का पता नहीं था. उन्हें तो सिर्फ यही मालूम था कि दोनों अच्छे दोस्त हैं.

मेपल ने सेकेंडरी पास कर के साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी में हेल्थ साइंस में एडमिशन ले लिया. वहीं वह मौडलिंग भी करने लगी. वहीं से उसे लघु फिल्म ‘डायरी औफ विंपी किड’ में एक भूमिका मिल गई. इस से उस के हौसले और बढ़ गए. वह अकसर मौडलिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी. इस के बावजूद उस ने पढ़ाई को नजरअंदाज नहीं किया. वह पढ़ाई को भी पूरा समय देती थी. वहीं गुरजिंदर ग्रैजुएशन पूरा कर के पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगा था.

प्यार की नींव विश्वास पर टिकी होती है. दोनों के बीच विश्वास था भी पर गुरजिंदर का विश्वास उस दिन डगमगा गया, जब उस ने मेपल को एक अन्य युवक के साथ यूनिवर्सिटी में हाथ में हाथ डाले घूमते देख लिया. उस दिन वह मेपल से मिलने यूनिवर्सिटी गया था. यह उसे अच्छा नहीं लगा, इसलिए निराश मन से वह बिना मिले ही लौट गया. जब दोनों दूसरे दिन मिले तो गुरजिंदर ने पूछा, ‘‘कल तुम्हारे साथ कौन लड़का था?’’

‘‘क्लास में पढ़ता है. हम दोनों में अच्छी दोस्ती है. पर तुम्हें मेरा उस के साथ घूमना बुरा क्यों लगा, यह तो आम बात है.’’ मेपल ने कहा.

गुरजिंदर उस के जवाब से संतुष्ट नहीं था. उस ने कहा, ‘‘मुझे यह अच्छा नहीं लगता. मैं नहीं चाहता कि कोई तुम्हें छुए भी.’’

बात आईगई हो गई. कुछ दिनों बाद गुरजिंदर कौफी शौप में कुछ दोस्तों के साथ गया तो वहां एक प्राइवेट केबिन में उस की नजर चली गई. वहां मेपल किसी लड़के के साथ अश्लील मुद्रा में बैठी थी. यह देख कर वह गुस्से से कांपने लगा. उस ने उस केबिन में जा कर दोनों को भलाबुरा कहने के साथसाथ मेपल से अपना कौमार्य टेस्ट कराने को कहा. उस ने कहा कि उसे शक है कि उस के कई लड़कों से शारीरिक संबंध हैं.

इस पर मेपल खुद पर काबू नहीं रख पाई. वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम कौन होते हो मुझ पर इस तरह का इल्जाम लगाने वाले. किस हक से तुम मुझे कुंवारेपन का टेस्ट कराने को कह रहे हो. हमारे बीच प्यार है, हम ने शादी नहीं की, जो तुम इस तरह हक जता रहे हो.’’

‘‘लेकिन मैं तो तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारने की सोच बैठा हूं.’’ गुरजिंदर ने कहा.

‘‘यह तुम्हारी सोच है, जरूरी नहीं कि मेरी भी यही सोच हो. मैं जिंदगी को बांधना नहीं चाहती. मैं खुल कर जीने में विश्वास रखती हूं. तुम्हें अच्छा नहीं लगता तो तुम अपना रास्ता अलग कर सकते हो.’’ मेपल ने दो टूक जवाब दिया.

गंभीर स्वभाव का गुरजिंदर बौखला गया. पर उस ने खुद पर संयम रखा. 24 सितंबर, 2011 को उस ने मेपल को उसी लड़के के साथ फिर देखा तो खुद पर काबू नहीं रख पाया और दोनों से उलझ पड़ा. वह मारपीट तक पर उतारू हो गया. उस का यह रूप देख कर मेपल ने इस की शिकायत पुलिस से कर दी, पर दूसरे दिन उस ने अपनी शिकायत वापस ले ली. हां, उस ने गुरजिंदर को चेतावनी जरूर दी कि आइंदा वह उस की जिंदगी में दखल न दे, वरना परिणाम अच्छा नहीं होगा.

‘‘परिणाम किस का अच्छा होगा, किस का बुरा यह तो अब पता चलेगा.’’ गुरजिंदर बड़बड़ाया.

उस ने मेपल को सबक सिखाने की योजना बना कर अपने दोस्त गुरसिमर बेदी से बात की. गुरजिंदर ने उस से सहयोग मांगा तो वह तैयार हो गया. उस ने साथ देने का वादा तो किया ही, साथ ही उस के कहे अनुसार एक रिवौल्वर का इंतजाम भी कर दिया. इस के बाद उस ने मेपल पर नजर रखनी शुरू कर दी. 28 सितंबर, 2011 को मेपल यूनिवर्सिटी के लिए घर से निकली तो दोनों उस का पीछा करते हुए वहां पहुंच गए और मौका देख यूनिवर्सिटी कैंपस में कार रोक कर गुरजिंदर ने उस पर गोलियां चला दीं और भाग खड़े हुए. मेपल के मरने की खबर गुरजिंदर को अपने घर वालों से मिल चुकी थी, क्योंकि वे मेपल के अंतिम संस्कार में गए थे, पर वह मेपल के घर शोक जताने भी नहीं गया.

पुलिस ने शक के आधार पर उसे हिरासत में भी लिया, पर वह झूठ बोल कर शक के दायरे से निकल गया. अंत में साल भर बाद उस का गुनाह सामने आ गया और वह पकड़ा गया. गुरजिंदर और गुरसिमर को सुर्रे सिटी कोर्ट में पेश किया गया, वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. 17 सितंबर, 2012 को अगली पेशी पर गुरजिंदर के वकीलों ने उसे निर्दोष बताते हुए सबूत भी दिए, पर कोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया.

30 अप्रैल, 2013 को पुलिस ने दोनों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दी. चार्जशीट, गवाह और सबूतों के आधार पर कोर्ट ने दोनों को दोषी करार दिया. यह संयोग ही था कि 28 सितंबर, 2011 को मेपल की हत्या हुई थी और 28 सितंबर, 2014 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी को साजिश रचने व हत्या करने के आरोप में 19 साल की सश्रम कारावास की सजा तथा उस के साथी गुरसिमर बेदी को साजिश में शामिल होने और हथियार मुहैया कराने के आरोप में 8 साल की सजा सुनाई.

कथा लिखे जाने तक 15 नवंबर, 2015 को गुरजिंदर के वकील ने जमानत की अर्जी कोर्ट में लगाई थी, पर कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए अर्जी खारिज कर दी थी. Canada

Delhi News: 2 बेटियों को मारकर मां ने की खुदकुशी

Delhi News: देश की राजधानी से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने हर किसी को हैरान कर रख दिया है. जहां एक मां ने पहले अपनी 2 बेटियों की जान ले ली, इस के बाद खुद भी सुसाइड करने की कोशिश की. आखिर कौन थी वह मां, जिस ने यह कदम उठाया और क्या मजबूरी रही होगी. जिस से वह इतना खौफनाक कदम उठाने के लिए मजबूर हो गई? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से, जो आप को होने वाली ऐसी घटनाओं से सावधान भी करेगी.

यह घटना दक्षिणी दिल्ली के मालवीय नगर से सामने आई है, जहां बड़ी बेटी राधिका और छोटी बेटी गुनिशा एक घर के अंदर मृत मिलीं. वहीं मां सुनीता एक कमरे में बेहोश मिली. इस घटना की जानकारी मिलते ही इलाके में सनसनी फैल गई.

पुलिस के अनुसार, उन्हें सूचना मिली कि एक घर में कमरा काफी देर से बंद है और दरवाजा कोई खोल नहीं रहा है. इस के बाद पुलिस मौके पर पहुंची तो देखा कि दरवाजा अंदर से बंद है. पुलिस ने दरवाजा खोला तो एक कमरे में एक युवती का शव पड़ा हुआ था, जिस के चेहरे पर एक तकिया भी रखा हुआ था. वहीं दूसरे कमरे में पुलिस को एक शव और मिला, जिस के गले पर निशान थे. बाद में दोनों की पहचान सगी बहनों के रूप में हुई. वहीं इन दोनों बहनों की मां सुनीता एक कमरे में बेहोश मिली. पुलिस ने तीनों को ट्रामा सेंटर में भरती करा दिया गया.

पुलिस ने आशंका जताई है कि दोनों बेटियों की हत्या  सुनीता ने की, इस के बाद खुद आत्महत्या करने की कोशिश की थी.

पुलिस ने मौके पर ही क्राइम टीम और एफएसएल की टीम को भी बुला लिया, जिस से इन की जांच की जा रही है. घटना की जानकारी मिलते ही मालवीय नगर के विधायक सतीश कुमार भी मौके पर पहुंचे. पुलिस का कहना है कि बड़ी बेटी राधिका बीमार रहती थी, वहीं गुनिशा कानून की पढ़ाई कर रही थी. पुलिस पूरे मामले की विस्तार से जांच कर रही है. Delhi News