Suspense Story: बेवफाई का दर्द

Suspense Story: धनदौलत, सुखसुविधाओं के अलावा औरत की और भी जरूरतें होती हैं. मर्चेंट नेवी में इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी  विवाहिता सुष्मिता की उन्हीं जरूरतों को पूरी नहीं  कर पा रहा था. इस का अंजाम इतना भयानक निकला कि…

9 दिसंबर, 2015 की सुबह के 6 बजे महाराष्ट्र के जिला रायगढ़ की तहसील पनवेल, नवी मुंबई के थाना मानसरोवर कामोठे के सीनियर इंसपेक्टर श्रीराम मल्लेमवार को किसी ने फोन द्वारा सूचना दी कि सेक्टर-19 की वेदांत दृष्टि सोसायटी की दूसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर 201 में एक हादसा हो गया है, जिस में 3 लोग मारे गए हैं. तीनों लाशें फ्लैट में पड़ी हैं. सूचना गंभीर थी. श्रीराम मल्लेमवार तत्काल अपने साथ सहायक पुलिस इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर, सबइंसपेक्टर जनार्दन पार्टे, हैडकांस्टेबल मोहन मुलीक, सुनील होलार, दिलीप मिनमिणे और रवि गर्जे को ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे.

सुबहसुबह सोसायटी में पुलिस देख कर सुरक्षागार्डों से ले कर वहां रहने वाले तक इस आशंका से घिर गए कि यहां ऐसा क्या हो गया कि पुलिस को आना पड़ा. देखते ही देखते पूरी सोसायटी के लोग इकट्ठा हो गए. पुलिस ने फ्लैट नंबर 201 के अंदर जाने से पहले उस में रहने वालों के बारे में पूछा तो पता चला कि उस में मर्चेंट नेवी में काम करने वाले इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी पत्नी सुष्मिता ठाकुर के साथ रहते थे. इसे उन्होंने एक साल पहले ही 10 हजार रुपए महीने के किराए पर लिया था.

धु्रवकांत नौकरी की वजह से अधिकतर बाहर ही रहते थे, इसलिए उन की पत्नी सुष्मिता ठाकुर यहां अकेली ही रहती थीं. साल भर में धु्रवकांत को एकदो बार ही देखा गया है. जबकि उन के एक दोस्त अजय सिंह को अकसर उन के यहां देखा गया है. करीब एक सप्ताह से वह सुष्मिता के साथ ही रह रहा था. कल रात ही धु्रवकांत अपने फ्लैट पर आए थे. सोसायटी के सुरक्षागार्डों से पूछताछ कर के श्रीराम मल्लेमवार ने यह जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी और सहयोगियों के साथ फ्लैट नंबर 201 के सामने जा पहुंचे. फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था. दरवाजा तोड़ कर वह अंदर दाखिल हुए तो उन्हें जो सूचना दी गई थी, वह सच साबित हुई.

सामने के हाल में फर्श पर एक युवक की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस के शरीर से निकला खून फर्श पर फैला हुआ था. उस के शरीर और गले पर किसी तेजधार वाले चाकू के कई गहरे घाव थे. हाल के सामने वाले बैडरूम में एक युवा और खूबसूरत महिला की लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर किसी तरह का कोई घाव नहीं था. उस के नाकमुंह पर एक तकिया पड़ा था, इस का मतलब उस की हत्या उसी तकिए से मुंहनाक दबा कर की गई थी. उसी कमरे में एक कोने में एक युवक बेहोश पड़ा था, जिस के गले में एक टूटी हुई टाई बंधी थी, पास ही एक छोटा सा टेबल गिरा पड़ा था, टाई का आधा हिस्सा छत में लगे पंखे से बंधा था. इस से श्रीराम मल्लेमवार ने अंदाजा लगाया कि इस ने आत्महत्या की कोशिश की होगी. लेकिन टाई के टूट जाने की वजह से वह उस में सफल नहीं हुआ.

श्रीराम मल्लेमवार ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया. गार्डों और पड़ोसियों ने उस की शिनाख्त धु्रवकांत ठाकुर के रूप में की. मृतका सुष्मिता ठाकुर थी और मृतक उस का दोस्त अजय सिंह था. श्रीराम मल्लेमवार घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण कर रहे थे कि नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर प्रभात रंजन, एडीशनल पुलिस कमिश्नर विश्वास पाढरे, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर शेषराव सूर्यवंशी भी आ गए थे. अधिकारियों के साथ ही प्रैस फोटोग्राफर, डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम भी आई थी. इन लोगों का काम खत्म हो गया तो वरिष्ठ अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के बाद वे इस मामले की जांच की जिम्मेदारी श्रीराम मल्लेमवार को सौंप कर चले गए.

श्रीराम मल्लेमवार ने सहायकों की मदद से घटनास्थल की औपचारिकताएं निभा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ग्रामीण अस्पताल भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति, 2 लोगों की हत्या और एक के आत्महत्या करने की कोशिश से ही पुलिस समझ गई थी कि यह अवैध संबंधों का मामला है. लेकिन पूरी सच्चाई तो तभी सामने आ सकती थी, जब बेहोश पड़े धु्रवकांत को होश आ जाता. लेकिन जब पुलिस ने उन के फ्लैट की तलाशी ली तो वहां पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला, जिसे धु्रवकांत ने अपनी बहन रंजना झा के नाम लिखा था.

उस सुसाइड नोट को पढ़ने के बाद हत्याओं और आत्महत्या का कुछ रहस्य तो उजागर हो गया, जो रहस्य बाकी बचा था, वह धु्रवकांत के होश में आने के बाद दिए गए उन के बयान से उजागर हो गया. यह सचमुच अवैध संबंधों में की गई हत्याओं का मामला था. यह पूरी कहानी कुछ इस तरह थी. 29 वर्षीय धु्रवकांत ठाकुर बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के थाना कस्बा मडि़यारपुर के रहने वाले विमलकांत ठाकुर के दूसरे नंबर के बेटे थे. विमलकांत के पास खेती की ठीकठाक जमीन थी, इसलिए उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे तथा एक बेटी रंजना थी.

बड़ा बेटा पढ़लिख कर बाप के साथ खेती करने लगा तो उन्होंने उस की शादी कर दी. उस के बाद रंजना की भी शादी कर दी. वह नवी मुंबई के एटौली में पति के साथ रहती थी. धु्रवकांत सब से छोटा था. उस ने विज्ञान विषय से पढ़ाई की थी, इसलिए एयरफोर्स या नेवी की नौकरी करना चाहता था. गांव में रह कर वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकता था, इसलिए बहन के पास मुंबई आ गया और सपनों की तलाश में जुट गया.

आखिर धु्रवकांत का सपना साकार हुआ. उस ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और मर्चेंट नेवी में भरती हो गया. उसे चैंबूर गोवड़ी की जीएसएम साईं कमर्शियल कंपनी में नौकरी मिल गई थी. उसे अच्छी तनख्वाह तो मिलती ही थी, विदेश घूमने का भी मौका मिल रहा था. अब उस का ज्यादा समय विदशों में ही बीतता था. नौकरी लगने के बाद वह स्थाई रूप से मुंबई में ही बसने के बारे में सोचने लगा था. नौकरी लगते ही घर वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी. विमलकांत बेटे के विवाह के लिए जैसे ही तैयार हुए, उन के यहां रिश्तों की लाइन लग गई. उन रिश्तों में उन्होंने अपने ही जिले की तहसील महुआ के रहने वाले चंद्रमोहन ठाकुर की सुंदरसुशिक्षित बेटी सुष्मिता को पसंद कर लिया.

धु्रवकांत ने भी सुष्मिता को देखा. उन्हें भी सुष्मिता पसंद आ गई तो मई, 2010 में धु्रवकांत और सुष्मिता की शादी धूमधाम के साथ हो गई. शादी के बाद धु्रवकांत सुष्मिता को मांबाप के पास छोड़ना चाहता था, लेकिन सुष्मिता इस के लिए तैयार नहीं हुई. मजबूरन उसे पत्नी को मुंबई लाना पड़ा.

मुंबई आने के बाद धु्रवकांत मात्र एक सप्ताह पत्नी के साथ रहा. उस के बाद पत्नी को बहन के पास छोड़ कर अपनी नौकरी पर चला गया. नईनवेली दुलहन सुष्मिता का दिन तो किसी तरह बीत जाता था, लेकिन रातें उस के लिए पहाड़ सी बन जाती थीं. लगभग 6 महीने बाद धु्रवकांत विदेश से वापस आया तो सुष्मिता शिकायतों का पिटारा ले कर उस के सामने बैठ गई. सुष्मिता की शिकायतें वाजिब थीं, क्योंकि एक औरत को शादी के बाद जो चाहिए, वह उन्हें पूरी नहीं कर सका था. लेकिन उस की भी मजबूरी थी. लिहाजा पत्नी को समझाबुझा कर और आश्वासन दे कर चुप करा दिया.

कुछ दिनों पत्नी के साथ रह कर धु्रवकांत फिर नौकरी पर चला गया. लेकिन इस बार वह लौटा तो घर का माहौल काफी बदला हुआ था. इस बार सुष्मिता ने उस की बहन रंजना के साथ रहने से साफ मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि उन दोनों के बीच काफी मनमुटाव हो गया था. पत्नी की बात मानना धु्रवकांत की मजबूरी थी, इसलिए सुष्मिता के कहने पर उस ने बहन से अलग रहने का फैसला कर लिया और सुष्मिता के रहने की व्यवस्था जुईनगर के एक वूमंस हौस्टल में कर दी. सुष्मिता को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो और उस का मन बहलता रहे, इस के लिए उस ने घर में कंप्यूटरइंटरनेट की भी व्यवस्था कर दी.

यही नहीं, सुष्मिता का समय व्यतीत करने के लिए उस ने उस का दाखिला एमजीएम अस्पताल में औपरेशन थिएटर में तकनीकी सहायक के कोर्स में करा दिया. लेकिन सुष्मिता जिस उम्र में थी, वह उम्र नदी में आई बाढ़ की तरह होती है. अगर बांध मजबूत न हुआ तो वह उसे तोड़ कर बह निकलने में देर नहीं लगाती. सुष्मिता ने भी कुछ ऐसा ही किया. भले ही मन बहलाने की सारी सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन पति से अलग रह कर वह खुश नहीं थी.

धीरेधीरे उस की शादी को 3 साल हो गए थे. अब तक न तो उस के तन की प्यास बुझी थी और न ही उसे मातृत्व सुख मिला था, जिस की चाहत हर औरत को होती है.

यह सब सोच कर जब कभी वह बेचैन होती तो सोशल मीडिया का सहारा लेती. धु्रवकांत से वह घंटों चैटिंग करती. फेसबुक पर भी उस के दोस्तों की लंबी सूची थी. उन्हीं दोस्तों में एक था अजय सिंह, जिस के सामने उस की नजरों में धु्रवकांत की तसवीर फीकी पड़ गई थी. सुष्मिता ने अजय की प्रोफाइल खोल कर देखी तो मजबूत कदकाठी का स्मार्ट दिखने वाला अजय उसी के जिले का रहने वाला निकला. वह दुबई की एक बैंक में नौकरी करता था. उस का फोटो और प्रोफाइल देख कर सुष्मिता उस की ओर आकर्षित हो गई. उस ने उस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो उस ने दोस्ती स्वीकार कर ली.

दिसंबर, 2014 में अजय भारत आया तो मुंबई के मैकडोनाल्ड में दोनों की मुलाकात हुई. इस मुलाकात में अजय के बातव्यवहार से वह उस पर मर मिटी. अजय अविवाहित था. उसे भी सुष्मिता इतनी भायी कि उस ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि वह विवाहित है. दोनों का मिलनाजुलना शुरू हुआ तो मर्यादा की दीवार टूटते देर नहीं लगी. इस पर सुष्मिता को कोई पछतावा भी नहीं हुआ. इस की वजह शायद यह थी कि अजय की बांहों में उसे जो सुख और सुकून मिला था, धु्रवकांत की बांहों में उसे कभी नहीं मिला था.

इस के बाद धु्रवकांत छुट्टी पर मुंबई आया तो किसी वजह से हौस्टल बंद हो गया. इस के बाद उस ने कामोठे की वेदांत दृष्टि सोसायटी में किराए का फ्लैट ले कर सुष्मिता को उस में शिफ्ट कर दिया. यहीं पर सुष्मिता ने अजय सिंह को अपने पति धु्रवकांत से मिलवाया. धु्रवकांत भी अजय की बातों और स्वभाव से काफी प्रभावित हुआ, इसलिए उस ने भी उस से दोस्ती कर ली.

लेकिन इस बार धु्रवकांत ने सुष्मिता के व्यवहार में काफी बदलाव महसूस किया. यह बदलाव उस ने जाने के बाद भी महसूस किया. पहले सुष्मिता उस से इंटरनेट पर घंटों चैटिंग करती रहती थी, फोन पर प्यार से बातें करती थी, अब वह उसे फोन ही नहीं करती थी. वह जब भी उसे फोन करता, उस का फोन बिजी रहता. फोन उठाती भी तो सीधे मुंह बात नहीं करती थी. नेट पर चैटिंग तो एकदम से बंद कर दी थी. इस से उसे काफी तकलीफ होती थी.

जब कभी धु्रवकांत शिकायत करता तो वह टाल देती. आखिर उसे चिंता ही किस बात की थी. उस की जिंदगी में तो कोई और धु्रव आ गया था. धु्रवकांत 6-7 महीने में आता था, जबकि सुष्मिता अजय सिंह को जब भी याद करती थी, वह 2 घंटे में उस के पास पहुंच जाता था. हौस्टल में सुष्मिता किसी पुरुष को साथ नहीं रख सकती थी, जबकि फ्लैट में तो कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. अजय सिंह का जब मन होता, वह उस के यहां रुक भी जाता था.

सुष्मिता क्यों बदल गई है, जब इस बात की जानकारी धु्रवकांत को हुई तो वह सन्न रह गया. वह सुष्मिता को बहुत प्यार करता था. वह तुरंत मुंबई आया और सुष्मिता को समझाने की कोशिश की. लेकिन अब सुष्मिता कहां समझने वाली थी. उस ने प्रेमी के लिए पति से झगड़ा ही नहीं कर लिया, बल्कि उसे छोड़ने को भी तैयार हो गई. धु्रवकांत ने सारी बातें सासससुर को बता कर सुष्मिता को समझाने को कहा तो उन लोगों ने उस की बात पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद सुष्मिता ने अपने मातापिता को सारी बात बता कर पहले ही अपने पक्ष में कर लिया था. इसी वजह से वे भी बेटी की बेवफाई पर चुप थे.

धु्रवकांत सुष्मिता को समझाबुझा कर अपनी ड्यूटी पर चला गया. लेकिन सुष्मिता मर्यादा में आने के बजाय और बाहर चली गई. उस ने अजय से शादी करने का फैसला कर लिया. इस से मुंबई से ले कर गांव तक धु्रवकांत की बदनामी हो रही थी. बदनामी उस से सहन नहीं हो पा रही थी. लेकिन वह कुछ कर पाने की स्थिति में भी नहीं था. वह एक मर्द था, अपनी पत्नी को दूसरे मर्द की बांहों में कैसे देख सकता था. उस के यारदोस्त भी उस की हंसी उड़ाते थे कि वह अपनी पत्नी को संभाल नहीं पाया. इस से वह और परेशान रहता था कि सुष्मिता को वह अजय के चंगुल से कैसे मुक्त कराए. वह इसी सोच में डूबा था कि सुष्मिता ने उस से जो कहा, उस से वह बेचैन हो उठा.

उस समय धु्रवकांत का जहाज फ्रांस के बंदरगाह पर था. सुष्मिता ने उसे फोन कर के कहा कि वह 2 दिनों में मुंबई पहुंचे और उसे तलाक दे. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. वह अजय से शादी कर के उस के साथ गृहस्थी बसाना चाहती है. धु्रवकांत ने उसे समझाना चाहा तो वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम्हीं बताओ, मैं ऐसा क्यों न करूं? आज तक तुम ने मुझे दिया ही क्या है? हर औरत मां बनना चाहती है. तुम आज तक मुझे मां नहीं बना सके. आखिर मैं तुम से क्या उम्मीद करूं? औरत को धनदौलत की उतनी चाह नहीं होती, जितनी पति और बच्चों की होती है. जब उसे ये चीजें पति से नहीं मिलतीं, तभी वह भटक जाती है. शादी के बाद तुम ने मेरे साथ कितने दिन और रातें गुजारी हैं, इसे अंगुलियों पर गिन कर बताया जा सकता है.’’

‘‘सुष्मिता, मैं तुम्हारे दर्द को अच्छी तरह समझता हूं. लेकिन क्या करूं, मेरी भी मजबूरी है. मेरी नौकरी ही ऐसी है कि मैं चाह कर भी तुम्हारे साथ ज्यादा दिन नहीं रह सकता. जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा.’’ धु्रवकांत ने सुष्मिता को समझाते हुए कहा. इस के बाद वह फ्लाइट पकड़ कर सीधे मुंबई आ गया. 8 दिसंबर, 2015 की रात 12 बजे जब वह अपने फ्लैट पर पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लगा था. सुष्मिता घर पर नहीं थी. गार्डों से पूछने पर पता चला कि वह 8 दिन पहले फ्लैट पर आए अजय सिंह के साथ कहीं बाहर गई है.

इस जानकारी के बाद धु्रवकांत अपना गुस्सा पी कर फ्लैट पर पहुंचा और अपनी चाबी से फ्लैट का दरवाजा खोल कर अंदर आया और हाल में बैठ कर सुष्मिता का इंतजार करने लगा. रात एक बजे जिस हालत में सुष्मिता अजय सिंह के साथ आई, वह सब देख कर धु्रवकांत का खून खौल उठा. सुष्मिता काफी कम कपड़ों में अजय की कमर में बांहें डाले अंदर आई थी. पत्नी को किसी गैर की बांहों में इस तरह देखना बरदाश्त के बाहर की बात थी. फ्लैट के अंदर रोशनी में बैठे धु्रवकांत को देख कर एक पल के लिए तो उन के चेहरे का रंग उड़ गया था, लेकिन अगले ही पल दोनों संभल गए. सुष्मिता ने बेरुखी से पूछा, ‘‘अरे, तुम कब आए?’’

पत्नी की बेरुखी से धुंवकांत का चेहरा लाल हो उठा. उस ने भी उसी की भाषा में कहा, ‘‘मैं कब आया, यह छोड़ो. पहले तुम यह बताओ कि इतनी रात गए तुम पराए मर्द के साथ कहां से आ रही हो?’’ इस के बाद अजय की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘इसे तुरंत यहां से बाहर करो.’’

‘‘यह तो कहीं नहीं जाएंगे, अगर जाना ही है तो तुम चले जाओ.’’ सुष्मिता ने अजय का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘हम दोनों कल मंदिर में शादी करने वाले हैं. इस के लिए मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है.’’ इतना कह कर सुष्मिता अजय सिंह का हाथ पकड़ कर बैडरूम में चली गई.

सुष्मिता की इन बातों और हरकत से धु्रवकांत का कलेजा छलनी हो गया. उस की आंखों में खून के आंसू आ गए. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था, एक दिन वह उस के साथ इस तरह का व्यवहार करेगी. सुष्मिता और अजय सिंह तो सो गए, जबकि धु्रवकांत को नींद नहीं आ रही थी. सुबह 5 बजे तक वह हाल के सोफे पर ही बैठा रहा. उस की आंखों के सामने सुष्मिता के साथ शादी से ले कर अब तक के बिताए पल चलचित्र की तरह घूम रहे थे. सुष्मिता ने जो किया था, कोई भी होता उसे नफरत हो जाती. अजय ने भी उस के साथ विश्वासघात किया था.

विश्वास, नफरत और हिकारत की आंधी ने धु्रवकांत की बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया. उस ने तुरंत एक भयानक फैसला कर लिया और किचन में जा कर सब्जी काटने वाला चाकू उठा लाया. चाकू ले कर वह बैडरूम पहुंचा और बातें करने के बहाने सुष्मिता के साथ गहरी नींद में सोए अजय सिंह को जगा कर हाल में ले आया. हाल में आते ही नींद में डूबे अजय का मुंह पकड़ कर उस ने उस पर हमला कर दिया. उस ने उसे तभी छोड़ा, जब तक वह मर नहीं गया. इस के बाद वह सुष्मिता के पास पहुंचा और उस से संबंध बनाने की इच्छा जताई. लेकिन उसे खून में नहाया देख कर सुष्मिता के होश उड़ गए. वह बैड से उठ कर भागी, लेकिन धु्रवकांत उसे दबोच कर उस के सीने पर सवार हो गया.

सुष्मिता ने विरोध तो बहुत किया, लेकिन धु्रवकांत ने तकिया उस के चेहरे पर रख कर दबा दिया. वह तकिए को तब तक दबाए रहा, जब तक वह मर नहीं गई. दोनों की हत्या कर धु्रवकांत ने अपना लैटरपैड उठाया और अपनी बहन रंजना के नाम एक पत्र लिखा, जिस में उस ने अपनी पत्नी सुष्मिता की बेवफाई और अजय सिंह के विश्वासघात का जिक्र करते हुए अपनी आत्महत्या के बारे में बताया कि वह सुष्मिता से बहुत प्यार करता था. वह उस का खून नहीं देख सकता था, इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार नहीं किया. उस ने उस की हत्या तकिए से की. सुष्मिता और उस का प्रेमी अजय सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं. अब वह भी जीना नहीं चाहता, इसलिए वह भी आत्महत्या कर रहा है.

सुसाइड नोट लिखने के बाद धु्रवकांत ने थाना पुलिस को फोन कर के घटना की सूचना दी. उस का सोचना था कि जब तक पुलिस उस के फ्लैट पर पहुंचेगी, तब तक वह भी मर चुका होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. संयोग से वह बच गया. उस ने जिस टाई से आत्महत्या करने की कोशिश की थी, वह काफी कमजोर थी. इसलिए उस के लटकते ही वह टूट गई. लेकिन टाई गले में कस गई थी, जिस से वह फर्श पर गिर कर बेहोश हो गया.

श्रीराम मल्लेमवार के दिशानिर्देश में असिस्टैंट इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर ने जांच पूरी कर के इस मामले को अपराध संख्या 234/2015 पर भादंवि की धारा 302, 164 के तहत दर्ज कर 1 जनवरी, 2016 को धु्रवकांत ठाकुर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Maharashtra Crime New: ड्रग क्वीन बेबी पाटनकर

Maharashtra Crime New: गरीबी में पलीबढ़ी शशिकला पाटनकर उर्फ बेबी ने महलों में रहने के जो सपने देखे थे, वे पूरे तो कर लिए, लेकिन न जाने कितनों के सपने तोड़ कर. अपने सपने पूरे करने के लिए उस ने जो रास्ता अख्तियार किया, क्या वह उचित था….

महाराष्ट्र के नवी मुंबई पनवेल के खारपाडा टोला नाके के पास जैसे ही एक लग्जरी बस आ कर रुकी, फुरती से उस में एक महिला के साथ कई लोग चढ़ गए. उन में से एकएक आदमी बस के दोनों गेटों के पास खड़े हो गए, ताकि बस से कोई भी आदमी बाहर न जा सके, बाकी लोग ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठी महिला के पास जा कर खड़े हो गए. महिला देखने में किसी धनाढ्य परिवार की लग रही थी. बस में चढ़े लोगोेंके साथ चढ़ी महिला ने सीट पर बैठी महिला से कहा, ‘‘मैडम चलिए, आप का सफर खत्म हो गया है. अब आप को हमारे साथ चलना है.’’

सीट पर बैठी उस महिला ने खड़ी महिला को एक बार ऊपर से नीचे तक देखा. इस के बाद थोड़ी नाराजगी जताते हुए बोली, ‘‘क्या मतलब है आप का. आप हैं कौन और मुझ से इस तरह की बात क्यों कह रही हैं?’’

‘‘हम कौन हैं, यह अभी आप को पता चल जाएगा. हम मतलब भी बता देंगे. बहरहाल अभी तो आप को हमारे साथ चलना होगा.’’ उस महिला को सवारी से बहस करता देख बस के ड्राइवर और कंडक्टर को बुरा लगा. उन्होंने सीट पर बैठी महिला का पक्ष लेते हुए उन लोगों से पूछा, ‘‘आप लोग कौन हैं, जो बस में बैठी महिला से इस तरह की बातें कर रहे हैं.’’

इसी के साथ अन्य सवारियों ने भी उन लोगों का विरोध करना शुरू कर दिया. इस के बाद उन लोगों में से एक ने अपना आईडी कार्ड दिखाते हुए कहा, ‘‘हम लोग मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच से हैं. इस महिला की हमें लंबे समय से तलाश थी.’’

जब सभी को पता चला कि ये पुलिस वाले हैं तो फिर किसी की भी बोलने की हिम्मत नहीं हुई. सीट पर बैठी महिला के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ने लगीं. पुलिस वालों ने उस महिला को बस से उतार कर अपनी वैन में बैठा लिया. इसी के साथ वे उसी बस में अलगअलग सीटों पर बैठे 3 अन्य लोगों को भी बस से उतार कर उसी वैन में बैठा लिया था. वे तीनों भी उसी महिला के साथी थे. उन चारों को पुलिस क्राइम ब्रांच के हेड औफिस ले आई. बस में बैठा कोई भी व्यक्ति नहीं समझ सका था कि वह महिला कौन थी और क्राइम ब्रांच वाले उसे और उस के साथियों को क्यों ले गए थे?

वह महिला कोई और नहीं, महाराष्ट्र की एक बहुत बड़ी ड्रग्स तस्कर 52 वर्षीया शशिकला मजगांवकर उर्फ बेबी रमेश पाटनकर थी. उस के साथ जिन 3 लोगों को हिरासत में लिया गया था, उस में उस का छोटा बेटा गिरीश पाटनकर, उस का दोस्त और उस की भांजी थी. बेबी को छोड़ कर बाकी तीनों के बयान ले कर पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया था. ड्रग्स तस्कर शशिकला मजगांवकर का नाम पुलिस की लिस्ट में तब आया था, जब सातारा लोकल क्राइम ब्रांच और मरीन लाइंस पुलिस ने उस के एक साथी कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे को 122 किलोग्राम मेफेड्रन  (मिथाइलमेथ कैथिनोन) के साथ गिरफ्तार किया गया था.

यह एक सिंथेटिक ड्रग है, जिस की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करीब 2 करोड़ रुपए से अधिक थी. कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा को ड्रग की इतनी बड़ी खेप के साथ गिरफ्तार कराने में शशिकला की ही मुख्य भूमिका थी. शशिकला ने ही सतारा पुलिस की लोकल क्राइम ब्रांच को इस की खबर दी थी. इस के बाद उस गिरफ्तार सिपाही धर्मराज से पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच ने शशिकला को गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की थी. शशिकला उर्फ बेबी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के साथ ड्रग्स तस्करी में लगे उस के दोनों भाई अर्जुन, शत्रुघ्न, उस के बेटे सतीश पाटनकर, ड्राइवर महेंद्र सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने उस की लग्जरी कारों को भी बरामद कर लिया.

अब तक की जांच में क्राइम ब्रांच को पता चला गया था कि शशिकला और कांस्टेबल धर्मराज के बीच गहरे रिश्ते थे. धर्मराज सिर्फ शशिकला के लिए ही काम करता था. इस पूछताछ और जांच में एक गरीब परिवार की बेटी शशिकला के ड्रग्स क्वीन बनने की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी : शशिकला माजगांवकर उर्फ बेबी पाटनकर का जन्म महाराष्ट्र के जनपद सतारा के एक गरीब किसान परिवार में हुए था. शशिकला चंचल स्वभाव की थी. उस की परवरिश गरीबी में हुई जरूर थी, लेकिन वह अतिमहत्त्वाकांक्षी थी. उस के परिवार में मातापिता के अलावा 2 भाई अर्जुन और शत्रुघ्न थे. वह अपने दोनों भाइयों से बड़ी थी. गरीबी की वजह से उन की पढ़ाईलिखाई भी नहीं हो सकी थी.

शशिकला को गरीबी से नफरत थी. उस की चाहत और सपने बड़े थे. वह अकसर धनदौलत के ख्वाब देखा करती थी. उस के सारे सपने और सारी चाहतें तब जल कर खाक हो गईं, जब उस की शादी एक साधारण से युवक रमेश पाटनकर से हो गई. सीधासाधा रमेश पाटनकर महानगर मुंबई के उपनगर वरली के सिद्धार्थनगर की झोपड़पट्टी में रहता था. वहां उस के साथ रहने में शशिकला का जैसे दम घुटता था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. पति जो भी मेहनतमजदूरी कर के लाता था, उसी में वह जैसेतैसे घर चलाती थी.

समय का पहिया अपनी गति से घूम रहा था. इसी बीच शशिकला 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई. परिवार बढ़ने पर घर के खर्च भी बढ़ गए थे. पति जो कमा कर लाता था, उस से घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था. उस ने अपने सपनों के साथ तो समझौता कर लिया था, लेकिन उसे बच्चों के भविष्य की भी चिंता थी. वह नहीं चाहती थी कि उसी की तरह उस के बच्चे भी अभावों भरी जिंदगी जिएं. शशिकला पति से आमदनी बढ़ाने की बात करती. लेकिन पति भी कोई ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, जिस से उसे कोई मोटी तनख्वाह की नौकरी मिलती. लिहाजा चाह कर भी वह अपनी आमदनी नहीं बढ़ा पा रहा था. इसी बात को ले कर शशिकला की पति से अकसर कहासुनी होती रहती थी. आखिरकार   रोजरोज की कहासुनी से तंग आ कर रमेश पाटनकर एक दिन घर छोड़ कर कहीं चला गया.

पति की इस बेरुखी से शशिकला टूट सी गई. अब तीनों बच्चों की परवरिश और पढ़ाईलिखाई की सारी जिम्मेदारी उस के कंधों पर आ गई. अचानक आने वाली इस परेशानी से वह घबराई नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश करने लगी. गुजरबसर के लिए शशिकला ने दूध का धंधा शुरू किया. वह सुबह उठ कर वरली की दूध डेयरी पर जाती और वहां से बोतल पैक दूध ला कर अपनी बस्ती के घरघर पहुंचाती. यह बात सन 1981 की है. इस से उस के घर की गाड़ी तो चलने लगी, लेकिन भविष्य के लिए हाथ में कुछ नहीं बचता था. इस के लिए वह हमेशा चिंतित रहती थी. अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए वह किसी हद तक जाने को तैयार थी. इसलिए वह किसी ऐसे काम की तलाश में थी, जिस से उसे भरपूर कमाई हो.

आखिर उसे एक दिन वह काम मिल ही गया, जिसे करने से उसे मोटी आमदनी हो सकती थी. शशिकला जिस बस्ती में रहती थी, वहीं उसे एक ऐसा व्यक्ति मिला, जिस ने उस की जीवनधारा ही बदल दी. उस ने बिना मेहतन के ढेर सारी दौलत कमाने का रास्ता सुझा दिया. वह काम ड्रग्स सप्लाई का था. यह काम थोड़ा जोखिम भरा जरूर था. लेकिन जितनी मेहनत वह दूध बेचने में करती थी, उतनी मेहनत इस काम में कर देने पर उस की झोली में ढेर सारी दौलत आ सकती थी.

शशिकला को उस आदमी की सलाह उचित लगी थी क्योंकि उस की बस्ती के ही तमाम लोग ड्रग्स का सेवन करते थे. उस ने  दूध बेचने के साथसाथ चरस, गांजा, हशीश, ब्राऊनशुगर आदि बेचना शुरू कर दिया. इस से उस की आमदनी बढ़ गई. जब कमाई बढ़ गई तो शशिकला ने दूध बेचने वाला काम बंद कर दिया और अपना पूरा ध्यान नशीले पदार्थों के धंधे पर लगा दिया. धीरेधीरे शशिकला ने बस्ती से बाहर पैर पसारने शुरू किए. इस के बाद उस ने मुंबई यूनिवर्सिटी परिसर को अपना अड्डा बना लिया. शुरूशुरू में ड्रग्स तस्करी में अपना पैर जमाने के लिए शशिकला पाटनकर को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ा था. लेकिन समय के साथ सब ठीक हो गया.

क्योंकि जल्दी ही उस के शहर के कई बड़े ड्रग्स तस्करों से अच्छे संबंध बन गए थे. इस लाइन में आने के बाद उस ने अपना नाम बेबी रख लिया था. बेबी उन्हीं तस्करों से माल ला कर मुंबई में सप्लाई करने लगी थी. गरीबी का अभिशाप दूर करने के लिए उस ने अपने पूरे परिवार, बेटे सतीश, बेटीबहू के अलावा दोनों भाइयों को भी अपने इस व्यवसाय में शामिल कर लिया था. किसी तरह की परेशानी न हो, सभी को उस ने धंधे के गुर भी सिखा दिए थे. मुंबई में अचानक ड्रग्स की विक्री की बाढ़ सी आ गई तो मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के अलावा एंटी नार्कोटिक्स (ड्रग्स कंट्रोल सेल) के अधिकारियों के कान खड़े हो गए. क्राइम ब्रांच ने मुखबिरों को सतर्क किया तो उन्हें अपने मुखबिरों से पता चला कि इस सारे रैकेट के पीछे किसी बेबी नाम की महिला का हाथ है.

क्राइमब्रांच और एंटी नार्कोटिक्स सेल के अधिकारी हाथ धो कर बेबी के पीछे पड़ गए तो वह घबरा कर कुछ दिनों के लिए भूमिगत हो गई. उस पर मामला तो दर्ज हो गया, लेकिन उस ने खुद को गिरफ्तारी से बचा लिया. उस के भूमिगत होने से ड्रग्स मार्केट में खलबली मच गई. बाजार में ड्रग्स के न आने से करोड़ो रुपए का नुकसान हो रहा था. बेबी इस बात को ले कर परेशान थी कि अगर कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा तो उस का करोबार ठप हो जाएगा. वह इस समस्या का समाधान ढूंढने लगी. इसी तलाश में उस की मुलाकात पुलिस कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे से हुई, जिस की मदद से उस ने एक बार फिर अपने कारोबार को शिखर पर पहुंचा दिया.

अपना काम निकालने के लिए बेबी ने उसे अपने रूपयौवन के जाल में इस तरह फंसाया कि वह उस में उलझ कर रह गया. यह सन 2002 की बात थी. धर्मराज उसी जनपद का रहने वाला था, जिस जनपद की बेबी रहने वाली थी. धर्मराज उन दिनों पुलिस की नौकरी में नयानया आया था. उसे भरती हुए लगभग 2 साल ही हुए थे. इस नौकरी से मिलने वाले थोड़े से वेतन से वह संतुष्ट नहीं था. उस के वेतन से उस के घरपरिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो पाता था. जब बेबी को भरोसा हो गया कि सिपाही धर्मराज उस के रूपजाल में पूरी तरह फंस चुका है तो उस ने उसे अपने कारोबार के बारे में सब कुछ बता कर करोबार को बढ़ाने में मदद मांगी.

बेबी की असलियत जान कर एक बार तो धर्मराज के होश उड़ गए. लेकिन जल्दी ही उस ने खुद को संभाल लिया. क्योंकि बेबी की तरह उस ने भी सुखसुविधाओं वाली जिंदगी के जो सपने देखे थे, वे पुलिस की नौकरी में मिलने वाले वेतन से कभी पूरे नहीं हो सकते थे. इसलिए शुरूशुरू में बेबी के साथ काम करने से भले ही वह घबराया हो, लेकिन जल्दी ही वह उस के साथ जुड़ गया. यह सच है कि पैसा अच्छोंअच्छों की नीयत खराब कर देता है, जबकि धर्मराज तो एक मामूली इंसान था, उस की कमाई न के बराबर थी. इसलिए वह बेबी के साथ जुड़ने से मना नहीं कर सका था.

धर्मराज बेबी के कहने पर उस के कारोबार से जुड़ गया. धर्मराज के जुड़ते ही बेबी के कारोबार को जैसे पंख लग गए. धर्मराज की मदद से बेबी अपना करोड़ो का माल बड़ी आसानी से इधर से उधर पहुंचा देती थी. सिपाही और वरिष्ठ अधिकारियों का ड्राइवर होने की वजह से धर्मराज पर कोई शक भी नहीं करता था. इस के अलावा भी पुलिस वालों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए बेबी खुद भी एक बड़े एनकाउंटर स्पैशलिस्ट की मुखबिर बन गई. विश्वास जमाने के लिए उस ने अपने ही कारोबार से जुड़े कई बड़े तस्करों की मुखबिरी कर के उन्हें पकड़ा दिया. इस से उसे दोहरा लाभ मिला. एक तो अधिकारी को उस पर भरोसा हो गया, दूसरे उस का कारोबार बढ़ गया.

अब वह सीधे राजस्थान के भवानी बाजार और मध्य प्रदेश के रतलाम शहर से भारी मात्रा में ड्रग्स मंगा कर पूरे मुंबई में सप्लाई करने लगी. इस बीच बेबी ने अपने कारोबार में धर्मराज की तरह कुछ अन्य पुलिस, कस्टम और इनकमटैक्स के बड़े अधिकारियों को जोड़ लिया था. जिस का उस ने जम कर फायदा उठाया. कुछ ही दिनों में बेबी गांजा, चरस, हशीश, ब्राऊनशुगर और म्यांऊम्यांऊ यानी एमडी मेफेड्रन जैसे खतरनाक ड्रग्स की महारानी बन गई. ड्रग्स तस्करी से बेबी पर नोटों की बरसात होने लगी. देखते ही देखते वह धन कुबेरों की लाइन में खड़ी गई. ड्रग्स तस्करी के पैसों से उस के सपने साकार होने लगे.

पुलिस जांच में बेबी की कई करोड़ की नामीबेनामी संपत्तियों का पता चला है. उस ने घर के सभी लोगों को सोने के गहनों से लाद दिया था. यही नहीं, सिद्धार्थनगर की जिस बस्ती में वह रहती थी, वहां की 20 चालों को उस ने खरीद लिया था, जिस से उसे मोटा किराया आता था. 4 लग्जरी कारों में उस की 2 कारें इनकमटैक्स विभाग में लगी थीं, जिन्हें उस का भाई देखता था. जरूरत पड़ने पर बेबी उन कारों का भी इस्तेमाल अपने कारोबार के लिए कर लेती थी.

इस के अलावा बेबी का नवी मुंबई में एक बड़ा सा प्लौट, पनवेल में एक फार्महाऊस, मुंबई के बोरीवली गौराई बीच में एक सुंदर सा आलीशान बंगला, पूना लोनावाला में एक बंगला, पूना के कोरेगांव में एक मंजिला गृह संकुल, वाइन शौप और कोकण विदर्भ में काफी जमीनजायदाद थी. पकड़े जाने पर 3 बैंक एकाउंट में 40-40 लाख रुपए कैश मिले थे. बेबी पाटनकर का सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. उस पर पहला मामला सन 2001 में दर्ज हुआ था. लेकिन 2014 में बेबी पर वरली, मुंबई और थाना जनपद वसई में अनेक मामले दर्ज हो गए तो उस का अस्तित्व डगमगा गया. उस ने इन 13 सालों में जिस तरह पुलिस और कस्टम के कई बड़े अधिकारियों को मैनेज कर के अपने कारोबार को फैलाया था, लगातार दर्ज होने वाली शिकायतों से उस की जमीजमाई बुनियाद हिल गई.

इस के बाद वह यह सोचने पर मजबूर हो गई कि कोई ऐसा है, जो उस के साम्राज्य में सेंध लगाना चाहता है. जब उस ने इस बात पर गहराई से विचार किया तो उसे अपने साथी धर्मराज उर्फ धर्मा पर संदेह हुआ. धर्मराज उर्फ धर्मा ही एक ऐसा आदमी था, जो उस के लगभग सभी रहस्यों को जानता था. इस की एक वजह यह भी थी कि अभी तक मुंबई और अन्य उपनगरों में बेबी द्वारा लाई गई ही एमडी बिकती थी. लेकिन इधर धर्मराज द्वारा उस के खंडाला कन्हेरी फार्महाऊस से 150 किलोग्राम एमडी छिपाने के बाद भी बाजार में बिक रही थी. इसी बात से उसे लगा कि धर्मराज ज्यादा पैसों के लालच में उस के साथ गद्दारी कर रहा है. जबकि बेबी का यह एक वहम था. वह 150 किलोग्राम एमडी को ले कर बेबी से थोड़ा नाराज जरूर था, लेकिन वह किसी भी तरह की कोई गद्दारी नहीं कर रहा था.

यह 150 किलोग्राम एमडी बेबी ने पूना के एक तस्कर सैमुअल से खरीदी थी. जबकि वह सैमुअल के बारे में ज्यादा कुछ जानती नहीं थी. बेबी से उसे उस के भाई बादशाह ने सन 2007 में मिलवाया था. सैमुअल बादशाह के साथ आर्थर रोड जेल में बंद रहा था. तभी दोनों में दोस्ती हुई थी. यह 150 किलोग्राम एमडी एसटी (स्टेट ट्रांसपोर्ट) की बस द्वारा 2 बार में लाई गई थी. बेबी ने इसे सिद्धार्थनगर स्थित अपने घर में रखवा दी थी. लेकिन दिसंबर, 2014 में सैमुअल पकड़ा गया तो बेबी डर गई. इस के बाद सारी एमडी उस ने धर्मराज को अपने किसी फार्महाऊस में छिपाने के लिए दे दी. धर्मराज उस एमडी को इस शर्त पर छिपाने के लिए राजी हुआ था कि बेबी उसे 25 लाख रुपए देगी.

बेबी ने शर्त मान ली तो धर्मराज ने उसे ले जा कर खंडाला कन्हेरी के अपने फार्महाऊस में छिपा दिया था. लेकिन बाद में बेबी ने शर्त में माने 25 लाख रुपए धर्मराज को नहीं दिए, जिस की वजह से दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था. दरअसल धर्मराज बेबी पाटनकर से मिले इन पैसों को पूना की किसी प्रौपर्टी में निवेश करना चाहता था. उस ने उस प्रौपर्टी के लिए डेढ़ लाख रुपए एडवांस भी दे दिए थे. बेबी के पैसे न देने से वह प्रौपर्टी तो हाथ से निकल ही गई थी, उस के पैसे भी डूब गए थे. इन पैसों को ले कर धर्मराज और बेबी के बीच अकसर कहासुनी होती रहती थी. इस कहासुनी से वह उसे गिरफ्तार कराने की धमकियां भी देता था.

पुलिस वाले कभी किसी के नहीं होते, यह सोच कर बेबी ने धर्मराज को पकड़वा देने में ही अपनी भलाई समझी और अपने ही करोड़ो रुपए के ड्रग को धर्मराज का बता कर सतारा लोकल क्राइम ब्रांच को सूचना दे दी. धर्मराज को अपनी गिरफ्तारी का शक उस पर न हो, इस के लिए वह धर्मराज को साथ ले कर 2 मार्च, 2015 को हिलस्टेशन चली गई थी. वह उस के साथ गोवा, कोल्हापुर, सांवतवाड़ी, रत्नागिरी, महाबलेश्वर और खंडाला जैसे पिकनिक प्वाइंटों पर घूमते हुए उस की गिरफ्तारी का चक्रव्यूह रचती रही. इस मामले में बेबी ने अपने एक विश्वसनीय सिपाही की मदद ली थी. वह सिपाही बेबी पाटनकर के कहने पर अपने एक निलंबित सबइंस्पेक्टर से मिला.

इस के बाद दोनों ने सिपाही धर्मराज के खंडाला कन्हेरी स्थित फार्महाऊस पर छापा मरवाने के लिए पहले पूना के एक कस्टम अधिकारी से बात की. लेकिन पूना के उस कस्टम अधिकारी ने किसी वजह से इस मामले में दिलचस्पी नहीं ली तो दोनों सतारा पुलिस की लोकल क्राइम ब्रांच के औफिस पहुंचे. सतारा क्राइम ब्रांच के अधिकारी तुरंत हरकत में आ गए. उन्होंने धर्मराज के खंडाला कन्हेरी स्थित फार्महाऊस पर छापा मार कर 110 किलोग्राम एमडी बरामद कर ली. धर्मराज उन दिनों मुंबई के मरीन लाइंस पुलिस थाने में तैनात था. वहां उस के लौकर से भी 12 किलोग्राम एमडी बरामद की गई.

9 मार्च, 2015 को पहले सतारा की क्राइम ब्रांच ने धर्मराज उर्फ धर्मा को गिरफ्तार किया. इस के बाद मरीन लाइंस पुलिस ने अपनी सुपुर्दगी में ले लिया. चूंकि सतारा की क्राइम ब्रांच पुलिस को 150 किलोग्राम एमडी की सूचना मिली थी, जबकि बरामद 122 किलोग्राम ही हुई थी. बाकी की 28 किलोग्राम एमडी कहां गई? इस के लिए धर्मराज से पूछताछ के बाद बेबी के बड़े बेटे सतीश पाटनकर को गिरफ्तार किया गया. उस ने पुलिस को बताया कि उस ने बेबी पाटनकर के कहने पर 40 किलोग्राम एमडी निकाली थी, जिस में से 12 किलोग्राम उस ने धर्मराज के लौकर में रखवा दी थी.

बेबी ने सिपाही धर्मराज को तो पकड़वा दिया. लेकिन ऐसा करते हुए वह यह भूल गई कि जिस आग को वह हवा दे रही है, उस आग में उस का खुद का भी दामन जल जाएगा. उस की लगाई आग की आंच जब उस के भाइयों और बेटे सतीश तक पहुंची तो वह समझ गई कि अब उस का भी खेल खत्म हो चुका है. जब उसे लगा कि अब पुलिस कभी भी उसे गिरफ्तार कर सकती है तो वह अपने सारे सोने के गहने गिरवी रख कर मुंबई से फरार हो गई. पुलिस ने उस के कई ठिकानों पर छापा मारा, लेकिन वह हाथ नहीं लगी. 13 मार्च, 2015 को बेबी का छोटा बेटा गिरीश अपनी मां को ले कर नवी मुंबई स्थित कामोठे में रहने वाली अपनी गर्लफ्रैंड के यहां पहुंचा.

गर्लफ्रैंड को भी साथ ले कर वह कार द्वारा सूरत चला गया. 14 मार्च, 2015 को सभी गर्लफ्रैंड की मौसी के यहां रुके. 15 मार्च को प्राइवेट कार से मुंबई के लिए निकले तो 16 मार्च को सुबह मुंबई के बोरिवली पहुंचे. गिरीश ने अपनी गर्लफ्रैंड को वहां छोड़ा और मां के साथ वाशी चला गया. यहां से मुंबई जा कर उस ने जमानत की कोशिश की, पर वकील ने उसे सलाह दी कि वह ऐसा न करे तो वह गिरीश की गर्लफ्रैंड के घर आगरा चली गई. कुछ दिनों तक आगरा में रहने के बाद वह दिल्ली आ गई. दिल्ली से वह कुराड़गांव में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहां चली गई. कुराड़गांव से बस द्वारा वह मुंबई आ रही थी, तभी एक सोशल वर्कर की नजर उस पर पड़ गई तो उस ने क्राइम ब्रांच सर्विस सेल के अधिकारियों को सूचना दे दी. इस के बाद वह पकड़ी गई.

इस तरह बेबी के पकड़े जाने पर 40 दिनों तक चले इस चूहेबिल्ली का खेल खत्म हो गया. गिरफ्तार बेबी के मामले की गंभीरता को देखते हुए ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर अतुलचंद्र कुलकर्णी ने आगे की तफ्तीश क्राइम ब्रांच यूनिट-2 प्रौपर्टी सेल के अधिकारियों को सौंप दी है. ड्रग्स क्वीन बेबी और सिपाही धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे से पूछताछ और उन के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स से कई पुलिस वालों और कस्टम अधिकारियों के नाम सामने आए हैं. इन में 30 मई को 4 लोग, एंटी नारकोटिक्स के इंसपेक्टर सुहास गोखले, गौतम गायकवाड़ सुधाकर, हवलदार ज्योतिराम माने और यशवंत पतारे को गिरफ्तार भी किया गया है. आगे की जांच क्राइम ब्रांच अधिकारी कर रहे हैं. इसी बीच उन्हें एक और बड़ी सफलता मिली.

ड्रग्स तस्कर सैमुअल को भारी मात्रा में ड्रग्स सप्लाई करने वाले तस्कर जानपाल दुरई को केरल से गिरफ्तार कर लिया गया. यह गिरफ्तारी सैमुअल के बयान पर हुई थी. जान पाल दुरई भी बेबी की तरह ही नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का मुखबिर था. उस ने नार्कोटिक्स ब्यूरो को कई बड़े टिप दिए थे. बहरहाल कथा लिखे जाने तक क्राइम ब्रांच बेबी से पूछताछ कर रहे थे. Maharashtra Crime New

कथा पुलिस सूत्रों और समाचार पत्रों पर आधारित

 

Crime Story : फिल्म इंडस्ट्री की आड़ में चल रहा था पोर्न फिल्मों का धंधा

Crime Story : बौलीवुड हो या साउथ की फिल्म इंडस्ट्री, फिल्मों में जाने के लिए तमाम युवक युवतियां प्रयास करते हैं. जो असफल रहते हैं, उन में से कई अभिनय के नाम पर पोर्न फिल्म बनाने वालों के चंगुल में फंस जाते हैं. फिल्म इंडस्ट्री की आड़ में पोर्न फिल्में अब भी बन रही हैं. यह भांडा तब फूटा जब..

कोरोना काल में मुसीबतों में फंसा रहा भारतीय फिल्म उद्योग अभी तक नहीं उभर पाया है. कुछ समय पहले अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में ड्रग्स एंगल का खुलासा होने के बाद बौलीवुड हिल गया था. नामी अभिनेत्रियों सहित सहित कई दूसरे लोगों की गिरफ्तारी से बौलीवुड में नशीले पदार्थों का काला कारोबार छाया रहा. इसी दौरान सैंडलवुड कहे जाने वाले कन्नड़ फिल्म उद्योग में भी ड्रग्स का जाल फैला होने का मामला सामने आया. कन्नड़ फिल्म उद्योग में ड्रग्स के मामले में कई नामी अभिनेत्रियों सहित दूसरे लोगों की गिरफ्तारियां हुईं.

फिल्म उद्योग में ड्रग्स के मामले अभी ठंडे भी नहीं पड़े थे कि अब बौलीवुड में पोर्न फिल्मों का मामला सामने आ गया है. पोर्न फिल्मों के मामले ने फिल्म उद्योग में फैले काले धंधों को उजागर करने के साथ वेब सीरीज के नाम पर ऐक्टिंग के लिए संघर्षरत युवाओं के शोषण की भी पोल खोल दी है. इसी साल 4 फरवरी की बात है. मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के प्रौपर्टी सेल के प्रभारी सीनियर इंसपेक्टर केदारी पवार को पोर्न फिल्में बनाने के बारे में सूचनाएं मिलीं, तो वह चौंके. उन्होंने कोई भी काररवाई करने से पहले अपने उच्चाधिकारियों सहायक पुलिस आयुक्त मिलिंद भारंबे, अपर पुलिस आयुक्त विरेश प्रभु और पुलिस उपायुक्त शशांक सांडभोर को इस बारे में बताना मुनासिब समझा.

उच्चाधिकारियों के निर्देश पर सीनियर इंसपेक्टर केदारी पवार ने इंसपेक्टर धीरज कोली, एपीआई लक्ष्मीकांत सांलुखे, सुनील माने, अमित भोसले, योगेश खानुरे, महिला अधिकारी अर्चना पाटील और सोनाली भारते आदि के अलावा मातहत पुलिस वालों की टीम बनाई. इस पुलिस टीम ने 4 फरवरी की आधी रात मुंबई के मालवणी इलाके में मड आइलैंड स्थित ओल्ड फेरी मार्ग पर बने ग्रीन पार्क बंगले पर छापा मारा. पुलिस अधिकारी अपने वाहनों को बंगले से कुछ दूर खड़ा कर जब पैदल ही बंगले के बाहर पहुंचे, तो वहां न तो कोई सुरक्षा के इंतजाम नजर आए और न ही कोई चहलपहल दिखी. बंगले के कुछ कमरों में रोशनी जरूर थी. कुछ आवाजें भी आ रही थीं.

पुलिस अधिकारी बंगले के एक कमरे में पहुंचे, तो वहां का दृश्य देख कर सन्न रह गए. कमरे में कुल 5 लोग थे. 2 महिला और 3 पुरुष. बिस्तर पर एक महिला और एक पुरुष अर्धनग्न अवस्था में अश्लील हरकतें कर रहे थे. एक महिला उन का वीडियो बना रही थी. मौके के हालात देख कर साफ था कि वहां पोर्न फिल्म की शूटिंग हो रही थी. पुलिस ने मौके से दोनों महिलाओं और तीनों पुरुषों को हिरासत में लिया. इन महिलाओं में 40 साल की फोटोग्राफर यास्मीन खान और 33 साल की ग्राफिक डिजाइनर प्रतिभा नलावडे थी. पकड़े गए पुरुषों में भानु ठाकुर और मोहम्मद नासिर ऐसी फिल्मों में ऐक्टिंग करते थे. वहीं मोनू जोशी कैमरामैन और लाइटमैन का काम करता था.

मौके से पुलिस ने 6 मोबाइल हैंडसेट, एक लैपटौप, कैनन कंपनी का कैमरा, 2 मैमोरी कार्ड, कैमरे का लैंस, एलईडी हैलोजन, स्पौट लाइट स्टैंड, ट्रायपोड स्टैंड सहित करीब 5 लाख 68 हजार रुपए का सामान जब्त किया. इन के अलावा शूटिंग के लिए लिखे गए डायलौग्स और स्क्रिप्ट सहित कुछ इकरारनामे भी बरामद किए. कई केस हुए दर्ज पूछताछ के लिए पांचों लोगों को पुलिस मालवणी पुलिस थाने ले आई. एपीआई लक्ष्मीकांत सांलुखे ने इस मामले में पुलिस थाने में केस दर्ज कराया. पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 292, 293, 420 और 34 के अलावा स्त्री असभ्य प्रतिरूपण प्रतिषेध अधिनियम की विभिन्न धाराओं आदि में 5 फरवरी को मुकदमा दर्ज कर पांचों लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने पांचों लोगों से पूछताछ की, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं. पता चला कि मुंबई में पोर्न फिल्में बनाने वाला रैकेट चल रहा है. इस में कुछ नामी अभिनेता और अभिनेत्री भी शामिल हैं. ये अभिनेता, अभिनेत्री बी और सी ग्रेड की बौलीवुड फिल्मों में काम कर चुके हैं. ऐसी फिल्म प्रोडक्शन कंपनियां ऐक्टिंग के लिए स्ट्रगल कर रही युवतियों को हीरोइन बनाने का ख्वाब दिखातीं और उन से शौर्ट फिल्म में काम करने का एग्रीमेंट करती थी. एग्रीमेंट के बाद शूटिंग के दौरान ये लोग न्यूड सीन देने का दबाव डालते थे. मना करने पर एग्रीमेंट के आधार पर केस करने की धमकी देते थे. पांचों लोगों से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने पोर्न फिल्में बनाने और उन्हें ओटीटी प्लेटफार्म पर अपलोड करने के मामले में अभिनेत्री गहना वशिष्ठ को भी 6 फरवरी को गिरफ्तार कर लिया.

गहना वशिष्ठ की गिरफ्तारी से बौलीवुड भी सकते में आ गया. पुलिस का कहना था कि गहना वशिष्ठ के प्रोडक्शन हाउस में पोर्न फिल्मों की शूटिंग होती थी. गहना वशिष्ठ की गिरफ्तारी पर उस की लीगल टीम ने एक बयान में कहा कि वह निर्दोष हैं. बोल्ड फिल्मों और हार्डकोर पोर्न फिल्मों में अंतर होता है. मुंबई पुलिस ने इन दोनों को एक समझ लिया. हमें उम्मीद है कि अदालत दोनों फिल्मों में अंतर समझ कर गहना को न्याय देगी. गहना वशिष्ठ, यास्मीन खान, प्रतिभा नलावडे और बाकी तीनों गिरफ्तार पुरुष आरोपियों मोनू जोशी, भानु ठाकुर व मोहम्मद नासिर से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने पोर्न फिल्मों से कमाई गई 36 लाख 60 हजार रुपए की रकम भी बरामद की.

इन सभी से पूछताछ में पता चला कि पोर्न फिल्मों की शूटिंग भारत में मुंबई और दूसरी जगहों पर होती थी, लेकिन कानून की गिरफ्त से बचने के लिए इन फिल्मों के वीडियो विदेश के आईपी एड्रेस और सर्वर से अपलोड किए जाते थे. गहना वशिष्ठ की प्रोडक्शन कंपनी की ओर से ये वीडियो उमेश कामत को वी ट्रांसफर के जरिए भेजे जाते थे. उमेश उस लिंक को लंदन भेजता था. वहां से इन फिल्मों के वीडियो ओटीटी प्लेटफार्म पर अपलोड होते थे. वी ट्रांसफर दुनियाभर में ई फाइल भेजने का सब से सरल तरीका है. इस के जरिए 2 जीबी तक की बड़ी फाइलें भी मुफ्त में भेजी या मंगाई जा सकती हैं. पुलिस जांच में सामने आया कि उमेश कामत इस काम का कोआर्डिनेटर है और उस के जरिए ही पेमेंट मिलता था.

क्राइम ब्रांच को करीब 3 दरजन ऐसी फिल्मों के सबूत मिले, जो उमेश के जरिए लंदन भेजी गईं और वहां से अपलोड की गईं. उमेश कामत बौलीवुड की एक टौप अभिनेत्री के पति की कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर है. अभिनेत्री का पति इस कंपनी में चेयरमैन और नान एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर है. गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ जरूरी सबूत जुटाने के बाद पुलिस ने इस मामले में 8 फरवरी को उमेश कामत को भी गिरफ्तार कर लिया. उमेश और दूसरे आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि प्रत्येक ऐसे वीडियो के एवज में विदेशी अपलोडर्स से उन्हें 2 से ढाई लाख रुपए मिलते थे. इन में से करीब एक लाख रुपए कलाकारों, कैमरामैन और फिल्म एडिटर आदि को दिए जाते थे और बाकी एक से डेढ़ लाख रुपए का मुनाफा होता था.

विवादों की रानी गहना गहना वशिष्ठ से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि ऐसी फिल्मों के लिए उस ने ओटीटी के दरजनों ऐप बनाए थे. पुलिस ने जांच की, तो इन में से एक ऐप पर ही उस के 67 हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर निकले. कोरोना काल में उस ने 85 से ज्यादा ऐसी फिल्में ओटीटी प्लेटफौर्म पर चलाई थीं. फरवरी में ही उस का 5-6 ऐसी फिल्में रिलीज करने का विचार था. पुलिस जांच में सामने आया कि फिल्म प्रोडक्शन कंपनी ने हौटहिट मूवीज नाम का एक ऐप भी बना रखा है. इस पर वे अपनी पोर्न फिल्म को अपलोड करते थे. इस ऐप के लिए बाकायदा 2 हजार रुपए तक सब्सक्रिप्शन फीस ली जाती थी.

8 फरवरी की रात पुलिस ने इस मामले में एक फोटोग्राफर श्याम बनर्जी उर्फ दिवांकर खासनवीस को गिरफ्तार किया. पोर्न फिल्म केस में यह 8वीं गिरफ्तारी थी. पुलिस का कहना है कि हौटहिट ऐप का संचालन 5 फरवरी को ग्रीन पार्क बंगला से गिरफ्तार महिला फोटोग्राफर यास्मीन खान और बाद में पकड़ा गया उस का पति फोटोग्राफर श्याम बनर्जी मिल कर करते थे. पुलिस की जांचपड़ताल में पोर्न फिल्म रैकेट के तार मुंबई से गुजरात के सूरत तक पहुंच गए. बाद में 10 फरवरी को पुलिस ने इस मामले में बी और सी ग्रेड बौलीवुड फिल्मों के अभिनेता तनवीर हाशमी को सूरत से गिरफ्तार किया.

पोर्न फिल्मों के मामले में गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई. वह पैसे कमाने की अंधी दौड़ में युवा पीढ़ी को पतन के रास्ते पर ले जाने की कहानी है. कोरोना काल में जब मार्च 2020 के चौथे सप्ताह में पूरे देश में लौकडाउन हो गया, तब देश की दोतिहाई आबादी अपने घरों में कैद हो कर रह गई.  इस दौरान लोगों के पास मनोरंजन के नाम पर केवल मोबाइल रह गए. मोबाइल पर इस दौरान पोर्न फिल्में देखने वालों की तादाद बढ़ गई. इस का फायदा उठा कर मुंबई के कुछ सी ग्रेड फिल्मकारों ने पोर्न फिल्में बनाने की योजना बनाई.

मई 2020 में जैसे ही अनलौक का पहला चरण शुरू हुआ, तो इन लोगों ने अपनी योजना को क्रियान्वित करने के लिए देसी पोर्न फिल्में बनाने का काम शुरू कर दिया. इन में अभिनेत्री गहना वशिष्ठ, अभिनेता तनवीर हाशमी और फोटोग्राफर यास्मीन खान आदि ने मुंबई में मलाड इलाके में मड आइलैंड के बंगलों को किराए पर लिया. उस समय फिल्मों व टीवी सीरियलों की शूटिंग बंद थी, तब इन बंद बंगलों में ऐसी फिल्मों की शूटिंग होने लगी. उस समय पुलिस और प्रशासन कोरोना से बचाव की जद्दोजहद में जुटा हुआ था. इसलिए पुलिस को इस सब की जानकारी नहीं मिली.

गहना वशिष्ठ पर 85 से ज्यादा पोर्न फिल्में पोर्न वेबसाइट या ऐप्स पर अपलोड करने का आरोप है. इन में कुछ नामी मौडल्स को भी शूट किया गया था. मौडल्स और खूबसूरत चेहरेमोहरे वाली युवतियों को शौर्ट फिल्मों के लिए बुला कर एग्रीमेंट किया जाता था. एग्रीमेंट कुछ सचाई कुछ कुछ मिनट की शूटिंग के बाद एक्टर्स को पोर्न सीन करने के लिए मजबूर किया जाता था. ऐसे सीन नहीं करने पर उन्हें कानूनी नोटिस भेजने की धमकी दी जाती थी. इस का कारण यह था कि 30-40 हजार रुपए मेहनताना का एग्रीमेंट करने वाली मौडल और युवतियां उस एग्रीमेंट को पढ़ती नहीं थी. उन से केवल एकदो दिन की शूटिंग होने के नाम पर जल्दी में दस्तख्त करा लिए जाते थे.

पेशे से फोटोग्राफर यास्मीन उर्फ रोवा खान ने भी 50 से ज्यादा पोर्न फिल्में बनाई हैं. ऐसी फिल्मों की शूटिंग आमतौर पर एक ही दिन में पूरी कर ली जाती थी. एडिटिंग में 2 से 3 दिन का समय लगता था. इस तरह करीब 20 से 30 मिनट की फिल्म तैयार हो जाती थी. इस के बाद ऐसी फिल्मों को विदेश के आईपी एड्रेस और सर्वर के जरिए ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज कर दिया जाता था. पोर्न फिल्मों के इस मामले में कथा लिखे जाने तक पुलिस में 4 केस दर्ज हुए थे. इन में 2 युवतियों ने मालवणी पुलिस थाने में केस दर्ज कराया. एक ने वसई के अर्नाला पुलिस स्टेशन में शिकायत दी. यह शिकायत लोनावाला पुलिस स्टेशन को ट्रांसफर की गई है. एक केस महाराष्ट्र साइबर सेल में दर्ज हुआ है.

इन में एक मौडल ने शिकायत में कहा कि गहना के प्रोडक्शन हाउस की ओर से शूट किए वीडियो में उसे न्यूड पोज देने के लिए फोर्स किया गया. एक मौडल ने गहना के खिलाफ 3 पुरुषों के साथ सैक्स करने को मजबूर करने का आरोप लगाया है. झारखंड की एक युवती ने मालवणी पुलिस थाने में दी शिकायत में पोर्न फिल्म न करने पर 10 लाख रुपए का हर्जाना देने की धमकी देने का आरोप लगाया है. अभिनेत्री गहना वशिष्ठ को पैसों का लालच ही इस गंदे काम की तरफ खींच लाया. छत्तीसगढ़ के चिरमिरी की रहने वाली गहना का असली नाम वंदना तिवारी है.

16 जून, 1988 को जन्मी वंदना तिवारी ने भोपाल से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया था. सन 2012 में जब उस ने मिस एशिया बिकनी कांटेस्ट जीता, तब वह लोगों की नजर में आई थी. उस ने इस प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए सब से ज्यादा अंक हासिल किए थे.  बाद में उस ने मौडलिंग करते हुए करीब 80 विज्ञापनों में अपने जलवे दिखाए. इन में मोंटे कार्लो, फिलिप्स एरेना, शेवरले क्रूज कार, ड्रीम स्टोन ज्वैलरी, पलक साड़ीज आदि मुख्य थे. बाद में वह स्टार प्लस के सीरियल ‘बहनें’ में लीड रोल में नजर आई. क्रिकेट वर्ल्ड कप 2015 के लिए उस ने योगराज सिंह और अतुल वासन के साथ एक न्यूज चैनल पर ऐंकरिंग भी की.

गहना वशिष्ठ ने अपना फिल्मी कैरियर ‘फिल्मी दुनिया’ नामक हिंदी फिल्म से शुरू किया. बौलीवुड फिल्म इंडियन नेवर अगेन निर्भया, दाल में कुछ काला है, लखनवी इश्क, सविता बार्बी, निर्भया, उन्माद और द प्रौमिस में उस ने अभिनय किया. इस के अलावा गहना ने करीब एक दरजन तेलुगू फिल्मों में भी महत्त्वपूर्ण रोल किए. एक स्पैनिश फिल्म में भी उस ने काम किया. वह साउथ के एक नामी अभिनेता की गर्लफ्रैंड भी रही है. वह अल्ट बालाजी की वेब सीरीज ‘गंदी बात’, उल्लू ऐप के ‘मी टू’, अमेजन प्राइम के ‘मिरर द बिटर’, प्राइम फ्लिक्स के भाभीजी घर पर हैं आदि के अलावा ओटीटी प्लेटफार्म न्यूफ्लिक्स आदि पर भी नजर आई. उस ने कई म्यूजिक वीडियो में भी काम किया.

तिरंगा लपेट कर फोटो शूट कराने और मैरीकाम के ओलिंपिक मैडल जीतने पर न्यूड फोटो खिंचवाने के कारण गहना वशिष्ठ विवादों में रह चुकी है. सन 2018 में वह तब भी चर्चा में आई थी, जब उन्होंने बिग बौस की प्रतिभागी अर्शी खान को ले कर दावा किया था कि वे अपनी उम्र कम बताती हैं. गहना ने दावा किया था कि अर्शी ने 50 साल के आदमी से शादी की है और उन के खिलाफ भारत व पाकिस्तान के झंडों के अपमान सहित 10 आपराधिक मामले दर्ज हैं. गहना की कंपनी जीवी स्टूडियों का खेल गहना वशिष्ठ ने जीवी स्टूडियोज के नाम से अपनी प्रोडक्शन कंपनी बना रखी है.

मुंबई पुलिस गहना वशिष्ठ की कंपनी के सामने आए वीडियो को पोर्न बता रही है. वहीं, गहना की कंपनी का कहना है कि जीवी स्टूडियोज की ओर से निर्मित और निर्देशित वीडियो को इरोटिका के रूप में क्लासीफाइड किया जा सकता है. कंपनी का कहना है कि उन्होंने केवल ऐसी फिल्में बनाई हैं, जो कानूनन बनाई जा सकती हैं. पुलिस ने भारत में हार्ड पोर्न और उन के मेकर्स की बनाई फिल्मों के साथ गहना की इरोटिका फिल्मों को मिक्स कर दिया है जबकि इरोटिका, कामुक या बोल्ड फिल्मों के बीच एक कानूनी अंतर है. बी और सी ग्रेड बौलीवुड फिल्मों का अभिनेता तनवीर हाशमी अब तक 40 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय कर चुका है.

गुजरात के सूरत के रहने वाले 40 वर्षीय तनवीर ने 20 साल के अपने फिल्मी कैरियर में ‘रात की बात’, ‘जख्मी नागिन’, ‘द रीयल ड्रीम गर्ल’, ‘भीगा बदन’, ‘बेस्ट पार्टनर’, ‘परदा’, ‘गरम’, ‘नाइट लवर’, ‘रेडलाइट’, ‘कामवाली’, ‘रिक्शावाली’, ‘कुंआरा पेइंग गेस्ट’, ‘दूधवाली’ और  ‘की क्लब’ जैसी सैक्सी फिल्मों में काम किया है. तनवीर सूरत के बारदोली इलाके में बंगला किराए पर ले कर पोर्न फिल्में बनाता था. पिछले 20 साल से फिल्मी परदे पर नजर आने के कारण उस की एक खास दर्शक वर्ग में पहचान थी. अपनी इसी पहचान के दम पर वह वेब सीरीज बनाने के बहाने ऐक्टिंग के शौकीन युवकयुवतियों को अपने जाल में फांस कर पोर्न फिल्में बनाता था.

पहले उस ने मुंबई में ही ऐसी कुछ फिल्में बनाई, लेकिन मुंबई में शूटिंग के लिए बंगलों का किराया ज्यादा था. इसलिए वह सूरत और आसपास के इलाकों में कम किराए के बंगले ले कर ऐसी फिल्में बनाने लगा. इस के लिए वह मुंबई से मौडल और युवतियों को सूरत बुलाता था. तनवीर और गहना न्यूफ्लिक्स ओटीटी के लिए भी ऐसी फिल्में बनाते थे. इस के चार लाख से ज्यादा कस्टमर हैं. ओरल सैक्स का मामला तनवीर हाशमी सन 2015 में मुंबई के साकीनाका में हुए ओरल सैक्स कांड से भी जुड़ा हुआ रहा है. उस समय एक मौडल ने आरोप लगाया था कि उस के साथ साकीनाका पुलिस स्टेशन में एक पुलिस इंसपेक्टर ने ओरल सैक्स किया था.

उस समय इस मामले में तनवीर हाशमी सहित एक नामी टीवी सीरियल का प्रोड्यूसर भी पकड़ा गया था. तनवीर उस समय साकीनाका पुलिस स्टेशन के कुछ अधिकारियों का खबरी हुआ करता था. उस समय तनवीर के क्रेडिट कार्ड से ही अंधेरी के एक पांच सितारा होटल में कमरा बुक कराया गया था. होटल के इसी कमरे में पीडि़त मौडल को 2 लाख रुपए के साइनिंग अमाउंट के लिए बुलाया गया था. ऐन वक्त पर मौडल ने उस कमरे में जाने से इनकार कर दिया और अपने बौयफ्रैंड को फोन कर दिया. आरोप लगा कि मौडल को उस का बौयफ्रैंड जब होटल से बाइक पर ले जा रहा था, तो साकीनाका थाना पुलिस ने उन दोनों को अगवा कर लिया.

बाद में एक पुलिस इंसपेक्टर ने एक पुलिस चौकी में मौडल को ले जा कर ओरल सैक्स किया था. इस मामले में आरोपी पुलिस वालों की भी गिरफ्तारी हुई थी. पोर्न फिल्मों का मामला नया नहीं है. मुंबई पुलिस ने कुछ दिन पहले संदीप इंगले नामक एक कास्टिंग डायरेक्टर को गिरफ्तार किया था. वह खुद को फिल्म प्रोड्यूसर भी बताता था और प्रेम के नाम से सैक्स रैकेट भी चलाता था. उस ने सैक्स रैकेट चलाने के लिए कई वेबसाइट बनाई थीं. इन वेबसाइटों को सर्च करने पर लोग आरोपियों से संपर्क करते थे. इस मामले में मुंबई के पांच सितारा होटल से 8 युवतियां मुक्त कराई गई थीं. इन में कुछ युवतियां नामी मौडल थीं.

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में भी पिछले साल जुलाई में पोर्न फिल्में बनाने का मामला सामने आया था. इंदौर पुलिस ने मौडल युवतियों की शिकायत पर मिलिंद डावर, अंकित सिंह चावड़ा, रैकेट के सरगना ब्रजेंद्र सिंह गुर्जर, गजेंद्र उर्फ गज्जू उर्फ गोवर्धन चंद्रावत आदि को गिरफ्तार किया था. ये लोग भी बंगलों और फार्महाउसों में पोर्न फिल्में बनाते और युवतियों का देह शोषण करते थे. मुंबई पोर्न फिल्म मामले में गिरफ्तार अभिनेत्री गहना वशिष्ठ के मकान और प्रोडक्शन हाउस की तलाशी में 3 मोबाइल फोन, 2 लैपटौप, 2 हार्ड डिस्क, 5 मैमोरी कार्ड, एक एडाप्टर, एक पेनड्राइव, प्रोडक्शन हाउस की रबर स्टैंप और एक कंपनी व कुछ कलाकारों के साथ एग्रीमेंट से जुड़े 10 करार पत्र सहित कई दस्तावेज मिले हैं.

गहना के एक बैंक खाते में एक आरोपी की ओर से रकम भेजे जाने के सबूत भी मिले हैं. पुलिस की ओर से इस मामले में गिरफ्तार और फरार आरोपियों के 2019 के बाद के बैंक खातों के लेनदेन के अलावा ईमेल, मोबाइल काल, वाट्सऐप चैट आदि की पड़ताल की जा रही है. गहना वशिष्ठ के कारोबारी पति सहित कई मौडल भी पुलिस जांच के दायरे में हैं. इस मामले में कुछ और गिरफ्तारियां होने के साथ बौलीवुड के चौंकाने वाले नए खुलासे होने की संभावना है. crime story

 

 

 

 

True Crime Stories : अंडरवर्ल्ड डॉन रवि पुजारी बिजनैसमैनों और नेताओं को धमकाकर वसूलता था करोड़ों

True Crime Stories : करीब 20 सालों से फरार रंगदारी, हत्या समेत लगभग 200 मामलों में वांटेड फिल्मी हस्तियों, बिल्डरों, नेताओं और बिजनैसमैनों को धमकी दे कर पैसे की उगाही करने वाला कुख्यात गैंगस्टर रवि पुजारी आखिर पकड़ा ही गया. कर्नाटक पुलिस उसे पश्चिमी अफ्रीकी देश सेनेगल से भारत ले तो आई, पर क्या उस का अंजाम भी छोटा राजन जैसा ही…

अंडरवर्ल्ड डौन रवि पुजारी करीब 2 साल के अथक प्रयास के बाद आखिर पश्चिमी अफ्रीकी देश सेनेगल की राजधानी डकार से नाटकीय ढंग से एक नाई की दुकान से पुलिस के हाथ लग ही गया. डौन रवि पुजारी 90 के दशक का मुंबई का सक्रिय अपराधी रह चुका था. उस के खिलाफ ही नहीं, उस की पत्नी के खिलाफ भी इंटरपोल का रेड कार्नर नोटिस जारी था. लेकिन वह लंबे समय से फरार चल रहा था. वह बहुत ही चालाक अपराधी था, इसलिए उसे पकड़ने के लिए काफी सतर्कता बरती गई थी. रवि पुजारी कई बार पुलिस के हाथों से निकल चुका था. उसे पकड़ने के लिए सेनेगल पुलिस 3 बसों में भर कर पहुंची थी और उसे चारों तरफ से घेर लिया था.

रवि पुजारी की कहानी भी वैसी ही है, जैसी आम बदमाशोें या अंडरवर्ल्ड डौन की होती है. मूलरूप से वह मंगलुरु का रहने वाला था. मंगलुरु में एक जगह है माल्पे, जहां वह 1968 में पैदा हुआ था. उस के पिता शिपिंग फर्म में काम करते थे. रवि पढ़ाई में काफी कमजोर था. लगातार फेल होने की वजह से उसे स्कूल से निकाल दिया गया. बचपन से ही उसे फिल्मों का बहुत शौक था. स्कूल से निकाले जाने के बाद अपने इसी शौक की वजह से रवि मुंबई आ गया था. मुंबई में रोजीरोटी के लिए यह अंधेरी में एक चाय की दुकान पर काम करने लगा, जहां वह लोगों को चाय सर्व करता था.

रवि पुजारी की मुंबई में यह शुरुआत थी. यह उस समय की बात है, जब मुंबई के पुराने डौन खत्म हो रहे थे और नएनए डौन उभर रहे थे. उन में दाऊद इब्राहीम और छोटा राजन मुख्य थे. रवि पुजारी जिस चाय की दुकान पर काम करता था, उस दुकान पर इलाके के तमाम मवाली और गुंडे चाय पीने आते थे. उन का रौबदाब और शाही रहनसहन देख कर रवि पुजारी उन मवालीगुंडों से काफी प्रभावित था. फलस्वरूप रवि पुजारी भी जुर्म की दुनिया में अपना नाम कमाने के बारे में सोचने लगा. संबंध बनाने के लिए वह ऐसे लोगों की खूब आवभगत करता था. उन्हें बढि़या से बढि़या चाय बना कर पिलाता था. उन से दोस्ती करने की कोशिश करता था.

उस दुकान पर आनेजाने वाले मवालीगुंडों में रोहित वर्मा और विनोद मटकर नाम के 2 गुंडे भी थे. ये दोनों छोटा राजन के लिए काम करते थे. एक तरह से ये छोटा राजन के शूटर थे. उस समय छोटा राजन दाऊद इब्राहीम के लिए काम करता था. यह 80 के दशक यानी सन 90 के पहले की बात है. उसी इलाके में एक गैंगस्टर और था, जिस का नाम था बाला जाल्टे. बाला जाल्टे और रोहित वर्मा के बीच किसी बात को ले कर ठनी हुई थी. एक दिन रोहित वर्मा अपने साथियों के साथ वहां पहुंचा और बाला जाल्टे की गोली मार कर हत्या कर दी. कहा जाता है कि बाला जाल्टे की हत्या करने के लिए हथियार रवि पुजारी ने ही ला कर दिया था.

इस के बाद रोहित वर्मा की रवि पुजारी से दोस्ती हो गई. रवि पुजारी शूटर बनना चाहता ही था, इसलिए जल्दी ही वह रोहित वर्मा के करीब आ गया. रोहित वर्मा ने उस से वादा किया कि वह उसे छोटा राजन से मिलवा देगा. करीब आने के बाद रोहित वर्मा उस से छोटेमोटे काम कराने के साथसाथ उसे टे्रनिंग दे कर शूटर बनाने लगा, जो वह जल्दी ही बन भी गया. उस का नाम भी छोटा राजन के शूटरों में जुड़ गया और धमकी दे कर उस के पास पैसा आने लगा. उस का निशाना होते थे फिल्म वाले, बिल्डर, नेता, होटल मालिक और बिजनैसमैन. जरूरत होती तो वह बात न मानने पर किसी की हत्या भी करा देता था. हथियार हाथ में आया तो रवि का ठिकाना मुंबई ही नहीं, कर्नाटक भी बन गया.

जान से मारने की धमकी दे कर वह बिल्डरों, बिजनैसमैनों और नेताओं से लाखोंकरोड़ों वसूलता था. जल्दी ही कर्नाटक में उस के खिलाफ 90 केस दर्ज हो गए. इन में से 37 केस बेंगलुरु में और 36 मेंगलुरु में दर्ज हुए. सरकार तक बात पहुंची तो उसे पकड़ने के लिए स्पैशल टीम बनाई गई. जो कर्नाटक, मुंबई में उसे सब जगह ढूंढ रही थी. पैसा आया तो रवि पुजारी दुबई चला गया और वहीं से अपने टारगेट को धमकी दे कर वसूली करने लगा. रवि पुजारी से लोग काफी परेशान हो चुके थे. वह देश में भले नहीं था, लेकिन उस की दहशत काफी थी. इसी वजह से उसे ले कर कर्नाटक पुलिस काफी परेशान थी.

अंतत: कर्नाटक सरकार ने पुलिस टीम से कहा कि रवि पुजारी नाम की इस आफत का किसी भी तरह पता लगाओे और उसे गिरफ्तार कर के भारत ले आओ.  2 मार्च, 2018 को कर्नाटक के एडीजीपी अमर कुमार पांडेय की अगुवाई में पुलिस की एक टीम बना कर रवि पुजारी को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई. पुलिस को रवि पुजारी की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी तो सौंप दी गई, लेकिन उस के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. सिर्फ इतना पता था कि 20 साल पहले 1990 में वह मुंबई से दुबई गया था और वहां से वह लोगों को धमका कर पैसे मांगता था. कर्नाटक और मुंबई में उस के कई शूटर थे. पुलिस टीम ने पता लगाना शुरू किया तो जानकारी मिली कि रवि दुबई से युगांडा गया और वहां से केन्या.

कुछ समय वह आस्ट्रेलिया में भी रहा. आस्ट्रेलिया छोड़ कर अब वह साउथ अफ्रीका में कहीं रह रहा है. रवि का टैरर गुजरात में भी था. वहां उस के कई साथी भी थे. गुजरात की एसटीएफ को भी उस की तलाश थी. रवि पुजारी के बारे में पुलिस के पास कोई निश्चित जानकारी नहीं थी. काफी कोशिश के बाद भी उस का पता नहीं चल पा रहा था. इस की एक वजह यह भी थी कि रवि पुजारी थोड़ा अलग किस्म का डौन था. वह टेक्नोलौजी का उपयोग बहुत कम करता था, जिस से किसी को उस का सुराग नहीं मिल पा रहा था. इस के बावजूद उस का वसूली का धंधा धड़ल्ले से चल रहा था. वह मुंबई में ही नहीं, कर्नाटक, केरल, उत्तर प्रदेश और गुजरात तक लोगों को धमकी दे कर वसूली कर रहा था.

रवि पुजारी को गिरफ्तार करने के लिए एडीजीपी अमर कुमार पांडेय की अगुवाई में टीम बन गई थी. उसे गिरफ्तार करने के लिए टीम ने अपने मुखबिर लगा दिए. क्योंकि उस के आदमी तो भारत में थे ही, जिन के माध्यम से वह वसूली कर रहा था. उन्हीं मुखबिरों से पुलिस टीम को पता चला कि मंगलुरु में एक ऐसा आदमी है, जिसे रवि पुजारी के बारे में हर छोटी से छोटी जानकारी है. दबिश दे कर पुलिस ने उस आदमी को उठा लिया. दबाव में आ कर वह आदमी वादामाफ गवाह बन कर रवि पुजारी की हर छोटी से छोटी जानकारी देने लगा. लेकिन उस आदमी द्वारा दी गई जानकारी से भी पुलिस को कोई खास सफलता नहीं मिली.

उसी दौरान पुलिस को कर्नाटक के एक और डौन बन्नाजी राजा के बारे में पता चला. वह मोरक्को में रह रहा था. सन 2015 में उसे मोरक्को से पकड़ कर भारत लाया गया. पुलिस को लगा था कि बन्नाजी राजा और मंगलुरु से पकड़े गए आदमी से रवि पुजारी के बारे में कुछ इस तरह की जानकारी मिल जाएगी कि उस तक पहुंचा जा सके. पर दोनों से ही इस तरह की कोई जानकारी नहीं मिली. फिर भी पुलिस दोनों से लगातार बातचीत करती रही. इस बातचीत में रवि पुजारी के साथी ने पुलिस टीम को बताया कि वह रेस्टोरेंट की चेन खोलना चाहता था. चूंकि वह इंडिया में मोस्टवाटेंड था, इसलिए उस ने अपना नाम भी बदल लिया था. उसे एक नाम बहुत पसंद था और वह था एंथोनी फर्नांडीज.

रवि का परिवार भी नहीं लगा हाथ पुलिस को रवि पुजारी का नाम तो पता चल गया था, पर इतनी बड़ी दुनिया में किसी को सिर्फ नाम के सहारे तो नहीं ढूंढा जा सकता था. फिर भी पुलिस उस के पीछे लगी रही. रवि पुजारी की पत्नी पद्मा दिल्ली में अपनी सास, 2 बेटियों और बेटे के साथ रह रही थी. सन 2005 में वह फरजी पासपोर्ट बनवाने के आरोप में गिरफ्तार हुई थी. लेकिन जमानत होते ही अपनी बेटियों और बेटे के साथ अचानक फरजी पासपोर्ट के सहारे गायब हो गई थी. पुलिस ने जब उस के बारे में पता लगाया तो पता चला कि वह भाग कर अपने पति रवि पुजारी के पास पहुंच गई है.

इस के बाद पुलिस रवि की खोज में और जोरशोर से लग गई. आखिर पुलिस की कोशिश रंग लाई और इस बार एक अहम जानकारी यह मिली कि रवि को अफ्रीका के एक पश्चिमी अफ्रीकी देश सेनेगल की राजधानी डकार में देखा गया है. पुलिस ने अपने मुखबिरों से उस के बारे में पता किया, पर कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली. इसी बीच पुलिस को अपने सूत्रों से पता चला कि रवि पुजारी पश्चिमी अफ्रीकी देश बुर्कीना फासो में देखा गया है. लेकिन वह वहां से निकल गया. उसी दौरान पुलिस को कुछ फोटो मिले, जिन्हें रवि पुजारी के 20 साल पुराने फोटो से मिलाया गया. वे फोटो पूरी तरह तो नहीं मिल रहे थे, फिर भी ऐसा लग रहा था कि फोटो उसी के हैं.

इस के बाद कर्नाटक पुलिस ने अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया. स्थानीय पुलिस की भी मदद ली गई. तब पुलिस को पता चला कि बुर्कीना फासो में एंथोनी फर्नांडीज नाम का एक आदमी रह रहा है. वहां पर एक रेस्टोरेंट की चेन चल रही है, जिस का नाम है नमस्ते इंडिया. रवि पुजारी भी इंडिया का था और रेस्टोरेंट की चेन का भी नाम नमस्ते इंडिया था. उस के इंडिया वाले साथी ने पुलिस को बताया भी था कि वह रेस्टोरेंट की चेन खोलना चाहता था. इस से लगा कि हो न हो ये नमस्ते इंडिया नाम के जो रेस्टोरेंट हैं, वे रवि पुजारी के ही हों. इस का मतलब था कि इन का मालिक एंथोनी फर्नांडीज ही रवि पुजारी है.

मुखबिरों और स्थानीय पुलिस से कर्नाटक पुलिस को पता चला कि नमस्ते इंडिया रेस्टोरेंट की चेन का मालिक एंथोनी फर्नांडीज बुर्कीना फासो के कंबोडिया इंटरनैशनल स्कूल के पास रहता है. इस के बाद पुलिस ने उस घर के जरिए काफी जानकारियां जुटाईं. पुलिस अब उस घर की निगरानी करने लगी थी कि शायद रवि पुजारी के बारे में और कोई पुख्ता जानकारी मिल जाए. उसी दौरान अक्तूबर, 2018 में पुलिस को पता चला कि सेनेगल में नमस्ते इंडिया रेस्टोरेंट की जो चेन चल रही है, उस का मालिक डांडिया नाइट करा रहा है. उस डांडिया नाइट में वही सब होगा, जो इंडिया में डांडिया नाइट में होता है.

इस के बाद पुलिस ने मुखबिर के जरिए उस डांडिया नाइट की वीडियो और तस्वीरें हासिल कीं. उस वीडियो में पुलिस ने देखा कि एंथोनी फर्नांडीज वहां के लड़कों से हाथ मिला रहा है और डांस कर रहा है. पुलिस ने उन तसवीरों को गौर से देखा तो 20 साल पहले के रवि पुजारी से एंथोनी फर्नांडीज की शक्ल काफी मिलतीजुलती लगी. लेकिन पुलिस के लिए इतना काफी नहीं था. पुलिस और सबूत जुटाती, उस के पहले ही एंथोनी फर्नांडीज बुर्कीना फासो से गायब हो गया. लेकिन वहां स्थित पुलिस के मुखबिर उस के बारे में पता करने में लगे थे. पुलिस को उन मुखबिरों से पता चला कि डकार में भी नमस्ते इंडिया रेस्टोरेंट की चेन है.

पुलिस मुखबिरों की मदद से डकार में नमस्ते इंडिया नाम के रेस्टोरेंट्स पर नजर रखने लगी. पुलिस इस चक्कर में थी कि शायद यहां से भी उस की कुछ तसवीरें मिल जाएं. तभी पता चला कि डकार में नमस्ते इंडिया रेस्टोरेंट की ओर से वहां एक क्रिकेट मैच कराया जा रहा है, जिस का नाम है इंडियन क्रिकेट क्लब सेनेगल. इस क्रिकेट मैच के आर्गनाइजरों में जो नाम थे, उन में एक नाम एंथोनी फर्नांडीज का भी था. इनविटेशन कार्ड में जो फोन नंबर थे, उन में एक नंबर बुर्कीना फासो स्थित एंथोनी फर्नांडीज के घर का था, इस से पुलिस को लगा कि यह वही आदमी है.

जहां मैच हो रहा था, पुलिस ने मुखबिर के जरिए उस पर नजर रखी. जिस समय क्रिकेट खेला जा रहा था, उसे इंडियन जर्सी में मैच देखते पाया गया. मुखबिर द्वारा पुलिस को उस की फोटो भी मिल गई. इस बार टेक्नोलौजी के जरिए रवि पुजारी की 20 साल पहले की फोटो से मिलाई गई तो साफ हो गया कि एंथोनी फर्नांडीज ही रवि पुजारी है. बहुत चालाक निकला रवि पुजारी नाम, रेस्टोरेंट की चेन और फोटो से यह बात जाहिर हो गई कि एंथोनी फर्नांडीज ही रवि पुजारी है तो कर्नाटक पुलिस ने कर्नाटक सरकार की मदद से सेनेगल सरकार से संपर्क किया. कहा जाता है कि सेनेगल के राष्ट्रपति मैकी शाल अपराध और अपराधी से बहुत नफरत करते हैं.

उन्होंने कई देशों के गैंगस्टरों को पकड़वा कर उन के देश भेजा भी था. इस से उम्मीद जागी कि वह रवि पुजारी को भी गिरफ्तार कराने में जरूर मदद करेंगे. भारत सरकार ने इंटरपोल के जरिए इस बात के सारे दस्तावेज सेनेगल की सरकार को सौंपे कि भारत को रवि पुजारी की 100 से ज्यादा मामलों में तलाश है तो वहां के राष्ट्रपति ने मदद करने का वादा ही नहीं किया, बल्कि अपनी पुलिस और इंटेलिजेंस को नमस्ते इंडिया रेस्टोरेंट पर नजर रखने के लिए लगा दिया. महीनों की कोशिश के बाद जब निश्चित हो गया कि एंथोनी फर्नांडीज नाम का आदमी ही रवि पुजारी है तो रविवार के दिन जब वह सैलून गया तो सेनेगल की पुलिस ने उसे दबोच लिया.

इस के बाद कर्नाटक पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस को पूरा विश्वास था कि अब रवि पुजारी को उन्हें सौंप दिया जाएगा. लेकिन रवि पुजारी कर्नाटक पुलिस से भी ज्यादा होशियार निकला. उस ने पुलिस वालों, कुछ माफियाओं और अपने लोगों के जरिए बुर्कीना फासो में अपने खिलाफ धोखाधड़ी का एक पुराना मामला दर्ज करा दिया. सेनेगल का यह कानून है कि किसी भी आदमी के खिलाफ अगर वहां कोई मामला दर्ज है, तो जब तक उस का निपटारा नहीं हो जाता, उसे किसी भी देश को नहीं सौंपा जा सकता. रवि पुजारी के मामले में भी यही हुआ. उस के खिलाफ मामला दर्ज होते ही वहां की सरकार ने फैसला आने तक उसे सौंपने से मना कर दिया. इस तरह रवि पुजारी पुलिस के हाथ आतेआते रह गया.

धोखाधड़ी का मामला बहुत गंभीर नहीं था, इसलिए पुलिस को लगा कि यह जल्दी ही निपट जाएगा. परंतु मामला गंभीर न होने की वजह से रवि पुजारी को जमानत मिल गई. जमानत इस शर्त पर मिली थी कि वह सेनेगल छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा. जबकि रवि पुजारी को इसी का इंतजार था. वह जनवरी, 2019 में पकड़ा गया था, फरवरी में जमानत मिली. जमानत इस शर्त पर मिली थी कि वह सेनेगल से बाहर नहीं जाएगा, परंतु जमानत मिलते ही वह गायब हो गया. इस के बाद एक बार फिर उस की तलाश शुरू हुई. 8-9 महीने बाद फिर उस का पता चला. इस बार वह साउथ अफ्रीका में मिला.

वहां से भारत लाने में काफी दिक्कतें पेश आतीं, इसलिए भारत के अनुरोध पर साउथ अफ्रीका से गिरफ्तार कर के उसे सेनेगल ले जाया गया. सेनेगल में धोखाधड़ी का एक मुकदमा उस पर पहले से ही था, दूसरा जमानत तोड़ने का हो गया था. लेकिन दोनों ही मामले ज्यादा गंभीर नहीं थे, इसलिए दोनों मामलों में उसे जल्दी ही सजा सुना दी गई. जिसे पूरा करतेकरते सन 2019 बीत गया. फरवरी, 2020 में सजा पूरी होते ही सेनेगल सरकार ने उसे भारत की कर्नाटक पुलिस के हवाले कर दिया. उस के बाद कर्नाटक पुलिस उसे 22 फरवरी, 2020 को भारत ले आई. कैसे बना छोटा राजन का खास 1993 में जब मुंबई में बम धमाके हुए तो दाऊद इब्राहीम और छोटा राजन के बीच दुश्मनी हो गई.

दोनोें ने अपनेअपने अलग गैंग बना लिए. दाऊद से अलग होने के बाद छोटा राजन बैंकाक चला गया और वहीं से अपना गैंग चलाने लगा. रवि पुजारी भी बैंकाक में छोटा राजन से मिलने गया. पहली बार बैंकाक में उस की मुलाकात छोटा राजन से हुई. इस के बाद छोटा राजन से उस की बातचीत होने लगी. जबकि अभी तक वह छोटा राजन के लिए रोहित वर्मा के माध्यम से काम करता था. अब वह उस के लिए सीधे काम करने लगा था. रवि पुजारी अब छोटा राजन के कहने पर मुंबई में बिल्डरों, नंबर दो का बिजनैस करने वालों और फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों से उगाही करने लगा. इस के बाद रवि पुजारी की छोटा राजन से अच्छी दोस्ती हो गई. वह उसे काफी इज्जत देने लगा. लेकिन अभी भी वह रोहित वर्मा को ज्यादा महत्त्व देता था.

रवि पुजारी के साथ ही एक और शूटर था गुरु साटम. दोनों में अच्छी बनती थी. इन्हें एक बात खटकती थी कि मोटी रकम वसूल कर के तो वे दोनों छोटा राजन को देते हैं, जबकि छोटा राजन उन दोनों के बजाय रोहित वर्मा पर ज्यादा विश्वास ही नहीं करता, बल्कि ज्यादा महत्त्व भी देता है. इसी बात को ले कर दोनों के मन में छोटा राजन के प्रति खटास पैदा होने लगी. वे दोनों उस से अलग हो कर अपना गैंग बनाना चाहते थे. तभी दाऊद के खास छोटा शकील ने बैंकाक में छोटा राजन पर हमला करा दिया, जिस में वह बालबाल बच गया, लेकिन रोहित वर्मा उस हमले में मारा गया. इस के बाद हालात काफी बदल गए.

छोटा राजन को अपनी जान बचाने के लिए ठिकाना ढूंढना पड़ा, तो रवि पुजारी ने अपना खुद का गैंग बना लिया. गुरु साटम उस के साथ था ही. बैंकाक में ही रह कर उस ने उगाही का काम शुरू भी कर दिया. उस का एक ही लक्ष्य था बहुत बड़ा डौन बनना और खूब पैसा कमाना. उस समय मुंबई में अंडरवर्ल्ड के 2 ही बड़े गैंग थे. एक दाऊद इब्राहीम का और दूसरा छोटा राजन का. छोटा राजन पर हमले के बाद उस का गैंग थोड़ा कमजोर पड़ गया था. इसी का फायदा उठा कर रवि पुजारी ने अपना गैंग बनाया और लोगों को धमका कर वसूली शुरू कर दी. इस के लिए उस ने उगाही का अपना अलग ही रास्ता अपनाया.

वह उन लोगों की लिस्ट पहले ही बना लेता था, जिन से वसूली करनी होती थी, साथ ही यह भी तय कर लेता था कि किस से किस तरह और कितना पैसा लेना है. उस ने अपनी उस लिस्ट में कुछ नेताओं, बिल्डरों, फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों, होटल मालिकों के अलावा 2 नंबर का काम करने वाले इस तरह के लोगों को शामिल किया, जिन से उगाही की जा सकती थी. अपनी इस लिस्ट में उस ने नेताओं और फिल्मी हस्तियों का नाम इसलिए शामिल किया, क्योंकि उन से पैसे भले न मिलें, पर पब्लिसिटी जरूर मिले. वह किसी को भी फोन कर के पैसे देने के लिए कह कर वादा करता था कि अगर वे उसे पैसे देंगे तो वह सुरक्षित तो रहेंगे ही, साथ ही वह उन्हें दूसरे अंडरवर्ल्ड के लोगों से भी बचाएगा.

जान सब को प्यारी होती है, लोग डर के मारे रवि पुजारी को पैसे देने लगे. जिस ने उसे पैसे नहीं दिए, उन पर उस ने हमला भी करवाया. अपनी दहशत फैलाने के लिए उस ने 1990 में चेंबूर में कुकरेजा बिल्डर के मालिक ओमप्रकाश कुकरेजा की हत्या करवा दी थी. इस के बाद उस ने नवी मुंबई के बिल्डर सुरेंद्र बाधवा पर भी हमला कर के उन की हत्या करानी चाही, पर उन्होंने भाग कर किसी तरह अपनी जान बचा ली थी. रवि पुजारी ने भारत में रहना ठीक नहीं समझा. क्योंकि वह जानता था कि भारत में रहने पर वह कभी भी पकड़ा जा सकता था. इसलिए वह पहले आस्टे्रलिया गया और फिर वहां से अफ्रीकी देश सेनेगल पहुंच गया और वहीं पर अपना स्थाई ठिकाना बना लिया.

क्योंकि अभी तक वहां भारत के किसी अन्य डौन की पहुंच नहीं थी. वह वहां से मुंबई पुलिस को फोन कर के कहता था कि पुलिस के वे लोग भी उस के निशाने पर हैं, जो दाऊद की मदद करते हैं. धीरेधीरे उस ने अपना वसूली का काम बढ़ा दिया. इसी के साथ उस ने रेस्टोरेंट की चेन नमस्ते इंडिया नाम से सेनेगल के शहरों में रेस्टोरेंट खोलने शुरू कर दिए. उसी बीच उस ने अपना नाम ही नहीं बदला, बल्कि एंथोनी फर्नांडीज नाम से अपना पासपोर्ट भी बनवा लिया. अब वह बुर्कीना फासो का निवासी बन गया. रवि पुजारी लोगों को इंटरनेट के जरिए फोन करता था, जिस की वजह से पता नहीं चल पाता था कि फोन कहां से किया गया है.

वह फोन कर के लोगों से पैसे मांगता और कहता कि अगर पैसे नहीं दिए तो जान से जाओगे. वह उन्हें ज्यादा से ज्यादा तीन दिनों का समय देता था. रवि पुजारी ने कुछ ऐसे लोगों को भी फोन कर के धमकियां दीं, जिन से उसे कुछ मिला तो नहीं, पर उस की पब्लिसिटी जरूर हुई. ऐसे लोगों में गुजरात के विधायक जिग्नेश मेमानी और केरल के विधायक पी. जार्ज भी शामिल थे. पुलिस का कहना है कि वह ऐसा जानबूझ कर करता था. पब्लिसिटी का भूखा था रवि उस ने उत्तर प्रदेश के एक ब्लौक प्रमुख अरुण सिंह को भी फोन कर के 5 करोड़ रुपए मांगे थे. उस ने कहा था कि अगर उन्होंने उसे पैसे नहीं दिए तो वह उन्हें ठोक देगा.

अरुण सिंह अपनी सुरक्षा के लिए एसएसपी के पास पहुंच गए. यहां स्पष्ट कर दें कि नाम के आगे पुजारी लगा होने से लोग उसे उत्तर प्रदेश का रहने वाला समझते थे. रवि पुजारी को अरुण सिंह से मिला तो कुछ नहीं, पर यह धमकी खबर बन गई. उत्तर प्रदेश के अखबारों में भी उस के बारे में खूब छपा. इस के बाद उत्तर प्रदेश के लोग भी उस के बारे में जान गए. दरअसल उसे मीडिया में अपनी पब्लिसिटी का बहुत शौक था. इसीलिए वह इस तरह के नेताओं, बड़ीबड़ी फिल्मी हस्तियों को फोन कर के धमकाता था. वह जानता था कि इस तरह के लोगों को फोन करने से उस की बात मीडिया वालों तक पहुंचेगी और मीडिया वाले उस की खबर छापेंगे या टीवी पर दिखाएंगे तो आम लोगों में उस की दहशत फैलेगी और उसे उगाही करने में आसानी रहेगी.

उस ने फिल्मी हस्तियों सलमान खान, शाहरुख खान, अक्षय कुमार, महेश भट्ट, प्रीति जिंटा, नेस वाडिया, करन जौहर, फरहान अख्तर आदि को फोन कर के मोटी रकम मांगी थी. करिश्मा कपूर के पूर्व पति को भी उस ने पैसों के लिए ईमेल भेजा था. उन से उस ने 50 करोड़ रुपए मांगे थे. उस ने महेश भट्ट को धमकी देने के बाद अपने लड़कों को भेज कर उन के घर के बाहर गोलियां भी चलवाई थीं. प्रीति जिंटा और नेस वाडिया को फोन करने के बाद उस ने प्रैस वालों को फोन कर के सफाई दी थी कि वह प्रीति जिंटा की बड़ी इज्जत करता है, वह बड़ी एक्ट्रैस हैं. उन का तो वह फैन है. उन के साथ भला वह ऐसा कैसे कर सकता है. वह गलत कह रही हैं. इसी तरह नेस वाडिया के बारे में भी उस ने कहा था कि उसे किसी वाडिया का नंबर चाहिए था, इसलिए फोन किया था.

अलग तरह का डौन रवि पुजारी के बारे में यह भी कहा जाता है कि रंगदारी वसूली की जो प्रोफेशनल रूपरेखा है, वह इसी की देन है. ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्होंने उसे मोटी रकम दी है. क्योंकि उसने जिस तरह सेनेगल में रेस्टोरेंट बनवाए हैं, उस से साफ लगता है कि वह इसी तरह की गई उगाही के पैसों से बने हैं.  कहा जाता है कि उस ने गुजरात के एक बिल्डर से करोड़ों रुपए वसूले थे. लेकिन इस तरह पैसे देने वाले जल्दी सामने नहीं आते. इसलिए इस मामले में कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई गई थी. रवि पुजारी के बारे में एक बात यह भी कही जाती है कि अगर कोई दूसरा अंडरवर्ल्ड डौन भी इस तरह पैसों के लिए धमकी देता था तो अपनी पब्लिसिटी के लिए रवि मीडिया वालों को फोन कर के कहता था कि वह धमकी उसी ने दी थी.

मुंबई के जानेमाने दीपा बार के मालिक को भी उस ने पैसों के लिए धमकी दी थी. यही नहीं, उस ने दीपा बार के बाहर अपने गुर्गों को भेज कर गोली भी चलवाई थी. मुंबई के एक जानेमाने वकील हैं माजिद मेमन. सन 2004-5 में उन्हें भी उस ने धमका कर पैसे ही नहीं मांगे, बल्कि उन की हत्या कराने की कोशिश भी की थी. उस का कहना था कि मेमन के संबंध अंडरवर्ल्ड डौन दाऊद इब्राहीम से हैं, इसलिए वह उन्हें जिंदा नहीं छोड़ेगा. वह खुद को हिंदू डौन कहता था. इसीलिए दाऊद इब्राहीम और छोटा शकील भी उस के निशाने पर थे.

13 फरवरी, 2016 को उस ने कट्टरपंथी हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह गिलानी को भी खत्म करने की धमकी दी थी. रवि पुजारी का कहना था कि वह उन सभी लोगों को खत्म कर देना चाहता है, जिन का दाऊद या छोटा शकील से किसी भी तरह का संबंध है. दाऊद इब्राहीम भारत विरोधी है और उस का संबंध आईएसआई से है. मुबई, कर्नाटक ही नहीं, पूरे देश में दहशत फैलाने वाले रवि पुजारी को आखिर सेनेगल से गिरफ्तार कर लिया गया और 22 फरवरी, 2020 को भारत लाया गया, जहां उसे अदालत में पेश किया गया. उसे रिमांड पर ले कर उस से विस्तारपूर्वक पूछताछ की गई. फिलहाल वह बेंगलुरु की जेल में बंद है. अलगअलग राज्यों की पुलिस उस से पूछताछ करने का प्रयास कर रही है. True Crime Stories

Pune News : सुनसान सड़क पर मैरिड गर्लफ्रेंड का दबाया गला

Pune News : रामकिशन राजुरे विवाहित सवित्रा को बहलाफुसला कर शहर के सपने दिखा कर गांव से पुणे ले आया था. 2 सालों तक उस ने उस के साथ ऐश की. लेकिन जब उस ने अपना हक मांगा तो…

आदिवासी गांव और देहात की युवतियां कोमल मन भी होती हैं और चंचल स्वभाव की भी. उन के मन में तमाम तरह की जिज्ञासाएं होती हैं. उन के सामने शहर की किसी चीज की प्रशंसा करो, तो उसे पाने या देखने के लिए विचलित हो जाती हैं चालाक और मनचले युवक इसी बात का फायदा उठाते हैं. जिस का अंजाम ज्यादातर दुखदाई होता है. 20 वर्षीय सवित्रा दिगंबर अंकुलवार की शादी हुए अभी 6 महीने भी नहीं हुए थे कि उस की आंखों में शहर के सुनहरे सपने तैरने लगे थे. यह सपने दिखाने वाला था उस के पति का दोस्त अविनाश रामकिशन राजुरे, जो चालाक और रंगीन तबीयत का था.

सांवले रंग की तीखे नाकनक्श वाली सवित्रा अपनी ससुराल आ कर अभी पति के परिवार को अच्छी तरह समझ भी नहीं पाई थी कि उस की स्वाभाविक चंचलता वहां के लोगों को लुभाने लगी थी. उसे जो एक बार देखता था, उसे पसंद करने लगता था. शहर से अपने गांव आए अविनाश राजुरे के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. जब से अविनाश राजुरे की नजर में सवित्रा आई थी, उस की रातों की नींद उड़ गई थी. वह उस का दीवाना हो गया था. अविनाश राजुरे सालों बाद शहर से अपने गांव आया था. दूसरे दिन जब वह अपने गांव के लोगों और दोस्तों से मिलने घर के बाहर निकला तो अपने दोस्त दिगंबर के घर भी गया.

उस का दोस्त दिगंबर तो नहीं मिला लेकिन दरवाजे पर पति के इंतजार में खड़ी सवित्रा से जब उस की नजर लड़ी तो वह उसे देखता रह गया था. अविनाश राजुरे औरतों के मामले में काफी अनुभवी था. वह सवित्रा के हावभाव देख कर काफी कुछ समझ गया. चूंकि वह उस के गहरे दोस्त की बीवी और गांव का मामला था, इसलिए वह बिना कुछ बात किए घर लौट आया. लेकिन घर लौट कर उसे चैन नहीं मिला. उस रात वह ठीक से सो नहीं पाया. उस की आंखों के सामने रहरह कर सवित्रा का कसा हुआ बदन, उभरा यौवन और नशीली आंखें घूम रही थीं. दूसरे दिन वह मौका देख कर दिगंबर के घर पहुंच गया.

दिगंबर ने उस का स्वागत गर्मजोशी से किया, साथसाथ पत्नी सवित्रा का भी परिचय कराया. पतिपत्नी दोनों ने मिल कर उस की अच्छी खातिरदारी की. उस दिन तो अविनाश राजुरे ने दिगंबर के सामने सिर्फ उस की पत्नी सवित्रा की तारीफों के सिवा ज्यादा बातें नहीं कीं. लेकिन दूसरी बार अपने दोस्त दिगंबर के घर पर न रहने पर वह आया तो उसे देख कर पहले तो सवित्रा घबरा गई, लेकिन दूसरे ही पल वह उस ने सोचा कि पति का दोस्त है, उसे घर के बरामदे में बिठाया. चायपानी के बाद जब सवित्रा ने उस के कामधंधे के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह पुणे शहर की एक मल्टीनैशनल कंपनी में सर्विस करता है.

जहां उसे अच्छा वेतन मिलता है. मस्ती से रहता, घूमताफिरता और अपने शौक पूरे करता है.

‘‘पुणे, मुंबई का बड़ा नाम सुना है, कैसा शहर है?’’ सवित्रा ने पूछा तो अविनाश राजुरे ने बताया, ‘‘बहुत अच्छा और स्वर्ग की तरह सुंदर है. काफी कुछ देखने और सुनने लायक है. मुंबई शहर पुणे के काफी करीब है. रेसकोर्स, म्यूजियम, जुहू चौपाटी, बड़ेबड़े फिल्मी कलाकारों के बंगले हैं, जहां मेला लगा रहता है. पुणे का बोट क्लब, खंडाला घाट जहां की छवि निराली है.’’

अविनाश राजुरे की लंबीचौड़ी बातें सुन कर सवित्रा बोली, ‘‘यह सब मुझे बताने का क्या फायदा, मेरे ऐसे नसीब कहां कि मैं पुणे और मुंबई जैसे शहरों के दर्शन करूं. मुझे तो इस गांव की मिट्टी और पति के साथ जिंदगी गुजारनी है.’’

सवित्रा की मायूसी भरी बातों और चाहतों का अविनाश राजुरे ने पूरापूरा फायदा उठाया. अब उसे जब भी मौका मिलता, वह सवित्रा की भावनाओं को भड़काने आ जाता और कहता कि वह मायूस न हो. अगर वह चाहेगी तो वह उस की मदद कर सकता है. बस इस के लिए थोड़ी सी हिम्मत की जरूरत होगी.

‘‘सच?’’ सवित्रा ने चौंक कर मुसकराते हुए कहा. फिर गंभीर हो गई, ‘‘लेकिन मैं अपने पति का क्या करूंगी?’’

सवित्रा को भावनात्मक स्तर पर बहकते देख कर अविनाश राजुरे तरंग में आ गया. वह सवित्रा को कमजोर पड़ते देख बोला, ‘‘भाभीजी, कुछ पाने के लिए कुछ खोना और कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं. एक बार घर की ड्योढ़ी पार कर के देखो दुनिया कितनी रंगीन और सुंदर है. सब कुछ भूल जाओगी. वैसे भी तुम्हारी जैसी हसीनों को शहरों में होना चाहिए, गांवखलिहानों में क्या रखा है.’’

सवित्रा अविनाश राजुरे की निगाहों में चढ़ गई थी. वह किसी भी तरह उसे पाना और भोगना चाहता था. उसे लग रहा था कि थोड़ा सा प्रयास करेगा तो वह कटे पर वाले पंछी की तरह उस की बांहों में आ कर गिरेगी. इसलिए वह अपनी कोशिशों में लगा रहा. अब जब भी उसे मौका मिलता था, वह सवित्रा के घर पर पहुंच जाता. कभी अकेले में तो कभी अपने दोस्त दिगंबर के साथ. नतीजा यह हुआ कि दोनों धीरेधीरे एकदूसरे के साथ घुलमिल गए. दोनों के बीच पहले मीठीमीठी बातें, छेड़छाड़ और फिर हंसीमजाक शुरू हो गया. आखिरकार वही हुआ जो अविनाश राजुरे चाहता था. उस के मन की मुराद पूरी हो गई और वह दिन भी आ गया जब दोनों अपना गांव छोड़ कर पुणे आ गए.

गांव में थोड़ीबहुत हलचल हुई. बाद में सब शांत हो गया. आदिवासी समाज में इस सब का कोई विशेष महत्त्व नहीं होता. सब गांव की पंचायतों में ठीक हो जाता है. 25 वर्षीय अविनाश राजुरे मजबूत कदकाठी का स्वस्थ और महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह उसी समाज और गांव का रहने वाला था, जिस गांव और समाज की सवित्रा दिगंबर अंकुलवार थी. उस के पिता का नाम रामकिशन राजुरे था. उस का भरापूरा परिवार था. उस के पिता एक साधारण किसान थे. वह खेतीकिसानी करते थे. अविनाश राजुरे उन का दूसरे नंबर का बेटा था. उस का खेती में जरा भी मन नहीं लगता था.

गांव से हाईस्कूल पास करने के बाद वह नौकरी की तलाश में पुणे आ गया था. यहां उसे एक कंपनी में काम मिल गया और कंपनी की ही बस्ती में किराए का एक कमरा ले कर रहने लगा. उस के शौक, मौजमजा और खानेपीने के बाद जो पैसा बचता था, उसे अपने गांव भेज देता था. साल में एक बार उसे गांव आने का मौका मिलता था. शहर के सुनहरे सपनों के आकर्षण में सवित्रा अपने दांपत्य को दांव पर लगा कर अविनाश राजुरे के साथ पुणे आ गई, जहां दोनों एक साथ पतिपत्नी की तरह रहने लगे. शुरूशुरू में अविनाश राजुरे सवित्रा को कुछ इधरउधर जगहों पर ले गया. उसे घुमायाफिराया और उस से शादी का वादा कर के उसके तनमन सौंदर्य से अपनी वासना की प्यास बुझाई.

2 साल तक सवित्रा के तन का उपभोग करने के बाद जब उस का मन भर गया तो सवित्रा उसे बोझ लगने लगी. वह अब उस से छुटकारा पाना चाहता था, लेकिन कैसे? यह उस की समझ में नहीं आ रहा था. उस की वजह से वह 2 साल से गांव नहीं जा पा रहा था. सवित्रा के साथ अगर गांव जाता तो वहां बखेड़ा खड़ा हो सकता था. उधर 2 साल तक अविनाश राजुरे के साथ रह कर सवित्रा भी अविनाश के इरादों को समझ गई थी. इसलिए वह अविनाश राजुरे पर आए दिन शादी का दबाव बनाने लगी थी. उस का मानना था कि इतने दिनों तक एक पराए पुरुष के साथ रहने के बाद वह अब कहां जाएगी. जिस से अविनाश राजुरे बौखला गया था.

काफी सोचनेविचारने के बाद आखिरकार उस ने सवित्रा के प्रति दिल दहला देने वाला खतरनाक फैसला ले लिया और मौके की तलाश में रहने लगा. और यह मौका उसे कोरोना के लौकडाउन में दीपावली के समय मिला. लौकडाउन की वजह से आम जनता को सार्वजनिक त्यौहारों में आनेजाने के लिए बहुत कम इजाजत थी. ऐसे में अविनाश राजुरे ने सवित्रा को यह कह कर विश्वास में लिया कि इस बार दीपावली का त्यौहार वह अपनी मोटरसाइकिल से गांव जा कर मनाएगा और परिवार वालों को मना कर उस से शादी करेगा. अविनाश राजुरे की यह बात सवित्रा ने खुशीखुशी स्वीकार कर ली और उस के साथ गांव जाने के लिए राजी हो गई.

दीपावली के एक दिन पहले 13 नवंबर, 2020 को सवित्रा खुशीखुशी गांव जाने के लिए सुबह से ही तैयार बैठी थी. पुणे शहर से उन के गांव की दूरी लगभग 7-8 घंटे की थी. यह दूरी तय करने के लिए उन्हें सुबहसुबह पुणे से निकलना था. लेकिन अविनाश राजुरे अपनी योजना के अनुसार शाम 4 बजे के आसपास निकला ताकि रास्ते में ही अपनी योजना को आसानी से पूरा कर सके. रात 12 बजे के करीब उसने वैसा ही किया जैसी कि उस की प्लानिंग थी. एक तो वह पुणे से देर शाम निकला था, दूसरे उस ने अपनी मोटरसाइकिल की गति धीमी रखी थी.

रात साढ़े 10 बजे के करीब वह जिला बीड तालुका बेकनूर के थेवल घाट पहुंचा और वहां के गिट्टी निकलवाने वाले मजदूरों के कैंप के पास अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर देखा कि बरसात के कारण काम और औफिस दोनों बंद थे. दूरदूर तक अंधेरा और सन्नाटों के सिवा कुछ नहीं था. ऐसे में उस ने सवित्रा को भरोसे में ले कर कहा कि बरसाती कीड़ोंमकोड़ों से उसे गाड़ी चलाने में परेशानी हो रही है. बाकी रात हम इसी औफिस में बिताएं. सुबह होते ही हम गांव के लिए निकल जाएंगे. जगह और औफिस दोनों सुनसान थे मगर सवित्रा अपनी मौत से अनभिज्ञ अविनाश राजुरे की बातों में आ गई.

14 नवंबर की सुबह लोग जागे, रोड चालू हुआ. सब अपनेअपने कामधंधे में लग गए. लेकिन लगभग 8 घंटों से तड़पतीकराहती मंगल औफिस के पीछे खाड़ी के पास पड़ी सवित्रा पर किसी का ध्यान नहीं गया. यह एक संयोग था कि घाट के एक चरवाहे की गाय उस तरफ चली आई और पूरे घाट में यह खबर आग की तरफ फैल गई. देखते ही देखते घटनास्थल पर भारी भीड़ एकत्र हो गई. इस भीड़ में से किसी ने घटना की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोलरूम से खबर मिलते ही थाना नेकनूर के सहायक इंसपेक्टर लक्ष्मण केंद्रे हरकत में आ गए. अपने सीनियर अधिकारियों को मामले से अवगत करा वह तत्काल घटनास्थल पर आ गए.

मामला संगीन था, इसलिए उन्होंने अपने सहायकों के साथ युवती का सरसरी तौर पर निरीक्षण किया और एंबुलैंस बुला कर तुरंत उसे स्थानीय अस्पताल और वहां से फिर प्राथमिक उपचार के बाद बीड़ के जिला अस्पताल भेज दिया. डीसीपी भास्कर सावंत थानाप्रभारी व अपने सहायकों के साथ घटनास्थल का निरीक्षण कर बीड़ जिला अस्पताल पहुंच गए. वहां के डाक्टरों  के बयान के मुताबिक 90 प्रतिशत जख्मी सवित्रा का बयान दर्ज किया था. 10 मिनट के लिए होश में आई सवित्रा ने रात 11 बजे के करीब हमेशा के लिए इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह दिया था.

उस 10 मिनट के बयान में सवित्रा ने अपना पूरा परिचय और अपने साथ घटी घटना के सारे रहस्यों को खोल दिया था, जिसे सुन कर पुलिस और वहां मौजूद लोग हैरान रह गए. उस के शव का पंचनामा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद जांच अधिकारी एपीआई लक्ष्मण केंद्रे ने डीसीपी भास्कर सावंत के निर्देशन में अपनी जांच तेजी से शुरू कर दी. उन्होंने अपने सहायकों की 2 टीमें बना कर एक पुणे शहर तो दूसरी अविनाश राजुरे की तलाश में उस के गांव रवाना कर दी. पुणे गई टीम के हाथ तो कुछ नहीं लगा, लेकिन गांव पहुंची पुलिस को यह जानकारी मिली कि अविनाश राजुरे गांव आया था. उस ने 15 नवंबर को गांव में जम कर दीपावली का त्यौहार मनाया.

दूसरे दिन काम का बहाना कर नांदेड़ के देगलूर अपने एक रिश्तेदार के यहां चला गया था. यह जानकारी मिलते ही बीड़ पुलिस की जांच टीम ने नांदेड़ के थाना देगलूर को अविनाश राजुरे की पूरी जानकारी दे दी. यह जानकारी पाते ही थाना देगलूर पुलिस तुरंत हरकत में आ गई और अविनाश राजुरे को गिरफ्तार कर थाना नेकनूर पुलिस को सौंप दिया. थाना नेकनूर लाए गए अविनाश राजुरे से खुद डीसीपी भास्कर सावंत ने पूछताछ की. पहले तो वह उन्हें गुमराह करता रहा. लेकिन थोड़ी सख्ती के बाद वह टूट गया और फिर उस ने बताया कि वह सवित्रा को मारना नहीं चाहता था मगर फिर मजबूरन उसे यह कदम उठाना पड़ा.

पहले उस ने उसे काफी समझाया. उसे उस के मायके मातापिता या ससुराल भेजने की कोशिश की. मगर वह इस के लिए राजी नहीं हुई. वह उस से शादी के लिए अड़ी थी. ऐसे में वह करता भी तो क्या करता. परिवार के डर से उस ने प्लान बना कर पहले से ही एक बोतल तेजाब खरीद कर अपनी मोटरसाइकिल में रख लिया था. बीड़ के येवलघाट मंगल औफिस के पास गाड़ी खड़ी कर के वह उसे अंदर ले गया. वहां जब सवित्रा को हलकी सी नींद आई तो उस ने उस की छाती पर चढ़ कर उस का गला दबा दिया. इस के बाद अर्द्धबेहोशी की हालत में उठा कर कार्यालय के पीछे खाड़ी के पास ले गया.

वहां उस ने पहले सबूत और पहचान मिटाने के लिए उस के चेहरे पर तेजाब डाला. उस के बाद गाड़ी से पैट्रोल निकाल कर उस के शरीर पर डाल कर आग लगा दी. इतना करने के बाद उसे लगा कि अब उस का बचना मुश्किल है तो वह वहां से अपने गांव आ गया. दूसरे दिन यह बात जब दैनिक अखबारों में छपी और टीवी पर दिखाई गई तो वह डर गया और गांव छोड़ कर बचने के लिए नांदेड़ के देगलूर में स्थित अपने रिश्तेदार के यहां चला गया. डीसीपी भास्कर सावंत और जांच अधिकारी एपीआई लक्ष्मण केंद्रे ने अविनाश रामकिशन राजुरे से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उस के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 326ए के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे बीड़ जिला मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर पुलिस हिरासत में जेल भेज दिया. – Pune News

Maharashtra Crime News : पत्नी के प्रेमी के किए 12 टुकड़े, आखिर क्यों

Maharashtra Crime News : सुशील सरनाइक ने शराब के नशे में अपनी करीबी दोस्त सलोमी के साथ जो अमर्यादित हरकत, वह भी उस के पति के सामने की, बरदाश्त करने लायक नहीं थी. ऐसा ही हुआ भी. लेकिन अब सुशील की मां और बहन…

15 दिसंबर, 2020. महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी थाणे से सटे जिला रायगढ़ के नेरल रेलवे स्टेशन (पूर्व) के पास से बहने वाले नाले पर सुबहसुबह काफी लोगों की अचानक भीड़ एकत्र हो गई. वजह यह थी कि गहरे नाले में 2 बड़ेबड़े सूटकेस पड़े होने की खबर थी. नए सूटकेस और उस में से उठने वाली दुर्गंध लोगों के लिए कौतूहल का विषय थी. निस्संदेह उन सूटकेसों में अवश्य कोई ऐसी चीज थी, जो संदिग्ध थी. किसी व्यक्ति ने नाले में पड़े सूटकेसों की जानकारी जिला पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम ने बिना किसी विलंब के इस मामले की जानकारी वायरलैस द्वारा प्रसारित कर दी. इस से घटना की जानकारी जिले के सभी पुलिस थानों और अधिकारियों को मिल गई.

चूंकि मामला नेरल पुलिस थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए नेरल थानाप्रभारी तानाजी नारनवर ने सूचना के आधार पर थाने के ड्यूटी अफसर को मामले की डायरी तैयार कर घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. ड्यूटी अफसर डायरी बना कर अपने सहायकों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से करीब 15-20 मिनट की दूरी पर था, वह पुलिस वैन से जल्द ही वहां पहुंच गए. घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस टीम ने पहले वहां पर इकट्ठा भीड़ को दूर हटाया और फिर वहां के 5 व्यक्तियों से नाले से उन दोनों सूटकेसों को बाहर निकलवाया. उन्हें खोल कर देखा गया तो भीड़ और पुलिस के होश उड़ गए.

सूटकेसों में किसी व्यक्ति का 12 टुकड़ों में कटा शव भरा था, जो पूरी तरह सड़ गया था. शव का दाहिना हाथ गायब था जो काफी खोजबीन के बाद भी नहीं मिला. यह वही नाला है, जहां बीब्लंट सैलून कंपनी की फाइनैंस मैनेजर कीर्ति व्यास का शव पाया गया था. (देखें मनोहर कहानियां जुलाई, 2018) मृतक की उम्र 30-31 साल के आसपास रही होगी. सांवला रंग, हृष्टपुष्ट शरीर. शक्लसूरत से वह किसी मध्यमवर्गीय परिवार का लग रहा था. नेरल पुलिस टीम अभी वहां एकत्र भीड़ से शव की शिनाख्त करवा ही रही थी कि एसपी अशोक दुधे, करजात एसडीपीओ अनिल घेर्डीकर, थानाप्रभारी तानाजी नारनवर, अलीबाग एलसीबी (लोकल क्राइम ब्रांच) और फोटोग्राफर के अलावा फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीमें भी आ गईं.

फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट का काम खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच की जिम्मेदारी करजात एसडीपीओ अनिल घेर्डीकर ने स्वयं संभाल ली. थानाप्रभारी तानाजी नारनवर को आवश्यक निर्देश दे कर घेर्डीकर अपने औफिस चले गए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद थानाप्रभारी तानाजी नारनवर ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल रायगढ़ भेज दिया. शिनाख्त न होने से पुलिस टीम समझ गई थी कि मृतक वहां का रहने वाला नहीं था. उस की हत्या कहीं और कर के शव को नाले में डाला गया था. ऐसी स्थिति में आगे की जांच काफी जटिल थी.

लेकिन पुलिस टीम इस से निराश नहीं थी. घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी हो जाने के बाद एसडीपीओ अनिल घेर्डीकर के निर्देशन में इस हत्याकांड के खुलासे के लिए एक अन्य टीम का गठन किया. उन्होंने नेरल थाने के अलावा कर्जत माथेरान और क्राइम ब्रांच के अफसरों और पुलिसकर्मियों को शामिल कर के मामले की समानांतर जांच का निर्देश दिया. उस इलाके का नहीं था मृतक वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर सभी ने अपनीअपनी जिम्मेदारियां संभाल लीं. अब मामले की जांच के लिए सब से जरूरी था मृतक की शिनाख्त, जो जांच टीम के लिए एक चुनौती थी.

जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, उसी तरह से पुलिस ने वायरलैस मैसेज शहर और जिले के सभी पुलिस थानों में भेज कर यह पता लगाने की कोशिश की कि कहीं किसी थाने में उस व्यक्ति की गुमशुदगी तो दर्ज नहीं करवाई गई है. लेकिन इस से उन्हें तत्काल कोई कामयाबी नहीं मिली. अब जांच टीम के पास एक ही रास्ता बचा था बारीकी से जांच. घटनास्थल और वह दोनों सूटकेस जो घटनास्थल पर शवों के टुकड़ों से भरे मिले थे. जब उन सूटकेसों की दोबारा जांच की गई तो सूटकेसों में मिले स्टिकरों ने पुलिस टीम को उस दुकान तक पहुंचा दिया, जहां से वे खरीदे गए थे. पता चला 13 दिसंबर, 2020 की सुबह करीब 10 बजे एक दंपति ने सूटकेस खरीदे थे.

उस दुकानदार के बयान और उस की दुकान के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और मुखबिरों के सहारे पुलिस टीम उस दंपति तक पहुंचने में कामयाब हो गई और फिर उन 12 टुकड़ों के रहस्य का मामला 24 घंटों में ही पूरी तरह सामने आ गया. पुलिस गिरफ्त में आए अभियुक्त दंपति ने पूछताछ में अपना नाम चार्ल्स नाडर और सलोमी नाडर बताया. मृतक का नाम सुशील कुमार सरनाइक था जो मुंबई के वर्ली इलाके का रहने वाला था और प्राइवेट बैंक का अधिकारी था. यह जानकारी मिलते ही नेरल पुलिस ने वर्ली पुलिस थाने से संपर्क कर शव की शिनाख्त के लिए मृतक के परिवार वालों को थाने बुला लिया और उन्हें ले कर रायगढ़ जिला अस्पताल गए, जहां मृतक सुशील कुमार सरनाइक को देखते ही उस के परिवार वाले दहाड़ें मार कर रोने लगे.

पुलिस टीम ने सांत्वना दे कर उन्हें शांत कराया और कानूनी खानापूर्ति कर मृतक का शव उन्हें सौंप दिया. पुलिस जांच और अभियुक्त नाडर दंपति के बयानों के मुताबिक इस क्रूर अपराध की जो कहानी उभर कर सामने आई, उस की पृष्ठभूमि कुछ इस तरह से थी—

31 वर्षीय सुशील कुमार मारुति सरनाइक सांवले रंग का स्वस्थ और हृष्टपुष्ट युवक था. वह दक्षिणी मुंबई स्थित वर्ली के गांधीनगर परिसर की  एसआरए द्वारा निर्मित बहुमंजिला इमारत तक्षशिला की पांचवीं मंजिल के फ्लैट में अपने परिवार के साथ रहता था. परिवार में उस की मां के अलावा एक बहन रेखा थी, जिस की शादी हो चुकी थी. लेकिन वह अधिकतर अपनी बेटी के साथ सुशील और मां के साथ ही रहती थी. परिवार का एकलौता बेटा होने के कारण सुशील के परिवार को उस से काफी प्यार था. यह मध्यवर्गीय परिवार काफी खुशहाल था. सुशील महत्त्वाकांक्षी युवक था. इस के साथ वह दिलफेंक और रंगीनमिजाज भी था. वह एक बार जिस किसी के संपर्क में आता था, उसे अपना मित्र बना लेता था. हर कोई उस के व्यवहार से प्रभावित हो जाता था.

ग्रैजुएशन पूरा करने के बाद उस ने अपने कैरियर की शुरुआत बीपीओ से शुरू की थी. जहां उस के साथ कई युवक, युवतियां काम करते थे. इन्हीं युवतियों में एक सलोमी भी थी जो ईसाई परिवार से थी. सुशील पड़ा सलोमी के चक्कर में 28 वर्षीय सलोमी पेडराई जितनी स्वस्थ और सुंदर थी, उतनी ही चंचल भी थी. वह किसी के भी दिल को ठेस पहुंचाने वाली बातें नहीं करती थी. उस के दिल में सभी के प्रति आदर सम्मान था. उस के मधुर व्यवहार के कारण संपर्क में आने वाले लोग उस की तरफ आकर्षित जाते थे. औफिस में सलोमी सुशील की बगल वाली सीट पर बैठती थी. काम के संबंध में दोनों एकदूसरे की मदद भी किया करते थे.

यही कारण था कि धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए और अच्छी दोस्ती हो गई. खाली समय में दोनों एक साथ कौफी हाउस, मूवी, मौलों में शौपिंग कर मौजमस्ती किया करते थे. यह सिलसिला शायद चलता ही रहता, लेकिन दोनों को अलग होना पड़ा. सुशील सरनाइक को एक बैंक का अच्छा औफर मिल गया, जहां उसे वेतन के साथसाथ बहुत सारी सुविधाएं भी मिल रही थीं. 2018 में सुशील सरनाइक की नियुक्ति आईसीआईसीआई बैंक की ग्रांट रोड, मुंबई शाखा में रिलेशनशिप मैनेजर की पोस्ट पर हो गई. सुशील सरनाइक ने बीपीओ की नौकरी छोड़ कर बैंक की नौकरी जौइन कर ली. दूसरी तरफ सलोमी का झुकाव बीपीओ के ओनर चार्ल्स नाडर की तरफ हो गया.

35 वर्षीय चार्ल्स नाडर अफ्रीकी नागरिक था. उस का पूरा परिवार अफ्रीका में रहता था. उस के पिता अफ्रीका के एक बड़े अस्पताल में डाक्टर थे. उस की शिक्षादीक्षा भी अफ्रीका में ही हुई थी. अस्थमा का मरीज होने के कारण उस का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था. कुछ साल पहले जब वह भारत आया तो उसे यहां के पर्यावरण से काफी राहत मिली, इसलिए वह भारत का ही हो कर रह गया. उस ने थाणे जिले के विरार में बीपीओ खोल लिया, जहां सलोमी और सुशील सरनाइक जैसे और कई युवकयुवतियां काम करते थे. सलोमी का झुकाव अपनी तरफ देख कर चार्ल्स नाडर ने भी उस की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया और दोनों लवमैरिज कर मीरा रोड के राजबाग की सोसायटी में किराए पर रहने लगे.

सुशील सरनाइक और सलोमी के रास्ते अलग तो हो गए थे मगर उन के दिलों की धड़कन अलग नहीं हुई थी. दोनों फोन पर तो अकसर हंसीमजाक करते ही थे, मौका मिलने पर सुशील सलोमी के घर भी आनेजाने लगा. दोनों नाडर के साथ पार्टी वगैरह कर के जम कर शराब का मजा लेते थे. ऐसी ही एक पार्टी उन्होंने उस रात भी की थी. मगर उस पार्टी का नशा सुशील सरनाइक पर कुछ इस तरह चढ़ा कि वह अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठा. शराब के नशे में वह अपनी मर्यादा लांघ गया. उस ने अपनी और सलोमी की दोस्ती को जो मोड़ दिया, वह बेहद आपत्तिजनक था. उस के पति के लिए तो और भी शर्मनाक.

सलोमी के पति चार्ल्स नाडर को बरदाश्त नहीं हुआ और किचन से चाकू ला कर उस ने एक झटके में सुशील का गला काट दिया. कमरे में सुशील सरनाइक की चीख गूंज उठी. उधर सुशील सरनाइक 12 दिसंबर, 2020 की सुबह अपनी मां और बहन से यह कह कर घर से निकला था कि वह अपने बैंक के कुछ दोस्तों के साथ पिकनिक पर जा रहा है. 13 दिसंबर को शाम तक घर लौट आएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. न वह घर आया और न उस का फोन आया. काफी कोशिशों के बाद भी उस से फोन पर संपर्क नहीं हुआ तो उस की मां और बहन को उस की चिंता हुई. रात तो किसी तरह बीत गई, लेकिन दिन उन के लिए पहाड़ जैसा हो गया था.

14 दिसंबर, 2020 की सुबह सुशील सरनाइक के नातेरिश्तेदार और जानपहचान वालों ने पुलिस से मदद लेने की सलाह दी. उन की सलाह पर सुशील सरनाइक की मां और बहन वर्ली पुलिस थाने की शरण में गईं. रात 11 बजे उन्होंने थानाप्रभारी सुखलाल बर्पे से मुलाकात कर उन्हें सुशील के बारे में सारी बातें बता कर मदद की विनती की और गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करवा दी. शिकायज दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी ने उन से सुशील का हुलिया और फोटो लिया और जांच का आश्वासन दे कर घर भेज दिया. शिकायत दर्ज होने के12 घंटे बाद ही सुशील के परिवार वालों को जो खबर मिली थी, उस से उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी.

सुशील सरनाइक की हत्या करने के बाद जब नाडर दंपति को होश आया तो उन्हें कानून और सजा का भय सताने लगा. इस से बचने के लिए क्या करें, उन की समझ में नहीं आ रहा था. काफी सोचविचार के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे कि उस के शव को किसी गुप्त जगह पर डंप करने में ही भलाई है. इस के लिए उन्होंने सुशील सरनाइक का मोबाइल और उस के बैंक एटीएम का सहारा लिया. उस का मोबाइल फिंगरप्रिंट से खुलता था और उस में एटीएम पिन था, यह बात वे अच्छी तरह जानते थे. 12 टुकड़ों में सिमटी जिंदगीउन्होंने उस का मोबाइल ले कर उस के अंगूठे से मोबाइल का लौक खोला और उस के एटीएम का पिन ले कर बदलापुर जा कर कार्ड से 80 हजार रुपए निकाले, जिस में से उन्होंने शव के टुकड़े करने के लिए एक कटर मशीन और 2 बड़े सूटकेस खरीदे.

उन्होंने शव के 12 टुकड़े कर दोनों सूटकेसों में भरे. शव का दाहिना हाथ सूटकेस में नहीं आया तो उसे अलग से एक थैली में पैक किया. इस के बाद दोनों ने 14 दिसंबर की रात सूटकेस ले जा कर नेरल रेलवे स्टेशन के पास गहरे नाले में डाल दिए और घर आ गए. अब पतिपत्नी उस की तरफ से निश्चिंत हो गए. उन का मानना था कि उस नाले से दोनों सूटकेस बह कर खाड़ी में चले जाएंगे, जहां सुशील सरनाइक का अस्तित्व मिट जाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. दोनों सूटकेस नेरल पुलिस के हाथ लग गए और सारा मामला खुल गया. नाडर दंपति नेरल पुलिस के शिकंजे में आ गए. नाडर के घर की तलाशी में कटर मशीन के साथ 30 हजार रुपए में 28 हजार रुपए भी पुलिस टीम ने बरामद कर लिए.

थाने ला कर सख्ती से पूछताछ करने पर उन्होंने अपना गुनाह स्वीकार करते हुए हत्या का सच उगल दिया. पुलिस टीम ने चार्ल्स नाडर और सलोमी नाडर से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उन के विरुद्ध सुशील सरनाइक की हत्या का मुकदमा दर्ज कर उन्हें रायगढ़ जिला जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक पुलिस जांच टीम सुशील सरनाइक के कटे दाहिने की तलाश कर रही थी.

 

Social Crime : राजनीति की आड़ में सेक्स रैकेट चला रही प्रीति की कहानी

Social Crime : खिलाड़ी औरतों के लिए हनीट्रैप कमाई का सब से अच्छा माध्यम है. लेकिन यह जरूरी नहीं कि इस में कामयाबी मिलेगी ही, क्योंकि पुलिस भी अपराधों की गंध सूंघती रहती है. प्रीति ने नेताओं और पुलिस के कंधों पर हाथ रख कर करोड़ों कमाए, लेकिन…

लौकडाउन से अनलौक की ओर कदम बढ़ते ही महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में यूं तो अपराध की जबरदस्त ताक धिना धिन सुनी जा रही थी. हत्याओं का सिलसिला सा बन गया था. राज्य के गृहमंत्री के गृहनगर की इस हालत पर राजनीतिक तीरतलवार चलाने वाले तरकश कसने लगे थे. पुलिस और प्रशासन पर तोहमत लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. कोरोना योद्धा के तौर पर शाबासी लूट चुकी शहर पुलिस ऐसी किसी तोहमत को तवज्जो नहीं देना चाहती थी. दावा यही कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की न जरूरत थी न ही होनी चाहिए. शहर पुलिस ने बड़ेबड़े अपराधियों के अपराध के आशियानों को कुछ समय में ही बड़े स्तर पर ध्वस्त कर दिया था. ऐसे में एक मामला अचानक चर्चा में हौट हुआ. यह मामला चार सौ बीसी के खेल में पकड़ी गई प्रीति का.

राजनीति के गलियारे में चहलकदमी के साथ समाजसेवा का नया मौडल बनी घूमती उस महिला के बारे में बड़ी चर्चा ये थी कि कई पुलिस वाले साहब उस के दबेल यानी उस के दबाव में थे. लिहाजा उस ने शहर व शहर के आसपास के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर दबावतंत्र बना कर कइयों की जिंदगी में जहर घोल दिया. पुलिस कभी उस का सत्कार करती थी तो कभी उस से सत्कार कराती थी. समाजसेवा के चोले में हनी ट्रैपर घटना 5 जून, 2020 की है. एक शिकायतकर्ता पांचपावली पुलिस स्टेशन में बेबस मुद्रा में मदद की याचना ले कर पहुंचा. शिकायतकर्ता का नाम था उमेश उर्फ गुड्डू तिवारी. पांचपावली क्षेत्र में ही रहने वाले गुड्डू ने बताया कि उस का जीवन एकदम सामान्य था.

वह एक स्कूल का कर्मचारी है. हर माह मिलने वाले वेतन से उस के परिवार का हंसीखुशी गुजारा हो रहा था. लेकिन जब से वह प्रीति की सोहबत में आया, उस की दुनिया लुटने लगी. उमेश उर्फ गुड्डू ने उस वक्त को कोसा है, जब वह फेसबुक पर प्रीति से जुड़ा था. प्रीति का आकर्षक फोटो देख गुड्डू ने उस पर सहज कमेंट किया था. उस कमेंट के जवाब में प्रीति ने फेसबुक पर ही गुड्डू को पर्सनल मैसेज भेज कर मोबाइल फोन नंबर का आदानप्रदान कर लिया. गुड्डू इस बात को ले कर भी खुद को दोष देता है कि एकदो बार फोन पर बात के बाद वह उस अनजानी महिला के सामने पूरी तरह से खुल गया. उस ने अपने घरपरिवार की बातें साझा कर दीं. यहां तक कि वैवाहिक जीवन में भी उस ने अरमानों के सूखे कंठ की वेदना को स्वर दे दिया.

प्रीति ने गुड्डू को बताया कि नागपुर के जिस इलाके में वह रहता है, उस के पास ही वह भी रहती है. उस ने अपनी पहचान के दायरे के ट्रेलर के तौर पर कुछ लोगों के नाम गिनाए. कुछ दिनों बाद दोनों के मिलने का सिलसिला मोहब्बत की परवाज भरने लगा. कभी प्रीति मिलने पहुंचती तो कभी गुड्डू को बुला लेती थी. एक दिन प्रीति ने गुड्डू से साफ कह दिया कि वह उस के साथ जीवन गुजारने को तैयार है. बशर्ते उसे अपनी पत्नी को तलाक देना होगा. भविष्य की योजना भी उस ने गुड्डू से साझा की. 50 वर्षीय गुड्डू जिंदगी के नए सफर पर चलने के लिए न केवल राजी हुआ बल्कि अति उत्साहित भी था.माल मिलते ही बदला रंग गुड्डू की शिकायत का लब्बोलुआब यह था कि प्रीति मनचाहा धन मिलते ही तेवर बदलने लगती थी.

बतौर गुड्डू प्रीति ने उस से फ्लैट खरीदने के लिए रुपयों की मांग की थी. उस का कहना था कि जब तक गुड्डू की पत्नी का तलाक नहीं हो जाता, तब तक दोनों उस फ्लैट में मिलतेजुलते रहेंगे. गुड्डू ने अग्रिम के तौर पर प्रीति को फ्लैट के लिए 2.60 लाख रुपए दे दिए. तय समय पर फ्लैट नहीं लिया गया तो गुड्डू ने रुपए वापस मांगे. बस यहीं से गुड्डू पर दबाव का नया सिलसिला चल पड़ा. फ्लैट के नाम पर लिए गए रुपए वापस लौटाना तो दूर प्रीति ने रुपयों की नई पेशकश रख दी. उस ने कहा कि सोशल मीडिया पर जितनी भी हौट बातें हुई हैं और फोन पर लाइव चैटिंग हुई है, उन का सारा हिसाब उस के पास है. अगर वह उस रिकौर्डिंग को पुलिस को सौंप दे तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा.

प्रीति की सीधी धमकी यह भी थी कि ज्यादा चूंचपड़ मत करना. मेरे हाथ काफी लंबे हैं. चुटकी बजा कर ऐसी जगह पर घुसेड़वा दूंगी, जहां से जीवन भर नहीं निकल पाएगा. और हां, अपनी इज्जत बचानी हो तो 5 लाख रुपए तैयार रखना. प्रीति के ठग अंदाज का जिक्र करते हुए गुड्डू ने बताया कि उस ने डर के मारे प्रीति को 2.42 लाख रुपए और दिए, जिस से वह कहीं मुंह न खोले. लेकिन माल पाने के बाद तो वह और भी रंग बदलने लगी. रुपए और गिफ्ट ले कर यहांवहां बुलाने लगी. उस से दूर होने का प्रयास किया तो वह घर में आ कर पिटवा देने की धमकी देने लगी. कुछ ही दिनों में उस ने नकदी और गिफ्ट के रूप में 14.87 लाख रुपए ऐंठ लिए. आखिरकार उसे अपने बचाव में पुलिस की शरण लेनी पड़ी.

पुलिस ने उस की शिकायत की शुरुआती पड़ताल करने के बाद प्रीति के खिलाफ भादंवि की धारा 420 व धारा 384 हफ्तावसूली के तहत केस दर्ज कर लिया. मामला दर्ज करने के बाद पुलिस ने प्रीति के कामठी रोड स्थित प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट के घर पर छापेमारी की. प्रीति वहां से चंपत हो गई थी. पुलिस ने उस के घर से काफी सामान और दस्तावेज बरामद किए. खुला भेद तो पुलिस भी रह गई दंग जिस पांचपावली पुलिस स्टेशन में प्रीति का आनाजाना लगा रहता था, उसी थाने की पुलिस उस के कारनामों की फेहरिस्त देख कर दंग रह गई. रिकौर्ड खंगालने पर पता चला कि प्रीति धोखाधड़ी के मामले में जेल की यात्रा कर चुकी है. उस के आपराधिक क्षेत्र के छोटेबड़े लोगों से भी करीबी संबंध है. उस के खिलाफ शहर के सीताबर्डी पुलिस स्टेशन में भादंवि की धारा 420, 406, 468, 467, 506, 507, 34 के  तहत प्रकरण दर्ज है.

धोखाधड़ी का वह प्रकरण शहर में काफी चर्चित हुआ था. इस के अलावा भंडारा के पुलिस स्टेशन में भी भादंवि की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज था. शहर पुलिस के बड़े अधिकारियों के लिए यह जानकारी काफी चौंकाने वाली थी कि जिस महिला को वे केवल सामाजिक कार्यकर्ता समझ रहे थे वह ब्लैकमैलर है. यही नहीं वह पुलिस से संबंधों का नाजायज फायदा उठाती रहती है. शहर पुलिस की ओर से प्रीति के अपराधों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी गई. बाकायदा प्रैस नोट जारी कर आह्वान किया गया कि इस महिला ने किसी से धोखाधड़ी की हो, तो तत्काल पुलिस से संपर्क करे. इस बीच प्रीति फरार हो गई थी. पुलिस उसे ढूंढती रही. करीब हफ्ते भर प्रीति बचाव का रास्ता खोजती रही.

उस ने वकील के माध्यम से जिला सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. कोशिश यही थी कि पुलिस गिरफ्तारी से बचते हुए उसे न्यायालय से जमानत मिल जाए. लेकिन उस की कोशिशों पर पानी फिर गया. न्यायालय ने उस की अरजी खारिज कर दी. लिहाजा उस ने 13 जून को पांचपावली पुलिस स्टेशन में आत्मसमर्पण किया. उसे पुलिस तक पहुंचाने वालों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा पुलिस के कुछ नुमाइंदे भी शामिल थे. गिरफ्तारी के बाद प्रीति को पुलिस रिमांड पर लिया गया. उस के खिलाफ पुलिस ने सबूत जुटाने शुरू किए. जांच में जुटी पुलिस यह जान कर दंग रह गई कि कुछ समय पहले तक मामूली मोपेड पर घूमने वाली प्रीति अब करोड़पति हो गई है. वह महंगी कारों से घूमती है. उस ने अपने करीबियों व रिश्तेदारों के नाम पर बेनामी संपत्ति खरीद रखी है.

बंगला, खेती की जमीन के अलावा वह एक कंपनी की भी संचालक भी थी. अवैध वसूली के लिए उस ने बाकायदा एक संस्था रजिस्टर्ड करा रखी थी. लिहाजा पुलिस ने धर्मदाय आयुक्तालय, विजिलैंस विभाग के अलावा अन्य विभागों को पत्र लिख कर उस के बारे में आवश्यक जानकारी मांगी. घर में हुआ अपमान तो कर लिया सुसाइड प्रीति के कारनामों की जानकारी जुटाई ही जा रही थी कि पुलिस अधिकारियों तक एक गुहार और पहुंची. गुहार यह कि एक व्यक्ति ने प्रीति और उस के साथियों के डर से सुसाइड कर लिया था. मृतक के परिवार को न्याय दिलाने के लिए यह शिकायत जूनी मंगलवारी निवासी वैशाली पौनीकर की थी. शिकायत के अनुसार वैशाली के पति सुनील पौनीकर ने अक्तूबर 2019 में सतीश सोनकुसरे से कुछ रकम कर्ज ली थी. सुनील पौनीकर मेस संचालक था.

काम में घाटे के कारण उसे कर्ज लेना पड़ा था. सतीश सोनकुसरे ने कर्ज वापसी के लिए सुनील पर दबाव बनाया. लेकिन समय पर रुपए नहीं लौटा पाने पर उस ने प्रीति की मदद ली. प्रीति यह भी दावा करती थी कि वह कर्ज वसूली का काम भी करती है. शहर के सारे बड़े पुलिस अफसर व नेता उस के पहचान के हैं. बतौर वैशाली पौनीकर, प्रीति ने सतीश सोनकुसरे से कर्ज वसूली की सुपारी ली थी. वह कुछ पुलिस कर्मचारियों की मदद से सुनील को प्रताडि़त करती थी. प्रीति की धमकी से किया सुसाइड  एक दिन प्रीति सतीश सोनकुसरे और मंगेश पौनीकर को साथ ले कर सुनील के घर पर पहुंच गई. प्रीति ने सुनील को कर्ज नहीं लौटाने पर धमकी दी.

उस के साथ कुछ पुलिस वाले भी थे, जो घर में आ कर मांबहन की गालियां दे गए. यहीं नहीं, वह बस्ती में नंगा घुमाने की धमकी दे रहे थे. धमकी और घिनौनी बातों से सुनील बुरी तरह आहत हुआ. लिहाजा उस ने 27 नवंबर, 2019 की दोपहर ढाई बजे लकड़गंज थाना क्षेत्र के बाबुलवन प्राथमिक शाला के मैदान में जहर पी लिया. मेयो अस्पताल में उपचार के दौरान 30 नवंबर, 2019 को सुनील ने दम तोड़ दिया था. पुलिस ने आकस्मिक मौत का मामला दर्ज कर जांच जारी रखी. अब वैशाली पौनीकर की शिकायत पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर लकड़गंज थाने की पुलिस ने प्रीति व उस के साथियों के खिलाफ सुनील आत्महत्या मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रकरण दर्ज कर तलाश शुरू कर दी.

मेस संचालक को आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रकरण लकड़गंज थाने में दर्ज हो ही रहा था कि जरीपटका थाने में एक और शिकायत पहुंची. शिकायत यह थी कि आरोपी प्रीति ने धौंस दिखा कर 25 हजार रुपए ऐंठ लिए. शिकायतकर्ता पूर्णाबाई सडमाके का बेटा नीतेश वायुसेना में लिपिक था. 8 मार्च, 2019 को उस की प्रणिता से शादी हुई थी. शादी के 2 माह बाद ही प्रणिता की अपनी सास पूर्णाबाई से अनबन होने लगी. प्रणिता अपना सामान ले कर मायके चली गई. समझाने पर भी वह नहीं मानी. उस ने पुलिस के भरोसा सेल में पूर्णाबाई की शिकायत दर्ज करा दी. भरोसा सेल में पूर्णाबाई की प्रीति से भेंट हुई.

प्रीति भरोसा सेल की एजेंट बन कर घूमती थी. उस ने विवाद निपटाने का झांसा दे कर पूर्णाबाई से 25 हजार रुपए मांगे. रुपए नहीं देने पर उस के बेटे की नौकरी जाने का भय बताया. लिहाजा 17 अक्तूबर, 2019 को पूर्णाबाई ने प्रीति को 25 हजार रुपए दे दिए. पूर्णाबाई ने प्रीति को फोन कर पूछताछ की. प्रीति ने बताया कि तुम्हारे बेटे का काम हो गया है. मैं ने मैडम को पैसे दे दिए हैं. बेटे से जुड़े मामले को ले कर एक बार पूर्णाबाई को भरोसा सेल की इंचार्ज इंसपेक्टर शुभदा शंखे ने पूछताछ के लिए बुलाया. उस दौरान पूर्णाबाई ने इंसपेक्टर शुभदा से सहज ही कह दिया कि मैं ने तो आप को 25 हजार रुपए दिए थे, फिर आप मुझ से इस तरह घुमावदार सवाल क्यों कर रही हो. इंसपेक्टर शुभदा चौंकी.

वह यह जान कर हैरान थी कि जिस प्रीति दास को वह सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सम्मान देती रही, वह तो उस के नाम पर ही अवैध वसूलियां करने लगी है. लिहाजा, इंसपेक्टर शंखे ने पूर्णाबाई को शहर पुलिस के जोन-5 के उपायुक्त नीलोत्पल के पास भेजा. पूर्णाबाई की शिकायत पर जरीपटका पुलिस ने आरोपी प्रीति के खिलाफ हफ्ता वसूली का मामला दर्ज कर लिया. 2 दिन बाद शहर पुलिस के पास एक और शिकायत पहुंची. शिकायतकर्ता युवती उच्चशिक्षित थी. उस के अनुसार उस के साथ एक युवक ने विवाह का झांसा दे कर दुष्कर्म किया था. प्रीति दास ने युवती को यह कह कर मदद का आश्वासन दिया था कि उस की पुलिस के बड़े अधिकारियों से खासी पहचान है. वह दुष्कर्म के आरोपी को सजा दिलाएगी.

इस कार्य के लिए उस ने युवती से 25 हजार रुपए मांगे. रुपए मिलने के बाद प्रीति उस युवती से मिलती भी नहीं थी. ऐसे में एक रोज युवती ने प्रीति से तल्खी के साथ सवाल किया तो वह उसे धमकाने लगी. साथ ही यह औफर देने लगी कि उस की गैंग में शामिल हो जाए. उस युवती का आरोप था कि प्रीति अकसर खूबसूरत युवतियों की मजबूरियों का फायदा उठाती है. युवतियों को पेश कर के वह रसूखदारों से मनचाहा माल वसूलती रहती है. 2 से 3 पुलिस कर्मचारी व अधिकारी को हनीट्रैप में फंसा देने का डर दिखा कर उसने कथित तौर पर लाखों की वसूली की है. उस ने यह भी बताया कि नागपुर में पश्चिम महाराष्ट्र के कई पुलिस अधिकारी बैचलर रहते हैं. उन का परिवार उन के गांव या शहर में है. लिहाजा उन्हें रात रंगीन कराने के एवज में प्रीति लगातार ब्लैकमेल करती रही है.

भंडारा पुलिस थाने में प्रीति के विरुद्ध दर्ज धोखाधड़ी के मामले में बताया गया कि वह नागपुर के बाहर के जिलों में खुद को बैंकर के तौर पर प्रचारित करती रही है. जरूरतमंदों को आसानी से लाखों का कर्ज दिलाने का झांसा देती रही है. उस के इस चक्रव्यूह में कुछ बैंक कर्मचारी व अधिकारी भी शामिल रहे हैं. दीवाने ही दीवाने प्रीति अपना पूरा नाम प्रीति ज्योतिर्मय दास लिखती है. 40 की उम्र की हो चली इस महिला के चेहरे से ही सादगी व शिष्टता झलकती है. लेकिन उस के शिकायतकर्ताओं की मानें, तो वह जैसी दिखती है वैसी है नहीं. उस की मित्रमंडली की फेहरिस्त में दीवाने ही दीवाने हैं. उस के कारनामों के तराने न जाने कहांकहां गूंज रहे हैं. शिकायतकर्ता गुड्डू तिवारी की सुनें तो प्रीति कपड़ों की तरह रिश्ते बदलती है. लिबास ही नहीं, जरूरत हो तो वह जाति और धर्म भी बदल लेती है.

कभी वह मसजिदों के इर्दगिर्द नजर आती है तो कभी गुरुद्वारे के आसपास. फर्राटेदार अंगरेजी तो बोलती ही है , मराठी और हिंदी में भी उस के तेवर तने रहते हैं. उस के जीवन में 4 लोगों के नाम प्रमुखता से जुड़े हैं. इन में एक मराठी, दूसरे कारोबारी हैं तो 2 मुसलिम हैं. चर्चा है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए उस ने संदीप दुधे, महेश गुप्ता, रफीक अहमद व मकसूद शेख से अलगअलग शादी रचाई. फिर उन को उस ने छोड़ दिया. शिकायतकर्ता गुड्डू की शिकायत में इन नामों का जिक्र है. फिलहाल यह साफ नहीं हो पाया है कि प्रीति अपने पति से क्यों और कैसे दूर हुई. परिवार में उस की बुजुर्ग मां व बेटा है. खबर है कि प्रीति के पिता सेना में थे. पिता की मृत्यु के बाद उस की मां को अब पेंशन मिलती है.

घर में अनुशासन व शिष्टाचार का पाठ तो मिलता रहा, लेकिन कहा जाता है कि प्रीति की हसरतों ने उसे नई राह पर ला दिया. उस की सोशल मीडिया पर साझा की गई एक तसवीर पर लिखा है, ‘मेरी सादगी ही गुमनाम रखती है मुझे, जरा सा बिगड़ जाऊं तो मशहूर हो जाऊं.’ उसे करीब से जानने वालों का कहना है कि वह आपराधिक प्रवृत्ति की नहीं थी. लेकिन शोहरत और दौलत पाने का जुनून कुछ ऐसा सवार है कि वह हर हद से गुजर जाने का दंभ भरती है. वह अपनी सोशल इमेज चमकाने का निरंतर प्रयास करती रही. हालत यह है कि अब भी कुछ लोग उसे धोखेबाज मानने को तैयार नहीं है.

प्रीति एक भाजपा पार्षद की सामाजिक संस्था से भी जुड़ी थी. लौकडाउन में जरूरतमंदों को राहत सामग्री देने के अभियान में वह पूरी ताकत के साथ जुटी रही. लिहाजा उस संस्था से जुड़े नेता ने तो उसे निर्दोष ठहराने का अभियान ही शुरू कर दिया है. दावे के साथ सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है— हमारी ताई को फंसाया जा रहा है. उस ने कोई अपराध नहीं किया है. यह भी सुना जा रहा है कि प्रीति स्वयं को बैंकर बताती रही है. वह खुद को एक राजनीतिक दल के पदाधिकारियों द्वारा संचालित एक बैंक की संचालक के रूप में भी प्रचारित करती रही है. सदर क्षेत्र में उस बैंक के कार्यालय में उस के कारनामों के किस्से हैं.

बैंक का मैनेजर भी सिर पर हाथ धरे रहता है. बैंक अधिकारी बताते हुए सीज किए हुए वाहन सस्ते में दिलाने के दावे के साथ धोखाधड़ी करने के उस के किस्से भी सुने जा रहे हैं. खास बात है कि प्रीति अकसर सादे लिबास में रहती है. उस का बर्ताव उच्चशिक्षित सा आकर्षक है. हमपेशेवर सहेलियों ने की चुगली यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रीति के कारनामों की चुगली उस की हमपेशेवर सहेलियों ने की. राजनीति से ले कर सामाजिक कार्यों में ऐसी कई नईपुरानी कार्यकर्ता हैं, जिन की पहचान वसूली एजेंट के तौर पर है. अब सब के काम और सोच के तरीके अलगअलग हो गए हैं. इन में से कुछ को केवल यह बात खटक रही है कि प्रीति कम समय में बहुतों की चहेती बन गई. नेता, पुलिस से ले कर अन्य क्षेत्र के बड़े लोग भी उस के साथ उठनेबैठने लगे. प्रीति का सोशल मीडिया पर इमेज चमकाने का तरीका भी कइयों की आंखों में चुभने लगा था.

लिहाजा प्रीति की चुगली भी होने लगी थी. कभी वह इंसपेक्टर स्तर के अफसर के साथ बदनाम होती तो कभी नेता के घर उस के नाम पर पारिवारिक झगड़ा होता था. बताते हैं कि चुगली के चक्कर में एक पुलिस वाले ने प्रीति से कुछ बातों को ले कर सवाल किए थे, जिस पर वह थाने में ही भड़क गई थी. उस ने उस अफसर को भी खरीखोटी सुनाते हुए ज्यादा चूंचपड़ नहीं करने को कहा था. थाने में सिपाहियों के सामने हुए उस अपमान को अफसर भूल नहीं पाया. शहर में हनीट्रैप के कारनामों में लिप्त कुछ महिलाओं के लिए भी प्रीति आंख का कांटा बनी है. उन्हें लगता है कि यह कल की आई महिला सब को पीछे छोड़ कर काफी आगे निकल चुकी है.

सैक्स रैकेट, भोजनालयों, अवैध धंधों के अड्डों से पुलिस के नाम पर वसूली कर गुजारा करने वालों के लिए यह बात और भी खटकने वाली है कि प्रीति तो सीधे पुलिस अफसरों की गाडि़यों में ही घूमने लगी. आइडियाज क्वीन प्रीति को पहचानने वाले उसे अवैध वसूली की आइडियाज क्वीन भी कहते हैं. अपनी सोशल इमेज बनाते हुए वह सत्कार कार्यक्रम का आयोजन करती रही है. चर्चा के अनुसार वह सत्कार के लिए ऐसे लोगों की तलाश करती रहती है जो कार्यक्रम में  शौल, श्रीफल मिलने के बदले 10 से 20 हजार रुपए खर्च कर सकें. कार्यक्रम आयोजन के नाम पर सहयोग के तौर पर वह हजारों रुपए जमा कर लेती है. उन कार्यक्रमों में पुलिस के बड़े अधिकारी या अन्य क्षेत्र के सम्मानित लोगों को आमंत्रित करती रही है.

सत्कार कराने के इस खेल में भी वह मोटी रकम बटोरती है. बड़े पुलिस अफसरों के लिए मुखबिरी कर के भी वह अपने स्वार्थ साधती रही है. इस के अलावा विविध मामलों को ले कर वह अफसरों व नेता, मंत्री को निवेदन सौंपने में भी आगे रही है. पुलिस मित्र के तौर पर शहर के सभी 33 पुलिस थानों में उस की खास पहचान है. अफसरों की निजी पार्टी के अलावा नेताओं की पर्सनल बैठकों में वह शामिल होती रही है. खुशियों के मौकों पर मनपा के बड़े नेता भी उस के साथ ठुमके लगाते दिखे. लिहाजा कइयों को यही लगता है कि प्रीति की प्रीत केवल उस से है. उसे होनहार कार्यकर्ता मानने वालों की भी कमी नहीं है. सत्कार करनेकराने का दौर कुछ ऐसा चला है कि शहर में जिम्मेदार वर्ग कहलाने वाले सभी क्षेत्रों के प्रतिष्ठितों के साथ वह मंच साझा कर चुकी है. नगर सेवक, महापौर, विधायक स्तर के जनप्रतिनिधि उस की खास मित्रमंडली में शामिल हैं.

वह सब से पहले अपने शिकार के बारे में जानकारी लेती है. मनचाही खुशियों का दाना फेंक कर शिकार फांसने का गुर वह जान चुकी है. हनीट्रैप के मामलों में उत्तर नागपुर में ही एक गिरोह चर्चा में रहा है. प्रीति का नाम आते ही वह हवा हो गया था. इस के अलावा कुछ आपराधिक मामलों में उस का नाम थानों तक पहुंचा, लेकिन पुलिस के रिकौर्ड में दर्ज नहीं हो पाया. बहरहाल कहा जा रहा है कि प्रीति के चक्कर में दास बने लोगों की लंबी कतार है. इन में कई सफेदपोश लोग भी हैं. उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही सारी हकीकत सामने आने लगेगी.

 

Maharashtra News : रिटायर्ड अफसर ने बेटी को मारी गोली

Maharashtra News : इस घटना ने सभी को चौंका दिया है, जिस में एक रिटायर्ड पिता ने अपनी बेटी की गोली मारकर हत्या कर दी. इस घटना में दामाद भी घायल हो गया. इस घटना की वजह पारिवारिक विवाद बताया जा रहा है. चलिए जानते हैं इस स्टोरी को विस्तार से-

यह घटना महाराष्ट्र की है. इस में एक सेवानिवृत सीआरपीएफ अधिकारी ने एक शादी समारोह के दौरान अपनी ही बेटी को गोली मार दी, जिस से उस की मौत हो गई. इस जानलेवा घटना में उस का दामाद भी बुरी तरह से घायल हो गया. घटना के बाद पुलिस ने तुरंत आरोपी पिता को अरेस्ट कर लिया गया है. बताया जा रहा की पिता अपनी बेटी की लवमैरिज से नाराज चल रहा था. इस लिए वह अपनी बेटी और दामाद को मारना चाहता था.

पुलिस के अनुसार, सीआरपीएफ से रिटायर्ड सब इस्पेक्टर किरण मंगले ने बेटी तृप्ती की गोली मारकर हत्या कर दी. इस हमले में तृप्ति का पति अविनाश वाघ भी गंभीर रूप से घायल हो गया. तृप्ति की शादी एक साल पहले ही हुई थी और वह अपने पति के साथ पुणे में रह रही थी. उस दिन वह अपने पति के साथ चोपड़ा तहसील के एक शादी समारोह में शामिल होने आई थी.

जैसे ही किरण मंगले को पता चलता है कि बेटी अपने पति के साथ एक शादी में आई है तो वह भी उस शादी समारोह में पहुंच गया. विवाह स्थल पर ने रिवाल्वर निकाली और अपनी बेटी को गोली मार दी, जिस से उस की मौत हो गई. उसी दौरान उस ने अपने दामाद को भी गोली मारकर गंभीर रुप से घायल कर दिया.

वारदात के तुरंत बाद आसपड़ोस के लोगों ने किरण मंगेल को पकड़ लिया और उस की पिटाई भी कर दी.
इस के बाद किरण मंगले को अस्पताल में भरती कराया गया है. पुलिस ने आरोपी को अरेस्ट कर लिया है और पूरे मामले की जांच कर रही है.

Maharashtra Crime News : प्रेमिका की हत्या कर शव को पेड़ पर लटकाया फिर पर्स और मोबाइल लेकर हुआ फरार

Maharashtra Crime News : आटो से ड्यूटी आनेजाने के दौरान किरण की दीपक रूपवते से दोस्ती हो गई. शादीशुदा होने के बावजूद दीपक विवाहिता किरण को चाहने लगा. किरण ने जब उस से शादी करने से  इनकार किया तो…

महाराष्ट्र के जिला सतारा का रहने वाला 30 वर्षीय आकाश सावले पिछले 2-3 सालों से मुंबई से सटे थाणे जिले के वाड़ेघर गांव में अपनी पत्नी किरण के साथ रहता था. दोनों ने लवमैरिज की थी. प्रेमिका से पत्नी बनी किरण को किसी प्रकार की कोई तकलीफ न हो, इस के लिए आकाश रातदिन मेहनत करता था. वह एक व्यवहारकुशल युवक था. इसलिए वह जल्दी ही बस्ती के लोगों से घुलमिल गया था. आकाश सावले जो कमाता था, सारे पैसे किरण के हाथों पर रख देता था. पति की इस ईमानदारी पर किरण काफी खुश थी. उसे ऐसा लगता था कि उस ने अपने जीवन के प्रति जो फैसला किया था, वह सही था. लेकिन उस की यह सोच कुछ दिनों बाद ही गलत साबित हो गई.

आकाश सावले जब अपने काम पर चला जाता तो घर का सारा काम निपटाने के बाद घर में अकेली किरण का मन ऊब जाता था. उस का टाइम पास नहीं होता था. वह चाहती थी कि वह भी कहीं नौकरी करे. इस से टाइम भी पास हो जाएगा और चार पैसे भी घर आएंगे. इस बारे में उस ने पति आकाश से कहा कि दोनों काम करेंगे तो उन की आय भी बढ़ेगी और उन के सारे सपने भी पूरे हो जाएंगे. किरण की यह बात आकाश सावले को ठीक लगी. यही नहीं, उस ने अपने एक परिचित के सहयोग से पत्नी को भिवंडी के एक कारखाने में काम पर भी लगवा दिया.

रविवार, 9 अगस्त, 2020 की शाम 5 बजे किरण सब्जी लेने के लिए जब घर से निकली तो फिर वापस लौट कर नहीं आई. आकाश सावले को किरण की चिंता सता रही थी. जैसेजैसे अंधेरा घना होता जा रहा था, वैसेवैसे आकाश के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. रात किसी तरह से बीत गई. किरण का मोबाइल भी स्विच्ड औफ था. सुबह होते ही बस्ती के लोगों के साथ उस ने किरण की तलाश शुरू कर दी. पूरा दिन उस ने अपने नातेरिश्तेदारों से किरण के बारे में पूछताछ की, लेकिन कहीं से भी उस की जानकारी नहीं मिल सकी.

पूरे 24 घंटों तक आकाश सावले अपने दोस्तों, जानपहचान वालों के साथ किरण की तलाश कर के जब थक गया और किरण का कहीं पता नहीं चला तो वह पुलिस को पत्नी के गुम होने की सूचना देने का फैसला किया. आकाश ने थाना कोनगांव जा कर वहां के ड्यूटी अफसर एसआई जीवन शेरखाने को सारी बातें बताईं और किरण सावले के गायब होने की सूचना दर्ज करवा दी. पुलिस ने किरण की गुमशुदगी दर्ज कर उस के हुलिया और फोटो के आधार पर अपनी जांच शुरू कर दी. शिकायत दर्ज हुए अभी 12 घंटे भी नहीं हुए थे कि कोनगांव पुलिस को एक चौंकाने वाली खबर मिली.

12 अगस्त, 2020 की सुबह लगभग 9 बजे पुलिस कंट्रोल रूम से यह खबर आई कि मुंबई-नासिक हाइवे रंजनोली नाका भिवंडी में स्थित टाटा आमंत्रा बिल्डिंग के पीछे पेड़ पर किसी युवती का शव लटका हुआ है. शायद आत्महत्या का मामला है. चूंकि यह क्षेत्र थाना कोनगांव के अंतर्गत आता था, इसलिए कोनगांव थाने के एसआई जीवन शेरखाने तुरंत अपने सहायकों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने प्रारंभिक काररवाई कर शव पेड़ से नीचे उतरवाया और शिनाख्त के लिए आकाश सावले को बुला लिया. मामला काफी जटिल और सनसनीखेज था. पुलिस ने इस की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ थानाप्रभारी आर.टी. काटकर को भी दे दी.

एसआई जीवन शेरखाने अभी अपने सहयोगियों के साथ मामले की जांच कर ही रहे थे कि सूचना पा कर थाणे के डीसीपी अंकित गोयल और थानाप्रभारी आर.टी. काटकर भी मौकाएवारदात पर आ पहुंचे थे. डीसीपी अंकित गोयल ने युवती के शव और घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और मामले की गंभीरता को देखते हुए थानाप्रभारी आर.टी. काटकर को कुछ दिशानिर्देश दे कर अपने औफिस लौट गए. उन के जाने के बाद थानाप्रभारी आर.टी. काटकर ने मामले की औपचारिकताएं पूरी कर युवती के शव को पोस्टमार्टम के  लिए भिवंडी के सिविल अस्पताल भेज दिया और थाने लौट आए.

थाने आ कर आत्महत्या का मामला दर्ज कर उन्होंने जांच शुरू कर दी. इस से पहले कि पुलिस टीम उस युवती की आत्महत्या की कडि़यां जोड़ पाती, मामले में एक नया मोड़ आ गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने मामले को उलझा दिया था. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने इस बात का खुलासा किया कि युवती की मौत आत्महत्या न हो कर एक साजिश के तहत हत्या थी, जिसे हत्यारे ने बड़ी होशियारी से अंजाम दिया था. हत्यारे ने 21-22 साल की किरण सावले की हत्या कर उस के शव को पेड़ से लटका दिया था. हत्यारे ने यह काम 3 दिन पहले किया था.

इस से स्पष्ट हो गया कि किरण की मौत आत्महत्या न हो कर एक सोचीसमझी साजिश के तहत की गई हत्या थी, यह जानकारी मिलने पर क्राइम ब्रांच भी सतर्क हो गई. क्राइम ब्रांच के डीसीपी प्रवीण पवार ने मामले की गंभीरता को समझा और जांच क्राइम ब्रांच यूनिट 3 के इंसपेक्टर संजू जौन को सौंप दी.  इंसपेक्टर संजू जौन ने एक टीम का गठन किया, जिस में उन्होंने असिस्टेंट इंसपेक्टर भूषण दामया, एसआई नितिन मुदगुन, हैडकांस्टेबल दत्ताराम भोसले, राजेंद्र धोलप, मंगेश शिरके, अजीत राजपूत आदि को शामिल कर कोनगांव पुलिस के साथ मामले की समानांतर जांच शुरू कर दी. साथ ही अपने मुखबिरों को भी जिम्मेदारी सौंप दी.

क्राइम ब्रांच के मुखबिरों ने 24 घंटे के अंदर ही इंसपेक्टर संजू जौन को यह खबर दे दी कि इस घटना का मुख्य अभियुक्त दीपक रूपवते डोंबिवली (पश्चिम) इलाके में घूम रहा है. खबर महत्त्वपूर्ण थी. इंसपेक्टर संजू जौन ने इस खबर को तुरंत कोनगांव पुलिस थाने से साझा किया और पूरे डोंबिवली पश्चिम में अपना सर्च औपरेशन शुरू कर दिया. नतीजा जल्दी सामने आ गया. क्राइम ब्रांच टीम और कोनगांव थाना पुलिस ने संयुक्त अभियान में दीपक रूपवते को कोपर ब्रिज के पास से दबोच लिया. पूछताछ में उस ने अपना नाम दीपक जगन्नाथ रूपवते बताया.

उस से क्राइम ब्रांच औफिस में पूछताछ की गई तो दीपक रूपवते अपना गुनाह स्वीकार करने में आनाकानी करता रहा, लेकिन जब सख्त रुख अपनाया गया तो वह तोते की तरह बोलने लगा. उस ने किरण सावले की हत्या का पूरा राज खोल दिया. 31 वर्षीय दीपक जगन्नाथ रूपवते अच्छी कदकाठी का युवक था. उस के पिता का नाम जगन्नाथ रूपवते था. जगन्नाथ रूपवते मूलरूप से महाराष्ट्र के लातूर जिले के रहने वाले थे. सालों पहले वह अपने परिवार के साथ कल्याण के गोविंद नगर इलाके में आ कर बस गए थे. रोजीरोटी के लिए उन्होंने मुंबई की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली.

दीपक रूपवते उन का एकलौता बेटा था, जिसे घर के सभी लोग प्यार करते थे. जगन्नाथ रूपवते और उन की पत्नी चाहती थी कि उन का बेटा पढ़लिख कर काबिल बन जाए. इस के लिए वह उस की सारी जरूरतें पूरी करते थे. लेकिन नतीजा उलटा ही निकला. पढ़ाईलिखाई में उस की कोई रुचि नहीं थी. उस ने बड़ी मुश्किल से 10वीं पास की. अच्छी शिक्षादीक्षा न होने के कारण उसे कोई अच्छा काम भी नहीं मिल सका. जिस जगह दीपक रूपवते रहता था, उस जगह के आटो ड्राइवरों से उस की अच्छी दोस्ती थी. लिहाजा दीपक ने भी तय कर लिया कि वह भी आटोरिक्शा चलाएगा. दोस्तों की मदद से उस ने अपना लाइसैंस भी बनवा लिया.

लेकिन उस के मातापिता को उस का आटोचालक बनना पसंद नहीं था. वह चाहते थे कि उन का बेटा ड्राइवर बनने के बजाय किसी अच्छी नौकरी में जाए लेकिन उन के सपने सच नहीं हुए. दीपक ने मातापिता की एक नहीं सुनी और आटो चलाने लगा. आटोचालक बनने के बाद उस के मातापिता ने उस के योग्य लड़की की तलाश की तो उन की यह तलाश जल्द ही पूरी हो गई. गांव के ही एक रिश्ते की लड़की उन्हें पसंद आ गई. करीब 5 साल पहले दीपक की शादी पूरे रस्मोरिवाज के साथ हो गई थी. शादी के शुरुआती दिनों में दीपक रूपवते पत्नी के प्यार में आकंठ डूबा रहता था. लेकिन जैसेजैसे समय गुजरता गया, दोनों के बीच छोटीछोटी बातों को ले कर किचकिच शुरू हो गई. यह तब और बढ़ गई, जब वह 2 बच्चों का पिता बन गया.

दीपक चाहता था कि उस की पत्नी बच्चों को संभालने के साथसाथ पहले जैसी ही बनसंवर कर रहे. लेकिन गांव के परिवेश में पलीबढ़ी उस की पत्नी चाह कर भी उस के हिसाब से रह नहीं पाती थी. जिस की वजह से वह दीपक के दिल में अपनी जगह नहीं बना पा रही थी. दीपक रूपवते के दिल में अपने लिए बेरुखी देख कर पत्नी ने उस का दिल जीतने की बहुत कोशिश की, लेकिन नाकाम रही. वह जब आटो चला कर आता, तब वह उस की मनपसंद की साड़ी पहनती, सजतीसंवरती, उस की पसंद का खाना बनाती, मीठीमीठी बातें कर उस का दिल जीतने की कोशिश करती. इस के बावजूद भी दीपक उस से दूरी ही बनाए रखता था.

दरअसल, रंगीनमिजाज दीपक अपनी पत्नी में वही छवि देखना चाहता था, जिस तरह की सुंदर, हसीन युवतियां उस के आटो में बैठती थीं. शादी के पहले दीपक ऐसी ही युवती की कल्पना किया करता था, जो उसे अपनी पत्नी में नहीं दिखाई देती थी. ऐसा रिश्ता भला कितने दिन चलता, रोजरोज की जलीकटी सुनने के बजाए एक दिन उस की पत्नी ने उस से और बच्चों से अपना रिश्ता खत्म कर उस का घर छोड़ दिया. 8-10 महीने अकेले रहने के बाद दीपक की जिंदगी में किरण सावले आई. किरण सावले और दीपक का मिलना एक संयोग था. किरण हमेशा अपने काम पर जाने के लिए बसस्टौप पर आती थी. अगर कभी उस की बस समय पर नहीं आती थी तो मजबूरी में उसे आटो से जाना पड़ता था.

उस दिन भी ऐसा ही हुआ. संयोग से उस दिन किरण के पास आटो का पूरा किराया नहीं था. ऐसे में दीपक ने उस की मदद की. दूसरे दिन जब किरण ने उसे बाकी किराया देने की कोशिश की तो दीपक ने लेने से मना कर दिया. बस यहीं से दीपक और किरण एकदूसरे के करीब आ गए. किरण ने दीपक का फोन नंबर भी ले लिया. अब जब भी किरण को समय पर बस नहीं मिलती, तो वह दीपक को फोन कर के बुला लेती. दीपक उसे उस के कारखाने पहुंचा आता था. 2-4 बार दीपक के आटो में आनेजाने पर दोनों की झिझक भी दूर हो गई. दोनों एकदूसरे से खुल कर बातें करने लगे.

दोनों ने एकदूसरे के सामने अपनेअपने जीवन के सारे पन्ने खोल कर रख दिए. दीपक ने अपनी पत्नी और बच्चों के बारे में ऐसा कुछ बताया कि किरण को उस से हमदर्दी हो गई, जिसे दीपक ने किरण का प्रेम समझ लिया. अब दीपक अकसर किरण से मिलता, उस की राह देखता. उसे अपने आटो से काम पर छोड़ता और ड्यूटी पूरी होने के बाद आटो से उस के घर के पास छोड़ देता. दोनों की घनिष्ठता बढ़ी तो दोनों फोन पर घंटों बातें करने लगे. इतना ही नहीं, वे समय निकाल कर मूवी देखते, मौल में घूमते, शौपिंग करते. आखिरकार एक दिन वह समय भी आ गया, जब दीपक ने किरण से शादी का प्रस्ताव रखा तो किरण ने उसे हंसी में टाल दिया.

कहा, ‘‘मुझे तुम से शादी कर के खुशी होगी, लेकिन मैं यह नहीं कर सकती. क्योंकि मेरा पति मुझे बहुत प्यार करता है. इस के अलावा हमारा एक समाज है, हम एक दोस्त हैं और दोस्त ही रहेंगे.’’

लेकिन दीपक इस से संतुष्ट नहीं था. वह किरण से प्यार करने लगा था. उसे अपना जीवनसाथी बना कर अपना घर बसाना चाहता था. उस ने किरण को कई बार शादी के लिए प्रपोज किया था, लेकिन अपने मनमुताबिक जवाब न पा कर वह उस से नाराज रहने लगा और उस ने किरण के प्रति एक क्रूर फैसला कर लिया था. घटना के दिन रात 8 बजे दीपक ने किरण को घुमाने के बहाने से अपने आटो में बिठाया. फिर वह कल्याण से भिवंडी रंजनोली नाका टाटा आमंत्रा बिल्डिंग के पीछे स्थित झाडि़यों के पीछे ले गया. वहां उस ने एक बार फिर किरण से शादी करने का आग्रह किया, लेकिन किरण ने इनकार कर दिया.

इस से गुस्सा हो कर दीपक ने किरण की ओढ़नी उस के गले में डाल कर उस की हत्या कर दी. पुलिस को गुमराह करने के लिए उस ने वारदात को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की. इस के लिए उस ने उसी ओढ़नी का फंदा बना कर शव को वहां एक पेड़ पर लटका दिया. फिर उस का पर्स और मोबाइल फोन ले कर फरार हो गया. दीपक जगन्नाथ रूपवते से विस्तृत पूछताछ करने के बाद क्राइम ब्रांच ने उसे कोनगांव थाना पुलिस के हवाले कर दिया. कोनगांव पुलिस ने उसे भिवंडी कोर्ट में पेश कर 7 दिन की पुलिस रिमांड पर लिया. विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने दीपक को फिर से भिवंडी कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.