Gujrat News: पैसों की चकाचौंध में बह गई भावना

Gujrat News: 30 जून, 2023 को गुजरात के जिला भरूच के थाना जंबुसर पुलिस को सूचना मिली कि पगरनाला में एक लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही थाना पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. लाश किसी पुरुष की थी, जिस की उम्र 36 साल के आसपास थी.

मरने वाले के शरीर पर कपड़े के नाम पर सिर्फ पैंट थी. पुलिस ने पैंट की तलाशी ली कि शायद उस की जेब से ऐसा कुछ मिल जाए, जिस से उस की पहचान हो जाए. पर उस की जेब से कुछ भी नहीं मिला. आसपास भी ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की पहचान हो पाती. तब पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

इस के बाद थाने आ कर यह पता करने की कोशिश की जाने लगी कि जिले में कहीं कोई गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. पर जिले के किसी थाने में उस हुलिए के किसी व्यक्ति की कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने लाश को बड़ौदा की मोर्चरी में रखवा दी. इस के बाद पुलिस यह पता करने की कोशिश करती रही कि मरने वाला कौन है?

10 दिन बाद हुई लाश की शिनाख्त

लाश मिलने के 10 दिनों बाद थाना जंबुसर से करीब 400 किलोमीटर दूर जिला बनासकांठा के थाना थराद के एसएचओ इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी ने फोन कर के जंबुसर पुलिस से पूछा, “पता चला है कि आप के थानांतर्गत एक पुरुष की लाश मिली है. मरने वाले की उम्र 36 साल के आसपास है.”

“जी, आज से 10 दिन पहले नाले में एक लाश मिली थी. मरने वाले की यही उम्र होगी, जितनी आप बता रहे हैं. मैं उस के फोटो भेज रहा हूं. लाश अभी मोर्चरी में रखी है.” थाना जंबुसर पुलिस ने कहा.

जंबुसर पुलिस ने लाश के फोटो भेजे तो पता चला कि वह लाश गुजरात के जिला बनासकांठा की तहसील थराद के गांव चोटपा के रहने वाले मारवाड़ी चौधरी पटेल शंकरभाई की थी. वह गांव में रह कर खेती करने के साथसाथ मकान बनाने के ठेके लेता था. उस के परिवार में पत्नी भावना पटेल के अलावा 3 बच्चे और बूढ़े मांबाप थे. पिता को लकवा मार दिया था, इसलिए वह चलफिर नहीं सकते थे.

29 जून, 2023 को साइट से आने के बाद शाम का खाना खा कर शंकर यह कह कर घर से निकला था कि वह पड़ोस में रहने वाले ऊदाजी के पास जा रहा है. वह घर से गया तो फिर लौट कर नहीं आया. घर वालों ने थोड़ी देर इंतजार किया. पर जब समय ज्यादा होने लगा तो उस के बारे में पता करने लगे. फोन किया गया तो पता चला फोन बंद है.

अगले दिन यानी 30 जून को थाना थराद पुलिस को सूचना दी गई, लेकिन थाना थराद पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेने के बजाय एकदो दिन और इंतजार करने के लिए कह कर सूचना देने गई शंकर की मां मीरादेवी को वापस भेज दिया था.

गुमशुदगी दर्ज कर पुलिस ने की कार्यवाही

जब 2 जुलाई तक शंकर नहीं आया तो मीरादेवी दोबारा थाने जा पहुंची. इस बार इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी से उन की मुलाकात हो गई. उन्होंने तुरंत शंकर की गुमशुदगी दर्ज कराई और शंकर के बारे में पता कराने का आश्वासन दे कर मीरादेवी को घर भेज दिया.

इस के बाद एसएचओ ने शंकर की तलाश शुरू की. गांव वालों से पूछताछ में पता चला कि शंकर की पत्नी भावनाबेन का चरित्र ठीक नहीं है. इस के बाद उन्होंने भावना का फोन सर्विलांस पर लगवा दिया. इस से उन्हें पता चला कि भावना लगातार पड़ोसी गांव कलश के रहने वाले शिवा पटेल के संपर्क में है.

जब उन्होंने शिवा पटेल के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह 29 जून को अंकलेश्वर से गांव आया तो था, पर अपने घर नहीं गया था. इस के अलावा 29 जून को उस ने शंकर को फोन भी किया था. 29 जून की शंकर और शिवा के फोन की लोकेशन निकलवाई गई तो पता चला कि दोनों के फोन की लोकेशन एक साथ थी.

इस से पुलिस को उस पर शक हुआ तो पुलिस ने उस की लोकेशन निकलवाई. उस की लोकेशन अंकलेश्वर की मिली. इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी की टीम अंकलेश्वर पहुंची और शिवा को गिरफ्तार कर के थाने ले आई.

थाने ला कर शिवा से पूछताछ शुरू हुई. शिवा पुलिस को गोलगोल घुमाता रहा. उस का कहना था कि वह 29 जून को गांव गया ही नहीं था. इधर शंकर से उस की मुलाकात ही नहीं हुई, लेकिन जब पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की लोकेशन उस के सामने रखी तो उस ने शंकर के मर्डर में अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि भावना के साथ रहने के लिए उस ने शंकर की हत्या की है. इस के बाद उस ने भावना से प्यार होने से ले कर शंकर की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मेले में मिल गए दोनों के दिल

शंकरभाई पटेल और भावनाबेन का विवाह करीब 14 साल पहले हुआ था. शंकर अपने परिवार के साथ चोटपा गांव में खेतों के बीच मकान बना कर रहता था. उस की दोस्ती कलश गांव के शिवाभाई पटेल से थी. वह भी मारवाड़ी चौधरी पटेल था. वह भी खेतों के बीच घर बना कर रहता था, शायद इसीलिए दोनों में कुछ ज्यादा पटती थी.

शिवा शंकर के घर भी खूब आताजाता था. शिवा अंकलेश्वर में मेटल का धंधा करता था. वह जब भी अंकलेश्वर से गांव आता, शंकर को अपनी क्रेटा गाड़ी में बैठा कर घुमाता था.

एक बार वह राजस्थान के बौर्डर पर लगने वाले लवाड़ा के मेले में घूमने जा रहा था तो शंकर के साथ उस की पत्नी भावना भी मेला देखने गई थी. उसी मेले में शिवा और भावना ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया था. बाद में दोनों के बीच फोन पर बातें होने लगीं. फोन पर बातें करतेकरते दोनों के बीच प्रेम संबंध बना तो फिर शारीरिक संबंध भी बन गए.

शिवा कुंवारा था, जवान था, अच्छा पैसा कमाता था, उसे एक महिला शरीर की जरूरत भी थी, जो भावना ने पूरी कर दी थी. शिवा के पास पैसों की कमी नहीं थी, वह दिल खोल कर भावना पर पैसे खर्च करता था तो भावना भी प्यार से उस की शारीरिक जरूरतें पूरी करती थी. यह अवैध संबंध इसी तरह चलते रहे.

यह लगाव जब गहराया तो भावना अकसर शिवा से शिकायत करने लगी, “मेरा पति शंकर मुझे बहुत परेशान करता है. जराजरा सी बात पर मुझे मारता है.”

शिवा के प्यार में डूब गई भावना

जब कभी भावना और शंकर में झगड़ा होता तो भावना शिवा को फोन कर के पति और अपना झगड़ा शिवा को सुनाती भी थी. शंकर भावना के साथ जो बरताव कर रहा था, वह शिवा को अच्छा नहीं लगता था. पर वह शंकर से कुछ कह भी नहीं सकता था.

शिवा भावना से बहुत प्यार करता था, इसलिए एक दिन उस ने कहा, “तुम शंकर को छोड़ कर मेरे साथ क्यों नहीं रहने आ जाती? मैं तुम्हें रानी की तरह रखूंगा.”

इस पर भावना ने कहा, “घर में बूढ़े मांबाप हैं, उन्हें छोड़ कर आऊंगी तो समाज मुझ पर थूकेगा. मेरी बहुत बदनामी होगी.”

“तब तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?” शिवा ने कहा.

“कुछ तो करना ही होगा, मैं इस आदमी के साथ अब नहीं रह सकती.” भावना बोली.

28 जून, 2023 को किसी बात पर शंकर और भावना में झगड़ा हुआ. तब भावना ने शिवा को फोन कर के कहा, “शिवा, तुम किसी भी तरह मुझे इस आदमी से छुड़ाओ. अब मैं इस आदमी के साथ बिलकुल नहीं रह सकती.”

शिवा भावना से प्यार तो करता ही था. पर उस के लिए परेशानी यह थी कि उस की बिरादरी में पति या पत्नी को छोडऩा आसान नहीं है. इसलिए जब उस ने भावना से एक बार फिर शंकर को छोड़ कर आने को कहा तो भावना बोली, “अगर मैं शंकर को छोड़ कर आती हूं तो समाज में मेरी बहुत बदनामी होगी. इसलिए शंकर से छुटकारा पाने के लिए उस का कुछ करना होगा.”

“वही तो मैं पूछ रहा हूं कि शंकर का किया जाए?” शिवा ने पूछा.

“ऐसा है, अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो उसे खत्म कर दो. वह नहीं रहेगा तो हम दोनों आराम से रह सकेंगे.” भावना ने कहा.

“ठीक है, जैसा तुम कह रही हो, वैसा ही करते हैं. आराम से बैठ कर योजना बनाते हैं, उस के बाद शंकर को खत्म कर देते हैं.” शिवा ने कहा.

शंकर की हत्या की हुई प्लानिंग

28 जून को यह बात हुई थी. इस के पहले भी दोनों में शंकर नाम के कांटे को निकालने की कई बार बात हो चुकी थी, लेकिन इस के पहले फाइनल योजना नहीं बनी थी. पर इस बार दोनों ने फोन पर ही शंकर को खत्म करने की फाइनल योजना बना डाली.

योजना बनाने के बाद किसी को शक न हो, इसलिए भावना 28 जून को ही मायके चली गई. 29 जून को शिवा ने एक दूसरे नंबर से अपने दोस्त शंकर को फोन कर के अच्छीअच्छी बातें करने के बाद विश्वास में ले कर कहा, “यार शंकर, तुम से एक जरूरी काम है. मैं गाड़ी ले कर आ रहा हूं. तुम ऐसा करो, सडक़ पर आ कर मुझ से मिलो.”

इस बीच भावना से भी शिवा की बातचीत होती रही. 2 महीने पहले भावना और शिवा के बीच शंकर को मारने की बात हुई थी, तब भावना ने कहा था कि शंकर को नींद की गोली खिला कर खत्म कर दो. इसलिए 2 महीने पहले ही उस ने भरूच सिटी से नींद की गोलियां खरीद कर रख ली थीं, जो उस की गाड़ी में ही रखी थीं. 2 महीने पहले हुई बातचीत के अनुसार शिवा अपनी योजना में आगे बढ़ रहा था.

कार में गला घोंट कर की थी हत्या

29 जून, 2023 की दोपहर को अपनी क्रेटा कार नंबर जीजे16डी के1389 ले कर शिवा अंकलेश्वर से निकला. उस ने अपने निकलने की बात शंकर को बता दी थी. चलने के पहले उस ने नींद की गोलियां पीस कर पानी की बोतल में मिला दी थीं.

रात करीब 9 बजे वह गांव चोटपा पहुंचा. उस ने शंकर से बता ही दिया था कि एक जरूरी काम से उसे साथ चलना है, इसलिए वह खाना खा कर तैयार था. गांव पहुंचते ही शिवा ने फोन किया तो शंकर आ कर उस की कार में बैठ गया. शिवा इधरउधर गाड़ी घुमाने लगा.

शिवा समय गुजार रहा था कि शंकर उस से पानी पीने के लिए मांगे. इसलिए वह शंकर को चोटपा से खोडा चरकपोस्ट, साचोर, ननेवा से घानेरा ले गया. जब वह काफी दूर निकल गया तो शंकर ने पानी पीने के लिए मांगा. शिवा ने तुरंत पानी की वही बोतल पकड़ा दी, जिस में उस ने नींद की गोलियां पीस कर मिलाई थीं.

वह पानी पीने के थोड़ी देर बाद शंकर को नींद आ गई. इस के बाद शिवा घानेरा से सीधे डीसा रोड पर गया. सडक़ पर सुनसान जगह देख कर शिवा ने कार रोकी और शंकर के मोबाइल को स्विच्ड औफ कर दिया कि किसी को पता न चल सके.

इस के बाद वह गाड़ी ले कर चल पड़ा. काफी दूर जाने के बाद सुनसान जगह देख कर उस ने सडक़ के किनारे गाड़ी रोक दी. शंकर गहरी नींद में था. शिवा ने कार में रखी रस्सी निकाली और शंकर के गले में लपेट कर कस दी. गला घोंटने से शंकर की सांस हमेशा हमेशा के लिए रुक गई.

बच्चों के अनाथ होने पर समाज ने की मदद

अब उसे शंकर की लाश को ठिकाने लगाना था. वह लाश को ऐसी जगह फेंकना चाहता था, जहां कोई उस की पहचान न कर सके. उस ने शंकर को आगे की सीट पर इस तरह बैठा दिया, जिस से लगे कि वह बैठेबैठे सो रहा हो.

शंकर की लाश को ले कर वह डीसा, पालनपुर, मेहसाणा, अहमदाबाद, बड़ौदा होते हुए वह जंबुसर गया. जंबुसर चौराहे से थोड़ी दूर आगे से सिंगल रोड गई थी. उसे वह रोड सुनसान दिखाई दी तो उस ने कार उसी रोड पर उतार दी. लगभग एक किलोमीटर जा कर शिवा को एक पगरनाला दिखाई दिया तो उस ने शंकर की लाश उसी पगरनाले में फेंक दी. उस समय सुबह के 6 बज रहे थे.

लाश को ठिकाने लगाने के बाद शिवा ने फोन कर के यह बात भावना को बताई और वहां से सीधे अंकलेश्वर चला गया. 2 दिन बाद भावना भी ससुराल आ गई, जिस से किसी को उस पर शक न हो.

हत्याकांड का खुलासा हो जाने के बाद थाना थराद पुलिस ने भावना को भी गिरफ्तार कर लिया. शिवा को थाने में देख कर उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. इस के बाद थाना थराद पुलिस ने शिवा और भावना को बनासकांठा की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों का 6 दिन का रिमांड लिया गया.

रिमांड के दौरान बनासकांठा के एसपी अक्षयराज मकवाना ने प्रैस कौन्फ्रैंस की. पत्रकारों के सामने भी प्रेमिका प्रेमी भावना और शिवा ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद सारे सबूत जुटा कर पुलिस ने दोनों को दोबारा अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

शंकर, जिस की हत्या हुई है, उस के पिता लकवाग्रस्त हैं, मां बूढ़ी है. 3 बच्चे हैं, जिस में सब से बड़ी बेटी 7 साल, उस से छोटा बेटा 4 साल और सब से छोटा बेटा 2 साल का है. पिता की हत्या हो गई है. पिता की हत्या के आरोप में मां जेल में है. बच्चों की हालत पर दया खा कर आजणा चौधरी समाज के बुजुर्गों ने बच्चों की मदद के लिए 15 लाख रुपए इकट्ठा कर के दिए हैं. Gujrat News

Love Crime: खूनी बन गई झूठी मोहब्बत

Love Crime: 19 मार्च, 2018 की सुबह कमलप्रीत कौर अपने पति हरजिंदर सिंह से यह कहते हुए घर से निकली थी कि उस के मायके में किसी की तबीयत खराब है, इसलिए वह राहुल को ले कर वहां जा रही है. पत्नी की यह बात सुन र हरजिंदर ने कहा, ‘‘ठीक है, हो आओ. ज्यादा परेशानी वाली बात हो तो तुम मुझे फोन कर देना. मैं भी पहुंच जाऊंगा.’’

‘‘हां, तुम्हारी जरूरत हुई तो फोन कर दूंगी और कोई ज्यादा चिंता वाली बात नहीं हुई तो 2 दिन में वापस लौट आऊंगी.’’ कमलप्रीत बोली.

मूलरूप से पंजाब के जिला पटियाला के गांव बल्लोपुर की रहने वाली थी कमलप्रीत. करीब 12 साल पहले जब वह 19 बरस की थी, तब उस की शादी हरियाणा के गांव गणौली के रहने वाले हरजिंदर सिंह से हुई थी. यह गांव जिला अंबाला की तहसील नारायणगढ़ के तहत आता है.शादी के ठीक एक साल बाद कमलप्रीत ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम राहुल रखा गया. इन दिनों वह गांव के सरकारी स्कूल में 5वीं कक्षा में पढ़ रहा था.

हरजिंदर का अपना खेतीबाड़ी का काम था, जिस में वह काफी व्यस्त रहता था. कमलप्रीत घर पर रहते हुए चौकेचूल्हे से ले कर सब कम संभाले हुए थी. जो भी था, सब बड़े अच्छे से चल रहा था. पतिपत्नी में खूब प्यार था. दोनों में अच्छी अंडरस्टैंडिंग भी थी. दोनों अपने बच्चों का भी सलीके से ध्यान रखे हुए थे.

काफी दिनों से राहुल पिता से कहीं घुमा लाने की जिद कर रहा था तो पिता ने उस से पक्का वादा किया था कि वह उस के इम्तिहान खत्म होने के बाद उसे 2 दिन के लिए घुमाने शिमला ले चलेगा. मगर पेपर खत्म होने के अगले रोज ही उसे अपनी मां के साथ नानी के यहां जाना पड़ गया. पत्नी के मायके जाने वाली बात पर हरजिंदर को कोई परेशानी वाली बात नहीं थी. पति की निगाह में कमलप्रीत एक सुलझी हुई मेहनती औरत थी, जो ससुराल के साथसाथ अपने मायके वालों का भी पूरा ध्यान रखती थी.

सुखदुख में वह अपने अन्य रिश्तेदारों के यहां भी अकेली आयाजाया करती थी. कुल मिला कर बात यह थी कि हरजिंदर को पत्नी की तरफ से कोई चिंता नहीं थी. इसलिए जब वह 19 मार्च को बेटे के साथ मायके के लिए घर से अकेली निकली तो हरजिंदर ने कोई चिंता नहीं की.

उसी रोज शाम के समय हरजिंदर ने पत्नी को यूं ही रूटीन में फोन कर के पूछा, ‘‘हां कमल, पहुंचने में कोई परेशानी तो नहीं हुई? बल्लोपुर पहुंच कर तुम ने फोन भी नहीं किया?’’

‘‘हांहां…वो ऐसा है कि अभी मैं बल्लोपुर नहीं पहुंच पाई.’’ कमलप्रीत बोली तो उस की आवाज में हकलाहट थी.

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पत्नी की ऐसी आवाज सुन कर हरजिंदर को थोड़ी घबराहट होने लगी. उस ने पूछा, ‘‘बल्लोपुर नहीं पहुंची तो फिर कहां हो?’’

‘‘अभी मैं शहजादपुर में हूं. किसी जरूरी काम से मुझे यहां रुकना पड़ गया.’’ कमलप्रीत ने पहले वाले लहजे में ही जवाब दिया.

‘‘शहजादपुर में ऐसा क्या काम पड़ गया तुम्हें? वहां तुम किस के यहां रुकी हो? सब ठीक तो है न? बताओ, कोई परेशानी हो तो मैं भी आ जाऊं क्या?’’

‘‘सब ठीक है, घबराने वाली कोई बात नहीं है. अच्छा, मैं फ्री हो कर अभी कुछ देर बाद फोन करती हूं. तब सब कुछ विस्तार से भी बता दूंगी.’’ कहने के साथ ही कमलप्रीत की ओर काल डिसकनेक्ट कर दी गई.

लेकिन हरजिंदर की घबराहट बढ़ गई थी. उस ने कमलप्रीत का नंबर फिर से मिला दिया. पर अब उस का फोन स्विच्ड औफ हो चुका था.

अचानक यह सब होने पर हरजिंदर का फिक्रमंद हो जाना लाजिमी था. कुछ नहीं सूझा तो उस ने उसी समय अपनी ससुराल के लैंडलाइन नंबर पर फोन किया. यहां से उसे जो जानकारी मिली, उस से उस के पैरों तले की जमीन सरक गई. ससुराल से उसे बताया गया कि यहां तो घर में कोई बीमार नहीं है और न ही कमलप्रीत के वहां आने की किसी को कोई जानकारी थी.

अब हरजिंदर के लिए एक मिनट भी रुके रहना संभव नहीं था. उस ने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और शहजादपुर की ओर रवाना हो गया. रास्ते भर वह कमलप्रीत को फोन भी मिलाता रहा था, पर हर बार उसे फोन के स्विच्ड औफ होने की ही जानकारी मिलती रही.

आखिर वह शहजादपुर जा पहुंचा. पत्नी और बच्चे की तलाश में उस ने उस गांव का चप्पाचप्पा छान मारा मगर पत्नी और बेटे राहुल के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. वहां से वह मोटरसाइकिल से ही अपनी ससुराल बल्लोपुर चला गया. कमलप्रीत को ले कर वहां भी सब परेशान हो रहे थे.

इस के बाद तो हरजिंदर सिंह और उस की ससुराल वालों ने कमलप्रीत व राहुल की जैसे युद्धस्तर पर तलाश शुरू कर दी. मगर कहीं भी दोनों मांबेटे के बारे में जानकारी हाथ नहीं लगी.

19 मार्च, 2018 का दिन तो गुजर ही गया था, पूरी रात भी निकल गई. 20 मार्च को भी दोपहर तक तलाश करते रहने के बाद सभी निराश हो गए तो हरजिंदर शहजादपुर थाने पहुंच गया. थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को उस ने पत्नी और बेटे के रहस्यमय तरीके से गायब होने की जानकारी दे दी. थानाप्रभारी ने कमलप्रीत और उस के बेटे राहुल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने अपने स्तर से दोनों मांबेटे को ढूंढने की काररवाई शुरू कर दी.

देखतेदेखते इस बात को एक सप्ताह गुजर गया, मगर पुलिस भी इस मामले में कुछ कर पाने में असफल रही.

बात 26 मार्च, 2018 की थी. थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह उस वक्त अपने औफिस में थे. तभी एक अधेड़ उम्र के शख्स ने उन के सामने आ कर दोनों हाथ जोड़ते हुए दयनीय भाव से कहा, ‘‘सर, मेरा नाम ओमप्रकाश है और मैं यमुनानगर में रहता हूं.’’

‘‘जी हां, कहिए.’’ शैलेंद्र सिंह बोले.

‘‘अब क्या कहूं सर, एक भारी मुसीबत आन पड़ी है हमारे परिवार पर.’’

‘‘हांहां बताइए, क्या परेशानी है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

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‘‘सर, मेरा एक भांजा है नीटू. उम्र उस की करीब 21 साल है. किसी बात पर उस का एक औरत से झगड़ा हुआ और हाथापाई में वह औरत मर गई. उस ने उस की लाश को कहीं ले जा कर दफन कर दिया. जब इस की जानकारी मुझे हुई तो हम ने उसे समझाया कि गलती हो जाने पर कानून से आंखमिचौली खेलने के बजाय पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना ही बेहतर होगा.’’ ओमप्रकाश ने बताया.

इस पर एकबारगी तो शैलेंद्र सिंह चौंके. फिर खुद को संभालने का प्रयास करते हुए बोले, ‘‘मतलब यह कि आप के भांजे ने किसी की जान ली, फिर उस की लाश भी ठिकाने लगा दी. अब सरेंडर का प्रस्ताव लेकर आए हो. तो यह भी बता दो कि किन शर्तों पर सरेंडर करवाओगे?’’

‘‘कोई शर्त नहीं सर. लड़का आप के सामने तो अपना अपराध कबूलेगा ही, अदालत में भी ठीक ऐसा ही बयान देगा. भले उसे कितनी भी सजा क्यों न हो जाए. बस आप से हमें सिर्फ इतना सहयोग चाहिए कि थाने में उस पर ज्यादा सख्ती न हो.’’ ओमप्रकाश ने कहा.

‘‘देखो, अगर वह हमें सहयोग करते हुए सच्चाई बयान करता रहेगा तो हमें क्या जरूरत पड़ी है उस से सख्ती से पेश आने की. जाओ, लड़के को ला कर पेश कर दो. यदि वह सच्चा है तो यहां उस के साथ किसी तरह की ज्यादती नहीं होगी.’’

‘‘ठीक है सर, मैं समझ गया. लड़का थाने के बाहर ही खड़ा है. मैं अभी उसे ला कर आप के सामने पेश करता हूं.’’ कहने के साथ ही ओमप्रकाश बाहर गया और थोड़ी ही देर में एक लड़के को ले कर थाने में आ गया.

‘‘यही है मेरा भांजा नीटू, सर.’’ उस ने बताया.

जिस वक्त ओमप्रकाश नीटू को ले कर थानाप्रभारी के औफिस में पहुंचा था, पुलिस वाले बगल वाले कमरे में एक अभियुक्त से गहन पूछताछ कर रहे थे. जरा सी देर में वहां से चीखचिल्लाहट की भयावह आवाजें आने लगी थीं.

ये आवाजें सुन कर नीटू थरथर कांपने लगा. फिर वह दबी सी आवाज में ओमप्रकाश से बोला, ‘‘मामा, ये लोग मेरा भी क्या ऐसा ही हाल करेंगे?’’

‘‘नहीं करेंगे बेटा, मैं ने एसएचओ साहब से सारी बात कर ली है. फिर जब तुम एकदम सच्चाई बयान कर ही रहे हो तो फिर डर कैसा?’’ ओमप्रकाश ने समझाया.

‘‘यही तो डर है मामा, मैं ने आप को भी पूरी सच्चाई नहीं बताई. दरअसल, मैं ने औरत के साथसाथ उस के बेटे का भी मर्डर कर दिया है और दोनों की लाशें एक साथ दफनाई हैं.’’

नीटू की यह बात थानाप्रभारी के कानों तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने नीटू को खा जाने वाली नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘मुझे पहले ही से शक था कि तुम्हारे अपराध का संबंध गणौली की कमलप्रीत और उस के बच्चे की गुमशुदगी से है.

अब तुम्हारे लिए बेहतर यही है कि तुम अपने घिनौने अपराध की सच्ची दास्तान अपने मामा को बता दो, वरना दूसरे तरीके से सच्चाई उगलवानी भी आती है.’’

थानाप्रभारी के इतना कहते ही ओमप्रकाश नीटू को ले कर एक दूसरे कमरे में ले गया. इस के बाद नीटू ने अपने अपराध की पूरी कहानी मामा को बता दी. नीटू के बताने के बाद ओमप्रकाश ने सारी कहानी थानाप्रभारी को बता दी.

थानाप्रभारी ने ओमप्रकाश के बयान दर्ज करने के बाद उसे घर भेज दिया फिर नीटू को गिरफ्तार कर उसे अदालत में पेश कर 2 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने जो कुछ पुलिस को बताया, उस से अपराध की एक सनसनीखेज कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

करीब एक साल पहले की बात है. अपनी रिश्तेदारी के एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए कमलप्रीत अकेली नारायणगढ़ के बड़ागांव गई थी. वहां जब वह नाचने लगी तो एक लड़के ने भी उस का खूब साथ दिया. उस ने बहुत अच्छा डांस किया था.

इस डांस के बाद भी दोनों एक साथ बैठ कर बतियाते रहे. लड़के ने अपना नाम सुमित उर्फ नीटू कहते हुए बताया कि यों तो वह शहजादपुर का रहने वाला है, मगर बड़ागांव में किराए का कमरा ले कर एक कंप्टीशन की तैयारी कर रहा है.

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कमलप्रीत उस की बातों से तो प्रभावित हो ही रही थी, उस का सेवाभाव भी उसे खूब पसंद आया. कमलप्रीत तो थकहार कर एक जगह बैठ गई थी, पार्टी में खाने की जिस चीज का भी उस ने जिक्र किया, वह ला कर उसे वहीं बैठी को खिलाता रहा.

इसी तरह काफी रात गुजर जाने पर कमलप्रीत को नींद सताने लगी. नीटू ने सुझाव दिया कि वह उसे अपने कमरे पर छोड़ आता है, जहां वह बिना किसी शोरशराबे के आराम से सो सकती है. थोड़ी झिझक के बाद वह मान गई.

अब तक नीटू को भी नींद आने लगी थी. अत: कमरे में चारपाई पर कमलप्रीत को सुलाने के बाद वह खुद भी जमीन पर दरी बिछा कर सो गया.

आगे का सिलसिला शायद इन के वश में नहीं था. रात के जाने किस पहर में दोनों की एक साथ आंखें खुलीं और बिना आगेपीछे की सोचे, दोनों एकदूसरे में समा गए. कमलप्रीत से नीटू 10 साल छोटा था, अत: उस मिलन के बाद कमलप्रीत उस की दीवानी हो गई. इस के बाद यही सिलसिला चल निकला. दोनों किसी न किसी तरीके से, कहीं न कहीं मौजमस्ती करने का तरीका निकाल लेते.

देखतेदेखते एक बरस गुजर गया. अब कमलप्रीत ने नीटू से यह कहना शुरू कर दिया था कि वह अपने पति को तलाक दे कर उस से शादी कर लेगी. मौजमस्ती तक तो ठीक था, कमलप्रीत की इस बात ने नीटू को परेशान कर डाला.

नीटू ने इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए आखिर मन ही मन यह निर्णय लिया कि वह कमलप्रीत को अच्छी तरह से समझाएगा. फिर भी न मानी तो वह उस का खून कर देगा. इस के लिए उस ने एक चाकू भी खरीद कर रख लिया था.

19 मार्च, 2018 की सुबह कमलप्रीत उस के यहां आ धमकी. उस के साथ एक लड़का था, जिसे उस ने अपना बेटा बताया. आते ही उस ने कहा कि वह अपने पति को हमेशा के लिए छोड़ आई है. आगे वह उस से शादी कर के अपने लड़के सहित उसी के साथ रहेगी.

नीटू ने उसे समझाने की कोशिश की. लगातार समझाते समझाते पूरा दिन और सारी रात भी निकल गई. मगर वह अपनी जिद पर अड़ी रही तो 20 मार्च को नीटू ने चाकू से कमलप्रीत की हत्या कर दी.

यह देख कर उस का लड़का राहुल सहम गया. मगर वह इस मर्डर का चश्मदीद गवाह बन सकता था. इसलिए नीटू ने चाकू से उस का भी गला रेत दिया. दोनों लाशों को कमरे में छिपा कर नीटू अमृतसर चला गया.

वहां गोल्डन टेंपल में उस ने वाहेगुरु से अपने इस गुनाह की माफी मांगी. रात में वापस आ कर बड़ागांव के पास से गुजर रही बेगना नदी की तलहटी में दोनों लाशों को दफन कर आया. इस के बाद वह अपने मामा के पास यमुनानगर चला गया, जिन्होंने उसे पुलिस के सामने सरेंडर करने का सुझाव दिया था.

पुलिस ने उस की निशानदेही पर न केवल चाकू बरामद किया बल्कि दोनों लाशें भी खोज लीं, जो जरूरी काररवाई के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. कस्टडी रिमांड की समाप्ति पर नीटू को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में अंबाला की केंद्रीय जेल भेज दिया गया था. Love Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Moradabad Crime: इश्क की नब्ज पकड़तेपकड़ते बना कातिल

Moradabad Crime: झोलाछाप डाक्टर मुबारक अंसारी उर्फ अजय बोस ने फरजी डिग्री की बदौलत लाखों रुपए कमाए. लेकिन औरतों का रसिया होने की वजह से उस ने अपना घर ही नहीं, जिंदगी भी बरबाद कर ली.

मुरादाबाद शहर के थाना मझोला का एक गांव है विशनपुर. इसी गांव का रहने वाला तौफीक रोज की तरह 3 फरवरी, 2016 को भी सुबह अपने खेतों पर गया तो वहां उसे गेहूं के खेत में एक युवती की अधजली लाश दिखाई दी. लाश देख कर वह घबरा गया. उस ने यह बात खेतों में काम कर रहे अन्य लोगों को बताई तो वे भी उस के खेत पर आ गए. वहीं से किसी ने इस बात की जानकारी थाना मझोला पुलिस को दी तो थानाप्रभारी राजेश द्विवेदी तुरंत पुलिस टीम के साथ विशनपुर गांव के लिए रवाना हो गए.

तौफीक के खेत पर पहुंच कर वहां पड़ी लाश का उन्होंने बारीकी से मुआयना किया तो देखा कि युवती का निचला हिस्सा झुलसा हुआ था. देखने से ही लग रहा था, उस पर पैट्रोल डाल कर जलाया गया था. गले में लाल रंग का नाड़ा बंधा था. शायद उसी नाड़े से उस का गला घोंटा गया था. उस के कानों में टौप्स और पैरों में पायल तथा बिछुए थे. उस की उम्र 22-23 साल रही होगी.

लाश के पास बच्चों का एक अधजला कंबल भी पड़ा था. राजेश द्विवेदी ने इस की सूचना उच्चाधिकारियों के अलावा विधि विज्ञान प्रयोगशाला की टीम को भी दे दी थी. कुछ ही देर में विधि विज्ञान प्रयोगशाला की टीम आ गई और सबूत जुटाने लगी. यह सब चल रहा था कि एएसपी अंकित मित्तल और अमानत मान भी वहां पहुंच गए. अधिकारियों ने भी मौकामुआयना कर के वहां मौजूद लोगों से लाश के बारे में पूछताछ की. लेकिन वहां मौजूद कोई भी आदमी उस लाश की शिनाख्त नहीं कर सका. इस के बाद पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए एसएसपी नितिन तिवारी ने एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में एएसपी सुजाता सिंह, थानाप्रभारी (मझोला) राजेश द्विवेदी, एसआई सतेंद्र भड़ाना, सुभाष मावी, कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर, मुस्तकीम को शामिल किया. हत्यारों का पता लगाने से पहले पुलिस टीम के सामने सब से बड़ी चुनौती यह पता लगाने की थी कि मरने वाली युवती कौन थी और कहां की रहने वाली थी? इस के लिए राजेश द्विवेदी ने उच्चाधिकारियों के निर्देश पर रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगवा कर थानाक्षेत्र के सभी गांवों में अज्ञात युवती की लाश मिलने की सूचना प्रसारित कराई. उन्होंने लाश की पहचान करने वाले व्यक्ति को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा भी की.

लाउडस्पीकर से घोषणा होने से इलाके के ज्यादातर लोगों को उस लाश के बारे में जानकारी मिल चुकी थी. इस का नतीजा यह निकला कि एक आदमी राजेश द्विवेदी के पास आया और बताया कि खुशहालपुर की पुलिस चौकी से थोड़ा आगे अपना क्लिनिक चलाने वाले बंगाली डाक्टर अजय बोस की पत्नी डा. बेबी बोस दिखाई नहीं दे रही है. उन दोनों का अकसर आपस में झगड़ा होता रहता था. राजेश द्विवेदी ने इस सूचना की पुष्टि के लिए एसआई सतेंद्र भड़ाना, कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर, मुश्तकीम आदि को लगा दिया. एसआई सतेंद्र भड़ाना ने सब से पहले बंगाली डाक्टर अजय बोस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि उस का क्लिनिक बहुत अच्छा चलता है. सुबह से ही उस के क्लिनिक पर मरीजों की भीड़ लग जाती थी. इलाके में उस की अच्छी प्रतिष्ठा थी.

इन बातों को देखते हुए बिना सबूत के बंगाली डाक्टर पर हाथ डालना सतेंद्र भड़ाना को उचित नहीं लगा. उन्हें यह भी पता चला था कि उस की पत्नी भी क्लिनिक पर महिला मरीजों को देखती थी, लेकिन इधर वह दिखाई नहीं दे रही थी. वह अचानक कहां चली गई, यह पता नहीं चला. इस बात का पता लगाने के लिए उन्होंने कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर को उस के क्लिनिक पर भेजा. कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर सादे कपड़ों में बंगाली डाक्टर की क्लिनिक पर पहुंचे तो उस समय तक वह क्लिनिक पर आया नहीं था. क्लिनिक पर जो मरीज आए थे, वे कंपाउंडर से अपना नंबर ले रहे थे.

जितेंद्र सिंह तोमर भी अपना नंबर ले कर डाक्टर के आने का इंतजार करने लगे. कुछ देर बाद डा. अजय बोस आया तो नंबर से मरीजों को देखने लगा. कांस्टेबल जितेंद्र सिंह तोमर का दोपहर 12 बजे के करीब नंबर आया तो डा. अजय बोस ने पूछा, ‘‘आप को क्या परेशानी है?’’

‘‘डाक्टर साहब, परेशानी मुझे नहीं, मेरी बीवी को है. उसे बहुत तेज दर्द हो रहा है. दरअसल वह प्रैग्नेंट है और उस की डिलिवरी का समय नजदीक है. मैं यहीं पास के डिडोरी गांव में रहता हूं. आप की पत्नी डाक्टर हैं. आप उन्हें मेरी पत्नी को देखने भेज देते तो बड़ी मेहरबानी होती. या फिर आप कहें तो मैं पत्नी को यहीं ले आऊं?’’

‘‘भई, अभी मैं आप की कोई मदद नहीं कर सकता, क्योंकि मेरी पत्नी अपने मायके कुशीनगर गई हैं. वह 15-20 दिनों बाद आएंगी. इसलिए आप अपनी पत्नी को कहीं और दिखा दें.’’ डाक्टर ने कहा.

जितेंद्र सिंह तोमर की नजरें डाक्टर बंगाली के चेहरे पर ही टिकी थीं. उस ने देखा कि अपनी बात कहते हुए डाक्टर घबरा रहा था. इस का मतलब कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर थी. उस ने यह बात एसआई सतेंद्र भड़ाना को बताई. इस के बाद उन्होंने अपने अधिकारियों से सलाहमशविरा कर के डा. अजय बोस को हिरासत में ले लिया.

थाने ला कर जब उस से उस की पत्नी बेबी के बारे में पूछा गया तो उस ने बड़ी सहजता से कहा कि वह अपने मायके गई है. वहां उस के किसी रिश्तेदार की शादी है.

‘‘जब शादी उस की रिश्तेदारी में है तो तुम क्यों नहीं गए?’’ राजेश द्विवेदी ने पूछा.

‘‘जाना तो था, पर मेरे जाने से क्लिनिक बंद हो जाता, जिस से मरीजों को परेशानी होती, इसीलिए मैं नहीं गया.’’

‘‘मेरी अपनी पत्नी से बात करा दो, मैं उस से कुछ बात करना चाहता हूं.’’ राजेश द्विवेदी ने कहा तो डाक्टर बंगाली के चेहरे का रंग उड़ गया. वह घबरा कर बोला, ‘‘सर, जल्दबाजी में वह अपना फोन यहीं भूल गई है.’’

इस से राजेश द्विवेदी को लगा कि यह झूठ बोल रहा है. उन्होंने जैसे ही उसे डांटा, वह डर के मारे कांपने लगा. उस ने कहा, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई, मैं ने पत्नी को मार कर उस की लाश एक खेत में फेंक दी है.’’

इस के बाद थानाप्रभारी उसे मोर्चरी ले गए, जहां उन्होंने उसे विशनपुर गांव से बरामद महिला की लाश दिखाई तो उस ने कहा कि यह लाश उस की पत्नी बेबी की है, जिसे उस ने पैट्रोल डाल कर जलाने की कोशिश की थी. अजय बोस से पूछताछ में बेबी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. डा. अजय बोस का असली नाम मुबारक अंसारी था. वह  मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के कस्बा गौरीशंकर के रहने वाले समीर अंसारी का बेटा था. समीर अंसारी उत्तर प्रदेश जल निगम में सुपरवाइजर हैं. उन की पोस्टिंग कुशीनगर में ही है. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां और 2 बेटे थे.

बच्चों में मुबारक अंसारी उर्फ अजय बोस सब से बड़ा था. बारहवीं पास कर के वह कस्बे में ही एक डाक्टर के यहां कंपाउंडरी करने लगा. उसी बीच सबीना मान से उस का विवाह हो गया, जिस से उसे 2 बेटियां हुईं. कुछ दिनों बाद मुबारक अंसारी कस्बे में ही क्लिनिक खोल कर मरीजों को देखने लगा. इस तरह वह झोलाछाप डाक्टर बन गया.

छोटीमोटी बीमारियों की दवाइयां वह जानता था, इसलिए जब लोगों को खांसी, बुखार आदि में फायदा होने लगा तो लोग उस के पास दवा लेने आने लगे. उसी बीच कई महिलाओं से उस के नाजायज संबंध बन गए. उन्हीं में एक थी रुखसाना (बदला हुआ नाम). रुखसाना का पति सऊदी अरब में काम करता था. वह हर महीने वहां से रुखसाना को मोटी रकम भेजता था. मुबारक अंसारी ने इसी का फायदा उठाते हुए बिजनैस के बहाने रुखसाना से साढ़े 3 लाख रुपए ले लिए.

रुखसाना से पहले मुबारक अंसारी के कस्बे की ही रहने वाली बेबी पटेल से नाजायज संबंध थे. बेबी शादीशुदा ही नहीं थी, उस की 7 साल की बेटी भी थी. लेकिन बेबी से उस के संबंध शादी से पहले के थे. बेबी के पिता फेंकू पटेल ने उस की शादी कमउम्र में ही प्रदीप से कर दी थी. शादी के बाद भी बेबी और मुबारक के संबंध चल रहे थे. बेबी के पति प्रदीप को जब उन के संबंधों का पता चला तो उस ने पत्नी को छोड़ दिया. इस के बाद बेबी अपनी बेटी के साथ मायके में रहने लगी. मुबारक रुखसाना से ज्यादा बेबी को चाहता था. यही वजह थी कि 10 जनवरी, 2012 को उस ने बेबी से प्रेम विवाह कर लिया.

चूंकि बेबी ने अपना धर्म बदलने से मना कर दिया था, इसलिए उस के प्यार में अंधा मुबारक अंसारी अपना धर्म बदल कर ईसाई बन गया. इस के बाद वह मुबारक अंसारी से अजय बोस बन गया. बेबी से शादी करने के बाद भी अजय बोस उर्फ मुबारक अंसारी उस से चोरीछिपे ही मिलता था. शादी के बाद भी इस तरह चोरीछिपे मिलना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए वे अपनी अलग गृहस्थी बसाने के लिए 13 मार्च, 2013 को दोनों अपनेअपने घरों से मुरादाबाद भाग आए और खुशहालपुर में किराए का कमरा ले कर रहने लगे. बेबी अपनी बेटी को मांबाप के पास छोड़ आई थी. उस के गायब होने पर उस के पिता फेंकू पटेल ने मुबारक के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी.

अजय बोस उर्फ मुबारक अंसारी के पास रुखसाना से लिए गए साढ़े 3 लाख रुपए थे. वह उन पैसों को भी अपने साथ लाया था, जिन से वह मुरादाबाद में अपनी डाक्टरी की दुकान खोलना चाहता था. इस के लिए उस ने किसी की मार्फत जम्मू से अपने नाम से बीएएमएस की फरजी डिग्री बनवा ली. अजय बोस उर्फ मुबारक अंसारी ने खुशहालपुर रोड, शाहपुर तिगड़ी गांव में महेंद्र प्रताप सिंह का मकान किराए पर ले लिया. यह मकान रोड के किनारे था. इसी में उस ने बंगाली क्लिनिक खोल ली. क्लिनिक पर उस ने अपने नाम और डिग्री के साथ बड़ा सा बोर्ड लगवाया. यही नहीं, उस ने अपनी हाईस्कूल फेल पत्नी बेबी पटेल का नाम भी डा. बेबी बोस स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के रूप में लिखवा दिया. पत्नी को उस ने कुछ दवाइयों के नाम बता दिए थे, जिन्हें वह महिलाओं को देती थी.

पतिपत्नी दोनों ही डाक्टर के रूप में क्लिनिक पर बैठ कर लोगों की जान से खिलवाड़ करने लगे. मरीजों के देखने की फीस वे ढाई सौ रुपए लेते थे. मरीज को दवाइयां आदि भी वे अपने पास से ही देते थे. धीरेधीरे उन के यहां आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ने लगी. अच्छे डाक्टर के रूप में दोनों की इलाके में पहचान हो गई. वे रोजाना 10 से 15 हजार रुपए कमाने लगे. पैसा आया तो अजय कुमार बोस ने विशनपुर गांव के पास 200 गज का एक प्लौट खरीद लिया. यह प्लौट डा. अजय बोस ने अपने असली नाम मुबारक अंसारी और पत्नी बेबी के नाम से खरीदा था.

तथाकथित डा. अजय बोस की पत्नी बेबी बोस की तबीयत अकसर खराब रहने लगी. इस बीच अजय के कुछ अन्य महिलाओं से नाजायज संबंध बन गए. बेबी को जब इस बात की जानकारी हुई तो वह पति से झगड़ा करने लगी. अजय संबंध तोड़ने के बजाय उन महिलाओं पर पानी की तरह पैसा बहाने लगा. पत्नी इस का विरोध करती तो वह उसे डांटता और झगड़ा करने लगता. इस तरह घर में रोजरोज किचकिच होने लगी.

एक महिला से अजय की नजदीकियां इतनी बढ़ गई थीं कि वह उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर घुमाताफिरता था. बेबी जब उस महिला को पति के साथ देखती तो उस का खून खौल उठता. जाहिर है, कोई भी महिला यह सब कतई नहीं बरदाश्त कर सकती. अजय को जब लगने लगा कि उस की पत्नी उस के प्यार में रोड़ा बन रही है तो वह उसे ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने अकेले ही पत्नी बेबी को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, 15 दिसंबर, 2015 को वह पत्नी को मोटरसाइकिल से ले कर कुशीनगर के लिए चल पड़ा. चलने से पहले उस ने कंपाउंडर से कहा था कि कुशीनगर में उस के यहां एक पारिवारिक समारोह है, जिस से वह हफ्ता बाद लौटेगा, तब तक वह उस के क्लिनिक का खयाल रखेगा. अजय ने सोचा था कि रास्ते में कहीं मौका मिलने पर वह पत्नी को ठिकाने लगा देगा, लेकिन उसे कहीं मौका नहीं मिला. 10 दिनों तक वह अपने घर में रुक कर 26 दिसंबर को पत्नी के साथ मुरादाबाद लौट आया.

इस के बाद पहली फरवरी, 2016 की शाम अजय बोस देर रात घर लौटा तो पत्नी बेबी बोस ने उस से देर से आने की वजह पूछी. वह कुछ नहीं बोला तो उस ने कहा, ‘‘तुम जरूर उसी औरत के साथ मौजमस्ती कर के आ रहे हो.’’

इसी बात पर दोनों के बीच झगड़ा शुरू हुआ तो बढ़ता ही गया. बात मारपीट तक पहुंच गई. मारपीट के दौरान अजय ने अपने लोअर का नाड़ा निकाल कर बेबी के गले में डाल कर कस दिया, जिस से दम घुटने से उस की मौत हो गई. उस ने लाश को पलंग पर लेटा कर चादर ओढ़ा दी. इस के बाद वह पूरी रात लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाता रहा. यही सोचतेसोचते दिन निकल आया. 2 फरवरी, 2016 को रोजाना की तरह तैयार हो कर वह अपने क्लिनिक पर गया. पूरे दिन उस ने मरीज देखे. शाम को क्लिनिक बंद कर के वह अपने कमरे पर आ गया. रात करीब 10 बजे उस ने लाश को कंबल व चादर में लपेट कर गठरी बना ली. उसे मोटरसाइकिल पर साइकिल के ट्यूब से बांध कर एक केन में पैट्रोल ले कर चल पडा़.

करीब 4 किलोमीटर दूर विशनपुर गांव के नजदीक एक गेहूं के खेत में लाश ले कर पहुंचा. वह खेत तौफीक का था. घासफूस इकट्ठा कर के लाश के ऊपर रखा और साथ लाया पैट्रोल डाल कर आग लगा दी. लाश को ठिकाने लगा कर वह घर लौट आया. उस ने सोचा था कि लाश जल कर नष्ट हो जाएगी और पुलिस उस के पास तक नहीं पहुंच सकेगी. लेकिन कुछ ही देर में पैट्रोल जल गया. लाश अधजली रह गई और उसी के सहारे पुलिस उस के पास तक पहुंच गई.

तथाकथित डा. अजय बोस उर्फ मुबारक अंसारी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर पल्सर मोटरसाइकिल बरामद कर ली. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे मुरादाबाद की जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था.

मुबारक अंसारी बेहद शातिर दिमाग था, तभी तो गलत कामों में अपना दिमाग खपाता रहा, अगर वह गलत काम के बजाय अपना दिमाग किसी अच्छे काम में लगाता तो हत्या जैसा अपराध करने की नौबत न आती और उस की जिंदगी शादीशुदा पत्नी सबीना मान के साथ हंसीखुशी से गुजर रही होती. यह सत्य है कि बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है. Moradabad Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: प्यार के लिए दबंगई कहां तक जायज

Love Story: उत्तर प्रदेश के महानगर मुरादाबाद के लाइनपार इलाके के रहने वाले महावीर सिंह सैनी के परिवार में उस की पत्नी शारदा के अलावा एक बेटा अंकित और 3 बेटियां थीं. 2 बेटियों की शादी हो चुकी थी. तीसरे नंबर की बेटी पूनम 9वीं कक्षा में पढ़ रही थी. महावीर राजमिस्त्री था. रोजाना की तरह 10 दिसंबर, 2016 को भी वह अपने काम पर चला गया था. बेटा अंकित ट्यूशन पढ़ने गया था. घर पर शारदा और उस की बेटी पूनम ही थी. सुबह करीब 10 बजे जब शारदा नहाने के लिए बाथरूम में गई तब पूनम घर के काम निपटा रही थी. शारदा को बाथरूम में घुसे 5-10 मिनट ही हुए थे कि उस ने चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुनीं. चीख उस की बेटी पूनम की थी.

चीख सुन कर शारदा घबरा गई. उस ने बड़ी फुरती से कपड़े पहने और बाथरूम से बाहर निकली तो देखा पूनम आग की लपटों से घिरी थी. उस के शरीर पर आग लगी थी. शोर मचाते हुए वह पूनम के कपड़ों की आग बुझाने में लग गई. उस की आवाज सुन कर पड़ोसी भी वहां आ गए. किसी तरह उन्होंने बुझाई. तब तक पूनम काफी झुलस चुकी थी और बेहोश थी. आननफानन में लोग उसे राजकीय जिला चिकित्सालय ले गए. बेटी के शरीर के कपड़ों में लगी आग बुझाने की कोशिश में शारदा के हाथ भी झुलस गए थे.

अस्पताल से इस मामले की सूचना पुलिस को दे दी गई. कुछ ही देर में थाना मझोला के थानाप्रभारी नवरत्न गौतम पुलिस टीम के साथ अस्पताल पहुंच गए. खबर मिलने पर पूनम के पिता महावीर भी अस्पताल आ गए. डाक्टरों के इलाज के बाद पूनम होश में आ गई थी. पूनम के बयान लेने जरूरी थे. इसलिए पुलिस ने इलाके के मजिस्ट्रैट को सूचना दे कर अस्पताल बुलवा लिया.

पुलिस और मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में पूनम ने बताया कि शिवदत्त ने उस के ऊपर केरोसिन डाल कर आग लगाई थी. उस के साथ उस के पिता महीलाल भी थे. शिवदत्त पूनम के घर के पास चामुंडा वाली गली में रहता था. पता चला कि वह पूनम से एकतरफा प्यार करता था.

थानाप्रभारी नवरत्न गौतम ने यह जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दे दी. मामला मुरादाबाद शहर का ही था इसलिए तत्कालीन एसएसपी दिनेशचंद्र दूबे और एएसपी डा. यशवीर सिंह जिला अस्पताल पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने पूनम का इलाज कर रहे डाक्टरों से बात की.

तब तक पूनम की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ने लगी थी. डाक्टरों ने उसे किसी दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दी. पूनम के घर वालों ने उसे दिल्ली ले जाने को कहा तो जिला अस्पताल से पूनम को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के लिए रैफर कर दिया गया.

महावीर की तहरीर पर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली. चूंकि पूनम ने शिवदत्त और उस के पिता पर आरोप लगाया था, इसलिए पुलिस ने शिवदत्त के घर दबिश दी पर उस के घर कोई नहीं मिला. पुलिस संभावित जगहों पर उन्हें तलाश करने लगी, पर दोनों बापबेटों में से कोई भी पुलिस के हत्थे नहीं लगा.

उधर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भरती पूरम की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. उस की हालत बिगड़ती जा रही थी. बर्न विभाग के डाक्टरों की टीम पूनम को बचाने में लगी हुई थी पर उन्हें सफलता नहीं मिल सकी. आखिर 10 दिसंबर की रात को ही पूनम ने दम तोड़ दिया.

अगले दिन जवान बेटी की हृदयविदारक मौत की खबर जब उस के मोहल्ले वालों को मिली तो पूरे मोहल्ले में जैसे मातम छा गया. आरोपी को अभी तक गिरफ्तार न किए जाने से लोग आक्रोशित थे. कहीं लोगों का गुस्सा भड़क न जाए इसलिए उस इलाके में भारी तादाद में पुलिस तैनात कर दी गई.

रविवार होने की वजह से पूनम की लाश का पोस्टमार्टम सोमवार 12 दिसंबर को हुआ. दोपहर बाद उस की लाश दिल्ली से मुरादाबाद लाई गई. पुलिस मोहल्ले के गणमान्य लोगों से बात कर के माहौल को सामान्य बनाए रही. अंतिम संस्कार के समय भी भारी मात्रा में पुलिस थी.

उधर पुलिस की कई टीमें आरोपियों को तलाशने में जुटी हुई थीं. जांच टीमों पर एसएसपी का भारी दबाव था. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई. 12 दिसंबर को पुलिस ने शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया. उस के गिरफ्तार होने के बाद लोगों का गुस्सा शांत हुआ.

थाने ला कर एसएसपी और एएसपी के सामने थानाप्रभारी नवरत्न गौतम ने अभियुक्त से पूछताछ की तो पहले तो वह पुलिस को बेवकूफ बनाने की कोशिश करता रहा पर उस का यह झूठ ज्यादा देर तक पुलिस के सामने नहीं टिक सका. उस ने पूनम को जलाने का अपराध स्वीकार कर उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

जिला मुरादाबाद के लाइनपार इलाके में मंडी समिति गेट के सामने की बस्ती में रहने वाला महावीर सिंह अपने राजगीर के काम से परिवार का पालनपोषण कर रहा था. इसी की कमाई से वह 2 बेटियों की शादी कर चुका था. पूनम 9वीं की पढ़ाई के साथ महिलाओं के कपड़े सिलती थी. घर के पास ही उस ने बुटीक खोल रखा था.

उस के घर के पास ही महीलाल का मकान था. महीलाल का बेटा शिवदत्त बदमाश प्रवृत्ति का था. उस की दोस्ती मंडी समिति के पास स्थित बिजलीघर में तैनात कर्मचारियों के साथ थी. उन्हीं की वजह से उसे ट्रांसफार्मर रखने के लिए बनाए जाने वाले चबूतरों का ठेका मिल जाता था.

चूंकि शिवदत्त का पड़ोसी महावीर राजमिस्त्री था, इसलिए उसी के द्वारा वह चबूतरे बनवा देता था. इस से कुछ पैसे शिवदत्त को बच जाते थे. काम की वजह से शिवदत्त का महावीर के घर आनाजाना शुरू हो गया था. महावीर की छोटी बेटी पूनम पर शिवदत्त की नजर पहले से ही थी. जब भी वह घर से निकलती तो वह उसे ताड़ता रहता था. पर पूनम ने उसे लिफ्ट नहीं दी. जब शिवदत्त का पूनम के घर आनाजाना शुरू हो गया तो उस ने पूनम के नजदीक पहुंचने की कोशिश की.

जब वह पूनम को ज्यादा ही परेशान करने लगा तो एक दिन पूनम ने इस की शिकायत अपनी मां से कर दी. इस के बाद शारदा ने यह बात पति को बताई तो महावीर ने शिवदत्त के पिता महीलाल से शिकायत करने के साथ शिवदत्त से बातचीत बंद कर दी. इस के अलावा उस ने अपने घर आने को भी उसे साफ मना कर दिया.

शिवदत्त दबंग था. महावीर द्वारा उस के पिता से शिकायत करने की बात उसे बहुत बुरी लगी. वह पूरी तरह से दादागिरी पर उतर आया और अब पूनम को खुले रूप से धमकी देने लगा कि वह उस से शादी करे नहीं तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. महावीर ने फिर से महीलाल से शिकायत की. इस बार महीलाल ने अपने बेटे शिवदत्त का ही पक्ष लिया.

महावीर कोई लड़ाईझगड़ा नहीं करना चाहता था. बात बढ़ाने के बजाय वह चुप हो कर बैठ गया. महावीर के रिश्तेदारों और मोहल्ले के कुछ लोगों ने उस से थाने में शिकायत करने का सुझाव दिया पर बेटी की बदनामी को देखते हुए वह थाने नहीं गया. महावीर के चुप होने के बाद शिवदत्त का हौसला और बढ़ गया. वह पूनम को और ज्यादा तंग करने लगा. इतना ही नहीं, वह कई बार पूनम के घर तमंचा ले कर भी पहुंचा.

हर बार वह उस से शादी करने की धमकी देता. घटना से एक दिन पहले भी वह पूनम के घर गया. तमंचा निकाल कर उस ने धमकी दी कि वह शादी के लिए अभी भी मान जाए वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहे. 10 दिसंबर को शिवदत्त फिर से पूनम के घर जा धमका. उस दिन वह अपने साथ एक केन में केरोसिन भी ले गया था. पूनम उस समय घर में झाड़ू लगा रही थी, तभी उस ने उस पर केरोसिन उड़ेल कर आग लगा दी और वहां से भाग गया.

शिवदत्त से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस मामले की जांच कर रही है. तत्कालीन एसएसपी दिनेशचंद्र दूबे का कहना था कि इस मामले में शिवदत्त के अलावा और कोई दोषी पाया गया तो उस के खिलाफ भी कानूनी काररवाई की जाएगी. Love Story

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: पबजी का प्यार

Love Story: जेबा अंडमान के डालीगंज इलाके में रहती थी. उस की उम्र 14 साल थी. वह स्थानीय स्कूल के 8वीं कक्षा में पढ़ती थी. जेबा के पिता सुलेमान अंडमान के एयरपोर्ट पर एजेंट थे. जबकि उस की मां हसीना बानो एक आम घरेलू औरत थीं. बचपन से ही उसे मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने का शौक था. कुछ दिनों पहले मोबाइल प्रेमियों के बीच पबजी नाम का एक नया गेम आया था, जिस में किशोर उम्र के बच्चे खूब रुचि लेतेथे. देखते ही देखते यह गेम दुनिया भर के बच्चों के बीच लोकप्रिय हो गया.

एक दिन जेबा को उस की सहेली फातिमा ने इस गेम के बारे में बताया तो उस ने भी पबजी खेलना शुरू किया. इस गेम में एक बैटलग्राउंड है, जिस में उसे विरोधी खिलाड़ी के मोहरों पर निशाना लगाना पड़ता था. इस गेम की खूबी थी कि एक खिलाड़ी घर पर औनलाइन रह कर सैकडों किलोमीटर दूर दुनिया के किसी भाग में स्थित अजनबी पार्टनर के साथ भी खेल सकता है. हालांकि दोनों पार्टनर अपनेअपने मोबाइल फोन पर दूसरे खिलाड़ी की चाल को देख सकते थे. मजे की बात थी कि वे आपस में अजनबी होते थे.  जेबा को इसे खेलने में दूसरे गेम से कहीं ज्यादा मजा आ रहा था. स्कूल से लौटने के बाद उसे जब भी मौका मिलता, वह पबजी गेम खेलने में मशगूल हो जाती थी.

एक दिन कि बात है. जेबा औनलाइन पबजी गेम खेल रही थी तो इस दौरान उस की मुलाकात एक नए प्रतिद्वंदी खिलाड़ी से हुई. यह प्रतिद्वंदी उस के साथ बड़ी चतुराई से खेल रहा था. गेम के दौरान जेबा ने उसे मात देने की पूरी कोशिश की, मगर काफी दिमाग लड़ाने के बाद भी वह उसे गेम में नहीं हरा सकी. अलबत्ता वह हर बार हार जरूर गई. हालांकि यह बात अलग थी कि हार जाने के बावजूद उसे खेल में बहुत मजा आया था. उस दिन के बाद जब भी जेबा को मौका मिलता, वह उस खिलाड़ी के साथ गेम जरूर खेलती थी. उधर जेबा का प्रतिद्वंद्वी भी उस के औनलाइन होने का इंतजार करता था.

जेबा के पिता सुलेमान उसे बहुत प्यार करते थे. वह उन की एकलौती बेटी थी. दुनिया के हर पिता की तरह सुलेमान भी बेटी की सभी फरमाइश पलक झपकते ही पूरी करने की कोशिश करते. हालांकि पिछले कुछ दिनों से बेटी को हर समय मोबाइल गेम में डूबा हुआ देख कर उन्हें दुख भी होता था पर वह बेटी से ज्यादा डांटडपट इसलिए नहीं करते थे क्योंकि वह अब बड़ी हो रही थी. उन के डांटने का प्रभाव गलत भी पड़ सकता था.

सुलेमान जब तक घर में मौजूद होते, जेबा पढ़ाई करती लेकिन जैसे ही वह किसी काम से घर से बाहर निकलते वह मोबाइलपर गेम खेलने बैठ जाती थी. मां की डांटडपट का उस पर कोई असर नहीं पड़ता था. एक भी दिन पबजी खेले बिना उस के दिल को चैन नहीं मिलता था. धीरेधीरे जेबा को इस खेल की लत पड़ गई. साथ ही वह इस अजनबी खिलाड़ी की मुरीद बन गई. वह रोज उसे हराने का प्रयास करती, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद वह कभीकभार ही उसे हराने में सफल हो पाती थी.

पबजी का प्यार…

एक दिन जब वह गेम खेल रही थी, उस के किशोर मन में इस अजनबी खिलाड़ी के बारे में जानने की उत्सुकता हुई. उस ने मैसेज भेज उस का मोबाइल नंबर पूछ ही लिया. दरअसल, इस औनलाइन गेम में दूसरी तरफ से कौन खेल रहा है, इस का पता पहले खिलाड़ी को तब तक नहीं चल पाता जब तक कि दूसरा खिलाड़ी खुद अपनी असलियत उस पर जाहिर न करे. जेबा के मैसेज का जवाब उस के मोबाइल पर तुरंत ही आ गया. उस खिलाड़ी ने अपना नाम बंटू बताया. उस ने अपना मोबाइल नंबर भी भेजा था.

बंटू का मोबाइल नंबर जानने के बाद जेबा ने उस के मोबाइल पर फोन कर उस से बात की. जेबा से बात कर के बंटू बहुत खुश हुआ. वह यह सोच कर खुशी के मारे फूला नहीं समा रहा था कि लडक़ी खुद ही उस में रुचि लेने लगी थी. इस के अलावा जेबा की आवाज भी बड़ी मीठी थी. बंटू ने भी जेबा को अपने बारे में बताया तो जेबा को पता चला कि वह उस से उम्र में 5 साल बड़ा था. फिर भी दोनों लगभग हमउम्र थे और उन के खयालात भी एकदूसरे से काफी मिलते थे. इस कारण कुछ ही दिनों में उन के बीच दोस्ती हो गई. वे गेम खेलने के साथ साथ फेसबुक फ्रैंड भी बन गए और हर समय एकदूसरे के संपर्क में रहने लगे.

हालांकि जेबा मांबाप की नजरों से बच कर गेम खेलने की कोशिश करती, जिस से उन की नजरों में वह अच्छी बनी रहे. जेबा और बंटू की यह दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. बाली उम्र का यह इश्क समय के साथ परवान चढ़ता जा रहा था. दोनों का पसंदीदा मोबाइल गेम पबजी था, जिसे वे रोज खेला करते थे. गेम खेलने के अलावा वे प्यार की उड़ान में फोन पर दुनिया भर की बातें करते थे.

एक ओर बंटू अपनी प्यार भरी बातों से जेबा का दिल जीतने की कोशिश करता तो दूसरी ओर जेबा भी अपनी मीठीमीठी बातों से उसे खुश रखती थी. बातों ही बातों में उन का वक्त कैसे गुजर जाता, इस का उन्हें पता ही नहीं चलता था. खेलखेल में हुआ प्यार उन्हें बेचैन किए जा रहा था. जिस दिन वे किसी कारण आपस में बात नहीं कर पाते तो उन का दिल तब तक बेचैन रहता, जब तक कि वे अपना हालेदिल एकदूसरे से बयां नहीं कर देते थे. बंटू को लगने लगा था कि जेबा के बिना उस की जिंदगी अधूरी है. कुछ यही हालत जेबा की थी.

अंडमान की प्रेमिका पहुंची बरेली…

समय का कारवां अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा. सोलहवां साल किसी भी लडक़ी के जीवन का सब से सुनहरा दौर होता है. इन दिनों विपरीत सैक्स का आकर्षण उस के सिर पर चढ़ कर बोलता है. 16 साल की हो चुकी जेबा इन दिनों 10वीं में पढ़ रही थी. नाबालिग का प्यार बढ़ता ही जा रहा था, जिस से उस का जी पढ़ाई में जरा भी नहीं लगता था. उसे लगता था किअब बंटू से मिलने के लिए उसे ही कुछ करना होगा.

हालांकि इस दौरान बंटू ने जेबा को अपने बारे में बता दिया कि वह एक मामूली घर का लडक़ा है. घर की माली हालत भी अच्छी नहीं है. उस के पिता सब्जी बेचने का काम करते हैं, जबकि वह खुद शादियों में सजावट करने का काम करता है. एक और भाई है जो कोई प्राइवेट नौकरी करता है.  बंटू की माली हालत के बारे में सुन कर भी जेबा के प्यार में कोई कमी नहीं आई. अपने घर की सारी सुखसुविधाएं छोड़ कर वह हर हाल में उस के साथ रहने को तैयार थी.

इस प्रकार देखते ही देखते 3 साल निकल गए. इन 5 सालों में जेबा और बंटू एकदूसरे के दिल के इतने करीब आ गए कि अब उन्हें एकदूसरे से दूर रहना मुश्किल लगने लगा. जेबा रोज बंटू के साथ अपने भावी जीवन को ले कर तरहतरह के सपने संजोती रहती थी. लेकिन जेबा के सामने एक समस्या यह थी कि एक तो वह अभी नाबालिग थी दूसरे उन की जाति और धर्म अलग थी, इसलिए परिवार की रजामंदी से उन की शादी होने का सवाल ही पैदा नहीं होता था. इसलिए जेबा खामोशी के साथ बंटू से मिलने की योजना बनाने लगी. बंटू कदमकदम पर उस का साथ देने के लिए तैयार था. यानी जेबा बंटू की मोहब्बत परवान चढ़ रही थी.

22 जनवरी, 2023 की आधी रात को जब जेबा के घर के सभी लोग गहरी नींद में थे, वह मौका देख कर घर से निकल गई. सुबह होने पर हसीना बानो की आंखें खुलीं तो बेटी को घर में नहीं पा कर उन के होश उड़ गए. उन्होंने जल्दी से जेबा के मोबाइल नंबर पर काल की तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. यह देख कर वह घबरा गई. जल्दी से हसीना ने अपने पति को जगाया और जेबा के घर से गायब होने के बारे में बताया.

बेटी के घर में नहीं होने की बात सुन कर सुलेमान ने अपना सिर पकड़ लिया. इस के बाद पहले तो उन दोनों ने अपने सभी नातेरिश्तेदारों के घर फोन कर जेबा का पता लगाने की कोशिश की, लेकिन जब कहीं से भी उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो वे स्थानीय अंडमान के पहाड़ गांव थाने में पहुंचे और अपनी बेटी जेबा की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

जेबा का पता लगाने के लिए पहाड़ गांव थाने की महिला एसआई अग्नेश बरथोलोम के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस मे एसआई प्रदीप और एक अन्य एसआई को शामिल किया. जेबा का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगाया तो उस के मोबाइल की लोकेशन अंडमान से हजारों किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के कस्बा फरीदपुर इलाके में मिली. 29 जनवरी को यह पुलिस टीम अंडमान निकोबार से चल कर उत्तर प्रदेश के फरीदपुर कस्बा में पहुंची और वहां की लोकल पुलिस की मदद से जेबा का पता लगाने में जुट गई.

21 वर्षीय बंटू यादव फरीदपुर थाने के परा मोहल्ले में साईं मंदिर के निकट किराए के मकान में रहता है. 28 जनवरी, 2023 को अंडमान से आई पुलिस टीम ने बंटू के घर पर दबिश दी तो पता चला बंटू जेबा के साथ अपनी मौसी के दातागंज स्थित घर में जा कर छिपा है. वहां छापा मारने पर पुलिस को जेबा मिल गई, मगर बंटू यादव को अपने पीछे पुलिस के पडऩे की भनक लग चुकी थी, इसलिए वह डर से फरार हो गया था.

एसआई अग्नेश बरथोलोम की टीम जेबा को अपने कब्जे में ले कर फरीदपुर थाने लौट गई. थाने में भी जेबा ने काफी ऊधम मचाया. दरअसल, वह किसी भी कीमत पर अंडमान निकोबार लौटने के लिए राजी नहीं हो रही थी. वह बंटू के साथ फरीदपुर में रहने की रट लगा रही थी. जब एसआई अग्नेश बरथोलोम ने उसे प्यार से समझाया. उसे उस के मातापिता की तबीयत खराब होने की बात बताई, तब कहीं जा कर वह अपने घर लौटने के लिए तैयार हुई. बाद में स्थानीय पुलिस ने उस के प्रेमी बंटू को भी गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ के दौरान जेबा ने पुलिस को बताया कि 22 जनवरी की रात उस ने पापा की अलमारी से 10 हजार रुपए निकाले और अपनी कुछ सहेलियों की मदद से अंडमान के एयरपोर्ट तक पहुंची थी. वहां से प्लेन पर सवार हो कर वह कोलकाता और वहां से जम्मू तवी ट्रेन पर सवार हो कर बरेली पहुंची थी. बरेली के रेलवे स्टेशन पर बंटू पहले से ही उस का इंतजार कर रहा था. वह उसे अपने घर ले गया था. जहां वे दोनों पिछले एक सप्ताह से पतिपत्नी की तरह रह रहे थे. बंटू के मांबाप ने उसे अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया था.

एसआई अग्नेश बरथोलम की टीम ने अगले दिन जेबा को अंडमान की कोर्ट में पेश कर दिया, जहां कोर्ट के आदेश पर जेबा का मैडिकल कराने के बाद उस के पिता के सुपुर्द कर दिया गया. जेबा अपने घर पहुंच जरूर गई है, लेकिन प्रेमी बंटू यादव की उसे बहुत याद आ रही थी. कथा लिखने तक बंटू भी जेल में बंद था. Love Story

कहानी में कुछ पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं.

Love Story: जब कोई करे एकतरफा प्यार

Love Story: एकतरफा प्यार आमतौर पर सफल नहीं होता, क्योंकि रिश्ते के लिए दोनों तरफ से प्रयास और भावनाएं जरूरी होती हैं, लेकिन सलीम इस बात को नहीं समझता था. वह क्षमा शर्मा को एकतरफा प्यार करता था. एक दिन इसी एकतरफा प्यार में वह अपना आपा खो गया और फिर ऐसा कदम उठा बैठा कि…

उस दिन सलीम बहुत खुश था, इसलिए उस ने अपनी बहन रुखसाना और उस के पति सलीम को भी घर पर दावत के लिए बुलाया हुआ था. बुलंदशहर में स्थित सलीम पीरवाली गली में रहता था. उस की फेमिली में अब्बूअम्मी के अलावा 2 भाई सुभान और समीर व एक बहन रुखसाना थे.

रुखसाना की शादी हापुड़ निवासी सलीम से हो चुकी थी. सलीम अपने बहनोई, जिस का खुद का नाम भी सलीम ही था, के साथ बड़े दोस्ताना ढंग से रहता था. सलीम कबाड़ी का काम करता था, इस के लिए वह कबाड़ का सामान लेने पास के कस्बों में और गावों में जाया करता था, जिस से उसे काफी अच्छी आमदनी हो जाया करती थी. रात में जब जीजासाला साथ में बैठे और पार्टी शबाब पर चढऩे लगी तो जीजा सलीम ने अपने साले सलीम से पूछा, ”साले साहब, आज बहुत शानदार पार्टी रखी है’ इस की कोई खास वजह या फिर कोई बड़ा खजाना हाथ तो नहीं लग गया?’’

”यस जीजा साहब, दिल किया तो पार्टी रख ली. कभीकभी पार्टी भी करनी चाहिए, जिस से आपस में बातें भी हो जाती हैं.’’ साले ने बात का रुख पलटते हुए कहा.

उधर जीजा यह समझ चुका था कि आज कुछ न कुछ बात अवश्य है, मगर साले साहब के दिल की बात उस की जुबान से उगलनी भी तो चाहिए, इसलिए वह बोला, ”देखिए साले साहब, आप ने अपने दिल में काफी गहरी बात छिपा कर रखी हुई है. घर वाले तुम्हारे दिल की बात भले ही न समझ पाएं, मगर मैं तुम्हारा चेहरा देख कर तुम्हारे दिल की बात जान ही लेता हूं.’’ जीजा ने साले का नया पैग बनाते हुए कहा.

”देखिए जीजा साहब, मैं आप से अपने दिल को कोई बात छिपाता भी तो नहीं हूं, इसलिए आप को अंदाजा लगाना आसान हो जाता है. अच्छा तो जीजा साहब, बताइए कि आज मेरे दिल में ऐसी कौन सी बात है, जो मैं ने अभी तक छिपा रखी है.’’ सलीम ने गिलास से एक लंबा घूंट लगाते हुए कहा.

मृतका क्षमा शर्मा का भाई रामबाबू शर्माः देर रात तक बहन घर नहीं लौटी तो थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी

”बात और दूसरी क्या हो सकती है. तुम्हारी महबूबा है न, क्षमा नाम ही है न उस का, उस से प्रेम की शुरुआत हो चुकी होगी अब तुम्हारी. देखो, उस का नाम तुम्हीं ने मुझे उस दिन बताया भी था. अब बताओ, शादी कब करने वाले हो तुम अपनी प्रेमिका से?’’ जीजा ने एक बड़ा सिप गले के अंदर लेते हुए कहा.

सलीम ने एक और गहरा राज अपने मन में छिपाते हुए कहा, ”जीजा साहब, आप फिर भी सही बात तक नहीं पहुंच पाए हो. असल बात क्षमा से ही संबंधित तो है पर कुछ और है, इसलिए अब मैं ने अपना एक अंतिम फैसला भी कर लिया है. आप असल में मेरे जीजा साहब हो, पर मैं आप को अपने दोस्त से भी बढ़ कर मानता हूं.’’

”अब तो पानी सिर के ऊपर ही आ गया है,’’ सलीम ने कहा तो उस के जीजा की जिज्ञासा और बढ़ गई. वह बोला, ”देखिए साले साहब, अब बात को ज्यादा घुमाइएगा मत, क्या उन्हें मुझ पर भरोसा नहीं रहा? मैं तुम्हारे लिए किसी भी हद तक जा सकता हूं. तुम्हारी खुशी ही मेरे लिए सब कुछ है. इसलिए अब सीधेसीधे बताइए, तुम्हारे दिल में ऐसी क्या बात है जो तुम ने मुझ से भी छिपा कर रखी हुई है.’’

”जीजा साहब, मुझे सचमुच आप से यही उम्मीद भी थी कि आप मेरा साथ जरूर देंगे. आप को मैं ने पहले बताया था कि मैं क्षमा से बेइंतहा प्यार करता हूं. मुझे पहलेपहले ऐसा लगा भी था, लेकिन अब वह न तो मुझे देखती है, न मेरे मैसेज का उत्तर देती है और न ही मुझ से बात करती है.

मुझे ऐसा लग रहा है कि उस की जिंदगी में शायद कोई और युवक आ गया है, जिस के लिए वह अब मुझ से किनारा करने लग गई है.

”अब आप ही बताएं जीजा साहब कि भला मैं यह सब कैसे बरदाश्त कर सकता हूं.’’ सलीम अब यह सब कहतेकहते रुक गया था, क्योंकि उस की आंखों में आंसू आ गए थे.

”साले साहब, अब तुम मुझे बताओ कि तुम्हारा इरादा क्या है? क्या करना चाहते हो?’’ जीजा ने नशे की खुमार में कहा.

”जीजा साहब, क्षमा से मैं अब आखिरी बार मिल कर अपने दिल की बात कह कर उसे अपना बना लेना चाहता हूं.’’ सलीम कबाड़ी ने कहा.

”देखो सलीम, प्यार तो दोनों तरफ से होता है. वैसे भी हमारा और उस का धर्म एकदम विपरीत है. यदि वह तुम्हारा प्यार अपनाने से इंकार कर देती है तो बेहतर यही होगा कि तुम उस का खयाल ही अपने दिल से निकाल दो. हमारे समाज में भी तो तुम्हें कई अच्छे रिश्ते मिल सकते हैं,’’ जीजा ने साले सलीम को समझाते हुए कहा.

”जीजा साहब, मैं ने क्षमा से दिल से मोहब्बत की है. मैं उस का इंकार सहन नहीं कर सकता, अगर कुछ हो गया तो आप मेरी मदद करोगे न!’’ साले ने अपने जीजा को हाथ से पकड़ते हुए विनती करते हुए कहा.

”अब तुम मेरे साले भी हो और मेरे दोस्त भी. मैं हर परिस्थिति में तुम्हारे साथ रहूंगा,’’ जीजा ने अपने साले की हथेलियों को मसलते हुए कहा.

दूसरे दिन 27 नवंबर, 2025 की तारीख थी. अपनी योजना के अनुसार, सलीम कबाड़ी ने शाम को 6 बजे क्षमा को फोन किया और आखिरी बार मिलने के लिए बुलाया. क्षमा ने सोचा कि वह सलीम को किसी तरह समझा भी देगी कि वह उस का खयाल अपने दिल से निकाल दे. क्षमा पढ़ीलिखी समझदार थी, उस ने सोचा कि समझाने से तो बुरे से बुरा इंसान भी समझ जाता है. क्षमा ने भी यही सोचा कि घर में अगर कुछ बताऊंगी तो घर वाले सभी सलीम की जान के दुश्मन बन जाएंगे. यदि बात समझाबुझा कर हल कर ली जाए तो अच्छा रहेगा.

इसीलिए क्षमा सलीम के बताई जगह पर उस से मिलने अकेले चली गई. सलीम क्षमा को ले कर उस के गांव नैथला हसनपुर से 3 किलोमीटर दूर वलीपुर नहर के पुल पर जा पहुंचा.

”बोलो सलीम, मुझे यहां पर अकेले क्यों बुलाया है?’’ क्षमा ने पूछा.

”क्षमा, मैं तुम से बेइंतहा मोहब्बत करता हूं. पिछले कुछ दिनों से तुम न मेरे मैसेज का जवाब देती हो, न मुझ से मिलती हो, न मुझ से बात करती हो. यह बात बिलकुल भी ठीक नहीं है.’’ संलीम ने कहा.

”देखो सलीम, तुम हमारे घर कबाड़ खरीदने आते थे. तुम ने एक दिन मुझ से मेरा मोबाइल नंबर मांगा, मैं ने दे दिया. उस के बाद तुम सुबहशाम उलटेसीधे मैसेज भेजने लगे. यदि मेरे घर वाले देख लेते तो मैं कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहती.

”जहां तक प्यार का संबंध है, तुम मुझ से प्यार करते हो, लेकिन मैं तुम से प्यार नहीं करती, न ही कभी कर सकती हूं. बेहतर होगा कि आज के बाद तुम मेरा पीछा करना छोड़ दो. इसी में तुम्हारी भलाई है,’’ क्षमा ने उसे समझाते हुए कहा.

”क्षमा, मैं तुम्हें बेवकूफ नहीं बना रहा हूं. जब मैं ने तुम को देखा, तुम से मिला, तुम से मेरी बातचीत हुई, तब मेरे दिल के अंदर तक जो हलचल हुई थी, उस से मुझे यह महसूस हुआ कि मोहब्बत क्या होती है. इसीलिए मैं तुम से अपने से ज्यादा प्यार करने लगा हूं. मैं अब तुम से शादी करना चाहता हूं. मैं तुम्हारे प्यार के लिए अपने को एकदम बदल लूंगा. बस, तुम हां कर दो.’’ कहते हुए सलीम ने क्षमा का हाथ पकड़ लिया.

यह सुन कर क्षमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था. वह उस का हाथ झटक कर गुस्से से बोली, ”सलीम, तू अपनी औकात में रह. अभी तक तो मैं तेरे साथ इज्जत से पेश आ रही थी, लेकिन तुम तो अब न जाने क्याक्या बकने लगे हो. आज के बाद यदि तुम कभी भी मेरे रास्ते में आए तो इस का परिणाम बहुत बुरा होगा.’’ यह कह कर क्षमा जैसे ही घर जाने के लिए पलटी तो उसी क्षण सलीम ने अपनी कमर में पहले से ही खोंसा हुआ चाकू निकाला और एक ही वार में उस ने क्षमा की गरदन को रेत कर वहां से फरार हो गया.

रोतेबिलखते मृतका क्षमा शर्मा के घर वाले तथा नीचे बाएं -चचेरा भाई अमित शर्मा

27 नवंबर, 2025 की रात तक भी जब क्षमा शर्मा घर नहीं लौटी तो उस के बड़े भाई रामबाबू शर्मा ने बुलंदशहर के चोला थाने में उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी. इधर पुलिस क्षमा को ढूढ रही थी तो दूसरी तरफ उस के फेमिली वाले उसे गांव से ले कर नातेरिश्तेदारों और सहेलियों के घर ढूंढने में दिनरात जुटे थे. किसी की समझ में यह नहीं आ पा रहा था कि रातोंरात क्षमा अचानक कहां गायब हो गई.

उस के फेमिली वाले किसी अनहोनी की आशंका से भी काफी डरे हुए थे. वह बारबार क्षमा को फोन कर रहे थे, लेकिन क्षमा का फोन बंद जा रहा था. उन्होंने क्षमा को हरसंभावित जगह, दोस्तों और रिश्तेदारियों में जा कर तलाश किया, परंतु क्षमा का कोई सुराग नहीं मिला. उधर बुलंदशहर कोतवाली नगर में धर्मेंद्र सिंह राठौर पहली दिसंबर, 2025 को अपने औफिस में बैठे ही थे कि तभी उन के मोबाइल पर किसी का फोन आ गया.

”कोतवाल साहब, मैं सुबहसुबह मौर्निंग वाक पर निकला था तो मुझे वलीपुरा नहर में एक शव तैरता हुआ दिखाई दे रहा है. कृपया आप यहां पर जल्दी आ कर मामले की जांच करें. मैं आप लोगों के आने तक यहीं पर खड़ा हूं.’’

यह सूचना मिलते ही कोतवाल धर्मेंद्र सिंह राठौर कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए और उन्होंने शव को नहर से बाहर निकाला. वह किसी युवती का था, जिस की उम्र करीब 20 से 25 वर्ष थी. वह बैंगनी रंग की हुडïडी, फिरोजी रंग का कुरता, फिरोजी रंग की सलवार, हलके बैंगनी रंग के जूते पहने हुए थी. उस के बाएं हाथ में कलावा और दाहिने हाथ में सफेद रंग की चूडिय़ां थीं. वहां मौजूद लोगों से पुलिस ने शव की शिनाख्त करने की कोशिश की, लेकिन वहां पर कोई भी शव की शिनाख्त नहीं कर सका.

इस के बाद कोतवाल धर्मेंद्र सिंह राठौर ने शव को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल बुलंदशहर भेज दिया और इस की जानकारी अपने उच्च अधिकारियों को भेज दी. इस के बाद कोतवाली पुलिस ने अज्ञात शव मिलने की जानकारी अपने आसपास के पुलिस स्टेशनों को देने के साथसाथ शव के हुलिया सहित इस की सूचना अपने प्रदेश और अन्य नजदीकी प्रदेशों को भी सूचित कर दिया.

इधर जब अज्ञात युवती का शव मिलने की सूचना चोला पुलिस को फोटो सहित मिली तो इंसपेक्टर बलराम सिंह सेंगर ने क्षमा शर्मा के फेमिली वालों को थाने पर बुला लिया. फेमिली वालों ने जब शव के फोटो और कपड़े देखे तो उन्होंने उस की शिनाख्त क्षमा शर्मा के रूप में कर दी. 2 दिसंबर, 2025 मंगलवार के दिन जब थाना चोला पुलिस क्षमा के शव को ले कर उन के गांव नैया हसनपुर पहुंची तो फेमिली वालों और ग्रामीणों ने शव को लेने से इंकार कर दिया. वे सब लोग पहले आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई की मांग को ले कर अड़े रहे.

सभी लोग पुलिस प्रशासन और आरोपियों के खिलाफ नारे लगाने लगे थे. हंगामे और तनाव की सूचना मिलने पर सीओ (सिकंदराबाद) भास्कर कुमार मिश्रा मौके पर पहुंच गए. सीओ भास्कर कुमार मिश्रा ने ग्रामीणों और मृतका क्षमा शर्मा के फेमिली वालों को उचित काररवाई करने का पूरापूरा आश्वासन दिया, जिस के बाद उन्होंने क्षमा का शव ले कर उस का अंतिम संस्कार किया. यह मामला काफी संवेदनशील व 2 समुदायों से जुड़ा था, जिस की वजह से पूरे गांव नैथला हसनपुर व आसपास के इलाकों में काफी तनाव का माहौल उत्पन्न हो गया था.

इसलिए बुलंदशहर पुलिस ने किसी भी अप्रिय घटना या अनहोनी से निपटने के लिए गांव नैथला हसनपुर में अतिरिक्त पुलिस बल बुला लिया. पुलिस अधिकारी वहां पर बारबार सभी ग्रामीणों और मृतका के परिजनों से शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील कर रहे थे. उसी दिन 2 दिसंबर, 2025 को मृतका क्षमा शर्मा के बड़े भाई रामबाबू शर्मा ने एक लिखित तहरीर जनपद बुलंदशहर के थाना चोला में दी, जिस में उन्होंने आरोप लगाया कि बुलंदशहर की ही पीरवाली गली निवासी सलीम कबाड़ खरीदने उन के घर पर अकसर आया करता था. सलीम कबाड़ी ने अपने अब्बू, भाइयों, बहन व बहनोई के साथ उस की बहन क्षमा शर्मा की सुनियोजित ढंग से हत्या कर दी थी.

रामबाबू शर्मा की लिखित तहरीर पर सलीम कबाड़ी और उस के परिजनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. परिजनों की तहरीर के आधार पर थाना पुलिस अब अभियुक्त सलीम के पीछे पड़ गई थी. मुखबिर की निशानदेही पर मुख्य अभियुक्त सलीम को 3 दिसंबर, 2025 की देर रात पुलिस ने चोला चौराहे से गिरफ्तार कर लिया. अभियुक्त सलीम से जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस ने हत्या में प्रयुक्त हथियार एक स्थान पर छिपा कर रखा हुआ है.

पुलिस टीम जब आरोपी सलीम को ले कर उस स्थान पर पहुंची तो उस ने हथियार निकालने के बहाने उस स्थान से एक तमंचा निकाल लिया और पुलिस पर अंधाधुंध फायर करने लगा और वहां से भागने का प्रयास करने लगा. सलीम के तमंचे की फायरिंग के कारण वहां पर मौजूद पुलिस कांस्टेबल अंकुर के दाहिने हाथ में गोली लग जाने के कारण वह बुरी तरह से घायल हो गया. पुलिस की जवाबी फायरिंग में एक गोली सीधे सलीम के पैर पर लग गई, जिस के कारण वह बुरी तरह से घायल हो गया.

पुलिस मुठभेड़ में घायल कबाड़ी सलीम को सहारा देकर ले जाते पुलिसकर्मी

पुलिस टीम तत्काल सलीम को गिरफ्तार कर उसे प्राथमिक उपचार के लिए बुलंदशहर के जिला अस्पताल में ले कर आ गई. पुलिस ने आरोपी सलीम कबाड़ी से अवैध हथियार और हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. इस के साथ ही घटना में प्रयुक्त कपड़े भी बरामद कर लिए. पुलिस पूछताछ में सलीम ने बताया कि वह और क्षमा एकदूसरे से परिचित थे. सलीम उसे पाना चाहता था, क्षमा से प्यार और शादी करना चाहता था, लेकिन क्षमा के इंकार करने पर उसे गुस्सा आ गया, जिस से क्षुब्ध हो कर 27 नवंबर, 2025 की शाम उस ने क्षमा की गला रेत कर हत्या कर दी और शव को वहां पर फेंक कर वहां से भाग गया.

अभियुक्त सलीम कबाड़ी से विस्तृत पूछताछ करने के बाद पुलिस जांच में यह सामने आया कि आरोपी सलीम कबाड़ी का पूरा परिवार इस मामले में शामिल रहा था. पुलिस के पास पुख्ता जानकारी थी कि इस प्रकरण में मुख्य अभियुक्त सलीम कबाड़ी के साथ उस की बहन रुखसाना, रुखसाना का पति सलीम और सलीम कबाड़ी के दोनों भाई सुभान और समीर भी शामिल थे.

5 दिसंबर, 2025 को पुलिस ने सलीम की बहन रुखसाना को गिरफ्तार किया और आवश्यक पूछताछ करने के बाद जेल भेज दिया. उस के बाद 6 दिसंबर, 2025 एक सूचना के आधार पर वांछित अभियुक्तगण सुभान और समीर को वलीपुरा नहर से गंगेरुआ को जाने वाले रास्ते से गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ के बाद दोनों अभियुक्तों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

मृतका क्षमा शर्मा के बड़े भाई रामबाबू शर्मा की तहरीर के आधार पर थाना चोला में सलीम कबाड़ी व अन्य 4 अभियुक्तों के खिलाफ बीएनएस की धारा 87/103(3)/238/61(2) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था. जिन में से एक आरोपी जो सलीम कबाड़ी का बहनोई सलीम शहर व थाना हापुड़ फरार चल रहा था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने के लिए अपनी कई टीमें भी लगा रखी थीं. 10 दिसंबर, 2025 को पुलिस ने उसे बुलंदशहर कलेक्ट्रेट गेट के पास से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ करने के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया. एकतरफा प्यार के कई बार बेहद घातक परिणाम देखने को मिलते हैं. यह प्यार सिर्फ एक तरफ से होता है.

एकतरफा प्यार आप की मेंटल हेल्थ को प्रभावित भी कर सकता है, क्योंकि यह प्यार आप को कभी खुशी नहीं देता है, बल्कि आप केवल इस के कारण दुखी ही होते हैं. जिस के कारण उस व्यक्ति की मेंटल हेल्थ, फिजिकल हेल्थ प्रभावित हो जाती है. ऐसे व्यक्ति खुद पर ध्यान देना एकदम से छोड़ देते हैं. मृतका क्षमा शर्मा के भाई रामबाबू शर्मा ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन का कहना है कि चोला थाने के एसआई मोहम्मद असलम ने मामूली पूछताछ के बाद सलीम को निर्दोष कह कर छोड़ दिया था. यदि उसी दिन सलीम से कड़ी पूछताछ की जाती तो शायद आज हमारी बहन जिंदा होती.

वहीं एसपी ने लापरवाही बरतने के आरोप में एसआई मोहम्मद असलम को निलंबित कर दिया है. उन्होंने कहा कि जो भी इस मामले में दोषी पाए जाएंगे, उन के खिलाफ काररवाई की जाएगी. Love Story

 

 

UP Crime: भाई क्यों बनता है – प्यार का दुश्मन

UP Crime: 20 वर्षीय अनुराधा की खता इतनी थी कि वह फोन पर अपने किसी दोस्त से बात करती थी. केवल इसी बात पर उस के बड़े भाई मनीष ने अपनी मम्मी के साथ मिल कर बहन की हत्या कर दी. यहां सोचने वाली बात यह है कि भाई चाहे किसी भी लड़की से मटरगश्ती करे, लेकिन जब उस की बहन किसी दोस्त से बात भी करे तो भाई उस का दुश्मन क्यों बन जाता है?

बात 16 नवंबर, 2025 की है. उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के परसाजागीर गनेशपुर निवासी मनीष ने छोटी बहन अनुराधा को फोन पर किसी अनजान युवक से बात करते देख लिया था. जिस से वह गुस्से से तमतमा गया. वह बहन पर आगबबूला हो गया. उस ने अनुराधा से कहा, ”तू फोन पर किस से बात कर रही है. यह बात करना बंद कर दे. मैं इस बारे में पहले भी तुझ से कई बार मना कर चुका हूं.’’

अनुराधा – फोन पर बात करना जान पर भारी पड़ा

तभी मनीष की मम्मी निर्मला देवी ने उलाहना दिया, ”मैं ने भी कई बार इस से बात करने से मना किया है, लेकिन यह किसी की बात सुनती ही नहीं है, बल्कि मुझ से झगड़ती है. जो मन में आए, वह करती है. यह तो पूरी तरह अपनी मरजी की मालिक हो गई है.’’

मम्मी की इन बातों ने आग में घी डालने का काम किया. इस से मनीष का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. गुस्सा करने के साथ ही वह अपना आपा खो बैठा और उस ने अनुराधा की बुरी तरह पिटाई कर दी. अत्यधिक पिटाई से अनुराधा बेहोश हो गई. इस में मम्मी ने भी मनीष का साथ दिया. तब मनीष अपनी कार की डिक्की में बेहोश अनुराधा को डाल कर रात के अंधेरे में चल दिया. रास्ते में सुनसान इलाके में उस ने अनुराधा की रस्सी से गला घोंट कर हत्या कर दी. शव को ठिकाने लगाने के लिए ममेरे भाई मुसकान को ननिहाल से अपने साथ ले लिया था.

शव को ठिकाने लगाने के लिए दोनों अयोध्या की ओर कार ले कर निकल गए, लेकिन पुलिया का निर्माण होने के कारण लौट आए. दुबौलिया-विश्वेश्वरगंज होते हुए मनीष गोंडा पहुंचा. वहां नवाबगंज में कार में पेट्रोल भरवाया. बनगांव के पास पीडी बंधा पर सुनसान जगह देख कर मनीष और मुसकान ने अनुराधा की लाश को कार की डिक्की से बाहर निकाला और उस की मौत सुनिश्चित करने के लिए मनीष ने उसे कार से कुचल कर दुर्घटना का रूप देने की कोशिश की.

अपनी सगी बहन को बेदर्दी से मारने के बाद शव को वहीं फेंक कर वे लोग मनकापुर-बभनान-गौरा मार्ग होते हए बस्ती की ओर फरार हो गए. बाद में मनीष ने ममेरे भाई मुसकान को उस के गांव छोड़ दिया और खुद अपने घर वापस आ गया. 17 नवबंर, 2025 को गोंडा पुलिस को थाना तरबगंज के अंतर्गत बनगांव के पास सिकरेटरीपुरवा और कंचनपुर के बीच पीडी बंधा पर सड़क किनारे एक अज्ञात युवती का शव मिला. इस की जानकारी बनगांव के ग्राम प्रधान मंजीत सिंह ने पुलिस को दी थी.

सूचना मिलने पर तरबगंज के एसएचओ कमलाकांत त्रिपाठी पुलिस बल सहित घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल का गहराई से निरीक्षण किया. जिस युवती की लाश मिली थी, उस के हाथ में रस्सी बंधी थी. फील्ड यूनिट, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया गया. मौके से टीमों द्वारा साक्ष्य जुुटाए गए. ग्रामप्रधान की शिकायत पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया.

हत्या के बाद अनुराधा की लाश को इसी कार से ठिकाने लगाया गया था

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस के शरीर व गले पर चोटों के कई निशान मिले तथा मृत्यु का कारण हेमोरेजिक शाक व एंटीमार्टम इंजरी पाया गया. इस पर पुलिस ने थाना तरबगंज में हत्या का मामला दर्ज कर लिया. युवती की शिनाख्त न होने और उस के बारे में कोई सुराग न मिलने पर मामले को ब्लाइंड मर्डर घोषित कर जांच तेज कर दी गई. पुलिस टीमों ने लगातार तकनीकी इनपुट खंगालने और सीसीटीवी फुटेज चैक किए.

आरोपी मनीष – बहन की हत्या का मनीष को जरा भी अफसोस नहीं हुआ

इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए गोंडा के एसपी विनीत जायसवाल ने तरबगंज क्षेत्र के एएसपी राधेश्याम राय के निर्देशन तथा सीओ (तरबगंज) उमेश्वर प्रभात सिंह की अध्यक्षता में एसओजी, सर्विलांस सहित 5 पुलिस टीमों का गठन कर दिया. पुलिस इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए 13 दिन तक जुुटी रही. उस की शिनाख्त कराने के साथ ही उस के हत्यारे की तलाश में जमीनआसमान एक कर दिया, इस के साथ ही अपने मुखबिरों को लगा दिया.

पुलिस टीमों ने लगातार टेक्निकल व मैनुअल इनपुट खंगाले और घटनास्थल के आसपास लगे कई सीसीटीवी चैक किए. पुलिस द्वारा तरबगंज और अयोध्या के सोहवल तक लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली. एक फुटेज में एक सफेद रंग की कार जरूर दिखाई दी, लेकिन नंबर स्पष्ट न होने से कार के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी.

इस बीच पुलिस को पता चला कि जनपद बस्ती परसाजागीर गणेशपुर की एक 20-22 साल की युवती अनुराधा 13 दिन पहले लापता हो गई थी. पुलिस जांंच में पता चला कि इस संबंध में उस के फेमिली वालों ने थाने में कोई सूचना या रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई है. इस पर पुलिस गांव परसाजागीर गणेशपुर जा पहुंची. पुलिस को गांव वालों से जानकारी हुई कि मनीष की बहन अनुराधा कई दिनों से घर से गायब है. वह गांव में किसी को दिखाई नहीं दे रही है.

वहां मनीष कुमार के घर पर ताला लगा था. पुलिस ने गांव वालों से परिवारीजनों के बारे में पूछताछ की. गांव वालों ने बताया कि पिछले कई दिनों से उन के घर पर ताला लगा हुआ है. गांव के लोगों ने बताया कि 16 नवंबर के बाद से अनुराधा को नहीं देखा. ग्रामीणों ने जब अनुराधा की मम्मी निर्मला देवी से अनुराधा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि अनुराधा अपने मामा के घर गई हुई है. इस पर ग्रामीण संतुष्ट हो गए थे.

30 नवंबर को गोंडा पुलिस ने जब मृतका के फोटो निर्मला देवी के पड़ोसियों को दिखाए तो उन्होंने कपड़ोंं के आधार पर उस की शिनाख्त अनुराधा के रूप में की. अनुराधा की हत्या से गांव वाले सन्न रह गए. उन का कहना था कि फेमिली वाले संपन्न व प्रतिष्ठित हैं. इस के बाद पुलिस के अलावा गांव वालों को भी यही शक हो गया कि अनुराधा की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि उस के फेमिली वालों ने ही की है, इसलिए वे फरार हो गए. उन के फोन नंबरों के आधार पर पुलिस उन्हें तलाशने लगी.

पुलिस की यह कोशिश रंग लाई. पुलिस ने मनीष कुमार और उस की मम्मी निर्मला को बस्ती के वाल्टरगंज थाना मोड़ के पास से 30 नवंबर, 2025 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने आरोपी से गांव से 100 किलोमीटर से अधिक दूर आने का कारण पूछा तो मनीष कोई जवाब नहीं दे सका. आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बलेनो कार भी पुलिस ने बरामद कर ली.

मृतका की मम्मी और भाई की गिरफ्तारी के बाद प्रैस कौन्फ्रैंस करते अधिकारी

मांबेटे से अनुराधा के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

इस संबंध में जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के थाना वाल्टरगंज के परसाजागीर गनेशपुर की रहने वाली 20 वर्षीय अनुराधा ग्रैजुएशन कर रही थी. उस की बड़ी बहन की शादी हो चुकी है. अनुराधा के 2 भाई मनीष कुमार और आशीष कुमार हैं. बड़ा भाई आशीष कुमार पुणे में पत्थर का काम करता है, जबकि मनीष घर पर ही रहता है. 16 नवबंर, 2025 को मनीष अपने दोस्तों के साथ गोरखपुर गया था. घर लौटने पर उस ने बहन अनुराधा को किसी अनजान लड़के से मोबाइल पर बात करते देख लिया. उस ने गुस्से से कहा, ”कितनी बार तुझे मना किया कि बात करना बंद कर दे. लेकिन समझाने के बाद भी तू मानती नहीं है.’’

निर्मला देवी: बेटी की हत्या में बेटे मनीष का साथ दिया

मनीष को शक था कि अनुराधा का चालचलन ठीक नहीं है. प्रतिष्ठित परिवार होने के कारण गांव में उन के परिवार की इज्जत थी. मनीष को यह बरदाश्त नहीं हुआ. मनीष ने उस लड़के के बारे में पूछा, जिस से वह फोन पर बातें कर रही थी. इसी बात पर मनीष की अनुराधा से बहस होने लगी. इस के बाद मनीष से उस की मम्मी निर्मला देवी ने भी अनुराधा की शिकायत की. इस से बहन के प्रति मनीष का गुस्सा और बढ़ गया. उस समय तो मनीष ने किसी तरह अपने गुस्से पर काबू कर लिया.

देर रात भी मनीष का गुस्सा शांत नहीं हुआ. मन ही मन उस के अंदर उथलपुथल मचती रही. सोचने लगा कि यदि अनुराधा ने कोई गलत कदम उठा लिया तो फेमिली वाले मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि उन के परिवार की गांव में बड़ी प्रतिष्ठा थी. मनीष ने अनुराधा से जब उस का मोबाइल मांगा तो उस ने मोबाइल फोन देने से साफ इंकार कर दिया. इसी बात को ले कर रात में मनीष का अनुराधा से फिर झगड़ा हुआ. तभी मनीष ने अनुराधा के हाथ से मोबाइल छीन कर तोड़ दिया.

इस पर अनुराधा भाई मनीष पर बिफर पड़ी. दोनों में एक बार फिर तकरार होने लगी. बात बढ़ गई और मनीष ने अनुराधा की बुरी तरह पिटाई कर दी. ज्यादा पिटाई के चलते अनुराधा बेहोश हो गई. तब बिना आगापीछा सोचे मनीष ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया. उस ने अनुराधा को जान से मारने का प्लान बनाया ताकि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. फिर मनीष ने अपनी मम्मी निर्मला देवी से रस्सी मंगा कर मम्मी के साथ मिल कर बहन के हाथपैर रस्सी से बांध दिए. इस के बाद अनुराधा को बोरे में भर कर अपनी कार की डिक्की में डाल दिया. मम्मी को साथ ले कर मनीष अपने मामा के घर की ओर चल पड़ा. मनीष के मामा का गांव थाना दुबौलिया क्षेत्र में था.

मामा के गांव पहुंचने से पहले एक सुनसान जगह पर कार रोक कर मनीष ने रस्सी से अनुराधा का गला घोंट दिया. फिर मम्मी को मामा के घर छोड़ कर ममेरे भाई मुसकान को कार में साथ ले कर अकबरपुर टांडा की तरफ निकल पड़ा और तरबगंज के पीडी बांध मार्ग पर अनुराधा के शव को डिक्की से निकाल कर सड़क पर फेंका, फिर कार से कुचल दिया. मनकापुर-बभनान-गौरा होते हुए घर लौट गया.

बहन की हत्या का उसे कोई अफसोस नहीं था. पुलिस ने अनुराधा की हत्यारी मां निर्मला देवी व सगे भाई मनीष को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. तीसरे आरोपी मनीष के ममेरे भाई मुसकान की गिरफ्तारी के लिए कई जगहों पर दबिश डाली गई, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस हिरासत में आरोपी

इस ब्लाइंड मर्डर केस का परदाफाश कर आरोपी मनीष व उस की मां को गिरफ्तार करने वाली टीम में इंसपेक्टर (तरबगंज) कमलाकांत त्रिपाठी, एसओजी प्रभारी गौरव सिंह, एडिशनल इंसपेक्टर थाना तरबगंज राजकुमार यादव, एसआई उपेंद्र यादव, एसओजी के रणवीर, अरुण यादव, राकेश सिंह, राशिद अली, अमित पाठक, इमरान अली, कांस्टेबल अंकित राय प्रमोद वर्मा व शशिबाला शामिल थे. एसपी (गोंडा) विनीत जायसवाल ने इस ब्लाइंड मर्डर का परदाफाश करने गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम तथा एसओजी टीम को 25 हजार रुपए का पुरस्कार भी दिया है.

अपनी बहन का गला घोंटते समय भाई को जरा भी मलाल नहीं हुआ. वह जल्लाद बन गया. मनीष और उस की मम्मी ने यह भी पता करने की कोशिश नहीं की कि अनुराधा किस युवक से बात करती है और वह युवक कौन है? अपनी कोख से जन्म देने वाली निर्मला ने भी उस की हत्या में अहम भूमिका निभाई, यदि वह चाहती तो अनुराधा की जान बच सकती थी. प्रश्न उठता है कि कब तक लोग कानून को अपने हाथ में लेते रहेंगे? कब तक निर्दोष लोग इस प्रकार अपनी जान से हाथ धोते रहेंगे? गांव के बुजुर्गों का कहना है कि मोबाइल कल्चर इस के लिए जिम्मेदार है, जिस ने एक हंसतेखेलते परिवार को उजाड़ दिया. UP Crime

 

Gujarat News: 2 निकाह के बाद भी करिश्मा रही अकेली

Gujarat News: अलगअलग धर्मों के होने की वजह से राजू शिंदे और करिश्मा भले ही विवाह नहीं कर सके, लेकिन 18 साल बाद नियति ने उन्हें जिंदगी के उस मोड़ पर मिलवा दिया, जब दोनों ही अपनेअपने जीवनसाथी को तलाक दे चुके थे. समय की नजाकत को देखते हुए दोनों ने निकाह तो कर लिया, लेकिन इस के बाद ऐसा क्या हुआ कि 2-2 निकाह करने के बावजूद करिश्मा अकेली ही रह गई.

महाराष्ट्र के शिरडी का रहने वाला राजू शिंदे पिछले 16 सालों से गुजरात के शहर अहमदाबाद के नरोडा में रहता था. वह अपने पेरेंट्स की भले ही इकलौती संतान था, लेकिन कोई खास पढ़ालिखा नहीं था, इसलिए इलास्टिक की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस समय राजू की उम्र यही कोई 25-26 साल रही होगी. फादर भी कमाते थे, इसलिए उसे किसी बात की चिंता नहीं थी. वह कमाता था और बनठन कर रहता था. खुद की कमाई खुद पर ही खर्च करता था. खानापीना घर से मिलता ही था, इसलिए किसी बात की फिक्र नहीं थी.

उस के पास सब कुछ था, लेकिन कोई ऐसा नहीं था, जो उसे प्यार करे. उसे किसी एक ऐसी लड़की की तलाश थी, जो उसे चाहे. वह जिस कंपनी में नौकरी करता था, उसी कंपनी में करिश्मा नाम की एक लड़की काम करती थी. राजू और करिश्मा एक साथ काम करते थे, इसलिए दोनों लगभग रोज ही मिलते थे और दोनों के बीच बातचीत भी होती रहती थी. इस तरह लगातार मिलने और बातचीत होने से जल्दी ही दोनों में दोस्ती हो गई. दोनों में दोस्ती भी हो गई. फिर वे एकदूसरे को चाहने भी लगे थे, पर उन का विवाह नहीं हो सका.

इस का कारण यह था कि दोनों ही अलगअलग धर्मों से थे. बहरहाल, बात विवाह तक पहुंच पाती, उस से पहले ही उसी दौरान साल 2006 में राजू शिंदे का विवाह गीता राठौड़ के साथ हो गया था. इस तरह करिश्मा राजू की सिर्फ दोस्त बन कर ही रह गई थी. राजू शिंदे की शादी होने के 3 साल बाद सन 2009 में करिश्मा का भी निकाह अजीज खान के साथ हो गया था. अजीज खान भी अहमदाबाद के नरोडा में ही रहता था और सोलर पैनल लगाने का काम करता था. शादी के साल भर बाद ही करिश्मा को बेटा हुआ तो उस ने नौकरी छोड़ दी और घर तथा बेटे को संभालने लगी. इस के बाद करिश्मा को 2 बच्चे हुए.

इस तरह वह 3 बच्चों की मां बन गई थी. दूसरी ओर राजू भी अपनी पत्नी गीता के साथ मजे से वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहा था. लेकिन बच्चे पैदा होने के बाद करिश्मा और अजीज खान में अकसर झगड़ा होने लगा था. इस की वजह यह थी कि अजीज शराब पीने लगा था. वह रोजाना शराब पी कर आता. करिश्मा उसे शराब पीने से रोकती, जिस की वजह से दोनों के बीच झगड़ा होता.

करिश्मा: 2 शादियों के बाद भी अकेली रह गई

पति की इस आदत से करिश्मा परेशान हो चुकी थी. आखिर पति की नशे की लत और रोजरोज के झगड़े से तंग आ कर करिश्मा ने अजीज से तलाक ले लिया. इस के बाद वह वटवा में किराए का मकान ले कर अकेली ही रहने लगी थी. संयोग देखो कि शादी के 18 सालों बाद साल 2024 में किसी कारणवश राजू और गीता के बीच भी तलाक हो गया था. पत्नी से तलाक होने के बाद राजू नरोडा में ही अकेला रहता था.

शादी के बाद राजू शिंदे और करिश्मा की मुलाकात नहीं हुई थी, लेकिन तलाक के बाद अपना घर चलाने तथा अपना और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए करिश्मा सालों पहले जिस इलास्टिक कंपनी में नौकरी करती थी, वहीं वह फिर से नौकरी करने लगी थी.

दूसरी ओर राजू साल 2016 से गांधीनगर के माणसा स्थित स्टेरीकोट हेल्थकेयर कंपनी में फिटर के रूप में नौकरी करने लगा था, लेकिन एक्स्ट्रा पैसे कमाने के लिए वह छुट्टियों के दिन या रात में अन्य कंपनियों में एक्स्ट्रा काम करने जाता था. इसी सिलसिले में एक बार वह उसी पुरानी इलास्टिक कंपनी में भी एक्स्ट्रा काम करने गया तो इत्तफाक से करिश्मा ने वहां राजू को काम करते देख लिया.

दोबारा जाग उठा प्यार

करिश्मा उस से मिलने उस के पास पहुंच गई. सालों बाद करिश्मा को देख कर राजू चौंका. लगभग डेढ़ दशक यानी 15 सालों बाद दोनों एकदूसरे से मिले थे. पुरानी यादें ताजी हुईं. शादी हुई या नहीं, कितने बच्चे हैं, इसी तरह की बातें शुरू हुईं. इन्हीं बातों में करिश्मा ने बताया कि उस का तलाक हो गया है और वह अपने बच्चों के साथ अकेली ही रहती है. घर चलाने के लिए वह फिर से यहां नौकरी कर रही है.

जवाब में राजू ने भी अपनी आपबीती सुनाई कि उस का भी तलाक हो गया है और वह भी अकेला रहता है. इस के बाद उस ने कहा, ”तू भी अकेली और मैं भी अकेला, बोल करेगी मुझ से शादी?’’

उस समय करिश्मा कुछ नहीं बोली, सिर्फ हंस कर रह गई थी. लेकिन दोनों के बीच फोन नंबरों का लेनदेन हो गया था, जिस से दोनों में बातें होने लगी थीं. धीरेधीरे यह बातचीत लंबी होती गई. इसी बातचीत के दौरान एक दिन करिश्मा ने राजू से कहा, ”यार राजू, तुम मेरे लिए कोई दूसरी नौकरी ढूंढ दो. यहां जो सैलरी मिलती है, उस में घर बड़ी मुश्किल से चलता है. 3 बच्चों का पेट बड़ी मुश्किल से भर पाती हूं.’’

इस पर राजू ने उसे एक व्यावहारिक रास्ता सुझाते हुए कहा, ”तू फिर से किसी से शादी कर के उसी के साथ सेट हो जा.’’

”तुम्हारी बात तो सही है राजू, लेकिन 3 बच्चों की मां से अब कौन शादी करेगा?’’ करिश्मा ने कहा. राजू को शायद ऐसे ही मौके की तलाश थी. क्योंकि शरीर की आग बुझाने के लिए उसे भी एक औरत की तलाश थी. करिश्मा ने जब कहा कि उस से कौन शादी करेगा तो जवाब में उस ने अपने दिल की बात कह दी, ”मैं करूंगा तुम से शादी. बोलो, करोगी मुझ से शादी?’’

राजू शिंदे की बात सुन कर करिश्मा को अपनी जिंदगी फिर से संवरती नजर आई. इस के बाद दोनों के बीच घंटों बातें होने लगीं. यही नहीं, दोनों नए प्रेमियों की तरह बाहर मिलने भी लगे. इस तरह बाहर मिलने में मजा नहीं आ रहा था, इसलिए साथ रहने के लिए साल 2023 में राजू ने करिश्मा से एक मसजिद में निकाह कर लिया.

निकाह के बाद राजू करिश्मा के साथ उस के वटवा वाले घर में रहने लगा. इस तरह दोनों ने एक बार फिर से नई जिंदगी शुरू की. राजू ने घर को व्यवस्थित करने यानी गृहस्थी बसाने के लिए लगभग 50 हजार रुपए का सामान भी खरीदा. लगभग 2 सालों तक राजू और करिश्मा का वैवाहिक जीवन हंसीखुशी से बीता, लेकिन धीरेधीरे दोनों के बीच विवाद होने लगा. राजू सुबह 5 बजे नौकरी के लिए निकल जाता था, इसलिए शुरूशुरू में वह बिना टिफिन लिए ही जाता था. इस के लिए वह करिश्मा से कुछ कहता भी नहीं था.

काफी दिनों बाद एक दिन राजू ने करिश्मा से कहा, ”हमारा निकाह हो गया है और हम पतिपत्नी हो गए हैं. पत्नी के होते हुए भी मुझे रोजाना बाहर का खाना खाना पड़ता है. तुम मुझे टिफिन बना कर दे दिया करो.’’

करिश्मा ने टिफिन बना कर देने से मना करते हुए कहा, ”तुम अपनी नौकरी पर 5 बजे जाते हो. तुम्हारा टिफिन बनाने के लिए मुझे सुबह 4 बजे उठ कर खाना बनाना होगा. मुझे घर भी संभालना होता है और बच्चों को भी देखना पड़ता है. इस के अलावा मुझे भी नौकरी पर जाना होता है. इतनी जल्दी उठ कर खाना बनाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है.’’

टिफिन को ले कर शुरू हुई बातचीत घर के अन्य कामों तक फैल गई. धीरेधीरे दोनों के बीच झगड़े होने लगे. झगड़ों की वजह से राजू को शक होने लगा कि करिश्मा का जरूर किसी और के साथ अफेयर चल रहा है, इसीलिए वह उस में पहले जैसी दिलचस्पी नहीं ले रही है. राजू इस बात को ले कर भी करिश्मा को ताने ही नहीं मारने लगा था, बल्कि झगडऩे भी लगा था.

दूसरी ओर करिश्मा राजू के शक्की स्वभाव से तंग आ कर उसे बिना बताए बाहर आनेजाने लगी थी. इस की वजह राजू को लगने लगा था कि करिश्मा अपने प्रेमी से मिलने जाती है. करिश्मा राजू से जब कुछ ज्यादा ही परेशान हो गई तो एक दिन उस ने राजू से साफसाफ कह दिया कि जब उसे उस पर विश्वास ही नहीं रह गया है तो वह कहीं और रहने चला जाए, अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती.

उसी दौरान एक घटना और घट गई. करिश्मा के पूर्व पति अजीज की अम्मी की मौत हो गई. इस बात की जानकारी करिश्मा को हुई तो पुराने रिश्ते के नाते वह अजीज के घर शोक व्यक्त करने गई. वहां करिश्मा और अजीज के बीच बातचीत हुई तो पुराने संबंध फिर से ताजे हो गए. राजू से परेशान करिश्मा ने अजीज से कहा कि अगर उसे कोई आपत्ति न हो तो वह फिर से उस के साथ रहना चाहती है, ताकि बच्चों का भविष्य संवारा जा सके.

अजीज को भी करिश्मा और बच्चों की बहुत याद आती थी. इसलिए पुराने झगड़े भुला कर उस ने करिश्मा के साथ नई जिंदगी की शुरुआत करने का फैसला किया. चूंकि अब वह अजीज खान के साथ फिर से निकाह करने जा रही थी, इसलिए उस ने राजू को घर से निकल जाने के लिए कह दिया था.

दूसरी ओर राजू किसी भी कीमत पर करिश्मा को छोडऩे के लिए तैयार नहीं था. अब वह करिश्मा के साथ ही रहना चाहता था, क्योंकि यहां उसे पत्नी का सुख मिलने के साथसाथ रहने के लिए घर भी मिला हुआ था, इसलिए उस ने करिश्मा से बहाना बनाया कि उस ने उस के घर के लिए जो 50 हजार रुपए का सामान खरीदा है, उस के वे सारे रुपए वापस कर दे तो वह उस का घर छोड़ कर चला जाएगा.

राजू को लग रहा था कि करिश्मा इतने रुपए कहां से लाएगी? न वह उस के रुपए वापस कर पाएगी, न उसे घर छोड़ कर जाना पड़ेगा. लेकिन राजू को तब झटका लगा, जब अजीज ने करिश्मा को 50 हजार रुपए दे दिए और उस ने वे रुपए ला कर राजू के मुंह पर दे मारे. उस के बाद वह बोली, ”अब चुपचाप यहां से चला जा और अब कभी मुझे अपना मुंह मत दिखाना.’’

रुपए मिलने के बाद राजू करिश्मा के घर से तो निकल गया, लेकिन उसे करिश्मा और उस के पति अजीज पर बहुत गुस्सा आया. उस का अहंकार (ईगो) बुरी तरह घायल हो गया था. उसे लगा कि यह अजीज उस के और करिश्मा के बीच कबाब में हड्ïडी बन गया है. अगर यह बीच में न आया होता तो करिश्मा उसी की होती, अगर करिश्मा को अपनी बनाए रखना है तो इस अजीज को बीच से हटाना होगा. दूसरी ओर करिश्मा से तलाक होने के बाद अजीज अपने बड़े भाई शब्बीर के साथ रहता था, क्योंकि उसी बीच उस की अम्मी की भी मौत हो गई थी. उन दिनों करिश्मा राजू के साथ रह रही थी.

मातम में बदली मोहब्बत

अजीज की अम्मी की मौत पर करिश्मा अजीज के यहां शोक व्यक्त करने आई थी, तभी उस ने अजीज के बड़े भाई शब्बीर से कहा था कि अब वह राजू के साथ नहीं रहना चाहती और अपने बच्चों के पिता अजीज के पास वापस आना चाहती है. तब शब्बीर ने सोचा था कि अगर करिश्मा वापस आ जाती है और बच्चों के साथ अजीज के साथ रहने लगती है तो यह उस की मेहरबानी होगी. उन्होंने भी हां कर दिया था और कहा था कि रमजान के बाद उन दोनों का फिर से निकाह करा दिया जाएगा.

दरअसल, करिश्मा के चली जाने के बाद अजीज शराब पी कर उसे याद कर के रोता रहता था, लेकिन जब से करिश्मा वापस मिल गई थी, तब से उस के चेहरे पर फिर से खुशी लौट आई थी. लेकिन उस की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी.

2 दिसंबर, 2025 की रात करीब 9 बजे अजीज नरोडा वाले घर से करिश्मा और बच्चों को कपड़े और रुपए देने वटवा गया था. उसी समय राजू अपनी बाइक से नरोडा की ओर खाना खाने जा रहा था. भारी ट्रैफिक के बीच भी वटवा की ओर जा रहे अजीज को राजू ने देख लिया. उसे समझते देर नहीं लगी कि वह करिश्मा से मिलने जा रहा है. यह सोच कर उस की आंखों में खून उतर आया था. उस का शरीर भी गुस्से से कांपने लगा था.

क्रोध की आग में जलता हुआ वह खाना खाना भूल गया. वह सीधे अपने घर गया और एक तेज धार वाला चाकू निकाला. चाकू की मूठ पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए उस ने कुछ निश्चय कर लिया. उस ने चाकू को एक कागज में लपेटा. फिर उसे पीछे अपनी पैंट में खोंसा और दोबारा अपनी बाइक ले कर निकल पड़ा. उसे पता था कि वटवा से नरोडा आनेजाने वाले लोग इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए उसे पूरा विश्वास था कि अजीज इसी रास्ते से लौटेगा. वह एक सुनसान जगह पर खड़े हो कर शांति से अजीज का इंतजार करने लगा.

मौत का किया इंतजार

एक घंटा, 2 घंटे, 3 घंटा बीत गया, लेकिन उस ने धैर्य नहीं खोया. रात के 12 बज गए. आखिरकार रात के साढ़े 12 बजे उस का इंतजार खत्म हुआ. उसे वटवा कैनाल के पास अजीज फिर से आता दिखाई दिया. अजीज को देख कर राजू शिंदे तुरंत अपने चेहरे पर मासूमियत के भाव ले आया और हाथ दे कर उसे रोका.

पुलिस गिरफ्त में आरोपी राजू शिंदे

अजीज के रुकते ही उस ने कहा, ”एक्सक्यूज मी, आप अजीज भाई हैं न? मेरा नाम राजू है. मैं यहीं नरोडा की ओर रहता हूं. दरअसल, मुझे अपने शेड पर सोलर पैनल लगवाना है. आप का नंबर नहीं था, इसलिए मैं आप के घर गया था. पर आप घर पर मिले नहीं. आप अचानक यहां दिखाई दे गए, इसलिए मैं ने आप को रोक लिया.’’

”आप की बात तो सही है राजूभाई, लेकिन अभी रात के साढ़े 12 बजे हैं और मैं थक भी गया हूं. इसलिए आप कल सुबह मुझे फोन कर लीजिएगा, मैं आप का काम कर दूंगा.’’

राजू ने मन ही मन सोचा कि काम तो बेटा तेरा तमाम करना है और वह भी अभी. इसलिए उस ने कहा, ”अरे अजीजभाई, मुझे थोड़ा अर्जेंट है. आप नरोडा की ओर ही जा रहे हैं, मेरा शेड भी वहीं है. मेरे पास कोई साधन भी नहीं है, इसलिए आप मुझे वहां तक छोड़ भी दीजिएगा और बाहर से शेड भी देख लीजिएगा. इस के बाद कल आ कर काम शुरू कर देना.’’

अजीज थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन फिर सोचा कि काम और पैसा खुद चल कर उस के पास तक आ रहा है और रास्ते में सिर्फ बाहर से ही तो शेड देखना है तो मना क्यों किया जाए? उस ने राजू को अपनी बाइक पर पीछे बैठाया और नरोडा की ओर चल पड़ा.अजीज ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह उस की जिंदगी की सब से बड़ी और आखिरी गलती होने वाली है. उसे क्या पता था कि काम के लालच में उस ने मौत पीछे बैठा ली है.

जैसे ही रास्ते में केडिला ब्रिज के पास अजीज की बाइक पहुंची, अंधेरे का फायदा उठाते हुए राजू बोला, ”अजीजभाई, गाड़ी यहीं साइड में ले लो, मेरा शेड यहीं है.’’

अजीज ने जैसे ही बाइक थोड़ी धीमी की. राजू को अजीज से इतनी नफरत थी कि उस ने बाइक रुकने का भी इंतजार नहीं किया. सुनसान और अंधेरा देख कर राजू ने पैंट में पीछे खोंसा चाकू निकाला और चलती बाइक पर ही अजीज का गला रेत दिया. उस ने इतनी नफरत से अजीज पर हमला किया था कि खून का फव्वारा फूट पड़ा और अजीज की श्वास नली तक कट गई थी. चीखते हुए अजीज बाइक समेत जमीन पर गिर पड़ा. अजीज के साथ राजू भी गिर पड़ा था. संयोग से उसे ज्यादा चोट नहीं लगी थी. उसे मामूली खरोंचें आई थीं. इसलिए वह तुरंत उठ कर खड़ा हो गया.

थोड़ी देर तड़प कर अजीज शांत हो गया. खून से लथपथ अजीज के शरीर को राजू ने पैर से हिला कर देखा कि वह मर चुका है या नहीं? उसे लगा कि अजीज का खेल खत्म हो गया है तो वह अंधेरे में गायब हो गया और घर जा कर इस तरह चैन से सो गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो. शायद उसे लगा था कि अंधेरे में किसी ने उसे देखा तो है नहीं, इसलिए पुलिस कभी उस तक पहुंच नहीं सकेगी. 3 दिसंबर की रात 2 से ढाई बजे पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि घोडासर के केडिला ब्रिज के पास एक युवक की गला कटी लाश पड़ी है.

सूचना मिलने पर थाना इसनपुर के इंसपेक्टर बी.एस. जाडेजा अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. बाइक के नंबर से मरने वाले की पहचान नरोडा के रहने वाले अजीज खान के रूप में हो गई थी. इस के बाद लाश को जब्त कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया था. आगे की पुलिस जांच में पता चला कि अजीज का अपनी पत्नी करिश्मा से तलाक हो गया था. उस की पत्नी वटवा में अलग रहती थी. पुलिस करिश्मा के घर पहुंची.

करिश्मा से पूछताछ की गई तो पता चला कि उस ने अजीज से तलाक लेने के बाद राजू नाम के व्यक्ति से निकाह कर लिया था और दोनों साथ रह रहे थे. लेकिन इधर वह राजू को छोड़ कर फिर से अजीज से निकाह करने वाली थी. करिश्मा की इस बात से राजू शक के दायरे में आ गया, लेकिन पुलिस ने सीधे उसे हिरासत में नहीं लिया था.

रह गई अकेली

राजू ने ही यह कांड किया है, यह कंफर्म करने के लिए पुलिस ने उस जगह की सीसीटीवी फुटेज चेक की, जहां अजीज की हत्या हुई थी. पुलिस को सीसीटीवी फुटेज में एक संदिग्ध व्यक्ति जाता दिखाई दिया, जिस की चाल और शरीर की बनावट राजू से हूबहू मेल खाती थी. इस के बाद पुलिस उसे थाने ले आई और सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि अजीज की हत्या उसी ने करिश्मा के लिए की थी.

दरअसल, राजू शिंदे के साथ रहते हुए ही करिश्मा अपने पूर्व पति अजीज से बातचीत करने लगी थी, जो राजू को बिलकुल पसंद नहीं था. यही नहीं, उस ने अजीज की ही वजह से उसे अपने घर से निकाल दिया था. इसलिए उसे लगा कि अगर अजीज नहीं रहेगा तो करिश्मा उस के पास फिर से वापस आ सकती है. यही सोच कर राजू ने नफरत से इस तरह बेरहमी से अजीज की हत्या कर दी थी.

राजू शिंदे की गिरफ्तारी के बाद करिश्मा ने पुलिस को बताया था कि अजीज से तलाक लेने के बाद उस ने राजू से निकाह कर लिया था. उस के बाद अजीज उसे धमकी दे कर जबरदस्ती अपने साथ ले जाने के लिए कह रहा था. वह कह रहा था कि ‘अगर मैं उस के साथ नहीं आई तो इस का अंजाम तू देखेगी.’

इसलिए वह डर गई थी कि कहीं वह कुछ उलटासीधा न कर बैठा तो नुकसान उसे ही होता, क्योंकि राजू और अजीज दोनों ही उस के थे. इसलिए उस ने अजीज के साथ जाने का फैसला किया था. अजीज की हत्या करने वाले अपने दूसरे पति राजू शिंदे के बारे में करिश्मा का कहना था कि राजू बहुत अच्छा इंसान था. वह किसी भी तरह का नशा नहीं करता था. उस ने उस के तीनों बच्चों को सगे पिता से भी ज्यादा प्यार दिया था. उस ने कभी बच्चों को पिता की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

लेकिन अजीज उसे बारबार धमका रहा था. यह बात सिर्फ वह और अजीज ही जानते थे. मजबूरी में उसे अजीज के साथ जाना पड़ रहा था. फिलहाल करिश्मा अपने बच्चों के साथ अकेली रह रही है और उस का कहना है कि अब वह तीसरे निकाह के बारे में बिलकुल नहीं सोच रही है. पुलिस को अजीज की हत्या में करिश्मा के कहीं से भी शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला था.

राजू शिंदे से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल भेज दिया था. Gujarat News

 

 

UP News: मोहब्बत में क्राइम हरगिज नहीं

UP News: 35 साल की सुनीता भले ही 5 बच्चों की मां बन चुकी थी, लेकिन उस के गठीले बदन की कसावट पर गांव के अनेक युवा आहें भरते थे. गांव का 22 वर्षीय आशीष कुमार उर्फ अंशु तो उसे अपना दिल दे चुका था. अमरबेल की तरह दोनों की मोहब्बत बढ़ती गई. मोहब्बत के इसी समंदर में डूब कर एक दिन दोनों ऐसा खतरनाक क्राइम कर बैठे कि…

आशीष उर्फ अंशु और उस की प्रेमिका सुनीता ने वीरपाल की हत्या करने की ठान ली, क्योंकि वह उन दोनों की मोहब्बत में रोड़ा बन रहा था. वीरपाल सुनीता का पति था. वे दोनों यही सोच रहे थे कि उस की हत्या कब और कैसे की जाए? तय किया कि आधी रात के बाद वीरपाल की गोली मार कर हत्या घर में ही कर दी जाए. फिर शोर मचा दिया जाएगा कि बदमाश आए थे. घर का सामान भी बिखेर दिया जाएगा और लूट की घटना बनाने के लिए जेवर और नकदी लूट कर ले जाने का नाटक किया जाएगा.

तभी अंशु बोला, ”तमंचा और कारतूस का इंतजाम कहां से होगा?’’

सुनीता ने कहा, ”यह इंतजाम तुम्हें ही करना पड़ेगा. इस के लिए रुपयों की जरूरत भी पड़ेगी.’’

”रुपए का तो मैं इंतजाम कर लूंगा, लेकिन तमंचा और कारतूस मिलना इतना आसान नहीं है. चलो, मान लिया जाए कि ये चीजें मिल भी गईं तो वीरपाल को गोली कौन मारेगा?’’ अंशु बोला.

”तुम ठीक कह रहे हो. यदि उस समय बच्चे उठ गए, उन्होंने देख लिया तो हम दोनों पकड़े जाएंगे. फिर बिना सजा के नहीं बचेंगे. इस तरह हमारी प्रेम कहानी तो अधूरी रह जाएगी.’’ सुनीता ने आशंका जताई.

इस के बाद उन्होंने दूसरी योजना तैयार की. गेहूं को सुरक्षित रखने के लिए सल्फास की गोलियों का प्रयोग होता है. अकसर यह सुनने में आता है कि लोग आत्महत्या के लिए इन गोलियों का सेवन करते हैं. उन्होंने सोचा कि क्यों न ये गोलियां किसी तरह वीरपाल को खिला दी जाएं.

यह तरीका दोनों को अच्छा लगा. फिर एक दिन सल्फास की गोलियों का पैकेट अंशु ने सुनीता को ला कर दे दिया. दोनों ने तय किया कि जब भी शराब के नशे में वीरपाल आएगा, खाने में मिला कर सल्फास की गोलियां उसे दे दी जाएंगी. इस से पहले कि योजना को अंजाम दिया जाता, सल्फास की गोलियों का पैकेट बच्चों के हाथ लग गया. बच्चे समझे कि पैकेट पापा लाए हैं. वीरपाल के सामने ले जा कर बच्चे पूछने लगे, ”पापा, ये गोलियां काहे की हैं?’’

वीरपाल गोलियों का पैकेट देख कर सन्न रह गया. वीरपाल ने पैकेट उलटपलट कर देखा तो उसे पता चला कि यह तो गेहूं को सुरक्षित रखने वाली सल्फास की गोलियां हैं.

गुस्से से आगबबूला होते हुए वीरपाल ने सुनीता से पूछा, ”सल्फास का पैकेट कौन लाया है?’’

सुनीता ने झूठ बोलते हुए कहा, ”गेहूं में घुन लगने लगे थे. इसलिए मैं ने ही यह पैकेट मंगाया है.’’

वीरपाल की हत्या करने का यह प्लान भी फेल हो गया. बात आईगई हो गई. कुछ समय बाद धान की फसल तैयार होने लगी. उस की रखवाली के लिए वीरपाल अकसर खेत पर जाया करता था. ग्रामीण क्षेत्र में कई तरह के जंगली जानवर फसलों को क्षति पहुंचाते हैं. उन से फसल को बचाने के लिए रात को भी अनेक किसान खेतों पर डेरा डाले रहते हैं.

वीरपाल भी धान की फसल की रखवाली के लिए खेत पर जाता था. नींद आने पर वह वहीं सो जाया करता था. शातिर दिमाग अंशु ने सुनीता से कहा, ”अब मौका आ गया है, वीरपाल को ठिकाने लगाया जा सकता है. जिस वक्त वीरपाल रात को खेत पर सोया हो, तभी उसे हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया जाएगा.’’ सुनीता को योजना सही लगी और वह राजी हो गई. उत्तर प्रदेश के जनपद संभल में थाना हयात नगर क्षेत्र में एक गांव स्थित है सहजना. इस गांव में दलवीर सिंह का परिवार निवास करता है. दलवीर सिंह के 5 बेटे और 5 बेटियां थीं. चौथे नंबर की बेटी सुनीता थी.

सुनीता का विवाह साल 2008 में जनपद मुरादाबाद के थाना बिलारी क्षेत्र के गांव अलेहदादपुर देवा नगला निवासी वीरपाल था. वीरपाल खेतीकिसानी के साथसाथ मजदूरी भी करता था. कभीकभी हरिद्वार में स्थित फैक्ट्री में मजदूरी करने भी चला जाता था. वीरपाल का एक बड़ा भाई है कुंवरपाल. वीरपाल की मां ज्ञानवती है, जो एक गृहिणी हैं. वीरपाल और सुनीता का वैवाहिक जीवन ठीकठाक गुजर रहा था. इस दौरान उन के 5 बच्चे हुए, जिन में 4 बेटियां और एक बेटा था.

5 बच्चों की मां होने के बावजूद सुनीता के हंसीमजाक में एक बेकाबू आग छिपी थी. उस के चेहरे पर जवानी की नैचुरल चमक थी. गालों की मुलायम लकीरों में मासूमियत और आत्मविश्वास दोनों एक साथ झलकते थे. उस की आंखें बड़ी साफ और गहरी थीं, मानो किसी के बोलने से पहले ही उस का मन पढ़ लेती हों. उस का शरीर किसी कठोर मेहनत से तराशा हुआ नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से सधे हुए अनुपातों वाला था. कंधे हलके चौड़े, कमर में नजाकत और चाल में लयबद्ध कोमलता, जिसे देख कर कोई भी तुरंत समझ जाए कि यह महिला तन से ही नहीं, मन से भी मजबूत है.

वह मध्यम कद की थी. उस का रंग गेहुंआ और चेहरा गोल था. उस की आंखें बड़ी और ध्यान खींचने वाली थीं, जिन में आत्मविश्वास का भाव दिखता था. बाल पूरी तरह से सिर को ढकने वाले दुपट्टे के नीचे छिपे रहते थे, जो पारंपरिकता और शालीनता दर्शाते थे. उस की नाक में एक छोटा नथ उस की पहचान को और उभारता था. होंठ थोड़े मोटे जरूर थे, लेकिन उन पर हलकी मुसकान दिखाई देती, जो उस में छिपी ममता और दृढ़ इच्छाशक्ति की झलक देती थी. उस की आंखों की चमक देखने वालों को भटकाने वाली पहेली सी लगती थी.

गांव की गलियों में जब भी सुनीता का नाम लिया जाता, लोग धीरे से मुसकरा देते. कोई जलन से, कोई तजुर्बे से. 5 बच्चों की मां होते हुए भी उस में कुछ ऐसा था, जो जवान दिलों को बेचैन कर देता था. उस की चाल, उस की बातों की मिठास और उस की आंखों में छिपी कामुक शरारत की वजह से 35 वर्षीय सुनीता गांव की अन्य महिलाओं से अलग पहचानी जाती थी. सब जानते थे कि वह साधारण महिला नहीं.

गांव में कुंवरपाल का परिवार भी निवास करता था. कुंवरपाल अलेहदादपुर गांव का दामाद था. करीब 2 दशक पहले इसी गांव में घरजमाई बन कर आया था. फिर गांव में ही बस गया था. उस के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. एक बेटे और एक बेटी की शादी हो चुकी है. कुंवरपाल का बेटा आशीष कुमार उर्फ अंशु करीब 22 साल का एक कुंवारा नौजवान था. अंशु अपनी जवानी के चरम पर पहुंच चुका था. 22 साल की उम्र उस के चेहरे पर एक अलग ही चमक ले कर आई थी. वह चमक जो मेहनत, आत्मविश्वास और युवापन के मिलन से पैदा होती है.

उस के नैननक्श साधारण होते हुए भी बेहद आकर्षक थे. माथे पर गिरती हलकी बिखरी लटें और आंखों में मौजूद सहज चमक उसे अलग पहचान देती थी. उस का शरीर एकदम सधा हुआ था. न बहुत भारी, न बहुत पतला. छाती में कसावट और बांहों में हलकी उभरी नसें, उस के मेहनत भरे जीवन की गवाही देती थीं. चलते समय उस का आत्मविश्वास साफ दिखता था. कदमों में सधी हुई लय और शख्सियत में एक ऐसी गरिमा जो बिना बोले ही लोगों को उस की तरफ देखने पर मजबूर कर देती थी. अंशु की मुसकान उस के पूरे चेहरे को रोशन कर देती थी. उस की जवानी में एक तरह की साफगोई थी, वही मासूम पर दृढ़ ऊर्जा जो केवल 21-22 की उम्र में ही दिखाई देती है.

कुंवरपाल के साले का नाम भूप सिंह था. वह इस समय गांव के मौजूदा प्रधान है. असरदार व्यक्ति है. गांव में उस का काफी मानसम्मान भी है. अंशु का दिल किसी रिश्ते की बंदिश नहीं मानता था.

अंशु अपनी नानी के घर रहता था. उस की पैदाइश भी यहीं पर हुई थी, जहां उस की जवानी बेलगाम घोड़े सी दौड़ रही थी. उस के अय्याशी के किस्से भी कम न थे. मामला पकड़े जाने पर पंचायतें भी हुईं. उस के मामा को मामला लेदे कर निपटाना पड़ा. कई बार उस के मामा को काफी रकम मुआवजे के रूप में गांव की गरीब लड़कियों को देनी पड़ी. अकसर लड़की वाले बदनामी के डर से प्रधान के रुतबे और प्रभाव के कारण कानूनी काररवाई के लिए आगे नहीं बढ़े. इस का फायदा अंशु उठाता रहा और कई घटनाएं गांव में अंजाम दे दीं.

जब सुनीता और अंशु की राहें टकराईं, तो जैसे दो चिंगारियां एक ही पल में भड़क उठीं. फिर रिश्ता रिश्ता नहीं, एक अंधी ललक बन गया, जहां उम्र, रिश्तेदारी और समाज सब पीछे छूट गया. कहानी यहीं से मोड़ लेती है. प्यार और पागलपन के इस खेल में वह सुनीता अपने पति से तंग आ चुकी थी, और अंशु उस की चाहत में अंधा हो गया था. शाम का वक्त था. खेतों से किसानों की वापसी हो रही थी, ढलती धूप में चलती बकरियों की आवाजें, ऐसा लग रहा था कि उन्हें भी घर वापस ले जाया जा रहा है.

बीच में एक महिला जो अपने आंगन में पानी भर रही थी. उस के बच्चे पास ही खेल रहे थे, गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा था, लेकिन इस शांति के पीछे एक तूफान पनप रहा था. अंशु गांव का मनचला, दुबलापतला मगर तेज नजर वाला जवान था. सब जानते थे कि अंशु की नजरें मासूम नहीं हैं और सुनीता भी यह बात समझती थी, मगर न जाने क्यों, उसे अब फर्क नहीं पड़ता था.

अंशु ने पहली बार बिना झिझक के उस से कहा, ”नानी, इतना पानी रोज क्यों भरती हो? कोई समंदर बनाना है क्या?’’

सुनीता मुसकराई, ”तेरे काम का समंदर नहीं है, डूब जाएगा तू इस में.’’

अंशु हंसा, ”डूबने का तो मन है ही, बस कोई मौका डूबने का मिल जाए.’’

उन के बीच का यह मजाक गांव के माहौल से ज्यादा गर्म था. दोनों जानते थे कि वो किस ओर बढ़ रहे हैं, मगर किसी को रोकने की हिम्मत न थी. धीरेधीरे ये मुलाकातें बढ़ीं. कभी खेत के किनारे, कभी सूनी पगडंडी पर तो कभी मकानों के पीछे के बाग में, जहां हवस और हंसी एक साथ घुलमिल जाती.

सुनीता अब अपने पति वीरपाल से ऊब चुकी थी. बच्चों और घर के झगड़ों ने उन के रिश्ते की जान निकाल दी थी. एक रात वीरपाल ने उसे रोकते हुए कहा, ”तू अब पहले जैसी नहीं रही, सुनीता.’’

तो उस ने ठंडे लहजे में जवाब दिया, ”हां, और तू भी मर्द जैसा नहीं रहा.’’

वीरपाल ने गुस्से में थप्पड़ मारा, मगर उस थप्पड़ की गूंज ने सुनीता के भीतर का सब कुछ तोड़ दिया. उसी रात वो चुपके से घर के पीछे वाले दरवाजे से बाहर निकली. अंशु उस का इंतजार कर रहा था.

”अंशु, मुझ से अब और नहीं सहा जाता,’’ सुनीता ने उस से कहा.

अंशु ने उस की आंखों में झांकते हुए फुसफुसाया, ”तो फिर खत्म कर देते हैं उसे, हमेशा के लिए.’’

सुनीता चौंकती हुई बोली, ”क्या मतलब?’’

”मतलब साफ है. तुम्हारे रास्ते में बस वो वीरपाल ही तो दीवार है. गिरा देंगे, उस दीवार को.’’

सुनीता चुप रही, मगर उस के दिल में डर और चाहत दोनों एक साथ पनपने लगे. बड़ी हिम्मत करने के बाद सुनीता सीधेसीधे प्रेमी को चुनौती देती हुई बोली, ”अगर तुम को मेरे साथ रहना है तो कुछ तो करना ही होगा, मगर उस के बाद क्या तुम मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार करोगे?’’

”सुनीता, मैं ने तुम से प्यार किया है. पत्नी मान भी लिया है. अब तुम बताओ उस के बाद तुम्हारी क्या भूमिका होगी?’’

”मैं जिंदगी भर तुम्हारा साथ दूंगी, तुम्हारा खयाल रखूंगी.’’

”अगर तुम मुझे पाना चाहते हो तो अब अपने नाना का काम तमाम कर ही दो.’’

अंशु का मामा प्रधान भूप सिंह जाति से जाटव है. एक ही बिरादरी के होने के नाते से प्रधान भूप सिंह, वीरपाल को गांव के रिश्ते में चाचा कहता था. इसी रिश्ते से अंशु वीरपाल को नाना और सुनीता को नानी कह कर संबोधित करता था. दोनों के संबंध जगजाहिर हो चुके थे. फिर भी गांव के लोगों को यकीन नहीं होता था कि दोनों की उम्र में इतना अंतर होने के बाद इन के बीच अवैध संबंध होंगे. वीरपाल 12 अक्तूबर, 2025 की रात को अपने धान के खेत पर सोने के लिए गए थे. अगले दिन जब गांव के लोग खेतों पर सुबहसुबह अपने काम के लिए निकले, तब उन्होंने देखा कि वीरपाल खेत में अपनी चारपाई पर लेटा हुआ था.

वीरपाल अकसर सुबहसुबह 5 बजे उठ कर घर आ जाता था. फ्रैश हो कर फिर से काम के लिए खेत पर आ जाता था, लेकिन उस दिन वह इतनी देर तक खेत में क्यों सो रहा है, लोग समझ नहीं पाए. पास जा कर लोगों ने देखा तो वह एकदम बेसुध सा लेटा हुआ था. उन्हें वीरपाल के शरीर पर कोई हरकत नहीं दिखी.  इस दौरान हड़कंप मच गया तो यह बात गांव तक पहुंची. काफी संख्या में ग्रामीण लोग उस के खेत पर पहुंच गए. गांव के एक डौक्टर को भी बुला लिया. उस ने नब्ज टटोलते ही वीरपाल को मृत घोषित कर दिया.

वीरपाल की पत्नी सुनीता भी खूब रोते हुए दहाड़े मारते हुए खेत पर पहुंच गई. पूरा चेहरा ढके हुए खूब रोए जा रही. उस को रोता देख कर लोगों का दिल पसीज गया कि अब इस बेचारी के बच्चों का क्या होगा? यह बात 13 अक्तूबर, 2025 की है. वहां मौजूद लोगों ने पुलिस को खबर देने की बात कही तो सुनीता कहने लगी कि मैं अपने पति की मिट्टी को खराब नहीं होने दूंगी. पुलिस हमारे पति का शरीर ले कर जाएगी. पोस्टमार्टम को भेजेगी. वहां चीरफाड़ होगी. पूरे शरीर को बरबाद कर देगी.

मैं अपने पति के साथ यह नहीं होने दूंगी. लेकिन कोई व्यक्ति पहले ही कोतवाली बिलारी में फोन कर के यह सूचना पुलिस को दे चुका था. सूचना पाते ही कोतवाल उदय प्रताप मलिक मय फोर्स के घटना स्तर पर पहुंच गए. शुरुआती जांच में मामला हत्या का प्रतीत हुआ, क्योंकि मृतक के गले पर दबाने के निशान थे. थोड़ीबहुत हलकीफुलकी छीनाझपटी जैसे निशान भी थे. इस से प्रतीत हो रहा था कि मृतक ने हत्यारों से थोड़ा बहुत संघर्ष भी किया है. फोरैंसिक टीम भी वहां पहुंच गई. घटनास्थल के आसपास का बड़ी बारीकी से मुआयना किया गया. आवश्यक सबूत इकट्ठे किए गए. मौके की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय मुरादाबाद भेज दिया.

कोतवाल उदय प्रताप मलिक ने मामले की जानकारी सीओ अशोक कुमार और एसपी (ग्रामीण) कुंवर आकाश सिंह को दे दी. अधिकारियों ने जांच के लिए पुलिस की दो टीमें गठित कर दीं. पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. गांव के लोगों ने पोस्टमार्टम से लाश आने के बाद वीरपाल का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस अपनी जांच कर ही रही थी. उसी दिन सुनने में आया कि वीरपाल की पत्नी सुनीता ग्रामीणों से लाश का पोस्टमार्टम कराने को मना कर रही थी. उस का कहना था कि ज्यादा शराब पी लेने से इस की स्वाभाविक मौत हुई होगी.

यह बात सुन कर पुलिस को वीरपाल की हत्या करने का शक उस की पत्नी सुनीता पर हो गया. सुनीता ने अपने पति की हत्या क्यों कराई? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए पुलिस ने जब छानबीन की तब पता चला कि गांव का ही एक युवक अंशु है, जिस से सुनीता का प्रेम प्रसंग चल रहा है. इतनी जानकारी मिलने पर अंशु भी पुलिस के शक के दायरे में आ गया. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया. इस के बाद उन से जब पूछताछ की गई तो उन्होंने पहले तो बातें गोलमोल करने की कोशिश की, लेकिन जब सख्ती की गई तब दोनों ने ही सच उगल दिया.

दोनों की उम्र में 13 से 14 साल का अंतर था. लोगों को जब इस बात का पता चला कि वास्तव में इन दोनों के बीच में प्रेम प्रसंग चल रहा था तो कोई इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है, लेकिन जब सच सामने आया तो सब हैरान रह गए. इस दौरान सुनीता ने अपने आप को बचाने के लिए खूब प्लानिंग की थी. पहली प्लानिंग तो उस ने पुलिस को बुलाने से मना किया. लेकिन जब उसे लगा कि पुलिस आ गई है तो पोस्टमार्टम न हो पाए, इस के लिए उस ने पूरी कोशिश की.

पुलिस ने लाश को जब पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. तब सुनीता ने भागने का भी प्लान बना रखा था. जब उस के रिश्तेदार आए. दोनों पक्षों के बीच नोकझोंक व झगड़ा चल रहा था तो एक रिश्तेदार सुनीता को अपनी बाइक पर बिठा कर वहां से निकलने वाला था, लेकिन जैसे ही सुनीता बाइक पर बैठी, गांव के लोगों ने देख लिया और उसे दौड़ कर पकड़ लिया. उस के बाद ग्रामीणों ने कहा कि जब तक पुलिस नहीं आएगी, तब तक कोई नहीं जाएगा. पुलिस को आने दो. उस के बाद जिस को जहां जाना हो, वो चला जाए.

पुलिस ने सुनीता और उस के प्रेमी आशीष कुमार उर्फ अंशु से पूछताछ की तो वीरपाल की हत्या के पीछे की ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस ने सभी को चौंका कर रख दिया. सुनीता गांव के रिश्ते में अंशु की नानी लगती थी. दोनों के खेत आसपास ही थे, इसलिए उन के बीच बातचीत होना आम बात थी. उसी दौरान दोनों के बीच प्यार हो गया. और जल्द ही उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. सुनीता अंशु के प्यार की कायल हो गई थी. उस के सामने अपना पति वीरपाल फीका लगने लगा था. इसलिए जब भी उन का शारीरिक संबंध बनाने का मन होता था, तो सुनीता वीरपाल को शराब पिला कर धान की रखवाली करने के लिए रात को खेत पर भेज देती थी.

फिर अंशु को फोन कर के रात को अपने घर पर बुला लेती थी. फिर रात भर दोनों मौजमस्ती करते थे. इस तरह सुनीता अविवाहित अंशु के प्यार में डूब चुकी थी, लेकिन यह खेल ज्यादा दिनों तक छिप न सका. एक दिन इसी बीच रात में एक बार वीरपाल धान के खेत से घर वापस आया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. यह देख कर वीरपाल का खून खौल गया. अंशु तो फटाफट वहां से भाग गया, लेकिन सुनीता कहां जाती. तब वीरपाल ने उस दिन सुनीता की खूब पिटाई की. सुनीता ने उसी दिन सोच लिया था कि वीरपाल हमारे प्यार के बीच में रोड़ा बन रहा है. इसे तो निपटवाना ही पड़ेगा.

सुनीता ने उस समय तो पति से हाथ जोड़ कर माफी मांग ली थी. वीरपाल ने यह बात किसी को बदनामी की वजह से नहीं बताई. 2-4 दिन बाद सुनीता और अंशु का चोरीछिपे मिलनाजुलना जारी रहा. एक दिन सुनीता ने अशु को बताया कि वीरपाल हम दोनों के प्यार में रोड़ा बन रहा है. इसे ठिकाने लगाना है. इतना ही नहीं, उस ने धमकी भी दी कि अगर तूने इसे ठिकाने नहीं लगाया तो मैं जहर खा कर अपनी जान दे दूंगी, लेकिन तेरे बिना नहीं जी सकती.

यह सुन कर अंशु के जवान खून में उबाल आ गया. उसे लगा कि उस की प्रेमिका उस के लिए जान देने के लिए तैयार है. उस की जुदाई बरदाश्त नहीं कर पा रही. लिहाजा अंशु ने कहा, ”तुम ऐसा मत करो. हम वीरपाल को ठिकाने लगा देंगे.’’

12 अक्तूबर को सुबह करीब 8 बजे सुनीता अपने खेत पर धान झाड़ रही थी. वहां पर उस की फेमिली के कुछ लोग भी मौजूद थे. उस समय अंशु भी अपने खेत पर था. सुनीता ने अंशु को अपने पास बुलाया. उस के साथ वह बात कर रही थी, तभी वीरपाल वहां पर आ गया. उस ने दोनों को बात करते देखा तो वीरपाल दोनों पर आगबबूला हो गया गालीगलौज करने लगा. अंशु उसी समय वहां से अपने घर चला गया. उस के कुछ देर बात वीरपाल भी चला गया तो सुनीता ने अंशु को फिर से बुला लिया.

फिर दोनों ने मिल कर वीरपाल की हत्या करने की योजना बनाई. वारदात की अन्य योजना पर सहमति नहीं बनी तो सुनीता ने अंशु को बताया कि वीरपाल रात में धान की रखवाली करने के लिए खेत पर जा कर सोता है. वहीं पर उस की हत्या करना आसान रहेगा. अंशु उस की इस बात पर राजी हो गया. 13 अक्तूबर को रात में करीब साढ़े 12 बजे वीरपाल खेत पर सोने गया. तभी सुनीता ने यह जानकारी प्रेमी अंशु को दे दी.

इस के बाद जब अंशु रात में वीरपाल के खेत पर पहुंचा तो उस समय वीरपाल शराब के नशे में चारपाई पर सो रहा था. अंशु ने उस का गला दबाना शुरू कर दिया. तभी वीरपाल का एक हाथ अचानक अंशु के मुंह पर लगा तो वह घबरा गया. अंशु को लगा कि अब यदि वह जिंदा बच गया तो मामला बहुत गड़बड़ हो जाएगा. वीरपाल ने उठने की कोशिश की, लेकिन नशा अधिक होने के कारण वह उठ नहीं सका. अंशु ने फिर से वीरपाल को अपने काबू में किया और गला दबाने लगा. उस के गले को वह तब तक दबाए रखा, जब तक कि वीरपाल की सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट नहीं गई.

जब वीरपाल निढाल हो गया, उस का छटपटाना बंद हो गया, उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई, तब कहीं अंशु को तसल्ली हुई. फिर भी अंशु ने उस की नाक पर हाथ रख कर एक बार चैककिया कि वह मर चुका है कि नहीं.

जब उसे विश्वास हो गया कि अब इस का काम तमाम हो गया है तो अंशु वहां से सीधे अपनी प्रेमिका सुनीता के घर पहुंचा. उस ने प्रेमिका को खुशखबरी देते हुए कहा कि तुम्हारे पति का मैं ने काम तमाम कर दिया है. अब वो तुम्हें कभी परेशान नहीं करेगा. इस मर्डर की खुशी में दोनों ने रात भर मौजमस्ती की. इस के बाद उन्होंने पुलिस से बचने का प्लान बनाया. फिर रात में ही अंशू अपने घर चला गया. दूसरे दिन अंशु भीड़ के साथ घटना स्थल पर पहुंचा और परिवार के लोगों के साथ रहा. पोस्टमार्टम से ले कर अंतिम संस्कार तक हर कार्यक्रम में वह वीरपाल के फेमिली वालों के साथ ही रहा, ताकि किसी को उस पर कोई शक न हो, लेकिन इस के बावजूद वह पुलिस के शक के दायरे में आ गया.

मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाकर हत्या कर देना आया. जिस के बाद मृतक के बड़े भाई कुंवरपाल की तहरीर के आधार पर धारा 103 (1)/61(2) (क) बीएनएस के तहत आशीष कुमार उर्फ अंशु और सुनीता को नामजद किया गया. 24 घंटे के भीतर पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझा दी. पूछताछ के बाद सुनीता और उस के प्रेमी आशीष कुमार उर्फ अंशु को जेल भेज दिया गया. बच्चों की परवरिश मृतक के बड़े भाई कुंवरपाल कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक अंशु और उस की प्रेमिका दोनों ही जेल में थे. UP News

 

 

MP News: जब सताए – पुराने प्रेमी की याद

MP News: 21 वर्षीय इकलौती बेटी निधि धानुक की शादी उस के पेरेंट्स ने देबू धानुक से कर जरूर दी थी, लेकिन वह अपने पुराने प्रेमी और रिश्ते के चाचा सूरज के प्यार को भुला नहीं पा रही थी. लिहाजा शादी के एक महीने बाद ही वह सूरज के साथ ससुराल से भाग गई. नवविवाहिता के इस कदम के बाद ऐसा खूनी खेल खेला गया कि…

14 जनवरी, 2026 की बात है. सुबह कड़ाके की ठंड और घने कोहरे के बावजूद कुछ लोग रोजाना की तरह उठ कर अपने मवेशियों को जगंल में चराने के लिए घर से निकले, तभी रास्ते में उन्होंने सरसों के खेत में एक युवती की रक्तरंजित लाश पड़ी देखी. जब उन्होंने लाश को करीब से जा कर देखा तो लाश देख कर उन सभी की घिग्गी बंध गई. उन्होंने हिम्मत कर के उस युवती के चेहरे पर नजर डाली तो उन्हें उसे पहचानने में देर नहीं लगी. वह लाश गांव के ही मुनेश धानुक की नवविवाहिता बेटी निधि की थी.

यह बात उन्होंने गांव के लोगों को बताई. पुलिस के आने तक गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई कि मुनेश धानुक की नवविवाहित बेटी निधि को किसी ने सरसों के खेत में गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया है. इस घटना ने सर्द मौसम के बावजूद गांव के माहौल में गरमाहट पैदा कर दी थी. थोड़ी ही देर में घटनास्थल पर ग्रामीणों की अच्छीखासी भीड़ लग गई. सब एकदूसरे के कान में खुसुरफुसुर कर रहे थे. उन में इस घटना को ले कर काफी गुस्सा था. वे निधि के हत्यारे को जल्द से जल्द पकडऩे की मांग कर रहे थे. इसी दौरान किसी ग्रामीण ने भिंड जिले के मेहगांव थाने में फोन कर के इस हत्या की सूचना दे दी.

पुलिस के पहुंचने से पहले ही मृतका की पहचान निधि धानुक के रूप में हो चुकी थी. उधर सूचना मिलते ही एसएचओ महेश शर्मा कुछ सिपाहियों को साथ ले कर मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि उस की हत्या सीने में गोली मार कर की गई है. पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर ग्रामीणों ने मृतका की शिनाख्त मुनेश धानुक की नवविवाहित बेटी निधि के रूप में कर दी थी.

पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि निधि की हत्या किन परिस्थितियों में किस ने और क्यों की? एसएचओ ने लाश को पोस्टमार्टम के निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और थाने आ कर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर पुलिस टीम को मृतका के पापा मुनेश की तलाश में लगा दिया था. काफी खोजबीन के बाद भी जब पुलिस को मुनेश का कुछ पता नहीं चला. संयोग से उसी दिन एक व्यक्ति बदहवास हालत में हड़बड़ाता हुआ थाने आया. वह बुरी तरह से हांफ रहा था. उस के कपड़ों पर खून भी लगा था. थाने में मौजूद एसएचओ ने उस के भागते हुए आने का कारण पूछा.

तब उस व्यक्ति ने बताया, ”साहब, आप मुझे हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लीजिए. मैं ने अपनी शादीशुदा बेटी की रात को गोली मार कर हत्या कर दी है.’’

उस की बात सुन कर एसएचओ चौंकते हुए उस की ओर देखते हुए पूछा, ”लाश कहां है?’’

”साहब, सरसों के खेत में.’’

”तुम्हारा नाम क्या है और कहां के रहने वाले हो?’’

”साहब, मेरा नाम मुनेश धानुक है और में खिरिया थापक गांव का रहने वाला हूं.’’

उस ने यह भी बताया कि बेटी को मारने के बाद उस ने खुदकुशी करने का प्रयास किया था, लेकिन कामयाब नहीं हो पाया तो हत्या करने के 8 घंटे तक फरार रहने के बाद वह थाने में अपने आप को कानून के हवाले करने चला आया.

उस की बात सुन कर एसएचओ समझ गए कि यह वही मुनेश धानुक है, जिस की उन्हें तलाश थी. उन्होंने थाने में सिर झुका कर खड़े मुनेश धानुक को गिरफ्तार करने का आदेश दिया. इस के तुरंत बाद उसे हिरासत में ले लिया गया. इस सनसनीखेज हत्या का खुलासा होने के बाद जांच की जिम्मेदारी एसएचओ महेश शर्मा ने स्वयं संभाली, साथ ही मुनेश को घटनास्थल पर ले जा कर पूरा क्राइम सीन रीक्रिएट कर साक्ष्य जुटाए.

निधि के पोस्टमार्टम के बाद पुलिस उस के ससुराल वालों के आने का इंतजार करती रही, लेकिन जब काफी इंतजार के बावजूद वे लोग नहीं आए तो निधि के कुछ रिश्तेदारों को एक कांस्टेबल के साथ अस्पताल की मोर्चरी भेज दिया, जहां निधि की लाश रखी थी. औपचारिक काररवाई के बाद निधि की लाश उस के करीबी रिश्तेदारों को सौंप दी गई. उसी दिन कुछ रिश्तेदारों की मदद से निधि का अंतिम संस्कार कर दिया. निधि की हत्या का जुर्म मुनेश कुबूल कर चुका था. पुलिस ने निधि की मम्मी पूजा धानुक को वादी बना कर एक तहरीर लिखवा ली.

पुलिस ने हिरासत में लिए गए मुनेश से निधि की हत्या का कारण जानने के लिए पूछताछ की तो मुनेश धानुक ने बिना कुछ छिपाए बेटी की हत्या के पीछे की जो खौफनाक कहानी बताई, वह हैरान कर देने वाली निकली. मध्य प्रदेश के जिला भिंड के मेहगांव थाने के अंतर्गत एक गांव है खिरिया थापक. इसी गांव में मुनेश धानुक अपनी पत्नी पूजा और बेटी निधि के साथ रहता था. मुनेश खेतीबाड़ी कर के गुजारा करता था. बेटी के शादी लायक होने पर उस ने उस की शादी 11 दिसंबर, 2025 को ग्वालियर के गुड़ागुड़ी का नाका निवासी देबू धानुक से कर दी थी.

निधि ने फेमिली वालों के दबाव में देबू से शादी तो कर ली थी, लेकिन वह प्यार तो सूरज से ही करती थी, निधि के देबू के साथ सात फेरों के बंधन में बंधने के बावजूद आशिकी का जनून धीरेधीरे खतरनाक मोड पर पहुंच रहा था. 28 दिसंबर, 2025 की शाम निधि अपने पति के साथ महाराज बाड़े पर शौपिंग करने गई थी. वहां छोलेभटूरे खाने के बाद उस ने योजनाबद्ध ढंग से अपने पति को पानी की बोतल लाने के लिए भेज दिया.

जब निधि का पति पानी की बोतल खरीद कर वापस लौटा तो निधि छोलेभटूरे की दुकान से बिना बताए नदारद थी. वह अपने प्रेमी सूरज के साथ फरार हो चुकी थी. उस ने अपना फोन भी बंद कर दिया था. अपनी पत्नी को वहां न पा कर देबू का माथा ठनका. बुरी तरह घबराए देबू ने अपने नातेरिश्तेदारों और जानपहचान वालों के यहां निधि को तलाशने के बाद उस के बारे में कुछ भी पता न चलने पर देर रात हुजरात कोतवाली में जा कर उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी थी.

अपने प्रेमी के साथ इंदौर भाग जाने के दौरान निधि ने कभी भी नहीं जानना चाहा कि उस के इस कदम से उस के पेरेंट्स का क्या हाल हुआ, किस तरह से वह अपनी तारतार हुई इज्जत के साथ जी रहे होंगे. गुमशुदगी की शिकायत दर्ज होने के एक पखवाड़े बाद इत्तफाक से जैसे ही निधि ने अपने फोन में जैसे ही नई सिम एक्टिव की तो साइबर सेल को तुरंत उस की लोकेशन मिल गई. पुलिस ने निधि से फोन द्वारा संपर्क किया तो पुलिस के कहने पर 7 जनवरी, 2026 को वह स्वयं अपने प्रेमी सूरज के साथ हुजरात कोतवाली में पहुंच गई.

उस ने हुजरात कोतवाली के कोतवाल द्वारा पूछताछ के दौरान बताया कि वह अपनी मरजी से अपने प्रेमी सूरज के साथ इंदौर चली गई थी. वह बालिग है, अत: अपना अच्छाबुरा समझती है, अब वह अपने प्रेमी सूरज के साथ ही रहना चाहती है. उधर निधि के कोतवाली में पहुंचने की भनक लगते ही निधि के पापा और नातेरिश्तेदारों ने कोतवाली पहुंच कर निधि को अपनी ससुराल वापस जाने के काफी समझाया-बुझाया, लेकिन वह इस जिद पर अड़ी रही कि वह किसी भी सूरत में अपनी ससुराल लौट कर नहीं जाएगी.

निधि के इस रुख से उस के पापा मुनेश का खून खौल गया बेटी की इस जिद से मुनेश की सामाजिक प्रतिष्ठा को काफी ठेस लगी थी. बेटी की जिद मुनेश को काफी नागवार गुजरी. बेटी की यह जिद मुनेश के बरदाश्त के बाहर थी. इस के बाद ही उस ने खतरनाक फैसला ले लिया था. ग्वालियर के हुजरात कोतवाली थाना परिसर में ही मुनेश ने सोच लिया था कि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. निधि के अपने प्रेमी सूरज के साथ जाने के बाद से ही मुनेश उस से सतत संपर्क बनाए हुए था. अपने मकसद को पूरा करने के लिए 14 जनवरी, 2026 को मकर संक्रांति का त्यौहार मनाने के बहाने उस ने उसे 10 जनवरी को इंदौर से अपने गांव खिरिया थापक बुला लिया.

इस के बाद योजना को अंजाम देने के लिए मुनेश बेटी निधि को 13 तारीख की रात खाना खाने के बाद टहलने के बहाने सरसों के खेत में ले गया, जहां वह एकटक उसे निहारने लगा. निधि ने इस तरह अपने पापा को निहारते देखा तो बोली, ”पापा, आप आज मुझे इस तरह क्यों देख रहे हैं. आप के दिल में जो भी बात हो बिना किसी हिचकिचाहट के कह दो.’’

मुनेश को लगा कि यह उचित मौका है, बेटी से अपने दिल की बात कहने का. मुनेश ने निधि को समझाते हुए प्यार से कहा, ”बेटी, घर की इज्जत का ध्यान रखते हुए मकर संक्रांति का त्यौहार मनाने के बाद तुम चुपचाप मायके से अपनी ससुराल चली जाना, इसी में तुम्हारी भलाई है.’’

निधि मुंहफट थी. पापा की बात का विरोध करते हुए उस ने दो टूक शब्दों में कहा, ”पापा, मैं किसी भी सूरत में अपनी ससुराल नहीं जाऊंगी, आप मुझ पर ज्यादा दबाव डालेंगे तो मैं बिना मकर संक्रांति का त्यौहार मनाए अभी रात में ही अपने सूरज के पास इंदौर जाने के लिए घर से निकल लूंगी.’’

बेटी के मुंह से ऐसा सुनते ही मुनेश का माथा ठनक गया. इस से पहले कि निधि कुछ समझ पाती, मुनेश ने अपनी कमर में खोंसा देशी कट्टा निकाल कर निधि के सीने में गोली मार दी. गोली लगते ही निधि कटे पेड़ की तरह खेत में गिर पड़ी और मौके पर ही उस ने दम तोड़ दिया, इस के बाद पूरे इत्मीनान के साथ मुनेश बेटी की लाश को खेत में लावरिस पड़ी छोड़ कर फरार हो गया.

विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने मुनेश धानुक को अदालत में पेश किया, जहां कोर्ट के आदेश पर उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया. इस से पूर्व एसडीओपी रविंद्र वास्कले ने निधि की हत्या और हत्यारे की गिरफ्तारी से संबंधित जानकारी मीडिया के लोगों से साझा की. निधि की हत्या से संबंधित मामला न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन दुखद बात यह रही की जिस बेटी को ब्याह कर उस के जीवन को संवारने का सपना पेरेंट्स ने पाल रखा था, वह निधि की नासमझी या यूं कहिए कि उस की शर्मनाक करतूत की वजह से चकनाचूर हुआ ही, उस की खुशहाल गृहस्थी भी उजड़ गई. इस के अलावा उस के पापा मुनेश धानुक बेटी की हत्या के जुर्म में जेल चले जाने से मम्मी का भविष्य भी चौपट हो गया.

हालांकि बेटी की हत्या के आरोप में मुनेश के जेल जाने से उस के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बल्कि उस के चेहरे पर इस बात का संतोष साफ झलक रहा था कि बदनामी का दाग लगाने वाली बेटी को उस ने अच्छा सबक सिखाया. MP News