Bihar Crime News: रंगदारी नही दींं तो ले ली जान

Bihar Crime News: रविकांत को किसी से कोई मतलब नहीं था, वह अपना कमाताखाता था. लेकिन उस की कमाई पर जब कुछ बदमाशों की नजर लगी तो वह तो मारा ही गया, बेटे की मौत के गम में बाप की भी मौत हो गई.

26 जनवरी, 2016 की सुबह पटना के बेउर मोहल्ले में रहने वाले 45 वर्षीय रविकांत अपनी दुकान पर जाने के लिए घर से मोटरसाइकिल से निकले थे. राजापुर बाजार में उन की ज्वैलर्स शौप थी. करीब पौने 10 बजे वह अपनी दुकान पर पहुंच गए. दुकान की साफसफाई कर के वह अपनी गद्दी पर बैठे ही थे कि उन की दुकान में 3 लड़के घुस आए.

रविकांत उन सभी को जानते थे. वे तीनों इलाके के बदमाश थे. सुबहसुबह उन्हें अपनी दुकान में देख कर वह समझ गए कि ये आज भी कुछ लेने आए हैं. वह सहम उठे. उन का भयभीत चेहरा देख कर एक लड़के ने कहा, ‘‘चल, सोने की चेन और 2 लाख रुपए अभी निकाल.’’

रविकांत उस लड़के का चेहरा ताकने लगे. इस पर वह लड़का थोड़ा गुस्से में बोला, ‘‘सुना नहीं? चल, जो कहा है, जल्दी निकाल वरना जान से मार देंगे.’’

‘‘तुम जब भी आते हो, मैं तुम लोगों को कुछ न कुछ देता रहता हूं, मैं ने कभी मना नहीं किया. लेकिन आज मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसलिए आज मैं कुछ नहीं दे सकता.’’ रविकांत ने कहा.

लड़के ने फिर धमकाया, ‘‘रुपए निकाल नहीं तो अंजाम ठीक नहीं होगा.’’

‘‘तुम मेरी बात समझने की कोशिश करो. सुबहसुबह इतने पैसे मैं कहां से लाऊं?’’ रविकांत गिड़गिड़ाए.

‘‘लगता है, मेरी बात सीधी तरह से तेरे भेजे में नहीं घुस रही है.’’ लड़के ने धमकाते हुए कहा, ‘‘मैं आखिरी बार कह रहा हूं. बात मान ले, वरना जान से हाथ धो बैठेगा.’’

इसी बात पर उस बदमाश और रविकांत में बहस होने लगी. एकदम से गुस्से में आ कर बदमाश ने देसी कट्टे से रविकांत के सीने में एक के बाद एक कर के कई गोलियां दाग दीं. चीख कर रविकांत वहीं ढेर हो गए. उन बदमाशों ने रविकांत को हिलाडुला कर देखा. जब उन्हें विश्वास हो गया कि वह मर चुका है तो वे वहां से पैदल ही मैनपुरा मोहल्ले की ओर चले गए. गोलियों की आवाज सुन कर दुकानदारों ने दुकानों के शटर गिराने शुरू कर दिए थे. बाजार में भगदड़ मच गई थी. थोड़ी ही देर में बाजार में सन्नाटा पसर गया था.

कुछ लोग हिम्मत कर के रविकांत की दुकान पर पहुंच गए. उन्होंने रविकांत को लहूलुहान हालत में देखा तो घबरा गए. उन्होंने तुरंत उन्हें औटो में लादा और पटना मैडिकल कालेज अस्पताल ले गए. जांच के बाद डाक्टरों ने रविकांत को मृत घोषित कर दिया. इसी बीच किसी ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी थी. पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंच कर जरूरी काररवाई की और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

रविकांत के करीबियों ने पुलिस को बताया कि अपराधी दुर्गेश शर्मा और मुनचुन गोप पिछले 3 महीने से रविकांत से 10 लाख रुपए की रंगदारी मांग रहे थे. जब उन्होंने इतनी बड़ी रकम देने में मजबूरी जताई तो वे उन से सोने के गहनों की मांग करने लगे. एक बार रविकांत ने उन्हें 36 ग्राम सोने की चेन बना कर दी भी थी. इस के बाद भी वे चुप नहीं बैठे और पैसे मांगते रहे.

घटना के समय रविकांत के पिता सुरेश्वर प्रसाद अस्पताल में भरती थे. जब उन्हें पता चला कि उन के बेटे की हत्या कर दी गई है तो उन्हें इतना गहरा सदमा लगा कि उन्हें हार्टअटैक आ गया और उन की भी मौत हो गई. इस तरह 24 घंटे में घर में 2 मौतें हो गईं. पति और बेटे की मौत पर लाडली देवी टूट गईं. वह रोरो कर बारबार बेहोश हो रही थीं. रिश्तेदार उन्हें किसी तरह संभाल रहे थे. रविकांत के घर में मातमी सन्नाटा पसरा था.

गनीमत इस बात की थी कि रोज की तरह उस दिन रविकांत का बेटा सौरभ उन के साथ शोरूम पर नहीं गया था, वरना उस की जान को भी खतरा हो सकता था. संयोग से उस दिन सौरभ अपने बीमार दादा को देखने अस्पताल गया था. रविकांत ने ही सौरभ को 10 हजार रुपए दे कर अस्पताल भेजा था. पुलिस ने रविकांत की पत्नी शोभा से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि बदमाश दुर्गेश शर्मा, मुनचुन गोप आदि उस के पति को बारबार फोन कर के 100 ग्राम सोने की चेन और 10 लाख रुपए की मांग कर रहे थे. ये सब न देने पर उन्होंने उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी थी.

मोबाइल पर बारबार धमकी आने से उस के पति बेहद परेशान रहते थे. जब बदमाशों ने उन्हें ज्यादा ही परेशान करना शुरू कर दिया तो पति ने मोबाइल का सिमकार्ड तोड़ कर फेंक दिया और नया सिमकार्ड ले लिया. चूंकि वे बदमाश काफी खतरनाक थे, इसलिए पति ने डर की वजह से पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखाई थी. जिस दिन रविकांत की हत्या हुई थी, उसी दिन शाम को अपराधी मुनचुन गोप ने लूटपाट और मारपीट के केसों में वांछित रहने की वजह से अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था. उस के खिलाफ ये दोनों मामले पिछले साल दर्ज हुए थे. दोनों ही मामलों में पुलिस को उस की तलाश थी.

पुलिस को जब पता चला कि मुनचुन गोप ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया है तो पुलिस ने उसे रिमांड पर ले कर पूछताछ की. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह अपने साथियों गणेश राय और करमू राय के साथ रविकांत की दुकान पर रुपए लेने गया था. उस का मकसद रविकांत की हत्या करना नहीं, बल्कि वह उसे डराने व अन्य दुकानदारों में दहशत फैलाने के लिए उस के पैर में गोली मारना चाहता था, लेकिन करमू राय ने हड़बड़ी में उस के सीने में गोली मार दी.

पूछताछ में पुलिस को पता चला कि गणेश राय काफी दिनों से दुर्गेश के लिए काम कर रहा था. गणेश के ही कहने पर करमू राय ने 12 जनवरी, 2016 को रविकांत से 100 ग्राम सोने की चेन और 10 लाख रुपए की रंगदारी मांगी थी. रविकांत ने रंगदारी देने से साफ मना कर दिया था. उसी रात गणेश राय ने करमू राय, मुनचुन गोप और पगला विक्रम को अपने घर पर बुलाया था. सभी ने मिल कर योजना बनाई कि रविकांत और बाकी कारोबारियों में खौफ फैलाने के लिए रविकांत की दुकान पर फायरिंग की जाए. अगर ज्यादा जरूरी हो तो रविकांत के पैरों में गोली मार कर उसे जख्मी कर दिया जाए.

रविकांत हत्याकांड में दुर्गेश का नाम आने के बाद भी पुलिस ने उसे ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की. इस की वजह शायद यह थी कि उस की राजनीतिक पहुंच बहुत ऊंची थी. पुलिस ने उस के गुर्गों पगला विक्रम उर्फ राजा, रंजीत उर्फ भोला, जितेंद्र कुमार और पप्पू कुमार को गिरफ्तार कर लिया था.

ये उस के ऐसे गुर्गे थे, जो उस के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते थे. यही बोरिंग रोड, राजापुर, मैनपुरा, मंदिरी और दानापुर इलाके में व्यवसायियों और ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते थे. पगला विक्रम तो दुर्गेश का दाहिना हाथ माना जाता है. मूलरूप से नालंदा का रहने वाला पगला विक्रम बड़ी ही ईमानदारी से दुर्गेश के साथ काम करता था. यही वजह थी कि जब पिछले साल वह जेल गया था तो दुर्गेश ने ही उस के घर का सारा खर्च चलाया था.

जेल से निकलने के बाद पगला विक्रम उस के लिए खुल कर काम करने लगा था और दुर्गेश की गैरमौजूदगी में वही गिरोह को चलाता था. पिछले 15 सालों से दुर्गेश अपराध की दुनिया में छाया हुआ था. उस में एक खास बात यह थी कि वह ऊंची पहुंच रखने वाले लोगों से अपने संबंध बनाए हुए था. इसी वजह से पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं करती थी. उस के खिलाफ आपराधिक मामले तो दर्ज होते थे, लेकिन वह गिरफ्तार नहीं होता था.

पिछले साल 12 फरवरी को मैनपुरा के राजकीय माध्यमिक विद्यालय के पास पूर्व पार्षद रंतोष के भाई संतोष की हत्या में भी उस का नाम आया था. उस के कुछ दिनों पहले राजापुर पुल के पास मधु सिंह की हत्या में भी उस का नाम उछला था. हर अपराध में पुलिस ने उस के गुर्गों को तो पकड़ कर जेल भेज दिया था, लेकिन वह खुलेआम रंगदारी वसूलता रहता था. बिहार के जिला छपरा के थाना गरखा के फुलवरिया गांव का रहने वाला दुर्गेश ने सन 2000 के आसपास पटना के मैनपुरा इलाके में अपना अड्डा बनाया था. उस के खिलाफ पहला केस 10 अक्तूबर, 2000 को बुद्धा कालोनी थाने में डकैती का मुकदमा दर्ज हुआ था.

शुरूशुरू में उस ने दुर्दांत अपराधी सुल्तान मियां और चांदीलाल गोप के गिरोह में शूटर के रूप में काम किया था. लेकिन कुछ ही दिनों बाद उस ने अपने इन दोनों आकाओं को ठिकाने लगा दिया और खुद ही गिरोह की कमान थाम ली. सन 2008 में उस ने आरा में बैंक डकैती डाली. केवल इसी मामले में वह गिरफ्तार हुआ था. पुलिस ने गिरफ्तार कर के उसे बेऊर जेल भेज दिया था. पर किसी तरह उस ने माननीय उच्च न्यायालय में फरजी जमानती आदेश बनवा लिए और जेल से बाहर आ गया. इस के बाद वह पुलिस के लिए दूर की कौड़ी हो गया. धीरेधीरे उस पर पटना के थाना पाटलिपुत्र, राजीवनगर, बुद्धा कालोनी, एस.के. पुरी, दीघा और कोतवाली में 30 मुकदमे दर्ज हो गए.

सुल्तान और चांदीलाल के गायब होने के रहस्य का आज तक खुलासा नहीं हो सका है. इस के बाद उस ने अपनी राह में बड़ी बाधा बन कर उभरे संतोष को भी 12 फरवरी, 2015 को मार डाला. संतोष अपराधियों से कारोबारियों की सुरक्षा मुहैया कराने लगा था. इस से दुर्गेश को रंगदारी का पैसा मिलना बंद हो गया था. इस के बाद दुर्गेश पहले से ज्यादा खूंखार हो गया. उस ने रंगदारी वसूलने के लिए कड़ा रवैया अपना लिया. पुलिस सूत्रों के मुताबिक दुर्गेश पिछले कई सालों से आरा में रह कर अपना गैंग चला रहा था. वह अकसर अपने गिरोह के लोगों से मिलने पटना और आरा के बीच स्थित नेउरा स्टेशन पर आता था.

आखिरी बार वह फरवरी, 2015 में पटना आया था. इलेक्ट्रीशियन रह चुका दुर्गेश अपने पास कोई मोबाइल फोन नहीं रखता. उस के साथ रहने वाले बदमाश भी कुछकुछ दिनों में अपना सिमकार्ड बदल लेते थे. जब भी उसे किसी व्यवसायी को धमकी देनी होती थी या उस से रंगदारी वसूलनी होती थी, वह फोन का इस्तेमाल करने के बजाय अपने किसी गुर्गे के जरिए व्यवसायी तक संदेश भिजवा देता था.

पुलिस को यह भी पता चला है कि दुर्गेश ने कोलकाता में अपना बिजनैस फैला रखा है. दुर्गेश राजापुर पुल के पास अपने नाम से एक शौपिंग कौम्पलेक्स बनवा रहा है. इस कौम्पलेक्स में उस के साथी पप्पू, बबलू, गिरीश और गुड्डू सिंह भी पार्टनर हैं. रंगदारी और लूट के पैसे से दुर्गेश ने पटना और उस के आसपास के इलाकों में अच्छीखासी प्रौपर्टी बना ली है. रविकांत की हत्या के बाद एसएसपी मनु महाराज ने उस की और उस के गिरोह के लोगों की जांच करानी शुरू कर दी है. उन का कहना है कि वह उन सब की संपत्ति का पता कर के उसे जब्त करने की काररवाई करेंगे. Bihar Crime News

Etah Crime Story: शक में उजाड़ा आशियाना

Etah Crime Story: सुखबीर के शक्की स्वभाव की वजह से पहली पत्नी छोड़ कर चली गई तो उस ने दूसरी शादी कर ली. लेकिन वह अपने स्वभाव को नहीं बदल सका. इस के बाद उस ने जो कुछ किया, उस की वजह से अब वह जेल में है.

उत्तर प्रदेश के जिला एटा के कस्बा भरथरा के रहने वाले गयाप्रसाद के परिवार में पत्नी के अलावा एक ही बेटा था सुखबीर. उस के पास खेती की ठीकठाक जमीन तो थी ही, कस्बे में बढि़या पक्का मकान भी था. छोटा परिवार था, इसलिए हर तरह से सुखी था. सुखबीर पढ़ाई के साथसाथ खेती के कामों में पिता का हाथ जरूर बंटाता था, लेकिन उस की सोच कुछ और ही थी. वह उस छोटे से कस्बे से निकल कर किसी बड़े शहर में रहना चाहता था.

सुखबीर का एक दोस्त राजपाल दिल्ली की एक गारमेंट बनाने वाली कंपनी में नौकरी करता था. वह जब भी घर आता, उसे देख कर सुखबीर को लगता था  कि वह उस से ज्यादा सुखी है. उसी की देखादेखी सुखबीर ने कस्बे के टेलर सुलतान की दुकान पर कपड़ों की सिलाई का काम सीखा और अच्छा कारीगर बनने के लिए घर में ही कपड़ों की सिलाई की दुकान खोल ली. सुखबीर शादी लायक हो गया था और कमाने भी लगा था. उस के लिए रिश्ते भी आने लगे थे. गयाप्रसाद ने एटा निवासी मोहर सिंह की बेटी महादेवी को पसंद कर के उस की शादी कर दी. इस बीच सुखबीर कस्बे वाली अपनी सिलाई की दुकान बंद कर के दिल्ली चला गया था. शादी के बाद वह महादेवी को भी दिल्ली ले आया. दिल्ली में वह नंदनगरी में किराए का कमरा ले कर रहता था.

महादेवी काफी खुशमिजाज और मिलनसार थी, इसलिए जल्दी ही आसपास रहने वाली औरतों से उस की दोस्ती हो गई. सुखबीर सुबह नौकरी पर जाता तो शाम को ही आता था. घर आ कर वह रोजाना महादेवी पूछता, ‘‘कोई आया तो नहीं था?’’

2-4 दिन तो महादेवी को उस का यह सवाल सामान्य लगा. लेकिन जब सुखबीर रोजाना और लगातार यही सवाल करने लगा तो उसे हैरानी हुई. आखिर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘अपने यहां कोई आने वाला है क्या, जो आप रोजाना एक ही बात पूछते हैं?’’

‘‘नहीं, मेरा मतलब पड़ोसियों से है.’’ सुखबीर ने कहा, ‘‘कोई पड़ोसी तो अपने यहां नहीं आया था?’’

‘‘पड़ोसियों को कोई काम पड़ेगा तो आएंगे ही. मुझे भी कोई काम पड़ता है तो मैं भी उन के यहां जाती हूं.’’ महादेवी ने सहजभाव से कहा.

महादेवी का इतना कहना था कि सुखबीर ने लपक कर उस के बाल पकड़ कर खींचते हुए कहा, ‘‘खबरदार, ऐसी भूल आगे से कतई मत करना. किसी भी पड़ोसी से कोई मतलब मत रखना. तुम्हें जिस भी चीज की जरूरत हो, मुझ से कहना.’’

पति का यह रूप देख कर महादेवी सन्न रह गई. उसे लगा कि उस का पति शक्की है. उस दिन के बाद महादेवी ने खुद को कमरे में कैद कर लिया. लेकिन अगलबगल रहने वालों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए मौका मिलने पर वे उस के पास आ कर बैठ जाते थे. महादेवी उन्हें मना भी नहीं कर सकती थी. उस दिन महादेवी को डांट कर शक्की स्वभाव के सुखबीर को लगा कि उस ने सब ठीक कर दिया है. महादेवी अब कमरे के बाहर कदम नहीं रखेगी. वह कमरे से बाहर ही नहीं निकलेगी तो उस की दोस्ती किसी से नहीं होगी.

दरअसल, सुखबीर को इस बात का डर था कि मिलनेजुलने से कहीं महादेवी की किसी लड़के से आंख न लड़ जाए. अगर आंख लड़ गई तो वह उसे छोड़ कर उस लड़के के साथ चली जाएगी. तब वह घर वालों और समाज को क्या जवाब देगा. सुखबीर महादेवी पर अंकुश लगा कर यही सोच रहा था कि अब उसे चिंता करने की जरूरत नहीं है. लेकिन जब एक दिन पड़ोसी बाल्टी ले कर पानी मांगने आ गया तो सुखबीर का खून खौल उठा. उस ने उसे धक्का देते हुए कहा, ‘‘हमारे घर नगरपालिका का नल लगा है क्या, जो पानी लेने चले आए. आज के बाद कभी इधर दिखाई दिए तो ठीक नहीं होगा.’’

महादेवी को यह बुरा तो बहुत लगा, लेकिन न वह कुछ कह सकती थी और न कुछ कर सकती थी. शक्की आदमी का क्या भरोसा, उसे ही कुछ कह दे. शक की वजह से उस ने उस की जिंदगी नरक कर दी है. उस के पास सिर्फ 2 ही काम थे, घर के काम करना और रात को पति को खुश करना. उस की अपनी न कोई इच्छा रह गई थी, न खुशी.

महादेवी ने फोन कर के पिता को सारी बातें बता दी थीं. मोहर सिंह ने आश्वासन दिया था कि वह जल्दी ही दिल्ली आ कर उसे लिवा लाएगा. लेकिन इसी बीच महादेवी की सास सुजाता बीमार पड़ी तो सुखबीर उसे मां की सेवा के लिए गांव छोड़ गया. महादेवी की सेवा से सुजाता जल्दी ही ठीक हो गई. बहू की सेवा से वह बहुत खुश थी. गयाप्रसाद भी बहू से खुश थे.

महादेवी के गांव जाने के बाद सुखबीर बेचैन रहने लगा था. उसे लगता था कि वह गांव के किसी लड़के से जरूर प्यार कर बैठेगी. अपने इसी शक की वजह से एक दिन वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. घर आ कर जब उसे पता चला कि महादेवी गर्भवती है, तब उसे लगा कि यह बच्चा उस का नहीं, किसी और का है. इतना ही नहीं, उस ने महादेवी से पूछ भी लिया, ‘‘महादेवी, तुम्हारे गर्भ में किस का पाप पल रहा है?’’

महादेवी ने उसे तो भलाबुरा कहा ही, यह भी तय कर लिया कि अब वह किसी भी कीमत पर उस शक्की आदमी के साथ नहीं रहेगी. उस ने पिता को फोन कर के सारी बात बता कर साथ ले चलने को कहा.

मोहर सिंह अगले ही दिन आ गए. उन्होंने जब गयाप्रसाद तथा सुजाता को पूरी बात बताई तो वे हैरान रह गए. क्योंकि उन्हें इस बारे में कुछ पता ही नहीं था. मोहर सिंह ने जब इस बारे में सुखबीर से बात की तो उस ने कहा, ‘‘महादेवी का चरित्र ठीक नहीं है. उस के गर्भ में पल रहा बच्चा मेरा नहीं है.’’

गयाप्रसाद ने उसे बहुत डांटाफटकारा. लेकिन महादेवी ने तो पहले ही तय कर लिया था कि अब उसे वहां नहीं रहना, इसलिए गयाप्रसाद और सुजाता के रोकने के बावजूद वह पिता के साथ चली गई.

समय पर उसे बेटा पैदा हुआ. मोहर सिंह ने इस बात की सूचना गयाप्रसाद को दे दी. गयाप्रसाद ने सुखबीर से बेटे और बहू को लाने के लिए कहा, पर उस ने मना कर दिया और दिल्ली चला गया. गयाप्रसाद और सुजाता अकेले पड़ गए थे. बेटे की हरकतों से वे बीमार रहने लगे और कुछ ही दिनों में दोनों की मौत हो गई. मांबाप की मौत के बाद सुखबीर को भी लगने लगा कि वह एकदम अकेला पड़ गया है, इसलिए उसे दूसरा विवाह कर लेना चाहिए.

सुखबीर दिल्ली में जहां रहता था, वहां से कुछ दूरी पर सरवरी बेगम रहती थी. उस के कई रिश्तेदार सीमापुरी और नंदनगरी में रहते थे. उस ने गांव के कई लड़कों की शादी कराई थी. उस की उन लोगों से जानपहचान थी, जो बंगाल, बिहार और उड़ीसा से लड़कियां लाते थे और जरूरतमंदों से पैसे ले कर उन की शादियां करवा देते थे.

सुखबीर ने सरवरी से कहा, ‘‘मौसी, तुम मेरी भी शादी करा दो, जो पैसे लगेंगे, मैं दे दूंगा.’’

सरवरी उस के शक्की स्वभाव को जानती थी, इसलिए उस ने मना कर दिया. लेकिन सुखबीर उस के पीछे पड़ गया. उस ने वादा किया कि अब वह पहले जैसा नहीं करेगा. इस के बाद सरवरी ने उस से पैसे तैयार रखने को कह दिया.

कुछ दिनों बाद सरवरी ने बिहार की काजल से उस की शादी करवा दी. सुखबीर ने काजल के लिए जो रकम खर्च की थी, उस के हिसाब से काजल बहुत अच्छी थी. इस तरह एक बार फिर सुखबीर की गृहस्थी बस गई. कमरे पर आते ही सुखबीर ने काजल से साफ कह दिया कि उसे अपना कमरा छोड़ कर न तो आसपड़ोस में किसी के यहां जाना है और न अपने कमरे में किसी को आने देना है. दरवाजा बंद कर के चुपचाप अपने कमरे में रहना है.

कुछ दिनों बाद सुखबीर ने वह कमरा छोड़ दिया. इस की वजह यह थी कि कहीं काजल को किसी से उस के शक्की स्वभाव के बारे में पता न चल जाए. नई जगह सुखबीर को बनाबनाया खाना भी मिलने लगा और देहसुख भी. काजल गरीब परिवार से आई थी, उसे कमाने वाला पति मिल गया था, इसलिए वह बहुत खुश थी, लेकिन उस की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. सुखबीर जब तक घर से बाहर रहता, यही सोचता रहता कि कहीं कोई काजल को बरगला कर उसे भगा न ले जाए. मोहल्ले के कई लड़के अभी कुंवारे थे.

घर आ कर सुखबीर काजल से रोजाना पूछता कि वह दिन भर क्या करती रही, कोई आया तो नहीं था, तुम किसी के यहां गई तो नहीं थी?’’

एक जैसे सवालों का रोजरोज जवाब देतेदेते एक दिन काजल को गुस्सा आ गया. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें क्या लगता है, मैं दिन भर कमरे के अंदर सोती रहूंगी, पड़ोस में किसी से बात नहीं करूंगी?’’

‘‘इस का मतलब मेरे जाने के बाद तुम आसपड़ोस में जा कर आवारागर्दी करती हो?’’ कह कर सुखबीर उस की पिटाई करने लगा.

काजल यह सोच कर परेशान थी कि उस ने ऐसा क्या कह दिया, जो सुखबीर उस की पिटाई करने लगा. जब वह थक गया तो उसे समझाने लगा, ‘‘तुम्हें पता नहीं, यहां आसपड़ोस में सब लफंगे रहते हैं, इन से मिलनाजुलना ठीक नहीं है. बिना मतलब की बदनामी होगी.’’

काजल ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन उसे पता था कि आसपड़ोस में कोई लुच्चालफंगा नहीं रहता. सभी एकदूसरे के सुखदुख में काम आने वाले हैं. उस का पति ही शक्की है.

एक दिन काजल ने सुखबीर को खाना देते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे गांव का कोई राजपाल आया था. वह तुम्हारे बारे में पूछ रहा था.’’

‘‘तुम ने उसे बैठाया नहीं?’’

‘‘मैं उसे क्यों बैठाऊंगी,’’ काजल ने कहा.

‘‘अच्छा किया, वह अच्छा आदमी नहीं है.’’

राजपाल का इस तरह कमरे पर आना सुखबीर को अच्छा नहीं लगा. वह उस का दोस्त था और उसी के साथ नौकरी करता था. सुखबीर को वही दिल्ली लाया था. राजपाल की शादी नहीं हुई थी, इसलिए सुखबीर को उस से खतरा महसूस होता था. अगले दिन सुखबीर नौकरी पर जा रहा था तो राजपाल उसे रास्ते में मिल गया. उस ने कहा, ‘‘अच्छा हुआ सुखबीर तुम मिल गए. खुशी की बात है कि तुम ने शादी कर ली. इसी तरह मेरी भी कहीं करा दो.’’

सुखबीर ने 2-4 बातें कर के किसी तरह राजपाल से पीछा छुड़ाया. राजपाल भी वहीं रहता था, इसलिए अकसर दोनों की मुलाकात हो जाती थी. उसे देखते ही सुखबीर मुंह घुमा कर चला जाता था. एक दिन राजपाल ने उसे रोक कर पूछा, ‘‘क्या बात है सुखबीर, तुम मुझे देख कर मुंह क्यों घुमा लेते हो?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. सुबह मिलते हो तो ड्यूटी पर जाना होता है, शाम को थका होता हूं.’’ सुखबीर बहाना बना कर चलने लगा तो राजपाल ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘शादी की है, कम से कम एक दिन घर में दावत ही कर दो. मन बदल जाएगा, होटल का खाना खाखा कर जी ऊब गया है.’’

‘‘काजल किसी से मिलनाजुलना पसंद नहीं करती.’’ सुखबीर ने कहा.

राजपाल हैरानी से उसे देखता रह गया. उस दिन काजल ने उस से कितनी इज्जत के साथ बात की थी. उस ने सोचा कि किसी दिन वह काजल से अकेले में बात करेगा.

दूसरी ओर सुखबीर को लगा कि राजपाल काजल के पीछे पड़ गया है. घर पहुंचते ही उस ने काजल से पूछा, ‘‘मेरे जाने के बाद राजपाल आता है क्या?’’

‘‘हां, 2-3 बार तुम्हें पूछने आया था?’’ काजल ने कहा.

सुखबीर उस की पिटाई करते हुए बोला, ‘‘तुम ने बताया क्यों नहीं?’’

बिना मतलब की यह मारपीट काजल से सहन नहीं हुई. उस ने सुखबीर को धक्का दे कर कहा, ‘‘तुम्हारी पहली पत्नी तुम्हारे इसी व्यवहार से छोड़ कर चली गई. तुम मुझे खरीद कर लाए हो तो इस का मतलब यह नहीं कि मैं तुम्हारा हर अत्याचार सहती रहूंगी.’’

काजल के इस तरह डट कर खड़ी होने से सुखबीर को लगा कि यह भी किसी के बहकावे में आ गई है. जरूर कोई इसे फुसला रहा है. कहीं यह उसे जहर दे कर उस के साथ चली न जाए, वह रात भर इसी बात पर विचार करता रहा. अंत में उस ने तय किया कि काजल को ले कर वह भरथरा चला जाएगा और फिर से कपड़े सीने की अपनी दुकान खोल लेगा.

सुखबीर काजल को ले कर गांव आ गया और अपनी कपड़े सीने वाली दुकान खोल ली. वह कपड़े अच्छे सिलता था, इसलिए उस की दुकान चल निकली.

कुछ दिनों बाद राजपाल गांव आया तो उस से मिलने उस की दुकान पर जा पहुंचा. जब राजपाल ने उसे बताया कि वह भी नौकरी छोड़ कर गांव आ गया है तो वह सन्न रह गया. उसे लगा कि इस ने नौकरी काजल के लिए छोड़ी है. अब वह काजल और राजपाल पर नजर रखने लगा. कुछ दिनों बाद जब काजल ने बताया कि वह गर्भवती है तो सुखबीर को लगा कि काजल और राजपाल के जो नाजायज संबंध हैं, यह उसी का परिणाम है. इस की वजह यह थी कि सुखबीर के शक्की मिजाज से काजल परेशान थी. इधर कभीकभार वह राजपाल से मिलने लगी थी.

दरअसल गांव में वह सिर्फ राजपाल को ही जानती थी. वह जब भी उस से मिलती सुखबीर की शिकायत कर के किसी भी तरह उस से छुटकारा दिलाने को कहती. राजपाल अविवाहित था. उसे काजल से हमदर्दी थी. साथ ही लगाव भी हो गया था. इसलिए वह उसे मौका मिलने पर छुटकारा दिलाने का आश्वासन देता रहता था.

सुखबीर काजल और राजपाल पर नजर रख ही रहा था, इसलिए उसे इन के मिलनेजुलने की जानकारी हो गई. लेकिन उस ने कभी अपनी आंखों से दोनों को नहीं देखा था. फिर भी वह घर में ताला लगा कर दुकान पर जाने लगा. काजल एक तरह से कैदी बन कर रह गई थी. एक दिन सुखबीर ताला बंद करना भूल गया तो काजल ने मौका पा कर एक बच्चे को भेज कर राजपाल को बुलवा लिया. उस ने राजपाल से कहा कि वह अपने मांबाप के पास जाना चाहती है, इसलिए किसी तरह उस का यह संदेश उस के मांबाप तक भिजवा दे.

इसी बीच सुखबीर को याद आया कि वह घर खुला छोड़ आया है. ताला बंद करने वह घर पहुंचा तो उस ने राजपाल और काजल को बातें करते देख लिया. इस के बाद वह खुद को रोक नहीं पाया और डंडा ले कर राजपाल को दौड़ा लिया.

राजपाल जान बचा कर भागा. वह तो उस के हाथ नहीं लगा, लेकिन काजल फंस गई. पहले उस ने लोहे की रौड से उस की पिटाई की. वह बेहोश हो गई तो घर में सब्जी काटने वाली छुरी से उस पर कई वार कर दिए. थोड़ी देर में काजल मर गई. पड़ोसियों ने काजल की चीखें तो सुनी थीं, लेकिन कोई सुखबीर के मामले में पड़ना नहीं चाहता था, इसलिए कोई उसे बचाने घर के अंदर नहीं गया.

सुखबीर का गुस्सा शांत हुआ तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस ने फावड़े से गड्ढा खोद कर लाश को गाड़ दिया और घर में ताला लगा कर भाग निकला. पड़ोसियों ने सुबह सुखबीर के घर ताला लगा देखा तो पुलिस को सूचना दे दी. कोतवाली देहात के प्रभारी पदम सिंह पुलिस के साथ सुखबीर के घर पहुंचे तो अंदर की स्थिति देख कर हैरान रह गए. ताजी खुदी मिट्टी के बीच एक पैर दिखाई दे रहा था.

पदम सिंह ने मिट्टी हटवाई तो काजल की लाश बाहर आ गई. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर थाने में हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर सुखबीर की तलाश शुरू कर दी.

पुलिस जानती थी कि सुखबीर दिल्ली भाग सकता है, इसलिए दिल्ली जाने वाले सभी रास्तों पर नाकाबंदी कर दी गई. आखिर सुखबीर एटा के बसअड्डे पर मिल गया. वह भाग इसलिए नहीं सका, क्योंकि उस के पास किराए के पैसे नहीं थे. उस ने सोचा था कि रात को घर जाएगा और चुपके से कुछ पैसे और सामान ले कर भाग जाएगा.

पूछताछ में उस ने काजल की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस का कहना था कि काजल एक चरित्रहीन औरत थी, इसलिए उस ने उसे मार दिया. पूछताछ के बाद उसे जेल भेज दिया गया. अपने शक्की स्वभाव के कारण उस ने घर तो उजाड़ा ही, जिंदगी भी बरबाद कर ली. Etah Crime Story

 

Mumbai Crime Story: एक विवाहिता की खूनी लव स्टोरी

Mumbai Crime Story: सलमान से प्यार होने के बाद संगीता को स्वप्निल कांटे की तरह चुभने लगा था. उस ने इस कांटे को निकालने के लिए सलमान से कहा तो अपराध करने से पहले उस ने यह भी नहीं सोचा कि उस के पत्नीबच्चों का क्या होगा…

स्वप्ननगरी के नाम से मशहूर मुंबई से लगा महाराष्ट्र का एक जिला है रायगण. इसी जिले की तहसील पनवेल के गांव न्हावा शेवा में नामदेव पाटील का छोटा सा परिवार रहता था. उन की पत्नी की मौत हो चुकी थी. समुद्र के किनारे बसा यह गांव सुप्रसिद्ध इंटरनेशनल बंदरगाह के पास है, जिस से यहां से प्रतिदिन पचासों मालवाहक जहाज देशविदेश आतेजाते हैं.

28 वर्षीय स्वप्लिन नामदेव पाटील का एकलौता बेटा था. करीब 7 साल पहले सन 2008 में स्वप्लिन का विवाह नवी मुंबई स्थित नेरुल के रहने वाले स्वर्गीय मारुती गायकवाड की एकलौती बेटी संगीता गायकवाड़ के साथ हुआ था. पतिपत्नी एकदूसरे से खुश थे. दोनों के 2 बच्चे थे, 5 वर्षीया अक्षरा और 4 वर्षीय जिविक. बच्चे पास के ही एक इंगलिश स्कूल में पढ़ते थे.

स्वप्लिन पाटील उरण स्थित ओएनजीसी में अस्थाई कर्मचारी के रूप में काम करता था. वहां से उसे इतना वेतन मिल जाता था कि उस के परिवार का खर्च आराम से चल सके. वह सुबह अपनी मोटरसाइकिल से ड्यूटी पर जाता था और शाम को 8-9 बजे तक घर लौट आता था.

संगीता सुबह पति को नाश्ता कराने और औफिस भेजने के बाद बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेजती थी. संगीता सुंदर तो थी ही, महत्त्वाकांक्षी और फैशनपरस्त भी थी. उसे पत्नी के रूप में पा कर स्वप्निल बहुत खुश था. स्वप्निल और संगीता के वैवाहिक जीवन के 7 साल बड़े मजे में गुजर गए. लेकिन वक्त ने धीरेधीरे रंग बदलना शुरू किया.

1 दिसंबर, 2015 की सुबह लगभग 7 बजे नवी मुंबई के नेरुल थाने के कांस्टेबल कांकड़ अपने इलाके की गस्त कर के थाने लौट रहे थे, तभी उन्हें खबर मिली कि नेरुल के सेक्टर 14 के रामलीला मैदान परिसर में बुरी तरह घायल एक युवक पड़ा है. यह खबर पुलिस कंट्रोल रूम से प्रसारित हुई थी. खबर सुन कर जब कांस्टेबल कांकड़ घटनास्थल पर पहुंचे, तब तक वहां लोगों की भीड़ लग चुकी थी.

घायल युवक के माथे और सिर में गंभीर चोटों के निशान थे, जिन से निकला खून बह कर आसपास फैल गया था. घायल युवक के सिर के पास ही एक बड़ा सा पत्थर पड़ा था, जिस पर खून के निशान थे. इस से पता चलता था कि युवक को उसी पत्थर से मार कर घायल किया गया था. कांस्टेबल कांकड़ ने वहां लगी भीड़ को हटा कर घायल युवक का निरीक्षण किया तो उन्हें लगा कि घायल युवक धीरेधीरे सांस ले रहा है. कांकड़ विलंब किए बिना 2 लोगों के साथ घायल युवक को नेरुल के डाक्टर डीवाई पाटील अस्पताल ले गए. लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. निरीक्षण के बाद डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

यह जानकारी नेरुल पुलिस थाने के वरिष्ठ महिला पुलिस इंसपेक्टर संगीता शिंदे अल्फांसो को मिली तो उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और तत्काल सहायक इंसपेक्टर नागराज मजगे, असिस्टैंट इंसपेक्टर जगवेंद्र सिंग राजपूत, अर्जुन गायकवाड़, सबइसंपेक्टर नितिन शिंदे, कांस्टेबल पोपट पावरा, जालिंदर कोली, गणेश वनकर और गणेश खेड़कर को साथ ले कर डाक्टर डीवाई अस्पताल पहुंच गई. पहले उन्होंने अस्पताल के डाक्टरों से मृतक के बारे में पूछताछ की. उस के बाद मृतक के कपड़ों की तलाशी ली. तलाशी में मृतक की जेब से कुछ कागज निकले, जिन में मृतक का पहचान पत्र और एक विजिटिंग कार्ड भी था. पहचान पत्र में मृतक का नाम और पता लिखा था.

विजिटिंग कार्ड पर लिखे फोन नंबर पर फोन करने से पता चला कि वह विजिटिंग कार्ड मृतक के मामा जितेंद्र म्हात्रे का था. पुसिल ने म्हात्रे को तुरंत डाक्टर डीवाई अस्पताल पहुंचने को कहा. विजिटिंग कार्ड के पीछे भी एक नंबर लिखा था. उस नंबर पर फोन किया गया तो वह नंबर मृतक के चचेरे भाई सत्यवान पाटील का निकला. मृतक का नाम स्वप्निल पाटील था. पुलिस ने सत्यवान को भी अस्पताल पहुंचने को कह दिया. जितेंद्र म्हात्रे और सत्यवान पाटील ने डाक्टर डीवाई पाटील अस्पताल पहुंच कर स्वप्निल को जिस हालत में देखा, उस से उन के होश उड़ गए. उन्होंने यह खबर स्वप्निल के घर वालों को दे दी.

पुलिस अभी सत्यवान और जितेंद्र म्हात्रे से स्वप्निल के बारे में पूछताछ कर रही थी कि मृतक का सारा परिवार अस्पताल पहुंच गया. स्वप्निल की लाश देख कर पूरा परिवार छाती पीटपीट कर रोने लगा. जितेंद्र म्हात्रे और सत्यवान ने उन्हें जैसेतैसे संभाला. आवश्यक पूछताछ के बाद पुलिस ने स्वप्निल की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के बाद घटनास्थल का निरीक्षण कर के पुलिस थाने लौट आई.

थाने लौटते वक्त पुलिस स्वप्निल के मामा जितेंद्र म्हात्रे और सत्यवान को अपने साथ थाने ले आई थी. पुलिस ने उन्हीं दोनों की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के विरुद्ध स्वप्निल की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. शुरुआती पूछताछ में संगीता शिंदे अल्फांसो को यह मामला काफी रहस्यमय लगा. इसलिए उन्होंने इस केस की जांच खुद ही करने का फैसला लिया.

पारिवारिक परिस्थितियों के बारे में गहराई से पूछताछ करने पर मृतक के मामा जितेंद्र म्हात्रे ने संगीता शिंदे को बताया कि उन्हें जिस व्यक्ति पर संदेह है, उस का नाम महेश ठाकुर है. कुछ सालों पहले महेश ठाकुर और स्वप्निल की पत्नी संगीता के बीच चक्कर था. संगीता का चरित्र कुछ ठीक नहीं था, इस बात को ले कर महेश ठाकुर और स्वप्निल के बीच जोरदार झगड़ा हुआ था. उस समय स्वप्निल ने महेश ठाकुर को काफी मारापीटा था. पिटने के बाद महेश ठाकुर ने स्पप्निल को देख लेने की धमकी दी थी.

संगीता शिंदे ने सोचा भी नहीं था कि इस गंभीर मामले की जांच आगे बढ़ाने के लिए इतनी जल्दी राह मिल जाएगी. उन्होंने तुरंत अपने सहायकों को आदेश दिया कि महेश ठाकुर और संगीता को पूछताछ के लिए थाने ले आएं. उन के आदेश पर पुलिस टीम दोनों को थाने ले आई. थाने पर दोनों से अलगअलग पूछताछ की गई. महेश ठाकुर से हुई पूछताछ में वह तो निर्दोष लगा, लेकिन संगीता से थोड़ी सख्ती के साथ पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि बीते दिन स्वप्निल अपने दोस्त सलमान के साथ बैठा शराब पी रहा था. तब यह बात उस ने उसे फोन कर के बताई थी. इस से ज्यादा वह कुछ नहीं जानती.

इस पूछताछ के बाद पुलिस ने सलमान के बारे में जानकारी एकत्र की, साथ ही उस का मोबाइल नंबर ले कर रजिस्ट्रेशन फार्म निकलवाया. रजिस्ट्रेशन फार्म से उस का पता मिल गया. सलमान की गिरफ्तारी के लिए इंसपेक्टर संगीता शिंदे अल्फांसो ने सबइंसपेक्टर नितिन शिंदे के नेतृत्व में एक पुलिस टीम को उस के पते पर भेज दिया. 4 दिसंबर, 2015 को सबइंसपेक्टर नितिन शिंदे ने अपनी टीम के साथ कराड़ शहर जा कर सरगम लौज में छिपे बैठे सलमान और उस के साथी शाहिद सुतार को गिरफ्तार कर लिया. जब पुलिस टीम उन्हें मुंबई लाई तो संगीता शिंदे ने उन से पूछताछ की.

लेकिन दोनों ने खुद को निर्दोष बताया. संगीता शिंदे ने उन की जुबान खुलवाने के लिए उन्हें जांच टीम के हवाले कर दिया. दोनों पुलिस टीम को गुमराह करते हुए खुद को निर्दोष बताते रहे. इस के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश कर के रिमांड लिया और पूछताछ शुरू की. आखिर पुलिस को दोनों के साथ थोड़ी सख्ती करनी पड़ी, साथ ही उन्हें यह भी बता दिया गया कि संगीता पुलिस हिरासत में है और उस ने सब कुछ बता दिया है. पुलिस का यह दांव काम कर गया.

बचाव का कोई रास्ता न देख दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उन दोनों की अपराध स्वीकारोक्ति के बाद एक खूनी लव स्टोरी का सच सामने आया. 21 वर्षीय सलमान शेख जिला सतारा के कराड़ शहर स्थित सांई बाबा नगर में अपने दादादादी, 2 छोटे भाई, बहन, मां और पत्नी कश्मीरा के साथ रहता था. बड़ा होने के बावजूद यह परिवार हर तरह से सुखी और संपन्न था. सलमान के पिता का कराड़ शहर में दूध का कारोबार था. उन के पास अच्छी नस्ल की काफी भैंसें थीं.

सलमान उन का बड़ा बेटा था. लाडप्यार में पलाबढ़ा सलमान आठवीं से आगे नहीं पढ़ पाया था. जवान होते ही पिता ने उस की शादी अपने एक रिश्तेदार की बेटी कश्मीरा से कर दी थी, साथ ही उसे अपने कारोबार में भी लगा लिया था. सलमान शराब और शबाब का शौकीन था. जब तक उस की पत्नी उस के साथ रहती थी, तब तक वह ठीक रहता था. उस के जाते ही वह इधरउधर मुंह मारने लगता था. उस के ठिकाने होते थे कराड़ के होटल और लौज.

स्वप्निल और संगीता से सलमान की मुलाकात कुछ महीने पहले कराड़ के सरगम लौज में हुई थी. दरअसल स्वप्निल और संगीता पिकनिक मनाने कराड़ गए थे. उन दिनों सलमान की पत्नी कश्मीरा गर्भवती होने की वजह से अपने मायके गई हुई थी. सलमान मन बहलाने के लिए उस लौज में ठहरा था. सलमान ने संगीता को देखा तो वह उसी के सपने देखने लगा. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद संगीता के सौंदर्य में कोई कमी नहीं आई थी. यही वजह थी कि उस का दूधिया बदन पहली ही नजर में सलमान की आंखों में समा गया था.

संगीता की नजदीकी पाने के लिए सलमान ने उस के पति स्वप्निल से दोस्ती गांठ ली. दरअसल स्वप्निल शराब का शौकीन था. जाहिर है, पीनेपिलाने वालों से दोस्ती करना बड़ा आसान होता है. पहला दांव चलते हुए सलमान उस का हमप्याला बन गया. एक टेबल पर साथसाथ पीने के बाद सलमान ने स्वप्निल के सामने प्रस्ताव रखा कि वह गाइड बन कर उन लोगों को शहर की सभी खासखास जगहों पर घुमाएगा. उस ने ऐसा ही किया भी.

स्वप्निल सलमान के व्यवहार का कायल हुआ तो संगीता उस के व्यक्तित्व की. कराड़ छोड़ते समय स्वप्निल और सलमान दोनों गर्मजोशी से गले मिले. दोनों ने अपनाअपना मोबाइल नंबर पहले ही एकदूसरे को दे दिया था. सलमान ने बातोंबातों में संगीता का नंबर भी हासिल कर लिया था. सलमान को स्वप्निल का ड्यूटी टाइम पता था. वह संगीता को ऐसे समय फोन करने लगा, जब उस का पति घर पर नहीं होता था. धीरेधीरे संगीता भी उस की बातों में रुचि लेने लगी. नतीजा यह हुआ कि दोनों एकदूसरे से खुलते गए और औपचारिकताएं पीछे छूटती गईं. सलमान जबतब संगीता को कराड़ आने का आमंत्रण देता रहता था. लेकिन स्वप्निल की वजह से संगीता का कराड़ जाना संभव नहीं था.

धीरेधीरे स्थिति यह आ गई कि संगीता की जिंदगी में भले ही स्वप्निल था, पर सपनों में सलमान था. अधर में फंसी संगीता चिड़चिड़ी हो गई थी. अब उस की पति से भी आए दिन तकरार होने लगी थी. तकरार होती तो कभीकभी वह अपने मायके नेरुल चली जाती. वहां बहाना कर के वह कराड़ चली जाती, जहां सलमान उस के ठहरने, खानेपीने का इंतजाम करता. नतीजा यह हुआ कि दोनों के बीच अनैतिक संबंध बन गए. जब संगीता कराड़ से वापस लौटती तो सलमान उसे 5-10 हजार रुपए भी दे देता था. अब तक संगीता पूरी तरह बदल चुकी थी. उस ने पति, बच्चों और ससुर की परवाह करना छोड़ दिया था. उस के ख्वाबों में केवल सलमान बसता था. वह मन ही मन दोनों की तुलना करती तो स्वप्निल से सलमान ही बेहतर नजर आता.

दूसरी ओर सलमान और संगीता के संबंधों के बारे में स्वप्निल को कोई जानकारी नहीं थी. बहरहाल सलमान की वजह से स्वप्निल और संगीता के बीच दूरियां बढ़ती गईं. इन दूरियों को बढ़ाने में स्वप्निल की शराब पीने की लत भी एक वजह बनी. जल्दी ही वह समय भी आया, जब संगीता स्वप्निल से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगी. संगीता और सलमान के बीच की दूरियां कम करने में संगीता की मां श्वेता गायकवाड का भी हाथ था. दरअसल संगीता अपने मायके नेरुल जाती थी तो उस की मां उसे पूरी छूट दे देती थी. इस का लाभ उठाते हुए संगीता सलमान के पास कराड़ चली जाती थी.

इस घटना के कुछ दिनों पहले सलमान के यहां बेटा पैदा हुआ. खुशी के इस मौके पर सलमान ने स्वप्निल, संगीता और उस की मां श्वेता को भी बुलाया. तीनों आए भी. मौका देख कर सलमान ने संगीता की मां श्वेता के खूब कान भरे. उस ने शिकायती लहजे में कहा कि स्वप्निल न केवल शराबी है, बल्कि संगीता को मारतापीटता भी है. अगर कुछ नहीं किया गया तो वह किसी दिन संगीता की हत्या कर सकता है.

करोड़ से लौटने के बाद संगीता और उस की मां श्वेता ने स्वप्निल से पीछा छुड़ाने के लिए एक खतरनाक योजना बनाई. योजना के अनुसार, संगीता स्वप्निल के साथ घर लौट आई. उस के और सलमान के बीच पहले की ही तरह बातें होती रहीं. एक दिन बातोंबातों में संगीता ने सलमान के पुरुषार्थ को ललकारते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें मर्द तभी समझूंगी, जब तुम हम दोनों के बीच आए कांटे को निकाल फेंकोगे. इस के बाद ही हम सुख से रह सकेंगे.’’

प्रेमिका के ये शब्द सलमान के लिए पत्थर की लकीर बन गए. वह उसी दिन से अपने और संगीता के बीच से स्वप्निल को हटाने के बारे में सोचने लगा. लेकिन स्वप्निल को वह अकेले मौत के घाट नहीं उतार सकता था. इस के लिए उस ने अपने बचपन के दोस्त शाहिद सुतार और कराड़ शहर की सुपर मार्केट के रहने वाले मल्हारी उर्फ मल्या उर्फ हनुमंत गंजुले से बात की. उस ने उन्हें अपनी और संगीता की लव स्टोरी बताई, साथ ही 60 हजार रुपए का लालच भी दिया. एक तो दोस्ती, दूसरे पैसों का लालच. उस के दोनों दोस्त उस की मदद करने के लिए तैयार हो गए.

फूलप्रूफ योजना तैयार करने के बाद सलमान शेख ने घटना के एक दिन पहले स्वप्निल को फोन कर के कहा कि वह उस से मिलने के लिए नेरुल, नवी मुंबई आ रहा है. उस ने साढ़े 4 बजे का समय भी बता दिया. उस के आने की बात सुन कर स्वप्निल खुश हो गया. योजना के अनुसार, सलमान और उस के दोस्त कराड़ से बस पकड़ कर पहले कोल्हापुर नाका पहुंचे और फिर वहां से दूसरी बस से सुबह साढ़े 4 बजे नवी मुंबई के उपनगर नेरुल पहुंच गए. नेरुल पहुंच कर सलमान ने एसएमएस से अपने पहुंचने की जानकारी संगीता को दे दी.

इस के बाद सलमान ने स्वप्निल को फोन किया, लेकिन उस ने उस का फोन नहीं उठाया. उस के कई बार फोन करने के बाद भी स्वप्निल ने जब फोन नहीं उठाया तो तीनों संगीता की मां श्वेता के घर चले गए. इन लोगों ने श्वेता को अपनी पूरी योजना बताई.

श्वेता ने चायपानी पिलाने के बाद उन्हें वहां से जाने को कह दिया, क्योंकि उन के वहां रुकने से किसी को शक हो सकता था. सलमान अपने दोस्तों के साथ नेरुल स्टेशन चला गया. वहां प्लेटफार्म पर बैठ कर तीनों ने एक घंटा बिताया. इस बीच मल्हारी उर्फ मल्या कुछ देर के लिए अपने एक रिश्तेदार से मिलने के लिए भी गया. सुबह करीब 8 बजे सलमान के पास स्वप्निल का फोन आया. उस ने समय से न पहुंच पाने के लिए माफी मांगी. इस के बाद अपनी पत्नी संगीता को फोन कर के कहा कि वह सलमान से मिलने नेरुल जा रहा है. फिर वह कुछ ही मिनटों में नेरुल रेलवे स्टेशन पहुंच गया.

अपनी योजना को पूरा करने के लिए सलमान और उस के दोस्त स्वप्निल की मोटरसाइकिल पर बैठ गए. सलमान ने नेरुल की पहाडि़यां देखने की इच्छा जाहिर की तो स्वप्निल उन्हें नेरुल की पहाडि़यों पर ले गया. लेकिन वहां इन लोगों को स्वप्निल को मारने का मौका नहीं मिला. दिन के उजाले में खतरा था. इसलिए समय बिताने के लिए ये लोग वापस नेरुल रेलवे स्टेशन आ गए. स्वप्निल ने सलमान के दोनों दोस्तों को स्टेशन पर छोड़ा और उन्हें वहीं रुकने के लिए कह कर वह सलमान के साथ घर आ गया. उस वक्त स्वप्निल के पिता नामदेव सो रहे थे. संगीता ने दोनों को खाने के लिए दालचावल दिया.

खाना खाने के बाद वे लगभग 12 बजे घर से निकल गए. वहां से दोनों सीधे पामबीच तालाब पर गए, जहां काफी बच्चे और नौजवान बैठ कर खेल रहे थे. दोनों वहीं पर आराम से बीते दिनों की बातें करने लगे. बातों ही बातों में स्वप्निल ने बीयर पीने की इच्छा जाहिर की. लेकिन सैलरी न आने के कारण स्वप्निल की जेब खाली थी. सलमान उस के लिए एक बोतल बीयर ले आया. स्वप्निल ने पामबीच पर बैठेबैठे बीयर खत्म कर दी. उस के बाद दोनों नेरुल रेलवे स्टेशन गए, जहां सलमान के दोनों दोस्त उन का इंतजार कर रहे थे. स्वप्निल ने अपनी मोटरसाइकिल पार्किंग में खड़ी कर दी.

इस के बाद चारों दोस्त लोकल ट्रेन पकड़ कर वाशी रेलवे स्टेशन आए. वहां से इन लोगों ने औटो लिया और सागर विहार बार पहुंचे, जहां स्वप्निल ने बीयर मांगी. लेकिन बीयर पीने के बाद भी उसे इतना नशा नहीं हुआ कि सलमान और उस के दोस्त उसे आराम से मौत के घाट उतार सकते. 2 बीयर पीने के बाद स्वप्निल शराब मांगने लगा. सलमान और उस के साथी यही चाहते थे. सलमान और उस के साथी अपना काम निकालने के लिए वाशी मौल गए. वहां जा कर सब ने अपने लिए बीयर और स्वप्निल के लिए शराब खरीदी. शराब ले कर वे फिर नेरुल रेलवे स्टेशन आ गए.

वहां से चारों दोस्त नेरुल के सेक्टर 14 के रामलीला मैदान चले गए. सब बीयरशराब का मजा लेने लगे. तब तक सुबह के 5 बजे गए थे. मैदान सुनसान था. सलमान ने स्वप्निल को अपनी बातों में उलझाए रखा. उसी बीच मौका देख कर मल्हारी उर्फ माल्या पेशाब करने के लिए उठा और पास ही पड़ा एक बड़ा सा पत्थर ला कर स्वप्निल के सिर पर पटक दिया. इस के बाद बारीबारी से सभी ने स्वप्निल के सिर पर पत्थर मारे और उसे मरा समझ कर वहां से उस की मोटरसाइकिल ले कर नेरुल स्टेशन आ गए. नेरुल स्टेशन पर उस की मोटरसाइकिल छोड़ कर वे ट्रेन द्वारा सीवीडी बेलापुर आए. वहां उन्होंने अपने खून सने कपड़े बदले और कराड़ चले गए.

मल्हारी उर्फ मल्या अपने घर चला गया. सलमान और शाहिद सुतार दोनों सरगम लौज में जा कर छिप गए, जहां से पुलिस ने उन्हें पकड़ा था. सलमान और शाहिद सुतार के बयानों के आधार पर पुलिस ने छापा मार कर मल्हारी उर्फ माल्या, संगीता, उस की मां श्वेता को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने सलमान शेख, शाहिद सुतार, मल्हारी उर्फ मल्या, संगीता और श्वेता से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उन के विरुद्ध भादवि की धारा 302, 120बी के तहत केस दर्ज किया और फिर उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Mumbai Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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Hindi StoriesHindi StoriesHindi Stories: बरकत मसीह दोहरे चरित्र का आदमी था. वह अपनी पत्नी कामिनी से प्रेम भी करता था और नफरत भी. उस की मोहब्बत ही हमेशा नफरत को काबू किए रहती थी, लेकिन एक दिन जब उस की नफरत मोहब्बत पर हावी हुई तो…

बात तब की है, जब मेरी तैनाती पंजाब के एक ऐसे देहाती इलाके में थी, जो काफी हराभरा था. उन दिनो गांवों में बिजली की बात तो दूर, सड़कें भी पक्की नहीं थीं. वह इलाका काफी पिछड़ा हुआ था. गर्मियों के दिन थे. दोपहर को मैं एक पेड़ के नीचे बैठा काम कर रहा था, तभी पास के एक गांव का नंबरदार मुझ से मिलने आया. वह बड़ा ही चापलूस था, लेकिन मेरा मुखबिर था. मैं ने उस से आने की वजह पूछी तो उस ने बताया कि एक घटना घट गई है, वह उसी की सूचना देने आया है.

उस ने बताया कि उस के गांव का बरकत मसीह अपनी घर वाली को साइकिल पर बिठा कर कहीं जा रहा था. जब वह छोटी नहर की पुलिया पर पहुंचा तो सामने से एक बैलगाड़ी बहुत तेज रफ्तार से आ रही थी. बैल भड़के हुए थे, जो गाड़ी वाले से संभल नहीं रहे थे. नहर की पुलिया पर दोनों ओर कोई दीवार नहीं थी, इसलिए बरकत मसीह ने बैलगाड़ी से बचने की कोशिश की तो साइकिल सहित नहर में जा गिरा. जब तक वह संभलता, पत्नी कई गोते लगा चुकी थी. नहर अधिक गहरी नहीं थी. उस ने पास जा कर देखा तो पत्नी अधमरी हो चुकी थी. वह पत्नी को पानी से बाहर निकाल कर ला रहा था, तभी उस ने दम तोड़ दिया.

यह एक साधारण सी घटना थी, जिस में पुलिस का कोई काम नहीं था. फिर भी मैं ने नंबरदार से कुछ बातें पूछ कर तसल्ली कर ली. इस घटना पर कोई रिपोर्ट भी दर्ज नहीं करनी थी. नंबरदार अपना कर्तव्य समझ कर मुझे खबर करने आ गया था. उसे गए कुछ समय ही गुजरा था कि वह दोबारा एक लड़के को ले कर मेरे पास आ गया. उस के चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे वह कोई नई खबर ले कर आया है. मैं ने उसे बिठा कर आने का कारण पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मलिक साहब, मामला गड़बड़ है.’’

‘‘कौन सा मामला गड़बड़ है?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘वही बरकत मसीह और उस की पत्नी वाला. आप तुरंत मेरे साथ चलिए.’’ उस ने कहा.

‘‘उस में तुम्हें क्या गड़बड़ लगा, जरा मुझे भी तो बताओ?’’

‘‘मैं तो क्या, यह लड़का बताएगा.’’ उस ने लड़के को मेरे सामने करते हुए कहा, ‘‘ओए, तू ने जो कुछ देखा था, साहब को बता दे.’’

पहले तो लड़का झिझका, उस के बाद उस ने जो बताया, उस से मुझे वह मामला हत्या का लगा. वह लड़का नंबरदार के ही गांव का रहने वाला था. जिस समय नहर पर वह घटना घटी थी, वह जामुन के एक पेड़ पर चढ़ कर जामुन तोड़ रहा था. दोपहर का समय था, आसपास कोई आदमी दिखाई नहीं दे रहा था. उस ने देखा कि एक साइकिल सवार साइकिल पर पीछे एक औरत को बैठाए जा रहा था. सामने से एक बैलगाड़ी आ रही थी, जिस के बैल काबू से बाहर थे.

साइकिल वाले ने घबरा कर साइकिल मोड़ी तो वह साइकिल सहित नहर में गिर गया. पानी में गिरते ही औरत हाथपैर मारने लगी. आदमी ने उस की मदद करने के बजाय उस का सिर पकड़ कर पानी में डुबो दिया. कुछ देर तड़प कर औरत ऊपर उभरी तो उस ने उस का गला दबा दिया. इस के बाद उस ने औरत को पानी से बाहर निकाला तो औरत में कोई हलचल नहीं दिखाई दे रही थी. आदमी ने इधरउधर देखा. कुछ दूर खेतों में कुछ किसान काम कर रहे थे. उस ने आवाज दे कर उन किसानों को बुलाया तो 7-8 लोग वहां आ गए. लड़का भी पेड़ से उतर कर उन के पास पहुंच गया.

पता चला कि वह औरत मर चुकी थी. वह उसी आदमी की पत्नी थी. उस ने उन किसानों से पत्नी के डूब कर मरने की बात बताई तो उन लोगों ने दुख प्रकट किया. एक आदमी ने उस की साइकिल नहर से निकाली और एक रेहड़ी का प्रबंध कर के औरत की लाश को गांव भिजवाया. लड़के ने पहली बार हत्या करते देखा था, इसलिए वह इतना डर गया था कि गांव जाने के बजाय इधरउधर घूमता रहा. नंबरदार थाने में रिपोर्ट कर के वापस जा रहा था, तभी रास्ते में वह उसे मिल गया. लड़के को लगा कि सारी बात नंबरदार को बता देनी चाहिए. नंबरदार ने जब यह बात सुनी तो वह लड़के को ले कर थाने आ गया.

मैं ने नंबरदार से नहर के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि नहर दूसरी नहरों से काफी छोटी थी. वह इतनी गहरी भी नहीं थी कि उस में कोई डूब कर मर जाए. पानी से पुलिया की ऊंचाई भी इतनी नहीं थी कि गिरने से चोट लगे. साफ था कि बरकत मसीह ने ही अपनी पत्नी की हत्या की थी. मैं ने नंबरदार से पूछा, ‘‘क्या उन का घर में आपस में झगड़ा होता था, जिस से उस ने पत्नी को मार दिया?’’

‘‘लड़ाईझगड़े का तो सवाल ही नहीं पैदा होता मलिकजी, वह तो अपनी बीवी का दीवाना था. कुछ लोेग तो उसे जोरू का गुलाम कहते थे. उस की पत्नी थी ही इतनी खूबसूरत कि कोई भी उस का दीवाना हो सकता था.’’

नंबरदार की इस बात से लगा कि शायद लड़के के देखने में कोई गलती हो गई है. वह पत्नी को डूबने से बचा रहा होगा, इसे लगा होगा कि वह उसे डुबो रहा है. जल्दी में कोई कदम उठाने के बजाय मैं ने लाश का पोस्टमार्टम कराना उचित समझा. मैं 2 सिपाहियों के साथ बरकत मसीह के घर पहुंच गया. मरने वाली महिला कामिनी के मांबाप पास के गांव के रहने वाले थे, जो आ चुके थे. कामिनी की बुआ के आने का इंतजार हो रहा था. उन के घर में रोनापीटना मचा था. पुलिस देख कर घर में सन्नाटा छा गया. गांव वाले आपस में खुसुरफुसुर करने लगे थे.

मैं ने नंबरदार से कहा कि वह बरकत को बुला कर मेरे पास ले आए. कुछ ही देर में बरकत मसीह आ गया. वह सुंदर और जवान युवक था. मैं ने पुलिसिया नजरों से उसे देखा. उस की आंखें लाल थीं और उन में नमी थी. शायद वह रो रहा था. मैं ने उस से कहा, ‘‘मर्द हो कर औरतों की तरह आंसू बहा रहे हो, धीरज रखो.’’

उस ने घबरा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं.’’ उस के बाद दोनों हाथों से वह अपनी आंखें साफ करने लगा.

‘‘कामिनी को क्या हुआ, एक बार मैं उस की लाश देखना चाहता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘सर, वह पानी में डूब कर मर गई.’’ कह कर उस ने मुझे पूरी घटना सुना दी.

‘‘पहले मैं लाश देखूंगा, क्योंकि अगर कहीं कोई नई बात निकल आई तो मैं अपने अधिकारियों को क्या जवाब दूंगा.’’ मैं ने कहा, ‘‘इस में घबराने की कोई बात नहीं है. तुम ऐसा करो, लाश के कमरे से सब को निकाल दो. मैं जा कर लाश देख लूंगा.’’

सब को निकाल कर उस ने मुझे कमरे में बुलाया. कमरे में आ कर मैं ने बरकत को बाहर जाने को कहा, लेकिन वह बाहर जाने को तैयार नहीं था. मैं ने 2 सिपाहियों से उसे बाहर ले जाने को कहा तो वे उसे खींच कर बाहर ले गए. बरकत के जाने के बाद मैं ने लाश की चादर खींची तो लाश देख कर मुझे धक्का सा लगा. वह बहुत सुंदर युवती थी. उस की आंखें इस तरह खुली थीं, जैसे मुझे ही देख रही हो. चेहरे में काफी खिंचाव था. नंबरदार की वह बात मुझे सच लगी कि उस औरत का कोई भी पति होता, वह गुलाम बन कर ही रहता.

मैं ने उस की गरदन की ओर देखा तो मुझे वह चीज दिखाई दे गई, जो मैं देखना चाहता था. गले पर लाल सा निशान था और वह निशान गला दबाने का था. मैं ने दोनों सिपाहियों को बुला कर कहा, ‘‘बरकत को कहीं जाने मत देना.’’

नंबरदार से कहा कि वह लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की व्यवस्था करे. वह एक तांगा ले आया तो जरूरी काररवाई करने के बाद मैं ने लाश को सिविल अस्पताल भिजवा दिया. शक की बुनियाद पर बरकत को हिरासत में ले कर थाने आ गया. अगले दिन मैं थाने आया तो सिपाही ने कहा कि बरकत मुझ से बात करना चाहता है. मैं ने उसे अपने कमरे में बुलाया तो देखा, उस की आंखें लाल हो रही थीं, जैसे वह सारी रात सोया न हो. उस ने कहा, ‘‘आप ने मुझे हवालात में क्यों बंद कर रखा है? मेरी घरवाली मर गई है, मुझ गरीब से क्या गलती हो गई है?’’

‘‘मुझे कुछ शक है. लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कह सकूंगा.’’ मैं ने कहा.

शाम करीब 5 बजे पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, कामिनी की मौत पानी में डूबने और सांस रुकने से हुई थी. उस में लिखा था कि मृतका के फेफड़ों, आंतों और मैदे में इतना पानी नहीं था, जितने पानी में डूब कर मौत होती है. इस के अलावा उस के गले पर दबाव का जो निशान पाया गया था, उस के बारे में कहा गया था कि उस पर कोई वजन पड़ा हो या दबाया गया हो. एक खास बात यह थी कि मृतका 3 महीने की गर्भवती थी.

रिपोर्ट देखने के बाद मुझे लड़के के बयान पर यकीन हो गया. कामिनी की लाश को उस के मातापिता के हवाले कर दिया. बरकत के ससुर ने पूछा कि उसे हवालात में क्यों बंद कर रखा है तो मैं ने कहा, ‘‘मुझे शक है कि तुम्हारी बेटी को बरकत ने गला घोंट कर मारा है? क्या तुम्हारी बेटी बरकत के साथ खुश थी?’’

मेरी इस बात पर वह मुझे हैरानी से देखते हुए बोला, ‘‘जी, वह बहुत खुश रहती थी, हमेशा बरकत की तारीफ करती रहती थी.’’

मैं ने कहा, ‘‘सोच कर बताओ, कभी उन में कोई झगड़ा हुआ था?’’

‘‘नहीं सरकार, शादी के बाद से अब तक उन में कोई झगड़ा नहीं हुआ था.’’ उस ने कहा.

मैं ने उस से बहुत घुमाफिरा कर पूछा, लेकिन कोई काम की बात पता नहीं चली. उस के जाने के बाद मैं ने बरकत को बुलवा कर कहा, ‘‘कामिनी की लाश का पोस्टमार्टम हो गया है और उसे तुम्हारे ससुर और साले ले गए हैं.’’

यह सुन कर वह रोते हुए बोला, ‘‘मुझे भी जाने दीजिए सरकार, मैं अपनी कामिनी को अपने हाथों से दफनाना चाहता हूं.’’

मैं ने कहा, ‘‘इन्हीं हाथों से, जिन से तुम ने उस का गला दबाया था.’’

यह सुन कर वह ऐसा उछला, जैसे उस के पैरों पर बम फोड़ दिया गया हो. उस की आंखें फैल गईं और रंग पीला पड़ गया. गर्मियों में वह ऐसे कांप रहा था, जैसे लोग ठंड में कांपते हैं. वह संभल कर बोला, ‘‘यह क्या कह रहे हैं सरकार, कामिनी तो मेरी जान थी, भला मैं उसे क्यों मारूंगा?’’

‘‘हत्या की वजह भी तुम्हीं बताओगे, वरना मैं तो पता कर ही लूंगा.’’ मैं ने कहा.

‘‘सरकार, आप पूरे गांव में किसी से भी पूछ लें, हम दोनों में कितना प्रेम था,’’ बरकत ने कुछ सोच कर कहा, ‘‘वह मेरे बच्चे की मां भी बनने वाली थी. मैं अपने बच्चे और पत्नी को कैसे मार सकता हूं?’’

बरकत ने जो कहा था, उस में वजन था. लेकिन मैं उस लड़के के बयान और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को कैसे झुठला सकता था. मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘कामिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफसाफ लिखा था कि उस की हत्या गला दबा कर की गई थी.’’

वह मेरी बात पर घबराने के बजाय दृढ़ता से बोला, ‘‘साहब, हम दोनों एकसाथ नहर में गिरे थे. हो सकता है, साइकिल का कोई पुरजा उस की गरदन पर जा लगा हो.’’

उस ने दलील अच्छी दी थी. लेकिन मैं समझ रहा था कि वह जरूरत से ज्यादा चालाक है और मुझ से झूठ बोल रहा है. मुझे लगा कि यह आसानी से मानने वाला नहीं है, इसलिए मैं ने सख्ती करने का फैसला कर लिया. मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारे लिए यही अच्छा है कि तुम इकबालिया बयान दे दो. हो सकता है मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं. अगर नहीं देते हो तो मुझे जरूरत भी नहीं है. मेरे पास ऐसा गवाह मौजूद है, जिस ने तुम्हें कामिनी का गला दबाते हुए देखा है. अब बोलो, क्या कहना चाहते हो?’’

मेरी इस बात पर उस की हालत खराब हो गई, उस से कुछ कहते नहीं बन रहा था. मैं उसे और मौका नहीं देना चाहता था, इसलिए मेज पर घूसा मार कर पूछा, ‘‘बोलो, तुम ने हत्या की है?’’

‘‘नहीं सरकार, मैं ने उस की हत्या नहीं की है.’’ वह सहम कर बोला.

मैं ने उसे हवालात में बंद कर दिया और अपने मुखबिरों से कहा कि वे शाम तक यह पता लगा कर बताएं कि कामिनी का चरित्र कैसा था? लेकिन मुखबिरों से कोई काम की बात पता नहीं चली. मैं ने उस लड़के को दोबारा बुला कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं ने अपनी आंखों से उसे गला दबाते देखा था. कुछ और बातें पूछ कर मैं ने उस लड़के को भेज दिया. उस के जाने के बाद नंबरदार आ गया तो उस ने बरकत के बारे में कुछ बातें बताईं.’’

नंबरदार के बताए अनुसार, बरकत एक हकीम की दुकान पर जड़ीबूटियां कूटने का काम करता था. वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था. किसी बात पर दोनों में कभीकभी छोटामोटा झगड़ा जरूर हो जाता था, लेकिन बाद में बरकत उसे मना लेता था. बरकत के घर के बराबर में एक औरत रहती थी, जिस का नाम सरदारा था. लोग उसे दारू कहते थे, उस की कामिनी से बहुत पटती थी. वह उस के बारे में सबकुछ जानती थी. अगर उस से पूछताछ की जाए तो शायद वह उस के बारे में कुछ बता सके.

मैं ने दारू को लाने के लिए तुरंत एक सिपाही को भेज दिया. इसी बीच एक और मुखबिर आ गया. उस ने मुझे जो कुछ बताया, वह मुझे पहले से ही पता था. लेकिन उस ने एक नई बात यह बताई कि बरकत को कोई बीमारी लगी थी, जिस का इलाज वह उसी हकीम से करा रहा था, जिस के यहां काम करता था. मैं ने मुखबिर से कहा कि वह उस की बीमारी का पता लगा कर मुझे बताए. जिस सिपाही को मैं ने दारू को लाने को भेजा था, वह उसे ले कर आ गया. लेकिन उस के साथ उस का पति भी आया था. दोनों काफी घबराए हुए थे. मैं ने दोनों को अपने कमरे में बुलवाया. औरत 35 साल के लगभग थी और मर्द 40 के लपेटे में था. मैं ने देखा, मर्द घबराया हुआ लग रहा था, लेकिन औरत शांत थी.

‘‘हम से क्या गलती हो गई सरकार,’’ मर्द हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘आप ने मेरी घरवाली को क्यों बुलवाया है?’’

मैं ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘घबराने की कोई बात नहीं है. मुझे इन से 2-3 बातें पूछनी हैं.’’

यह कह कर मैं ने पति को बाहर भेज दिया. औरत मेरी ओर देखने लगी. मैं ने कहा, ‘‘सुना है कि तुम्हारी कामिनी से बड़ी गहरी दोस्ती थी. उस के मरने का मुझे बहुत अफसोस है. उस के बारे में मैं तुम से 2-3 बातें पूछना चाहता हूं.’’

‘‘बस जी, अल्लाह को जो मंजूर था, वह हो गया. बड़ी प्यारी लड़की थी,’’ उस ने एक आह भर कर कहा, ‘‘आप जो पूछना चाहें, पूछ लें. मुझे जो पता होगा, जरूर बताऊंगी.’’

‘‘मुझे शक है कि कामिनी की हत्या हुई है,’’ इतना कह कर मैं ने उस के चेहरे को गौर से देखा. मुझे लगा था कि हत्या की बात पर वह उछल पड़ेगी, लेकिन वह सामान्य रही.

‘‘आप का शक ठीक है, मुझे भी यही शक था. लेकिन मैं किसी से कुछ कह नहीं सकी.’’ उस ने कहा.

दारू ने यह बात कह कर मुझे हैरान कर दिया था. मैं ने पूछा, ‘‘शक का कोई कारण तो होगा?’’

‘‘यह लंबी कहानी है,’’ उस ने कहा.

इस के बाद उस ने मुझे जो कहानी सुनाई, उसे मैं यहां संक्षेप में लिख रहा हूं.

कामिनी 2 भाइयों की एकलौती बहन थी, इसलिए घर में सब की लाडली थी. जवान हुई तो इतनी खूबसूरत निकली कि सब के आकर्षण का केंद्र बन गई. ईसाई होने की वजह से उसे घूमनेफिरने की आजादी थी. उस से लड़के बात करने से कतराते थे, क्योंकि वह ऐसा जवाब देती थी कि वे मुंह ताकते रह जाते थे. कामिनी की बिरादरी के कई लड़के उस से शादी करना चाहते थे, लेकिन उसे उन में से कोई भी पसंद नहीं था. वह अपनी ही तरह सुंदर लड़का चाहती थी. उन्हीं दिनों गांव के एक लड़के से उस की दोस्ती हो गई, जो बहुत सुंदर था. उस का नाम कमाले था.

उन की दोस्ती दीवानगी तक जा पहुंची. दोनों रोजाना चोरीछिपे मिलने लगे, लेकिन उन का यह मिलन छिपा नहीं रहा. जल्दी ही उस के भाइयों और पिता को पता चल गया. उन्होंने सख्ती करने के बजाय उस की शादी बरकत से कर दी. कमाले को जब उस की शादी के बारे में पता चला तो उस ने कामिनी से भाग चलने को कहा. लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं हुई. क्योंकि मांबाप, भाइयों ने उसे बहुत लाडप्यार से पाला था, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि उस की वजह से उस के घरवालों की बदनामी हो. अपने मांबाप की इज्जत के लिए उस ने अपनी मोहब्बत का गला घोंट दिया. उस दिन वह कमाले से लिपट कर इतना रोई थी कि कमाले को संभालना मुश्किल हो गया था.

इस के बाद कमाले ने कहा, ‘‘अच्छा, ऐसा करता हूं कि मैं तुम से महीने में 2-3 बार मिलने आ जाया करूंगा.’’

‘‘अगर किसी ने देख लिया तो बदनामी होगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘जरूरी नहीं कि हम मिलें ही, दूर से ही एकदूसरे को देख लिया करेंगे.’’ कमाले ने समझाया.

कामिनी ब्याह कर बरकत के घर आ गई. कमाले महीने में 2-3 बार बरकत के गांव आता रहता था. इस तरह दोनों दूर से ही एकदूसरे को देख कर अपने मन को तसल्ली दे लेते थे. इसी बीच कामिनी ने अपनी पड़ोसन दारू को अपना भेदी बना लिया. उस ने उस से सब कुछ सचसच बता दिया. इस के बाद दारू उस की खबर कमाले तक पहुंचाने लगी. कभीकभी दारू उन का मिलन भी करवा देती थी. शादी को 2 साल हो गए थे, लेकिन उसे कोई बच्चा नहीं हुआ था. उस जमाने में डाक्टरी टैस्ट तो होते नहीं थे, सारी कमी मर्द के बजाय औरत पर डाल दी जाती थी.

कमाले बराबर कामिनी से मिलने आता रहता था, बाद में दोनों एक वीरान कब्रिस्तान के पास रात में मिलने भी लगे थे. उस जगह पर कोई दिन में भी नहीं जाता था. उन दिनों घरों में शौचालय तो होते नहीं थे, लोग खेतों में जाया करते थे. औरतें अंधेरे में जाया करती थीं. कामिनी भी दारू के साथ जाती थी, उधर कमाले आ जाता था. दारू उसे कमाले के पास छोड़ कर इधरउधर हो जाती थी. वे दोनों मिलते जरूर थे, लेकिन रहते अपनी हद में थे.

धीरेधीरे दोनों हदें पार करने लगे. समय गुजरता रहा. शादी के 2 सालों बाद कामिनी ने अपने अंदर कुछ बदलाव देखा तो उस ने दारू से कहा. दारू ने उसे गले से लगा कर कहा, ‘‘बड़ी खुशी की बात है, तू मां बनने वाली है.’’

कामिनी सुन कर बहुत खुश हुई. उस ने बरकत को यह बात बताई तो वह भी खुश हुआ. लेकिन कुछ देर बाद वह बुझ सा गया और सिर झुका कर कुछ सोचने लगा. कामिनी समझ नहीं पाई कि उस के मां बनने की खुशी में उसे खुश होना चाहिए था, जबकि वह बुझ सा क्यों गया. इस के बाद बरकत के मिजाज में चिड़चिड़ापन आ गया.

बरकत को चुप देख कर एक दिन कामिनी ने पूछा तो बरकत ने उसे जो जवाब दिया, उसे सुन कर वह सन्न रह गई. उस ने कहा, ‘‘कामिनी यह बच्चा मेरा नहीं हो सकता, क्योंकि मैं बाप बनने के काबिल नहीं हूं.’’

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’ कामिनी ने कहा, ‘‘यह बच्चा तुम्हारा ही है. तुम से किस ने कहा कि तुम बाप नहीं बन सकते?’’

‘‘कामिनी हमारी शादी के डेढ़ साल बाद भी जब हमें कोई बच्चा नहीं हुआ तो मैं ने हकीमजी, जिन के यहां मैं काम करता हूं, से पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि तुम्हारी पत्नी बिलकुल ठीक है, कमी मेरे अंदर है. लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है, मैं तुम्हें ऐसी दवा दूंगा कि तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे. और वह दवा पूरे छह महीने तक चलेगी. लेकिन अभी दवा लेते हुए मुझे 2 महीने ही हुए हैं.’’

कामिनी ने कहा, ‘‘हो सकता है, तुम 2 महीने में ही ठीक हो गए हो?’’

यह सुन कर उसे कुछ तसल्ली हुई, लेकिन पूरी तरह नहीं. अब उस की हालत ऐसी हो गई कि कभी वह खुश रहता तो कभी कामिनी से लड़नेमरने पर उतारू हो जाता. कामिनी गुस्सा हो जाती तो किसी तरह उसे मना लेता. एक दिन बरकत काम से लौटा तो कामिनी से बहुत लड़ा. उस ने कहा, ‘‘यह जो बच्चा तेरे पेट में पल रहा है, यह हराम का है. मैं ने हकीम से पूछा था कि क्या उन की दवा से मैं 2 महीने में ठीक हो सकता हूं तो उन्होंने कहा कि कभी नहीं, यह जो दवा दी गई है, यह 3 महीने चलेगी, उस के बाद नई दवा दी जाएगी, जो 3 महीने चलेगी. उस के बाद ही तुम पूरी तरह से ठीक हो जाओगे.

उस दिन भी कामिनी ने बरकत को काफी समझाने की कोशिश की, पर बरकत उस की बात मानने को तैयार नहीं था. पति की इस बात पर कामिनी रूठ गई, पर बरकत ने उसे मना लिया. इस घटना के 2-3 दिनों बाद गांव में एक मेला लगा. कामिनी ने बरकत से कहा कि वह उसे मेला दिखा लाए. बरकत की उस दिन छुट्टी थी. वह उसे साइकिल पर बिठा कर मेला दिखाने ले गया. पता चला कि दोनों नहर में गिर गए, जिस में कामिनी की मौत हो गई.

इस के बाद दारू ने कहा, ‘‘अब आप को पता चल गया होगा कि मैं ने क्यों कहा था कि ऐसा तो होना ही था.’’

पूरी कहानी सुनने के बाद मैं ने दारू से कहा कि अब वह घर जाए. फिर जब कभी जरूरत पड़ेगी, उसे बुला लिया जाएगा. उस के जाने के बाद मैं ने अपने एक एएसआई जो पठान था, को बुला कर उसे कमाले का पता दे कर कहा कि वह उसे ले आए. अगर वह न आए तो उस की ठुकाई कर के उसे घसीटता हुआ ले आए. वह तुरंत उसे लेने चला गया. इस के बाद मैं ने बरकत को हवालात से निकाल कर लाने को कहा. अब मेरे पास गवाह भी था और पूरी कहानी भी मैं सुन चुका था. मुझे कमाले का बयान भी लेना था और बरकत का मैडिकल चैकअप भी कराना था, क्योंकि मैं यह साबित करना चाहता था कि वह संतान पैदा करने  के काबिल नहीं है, जबकि उस की पत्नी को 3 महीने का गर्भ था और उस ने शक की बिनाह पर उस की हत्या की थी.

एक सिपाही बरकत को मेरे कमरे में ले आया. वह कुरसी पर बैठने जा रहा था, तभी मैं ने अपने हाथ में थामा बेंत का डंडा जोर से मेज पर पटका, जिस से एक तेज आवाज हुई. वह उछल कर पीछे हट गया. मैं ने डांट कर कहा, ‘‘वहीं खड़े रहो. मैं ने तुम्हें बड़ा सम्मान दिया, लेकिन अब तुम इस के काबिल नहीं रहे, लगातार झूठ बोलते रहे. अब झूठ बोले तो तुम्हें उलटा लटका दूंगा. मैं एक बार और कह रहा हूं कि अगर तुम ने शराफत से इकबालिया बयान दे दिया तो फायदे में रहोगे.’’

‘‘मैं क्या इकबालिया बयान दूं, मैं ने अपनी बीवी की हत्या नहीं की है.’’ उस ने कहा.

वह काफी ढीठ हो रहा था. मैं ने उस पर सीधा हमला करते हुए कहा, ‘‘कामिनी के पेट में किस का पाप पल रहा था?’’

यह सुन कर वह 2 कदम पीछे हट गया, उस का चेहरा पीला पड़ गया. वह मुझे इस तरह देखने लगा, जैसे मैं कोई जादूगर हूं.

‘‘वह मेरी घर वाली थी, उस के पेट में मेरा ही बच्चा होगा न.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम बड़े बेशर्म हो. मुझे पता है कि तुम इस काबिल नहीं हो कि बाप बन सको. अगर नहीं मानोगे तो मैं उस हकीम को यहां बुलवा लूंगा जिस की दवा तुम खा रहे थे.’’ मैं ने उसे घेरने की गरज से कहा.

हमला उस की मरदानगी पर हुआ था, इसलिए उसे परेशान तो होना ही था. वह सिर झुका कर खड़ा हो गया. मुझे उस पर दया भी आई. उस ने सिर उठाया तो उस की आंखों में आंसू थे. उस ने कहा, ‘‘सरकार, मैं बश्ेर्म नहीं हूं. मैं ने ही कामिनी को गला घोंट कर मारा है. पूछिए, आप क्या पूछना चाहते हैं, मैं आप की सभी बातों का जवाब दूंगा.’’

इस के बाद उस ने लंबा बयान दिया, जो इस तरह था. बरकत की शादी कामिनी से हुई तो वह बहुत खुश था. कामिनी बहुत सुंदर थी. वह उस की हर बात मानता था. कामिनी ने उस की इस कमजोरी का खूब फायदा उठाया. वह उसे अंगुलियों पर नचाने लगी. लोग उसे जोरू का गुलाम कहने लगे. एक साल बीता तो लोग पूछने लगे कि बच्चा क्यों नहीं हो रहा? दोनों यही जवाब देते कि अभी जल्दी क्या है, हो जाएगा. लेकिन अकेले में जब वे इस बात पर विचार करते तो परेशान हो जाते. मर्द कैसा भी हो, वह यह कतई सहन नही कर सकता कि कोई उसे नपुंसक कहे.

बरकत ने पत्नी से कहा, ‘‘वह गांव की किसी दाई को दिखा कर पूछे कि अभी तक उसे बच्चा क्यों नहीं ठहरा.’’

कामिनी ने एक दाई को दिखाया तो उस ने कहा कि वह बिलकुल ठीक है. मर्द में ही कोई कमी हो सकती है. कामिनी ने बरकत से कहा कि वह हकीम से अपने आप को चैक कराए. बरकत ने ऐसा ही किया. हकीम ने बताया कि वह बच्चा पैदा करने लायक नहीं है. अगर वह बच्चा चाहता है तो उसे 6 महीने तक इलाज कराना होगा. हकीम ने उस का इलाज शुरू कर दिया. उसे दवा खाते 2 महीने ही हुए थे कि कामिनी ने उस से बताया कि वह मां बनने वाली है. यह सुन कर वह बहुत खुश हुआ, लेकिन पलभर बाद उसे लगा कि कामिनी मजाक कर रही है. अगर ऐसा सचमुच है तो उस के किसी से अवैध संबंध हैं.

बरकत ने हकीम से पूछा तो उस ने कहा कि 2 महीने में उस का ठीक होना कतई संभव नहीं है. यह दवा 2 कोर्स में होती है. अभी तो उस का पहला कोर्स चल रहा है. दूसरा कोर्स 3 महीने बाद शुरू होगा, जिस में बच्चा पैदा करने वाले शुक्राणु बढ़ाए जाएंगे. बरकत समझ गया कि कामिनी हराम का बच्चा लिए घूम रही है. उस ने तय कर लिया कि वह इस बात का पता लगाएगा कि कामिनी के किसी के साथ अवैध संबंध तो नहीं हैं? उस ने कई बार दिन में आ कर देखा, वह उसे घर में ही मिली. उसे लगा कि कामिनी रात को दिशामैदान जाती है, तब वह प्रेमी से मिलती होगी. उस ने रात में भी उस का पीछा किया, लेकिन उसे कोई शक वाली बात नहीं दिखाई दी.

लेकिन एक रात वह अचानक कामिनी और दारू का पीछा करता हुआ गया तो उस रात दोनों बहुत दूर निकल गईं. कब्रिस्तान के पास पहुंच कर दारू तो खेत में चली गई, जबकि कामिनी हंसती हुई कब्रिस्तान में गायब हो गई. बरकत ने आगे बढ़ कर वहां जो देखा, अवाक रह गया. कामिनी एक जवान लड़के से लिपटी हुई थी. दोनों की दबीदबी हंसी की आवाजें आ रही थीं. आगे जो हुआ, उसे देख कर बरकत को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन किसी तरह खुद पर नियंत्रण कर के वह वापस घर आ गया.

बस, वहीं से उसे पत्नी से नफरत हो गई, लेकिन कामिनी को देख कर पता नहीं उसे क्या हो जाता था कि वह सब कुछ भूल जाता था. उस ने सोचा कि सब कुछ देख कर भी वह चुप रहेगा. अगर वह कामिनी को तलाक देता है या उस की हत्या करता है तो इतनी सुंदर पत्नी से हाथ धो बैठेगा, इसलिए सब कुछ जानते हुए भी वह चुप रहा.

इस घटना के कुछ दिनों बाद कामिनी ने बरकत से कहा कि वह उसे मेला दिखा लाए. दोनों साइकिल पर मेला देखने जा रहे थे तो रास्ते में बरकत के दिमाग में हलचल मची, वह उसे मारने के बारे में सोच रहा था, लेकिन उस की भोली सूरत देख कर उस का इरादा बदल जा रहा था. यही सोचतेसोचते उस की साइकिल नहर की पुलिया पर पहुंच गई.

उसी बीच सामने से तेजी से बैलगाड़ी को आता देख कर वह संतुलन खो बैठा. बैलगाड़ी से बचने के चक्कर में वह पत्नी के साथ नहर में गिर गया. कामिनी तैरना नहीं जानती थी. वह बारबार पानी से सिर निकाल कर कह रही थी कि मुझे बचा लो. वह उसे बचाने के लिए तेजी से तैर कर गया, लेकिन तभी उसे उस की बेवफाई याद आ गई. उस ने उसे बचाने के बजाय उस की गरदन पकड़ कर दबा दी, जिस से वह मर गई.

बयान देते समय बरकत रो रहा था. मैं समझ रहा था कि उस का रोना असली है. वह दोहरे चरित्र का मालिक था. उसे कामिनी से प्रेम भी था और नफरत भी. उस का बयान सुन कर मैं आंखें बंद किए बैठा था कि तभी मेरे पठान एएसआई ने आ कर कहा, ‘सर, मैं कमाले को ले आया हूं.’ मैं ने उसे अंदर लाने को कहा. मेरे कमरे में एक सुंदर जवान आया, जो कमाले था. उस के पीछे एएसआई खड़ा था.’ मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हें पता है, कामिनी पिछले दिनों नहर में डूब कर मर गई है?’’

उस ने कहा, ‘‘जी पता है, इस की चर्चा आसपास के गांवों में फैल चुकी है.’’

‘‘तुम्हें तो कामिनी के मरने का बहुत दुख होगा?’’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

‘‘साहब, मेरा उस से क्या वास्ता? मैं तो उसे जानता तक नहीं, मुझे उस के मरने का क्यों दुख होगा?’’ उस ने कहा.

‘‘मैं ने सुना है कि तुम उस से मिलने बहुत दूर से आते थे. तुम्हारी उस से बहुत गहरी दोस्ती थी.’’

‘‘साहब, आप ने गलत सुना है. मैं तो उस को जानता तक नहीं था.’’

एएसआई, जो उस के पीछे खड़ा था, को मैं ने उसे इशारा किया. उस ने कमाले के बालों को जोर से झटका दिया तो वह नीचे गिर पड़ा. जैसे ही वह उठा, उस के गाल पर तमाचा मारा तो उस के मुंह से खून निकलने लगा.

‘‘तुम से जो पूछा जा रहा है, उसे ठीकठीक बताओ, नहीं तो खाल खींच लूंगा.’’ एएसआई ने कहा.

मैं ने कहा, ‘‘सचसच बताओ, कामिनी से तुम्हारे संबंध थे या नहीं? अगर झूठ बोले तो मैं तुम्हारी अम्मा दारू को भी बुला लूंगा, जो तुम दोनों को मिलवाती थी.’’

इस पर वह टूट गया. उस ने भी वह पूरी कहानी सुना दी, जो ऊपर लिखी गई है. मैं ने उस का बयान लिख कर उस के हस्ताक्षर करा लिए. केस मजबूत हो गया था. कमाले का बयान, बरकत का बयान, जिस लड़के ने बरकत को गला दबाते देखा था, उस की गवाही, दारू की गवाही, हकीम की गवाही. यह सब तैयार कर के मैं ने अदालत में चार्जशीट पेश कर दी.

अपराधी के बयान और सभी गवाहों के बयान से अदालत ने बरकत को मृत्युदंड की सजा दी. बरकत के वकील ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिस में उस ने कहा कि बरकत अपनी पत्नी के चरित्र से इतना दुखी हो गया था कि वह हर समय दिमागी तौर से बीमार रहने लगा था. एक दिन इसी तकलीफ के कारण उत्तेजित हो कर उस ने पत्नी की हत्या कर दी. अदालत ने उस की यह अपील मान ली और उस की मृत्युदंड की सजा कम कर के केवल 7 साल की Hindi Stories

Madhya Pradesh Crime News: गढ़ी का रहस्य

Madhya Pradesh Crime News: नंदी सिंह और हरि सिंह के सामने जब भी युवरानी और राजकुमारी बेबी राजा आतीं, दोनों को अपना वह अपमान याद आ जाता, जिसे उन्होंने गांव वालों के सामने पुलिस से करवाया था. उन्होंने दोनों की हत्या कर के अपमान का बदला तो ले लिया, लेकिन अब उन की बाकी की जिंदगी जेल में ही कटेगी.

छतरपुर जिले में जहां से उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू होती है, वहां हजार बारह सौ लोगों की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है नैगुंवा. विकास की दौड़ में पिछड़े इस जिले में नैगुंवा का इलाका काफी पिछड़ा हुआ है. नैगुंवा हमेशा से उपेक्षा का शिकार रहा हो, ऐसा नहीं है. उत्तर प्रदेश के चरखारी राजा की यह जागीर भूतकाल में अपने वैभव और सुशासन के लिए जानी जाती थी. स्वतंत्रता के बाद राजारजवाड़े खत्म हो गए तो फिर जागीरें भी नहीं रहीं. लेकिन जैसे रस्सी जलने पर भी उस के बल नहीं जाते, कुछ वैसा ही हाल इन रियासतों और रियासतदारों का है.

नैगुंवा के बीचोबीच पत्थर की विशाल हवेली आज भी मौजूद है, जिसे जागीरदारों की निशानी कह सकते हैं. स्थानीय लोग इसे गढ़ी कहते हैं. यह गढ़ी अब जागीरदार के वंशज महाराज बहादुर सिंह के आधिपत्य में है. इस हवेली में वह अपनी पत्नी संगीता देवी, 70 वर्षीया राजमाता युवरानी और 40 वर्षीया बहन राजकुमारी बेबी राजा के साथ रहते हैं. यह जागीर अब पहले जैसी संपन्न तो नहीं रही, लेकिन अभी भी जागीरदारों के पास खेतीकिसानी की इतनी जमीन है, जिस से आज भी इस पुराने जागीरदार खानदान का राजसी ठाठबाट बरकरार है.

अपने रुतबे को बरकरार रखने के लिए महाराज बहादुर सिंह ने अपनी सारी खेती की जमीन बंटाईदारों को सौंप रखी है. इस के 2 फायदे हैं, एक तो राजा को खुद किसान के तौर पर अपने खेतों में काम नहीं करना पड़ता, दूसरे बटाई के बाद भी जागीर के खाते में हर साल इतना माल आ जाता है कि पेट भी भरता रहे और शान भी बनी रहे. इसी साल फरवरी महीने के दूसरे सप्ताह की बात है. महाराज के ससुराल पक्ष के किसी खास रिश्तेदार के यहां शादी थी. शादी में शामिल होने के लिए महाराज बहादुर सिंह अपनी पत्नी संगीता देवी और दोनों बच्चों को ले कर उरई चले गए. उन की मां युवरानी और बहन बेबी राजा गढ़ी में ही रह गईं.

दरअसल, महाराज बहादुर सिंह की 2 बहनें थीं, जिन में से एक की मृत्यु हो चुकी थी. दूसरी छोटी बहन बेबी राजा की शादी उत्तर प्रदेश के एक राज परिवार में हुई थी. लेकिन पति से अनबन के कारण वह पिछले कई सालों से अपने मायके में मां और भाई के साथ रह रही थीं. 17 फरवरी की बात है. महाराज बहादुर सिंह उरई में शादी समारोह में व्यस्त थे. तभी नैगुंवा के रहने वाले नंदी सिंह राजपूत ने उन्हें फोन कर के बताया कि गढ़ी के दरवाजे सुबह से ही बंद हैं. दरअसल नंदी सिंह रोज सुबह गढ़ी में दूध देने आता था. वह महाराज का बटाईदार भी था, इसलिए महाराज बहादुर सिंह से उस की अच्छी बनती थी.

नंदी ने फोन पर महाराज को बताया कि सुबह वह दूध ले कर गढ़ी गया था, लेकिन काफी देर तक दरवाजे पर दस्तक देने के बाद भी किसी ने दरवाजा नहीं खोला. उस वक्त वह वापस लौट आया और 11 बजे के आसपास फिर से दूध ले कर गढ़ी पर गया. लेकिन अंदर से दरवाजा अब भी बंद था. बारबार आवाज देने पर अंदर से कोई नहीं आया, न ही कोई जवाब मिला.नंदी की इस सूचना के बाद महाराज बहादुर सिंह को तत्काल कदम उठाना चाहिए था, लेकिन संभवत: अपनी व्यस्तता की वजह से उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया, फलस्वरूप बात यहीं खत्म हो गई. अगले दिन 18 फरवरी की सुबह नंदी ने उन्हें फिर से फोन कर के दरवाजा न खोले जाने की बात बताई, जिसे सुन कर नैगुंवा महाराज बहादुर सिंह को मांबहन की चिंता हुई.

दोपहर बाद वह पत्नी संगीता और बच्चों को ले कर नैगुंवा वापस आ गए. महाराज के बारबार आवाज देने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला तो पूरा गांव गढ़ी के बाहर जमा हो गया. लोगों ने तुरंत बढ़ी सी सीढ़ी लगाई, ताकि अंदर जाया जा सके. कुछ लोगों ने सीढ़ी के सहारे महाराज के साथ गढ़ी की दीवार फांद कर अंदर प्रवेश किया. अंदर सन्नाटा पसरा था. महाराज ने गांव वालों के साथ एकएक कमरे को छान मारा, लेकिन मां और बहन का कहीं कोई पता नहीं चला. उन्हें ढूंढ़ते हुए जब वह महारानी युवरानी के शयन कक्ष में पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर सन्न रह गए. कमरे की फर्श पर उन की मां युवरानी और बहन बेबी राजा के शव पड़े थे.

मौके के हालात किसी गंभीर वारदात की तरफ इशारा कर रहे थे, इसलिए महाराज ने तुरंत इस घटना की जानकारी नैगुंवा थाना प्रभारी मृगेंद्र त्रिपाठी को दी. जागीरदार परिवार में इस तरह का हादसा होना गंभीर बात थी. टीआई मृगेंद्र त्रिपाठी ने तुरंत एसपी छतरपुर ललित शाक्यवार और एसडीओपी नैगुंवा उमेश तोमर को इस घटना के बारे में बता दिया. इस के बाद वह अपने साथ एसआई जितेंद्र भदौरिया, सुशील शुक्ला और महिला एसआई प्रतिभा श्रीवास्तव को ले कर नैगुंवा पहुंच गए.

जिस के बारे में हम यहां बात कर रहे हैं, वह चरखारी रियासत कभी बुंदेलखंड अंचल के बड़े भूभाग पर फैली हुई थी. प्रजा की बेहतर खुशहाली के लिए जब कुछ जागीरदारों के गठन की जरूरत पड़ी तो विचारविमर्श के बाद नैगुंवा के रहने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह यादव को नैगुंवा का जागीरदार नियुक्त किया गया था. विश्वनाथ प्रताप सिंह वाकई योग्य, पराक्रमी और ईमानदार व्यक्ति थे. उन्होंने अपने समय में इस जागीर का काफी विकास किया, जिस से खुश हो कर चरखारी महाराज ने नैगुंवा की सीमा से लगी रिबई जागीर की जागीरदारी भी उन्हें सौंप दी. दोनों जागीरों का काम संभालते हुए ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की शादी हुई. शादी के एक साल बाद उन के घर बेटे का जन्म हुआ, जिसे नाम दिया गया रतन सिंह जूदेव.

वक्त के साथ रतन सिंह जूदेव बड़े होने लगे. शिक्षादीक्षा के बाद जब उन्होंने जवानी में कदम रखा तो रियासत में सब से खूबसूरत मानी जाने वाली युवती चंपा पर उन का दिल आ गया. यह वह समय था, जब जागीरदार के बेटे और भविष्य के जागीरदार की जीवनसाथी बनने के लिए लगभग हर युवती तैयार रहती थी. जब रतन सिंह ने चंपा के पास एकांत में मिलने का संदेश भिजवाया तो वह खुशी से झूम उठी. वह निश्चित समय पर रतन सिंह से मिलने नदी किनारे बने बाग में पहुंच गई. पहली मुलाकात में ही चंपा ने रतन सिंह के दिल पर अपनी छाप छोड़ दी. नतीजतन रतन सिंह उस से शादी करने की जिद कर बैठे. लेकिन पिता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यह रिश्ता स्वीकार नहीं किया.

उस की जगह वह पड़ोसी जागीरदार की बेटी को बहू बना कर गढ़ी में ले आए. रतन सिंह ने पिता की आज्ञा मान कर उन की पसंद की लड़की से शादी तो कर ली, लेकिन पत्नी का रूपयौवन उन का मन नहीं जीत सका. फलस्वरूप शादी के बाद भी रतन सिंह की अधिकांश रातें चंपा के साथ बीतती रहीं. समय के साथ चंपा रतन सिंह के 2 बेटों, सरकार सिंह और सरताज सिंह की मां बनी. दूसरी तरफ रतन सिंह की ब्याहता रानी से भी 2 बेटे, विजय बहादुर सिंह और गजराज सिंह पैदा हुए. चंपा चाहती थी कि महाराज अपनी नैगुंवा और रिबई की जागीरदारी में से एक जागीर उस के दोनों बेटों को दे दें और दूसरी अपनी पत्नी के बेटों को.

लेकिन तब तक चंपा का यौवन ढल चुका था. उस में अब वह आकर्षण नहीं रह गया था, जिस की वजह से महाराज अपनी रानी को छोड़ कर उस के घर पड़े रहते थे. इसलिए वह उस की बात टालते रहे. उसी दौरान उन का निधन हो गया. महाराज के निधन के बाद जागीरों का बंटवारा हुआ, जिस में रिबई की जागीर गजराज सिंह को मिली और नैगुंवा की जागीर विजय बहादुर सिंह को. इस तरह गजराज सिंह और विजय बहादुर सिंह अलगअलग जागीरों के जागीरदार बन गए.

बाद में गजराज सिंह का विवाह महोबा के महाराजपुर की राजकुमारी शांति सिंह के साथ हुआ. लेकिन विवाह के ठीक दूसरे दिन जब महाराज की सुहागरात थी और वह अपने शयनकक्ष में दाखिल होने ही वाले थे कि अज्ञात लोगों ने उन पर हमला कर के उन की हत्या कर दी थी. शांति सिंह पति का चेहरा देखने से पहले ही विधवा हो गईं. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और देवर विजय बहादुर सिंह के सहयोग से अपनी जागीर को संभालने लगीं.

विजय बहादुर सिंह जूदेव का विवाह हमीरपुर जिले के ममना गांव में हुआ था. उन की 3 संतानें हुईं, 2 बेटियां और एक बेटा महाराज बहादुर सिंह जूदेव. समय आने पर विजय बहादुर सिंह जूदेव ने अपनी बड़ी बेटी रज्जो राजा का विवाह कर दिया. इसी बीच लंबी बीमारी के बाद उन का निधन हो गया. जबकि दूसरी बेटी बेबी राजा की शादी के बाद अपने पति से नहीं बनी. फलस्वरूप वह मायके आ कर अपनी मां युवरानी और भाई महाराज बहादुर सिंह के साथ रहने लगीं.

सब कुछ ठीक चल रहा था कि 18 फरवरी को महाराज बहादुर सिंह की गैरमौजूदगी में गढ़ी के अंदर मांबेटी की संदिग्ध मौत से गढ़ी चर्चाओं में आ गई. नैगुंवा थाना टीआई मृगेंद्र त्रिपाठी की टीम नैगुंवा स्थित गढ़ी के अंदर पहुंची तो वहां पर 70 वर्षीया युवरानी तथा 40 वर्षीया राजकुमारी बेबी राजा की लाशें बरामद हुईं. घटनास्थल पर मिले सबूत और हालात साफ इशारा कर रहे थे कि मांबेटी को किसी सुनियोजित साजिश के तहत मौत के घाट उतारा गया था. अलबत्ता वारदात को हादसे की शक्ल देने की नाकाम कोशिश जरूर की गई थी. गढ़ी के अंदर महारानी और राजकुमारी के शव बरामद होने की खबर फैलते ही न केवल छरतपुर जिले में, बल्कि समूचे बुंदेलखंड में सनसनी फैल गई थी.

घटनास्थल की स्थिति से साफ लग रहा था कि हत्यारों ने मांबेटी की हत्या के बाद उन के शव रूम हीटर से चिपका दिए थे, ताकि ऐसा लगे कि दोनों की मौत करंट की चपेट में आने की वजह से हुई थी. प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने रानी और राजकुमारी की बरामद लाशों को पोस्टमार्टम के लिए नैगुंवा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भिजवा दिया. 3 चिकित्सकों के पैनल ने मांबेटी के शवों का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के बाद गांव में ही शवों का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया. गढ़ी में मांबेटी की संदिग्ध मौत को ले कर तरहतरह के कयास लगाए जा रहे थे. लेकिन हकीकत तब सामने आई, जब 3 दिनों बाद पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली.

रिपोर्ट में बताया गया था कि रानी और राजकुमारी के साथ मारपीट कर के उन की हत्या की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर नैगुंवा थाना पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी. दूसरी तरफ इस बीच छतरपुर रेंज के डीआईजी के.सी. जैन, एसपी ललित शाक्यवार, एएसपी नीरज पांडेय, नैगुंवा एसडीओपी उमेश सिंह तोमर ने भी मौके पर पहुंच कर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

इन अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से चर्चा भी की. घटनास्थल का जायजा लेने के बाद ललित शाक्यवार ने न केवल एक टीम गठित कर के जल्द से जल्द हत्या की गुत्थी सुलझाने के निर्देश दिए, बल्कि यह भी बताया कि जांच की दिशा क्या होनी चाहिए? दरअसल, घटनास्थल से पुलिस को कुछ टूटे दांत और कुछ ऐसे सबूत मिले थे, जिन से साफ जाहिर हो रहा था कि मांबेटी की मौत करंट लगने से नहीं, बल्कि उन की हत्या की गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, मृत्यु से पहले मांबेटी को क्रूरतापूर्वक पीटा गया था, जिस से जिस्म के कई अंदरूनी हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे और इसी वजह से दोनोें ने दम तोड़ दिया था. गढ़ी से राजकुमारी बेबी राजा का मोबाइल भी गायब था. लेकिन लंबा समय बीतने के बाद भी हत्यारों का कोई पुख्ता सुराग नहीं लगा तो एसपी ने हत्यारों का सुराग देने वाले व्यक्ति को 10 हजार रुपए इनाम देने की घोषिण की.

बाद में इस राशि को बढ़ा कर छतरपुर पुलिस रेंज के डीआईजी ने 20 हजार रुपए कर दी. इस के बाद भी जब पुलिस को सफलता नहीं मिली तो ललित शाक्यवार ने घटना का सिलसिलेवार अध्ययन किया और सब से पहले महाराज बहादुर सिंह को वारदात की सूचना देने वाले नंदी सिंह से बारबार पूछताछ करने के निर्देश दिए. इस का नतीजा यह निकला कि वारदात के 13वें दिन पुलिस को गढ़ी के अंदर दोहरी हत्या करने वालों तक पहुंचने में कामयाबी मिल गई.

दोहरी हत्या की इस वारदात को नैगुंवा के नंदी सिंह राजपूत ने अपने साथी हरि सिंह उर्फ मुन्ना यादव के साथ मिल कर अंजाम दिया था. पुलिस ने आरोपियों से जब सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने महारानी और राजकुमारी की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. दोनों हत्यारोपियों को अदालत में पेश कर के नैगुंवा पुलिस ने दोनों को 2 बार पुलिस रिमांड पर ले कर हत्याकांड से संबंधित पूछताछ की और सबूत हासिल किए. नैगुंवा टीआई के मुताबिक हत्या की वारदात का मकसद एक लाख रुपए की रकम चोरी करना तथा पुरानी रंजिश थी.

नंदी राजपूत रानी की खेती की जमीन बटाई पर ले कर खेती किया करता था. नंदी ने गढ़ी के अंदर दोहरी हत्या को उस वक्त अंजाम दिया था, जब राजा महाराज बहादुर सिंह जूदेव उरई स्थित रिश्तेदारी में गए हुए थे. हत्या की वारदात के अगले दिन हत्यारोपी नंदी राजपूत ने योजना अनुसार मोबाइल पर महाराज बहादुर सिंह जूदेव को सूचना दी कि गढ़ी के दरवाजे नहीं खुल रहे हैं.

महाराज बहादुर सिंह जूदेव के निर्देश पर नंदी राजपूत ने नैगुंवा थाना पुलिस को गढ़ी के दरवाजे न खुलने की जानकारी दी थी. बताते हैं कि नैगुंवा गढ़ी में कुछ समय पूर्व लाखों रुपए के गहने, नकदी चोरी होने की घटना घटी थी, जिस में संदेह के आधार पर राजकुमारी बेबी राजा ने पुलिस से दोनों हत्यारोपियों को प्रताडि़त करवाया था. इन दोनों को पता चला कि बेबी राजा ने किसी को एक लाख रुपए की जमीन बेची है. नकदी चोरी करने के मकसद से दोनों हत्यारोपी रात के वक्त गढ़ी में घुसे. लेकिन वहां से उन्हें महज 3 हजार रुपए की धनराशि और एक मोबाइल ही मिल पाया था.

जमीन बिक्री से हासिल रकम कर्ज में चुका दी गई थी. चूंकि गढ़ी के अंदर दाखिल हत्यारोपियों को महारानी और राजकुमारी ने पहचान लिया था, इसलिए भेद खुल जाने के डर से दोनों ने पीटपीट कर मांबेटी की हत्या कर दी थी. पुलिस रिमांड के बाद 5 मार्च को दोनों अभियुक्तों का डीएनए परीक्षण कराने के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Madhya Pradesh Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Murder Case: हिमांशी की मौत का बहुचर्चित मामला – हत्या या आत्महत्या

Murder Case: पूर्व राज्यमंत्री हीरालाल कश्यप ने डाक्टरी पढ़ रहे सांसद नरेंद्र कश्यप के बेटे सागर से अपनी होनहार बेटी हिमांशी का विवाह कर के राजनीतिक दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दिया था. लेकिन हिमांशी की गोली लगने से मौत हो गई तो ससुराल वाले जहां आत्महत्या की बात कर रहे हैं, वहीं मायके वाले दहेज हत्या का आरोप लगा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के जनपद गाजियाबाद में 6 अप्रैल, 2016 की दोपहर खबर फैली कि एक बड़े राजनीतिक घराने की बहू की मौत हो गई है. चर्चा यह थी कि वह जिंदगी की जंग खुद हार गई या उसे साजिशन मौत के घाट उतार दिया गया. इस की वजह भी थी. उस की मौत जिस स्थिति में हुई थी, उसे देख कर लोग अपनीअपनी सोच और समझ के हिसाब से तरहतरह के कयास लगा रहे थे. एक रसूखदार परिवार की बहू को किन कारणों ने मौत के नजदीक पहुंचा दिया, सही कारण कोई नहीं जानता था. मृतका का नाम हिमांशी कश्यप था. वह कानून की पढ़ाई कर रही थी, जबकि उस का पति डाक्टर की एमडी डिग्री के लिए पढ़ाई कर रहा था.

चर्चा की मुख्य वजह यह थी 25 वर्षीया हिमांशी के ससुर नरेंद्र कश्यप सांसद होने के साथ बहुजन समाज पार्टी में मजबूत पकड़ वाले नेता थे. हिमांशी को अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था. मामला चूंकि गंभीर था, इसलिए पुलिस मामले की जांच में जुट गई थी. वाकया काफी चौंकाने वाला था. सांसद नरेंद्र कश्यप का परिवार गाजियाबाद के थाना कविनगर के संजयनगर के बी ब्लौक में रहता था. उन के परिवार में पत्नी देवेंद्री के अलावा 2 बेटे व बेटियां थीं. हिमांशी उन के बड़े बेटे सागर की पत्नी थी. उस का एक साल का बेटा भी था मौलिक.

नरेंद्र कश्यप राजनीतिक रसूख वाले आदमी थे. पार्टी कार्यकर्ताओं में उन की अच्छी पकड़ थी. निचले स्तर से राजनीति शुरू कर के सांसद बनने तक का मुकाम उन्होंने कड़ी मेहनत से हासिल किया था. मृदुभाषी नरेंद्र कश्यप अपने राजनीतिक कैरियर और परिवार को बड़े मुकाम पर देखना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने हर तरह के प्रयास भी किए थे. उन के बच्चे भी पढ़ने में होशियार थे. बेटियों का वह विवाह कर चुके थे. उन का छोटा बेटा वकालत कर रहा था. बड़े बेटे सागर को चिकित्सा क्षेत्र में रुचि थी. वह नजदीकी जनपद मेरठ के एक नामी मैडिकल कालेज से एमडी की पढ़ाई कर रहा था. पढ़ाई के लिए वह घर से ही आताजाता था. 2 साल पहले ही उस का विवाह हिमांशी से हुआ था.

हिमांशी का ताल्लुक भी बड़े घराने से था. वह उत्तर प्रदेश के जिला बदायूं के पूर्व बसपा सरकार के राज्यमंत्री हीरालाल कश्यप की एकलौती बेटी थी. उन के परिवार में पत्नी सीमा के अलावा बड़ी बेटी हिमांशी और उस से छोटे 3 बेटे थे आयुष, परख व रितिक.  हीरालाल कश्यप 2 बार आवास विकास परिषद के अध्यक्ष रह चुके थे. राजनीति में वह बड़ा नाम थे. एक ही पार्टी में होने की वजह से नरेंद्र कश्यप और हीरालाल कश्यप एकदूसरे को पहले से ही जानते थे. समय के साथ उन के परिवारों के बीच नजदीकियां बढ़ीं तो दोनों परिवारों में रिश्ते को ले कर बात चली. सागर और हिमांशी ने एकदूसरे को पसंद कर लिया तो राजनीतिक नजदीकियां रिश्तेदारी में बदल गईं.

27 नवंबर, 2013 को हीरालाल कश्यप ने बेटी का विवाह बड़ी धूमधाम से किया था. विवाह का आयोजन इतना बड़ा था कि उस में करीब 10 हजार लोगों को न्यौता दिया गया था. शहर के सारे होटलों को बुक कराया गया था. कई बड़े व रसूखदार नेता विवाह समारोह में आए थे. हिमांशी की विदाई भी हेलीकौप्टर से हुई थी. हीरालाल ने बेटी की खुशी के लिए वह सब किया, जो वह कर सकते थे.

भविष्य के सुनहरे ख्वाबों का घरौंदा बनाने वाली हिमांशी जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही होनहार, नई सोच, संस्कारी और परिवार को साथ ले कर चलने वाली थी. खुशमिजाज जिंदगी उसे पसंद थी. बड़ी होने की वजह से परिवार की भी लाडली थी. वह पढ़लिख कर ऊंचा मुकाम हसिल करना चाहती थी. उस ने हाईस्कूल से ले कर एमए व बीएड तक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की थी.

विवाह के बाद हिमांशी ने आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर की तो ससुराल वालों ने अनुमति दे दी. उस ने एलएलबी की पढ़ाई शुरू कर दी. जिंदगी खुशहाली के आंगन में तराना गुनगुना रही थी. प्यार, समर्पण और विश्वास के रिश्ते यूं भी खुशियां ही दिया करते हैं. एक साल बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया तो खुशियों में और भी इजाफा हो गया. कश्यप परिवार के पास नाम, शोहरत, दौलत सब कुछ था, जिसे पाने का लोग ख्वाब देखते रहते हैं. चकाचौंध भरी जिंदगी के पीछे भी कोई खालीपन या अवसाद हो सकता है, इस की कल्पना भी बेमानी थी. लेकिन कई बार जो दिखता है, वैसा होता नहीं है. हिमांशी की खुशियां भी कुछ वैसी ही थीं.

6 अप्रैल की दोपहर हिमांशी की ससुराल वाले उसे शहर के एक प्राइवेट अस्पताल ले कर पहुंचे. वह खून से लथपथ थी. उस की दाईं कनपटी पर गोली का निशान था. डाक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया था. उन्हें बताया गया था कि उस ने खुद को गोली मार ली थी. मामला आत्महत्या का बताया गया था, इसलिए अस्पताल की ओर से इस बात की सूचना पुलिस को दे दी गई थी.

मामला सनसनीखेज और रसूखदार परिवार का था, इसलिए एसपी (सिटी) सलमान ताज, सीओ मनीष मिश्रा और स्थानीय थाना कविनगर के थानाप्रभारी अशोक सिसौदिया अस्पताल पहुंच गए थे. खून रोकने के लिए हिमांशी के सिर पर पट्टी बंधी थी. उस की नाक से भी खून आ रहा था और आंखों के ऊपर का भाग सूज कर नीला पड़ गया था.

पुलिस अधिकारी नरेंद्र कश्यप के आवास पर भी पहुंचे. सूचना पा कर एसएसपी धर्मेंद्र सिंह भी आ गए थे. घटना कोठी की पहली मंजिल पर घटी थी. ऊपर बने बैडरूम के नजदीक के बाथरूम का दरवाजा खुला था. उस की फर्श पर खून के निशान मौजूद थे. पुलिस ने सांसद नरेंद्र कश्यप व घर के अन्य लोगों से पूछताछ की. उन्होंने जो बताया, उस के मुताबिक 6 अप्रैल की सुबह सागर पढ़ाई के लिए मेरठ चला गया था तो सिद्धार्थ कचहरी.

तकरीबन 11 बजे हिमांशी अपने बैडरूम में अकेली थी, जबकि बाकी लोग नीचे थे. नरेंद्र हिमांशी के बेटे मौलिक को खिला रहे थे. वह रोने लगा तो नरेंद्र ने अपने भतीजे मोनू से कहा, ‘‘बेटा, ऊपर जा कर हिमांशी को बुला लाओ, वह आ कर मौलिक को संभाल लेगी.’’

‘‘जी, अभी बुलाता हूं.’’ कह कर मोनू सीढि़यां चढ़ कर ऊपर पहुंचा. वहां सन्नाटा पसरा था. मोनू ने हिमांशी को आवाज दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. उस ने बाथरूम का दरवाजा चैक किया तो वह अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खटखटाने के साथ कई आवाजें दीं, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उसे हैरानी और आशंका दोनों हुईं. उस की कुछ समझ में नहीं आया तो उस ने नीचे आ कहर कहा, ‘‘मैं ने भाभी को कई आवाजें दीं, लेकिन वह कोई जवाब नहीं दे रही हैं. वह बाथरूम में हैं.’’

मोनू की बात से सभी सोच में पड़ गए. मन में अनहोनी की आशंका लिए सभी ऊपर पहुंचे. आवाजें देने पर भी दरवाजा नहीं खुला तो दरवाजा तोड़ दिया गया. बाथरूम की फर्श पर हिमांशी घायल पड़ी थी. उस के पास ही पति सागर का लाइसैंसी रिवौल्वर पड़ा था. उन लोगों ने उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया, लेकिन वहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. शायद वह पहले ही मर चुकी थी. इस के बाद पुलिस को सूचना दी गई. सूचना पा कर हिमांशी के पति सागर और देवर सिद्धार्थ भी घर आ गए थे. पुलिस ने उन दोनों से भी पूछताछ की.

सागर से पुलिस को पता चला कि 10 बज कर 53 मिनट पर हिमांशी ने उसे फोन किया था. उस ने उसे ‘आई लव यू’ कहा था. हालांकि जिस तरह से उस ने बात की थी, उस का अंदाज कुछ अलग था, लेकिन वह उसे समझ नहीं सका. उस की करीब 53 सेकेंड बात हुई थी. मामला आत्महत्या का बताया जा रहा था, लेकिन हिमांशी ने आत्महत्या क्यों की, इस का जवाब किसी के पास नहीं था. दूसरे जिस रिवौल्वर से हिमांशी ने खुद को गोली मारी थी, वह भी बैडरूम में अलमारी के ऊपर रखा पाया गया था. नरेंद्र कश्यप का कहना था कि उसे घर वालों ने बाथरूम से उठा कर वहां रखा था.

सवाल यह भी था कि मामला अगर आत्महत्या का था तो घटनास्थल से छेड़छाड़ क्यों की गई थी? एक तरह से साक्ष्यों को छिपाने की कोशिश की गई थी. दूसरे बाथरूम का दरवाजा भी सहीसलामत था. उस की सिटकनी टूटी होनी चाहिए थी, लेकिन वह बिलकुल ठीक थी. सब से बड़ा सवाल यह था कि किसी ने गोली चलने की आवाज नहीं सुनी थी. फिंगरप्रिंट, फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम को भी मौके पर बुला लिया गया था. टीम ने खून सने कपड़े, खून के नमूने, जरूरी साक्ष्य और फोटोग्राफ वगैरह ले लिए गए थे. पुलिस ने वह रिवौल्वर भी अपने कब्जे में ले लिया था, जिस से गोली चलाने की बात कही जा रही थी.

पुलिस अधिकारियों ने घटना को डेमो कर के देखा. डेमो के दौरान बाथरूम की सिटकनी टूट गई, जबकि वह पहले नहीं टूटी थी. यहां एक सवाल यह भी था कि घटना की सूचना पुलिस को नहीं दी गई थी. पहली नजर में मामला संदिग्ध लग रहा था. खबर जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी. हिमांशी के मायके वाले भी गाजियाबाद आ गए थे. बेटी की लाश देखने के बाद उन का रोरो कर बुरा हाल हो गया. पुलिस ने सांत्वना दे कर उन्हें चुप कराया, फिर पूछताछ की. उन लोगों ने हिमांशी की आत्महत्या करने वाली बात को सिरे से नकार दिया. उन्होंने पुलिस को जो बताया, वह चौंकाने वाला था.

मायके वालों के अनुसार, हिमांशी को काफी दानदहेज दिया गया था. इस के बावजूद विवाह के बाद से ही उसे ससुराल में दहेज के लिए परेशान किया जाने लगा था. हर त्यौहार पर सोनेचांदी के जेवरों व कपड़ों के साथ अन्य वस्तुओं की मांग की जाती थी.

बेटी की खुशियों के लिए वे लोग हिमांशी की ससुराल वालों की मांगें पूरी करते रहे. हीरालाल कश्यप के अनुसार, शादी के 4 दिनों बाद ही नरेंद्र के परिवार का दहेजलोभी चेहरा सामने आ गया था. बेटी की खुशियों के लिए खामोश रहना उन की मजबूरी बन गया था. इस से उन के हौसले और भी बढ़ गए.  हिमांशी को बागबानी और पेंटिंग का शौक था. वह सकारात्मक सोच वाली लड़की थी. इसलिए संस्कारों के साथ अच्छी बहू होने का दायित्व निभा रही थी. लेकिन ससुराल वालों के लालचभरे व्यवहार के कारण वह अंदर ही अंदर बुरी तरह टूट गई थी.

हिमांशी अपनी सास की नापसंद बन गई थी. छोटीछोटी बातों पर दोनों के बीच झगड़ा होता रहता था, जिस से स्थितियां लगातार बिगड़ती गईं. दहेज के लिए उस के साथ कई बार मारपीट भी की गई. पिछले कुछ महीनों से हिमांशी की ससुराल वाले फौर्च्युनर कार मांग कर रहे थे, जिसे ले कर आए दिन विवाद होता रहता था. 25 मार्च को हिमांशी मायके गई थी, तब भी उस ने बताया था कि अगर कार नहीं दी गई तो उस पर अत्याचार बढ़ते जाएंगे.

उस ने बताया था कि उस के साथ कुछ दिनों पहले मारपीट की गई थी, जिस से उस के कान का परदा सूज गया था. सागर उसे यह कह कर प्रताडि़त करता था कि वह पिता से जल्दी कार ले आए, क्योंकि उसे अपने पापा की गाड़ी से जाना पड़ता है. ऐसी स्थिति में हिमांशी ने ससुराल जाने से मना कर दिया था, लेकिन घर वालों ने समझाबुझा कर किसी तरह उसे ससुराल भेजा था.

वह बेटी पर होने वाले अत्याचारों की शिकायत पुलिस में करना चाहते थे, लेकिन बदनामी के डर से कर नहीं सके. बेटी को उत्पीड़न से बचाने के लिए हीरालाल कार देने के लिए भी राजी हो गए थे. उन्होंने वादा कर लिया था कि प्लौट बेच कर वह कार दे देंगे. जब मांग जल्दी पूरी नहीं हुई और कलह बढ़ती गई तो दहेज के दानव ने उन की बेटी को लील लिया. उन्हें बेटी की मौत की खबर तक नहीं दी गई. टीवी पर खबर देखने के बाद जब रिश्तेदारों के फोन आने लगे तो उन्हें पता चला. उन्होंने नरेंद्र कश्यप को फोन किया तो उन्होंने बताया कि हिमांशी ने बाथरूम में खुद को गोली मार ली है, इसलिए आप लोग आ जाएं. जिस के बाद वे लोग आए.

तमाम आरोपों के साथ हीरालाल के भाई हरिओम कश्यप ने लिखित तहरीर दी तो पुलिस ने नरेंद्र कश्यप, उन की पत्नी देवेंद्री, बेटों सागर, सिद्धार्थ और बेटियों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न व हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच सीओ मनीष मिश्रा को सौंप दी गई. इसी बीच नरेंद्र कश्यप और उन की पत्नी की तबीयत बिगड़ गई. सीने में दर्द और घबराहट की शिकायत पर दोनों अस्पताल में भरती हो गए. लेकिन पूछताछ में दोनों अपने बयानों पर कायम रहे. मामला संदिग्ध था, घटनास्थल ने उसे और संदिग्ध बना दिया था. पुलिस ने आसपड़ोस वालों से पूछताछ की तो उन का कहना था कि गोली की बात उन से छिपाई गई थी. उन्हें बताया गया था कि हिमांशी जल गई है, इसलिए उसे अस्पताल ले जा रहे हैं.

दूसरी ओर सीएमओ डा. अजय अग्रवाल के निर्देश पर 3 डाक्टरों की टीम ने हिमांशी की लाश का पोस्टमार्टम वीडियोग्राफी के बीच किया. गोली उस के सिर में फंसी पाई गई थी. पोस्टमार्टम के बाद हिमांशी की लाश उस के मायके वालों को सौंप दी गई तो वे उसे ले कर बदायूं चले गए. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि अगर सब कुछ ठीक था तो फिर ऐसी कौन सी वजह थी, जिस ने हिमांशी को मौत के नजदीक पहुंचा दिया. पुलिस जांच में जुट गई. घटनास्थल से मिले साक्ष्यों और हिमांशी के घर वालों से उस की मौत की बात छिपाने जैसी बातों ने घटना को संदिग्ध बना दिया था.

पुलिस ने सागर को हिरासत में ले कर पूछताछ की. घर वालों के बयान मेल नहीं खा रहे थे. मुकदमा दर्ज हो चुका था. कभी भी गिरफ्तारी हो सकती थी, किसी सांसद को गिरफ्तार करना पुलिस के लिए आसान नहीं होता. जिलाधिकारी विमल कुमार शर्मा और एसएसपी धर्मेंद्र सिंह ने सांसद की गिरफ्तारी के लिए संयुक्त रिपोर्ट तैयार कर के राज्यसभा के सभापति को भेज दी.

अगले दिन पुलिस ने सांसद नरेंद्र कश्यप, उन की पत्नी और बेटे सागर को दहेज हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. सांसद की गिरफ्तारी से उन के समर्थकों में रोष फैल गया. उन्होंने इसे ले कर हंगामा किया. पुलिस ने जैसेतैसे स्थिति को काबू करके तीनों आरोपियों का मैडिकल चैकअप कराने के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट कमरुजमां की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

दूसरी ओर बदायूं में हिमांशी की मौत से हर कोई स्तब्ध था. किसी को नहीं पता था कि जिस होनहार बेटी को दुलहन के रूप में धूमधाम से विदा किया गया, वह एक दिन इस तरह चली जाएगी. गमगीन माहौल के बीच उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उसे इंसाफ दिलाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आए. उन्होंने प्रदर्शन और नारेबाजी के साथ हिमांशी के हत्यारोपियों को फांसी दिए जाने की मांग की. गमजदा लोगों ने कैंडल मार्च भी निकाला. सोशल साइट्स पर भी हिमांशी को इंसाफ दिलाने की मुहिम शुरू हो गई.

इस बीच हिमांशी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई थी. उस की मौत की वजह गनशौट बताई गई. उस की मौत रिवौल्वर की नजदीक से चली गोली की वजह से हुई थी. कनपटी के दाहिनी तरफ जो घाव था, उस के पास बारूद के कणों के साथ लालकाले धब्बे पाए गए. आंखों के पास भी वाले धब्बे थे. उस की हथेलियों पर भी चोट के निशान थे.

पुलिस ने बरामद रिवौल्वर को बैलेस्टिक जांच के लिए और हिमांशी के सिर से मिली गोली, कपड़ों व मौके से लिए गए खून के सैंपल को जांच के लिए फोरैंसिक लैब भेज दिया, ताकि पता लगाया जा सके कि गोली किस रिवौल्वर से, कितनी दूरी और किस दिशा से चली. उस के विसरा को भी जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया था.

हिमांशी की मौत की मिस्ट्री हत्या और आत्महत्या के बीच उलझी हुई थी. कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन एक होनहार विवाहिता ने अपने मातापिता को तो गम दिया ही, नरेंद्र कश्यप और उन का परिवार भी मुसीबत में फंस गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही थी. फोरैंसिक लैब की रिपोर्ट का भी इंतजार था. किसी ने नहीं सोचा था कि 2 बड़े परिवारों के रिश्तों की डोर इस तरह टूट जाएगी. पुलिस नामजद अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयास कर रही है. अभी सांसद नरेंद्र कश्यप के खिलाफ उन की पार्टी ने कोई कदम नहीं उठाया है. पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रामअचल का कहना था कि पार्टी न्यायालय के फैसले के बाद ही कोई काररवाई करेगी. आरोप तो किसी पर भी लगाया जा सकता है.

असमय एकलौती होनहार बेटी हिमांशी की मौत से उस के मातापिता बुरी तरह दुखी हैं. पिता हीरालाल कश्यप का कहना है कि उन की बेटी बहादुर और समझदार थी. वह सकारात्मक सोच रखने वाली लड़की थी. वह आत्महतया जैसा कदम कतई नहीं उठा सकती. उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि दहेज के लिए उन की बेटी को मार दिया जाएगा. अगर पता होता तो वह बेटी को साथ ले आते. वह तो बंदोबस्त कर के लालची ससुराल वालों को कार देने को भी तैयार थे. वह आरोपियों को फांसी तक पहुंचाने के लिए लड़ाई लड़ेंगे.

दूसरी ओर दहेज हत्या के आरोपों में फंसे सांसद नरेंद्र कश्यप का जेल जाने से पूर्व पुलिस हिरासत के दौरान कहना था कि हिमांशी उन की नेक व शरीफ बहू थी. उन्होंने उसे हमेशा बेटी की तरह रखा. उन्हें उस से कोई शिकायत नहीं थी. उस के पिता ने दुखी हो कर उन पर दहेज के आरोप लगाए हैं, जबकि उन्होंने कभी दहेज की मांग नहीं की. उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया है. वह हर जांच को तैयार हैं, जिस से सारी सच्चाई सामने आ जाएगी. Murder Case

—कथा पुलिस सूत्रों व परिजनों से बातचीत पर आधारित

 

Uttar Pradesh Crime: मां का आशिक बेटे का दुश्मन

Uttar Pradesh Crime: पति के बाहर रहने की वजह से कमला ने गांव के ही संजय से संबंध बना लिए. लेकिन जब कमला के बेटे विशाल ने उसे संजय के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया तो वह दोनों के लिए खतरा बन गया. तब इस खतरे से निपटने के लिए संजय ने जो किया, वह कतई ठीक नहीं था.

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के थाना मारहरा के गांव पिदौरा के रहने वाले बालकिशन के परिवार में पत्नी कमला के अलावा 5 बच्चों में, 2 बेटियां, गीता, रमा तथा 3 बेटे दरवेश, दीपक और विशाल थे. बालकिशन अलीगढ़ से ताले खरीद कर गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के शहरों में घूमघूम कर बेचने का काम करता था. इसलिए वह कईकई महीनों बाद घर आता था. उस के पीछे घर और बच्चों की जिम्मेदारी पत्नी कमला संभालती थी.

कहने को तो उस का बड़ा भाई जयराम पत्नी मीना के साथ पड़ोस में ही रहता था, लेकिन भाई से उस की बिलकुल नहीं पटती थी, इसलिए वह बालकिशन के घरपरिवार से कोई मतलब नहीं रखता था. वह निस्संतान था, इसलिए बालकिशन का छोटा बेटा विशाल जब कभी उस के यहां जाता, पतिपत्नी उसे बहुत प्यार करते थे, इसलिए वह जबतब ताईताऊ के यहां जाता रहता था.

कमला जब से ब्याह कर आई थी, पति का साथ ज्यादा नहीं मिला था, इसलिए बालकिशन जब भी घर आता, वह उस से शिकायत करती कि उस के जाने के बाद उस का मन नहीं लगता. तब बालकिशन उसे समझाता कि रोजीरोटी के लिए तो लोग देश छोड़ देते हैं, कम से कम वह देश में रह रहा है. 4-6 महीने में उस के पास आ जाता है, इसलिए उसे इसी में खुश रहना चाहिए. कमला ने हालात से भले समझौता कर लिया था, लेकिन कभीकभी मन में अकेली होने की कसक जरूर उठती थी.

उस के घर के सामने ही शराब का ठेका था, जिस पर गांव का पूर्व बीडीसी संजय लगभग रोज शराब पीने आता था. कमला ने घर के बाहरी हिस्से में दुकान खोल रखी थी, इसलिए आतेजाते संजय उस से दुआसलाम कर के हालचाल पूछ लेता था. कभीकभार कुछ देर बैठ भी जाता था और जरूरत पड़ने पर उस के छोटेमोटे काम भी कर देता था.

जवान और आकर्षक कमला की बातों से संजय को लगने लगा था कि कमला पति के बाहर रहने से बेचैन रहती है. इस के बाद वह कमला के घर कुछ ज्यादा ही आनेजाने लगा. इस की एक वजह यह भी थी कि वह अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं था, क्योंकि उस की पत्नी अधपगली थी. यही वजह थी कि कमला के पास बैठतेबैठते उस की अतृप्त कामनाएं जाग उठी थीं.

गांव के रिश्ते से कमला उस की भाभी लगती थी, इसलिए वह उस से हंसीमजाक पहले से ही करता रहा था. कमला भी उस के हंसीमजाक का जवाब उसी के अंदाज में देती थी. इन बातों से संजय का आकर्षण कमला के प्रति बढ़ता गया. अब वह जब भी कमला के घर आता, उस के दिल की धड़कनें बढ़ जातीं. दिल कुछ कहना चाहता, लेकिन कहने की हिम्मत नहीं होती. संजय ने सोचा आखिर इस तरह कब तक चलेगा, अगर उसे कमला को पाना है तो दिल की बात कहनी ही होगी.

एक दिन दोपहर को संजय बैठा था, तभी कमला ने कहा, ‘‘बच्चों के जाने के बाद दोपहर तक का समय बिताना मुश्किल हो जाता है. तुम्हारे भैया के बाहर रहने की वजह से घर सूनासूना लगता है, बच्चे आ जाते हैं तो थोड़ा मन लग जाता है.’’

‘‘भाभी, मैं आप की परेशानी अच्छी तरह समझता हूं. तुम इतनी सुंदर हो, इस के बावजूद भाई तुम्हें छोड़ कर न जाने कहांकहां भटकता रहता है.’’

अपनी तारीफ हर किसी को अच्छी लगती है, खासकर महिलाओं को और ज्यादा. कमला को भी अपनी तारीफ अच्छी लगी. आह सी भरते हुए उस ने कहा, ‘‘भइया, सब नसीब का खेल है.’’

संजय को लगा कि दिल की बात कहने का यह अच्छा मौका है. उस ने कमला का हाथ थाम कर कहा, ‘‘भाभी, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, मैं तुम्हारे दर्द को अच्छी तरह समझता हूं, इसलिए तुम्हारी तन्हाई बांटना चाहता हूं.’’

कमला ने हैरानी से संजय को देखा. उस की यह हरकत उसे अच्छी नहीं लगी. इसलिए उस ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, ‘‘संजय, अब अच्छा यही होगा कि तुम चुपचाप यहां से चले जाओ.’’

संजय घबरा गया और तुरंत वहां से चला गया. उस के जाने के बाद थोड़ी देर कमला गुमसुम बैठी रही. बच्चे स्कूल से आ गए तो वह काम में लग गई. लेकिन रात में जब वह सोने के लिए लेटी तो उसे संजय की याद आने लगी. उस ने अपना दिल टटोला तो उसे लगा, संजय ने जो कहा है, बुरा नहीं कहा है. उसे भी तो वह अच्छा लगता है. लेकिन उस ने उस के बारे में इस तरह की बातें अब तक सोची ही नहीं थीं.

अगले कुछ दिनों तक संजय दिखाई नहीं दिया तो कमला बेचैन हो उठी. दिल और दिमाग की कशमकश में दिल जीत गया. कमला ने बेटे को भेज कर संजय को बुला लिया. उस के आने पर कमला ने कहा, ‘‘तुम कैसे मर्द हो, जो अपना हक भी नहीं ले सकते. अरे तुम तो अपना हक ताकत से ले सकते हो. भई, जब प्यार करते हो तो डर क्यों रहे हो?’’

संजय ने बुलाने का मतलब समझ लिया था. उस समय बच्चे थे, इसलिए उस ने कहा, ‘‘भाभी, रात को आऊंगा, दरवाजा खुला रखना.’’

बालकिशन जिस पत्नी के सुख के लिए शहरशहर भटक रहा था, उस रात उस ने पराए मर्द के साथ उस की इज्जत को तारतार कर दिया. इस के बाद जब भी दोनों को मौका मिलता, बालकिशन की इज्जत से खिलवाड़ कर लेते. कुछ समय तक तो दोनों पर किसी का ध्यान नहीं गया, लेकिन एक दिन ठेके पर बैठे किसी आदमी ने जब कहा कि आजकल संजय का बालकिशन के घर कुछ ज्यादा ही आनाजाना है तो लोगों को लगा कि जरूर कुछ गड़बड़ है. लोग कमला और संजय पर नजर रखने लगे. कमला लापरवाह हो गई थी, इसलिए उस की हरकतों को देख कर लोगों को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि उन के बीच जरूर कुछ है.

बालकिशन इस बार घर लौट कर आया तो उसे घर का माहौल कुछ बदला सा लगा. कमला ने अकेलेपन की भी शिकायत नहीं की. उस ने बिस्तर पर भी महसूस किया कि कमला उस के पास नहीं है. 2 दिनों बाद कमला ने पूछा, ‘‘कितने दिनों तक रहोगे?’’

बालकिशन ने आह भरते हुए कहा, ‘‘अब मैं अपने इस काम से ऊब गया हूं. जाने का मन नहीं हो रहा. मन करता है, यह काम छोड़ कर कोई दूसरा काम कर लूं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?’’ कमला ने बेचैन हो कर कहा, ‘‘यह घर कैसे चलेगा?’’

बालकिशन ने सोचा, पहले तो कमला कहती थी कि यह काम छोड़ कर कोई ऐसा काम कर लो, जिस में घर से बाहर न जाना पड़े. अब ऐसा क्या हो गया कि वह घर में नहीं रहने देना चाहती. उस ने उसे तीखी नजरों से घूरा तो कमला बोली, ‘‘बच्चों को पालने के लिए कुछ तो करना ही होगा.’’

बालकिशन की समझ में नहीं आया कि वह दूसरा कुछ क्या करे, इसलिए उस ने कहा, ‘‘2 दिनों बाद जाने का मन है.’’

बालकिशन के जाते ही संजय का उस के घर आनाजाना फिर शुरू हो गया. कमला का सब से छोटा बेटा 10 साल का विशाल अकसर बच्चों के साथ सड़क पर खेला करता था. आतेजाते लोग उस से पूछते, ‘‘बच्चा, यह संजय तुम्हारे घर क्यों आता है, तुम्हें पता है?’’

विशाल न में सिर हिलाता तो वे कहते, ‘‘वह तुम्हारी मम्मी का यार है, इसलिए अब वही तुम्हारा पापा है.’’

विशाल को जब लगने लगा कि लोग उस की मां को गाली देते हैं तो उस ने सोचा कि अब वह संजय चाचा को अपने घर नहीं आने देगा. संजय अकसर तभी कमला के घर आता था, जब बच्चे घर में नहीं होते थे. इसलिए विशाल और संजय का आमनासामना कम ही होता था. लेकिन एक दिन जब शाम को उस ने मम्मी के पास संजय को बैठा देखा तो भड़क उठा, ‘‘चाचा, तुम मेरे यहां मत आया करो. लोग तुम्हें ले कर मेरी मम्मी को गाली देते हैं.’’

यह सुन कर कमला हक्कीबक्की रह गई. उस ने विशाल को डांटा, ‘‘बड़ों से इस तरह की बातें नहीं करते. क्या मैं ने तुम्हें यही सिखाया है?’’

मां की डांट से विशाल चुप तो हो गया, लेकिन उस की बातों से कमला और संजय सहम उठे. इस का मतलब किसी ने बच्चे को भड़काया है. एक दिन स्कूल में तबीयत खराब होने की वजह से विशाल अचानक घर आ गया तो उस ने कमला को संजय के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया.

संजय जल्दी से कपड़े संभाल कर भाग खड़ा हुआ, कमला ने कपड़े संभालते हुए पूछा, ‘‘आज तू इतनी जल्दी कैसे आ गया?’’

विशाल की समझ में नहीं आया कि वह मम्मी से क्या कहे? गांव वाले उस की मम्मी को ले कर उस से जो कहते थे, आज उस की समझ में आ गया था. उसे मम्मी से नफरत हो गई. वह कुछ कहे बगैर ही ताई के पास चला गया. वहां उस ने कहा, ‘‘ताई, संजय चाचा और मम्मी गंदा काम करते हैं, मैं संजय चाचा को कभी अपने घर नहीं आने दूंगा.’’

मीना को भी संजय और कमला के संबंधों की जानकारी थी. लेकिन बच्चे ने जो कुछ देखा था, उस से उसे चिंता हुई कि बच्चे के मन पर इस का क्या असर पड़ेगा. उस ने विशाल को समझाने की कोशिश की. उस ने विशाल के मन से इस बात को निकालने की कोशिश तो की, लेकिन उस की नाराजगी बढ़ती ही गई. विशाल को अब संजय फूटी आंख नहीं सुहा रहा था. उसे अपनी मां से भी नफरत होने लगी थी. संजय भी उस से कतराने लगा था. आखिर एक दिन संजय ने कहा, ‘‘कमला, अब मुझे विशाल से डर लगने लगा है. यह लड़का हमारे लिए खतरा बनता जा रहा है. इस का कुछ तो करना ही पड़ेगा.’’

कमला ने कहा, ‘‘विशाल, अभी बच्चा है, उस की बात का क्या बुरा मानना. फिर उस की बात पर कौन विश्वास करेगा.’’

संजय न तो कमला को छोड़ सकता था और न ही विशाल को और अधिक सह सकता था. उसे लगता था कि विशाल कभी भी उसे फंसा सकता है. इसलिए बालकिशन घर लौट कर आए, उस के पहले ही उसे विशाल का कुछ करना था. उसे यह भी पता था कि कमला उस की इस साजिश में शामिल नहीं होगी, इसलिए यह काम उस की चोरी उसे अकेले ही करना था.

वह विशाल को खत्म कर देना चाहता था, लेकिन सवाल यह था कि यह काम वह करे कैसे? इस की वजह यह थी कि वह चाह कर भी विशाल को कहीं नहीं ले जा सकता. जबकि वह विशाल को कहीं एकांत में ले जा कर उसे मार कर उस की लाश को छिपा देना चाहता था. लेकिन विशाल उस के साथ कहीं जा नहीं सकता था. इसलिए उस के लिए यह काम कठिन था. एक दिन वह इस बारे में सोच रहा था कि उस की नजर सामने से चले आ रहे मुकेश पर पड़ी. मुकेश संजय का दोस्त था और पक्का शराबी था. जबतब वह संजय से पैसे भी उधार लेता रहता था. संजय ने मुकेश को बुला कर कहा, ‘‘चलो, ठेके पर चलते हैं, 2-2 पैग पी लेते हैं.’’

मुकेश तो ऐसे मौके ढूंढ़ता ही रहता था. वह संजय के साथ ठेके पर पहुंच गया. संजय ने बोतल मंगाई तो उस ने पूछा, ‘‘आज किस खुशी में यह पार्टी दे रहे हो?’’

‘‘तुम शराब पियो, पार्टी की बात बाद में बताऊंगा.’’

दोनों शराब पीने लगे. जब थोड़ा नशा चढ़ा तो संजय ने कहा, ‘‘मुकेश मेरा एक काम है, कर दोगे?’’

मुकेश ने हां में सिर हिलाया तो संजय ने कहा, ‘‘ठीक है, कल 6 बजे यहीं मिलना, तभी काम बताऊंगा.’’

इस के बाद दोनों शराब पी कर अपनेअपने घर चले गए. उस रात संजय को नींद नहीं आई. वह रात भर सोचता रहा कि उसे अपने रास्ते के कांटे को किसी भी तरह निकाल फेंकना है.

आदमी जब कुछ ठान लेता है तो उसे कर गुजरता है. तब वह अंजाम की भी चिंता नहीं करता. ऐसा ही संजय ने भी किया. अगले दिन शाम को विशाल खेलने बाहर निकला तो लौट कर घर नहीं आया. देर होने लगी तो कमला ने बच्चों को उसे ढूंढ़ने के लिए भेजा. बच्चे विशाल को ढूंढ़ते रहे, पर वह कहीं नहीं मिला. देर रात तक विशाल का कुछ पता नहीं चला तो कमला ने बालकिशन को फोन किया. बालकिशन उस समय दिल्ली में था, वह उसी समय घर के लिए चल पड़ा. सुबह वह घर पहुंचा तो कमला ने उसे सारी बात बताई.

परेशान बालकिशन गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर थाने जाने की तैयारी कर रहा था कि संजय आ गया. उस ने कहा, ‘‘भाई, थाने जाने से पहले हमें गांव में विशाल को ढूंढ़ लेना चाहिए. चलो, तुम्हारे घेर में देख लेते हैं. कहीं ऐसा न हो, वह किसी बात पर गुस्सा हो कर घेर में ही छिपा बैठा हो.’’

सभी लोग घेर में पहुंचे तो यह देख कर हैरान रह गए कि बालकिशन के घेर में पुआल के नीचे विशाल की लाश पड़ी थी. किसी ने गला घोंट कर उस की हत्या कर दी थी. जिस रस्सी से गला घोंटा गया था, वह भी वहीं पड़ी थी. बेटे की लाश देख कर बालकिशन फूटफूट कर रोने लगा. थाना मारहरा पुलिस को सूचना दी गई. थोड़ी ही देर में थानाप्रभारी यशवंत सिंह सहयोगियों के साथ आ गए. लाश का निरीक्षण करने के बाद यशवंत सिंह ने पूछताछ शुरू की. लेकिन उस समय उन्हें ऐसी जानकारी नहीं मिली कि वह हत्यारे तक पहुंच पाते. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर वह थाने आ गए और बालकिशन की ओर से अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस के सामने सवाल यह था कि बच्चे से किस की क्या दुश्मनी हो सकती थी, जो उस ने उसे मार दिया. बालकिशन बाहर ही रहता था, इसलिए उस की किसी से दुश्मनी हो नहीं सकती थी. आगे की पूछताछ में जब पता चला कि बालकिशन की पत्नी कमला के गांव के ही संजय से नाजायज संबंध थे तो यशवंत सिंह ने उसे पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. थाने में संजय से पूछताछ की गई तो उस ने कहा कि वह खुद हैरान है कि बच्चे की हत्या किस ने और क्यों कर दी? बच्चे से किसी की क्या दुश्मनी हो सकती है? इस के बाद उस ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘कहीं उस के ताईताऊ ने तो उसे नहीं मरवा दिया? बालकिशन से वे रंजिश भी रखते हैं.’’

पुलिस जयराम और मीना को थाने ला कर पूछताछ करने लगी. तब मीना ने कहा, ‘‘विशाल संजय से काफी नफरत करता था, क्योंकि उस ने उसे अपनी मां के साथ रंगेहाथों देख लिया था. वह अकसर संजय को गालियां देता रहता था. कहीं पोल खुलने के डर से संजय ने तो उसे नहीं मार दिया?’’

इस बात की पुष्टि गांव के अन्य लोगों ने भी की थी. यशवंत सिंह ने संजय को हिरासत में ले कर सख्ती से पूछताछ करनी चाही तो उस के बचाव में कमला आ गई. उस ने कहा, ‘‘संजय मेरे बेटे को क्यों मारेगा?’’

संजय लगातार कहता रहा कि उस ने बच्चे की हत्या नहीं की. लेकिन तभी यशवंत सिंह को कहीं से पता चला कि जिस दिन विशाल की हत्या हुई थी, संजय का दोस्त मुकेश उस के साथ था. संजय ने उसे शराब पिलाई थी और दोनों साथसाथ ठेके से निकले थे. यशवंत सिंह मुकेश को पकड़ लाए. जब थाने में उस से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, ‘‘मैं ने कुछ नहीं किया साहब, मुझे तो पता भी नहीं था कि संजय उस बच्चे को मार डालेगा.’’

‘‘उस दिन क्या हुआ था, विस्तार से बताओ?’’ यशवंत सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, संजय ने मुझे शराब पिला कर कहा कि मैं विशाल को बहलाफुसला कर उस के घेर में ले आऊं. मुझे मालूम नहीं था कि संजय उसे वहां क्यों लाने को कह रहा है. सच तो यह था कि मैं शराब के नशे में था, इसलिए मैं ने कुछ जानने की जरूरत ही नहीं समझी. लेकिन मैं जैसे ही विशाल को ले कर घेर में पहुंचा, संजय उसे मारने के लिए तैयार बैठा था. विशाल को देखते ही उस ने उस के गले में रस्सी का फंदा डाल कर कस दिया. मासूम छटपटा कर मर गया. इस के बाद उस ने मुझे धमकी दी कि अगर मैं ने यह बात किसी से कही तो हमें पुलिस पकड़ कर ले जाएगी, इसलिए मैं चुप रहा.’’

मुकेश के अपराध स्वीकार कर लेने के बाद संजय ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. उस ने बताया कि विशाल ने उसे कमला के साथ देख लिया था, इसलिए उसे डर था कि वह उस के संबंधों के बारे में बालकिशन को बता देगा. अपने संबंधों को छिपाए रखने के लिए ही उस ने उसे मार दिया था.

बालकिशन को जब पता चला कि उस के बेटे की हत्या की वजह उस की अपनी पत्नी है तो उस ने अपना सिर पीट लिया. कमला ने भी कभी नहीं सोचा रहा होगा कि उस का बेटा उस की अय्याशी की बलि चढ़ जाएगा. पूछताछ के बाद पुलिस ने संजय और मुकेश को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Andhra Pradesh: प्रेम के लिए हुई खौफनाक हत्या – मोनिका का शरीर टुकड़ों में मिला

Andhra Pradesh: प्यार से जुड़ा एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने हर किसी को हैरान कर दिया है. इस घटना में एक प्रेमिका अपने प्रेमी के घर गई थी, क्योंकि प्रेमी ने उसे बताया कि उस की पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके चली गई है. पत्नी के जाते ही प्रेमी ने महिला को घर बुला लिया, लेकिन वहां क्या हुआ कि अब उस के शव के टुकड़े बरामद हुए. आइए जानते हैं इस क्राइम की पूरी कहानी, जो आप को सावधान करेगी.

यह मामला आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम शहर से सामने आया है. जहां मोनिका और रविंद्र के बीच प्रेम प्रसंग चल रहा था. रविंद्र नेवी में टेक्नीशियन है और विजयनगरम जिले के राजम का निवासी है. पुलिस रिपोर्ट्स के अनुसार, रविंद्र की पत्नी कुछ हफ्ते पहले अपने मायके चली गई थी, जिस से वह घर में अकेला रह गया. रविंद्र के फोन करने पर रविवार दोपहर को मोनिका उन के घर पहुंची. दोनों कई घंटों तक घर में रहे, लेकिन बताया जा रहा है कि शाम को उन के बीच किसी बात पर विवाद हो गया.

गुस्से में आ कर रविंद्र ने चाकू का इस्तेमाल करते हुए मोनिका की हत्या कर दी. इस के बाद उस ने महिला के शव को टुकड़ों में काट दिया. रविंद्र ने शव के कुछ हिस्सों को नष्ट कर दिया और बाकी अंगों को अपने फ्रिज में रखा. आरोप है कि उस ने शरीर के कुछ अंगों को बैग में पैक कर किसी सुनसान जगह पर फेंक दिया, जबकि बाकी अंगों को फ्रिज में रख लिया.

पुलिस ने बताया कि रविंद्र बाद में थाने जाकर अपने अपराध को कबूल कर दिया और सरेंडर कर दिया. अधिकारियों ने उसके घर से शव के कुछ अंग बरामद किए, लेकिन सिर गायब था.

पुलिस को शक है कि उस ने सिर को कहीं और ठिकाने लगाया है. सिर और अन्य अंगों का पता लगाने के लिए पुलिस की विशेष टीम गठित की गई है. Andhra Pradesh

ExtraMarital Affair: अवैध संबंधों ने उजाड़ दिया परिवार

ExtraMarital Affair: विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.

बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.

यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.

मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.

लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.

पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.

इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.

लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.

विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.

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अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.

लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.

ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.

ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.

पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.

शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.

कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.

यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.

यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.

जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.

इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.

ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.

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वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.

अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.

हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.

दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.

दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.

धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.

जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.

तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.

वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.

अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.

बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.

सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.

यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.

पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.

दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी. ExtraMarital Affair

Hindi stories: जुर्म का रिश्ता

Hindi stories: चोरीडकैती करने वाली लैला को रौनी से प्यार हुआ तो वह साथियों से धोखा करने लगी. भला उस के साथी यह धोखेबाजी कैसे बरदाश्त करते, परिणामस्वरूप वह मारी गई.

सीनियर पुलिस इंसपेक्टर से मिलने का समय ले कर मैं ने फोन रखा ही था कि रौनी आ गया. उस का चेहरा उतरा हुआ था. इस का मतलब था कि वह किसी मुसीबत में था. उस ने आते ही कहा, ‘‘कौफी का वक्त है, मंगवा लो.’’

मैं ने कौफी का और्डर दे दिया. उस ने कुरसी पर करवट बदलते हुए कहा, ‘‘दोस्त, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं, जिस से मेरा दिल हलका हो जाए.’’

रौनी ऊंचा, स्मार्ट और पूरा आदमी था. वह काला सूट पहने था. रौनी अपनी बात कहे, उस से पहले मैं थोड़ा अपने बारे में बता दूं. मैं एक प्राइवेट डिटैक्टिव हूं. इस इमारत की दूसरी मंजिल पर मेरा औफिस है. उसी मंजिल पर रौनी का भी औफिस है. वह एक साइकियाट्रिस्ट था. उस के पास ज्यादा लोग नहीं आते थे, पर जो आते, वे बड़े लोग होते थे. वह उन्हीं लोगों से इतनी रकम ऐंठ लेता था कि उसे पैसों की कोई तकलीफ नहीं होती थी, क्योंकि उन के सेशन काफी चलते थे.

रौनी अपने काम में परफेक्ट था, क्योंकि जो लोग उस के पास आते थे, वे कहीं और नहीं जाते थे. उस के पास समय की कमी नहीं होती थी, इसलिए दिन में 1-2 चक्कर वह मेरे औफिस के जरूर लगा लेता था. उस की बातें बड़ी दिलचस्प और असरदार होती थीं. उस के न आने पर मुझे उस की कमी महसूस होती थी. आज मैं थोड़ा मसरूफ था. मेरा दिमाग एक उलझन में फंसा था. उस समय मेरे सामने सब से बड़ा मसला गहनों की दुकानों में होने वाली डकैतियां थीं. मेरे एक ज्वैलर क्लाइंट ने अपनी दुकान पर होने वाली डकैती के बारे में पता लगाने का काम मुझे सौंप रखा था.

इसी बात को ले कर मैं ने सीनियर पुलिस इंसपेक्टर मेहता से बात की थी. उस ने आज ही मुझे थाने बुलाया था. रौनी ने मुझे सोच में डूबा देख कर कहा, ‘‘सच में मैं बहुत परेशान हूं. मेरी दोस्त लैला का कुछ पता नहीं चल रहा है, न कोई फोन, न कोई सूचना.’’

लैला काम क्या करती थी, यह मुझे पता नहीं था, लेकिन इतना जरूर पता था कि वह क्रिस्टल बौल में लोगों को उन का भविष्य बता कर बेवकूफ बनाया करती थी. वह बेहद खूबसूरत और हंसमुख लड़की थी. हां, उस की ड्रैसिंग कुछ अजीब होती थी. वह काला या सुरमई रंग का रेशमी लबादानुमा चोंगा पहनती थी. उस के बाल पौनीटेल में बंधे होते थे. हाथों में ढेर सी मोटीमोटी चांदी की चूडि़यां कानों में बड़ीबड़ी बालियां और हमेशा होंठों पर गहरी लिपस्टिक लगाए रहती थी.

मैं ने रौनी से कहा, ‘‘हो सकता है रौनी, वह किसी काम से कहीं बाहर चली गई हो और तुम्हें बता न पाई हो?’’

‘‘नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे बिना बताए वह कहीं नहीं जा सकती.’’

‘‘यह भी हो सकता है कि वह किसी क्लाइंट को प्रभावित करने के लिए कुछ खास कर रही हो और उसे फुरसत न मिल रही हो.’’

मैं ने यह बात इसलिए कही थी, क्योंकि मुझे पता चला था कि वह भविष्य बता कर अच्छेभले लोगों को उल्लू बना रही थी. मेरा तो यह भी सोचना था कि वह रौनी को भी उल्लू बना रही थी. प्यार वगैरह सब ढोंग था. रौनी का प्यार तो सच्चा था, पर मुझे लैला पर जरा भी भरोसा नहीं था.

लेकिन यह सब मैं रौनी से नहीं कह सकता था. मैं ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘तुम परेशान बिलकुल मत हो, निश्चित वह कहीं काम में फंसी है. जल्दी ही वह तुम्हें खबर देगी.’’

‘‘नहीं, मेरा दिल बेचैन है. परसों रात हम मिलने वाले थे. मैं उस के फ्लैट पर गया, लेकिन वह वहां नहीं मिली. कल और आज मैं ने कई बार उसे फोन किया, पर उस ने फोन नहीं उठाया. पता नहीं क्या बात है? तुम प्राइवेट जासूस हो, मेरी गुमशुदा महबूबा को ढूंढने का केस ले लो प्लीज.’’

‘‘क्या तुम ने लैला की गुमशुदगी थाने में दर्ज करा दी है?’’

‘‘नहीं, क्या मुझे उस की गुमशुदगी की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए?’’

‘‘अगर, सच में वह गायब है तो अवश्य दे देनी चाहिए.’’ मैं ने कहा.

दरअसल, मैं उस का केस लेना नहीं चाहता था, क्योंकि मेरा खयाल था कि लैला जानबूझ कर उस से मिलना नहीं चाह रही है. नहीं तो वह जरूर खबर करती. जाहिर है, ऐसी सूरत में मेरी भागदौड़ बेकार जाती. रौनी ने कहा, ‘‘यह मत समझना कि मैं मुफ्त में काम कराऊंगा. मैं तुम्हें इस की पूरी फीस दूंगा.’’

‘‘मेरा खयाल है कि हमें जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए. हो सकता है, जल्द ही वह तुम्हें सूचना दे.’’

मेरा इंसपेक्टर से मिलने का समय हो गया था, इसलिए मैं ने खड़े होते हुए कहा, ‘‘मुझे एक जरूरी काम से पुलिस स्टेशन जाना है. मैं वहां पता करूंगा कि उस के साथ कोई हादसा तो नहीं हो गया. इस बीच तुम उस के दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन कर के पता कर लो.’’

उस ने इत्मीनान की सांस ली. हकीकत में मैं इस मामले को ले कर जरा भी परेशान नहीं था. मैं पुलिस स्टेशन चला गया. इंसपेक्टर मेहता ने मुझे बैठा कर कहा, ‘‘मि. रुस्तम, मसला यह है कि गहनों की दुकानों में लगातार होने वाली चोरियों ने हमें परेशान कर रखा है. मेरा खयाल है, ये सारी वारदातें एक ही सिलसिले की कडि़यां हैं, पर ऐसा कोई सबूत नहीं मिल रहा है, जिस से तफतीश आगे बढ़ सके.’’

‘‘यह अंदाजा आप ने कैसे लगा लिया कि ये वारदातें एक ही सिलसिले की कडि़यां हैं? यह भी तो हो सकता है कि कोई एक ही आदमी हो, जो अलगअलग जगहों पर वारदात कर रहा हो?’’

‘‘ऐसा सोचने की वजह यह है कि एक तो ये सारी वारदातें दिन में हुई हैं, दूसरे लूटे गए गहने एकदम से गायब हो गए हैं. उन्हें कहीं बेचा भी नहीं गया. हम इस पर कड़ी नजर रखे हुए हैं. इस से यही लगता है कि यह किसी एक गिरोह का या एक आदमी का काम है.’’

इंसपेक्टर मेहता होशियार और तेजतर्रार पुलिस अफसर थे. वह जरा भी घमंडी और मगरूर नहीं थे. प्राइवेट जासूसों से भी अच्छे से मिलते थे, इसलिए मेरी उन से अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. आज हमारी मुलाकात का यही मकसद था कि वह इस उलझे हुए केस में मेरी सलाह और मदद चाहते थे. मैं ने पूछा, ‘‘मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं?’’

‘‘मैं ने कुछ लोगों को पकड़ रखा है. वे इन डकैतियों में शामिल हो सकते हैं, पर काफी कोशिश के बाद भी मैं उन से कुछ मालूम नहीं कर सका हूं. शायद आप उन से काम की कोई बात उगलवा सकें.

उन के औफिस से निकल कर मैं हवालात की ओर बढ़ा था कि बरामदे में पड़ी बैंच पर मुझे रौनी की महबूबा लैला बैठी दिखाई दी. 2-3 बार वह रौनी के साथ मेरे औफिस में आई थी, इसलिए मैं उसे पहचानता था. वह थोड़ी तिरछी बैठी थी, इसलिए शायद उस ने मुझे नहीं देखा. मैं ने मेहता से पूछा, ‘‘इस औरत को जानते हो?’’

‘‘नहीं, पहले कभी नहीं देखा.’’

पहले जिस आदमी को मेरे सामने लाया गया, उस का नाम नरेन था. वह ज्वैलरी की एक दुकान में काम करता था. उस दुकान में भी डकैती हो चुकी थी. उस ने वारदात के 2 दिन पहले वहां से नौकरी छोड़ दी थी. उस से पूछताछ करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस का डकैती से कोई संबंध नहीं है. दूसरा आदमी सीधासादा नौजवान बब्बन था, बातचीत से ही वह बेकसूर लग रहा था. तीसरा आदमी लंबे चेहरे वाला जिमी था. उस का कहना था कि इस शहर में आए उसे बस 2 हफ्ते ही हुए हैं. वह यहां अपनी बीमार मां को देखने आया था, जो एक नर्सिंगहोम में एडमिट थी. उस ने मेरी हर बात के जवाब ठीक दिए थे, इसलिए उस पर शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

फिर भी मैं ने नर्सिंगहोम में भरती उस की मां से मिलने का फैसला किया. लेकिन इस से कुछ खास फायदा नहीं हुआ. उस की मां काफी बूढ़ी थी. वह व्हीलचेयर पर बैठी थी, जिसे एक नर्स धकेल रही थी. मैं ने अपना परिचय दिया तो वह मुसकराने लगी. मैं ने कहा, ‘‘मिसेज जेसिका मैं यहां सिर्फ यह पता करने आया हूं कि यहां आप की ठीक से देखभाल हो रही है या नहीं?’’

वह सिर्फ मुसकराती रही.

मैं ने आगे पूछा, ‘‘आप के कितने बच्चे हैं, क्या आप को देखने आते हैं?’’

उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, मेरे 6 बच्चे हैं.’’

‘‘क्या आप उन के नाम बता सकती हैं.’’

‘‘जौर्ज, साबू, सरीन, रौकी, मेरिन और पवन.’’

‘‘क्या उन में किसी का नाम जिमी भी है?’’

‘‘हां है न, वह बहुत अच्छा लड़का है.’’

‘‘लेकिन अगर जिमी को मिला लेते हैं तो आप के 7 बच्चे हो जाते हैं.’’

‘‘तो फिर 7 ही होंगे.’’

‘‘अच्छा, एक बार उन के नाम फिर से बताइए.’’

‘‘जिमी, पवन, जौन, सुरेश, बाबू, रीता, मेरिन.’’

मैं समझ गया कि बुढि़या का दिमाग ठीक नहीं है. मैं ने नर्सिंगहोम के रिसेप्शन से पता किया तो बताया गया कि जिमी के हुलिए का एक आदमी अकसर उस से मिलने आता रहता था. यह भी पता चला कि बुढि़या से मिलने तमाम लोग आते रहते थे. वह किसी को बेटा कहती थी तो किसी को बेटी.

जवान पोतेपोतियां भी उस से मिलने आते थे. इन की सारी तादाद पता नहीं थी. मेरे खयाल में जेसिका इस मामले में खुशनसीब थी. इतने लोग उस से मिलने आते थे और उस का खयाल रखते थे. शायद बुढ़ापे की वजह से उस की याददाश्त ठीक नहीं थी. कई बार तो उसे मिलने आने वाले बेटेबेटी या पोते का नाम क्या है, यही नहीं याद होता था? सब का प्यार मिलने की वजह से हर वक्त उस के होंठों पर मुसकान खिली रहती थी.

मैं रौनी से बचता हुआ अपने औफिस पहुंच गया. अगर मैं उसे यह बता देता कि मैं ने लैला को थाने में बैठी देखा था तो वह मेरी जान खा लेता. सवाल करकर के परेशान कर देता, इसलिए मैं उस से नहीं मिला.

रात को मैं अपने अपार्टमैंट में सो रहा था कि फोन की घंटी बजी. आंख खुली तो देखा रात के 2 बज रहे थे. फोन उठाना मेरी मजबूरी थी. दूसरी तरफ से रौनी की परेशान आवाज सुनाई दी, ‘‘रुस्तम, पुलिस मेरे अपार्टमैंट की तलाशी ले रही है, तुम जल्दी से आ जाओ.’’

‘‘क्यों, पुलिस तुम्हारे अपार्टमेंट की तलाशी क्यों ले रही है?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘पता नहीं, ये लोग कुछ बता भी नहीं रहे हैं. दोस्त तुम फौरन आ जाओ. तुम पुलिस के साथ काम करते हो, मुमकिन है तुम इस मामले में मेरी कुछ मदद कर सको. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है?’’

यह बात मेरी भी समझ में नहीं आई थी. आखिर पुलिस रौनी के फ्लैट की तलाशी क्यों ले रही थी? मैं उसे अच्छी तरह से जानता था, वह एक शरीफ आदमी था.

उस की मदद करना जरूरी था, इसलिए मैं उसी वक्त घर से निकल पड़ा. 10 मिनट में मैं उस की बिल्डिंग में पहुंच गया. उस समय इंसपेक्टर मेहता फ्लैट से निकल रहा था. मुझे देख कर बोला, ‘‘हैलो रुस्तम, आखिरकार हम ने इसे पकड़ ही लिया?’’

‘‘क्या…?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, पूरा माल तो नहीं, फिर भी अलगअलग दुकानों से चोरी के कुछ गहने जरूर बरामद हुए हैं. समझ लो केस खुल गया. पुलिस स्टेशन आ जाओ, मैं तुम्हें सब विस्तार से बता दूंगा.’’

मैं कुछ कहना चाहता था, तभी एएसआई और सिपाही रौनी को हथकड़ी लगा कर मेरे सामने से गुजरे, उस ने नाइटसूट पर कोट पहन रखा था, पैरों में स्लीपर थे. मुझे देख कर वह दुखी हो कर बोला, ‘‘प्लीज, मेरी मदद करो, मैं बेकसूर हूं रुस्तम.’’

पुलिस वाले उसे ले कर चले गए. मैं ने इंसपेक्टर मेहता से कहा, ‘‘मुझे लगता है, आप ने गलत आदमी को पकड़ लिया है?’’

‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो? इस के फ्लैट से चोरी का कुछ माल बरामद हुआ है.’’

‘‘एक बात मेरी समझ में यह नहीं आ रही है कि तुम्हें  इस पर क्यों शक हुआ?’’

‘‘रौनी के घर में जो औरत साफसफाई का काम करती है, उस ने अखबारों में गहनों की दुकानों में होने वाली डकैतियों के बारे में पढ़ा था. आज शाम को थाने आ कर उसी ने बताया कि उस ने रौनी के घर में कई जगहों पर गहनों के डिब्बे छिपे हुए देखे हैं, जिन में गहने रखे हैं.’’

मैं ने मेहता से कहा कि रौनी इस तरह का आदमी नहीं है. वह शरीफ और कानून पसंद आदमी है. इंसपेक्टर मेहता भी मुझ से सहमत थे, पर गहने उस के घर से बरामद हुए थे. हो सकता था, इस में उस का हाथ न हो. मैं ने कहा, ‘‘मुझे लगता है, उसे किसी ने फंसाने की कोशिश की है?’’

‘‘पर वह कौन हो सकता है? उस ने ऐसा क्यों किया?’’

उसी समय मेरी जेहन में लैला का खयाल आया. उसे मैं ने थाने के बरामदे में बैठी देखा था. मैं ने यह बात मेहता से पूछी तो उस ने कहा, ‘‘हां, सुबह जब तुम ने उस के बारे में पूछा था तो मैं ने पता किया कि वह थाने क्यों आई थी? उस ने बताया कि वह जिमी का इंतजार कर रही थी. मेरा खयाल है कि वह जिमी की गर्लफ्रैंड है, क्योंकि जब जिमी पहुंचा था तो उन दोनों में बातचीत भी हुई थी. झगड़े जैसी आवाजें भी आई थीं. बाद में वह उसी के साथ चली गई थी.’’

‘‘मुझे यकीन था कि वह रौनी और इस केस के बीच की कड़ी थी. हमें सख्त पूछताछ करनी होगी.’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं अपने आदमियों को लैला और जिमी की तलाश में भेजता हूं.’’ मेहता ने कहा.

रौनी को पुलिस से रिहा करा कर मैं घर आ गया. मैं ने मेहता से वादा किया था कि किसी भी वक्त रौनी को हाजिर करने की जिम्मेदारी मेरी है. उस ने भी कहा था कि लैला के मिलते ही वह मुझे सूचना देगा.

दूसरे दिन रौनी जब मेरे औफिस आया तो उस की हालत काफी खराब थी. उस के बाल बिखरे हुए थे, चेहरा  उजड़ा हुआ था. वह दुखी हो कर बोला, ‘‘यह कितनी खराब बात थी कि पुलिस वाले मुझे मुजरिमों की तरह हथकड़ी लगा कर ले गए.’’

‘‘रौनी, तुम्हारे घर से चोरी के गहने बरामद हुए थे. उन्हें यह तो करना ही था. शुक्र करो कि तुम्हें रिहाई मिल गई, सवाल यह है कि तुम्हारे घर चोरी के गहने आए कैसे?’’

‘‘मुझे इस बारे में कुछ खबर नहीं है. तुम्हें तो पता है कि मैं ज्यादातर घर से बाहर रहता हूं. मुझे खुद हैरानी हो रही है कि मेरे घर किस ने और क्यों वे गहने रखे?’’

‘‘लैला के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है, क्या यह मुमकिन है?’’

उस ने मेरी बात काट कर कहा, ‘‘नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकती. उस के पास चोरी के गहने कहां से आएंगे? तुम उस पर क्यों शक कर रहे हो?’’

‘‘क्या तुम उस के अतीत के बारे में जानते हो? उस की हर गतिविधि की जानकारी तुम्हें रहती है?’’

‘‘क्यों, उस की ऐक्टीविटीज जानना जरूरी है?’’

‘‘तभी तो कोई बात तुम दावे से कह सकते हो. किसी इंसान के बारे में कुछ कहने के लिए उस का अतीत, वर्तमान और बैकग्राउंड जानना जरूरी है और उसे गहनों का शौक भी बहुत है.’’

‘‘मैं उस के बारे में बस इतना जानता हूं कि उस की बूढ़ी मां यहां के एक नर्सिंगहोम में भरती है.’’

‘‘एक मिनट, उस की मां का नाम क्या है? और वह किस नर्सिंगहोम में भरती है?’’

उस ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘न तो मुझे उस की मां का नाम पता है, न नर्सिंगहोम का.’’

‘‘क्या  उस के बहुत सारे भाईबहन हैं?’’

‘‘भाईबहन का उस ने जिक्र ही नहीं किया मुझ से.’’

मेरे दिमाग में अजीब सी हलचल मची हुई थी, जिस ने मुझे बेचैन कर रखा था.

दोपहर को एक संदिग्ध आदमी से पूछताछ चल रही थी. मुझे देखते ही मेहता ने कहा, ‘‘पिछली रात तुम्हारे दोस्त के फ्लैट से जो गहने हमें मिले थे, उन्हें 2-3 दुकानदारों ने पहचान लिया है. उन्हीं की दुकान के थे. बस इस के आगे तफतीश नहीं बढ़ रही है.’’

‘‘लैला का क्या हुआ? उस से कोई काम की बात पता चली?’’

‘‘नहीं, हम उसे अभी तक तलाश नहीं सके.’’

‘‘तुम ने कहा था कि कल उस ने जिमी से बात की थी और उसी के साथ गई थी तो जिमी को पकड़ कर उस से लैला के बारे में क्यों नहीं पूछते?’’

‘‘मेरे दिमाग में यह बात आई तो थी, लेकिन जिमी भी लापता है.’’ मेहता ने कहा.

मैं ने उसे जिमी की मां से मुलाकात के बारे में बता कर कहा कि रौनी बता रहा था कि लैला की मां भी किसी नर्सिंगहोम में भरती है. तभी फोन बज उठा. उस के चेहरे पर चिंता उभर आई. कुछ अच्छी खबर नहीं थी. बताया गया कि लैला की लाश एक कूड़ेदान में पड़ी मिली है, उसे पिछली रात ही मारा गया है. मैं एक ठंडी सांस भर कर रह गया. यकीनन लैला की मौत रौनी के लिए एक बड़ा सदमा थी. उस ने आगे कहा, ‘‘उस की मां का नाम जेसिका है. वह यहां एक नर्सिंगहोम में भरती है, मेरा खयाल है हमें उस से मिलना चाहिए. शायद उस से कुछ काम की बातें पता चल सकें. उसे उस की बेटी की मौत की इत्तला भी देनी है.’’

जेसिका से काम की कोई बात पता चल सकेगी, मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी. हो सकता है बेटी की मौत की खबर सुन कर वह कुछ कहे या नौर्मल हो जाए. जब हम नर्सिंगहोम पहुंचे, जेसिका के कमरे में ताला लगा था. हम ने नर्स से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘वह यहीं कहीं घूम रही होगी. थोड़ी देर पहले अपनी व्हीलचेयर पर यहीं बरामदे में घूम रही थी.’’

पर हमें जेसिका कहीं नहीं मिली. हम ने उन से डुप्लीकेट चाबी ले कर कमरा खोला तो कमरे की सारी चीजें बिखरी पड़ी थीं, मेज की दराजें खुली थीं, सामान बाहर पड़ा था. 2 दिन पहले उस ने जो गाउन पहन रखा था, वह भी फर्श पर पड़ा था. बिस्तर भी अस्तव्यस्त था. हम सब हैरान थे, क्योंकि वह तो डिसएबल थी. वह ऐसा कर नहीं सकती थी. किसी की मदद के बगैर उसे कुछ करना मुमकिन नहीं था. अचानक मेरे दिमाग में एक बात कौंधी, मैं तेज कदमों से नर्सिंगहोम के सामने की तरफ बढ़ा. सीढि़यों के करीब पहुंच कर मैं ने खिड़की से बाहर झांका. उस समय हम दूसरी मंजिल पर थे.

नीचे इमारत के सामने मुझे जेसिका दिखाई दे गई. वह जल्दीजल्दी 2 सूटकेस एक टैक्सी के पिछले दरवाजे से ठूंसने की कोशिश कर रही थी. जल्दी से वह टैक्सी की पिछली सीट पर बैठ गई. इस बीच मेहता और नर्स भी मेरे करीब आ गए थे. उन दोनों ने भी जेसिका को देख लिया था.

मेहता ने पूछा, ‘‘क्या यही जेसिका है?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां, यही जेसिका है.’’

नर्स दांत भींचते हुए गुस्से में बोली, ‘‘मैं इस कमबख्त को मजबूर समझ कर 2 महीने से इस की व्हीलचेयर धकेल रही थी. यह तो मुझ से भी तेज चल सकती है.’’

मेहता ने मोबाइल निकाल कर टैक्सी के औफिस फोन कर के पूछा कि जो टैक्सी इरोज नर्सिंगहोम से सवारी उठा रही है, वह कहां के लिए बुक की गई है?

पता चला कि वह टैक्सी एयरपोर्ट जाने के लिए बुक की गई थी. उन्होंने उसी समय थाने फोन कर के ड्यूटी औफिसर से कहा कि इस नंबर की टैक्सी का तुरंत पीछा किया जाए, साथ ही बारीकी से मिसेज जेसिका का हुलिया बता कर कहा गया कि जैसे ही यह औरत टैक्सी से उतरे, उस की निगरानी की जाए.’’

इस में कोई शक नहीं कि मेहता एक जहीन अफसर थे. उन्होंने बड़ी होशियारी से पूरी सिचुएशन को हैंडल किया और उन्होंने तुरंत एयरपोर्ट फोन कर के वहां के सिक्यूरिटी अफसर से बात की. उन्होंने जेसिका का हुलिया बता कर कहा कि इसे या इस के किसी साथी को प्लेन में सवार न होने दिया जाए. मेहता की ज्यादा दिलचस्पी उन दोनों सूटकेसों में थी, जो जेसिका ने कार में ठूंसे थे. नर्सिंगहोम से निकल कर मेहता की गाड़ी एयरपोर्ट के लिए चल पड़ी थी. मुझे उम्मीद थी कि हम टाइम पर एयरपोर्ट पहुंच जाएंगे और हमेशा मुसकराने वाली बुढि़या का ड्रौपसीन देख लेंगे, जिस की बेजान टांगे एकदम ठीक हो गई थीं.

मेहता ने वायरलैस स्विच औन कर लिया था और अपने आदमियों से मिलने वाली खबरें एयरपोर्ट के सिक्यूरिटी अफसर को देने लगा कि जेसिका की टैक्सी एयरपोर्ट पार्किंग में दाखिल हो रही है. उस का स्वागत करने को तैयार रहें. हम खुशनसीब निकले कि जब हम लोग एयरपोर्ट पहुंचे, मिसेज जेसिका टैक्सी से उतर रही थीं, साथ ही मेहता के बंदे भी पहुंच चुके थे. जेसिका दोनों हाथों से सूटकेस संभाले टिकट काउंटर की ओर बढ़ी. उस के बाद वह वेटिंग लाउंज की ओर बढ़ी. वहां भीड़ में मिसेज जेसिका की उस के बच्चों से मुलाकात हो गई. वे सब के सब जवान और अधेड़ उम्र के थे.

जैसे ही स्पीकर पर कहा गया कि मुसाफिर जहाज पर पहुंच जाएं, वे सब लाउंज के दरवाजे की तरफ बढ़े. उसी समय मेहता के सहयोगियों और एयरपोर्ट के सिक्यूरिटी अफसर ने आगे बढ़ कर उस हंसतीमुसकराती फैमिली को अपने घेरे में ले लिया. उन में से 1-2 ने भागने की कोशिश की, लेकिन वे पकड़ लिए गए. उसी समय हम सब भी वहां पहुंच गए. मैं ने उन में से कुछ को पहचान लिया. जिमी और नरेन, उस में वह आदमी भी था, जिस ने चोरी से पहले नौकरी छोड़ दी थी और बब्बन भी था. बाकी लोगों को मेहता ने पहचान लिया. ज्वैलरी डकैती के केस में वह उन से पूछताछ कर चुका था और उन्हें बेगुनाह समझ कर छोड़ दिया था.

बूढ़ी जेसिका के होंठों की मुसकराहट गायब हो चुकी थी. वह गालियां बकते हुए अपनी औलादों को डांट रही थी कि उन लोगों की लापरवाही की वजह से पुलिस उन के पीछे लग गई, यह उन की भूल थी. मेहता के सिपाहियों ने सूटकेस अपने कब्जे में ले लिए. सूटकेस जाते देख कर जेसिका गुस्से से पागल हो उठी. वह पुलिस वालों के विरोध में बोल रही थी. उन के खिलाफ कानूनी काररवाई की धमकी दे रही थी. हमें यकीन था कि शहर की दुकानों से लूटे गए गहने उन्हीं दोनों सूटकेसों में हैं. इसलिए इन सब को गिरफ्तार करने के लिए कहा गया. अंदाजा था, लैला का मर्डर भी उन्हीं लोगों ने किया था.

जब उन सब को हथकडि़यां पहनाई जाने लगीं तो वे सब खुद को बेगुनाह साबित करते हुए बुरी तरह चीखनेचिल्लाने लगे. उन की मां बचीखुची गालियां दे कर उन्हें चुप कराने लगी. पुलिस स्टेशन पहुंच कर बारीबारी से सब से अलगअलग पूछताछ की गई. पता चला कि लैला के कत्ल के बाद जिमी ने ही जेसिका और अन्य लोगों को वहां से भाग चलने के लिए मजबूर किया था. जब जेसिका सारे गहने समेट कर भाग रही थी, तभी हमारी नजर उस पर पड़ गई थी, सारे साथी एयरपोर्ट पर मिल कर फरार होने वाले थे.

अब मेरी सब से बड़ी मुश्किल यह थी कि पेपर में खबर छपने से पहले ये सारी बातें रौनी को कैसे बताऊं? यह सब जान कर उसे कितना दुख होगा और लैला की मौत की खबर तो उसे पागल कर देगी. मैं ने अपने औफिस में उसे बुला कर अच्छे तरीके से सारी बातें बताईं. यह सब सुन कर वह एकदम से शौक्ड रह गया था. उस ने अपने आप पर कंट्रोल किया, दुखी हो कर बोला, ‘‘रुस्तम, मैं ने जिंदगी में पहली बार किसी से मोहब्बत की थी, वह भी बहुत ज्यादा. उस का अंजाम कितना दुखद हुआ. मुझे पता नहीं था कि वह ऐसी होगी और इस तरह मारी जाएगी.’’

मैं जानता था कि उसे बड़ा गहरा सदमा लगेगा. इस क्राइसिस से निकलने में उसे वक्त लगेगा. फिर भी मैं ने उस का दुख कम करने के लिए कहा, ‘‘हो सकता है, उस का बचपन गरीबी में गुजरा हो, हालात से तंग आ कर उस ने चोरी के रास्ते पर कदम बढ़ाए हो, हम कह नहीं सकते. वह किन हालात में चोर बनी, अब उसे भूलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.’’

रौनी ने एक ठंडी सांस भर कहा, ‘‘हां, शायद तुम ठीक कह रहे हो. वह दिल की बहुत अच्छी थी, बहुत चाहने वाली. पता नहीं किस मजबूरी ने उसे गलत राह पर डाल दिया था.’’

पर यह हकीकत अपनी जगह थी कि वह एक मुजरिम थी. मजे की बात यह थी कि उन सारे लोगों में किसी का किसी से कोई आपसी रिश्ता नहीं था. ये सभी गहनों की दुकानों को लूटने के लिए आपस में मिल बैठे थे. वे अन्य शहरों में भी इसी किस्म की वारदात कर चुके थे. उन सभी को एक गिरोह में समेटने वाली जेसिका थी. वह इस गिरोह की सरगना थी. उस की प्लानिंग और हिदायत पर ही वे वारदात करते थे. गिरोह में कुल 10 लोग थे. लैला भी इस गिरोह में शामिल थी. लेकिन यहां आने के बाद उस की नीयत बदल गई. वह अपने हिस्से के गहने नर्सिंगहोम में भरती जेसिका के पास जमा कराने के बजाय गायब करने लगी. गहने जमा करने के लिए उन्होंने कितनी सेफ जगह ढूंढी थी-नर्सिंगहोम.

लैला की इस हरकत की वजह शायद रौनी था, वह उस से सचमुच मोहब्बत करने लगी थी. वह कुछ माल जमा कर के रौनी को अपनी मोहब्बत से मजबूर कर के किसी अंजान शहर भाग जाना चाहती थी, जहां वह चैन की जिंदगी गुजार सके. चोरी के गहने बेच कर उसे अच्छीखासी रकम मिल सकती थी. लेकिन उस ने अभी तक रौनी को अपने मंसूबे से आगाह नहीं किया था. उसे यह भी नहीं बताया था कि वह चोरी किए गए गहने उस के फ्लैट में छिपा रही है. जेसिका को शक हो गया था कि लैला चोरी किए गए पूरे गहने उस के पास जमा नहीं कर रही है.

उस ने गैंग के दूसरे आदमियों को उस की निगरानी पर लगा दिया था. जिमी ने गहनों के बारे में पता लगाने के लिए सख्ती की तो लैला अपनी जान से हाथ धो बैठी. जुर्म करने के लिए ये सभी एक रिश्ते में बंधे थे. उन की सरगना जेसिका उन की मां का रोल एक अपाहिज औरत के रूप में बहुत अच्छे से कर रही थी. पकड़े जाने पर सारे रिश्ते बिखर गए. Hindi stories