True Crime Story: जब सोई मोहब्बत जागी

True Crime Story: शहाना स्कूल के समय से ही सरफराज से मोहब्बत करने  लगी थी. जब उस की शादी  सरफराज से नहीं हो सकी  तो वह सलीम से निकाह  कर के उस की हो गई,  लेकिन बाद में उस ने  सलीम से भी किनारा  कर लिया. इस के बाद  उस का निकाह नवाब से  हुआ लेकिन अपने प्यार के  चक्कर में उस ने नवाब को  ठिकाने लगवा दिया.

8दिसंबर, 2015 की देर रात उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा में किसी राहगीर ने फोन द्वारा सूचना दी कि शेर अली बाबा की मजार के पास एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. शेरअली बाबा की मजार काशीपुरजसपुर राष्ट्रीय राजमार्ग- 74 के किनारे है. लाश पड़ी होने की सूचना मिलते ही थाना कुंडा के थानाप्रभारी रमेश तनवार तुरंत पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश खून से लथपथ जसपुर की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे पड़ी थी. वहीं पर कुछ लोग भी खड़े थे.

थानाप्रभारी ने वहां खड़े लोगों से मरने वाले शख्स की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका. पुलिस ने मृतक की जेब की तलाशी ली तो जेब में एक परची मिली. उस पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. वह फोन नंबर किस का है, यह जानने के लिए थानाप्रभारी ने अपने फोन से वह नंबर मिलाया  तो दूसरी तरफ से शहाना नाम की औरत ने फोन रिसीव किया. उन्होंने उस महिला से जानकारी ली तो पता चला कि वह जसपुर के मोहल्ला छिपियान के नवाब की पत्नी शहाना परवीन है.

थानाप्रभारी ने शहाना से उन के पति के बारे में पूछा तो उस ने उलटे थाना प्रभारी से ही सवाल किया, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन बोल रहे हैं और आप मेरे पति को क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘देखिए, मैं थाना कुंडा का थानाप्रभारी बोल रहा हूं. दरअसल हमें शेर अली बाबा की मजार के पास एक आदमी की लाश मिली है. उसी लाश की जेब से यह आप का मोबाइल नंबर मिला है. कहीं यह लाश आप के किसी परिचित की तो नहीं है? आप यहां आ कर लाश को देख लीजिए.’’

थानाप्रभारी ने शहाना को लाश का जो हुलिया बताया था, वह जान कर शहाना रोने लगी, क्योंकि वह हुलिया उस के पति के हुलिए से मिल रहा था. उस का पति नवाब भी घर पर नहीं था. देर रात में अचानक शहाना के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर उस के परिवार वाले और मोहल्ले के कुछ लोग जमा हो गए. नवाब के साथ अनहोनी की बात सुनते ही वे सभी रात में ही शहाना के साथ अली बाबा की मजार के पास पहुंच गए. घटनास्थल पर पड़ी लाश देखते ही शहाना दहाड़े मार कर रोने लगी, क्योंकि वह लाश उस के पति नवाब की थी. उस जगह को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे नवाब का किसी वाहन से एक्सीडेंट हुआ था, लेकिन उस के घर वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि नवाब वहां तक पहुंचा कैसे?

पुलिस ने नवाब के घर वालों से पूछा तो उन्होंने बताया कि नवाब का हरिद्वार और लक्सर में ट्रांसपोर्ट का काम था. उस के घर आनेजाने का भी कोई नियत समय नहीं था. काम में व्यस्त होने की वजह से वह 2-4 दिनों बाद ही जसपुर आता था. 8 दिसंबर को वह घर जरूर आया था. घर से वह काशीपुर कैसे पहुंचा, इस की किसी को जानकारी नहीं थी. उस समय रात ज्यादा हो चुकी थी, इसलिए घर वालों से कुछ जानकारी लेने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए काशीपुर भिजवा दिया गया. अगले दिन से पुलिस इस केस की जांचपड़ताल में जुट गई. सुबहसुबह पुलिस फिर से उस जगह पहुंच गई, जहां लाश मिली थी, ताकि वहां से कोई सबूत वगैरह मिल सके.

घटनास्थल के आसपास पुलिस ने काफी खोजबीन की, लेकिन वहां से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस घटना की तह तक पहुंच पाती. मृतक का मोबाइल फोन भी गायब था. पुलिस ने सोचा कि दुर्घटना होने पर नवाब सड़क पर गिर गया होगा और उसे एक्सीडेंट करने वाले ने मजार के पास डाल दिया होगा. पुलिस ने मृतक के घर वालों से एक बार फिर बात की तो उन्होंने बताया कि नवाब एक मिलनसार व्यक्ति था. उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. वह उस की दुर्घटना वाली बात को मानने को तैयार नहीं थे. इस पर पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.

नवाब के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि 8 दिसंबर को उस की कुछ नंबरों पर बातचीत हुई थी. जिनजिन नंबरों पर उस की बातचीत हुई थी, पुलिस उन नंबरों की जांच में जुट गई. उन में 2 नंबर संदिग्ध नजर आए. जांच के दौरान पता चला कि उन में से एक नंबर रामपुर जिले के गांव बैजनी निवासी खालिद का था, जबकि दूसरा नंबर जिला मुरादाबाद के थाना भगतपुर के गांव बहेड़ी के रहने वाले उस्मान का था.

पुलिस इन दोनों ही व्यक्तियों से पूछताछ करना चाहती थी, इसलिए एसएसपी केवल खुराना ने उन की तलाश कि लिए थानाप्रभारी रमेश सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई अशोक कुमार, कांस्टेबल मनोज कोहली, खेम सिंह, जगत सिंह, शहाना परवीन आदि को शामिल किया गया. यह पुलिस टीम खालिद और उस्मान के घरों पर गई तो वे दोनों ही अपने घरों से गायब मिले. उन के घरों से पुलिस को उन के बारे में यह जानकारी मिल गई कि दोनों काशीपुर में नौकरी कर रहे हैं.

पता चला कि खालिद हमदम अस्पताल में और उस्मान वहीं के सनराईज अस्पताल में कंपाउंडरी कर रहा है. यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम काशीपुर पहुंची. लेकिन वे वहां भी नहीं मिले. अस्पताल वालों ने बताया कि वे कई दिनों से अपनी ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं. इस के बाद पुलिस को इन दोनों पर शक हो गया. लिहाजा पुलिस ने उन की तलाश के लिए मुखबिर लगा दिए. करीब 2 सप्ताह बाद 25 दिसंबर को पुलिस को सुबहसुबह मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि खालिद और उस्मान कहीं जाने की फिराक में काशीपुर बसअड्डे पर खड़े हैं. यह खबर मिलते ही पुलिस टीम तुरंत बस अड्डे पर पहुंच गई. दोनों वहां एक बैंच पर बैठे मिल गए.

पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. दोनों को गिरफ्तार कर पुलिस कुंडा थाने ले आई. वहां उन से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों जल्दी ही टूट गए. दोनों ने स्वीकार कर लिया कि नवाब की हत्या उन्होंने नवाब की पत्नी शहाना के प्रेमी सरफराज के कहने पर की थी. सरफराज एक प्रतिष्ठित परिवार से था. पुलिस बिना सबूत के उसे गिरफ्तार करना नहीं चाहती थी. इसलिए पुलिस ने सब से पहले सरफराज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर वह दिन में करीब 40 बार बात करता था.

जांच में पता चला कि वह नंबर उसी मोहल्ले की रहने वाली शहाना का है. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि सरफराज और शहाना के बीच जरूर प्रेमसंबंध रहे होंगे, तभी तो वे फोन पर इतनी ज्यादा बातें करते हैं. यानी खालिद और उस्मान ने पुलिस को जो बात बताई थी, उस में सच्चाई नजर आने लगी. इस से पुलिस को कुछ और ही कहानी नजर आने लगी. सरफराज जसपुर के ही मोहल्ला छिपियान में रहता था. पुलिस उस के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस को देखते ही उस के होश उड़ गए. पुलिस पूछताछ के लिए उसे भी थाने ले आई.

पुलिस ने सरफराज से पूछताछ की तो उस ने साफ कह दिया कि उस का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. इस पर पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स उस के सामने रखी. जिस में उस की शहाना से एक साल में 12995 बार बातें हुई थीं. अब सच्चाई सरफराज के सामने थी, जिसे वह झुठला नहीं सकता था. फिर भी वह खुद को बचाने के लिए यही कहता रहा कि उस की शहाना से दोस्ती है, इसलिए वह उस के साथ इतनी बातें फोन पर करता था. लेकिन नवाब की हत्या से उस का कोई संबंध नहीं है.

इस के बाद पुलिस टीम मृतक नवाब की पत्नी शहाना को पूछताछ के लिए थाने ले आई. शहाना भी पुलिस को घुमाने की कोशिश में लगी रही. लेकिन पुलिस ने जब उसे बताया कि उस का प्रेमी सरफराज पुलिस हिरासत में है और उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया है तो शहाना को सांप सूंघ गया. पुलिस उसे सरफराज के पास ले आई. दोनों को आमनेसामने बैठा कर बात की गई तो सरफराज टूट गया. उस ने बताया कि शहाना के कहने पर ही उस ने नवाब को ठिकाने लगवाया था. इस के बाद दोनों ने ही अपना गुनाह कबूल कर लिया. इन दोनों के प्यार से ले कर नवाब की हत्या तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उत्तराखंड के जसपुर शहर के मोहल्ला छिपियान में हाजी फिदा हुसैन का परिवार रहता था. मुसलिम बाहुल्य इस शहर के अधिकांश मुसलिमों का लकड़ी का व्यापार है. फिदा हुसैन का भी लकड़ी का व्यापार था. उन के परिवार में 7 सदस्य थे. शहाना इन की दूसरे नंबर की बेटी थी. वह शुरू से ही पढ़ाईलिखाई में तेज थी. इसीलिए मदरसे की पढ़ाई के बाद फिदा हुसैन ने उस का दाखिला फैजएआम इंटर कालेज में करा दिया था. सरफराज ने भी उसी कालेज में दाखिला लिया था. इस से पहले भी वह मदरसे में शहाना के साथ ही पढ़ता था.

सरफराज फिदा हुसैन के घर के पास अगले नुक्कड़ पर रहने वाले शब्बीर मास्टर का बेटा था. पड़ोसी होने के नाते दोनों के घर वालों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. शब्बीर मास्टर का छोटा परिवार था. शब्बीर प्राइमरी स्कूल में टीचर थे. उन के परिवार में 3 बेटे थे, जिन में सरफराज सब से छोटा था. शब्बीर मास्टर तेजतर्रार व्यक्ति थे. इसलिए मोहल्ले क्या, शहर की पूरी बिरादरी में उन की अच्छी जानपहचान थी.

शब्बीर मास्टर अपने दोनों बेटों की शादी कर चुके थे. सरफराज अभी पढ़ रहा था, इसलिए उन्हें उस की ज्यादा चिंता नहीं थी. सरफराज के इंटरमीडिएट करने के बाद शब्बीर मास्टर ने उस के सामने शादी की बात रखी तो उस ने साफ कह दिया कि जब तक वह कोई कामधंधा नहीं कर लेता, शादी नहीं करेगा. उधर शुरू से साथसाथ पढ़ने के कारण शहाना और सरफराज के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. उन की दोस्ती प्यार में बदल गई थी. और तो और दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं.

उसी दौरान किसी के माध्यम से शब्बीर मास्टर को पता चला कि सरफराज और शहाना के बीच चक्कर चल रहा है. वह समझ गए कि सरफराज शादी के लिए मना क्यों कर रहा है. उन्होंने इस बारे में सरफराज से बात की तो उस ने कह दिया कि वह शहाना से प्यार करता है और उसी से निकाह करना चाहता है. शब्बीर मास्टर ने बेटे की खुशी के लिए शहाना के अब्बू फिदा हुसैन से बात भी की, पर वह तैयार नहीं हुए.

फिदा हुसैन की समाज में अच्छीखासी इज्जत थी. बेटी वाली बात कहीं समाज में न फैल जाए, इसलिए वह उस के लिए अच्छा लड़का तलाशने लगे, ताकि जल्द से जल्द उस की शादी कर सकें. थोड़ी भागादौड़ी कर के उन्हें उस के योग्य वर मिल भी गया. जसपुर के तत्कालीन चेयरमैन मोहम्मद उमर के बेटे सलीम से उन्होंने शहाना की शादी तय कर दी. अच्छी हैसियत वाले परिवार में शादी तय होने के बाद घर वाले गदगद थे. फिदा हुसैन इस बात से खुश थे कि उन की बेटी इतने संपन्न परिवार में खुश रहेगी.

शादी तो तय हो गई, लेकिन फिदा हुसैन को दुविधा इस बात की थी कि कहीं शहाना शादी करने से मना न कर दे. यदि उस ने ऐसा कर दिया तो बिरादरी में उन की किरकरी हो जाएगी. इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिदा हुसैन ने अपने नजदीकी रिश्तेदारों को बुला कर शहाना को समझाने के लिए कहा. रिश्तेदारों के समझाने पर शहाना सलीम से शादी करने के लिए तैयार तो हो गई, लेकिन उस का दिल सरफराज पर ही लगा रहा. इस के बाद फिदा हुसैन ने शादी की तैयारी शुरु कर दी. उधर जब सरफराज को पता चला कि शहाना की शादी किसी और के साथ होने वाली है तो वह परेशान हो गया. उस ने शहाना से बात की तो शहाना ने कह दिया कि घर वालों और रिश्तेदारों की हठ के आगे उसे मजबूर होना पड़ा. शहाना का फैसला सुन कर सरफराज को दुख हुआ.

उधर बड़ी धूमधाम के साथ शहाना और सलीम का निकाह हो गया. यह सन 1997 की बात है. उस के निकाह के बाद सरफराज परेशान रहने लगा. वह शहाना से फोन पर बातें करता रहता था. शहाना भले ही सलीम की पत्नी बन गई थी लेकिन सरफराज के साथ गुजारे पलों की यादें उस के दिल से अभी भी धूमिल नहीं हो पाई थीं.

वह जब कभी मायके आती, उस की निगाहें हर वक्त सरफराज की राहों पर जमी रहतीं. इत्तफाक से कभी दोनों आमनेसामने पड़ जाते तो एकदूसरे के लिए तड़प उठते. मौका मिलने पर दोनों मुलाकात भी कर लेते. यही वजह थी कि शहाना मायके आने के बाद ससुराल नहीं जाना चाहती थी. वह सरफराज के प्यार में पागल सी हो गई थी. यह बात सलीम को पता चली तो वह परेशान हो उठा. सलीम ने शहाना को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. जब शहाना नहीं मानी तो उस ने उस के साथ रिश्ता तोड़ दिया.

सलीम से रिश्ता टूटने के बाद सरफराज बहुत खुश हुआ. उसे उम्मीद थी कि अब तो उसे उस का खोया प्यार मिल जाएगा. फिदा हुसैन पहले से ही बेटी के कारनामों से तंग आ चुके थे. दोनों के मिलनेजुलने से मोहल्ले वालों ने उन का मोहल्ले में रहना दूभर कर दिया. शहाना अपने अब्बू पर सरफराज से निकाह कराने का दबाव डाल रही थी, लेकिन फिदा हुसैन को सरफराज से इतनी नफरत हो गई थी कि वह किसी भी कीमत पर उस से शहाना का निकाह करने को तैयार नहीं थे.

शहाना फिर से सरफराज की मोहब्बत में पागल हो गई थी. जब कोई उपाय नहीं सूझा तो अंत में फिदा हुसैन ने शब्बीर मास्टर से इस बारे में बात कर के सरफराज की शादी कहीं और करने की बात कही. शब्बीर मास्टर समझदार व्यक्ति थे. वह जानते थे कि समाज में इंसान की इज्जत की क्या कीमत होती है. यही सोच कर उन्होंने जल्दी ही सरफराज के लिए बिजनौर के स्योहारा कस्बे में एक लड़की देखी और उस का निकाह करा दिया.

सरफराज ने पिता के दबाव में शादी तो कर ली, लेकिन वह अपने दिल से शहाना को नहीं निकाल सका. लेकिन सरफराज के शादी करने की बात शहाना को बहुत बुरी लगी. उस ने उस से मिलनाजुलना बिलकुल बंद कर दिया. इस के बाद सरफराज भी अपनी गृहस्थी के चक्कर में फंस गया और कुछ दिनों के लिए शहाना को भूल गया. जवान बेटी के घर बैठने पर फिदा हुसैन भी चिंतित रहने लगे. उन्होंने अपनी पत्नी हुसना से कहा कि वह शहाना को दूसरे निकाह के लिए तैयार करे. शहाना सरफराज की मोहब्बत से टूट चुकी थी. वह यह भी जानती थी कि सारी जिंदगी मांबाप के सीने पर मूंग तो नहीं दली जा सकती.

उस ने अपने घर वालों की परेशानी समझ कर दूसरे निकाह के लिए हामी भर दी. शहाना के शादी के लिए तैयार होते ही उस के अब्बू फिदा हुसैन ने फिर से उस के लिए सही लड़का देखना शुरू कर दिया. उसी दौरान उन के एक करीबी रिश्तेदार ने जसपुर के ही मोहल्ले जटवारा के इमरान चौक में रहने वाले मोहम्मद असलम के बेटे नवाब के बारे बताया. नवाब का ट्रांसपोर्ट का अपना काम था. नवाब के कुल मिला कर 6 भाई और 4 बहनें थीं. भले ही मोहम्मद असलम का परिवार बड़ा था, लेकिन उस के सभी बेटे अपनेअपने काम से लगे हुए थे. शादी की बात पक्की होने के बाद 17 मई, 2000 को बड़ी धूमधाम के साथ नवाब और शहाना का निकाह हो गया.

शहाना नवाब के साथ निकाह कर के खुश थी. वह अपनी पुरानी जिंदगी भूल कर नई जिंदगी जीना चाहती थी. नवाब का अपना अच्छा कारोबार था. आमदनी भी अच्छी थी, इसलिए दोनों हंसीखुशी से रह रहे थे. शहाना परवीन लिखीपढ़ी थी, इसलिए उसे आंगनबाड़ी में सहायिका की नौकरी मिल गई. वह आसपास के बच्चों को पढ़ाने लगी. कहते हैं कि वक्त को बदलते देर नहीं लगती. शहाना के आंगनबाड़ी में लगते ही उस का फिर से घर से बाहर आनाजाना शुरू हो गया. उसी दौरान एक दिन उस का आमनासामना फिर से सरफराज से हो गया. सरफराज को सामने से आते देख शहाना ने उस से बचने की कोशिश की, लेकिन सरफराज उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

उस दिन सरफराज ने उस से केवल हालचाल पूछा और वहां से चला गया. लेकिन इस छोटी सी मुलाकात ने शहाना के दिल में पुरानी मोहब्बत को चिंगारी दिखा दी. शहाना कई दिनों तक उस की यादों में जीती रही. उस ने कई बार उस मुलाकात को भूलने की कोशिश की, लेकिन भुला नहीं सकी. हालांकि शहाना और सरफराज दोनों ही एकएक बच्चे के मांबाप बन चुके थे, लेकिन उन के दिलों में पुरानी मोेहब्बत शायद अभी भी जिंदा थी. दोनों के दिलों में छिपी मोहब्बत फिर से जागी तो वे फिर चोरीछिपे मिलने लगे. आंगनबाड़ी के बहाने शहाना कई घंटों तक घर से बाहर रहती थी. उसी दौरान मौका निकाल कर वह सरफराज के साथ इधरउधर मौजमस्ती करने लगी.

उसी बीच शहाना दूसरी बच्ची की भी मां बन गई. लेकिन अब उस का सरफराज से मिलनाजुलना और भी ज्यादा हो गया था. शहाना नवाब का भी पूरा ख्याल रखती थी. इसलिए वह उस पर पूरा भरोसा करता था. लेकिन उसे पता नहीं था कि पत्नी उस की पीठ पीछे क्या गुल खिला रही है? शहाना अपने मकान की ऊपरी मंजिल पर अकेली ही रहती थी. उस का पति नवाब अपने काम से चला जाता और उस की दोनों बेटियां अभी छोटी थीं.

इसी का लाभ उठा कर वह हर वक्त सरफराज से मोबाइल पर बतियाती रहती थी. जब उस के मोबाइल में बैलेंस खत्म हो जाता तो सरफराज रिचार्ज करा देता. उसी दौरान सरफराज ने नवाब से भी दोस्ती बढ़ा ली, ताकि वह उस के घर बिना किसी झिझक के आजा सके. लेकिन नवाब उस के मंसूबों को समझ नहीं पाया. नवाब के भाई जसपुर में ट्रांसपोर्ट का धंधा चलाते थे. इस धंधे में अच्छी कमाई थी, इसलिए नवाब ने हरिद्वार के लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. धंधे की वजह से वह अकसर घर से बाहर रहता था. ट्रांसपोर्ट के काम के साथ नवाब ने प्रौपर्टी खरीदनेबेचने का काम भी शुरू कर दिया था. इसी का लाभ उठाते हुए सरफराज और शहाना मौजमस्ती कर रहे थे.

उसी दौरान सरफराज ने भी नवाब के सहयोग से लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. सरफराज ने कुछ दिनों में नवाब के साथ इतनी गहरी दोस्ती कर ली कि वह हर वक्त उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था. सरफराज कभीकभी नवाब के जिम्मे अपना औफिस छोड़ कर जसपुर आ जाता और शहाना के साथ मौजमस्ती करता. नवाब की हत्या से लगभग 5-6 महीने पहले सरफराज ने शहाना से कहा, ‘‘शहाना क्यों न हम आपस में शादी कर लें.’’

‘‘हम दोनों पहले से ही शादीशुदा हैं तो फिर यह आफत मोल लेने से क्या फायदा?’’ शहाना बोली, ‘‘सरफराज, तुम यह बात तो जानते ही हो कि नवाब के जीवित रहते मैं भला तुम्हारे साथ निकाह कैसे कर सकती हूं. यदि तुम यह चाहते हो तुम्हें कुछ करना पड़ेगा.’’

सरफराज अब शहाना के दिल की बात जान गया था. उस ने पक्का मन बना लिया कि शहाना को पाने के लिए वह कुछ भी करेगा. उधर शहाना भी सरफराज की मोहब्बत में पागल सी हो गई थी. वह यह भी भूल गई थी कि नवाब उसे कितना चाहता है. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद उस की अच्छाबुरा सोचने की शक्ति पर पानी फिर गया था. इसी पागलपन में वह नवाब को अपने और सरफराज के बीच से हटाने के लिए भी राजी हो गई. अब से लगभग ढाई महीने पहले सरफराज का ड्राइवर मकसूद हादसे में घायल हो गया था. उसे इलाज के लिए काशीपुर के हमदम अस्पताल में भरती कराया गया था. यहीं पर सरफराज की मुलाकात खालिद व उस्मान से हुई. हालांकि खालिद और उस्मान दोनों अलगअलग अस्पतालों में काम करते थे, लेकिन दोनों में अच्छी दोस्ती थी.

खालिद उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के बैजनी गांव का था और उस्मान मुरादाबाद के रोशनपुर बहेड़ी गांव का था. खालिद ओटी टैक्नीशियन था तो उस्मान कंपाउंडर. उसी दौरान बातोंबातों में सरफराज ने उस्मान और खालिद के सामने जिक्र करते हुए पूछा कि कोई ऐसी भी दवा आती है, जिस के प्रयोग से इंसान खत्म हो जाए और किसी को पता भी न चले. इस पर खालिद ने बताया, ‘‘भाई काम सब हो जाते हैं, लेकिन उस के लिए कुछ खर्च करना पड़ता है. यह काम बहुत ही रिस्की होते हैं. आप को अगर किसी का काम कराना है तो पूरे एक लाख रुपए खर्च करने होंगे.’’

सरफराज के लिए एक लाख रुपए कोई मायने नहीं रखते थे. अपने प्यार को पाने के लिए वह कुछ भी खर्च करने को तैयार था. उस ने दोनों को 75 हजार रुपए दे कर नवाब की मौत का सौदा तय कर लिया. बाकी के 25 हजार रुपए उन्होंने काम हो जाने के बाद देने को कह दिया. बातचीत हो जाने के बाद सरफराज ने खालिद और उस्मान को प्रौपर्टी डीलर बताते हुए नवाब से उन की मुलाकात करा दी. उस ने नवाब से कह दिया कि यदि वह किसी प्रौपर्टी का सौदा इन से कराते हैं तो अच्छा कमीशन मिलेगा. नवाब खुश हो गया कि प्रौपर्टी बिकवाने पर उसे अतिरिक्त आमदनी होगी. नवाब शराब पीता ही था, इसलिए उस्मान और खालिद ने नवाब से दोस्ती गांठते हुए उसे शराब भी पिलानी शुरू कर दी.

8 दिसंबर, 2015 को योजना के अनुसार, सरफराज नवाब को साथ ले कर खालिद और उस्मान के पास काशीपुर पहुंचा. नवाब को उन दोनों के पास छोड़ कर वह खुद शहर में कुछ काम होने का बहाना कर के वहां से खिसक लिया. सरफराज के जाने के बाद उस्मान और खालिद ने नवाब को रामनगर रोड पर सड़क के किनारे ही शराब पिलाई. शराब पीने के बाद तीनों सनराइज अस्पताल पहुंचे. उस्मान उसी अस्पताल में कंपाउंडर था. उस ने अस्पताल के मालिक डा. सम्स से जसपुर जाने की बात कह कर उन की नैनो कार मांगी. डा. सम्स ने उसे अपनी कार दे दी. नवाब को उस कार में बिठा कर तीनों जसपुर की ओर चल दिए.

नवाब पर शराब का नशा चढ़ गया था. उसी का लाभ उठाते हुए दोनों ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इंजेक्शन के लगते ही नवाब बेहोश हो कर सीट पर लुढ़क गया. इस के बाद शेर अली बाबा की मजार के पास कार रोक कर उन्होंने उसे ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाला 10 एमएल का पूरा इंजेक्शन लगा दिया और फिर उसे चलती कार से सड़क पर फेंक दिया. बाद में उन्होंने उसी कार से उसे 2-3 बार बेरहमी से कुचल दिया, जिस के बाद नवाब की मौके पर ही मौत हो गई. सरफराज ने घटना वाले दिन ही उस्मान को शहाना का नंबर लिख कर दे दिया था, जो उन्होंने नवाब की जेब में रख दिया था. जिस से पुलिस उस के घर वालों तक आसानी से पहुंच सके. उसी के द्वारा पुलिस ने शहाना को फोन कर के दुर्घटना वाली बात बताई थी.

नवाब को मौत के घाट उतारने के बाद उस्मान और खालिद, दोनों ही काशीपुर वापस चले आए थे. इस घटना को अंजाम देने के बाद ही उस्मान ने मोबाइल से सरफराज को बता दिया था कि उस का काम हो गया है. इस घटना के बाद से खालिद और उस्मान के साथसाथ सरफराज ने भी अपना मोबाइल बंद कर लिया था. सरफराज ने नवाब को मारने की सूचना शहाना परवीन को भी दे दी थी. इस केस का खुलासा होते ही पुलिस ने भादंवि की धारा 302/120 के तहत मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.

एसएसपी केवल खुराना ने इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को 2,500 रुपए का इनाम देने की घोषणा की थी. वहीं मृतक के घर वालों ने भी पुलिस को 5 हजार रुपए बतौर इनाम दिए. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: दगाबाज महबूबा

True Crime Story: औरत अगर चरित्रहीन हो तो   बसेबसाए घर उजड़ जाते हैं. एक नहीं, कई जिंदगियां बरबाद हो जाती हैं. ऐसे में औरत तो परेशान होती ही है, ससुराल के ही नहीं,  मायके वाले भी दुखी होते हैं. मुराद अली से मेरी अच्छी दोस्ती थी. उस दिन वह अपने साथ अपने दोस्त नादिर अली को ले कर मेरे पास आया था. वह बड़ा परेशान था. मेरे पूछने

पर मुराद अली ने बताया, ‘‘वाकया नादिर अली के बड़े भाई कादिर अली के साथ हुआ है. इन दोनों भाइयों की खालिद रोड पर साझे में टायरों की काफी बड़ी दुकान है. कल कादिर अली को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.’’

‘‘किस जुर्म में गिरफ्तार किया है?’’ मैं ने पूछा तो वह बोले, ‘‘उन्हें उन की एक्स वाइफ के कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार किया गया है. फिलहाल वह रिमांड पर पुलिस कस्टडी में हैं.’’

‘‘कादिर अली की एक्स वाइफ के बारे में कुछ बताइए?’’ मैं ने नादिर अली से पूछा.

‘‘उस का नाम लुबना था. उस औरत ने भाईसाहब को जिंदगी भर दुख दिए और मरने के बाद भी उन्हें मुसीबत में डाल गई. तलाक भी एक तरह से उस ने जबरदस्ती लिया. उस ने एक ऐसा नाटक खेला था कि भाई को मजबूरन उसे तलाक देना पड़ा. बाद में तलाक को कानूनी हैसियत भी मिल गई. यह सब एक सोचीसमझी साजिश के तहत हुआ था. बेहद मक्कार और शातिर औरत थी वह.’’ नादिर अली ने नफरत से कहा.

‘‘तलाक वाली बात कितना अरसा पहले की है?’’

‘‘यह मई चल रहा है, तलाक जनवरी में हुआ था. भाई अच्छेखासे अपनी बेटी आरिफा के साथ रह रहे थे कि यह आफत गले पड़ गई.’’

‘‘आरिफा अपनी मरजी से बाप के साथ रह रही थी?’’

‘‘हां, उन की बेटी आरिफा 15 साल की है, वह बेटी की वजह से मजबूर थे. इसलिए अपनी बीवी लुबना की आवारगी और ज्यादती को जहर की तरह गले उतारते रहे. लेकिन जब लुबना ने सारी हदें पार कर दीं, वह भी सिर्फ भाई से जान छुड़ाने के लिए तो उन्होंने भी देर नहीं की और उस शातिर औरत को अपनी जिंदगी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. उन की बेटी आरिफा काफी समझदार है, वह मां की चालों और चरित्रहीनता को समझ गई थी. इसलिए उस ने खुद बाप के साथ रहने का फैसला किया था.’’

मुराद अली ने थोड़ा रुक कर कहा, ‘‘वकील साहब, तलाक वाली रात उन के घर में जिस तरह का तमाशा हुआ था, उस ने आरिफा को पूरी तरह मां के खिलाफ कर दिया था. उस ने बड़े सही वक्त पर सही फैसला लिया था.’’

‘‘तलाक का मंसूबा और तलाक वाली रात हुए ड्रामे की बात मैं कुछ समझ नहीं पाया. यह एक नहीं, दो बातें हैं?’’ मैं ने पूछा तो नादिर अली ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘बताने में शरम आ रही है, पर आप भाई का केस लड़ रहे हैं, इसलिए बताना जरूरी है. ज्यादा डिटेल तो मैं नहीं जानता, पर मुझे जो पता है, बताए देता हूं.’’

उस ने बताया, ‘‘लुबना काफी दिनों से इस कोशिश में थी कि भाई उसे छोड़ दें, ताकि वह मनमाने ढंग से अय्याशी कर सके, पर भाईजी उस की हर ज्यादती सहते रहे. यह देख कर वह नीचता पर उतर आई और उस ने भाई के लिए एक जाल बुना. वह अपनी इंसानी कमजोरी के चलते उस में फंस गए और फिर उन के पास तलाक के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा.’’

‘‘जब कोई औरत छुटकारा पाने के लिए साजिश रचती है तो उस के पीछे कोई न कोई मकसद तो होना चाहिए. उस का क्या मकसद था?’’ मैं ने पूछा तो वह उत्तेजित हो कर बोले, ‘‘मकसद था जनाब, बड़ा बेशरमी भरा मकसद था. वह मेरे भाई की बीवी होने के बावजूद एक गैर इंसान से ताल्लुक बनाए हुए थी. उस से शादी करना चाहती थी. उस मरदूर का नाम जमाल बेरी है.

‘‘भाई को जब इस बात का पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया. उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की तो वह नएनए हथकंडे अपनाने लगी, ताकि भाई तंग आ कर उसे छोड़ दें. जब पानी सिर से गुजर गया तो मजबूरन उन्हें लुबना को तलाक देना पड़ा. तलाक पाने के लिए उस ने घर की मुलजिमा रशना का इस्तेमाल किया था.’’

‘‘यानी लुबना ने भाई से तलाक ले कर जमाल से शादी कर ली. इस तरह उस का मकसद पूरा हो गया?’’

‘‘नहीं, पिछले दिनों उन की मंगनी की खबर सुनी थी, अगर वह जिंदा रहती तो शादी भी हो जाती.’’ नादिर अली ने कहा.

कुछ और बातें पता कर के मै ंने फीस ली और उन्हें तसल्ली दे कर विदा कर दिया. पुलिस ने मुलजिम कादिर अली को अदालत में पेश कर के 7 दिनों का रिमांड लिया था. शाम को मैं थाने पहुंच गया. कादिर अली को देख कर मैं चौंका, क्योंकि उस का चेहरामोहरा नािदर अली से काफी मिलता था, उम्र में वह जरूर 2-4 साल बड़ा रहा होगा. वह उदास और परेशान था. यह जान कर कि मैं उन का वकील हूं, उन्होंने कहा, ‘‘बेग साहब, मैं बैठेबिठाए इस मुसीबत में फंस गया हूं, मेरा कहीं कोई कसूर नहीं है.’’

‘‘आप को पूरा यकीन है कि आप पूरी तरह निर्दोष हैं?’’

‘‘जी हां, वकील साहब, मुझे जानबूझ कर फंसाया गया है, मैं बेकसूर हूं.’’

‘‘अगर आप बेकसूर है तो आप जरूर इस केस से बाइज्जत बरी हो जाएंगे, यकीन रखिए. अगले 20 मिनट तक मैं उन से केस से संबंधित सवालजवाब करता रहा. उन्होंने मुझे कई सनसनीखेज बातें बताईं. वकालतनामे पर साइन ले कर मैं ने उन्हें सारी बातें समझा दीं कि वह पुलिस वालों की कोई पेशकश कबूल न करें और न ही उन की कोई मांग मानें. बस मजबूती से अपने बयान पर टिके रहें.’’

रिमांड खत्म होने के बाद पुलिस ने अदालत में चालान पेश कर दिया. इसी पेशी पर मैं ने अपने वकालतनामे के साथ मुलजिम की जमानत की अरजी पेश कर दी, ‘‘जनाबेआला, मेरा मुवक्किल एक बाइज्जत शहरी है. उस का रिकौर्ड बिलकुल साफ है. उसे इस केस में जबरन फंसाया गया है. उस की जमानत की अरजी मंजूर की जाए.’’

इस्तेगासा के वकील ने कहा, ‘‘वारदात के वक्त मुलजिम को मकतूल के फ्लैट में जाते और आते देखा गया था. इस का एक गवाह भी मौजूद है. साथ ही मौकाएवारदात पर मुलजिम की मौजूदगी के निशान भी पाए गए हैं. जबकि कुछ अरसा पहले मुलजिम के मकतूल के ताल्लुकात खतम हो चुके थे?’’

इसी तरह बहस चलती रही. कत्ल के मुलजिम को जमानत वैसे भी मुश्किल से मिलती है, इसलिए बहुत जोर देने पर भी कादिर अली की जमानत नहीं हो सकी. अदालत ने 15 दिनों बाद की तारीख दे कर मुलजिम को जेल भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, लुबना की मौत 9 मई की रात 8 से 9 बजे के बीच हुई थी. एक तेजधार वाला खंजर उस के सीने में उतार दिया गया था. मौत की वजह वही खंजर था. जब उस पर हमला किया गया था, वह नशे में थी. मारने से पहले उसे कोई ऐसी नशीली दवा दी गई थी, जिस से नींद आती है. मेरे पास 15 दिनों का समय था. मैं ने दौड़भाग कर के सार सबूत जुटा लिए, जो आप को अदालती काररवाही के दौरान पता चलेंगे.

अगली पेशी पर अदालत की काररवाही शुरू हुई तो जज ने जुर्म पढ़ कर सुनाया. मेरे मुवक्किल ने कत्ल के जुर्म से साफ इनकार कर दिया. इस के बाद मुलजिम का बयान दर्ज किया गया. वकील ने जिरह शुरू की, ‘‘मकतूल, जो पहले तुम्हारी बीवी थी और तुम्हारे व्यवहार से बहुत परेशान थी?’’

वह कुछ और पूछता मेरे मुवक्किल ने कहा, ‘‘वह मेरी बीवी जरूर थी, लेकिन मेरे व्यवहार से बिलकुल परेशान नहीं थी.’’

‘‘उस ने तुम से परेशान हो कर ही सहारा ढूंढ़ कर तलाक लिया था?’’

‘‘उस ने मुझ से तलाक जरूर लिया था, पर व्यवहार मेरा नहीं, उस का खराब था. वह मुझ से ठीक से बात तक नहीं करती थी, मेरे जज्बातों और मेरी जरूरतों की उसे जरा भी परवाह नहीं थी. जवान बेटी के सामने मैं उसे कुछ कह भी नहीं सकता था, इसलिए उस की हर ज्यादती चुपचाप बरदाश्त करता रहा. लेकिन जब पानी सिर के ऊपर से गुजर गया तो मुझे अपना रास्ता अलग करना पड़ा. जब तक वह मेरी बीवी थी, मैं ने उस पर अंधा यकीन किया. मैं जमाल को उस का बौस समझता रहा. मुझे तो बाद में पता चला कि उस का जमाल से अफेयर चल रहा था और वह उस से शादी करना चाहती थी.’’

वकील इस्तेगासा ने जख्मों पर नमक छिड़कते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह सच है कि तुम्हारी बीवी का जमाल से इश्क चल रहा था और वह जल्दी ही उस से शादी करना चाहती थी. उन की मंगनी भी हो गई थी. उस की मौत से तो तुम्हें खुशी हुई होगी?’’

‘‘इस में खुश होने की क्या बात है? जो औरतें अपना घर उजाड़ कर गलत राह पर चलती हैं, उन का यही अंजाम होता है. मुझे बिलकुल नहीं पता कि उस का किस ने, क्यों और कैसे कत्ल किया?’’

‘‘क्या तुम 9 मई यानी कत्ल वाली रात मकतूल के फ्लैट पर उस से मिलने नहीं गए थे?’’

‘‘रात को नहीं, शाम 7 बजे 5 मिनट के लिए मैं उस के फ्लैट पर उस की अमानत लौटाने गया था. वह अमानत क्या थी, यह मैं बताना नहीं चाहता.’’

इस्तेगासा वकील ने 2-4 सवाल और पूछ कर अपनी जिरह खत्म कर दी.

अब मेरी बारी थी. मुझे इस तरह से सवाल करने थे कि कादिर अली की बेगुनाही साबित हो जाए. मैं ने पूछा, ‘‘आप की शादी को कितना अरसा हुआ होगा, क्या आप दोनों में शुरू से ही अनबन थी?’’

‘‘मेरी शादी को 16 साल हो गए हैं. शुरू में तो सब ठीक रहा. इधर 2, ढाई साल से लुबना के व्यवहार में बदलाव आना शुरू हुआ था. वह मुझ से दूर रहने लगी थी और ज्यादा से ज्यादा समय घर से बाहर गुजारने लगी थी. उस ने मेकअप आर्टिस्ट की हैसियत से एक आर्ट एकेडमी जौइन कर ली.’’

‘‘कैसी आर्ट एकेडमी, क्या इस में आप की मरजी शामिल थी?’’

‘‘वह आर्ट एकेडमी ऐक्टिंग, मौडलिंग, संगीत आदि की ट्रेनिंग दे कर शौकीन लोगों को अदाकार बनाती है. उस का नाम है परफौरमैंस. लुबना ‘परफौरमैंस’ में मेकअप आर्टिस्ट के रूप में काम करने लगी थी. जबकि यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं था. पर उस की लगातार जिद के आगे मैं मजबूर था.

इस की वजह यह थी कि मै ंने सुन रखा था कि ऐसी जगहों पर बहुत ज्यादा आजादी और बेशरमी होती है, वहां सारे गलत काम होते हैं. काश मैं ने इजाजत न दी होती.’’

‘‘क्या यह वही एकेडमी है, जिस का मालिक जमाल बेरी है?’’

‘‘जी हां, परफौरमैंस का मालिक जमाल ही है.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि लुबना का अफेयर अपने बौस से चल रहा था और आप से तलाक के बाद उस ने उस से मंगनी कर ली थी.’’

‘‘जी हां, परफौरमैंस की नौकरी के बाद ही लुबना बदल गई और मेरी जिंदगी में यह तबाही आई.’’

‘‘दोनों शादी करते, उस के पहले ही लुबना का कत्ल हो गया. अब मैं कुछ निजी सवाल पूछना चाहता हूं, जो बहुत जरूरी हैं, आप उन पर माइंड मत कीजिएगा. मकतूल और जमाल के अफेयर के बारे में आप को पता था?’’

‘‘नहीं, यह मुझे बहुत बाद में तब पता चला कि जब वह तलाक के लिए ड्रामा करने लगी यह सारी चाल जमाल के लिए चली गई थी.’’

‘‘क्या लुबना रात को देर से घर आती थी?’’

‘‘वह अकसर एकेडमी से रात को घर आती थी. मैं ने बहुत समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. मैं ने उसे एकेडमी छोड़ने को कहा तो उस ने साफ मना कर दिया. इधर वह मेरी कोई बात नहीं मानती थी.’’

‘‘इस का मतलब मकतूल आप को शौहर नहीं मानती थी? आप ने उसे सख्ती से नहीं रोका?’’

‘‘कैसे रोकता? उस ने मुझे धमकी दी कि अगर ज्यादा रोकटोक की तो वह आर्ट एकेडमी में ही रहने लगेगी. उस समय मेरी बेटी भी मां की हमदर्द थी.’’

‘‘क्या आप अपनी बीवी की धमकी से डर गए थे?’’

‘‘जी, मैं शरीफ आदमी हूं. ऐसे हथकंडों से डर गया था. वैसे भी हम अजनबियों की तरह एक छत के नीचे रह रहे थे.’’

‘‘क्या आप दोनों के बीच मियांबीवी वाला रिश्ता नहीं रह गया था? जहां तक मुझे जानकारी है कि आप दोनों के बैडरूम अलगअलग थे?’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं. हमारे बीच मियांबीवी वाला रिश्ता खत्म हो चुका था. 2, ढाई साल से हमारे बैडरूम भी अलगअलग थे. लुबना मुझे शौहर नहीं मानती थी. मैं ने कभी उस के करीब जाना चाहा तो उस ने बेरुखी से झिड़क दिया. अब उसे मेरी निकटता की कोई जरूरत नहीं रह गई थी. हमारे बीच प्यारमोहब्बत का कोई रिश्ता नहीं बचा था. उस ने साफ कह दिया था कि वह मुझ से नफरत करती है. गुस्सा तो मुझे बहुत आता था, लेकिन बेटी की वजह से मैं खामोश रहता था. मैं उसे तलाक दे कर आजाद नहीं छोड़ना चाहता था.’’

‘‘फिर ऐसा क्य हुआ कि आप ने उसे तलाक दे दिया?’’

‘‘लुबना ने परफौरमैंस एकेडमी में स्टार बनने आई एक लड़की रशना को हमारे घर में केयरटेकर के रूप में रखवा दिया. रशना काफी खूबसूरत और जवान थी. पर वह उन लोगों में से थी, जो अपनी मंजिल पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

‘‘लुबना ने शायद उस से कहा था कि अगर वह कुछ दिनों तक उस के घर पर काम करेगी तो वह उसे स्टार बना देगी. यह मुझे बाद में पता चला कि लुबना उसे अपना ‘खास मकसद’ पूरा करने के लिए योजना बना कर हमारे घर लाई थी.

‘‘यह सब मुझे पता नहीं था. मैं तो उसे केयरटेकर ही समझता रहा. खैर मैं उसे रखने के सख्त खिलाफ था, लेकिन लुबना का कहना था कि वह एकेडमी में बहुत मसरूफ रहती है, इसलिए घर की देखभाल के लिए किसी का होना जरूरी है. उस ने जिद कर के रशना को रखवाया था.’’

मैं ने देखा, जज बड़ी दिलचस्पी से कादिर अली की बरबादी की दास्तान सुन रहे थे. इस्तेगासा वकील भी औब्जेक्शन कहना भूल सा गया था. अदालत में भी खामेशी और उत्सुकता थी.

कादिर अली ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘रशना 25 साल की खूबसूरत व स्मार्ट लड़की थी, वह कपड़े भी स्टाइल वाले पहनती थी. लुबना ने उसे मेकअप करने में भी एक्सपर्ट कर दिया था. वह लुबना द्वारा तैयार की गई स्क्रिप्ट के अनुसार कदमदरकदम बढ़ रही थी. उसे आए महीना भी नहीं गुजरा था कि एक दिन वह अपने मकसद में कामयाब हो गई.

‘‘लुबना ने जानबूझ कर आरिफा को अपनी बहन के घर भेज दिया था. उस रात मैं और रशना घर में अकेले थे. लुबना एकेडमी से लौटी नहीं थी. रशना ने आकर्षित करने वाला खुला लिबास पहना था और जानबूझ कर वह बारबार मेरे करीब आने की कोशिश कर रही थी. मैं भी इंसान हूं, कोई फरिश्ता नहीं. बीवी के साथ को तरसा हुआ था. जब एक भूखे इंसान के सामने सजीसजाई थाली रख दी जाए तो वह कहां तक खुद को रोकेगा? उसे लालच आ ही जाएगा.’’

‘‘आप सही कह रहे हैं, एक तो आप अपनी बीवी की बेरुखी के सताए थे, दूसरी तरफ प्यार भरे इसरार पर आप का फिसलना कुदरती था.’’ मैं ने उसे स्पोर्ट किया.

‘‘लुबना ने मुझे बदनाम व रुसवा करने का पूरा मंसूबा बना लिया था. वह हम दोनों को रंगेहाथों पकड़ना चाहती थी. संयोग था कि मैं उस दलदल में फंसने से बच गया. वह मेरे एकदम करीब आ गई थी, लेकिन अचानक मेरा जमीर जाग उठा, मैं ने जैसे ही झटके से उस से अलग हुआ, उसी समय लुबना चुपके से आ कर चीखनेचिल्लाने लगी.

‘‘हम दोनों बुरी तरह से बौखला उठे. बाद में पता चला कि रशना का बौखलाना भी ऐक्टिंग था. वह लुबना के पास जा कर कहने लगी, ‘‘साहब मुझ से जबरदस्ती कर रहे थे. सही वक्त पर आ कर आप ने मुझे बचा लिया?’’

लुबना ने फटाफट फोन कर के 6-7 लोगों को बुला लिया. आने वालों में उस की बहनें, आरिफा, एकेडमी का उस का असिस्टैंट उबेद जामी और रशना का बूढ़ा शराबी बाप भी शामिल था. लुबना चीखचीख कर कह रही थी, ‘‘मैं ऐसे चरित्रहीन आदमी के साथ कतई नहीं रह सकती. मुझे अभी तलाक चाहिए.’’

‘‘उस के साथ अन्य लोग भी मुझे ही बुराभला कहने लगे. मैं लुबना के खेल को समझ गया था, इसलिए मैं ने उसे उसी समय तलाक दे दिया. मेरी बेटी आरिफा भी मां की चाल समझ गई थी, क्योंकि रशना को उस ने जिद कर के घर में रखवाया था, इसलिए आरिफा ने भी मेरे साथ रहने का फैसला किया.’’

‘‘तो यह है आप की दुखभरी कहानी, जिस ने आप की जिंदगी बरबाद कर दी. लुबना को आप ने तलाक दे दिया, आरिफा आप के साथ रहने लगी, लेकिन रशना का क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे उसी समय घर से निकाल दिया. अब वह कहां है, मुझे मालूम नहीं.’’

मेरे सवालों से सारा मामला अदालत के सामने आ गया था. रशना के उस शर्मनाक ड्रामे में जमाल और लुबना की मिलीभगत थी, जिस की स्क्रिप्ट जमाल ने लिखी थी और डायरेक्शन लुबना का था.

मैं ने जिरह आगे बढ़ाई, ‘‘कादिर अली साहब, आप ने जनवरी में लुबना को तलाक दिया, उस के एक, डेढ़ महीने बाद ही उस ने मंगनी कर ली. मई में उस का कत्ल हो गया. इस से एक बात यह सामने आती है कि कोई ऐसा था, जो लुबना और जमाल की शादी से खुश नहीं था या वह खुद लुबना में रुचि ले रहा था. मंगनी के बाद उस ने नाराज हो कर उस का कत्ल कर दिया. यह सब तलाश करना पुलिस और अदालत का काम है.

‘‘आप ने इस्तेगासा की जिरह में बताया था कि आप कत्ल की शाम लुबना को उस की अमानत लौटाने गए थे. क्या आप उस के फ्लैट पर गए थे, जहां वह आप से अलग होने के बाद रह रही थी? वह फ्लैट जमाल बेरी का है, जहां वह अकसर लुबना से मिलने आया करता था. आप मुझे यह बताइए कि आप उस की कौन सी अमानत लौटाने गए थे?’’

‘‘वकील साहब, आप पूछ रहे हैं तो मुझे बताना ही पड़ेगा. एक दिन मैं सफाई कर रहा था तो मुझे मेज की दराज से एक ब्राउन रंग का लिफाफा मिला, जिस में लुबना के कुछ कागजात थे. साथ ही 20 हजार रुपए का एक क्रौस किया चेक था, जो मैं ने ही लुबना को एक बार दिया था. मै ंने यह बात आरिफा को बताई तो उस ने कहा कि वह ब्राउन लिफाफा चेक समेत लुबना तक पहुंचा देना चाहिए. इसलिए मैं उस शाम आरिफा और उस की दोस्त सबा के साथ लुबना के फ्लैट पर गया और उसे लिफाफा दे कर 5 मिनट में लौट आया.’’

‘‘क्या आरिफा और उस की दोस्त भी तुम्हारे साथ लुबना के फ्लैट पर गई थीं?’’

‘‘नहीं, आरिफा और उस की दोस्त नीचे गाड़ी में बैठी थीं. मैं नहीं चाहता था कि मांबेटी का सामना हो, इसलिए मैं उसे साथ नहीं ले गया था.’’

‘‘क्या आप वहां से सीधे घर आ गए थे?’’

‘‘नहीं, दरअसल उस दिन रौयल होटल में पैंटिंग्स की नुमाइश लगी थी. मेरी बेटी आरिफा और उस की दोस्त सबा फाइन आर्ट की उस एग्जीविशन को देखना चाहती थीं, जिस का टाइम 7 से 10 बजे तक था.

चूंकि समय हो चुका था, इसलिए मैं फटाफट लुबना को लिफाफा दे कर नीचे आ गया और आरिफा तथा सबा को ले कर रौयल होटल चला गया. 7 बज कर 20 मिनट पर मैं होटल पहुंच गया था.’’

‘‘नुमाइश का समय 7 बजे से 10 बजे तक था. आप उन दोनों को छोड़ कर वापस आ गए होंगे?’’

‘‘नहीं साहब, उन की जिद पर मुझे भी उन के साथ पैंटिंग्स की एग्जीविशन देखनी पड़ी थी?’’

‘‘इस का मतलब आप वारदात के दिन शाम सवा सात बजे से 10 बजे तक रौयल होटल में नुमाइश देख रहे थे?’’

‘‘जी जनाब, उस दिन 7 बज कर 20 मिनट से रात 10 बजे तक मैं नुमाइश देखता रहा.’’

इस का मतलब उस दिन आप लुबना के फ्लैट से काफी दूर होटल रौयल में नुमाइश में थे?

‘‘जी जनाब.’’

इस के बाद मैं ने जिरह खत्म कर दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, लुबना का कत्ल 9 मई को रात 8 से 9 बजे के बीच हुआ था. जबकि उस वक्त मेरा क्लाइंट घटनास्थल से काफी दूर होटल रौयल में था. इसलिए वह कत्ल नहीं कर सकता था. एक हिसाब से केस यहीं खत्म हो जाना चाहिए था, पर अभी कई सवाल बाकी थे. इस्तेगासा का पहला गवाह अमजद था. उस की फ्लैट के सामने दरजी की दुकान थी. उस ने अपने बयान में कहा कि उस ने मुलजिम को मकतूल के फ्लैट में जाते और निकलते देखा था. 1-2 सवाल पूछ कर इस्तेगासा वकील ने अपनी जिरह खत्म कर दी.

अपनी बारी पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप की दुकान मकतूल के फ्लैट के काफी करीब है, जैसा आप ने कहा है. क्या आप मकतूल और उस के मुलाकातियों को जानते थे?’’

‘‘मकतूल 3-4 महीने पहले ही वहां रहने आई थी. 1-2 बार वह मेरी दुकान पर भी आई थी. उन के मुलाकातियों में जमाल साहब को ही मैं ने देखा था.’’

‘‘क्या आप जमाल को जानते हैं?’’

‘‘जी, क्योंकि उस फ्लैट के मालिक वही हैं.’’

‘‘वारदात के दिन छुट्टी थी. सभी दुकानें बंद थी, फिर आप की दुकान कैसे खुली थी?’’

‘‘मुझे इमरजेंसी में शादी के कपड़े देने थे.’’

‘‘आप ने मुलजिम को बिल्डिंग में जाते देखा था, पर यह कैसे कह सकते हैं कि वह मकतूल के फ्लैट में ही गया था? क्या आप ने उस का पीछा किया था?’’

‘‘नहीं, मैं ने पीछा नहीं किया था. सभी कह रहे हैं कि वह मकतूल के फ्लैट में गया था, इसलिए मैं भी कह रहा हूं.’’

‘‘मैं सब की बात नहीं, आप की बात कर रहा हूं. आप को कैसे पता चला कि वह मकतूल के फ्लैट गया था?’’

‘‘मुझे यह बात जमाल बेरी साहब ने बताई थी कि मुलजिम का नाम कादिर अली है और वह मकतूल से मिलने उस के फ्लैट पर आया था.’’

‘‘यह बात जमाल ने आप को कब बताई थी?’’

‘‘वारदात वाले दिन रात साढ़े 10 बजे. वह आए और फ्लैट में गए. घबरा कर वापस आए और मुझे बताया कि लुबना को किसी ने खंजर घोंप कर मार दिया है. इस के बाद कादिर अली का हुलिया और गाड़ी की पहचान बता कर पूछा कि इस तरह का कोई आदमी तो नहीं आया था? मैं ने ‘हां’ कहा तो उन्होंने कहा कि उसी कादिर अली ने लुबना का कत्ल कर दिया है.’’

उस ने इस बात को माना कि जमाल ने उसे तफ्सील से बताया तो उस ने ‘हां’ कहा था. अगली पेशी पर मामले की जांच करने वाला अफसर फजल शाह था. मैं ने पूछा, ‘‘आप को वारदात की खबर कब और किस ने दी थी?’’

‘‘मुझे जमाल बेरी ने रात 11 बजे वारदात की खबर दी थी. इस के बाद मैं करीब पौने 12 बजे मकतूल के फ्लैट पर पहुंचा था.’’

‘‘उस समय जमाल वेरी फ्लैट पर मौजूद था?’’

‘‘जी हां, जमाल वहां मौजूद था और उस ने टेलर अमजद को भी रोक रखा था.’’

‘‘क्या यह सच है कि जमाल ने ही आप से कहा था कि कादिर अली ने ही यह हत्या की है?’’

‘‘जी हां, जमाल ने ही कादिर अली की तरफ इशारा किया था. फिर मैं ने अमजद का बयान लिया. उस ने भी कहा कि कादिर अली को मकतूल के फ्लैट में जाते उस ने देखा था. टाइम का सही अंदाजा उसे नहीं था.’’

‘‘क्या आप यह बताना चाहेंगे कि जमाल बेरी ने यह कैसे तय कर लिया कि कत्ल कादिर अली ने ही किया था, क्या उस के पास कोई ठोस सबूत था?’’

‘‘जी हां, मकतूल के पास एक ब्राउन लिफाफा रखा मिला था, जिस में कादिर अली का दिया 20 हजार का चेक था.’’

‘‘यह वही लिफाफा तो नहीं, जिस की जिक्र मेरी जिरह में आ गया है?’’

‘‘जी हां, वह वही लिफाफा था.’’

‘‘जब आप वहां पहुंचे तो आप ने क्या देखा?’’

‘‘मकतूल बिस्तर पर मरी पड़ी थी. उस के सीने में खंजर घोंपा हुआ था. लगता था, उस ने बचने के लिए कोई संघर्ष नहीं किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उस ने नशे की कोई दवा ली थी. सब चीजें अपनी जगह पर सुरक्षित थीं.’’

‘‘खंजर पर फिंगरप्रिंट मिले थे?’’

‘‘नहीं, मुलजिम ने चालाकी से प्रिंट साफ कर दिए थे.’’

‘‘कमरे के किसी हिस्से में भी मुलजिम के फिंगरप्रिंट नहीं मिले?’’

‘‘जी नहीं, कमरे में कहीं अंगुलियों के निशान नहीं मिले.’’

‘‘क्या कमाल की बात है. मुलजिम के पास इतना समय था कि अंगुलियों के निशान साफ कर वह समय पर रौयल होटल भी पहुंच गया.’’

‘‘हो सकता है, आप का क्लाइंट झूठ बोल रहा हो? वह वहां ज्यादा देर रुका हो.’’

‘‘एक बात सोच कर बताइए, आप के सामने मुलजिम ने दुखभरी कहानी सुना दी, सारे हालात बता दिए कि किस वजह से किस परिस्थिति में तलाक हुआ. क्या इस सब के बाद भी आप यह उम्मीद करते हैं कि मकतूल फ्लैट का दरवाजा खोल कर मुलजिम को अपने बैडरूम में ले जाएगी. जिस से वह सख्त नफरत करती थी, कभी नहीं ले जाएगी न? इस का मतलब साफ है कि जिस ने मकतूल का कत्ल किया है, वह उस का भरोसे का आदमी था. वह उसे तनहाई में अपने बैडरूम में ले गई. मेरा मुवक्किल वह आदमी नहीं हो सकता. आप क्या कहते हैं?’’

‘‘तो फिर ऐसा शख्स कौन हो सकता है?’’

‘‘यह पता लगाना आप का काम है, मेरा काम खत्म हुआ.’’

अगली पेशी पर विटनेस बौक्स में मकतूल का मंगेतर आर्ट एकेडमी का मालिक जमाल बेरी था.

इस्तगासा वकील की जिरह में कोई खास बात निकल कर सामने नहीं आई. जमाल बेरी ने जो बातें अपने बयान में कही थीं, वही रिपीट हुईं. उस के बाद मैं ने जिरह शुरू की. पहले मैं ने उस की मंगेतर की मौत पर दुख का इजहार किया. उस के बाद पूछा, ‘‘आप ने परफौरमैंस एकेडमी खोलने से पहले इस का कोई कोर्स किया था?’’

‘‘मैं ने कोई कोर्स तो नहीं किया, पर मैं स्टेज करता था और इस का तजुर्बा रखता हूं.’’

‘‘यानी आप के पास अच्छी तालीम है, क्या आप दीन, खुदा और रसूल पर भी यकीन रखते हैं?’’

‘‘हां खुदा रसूल पर पूरा यकीन रखता हूं.’’

‘‘इस के बावजूद आप ने मुलजिम की अच्छीभली शादीशुदा जिंदगी में दरार पैदा कर दी और उस की बीवी से ऐसी मोहब्बत बढ़ाई कि उन के बीच लड़ाईझगड़े करवा कर रशना वाली साजिश रच कर लुबना का तलाक करवा दिया. यही नहीं, एक बेगुनाह इंसान पर झूठे इलजाम लगवा दिए. ये बातें खुदा को सख्त नापसंद है. आप ने किसी का घर उजाड़ कर गुनाह नहीं किया?’’

‘‘मैं क्या कर सकता था. लुबना मुझ से बहुत ज्यादा मोहब्बत करती थी. मैं भी उसे चाहने लगा था. मोहब्बत में अंधे हो कर यह सब होता गया. वह मुझ से जल्द शादी करना चाहती थी और मकतूल की मुजरिम से जान छुड़ाने के लिए यह सब करना जरूरी था.’’

परेशानी और शर्मिंदगी उस के चेहरे पर साफ झलक रही थी. वह काफी स्मार्ट और शानदार पर्सनाल्टी का मालिक था. मैं ने जिरह आगे बढ़ाई, ‘‘जमाल साहब, वारदात के दिन आप मकतूल के पास कब पहुंचे थे?’’

‘‘रात के करीब साढ़े 10 बजे मैं वहां पहुंचा था.’’

‘‘जब आप मकतूल के फ्लैट पर पहुंचे तो क्या हुआ था, क्या आप ने डोरबैल बजाई थी?’’

‘‘मैं ने डोरबैल बजाई, पर कोई नतीजा नहीं निकला. उस के बाद मैं ने हैंडल घुमाया तो दरवाजा खुल गया.’’

‘‘आप ने अंदर दाखिल हो कर आवाज दी होगी, जवाब न मिलने पर आप परेशान हो कर बैडरूम में गए होंगे, जहां वह अपने बैड पर मरी पड़ी थी, ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘जी हां, ऐसा ही हुआ था.’’

‘‘जब आप वहां पहुंचे थे तो आप की मंगेतर को मरे डेढ़, 2 घंटे हो चुके थे. इस का मतलब साफ है कि आप कातिल नहीं हैं? अब मैं मुलजिम की बेगुनाही की तरफ आता हूं. वारदात वाले दिन शाम 7 बजे मुलजिम मकतूल के फ्लैट पर ब्राउन लिफाफा देने गया था, जिस में एक चैक भी था. यह ब्राउन लिफाफा वही है, जिस की वजह से मुलाजिम पर कातिल होने का शक किया जा रहा है? आप ने टेलर अमजद से पूछताछ की और पुलिस के आने पर आप ने कादिर अली को कातिल की तरह पेश कर दिया. मैं गलत तो नहीं कह रहा?’’

‘‘नहीं, आप ठीक कह रहे हैं, हालात ऐसे ही पेश आए थे. मुझे यही लगा था.’’

‘‘आप एक आर्ट एकेडमी चला रहे हैं तो आप को रौयल होटल में होने वाली आर्ट एग्जीबिशन के बारे में पता ही रहा होगा?’’

‘‘जी हां, मुझे इन्वीटेशन भी मिला था, पर मेरा डिनर मकतूल के साथ तय था, इसलिए मैं वहां नहीं जा सका.’’

‘‘मुलजिम अपनी बेटी आरिफा और उस की दोस्त सबा के साथ शाम साढ़े 7 बजे से साढ़े 10 बजे तक एग्जीबिशन में था. एक मशहूर आर्टिस्ट शाहिद निजामी पूरे वक्त उस के साथ थे. वह उस की वहां मौजूदगी के गवाह हैं. जरूरत पड़ने पर उन्हें गवाही के लिए बुलाया जा सकता है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मकतूल का कत्ल 8 बजे और 9 बजे के बीच हुआ था. इस अरसे मेरा मुवक्किल नुमाइश में था, इसलिए यह कहना बेवकूफी है कि उस ने मकतूल का कत्ल किया है.’’

‘‘अगर उस ने कत्ल नहीं किया तो कातिल कौन हो सकता है?’’ जमाल ने उलझ कर पूछा.

‘‘आप का जवाब देने से पहले मैं इस केस के इंक्वायरी अफसर से सवाल करना चाहूंगा.’’

जज ने फौरन इजाजत दे दी. मैं ने आईओ से पूछा, ‘‘आप ने वारदात की जगह से जो फिंगरप्रिंट्स उठाए हैं, उस का रिकौर्ड आप के पास होगा? आप यह बताएं कि वहां किनकिन लोगों के निशान आप को मिले हैं?’’

‘‘हम ने 3 लोगों के फिंगरप्रिंट्स उठाए हैं. एक मकतूल लुबना, दूसरे उस के मंगेतर जमाल और तीसरे के बारे में कुछ पता नहीं चल सका है.’’ उस ने शर्मिंदगी से कहा.

‘‘मैं दावे से कह सकता हूं कि तीसरे नंबर के फिंगरप्रिंट्स जिन का पता नहीं चल सका, वह कातिल के हैं और कातिल तक मि. जमाल पहुंचाएंगे.’’

‘‘मैं… मैं कैसे?’’ वह हकलाया.

मैं ने जमाल से पूछा, ‘‘मि. जमाल, क्या आप किसी ऐसी लड़की या औरत के बारे में जानते हैं, जो आप से शादी करना चाहती है?’’

‘‘मेरी नजर में ऐसी कोई लड़की नहीं है.’’

‘‘कोई ऐसा शख्स है, जो मकतूल को बहुत पसंद करता था और उस से शादी करना चाहता था? एकेडमी में कोई ऐसा है, जिस की मकतूल से दोस्ती थी?’’

‘‘मेरी जानकारी में बस उबेद ऐसा शख्स है, जिस की लुबना से अच्छी बनती थी. उस वक्त लुबना से मेरी मंगनी नहीं हुई थी. मैं कैसे ऐतराज कर सकता था?’’

‘‘आप की मंगनी पर उस का क्या रिएक्शन था?’’

‘‘मेरी मंगनी के बाद वह एकदम बुझ सा गया था.’’

‘‘इस का मतलब मंगनी से उसे दुख पहुंचा था?’’

‘‘हो सकता है.’’

‘‘क्या यह वही उबेद है, जिसे लुबना ने रशना वाले ड्रामे के दिन फोन कर के घर बुलाया था?’’

‘‘जी हां, वही है. लौट कर उस ने मुझे बताया था कि काम हो गया.’’

‘‘यानी मुलजिम ने मकतूल को तलाक दे दिया?’’

‘‘जी हां, उस का यही मतलब था.’’

मैं ने अपना रुख जज की तरफ कर के कहा, ‘‘जनाब, अब तक की अदालती काररवाही मेरे मुवक्किल को बेगुनाह साबित करने को काफी है. फिर भी अदालत को निर्णय लेने में आसानी हो, मैं अगली पेशी पर मुलजिम की बेटी आरिफा उस की दोस्त सबा और आर्टिस्ट शाहिद निजामी को गवाही में पेश करूगा. आईओ साहब से रिक्वेस्ट है कि वह उबेद जामी के फिंगरप्रिंट्स जल्द हासिल कर के तीसरे नामालूम फिंगरप्रिंट्स से मिलाएं तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा?’’

जज ने आईओ और पुलिस को हिदायत दी कि उबेद को शामिल तफतीश किया जाए और अगली पेशी पर उसे हाजिर किया जाए. पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी से उसी दिन उबेद को शामिल तफतीश कर के उस के फिंगरप्रिंट्स तीसरे नंबर के नामालूम फिंगरप्रिंट्स से मिलाए तो सारा मामला साफ हो गया. फिंगरप्रिंट्स के नमूने से उबेद के फिंगरप्रिंट्स मैच हो गए. पहले तो उबेद पुलिस को इधरउधर घुमाता रहा, जुर्म से इनकार करता रहा, पर जब पुलिस ने हाथ कड़े किए तो उस ने सच उगल दिया.

उबेद ने इकरारे जुर्म कर लिया कि लुबना को उसी ने सीने में खंजर घोंप कर मौत की नींद सुलाया था. यह कत्ल उस ने दास्ताने पहन कर किया था, इसलिए खंजर पर फिंगरप्रिंट नहीं आए थे. दूसरी जगहों पर फिंगर प्रिंट्स पाए गए थे. उबेद के बयान के मुताबिक, लुबना डबल गेम खेल रही थी. पहले तो वह उबेद से हंसतीबोलती रही, उस से दोस्ती बढ़ाती रही. जब उबेद उस की मोहब्बत में डूब गया तो जमाल को अपनी ओर आकर्षित देख कर वह उस की तरफ मुड़ गई. वह एकेडमी का मालिक था और उबेद से ज्यादा स्मार्ट था. मगर वह उबेद का सब्जबाग दिखाती रही. दोनों अपनीअपनी जगह पर लुबना को माशूका पा कर खुश थे. वह बारीबारी दोनों को खुश करती रही. दोनों यही समझते रहे कि वह बस उस के साथ सीरियस है.

अपने शौहर यानी कादिर अली से तलाक हासिल करने के बाद उस ने खुल्लमखुल्ला अपना फैसला जमाल के हक में दे दिया और उस के दिए हुए फ्लैट में रहने लगी. बाद में उस से मंगनी भी कर ली. उबेद को दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया कि वह उसे इतने दिनों तक उल्लू बनाती रही. उस ने पुलिस को बयान देते हुए कहा, ‘‘मैं मोहब्बत में अपनी यह हार बिलकुल बरदाश्त नहीं कर पाया. वह मुझ से बड़ा प्यार जताती थी. मैं ने उल्लू बन कर उसे महंगेमहंगे तोहफे दिए थे. उस का धोखा मेरे दिल को लग गया. मैं ने तय कर लिया कि मैं बदला जरूर लूंगा.

‘‘मैं ने उसे बुझे दिल से मंगनी की मुबारकबाद दी. फिर कुछ दिन गुजरने के बाद मैं ने लुबना से रिक्वैस्ट की कि अपनी मोहब्बत मैं भूल जाऊंगा, बस वह एक घंटा तनहाई में मेरे साथ गुजारे. इस के बाद मैं उन की जिंदगी से दूर हो जाऊंगा. उसे पुरानी मोहब्बत का वास्ता दिया तो वह मान गई. हम ने जिंदगी के बहुत सारे रंगीन लम्हे साथ बिताए थे. उन्हीं की यादों को ताजा करते हुए उस ने मेरी बात मान ली.’’

आईओ ने पूछा, ‘‘तो तुम ने एक खास मकसद के लिए उस से मुलाकात की और चुपचाप वापस चले आए. यह नशे का क्या मामला था?’’

‘‘वारदात वाले दिन लुबना ने 8 बजे बुलाया था. और यह जता दिया था कि 9 बजे के पहले चले जाना होगा. मैं पूरी तैयारी के साथ उस के फ्लैट पर ठीक 8 बजे पहुंच गया. उस ने मेरे लिए चाय बनाई. मैं ने नजर बचा कर उस की चाय में नींद की गोलियां डाल दीं. चाय पी कर वह सिरदर्द की शिकायत करने लगी. मैं ने उसे सहारा दे कर उस के बैडरूम में ले जा कर बैड पर लिटा दिया. मेरी दी हुई दवा ने असर दिखाना शुरू कर दिया था. वह अपने होश में नहीं रही तो मैं ने अपने लिबास में छिपाया खंजर निकाला और दास्ताने पहन कर खंजर का घातक वार उस दगाबाज औरत के सीने पर कर दिया.’’

उबेद अपने जुर्म, अपने बदले की दास्तान सुना रहा था. उस के एकएक लफ्ज में नफरत की चिनगारियां निकल रही थीं, ‘‘वह बेवफा औरत इसी लायक थी. ऐसी दगाबाज औरतें ऐसे ही अंजाम की हकदार होती हैं. मुझे अपने किए पर कोई दुख, कोई पछतावा नहीं है. बस दुख इस बात का है कि मैं पकड़ा गया. हालांकि चाय के खाली कप मैं अपने साथ ले गया था, ताकि पुलिस को मुझ तक पहुंचने का कोई सुराग न मिले. लेकिन मेरी बदनसीबी की मैं पकड़ा गया.’’

उबेद के इकबाले जुर्म के बाद मेरे मुवक्किल की बेगुनाही पक्की हो गई और अगली पेशी पर आरिफा, सबा व शाहिद निजामी की गवाही के बाद कादिर अली बाइज्जत बरी हो गया. True Crime Story

 

Hindi Crime Story: जो सिर्फ दिमाग चलाते हैं

Hindi Crime Story: एक एनजीओ संचालक ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम बना कर बौलीवुड फिल्म ‘स्पैशल 26’ की तरह एक बिल्डर के यहां छापा मार कर 21 लाख रुपए और गहने जिस तरह ठगे, हैरान करने वाली बात है. लेकिन क्या वे पुलिस से बच पाए?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कों पर रोज की तरह उस दिन भी वाहनों की आवाजाही लगी थी. रात के लगभग 9 बजे दिल्ली नंबर की एक चमचमाती सफेद रंग की एलैंट्रा कार नंबर- डीएल 3सी एक्यू 0504 सहारनपुर चौक से राजपुर की ओर चली जा रही थी. कार में 4 आदमी और 2 औरतें सवार थीं. सभी ने सफेद रंग की पैंट और कमीज पहन रखी थी.

कार कारगी चौक पहुंच एक किनारे खड़ी हो गई. कार के रुकते ही वहां पहले से खड़े 2 लोग उस के नजदीक आए तो कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक उन से मुखातिब हुआ, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘यस, लाइन क्लियर है. बस आप लोगों का ही इंतजार था.’’ कह कर वे दोनों भी कार में सवार हो गए. इस के बाद कार फिर चल पड़ी तो कुछ देर में वह पौश इलाके सरकुलर रोड पर कोठी नंबर 92 के सामने जा कर रुकी.

यह कोठी बिल्डर यशपाल टंडन की थी. यशपाल प्रौपर्टी का काम करते थे. इस के अलावा बड़ीबड़ी कमेटियां भी डालते थे, जिस में लाखों रुपए का लेनदेन होता था.

यशपाल का अपना औफिस भी था, जिस में वह सुबह से शाम तक बैठते थे. कोई नहीं जानता था कि उस दिन यशपाल का वास्ता एक बड़ी मुसीबत से पड़ने वाला था. कार में बाद में सवार हुए दोनों लोगों को छोड़ कर बाकी सभी कार से नीचे उतरे. उन में से एक के हाथ में ब्रीफकेस था. कार से उतरे लोग कोठी के गेट पर जा कर खड़े हो गए. उन्होंने डोरबैल बजाई तो कुछ सेकैंड बाद दरवाजे पर यशपाल टंडन खुद आए. उन के दरवाजा खोलते सब से आगे खड़े एक आदमी ने पूछा, ‘‘आप यशपाल टंडन?’’

‘‘जी हां, लेकिन आप कौन?’’ उन्होंने पूछा तो उसी आदमी ने रौब जमाते हुए सख्त लहजे में कहा, ‘‘हम लोग प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से हैं. आइए अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’

टंडन सकपका गए. एकाएक उन की कुछ समझ में नहीं आया. आने वालों के तेवर उन्हें ठीक नहीं लग रहे थे. उन्होंने हकलाते हुए कहा, ‘‘ल…ल…लेकिन इस तरह.’’

‘‘कहा न, चलो अंदर चल कर बात करते हैं.’’ कहने के साथ ही टीम का नेतृत्व कर रहे उस आदमी ने साथियों से कहा, ‘‘दरवाजा बंद कर के इन्हें अंदर ले आइए और बाहर खड़े लोगोें से कहिए कि बिना इजाजत कोई अंदर न आने पाए.’’

हालात अचानक बदल गए थे. टंडन चुपचाप उन के साथ अंदर आ गए. ड्राइंगरूम में आते ही उन्होंने टंडन को सोफे पर बैठा कर कहा, ‘‘मि. टंडन, हमें तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है. हमें शिकायत मिली है कि तुम्हारे पास बहुत ब्लैकमनी है.’’

‘‘ऐसा तो कुछ भी नहीं है सर, जरूर आप को किसी ने गलत सूचना दी है.’’ टंडन ने सफाई देनी चाही तो टीम का नेतृत्व कर रहा आदमी बड़े ही आत्मविश्वास से बोला, ‘‘हमारी इन्फौरमेशन गलत नहीं है. हम तुम पर तभी से नजर रख रहे हैं, जब तुम्हारे दोस्त विजय मनचंदा के यहां आयकर का छापा पड़ा था, उस समय तुम खुद भी तो वहां मौजूद थे.’’

उस की इस बात पर यशपाल चौंके, क्योंकि उस अधिकारी ने जो कहा था, वह एकदम सही था. दरअसल 4 महीने पहले उन के दोस्त विजय मनचंदा के यहां जब आयकर विभाग ने छापा मारा था, तब वह भी वहां मौजूद थे. इतना ही नहीं, आयकर विभाग ने उन का पहचान पत्र ले कर उन्हें गवाह भी बना लिया था. वह घबरा गए. यह सब उन की पत्नी भी देखसुन रही थीं. वह भी घबरा गईं. टंडन और उन की पत्नी को सोफे पर एक तरह से बंधक बना कर बैठा दिया गया.

‘‘मि. टंडन, हमें कोऔपरेट कीजिए.’’ सामने बैठे आदमी ने कहा तो टीम में शामिल युवा लड़कियां टंडन दंपति के इर्दगिर्द खड़ी हो गईं, जबकि बाकी लोग कोठी की तलाशी लेने लगे. करीब आधा घंटे तक जब कुछ हाथ नहीं लगा तो उन्होंने सेफ की चाबी ले कर सारा सामान उलटपलट दिया. इस जांचपड़ताल में उन के हाथ संपत्ति के कुछ कागजात, नकदी और गहने लगे.

उन्हें जो भी मिला, वह सब एक स्थान पर रखते गए. उन के बारे में तरहतरह के सवाल भी करते रहे. टीम का नेतृत्व कर रहे अधिकारी ने यशपाल को गहरी नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘इन सब का हिसाब देने तुम्हें कल औफिस आना होगा. तुम्हारे खिलाफ एफआईआर तो होगी ही, जरूरत पड़ी तो गिरफ्तारी भी हो सकती है.’’

यशपाल के तो होश उड़ गए. उन्हें परेशान देख कर अधिकारी ने कहा, ‘‘हमारे पास एक बीच का रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ डरेसहमे यशपाल टंडन ने पूछा तो राजदाराना अंदाज में वह बोला, ‘‘अगर हमें 50 लाख रुपए मिल जाएं तो तुम आगे की काररवाई से बच सकते हो.’’

इस काररवाई से दहशत में आए यशपाल सोच में पड़ गए. गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में उन्होंने कहा, ‘‘सर, मेरे पास इतनी बड़ी रकम नहीं है. कुछ कम हो जाए तो मैं कोशिश कर सकता हूं.’’

‘‘ठीक है, रकम कम करेंगे तो हम इन्हें अपने साथ ले जाएंगे.’’ उस ने गहनों की ओर इशारा कर के कहा.

यशपाल इजाजत ले कर सोफे से उठे और घर में रखे 6 लाख रुपए निकाल कर उन्हें दे दिए.

लेकिन छापा मारने वाली टीम ने उन्हें लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि इतने में बात नहीं बनेगी. इस के बाद टंडन ने फोन कर के अपने किसी परिचित व्यापारी से 10 लाख रुपए मंगा कर लिए. यह रकम लेने टंडन खुद दरवाजे तक गए थे. इतने पर भी बात नहीं बनी तो उन्होंने अपने किसी अन्य परिचित से 5 लाख रुपए और मंगा कर दिए.

टीम का मुखिया इतने पर भी संतुष्ट नजर नहीं आया. उस ने सारी नकदी और आभूषण एक बैग में रख लिए. इस के बाद चलने लगा तो कहा, ‘‘थोड़ी देर के लिए अपनी स्कूटी देना.’’

टंडन ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘आप चिंता न करें, हमारा कर्मचारी आ कर उसे दे जाएगा.’’

करीब सवा 2 घंटे की काररवाई के बाद पूरी टीम चली गई.

यशपाल टंडन के यहां ईडी का यह छापा 2 नवंबर, 2015 की रात पड़ा था. इस छापे से वह काफी परेशान थे. उन्होंने अपने परिचितों को फोन कर के इस छापे की जानकारी दी तो बिना पुलिस के रात में छापा मारना और स्कूटी मांग कर ले जाने वाली बात से उन लोगों को यह सब संदिग्ध लगा. जब यह साफ हो गया कि आयकर विभाग या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रात में छापा नहीं मारता तो लगा कि उन के साथ कोई बड़ी गड़बड़ हुई है. परिचितों से सलाहमशविरा कर के यशपाल टंडन ने इस की सूचना पुलिस कंट्रौल रूम को दे दी.

फरजी ईडी टीम द्वारा छापे के बहाने लाखों रुपए ले जाने की घटना की सूचना पा कर थाना कोतवाली के प्रभारी एस.एस. बिष्ट और लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह पुलिस बल के साथ टंडन की कोठी पर पहुंच गए. अधिकारियों को भी सूचित कर दिया गया था. इस घटना से जिला पुलिस में हड़कंप मच गया था. एसपी (सिटी) अजय सिंह और सीओ मनोज कत्याल भी मौके पर पहुंच गए थे. सभी ने यशपाल से पूछताछ की तो उन्होंने पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यशपाल टंडन को छापे के बहाने शातिराना अंदाज में ठगा गया है. प्रवर्तन निदेशालय के क्षेत्रीय प्रमुख पी.के. चौधरी ने भी स्पष्ट कर दिया कि उन की किसी टीम ने छापा नहीं डाला है.

यशपाल बुरी तरह हताश हो गए. ठग पूरी तैयारी के साथ आए थे और बड़ी चालाकी से उन्हें ठग कर चले गए थे. मामला बेहद गंभीर था. थाना कोतवाली में यशपाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपराध संख्या- 304/2015 पर भादंवि की धारा 595, 419, 420, 120 बी, 406 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. सदानंद दाते को भी इस घटना की सूचना मिल गई थी. वह काफी हैरान थे. इस की वजह यह थी कि यह फिल्मी स्टाइल में किया गया अपनी तरह का एक अलग अपराध था. उन्होंने एसपी (सिटी) अजय सिंह से सलाह कर के इस मामले के खुलासे के लिए एक टीम का गठन करने का आदेश दिया.

इस स्पैशल औपरेशन ग्रुप की संयुक्त टीम में थानाप्रभारी एस.एस. बिष्ट, लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह, एसआई दिलबर सिंह, एएसआई सर्वेश कुमार, कांस्टेबल अरविंद भट्ट, मनमोहन सिंह, कुलवीर, सत्येंद्र नेगी, प्रमोद, गंभीर सिंह और महिला कांस्टेबल रजनी कोहली तथा सुमन को शामिल किया गया. इस का नेतृत्व खुद एसपी (सिटी) अजय सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम तुरंत अपने काम में लग गई. यशपाल टंडन से हुई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक्सपर्ट से एक आरोपी का स्कैच भी बनवा कर जारी कर दिया.

यशपाल ने कार का जो नंबर बताया था, पुलिस ने अगले दिन उस की जांच की तो वह पंजाब प्रांत की किसी मोटरसाइकिल का निकला. 2 बातें स्पष्ट होती थीं, एक तो यह कि यशपाल को ठीक से नंबर याद नहीं था या फिर कार में फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया गया था. यशपाल की स्कूटी पुलिस ने उसी दिन कारगी चौक से लावारिस अवस्था में खड़ी बरामद कर ली थी. उन की कोठी के बाहर बाईं ओर एसजीआरआर स्कूल था. उस के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने उस की रिकौर्डिंग चैक की, लेकिन उस से कार का नंबर पकड़ में नहीं आ सका.

राजधानी के मुख्य चौराहों पर भी सुरक्षा की दृष्टि से हाई डैफिनेशन कैमरे लगे हैं. पुलिस ने रात 9 से साढ़े 11 बजे तक की उन की फुटेज बारीकी से चैक की तो आशारोड़ी क्षेत्र के कैमरे में वह कार दिख गई, जिस में सवार हो कर कथित ईडी टीम के सदस्य आए थे. इस में कार का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था. इस तरह पुलिस को नंबर मिल गया. अब तक कई दिन बीत चुके थे. चूंकि नंबर दिल्ली का था, इसलिए एसआई राकेश शाह के नेतृत्व में एक टीम दिल्ली भेज दी गई.

दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने आरटीओ औफिस से कार के मालिक के बारे पता किया. पुलिस आरटीओ औफिस से मिले पते पर पहुंची तो वहां जो मिला, पता चला उस ने कार बेच दी थी. जिस व्यक्ति को उस ने कार बेची थी, पुलिस उस के पास पहुंची तो वहां भी निराश होना पड़ा, क्योंकि उस ने भी किसी अन्य को कार बेच दी थी. पुलिस टीम दिल्ली में ही डेरा डाले थी. कार आदर्शनगर निवासी पुष्पा को बेची गई थी. पुलिस खोजबीन करते हुए पुष्पा के यहां पहुंची तो उस ने बताया कि उस की कार को एक एनजीओ संचालक प्रदीप सिंह मांग कर ले गया था.

प्रदीप के बारे में पूछताछ की गई तो पता चला कि वह अपने भाई बबलू और कुछ अन्य साथियों के साथ जहांगीरपुरी में एक औफिस खोल कर एनजीओ चलाता है. उस के यहां स्टाफ भी था. पुलिस ने पूछताछ कर के उस के बारे में जानकारी इकट्ठा कर ली. पुलिस को कार पुष्पा के यहां मिल गई थी. पुलिस को जो सुराग मिले थे, वे काम के थे. 25 नवंबर को पुलिस टीम जहांगीरपुरी स्थित फ्लैट नंबर डी 268 पर पहुंची. फ्लैट में औफिस चल रहा था. पुलिस को वहां प्रदीप तो नहीं मिला, उस के यहां काम करने वाली 2 लड़कियां मिल गईं.

ईडी के छापे में चूंकि 2 लड़कियां भी शामिल थीं, इसलिए पुलिस ने उन्हें शक के दायरे में रख कर पूछताछ शुरू कर दी. उन लड़कियों में एक श्रद्धानंद कालोनी निवासी बेबी पुत्री वीरेंद्र और दूसरी राखी पुत्री कल्लू थीं. दोनों बेहद साधारण परिवारों से थीं. वे दोनों कई महीने से इस एनजीओ में काम कर रही थीं. पुलिस ने उन से घुमाफिरा कर सवाल किए तो वे जवाब देने में उलझ गईं. उन्होंने जो सच बताया, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. इस फरजी छापे की योजना किस ने तैयार की थी, यह तो वे नहीं जानती थीं, लेकिन प्रदीप के साथ छापे में वे भी गई थीं. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर देहरादून आ गई. पुलिस प्रदीप के जहांगीरपुरी स्थित एमसीडी में फ्लैट नंबर 306 पर भी गई थी, लेकिन वहां ताला लगा था.

पुलिस ने दोनों लड़कियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि 2 नवंबर को प्रदीप छापा मारने की बात कह कर उन्हें अपने साथ ले गया था. उस के साथ उस का भाई बबलू और 2 दोस्त भी थे, जबकि 2 लोग उन्हें देहरादून में मिले थे. बेबी और राखी प्रदीप एवं बबलू के अलावा किसी और को नहीं पहचानती थीं. पुलिस ने यशपाल टंडन से लड़कियों का आमनासामना कराया तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया. लड़कियों ने हैरान करने वाली बात यह बताई कि प्रदीप ने यह छापा फिल्म ‘स्पैशल-26’ की स्टाइल में मारा था. इस के लिए उस ने खुद तो रिहर्सल किया ही था, उन्हें भी रिहर्सल कराया था. उन्हें कई बार फिल्म भी दिखाई थी.

टीम असली लगे, इस के लिए उन्होंने सफेद रंग के कपड़े सिलवाए थे. अपनी बनाई योजना के अनुसार वे छापा मार कर चले गए थे. प्रदीप के पास ही पूरी रकम थी. छापा मारने के पहले जो 2 लोग देहरादून में मिले थे, वे देहरादून में ही रह गए थे. लड़कियों ने बताया था कि यशपाल टंडन ने टीम को पूरा सहयोग दिया था. उन्होंने खुद ही बताया था कि अमुकअमुक स्थान पर तलाशी लें. इस से यशपाल की भूमिका भी संदिग्ध हो गई थी.

यशपाल कमेटी डलवाते थे. हो सकता था कि घाटा दिखाने के लिए उन्होंने ही यह योजना बनाई हो. इस मुद्दे पर उन से भी पूछताछ की गई, लेकिन इस में उन का कोई हाथ नहीं निकला. अलबत्ता लड़कियों और उन के बयानों में थोड़ा विरोधाभास जरूर बना रहा. अभी मामले का खुलासा पूरी तरह नहीं हो सका था. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 26 नवंबर को अपने औफिस में प्रेसवार्ता कर के इस फरजी छापे का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने दोनों लड़कियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि वारदात में स्थानीय लोगों का भी हाथ जरूर था. पुलिस टीम प्रदीप की तलाश में जुटी थी, लेकिन अगले कई दिनों तक वह हाथ नहीं आया. पुलिस प्रदीप और उस के भाई के मोबाइल नंबरों की जांच कर रही थी. लेकिन वे बंद हो चुके थे. पुलिस हर सूरत में पूरे मामले का परदाफाश करना चाहती थी. एसपी (सिटी) अजय सिंह समयसमय पर टीम के काम की समीक्षा करते रहते थे. देखते ही देखते घटना को घटे डेढ़ महीने से ज्यादा का समय बीत गया, लेकिन आरोपियों का कोई सुराग नहीं मिला. कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ लग जाए, इस के लिए पुलिस ने जेल में बंद राखी और बेबी से दोबारा पूछताछ की.

पुलिस आरोपियों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स पर भी काम कर रही थी. इस से कडि़यां जुड़ती चली गईं. इस कड़ी में एक नाम धर्मपाल भाटिया का सामने आया. धर्मपाल हरियाणा के जिला करनाल के हांसी रोड पर रहता था. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई और उस से पूछताछ के आधार पर देहरादून के थाना क्लेमन टाउन के गोकुल एन्कलैव में रहने वाले दीपक मनचंदा को भी 4 जनवरी, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दोनों से पूछताछ की. इन से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि यह पूरी योजना एक महिला द्वारा तैयार की गई थी तो हैरानी बढ़ गई. सभी लोगों ने योजना बना कर जिस तरह फिल्मी अंदाज में छापा मारा था, पुलिस उलझ कर रह गई थी. ठगी का शिकार हुए यशपाल टंडन का उन का अपना कलैक्शन एजेंट ही उन्हें दगा दे गया था. दरअसल, दीपक मनचंदा यशपाल के दोस्त विजय मनचंदा का भतीजा था. इसी नाते उन्होंने भरोसा कर के उसे अपने यहां कमेटी का पैसा जुटाने और अन्य कामों के लिए रख लिया था. दीपक ने खूब मेहनत कर के काम किया, जिस से यशपाल टंडन को उस पर पूरा भरोसा हो गया. वह उस के साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करने लगे.

जरूरी नहीं कि इंसान जैसा दिखता है, ठीक वैसा हो ही. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह बुरी आदतों का शिकार था. उन में एक आदत अनापशनाप खर्च करना भी थी. यशपाल के लिए वह मोटी रकम इकट्ठा करता था. धीरेधीरे उस ने उन से 5 लाख रुपए उधार ले लिए. जब रुपए लौटाने की बात आई तो वह परेशान रहने लगा. दीपक मूलरूप से करनाल का ही रहने वाला था और कुछ सालों पहले ही देहरादून आया था. उस की जानपहचान धर्मपाल भाटिया और उस की पत्नी निशा उर्फ रेखा से थी. निशा तेजतर्रार महिला थी. एक दिन बातोंबातों में उस ने अपनी परेशानी दोनों को बताने के साथ यह भी बताया कि उस का मालिक काफी दौलतमंद आदमी है.

‘‘तुम उसी से पैसा क्यों नहीं कमाते?’’ निशा ने रहस्यमय अंदाज में कहा.

‘‘वह कैसे?’’ दीपक ने हैरानी से पूछा.

‘‘इस की तरकीब मैं तुम्हें बताऊंगी.’’ निशा ने कहा.

आश्वासन मिलने पर दीपक को थोड़ी राहत मिल गई. जहांगीरपुरी में रहने वाले प्रदीप और बबलू निशा के भाई थे. दोनों काफी शातिर थे. वे एनजीओ की आड़ में ब्लैकमेलिंग का धंधा करते थे. निशा और धर्मपाल ने इस मुद्दे पर उन से बात की तो काफी सोचविचार कर उन्होंने फिल्म ‘स्पैशल 26’ की स्टाइल में यशपाल टंडन को लूटने की सोची.

इस के बाद उन्होंने दीपक से बात की तो उस ने यशपाल के बारे में सब कुछ बता दिया. उस ने यह भी बताया कि यशपाल चूंकि कमेटी के साथ ब्याज पर भी रुपए देने का काम करते हैं, इसलिए उन के पास बिना हिसाबकिताब की मोटी रकम होती है. प्रदीप और निशा को वह सौफ्ट टारगेट लगे. प्रदीप स्मार्ट युवक था और अधिकारियों वाले अंदाज में रहता था.

सभी ने मिल कर यशपाल को प्रवर्तन निदेशालय के फरजी छापे के जरिए अपना शिकार बनाने का फैसला किया. प्रदीप ने इस योजना  में अपने एक दोस्त पंकज तिवारी, भांजे रमन और एनजीओ में काम करने वाली बेबी और राखी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया. प्रदीप, उस का भाई, दोस्त, भांजा और दोनों लड़कियों ने कई बार ‘स्पैशल 26’ फिल्म देखी. प्रदीप को अधिकारी की भूमिका में रहना था, जबकि बाकी को टीम के सदस्य के रूप में. योजना बन गई तो तय दिन 2 नवंबर के एक दिन पहले ही धर्मपाल दीपक के पास देहरादून पहुंच गया.

अगले दिन प्रदीप ने बहाने से पुष्पा की कार मांगी और बबलू, पंकज, रमन, बेबी और राखी के साथ शाम को दिल्ली से चल कर करीब 8 बजे देहरादून पहुंच गया. यशपाल और दीपक तय योजना के तहत उन्हें रास्ते में मिल गए. सभी लोग यशपाल की कोठी पर पहुंचे. चूंकि यशपाल दीपक को पहचानते थे, इसलिए वह धर्मपाल के साथ बाहर कार ही में रुक गया. यशपाल को उन के फरजी ईडी होने का शक न हो, इस के लिए प्रदीप ने उन्हें उन के दोस्त के यहां पूर्व में पड़े आयकर विभाग के छापे का जिक्र किया. यह बात दीपक उसे पहले ही बता चुका था. उन्होंने बेहद शातिराना अंदाज में 21 लाख कैश और गहने ठग लिए. जातेजाते वे स्कूटी भी ले गए, जिसे उन्होंने कारगी चौक पर छोड़ दिया.

इस के बाद दीपक अपने घर चला गया. धर्मपाल करनाल और बाकी लोग दिल्ली. प्रदीप ने कहा कि वह माल का बंटवारा बाद में करेगा. लेकिन वह सभी से शातिर निकला और अपने भाई के साथ पूरी रकम ले कर फरार हो गया. उस ने सिर्फ बेबी और राखी को 6 हजार रुपए खर्च के लिए दिए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपियों का सामना यशपाल टंडन से कराया. वह अपने दोस्त के भतीजे द्वारा दी गई दगा से आहत थे. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 5 जनवरी, 2016 को आरोपियों को मीडिया के सामने पेश कर के केस का खुलासा किया और पुलिस टीम को ढाई हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की.

पुलिस ने बाद में गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक जेल गए आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. बाकी अन्य आरोपी निशा उर्फ रेखा, प्रदीप, बबलू, पंकज और रमन की तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story Hindi: चाय की तरह – खून पीने वाले ड्रैकुला

Suspense Story Hindi: ड्रैकुला, पिशाच अथवा चुड़ैल जैसे शब्दों की अवधारणा सदियों से चली आ रही है. कहानियों के माध्यम से ये शब्द लोगों के मन में दहशत भी पैदा करते रहे हैं. लेकिन हकीकत में डै्रकुला, पिशाच या चुडै़ल जैसा कुछ नहीं होता. वैसे मानवीय खून पीने वाले ड्रैकुला आज भी इंसानों के बीच मौजूद हैं.

अगर आप मानते हैं कि इंसानी खून पीने वाले ड्रैकुला महज किस्सेकहानियों का हिस्सा हैं तोआप गलतफहमी में हैं. क्योंकि दुनिया में 1-2 नहीं बल्कि 20 लाख से ज्यादा चलतेफिरते ऐसे जिंदा लोग हैं, जो रोज या अकसर चाय या काफी की तरह इंसानी खून पीते हैं. जिस तरह तमाम लोगों को शराब, स्मैक या अफीम की लत होती है, वैसे ही इन्हें रोजाना खून पीने की लत होती है. इन की सब से मुखर मौजूदगी उस अमेरिका में ही है जो आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक सोच का गढ़ माना जाता है.

खून पीने वाले ये बिलकुल आम लोग हैं. इन में कोई क्लर्क है तो कोई बेकरी वाला तो कोई इमीग्रेशन महकमे का अधिकारी है तो कोई नर्स. कोई किसी स्कूल में कविताएं पढ़ाने वाली अध्यापिका है तो कोई मसाज करने वाली या कालगर्ल. यहां तक कि नियमित खून पीने वाले इन पिशाचों में पूरे रस्मोरिवाज से धार्मिक अनुष्ठान कराने वाला किसी धर्म का कोई व्यक्ति भी हो सकता है.

एक और हैरान करने वाली बात यह है कि न केवल दुनिया में नियमित खून पीने वाले लोग मौजूद हैं, बल्कि नियमित रूप से खून पिलाने वाले लोग भी मौजूद हैं. खून पिलाने वाले लोग भी बिलकुल हमारे आप के जैसे आम लोग ही हैं. दुनिया भर की तमाम कहानियों में भले ही ड्रैकुला, पिशाच या चुड़ैलें लोगों को मार कर उन का खून पीते हों, लेकिन हकीकत से इस का कुछ लेनादेना नहीं है. स्थिति यह है कि अब तो ज्यादातर ड्रैकुलाओं को सहमति से खून पिलाने वाले उपलब्ध हैं. यह बात खून पीने और पिलाने वाले की आपसी रजामंदी से तय होती है कि खून शरीर में से सीधे चीरा लगा कर पीया जाएगा या फिर सक्शन पाइप से गिलास में निकाल कर सिप करते हुए पीया जाएगा.

बीबीसी फ्यूचर के लिए इस विषय पर एक रिसर्च लेख लिखने वाले डेविड राबसन कहते हैं, ‘‘एक दिन अमेरिका के न्यू आरलींस के फ्रेंच क्वार्टर इलाके में मैं ने पाया कि जान एडगर ब्राउनिंग के ‘रक्तदान’ का एक खास सत्र शुरू होने वाला था. इसे चिकित्सीय अंदाज में शुरू किया गया. उन के एक जानकार ने एल्कोहल से उन की पीठ का एक हिस्सा साफ किया. फिर उन की पीठ पर डिस्पोजेबल छुरी से एक कट लगाया, जिस से शरीर से खून निकलने लगा. फिर उस ने उस निकलते खून को पीना शुरू कर दिया. इस तथाकथित ड्रैकुला ने ब्राउनिंग का थोड़ा सा खून पीने के बाद, खून पीना बंद कर दिया. उस ने उन के शरीर को फिर एल्कोहल से साफ किया और कटी हुई जगह पर पट्टी लगा दी.

क्योंकि पीने वाले के मुताबिक ब्राउनिंग के खून में मैटेलिक तत्वों की मात्रा कम थी, जिस से वह उस के टेस्ट के मुताबिक नहीं था. कह सकते हैं कि ड्रैकुला यूं ही किसी का खून नहीं पी लेते, वह खून उन के टेस्ट के अनुरूप भी होना चाहिए.’’

वास्तव में हर किसी के खून का स्वाद उस के खानपान, शरीर में पानी की मात्रा और ब्लडग्रुप से तय होता है. दरअसल, ब्राउनिंग, लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर हैं. वह न्यूआरलींस रियल वैंपायर समुदाय पर हो रहे शोध से जुड़े हैं. अमेरिका में ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें खून पीने की लत है. पहले ब्राउनिंग मानते थे कि ब्लड फीडिंग महज एक तरह की तांत्रिक गतिविधि या कोई धार्मिक कर्मकांड है. लेकिन तब तक वह उन लोगों से नहीं मिले थे, जो सीधे किसी इंसान के शरीर से उस का खून पीते हैं. ऐसे में जब उन्होंने ब्लड फीडिंग के लिए खुद को डोनर के तौर पर पेश किया तो उन का नजरिया ही बदल गया.

यहां यह बता देना भी जरूरी है कि खून पीने वाले लोगों में से ज्यादातर का अलौकिक शक्तियों पर कोई भरोसा नहीं होता. कहने का मतलब यह कि ये लोग अपनी खुद की इच्छा के लिए खून पीते हैं. फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे लोग एक खास तरह की मन:स्थिति के शिकार होते हैं. क्योंकि नियमित रूप से खून पीने वाले लोगों को अगर कभी खून नहीं मिलता या मिलने में देर हो रही होती है तो इन की हालत बड़ी विचित्र हो जाती है. ये थकान, सिरदर्द और असहनीय पेट दर्द का शिकार होने लगते हैं. दरअसल खून पीते वक्त इन के दिलोदिमाग में पूरी ताकत से यह बात बैठी होती है कि उन्हें केवल इंसानों का खून पीने से ही राहत मिल सकती है.

दुनिया में मौजूद जीवित ड्रैकुलाओं का किस्से कहानियों के ड्रैकुलाओं से कोई संबंध नहीं है. वर्तमान में पूरी दुनिया में इंसानी रक्त पीने वाले जो लोग मौजूद हैं, वे वितृष्णाओं और विकृतियों की देन हैं. ऐसे लोगों ने आधुनिक वैज्ञानिक विकास को भी बहुत होशियारी से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है. मसलन इंटरनेट से पहले के जमाने में ये लोग जहां अलगथलग पड़े हुए थे, वहीं आज इन लोगों के समूहों ने अपनी वेबसाइटें बना रखी हैं. वेब पन्ने बना रखे हैं. इन लोगों का नेटवर्क भी खासा विकसित है. इंसानी खून पीने के अपने अलगअलग तरीकों और अलगअलग तरह की आदतों की वजह से इन के कई रूप हैं.

मसलन खून पीने वाली नर्सें, बार स्टाफ, सेके्रटरी या फिर ऐसे ही कई अन्य पेशेवर लोग सामान्य नौकरियां करते हैं. दूसरी तरफ सेठ ड्रैकुला जो बहुत रईस हैं, जो अपने लिए हर दिन पसंदीदा किस्म के खून का इंतजाम करते हैं. खून पीने वाले पिशाचों या ड्रैकुलाओं में जहां कुछ शर्मीले स्वभाव के होते हैं, वहीं कई धार्मिक किस्म के होते हैं, जिन का संबंध अलगअलग धर्मों से होता है. ऐसे लोग अपना जीवन पूरे धार्मिक भाव से ईमानदारी के साथ गुजारते हैं. कई लोग हर रोज उसी तरह शाम को खून पीते हैं, जैसे कई दूसरे लोग शाम को शराब पीते हैं.

कइयों के बारे में किसी को पता भी नहीं चलता कि वे किसी ब्लड बैंक से चुपचाप ब्लड खरीदते हैं और आराम से घर बैठ कर पीते हैं. कई लोग खून को चाय में मिला कर पीते हैं तो कई इसे विभिन्न किस्म की जड़ीबूटियों के साथ पीते हैं. कई लोग ऐसे भी हैं, जो इंसान के साथसाथ कभीकभार जानवर का खून भी पी लेते हैं. खासकर तब जब इंसान का खून उपलब्ध नहीं हो पाता. कई ऐसे लोग भी होते हैं, जो बहुत परोपकारी होते हैं. खून पीने वाले आज के ड्रैकुला माइथोलौजी की कथाओं की तरह न तो कब्रिस्तान जाते हैं और न वहां रहते हैं, बल्कि नाइट क्लब जाते हैं.

कई नाइट क्लबों में भी चुपचाप खून परोसा जाता है. ब्राउनिंग जैसे शोधकर्ताओं  ने पाया कि ऐसे कई ‘वैंपायर’ भी होते हैं, जिन के लिए खून पीना एक मनोवैज्ञानिक जरूरत बन जाती है. अपने शोध के दौरान ब्राउनिंग की एक ऐसे किशोर से मुलाकात हुई, जो मुश्किल से 13-14 साल का था. उस ने ब्राउनिंग को बताया कि वह हमेशा कमजोर महसूस करता था, दोस्तों के साथ खेलते हुए थक जाता था. एक दिन उस का अपने किसी दोस्त से झगड़ा हो गया.

इस झगड़े में उस के दोस्त को चोट लग गई, खून बहने लगा और उसी दौरान वह खून उस के मुंह, दांतों में लग गया, जिस से उसे लगा कि अचानक उस के अंदर ताकत आ गई है. खून के स्वाद ने खून की भूख बढ़ा दी. अब वह नियमित खून पीता है. किसी शराबी की तरह जब तक वह खून नहीं पीता, उस के शरीर में वह स्फूर्ति नहीं आती. कुल मिला कर यह विकृति एक मनोवैज्ञानिक नशा ही है. मिलिए ब्लट से. 28 साल की ब्लट कैटशेन ड्रैकुलाओं को अपना खून पिलाती हैं. मगर यह ऐसा नहीं कहतीं. यह खुद को एक ब्लड डोनर बताती हैं. ब्लट अमेरिका के मैक्सिको प्रांत के लूसियाना शहर में रहती हैं. वह हमारे आप के जैसी ही बिलकुल सामान्य महिला हैं. भिखारियों के प्रति दयालु, बच्चों से प्यार करने वाली सभ्य महिला, अपने से बड़ों की इज्जत करने वाली.

कहने का मतलब बिलकुल सामान्य और खुशमिजाज. लेकिन वह टेक्सास में रहने वाले अपने एक वैंपायर दोस्त के घर भी जाती रहती हैं, ताकि उसे अपना खून पिला सकें. माइकल वैकमील नाम का उन का यह दोस्त नियमित रूप से उन का खून पीता है. यह जानने की इच्छा स्वाभाविक है कि आखिर अलगअलग वैंपायरों को ब्लट अपना खून कैसे पिलाती होंगी? पीठ से निकाल कर या वह कहती होंगी कि सीधे चीरा लगा कर वह खून पी लें. हकीकत यह है कि ब्लट दोनों ही तरह से खून पिलाती हैं.

कई बार खून पीने के लिए वैंपायर उन की पीठ पर कट लगाते हैं. इस के बाद सीधे मुंह लगा कर खून पी लेते हैं तो कई बार पहले सक्शन कप की मदद से खून शरीर से निकाला जाता है, फिर आसानी से बातचीत करते हुए पीया जाता है. खून किस तरीके से पीया जाना है, यह दोनों की रजामंदी से तय होता है. Suspense Story Hindi

लेखक – निनाद गौतम    

 

Family Dispute: भाभी के लिए भाई बना दुश्मन

Family Dispute: निठल्ले अंग्रेज सिंह की नीयत अपनी खूबसूरत भाभी पर ही नहीं, भाई की दौलत पर भी खराब थी. यह सब पाने के लिए उस ने दोस्तों की सलाह पर जो किया, वह किसी भी कीमत पर उचित नहीं था.  सखेतों का काम निपटा कर सुखविंदर सिंह ने दोपहर का खाना खाने के लिए घर जाने से पहले जानवरों के कमरे में जा कर उन का चारा वगैरह देख लिया था. पूरी तरह संतुष्ट हो कर वह घर के लिए चल पड़ा. उस के खेतों से कुछ दूरी पर कुलदीप सिंह के खेत थे. उस के आगे लखविंदर और जसबीर के खेत थे.

चूंकि कुलदीप दूर के रिश्ते में उस का भाई लगता था और गांव जाने का रास्ता उस के खेतों से था, इसलिए उस ने सोचा कि वह उस से भी पूछ ले कि अगर वह भी घर चल रहा है तो दोनों साथसाथ बातचीत करते चले जाएंगे. यही सोच कर सुखविंदर खेतों में बने कुलदीप के नलकूप वाले कमरे की ओर बढ़ा. जैसे ही वह नलकूप की टंकी के पास पहुंचा, उस के पैर जहां थे, वहीं रुक गए. उस का शरीर कांप उठा और मारे डर के उस का चेहरा पीला पड़ गया. एकाएक उस के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली.

नलकूप वाले कमरे के दरवाजे के ठीक बीचोबीच कुलदीप सिंह की लहूलुहान लाश पड़ी थी. उस के सिर, पेट और शरीर के अन्य अंगों से खून अभी भी रिस रहा था. कुलदीप को उस हालत में देख कर सुखविंदर घबरा गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह तेजी से गांव की ओर भागा. गांव पहुंच कर सीधे वह कुलदीप के घर पहुंचा और एक ही सांस में उस की पत्नी करमजीत कौर को पूरी बात बता दी. संयोग से उस समय करमजीत कौर का भाई रछपाल सिंह भी बहन से मिलने आया था. सुखविंदर की बात सुन कर करमजीत कौर भाई रछपाल, सुखविंदर और गांव के कुछ अन्य लोगों के साथ खेतों की ओर भागी.

नलकूप पर इन लोगों ने जो देखा, सब की सांसें अटक गईं. करमजीत तो दहाड़ मार कर पति के ऊपर गिर पड़ी. कुछ लोगों ने कुलदीप की नाड़ी देखी तो पता चला कि वह मर चुका है. तुरंत इस बात की जानकारी पुलिस को दी गई. यह घटना 9 सितंबर, 2015 की है. हत्या की सूचना मिलते ही थाना सुलतानपुर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह, एसआई जसप्रीत सिंह, एएसआई लखविंदर सिंह, हैडकांस्टेबल जसविंदर सिंह, वतन सिंह, सुखदेव सिंह और कमलजीत सिंह के साथ गांव माछीछोआ पहुंच गए. अब तक वहां लगभग पूरा गांव जमा हो चुका था.

हत्या की सूचना मिलने के तुरंत बाद हरप्रीत सिंह ने घटना की सूचना एसपी (डी) जगजीत सिंह सरोआ के साथसाथ क्राइम टीम को भी दे दी थी. इसलिए उन के घटनास्थल पर पहुंचतेपहुंचते क्राइम टीम भी पहुंच गई थी. हरप्रीत सिंह ने लाश का गहराई से निरीक्षण किया तो मृतक के सिर और पेट पर चोटों के गंभीर निशान नजर आए. शायद वे किसी तेजधार हथियार से किए गए थे. यही गंभीर चोटें मौत का कारण बनी थीं. उन्होंने आसपास का भी निरीक्षण किया कि शायद कोई ऐसी चीज मिल जाए, जिस की मदद से जांच आगे बढ़ सके.

बहरहाल, क्राइम टीम को जो सबूत मिले, उन्हें कब्जे में ले लिए तो हरप्रीत सिंह ने अन्य औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाना लौट कर उन्होंने मृतक की पत्नी करमजीत कौर की ओर से कुलदीप सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर दिया. इस के बाद इस अंधे कत्ल के खुलासे के लिए एसएसपी राजेंद्र सिंह ने सीआईए स्टाफ की एक टीम गठित कर दी.

काफी प्रयास के बाद भी पता नहीं चला कि कुलदीप की हत्या किस ने और क्यों की थी? पहले पुलिस ने इस हत्या को अवैध संबंधों से जोड़ कर देखा और अपने कुछ मुखबिरों को करमजीत कौर पर नजर रखने के लिए लगा दिया. मृतक कुलदीप की भी कुंडली खंगाली गई. पुलिस को संदेह था कि अवैध संबंधों में रोड़ा बनने की वजह से करमजीत कौर ने ही पति को मरवा दिया होगा. इस बात पर भी गौर किया जा रहा था कि कहीं कुलदीप के ही किसी से नाजायज संबंध न रहे हों और उस के घर वालों ने कुलदीप को रास्ते से हटा दिया हो.

थाना सुलतानपुर लोधी पंजाब के जिला कपूरथला के अंतर्गत आता है. इसी थाने का एक गांव है माछोछीआ, जिस में सरदार समुंद्र सिंह परिवार के साथ रहते थे. उन के पास काफी उपजाऊ जमीन थी, गांव में पक्का मकान था. खेतों से इतनी पैदावार हो जाती थी कि साल का खर्च निकालने के बाद भी उन के पास काफी कुछ बच जाता था, जिस में से गुरु का आदेश ‘वंड छक्को’ मान कर काफी पैसा वह गरीबों और जरूरतमंदों को दे देते थे. कुल मिला कर समुंद्र सिंह अपने नाम की ही तरह नेकदिल और दरियादिल थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे थे. बड़ा कुलदीप सिंह, उस से छोटा अंग्रेज सिंह और सब से छोटा रणजीत सिंह.

रणजीत सिंह थोड़ा मंदबुद्धि था. जबकि अंग्रेज सिंह काफी चालाक और शातिरदिमाग था. वह जिस तरह का दिखाई देता था, उस तरह का था नहीं. बड़ा कुलदीप सिंह पिता की ही तरह धार्मिक सोच वाला सीधासादा नेक इंसान था. दूसरों और जरूरतमंदों के काम आना उसे अच्छा लगता था. उस की व्यवहार कुशलता और स्वभाव की वजह से गांव में उस की बड़ी इज्जत थी. सभी उस से प्यार भी करते थे. जबकि उस के छोटे अंग्रेज सिंह को गांव का कोई भी आदमी पसंद नहीं करता था. तीनों भाई अपने पुश्तैनी मकान में एक साथ रहते थे.

हरप्रीत सिंह ने मृतक की पत्नी करमजीत कौर और गांव वालों से पूछाताछ की. सब का यही कहना था कि कुलदीप की किसी से न कोई दुश्मनी थी और न अदावत. वह सब के काम आने वाला इंसान था. लोग उस की बहुत इज्जत करते थे. मुखबिरों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मृतक और उस की पत्नी करमजीत कौर का चरित्र एकदम पाकसाफ था. ना तो मृतक के किसी औरत से नाजायज संबंध थे और न ही करमजीत कौर की किसी अन्य मर्द से बोलचाल थी. कुलदीप पूरा दिन अपने खेतों में व्यस्त रहता था. फालतू बातों के लिए पतिपत्नी के पास जरा भी समय नहीं था. मुखबिरों ने यह भी बताया था कि यह काम किसी बाहरी आदमी ने किया है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के रिश्तेदारों तथा अगलबगल के गांव वालों से भी पूछताछ की. लेकिन इस का भी कुछ नतीजा नहीं निकला. हर किसी ने मृतक की तारीफ ही की. किसी ने उस के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा. जब इस मामले की जांच आगे नहीं बढ़ सकी तो एसएसपी राजेंद्र कुमार ने तीन टीमें बना कर जांच में लगा दीं. थानाप्रभारी हरप्रीत सिंह ने इस मामले को चुनौती के रूप में लिया. उन्हें लगता था कि कहीं कोई ऐसी बात है, जो उन की नजरों के सामने नहीं आ रही है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के छोटे भाई अंग्रेज सिंह को बुला कर पूछाताछ की तो उस के बयानों में तमाम बातें विरोधाभासी मिलीं. वह किसी भी सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहा था. वह हर बात को घुमाफिरा कर ही कहता था. पूछताछ के बाद उन्होंने उसे जाने तो दिया, लेकिन उस पर नजर रखने के लिए अपने कुछ चालाक मुखबिरों को लगा दिया. 2 दिनों बाद ही मुखबिरों ने अंग्रेज सिंह के बारे में जो सूचनाएं दीं, उसे सुन कर हरप्रीत सिंह को लगा कि अब हत्यारे उन की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं हैं.

हरप्रीत सिंह अंग्रेज सिंह को पकड़ कर थाने ले आए और सख्ती से पूछताछ शुरु कर दी. हर अपराधी की तरह अंग्रेज सिंह भी खुद को निर्दोष बताता रहा. लेकिन हरप्रीत सिंह के पास जो सबूत थे, उन्हें सामने रख कर जब पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने भाई की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने कहा कि उसी ने अपने दोस्तों, बगीचा सिंह पुत्र निम्मा सिंह निवासी गांव थेहवाला, जसवंत सिंह पुत्र गुरबचन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, राजू पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, परविंदर सिंह पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव मुहालम, जिला फिरोजपुर तथा चरणजीत सिंह पुत्र सुच्चा सिंह निवासी गांव थेहवाला के साथ मिल कर भाई की हत्या की थी.

इस के लिए उस ने अपने इन दोस्तों को 2 लाख रुपए देने का वादा किया था, जिस में से एक लाख रुपए उस ने किसी से उधार ले कर दे भी दिए थे. उसी दिन हरप्रीत सिंह ने इस हत्या में शामिल लोगों के घरों पर छापे मारे, जिस में से बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पकड़ लिए गए. बाकी के 3 लोग फरार होने में सफल रहे. शायद उन्हें पुलिस की काररवाई की भनक लग गई थी. गिरफ्तार किए गए तीनों अभियुक्तों से पूछताछ में कुलदीप सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह हीनभावना से ग्रस्त एक ईर्ष्यालु भाई की घृणित मानसिकता का परिणाम था. कुलदीप सिंह और उस के छोटे भाई अंग्रेज सिंह की सोच में जमीनआसमान का अंतर था.

कुलदीप सिंह जहां धार्मिक सोच वाला दयालु आदमी था, वहीं अंग्रेज सिंह शैतानी सोच वाला ईर्ष्यालु आदमी था. तीसरा भाई रणजीत सिंह मंदबुद्धि था, इसलिए उसे परिवार की किसी चीज से कोई मतलब नहीं था. उस का ज्यादातर समय गुरुद्वारा में बीतता था. गांव वाले अकसर कुलदीप सिंह की बड़ाई किया करते थे. यह बात अंग्रेज को बिलकुल नहीं भाती थी. गांव में कोई समारोह होता तो कुलदीप सिंह को उस में सब से आगे रखा जाता. यह सब देख कर अंग्रेज सिंह जल उठता था. उसे इस बात पर गुस्सा आता था कि कुलदीप सिंह की तरह लोग उस की इज्जत क्यों नहीं करते.

एक दिन शराब पीते समय यही बात उस ने अपने दोस्त बगीचा सिंह से कही तो उस ने कहा, ‘‘उस के रहते तुझे कोई नहीं पूछेगा भाई, इसलिए तू उसे खत्म क्यों नहीं कर देता.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ अंग्रेज सिंह ने हैरानी से कहा.

‘‘भाई बढि़या आइडिया दे रहा हूं. तुझे भाभी बहुत अच्छी लगती है न? कब से तू उस के पीछे पड़ा है, लेकिन वह तुझे हाथ नहीं रखने दे रही है. कुलदीप को मार देगा तो वह तेरी हो जाएगी. इस के अलावा उस की जमीन भी तेरी हो जाएगी. तेरा छोटा भाई पागल ही है, उस के हिस्से की भी जमीन तुझे ही मिलेगी. इस तरह पूरी प्रौपर्टी का मालिक तू अकेला हो जाएगा.’’ बगीचा सिंह ने कहा.

अंग्रेज सिंह की आंखे हैरानी से फैल गईं. उस ने कहा, ‘‘यार बगीचा, तू ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई. तू ने कितनी सच बात कही है, भाई के न रहने पर भाभी करमजीत कौर न खुद को संभाल पाएगी और न इतनी जमीन को. मजबूरन उसे मेरा सहारा लेना पड़ेगा. फिर तो मेरी चांदी ही चांदी हो जाएगी.’’

यह बात दिमाग में आते ही अंग्रेज सिंह भाई कुलदीप की हत्या की योजना बनाने लगा. 2 बार तो उस ने नलकूप की मोटर के स्टार्टर में बिजली का नंगा तार बांध दिया कि कुलदीप मोटर स्टार्ट करने आए तो करंट से उस की मौत हो जाए. लेकिन तार पर नजर पड़ जाने की वजह से कुलदीप बच गया. इस के बाद अंग्रेज ने कुएं के ऊपर रखा लकड़ी का पटरा हटा कर पतली सी प्लाई रख दी, जिस से कुलदीप उस पर चढ़े तो वह टूट जाए और कुलदीप सीधे कुएं में गिर जाए. नीचे पंखा लगा था, अगर कुलदीप उस पर गिरता तो मर जाता. लेकिन उस पर भी कुलदीप की नजर पड़ गई. उस ने उसे हटा कर मोटा पटरा रख दिया.

इस तरह कुलदीप सिंह को मारने की अंग्रेज सिंह की सारी कोशिशें विफल हो गईं. अपनी इन कोशिशों में असफल होने के बाद अंग्रेज सिंह ने कुलदीप की हत्या पैसे ले कर हत्या करने वालों से कराने पर विचार किया और बगीचा सिंह के माध्यम से उस ने राजू, परविंदर और चरणजीत सिंह को 2 लाख रुपए में बड़े भाई की हत्या की सुपारी दे दी. एक लाख रुपए उस ने एक आदमी से उधार ले कर एडवांस भी दे दिए. रुपए देने के बाद अंग्रेज सिंह ने पांचों को पिस्तौल खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश भेजा. ये सभी बरेली, अलीगढ़ आदि शहरों में घूम कर 7 सितंबर को लौट आए. इन्हें कहीं पिस्तौल नहीं मिली. आखिर में तय हुआ कि किसी तेजधार हथियार से कुलदीप सिंह की हत्या कर दी जाए.

9 सितंबर की दोपहर को जब कुलदीप सिंह खेतों का काम निपटा कर मोटर बंद करने के लिए नलकूप के कमरे में गया तो वहां बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पहले से बैठे थे. कुलदीप मोटर बंद करने के लिए जैसे ही कमरे में घुसा, दोनों ने एकदम से कुलदीप पर हंसिया और चाकू से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से कुलदीप चकरा कर जमीन पर गिर पड़ा और कुछ देर तड़प कर मर गया. कुलदीप सिंह मर गया तो अंग्रेज सिंह बगीचा और परविंदर को अपनी मोटरसाइकिल से सुलतानपुर लोधी छोड़ आया. इस के बाद घर लौट कर वह इस तरह सामान्य बना रहा, जैसे उसे किसी बात का पता ही नहीं है.

इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह ने मुखबिरों को तो अंग्रेज सिंह के पीछे लगाया ही था, उसी समय उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवा ली थी. इसी काल डिटेल्स से पता चला था कि कुलदीप के कत्ल वाले दिन 9 सितंबर को कुलदीप की हत्या से कुछ देर पहले और बाद में अंग्रेज सिंह ने 4-5 लोगों से 60-70 बार बात की थी. उन्हीं पांचों नंबरों से ही अंग्रेज सिंह के पांचों साथियों का पता चला था. बहरहाल, गिरफ्तार अंग्रेज सिंह, बगीचा सिंह और परविंदर का बयान लेने के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान बगीचा सिंह और परविंदर की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया और चाकू बरामद कर लिया गया.

रिमांड खत्म होने पर 15 सितंबर को तीनों अभियुक्तों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में थे, किसी की जमानत नहीं हुई थी. बाकी बचे तीनों अभियुक्तों की पुलिस तलाश कर रही थी. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं गए थे. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: इश्क की राह में भटकी औरत

Love Story: जिस महेश के लिए राधा ने पति से बेवफाई की, उसी महेश की नीयत जब उस की 14 साल की बेटी पर बिगड़ी तो भला राधा इस बात को कैसे बरदाश्त करती. फिर उस ने जो किया, क्या वह ठीक था

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर देहात के थाना झीझंक का एक गांव है महेवा. इसी गांव में राम सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और एक बेटी राधा थी. राम सिंह घी का कारोबार करता था. वह गांवगांव जा कर लोगों के यहां से घी खरीदता और उसे ले जा कर कानपुर में बेच आता. इस से उसे जो फायदा होता, उसी से उस के परिवार की गुजरबसर होती थी.

राम सिंह की बेटी राधा सुंदर होने के साथसाथ थोड़ी चंचल भी थी. इसलिए सयानी होने पर गांव का हर लड़का उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में लग गया था. जब यह सब राम सिंह ने देखा तो उसे लगा कि अब जल्दी ही राधा की शादी कर देनी चाहिए. उस ने उस के लिए लड़के की तलाश शुरू की तो उसे गांव बेलूपुर में एक लड़का मिल गया.

लड़के का नाम अजय था. उस के पिता लाखन सिंह के पास 10 बीघा खेती की जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. इसी वजह से उस की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी. बातचीत शुरू हुई तो राधा और अजय का रिश्ता तय हो गया. इस रिश्ते में अगर कोई खटकने वाली बात थी तो यह कि अजय सांवला था, जबकि राधा गोरी थी. इस के बावजूद अजय का पलड़ा भारी था, क्योंकि उस के पास 10 बीघा जमीन थी. जल्दी ही दोनों की शादी हो गई.

अजय तो सुंदर पत्नी पा कर खुश था, जबकि राधा अपने सांवले पति से खुश नहीं थी. शादी के पहले उस के मन में पति की जो छवि थी, अजय उस में कहीं भी फिट नहीं बैठता था. लेकिन अब विवाह हो गया था, इसलिए साथ तो रहना ही था. धीरेधीरे राधा एक बेटी अर्पिता और 2 बेटों जय तथा विजय की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी राधा में कोई बदलाव नहीं आया था. उस के मन में न तो बच्चों के प्रति वह मोह जागा था, जो एक मां को अपने बच्चों के प्रति होता है और न ही पति के प्रति वह चाहत जागी थी, जो जागनी चाहिए थी. पत्नी की इस उपेक्षा से अजय काफी दुखी था.

इस दुख को कम करने के लिए वह शराब पीने लगा. जब वह पक्का शराबी हो गया तो खेतीकिसानी से उस का मन हट गया. उसे लगता था कि आखिर वह किस के लिए मेहनत करे. जब वह पूरी तरह से निठल्ला हो गया तो मांबाप ने उसे अलग कर दिया. गांव में अजय का एक और अन्य मकान था, इसलिए मांबाप से अलग होने पर उसे कोई परेशानी नहीं हुई. वह पत्नी और बच्चों के साथ उसी मकान में रहने लगा. वह मेहनत कर नहीं सकता था, इसलिए बाप से मिली जमीन उस ने बटाई पर दे दी.

राधा 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन अब भी उस की सुंदरता में जरा भी कमी नहीं आई थी. बल्कि शरीर भर गया था, इसलिए वह पहले से भी ज्यादा सुंदर लगने लगी थी. स्वभाव से हंसमुख और चंचल राधा का मन घरगृहस्थी में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि वह कभी अजय को पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाई. शायद इसी वजह से उस का मन भटकता रहता था. राधा की सुंदरता और चंचलता की वजह से गांव के महेश का दिल उस पर आ गया था. वह उस तक पहुंचने का तिकड़म भिड़ाने लगा था.

3 भाइयों में महेश सब से बड़ा था. उस के पिता भवानी सिंह ने उस का विवाह शिवली कस्बा की रहने वाली रजनी से कर दिया था. लेकिन अपनी आशिकमिजाजी की वजह से वह पत्नी का हो कर नहीं रह सका. वह इधरउधर मुंह मारता फिरता था. गांव की कई महिलाओं से उस के संबंध थे. लेकिन उन के बारे में कोई नहीं जान सका. राधा पर वह पूरी तरह से मोहित था. इसलिए उस तक पहुंचने के लिए उस ने उस के खेत बटाई पर ले लिए. इस से उसे राधा के घर आनेजाने में आसानी हो गई थी. वह जब भी राधा के घर जाता, मौका मिलने पर उस से हंसीमजाक करने से नहीं चूकता.

राधा भी उस से खुल कर हंसीमजाक करती थी. एक दिन महेश आया तो अजय घर में नहीं था. राधा को अकेली पा कर उस के दिल की धड़कन बढ़ गई. वैसा ही कुछ हाल राधा का भी था. उस ने इठलाते हुए कहा, ‘‘आओ देवरजी, कैसे आना हुआ?’’

‘‘खेतों पर काम कर रहा था, अचानक तुम्हारी याद आई तो मन मचल उठा. पहले तो उसे मनाने की कोशिश की, जब वह नहीं माना तो यह सोच कर चला आया कि चल कर प्यारी भाभी का दीदार कर लूं. कभीकभी सोचता हूं कि इतनी सुंदर भाभी कालेकलूटे अजय भैया के पल्ले कैसे पड़ गईं?’’

‘‘अपनाअपना नसीब है देवरजी. मेरी तकदीर में यही लिखा था.’’ राधा ने लंबी सांस ले कर कहा.

राधा के इस जवाब से महेश को लगा कि उस का तीर सही निशाने पर लगा है. वह उस के एकदम करीब आ कर बोला, ‘‘नसीब अपने हाथ में होता है भाभी, मैं आप से प्यार करता हूं. मैं कोई पराया तो हूं नहीं. वैसे भी मैं न जाने कब से तुम्हारी खूबसूरती का दीवाना हूं.’’

‘‘देवरजी, यह दीवानापन छोड़ो और अब चुपचाप चले जाओ. कहीं वह आ गए तो पता नहीं क्या सोचेंगे?’’ राधा ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

महेश ने उसे बांहों में भर कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चला तो जाऊंगा, पर खाली हाथ नहीं जाऊंगा. आज तो तुम्हारा प्यार ले कर ही जाऊंगा.’’

राधा को बांहों में भरते ही उस ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी. राधा ने उस की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया. इस की वजह यह थी कि वह भी यही चाहती थी. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भूखे भेडि़ए की तरह क्यों टूटे पड़ रहे हो, थोड़ा सब्र से काम लो, दरवाजा खुला है. वैसे भी तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक नहीं है.’’

महेश समझ गया कि राधा को कोई आपत्ति नहीं है. इस का उस ने पूरा फायदा उठाया और अपने तथा राधा के बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. इस तरह राधा के कदम एक बार बहके तो बहकते चले गए. मौका मिलते ही महेश राधा के घर आ जाता. राधा भी हर तरह से उस का सहयोग कर रही थी. इस की वजह यह थी कि वह उस के पति से हर मायने में इक्कीस था. महेश और राधा का यह अवैध संबंध चोरीछिपे सालों तक चलता रहा, किसी को पता नहीं चला. आखिर कब तक उन का यह गलत संबंध छिपा रहता. वे समय के साथ लापरवाह होते गए, परिणामस्वरूप एक दिन अजय ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उन के बीच यह खेल काफी दिनों से चल रहा है.

महेश चूंकि दबंग स्वभाव का था, इसलिए अजय ने उस से सीधे टकराना ठीक नहीं समझा. उस के जाने के बाद उस ने राधा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘शरम आनी चाहिए तुम्हें यह सब करते हुए. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद तुम नीचता पर उतर आई हो.’’

इस के बाद जब दोनों में तूतूमैंमैं शुरू हुई तो बात बढ़ती गई. इस के बाद अजय ने राधा की जम कर पिटाई कर दी. लेकिन इस पिटाई के बाद भी राधा ने महेश को नहीं छोड़ा. वह महेश की इतनी दीवानी हो चुकी थी कि जब उसे घर में उस से मिलने का मौका नहीं मिलता तो वह किसी न किसी बहाने खेतों पर जा कर उस से मिल लेती. जब इस का पता अजय को चलता तो वह शराब पी कर राधा और महेश को खूब गालियां देता.

ज्यादा शराब पीने की वजह से अजय बीमार पड़ गया. राधा ने कानपुर ले जा कर उस का इलाज कराया. समय पर सही इलाज मिलने से अजय ठीक हो गया. उस के इलाज में सारा पैसा महेश ने लगाया था, इसलिए वह उस के एहसान तले दब गया. अब उस ने महेश से समझौता कर लिया कि वह उस के और राधा के बीच में बाधा नहीं बनेगा. इस के बाद महेश ने उस की नौकरी झीझंक कस्बा में एक आढ़ती के यहां लगवा दी. अजय सुबह 11 बजे घर से निकलता तो शाम को ही वापस आता. कभीकभी काम ज्यादा होता तो वह आढ़त पर ही रुक जाता.

अब तक राधा की बेटी अर्पिता 14 साल की हो चुकी थी. वह भी मां की तरह सुंदर और चंचल थी. गांव के रिश्ते के नाते वह महेश को भइया कहती थी. मां और महेश के संबंधों की उसे जानकारी थी. लेकिन मां के डर की वजह से वह विरोध नहीं कर पाती थी. इस की एक वजह यह भी थी कि स्कूल की फीस से ले कर बाकी के उस के सारे खर्च महेश ही उठाता था. शायद इसीलिए वह अपनी जुबान बंद रखती थी.

एक दिन अजय ने घर से जाते समय राधा से कहा कि रात को वह घर नहीं आ पाएगा, इसलिए वह बच्चों के साथ खाना खा कर सो जाए. शाम ढलते ही राधा ने महेश को फोन कर के बता दिया कि वह जल्दी से घर आ जाए. आज की पूरी रात उन की अपनी है. क्योंकि अजय घर नहीं आएगा. राधा की बात सुन कर महेश बहुत खुश हुआ. रात 10 बजे के आसपास वह शराब के नशे में झूमता हुआ राधा के घर पहुंचा. अब तक राधा ने बच्चों को खिलापिला कर दूसरे कमरे में सुला दिया था. महेश ने आते ही राधा को बांहों में भरा और उस के साथ कमरे में चला गया.

आधी रात के बाद महेश लघुशंका के लिए कमरे से बाहर निकला तो उस की नजर दूसरे कमरे में सो रही अर्पिता पर पड़ी. उस को उस रूप में देख कर महेश की सांसें तेज हो गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा. उस के बाद लघुशंका कर के लौटा तो एक बार फिर उस की नजरें अर्पिता कर टिक गईं.

उस की नीयत खराब  होने लगी. वह राधा के कमरे में आया तो देखा राधा सो रही थी. अब तक उस की नीयत पूरी तरह खराब हो चुकी थी. वह लौटा और जा कर अर्पिता के बगल में लेट गया. उस ने अर्पिता से छेड़छाड़ की तो उस की नींद खुल गई. उस ने चीखना चाहा. लेकिन महेश ने उस के मुंह पर हाथ रख कर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘चुप रह, मैं हूं महेश.’’

‘‘महेश भइया तुम? यह क्या कर रहे हो?’’

‘‘चुप रह, मैं जो करने जा रहा हूं, इस में बड़ा मजा आएगा.’’

‘‘नहीं भइया, यह गलत है. आप को जो करना है, मम्मी के साथ करो. मेरे साथ कुछ किया तो शोर मचा दूंगी.’’ अर्पिता ने धमकाया तो महेश डर गया और चुपचाप राधा के कमरे में चला गया.

अर्पिता राधा से ज्यादा सुंदर थी, इसलिए वह महेश के दिलोदिमाग में बस गई. अर्पिता को पाने के लिए वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. इस छेड़छाड़ का परिणाम यह निकला कि अर्पिता को भी मजा आने लगा. अब वह भी महेश के आने का इंतजार करने लगी. महेश अर्पिता के साथ कुछ कर पाता, इस से पहले ही एक दिन राधा ने उसे अर्पिता से छेड़छाड़ करते देख लिया. उस के बाद तो राधा महेश पर बिफर पड़ी, ‘‘मेरी फूल सी बच्ची को बरगलाने में तुम्हें शरम नहीं आई, मैं ने पति से बेवफाई कर के तुम्हारा साथ दिया, जबकि तुम मेरी ही बेटी को बरबाद करने पर तुले हो. कान खोल कर सुन लो, आज के बाद तुम ने उसे बरगलाने की कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा.’’

राधा की धमकी का महेश पर कोई असर नहीं हुआ. उसे जब भी मौका मिलता, वह अर्पिता के साथ छेड़खानी कर बैठता. एक दिन तो हद हो गई, महेश ने राधा के सामने ही अर्पिता को अपनी बांहोें में भर लिया. इस के बाद तो राधा आपा खो बैठी. उस ने महेश और अर्पिता दोनों की पिटाई कर दी. इस के बाद राधा और महेश में जम कर कहासुनी हुई. राधा की समझ में आ गया कि महेश ऐसा सांप है, जो किसी भी दिन उस की बेटी को डंस सकता है, इसलिए उस ने इस सांप का फन कुचलने का निश्चय कर लिया.

14 दिसंबर, 2015 की सुबह राधा थाना झीझंक पहुंची और थानाप्रभारी आर.के. सिंह को बताया कि बेलूपुर के रहने वाले महेश ने उस के घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. उस की इस सूचना पर आर.के. सिंह पुलिस बल के साथ उस के घर जा पहुंचे. उस समय राधा के घर के बाहर भीड़ लग चुकी थी. भीड़ को हटा कर थानाप्रभारी वहां पहुंचे, जहां महेश फांसी के फंदे से झूल रहा था. महेश जीने की ग्रिल से लटका था. उस के पैर जमीन को छू रहे थे. पहली ही नजर में फांसी लगाने जैसा कोई लक्षण नजर नहीं आ रहा था. न तो उस के मुंह से झाग निकला था और न ही मलमूत्र निकला था. शक होने पर आर.के. सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

उन्होंने राधा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि महेश ने उस के खेत बटाई पर ले रखे हैं, इसलिए उस का उस के घर आनाजाना था. उस के पति अजय के नौकरी पर जाने के बाद महेश आया और उस की साड़ी का फंदा बना कर ग्रिल से झूल गया. उस ने महेश को न आते देखा और न फांसी पर झूलते देखा. आर.के. सिंह ने मृतक महेश के पिता भवानी सिंह से पूंछतांछ की तो फफकफफक कर रोते हुए उस ने बताया कि महेश की हत्या राधा और उस के पति अजय ने की है. पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश को फंदे पर लटकाया गया है. हत्या की वजह राधा और मेहश के बीच अवैध संबंध हैं.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो आर.के. सिंह चौंके. क्योंकि महेश की मौत गला दबाने से हुई थी. उस ने आत्महत्या नहीं की थी. चूंकि शक के घेरे में राधा और उस का पति अजय था, इसलिए वह उन्हें हिरासत में ले कर थाने ले आए और पूछताछ की. अजय ने बताया कि वह घर पर नहीं था, इसलिए महेश की हत्या किस ने की, उसे पता नहीं है. अजय ने हत्या करने से साफ मना कर दिया तो आर.के. सिंह ने राधा से पूछताछ की. पहले तो वह उन्हें गुमराह करती रही, लेकिन जब उस से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और महेश की हत्या का अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि उस के और महेश के बीच पिछले कई सालों से संबंध थे. उस के प्यार में अंधी हो कर उस ने पति तक से बेवफाई कर डाली. तब उसे पता नहीं था कि उस की यह बेवफाई उस की बेटी की जिंदगी पर भारी पड़ जाएगी. महेश उस की बेटी अर्पिता पर बुरी नजर डाल रहा था. राधा ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं माना. मजबूर हो कर उस ने साजिश रच कर 14 दिसंबर की सुबह 4 बजे जब अजय काम पर चला गया तो महेश को बुला लिया. आते ही महेश ने जैसे ही उसे पकड़ा, उस ने उस के नाजुक अंग को दांतों से काट लिया.

वह दर्द से तड़पने लगा तो वह उस की छाती पर सवार हो गई और साड़ी से उस का गला घोंट दिया. पुलिस को गुमराह करने के लिए उस ने उस की लाश को फंदे से जीने की ग्रिल से लटका दिया. उस के बाद थाने जा कर पुलिस को सूचना दे दी. राधा के इसी बयान के आधार पर आर.के. सिंह ने मृतक के पिता भवानी सिंह की ओर से अपराध संख्या 347/2015 पर महेश की हत्या का मुकदमा राधा के खिलाफ दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

17 दिसंबर, 2015 को थाना झीझंक पुलिस ने राधा को कानपुर देहात की माती अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. चूंकि अजय निर्दोष था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया. Love Story

 

Jharkhand Crime: अय्याशी की राह पर गुनाह

Jharkhand Crime: प्रभाकरण अय्याश तबीयत का आदमी था. खूबसूरत पत्नी के रहते वह अस्पताल की महिला डाक्टरों और नर्सों पर लाइन मारता था. जब दूर के रिश्ते की बहन हेमा नर्स बन कर अस्पताल आई तो उस ने उसे भी नहीं छोड़ा. हेमा की वजह से डा. प्रभाकरण की पत्नी डा. शांति ने तो घर छोड़ दिया पर हेमा के साथ जो हुआ वह बहुत भयानक था…

झारखंड के जिला सिंहभूम में एक तहसील है घाटशिला. इस तहसील का उपनगर मउभंडार हिंदुस्तान कौपर लिमिटेड की वजह से प्रसिद्ध है. मउभंडार में जहां कौपर फैक्ट्री है, वहां पास में ही कौपर कालोनी है, जो वर्कर्स के लिए बनाई गई है. इस कालोनी से थोड़ा हट कर मउभंडार वर्क्स हौस्पिटल है, जो स्थानीय लोगों के लिए बनाया गया है. सन 1979 में इस हौस्पिटल में एक डाक्टर तैनात था प्रभाकरण. उस की पत्नी डा. शांति भी उसी अस्पताल में तैनात थीं. इस डाक्टर दंपति को अस्पताल के प्रांगण में ही रहने के लिए बंगला मिला हुआ था. डाक्टर प्रभाकरण शक्लसूरत और व्यवहार से जितना असभ्य, बदमिजाज और क्रूर लगता था, डा. शांति अपने नाम के अनुरूप उतनी ही शांत स्वभाव की थीं.

डा. प्रभाकरण और डा. शांति के 2 बच्चे थे, एक बेटा एक बेटी. दोनों बच्चे मोसाबनी कौनवेंट स्कूल में पढ़ रहे थे. डा. प्रभाकरण असभ्य और बदमिजाज ही नहीं बल्कि दिलफेंक भी था. अस्पताल की किसी डाक्टर अथवा नर्स के साथ उस का चक्कर चलता रहता था. कई बार तो उस की प्रेम कहानियों की चर्चा अस्पताल से बाहर कालोनी तक पहुंच जाती थीं. यही वजह थी कि डा.  शांति को पति की इन गलत हरकतों की वजह से कालोनी के लोगों की चुभती नजरों का सामना करना पड़ता था.

कई बार तो क्लब वगैरह में मुंहफट अफसर कह भी देते थे, ‘‘भाभीजी, डाक्टर साहब को नकेल डाल कर रखिए. इतनी काबिल और खूबसूरत पत्नी के होते हुए भी पता नहीं किसकिस नाले का पानी पीते रहते हैं.’’

डा. शांति अपमान का घूंट पीने के अलावा कुछ नहीं कर पाती थीं. अस्पताल की सभी लेडी डाक्टर और नर्सें एक जैसी नहीं थीं. कई बार डा. प्रभाकरण को किसी लेडी डाक्टर या नर्स के हाथों अपमानित भी होना पड़ता था. चीफ मैडिकल औफिसर डा. पुरुकायस्थ ने प्रभाकरण को कई बार समझाया भी था लेकिन इस का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. कड़वे मीठे अनुभवों के बीच जैसेतैसे जिंदगी गुजर रही थी, तभी डा. शांति के जीवन में तूफान बन कर आई हेमा. हेमा डा. प्रभाकरण की दूर के रिश्ते की बहन की बेटी थी और उस की नियुक्ति बतौर नर्स टाटा मेन हौस्पिटल टाटानगर में हुई थी.

पूर्व में हेमा डा. प्रभाकरण से शादी के सपने देखा करती थी. दोनों के रिश्ते की बात भी चली थी, लेकिन प्रभाकरण ने हेमा का रिश्ता ठुकरा कर डा. शांति से प्रेम विवाह कर लिया था. उस समय हेमा बहुत रोई थी, उस की मां और बहन ने भी खूब हंगामा किया था. मउभंडार हौस्पिटल से प्रतिदिन 2-3 मरीजों को एंबुलेंस से 30-35 किलोमीटर दूर टाटा हौस्पिटल टाटानगर भेजा जाता था. इस की वजह यह थी कि मउभंडार अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं, गंभीर मरीजों को टाटा हौस्पिटल भेजना पड़ता था. हेमा टाटानगर स्थित टाटा हौस्पिटल के हौस्टल में रहती थी. शनिवार को वह अस्पताल की एंबुलेंस से मउभंडार आ जाती थी और सोमवार सुबह एंबुलेंस से ही टाटानगर लौट जाती थी.

मउभंडार में वह डा. प्रभाकरण के बंगले पर ही ठहरती थी. डा. प्रभाकरण रंगीनमिजाज आदमी था, डा. शांति की गैरमौजूदगी का लाभ उठा कर उस ने हेमा से संबंध बना लिए थे. जब डा. शांति घर में नहीं होती थी तो प्रभाकरण और हेमा इस का जम कर लाभ उठाते थे. डा. शांति को अपने घर में हेमा की मौजूदगी अच्छी नहीं लगती थी. इस की वजह यह कि उन्हें पति की फितरत अच्छी तरह मालूम थी. लेकिन वह चाह कर भी इसलिए कुछ नहीं कर पाती थीं क्योंकि हेमा उन के ससुराल पक्ष से थी. जिस दिन हेमा मउभंडार आई होती थी, उस दिन डा. प्रभाकरण नाइट ड्यूटी पर रहता था. काम सिखाने का बहाना कर के वह हेमा को भी साथ रखता था.

जब हेमा और प्रभाकरण की कहानियां सार्वजनिक होने लगीं तो डा. शांति हेमा के मउभंडार आने पर आपत्ति करने लगीं. लेकिन प्रभाकरण पर हेमा के मादक और मांसल शरीर का नशा छाया हुआ था. हेमा को ले कर डा. प्रभाकरण और डा. शांति के बीच अकसर झगड़े और हाथापाई होती थी, जिस की आवाजें बंगले के बाहर तक सुनाई देती थीं. सर्वेंट क्वार्टर में रहने वाले नौकरचाकर भी बंगले की कहानी खूब चटकारे ले कर सुनाते थे. यह अलग बात है कि उन सब की सहानुभूति डा. शांति के साथ रहती थी. जैसेतैसे दिन गुजर रहे थे कि एक दिन खबर आई कि डा. शांति का ट्रांसफर खेतड़ी कौपर प्रोजेक्ट में हो गया है. चूंकि कालोनी छोटी थी इसलिए इस बात को फैलने में देर नहीं लगी.

महीने भर के अंदर ही डा. शांति अपने दोनों बच्चों के साथ खेतड़ी चली गईं और वहां पर वर्क्स हौस्पिटल जौइन कर लिया. इस के पीछे डा. पुरुकायस्थ का हाथ था. दरअसल ऐसा कर के उन्होंने अपनी मानवता का भरपूर परिचय दिया था. लेकिन डा. शांति के जाने के बाद प्रभाकरण ने अपनी पत्नी के डा. पुरुकायस्थ के साथ झूठेअवैध संबंध की कहानी सुनानी शुरू कर दी. जबकि पत्नी और बच्चों के जाने के बाद वह खुद और भी ज्यादा धूर्त हो गया था. अब उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था.

हेमा का टाटा अस्पताल से मउभंडार आनाजाना पूर्ववत चलता रहा. हेमा की पोस्टिंग मउभंडार वर्क्स हौस्पिटल में हो जाए इस के लिए प्रभाकरण कलकत्ता औफिस में हर तरह से जुगाड़ बैठा रहा था. इसलिए अब हेमा ज्यादा दिन मउभंडार में ही रहा करती थी. शांति के चले जाने के बाद प्रभाकरण और हेमा ने निर्लज्जता की सारी सीमाओं को पार कर दिया था. टाटा अस्पताल का हौस्टल छोड़ कर वह मउभंडार में ही रहने लगी थी. ड्यूटी के लिए अब वह मउभंडार से ही हौस्पिटल की एंबुलेंस से टाटानगर आनाजाना करने लगी थी.

डा. शांति के जाने, हेमा और प्रभाकरण के साथसाथ रहने की बातें धीरेधीरे पुरानी पड़ने लगी थीं. प्रभाकरण और हेमा जल्दी ही केरल जा कर शादी करेंगे. इस के लिए प्रभाकरण ने डा. शांति को तलाक का नोटिस भेजा है, जैसी बातें लोगों को अकसर सुनने को मिलती रहती थीं. लेकिन कालोनी वालों को यह सब सुननेजानने में अब कोई दिलचस्पी नहीं थी.

इसी बीच अफवाह फैली कि अब डा. प्रभाकरण की नजर डा. शांति की जगह पर आई डा. मधु करकेट्टा पर है. उसे रिझाने के लिए वह उस के आगेपीछे घूम रहा है. प्रभाकरण संथाली सौंदर्य डा. मधु करकेट्टा का उपासक बन गया है, यह जानकारी मिलते ही हेमा किसी घायल नागिन की तरह फुफकार उठी. आए दिन दोनों के चीखनेचिल्लाने की आवाजें हौस्पिटल परिसर में गूंजने लगीं. ऐसी बातों को फैलाने में सर्वेंट क्वार्टर में रहने वाले ही हवा देते थे. मउभंडार हौस्पिटल में हेमा की नियुक्ति होना निश्चित हो गया था कि अचानक हेमा केरल चली गई. उसे केरल के किसी हौस्पिटल में अच्छी नौकरी मिल गई थी. यह बात प्रभाकरण ने लोगों को खुद बताई थी.

हेमा के जाने के ठीक एक महीने बाद उस के पिता और भाई उसे समझाबुझा कर केरल ले जाने के लिए मउभंडार आए. लेकिन हेमा वहां नहीं थी. जब प्रभाकरण ने उन्हें बताया कि हेमा एक महीने पहले ही वहां से चली गई है तो उन्हें आश्चर्य हुआ. हेमा केरल पहुंची ही नहीं थी. वहां उसे कोई नौकरी मिलने वगैरह की कोई बात भी उन के सामने नहीं आई थी. उस ने केरल आने की खबर भी नहीं दी थी. सोचने वाली बात यह थी कि हेमा केरल नहीं गई तो कहां गई? अगर प्रभाकरण ने उसे केरल जाने वाली ट्रेन में बैठाया तो फिर वह रास्ते में गायब कैसे हो गई, जैसे कितने ही सवाल मुंह बाए खड़े थे.

प्रभाकरण की झूठीसच्ची बातों ने उसे शक के घेरे में डाल दिया था. फिर भी उन दोनों ने 2 दिनों तक हौस्पिटल के डाक्टर, नर्स से ले कर सारे कर्मचारियों से हेमा के बारे में पूछताछ की. लेकिन सब का एक ही जवाब था कि पिछले एक महीने से उसे किसी ने नहीं देखा. हर ओर से निराश हो कर वे दोनों टाटा मेन हौस्पिटल जमशेदपुर भी गए, पर हेमा का कुछ पता नहीं लग सका. वे लोग दुखी और निराश हो कर लौट तो गए, लेकिन 2 हफ्ते बाद ही केरल पुलिस हेमा के लापता होने के संदर्भ में पूछताछ करने के लिए मउभंडार आ पहुंची. लेकिन डा. प्रभाकरण डा. करकेट्टा के साथ दीर्घा बीच गया हुआ था.

जब 2 दिन तक प्रभाकरण नहीं लौटा तो पुलिस टीम दीर्घा पहुंची और प्रभाकरण को ढूंढ़ निकाला. पूछताछ के दौरान वह एक ही बात दोहराता रहा कि हेमा को उस ने केरल जाने वाली गाड़ी में चढ़ा दिया था. हेमा कहां गई उसे कुछ नहीं पता. निराश हो कर पुलिस वापस तो लौट गई लेकिन अभी प्रभाकरण की मुश्किलें कम नहीं हुई थीं.

उस साल इतनी बारिश हुई थी कि स्वर्णरेखा नदी का उफान बहुत ही उन्मादी और भयानक हो गया था. इतना भयानक कि नदी का पानी कौपर फैक्टरी के गेट तक आ पहुंचा था. ऐसा लग रहा था कि पूरी कालोनी ही जल निमग्न हो जाएगी. बहुत सारे बहे हुए मृत जानवरों की लाशें बह कर आ गई थीं और कालोनी में दुर्गंध पैदा कर रही थीं. प्रभाकरण के घर से भी बहुत बदबू आ रही थी.

इसी बीच केरला पुलिस सादे कपड़ों में फिर से मउभंडार आ पहुंची. उस ने हौस्पिटल में ही प्रभाकरण को जा घेरा. सब की मौजूदगी में जब प्रभाकरण के बंगले को तलाशी के लिए खोला गया तो मारे दुर्गंध के लोगों को नाक पर रूमाल रखने पड़े. जिस कमरे से भयानक दुर्गंध आ रही थी, उस में टीन का एक बक्सा रखा हुआ था. पानी उस बक्से में से बह कर बाहर आंगन में आ कर नाली में मिल रहा था. पुलिस ने जैसे ही बक्से को खोला, वहां खड़े लोगों की रूह कांप उठी. बक्से में टुकड़ों में कटी हेमा की लाश नमक और एसिड में रखी हुई थी.

थोड़ा हिलाते ही उस के चेहरे से मांस अलग हो गया. उस भयानक दृश्य को देखने के लिए हजारों की भीड़ एकत्र हो गई. सारे सबूतों के साथ पुलिस प्रभाकरण को ले कर जमशेदपुर के टाटा पुलिस स्टेशन ले गई. जहां उस ने अपना गुनाह कबूल लिया. उस ने जो बताया वह क्रूरता की पराकाष्ठा तो थी ही साथ ही मउभंडार वर्क्स हौस्पिटल के मैनेजमैंट की लापरवाही का भी शर्मनाक नमूना था. हेमा के दर्दनाक अंत की कहानी सुन कर सभी हतप्रभ रह गए.

प्रभाकरण से हेमा गर्भवती हो गई थी. वह प्रभाकरण पर जल्द से जल्द शादी  कर लेने के लिए प्रभाकरण पर दबाव डाल रही थी. जबकि उस की बातों पर गौर करने के बजाय प्रभाकरण डा. करकेट्टा के साथ रंगरेलियां मना रहा था. एक दिन हेमा टाटा हौस्पिटल से जल्दी घर लौट आई. घर में प्रभाकरण के साथ डा. मधु करकेट्टा को देख कर वह क्रोध में चिल्लाने लगी.

उस ने डा. करकेट्टा को धक्का देते हुए गेट से बाहर कर दिया और प्रभाकरण को खुले शब्दों में चेतावनी दी, ‘‘मुझे शांति मत समझना जो तुम्हारी रंगरेलियों की वजह से बुजदिल की तरह मुंह छिपा कर कहीं चली जाऊंगी. केरल से मां और नानी को बुला कर पूरे मउभंडार के लोगों के सामने तुम्हारी उस अय्याशी के परिणाम के बारे में बताऊंगी जो मेरे पेट में पल रहा है. वैसे तुम्हारी रंगीनमिजाजी की बात सभी जानते हैं. उस चुड़ैल डाक्टरनी का तो मैं गला दबा कर खून पी जाऊंगी. तुम ने जल्द से जल्द शादी नहीं की तो मैं पुलिस के पास जा कर तुम्हारी करतूत के बारे में बताऊंगी.’’ उस वक्त उस की चीखें बाहर तक सुनाई पड़ रही थीं.

हेमा की धमकियों से प्रभाकरण को बहुत गुस्सा आया. फिर भी उस ने सौरी कहते हुए हेमा से क्षमा मांग ली और जल्दी ही शादी करने की बात कह कर उसे आश्वस्त कर दिया. इस घटना के 2 हफ्ते बाद ही एक रात उस ने हेमा को कोल्डड्रिंक में नींद की दवा डाल कर पिला दी और उसी रात उस ने गला दबा कर उस की हत्या कर दी. प्रभाकरण के अमानवीय कृत्य का अंत यहीं तक नहीं हुआ. उस ने आपरेशन थिएटर से तेज धार वाले औजार ला कर हेमा की लाश के टुकड़े किए और एक बड़े बक्से में रख कर नमक और एसिड डाल दिया. इस काम में डा. करकेट्टा ने उस का साथ दिया.

प्रभाकरण अगर चाहता तो हेमा की लाश के टुकड़ों को एकएक कर के बड़ी आसानी से फैक्टरी गेट तक उफनती हुई स्वर्णरेखा नदी के पानी में फेंक सकता था, जो उस के बंगले से सौ कदम दूरी पर ही था. लेकिन घर में इतने दुस्साहसी काम को अंजाम देने वाला प्रभाकरण ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा सका. पहाड़ी नदी की उफनती धारा ने हाथियों तक को बहा दिया था. कहते हैं कि गुनाह सिर चढ़ कर बोलता है, शायद इसी डर से प्रभाकरण ऐसा नहीं कर सका या फिर उचित समय का इंतजार करता रहा जो कभी नहीं आया. अपने बंगले में वह यदाकदा ही जाता था. ज्यादा समय वह हौस्पिटल में ही गुजारता था. वहीं की कैंटीन में वह खातापीता था.

प्रभाकरण के बंगले की नाली से बदबूदार पानी निकलने पर भी कोई सोच तक नहीं सका कि घर के अंदर लाश के टुकड़े सड़ रहे हैं. क्योंकि ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी. पुलिस ने हेमा के पिता और भाई को टाटानगर बुलवाया और पूरी घटना से अवगत कराते हुए उन्हें हेमा की लाश के टुकड़े सौंप दिए. रोतेबिलखते हुए उन्होंने अपने केरल समाज के अनुसार हेमा की अंत्येष्टि टाटानगर में ही कर दी.

हेमा को रिश्तों में बेवफाई की कीमत अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी थी. सच ही कहते हैं स्त्रियां ही स्त्रियों की दुश्मन होती है. शांति एवं उस के बच्चों का अधिकार छीनने की कीमत हेमा को अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी थी. जहां मर्द की अय्याशी ढकीछिपी रह जाती है वहीं स्त्री की कोख उस के गुनाह से सारे परदे उठा देती है.

यही सब से बड़ा अंतर है स्त्रीपुरुष के दुष्कर्म करने में. पुलिस कस्टडी में प्रभाकरण को केरल ले जाया गया, वहां उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई. डा. करकेट्टा को डा. पुरुकायस्थ और हौस्पिटल मैनेजमैंट ने किसी तरह पैरवी कर के बचा लिया था. Jharkhand Crime

 

Camel Festival: ऊंटों का रोमांचक महोत्सव

Camel Festival: खेतीबाड़ी और ऐसे ही और कामों के लिए आई आधुनिक मशीनों ने भले ही ऊंटों के महत्त्व को कम कर दिया हो, पर राजस्थान में ऊंट आज भी महत्त्वपूर्ण है. उस की महत्ता को बनाए रखने के लिए ही यहां हर साल कई ऊंट प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं.

गुलाबी नगरी जयपुर और मरुभूमि बीकानेर का अपना अलगअलग महत्त्व है. ऐतिहासिक नजरिए से दोनों नगर गरिमामय हैं, जयपुर की अपनी अलग खूबसूरती है और रेत के धोरों से घिरे बीकानेर की अलग. बीकानेर मेरे लिए कोई नया नहीं था, पहले भी गया था मैं वहां. लेकिन इस बार ऊंट महोत्सव देखने का रोमांच कुछ अलग ही था. इस रोमांच के लिए ठंडी के मौसम में 335 किलोमीटर का थका देने वाला उबाऊ सफर भी मुझे रोकने में असमर्थ रहा. आखिर मैं ठंड या थकान की चिंता किए बिना बीकानेर पहुंच ही गया. बीकानेर का अपना गौरवशाली इतिहास है.

किसी जमाने में यहां राजेरजवाड़ों की तूती बोलती थी. लेकिन अब उन की यादें और उन के द्वारा स्थापित महलोंचौबारों के अवशेष ही नजर आते हैं, जिन्हें यह नगर किसी धरोहर की तरह अपने आंचल में समेटे है. इस से हट कर बात करें तो आज बीकानेरी भुजिया और रसगुल्ले दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं. खैर, मेरा मकसद केवल 2 दिनों का ऊंट महोत्सव देखना था, जिसे देखने के लिए दुनिया भर के सैलानी आते हैं. ऊंट को रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है. देश में ऊंटों की संख्या भले ही घट रही हो, पर राजस्थान खासकर राजस्थान का वह भूभाग जहां रेत ही रेत है, ऊंट के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल लगता है. इसीलिए राजस्थान सरकार ने ऊंट को स्टेट एनिमल घोषित किया है.

आमतौर पर देखें तो ऊंट सवारी करने, खेती में काम आने वाला प्राणी अथवा सामान ढोने वाला जानवर है, लेकिन बीकानेर के पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन ने अन्य सालों की तरह इस बार 9 और 10 जनवरी को ऊंट महोत्सव का आयोजन इसलिए किया, ताकि लोग यह देख सकें कि ऊंट के कितने रंग हैं, उस में कितनी कलाएं हैं. यही सब देखने के लिए मैं बीकानेर गया था. ऊंट महोत्सव के पहले दिन यानी 9 जनवरी को जूनागढ़ किले से सादुल क्लब तक सजेधजे ऊंटों की शोभायात्रा निकाली गई. यह कोई सामान्य यात्रा नहीं थी. सजेधजे ऊंटों पर रोबीली मूंछों और रंगबिरंगी पगड़ी वाले लोेग राजस्थानी योद्धाओं की तरह नंगी तलवार लिए बैठे थे तो उन के आगे नाचतेगाते चल रहे कलाकारों और उन से भी आगे सिर पर कलश ले कर चल रही बालिकाओं ने अलग ही रंग जमा रखा था.

यह शोभायात्रा जूनागढ़ से शुरू हो कर कचहरी रोड, अभिलेखागार, वीर दुर्गादास सर्किल होते हुए सादुल क्लब पहुंची. सादुल क्लब के मैदान में आयोजित महोत्सव में ढोल की थाप पर ऊंटों ने नृत्य करने जैसे हैरतंगेज करतब दिखाए, जिन्हें देख कर देशीविदेशी पर्यटक ही नहीं, स्थानीय लोग भी अचरज में पड़ गए. ग्रामीण और राजस्थानी संस्कृति से ओतप्रोत इस आयोजन ने सैलानियों का मन मोह लिया.

राजस्थान की अलगअलग जगहों से अपनेअपने ऊंटों के साथ आए लोगों ने अपने ऊंटों के करतब दिखाए. झुंझनू जिले के सावंतसरी गांव के रहने वाले धरमा उर्फ धर्मेंद्र अपने जिगरी दोस्त हंसराज के साथ मैदान में उतरे. हंसराज उन के 16 वर्षीय ऊंट का नाम है, जो पिछले 8 सालों से उन के साथ है. इन दोनों के प्यार को देखते हुए लोगों ने इन्हें धरमेला (धर्मभाई) नाम दे दिया है, हंसराज कभी दोनों पैरों को उठा कर लोगों से सैल्यूट करता तो कभी ठुमके लगा कर नाचता. हंसराज ने चारपाई पर चढ़ कर करतब दिखाए तो दर्शक हैरान रह गए.

हंसराज कभी अपने मालिक धरमा की छाती पर पैर टिकाता और हलके से छू कर पैर उठा लेता तो कभी आगे के पैर उन के सिर पर रख कर आशीर्वाद देता. ऊंट महोत्सव देखने आए लोगों की सांसें तब थम गईं, जब हंसराज ने अचानक धरमा की गरदन अपने जबड़ों में फंसा ली. एक तरफ धरमा की पूरी गरदन ऊंट के जबड़ों में और दूसरी ओर साफा बांधे धरमा का सिर और कनपटी से गाल तक नसें खिंचा हुआ तमतमाया चेहरा. ऊंट के दांतों का हल्का सा दबाव भी बढ़ जाता तो धरमा की जिंदगी का काम तमाम होना तय था.

एकबारगी सब कुछ ठहर सा गया. लोग खड़े हो गए. लगा, अनहोनी न हो जाए. अचानक ढोल बजा और हंसराज अपने मालिक की गरदन छोड़ कर ठुमकने लगा. धरमा ने ठहाका लगाया तो हंसराज ने भी थुथला कर अपने मुंह से झाग छोड़े मानो वह भी मालिक से ऐसी अठखेली कर खिलखिला रहा हो. इंसान व जानवर के अद्भुत रिश्ते की कई कहानियां ऊंट महोत्सव में जीवंत होती नजर आईं. ये कहानियां ऊंटों को सजानेसंवारने और बाल कतरने में दिखाई कलात्मकता से भी झलक रही थीं. अपने मनमोहक नृत्य के साथ झुक कर अभिवादन करते हुए ऊंट मानो अपने व्यवहार से इंसान को रिश्तों की अहमियत और अपनत्व का पाठ पढ़ा रहे थे.

इस से पहले सादुल क्लब मैदान में ढोल की थाप और शंख ध्वनि के बीच जिला कलेक्टर पूनम, जनरल औफिसर कमांडिंग मेजर के.के. शर्मा, स्टेट बैंक औफ बीकानेर ऐंड जयपुर के मुख्य महाप्रबंधक वेंकटरमन एस. आदि ने सफेद कबूतर और रंगबिरंगे गुब्बारे छोड़ कर ऊंट महोत्सव का शुभारंभ किया. जिला कलेक्टर पूनम ने ऐतिहासिक किले जूनागढ़ से शोभायात्रा को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया. इस शोभायात्रा में राजस्थान के पारंपरिक वाद्ययंत्रों, कालबेलिया, गैर और गरबा जैसे लोकनृत्यों ने बहुरंगी संस्कृति को साकार कर देशीविदेशी पर्यटकों का मन मोह लिया.

ऊंट महोत्सव में पहली बार निकली मोटरसाइकिल रैली बीकानेर अरबन लूप-2016 भी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र रही. राजस्थान रौयल्स मोटर साइकिलिंग क्लब व पर्यटन विभाग के साझा तत्वावधान में शोभायात्रा से पहले जूनागढ़ से निकले ये बाइकर्स बीकानेर शहर के विभिन्न इलाकों से होते हुए सादुल क्लब मैदान पहुंचे. रैली में हार्ले डेविडसन के विभिन्न मौडल के साथ 37 बाइकर्स ने भागीदारी की. इन में जयपुर से बेनली बाइक पर आए इंजीनियर मुदित अस्थाना, हार्ले 48 पर आए प्रतीक और उन की पत्नी डा. कृति भी शामिल थीं.

पहले दिन ऊंट नृत्य, साजसज्जा सहित विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया. राजस्थान में ऊंटों को सजाने की पुरानी परंपरा है. माना जाता है कि जिस की ऊंटनी जितनी सजीधजी हसीना जैसी होगी, उस का मालिक उतना ही धनवान होगा. बीकानेर के ऊंट महोत्सव, पुष्कर मेला, बाड़मेर व जैसलमेर में होने वाले ऊंटों के उत्सव में ऊंट ऊंटनियों को सजानेसंवारने और उन के डांस की काफी डिमांड रहती है. राजस्थान में कई जगह ऊंटों को सजानेसंवारने वाले हैं, वे अपनी दुकान को ऊंटनी का ब्यूटीपार्लर कहते हैं.

इन पार्लरों में ऊंट और ऊंटनियों का शृंगार किया जाता है. सब से पहले ऊंट के गले का शृंगार होता है, इस में गोरबंद का इस्तेमाल किया जाता है. गले में ही चांदी और जरी की कसीदाकारी पट्टियां भी लगाई जाती हैं. पैरों में नेवरी बांधी जाती है. घुंघरू पहनाए जाते हैं. ऊंट की पीठ पर भी शृंगार किया जाता है. पहले काठी पहनाई जाती है. इस में 2 लोगों के बैठने की जगह होती है. इस के नीचे गद्दियां और ऊपर छेवटी रखी जाती है. काठी के सब से ऊपर गादी रखी जाती है, जो बैठने वालों के लिए आरामदेह होती है. ऊंट को गले के दोनों ओर पांवों तक लुंबाझुंबा पहनाया जाता है. यह रंगबिरंगा होता है. इस के बाद मुंह, कान व नाक को ढकते हुए चांदी का कसीदा किया हुआ मोहरा पहनाया जाता है.

इस मौके पर हुई प्रतियोगिता में मिस्टर बीकाणा का खिताब भंवरलाल ओझा के नाम रहा, जबकि रविंद्र जोशी दूसरे और नवीन बिस्सा तीसरे स्थान पर रहे. मिस मरवण का खिताब हेमा कंवर राठौड़ और निशा सांखला के नाम रहा. सुमन चौधरी दूसरे और शिखा राजपुरोहित तीसरे स्थान पर रहीं. मिस मरवण के लिए पहुंची युवतियों ने कैटवाक भी किया. फर कटिंग में ऊंटपालकों ने ऊंटों के शरीर पर विभिन्न आकृतियां उकेरीं. कैमल फर कटिंग प्रतियोगिता में रामलाल (अक्कासर) प्रथम, जापान की मैगोमी टाकेड़ची द्वितीय और स्वरूपदेवर के गोविंदराम तीसरे स्थान पर रहे. ऊंट साजसज्जा प्रतियोगिता में ऊंटों का दुलहन की तरह साजशृंगार किया गया.

ऊंट शृंगार प्रतियोगिता में स्वरूपदेसर के लक्ष्मणराम सियाग प्रथम, इमरान खां द्वितीय और अख्तर अली तीसरे स्थान पर रहे. महोत्सव के तहत विदेशियों और स्थानीय महिलाओं और पुरुषों की खोखो प्रतियोगिता, मटका दौड़ और रस्साकसी प्रतियोगिताएं भी हुईं. ग्रामीणों ने कुश्ती में भी अपने दांवपेच दिखाए. विदेशी पर्यटकों के लिए साफा बांधने की प्रतियोगिता भी हुई. कबड्डी का मैच भी खेला गया. रौबीले मूंछों का प्रदर्शन भी किया गया. शाम को सजी नाचगाने की महफिल में लोक कलाकारों ने समां बांध दिया. ऊंट महोत्सव का दूसरा दिन भी यादगार रहा. सादुल क्लब मैदान में दिन भर कार्यक्रम एवं प्रतियोगिताएं होती रहीं. देशीविदेशी सैलानियों की जोरआजमाइश देख कर पूरा मैदान जोर लगा कर हइशा… के उद्घोष से गूंज उठा. पुरुषों व महिलाओं की खोखो प्रतियोगिता से दूसरे दिन की शुरुआत हुई.

कुश्ती में पहलवानों ने दांव दिखाए. रस्साकसी, कबड्डी, साफा बांधने की प्रतियोगिता, ऊंट नृत्य, महिलाओं की मटका दौड़, म्यूजिकल चेयर आदि की प्रतियोगिताएं भी हुईं. साफा बांधने की प्रतियोगिता में स्पेन की लुइस रुबियो ने प्रथम स्थान हासिल किया, जबकि आस्ट्रेलिया की सैंडी बोले दूसरे व स्पेन की सुमाना तीसरे स्थान पर रहीं. महिला रस्साकसी प्रतियोगिता में विदेशी महिलाओं ने बाजी मारी.

विदेशी महिला टीम में कनाडा की मोनिका, फ्रांस की जोइले, रशिया की ओल्गा, आस्ट्रेलिया की डा बोलेश और अमेरिका की डी हर्ले शामिल थीं. पुरुष रस्साकसी में स्थानीय लोगों ने जीत दर्ज की. टीम में सहीराम, प्रदीप कुमार, मेहरचंद, रामप्रताप सिंह, प्रेमनाथ, जुगल किशोर व रामप्रताप शामिल थे. ऊंट नृत्य में झुंझनूं जिले के सांवतसरी गांव के धरमा प्रथम रहे. जबकि झुंझनूं के ही नेकीराम व रामअवतार दूसरे तथा तीसरे स्थान पर रहे. समापन पर धधकते अंगारों पर जसनाथी संप्रदाय की ओर से प्रस्तुत अग्नि नृत्य ने लोगों को रोमांचित कर दिया. सतगुरु सिंवरो मोवणा, जिन गुरु संवार उपाया…पारंपरिक जसनाथजी की स्तुति के साथ जसनाथ संप्रदाय के लोगों ने धधकते अंगारों पर नृत्य किया तो पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा.

जसनाथजी महाराज की स्तुति व वंदना के अग्नि नृत्य को मालासर के महंत रूपनाथ सिद्ध एंड पार्टी ने पेश किया. इस में 4 क्विंटल खेजड़ी की लकड़ी के अंगारों पर जगदीशनाथ, पुरखनाथ, मेघनाथ, तपसीनाथ, किशननाथ, ऊदनाथ व गौरीशंकर ने नृत्य किया. इन्होंने अंगारों को मुंह में रखा और नंगे पैरों से फूलों की तरह उठाया. नगाड़े की थाप के साथ इन नर्तकों की गति भी बढ़ती गई. नगाड़ा वादन मानाराम कर रहे थे. सैलानियों की दिन भर की थकावट शाम को आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों से दूर हुई. इस में देश के विभिन्न इलाकों से आए लोक कलाकारों ने एक से बढ़ कर एक शानदार प्रस्तुतियां दीं.

सांस्कृतिक कार्यक्रम में बीकानेर की तरुणा शेखावत एंड पार्टी ने राजस्थानी लोकनृत्य, हरियाणा के कलाकारों ने हरियाणवी होली व बम लहरी लोकनृत्य, गुजरात के कलाकारों ने गरबा रास, चुरू की मनीषा शांडिल्य ने लोकगीत व उत्तराखंड के कलाकारों ने गढ़वाली लोकनृत्य प्रस्तुत किए. 2 दिनों के इस अंतरराष्ट्रीय महोत्सव से ऊंटों को बचाने का संदेश भी दिया गया. रेगिस्तानी जहाज ऊंट राजस्थान की शान रहा है. अब भले ही ऊंटों की तादाद दिन पर दिन घट रही है, लेकिन ऊंट आज भी गांवों में रोजीरोटी का जरिया है. राजस्थान में सन 1997 की पशुगणना में 6 लाख 68 हजार ऊंट थे, जो सन 2003 में घट कर 4 लाख 98 हजार रह गए. सन 2008 में इन की तादाद और भी घट कर 4 लाख 30 हजार 426 रह गई. सन 2012 में राज्य में केवल 3 लाख 25 हजार 713 ऊंट थे. Camel Festival

 

Uttar Pradesh Crime: अंधविश्वास का नतिजा

Uttar Pradesh Crime: तंत्रमंत्र की क्रियाओं या अंधविश्वास से किसी का भला नहीं होता, फिर भी अंधविश्वासी लोग ऐसे चक्करों में पड़ जाते हैं. अगर वक्त रहते जफर ने तंत्रमंत्र की राह छोड़ कर अपनी घरगृहस्थी पर ध्यान दिया होता तो वह न होता जो हुआ…

जफर हुसैन उर्फ चांद बाबू के सिर पर धर्म का उन्माद सवार रहता था. वह तरहतरह की तंत्र क्रियाएं करता रहता है, यह पूरा गांव जानता था. इसी वजह से कोई उसे तांत्रिक कहता था तो कोई पागल तो कोई कुछ और. गांव के लोगों से उस के ताल्लुकात अच्छे नहीं थे. इस की वजह यह थी कि वह छोटीछोटी बातों पर गुस्सा हो जाता था. वादविवाद की स्थिति में लोगों को तांत्रिक क्रियाओं की धमकी देना उस की आदत में शुमार था. लिबास भी वह ढोंगियों और पाखंडियों जैसा पहनता था. उस की इन अजीबओगरीब हरकतों से गांव वाले भी अंधविश्वास का शिकार हो गए कि उसे नाराज करने से उन का कोई अनिष्ट हो सकता है. यही वजह थी कि लोग उस से मेलजोल बढ़ाने से कतराते थे.

जफर उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के भोजीपुरा थाना के गांव मैमोर में रहता था. उस के परिवार में पत्नी नईम बानो के अलावा 4 बच्चे, 7 साल का फरहान, 5 साल की फरहीन, 4 साल का फयाज और 1 साल का फमान. जफर का वास्ता चूंकि लोगों से कम था, इसलिए दूसरे लोग भी उस पर कम ही ध्यान देते थे. लेकिन एक दोपहर जफर के घर से आने वाली चीखनेचिल्लाने की आवाजों ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया.

उस के दरवाजे पर पहुंचे लोगों ने अंदर का नजारा देखा तो ठिठक गए. उन्होंने बाहर खड़े हो कर देखा, जफर अपनी बेटी फरहीन को बुरी तरह पीट रहा था. डरीसहमी मासूम बच्ची उस के चंगुल के छूटने के लिए छटपटा रही थी. नईम बानो बेटी को बचाने के लिए उस के साथ धक्कामुक्की कर रही थी.

‘‘इस ने मेरी सारी तांत्रिक क्रिया खराब कर दी. मेरा अच्छा वक्त आने वाला था, लेकिन इस ने उसे खत्म कर दिया. यह मेरी बेटी नहीं, बल्कि इस के अंदर किसी शैतानी आत्मा का साया है.’’ जफर फरहीन को प्रताडि़त करते हुए बड़बड़ा रहा था.

‘‘क्या बकवास कर रहे हो तुम?’’ नईम बानो चिल्लाई तो वह उसे समझाने वाले अंदाज में बोला, ‘‘यह हकीकत है बानो, इस ने शैतानी हरकत की है. मैं इसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’ कहते हुए वह बेटी को बेरहमी से पीटने लगा. नईम बानो तेजतेज चिल्लाने लगी. नईम ही नहीं, फरहीन भी चिल्ला रही थी, ‘‘अब्बू, मुझे छोड़ दो, मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘कैसे छोड़ दूं. तू फरहीन नहीं, बल्कि ऐसा शैतान है, जो मेरी जिंदगी को तबाह कर देना चाहता है. मेरी तांत्रिक क्रिया को फेल करना चाहता है. अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूं. चूल्हे के पास ही तेरी कब्र बना दूंगा.’’

जफर गुस्से में बड़बड़ा रहा था. उस के सिर पर जैसे खून सवार था. डर की वजह से जफर के बाकी बच्चे बरामदे में पड़े तख्त के नीचे छिप गए थे. बाप की ही तरह वे भी हरे व काले रंग का खास लिबास पहने हुए थे और उन के सिर पर वैसे ही रंग का कपड़ा बंधा था.

यह नजारा देख रहे लोग चिल्लाए, ‘‘जफर, पागल हो गया है तू. मार ही डालेगा क्या बच्ची को?’’

जफर ने उन की तरफ घूर कर देखते हुए कहा, ‘‘खबरदार, मेरे बीच कोई मत आना वरना भस्म कर दूंगा.’’

इस के साथ ही उस ने मासूम फरहीन का सिर जमीन पर पटकना शुरू कर दिया. उस का दिल जरा भी नहीं पसीजा. नईम बानो हैवान बने शौहर से फरहीन को बचाने आई तो उस ने उसे धक्का दे कर दूर कर दिया. फरहीन के सिर से खून बह निकला. कुछ देर के लिए उस का शरीर छटपटाया और फिर शांत हो गया. यह देख कर नईम बानो बदहवास हो गई. बाहर खड़ा कोई शख्स अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा सका. चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर पड़ोस में रहने वाले जफर के चाचा वली हुसैन भी वहां आ पहुंचे.

उस जगह का नजारा देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह घर के अंदर दाखिल हो कर जफर के नजदीक पहुंचे तो उस ने उन पर चाकू से हमला कर दिया. वली हुसैन वापस दरवाजे पर आ गए. लोग तमाशबीन बने देखते रहे. जबकि जफर पालथी मार कर फरहीन के पास बैठ गया. डरीसहमी पत्नी व दोनों बच्चे भी उस के पास बैठ गए. जफर मन ही मन कुछ बुदबुदाने लगा.

दिल दहला देने वाले इस हैरतअंगेज नजारे ने गांव वालों के रोंगटे खड़े कर दिए. इस बीच घटना की खबर पा कर स्थानीय मीडियाकर्मी भी वहां पहुंच गए. लेकिन कोई भी घर के अंदर घुसने की हिम्मत नहीं जुटा सका. गांव के चौकीदार मुकेश ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी अनिल सिरोही, एसआई अखिलेश सिंह और कुछ अन्य पुलिसकर्मी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने जफर को हिरासत में ले लिया. वह पुलिस की पकड़ से छूटने की कोशिश करते हुए बोला, ‘‘मुझे क्यों पकड़ रहे हो? मैं ने तो शैतान का कत्ल किया है. मेरी बेटी तो अभी कुछ देर में जिंदा हो जाएगी. मैं उसे जिंदा कर दूंगा.’’

मामला संगीन था. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी धर्मवीर को भी दे दी थी. बाद में पुलिस अधीक्षक (देहात) ब्रजेश श्रीवास्तव भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस ने मौका मुआयना किया और पंचनामा भर कर बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. आरोपी के घर का माहौल बिलकुल अजीब था. वहां तंत्र क्रियाओं का कई तरह का सामान मौजूद था. पुलिस ने संदिग्ध चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. फिर उस की पत्नी, बच्चों और गांव वालों से पूछताछ की.

यह घटना किसी को भी झकझोर सकती थी. पुलिस आरोपी को थाने ले आई और उस से विस्तृत पूछताछ की. जफर से हुई पूछताछ व ग्रामीणों के बयानों के बाद अंधविश्वास के साए में जी रहे एक ऐसे शख्स की कहानी निकल कर सामने आई, जिस ने अंधविश्वास में डूब कर अपने परिवार को तो तबाह कर ही दिया था, साथ ही अपना भविष्य भी बरबाद कर लिया था.

जफर उन नौजवानों में से था, जो बिना मेहनत किए बड़ेबड़े ख्वाब देखते हैं. सालों पहले जफर का विवाह नईम बानो के साथ हुआ तो वह परिवार से अलग हो गया. वक्त के साथ वह 3 बच्चों का पिता बन गया. जफर के परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. बस किसी तरह छोटेमोटे काम कर के वह परिवार की गाड़ी खींच रहा था. काम के बाद उस का बाकी का वक्त यारदोस्तों में बीतता था. गनीमत यह थी कि वह किसी बुरी आदत का शिकार नहीं था. जफर जब भी दोस्तों के बीच बैठता था, बड़ीबड़ी खयाली बातें किया करता था.

गांवदेहात के इलाकों में अंधविश्वास के अनेक रोचक किस्से होते हैं. समाज का मनोविज्ञान है कि लोग अंधविश्वास के किस्सों को रहस्य के साथ बड़ी रुचि से सुनाते हैं. इन किस्सों पर लोगों के बीच चर्चा होती है. अंधविश्वास के नकारात्मक पहलुओं पर इतनी चर्चा नहीं होती, जितनी कि इत्तेफाकिया सही हो जाने वाले मामलों की होती है. इसे लोग चमत्कार भी समझते हैं. फलस्वरूप अंधविश्वास की कहानियां बचपन से ही दिमाग में बैठनी शुरू हो जाती हैं. जफर भी अंधविश्वास का शिकार था. दोस्तों के बीच वह ऐसे किस्सों को दिल लगा कर सुनता और दिनचर्या की बातों और जीवन में आने वाली बाधाओं को अंधविश्वास से जोड़ कर देखता है.

जफर किसी भी परेशानी का शिकार होता तो वह सीधा किसी बाबा या तांत्रिक के पास जा पहुंचता. तांत्रिक उस के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उस से रुपए ऐंठ कर कभी ताबीज पकड़ा देते तो कभी भभूत. बच्चों को कोई बीमारी होती तो भी वह चिकित्सकों से ज्यादा बाबाओं पर भरोसा करता था. उसे यह समझाने वाला कोई नहीं था कि अंधविश्वास के आईने में वह यथार्थ को न भुलाए. दरअसल सुझाव का सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान होता है. यह व्यक्ति के उद्देश्य, मत, विचार एवं जीवन में भी परिवर्तन लाता है. बशर्ते सुझाव सही और उसे मानने वाला अच्छेबुरे का फर्क करना जानता हो.

जफर ने आजीविका चलाने के लिए एक बैंडबाजा मंडली में काम करना शुरू कर दिया था. इस से जो कमाई होती थी, उसी से उस का घर चलता था. इस काम में उसे आमदनी कम थी, लिहाजा वह किसी चमत्कार की उम्मीद किया करता था. तांत्रिकों के संपर्क में आने के बाद वह खुद भी अजीब ढंग से जिंदगी जीने लगा था. इस के बावजूद उस के हालत जस के तस थे. वह चाहता था कि उस के हालात अच्छे हों और जिंदगी आसान सी हो जाए.

इंसान का व्यवहार तब बदल जाता है? जब उस की उम्मीदें पूरी नहीं होतीं. जफर जिन उम्मीदों को पाले हुए था, वे मेहनत के बलबूते ही पूरी हो सकती थीं. जबकि वह अंधविश्वास में पड़ कर चमत्कार की चाहत पाले बैठा था. बैंडबाजे के काम से गुजर मुश्किल हो गई, तो जफर ने एक चिटफंड कंपनी में बतौर एजेंट काम करना शुरू कर दिया. इस से उस की पारिवारिक स्थिति थोड़ी सुधरी. उस ने अपनी जानपहचान वाले लोगों का रुपया तो कंपनी में लगवाया ही, अपनी कमाई भी उस में निवेश कर दी. यह कंपनी अपनी आकर्षक स्कीमों के जरिए तय वक्त पर लोगों को उन के निवेश का बड़ा फायदा देने का वादा करती थी. बाजारों में ऐसी चिटफंड कंपनियों की भरमार है, जो लोगों को बड़ेबड़े सपने दिखा कर रुपया बंटोरती हैं.

अधिकांशत: इन का शिकार वे लालची लोग होते हैं, जो कम वक्त में रईस बनने के सपने देखते हैं. उन्हें लगता है कि बैठेबिठाए ही उन की रकम बढ़ जाएगी, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं नहीं है. ऐसी कंपनियां मोटी रकम एकत्र होते ही चंपत हो जाती हैं. जफर जिस कंपनी में काम करता था, उस ने भी एक दिन ऐसा ही किया. कंपनी के लापता होते ही जफर दोराहे पर आ खड़ा हुआ. लोगों ने भी उस से रुपए मांगने शुरू कर दिए. इस से वह परेशान रहने लगा. परेशानी के इसी दौर में अंधविश्वास के शिकार जफर ने फिर पाखंडी तांत्रिकों का सहारा लेने की सोची.

वह तांत्रिकों से मिला तो उन लोगों ने उसे कुछ टोनेटोटके समझा दिए. साथ ही बताया कि वह सब्र से काम ले, बहुत जल्द उस की जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी. जफर के लिए यह सब किसी सुखद सपने जैसा था. इस के बाद वह लोगों से कहने लगा कि अब बहुत जल्द उस का वक्त बदलने वाला है. बेरोजगार होने के बाद जफर के पास कोई काम नहीं बचा था. वह नौजवान था. वह चाहता तो कोई भी काम कर के अपने पारिवारिक हालात को संवार सकता था, लेकिन अंधविश्वास ने उसे बुरी तरह जकड़ रखा था. निठल्ला होने की वजह से वक्त उस के लिए महायातना बन गया. कमाई धेले की नहीं थी, नतीजतन बच्चों के भूखे मरने की नौबत आ गई.

नईम बानो ने अपने पिता को खबर की. उस का मायका पीलीभीत, जहानाबाद क्षेत्र के गांव चका में था. खबर मिलते ही उस के पिता मोहम्मद अनवार मैमोर आ गए. उन्होंने रुपए दे कर मदद तो की ही, साथ ही वह जफर को समझाया भी, ‘‘बेटा, मेरी बात को गलत मत समझना. मेरी सलाह है कि कोई कामधंधा ढूंढ लो.’’

‘‘मैं बहुत जल्द सब ठीक कर दूंगा.’’ जफर ने खयाली अंदाज में आत्मविश्वास से जवाब दिया. मोहम्मद अनवार ने उस से कहा, ‘‘अगर तुम्हें ऐतराज न हो तो मैं बानो और बच्चों को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाता हूं. जब हालात सुधर जाएं तो तुम इन्हें ले आना.’’

इस बात पर जफर भड़क गया, ‘‘नहीं, यह मुझे हरगिज मंजूर नहीं है.’’

अनवार ने अपनी बात पर अडिग रहने की कोशिश की तो जफर ने चेतावनी दी कि अगर वह बच्चों को ले गए तो वह मौत को गले लगा लेगा. दामाद का इस तरह का व्यवहार देख कर अनवार बुझे मन से वापस चले गए. जफर अंधविश्वास में पूरी तरह डूब चुका था. वह तंत्र क्रियाओं में लीन रहता था. उस का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो गया था. कोई उस पर किसी तरह की टिप्पणी कर देता तो वह बुरी तरह भड़क जाता. इस के अलावा वह लोगों से छोटीछोटी बातों पर झगड़ने लगता था.

उस की इस तरह की आदत से एक तरफ जहां लोग उस से कतराने लगे थे, वहीं उस ने भी सब से दूरियां बना ली थीं. लोग तब उस से और भी डरने लगे, जब उस ने अपने चचेरे भाई मोहम्मद हुसैन से झगड़ा होने पर एक रात उस की मोटरसाइकिल को आग लगा दी और प्रचारित किया कि उस ने तंत्रमंत्र के बल पर ऐसा किया है. नईम बानो अनपढ़ महिला थी. जफर ने उसे व बच्चों को भी अपने रंग में रंग लिया था. इसी तरह वक्त बीतता गया. टोनेटोटकों से न हालात सुधरने थे और न सुधरे. जफर अजीब सी गफलत में रहने लगा. उसे लगने लगा कि उस के परिवार पर कोई शैतानी साया है, जो उसे आगे नहीं बढ़ने दे रहा. आर्थिक हालात दिनबदिन बिगड़ते जा रहे थे. जफर के घर के आर्थिक हालात मोहल्ले वालों से भी छिपे नहीं थे. वे मदद करने का प्रयास करते तो जफर उन्हें गालियां दे कर भगा देता.

स्थिति बिगड़ती गई तो उस ने एक तांत्रिक क्रिया करने का फैसला किया. इस के लिए उस ने सब से पहले पूरे परिवार के लिए काले व हरे रंग के कपड़े सिलवाए. इन कपड़ों को सभी को पहना कर वह घर में तरहतरह की क्रियाएं करता. बच्चों के सिर पर वह टोपीनुमा एक कपड़ा बंधवा देता. उस ने एक दिन पत्नी व बच्चों को समझाते हुए कहा, ‘‘किसी के भी सिर से एक सप्ताह तक यह कपड़ा नहीं उतरना चाहिए, वरना बहुत बुरा हो जाएगा. यह कपड़ा बंधा रहा तो जल्द ही मेरा वक्त सुधर जाएगा.’’

घर में पत्नी और बच्चे उस के हुक्म के गुलाम थे. सब ने ऐसा ही किया. वह बच्चों के साथ घर में घंटो बैठ कर अजीबअजीब क्रियाएं करता रहता. बच्चों व पत्नी के घर से निकलने पर भी उस ने पाबंदी लगा दी थी. 2 अक्तूबर, 2015 की दोपहर का वक्त था. जफर अपनी तंत्र क्रिया में लीन था. इसी बीच नईम बानो खाना बनाने लगी. फरहीन घर में खेलते हुए मां के पास रोटी लेने चली गई. जैसे ही वह रोटी लेने के लिए झुकी, उस के सिर से दुपट्टेनुमा बंधा कपड़ा हट गया. जफर की नजर उस पर गई तो वह आगबबूला हो उठा,‘‘यह क्या किया तू ने, सिर से दुपट्टा कैसे हट गया?’’

‘‘गलती हो गई अब्बू.’’ फरहीन ने डर कर जवाब दिया. यह सुन कर जफर गुस्से में बोला, ‘‘तू जरूर वही शैतानी साया है, जो मुझे आगे नहीं बढ़ने दे रहा. अच्छा हुआ तू पकड़ में आ गया. आज मैं तुझे सबक सिखा कर ही दम लूंगा.’’

इस के साथ ही जफर ने मासूम फरहीन को पीटना शुरू कर दिया. उस का भयानक रूप देख कर फरहीन के भाई पिटाई के डर से तख्त के नीचे छिप गए. नईम बानो ने बेटी को बचाने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन जफर ने आखिर उसे बेरहमी से मार ही डाला. पूछताछ में पता चला कि जफर की इस कहानी से पुलिस भी हैरान थी. आर्थिक परेशानियों और अंधविश्वास की वजह से जफर की हालत पागलों जैसी हो गई थी. पुलिस ने उस के खिलाफ गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज किया. अगले दिन उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

जफर ने मेहनत कर के जिंदगी को संवारा होता और अंधविश्वास में न पड़ा होता तो ऐसी नौबत कभी न आती. कथा लिखे जाने तक जफर की जमानत नहीं हो सकी थी. उस की पत्नी व बच्चे नातेरिश्तेदारों की रहमोकरम पर पल रहे थे. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Kahani: गुनाह जो माफी लायक नहीं

Crime Kahani: कोकीन की लत लग जाने से रोनाल्ड के ऊपर काफी कर्ज हो गया था. इस कर्ज को उतारने और अपनी लत को पूरा करने के लिए उस ने प्रेमिका के साथ जो घिनौना अपराध किया, वह सचमुच माफी के लायक नहीं है.

रात के साढ़े 11 बजे बौब फ्लारडे घर लौटा तो दरवाजे पर उस ने पत्नी को इंतजार करते पाया. उसदिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, इसलिए उसे हैरानी हुई. वह कुछ कहता, उस से पहले ही पत्नी ने पूछा, ‘‘तान्या कहां है?’’

‘‘तान्या?’’ फ्लारडे ने जवाब देने के बजाय चौंक कर सवाल किया, ‘‘क्या तान्या अभी तक घर नहीं आई है?’’

‘‘नहीं, मुझे तो लग रहा था कि तुम उसे साथ ले कर आओगे?’’ मिसेज फ्लारडे ने कहा.

‘‘हां, इरादा तो यही था. उसे क्लब के बाहर छोड़ते हुए मैं ने कहा भी था कि पार्टी खत्म होने पर मैं उसे लेने आ जाऊंगा, पर उस ने मना कर दिया था. उस ने कहा था कि वह अपनी किसी सहेली के साथ घर आ जाएगी.’’

‘‘उस का क्या, तुम्हें सोचना चाहिए था. जवान बेटी का इतनी रात गए घर से बाहर रहना क्या ठीक है?’’ मिसेज फ्लारडे ने चिंता व्यक्त की.

‘‘हमारी बेटी समझदार है, किसी सहेली के यहां चली गई होगी. चलो, उस के मोबाइल पर फोन कर के पूछते हैं कि वह कहां है?’’

बौब फ्लारडे ने ड्राइंगरूम में जा कर वहां रखे लैंडलाइन फोन से तान्या के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन उस के मोबाइल का स्विच औफ था, इसलिए बात नहीं हो सकी. उन्होंने कई बार फोन किया, हर बार जवाब यही मिला कि फोन का स्विच औफ है. बौब फ्लारडे परेशान हो उठे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी रात को वह बेटी को ढूंढ़ने कहां जाएं. जवान बेटी थी, कहीं कोई हादसा न पेश आ गया हो?

यह सोच कर उन का कलेजा कांप उठा. उन्होंने तुरंत जूलियन बिस्त्रे क्लब को फोन किया. पार्टी वहीं थी. काफी देर तक घंटी बजने के बाद फोन उठा तो फ्लारडे ने बेचैनी से पूछा, ‘‘हैलो, बिस्त्रे क्लब?’’

‘‘जी, कहिए?’’ दूसरी तरफ से किसी ने कहा.

‘‘तुम्हारे यहां शाम को स्कूली बच्चों की एक पार्टी थी, क्या वह खत्म हो गई?’’

‘‘पार्टी तो कब की खत्म हो गई, सब बच्चे चले भी गए हैं.’’

‘‘क्या कोई लड़की अभी…?’’ फ्लारडे अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए कि दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘अब यहां कोई नहीं है, सिवाय मेरे.’’

‘‘तुम वहां क्या कर रहे हो?’’ फ्लारडे ने पूछा.

‘‘मैं यहां का चौकीदार हूं,’’ उस व्यक्ति ने तल्खी से कहा, ‘‘शायद अब यह बताने की जरूरत नहीं होगी कि मैं यहां क्या कर रहा हूं?’’

‘‘तुम मेरी बात का बुरा मन गए,’’ फ्लारडे ने विनम्रता से कहा, ‘‘माफ करना, मैं अपनी बेटी को ले कर परेशान हूं. उस का नाम तान्या है, क्या उसे किसी के साथ देखा है?’’

‘‘सौरी, पार्टी के बाद कौन किस के साथ गया, इस की जानकारी मुझे नहीं है. मेरी ड्यूटी तो क्लब बंद होने के बाद शुरू होती है.’’ चौकीदार ने कहा और फोन काट दिया.

इस के बाद फ्लारडे को ऐनी की याद आई. वह तान्या के साथ ही पढ़ती थी. पार्टी में वह भी गई थी. वह फ्लारडे के खास दोस्त और उन के रेस्तरां के खानसामा के पार्टनर थौमस को बेटी थी. उन्होंने थौमस को फोन किया. पता चला कि वह तो सवा 11 बजे ही घर आ गई थी. उस समय वह सो रही थी. वहां से भी मायूसी ही हाथ लगी. अब एक और व्यक्ति बचा था, जो तान्या के बारे में जानकारी दे सकता था. वह था स्कूल का वार्डन नेड कैली. उसी की निगरानी में स्कूल के बच्चों की यह फेयरवेल पार्टी आयोजित की गई थी.

फ्लारडे ने नेड को फोन किया. काफी देर बाद उस ने फोन रिसीव किया तो फ्लारडे ने जब उसे बताया कि तान्या अभी तक घर नहीं पहुंची है तो वह चौंका. उस ने हैरानी से कहा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? जब मैं क्लब से घर के लिए निकला था तो वह क्लब में ही थी.’’

‘‘क्या तुम पार्टी खत्म होने से पहले ही चले गए थे?’’

‘‘दरअसल, 11 बजे मेरी पत्नी का फोन आया तो मुझे वहां से निकलना पड़ा. लेकिन तब तक पार्टी खत्म हो चुकी थी. काफी बच्चे जा भी चुके थे. मुझे लगा कि बच्चे समझदार हैं, इसलिए मैं ने उन की सुरक्षा की जरूरत महसूस नहीं की. बहरहाल आप परेशान मत होइए, मैं आ रहा हूं.’’

करीब आधे घंटे बाद नेड आ पहुंचा. इस बीच फ्लारडे ने अपने कुछ परिचितों और तान्या की सहेलियों को फोन कर के उस के बारे में पता किया था, लेकिन कहीं से उस के बारे में कुछ पता नहीं चला था.फ्लारडे नेड को अपना शुभचिंतक मानता था और उस पर विश्वास भी करता था. इसीलिए उसे तान्या का ट्यूटर भी नियुक्त किया था. नेड के आते ही वह अपने आंसू नहीं रोक सका और रोते हुए बोला, ‘‘यह क्या हो गया नेड, कहां है मेरी बेटी?’’

‘‘धीरज रखो मि. फ्लारडे. तान्या मिल जाएगी. मेरे खयाल से पुलिस को इत्तिला कर देनी चाहिए.’’

13 जून, 2003 की रात करीब 3 बजे फ्लारडे और नेड पास ही स्थित हाईवे पुलिस चौकी पहुंचे और ड्यूटी औफिसर को तान्या की फोटो दे कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत शहर के सभी पुलिस स्टेशनों में तान्या का फोटो सहित हुलिया प्रेषित कर उस की तलाश में सहयोग की अपील की. तान्या दक्षिण अफ्रीका के रैडबर्ग सिटी, जोहानेसबर्ग के रहने वाले बौब फ्लारडे की एकलौती संतान थी. 18 साल की खूबसूरत तान्या चंचल और हंसमुख स्वभाव की थी. वह 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. पढ़ाई के साथसाथ वह पिता के रेस्तरां में भी उन का हाथ बंटाती थी.

उस की लगन और कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश को देखते हुए फ्लारडे उसे बतौर मैनेजर ट्रेनिंग दे रहे थे, ताकि वह अपने व्यवसाय को अच्छी तरह संभाल सके. उस के दोस्तों की संख्या ज्यादा नहीं थी. उस का किसी लड़के से प्रेम संबंध भी नहीं था. सुबह 8 बजे फ्लारडे फिर पुलिस स्टेशन जा पहुंचा. उसे उम्मीद थी कि पुलिस को तान्या के बारे में कुछ न कुछ पता चल ही गया होगा. तब तक चौकीइंचार्ज महिला इंसपेक्टर क्रिस्टीले सटीन होवे अपनी ड्यूटी पर आ चुकी थीं. उन्होंने तान्या की गुमशुदगी के बारे में सारी जानकारी ले ली थी. क्रिस्टीले ने फ्लारडे को धीरज बंधाते हुए कहा कि वह तान्या को खोजने की हर मुमकिन कोशिश करेंगी.

ठीक उसी समय किसी हेनीर रीडर ने फोन पर सूचना दी कि डैरनवुड स्थित हिलबरोव झील पर एक पेड़ के नीचे एक लड़की की लाश पड़ी है. क्रिस्टीले तुरंत सहकर्मियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गईं. उन्होंने फ्लारडे को भी साथ ले लिया था. वहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा. वहां एक लड़की की लाश औंधे मुंह पड़ी थी. लाश पर कुछ मिट्टी और पेड़ के सूखे पत्ते पड़े थे, जिन्हें हटा कर क्रिस्टीले लाश का निरीक्षण करने लगीं. मृतका के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. उस की उम्र 17-18 साल थी. उस के पूरे शरीर पर चोटों के निशान थे, गले में नायलौन की रस्सी बंधी थी. संभवत: उसे उसी रस्सी से गला घोंट कर मारा गया था.

मृतका की हालत देख कर ही पता चला रहा था कि उस के साथ हत्या से पूर्व कई लोगों द्वारा दुष्कर्म किया गया था. उस की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. क्रिस्टीले को वह लाश तान्या की लगी, इसलिए उन्होंने अब तक फ्लारडे को लाश नहीं दिखाई थी. लाश को चादर से ढक कर सिर्फ उस का चेहरा फ्लारडे को दिखाया गया तो वह फूटफूट कर रोने लगा. उस के इस तरह रोने से ही साफ हो गया कि लाश उस की बेटी तान्या की थी. आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्टपार्टम के लिए भिजवा दिया गया. इस के बाद फ्लारडे से जब पूछा गया कि उसे किसी पर शक है तो उस ने रोते हुए स्पष्ट कहा कि उसे नहीं लगता कि उस की बेटी ने आज तक किसी का कुछ बिगाड़ा है. वह बेहद मासूम थी. उस की संगत भी गलत नहीं थी. जाने किस ने उस की बेटी के साथ…?

जब तान्या के ट्यूटर नेड कैली के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि वह ऐसा कतई नहीं कर सकता. लेकिन पुलिस को उसी पर शक था. इस का कारण यह था कि उस की उम्र अभी 25-26 साल थी. वह तान्या के स्कूल का वार्डन होने के साथसाथ ट्यूटर भी था. तान्या खूबसूरत लड़की थी. संभव था कि पढ़ाई के दौरान दोनों के बीच नजदीकी बढ़ने के साथ शारीरिक संबंध भी बन गए हों. इस के बाद किसी बात को ले कर दोनों के रिश्ते में खटास आ गई हो और नेड ने दुष्कर्म कर के उस की हत्या कर दी हो. यह भी संभव था कि नेड तान्या से एकतरफा प्रेम करने लगा हो और तान्या ने उस के प्रेम को स्वीकार न किया हो. बदले में उस ने जबरदस्ती कर के उस का कत्ल कर दिया हो?

लेकिन तान्या की हत्या करना अकेले नेड के बस की बात नहीं थी. इसलिए इस मामले में उस के कुछ अन्य साथी भी रहे होंगे. नेड ने उन्हें दौलत और तान्या के कुंवारे जिस्म को भोगने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया होगा. उसी दिन शाम को तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, मरने से पहले तान्या से 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. वह पुरुष संसर्ग की आदी नहीं थी. उस के शरीर पर किसी तेजधार हथियार से वार किए गए थे. उस के साथ मारपीट की गई थी, उस के बाद नायलौन की रस्सी से गला घोंट कर उस की हत्या की गई थी. उस की मौत दम घुटने से हुई थी. उस के गले पर रस्सी के निशान थे.

फ्लारडे को नेड पर विश्वास था. इस के बावजूद नेड को शक के आधार पर पुलिस चौकी बुला कर कई दौर में पूछताछ की गई. इस पूछताछ में कोई भी तथ्य सामने नहीं आया, जिस से उस पर किए जाने वाले शक की पुष्टि होती. पूछताछ में पता चला कि कुछ समय पहले ही उस की शादी हुई थी. उस की पत्नी काफी सुंदर थी. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. नजदीकी होने के बावजूद नेड कभी तान्या के प्रति गलत विचार मन में नहीं लाया. तान्या को ही नहीं, किसी भी लड़की को उस ने बुरी नजरों से नहीं देखा. वह स्कूल का वार्डन था और अपने कर्तव्य का निर्वाह ईमानदारी से कर रहा था. नेड से पता चला कि घटना वाली रात तान्या पार्टी में अकेली आई थी. क्लब से जाते समय उस ने तान्या को पार्टी में देखा था.

तान्या के दुष्कर्म और हत्याकांड की गुत्थी उलझती जा रही थी. अब जांच के लिए 2 ही चीजें बची थीं, एक तान्या का मोबाइल फोन और दूसरा जुलियन बिस्त्रे क्लब. तान्या के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई. उस से पता चला कि घटना की रात तान्या ने न तो किसी को अपने मोबाइल से फोन किया था और न ही उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. हां, उस ने रात करीब डेढ़ बजे अपनी एक सहेली को एसएमएस जरूर भेजा था कि मैं सुरक्षित हूं. वहीं रात भर उस का मोबाइल बंद था, लेकिन उस के मोबाइल सेटर का सिमकार्ड बदला गया था.

इस से भी कोई सार्थक जानकारी नहीं मिली. अब क्लब को जांच का लक्ष्य बनाया गया. जुलियन बिस्त्रे क्लब शहर के बीचोबीच स्थित था. पुलिस टीम ने 13 जून, 2003 को क्लब में हुई पार्टी व अन्य गतिविधियों की जांच की. इस जांच में पता चला कि तान्या ने रात करीब 11 बजे क्लब से एक फोन किया था. टेलीफोन एक्सचेंज से पता चला कि वह फोन रोनाल्ड एडवर्ड ग्रीम्सली को किया गया था. रोनाल्ड का पता भी मिल गया था. वह फोंटने ब्ल्यू स्थित एक छोटे से मकान में रहता था. कुछ पुलिसकर्मी उस के घर भेजे गए तो वहां ताला बंद मिला. आसपड़ोस वालों को भी उस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. उन लोगों को सिर्फ इतना पता था कि वह किसी विज्ञापन फिल्में बनाने वाली कंपनी में काम करता था.

रोनाल्ड पूरी तरह शक के घेरे में आ गया था. फ्लारडे से रोनाल्ड के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया, ‘‘हां, एक बार तान्या ने मुझे उस से मिलवाया था. उस ने कहा था कि वह उस का अच्छा दोस्त है. लेकिन तान्या को मैं ने उस के साथ कहीं आतेजाते नहीं देखा था.’’

शहर भर की सभी उन फिल्म कंपनियों को खंगाला गया, जो मुख्य तौर पर विज्ञापन फिल्में बनाती थीं. इस बीच रोनाल्ड के घर जब भी दबिश दी गई, दरवाजे पर ताला ही लटका मिला. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. आखिर 18 जुलाई, 2003 को वह पुलिस की पकड़ में आ गया. उस से पूछताछ की जाने लगी तो वह चुप रहा. वह एक शब्द भी नहीं बोला. लेकिन उस के चेहरे के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह किसी राज को दिल की गहराई में छिपाए है. जब उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाला गया तो उस ने बेहद गंभीर स्वर में सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘हां, मैं गुनहगार हूं. मैं ने ही तान्या के साथ दुष्कर्म किया है और फिर गला दबा कर उसे मार दिया है.’’

काफी कोशिश के बाद भी उस ने यह नहीं बताया कि उस ने ऐसा क्यों किया? तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया था कि उस के साथ 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. संभवत: वे भी उस की हत्या में शामिल थे. लेकिन रोनाल्ड ने इस बारे में जुबान नहीं खोली. इस से यही लगा कि या तो रोनाल्ड बेहद शातिर है या फि वह किसी से डरासहमा है. खैर, अपराध स्वीकार करने के बाद रोनाल्ड को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. लेकिन तान्या के साथ दुष्कर्म और उस की हत्या का कारण रहस्य ही बना रहा.

रोनाल्ड ने जेल में कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की. एक बार उस ने ब्लेड से अपने हाथ की नसें काट डालीं तो दूसरी बार चादर से गला घोंटने की कोशिश की. दोनों बार उसे बचा लिया गया, लेकिन मानसिक तनाव की वजह से वह कोमा में चला गया. इस के बाद बैरक में रखे उस के सामान की तलाश ली गई तो उस में एक पत्र मिला, जिस में उस ने तान्या के पिता फ्लारडे को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘‘मुझे 13 जून के लिए माफ कर देना. खुद को जीवित रखने के लिए मुझे तान्या की हत्या करनी पड़ी थी.’’

इस पत्र ने केस को और पेचीदा बना दिया था. शायद यह उस का सुसाइड नोट था. इस से लगता था कि रोनाल्ड की कोई मजबूरी रही होगी, जिस की वजह से उस ने तान्या की हत्या की थी, वरना वह ऐसा करना नहीं चाहता था. अब पुलिस को इसी तथ्य को उजागर करना था, लेकिन रोनाल्ड कोमा में था. करीब 2 महीने बाद रोनाल्ड कोमा से बाहर आया तो उसे देख कर लगता था कि वह काफी हताश है, अपराधबोध में जकड़ा हुआ है. उस से जब हमदर्दी जताते हुए उस की दुखती रग को दबाया गया तो सचाई उस के मुंह से बाहर आ गई.

उस ने नजरें नीची कर के कहा, ‘‘मैं पिछले 9 सालों से कोकीन का आदी था. इसी वजह से अकसर मेरे पास पैसों की तंगी रहती थी. नशे के सौदागरों का काफी कर्ज मुझ पर चढ़ गया था.’’ इतना कह कर रोनाल्ड रुका. फिर उस ने एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, ‘‘उस दिन मेरे पास कोकीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे. नशे के बिना मैं काफी बेचैनी महसूस कर रहा था. मैं चुटकी भर कोकीन के लिए कोकीन बेचने वालों के सामने गिड़गिड़ाया, पर उन्होंने नहीं दी. उलटा कर्ज चुकाने को कहा और धमकी दी कि अगर मैं ने उन के पैसे नहीं दिए तो वे मुझे मार डालेंगे. तब कोकीन और कर्ज की खातिर मैं ने उन से एक डील कर ली.’’

‘‘कैसी डील?’’ इंसपेक्टर क्रिस्टीले ने पूछा.

रोनाल्ड ने चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू भरे थे. वह बोझिल आवाज में बोला, ‘‘उन्होंने कहा कि अगर मैं किसी लड़की के साथ अपनी ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे दूं तो न केवल वे मेरा सारा कर्ज माफ कर देंगे, बल्कि मुझे नशे की लत को पूरा करने के लिए काफी पैसे भी देंगे. नशे की लत और जिंदगी की चाहत ने मुझे हैवान बना दिया. मैं ने अपनी ही चाहत को दागदार कर के उस की हत्या कर दी.’’

इतना कह कर रोनाल्ड फफकफफक कर रोने लगा. यहां जानने वाली बात यह है कि लड़कों से दूर भागने वाली तान्या करीब 6 महीने पहले रोनाल्ड से मिली थी. तान्या ने उस में न जाने ऐसा क्या देखा था कि उस के दिल में हलचल सी मच गई थी. उस ने इस के पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था. रोनाल्ड की नजर भी उसी पर जमी थी. पहली नजर और पहली मुलाकात में ही तान्या और रोनाल्ड एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

तान्या की तरह रोनाल्ड भी सभ्य व संस्कारी था, पर उस में एक कमी यह थी कि उसे कोकीन के नशे की लत लग गई थी. बस, इसे छोड़ कर उस में और कोई कमी नहीं थी. उस की इस आदत को तान्या नहीं जान पाई थी. दोनों अकसर मिलने लगे थे. लेकिन मिलने में वे इतनी सावधानी बरतते थे कि कभी किसी को उन के प्यार का पता नहीं चल सका.

रोनाल्ड थोड़ा सामान्य हुआ तो उस ने आगे कहा, ‘‘13 जून को कोकीन न मिलने की वजह से मेरी सांसें घुटी जा रही थीं. हाथपांव कांप रहे थे. मौत नजदीक आती दिखाई दे रही थी. पार्टी के बाद तान्या ने मुझ से मिलने का वादा किया था. रात करीब 11 बजे तान्या का फोन आया तो मुझे जैसे जिंदगी मिलती नजर आई. मेरा जमीर उस पल मर गया और मैं ने एक ऐसा फैसला ले लिया, जिस के बारे में मैं ने कभी सोचा भी नहीं था. मैं इंसान से हैवान बन गया. कुछ सोच कर मैं उसे लेने क्लब चला गया और मैं उसे ले कर अपने घर आ गया.’’

रोनाल्ड ने तान्या के आने की जानकारी कोकीन सप्लाई करने वाले नाइजीरियन सौदागरों को दे दी थी. उस ने कोकीन की एक पुडि़या के लिए उन से वादा कर लिया था कि वह प्रेमिका के साथ ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे देगा. तान्या रोनाल्ड के घर पहुंची तो उन नाइजीरियन युवकों को देख कर डर गई. लेकिन अब तो वह फंस चुकी थी. उन्होंने उस से कपड़े उतारने को कहा तो उस ने अपने प्रेमी रोनाल्ड की तरफ देखा. वह समझ नहीं पा रही थी कि रोनाल्ड को यह क्या हो गया है?

तान्या ने विरोध किया तो नाइजीरियन युवकों ने उस के साथ मारपीट की. इस के बाद चाकू की नोक पर उस के हाथपैर बांध कर सोफे पर डाल दिया. रोनाल्ड उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा तो वे उस की फिल्म बनाने लगे. रोनाल्ड के बाद उन दोनों ने भी तान्या के साथ जबरदस्ती की. अब तक तान्या अधमरी सी हो चुकी थी. उस के जीवित रहने से तीनों फंस सकते थे, इसलिए वहां पड़ी नायलौन की रस्सी से उस का गला घोंट दिया गया.

इस के बाद तीनों रात के अंधेरे में तान्या की लाश को झील के पास स्थित एक पेड़ के नीचे फेंक आए. दोनों नाइजीरियन अपना कैमरा ले कर चले गए तो रोनाल्ड को होश आया. वह कांप उठा कि उस ने यह क्या कर डाला? मगर अब क्या हो सकता था. वह पुलिस के डर से छिपता भागता रहा, लेकिन कब तक भागता फिरता, आखिर पकड़ा गया. इस के बाद पुलिस ने दोनों नाइजीरियन युवकों को पकड़ने की काफी कोशिश की, लेकिन वे पकड़े नहीं जा सके. 2 सालों तक मुकदमा चला.

17 जुलाई, 2005 को जोहानेसबर्ग कोर्ट के जज बेनडस्टन ने दुष्कर्म, हत्या, चोरी और अश्लील फिल्म बनाने के आरोप में रोनाल्ड को 18 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई. इस बीच रोनाल्ड का नशा छुड़ाने का इलाज भी चलता रहा. सजा के दौरान रोनाल्ड की कोकीन की लत छूट गई. जेल में वह ज्यादातर बाइबल पढ़ता रहता था. उस के चालचलन के मद्देनजर जेल प्रशासन ने उस की सजा कम करने की गुजारिश की, लेकिन रोनाल्ड ने अपने ऊपर किसी तरह का रहम न किए जाने की बात कही.

उस का कहना था कि उस ने जो गुनाह किया है, उस के लिए उसे मौत की सजा मिलनी चाहिए.  अब वह आत्मग्लानि का बोझ ले कर जीना नहीं चाहता. उस के चालचलन को देखते हुए फरवरी, 2015 में उस की बाकी सजा माफ करते हुए कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया. लेकिन 25 मार्च, 2015 को उस ने कोर्ट से अपील की कि उसे मौत की सजा दे दी जाए. लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इस के बाद 14 मई, 2015 को उस ने दोबारा अपील की है कि उसे ताउम्र कैद की सजा दी जाए. उस की इस अपील पर अभी तक फैसला नहीं हुआ है. Crime Kahani