Builders Scam : कहानियां सुना कर की जाने वाली लूट गायत्री बिल्डर की ठगी

Builders Scam : पिछले 2-3 दशकों में महानगरों खासकर दिल्ली एनसीआर में तमाम बिल्डर कुकुरमुत्तों की तरह सामने आए. इन में से अनेक ने लग्जरी फ्लैट देने के नाम पर लोगों को खूब ठगा. गायत्री रियल एस्टेट का मालिक हरिओम दीक्षित भी उन्हीं में से एक है. अलगअलग हाउसिंग परियोजनाओं के नाम पर इस शातिर ठग ने लोगों के करोड़ों रुपए इतनी आसानी से डकार लिए कि

गेट वे औफ उत्तर प्रदेश कहे जाने वाले नोएडा के सेक्टर-78 में रहने वाले विनोद कुमार गुप्ता पेशे से बड़े बिजनेसमैन हैं. एक जमाना था जब पुरानी दिल्ली में उन के खानदानी घर में पूरा परिवार एक ही छत के नीचे एक साथ रहता था. लेकिन वक्त के साथ जरूरतें और माहौल सब बदलते हैं. समय के साथ परिवार का भी विस्तार हो गया था, लिहाजा विनोद गुप्ता ने पुरानी दिल्ली की तंग गलियों से निकल कर आधुनिक और भव्य इलाके में अपना नया घरौंदा बनाने का विचार कर लिया

उन्होंने अच्छीखासी रकम में पुरानी दिल्ली का मकान बेच दिया और नोएडा के सेक्टर 78 में एक कोठी बना लीइसी आशियाने में विस्तार पा चुका परिवार विकसित होता रहा और बच्चे धीरेधीरे जवान होने लगे. नए जमाने की जरूरतों को समझते हुए विनोद कुमार ने सोचा कि क्यों वक्त रहते सभी बच्चों और परिवार के सदस्यों को उन के लिए पसंद का आशियाना खरीद दिया जाए

लेकिन तमाम उम्र परिवार के साथ बिताने वाले विनोद यह नहीं चाहते थे कि अलग आशियाना बसाने की चाह में परिवार बिखर जाए. इसलिए वह ग्रेटर नोएडा में विकसित हो रही उन प्रौपर्टीज की खोज करने लगे, जिन में सुविधाओं के साथ आसान पहुंच भी होआखिर साल 2010 में उन की तलाश पूरी हुई. गायत्री हौस्पिटैलिटी एंड रियलकन नाम की बिल्डर कंपनी ग्रेटर नोएडा के सेक्टरएक में गायत्री ओरा हाउसिंग परियोजना बना रही थी. करीब 500 फ्लैट वाले इस प्रोजेक्ट में आलीशान फ्लैट के साथ वे तमाम सुविधाएं भी बताई जा रही थीं, जिन का वह सपना देखते थे.

आशियाने की खोज पूरी हुई तो परिवार के लोगों के साथ प्रोजेक्ट को देखनेदिखाने का दौर शुरू हुआ. प्रोजेक्ट अपने शुरुआती दौर में ही था, इसलिए थोड़ा किफायती कीमत पर भी मिल रहा थाबिल्डर कंपनी के मालिक के अलावा सेल्स और मार्केटिंग टीम के लोगों से बातचीत का दौर शुरू हुआप्रोजेक्ट की वैधानिकता जांचने के लिए उन्होंने उन के परिजनों ने जमीन के कागजों से ले कर अथौरिटी से प्रोजेक्ट की मंजूरी और नक्शे लेआउट प्लान तक सब देख डाले. कहीं कोई शंका नजर नहीं आई.

दरअसल, विनोद गुप्ता ने सुन रखा था कि नोएडा में बिल्डर मिट्टी को सोना बता कर और बंजर जमीन पर आलीशान बंगला बनाने का ख्वाब दिखा कर लोगों से उन की खूनपसीने की गाढ़ी कमाई लूट लेते हैंविनोद गुप्ता ऐसे किसी लफड़े में नहीं पडऩा चाहते थे, इसीलिए उन्होंने कदम आगे बढ़ाने से पहले कागजों की सारी पड़ताल सारी जांचपरख कर ली थी

इस के बाद उन्होंने पहले परिवार के 7 सदस्यों के नाम पर 3 बैडरूम वाले 7 फ्लैट बुक करवा दिए और गायत्री बिल्डर को डिमांड की गई एडवांस रकम अलगअलग तरीके से दे दी. इस की उन्होंने बाकायदा लिखापढ़ी भी कर लीबिल्डर की तरफ से वायदा किया गया था कि 2016 के अंत तक वह सभी फ्लैट का कब्जा उन्हें दे देगा. 1-2 साल का वक्त गुजरा तो अचानक उस इलाके में प्रौपटी के रेट तेजी से बढऩे शुरू हो गए

इसी बीच गायत्री बिल्डर की मार्केटिंग टीम की तरफ से उन्हें औफर मिला कि अगर वे उन के प्रोजेक्ट में और निवेश करना चाहते हैं तो उन्हें पुराने रेट पर ही फ्लैट बुक करने का बेनिफिट मिल सकता है

14 फ्लैट किए बुक

विनोद गुप्ता को लगा कि यह सुनहरा मौका है, इस से उन्हें बड़ा फायदा होगा. वैसे भी उन का व्यवसाय ठीक ही चल रहा था, पैसे की कोई कमी थी नहीं, लिहाजा उन्होंने परिवार के 7 और सदस्यों के नाम से 2 3 कमरे के 7 और फ्लैट बुक कर के उन की रकम भी एडवांस जमा करा दी

इस तरह उन्होंने 2010 से 2015 के बीच सेक्टर एक के जीएच-11 भूखंड पर विकसित की जा रही गायत्री ओरा हाउसिंग परियोजना सोसायटी में विभिन्न आकार के कुल 14 फ्लैट बुक कराए. वे अब तक बिल्डर को करीब 3.35 करोड़ रुपए एडवांस दे चुके थेबिल्डर ने तय समय में फ्लैट पर कब्जा देने और विक्रय पत्र अनुबंध करने का आश्वासन दिया था. वक्त तेजी से गुजरता गया और 2016 का वह समय भी गया, जब उन्हें उन के सभी 14 फ्लैट का कब्जा मिलना था

उस से कुछ दिन पहले की बात है, जब विनोद कुमार ने सोचा कि फ्लैट बन कर तैयार हो गए होंगे. कब्जा लेने से पहले देख आते हैं कि काम कैसा हुआ है, लेकिन जब वे बिल्डर की साइट पर पहुंचे तो जिस जगह उन का ब्लौक बनना था, वहां तो खाली जमीन पड़ी थी. वहां फ्लैट तो क्या एक ईंट नहीं लगी थी.

विनोद कुमार यह देख कर भड़क गए. उन्होंने गायत्री बिल्डर के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने जवाब दिया कि जिस जगह उन का ब्लौक तैयार होना था, उस जगह पर कोर्ट में किसानों ने मुआवजा बढ़ाने की मांग को ले कर केस कर दिया था, जिस कारण कोर्ट ने जमीन के उस हिस्से पर निर्माण करने पर रोक लगा दी है

गायत्री बिल्डर के अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि अब अदालती विवाद लगभग खत्म हो गया है और जल्द ही निर्माण कार्य शुरू हो जाएगाबिल्डर की तरफ से जो कहा गया था, उस के मुताबिक एक से डेढ़ साल के भीतर उन्हें निर्माण करवा कर फ्लैटों को कब्जा दे दिया जाएगा

मरता क्या करता, गुप्ता परिवार ने सब्र कर लिया कि चलो एकडेढ़ साल बाद ही सही उन के फ्लैट उन्हें मिल जाएंगे, लेकिन जो कहा गया था, वैसा हुआ नहीं.  क्योंकि एक तरफ उन से कहा गया था कि उन्हें डेढ़ साल के भीतर फ्लैट सुपुर्द कर दिए जाएंगे, दूसरी तरफ वे जब भी 1-2 महीने में गायत्री बिल्डर की ओरा परियोजना की साइट पर जाते तो उन के ब्लौक की खाली जमीन पर उन्हें वैसे ही हालात मिलते, जैसे पहले थे

आखिर यह हो क्या रहा है? एक दिन गुस्से में कर जब बिल्डर ग्रुप के पदाधिकारियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि किसानों ने समझौता करने से इंकार कर दिया है और वे फिर से कोर्ट में चले गए हैं, लिहाजा जब तक मामला नहीं सुलटता, तब तक उस हिस्से में काम शुरू नहीं किया जा सकता.  लेकिन इस बार उन्होंने जो आश्वासन दिया, उस से विनोद गुप्ता की उम्मीदें थोड़ा बढ़ गई थीं. उन्होंने विनोद गुप्ता से कहा कि अगर तय समय में कोर्ट से जमीन का विवाद नहीं सुलझा तो जो ब्लौक बन कर तैयार हो रहा है, उन्हें उस ब्लौक में फ्लैट आवंटित कर दिए जाएंगे

जिस ब्लौक में फ्लैट देने का वायदा किया था, विनोद गुप्ता ने उस के मौडल फ्लैट देख भी लिए, सब कुछ वैसा ही था, जैसा उन को मिलने वाले फ्लैट में था. कुछ महीनों का इंतजार भी खत्म हो गया. इस दौरान बताए गए दूसरे ब्लौक के फ्लैट बन कर तैयार हो गए.  उन्होंने गायत्री बिल्डर के औफिस जा कर उस ब्लौक में फ्लैट देने की बात पूछी तो उन से कहा गया कि वे सारे फ्लैट तो सेल आउट हो गए हैं. अब उन्हें बताया गया कि उन्हें तब तक इंतजार करना होगा, जब तक उन के ब्लौक की जमीन का विवाद खत्म नहीं हो जाता.

विनोद गुप्ता और उन के परिजनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. आखिर यह क्या बात हुई कि 3.35 करोड़ रुपए की बड़ी रकम एडवांस लेने के बाद भी उन्हें फ्लैट नहीं दिया जा रहा है, जबकि सालों गुजर चुके हैं.  उन्होंने बिल्डर ग्रुप पर ब्याज सहित पैसा वापस करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. शुरू में तो उन से कहा गया कि जल्द ही उन का बुकिंग अमाउंट का पैसा रिटर्न कर दिया जाएगा. लेकिन टालमटोल करते हुए नित नए बहाने बनाते हुए इस बात को भी कई महीने गुजर गए

आखिर एक दिन विनोद गुप्ता अपने परिजनों कुछ जानकारों के साथ गायत्री बिल्डर के औफिस जा धमके और अपना पैसा लौटाने या फ्लैट देने की जिद पर अड़ गए. लेकिन उस दिन उन्हें पता चला कि बिल्डर की नीयत में ही खोट हैउस दिन साफ कह दिया गया कि बुकिंग अमाउंट वापस करना कंपनी की पौलिसी में नहीं है, अगर किसी वजह से फ्लैट नहीं दिया जाता तो कंपनी किसी दूसरे प्रोजेक्ट में पैसा एडजस्ट कर सकती है

ठगी का हुआ अहसास

अब तक विनोद गुप्ता को यह बात बखूबी समझ चुकी थी कि वे और उन का परिवार गायत्री बिल्डर के हाथों ठगे गए हैं. उन्हें अपना करोड़ों रुपया डूबता नजर आने लगा. इसलिए अब उन्होंने बिल्डर को सबक सिखाने का मन बना लियाविनोद गुप्ता ने अपने कुछ परिचित वकीलों के साथ मिल कर जब बिसरख थाने में गायत्री बिल्डर की वादाखिलाफी और धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराने की कोशिश की तो उन्हें पता लगा कि ऐसे दगाबाज बिल्डर के खिलाफ कानूनी काररवाई करने में पुलिस भी कितनी लाचार है

सरकार ने ऐसे बिल्डरों पर लगाम लगाने के लिए रेरा नाम की संस्था बनाई हुई है. विनोद गुप्ता ने वहां भी बिल्डर कंपनी के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी. यहां से वहां इस विभाग से उस विभाग तक धक्के खाते हुए विनोद गुप्ता को कई साल बीत गए, लेकिन कहीं से भी नतीजा अच्छा नहीं निकला

उन की खूनपसीने की कमाई लगभग पानी में डूबती नजर रही थी. विनोद गुप्ता अमनपसंद और कानून में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे, लिहाजा उन्होंने तय कर लिया कि अब वे कानून से मदद लेने के लिए अदालत जाएंगे और पुलिस को विवश करेंगे कि वह बिल्डर के खिलाफ काररवाई करेउन्होंने गौतमबुद्ध नगर की जिला अदालत में 156/3 में एक याचिका दाखिल कर दी ताकि पुलिस को उन की एफआईआर दर्ज करने का अदालती आदेश दिया जा सके. लेकिन यह काम भी उतना आसान नहीं था, जितना उन्होंने समझा था

कानून की पेचीदगियों के छेद भरतेभरते आखिरकार गौतमबुद्ध नगर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रैट ने फरवरी, 2026 में कमिश्नरेट पुलिस को आदेश दिया कि विनोद गुप्ता की शिकायत पर गायत्री बिल्डर के खिलाफ बीएनएस की धारा 318, 406, 467, 468, 471, 120बी और 352 के तहत एफआईआर दर्ज कराई जाए, ताकि बिल्डर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ काररवाई कर के विनोद गुप्ता को फ्लैट अथवा उन की रकम वापस दिलाई जा सके20 फरवरी, 2026 को न्यायालय के आदेश पर बिसरख थाने के एसएचओ कृष्ण गोपाल शर्मा ने विनोद गुप्ता की शिकायत पर गायत्री बिल्डर डेवलपर के मालिक हरिओम दीक्षित के खिलाफ जालसाजी का मुकदमा दर्ज कर लिया और जांच भी शुरू कर दी गई

विनोद गुप्ता के परिवार ने साल 2010 से 2015 तक कुल 3.35 करोड़ रुपए बिल्डर फर्म के निदेशक हरिओम दीक्षित को दे कर तय समय सीमा में तो फ्लैट पाया उन की रकम मिली. कुछ पाया तो काफी मेहनतमशक्कत और सालों के इंतजार के बाद एक मुकदमा जिस के लिए भी उन्हें अदालत में लंबी लड़ाई लडऩी पड़ीविनोद गुप्ता को इस लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पता चला कि बिल्डर ने उन्हें फ्लैट पर कब्जा इसलिए नहीं दिया और वह लगातार टालमटोल करता रहा, क्योंकि जिन ब्लौक में उन के फ्लैट बुक किए गए थे, वह वास्तविक निर्माण योजना में शामिल ही नहीं थे.

उन्हें फरजी नक्शा दिखा कर बुकिंग कर ली गई थी. उन्होंने कंपनी के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) में भी शिकायत की थी, जो आज तक लंबित है. एनसीएलटी में भी उन की शिकायत पर जवाब देते वक्त गायत्री बिल्डर कंपनी की तरफ से गलत जानकारी दी गई

11 जनवरी, 2019 को एनसीएलटी में दाखिल कंपनी की सूची में 14 में से सिर्फ 7 फ्लैट ही दिखाए गए हैं. इन में भी 3 का उल्लेख नहीं था और 4 अन्य नामों से दिखाए गए हैं, जबकि 10 जुलाई, 2022 की सूची में सिर्फ एक फ्लैट दिखाया गया था4 कोअनएलाटेड एडवांसदिखाया है. 8 अन्य आवंटियों के नाम से दर्शाए गए और एक फ्लैट का जिक्र ही नहीं था

और भी फंसे जाल में

एनसीएलटी में कंपनी की तरफ से दाखिल दस्तावेजों के मुताबिक परियोजना के आई और के ब्लौक को स्क्रैप कर उन की जमीन पर कामर्शियल निर्माण करा दिया गया, जबकि 4 फ्लैट इन्हीं ब्लौकों में बुक थे. विनोद कुमार गुप्ता समेत अन्य पीडि़तों को तो वैकल्पिक फ्लैट दिए और ही रकम वापस की गई.

दरअसल, विनोद कुमार गुप्ता अकेले ऐसे निवेशक नहीं हैं, जिन्हें आशियाने का सपना दिखा कर गायत्री बिल्डर के मालिक हरिओम दीक्षित ने करोड़ों रुपए हड़प लिए और तो समय पर फ्लैट दिया ही उन के पैसे लौटाए. ऊपर से पैसे लौटाने का दबाव बनाने पर धमकी तक दी गई.  पिछले 2 से 3 दशकों में महानगरों खासकर दिल्ली एनसीआर में एक कहावत तेजी से प्रचलित हुई है कि शहरों में सिर्फ 2 चीजों के दाम बेतहाशा बढ़े हैं, जमीनों के और कमीनों के

इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है कि तेजी से बढ़ती आबादी और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण शहरों की सीमाओं में तेजी से विस्तार हुआ. लोगों के सपनों के घर आशियाने की जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार के विभिन्न प्राधिकरणों और निजी बिल्डरों ने नई आवासीय योजनाएं शुरू कींइन आवासीय योजनाओं को पूरा करने के लिए जमीनों की जरूरत थी. लिहाजा बिल्डरों प्राधिकरणों ने किसानों ग्रामीणों से खेती की जमीन को खरीद कर उन का लैंड यूज चेंज करा लिया

शुरुआत में किसानों से आवासीय योजनाओं के लिए खरीदी गई जमीनें अपेक्षाकृत सस्ती थीं, लेकिन जब वक्त के साथ देशभर में किसानों को यह आभास हुआ कि उन से सस्ते दामों पर जमीन खरीद कर प्राधिकरण और बिल्डर बनाए गए फ्लैटों को बेहद महंगे दामों पर बेचते हैं तो उन्होंने भी अपनी जमीनों के दाम बढ़ाने शुरू कर दिएहालात यह हो गए कि महानगर के आसपास जमीनें सोने के भाव बिकने लगीं और जमीनों के बढ़े दाम आसमान छूने लगे. ये तो हुई बढ़े हुए जमीनों के दाम की मूल कहानी. अब बताते हैं कमीनों के दाम कैसे बढ़े

शुरुआत में जब सरकार के प्राधिकरण लोगों को पर्याप्त रूप से आवासीय सुविधाएं देने में नाकाम रहे तो सरकार ने निजी बिल्डरों डेवलपरों को आवासीय परियोजनाएं बनाने की मंजूरी दी. बस यहीं से कमीनों के दाम बढऩे का सिलसिला शुरू हुआ.  महानगरों में रहने वाले ऐसे लोग जिन के पास अपना थोड़ाबहुत पुश्तैनी पैसा था, उन्होंने बैंकों से मोटे कर्ज ले कर किसानों से औनेपौने दाम में जमीनें खरीदनी शुरू कर दी और वहां सरकार से आवासीय परियोजना बनाने की मंजूरी ले कर गगनचुंबी इमारतें बनानी शुरू कर दीं

कुछ बिल्डर कंपनियां, जिन्होंने पैसे का ईमानदारी से उपयोग किया, वे फलीफूलीं और नामचीन कंपनी बन गईं. लेकिन इन में से अधिकांश लोग ऐसे निकले, जिन्होंने इस की टोपी उस के सिर और उस की टोपी इस के सिर पर रखने काम काम कियामसलन, उन्होंने अपनी आवासीय अथवा कामर्शियल परियोजनाओं में एक मौडल फ्लैट, दुकान या औफिस बना कर लोगों को आशियाने और सपनों का घर देने का वायदा करना शुरू कर दिया.

ऐसे जुगाड़ू बिल्डर निवेशकों से 2 से 3 सालों में कब्जा देने का सब्जबाग दिखा कर बुकिंग अमाउंट के रूप में मोटी रकम जमा कराने लगेकुछ बिल्डरों ने तो टोपियां घुमाने का ऐसा धंधा किया कि एक परियोजना से बुकिंग के रूप में मिली करोड़ों की धनराशि को प्रोजेक्ट शुरू करने के बजाय दूसरे प्रोजेक्ट के लिए किसानों से जमीन खरीदने में लगा दिया. जबकि पहले प्रोजेक्ट का काम ही शुरू नहीं हुआ.

ऐसे जुगाड़ू बिल्डर हर छोटेबड़े शहर खासकर दिल्ली एनसीआर में कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो गए. ऐसे बिल्डरों को तो लोगों के खूनपसीने की कमाई के नुकसान का डर था, उन के सपनों के घर के टूटने की परवाह. उन्हें चाह थी तो रातोंरात शार्टकट से अमीर बनने कीबिल्डरों ने दिल्ली एनसीआर में आशियाने का सपना दिखा कर लोगों से पैसा ऐंठने के लिए ऐसेऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि रियल एस्टेट व्यवसाय में लगे लोगों को लोग कमीना मानने लगे

इन के कारनामों से निवेशक और घर खरीदने की चाह रखने वाले इतने आजिज गए कि सरकार कोरेरानाम की एक संस्था बनानी पड़ी, ताकि बिल्डर समय पर निवेशकों को उन की संपत्ति का कब्जा देने के लिए बाध्य होंइतना ही नहीं, बैंकों सरकारी संस्थाओं से कर्ज ले कर परियोजना बनाने वाले रियल एस्टेट समूह पर देनदारी सुनिश्चित करने के लिए एनसीएलटी जैसा प्राधिकरण भी बना दिया गया

लेकिन हैरत की बात यह है कि रियल एस्टेट के धंधे से जुड़े लोगों ने धांधली इस कदर मचा दी है कि इन संस्थाओं के होते हुए भी हर रोज लोग लाखोंकरोड़ों खर्च करने के बावजूद अपने सपनों का आशियाना पाने का सपना सिर्फ आंखों में ही संजो कर रह गए हैंक्योंकि रेरा जैसी संस्थाओं तथा एनसीएलटी जैसे प्राधिकरण में बिल्डरों के खिलाफ शिकायतों के इतने अंबार लगे हैं कि लोगों को सालों तक अपनी सुनवाई का इंतजार करना पड़ रहा है. फैसला आने में तो हो सकता है दशकों बीत जाएं.       

बहरहाल, गायत्री बिल्डर का मालिक हरिओम दीक्षित कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हुए उन्हीं बिल्डरों में से एक है, जिस ने शार्टकट से पैसा कमाने के लिए तो लोगों को झूठे सब्जबाग दिखाने में कोई भय है ही लोगों का घर का सपना टूटने का कोई डर

आगरा में बनी साख

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मलपुरा के मिढ़ाकुर का मूल निवासी हरिओम दीक्षित वर्तमान में नोएडा के सेक्टर 121 की वीआईपी सोसायटी में रह रहा है. साल 2006 में हरिओम दीक्षित ने गायत्री बिल्डर डेवलपर नाम से रियल एस्टेट कंपनी बना कर आगरा में अपने बिजनैस की शुरुआत की थी

शुरू में उस ने आगरा में रियल एस्टेट के कई प्रोजेक्ट बनाए और लोगों को उन के घर फ्लैट के कब्जे समय से दे कर अपनी साख बनाईकुछ ही सालों में आगरा में उस की साख इतनी बढ़ गई कि उस के किसी भी प्रोजेक्ट से पहले सारे फ्लैटों की एडवांस बुकिंग होने लगी और प्रोजेक्ट के लिए मोटा पैसा इकट्ठा होने लगा.

कहते हैं लालच इंसान की सब से बड़ी कमजोरी होता है. हरिओम दीक्षित के साथ भी वही हुआ. रातोंरात दुनिया का सब से अमीर आदमी बनने की चाह में उस ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिएएनसीआर उन दिनों रियल एस्टेट का सब से तेजी से उभरता केंद्र था. लिहाजा हरिओम दीक्षित ने भी आगरा जैसे छोटे शहर से निकल कर दिल्ली एनसीआर के शहरों नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम की तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए

उस ने पहले अपनी पत्नी कल्याणी चतुर्वेदी के नाम से कल्याणी स्टोर एंड हाउसिंग नाम से एक नई कंपनी शुरू की. वैसे उस का आगे बढऩे का सिलसिला यहीं पर नहीं रुका. आगरा में कमाई गई अपनी साख को वह पूरी तरह भुनाना चाहता थाउस ने कुछ कारोबारी दोस्तों के साथ मिल कर और भी कई कंपनियां बनाईं और उन सभी में या तो वह खुद या उस की पत्नी कल्याणी पार्टनर बन गए. काम का फैलाव हुआ तो हरिओम दीक्षित ने बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं से अपने प्रोजेक्टों के लिए लोन भी लेना शुरू कर दिया.

फिर शुरू हुई हरिओम दीक्षित की ऊंची उड़ान और इस के लिए लोगों के सपने रौंद कर उन से पैसा ऐंठने का अंतहीन सिलसिला. हरिओम दीक्षित ने आगरा से ले कर नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम में दरजनों कंपनियां बना कर नएनए प्रोजेक्ट बनाने शुरू कर दिएहर प्रोजेक्ट आलीशान होने के दावों के साथ उस में भौतिक सुखसुविधाओं का ऐसा गुणगान किया जाता कि लोग आंखें बंद कर के उस के प्रोजेक्ट में फ्लैटों की बुकिंग के लिए लाखोंकरोड़ों रुपए एडवांस में दे देते

2012 के बाद हरिओम दीक्षित की अलगअलग रियल एस्टेट फर्मों ने प्रोजेक्ट तो दरजनों शुरू किए, लेकिन शायद ही कोई ऐसा प्रोजेक्ट रहा होगा, जो समय से पूरा हुआ या निवेशकों को समय से डिलिवरी दी गई हो. ज्यादातर प्रोजेक्ट या तो पूरे ही नहीं हुए या निवेशकों को पुलिस और अदालतों की शरण लेनी पड़ी.

ग्रेटर नोएडा के सेक्टर एक में गायत्री ओरा प्रोजेक्ट जहां विनोद गुप्ता के 14 परिजनों ने 14 फ्लैट बुक कराने के लिए 3 करोड़ 35 लाख रुपए एडवांस दिए थे, उसी प्रोजेक्ट में योगेश, कपिल और उन के 3 दोस्त भी निवेशक हैं, जिन्हें विनोद गुप्ता की ही तरह 2024 में अदालत का सहारा ले कर थाना बिसरख में एफआईआर दर्ज कराने के लिए मजबूर होना पड़ा था

उन चारों से भी लाखों रुपया फ्लैट बुक कराने के नाम पर ले लिया गया, लेकिन तो समय से फ्लैट मिले, ही काफी समय गुजरने के बाद कोई धनराशि लौटाई गई.  गायत्री ओरा प्रोजेक्ट में निवेश करने वालों को तो कानोंकान इस बात की खबर नहीं लगी कि करीब एक माह पहले यानी 24 जनवरी, 2026 को आगरा प्रशासन ने गायत्री डेवलपर के निदेशक हरिओम दीक्षित की ग्रेटर नोएडा वेस्ट सेक्टर-1 के इस प्रोजेक्ट की 100 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्तियां कुर्क कर ली थीं.

आगरा प्रशासन के आदेश पर जिन प्रोजेक्ट की संपत्तियां कुर्क की गईं, उन में नोएडा के गायत्री ओरा, एपेक्स ओरा और गायत्री हौस्पिटैलिटी प्रोजेक्ट शामिल हैं. घर खरीदारों की बकाया राशि चुकाने के लिए इन संपत्तियों को नीलाम किया जाना है

वैसे तो हरिओम दीक्षित उस की रियल एस्टेट कंपनियों की पोल 2012 के बाद ही खुलनी शुरू हो गई थी. जब उस के खिलाफ निवेशकों ने एक के बाद एक शिकायतें पुलिस, अदालतों और रेरा में दर्ज करानी शुरू कर दी थीं. कोई प्रोजेक्ट ऐसा नहीं बचा था, जहां फ्लैट बुक कराने वाले निवेशकों ने समय से फ्लैट देने पर बिल्डर ग्रुप के खिलाफ प्रदर्शन किया हो

पुलिस ने किया अरेस्ट

लेकिन हरिओम दीक्षित को सब से बड़ा झटका लगा 3 अक्तूबर, 2020 को जब आगरा की ताजनगरी पुलिस ने बिल्डर हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित को जेल भेज दिया थादरअसल, बुकिंग कराने के बाद भी लोगों को फ्लैट देने और करोड़ों रुपए की ठगी मामले में दोनों को गिरफ्तार किया गया था

उस समय हरिओम दीक्षित को गायत्री बिल्डर एवं डेवलपर्स के मालिक और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित को कल्याणी स्टोर एंड हाउसिंग की डायरेक्टर की हैसियत से गिरफ्तार किया गयाक्योंकि मेरठ रेंज के आईजी . सतीश गणेश ने आगरा जिले की समीक्षा के दौरान पाया था कि विगत 2 साल में आगरा के अलगअलग बिल्डरों के खिलाफ 40 से ज्यादा मुकदमे दर्ज होने पर भी पुलिस ने उन के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की

आईजी ने जिम्मेदार अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए सख्त काररवाई करने का आदेश दिया था. जिस के बाद आगरा पुलिस ने लोगों से ठगी कर के फरार हुए बिल्डरों की एक सूची बनाई और उन के खिलाफ काररवाई शुरू की

उन्हीं में एक बिल्डर हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी भी शामिल थे, जिन के खिलाफ कई मामले पुलिस अदालतों में दर्ज थे, लेकिन स्थानीय पुलिस ने बिल्डर से मिले सुविधा शुल्क के कारण कभी उस के खिलाफ गैरजमानती वारंट नहीं लेने की जहमत ही नहीं उठाई.  जबकि हरिओम दीक्षित के खिलाफ हरिपर्वत, सिकंदरा, न्यू आगरा, ताजगंज और रकाबगंज थानों में करीब एक दरजन शिकायतें दर्ज थीं, जिस में उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित भी नामजद थी.

बिल्डर हरिओम दीक्षित पर ज्यादातर मामलों में एक ही आरोप था कि लोगों के बुकिंग कराने के बाद भी उन्हें अभी तक फ्लैट नहीं दिए. कब फ्लैट मिलेंगे, यह भी नहीं बताया जा रहा है.  बिल्डर के औफिस में तो फोन उठाया जाता था, जिन मामलों में उस ने  चैक दिए थे, वे बाउंस हो गए, लेकिन पुलिस ने कभी भी उसे गिरफ्तार करने की जहमत नहीं उठाई.

आगरा थाने की हरिपर्वत पुलिस ने बाद में झांसी के जल निगम में तैनात वीरेंद्र पाल सिंह की शिकायत पर हरिओम दीक्षित उस की पत्नी के अलावा उस के भाई देवेंद्र दीक्षित को भी जेल भेजा था. इस मामले में उस की सास और साली समेत 12 लोग नामजद हैं. वीरेंद्र पाल से भी एडवांस बुकिंग के नाम पर 24 लाख रुपए की ठगी की गई थी

हालांकि 2020 में आगरा की हरिपर्वत थाना पुलिस द्वारा हरिओम दीक्षित की गिरफ्तारी से पहले आगरा के ही रकाबगंज और ताजगंज थाने में दर्ज मुकदमों में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, लेकिन जब आईजी सतीश गणेश की नजरें पुलिस की करतूत पर टेढ़ी हुईं तो इस की जांच भी शुरू की गई कि इन मुकदमों को किस आधार पर खत्म किया गया.

बिल्डर हरिओम दीक्षित के खिलाफ आगरा के अलावा नोएडा और गुरुग्राम में विभिन्न थानों में 2 दरजन से अधिक मुकदमे दर्ज हैं. हैरानी की बात है कि अधिकांश में पुलिस ने एक बिल्डर के खिलाफ किसी भी मुकदमे में गैरजमानती वारंट नहीं लिए. इसे ले कर पुलिस और बिल्डरों के गठजोड़ पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं.

2020 में हरिओम दीक्षित की गिरफ्तारी के बाद मामला गरमा गया तो उस वक्त आगरा पुलिस ने एक सूची बनाई, जिस में हरिओम दीक्षित की किस कंपनी के कौन से प्रोजेक्ट हैं, उन में अधिकांश पर विवाद है.  जांच में पता चला कि हरिओम दीक्षित की गायत्री डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड ने वर्ष 2010 में 2 कंपनी एडोर्न इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड और मैसर्स राधारानी प्राइवेट लिमिटेड के नाम से भी कंपनी है, जिस ने 10 हजार वर्गमीटर जमीन खरीदी.

इस के बाद सिकंदरा क्षेत्र में अन्ना आइकोन रोड पर मनहर गार्डन सोसायटी के नाम से 200 फ्लैट तैयार किए. इस में केनरा बैंक एमजी रोड से भी लोन लिया. बाद में बैंक ने तकरीबन 59 फ्लैट्स लोन के बदले अपने कब्जे में लिए

बैंक खाते हुए कुर्क

मैसर्स कल्याणी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड हाउसिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के माध्यम से शमसाबाद रोड पर वर्ष 2007 में गायत्री उपवन के नाम से 6 बीघा जमीन खरीद कर प्लौट बेचे गए.  गायत्री हौस्पिटैलिटी के माध्यम से नोएडा में गायत्री एडोरा के नाम से 36,000 वर्गफीट जमीन ले कर 1680 फ्लैट का निर्माण किया जा रहा हैकृष्णा मयूरी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के नाम से वर्ष 2012 में रंगोली कालोनी में नीलामी के दौरान 8,000 वर्ग मीटर जमीन ली थी. इस पर आज तक कोई निर्माण कार्य नहीं किया गया.

हरिओम दीक्षित के स्वामित्त्व वाली मनहर इंफ्रा होम प्राइवेट लिमिटेड के द्वारा वर्ष 2015 में फतेहाबाद रोड पर गायत्री रिट्रीट के नाम से प्रोजेक्ट्स में 72 फ्लैट तैयार कर के बेचे जा चुके हैं. नोएडा के सेक्टर 121 थाने में हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित के खिलाफ 4 मुकदमे दर्ज हैं. इन में अपने प्रोजेक्ट में फ्लैट और प्लौट की बुकिंग कर के रुपए लेने और कब्जा नहीं देने के आरोप थे.

जांच में यह भी पता चला कि आगरा में फ्लैट देने के नाम पर धोखाधड़ी के चलते न्यायालय के आदेश पर एसडीएम (सदर) गायत्री डेवलपमेंट बिल्डर्स के मालिक हरिओम दीक्षित के 11 खाते कुर्क कर दिए हैं. उस के 3 खातों से राजस्व टीम ने 18 लाख रुपए की वसूली की है. बाकी 8 खातों में राजस्व टीम को एक भी पैसा नहीं मिला

गायत्री बिल्डर से भू संपदा विनियामक (रेरा) ने अप्रैल, 2021 में 69.16 लाख वसूली के आदेश डीएम को दिए दिए थे. बकाएदारी नहीं चुकाने और वसूली में लापरवाही बरतने पर 2 पीडि़त हाइकोर्ट की शरण में गए थे. जिस के बाद न्यायालय के आदेश पर एसडीएम (सदर) ने बिल्डर के 11 खाते कुर्क किए थे. बिसरख थाने की पुलिस को विनोद कुमार गुप्ता के मामले की जांच में पता चला है कि गायत्री बिल्डर को सेक्टर एक में 17.5 एकड़ जमीन अलौट हुई थी, जिस में गायत्री ओरा के तहत 1,500 फ्लैट बनाने थे

इन में से कुछ टावरों को निर्माण तो हुआ, जिस की आड़ में बिल्डर ने करीब एक हजार फ्लैट बिना बने ही एडवांस रकम ले कर बेच डाले और अब इन के निवेशक या तो थानों के अथवा अदालतों के धक्के खा रहे हैं

सुनीत अवस्थी ने भी 2011 में गायत्री ओरा में 1,195 वर्गफीट का एक फ्लैट बुक किया था, जिस के लिए अब तक 16 लाख रुपए का पेमेंट कर चुके हैं.  इस के बाद भी  डेवलपर के साथ कई बार मीटिंग और वादों के बावजूद, जमीन के उस टुकड़े पर कंस्ट्रक्शन का कोई काम शुरू नहीं किया गया

उन्होंने भी पिछले साल गायत्री बिल्डर के खिलाफ 2 जुलाई को केस दर्ज किया था. गायत्री बिल्डर ने अपने ओरा प्रोजेक्ट में बुकिंग के बदले 30 से 90 फीसदी तक पेमेंट ले लिया है, जो सभी 2011 और 2015 में बुक की गई थीं, लेकिन आज तक बिल्डर ने जमीन की खुदाई तक नहीं की है

हैरानी की बात यह है कि विनोद गुप्ता की तरह बिल्डर सभी इनवेस्टर्स को शिकायत करने पर यही कहानी सुनाता है कि किसानों ने अभी तक जमीन का कब्जा नहीं सौंपा है. लेकिन हकीकत यह है कि गायत्री डेवलपर ने वह प्लौट किसी और को बेच दिया था.

UP Crime: चाइल्ड पोर्न केस – दंपति को सजा ए मौत

UP Crime: इंजीनियर राम भवन ने अपनी पत्नी दुर्गावती के साथ मिल कर 33 मासूम बच्चों से ऐसी दरिंदगी की कि पोक्सो कोर्ट ने दोनों को मरते दम तक फांसी पर लटकाए जाने की सजा सुनाई. आखिर यह उच्चशिक्षित दंपति मासूमों को अपने जाल में किस तरह फांसता था और उन के साथ किसकिस तरह से शोषण किया जाता था, जिस से यह मामला इंटरनैशल  लेवल तक चर्चित हुआ और उन्हें मिली सजा ए मौत?

उत्तर प्रदेश में बांदा जिले का विशेष पोक्सो कोर्ट 18 फरवरी, 2026 को खचाखच भरा हुआ था. बहुत ही खास केस की सुनवाई होनी थी, जो करीबकरीब अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी. केस की जांच सीबीआई के जिम्मे थी. मामला दरजनों मासूम बच्चों के साथ यौनाचार का था, जिन की उम्र 3 साल से 15 साल तक की थी. यह अनोखा मामला भले ही 6 साल से पोक्सो कोर्ट में आया था, लेकिन उत्तर प्रदेश में बच्चों के साथ यौनाचार और उन की अश्लील तसवीरें, वीडियो आदि इंटरनेट मीडिया के जरिए पूरी दुनिया में फैलाने और बेचने की चर्चा साल 2010 से ही बनी हुई थी.

पोक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा कुछ मिनटों में ही आने वाले थे. हौल की 2 कतारों में लगी बेंचों पर सीबीआई के वकील, यूपी पुलिस, आरोपी, गवाह और बचाव पक्ष के वकील आ चुके थे. यानी कि कोर्ट में साक्ष्यों, सीबीआई के अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष अपनीअपनी बातें रखने के लिए पूरी तैयारी में थे. उन की तत्परता और उत्सुकता देखते बन रही थी. इस बारे में मीडियाकर्मी भी जानने को उत्सुक थे, लेकिन उन्हें वहां से दूर रखा गया था. हौल में तमाम तरह के मोबाइल फोन और दूसरे डिजिटल डिवाइसेस प्रतिबंधित थे.

दरअसल, इस मामले के आरोपी पतिपत्नी थे. मुख्य आरोपी सिंचाई विभाग का पूर्व जूनियर इंजीनियर राम भवन था, जबकि उस का साथ देने वाली उस की पत्नी दुर्गावती पर भी गंभीर आरोप लगे थे. उन दोनों को भारी सुरक्षा के साथ जेल से कुछ समय पहले ही कोर्ट में लाया जा चुका था. कोर्ट के हौल में गहमागहमी का माहौल था. लोग अपने बगल बैठे साथी से फुसफुसा कर बातें कर रहे थे. उन के चेहरे पर यह जानने की उत्सुकता बनी हुई थी कि बच्चों के साथ यौनाचार के मामले में क्या फैसला सुनाया जाता है. वहां कुछ पीडि़तों के परिजन भी चेहरा ढंक कर गुमसुम बैठे थे.

जैसे ही न्यायाधीश महोदय प्रदीप कुमार मिश्रा हौल में आए, वहां अचानक सन्नाटा छा गया. उपस्थित सभी लोग खड़े हो गए. श्री मिश्रा अपनी सीट पर बैठ गए. उन के सामने कई फाइलें पहले से ही रख दी गई थीं. उन में से उन्होंने एक फाइल खोलने के बाद पहले पन्ने को पढऩा शुरू किया. उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था— ‘सैक्सुअली असाल्टिंग केस औफ 33 मेल चिल्ड्रेन’. केस सीबीआई बनाम राम भवन और दुर्गावती का था.

इस मामले की सुनवाई 12 फरवरी, 2021 को ही शुरू हो चुकी थी. कई दौर की सुनवाई के दरम्यान जैसेजैसे इस मामले में आरोपी के खिलाफ गवाहों की फेहरिस्त बढ़ती चली गई थी, वैसेवैसे मामला और भी पेचीदा हो चुका था. आरोपियों के खिलाफ प्याज के छिलके की तरह तथ्यों और तर्कों की परतें उतरने लगी थीं. बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के वकीलों की दलीलों के साथसाथ मामले की फाइल मोटी हो गई थी. पुलिस की उलझी हुई जांच में कई खामियां थीं. तथ्य थे, मगर उस के सबूत नहीं थे. नतीजे पर पहुंचने में उलझनें कम होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

न्यायाधीश ने अचानक अपने सामने रखे लकड़ी के हथौड़े से 3 बार ठकठक की आवाज की. पूरा हौल एकदम से एक बार फिर शांत हो गया. श्री मिश्रा पोक्सो कोर्ट के सरकारी वकील की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, ”हां, तो कमल सिंहजी! आगे की सुनवाई के लिए आप तैयार हैं?’’

”जी जनाब! पहले मैं इस केस के बारे में थोड़ा ब्यौरा देना चाहता हूं.’’ एडवोकेट कमल सिंह ने अनुमति मांगी.

”इजाजत है…संक्षेप में बताइएगा.’’ श्री मिश्रा बोले.

”जी हुजूर! चाइल्ड पोर्न के इस मामले का खुलासा सीबीआई ने किया है. उसे इंटरपोल से केस के बारे में जानकारी मिली थी. 3 मोबाइल नंबरों से बने आईडी के जरिए बच्चों के यौन शोषण के वीडियो औनलाइन अपलोड किए गए थे और यह मटीरियल लगभग 40-45 देशों में बेचा गया था.

”इस बारे में सीबीआई द्वारा बरामद पेन ड्राइव में 36 बच्चों के यौन शोषण के 679 फोटो और वीडियो थे. वे सारे आरोपी राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती के घर से मिले थे. इस की जांच पहले ही की जा चुकी है. 4 साल तक चले ट्रायल के दौरान 74 गवाहों से पूछताछ की जा चुकी है.

”इस केस की मूल जड़ में राम भवन और उस की पत्नी है, जिन्होंने मासूम बच्चों को तरहतरह का लालच दिया. अपने घर पर बुलाया और उन के साथ यौनाचार किया.

”यही नहीं हुजूर, दोनों ने उन के साथ यौनाचार के वीडियो और तसवीरें भी बनाईं. उन का कामर्शियल यूज किया और इंटरनेट मीडिया के जरिए विदेशों में बेच दिया.’’

”औब्जेक्शन जज साहब!… पुरानी कहानी दोहरा कर बेवजह कोर्ट का समय बरबाद किया जा रहा है.’’ बचाव पक्ष के वकील बीच में बोल पड़े.

”उन्हें अपनी बात पूरी तरह से रखने दीजिए… आप को भी अपनी बात कहने का मौका दिया जाएगा…सिंह साहब, आगे बताइए.’’ न्यायाधीश महोदय हथौड़े से तख्ती को पीटते हुए बोले.

जेई राम भवन और उसकी पत्नी दुर्गावती – कोर्ट ने सुनाई मरते दम तक फांसी की सजा

”राम भवन मूलरूप से बांदा जिले के नरैनी शहर के रहने वाले चुन्ना प्रसाद कुशवाहा का पुत्र है. उस ने अपनी पत्नी के साथ मिल कर जिस तरह के घिनौने अपराध किए हैं, उस की जितनी सख्त हो सके सजा दी जानी चाहिए.

”वह पड़ोस, रिश्तेदारों और आसपास के मासूम बच्चों को निशाना बनाते थे. बच्चों को पैसे, गिफ्ट्स और वीडियो गेम का लालच दे कर घर बुलाया जाता था. इस तरह पीडि़त बच्चों की कुल संख्या 33 थी. उन में नाबालिग लड़के थे.

”उन के साथ गंभीर यौन शोषण किया गया था. कई बच्चों को गंभीर चोटें आई थीं, कुछ को अस्पताल में भरती होना पड़ा था और कई मानसिक आघात के चलते शारीरिक समस्याओं की चपेट में आ चुके थे.

”राम भवन, दुर्गावती 10 साल तक बांदा और चित्रकूट घूमते रहते थे. वीडियो बनाने से पहले लड़कों को लुभाने के लिए तोहफों का इस्तेमाल किया था. हुजूर! एक दशक तक राम भवन ने अपना चाइल्ड पोर्न औपरेशन आराम से चलाया था.

”चित्रकूट में एक किराए का कमरा, राज्य के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर की पोस्टिंग, एक आम जिंदगी जिस से कोई बाहरी संकेत नहीं मिलता था कि वह अपने आसपास के बच्चों के साथ क्या कर रहा है. सभी पीडि़त 18 साल से कम उम्र के लड़के थे, उन में 3 साल के भी थे.

”राम भवन और उस की पत्नी ने दरजनों पीडि़तों को शामिल करते हुए हैरान करने वाले 2 लाख वीडियो बनाए थे. वह बच्चों पर काम करने के अलगअलग तरीके अपनाता था, जिस में औनलाइन वीडियो गेम तक पहुंच और उन्हें लुभाने के लिए पैसे या गिफ्ट देना शामिल था. उन पर दया दिखा कर और लालच दे कर फंसाया जाता था, फिर उन के साथ गलत व्यवहार किया जाता था. उन्हें फिल्माया जाता था. वे उन्हें मोबाइल फोन, चौकलेट और घडिय़ां देने का भी वादा करते थे.’’

कोर्ट में स्पैशल पब्लिक प्रासिक्यूटर सौरभ सिंह ने भी इस केस में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि फोटो और वीडियो के जरिए राम भवन कई सालों तक बच्चों को धमकाता रहा. इस का पता लगाने में सीबीआई को ग्लोबल पुलिस ग्रुप इंटरपोल से मदद मिली. वहीं से डार्क वेब पर पोर्न की बिक्री से जुड़े 3 मोबाइल नंबर मिले.

सीबीआई की गवाही

दोनों ने पीडि़तों के 2 लाख से ज्यादा आपत्तिजनक वीडियो और तसवीरें इंटरनेट के जरिए लगभग 47 देशों में सर्कुलेट कीं. जांच के दौरान मिली एक पेन ड्राइव में 34 साफ वीडियो और 679 तसवीरें थीं. कपल ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म, वेबसाइट और डार्क वेब पर मटीरियल अपलोड करने, शेयर करने और बेचने के लिए कई मोबाइल नंबरों और ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया था. इलेक्ट्रौनिक डिवाइस की फोरैंसिक जांच से एक साफ डिजिटल ट्रेल मिला.

सरकारी वकीलों के बाद न्यायाधीश श्री मिश्रा ने उन के कहने के आधार पर सीबीआई अधिकारी को भी कठघरे में आ कर अपनी बात कहने के लिए बुलाया.

”जनाब, आप ने अपनी जांच में क्याक्या पाया, उस बारे में जज साहब को बताएं.’’ सरकारी वकील बोले.

”जी साहब, जरूर. मैं सब कुछ इस मामले की जांच के आधार पर ही बताऊंगा. जांच के दौरान मैं ने पाया कि आरोपियों ने 33 लड़कों के साथ कई तरह के गलत काम किए थे, जिन में से कुछ की उम्र 3 साल के आसपास थी. इस बारे में 74 गवाहों में से कम से कम 25 ने गवाही दी. पीडि़तों से दरिंदगी का अंदाजा इस बात से लग जाता कि कुछ अभी भी हौस्पिटल में भरती हैं. कुछ पीडि़तों की आंखें टेढ़ी हो गई हैं. पीडि़त अभी भी दरिंदों की वजह से हुए साइकोलौजिकल ट्रामा से जूझ रहे हैं.

”राम भवन ने गलत तरीके से वीडियो रिकौर्ड किए. यह उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि उन का कामर्शियल इस्तेमाल के लिए किया गया था. जांच में पाया गया कि राम भवन ने जो कुछ भी फिल्माया, उसे बेचने के लिए एक सिस्टमैटिक डिजिटल औपरेशन बनाया था. वे इस बात से बेखबर थे कि इन्वैस्टिगेटर्स इंटरनेट पर सर्कुलेट हो रहे बच्चों के यौन शोषण के मटीरियल पर नजर रख रहे थे. जब उन्हें कपल से जुड़ा कंटेंट मिला, तब वे इंटरपोल की निगाह में आ गए.’’

इस मामले की जांच अक्तूबर, 2020 में सीबीआई को सौंप दी गई. यह वह दौर था, जब पूरा देश कोविड 19 की चपेट में था. लौकडाउन का माहौल था. चौतरफा तरहतरह की सख्ती का आलम था.

हालांकि यह मामला साल 2010 से ही चल रहा था, जिस बारे में कई तरह के घिनौने खेल की बातें मीडिया में आती रहती थीं. मुख्य आरोपी रामभवन चित्रकूट में सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात था. वह बाहर से सामान्य दिखता था और किराए के घर में रहता था. उस के घर के अंदर एक भयानक खेल चल रहा था, इस बात से आसपास के लोग अनभिज्ञ थे, जबकि इस में जेई की पत्नी दुर्गावती भी पूरी तरह शामिल थी. बताते हैं कि 2010 से 2020 तक लगभग 10 सालों तक यह सिलसिला चल रहा था.

देश के कई हिस्सों में चाइल्ड पोर्न को ले कर सीबीआई कई सालों से सक्रिय थी. इसी सिलसिले में सीबीआई द्वारा सितंबर 2020 में अनपरा निवासी इंजीनियर नीरज यादव गिरफ्तार किया गया. दरअसल, अंतरराष्ट्रीय पुलिस संगठन इंटरपोल ने सीबीआई को सूचना दी थी कि बच्चों के यौन शोषण और अश्लील सामग्री से जुड़ा डिजिटल डेटा मिला है, जो डार्क वेब पर साझा किया जा रहा है और वहां से उसे बेचा जा रहा है. इस के बाद ही सीबीआई ने 30-31 अक्तूबर, 2020 को एफआईआर दर्ज की थी.

उस के बाद आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई. नीरज दिल्ली में रह कर औनलाइन संदिग्ध लिंक साझा करता था. इसी दौरान एक औनलाइन लिंक के आधार पर विशेष औनलाइन चाइल्ड सैक्सुअल एब्यूज एंड एक्सप्लाइटेशन (ह्रष्टस््रश्व) यूनिट की जांच में राम भवन का नाम सामने आया. सीबीआई ने लगभग डेढ़ महीने तक जाल बिछा कर 17 नवंबर, 2020 को कर्वी की एसडीएम कालोनी स्थित किराए के मकान से राम भवन और उस की पत्नी दुगार्वती को गिरफ्तार किया.

इस के लिए सीबीआई ने विदेशी एजेंसियों के साथ जानकारी शेयर की, जिन्होंने मटीरियल के खरीदारों और पाने वालों की भी पहचान की थी, जिस से यह केस और पक्का हो गया. इस की शिकायत मिलने पर 31 अक्तूबर, 2020 को सीबीआई ने राम भवन के खिलाफ केस दर्ज किया. उस के द्वारा बच्चों के अश्लील वीडियो/फोटो बना कर डार्क वेब के जरिए अंतरराष्ट्रीय पेडोफाइल नेटवर्क तक पहुंचाने का आरोप लगाया गया. इस के बाद 17 नवंबर, 2020 को सीबीआई ने राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती को गिरफ्तार कर लिया था.

दाखिल हुई चार्जशीट

गिरफ्तारी के 88 दिन बाद 12 फरवरी, 2021 को बांदा कोर्ट में 700 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी. चार्जशीट में मैडिकल रिपोर्ट और बच्चों के बयानों को आधार बनाया गया. इस दौरान सीबीआई की टीम ने 4 से 42 साल तक की उम्र के लोगों के बयान दर्ज किए. सभी का मैडिकल परीक्षण कराने के साथ डिजिटल सबूत को कनेक्ट किया गया था.

इस के बाद बच्चों से जुड़ा मामला होने के चलते सीबीआई ने पोक्सो कोर्ट में ट्रायल की शुरुआत जून, 2023 से करवाई. इस सिलसिले में सीबीआई ने 74 गवाह पेश किए. सरकारी वकील ने मांग करते हुए कहा कि डीएम को एक पत्र लिखा जाए, जिस में पीडि़त बच्चों को 10-10 लाख रुपए की राशि देने का काम किया जाए. बांदा के पोक्सो कोर्ट में 18 फरवरी, 2026 की सुनवाई करीबकरीब पूरी हो गई. दोनों आरोपियों राम भवन और दुर्गावती को दोषी ठहराया गया. उन के खिलाफ फैसला 20 फरवरी, 2026 को सुनाया गया, जो भारतीय कानून के इतिहास में काफी बड़ा था.

बांदा के स्पैशल पोक्सो कोर्ट में पेशी के लिए दंपति को ले जाती पुलिस

न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने कहा, ”सीबीआई की विशेष जांच के बाद सिंचाई विभाग के पूर्व जूनियर इंजीनियर राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती को 33 बच्चों के यौन शोषण और उन के वीडियो बना कर डार्क वेब पर बेचने का दोषी पाया गया है. यह मामला ‘रेयरेस्ट औफ रेयर’ श्रेणी में रखा गया है.’’

उन्होंने कहा कि उन का अपराध इतना भयावह और योजनाबद्ध था कि सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची. दोनों दोषियों को मरते दम तक फंदे पर लटकाए रखने का आदेश दिया जाता है. उन्हें ‘मृत्यु होने तक फांसी पर लटकाया जाए!’

फांसी की सजा के साथसाथ कोर्ट ने राम भवन पर 6.45 लाख रुपए और दुर्गावती पर 5.40 लाख रुपए का जुरमाना भी लगाया.  साथ ही न्यायालय ने पीडि़त बच्चों के पुनर्वास के लिए महत्त्वपूर्ण आदेश दिए.

कानून और पीनल कोड

दंपति को इंडियन पीनल कोड और पोक्सो  ऐक्ट के तहत गंभीर पेनेट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट, पोर्नोग्राफिक मकसद के लिए बच्चों का इस्तेमाल, बच्चों से जुड़े पोर्नोग्राफिक मटीरियल का स्टोरेज, उकसाना और क्रिमिनल कांसपिरेसी जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था. इस के 163 पेज के फैसले में, एडिशनल डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज प्रदीप कुमार मिश्रा की कोर्ट ने ‘रेयरेस्ट औफ रेयर’ सिद्धांत लागू किया.

कोर्ट ने कहा कि कई जिलों में इस तरह के उत्पीडऩ का बड़ा पैमाना, दोषियों की बहुत ज्यादा नैतिक गिरावट के साथ मिल कर, इसे इतना असाधारण और घिनौना अपराध बनाता है कि इस में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है, जिस से न्याय के मकसद को पूरा करने के लिए आखिरी न्यायिक रोकथाम की जरूरत है. इस फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार को 33 पीडि़तों में से हर एक को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया गया. साथ ही दंपति के घर से जब्त किया गया कैश 8 लाख रुपया भी पीडि़तों में बराबर बांटने के लिए कहा गया.

आगे की कानूनी प्रक्रिया के तहत दोषी हाई कोर्ट में अपील कर सकते हैं. वहां से राहत नहीं मिलने की स्थिति में वे सुप्रीम कोर्ट और उस के बाद राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर कर सकते हैं. इस बारे में जानकार वकील का कहना है कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए दंपति को उच्च अदालतों से राहत की संभावना कम है. भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड के मामलों की स्वचालित पुष्टि उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है, जिस के बाद ही सजा अंतिम रूप लेती है.

केस से जुड़े वकीलों ने दंपति को सजा ए मौत सुनाए जानें पर अपनी खुशी व्यक्त की

यह भी बताया जाता है कि जेई राम भवन अपनी अवैध कमाई को जमीन खरीद में निवेश करने की योजना बना चुका था, किंतु वह इस में सफल नहीं हो पाया. सीबीआई जांच में पता चला कि उस ने वर्ष 2018 में 21 बीघा जमीन खरीदने की कोशिश की थी. राम भवन ने शोभा सिंह का पुरवा स्थित एसडीएम कालोनी के पास यह जमीन खरीदने की योजना बनाई थी. इस सौदे के लिए उस ने 2 अन्य इंजीनियरों को भी अपने साथ शामिल कर लिया था. जमीन की शुरुआती मांग 18 करोड़ रुपए थी, जिस पर राम भवन ने लगभग 8 करोड़ रुपए की बोली लगाई थी.

एक साल तक चली जमीन की सौदेबाजी के दौरान वर्ष 2019 में भूस्वामी ने 14 करोड़ रुपए की कीमत तय की थी, किंतु जेई राम भवन 10 करोड़ रुपए से अधिक देने को तैयार नहीं हुआ, जिस के कारण यह सौदा नहीं हो सका. इसी बीच रामभवन की अवैध गतिविधि से धन कमाने का पता चला, जिसे जमीन में निवेश कर वैध बनाना चाहता था. सीबीआई ने उस की गिरफ्तारी के बाद जमीन के सौदे से जुड़े लोगों से गहन पूछताछ की थी. जांच एजेंसी ने उस की संभावित अवैध आय के स्रोतों की भी पड़ताल की.

स्थानीय लोगों के अनुसार, तीनों साझेदार इस जमीन पर अपने लिए अलगअलग आवास भी बनवाना चाहते थे. सौदेबाजी के दौरान कीमत को ले कर भूस्वामी और जेई के बीच मतभेद बना रहा. अंतत: 10 करोड़ रुपए से अधिक न देने की जिद के कारण सौदा रद्द हो गया. सिंचाई विभाग में कार्यरत एक कर्मचारी ने बताया कि पुराने अफसरों ने कई बार राम भवन के काम में लापरवाही की शिकायत की, लेकिन उस पर कोई काररवाई नहीं हुई, क्योंकि राम भवन की सत्ता के गलियारों के साथ ही विभाग में तगड़ी पैठ थी. कभीकभी तो वह सप्ताहसप्ताह भर दफ्तर से गायब रहता था.

उस की पैठ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी के 16 दिन बाद 18 नवंबर, 2020 को उसे निलंबित किया गया. उस का निलंबन उस समय के जिलाधिकारी शेषमणि त्रिपाठी व सिंचाई विभाग के प्रमुख अभियंता वी.के. निरंजन के आदेश पर हुआ था. यह मामला डिजिटल प्लेटफार्म के दुरुपयोग और डार्क वेब के जरिए संचालित अपराधों की गंभीरता को उजागर करता है. जांच एजेंसियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े ऐसे मामलों में तकनीकी निगरानी और अंतरराज्यीय समन्वय बेहद महत्त्वपूर्ण है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बाल यौन शोषण और औनलाइन आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ कड़ा संदेश है. अदालत ने न केवल दोषियों को कठोर सजा दी, बल्कि पीडि़त बच्चों के पुनर्वास और क्षतिपूर्ति पर भी विशेष ध्यान दिया.

दिल्ली का इंजीनियर भी बेचता था पोर्न वीडियो

जेई समेत उस की पत्नी को यौनाचार और पोर्न वीडियो बेचने के जुर्म में फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद सीबीआई इस तरह के मामले की तहकीकात काफी सक्रियता से करने लगी है. इस सिलसिले में दिल्ली के इंजीनियर मोहम्मद आकिब भी निशाने पर आ चुका है. आकिब पर भी बच्चों के यौन शोषण के वीडियो विदेशों में बेचने का आरोप है. इस संबंध में सीबीआई ने गूगल के अधिकारियों समेत 8 लोगों के बयान दर्ज करने की तैयारी की है. जल्द ही आकिब भी सीबीआई के शिकंजे में कसा जा सकता है.

दरअसल, मासूम लड़कों के साथ यौन शोषण और वीडियो बना कर बेचने के मामले में जेई राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती के साथ तीसरा आरोपी आकिब ही है. वह दंपति से वीडियो मंगवाता था और फिर उन्हें विदेशों को भेज कर मोटी कमाई करता था. इस से होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा राम भवन को भी देता था. सीबीआई के लोक अभियोजक दारा सिंह मीणा के अनुसार सालों से चल रहे इस अपराध में आकिब भी पोर्न बाजार का एक शातिर खिलाड़ी है.

उस का दोष गूगल के अधिकारियों समेत एयरटेल कंपनी व एम्स के डाक्टरों से चिकित्सीय परीक्षण की रिपोर्ट समेज कुल 8 लोगों से पूछताछ के बाद ही तय हो पाएगा. मोहम्मद आकिब दिल्ली का रहने वाला पेशे से इंजीनियर है. उस के खिलाफ की गई जांच में पाया गया है कि वह जेई और उस की पत्नी से ईमेल के जरिए अश्लील सामग्री मंगवाता था. उस के बाद विभिन्न देशों में इसे भेज कर मोटी कमाई करता था. UP Crime

 

UP News: चांदनी की चाहत

UP News: चांदनी वास्तव में  इतनी खूबसूरत थी कि गोरखपुर का विश्वकर्मा चौहान उस पर मर मिटा था. जबकि वह एक बेटी का बाप था. पत्नी ममता उस पर जान छिड़कती थी, लेकिन प्रेमिका चांदनी के प्यार में विश्वकर्मा एक दिन ऐसा जघन्य अपराध कर बैठा कि न वह घर का रहा और न घाट का.

विश्वकर्मा ने प्रेमिका चांदनी से मिल कर पत्नी ममता के साथ हुए विवाद के बारे में सारी बातें बताईं और उसे रास्ते से हटाने के बारे में सुझाव भी मांगा तो उस ने बड़ी खूबसूरती के साथ अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा, ”जो भी करना है, आप को करना है. मुझे तो आप के पहलू में सिर रख कर सोना है बस.’’

उधर बेटी की परवरिश के लिए ममता पति विश्वकर्मा से अपने हक के लिए दबाव बनाए हुए थी. पत्नी के दबाव से वह परेशान हो गया था. इसी बीच उस ने अपने हिस्से की गांव वाली जमीन पापा से अपने नाम रजिस्ट्री करा कर वह 35 लाख रुपए में बेच दी. जब ममता को जानकारी हुई कि पति ने गांव वाली अपने हिस्से की जमीन 35 लाख रुपए में बेच दी है तो वह उन रुपयों में से आधा हिस्सा मांगने लगी. पति ने फिर वही रटारटाया जवाब दिया कि चाहे जो कुछ भी हो जाए, उसे एक फूटी कौड़ी नहीं देगा. इस के बाद पति और पत्नी के बीच विवाद और गहराता चला गया.

ममता और विश्वकर्मा के बीच विवाद इस कदर बढ़ता चला गया कि विश्वकर्मा को ममता के नाम से ही नफरत हो गई थी और उस के खून से अपने हाथ रंगने के लिए तैयार हो गया था. उस दिन के बाद से वह पत्नी की हर गतिविधि पर नजर रखने लगा. वह उस की रेकी करने लगा था. यह घटना से करीब एक महीने पहले की बात थी. ममता अपनी बेटी को साथ ले कर शाहपुर थानाक्षेत्र के गीता वाटिका मोहल्ले में किराए के कमरे में रहती थी. यहीं रह कर वह प्राइवेट जौब कर अपनी और बेटी की परवरिश करती थी. विश्वकर्मा ने पता लगा लिया था कि वह बेटी के साथ कहां रहती है.

बात 4 सितंबर, 2025 की है. शाम साढ़े 7 बजे ममता बेटी को साथ ले कर घरेलू सामान की खरीदारी और फोटो खिंचवाने के लिए बाजार गई थी. पत्नी को घर से बाहर निकलते देख पहले से घात लगाए बैठा विश्वकर्मा अलर्ट हो गया और उस के पीछे लग गया. जहांजहां वह जाती, विश्वकर्मा उस के पीछे था. इस बात से अंजान ममता अपनी धुन में खोई बेटी के साथ बाजार की ओर बढ़ती रही. उसे इस बात का कतई अंदेशा नहीं था कि पति उस का पीछा कर रहा है.

ममता बेटी को ले कर गीता वाटिका के आसपास की दुकानों से सामान खरीद कर जेल रोड के सामने स्थित राधिका स्टूडियो में दाखिल हुई तो स्टूडियो से थोड़ी पहले विश्वकर्मा अपनी बाइक खड़ी कर के उस के वहां से आने का इंतजार करने लगा. करीब 20 मिनट बाद ममता बेटी के साथ फोटो खिंचवा कर स्टूडियो से बाहर निकली तो उसे देखते ही विश्वकर्मा का जबड़ा गुस्से से भिंच गया.

ममता स्टूडियो से जैसे ही थोड़ी आगे बढ़ी, तभी विश्वकर्मा उस के सामने आ खड़ा हुआ. पति को सामने देख कर ममता सहम गई और वहीं खड़ी हो गई. बेटी भी पापा को देख कर सकते में आ गई. अभी वह कुछ कह या समझ पाती, तब तक उस ने हेलमेट में छिपा कर रखा तमंचा निकाला और एक गोली पत्नी ममता के सीने में और दूसरी गोली बाएं कंधे पर चला दी.

गोली लगते ही ममता लहराते हुए जमीन पर गिर पड़ी और तड़पने लगी. यह देख कर बेटी अपनी जान बचा कर वहीं आसपास छिप गई. विश्वकर्मा घुटने जमीन पर टिका कर नीचे बैठ कर तड़प रही पत्नी को गौर से देखने लगा और होंठों में बुदबुदाया, ”कहा था मैं ने कि मुझ से पंगा मत ले, मत ले, लेकिन तू नहीं मानी. तूने मेरी बात मान ली होती और आराम से तलाक दे दिया होता तो तू ऐसे सड़क पर नहीं पड़ी होती, जिंदा रहती. अपनी बेटी के साथ जीती, लेकिन अपनी अकड़ के आगे तूने झुकना नहीं सीखा तो मैं कहां तुझे बख्शने वाला था. हरामजादी कहीं की…’’

इधर गोली चलने की आवाज सुनते ही व्यापारी अपनी दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिराने लगे. कुछ ही देर में वहां सन्नाटा पसर गया. इसी बीच भीड़ में से किसी ने घटना की सूचना गोरखपुर के शाहपुर थाने के इंसपेक्टर नीरज राय को दे दी. घटना की सूचना मिलते ही इंसपेक्टर राय फोर्स के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने देखा तमंचा हाथ में लिए हत्यारा विश्वकर्मा चौहान वहीं बैठा है. फिर क्या था, पुलिस ने उसे तमंचे सहित गिरफ्तार कर लिया.

आननफानन में घायल ममता को जीप में लाद कर जेल रोड स्थित विनायक नर्सिंगहोम ले जाया गया, जहां डौक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया.

मम्मी की मौत की सूचना मिलते ही मासूम बेटी लडख़ड़ा कर फर्श पर जा गिरी. वह यह समझ नहीं पा रही थी कि उस के साथ ये क्या हो रहा है. ऐसा कौन सा गुनाह किया था, जो उसे इतनी बड़ी सजा दी है. सिर से मम्मी का साया छिन गया तो वह अब किस के सहारे जीएगी? वीरान सी जिंदगी अकेले कैसे जीएगी? पुलिस ने ममता के शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए गुलरिहा स्थित बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया. पुलिस ने ममता के मोबाइल फोन से उस के बड़े भाई संदीप चौहान, जो लुधियाना में परिवार सहित रहता था, को सूचना देते हुए मौके पर आने के लिए कहा.

बहन की हत्या की सूचना मिलते ही वह  उसी रात प्राइवेट वाहन से लुधियाना से गोरखपुर के लिए रवाना हो गया था. अगले दिन यानी 5 सितंबर, 2025 को संदीप चौहान परिवार सहित गोरखपुर पहुंचा और शाहपुर थाने आया तो वहां मामा संदीप को देखते ही उस की भांजी उस से लिपट कर फफकफफक कर रोने लगी. भांजी को रोता देख कर संदीप भावुक हो उठा. सुरक्षा के लिहाज से पुलिस ने बीती रात से ही मृतका की बेटी को अपनी सुरक्षा में ले रखा था, ताकि उसे कोई नुकसान न पहुंचा सके. क्योंकि इस घटना की वही एकमात्र चश्मदीद गवाह थी.

पोस्टमार्टम के बाद में पुलिस ने ममता चौहान की लाश उस के भाई संदीप को सौंप दी थी. जहां उन्होंने राजघाट श्मशान में अंतिम संस्कार कराया और उसे साथ ले कर अपने गांव खजनी के पुरैना कटया चला गया. आरोपी विश्वकर्मा चौहान से की गई पूछताछ में कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

36 वर्षीया ममता चौहान 3 भाइयों संदीप चौहान, सनी चौहान और सुभाष चौहान के बाद जन्मी थी. घर में वह सब से छोटी थी और सब की लाडली भी थी. सब से बड़े भाई संदीप से उस की काफी निभती थी. ममता पिता के समान बड़े भाई को सम्मान देती थी.

मन जैसा नहीं था पति

ममता नाम के अनुरूप ही थी. उस की वाणी से रस टपकता था. लोग उस की प्रशंसा किए बिना रहते नहीं थे, लेकिन जिद्ïदी तो इतनी थी कि एक बार किसी काम के लिए अपनी जिद पर अड़ जाती तो उसे पूरा किए बिना पीछे हटती नहीं थी. घर ही नहीं आसपास के सभी लोग उस के इस व्यवहार से वाकिफ थे. धीरेधीरे बचपन की गलियों को पीछे छोड़ उस ने जवानी की दहलीज पर पांव रखा तो फेमिली वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी. फेमिली वालों ने उस की शादी के लिए नातेरिश्तेदारों से अच्छे लड़के की तलाश करने के लिए कह रखा था.

ममता चौहान

जल्द ही फेमिली वालों की मनोकामना पूरी भी हो गई और ममता के लिए जैसा वर चाहते थे, उन्हें हरसेवकपुरम के रहने वाले विश्वकर्मा चौहान के रूप में मिल गया था. फिर जल्द ही उन की शादी हो गई. कसरती और गठीले बदन वाला विश्वकर्मा चौहान देखने में मेहनतकश तो लगता था, लेकिन वह वैसा था नहीं. ममता ने सपनों के जिस राजकुमार की कल्पना की थी, वह वैसा निकला नहीं. पति का चरित्र रसिक और आपराधिक था, क्योंकि अपने हार्डकोर क्रिमिनल भतीजे की संगत में रह कर वह भी छोटेमोटे अपराध करने लगा था.

जब तक ममता पति की पूरी सच्चाई जानती, तब तक बहुत देर हो चुकी थी, क्योंकि तब तक वह एक बेटी की मां बन चुकी थी. धीरेधीरे बेटी बड़ी हो रही थी. पिता की आपराधिक छाया बेटी पर न पड़ेे, इसलिए वह पति को आपराधिक छवि से दूर होने के लिए समझाती रही. एक दिन ममता ने पति को समझाते हुए कहा, ”ऐ जी, तुम यह काम छोड़ क्यों नहीं देते? देखो, अब तुम्हारा परिवार है. एक बेटी भी हो चुकी है. धीरेधीरे बड़ी होगी और जब मुझ से पापा के काम के बारे में पूछेगी तो मैं उसे क्या जवाब दूंगी. क्या कहूंगी उसे कि तेरे पापा अच्छा काम नहीं करते, वह बुरे इंसान हैं तो उस के बालमन को कितना गहरा आघात पहुंचेगा. इस बारे में कभी सोचा है?’’

”यार, तुम कितना बकबक करती हो. सोने भी नहीं देती, जा चुपचाप सो जा. रात काफी गहरी हो चुकी है. इस बारे में हम सबेरे बात करते हैं. मुझे जोर की नींद आ रही है.’’ पत्नी के सवालों को सुन कर विश्वकर्मा बात इधरउधर टालमटोल कर सोने का बहाना बनाने लगा था.

”एक नहीं सुनूंगी मैं आज तुम्हारी. क्यों न पूरी रात यंू ही आंखों में कट जाए, लेकिन अपने सवालों के जबाव सुने बगैर न खुद सोऊंगी और न ही सोने दूंगी. बताइए, ये गंदा काम छोड़ कर क्यों नहीं कोई दूसरा काम करते हैं, जिस में 2 पैसों की आमदनी हो और सम्मान से जीए भी.’’

”मेरे को गुस्सा मत दिला ममता. सोने दे. कहा न, इस बारे में कल सबेरे बात करते हैं. फिर सुनती क्यों नहीं?’’ उस ने पत्नी को डांटा.

”मेरे सवालों का जबाव दे दो, चुप हो जाऊंगी. तुम्हारा कल का सवेरा कभी आता ही नहीं. सवेरा हुआ नहीं कि तैयार हो कर बाहर निकल जाओगे और फिर रात में ही घर वापस लौटोगे. तो बताओ, मैं कब तुम से बात करूं?’’

”जिसे तुम गंदा काम कहती हो, वह मेरा प्रोफेशन है, अपने प्रोफेशन से अलग रह कर जिंदा नहीं रह सकता मैं. मेरे से पहले मुझे कोई टपका दिया तो करती रह जाना शृंगार. बेवा की जिंदगी ही नसीब होगी, इसलिए तुम भी सो जाओ और मुझे भी सोने दो. बेटी सो रही है, जग जाएगी. मेरे को भी पता है कि बेटी बड़ी होगी और मेरे पेशे के बारे में जानेगी तो उसे दुख होगा. तब की तब देखी जाएगी. तब के लिए रात क्यों खराब करती हो?’’ कहते हुए विश्वकर्मा खर्राटे भरने लगा और ममता उसे देखती रह गई.

सुबह होते ही फ्रैश हो कर विश्वकर्मा नाश्ता कर के बाहर निकल गया. रात का ममता का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था. नाश्ता बना कर पति को दे तो दिया था, लेकिन गुस्से से उस का नथुना अभी भी फूल और पिचक रहा था.

सौतन लाने की थी तैयारी

विश्वकर्मा के दिन का आधा समय सोशल मीडिया (फेसबुक) देखने में बीत जाता था. यही नहीं, फेसबुक पर लड़कियों से घंटों चैटिंग करता रहता था. यह देख कर ममता जलभुन जाती थी. चैटिंग करता था सो अलग की बात थी, कई लड़कियों से उस के अफेयर चल रहे थे, जिन में चांदनी नाम की एक युवती को तो पत्नी की सौतन बनाने की तैयारी में जुटा हुआ था. पति की करतूतों से ममता के सपने आहत हो चुके थे. जो सपने आंखों में सजाए पीहर से ससुराल आई थी, सासससुर और जेठ सब के सब मम्मीपापा और भाई जैसे ही मिले, लेकिन जिस के साथ जीवन बिताना था, वही छलिया निकला. अब बेटी ही उस के जीने का एकमात्र सहारा बची थी.

पत्नी के हत्या के आरोपों में सलाखों के पीछे विश्वकर्मा चौहान

जब से पति कि चरित्र की कलई उस के सामने खुली थी, तब से उस का मन पति के प्रति घृणा से भर गया था. नफरत हो गई थी उस की सूरत से. धीरेधीरे दोनों के बीच मनभेद ने अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया था. ममता और विश्वकर्मा एक छत के नीचे रहते तो जरूर थे, लेकिन उन में अजनबियों जैसा व्यवहार था. उन के बीच में बातचीत कम होती थी, वाट्सऐप से बातें होती थीं. किसी चीज की जरूरत होती थी तो ममता उसे वाट्सऐप पर मैसेज भेज देती थी. विश्वकर्मा उसे पकड़ कर उस की जरूरतें पूरी कर देता था.

पत्नी करने लगी थी नफरत

पत्नी की नफरत भरी हरकतों से विश्वकर्मा का भी मन उस के प्रति नफरतों से भरता जा रहा था. इस का नतीजा यह हुआ कि पत्नी से दूरियां बना गर्लफ्रेंड चांदनी को घर की जीनत बनाने के ख्वाब देखने लगा. कल तक जो पति छिपछिप कर अपनी महिला दोस्तों से फेसबुक पर चैटिंग करता था, वह अब पत्नी के सामने उन से रोमांटिक बातें करता था. यह देख कर ममता जलभुन जाती थी. धीरेधीरे बेटी 10 साल की हो गई थी. मम्मी और पापा के बीच की दूरियों को समझ रही थी. उन के खटास रिश्तों को अपने प्यार की मिठास से सुंदर बनाने की अथाह कोशिश करती रही, लेकिन उस का यह प्रयास नाकाम साबित हुआ था.

दिन पर दिन पतिपत्नी के रिश्तों में खाई और गहराती जा रही थी. यह देख और सोच कर बेटी का हृदय आत्मग्लानि से भरा जा रहा था कि मेरा क्या कुसूर था, जो मम्मी और पापा के झगड़े के बीच वह पिस रही है. ममता के कंधे पर बेटी की जिम्मेदारी का बोझ आ गया था. पति इधरउधर से जो भी कमाता था, अपनी अय्याशी पर उड़ा देता था. बेटी से भी उस ने एक तरह से मुंह मोड़ लिया था. जबकि बेटी सयानी होती जा रही थी. उस का भविष्य दोनों की लड़ाईझगड़े के बीच पिसता जा रहा था. पति ने जब अपना हाथ खींच लिया तो ममता बेटी के जीवन संवारने के लिए प्राइवेट नौकरी करने लगी.

ममता के घर से बाहर नौकरी करने पर विश्वकर्मा को आपत्ति थी. पति के इस रवैए से नाखुश ममता बेटी को साथ ले कर मायके खजनी चली गई. वहां कुछ दिनों तक रही और बड़े भाई संदीप से अपना दुखड़ा रोती रही. भाई भी बहनोई के चरित्र से परेशान हो चुका था. वह भी नहीं समझ पा रहा था कि दोनों के रिश्ते को कैसे सही करूं. दोनों को समझासमझा कर थक चुका था, लेकिन इस का नतीजा सिफर ही निकला.

पत्नी ममता के मायके में रहने से विश्वकर्मा चौहान स्वच्छंद जीवन जी रहा था. उस के जीवन में कई लड़कियों ने अपना बसेरा डाल रखा था. समयसमय पर वह सभी के साथ फ्लर्ट करता था. उन लड़कियों में एक लड़की सब से अलग मिजाज की थी, जिस का नाम था चांदनी. बिलकुल चांदनी के माफिक उजली गोरीचिट्टी, मानो खुद चांदनी धरा पर अपनी छटा बिखेर रही हो. उस से टूट कर प्यार करता था विश्वकर्मा. वह भी उसे दिल की गहराइयों तक प्यार करती थी. उस के प्यार में अंधी थी वह.

विश्वकर्मा के जीवन में चांदनी के आने के बाद उस के जीने का तौरतरीका ही बदल गया था. पत्नी ममता तो उसे फूटी आंख नहीं भा रही थी. वह चाहता था कि पत्नी से जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी आजादी मिल जाए तो चांदनी के साथ शादी कर के आगे का जीवन मजे से जीए. लेकिन ममता एक पढ़ीलिखी, मेहनतकश और मजबूत इरादों वाली महिला थी. इतनी आसानी से वह पति को आजादी देने वाली नहीं थी. कसम खा ली थी कि शरीर के चाहे टुकड़ेटुकड़े हो जाएं, पति को आजादी नहीं दूंगी.

पति के चालचलन से खीझ कर ही वह बेटी को साथ ले कर मायके चली गई थी. पत्नी के मायके जाने से विश्वकर्मा चौहान की जिंदगी में जैसे बहार आ गई थी. पत्नी के इस फैसले से वह बेहद खुश था, जैसे उस की मुराद पूरी हो गई थी. विश्वकर्मा चौहान का मकान पूरी तरह से खाली था. मम्मीपापा गांव में रहते थे. एक भाई था, वह भी अपने परिवार के साथ अलग रहता था. पत्नी के मायके जाने के बाद उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था.

पत्नी के जाने के बाद अपनी प्रेमिका चांदनी को वह अपने घर ले आया था. एक मेहमान की तरह उस ने उस की खूब आवभगत की. बढ़चढ़ कर उस की खातिरदारी की. अपनी शानदार आवभगत से चांदनी बहुत खुश हुई. अपनी भावनाओं को वह रोक नहीं पा रही थी. आखिरकार उस ने कह ही दिया, ”बहुत खुश हूं मैं आप की मेहमाननवाजी से. मेरा दिल भर गया. नहीं जानती थी कि आप मुझे से इतना प्यार करते हो. मेरे लिए आप के दिल में इतना सम्मान है, चाहत है, बेपनाह इश्क है.’’

”सो तो है,’’ विश्वकर्मा अपना अपना दायां हाथ बाएं सीने से सटा कर अदब से झुक कर बोला था, ”मैं चीज ही ऐसा हूं जनाबेआली. मेरी अनोखी खातिरदारी से अच्छेअच्छे लोग पिघल जाते हैं. फिर आप फिसली तो क्या फिसली.’’

”अच्छा!’’ चांदनी चहक कर बोली, ”जनाब को खुद के आदरसत्कार पर बड़ा नाज है, लगता है.’’

”जी, मोहतरमा. कोई शक.’’

”नहीं,’’ कह कर दोनों ने एकदूसरे को प्यारभरी नजरों से देखते हुए ठहाके लगाए.

हालांकि इस से पहले भी विश्वकर्मा चांदनी को अपने घर पर कई बार ले कर आ चुका था, मगर दोनों को जितना आनंद आज के दिन आया था, उतना आनंद इस से पहले कभी नहीं आया था.

खैर, ठहाका लगातेलगाते वह चांदनी के बगल में बैठ गया तो वह भी गंभीर हो

बिखरे आंचल को सहेजने लगी और सहज हो गई.

जेल रोड स्थिर राधिका स्टूडियो जहां बेटी के साथ फोटो खिचवाने पहुंची थी ममता चौहान

पलभर के लिए कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया था. दोनों के दिलों की धड़कनें तेज हो गई थीं. प्रेम अग्नि में उन के तनबदन तपने लगे थे. एक अजीब सी ठंडीठंडी सुरहुरी चांदनी के बदन में उठ रही थी. उस का रोमरोम खिल उठा था. विश्वकर्मा धीरेधीरे बेकाबू हो रहा था. चांदनी भी उस की तपिश में पिघलती जा रही थी. इश्क की आग में दोनों बराबर जल रहे थे. विश्वकर्मा के छूते ही वह छुइमुई की तरह सिकुड़ती जा रही थी. उस के पूरे बदन में झुरझुरी पैदा हो गई थी. सांसें धौंकनी की तरह तेजतेज चलने लगी थी. वह बेकाबू होती जा रही थी, फिर भी खुद पर नियंत्रण रखे हुई थी. वह आहिस्ता से बोली, ”बस, मुझे और बेकाबू मत कीजिए, वरना जूठी हो जाऊंगी.’’

प्यार में हुआ अंधा

”रोको मत, मुझे. हो जाने दो बेकाबू मुझे. आज पूरी तरह समा जाना चाहता हूं मैं.’’ विश्वकर्मा मद्धिम स्वर में बोला.

”नही…नहीं.’’ चांदनी कसमसा उठी, ”अभी नहीं. आप जब पूरी तरीके से मुझे पूरा अधिकार देंगे, तभी मैं सौंपूंगी खुद को आप के हवाले.’’

”कैसी बातें करती हो मेरी जान. तुम तो मेरी हो और मैं तुम्हारा हूं. क्या मुझ पर और मेरे प्यार पर तुम्हें भरोसा नहीं है.’’

”पूरा भरोसा है, यकीन भी है, लेकिन…’’

”लेकिन क्या?’’

”अब और सहन किया नहीं जा रहा है, मुझ से. समा जाने दो मुझे तुम में.’’

”नहीं…नहीं…अभी नहीं. शादी से पहले नहीं.’’

”जिद मत करो, चांदनी. तुम्हारी दूरी तनिक भी बरदाश्त नहीं हो रही है. 2 जिस्म एक जान हो जाने दो हमें. अपने प्यार की एक नर्ह कहानी अपने जिस्म पर लिख लेने दो हमें.’’ वासना की आग में जलता हुआ विश्वकर्मा बोले जा रहा था. जबकि प्रेमिका चांदनी लगातार उस से दूरियां बनाए हुए थी.

”देखिए, इस वक्त आप पूरी तरह बहक रहे हैं. ऐसे में कोई ऊंचनीच हो जाएगी तो समाज हम पर थूकेगा. कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी मैं. सो प्लीज, मेरी बात मान जाइए और दूर हो जाइए.’’

प्रेमिका की बात सुन कर विश्वकर्मा के सिर से रोमांस का भूत उतर गया और वह बुरी तरह झल्ला उठा. वह बोला, ”अच्छेखासे मूड का तुम ने कचरा बना दिया.’’

”मैं ने क्या किया, जो आप इतना बिदक रहे हो.’’ चांदनी के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान थिरक रही थी, ”मैं ने थोड़ा सा सामाजिक आइना ही तो दिखाया आप को. यही कहा न कि अभी नहीं. जो करना है शादी के बाद करना है तो भला इस में क्या गलत कहा. इतने ही उतावले हो रहे हो मेरे जिस्म को पाने के लिए तो क्यों नहीं अपनी बीवी को तलाक दे रहे हो.’’ चांदनी के स्वर में अजीब सी तल्खी थी, जैसे सीधे छुरी उस के सीने में उतार दिया हो.

”क्या बेवकूफों की तरह बकवास करती हो तुम?’’

”आ…ह…हा… अब मेरी बात बेवकूफों की तरह लगने लगी.’’

”हां, तो…’’

”तो क्या? कुछ भी गलत तो नहीं कहा मैं ने. अपनी बीवी को तलाक दे दीजिए, मुझ से शादी कीजिए और मेरी जवानी के मजे लीजिए.’’

”तलाक…तलाक…तलाक… क्यों मेरे दिमाग का दही बना रही है. दे दूंगा, उसे तलाक भी दे दूंगा, पर आज का दिन तो मत खराब कर मेरी जान. मजे तो लूट लेने दे, क्यों तड़पा रही हो, क्यों सता रही हो अपने दीवाने को. बेचारा मुफ्त में मर जाएगा तेरी इस नानुकुर में.’’

”अपने राजा को ऐसे थोड़े ही न मरने दूंगी मैं,’’ शरारत भरे अंदाज में चांदनी बोली, ”अभी तो मेरे राजा को जन्नत की सैर करानी बाकी है.’’

”देख चांदनी, तू मेरे को ऐसे मत सता, मेरा मूड खराब हुआ तो…’’

ममता चौहान की मां

”तो…तो…क्या करोगे जानू.’’ चांदनी ने प्रेमी को जलाने के लिए उसे छेड़ा, ”जान से मार देंगे?’’

”अरे नहीं, यही तो नहीं कर सकता मैं. ऐसा करने से पहले मैं मर जाऊंगा. तू तो मेरी जान है. मेरे रगों में बहने वाला खून है. भला तुम्हें क्यों मारूंगा. अब तो कुछ न कुछ जल्द सोचना ही पड़ेगा.’’

”किस बारे में?’’

”तुम्हारे बारे में.’’

”मतलब?’’

”मतलब, तुम से दूर रह कर तो जी नहीं सकता और तू करीब आने नहीं देगी तो मुझे पत्नी के तलाक के बारे में सोचना ही पड़ेगा. जितनी जल्द उसे तलाक दूंगा, तभी तो तुम्हें अपने घर की जीनत बना सकंूगा.’’

”अब की है मुद्ïदे की बात. बीवी को तलाक दे दीजिए, ये जीनत उसी दिन आप की हो जाएगी.’’

”ठीक है, मैं ममता को तलाक देने के लिए किसी अच्छे वकील से मिल कर आगे की प्रोसेस करता हूं.’’

”ठीक है, चलती हूं मैं, बहुत देर हो चुकी है मेरे को आए, बाय…बाय…’’ कह कर चांदनी अपने घर के लिए रवाना हो गई तो विश्वकर्मा भी उसे बाय बाय बोल कर बाहर तक छोड़ कर आया और थोड़ा नाश्ता कर के फिर सो गया.

चांदनी से बात कर के विश्वकर्मा की खुशी का ठिकाना नहीं था तो चांदनी भी कुछ कम खुश नहीं थी. प्रेमी के साथ बिताए पल को सोचसोच कर उस का रोमरोम खिल उठा था और यही सोच रही थी कि काश! उस खूबसूरत पल को कैद कर लेती तो कितना अच्छा होता. कब मेरा प्यार, दुल्हनिया बना कर मुझे अपने घर ले जाएगा, वह पल कब आएगा.

तलाक को उकसाया

उस दिन के बाद से चांदनी दिन भर में विश्वकर्मा को 2-3 बार फोन कर के पत्नी को तलाक देने के लिए उकसा दिया करती थी. प्रेमिका का फोन आते ही वह विचलित हो जाता था. और उसे भरोसा दिलाता था कि जल्द से जल्द ममता को तलाक दे देगा और उसे अपनी दुल्हन बना कर ले आएगा. इस बारे में वकील से बात कर ली है. थोड़ा वक्त उसे और दे दे. विश्वकर्मा चांदनी को आश्वासन दे चुका था कि पत्नी ममता को जल्द ही तलाक दे देगा, लेकिन वह जानता था उसे तलाक दे पाना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वह खुद ही इतनी आसानी से उसे आजाद नहीं कर रही थी.

विश्वकर्मा का एक भतीजा बदमाश था. लूट, हत्या, छिनैती, हत्या के प्रयास जैसे तमाम संगीन जुर्मों में वांछित चल रहा था. वह पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया गया था. भतीजे की धमक से विश्वकर्मा बेहद प्रभावित था. वह भी उसी ढर्रे पर चल निकला था. काफी सारे दुश्मन उस ने अपने आस्तीन में पाल लिए थे. अपनी सुरक्षा के मकसद से वह अपने पास एक अवैध तमंचा रखता था. चांदनी के प्यार में विश्वकर्मा इस कदर अंधा हो चुका था कि उसे पत्नी ममता और बेटी की सूरत दिखाई नहीं दे रही थी, उसे तो बस कपड़े की तरह औरतें बदलने की आदत बन चुकी थी.

वारदात की सूचना मिलने पर घटनास्थल पर पहुंची पुलिस

फ्लर्ट तो वह कई लड़कियों के साथ करता था, लेकिन चांदनी उसे इस कदर भा गई थी कि उसे पत्नी बनाने के लिए ठान लिया था, इसीलिए वह पत्नी को तलाक दे देना चाहता था. उस ने तलाक की अरजी न्यायालय में दाखिल भी कर दी थी. इस के बाद वह ममता से कोर्ट में गवाही देने के लिए दबाव बनाने लगा था, ताकि दोनों अपनी जिंदगी अपने तरीके से खुल कर जी सकें. पति विश्वकर्मा से ममता ने साफ शब्दों में कह दिया था कि न वह उसे तलाक देगी और न ही मनमानी करने देगी. भले ही जान ही क्यों न चली जाए.

आखिर एक बेटी है, जो सयानी हो रही है, उसे पढ़ाना है, उस का जीवन संवारना है. यदि पति गांव में स्थित अपने हिस्से वाला पूरा खेत मेरे नाम कर दे तो सोचूंगी.

पति कर बैठा क्राइम

विश्वकर्मा जानता था कि ममता उसे आसानी से तलाक नहीं देने वाली है. यानी  घी सीधी अंगुली से निकलने वाला नहीं है. फिर तो अंगुली टेढ़ी करनी ही पड़ेगी. उस ने तय कर लिया कि यदि ममता मेरी आजादी की राह में रोड़ा बन रही है तो इसे मौत के घाट उतारना ही पड़ेगा. ममता ने भी अदालत में खर्चे का दावा ठोक दिया था. पति की अय्याशी का जवाब देने के लिए सोशल मीडिया पर रोमांटिक रील बनाबना कर पोस्ट करने लगी थी. ममता का यह रुख देख कर वह और बौखला गया था, लेकिन खिसियानी बिल्ली की तरह सिर्फ खंभा नोच कर रह गया था. इधर ममता मायके से वापस लौट कर शाहपुर थानाक्षेत्र के गीता वाटिका मोहल्ले में एक किराए का कमरा ले कर बेटी के साथ रह रही थी. वहीं रह कर वह नौकरी पर जाती थी.

इधर विश्वकर्मा यह पता लगा रहा था कि ममता ने अपना नया ठिकाना कहां बनाया है. आखिरकार उस ने पता लगा ही लिया था कि वह गीता वाटिका कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहती है. पते की बात तो यह थी कि जिस दिन से ममता ने बेटी को अपने साथ ले कर पति का घर छोड़ा था, उस के लिए दूसरी औरत को ले आने का रास्ता खुल गया था. दूसरी औरत यानी प्रेमिका चांदनी को घर ला कर उस के साथ रंगरेलियां मनाता था. वह अपने आशिक विश्वकर्मा पर पत्नी ममता से तलाक लेने के लिए बराबर दबाव बना रही थी.

विश्वकर्मा ममता के उस फैसले से और खार खाए हुए था, जिस में उस ने भरणपोषण के लिए अदालत में याचिका दायर की थी. और वह उसे अपने हिस्से में से एक फूटी कौड़ी देने के लिए तैयार नहीं था. और फिर 4 सितंबर, 2025 की रात जेल रोड के सामने उस की गोली मार कर हत्या कर दी. कथा लिखे जाने तक आरोपी विश्वकर्मा चौहान जेल की सलाखों के पीछे था. पत्नी की हत्या का उसे जरा भी मलाल नहीं था. इस बात की उसे खुशी थी कि अब उसे पैसे नहीं देने पड़ेंगे, लेकिन उस ने तनिक भी नहीं सोचा कि मासूम बेटी का क्या होगा? वह किस के सहारे जीएगी? उस का सहारा कौन बनेगा?

हैवानियत की पराकाष्ठा पर उतर आए विश्वकर्मा ने तनिक भी सोचा होता कि वह जो कर रहा है, गलत कर रहा है तो शायद उस की खुशहाल गृहस्थी बची रहती और बेटी अपने पेरेंट्स के प्यार से महरूम नहीं होती. UP News

(कथा में चांदनी परिवर्तित नाम है)

 

 

MP News : शिवसेना नेता अनुपमा का जिस्मफरोशी के धंधे का पर्दाफाश

MP News : शिवसेना नेत्री अनुपमा तिवारी की इलाके में एक समाजसेवी, साहित्यकार और पत्रकार के रूप में पहचान थी. लेकिन जब पुलिस ने उसे जिस्मफरोशी का धंधा करने के आरोप में गिरफ्तार किया तो उस भगवाधारी की ऐसी कलई खुली कि…

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सब से नजदीकी जिले सीहोर की दूरी महज 35 किलोमीटर है. इंदौरभोपाल रोड पर हाईवे बन जाने के बाद से यह दूरी महज आधे घंटे में तय हो जाती है. एक तरह से सीहोर भोपाल का ही हिस्सा बनता जा रहा है क्योंकि ये दोनों शहर तेजी से एकदूसरे की तरफ बढ़ रहे हैं.  शहरीकरण का असर ही इसे कहेंगे कि छोटे और घनी बसाहट वाले कसबे सीहोर में भी कालोनियों और अपार्टमेंटों की बाढ़ सी आती जा रही है, जो सारे के सारे बाहर की तरफ बन रहे हैं.

लेकिन सीहोर की पहचान पुराने शहर से ही है खासतौर से बसस्टैंड से, जो शहर को चारों तरफ से जोड़ता है. इस बसस्टैंड पर देर रात तक चहलपहल रहती है. बसस्टैंड के आसपास कई पुराने मोहल्लों में से एक है हाउसिंग बोर्ड कालोनी, जहां आधे पक्के और आधे कच्चे मकान बने हुए हैं. यहीं से आधा किलोमीटर दूर स्थित है सिटी कोतवाली, जो कोतवाली चौराहे पर स्थित है. आमतौर पर बसस्टैंड के आसपास के मोहल्लों में पुश्तों से रह रहे लोग ही ज्यादा हैं और सभी एकदूसरे को जानते हैं. इसी बसस्टैंड के पास एक मकान या योग आश्रम, कुछ भी कह लें, अनुपमा तिवारी का भी है. जिन के बारे में लोग ज्यादा कुछ नहीं जानते सिवाय इस के कि वह शिवसेना की नेत्री हैं.

साल 2015 में वह नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव भी इसी पार्टी से लड़ी थीं, जिस के राष्ट्रीय मुखिया कभी बालासाहेब ठाकरे जैसे आक्रामक और कट्टरवादी हिंदू नेता हुआ करते थे और आजकल उन के बेटे उद्धव ठाकरे इन दिनों कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं. शिवसेना की कोई खास पूछपरख सीहोर ही क्या पूरे मध्यप्रदेश में नहीं है. शायद इसीलिए अनुपमा तिवारी को 700 वोट भी नहीं मिले थे और उस की जमानत जब्त हो गई थी. छोटे शहरों में जो स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ लेता है उसे पूरा शहर जानने लगता है, यही अनुपमा के साथ हुआ था कि सीहोर के लोग उस के नाम से परिचित हो गए थे. चुनाव हार चुकी अनुपमा ने हिम्मत नहीं हारी और वह समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हो गई.

छोटेमोटे जुलूस और धरनेप्रदर्शनों में शिवसेना की अधेड़ और सामान्य दिखने वाली नेत्री अनुपमा तिवारी के इर्दगिर्द कुछ महिलाएं भी नजर आने लगीं तो लोग और मीडिया उस का नोटिस भी लेने लगे और शायद यही वह चाहती थी. कुछ कर गुजरने की कशिश के चलते महत्त्वाकांक्षी अनुपमा ने सन 2017 में शहर के व्यस्ततम कोतवाली चौराहे पर शराब के विरोध में धरना दिया था और शराब को प्रतिबंधित करने की उस की मांग न माने जाने पर हाहाकारी आंदोलन की चेतावनी दी थी. उस वक्त उस के साथ महिलाओं की संख्या पहले के मुकाबले कुछ ज्यादा थी.

यह धरना शिवसेना गौजन कल्याण संघ के बैनर तले दिया गया था, जिस की प्रमुख अनुपमा तिवारी खुद थी और उस का साथ दे रही महिलाओं को महिला बिग्रेड कहा गया था. इस धरने से भी कुछ हासिल नहीं हुआ, लेकिन अनुपमा को लोग अब अच्छे से पहचानने लगे थे. धीरेधीरे अनुपमा फुलटाइम समाजसेवी होती गई और कई छोटेबड़े समारोहों में नजर आने लगी. महिला हितों की बात करते रहने से फायदा यह हुआ कि उस के आसपास दुखियारी पीडि़त महिलाएं इकट्ठा होने लगीं जिन्हें बड़ी उम्मीद रहती थी कि कोई और उन की बात सुने न सुने, लेकिन अनुपमा दीदी जरूर सुनेंगी और जरूरत पड़ी तो उन के हक में लड़ेंगी भी.

इस सक्रियता का ही नतीजा था कि उसे 21 जून, 2018 को नेहरू युवा केंद्र सीहोर के एक कार्यक्रम में अपर कलेक्टर द्वारा सम्मानित किया गया था. सम्मान की वजह थी उस का योगाचार्य होना. इस समारोह में वह राजनीति में सक्रिय और सफल साध्वियों जैसी भगवा ड्रेस पहन कर गई थी, इसलिए भी आकर्षण का केंद्र रही थी. एक चेहरे पर लगाए कई चेहरे अनुपमा अब तक योगाचार्य ही नहीं रह गई थी, बल्कि नेत्री और समाजसेवी के अलावा वह एक पत्रकार व साहित्यकार के रूप में भी प्रचारित हो चुकी थी. बसस्टैंड वाले मकान में अब अनुपमा का छोटामोटा दरबार भी लगने लगा था, जहां हैरानपरेशान औरतें अपना दुखड़ा ले कर आती थीं और अनुपमा से मदद की गुहार लगाती थीं.

राजनीति और समाजसेवा के इस नए मठ को सीहोर के लोग अब उत्सुकता से देखने लगे थे, जो आश्रम कहलाता हुआ एक शक्ति केंद्र भी बनता जा रहा था. अनुपमा अब औरतों से ताल्लुक रखते राष्ट्रीय मुद्दों पर भी बोलने लगी थी. अपनी आवाज में दम लाने के लिए उस ने सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहना शुरू कर दिया था और तमाम प्लेटफार्मों पर वह दिग्गज सियासी हस्तियों के साथ अपने फोटो व उपलब्धियां भी शेयर करने लगी थी. यह और बात थी कि उसे न तो ज्यादा फालोअर्स कभी मिले और न ही उस का अपना बड़ा प्रशंसक वर्ग बन पाया. लेकिन कुछ महिलाएं जरूर उस की मुरीद हो गई थीं, जिन से वह औफलाइन भी बड़ीबड़ी क्रांतिकारी बातें शेयर करने लगी थी.

ऐसी ही एक पोस्ट उस ने 8 नवंबर, 2017 को शेयर की थी जिस में लिखा था— प्रदेश में महिलाएं सुरक्षित नहीं, बच्चियां वहशी दरिंदों का शिकार हो रही हैं. इत्तफाक से ठीक 4 साल बाद 8 नवंबर, 2021 को ही अनुपमा तिवारी पुलिस की गिरफ्त में आ गई. आरोप था महिलाओं से देह व्यापार करवाना. इन 4 सालों में सीहोर की पार्वती नदी का पानी बहुत बह चुका था और यह अनुपमा अब सैक्स रैकेट की सरगना के तौर पर भी जानी गई, जिस की सीहोर वासियों को कोई खास हैरानी नहीं हुई. क्योंकि जो वह कर रही थी, उस से पूरा शहर वाकिफ हो चुका था.

छापे के बाद लोग हुए हैरान सीहोर के युवा एसपी मयंक अवस्थी को सीहोर आए अभी 2 महीने ही पूरे हुए थे. पदभार संभालते ही उन्हें शिकायतें मिलने लगी थीं कि बसस्टैंड के नजदीक धड़ल्ले से देह व्यापार का अड्डा संचालित हो रहा है जिस की कर्ताधर्ता एक पहुंच वाली और रसूखदार नेत्री है. मुखबिर भी लगातार खबर दे रहे थे कि यह अड्डा कौन संचालित करता है और कैसे काम करता है. इतना ही नहीं, मोहल्ले के लोग भी नाम से और गुमनाम शिकायतें पुलिस को कर चुके थे कि इस मकान में सैक्स रैकेट के चलते उन का वहां रहना मुहाल हो रहा है लिहाजा पुलिस सख्त काररवाई करे.

मयंक अवस्थी ने अनुपमा की कुंडली खंगाली तो उन्हें आरोप व शिकायतें सच और अनुपमा की गतिविधियां संदिग्ध लगीं. लिहाजा उन्होंने सीएसपी समीर यादव की अगुवाई में एक टीम गठित कर दी, जिन के निर्देशन में थानाप्रभारी कोतवाली अर्चना अहीर और उन के साथियों ने 8 नवंबर, 2021 को योजनाबद्ध तरीके से अनुपमा के घर पर छापा मार दिया. जैसे ही पुलिस टीम मकान के अंदर पहुंची तो तीनों कमरों में योगासनों की जगह वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित कामासनों और अय्याशी का खुला खेल चल रहा था. शबाब के साथसाथ शराब भी थी, कंडोम भी थे और उत्तेजक अश्लील सामग्री भी थी, जो इस तरह के हर छापे में आमतौर पर मिलती ही हैं.

एक कमरे में मसाज बैड भी था और बड़ी स्क्रीन वाला टीवी भी दीवार पर टंगा था. जब पुलिस टीम बाहर टोह ले रही थी, तब इस मकान से तेज आवाज में संगीत की भी आवाज आ रही थी. जाहिर है मौजमस्ती के शौकीन गुलाबी सर्दी को पूरी तरह एंजौय कर रहे थे, जिन की सारी खुमारी पुलिस टीम को सामने खड़ा देख हवा हो गई थी. कमरों की मुकम्मल तलाशी के बाद जब आरोपियों को लाइन में खड़ा किया गया तो उन के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं. रंगेहाथों पकड़े जाने के कारण किसी के पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं था. शुरुआती पूछताछ में यह बात साफ हो गई कि चारों महिलाएं भोपाल की उपनगरी बैरगढ़ से धंधा करने आईं थीं, जिन का अपना एक वाट्सऐप ग्रुप भी था. ग्राहकों और कालगर्ल्स को इंदुलता नाम की एक महिला मैनेज करती थी.

पकड़े गए चारों ग्राहक सीहोर के ही थे जिन के हावभाव देख साफ लग रहा था कि वे इस अड्डे से अच्छी तरह वाकिफ थे, लेकिन इस बार गच्चा खा गए थे. क्योंकि पुलिस ने अनुपमा मैडम के नाम और रसूख का कोई लिहाज नहीं किया था. कानूनी खानापूर्ति के बाद आरोपियों को थाने लाया गया, लेकिन उस के पहले ही इस छापे की खबर जंगल की आग की तरह सीहोर से भोपाल होती हुई पूरे मध्य प्रदेश और देश में फैल गई थी, जिस की इकलौती वजह यह थी कि इस गिरोह की सरगना शिवसेना की नेत्री थी, जो नगर पालिका अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़ चुकी थी.

पुलिस टीम ने मौके से 10 मोबाइल फोन और 28 हजार रुपए नगद भी जब्त किए. 2 लग्जरी कारें भी मकान के बाहर से बरामद की गईं. सभी आरोपियों के खिलाफ थाना कोतवाली सीहोर में अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत काररवाई की गई. पुलिस टीम में एसआई प्रिया परते और पूजा राजपूत के अलावा कांस्टेबल कुलदीप, चंद्रभान व विक्रम शामिल थे. बदनामी के डर से कांप रहे आरोपियों और महिलाओं ने उस वक्त चैन की सांस ली, जब उन्हें देर रात थाने से ही बांड भरवा कर जमानत दे दी गई.

गलत क्या कर रही थी अनुपमा अनुपमा ने देह व्यापार की बात स्वीकारी क्योंकि यह तो छापे में ही साबित हो चुका था कि ग्राहकों ने कालगर्ल्स को 500-500 रुपए के हिसाब से भुगतान किया था और ये महिलाएं बैरागढ़ से आई थीं. अनुपमा के पति की मौत कोई 3 साल पहले हो चुकी थी. इस के बाद उसे पैसों की किल्लत होने लगी थी. कुछ दिन मायके होशंगाबाद में रहने के बाद वह ससुराल सीहोर वापस आई और समाजसेवा के काम में जुट गई. लेकिन इस के बाद वह इंदौर चली गई थी. इस दौरान वह सीहोर कभीकभार आती रही लेकिन उस की गतिविधियां और सक्रियता कम हो रही थीं.

आजकल समाजसेवा भी मुफ्त में नहीं होती फिर अनुपमा के खर्चे तो अनापशनाप थे. विधवा होने की त्रासदी भुगत रही अनुपमा ने देखा कि उस के जैसी कई विधवाएं और परित्यक्ताएं बदहाल जिंदगी जी रही हैं. कइयों के पति निकम्मे और शराबी हैं तो कुछ का चक्कर इधरउधर चल रहा है. ऐसी औरतों को कमानेखाने और बच्चे अगर हों तो उन की परवरिश और स्कूलिंग के लिए पैसों के लाले पड़े रहते हैं और उन की कोई सगे वाला तो दूर की बात है दूर वाला भी मदद नहीं करता और जो करता है वह उन से कुछ न कुछ चाहता जरूर है. अनुपमा ने कुछ सोचा और फिर इन बेसहाराओं और जरूरतमंदों की मदद करने की गरज से उन से देहव्यापार करवाना शुरू कर दिया, जिस से उसे भी दलाली के जरिए खासी आमदनी होने लगी.

अनुपमा के संपर्क में लगभग 15 महिलाएं थीं और एकदो को छोड़ कर सभी अधेड़ सी थीं, जिन की अपने पतियों से पटरी नहीं बैठती थी या पतियों ने उन्हें छोड़ रखा था यानी वह इस धंधे में शादीशुदाओं को ही लाती थी. क्योंकि ग्राहक से ज्यादा वे राज उजागर होने से डरती थीं. पैसों के लिए देह व्यापार का शार्टकट अपनाने के लिए अनुपमा ने उन्हें उकसाया और समझाया था, कोई जोरजबरदस्ती की होगी, जैसा कि पुलिस और मीडिया वाले कह रहे हैं, ऐसा लग नहीं रहा. जिस का खुलासा अदालत में हो जाएगा. सीहोर में पकड़े गए रैकेट में सभी महिलाएं अधेड़ और वक्त की मारी थीं, जिन का इकलौता आर्थिक और सामाजिक सहित भावनात्मक सहारा भी अनुपमा ही थी.

अनुपमा ने कानूनन जरूर जुर्म किया है जो अगर साबित हो पाया तो उसे सजा भी मिलेगी. लेकिन देखा जाए तो उस ने बेसहारा औरतों को होने वाले मुफ्त के शारीरिक शोषण को सशुल्क कर दिया था, जिस से उन्हें किसी के आगे हाथ नहीं पसारना पड़ता था. अनुपमा के पास बड़ा मकान था और उस का अपना एक अलग रुतबा भी था, जिस का फायदा उठा कर उस ने देह व्यापार का आदिम धंधा शुरू कर दिया. यह भी सोलह आने सच है कि पुलिस उस पर हाथ डालने से कतरा रही थी क्योंकि उस के तार कई दिग्गजों से जुड़े थे. लेकिन गिरफ्तारी के बाद चर्चा के मुताबिक कोई बड़ा नाम सामने नहीं आया तो तमाम अटकलों पर विराम लग गया और अनुपमा को भी समझ आ गया कि लोग लुत्फ और फायदा तो उठाने में पीछे नहीं रहते, लेकिन कीचड़ को भी माथे से नहीं लगाते. हर कोई पाकसाफ दिखना चाहता है.

यह भी हर्ज या ऐतराज की बात नहीं, पर सीहोर का यह छापा सोचने को मजबूर करता ही है कि हैरानपरेशान और जरूरतमंद औरतें देह व्यापार में क्यों आती हैं और इन्हें सजा देने से अब तक किस को क्या हासिल हुआ है. देह व्यापार जब कानून से बंद नहीं हो सकता तो इसे कानूनी मान्यता देने में हर्ज क्या है. MP News

 

Family Dispute : नफरत का खौफनाक अंजाम

Family Dispute : पति नीरज से अनबन हो जाने के बाद आयशा अपने 12 वर्षीय बेटे सक्षम के साथ मायके में रहने लगी थी. पत्नी के प्रति नीरज के मन में उपजी इस नफरत का ऐसा खौफनाक अंजाम निकला कि…

21 अक्तूबर, 2021 की रात के करीब साढ़े 11 बजे फरीदाबाद के गोठड़ा मोहब्ताबाद का रहने वाला गगन (26 वर्ष) अपने परिवार के साथ खाटू श्याम के दर्शन कर के घर लौटा था. गगन हर साल इसी समय के आसपास अपने पूरे परिवार के साथ खाटू श्याम मंदिर में दर्शन के लिए जाया करता था. उस मंदिर के प्रति उस की आस्था बहुत थी. वह इस साल अपनी माता सुमन (50 वर्ष), अपनी बहन आयशा (30 वर्ष), अपने छोटे भांजे सक्षम (12 वर्ष) और अपने दोस्त राजन शर्मा के साथ मंदिर में दर्शन कर के लौटा था.

गगन राजन के साथ ही फरीदाबाद सेक्टर 55-56 में प्रौपर्टी डीलिंग और पुरानी गाडि़यों की खरीदफरोख्त का काम करता था. इस से पहले गगन अपने परिवार के साथ फरीदाबाद सेक्टर 55 में किराए पर ही रहता था. लेकिन इसी साल सितंबर में उस ने गोठड़ा मोहब्ताबाद में किराए के एक मकान में, जो कि एक पूर्व सरपंच का मकान है, वहां रहने लगा था. उस के पुराने घर से इस नए मकान के बीच करीब 30 मिनट पैदल की दूरी थी. 21 अक्तूबर को मंदिर से दर्शन कर देर रात घर लौटने की वजह से गगन ने राजन को अपने घर पर ही रुकने का आग्रह किया था, क्योंकि रात बहुत हो चुकी थी और वह अपने इलाके में देर रात होने वाली घटनाओं और वारदातों के बारे में अच्छे से जानता था.

राजन ने भी गगन की बात मान ली और वह उस रात उसी के घर पर ही रुक गया. देर रात को लंबा सफर कर के लौटे सभी लोग पहले फ्रैश हुए और हलकाफुलका खाना खा कर वे सब सोने के लिए अपनेअपने कमरे में चले गए. आयशा व उस की मां सुमन मकान में नीचे के कमरे में सोने चली गईं और गगन, राजन वह सक्षम पहली मंजिल पर सोने चले गए. सब थकेहारे थे तो हर किसी को जल्दी नींद भी आ गई थी और सभी गहरी नींद में सो भी गए थे. बस सक्षम ही रात को जागा हुआ था.

नींद तो सक्षम को भी तेज आ रही थी, लेकिन वह किसी का बहुत बेसब्री से इंतजार कर रहा था. वह रात को जगे हुए अपने मम्मी के फोन में गेम खेल रहा था. रात के करीब ढाई बजे के आसपास उस का फोन बजा. इस से पहले कि फोन की घंटी हर किसी को नींद से जगा देती कि उस से पहले ही सक्षम ने तुरंत फोन उठा लिया. यह उस के पिता नीरज चावला (35 वर्ष) का फोन था. सक्षम ने फोन उठा कर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘हैलो पापा.’’

नीरज अपने बेटे को पुचकारते हुए बोला, ‘‘अरे मेरा बेटा कैसा है? खाटू श्याम घूम कर आ गए सब? कैसा लगा वहां घूम कर? मजा आया?’’

सक्षम ने फिर से फुसफुसाते हुए अपने पिता के सवालों का जवाब दिया, ‘‘जी पापा. वहां तो खूब मजा आया पापा. काश! आप भी साथ होते और मजा आता. हमें तो काफी रात हो गई थी वहां से वापस आते हुए.’’

ये सुन कर नीरज ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटे. सुनो, जो हमारी बीच बात हुई थी तुम्हें याद है न?’’

सक्षम ने उत्सुकता के साथ कहा, ‘‘जी पापा, मुझे याद है. आप क्या लाए हो मेरे लिए?’’

नीरज ने जवाब दिया, ‘‘वो तो सरप्राइज है मेरे बच्चे. मैं अभी तुम्हारे घर के बाहर ही तो खड़ा हूं. नीचे आ कर दरवाजा खोलो और अपना गिफ्ट ले जाओ. और हां, किसी को इस बारे में बताने की जरूरत नहीं है. ये गिफ्ट स्पैशल तुम्हारे लिए मंगवाया है बाहर से. अब जल्दी से नीचे आ कर अपना गिफ्ट ले लो. इसी बहाने मैं अपने बेटे से भी मिलूंगा.’’

अपने पिता के द्वारा लाए हुए गिफ्ट की बात सुन कर सक्षम के मन में खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. वह तुरंत अपने बिस्तर से इस तरह से उठा कि किसी और को उस के उठने की भनक तक नहीं लगी और वह जल्द ही नीचे दरवाजे की ओर भागा. आहिस्ता से सक्षम ने अंदर से लगी दरवाजे की कुंडी खोली और धीरे से दरवाजा खोला. उस ने देखा उस के पिता दरवाजे के ठीक सामने अपने हाथों में एक थैली लिए खड़े थे. सक्षम न समझ सका पिता के इरादे सक्षम के दरवाजा खोलने पर नीरज ने झुक कर उसे पहले अपने गले लगा लिया और फुसफुसाते हुए उस से पूछा, ‘‘कोई जागा तो नहीं बेटा?’’

सक्षम ने भी उसी तरह से नीरज को जवाब दिया, ‘‘नहीं पापा, कोई नहीं जागा.’’

यह सुन कर नीरज ने सक्षम के कंधे पर हाथ रखा और घर के अंदर आ गया. सक्षम को यह देख कर थोड़ा अजीब लगा. उस ने अपने पिता को रोकना चाहा, लेकिन वह कहां रुकने वाला था. उन दोनों के अंदर घुसते ही बाहर से एक और आदमी मकान में आ घुसा. यह शख्स नीरज का दोस्त लेखराज था. लेखराज के अंदर आते ही उस ने भीतर से मुख्य दरवाजे की कुंडी बंद कर दी और भाग कर पहली मंजिल पर जा पहुंचा. लेखराज को देखते ही इस से पहले कि सक्षम कुछ कहता, नीरज ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया और उसे अपनी गोद में उठा कर उस कमरे की ओर चल पड़ा, जहां पर उस की पत्नी आयशा और उस की सास सुमन सोए हुए थी.

एक तरफ नीचे ग्राउंड फ्लोर पर नीरज अपने बेटे के साथ था तो दूसरी ओर लेखराज पहली मंजिल पर गगन और राजन के कमरे में था. लेखराज ने अपनी कमर से एक देसी तमंचा निकाल कर सोते हुए राजन पर गोली चला दी. गोली चलने की आवाज सुन कर गगन नींद से जाग गया और उस की नजर लेखराज और उस के हाथ में तमंचे पर पड़ी. गगन के अवचेतन दिमाग ने खुद को बचाने के लिए अपने बिस्तर किनारे रखे फोन को लेखराज की ओर जोर से फेंका.

वह फोन लेखराज के चेहरे पर जा कर लगा और कुछ पलों के लिए उस का ध्यान गगन से हट गया. इतने में गगन भाग कर दरवाजे की ओर से निकलने ही वाला था कि लेखराज ने गगन पर पीछे से गोली चला दी, जोकि उस की कमर पर लगी. गोली लगते ही वह गिर पड़ा. गगन के शरीर से निकला खून पूरे फर्श पर फैल चुका था, जिसे देख लेखराज को लगा कि वह मर गया है, क्योंकि गगन के शरीर से किसी तरह की कोई हरकत नहीं हो रही थी. पहली मंजिल पर गोली चलने की आवाज सुन कर 12 साल का छोटा बच्चा इस से पहले कि कुछ समझ पाता, नीरज ने उसे नीचे उतार दिया. फिर उस ने अपने थैले में से तमंचा बाहर निकाल कर अपनी सास सुमन पर निशाना साधते हुए 2 गोलियां चला दीं.

नीरज की पत्नी आयशा जो गहरी नींद में सो रही थी, बाहर होने वाले शोर से वह भी जाग गई. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाती, नीरज ने मौका देख कर एक गोली अपनी पत्नी की छाती पर दाग दी. गोली मारने के बाद नीरज ने इधरउधर देखा तो सक्षम वहां मौजूद नहीं था. नीरज ने जब उसे अपनी गोद से उसे नीचे उतारा था, तब वह भाग कर बाथरूम में चला गया था. उस ने खुद को बाथरूम में बंद कर लिया. सक्षम इतनी दहशत में था कि उस ने बाथरूम में किसी तरह की कोई हरकत करने की हिम्मत नहीं दिखाई.

इतने में लेखराज अपना काम पूरा कर के नीचे आया और उस ने नीरज से पूछा, ‘‘काम हो गया, अब आगे क्या करना है?’’

नीरज ने अपने थैले में से 2 धारदार चाकू निकाले और एक उस के हाथ में थमाते हुए बोला, ‘‘ये दोनों किसी भी कीमत पर जिंदा नहीं रहने चाहिए. इन्होंने मेरा जीना हराम कर दिया है, इसलिए इन्हें पूरी तरह से खत्म कर दो.’’

गोली मारने के बाद चाकुओं से गोदा दोनों को कहते हुए लेखराज और नीरज दोनों सुमन और आयशा की लाश की ओर बढ़े और दोनों उन के शरीर पर चढ़ कर उन के शरीर पर लगातार चाकू से वार करने लगे. उन्होंने उन का शरीर गोदने के बाद महसूस किया कि मकान में उन का नौकर भी रहता है, उस नौकर को भी उन्होंने ठिकाने लगाना जरूरी समझा. उसी समय उन्होंने महसूस किया कि कोई मकान का मेन दरवाजा खोल रहा है. यह उस मकान में काम करने वाला नौकर शिवा ही था. उसे देख कर नीरज उस की ओर अपना तमंचा ले कर दौड़ा. शिवा अपनी जान बचाने के लिए तेजी से भागा और दीवार फांदते हुए वह मकान के इर्दगिर्द खाली पड़े प्लौट को पार करते हुए भाग निकला.

इस बीच नीरज ने उस की ओर निशाना साध कर गोली भी चलाई थी, लेकिन गोली के तमंचे में फंस जाने की वजह से शिवा अपनी जान बचाने में कामयाब रहा. नीरज और लेखराज सक्षम को छोड़ घर में सभी को गोली मारने के बाद तुरंत वहां से नौ दो ग्यारह हो गए. हत्यारों की गोली से बच गया गगन नीरज और लेखराज ने सभी को गोली तो मार दी थी, लेकिन उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि गगन को गोली लगने के बाद भी वह बच जाएगा. गगन को उस की कमर पर गोली लगी थी, उस का खून भी काफी बह चुका था लेकिन वह जिंदगी और मौत के बीच लटक गया था.

नीरज और लेखराज के हत्या कर के वहां से निकल जाने के बाद सक्षम रोताबिलखता एकएक कर अपने परिवार के पास जा कर उन्हें देख रहा था, तभी उस ने देखा कि उस के मामा के शरीर में हरकत हो रही थी. यह देख कर फोन ले कर वह भागते हुए अपने मामा गगन के पास पहुंचा. गगन ने 100 नंबर डायल कर पुलिस को फोन लगाया और पुलिस को कराहती आवाज में जल्द ही अपने घर पर आने के लिए कहा. सुबह के करीब साढ़े 3 बज रहे थे, जब इस घटना की सूचना फरीदाबाद में धौज थाना क्षेत्र को मिली. धौज थाना परिसर गगन के नए घर से मात्र 5 मिनट की दूरी पर ही था.

मामले की सूचना मिलते ही धौज थानाप्रभारी दयानंद अपनी टीम के साथ कुछ ही देर में गगन के घर जा पहुंचे और उन्होंने सब से पहले मकान में गगन को ढूंढ निकाला और उसे पास के अस्पताल ले गए. उसी दौरान उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को इस मामले की सूचना दी. सूचना मिलने पर थोड़ी देर में जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और फोरैंसिक टीम भी वहां पहुंच गई. फोरैंसिक टीम द्वारा अपना काम निपटाने के बाद पुलिस ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. इस के बाद उच्चाधिकारियों के निर्देश पर थानाप्रभारी ने जांच शुरू कर दी. पुलिस ने सक्षम से उस के पिता का मोबाइल नंबर ले कर टेक्निकल टीम को दे दिया. टीम ने ट्रेसिंग कर के नीरज की लोकेशन का पता लगा लिया.

घटना के 9 घंटे बाद डीएलएफ और धौज की क्राइम ब्रांच की टीमों ने 22 अक्तूबर को एनआईटी फरीदाबाद से दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. पत्नी के बर्ताव से उपजी कलह इस हत्या के दोनों आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद उन से पूछताछ के दौरान इस पूरे हत्याकांड की वजह सामने आई. दरअसल, नीरज और उस की पत्नी आयशा के जीवन में सब कुछ सही चल रहा था, लेकिन नीरज के मन में आयशा को ले कर उसे शक होता था. आयशा अकसर अपने बचपन के दोस्तों के साथ फोन पर बातचीत किया करती थी. कई बार वह बातों में इतनी मशगूल हो जाती थी कि आयशा का ध्यान नीरज पर होता ही नहीं था.

इस के अलावा आयशा खुले दिमाग वाली युवती थी. दोस्तों के संग बातचीत, हंसीमजाक करना उसे बेहद पसंद था. लेकिन कहीं न कहीं आयशा का इस तरह का बर्ताव करना नीरज को पसंद नहीं आता था. इसी को ले कर अकसर नीरज और आयशा के बीच झगड़े होते रहते थे. दोनों के बीच झगड़े इतने बढ़ जाते थे कि उन के बीच सुलह के लिए आयशा के मायके वालों को आना पड़ता था. इसी बीच पिछले साल, नीरज ने आयशा के भाई यानी अपने साले गगन से 10 लाख रुपए उधार भी मांगे थे. एनआईटी फरीदाबाद का रहने वाला नीरज अपने इलाके में एक टेलर मैटेरियल की दुकान खोलना चाहता था, जिस के लिए उसे पैसों की जरूरत थी.

उस ने गगन से पैसे ले कर साल भर में वापस करने की बात भी कही थी. लेकिन जब एक साल से ज्यादा का समय हो गया तो गगन नीरज को पैसे लौटाने के लिए कहने लगा. कोरोना की वजह से धंधा नहीं चलने के कारण नीरज के पास गगन को लौटाने के लिए पैसा इकट्ठे नहीं हो सके. वह गगन को आज कल कह कर हर दिन पैसे लौटाने की बात किया करता, लेकिन वह पैसों का जुगाड़ नहीं कर पा रहा था. ये बात कहीं न कहीं गगन को भी समझ आ गई थी कि उस के जीजा के पास पैसे नहीं है. सास भी मारती थी ताने जब यह बात उस ने अपने घर वालों को बताई तो आएशा की मां सुमन ने नीरज को ताना मारना शुरू कर दिया. सुमन और गगन के साथसाथ आएशा को जब कभी मौका मिलता, वे सब उसे पैसे लौटाने के लिए कहते, नहीं तो उसे किसी न किसी बहाने ताने मारते थे.

यही नहीं, पिछले एक साल से आयशा अपने बेटे सक्षम के साथ अपने मायके में ही थी. दोनों के बीच झगड़े के बाद आयशा अपने बेटे को ले कर अपने मायके रहने के लिए आ गई थी. और यह बात नीरज को काफी खटकने लगी थी. ये सब देखते हुए और इन सभी चीजों से परेशान हो कर उस ने इस हत्याकांड की प्लानिंग अपने दिमाग में ही रच ली थी. पूरी प्लानिंग के चलते नीरज ने बीते कुछ दिनों से ससुराल के लोगों को राजीनामे के बहाने अपनी बातों में फंसाना शुरू कर दिया, ताकि उस पर कोई शक न कर सके.

इसी के चलते 15-16 दिन पहले नीरज ससुराल के लोगों से राजीनामा करने के बहाने मोहब्ताबाद गया और पूरी कोठी को अपनी नजरों में उतार लिया था. उस ने इस हत्याकांड को अंजाम देने के लिए पैसों का लालच दे कर अपने करीबी दोस्त लेखराज को भी इस में शामिल कर लिया था. इस हत्याकांड को अंजाम देने के लिए नीरज ने एक महीने पहले हापुड़ से 35 हजार रुपए में 2 देसी तमंचे, 2 चाकू और कुछ कारतूस खरीद लिए थे.

नीरज ने कभी न तो हथियार रखे और न ही चलाए थे, लेकिन पत्नी के चरित्र और पैसे के लेनदेन के चलते तीनों की हत्या करने के लिए उस ने तमंचा चलाना भी सीख लिया था. फिर उस ने 21 अक्तूबर, 2021 की रात को घटना को अंजाम दे दिया. कोई भी जीवित न बचे, इसलिए नीरज और लेखराज ने गोली चलाने के साथसाथ चाकुओं से भी वार किए सास सुमन को एक गोली लगी और चाकू के कई वार किए गए. आयशा को 2 गोली लगी थीं. राजन शर्मा को एक गोली सीने में लगी, जबकि गगन के कमर में गोली लगी थी.

नीरज को अनुमान था कि इस गोली से गगन की मौत हो जाएगी. लेकिन वह जीवित बच गया. दोनों आरोपियों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. Family Dispute

 

Police Story : जिस्म सौंप कर इंतकाम लेने वाली पुलिस वाली

Police Story : हैडकांस्टेबल शिवाजी माधवराव सानप के साथ अय्याशी करने वाली कांस्टेबल शीतल पांसरी का स्वार्थ पूरा नहीं हुआ तो उस के दिल पर ऐसी चोट लगी कि इंतकाम लेने के लिए उस ने एक नहीं बल्कि 2 मर्दों को अपने जिस्म का लालच दे कर अपने इंतकाम की आग बुझाई.

शिवाजी माधवराव सानप (54) मुंबई पुलिस के नेहरू नगर थाने में हैडकांस्टेबल के पद पर तैनात था. वह पुणे में रहता था. वहीं से रोजाना ड्यूटी के लिए अपडाउन करता था. पुणे से वह बस से पनवेल जाता था, फिर पनवेल से दूसरी बस पकड़ कर कुर्ला पहुंचता और कुर्ला से लोकल ट्रेन के जरिए वह नेहरू नगर थाने पहुंचता. आनेजाने के लिए उस का रुटीन ठीक उसी तरह तय था, जैसे सुबह उठ कर लोग दैनिक काम करते हैं. 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के कारण काफी भागदौड़ रही. दिन भर की थकान के बाद वह उस रात भी कुर्ला स्टेशन से उतरने के बाद पनवेल के लिए बस पकड़ने के लिए लगभग रात के साढ़े 10 बजे सड़क से गुजर रहा था.

तभी सड़क पार करते समय एक तेज रफ्तार नैनो कार ने शिवाजी को इतनी जोर की टक्कर मारी कि उस का शरीर हवा में उछलता हुआ सड़क के किनारे दूर जा गिरा. इस बीच शिवाजी को टक्कर मारने वाली कार हवा की गति से नौ दो ग्यारह हो गई. शिवाजी सानप गंभीर रूप से घायल हो गया. आनेजाने वाले कुछ राहगीरों ने यह माजरा अपनी आखों से देखा था. लिहाजा वहां मोजूद हुए लोगों में से किसी ने उसी समय पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दे दी. पहले पीसीआर की गाड़ी आई जिस ने घायल शिवाजी को पास के एक अस्पताल में भरती करा दिया. लेकिन कुछ देर की जद्दोजहद के बाद आखिरकार शिवाजी की को मृत घोषित कर दिया गया.

मामला बिलकुल सीधासाधा सड़क हादसे का दिख रहा था, इस में शक की कोई गुंजाइश भी नहीं लग रही थी. लिहाजा पनवेल शहर पुलिस स्टेशन के सीनियर पीआई अजय कुमार लांडगे ने सड़क दुर्घटना का मामला दर्ज करवा दिया. शिवाजी के कपड़ों की तलाशी लेने के बाद जेब से उस का महाराष्ट्र पुलिस का परिचय पत्र, आधार कार्ड व अन्य दस्तावेज मिले थे. इस से पुलिस को उस की पहचान कराने में भी ज्यादा जहमत नहीं उठानी पड़ी. सड़क दुर्घटना का केस दर्ज करने के बाद पनवेल पुलिस स्टेशन ने पुणे में रहने वाले शिवाजी के घर वालों को भी हादसे की खबर कर दे दी. अगली सुबह ही शिवाजी सानप की पत्नी गायित्री अपने भाई व रिश्तेदारों को ले कर पनवेल पुलिस स्टेशन पहुंची, जहां उन्हें हादसे के बारे में बताया गया.

पुलिस ने विभाग का आदमी होने के कारण जल्दी ही शिवाजी के शव का पोस्टमार्टम करवा कर शव उस के परिजनों का सौंप दिया. 1-2 दिन गुजरने के बाद अचानक शिवाजी की पत्नी गायित्री अपने भाई के साथ पनवेल पुलिस स्टेशन पहुंची और सीनियर पीआई अजय कुमार लांडगे से मुलाकात की. गायत्री ने अपने मन में छिपे शक का इजहार करते हुए कहा, ‘‘सर, मेरे पति का ऐक्सीडेंट नहीं हुआ उन की हत्या की गई है. हत्या भी इस तरह कि लोगों को लगे कि ये सड़क दुर्घटना है.’’

यह सुन कर अजय लांडगे के होंठों पर हलकी सी मुसकान तैर गई. वह बोले, ‘‘देखो गायत्री, मैं तुम्हारा दुख समझता हूं. तुम्हारे पति की मौत हुई है और तुम्हारे दिमाग की हालत अभी ठीक नहीं है. लेकिन इस का मतलब ये नहीं कि तुम्हारे पति की हत्या हुई है. भला तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है. सड़कों पर हर रोज ऐसे हजारों ऐक्सीडेंट होते हैं, लेकिन इस का मतलब ये तो नहीं कि सब हत्या कही जाएंगी.’’

‘‘हां साहब, इस की वजह मैं आप को बताती हूं,’’ कहने के बाद गायत्री ने इंसपेक्टर कुमार लांडगे को जो कुछ बताया, उसे सुन कर लांडगे की आंखें फैल गईं.

कुछ देर शांत रहने के बाद इंसपेक्टर लांडगे ने कहा, ‘‘ठीक है गायत्री, तुम ने जो कुछ बताया, अगर वो सच है तो हम इस की जांच करेंगे. अगर तुम्हारे पति की मौत हत्या है तो तुम्हें इंसाफ जरूर मिलेगा और कातिल जेल की सलाखों के पीछे होगा.’’ इंसपेक्टर लांडगे ने उसी दिन पनवेल डिवीजन के एसीपी भगवत सोनावने को शिवाजी की पत्नी और उस के साले के इस शक के बारे में जानकारी दे कर यह भी बता दिया कि उन्हें क्यों शक है कि शिवाजी की मौत सड़क हादसा नहीं बल्कि मर्डर है.

सुनने के बाद एसीपी सोनावने भी सोच में पड़ गए, ‘‘लांडगे साहब, हम ऐसे ही किसी पर हाथ नहीं डाल सकते, क्योंकि हमारे पास कोई सबूत नहीं हैं. आप ऐसा करो, एक टीम तैयार करो और जरा पता करो कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है.’’

शिवाजी की पत्नी के कहने पर पनवेल पुलिस ने जांच तो शुरू कर दी, लेकिन खुद लांडगे के पास अभी भी इस केस को सड़क दुर्घटना नहीं मानने के लिए कोई सबूत नहीं था. हालांकि पुलिस को अभी तक यह भी नहीं पता था कि शिवाजी का ऐक्सीडेंट जिस कार से हुआ था, वह कौन सी कार थी. लेकिन कहानी में पहला ट्विस्ट तब आया, जब इंसपेक्टर लांडगे को पता चला कि शिवाजी सानप के ऐक्सीडेंट वाले स्थान से 2 किलोमीटर की दूरी पर एक सुनसान जगह पर उसी रात एक नैनो कार जली हालत में मिली.

संबंधित चौकी के स्टाफ से जानकारी मिलने के बाद लांडगे सोच में पड़ गए. लांडगे एक ही रात में शिवाजी तथा ऐक्सीडेंट स्पौट से करीब 2 किलोमीटर दूर एक जली हुई कार के मिलने की कडि़यों को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे. इस के अगले ही दिन जब शिवाजी की पत्नी गायत्री ने यह शक जताया कि उस के पति की मौत सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि सोचीसमझी साजिश के तहत की गई है तो पुलिस मौत की जांच का काम करने में जुट गई. जिस जगह यह हादसा हुआ था, पुलिस ने उस के आसपास लगे तमाम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकालनी शुरू कर दी. पुलिस ने थाना नेहरू नगर के ड्यूटी औफिसर और शिवाजी के परिवार वालों से शिवाजी के आनेजाने के रुटीन का पता किया कि वह पुणे से नेहरू नगर पुलिस स्टेशन कैसे आताजाता था.

इस के बाद उन्होंने नेहरू नगर थाने से ले कर कुर्ला स्टेशन तक जितने भी सीसीटीवी लगे थे, सब को चैक किया. यह एक लंबी कवायद थी, लेकिन मामला चूंकि अपने ही विभाग से जुड़े हैडकांस्टेबल की संदिग्ध मौत से जुड़ी जांच का था, लिहाजा पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी. करीब 250 सीसीटीवी फुटेज को खंगालने के बाद 15 अगस्त की रात शिवाजी कुर्ला रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने की एक फुटेज कैमरे में मिल ही गई.

जांच आगे बढ़ी तो पनवेल के बस स्टैंड पर बस पकड़ने के लिए पैदल चलते एक और सीसीटीवी कैमरे में उन की फुटेज मिल गई. कडि़यों को जोड़ते हुए सड़क को कवर करने वाले सीसीटीवी कैमरों को भी खंगालना शुरू किया तो एक कैमरे में वह वारदात भी कैद मिली, जिस में शिवाजी को तेज रफ्तार नैनो कार कुचलती हुई आगे निकली थी. इस से एक बात साफ हो गई कि घटना वाली रात करीब 2 किलोमीटर दूर जो नैनो कार जली मिली, उस का संबंध शिवाजी सानप से ही था. अब नेहरू नगर सीनियर पीआई अजय कुमार लांडगे को यह समझ आने लगा कि शिवाजी के परिवार ने उन की हत्या की जो आशंका जताई थी, उस में जरूर सच्चाई छिपी थी क्योंकि अगर शिवाजी की मौत सिर्फ हादसा होती तो नैनो कार को जलाने की जरूरत ही नहीं थी.

यानी साफ था कि कातिल सबूत मिटाने के लिए कत्ल के लिए इस्तेमाल हुई कार को जला कर सबूत खत्म करना चाहता था. पुलिस ने जब कुछ और कैमरों को खंगाला तो पता चला कि उस में 2 लोग सवार थे. पुलिस ने एक्सपर्ट की मदद से कार में बैठे दोनों लोगों की तसवीर जूम कर के तैयार करवाई. पहले पुलिस ने अपने रिकौर्ड खंगाले कि कहीं ऐसा तो नहीं किसी पुराने अपराधी ने शिवाजी से अपनी पुरानी दुश्मनी निकालने के लिए उन की योजनाबद्ध तरीके से हत्या कर दी हो. पुलिस रिकौर्ड में जितने भी अपराधी दर्ज थे, सीसीटीवी से मिले फोटो कहीं भी मैच नहीं हुए.

इस दौरान पुलिस की एक दूसरी टीम जो इस बात की जांच कर रही थी कि शिवाजी सानप की तैनाती कहांकहां रही और उन का रिकौर्ड कैसा था. इस बिंदु पर तफ्तीश करने वाली पुलिस टीम को एक और कहानी पता चली. कहानी के मुताबिक, साल 2019 में शीतल पंचारी नाम की एक महिला कांस्टेबल ने शिवाजी के खिलाफ 2 अलगअलग पुलिस थानों में 2 रिपोर्ट लिखाई थीं. ये दोनों रिपोर्ट छेड़खानी और यौनशोषण की थी. नई कहानी सामने आने के बाद पुलिस ने 2019 में झांकने का फैसला किया, तब एक नई कहानी सुनने को मिली.

दरअसल, 2019 तक शिवाजी सानप और शीतल पंचारी मुंबई के नेहरू नगर पुलिस स्टेशन में एक साथ काम करते थे. इन दोनों के बीच काफी गहरे रिश्ते भी थे. लेकिन फिर अचानक रिश्तों में काफी कड़वाहट आ गई. दोनों के बीच झगड़े होने लगे और इसी झगड़े के बाद 2019 में शीतल ने 2 अलगअलग पुलिस थानों में शिवाजी के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी. यह बात शिवाजी की पत्नी और साले को भी पता थी. यही वजह है कि दोनों ने यह शक जताया कि शिवाजी की मौत सड़क हादसा नहीं, बल्कि कत्ल है और इस कत्ल में शीतल का हाथ होने का उन्होंने इशारा किया था.

पनवेल पुलिस स्टेशन नवी मुंबई के जोन-2 एरिया में आता है जिस के डीसीपी हैं शिवराज पाटिल. मामला चूंकि एक पुलिस वाले की मौत का था और शक की सुई विभाग की ही एक महिला कांस्टेबल की तरफ घूम रही थी. इसलिए इंसपेक्टर लांडगे और एसीपी भगवत सोनावने ने शीतल पंचारी के बारे में डीसीपी पाटिल को बताया गया तो उन्होंने लांडगे को क्लीन चिट दे दी कि कोशिश कर के शीतल के खिलाफ पहले सबूत एकत्र करें, उस के बाद ही उस पर हाथ डालें.

लेकिन अभी तक शीतल के खिलाफ केवल शक था. पुलिस के पास कोई सबूत नहीं था कि वह उसे कातिल ठहरा सके. इसीलिए इंसपेक्टर लाडंगे ने अपनी टीम को बड़ी खामोशी के साथ शीतल के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के काम पर लगा दिया. शीतल उस समय शस्त्र शाखा में काम करती थी. पुलिस ने शीतल के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवा ली. इतना ही नहीं, उस के सोशल मीडिया अकांउट का पता लगा कर उस में भी झांकना शुरू किया, कोशिश रंग लाई. शीतल के इंस्टाग्राम पर पुलिस को एक मर्द का चेहरा और एक पोस्ट नजर आई, जिस का नाम धनराज यादव था. पुलिस ने शीतल के परिचितों को खंगालना शुरू किया तो जानकारी मिली कि धनराज यादव पेशे से एक बस ड्राइवर है.

शीतल की इंस्टाग्राम पर धनराज से दोस्ती हुई थी. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि शीतल ने धनराज से दोस्ती करने के 5 दिनों बाद ही उस से शादी कर ली. यह बात 2019 के आखिर की है. यह अपने आप में हैरानी की बात जरूर थी. इंसपेक्टर लांडगे को लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं धनराज यादव ने ही अपनी पत्नी के साथ हुए यौन शोषण का बदला लेने के लिए शिवाजी की सड़क हादसा कर हत्या कर दी हो. वह पेशे से ड्राइवर भी था. पुलिस को लगने लगा कि कातिल अब उस से एक हाथ की दूरी पर है. गुपचुप तरीके से शीतल के जानकारों से पुलिस ने पता कर लिया कि धनराज तमिलनाडु का रहने वाला है.

शादी के सिर्फ एक महीने बाद ही धनराज रहस्यमय तरीके से अचानक शीतल को छोड़ कर तमिलनाडु चला गया. उस के बाद धनराज को किसी ने नहीं देखा. डीसीपी शिवराज पाटिल को केस की इस नई जानकारी का पता चलने पर एक टीम को तमिलनाडु भेज दिया गया. एक सप्ताह तक सुरागरसी करतेकरते पुलिस टीम आखिर तमिलनाडु में धनराज के घर तक पहुंच गई और उसे पकड़ कर मुंबई पनवेल ले आई.

हालांकि पुलिस ने नैनो कार में बैठे जिन 2 लोगों की सीसीटीवी फुटेज हासिल की थी, उन से धनराज का चेहरा कहीं भी मेल नहीं खाता था. लेकिन फिर भी उस से पूछताछ का सिलसिला शुरू हुआ तो उस ने कुबूल कर लिया कि उस ने इंस्टाग्राम पर कांस्टेबल शीतल से दोस्ती करने के बाद 5 दिनों में ही शादी कर ली थी, लेकिन एक महीने के बाद ही वह शीतल को छोड़ कर अपने गांव चला गयाथा.

‘‘क्यों, ऐसा क्यों किया तुम ने?’’ इंसपेक्टर लांडगे ने सवाल किया.

‘‘सर, मैं बहुत डर गया था. पहले तो दोस्ती करने के बाद इतनी जल्द मेरे जैसे ड्राइवर से एक पुलिस वाली के शादी करने का राज ही मेरी समझ में नहीं आया था. लेकिन शादी के 5 दिन बाद ही जब शीतल ने मुझ से एक खतरनाक काम करने के लिए कहा तो मेरी समझ में आ गया कि उस ने अपना काम कराने के लिए मुझ से शादी की है और मुझे हथियार बनाना चाहती है.’’ धनराज ने सहमते हुए एकएक राज उगलना शुरू कर दिया.

उस ने बताया कि शीतल ने उसे शिवाजी सानप द्वारा अपने यौनशोषण की कहानी सुना कर भावुक कर दिया था. इस के बाद शीतल ने उस से कहा कि अगर वह उस से प्यार करता है तो वह अपनी पत्नी के साथ हुई नाइंसाफी का बदला ले और शिवाजी को ट्रक से कुचल कर मार दे. यह सुन कर धनराज बहुत डर गया… क्योंकि वह मुंबई शहर में रोजीरोटी कमाने के लिए आया था. ऐसे में एक कत्ल वह भी पुलिस वाले का… ऐसा सुनते ही धनराज के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने शीतल को समझाया, ‘‘शीतल, जो हुआ उसे भूल जाओ. यह सब जान कर भी तुम्हारे लिए मेरा प्यार कम नहीं हुआ है. वैसे भी यह काम बहुत रिस्क वाला है मैं ने जीवन में कभी ऐसा काम नहीं किया है… सोचो मैं ने यह काम कर भी दिया तो एक न एक दिन भेद खुल जाएगा. फिर मैं और तुम दोनों ही पकड़े जाएंगे.’’

लेकिन शायद शीतल के ऊपर शिवाजी से इंतकाम लेने का जुनून इस कदर सवार था कि वह आए दिन धनराज पर दबाव डालने लगी कि चाहे जैसे भी हो, उसे शिवाजी की हत्या करनी ही होगी. वह तो पेशे से ड्राइवर है इसलिए किसी को भी शक नहीं होगा. अगर पकड़े भी गए तो केवल लापरवाही से हुई दुर्घटना का केस चलेगा. इसी तरह 3 सप्ताह गुजर गए. धनराज अजीब पशोपेश में था. क्योंकि वह दिल से नहीं चाहता था कि ऐसा गलत काम करे. उसे अब इस बात का भी डर सताने लगा था कि अगर वह लगातार शीतल का काम करने से मना करता रहा तो वह कहीं उसे पुलिस विभाग में अपनी तैनाती का फायदा उठा कर किसी झूठे आरोप में फंसवा कर जेल न भिजवा दें.

उस के सामने अब यह भी साफ हो गया था कि शीतल ने उस से शादी अपना यह काम करवाने के लिए ही की थी. लिहाजा एक दिन डर की वजह से धनराज अपनी नौकरी छोड़ कर सारा सामान समेट कर अपने गांव तमिलनाडु भाग गया. धनराज से पूछताछ के बाद पुलिस एक बार फिर अंधेरे मोड़ पर खड़ी हो गई. क्योंकि पुलिस पहले ही इस बात की तसदीक कर चुकी थी कि 2019 में तमिलनाडु जाने के बाद धनराज कभी अपने राज्य से बाहर या मुंबई नहीं गया था.

‘‘अच्छा, तुम ये दोनों फोटो देख कर बताओ कि इन में से किसी को पहचानते हो? ये उस कार में बैठे लोगों की फोटो हैं जिस से शिवाजी का ऐक्सीडेंट हुआ था.’’

धनराज से पूछताछ के बाद निराश इंसपेक्टर लांडगे ने धनराज को सीसीटीवी से हासिल हुई दोनों संदिग्धों की फोटो दिखाईं तो धनराज बोला, ‘‘अरे सर, ये तो विशाल है. मैं 2019 में शीतल से शादी के बाद जिस सोसाइटी में रहता था, उसी सोसाइटी के चौकीदार बबनराव का बेटा है ये.’’

पूरी तरह से निराश हो चुके इंसपेक्टर लांडगे के चेहरे पर धनराज का जवाब सुनते ही अचानक चमक आ गई. अब उन्हें लगने लगा कि शिवाजी सानप हत्याकांड की गुत्थी सुलझ जाएगी. धनराज की इस गवाही से जब डीसीपी पाटिल को अवगत कराया गया तो उन्होंने तत्काल पुलिस कमिश्नर को इस पूरे केस की जानकारी दे कर शीतल की गिरफ्तारी का आदेश हासिल कर लिया. 12 सितंबर की रात पुलिस ने ताबड़तोड छापेमारी कर पहले शीतल को हिरासत में लिया, उस के बाद उसी रात विशाल बबनराव जाधव को. उन दोनों से पूछताछ के बाद गणेश लक्ष्मण चव्हाण उर्फ मुदावथ को भी हिरासत में ले लिया.

इन लोगों के पास से पुलिस ने 3 मोबाइल फोन, एक कार और कुछ कपड़े बरामद किए. तीनों ने कड़ी पूछताछ में शिवाजी सानप की हत्या का गुनाह कुबूल कर लिया. शिवाजी माधवराव सानप की सड़क दुर्घटना में मौत का मामला पनवेल पुलिस ने भादंसं की धारा 302 व 201 में दर्ज कर लिया. अगले दिन तीनों को कोर्ट में पेश करने के बाद 7 दिन की पुलिस रिमांड पर लिया गया. इस दौरान पुलिस ने घटना की एकएक कडि़यों को जोड़ कर तीनों आरोपियों के खिलाफ कड़े सबूत एकत्र करने का काम किया.

इन से की गई पूछताछ के बाद इस अपराध की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली— शीतल पंचारी महाराष्ट्र के जलगांव की रहने वाली थी. स्नातक की पढ़ाई करने के बाद उसे महाराष्ट्र पुलिस में नौकरी मिल गई. 28 साल की शीतल 4 साल नौकरी के बाद जब 2018 में नेहरू नगर थाने में तैनात हुई तो उस की दोस्ती जल्द ही अपने ही थाने में तैनात हैडकांस्टेबल शिवाजी माधवराव सातप से हो गई. दोनों की दोस्ती जल्द ही प्यार में बदल गई और दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ता भी कायम हो गया. दोनों के बीच लंबे समय तक प्यार की कहानी चली.

उन दोनों के रिश्ते के बारे में अब विभाग में भी चर्चा होने लगी थी. शीतल के साथ काम करने वाले साथी पुलिसकर्मी भी अब उसे शिवाजी का माल कह कर चिढ़ाने लगे थे. ऐसे में बदनामी बढ़ती देख एक दिन शीतल ने शिवाजी से कहा कि हम दोनों के संबंधों को ले कर अब लोग अंगुलियां उठाने लगे हैं, इसलिए हमें अब शादी कर लेनी चाहिए. यह सुनते ही शिवाजी को झटका लगा. क्योंकि वह तो पहले से ही शादीशुदा था, उस के 2 बच्चे भी थे. लिहाजा शादी की बात सुनते ही शिवाजी ने शीतल को डपट दिया और बोला, ‘‘संबध रखने हैं तो रखो नहीं तो छोड़ दो. लेकिन मैं किसी भी हालत में शादी नहीं कर सकता. क्योंकि मैं अपनी पत्नी से बेहद प्यार करता हूं.’’

शादी से इंकार की बात सुनते ही शीतल शिवाजी पर बिफर पड़ी. क्योंकि शिवाजी ने ऐसी कड़वी बात कह दी थी, जिस ने शीतल के तन, मन और आत्मा को बुरी तरह झुलसा दिया था. शिवाजी ने तंज कसा था, ‘‘शादी से पहले जो औरत एक हैडकांस्टेबल के नीचे लेट सकती है वह अपना काम निकलवाने के लिए तो न जाने कितने बड़े अफसरों के नीचे लेटेगी. अपनी प्यार करने वाली बीवी को छोड़ कर ऐसी औरत से कौन शादी करेगा?’’

उस दिन शिवाजी और शीतल में खूब लड़ाई हुई और उसी दिन से दोनों के बीच दूरियां आ गईं. चूंकि शीतल के शिवाजी से संबंधों की बात पूरे थाने को और विभाग के दूसरे लोगों को भी पता थी. इसलिए खुद को पाकसाफ दिखाने के लिए शीतल ने पहले उस के खिलाफ उसी नेहरू नगर थाने में छेड़छाड़ की धारा 354 तथा उस के बाद कल्याण थाने में बलात्कार की धारा 376 में शिकायत दर्ज करवा दी थी. इन दोनों ही शिकायतों पर शिवाजी सानप के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई. शीतल के साथ संबंधों की जानकारी शिवाजी के परिवार तक पहुंच गई थी.

चूंकि शिवाजी सातप तेजतर्रार हैड कांस्टेबल था. मुंबई पुलिस में कई सीनियर अफसरों के साथ रहते हुए उस ने कई गुडवर्क किए थे, इसलिए वे तमाम अधिकारी उसे पसंद करते थे. सभी को ये भी पता था कि शिवाजी के शीतल के साथ संबंध थे, लेकिन उस ने कभी शीतल से जबरदस्ती नहीं की थी. यही कारण रहा कि ऐसे तमाम अधिकारियों के दबाव में शिवाजी के खिलाफ की गई शीतल की शिकायत ठंडे बस्ते में डाल दी गई. जब काफी वक्त गुजर गया और शीतल को लगने लगा कि शिवाजी के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ कर वह उसे सजा नहीं दिलवा पाएगी तो उस ने खुद ही उसे सजा देने का निर्णय कर लिया.

शीतल पहले ही नेहरू नगर थाने से आर्म्स यूनिट में अपना तबादला करा चुकी थी. मन ही मन वह किसी ऐसी तरकीब पर विचार करने लगी, जिस से वह शिवाजी से अपने अपमान का इंतकाम भी ले सके और उस पर आंच भी ना आए. इसी सोचविचार में काफी वक्त गुजर गया. अचानक उसे खयाल आया कि क्यों न शिवाजी को सड़क हादसे में करवा दिया जाए. एक बार इस खयाल ने मन में जगह बनाई तो रातदिन वह इसी रास्ते से शिवाजी से बदला लेने की साजिश रचने लगी.

इसी साजिश के तहत उस ने ट्रक ड्राइवर का पेशा करने वाले धनराज यादव की इंस्टाग्राम पर प्रोफाइल देखी तो साजिश का खाका उस के दिमाग में फिट बैठ गया. शीतल ने शिवाजी को रास्ते से हटाने के लिए हथियार के रूप में धनराज को मोहरा बनाने के लिए पहले इंस्टाग्राम पर रिक्वेस्ट भेज कर धनराज से दोस्ती की और 5 दिन बाद ही उस ने धनराज को शादी के लिए प्रपोज भी कर दिया. चंद रोज के भीतर दोनों ने शादी कर ली.

एक हफ्ते बाद ही शीतल ने धनराज को शिवाजी की कहानी सुनाई और कहा कि वह उस से बदला लेना चाहती है. तुम ड्राइवर हो, तुम से सड़क हादसा हो जाए तो तुम पर कोई शक भी नहीं करेगा. लेकिन धनराज तैयार नहीं हुआ और डर कर अपने गांव भाग गया. शीतल का पहला दांव ही खाली चला गया. जिस मकसद से उस ने धनराज से शादी की थी, वह अधूरा रह गया. पर वह किसी भी कीमत पर शिवाजी से बदला लेना चाहती थी. इसी उधेड़बुन में काफी वक्त गुजर गया. इसी बीच मुंबई में 2020 की शुरुआत से कोविड महामारी का प्रकोप फैलने लगा.

कोविड का पहला दौर ठीक से खत्म भी नहीं हुआ था कि महामारी की दूसरी लहर भी शुरू हो गई. जून महीने के बाद जब हालत कुछ सुधरने लगे तो शीतल के दिमाग में फिर से शिवाजी से बदला लेने की धुन सवार हो गई. शीतल खुद इस काम को अंजाम नहीं देना चाहती थी, इसलिए अबकी बार उस ने दूसरा मोहरा चुना अपनी सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड बबनराव के बेटे विशाल जाधव को. दरअसल, सोसाइटी में आतेजाते शीतल ने एक बात नोटिस की थी कि गार्ड बबनराव का 18 साल का बेटा विशाल जाधव उसे चोरीछिपी नजरों से देखता है. शीतल एक खूबसूरत और जवान युवती थी. किसी मर्द की नजर को वह भलीभांति जानती थी कि उन नजरों में उस के लिए कौन सा भाव छिपा है.

अचानक विशाल के रूप में शीतल को शिवाजी से बदला लेने का दूसरा हथियार नजर आने लगा. उस ने मन ही मन प्लान कर लिया कि अब विशाल को कैसे अपने काबू में करना है. एक जवान और जिस पर कोई लड़का पहले से ही निगाह लगाए हो, उसे काबू में करना तो बेहद आसान होता है. कुछ रोज में ही विशाल पूरी तरह शीतल के काबू में आ कर उस के आगेपीछे मंडराने लगा. शीतल ने विशाल की आंखों में अपने लिए छिपी जिस्मानी भूख को पढ़ लिया था. थोड़ा तड़पाने के बाद उस ने जब विशाल की इस जिस्मानी भूख की ख्वाहिश को पूरा कर दिया तो इस के बाद विशाल पूरी तरह उस के इशारे पर नाचने लगा.

विशाल के पूरी तरह मोहपाश में फंसते ही एक दिन शीतल ने उसे भी भावुक कर के हैडकांस्टेबल शिवाजी द्वारा अपनी इज्जत लूटने की एक झूठी कहानी सुना कर अपना बदला लेने के लिए उकसाना शुरू कर दिया. शीतल के प्यार में विशाल पागल था, लिहाजा लोहा गर्म देख कर जब कई बार विशाल से प्यार की खातिर शिवाजी से बदला लेने के लिए कहा तो एक दिन विशाल ने उस का काम करने के लिए हामी भर दी, लेकिन साथ ही कहा कि इस काम के लिए उसे एक और साथी की जरूरत पड़ेगी और इस में कुछ पैसा भी खर्च होगा.

शीतल ने तुरंत हां कर दी. बस इस के बाद शीतल ने शिवाजी को खत्म करने की साजिश को अमली जामा पहनाने का काम शुरू कर दिया. विशाल ने इस काम के लिए अपने एक दोस्त गणेश चौहान से बात की. गणेश तेलंगाना से रोजीरोटी की तलाश में मुंबई आया था. संयोग से कोरोना महामारी के कारण उन दिनों उस के पास कोई कामकाज नहीं था और पैसों की बड़ी तंगी थी.

जब विशाल ने उसे बताया कि उन्हें किसी का ऐक्सीडेंट करना है इस के बदले अच्छीखासी रकम मिलेगी तो मजबूरी में दबा गणेश भी तैयार हो गया. दोनों से शीतल ने मुलाकात की. शिवाजी को ठिकाने लगाने के लिए शीतल ने विशाल को 50 हजार और गणेश को 70 हजार रुपए एडवांस दे दिए. जिस के बाद विशाल और गणेश ने सब से पहले शिवाजी का पीछा करना शुरू किया. उस के आनेजाने के समय को नोट किया. इस के बाद उन्होंने तय किया कि वो कुर्ला से पनवेल के बीच ही शिवाजी को मार डालेंगे. इस काम के लिए शीतल ने उन्हें एक सेकेंडहैंड नैनो कार खरीदवा दी. और 15 अगस्त की रात को इस खौफनाक वारदात को अंजाम दे दिया गया.

प्लान के मुताबिक 15 अगस्त, 2021 की रात साढ़े 10 बजे पनवेल रेलवे स्टेशन से मालधक्का जाने वाली सड़क पर शिवाजी को उन की नैनो कार से जोरदार टक्कर मार दी. संयोग से राष्ट्रीय अवकाश के कारण व कम रोशनी के कारण कोई न तो यह देख सका कि टक्कर किस नंबर की कार से लगी है. शिवाजी को टक्कर मारने के वक्त शीतल एक दूसरी कार से पीछा करते हुए पूरा नजारा देख रही थी. उस ने सड़क पर घायल शिवाजी को देख कर ही समझ लिया था कि वह जिंदा नहीं बचेगा.

योजना के मुताबिक ऐक्सीडेंट करने के बाद करीब 2 किलोमीटर आगे जा कर विशाल व गणेश ने नैनो कार पर पैट्रोल डाल कर पूरी तरह जला दी ताकि कोई सबूत पीछे न छूटे. वारदात के बाद दोनों का पीछा कर रही शीतल उन्हें कार जलाने के बाद अपनी कार में बैठा कर साथ ले गई और उन्हें उन के घर छोड़ दिया. बाद में पुलिस ने जब शीतल, विशाल व गणेश के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवा कर उन के मोबाइल की लोकेशन देखी तो उन की मौजूदगी उसी जगह के आसपास दिखी, जहां शिवाजी सानप का ऐक्सीडेंट हुआ था. पुलिस ने रिमांड अवधि में पूछताछ के बाद तीनों को न्यायालय में पेश कर दिया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Police Story

—कथा पुलिस की जांच व आरोपियों से पूछताछ पर आधारित

 

Crime Stories : डेरा सच्चा सौदा के पाखंडी को मिली सजा

Crime Stories : डेरा सच्चा सौदा के संत राम रहीम ने अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के लिए डेरे को अनैतिक कार्यों का केंद्र और अकूत संपत्ति हासिल करने का माध्यम बना लिया था. सब कुछ जानने के बाद उस के डर से डेरे में कोई मुंह तक नहीं खोल पाता था. लेकिन उस के काले कारनामों की जिस तरह कोर्ट द्वारा सजा सुनाई जा रही है, उस से तो यही लगता है कि…

18 अक्तूबर, 2021 को सुबह से ही पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत के बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. अदालत के आसपास धारा 144 लागू कर दी गई थी. हत्या के जिस मामले में विशेष सीबीआई कोर्ट के जज सुशील कुमार गर्ग सजा का ऐलान करने वाले थे, उस में 5 आरोपी उन के सामने कठघरे में खडे़ थे. जबकि एक आरोपी पिछले कई घंटों से रोहतक की सुनारिया जेल से वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए जुड़ा था. इसी शख्स के कारण सुरक्षा के तमाम इंतजाम किए गए थे. क्योंकि प्रशासन को आशंका थी कि उस के खिलाफ सजा का ऐलान होने से कहीं उस के भक्त भड़क कर हिंसा पर उतारू न हो जाएं. यह शख्स कोई छोटामोटा व्यक्ति नहीं, बल्कि डेरा सच्चा सौदा का मुखिया संत गुरमीत राम रहीम था, जिस के देशविदेश में लाखों समर्थक थे.

सरकारी वकील और बचाव पक्ष के वकीलों की कई घंटे दलील चली. आखिरकार कई घंटों की बहस के बाद सीबीआई जज सुशील कुमार ने अपना फैसला देते हुए डेरे के सेवादार रणजीत कुमार की हत्या के आरोप में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख संत गुरमीत राम रहीम, अवतार सिंह, जसबीर सिंह, सर्बदिल सिंह और कृष्णलाल को धारा 120बी, 302 एवं 506 के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई. इस मामले में आरोपित इंद्रसेन की सुनवाई के दौरान 8 अक्तूबर, 2020 को मौत हो गई थी. जज ने गुरमीत राम रहीम को 32 लाख रुपए का जुरमाना अदा करने की सजा भी सुनाई. यह रकम पीडि़त परिवार को देने का आदेश दिया. सजा का ऐलान होते ही रोहतक की सुनारिया जेल से वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए कोर्ट के साथ जुड़े राम रहीम ने अपना सिर पकड़ लिया और वहीं जमीन पर बैठ गया.

ये वही गुरमीत राम रहीम था, जिस के आगेपीछे कुछ साल पहले तक लाखों अनुयायियों की भीड़ जुटी रहती थी. लेकिन अपने कर्मों के कारण आज वह सलाखों के पीछे एक नहीं बल्कि 3 आपराधिक मामलों में सजा भोग रहा है. रणजीत सिंह हत्याकांड की कहानी को समझने के लिए हमें पहले राम रहीम और उस के उस साम्राज्य की बात करनी होगी, जिस के गुमान में वह अपराध दर अपराध करते हुए आज सलाखों के पीछे है. गुरमीत सिंह के डेरा प्रमुख राम रहीम बनने की कहानी  गुरमीत सिंह अपने मातापिता की इकलौती संतान था. उस का जन्म 15 अगस्त, 1967 को राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के गुरुसर मोदिया में जट सिख परिवार में हुआ था. उस के पिता का नाम मघर सिंह व मां का नाम नसीब कौर है. मातापिता हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी थे.

महज 7 साल की उम्र में मातापिता ने 31 मार्च, 1974 को अपने बेटे गुरमीत सिंह को तत्कालीन डेरा प्रमुख शाह सतनाम सिंह के चरणों में समर्पित कर दिया था. जिस के बाद डेरे में ही उस की शिक्षादीक्षा शुरू हुई. 23 सितंबर, 1990 को शाह सतनाम सिंह ने देशभर से अनुयायियों का सत्संग बुलाया. उसी समय उन्होंने गुरमीत सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. गुरमीत सिंह हरियाणा के सिरसा में स्थित आध्यात्मिक संस्था डेरा सच्चा सौदा के तीसरे प्रमुख बने. जिस की स्थापना 1969 में शाह सतनाम सिंह के गुरु शाह मस्तानाजी ने की थी.

डेरा प्रमुख बनने से पहले ही गुरमीत सिंह का गृहस्थ जीवन शुरू हो चुका था. गुरमीत सिंह की 2 बेटियां और एक बेटा है. बड़ी बेटी चरणप्रीत और छोटी का नाम अमरप्रीत है. उस ने इन 2 बेटियों के अलावा एक बेटी हनीप्रीत को गोद लिया हुआ था. इस की बड़ी बेटी चरणप्रीत कौर के पति का नाम डा. शान-ए-मीत इंसां जबकि छोटी बेटी अमरप्रीत के पति का नाम रूह-ए-मीत इंसां है. गुरमीत सिंह के बेटे जसमीत की शादी बठिंडा के पूर्व एमएलए हरमिंदर सिंह जस्सी की बेटी हुस्नमीत इंसां से हुई थी. डेरा सच्चा सौदा का साम्राज्य विदेशों तक फैला हुआ है. अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड से ले कर आस्ट्रेलिया और यूएई तक उन के आश्रम व अनुयायी हैं. डेरे की तरफ से दावा किया जाता है कि दुनिया भर में उन के करीब 5 करोड़ अनुयायी हैं, जिन में से 25 लाख अनुयायी अकेले हरियाणा में ही मौजूद हैं.

बहरहाल, गद्दी संभालने के बाद गुरमीत सिंह ने सर्वधर्म समभाव का संदेश देने के लिए अपने नाम में सभी धर्मों के नाम शामिल किए और अपना नाम गुरमीत सिंह से बदल कर गुरमीत राम रहीम सिंह रख लिया. जिस कारण चौतरफा उन की प्रशंसा हुई. उन्होंने जाति प्रथा की समाप्ति का आह्वान किया तथा अपने भक्तों से जातिवाचक नाम हटा कर ‘इंसां’ नाम लगाने को प्रेरित किया. गुरमीत राम रहीम ने कई वेश्याओं को अपनी पुत्री का दरजा दे कर अपनाया व अनुयायियों से आह्वान कर उन के घर बसाए. उन्होंने सफाई के कई अभियान चलाए. ऐसे कई काम थे, जिस कारण संत गुरमीत राम रहीम की शोहरत दुनिया भर में फैलने लगी और उन के भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी.

लेकिन इंसान चाहे साधारण हो या कोई संत, अगर अपनी इच्छाओं और कामनाओं पर अंकुश न रख सके तो शोहरत को कलंक लगने में देर नहीं लगती. गुरमीत राम रहीम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. गुरमीत राम रहीम सन 2002 में पहली बार सुर्खियों में तब आए, जब उन के ऊपर डेरे की साध्वियों के यौनशोषण के आरोप लगे. उसी साल उन के खिलाफ यौन शोषण की खबर छापने वाले सिरसा के एक स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या हो गई. इस के आरोप भी डेरामुखी पर ही लगे. अचानक शोहरत की बुलंदियां छूते राम रहीम अपने किसी न किसी कारनामे के कारण आए दिन मीडिया की सुर्खियां बनने लगे. डेरामुखी राम रहीम ने अपने ऊपर लगे आरोपों से निकलने के लिए एक के बाद ऐसी गलतियां कीं, जिस से वह अपराध की दलदल में गहरे तक फंसते चले गए.

जब हुआ बेनकाब डेरे में चल रही अय्याशगाह का खेल  28 अगस्त, 2017 को सीबीआई कोर्ट ने पहली बार गुरमीत राम रहीम को 4 साध्वियों के बलात्कार मामले में 20 साल की जेल व 30 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई थी. जिस मामले में उन्हें सजा सुनाई गई थी. डेरे में चल रहे साध्वियों के यौन उत्पीड़न के खुलासे की कहानी बेहद रोचक है. हुआ यूं कि साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक गुमनाम पत्र मिला. इस में एक गुमनाम साध्वी ने लिखा कि वह पंजाब की रहने वाली है और सिरसा के डेरा सच्चा सौदा में 5 साल से रह रही है. डेरे में साध्वियों का यौन शोषण किया जा रहा है. लेटर में बठिंडा, कुरुक्षेत्र की कुछ साध्वियों के यौन शोषण किए जाने की बात भी लिखी थी.

साध्वी के पत्र में लिखी बातों का कुछ हिस्सा बेहद आपत्तिजनक था. इस गुमनाम पत्र के बाद से ही बवाल शुरू हो गया था.  2002 में गुमनाम साध्वी की लिखी चिट्ठी की गोपनीय जांच शुरू हो गई, लेकिन इसी बीच ये चिट्ठी मीडिया के जरिए सार्वजनिक हो गई, जिस पर संज्ञान लेते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सीबीआई को मामले की जांच सौंप दी. सीबीआई ने डेरे के मैनेजर इंद्रसेन से 1999 से 2001 तक की साध्वियों की लिस्ट मांगी तो 2005 में सीबीआई को 3 लिस्ट मिलीं. पहली लिस्ट में 53, दूसरी में 80 और तीसरी लिस्ट में 24 साध्वियों के नाम थे.

राम रहीम के खिलाफ सबूत जुटाने के लिए सीबीआई ने 1997 से 2002 के बीच डेरा छोड़ चुकी 24 साध्वियों पर फोकस किया. इन में से 18 को ही सीबीआई ट्रेस कर पूछताछ कर पाई. इन में भी सिर्फ 2 ही साध्वियां अदालत तक पहुंचीं और और अपने बयान दर्ज कराए. इन शादीशुदा साध्वियों के बच्चे भी हैं. जो साध्वी सीबीआई के सामने आईं, उस में से फतेहाबाद की एक पूर्व साध्वी ने 4 मई, 2006 को सीबीआई के सामने बयान दर्ज कराया. उस ने बताया कि 1998 में डेरा में बतौर साध्वी जौइन किया था. वह शाह सतनामजी स्कूल में पढ़ाती थी. 6 महीने बाद उस की बहन भी साध्वी बन गई. बाबा ने उस का नाम नाजम और बहन का तसलीम रखा.

बाबा गर्ल्स हौस्टल के पास बनी अपनी गुफा में रहता था और गुफा के बाहर साध्वियों को ही संतरी रखता था. जिन की ड्यूटी रात 8 बजे से 12 और 12 बजे से 4 बजे 2 शिफ्टों में होती थी. एक दिन उसे रात को 10 बजे गुफा में बुलाया गया, जहां बाबा ने उस के साथ जबरन रेप किया. वह रोती हुई गुफा से निकली और हौस्टल चली गई. वहां पर उस ने किसी को कुछ नहीं बताया. मगर उस दिन उस की बहन ने बताया कि बाबा उस के साथ भी रेप कर चुका है. रेप होने के एक साल बाद उसे डेरे के मैनेजर ने बुलाया और कहा कि बाबा ने उसे गुफा में बुलाया है. मगर पहले हुई घटना के कारण उस ने गुफा में जाने से मना कर दिया. इस के बाद मैनेजर ने उसे ऐसा करने पर भूखा रखने की धमकी दी. मजबूर हो कर उसे गुफा में दोबारा जाना पड़ा और बाबा ने उस के साथ फिर रेप किया.

दोनों बहनों ने हौस्टल की दूसरी साध्वियों को भी बाबा की गुफा से कई बार रोते हुए निकलते देखा था. एक बहन ने तो अपने साथ हुई घटना के तुरंत बाद डेरा छोड़ दिया. दूसरी साध्वी बहन भी डेरा छोड़ना चाहती थी, मगर उस के भाई की बेटियां डेरे में बीए की पढ़ाई कर रही थीं. इस कारण उसे वहां रुकने के लिए मजबूर होना पड़ा. फिर अप्रैल, 2001 में उस ने अपने भाई और उस की दोनों बेटियों समेत डेरा छोड़ दिया. दोनों बहनों के डेरा छोड़ने के बाद ही प्रधानमंत्री कार्यालय को गुमनाम चिट्ठी मिली थी. बहरहाल, साध्वी के बयान कोर्ट में दर्ज कराने के बाद सीबीआई ने बाबा के साथ एक आरोपी अवतार सिंह, डेरा मैनेजर इंद्रसेन और मैनेजर कृष्णलाल को आरोपी बना कर उन का चंडीगढ़ और दिल्ली में लाई डिटेक्टर टेस्ट कराया.

जहां झूठ पकड़ने वाली मशीन से खुलासा हुआ कि डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम साध्वियों का यौन शोषण करता था. दोनों साध्वियों ने सीबीआई और अदालत को अपनी जो आपबीती सुनाई, उस में कहा था कि बाबा हर रोज साध्वियों को गुफा में बुलाता था और रेप करता था. उस के शीश महल जिसे वह गुफा कहता था, वहां से साध्वियां हर रोज रोते हुए बाहर निकलती थीं. गुफा के आसपास बने हौस्टलों में 200 से ज्यादा सुंदर साध्वियों को रखा गया था.  बाबा की गुफा के आसपास रात के वक्त महिला साध्वियों को गार्ड के रूप में तैनात किया जाता था.  साध्वियों से दुष्कर्म का यही वो केस था, जिस के बाद गुरमीत राम रहीम नायक से खलनायक और संत से अपराधी बन गया था.

प्रधानमंत्री कार्यालय में भेजे गए गुमनाम साध्वी के इस पत्र को पहले गृह मंत्रालय को सौंपा गया था. जहां से बाद में पत्र की जांच का जिम्मा सिरसा के सेशन जज को सौंपा गया. इसी दौरान हाईकोर्ट ने भी इस पर संज्ञान ले लिया था. दिसंबर 2002 में  राम रहीम के खिलाफ धारा 376, 506 और 509 आईपीसी के तहत केस दर्ज किया गया था. दिसंबर 2003 में  इस केस की जांच सीबीआई को सौंपी दी गई. जांच अधिकारी सतीश डागर ने केस की जांच शुरू की और आखिर साल 2005-2006 में उस साध्वी को ढूंढ निकाला, जिस का यौन शोषण हुआ था.

जुलाई 2007 में  सीबीआई ने केस की जांच पूरी कर अंबाला सीबीआई कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी. अंबाला से केस की सुनवाई पंचकूला शिफ्ट कर दी गई. चार्जशीट के मुताबिक, डेरे में 1999 और 2001 में कुछ और साध्वियों का भी यौन शोषण हुआ, लेकिन वे मिल नहीं सकीं. अगस्त 2008 में साध्वियों से दुष्कर्म  केस का ट्रायल शुरू हुआ और डेरा प्रमुख राम रहीम के खिलाफ आरोप तय कर दिए गए. साल 2011 से 2016 तक  केस का ट्रायल चला और डेरा प्रमुख राम रहीम की ओर से बड़ेबड़े वकील लगातार जिरह करते नजर आए. जुलाई 2016 तक चली केस की सुनवाई के दौरान कुल 52 गवाह पेश किए गए, इन में 15 प्रौसिक्यूशन और 37 डिफेंस के थे. और फिर वह दिन आ गया, जब राम रहीम की गरदन इस केस में पूरी तरह फंसी नजर आई और जून 2017 में कोर्ट ने डेरा प्रमुख के विदेश जाने पर रोक लगा दी.

17 अगस्त, 2017 को दोनों पक्षों की ओर से चल रही जिरह खत्म हो गई और फैसले के लिए 25 अगस्त की तारीख तय की गई. 25 अगस्त, 2017 को पंचकूला सीबीआई कोर्ट के जज जगदीप सिंह ने राम रहीम को उम्र कैद की सजा सुनाई. राम रहीम के खिलाफ सजा दिए जाने के आदेश के बाद डेरा सर्मथकों ने पंचकूला और सिरसा में जम कर उत्पात मचाया और हिंसा की, जिस में करीब 41 लोगों की मौत हुई. अदालत के फैसले के खिलाफ सिरसा व पंचकूला में हुई हिंसा के बाद गुरमीत राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा पर पुलिस के छापे पडे़ तो वहां से हथियारों का जखीरा बरामद हुआ.

हरियाणा पुलिस ने हिंसा फैलाने के आरोप में राम रहीम की गोद ली बेटी और उस की कथित प्रेयसी कहीं जाने वाली हनीप्रीत को भी चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. हनीप्रीत हिंसा होने के बाद से ही फरार थी. फ्रीज हुए डेरा के 90 बैंक एकाउंट साध्वियों से बलात्कार मामले में गुरमीत राम रहीम का सजा होने व गिरफ्तारी के बाद से ही डेरा सच्चा सौदा के रहस्य लोक की कहानियां सार्वजनिक होने लगीं. इधर, डेरा सर्मथकों की हिंसा के बाद डेरा के 90 बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए. गुरमीत राम रहीम के खिलाफ एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) ने भी जांच शुरू कर दी. क्योंकि डेरा की 700 करोड़ की संपत्ति में मनी लांड्रिंग की आशंका नजर आ रही थी.

गुरमीत राम रहीम को रेप मामले में सजा होने के बाद पंचकूला और सिरसा के अलावा करीब 5 राज्यों में हिंसक प्रर्दशन हुए थे. इस मामले में दरजनों केस दर्ज हुए. चंडीगढ़ व पंचकूला में हिंसा फैलाने के मामले में डेरा प्रवक्ता दिलावर सिंह को भी देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया. दिलावर सिंह एमएसजी ग्लोरियस इंटरनैशनल स्कूल सिरसा का एडमिनिस्ट्रेटर था. उस ने डेरामुखी के गनमैन ओमप्रकाश सिंह, डेरा सर्मथक दान सिंह व चमकौर सिंह के साथ मिल कर पंचकूला में आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया था. करीब 177 से अधिक मामले दर्ज किए गए और 1137 आरोपियों को अरेस्ट किया गया था.

बहरहाल, गुरमीत राम रहीम के पापों की कलई खुलनी शुरू हो चुकी थी और कानून ने सख्त रुख अपना लिया था. उस के खिलाफ मुंह न खोलने वाले लोग भी अब अदालत में सच बयां कर रहे थे. एक तरफ राम रहीम साध्वियों से बलात्कार के मामले में जेल से बाहर आने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा रहा था कि 17 जनवरी, 2019 को पंचकूला की विशेष सीबीआई के जज जगदीप सिंह  ने सिरसा के स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या के मामले में भी गुरमीत राम रहीम को उम्रकैद की सजा सुना दी. इस मामले में डेरा प्रमुख के साथ 3 अन्य लोगों कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल को भी दोषी ठहराया गया था. इन्हें भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

दरअसल, सिरसा के स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति वकालत छोड़ कर ‘पूरा सच’ नाम से एक अखबार निकालते थे. रामचंद्र अपने अखबार के नाम की तरह ही पत्रकारिता के लिए जाने जाते थे. निर्भीक छवि के रामचंद्र छत्रपति की हत्या का मामला कहीं न कहीं साध्वियों के दुष्कर्म से ही जुड़ा था.  2002 में रामचंद्र छत्रपति के हाथ वह चिट्ठी लग गई, जो गुमनाम साध्वी ने लिखी थी. रामचंद्र ने उस चिट्ठी को अपने अखबार में छाप दिया. इसी अखबार में छपी खबर के बाद लोगों को डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम द्वारा डेरे में साध्वियों के साथ दुष्कर्म करने की जानकारी मिली थी. इस खबर के छपने के बाद छत्रपति को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं.

आखिरकार 19 अक्तूबर, 2002 की रात छत्रपति को घर के बाहर गोली मारी गई. इस के बाद 21 अक्तूबर को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उन की मौत हो गई. हालांकि इस दौरान छत्रपति होश में आए लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण छत्रपति का बयान तक दर्ज नहीं किया गया. दरअसल, छत्रपति अपने अखबार में डेरा सच्चा सौदा की अच्छी और बुरी खबरों को छापते थे, जिस कारण उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रहती थीं. यह बात सिरसा के सभी पत्रकार जानते थे. मृतक पत्रकार के बेटे अंशुल ने हाईकोर्ट में दायर की थी याचिका जनवरी, 2003 में मृतक के बेटे अंशुल ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर मामले को सीबीआई को सौंपने की मांग की. इस याचिका में डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के भी इस में संलिप्त होने के आरोप लगाए.

सोशल मीडिया में रामचंद्र छत्रपति को इंसाफ दिए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी. इसी दौरान डेरामुखी पर डेरे के एक पूर्व मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या के भी आरोप लगने लगे. इस मामले में भी पीडि़तों की तरफ से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया. हाईकोर्ट ने पत्रकार छत्रपति और डेरा मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या के मामलों को जोड़ते हुए 10 नवंबर, 2003 को सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया. सीबीआई ने दिसंबर, 2003 में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी. मामला दर्ज होते ही डेरा की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर जांच पर रोक लगाने की अपील की गई, जिस के बाद उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की और मामले की जांच पर उस वक्त रोक लगा दी गई.

लेकिन नवंबर, 2004 में दूसरे पक्ष की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने डेरा की याचिका को खारिज कर दिया और सीबीआई जांच को जारी रखने के आदेश दिए. सीबीआई ने दोबारा दोनों मामलों की जांच शुरू की और डेरा प्रमुख समेत कइयों को अभियुक्त बनाया. इसी मामले में सीबीआई कोर्ट ने गुरमीत राम रहीम समेत 4 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. साध्वी रेप केस मामले और पत्रकार छत्रपति हत्याकांड की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के जेल जाने के बाद से उस की खास राजदार हनीप्रीत सब से ज्यादा सुर्खियों में रही है. उस पर भी पंचकूला में दंगा भड़काने, राजद्रोह और राम रहीम को पुलिस कस्टडी से भगाने की साजिश रचने के आरोप लगे और बाद में उसे गिरफ्तार किया गया.

हालांकि कुछ महीने बाद हनीप्रीत को अदालत से जमानत मिल गई और उस के बाद हनीप्रीत ने डेरा सच्चा सौदा की कमान अपने हाथों में ले ली. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर हनीप्रीत कौन है, जो गुरमीत राम रहीम के बाद डेरा सच्चा सौदा की सब से ताकतवर बनी है. आखिर इतना बड़ा परिवार होते हुए राम रहीम क्यों हर वक्त हनीप्रीत को याद करता रहा और हनीप्रीत से उस का क्या खास रिश्ता है. हनीप्रीत इंसां का जन्म 21 जुलाई, 1980 को हरियाणा के फतेहाबाद में हुआ था. उस का स्कूली नाम प्रियंका तनेजा है.  प्रियंका तनेजा का पूरा परिवार करीब ढाई दशक से डेरे का अनुयायी था. हनीप्रीत के दादा ने पाकिस्तान से आ कर हरियाणा के सिरसा में कपड़े की दुकान खोली थी. जहां गुरमीत राम रहीम के गुरु शाह मस्तानाजी आते रहते थे. तभी से उन की फैमिली डेरे की अनुयायी हो गई.

कुछ ही दिनों में हनीप्रीत के दादा डेरे के प्रशासक बन गए और वहां खजाने से संबंधित काम देखने लगे थे. 1996 में प्रियंका के दसवीं पास करते ही दादा ने उस का एडमिशन डेरे के ही स्कूल में करवा दिया. हनीप्रीत के पिता रामानंद तनेजा पहले पुरानी दिल्ली एमआरएफ टायर्स का ‘सर्च टायर्स’ नाम से शोरूम चलाते थे. लेकिन बाद में उन्होंने डेरे में ही एक बड़ा सीड प्लांट डाल लिया. बाद में गुरमीत राम रहीम ने उस के पिता रामानंद तनेजा को डेरा की पर्चेजिंग कमेटी का हेड बना दिया, जो डेरे के सारे सामान की खरीदफरोख्त का काम देखने लगे.

प्रियंका के भाई साहिल तनेजा को भी गुरमीत का आशीर्वाद मिल गया और वह भी डेरे में बड़े स्तर पर कारोबार करने लगा. बाद में प्रियंका की छोटी बहन नीशू तनेजा की गुरुग्राम में जो शादी हुई, उस में भी बाबा का खास योगदान रहा. हनीप्रीत के चाचा और मामा समेत दूसरे कई रिश्तेदार सिरसा के मुख्य मार्गों पर टायरों का कारोबार करते हैं. आज भी डेरे में कई बड़े प्रोजेक्ट हनीप्रीत के नाम से चल रहे हैं. बताते हैं कि गुरमीत राम रहीम 1996 में डेरे के स्कूल में जब छात्राओं को आशीर्वाद देने गया था तो वहां उस की नजर पहली बार प्रियंका तनेजा पर पड़ी थी. बस उसी के बाद बाबा ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया कि वह प्रियंका को अपना खास आशीर्वाद देने के लिए डेरे में अपने निजी कक्ष में बुलाने लगा.

बाबा की खासमखास बन गई हनीप्रीत कुछ ही दिनों में प्रिंयका पूरी तरह बाबा के वश में हो गई. कुछ समय बाद बाबा ने उस का नया नामकरण किया और उस का नाम हनीप्रीत इंसां रख दिया. क्योंकि डेरे में सभी राजदारों व साधुसाध्वियों को ‘इंसां’ सरनेम दिया जाता है. उम्र का काफी फासला होने के बावजूद धीरेधीरे गुरमीत राम रहीम और हनीप्रीत इंसा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. जल्द ही हनीप्रीत बाबा की खास बन गई और उस की पहुंच बेरोकटोक बाबा के बैडरूम तक होने लगी. हनीप्रीत ने 12वीं तक की पढ़ाई डेरे के स्कूल में ही की. बाबा ने उस का डेरे से बाहर आनाजाना बंद करा दिया. डेरे में उस के लिए एक खास आवास की व्यवस्था कर दी गई और वहीं पर उस के टीचर उसे पढ़ाने के लिए आते.

इतना ही नहीं, बाबा ने हनीप्रीत के लिए एक विशेष जिम बनवा दिया. हनीप्रीत के नाम पर डेरे के अंदर एक बुटीक भी खोल दिया गया. बताते हैं कि धीरेधीरे हनीप्रीत और राम रहीम की नजदीकियां कुछ इस तरह बढ़ गईं कि हनीप्रीत बाबा के हर राज की राजदार हो गई. हनीप्रीत अब गुरमीत की सब से करीबी बन गई थी. गुरमीत उस पर इतना मेहरबान था कि उस ने हनीप्रीत के नाम पर डेरे में कई बड़े कारोबार शुरू किए.  बताते हैं कि डेरे के अंदर बाबा और हनीप्रीत के रिश्ते को ले कर हमेशा लोगों के मन में सवाल रहते थे. लेकिन बाबा के डर से कोई अपनी जबान नहीं खोलता था, क्योंकि बाबा राम रहीम उसे लोगों के सामने अपनी बेटी, अपनी ‘परी’ कहता था. लेकिन हकीकत यह थी कि वो बाबा की ‘परी’ नहीं बल्कि बाबा की ‘हनी’ थी.

बताते हैं कि जब बाबा को लगा कि एक अविवाहित लड़की इस तरह उस की सेवा में रहेगी तो इस से उस की छवि और प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े हो सकते हैं. इसलिए उस ने 14 फरवरी, 1999 वैलेनटाइंस डे के दिन हनीप्रीत की शादी विश्वास गुप्ता से करा दी. हनीप्रीत के परिवार की तरह करनाल के रहने वाले विश्वास गुप्ता का परिवार भी बाबा का अनुयायी था. बाबा ने ही शादी की सारी व्यवस्थाएं कराई थीं. राम रहीम ने हनीप्रीत की शादी तो गुप्ता से करा तो दी, लेकिन दोनों को आदेश दिया कि वे बच्चा पैदा न करें.

हनीप्रीत के पूर्व पति विश्वास गुप्ता ने बाबा की गिरफ्तारी के बाद मीडिया को बताया था कि शादी के 2 या 3 दिन बाद बाबा राम रहीम ने उसे हनीप्रीत के साथ डेरे में मुलाकात के लिए बुलाया था. तब बाबा ने कहा था कि तुम हमारे साथ बाहर यात्राओं पर जाती हो, अगर बच्चा हुआ तो उस के स्कूल जाने और लालनपालन के चलते हमारी सेवा नहीं कर पाओगी, इसलिए बच्चा पैदा न करो. बाबा ने कहा था कि हम तुम्हें बेटा मानते हैं, उसी तरह हनीप्रीत भी हमारी बेटी है. हम उसे भी उतना ही प्यार देंगे. विश्वास गुप्ता ने आरोप लगाया था कि बाबा हर सप्ताह हनीप्रीत और उसे डेरे में बुलाने लगा. वह गुफा के अंदर बने बैडरूम में हनीप्रीत को बुलाता था और उसे लिविंग रूम में ही बैठने को कहता था.

पूछने पर बाबा कहता था कि बेटी अकेले में ससुराल के हर सुखदुख बता सके, इसलिए उस से अकेले में हालचाल पूछता हूं. विश्वास गुप्ता ने आरोप लगाए थे कि राम रहीम और हनीप्रीत की सभी मुलाकातें हर बार एक से डेढ़ घंटे तक होती थीं. इस दौरान बाबा के चेले और दूसरे सेवादार विश्वास गुप्ता को बातों और कुछ कामों में उलझाए रखते थे. बाद में बाबा ने विश्वास गुप्ता को सप्ताह में 2 दिन पत्नी के साथ गुफा में रहने का आदेश दिया. बताते हैं कि उसी दौरान एक रात जब  विश्वास गुप्ता डेरे में बाबा की गुफा के लिविंग रूम में सो रहा था तो उस ने रात के वक्त बाबा के बैडरूम में अपनी पत्नी हनीप्रीत व बाबा को कामक्रीड़ा करते देखा. बस इसी के बाद से बाबा और हनीप्रीत से उस का मोहभंग हो गया.

बाद में हनीप्रीत और विश्वास गुप्ता के संबध बिगड़ने लगे तथा दोनों में अकसर तकरार होने लगी. विश्वास गुप्ता और हनीप्रीत का रिश्ता केवल 11 साल चला. बाबा राम रहीम ने साल 2009 में हनीप्रीत को बेटी के रूप में गोद ले लिया. जिस के बाद हनीप्रीत बाबा के साथ डेरे की गुफा में ही रहने लगी. हनीप्रीत को गोद लेने के बाद गुप्ता से हनी के मतभेद और गहरे हो गए. गुप्ता ने जब हनीप्रीत पर घर वापस चलने का दबाव डाला तो उस के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करवा दिया गया, जिस में उसे जेल की हवा खानी पड़ी. बाद में जेल से रिहा होने पर  साल 2011 में विश्वास गुप्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर राम रहीम के कब्जे से अपनी पत्नी यानी हनीप्रीत को मुक्त कराने की मांग की थी. अदालत में दी गई याचिका में विश्वास गुप्ता ने राम रहीम पर हनीप्रीत के साथ अवैध संबंध होने का भी आरोप लगाया था.

डेरे के सारे फैसले लेने लगी हनीप्रीत बताते हैं कि बाद में डेरे के कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण विश्वास गुप्ता के परिवार वालों ने हनीप्रीत से उस का तलाक करवा दिया. लेकिन इस दौरान गुप्ता परिवार को बाबा के ऊंचे रसूख के कारण कई तरह की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ा. विश्वास गुप्ता से तलाक के बाद हनीप्रीत पूरी तरह बाबा के लिए समर्पित हो गई. हनीप्रीत डेरा के हर महत्त्वपूर्ण फैसले लेने लगी. बाबा राम रहीम के साथ वह साए की तरह चौबीसों घंटे रहने लगी. बाबा हर फैसला हनीप्रीत से सलाह ले कर ही करता था.

इतना ही नहीं, बाबा ने हनीप्रीत की फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश को देखते हुए ‘एमएसजी’ नाम से एक फिल्म कंपनी बनाई जिस के तहत बनी फिल्म ‘एमएसजी’, ‘जट्टू इंजीनियर’, ‘द वारियर लायन हार्ट’ समेत दूसरी और भी फिल्मों का निर्देशन हनीप्रीत ने ही किया. एमएसजी नाम की फिल्म में तो बाबा ने खुद हीरो के रूप में काम भी किया. बाबा की बेबी हनीप्रीत इतनी ताकतवर हो चुकी थी कि उसी के हाथ में डेरे की सभी चाबियां रहती थीं. पैसे से ले कर हर वो फैसला जो डेरे से संबंधित होता था, वह हनीप्रीत ही करती थी. हनीप्रीत भले ही दिखावे के लिए बाबा की बेबी रही हो, लेकिन लोग अब खुली जुबान से कहते हैं कि वह बाबा की हनी थी. शायद यही वजह थी कि गुरमीत राम रहीम की अपनी बीवी और बेटेबहू से दूरियां रहती थीं.

राम रहीम को अपने तौरतरीकों से चलाने वाली हनीप्रीत जेल जाने तक उस के साथ नजर आई थी और बाद में उसी ने डेरे का प्रबंध अपने हाथों में लिया. गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद 600 करोड़ रुपए के टर्नओवर वाले उस के एमएसजी प्रोडक्ट्स की कमान भी बाद में हनीप्रीत के हाथों में आ गई. एमएसजी के सिरसा में 5 बड़े शोरूम थे, जिन में करीब 150 से ज्यादा प्रोडक्ट्स बेचे जाते थे. हालांकि बाबा की गिरफ्तारी के बाद एमएसजी का यह कारोबार आर्थिक संकट का शिकार हो कर बंद हो गया, जिस से इस में निवेश करने वाले लगभग 10 हजार लोगों की रकम भी डूब गई. साध्वियों के साथ रामचंद्र छत्रपति के परिवार को इंसाफ मिल चुका था, लेकिन राम रहीम के दामन पर लगे डेरा प्रेमी रणजीत सिंह की हत्या के दागों का इंसाफ होना अभी बाकी था.

18 अक्तूबर, 2021 को रणजीत सिंह हत्याकांड में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत के जज सुशील कुमार ने राम रहीम समेत 5 लोगों को दोषी ठहरा कर उम्रकैद की सजा सुनाई. 19 साल तक अदालत में चले इस मामले की 250 पेशी हुई और 61 गवाही के बाद अदालत ने 5 आरोपियों को दोषी माना. रणजीत सिंह एक समय राम रहीम के डेरे का मैनेजर और उस का भक्त हुआ करता था, लेकिन 10 जुलाई, 2002 को अचानक रणजीत सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हत्या का रहस्य बहुत गहरा था. हत्या के आरोप में राम रहीम के साथ उस का सहयोगी कृष्ण लाल भी फंसा था.

रणजीत सिंह हत्याकांड में 3 गवाह महत्त्वपूर्ण थे. इन में 2 चश्मदीद गवाह सुखदेव सिंह और जोगिंद्र सिंह थे. इन का कहना था कि उन्होंने आरोपियों को रंजीत सिंह पर गोली चलाते हुए देखा था. तीसरा गवाह गुरमीत का ड्राइवर खट्टा सिंह था, जिस के सामने रंजीत को मारने की साजिश रची गई थी. हालांकि बाद में खट्टा सिंह अदालत के सामने बयान से मुकर गया था. कई साल बाद खट्टा सिंह फिर से कोर्ट में पेश हो गया और गवाही दी. रणजीत का साला परमजीत सिंह भी इस मामले में गवाह था, जिस ने सीबीआई के स्पैशल मजिस्ट्रैट के सामने बयान दर्ज कराए थे. परमजीत ने अदालत को बताया था कि रणजीत की बहन भी जुलाई, 1999 में साध्वी बनी थी.

परमजीत ने कोर्ट के सामने डेरे से जुड़ी घटनाओं की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए बताया कि रणजीत सिंह की साध्वी बहन डेरा प्रमुख की गुफा के बाहर पहरेदारी का काम करती थी. उसी ने अपने भाई को डेरा प्रमुख की गुफा में साध्वियों के साथ होने वाले दुष्कर्म की बात बताई थी. जिस के बाद रणजीत सिंह ने डेरा छोड़ दिया और अपने गांव कुरुक्षेत्र चला गया. डेरा प्रमुख को शक था कि साध्वियों को डेरे से भगाने और उन के खिलाफ प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट में चिट्ठी लिखवा कर उसे बदनाम करने का काम रणजीत सिंह ने अपनी साध्वी बहन के जरिए किया है, इसीलिए रणजीत सिंह की हत्या करा दी गई.

चूंकि डेरे में 20 साल तक सेवादार रहे रणजीत सिंह की 2002 में गुमनाम साध्वी का पत्र सामने आने के बाद ही हत्या हुई थी. इसीलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कडि़यां जोड़ते हुए अदालत ने बाबा को उस की हत्या का दोषी माना. वैसे साध्वियों से दुष्कर्म, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरे के मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के अलावा भी डेरामुखी राम रहीम के खिलाफ कई संगीन आरोप हैं. 2010 में डेरा के ही एक पूर्व साधु रामकुमार बिश्नोई ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर डेराप्रमुख पर डेरे के पूर्व मैनेजर फकीर चंद की हत्या कराने का आरोप लगाया था. 400 साधुओं को बनाया नपुंसक फकीरचंद की गुमशुदगी की सीबीआई जांच की मांग पर अदालत ने सीबीआई को जांच के आदेश तो दिए लेकिन जांच एजेंसी मामले में सबूत नहीं जुटा पाई और क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी. हालांकि बिश्नोई ने क्लोजर रिपोर्ट को उच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है.

इस के अलावा फतेहाबाद जिले के कस्बा टोहाना के रहने वाले डेरे के एक पूर्व साधु हंसराज चौहान ने जुलाई 2012 में उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर राम रहीम पर डेरा के 400 साधुओं को नपुंसक बनाए जाने का गंभीर आरोप लगाया था. अदालत के सामने उन्होंने 166 साधुओं का नाम सहित विवरण प्रस्तुत करते हुए गुरमीत राम रहीम की करतूतों की पोल खोली थी. अदालत ने इस शिकायत की जांच का काम भी सीबीआई को सौंपा, जिस के बाद ये मामला भी अब अदालत में विचाराधीन है. साधु हंसराज ने बताया कि उस के मातापिता डेरे के अनुयायी थे, इसलिए वह भी साल 1996 में 17 साल की उम्र में डेरे के अनुयायी बन गए थे. जहां डेरामुखी ने यह कहते हुए अनुयायियों को नपुंसक बनाया कि वे अगर खुद नपुंसक बनते हैं तो भगवान को पाने में सफल होंगे.

उन्हें साल 2002 में श्रीगंगानगर स्थित डेरे के अस्पताल में नपुंसक बनने के लिए मजबूर किया गया, जहां उन के अलावा कई अन्य साधु (डेरा अनुयायी) भी थे. डेरामुखी का मानना था कि नपुंसक बनने के बाद अनुयायी डेरा छोड़ कर नहीं जा सकेंगे. डेरामुखी ऐसे अनुयायियों से खाली कागज पर दस्तखत भी करवा लेता था. उस के बाद उन के नामों पर डेरामुखी को दान की गई जमीन ट्रांसफर करवाता और कुछ समय बाद उस जमीन को डेरा ट्रस्ट के नाम पर ट्रांसफर करवा लिया जाता. दरअसल, गुरमीत राम रहीम के गलत कामों की कुंडलियां खुलने के बाद ही पता चला कि डेरे का आकार बढ़ाने के लिए उस ने डेरे के आसपास की जमीन हथियाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया हुआ था.

गुरमीत राम रहीम ने 1990 में गद्दीनशीं होने के बाद डेरे के चारों ओर की जमीन हासिल करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए. लोगों को डराधमका कर औनेपौने दामों पर 700 एकड़ जमीन हासिल की. इसी वजह से महज कुछ एकड़ में फैला डेरा आज बड़े शहर में तब्दील हो चुका है. गांव शाहपुर बेगू, नेजियाखेड़ा और फूलकां बाजेकां के जिन लोगों ने बाबा को जमीन देने का विरोध किया, उन्हें परेशान करने के लिए बाबा के गुंडों ने पहले उन्हें धमकाया फिर समझाया और जो इस के बाद भी नहीं माना, उस की जमीन को रातोंरात ओपन टौयलेट बना दिया जाता था.

डेरे पर आने वाले हजारों लोग ऐसे लोगों के खेतों और फसल की ऐसी दुर्दशा कर देते थे कि गंदगी की वजह से खेतों के आसपास जाना भी मुश्किल हो जाता था. परेशान हो कर लोग उस जमीन को जमीन बेचने में ही भलाई समझते थे. अदालत से जिन मामलों में गुरमीत राम रहीम को अपने कुकर्मों की सजा मिल चुकी है, वे तो महज उदाहरण हैं. लेकिन यौन उत्पीड़न से ले कर हत्या और लोगों की संपत्ति हड़पने के ऐसे सैकड़ों गुनाह हैं, जिन की पीडि़तों ने शिकायत ही नहीं की. लेकिन ऐसे तमाम लोग आज इस बात से खुश हैं कि सच्चे डेरे की आस्था को कलंकित करने वाला संत अब सलाखों के पीछे है. Crime Stories

 

Delhi News : शूटआउट इन रोहिणी कोर्ट

Delhi News : दिल्ली की जिला एवं सत्र न्यायालय रोहिणी में 24 सितंबर की दोपहर को एक कोर्टरूम में अंधाधुंध गोलियां चलीं. वकील के वेश में आए 2 हमलावरों ने गैंगस्टर जितेंद्र मान उर्फ गोगी को आधा दरजन गोलियां बरसा कर छलनी कर दिया. जानिए कि उस दिन कोर्टरूम में क्याक्या और कैसे घटा…

24 सितंबर, 2021. शुक्रवार का दिन था. दोपहर के करीब एक बजे का टाइम था. दिल्ली के जिला अदालत रोहिणी कोर्ट में हर दिन की तरह ही काम हो रहा था. हर कोर्टरूम में अदालती काररवाई चल रही थी. कोर्ट परिसर की बिल्डिंग के अंदर और बाहर दोनों ही एरिया में वकीलों, पीडि़तों, फरियादियों, पुलिस वालों इत्यादि की भीड़ जमा थी. हर कोई अपनेअपने काम में व्यस्त था. बिल्डिंग के अंदर कोर्ट रूम नंबर 207 के बाहर भी ऐसा ही कुछ माहौल था. दोपहर करीब सवा बजे के आसपास एडिशनल सेशन जज गगनदीप सिंह अपने कोर्टरूम में दाखिल हुए तो रूम में बैठे सभी लोग उन के सम्मान में खड़े हुए और धीमी आवाज में हो रही खुसफुसाहट एकदम से शांत हो गई.

रूम में दाखिल होते ही उन्होंने कोर्टरूम में सभी लोगों पर अपनी नजर घुमाई और ये सुनिश्चित किया कि सब ठीक तो है. नजर घुमाने के बाद न्यायाधीश ने अपनी जगह पर बैठते हुए सभी लोगों को हाथ से बैठने का इशारा किया और अपनी कुरसी पर बैठ गए. उस समय कोर्टरूम में बाएं और दाएं दोनों ओर कठघरों के पास वकील की ड्रैस पहने 2 व्यक्ति चुपचाप खड़े थे. कमरे के बीचोबीच नीले रंग की कमीज और काली पैंट में एक शख्स 2 पुलिस वालों के साथ खड़ा था. उस के हाथों में हथकडि़यां लगी थीं और वह ठीक न्यायमूर्ति के सामने ही खड़ा था.

यह शख्स मशहूर गैंगस्टर जितेंद्र मान उर्फ गोगी था, जिस पर दिल्ली और हरियाणा पुलिस ने एक समय पर कुल मिला कर 6 लाख रुपए का ईनाम घोषित किया हुआ था. गोगी पर जून 2018 में दिल्ली पुलिस ने मकोका एक्ट लगा दिया था, जिस की सुनवाई उस दिन होने वाली थी. गोगी इतना बड़ा और खतरनाक गैंगस्टर था कि उसे स्पैशल सेल और थर्ड बटालियन की कस्टडी में कोर्ट में लाया गया था. करीब 2 मिनट के बाद सामने कुरसियों पर बैठे लोगों में से एक वकील अपने हाथों में एक भारीभरकम मोटी सी फाइल लिए अपनी कुरसी से उठा और अपनी फाइल में से केस का वारंट निकाल कर जज साहब की ओर आगे बढ़ा दिया.

उस का दिया वारंट अभी जज के हाथों में पहुंचा ही था कि दोनों कठघरों के पास खड़े काले कोट में वकील जैसे दिखाई देने वाले दोनों लोग अचानक से गोगी की तरफ आगे बढ़े और अपनी कमर में पीछे की ओर से पिस्तौल निकाल कर गोगी की छाती पर तान दी. उन्होंने गोगी की छाती पर अपनी पिस्तौल तान कर गोली चला दी. वकील के काले कोट में दोनों लोगों ने एकएक कर करीब कुल मिला कर आधा दरजन गोलियां चला कर उस के शरीर को भेद दिया, जिस से वह वहीं ढेर हो कर जमीन पर गिर पड़ा. ये सब इतनी अचानक से और इतनी जल्दी हुआ कि किसी को भी होश संभालने का मौका तक नहीं मिला. कोर्टरूम में अचानक से अफरातफरी का माहौल बन गया.

सब के दिलों में दहशत फैल गई थी. कोर्टरूम के आगे और पीछे के गेट से जितने लोग अपनी जान बचाने के लिए निकल सकते थे, वे निकल गए. लेकिन कोर्टरूम में अभी भी गोलियां चलाने वाले दोनों हमलावर पुलिस की टीम (जो गोगी को कोर्टरूम में ले कर आए थे), अन्य पुलिसकर्मी, न्यायमूर्ति गगनदीप सिंह और उन के साथ कुछ और लोग कोर्टरूम में ही फंसे थे. दोनों हमलावर कोर्टरूम से भाग कर निकल न सकें, इस के लिए अंदर मौजूद पुलिसकर्मियों ने कोर्टरूम के दोनों दरवाजों को बंद कर दिया. कोर्टरूम में हर कोई खुद को सुरक्षित करने के लिए जिसे जहां जगह मिली, वह उसी के पीछे या नीचे छिप कर चलने वाली गोलियों से खुद को बचाने लगे. न्यायाधीश गगनदीप सिंह भी अपनी जान बचाने के लिए अपनी डेस्क के नीचे छिप गए.

हमलावरों ने गोगी पर गोलियां चलाने के बाद भागने के लिए जब कोर्टरूम के दरवाजों पर नजर घुमाई तो देखा कि दोनों गेट बंद थे. यह देख कर वे और भी अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे. ऐसे में रूम में मौजूद पुलिसकर्मियों ने भी जवाबी काररवाई करते हुए उन दोनों हमलावरों पर गोलियां चलाईं. पुलिस की गोलियों से बचने के लिए दोनों हमलावरों ने अपनेअपने कोनों में कुरसियों के पीछे छिप कर मौका देख कर पुलिस पर गोलियां चलाने लगे थे. पुलिसकर्मी भी खुद को सुरक्षित रखते हुए और बाकी लोगों की जान बचाने के लिए जल्द से जल्द उन हमलावरों को ढेर कर देना चाहते थे.

उधर दूसरी ओर कोर्टरूम के बाहर और पूरे अदालत परिसर में गोलियों की आवाजें गूंजने लगी थीं. लोग अपनी जेब से मोबाइल फोन निकाल कर उस घटना का वीडियो बनाने लगे थे. कोर्टरूम के बाहर भी लोग अपना फोन निकाल कर वीडियो बना रहे थे और अदालत परिसर में जहांजहां तक गोलियां चलने की आवाजें पहुंच रही थीं, लोग उसे रिकौर्ड कर रहे थे. जो रिकौर्ड नहीं कर रहे थे, वह जल्द से जल्द अदालत से बाहर निकल कर खुद की जान बचाना चाहते थे. उस समय गोलियों की धायंधायं आवाजें सुन कर जिला अदालत रोहिणी कोर्ट के हर कोने में हर व्यक्ति के दिल में दहशत फैल गई थी. वहीं कोर्टरूम में गोलियां चलने की आवाजें थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं. हमलावर और पुलिसकर्मी दोनों ओर से एकदूसरे पर फायरिंग की जा रही थी.

इसी तरह से फायरिंग करते हुए करीब 9 मिनट के बाद पुलिस ने कोर्टरूम में मौजूद 2 में से एक हमलावर को ढेर कर दिया. अब सिर्फ एक ही हमलावर बचा रह गया था, जिस पर काबू पाना मुश्किल साबित हो रहा था. वह शारीरिक रूप से काफी तगड़ा और फुरतीला भी था. उस ने किसी तरह से खुद को पुलिस की गोलियों से बचाया हुआ था. करीब 12 मिनट के बाद भी वह हार मानने को तैयार नहीं था. लेकिन उस पर भी किसी तरह से काबू पा लिया गया, जब एक पुलिसकर्मी की गोली उस के शरीर पर लगी और वह भी ढेर हो कर गिर पड़ा.

कोर्टरूम में यह शूटआउट करीब 12 मिनट तक चलता रहा. इन 12 मिनट के शूटआउट के दौरान हर कोई यही प्रार्थना कर रहा था कि वह किसी तरह से सुरक्षित बच जाए. 12 मिनट के बाद जब दोनों हमलावर पुलिस की गोली से ढेर हो गए तो कोर्टरूम में अचानक से शांति फैल गई. कोर्टरूम में शांति इसलिए भी फैली क्योंकि अंदर मौजूद सभी लोगों के कान गोलियों की तड़तड़ाहट से सुन्न पड़ गए थे. शूटआउट खत्म होने के बावजूद कमरे में मौजूद लोग अपनी आंखों और कानों को बंद कर के बचाव की मुद्रा में किसी भी चीज का सहारा लेते हुए जमीन पर लेटे हुए थे.

कोर्टरूम नंबर 207 में सुनवाई के लिए आए जितेंद्र गोगी और उस पर हमला करने वाले दोनों हमलावरों की लाशें पड़ी थीं. कोर्टरूम में चारों और गोलियों के खाली खोखे बिखरे पड़े थे. इस पूरे 12 मिनट के शूटआउट के दौरान कमरे में मौजूद कई लोगों को मामूली खरोंचें भी आईं. शूटआउट की समाप्ति के बाद दोपहर के 1.36 बजे गोगी की डैडबौडी को दिल्ली पुलिस पास के अस्पताल ले कर पहुंची, जिसे देख डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. इस के अलावा दोनों हमलावरों में एक की पहचान सोनीपत हरियाणा निवासी जगदीप उर्फ ‘जग्गा’ के रूप में की गई और दूसरा, उत्तर प्रदेश के मेरठ का रहने वाला राहुल त्यागी उर्फ ‘फफूंदी’ था. दोनों हमलावर गैंगस्टर सुनील मान उर्फ टिल्लू के गुर्गे थे.

इस शूटआउट से यही बात सामने आई कि ये दोनों गुर्गे कुख्यात गैंगस्टर जितेंद्र मान उर्फ गोगी को मारने आए थे. आखिर यह गोली है कौन और किस तरह यह अपराध की दुनिया में आ कर इतना बड़ा अपराधी बना, यह जानने के लिए हमें गोली की जन्मकुंडली खंगालनी होगी. जितेंद्र मान उर्फ ‘गोगी’ का जन्म साल 1991 में दिल्ली के अलीपुर गांव में हुआ था. गोगी वौलीबाल का अच्छा खिलाड़ी था. उस ने अपने स्कूल के दिनों में वौलीबाल में पदक भी जीते थे. वह वौलीबाल में अपने स्कूल का प्रतिनिधित्व करता था. इस से पहले कि वह खेल को अपना कैरियर बना पाता, 17 साल की उम्र में एक दुर्घटना में उस का दाहिना कंधा घायल हो गया था, जिस के कारण वह फिर कभी नहीं खेल सका.

गोगी के बड़े भाई रविंदर टैंपो चलाते थे और किराए पर देते थे, जबकि उन के पिता मेहर सिंह एक निजी ठेकेदार थे और अलीपुर में प्रमुख जमींदार जाट समुदाय से थे. गोगी के पिता को कैंसर हो गया था. गोगी पढ़नेलिखने में ठीकठाक था. स्कूल की पढ़ाई के बाद उस का दाखिला दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानंद कालेज में हो गया था. कालेज में पढ़ाई के दौरान गोगी के कई दोस्त बने. उन में से एक सुनील उर्फ ‘टिल्लू ताजपुरिया’ भी था. समय के साथसाथ जितेंद्र गोगी और टिल्लू की दोस्ती गहरी होती गई. कालेज में हर साल होने वाले छात्रसंघ के चुनावों ने गोगी की पूरी जिंदगी ही बदल दी.

चुनाव के दौरान उस ने अपने प्रतिद्वंद्वी समूह के साथ लड़ाई की और अपने सहयोगियों रवि भारद्वाज उर्फ बंटी, अरुण उर्फ कमांडो, दीपक उर्फ मोनू, कुणाल मान और सुनील मान के साथ संदीप और रविंदर पर गोलियां चला कर हमला किया था. इस मामले में एफआईआर भी हुई थी. उस का सहयोगी रवि भारद्वाज उर्फ बंटी एक जमाने में गैंगस्टर भी रहा था, जिस की गिरफ्तारी के लिए दिल्ली पुलिस ने एक लाख रुपए का ईनाम भी घोषित किया था, जिसे स्पैशल सेल ने वर्ष 2014 में गिरफ्तार किया था. गोगी का दोस्त अरुण उर्फ कमांडो भी श्रद्धानंद कालेज में पढ़ता था और छात्रसंघ के चुनाव के दौरान अलीपुर के एक छात्र का समर्थन कर रहा था. प्रत्याशी गोगी के गांव का ही रहने वाला था.

दूसरी ओर, एक अन्य छात्र एक गैंगस्टर का चचेरा भाई टिल्लू, जोकि गोगी का पक्का दोस्त था, के विपक्षी पार्टी से एक उम्मीदवार था. छात्र संघ के चुनाव के दिनों में सुनील उर्फ टिल्लू के गुट के सदस्यों ने कुछ कारणों से अरुण उर्फ कमांडो को पीट दिया. जिस की वजह से गोगी गुट के प्रत्याशी ने उस चुनाव से नाम वापस ले लिया और टिल्लू के समूह के प्रत्याशी ने वह चुनाव जीत लिया. लेकिन उस घटना ने दोनों के बीच रंजिश को जन्म दे दिया और यहीं से गोगी और टिल्लू दोनों के बीच दुश्मनी हो गई. दोनों के बीच दुश्मनी का बीज इतना गहरा हो गया था, जिसे उखाड़ फेंकना नामुमकिन था. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गोगी का मिशन टिल्लू का पूर्ण विनाश था.

पिछले 5 सालों में दोनों पक्षों के कम से कम 12 लोगों की जान जा चुकी है. यही नहीं, यह बात भी फैली कि गोगी तब तक नहीं रुकेगा जब तक वह टिल्लू को नहीं मार देता. न्यायिक हिरासत के दौरान गोगी का एक सहयोगी सुनील मान उर्फ टिल्लू के करीब आया. जेल से छूटने के बाद गोगी और सुनील मान दबदबे के मुद्दे पर एकदूसरे के प्रतिद्वंदी बन गए. वहीं दूसरी ओर गोगी की दूर की बहन का अफेयर दीपक उर्फ राजू से था. दीपक गोगी की दूर की बहन के साथ डेट करता था और इस बात को खुल कर स्वीकार करता था.  दीपक टिल्लू का करीबी दोस्त था. इस के बाद दीपक की हरकतों और अफवाहों के चलते गोगी और उस के साथियों ने दीपक की हत्या को अंजाम दिया.

उस मामले में 4 आरोपी योगेश उर्फ टुंडा, कुलदीप उर्फ फज्जा, दिनेश और रोहित को गिरफ्तार किया गया और आरोपी जरनैल को स्पैशल सेल द्वारा गिरफ्तार किया गया. इस के बाद गोगी को दीपक की हत्या के लिए मार्च 2016 को पानीपत पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, लेकिन जुलाई 2016 को वह बहादुरगढ़ क्षेत्र में न्यायिक हिरासत से फरार हो गया. दीपक की हत्या के प्रतिशोध में टिल्लू गिरोह के सदस्यों ने अरुण उर्फ कमांडो की हत्या को अंजाम दिया, जो गैंगस्टर गोगी का सहयोगी था. इस मामले में सोनू को गिरफ्तार किया गया और वर्तमान में वह न्यायिक हिरासत में है. इस के बाद दोनों गैंग के बीच कई बार वारदात को अंजाम दिया गया और दोनों के बीच की दुश्मनी बढ़ती ही चली गई.

रोहिणी कोर्ट में मारा गया जितेंद्र गोगी कितना बड़ा अपराधी था, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली पुलिस की गिरफ्तारी से पहले दिल्ली में उस पर 4 लाख रुपए का ईनाम था. इस के अलावा हरियाणा की पुलिस ने भी उस पर 2 लाख रुपए का ईनाम घोषित कर रखा था. 3 मार्च, 2020 को दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल ने गुरुग्राम से उसे गिरफ्तार किया था. इस से पहले साल 2015 में जब जितेंद्र गोगी को गिरफ्तार किया गया था तो 30 जुलाई, 2016 को गोगी पुलिस को चकमा दे कर फरार हो गया था. उस वक्त उसे हरियाणा रोडवेज की बस से नरवाना कोर्ट में पेशी पर ले जाया जा रहा था. तब 10 हथियारबंद बदमाश बस को रुकवा कर जितेंद्र गोगी को अपने साथ ले कर भाग गए थे.

इस के बाद से लगातार बड़ी वारदात में जितेंद्र का नाम सामने आता रहा. 17 अक्तूबर, 2017 को हरियाणा के पानीपत में चर्चित सिंगर हर्षिता दहिया की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हर्षिता को 4 गोलियां मारी गई थीं. इस केस में जितेंद्र गोगी का नाम सामने आया था और कहा गया था कि हर्षिता के जीजा ने जितेंद्र गोगी को सुपारी दे कर हत्या करवाई थी. इस के अगले ही महीने स्वरूप नगर में एक टीचर दीपक बालियान की हत्या कर दी गई, जिस में जितेंद्र गोगी का ही नाम सामने आया. जनवरी, 2018 में अलीपुर के रवि भारद्वाज की 25 गोलियां मार कर हत्या की गई थी.

इस में भी जितेंद्र गोगी ही शामिल था. अभी इसी साल 19 फरवरी को रोहिणी के कंझावला में आंचल उर्फ पवन की भी हत्या जितेंद्र गोगी गैंग ने की थी, जिस में कम से कम 50 राउंड फायरिंग हुई थी. 8 सितंबर, 2019 को दिल्ली के नरेला इलाके में विधानसभा का चुनाव लड़ चुके वीरेंद्र मान की 26 गोलियां मार कर हत्या कर दी गई थी. इस केस का भी मुख्य आरोपी जितेंद्र गोगी ही था. तब पुलिस ने जितेंद्र गोगी के शार्पशूटर कपिल को गिरफ्तार किया था. इस दुश्मनी में अब तक ये दोनों गैंग 8 बार सड़क पर टकरा चुके हैं. कम से कम 30 लोगों की जान गई है और जितेंद्र गोगी की मौत के बाद एक बार फिर से इस गैंगवार के बढ़ने का अंदेशा जताया जा रहा है.

राजधानी दिल्ली की रोहिणी कोर्ट में जज के सामने ही टौप मोस्ट गैंगस्टर जितेंद्र मान उर्फ गोगी हत्याकांड की पटकथा 10 दिन पहले ही मंडोली जेल में लिख ली गई थी. 15 सितंबर को टिल्लू ताजपुरिया से मिलने उस के गैंग के लोग मंडोली जेल में पहुंचे थे. वहां टिल्लू ने अपने साथियों को गोगी की हत्या का प्लान बताया था. टिल्लू के कहने पर ही प्लान को अंजाम तक पहुंचाने के लिए लगातार 4 दिन कोर्ट की रैकी कर पांचवें दिन वारदात को अंजाम दे दिया गया. अदालत के सभी गेट पर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया गया. इस के बाद फैसला हुआ कि गेट नंबर 4 से अंदर दाखिल हो कर वकील के कपड़ों में कोर्टरूम में पहुंचा जाएगा. ऐसा हुआ भी. बदमाश अपने मकसद में कामयाब हुए और इन्होंने योजना के तहत गोगी की हत्या कर दी.

पुलिस सूत्रों का कहना है कि गोगी की हत्या के बाद विरोधी टिल्लू खेमे में खुशी का माहौल है. पिछले कई सालों से टिल्लू लगातार गोगी की हत्या की योजना बना रहा था. पुलिस सूत्रों का कहना है कि 15 सितंबर को मंडोली जेल में टिल्लू से मिलने के लिए उमंग और विनय के अलावा कुछ और भी लोग थे. वहां मुलाकात के दौरान टिल्लू ने इन को अपना प्लान समझाया था. योजना के तहत शूटरों के रुकने की व्यवस्था उमंग ने अपने घर में की. यहां से रोहिणी कोर्ट ढाई से तीन किलोमीटर के बीच है. ऐसे में यहां से आनाजाना आसान था. पुलिस के अनुसार, 20 सितंबर के बाद उमंग, विनय, राहुल और जगदीप लगातार 3 से 4 घंटे कोर्ट की रैकी कर रहे थे. इन सभी को इस बात का पहले से ही अंदाजा था कि गोगी की सुनवाई कोर्टरूम नंबर 207 में ही होगी.

गोगी किसी भी सूरत में जिंदा न रहे, इसलिए शूटरों को आदेश था कि वे दोनों ओर से गोगी पर फायर करें. सब कुछ साजिश के तहत हुआ. घटना वाले दिन उमंग शूटर राहुल व जगदीप को ले कर कोर्ट के गेट नंबर 4 से ही दाखिल हुआ. काफी देर वह पार्किंग में ही मौजूद रहा. जब कोर्ट रूम में गोलियां चलने की आवाज आई तो उमंग वहां से भाग निकला और सीधा अपने घर पहुंचा. पुलिस सूत्रों का दावा है कि तिहाड़ और मंडोली जेल से इस साजिश को अंजाम दिया गया है. इस साजिश में टिल्लू ताजपुरिया, पश्चिमी यूपी का गैंगस्टर सुनील राठी, नीरज बवानिया गैंग का नवीन बाली और उस का भाई राहुल काला, टिल्लू का गुर्गा सुनील मान के शामिल होने की आशंका है.

इन में अधिकतर गैंगस्टर तिहाड़ की जेल नंबर 15 में हैं. आशंका है कि गैंगस्टरों ने इस हत्याकांड को अंजाम देने से पहले फोन के जरिए आपस में संपर्क किया होगा. वहीं दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल ने मामले में काररवाई करते हुए 2 लोगों को गिरफ्तार किया है. स्पैशल सेल की गिरफ्त में आए दोनों लोगों की पहचान उमंग और विनय के रूप में हुई है. स्पैशल सेल ने दोनों को कोर्ट के गेट नंबर 4 के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर गिरफ्तार किया है. ये दोनों आरोपी उत्तर पश्चिमी दिल्ली के हैदरपुर के रहने वाले हैं.  गैंगस्टर सुनील उर्फ टिल्लू ताजपुरिया एक पुराने मामले में रोहिणी कोर्ट में पेश हुआ. दिल्ली पुलिस स्पैशल सेल और थर्ड बटालियन के हथियारों से लैस जवान उसे सुबह ही कोर्ट में ले आए थे.

रोहिणी जिला पुलिस ने भी भारी बंदोबस्त कर रखा था. रोहिणी कोर्ट पूरी तरह से छावनी में तब्दील दिखी. पुलिस को आशंका है कि गोगी गैंग पलटवार करते हुए टिल्लू पर हमला कर सकता है, इसलिए एजेंसियां कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं.  पुलिस सूत्रों ने बताया कि टिल्लू ताजपुरिया को शनिवार सुबह मंडोली जेल से लेने के लिए स्पैशल सेल की टीम को भेजा गया. थर्ड बटालियन के जवान और स्पैशल सेल की टीम उसे अपनी सुरक्षा के घेरे में सुबह करीब सवा 10 बजे ले कर रोहिणी कोर्ट परिसर में पहुंच गई. एक पुराने मामले में उस की पेशी कोर्ट नंबर 202 में अडिशनल सेशन जज राकेश कुमार की कोर्ट में थी.

इस से पहले ही लोकल पुलिस ने पूरी तरह से रोहिणी कोर्ट परिसर को अपने घेरे में ले लिया था. पुलिस सूत्रों ने बताया कि जज के सामने टिल्लू को पेश किया गया तो उन्होंने अगली तारीख लगा दी. सुरक्षा टीम करीब 12 बजे टिल्लू को कड़े सुरक्षा घेरे के बीच मंडोली जेल के लिए ले कर रवाना हो गई. करीब एक घंटे बाद जब पुलिस अफसरों को टिल्लू के सुरक्षित मंडोली जेल पहुंचने का मैसेज किया गया तो सब ने राहत की सांस ली. क्राइम ब्रांच की टीम शूटआउट के अगले दिन 25 सितंबर को दोपहर बाद रोहिणी कोर्ट में पहुंची और 2 घंटे से भी ज्यादा समय तक पड़ताल की.

इस दौरान कोर्ट रूम में क्राइम सीन रीक्रिएट किया गया. लोकल पुलिस से जल्द ही सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज हासिल की जाएगी, जिन का एनलिसिस कर पता लगाया जाएगा कि वकील की ड्रेस में कोर्ट के भीतर आए बदमाश किसकिस रूट से आए थे. दोनों हमलावरों के साथ क्या कुछ और बदमाश भी अदालत में आए थे. Delhi News

 

Social Stories : समलैंगिक प्यार में हुआ परिवार स्वाहा

Social Stories : रोहतक का रहने वाला 20 साल का अभिषेक जब दिल्ली में स्किल कोर्स करने गया तो उस की दोस्ती समलैंगिक कार्तिक से हुई. यह दोस्ती प्यार में बदल गई. कार्तिक से शादी करने के लिए अभिषेक ने अपना लिंग चेंज कराने की ठान ली. लेकिन उस के मातापिता ने अपने इकलौते बेटे को इस की इजाजत नहीं दी. तब समलैंगिक प्यार में अंधे हो चुके अभिषेक ने अपने घर वालों को कुछ इस तरह से सजा दी कि सब की रूह कांप गई.

हरियाणा में रोहतक के विजय नगर में रहने वाला मलिक परिवार, इलाके के संपन्न परिवारों में से एक था. घर के मुखिया प्रदीप मलिक को रोहतक का हर इंसान जानता था. पेशे से वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम किया करते थे और हर कोई उन्हें बबलू पहलवान के नाम से जानता था. उन के छोटे से हंसतेमुसकराते  परिवार में उन की पत्नी संतोष देवी उर्फ बबली, उन का एकलौता बेटा अभिषेक मलिक उर्फ मोनू और एकलौती बेटी तमन्ना उर्फ नेहा ही थी. मलिक परिवार में कभी भी किसी भी सदस्य को किसी भी चीज की कमी नहीं थी. घर के दरवाजे पर एक गाड़ी खड़ी रहती, बच्चों के हाथों में उन के मनमुताबिक एप्पल के मोबाइल फोन और तो और दोनों बच्चों के पास एप्पल के ही लैपटौप थे.

इतना संपन्न परिवार होने के बावजूद मलिक परिवार में बीते कुछ समय से अशांति बनी हुई थी. बीते कुछ समय से अभिषेक घर में अपने घर वालों से 5 लाख रुपयों की मांग कर रहा था. हालांकि उस के पिता बबलू पहलवान ने उसे पैसे देने से इंकार नहीं किया था, लेकिन घर में अशांति तब पैदा हुई जब घर वालों को अभिषेक के 5 लाख रुपयों की मांग करने की असली वजह पता चली. घर वालों के लिए ये बात इतनी गंभीर थी कि उन्होंने अभिषेक पर घर में कई तरह की पाबंदियां तक लगा दीं. आखिर वह वजह क्या थी? 27 अगस्त, 2021 के दिन जब अभिषेक को लगा कि उस पर घर वालों के द्वारा लगाई गई पाबंदियां कुछ ढीली पड़ी हैं, तो उस ने तय किया कि वह बाहर घूम कर आएगा.

आखिर वह पिछले 20 दिनों से घर में किसी कैदी की तरह रहने को मजबूर था जिस के साथ कोई भी ढंग से बात करने को राजी नहीं था. यहां तक कि उस की मां और बहन भी उस से नजरें नहीं मिलाते थे. घर में अभिषेक को समझानेबुझाने के लिए उस की नानी रोशनी देवी भी आई थीं. सिर्फ उस की नानी ही उस से इन दिनों बात किया करतीं और उस का खयाल रखा करती थीं. 27 अगस्त को घर में हर कोई मौजूद था. उस के पापा भी उस दिन काम से नहीं निकले थे. करीब सुबह 11 बजे के आसपास अभिषेक ने घर में किसी को कुछ नहीं बताया और घर से थोड़ा टहलने के लिए निकल गया.

विजय नगर के पास ही एक जगह पर उस का दोस्त कार्तिक दिल्ली से उस से मिलने आया था तो अभिषेक वहीं चला गया. जब वह अपने पक्के यार कार्तिक से मिल कर दोपहर को ढाई बजे के करीब घर पर लौटा तो उस ने देखा कि घर में सभी कमरे बाहर से बंद थे. उस ने कमरा खटखटाया लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. उस ने अपनी बहन नेहा को फोन मिलाया लेकिन घंटी बजती रही. अभिषेक ने उस के बाद अपनी मां के नंबर पर फोन किया. इस बार रिंगटोन जोर से बजी और ये समझ आया कि फोन घर पर ही है लेकिन किसी ने भी नहीं उठाया. हार मान कर उस ने अपने पिता के नंबर पर फोन किया लेकिन वही हुआ जो अभी तक होता आ रहा था, किसी ने फोन नहीं उठाया और कोई जवाब नहीं मिला.

घर के सदस्यों को लगातार फोन करने का सिलसिला काफी देर तक चलता रहा लेकिन जब अभिषेक को कुछ गड़बड़ होने का अंदेशा हुआ तो उस के दिल में घबराहट पैदा हो गई. अभिषेक ने बिना किसी देरी के अपने पापा के साथ प्रौपर्टी डीलिंग में पार्टनर और उस के मामा प्रवीण, जोकि सांपला के रहने वाले थे, को फोन मिलाया. उस ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘मामा, घर पर कोई फोन नहीं उठा रहा, दरवाजा भी लौक हो रखा है. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि क्या हुआ है. अंदर से किसी की आवाज नहीं आ रही है..’’

उस के मामा प्रवीण ने उसे हौसला रखने को कहा, ‘‘अरे चिंता मत कर, मैं देखता हूं एक बार.’’ घर के बाहर जुट गई भीड़ यह कहते हुए प्रवीण ने भी एक एक कर सब के नंबर पर फोन किया. जब उन का फोन भी किसी ने नहीं उठाया तो बिना देरी किए प्रवीण ने अपनी गाड़ी निकाली, उस से तुरंत ही अभिषेक के घर के लिए निकल गए और रास्ते में उन्होंने अभिषेक को फोन किया. प्रवीण ने अभिषेक से कहा, ‘‘सुन अभिषेक, मैं अपने घर से निकल गया हूं वहां आने के लिए. तू घबरा मत. मैं 15 मिनट में पहुंच जाऊंगा. तब तक मैं कुछ जानकारों को फोन कर के वहां पहुंचने के लिए कहता हूं.’’

प्रवीण ने ये कह कर फोन काट दिया और अपनी कार में बैठेबैठे उन्होंने उसी इलाके में अपने जानकारों को फोन कर जल्द से जल्द अभिषेक के घर पर पहुंचने को कहा. उधर देखते ही देखते मलिक परिवार के घर के आगे लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी. अभिषेक के साथ मिल कर कुछ लोग घर का दरवाजा तोड़ने में लगे थे, जोकि आसान काम बिलकुल भी नहीं था. अभिषेक के घर से लग कर साथ वाले मकान से तमाशा देख रहे लोगों ने उसे अपनी छत से उस के घर में प्रवेश करने के लिए कहा तो अभिषेक भाग कर उन की छत पर जा पहुंचा और छत फांद कर वह अपने घर में जा घुसा.

घर में घुसते ही उस ने सब से पहले नीचे आ कर मकान का मेन गेट खोला और एकएक कर बाकी लोग उस के घर में आ घुसे. ग्राउंड फ्लोर में जिस कमरे में अभिषेक ने आखिरी बार अपने पापा को देखा था उस के नीचे से खून बह रहा था. ये देख कर अभिषेक की आंखों से आंसू बहने शुरू हो गए और बाकी लोग दंग रह गए. सब लोगों ने मिल कर कमरे का दरवाजा तोड़ा और अंदर प्रदीप मलिक उर्फ बबलू पहलवान की लाश सोफे पर बैठी हालत में मिली. यह देख कर अभिषेक खुद को रोक नहीं पाया और वह जोरजोर से ‘पापा…पापा’ कहते हुए चिल्लाने लगा. इतने में उस के मामा प्रवीण आ पहुंचे और वह अपने बहनोई प्रदीप की लाश देख कर टूट गए.

लेकिन हिम्मत जुटाते हुए उन्होंने अभिषेक को ले कर ऊपर कमरे की ओर जाने को कहा, जहां घर के अन्य सदस्य मौजूद हो सकते थे. अभिषेक ने भी अचानक से अपने आंसू पोंछे और ‘नेहा…नेहा’ चीखतेचिल्लाते हुए वह घर की पहली मंजिल पर बने कमरे में जा पहुंचा.

यह कमरा भी बाहर से बंद था तो सब ने मिल कर दरवाजा तोड़ा और कमरे में घुसते के साथ अभिषेक और प्रवीण समेत बाकी सभी ने जो देखा उसे देख कर सभी के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई. पहली मंजिल के कमरे का दरवाजा टूटा तो अभिषेक ने सब से पहले अपनी मां संतोष देवी, उस के बाद अपनी नानी रोशनी देवी और अंत में अपनी बहन नेहा की लाश देखी. यह देख कर अभिषेक पागलों की तरह रोनेपीटने लगा. प्रवीण समेत मकान में मौजूद कुछ लोग अभिषेक को संभालने में लगे थे. अभिषेक का पूरा परिवार ही उजड़ गया था. वक्त बरबाद न करते हुए प्रवीण ने भीड़ से हटते हुए बाहर निकल कर पुलिस को फोन कर इस घटना की सूचना दी और पलक झपकते ही रोहतक के थाना शिवाजी कालोनी के थानाप्रभारी सुरेश कुमार टीम के साथ वहां पहुंच गए.

पुलिस की टीम के आते ही सब से पहले सभी लोगों को बाहर निकाला गया ताकि वहां से कुछ सबूत जुटाए जा सकें. घटनास्थल की जांच की गई. एकएक कर मृतकों के शरीर को लपेटते हुए बाहर निकाला गया और एक टीम ने इस हत्याकांड में एकमात्र बचे शख्स, अभिषेक का बयान लिया. शुरुआती पूछताछ में अभिषेक ने पुलिस को दिए अपने बयान में बताया कि प्रौपर्टी डीलर होने की वजह से उस के पिता की लोगों से दुश्मनी थी. उस ने एकदो लोगों के नाम भी पुलिस टीम को दिए. जानकारी मिलते ही शिवाजी कालोनी पुलिस थाने के थानाप्रभारी एसआई सुरेश कुमार ने मामले की जांच तुरंत शुरू कर दी. सभी की हत्या गोली मार कर की गई थी. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

टैक्निकल टीम की मदद ले कर घर के सभी लोगों की लोकेशन का पता लगाया गया और लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया गया. इस केस के जांच अधिकारी इंसपेक्टर बलवंत सिंह ने बारीकी से इस केस के संबंधित हर व्यक्ति की आखिरी लोकेशन का पता लगाया. लेकिन अभिषेक की लोकेशन और उस के द्वारा दिए गए बयान आपस में मेल नहीं खा रहे थे. इस बिंदु को संज्ञान में लेते हुए इंसपेक्टर बलवंत सिंह ने फिर से अभिषेक से पूछताछ की और अभिषेक ने अपना बयान बदल दिया. थानाप्रभारी को अभिषेक पर शक गहराता गया. उसी दौरान जब मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई तो अभिषेक पर शक की सुई और गहराती चली गई.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार पीडि़तों को गोली मारने का टाइम उस समय का था, जब अभिषेक अपने घर पर ही था. अंत में जब शक की सभी सुई अभिषेक पर आ रुकीं तो अभिषेक को हिरासत में लेते हुए इंसपेक्टर बलवंत सिंह से कड़ाई से पूछताछ की. इस पूछताछ के दौरान भी अभिषेक ने पुलिस टीम को गुमराह करने का प्रयास किया लेकिन उस का यह प्रयास व्यर्थ गया. इंसपेक्टर बलवंत सिंह और थानाप्रभारी रमेश कुमार ने अभिषेक को सब कुछ सचसच बताने को कहा. उन्होंने अभिषेक को बताया कि इस हत्याकांड के सारे सबूत उसी की ओर इशारा कर रहे हैं, बेहतर है की वह अब सच बता दे.

अभिषेक ने भी अंत में हार मान ली और जांच अधिकारी बलवंत सिंह को बताया कि उस ने अपने घर के 4 जनों को गोली मारी थी. इस चौहरे हत्याकांड की जो वजह सामने आई, वह इस प्रकार निकली. बात 3 साल पहले की है. अभिषेक ने जब 12वीं क्लास पास की तो उस के पिता प्रदीप मलिक ने उसे कोई भी एक स्किल कोर्स करने की सलाह दी. वैसे उन के पास पैसों की कभी कोई किल्लत नहीं थी. फिर भी प्रदीप रोहतक में प्रौपर्टी डीलिंग करते थे. वह चाहते थे कि अभिषेक भी खाली न बैठे. इसलिए उन्होंने उसे कुछ भी करने की छूट दे दी थी. तब अभिषेक ने जानबूझ कर रोहतक से दूर दिल्ली में स्थित एक इंस्टीट्यूट में एयरप्लेन कैबिन क्रू का कोर्स करने की जिद की.

प्रदीप मलिक ने अपने इकलौते बेटे की इच्छा का ध्यान रखते हुए उसे कोर्स करने के लिए दिल्ली जाने की इजाजत दे दी. तब अभिषेक ने दिल्ली जा कर एक इंस्टीट्यूट में दाखिला ले लिया और उस के एक हफ्ते बाद ही उस की क्लासेज शुरू हो गईं. अभिषेक को उस दौरान पहली बार आजादी महसूस हुई थी. नए लोगों से मिलना उन से बातें करना उसे बेहद अच्छा लगने लगा. इंस्टीट्यूट में उस के बैच में सिर्फ 10-12 स्टूडेंट्स ही थे. सब से उस की अच्छी जानपहचान हो गई थी, लेकिन उन में से कार्तिक उस का करीबी दोस्त बन गया था. वह उत्तराखंड का रहने वाला था और दिल्ली में अपने रिश्तेदार के साथ रहता था.

अलग तरह की होती थी फीलिंग कार्तिक उस के सब से अच्छे दोस्तों में से एक बन गया था. उसे उस के साथ वक्त गुजारना अच्छा लगने लगा. दोनों मिल कर क्लास के बाद दिल्ली के अलगअलग जगहों पर घूमने निकल जाते, अच्छे होटल में खाना खाते. कभी स्टारबक्स, कभी मैकडोनल्डस, कभी केएफसी, कभी बर्गर किंग तरह तरह की जगहों पर अकसर वक्त गुजारते. वह जब कभी भी कार्तिक के साथ मिलता तो उस के शरीर में एक अलग तरह की सिहरन दौड़ जाती थी. उस का चेहरा और उस की बातें, उस की आंखों और दिल को सुकून देती थीं. कार्तिक के लिए उस के मन में एक अजीब तरह की फीलिंग महसूस होने लगी थी.

अभिषेक मन में कार्तिक को छूने की, उस के करीब रहने की बातें घूमती रहती थीं. वह भी उसे एक अच्छा दोस्त समझता था. लेकिन उसे यह नहीं पता था कि जो फीलिंग्स वह कार्तिक के लिए अपने मन में रखता है, क्या वह भी उसे उसी तरह से देखता है या नहीं. 2 सालों तक वह दिल्ली में कार्तिक के साथ इसी तरह से मिला करता था. लेकिन एक दिन अभिषेक ने कार्तिक को अपने घर पर आने का न्यौता दिया. वह उस के घर पर आया. उस के पूरे परिवार से मिला. उस के घर पर सभी को पता था कि वे दोनों बेहद अच्छे दोस्त हैं. ऐसे ही एक दिन जब कार्तिक उस के घर पर आया तो वह दोनों लैपटोप पर फिल्म देख रहे थे. वह अभिषेक से चिपक कर बैठा था. उस का ध्यान फिल्म पर बिलकुल भी नहीं था.

न जाने उसी वक्त उसे क्या हुआ कि उस ने कार्तिक को उस की गरदन पर चूम लिया. खुद को लड़की मानता था अभिषेक अभिषेक की इस हरकत का कार्तिक ने बुरा नहीं माना बल्कि उस ने उस का हाथ पकड़ लिया और उस ने भी अभिषेक की गरदन पर चूम लिया. इस अहसास को अभिषेक ने इस से पहले कभी महसूस नहीं किया था. कुछ इस तरह से उस के और कार्तिक के बीच संबंध बनने शुरू हुए. जिस के बाद वे दोनों अकसर होटल में मिलते और अपनी जरूरतों को पूरा करते. 3 साल का उन का कैबिन क्रू का कोर्स खत्म हुआ तो अभिषेक अपने घर आ गया. तब उस का दिल्ली जा पाना और कार्तिक से मिलना मुश्किल हो गया. तब वह कार्तिक को मिलने के लिए अकसर रोहतक में बुला लिया करता था.

पहले के मुकाबले उन की मुलाकात अब ज्यादा दिनों में होती. बढ़ते गैप के साथसाथ उन दोनों के मन में एकदूसरे के लिए फीलिंग्स और भी ज्यादा बढ़ने लगीं. कार्तिक के बिना उस के लिए एक पल भी गुजारना मुश्किल होने लगा था. अगर वह नहीं मिल पाते तो घंटों फोन पर एकदूसरे से बातें करते. कार्तिक से मिलने के बाद अभिषेक ने खुद को अन्य लोगों से अलग महसूस किया. अकसर उस के मन में आता कि बेशक वह लड़का है, लेकिन अंदर से वह खुद को लड़की मानने लगा था. घर में अकेले होता था तो वह अपनी बहन नेहा के कपड़े पहन कर और मेकअप कर के देखता कि कैसा दिखाई देता है. वह पूरी तरह से खूद को बदलाबदला सा महसूस करता. अभिषेक की अब हलके और चटक रंग के कपड़ों में दिलचस्पी बढ़ने लगी थी. उस की पसंद में पूरी तरह से बदलाव आ गया था.

ऐसे ही साल 2020 के अगस्त के महीने में अभिषेक ने यह तय कर लिया था कि वह खुद को अंदर से जैसा महसूस करता है, वैसा ही वह हकीकत में बनेगा. यानी वह लड़की बनना चाहता था. इस संबंध में उस ने इंटरनेट पर सर्च करना शुरू कर दिया. उसे पता चला कि औपरेशन के जरिए एक इंसान अपना लिंग बदल सकता है. अभिषेक इस बारे में पूरी जानकारी हासिल करना चाहता था, इसीलिए वह घंटों इंटरनेट पर इसी के संबंध में सर्च करता रहता, पढ़ता रहता और वीडियोज देखता. वह भारत में सैक्स चेंज का औपरेशन करने वाले क्लिनिक या हौस्पिटल के बारे में पता करने लगा. धीरेधीरे उस ने इस औपरेशन में आने वाला खर्चा, सारी सावधानियां, सभी ऐहतियात सब के बारे में पता कर लिया.

अब वह अपने जीवन में एक अहम पड़ाव पर आ कर फंस गया था, उसे एक ऐसा फैसला करना था जिस के बाद उस की पूरी जिंदगी बदल जाती. उस ने दिनरात इस के बारे में सोचा. उस ने इस की भनक कार्तिक को बिलकुल भी नहीं होने दी, क्योंकि वह उस के साथ रिश्ते में बंधने के लिए उसे सरप्राइज देना चाहता था. अंत में उस ने फैसला कर ही लिया कि उसे क्या चाहिए. उस ने अपने लिए खुद को चुना, कार्तिक को चुना क्योंकि वही उस की खुशियां बनने वाला था. उस ने औपरेशन के लिए खुद को तैयार कर लिया, लेकिन उस के लिए उसे पैसों की जरुरत थी.

नए साल 2021 की शुरुआत में ही अभिषेक ने अपने पापा से 5 लाख रुपए मांगे. उसे लगा कि हर बार की तरह वह इस बार भी नहीं पूछेंगे कि उसे इतने पैसे किसलिए चाहिए. लेकिन इस बार इतनी बड़ी रकम मांगने पर उन्होंने उस से पूछ ही लिया कि उसे ये पैसे किसलिए चाहिए. तब अभिषेक ने उन से झूठ बोला कि उसे किसी काम के लिए चाहिए तो उन्होंने साफ मना कर दिया. फिर अभिषेक ने पैसों के लिए अपनी मम्मी के पास जा कर एप्रोच किया. मम्मी उसे पैसों के लिए कभी भी मना नहीं करती थीं, लेकिन इतनी बड़ी रकम सुन कर उन्होंने भी मना कर दिया था. बहन को बता दी मन की बात वह पैसों का जुगाड़ नहीं कर पा रहा था. उसे इस औपरेशन के लिए जल्द से जल्द पैसे चाहिए थे.

कार्तिक से दूरी वह अब बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. हार मान कर उस ने यह बात अपनी बहन नेहा को बता दी कि उसे किसलिए पैसों की जरूरत है. अभिषेक को लगा कि एक लड़की और मेरी बहन होने के नाते वह उस की फीलिंग्स की कदर करेगी और उस की बातों को समझेगी. लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ. जिस रात उस ने नेहा को पैसे मांगने का कारण बताया उस के अगले दिन नेहा ने उस की गैरमौजूदगी में पापा और मम्मी को ये बात बता दी कि अभिषेक पैसे किसलिए मांग रहा है. उस दिन अभिषेक बाहर किसी काम से निकला था, लेकिन जब वह घर लौटा तो पापा और मम्मी का चेहरा देख कर उसे अंदाजा हो गया था कि नेहा ने इन्हें सब कुछ बता दिया है. पापा और मम्मी ने उसे अपने कमरे में बुलाया और उन्होंने उसे यह खयाल अपने दिमाग से निकाल देने की नसीहत दी.

लेकिन अभिषेक नहीं माना. उस ने उन के सामने ही उन की बातों को मानने से इंकार कर दिया. गुस्से में मम्मी तो कमरे से निकल गईं, लेकिन पापा ने उस दिन उसे बहुत मारा. इस के साथ ही उन्होंने अपनी सारी प्रौपर्टी नेहा के नाम कर देने की धमकी भी दे डाली. पापा ने कभी भी अभिषेक पर हाथ नहीं उठाया था लेकिन जब उन्होंने उस दिन उसे पीटा तो उस ने उसी दिन यह तय कर लिया था कि उसे अब किसी भी हालत में अपना सैक्स बदलना है. उस दिन के बाद अभिषेक पर घर में हर काम के लिए बंदिशें लगने लगीं. उसे अपने कमरे के दरवाजे को अंदर से बंद करने के लिए मना कर दिया गया. कुछ दिनों के लिए उस का फोन छीन लिया गया. घर में इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा दिया गया.

इतना ही नहीं, उस ने सारे दोस्तों को घर पर आनेजाने के लिए मना कर दिया गया. उसे घर पर हर कोई अजीब नजरों से देखने लगा. यहां तक कि नानी को भी इसलिए बुलाया गया था ताकि वह उसे इस के लिए समझाए कि सैक्स चेंज कराना अच्छी बात नहीं है. अभिषेक को उस के ही घर में ऐसी पैनी और शक भरे अंदाज में देखा जाता था जैसे उस ने यह सोच कर ही कोई बहुत बड़ा गुनाह कर लिया हो. उसे अपने ही घर में घुटन होने लगी थी. उसे लगता था जैसे वह किसी जेल में फंसा है. वह जानता था कि लोग लड़के से लड़के का प्यार करना बरदाश्त नहीं करते, इसलिए उस ने यह सोच रखा था कि वह सैक्स चेंज करवाने के बाद कार्तिक के साथ भारत में नहीं तो किसी दूसरे देश में रह लेगा. क्योंकि भारतीय समाज में समलैंगिकों को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता.

7 अगस्त के दिन अभिषेक ने यह तय कर लिया था कि अगर उस के घर वाले उसे पैसे नहीं देंगे तो वह उन्हें जान से मार देगा. उस ने इस के लिए प्लानिंग कर ली थी. जब उसे उस का फोन दोबारा से दिया गया तो वह अपने घर वालों को जान से मारने के लिए तरह तरह के तरीके इंटरनेट पर सर्च करने लगा. उस ने देखा कि ऐसी चीजें इंटरनेट पर नहीं मिलतीं तो उस ने टीवी पर आने वाले क्राइम शो के एपिसोड गौर से देखने शुरू किए. उस ने कुछ दिनों तक उन शोज को देखा और अंत में उसे आइडिया मिल ही गया कि इस काम को कैसे अंजाम देना है. पिता की पिस्तौल ही बनी कालदूत चूंकि प्रदीप मलिक प्रौपर्टी डीलर थे तो इस धंधे में दुश्मनी होना आम बात थी. उन्होंने अपने पास बिना लाइसैंस वाली पिस्तौल रखी थी.

15-16 साल की उम्र में उन्होंने अपने दोनों बच्चों को पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग भी दे दी थी. अभिषेक किसी तरह उस पिस्तौल को ढूंढना चाहता था. ऐसे ही एक दिन जब प्रदीप मलिक घर पर नहीं थे, मम्मी अपने काम में बिजी थीं और नेहा सो रही थी तब अभिषेक ने स्टोर रूम में उस पिस्तौल को ढूंढ निकाला. उसे उस की गोलियां भी उसी डब्बे में रखी मिल गई जिस में वह पिस्तौल छिपाई गई थी. इस के बाद अभिषेक ने वह पिस्तौल अपने पास रख ली और सही मौके का इंतजार करने लगा. 25 अगस्त, 2021 को उस ने कार्तिक को मिलने के लिए रोहतक बुला लिया और अपने घर वालों से काम का बहाना कर उस से मिलने चला गया.

उस दिन कार्तिक से मिल कर अभिषेक ने अपने दिल के सारे अरमान पूरे कर लिए. उस ने उसे बीते कुछ दिनों में उस के साथ क्याक्या हुआ, उस की भनक तक नहीं लगने दी. कार्तिक को तो अंदाजा भी नहीं था कि वह उस के साथ इस रिश्ते में बंधने के लिए कितना बड़ा कदम उठाने जा रहा है. 26 अगस्त, 2021 को जब वह उस से मिल कर अपने घर वापस आया तो रात को उस ने अंतिम फैसला ले लिया कि उसे क्या करना है. वह अगले दिन का इंतजार करने लगा. 27 अगस्त की सुबह करीब साढ़े 11 बजे उस ने सब से पहले अपने कमरे में म्यूजिक सिस्टम को फुल वौल्यूम में किया.

उस के बाद निर्दयी बन चुका अभिषेक सब से पहले नेहा के कमरे में गया. वह गहरी नींद सोई हुई थी. उस ने पिस्तौल अपनी कमर में खोंस रखी थी. उस ने अंदर से नेहा के कमरे का गेट बंद किया, मोटा तकिया लिया और पिस्तौल को पूरी तरह से ढंक लिया ताकि आवाज बाहर न निकल सके. उस के सर के सामने जा कर उस ने उस के भेजे में एक गोली दाग दी. अभिषेक को लगा था कि शायद गोली चलने की आवाज घर में गूंज गई होगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उस के बाद वह नानी के पास गया और उन्हें बोला कि नेहा उन्हें बुला रही है. नानी थोड़ी देर रुकीं और उस के कमरे की ओर चल पड़ीं.

पीछेपीछे वह भी उन के साथ गया. पहली मंजिल पर कमरे में घुसते के साथ ही उस ने नानी को धक्का दे दिया और दोबारा से तकिया ले कर उन के सर पर उसी तरह से गोली चला दी जैसे नेहा पर चलाई थी. गोली मारने के बाद उसे लगा कि मम्मी उस का नाम ले कर उसे आवाज लगा रही हैं. वह नीचे गया तो मम्मी ने उस से पूछा कि नानी कहां हैं तो अभिषेक ने ऊपर नेहा के कमरे का इशारा कर दिया. उस की मम्मी भी बिना देरी के नेहा के कमरे की ओर चल पड़ीं. मम्मी को भी उस ने नानी की तरह पीछे से धक्का दिया और तकिए का इस्तेमाल कर उन के सर में एक गोली दाग दी.

उस के बाद सिर्फ पापा ही बचे थे. पापा ग्राउंड फ्लोर पर अपने कमरे में दरवाजा लगा कर अपने फोन में यूट्यूब देख रहे थे. वह उन के कमरे में दाखिल हुआ. उन्होंने उसे अंदर आते हुए देखा लेकिन कुछ नहीं कहा. वह चुपचाप उन के पीछे गया. टीवी का रिमोट लेने के बहाने उन के पीछे से सर पर 2 गोलियां दाग दीं. उस ने देखा कि 2 गोलियां लगने के बाद भी पापा का शरीर हरकत कर रहा है तो उस ने एक और गोली उन के सर पर दाग दी. अभिषेक ने क्राइम शो में देखा था कि हत्या करने वाला अकसर घटनास्थल को बिगाड़ देता है ताकि मामला लूट का लगे. उस ने भी वही किया. उस ने पापा के कमरे में सारे सामान को इधरउधर बिखेर दिया.

उस के बाद वह ऊपर गया और नेहा के कमरे में भी ऐसा ही किया. उसी बीच उस ने मां के कानों और गले में पहनी हुई सोने की ज्वैलरी निकाल ली. फिर दरवाजा बंद किया. वह दरवाजा दोनों तरफ से बंद हो जाता था. इस के बाद जिस होटल में कार्तिक रुका हुआ था वहां चला गया. कमरे में कार्तिक के साथ वह हमबिस्तर हुआ और उस के बाद उस ने खाना मंगवाया. लेकिन अभिषेक को भूख नहीं थी, इसलिए उस ने कुछ भी नहीं खाया. दोपहर को करीब दोढाई बजे के आसपास वह घर गया. और दरवाजा न खुलने का नाटक कर के उस ने सोनीपत में रहने वाले मामा प्रवीण को फोन मिलाया. उस ने उन्हें बताया कि घर पर कोई भी फोन नहीं उठा रहा और दरवाजा भी बंद है. बाद में दरवाजा तोड़ा गया तो घटना सामने आई.

कुछ ही देर में पुलिस आई और जब पुलिस ने अभिषेक से पूछताछ की तो विरोधाभासी बयानों से उस की पोल खुल गई. तब अभिषेक ने अपना गुनाह पुलिस के सामने कुबूल कर लिया. पुलिस की टीम ने आरोपी अभिषेक मलिक से विस्तार से पूछताछ कर अस्पताल में उस की जांच कराई तो मनोचिकित्सक ने अपनी प्राथमिक जांच में पाया कि अभिषेक उर्फ मोनू ने अपने पिता प्रदीप मलिक उर्फ बबलू पहलवान, मां बबली, बहन तमन्ना और नानी रोशनी देवी की हत्या पूरे होशोहवास में रहते हुए की थी. इस के बाद पुलिस ने हत्यारोपी अभिषेक को कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Social Stories.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Karnataka News : पत्नी को संभाल कर रखो या जेलों में जाओ

Karnataka News : पुलिस रस्सी को सांप किस तरह बनाती है, इस कहानी से स्पष्ट हो जाता है. सुरेश नाम के युवक की पत्नी मल्लिगे के अचानक गायब हो जाने पर पुलिस ने उस की खोजबीन तो नहीं की, बल्कि 9 महीने बाद किसी महिला का कंकाल मिलने पर पुलिस ने वह कंकाल लापता मल्लिगे का बताते हुए हत्या के आरोप में उस के पति सुरेश को ही जेल में ठूंस दिया, लेकिन इस के बाद सच्चाई सामने आने पर कोर्ट में पुलिस की ऐसी फजीहत हुई कि…

अधिकांश अपराध कथाओं में पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार करती है. पर यह कहानी ऐसी कहानियों से थोड़ा अलग है. जब पिटाई करने वाले अध्यापक को स्कूल का प्रिंसिपल क्लास में आ कर विद्यार्थियों के सामने डांटता है तो बच्चे खूब खुश होते हैं. कुछ ऐसी ही परिस्थिति 4 अप्रैल, 2025 को कर्नाटक के जिला मैसूर की कोर्ट में बनी थी. मैसूर की पंचम एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट में जज गुरुराज सोमक्कलावर अपनी बात कह रहे थे तो उन की आवाज में पीड़ा के साथ आक्रोश भी था.

उन के सामने जिला मैसूर के एसपी एन. विष्णुवर्धन बड़े अदब के साथ खड़े थे. उन के बगल में जिला कोडागु के एसपी सिर झुकाए खड़े थे. इन्हीं लोगों के साथ खड़े इन के अंडर में काम करने वाले थाना बेट्टाडापुरा के 5 पुलिसकर्मियों की हालत तो ऐसी थी कि काटो तो खून न निकले. वह वहां दयनीय हालत में थे. अब क्या होगा, यह सोचसोच कर सभी परेशान थे. जज साहब इन लोगों से जो सवाल पूछ रहे थे, तात्कालिक जवाब देने की की इन में से किसी की हिम्मत नहीं थी. नाराज जज साहब ने कहा, ”जब से भारत आजाद हुआ है, तब से ले कर अब तक पुलिस विभाग की इतनी बड़ी लापरवाही का यह शायद तीसरा या चौथा मामला है.’’

इस के बाद जज साहब ने जिला मैसूर के एसपी को 13 दिनों का समय देते हुए आदेश दिया, ”जिला कोडागु के एसपी से मैं ने जोजो सवाल पूछे हैं, उन के जवाबों की जांच कर के 17 मार्च, 2025 तक कोर्ट में अपनी रिपोर्ट पेश करें.’’

अब आइए इस पूरे मामले के बारे में जानते हैं, जिसमें जज साहब ने अपनी अदालत में जिले के एसपी को तलब कर लिया था. कर्नाटक के जिला कोडागु की तहसील कुशलनगर के आदिवासी कैंप में तमाम मजदूर परिवार रहते थे. ये आदिवासी दिहाड़ी मजदूरी कर के अपना गुजारा करते थे. इन में कुरुबरा परिवार भी इसी तरह रहता था. बूढ़ी मां और पिता के साथ रहने वाले सुरेश का विवाह 18 साल की उम्र में ही हो गया था. उस की पत्नी का नाम मल्लिगे था. सुरेश और मल्लिगे के 2 बच्चे थे. बेटा 18 साल का और उस से 4 साल छोटी बेटी 14 साल की. पूरा परिवार मेहनतमजदूरी कर के शांति से रह रहा था.

12 दिसंबर, 2020 को इस परिवार पर आफत टूट पड़ी. रात को पूरा परिवार साथ खाना खा कर सोया था. परंतु सवेरे जब सभी उठे तो देखा मल्लिगे घर में नहीं थी. सुरेश और उस के दोनों बच्चों ने पूरे कैंप में दौड़दौड़ कर मल्लिगे को ढूंढा. पर मल्लिगे तो इस तरह गायब हो चुकी थी कि उस का कहीं पता ही नहीं चला. सुरेश के पिता तो बीमार ही थे, बूढ़ी मां बहू की तलाश में इधरउधर भटकती रही, पर मल्लिगे का कुछ पता नहीं चला. निराशा में डूबा परिवार पूरा दिन भूखाप्यासा बैठा रहा. शाम को सुरेश का दोस्त नंदू वहां आया. उस ने सभी को समझाया कि इस तरह बैठे रहने का कोई मतलब नहीं है. जा कर थाने में मल्लिगे के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज कराओ. मल्लिगे जहां भी होगी, पुलिस उसे ढूंढ कर ले आएगी.

सुरेश उठा और नंदू के साथ थाना कुशलनगर रूरल पहुंचा. थाना पुलिस को मल्लिगे की फोटो दे कर सुरेश ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज कर पुलिस ने पूछा कि उसे किसी पर शक तो नहीं है? नंदू कुछ कहने जा रहा था कि सुरेश ने उसे रोक कर कहा कि उसे किसी पर शक नहीं है. एक आदिवासी दिहाड़ी मजदूर की पत्नी को ढूंढने के लिए पुलिस अपना कितना समय और शक्ति गंवाती? इस की संभावना कम ही थी? समय बीतता गया, पर मल्लिगे का कुछ पता नहीं चला. हर 15 दिन पर सुरेश धक्का खाते हुए थाने जा कर मल्लिगे के बारे में पूछता कि कुछ पता चला? पर वहां से कोई जवाब न मिलता. इसलिए सुरेश ने उम्मीद छोड़ दी.

ठीक 9 महीने बाद सितंबर, 2021 में कावेरी नदी के किनारे झाडिय़ों के बीच एक मानव कंकाल के पड़े होने की सूचना मिलने पर पुलिस की दौड़भाग शुरू हो गई. जहां कंकाल मिला था, वह इलाका थाना वेट्टाडापुरा के अंतर्गत आता था, इसलिए थाना वेट्टाडापुरा की पुलिस टीम वहां पहुंच गई. उस कंकाल के पास साड़ी, हाथ में चूडिय़ां और पैर में लेडीज चप्पलें मिली थीं. इस से पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यह कंकाल किसी महिला का है. कंकाल की हालत देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि 6-7 महीने पहले किसी ने इस महिला की हत्या कर के अपना अपराध छिपाने के लिए लाश को यहां ला कर छिपा दिया होगा.

थाना वेट्टाडापुरा के एसएचओ ने आसपास के थानों से पता किया कि पिछले 10 महीने में लगभग 30 साल की महिला की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज कराई गई है? यदि दर्ज कराई गई है तो तत्काल पूरी जानकारी दें. उन्हें जवाब में थाना कुशलनगर रूरल की ओर से यही जवाब मिला कि सुरेश नाम के युवक ने दिसंबर 2020 में अपनी पत्नी मल्लिगे की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. थाना बेट्टाडापुरा पुलिस ने पंचनामा के समय सुरेश को बुलाया. अनपढ़ आदिवासी मजदूर सुरेश को देख कर पुलिस ने कुछ और सोचेविचारे बिना ही निर्णय कर लिया कि इसी आदमी ने अपनी पत्नी की हत्या की होगी.

ऐसा करने से यह कंकाल किस का है, यह भी पता करने का झंझट खत्म हो जाएगा और थाना कुशलनगर रूरल में मल्लिगे की गुमशुदगी की जो रिपोर्ट दर्ज है, उस का भी निपटारा हो जाएगा. इसी सुरेश ने अपनी पत्नी मल्लिगे की हत्या की है और यह कंकाल मल्लिगे का ही है, अगर इस तरह की व्यवस्था हो जाती है तो एक साथ तेजी से 2-2 मामलों का खुलासा करने का क्रेडिट भी मिल जाएगा. अनपढ़ सुरेश को लिखनापढऩा तो आता नहीं था. पर वह अपना नाम लिख कर दस्तखत करना सीख गया था. पंचनामे के बाद पुलिस ने सुरेश को कागज दे कर दस्तखत करने को कहा. पुलिस ने जहां कहा, सुरेश ने वहां दस्तखत कर दिए.

इस के बाद पुलिस ने सुरेश से कहा कि उस ने अपनी पत्नी की हत्या कर अपना अपराध छिपाने के लिए पुलिस में उस के गायब होने की झूठी शिकायत दर्ज कराई है. यह कंकाल उस की पत्नी मल्लिगे का है. सुरेश रोरो कर गिड़गिड़ाते हुए पुलिस से कहता रहा कि उस ने पत्नी की हत्या नहीं की है, पर पुलिस ने उसे मारपीट कर और धमका कर चुप करा दिया. कंकाल मल्लिगे का ही है, यह साबित करने के लिए मल्लिगे की मां गौरी को बुलाया गया. कंकाल के साथ गौरी के खून का नमूना डीएनए टेस्ट के लिए भेज दिया गया.

पुलिस डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट आने तक धैर्य नहीं रख सकी. पुलिस ने डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट आने का इंतजार भी नहीं किया. फटाफट काम निपटाने के लिए रिपोर्ट आने के पहले ही पुलिस ने फाइनल चार्जशीट तैयार कर के कोर्ट में पेश कर दी. पुलिस ने सुरेश पर आरोप लगाया था कि उस ने अवैध संबंध के शक में पत्नी मल्लिगे की हत्या की है. इसी आरोप के आधार पर सुरेश को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर दिया गया था, जहां से उसे जेल भेज दिया गया था. सुरेश पुलिस के सामने गिड़गिड़ाता रहा कि उस ने हत्या नहीं की है, पर मारपीट, टार्चरिंग और इस के अलावा पूरे परिवार को जेल में डाल देने की धमकी के आगे सुरेश मजबूर था.

6 महीने बाद डीएनए टेस्ट रिपोर्ट आई. उस में स्पष्ट बताया गया था कि दोनों नमूने मैच नहीं हो रहे हैं, इसलिए यह कंकाल मल्लिगे का नहीं है. सुरेश के वकील पांडु पुजारी ने कोर्ट में डिस्चार्ज के लिए प्रार्थनापत्र दिया. अदालत ने डीएनए रिपोर्ट स्वीकार करने के बजाए विटनैस एग्जामिनेशन के लिए मल्लिगे की मां और उस के अलावा गांव के 7 लोगों को अदालत में लाने का आदेश दिया. सुरेश का दोस्त नंदू भी गवाहों की इस टीम में शामिल था. मल्लिगे की मां गौरी सहित सातों गवाहों ने अदालत को बताया कि मल्लिगे का एक अन्य युवक से प्रेम संबंध था. उसी के साथ वह भाग गई है. वह जीवित है. अगर उसे ढूंढ निकाला जाए तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी.

अदालत ने थाना बेट्टाडापुरा पुलिस और कुशलनगर रूरल पुलिस से पूछा तो उन्होंने पूरे विश्वास के साथ कहा कि उन की जांच में कहीं कोई गलती नहीं है. उन्होंने जो चार्जशीट पेश की है, पूरी जांच के बाद ही पेश की है. मल्लिगे की हत्या सुरेश ने ही की है. अदालत ने पुलिस की बात को अधिक महत्त्व दिया, इसलिए सुरेश जेल में ही पड़ा रहा. इस के बाद सुरेश के वकील पांडु पुजारी की तथ्यात्मक दलीलों की वजह से सितंबर, 2023 में सुरेश की जमानत मंजूर तो हुई, परंतु एक लाख रुपए के सिक्योरिटी बांड की व्यवस्था करने की आर्थिक ताकत न होने के कारण सुरेश को जेल में ही रहना पड़ा. घर में कमाने वाला एकमात्र सुरेश ही था.

सुरेश के जेल जाने के बाद उस की बूढ़ी मां और पिता को अधिक काम करना पड़ रहा था. सुरेश का बेटा दसवीं क्लास में पढ़ रहा था. वह पढ़ाई छोड़ कर मजदूरी कर के परिवार को सहारा देने लगा. छोटी बहन से वह कहता था कि वह अच्छी तरह पढ़ सके, इसलिए उस ने पढ़ाई छोड़ कर मजदूरी करनी शुरू कर दी है. पापा जेल से छूट कर बाहर आ जाएंगे तो वह फिर से पढऩे जाने लगेगा. एक साल बाद सितंबर, 2024 में किसी तरह जमानत की व्यवस्था हो गई. इस तरह 2 साल जेल में रहने के बाद सुरेश जमानत पर जेल से बाहर आ पाया. नंदू को अपने दोस्त सुरेश से सच्चा लगाव था. उस ने सुरेश को लगभग डांटते हुए पूछा, ”सुरेश, तुम ने थाने में मल्लिगे की गुमशुदगी दर्ज कराते समय पुलिस को सच बात क्यों नहीं बताई थी?’’

दरअसल, इस में हकीकत यह थी कि मल्लिगे का गणेश नाम के एक युवक से प्रेम संबंध था. सुरेश को भी इस की थोड़ीबहुत जानकारी थी. मल्लिगे भाग गई तो सुरेश को लगता था कि मल्लिगे 2-4 दिन में पश्चाताप कर के लौट आएगी. अगर वह पुलिस से इस बारे में बता देता तो मल्लिगे की इज्जत का जनाजा निकल जाएगा. फिर अगर वह वापस आती है तो समाज में उस का स्थान एक बदनाम औरत के रूप में हो जाएगा. सुरेश को पूरा विश्वास था कि वह लौट आएगी, इसलिए उस ने यह बात किसी को नहीं बताई थी. चुपचाप जहर का घूंट गटक लिया था.

नंदू हर हालत में अपने दोस्त की मदद के लिए हर तरह से तैयार था. उस ने सुरेश से कहा कि सौ प्रतिशत मल्लिगे जीवित है और यहीं आसपास के किसी गांव में गणेश के साथ रह कर मजे कर रही है. अगर एक बार उस के बारे में पता चल जाए तो उस का केस क्लियर हो जाएगा. 2 सालों तक जेल में रहने की वजह से सुरेश पूरी तरह से मानसिक रूप से टूट चुका था. फिर भी नंदू ने उसे प्रेरित किया. इस के बाद नंदू और सुरेश मिल कर मल्लिगे की तलाश में लग गए. पहली अप्रैल, 2025 को उन की मेहनत रंग लाई. उन के गांव से 25 किलोमीटर दूर मडिकेरी नामक गांव में दोनों मल्लिगे की तलाश में भटक रहे थे, तभी उन्हें मल्लिगे दिखाई दी. मल्लिगे अपने प्रेमी गणेश के साथ एक होटल के अंदर जा रही थी.

मल्लिगे और गणेश को पता न चल सके, इस तरह चालाकी से नंदू ने अपने मोबाइल में उन दोनों का फोटो खींच लिया. उन दोनों की साथ खाते हुए वीडियो भी बना ली. इस के बाद दोनों भाग कर थाना मडिकेरी पहुंचे. नंदू एसएचओ को अपने मोबाइल में फोटो तथा वीडियो दिखा कर गिड़गिड़ाया कि अगर वह इस महिला को पकड़ लेते हैं तो उस के निर्दोष दोस्त की जिंदगी बच जाएगी. थाना मडिकेरी के एसएचओ ने तत्काल ऐक्शन ले कर मल्लिगे को पकड़ लिया. इस के बाद वकील ने एडवांसमेंट अप्लिकेशन कोर्ट में पेश किया. कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मल्लिगे को कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया.

मल्लिगे कोर्ट में आई. उस ने एकदम सहजता से कहा, ”मैं गणेश से प्यार करती थी. इसलिए हमेशा के लिए उस के साथ रहने के लिए सुरेश के घर से भाग कर गणेश के पास आ गई थी. मैं ने गणेश के साथ विवाह भी कर लिया है. सुरेश के घर से निकलने के बाद उस के साथ क्या हुआ, मुझे कुछ पता नहीं है. मैं ने यह जानने की परवाह भी नहीं की.’’

अदालत ने मल्लिगे से पूछा, ”सुरेश ने उस के घर से जाने के बाद थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. उसे इस की भी जानकारी नहीं थी?’’

जवाब में मल्लिगे ने कहा, ”मुझे इस की शिकायत का कुछ पता नहीं है. मैं कहीं छिप कर थोड़े ही रह रही थी. गणेश के साथ सभी जगह खुलेआम घूमती थी. पर किसी दिन कोई पुलिस वाला मुझे खोजने नहीं आया.’’

पुलिस की इस गंभीर लापरवाही को देख कर पंचम एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट के जज गुरुराज सोमक्कलावर ने त्वरित काररवाई करते हुए जिला मैसूर के एसपी एन. विष्णुवर्धन, जिला कोडागु के एसपी और थाना बेट्टाडापुरा के 5 पुलिसकर्मियों को 4 मार्च, 2025 को कोर्ट में उपस्थित होने का आदेश दिया. सभी के कोर्ट में उपस्थित होने पर जज ने जिला कोडागु पुलिस से पूछा, ”तुम लोगों ने डीएनए रिपोर्ट आने के पहले ही चार्जशीट कैसे तैयार कर दी? मात्र अपनी धारणा के आधार पर बिना किसी सबूत के वह कंकाल मल्लिगे का ही है, यह कैसे मान लिया?

सचमुच वह कंकाल किस का है, तुम लोगों ने इस की जांच क्यों नहीं की? एक साथ 2 मामलों का खुलासा करने के लिए लापरवाही में एक निर्दोष युवक को 2 साल जेल में क्यों रहना पड़ा? जज ने जिला मैसूर के एसपी को जांच की जिम्मेदारी सौंप कर 17 मार्च, 2025 तक रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया. इस के बाद सुरेश के वकील पांडु पुजारी ने पत्रकारों से कहा कि 17 मार्च को रिपोर्ट आने के बाद फाइनल और्डर आ जाएगा और सुरेश निर्दोष घोषित हो जाएगा. उस के बाद मैं हाईकोर्ट में रिट पिटीशन कर के सुरेश को यातना देने वाले और झूठी चार्जशीट बनाने वाली पुलिस पर केस करूंगा. सुरेश और उस के फेमिली वालों ने जो पीड़ा सही है, उन्हें न्याय मिले और मुआवजा मिले, इस के लिए भी लड़ूंगा.

मानव अधिकार आयोग और शेड्यूल्ड ट्राइब कमीशन में जा कर इस निर्दोष आदिवासी परिवार को मुआवजा दिलाऊंगा. जज गुरुराज सोमक्कलावर ने मैसूर के एसपी एन. विष्णुवर्धन को जांच की जो जिम्मेदारी सौंपी थी, उन्होंने यह जिम्मेदारी थाना वायलाकुप्पे के सर्किल इंसपेक्टर दीपक कुमार को सौंप दी थी. दीपक कुमार ने 17 अप्रैल, 2025 को एसपी की ओर से 18 पृष्ठों की अपनी जांच रिपोर्ट अदालत में पेश की. जज ने इस जांच रिपोर्ट पर गंभीर आपत्ति जताई, क्योंकि इस रिपोर्ट में आदिवासी सुरेश के खिलाफ दायर आरोपपत्र को उचित ठहराने की कोशिश की गई थी.

इस के बाद सुरेश के वकील पांडु पुजारी ने कहा कि अदालत में सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी के पास कोई उचित कारण नहीं था. पुलिस पर साक्ष्य गढऩे और अपने मुवक्किल, जोकि निर्दोष था, को फंसाने के लिए आरोपपत्र तैयार करने का आरोप लगाते हुए पुजारी ने कहा कि सुरेश ने हिरासत में अपने कीमती समय के लगभग 2 साल एक ऐसे अपराध के लिए गंवा दिए, जो उस ने कभी किया ही नहीं था. जिस की वजह से समाज में उसकी काफी बदनामी हुई. अपराध की स्वीकृति के लिए उसे काफी प्रताडि़त भी किया गया.

उन्होंने पुलिस पर फरजी आरोपपत्र दाखिल कर के अदालत के साथ धोखाधड़ी करने का भी आरोप लगाया है. पुजारी चाहते हैं कि अदालत स्वत:संज्ञान ले कर जांच अधिकारियों पर मामला दर्ज करे. अब देखना है कि इस मामले में अदालत क्या करती है. बहरहाल, सुरेश तो निर्दोष घोषित हो ही चुका है. Karnataka News