बारात से एक दिन पहले युवक ने किया प्रेमिका के साथ सुसाइड

प्रिया रज्जनलाल से प्यार करने लगी थी और उसे ही अपना जीवनसाथी बनाना चाहती थी, लेकिन दोनों का सामाजिक स्तर आड़े रहा था. ऐसे में प्रिया और रज्जनलाल ने ऐसा कदम उठाया कि…  

15साल की प्रिया लखनऊ के बंथरा कस्बे से कुछ दूर दरोगाखेड़ा के एक प्राइवेट स्कूल में 10वीं में पढ़ती थी. उस के पिता रमाशंकर गुप्ता की जुराबगंज में हार्डवेयर की दुकान थीप्रिया के अलावा रमाशंकर गुप्ता के 2 और बच्चे थे, जो अलगअलग स्कूलों में पढ़ रहे थे. प्रिया देखने में सुंदर और मासूम सी थी. घर में सब लोग उसे प्यार से मुन्नू कहते थे. घर के बच्चों में वह सब से बड़ी थी, इसलिए मातापिता उसे कुछ ज्यादा ही प्यार करते थे. घर वालों के इसी लाडप्यार में वह कुछ जिद्दी सी हो गई थी.

स्कूल में प्रिया की दोस्ती कुछ ऐसी लड़कियों से थी, जो खुद को ज्यादा मौडर्न समझने के चक्कर में प्यारमोहब्बत में पड़ गई थीं. उस की कई सहेलियों के बौयफ्रेंड थे, जिन से वे उस के सामने ही बातें करती थीं. प्रिया इन बातों से दूर रहती थी. वह अपना ज्यादा ध्यान पढ़ाई पर देती थी. लेकिन कहते हैं कि साथ रहने वाले पर थोड़ाबहुत संगत का असर पड़ ही जाता है. सुप्रिया ने कहा, ‘‘प्रिया, तू हमारी बातें तो खूब सुनती है, कभी अपने बारे में नहीं बताती. तेरा कोई बौयफ्रेंड नहीं है क्या?’’

  ‘‘नहीं, मैं इन चक्करों में नहीं पड़ती.’’

  ‘‘अच्छा, और मोबाइल.’’ आरती ने चौंकते हुए सवाल किया.

  ‘‘नहीं, अभी तो मोबाइल भी नहीं है. मैं तो तुम लोगों से अपनी मां के मोबाइल से ही बातें करती हूं.’’

  ‘‘अरे, किस जमाने में जी रही है तू. यार, यहां लोगों के पास स्मार्टफोन हैं, जिस से वे फेसबुक और वाट्सअप का उपयोग कर रहे हैं और एक तू है कि तेरे पास मोबाइल भी नहीं है.’’ आरती ने उपेक्षा से कहा. सहेली की बात प्रिया को भी चुभी. उसे लगा कि वह अपने स्कूल की सभी लड़कियों में सब से पीछे है. उस का तो कोई बौयफ्रेंड है और ही उस के पास कोई मोबाइल. वह यह सब सोच ही रही थी कि उस की दूसरी सहेली बोली, ‘‘प्रिया यह बता कि कभी तूने खुद को आईने में गौर से देखा है? जानती है जितनी तू सुंदर और समझदार है, तुझे तमाम लड़के मिल जाएंगे. उन में जो सही लगे, उसे बौयफ्रैंड बना लेना. फिर देखना, मोबाइल वह खुद ही दिला देगा.’’ 

सहेलियों की बातों ने प्रिया पर असर डालना शुरू कर दिया. वैसे प्रिया महसूस करती थी कि जब वह स्कूल आतीजाती है तो कई लड़के उसे चाहत भरी नजरों से देखते हैं. लेकिन उस ने कभी उन की तरफ ध्यान नहीं दिया. अब उन मनचलों के चेहरे उस के दिमाग में घूमने लगे. वह यह सोचने लगी कि वह किस लड़के से दोस्ती करे. प्रिया के स्कूल आनेजाने वाले रास्ते में एक लड़का हमेशा बनठन कर खड़ा रहता था. वह उम्र में उस से कुछ बड़ा था. प्रिया को और लड़कों के बजाए वह लड़का अच्छा लगा.

अगले दिन प्रिया जब घर से स्कूल के लिए निकली तो रास्ते में उसे वही लड़का मिल गया. प्रिया उसे देख कर मुसकराई तो उस लड़के की जैसे बांछे खिल गईं. वह समझ गया कि लड़की की तरफ से उसे ग्रीन सिग्नल मिल गया है. जल्दी ही वह लड़का स्कूल जाते समय मोटरसाइकिल से प्रिया के पीछेपीछे जाने लगा और उस से बातें करने का मौका तलाशने लगा. एक दिन मौका मिला तो उस ने प्रिया से बात की और उसे बताया कि उस का नाम रज्जनलाल है, वह हमीरपुर गांव का रहने वाला है. हमीरपुर बंथरा के पास ही था. इस के बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई. कुछ दिनों बाद रज्जनलाल ने प्रिया के सामने प्यार का इजहार किया तो उस ने हंसी में जवाब दे कर सहमति जता दी. इस के बाद दोनों स्कूल आनेजाने के रास्ते में मिलनेजुलने लगे.

रज्जनलाल टैंपो चलाता था. प्रिया को जब उस के काम के बारे में पता चला तो उस ने रज्जनलाल को टैंपो चलाने के बजाए कोई दूसरा काम करने की सलाह दी. बात प्रेमिका की पसंदगी की थी, इसलिए उस ने अगले दिन से ही टैंपो चलाना बंद कर दिया और कोई दूसरा काम खोजने लगा. वह चूंकि ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, इसलिए काफी कोशिश के बाद भी उसे दूसरा काम नहीं मिला. रज्जनलाल को पता था कि प्रिया के पिता रमाशंकर गुप्ता की हार्डवेयर की दुकान है. उन की दुकान पर उस का एक दोस्त काम करता था. उसी की मार्फत उसे जानकारी मिली कि रमाशंकर को अपनी दुकान के लिए एक और लड़के की जरूरत है. रज्जनलाल ने सोचा था कि अगर उन की दुकान पर उसे नौकरी मिल जाती है तो उसे प्रिया से मिलने में आसानी होगी. अपने उसी दोस्त की मार्फत रज्जनलाल ने रमाशंकर गुप्ता से नौकरी के बारे में बात की. फलस्वरूप उन के यहां उसे नौकरी मिल गई.

अगले कुछ दिनों में ही रज्जनलाल ने अपने कामकाज से रमाशंकर पर विश्वास जमा लिया. उन्हें यह पता नहीं था कि उस का उन की बेटी प्रिया के साथ कोई चक्कर चल रहा है. यही वजह थी कि कोई काम होने पर वह उसे अपने घर भी भेज देते थे. घर जाता तो वह प्रिया से भी मिल लेता था. चूंकि घर पर वह प्रिया से ज्यादा बात नहीं कर पाता था, इसलिए उस ने एक चाइनीज फोन खरीद कर प्रिया को दे दिया. इस के बाद दोनों की रात में फोन पर लंबीलंबी बातें होने लगीं. दिन में वे एकदूसरे को एसएमएस भेज कर काम चलाते. बीतते वक्त के साथ उन के बीच प्यार गहराता जा रहा था.

प्यार में फंस कर प्रिया को अपने कैरियर और मांबाप के प्यार की भी परवाह नहीं रह गई थी. सब ठीक चल रहा था कि एक दिन प्रिया की मां सपना को पता चल गया कि प्रिया का दुकान पर काम करने वाले रज्जनलाल के साथ चक्कर चल रहा है. उन्होंने प्रिया से मोबाइल छीन लिया और पति को सारी बात बता कर रज्जनलाल की दुकान से छुट्टी करवा दी. इस के बाद दोनों का एकदूसरे से संपर्क नहीं हो सका. प्रिया रज्जनलाल को अपने दिल में बसा चुकी थी, इसलिए पाबंदी लगाने के बाद भी वह उसे भुला सकी.

उधर रज्जनलाल गांव की प्रधान बिमला प्रसाद की कार चलाने लगा था. प्रिया और रज्जन एक बार फिर स्कूल आनेजाने के रास्ते में मिलने लगे. रज्जनलाल के प्यार में पड़ कर प्रिया ने केवल अपने मातापिता का विश्वास खो दिया था, बल्कि वह अपनी पढ़ाई भी नहीं कर पा रही थी. स्कूल के टीचरों और छात्रों के बीच भी उस के और रज्जनलाल के संबंध के चरचे होने लगे थे. बेटी की वजह से रमाशंकर की कस्बे में खासी बदनामी होने लगी तो उन्होंने प्रिया को डांटा और उस का स्कूल जाना बंद करा दिया. इस से रमाशंकर को लगा कि अब शायद प्रिया सुधर जाएगी और रज्जनलाल से दूरी बना लेगी.

हालांकि वह चाहते थे कि प्रिया अपनी पढ़ाई पूरी कर ले. लेकिन उस के बदम बहक जाने की वजह से उन्हें यह कठोर फैसला लेना पड़ा था. खुद के ऊपर पाबंदी लगाए जाने पर एक दिन प्रिया ने ज्यादा मात्रा में नींद की गोली खा कर जान देने की कोशिश की. यह बात रज्जनलाल को पता चली तो उसे इस बात का दुख हुआ. वह प्रिया से बात कर के उसे समझाना चाहता था. लेकिन उसे प्रिया से मिलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. ऐसे में उसे अपने उस दोस्त की याद आई, जो प्रिया के पिता की दुकान पर काम करता था. उस ने एक मोबाइल और सिम कार्ड खरीद कर उस के हाथों प्रिया के पास भिजवा दिया. इस के बाद उन दोनों के बीच फिर से बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया.

इस के साथ ही रज्जनलाल प्रिया का दीदार करने की कोशिश में उस के घर के आसपास मंडराने लगा. रमाशंकर ने जब यह देखा तो उन्होंने इस की शिकायत उस के घर वालों से की. रज्जनलाल की शिकायतें सुनसुन कर उस के घर वाले परेशान हो चुके थे. उन्होंने सोचा कि अगर रज्जनलाल की शादी कर दी जाए तो वह प्रिया को भूल जाएगा. कुछ दिनों बाद रज्जनलाल के लिए उन्नाव जिले के गांव मटियारी में रहने वाले प्रहलाद की बेटी अलका से शादी का प्रस्ताव आया. लड़की ठीकठाक थी, इसलिए घर वालों ने फटाफट उस की शादी अलका से तय कर दी. चूंकि घर वालों को शादी की जल्दी थी, इसलिए 21 फरवरी, 2014 को शादी का दिन मुकर्रर कर दिया गया. दोनों ही तरफ से शादी की तैयारियां होने लगीं.

उधर घर वालों के दबाव में रज्जनलाल शादी के लिए इनकार तो नहीं कर सका, लेकिन वह मन से इस शादी के लिए तैयार नहीं था. उस के दिल में तो प्रिया ही बसी थी. जैसेजैसे 21 फरवरी नजदीक रही थी, उस की चिंता बढ़ती जा रही थी. इसी चिंता में 19-20 फरवरी की रात उसे नींद नहीं रही थी. करीब 12 बजे उस ने प्रिया के मोबाइल पर एसएमएस किया. जिस में लिखा था, ‘हम तेरे बिन अब जी नहीं सकते. हम न खुद किसी के होंगे और तुम को किसी और का होने देंगे.’ दूसरी तरफ से प्रिया ने भी उस का साथ निभाने के वादे के साथ एसएमएस किया. प्रिया का एसएमएस पाने के बाद रज्जनलाल ने मन ही मन एक खतरनाक योजना बना ली. जिस के बारे में उस ने प्रिया को भी बता दिया.

उस रात प्रिया अपनी मां के पास लेटी थी. बेटी को देख कर मां यह अंदाजा नहीं लगा पाई कि वह उन के विश्वास को तोड़ने की साजिश रच चुकी थी. देर रात जब घर के सब लोग सो गए तो करीब 1 बजे प्रिया छत के रास्ते से निकल कर घर से बाहर आ गई. योजना के अनुसार रज्जनलाल अपनी मोटरसाइकिल ले कर उस के घर से कुछ दूर कर खड़ा हो गया. प्रिया उस के पास पहुंच गई. वहां से दोनों मोटरसाइकिल से लालाखेड़ा चले गए.

बंथरा के पास स्थित लालाखेड़ा के टुडियाबाग स्थित प्राथमिक विद्यालय में एनएसएस का शिविर लगा था. इस शिविर में छात्र अपने टीचरों के साथ रुके हुए थे. 20 फरवरी, 2014 की सुबह 7 बजे के वक्त शिविर के कुछ छात्र खाना बनाने के लिए लकड़ी लेने गांव से कुछ दूर एक खेत के नजदीक पहुंचे तो वहां एक लड़की की लाश देख कर उन की चीख निकल गई. लाश औंधे मुंह पड़ी थी. छात्रों ने यह बात अपने टीचरों को बताई तो उन्होंने इस की सूचना थाना बंथरा पुलिस को दी. थानाप्रभारी वीरेंद्र सिंह यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर  पहुंच गए. तब तक वहां गांव के तमाम लोग एकत्र हो गए थे.

पुलिस ने जब लड़की की लाश सीधी की तो उसे देखते ही लोग चौंक गए. क्योंकि वह बंथरा के ही रहने वाले रमाशंकर गुप्ता की बेटी प्रिया थी. जिस जगह लाश पड़ी थी, वहीं पर एक मोटरसाइकिल खड़ी थी और एक तमंचा भी पड़ा हुआ था. पुलिस लाश का अभी मुआयना कर ही रही थी कि कुछ लोगों ने बताया कि पास के ही एक पेड़ पर एक युवक ने फांसी लगा ली है. उस की लाश महुआ के पेड़ में लटक रही है. थानाप्रभारी तुरंत उस महुआ के पेड़ के पास पहुंचे. वह पेड़ वहां से लगभग 50 मीटर दूर था. उन्होंने देखा पेड़ में बंधी लाल रंग की चुन्नी से एक युवक की लाश लटक रही है. पुलिस ने जब लाश को नीचे उतरवाया तो लोगों ने उस की शिनाख्त रज्जनलाल के रूप में की. पुलिस को लोगों से यह भी पता चला कि प्रिया और रज्जन का प्रेम संबंध चल रहा था.

2-2 लाशें मिलने की खबर आसपास के गांव वालों को चली तो सैकड़ों की संख्या में लोग वहां पहुंच गए. प्रिया और रज्जनलाल के घर वाले भी वहां पहुंच चुके थे. थानाप्रभारी वीरेंद्र सिंह यादव ने यह सूचना अपने अधिकारियों को दी तो लखनऊ के एसएसपी प्रवीण कुमार त्रिपाठी, एसपी (पूर्वी क्षेत्र) राजेश कुमार, एसपी (क्राइम) रविंद्र कुमार सिंह और सीओ (कृष्णानगर) हरेंद्र कुमार भी मौके पर  पहुंच गए.

सभी पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल और लाशों का मुआयना किया. प्रिया की कमर का घाव देख कर लग रहा था कि उस की हत्या वहां पड़े तमंचा से गोली मार कर की गई थी. अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि रज्जनलाल ने पहले प्रिया को गोली मारी होगी और बाद में उस ने खुद को फांसी लगाई होगी. प्रिया की लाश के पास जो मोटरसाइकिल बरामद हुई थी, पता चला कि वह रज्जनलाल की थी. पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. उधर रज्जनलाल के भाई राजकुमार ने आरोप लगाया कि उस के भाई और प्रिया एकदूसरे से प्यार करते थे, इसलिए प्रिया के पिता रमाशंकर ने कुछ लोगों के साथ मिल कर प्रिया और रज्जनलाल की हत्या की है. उस ने इसे औनर किलिंग का मामला बताते हुए आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने की मांग की.

रज्जनलाल बंथरा की ग्राम प्रधान विमला कुमार की गाड़ी चलाता था. विमला के पति रिटायर पुलिस आफिसर थे. वह भी थाना पुलिस के ऊपर दबाव डालने लगे तो पुलिस ने राजकुमार की तहरीर पर रमाशंकर और उन के नौकर राजू आदि के खिलाफ भादंवि की धारा 302 और 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. दूसरी ओर प्रिया के पिता रमाशंकर का आरोप था कि रज्जनलाल उन की बेटी को बहलाफुसला कर भगा ले गया और उस की गोली मार कर हत्या कर दी. रमाशंकर गुप्ता ने इस संबंध में थानाप्रभारी को एक तहरीर भी दी. इस मामले की जांच थानाप्रभारी वीरेंद्र सिंह यादव खुद कर रहे थे.

20 फरवरी को जब दोनों लाशों का पोस्टमार्टम हुआ तो उस की पूरी वीडियोग्राफी कराई गई, जिस से काररवाई में पारदर्शिता बनी रहे और पुलिस के ऊपर अंगुली न उठे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रज्जनलाल के मरने की वजह फांसी के फंदे के कारण दम घुटना बताया गया. उस के शरीर पर किसी तरह की चोट का कोई निशान नहीं था. सारी हकीकत सामने आ सके इस के लिए एसएसपी प्रवीण कुमार ने एसपी रविंद्र कुमार सिंह को भी इस मामले की जांच में लगा दिया. रज्जनलाल ने हताशा में यह कदम उठा तो लिया, लेकिन ऐसा करने से पहले उस ने यह नहीं सोचा कि जिस लड़की से अगले ही दिन उस की शादी होने वाली थी, उस पर और उस के घर वालों पर क्या गुजरेगी? अलका को जब पता चला कि उस के होने वाले पति रज्जनलाल ने खुदकुशी कर ली है तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस के यहां शादी की जो तैयारियां चल रही थीं, वह मातम में बदल गईं.

पिता प्रहलाद की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे में करें तो क्या करें, ऐसे में लोगों ने उन्हें सलाह दी कि जब शादी की सारी तैयारियां हो ही चुकी हैं तो क्यों न अलका की शादी रज्जनलाल के छोटे भाई राजकुमार से कर दी जाए. प्रहलाद ने जब यह प्रस्ताव राजकुमार के सामने रखा तो उस ने सहमति जता दी. इस पर 20 फरवरी, 2014 को जिस समय रज्जनलाल के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, उसी समय राजकुमार 5 लोगों के साथ अलका से शादी रचाने चला गया.

जांच के बाद पुलिस ने इस मामले को आनर किलिंग की घटना मानने से इनकार कर दिया. कुछ लोगों ने पुलिस की इस बात को झुठलाते हुए पुलिस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और कानपुर लखनऊ हाईवे पर जाम लगा दिया. जाम लगाने वालों की पुलिस ने वीडियोग्राफी कराई और बड़ी मुश्किल से समझाबुझा कर जाम खुलवाया. इस के बाद पुलिस ने हाइवे जाम करने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

(प्रिया परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

छः टुकड़े कर गटर में फेंका और मांगी 50 लाख की फिरौती

भूषण कुमार सिंह और विक्की कुमार काम की तलाश में बिहार से दिल्ली आए थे. चाहते तो उन्हें काम मिल जाता, लेकिन उन्होंने शौर्टकट चुना और अपहरण हत्या के आरोप में जा पहुंचे जेल. मूलरूप से मुजफ्फरपुर, बिहार के रहने वाले रामनाथ यादव सालों पहले काम की तलाश में दिल्ली आए थे. वह पढ़ेलिखे थे, इसलिए 

किसी अच्छी कंपनी में नौकरी ढूंढने लगे. जब उन के मनमुताबिक नौकरी नहीं मिली तो उन्होंने एक सीए के यहां नौकरी कर ली. नौकरी मिल गई तो वह अपने बीवीबच्चों को भी दिल्ली ले आए और परिवार के साथ पश्चिमी दिल्ली के नांगलोई रोड पर स्थित अग्रसेन पार्क में रहने लगे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा सचिन यादव था.

21 साल का सचिन कृष्णा मंदिर नजफगढ़ के पास स्थित बालाजी कारपेट की दुकान पर नौकरी करता था. रामनाथ ने सचिन की शादी कर दी थी. करीब 2 महीने पहले ही सचिन के बेटा हुआ था. घर में बच्चे की किलकारियां गूंजने से सभी खुश थे. लेकिन इसी साल मई के दूसरे सप्ताह में उन के घर में एक ऐसी घटना घटी, जिसे यह परिवार जिंदगी भर नहीं भुला सकेगा.

दरअसल 12 मई, 2018 को सुबह करीब साढ़े 7 बजे सचिन के मोबाइल पर किसी की काल आई. फोन पर बात करने के कुछ देर बाद वह किसी के साथ बाइक पर बैठ कर निकल गया. जब 2 घंटे बाद भी सचिन घर नहीं लौटा तो घर वालों ने उस का फोन नंबर मिलाया, पर उस का फोन स्विच्ड औफ मिलासचिन वैसे तो कभी भी अपना फोन बंद नहीं करता था, पर फोन बंद आने पर घर वालों ने सोचा कि शायद उस के फोन की बैटरी डाउन हो गई होगी.

उस के एकाध घंटे बाद उन्होंने फिर से सचिन का नंबर मिलाया. इस बार भी उस का फोन बंद ही मिला. घर वालों ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह उधर से ही अपनी ड्यूटी पर चला गया हो. इस बात की पुष्टि करने के लिए रामनाथ यादव ने बालाजी कारपेट की दुकान का फोन मिलाया. वहां बात करने पर पता चला कि वह दुकान पर नहीं पहुंचा है. यह जानकारी मिलने के बाद घर वालों का परेशान होना लाजिमी था. फिर तो उन्होंने उस के यारदोस्तों और जानपहचान वालों के पास फोन करने शुरू कर दिए

रामनाथ यादव पूरे दिन इधरउधर बेटे को तलाशते रहे, लेकिन कहीं से भी उस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली. जवान बेटे के गायब होने के बात रामनाथ के परिचितों को पता लगी तो वह भी खोजने में उन की मदद करने लगे. बीचबीच में घर वाले सचिन का फोन भी मिलाते रहे लेकिन उस का फोन बंद ही मिलता रहा. सचिन की पत्नी, मां और बहनों का तो रोरो कर बुरा हाल था. 12-13 मई की रात को घर के सभी लोगों की नींद गायब थी. सभी की निगाहें दरवाजे पर ही लगी हुई थीं. 

कभीकभी तो उन के दिमाग में सचिन को ले कर तरहतरह के विचार आते. सभी लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर सचिन मोटरसाइकिल पर बैठ कर कहां चला गया. सचिन जिस युवक के साथ गया था, उसे कोई नहीं जानता था. घर वाले सभी संभावित जगहों पर सचिन को ढूंढ चुके थे. इस के बावजूद भी 13 मई की पौ फटने के बाद वह फिर से सचिन की तलाश में जुट गए. चारों ओर से हताश होने के बाद जब उस का कहीं पता नहीं चला तो आखिर वह क्षेत्र के थाना हरिदासनगर पहुंच गए

रामनाथ ने थानाप्रभारी को सचिन के गायब होने की बात बताई. थानाप्रभारी ने सचिन की गुमशुदगी दर्ज कर ली. उस की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद उन्होंने वह सब जरूरी काररवाई की, जो किसी की भी गुमशुदगी दर्ज होने के बाद अमूमन की जाती है. मसलन सभी थानों को गुम हुए व्यक्ति का हुलिया भेजना, पैंफ्लेट छपवा कर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवाना आदि. अपने स्तर से पुलिस भी सचिन का पता लगाने में जुट गई. सचिन 21 साल का युवक था, इस बात को देखते हुए इस बात की भी आशंका जताई जा रही थी कि कहीं उस का किसी के साथ कोई अफेयर तो नहीं चल रहा था

हालांकि वह शादीशुदा था, लेकिन प्यारमोहब्बत के मामले में किसी का कुछ नहीं कहा जा सकता. इसलिए पुलिस उस के दोस्तों से यह जानने में लग गई कि कहीं उस का किसी लड़की के साथ कोई चक्कर तो नहीं था. दोस्तों ने थानाप्रभारी को बताया कि सचिन इस किस्म का नहीं था. और तो और वह किसी से फालतू बात तक नहीं करता था. सचिन को गायब हुए 3 दिन बीत चुके थे, तो पुलिस और ही सचिन के घर वालों को उस के बारे में कोई जानकारी मिल पा रही थी. 15 मई को सचिन की बहन ने फिर सचिन का फोन नंबर मिलाने की कोशिश की तो उस दिन उस का नंबर मिल गया. इस से बहन बहुत खुश हुई. लेकिन फोन उस के भाई के बजाय किसी और ने उठाया. बहन ने जब सचिन के बारे में पूछा तो उस व्यक्ति ने कहा कि सचिन अभी टायलेट में है.

पास में रामनाथ यादव भी थे. बेटी से हो रही बातचीत को सुन कर उन्हें लगा कि सचिन के बारे में शायद जानकारी मिल गई है. इसलिए बेटी से फोन ले कर वह खुद बात करने लगे. उन्होंने भी उस शख्स से बेटे के बारे में जानकारी हासिल करनी चाही, लेकिन वह शख्स उन्हें इधरउधर की बातें सुनाने लगा. उन्होंने जब पूछा कि वह कौन और कहां से बोल रहे हैं तो वह रामनाथ यादव से उलटीसीधी बातें करने लगा. इतना ही नहीं, वह उन्हें धमकी भी देने लगा. इस के बाद उस ने फोन काट दिया.

रामनाथ ने फिर से बेटे का नंबर मिलाया, लेकिन इस बार वह स्विच्ड औफ हो गया. वह घबरा गए कि जो शख्स उन से बात कर रहा था वह कौन था. कहीं ऐसा तो नहीं कि सचिन का किसी ने अपहरण कर लिया हो. वह घबराए हुए सीधे थाना हरिदासनगर पहुंचे और थानाप्रभारी को बात बताई. थानाप्रभारी ने उसी समय अपने फोन से सचिन का नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने सचिन यादव के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस ने सचिन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाने की काररवाई शुरू कर दी.

15 मई, 2018 को ही रामनाथ यादव के पास उन के बेटे सचिन के फोन से काल आई. अपने फोन स्क्रीन पर बेटे का नंबर देख कर रामनाथ यादव खुश हो गए. उन्होंने जैसे ही काल रिसीव की, तभी दूसरी ओर से किसी ने रौबदार आवाज में कहा, ‘‘तुम घबराओ मत, सचिन हमारे कब्जे में है. यदि तुम उसे सहीसलामत चाहते हो तो 50 लाख रुपए का इंतजाम कर लो, वरना सचिन की लाश कई टुकड़ों में मिलेगी.’’ ‘‘देखो जी, मैं आप के आगे हाथ जोड़ कर विनती करता हूं कि मेरे बेटे को कुछ नहीं कहना. आप चाहे मेरा सब कुछ ले लो, मगर मेरे सचिन को मुझे दे दो.’’

‘‘हम भी तो यही कह रहे हैं कि यदि बेटा जिंदा चाहिए तो 50 लाख रुपए हमें दे दो.’’ अपहर्त्ता ने कहा. ‘‘देखिए साहब, मैं एक मामूली नौकरी वाला आदमी हूं. इतने पैसे तो पूरी उमर काम कर के भी नहीं कमा सकूंगा. मेरी प्राइवेट नौकरी है. इतने पैसे भला मैं कहां से लाऊंगा.’’ रामनाथ गिड़गिड़ाए.

‘‘यदि तुम्हारा बेटा अस्पताल के आईसीयू में भरती हो और डाक्टर इलाज के 50 लाख बता रहा हो तो बताओ उसे ऐसे ही मर जाने दोगे या बचाने की कोशिश करोगे?’’ उस शख्स ने सवाल किया.

‘‘देखिए जी, मैं क्या दुनिया का हर बाप बेटे को बचाने की कोशिश करेगा लेकिन जब डाक्टर द्वारा मांगी गई वह रकम उस के बूते के बाहर की होगी तो वह हाथ खड़े कर देगा. क्योंकि यह उस की मजबूरी होगी.’’ रामनाथ यादव बोले.

‘‘बहरहाल, अब तुम देख लो कि तुम्हें पैसा प्यारा है या बेटा.’’ अपहर्त्ता ने एक तरह से धमकी दी.

‘‘देखिए साहब, मैं गरीब आदमी हूं. इतने पैसे मेरे पास नहीं हैं.’’ रामनाथ यादव ने मजबूरी जताई, ‘‘मैं अपनी हैसियत के अनुसार दे सकता हूं.’’

दोनों तरफ से बात होती रही और अंत में 4 लाख रुपए में बात तय हो गई. अपहर्त्ता ने फिरौती की रकम एशिया की सब से बड़ी आजादपुर सब्जीमंडी में ले कर आने को कहा. फिरौती मांगने पर यह स्पष्ट हो गया कि सचिन का अपहरण कर लिया गया है और इस समय वह अपहर्त्ताओं के कब्जे में हैं. घर वाले और अन्य लोग सचिन के सहीसलामत होने की कामना करने लगे. अपहर्त्ता से रामनाथ की फोन पर जो बातचीत हुई थी, उस के बारे में उन्होंने पुलिस को भी बता दिया. फिर तो पुलिस भी सक्रिय हो गई. अब पुलिस ने उस फोन नंबर पर जांच केंद्रित कर दी, जिस नंबर से फिरौती की काल आई थी. उधर अपहर्त्ता की जो 4 लाख रुपए की डील फाइनल हुई थी, पुलिस ने योजना बना कर रामनाथ को पैसे ले कर आजादपुर मंडी भेजा

पुलिस टीम भी सादा कपड़ों में रामनाथ के इधरउधर रही. लेकिन अपहर्त्ता वहां पैसे लेने नहीं आया और न ही उस ने इस के लिए रामनाथ को फिर से फोन किया. इस से यही लगा कि अपहर्त्ता को पुलिस के मौजूद होने की भनक लग गई थी. पुलिस की टैक्निकल सर्विलांस टीम ने बताया कि अपहर्त्ता ने उत्तरी दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके से फोन कर के फिरौती मांगी थी. पुलिस मजनूं का टीला इलाके में पहुंच गई. फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस मजनूं के टीला से हरियाणा के पानीपत शहर पहुंची, लेकिन किडनैपर्स वहां भी नहीं मिले. पकड़े जाने के भय से वे बिहार भाग गए.

दिल्ली पुलिस की टीम भी पीछा करते हुए बिहार चली गई और उस ने 20 मई की रात को बिहार में एक जगह दबिश डाल कर भूषण कुमार सिंह उर्फ वरुण को हिरासत में ले लिया. उस से सचिन यादव के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि सचिन तो दिल्ली में ही है. दिल्ली में वह किस जगह पर है, पूछने पर भूषण ने बताया कि वह अब जीवित नहीं है. बल्कि उन्होंने उस की हत्या कर लाश के टुकड़े गटर में डाल दिए हैं. यह बात सुन कर पुलिस टीम को धक्का लगा. पुलिस ने भूषण से पूछताछ की तो उस ने बताया कि इस मामले में उस के साथ विक्की कुमार भी शामिल था. करीब 2 घंटे की मशक्कत के बाद पुलिस ने विक्की कुमार को भी बिहार से ही गिरफ्तार कर लिया. ये दोनों आपस में सालेबहनोई थे. 

दोनों आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड पर ले कर टीम दिल्ली लौट आई. दिल्ली के कोर्ट में पेश करने के बाद थानाप्रभारी ने दोनों आरोपियों से पूछताछ की तो उन्होंने अपहरण की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली. भूषण कुमार सिंह और विक्की कुमार दोनों ही बिहार के रहने वाले थे. दोनों काम की तलाश में बिहार से दिल्ली आए थे. ये दोनों उसी शोरूम पर ठेके पर काम करते थे, जहां सचिन नौकरी करता था. पर वहां सचिन की नौकरी लग जाने के बाद शोरूम मालिक ने इन दोनों को काम से हटा दिया था. इन के वहां से हट जाने के बाद भी सचिन की उन से फोन पर बातचीत होती रहती थी. करीब 2 महीने पहले सचिन के घर बेटा हुआ तो उस ने इस खुशी में कुछ लोगों को घर पर पार्टी दी थी. इस पार्टी में उस ने भूषण और विक्की को भी बुलाया था.

भूषण और विक्की तो सचिन से इस बात की रंजिश रखते थे कि उस के शोरूम पर नौकरी पर लगने के बाद उन दोनों की छुट्टी हो गई थी. इस के लिए वह सचिन को ही दोषी मानते थे. इस बात का सचिन को आभास नहीं हुआ. वह तो उन्हें अपना दोस्त ही समझता था, तभी तो उस ने बेटा पैदा होने पर दोनों को अपने घर पार्टी में बुलाया था. सचिन का रहनसहन देख कर भूषण और विक्की समझने लगे कि सचिन अमीर बाप का बेटा है. उसी दिन उन्होंने सचिन को सबक सिखाने की ठान ली. उन्होंने सोचा कि यदि किसी तरह सचिन का अपहरण कर लिया जाए तो इस के बदले में मोटी फिरौती मिल सकती है. इस के बाद उन्होंने सचिन का अपहरण करने की योजना बना ली.

योजना बनाने के बाद उन्होंने 12 मई, 2018 को सुबह करीब साढ़े 7 बजे सचिन को फोन किया और भूषण मोटरसाइकिल ले कर सचिन के घर के पास पहुंच गया. चूंकि सचिन उस की योजना से अनजान था और वह उस पर विश्वास करता था, इसलिए वह उस के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर चला गया. मोटरसाइकिल से वह सचिन को दिल्ली के ओल्ड खयाला रोड पर प्रेमनगर स्थित एक कमरे पर ले गया. वह कमरा उस ने 2 दिन पहले ही किराए पर लिया था. भूषण और विक्की ने वहां उसे नशे की गोली मिली कोल्डड्रिंक पीने को दी. 

जब सचिन अर्द्धबेहोशी की हालत में हो गया तो उन दोनों ने गला दबा कर उस की हत्या कर दी. हत्या करने के बाद उन्होंने उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ कर के अपने कब्जे में ले लिया और लाश टांड पर छिपा दी. इस के बाद वे लाश को ठिकाने लगाने के उपाय खोजने लगे. लाश को वे बाहर ले कर नहीं जा सकते थे लिहाजा उन्होंने 21 वर्षीय सचिन की लाश के 6 टुकड़े किए और उन टुकड़ों को गटर में डाल दिया. लाश ठिकाने लगा कर वे निश्चिंत हो गए थे. फिर उन्होंने सचिन का फोन प्रयोग करते हुए उस के घर वालों से फिरौती मांगनी शुरू कर दी. जिस में वे सफल नहीं हो सके. 

उन्हें शक हो गया कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है. पुलिस कभी भी उन के पास पहुंच सकती है, लिहाजा दोनों बिहार भाग गए पर दिल्ली पुलिस उन्हें वहीं से गिरफ्तार कर लाई. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर खयाला रोड, प्रेमनगर के गटर से भारी मशक्कत के बाद सचिन के शरीर के सभी टुकड़े बरामद कर लिए, जिन्हें पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए राव तुलाराम अस्पताल भेज दिया. अभियुक्त भूषण कुमार सिंह उर्फ वरुण और विक्की कुमार को गिरफ्तार कर पुलिस ने न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस अब यह जांच कर रही है कि इस मामले में इन दोनों के अलावा कहीं कोई तीसरा तो शामिल नहीं था.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

   

एक्ट्रेस ने तीसरी शादी के लिए रचा मौत का नाटक

मराठी फिल्मों  और धारावाहिकों में  काम करने वाली 2 शादियां कर चुकी 3 बच्चों की मां अलका पुनेवर को अपनी बड़ी बेटी से भी कम उम्र के आलोक पालीवाल से प्यार हुआ तो उस की पत्नी बनने के लिए उस ने अपनी ही मौत का ड्रामा रच डालामराठी फिल्मों और टीवी सीरियलों की जानीमानी सहअभिनेत्री अलका पुनेवर नाश्ता करते समय पति संजय पुनेवर से बोली, ‘‘मेरा आज का शेड्यूल बहुत बिजी है.

पहले मुझे एक स्टेज कार्यक्रम में भाग लेने के लिए नवी मुंबई के उरण जाना है. इस के बाद एक फिल्म की शूटिंग के लिए पूना जाऊंगी. जो लोग उरण में कार्यक्रम करा रहे हैं, वही थाणे रेलवे स्टेशन पर एक कार भेज देंगे. कार्यक्रम खत्म होने के बाद वही कार मुझे पूना छोड़ देगी.’’ अलका पुनेवर की इस बात पर संजय पुनेवर और उन के दोनों बच्चों को जरा भी हैरानी नहीं हुई, क्योंकि इस तरह की बातें उन के लिए आम थीं. नाश्ता करने के बाद संजय पुनेवर पत्नी को कार से थाणे रेलवे स्टेशन के पास छोड़ कर अपने औफिस चले गए. यह 27 दिसंबर, 2013 की बात है.

रात करीब 10 बजे संजय पुनेवर घर लौटे तो उन्होंने अपने बच्चों प्रतीक और पीयूष से अलका के बारे में पूछा. बच्चों ने बताया कि वह अभी नहीं लौटी हैं. अलका को शूटिंग से लौटने में कभी देर भी हो जाया करती थी, इसलिए उन्होंने सोचा कि खाना खाने के बाद वह उस से इत्मीनान से बात करेंगे. खाना खाने के बाद उन्होंने पत्नी अलका को फोन लगाया, लेकिन उस का फोन स्विच औफ बता रहा था. उन्होंने कई बार नंबर मिलाया, हर बार यही बताया गया कि डायल किया गया नंबर स्विच्ड औफ है. फोन नहीं मिला तो वह यह सोच कर सोने चले गए कि वह किसी खास काम में बिजी होगी, सुबह बात कर लेंगे.

28 दिसंबर, 2013 की सुबह जब उन की आंखें खुलीं तो उन्होंने अपने मोबाइल पर अलका का एसएमएस देखा. उन की जान में थोड़ी जान आई. वह एसएमएस सुबह साढ़े 4 बजे आया था. मगर उस एसएमएस में अलका ने यह नहीं लिखा था कि वह कहां है और घर कब लौटेगी. उस ने बेटे प्रतीक को लिखा था कि वह अपना बायोडाटा फलां कंपनी को मेल कर देअलका और संजय के जुड़वां बेटे प्रतीक और पीयूष थे, जो अब 19-19 साल के हो चुके हैं. प्रतीक इंजीनियरिंग कर रहा था और पीयूष मैनेजमेंट. एसएमएस पढ़ने के बाद संजय ने अलका को फोन किया, लेकिन इस बार भी उस के फोन ने स्विच्ड औफ बताया.

धीरेधीरे अलका को घर से गए 36 घंटे बीत चुके थे. इस बीच उस के बारे में पता नहीं चला कि वह कहां है, क्या कर रही है, कब लौटेगी? उसे ले कर संजय पुनेवर और उन के दोनों बेटे परेशान थे. संजय को अलका से शादी किए 22 साल हो चुके थे. इन 22 सालों में ऐसा पहली बार हुआ था कि आउटडोर शूटिंग पर जाने के दौरान उस का मोबाइल फोन बंद हुआ था.

संजय का धैर्य जवाब दे चुका था. किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए वह बच्चों के साथ पत्नी को ढूंढ़ने के लिए निकल पड़े. उन्होंने उस के सभी दोस्तों को फोन कर के उस के बारे में पूछा, नातेरिश्तेदारों के यहां भी फोन किया. लेकिन कहीं से भी उस के बारे में कोई खबर नहीं मिली. थकहार कर वह थाना कोपरी पहुंचे और थानाप्रभारी मीरा वनसोडे को पत्नी के गायब होने की सूचना दी तो थानाप्रभारी ने अलका पुनेवर की गुमशुदगी दर्ज कर ली.

मामला एक प्रतिष्ठित परिवार और फिल्म अभिनेत्री की गुमशुदगी का था, इसलिए थानाप्रभारी ने अलका पुनेवर के गायब होने की जानकारी पुलिस आयुक्त के.पी. रघुवंशी, पुलिस उपायुक्त बालासाहेब पाटिल के साथ पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे कर खुद अपने स्तर से उस की तलाश भी करने लगीं. गुमशुदगी दर्ज करा कर संजय अभी घर लौटे ही थे कि उन के साले अमित मिश्रा का फोन आया कि मुंबई से पूना जाने वाली रोड पर गहरी खाई में एक कार गिरी मिली है, जिसे खापोली पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया है. उस कार के अंदर से अलका के कुछ कागजात बरामद हुए हैं. मैं खापोली थाने के लिए निकल रहा हूं, आप भी वहां जल्दी से पहुंचें.

खाई में कार गिरने की जानकारी थाना कोपरी के थानाप्रभारी को भी मिल चुकी थी. संजय पुनेवर उस जगह के लिए निकल पड़े, जहां खाई में कार गिरे होने की जानकारी मिली थी. उन के और उन के साले अमित मिश्रा के वहां पहुंचने से पहले कोपरी थाने की पुलिस वहां पहुंच चुकी थी. कार देखने के बाद संजय ने पुलिस को बताया कि यह कार अलका की नहीं है.

थाना खापोली पुलिस ने खाई में गिरी कार से जो कागजात बरामद किए थे, उन में अलका पुनेवर का पासपोर्ट भी था. सारे कागजातों को थाना कोपरी पुलिस ने थाना खापोली पुलिस से अपने कब्जे में ले लिए. कार की छानबीन की गई तो उस में एक भी ऐसा सुबूत नहीं मिला, जिस से लगता कि इस दुर्घटना में किसी की जान की क्षति हुई हो. इस से संजय पुनेवर की जान में जान आई.

उन्होंने राहत की सांस ली. पुलिस यह नहीं समझ पा रही थी कि जब कार खाई में गिरी तो इसे चलाने वाला कहां चला गया? और यह कार अलका की नहीं है तो और किस की है? पुलिस को इस मामले में किसी गहरी साजिश की गंध आने लगी. मामला हाईप्रोफाइल परिवार से जुड़ा था, इसलिए पुलिस कमिश्नर ने इस मामले की जांच में क्राइम ब्रांच को भी लगा दिया. क्राइम ब्रांच के चीफ हिमांशु राय के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में अपर पुलिस आयुक्त निकेत कौशिक, पुलिस उपायुक्त अंबादास पोटे, सहायक पुलिस आयुक्त प्रफुल्ल जोशी क्राइम यूनिट-1 के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक नंदकुमार गोपाले को शामिल किया गया. इस टीम ने अभिनेत्री अलका के मामले की तफ्तीश बड़ी सरगरमी से शुरू कर दी.

टीम ने अलका के पति संजय पुनेवर और उन के दोनों बेटों प्रतीक पीयूष को क्राइम ब्रांच के औफिस में बुला कर उन से अलका के बारे में गहन पूछताछ की. पुलिस ने संजय पुनेवर का वह मोबाइल फोन भी अपने कब्जे में लिया, जिस पर अलका का एसएमएस आया था. जिस फोन नंबर से वह एसएमएस भेजा गया था, उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि जिस समय संजय के फोन पर वह एसएमएस आया था, उस के चंद सेकेंड बाद वही एसएमएस एक दूसरे फोन नंबर पर भी भेजा गया था. पुलिस ने उस नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो जानकारी मिली कि यह नंबर किसी आलोक पालीवाल का था और वह नंबर तकरीबन 6 महीने पहले बंद हो चुका था.

अब पुलिस की जांच की दिशा बदल गई. पुलिस पता लगाने लगी कि आलोक पालीवाल कौन है? पुलिस पता लगाने की कोशिश करने लगी कि आलोक पालीवाल के फोन में अब किस कंपनी का सिम कार्ड ऐक्टिव है. फोन के आईएमईआई नंबर से पुलिस को आलोक का नया नंबर मिल गया. इस के बाद पुलिस ने उस के नए नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. इस काल डिटेल्स के अध्ययन पर चौंकाने वाली जानकारी मिली. पता चला कि उस नंबर से अलका पुनेवर की नियमित लंबी बातें होती थीं. वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक नंदकुमार गोपाले ने अलका के पति से आलोक पालीवाल के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि इस नाम का उस का कोई रिश्तेदार नहीं है और ही उन्होंने कभी अलका के मुंह से आलोक पालीवाल के बारे में कुछ सुना है.

आलोक पालीवाल की काल डिटेल्स में मिले नंबरों में से पुलिस टीम को एक नंबर पर शक हुआ. जांच में पता चला कि वह नंबर उस के दोस्त संजीव कुमार का था. पुलिस ने आलोक को डिस्टर्ब करने के बजाए संजीव कुमार को बुला लिया. उस से आलोक और अलका के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने अलका और आलोक पालीवाल की लवस्टोरी का सारा रहस्य उजागर करते हुए पूरी साजिश का खुलासा कर दिया. संजीव की निशानदेही पर क्राइम ब्रांच पुलिस चेन्नई पुलिस के सहयोग से 4 फरवरी, 2014 को अलका पुनेवर और आलोक पालीवाल को चेन्नई के एक फाइवस्टार होटल से हिरासत में ले कर पूछताछ के लिए मुंबई ले आई. पुलिस अनुमान लगा रही थी कि अलका किसी साजिश का शिकार हुई है. लेकिन अलका से की गई पूछताछ में जो जानकारी मिली, उस के अनुसार खापोली थाना के अंतर्गत खाई में जो कार गिरी थी, वह एक साजिश के तहत गिराई गई थी. इस साजिश के पीछे के इरादे का पता चलने पर सभी दंग रह गए.

50 वर्षीया अलका पुनेवर के बचपन का नाम अलका मिश्रा था. सालों पहले उस के दादापरदादा रोजीरोटी की तलाश में उत्तर प्रदेश से नागपुर (महाराष्ट्र) कर बस गए थे. धीरेधीरे यह परिवार महाराष्ट्र की भाषा और रीतिरिवाजों में रंग गया. अलका की पढ़ाईलिखाई मराठी मीडियम से हुई. वह परिवार की एकलौती बेटी थी. उस का एक छोटा भाई था अमित मिश्रा. ऐशोआराम से पलीबढ़ी अलका अतिमहत्वाकांक्षी लड़की थी. उसे बचपन से ही मराठी फिल्में और टीवी सीरियल्स देखने का शौक था, इसलिए उस का झुकाव मराठी फिल्मों और टीवी सीरियलों की तरफ अधिक था. खूबसूरत अलका मराठी फिल्म और टीवी सीरियलों में काम कर के ग्लैमर की दुनिया में चमकना चाहती थी.

जब इस बात का अलका के पिता को पता चला तो वह परेशान हो उठे. वह नहीं चाहते थे कि उन की बेटी फिल्मों या टीवी सीरियलों में काम करे. उन्होंने अलका को समझाया, लेकिन वह नहीं मानी. इसलिए अलका के पढ़ाई खत्म करते ही उन्होंने उस की शादी तय कर दी. लड़का एक जानीमानी कंपनी में अच्छी पोस्ट पर था. उस के सिर से फिल्मों का भूत उतर जाए, इसलिए घर वालों ने उसे सात फेरों के बंधन में बांध दिया.

शादी के बाद अलका को एक बेटी पैदा हुई. लेकिन फिल्मों की दीवानी अलका को शादी का बंधन रास नहीं आया. एक बच्ची की मां होने के बाद भी उस की फिगर में गजब का आकर्षण था. उस के दिमाग से फिल्मों और टीवी सीरियलों का भूत नहीं उतरा था. वह अपनी दुधमुंही बच्ची की परवाह किए बिना सिल्वर स्क्रीन पर काम करने के लिए स्ट्रगल करने लगी. पति को उस की यह बात अच्छी नहीं लगी. लिहाजा दोनों के बीच मतभेद होने से परिवार में विवाद होने लगा. फिर नौबत तलाक तक पहुंच गई.

पति से तलाक होने के बाद अलका मुंबई में अपने एक रिश्तेदार के यहां गई. अब वह अकेली थी, इसलिए काम के लिए फिल्म निर्माताओं के यहां चक्कर लगाने लगी. उस की मेहनत रंग लाई और उसे मराठी फिल्मों और टीवी सीरियलों में सहकलाकार की भूमिकाएं मिलने लगीं. कुछ दिनों बाद अलका को पति की कमी खलने लगी. तब अलका ने मुंबई के सटे जनपद थाणे के कोपरी में रहने वाले संजय पुनेवर से विवाह कर लिया. संजय पुनेवर एयरफोर्स में अधिकारी और खुले विचारों वाले आदमी थे. उन्हें अलका के मामलों से कुछ लेनादेना नहीं था और ही अलका के फिल्मों में काम करने से कोई परहेज था.

संजय पुनेवर का परिवार आधुनिक विचारों वाला था, इसलिए अलका को उस के परिवार ने स्वीकार कर लिया. फिल्मों और टीवी सीरियलों में काम करते हुए उन का दांपत्यजीवन अच्छी तरह से चल रहा था. अलका ने जुड़वां बेटों को जन्म दिया, जिन का नाम प्रतीक और पीयूष रखा गया. संजय पुनेवर अपने दांपत्यजीवन से बहुत खुश थे. ग्लैमर की दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाली अलका पुनेवर खुले दिल और विचारों वाली महिला थी. जिस संजय पुनेवर से 20 साल पहले अलका ने अपनी नन्ही सी बच्ची और पति को छोड़ कर शादी की थी, अब उसी संजय को छोड़ कर उस का झुकाव अपने से आधी उम्र वाले युवक आलोक पालीवाल की तरफ हो गया था.

अलका पुनेवर का दिल जिस आलोक पालीवाल के लिए धड़क रहा था, उस की उम्र उस के पहले पति से जन्मी बेटी से भी कम थी. नागपुर में रहने वाला आलोक पालीवाल का परिवार भी अलका के परिवार वालों की तरह उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. आलोक पालीवाल के पिता रामचंद्र पालीवाल सुप्रसिद्ध प्लास्टिक सर्जन थे, जो बैंकाक के किसी अस्पताल में काम करते थे. चूंकि अलका अपनी खूबसूरती को बनाए रखना चाहती थी, इसलिए आलोक पालीवाल से मिलने के बाद बैंकाक जा कर उस के पिता से अपने चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी भी करवाई थी.

आलोक पालीवाल एक हैंडसम युवक था. इंजीनियरिंग करने के बाद उस ने बैंकाक से एमबीए किया था. उस के बाद एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस में एक बड़ी पोस्ट पर काम करने लगा था. अलका पुनेवर और आलोक पालीवाल की मुलाकात लगभग 6 महीने पहले एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस की एक बिजनैस मीटिंग में हुई थी. उस मीटिंग में अलका पुनेवर एक गेस्ट के रूप में आई थी. उसी दौरान अलका को पता चला था कि आलोक का परिवार भी मूलरूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. इस मुलाकात के बाद उन के बीच होने वाली मुलाकातों ने उन्हें प्यार के मुकाम तक पहुंचा दिया था.

आलोक पालीवाल भी अपनी उम्र से 25 साल बड़ी अलका पुनेवर के प्यार में दीवाना हो गया था. दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. आलोक पालीवाल ने जब अलका से शादी करने की बात घर वालों से कही तो घर वाले उस की पसंद पर चौंके. क्योंकि पहली बात तो यह थी कि अलका उस से उम्र में लगभग दोगुनी थी. इस के अलावा यह भी पता चला था कि अलका की 2 शादियां पहले भी हो चुकी थीं. पहले पति से उस की एक 24 साल की बेटी थी. दूसरे पति संजय पुनेवर से 19-19 साल के 2 बेटे थे. अमित ने तय कर लिया था कि कुछ भी हो जाए, वह अलका से जुदा नहीं होगा.

फिल्म और टीवी सीरियलों की लिखी गई स्क्रिप्ट पर काम करने वाली अलका पुनेवर ने आलोक के साथ रहने के लिए उस के साथ मिल कर एक रहस्यमय स्क्रिप्ट लिख डाली. उस स्क्रिप्ट में अलका पुनेवर और आलोक पालीवाल ने अपने एक दोस्त संजीव कुमार को भी शामिल कर लिया. संजीव कुमार और आलोक पालीवाल बचपन के दोस्त थे. स्कूल और कालेज की पढ़ाई भी दोनों ने साथसाथ की थी. आलोक की नौकरी बंगलुरू स्थित एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस में लगी तो संजीव कुमार एयरटेल कंपनी में नौकरी पर लग गया. उस की पोस्टिंग मुंबई में थी.

अपनी लिखी गई स्क्रिप्ट के अनुसार आलोक पालीवाल संजीव कुमार और अलका पुनेवर ने घटना से 5 दिनों पहले 22 दिसंबर, 2013 को 28 हजार रुपए में एक पुरानी कार खरीदी. योजनानुसार, 27 दिसंबर, 2013 को अलका अपने पति संजय पुनेवर और बच्चों से शूटिंग पर जाने के लिए कह कर घर से निकली. संजय ने उसे कार से थाणे रेलवे स्टेशन के पास छोड़ दिया. कुछ देर बाद आलोक पालीवाल और संजीव कुमार कार ले कर वहां गए. अलका उन की कार में बैठ गई. उन्होंने उसे सीएसटी रेलवे स्टेशन छोड़ा और उसे लोकल ट्रेन पकड़ कर उरण आने को कहा. मगर अलका ट्रेन के बजाए बस से उरण जा पहुंची. थोड़ी देर बाद आलोक और संजीव भी कार से उरण पहुंच गए.

तीनों ने एक होटल में बैठ कर आगे की योजना बनाई. योजना के अनुसार अलका पूना के लिए निकल पड़ी. जबकि आलोक पालीवाल और संजीव कुमार कार ले कर पूनाखडाला की तरफ. रात 12 बजे के करीब वह खापोली पहुंचे, जहां 8-9 सौ फुट गहरी खाई थी. पोली के हील पौइंट पर ले जा कर दोनों कार से उतर गए. उन्होंने अलका के पासपोर्ट की फोटोकौफी और अन्य कागज कार में रख कर धक्का दिया तो कार खाई में गिर गई. उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि लोग समझें कि अलका पुनेवर की इस हादसे में मौत हो गई है.

उन्होंने कार तो खाई में गिरा दी, लेकिन इस बात की जानकारी लोगों तक कैसे पहुंचे कि मराठी फिल्मों और टीवी सीरियलों की जानीमानी अभिनेत्री अलका पुनेवर की कार ऐक्सीडेंट में मौत हो गई है, इस के लिए आलोक और संजीव मुंबईपूना एक्सप्रेस हाइवे पर आए और वहां से गुजरने वाले ट्रक ड्राइवरों को रोक कर उन्हें खाई में गिरी कार की जानकारी दी. उन की बात सुन कर ट्रक चालक उस कार और उस महिला की मदद के लिए आगे आए. थोड़ी देर में वहां काफी लोग जमा हो गए. आलोक और संजीव मौका देख कर वहां से खिसक गए और बस पकड़ कर पूना चले गए. वहां उन्हें अलका मिल गई. आलोक और अलका वहां से बंगलुरू और फिर चेन्नई चले गए, जबकि संजीव कुमार मुंबई लौट गया. वहीं से आलोक पालीवाल ने अपने पास छोड़े गए अलका के मोबाइल से संजय पुनेवर और एक दूसरे नंबर पर एसएमएस कर दिया था.

अलका का सोचना था कि वह मामला शांत होने पर अपने चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करवा कर आलोक पालीवाल से शादी कर लेगी. प्लास्टिक सर्जरी कराने के बाद उसे कोई पहचान नहीं पाएगा. मगर उस की इस साजिश का खेल एसएमएस ने बिगाड़ दिया और वह पकड़ी गई. उसी के साथ साजिश रचने वाला आलोक भी पकड़ा गया. अलका पुनेवर ने पुलिस को बताया कि उस का पति संजय पुनेवर उसे मानसिक रूप से परेशान करता था, जिस की वजह से उस ने यह कदम उठाया. क्राइम ब्रांच यूनिट-1 की टीम ने तीनों को थाना कोपरी की थानाप्रभारी मीरा वनसोडे को सौंप दिया. जांच पूरी कर के मीरा वनसोडे ने मामले की फाइल पुलिस उपायुक्त बालासाहेब पाटिल को सौंप दी.

आलोक पालीवाल और अलका पुनेवर का मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था. उन के खिलाफ किसी ने कोई शिकायत भी नहीं दर्ज नहीं कराई थी. इसलिए उन के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता था. पुलिस उपायुक्त बालासाहेब ने तीनों को घर जाने दिया. थाने से निकल कर अलका पुनेवर घर जाने के बजाए आलोक पालीवाल के साथ चली गई थी.

    

कौन थी मरजान जिसे गुल का प्यार नहीं मिला तो कहा अलविदा

समर गुल हत्या कर के फरार हुआ था, सरहद पार कबीले के सरदार नौरोज खान ने उसे शरण दी. लेकिन नौरोज की बेटी समर गुल और मरजाना एकदूसरे को प्यार कर बैठे, जो कबाइली परंपरा के विपरीत था. आखिर क्या हुआ उन के प्यार का अंजाम…    

मर गुल ने जानबूझ कर एक अभागे की हत्या कर दी थी. पठानों में ऐसी हत्या को बड़ी इज्जत की नजर से देखा जाता था और हत्यारे की समाज में धाक बैठ जाती थी. समर गुल की उमर ही क्या थी, अभी तो वह विद्यार्थी था. मामूली तकरार पर उस ने एक आदमी को चाकू घोंप दिया था और वह आदमी अस्पताल ले जाते हुए मर गया था. गिरफ्तारी से बचने के लिए समर गुल कबाइली इलाके की ओर भाग गया था.

 जब वह वहां के गगनचुंबी पहाड़ों के पास पहुंचा तो उसे कुछ ऐसा सकून मिला, जैसे वे पहाड़ उस की सुरक्षा के लिए हों. सरहदें कितनी अच्छी होती हैं, इंसान को नया जन्म देती हैं. फिर भी यह इलाका उस के लिए अजनबी था, उसे कहीं शरण लेनी थी, किसी बड़े खान की शरण. क्योंकि मृतक के घर वाले किसी कबाइली आदमी को पैसे दे कर उस की हत्या करवा सकते थे. पठानों की यह रीत थी कि अगर वे किसी को शरण देते थे तो वे अपने मेहमान की जान पर खेल कर रक्षा करते थे.

वह एक पहाड़ी पर खड़ा था, उसे एक गांव की तलाश थी. दूर नीचे की ओर उसे कुछ भेड़बकरियां चरती दिखाई दीं. उस ने सोचा, पास ही कहीं आबादी होगी. वह रेवड़ के पास पहुंच कर इधरउधर देखने लगा. गड़रिया उसे कहीं दिखाई नहीं दिया. अचानक एक काले बालों वाला कुत्ता भौंकता हुआ उस की ओर लपका. उस ने एक पत्थर उठा कर मारा, लेकिन कुत्ता नहीं रुका. उस ने चाकू निकाल लिया, तभी एक लड़की की आवाज आई, ‘‘खबरदार, कुत्ते पर चाकू चलाया तो…’’ 

उस ने उस आवाज की ओर देखा तो कुत्ता उस से उलझ गया. उस की सलवार फट गई. कुत्ते ने उस की पिंडली में दांत गड़ा दिए थे. आवाज एक लड़की की थी, उस ने कुत्ते को प्यार से अलग किया और उसे एक पेड़ से बांध दिया. समर गुल एक चट्टान पर बैठ कर अपने घाव का देखने लगा. लड़की ने पास कर कहा, ‘‘मुझे अफसोस है, मेरी लापरवाही की वजह से आप को कुत्ते ने काट लिया.’’

समर गुल ने गुस्से से लड़की की ओर देखा तो उसे देखता ही रह गया. वह बहुत सुंदर लड़की थी. उस की शरबती आंखों में शराब जैसा नशा था. लड़की ने पिंडली से रिसता हुआ खून देखा तो भाग कर पानी लाई और उस का खून साफ किया. फिर अपना दुपट्टा फाड़ कर उसे जलाया और समर के घाव पर उस की राख रखी, जिस से खून बंद हो गया. समर गुल उस लड़की की बेचैनी और तड़प को देखता रहा. खून बंद हो गया तो वह खड़ी हो गई.

‘‘कोई बात नहीं,’’ समर गुल ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘कुत्ते ने अपनी ड्यूटी की और इंसान ने अपनी ड्यूटी.’’

‘‘अजनबी लगते हैं आप.’’ लड़की ने कहा तो उस ने अपनी पूरी कहानी उसे सुना दी.

‘‘अच्छा तो आप फरार हो कर आए हैं. मैं बाबा को आप की कहानी सुनाऊंगी तो वह खुश होंगे, क्योंकि काफी दिन बाद हमारे घर में किसी फरारी के आने की चर्चा होगी.’’

मलिक नौरोज खान एक जिंदादिल इंसान था. 70-75 साल की उमर होने पर भी स्वस्थ और ताकतवर जवान लड़कों जैसा. बड़ा बेटा शाहदाद खान सरकारी नौकरी में था जबकि छोटा बेटा शाहबाज खान जिसे सब प्यार से बाजू कहते थे, बड़ा ही खिलंदड़ा और नटखट था. वह बहन ही की तरह सुंदर और प्यारा था. बेटी की जुबानी समर गुल की कहानी सुन कर नौरोज ने सोचा कि इतनी कम उम्र का बच्चा हत्यारा कैसे हो सकता है. फिर भी उस के लिए अच्छेअच्छे खाने बनवाए गए. उसे घर में रख लिया गया. कुछ दिन के बाद समर गुल ने सोचा, कब तक मेहमान बन कर इन के ऊपर बोझ बनूंगा, इसलिए कोई काम देखना चाहिए. उस ने नौरोज खान से बात करना ठीक नहीं समझा. के लिए उसे मरजाना से बात करना ठीक लगा. हां, उस लड़की का ही नाम मरजाना था.

अगले दिन सुबह उस ने मरजाना से कहा, ‘‘बात यह है कि मुझे लकड़ी काटना नहीं आता, हल चलाना नहीं आता. मैं ने सोचा कि रेवड़ तो चरा सकता हूं. मुफ्त की रोटी खाते मुझे शरम आती है.’’

‘‘यह काम भी तुम से नहीं होगा, तुम इस काम के लिए पैदा ही नहीं हुए हो. मुझे तो हैरानी है कि तुम ने हत्या कैसे कर दी. तुम ऐसे ही रहो, तुम्हें मुफ्त की रोटी खाने का ताना कोई नहीं देगा.’’

‘‘अगर मुझे सारा जीवन फरारी बन कर रहना पड़ा तो?’’

‘‘मैं बाबा से बात करूंगी, वह भी यही कहेंगे जो मैं ने कहा है.’’ इतना कह कर वह रेवड़ ले कर चली गई और समर गुल उसे जाते हुए देखता रहा. हकीकत जान कर नौरोज ठहाका मार कर हंसा और समर से बोला, ‘‘फरारी बाबू, मैं ने तुम्हारे लिए काम ढूंढ लिया है. तुम बाजू को पढ़ाया करोगे.’’

यह काम उस के लिए बहुत अच्छा था. अगले दिन से उस ने केवल बाजू को बल्कि गांव के और बच्चों को इकट्ठा कर के पढ़ाना शुरू कर दिया. शाम के समय चौपाल लगती थी, गांव के सब बूढ़ेबच्चे इकट्ठे हो जाते. समर गुल भी चौपाल पर चला जाता था. वहां कोई कहानी सुनाता, कोई चुटकुले और कोई शेरोशायरी. यह सभा आधीआधी रात तक जमी रहती थी. रात को लौट कर समर गुल जब दरवाजा खटखटाता तो मरजाना ही दरवाजा खोलती, क्योंकि मलिक नौरोज खान ऊपर के माले पर सोता था.

समर गुल को यहां आए हुए 2-3 महीने हो गए थे, लेकिन मरजाना से उस की बात नहीं हो पाई थी, क्योंकि वह उस से डराडरा सा रहता था. वह समर से हंस कर पूछती, ‘‘ गए…’’ वह उसे सिर झुकाए जवाब देता, लेकिन एक पल के लिए भी वहां नहीं रुकता था और अपने कमरे में जा कर लेट जाता था. वह बिस्तर पर भी मरजाना के बारे में सोचता रहता थामरजाना का व्यवहार सदैव उस के प्रति प्यार भरा होता था. लेकिन अब वह उस की तरफ और भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी. एक रात जब वह आया तो मरजाना ने रोज की तरह कहा, ‘‘ गए…’’

वह कुछ नहीं बोला और खड़ा रहा. दोनों के ही दिल तेजी से धड़क रहे थे. दोनों ने एक अनजानी सी खुशी और डर अपने अंदर महसूस किया. मरजाना ने धीरे से कहा, ‘‘अंदर आ जाओ.’’ वह अंदर आ गया. मरजाना ने दरवाजा बंद कर के कुंडी लगा दी. फिर भी वह वहीं खड़ा रहा. मरजाना भी वहीं खड़ी उसे निहारती रही. फिर धीरे से बोली, ‘‘जाओ, सो जाओ.’’ वह चला गया, लेकिन मरजाना वहीं खड़ी रही. उस का अंगअंग एक अनोखी मस्ती से बहक रहा था. साथ ही दिल भी एक अनजानी खुशी से भर गया था. समर गुल अपने कमरे में पहुंचा तो उस की आंखों में खुशी के आंसू आ गए. वह बारबार होंठों ही होंठों में दोहरा रहा था, ‘‘जाओ,सो जाओ.’’

मरजाना का प्यारभरा स्वर उस की आत्मा को झिंझोड़ गया था. वह भावुक हो गया और सिसकियां ले कर रोने लगा. यह खुशी के आंसू थे. उस की हालत एक बच्चे जैसी हो गई थी. उसे यह अहसास डंक मार रहा था कि उस ने किसी की हत्या की हैवह पहली बार दिल की गहराइयों से अपने किए पर लज्जित था, उस की आत्मा पर पाप का बोझ पड़ा था. इस बोझ को उस ने पहले महसूस नहीं किया था, लेकिन प्रेम की अग्नि ने उसे कुंदन बना दिया था. आज वह किसी का दुश्मन नहीं रहा. मरजाना अपने बिस्तर पर लेट कर अंदर ही अंदर खुश हो रही थी, ऐसी खुशी उसे पहली बार मिली थी. वह सोच रही थी कि जब मैं ने दरवाजा बंद किया तो समर वहीं खड़ा रहा. वह चुपचाप था. उस की खामोशी ने मुझे अंदर तक हिला डाला. क्या इसी को प्रेम कहते हैं?

सोच रही थी कि क्या यही मीठामीठा प्रेम का दर्द है, जिस के लिए दरखुई आदम खान के लिए मर गई थी और आदम खान दरखुई के लिए मरा था. गुल मकई मूसा खान के लिए मरी और मूसा खान गुल मकई के लिएहां, ये सब प्रेम के लिए मर गए थे, लेकिन लोग प्रेम करने वालों के दुश्मन क्यों होते हैं. इतनी पवित्र चीज और खुशी से इंसानों को क्यों दूर रखा जाता है. लेकिन मेरी अंतरात्मा पवित्र है, मैं ने कोई पाप नहीं किया. वह झटके से बोली, ‘‘नहींनहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. अपने आप को इस अनजानी खुशी से वंचित नहीं होने दूंगी.’’ सुबह हुई तो मरजाना ने उजाले में वह सुंदरता देखी जो उसे पहले कभी दिखाई नहीं दी थी. समर गुल जाग रहा था. वह उठा और उस ने बाहर जा कर देखा, मरजाना रेवड़ ले कर जा चुकी थी. उस की निगाहें हवेली की दीवारों पर टिक गईं, ऐसा लगा जैसे उस का बचपन यहीं गुजरा हो.

तभी बाजू पास कर बोला, ‘‘गुल लाला चलो, सब बच्चे आप का इंतजार कर रहे हैं. आप अभी तक पढ़ाने नहीं आए.’’ उस ने बाजू को गोद में उठा लिया और उसे चूमने लगा. बाजू बोला, ‘‘लाला, इतना प्यार तो आप ने मुझे कभी नहीं किया.’’ उस ने कहा, ‘‘हां बाजू, मैं ने कभी इतना प्यार नहीं किया, लेकिन दिल में तुम्हारे लिए बहुत प्यार रखता था.’’ फिर वह उसे नीचे उतार कर बोला, ‘‘बाजू, जाओ आज तुम सब छुट्टी कर लो.’’ वह खुश हो कर चला गया. गुल घर में रखी रायफल ले कर जंगल चला गया. मरजाना रेवड़ के पास डलिया बुन रही थी. साथ ही धीमे स्वर में गा रही थी. समर गुल चुपके से उस के पीछे खड़ा हो कर उस का गाना सुनने लगा.

मरजाना जो गा रही थी, उस का सार कुछ इस तरह था, ‘तुम नहीं आए थे तो दिल में कोई हलचल नहीं थी, जीवन शांति से अपनी डगर पर चल रहा था. तुम आते तो यह जीवन इसी तरह कट जाता. लेकिन तुम ने अपनी सुंदर आंखों से मेरे दिल को जगमगा दिया है. तुम ने यह क्या कियापलक झपकते ही मेरी दुनिया ही बदल डाली. बाप, भाई, मां सब से नाता टूट गया, यह तुम ने क्या किया. अब तुम मेरे खून में दौड़ने लगे.’ समर गुल चुपचाप सुनता रहा. फिर धीरे से बोला, ‘‘मरजाना!’’ वह एकदम चौंक पड़ी. उस के होंठ कांपने लगे. उस की भूरी आंखें खुशी के आंसुओं से भर गईं.

समर गुल उस के आंसू पोंछते हुए बोला, ‘‘तुम मुझे दूर पहाडि़यों में ढूंढ रही थी, लेकिन मैं यहां तुम्हारे दिल के पास खड़ा था.’’ ‘‘खुदा करे, मैं तुम्हें हर पल ढूंढती रहूं.’’ वह उस के पास बैठते हुए बोला, ‘‘मरजाना, मैं हत्या कर के बहुत पछता रहा हूं. लेकिन लगता है कि कुदरत ने तुम से मिलवाने के लिए मुझ से यह हत्या करवाई थी. मुझे हैरानी है कि पाप के बदले इतनी बड़ी खुशी मिली. डरता हूं कि यह खुशी छिन जाए.’’

मरजाना बोली, ‘‘तुम्हारे बिना मैं जीने की चाहत भी नहीं कर सकती. मुझे तुम पहले दिन से ही अच्छे लगने लगे थे. कुछ भी हो जाए, मुझे तुम अपने साथ ही पाओगे. मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकती.’’ ‘‘मरने की बात न करो मरजाना.’’ ‘‘मेरा नाम मरजाना है गुल, मुझे मर जाना आता है. मरने की बात क्यों न करूं?’’ ‘‘नहीं मरजाना नहीं, मैं तुम्हें बाबा से मांग लूंगा. पूरी जिंदगी की गुलामी कर लूंगा. अगर तब भी नहीं माने तो बापभाइयों से कहूंगा कि मरजाना के कदमों में पैसे का ढेर लगा दो, उसे हीरेजवाहरात में तोल दो. सब कुछ ले लो मगर मरजाना को दे दो.’’

‘‘यह सब तो ठीक है, लेकिन गुल यहां के कानून के मुताबिक यहां के लोग अपनी बेटियों को सरहद के पार नहीं देते. देख लेना, बाबा तुम से यही कहेगा.’’ ‘‘इस का मतलब मरजाना, मैं तुम्हें कभी नहीं पा सकूंगा?’’ ‘‘मैं ने कह तो दिया मेरा नाम मरजाना है और मुझे मरना आता है.’’  ‘‘मरने की बातें मत करो मरजाना,’’ गुल ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया. अचानक कहीं से उस का कुत्ता गया और गुल के पांव चाटने लगा. गुल बोला, ‘‘देखो, एक दिन इस ने मेरी टांग पर काटा था और अब पैर चाट रहा है.’’ मरजाना बोली, ‘‘यह तुम्हारे प्रेम को समझ गया है.’’

कुछ देर बातें करने के बाद दोनों घर पहुंचे तो गुल के पिता, भाई और मामा बैठे थे और चाय पी रहे थे. गुल को उन्होंने गले लगा लिया. गुल के चेहरे की रंगत और सेहत देख कर सब हैरत में पड़ गए. उन के आने से केस के बारे में पता चला, पुलिस ने दोनों पार्टियों का समझौता करा कर केस बंद कर दिया था. वे लोग गुल को लेने के लिए आए थे. रात में गुल ने बड़े भाई को सब बातें बता दीं. साथ ही अपना फैसला भी सुना दिया कि वह वापस नहीं जाएगा और अगर जाएगा तो मरजाना भी साथ जाएगी. 

उस की बातें सुन कर उस का भाई परेशान हो गया. अंत में यह तय हुआ कि मरजाना के पिता से रिश्ता मांग लिया जाए. बहुत झिझक के साथ मरजाना के बाबा से उस के रिश्ते की बात की तो उस ने कहा, ‘‘देखो, मैं बहादुर आदमियों की इज्जत करता हूं. घर में शरण भी देता हूं लेकिन सरहद पार का पठान कितना भी बड़ा क्यों हो, हमारे कबीले के सरदारों का मुकाबला नहीं कर सकता. मैं किसी ऐसे आदमी को दामाद नहीं बना सकता, जो हमारे खून की बराबरी कर सके.’’

समर गुल के बाप ने मिन्नत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. हजारों रुपयों का लालच दिया, लेकिन रुपयों की बात सुन कर उस ने कहा, ‘‘हमें रुपयों का लालच दो, हमारे पास पैसे की कोई कमी नहीं है. हम सरहद पार अपनी लड़की नहीं देंगे.’’ समर गुल ने ये बातें सुनीं तो उस की आंखों से नींद ही गायब हो गई. कुछ दिन पहले उस ने जो ख्वाब देखे थे, वे तिनके की तरह बिखर गए. इस का मतलब यह कि उसे बिना मरजाना के जाना होगा. अगली सुबह वे लोग अपने घर की ओर चल दिए. समर गुल ने आखिरी बार पीछे मुड़ कर देखा. वह रोने लगा. उस के भाई ने उसे गले से लगा लिया. उस का बाप, भाई और मामा उस के दुख को समझते थे. सब लोग चले जा रहे कि अचानक कुत्ते के भौंकने की आवाज आई. वह गुल की ओर दौड़ा चला आ रहा था. उस के पीछे मरजाना दौड़ी आ रही थी.

‘‘मरजाना…’’ गुल जोर से चीखा. मरजाना उस के पास आ कर उस के सामने खड़ी हो गई. वह हांफते हुए बोली, ‘‘मैं ने कहा था न, मेरा नाम मरजाना है, मुझे मरना आता है.’’ गुल ने अपने बाप की ओर इशारा करते हुए  मरजाना से कहा, ‘‘यह मेरे बाबा हैं.’’ मरजाना उस के बाप के पैरों में गिर गई और बोली, ‘‘बाबा, मुझे भी अपनी बेटी बना लो, अब मैं वापस नहीं जाऊंगी.’’ समर गुल का बाप उसे देख कर भौचक्का रह गया. उस ने उसे उठाया और ध्यान से देखा. वह लड़की उस के बेटे के लिए अपना परिवार, अपना वतन सब कुछ छोड़ कर आ गई थी. लेकिन वह तुरंत संभल गया. उस ने सोचा कि यह उस आदमी की बेटी भी तो है, जिस ने मेरे बेटे पर बड़े उपकार किए हैं. 

गुल के पिता ने उस के सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘‘बेटी, मैं तुम्हारी इज्जत करता हूं. तुम ने मेरे बेटे से प्यार किया है, तुम जैसी लड़की लाखों में भी नहीं मिलेगी. लेकिन बेटी तुझे साथ ले जा कर मैं दुनिया को क्या मुंह दिखाऊंगा. लोग कहेंगे सरहद के पठान का क्या यही किरदार होता है कि जिस थाली में खाए उसी में छेद करे.’’ मरजाना गिड़गिड़ाई, ‘‘बाबा, मैं वापस नहीं जाऊंगी, आप के साथ ही चलूंगी. यह सब दुनियादारी की बातें हैं.’’

समर गुल के बाप ने मरजाना को गले लगा कर कहा, ‘‘बेटी, जरा सोचो तुम अपने बाप की इज्जत हो. अपने भाइयों की आन हो, जब दुनिया यह सुनेगी, नौरोज खान की बेटी घर से भाग गई है तो तुम्हारे बाप के दिल पर क्या गुजरेगी? एक बाप के लिए यह बात मरने के बराबर होगी.’’ उस ने कहा, ‘‘बाबा, रात मैं ने कसम खाई थी कि जो रास्ता मैं ने चुना है, उस से पीछे नहीं हटूंगी.’’

समर गुल ने बाप से कहा, ‘‘बाबा, मान जाइए. इस ने कसम खा ली है. अगर यह मेरी नहीं हुई तो अपनी जान दे देगी और फिर मैं भी जिंदा नहीं रहूंगा.’’ बाप चुप हो गया और समर गुल का भाई व मामा भी चुप रहे. लगता था मोहब्बत जीत गई थी. मरजाना का कुत्ता बारीबारी से सब को सूंघ रहा था, जैसे सब को पहचानने की कोशिश कर रहा हो. समर गुल के बाप ने भीगी आंखों से मरजाना को गले लगा लिया और उस के सिर पर हाथ रख दिया.

शाम को इक्कादुक्का भेड़ें घर पहुंचीं, लेकिन उन के साथ मरजाना नहीं थी. कुत्ता भी गायब था, नौरोज का दिल बैठा जा रहा था. कुछ ही देर में पूरे गांव में यह खबर फैल गई कि नौरोज की लड़की मरजाना घर से भाग गई.अगले दिन तक आसपास के कबीलों में यह खबर पहुंच गई. दोस्त या दुश्मन सब के लिए यह खबर दुख की थी. यह सवाल नौरोज के घर की इज्जत का ही नहीं, बल्कि पूरे कबीले की इज्जत का था. तक हर गांव से हथियारबंद लड़के पहुंचने शुरू हो गए. कबीले का जिरगा (कबीले की संसद) बुलाया गया और यह तय किया गया कि हर गांव से एक जवान चुना जाए और ये जवान चारों ओर फैल जाएं. इन्हें हर हाल में मरजाना को ले कर आना होगा. जो जवान खाली हाथ सरहद पर वापस आता दिखाई दे, उसे तुरंत गोली मार दी जाए. इसलिए 25 जवानों का दस्ता मालिक नौरोज के नेतृत्व में रवाना हो गया.

समर गुल के बाप ने अपने गांव पहुंचते ही समर गुल और मरजाना का निकाह करा दिया. अभी उन की शादी को एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि उन के गांव को चारों ओर से घेर कर अंधाधुंध फायरिंग होने लगी. गांव के लोग भी चुप नहीं थे. एक कबीले के सरदार की बेटी उन की बहू बनी थी, इसलिए गोली का जवाब गोली से दिया गया. 2 दिन तक फायरिंग होती रही, दोनों ओर से कई लोग घायल भी हुए लेकिन फायरिंग बंद नहीं हुई. मरजाना के हाथों की मेहंदी का रंग अभी ताजा था, उस में अभी तक महक थी. तीसरे दिन पुलिस की भारी कुमुक पहुंच गई और बहुत मुश्किल से फायरिंग पर काबू पाया गया. लेकिन नौरोज घेरा तोड़ने को तैयार नहीं हुआ. पुलिस औफीसर ने सोचा अगर इन पर सख्ती की गई तो यह कबीला मरनेमारने पर तैयार हो जाएगा. पुलिस अधिकारी ने समझदारी से काम लेते हुए दोनों ओर के 4-4 जवानों को चुना और उन की मीटिंग बैठा दी.

समर गुल के बाप ने कहा, ‘‘जो कुछ हुआ, मुझे उस का खेद है. हम पहले से ही मरजाना के पिता के सामने आंख उठा कर नहीं देख सकते. मैं उस से माफी मांगने के लिए भी पीछे नहीं हटूंगा. यह मैं किसी दबाव में नहीं कह रहा हूं बल्कि यह मेरे दिल की आवाज है. नौरोज ने हमारे ऊपर उपकार किया है, हम नौरोज से दगा करने वाले लोग नहीं हैं. अगर वह चाहे तो मरजाना के बदले मैं अपनी बेटी उस के बेटे से ब्याह सकता हूं. और अगर खून बहाना हो तो मेरे बेटे के बदले मैं अपना खून दे सकता हूं. मैं उन के साथ सरहद पर जा सकता हूं. वे मेरी हत्या कर के अपने दिल की भड़ास निकाल लें. जहां तक मरजाना का सवाल है, मेरा बेटा उसे भगा कर नहीं लाया है. हम ऐसा कर ही नहीं सकते. अब वह मेरी बहू बन चुकी है और उसे मैं किसी भी कीमत पर वापस नहीं करूंगा. बहू परिवार की इज्जत होती है.’’

जिरगे में मौजूद नौरोज खान ने कहा, ‘‘मुझे समर गुल के बाप का खून नहीं चाहिए. उस से मेरी प्यास नहीं बुझ सकती और ही उस की लड़की का रिश्ता चाहिए. उस से मेरी तसल्ली नहीं होगी. मुझे हीरेजवाहरात भी नहीं चाहिए, उन से मेरे घाव नहीं भर सकते. भागी हुई बेटी बाप की आत्मा में जो घाव लगा देती है, दुनिया की कोई दवा उसे ठीक नहीं कर सकती. थप्पड़ के बदले थप्पड़, हत्या के बदले हत्या की जा सकती है, लेकिन मैं दिल वालों से पूछता हूं, भागी हुई बेटी का बदला कोई किस तरह ले? मुझे समझाओ, मैं यहां क्या लेने आया हूं? समर के पिता को गोली मारूं, समर को गोली मारूं या अपनी बेटी को? कोई बतलाए कि मैं क्या करूं?’’ 

इतना कह कर मलिक नौरोज फूटफूट कर रोने लगा. सब ने पहली बार एक चट्टान को रोते देखा. मरजाना ने सब कुछ सुन लिया था. अपनी खुशी के लिए उस ने जो कदम उठाया था, वह अपने बाप के दुख के सामने कितना मामूली था. यह जीवन कितना अजीब है, दूसरों के लिए जीना, दूसरों के लिए मरना, उस ने समर गुल से कहा, ‘‘मेरे प्रियतम, अब मैं बहुत दूर चली जाऊंगी.’’

समर गुल कुछ नहीं बोला. उसे हक्काबक्का देखता रहा.

‘‘समर गुल,’’ उस ने रुंधी आवाज में कहा, ‘‘मुझे जाना ही होगा, मुझे मान लेना चाहिए. मैं बाप की इज्जत से खेली हूं. जीवन दूसरों के लिए होता है, मुझे आज इस का अहसास हुआ है.’’ ‘‘जो होना था, वह तो हो चुका.’’ समर गुल ने तड़प कर कहा, ‘‘गई हुई इज्जत तो गिरे हुए आंसुओं की तरह होती है, जो फिर हाथ नहीं आते.’’

‘‘हां, इज्जत वापस नहीं सकती, लेकिन मैं उस का प्रायश्चित करना चाहती हूं, मेरे जानम.’’ ‘‘तो तुम मरना चाहती हो?’’ ‘‘हां, मेरे बाप का कुछ तो बोझ हलका होगा, उस की आनबान को कुछ तो सहारा मिल जाएगा.’’ उस ने समर के सीने पर अपना सिर रख कर कहा, ‘‘यह मेरा आखिरी फैसला है, समर गुल. मेरे बाबा से कह दो, मैं उस के साथ जाने के लिए तैयार हूं.’’ जिरगे को बता दिया गया. समर गुल के बाप को बड़ी हैरत हुई. लेकिन मरजाना के बाप के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उस ने राइफल की गोलियां निकाल कर फेंक दी, जंग खत्म हो गईवे लोग मरजाना को ले कर चल दिए. पूरा गांव उदास था. आई थी तो गई ही क्यों, हर एक की जुबान पर यही सवाल था. उस के जाने का कारण समर गुल के अलावा और कोई नहीं जानता था.

अगले दिन वे सरहद पर पहुंच गए. सब लोग सरहद पर रुक गए, लेकिन मरजाना नहीं रुकी. वह आगे बढ़ती रही. अचानक गोलियां की बौछार हुई, मरजाना तड़प कर मुड़ी और गिर पड़ी. हिचकी ली, एकदो बार मुंह खोला और शांत हो गई. उस की आंखें आसमान की ओर थीं, जैसे कह रही हों, ‘मेरा नाम मरजाना है, मुझे मर जाना आता है.’  

शौहर ने पत्नी की हत्या के लिए दिए 10 लाख

सिकंदर ने अपनी प्रेयसी और सेक्रेटरी रोमा के साथ मिल कर जो नाटक किया, वह वाकई जबरदस्त था. इस से उस की पत्नी भी संतुष्ट हो गई और उन दोनों के मिलने का रास्ता भी साफ हो गया. एक रोमांचक कहानी…   

पिछला टेलीफोन उस के लिए परेशानी भरा था. दूसरा फोन तो उसे खौफजदा करने के लिए काफी था. दोनों टेलीफोन दिन के वक्त आए थे. तब जब उस का हसबैंड सिकंदर अपने औफिस में था और वह घर पर अकेली थी.

‘‘मिसेज सिकंदर,’’ फोन पर एक अजनबी औरत की आवाज सुनाई दी.

‘‘हां, बोल रही हूं. आप कौन हैं?’’ मिसेज सिकंदर ने कहा.

‘‘एक दोस्त हूं. मकसद है आप की मदद करना. क्या आप सलिलि को जानती हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘तो क्या आप सलिलि हैं?’’ मिसेज सिकंदर ने पूछा.

‘‘नहीं मिसेज सिकंदर, सलिलि तो आप के शौहर की सेक्रेटरी का नाम है. मिस्टर सिकंदर और सलिलि के बीच जो चल रहा है, आप के लिए ठीक नहीं है. मेरा फर्ज है कि मैं आप को सही हालात की जानकारी दे दूं.’’

मिसेज सिकंदर गुस्से से चिल्लाई, ‘‘यह सब फालतू बकवास है. सलिलि मेरे शौहर की सेक्रेटरी जरूर है. वह उस का जिक्र भी करते हैं. पर उन का उस से कोई चक्कर है, यह बिलकुल गलत है. सलिलि को दिल की बीमारी है, इसलिए वह उस से हमदर्दी रखते हैं. अबकी बार तो वह कह रहे थे, अगर अब उस ने ज्यादा छुट्टियां लीं तो उसे नौकरी से निकाल देंगे.’’

दूसरी तरफ से औरत की जहरीली हंसी की आवाज आई, ‘‘हां, आप यह सच कह रही हैं मिसेज सिकंदर. सलिलि को दिल की बीमारी है, लेकिन वह दूसरी तरह की दिल की बीमारी है. वैसे मुझे सलिलि से कोई जलन नहीं है. मैं तो आप का भला चाहती हूं. आप यह मालूम करने की कोशिश करें कि जब आप के शौहर पिछले महीने बिजनैस के सिलसिले में सिंगापुर गए थे, उस वक्त उन की खूबसूरत सेक्रेटरी सलिलि कहां थी?’’

‘‘आप हद से आगे बढ़ रही हैं मैडम, अपनी बेहूदा बकवास बंद कीजिए.’’ गुस्से से मिसेज सिकंदर ने फोन रख दिया. दोनों हाथों से सिर थाम कर मिसेज सिकंदर सोच में डूब गईंउन्हें याद आया, जब पिछले महीने सिकंदर बिजनैस के लिए सिंगापुर गया था, तो उस ने उसे सिंगापुर के उस होटल का नाम बताया था, जहां वह ठहरने वाला था. लेकिन एक जरूरी काम के सिलसिले में जब उस ने सिकंदर को होटल फोन किया था तो होटल से बताया गया था कि सिकंदर नाम का कोई आदमी उन के होटल में नहीं ठहरा है. उस वक्त उस ने सोचा था कि सिकंदर ने किसी वजह से होटल बदल लिया होगा. लेकिन अब?

सिकंदर से उस की शादी किसी रोमांस का नतीजा नहीं थी. उसे कहीं देख कर सिकंदर ने उस के हुस्न की तारीफ की तो वह सोच में पड़ गई थी. वह सिकंदर से उम्र में बड़ी थी. देखने में भी कोई खास अच्छी नहीं थी. उसे अपने हुस्न के बारे में कोई गलतफहमी नहीं थी. सिकंदर ने उस से शादी सिर्फ इसलिए की थी कि वह एक बड़ी दौलत और जायदाद की वारिस थी. 14 साल से वह सिकंदर के साथ एक अच्छी जिंदगी गुजार रही थी. सिकंदर देखने में स्मार्ट था और बेहद जहीन भी.

उस ने रोमा की दौलत को इस तरह बिजनैस में लगाया कि कारोबार चमक उठा. बिजनैस खूब फलफूल रहा था. 14 साल के अरसे में उन की शादी को एक शानदार कारोबारी समझौता कहा जा सकता था. दोनों एकदूसरे से खुश थे और इस कामयाब फायदेमंद कौंट्रैक्ट को तोड़ने पर राजी नहीं थे. दोनों ही खुशहाल जिंदगी बसर कर रहे थे. शाम को सिकंदर की वापसी पर रोमा ने फोन काल के बारे में कुछ नहीं बताया. एक हफ्ता आराम से गुजरा. इस बार किसी आदमी का फोन था. जिस ने उसे दहशतजदा कर दिया. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘इस बारे में आप को फिक्र करने की जरूरत नहीं है. जो मैं कह रहा हूं, उसे ध्यान से सुनो मिसेज सिकंदर. मैं एक पेशेवर कातिल हूं. मैं मोटी रकम के बदले किसी का भी कत्ल कर सकता हूं. शायद यह जान कर आप को ताज्जुब होगा कि आप के शौहर सिकंदर ने आप को कत्ल करने के लिए मुझे 10 लाख रुपए की औफर दी है.’’ रोमा डर कर चिल्लाई, ‘‘तुम पागल हो गए हो या मजाक कर रहे हो? मेरा शौहर हरगिज ऐसा नहीं कर सकता.’’

मरदाना आवाज फिर उभरी, ‘‘अगर आप को आप के शौहर के औफर के बारे में बताता तो शायद मैं पागल कहलाता. मैं हर काम बहुत सोचसमझ कर करता हूं. 10 लाख का औफर मिलने के बाद मैं ने अपने शिकार के बारे में जानकारी हासिल की और आप तक पहुंचा

‘‘मैं कोई मामूली ठग या चोर नहीं हूं. अपने मैदान का कामयाब खिलाड़ी हूं. मैं इस तरह कत्ल करता हूं कि मौत नेचुरल लगे. किसी को भी कोई शक न हो. मैं अपने काम में कभी भी नाकाम नहीं रहा.’’

मिसेज सिकंदर ने कंपकंपाती आवाज में कहा, ‘‘यह सब क्या कह रहे हो तुम, मुझे कुछ समझ में नहीं रहा है.’’ अजनबी मर्द की आवाज गूंजी, ‘‘मैं आप को सब समझाता हूं. आप के हसबैंड की औफर कबूल करने के बाद मुझे आप के बारे में पता लगा कि सारी दौलत की मालिक आप हैं. आप का शौहर आप का कत्ल करवाने के बाद पूरी दौलत का मालिक बनना चाहता है

‘‘तब मुझे एक खयाल आया कि अगर मिसेज सिकंदर मुझे डबल रकम देने पर राजी हो जाएं तो मैं उन की जगह उन के शौहर को ही ठिकाने लगा दूं. आप क्या कहती हैं, इस बारे में मिसेज सिकंदर?’’

मिसेज सिकंदर खौफ से चीखीं, ‘‘तुम एकदम पागल आदमी हो. मैं पुलिस को खबर कर रही हूं.’’

मर्द ने जोरों से हंसते हुए कहा, ‘‘पुलिस, आप उन्हें क्या बताएंगी. चलिए, अगर उन्होंने यकीन कर भी लिया तो आप मुझे कहां तलाश करेंगी? मैं पीसीओ से फोन कर रहा हूं. आप बेकार की बातें छोड़ें और गौर करें. आप दोनों में से कोई एक मरने वाला है. अब रहा सवाल यह कि मरने वाला कौन होगा? आप या आप का शौहर? इस का फैसला आप को करना होगा. आप तसल्ली से सोच लें. कल मैं इसी वक्त फिर फोन करूंगा. आप का आखिरी फैसला जानने के लिए.’ दूसरी तरफ से फोन बंद हो गया.

शाम को सिकंदर घर नहीं आया. उस ने फोन कर दिया कि औफिस में काम ज्यादा है, वह देर रात तक काम करेगा. उस ने सोचा कि सलिलि के साथ ऐश करेगा. जब आधी रात को सिकंदर बैडरूम में दाखिल हुआ तो वह जाग रही थी और कुछ सोच रही थी. सोचतेसोचते वह इस फैसले पर पहुंच गई कि सुबह सिकंदर को टेलीफोन के बारे में बताएगी. मगर सिर्फ पहले फोन के बारे में. वह उस से कहेगी कि अगर उसे कोई कीप रखनी है तो रखे. उसे कोई ऐतराज नहीं, पर यह बात राज रहे. कोई बदनामी हो.

वह आखिर दूसरे फोन के बारे में क्या बताती कि एक आदमी ने कहा है कि मुझे कत्ल करने के लिए 10 लाख का औफर दिया गया है. अगर मैं औफर डबल कर दूं तो मेरी जगह वह मारा जाएगा. शायद यह सुन कर सिकंदर उसे पागलखाने में दाखिल करा दे.फिर उसे खयाल आया कि क्यों वह उस अजनबी मर्द के दूसरे फोन का इंतजार करे. हो सकता है बातचीत के दौरान उस की कोई ऐसी गलती पकड़ में जाए, जिस की वजह से सिकंदर और पुलिस दोनों को उस की बात का यकीन जाए. फिर उसे पागलखाने में डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

लेकिन उसे लगा कि पहले फोन के बारे में भी बताने की भी क्या जरूरत है. वह उस की कहानी सुन कर खूब हंसेगा. अफेयर से इनकार करेगा और चौकन्ना हो जाएगा. जैसेजैसे वह सोच रही थी, उसे लग रहा था कि फोन करने वाला आदमी पागल है. आखिर सिकंदर उस का कत्ल क्यों करवाएगा? वह खुद बूढ़ा हो रहा है, तोंद निकल आई है. अब क्या इश्क लड़ाएगा. पर यह बात भी सच है कि वह उसे तलाक नहीं दे सकता, क्योंकि सारी दौलत उस के हाथ से निकल जाएगी. पर अचानक एक खयाल ने उसे डरा दिया कि अगर आज वह मर जाती है तो सारी दौलत का मालिक सिकंदर होगा. इस तरह उसे अपनी बीवी से छुटकारा मिल जाएगा और वह सलिलि से शादी करने के लिए आजाद हो जाएगा.

इसी सोचविचार में सारी रात कट गई. दूसरे दिन जब फोन की घंटी बजी तो उसी मरदाना आवाज ने पूछा, ‘‘मैडम, आप ने क्या फैसला किया?’’ रोमा की पेशानी पसीने से भीग गई. उस ने कहा, ‘‘मैं तैयार हूं. मैं तुम्हें 20 लाख दूंगी, तुम शिकार बदल दो. पर शिकार सिकंदर नहीं, सलिलि होगी.’’

‘‘बहुत अच्छा फैसला है, मतलब अब इस लड़की को ठिकाने लगाना है.’’ मरदाना आवाज ने पूछा.

‘‘हां, मेरे शौहर के बजाए उस की सेक्रेटरी सलिलि को कत्ल करना बेहतर है. क्योंकि रहेगा बांस बजेगी बांसुरी. उसे लग रहा था, जैसे सलिलि और सिकंदर के अफेयर के बारे में सारी दुनिया जानती है. सलिलि के रहने से वह खुद ही वफादार बन जाएगा और अगर उस ने अपनी बीवी को कत्ल कराने की कोशिश की थी तो वह उस से खौफजदा भी रहेगा.’’

उस के दिमाग में एक खयाल और आया कि ये सारी बातें लिख कर अपने वकील के पास हिफाजत से रखवा देगी कि उस की अननेचुरल डैथ के बाद इसे खोला जाए और मौत का जिम्मेदार सिकंदर को ठहराया जाए. फोन में मरदाना आवाज उभरी, ‘‘मुझे इस से कोई मतलब नहीं कि शिकार कौन है? मैं अपना काम बहुत ईमानदारी और सलीके से करता हूं. मैं आज ही आप के शौहर के औफर से इनकार कर दूंगा

‘‘आप का काम हो जाने के बाद फिर कभी आप मेरी आवाज नहीं सुनेंगी, पर एकदो चीजें बहुत जरूरी हैं. मैं अपनी फीस एडवांस में नहीं मांग रहा हूं पर आप को मेरे बताए पते पर मेरे कहे मुताबिक एक खत लिख कर भेजना पड़ेगा. मेरा पता हैरूस्तम, पोस्ट बौक्स-911, रौयल पैलेस.’’

रोमा ने घबरा कर पूछा, ‘‘मुझे क्या लिखना होगा?’’

‘‘आप को लिखना होगा कि आप ने 20 लाख के एवज में मुझे हायर किया है कि मैं आप के शौहर की सेक्रेटरी सलिलि फर्नांडीज को कत्ल कर दूं.’’ मरदानी आवाज सुनाई दी. रोमा चीख पड़ी, ‘‘नहीं, हरगिज नहीं. इस तरह तो मैं कत्ल में शामिल हो जाऊंगी.’’ ‘‘बेशक, पर यह खत मेरे लिए बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इसे लिखने के बाद आप मेरे बारे में छानबीन नहीं करेंगी. यही खत मेरी फीस की गारंटी भी है. जब आप को सबूत मिल जाए कि सलिलि मर चुकी है, आप मुझे 20 लाख की रकम भेजेंगी. उस के मिलते ही कुरियर से आप को आप का खत वापस मिल जाएगा.’’

‘‘नहीं नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती.’’ रोमा ने चिल्ला कर कहा.

‘‘मुझे बहुत दुख है मैडम कि आप के शौहर आप से कहीं ज्यादा अक्लमंद हैं. उन्होंने मेरी हर बात मंजूर कर ली थी. अब मैं आप के शौहर से ही सौदा कर लेता हूं.’’

रोमा ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘ठहरो, मुझे तुम्हारी बात मंजूर है. बताओ, मुझे क्या लिखना है?’’

‘‘हां, यह ठीक है. आप कागज पेन ले लें, मैं आप को लिखवाता हूं.’’ 

रोमा ने कांपते हाथों से खत लिखा. फिर उस ने कहा, ‘‘मैं आप को खबर करूंगा कि आप खत भेज दें. खत मिलने के 2-3 दिन के अंदर ही अखबार में आप को सलिलि फर्नांडीस की मौत की खबर मिल जाएगी. फिर मैं आप को रकम के बारे में बताऊंगा कि कहां और कैसे भेजनी है. और फिर आप का खत आप को वापस मिल जाएगा. इस के बाद हमारा ताल्लुक खत्म.’’ दूसरी तरफ से फोन बंद हो गया. दिन बाद फिर फोन आया. उस ने खत भेजने की हिदायत दी. रोमा ने खत रवाना कर दिया. तीसरे दिन अखबार में सलिलि फर्नांडीस की मौत की खबर छपी कि कल रात सलिलि फर्नांडीस की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई.

रोमा का शौहर सिकंदर काम के सिलसिले में कलकत्ता गया हुआ था. अब उसे कोई फिक्र नहीं थी. वह कहां जाता है, कहां ठहरता है, क्या करता है. दूसरे दिन उसी आदमी ने रकम के बारे में कई हिदायतें दीं. रोमा ने अलगअलग बैंकों से रकम निकलवाई. कुछ अपने पास से मिलाई और बड़ी ईमानदारी से वहां पैसा पहुंचा दिया, जहां कहा गया था. वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. पेशेवर कातिल भी अपने वादे का पक्का निकला. दूसरे रोज ही रोमा को कुरियर से उस का खत वापस मिल गया. उस ने फौरन उसे जला दिया और चैन की नींद सो गई.

उसी रात रोमा का शौहर रोमा से कई सौ मील दूर अपनी खूबसूरत सेक्रेटरी सलिलि के साथ एक शानदार होटल में अपनी कामयाबी का जश्न मना रहा था. सलिलि ने पूछा, ‘‘सिकंदर, मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि यह सब कैसे हो गया? आखिर कैसे तुम ने मेरी मौत की खबर छपवा दी?’’ सिकंदर ने शराब का घूंट भरते हुए कहा, ‘‘बहुत आसानी से, तुम्हारे मरने की खबर और रकम मैं ने अखबार वालों को भेज दी थी और उस के साथ एक परचा रखा था—‘सलिलि फर्नांडीस का कोई रिश्तेदार या करीबी इस शहर में नहीं है और वह मेरी कंपनी में मुलाजिम थी. उस की सारी जिम्मेदारी मुझ पर आती है. उस के सारे मामलात मैं ही देख रहा हूं. बस अखबार के जरिए उस की मौत की खबर दुनिया को बताना चाहता हूं.’ 

उन लोगों ने दूसरे दिन ही यह खबर छाप दी. अच्छा जानेमन, तुम यह बताओ कि तुम ने फ्लैट छोड़ते वक्त अपनी मकान मालकिन से क्या कहा?’’ ‘‘मैं ने मकान मालकिन से कहा था कि मैं दिल की मरीज हूं. अपने शहर वापस जा कर अपने डाक्टर से इलाज कराऊंगी, क्योंकि अब तकलीफ बहुत बढ़ गई है.’’

‘‘शाबाश, तुम्हें मुंबई आए अभी बहुत कम अरसा हुआ है. कोई तुम्हें जानता भी नहीं है, कोई दोस्त है. अब तुम दूरदराज के इलाके में एक शानदार फ्लैट ले कर ठाठ से रहना. अपना नाम और पहचान भी बदल लेना. रोमा से मिले 20 लाख रुपए मैं किसी बिजनैस में लगा दूंगा ताकि हर महीने गुजारे के लिए अच्छीखासी रकम मिलती रहे.’’

‘‘डार्लिंग, तुम कितने अच्छे हो, सारी रकम मेरे नाम पर लगा रहे हो.’’

‘‘क्यों नहीं डियर, पहली बार टेलीफोन करने वाली तुम खुद थीं. तुम्हीं ने तो प्लान कामयाब बनाया.’’

‘‘मगर सिकंदर, सारी प्लानिंग तो तुम्हारी थी. तुम ने कितनी कामयाबी से आवाज बदल कर कातिल का रोल अदा किया. तुम्हारी आवाज सुन कर तो मैं भी धोखा खा गई थी. तुम वाकई में बहुत बड़े कलाकार हो.’’

‘‘चलो, फालतू बातें छोड़ो, अब हमारे मिलने में कोई रुकावट नहीं रहेगी. टूर का बहाना कर के मैं तुम्हारे पास जाया करूंगा. उधर रोमा अपनी दौलत पर नाज करते हुए चैन से सोएगी. अब मुझ पर शक भी नहीं करेगी.’’

अंधविश्वास के कारण परिवार के 11 लोगों ने की आत्महत्या

दिल्ली के संतनगर, बुराड़ी में जिस तरह एक ही परिवार के 11 लोगों ने आत्महत्या की, उसे देख कर लगता है कि देश में अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहराई तक पैठ बनाए हुए हैं कि उन्हें उखाड़ फेंकना आसान नहीं है. सुबह के साढ़े 7 बज चुके थे, पर ललित की दुकान अभी तक बंद थी. जबकि रोजाना साढ़े 6 बजे ही दुकान खुल जाती थी. दुकान बंद देख कर पड़ोस में रहने वाले गुरचरण सिंह को आश्चर्य हुआ. क्योंकि उन के घर का मुख्य दरवाजा खुला था. जबकि अमूमन होता उलटा था, दुकान खुली होती थी और घर का दरवाजा बंद होता था.

संतनगर, बुराड़ी की गली नंबर 2 में रहने वाले गुरचरण सिंह का घर ललित के पड़ोस में ही था. ललित के घर का मुख्य दरवाजा खुला देख गुरचरण सिंह उन के घर के भीतर चले गए. अंदर का दृश्य देख कर वह हक्केबक्के रह गए. छत पर लगी लोहे की ग्रिल से घर के सारे सदस्य फांसी के फंदे पर लटके हुए थे. यह खौफनाक दृश्य देख गुरचरण सिंह उल्टे पांव वापस लौट आए और पड़ोस के लोगों को इकट्ठा कर अंदर की जानकारी दी. साथ ही उन्होंने पुलिस को भी सूचना दे दी. गली नंबर 2 में रहने वाले जिस किसी ने भी घर में जा कर देखा, हैरान रह गया. घर के सभी 11 लोगों के फांसी के फंदे पर झूलने की बात सुन कर कुछ ही देर में वहां लोगों की भीड़ जुट गई.

कुछ ही देर में बुराड़ी थाने की पुलिस भी आ गई. यह बात पहली जुलाई 2018 की सुबह की थी. एक ही घर के 11 लोगों की मौत बहुत बड़ी घटना थी. सूचना पा कर थोड़ी देर में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी घटनास्थल पर पहुंचना शुरू कर दिया था. पुलिस आयुक्त के आदेश पर क्राइम ब्रांच के कई अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. फौरेंसिक और क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीमें भी मौके पर पहुंच कर जांच में जुट गईं. मरने वालों में 4 पुरुष और 7 महिलाएं थीं. जांच के दौरान घर की बाहरी दीवार पर 11 पाइप लगे मिले. इन में से 4 पाइप बडे़ और सीधे थे, जबकि 7 अन्य पाइपों का मुंह नीचे की ओर था.

घर की मुखिया नारायणी देवी की लाश नीचे फर्श पर पड़ी थी. उन के 2 बेटों भुवनेश और ललित, उन की पत्नियां सविता और टीना, नारायणी की विधवा बेटी प्रतिभा और प्रतिभा की बेटी प्रियंका की लाशें जाल में बंधी चुन्नियों से लटकी थीं. भुवनेश के 3 बच्चे नीतू, मेनका ध्रुव और ललित के बेटे शिवम की लाशें भी चुन्नी के सहारे जाल से लटकी हुई थीं. सभी लाशें प्रथम तल पर थीं. यह पूरा परिवार भोपाल सिंह भाटिया का था. भोपाल सिंह की मौत करीब 11 साल पहले हो गई थी.

प्रथम तल पर जाने वाली सीढ़ी के दोनों दरवाजे खुले थे. घर में कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. ही लूटपाट के कोई निशान थे. संभवतया देश भर में यह अपनी तरह की पहली घटना थी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के 11 लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. नारायणी देवी का एक बेटा दिनेश सिविल कौंट्रेक्टर है जो अपने परिवार के साथ राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में रहता है और उन की एक बेटी सुजाता पानीपत में रहती है. पुलिस ने इन दोनों भाईबहनों के पास भी सूचना भिजवा दी. सामूहिक आत्महत्या की देश की सब से बड़ी घटना मामले की जांच क्राइम ब्रांच ने शुरू कर दी. ज्योंज्यों तफ्तीश आगे बढ़ी मामला साफ होता गया. शुरू में हत्या और सामूहिक आत्महत्या, दोनों एंगल से जांच शुरू की गई.

भाटिया परिवार के बचे सदस्यों ने यह हत्या का मामला बताया. भोपाल सिंह की बेटी सुजाता ने कहा कि उन का परिवार आत्महत्या नहीं कर सकता. उन की योजनाबद्ध तरीके से किसी ने हत्या की है. परिवार धार्मिक जरूर था पर अंधविश्वासी नहीं था. पुलिस की जांच में 11 लोगों की मौत का खुलासा हुआ तो अंधविश्वास की एक ऐसी खौफनाक कहानी सामने आई जिसे सुन कर हर कोई दंग रह गया. अंधविश्वास के दलदल में फंस कर समूचा परिवार मौत के मुंह में समा गया. अंधविश्वास से जुड़ी यह विरल घटना थी, जिसे जान कर हर कोई हैरान और सन्न रह गया. टीवी चैनलों पर दिनभर भाटिया परिवार की मौत की सनसनीखेज खबरें प्रसारित होने लगीं.

अंधविश्वास की इस घटना ने तमाम वैज्ञानिक और शैक्षिक तरक्की को अंगूठा दिखा दिया. इस घटना ने समाज के उस अंधकार को उजागर किया, जिस के भीतर सदियों से डूबा यह देश परमात्मा, आत्मा, स्वर्ग, नरक, मुक्ति और मोक्ष को तलाशता रहा है. पुलिस जांच में सामने आया कि घर की मुखिया जिन नारायणी देवी की लाश फर्श पर पड़ी मिली, उन्हें गला घोंट कर मारा गया था. बाकी सभी के शव जाल से लटके मिले. उन की आंखों पर पट्टी बंधी थी, मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था. हाथ बंधे हुए थे.

पुलिस को मकान से जो डायरी मिली उस से पता चला कि यह सब मौतें अंधविश्वास की वजह से हुई थीं. डायरी में लिखी बातों से पता लगा कि ललित पिता के अलावा परिवार से जुड़े 5 अन्य सदस्यों की आत्मा को भी मोक्ष दिलाना चाहता था. डायरी में 9 जून को लिखा था, ‘अभी 7 आत्माएं मेरे साथ भटक रही हैं. क्रिया में सुधार करोगे तो गति बढ़ेगी. मैं इस चीज के लिए भटक रहा हूं. ऐसे ही सज्जन सिंह, हीरा, दयानंद, कर्मानंद, राहुल, गंगा और जमुना देवी मेरे सहयोगी बने हुए हैं.’

ललित ने जिन लोगों का जिक्र किया है उन में सज्जन सिंह ललित का ससुर यानी उस की पत्नी टीना का पिता, हीरा प्रतिभा का पति, दयानंद और गंगा देवी ललित की बहन सुजाता के ससुराल पक्ष के लोग थे, जो कुछ समय पहले मरे थे. संयुक्त आयुक्त क्राइम ब्रांच आलोक कुमार के मुताबिक तफ्तीश में जितने भी सबूत मिले, उस से साफ हो गया कि परिवार के सभी सदस्यों ने अंधविश्वास के चलते सामूहिक आत्महत्या की थी. ऐसा करने के लिए पूरे परिवार को ललित ने मजबूर किया था.

शुरू में इन लोगों की हत्या का संदेह जताया गया पर बाद में सबूतों और पूछताछ के आधार पर एक ऐसे परिवार की कहानी सामने आई, जो अंधविश्वास के ऐसे खौफनाक अंधकार में फंसा हुआ था कि किसी में विवेक नाम की जरा भी शक्ति नहीं बची थी. अंधविश्वास के दलदल में फंसे इस परिवार की भयावह हकीकत जान कर हर कोई सन्न रह गया. अंधविश्वास का अंधकूप तलाशी के दौरान पुलिस को छानबीन में घर से कई डायरियां मिलीं, इन डायरियों में परिवार के सदस्यों की इन मौतों की पूरी पटकथा लिखी थी. पुलिस ने कडि़यां जोड़ीं तो इस परिवार द्वारा मृत पिता भोपाल सिंह कीआत्माके आदेश परपरमात्मासे मिल कर वापस लौट आने का झूठा भ्रम फैलाया गया था.

भाटिया परिवार के मझले बेटे ललित के सिर में कुछ साल पहले चोट लगी थी. जिस की वजह से वह बोल नहीं पाता था. चोट से उस के दिमाग पर बुरा असर पड़ा था. उस का 3 साल तक इलाज चला. इस के बाद वह थोड़ाथोड़ा बोलने लगा था. इसे वह चमत्कार मानता था. ललित ने दावा करना शुरू कर दिया था कि उस पर उस के पिता भोपाल सिंह की आत्मा आती है और वह परिवार को सुखी रखने और दुख दूर करने के उपाय बताती है. बाद में उस ने डायरी लिखनी शुरू की जिस में धार्मिक आदेशात्मक बातें लिखता था

पुलिस के अनुसार ललित ने अंधविश्वासी क्रियाएं जुलाई, 2007 से शुरू कीं. ललित पूजापाठ से परिवार की समस्याएं दूर करता था. पड़ोसी बताते हैं कि इस काम में ललित की पत्नी टीना भी मदद करती थी. वह पूरी धार्मिक हो गई थी. भाटिया परिवार हदे से परे तक धार्मिक प्रवृत्ति का था और पूजापाठ में डूबा रहता था. साथ ही वह घोर अंधविश्वासी भी था. पूरा परिवार सुबह, दोपहर और शाम यानी 3 टाइम पूजापाठ करता था. क्राइम ब्रांच को 5 जून, 2013 से 30 जून, 2018 तक की तारीखों में लिखी 11 डायरियां मिलीं

इन डायरियों में अलगअलग तरह की लिखावट थी. ज्यादातर लिखावट प्रियंका की थी. ललित पर जब पिता का साया आता था और वह जो बोलता था उसे प्रियंका ही नोट करती थी. भाटिया परिवार को भरोसा था कि दिवंगत पिता की आत्मा परिवार की मदद कर रही है. यह विश्वास इसलिए बढ़ा क्योंकि घर के बाहर दोनों भाइयों की 2 दुकानें अच्छी चल रही थीं. भुवनेश की बेटी मेनका भी स्कूल में टौपर बच्चों में से थी. भुवनेश की किराने की दुकान थी और ललित की प्लाईवुड की. भाइयों के बच्चे भी अच्छे नंबरों से पास होते थे. इन के अलावा ललित की भांजी प्रियंका को मांगलिक बताया गया था. इस के बावजूद उस का रिश्ता तय हो गया था. 17 जून, 2018 को ही प्रियंका की सगाई नोएडा के एक इंजीनियर लड़के से तय हो गई थी और परिवार ने सगाई का कार्यक्रम बड़ी खुशीखुशी किया था.

इस से पहले ललित ने प्रियंका का रिश्ता होने पर उसे मांगलिक मान कर घर में हवनपूजा की थी. जिस में उस ने दावा किया था कि उस के पिता की आत्मा भी मौजूद है. प्रियंका के मांगलिक होने पर ललित ने उज्जैन जा कर भी पूजापाठ कराया था. ललित तंत्रमंत्र क्रियाएं भी कराता रहता था. जांच के दौरान घर की बाहरी दीवार पर 11 पाइप लगे मिले. यह पाइप भी ललित ने ही लगवाए थे. इन की वहां जरूरत भी नहीं थी. पुलिस को यह पता नहीं लगा कि ललित ने ये पाइप किसलिए लगवाए थे. पढ़ेलिखे बेवकूफ पूरा भाटिया परिवार पढ़ालिखा था. 32 साल की प्रियंका ने एमबीए किया था. वह दिल्ली में ही पढ़ीलिखी थी. इस समय प्रियंका नोएडा की सीपीएम ग्लोबल कंपनी में नौकरी करती थी. इस से पहले वह एक नामी सौफ्टवेयर कंपनी में थी

प्रियंका की भी धर्म, ज्योतिष और धर्मगुरुओं के प्रति रुचि थी. वह सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती थी. जन्म के 2 साल बाद ही प्रियंका के पिता हीरा की मृत्यु हो गई थी. इस के बाद वह अपनी मां के साथ राजस्थान से कर संतनगर, बुराड़ी में रहने लगी थी. प्रियंका की मां प्रतिभा घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी. प्रियंका का रिश्ता हो जाने पर ललित ने अपने पिता और भगवान का शुक्रिया करने के लिए 24 से 30 जून तक 7 दिन की पूजा साधना क्रिया का प्रोग्राम तय किया था, जिस में पूरे परिवार को शामिल होना था. इस बात की तस्दीक डायरी में लिखी बातों से होती है

डायरी में एक सप्ताह पहले लिखा गया था कि इस पूजा का उद्देश्य भगवान को धन्यवाद देना था, क्योंकि पूरे परिवार का मानना था कि भगवान उन पर आशीर्वाद बनाए हुए हैं. कुछ वर्षों के दौरान ललित अपने परिवार को यह समझाने में सफल हो गया था कि पिता की आत्मा की वजह से उन का परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है. डायरी में परिवार के सदस्यों की मौत का पूरा बयौरा लिखा गया था. डायरी में एक जगह लिखा था, ‘सभी सदस्य मोक्ष प्राप्त करने के बाद भगवान से मिल कर वापस धरती पर आ जाएंगे. इस के लिए तैयार रहना.’  आगे लिखा था, ‘बड़ पूजा क्रिया की जाएगी. यानी बड़ वृक्ष के नीचे लटकी जड़ों की तरह सब को लटकने की क्रिया करनी होगी. यह पूजा पूरी लगन और श्रद्धा से लगातार 7 दिन करनी है. पूजा के समय अगर कोई घर में आ जाए तो पूजा अगले दिन से शुरू होगी.’

एक जगह लिखा था, ‘9 सदस्यों के लिए भगवान का रास्ता जाल (घर में लगा लोहे का जाल) से शुरू होता है. बेबी (प्रतिभा) मंदिर के निकट स्टूल पर खड़ी होगी. 10 बजे भोजन का और्डर किया जाएगा. मां रोटी खिलाएंगी. क्रिया 1 बजे होगी. गीला कपड़ा मुंह में रखना होगा. टेप से हाथों को बांधना होगा और कानों को रूई से बंद करना होगा.’ आगे लिखा था, ‘पट्टियां अच्छे से बांधनी हैं. उस समय शून्य के अलावा कुछ भी नहीं दिखना चाहिए.’ यह भी लिखा था, ‘एक कप पानी का रखा जाएगा और जब पानी का रंग बदल जाएगा तब समझना कि पिता की आत्मा प्रकट हो चुकी है और वही आत्मा सब को बचा लेगी.’

ललित ने एक जगह लिखा था, ‘झूठ की जिंदगी से दूर रहना होगा. ऐसा करने से तुम्हारा जीवन आगे नहीं बढ़ेगा. मैं चाहता हूं कि आप ऐसा काम करो जिस से आप को कम मेहनत करनी पड़े और खुशहाल जिंदगी जी सको.’ हवाई खयालों में जीता था ललित 28 जून को डायरी में लिखी गई बात को पढ़ने से साफ हो जाता है कि परिवार का मरने का कोई इरादा नहीं था क्योंकि इस में अगले महीने तक की प्लानिंग लिखी थी. डायरी में लिखा था, ‘भूपी (भुवनेश) बैंक से पैसा निकालेगा. इस पैसे को दुकान में लगाया जाएगा. घर में इस पैसे का इस्तेमाल कदापि नहीं होगा.’

पुलिस ने दरवाजे के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो 30 जून की सुबह प्रतिभा और प्रियंका मौर्निंग वाक पर जाती दिखीं. भुवनेश सुबह 5:40 बजे मंदिर गया और 5:51 बजे घर वापस गया. 10 बजे ललित अपनी दुकान पर गया. दोपहर में उस ने मोबाइल की एक दुकान से अपना फोन रिचार्ज करवाया. रात 10 बजे सीसीटीवी में घर की 2 महिलाएं स्टूल ले कर आती दिखीं. कुछ देर बाद बच्चे नीचे दुकान से तार ले जाते दिखे. 10:40 बजे डिलीवरी बौय खाना दे कर गया. खाने में केवल 20 रोटियां थीं. मुंह पर चिपकाने के लिए टेप और अलगअलग रंग की चुन्नियां खरीदी गई थीं. इस से स्पष्ट है कि यह सब ललित के दिमागी पागलपन की निर्धारित योजना के तहत था.

वास्तव में ललित मनोरोगी था. परिवार के किसी सदस्य को इस बात का पता नहीं चला. परिवार यही सोचता था कि जब ललित पर पिता की आत्मा सवार हो जाती है उस समय ललित के मुंह से पिता भोपाल की भाषा शैली में ही आवाज निकलती है. उस समय ललित जो कुछ बोलता था, पूरा परिवार ध्यान से सुन कर उस पर अमल करता था. डायरी में लिखे गए आदेशों के अनुसार 30 जून, 2018 की रात को पूरे परिवार ने 11 बजे के बाद मोक्ष की क्रिया शुरू की. रात को 10  बजे के करीब बाहर से रोटी मंगाई गई. परिवार के पास एक कुत्ता था, जिसे छत के ऊपर जाल में बांध दिया गया और फिर परिवार के सभी 11 सदस्य फंदे बना कर लटक गए. घर का दरवाजा इसलिए खुला रखा गया ताकिपिता की आत्मादरवाजे से प्रवेश कर सके.

ललित ने घर वालों को बताया था कि मोक्ष के लिए उन्हें 7 दिन तक मोक्ष क्रिया करनी होगी और जब यह क्रिया पूरी कर लेंगे तब पिता की आत्मा ही उन्हें बचाएगी. ईश्वर और पिता से मिलने के बाद वे वापस लौट आएंगे. भाटिया परिवार के सदस्य मरना नहीं चाहते थे और उन्हें जरा भी मालूम नहीं था कि ईश्वर से मिलने के लिए वे जो क्रिया कर रहे हैं, उस से वे सचमुच मौत को गले लगाने जा रहे हैं. उन्हें पूरा भरोसा था कि उन्हें पिताजी बचा लेंगे.

डायरी में लिखे मौत के रहस्य डायरी में फंदे पर कैसे लटकना है, इस का तरीका भी लिखा था. ‘7 दिन लगातार पूजा करनी है. थोड़ी श्रद्धा और लगन से. बेबी खड़ी नहीं हो सकतीं तो वह अलग कमरे में लेट सकती हैं. पट्टियां अच्छे से बांधनी हैं. हाथ प्रार्थना की मुद्रा में होने चाहिए.  गले में सूती चुन्नी या साड़ी का ही प्रयोग करना है.’ आगे लिखा था, ‘सब की सोच एक जैसी हो. पहले से ज्यादा दृढ़. स्नान की जरूरत नहीं है, मुंहहाथ धो कर ही काम चल सकता है. इस से तुम्हारे आगे के काम होने शुरू होंगे. ढीलापन और अविश्वास नुकसानदायक होते हैं. श्रद्धा में तालमेल और आपसी सहयोग जरूरी होता है. मंगल, शनि, वीर, इतवार को फिर आऊंगा. मध्यम रोशनी का प्रयोग करना है.

हाथों की पट्टी बचेगी. उसे डबल कर के आंखों पर बांधना है. मुंह की पट्टी को भी रूमाल बांध कर डबल कर लेनी है. जितनी दृढ़ता और श्रद्धा दिखाओगे, उतना ही उचित फल मिलेगा. जिस दिन यह प्रयोग करो उस दिन फोन कम से कम प्रयोग करना.’ एक पेज पर लिखा था, ‘धरती कांपे या आसमान हिले लेकिन तुम घबराना मत. मैं आऊंगा और सब को बचा लूंगा.’मनोचिकित्सकों का मानना है कि असल में ललित मनोरोगी था. उस का रोग धार्मिक मान्यता और अंधविश्वास से जुड़ा हुआ था. ऐसे में पीडि़त व्यक्ति को किसी अदृश्य शक्ति के वश में होने का अहसास होता है और अपने अस्तित्व को कुछ देर के लिए भूल जाता है. मनोचिकत्सक इसेशेयर्ड  साइकोथिक डिसऔर्डरकहते हैं. पूरा परिवार इस बीमारी का शिकार था. ललित जो भी बात बताता था, पूरा परिवार उसे उस का आदेश मानता था.

आज पूरे देश में जिस तरह के धार्मिक अंधविश्वास का माहौल बना हुआ है, उसे देखते हुए संतनगर की यह घटना कोई ताज्जुब वाली बात नहीं है. क्योंकि सारा देश ही अंधविश्वास के जंजाल में बुरी तरह उलझा नजर आता है. मौजूदा समय में लोगों में समस्याओं के समाधान के लिए पूजापाठ, हवनयज्ञ, तंत्रमंत्र, टोनेटोटकों का चलन चरम पर है. कदमकदम पर परेशानियां दूर करने वाले पंडेपुजारी, ज्योतिषी, तांत्रिक, साधु या गुरु अंधविश्वास का डेरा जमाए बैठे हैं. हर नुक्कड़ पर समस्याओं का समाधान करने का दावा करने वाले तथाकथित मार्गदर्शक बैठे हैं जो बदले में दानदक्षिणा, चढ़ावा मांगते हैं.

धर्मगुरु, पंडेपुजारी अंधविश्वास के अंधेरे को बढ़ावा दे रहे हैं. मीडिया ऐसे पाखंडियों का प्रचार करने में लगा हुआ है. भाग्यवाद, लोकपरलोक, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, मोक्ष, पूर्वजन्म के कर्मों का फल, 33 करोड़ देवीदेवता, 84 लाख योनियां, मोहमाया त्याग कर ईश्वर की शरण में चले जाने जैसी मूर्खता की बातें इंसान को बरगलाने, मानसिक रूप से कमजोर करने के लिए काफी हैं. अंधविश्वास का जाल अब गांवों के दायरे से निकल कर शहरों, महानगरों में शिक्षित युवाओं और विदेशों तक पहुंच चुका है. आज लोग विज्ञान से ज्यादा टोनेटोटकों, अंधविश्वास और तंत्रमंत्र में अपनी परेशानियों का समाधान तलाश रहे हैं. अंधविश्वास का यह कारोबार खूब फलफूल रहा है.

11 लोगों की मौत की घटना किसी दूरदराज के इलाके में नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में घटित हुई जो शिक्षा, विज्ञान, सामाजिक सभ्यता और तथाकथित आध्यात्मिकता प्रगति संबंधी नीति निर्माण का केंद्र बिंदु है. यहां सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक विकास के बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं. ज्योंज्यों शिक्षा का विस्तार और वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रसार हो रहा है, लोग उतने ही अंधविश्वास की गर्त में धंसते जा रहे हैं. अंधविश्वास तार्किक, उदार और स्वतंत्र विचारों पर हावी है. वैज्ञानिक और तार्किक विचारों की बात करने वालों पर हमले किए जाते हैं. ऐसे में संतनगर की घटना समूचे समाज के माथे पर कलंक है. यह घटना अंधविश्वास की इंतहा है.

                           

एक टुकड़ा सुख

संस्था में सुनील से मुलाकात के होने के बाद मुक्ता के मन में संस्था से निकल कर अपनी लाइफ को अपनी तरह से जीने की उम्मीद जागी थी. सुनील ने भी उस की सोच को नए पंख दे दिए थे. लेकिन यह पंख भी मुक्ता को एक टुकड़ा सुख से ज्यादा कुछ न दे सके.

आज सुबह से ही न जाने क्यों मेरा मन किसी काम में नहीं लग रहा था. किसी अनहोनी आशंका से मेरा मन घिरा हुआ था. मैं चाहते हुए भी स्वयं को संयत नहीं रख पा रहा था. जल्दीजल्दी नाश्ता किया और औफिस के लिए निकल पड़ा. मेरी पत्नी मानसी ने एकदो बार पूछा भी परंतु मैं उसे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया. बस, अनमने मन से कहा, ”नहीं, बस यूं ही, औफिस में थोड़ा ज्यादा काम है.’’ कह कर मैं ने बात टाल दी. अभी मैं अपने घर के दरवाजे तक भी नहीं पहुंचा था कि पीछे से मानसी ने आवाज दे कर याद दिलाया कि आप कार की चाबी और टिफिन बौक्स तो घर पर ही भूल गए हैं. वह मेरे पास आ कर बोली, ”तबीयत ठीक नहीं है तो मत जाओ.’’ 

जवाब में मैं ने कुछ नहीं कहा और बेमन से औफिस चला गया. अभी मैं औफिस में अपने कामों को देख ही रहा था कि याद आया आज तो मैं ने अपनी केबिन में रखे छोटे से मंदिर की दीयाबाती भी नहीं की. क्या हो गया है मुझे आज! मैं सोचने लगा. तब तक औफिस का चपरासी टेबल पर चाय और पानी का गिलास रख कर जाने लगा तो मैं ने उस से कहा, ”मिसेज शर्मा को भेज देना.’’ फिर कुछ सोच कर बोला, ”अच्छा रहने दो, मैं बाद में बुला लूंगा.’’ वह मेरा मुंह देखने लगा.

हमारे औफिस में मोबाइल सुनने पर पाबंदी थी, इसलिए सभी स्टाफ अपना मोबाइल साइलेंट मोड पर रखते थे. मैं ने भी अपना फोन वाइब्रेट मोड पर रख कर सामने रख दिया. तभी फोन धीरे से बज उठा. किसी अंजान नंबर से फोन था. मैं ने जैसे ही रिसीव किया तो दूसरी तरफ से किसी महिला की आवाज आई, ”नमस्ते सर, क्या मैं सुनीलजी से बात कर सकती हूं?’’

जी, बोल रहा हूं… आप कौन?’’

मैं देहरादून से बोल रही हूं बसेरासे.’’ 

मैं चौंक गया. बसेरावृद्ध असहाय लोगों का एक आश्रम था, जिसे एक एनजीओ चलाता था. 

जी, बात यह है कि आप को प्रशांतजी याद कर रहे थे… आज आप यहां आ सकते हैं क्या?’’

क्यों, क्या बात हो गई? सब ठीक तो है न?’’ मैं ने चिंतित होते हुए पूछा.

सब कुछ तो ठीक नहीं है, बस आप यहां आ जाइए.’’

ठीक है, मैं एकदो दिन में आता हूं,’’ मैं ने कहा.

क्या आप आज नहीं आ सकते?’’ उस के स्वर में थोड़ी कंपन थी. शायद थोड़ा घबराई हुई भी थी.

अच्छा, मैं कोशिश करता हूं.’’ कह कर मैं ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

10 बज चुके थे और मैं कितनी भी जल्दी करूं, 12 बजे से पहले की बस तो पकड़ ही नहीं सकता था. मैं ने जल्दीजल्दी अपना सारा काम मिसेज शर्मा को समझा दिया. उधर पत्नी मानसी को भी मैं ने जाने की तैयारी के लिए कह दिया. मुझे इसी भागदौड़ में बस मिल गई. मैं ने जानबूझ कर पीछे की सीट ली ताकि आगे के शोर से बच सकूं. बस चलते ही बाहर का शोर तो कम हो गया, पर अपने भीतर के शोर का क्या करता, वह तो देहरादून और बसेराकी यादों में उलझा रहा. मैं यादों को जितना दबाता, वह उतना ही उभर कर सामने आ जातीं और उन्हीं यादों में एक याद मुक्ता की भी थी.

 

2 साल पहले मुझे मेरी कंपनी ने उत्तराखंड में सर्वे के लिए भेजा था, ताकि हम अपना प्रोडक्ट ठीक से बाजार में उतार सकें. हमारी कंपनी हौट वाटर बोटल यानी गर्म पानी की रबर की बोतलें बनाती थी और उत्तराखंड ही ऐसा राज्य था, जहां इस का प्रचारप्रसार हो सकता था. मैं ने देहरादून को अपना स्टेशन बनाया और सर्वे करता रहा. कभी मसूरी, कभी नैनीताल और कभी ऋषिकेश में. मैं अपने सर्वे का दायरा बढ़ाता रहा. बीचबीच में जब भी समय मिलता, मैं आश्रमों और मंदिरों में जाने लगा. राजपुर रोड पर कई आश्रम थे और कहीं न कहीं कोई प्रोग्राम चलता ही रहता था.

एक दिन मैं यूं ही घूम रहा था कि मेरी नजर एक बोर्ड पर जा पड़ी. जिस पर लिखा था कि बसेरा नाम की संस्था भागवत सप्ताह मनाने जा रही है और योगदान की सारी राशि वृद्धाश्रम के लिए उपयोग की जाएगी. उन दोनों ही बातों ने मुझ में जिज्ञासा पैदा की. पता पढ़ कर मैं अगले दिन सुबह ही बसेरापहुंच गया. उस दिन रविवार था. जैसे ही मैं हाल में पहुंचा, लगभग सारी सीटें भर चुकी थीं. वह एक छोटा सा हाल था, जिस में 30-35 व्यक्तियों के बैठने की व्यवस्था थी. मैं ने उड़ती हुई नजर हाल में दौड़ाई और पीछे की एक कुरसी पर बैठ गया.

सामने की तरफ एक कोने में कुछ देवीदेवताओं की फोटो के सामने एक दीया जल रहा था और एक वृद्ध कुरसी पर बैठे किसी किताब के पन्ने पलट रहे थे. दूसरी तरफ एक मंडली भजन गा रही थी. भजन समाप्त होते ही महाराजजी ने धीमे मगर मधुर स्वर से भूमिका बांधनी शुरू की और भागवत का महत्त्व समझाने लगे. तभी एक 28-30 साल की महिला ने मेरे पास आ कर बड़ी विनम्रता से जूते बाहर उतारने के लिए निवेदन किया. मैं ने इस बात को पहले नहीं महसूस किया कि सभी के जूतेचप्पल हाल के बाहर रखे थे. मैं सब से पीछे बैठा था, इसलिए किसी का ध्यान मेरी तरफ नहीं गया. मेरे लिए जूते उतार कर बाहर रखना या जूते पहन कर बाहर जाना, सब का ध्यान आकर्षित करने जैसा था. 

मैं थोड़ा हिचकिचाने लगा कि अब क्या करूं. वह मेरी ही पंक्ति में कोने में बैठी थी. उस ने मेरी इस हिचकिचाहट को भांप लिया और इशारा किया कि चुपचाप जूते उतार कर अपनी कुरसी के नीचे रख दूं. उस दिन की भागवत की क्लास समाप्त होने पर शांति पाठ हुआ और सभी लोग महाराज के पीछे चले गए. वह जैसे ही अपने स्थान से उठी, मैं ने हाथ जोड़ कर उन्हें धन्यवाद दिया और जूते बाहर ले जा कर पहनने लगा. 

हाल में 2 व्हील चेयर पर वृद्ध से व्यक्ति बैठे थे. वह उठ कर उन में से एक को धीरेधीरे बाहर ले जाने लगी. मैं अपने स्थान पर खड़ा हो गया और धीरे से कहा, ”मैं कुछ मदद करूं?’’ तब तक वह दूसरी व्हील चेयर भी बाहर ले आई और हाल का दरवाजा बाहर से बंद करती हुई बोली, ”आप को कोई परेशानी न हो तो एक व्हील चेयर के साथ मेरे पीछेपीछे आ जाइए.’’  मैं ने अपने जीवन में कभी व्हील चेयर को हाथ तक नहीं लगाया था और किसी की मदद करने में बड़ा सुख महसूस हो रहा था. भीतर से कोई आवाज ऐसी भी आ रही थी कि कोई ऐसा मोहताज कभी न बने. उन में से एक को पार्क के पास छोड़ कर और दूसरे व्यक्ति को पास के ही एक कमरे में छोड़ कर वह मेरे पास आ गई.

आप पहली बार आए हैं यहां?’’ उस ने पूछा. 

मैं वहां का वातावरण देख कर इतना भावुक हो गया था कि मुंह से कोई शब्द नहीं निकला, सिर्फ सिर नीचा कर के हांकी. तब तक सामने से 2 व्यक्ति आ रहे थे. उस ने हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया. मेरे हाथ भी खुदबखुद जुड़ गए. वह उन में से एक व्यक्ति की तरफ देखते हुए बोली, ”ये पहली बार आए हैं यहां, औफिस के बारे में पूछ रहे थे.’’ उन्होंने मुसकरा कर मेरा अभिनंदन किया और गेट के पास एक कमरे की तरफ इशारा कर के कहा कि आप वहां बैठिए, मैं थोड़ी देर में आता हूं. 

तब तक वह बोली, ”चलिए, आप को वहां तक ले चलती हूं. जिन से आप मिले थे, वह यहां के ट्रस्टी हैं.’’  बातों का सिलसिला जारी रखते हुए मैं ने अपना परिचय दिया, ”मेरा नाम सुनील है, अभी 3 महीने पहले ही यहां आया हूं. परसों आप की संस्था का बोर्ड पढ़ा था. सोचा एक बार देख लूं. किसी भी आश्रम में आने का मेरा यह पहला अनुभव है और वह भी ऐसी संस्था जहां ज्यादातर शायद वृद्ध ही रहते हैं. आप यहां के बारे में कुछ बताइए.’’

उस ने मुझे बताना शुरू किया, ”बसेरा नाम का यह ट्रस्ट केवल वृद्ध व्यक्तियों की सेवा करता है. सीनियर सिटिजन होम भी इसे कह सकते हैं. प्रशांतजी, जिन से आप अभी मिले थे, यहां के प्रधान ट्रस्टी हैं. उन्हीं का बनाया हुआ यह ट्रस्ट है. कुछ तो यहां अपनी खुशी से रह रहे हैं और कुछ मजबूरी से. समय बिताने के लिए यहां एक छोटा सा मंदिर, पार्क, सत्संग हाल और एक पुस्तकालय है, जिन की जैसी रुचि हो वहां चला जाता है. और एक किचन भी है जहां सभी पहुंच जाते हैं और जो नहीं पहुंच सकते, उन के कमरों तक भोजन, नाश्ता वगैरह पहुंचाया जाता है.’’

और इन सब के लिए धन कहां से आता है, मेरा मतलब खर्चे भी बहुत होते होंगे इतनी बड़ी संस्था को चलाने के लिए.’’

हां, वह तो है… यह सब तो मैनेजमेंट ही जाने.’’ कह कर उस ने सामने के कमरे की तरफ इशारा कर के इंतजार करने के कहा.

मैं उन के कमरे के बाहर बरामदे में बैठ गया. थोड़ी देर में प्रशांतजी आए, मैं ने उन्हें अपना परिचय दिया और बातोंबातों में कुछ अपनी गर्म पानी की बोतलें भेंट करने का आश्वासन दिया. वह लगभग 68 वर्ष के सौम्य और शालीन नेचर के व्यक्ति थे. लगभग 20 वर्ष पहले उन्होंने यह संस्था शुरू की थी. समय बीतता गया और लोग जुड़ते गए. समयसमय पर सत्संग, भजन, प्रवचन, होलीदिवाली मेलों इत्यादि का आयोजन करते रहते और इकट्ठा हुए धन से संस्था का काम करते रहते.

मेरे जीवन का किसी भी संस्था में जाने का यह पहला अनुभव था. मैं बहुत ही नपेतुले शब्दों का प्रयोग करता रहा और मेरे इसी व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उन्होंने मुझे यहां आने का एक खुला आमंत्रण दे दिया. यहां पर 3-4 दंपतियों के अलावा 12 पुरुष और 8 महिलाएं भी रहते थे. मैं ने उस संस्था में जाना शुरू कर दिया और एकदम पीछे की कुरसी पर जा बैठता. कुछ व्यक्ति तो बैठेबैठे ही सो जाते और कुछ ध्यान से भागवत कथा सुनते रहते. मेरी मिलीजुली प्रक्रिया थी. कभी मन लगता, कभी इधरउधर देखने लगता. मैं यहां इसलिए आ जाता था कि मेरे पास औफिस के बाद और कोई काम नहीं था, दूसरा प्रसाद इतना मिल जाता कि रात को खाना खाने की जरूरत महसूस नहीं होती थी. 

शायद इस के अलावा भी एक और बात थी, वह थी उस 28-30 वर्षीय महिला का आकर्षक व्यक्तित्त्व. न जाने उस में ऐसा क्या था कि मेरी नजरें उसी पर अटक जातीं. एक दिन सत्संग के बाद सारे पंखे और लाइटें बंद कर के वह हाल से बाहर निकल रही थी तो मैं ने उस से पूछा, ”यहां कोई कैंटीन भी है, जहां चायनाश्ता मिलता हो.’’

जी,’’ वह थोड़ा मुसकरा कर बोली, ”लाइब्रेरी के पीछे किचन है, आप चाहें तो पेंमेंट दे कर ले सकते हैं. आइए, मैं आप को दिखा देती हूं.’’ कह कर वह मेरे साथ चलने लगी.

आप यहीं रहती हैं क्या?’’ मैं ने पूछा.

जी,’’ कह कर वह अपनी चुन्नी सिर पर लेती हुई मेरी ओर देखने लगी. 

बातों का सिलसिला जारी रखते हुए मैं ने कहा, ”कब से?’’

पता नहीं शायद 7-8 साल तो हो गए होंगे, मेरा नाम मुक्ता है.’’

उस ने फिर से एक बार मुझे मुसकरा कर देखते हुए कहा, ”आप इधर से सामने की तरफ चले जाइए, वहां लिखा हुआ है. अच्छा, अब मैं चलती हूं, मेरा लाइब्रेरी का समय हो गया है.’’

वहां पढ़ती हैं आप?’’

ऐसा ही कुछ समझ लीजिए. मैं यहां की लाइब्रेरी संभालती हूं… जीने का कोई तो बहाना चाहिए…’’ कह कर वह मुंह फेर कर वहां से चली गई. 

वह नम्र और संयत स्वर में बात करती थी. एकदम नपातुला. कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो आंखों को बांध लेते हैं. वह भी ऐसी ही थी. परंतु उस के आखिरी वाक्य ने मेरे भीतर कई प्रश्न खड़े कर दिए. मैं रातभर उसी के बारे में सोचता रहा. अगले दिन मेरा आश्रम में जाना तय था. मैं सब से पहले वहां पहुंच गया और पीछे बैठ गया. धीरेधीरे लोग आते रहे, कुछ मेरी तरह बाहर से तो कुछ यहीं के. कुछ जानेपहचाने चेहरों ने मेरा मुसकरा कर स्वागत किया. मेरी नजरें जिसे तलाश रही थीं, वह वहां नहीं थी. 

इतने में एक व्हील चेयर के साथ वह आई. व्हील चेयर को एक कोने में खड़ा कर के टेबल पर रखी फोटो के सामने एक दीया और अगरबत्ती जला कर पीछे बैठ गई. मैं उसी को देखता रहा. उस ने भी चोर निगाहों से मुझे देखा और नजरें फेर लीं. सप्ताह के अंत तक यह भी स्पष्ट हो गया कि उसे भी मेरा इंतजार रहता है. बातचीत हम दोनों के बीच इतनी जरूरी नहीं थी जितना की आंखों का भाव. आखिरी दिन प्रसाद भंडारे में भी मैं ने अंत तक अपना योगदान दिया. यहां तक कि 10-12 सहायकों में मुझे भी शामिल कर लिया गया. मुझे जब भी समय मिलता, मैं किसी न किसी काम में शामिल कर लिया जाता. मुक्ता से भी मेरी मुलाकात लगभग हर रोज हो जाती. शायद यह भी झूठ नहीं होगा कि मैं मुक्ता से मिलने के बहाने इस संस्था से जुड़ता चला गया.

हमारे छोटे वाक्यों में बातचीत का सिलसिला चलता रहा. वह इस संस्था में काम न करती होती तो शायद मैं उसे कहीं घूमने के लिए कह देता. मुझे यहां की सीमाओं और मर्यादाओं ने बांध रखा था. एक दिन सुबह रविवार को मैं थोड़ा जल्दी पहुंच गया. पहुंचने का तो बहाना था. मैं ने सामने से मुक्ता को आते देखा. बजाय पार्क में जाने के, जहां पहले से ही कई बुजुर्ग व्यक्ति बैठे धूप का आनंद ले रहे थे, मैं लाइब्रेरी में चला गया. थोड़ी देर में वह इशारे से पूछने लगी कि मैं औफिस या पार्क में क्यों नहीं गया. यह मेरा सामान्य नियम था कि मैं औफिस से प्रशांतजी को मिल कर कुछ समय यहां सेवा करता रहता.

वो प्रशांतजी तो 11 बजे से पहले आएंगे नहीं, मुझे अपनी गाड़ी सर्विस करानी है तो सोचा पहले यहीं आ जाता हूं.’’ कह कर मैं ने मैगजीन स्टैंड से कुछ पत्रिकाएं उठा लीं और एक कोने में बैठ गया. वह इधरइधर पड़ी किताबें और अखबार समेटती रही.

एक बात पूछनी थी आप से?’’ मैं ने धीमे से कहा. वह मेरे पास आ कर बैठ गई और बहाने से एक रजिस्टर सामने रख लिया, जैसे वह भी मुझ से बात करने का कोई अवसर ढूंढ़ रही हो.

उस दिन आप ने कहा था कि जीने का कोई तो बहाना होना चाहिए, यह तो इतनी शांत जगह है फिर आप की शायद कोई जिम्मेदारियां भी नहीं लगतीं, यहां भी बहाने ढूंढने पड़ते हैं क्या?’’

वह मुझे ऐसे देखने लगी जैसे मैं ने कोई गलत बात पूछ ली हो. उस का चेहरा सफेद होने लगा. मुझे यहां आते लगभग 2 महीने बीत चुके थे पर मैं ने उस के चेहरे पर कभी कोई खुशी नहीं देखी. हमारे बीच एक सन्नाटा सा पसर गया. मुझे लगा कि या तो वह कुछ बताना नहीं चाहती थी या बताने के लिए शब्द ढूंढ रही थी. मैं ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ”माफ कीजिए, मैं कुछ ज्यादा ही बोल गया. कोई संकोच हो तो रहने दीजिए. मुझे तो यहां के तौरतरीके, बातचीत करने का ढंग भी नहीं आता.’’ कहतेकहते मैं ने अपनी लाचारी जताई और मैगजीन के पन्ने पलटने लगा.

मेरे पास बताने या छिपाने जैसी कोई बात नहीं है,’’ उस ने अपनी नजरें नीची कर लीं, ”अपने मम्मीपापा के साथ मैं काफी समय से यहां आती थी, लगभग हर छुट्टियों में. एक दिन पापा अचानक एक हादसे में चल बसे. न तो हमारे पास कोई जमापूंजी थी, न कोई अपना मकान. प्रशांतजी ने हमें हमारी हालत पर तरस खा कर यहां रहने की इजाजत दे दी. मम्मी भंडार घर में काम करने लगीं और मैं स्कूल जाने लगी.

”मेरी अभी इंटरमीडिएट की पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई कि मम्मी को कैंसर हो गया, न वह बच पाईं न मेरी पढ़ाई. मैं एकदम अकेली पड़ गई. कहां जाती. बस तब से यहीं पड़ी हूं. मेरा फिर हर चीज से मोह टूट गया. कुछ भी करने का मन नहीं करता…’’

तो क्या सारी जिंदगी यूं ही काट देंगी?’’

फिर कहां जाऊं, न कोई मेरी आमदनी है न कोई और ठिकाना, बस मजबूरी है. इतनी पढ़ीलिखी भी नहीं कि कोई मुझे काम दे देगा. और अकेली जवान लड़की. पापा को अपने परिवार के बारे में कुछ सोचना चाहिए था. कहीं कुछ तो जोड़ते.’’

कहतेकहते वह रुआंसी सी हो गई. मेरे पास कहने के लिए शब्द कम पड़ गए. मैं उस की तरफ देखता रहा. उस की आंखों में आंसू थे, जो मुझ से छिपा रही थी. घबरा कर मैं ने नजरें फेर लीं, हालात जैसे नजर आते हैं वैसे होते नहीं.

जिस का नसीब ही खोटा है वह क्या करे.’’ एक लंबी सांस भर कर उस ने कहा और वहां से चल दी. मैं भी बिना कुछ कहे वहां से उठ कर चला गया. दिन बीतते गए उन को तो बीतना ही था. मुक्ता मेरा अभिवादन अब मुसकरा कर करती. मैं कभीकभी चुपके से उस के लिए कोई मिठाई या कोई नियमित प्रयोग होने वाला कोई सामान देता रहता. कभीकभी वह भी छोटामोटा सामान मंगवाती रहती. मैं उस की मदद करना चाहता था. एक बार देर रात प्रशांतजी का फोन आया कि अचानक एक माताजी की तबीयत खराब हो गई है, उन को एम्स ले जाना है, वह स्वयं कहीं बाहर गए हुए थे. उन्होंने मुझ से निवेदन किया जो मैं मना नहीं कर सका. मेरे लिए उन वृद्ध माताजी को अस्पताल ले जाने का सौभाग्य तो था ही और उस से ज्यादा खुशी की बात यह थी कि मुक्ता को उन की सेवा में लगा दिया.

मैं ने उन दोनों को साथ ले जा कर इमरजेंसी में सारी औपचारिकताएं पूरी कर के भरती करा दिया. जब तक उन का चैकअप होता रहा, मुझे बाहर ही बैठना था, मुक्ता को उन माताजी के साथ रहना था. थोड़ी देर में मुक्ता भी बाहर आ कर मेरे पास बैठ गई. मैं ने सामने के कैफेटेरिया से 2 कप कौफी ली और उस के साथ बैठ गया. रात काफी हो चुकी थी. हमारे पास डाक्टर की रिपोर्ट का इंतजार करने के सिवाय और कोई रास्ता भी तो नहीं था. मुझे तो जैसे 

इसी अवसर की तलाश थी. मुक्ता के चेहरे पर मैं ने पहली बार खुशी देखी. कहने लगी, ”पिछले एक साल से मैं पहली बार बाहर निकली हूं.’’

आप के निकलने पर कोई पाबंदी है क्या?’’

”पाबंदी तो नहीं है पर जाऊं भी कहां? मेरा और है ही कौन? जो कोई दूर पास के रिश्तेनाते थे, उन्होंने भी मां के मरने के बाद किनारा कर लिया. शायद मैं कोई डिमांड ही न कर बैठूं… या शायद उन पर बोझ ही न बन बैठूं. यहां कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो साधनसंपन्न हैं, उन के मिलने वाले कभीकभी उन को मसूरी, देहरादून या ऋषिकेश घुमाने ले जाते हैं, वह मुझे भी साथ ले जाना चाहते थे, पर यहां से इजाजत नहीं मिली.’’

कह कर वह वहां से मेरा भी खाली कप ले कर उठ गई. शायद वह भरे गले से मुझ से और बातचीत करने से बचना चाहती थी. तब तक ड्यूटी डाक्टर ने आ कर बताया, ”कोई घबराने वाली बात नहीं है, थोड़ी गैस्ट्रिक प्राब्लम है, अब थोड़ा ठीक है, सुबह तक हम उन को यहां रखेंगे, आप चाहें तो उन्हें सुबह ले जा सकते हैं.’’

मैं मुक्ता की तरफ देखने लगा, वह मेरा इशारा समझ गई. वह इतनी नादान भी नहीं थी, जितना मैं समझता था. कहने लगी, ”आप चाहें तो इन्हें यहां भरती कर लीजिए, हम लोग तो वृद्धाश्रम से आए हैं इन को ले कर. एकदो दिन में उन का कोई न कोई रिश्तेदार भी आ जाएगा, आश्रम में इन की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है.’’

अस्पताल को भला इस में क्या परेशानी हो सकती थी, उन्होंने थोड़ी ही देर में उन को रूम में शिफ्ट कर दिया. मैं भी उन से इजाजत ले कर वहां से चला गया. मैं ने अगले 3 दिनों के लिए अपने औफिस से छुट्टी ले ली और दोपहर तक फिर से उन के रूम में पहुंच गया. माताजी मुझे देख कर बहुत खुश हुईं. बोली, ”बेटा, बहुतबहुत आशीर्वाद, कल रात तुम ने जो कुछ भी मेरे लिए किया, मैं हृदय से आभारी हूं. लोग अपनों के लिए इतना नहीं करते,’’ कहतेकहते उन की आवाज भर्रा गई.

तो क्या मैं पराया हूं. माताजी, जब एक रास्ता बंद हो जाता है तो कई और खुल जाते हैं. आप जब तक यहां हैं, मैं आप की सेवा में रहूंगा, आप चिंता मत कीजिए.’’ कह कर मैं सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गया. 

मुक्ता ने मुझे देखते ही कहा, ”माताजी काफी समय से आप को याद कर रही थीं, उन का कुछ सामान, कपड़े, दवाइयां वगैरह उन के कमरे से लाना है, आप चल सकेंगे क्या?’’

इन का काम तो मेरे लिए सौभाग्य की बात है, पर अकेले इन के कमरे में…’’

नहीं, मुझे साथ जाना होगा… मैं ने प्रशांतजी से बात कर ली है,’’ वह बोली.

कब जाना है?’’ मैं ने पूछा.

अभी चलें… अगर आप को कोई परेशानी न हो तो?’’

परेशानी होती तो यहां आता ही क्यों, आप बाहर आ जाइए, मैं गाड़ी निकाल कर लाता हूं.’’ कह कर मैं पार्किंग में चला गया. 

मेरी तो बांछें ही खिल गईं. अब तो मेरे पास उस के साथ जाने का आधिकारिक फरमान था. मैं ने उसे गाड़ी में बिठाया और रास्ते में पूछा, ”कुछ खाओगी क्या… कचौरी समोसे या कुछ और..?’’

हांहां क्यों नहीं…’’ उस ने चहकते हुए कहा.

चलो, फिर तुम को साउथ इंडियन खिलाता हूं,’’ कह कर मैं ने गाड़ी मद्रास कैफे की तरफ मोड़ दी. 

समोसेकचौरी तो तुम्हारे यहां भी मिल जाती होंगी, नहींï?’’ मैं ने उस की तरफ देखते हुए कहा, ”तुम्हें कोई जल्दी तो नहीं?’’

”मुझे कौन सी जल्दी है.’’ वह बोली तो मुझे लगा जैसे उस का बचपन फिर से लौट आया है. कितने अरमानों को मार कर वह बेचारी सी महसूस करती होगी. अपनी मरजी का कुछ भी नहीं. मैं ने थोड़ाथोड़ा कर के काफी कुछ मंगवा दिया. वह ऐसे खाती रही जैसे जीवन में पहली बार खाया हो.

कार में बैठते ही उस ने बिना किसी संकोच मेरे हाथ पर हाथ रख कर कहा, ”थैंक्यू.’’

उस के कोमल हाथों का स्पर्श मुझ में भीतर तक सिहरन पैदा करने लगा. स्पर्श का अपना ही एक सुख होता है. एक अनकहा पूरा वाक्य. मैं गियर बदलने के लिए वहां से हाथ हटाना नहीं चाहता था, देर तक हम दोनों यूं ही बैठे रहे. चुप्पी तोड़ते हुए मैं ने कहा, ”जानती हो, उस दिन रविवार सुबह मैं जल्दी आश्रम क्यों आ गया था?’’

”क्या आप नहीं जानते कि रविवार को लाइब्रेरी बंद रहती है? आप को दूर से आता देख कर मैं ने जानबूझ कर खोली थी कि शायद आप किसी बहाने वहां आओ. मुझे क्या मालूम था कि आप के भीतर कुछ चल रहा है.’’

मुक्ता के इस प्रतिप्रश्न से मेरे भीतर कुछ झन्न सा टूट गया. मैं ने यह तो सोचा भी न था, दिलों के इस खेल की शुरुआत तो दोनों तरफ से हो ही चुकी थी.

और शायद ऊपर वाले को मेरी नीरस सी जिंदगी पर तरस आ गया होगा, तभी तो आप मिल गए. अब मैं आप को खोना नहीं चाहती. सुना है इस जन्म के सारे संबंध पिछले जन्मों के बकाया लेनदेन को पूरा करने आते हैं.’’ कहतेकहते वह अपने विचारों में खो गई. मैं भी खयालों की दुनिया से यथार्थ में आ गया और यंत्रचलित हाथ कार को ठेल कर आश्रम आ गए. हमारे संबंध अब नजदीकी और मजबूत होते गए. मैं छोटेछोटे पल भी उस के साथ गुजारने लगा. उस को आश्रम से लाना, छोडऩा वगैरहवगैरह. तीसरे दिन माताजी को अस्पताल से छुट्टी मिलनी थी. 

मुक्ता ने बहुत कोशिश की कि किसी बहाने कुछ दिन और यहां माताजी को रखा जाए, पर ऐसा हो न सका. माताजी के घर से किसी व्यक्ति ने आ कर अस्पताल का सारा हिसाब कर दिया. मुक्ता माताजी के पास थी और मैं नीचे रिसैप्शन पर. जब सब कुछ सैटल हो गया तो मुक्ता भागीभागी मेरे पास आ कर बोली, ”अब तो यहां से जाना ही होगा. पता नहीं अब मेरा क्या होगा. कैसे रहूंगी आप के बिना.’’ कहतेकहते वह सारे संकोच छोड़ कर मुझ से लिपट गई और रोने लगी, ”मैं अब आश्रम नहीं जाना चाहती.’’

मेरे पास शब्द ही नहीं थे, अपने साथ भी नहीं रख सकता था और उस के बिना रहना भी मुश्किल था. पता नहीं वह कौन सा पल था, जो मुझे मुझ से ही चुरा कर ले गई. उस के शब्दों के साथ मेरा भी दिल बैठने लगा.

”क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं कि मैं आप के आसपास रह सकूं… मेरा दिल बैठा जा रहा है, कोई तो उपाय होगा. झूठ ही कह दो कि आप भी मेरे बिना नहीं रह सकते.’’ वह भावुक हो कर बोली. तब तक दूर से माताजी को व्हील चेयर पर आते देख कर मैं उस से अलग हो गया. बड़े बेमन से वहां से उठा और कार ला कर पोर्च में खड़ी कर दी. माताजी रास्ते भर ढेर सारे आशीर्वचनों से मुझे लादती रहीं. उन सब को वृद्धाश्रम छोडऩे के बाद मैं वहां से निकल गया. मुक्ता से आंखें मिलाने का साहस अब मुझ में नहीं था, शब्दों की यहां कोई जरूरत नहीं थी.

दिन बीतते गए. बसेरा में मेरा आनाजाना लगा रहा. उस के निकट रहता तो सीमाएं टूटतीं और दूर रहता तो मन टूटता. सुबह उठते ही पहला खयाल उस का होता और आखिरी भी उस का. जिस दिन मैं नहीं आता, वह कहीं न कहीं से फोन करती. उस की आवाज भर्रा जाती और टूट भी जाती थी. जब से मैं ने माताजी की सेवा की, मेरा परिचय वहां के लोगों से बढऩे लगा. उन के मन में मेरे प्रति एक आदर का भाव था.

और एक दिन वही हुआ, जिस का मुझे डर था. प्रशांतजी ने मुझे बुला कर कहा, ”सुनीलजी, यह समाज पतिपत्नी के अलावा बाकी सभी रिश्तों को संदेह की नजर से देखता है, उन का न कोई नाम होता है न मुकाम. इन थोड़े से शब्दों को ही अधिक समझना, बाकी जैसा आप को ठीक लगे.’’ उन के शब्दों को मैं न समझ सकूं, ऐसा नासमझ भी नहीं था मैं. मुझ से न तो कोई जवाब देते बना, न ही मैं नजरें मिला सका. आगे कुछ और अप्रिय न सुनना पड़े, मैं वहां से उठ कर चला गया.

उस रात मेरी आंखों को नींद ने धोखा दे दिया. हार कर मुझे अपनी कामनाओं के पंख समेटने पड़े, जो इतना आसान नहीं था. मैं ने खुद को समझाने की कोशिश की, पर दिल कहां मानने वाला था. मैं ने वहां जाना अब कम करने का मन बनाया. मैं कोशिश करता कि उन जगहों पर न जाऊं, जहां मुक्ता के मिल जाने की संभावना थी. मैं अपने आप को ही धोखा दे रहा था. मैं उस को देखना भी चाहता था और उस से छिपना भी. महाशिवरात्रि के दिन मैं चुपचाप मंदिर में आया और पूजाअर्चना कर के पीछे के रास्ते से निकल रहा था. तभी अचानक मेरी नजर मुक्ता पर पड़ी. वह एक कोने में बैठी हुई थी. उस से नजरें मिलते ही मैं बेचैन हो गया. उस का चेहरा उतरा हुआ था और रंग भी पीला पड़ चुका था. निष्प्राण सा शरीर और निस्तेज आंखें मानों कई सालों से बीमार हो. मैं उस से नजरें चुरा कर पीछे के रास्ते से जा ही रहा था कि न जाने वह कहां से सामने आ गई.

ऐसा क्या गुनाह कर दिया मैं ने, एक टुकड़ा साथ ही तो मांगा था.’’ वह बोली.

क्या?’’ मैं ने जानबूझ कर अनजान बनने की कोशिश की.

न आप लाइब्रेरी में मुझ से मिलने आते हैं, न मेरा फोन ही सुनते हैं. मुझ से मिलना नहीं चाहते क्या? आप से मिल कर जीवन जीने की कुछ आस बंधी थी और अब वह भी टूटती जा रही है. मैं ने ऐसा क्या जुर्म कर दिया, जिस का फैसला आप सुना रहे हैं? तुम क्यों आए थे यहां…’’ कहतेकहते वह रो पड़ी और नजरें हटा कर वहां से चली गई.

सच्चाई से ज्यादा मुश्किल सवाल था यह, जिस का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था. बस यह मेरी उस से आखिरी मुलाकात थी. इस के बाद मैं ने अपने दिल को मजबूत किया और वहां आनाजाना बंद कर दिया. उस ने कुछ दिनों तक तो बहुत फोन किए और करवाए भी, पर बड़ी विनम्रता से मैं ने पीठ दर्द का बहाना बना कर टाल दिया. असली दर्द तो मेरे सीने में था. मन के घावों को वक्त पर छोड़ कर वहां से चला आया. और आज अचानक ‘बसेरा’ से फोन आ गया. देहरादून छोड़े हुए मुझे 6 महीने से अधिक का समय हो गया था. मैं मुक्ता का सामना किस मुंह से कर पाऊंगा. सच कहूं तो एक भी दिन ऐसा नहीं गया, जब मैं ने उसे याद न किया हो. उस की यादें अब मेरी पर्सनल लाइफ को भी प्रभावित कर रही थीं.

शाम काफी हो चुकी थी. बसेराके गेट पर पहुंचते ही मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगा. मैं दुआ करता रहा कि मुक्ता से सामना न हो तो अच्छा. मैं सीधा प्रशांतजी के औफिस गया, जहां वह मेरा ही इंतजार कर रहे थे.

कैसा रहा सफर, बहुत थक गए होगे. कुछ बात ही ऐसी है कि तुम को बुलाना पड़ा और तुम ने मेरा आग्रह मान कर फौरन हां कर दी, यह मेरा सौभाग्य है.’’ प्रशांतजी बोले.

मैं सामने की कुरसी पर बैठ गया और अगले वाक्य का इंतजार करने लगा.

तुम्हारे लिए चायनाश्ता मंगवाता हूं. फिर आराम से बात करेंगे. रात में तुम्हारे रहने की व्यवस्था भी यहीं करवा देता हूं.’’

नहीं रहने दीजिए… थोड़ी देर बाद ले लूंगा…’’ कह कर मैं ने बात टाल दी. मैं नहीं चाहता था कि मेरे आने का पता सब को चले.

उन्होंने अपनी कुरसी पीछे की और फिर आराम से बैठ गए.

बात यह है सुनीलजी कि मैं ने इस संस्था की 20 वर्षों से अधिक सेवा की. इस को वृद्ध लोगों का बसेराबनाया. अच्छे दिन भी देखे और बुरे भी. कई आए और चले गए. मुझ से अब यह बसेरानहीं संभलता. इसलिए मैं ने इस को नए लोगों के हाथों में सौंपने का फैसला किया है. कल हमारे ट्रस्ट की आखिरी मीटिंग है. आप ने इस संस्था के लिए जो भी योगदान दिया, उस के लिए मैं हृदय से आभारी हूं. यदि आप चाहें तो मैं आप का नाम ट्रस्टी में करवा सकता हूं, अभी इतना अधिकार मेरे पास है.’’

मैं खामोश रहा और उन की बातों का मतलब समझने लगा. परंतु मेरे मन में तो कुछ और ही चल रहा था. मैं ने एक लंबी सांस भर कर कहा, ”मुझे सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए. खैर… यहां और सब लोग कैसे हैं?’’

आप का मतलब मुक्ता से है?’’ उन्होंने सीधा प्रश्न किया. मैं खामोश रहा.

मिलना चाहेंगे उस से?’’

मैं ने धीरे से सिर हिला कर इंकार कर दिया. इतना तो पता चल गया कि वह यहीं है. मुझे उस समय उस के साथ बिताए एकएक पल याद आने लगे. उन का यह ऐसा प्रश्न था, जिस की उम्मीद नहीं थी. यह प्रश्न पूछने का साफ मतलब था कि उन्हें हमारे संबंधों का पता है.

”सर, यदि आप मेरे लिए कुछ करना ही चाहते हैं तो मुक्ता के लिए कोई ऐसी व्यवस्था कर दीजिए कि उस को यहां से कोई निकाल न सके. मैं नहीं चाहता कि वह स्वयं को लाचार महसूस करे, अनाथ और बेसहारा महसूस करे.’’ पता नहीं उस समय मेरे मन में ऐसे विचार कहां से आए और मैं कह गया. वह कुछ देर मुझे देखते रहे. ट्रस्टी जैसे महत्त्वपूर्ण पद को छोड़ कर मैं मुक्ता के लिए कुछ मांग रहा था. फिर गंभीर हो कर कहने लगे, ”ठीक है, मैं उस को एक कमरा दिलवा देता हूं. वह जब तक जीवित रहेगी, उसे यहां से कोई नहीं निकालेगा, साथ ही वह यहां काम भी करती रहेगी, यह भी अभी तक मेरे अधिकार में है. परंतु आप को एक लाख रुपए की व्यवस्था करनी होगी. ट्रस्ट का ऐसा ही नियम है. मैं इस बारे में भी आप से बात करना चाहता था.’’

मैं अपनी कंपनी से आप को इस फंड में रुपए भिजवा देता हूं. यह मेरे अधिकार में है. हमारी कंपनी को ऐसे कार्य में योगदान के लिए कोई आपत्ति नहीं है.’’ मैं ने उन से धीरे से कहा.

मुक्ता को जीवन भर संस्था में रखने का भरोसा पा कर मैं बहुत खुश हुआ. मुझे बहुत सुकून मिला कि वह बेचारी अब जिंदगी भर वहां रह सकेगी.

लेखक –   डा. पंकज धवन

Webseries इल्लीगल : सीजन 3

वेब सीरीज इल्लीगल-3’ की कहानी तो कोई खास नहीं है, लेकिन इस में कई तरह के सब प्लौट हैं, जो कथा को व्यस्त और तनावपूर्ण रखते हैं. सीरीज में कानूनी लड़ाई से ले कर व्यक्तिगत संघर्षों तक कहानी एक तेज गति में दिखती है.

कलाकार: नेहा शर्मा, पीयूष मिश्रा, सत्यदीप मिश्रा, अक्षय ओबेराय, नील भूपलम, इरा दुबे, अचिंत कौर, विक्की अरोरा, अंशुमान मल्होत्रा, कीर्ति बिज, सोनाली सचदेवा, अशीमा वरदान

निर्माता: समर खान, आदित्य, निर्देशक: साहिर रजा, पटकथा: सुदीप निगम और भारत मिश्रा, लेखक: राधिका आनंद, ओटीटी: जियो सिनेमा

बौलीवुड एक्ट्रैस नेहा शर्मा और पीयूष मिश्रा की वेब सीरीज इल्लीगलका तीसरा सीजन 8 एपिसोड में जियो सिनेमा पर आ चुका है. पहले 2 सीजन की तरह इस बार भी इल्लीगल 3’ वेब सीरीज एक कोर्टरूम ड्रामा है. इस सीरीज में नेहा शर्मा एडवोकेट निहारिका सिंह के रोल में नजर आ रही हैं. सीरीज में नील भूपलम की एंट्री हुई है. नील भूपलम ने दुष्यंत राठौर के किरदार में लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है.

सीरीज की शुरुआत निहारिका सिंह और उन के सहयोगी पुनीत (सत्यदीप मिश्रा) के अलग होने से होती है. सीरीज में कोर्टरूम ड्रामा को काफी अच्छे से दिखाया गया है. नेहा सिंह के अलावा वेब सीरीज में मुख्यमंत्री जनार्दन जेटली के रूप में पीयूष मिश्रा का किरदार भी दर्शकों पर असर छोड़ता है. इस वेब सीरीज की स्टोरी कुछ खास नहीं है. सीरीज राजनैतिक दांवपेंच और कानूनी काररवाई से भरी पड़ी है. कहानी कभी दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के बीच के अधिकारों की याद दिलाती है तो मुख्यमंत्री की नाजायज औलाद रनदीप की कहानी से लगता है कि यह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी के व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी हुई नजर आती है.

‘इल्लीगल 3’ की कहानी वकील निहारिका सिंह पर केंद्रित है, जो दिल्ली के जानेमाने वकील जनार्दन जेटली की प्रेस्टिजियस ला फर्म में अपना करिअर शुरू करती है. जैसेजैसे सीरीज आगे बढ़ती है, निहारिका कई चौंकाने वाले खुलासे करती जाती है. पूरे सीजन में निहारिका का किरदार दिल्ली की प्रमुख वकील बनने की महत्त्वाकांक्षा में अपने सिद्धांतों से समझौता करने से जूझता है. कहानी में दिलचस्प मोड़ तब आते हैं, जब वह जिन मामलों पर काम करती है, उन से जुड़ी छिपी सच्चाइयों और काले रहस्यों का परदाफाश करती है.

पिछले सीजन में निहारिका ने लगातार अपने सीनियर जेजे (अब सीएम) को काम के प्रति उन के क्रूर रवैए के लिए दोषी ठहराया, लेकिन इस सीजन में उसे उसी राक्षस में बदलते हुए दिखाया गया है, जिस का उस ने कभी सामना किया था. निहारिका और जेजे के अलावा, ज्यादातर किरदार कार्डबोर्ड के टुकड़ों की तरह लगते हैं, जिन्हें ज्यादा बेहतरीन व्यक्तित्व की जरूरत होती है. अगर पुनीत एक आदर्शवादी है तो अक्षय डैडीमुद्दों वाला पुरुष है, जबकि जोया अहमद  निहारिका और दुष्यंत के युवा संस्करण की तरह लगती है.

इल्लीगल में सब से दिलचस्प एपिसोड दुष्यंत और उस की अभिनेत्री पत्नी अतीशा के बीच घरेलू हिंसा है, जिस में निहारिका न्याय के गलत छोर पर होने के बावजूद मामले को आगे बढ़ाती है. राजनीतिक ड्रामा तुलनात्मक रूप से उतना असरकारी नहीं है और पुनीत की पत्नी सू के गर्भपात के इर्दगिर्द का सबप्लौट भी बकवास लगता है.

एपीसोड

मेड लायर रिटर्ननाम के 40 मिनट के इस एपीसोड में पहले सीजन 2 का रिकैप दिखाया गया है, जिस में जनार्दन जेटली की ला फर्म में निहारिका काम करती है और बाद में दोनों आमनेसामने हो जाते हैं. जनार्दन जेटली के एक वकील से ले कर मुख्यमंत्री की कुरसी पाने की कहानी है. सीजन 3 की शुरुआत में एक एंबुलैंस में निहारिका सिंह (नेहा शर्मा) अपने साथी एडवोकेट पुनीत टंडन (सत्यदीप मिश्रा) को  हौस्पिटल ले कर पहुंचती है. एक घंटे पहले के घटनाक्रम को फ्लैशबैक में दिखाया गया है. 

नरेला में जिंगलपुर इंडस्ट्रीज के खिलाफ अर्थ नेक्स्ट एनजीओ के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, उस प्रदर्शन में पुनीत और निहारिका शामिल होते हैं, तभी दुष्यंत राठौर के कहने पर पुलिस वहां आ कर प्रदर्शनकारियों को रोकती है. भीड़ में से कोई पुलिस पर पथराव कर देता है और पुलिस बल प्रयोग करती है, जिस में पुनीत घायल हो जाता है.

हौस्पिटल में पुनीत की पत्नी सू उस से मिलने आती है, तभी पुनीत बाहर आ कर कोर्ट जा कर अर्थ नेक्स्ट के फाउंडर रीमा और फरहान की बेल करने की बात कहता है. उसी समय अक्षय जेटली भी निहारिका से मिलने आता है. अक्षय जेटली जिस होटल में रहता है, वहां उस का पिता दिल्ली सरकार का मुख्यमंत्री जनार्दन जेटली उर्फ जेजे (पीयूष मिश्रा) मिलने आता है, जहां वह अक्षय को सफाई दे कर कहता है कि उस की मां रोहिणी का खून उस ने नहीं किया है, लेकिन अक्षय उस की बात सुनने के बजाय उसे होटल से बाहर जाने को कहता है. 

कार में जाते समय जेजे अपने पीए को पत्थरबाजी करने वालों की जानकारी लेने को कहता है. इधर पुनीत कोर्ट में जिरह कर के रीमा और फरहान की जमानत करवा लेता है. अंकुश सिंघल जो अर्थ नेक्स्ट संस्था का फाउंडर है, मीडिया के सामने पत्थरबाजी की जिम्मेदारी लेता है. इस के बाद पुलिस रीमा और फरहान को रात के समय घर से अरेस्ट कर लेती है. पुनीत और निहारिका फिर से उन की जमानत के लिए कोशिश करने लगते हैं. अक्षय निहारिका को बहुत सारे पार्सल भेज कर उस के घर मिलने पहुंच जाता है और फिर से दोस्ती का वास्ता दे कर उस के नजदीक आना चाहता है.

इधर निहारिका दुष्यंत राठौर (नील भूपलम) से मिल कर बताती है कि उस की फर्म ने उस की फर्म से लाखों रुपए के चैक से पारस जैम्स कंपनी को फायदा पहुंचाया है. यह कंपनी मिस्टर मुंजाल की है, जिस का दामाद अंकुश सिंघल है. जिंगलपुर इंडस्ट्रीज के खिलाफ आंदोलन को रोकने के लिए अंकुश सिंघल को पैसे देने की बात कहने पर दुष्यंत बिना डरे निहारिका को कोर्ट जाने की सलाह देता है.

जनार्दन जेटली प्रेस कौन्फ्रैंस कर जानकारी देता है कि सरकार अपनी जमीन दुष्यंत जैसे पूंजीपतियों के हाथों में नहीं जाने देगी. निहारिका कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर के जिंगलपुर इंडस्ट्रीज की जमीन शरणार्थियों को (आईडीपीएस) को वापस देने की गुहार लगाती है. निहारिका दुष्यंत से मिल कर नया दांव खेलती है. वह दुष्यंत से लिंगलपुर इंडस्टी से प्रभावित लोगों को मजनू का टीला के पास जमीन दे कर मुआवजा देने और सभी कामगारों को 2 साल तक फैक्ट्री में काम देने और अर्थ नेक्स्ट के खिलाफ शिकायतों को वापस लेने की शर्त पर पिटीशन वापस लेने का प्रस्ताव रखती है, जिन्हें दुष्यंत मान लेता है. 

लेखक ने डायलौग लिखते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा कि दुष्यंत जैसा बिजनैसमैन, जो कई कंपनियों का मालिक है, वह बातचीत में तो अंगरेजी शब्दों का इस्तेमाल करता है, मगर दूसरी तरफ भद्दी और फूहड़ गालियां भी बकता है, जिन से उस के कैरेक्टर पर सवालिया निशान लगता है.

एपीसोड 2

37 मिनट के दूसरे एपीसोड का नाम लव एंड लासहै, जिस की शुरुआत एक गरमागरम सीन से होती है. दुष्यंत एक अवार्ड फंक्शन में जाने से पहले बंद कमरे में लड़की के साथ रोमांस कर रहा है. पुनीत रीमा और फरहान की रिहाई के लिए निहारिका के पास पहुंचता है, मगर निहारिका अपनी सहायक शायना के साथ किसी क्लाइंट से मिलने चली जाती है. अक्षय निहारिका को पुरानी बातें भुला कर फिर से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करता है. पार्टी में दुष्यंत की तीसरी बीवी अतीसा (इरा दुबे) किसी बात को ले कर दुष्यंत को भलाबुरा कहती हैं तो दुष्यंत गुस्से से उसे जमीन पर गिरा देता है. एपीसोड में अंगरेजी डायलौग की भरमार है. जिसे देख कर लगता है कि दर्शक कोई इंगलिश मूवी देख रहे हैं.

निहारिका पुनीत के किसी काम में रुचि नहीं ले रही है. शनाया इस बात से चिंतित हैं कि कहीं पुनीत को निहारिका और दुष्यंत के बीच की डील का पता न चल जाए. पुंडीर साहब की पार्टी में सीएम जेटली पहुंचता है, वहां महिला लीडर मृणालिनी (अचिंत कौर) से मुलाकात में पता चलता है कि वे दिल्ली की एलजी बनने वाली है. धर दुष्यंत के खिलाफ अतीशा कोर्ट में केस कर देती है और दुष्यंत की तरफ से निहारिका वकालत करती है. अतीशा की तरफ से जोया अहमद (जयन मेरी खान) कोर्ट में खड़ी होती है. 

जेटली पत्रकार के माध्यम से एक इंटरव्यू रिकौर्ड करवा कर यह बताता है कि नरेला की जमीन शरणार्थियों को दिलाने वह दुष्यंत जैसे दुशासन से लड़ता रहेगा. वह अपने पीए ओपी को कहता है कि सोशल मीडिया में यह खबर फैला दो कि लेफ्टिनेंट गवर्नर सीएम को काम नहीं करने दे रही.

एपीसोड

34 मिनट के तीसरे एपीसोड का नाम ‘लोनली ऐट द टौप’ है, जिस की शुरुआत कोर्ट के एक अर्दली शरद और एडवोकेट जोया अहमद की बातचीत से शुरू होती है. जोया अहमद शरद की बेटी सोनाली के डायवोर्स केस को लडऩे का फैसला करती है तो भावनात्मक रूप से शरद उस का शुक्रिया अदा करता है. दूसरे सीन में सीएम जेटली हुमायूं के मकबरे में अपने नाजायज बेटे रनदीप (विक्की अरोरा) से मिलता है तो रनदीप मेरठ से दिल्ली में उस के साथ रहने की जिद करता है. मगर जेटली उसे लंदन भेजने का बंदोबस्त करने को कह कर वहां से चला जाता है.

जेटली पुनीत को बुला कर बताता है कि पत्थरबाजी अर्थ नेक्स्ट के लोगों ने नहीं, बल्कि किसी और ने की थी. जेटली पुनीत को इस का सबूत देने और सरकार का चीफ पब्लिक प्रौसीक्यूटर बनाने का प्रलोभन देता है.  अक्षय जोया को उस की फर्म में उस का औफिस दिखाता है तो जोया कहती है कि वह निहारिका के खिलाफ केस लड़ कर उसे खत्म करना चाहती तो अक्षय मना करता है. तभी अतीसा का फोन आने पर जोया वहां से चली जाती है.

पुनीत पत्नी सुलेखा (कीर्ति विज) से जेजे के प्रपोजल पर बात करता है तो वह भी अपनी सहमति देते हुए कहती है कि रीमा और फरहान को जेल से बाहर निकालने के लिए जेजे की बात मान लेना ही समझदारी है. इधर दुष्यंत न्यूज सुन कर घबरा जाता है और निहारिका से फोन पर बात करता है तो निहारिका उस की जमानत करने की बात कहती है. मगर जोया अपनी चाल से किसी दूसरे क्लाइंट में निहारिका को उलझा देती है और जब तक निहारिका कोर्ट पहुंचती है, कोर्ट के दरवाजे बंद हो चुके होते है. 

दुष्यंत की जमानत के लिए निहारिका कोर्ट में देर से पहुंचे इस के लिए जोया द्वारा जिस पागल खानदान को भेजा गया है, वह दृश्य भी कोई खास प्रभाव दर्शकों पर नहीं छोड़ पाता है. यहां पर कमजोर पटकथा और निर्देशन की कमी साफ दिखाई देती है. पुलिस दुष्यंत को 2 दिन की न्यायिक हिरासत में लेती है, यह समाचार सुन कर सीएम जेटली बेहद खुश होता है. निहारिका पुलिस लौकअप में बंद दुष्यंत से मिलने जाती है तो दुष्यंत उसे डांटता है. इस पर निहारिका माफी मांगते हुए 2 दिन बाद जमानत करवाने का वचन देती है.

पुनीत को रात के अंधेरे में जेटली का पीए ओपी किसी लालू नाम के पेशेवर अपराधी से मिलवाता है जो पुनीत को बताता है कि दुष्यंत के लिए काम करने वाले लाखन मंडल और सुरेश जैन के कहने पर उस ने पत्थरबाजी की थी.

एपीसोड

35 मिनट के चौथे एपीसोड का नाम गेम औनहै. इस में शनाया के पास निखिल मेहरा (अंशुमान मल्होत्रा) की मां उसे ले कर आती है. निखिल को मल्टीपल स्केलिरिस बीमारी है, जिस की वजह से उसे असहनीय दर्द होता है. देशविदेश में इलाज के बाद भी कोई दवा, थैरेपी से उसे राहत नहीं मिल रही. निखिल इच्छामृत्यु के लिए कोर्ट में पिटीशन दाखिल करना चाहता है. इधर पुनीत रीमा और फरहान को रिहा करवा देता है. पुनीत और निहारिका में उसूलों को ले कर फिर बहस होती है. सबइंसपेक्टर दानियल शेख पुलिस स्टेशन में रनदीप को लंदन का टिकट, होटल बुकिंग के पेपर और खर्च के लिए पैसे दे कर कहता है कि कल सुबह की फ्लाइट से लंदन जाना है, ये जेजे सर का आदेश है, मगर रनदीप पेपर फाड़ कर कहता है कि वह कहीं नहीं जाएगा.

शनाया और निहारिका दुष्यंत की बेल के बारे में चर्चा करते हैं. सीएम जेजे पुनीत के औफिस खुद मिलने पहुंच जाता है और पुनीत को कहता है कि यदि दुष्यंत को हराना है तो दिल्ली पुलिस से 2 कदम आगे चलना होगा. अंकुश सिंघल को पकड़ो और कोर्ट में साबित कर दो कि उस बयान के पीछे दुष्यंत का हाथ था, फिर देखो यह जमीन हमारे कब्जे में होगी. निहारिका के घर में अक्षय उसे दुष्यंत की बेल के लिए शुभकामनाएं देता है तो निहारिका अक्षय को जोया अहमद को हायर करने की बधाई देती है. इस को ले कर निहारिका नाराज हो जाती है, मगर अक्षय उसे मना लेता है. दोनों खाना खाने मेज पर पहुंचते हैं, तभी दिलबहार आ कर निहारिका को उस दिन की घटना के संबंध में बताता है. 

दुष्यंत की रिहाई के बाद निहारिका अतीसा मेवानी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करती है. कोर्ट में जोया और निहारिका के बीच शानदार जिरह होती है. निहारिका अतीसा के खिलाफ जिंगलपुर इंडस्ट्रीज हड़पने का आरोप लगाती है तो जोया और निहारिका कोर्टरूम में भिड़ जाती हैं. इस पर मजिस्ट्रैट उन्हें फटकार लगाता है और सुनवाई की अगली तारीख देता है.

शनाया और निहारिका एक बार में बैठ कर बातें कर रहे होते हैं, तभी एक जगह से लड़की शोर मचाती है. शनाया का ध्यान उस तरफ जाता है, जहां तान्या नाम की लड़की निखिल पर इसलिए गुस्सा हो रही है कि निखिल ने पैंट में पेशाब कर ली है. वह सफाई देता है, मगर तान्या उस से गुस्सा हो कर भाग जाती है.  निखिल व्हीलचेयर से गिर जाता है. शनाया और निहारिका उसे उठा कर कपड़े साफ करती हैं और उस के घर छोडऩे जाती हैं. वहां उस की मां से बातचीत में निखिल की बीमारी और परेशानी से वाकिफ होती हैं और निखिल की इच्छामृत्यु का केस लडऩे के लिए तैयार होती है.

अर्थ नेक्स्ट के एक प्रोग्राम में सीएम जेटली मीडिया के सामने कहता है कि दिल्ली सरकार ने इस जमीन को दोबारा वापस लेने के लिए एक अरजी एलजी साहिबा के पास लगाई थी, मगर एलजी साहिबा केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही हैं. न्यूज सुन रही मृणालिनी दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से कहती है कि जांच को डिले करने से कुछ नहीं होगा, वह मीडिया के कंधे पर बंदूक रख कर चला रहा है. 

एपीसोड

41 मिनट के पांचवें एपीसोड का नाम पावर प्लेहै. इस एपिसोड की शुरुआत में दिखाया गया है कि लाखन मंडल अपने बेटे बिजू के घावों पर मरहमपट्टी लगाते हुए पूछ रहा है कि ये किस ने कियाबिजू बताता है कि जेटली की पार्टी की स्टूडेंट्स यूनियन के लड़कों ने उसे इसलिए मारा है, क्योंकि वह विरोधी पार्टी का है. एलजी मृणालिनी अक्षय को वह फाइल सौंपती है, जिस में जेटली और रनदीप के कारनामों का काला चिट्ठा है.

कोर्ट में निखिल मेहरा के इच्छामृत्यु के केस की सुनवाई होती है, जिस में निहारिका और पुनीत के द्वारा बेहतरीन तरीके से जिरह की जाती है और मजिस्ट्रैट भी इमोशनल हो कर एक्सपर्ट की राय सुनना चाहता है. इस रोग की एक्सपर्ट डा. भारती कोर्ट को बताती है कि इस रोग के इलाज हेतु नई थैरेपी ईजाद हो रही है. निहारिका के पूछने पर डा. भारती स्वीकार करती है कि निखिल का केस यूनिक है. निहारिका और पुनीत कोर्ट में बहस के दौरान आमनेसामने आ जाते हैं तो मजिस्ट्रैट डांटते हुए अगली सुनवाई की तारीख दे देता है.

पुनीत की पत्नी सुलेखा, जिस को 20 सप्ताह का गर्भ है, को डा. जाह्नïवी के क्लीनिक ले जाता है, जहां डा. जाह्नïवी बताती है कि भ्रूण का ब्रेन विकसित नहीं हुआ है, ऐसी स्थिति में यदि वह बच्चे को जन्म देगी तो बच्चे की अधिकतम उम्र 10 साल होगी और वह हमेशा दर्द से परेशान रहेगा, इसलिए डाक्टर एबार्शन करवाने की सलाह देती है. पुनीत की पत्नी सुलेखा की प्रेगनेंसी की रिपोर्ट में आने वाले बच्चे के रोग की वजह से एबार्शन की कहानी ज्यादा असर नहीं डाल पाई. इस समस्या की तुलना निखिल मेहरा के असहनीय दर्द और लाइलाज बीमारी से करना दर्शकों के गले नहीं उतरता.

कोर्ट में अतीसा मेवानी राठौर के केस की सुनवाई में भी जोया और निहारिका की बहस को रोचक अंदाज में पेश किया गया है. दुष्यंत के थप्पड़ मारने की रिपोर्ट में आंख के नीचे जिस चोट के निशान का उल्लेख किया गया है, उसे निहारिका फोरैंसिक एक्सपर्ट के बयान से यह साबित कर देती है कि वह मेकअप आर्टिस्ट द्वारा बनाया गया है. फोन काल आने पर पुनीत सीएम जेटली से मिलने जाता है, जहां पर वह बताता है कि जोया अहमद अब उन के लिए काम करेगी. सीएम का पीए ओमप्रकाश पुनीत को बताता है कि जोया ने कंफर्म किया है कि अंकुश ने दुष्यंत से पैसे ले कर मीडिया में बयान दिया था. मजिस्ट्रैट जोया को अपने क्लाइंट से बात करने का समय और चेतावनी दे कर अगली सुनवाई बंद कमरे की बजाय प्रिंट मीडिया की उपस्थिति में करने का आदेश देता है.

सीएम जेटली अपने निवास से एलजी से मिलने पदयात्रा करने का ड्रामा करता है. एलजी मृणालिनी से मिलबांट कर खाने और काम करने का समझौता होता है. रेस्टोरेंट में निहारिका अक्षय का इंतजार कर रही है. उधर अक्षय मृणालिनी की दी गई फाइल खोल कर देखता है तो रनदीप का पता लगाने वह फोन पर बुरी तरह चीखने लगता है. कुछ देर बाद निहारिका उस के पास पहुंचती है तो वह बताता है कि रनदीप ने उस की मां का मर्डर किया था और अब रनदीप मेरठ में है.

दिलबहार निहारिका को फोन कर के बताता है कि वह अतीसा के बौडीगार्ड रौकी का पीछा कर रहा है. इस के बाद निखिल मेहरा और निहारिका के बीच इमोशनल बातचीत होती है, जिस में निखिल अपनी परेशानी बता कर निहारिका को यह केस जीत लेने की बात कह कर रो पड़ता है.

एपीसोड

40 मिनट के छठवें एपीसोड का नाम सीक्रेट ऐंड सैक्रीफाइसहै, जिस की शुरुआत में शनाया हाथ में मोबाइल लिए रेलवे स्टेशन से बाहर निकलती है. उस के मोबाइल पर किसी बच्चे के रोने की आवाज आती है. शनाया घर पहुंचती है, जहां उस की बहन बेहोश पड़ी है और उस का बच्चा रो रहा है. वह एंबुलैंस से उन्हें हौस्पिटल पहुंचाती है. लाखन मंडल सीएम जेटली से मिल कर अपने बेटे पर हुए हमले का दुखड़ा सुनाता है तो जेटली उस का स्टेटमेंट रिकौर्ड कराता है, जिस में वह दुष्यंत राठौर पर आरोप लगाता है कि उस ने झूठी दिलासा दे कर शरणार्थियों की जमीन धोखे से अपने कब्जे में कर ली. सीएम जेटली इस स्टेटमेंट को सभी टीवी चैनल पर चलवाने का निर्देश देता है.

शनाया और प्रीति की बातचीत से पता चलता है कि शनाया का असली नाम आकांक्षा तिवारी है. मगर इस छोटे से सीन से दर्शकों को समझ नहीं आता कि आखिर आकांक्षा अपना असली नाम क्यों छिपा रही है. रनदीप अक्षय को कुरसी से बांध कर टौर्चर करता है और उस की फोटो जेटली को भेज देता है. इधर अक्षय किसी नुकीली चीज से अपने हाथों में बंधी रस्सी खोल लेता है. दर्शकों के लिए यह समझना बड़ा मुश्किल है कि बंधे हाथों में वह नुकीली चीज आई कहां से. 

अक्षय और रनदीप के बीच हाथापाई होती है, तभी रनदीप की पिस्टल गिर जाती है, जिसे अक्षय उठा कर उस के ऊपर तान देता है. उसी समय जेटली भी वहां पहुंचता है और गोली चलने की आवाज आती है. यह सस्पेंस बना रहता है कि रनदीप पर गोली किस ने चलाई. कोर्ट में निखिल मेहरा के केस की सुनवाई हो रही है. मजिस्ट्रैट निखिल की मां श्वेता और पिता हरीश के पक्ष को सुनते हैं, जहां मां निखिल के असहनीय दर्द और बीमारी का कोई इलाज न होने की बात कह कर इच्छा मृत्यु मांगती है तो वहीं पिता उसे जिंदा रखने की बात रखता है. मजिस्ट्रैट यह कह कर एक हफ्ते का वक्त मांगता है कि हिंदुस्तान में अभी तक इच्छामृत्यु के पक्ष में कोई फैसला नहीं हुआ है.

कोर्ट में दुष्यंत अतीसा केस की सुनवाई में निहारिका की जगह हड़बड़ी में देर से शनाया पहुंचती है और जज उसे बताता है कि जोया ने एक गवाह एंड किया है. इस पर शनाया वक्त मांगती है तो जज सुनवाई टाल देता है. कोर्टरूम से बाहर निकल कर शनाया दुष्यंत से उस गवाह आरती भटनागर के बारे में पूछती है तो पता चलता है कि आरती दुष्यंत की कालेज में क्लासमेट रही है, जिस के साथ दुष्यंत ने मारपीट की थी. 

निहारिका अक्षय को ले कर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराती है और अक्षय मीडिया के सामने बयान दे कर बताता है कि रनदीप का खून जेजे ने किया है. यह खबर सुन कर जेजे को दिल का दौरा पड़ता है.

एपीसोड

सातवें एपीसोड का नाम टेबल्स टर्नहै, जो 37 मिनट का है. मुख्यमंत्री जेटली के निवास के सामने लोग तख्तियां लिए जेटली के विरोध में नारेबाजी कर रहे हैं. दिल्ली और मेरठ पुलिस स्थिति पर नजर रख काररवाई करने की बात कर रही है. जेटली जोया और एसके से निहारिका को उस का केस लडऩे को कहते हैं. जोया और एसके के साथ जेटली एक फोटो शेयर करते हुए लिखता है कि जेटली एसोसिएट अब जनार्दन जेटली को रिप्रेजेंट करेंगे तो अक्षय बौखला जाता है.

जोया और निहारिका के बीच जोरदार बहस होती है. निहारिका अतीसा से कुछ सवाल पूछती है, जिस के उत्तर में अतीसा बताती है कि दुष्यंत नशे में धुत हो कर उस की पिटाई करता था और नशा उतरते ही अपने व्यवहार के लिए माफी मांगता. इस वजह से उस ने कभी इस की शिकायत नहीं की. एक फाइल देते हुए अतीसा से आखिरी सवाल पूछने की इजाजत निहारिका जज से मांगती है, जोया विरोध करती है. जज की इजाजत पर निहारिका अतीसा से पूछती है कि वह दुष्यंत की मार सहने के बाद कभी डाक्टर के पास गईं तो अतीसा मना कर देती है. इस पर निहारिका जज को अतीसा की मैडिकल रिपोर्ट पढऩे को कहती है, जिस में डाक्टर ने ऐसी बीमारी डायग्नोस की है, जिस में उस के रक्त का थक्का नहीं जमता. 

निहारिका अतीसा को झूठा साबित कर देती है. तब दुष्यंत को घरेलू हिंसा के केस में बाइज्जत बरी कर देता है. इधर पुनीत अक्षय को समझाता है कि उस की इमेज मीडिया में एक पागल की तरह बन गई है. वह पुनीत की सलाह पर एक यूट्यूबर की मदद से अक्षय के इंटरव्यू को रिकौर्ड कराता है, जिस में जेटली के खिलाफ बहुत सारे सबूत हैं. यही सबूत पुलिस को भी सौंपे जाते हैं. जेटली के खिलाफ मनी ट्रांसफर के सबूत तो हैं, परंतु रनदीप की बौडी न मिलने से जेटली के खिलाफ ऐक्शन नहीं हो रहा. अक्षय मृणालिनी से बात करता है तो दिल्ली पुलिस जेजे को गिरफ्तार कर लेती है.

मृणालिनी के कहने पर अक्षय मेरठ पुलिस स्टेशन जा कर इंसपेक्टर डेनियल शेख से रनदीप की बौडी खोजने की बात कहता है, उसी समय उस का सस्पेंशन और्डर का फोन आ जाता है. केस की जांच दिल्ली पुलिस के हाथों में आ जाती है और वह रनदीप की डैडबौडी खोज निकालती है. कोर्ट में सीएम जेटली के केस की सुनवाई शुरू होने वाली होती है. जज काररवाई शुरू करने के लिए निहारिका को बुलाते हैं. वह बताती है कि वह जेटली की अटर्नी नहीं है. तब जज उसे वकालतनामा दिखाते हुए पूछता है कि ये दस्तखत तो आप के ही हैं. निहारिका आश्चर्य से देखती है. तब पता चलता है कि किसी ने धोखे से उस के हस्ताक्षर वकालतनामा पर करवा लिए हैं.

एपीसोड

43 मिनट के आखिरी एपीसोड का नाम द बर्डन औफ ट्रुथहै. एपीसोड की शुरुआत में जज निहारिका को जेजे का केस न लडऩे पर लाइसेंस रद्द करने की हिदायत देता है. निहारिका के नाम का वकालतनामा के संबंध में शनाया कुछ सफाई देना चाहती है, मगर निहारिका उसे डांट लगाती है. अक्षय भी यह सुन कर नाराज हो जाता है. जेजे निहारिका को बुला कर बताता है कि रनदीप को उस ने नहीं, अक्षय ने मारा है. वह निहारिका को बताता है कि रनदीप उस का बेटा था, मगर उसे वह सब नहीं मिल सका, जो उस का हक था. वह निहारिका से कहता है कि केस तो कोई भी लड़ सकता है, मगर तुम दोनों को डिफेंड करोगी. 

तुम्हारा प्यार गुनहगार को बचाएगा और तुम्हारा ईमान बेकुसूर को न्याय दिलाएगा. कोर्ट में पुनीत और निहारिका की गरमागरम बहस होती है और निहारिका को कोर्ट एक हफ्ते का वक्त देता है. हौस्पिटल आ कर निखिल के पिता उसे क्लीनिकल ट्रायल के लिए बंगलुरु ले जाने की बात कह कर रूम से बाहर निकलते हैं. तभी निहारिका निखिल के पास लगे उपकरण को स्विच औफ करना चाहती है, मगर निखिल की मां वहां आ जाती है. वह निहारिका के गाल पर प्यार से हाथ फेरती है. निहारिका रूम से जैसे बाहर जाती है, निखिल की मां उस स्विच को बंद कर देती है और कुछ ही क्षणों में निखिल की मौत हो जाती है. बाहर निहारिका की आंखों में आंसू देख कर निखिल के पिता अंदर आते हैं.

शनाया निहारिका के घर जा कर बताती है कि उस का असली नाम आकांक्षा तिवारी है, वह गरीब परिवार से है. वकालत करने के बाद उसे जौब नहीं मिल रही थी, इसलिए उस ने अपना नाम शनाया रख लिया.  जोया को यह सब पता चल गया तो वह ब्लैकमैल करने लगी. जोया के कहने पर ही उस ने जेजे के केस के वकालतनामा पर आप से दस्तखत करवा लिए. निहारिका टीवी चैनल पर एक न्यूज देख रही होती है, जिस में बताया जा रहा है कि दिल्ली की उपराज्यपाल मृणालिनी ने उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा पराली जलाए जाने को ले कर वहां के मुख्यमंत्री की निंदा की है. एक किसान माधव चौहान कहता है कि जेटली के जाते ही यह सब आरोप लगना शुरू हो गए. किसान तो वही करेगा, जो उस के बापदादा करते आए हैं.

निहारिका जज को एक एफिडेविट दे कर बताती है कि मेरठ के श्याम नगर में रहने वाले उत्कर्ष गुप्ता ने रनदीप से 2 लाख रुपए उधार लिए थे, जो वह चुका नहीं सका. इस वजह से उस ने रनदीप को मार दिया है. निहारिका रनदीप के पास मिले गन और दूसरे सबूत भी अदालत में पेश करती है. कोर्ट दिल्ली पुलिस को उन के खिलाफ घूस का प्रकरण दर्ज करने और उत्कर्ष गुप्ता के खिलाफ रनदीप का मर्डर करने का केस दर्ज करने का निर्देश देता है. कोर्टरूम से बाहर निकलते ही अक्षय निहारिका के पास जा कर जेटली की तरफ इशारा कर कहता कि वह जेल जाएगा.

दिल्ली पुलिस अक्षय को गोली मारने के आरोप में डेनियल को गिरफ्तार कर लेती है. निहारिका की मौजूदगी में अक्षय का अंतिम संस्कार होता है, वहीं पर पुलिस आ कर निहारिका को निखिल के खिलाफ जान से मारने की कोशिश करने के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है. वेब सीरीज का अंत बोरिंग तरीके से दिखाया गया है, जिस में जेल में बीड़ी पीते हुए जेटली को उपदेशक की भूमिका में दिखाया गया है.

नेहा शर्मा

नेहा शर्मा का जन्म 21 नवंबर, 1987 को भागलपुर बिहार में हुआ था. नेहा शर्मा के पिता अजित शर्मा एक राजनेता हैं, जो भागलपुर से कांग्रेसी विधायक हैं. उन के पिता ने 2024 का लोकसभा चुनाव भागलपुर सीट से लड़ा था, परन्तु उन्हें हार का सामना करना पड़ा. नेहा शर्मा ने अपनी शुरुआती पढाई माउंट कार्मेल स्कूल भागलपुर से कर नैशनल इंस्टीट्यूट औफ फैशन टेक्नोलौजी (हृढ्ढस्नञ्ज) से फैशन डिजाइन की पढ़ाई की थी. नेहा शर्मा ने अपने करिअर की शुरुआत तेलुगू फिल्म चिरुथासे की थी. इस फिल्म में चरण तेज के अपोजिट नजर आई थी. उस ने हिंदी सिनेमा में मोहित सूरी की फिल्म क्रुकसे शुरुआत की थी, जिस में इमरान हाशमी भी था. 

उस की यह पहली फिल्म बौक्स औफिस पर कोई कमाल नहीं दिखा सकी. इस के बाद वह तेरी मेरी कहानीऔर कौमेडी फिल्म क्या सुपर कूल हैं हममें नजर आई. इस फिल्म में उस के अलावा रितेश देशमुख और तुषार कपूर भी थे. उसे इस फिल्म में अभिनय के लिए आलोचकों से मिलीजुली प्रतिक्रिया मिली थी. इस के बाद वह कौमेडी लव स्टोरी जयंतु भाई की लवस्टोरी में विवेक ओबराय संग नजर आई और यह फिल्म भी बौक्स औफिस पर बुरी तरह फ्लौप साबित हुई. उस का अब तक हिंदी फिल्मों का करिअर कुछ खास नहीं रहा. साल 2020 में आई फिल्म तान्हाजीउन के करिअर की इकलौती ब्लौकबस्टर फिल्म है. नेहा की आने वाली फिल्म जोगीरा सारा रा राहै, जिस में वह नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ नजर आएगी.

पीयूष मिश्रा

पीयूष मिश्रा का जन्म 13 जनवरी, 1963 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में हुआ था. पीयूष मिश्रा को उस के पिता की बड़ी बुआ ने गोद लिया था, जिस के बाद उस का नाम प्रियाकांत शर्मा हुआ. पीयूष मिश्रा ने अपनी पढाई कार्मेल कौन्वेंट स्कूल, ग्वालियर से पूरी की थी. बचपन से ही पीयूष सिंगिंग, पेंटिंग और ऐक्टिंग में दिलचस्पी रखता था. ऐक्टिंग के शौक ने उसे नैशनल स्कूल औफ ड्रामा पहुंचा दिया. पीयूष मिश्रा की शादी प्रिया नारायण से हुई, दोनों की मुलाकात वर्ष 1992 में हुई थी.

वर्ष 1986 में नैशनल स्कूल औफ ड्रामा से पास आउट होने के बाद पीयूष ने दिल्ली में ही थिएटर करना शुरू कर दिया. फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले पीयूष कई लोकप्रिय थिएटर स्टेज शोज का हिस्सा बना. उस ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा वर्ष 1998 में फिल्म ‘दिल से’ में, इस फिल्म में वह एक सीबीआई इनवैस्टीगेशन औफिसर की भूमिका में नजर आया था. इस के बाद उस ने कुछ खास फिल्मों के डायलौग भी लिखे. पीयूष को हिंदी सिनेमा में पहचान विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ से मिली, इस फिल्म में पीयूष ने काका की भूमिका निभाई थी, जिसे दर्शकों ने बेहद सराहा था. इस के बाद पीयूष ने ‘गुलाल’, ‘गैंग औफवासेपुर’ में महत्त्वपूर्ण किरदार निभाया है.

अक्षय ओबेराय

अक्षय ओबेराय भारतीय मूल का एक अमेरिकी अभिनेता है, जो हिंदी फिल्मों में ऐक्टिंग करता है. 2002 की कौमेडी-ड्रामा अमेरिकन चायमें बतौर बाल कलाकार के रूप में अभिनय की शुरुआत की थी, अक्षय ने 2010 में राजश्री प्रोडक्शंस में बनी फिल्म इसी लाइफमें अपनी पहली प्रमुख भूमिका निभाई थी. अक्षय ओबेराय का जन्म पहली जनवरी, 1985 को संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यू जर्सी में हुआ था. अक्षय के पिता कृष्ण ओबेराय, अभिनेता सुरेश ओबेराय के भाई हैं और अक्षय विवेक ओबेराय का चचेरा भाई है. 

अक्षय ने नेवार्क एकेडमी से स्कूली शिक्षा प्राप्त की और बाल्टीमोर में जोंस हापकिंस विश्वविद्यालय से रंगमंच कला और अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री हासिल की है. उस ने न्यूयार्क शहर में स्टेला एडलर और फिर लौस एंजिल्स में प्लेहाउस वेस्ट में अभिनय प्रशिक्षण पूरा किया. अपनी शिक्षा के दौरान उस ने द एडम्स फैमिलीसे जौन एस्टिन के साथ अभिनय का अध्ययन किया. साथ ही, उस ने ब्रौडवे डांस सेंटर में बैले, जैज और हिपहौप नृत्य का भी अध्ययन किया.

भारत आने के बाद अक्षय ने पृथ्वी थिएटर  में नाटक किए और किशोर नमित कपूर से प्रशिक्षण लिया. फिल्म लाल रंगऔर गुडग़ांवमें दर्शकों ने अक्षय के काम को पसंद किया है. इल्लीगल 3’ में अक्षय ने सीएम के बेटे अक्षय जेटली का किरदार निभाया है. मानसिक रूप से अस्थिर और एक पागल प्रेमी के किरदार में फिट नजर आया है.

 

 

अश्लील वीडियो चैट गैंग की कई लड़कियां गिरफ्तार

अच्छी सैलरी के लालच में कुछ लड़कियां अश्लील वीडियो चैट गैंग के चंगुल में फंस जाती हैं. निकिता भी उन के चंगुल में जा फंसी. आप भी जानें कि गैंग नौकरी के लालच में किस तरह लड़कियों को फांस कर अश्लील वीडियो चैट कराने को मजबूर करता है?

राघव चड्ढा ने धड़कते दिल से अपने मोबाइल का वीडियो काल औन किया तो वह अपनी जगह से उछल पड़ा. क्योंकि उस के मोबाइल पर जो लड़की नजर आई, वह 22-23 साल की खूबसूरत नवयौवना थी. उस का एकएक अंग कसा हुआ और कमनीय था. रंग दूध में केसर मिले जैसा हल्का सा गुलाबी. काले बालों की लंबी चोटी जो इस वक्त उस के उभरे सीने पर नागिन सी बलखाती प्रतीत हो रही थी. पतले रसीले होंठ, लंबी नाक और हिरणी सी चंचल आंखें. वह सचमुच अप्सरा जैसी ही लग रही थी. उस के जिस्म पर रंगीन बेलबूटों वाली मिनी शर्ट और आसमानी रंग की जींस थी.

राघव चड्ïढा इस वक्त केवल टावेल लपेटे हुए था. शरमा कर वह शर्ट पहनने दौड़ा तो अप्सरा खिलखिला कर हंस पड़ी, ”रहने दो राघव, तुम्हारा नंगा बदन देखने में मुझे मजा आ रहा है. शर्ट पहनने की कोशिश करोगे तो सारा मजा ही खराब हो जाएगा.’’

राघव के पांव वहीं ठिठक गए. वह झेंप कर बोला, ”मैं नहा कर आया था, ध्यान ही नहीं रहा कि मैं ने अपनी शर्ट और पायजामा नहीं पहना है.’’

कोई बात नहीं,’’ अप्सरा मुसकराई, ”देखो, तुम्हारा टाइम निकल रहा है, तुम ने एक घंटे के लिए मुझे एक हजार रुपए दिए हैं.’’ 

”हां.’’ राघव ने सिर हिलाया और अप्सरा की खूबसूरत फिगर देखते हुए गहरी सांस भरी, ”तुम वाकई हसीन हो अप्सरा. तुम्हें देख कर दिल को सुकून पहुंच गया.’’

”मैं तुम्हारे दिल को गुदगुदाना चाहती हूं राधव, मैं और मेरी यह जवानी एकदम अछूती है, इसे आज तक किसी पुरुष ने छुआ तक नहीं है. तुम्हें मैं अपनी उफनती जवानी का नशीला डोज पिलाने को तैयार हूं, इस की कीमत दे सकोगे?’’  राघव ने पूरे जोश में कहा, ”क्या लोगी, हुक्म करो अप्सरा, तुम्हारी इस अछूती कातिल जवानी का जाम पीने के लिए मैं खुद को कुरबान कर सकता हूं.’’ 

मैं एक बार की बैठक के 5 हजार लूंगी. पूरी रात अपनी बांहों में रखोगे तो 20 हजार खर्च करने पड़ेंगे.’’

मैं 25 हजार दे दूंगा अप्सरा, तुम्हें मैं अपने बिस्तर पर हर सूरत में पाना चाहता हूं.’’ राधव के स्वर में मजबूती थी.

यह सौदा तुम्हारे और मेरे बीच का होगा राधव. इस के लिए मैं तुम से आज रात को 7 बजे संपर्क करूंगी.’’ अप्सरा बहुत धीमी आवाज में बोली, जिसे केवल राधव ही सुन पाया.

ठीक है अप्सरा, मैं 7 बजे तैयार रहूंगा. मुझे बता देना तुम्हें मैं कहां से पिक करूं.’’

”बता दूंगी,’’ अप्सरा ने कह कर कातिल अंगड़ाई ली. फिर बड़ी बेबाकी से उस ने शर्ट के बटन खोल दिए. उस का उफनता हुआ यौवन खजाना अब अधखुला था. राघव की आंखें फट पड़ीं. 

”देख लो राघव बाबू, तुम ने ऐसी जन्नत का नजारा शायद ही कभी किया होगा.’’

”सही कह रही हो अप्सरा.’’ फटीफटी आंखों से अप्सरा के अर्धनग्न उभारों का नजारा देखते हुए राघव चड्ïढा ने थूक निगला, ”मेरी शादी नहीं हुई है तो यह सब कहां देखने को मिलता.’’

कुछ और देखोगे…’’

नहीं.’’ राघव जल्दी से बोला, ”अगर शरीर के सारे भेद पहले ही खोल दोगी तो उन लम्हों का सारा मजा किरकिरा हो जाएगा जो मैं अपने पलंग पर देखना चाहता हूं. तुम्हारे जिस्म को मैं बेपरदा करूं, यह मेरी तमन्ना है.’’

ओके.’’ अप्सरा ने कहने के बाद अपनी शर्ट के बटन लगा लिए. 

तो मैं शेष बचे तुम्हारे 15 मिनट का आनंद बातों से ही चुका देती हूं. मेरी रसभरी बातें भी तुम्हें पूरा मजा देंगी राघव बाबू.’’

मुझे तुम्हारे रसभरे यौवन को देख कर ही मजा आ रहा है अप्सरा. अब शेष रात के लिए छोड़ो. कुछ अपने विषय में बताओ, कहां पर रहती हो तुम?’’

गाजियाबाद की ही हूं राघव,’’ अप्सरा फिर धीरे से फुसफुसाई, ”यह सब पूछताछ मेरी जौब में शामिल नहीं है. तुम रोमांटिक बातें करो.’’ 

जौब…’’ राघव चौंका, ”क्या तुम पुरुष का दिल बहलाने की जौब करती हो?’’

हां.’’ अप्सरा ने धीरे से कहा, ”मेरा मालिक सामने बैठा है, लेकिन इतनी दूर है जहां मेरी धीमी आवाज नहीं पहुंच पाएगी.’’ 

राघव चड्ïढा गाजियाबाद की एक प्राइवेट कंपनी में सेल्समैन का काम करता था. संडे या छुट्ïटी वाले दिन वह देर तक सोता था. उस की अभी शादी नहीं हुई थी. मम्मीपापा अलीगढ़ में रहते थे, अत: उसे यहां कोई डिस्टर्ब करने वाला भी नहीं था. राजनगर एक्सटेंशन में उस ने किराए का कमरा ले रखा था. फिलहाल मस्तमौला जिंदगी थी उस की. खाना वह घर पर ही बनाता था. छुट्टी वाले दिन वह 10 बजे तक सोता था, फिर उठ कर नित्यकर्म से निपटने के बाद चाय परांठे बनाता था. फिर मोबाइल ले कर पलंग पर पसर जाता था. कोई दोस्त वगैरह आ गया तो उस से गप्पें लड़ा कर टाइम पास हो जाता था. 

उस दिन रविवार को सवा 10 बजे राघव ने बिस्तर छोड़ा. टावेल बाथरूम में टांग कर वह फ्रेश होने के लिए टायलेट में घुस गया. टायलेट से निपट कर वह नहाया और टावेल लपेट कर किचन में आ गया. उस ने चाय गैस पर रखी ही थी कि तभी उस के मोबाइल की घंटी बजने लगी. स्क्रीन पर नया नंबर था, जो उस के लिए अनजान था. उस ने फोन काट दिया. थोड़ी देर में फिर मोबाइल की घंटी बजने लगी. वही नंबर स्क्रीन पर था.

राघव ने काल रिसीव कर के कहा, ”हैलो..’’

दूसरी ओर से किसी फीमेल की आवाज उस के कान में सुनाई दी, ”गुड मार्निंग राघवजी.’’

गुडमार्निंग.’’ हैरत में डूबे राघव ने जल्दी से कहा, ”मैं ने आप को पहचाना नहीं. आप कौन हैं?’’

मैं आप के पहचान की नही हूं मिस्टर राघवजी, लेकिन क्या अंजान लोगों से आप बात नहीं करते हैं?’’

स्वर में जैसे मिश्री घोल रखी हो उस युवती ने. राघव चड्ढा के दिल के तार झनझना उठे.

वह हड़बड़ा कर बोला, ”बात अंजान व्यक्ति से भी की जा सकती है लेकिन नाम मालूम हो जाता तो अच्छा रहता.’’

मेरा नाम अप्सरा है.’’ अपने एकएक शब्द में शहद घोलते हुए दूसरी ओर से युवती ने अपना परिचय दिया, ”मैं नाम की ही अप्सरा नहीं हूं, मेरा रूपयौवन इंद्र की अप्सरा को भी मात देने वाला है.’’

राघव उस के रूपयौवन की बात पर सिर से पांव तक रोमांच से भर गया. गैस बंद कर के वह पलंग पर आ कर बैठ गया. उस युवती की आवाज का जादू उस के सिर चढ़ कर बोलने लगा था. उसे लगा यह युवती दिलफेंक है और उस से दोस्ती करना चाहती है.

आप खामोश हो गए राघव बाबू. लगता है आप को मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है.’’

नहीं, ऐसी बात नहीं है अप्सराजी,’’ राघव जल्दी से बोला, ”आप कह रही हैं तो आप होंगी इंद्र की अप्सरा से भी हसीन, जवान. लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि आप मुझे कैसे जानती हैं. मेरा मोबाइल नंबर आप को किस ने दिया है और…’’

”आप जैसे हैंडसम बैचलर का नाम और मोबाइल नंबर को मालूम करना ही हमारा काम होता है मिस्टर राघव चड्ढाजी, हमें यह सब पता होगा तभी तो आप से मन की बात हो सकेगी.’’ राघव की बात काट कर अप्सरा ने मदहोश करने वाले अंदाज में कहा, ”मुझ से बात कर के आप सारे जहां का सुख पा लेंगे.’’

वाव! आप तो बहुत रोमांटिक मिजाज वाली हैं अप्सराजी, किंतु आप बातों से ही मन बहलाती हैं या इस से आगे भी जाने की कोशिश करती हैं. मेरा इशारा समझ रही हैं न आप?’’

मर्दों का चेहरा पढ़ कर उस के दिल की बात जान लेने की कला हर औरत को आती है राघव बाबू. आप के मन में जो कुछ है, वह मैं समझ रही हूं, लेकिन उस के लिए एक कीमत भी होती है और खुफिया जगह भी. खुफिया से मेरा मतलब है जहां बात परदे में ही रहे, न आप बदनाम हो न मैं.’’

जगह है मेरे पास.’’ राघव मस्ती से भर कर झट से बोला, ”मैं यहां अपने कमरे में अकेला रहता हूं. आप खुश हो जाएं, उस की कीमत भी मैं आप को दे दूंगा.’’

अप्सरा खिलखिला कर हंस पड़ी, ”बहुत उतावले हैं आप राघवजी. लेकिन कीमत मैं बिस्तर पर आने की ही नहीं, आप से रोमांटिक बातें करने की भी लूंगी.’’

कितना कीमत लेंगी आप?’’ राघव ने पूछा.

”बात करने की कीमत 15 मिनट के लिए केवल 250 रुपए. अगर मंजूर हो तो वीडियो काल औन कर सकते हैं.’’

राघव चड्ढा ने खुशी से कहा, ”आप से आमनेसामने रोमांटिक बात करने के लिए यह कीमत कुछ नहीं है अप्सराजी.’’

”तो आप एक हजार रुपए मेरे अकाउंट में डाल दीजिए, फिर मैं एक घंटे के लिए आप को अपने रेशमी जिस्म के वह गोपनीय हिस्से दिखाऊंगी, जो एक कुंवारे व्यक्ति ने केवल ब्लू फिल्म में ही देखे होते हैं.’’ 

अरे वाह! यह तो बहुत रोमांचकारी होने वाला है अप्सराजी. आप अपना अकाउंट नंबर बता दीजिए. मेरे दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं.’’ 

अप्सरा ने तुरंत अपना अकाउंट नंबर राघव के मोबाइल पर वाट्सऐप कर दिया. राघव ने पेटीएम से एक हजार रुपए उस अकाउंट में डाल दिए. अप्सरा की ओर से मुसकरा कर कहा गया, ”अब आप अपनी ओर से मुझ से वीडियो कालिंग कर सकते हैं.’’ अप्सरा से बात करने के बाद राघव की खोपड़ी भन्ना गई. वह अप्सरा से बोला, ”यार, मैं पहली बार सुन रहा हूं पुरुष का दिल बहलाने के लिए भी लड़कियां जौब करती हैं.’’ 

यह हकीकत है राघव.’’ अप्सरा का स्वर गंभीर हो गया, ”हमारी मजबूरी कुछ भी करा लेती है राघव. लेकिन मैं ने तुम से एक घंटे के लिए जो रुपए लिए हैं, वह मेरे पर्स में नहीं आएंगे. मैं ड्यूटी पर हूं, यह रुपए मालिक की पौकेट में जाएंगे. हां, अगर तुम अपने दिल से मुझे रात को अपने पास बुलाओगे तो वह मेरी अपनी कमाई होगी.’’ 

राघव कुछ क्षण सोचा फिर बोला, ”तुम शाम को फोन करना अप्सरा. अब तो तुम से मिलना बहुत जरूरी हो गया है. बाय…’’ कहने के बाद राघव ने काल डिसकनेक्ट कर दी. वह अजीब सी उथलपुथल मन में लिए पलंग पर लेट गया. दुनिया में क्याक्या खेल हो रहे हैं, जान लेने के बाद वह गहरी सोच में डूब गया था. उसे कब नींद आ गई. वह जान ही नहीं पाया.

उत्तर प्रदेश के महानगर गाजियाबाद के थाना शालीमार गार्डन में 5 जुलाई, 2024 को शाम के समय एक महिला घबराई हुई आई. महिला की उम्र 25-26 साल के आसपास की होगी. देखने मे वह खूबसूरत थी. उस का रंग गेहुआं था. साधारण साड़ीब्लाउज में वह मध्यम परिवार से लग रही थी. उस के साथ एक व्यक्ति भी था. वह शर्ट पतलून पहने हुए था. दाढ़ी के बाल सफेद थे, सिर में भी हलकी सफेदी झलक रही थी. यह व्यक्ति 32 वर्ष के करीब होगा. पांव में उस ने रबड़ की चप्पलें पहन रखी थीं.

हैडकांस्टेबल मलखान सिंह उस समय बाहर ही बैठा था. उस से उस महिला के साथ आए व्यक्ति ने झिझकते हुए कहा, ”हमें एक शिकायत करनी है. साहब कहां बैठते हैं?’’

आज एसएचओ साहब नहीं आए हैं. सामने के रूम में एसआई जितेंद्र सिंह मौजूद हैं, तुम उन से मिल लो.’’ हैडकांस्टेबल मलखान सिंह ने सामने का कमरा दिखाते हुए कहा. दोनों उस रूम की तरफ बढऩे लगे तो हैडकांस्टेबल मलखान सिंह यह जानने के लिए कि मामला क्या है, दोनों के पीछे एसआई जितेंद्र सिंह के कमरे में पहुंच गया. एसआई जितेंद्र सिंह महिला और साथ में आए व्यक्ति की ओर देख कर पूछ रहे थे, ”क्या हुआ है, तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’ 

मेरी जान को खतरा है साहब, वे लोग मुझे जान से मार डालने की धमकी दे रहे हैं.’’ महिला थरथराते लहजे में बोली. 

कौन लोग? किस से तुम्हारी जान को खतरा है?’’ एसआई सिंह हैरान हो कर बोले.

वे बहुत खतरनाक लोग हैं साहब.’’ महिला डरी आवाज मे बोली, ”तेजाब से मेरा चेहरा बिगाडऩे की धमकी दे रहे हैं.’’ 

मामला गंभीर लग रहा था. एसआई सिंह ने हैडकांस्टेबल मलखान को आंखों से इशारा किया. मलखान सिंह ने दोनों के करीब आ कर कहा, ”तुम दोनों बैंच पर बैठो. यह पुलिस थाना है, यहां डरने की कोई बात नहीं है. बैठो, मैं तुम्हारे लिए पानी लाता हूं.’’ 

दोनों बैंच पर बैठ गए. हैडकांस्टेबल दोनों के लिए पानी ले आया. पानी पी लेने के बाद महिला थोड़ा नारमल हुई. 

क्या नाम है तुम्हारा?’’ एसआई जितेंद्र सिंह ने पूछा.

मेरा नाम निकिता है, यह मेरे पति हैं, इन का नाम जितेंद्र यादव है.’’

कहां पर रहते हो जितेंद्र?’’

जी, राजनगर एक्सटेंशन, नंदग्राम नगर (गाजियाबाद) का निवासी हूं मैं. एक दुकान पर नौकरी करता हूं.’’ जितेंद्र यादव ने बताया.

तुम्हारी पत्नी निकिता को किस से जान का खतरा है?’’

यह खतरा इस ने खुद मोल लिया है साहब.’’ जितेंद्र के स्वर में अब खीझ थी, ”अच्छाभला घर के काम संभाल रही थी. मैं इतना कमा लाता हूं कि इसे घर से बाहर कदम निकालने की जरूरत ही न पड़े. लेकिन नहीं, 2 अक्षर क्या पढ़लिख गई, नौकरी करने का भूत सिर पर सवार हो गया. और मुसीबत मोल के आई अपनी जान को.’’

तुम कहां गई थी नौकरी करने के लिए? मुझे पूरी बात बताओ, वे कौन लोग हैं जो तुम्हारी जान लेना चाहते हैं और तुम्हारे मुंह पर तेजाब डालने की धमकी दे रहे हैं.’’ एसआई सिंह का स्वर गंभीर हो गया था.

निकिता अपने साथ घटी घटना का पूरा ब्यौरा चलचित्र की भांति सुनाने लगी.

सर, मैं इंटरमीडिएट तक पढ़ी हूं, पति की कमाई से मैं संतुष्ट नहीं थी. कारण, इतनी महंगाई में कम तनख्वाह में गुजारा तो हो रहा था, किंतु भविष्य के लिए कुछ बचता नहीं था. बहुत सोचविचार कर के मैं ने अपना रिज्यूम जौब हैएप्लीकेशन पर डाल दिया.

पहली जुलाई 2024 को मुझे मेरे मोबाइल पर एक काल आई. हैलो निकिता, आप ने जौब है ऐप पर अपना रिज्यूम डाला है, क्या आप अच्छी नौकरी करना चाहती हैं?’’

हां सर, लेकिन पहले यह बताइए आप कौन हैं?’’

मैं एक फाइनैंस कंपनी का एमडी रविंदर कुमार हूं. मेरी कंपनी में आप के लिए फाइनैंस एडवाइजर का पद खाली है, आप को यह जौब मैं दे सकता हूं.’’

मैं ने केवल इंटर किया है सर, मेरी इंगलिश भी कमजोर है. मैं यह जौब कैसे कर पाऊंगी.’’ निकिता ने सच्चाई बयां करते हुए कहा, ”आप की कंपनी में कोई दूसरा काम हो तो बताइए.’’

आप तो डर रही हैं, भाई मेरे यहां सारा काम हिंदी में ही होता है. हम भारतीय हैं निकिताजी, अंगरेज नहीं. फिर क्यों अंगरेजी की टांग अपने काम में घसीटें, आप बेफिक्र रहिए. आप फाइनैंस एडवाइजर का काम बखूबी कर लेंगी. मैं सैलरी भी 30 हजार से ऊपर दूंगा आप को.’’

”30 हजारï…’’ निकिता खुशी से उछल पड़ी, ”बताइए रविंदरजी, मैं कब से यह जौब जौइन करूं?’’

आज पहली जुलाई है, मैं कंपनी के काम से कोलकाता जा रहा हूं. 2 दिन का टूर है मेरा. मैं आज रात को फ्लाइट पकड़ूंगा और 3 जुलाई को फ्लाइट से वापस आ जाऊंगा. आप 4 जुलाई को मुझ से मिल कर अपना जौइनिंग लेटर ले लेना. उसी दिन से आप की सैलरी शुरू हो जाएगी.’’

धन्यवाद सर,’’ निकिता अपनी खुशी छिपाने की कोशिश करती हुई बोली, ”मुझे कहां आना होगा सर?’’

आप सुबह 10 बजे मुझे डीएलएफ के पास बस स्टाप पर मिलना, मैं आप को अपने औफिस ले जाने के लिए खुद वहां आ जाऊंगा. याद रहेगा न 4 जुलाई 10 बजे.’’

याद रहेगा सर. मैं ठीक समय पर आप को मिल जाऊंगी.’’ निकिता ने कहा.

दूसरी ओर से फोन कट गया तब निकिता खुशी से पूरे घर में नाचती रही. शाम को उस का पति जितेंद्र काम से लौटा तो निकिता ने उस के गले में प्यार से हाथ डाल कर चहकते हुए कहा, ”आप मुझे मना करते रहे, देख लो मुझे एक फाइनैंस कंपनी में फाइनैंस एडवाइजर की शानदार जौब मिल गई है. सैलरी जानते हो कितनी मिलेगी? पूरे 30 हजार रुपए.’’

”30 हजार…’’ जितेंद्र हैरत से बोला, ”अब हमारी गरीबी दूर हो जाएगी निकिता.’’

”जी हां,’’ निकिता मुसकराई, ”एक महीने की सैलरी मुझे मिल जाएगी तो तुम काम छोड़ देना, घर संभालना. मैं कमा कर लाऊंगी, तुम्हें घर संभालना होगा.’’

उड़ो मत निकिता, हम दोनों कमाएंगे. दोनों मिल कर घर को संभाल लेंगे. चलो, अब अपने हाथ से गरमागरम चाय बना कर पिलाओ मुझे.’’ जितेंद्र ने कहा और हाथमुंह धोने बाथरूम में चला गया.

निकिता 3 दिन बाद 4 जुलाई को सजसंवर कर ठीक 10 बजे डीएलएफ के बस स्टाप पर पहुंच गई. थोड़ी ही देर में एक सांवले रंग का युवक बाइक पर वहां आ गया.

निकिता?’’ उस ने अपने चेहरे से सुनहरी फ्रेम का चश्मा उतारते हुए निकिता की ओर देखा.

जी हां, मैं निकिता हूं.’’ निकिता उस युवक की ओर बढ़ते हुए मुसकरा कर बोली, ”आप ही रविंदर हैं?’’

युवक ने सिर हिलाया. निकिता ने दोनों हाथ जोड़ कर रविंदर को नमस्ते की. रविंदर ने उसे बाइक पर बैठने का इशारा किया तो वह उचक कर बैठ गई. रविंदर उसे राजेंद्र नगर ले कर गया. 

यहां 11/186, सेक्टर-3 के फस्र्ट फ्लोर पर उस का औफिस था. औफिस में उस समय शानदार कुरसियों पर एक युवा लड़की और एक युवक बैठे हुए थे. अंदर दूसरे रूम में 4-5 युवतियां भी थीं, जो कानों पर हेडफोन लगाए किसी से बातें करती नजर आ रही थीं.

बैठो निकिता.’’ रविंदर ने उस के लिए एक कुरसी बढ़ाई तो निकिता सकुचाती हुई बैठ गई.

यह है तुम्हारा औफिस. तुम्हें यहां बैठ कर काम करना है,’’ रविंदर ने मुसकरा कर कहा, ”मैं तुम्हें पूरे 30 हजार रुपए दूंगा, लेकिन तुम एक महीना ठीक काम कर पाओ, इस की मुझे गारंटी चाहिए.’’

मैं पूरी लगन से काम करूंगी सर, इतनी अच्छी नौकरी को मैं नहीं छोडऩे वाली.’’ निकिता ने दृढ़ स्वर में अपनी बात कही.

फिर भी मुझे विश्वास करने के लिए 25 हजार रुपए तुम से चाहिए. ये रुपए तुम्हारे मेरे पास जमा रहेंगे, मुझे जब विश्वास हो जाएगा कि तुम अब काम नहीं छोड़ोगी तो मैं 25 हजार रुपए वापस कर दूंगा.’’

”25 हजार?’’ निकिता कुछ क्षण के लिए गहरी सोच में डूब गई. फिर सामान्य हो कर बोली, ”मेरे पास 25 हजार रुपए हैं, लेकिन मैं पेटीएम कर सकती हूं सर.’’

ठीक है.’’ रविंदर खुश हो कर बोला. उस ने अपना क्यूआर कोड दिखा दिया.

निकिता ने अपने मोबाइल से 25 हजार रुपए रविंदर को पेटीएम कर दिए. संतुष्ट होने के बाद रविंदर अपनी कुरसी को सरका कर उस के करीब आ गया.

अब अपना काम समझ लो निकिता, यहां कोई फाइनैंसवाइनैंस का काम नहीं होता. तुम्हें यहां बैठ कर युवकों से न्यूड चैटिंग करनी होगी, न्यूड चैटिंग.’’ 

निकिता चौंक कर बोली, ”यह तो अच्छा काम नहीं है सर, मैं यह नहीं कर सकती.’’

”पूरी बात सुन लो.’’ रविंदर बेशरमी से बोला, ”तुम्हें युवकों को खुश करने के लिए वीडियो कालिंग पर अपने इस खूबसूरत जिस्म को नंगा भी करना पड़ेगा. युवकों से 10 मिनट की चैटिंग के बदले 200 रुपए लोगी तुम.’’

नहीं, मैं यह काम हरगिज नहीं करूंगी.’’ निकिता गुस्से से अपनी जगह पर खड़ी हो गई.

वहां बैठी युवती जिस का नाम पूजा था, वह उठ कर उस के पास आ खड़ी हुई, ”देखो निकिता, तुम प्यार से इस काम को करने की हां कर दो, नहीं तो तुम्हारी हां करवाने के दूसरे रास्ते भी हैं हमारे पास.’’ 

”क्या करोगी तुम?’’ निकिता गुस्से से चीखी, ”मैं यह गलीज काम नहीं करूंगी.’’

”तेरा तो बाप भी करेगा.’’ वहां बैठा विवेक नाम का युवक तमतमा कर अपनी कुरसी से उठा, ”मना करेगी तो यहीं तुझे नंगा कर के अश्लील वीडियो बना लूंगा और तेरे पति को भेज दूंगा.’’

नहीं.’’ निकिता भय से चीखी, ”तुम ऐसा नहीं करोगे. रविंदर उसे समझाओ, यह क्या बकवास कर रहा है.’’

यह सब कुछ करेगा निकिता. तुम्हें काम के लिए राजी करवाने के लिए यह हर हथकंडा अपनाएगा. मना कर के यहां से चली भी गई तो तुम्हारा यह खूबसूरत थोबड़ा, जिस पर तुम्हें नाज है, यह तेजाब से बिगाड़ देगा. यह तुम्हें कत्ल भी करने की हिम्मत रखता है.’’ रविंदर बेशरमी से बोला, ”तुम चुपचाप हां कर दोगी तो यह शांत बैठ जाएगा.’’

निकिता समझ गई थी, वह गलत लोगों के जाल में फंस गई है. वह धम्म से कुरसी पर बैठ गई और गहरीगहरी सांसें लेने लगी. थोड़ी देर बाद वह संयत हो कर बोली, ”मैं यह काम करूंगी रविंदर, लेकिन आज से नहीं. मैं बहुत नरवस हो गई हूं, मैं कल 10 बजे यहां फ्री माइंड हो कर आ जाऊंगी. प्लीज रविंदर, मेरा विश्वास करो, मुझे एक दिन का समय दे दो, खुद को इस काम के लिए तैयार होने के लिए.’’

ठीक है, आज तुम जाओ. लेकिन कल ठीक 10 बजे यहां आ जाना. नहीं आई तो विवेक तेजाब ले कर तुम्हारे घर पहुंच जाएगा.’’ रविंदर ने धमकी देते हुए कहा, ”कल 10 बजे मैं तुम्हें यहां देखना चाहता हूं.’’ 

मैं आऊंगी रविंदर सर.’’ निकिता जल्दी से बोली, ”मैं अपना चेहरा खराब नहीं करवाना चाहती.’’

जाओ.’’ रविंदर ने जैसे ही कहा मैं सिर पर पांव रख कर भागी. गिरतेपड़ते मैं किसी तरह घर पहुंची. शाम को मेरे पति काम से लौटे तो मैं ने इन्हें सारी बात बताई. यह घबरा गए. हम दोनों रात के अंधेरे में घर छोड़ कर गांव भाग गए. 

एक सप्ताह से हम वहां छिप कर रह रहे थे, लेकिन हम ने सोचा ऐसे कब तक छिपेंगे. पति का काम भी छूट जाएगा. हिम्मत कर के आज हम थाने में अपनी शिकायत लिखवाने आए हैं, सर! आप हमारी रिपोर्ट लिख कर उस बदमाश को गिरफ्तार कर लीजिए.’’

तुम अब हमारी सुरक्षा में हो, हम आज रात को ही रविंदर और उस के सहयोगियों को गिरफ्तार कर लेंगे.’’ एसआई जितेंद्र सिंह ने कहते हुए पास में खड़े हैडकांस्टेबल मलखान की ओर देखा, ”मलखान, तुम इन से लिखित शिकायत ले कर एफआईआर दर्ज कर लो, मैं एसीपी साहब से बात करता हूं.’’

ठीक है सर.’’ हैडकांस्टेबल ने सिर हिलाया और निकिता तथा जितेंद्र को ले कर रिसैप्शन रूम में आ गया.

निकिता से लिखित शिकायती पत्र ले कर उसे भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 56, 79, 351 (3), 352 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज कर ली. एसआई जितेंद्र सिंह ने डीसीपी सिद्धार्थ गौतम को फोन पर सारा मामला बता दिया. डीसीपी ने एसीपी सिद्धार्थ गौतम के नेतृत्व में एक टीम का गठन कर दिया. इस टीम ने दूसरे दिन 5 जुलाई को निकिता के द्वारा बताए गए सेक्टर-3, राजेंद्र नगर के फ्लैट 1/186 की फस्र्ट फ्लोर पर दबिश दी. पुलिस ने यहां न्यूड चैटिंग का धंधा करने वाले रविंदर, उस के साथी विवेक और पूजा सक्सेना को गिरफ्तार कर लिया गया.

अंदर के रूम में 5 युवतियां भी थीं, जो रविंदर के इस न्यूड चैटिंग धंधे में मजबूरी से शामिल हुई थीं. वे वहां से मोबाइल द्वारा विडियो काल पर युवकों से अश्लील बातें करती थीं, उन्हें उन युवकों को ज्यादा वक्त तक बातों में उलझाने के लिए अपने तन को निर्वस्त्र करने में भी संकोच नहीं होता था. जितना वक्त वह युवकों को बातों में उलझाती थी, उतनी ही कमाई होती थी. युवकों से दस मिनट अश्लील चैटिंग करने को 200-250 रुपया वसूला जाता था.

इस न्यूड चैटिंग गिरोह का सरगना रविंदर कुमार, राजबाग, साहिबाबाद का निवासी है. अपनी एक महिला मित्र के कहने पर उस ने अश्लील न्यूड चैटिंग का काम शुरू किया था. वह जौब एप्लीकेशन वेबसाइट से मैरिड, अनमैरिड युवतियों, औरतों के रिज्यूम लेता था. फिर उन युवतियों को फाइनैंस एडवाइजर या लोन एजेंट की जौब के लिए अच्छी सैलरी का लालच दे कर अपने औफिस में बुलाता था. बाद में उन्हें धमका कर या लालच दे कर युवकों से न्यूड हो कर चैटिंग करने के काम पर लगा लेता था. 

उन युवतियों ने बताया कि वह ऐसा करने के लिए उन्हें डरायाधमकाया गया था. मजबूरी में वह यह गलत काम कर रही थीं. इन पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 56, 79, 351 (3), 352 लगाई गई. सभी को सक्षम न्यायालय में पेश कर के रविंदर, विवेक और पूजा सक्सेना को जेल भेज दिया गया. शेष 5 युवतियों को चेतावनी दे कर उन के परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया. रविंदर पहले वाहन इंश्योरेंस और एआरटीओ कार्यालय से लाइसेंस व अन्य कागजात बनाने का काम करता रहा है. उस ने यह न्यूड चैटिंग का धंधा करने के लिए डीएलएफ राजेंद्र नगर का वह फ्लैट 16,500 में किराए पर ले रखा था. कथा लिखने तक पुलिस उस के खिलाफ सबूत जुटाने का काम कर रही थी, ताकि उसे सख्त सजा दिलाई जा सके.

कथा में राघव चड्ïढा, अप्सरा, निकिता और जितेंद्र यादव परिवर्तित नाम हैं.

तंत्र साधना के लिए काटा दोस्त का सिर

तथाकथित तांत्रिक परमात्मा तंत्र साधना से अपार दौलत पाने का दावा करता था. इस के लिए उस ने अपने दोस्तों विकास और धनंजय से किसी इंसान का कटा सिर लाने को कहा. 5 लाख रुपए के लालच में विकास और धनंजय अपने दोस्त राजू कुमार की हत्या कर उस का सिर काट कर तांत्रिक परमात्मा के पास ले गए. तांत्रिक ने उस खोपड़ी पर 7 दिनों तक तंत्रमंत्र क्रियाएं कीं. यह सब करने के बाद क्या उन्हें दौलत मिल सकी?

सड़क किनारे जंगल में सुबह करीब साढ़े 6 बजे कुछ लोगों की नजर एक लाश पर गई. उस लाश का सिर कटा हुआ था. इस के बाद जो भी उधर से गुजर रहा था, लाश को देखने लगा. उसी दौरान किसी ने इस की सूचना गाजियाबाद के थाना टीला मोड़ पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. पुलिस ने देखा कि पेड़ों के बीच एक सिरकटी लहूलुहान लाश पड़ी है. युवक की उम्र करीब 29-30 वर्ष थी. शव के धड़ से सिर गायब था, जबकि शरीर के शेष अंग मौजूद थे. 

सूचना पर पहुंची पुलिस ने डौग स्क्वायड को भी बुला लिया. टीम ने जांचपड़ताल की. मृतक की नारंगी रंग की शर्ट खून से सनी थी, जबकि वह काला सफेद व लाल पट्टी का लोअर पहने हुआ था. पुलिस ने आसपास के क्षेत्र में उस का सिर तलाशा, लेकिन सिर नहीं मिला. एसीपी सिद्धार्थ गौतम भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस को शव के पास एक गद्दी का कवर भी खून से सना मिला. पुलिस ने शव की पहचान कराने का प्रयास किया, लेकिन  कोई भी उस की शिनाख्त नहीं कर सका. मौके की जांच करने के बाद ऐसा लग रहा था कि उस युवक की हत्या कहीं और करने के बाद शव वहां डाला गया था. 

पुलिस टीम को मृत युवक के दाहिने हाथ पर कुछ लिखा मिला, जो समझ में नहीं आ रहा था. इस के अलावा बाएं हाथ पर किसी नुकीली चीज से काटने के निशान थे. दोपहर को फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंची और जांच की, लेकिन कोई अहम सुराग नहीं मिला. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. यह घटना गाजियाबाद जिले के टीला मोड़ थाने से करीब एक किलोमीटर दूर लोनी भोपुरा इलाके में 22 जून, 2024 को घटी थी.

डीसीपी (ट्रांस हिंडन) निमिष पाटिल ने इस केस को सुलझाने के लिए एसीपी सिद्धार्थ गौतम के निर्देशन में 6 पुलिस टीमों का गठन किया. सभी टीमें अपनेअपने काम में जुट गईं. पुलिस टीमों ने इस सनसनीखेज वारदात के खुलासे के लिए घटनास्थल के निकट के इलाके को खंगालना शुरू किया. पुलिस ने दिल्ली के 161 थानों से भी लापता व्यक्तियों के बारे में जानकारी हासिल की, लेकिन उन थानों में इस हुलिए के किसी युवक की गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. 

पुलिस टीम को हाथ पर बने टैटू से सुराग मिलने की संभावना थी. जांच के दौरान टीम ने दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के आसपास के थानों में भी दर्ज गुमशुदगी के रिकौर्ड खंगालने शुरू कर दिए, लेकिन पुलिस को कुछ हासिल नहीं हुआ. पुलिस ने मृतक की फोटो लगे पैंफ्लेट गाजियाबाद और दिल्ली के सार्वजनिक स्थानों पर चस्पा कर दिए थे. उन्हीं पैंफ्लेट को देख कर दिल्ली के ताहिरपुर का रहने वाला गणेश थाना टीला मोड़ पहुंचा.

उस ने पुलिस को बताया कि उस के साले का 29 साल का बेटा राजू कुमार अचानक 15 जून, 2024 को लापता हो गया. राजू बिहार के मोतिहारी जिला के पिपरा थाना का निवासी था. राजू के मातापिता का निधन हो चुका है. वह उन के साथ ही दिल्ली में ताहिरपुर में रहता था. राजू चाटपकौड़ी का ठेला कमला मार्केट में लगाता था. रात तक जब वह घर वापस नहीं आया, तब उन्हें चिंता हुई. अब सवाल था कि राजू बिना बताए कहां गायब हो गया? उन्होंने इस की संबंधित पुलिस थाने में जा कर शिकायत की, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज नहींं की और जांच का आश्वासन दे कर घर लौटा दिया था. 

हत्यारों तक कैसे पहुंची पुलिस

पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों को खंगालना शुरू किया. शुरुआती छानबीन के दौरान तुलसी निकेतन में एक बहुमंजिला इमारत की आठवीं मंजिल पर लगे सीसीटीवी कैमरे में एक धुंधली फुटेज हाथ लगी, जिस में एक आटो की हैड व टेल लाइट और पीछे लाल रंग के 2 ट्रायंगल रिफ्लेक्टर नजर आए थे. अब पुलिस ने उस आटो को तलाशना शुरू कर दिया. इस दौरान पुलिस सैकड़ों आटो चैक किए. पुलिस की डेढ़ महीने की मेहनत आखिर रंग लाई और पुलिस ने धुंधली फुटेज से तसवीर साफ कर उस आटोचालक के पास पहुंच गई और उस के आटो को बरामद कर लिया. पुलिस उसी आटो के आधार पर आरोपियों तक जा पहुंची.

आगे की जांच करते हुए पुलिस ने बिहार के मोतिहारी से हत्याकांड में शामिल 2 आरोपियों को 16 अगस्त, 2024 को गिरफ्तार कर लिया. इन में 24 वर्षीय विकास उर्फ मोटा निवासी गली नंबर-1,  ताहिरपुर, दिल्ली तथा उस का साथी 28 वर्षीय धनंजय निवासी कमला मार्केट, दिल्ली जो मूलरूप से हुसैनी, थाना डुमरिया घाट जिला मोतिहारी, बिहार का निवासी है, शामिल थे. जबकि तीसरा मुख्य आरोपी  विकास उर्फ परमात्मा निवासी मोतिहारी बिहार फरार हो गया. 

पता चला कि वह पुलिस से बचने के लिए नेपाल भाग गया है. इस वीभत्स हत्याकांड का खुलासा पुलिस ने घटना के पौने 2 माह बाद आखिर कर दिया. आरोपियों से पूछताछ के बाद जो कहानी सामने आई, उसे सुन कर पुलिस वालों के भी रोंगटे खड़े हो गए. पता चला कि तीनों दोस्तों ने तंत्रमंत्र के जरिए अमीर बनने के लिए राजू नाम के युवक की हत्या कर दी थी. पुलिस ने गिरफ्तार दोनों हत्यारोपियों के कब्जे से आलाकत्ल छुरियां, आटोरिक्शा, ईरिक्शा आदि बरामद कर लिए.

5 लाख के लालच में काटा सिर

आरोपी विकास उर्फ मोटा अपने मामा मुन्ना निवासी गोकुलधाम सोसाइटी शालीमार गार्डन, गाजियाबाद का आटो किराए पर ले कर चलाता था. कुछ महीने पहले उस की मुलाकात धनंजय से हुई थी. धनंजय नई दिल्ली के कमला मार्केट निवासी अपने मामा रंजीत और रणधीर साहनी के पास रह कर खाना बनाने का ठेला लगाता था. विकास उर्फ मोटा धनंजय के ठेले पर खाना खाने के लिए आता था. इस के चलते उस की उस से दोस्ती हो गई. उसी के माध्यम से धनंजय की परमात्मा से मुलाकात हुई. परमात्मा ईरिक्शा चालक था. वह कमला मार्केट के पास किराए के कमरे में रहता था. वह इन दोनों से तंत्रमंत्र विद्या और टोनेटोटके से रुपए कमाने के साथ ही सब कुछ हासिल करने की बात कहता रहता था.

परमात्मा ने धनंजय और विकास को एक दिन बताया कि वे तंत्र विद्या के जरिए बहुत पैसा कमा सकते हैं. उसे तंत्र विद्या करनी आती है. एक दिन तुम दोनों को भी बहुत पैसे मिलेंगे. परमात्मा ने दोनों को जल्द अमीर बनने का सपना दिखाया. उस ने कहा कि इस के लिए एक काम करना होगा. तुम दोनों को ऐसे अनाथ व्यक्ति की तलाश करनी होगी, जिस की हत्या कर के उस की खोपड़ी काटने के बाद उस खोपड़ी पर तंत्र क्रिया की जा सके. परमात्मा ने धनंजय से अनाथ युवक को तलाश करने के लिए 5 लाख रुपए देने का लालच भी दिया. 

रुपयों के लालच में धनंजय और विकास उर्फ मोटा एक साथ ऐसे युवक की तलाश करने लगे. इस दौरान धनंजय ने अपने पड़ोसी और दोस्त राजू कुमार, जो उस के साथ ही चाटपकौड़े का ठेला लगाता था, को निशाना बनाने के लिए अपने जाल में फंसाना शुरू कर दिया. राजू नशा करने का आदी था. इस का धनजंय और विकास ने फायदा उठाया. कई दिनों तक विकास और धनंजय ने राजू के साथ शराब पी. 15 जून, 2024 को दोनों राजू को शराब का लालच दे कर तथाकथित तांत्रिक परमात्मा के कमरे पर ले गए. वहां 6 दिन तक उसे शराब पिलाते रहे. उसे घर तक नहीं जाने दिया. सातवें दिन यानी 21-22 जून की दरमियानी रात को राजू की उन्होंने गमछे से गला दबा कर हत्या कर दी. इस के बाद शव को पंखे से लटका दिया. 

शव को छिपाने के लिए तीनों ने रात करीब ढाई बजे विकास उर्फ मोटा के आटो में शव को रखा और टीला मोड़ थाना क्षेत्र की पंचशील कालोनी ले कर गए. पुलिस द्वारा पकड़े जाने के डर से उन्होंने आटो को एक सुनसान जगह पर सड़क किनारे खड़ा किया और मीट काटने वाली छुरी से राजू का सिर काट कर अलग कर दिया. फिर उस के धड़ को जंगल में फेंक  दिया. तीनों ने राजू के कटे सिर को प्लास्टिक की बाल्टी में रखा और आटो में बैठ कर वापस दिल्ली आ गए.

कटे सिर पर 7 दिनों तक करते रहे तंत्रक्रिया

हत्या करने के बाद तीनों आरोपियों ने हैवानियत की सभी हदें पार कर दीं. परमात्मा के दिल्ली के कमला मार्केट स्थित कमरे पर चाकू से उन्होंने उस की आंखें निकालीं, फिर नाक, कान काट कर खोपड़ी की पूरी तरह खाल उतार दी. राजू की खोपड़ी के साथ परमात्मा ने काला टीका लगा कर व काले कपड़े पहन कर तंत्र साधना शुरू की. उस ने मानव खोपड़ी पर तंत्रमंत्र विद्या से पैसे कमाने का तरीका आजमाया. वह कुछ घंटे प्रयास के बावजूद सफल नहीं हुआ. लेकिन उस ने हार नहीं मानी और लगातार 7 दिनों तक वह तंत्र साधना करता रहा, फिर भी उसे कुछ हासिल नहीं हुआ.  

इस के बाद उस ने अपने दोनों साथियों से कहा कि खोपड़ी पर चोट का निशान है. यह क्रैक हो गई है. इसलिए यह खोपड़ी तंत्र साधना के लायक नहीं है. तुम लोगों को दूसरी मानव खोपड़ी लानी होगी. खोपड़ी को 7 दिनों तक कमरे में रखने से दुर्गंध आने लगी थी, तब तांत्रिक परमात्मा खोपड़ी ले कर भाग गया और उसे दिल्ली में जीटीबी अस्पताल के पास नाले में फेंक आया. अस्पताल के नाले में खोपड़ी को फेंकने की बात उस ने अपने दोनों साथियों को बताई.

आंखें निकाल कर खेले कंचे

इस घटना से 1994 की फिल्म अंदाज अपना अपनाकी याद आ जाती है. इस फिल्म में क्राइम मास्टर गोगो के किरदार में शक्ति कपूर का फेमस डायलौग था, आंखें निकाल कर गोटियां खेलूंगा.’ इन आरोपियों ने इस डायलौग को हकीकत में बदल दिया. तंत्रमंत्र क्रिया के दौरान राजू के कटे सिर से आंखें निकालने के बाद उन से तांत्रिक क्रिया करते हुए कंचे (गोटियां) भी खेले. इस बात की जानकारी पकड़े गए दोनों आरोपियों धनंजय व विकास उर्फ मोटा ने पुलिस को दी. 5 लाख रुपए का लालच दे कर परमात्मा ने जिंदा मानव की खोपड़ी लाने की बात कह कर एक निर्दोष युवक की हत्या करा दी. इस हत्याकांड का खुलासा करने व आरोपियों को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम को पुलिस कमिश्नर (गाजियाबाद) अजय कुमार मिश्र की ओर से 25 हजार रुपए का तथा डीसीपी (ट्रांस हिंडन) निमिष पाटिल की ओर से 10 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की गई है. 

पुलिस पूछताछ में विकास और धनंजय ने बताया कि मुख्य आरोपी परमात्मा ने राजू की खोपड़ी को दिल्ली में जीटीबी अस्पताल के नाले में फेंक दिया था. उस के साथ उस की आंखें, नाक, कान और बाल भी थे.  इस तथ्य के सामने आने के बाद टीला मोड़ पुलिस ने दिल्ली पुलिस की मदद से नाले की सफाई कराई, लेकिन कई घंटे के प्रयास के बाद भी टीम को सफलता नहीं मिली. एसीपी सिद्धार्थ गौतम ने बताया, परमात्मा ने अपने एक परिचित के पास अपना ईरिक्शा 35 हजार रुपए में गिरवी रख दिया था. उस के बाद वह अपना मोबाइल बंद कर फरार हो गया. 

राजू कुमार की हत्या के बाद दोनों हत्यारोपी धनंजय और विकास एकदूसरे से मिलते थे. दोनों ने इस बीच परमात्मा से भी मिलने का प्रयास किया, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. पुलिस ने यदि मृतक राजू कुमार के फूफा गणेश की बात को गंभीरता से लेते हुए 15 जून, 2024 को राजू के लापता होने पर उन के द्वारा शिकायत करने पर राजू की गुमशुदगी दर्ज कर तलाश शुरू कर दी होती तो शायद राजू की जान बच सकती थी. क्योंकि उस की हत्या 21-22 जून की रात को की गई थी. ये लालच था जल्दी अमीर बनने का और इस लालच ने एक निर्दोष दोस्त को ऐसी मौत दी, जिसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. पैसे पाने का सपना पाले हत्यारे दोस्तों के हाथ यहीं नहीं कांपे, उन्होंने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं. इन के इस जघन्य अपराध ने दोस्ती को भी शर्मसार कर दिया. 

पुलिस ने दोनों आरोपियों विकास उर्फ मोटा और धनंजय को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. वहीं पुलिस मुख्य आरोपी काला जादू करने वाले तथाकथित तांत्रिक परमात्मा की तलाश में जुटी थी. अपनी किस्मत बदलने की चाहत में एक निर्दोष को बलि का बकरा उस के ही वहशी बने दोस्तों ने बनाया. लेकिन तंत्र साधना के चक्कर में पड़ कर दोस्त की जान लेने पर भी उन्हें धन तो नहीं मिला. हां, जेल की सलाखों के पीछे जरूर जाना पड़ा.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित