निशा के जीवन की रक्तिम रात – भाग 3

जितेंद्र सुबह 9 बजे घर से निकलता तो उस की घर वापसी रात 12 बजे से पहले नहीं होती थी. एक दिन अचानक तबीयत खराब हुई तो जितेंद्र शाम 5 बजे ही घर जा पहुंचा. जब वह अपने घर पहुंचा, कमरे के अंदर से निशा की खिलखिलाहट सुनाई दी. जितेंद्र के पैर जहां के तहां ठिठक गए. वह मन ही मन सोचने लगा कि जब मैं घर में होता हूं तो निशा की त्यौरियां चढ़ रहती हैं. कुछ कहता हूं तो चिढ़ जाती है. कहीं वजह इस खिलखिलाहट में ही तो नहीं छिपी.

जितेंद्र का माथा ठनका. उस ने कदम बढ़ाया, लेकिन फिर पीछे खींच लिया. निशा कह रही थी, ‘‘तुम्हारे जोश की तो मैं दीवानी हूं. अरे छोड़ो यार, तुम किस लल्लू का जिक्र कर रहे हो. कहां तुम कहां वह. पति किसी लायक होता तो तुम से क्यों दिल लगाती.’’

निशा किस से बात कर रही थी, यह तो नहीं पता चला लेकिन वह यह जरूर समझ गया कि निशा खुश भी है और जोश में भी. उस की आवाज फिर सुनाई दी. वह कह रही थी, ‘‘तुम्हारे इसी जोश की तो मैं दीवानी हूं.’’

एकतरफा संवाद से जितेंद्र ने अनुमान लगाया कि कमरे में निशा के अलावा कोई और नहीं है. वह मोबाइल पर किसी से रसीली बातें कर रही होगी. जितेंद्र की खोपड़ी घूम गई. निशा बीवी उस की थी और जोश का गुणगान किसी दूसरे का कर रही थी. गुस्से में उस ने दरवाजे को धक्का दिया. भीतर से बंद न होने के कारण दरवाजा खुल गया.

सामने ही निशा कान से मोबाइल लगाए टहलते हुए किसी से बातें कर रही थी. पति को देखते ही हड़बड़ा कर उस ने मोबाइल डिसकनेक्ट कर दिया. निशा ने चेहरे पर मुसकान सजाने की जबरन कोशिश करते हुए कहा, ‘‘अरे तुम, आज इतनी जल्दी आ गए?’’

‘‘यह जानने के लिए कि तू किस के जोश की दीवानी है.’’ जितेंद्र ने लपक कर निशा के हाथ से मोबाइल छीन लिया.

फोन का काल लौग चैक करने पर जितेंद्र ने पाया कि निशा जिस नंबर पर बात कर रही थी, वह होटल के मैनेजर विकास का था. वही विकास जिसे उस ने ही नौकरी पर रखा था. जितेंद्र का दिमाग पहले से गरम था, अब और भी गरम हो गया. उस ने निशा की कनपटी पर जोरदार थप्पड़ जड़ा और उसे धाराप्रवाह गालियां देने लगा.

निशा विकास के जोश की तारीफ करते रंगेहाथ पकड़ी गई थी, इसलिए उस के पास सफाई में कहने को कुछ नहीं था. निशा की खामोशी उस के गुनाह का इकरार था. पलपल जितेंद्र का क्रोध बढ़ता गया. उस ने निशा को लात, घूसों और थप्पड़ों से खूब धुना. हर प्रहार के साथ उस का प्रश्न होता था, ‘‘बता, तू विकास के जोश की दीवानी क्यों और कैसे हुई? कब से चल रहा है ये सब?’’

पति के तेवर देख निशा समझ गई कि जान बचानी है तो सच उगलना ही पड़ेगा. अंतत: उस ने पिटते पिटते रोते और सिसकते हुए अपने पतन की पूरी कहानी बयान कर दी. साथ ही दोबारा गलती न करने का वादा भी किया.

निशा को मारपीट कर जितेंद्र होटल पहुंचा तो विकास उसे काउंटर पर ही मिल गया. उसे देखते ही जितेंद्र आपा खो बैठा. वह विकास को घसीटते हुए कमरे में ले गया और बोला, ‘‘मैं ने तुझ पर तरस खा कर नौकरी दी और भरोसा कर के तुझे घर जाने की छूट दी. लेकिन तूने मेरी ही इज्जत पर डाका डाल दिया. मैं तुझे आज और इसी वक्त नौकरी से निकाल रहा हूं. आज के बाद तू न तो होटल में नजर आएगा और न ही मेरे घर के आसपास.’’

पत्नी की बेवफाई से टूट गया जितेंद्र

विकास समझ गया कि किसी तरह उस के और निशा के नाजायज संबंधों की जानकारी जितेंद्र को हो गई है. वह वहां से चला गया. इस घटना के बाद निशा और विकास का मिलन बंद हो गया. लेकिन विकास के प्यार में पागल निशा ज्यादा दिनों तक उस से दूर नहीं रह सकी. उस ने फिर से विकास से संपर्क बना लिया. इस के बाद दोनों का फिर से शारीरिक मिलन होने लगा. यह अलग बात थी कि अब उन का मिलन घर के बजाए बाहर होता था.

इधर पत्नी की बेवफाई से जितेंद्र बुरी तरह टूट गया था. वह शराब तो पहले भी पीता था. लेकिन अब कुछ ज्यादा ही पीने लगा था. होटल से वह रात 12 बजे नशे में धुत हो कर घर आता और कभी खाना खा कर तो कभी बिना खाए ही बैड पर पसर कर सो जाता. नाजायज रिश्तों को ले कर अब निशा और जितेंद्र में अकसर झगड़ा होने लगा था. कभीकभी झगड़ा इतना बढ़ जाता था कि जितेंद्र निशा की पिटाई कर देता. बाद में निशा पूरे दिन सिसकियां भरती रहती.

बन गई खतरनाक योजना

रोजरोज के झगड़े व पिटाई से तंग आ कर एक दिन निशा ने एकांत में विकास से मुलाकात की और उस से बोली, ‘‘विकास, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती. जितेंद्र हम दोनों के मिलन में बाधक है. इस बाधा को दूर कर दो. अगर किसी दिन उस ने हम दोनों को रंगेहाथ पकड़ लिया तो हमारी जान ही ले लेगा.’’

‘‘आप कहना क्या चाहती हैं भाभी,  साफसाफ बताओ.’’ विकास ने निशा के चेहरे पर नजरें गड़ा दीं.

‘‘यही कि जितेंद्र को रास्ते से हटा दो. उस की करोड़ों की जायदाद है, हम दोनों मौज करेंगे.’’

‘‘यह पाप है भाभी.’’ मरने मारने की बात से विकास हड़बड़ा गया.

‘‘जब तू मेरे शरीर से खेलता है, तब तुझे पाप दिखाई नहीं देता. बड़ा आया पाप पुण्य वाला.’’ निशा का बातचीत का अंदाज ही बदल गया, ‘‘मैं ने तो सुना था कि प्रेमी अपनी प्रेमिका को पाने के लिए एक कत्ल तो क्या, खून की नदी बहाने को तैयार हो जाते हैं. एक तू है जो एक खून के लिए घबरा रहा है, धिक्कार है तेरी मर्दानगी पर.’’

निशा ने विकास की मर्दानगी को चुनौती दी तो विकास जितेंद्र का खून करने को राजी हो गया. इस के बाद दोनों ने सिर से सिर जोड़ कर हत्या की योजना बनाई.

इस योजना के तहत विकास फतेहपुर शहर के चौगलिया बाजार गया और वहां से तेज धार वाला चाकू खरीद लाया. चाकू उस ने छिपा कर अपने बैग में रख लिया. योजना के तहत ही निशा ने अपने दोनों बच्चों तनु मनु को ननिहाल भेज दिया था. इस के बाद वे दोनों सही समय का इंतजार करने लगे.

30 अप्रैल, 2019 की रात जितेंद्र यादव महेंद्र होटल से 12 बजे अपने घर गढ़ीवा पहुंचा. उस समय वह नशे में धुत था, आते ही पलंग पर पसर गया और कुछ देर बाद खर्राटे लेने लगा.

सही मौका देख कर निशा ने विकास को वाट्सऐप मैसेज भेजा कि वह तुरंत आ जाए. रात को लगभग एक बजे विकास निशा के घर पहुंच गया. निशा ने मेनगेट पहले ही खोल रखा था. विकास आसानी से घर के अंदर दाखिल हो गया.

निशा और विकास ने कमरे के अंदर सो रहे जितेंद्र पर एक नजर डाली, फिर दोनों ने मिल कर जितेंद्र के शरीर को चाकू से गोद डाला. नशे की अधिकता के कारण जितेंद्र ज्यादा चीखचिल्ला भी नहीं सका. जितेंद्र के शरीर से खून की धार बहने लगी, जिस से बिस्तर व फर्श पर खून ही खून नजर आने लगा.

जितेंद्र की हत्या के बाद निशा व विकास ने लूट का नाटक रचा. विकास ने अलमारी खोल कर उस का सारा सामान बिखेर दिया और निशा ने आभूषण व नकदी निकाल कर विकास को थमा दिए. इस के बाद विकास ने खून से सने कपड़े, चाकू, बेल्ट तथा जूता अपने बैग में रख लिए. उस ने खून सने हाथ बाथरूम में जा कर धोए. वह एक जोड़ी कपड़े साथ लाया था, सो उस ने साथ लाए कपड़े बदल लिए.

इस के बाद विकास ने निशा को दूसरे कमरे में ले जा कर उस की साड़ी से उस के हाथपैर बांध दिए और बाहर से कुंडी लगा दी. फिर वह बैग ले कर घर से निकल गया. बैग ले जा कर उस ने बैजू बनिया बाग में शिवमंदिर के पास कुएं में फेंक दिया.

इधर निशा कमरे में कुछ देर शांत रही, फिर सुबह 4 बजे दरवाजा पीटने लगी. आवाज सुन कर किराएदार विनोद आया और उस ने कमरे की कुंडी खोली. कमरे के अंदर निशा बदहवास थी. विनोद ने साड़ी से बंधे उस के हाथपैर खोले और पानी पिलाया.

बंधन खुलते ही निशा दहाड़ मार कर रोने लगी. उस के रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी आ गए. जिन्हें निशा ने बताया कि रात में 2 बदमाश लूट के इरादे से घर में घुस आए थे. जितेंद्र ने लूट का विरोध किया तो उन्होंने उस की हत्या कर दी और जेवर, नकदी लूट ले गए. इसी बीच किसी ने कोतवाली पुलिस को सूचना दे दी थी. पुलिस जांच में अवैध रिश्तों में हुई हत्या का परदाफाश हुआ.

3 मई, 2019 को थाना कोतवाली पुलिस ने अभियुक्त विकास यादव और निशा यादव को फतेहपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

निशा के जीवन की रक्तिम रात – भाग 2

मैनेजर विकास को जितेंद्र ने ही नौकरी पर रखा था

विकास यादव होटल का मैनेजर था और जितेंद्र यादव ने ही उसे मैनेजर के पद पर नियुक्त किया था. पूछताछ से यह भी पता चला कि विकास यादव का जितेंद्र के घर आनाजाना लगा रहता था.

होटल स्टाफ से पूछताछ के बाद पूजा यादव का माथा ठनका. वह सोचने लगीं कि कहीं विकास और निशा के बीच नाजायज संबंध तो नहीं थे, जिस के चलते दोनों ने मिल कर जितेंद्र की हत्या कर दी हो और निशा लूट का नाटक रच कर पुलिस को गुमराह कर रही हो. लेकिन बिना सबूत के दोनों पर शक नहीं किया जा सकता था. इस बारे में पूजा यादव ने सीओ कपिलदेव मिश्रा से विचारविमर्श किया. मिश्रा भी पूजा की बात से सहमत थे.

पूजा यादव के पास निशा का मोबाइल फोन था. उन्होंने उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से पता चला कि एक विशेष नंबर पर वह रोजाना लंबीलंबी बातें किया करती थी. उस नंबर की जांच की गई तो वह फतेहपुर शहर के रामगंज पक्का तालाब निवासी विकास यादव का निकला. यह विकास यादव कोई और नहीं, बल्कि महेंद्र सिंह के होटल का मैनेजर ही था. मोबाइल की जांच से यह भी पता चला कि निशा ने घटना वाली रात इसी नंबर पर वाट्सऐप मैसेज भेज कर विकास को घर बुलाया था.

अब सबूत मिल चुका था, लिहाजा 2 मई 2019 की शाम को एडिशनल एसपी पूजा यादव ने अपनी टीम सहित जा कर निशा यादव और विकास यादव को उन के घरों से हिरासत में ले लिया. थाना कोतवाली ला कर दोनों से जितेंद्र की हत्या के संबंध में पूछा गया तो दोनों साफ मुकर गए. लेकिन जब सख्ती की गई तो दोनों टूट गए और जितेंद्र की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

पुलिस ने जितेंद्र के हत्यारों को तो पकड़ लिया, लेकिन अभी तक हत्या में इस्तेमाल हथियार और गहने आदि बरामद नहीं हो पाए थे. इस संबंध में पुलिस ने विकास यादव से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कत्ल वाला चाकू और गहने उस ने भिटौरा रोड पर स्थित बैजू बनिया बाग में शिवमंदिर के कुएं में छिपा दिए हैं.

यह पता चलते ही पुलिस विकास को कुएं पर ले गई. वहां उस ने कुएं से बैग बरामद करा दिया. उस बैग में खून से सना चाकू, खून सने कपड़े, जूते व बेल्ट थी. यह सारा सामान पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. विकास यादव ने एक दूसरी जगह से गहने और नकदी भी बरामद करा दी. गहनों को निशा ने पहचान लिया. गहने उसी के ही थे, जो उस ने पति के कत्ल के बाद विकास को दे दिए थे.

जितेंद्र की हत्या का खुलासा करने व अभियुक्तों की गिरफ्तारी की सूचना एडिशनल एसपी पूजा यादव ने एसपी कैलाश सिंह को दे दी. एसपी ने आननफानन में प्रैसवार्ता की और अभियुक्तों को मीडिया के सामने पेश कर घटना का खुलासा कर दिया. निशा यादव ने अपना सिंदूर खुद ही मिटाने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर शहर के गढ़ीवा निवासी जितेंद्र यादव की शादी निशा से करीब 10 साल पहले हुई थी. निशा बला की खूबसूरत थी. निशा को पा कर जितेंद्र खूब खुश था. जितेंद्र का अपना दोमंजिला मकान था. उस के पास जरूरत की सभी भौतिक सुखसुविधाएं थीं.

जितेंद्र यादव के चाचा महेंद्र सिंह यादव शहर के चर्चित कारोबारी थे. वह समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता थे. उन की पत्नी फूलमती बहुआ ब्लौक प्रमुख थीं. शहर के वर्मा चौराहे पर उन का आलीशान महेंद्र कांटिनेंटल होटल था. इस होटल का संचालन उन का भतीजा जितेंद्र यादव करता था. होटल के अलावा भी जितेंद्र उन के दूसरे कारोबारों की देखरेख करता था. महेंद्र यादव की शहर में अच्छीखासी प्रौपर्टी थी. वह साफसुथरी छवि वाले नेता थे.

जितेंद्र यादव पढ़ालिखा व हंसमुख था. उस के इसी स्वभाव व कुशल संचालन से महेंद्र होटल सदैव गुलजार रहता था. महेंद्र सिंह यादव जितेंद्र पर पूरा विश्वास करते थे.

होटल चलाने में उन का कोई दखल नहीं था. जितेंद्र सुबह 9 बजे घर से निकलता था. उस की वापसी देर रात ही हो पाती थी. निशा की नजरें हर समय जितेंद्र के इंतजार में दरवाजे पर लगी रहती थीं.

जितेंद्र के घर सारी सुखसुविधाएं थीं. उस का जीवन सुखमय था. कालांतर में निशा ने 2 बेटों तनु व मनु को जन्म दिया. 2 बच्चों के जन्म के बाद घर में खुशी छा गई. निशा की बोरियत भी कम हो गई. वह बच्चों की देखभाल में जुटी रहती थी. समय के साथ बच्चे बड़े हुए तो वे स्कूल जाने लगे.

2 बच्चों के जन्म के बाद जितेंद्र ने पत्नी निशा की तरफ ध्यान देना कम कर दिया. वहीं निशा की कामेच्छा बढ़ गई थी. जितेंद्र रात 12 बजे घर आता और खाना खा कर सो जाता था. निशा उसे सैक्स के लिए उकसाती तो वह उसे झिड़क देता था.

विकास आया निशा की जिंदगी में

निशा रात भर गीली लकड़ी तरह सुलगती रहती थी. कामेच्छा की पूर्ति न होने से निशा का स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया था. वह बातबात पर पति से झगड़ने लगी थी.

उन्हीं दिनों निशा की नजर विकास यादव पर पड़ी. विकास यादव रामगंज पक्का तालाब के पास रहता था और महेंद्र कांटिनेंटल होटल में मैनेजर था. उसे निशा के पति जितेंद्र यादव ने ही मैनेजर के पद पर नियुक्त किया था. किसी न किसी काम से विकास का जितेंद्र के घर आनाजाना लगा रहता था. विकास शरीर से हृष्टपुष्ट था और स्मार्ट भी.

विकास निशा को भाभी कहता था. वह हंसमुख व बातूनी था, इसलिए निशा जल्दी ही उस से घुलमिल गई थी. विकास निशा की सुंदरता पर रीझ गया था और मन ही मन उसे चाहने लगा था. लेकिन वह अपनी चाहत का इजहार नहीं कर पा रहा था. जबकि निशा विकास की नजरों की चाहत भांप गई थी. उसे अब पति जितेंद्र विकास की तुलना में कमतर नजर आने लगा था. इसलिए वह विकास को ज्यादा तवज्जो देने लगी थी.

विकास जब भी निशा के सामने होता, वह उस की सुंदरता की तारीफ करता और अपनी लच्छेदार बातों से उसे रिझाता. इस सब में निशा को खूब आनंद आने लगा था. ज्यादातर औरतें अपनी प्रशंसा सुन कर गदगद हो जाती हैं. निशा को भी अपनी तारीफ सुनना अच्छा लगता था.

एक दिन मन के भाव जाहिर न कर के उस ने विकास से पूछा, ‘‘विकास, मुझ में तुम्हें ऐसा क्या खूबसूरत लगा कि मेरी तारीफ करते नहीं थकते? कुछ कहने से पहले यह भी सोच लेना चाहिए कि मैं 2 बच्चों की मां हूं.’’

‘‘भाभी, तुम 2 बच्चों की मां जरूर हो, लेकिन इस से तुम्हारी खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई है. तुम्हारे लंबे बाल, शरबती आंखें, रसीले होंठ सब कुछ लाजवाब हैं.’’ विकास आप से तुम पर आ गया.

‘‘पर तुम्हारे भैया ने तो मेरी खूबसूरती की कभी तारीफ नहीं की.’’ निशा ने बात आगे बढ़ाने वाली चाल चली.

‘‘भैया बुद्धू हैं, वह रातदिन होटल में व्यस्त रहते हैं. उन्हें शायद पता नहीं है कि औरत को पेट की भूख के अलावा और भी कुछ चाहिए होता है. मैं ने कुछ गलत तो नहीं कहा, भाभी.’’

‘‘नहीं, तुम सच कह रहे हो, विकास. मैं वाकई उन के साथ नीरस जिंदगी जी रही हूं. जब से तुम घर आने लगे हो तब से मेरे मन में कुछ आस जागी है. तुम्हारी रसभरी बातों से मुझे सुकून मिलता है. जब तुम चले जाते हो तो घर फिर सूनासूना सा लगने लगता है.’’

भले ही स्वार्थ के लिए सही, निशा और विकास दोनों एकदूसरे को चाहने लगे थे. लेकिन दिल की बात खुल कर कहने में दोनों ही संकोच कर रहे थे. दोनों तरफ प्यार की आग बराबर लगी थी.

एक दिन दोपहर को विकास, निशा के घर पहुंचा. इधरउधर की बातें करने के बाद उस ने निशा को छेड़ा, ‘‘भाभी, कब तक तड़पाओगी’’

‘‘तुम निरे बुद्धू हो, विकास. मैं तुम्हें नहीं तड़पा रही, बल्कि तुम मुझे तड़पा रहे हो.’’ कहते हुए निशा की आंखों में निमंत्रण उतर आया.

निशा के इस आमंत्रण पर विकास रोमांचित हो गया. उस की नसों में सनसनी सी दौड़ गई. उस ने आगे बढ़ कर निशा को अपनी बाहों में भींच लिया. निशा भी विकास से लता की तरह लिपट गई.

थोड़ी देर बाद जब दोनों एकदूसरे से अलग हुए तो खूब खुश थे. दोनों के मन की चाहत पूरी हो गई थी.

उस दिन के बाद जब भी निशा और विकास को मौका मिलता, एकदूसरे को अपनी देह समर्पित कर देते. निशा अब तन के साथसाथ मन से भी विकास की हो गई थी. अब वह अपने प्रेमी विकास का तो खूब खयाल रखती थी, लेकिन पति की उपेक्षा करने लगी थी. कभीकभी वह बिना बात के पति से झगड़ने भी लगती थी. जितेंद्र निशा की बेरुखी और बदले हुए व्यवहार का कारण नहीं समझ पा रहा था.

निशा के जीवन की रक्तिम रात – भाग 1

कुछ लोग सुबह 5 बजे उठ जाते हैं, जबकि ज्यादातर लोगों के लिए यह गहरी नींद का समय होता है. ऐसे में किसी के रोने की आवाज कानों में पड़ जाए तो उस की स्थिति बड़ी अजीब हो जाती है. क्योंकि रोने की आवाज को इग्नोर कर के बिस्तर पर पड़े रहना मुश्किल होता है.

1 मई, 2019 की सुबह भी यही हुआ था. कानपुर के गढ़ीवा मोहल्ले में रहने वाले जितेंद्र के घर से आती रोनेपीटने की आवाजों ने अड़ोसपड़ोस के लोगों की नींद खराब कर दी. रोने वाली जितेंद्र की पत्नी निशा थी.

कुछ लोग और महिलाएं जितेंद्र के घर पहुंचे तो निशा छाती पीटपीट कर रो रही थी. लोगों को आया देख उस का रुदन और तेज हो गया. वह रोने के साथसाथ छाती पीटते हुए कहने लगी, ‘‘मैं तो लुट गई, बरबाद हो गई. अब मेरा और मेरे बच्चों का क्या होगा?’’

‘‘आखिर हुआ क्या?’’ एक महिला ने पूछा तो निशा कमरे की ओर इशारा करते हुए बोली, ‘‘घर में बदमाश घुस आए और लूटपाट करने लगे. मनु के पापा ने विरोध किया तो उन्होंने मार डाला उन्हें.’’

अपनी बात कह कर निशा फिर जोरजोर से रोने लगी. मनु निशा के बेटे का नाम था. अब औरतें समझ गईं कि निशा के पति की हत्या हो गई है. जितेंद्र के कत्ल की बात सुन कर मोहल्ले के तमाम लोग एकत्र हो गए. मोहल्ले भर में कोहराम सा मच गया. जितेंद्र फतेहपुर के रहने वाले समाजवादी पार्टी के नेता और कारोबारी महेंद्र सिंह का भतीजा था.

कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई. किसी ने मोबाइल पर इस बात की सूचना महेंद्र सिंह को दे दी. साथ ही पुलिस को भी बता दिया. सूचना मिलते ही थाना कोतवाली के प्रभारी इंसपेक्टर एस.के. सिंह पुलिस टीम के साथ गढ़ीवा मोहल्ले में जितेंद्र के घर पहुंच गए. उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी.

कुछ ही देर में एसपी कैलाश सिंह, एडिशनल एसपी पूजा यादव और सीओ कपिलदेव मिश्रा भी वहां आ गए. फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया था.

पुलिस ने देखा मकान के एक कमरे के अंदर बैड पर जितेंद्र की लाश पड़ी थी. हत्यारों ने उस का कत्ल बड़ी बेरहमी से किया था. उस की गरदन, पेट और सीने पर चाकू के करीब दरजन भर घाव थे. बिस्तर और फर्श खून से लाल थे. कमरे की अलमारी खुली हुई थी. देखने से लग रहा था कि जितेंद्र की हत्या लूट के चक्कर में की गई थी. फोरैंसिक टीम ने बैड, अलमारी और कुछ अन्य जगहों से फिंगरप्रिंट उठाए.

इस बीच निशा जितेंद्र के शव के पास आ बैठी थी और निरंतर रोए जा रही थी. मोहल्ले की औरतें उसे संभाल रही थीं. एडिशनल एसपी पूजा यादव भी उन महिलाओं में शामिल हो गईं.

उन्होंने उस से घटना के बारे में पूछा तो निशा ने रोतेरोते बताया, ‘‘रात में करीब 12 बजे ये होटल से घर आए थे. खाना खा कर हम लोग कुछ देर बातें करते रहे. फिर ये उसी बैड पर सो गए. मैं भी सोने चली गई. कुछ देर बाद कमरे में खटपट की आवाज सुनाई दी तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं ने कमरे में जा कर देखा तो 2 बदमाश थे, जो अलमारी का सामान निकाल कर फेंक रहे थे.

‘‘मैं ने उन का विरोध किया तो बदमाशों ने चाकू निकाल लिया, जिसे देख कर मेरी घिग्घी बंध गई. तभी ये भी जाग गए. इन्होंने बदमाशों का विरोध किया तो उन्होंने इन के ऊपर चाकू से हमला कर दिया और इन्हें चाकू से गोद कर मार डाला. इस के बाद वे लाखों के जेवर, नकदी लूट कर ले गए.

‘‘मैं चीखने लगी तो बदमाशों ने मेरी गरदन पर चाकू रख दिया. फिर मुझे बगल वाले कमरे में ले गए और हाथपैर साड़ी से बांध दिए. फिर वे लोग बाहर से कमरे की कुंडी बंद कर के भाग गए.’’

निशा ने आगे बताया कि कुछ देर बाद वह घिसट घिसट कर दरवाजे के पास आई और दरवाजा पीटने लगी. डर की वजह से उस की आवाज भी नहीं निकल रही थी.

दरवाजा पीटने की आवाज सुन कर किराएदार विनोद आया और उस ने बाहर की कुंडी खोल कर उसे कमरे से बाहर निकाला. सब से पहले उस ने विनोद को ही घटना की जानकारी दी. बाद में अड़ोस पड़ोस की औरतें भी आ गईं.

किराएदार विनोद घटनास्थल पर मौजूद था. एसपी कैलाश सिंह ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह रात करीब 10 बजे अपने कमरे में सो गया था. सुबह लगभग 4 बजे उसे दरवाजा पीटने की आवाज सुनाई दी. इस के बाद वह कमरे के पास पहुंचा और बाहर से कुंडी खोल कर कमरे के अंदर गया.

वहां देखा तो निशा भाभी के हाथपैर बंधे हुए थे और उन के मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही थी. उन के हाथ पैरों को खोलने के बाद उस ने उन्हें पीने के लिए एक गिलास पानी दिया. फिर निशा भाभी ने बताया कि बदमाशों ने जितेंद्र भैया की हत्या कर दी है और सामान लूट ले गए हैं.

पुलिस अधिकारियों ने पूरे घर को खंगाला तो पाया कि घर में घुसने का एक ही रास्ता है मेनगेट. सवाल यह था कि बदमाश घर के अंदर दाखिल हुए तो कैसे? घर में 2 ही लोग थे विनोद व निशा. इस का मतलब यह कि बदमाशों के लिए या तो विनोद ने दरवाजा खोला या फिर निशा ने. निशा जिस तरह से पति की मौत पर आंसू बहा रही थी, उस स्थिति में उसे थाने ले जा कर उस से पूछताछ करना संभव नहीं था. इसलिए पुलिस ने निशा को तो हिरासत में नहीं लिया, लेकिन विनोद को पूछताछ के लिए थाने ले आई.

बहरहाल, शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने जितेंद्र का शव पोस्टमार्टम के लिए फतेहपुर जिला अस्पताल भिजवा दिया. साथ ही खून आलूदा मिट्टी का नमूना ले कर जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया.

इस बीच मृतक जितेंद्र के चाचा सपा नेता महेंद्र सिंह भी घर आ गए थे. उन्होंने भतीजे की हत्या पर आश्चर्य व्यक्त किया. साथ ही कोतवाली फतेहपुर जा कर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या व लूट की रिपोर्ट दर्ज करा दी. उन्होंने पुलिस अधिकारियों से अनुरोध किया कि वे जल्द से जल्द हत्यारों का पता लगाने की कोशिश करें.

एडिशनल एसपी और सीओ को सौंपी गई जांच

चूंकि मामला रसूखदार व्यवसायी व नेता महेंद्र सिंह के भतीजे की हत्या का था, इसलिए एसपी कैलाश सिंह ने इस हत्याकांड की जांच एडिशनल एसपी पूजा यादव और सीओ (सदर) कपिलदेव मिश्रा को सौंप दी.

युवा व तेजतर्रार पुलिस अफसर पूजा यादव ने अपनी टीम के साथ एक बार फिर घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने इस बात का पता लगाया कि घटनास्थल के आसपास कहीं सीसीटीवी कैमरे तो नहीं लगे हैं. इस में उन्हें सफलता मिल गई. मृतक के घर के सामने ही सीसीटीवी कैमरा लगा था.

पुलिस ने घर के सामने लगे सीसीटीवी कैमरे की रात की फुटेज देखी. घटना वाली रात को फुटेज में एक व्यक्ति करीब एक बजे मेनगेट से जितेंद्र के घर में प्रवेश करता हुआ दिखा. फिर वही व्यक्ति रात में 2 बजे उसी मेनगेट से निकल कर बाहर आता दिखाई दिया. फुटेज धुंधली होने से घर में प्रवेश करने वाले उस शख्स का चेहरा साफ नहीं दिख रहा था.

फुटेज देख कर पुलिस औफिसर पूजा यादव का माथा ठनका. क्योंकि मृतक जितेंद्र की पत्नी निशा यादव ने अपने बयान में कहा था कि उस के घर में 2 बदमाश घुसे थे. जबकि सीसीटीवी फुटेज में एक ही आदमी दिख रहा था. इस से जाहिर हो रहा था कि निशा झूठ बोल रही थी. उस के झूठ में क्या राज छिपा है, उन्हें इस का पता लगाना था. निशा संदेह के घेरे में आई तो पूजा यादव ने उस का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया.

पूजा यादव को यह भी शक हुआ कि फुटेज में दिख रहा व्यक्ति विनोद तो नहीं है. कहीं विनोद और निशा ने मिल कर तो जितेंद्र  की हत्या नहीं कर दी. विनोद पुलिस हिरासत में पहले से था. अब पूजा यादव ने उस से सख्ती से पूछताछ की. लेकिन वह अपने बयान पर कायम रहा.

उस ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हत्या में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया. हां, उस ने यह जरूर बताया कि किसी बात को ले कर कुछ दिन पहले जितेंद्र भैया और निशा भाभी में खूब झगड़ा हुआ था. तब भैया ने भाभी को पीटा भी था.

काफी पूछताछ के बाद जब लगा कि विनोद बेकसूर है तो एडिशनल एसपी पूजा यादव ने उसे क्लीन चिट दे कर घर भेज दिया. इस के बाद पूजा यादव सीओ कपिलदेव मिश्रा को ले कर वर्मा चौराहा स्थित महेंद्र कांटिनेंटल होटल पहुंचीं.

यह आलीशान होटल सपा नेता महेंद्र सिंह यादव का था और इस होटल का संचालन मृतक जितेंद्र सिंह यादव करता था. पुलिस अधिकारियों ने होटल स्टाफ से पूछताछ की तो पता चला कि किसी बात को ले कर जितेंद्र की विकास यादव से तूतू मैंमैं हुई थी.

इंटीरियर डिजाइनर का खूनी इश्क – भाग 3

योजना के अनुसार, अमृता ने इस दौरान ओमवीर से दूरी बना ली. उसे ओमवीर से जो बात करनी होती वह या तो उसे फोन कर देती या फिर वाट्सऐप पर मैसेज कर के बात कर लेती थी. इधर रूपेंद्र इस बात से अनजान था कि ओमवीर तथा अमृता उस के खिलाफ एक खूनी साजिश रच चुके हैं. इस साजिश को अमली जामा पहनाने के लिए ओमवीर ने अपनी ही सोसायटी के एक गार्ड सुमित को भी पैसे का लालच दे कर साजिश में शामिल कर लिया.

सुमित हापुड़ जिले की बाबूगढ़ तहसील के गांव भडंगपुर का रहने वाला था. पिछले 2 सालों से वह गैलेक्सी-2 सोसायटी में गार्ड की नौकरी कर रहा था. सुमित हैबतपुर गांव में किराए का एक कमरा ले कर रह रहा था.

सुमित ओमवीर से कई बार कह चुका था कि वह कोई ऐसा काम बताए, जिस से उसे मोटी रकम मिल सके. उस रकम से वह अपना कोई कामधंधा शुरू कर लेगा. ओमवीर के कहने पर सुमित ने जिला बुलंदशहर के बीबीनगर के रहने वाले अपने एक दोस्त भूले को भी इस साजिश में शामिल कर लिया.

लेकिन बिना पैसा लिए वे इस काम को अंजाम देने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने इस काम के लिए 3 लाख रुपए की मांग की थी. ओमवीर ने यह बात अमृता को बताई तो अमृता ने 23 अप्रैल को ओमवीर के साथ जा कर अपनी सोने की 2 चूडि़यां और एक हार बेच कर एडवांस में डेढ़ लाख रुपए दे दिए.

लालची ओमवीर ने इन पैसों में से 50 हजार रुपए अपने पास रख कर 50-50 हजार रुपए सुमित और भूले को दे दिए. बाकी रकम उस ने काम पूरा होने के बाद देने का वायदा कर लिया.

काम को अंजाम देने के लिए सुमित ने 8 हजार रुपए में .32 बोर की कंट्री मेड पिस्टल और कुछ कारतूस खरीद लिए. अब सही मौका देख कर सुमित की हत्या की वारदात को इस तरह अंजाम देना था कि लूट की घटना लगे.

28 अप्रैल, 2019 को रविवार का दिन था और रूपेंद्र की उस दिन छुट्टी थी. ओमवीर ने उस दिन को खासतौर से इसलिए चुना था क्योंकि उन्हें जो कहानी बनानी थी, उस के लिए रूपेंद्र की छुट्टी का दिन ही सब से मुफीद लगा था.

ओमवीर छुट्टी के दिन अकसर रूपेंद्र के घर उस से मिलने चला जाता था. उस दिन भी वह उस के घर आया. वे दोनों चाय पी कर निबटे ही थे कि अमृता ने रूपेंद्र से दोपहर के वक्त कहा कि रसोई की चिमनी खराब हो गई है उसे दूसरी चिमनी खरीदनी है. लिहाजा दोपहर के वक्त रूपेंद्र चिमनी खरीदने की बात कह कर अपने फ्लैट से निकला.

घर में घुस कर विश्वास जीता फिर लगा दिया ठिकाने

रूपेंद्र के साथ लिफ्ट में नीचे तक ओमवीर भी आया. लेकिन वह नीचे आ कर रूपेंद्र से यह कह कर अपने फ्लैट की तरफ बढ़ गया कि उसे हैबतपुर जाना है, वह पार्किंग से गाड़ी निकाल कर सोसायटी के बाहर उस का इंतजार करे. तब तक वह अपने फ्लैट से कुछ सामान ले कर आता है.

रूपेंद्र अपनी कार निकालने के लिए पार्किंग की तरफ चला गया. तभी ओमवीर ने सुमित और भूले को सोसायटी के बाहर पहुंचने को कहा. इतनी देर में ओमवीर अपने फ्लैट पर पहुंचा और वहां से पिस्टल और कारतूस जेब में रख कर सोसायटी के बाहर पहुंच गया.

रूपेंद्र को भी पार्किंग से कार ले कर बाहर पहुंचने में 15 मिनट का समय लगा. वहां रुक कर वह ओमवीर का इंतजार करने लगा. सोसायटी से थोड़ा आगे वह रूपेंद्र के पास पहुंचा तो उस ने कुछ ही दूरी पर खड़े सुमित व भूले से पूछा, ‘‘अरे भाई, तुम यहां कैसे खड़े हो, किस का इंतजार कर रहे हो?’’

सुमित ने जोर से चिल्ला कर कहा, ‘‘भैया, आटो का इंतजार कर रहे हैं. तिगड़ी गोलचक्कर तक जाना है.’’

ओमवीर ने वहीं से चिल्ला कर कहा, ‘‘अरे आ जाओ, रूपेंद्र भैया उधर ही जा रहे हैं. तुम लोगों को भी छोड़ देंगे.’’

ओमवीर खुद तो रूपेंद्र की कार में बैठ ही गया, उस ने रूपेंद्र से सुमित व उस के साथी को भी तिगड़ी गोलचक्कर तक लिफ्ट देने की सिफारिश कर कार में बिठा लिया.

गरमी के कारण गौर सिटी की हैबतपुर जाने वाली सर्विस रोड पर दिन के वक्त छुट्टी वाले दिन कुछ ज्यादा ही सन्नाटा रहता है. सोसायटी के करीब ढाई किलोमीटर दूर जाने पर अचानक ओमवीर ने रूपेंद्र से कार रोकने को कहा तो रूपेंद्र ने बिना कुछ सोचेसमझे कार रोक दी.

कार रोकने के बाद उस ने ओमवीर से जैसे ही पूछा कि क्या हुआ, कार क्यों रुकवाई तो वह यह देख कर चौंक गया कि तब तक ओमवीर अपनी कमर में खोंसे पिस्टल को निकाल कर उस की तरफ तान चुका था. जब तक रूपेंद्र कुछ समझता तब तक ओमवीर ने उस की कनपटी से पिस्टल सटा कर गोली चला दी.

गोली चलते ही खून की धारा बहने के साथ ही रूपेंद्र का सिर स्टीयरिंग पर लुढ़क गया. उसे जब इत्मीनान हो गया कि वह ढेर हो चुका है तो उन तीनों ने रूपेंद्र की घड़ी, पर्स, अंगूठी और गले में पहनी सोने की चेन निकाल ली ताकि पुलिस यही समझे कि मामला लूटपाट के लिए हुई हत्या का है. चूंकि दोपहर के वक्त इलाके में सन्नाटा था, इसलिए न तो किसी ने गोली की आवाज सुनी और न ही किसी ने उन्हें वारदात को अंजाम देते हुए देखा.

इस के बाद तीनों वहां से निकले और पिस्टल बाकी बचे कारतूसों के साथ कुछ ही दूरी पर झाडि़यों के पीछे एक गड्ढे में फेंक दी. भूले वारदात के बाद अपने गांव चला गया था, जबकि ओमवीर तथा सुमित सोसायटी में वापस आ गए. सुमित वापस आ कर सोसायटी में अपनी ड्यूटी करने लगा जबकि ओमवीर ने घर पर आ कर अपने कपड़े बदले क्योंकि उस की शर्ट पर खून के निशान लग गए थे.

इस के 3-4 घंटे बाद योजना के मुताबिक अमृता ने अपना नाटक शुरू किया. उस ने ओमवीर को बुला कर कहा कि अब सभी से यही कहना है कि रूपेंद्र घर से गहने ले कर निकला था. वह गहने उसे गाजियाबाद में पीसी ज्वैलर्स के पास गिरवी रखने थे. दोनों ने यही कहानी गढ़ी.

उसी के बाद ओमवीर ने घटना का गवाह बनाने के लिए रूपेंद्र के पड़ोसी प्रशांत को फोन कर के इस बारे में बताया और उस के बाद रूपेंद्र को ढूंढने का नाटक शुरू हुआ. सब कुछ पहले से तय था. इन लोगों ने सुमित को इसलिए जानबूझ कर साथ लिया कि वह नाटक रचते हुए उन्हें रूपेंद्र की कार तक ले जाए. यही उस ने किया भी.

चूंकि पुलिस को जांच के दौरान पता चला था कि रूपेंद्र का मोबाइल तो उस की जेब में है लेकिन उस का पर्स, अंगूठी और सोने की चेन उस के पास नहीं थी, इसलिए उस रात पुलिस भी इस वारदात को लूटपाट के लिए हुई हत्या की घटना मान कर जांच करने में लगी थी.

ये भी पढ़ें – दुराचारी पिता का हश्र

अमृता का व्यवहार ही बना शक की वजह

लेकिन अगले दिन बिसरख के एसएचओ मनोज पाठक को पहली बार रूपेंद्र की पत्नी अमृता का यह व्यवहार अजीब लगा कि पति की हत्या की सूचना के बाद जब वह घटनास्थल पर पहुंची तो उस ने पुलिस को कोई शिकायत नहीं दी. वह बस यही कहती रही कि किसी ने जेवर लूटने के लिए उस के पति की हत्या कर दी. अगले दिन भी जब उस ने कोई शिकायत नहीं दी तो उस पर शक और गहरा गया.

जांच में एसएचओ का शक उस वक्त और भी ज्यादा बढ़ गया जब अमृता से पूछताछ की तो वह एक रटीरटाई थ्यौरी के मुताबिक बेधड़क हो कर मामले को लूटपाट का बताने पर अड़ी रही.

जब उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि जिस समय दोपहर में रूपेंद्र को गोली मारी गई थी, उसी वक्त ओमवीर ने उसे फोन कर के लंबी बातचीत की थी और वाट्सऐप पर कहा था कि काम हो गया है.

हालांकि ओमवीर और सुमित ने पूछताछ में यह बताया था कि वे वारदात के वक्त सोसायटी में थे. लेकिन वारदात के वक्त उन के मोबाइल की लोकेशन रूपेंद्र के मोबाइल की लोकेशन के साथ ही मैच हो रही थी.

सोसायटी के आउट गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे की जांच करने पर पता चला कि जिस वक्त रूपेंद्र सोसायटी के बाहर अपनी कार ले कर निकला था, उस के 2-4 मिनट के अंतराल से ओमवीर तथा सुमित एक अन्य व्यक्ति के साथ पैदल सोसायटी के बाहर निकले थे. इतना ही नहीं, सुमित और ओमवीर डेढ़ घंटे बाद एक साथ सोसायटी के अंदर प्रवेश करते हुए सीसीटीवी फुटेज में दिखे.

ओमवीर और सुमित के बीच इसी दौरान हुई बातचीत और ओमवीर की अमृता के साथ लंबीलंबी बातचीत तथा वाट्सऐप संदेशों ने भी पुलिस को ओमवीर तथा अमृता पर शक करने की वजह दे दी. ओमवीर पर पुलिस का शक उस वक्त यकीन में बदल गया जब 29 अप्रैल की सुबह रूपेंद्र के बैंक खाते से किसी ने 10 हजार रुपए की 2 बार एटीएम में ट्रांजैक्शन की. इस का मैसेज पुलिस के कब्जे में मौजूद रूपेंद्र के फोन पर आया तो पुलिस चौंकी.

पुलिस की एक टीम उसी समय उस एटीएम की जांच करने के लिए गई. शाम होतेहोते सीसीटीवी की फुटेज देखने पर पुलिस को पता चला कि यह रकम एटीएम से ओमवीर ने निकाली थी. बस फिर क्या था, पुलिस के सामने सारी कडि़यां जुड़ती चली गईं. पुलिस ने सब से पहले ओमवीर को हिरासत में ले कर कड़ी पूछताछ की. उस ने सारा सच उगल दिया. इस के बाद इंसपेक्टर पाठक की टीम ने उसी दिन सुमित और भूले को भी धर दबोचा.

जब तीनों को पुलिस ने गिरफ्तार किया, तभी अमृता को अपनी गिरफ्तारी की आशंका हो गई थी. पुलिस उस तक पहुंचती, उस से पहले ही वह फरार हो गई. इंसपेक्टर पाठक ने ओमवीर तथा उस के साथियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल और कई जिंदा कारतूस भी बरामद किए.

पुलिस ने ओमवीर, सुमित और भूले को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने अमृता को पकड़ने के लिए जाल बिछाया. सर्विलांस की मदद से आखिर 4 मई को अमृता को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उस से मिली जानकारी के बाद ओमवीर को एक बार फिर से पुलिस रिमांड पर लिया तो उस की शिनाख्त पर पुलिस ने ज्वैलर्स के यहां से डेढ़ लाख रुपए में बेचे गए आभूषण भी बरामद कर लिए.

अगर पुलिस रूपेंद्र की हत्या को केवल लूटपाट का विरोध करने के दौरान हुई मौत पर ही अपनी जांच केंद्रित करती तो अमृता और ओमवीर अपनी साजिश में कामयाब हो जाते. आरोपियों ने एक के बाद एक ऐसी कई छोटीछोटी गलतियां कर दी थीं कि पुलिस धीरेधीरे उन कडि़यों को जोड़ कर उन तक पहुंच गई.

—कथा पुलिस की आरोपियों से हुई पूछताछ पर आधारित

इंटीरियर डिजाइनर का खूनी इश्क – भाग 2

सुबह से ही इंसपेक्टर पाठक ने रूपेंद्र हत्याकांड की जांच का काम तेज कर दिया. उन्होंने एसआई पीयूष और वीरपाल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन कर दिया. साथ ही उन्होंने एसपी (देहात) की टीम के कांस्टेबल सुधीर और संजीव को मृतक के परिवार के सभी सदस्यों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाने और उन के फोन को सर्विलांस पर लगवाने की जिम्मेदारी सौंप दी.

पुलिस टीम ने रूपेंद्र के परिजनों से पूछताछ की. इस के अलावा गैलेक्सी सोसायटी में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगालनी शुरू कर दी.

काल डिटेल्स, सीसीटीवी कैमरों की फुटेज आदि की जांच के बाद पुलिस ने पहली मई को ओमवीर को हिरासत में ले लिया. ओमवीर मृतक का बहनोई था. इंसपेक्टर मनोज पाठक ने थाने ला कर जब उस से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपने खिलाफ पुलिस के पास मौजूद सबूतों को देख कर आसानी से सच उगल दिया.

पुलिस के सामने जब रूपेंद्र की हत्या का सच आया तो सब हैरान रह गए क्योंकि ओमवीर ने रूपेंद्र की हत्या अपनी सोसायटी के गार्ड सुमित और एक अन्य साथी भूले के साथ मिल कर की थी. पुलिस की एक टीम ने उसी दिन उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया. ओमवीर और उस के दोनों साथियों से पूछताछ हुई तो रूपेंद्र हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

रूपेंद्र सिंह चंदेल (33 वर्ष) मूलरूप से उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के गांव मोहारी का रहने वाला था. उस के पिता अर्जुन सिंह चंदेल पीएसी में हैडकांस्टेबल हैं और इन दिनों उन की नियुक्ति प्रयागराज में है. रूपेंद्र का एक मंझला भाई राघवेंद्र भी शादीशुदा है और गांव में रहता है. राघवेंद्र वकालत की पढ़ाई कर रहा है. रूपेंद्र का एक छोटा भाई भी है, जो दिल्ली में रहता है. रूपेंद्र ने एमबीए किया था और पढ़ाई पूरी करने के बाद सन 2012 में उस की नौकरी ग्रेटर नोएडा की बिसकुट कंपनी हिंज प्राइवेट लिमिटेड में लग गई थी.

नौकरी लगने के एक साल बाद सन 2013 में परिवार वालों ने उस की शादी महोबा की रहने वाली अमृता सिंह से कर दी. अमृता न सिर्फ सुंदर थी बल्कि पोस्टग्रैजुएट भी थी. अमृता से शादी के बाद रूपेंद्र की जिंदगी में तेजी से बदलाव आने लगा.

एक साल बाद ही वह एक बच्चे का पिता बन गया, जिस का नाम आयुष्मान रखा. अमृता के जीवन में आने के बाद रूपेंद्र ने तेजी के साथ तरक्की की सीढि़यां चढ़ीं और वह सेल्स मैनेजर के ओहदे तक पहुंच गया.

करीब 3 साल पहले उस ने फोर्ड फिगो कार खरीदी थी, उस के बाद एक साल पहले यानी मई 2018 में रूपेंद्र ने गैलेक्सी नार्थ एवेन्यू-2 में 35 लाख रुपए में 2 बैडरूम का फ्लैट भी खरीद लिया था. रूपेंद्र की अच्छी सैलरी थी, इसलिए ये तमाम चीजें उस ने लोन ले कर खरीदी थीं. मकान खरीदने के बाद रूपेंद्र ने अपने मकान में 2-3 लाख रुपए खर्च कर के इंटीरियर डिजाइनिंग का कुछ काम भी कराया था.

ओमवीर इंटीरियर डिजाइनर से बना बहनोई

रूपेंद्र के फ्लैट में इंटीरियर का काम उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के मोहारी गांव के रहने वाले ओमवीर सिंह ने किया था. ओमवीर गैलेक्सी-2 सोसायटी के फ्लैट संख्या ई-244 में अपने भाई कृष्णवीर तथा 2 रिश्तेदारों के साथ रहता था. ये सभी गौर सिटी की सोसायटियों में इंटीरियर डिजाइनिंग का काम करते थे.

उस ने गैलेक्सी-2 सोसायटी में भी करीब 20 से अधिक फ्लैटों का इंटीरियर डिजाइन किया था. रूपेंद्र को जब ओमवीर से बातचीत में यह बात पता चली कि ओमवीर भी ठाकुर है तो उस ने अपने फ्लैट की इंटीरियर डिजाइन का काम ओमवीर से ही कराया.

कुछ दिन रूपेंद्र के घर में काम करने के दौरान ओमवीर और रूपेंद्र की दोस्ती हो गई. ओमवीर 4 भाइयों में सब से बड़ा था. उस का एक छोटा भाई कृष्णवीर उसी के साथ काम करता था जबकि बाकी दोनों भाई गांव में ही रह कर खेती करते थे. ओमवीर पढ़ालिखा और अच्छे परिवार का लड़का था.

ये क्राइम स्टोरी भी पढ़ें – प्यार में भटका पुजारी

जब रूपेंद्र से ओमवीर की दोस्ती हो गई तो रूपेंद्र के घर उस का अकसर आनाजाना हो गया. रूपेंद्र रोजाना सुबह को नौकरी पर निकल जाता और शाम को ही घर लौटता था. लेकिन ओमवीर का अपना काम था. वह ज्यादातर गैलेक्सी सोसायटी में ही रहता था. इसलिए वह जब तब रूपेंद्र की गैरमौजूदगी में भी उस के घर चला जाता था.

चूंकि ओमवीर रूपेंद्र का दोस्त था, इसलिए ओमवीर जब भी रूपेंद्र की अनुपस्थिति में उस के घर जाता तो अमृता ओमवीर को एक पारिवारिक दोस्त की तरह सम्मान और सत्कार देती थी. शुरुआत में तो ओमवीर कभीकभार ही रूपेंद्र के घर आता था, लेकिन धीरेधीरे अमृता की खूबसूरती उस के मन में बस गई.

अमृता को पति से प्यारा लगने लगा ओमवीर

इस के बाद तो वह रोज ही कुछ घंटों के लिए रूपेंद्र की गैरमौजूदगी में उस के घर जाने लगा. शुरू में ओमवीर और अमृता औपचारिक रूप से ही बातचीत करते थे, लेकिन जब ओमवीर का अकसर आनाजाना शुरू हुआ तो दोनों की झिझक दूर हो गई और वे खुल कर बातचीत करने लगे.

जनवरी 2019 में दोनों की झिझक इस हद तक दूर हो गई कि ओमवीर अमृता से शारीरिक छेड़छाड़ करने लगा. जब अमृता ने उस की इस तरह की हंसीमजाक का कोई विरोध नहीं किया तो ओमवीर की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद वह इस से भी एकदो कदम आगे बढ़ गया.

उस ने हंसीमजाक में पहले अमृता को एकदो बार अपनी बांहों में भर लिया था. लेकिन जब अमृता ने इस का भी विरोध नहीं किया तो बात इस के आगे चुंबन तक पहुंच गई. दरअसल, रूपेंद्र जहां गंभीर और सीधे स्वभाव का युवक था, वहीं ओमवीर तेजतर्रार और आधुनिक विचारधारा का लड़का था.

अमृता ओमवीर जैसे तेजतर्रार लोगों को पसंद करती थी. यही कारण रहा कि उस ने कभी ओमवीर की किसी हरकत का बुरा नहीं माना था. इस से ओमवीर की हरकतें और बढ़ने लगीं. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूट गई. दोनों के बीच उस रिश्ते ने जन्म ले लिया, जिसे समाज अवैध संबंध कहता है. अमृता को ओमवीर के जिस्म का ऐसा चस्का लगा कि बाद में दोनों के बीच अकसर ही यह खेल खेला जाने लगा.

रूपेंद्र उन के खेल से पूरी तरह अनजान था. अमृता की शारीरिक जरूरतें पूरी होने लगीं तो उस ने धीरेधीरे पति में दिलचस्पी लेनी बंद कर दी. ओमवीर ही उस के लिए सब कुछ हो गया था. लेकिन ओमवीर के मन में कुछ और ही खिचड़ी पकने लगी थी. उस ने सोचा कि अमृता के साथ अगर रूपेंद्र का ये मकान भी उसे मिल जाए तो नोएडा जैसी औद्योगिक नगरी में वह अपना बड़ा बिजनैस खड़ा कर सकता है. इसलिए अब उस ने धीरेधीरे अमृता के दिलोदिमाग में रूपेंद्र के खिलाफ जहर के बीज बोने शुरू कर दिए.

अपनी लच्छेदार बातों में फंसा कर ओमवीर ने अमृता के दिमाग में नफरत भर दी. बात यहीं खत्म नहीं हुई. 2019 के फरवरी महीने में रूपेंद्र की मौसी की लड़की शिखा 15 दिन के लिए रूपेंद्र के घर रहने के लिए आई थी. शिखा अमृता जैसी खूबसूरत तो नहीं थी लेकिन सीधीसादी थी. उसे देख कर ही ओमवीर के मन में खयाल आया कि क्यों न रूपेंद्र के घर में बेरोकटोक आने के लिए शिखा से शादी कर ली जाए.

जब यह बात उस ने अमृता से कही तो बात उस की भी समझ में आ गई. अमृता ने इस बारे में पति से बात की तो रूपेंद्र को भी लगा कि जवान मौसेरी बहन के लिए अगर ओमवीर जैसा बिरादरी का ही लड़का मिल जाए तो इस से अच्छा और क्या होगा. ओमवीर ठीकठाक कमा भी लेता था.

रूपेंद्र ने जब महोबा में रहने वाली अपनी मौसी से यह बात की तो वह तैयार हो गईं. फरवरी के आखिरी हफ्ते में दोनों परिवारों की रजामंदी से ओमवीर और शिखा की शादी हो गई. शादी के कुछ रोज बाद शिखा अपने पति ओमवीर के पास नोएडा आ गई. वह गैलेक्सी-2 सोसायटी में पति के साथ रहती थी. शिखा का अभी गौना भी होना था, लिहाजा 10 दिन बाद वह अपने मायके चली गई.

लेकिन इसी दौरान एक दिन न जाने क्यों रूपेंद्र को अमृता के किसी व्यवहार से शक हो गया कि ओमवीर से उस के संबंध कुछ अलग तरह के हो चुके हैं. हालांकि उसे सिर्फ शक था लेकिन फिर भी उस के मन में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा था. लिहाजा रूपेंद्र ने अमृता से ओमवीर से दूरी बना कर रखने की बात कह दी. रूपेंद्र के ऐसा कहते ही अमृता समझ गई कि हो न हो रूपेंद्र को उन के संबंधों पर शक हो गया है.

बनने लगी हत्या की योजना

अमृता ने जब यह बात ओमवीर को बताई तो उसे भी लगा कि उसे अगर अमृता व उस की संपत्ति हासिल करनी है तो रूपेंद्र को रास्ते से हटाना होगा. यह काम करने का यही अच्छा मौका है. यह बात उस ने अमृता से कही. अमृता तो उस के प्यार में अंधी हो चुकी थी, लिहाजा वह पति की हत्या कराने के लिए तैयार हो गई.

ओमवीर ने अमृता से कहा कि अगर वह कुछ पैसे खर्च कर दे तो वह ऐसे लोगों का इंतजाम कर देगा जो रूपेंद्र को उन के रास्ते से हटा देंगे. अमृता ने ओमवीर से कह दिया कि वह उसे पैसे दे देगी, वह भाड़े के हत्यारों का इंतजाम कर ले.

तीसरी ताकत का खेल

दिल्ली के दक्षिण पश्चिमी जिले में दिनदहाड़े एक युवक की हत्या और 77 हजार रुपए लूटने की खबर जब वायरलैस पर प्रसारित हुई तो पूरे जिले की पुलिस हरकत में आ गई. यह वारदात 23 सितंबर, 2014 को थाना उत्तरी द्वारका के क्षेत्र में घटी थी.

सूचना मिलने पर जिले की डीसीपी सुमन गोयल ने सभी थानाप्रभारियों को अपनेअपने क्षेत्र में बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की सघन तलाशी के आदेश दिए. लुटेरे बाइक पर सवार थे, इसलिए पुलिस की निगाहें बाइक सवारों पर थीं. थाना दिल्ली कैंट की पुलिस भी बैरिकेड्स लगा कर लुटेरों की जांच में लगी हुई थी.

उसी समय दोपहर एक बजे के करीब कैंट इलाके में आरआर अस्पताल के पीछे से एक आदमी भाग कर आता हुआ दिखाई दिया. उस की उम्र करीब 25-30 साल थी. उस के सिर से खून बह रहा था. उस ने पिकेट पर तैनात पुलिस को अपना नाम कीरत सिंह बताया. उस ने बताया कि उस के दोस्त नकुल धीर और मुकीम ने चलती कार में उस के सिर पर गोली मारी है, जान बचाने के लिए वह कार से कूद कर भाग आया है.

कीरत सिंह के सिर से खून बह रहा था इसलिए पुलिस उसे तुरंत एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) के ट्रामा सेंटर ले गई और यह सूचना थाना कैंट के ड्यूटी औफिसर को दे दी. जिस इलाके में घटना घटी थी वह कैंट थाने की सुब्रोतो पार्क चौकी क्षेत्र में आता था. चौकी इंचार्ज के.बी. झा को खबर मिली तो वह भी उस जगह पहुंच गए जहां घटना घटी थी. इस के बाद वह एम्स के ट्रामा सेंटर पहुंचे.

कीरत सिंह का इलाज कर रहे डाक्टरों ने सबइंसपेक्टर के.बी. झा को बताया कि वह बेहोश है और बयान देने की स्थिति में नहीं है. कीरत सिंह कहां का रहने वाला था, उस के दोस्त कहां रहते थे और उन्होंने उसे गोली क्यों मारी? यह सारी जानकारी उस से बात करने के बाद ही मिल सकती थी. लिहाजा के.बी. झा उस के होश में आने का इंतजार करने लगे.

दोस्तों ने कीरत सिंह के सिर में 2 गोलियां मारी थीं. दोनों गोलियां सिर के पिछले हिस्से को छूती हुई निकली थीं. इसलिए उस की हालत कोई ज्यादा सीरियस नहीं थी. अगले दिन जब वह होश में आया तो चौकी इंचार्ज के.बी. झा ने उस से बात की.

कीरत सिंह ने उन्हें बताया कि वह शाहदरा की चंद्रलोक कालोनी में रहता है. कल वह अपने दोस्त नकुल धीर, जो नवीन शाहदरा में रहता है, के साथ कार से गुड़गांव जा रहा था. रास्ते में नकुल का दोस्त मुकीम उर्फ राहुल मिला. राहुल लोनी में रहता है. कार पालम फ्लाईओवर के नजदीक पहुंची तभी मुकीम ने उसे मारने के लिए उस के सिर पर 2 गोलियां चलाईं. लेकिन वह अपनी जान बचाने के लिए चलती कार से ही कूद गया.

कीरत सिंह से पूछताछ के बाद सबइंसपेक्टर के.बी. झा ने यह बात दिल्ली कैंट के थानाप्रभारी सुरेश कुमार वर्मा को बताई. चूंकि हत्यारों का नामपता पुलिस को मिल चुका था इसलिए डीसीपी सुमन गोयल ने अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम में थानाप्रभारी सुरेश कुमार वर्मा, चौकीइंचार्ज के.बी. झा, एसआई राजेंद्र सिंह, एएसआई जयकिशन, कांस्टेबल अवतार सिंह आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने नकुल धीर और मुकीम के घरों पर दबिश डाली लेकिन वे दोनों अपनेअपने घरों से फरार मिले. उन्हें उन के और भी संभावित ठिकानों पर तलाशा गया लेकिन वे नहीं मिले. असफलता मिलने पर पुलिस ने अपने मुखबिरों को भी लगा दिया. 3 अक्तूबर को एक मुखबिर द्वारा चौकी इंचार्ज के.बी. झा को सूचना मिली कि आरोपी नकुल धीर अपने घर आया हुआ है. खबर मिलते ही पुलिस टीम उस के नवीन शाहदरा स्थित घर पहुंच गई.

मुखबिर की सूचना सही निकली. नकुल धीर घर पर ही मिल गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस चौकी सुब्रोतो पार्क ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपने दोस्त कीरत सिंह पर जानलेवा हमला करने की बात स्वीकार ली. उस ने कहा कि वह कीरत सिंह की हत्या करना चाहता था, लेकिन इत्तेफाक से निशाना चूक गया जिस से गोली उस के सिर को छूती हुई निकल गई और वह बच गया.

वह कीरत की हत्या क्यों करना चाहता था, यह पूछने पर उस ने जो कहानी बताई, वह नाजायज संबंधों के तानेबाने पर गढ़ी हुई निकली.

28 वर्षीय कीरत सिंह अपने परिवार के साथ उत्तर पूर्वी दिल्ली के शाहदरा क्षेत्र स्थित चंद्रलोक कालोनी में रहता था. उस के परिवार में पत्नी ममता के अलावा मांबाप और एक बहन थी. वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. उसी से उस के परिवार का भरणपोषण होता था.

कीरत सिंह का एक दोस्त था नकुल धीर, जो नवीन शाहदरा में ही रहता था. उस का टूर ऐंड ट्रैवल का काम था, जिस से उसे अच्छी आमदनी होती थी. दोस्त होने की वजह से नकुल धीर का कीरत के यहां आनाजाना था. नकुल की जैसी आमदनी थी, उसी के अनुसार वह अपने ऊपर खर्च भी करता था. उसे बनठन कर रहने का शौक था.

कीरत सिंह की आमदनी सीमित थी. महीने की जो बंधीबंधाई तनख्वाह मिलती थी, उसी से वह घरपरिवार का गुजारा करता था. ममता उस से अपनी कोई फरमाइश करती तो वह कोई न कोई बहाना बना देता था, जिस से वह खिन्न हो जाती थी. उस के अरमान तंगहाली की आंच में झुलस रहे थे. मगर कीरत सिंह को इस बात की कोई फिक्र नहीं थी. वह उस की भावनाओं की कद्र करने के बजाय बाहरी महिलाओं के साथ मौजमस्ती करता था.

कीरत सिंह 1 बच्चे का बाप बन चुका था, इस के बावजूद वह बाहरी महिलाओं के चक्कर में लगा रहता था. ममता को जब पति की हरकतों की जानकारी मिली तो वह बहुत नाराज हुई. उस ने पति को समझाया लेकिन उस ने अपनी छिछोरेपन की आदत नहीं छोड़ी. इसी बात को ले कर पतिपत्नी के बीच अकसर नोकझोंक होती रहती थी.

पिछले साल तो कीरत सिंह ने हद कर दी. उस ने शाहदरा की ही रहने वाली अलका नाम की एक परिचित युवती के साथ बलात्कार कर दिया. अलका ने शाहदरा थाने में उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी, जिस के बाद उसे जेल भी जाना पड़ा. पति की इस कारगुजारी पर ममता को बहुत शर्मिंदा होना पड़ा.

पति के जेल जाने के बाद ममता के सामने आर्थिक परेशानी खड़ी हो गई. पति ही कमाने वाला था. वह भी इतनी पढ़ीलिखी नहीं थी, जिस से उसे आसानी से नौकरी मिल जाती. इस परेशानी में उस की मदद पति के 26 वर्षीय दोस्त नकुल धीर ने की.

नकुल ने आर्थिक सहयोग तो किया ही, साथ ही वह कीरत को जेल से बाहर निकलवाने की कोशिश में भी लग गया. ममता के साथ वह वकील के पास जाता और जेल जा कर कीरत से मुलाकात भी करता. कुल मिला कर नकुल ममता की हर तरह से मदद कर रहा था.

लंबे समय तक नकुल धीर के साथ रहने पर ममता का उस से लगाव हो गया. यहां तक कि बाद में उन के बीच अवैध संबंध भी बन गए. ममता को कोई रोकने टोकने वाला तो था नहीं, इसलिए वह उस के साथ बिना किसी डर के मौजमस्ती करने लगी. चूंकि नकुल के द्वारा ममता की ख्वाहिशें पूरी हो रही थीं इसलिए वह उस से खुश थी.

उन दोनों के बीच यह खेल लंबे समय तक चलता रहा. इसी वजह से ममता नहीं चाहती थी कि उस का पति जेल से जमानत पर बाहर आए. लेकिन अपने सासससुर के दबाव की वजह से उसे पति की जमानत के लिए पैरवी करनी पड़ी. अंतत: करीब सवा साल जेल में रहने के बाद कीरत सिंह की जमानत हो गई.

बाहर आने के बाद कीरत सिंह ने किसी तरह अलका को समझाबुझा कर केस वापस लेने के लिए तैयार कर लिया. अलका द्वारा केस वापस लेने पर कीरत ने राहत की सांस ली. इसी बीच उसे यह भी जानकारी मिल गई कि उस के जेल में रहने के दौरान उस की पत्नी नकुल के साथ गुलछर्रे उड़ाती थी. कीरत ने इस बारे में ममता से बात की तो उस ने बताया कि लोग उसे बिना वजह बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं.

पत्नी का जवाब सुन कर कीरत ने बात रफादफा जरूर कर दी थी लेकिन उस के दिमाग में शक का कीड़ा घर कर चुका था. वह पत्नी की गतिविधियों पर इस तरह नजर रखने लगा ताकि उसे आभास न हो.

उधर पति की मौजूदगी के मद्देनजर ममता ने भी नकुल से मिलने में सावधानी बरतनी शुरू कर दी थी. एक बार पति के सो जाने के बाद ममता बाथरूम में जा कर फोन पर अपने आशिक नकुल से बात कर रही थी. आधी रात के करीब कीरत सिंह की आंखें खुलीं तो उस ने पत्नी को बेड से नदारद पाया. उस ने सोचा कि शायद वह टायलेट गई होगी. 15 मिनट बाद तक भी जब ममता कमरे में नहीं लौटी तो वह बिस्तर से उतर कर दबेपांव कमरे से बाहर निकला.

तभी उस ने बाथरूम की तरफ पत्नी की आवाज सुनी. वह धीरे से जा कर बाथरूम के बाहर खड़ा हो गया और कान लगा कर पत्नी की बातें सुनने लगा. वह फोन पर प्यारभरी बातें कर रही थी. कीरत समझ गया कि जरूर वह अपने यार से बात कर रही है. उस का मन तो किया कि अभी उस की जम कर धुनाई करे, लेकिन आधी रात को वह कोई हंगामा खड़ा नहीं करना चाहता था.

गुस्से का घूंट पी कर वह कमरे में आ कर बिस्तर पर लेट गया. उस के सामने पत्नी की बेवफाई की तसवीरें घूमने लगीं. नींद उस की आंखों से कोसों दूर जा चुकी थी. उस ने तय कर लिया कि सुबह होते ही वह ममता की खबर लेगा.

अपने प्रेमी नकुल से काफी देर बतियाने के बाद ममता चुपके से आ कर पति के पास बिस्तर पर लेट गई. जब वह बिस्तर पर आई, तब कीरत जाग रहा था. वह चुपचाप लेटा अंदर ही अंदर गुस्से से भुन रहा था.

सुबह होने पर कीरत ने पत्नी से पूछा, ‘‘रात को तुम कहां चली गई थी, मेरी आंख खुली तो तुम बिस्तर पर नहीं थीं?’’

‘‘बाथरूम गई थी.’’ ममता ने साधारण तरीके से जवाब दिया.

‘‘बाथरूम में किस से बात कर रही थीं?’’

इतना सुनते ही ममता सकपकाते हुए बोली, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’

‘‘झूठ मत बोलो, सच बताओ तुम किस से बात कर रही थीं?’’ कहते हुए कीरत ने उस की पिटाई करनी शुरू कर दी. साथ ही उसे हिदायत दी कि यदि उस ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह उसे घर से निकाल देगा.

पिटाई से ममता का शरीर दुख रहा था. 2-4 दिन वह घर में ही रही. उस ने नकुल से भी बात नहीं की. बाद में नकुल धीर का फोन आया तो उस ने पिटाई की बात उसे बता दी. इस का नकुल को बहुत दुख हुआ.

एक दिन मौका पा कर ममता ने नकुल से मुलाकात कर के उस के सामने अपना दर्द बयान कर दिया. नकुल ने उसे कीरत को ठिकाने लगाने की सलाह दी. उस ने कहा कि कीरत को रास्ते से हटाने के बाद हम लोग शादी कर लेंगे.

यह बात ममता की समझ में आ गई. उस ने इस के लिए हामी भर दी. यह काम नकुल अकेले नहीं कर सकता था. उस ने लोनी के रहने वाले मुकीम उर्फ राहुल से बात की. इस के बदले में उस ने मुकीम को 50 हजार रुपए देने की पेशकश की तो मुकीम इस के लिए तैयार हो गया.

इस के बाद नकुल धीर, मुकीम और ममता ने कीरत सिंह को ठिकाने लगाने की योजना बना ली. इस योजना के अनुसार 23 सितंबर, 2014 को नकुल धीर अपने एक दोस्त की मारुति जेन कार ले कर कीरत के घर पहुंचा. किसी बहाने से उस ने कीरत को गुड़गांव जाने के लिए तैयार कर लिया. कीरत को कार में बिठा कर वह गुड़गांव की ओर निकल गया. रास्ते में नकुल ने एक अन्य युवक को कार में बैठा लिया. नकुल ने उस का नाम मुकीम बताते हुए कहा कि वह उस का दोस्त है.

कार नकुल चला रहा था, कीरत उस के बराबर वाली सीट पर बैठा था. मुकीम पीछे की सीट पर बैठ गया. कार अपनी गति से आगे बढ़ रही थी. तीनों आपस में बातें कर रहे थे. तभी कार के दिल्ली कैंट की तरफ जाने वाले फ्लाईओवर पर चढ़ने से पहले ही मुकीम ने तमंचा निकाल कर कीरत पर एक फायर कर दिया. गोली उस के सिर को छूती हुई चली गई. उसी समय नकुल ने भी तमंचे से एक फायर कीरत के सिर पर किया.

वह गोली भी कीरत के सिर को छूती हुई निकल गई. कीरत समझ गया कि उस की जान खतरे में है. इसलिए वह कार का गेट खोल कर चलती कार से कूद गया. उस के सिर से खून बह रहा था. वह भागता हुआ पिकेट पर तैनात पुलिस के पास पहुंच गया और सारी बात बता दी. पुलिस उसे एम्स के ट्रामा सेंटर ले गई.

नकुल धीर से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 4 अक्तूबर को कीरत सिंह की पत्नी ममता और मुकीम उर्फ राहुल को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उन्होंने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. 4 अक्तूबर को ही पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को पटियाला हाउस कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी धीरज मित्तल के समक्ष पेश कर के उन्हें 3 दिन के रिमांड पर लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने उन की निशानदेही पर मारुति जेन कार, वारदात में प्रयुक्त तमंचे आदि बरामद किए. काररवाई पूरी होने पर पुलिस ने आरोपियों को पुन: न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. उधर कीरत सिंह की हालत सुधरने पर उस की अस्पताल से छुट्टी कर दी गई थी. उस का कहना है कि वह बेवफा पत्नी से वास्ता नहीं रखेगा.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, कुछ पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.

इंटीरियर डिजाइनर का खूनी इश्क – भाग 1

पिछले 15-20 सालों में नोएडा और ग्रेटर नोएडा का बहुत तेजी से विकास हुआ है. इस के आसपास के गांव भी विकास की दौड़ में शामिल हैं. ग्रेटर नोएडा क्षेत्र का गांव बिसरख 20 साल पहले भले ही गांव था, लेकिन अब छोटेमोटे शहरों से बेहतर है. यहां पर गौर सिटी-2 की टाउनशिप बन गई है.

प्रशांत कुमार गौर सिटी-2 के गैलेक्सी नार्थ एवेन्यू-2 के फ्लैट नंबर ए-1468 में रहता था. उस के फ्लैट से 2 फ्लोर नीचे उस के दोस्त रूपेंद्र सिंह चंदेल का फ्लैट था. प्रशांत और रूपेंद्र के बीच गहरी दोस्ती थी.

28 अप्रैल, 2019 को रविवार की छुट्टी थी. उस दिन शाम करीब साढ़े 6 बजे प्रशांत घर पर ही था और पत्नी व बच्चों के साथ मौल घूमने जाने की तैयारी में लगा था. उसी वक्त उस के मोबाइल पर रूपेंद्र के बहनोई ओमवीर का फोन आया.

ओमवीर इसी सोसायटी के फ्लैट नंबर-244 में रहता था. ओमवीर ने फोन पर प्रशांत को जो कुछ बताया, उसे सुन कर वह चिंतित हो उठा. ओमवीर ने बताया था कि रूपेंद्र दोपहर में अपनी सफेद रंग की फोर्ड फिगो कार ले कर घर से गया था. उसे कुछ पैसों की जरूरत थी. वह घर से पत्नी के गहने ले कर गाजियाबाद के पी.सी. ज्वैलर्स के पास गिरवी रखने के लिए निकला था. लेकिन साढ़े 3 घंटे गुजर जाने के बावजूद अभी तक वह घर नहीं लौटा है.

ओमवीर ने यह भी बताया कि रूपेंद्र की पत्नी अमृता और वह खुद कई बार रूपेंद्र से फोन पर संपर्क करने की कोशिश कर चुके हैं, मगर दूसरी ओर से काल रिसीव नहीं की जा रही.

यह ऐसी बात थी जिसे सुन कर किसी को भी चिंता हो सकती थी. रूपेंद्र तो वैसे भी प्रशांत का बहुत अच्छा दोस्त था. लिहाजा वह फटाफट जीने की सीढि़यां उतर कर रूपेंद्र के फ्लैट पर पहुंच गया. ओमवीर वहां पहले से ही मौजूद था. रूपेंद्र की पत्नी अमृता के चेहरे पर उड़ रही हवाइयां साफ बता रही थीं कि वह बेहद परेशान है. प्रशांत ने जब अमृता से रूपेंद्र के बारे में पूछा तो उस ने भी वही सब बताया जो कुछ देर पहले ओमवीर ने फोन पर उसे बताया था.

ये भी पढ़ें – साजिश का तोहफा

वह घबराते हुए बोली, ‘‘भैया, वो सोने के जेवर ले कर गए हैं. इतनी देर हो गई, न तो वापस आए हैं और न ही फोन रिसीव कर रहे हैं. मेरा दिल बहुत घबरा रहा है. आप को तो पता है कि यह इलाका कितना खराब है. यहां आए दिन लूटपाट और न जाने क्याक्या होता रहता है. कहीं उन के साथ कुछ ऐसावैसा तो नहीं हो गया? मैं चाहती हूं कि एक बार आप लोग सोसायटी के बाहर जा कर उन्हें आसपास के इलाके में देख लें.’’

कहतेकहते अमृता की आंखों में आंसू छलक आए.

‘‘घबराइए मत भाभीजी, कुछ नहीं होगा रूपेंद्र को. हम लोग अभी पुलिस को खबर कर देते हैं.’’ प्रशांत ने कहा.

‘‘नहीं प्रशांत भाई, अभी हमें पुलिस को इनफौर्म नहीं करना है. मैं चाहता हूं कि पहले हम कुछ लोग मिल कर रूपेंद्र को तलाश कर लें, अगर वह नहीं मिलता तो फिर पुलिस को सूचना दे देंगे.’’ ओमवीर ने बीच में बात काट कर अपनी राय दी.

‘‘हां, यह भी ठीक है. पहले हम लोग तलाश कर लेते हैं.’’ प्रशांत बोला.

पुलिस में जाने से पहले प्रशांत की खोजबीन

इस के बाद प्रशांत और ओमवीर सोसायटी के दफ्तर में पहुंचे. वहां से ओमवीर ने सोसायटी के गार्ड और औपरेटर का काम करने वाले सुमित को अपने साथ ले लिया. प्रशांत ने सोसायटी में रहने वाले अपने दोस्तों संजीव और रोबिन को भी साथ ले लिया.

इस के बाद वे सभी कार ले कर आसपास के इलाके में रूपेंद्र को तलाश करने के लिए निकल पड़े. एक घंटे में उन लोगों ने आसपास के 6-7 किलोमीटर का रास्ता देख लिया लेकिन न तो उन्हें कहीं रूपेंद्र की कार दिखाई दी और न ही आसपास के इलाके में कहीं कोई दुर्घटना होने की जानकारी मिली.

सभी लोग आगे की काररवाई पर विचार करने के लिए वापस सोसायटी की तरफ लौटने लगे. तब तक रात के 10 बज चुके थे. गौर सिटी से कुछ दूर ब्रह्मा मंदिर है. जैसे ही वे लोग कार से मंदिर के पास से गुजरे कि तभी सुमित ने चिल्ला कर कहा, ‘‘सर, कार रोको… कार रोको.’’

‘‘क्या हुआ भाई, कुछ हो गया क्या?’’ कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे प्रशांत ने कार की गति धीमी करते हुए सुमित से पूछा.

सुमित ने मंदिर के पास सर्विस रोड की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘सर, वो देखो वहां एक सफेद रंग की कार खड़ी है. मुझे लगता है, वह रूपेंद्र सर की ही है.’’

सभी ने चौंकते हुए सर्विस रोड की तरफ देखा तो वहां वाकई एक सफेद रंग की कार खड़ी नजर आई. प्रशांत ने फौरन अपनी कार आगे बढ़ा दी. कुछ दूर आगे जा कर यू टर्न ले कर वह कार को सर्विस रोड पर वहां ले गया, जहां सफेद रंग की कार खड़ी थी.

पास पहुंचते ही प्रशांत ने देखा कि वाकई वह फोर्ड फिगो कार थी और उस का नंबर यूपी95जे 9096 था, जो रूपेंद्र की कार का था. कार का नंबर पढ़ते ही प्रशांत और ओमवीर साथियों के साथ जल्दी से नीचे उतरे और उन्होंने गाड़ी के शीशे से भीतर झांका तो उन के हलक से चीख निकल गई. क्योंकि कार के भीतर ड्राइविंग सीट पर खून से लथपथ रूपेंद्र का शव पड़ा था.

प्रशांत व ओमवीर ने दरवाजा खोल कर रूपेंद्र को हिलाडुला कर देखा तो ओमवीर की मौत हो चुकी थी.

‘‘ओह माई गौड! मुझे जिस बात का शक था, वही हुआ. लगता है बदमाशों ने लूटपाट कर के रूपेंद्र को मार दिया है.’’ कहते हुए ओमवीर ने अपना माथा पकड़ लिया.

जिस की तलाश में प्रशांत और उस के साथी निकले थे, वह तलाश पूरी हो चुकी थी. रूपेंद्र जिंदा तो नहीं मिला अलबत्ता उस की लाश जरूर मिल गई थी. उस की मौत कैसे हुई? क्या हादसा हुआ? यह पता लगाना पुलिस का काम था.

लिहाजा करीब साढ़े 10 बजे प्रशांत ने पुलिस नियंत्रण कक्ष को फोन कर के इस घटना की सूचना दे दी. कुछ ही देर में पीसीआर की गाड़ी वहां पहुंच गई. ओमवीर ने भी तब तक अपनी पत्नी और रूपेंद्र की पत्नी को इस बारे में खबर कर दी थी. गौर सिटी के कुछ दूसरे लोग भी रूपेंद्र की लाश मिलने की सूचना पा कर वहां पहुंच गए.

पीसीआर गाड़ी से आए पुलिसकर्मियों ने घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद यह खबर स्थानीय बिसरख थाने को दे दी. बिसरख थाने के एसएचओ मनोज पाठक पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल की जांचपड़ताल के बाद सीओ पीयूष कुमार सिंह, एसपी (देहात) विनीत जायसवाल और फोरैंसिक टीम को खबर कर दी. कुछ ही देर में फोरैंसिक टीम और पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए.

जांचपड़ताल में पुलिस को घटनास्थल पर ऐसा कोई निशान नहीं मिला, जिस से पता चल पाता कि रूपेंद्र की हत्या लूटपाट के लिए या लूटपाट का विरोध करने के कारण हुई है. सब से बड़ी बात यह थी कि उस की हत्या उस के निवास से करीब ढाई किलोमीटर की दूरी पर हुई थी.

रूपेंद्र की पत्नी अमृता भी अपने 6 साल के बेटे आयुष्मान के साथ वहां पहुंच गई थी. पति की मौत के बाद एक पत्नी का दुख और सदमा उस पर क्या असर करता है, अमृता का विलाप देख कर समझा जा सकता था. ओमवीर की पत्नी शिखा जो रिश्ते में अमृता की ननद थी, उस ने कुछ दूसरी महिलाओं व लोगों के साथ मिल कर रो रही अमृता को सांत्वना दी.

फोरैंसिक टीम ने मृतक की कार के भीतर से फिंगरप्रिंट व दूसरी तरह के नमूने एकत्र कर लिए थे. मौके की काररवाई निपटाने के बाद इंसपेक्टर मनोज पाठक ने रूपेंद्र का शव रात में ही पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. साथ ही उन्होंने मृतक के परिजनों से इस मामले की एफआईआर दर्ज कराने के लिए लिखित शिकायत देने के लिए अगली सुबह थाना बिसरख आने के लिए कहा.

थाने में रिपोर्ट लिखाने से भी किया मना

लेकिन हैरत की बात यह कि अगली सुबह रूपेंद्र की पत्नी या उस के बहनोई ओमवीर में से कोई भी थाने नहीं पहुंचा. हां, रूपेंद्र का दोस्त प्रशांत जरूर अपने दोस्तों को ले कर बिसरख थाने पहुंच गया था. इंसपेक्टर पाठक ने जब उस से पूछा कि रूपेंद्र की पत्नी या परिवार के लोगों में से कोई एफआईआर कराने क्यों नहीं आया तो प्रशांत ने बताया कि उस ने रूपेंद्र के परिवार वालों से थाने चलने के लिए कहा था. लेकिन उन्होंने कहा कि रिपोर्ट लिखाने से क्या होगा, इस से रूपेंद्र जिंदा तो हो नहीं जाएंगे.

परिजनों का जवाब बेहद चौंकाने वाला था, लेकिन पुलिस को जांच आगे बढ़ाने के लिए महज शिकायत की जरूरत होती है. घटना से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा कोई भी शख्स शिकायत कर सकता है.

लिहाजा इंसपेक्टर पाठक ने प्रशांत से ही लिखित में शिकायत ले कर 29 अप्रैल, 2019 को भादंसं की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने उसी दिन रूपेंद्र के शव का पोस्टमार्टम करवा कर शव उस के घर वालों को सौंप दिया. तब तक रूपेंद्र के पिता और भाई के अलावा उस के दूसरे रिश्तेदार तथा अमृता के परिजन भी आ चुके थे.

सलमा का लाल सलाम

अक्तूबर के दूसरे सप्ताह से इंदौर में 3 दिनों के लिए ग्लोबल इनवेस्टर्स मीट का आयोजन था. इस आयोजन में करीब 2500 देसी विदेशी उद्योगपति, व्यवसाई आने थे. मीट का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को करना था. इस की तैयारी युद्ध स्तर पर चल रही थी. हर उस रास्ते को सजाया गया था, जहांजहां से मेहमानों का आवागमन होने वाला था. आईजी पुलिस से ले कर सिपाही तक समयसमय पर रातदिन इन रास्तों पर गश्त करते रहते थे.

23 सितंबर को दिन के 10 बजे एरोड्रम थानाप्रभारी कन्हैयालाल दांगी इसी सिलसिले में क्षेत्र की गश्त पर थे. सुपर कारिडोर से गुजरते समय उन्होंने सर्विस रोड पर भीड़ देखी तो फौरन अपनी जीप भीड़ के पास ले गए. वहां एक 40 वर्षीय व्यक्ति का शव पड़ा था. पास ही एक बाइक भी पड़ी थी. आधा शव घास पर था तो पैरों की ओर वाला आधा हिस्सा वही गिरी पड़ी बाइक पर था. ऐसा लग रहा था जैसे दुर्घटना हुई हो.

कन्हैयालाल ने थाना एरोड्रम फोन कर के कुछ सिपाही बुला लिए. साथ ही फोरेंसिक एक्सपर्ट और पुलिस के बड़े अधिकारियों को भी सूचित कर दिया.

घटनास्थल पर आ कर लाश देखने के बाद फोरेंसिंक एक्सपर्ट ने बताया कि मृतक की मौत दुर्घटना से नहीं हुई है. लाश को घसीटने के भी निशान नहीं थे. अलबत्ता मृतक के शरीर पर चोट के निशान जरूर थे. लाश को इस तरह रख कर यह दर्शाने की कोशिश की गई थी, जैसे मृतक दुर्घटना में मरा हो. जबकि हकीकत में उस की हत्या की गई थी. मृतक के कपड़ों की तलाशी में ऐसी एक भी चीज नहीं मिली, जिस से पता चल पाता कि वह कौन था.

प्राथमिक जांच के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. हालांकि यह ब्लाइंड मर्डर था, पर गनीमत यही थी कि रोशनी की एक किरण के रूप में मृतक की बाइक मौजूद थी. बाइक के नंबर से पता लगाया जा सकता था कि मृतक कौन है.

अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी कन्हैयालाल दांगी ने मामले की जांच शुरू कर दी. सब से पहले उन्होंने बाइक के नंबर के आधार पर आरटीओ औफिस से बाइक मालिक का पता लगाया. वह बाइक देवास जिले के बदरका गांव निवासी सादिक पटेल के नाम पर रजिस्टर्ड थी.

पुलिस ने बदरका गांव के सादिक पटेल से संपर्क किया तो उस ने बताया कि बाइक उसी की है, पर उसे उज्जैन के गांव मलानाकलां का रहने वाला अरमान पटेल ले गया था. इस पर पुलिस ने सादिक को बताया कि अरमान पटेल की लाश इंदौर के थाना एरोड्रम क्षेत्र में मिली है. सादिक से अरमान के पिता इब्राहीम पटेल का मोबाइल नंबर मिल गया. थानाप्रभारी कन्हैयालाल ने इब्राहीम पटेल को यह दुखद सूचना दे कर इंदौर आने को कहा.

सूचना मिलते ही इब्राहीम पटेल कार से अपने परिवार के साथ इंदौर आ गए.

थानाप्रभारी कन्हैयालाल ने उन्हें अस्पताल लेजा कर लाश दिखाई तो पूरा परिवार बिलखने लगा. लाश उन के बेटे अरमान की ही थी. पुलिस ने लिखापढ़ी कर के अरमान की लाश उस के घरवालों को सौंप दी, जिसे वे उज्जैन ले गए.

पूछताछ में इब्राहीम पटेल ने यह बात साफ कर दी थी कि अरमान की किसी से रंजिश थी या नहीं, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. कन्हैयालाल दांगी ने उन से अरमान का मोबाइल नंबर ले लिया.

मामले की जांच आगे बढ़ाने के लिए कन्हैयालाल दांगी ने अरमान के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस डिटेल्स में एक ऐसा नंबर मिला, जिस पर रोजाना लंबीलंबी बातें होती थीं.

उस नंबर के बारे में पता लगाया गया तो वह धार के पास स्थित गुनावदा गांव की एक महिला सलमा का निकला. अरमान की हत्या से पहले सलमा की अरमान से लंबी बातें हुई थीं. खास बात यह कि इस बातचीत के वक्त सलमा के नंबर की लोकेशन धार में थी. दांगी ने सलमा के नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई. उस की और अरमान की काल डिटेल्स में कुछ ऐसे नंबर भी मिले, जिन पर दांगी को संदेह हुआ.

जिन नंबरों पर संदेह हुआ, घटना के दिन उन की भी लोकेशन धार की ही थी. जिन नंबरों पर शक था, कन्हैयालाल दांगी ने उन नंबरों की सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों से उन के धारकोें के नामपते निकलवाए. उन में 2 नंबर अल्लाहनूर और अमजद के थे, एक रईस का और एक देवीलाल कुमावत का. इन में अल्लाहनूर और अमजद के पिता का नाम मुराद और पता एक ही था. इस का मतलब वे दोनों सगे भाई थे.

चूंकि ये सब लोग धार के ही रहने वाले थे, इसलिए इमरान की हत्या का शक इन्हीं लोगों पर गया. दांगी ने अल्लाहनूर, अमजद, आई एफ रईस और देवीलाल कुमावत तक पहुंचने के लिए एक पुलिस टीम गठित की, जिस में सबइंसपेक्टर पवार, सिपाही जीतू सरदार, कमलेश रविंद्र और दीनदयाल को शामिल किया गया.

इस पुलिस टीम को सब के पते दे कर धार रवाना कर दिया गया. पुलिस टीम ने मुराद के घर पर छापा मारा तो उस का 23 वर्षीय बेटा अल्लाहनूर घर पर ही मिल गया. जबकि अमजद फरार था. रईस अल्लाहनूर के मामा का लड़का था, वह भी घर पर ही मिल गया. पुलिस ने पूछताछ के लिए दोनों को हिरासत में ले लिया.

देवीलाल गांव कोटा मिडोला, थाना सरदारपुर जिला धार का रहने वाला था. पुलिस उस के घर गई तो वह भी फरार मिला. इस पर पुलिस टीम रईस और अल्लाहनूर को ले कर इंदौर लौट आई. थाने ला कर जब दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने कहा कि वे लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते.

लेकिन जब पुलिस ने उन के साथ सख्ती बरतते हुए उन्हें बताया कि उन के मोबाइल की काल डिटेल्स से पता चल गया है कि उन दोनों के अलावा उन के साथी अमजद और देवीलाल के नंबर न केवल अरमान की काल डिटेल्स में पाए गए हैं, बल्कि घटना के समय उन के नंबरों की लोकेशन भी इंदौर में थी तो वे टूट गए.

अल्लाहनूर और रईस से पूछताछ के बाद पता चला कि यह मामला प्रेमप्रसंग का था. इस के पीछे की जो कहानी पता चली, वह कुछ इस तरह थी.

करीब 5 साल पहले सन 2010 में देवास के पास एक गांव में शादी समारोह था. इस शादी में मुराद के घर वाले भी शामिल हुए और जिला उज्जैन के गांव मलानाकलां के इब्राहीम पटेल के घर वाले भी. यहीं पर अरमान की मुलाकात धार निवासी मुराद की बेटी सलमा से हुई.

अरमान और सलमा दोनों ही न केवल शादीशुदा थे, बल्कि मांबाप भी थे. अरमान के 4 बच्चे थे तो सलमा 2 बच्चों की मां थी. अरमान लंबे कद का आकर्षक व्यक्तित्व वाला आदमी था. सलमा भी कम खूबसूरत नहीं थी. सलमा और अरमान को शादी के समारोह में 4 दिन रुकना पड़ा. इन 4 दिनों में वे एकदूसरे से खूब घुलमिल गए.

शादी समारोह के बाद अरमान अपने गांव मलानाकलां चला गया और सलमा जिला धार स्थित अपनी ससुराल गुनावदा. सलमा का मायका धार में था. समारोह के दौरान ही सलमा और अरमान ने अपने अपने मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे दिए थे. इस के बाद दोनों के बीच मोबाइल पर बात करने का सिलसिला जुड़ गया.

जब सलमा का पति अंसार पटेल काम पर चला जाता था और बच्चे स्कूल तो फ्री हो कर वह अरमान से बात करती थी. लंबीलंबी बातें होने से दोनों धीरेधीरे एकदूसरे से खुलने लगे. सलमा को पति की वजह से एहतियात बरतनी पड़ती थी, इसलिए उस ने अरमान से कह रखा था कि अगर उसे खतरा महसूस हुआ तो वह कभी भी मोबाइल स्विच्ड औफ कर सकती है.

अगर बात करतेकरते कभी खतरा महसूस होता था तो सलमा फोन काट देती थी. इस के बाद अरमान दोबारा फोन नहीं मिलाता था. यह बात दोनों के बीच तय थी.

एक दिन अरमान ने फोन कर के सलमा से कहा कि वह धार आ रहा है. वह भी मायके जाने की बात कह कर गुनावदा से धार आ जाए. अरमान ने उस से यह भी कहा था कि वह धार के जिस होटल में ठहरेगा, फोन कर के उसे बता देगा. वह बुरका पहन कर वहां आ जाए, ताकि किसी की नजर न पड़े.

धार पहुंचने के बाद अरमान ने फोन कर के सलमा को सूचना दे दी कि वह कौन से होटल के किस कमरे में ठहरा है. अरमान का गांव मलानाकलां धार से करीब 125 किलोमीटर दूर था. वह बाइक से धार पहुंचा था. उस का फोन मिलने पर सलमा बस पकड़ कर गुनावदा से 20-22 किलोमीटर दूर धार आ गई. वह पति से मायके जाने की बात कह कर आई थी.

धार आ कर उस ने बुरका पहना और सीधे होटल पहुंच गई. वहां दोनों ने खुल कर अपने अरमान पूरे किए. इस के बाद सलमा ने फिर बुरका पहना और अपने मायके चली गई. मायके में थोड़ी देर रुक कर वह अपनी ससुराल गुनावदा चली गई.

इस के बाद बुरके की आड़ में यह सिलसिला चल पड़ा. जब भी मन होता अरमान धार जा कर उसी होटल में ठहर जाता और सलमा मायके जाने के बहाने वहां आ जाती. मौजमस्ती के बाद दोनों अपनीअपनी राह चले जाते.

सब ठीकठाक चल रहा था कि एक बार सलमा का पति अंसार किसी काम से जल्दी घर आ गया. सलमा उस वक्त फोन पर अरमान से बातें कर रही थी. उस की बातों के कुछ आपत्तिजनक अंश अंसार ने सुन लिए.

सलमा ने अंसार को सामने देखा तो जल्दी से फोन काट दिया. उस के चेहरे पर घबराहट साफ नजर आ रही थी. अंसार समझ तो बहुत कुछ गया था, पर बोला कुछ नहीं. अलबत्ता उस के मन में शक की बुनियाद पड़ गई.

अब की बार सलमा जब मायके जाने के बहाने धार गई तो उस के जाने के घंटा भर बाद अंसार भी बाइक ले कर घर से निकल गया. वह सीधा अपनी ससुराल पहुंचा, लेकिन सलमा वहां नहीं थी. अंसार ने किसी से कुछ कहासुना नहीं. वह एकडेढ़ घंटा ससुराल में रुक कर अपने घर लौट आया. तब तक सलमा लौट आई थी.

अंसार ने उस से पूछा, ‘‘हो आईं मायके?’’

‘‘हां, वहां सब ठीकठाक हैं. तुम्हें पूछ रहे थे.’’ सलमा ने कहा तो अंसार के तनबदन में आग लग गई. इस के बावजूद उस ने सलमा से न कुछ कहा और न पूछा. अलबत्ता वह समझ जरूर गया कि सलमा कुछ गड़बड़ घोटाला कर रही है.

करीब 15 दिनों बाद सलमा जब फिर मायके जाने के बहाने धार के लिए रवाना हुई तो पहले से तैयार अंसार के एक दोस्त ने फोन कर के उसे बता दिया कि सलमा बस से निकल गई है. इस पर अंसार ने उस दोस्त से कहा कि वह सीधा धार बस स्टैंड पहुंचे, वह वहीं आ रहा है.

दोनों दोस्त धार बस स्टैंड पहुंच गए. इस के थोड़ी देर बाद गुनावदा की बस आ गई. अंसार और उस का दोस्त दूर खड़े देख रहे थे. तभी बुरका पहने चेहरा ढंके एक महिला बस से उतरी. अंसार ने बुरके के डिजाइन से पहचान लिया कि वह सलमा ही है. अंसार और उस के दोस्त ने थोड़ा फासला रख कर सलमा का पीछा किया. वे उस समय आश्चर्य में रह गए, जब सलमा मायके जाने के बजाय एक होटल में चली गई.

वे दोनों भी उस के पीछे पीछे होटल पहुंच गए. अंसार ने अपने दोस्त को अंदर भेज दिया और खुद बाहर ही खड़ा रहा. दोस्त ने लौट कर बताया कि होटल के एक कमरे के बाहर एक गोराचिट्टा आदमी खड़ा था, सलमा उस के साथ कमरे में चली गई. इस के बाद दोनों उस कमरे में गए.

उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो अंदर से एक व्यक्ति की आवाज आई, ‘‘कौन है?’’ इस पर अंसार के दोस्त ने कहा, ‘‘साहब, नाश्ता.’’

अरमान ने दरवाजा खोला तो दोनों अंदर घुस गए. अरमान ने उन्हें अंदर आया देख कहा कि यह क्या बदतमीजी है.

अंसार जो देखना चाहता था, देख चुका था. सलमा का बुरका और ओढ़नी कमरे में पड़ी टेबल पर रखे थे. वह कमरे में डबल बेड पर बैठी थी. अंसार को देख कर उस की आंखें फटी की फटी रह गई थीं. चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. अरमान चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था. वह समझ गया था कि आगंतुक कौन है. न तो अरमान के मुंह से एक शब्द निकला और न ही सलमा के मुंह से. दोनों रंगेहाथ पकड़े गए थे.

अंसार ने सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘आज से हमारे सारे रिश्ते खत्म हो गए. मैं अभी इसी समय तुम्हें तलाक देता हूं, तलाक तलाक तलाक.’’

अपनी बात कह कर अंसार तेजी से कमरे के बाहर चला गया. उस ने सिर्फ कहा ही नहीं, बल्कि सलमा को अपने दिल से, अपनी जिंदगी से निकालने का फैसला भी कर लिया. उस ने घर आते ही सलमा का सारा सामान पैक किया और बच्चों को ले कर उस के मायके छोड़ आया. यह देख कर सलमा के अब्बा और भाई सन्न रह गए. सलमा कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थी.

बाद में मुराद अपने बेटे अल्लाहनूर और अमजद को ले कर अंसार के गांव गुनावदा गए. उन्होंने उस से सलमा को इस तरह छोड़ आने का कारण पूछा तो अंसार गुस्से में बोला, ‘‘बेहतर होगा, यह बात आप अपनी बेटी से ही पूछें. बस इतना समझ लीजिए कि अब मैं उस औरत को बिलकुल बरदाश्त नहीं कर सकता.’’

‘‘हम तुम्हारे मुंह से सुनना चाहते हैं.’’ मुराद ने कहा तो अंसार बोला, ‘‘आप की बेटी के उज्जैन के अरमान से नाजायज संबंध हैं, मैं ने होटल में दोनों को रंगेहाथों पकड़ा है. ऐसी बदचलन औरत से मैं अब कोई संबंध नहीं रखना चाहता.’’

जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो आदमी क्या कर सकता है? मुराद अपनी बेइज्जती को बरदाश्त कर के बेटों के साथ धार लौट गए. घर लौट कर उन्होंने सलमा को खूब लताड़ा. इस के बाद बाप होने के नाते मुराद ने काफी कोशिश की कि अंसार सलमा को ले जाए. लेकिन वह पत्नी को किसी भी कीमत पर साथ ले जाने को तैयार नहीं हुआ.

मजबूरी में मुराद को बेटी को अपने ही घर में पनाह देनी पड़ी, पर इस हिदायत के साथ कि आइंदा वह कोई भी ऐसीवैसी हरकत नहीं करेगी. अगर उस ने कुछ भी ऐसावैसा किया तो वे उसे घर से निकाल देंगे.

समय के साथ सब कुछ सामान्य हो गया. देखते देखते एक वर्ष बीत गया. इस बीच सलमा और अरमान का संपर्क चूंकि पूरी तरह टूटा रहा, इसलिए बात आई गई हो गई. चूंकि दोनों के ही परिवार इज्जतदार थे, सो इस नाजायज रिश्ते की बात दब सी गई.

कहावत है कि चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से न जाए. इस मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ. अरमान ने एक मोबाइल खरीद कर अपने एक परिचित के माध्यम से सलमा के पास भिजवा दिया. सलमा ने उस के भेजे मोबाइल को घर वालों से छिपा कर रखा. वह उस फोन की हिफाजत अपनी जान से भी ज्यादा करती थी.

घर वालों की वजह से सलमा और अरमान के बीच बातचीत तो कम ही हो पाती थी, पर मैसेजबाजी खूब होती थी. अरमान टाइल्स कटिंग और फिटिंग का कुशल कारीगर था. इस काम से उसे अच्छी आय होती थी. इस बीच सलमा चूंकि घर से बाहर आनेजाने लगी थी, इसलिए होटलों में फिर से दोनों का मिलना होने लगा था.

सब कुछ ठीक चल रहा था. अरमान और सलमा फिर से मिलने लगे हैं, इस बात की किसी को भनक तक नहीं थी. लेकिन यह बात छिप नहीं सकी. हुआ यह कि एक दिन सलमा बाथरूम में नहाने गई तो मोबाइल बेड पर रखा छोड़ गई.

इत्तफाक से तभी अल्लाहनूर घर आ गया. वह किसी काम से सलमा के कमरे में गया तो बेड पर मोबाइल रखा देख चौंका. उसी वक्त मोबाइल पर एक मैसेज आ गया. मैसेज अरमान का था. उस ने लिखा था कि वह 12-1 बजे के आसपास आएगा. मैसेज देखने के बाद अल्लाहनूर ने मोबाइल उसी जगह रख दिया. यह 22 सितंबर, 2014 की बात है.

इस से यह बात खुल गई कि सलमा के पास मोबाइल है और वह अभी भी अरमान के संपर्क में है. अल्लाहनूर ने सलमा के पास मोबाइल होने और उसे अरमान का मैसेज आने की बात अमजद को बताई. अमजद ने सुना तो उस के भी तनबदन में आग लग गई.

दोनों भाइयों ने मिल कर तय किया कि जिस अरमान की वजह से उन की बहन का घर टूटा है और जो अब भी उसे बरबादी की ओर ले जा रहा है, उसे सबक जरूर सिखाएंगे. लेकिन दोनों ने इस मुद्दे पर जब गंभीरता से बात की तो उन्हें लगा कि इस काम के लिए एकदो साथी और होने चाहिए.

इस के लिए अल्लाहनूर और अमजद ने अपने मामा इशाक पटेल के बेटे रईस से बात की. रईस भी उन दोनों का हमउम्र था. अल्लाहनूर और अमजद ने परिवार की इज्जत का वास्ता दे कर रईस को सारी बातें बता दीं. शुरू में तो रईस डर रहा था, लेकिन परिवार की इज्जत के नाम पर वह साथ देने को तैयार हो गया. लेकिन इस शर्त पर कि अरमान को जान से नहीं मारा जाएगा.

रईस का दोस्त था देवीलाल कुमावत. वह गांव कोटा मिडोला का रहने वाला था. रईस ने उस से बात की तो दोस्ती के नाम पर वह भी साथ देने के लिए तैयार हो गया. इस के बाद चारों ने मिल कर योजना बनाई. तय हुआ कि अल्लाहनूर और अमजद फोन पर बात कर अरमान से मिलने की बात करेंगे.

इस के बाद लेबड़ गांव के थोड़ा पहले रास्ते के किनारे खड़े हो कर उस के लौटने का इंतजार करेंगे. रईस और देवीलाल छिप कर खड़े हो जाएंगे. जब अरमान आएगा तो दोनों बातचीत के बहाने उसे रोक लेंगे. सब मिल कर उसे समझाएंगे और थोड़ा धमकाएंगे भी. जिस रास्ते पर मिलने की बात हुई थी, वह इंदौर से धार की ओर आने का शार्टकट रास्ता था.

योजनानुसार 23 सितंबर को अल्लाहनूर और अमजद लेबड़ गांव से थोड़ा पहले रास्ते के किनारे खड़े हो कर अरमान के आने का इंतजार करने लगे. रईस और देवीलाल छिप कर खड़े हो गए. दिन के करीब एक बजे अरमान बाइक से आता दिखाई दिया. उस वक्त दोपहर का समय था और उस रास्ते पर आवाजाही बिलकुल नहीं थी. जब अरमान पास आया तो अल्लाहनूर और अमजद ने बात करने के बहाने उसे रोक लिया.

अरमान के रुकते ही अल्लाहनूर बोला, ‘‘अरमान भाई, हम आप से जरूरी बात करना चाहते हैं. यहां सड़क पर बात करना ठीक नहीं है. अगर आप को परेशानी न हो तो आप हमारे साथ चलिए, पास ही हमारा खेत है, वहीं बैठ कर आराम से बात करेंगे.’’

अरमान को किसी तरह का कोई शक तो था नहीं, सो उस ने अल्लाहनूर को अपनी बाइक पर बैठा लिया. वह उसे रास्ता बताने लगा. अमजद इन दोनों के साथ अपनी अलग बाइक पर चल रहा था.

रईस और देवीलाल के पास भी बाइक थी. वे दोनों कुछ फासले से उन के पीछे चल दिए. करीब 10 किलोमीटर चलने के बाद वे एक खेत में रुके, जहां एक झोपड़ी बनी हुई थी. जब अल्लाहनूर, अमजद और अरमान वहां पहुंचे तो पीछे से रईस और देवीलाल भी आ गए. इस के बाद चारों ने मिल कर अरमान को दबोच लिया.

वहां दूरदूर तक इन पांचों के अलावा कोई नहीं था. इन लोगों ने अरमान को एक पेड़ से बांध कर उस के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया और फिर सब ने लातघूंसों और बेल्ट से उस की जम कर पिटाई की. पिटते पिटते अरमान बेहोश हो गया. अल्लाहनूर, अमजद, रईस और देवीलाल जब उसे पीटते पीटते थक गए तो वहीं बैठ कर अपनी थकान उतारने लगे.

थोड़ी देर बाद अल्लाहनूर ने अरमान को झंझोड़ कर जगाना चाहा, लेकिन वह मर चुका था. यह देख कर चारों घबरा गए. जल्दबाजी में कुछ नहीं सूझा तो वे उसे खोल कर घसीटते हुए झोपड़े में ले गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें, क्योंकि वह खेत उन के एक रिश्तेदार का था. लाश को वहां छोड़ना ठीक नहीं था. इसलिए सब ने मिल कर तय किया कि रात हो जाने पर लाश को कहीं दूर फेंक आएंगे.

रात 8 बजे के बाद इन लोगों ने अरमान की लाश को जैसेतैसे बाइक पर बीच में बिठाया और अपनेअपने चेहरे पर रूमाल बांध लिए. उन्होंने अरमान की लाश के मुंह पर भी रूमाल बांध दिया. एक बाइक देवीलाल ने तो दूसरी रईस ने संभाली. अल्लाहनूर और अमजद ने अरमान की बाइक पर बीच में उस की लाश रख ली.

इस के बाद ये लोग वहां से करीब 60 किलोमीटर दूर इंदौर के एरोड्रम थानाक्षेत्र में बने 8 लेन मार्ग सुपर कारीडोर तक आए. तब तक रात गहरा गई थी. इन लोगों ने अरमान की लाश को एक जगह सुपर कारीडोर की सर्विस रोड पर घास पर लिटा दिया. उस की बाइक भी इन्होंने वहीं डाल कर, उस का एक पैर बाइक पर इस तरह रख दिया जैसे हादसा हुआ हो और उसी की वजह से उस की मौत हो गई हो.

23 सितंबर को थानाप्रभारी श्री दांगी ने गश्त के वक्त अरमान की लाश देखी थी. पोस्टमार्टम में पता चला कि अरमान की मौत बहुत ज्यादा मारपीट के कारण हुई थी. अल्लाहनूर और रईस पकड़े जा चुके थे. अगले 24 घंटे में देवीलाल भी पकड़ा गया.

अल्लाहनूर ने रोते हुए अपने बयान में बताया कि उन लोगों ने अरमान को कई बार समझाया था कि वह सलमा से मिलना छोड़ दे. उन्होंने अरमान की पत्नी को भी उस की करतूत बता दी थी. पर वह बाज नहीं आ रहा था. उन लोगों का इरादा उसे जान से मारने का बिलकुल नहीं था. देवीलाल ने भी यही बयान दिया.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस तरह सलमा और अरमान के नाजायज रिश्ते की वजह से दो हंसते खेलते परिवार बरबाद हो गए. अमजद अभी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. पुलिस उसे खोज रही है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

नाजायज रिश्तों में हक जमाने की भूल

सईद जिस मकान में रह रहा था, वह उस के साले शकील का था. शकील अपनी पत्नी शबनम और बच्चों के साथ मकान के भूतल पर रहता था जबकि सईद प्रथम तल पर रह रहा था. सईद छत पर लगे लोहे के जाल से शबनम और शकील की गतिविधियों नजर रखे रहता था. जैसे ही शकील काम पर जाने के लिए घर से निकलता, सईद झट से शबनम के पास पहुंच जाता था. इस के बाद दोनों जी भर कर अपनी हसरतें पूरी करते थे.

35 वर्षीय शकील लखनऊ के हसनगंज थाना क्षेत्र के रमबगिया खदरा मोहल्ले में रहता था. उस के पिता अहमद हुसैन दरजी थे. पिता से यही काम सीखने के बाद वह भी टेलर बन गया था. करीब 10 साल पहले उस की शादी लखनऊ से सटे हरदोई जिले के संडीला कस्बे के महताब मूसापुर गांव की रहने वाली शबाना अंजुम उर्फ शबनम से हुई थी. एमए तक पढ़ी शबनम खूबसूरत युवती थी.

अपने से 5 साल छोटी, खूबसूरत और पढ़ी लिखी पत्नी घर में आने के बाद शकील की जिम्मेदारियां और भी बढ़ गई थीं. सुबह को दुकान पर गया शकील अब ज्यादा देर तक दुकान पर बैठने लगा. वह पत्नी की सारी जरूरतों का तो खयाल रखता, लेकिन उस के मन की चाहत पर ध्यान नहीं दे पाता था. वह सजी धजी पत्नी की भावना को समझने के बजाय करवट बदल कर जल्दी सो जाता था. शबनम कभी पहल करती तो वह तवज्जो नहीं देता था.

कह सकते हैं कि शबनम वासना की आग में जलती रहती थी. यह भी सच है कि वासना की आग में जलने वाली औरत अकसर गुमराह हो जाती है. ऐसे में वह अपनी और घर की बदनामी के बारे में भी नहीं सोचती.

इसी दौरान शकील का बहनोई सईद अख्तर उर्फ कल्लू उर्फ माटू उस के यहां रहने के लिए आ गया था. कानपुर के थाना अनवरगंज के कुली बाजार में रहने वाले सईद का विवाह शकील की बहन नजमा से हुआ था. शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी नजमा मां नहीं बन सकी थी. सईद अकसर शकील के घर आताजाता रहता था.

एक दिन दोनों के बीच बातचीत हुई तो शकील ने सईद से लखनऊ में रह कर अपना कोई काम करने की बात कही. सईद को साले का यह सुझाव अच्छा लगा. उस ने सोचा कि लखनऊ में रह कर काम करने पर उस की आमदनी बढ़ सकती है. बात जब रहने के इंतजाम की आई तो शकील ने उसे अपने मकान की पहली मंजिल पर रहने को कह दिया.

कुछ दिनों बाद शकील अपने सामान के साथ कानपुर से लखनऊ आ गया. पत्नी नजमा को वह कानपुर में ही छोड़ आया था. लखनऊ आ कर उस ने तसला बनाने का काम शुरू कर दिया.

शकील सुबह काम पर जाता तो देर रात ही घर लौटता था. जबकि सईद कुछ घंटे काम कर के कमरे पर लौट आता था. खाली समय होने पर वह शबनम के साथ बैठ कर बातें करता. चूंकि दोनों में ननदोई सलहज का रिश्ता था, इसलिए आपस में हंसीमजाक होता रहता था. सईद शबनम को अपनी बाइक पर बैठा कर घुमाने ले जाता और बाजार में अच्छी से अच्छी चीजें खिलाता पिलाता था.

शबनम भी इतनी नासमझ नहीं थी, जो ननदोई की आंखों की भाषा न पढ़ पाती. इस के बावजूद वह जल्दबाजी में अपने कदम उस की तरफ नहीं बढ़ाना चाहती थी.

एक दिन पति के जाने के बाद शबनम सईद के लिए चाय बना रही थी. उस समय कमरे में बैठा सईद उसे अपलक निहार रहा था. शबनम ने उसे कनखियों से देखा तो मन ही मन खुश हुई. चाय का कप ले कर वह सईद के पास आई और कप उस की ओर बढ़ाते हुए मुसकरा कर बोली, ‘‘तुम्हारे पास कोई काम नहीं है क्या, जो मुझे टकटकी लगा कर देखते रहते हो?’’

सईद ने बेहिचक जवाब दिया, ‘‘शबनम, तुम्हें देखना भी तो काम ही है. वैसे एक बात बताऊं, मैं तुम्हें देखता कम हूं, तुम्हारे बारे में सोचता ज्यादा हूं.’’

यह सुनते ही शबनम की धड़कनें बढ़ गईं. वह उस के सामने बैठ गई. फिर घुटने पर कोहनी रख कर हथेली पर ठोड़ी टिकाते हुए मुसकराई, ‘‘क्या सोचते हो, जरा मुझे भी तो बताओ.’’

‘‘यही कि शकील निरा बुद्धू है. इतनी खूबसूरत बीवी मिली है, लेकिन उस की कद्र तक करना नहीं जानता. देखो न क्या हाल बना कर रखा है.’’ सईद ने शबनम को पैरों से ले कर सिर तक निहारते हुए कहा.

शबनम को लगा कि सईद उस के मन की ही बात कह रहा है. वह बोली, ‘‘क्या करें, उन्हें तो सिर्फ पैसों से प्यार है, मगर पैसे के अलावा घरगृहस्थी की और भी जरूरतें होती हैं, इस बात को वो नहीं समझते.’’

शबनम के इतना कहते ही सईद ने लोहा गर्म देख शब्दों का वार किया, ‘‘शबनम, शकील अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करता तो न सही. तुम परेशान क्यों होती हो, मैं हूं न.’’

शबनम के लिए यह खुला आमंत्रण था. उस के गालों पर हया की सुर्खी दौड़ी तो लाज से निगाहें झुक गई. वह झिझकते हुए बोली, ‘‘कहते हुए सोच तो लिया करो कि क्या कह रहे हो.’’

‘‘शबनम, यह बात मैं तुम से काफी दिनों से कहना चाह रहा था, लेकिन तुम ने कभी मौका ही नहीं दिया.’’ सईद ने व्याकुल हो कर उस का हाथ पकड़ लिया.

शबनम मन ही मन खुश थी. उस का मन चाह रहा था कि सईद उसे बांहों में भर कर सीने से लगा ले और उसे खूब प्यार करे. इस के बावजूद वह दिखाने के लिए नाटकीय अंदाज में बोली, ‘‘छोड़ो न मुझे, यह क्या कर रहे हो? किसी ने देख लिया तो हमारी शामत आ जाएगी.’’

‘‘इस मकान में हम दोनों के सिवा है कौन, जो हमें देख लेगा. मेन गेट मैं ने पहले से बंद कर रखा है. इसलिए बाहर से कोई अंदर नहीं आ सकता.’’ फिर सईद उस के नजदीक आ कर बोला, ‘‘वैसे भी समझदार मर्द वही है, जो औरत के इनकार को ही उस का इकरार समझे.’’

सईद ने उसे बांहों में उठाया और ले जा कर बेड पर लिटा दिया. वह खुद भी उस के पहलू में लेट गया. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं.

सईद का प्यार पा कर शबनम बहुत खुश हुई. ननदोई सलहज के बीच एक बार अवैध संबंध क्या बने कि वे रोज रोज यह खेल खेलने लगे. शकील को इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उस के जाने के बाद पत्नी और बहनोई क्या गुल खिला रहे हैं. समय के साथ उन के रिश्ते परवान चढ़ने लगे.

लखनऊ की आबोहवा देखने के बाद शबनम भी कहीं नौकरी करना चाहती थी. इस बारे में उस ने पति से बात की तो उस ने उसे नौकरी करने की इजाजत दे दी. एमए पास शबनम अखबारों में छपे नौकरी के विज्ञापन देखने लगी. अपनी योग्यता के अनुसार उस ने कई कंपनियों में आवेदन किया. कई जगह इंटरव्यू भी दिए. आखिर उसे सफलता मिल ही गई.

शबनम को हजरतगंज में शक्ति भवन के पीछे स्थित आइडिया कंपनी के काल सेंटर में नौकरी मिल गई. नौकरी मिलने पर वह बहुत खुश हुई. उसे अलगअलग शिफ्ट में काम पर जाना होता था. सुबह जल्दी जाना होता तो वह टैंपो से चली जाती और शाम को जाना होता तो सईद उसे अपनी बाइक से छोड़ आता था.

शबनम काफी मिलनसार और हंसमुख स्वभाव की थी, इसलिए वह औफिस में काम करने वाले लोगों से जल्दी ही घुलमिल गई. उस के औफिस में संजय नाम का एक युवक काम करता था. चूंकि औफिस के काम के मामले में शबनम एकदम नई थी, इसलिए संजय ही उस की हेल्प करता था. जल्दी ही दोनों के बीच अच्छीभली दोस्ती हो गई.

संजय शबनम की खूबसूरती पर फिदा था. वह उस का पूरी तरह से खयाल रखता था. शबनम को भी उस का साथ अच्छा लगने लगा. इस की एक वजह यह थी कि संजय उस का हमउम्र था जबकि सईद उस से 20 साल बड़ा था. धीरेधीरे दोनों में दूरियां घटती गईं और वे काफी नजदीक आ गए. दोनों के मन में एकदूसरे के प्रति चाहत थी. एक दिन संजय ने शबनम के सामने अपने प्यार का इजहार किया तो शबनम ने सहजता से उस का प्यार कुबूल कर लिया.

संजय से प्यार होने के बावजूद शबनम ने सईद से दूरी नहीं बनाई. वह उस की ख्वाहिशों को पूरा करती रही. वह उसे इसलिए छोड़ना नहीं चाहती थी क्योंकि उस ने उस समय उस का साथ दिया था, जब उसे एक साथी की सख्त जरूरत थी. इस तरह शबनम पति के अलावा 2 नावों की सवारी कर रही थी.

5 मार्च, 2014 को सुबह करीब साढ़े 5 बजे शबनम घर से औफिस जाने के लिए निकली. उस के जाने के बाद शकील कुछ देर के लिए बेड पर यूं ही लेट गया. अभी मुश्किल से 15-20 मिनट ही हुए थे कि घर के बाहर किसी चीज के गिरने की आवाज आई और शोर भी सुनाई दिया. शकील बाहर निकल कर आया तो उस ने शबनम को दरवाजे के बाहर लहूलुहान हालत में पड़े पाया. गिरने के बाद वह बेहोश हो गई थी. पड़ोसी भी उस की हालत देख कर वहां पहुंच गए थे.

पत्नी को इस हाल में देख कर शकील घबरा गया. पड़ोसियों की मदद से वह शबनम को उठा कर बलरामपुर अस्पताल ले गया. लेकिन डाक्टरों ने उसे मृत घेषित कर दिया. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए अस्पताल से इस की सूचना हसनगंज थाने को दे दी गई.

सूचना पा कर थानाप्रभारी दिनेश सिंह पुलिस टीम के साथ अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया तो पता चला शबनम के गले व पेट पर किसी तेज धारदार हथियार से वार किए गए थे. शबनम के पति से बात करने के बाद थानाप्रभारी ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया.

शकील की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

केस दर्ज होने के बाद थानाप्रभारी ने जांच शुरू कर दी. लेकिन 10 दिनों की तफ्तीश के बाद भी उन्हें हत्यारों के बारे में कोई क्लू नहीं मिला. इस सिलसिले में उन्होंने कई मर्तबा शकील और उस के बहनोई सईद से पूछताछ की. पूछताछ के बाद उन्हें सईद पर शक होने लगा.

15 मार्च, 2014 को दोपहर के समय पुलिस ने सईद को थाने बुला कर फिर से पूछताछ की. सख्ती से की गई पूछताछ में उस ने शबनम की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने हत्या की जो वजह बताई, वह चौंकने वाली थी.

शबनम जब काल सेंटर में नौकरी करने लगी तो सईद को किसी तरह पता चल गया कि उस की दोस्ती उस के साथ काम करने वाले किसी लड़के के साथ हो गई है. जबकि उसे शबनम का दूसरे पुरुषों से मिलना, बातें करना अच्छा नहीं लगता था. वह बारबार उस पर इस बात का दबाव डालता था कि वह किसी बाहरी मर्द से बात न किया करे.

सईद ने कोशिश की तो उसे यह जानकारी मिल गई कि शबनम औफिस के जिस युवक के साथ ज्यादा मिलतीजुलती है उस का नाम संजय है. इस के बाद वह खुद उस की जासूसी करने लगा. एक दिन सईद ने शबनम को संजय के साथ औफिस के नजदीक एक रेस्टोरेंट में देख लिया. उस समय तो सईद ने शबनम से कुछ नहीं कहा लेकिन घर लौटने पर उस ने शबनम से नाराजगी जताई.

इस के जवाब में शबनम ने कहा कि जब वह नौकरी करने जाएगी तो औफिस के लोगों से बातचीत होगी ही. वह उन से बातचीत न करे, ऐसा मुमकिन नहीं है. इस से सईद को विश्वास हो गया कि शबनम के संजय के साथ नाजायज ताल्लुकात हैं इसलिए वह उसे छोड़ना नहीं चाहती. इस बात को ले कर दोनों में कभीकभी झगड़ा भी हो जाता था. लेकिन शबनम ने कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया था.

सईद नहीं चाहता था कि शबनम उस के रहते किसी दूसरे के साथ मौजमस्ती करे. उस ने शबनम को कई बार समझाया. जब वह नहीं मानी तो उस ने शबनम की हत्या करने की ठान ली.

5 मार्च, 2014 को जब शबनम सुबह साढ़े 5 बजे घर से अपने औफिस जाने के लिए निकली तो सईद भी चुपके से उस के पीछे हो लिया. सईद ने अपना चेहरा कपड़े से छिपा लिया था.

शबनम घर से लगभग 200 मीटर दूर ही पहुंची होगी कि सईद उस के सामने जा कर खड़ा हो गया. यह देख कर शबनम ठिठकी लेकिन वह कुछ समझती, उस से पहले ही सईद ने उस के गले व पेट पर साथ लाई कैंची से कई प्रहार किए और वहां से भाग गया. वहां से भाग कर वह पास के कब्रिस्तान में गया और खून से सनी कैंची चारदीवारी के किनारे झाडि़यों में छिपा दी. फिर वह छिपते छिपाते जल्दी ही घर पहुंच गया.

शबनम घायल जरूर हो गई थी लेकिन उस ने भी हिम्मत नहीं हारी थी. पेट पर हाथ रख कर वह लड़खड़ाते हुए अपने घर तक पहुंच गई, लेकिन घर के दरवाजे पर पहुंचते पहुंचते उस की सांसों की डोर टूट गई और धड़ाम की आवाज के साथ जमीन पर गिर गई.

पुलिस ने सईद से पूछताछ के बाद उस की निशानदेही पर कब्रिस्तान के पास छिपा कर रखी कैंची बरामद कर ली. फिर कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर उसे कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जल्लाद डाक्टर ने किए लाश के 500 टुकड़े

साल 1981 में राजतिलक द्वारा निर्देशत एक फिल्म आई थी ‘चेहरे पे चेहरा’. यह एक थ्रिलर और  हौरर फिल्म थी. फिल्म के केंद्रीय पात्र संजीव कुमार थे, जिन्होंने एक वैज्ञानिक और डा. विल्सन का किरदार निभाया था. विल्सन एक ऐसा कैमिकल ईजाद कर लेता है, जो आदमी की बुराइयों को खत्म कर सकता है. इस कैमिकल का प्रयोग वह सब से पहले खुद पर करता है, लेकिन इस का असर उलटा हो जाता है. विल्सन के भीतर की बुराइयों का प्रतिनिधित्व करता एक और किरदार ब्लैक स्टोन उस की अच्छाइयों पर हावी होने लगता है.

सी ग्रेड की यह फिल्म हालांकि दर्शकों ने ज्यादा पसंद नहीं की थी, लेकिन फिल्म यह संदेश देने में सफल रही थी कि आदमी के अंदर अच्छाइयां और बुराइयां दोनों मौजूद रहती हैं. इन में से जिसे अनुकूलताएं मिल जाती हैं, वह बढ़ जाती हैं.

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के एक डाक्टर सुनील मंत्री की कहानी या किरदार काफी हद तक विल्सन के दूसरे चेहरे ब्लैक स्टोन से मिलताजुलता है, जिस के भीतर का हैवान या पिशाच बगैर कोई कैमिकल दिए ही जाग गया था.

होशंगाबाद के आनंदनगर में रहने वाले इस हड्डी रोग विशेषज्ञ की पोस्टिंग नजदीक के कस्बे इटारसी के सरकारी अस्पताल में थी. सुनील मंत्री पोस्टमार्टम भी करता था, लिहाजा लाशों को चीरफाड़ कर मौत की वजह निकालना उस का काम था. अकसर होशंगाबाद-इटारसी अपडाउन करने वाले इस डाक्टर की जिंदगी की कहानी भी हिंदी फिल्मों सरीखी ही है.

अब से कोई सवा साल पहले तक सुनील मंत्री की जिंदगी में कोई कमी नहीं थी. उस के पास वह सब कुछ था, जिस की तमन्ना हर कोई करता है. इज्जतदार पेशा, खुद का मकान व कारें और सुंदर पत्नी सुषमा के अलावा बेटा श्रीकांत और बेटी जो नागपुर के एक नामी कालेज में पढ़ रही है. बेटा श्रीकांत भी मुंबई की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है.

वक्त काटने और कुछ और पैसा कमाने की गरज से सुषमा ने साल 2010 में एक बुटीक खोला था. इसी दौरान उन के संपर्क में रानी पचौरी नाम की महिला आई, तो उन्होंने उसे भी अपने बुटीक में काम पर लगा लिया.  रानी मेहनती और ईमानदार थी, इसलिए देखते ही देखते सुषमा की विश्वासपात्र बन गई. सुषमा भी उसे घर के सदस्य की तरह मानने लगी थी.

सुनील मंत्री की दिलचस्पी बुटीक में कोई खास नहीं थी लेकिन जब से उस ने रानी को देखा था, तब से उस के होश उड़ गए थे. रानी का पति वीरेंद्र उर्फ वीरू पचौरी एक तरह से निकम्मा और बेरोजगार था, जो कभीकभार छोटेमोटे काम कर लिया करता था. नहीं तो वह पत्नी की कमाई पर ही आश्रित था. वीरू जैसे पतियों की समाज में कमी नहीं है. ऐसे लोगों के लिए एक कहावत है, ‘काम के न काज के, दुश्मन अनाज के.’

रानी जैसी पत्नियों की भी यह मजबूरी हो जाती है कि वे ऐसे पति को ढोती रहें, जो कहने भर का पति होता है. उस से उन्हें कुछ नहीं मिलता सिवाय एक सामाजिक सुरक्षा के, इसलिए वह वीरू को ढो ही रही थी.

पत्नी की मौत के बाद डाक्टर ने  रानी में ढूंढा मन का सुकून

यह कोई हैरानी या हर्ज की बात नहीं थी, पर ऐसे मामलों में जैसा कि अकसर होता है, इस में भी हुआ यानी कि डा. सुनील मंत्री और रानी के बीच भी सैक्स की खिचड़ी पकने लगी. चूंकि रानी के घर आनेजाने की कोई रोकटोक नहीं थी, इसलिए दोनों को साथ वक्त गुजारने में कोई दिक्कत नहीं आती थी.

उस दौरान डा. सुनील मंत्री का वक्त कैसे गुजरता था, यह तो कोई नहीं जानता लेकिन 7 अप्रैल, 2017 को डाक्टर की पत्नी सुषमा की भोपाल के बंसल हौस्पिटल में मौत हो गई. पत्नी के देहांत के बाद तनहा रह गए डा. सुनील मंत्री का अधिकांश वक्त रानी के साथ ही गुजरने लगा.

सुषमा के बाद दिखावे के लिए बुटीक का काम रानी ने संभाल लिया था, लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि रानी ने और कई चीजों की डोर अपने हाथ में ले ली थी. जब तक सुषमा थी तब तक रानी का पति वीरू रानी को उस के यहां आनेजाने पर कोई ऐतराज नहीं जताता था लेकिन बाद में रानी पहले से कहीं ज्यादा वक्त बुटीक में बिताने लगी तो उस का माथा ठनका, जो स्वाभाविक बात थी. क्योंकि सुनील मंत्री अब अकसर अकेला रहता था.

रानी जब अपने घर में होती थी तब भी डा. सुनील मंत्री से फोन पर लंबीलंबी और अंतरंग बातें करती रहती थी. वीरू को शक तो था कि डाक्टर साहब और रानी के बीच प्यार की खिचड़ी पक रही है लेकिन उस का शक तब यकीन में बदल गया जब उस ने खुद अपने कानों से डाक्टर और रानी के बीच हुई अंतरंग बातचीत को सुन लिया.

दरअसल हुआ यह था कि मोबाइल फोन खराब हो जाने के कारण रानी ने अपना सिम कार्ड कुछ दिनों के लिए वीरू के फोन में डाल लिया था. न जाने कैसे बातचीत की रिकौर्डिंग वीरू के फोन में रह गई. वही रिकौर्डिंग वीरू ने सुन ली तो उस का खून खौल उठा.

पहले तो उस के जी में आया कि बेवफा बीवी और उस के आशिक डाक्टर का टेंटुआ दबा दे, पर जब उस ने धैर्य से विचार किया तो बस इतना सोचा कि क्यों न डा. सुनील मंत्री को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना कर रोज एक अंडा हासिल किया जाए. क्योंकि वह अगर डा. सुनील मंत्री को मारता या हल्ला मचाता तो उस के हाथ कुछ नहीं लगना था, उलटे लोग यही कहते कि गलती डाक्टर के साथसाथ रानी की भी थी.

लिहाजा एक दिन वीरू ने सुनील मंत्री को बता दिया कि वह उस के और अपनी पत्नी रानी के अवैध संबंधों के बारे में जान गया है और इस की वाजिब कीमत चाहता है. इस पेशकश पर शुरू में सुनील मंत्री को कोई नुकसान नजर नहीं आया, उलटे फायदा यह दिखा कि वीरू का डर खत्म हो गया.

यानी वह अपनी मरजी से ब्लैकमेल होने को तैयार हो गया. शुरू में सुनील मंत्री जिसे मुनाफे का सौदा समझ रहा था, वह धीरेधीरे बहुत घाटे का साबित होने लगा. क्योंकि वीरू अब जब चाहे तब उसे ब्लैकमेल करने लगा था. उस का मुंह सुरसा की तरह खुलता और बढ़ता जा रहा था.

डाक्टर की इस दिक्कत या कमजोरी का वीरू पूरा फायदा उठा रहा था. डाक्टर अगर पुलिस में रिपोर्ट भी करता तो बदनामी उसी की ही होती. लिहाजा वह रानी को अपने पहलू में बनाए रखने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई वीरू को सौंपने को मजबूर था.

वक्त गुजरता रहा और वीरू डा. सुनील मंत्री को अपने हिसाब से निचोड़ता रहा. इस से डाक्टर को लगने लगा कि ऐसे तो वह एक दिन कंगाल हो जाएगा और रानी भी हाथ से निकल जाएगी.

यह डा. सुनील मंत्री की 56 साला जिंदगी का बेहद बुरा वक्त था. रानी से मिल रहे देह सुख की कीमत जब उस की हैसियत पर भारी पड़ने लगी तो उस ने एक बेहद खतरनाक फैसला ले लिया. चेहरे पे चेहरा फिल्म का हैवान ब्लैक स्टोन उस के भीतर जाग उठा और उस ने वीरू की इतनी नृशंस तरीके से हत्या कर डाली कि देखने सुनने वालों की रूह कांप उठे. हर किसी ने यही कहा कि यह डाक्टर है या जल्लाद.

डाक्टर बना जल्लाद

डा. सुनील मंत्री फंस इसलिए गया था कि उस के और रानी के नाजायज ताल्लुकातों के सबूत वीरू के पास थे, नहीं तो तय था कि वह रानी को छोड़ देता. ये सबूत जो कभी सार्वजनिक या उजागर नहीं हो सकते, अब पुलिस के पास हैं.

वीरू की ब्लैकमेलिंग से आजिज आ गए सुनील मंत्री ने उसे अपने यहां बतौर ड्राइवर की नौकरी पर रख लिया. पगार तय की 16 हजार रुपए महीना.

इस जघन्य हत्याकांड का एक विरोधाभासी पहलू यह भी चर्चा में है कि डाक्टर ने वीरू को समझाया था कि तुम मेरे ड्राइवर बन जाओ तो चौबीसों घंटे मुझे देखते रहोगे. इस से तुम्हारा शक दूर हो जाएगा.

जबकि हकीकत में डा. सुनील मंत्री वीरू की हत्या का खाका काफी पहले से ही दिमाग में बना चुका था. उसे दरकार थी तो बस एक अदद मौके की, जिस से वीरू नाम की बला से हमेशाहमेशा के लिए छुटकारा पाया जा सके. 3 फरवरी, 2019 की सुबह वीरू डा. सुनील को कार से होशंगाबाद से इटारसी ले कर गया था.

दोनों शाम कोई 4 बजे वापस लौट आए. लेकिन वीरू अपने घर नहीं पहुंचा. दूसरे दिन रानी ने फोन पर यह खबर अपने ससुर लक्ष्मीकांत पचौरी को दी.

5 फरवरी की सुबह लक्ष्मीकांत होशंगाबाद आए और बेटे की ढुंढाई शुरू की. रानी ने उन्हें इतना ही बताया था कि वीरू ने 2 दिन पहले ही डा. सुनील मंत्री के यहां ड्राइवर की नौकरी शुरू की है.

यह बात सुन कर वह सीधे डा. सुनील मंत्री की कोठी पर जा पहुंचे और बेटे वीरू की बाबत पूछताछ की तो डाक्टर ने उन्हें गोलमोल जवाब दे कर टरकाने की कोशिश की. इस पर बुजुर्ग और अनुभवी लक्ष्मीकांत का माथा ठनकना स्वाभाविक था. उन्होंने डाक्टर से उस के घर के अंदर जाने की जिद की तो डाक्टर ने अचकचा कर मना कर दिया.

इस पर दोनों में झगड़ा शुरू हो गया. बेटे की चिंता में हलकान हुए जा रहे लक्ष्मीकांत डाक्टर पर वीरू को गायब करने का आरोप लगा रहे थे और डाक्टर उन के इस आरोप को खारिज कर रहा था. झगड़ा होते देख वहां भीड़ जमा हो गई. इन में कुछ डा. सुनील मंत्री के पड़ोसी भी थे, जिन की नजरों में सुनील मंत्री पिछले 2 दिन से संदिग्ध हरकतें कर रहा था.

इत्तफाक से इसी दौरान पुलिस की एक गश्ती गाड़ी वहां से गुजर रही थी, जिस के पहिए यह झगड़ा देख रुक गए.

आखिर माजरा क्या है, यह जानने के लिए पुलिस वाले गाड़ी से नीचे उतरे और बात को समझने की कोशिश करने लगे. लक्ष्मीकांत ने फिर आरोप दोहराते हुए कहा कि डाक्टर ने उन के बेटे को गायब कर दिया है और अब कोठी के अंदर भी नहीं देखने दे रहा.

इस पर पुलिस वालों को हैरानी हुई कि अगर डाक्टर ने कुछ नहीं किया है तो उसे किसी के अंदर जाने पर इतना सख्त ऐतराज या जिद नहीं करनी चाहिए. लिहाजा खुद पुलिस वालों ने अंदर जाने का फैसला ले लिया.

कीमे के रूप में मिली लाश

अंदर जाने के बाद सख्त दिल पुलिस वाले भी दहल उठे, क्योंकि ड्राइंगरूम में जगहजगह खून बिखरा पड़ा था. इतना ही नहीं, मांस के छोटेछोटे टुकड़े भी यहांवहां बिखरे पड़े थे मानो यह आलीशान कोठी कोई गलीकूचे की मटन शौप हो. पुलिस वालों के साथ अंदर गए लक्ष्मीकांत पहले से ही किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त थे. उन्होंने खोजबीन की तो एक ड्रम में उन्हें एक कटा हुआ सिर दिखा, जिसे देख वे दहाड़ मार कर रोने लगे. वह सिर उन के जवान बेटे वीरू का था.

जब पुलिस वालों ने घर का और मुआयना किया तो उन्हें टौयलेट में 4 आरियां मिलीं. इन में से 2 आरियों के बीच वीरू के एक पैर के दरजन भर टुकड़े फंसे हुए थे. जब ड्रम को गौर से देखा गया तो एसिड में वीरू के कटे सिर के साथसाथ हाथपैर भी पडे़ दिखे. डाक्टरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले दस्ताने भी खून से सने हुए थे. इस हैवान डाक्टर ने वीरू के शरीर के 4-6 नहीं बल्कि करीब 500 टुकड़े कर डाले थे.

अब बारी सुनील मंत्री की थी, जिस ने शराफत से अपना जुर्म स्वीकारते हुए बताया कि वह वीरू की ब्लैकमेलिंग से आजिज आ गया था, इसलिए उस ने उस की हत्या कर डाली.

दरअसल, 3 फरवरी को वीरू के दांत में दर्द था. यह बात उस ने डा. सुनील मंत्री को बताई तो उस ने इटारसी जाते वक्त एक गोली दी. लेकिन होशंगाबाद वापस आने के बाद वीरू ने फिर दांत दर्द की बात कही तो डा. सुनील के अंदर बैठे ब्लैक स्टोन ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इसी बेहोशी में उस ने वीरू का गला रेता और फिर उस की लाश के टुकड़े करने शुरू कर दिए.

एक दिन में लाश को काट कर टुकड़ेटुकड़े कर डालना मुश्किल काम था, इसलिए दूसरे दिन भी वह यही करता रहा और इटारसी अस्पताल भी गया था. लेकिन जल्द ही वापस आ गया था. जाते समय उस ने वीरू के खून से सने कपड़े बाबई के पास फेंक दिए थे. दोनों दिन उस ने घर की लाइटें नहीं जलाई थीं ताकि कोई मरीज न आ जाए. दूसरे दिन लाश के टुकड़े वह दूसरी मंजिल पर ले गया था.

सुनील मंत्री अपनी योजना के मुताबिक काफी दिनों से एसिड इकट्ठा कर रहा था. चूंकि वह डाक्टर था, इसलिए दुकानदार उस पर शक नहीं कर रहे थे और वह भी पहले से ही बता देता था कि वह स्वच्छ भारत अभियान के तहत एसिड खरीद रहा है. डाक्टर होने के नाते सुनील बेहतर जानता था कि लाश के टुकड़े गल कर नष्ट हो जाएंगे और किसी को हवा भी नहीं लगेगी.

लेकिन जब हवा होशंगाबाद, इटारसी से भोपाल होते हुए देश भर में फैली तो सुनने वालों का कलेजा मुंह को आ गया कि डाक्टर ऐसा भी होता है. ऐसा हो चुका था और डा. सुनील मंत्री खुद पुलिस वालों को बता भी रहा था कि ऐसा कैसे और क्यों हुआ.

इस खुलासे पर सनसनी मची तो होशंगाबाद के तमाम आला पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों के आते ही डाक्टर की हालत खस्ता हो गई और वह ऊटपटांग हरकतें करने लगा. कभी वह गुमसुम बैठ जाता था तो कभी रोने लगता था. कहीं वह कुछ उलटासीधा न कर बैठे, इस के लिए उस के इर्दगिर्द दरजन भर पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए और उस का पैर जंजीर से बांध दिया गया.

यह बात सच है कि डा. सुनील अपना दिमागी संतुलन अस्थाई रूप से खो बैठा था. उस की शुगर और ब्लडप्रेशर दोनों बढ़ गए थे और वह सोडियम पोटैशियम इम्बैलेंस का भी शिकार हो गया था, जिस में मरीज कुछ भी बकने लगता है और ऊटपटांग हरकतें करनी शुरू कर देता है.

इन बीमारियों पर काबू पाया गया तो एक के बाद एक वीरू की हत्या से ताल्लुकात रखते राज खुलते गए कि इस की आखिर वजह क्या थी.

फंस ही गया डाक्टर चक्रव्यूह में

छानबीन और जांच में पुलिस वालों की जानकारी में जब डाक्टर की पत्नी सुषमा मंत्री की मौत संदिग्ध होनी पाई गई तो एक टीम भोपाल के नामी बंसल हौस्पिटल भी पहुंची. दरअसल, सुषमा की मौत भी सुनील के लगाए गए इंजेक्शन के रिएक्शन से हुई थी. इंजेक्शन लगाने के बाद सुषमा के शरीर में संक्रमण फैलने लगा तो सुनील उसे भोपाल ले कर आया था. इस संदिग्ध मौत के बाद भी सुषमा का पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया था, इस बात की जांच पुलिस कथा लिखे जाने तक कर रही थी.

रानी के बयान और किरदार दोनों अहम हो चले थे, लेकिन पूछताछ में वह अनभिज्ञता जाहिर करती रही. पुलिस ने जब सुनील मंत्री से उस के संबंधों के बारे में पूछा तो वह खामोश रही. इस से पुलिस को रानी की भूमिका ज्यादा संदिग्ध नजर आई, जिस की जांच पुलिस कथा लिखने तक कर रही थी. सुनील मंत्री से उस की फोन पर हुई बात की रिकौर्डिंग भी पुलिस ने हासिल कर ली.

पुलिस ने मामला दर्ज कर के वीरू की टुकड़ेटुकड़े बनी लाश पोस्टमार्टम के बाद उस के परिजनों को सौंप दी, जिस का दाह संस्कार भी हो गया. कुछ सामान्य होने के बाद सुनील कहने लगा कि हां, उस ने वीरू की हत्या की थी लेकिन अब अदालत में उस का वकील बोलेगा.

रिमांड पर लिए जाने के बाद वह अदालत में असामान्य दिखा, जिस से उस की हिरासत की अवधि लगातार बढ़ाई जा रही है. हालांकि सच यह है कि किसी अंतिम निष्कर्ष पर पुलिस तभी पहुंचेगी, जब रानी मुंह खोलेगी. पुलिस सुषमा की मौत को भी संदिग्ध मान कर काररवाई कर रही है कि कहीं वह भी हत्या तो नहीं थी.

सब कुछ मुमकिन है लेकिन जिस तरह वीरू की हत्या डा. सुनील मंत्री ने की वह जरूर हैरत वाली बात है कि कोई डाक्टर जो जिंदगियां बचाता है, वह इतने वीभत्स, हिंसक और जघन्य तरीके से किसी की जिंदगी भी छीन सकता है.