Gorakhpur Crime: प्रेमिका की हत्या कर टकला हो गया बौयफ्रेंड

Gorakhpur Crime: एक ऐसी शर्मनाक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिस ने इंसानियत को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है. एक शादीशुदा प्रेमी ने अपनी प्रेमिका की बेरहमी से हत्या कर दी. इतना ही नहीं पहचान छिपाने के इरादे से उस ने शव को निर्वस्त्र कर सड़क किनारे फेंक दिया और खुद को बचाने के लिए दाढ़ी और बाल भी मुंडवा लिए. अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस नृशंस हत्या की वजह क्या थी? इस हत्याकांड का पूरा सच जानने के लिए आगे पढ़ें. यह कहानी न सिर्फ अपराध की भयावहता दिखाएगी, बल्कि आप को ऐसी घटनाओं से सतर्क और सचेत भी करेगी.

क्राइम की यह दर्दनाक वारदात उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से सामने आई है. यहां सड़क किनारे एक महिला की निर्वस्त्र लाश मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई. मृतका की पहचान प्रिया शेट्टी के रूप में हुई. जब पुलिस मौके पर पहुंची तो वह भी हैरान रह गई, क्योंकि प्रिया के चेहरे पर ईंट से बुरी तरह वार किए गए थे, ताकि उस की पहचान न हो सके. शव की हालत बेहद भयावह थी.

पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और 2 फरवरी, 2026 को इस हत्याकांड का खुलासा कर दिया. पुलिस के मुताबिक, प्रिया की हत्या किसी और ने नहीं बल्कि उस के प्रेमी विजय कुमार साहनी ने की थी. जांच में यह भी सामने आया कि इस अपराध में विजय की पत्नी संध्या साहनी भी शामिल थी.

आप को बता दें कि प्रिया शेट्टी की मुलाकात विजय कुमार साहनी से महाराष्ट्र के मुंबई शहर में हुई थी, जहां दोनों एक इंश्योरेंस कंपनी में काम करते थे. धीरेधीरे दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए और वे लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे. बताया जा रहा है कि इस रिश्ते से उन का एक 15 वर्षीय बेटा भी है. हालांकि, पारिवारिक दबाव के चलते विजय ने साल 2014 में गोरखपुर की रहने वाली संध्या साहनी से शादी कर ली. विजय और संध्या के 3 बच्चे हैं.

शादी के बाद भी विजय का प्रिया से रिश्ता खत्म नहीं हुआ. कुछ समय बाद विजय अपनी पत्नी संध्या और प्रेमिका प्रिया दोनों को मुंबई से गोरखपुर ले आया, लेकिन संध्या को यह बिलकुल मंजूर नहीं था कि उस का पति प्रिया के साथ रहे. इसी बात को ले कर घर में लगातार विवाद होता रहता था.

पुलिस के अनुसार, गोरखपुर लाने के बाद विजय और संध्या ने साजिश रचकर प्रिया को शराब पिलाई. नशे की हालत में होने पर उस के सिर पर किसी भारी वस्तु से हमला किया गया. इस के बाद दोनों को लगा कि प्रिया बच निकल सकती है, इसलिए पहचान छिपाने के लिए उस के सिर और चेहरे पर कई बार ईंट से वार किया और शव को निर्वस्त्र कर सड़क किनारे फेंक दिया. सुबह मोर्निंग वाक के लिए निकले लोगों ने प्रिया की लाश देखी और तुरंत पुलिस को सूचना दी. पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लिया.

2 फरवरी, 2026 को पुलिस ने लाश फेंकने की जगह के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच शुरू की. सीसीटीवी फुटेज के आधार पर विजय को पहचान लिया गया. आरोप से बचने के लिए विजय ने अपने सिर के बाल और दाढ़ी मुंडवा ली, जबकि संध्या ने प्रिया के कपड़े नदी में फेंक दिए.

जांच में यह भी सामने आया कि कत्ल के वक्त विजय ने अपने ससुर रामबिलास की स्कूटी का इस्तेमाल किया था. इसलिए पुलिस ने ससुर को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों आरोपियों को अरेस्ट कर लिया गया है और मामले की जांच जारी है. Gorakhpur Crime

Lucknow Crime News: मैं चोर नहीं हूं’ लिखकर दी रेस्टोरेंट कर्मी ने जान

Lucknow Crime News: एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिस में एक रेस्टोरेंट कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली, जिसे सुनकर सभी हैरान रह गए. कर्मचारी पर 500 रुपए चोरी करने का आरोप लगाया गया, जिस से आहत हो कर उस ने अपनी जान देने का कदम उठाया. उस ने मौत से पहले सुसाइड नोट में अपने दुख का जिक्र किया.

आइए जानें इस दर्दनाक स्टोरी को, जो आप को सचेत और सतर्क होने की सीख देगी. आखिर क्या है इस घटना का पूरा सच, पढ़ें स्टोरी.

यह एक दुखद घटना उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आई है. जहां मड़ियांव क्षेत्र में स्थित एक रेस्टोरेंट में 25 साल के अंशु कश्यप ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी. अंशु का शव रेस्टोरेंट की पहली मंजिल के हौल में पंखे से लटका मिला. वहीं मेज पर उस का सुसाइड नोट भी रखा हुआ था. नोट में अंशु ने लिखा कि वह गुड बेकर्स का ईमानदार कर्मचारी है. 500 रुपए के हिसाब में हुई छोटी गलती को छिपाने के लिए उस ने झूठ बोल दिया, जिस से मालिक की नजर में वह गलत साबित हो गया.

उस ने बताया कि अब वह चोरी या बेईमानी का आरोप ले कर जीवित नहीं रह सकता. उस ने सबको अपनी मम्मी का ध्यान रखने के लिए कहा और यह स्पष्ट किया कि वह चोर नहीं है. साथ ही उस ने लोगों से यह संदेश भी साझा किया कि कभी किसी मालिक के सामने जरूरत से ज्यादा वफादार न बनें. अंत में उसने दोहराया कि वह सच में चोर नहीं है.

पुलिस के अनुसार, अंशु कश्यप गुड बेकर्स रेस्टोरेंट में काम करता था. घटना वाले दिन सुबह वह अपने काम पर पहुंचा था. 500 रुपए के हिसाब को ले कर स्टाफ के साथ उस का झगड़ा हुआ. इस फटकार से वह मानसिक रूप से आहत हुआ. इस के बाद वह बिना किसी को बताए पहली मंजिल पर बने हौल में गया. काफी देर तक वहां बैठा रहने के बाद जब उस ने महसूस किया कि अब कोई उसे नहीं देख रहा, तो उस ने कुरसी पर चढ़कर पंखे से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली. उसके पास मेज पर सुसाइड नोट और मोबाइल फोन भी बरामद हुआ.

सूचना मिलने पर पुलिस और फोरैंसिक टीम तुरंत घटनास्थल पर पहुंची और मामले की जांच शुरू की. शव को पोस्टमार्टम के लिए ले जाते समय परिजन और दोस्त गाड़ी के पास पहुंच गए और उसे रोक लिया. परिजनों ने लगभग 3 घंटे तक हंगामा किया और सीसीटीवी फुटेज दिखाने की मांग की. पुलिस ने रेस्टोरेंट मालिक को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है. मामले की तहकीकात अभी जारी है. Lucknow Crime News

Social Stories: सुलेखा की होली – खुद को बचा पाई सुलेखा

Social Stories: सुलेखा की हाल ही में शादी हुई थी. होली के मौके पर वह पहली बार अपनी ससुराल में थी. होली को ले कर उस के मन में बहुत उमंगें थीं. वैसे तो वह गांव की रहने वाली थी, मगर शादी से पहले वह बहुत दिनों तक शहर में भी रह चुकी थी.

होली के दिन सुबह से ही पूरा गांव होली के रंग में डूबा हुआ था. होली के रंग में प्यार का रंग मिला कर सुलेखा भी अपने पति दिनेश के साथ होली खेलने लगी.

दिनेश ने सुलेखा को रंगों से सराबोर कर दिया. नीलेपीले रंगों में लिपीपुती सुलेखा बंदरिया लग रही थी. इस तरह हंसीठिठोली के बीच दोनों ने होली मनाई.

‘‘मैं अपने दोस्तों के साथ होली खेलने जा रहा हूं. अगर मैं उन के साथ नहीं गया, तो वे मुझे जोरू का गुलाम कहेंगे. थोड़ी देर बाद आऊंगा,’’ यह कह कर दिनेश घर से निकल गया.

सुलेखा मुसकराते हुए पति को जाते हुए देखती रही. दरवाजा बंद कर के वह जैसे ही मुड़ी, तभी उस की नजर एक कोने में चुपचाप खड़े अपने देवर महेश पर पड़ी.

‘‘क्यों देवरजी, तुम इतनी दूर क्यों खड़े हो? क्या मुझ से होली खेलने से डरते हो? आओ मेरे पास और खेलो मुझ से होली…’’

‘‘तुम तो पहले से ही रंगों से लिपीपुती हो भाभी. इस पर मेरा रंग कहां चढ़ेगा…’’ महेश शरारत से बोला.

‘‘क्यों नहीं चढ़ेगा. क्या तुम्हारे मन में कोई ‘चोर’ है…’’ सुलेखा मुसकराते हुए बोली.

‘‘नहीं तो…’’ इतना कह कर महेश झेंप गया.

‘‘तो फिर होली खेलो. देवर से होली खेलने के लिए मैं बेकरार हूं…’’ कह कर सुलेखा ने महेश को रंग लगा दिया और फिर खिलखिलाते हुए बोली, ‘‘तुम तो बंदर लग रहे हो देवरजी.’’

महेश ने भी ‘होली है…’ कह कर सुलेखा के गालों पर गुलाल मल दिया.

भाभी से होली खेल कर महेश खुश हो गया. होली की खुशियां लूटने के बाद सुलेखा घर के कामों में जुट गई.

थोड़ी देर बाद ही दिनेश अपने दोस्तों के साथ लौट आया और उन्हें आंगन में बैठा कर सुलेखा से बोला, ‘‘मेरे दोस्त तुम से होली खेलने आए हैं. तुम उन के साथ होली खेल लो.’’

‘‘मैं उन के साथ होली नहीं खेलूंगी.’’

‘‘कैसी बातें करती हो? वे मेरे दोस्त हैं. थोड़ा सा रंग डालेंगे और चले जाएंगे. अगर तुम नहीं जाओगी, तो वे बुरा मान जाएंगे.’’

‘‘अच्छा, ठीक है…’’ सुलेखा उठ कर आंगन में चली आई.

दिनेश के दोस्त नईनवेली खूबसूरत भाभी से होली खेलने के एहसास से ही रोमांचित हो रहे थे.

सुलेखा को देखते ही उन की आंखों में चमक आ गई. वे नशे में तो थे ही, उन्होंने आव देखा न ताव, सुलेखा पर टूट पड़े. कोई उस के गालों पर रंग मलने लगा, तो कोई चोली भिगोने लगा. कोई तो रंग लगाने के बहाने उस का बदन सहलाने लगा.

दिनेश कोने में खड़ा हो कर यह तमाशा देख रहा था. उसे यह सब अच्छा तो नहीं लग रहा था, मगर वह दोस्तों को क्या कह कर मना करता. वह भी तो उन सब की बीवियों के साथ ऐसी ही होली खेल कर आ रहा था.

‘‘हटो, दूर हटो… रंग डालना है, तो दूर से डालो…’’ तभी सुलेखा उन्हें परे करते हुए दहाड़ कर बोली, ‘‘अरे, देवर तो भाई जैसे होते हैं. क्या वे भाभी के साथ इस तरह से होली खेलते हैं? कैसे इनसान हो तुम लोग? क्या तुम्हारे गांव में ऐसी ही होली खेली जाती है? अगर कोई लाजशर्म नहीं है, तो मैं नंगी हो जाती हूं, फिर जितना चाहे, मेरे बदन से होली खेल लेना…’’

सुलेखा के तेवर देख कर सभी पीछे हट गए. किसी अपराधी की तरह उन सब के सिर शर्म से झुक गए. किसी में भी सुलेखा से आंख मिलाने की हिम्मत न थी. उन का सारा नशा काफूर हो चुका था.

थोड़ी देर में सारे दोस्त अपना सा मुंह ले कर चुपचाप चले गए. बीवी के इस रूप को दिनेश हैरानी से देखता रह गया.

‘‘यह क्या किया तुम ने…’’ दोस्तों के जाते ही दिनेश बोला.

‘‘मैं ने उन्हें होली का पाठ पढ़ाया और बिलकुल ठीक किया. आप भी अजीब आदमी हैं. दोस्तों की इतनी परवाह है, लेकिन मेरी नहीं…’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ऐसा क्यों कहती हो. मैं तो तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’

‘‘क्या यही है आप का प्यार… कोई आप की आंखों के सामने आप की बीवी के साथ छेड़खानी करे और आप चुपचाप खड़े हो कर तमाशा देखते रहें. कैसे पति हैं आप…

‘‘अब खड़ेखड़े मेरा मुंह क्या देख रहे हैं. जल्दी से 2 बालटी पानी लाइए, मैं नहाऊंगी.’’

दिनेश ने चुपचाप पानी ला कर रख दिया और सुलेखा कपड़े ले कर बाथरूम में घुस गई.

दरवाजा बंद करने से पहले जब सुलेखा ने दिनेश की तरफ मुसकरा कर देखा तो बीवी की इस अदा पर वह ठगा सा रह गया.

‘‘अंगअंग धो लूं जरा मलमल के बाण चलाऊंगी नैनन के… हर अंग का रंग निखार लूं कि सजना है मुझे सजना के लिए…’’ बाथरूम में नहाते हुए सुलेखा मस्ती में गुनगुनाने लगी. Social Stories

बाहर खड़े दिनेश को अपनी बीवी पर नाज हो रहा था.

Crime Story Hindi: अंधेरा आश्रम – साक्षी की इज्ज्त से खेलता बाबा

Crime Story Hindi: गिरधारी लाल कसबे के बड़े कारोबारी थे. उन की पत्नी सुशीला देवी घर में पंडितों को भोज, पूजापाठ करवा कर आएदिन उन्हें दक्षिणा देती रहती थीं. वे आंख मींच कर पंडितों और बाबाओं पर भरोसा करती थीं.

वे आएदिन व्रतउद्यापन कराती थीं, सो उन के घर में दूसरी सहेलियों का आनाजाना भी लगा रहता था. हर उद्यापन के पहले शहर के बड़े साड़ी स्टोर से आदमी नए फैशन की साडि़यां ले कर घर आता और सुशीला देवी खटाखट 15 एकजैसी साड़ियां बांटने के लिए निकाल लेतीं. फिर एक भारी साड़ी वे खुद के लिए पसंद करतीं और बहू इंद्रा को भी पुकारतीं और कहतीं कि तुम भी एक अच्छी साड़ी पसंद कर लो.

सुशीला देवी के घर में एक नामी बाबाजी का भी आनाजाना था. उन के आशीर्वाद के बिना तो घर का पत्ता भी नहीं हिलता था. कुछ भी नया काम हो, बाबाजी उस का मुहूर्त निकालते और हवन करते, फिर उस काम की शुरुआत होती.

सुशीला देवी बाबाजी के आश्रम में जातीं और सेवा कर के आतीं. उन का विश्वास था कि घर में हर तरक्की बाबाजी के आशीर्वाद से होती है.

हकीकत यह थी कि सुशीला देवी व उन के जैसे ही दूसरे भक्तों की मदद से बाबाजी का आश्रम हराभरा हो रहा था. जब सुशीला देवी सेवा के लिए जातीं, तो अपनी बेटी साक्षी को भी साथ ले जातीं.

आश्रम में वे कहतीं, ‘‘बाबाजी के पैर छू कर आशीर्वाद लो बेटी.’’

बाबाजी भी साक्षी को आशीर्वाद देते और कहते, ‘‘देखना, हमारी साक्षी बेटी किसी राजा भोज को ब्याही जाएगी.’’

शकुंतला देवी बाबाजी के मुंह से शुभ वचन सुन कर धन्य हो जातीं.

साक्षी निकली भी बहुत खूबसूरत. 4-5 साल बाद वह कालेज जाने लगी थी. जब इम्तिहान का समय आता, बाबाजी घर आते, साक्षी को आशीर्वाद देते. साक्षी भी उन की शख्सीयत से बहुत प्रभावित थी. कभीकभी अगर शकुंतला देवी सेवा के लिए न जा पातीं, तो वे साक्षी को भेज देतीं.

सुशीला देवी की बहू इंद्रा पेट से हुई. सुशीला देवी तो बाबाजी के चरण पकड़ कर बैठ गईं और कहने लगीं, ‘‘कुछ ऐसा कीजिए बाबाजी, पहली बार में ही पोते का मुंह देखूं. पोता होते ही आप के पूरे आश्रम में एसी लगवाऊंगी.’’

बाबाजी ने बहू को पुकारा, ‘‘बेटी इंद्रा, जरा इधर आओ तो…’’

इंद्रा वहां आई. बाबाजी ने कुछ मंत्र बुदबुदाया और बहू को आशीर्वाद दिया.

पोते की आस लिए सुशीला देवी जीजान से अपनी एकलौती बहू की सेवा में जुटी रहीं. सुबह उठते ही मक्खनमिश्री मिला कर बहू को दे देतीं और आंखें मटका कर कहतीं, ‘‘रोज खाया करो, मक्खन सा गोरा बेटा पैदा होगा.’’

एक दिन शकुंतला देवी ने साक्षी से कहा, ‘‘बेटी, आज बाबाजी के आश्रम में तुम चली जाओ, मुझे कुछ काम है. और देखो, रसोई में सूखे मेवे रखे हैं, उन्हें ले जाना नहीं भूलना. बाबाजी के आशीर्वाद से पोता ही होगा… देख लेना तुम लोग.’’

साक्षी भी मां के कहे मुताबिक बाबाजी की सेवा में जुटी रहती थी. बहू इंद्रा के दिन चढ़ रहे थे और सुशीला देवी की चिंता बढ़ती जा रही थी. उधर साक्षी पर बाबाजी की सेवा का काम बढ़ता जा रहा था. वह आश्रम में जा कर बाबाजी का बिस्तर लगाती, उन की खड़ाऊं जगह पर रखती, उन की किताबें जमाती, यह सब कर के वह अपनेआप को धन्य समझती.

साक्षी सारीसारी रात बाबाजी के आश्रम में बिताती. सुशीला देवी कुछ पूछतीं, तो वह कहती, ‘‘मां, आज आश्रम में अखंड मंत्र जाप था. सो, उठ कर बीच में नहीं आ सकती थी. मुंहअंधेरे बाबाजी को हवन करना था, इसलिए उस की तैयारी कर रही थी और देर हुई तो वहीं सो गई.’’

सुशीला देवी भी चेहरे पर शांत भाव लाते हुए कहतीं, ‘‘हां बेटी, अच्छा ही है. हमारे घर में जो अच्छी आमदनी हो रही है न, सब बाबाजी की कृपा से ही है. अब बस इसे संभालने वाला एक वारिस और आ जाए, तो मैं बद्री नारायण के दर्शन कर आऊं.’’

साक्षी घर से सलवारकुरता पहन चुन्नी ओढ़ कर जाती और सांझ ढलते ही छोटेछोटे कपड़े पहन किसी अप्सरा का रूप धारण कर लेती. वह अपनी जवानी का बाबाजी के साथ भरपूर मजा ले रही थी.

अंधा क्या चाहे दो आंखें. सो, बाबाजी दिन में घर से लाए मेवों का भोग लगाते और रात में साक्षी का.

कभीकभी सुशीला देवी कहतीं, ‘‘बेटी साक्षी, तुम बहुत आश्रम में बहुत रहने लगी हो. अपनी पढ़ाई पर भी जरा ध्यान दो.’’

साक्षी कहती, ‘‘मां, आप चिंता न कीजिए. मैं खुद ध्यान दे रही हूं अपनी पढ़ाई पर.’’

इधर बाबाजी जब कभी घर आते, तो सुशीला देवी से कहते, ‘‘साक्षी बेटी पर यह साल भारी है, थोड़ा आश्रम में मंत्र जपेगी और हवन करेगी, तो दोष मुक्त होगी.’’

साक्षी तो बाबाजी से इतनी सम्मोहित हो चुकी थी कि घर में कुछ न बताती. जो चल रहा था, उस में वह बहुत खुश थी. कभीकभी साक्षी की सहेलियां उसे पार्टी के लिए बुलातीं, तो साक्षी बाबाजी से कहती, ‘‘बाबाजी, आज रात को मैं न आ सकूंगी.’’

बाबाजी कहते, ‘‘अब तुम बिन हमारा जीवन असंभव है. तुम भी नहीं चाहोगी कि यह राज खुल जाए. एक रात की भी छुट्टी नहीं तुम्हें.’’

साक्षी बाबाजी के डर के मारे जिद न करती और अपनी सहेलियों से कह देती कि घर में काम ज्यादा है, वह पार्टी में न आ सकेगी.

जल्दी ही सुशीला देवी के घर में खुशखबरी आ गई कि उन की बहू इंद्रा ने बेटे को जन्म दिया है.

सुशीला देवी तो खुशी के मारे आसमान में उड़ने लगी थीं. घर में बड़े ही जोरशोर से जश्न मनाया गया और बाबाजी का आश्रम सुशीला देवी की कृपा से चमचमा उठा.

अब पोते के साथ सुशीला देवी और ज्यादा बिजी हो गईं और उधर साक्षी बाबाजी के आश्रम में. वह बाबाजी के खिलाफ एक शब्द भी सुनना पसंद नहीं करती थी.

अब कभीकभी सुशीला देवी कहतीं, ‘‘बेटी साक्षी, अब तुम आश्रम जाना छोड़ दो. पोता हो गया, मैं तो गंगा नहा ली. अब मैं फिर से बाबाजी की सेवा में जुट जाती हूं.’’

साक्षी कहती, ‘‘मां, कहां तुम इस उम्र में आश्रम में दौड़भाग करोगी? अब तुम पोता संभालो, बाबाजी की सेवा में मैं कोई कमी न आने दूंगी.’’

यह सुन कर सुशीला देवी के चेहरे पर बड़ी सी मुसकराहट बिखर जाती. वे मन ही मन सोचतीं, ‘आजकल लड़कियां इतना डिस्को में जाती हैं, अच्छा है साक्षी को यह हवा नहीं लगी. क्या फायदा 4 बौयफ्रैंड्स बना लेगी और वहां नशा करेगी. इस से अच्छा है कि आश्रम में ही सेवा करे, कुछ पुण्य ही कमाएगी.’

सुशीला देवी निश्चिंत हो कर एक तीर्थ कर आईं. उन्हें आए अभी 3-4 दिन ही बीते थे कि अस्पताल से फोन आया, ‘आप की बेटी अस्पताल में भरती है. आप जल्दी यहां आइए.’

सुशीला देवी ने जैसे ही फोन सुना, उन के तो हाथपैर फूल गए. एक बार को तो उन्हें कुछ समझ ही नहीं आया कि वे क्या करें, लेकिन अपनेआप को सहज किया, फिर झट से ड्राइवर को गाड़ी निकालने को कहा.

वहां जा कर जब उन्हें सारी बात मालूम हुई, तो उन्हें कानों सुने पर विश्वास ही न हुआ. मालूम हुआ कि साक्षी अस्पताल में बच्चा गिरवाने आई थी और उस दौरान उस की अंदर की कोई नस फट गई, जिस के चलते उस के शरीर से बहुत खून बह गया और उस की जान को खतरा हो गया.

सुशीला देवी तो समझ ही नहीं पाईं कि यह कब और कैसे हो गया. साक्षी अभी बेहोशी की हालत में थी.

जब साक्षी को होश आया, तो सुशीला देवी ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘यह कैसे हो गया बेटी?’’

साक्षी सिर्फ इतना ही कह पाई, ‘‘बाबाजी…’’

यह सुन कर सुशीला देवी के तो जैसे तनबदन में आग लग गई. वे कहने लगीं, ‘‘क्या बाबाजी ने जबरदस्ती की तुझ से?’’

साक्षी बोली, ‘‘नहीं मां, सब मेरी मरजी से. मुझे नहीं मालूम कि क्या हो गया है, लेकिन बाबाजी का साथ मुझे अच्छा लगता है.’’

उस की बात सुन कर सुशीला देवी का गुस्सा बेकाबू हो गया. फिर भी अपनी व साक्षी की इज्जत की खातिर अपनेआप को शांत कर वे बोलीं, ‘‘बेटी, क्या सोचा और क्या पाया?’’

खैर, अस्पताल में तो उन्हें मुंह बंद रखने में ही समझदारी नजर आई. साक्षी को अस्पताल से डिस्चार्ज करवा कर वे घर लाईं.

सेठ गिरधारी लाल ने जब सचाई सुनी, तो उन के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई. पर अब किया भी क्या जा सकता था. आखिर इस सब में साक्षी भी तो शामिल थी.

हां, सुशीला देवी का बेटा रमेश कहने लगा, ‘‘देखा मां, बाबाजी की अंधभक्ति का नतीजा. मैं ने तुम्हें कितनी बार समझाया था कि घर में जो कुछ है, वह पिताजी व मेरी मेहनत का फल है. बाबाजी के आशीर्वाद से कुछ नहीं होता है, लेकिन मां, तुम्हें तो उन पर इतना विश्वास था कि तुम मेरी एक भी बात ध्यान से सुनती तक नहीं.’’

भाईभाभी, सुशीला देवी व गिरधारी लाल ने मिल कर साक्षी को बड़े प्यार से समझाया, ताकि वह बाबाजी के सम्मोहन से बाहर निकल सके.

फिर सुशीला देवी का बेटा रमेश व बहू इंद्रा साक्षी को एक काउंसलर के पास ले गए, ताकि वह उसे समझाबुझा कर उस के बीते कल से छुटकारा दिला सके. कुछ महीने के लिए सुशीला देवी उसे अपनी बहन के घर ले गईं. कुछ समय में साक्षी फिर से सामान्य हो गई थी.

अब सुशीला देवी समझ गई थीं कि बाबाजी ने उस की अंधभक्ति का इस्तेमाल किया और उस के विश्वास का फायदा उठा कर उसी की बेटी का सम्मोहन कर लिया था. लेकिन अब सुशीला देवी ने बाबाजी के लिए अपने घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए थे.

बाबाजी ने भी सोचा कि शांत रहने में ही भलाई है, वरना कहीं गिरधारी लाल आगबबूला हो गए, तो पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे और उन की पोलपट्टी खुल जाएगी. उन्होंने जो आश्रम में हवनकीर्तन के नाम पर कारोबार किया हुआ है और बाबाजी का मुखौटा पहना है, वह जनता के सामने न उतर जाए. कहीं उन्हें जेल की हवा न खानी पड़ जाए. Crime Story Hindi

Crime Story Hindi: वकील साहब का दर्द – कौन थी प्रियंका विपिन की

Crime Story Hindi: कुसुमा ने अपने दामाद एडवोकेट विपिन कुमार निगम से वादा किया था कि अगर बड़ी बेटी उन के बच्चे की मां नहीं बनी तो वह उस के साथ अपनी छोटी बेटी काजल का विवाह कर देगी. लेकिन 4 साल बाद कुसुमा अपने वादे से मुकर गई. इस के बाद परिवार में कलह इतनी बढ़ गई कि…

सिकंदरपुर कस्बे के सुभाष नगर मोहल्ले में सुबह सवेरे यह खबर फैल गई कि विचित्र लाल के वकील बेटे विपिन कुमार निगम ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है, जिस ने भी यह खबर सुनी, स्तब्ध रह गया. कुछ ही देर में विचित्र लाल के घर के बाहर लोगों का मजमा लग गया. लोग आपस में कानाफूसी करने लगे. इसी बीच मृतक के छोटे भाई नितिन ने फोन पर भाई के आत्महत्या कर लेने की सूचना थाना छिबरामऊ पुलिस को दे दी. यह बात 22 मई, 2020 की सुबह की है.

मामला एक वकील की आत्महत्या का था. थानाप्रभारी शैलेंद्र कुमार मिश्र ने वारदात की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी और चौकी इंचार्ज अजब सिंह व अन्य पुलिसकर्मियों को साथ ले कर सुभाष नगर स्थित विचित्र लाल निगम के घर पहुंच गए.

थानाप्रभारी उस कमरे में पहुंचे, जिस में विपिन कुमार निगम की लाश कमरे की छत के कुंडे से लटकी हुई थी. उन्होंने सहयोगी पुलिसकर्मियों की मदद से शव को फांसी के फंदे से नीचे उतरवाया. मृतक की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. मृतक की जामातलाशी ली गई तो पैंट की दाहिनी जेब से एक पर्स तथा शर्ट की ऊपरी जेब से एक मोबाइल फोन मिला. पर्स तथा मोबाइल फोन पुलिस ने अपने पास रख लिया.थानाप्रभारी शैलेंद्र कुमार मिश्र अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह और एएसपी विनोद कुमार भी घटनास्थल पर आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. टीम ने उस प्लास्टिक स्टूल की भी जांच की जिस पर चढ़ कर मृतक ने गले में रस्सी का फंदा डाला था और स्टूल को पैर से गिरा दिया था.

मृतक विपिन कुमार निगम शादीशुदा था, पर घटनास्थल पर न तो उस की पत्नी प्रियंका थी और न ही प्रियंका के मातापिता और भाई में से कोई आया था. यद्यपि उन्हें सूचना सब से पहले दी गई थी. मौका ए वारदात पर मृतक का पूरा परिवार मौजूद था. मृतक के कई अधिवक्ता मित्र भी वहां आ गए थे जो परिवार वालों को धैर्य बंधा रहे थे. मित्र के खोने का उन्हें भी गहरा दुख था.पुलिस अधिकारियों ने मौके पर मौजूद मृतक के छोटे भाई नितिन कुमार से पूछताछ की तो उस ने बताया कि भैया सुबह जल्दी उठ जाते थे और केसों से संबंधित उन फाइलों का निरीक्षण करने लगते थे, जिन की उसी दिन सुनवाई होती थी.

आज सुबह 8 बजे जब मैं उन के कमरे पर पहुंचा तो कमरा बंद था और कूलर चल रहा था. यह देख कर मुझे आश्चर्य हुआ. मैं ने दरवाजा थपथपाया और आवाज दी. पर न तो दरवाजा खुला और न ही अंदर से कोई प्रतिक्रिया हुई. मन में कुछ संदेह हुआ तो मैं ने मातापिता और अन्य भाइयों को बुला लिया. उन सब ने भी आवाज दी, दरवाजा थपथपाया पर कुछ नहीं हुआ.इस के बाद हम भाइयों ने मिल कर जोर का धक्का दिया तो दरवाजे की सिटकनी खिसक गई और दरवाजा खुल गया. कमरे के अंदर का दृश्य देख कर हम लोगों की रूह कांप उठी. भैया फांसी के फंदे पर झूल रहे थे.

इस के बाद तो घर में कोहराम मच गया. खबर फैली तो मोहल्ले के लोग आने लगे. इसी बीच हम ने घटना की जानकारी भाभी प्रियंका, रिश्तेदारों, भैया के दोस्तों और पुलिस को दी.‘‘क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारे भाई ने आत्महत्या क्यों की?’’ एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह ने नितिन से पूछा. ‘‘सर, भैया ने पारिवारिक कलह के चलते आत्महत्या की है. दरअसल प्रियंका भाभी और उन के मायकों वालों से नहीं पटती थी. 2 दिन पहले ही भाभी ने कलह मचाई तो भैया उन्हें मायके छोड़ आए थे. उसी के बाद से वह तनाव में थे. शायद इसी तनाव में उन्होंने आत्महत्या कर ली.’’ निखिल ने बताया.

इसी बीच एएसपी विनोद कुमार ने मृतक के अंदर वाले कमरे की तलाशी कराई तो उन्हें एक सुसाइड नोट फ्रिज कवर के नीचे से तथा दूसरा सुसाइड नोट टीवी कवर के नीचे से बरामद हुआ. एक अन्य सुसाइड नोट उन के पर्स से भी मिला. यह पर्स जामातलाशी के दौरान मिला था. पर्स में पेन कार्ड, आधार कार्ड और कुछ रुपए थे.

विपिन के सुसाइड नोट

फ्रिज कवर के नीचे से जो पत्र बरामद हुआ था, उस में विपिन कुमार ने अपनी सास कुसुमा देवी को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘सासूजी, आप ने वादा किया था कि प्रियंका 3 साल तक बच्चे को जन्म नहीं दे पाई तो आप दूसरी बेटी काजल की शादी मेरे साथ कर देंगी. पर 3 साल बाद आप मुकर गईं. इस से मुझे गहरी ठेस लगी. प्रियंका के कटु शब्दों ने मेरे दिल को छलनी कर दिया है. उस के मायके जाने के बाद मैं 2 दिन बेहद परेशान रहा. रातरात भर नहीं सोया. आखिर परेशान हो कर मैं ने अपने आप को मिटाने का निर्णय ले लिया.’ विपिन निगम.

दूसरा पत्र जो टीवी कवर के नीचे से बरामद हुआ था. वह पत्र विपिन ने अपनी पत्नी प्रियंका को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘प्रियंका, तुम मेरे जीवन में बवंडर बन कर आई, जिस ने आते ही सब कुछ तहसनहस कर दिया. शादी के कुछ महीने बाद ही तुम रूठ कर मायके चली गईं. मांबाप के कान भर कर, झूठे आरोप लगा कर तुम ने मेरे तथा मेरे मातापिता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. ‘किसी तरह मामला रफादफा कर मैं तुम्हें मना कर घर ले आया.

डिलीवरी के दौरान मैं ने अपना खून दे कर तुम्हारी जान बचाई. यह बात दीगर है कि बच्चे को नहीं बचा सका. इतना सब करने के बावजूद तुम मेरी वफादार न बन सकी.
‘तुम ने कहा था कि 3 साल तक बच्चा न दे पाऊं तो मेरी छोटी बहन काजल से शादी कर लेना. पर तुम मुकर गई. लड़झगड़ कर घर चली गई. तुम सब ने मिल कर मेरी जिंदगी तबाह कर दी. अब मैं ऐसी जिंदगी से ऊब गया हूं जिस में गम ही गम हैं. —विपिन निगम.

तीसरा पत्र जो पर्स से मिला था, विपिन ने अपनी साली काजल को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘आई लव यू काजल, तुम मेरी मौत पर आंसू न बहाना. तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है. तुम तो मेरी आंखों का काजल बन चुकी थीं. मुझे यह भी पता है कि तुम मुझ से शादी करने को राजी थीं. पर तुम्हारी मां मंथरा बन गई.
‘उस ने नफरत भरने के लिए दोनों बहनों के कान भरे और फिर शादी के वादे से मुकर गई. मैं तुम दोनों बहनों को खुश रखना चाहता था, लेकिन ऐसा हो न सका. मैं निराश हूं. तन्हा जीवन से मौत भली. काजल, आई लव यू. मेरी मौत पर आंसू न बहाना. तुम्हारा विपिन.’
विपिन की शर्ट की जेब से उस का मोबाइल भी बरामद हुआ था. एएसपी विनोद कुमार ने जब फोन को खंगाला तो पता चला कि विपिन ने अपनी जीवनलीला खत्म करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट पर शायराना अंदाज में एक पोस्ट लिखी थी.

सुसाइड नोट्स से समझ आया माजरा

विपिन के सुसाइड नोट पढ़ने के बाद पुलिस अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि युवा अधिवक्ता विपिन कुमार निगम ने पारिवारिक कलह के कारण आत्महत्या की है. वह अपनी पत्नी प्रियंका और सास कुसुमा देवी से पीडि़त था.साक्ष्य सुरक्षित करने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए कन्नौज के जिला अस्पताल भिजवा दिया. पुलिस जांच और मृतक के परिवार वालों द्वारा दी गई जानकारी से आत्महत्या प्रकरण की जो कहानी सामने आई उस का विवरण इस प्रकार से है—

ग्रांट ट्रंक रोड (जीटीरोड) पर बसा कन्नौज शहर कई मायने में चर्चित है. कन्नौज सुगंध की नगरी के नाम से जाना जाता है. यहां का बना इत्र फुलेल पूरी दुनिया में मशहूर है. दूसरे यह ऐतिहासिक धरोहर भी है. चंदेल वंश के राजा जयचंद की राजधानी कन्नौज ही थी. उन का किला खंडहर के रूप में आज भी दर्शनीय है. गंगा के तट पर बसा कन्नौज तंबाकू और आलू के व्यापार के लिए भी मशहूर है. पहले कन्नौज, फर्रुखाबाद जिले का एक कस्बा था, जिसे बाद में जिला बनाया गया.

इसी कन्नौज जिले का एक कस्बा सिकंदरपुर है, जो छिबरामऊ थाने के अंतर्गत आता है. इसी कस्बे के सुभाष नगर मोहल्ले में विचित्र लाल निगम अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सरिता निगम के अलावा 4 बेटे थे. जिस में विपिन कुमार निगम सब से बड़ा तथा नितिन कुमार सब से छोटा था. विचित्र लाल व्यापारी थे, आर्थिक स्थिति मजबूत थी. कायस्थ बिरादरी में उन की अच्छी पैठ थी.
विपिन कुमार निगम अपने अन्य भाइयों से कुछ ज्यादा ही तेजतर्रार था. वह वकील बनना चाहता था. उस ने छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से एलएलबी की पढ़ाई की.

इस के बाद वह छिबरामऊ तहसील में वकालत करने लगा. विपिन कुमार निगम दीवानी और फौजदारी दोनों तरह के मुकदमे लड़ता था. कुछ दिनों बाद उस के पास अच्छेखासे केस आने लगे थे. उस ने तहसील में अपना चैंबर बनवा लिया और 2 सहयोगी कर्मियों को भी रख लिया.विपिन कुमार निगम अच्छा कमाने लगा तो उस के पिता विचित्र लाल ने 6 जनवरी, 2014 को औरैया जिले के उजैता गांव के रहने वाले राजू निगम की बेटी प्रियंका से शादी कर दी. राजू निगम किसान थे. उन के 2 बेटियां और एक बेटा था, जिन में प्रियंका सब से बड़ी थी.

खूबसूरत प्रियंका, विपिन की दुलहन बन कर ससुराल आई तो सभी खुश थे, पर प्रियंका खुश नहीं थी. उसे शोरगुल पसंद नहीं था. यद्यपि उसे पति से कोई शिकवा शिकायत न थी. प्रियंका ससुराल में 10 दिन रही. उस के बाद उस का भाई आकाश आया और उसे विदा करा ले गया.
प्रियंका ने दिखाए ससुराल में तेवर

लगभग 2 महीने बाद प्रियंका दोबारा ससुराल आई तो उस ने अपना असली रूप दिखाना शुरू कर दिया. वह सासससुर से कटु भाषा बोलने लगी, देवरों को झिड़कने लगी. सास सरिता बेस्वाद खाना बनाने को ले कर टोकती तो जवाब देती कि स्वादिष्ट खाना बनाने को नौकरानी रख लो. घर के काम के लिए कहती तो जवाब मिलता कि वह नौकरानी नहीं, घर की बहू है.

यही नहीं उस ने दहेज में मिला सामान पलंग, टीवी, फ्रिज, अलमारी पहली मंजिल पर बने 2 बड़े कमरों में सजा लिया और एक तरह से परिवार से अलग रहने लगी. इसी बीच उस
के पैर भारी हो गए. ससुराल वालों के लिए यह खबर खुशी की थी लेकिन उस के दुर्व्यवहार के कारण किसी ने खुशी जाहिर नहीं की.विपिन परिवार के प्रति पत्नी के दुर्व्यवहार से दुखी था. उस ने प्रियंका पर सख्ती कर लगाम कसने की कोशिश की तो वह त्रिया चरित्र दिखाने लगी. अपनी मां कुसुमा को रोरो कर बताती कि ससुराल वाले उसे प्रताडि़त करते हैं. मां ने भी बेटी की बातों पर सहज ही विश्वास कर लिया और उसे मायके बुला लिया.

इस के बाद मांबेटी ने सोचीसमझी रणनीति के तहत ससुराल वालों पर झूठे आरोप लगा कर थाना फफूंद में दहेज उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज करा दी. जब विपिन को पत्नी द्वारा रिपोर्ट दर्ज कराने की जानकारी हुई तो वह सतर्क हो गया. वह ससुराल पहुंचा और किसी तरह पत्नी व सास का गुस्सा शांत किया, जिस से फिर मुकदमे में समझौता हो गया. इस के बाद कई शर्तों के साथ कुसुमा देवी ने प्रियंका को ससुराल भेज दिया. ससुराल आ कर प्रियंका स्वच्छंद हो कर रहने लगी. उस ने पति को भी अपनी मुट्ठी में कर लिया था.
फिर जब प्रसव का समय आया तो प्रियंका मायके आ गई. कुसुमा ने उसे प्रसव के लिए इटावा के एक निजी नर्सिंग होम में भरती कराया. डाक्टरों ने उस का चेकअप किया तो खून की कमी बताई. और यह भी साफ कर दिया कि बच्चा औपरेशन से होगा.

कुसुमा चालाक औरत थी. वह जानती थी कि नर्सिंग होम का खर्चा ज्यादा आएगा. अत: उस ने दामाद विपिन को पहले ही नर्सिंग होम बुलवा लिया था. 9 जनवरी, 2015 को विपिन ने अपना खून दे कर प्रियंका की जान तो बचा ली, लेकिन बच्चा नहीं बच सका. लगभग एक हफ्ते तक अस्पताल में भरती रहने के बाद प्रियंका मां के घर आ गई. डिस्चार्ज के दौरान डाक्टर ने एक और चौंकाने वाली जानकारी दी कि प्रियंका दोबारा मां नहीं बन पाएगी.

यह जानकारी जब विपिन व प्रियंका को हुई तो दोनों दुखी हुए. इस पर सास कुसुमा ने बेटी दामाद को समझाया और कहा, ‘‘कुदरत का खेल निराला होता है, फिर भी यदि 3 साल तक प्रियंका बच्चे को जन्म न दे पाई तो मैं वादा करती हूं कि अपनी छोटी बेटी काजल का विवाह तुम्हारे साथ कर दूंगी.’’
सासू मां की बात सुन कर विपिन मन ही मन खुश हुआ. प्रियंका व काजल ने भी अपनी सहमति जता दी. इस के बाद प्रियंका पति के साथ ससुराल में आ कर रहने लगी. विपिन कुमार भी अपने वकालत के काम में व्यस्त हो गया. प्रियंका कुछ माह ससुराल में रहती तो एकदो माह के लिए मायके चली जाती. इसी तरह समय बीतने लगा.

प्रियंका के रहते विपिन के मन में पहले कभी भी साली के प्रति आकर्षण नहीं रहा, किंतु जब से सासू मां ने शादी करने की बात कही तब से उस के मन में काजल का खयाल आने लगा था. 17वां बसंत पार कर चुकी काजल की काया कंचन सी खिल चुकी थी. उस की आंखें शरारत करने लगी थीं. काजल का खिला रूप विपिन की आंखों में बस गया. अब वह उस से खुल कर हंसीमजाक करने लगा था. काजल की सोच भी बदल गई थी. वह जीजा के हंसीमजाक का बुरा नहीं मानती थी. दरअसल वह मान बैठी थी कि दीदी यदि बच्चे को जन्म न दे पाई तो विपिन उस का जीजा नहीं भावी पति होगा.

पत्नी और ससुरालियों के बयान से  टूट गया विपिन

धीरेधीरे 3 साल बीत गए पर प्रियंका बच्चे को जन्म नहीं दे पाई. तब विपिन ने सासू मां से कहना शुरू किया कि वह वादे के अनुसार काजल की शादी उस से कर दे लेकिन कुसुमा देवी उसे किसी न किसी बहाने टाल देती. इस तरह एक साल और बीत गया. विपिन को अब दाल में कुछ काला नजर आने लगा. अत: एक रोज वह ससुराल पहुंचा और सासू मां पर शादी का दबाव डाला, इस पर वह बिफर पड़ी, ‘‘कान खोल कर सुन लो दामादजी, मैं अपनी फूल सी बेटी का ब्याह तुम से नहीं कर सकती.’’‘‘पर आप ने तो वादा किया था. इस में आप की दोनों बेटियां रजामंद थीं.’’ विपिन गिड़गिड़ाया.

‘‘रजामंदी तब थी, पर अब नहीं. प्रियंका भी नहीं चाहती कि काजल की शादी तुम से हो.’’ कुसुमा ने दोटूक जवाब दिया.इस के बाद विपिन वापस घर आ गया. उस ने इस बाबत प्रियंका से बात की तो उस ने मां की बात का समर्थन किया. इस के बाद काजल से शादी को ले कर विपिन का झगड़ा प्रियंका से होने लगा. 18 मई, 2020 को भी प्रियंका और विपिन में झगड़ा हुआ. उस के बाद वह प्रियंका को उस के मायके छोड़ आया.पत्नी मायके चली गई तो विपिन कुमार तन्हा हो गया. उसे सारा जहान सूनासूना सा लगने लगा. उस की रातों की नींद हराम हो गई. वह बात करने के लिए पत्नी को फोन मिलाता, पर वह बात नहीं करती.

विपिन जब बेहद परेशान हो उठा, तब उस ने आखिरी फैसला मौत का चुना. उस ने 3 पत्र कुसुमा देवी, प्रियंका तथा काजल के नाम लिखे. काजल को लिखा पत्र उस ने अपने पर्स में रख लिया और सास को लिखा पत्र फ्रिज कवर के नीचे व पत्नी को लिखा पत्र टीवी कवर के नीचे रख दिया.21 मई, 2020 की आधी रात के बाद अधिवक्ता विपिन कुमार निगम ने अपनी जीवन लीला खत्म करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट में एक पोस्ट डाली. फिर कमरे की छत के कुंडे में रस्सी बांध कर फंदा बनाया और फिर स्टूल पर चढ़ कर फांसी का फंदा गले में डाल कर झूल गया. इधर सुबह घटना की जानकारी तब हुई जब विपिन का छोटा भाई नितिन कमरे पर पहुंचा.

मृतक विपिन कुमार निगम ने अपने सुसाइड नोट मे अपनी मौत का जिम्मेदार अपनी सास कुसुम देवी और पत्नी प्रियंका को ठहराया था, लेकिन मृतक के घर वालों ने कोई तहरीर थाने में नहीं दी जिस से पुलिस ने मुकदमा ही दर्ज नहीं किया और इस प्रकरण को खत्म कर दिया. Crime Story Hindi

Hindi Stories: कुंवारे बदन का दर्द – शबनम की कहानी

Hindi Stories: जावेद ने अपनी बीवी रह चुकी शबनम को बड़े ही गौर से देखा तो हक्काबक्का रह गया. यह एक होटल था जहां सब लोग खाना खा रहे थे. तलाक के बाद तो वे दोनों एकदूसरे के लिए अजनबी थे लेकिन 5 सालों तक साथ रहने के बाद, एक ही बिस्तर पर सोने के बावजूद कैसे अजनबी रह सकते थे.

शबनम अकेले ही एक टेबल पर बैठ कर खाना खा रही थी और जावेद अलग टेबल पर. 5 सालों के बाद उन के चेहरों में कोई खास फर्क नहीं आया था. शबनम को खातेखाते कुछ याद आया और वह खाना छोड़ कर जावेद के टेबल की तरफ बढ़ी. शायद उसे 5 साल पहले की कोई बात याद आई थी.

‘‘आप ने खाने से पहले इंसुलिन का इंजैक्शन लिया है कि नहीं?’’ शबनम ने जावेद से पूछा.

‘‘इंजैक्शन लिया है. लेकिन 5 साल तक तलाकशुदा जिंदगी गुजारने के बाद तुम्हें कैसे याद है?’’ जावेद ने पूछा.

‘‘जावेद, मैं एक औरत हूं.’’

‘‘तुम्हारे जाने के बाद, इतना मेरा किसी ने खयाल नहीं रखा,’’ जावेद ने कहा.

‘‘अगर ऐसी बात थी तो तुम ने मुझे तलाक क्यों दिया?’’

‘‘वह तो तुम जानती हो…

5 साल साथ रहने के बाद भी तुम मां नहीं बन पाई और बच्चा तो हर किसी को चाहिए.’’

‘‘अगर तुम बच्चा पैदा करने के लायक होते तो क्या मैं नहीं देती?’’ शबनम ने कहा और अपनी टेबल की तरफ बढ़ गई.

जब वे दोनों होटल से बाहर निकले तो फिर मेन गेट पर उन की मुलाकात हो गई.

‘‘चलो, कुछ दूर साथ चलते हैं,’’ जावेद ने कहा.

‘‘जिंदगीभर साथ चलने का वादा था लेकिन तुम ने ही मुझे तलाक दे कर घर से निकाल दिया,’’ शबनम बोली.

‘‘जो होना था, हो गया. अब यह बताओ कि तुम यहां आई कैसे?’’

‘‘जब तुम ने तलाक दिया तो मैं अपने मांबाप के पास गई. वे इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर सके और 6 महीने के अंदर ही दोनों चल बसे. मैं तो उन की कब्र पर भी नहीं जा सकी क्योंकि औरतों का कब्रिस्तान में जाना सख्त मना है.

‘‘उस के बाद मैं भाई के पास रही थी. भाई तो कुछ नहीं बोलता था, लेकिन भाभी के लिए मैं बोझ बन गई थी. वह रातदिन मेरे भाई के पीछे पड़ी रहती और मुझे जलील करते हुए कहती थी कि इस की दूसरी शादी कराओ, नहीं तो किसी के साथ भाग जाएगी.

‘‘तुम नहीं जानते कि कोई मर्द तलाकशुदा औरत से शादी नहीं करता. सब को कुंआरी लड़की और कुंआरा बदन चाहिए.

‘‘भाई बहुत इधरउधर भागा, पर कहीं कोई मेरा हाथ थामने वाला नहीं मिला. आखिरकार उस ने एक बूढ़े आदमी से मेरी शादी करा दी. वह दिनभर बिस्तर पर पड़ा रहता और मैं उस की एक नर्स हूं. उसे समय से दवा देना, खाना खिलाना या बाथरूम ले जाना, यही मेरी ड्यूटी?थी.

‘‘मुझे यह भी मालूम है कि तुम ने दूसरी शादी कर ली और तुम को दोबारा एक कुंआरी लड़की मिल गई. लेकिन मेरी जिंदगी को तो तुम ने सीधे आग की लपटों में फेंक दिया. और मैं नामुराद दूसरी शादी के बाद भी जल रही हूं.

‘‘तुम ने मुझे तलाक दे दिया और मेरे कुंआरे बदन का सारा रस निचोड़ लिया. एक औरत की जिंदगी क्या होती?है, तुम्हें मालूम नहीं है,’’ शबनम ने अपना दर्द बताया. उस की आंखों में आंसू आ गए. वह रोतेरोते पत्थर की बनी एक कुरसी पर बैठ गई.

जावेद सबकुछ एक बुत की तरह सुनता रहा और फिर अपना वही सवाल दोहराया, ‘‘तुम इस शहर में कैसे आई?’’

‘‘मेरा बूढ़ा पति बहुत बीमार है. मैं ने उसे एक अस्पताल में भरती कराया है.’’

‘‘उस की उम्र क्या है?’’ जावेद ने पूछा.

‘‘70 साल से भी ऊपर?है,’’ शबनम ने जवाब दिया.

‘‘फिर तो उम्र का बहुत फर्क है,’’ जावेद बोला.

जब शबनम वहां से उठ कर जाने लगी तो जावेद ने आगे बढ़ कर उस का हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘मुझे माफ कर दो.’’

‘‘तलाक माफी मांगने से नहीं खत्म होता है. तुम ने मुझे तलाक दे कर जैसे किसी ऊंची पहाड़ी से नीचे धकेल दिया और मैं नरक में चली गई,’’ और फिर शबनम अपना हाथ छुड़ा कर वहां से चली गई.

दूसरे दिन जावेद शाम को उसी होटल के सामने शबनम का इंतजार करता रहा. वह आई और बगैर कुछ बोले ही होटल के अंदर चली गई.

जावेद पीछेपीछे गया और उस के पास बैठ गया. दोनों ने एकदूसरे को देखा और उन के बीच रस्मी बातचीत शुरू हो गई.

‘‘तुम्हारी मम्मी कैसी हैं?’’ शबनम ने पूछा.

‘‘ठीक हैं. अब वे भी काफी बूढ़ी हो चुकी हैं.’’

‘‘उन को मेरी याद तो नहीं आती होगी. मुझे 5 साल तक बच्चा नहीं हुआ तो उन्होंने मेरा तुम से तलाक करा दिया और तुम्हारी बहन जरीना को 7 साल से बच्चा नहीं हुआ तो कोई बात नहीं, क्योंकि जरीना उन की अपनी बेटी है, बहू नहीं.’’

‘‘चलो जो होना था हो गया. यह हम दोनों का नसीब था,’’ जावेद ने अफसोस जताते हुए कहा.

‘‘नसीब बनाया भी जाता है और बिगाड़ा भी जाता है. अगर औरतों की सोच गलत होती?है तो घर के मर्द एक लोहे की दीवार की तरह खड़े हो जाते हैं. वैसे, औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं.’’

जावेद के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था. वह होटल की छत की तरफ देखने लगा. फिर उस ने बात को बदलते हुए कहा, ‘‘क्या मेरी मम्मी से बात करोगी?’’

‘‘हां, लगाओ फोन. मैं बात कर लेती हूं.’’

जावेद ने अपनी मां को फोन लगा कर कहा, ‘‘मम्मी, शबनम आप से बात करना चाहती है.’’

‘‘तोबातोबा, तुम अपनी तलाकशुदा औरत के साथ हो. यह हमारे मजहब के खिलाफ है. मैं उस से बात नहीं करूंगी,’’ उस की मां की आवाज स्पीकर पर शबनम को भी सुनाई दी.

‘‘जावेद, तुम उन का नंबर दो. मैं अपने मोबाइल फोन से बात करूंगी.’’

जावेद ने शबनम का मोबाइल फोन ले कर खुद ही नंबर लगा दिया. घंटी बजने लगी. उधर से आवाज आई, ‘कौन?’

‘‘मैं आप की बहू शबनम बोल रही हूं. आप ने अपने लड़के से मुझे तलाक दिलवाया, वह एकतरफा तलाक था. मेरे मांबाप को इस का इतना दुख हुआ कि वे मर गए. अब मैं तुम्हारे लड़के जावेद को ऐसा तलाक दूंगी कि वह भी तुम्हारी जिंदगी से चला जाएगा.’’

उधर से टैलीफोन कट गया, लेकिन जावेद के चेहरे पर सन्नाटा छा गया. उस ने कहा, ‘‘तुम मेरी मम्मी से क्या फालतू बात करने लगी थी…’’

शबनम ने जावेद की बात का कोई जवाब नहीं दिया.

अब भी वे दोनों कई दिनों तक रात का खाना खाने उस होटल में आए लेकिन अलगअलग टेबलों पर बैठ कर चले गए, क्योंकि रिश्ता तो टूट ही गया था और अब बातों में कड़वाहट भी आ गई थी.

एक दिन होटल में शबनम जल्दी आई, खाना खा कर बाहर पत्थर की बनी कुरसी पर बैठ गई और जावेद का इंतजार करने लगी. जावेद जब खाना खा कर निकला तो शबनम ने उसे आवाज दी, ‘‘आओ, कहीं दूर तक इन पहाड़ों में घूम कर आते हैं. मेरे बूढ़े पति की अस्पताल से छुट्टी हो गई है. मैं अब चली जाऊंगी. इस के बाद यहां नहीं मिलूंगी.’’

वे दोनों एकदूसरे के साथ गलबहियां करते हुए टाइगर हिल के पास चले आए जहां ऐसी ढलान थी कि अगर किसी का पैर फिसल जाए तो सीधे कई गहरे फुट नीचे नदी में जा गिरे. शबनम ने साथ चलतेचलते जावेद से कहा, ‘‘मैं तुम्हारा अपने मोबाइल फोन से फोटो लेना चाहती हूं क्योंकि अब हम नहीं मिलेंगे. तुम इस ढलान पर खड़े हो जाओ ताकि पीछे पहाड़ों का सीन फोटो में अच्छा लगे.’’

जावेद मुसकराया और फोटो खिंचवाने के लिए खड़ा हो गया. शबनम उस के पास आई, मानो वह सैल्फी लेगी. तभी उस ने जावेद को जोर से धक्का दिया और चिल्लाई, ‘‘तलाक… तलाक… तलाक…’’ जावेद ढलान से गिरा, फिर नीचे नदी में न जाने कहां गुम हो गया. Hindi Stories

Love Story: इश्क में सिर कलम – परिवार जान का दुश्मन

Love Story: 19 साल की कीर्ति हमेशा की तरह घर से बाजार जाने को कह कर निकली थी. मां को बताया था कि वह पहले कांता के पास जाएगी. उसे भी साथ में जाना है. उस को अपने लिए कुछ जरूरी सामान खरीदना है. रास्ते में ही उस का भाई कुणाल मिल गया. वह ट्यूशन पढ़ कर साइकिल से घर लौट रहा था. उस ने टोका था, ‘‘कहां जा रही है अकेली?’’

कुणाल कीर्ति से केवल एक साल छोटा था. भाई को भी उस ने सहमते हुए वही कहा, जो मां से बता कर निकली थी. इस पर उस ने सवाल भी किए थे, ‘‘लेकिन, कांता का घर तो पीछे रह गया?’’ कुणाल ने उस से कहा.

इस पर सफाई देते हुए वह बोली, ‘‘कांता खेत पर गई हुई है, रास्ते में मिल जाएगी.’’

उस के बाद कीर्ति तेजी से आगे बढ़ गई और कुणाल तेजी से साइकिल के पैडल मारते हुए वहां से चला गया.

उस के जाते ही कीर्ति अपने आप से बोलने लगी, ‘हुंह… बड़ा आया सवाल- जवाब करने वाला. खुद तो ट्यूशन के बहाने दोस्तों के साथ घूमता फिरता है और हमें रोकताटोकता रहता है.’

इस के बाद कीर्ति अपने प्रेमी अविनाश के पास एक निश्चित जगह पर पहुंच गई, जो उस का इंतजार कर रहा था. उसे देखते ही अविनाश खुश हो गया. वह अपने मोबाइल में टाइम दिखा कर चहकती हुई बोली, ‘‘देखो, आज मैं ने तुम्हारी शिकायत पूरी कर दी है. एकदम समय पर पहुंच गई हूं.’’

‘‘मुझे तुम्हारा भाई घर जाते हुए दिखा था, तब लगा तुम शायद आज नहीं आ पाओगी, लेकिन तुम ने तो वाकई कमाल कर दिया.’’ खुशी और आश्चर्य से अविनाश ने उस के हाथ पकड़ लिए.

‘‘चलो, उधर पीछे की ओर बैठते हैं. मैं तुम्हारे लिए कुछ लाई हूं.’’ कीर्ति स्कूल की पुरानी बिल्डिंग की ओर इशारा करती हुई बोली.

‘‘हां चलो, मैं ने वहां पर एक अच्छी जगह देखी है, जहां अब कोई आताजाता नहीं है. और वहां बैठने लायक थोड़ी साफसफाई भी है.’’ अविनाश बोला.

उस के बाद दोनों सरकारी स्कूल की पुरानी बिल्डिंग के पिछवाड़े खाली जगह पर चले गए. वहां छोटेबड़े पेड़पौधे लगे थे. हरियाली थी. मनमोहक जगह थी. लोगों की नजरों से बच कर कुछ समय वहां बिताया जा सकता था.

दोनों वहीं एक पेड़ की ओट में बैठ गए. कीर्ति अपने साथ पीठ पर लादे छोटा सा बैग उतार कर खोलने लगी. उस में से गांठ लगी पौलीथिन निकाली.

‘‘क्या है इस में?’’ अविनाश ने जिज्ञासावश पूछा.

‘‘अभी बताती हूं. इस में तुम्हारी पसंद का नाश्ता है. मैं ने खासकर तुम्हारे लिए कांदापोहा बनाया है. लेकिन मिर्ची तेज लगेगी. तुम्हें पसंद है न, इसीलिए हरी मिर्च ज्यादा डाली हैं.’’ कीर्ति पौलीथिन पैक की गांठ खोलती हुई बोली.

‘‘अरे वाह! मेरी पसंद का तुम कितना खयाल रखती हो. मैं भी तुम्हारे लिए कुछ ले कर आया हूं.’’ अविनाश सामने बैठते हुए बोला.

‘‘क्या लाए हो दिखाओ,’’ कीर्ति बोली.

‘‘पहले पोहा खा लेता हूं, फिर दिखाता हूं, खूशबू अच्छी आ रही है.’’ अविनाश बोला.

‘‘देखो कैसा कलर है पोहा का. नमक कम लगे तो बताना अलग से पुडि़या में है.’’ कीर्ति तब तक पोहा एक छोटी सी थर्मो प्लेट में निकाल चुकी थी.

अविनाश ने भी अपने बैग से एक छोटा सा पैकेट निकाल लिया था. उसे देखते ही कीर्ति चहक पड़ी, ‘‘अरे हेडफोन! यह महंगा वाला लगता है…’’

‘‘हां, थोड़ा महंगा है, लेकिन कार्डलैस है. तुम को औनलाइन पढ़ाई में दिक्कत आ रही थी, इसलिए तुम्हारे लिए खरीदा है.’’ अविनाश बोला. उस ने पैकेट खोल कर गले में पहनने वाले हेडफोन को उस के गले में डाल दिया.

‘‘पोहा भी खाओ ना,’’ कीर्ति खुशी से बोली.

‘‘कीर्ति हम लोग कब तक छिप कर मिलते रहेंगे. तुम्हारा भाई हमेशा हमें शक की निगाह से देखता है. वो है तो उम्र में छोटा लेकिन पता नहीं क्यों उस की नजरें हमेशा हमें तरेरती रहती हैं.’’

‘‘क्या करूं अविनाश, मैं भी उस से परेशान रहती हूं. पता नहीं इस हेडफोन को ले कर कितने सवालजवाब करे.’’

‘‘बोल देना मैं ने ट्यूशन पढ़ा कर कमाए पैसों से खरीदा है.’’

इस तरह कीर्ति और अविनाश का आपसी प्रेम परवान चढ़ने लगा था. वे एकदूसरे के दिलों की भावना को गहराई से समझने लगे थे, उन के बीच प्रेम में कोई छलावा या दिखावा नहीं था. केवल एक ही बात मन को कचोटती थी कि उन्हें मिलने के लिए घर वालों से कई तरह के झूठ बोलने पड़ते थे. ऐसा करते हुए कीर्ति कई बार परेशान हो जाती थी. मन दुखी हो जाता था.

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महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में वैजापुर तहसील के लाड़गांव शिवार की रहने वाली कीर्ति को गांव के ही अविनाश संजय थोरे से प्यार हो गया था. दोनों अकसर ही छिपछिप कर मिलते और घंटों प्यारभरी बातों में डूबे रहते थे. इस बीच उन्होंने हर तरह के सपने बुने थे.

उन के बीच पढ़ाईलिखाई से ले कर सिनेमा, संगीत, फैशन, मौडल, एंटरटेनमेंट, हाटबाजार, शहरी मौल मल्टीप्लेक्स और कोरोना तक की बातें होती थीं.

कई बार वे आलिया भट्ट से ले कर अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण से ले कर रणवीर, अक्षय और विराट कोहली को ले कर चर्चा और बहस करने लगते थे.

जब मोदी, राहुल, प्रियंका की बातें होतीं तब दोनों चिढ़ जाते थे. अविनाश कहता कि हमें राजनीति से कोई मतलब नहीं है. कीर्ति भी तुनकती हुई कहती, मुझे कौन सी राजनीति से मतलब है. अरे, लौकडाउन लगने से वे बातों में आ जाते हैं. मैं क्या करूं.

प्यार परवान चढ़ा तो दोनों ने जीवन भर साथ रहने का निश्चय कर लिया. इस बारे में उन्होंने अपनीअपनी किताबें हाथ में ले कर कसम खाई कि वे शादी करेंगे एकदूसरे के साथ ही.

उन्होंने अपनी किताबों पर एकदूसरे का नाम लिख कर अदलाबदली भी कर ली थी. हालांकि दोनों को ही मालूम था कि परिवार और बिरादरी वाले उन की शादी में रोड़ा अटकाएंगे. वजह थी दोनों ही जातियों के बीच बरसों से चला आ रहा मनमुटाव.

लाड़गांव शिवार में 2 उपनाम के परिवारों में विवाह संबंध नहीं होते हैं. यह कोई एक गोत्र वाला मामला नहीं है, बल्कि दोनों के बीच वर्चस्व और मानमर्यादा की लड़ाई का है. एक पक्ष का मानना है कि उन के नाम वाले लोग ही गांव के मुखिया रहे हैं, इसलिए यहां उन की ही चलेगी.

जबकि दूसरे पक्ष का तर्क होता है कि वह भी उसी जाति से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने भी राज किया है, इसलिए उन का वर्चस्व और मानसम्मान ज्यादा होना चाहिए. इस भाव के कारण दोनों बिरादरी के लोग एकदूसरे को नीचा दिखाने की जुगत में लगे रहते हैं.

ऐसे गांव में जब कीर्ति और अविनाश के दिलों में एकदूसरे के लिए प्यार की कोपलें फूटीं तो वे शादी की इच्छा घर वालों से बताने में डर गए. उन्हें पता था कि दोनों के घर वाले इस के लिए कभी भी राजी नहीं होंगे. अलबत्ता बात का बतंगड़ बन जाएगा और नौबत मरनेमारने तक आ जाएगी. तब दोनों प्रेमियों ने भाग कर शादी करने का फैसला कर लिया. जून 2021 में दोनों ने किसी को बताए बिना घर से भाग कर पुणे के आलंदी में विवाह कर लिया.

इस शादी की सूचना जब कीर्ति के पिता संजय मोटे को मिली, तो उस ने घर में तांडव शुरू कर दिया. वह आगबबूला हो गया. उसे लगा कि बेटी के इस कदम से उस की प्रतिष्ठा धूमिल हो गई है. गांव भर के आगे उस की नाक कट गई है. इस तनाव के चलते उस ने अपनी पत्नी शोभा पर ही बेटी को नहीं संभाल पाने का आरोप मढ़ दिया.

वह आए दिन अपनी पत्नी को कोसने लगा. उस के साथ गालीगलौज और मारपीट तक शुरू कर दी. हर गलती के लिए वह अपनी पत्नी को ही दोषी ठहरा देता. यही नहीं, कीर्ति के छोटे भाई कुणाल पर भी जबतब बाप का गुस्सा फूटने लगा.

संजय मोटे के उग्र तेवरों के कारण पूरा परिवार बुरी तरह तनाव में आ गया था. सब के दिमाग में यह बात बैठ गई कि कीर्ति ने प्रेम विवाह कर गांव भर में उन की इज्जत मिट्टी में मिला दी है.

कुछ दिनों बाद कीर्ति और अविनाश लाड़गांव आ कर रहने लगे. कीर्ति के अपनी ससुराल में पति के साथ रहने की खबर कीर्ति के घर वालों को मिली.

उन्हें यह भी मालूम हुआ कि कीर्ति को अविनाश के घर वालों ने अपना लिया है. कीर्ति अपनी ससुराल में रचबस गई थी. खुशी की बात यह थी कि वह गर्भवती थी. उस के पेट में 2 माह का गर्भ था.

कीर्ति की मां शोभा को जब दोनों के गांव लौटने का समाचार मिला तो एक दिन वह जा कर बेटीदामाद से उन के घर पर मिल आई. बेटी और दामाद से बड़ी आत्मीयता से मिली. कीर्ति ने महसूस किया कि उस की मां को अब उस की अविनाश से शादी को ले कर कोई शिकायत नहीं है.

मां ने मीठीमीठी बातें कर पिता को भी मना लेने का वादा किया. जबकि सच्चाई तो यह थी उस की मां भीतर ही भीतर सुलग रही थी. उस के दिलोदिमाग में खुराफाती योजना बन चुकी थी. यह बात उस ने केवल अपने बेटे संकेत को बताई.

योजना के मुताबिक ही 5 दिसंबर, 2021  को शोभा फिर अपने बेटे कुणाल के साथ कीर्ति की ससुराल गई. उस वक्त कीर्ति खेत में अपने सासससुर के साथ काम कर रही थी. मां और भाई को आया देख वह खेत का काम छोड़ कर खुशीखुशी घर दौड़ी आई.

उस ने बड़े प्यार से मां और भाई को पानी का गिलास दिया और चाय बनाने के लिए रसोई में चली गई. उस समय उस का पति अविनाश भी घर पर ही था, लेकिन तबियत ठीक नहीं होने के कारण वह दूसरे कमरे में लेटा हुआ था.

अचानक अविनाश को रसोई में बरतनों के गिरने की आवाज सुनाई दी. वह बिस्तर से उठ कर रसोई में आया. वहां का नजारा देख कर तो उस के होश ही उड़ गए. वह रसोई के दरवाजे पर ठिठक गया. हाथपैर जैसे सुन्न पड़ गए.

रसोई में शोभा यानी उस की सास ने अपनी बेटी कीर्ति के दोनों पैर कस कर पकड़ रखे थे और उस का छोटा भाई कुणाल एक धारदार हथियार कोयता से बहन की गरदन पर वार पर वार किए जा रहा था.

मां और भाई के हमले से कीर्ति बुरी तरह छटपटा रही थी. मगर उस की छटपटाहट क्षण भर में ठहर गई और भाई ने अंतिम वार कर उस की गरदन को धड़ से अलग कर दिया.

बहन का सिर बालों से पकड़ कर लहराते हुए दूसरे हाथ में खून सना कोयता लिए दरवाजे पर खड़े अविनाश को मारने के लिए झपटा. बीमार अविनाश कमजोरी महसूस कर रहा था. वह किसी तरह वहां से बच कर निकल भागा.

कीर्ति का भाई बहन का सिर हाथ में ले कर बाहर बरामदे में आया. बाहर खड़ी भीड़ को उस ने बहन का खून टपकता सिर दिखाया. मोबाइल निकाल कर सेल्फी खींची और फिर मां को मोटरसाइकिल पर बैठा कर पुलिस थाने जा पहुंचा. थाने में उस ने हत्या का जुर्म स्वीकारते हुए सरेंडर कर दिया.

वैजापुर के डीएसपी कैलाश प्रजापति ने इस बारे में मीडिया को जानकारी दी. उन्होंने कहा कि औनर किलिंग का यह रोंगटे खड़े कर देने वाला कांड है. छोटे भाई ने जिस बेरहमी से अपनी बड़ी बहन की हत्या की, उसे देख कर पुलिस भी थर्रा गई.

उन्होंने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला है कि कीर्ति 2 महीने की गर्भवती थी. एक मां द्वारा एक होने वाली मां की ऐसी जघन्य हत्या समाज की संकीर्ण मानसिकता बताती है.

अपनी झूठी इज्जत के लिए अपने खून का भी खून करने में लोग नहीं हिचकते हैं और यहां तो एक महिला ने ऐसा कांड कर डाला. इन दोनों से पूछताछ में पता चला कि ये लोग कीर्ति की हत्या की योजना पहले से ही बना कर बैठे थे. बस मौके की तलाश थी, जो उस रोज मिल गया था.

इस मामले में मां और बेटे के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत हत्या का आरोपी बनाया गया है. आधार कार्ड और स्कूल प्रमाण पत्र के अनुसार कुणाल नाबालिग था, इसलिए न्यायालय ने उसे नाबालिग मानते हुए औरंगाबाद के बाल न्यायालय के समक्ष हाजिर करने के आदेश दिए. जहां से उसे जुवेनाइल होम भेज दिया गया. जबकि मां शोभा को हत्या के आरोप में जेल भेजा गया है. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कुणाल परिवर्तित नाम है.

Haryana Crime News: प्रेमी संग भागी मां को बेटे ने किया लहूलुहान

Haryana Crime News: एक ऐसा दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक मां अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी. मां के भाग जाने पर गुस्साए बेटे ने अपनी मां के पैरों को ही काट डाला. आइए जानते हैं क्राइम से जुड़ी यह पूरी कहानी.

यह शर्मनाक घटना हरियाणा के पलवल जिले से सामने आई है. 39 साल की शादीशुदा महिला अपने 20 वर्षीय प्रेमी के साथ भागकर लिवइन रिलेशन में रहने लगी. महिला के 5 बच्चे भी हैं. बताया गया है कि महिला पलवल के छांयसा गांव की रहने वाली है और उसका प्रेमी उसी गांव का नजरूद्दीन था. दोनों का अफेयर कई सालों से चल रहा था. इसी कारण महिला ने अपने पति और बच्चों को छोड़कर नजरूद्दीन के साथ रहने का निर्णय लिया. यह कदम उस के परिवार और गांव वालों को बिलकुल पसंद नहीं आया.

कुछ दिन पहले महिला के पति और बच्चों को पता चला कि वह प्रेमी के साथ पिनगवां गांव में रह रही है. सोमवार सुबह महिला का नाबालिग बेटा अपने कुछ साथियों के साथ उस मकान में पहुंचा, जहां उस की मां अपने प्रेमी के साथ रह रही थी. गुस्साए बेटे ने अपनी मां को चारपाई पर बांधकर चाकू से उस के दोनों पैरों पर कई गंभीर घाव कर दिए. महिला की हालत नाजुक है और उस का इलाज चल रहा है.

पड़ोसियों की सूचना पर मौके पर पहुंची पुलिस ने महिला को जिला अस्पताल भेजा. डॉक्टरों के अनुसार महिला के दोनों पैरों पर आधाआधा इंच गहरे कई जख्म हैं और उसे आंतरिक चोटें भी आई हैं.

पिनगवां थाने के एसएचओ निखिल कुमार ने बताया कि मामले की जांच जारी है. जांच में यह भी सामने आया कि महिला ने अपने प्रेमी से कोर्ट मैरिज कर रखी थी. Haryana Crime News

UP Crime: जेल से बड़ा जुर्म – परिवार ही बना शिकार

UP Crime: 52 साल के सत्यपाल शर्मा को गांव में हर कोई जानता था. वे उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद के गांव सिंघावली अहीर के रहने वाले थे और नजदीक के ही एक गांव खिंदौड़ा में बने आदर्श प्राइमरी स्कूल में हैडमास्टर थे. गांव में उन की खेतीबारी भी थी. उन के परिवार में पत्नी उर्मिला के अलावा एक बेटा सोनू व एक बेटी सीमा थी.

23 अप्रैल, 2016 की सुबह सत्यपाल शर्मा रोजाना की तरह मोटरसाइकिल से स्कूल गए थे. सुबह के तकरीबन पौने 10 बजे थे. लंच ब्रेक का समय था. सत्यपाल शर्मा स्कूल के बरामदे में कुरसी डाल कर बैठे हुए थे, तभी एक मोटरसाइकिल पर सवार 3 नौजवान स्कूल परिसर में आ कर रुके. उन में से एक नौजवान मोटरसाइकिल के पास ही खड़ा रहा, जबकि 2 नौजवान पैदल चल कर सत्यपाल शर्मा के नजदीक पहुंच गए.

उन्होंने नमस्कार किया, तो सत्यपाल शर्मा ने पूछा, ‘‘कहिए?’’

उन में से एक नौजवान ने पूछा, ‘‘क्या आप ही मास्टर सत्यपाल हैं?’’

‘‘जी हां, मैं ही हूं. आप लोग कहां से आए हैं?’’

‘‘हम तो नजदीक के गांव से ही आए हैं मास्टरजी.’’

सत्यपाल शर्मा ने उन्हें बैठने का इशारा किया, तो वे पास रखी कुरसियों पर बैठ गए. इस बीच तीसरा नौजवान भी टहलता हुआ वहां आ गया.

सत्यपाल शर्मा उन नौजवानों को पहचानते नहीं थे. वे कुछ जानसमझ पाते कि उस से पहले ही कुरसी पर बैठे दोनों नौजवान बिजली की सी फुरती से खड़े हुए और उन्होंने अपने हाथों में तमंचे निकाल लिए. सत्यपाल शर्मा सकते में आ गए. पलक झपकते ही एक नौजवान ने उन्हें निशाना बना कर गोली दाग दी. गोली उन के पेट में लगी और खून का फव्वारा छूट गया.

सत्यपाल शर्मा समझ गए थे कि वे नौजवान उन के खून के प्यासे हैं. वे जान बचाने के लिए चिल्लाते हुए परिसर में तेजी से भागे, लेकिन तकरीबन 50 मीटर ही भाग पाए थे कि बदमाशों ने उन पर 2 और फायर झोंक दिए. इस से वे लहूलुहान हो कर जमीन पर गिर पड़े. गोलियां चलने से स्कूल के टीचरों व बच्चों में चीखपुकार और भगदड़ मच गई. स्कूल चूंकि गांव के बीच में था, इसलिए आसपास के गांव वाले भी इकट्ठा होना शुरू हो गए.

यह देख कर गोली मारने वाले बदमाशों के पैर उखड़ गए. घिरने का खतरा देख कर मोटरसाइकिल वाला बदमाश अकेला ही भाग गया, जबकि एक बदमाश दीवार कूद कर खेतों की तरफ और तीसरा बदमाश गांव के रास्ते की तरफ भाग निकला. जो बदमाश गांव की तरफ भागा था, गांव वालों ने उस का पीछा कर कुछ ही दूर जा कर उसे पकड़ लिया था. गांव वालों ने पीटपीट कर उसे लहूलुहान कर दिया. उधर बदमाशों की गोली से घायल सत्यपाल शर्मा की मौके पर ही मौत हो गई.

इस सनसनीखेज वारदात की सूचना पा कर थाना सिंघावली अहीर के थाना प्रभारी सुभाष यादव अपने दलबल के साथ मौके पर पहुंच गए. हत्या की इस वारदात से गांव वालों में भारी गुस्सा था. लिहाजा, एसपी रवि शंकर छवि, कलक्टर हृदय शंकर तिवारी, एएसपी अजीजुलहक, सीओ कर्मवीर सिंह व दूसरे थानों का पुलिस बल भी वहां आ पहुंचा. पुलिस को मौके से एक तमंचा व खाली कारतूस बरामद हुए.

उधर सत्यपाल शर्मा की मौत की खबर से उन के परिवार में कुहराम मच गया था. उन की पत्नी उर्मिला व बेटा सोनू भी वहां आ पहुंचे थे. थाना पुलिस को गांव वालों के आरोपों के साथ विरोध का सामना करना पड़ रहा था. इस विरोध की भी वजह थी. लोगों का आरोप था कि कुछ दिनों पहले कुछ बदमाशों ने सत्यपाल शर्मा पर उन के घर पर हमला किया था. उन्होंने इस की शिकायत थाने में की थी और जान का खतरा बता कर सिक्योरिटी की मांग की थी, लेकिन थाना प्रभारी सुभाष यादव ने इस मामले में घोर लापरवाही दिखाते हुए नजरअंदाज कर दिया था.

पूछताछ में पुलिस को पता चला कि सत्यपाल शर्मा की जमीन को ले कर अपने ही परिवार के लोगों से रंजिश चली आ रही थी. इस रंजिश का शिकार हुए अपने बेटे सतीश के लिए सत्यपाल शर्मा इंसाफ की जंग लड़ रहे थे, इसीलिए उन की भी हत्या कर दी गई थी. गांव वालों का गुस्सा पकड़े गए बदमाश पर उतर रहा था. वह अधमरी हालत में पहुंच गया था. पुलिस ने उस से पूछताछ की, तो उस ने अपना नाम सोनू बताया, जबकि अपने साथियों के नाम गौरव व रोहित बताए.

सोनू गांव निरपुड़ा का रहने वाला था, जबकि गौरव उस का चचेरा भाई था और रोहित शेरपुर लुहारा गांव का रहने वाला था. पुलिस सोनू को अस्पताल में दाखिल कराती, उस से पहले ही उस की मौत हो गई. पुलिस ने सत्यपाल शर्मा व बदमाश सोनू की लाशों का पंचनामा कर के पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इस मामले में पुलिस ने सत्यपाल शर्मा के बेटे सोनू की तरफ से मारे गए व भागे बदमाशों के साथ ही विरोधी पक्ष के राजकरण, उस के भाई रामकिशन व आनंद, राजकरण के 2 बेटों पंकज पाराशर, दीपक, आनंद के बेटों मोहित, रोहित, बेटी पूजा, आनंद की पत्नी बबली, राजकरण की पत्नी कौशल्या, राजकरण के बेटे ईशान व रामकिशन के बेटे महेश के खिलाफ धारा 302 व 120बी के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया.

मामला बेहद गंभीर था. एसपी रवि शंकर छवि ने थाना प्रभारी सुभाष यादव को तत्काल प्रभाव से सस्पैंड कर दिया और थाने का प्रभार चंद्रकांत पांडेय को सौंप दिया. उन्होंने आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश देने के साथ ही हत्या की साजिश का खुलासा करने के निर्देश भी दिए. पुलिस ने सत्यपाल शर्मा की पत्नी उर्मिला व बेटे सोनू के साथसाथ गांव वालों से भी पूछताछ की. मामला सीधेतौर पर रंजिश का था.

दरअसल, सत्यपाल शर्मा की राजकरण व आनंद से जमीन की डोलबंदी को ले कर तकरीबन 10 साल से रंजिश चली आ रही थी. इसी रंजिश में 4 जुलाई, 2014 को सत्यपाल शर्मा के  जवान बेटे सतीश की सुबह तकरीबन 8 बजे उस वक्त गोली मार कर हत्या कर दी गई थी, जब वह खेत में काम करने के लिए गया था. सत्यपाल शर्मा ने इस मामले में 11 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

पुलिस ने इस मामले में आनंद व उस के बेटे मोहित को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. आनंद के कब्जे से हत्या में इस्तेमाल किया गया तमंचा व कारतूस भी बरामद हुए थे, जबकि बाकी आरोपियों को पुलिस ने जांच के दौरान क्लीनचिट दे दी थी. इस मामले में पुलिस मिलीभगत के आरोपों का सामना कर रही थी. बेटे सतीश की मौत से दुखी हो कर सत्यपाल शर्मा ने सोच लिया था कि वे उस के कातिलों को सजा दिला कर रहेंगे, इसलिए वे आएदिन कचहरी जा कर मुकदमे को मजबूत करने के लिए पैरवी करते थे. उन की पैरवी का ही नतीजा था कि जेल में बंद आरोपियों को जमानत नहीं मिल पा रही थी.

सत्यपाल शर्मा की इसी पैरवी से चिढ़ कर 26 मार्च की रात उन पर उस समय हमला किया गया था, जब वे घर पर थे. बदमाश गोली चला कर भाग गए थे. सत्यपाल शर्मा को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. जब उन्होंने जान का खतरा बता कर पुलिस से सिक्योरिटी मांगी थी, तब थाना पुलिस ने न जाने किन वजहों से अपने फर्ज से मुंह मोड़ लिया था.

पुलिस दोनों पक्षों की रंजिश से वाकिफ थी. बाद में इस मामले में सत्यपाल शर्मा की तहरीर पर राजकरण व रोहित के खिलाफ धारा 452 व 523 के तहत मुकदमा तो लिख लिया गया था, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई थी. इस के बाद सत्यपाल शर्मा की हत्या हो गई थी.

पुलिस सत्यपाल शर्मा के हत्यारों की तलाश में जुट गई. अगले दिन पुलिस ने इस मामले में नामजद रोहित व उस की बहन पूजा को गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ की गई, तो एक चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि इस हत्या की योजना लाखों रुपए की सुपारी के बदले मेरठ जेल में बनाई गई थी. पुलिस ने जरूरी सुराग हासिल कर के उन दोनों को जेल भेज दिया और दूसरे आरोपियों की तलाश में लग गई.

26 अप्रैल, 2016 को पुलिस ने एक शूटर गौरव व एक औरत किरन को गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ हुई, तो पुलिस भी चौंक गई, क्योंकि आरोपी परिवार की औरतों से ले कर गिरफ्तार की गई औरत ने भी हत्या की इस साजिश में अहम भूमिका निभाई थी. पूछताछ में सत्यपाल शर्मा की हत्या का हैरान करने वाले सच सामने आया.

दरअसल, सत्यपाल शर्मा अपने बेटे सतीश की हत्या की जिस तरह से पैरवी कर रहे थे, उस से आनंद व उस के बेटे मोहित को चाह कर भी जमानत नहीं मिल पा रही थी. उन्होंने अपनी जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील कर दी थी. 31 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन की जमानत पर सुनवाई होनी थी. सत्यपाल शर्मा इस का कानूनी तरीके से विरोध कर रहे थे. आरोपियों को लगने लगा था कि सत्यपाल शर्मा के रहते उन्हें कभी जमानत नहीं मिल पाएगी और उन्हें सजा हो कर रहेगी.

सत्यपाल शर्मा के पैरवी बंद कर देने से उन की राह आसान हो सकती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता था. आनंद की पत्नी बबली अपने पति व बेटे से अकसर जेल में मुलाकात के लिए जाती थी. उस ने आनंद व मोहित को उकसाया कि वे किसी भी तरह सत्यपाल का कोई इलाज करें. जितने रुपए कोर्टकचहरी में खर्च हो रहे हैं, उतने में तो उसे मरवाया जा सकता था. आनंद और मोहित को बबली की बात ठीक लगी. जेल की बदहाल जिंदगी से वे पहले ही परेशान थे. बबली अपनी जेठानी कौशल्या से इस संबंध में अकसर बात करती थी.

आनंद ने जेल में रहते बदमाश अमरपाल उर्फ कालू व अनिल से बात की. अमरपाल बागपत के ही छपरौली थाना क्षेत्र के शेरपुर लुहारा गांव का रहने वाला था, जबकि अनिल सूप गांव का बाशिंदा था. वे दोनों भी हत्या के मामले में मेरठ जेल में बंद थे. दोनों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे. आनंद व उस का परिवार सत्यपाल शर्मा को रास्ते से हटाना चाहता था. दोनों बदमाशों ने इस काम के लिए हामी भर ली. साढ़े 6 लाख रुपए में उन का सौदा तय हो गया.

अमरपाल ने इस मामले में अपने ही गांव के रोहित को जेल में बुलवा कर उस से बात की. उस से रुपयों के बदले में सत्यपाल शर्मा की हत्या करना तय हो गया. रोहित ने इस काम के लिए अपने दोस्तों सोनू राणा उर्फ शिशुपाल उर्फ अमरीकन व उस के चचेरे भाई गौरव को भी तैयार कर लिया. अमरपाल जेल में जरूर था, लेकिन उस के गैरकानूनी कामों को उस की पत्नी किरन उर्फ बाबू पूरा करती थी.

इस मामले में भी अमरपाल ने सुपारी के लेनदेन से ले कर हथियार मुहैया कराने  तक की जिम्मेदारी किरन को ही सौंप दी और उस की मुलाकात आनंद की पत्नी बबली से करा दी. सुपारी की रकम हत्या के बाद दी जानी थी. 11 अप्रैल को किरन, रोहित, गौरव व सोनू जेल में जा कर अमरपाल व अनिल से मिले. आनंद व उस की पत्नी बबली की भी उन से मुलाकात हुई और हत्या का प्लान तैयार कर लिया गया. इस के बाद रोहित अपने साथियों के साथ किरन के संपर्क में रहने लगा.

हत्या के लिए किरन ही उन्हें हथियार देने वाली थी. हत्या किस तरह करनी है, इस की पूरी कमान अब बबली व किरन ने संभाल ली थी. किरन अपने मायके मुजफ्फरनगर जिले के टयावा गांव में रह रही थी. अमरपाल के कई साथी, जो जेल से बाहर थे, किरन उन के संपर्क में थी. उन से बात कर के उस ने 3 तमंचों और कारतूसों का इंतजाम कर लिया था.

14 अप्रैल को रोहित, गौरव व सोनू बबली से उस के घर जा कर मिले. बबली ने उन्हें खर्च के लिए 10 हजार रुपए दिए. तीनों ने बबली व कौशल्या से सत्यपाल शर्मा के बारे में जानकारियां जुटा लीं. इस के बाद किरन ने उन्हें 3 तमंचे व 17 कारतूस सत्यपाल शर्मा की हत्या के लिए दे कर ताकीद कर दिया कि वह किसी भी सूरत में बचना नहीं चाहिए. इस के बाद कई दिनों तक उन्होंने रेकी कर के सत्यपाल शर्मा की पहचान के साथसाथ स्कूल आनेजाने का समय भी पता कर लिया.

23 अप्रैल को उन्होंने योजना को आखिरी रूप देने का फैसला किया. 22 अप्रैल की शाम को वे मोटरसाइकिल से बबली के घर पहुंच गए. किसी को शक न हो, इसलिए उन के सोने का इंतजाम एक ट्यूबवैल पर कर दिया गया. बबली और उस के बेटेबेटी ने उन के खानेपीने व सोने का भी इंतजाम किया था. 23 अप्रैल की अलसुबह वे वहां से निकल गए. उन्होंने सत्यपाल शर्मा को रास्ते में ही स्कूल जाते वक्त मारने की योजना बनाई. वे खिंदौड़ा वाले रास्ते की एक पुलिया पर खड़े हो गए. सत्यपाल शर्मा अपनी मोटरसाइकिल पर तेजी से आए और निकल गए, इसलिए उन का प्लान चौपट हो गया.

इस के बाद वे तीनों बदमाश इधरउधर टहलते रहे. बाद में उन्होंने स्कूल जा कर ही सत्यपाल शर्मा की हत्या करने का मन बनाया. सत्यपाल शर्मा को मारने में गलती न हो, इसलिए सोनू व रोहित ने पहले उन से नाम पूछा और इस के बाद उन तीनों ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी. शोरशराबा होने पर वे घबरा गए और मजबूरन उन्हें अलगअलग रास्ते से भागना पड़ा. सोनू भीड़ के गुस्से का शिकार हो गया.

पुलिस ने गौरव की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल हुआ तमंचा व मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली. इस के साथ ही पुलिस ने मुकदमे में किरन, उस के हिस्ट्रीशीटर पति अमरपाल व दूसरे बदमाश अनिल का नाम भी बढ़ा दिया. एसपी रवि शंकर छवि ने किरन व गौरव को मीडिया के सामने पेश कर के हत्याकांड का खुलासा किया. उन दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. UP Crime

Hindi Crime Stories: आधी रात के बाद हुस्न और हवस का खेल

Hindi Crime Stories: 18 नवंबर, 2016 की रात के यही कोई डेढ़ बजे मुंबई से सटे जनपद थाणे के उल्लासनगर के थाना विट्ठलवाड़ी के एआई वाई.आर. खैरनार को सूचना मिली कि आशेले पाड़ा परिसर स्थित राजाराम कौंपलेक्स की तीसरी मंजिल स्थित एक फ्लैट में काले रंग के बैग में लाश रखी है. सूचना देने वाले ने बताया था कि उस का नाम शफीउल्ला खान है और उस फ्लैट की चाबी उस के पास है.

35 साल का शफीउल्ला पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद की तहसील नगीनबाग के गांव रोशनबाग का रहने वाला था. रोजीरोटी की तलाश में वह करीब 8 साल पहले थाणे आया था, जहां वह उल्लासनगर के आशेले पाड़ा परिसर स्थित राजाराम कौंपलेकस के तीसरी मंजिल स्थित फ्लैट नंबर 308 में अपने परिवार के साथ रहता था. वह राजमिस्त्री का काम कर के गुजरबसर कर रहा था.

उस के फ्लैट से 2 फ्लैट छोड़ कर उस का मामा राजेश खान अपनी प्रेमिकापत्नी खुशबू उर्फ जमीला शेख के साथ रहता था. 10-11 महीने पहले ही खुशबू राजेश खान के साथ इस फ्लैट में रहने आई थी. वह अपना कमातीखाती थी, इसलिए वह राजेश खान पर निर्भर नहीं थी. राजेश खान कभीकभार ही उस के यहां आता था. ज्यादातर वह पश्चिम बंगाल स्थित गांव में ही रहता था.

18 नवंबर की दोपहर शफीउल्ला अपने फ्लैट पर जा रहा था, तभी इमारत की सीढि़यों पर उस की मुलाकात राजेश खान से हो गई. उस समय काफी घबराया होने के साथसाथ वह जल्दबाजी में भी था. लेकिन शफीउल्ला सामने पड़ गया तो उस ने रुक कर कहा, ‘‘शफी, अगर तुम मेरे साथ नीचे चलते तो मैं तुम्हें एक जरूरी बात बताता.’’

‘‘इस समय तो मैं कहीं नहीं जा सकता, क्योंकि मुझे बहुत तेज भूख लगी है. जो भी बात है, बाद में कर लेंगे.’’ कह कर शफीउल्ला जैसे ही आगे बढ़ा, राजेश खान ने पीछे से कहा, ‘‘यह रही मेरे फ्लैट की चाबी, रख लो. तुम्हारी मामी मुझ से लड़झगड़ कर कहीं चली गई है. मैं उसे खोजने जा रहा हूं. मेरी अनुपस्थिति में अगर वह आ जाए तो यह चाबी उसे दे देना. बाकी बातें मैं फोन से कर लूंगा.’’

राजेश खान से फ्लैट की चाबी ले कर शफीउल्ला अपने फ्लैट पर चला गया तो राजेश खान नीचे उतर गया.  करीब 12 घंटे बीत गए. इस बीच न राजेश खान आया और न ही उस की पत्नी खुशबू आई. शफीउल्ला को चिंता हुई तो उस ने दोनों को फोन कर के संपर्क करना चाहा. लेकिन दोनों के ही नंबर बंद मिले.

शफीउल्ला सोचने लगा कि अब उसे क्या करना चाहिए. वह कुछ करता, उस के पहले ही रात के करीब एक बजे उस के फोन पर राजेश खान का फोन आया. उस के फोन रिसीव करते ही उस ने पूछा, ‘‘तेरी मामी आई या नहीं?’’

‘‘नहीं मामी तो अभी तक नहीं आई. यह बताओ कि इस समय तुम कहां हो?’’ शफीउल्ला ने पूछा.

‘‘तुम्हें राज की एक बात बताता हूं. अब तुम्हारी मामी कभी नहीं आएगी, क्योंकि मैं ने उसे मार दिया है. इस में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए. मेरे फ्लैट के बैडरूम में बैड के नीचे काले रंग का एक बैग पड़ा है, उसी में तुम्हारी मामी की लाश रखी है. तुम उसे ले जा कर कहीं फेंक दो. जल्दबाजी में मैं उसे फेंक नहीं पाया. इस समय मैं ट्रेन में हूं और गांव जा रहा हूं.’’

खुशबू की हत्या की बात सुन कर शफीउल्ला के होश उड़ गए. उस ने उस बैग के बारे में आसपड़ोस वालों को बताया तो सभी इकट्ठा हो गए. उन्हीं के सुझाव पर इस बात की सूचना शफीउल्ला ने थाना विट्ठलवाड़ी पुलिस को दे दी थी.

एआई वाई.आर. खैरनार ने तुरंत इस सूचना की डायरी बनवाई और थानाप्रभारी सुरेंद्र शिरसाट तथा पुलिस कंट्रोल रूम एवं पुलिस अधिकारियों को सूचना दे कर वह कुछ सिपाहियों के साथ राजाराम कौंपलेक्स पहुंच गए. रात का समय था, फिर भी उस फ्लैट के बाहर इमारत के काफी लोग जमा थे. उन के पहुंचते ही शफीउल्ला ने आगे बढ़ कर उन्हें फ्लैट की चाबी थमा दी.

फ्लैट का ताला खोल कर वाई.आर. खैरनार सहायकों के साथ अंदर दाखिल हुए तो बैडरूम में रखा वह काले रंग का बैग मिल गया. उन्होंने उसे हौल में मंगा कर खुलवाया तो उस में उन्हें एक महिला की लाश मिली.

बैग से बरामद लाश की शिनाख्त की कोई परेशानी नहीं हुई. शफीउल्ला ने उस के बारे में सब कुछ बता दिया. लाश बैग से निकाल कर वाई.आर. खैरनार जांच में जुट गए. वह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि थानाप्रभारी सुरेंद्र शिरसाट, एसीपी अतितोष डुंबरे, एडिशनल सीपी शरद शेलार, डीसीपी सुनील भारद्वाज, अंबरनाथ घोरपड़े के साथ आ पहुंचे.

फोरैंसिक टीम के साथ पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण किया. अपना काम निपटा कर थोड़ी ही देर में सारे अधिकारी चले गए.

लाश के निरीक्षण में स्पष्ट नजर आ रहा था कि मृतका की बेल्ट से जम कर पिटाई की गई थी. उस के शरीर पर तमाम लालकाले निशान उभरे हुए थे. कुछ घावों से अभी भी खून रिस रहा था. उस के गले पर दबाने का निशान था. लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर के सुरेंद्र शिरसाट ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए उल्लासनगर के मध्यवर्ती अस्पताल भिजवा दिया.

घटनास्थल की पूरी काररवाई निपटा कर सुरेंद्र शिरसाट थाने लौट आए और सहयोगियों से सलाहमशविरा कर के इस हत्याकांड की जांच एआई वाई.आर. खैरनार को सौंप दी.

वाई.आर. खैरनार ने मामले की जांच के लिए अपनी एक टीम बनाई, जिस में उन्होंने एआई प्रमोद चौधरी, ए. शेख के अलावा हैडकांस्टेबल दादाभाऊ पाटिल, दिनेश चित्ते, अजित सांलुके तथा महिला सिपाही ज्योति शिंदे को शामिल किया.

पुलिस को शफीउल्ला से पूछताछ में पता चल गया था कि राजेश खान ने कत्ल कर के गांव जाने के लिए कल्याण रेलवे स्टेशन से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रैस पकड़ ली है. अब पुलिस के लिए यह चुनौती थी कि वह गांव पहुंचे, उस के पहले ही उसे पकड़ ले. अगर वह गांव पहुंच गया और उसे पुलिस के बारे में पता चल गया तो वह भाग सकता था.

इस बात का अंदाजा लगते ही पुलिस टीम ने जांच में तेजी लाते हुए राजेश खान के मोबाइल की लोकेशन पता की तो वह जिस ट्रेन से गांव जा रहा था, वहां से उसे गांव पहुंचने में करीब 10 घंटे का समय लगता.

पुलिस टीम किसी भी तरह उसे हाथ से जाने देना नहीं चाहती थी, इसलिए वाई.आर. खैरनार ने सीनियर अधिकारियों से बात कर के राजेश खान की गिरफ्तारी के लिए एआई ए. शेख और हैडकांस्टेबल माने को हवाई जहाज से कोलकाता भेज दिया. दोनों राजेश के पहुंचने से पहले ही हावड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए और उसे गिरफ्तार कर लिया.

26 साल के राजेश खान को मुंबई ला कर पूछताछ की गई तो उस ने खुशबू से प्रेम होने से ले कर उस की हत्या तक की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

राजेश खान पश्चिम बंगाल के जनपद मुर्शिदाबाद की तहसील नगीनबाग के गांव रोशनबाग का रहने वाला था. गांव में वह मातापिता एवं भाईबहनों के साथ रहता था. गांव में उस के पास खेती की जमीन तो थी ही, बाजार में कपड़ों की दुकान भी थी, जो ठीकठाक चलती थी. उसी दुकान के लिए वह कपड़ा लेने थाणे के उल्लासनगर आता था. वह जब भी कपड़े लेने उल्लासनगर आता था, अपने भांजे शफीउल्ला से मिलने जरूर आता था.

24 साल की खुशबू उर्फ जमीला से राजेश खान की मुलाकात उस की कपड़ों की दुकान पर हुई थी. वह उसी के गांव के पास की ही रहने वाली थी. उस की शादी ऐसे परिवार में हुई थी, जिस की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. वह जिन सपनों और उम्मीदों के साथ ससुराल आई थी, वे उसे पूरे होते नजर नहीं आ रहे थे. खुली हवा में सांस लेना घूमनाफिरना, मनमाफिक पहननाओढ़ना उस परिवार में कभी संभव नहीं था.

इसलिए जल्दी ही वहां खुशबू का दम घुटने लगा. खुली हवा में सांस लेने के लिए उस का मन मचल उठा. दुकान पर आनेजाने में जब उस ने राजेश खान की आंखों में अपने लिए चाहत देखी तो वह भी उस की ओर आकर्षित हो उठी.

चाहत दोनों ओर थी, इसलिए कुछ ही दिनों में दोनों एकदूसरे के करीब आ गए. जल्दी ही उन की हालत यह हो गई कि दिन में जब तक दोनों एक बार एकदूसरे को देख नहीं लेते, उन्हें चैन नहीं मिलता. उन के प्यार की जानकारी गांव वालों को हुई तो उन के प्यार को ले कर हंगामा होता, उस के पहले ही वह खुशबू को ले कर मुंबई आ गया और किराए का फ्लैट ले कर उसी में उस के साथ रहने लगा. मुंबई में उस ने उस से निकाह भी कर लिया.

मुंबई पहुंच कर खुशबू ने आत्मनिर्भर होने के लिए एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी कर ली. इस से राजेश खान चिंता मुक्त हो गया. वह महीने में 10-15 दिन मुंबई में खुशबू के साथ रहता था तो बाकी दिन गांव में रहता था.

मुंबई आ कर खुशबू में काफी बदलाव आ गया था. ब्यूटीपार्लर में काम करने के बाद उस के पास जो समय बचता था, उस समय का सदुपयोग करते हुए अधिक कमाई के लिए वह बीयर बार में काम करने चली जाती थी. पैसा आया तो उस ने रहने का ठिकाना बदल दिया. अब वह उसी इमारत में आ कर रहने लगी, जहां शफीउल्ला अपने परिवार के साथ रहता था. वहां उस ने सुखसुविधा के सारे साधन भी जुटा लिए थे.

खुशबू के रहनसहन को देख कर राजेश खान के मन संदेह हुआ. उस ने उस के बारे में पता किया. जब उसे पता चला कि खुशबू ब्यूटीपार्लर में काम करने के अलावा बीयर बार में भी काम करती है तो उस ने उसे बीयर बार में काम करने से मना किया. लेकिन उस के मना करने के बावजूद खुशबू बीयर बार में काम करती रही. इस से राजेश खान का संदेह बढ़ता गया.

18 नवंबर की सुबह खुशबू बीयर बार की ड्यूटी खत्म कर के फ्लैट पर आई तो राजेश खान को अपना इंतजार करते पाया. उस समय वह काफी गुस्से में था. उस के पूछने पर खुशबू ने जब सीधा उत्तर नहीं दिया तो वह उस पर भड़क उठा. वह उस के साथ मारपीट करने लगा तो खुशबू ने साफसाफ कह दिया, ‘‘मैं तुम्हारी पत्नी हूं, गुलाम नहीं कि जो तुम कहोगे, मैं वहीं करूंगी.’’

‘‘खुशबू, तुम मेरी पत्नी ही नहीं, प्रेमिका भी हो. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. तुम अपनी ब्यूटीपार्लर वाली नौकरी करो, मैं उस के लिए मना नहीं करता. लेकिन बीयर बार में काम करना मुझे पसंद नहीं है. मैं नहीं चाहता कि लोग तुम्हें गंदी नजरों से ताकें.’’

‘‘मैं जो कर रही हूं, सोचसमझ कर कर रही हूं. अभी मेरी कमानेखाने की उम्र है, इसलिए मैं जो करना चाहती हूं, वह मुझे करने दो.’’ कह कर खुशबू बैडरूम में जा कर कपड़े बदलने लगी.

राजेश खान को खुशबू से ऐसी बातों की जरा भी उम्मीद नहीं थी. वह भी खुशबू के पीछेपीछे बैडरूम में चला गया और उसे समझाने की गरज से बोला, ‘‘इस का मतलब तुम मुझे प्यार नहीं करती. लगता है, तुम्हारी जिंदगी में कोई और आ गया है?’’

‘‘तुम्हें जो समझना है, समझो. लेकिन इस समय मैं थकी हुई हूं और मुझे नींद आ रही है. अब मैं सोने जा रही हूं. अच्छा होगा कि तुम अभी मुझे परेशान मत करो.’’

खुशबू की इन बातों से राजेश खान का गुस्सा बढ़ गया. उस की आंखों में नफरत उतर आई. उस ने चीखते हुए कहा, ‘‘मेरी नींद को हराम कर के तुम सोने जा रही हो. लेकिन अब मैं तुम्हें सोने नहीं दूंगा.’’

यह कह कर राजेश खान खुशबू की बुरी तरह से पिटाई करने लगा. हाथपैर से ही नहीं, उस ने उसे बेल्ट से भी मारा. इस पर भी उस का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो फर्श पर पड़ी दर्द से कराह रही खुशबू के सीने पर सवार हो गया और दोनों हाथों से उस का गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया.

खुशबू के मर जाने के बाद जब उस का गुस्सा शांत हुआ तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे जेल जाने का डर सताने लगा. वह लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को फ्लैट में ही छिपा कर गांव भाग जाने में अपनी भलाई समझी. उस का सोचना था कि अगर वह गांव पहुंच गया तो पुलिस उसे कभी पकड़ नहीं पाएगी.

उस ने बैडरूम मे रखे खुशबू के बैग को खाली किया और उस में उस की लाश को मोड़ कर रख कर उसे बैड के नीचे खिसका दिया. वह दरवाजे पर ताला लगा कर बाहर निकल रहा था, तभी उस का भांजा शफीउल्ला उसे सीढि़यों पर मिल गया, जिस की वजह से खुशबू की हत्या का रहस्य उजागर हो गया.

घर की चाबी शफीउल्ला को दे कर वह सीधे कल्याण रेलवे स्टेशन पहुंचा और वहां से कोलकाता जाने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव के लिए चल पड़ा.

राजेश खान से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ अपराध संख्या 324/2016 पर खुशबू की हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मामले की जांच एआई वाई.आर. खैरनार कर रहे थे. Hindi Crime Stories

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित