MP News: लालची मामा का शिकार हुई एक भांजी

MP News: मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले की सोहागपुर तहसील में जमीनों के दाम उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़े हैं, क्योंकि यह सैरसपाटे की मशहूर जगह पचमढ़ी के नजदीक है. इस के अलावा सोहागपुर से चंद किलोमीटर की दूरी पर एक और जगह मढ़ई तेजी से सैलानियों की पसंद बनती जा रही है. इस की वजह वाइल्ड लाइफ का रोमांच और यहां की कुदरती खूबसूरती है. सैलानियों की आवाजाही के चलते सोहागपुर में धड़ल्ले से होटल, रिसोर्ट और ढाबे खुलते जा रहे हैं.

दिल्ली के पौश इलाके वसंत विहार की रहने वाली 40 साला लीना शर्मा का सोहागपुर अकसर आनाजाना होता रहता था, क्योंकि यहां उस की 22 एकड़ जमीन थी, जो उस के नाना और मौसी मुन्नीबाई ने उस के नाम कर दी थी.

लीना शर्मा की इस जमीन की कीमत करोड़ों रुपए में थी, लेकिन इस में से 10 एकड़ जमीन उस के रिश्ते के मामा प्रदीप शर्मा ने दबा रखी थी. 21 अप्रैल, 2016 को लीना शर्मा खासतौर से अपनी जमीन की नपत के लिए भोपाल होते हुए सोहागपुर आई थी. 23 अप्रैल, 2016 को पटवारी और आरआई ने लीना शर्मा के हिस्से की जमीन नाप कर उसे मालिकाना हक सौंपा, तो उस ने तुरंत जमीन पर बाड़ लगाने का काम शुरू कर दिया.

दरअसल, लीना शर्मा 2 करोड़ रुपए में इस जमीन का सौदा कर चुकी थी और इस पैसे से दिल्ली में ही जायदाद खरीदने का मन बना चुकी थी. 29 अप्रैल, 2016 को बाड़ लगाने के दौरान प्रदीप शर्मा अपने 2 नौकरों राजेंद्र कुमरे और गोरे लाल के साथ आया और जमीन को ले कर उस से झगड़ना शुरू कर दिया.

प्रदीप सोहागपुर का रसूखदार शख्स था और सोहागपुर ब्लौक कांग्रेस का अध्यक्ष भी. झगड़ा इतना बढ़ा कि प्रदीप शर्मा और उस के नौकरों ने मिल कर लीना शर्मा की हत्या कर दी. हत्या चूंकि सोचीसमझी साजिश के तहत नहीं की गई थी, इसलिए इन तीनों ने पहले तो लीना शर्मा को बेरहमी से लाठियों और पत्थरों से मारा और गुनाह छिपाने की गरज से उस की लाश को ट्रैक्टरट्रौली में डाल कर नया कूकरा गांव ले जा कर जंगल में गाड़ दिया.

लाश जल्दी गले, इसलिए इन दरिंदों ने उस के साथ नमक और यूरिया भी मिला दिया था. हत्या करने के बाद प्रदीप शर्मा सामान्य रहते हुए कसबे में ऐसे घूमता रहा, जैसे कुछ हुआ ही न हो. जाहिर है, वह यह मान कर चल रहा था कि लीना शर्मा के कत्ल की खबर किसी को नहीं लगेगी और जब उस की लाश सड़गल जाएगी, तब वह पुलिस में जा कर लीना शर्मा की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा देगा. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया.

लीना शर्मा की जिंदगी किसी अफसाने से कम नहीं कही जा सकती. जब वह बहुत छोटी थी, तभी उस के मांबाप चल बसे थे, इसलिए उस की व उस की बड़ी बहन हेमा की परवरिश मौसी ने की थी.

मरने से पहले ही मौसी ने अपनी जमीन इन दोनों बहनों के नाम कर दी थी. बाद में लीना शर्मा अपनी बहन हेमा के साथ भोपाल आ कर परी बाजार में रहने लगी थी. लीना शर्मा खूबसूरत थी और होनहार भी. लिहाजा, उस ने फौरेन ट्रेड से स्नातक की डिगरी हासिल की और जल्द ही उस की नौकरी अमेरिकी अंबैसी में बतौर कंसलटैंट लग गई. लेकिन अपने पति से उस की पटरी नहीं बैठी, तो तलाक भी हो गया. जल्द ही अपना दुखद अतीत भुला कर वह दिल्ली में ही बस गई और अपनी खुद की कंसलटैंसी कंपनी चलाने लगी.

40 साल की हुई तो लीना शर्मा ने दोबारा शादी करने का फैसला कर लिया, लेकिन शादी के पहले वह सोहागपुर की जमीन के झंझट को निबटा लेना चाहती थी, पर रिश्ते के मामा प्रदीप शर्मा ने उस के मनसूबों पर पानी फेर दिया. लीना शर्मा की हत्या एक राज ही बन कर रह जाती, अगर उस के दोस्त उसे नहीं ढूंढ़ते. जब लीना शर्मा तयशुदा वक्त पर नहीं लौटी और उस का मोबाइल फोन बंद रहने लगा, तो भोपाल में रह रही उस की सहेली रितु शुक्ला ने उस की गुमशुदगी की खबर पुलिस कंट्रोल रूम में दी.

पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रदीप शर्मा से संपर्क किया, तो वह घबरा गया और भांजी के गुम होने की रिपोर्ट सोहागपुर थाने में लिखाई, जबकि वही बेहतर जानता था कि लीना शर्मा अब इस दुनिया में नहीं है. देर से रिपोर्ट लिखाए जाने से प्रदीप शर्मा शक के दायरे में आया और जमीन के झगड़े की बात सामने आई, तो पुलिस का शक यकीन में बदल गया.

मामूली सी पूछताछ में प्रदीप शर्मा ने अपना जुर्म कबूल कर लिया, लेकिन शक अब लीना शर्मा की बहन हेमा पर भी गहरा रहा है कि वह क्यों लीना शर्मा के गायब होने पर खामोश रही थी? कहीं उस की इस कलयुगी मामा से किसी तरह की मिलीभगत तो नहीं थी? इस तरफ भी पुलिस पड़ताल कर रही है, क्योंकि अब उस पर सच सामने लाने का दबाव बढ़ता जा रहा है.

लीना शर्मा के दिल्ली के दोस्त भी भोपाल आ कर पुलिस के आला अफसरों से मिले और सोहागपुर भी गए. हेमा के बारे में सोहागपुर के लोगों का कहना है कि वह एक निहायत ही झक्की औरत है, जिस की पागलों जैसी हरकतें किसी सुबूत की मुहताज नहीं. खुद उस का पति भी स्वीकार कर चुका है कि वह एक मानसिक रोगी है. अब जबकि आरोपी प्रदीप शर्मा अपना जुर्म कबूल कर चुका है, तब कुछ और सवाल भी मुंहबाए खड़े हैं कि क्या लीना शर्मा का बलात्कार भी किया गया था, क्योंकि उस की लाश बिना कपड़ों में मिली थी और उस के जेवर अभी तक बरामद नहीं हुए हैं?

आरोपियों ने यह जरूर माना कि लीना शर्मा का मोबाइल फोन उन में से एक ने चलती ट्रेन से फेका था. लाश चूंकि 15 दिन पुरानी हो गई थी, इसलिए पोस्टमार्टम से भी बहुत सी बातें साफ नहीं हो पा रही थीं. दूसरे सवाल का ताल्लुक पुश्तैनी जायदाद के लालच का है कि कहीं इस वजह से तो लीना शर्मा की हत्या नहीं की गई है?

प्रदीप शर्मा ने अपनी भांजी के बारे में कुछ नहीं सोचा कि उस ने अपनी जिंदगी में कितने दुख उठाए हैं और परेशानियां भी बरदाश्त की हैं. लीना शर्मा अगर दूसरी शादी कर के अपना घर बसाना चाह रही थी तो यह उस का हक था, लेकिन उस की दुखभरी जिंदगी का खात्मा भी दुखद ही हुआ. MP News

Crime Story: जब एक बैनर ने पकड़वाया कातिल

Crime Story: पटना गया रेलवे लाइन के पास कई टुकड़ों में मिली लाश की गुत्थी को एक बैनर ने सुलझा दिया. 45 साला गीता की लाश के कुछ टुकड़े सरस्वती पूजा के लिए बने बैनर में लिपटे मिले थे. उस बैनर पर फ्रैंड्स क्लब, कुसुमपुर कालोनी, नत्थू रोड, परसा बाजार लिखा हुआ था. इस गुत्थी को सुलझाने के लिए सदर अनुमंडल पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार मंडल की अगुआई में जक्कनपुर थाना इंचार्ज अमरेंद्र कुमार झा और परसा बाजार थाना इंचार्ज नंदजी प्रसाद व दारोगा रामशंकर की टीम बनाई गई. पूछताछ के बाद पता चला कि उस बैनर को रंजन और मेकैनिक राजेश अपने साथ ले कर गए थे. पुलिस ने तुरंत राजेश को दबोच लिया. राजेश से पूछताछ करने के बाद कत्ल की गुत्थी चुटकियों में हल हो गई.

गीता का कत्ल उस के अपनों ने ही कर डाला था. कत्ल से ज्यादा दिल दहलाने वाला मामला लाश को ठिकाने लगाने के लिए की गई हैवानियत थी. गीता के पति उमेश चौधरी, बेटी पूनम देवी और दामाद रंजन ने मिल कर गीता का कत्ल किया था. रंजन और उस के दोस्त राजेश ने मिल कर लाश को 15 छोटेछोटे टुकड़ों में काटा. उमेश, पूनम और राजेश को पुलिस ने दबोच लिया है, जबकि रंजन फरार है. हत्या में इस्तेमाल किए गए 3 धारदार हथियार भी पुलिस ने बरामद कर लिए हैं.

रंजन और राजेश ने गीता की लाश को चौकी पर रखा और हैक्सा ब्लेड से सब से पहले सिर को धड़ से अलग किया. सिर को काटने के बाद खून का फव्वारा बहने लगा, तो खून को एक प्लास्टिक के टब में जमा कर लिया और टौयलेट के बेसिन में डाल कर फ्लश चला दिया. उस के बाद लाश के दोनों हाथपैरों को काटा गया.

गीता की बोटीबोटी काट कर उसे कई पौलीथिनों में बांध कर दूरदूर अलगअलग जगहों पर फेंक दिया. धड़ को कुसुमपुर में ही पानी से भरे एक गड्ढे में फेंक दिया गया. सिर को जक्कनपुर थाने के पास गया फेंका गया. वहीं पर हत्या में इस्तेमाल किए गए गड़ांसे और हैक्सा ब्लेड वगैरह को फेंक दिया गया.

हाथपैरों के टुकड़ों को पटनागया पैसेंजर ट्रेन में रख कर रंजन और राजेश पुनपुन रेलवे स्टेशन पर उतर गए. पटना गया पैसेंजर ट्रेन जब गया स्टेशन पहुंची, तो रेलवे पुलिस ने एक डब्बे में लावारिस बैग बरामद किया. उस बैग में हाथपैर के टुकड़े मिलने से गया पुलिस ने 18 अप्रैल को पटना पुलिस को सूचित किया. पटना पुलिस को धड़ और सिर पहले ही मिल चुके थे. शरीर के सभी हिस्सों को जोड़ने के बाद पता चला कि वह एक ही औरत की लाश है.

हत्यारों द्वारा गीता के जिस्म के टुकड़ों को अलगअलग जगहों पर फेंकने की वजह से हत्या के मामले को 3 थानों में दर्ज कराना पड़ा. गया के जीआरपी थाने में हाथपैर मिलने का, परसा बाजार में सिर मिलने का और पटना के जक्कनपुर थाने में धड़ मिलने का मामला दर्ज किया गया.

पटना के एसएसपी मनु महाराज कहते हैं कि अपराधी चाहे कितनी भी चालाकी कर ले, कोई न कोई सुबूत पुलिस के लिए छोड़ ही जाता है. गीता की हत्या करने वालों ने भी कानून की पकड़ से बचने के लिए पूरा उपाय किया था, पर उस के दामाद ने ऐसा सुबूत छोड़ दिया कि पुलिस आसानी से उन तक पहुंच गई.

कत्ल के 40 घंटे के भीतर पटना सदर पुलिस की टीम ने पूरे मामले का खुलासा कर दिया. 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. गीता का कत्ल कर उमेश अपनी बेटी पूनम के साथ मसौढ़ी चला गया था. उस के बाद रंजन ने अपने साथ काम करने वाले दोस्त राजेश को घर पर बुलाया और उस की मदद से लाश को टुकड़ों में काट डाला. इस के बदले में रंजन ने उसे 20 हजार रुपए देने का लालच दिया था.

17 अप्रैल की रात को पूनम ने अपनी मां गीता को चिकन खाने के लिए घर पर बुलाया था. वहां उमेश और रंजन पहले से मौजूद थे. पूनम ने चिकन में नींद की गोलियां मिला दी थीं. खाना खाने के बाद गीता बेहोश हो गई. तकरीबन 5 घंटे के बाद गीता को होश आया, तो उसे काफी कमजोरी महसूस हो रही थी.

गीता ने कमरे में इधरउधर देखा, तो कोई नजर नहीं आया. किसी तरह से उस ने अपने मोबाइल फोन से तुरंत अपने प्रेमी अरमान को फोन किया और बताया कि उस की तबीयत काफी खराब लग रही है. इसी बीच गीता का दामाद रंजन कमरे में पहुंच गया और उस ने गीता को मोबाइल फोन पर किसी से बात करते हुए सुन लिया. रंजन ने गुस्से में आ कर गीता का गला दबा कर उसे मार डाला.

पुलिस की छानबीन में पता चला है कि गीता का अरमान नाम के शख्स से नाजायज रिश्ता था. इस वजह से पति और बेटी ने मिल कर उस की हत्या कर डाली. गीता हर महीने अपने पति उमेश से रुपए लेने पहुंच जाती थी और उस से उस की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा ले कर अपने प्रेमी अरमान को दे देती थी. पिछले 20 सालों से गीता और अरमान के बीच नाजायज रिश्ता था. गीता का पति उमेश सचिवालय के भवन निर्माण विभाग में ड्राफ्टमैन था.

55 साल के उमेश की शादी 30 साल पहले मसौढ़ी के तरेगाना डीह की रहने वाली गीता से हुई थी. शादी के बाद गीता ससुराल में रहने लगी और उन के 3 बच्चे भी हुए. कुछ सालों के बाद उमेश लकवे का शिकार हो गया. पति की बीमारी का फायदा उठाते हुए गीता ने अपने पड़ोसी अरमान से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी और उस के बाद जिस्मानी रिश्ते भी बने. वह ज्यादा से ज्यादा समय अरमान के साथ ही गुजारती थी.

गीता की इस हरकत से उमेश और उस की बेटियां गुस्से में रहती थीं. उन्होंने कई दफा गीता को समझाने और परिवार को संभालने की बात की, पर गीता पर उन की बातों का कोई असर नहीं होता था. यही वजह थी कि गीता का इतनी बेरहमी से कत्ल किया गया.

गांव वालों के ताने सुन कर उमेश परेशान रहने लगा था और उस ने अपना पुश्तैनी घर भी छोड़ दिया था. उस के बाद उमेश ने कुसुमपुर वाला घर भी छोड़ दिया. कभीकभी वह मसौढ़ी में अपनी ससुराल वाले घर में रहता था, तो कभी पटना में रहता था.

एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि हत्यारों ने हत्या में इस्तेमाल किए गए गंड़ासे और हैक्सा ब्लेड को फ्लैक्स में लपेट कर फेंका था. बैनर पर कुसुमपुर फ्रैंड्स क्लब का पता लिखा हुआ था. उसी पते के सहारे पुलिस कुसुमपुर पहुंची और फ्रैंड्स क्लब का पता कर के हत्यारों तक आसानी से पहुंच गई. Crime Story

UP Crime: होटल के कमरे में प्यार का खूनी अंत, लाश के साथ बीती पूरी रात

UP Crime: एक ऐसी खौफनाक घटना सामने आई है, जिस ने प्यार जैसे रिश्ते को शर्मसार कर दिया. जिस हाथ को थामकर साथ निभाने की कसमें खाई जाती हैं, उसी हाथ ने प्रेमिका की जान ले ली. यह कहानी है उस प्रेमी की, जो प्यार के नाम पर पनपी नफरत और गुस्से से हैवान बन गया. मामूली विवाद से शुरू हुआ झगड़ा इतना बढ़ गया कि प्रेमी ने  प्रेमिका को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया और उस की पसलियां तक तोड़ डालीं.

सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजह थी, जिस ने प्यार को हिंसा में बदल दिया? आइए जानते हैं इस दिल दहला देने वाली क्राइम स्टोरी की पूरी सच्चाई.

यह शर्मनाक घटना उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई है. 10 जनवरी, 2026 को सफाई कर्मचारी प्रवीण कुमार अपनी प्रेमिका आरती को एक होटल में ले गया. कमरे में दोनों ने साथ बैठकर शराब पी. नशे के दौरान किसी मामूली बात को ले कर दोनों के बीच विवाद हो गया. यह विवाद इतना बढ़ गया कि गुस्से में प्रवीण ने आरती पर लातघूंसे बरसाने शुरू कर दिए.

पुलिस के मुताबिक आरती और प्रवीण के बीच पिछले 3 सालों से प्रेम संबंध थे. आरती के पति की पहले ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी थी और उस के 2 बच्चे थे, जबकि प्रवीण भी अपनी पत्नी से अलग रह रहा था. पुलिस जांच में सामने आया कि शराब के नशे में आरती ने गुस्से में प्रवीण का चेहरा नोच लिया था. इसी बात से बौखलाकर प्रवीण ने उस पर बेरहमी से हमला किया. लगातार पिटाई के कारण आरती की कई पसलियां टूट गईं और अंदरूनी चोटों की वजह से उस की मौत हो गई. आरती ने खुद को बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन आरोपी का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था.

हत्या के बाद प्रवीण पूरी रात शव के पास बैठा रहा. 11 जनवरी की सुबह जब वह होटल से निकलने लगा तो होटल के एक कर्मचारी ने उसे रोक लिया. महिला के बारे में पूछने पर प्रवीण गोलमोल जवाब देने लगा, जिस से उस कर्मचारी को शक हो गया.

इस के बाद में उस ने खुद पुलिस को फोन कर मैडिकल इमरजेंसी होने का नाटक किया, लेकिन सच सामने आ गया. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और उस से  पूछताछ जारी है. UP Crime

Emotional Story: मेरी ममता की आवाज

Emotional Story: लोगों ने बहुत कहा कि मुझे एक ही बेटी पैदा हुई है, लेकिन मैं मां थी, इसलिए मुझे पता था कि मुझे एक नहीं, 2 बेटियां पैदा हुई थीं. और मैं ने यह बात साबित भी कर दी, लेकिन इस में 9 साल लग गए.

शादी के 2 सालों बाद मैं ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था, लेकिन डिलीवरी के बाद जब मैं वार्ड में पहुंची तो मुझे बताया गया कि मेरे एक ही बच्ची पैदा हुई थी. जब मैं लेबर रूम में थी, तब प्रसव पीड़ा के बीच मुझे इतना तो अहसास था कि मैं ने 2 बच्चे पैदा किए थे. वहां किसी ने कहा भी था कि जुड़वां लड़कियां हुई हैं. जब मैं ने 2 लड़कियां पैदा की थीं तो एक कहां चली गई? मैं ने सास से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक ही लड़की पैदा हुई थी. मुझे सास पर ही शक हुआ, क्योंकि वह मुझ से पहले कई बार कह चुकी थीं कि मुझे लड़का ही चाहिए, इसलिए लड़का पैदा करना.

मुझे लगा कि सास ऐसे ही कह रही होंगी, इसलिए मैं तब कुछ नहीं बोली थी. लेकिन जब अस्पताल से बच्ची गायब हो गई तो मुझे उन की धमकी याद आ गई. लेकिन मैं वहां कर भी क्या सकती थी, इसलिए उस बच्ची के लिए बेजार रोतीबिलखती  रही, पर वहां मुझ पर किसी को तरस नहीं आया. सब यही कहते रहे कि मुझे एक लड़की ही पैदा हुई होगी, सास भला बच्ची क्यों गायब करेगी. मान लिया जाए कि उसे अगर पोते की चाहत थी तो वह एक ही क्यों, दोनों लड़कियों को गायब कर देती. लेकिन उन लोगों की बातें मेरे दिल को तसल्ली नहीं दे पा रही थीं. मुझे ताज्जुब इस बात पर हो रहा था कि एक अस्पताल के लेबर रूम से बच्ची को आखिर कैसे गायब कर दिया गया.

यह काम बिना नर्स की मिलीभगत के बिलकुल संभव नहीं था. लेकिन नर्स जसपाल के व्यवहार और सेवा भाव को देख कर उस पर अंगुली उठाना मेरे दिल को गवारा नहीं लग रहा था. बहरहाल, घर वाले मुझे आश्वस्त करते हुए अस्पताल से घर ले आए. मेरे न मानने से घर में क्लेश होने लगा. गनीमत यह थी कि ससुराल के अन्य लोगों की तरह पति अशोकजीत ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. इस का नतीजा यह निकला कि उस क्लेश की वजह से मुझे और पति को पुश्तैनी घर छोड़ कर किराए के घर में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा. किराए के मकान में शिफ्ट होने के बाद हमें बहुत आर्थिक परेशानियां हुईं, इस के बावजूद भी पति ने पुश्तैनी घर में जाने से मना कर दिया. मेरी बात पर सास ने उन्हें बड़े कड़वे बोल बोले थे.

उन्होंने कहा था, ‘‘डायन भी 7 घर छोड़ देती है, लेकिन तेरी बहू ने तो मुझ पर तोहमत लगाने में डायनों को भी पीछे छोड़ दिया. उस ने मुझ पर यह आरोप तो लगा दिया, लेकिन अब मैं हकीकत में ऐसा ही कर के दिखाऊंगी. जिस बच्ची पर यह इतरा रही है, उसे मैं ऐसे गायब कर दूंगी कि सारी जिंदगी उसे नहीं ढूंढ पाएगी. पता नहीं एक कैसे पैदा कर दी, बात करती है 2-2 की.’’

घर में सास ने जो क्लेश किया था, उसे याद कर के अशोकजीत सिहर उठते थे. मां के रौद्र रूप की वजह से ही उन्होंने उस घर से दूर रहने का फैसला किया था. मुझे तो यही चिंता खाए जा रही थी कि मेरी एक बेटी तो पहले ही छिन गई, कहीं दूसरी भी न छिन जाए. कुछ दिनों बाद मेरे पति अशोक को भी लगने लगा कि मुझे 2 बेटियां पैदा होने की शायद गलतफहमी पैदा हुई थी. पति ने जब भी मुझे समझाना चाहा, मैं जोरजोर से रोने लगती. तब मैं कहती, ‘‘मां हूं मैं. इस बात की खबर मुझे नहीं, किसी और को होगी कि मुझे एक नहीं 2 बच्चे पैदा हुए. मैं अब भी पूरे दावे के साथ कह रही हूं कि तुम्हारी मां ने ही मेरी एक बेटी को गायब किया है.’’

अशोक मेरे दर्द को समझता था, इसलिए वह अकसर समझाने की कोशिश करता. लेकिन मैं उस अनदेखी बेटी को भुला नहीं पा रही थी. पति को जब लगा कि मैं बेटी वाली बात पर नरवस हो जाती हूं तो उन्होंने इस मुद्दे पर बात करनी ही बंद कर दी. वह मुझे खुश रखने की पूरी कोशिश करते. लेकिन मैं न कभी खुश रह पाई और न अपनी अनदेखी बेटी भुला पाई. वक्त का पहिया घूमता रहा. देखतेदेखते मेरी बेटी 9 साल की हो गई. इस की जुड़वा बहन भी आज इतनी ही बड़ी होगी. उस की याद में आंसू बहाते हुए मैं अपनी इस बेटी में दूसरी बेटी का रूप देखने की कोशिश करती. उस समय मैं भावुक भी हो उठती थी. उस बेटी को मैं भले ही भुला नहीं पा रही थी, लेकिन उसे वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी थी.

लेकिन एक दिन अजीब घटना घटी. बाजार में खरीदारी करते समय मुझे एक अनजान औरत मिली. मुझे देखते ही उस ने कहा, ‘‘अरे, तुम तो वही स्वीटी हो न, जिस ने सिविल अस्पताल में जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था, जिस में से एक बच्ची को नर्स ने बेच दिया था?’’

‘‘हां,’’ मैं हैरान हो कर बोली, ‘‘मगर तुम कौन हो, मेरा नाम तुम कैसे जानती हो? और तुम जिस बच्ची को बेचने की बात कह रही हो, तुम्हें कैसे पता चली?’’

‘‘मेरी छोड़ो, तुम अपनी बताओ कि क्या तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई थी?’’ उस ने पूछा, ‘‘तुम ने शोर तो बहुत मचाया था, इस से मुझे लगा था कि तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई होगी?’’

‘‘मेरे शोर मचाने का कोई फायदा नहीं हुआ था. मेरी वहां किसी ने नहीं सुनी. लेकिन बहन एक बात बताओ, तुम्हें कैसे पता कि मेरी बेटी को नर्स ने बेचा था.’’ मैं ने उस महिला से बड़ी विनम्रता से पूछा.

‘‘नर्स जसपाल कौर को मैं ने बच्ची को किसी और के हाथों में सौंपते हुए अपनी आंखों से देखा था. उस ने जिस आदमी को बच्ची दी थी, उस ने नर्स को नोटों की गड्डी भी दी थी. जिन दिनों तुम अस्पताल में भरती थी, उन दिनों हमारी भी एक रिश्तेदार वहां भरती थी. मैं उसे देखने छोटी बहन के साथ रोजाना अस्पताल जाया करती थी. उसी आनेजाने से नर्स जसपाल कौर से हमारी जानपहचान हो गई थी.’’

उस महिला की बात से मुझे बल मिला. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस के आगे तुम ने वहां और क्या देखा था, मतलब जिसे मेरी बच्ची सौंपी थी, वह कौन था?’’

‘‘जिसे तुम्हारी बच्ची सौंपी थी उस शख्स को तो मैं नहीं जानती. लेकिन जिस समय नर्स उस आदमी को बच्ची सौंप रही थी, मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं. उसी दौरान नर्स ने मुझे देख लिया था. तुम्हारा शोर खत्म होने के बाद नर्स मेरे पास आई थी. उस ने मुझे धमकाते हुए कहा था कि चुपचाप तमाशा देखती रहो. ध्यान रखो, अगर मैं फंस गई तो यही कहूंगी कि बच्ची उठा कर मैं ने उसे दिया था. तब उस के साथसाथ मैं भी जेल जाऊंगी.’’

‘‘बहन, तुम से मेरी एक गुजारिश है, बस नर्स जसपाल कौर का पता बता दो, अपनी बेटी को तो मैं पाताल से भी ढूंढ लाऊंगी.’’ मैं ने उस महिला से कहा.

‘‘वह तो अब भी सिविल अस्पताल में ही है. मगर देखो, इस मामले में मेरा कहीं भी जिक्र नहीं आना चाहिए वरना मैं अपनी कही बातों से साफ मुकर जाऊंगी.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम इस की चिंता मत करो. मैं किसी से तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहूंगी. मुझे अपनी बच्ची से मतलब है. पिछले 9 सालों से तड़प रही हूं मैं अपनी उस औलाद के लिए. उस नर्स ने मेरी बेटी को किस के हाथों बेचा है, बस इतना पता लग जाए.’’ मैं ने उसे भरोसा दिया.

बाजार से सामान ले कर मैं जल्दी से घर लौट आई. मैं ने नर्स जसपाल के पास सीधे जाना उचित नहीं समझा, क्योंकि उस ने उस समय बच्ची के बारे में कुछ नहीं बताया था तो अब 9 साल बाद क्यों बताती. अस्पताल के लोग उलटे मुझे ही बेवकूफ बनाते. इसलिए मैं सीधे थाने पहुंची. लेकिन थाना पुलिस ने मेरी बात को तवज्जो नहीं दी. उन्होंने कहा कि इतने पुराने मामले में वे बिना सबूत के कुछ नहीं कर सकते. निराश हो कर मैं घर लौट आई. इस बारे में मैं ने अशोक से बात की तो अगले दिन वह मुझे ले कर एसएसपी के यहां गए. हम ने अपनी पीड़ा उन से कही. उन्होंने हमारी बात ध्यान से सुनी. मेरा यह अजीबोगरीब मामला था.

क्योंकि एक मां 9 साल बाद अपनी उस बच्ची के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराना चाह रही थी, जिस की उस ने शक्ल तक नहीं देखी थी. एसएसपी साहब ने हमारे सामने ही कुछ पुलिस अफसरों को बुला कर इस बात पर चर्चा की. मीटिंग खत्म हो गई, लेकिन एसएसपी समझ नहीं पाए कि उन्हें इस मामले में क्या काररवाई करनी चाहिए. मैं ने जो शिकायत उन्हें दी थी. उस में नर्स जसपाल कौर के अलावा अपनी सास को भी नामजद करने की बात कही थी.

फिलहाल एसएसपी ने यह कह कर हमें वापस भेज दिया कि वह इस मामले पर गहराई से अध्ययन कर के ही कुछ कर पाएंगे. हमें लगा कि थाना पुलिस की तरह वह भी हमें टरका रहे हैं. अब इतने बड़े अफसर से हम कह भी क्या सकते थे. इसलिए भरे मन से घर लौट आए. उन के यहां जा कर अपनी बच्ची तक पहुंचने की जो थोड़ीबहुत आस मुझे हुई थी, उन की बातों से मुझ से वह भी दूर होती दिखाई देने लगी थी. लेकिन कुछ दिनों बाद एसएसपी ने हमें अपने औफिस में बुला कर एक बार फिर हमारी पूरी दास्तान गौर से सुनी. इस के बाद उन्होंने मेरी सास और नर्स जसपाल कौर को बुलवाया. उन्होंने उन दोनों से भी पूछताछ की. पूछताछ में दोनों ज्यादा देर तक झूठ नहीं बोल सकीं. आखिर उन्होंने कबूल कर लिया कि मुझे 2 बेटियां पैदा हुई थीं. उन में से एक को उन्होंने एक बेऔलाद आदमी को बेच दी थी.

अशोक को जब पता चला कि इस काम में उन की मां का भी हाथ था तो वह दंग रह गए. जब मैं उस समय सास पर बच्ची चोरी का आरोप लगा रही थी तब उन्होंने मुझ पर ही गलतफहमी होने का आरोप लगाया था. पूछताछ में मेरी बेटी को चोरी करने की उन्होंने जो कहानी बताई थी, इस प्रकार निकली. इंदरजीत सिंह को औलाद नहीं थी. वह नर्स जसपाल कौर को अच्छी तरह जानते थे. उस से वह कई बार मिल कर कह चुके थे कि किसी लावारिस बच्चे का मामला उस की जानकारी में आए तो वह उसे बता दे. वह उसे अपनी औलाद बना लेंगे. नर्स जसपाल ने उन से कहा था कि वह उन के लिए बच्चे का इंतजाम कर देगी, मगर इस के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी.

इंदरजीत कई फैक्ट्रियों के मालिक थे. उन के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए उन्होंने बच्चे के लिए मुंहमांगी रकम देने की हामी भर ली थी. बच्चा पैदा होने के लिए जब मुझे अस्पताल लाया गया तो मेरी सास एक ही रोना रोती रही थीं, ‘‘हाय रब्बा, देखना स्वीटी के कहीं लड़की न हो जाए, इसे तो बेटा ही होना चाहिए, तभी मेरा वंश चलेगा.’’

सास ने यही बात नर्स जसपाल कौर के सामने भी कही तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों बड़ी बी, लड़का न हो कर लड़की हो गई तो क्या करोगी?’’

‘‘अरी, शुभशुभ बोल. लड़की हो गई न तो उसे यहीं मार कर गाड़ दूंगी, अस्पताल की मिट्टी में.’’ मेरी सास ने नर्स जसपाल कौर से कहा.

मैं उस अस्पताल में चैकअप के लिए जाती रहती थी, इसलिए उस नर्स को पता था कि मेरे पेट में जुड़वां बच्चे हैं. तभी तो उस ने मेरी सास से सीधे कहा, ‘‘देख माई, तेरी बहू को होने हैं जुड़वां बच्चे. एक को ला कर मेरे हवाले कर देना, मुंहमांगी रकम दूंगी.’’

‘‘सुन मेरी बात. लड़कियां हुईं तो भले दोनों ले जाना, लड़के हुए तो नहीं ले जाने दूंगी एक को भी.’’

आखिर समय आने पर मैं ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया. मेरी सास वहीं थी. उस ने एक बच्ची उठा कर जसपाल के हवाले कर दी. यह काम उस ने इतनी होशियारी से किया कि किसी को कुछ पता नहीं चला. यह भी संभव था कि इस अपराध में अस्पताल के कुछ अन्य लोग पहले से मिले रहे हों. जसपाल के बुलाने पर इंदरजीत सिंह भी वहां पहुंचे हुए थे. उसे अच्छीखासी रकम दे कर वह बच्ची को अपने साथ ले गए. उन लोगों ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि मेरे शोर मचाने के बाद भी मेरी बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया. फिर तो यह मामला कुछ ऐसा टला कि नर्स जसपाल और इस मामले से जुड़े अन्य लोग इस तरह भूल गए कि कभी यह मामला खुल भी सकता है.

लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी. और आखिर यह मामला खुल ही गया. पूरे 9 साल बाद केस खुलने पर पुलिस ने इंदरजीत के यहां दबिश दी. वह सचमुच बहुत बड़े आदमी थे. उन की बहुत बड़ी कोठी थी. मैं ने जब उन के यहां पल रही लड़की को देखा तो मेरा दिल खिल उठा. उस लड़की की शक्ल मेरी दूसरी बेटी से हूबहू मिल रही थी. लेकिन वह जिस शानोशौकत से उन के यहां रह रही थी, उस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. इंदरजीत ने उस का दाखिला शहर के एक नामचीन स्कूल में करा रखा था. जमाने भर की सुखसुविधाएं उसे मुहैया थीं. हमें वह पहली बार देख रही थी, इसलिए पहचानने तक से उस ने मना कर दिया.

उस के लिए तो इंदरजीत सिंह और उन की पत्नी ही उस के असली मांबाप थे. जो सुविधाएं उसे वहां मिल रही थीं, हम उसे ताउम्र नहीं दे सकते थे. पुलिस टीम ने उन्हें एसएसपी के सामने पेश किया. पूरी बात सामने आने के बाद एसएसपी ने अशोक और मुझे विश्वास में ले कर समझाना शुरू किया कि हम लोग आगे जो भी निर्णय लें, ठंडे दिमाग से सोचसमझ कर पूरी गहराई से लें. खासकर इस बात का हम ध्यान रखें कि इंदरजीत सिंह के यहां पल रही बच्ची के भविष्य पर कोई आंच न आए. जब हम ने गहराई से सोचा तो हमारे दिमाग में बारबार यही बात आती रही कि हमारी दूसरी बेटी का भविष्य इंदरजीत के यहां ही सुरक्षित है. जो परवरिश इंदरजीत के यहां बच्ची को मिल रही है, वैसी उसे हमारे यहां कदापि नहीं मिल सकती.

इस के बाद मेरी ममता ने कुछ इस तरह उछाल मारा कि मामला दर्ज करवाने की बात मैं भूल गई. उसी समय मेरे दिमाग में आया कि अगर मेरी दूसरी बेटी इंदरजीत के यहां रहती है, तभी उस का भविष्य संवर सकता है. इस से हमारा संबंध भी बना रहेगा और दोनों बहनें साथसाथ रह सकती हैं. बेटी के भविष्य को देखते हुए मैं ने और अशोक ने इतनी बड़ी कुर्बानी देने का फैसला कर लिया. इस के बाद अपनी सोच से इंदरजीत सिंह को अवगत कराया. खुश होते हुए उन्होंने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार लिया. इस के बाद इंदरजीत के साथ कचहरी जा कर बच्ची को विधिवत गोद दिए जाने की औपचारिकताएं पूरी करवाईं.

इस एवज में मेरे पति और मैं ने इंदरजीत से कोई तोहफा लेने से इनकार कर दिया. पैसा लेने का तो सवाल ही नहीं उठता था. लेकिन हां, इंदरजीत ने दोनों बच्चियों को बेहतरीन परवरिश का वादा किया और उन्होंने दोनों बच्चियों को एक बड़े स्कूल के हौस्टल में दाखिल करवा दिया. हर हफ्ते मैं पति के साथ दोनों बेटियों से मिलने जाती रही. दोनों ही पढ़ाई में होशियार थीं. यह क्रम कभी नहीं टूटा.

इसी तरह वक्त आगे बढ़ता गया. आज दोनों लड़कियां एमबीबीएस कर रही हैं. एमबीबीएस के बाद की उच्च शिक्षा के लिए उन का विदेश जाने का इरादा है. दोनों बेटियों की सफलता पर मैं और पति दोनों खुश हैं. हमें उम्मीद है कि वे आसमान की बुलंदियों को छुएंगी. मैं ने गलत किया या सही, मैं नहीं जानती. मगर किया वही, जो मेरी ममता ने मुझ से करवाना चाहा. Emotional Story

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Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल – फिल्मों की ही नहीं, ठगी की भी नायिका

Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल ने दक्षिण भारतीय ही नहीं बौलीवुड में भी अपनी पहचान बना ली थी. लेकिन बालाजी के प्यार में पड़ कर उस ने अपना बनाबनाया कैरियर तो बरबाद किया ही, अपराध की राह भी पकड़ ली.

29 मई की सुबह 8 बजे के आसपास मुंबई के उपनगर गोरेगांव के पौश इलाके तिलक रोड स्थित बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स के नीचे एकएक कर के पुलिस की कई गाडि़यां आ कर रुकीं तो देखने वालों को हैरानी के साथ उत्सुकता भी हुई. इमारत में अचानक ऐसा क्या हो गया कि इतनी सुबह पुलिस की इतनी गाडि़यां आ गईं. कौन क्या सोच रहा है, पुलिस को इस से क्या मतलब था? वे अपनी गाडि़यों से उतरे और लिफ्ट से इमारत की 32वीं मंजिल पर जा कर एक फ्लैट की डोरबेल बजाई. जैसे ही फ्लैट का दरवाजा खुला, उस में रहने वाली एक युवती और उस के साथी युवक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. आखिर कौन थी वह युवती और युवक, पुलिस ने उन्हें हिरासत में क्यों लिया था? यह सब इमारत वालों को अगले दिन तब पता चला, जब उन के बारे में अखबारों में विस्तार से छपा.

पता चला कि युवती का नाम लीना मारिया पौल और उस के साथ पकड़े गए युवक का नाम बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद शेखर था. लीना ने दक्षिण भारत की कई फिल्मों में ही नहीं, 1-2 हिंदी फिल्मों में भी काम किया था. दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. उन के ऊपर चेन्नई और मुंबई में करोड़ों रुपए की ठगी का आरोप था. दोनों को गिरफ्तार किया था मुंबई क्राइम ब्रांच के आर्थिक अपराध शाखा के सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी, शिवाजी फडतरे, इंसपेक्टर अशोक खेडकर, जगदीश कुलकर्णी, तनवीर शेख, सबइंसपेक्टर कदम ने. इन की मदद के लिए एक दरजन पुलिस कांस्टेबल भी थे.

दरअसल, इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे को सूचना मिली थी कि बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स की 32वीं मंजिल के एक फ्लैट में रहने वाली फिल्म अभिनेत्री लीना मारिया पौल बालाजी की मदद से लगभग एक साल से कुछ रसूखदारों की मदद से जालसाजी का एक बड़ा रैकेट चला रही है. एक कंपनी बना कर उस के जरिए तरहतरह की लुभावनी स्कीमों में लोगों की मेहनत की कमाई को कम समय में डबल ट्रिपल और चौगुना करने का लालच दे कर उन्हें ठगी का शिकार बना रही है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे ने तत्काल इस की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों जौइंट पुलिस कमिश्नर धनंजय कमलाकर और एडिशनल पुलिस कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी को दी. दोनों अधिकारियों ने पहले मामले का गहराई से अध्ययन किया, उस के बाद काररवाई करने के आदेश दिए. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर ही दोनों पुलिस अधिकारियों ने टीम बना कर अभिनेत्री लीना मारिया पौल और बालाजी के फ्लैट पर छापा मार कर गिरफ्तार किया था. क्राइम ब्रांच के औफिस ला कर जब दोनों से पूछताछ की गई तो उन के द्वारा की जाने वाली ठगी की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

27 वर्षीया लीना मारिया पौल केरल के रहने वाले सी.एस. पौल की बेटी थी. वह दुबई स्थित मैस्को कंपनी में इंजीनियर थे, और परिवार को वहीं साथ रखते थे. इसलिए लीना वहीं पैदा ही नहीं, पलीबढ़ी भी. लीना ने बीडीएस (बैचलर औफ डैंटल सर्जरी) की पढ़ाई की. दांतों की डाक्टर बनने के बाद प्रैक्टिस करने या नौकरी करने के बजाय अचानक उस पर हीरोइन बनने का भूत सवार हो गया. दरअसल, लीना के मातापिता अकसर नातेरिश्तेदारों और घर वालों से मिलनेजुलने केरल आते रहते थे. मातापिता के साथ आनेजाने में लीना को भारत आनाजाना अच्छा लगने लगा. बाद में वह समझदार हो गई तो अकेली भी भारत आने लगी.

लीना खूबसूरत तो थी ही, उस की फिगर भी आकर्षक थी, इसलिए उस ने भारतीय फिल्मों में काम करने वाली हीरोइनों से अपनी तुलना की तो उसे लगा कि वह भी हीरोइन बन सकती है. पैसा और शोहरत के लालच में डाक्टरी का पेशा छोड़ कर वह हीरोइन बनने के सपने देखने लगी. लीना ने अपनी इच्छा पिता को बताई तो उन्हें हैरानी हुई. उन्होंने लीना को समझाया कि यह सब इतना आसान नहीं है. लेकिन लीना ने तो ठान लिया था, इसलिए वह जिद पर अड़ गई. आखिर पिता को ही झुकना पड़ा. मजबूरी में ही सही, उन्होंने अनुमति दे दी. लीना दुबई से चेन्नई पहुंच गई. क्योंकि उसे लगता था कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में उसे आसानी से काम मिल जाएगा.

लीना को पता था कि सीधे फिल्मों में काम मिलना आसान नहीं है. इसलिए वह चेन्नई पहुंच कर मौडलिंग के लिए हाथपैर मारने लगी. इस के लिए उस ने अपना पोर्टफोलियो तैयार करा कर बड़ीबड़ी एजेंसियों से संपर्क किया. इस सब की बदौलत उसे कुछ विज्ञापन मिले तो उस की खूबसूरती और आकर्षक फिगर कुछ दक्षिण भारतीय फिल्म मेकरों के सामने आई. अंतत: उसे दक्षिण भारत की कुछ फिल्में मिल ही गईं और तो वह बड़े परदे पर आ गई. उस की कुछ फिल्में बौक्स औफिस पर सफल भी रहीं. इस तरह लीना दक्षिण भारतीय फिल्मों की हीरोइन बन गई. चूंकि वह दक्षिण भारतीय फिल्मों तक सीमित नहीं रहना चाहती थी, इसलिए हिंदी फिल्मों में काम पाने की कोशिश करती रही.

उस की कोशिश सफल रही और फिल्म निर्माता सुजित सरकार की नजर पड़ गई. उन्होंने लीना को अपनी हिंदी फिल्म ‘मद्रास कैफे’ में काम दे दिया. इस फिल्म में उसे लिट्टे के एक विद्रोही सदस्य की भूमिका करनी थी. फिल्म में हीरो थे जौन अब्राहम. कहते हैं, लीना की इस सफलता का राज था वे पार्टियां, जिन में वह अकसर जाया करती थीं. लीना फिल्मी पार्टियों की हौट गर्ल मानी जाती थी. शायद इसलिए जल्दी ही उस समय पुलिस की हिटलिस्ट में उस का नाम आ गया, जब वह चेन्नई और दिल्ली पुलिस के जौइंट औपरेशन में अपने बौयफ्रैंड बालाजी के साथ ठगी के आरोपों में पकड़ी गई.

बालाजी ने लीना को अपने प्यार के प्रभाव में कुछ इस तरह लिया था कि वह फिल्मों तक की डगर भूल कर उस के हर अच्छेबुरे कामों में उस का साथ देने लगी थी. उस ने लीना की जिंदगी ही नहीं, उद्देश्य तक बदल कर रख दिए थे. मूलरूप से बंगलुरु का रहने वाला बालाजी सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व का युवक था. वह लोगों को अपना परिचय बड़े ही रुतबेदार अंदाज में देता था. वह खुद को कभी कर्नाटक कैडर का आईएएस अधिकारी तो कभी करुणानिधि का पोता बताता था. वह कभी अपना नाम शेखर रेड्डी तो कभी सुकेश चंद्रशेखर या बालाजी बताता था.

बालाजी ने लीना को किसी फाइवस्टार पार्टी में देखा था. उस समय उस ने लीना से खुद को पूर्व मुख्यमंत्री करणानिधि का पोता और एक बड़ा बिल्डर बताया था. उस ने लीना की फिल्में देखी थीं. साथ ही वह उसे पसंद भी करता था. इसीलिए जब वह उस से मिला तो उसे लीना से प्यार हो गया था. वह किसी भी हालत में लीना को पाना चाहता था. आखिर उस ने अपनी झूठी बातों से लीना को अपने प्रेमजाल में फांस ही लिया. लीना को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उस ने फिल्म निर्माता निर्देशक रामगोपाल वर्मा को अपना जिगरी दोस्त बताया था.

लीना ने बिना सोचेविचारे बालाजी की बातों पर विश्वास कर लिया. उसे लगा कि जिस रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में काम करने के लिए लड़कियां लालायित रहती हैं, बालाजी उसे उन की फिल्मों में आसानी से काम दिला देगा. इस के बाद उस की किस्मत चमक जाएगी. इस मुलाकात के बाद लीना की बालाजी से अकसर मुलाकातें होने लगीं. इन मुलाकातों में लीना उस के बारे में कुछ नहीं जान पाई. शायद वह उस से भी बड़ा ऐक्टर था.

लीना और बालाजी की मुलाकातें बढ़ीं तो जल्दी ही उन में गहरी दोस्ती हो गई. इस बीच बालाजी ने लीना को रामगोपाल वर्मा के अलावा और भी कई बौलीवुड की हस्तियों से मिलवाने का लालच दिया. लीना बालाजी के रहनसहन और बातचीत से काफी प्रभावित थी. इसलिए उन की यह दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. परिणामस्वरूप लीना ने अपना तनमन बालाजी को सौंप दिया. इस के बाद दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे. बालाजी ने लीना को अपने प्यार के जाल में कुछ इस तरह फंसाया कि उस की यह सच्चाई जानने के बाद भी कि वह एक बड़ा जालसाज है, लीना उस से अलग नहीं हो पाई. सन 2013 में लीना और जौन अब्राहम द्वारा अभिनीत फिल्म ‘मद्रास कैफे’ रिलीज हुई.

फिल्म ठीक चली. लीना के अभिनय की काफी तारीफ हुई. अगर वह चाहती तो उसे फिल्मों में आगे भी अच्छी भूमिकाएं मिल सकती थीं. लेकिन बालाजी के साथ आने के बाद उस ने ऐसी कोई कोशिश ही नहीं की. उस ने खुद फिल्मों से नाता तोड़ लिया. क्योंकि जितनी मेहनत कर के लीना साल भर में कमाती थी, उतना पैसा तो बालाजी एक झटके में कमा लेता था. शायद इसी वजह से उस का फिल्मों से मोहभंग हो गया था. वह बालाजी के साथ उस के ठगी के कारोबार में उस की मदद करने लगी थी. लीना के साथ आने के बाद बालाजी का दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा था. लोगों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए वह लीना को साथ रखता था.

लीना के साथ आने के बाद बालाजी ने बड़ीबड़ी हस्तियों को ठगी का शिकार बनाया. उन दिनों कोच्चि के रहने वाले कुछ बिजनैसमैनों ने अपने प्रोजैक्टों और शोरूम के बिजनैस प्रमोशन के लिए उस का उद्घाटन फिल्मी हस्तियों से करवाना शुरू किया. इन्हीं में एक नया नाम इमैनुवल सिल्क टैक्सटाइल कंपनी के मालिक बैजू साहब का भी था. बैजू साहब 2012 में चेन्नई में अपना एक शोरूम खोल रहे थे. वह अपने इस शोरूम का उद्घाटन किसी बड़ी फिल्मी हस्ती से कराना चाहते थे. इस बात की जानकारी बालाजी को हुई तो वह बैजू साहब से मिला, और उन्हें उन के शोरूम के उद्घाटन के लिए बड़ी अभिनेत्री कैटरीना कैफ का नाम सुझा कर 20 लाख रुपए का खर्च बताया.

बैजू साहब बालाजी से किसी फाइवस्टार पार्टी में मिल चुके थे. इसलिए बैजू ने सहज ही बालाजी पर विश्वास कर के 20 लाख रुपए दे दिए. इस के बाद कैटरीना कैफ को शोरूम के उद्घाटन के लिए लाने की बात कौन कहे, वह खुद ही गायब हो गया. कई दिनों तक बैजू साहब बालाजी को फोन करते रहे, लेकिन जब बालाजी का कुछ पता नहीं चला तो उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वह बालाजी द्वारा ठग लिए गए हैं. इस के बाद उन्होंने थाना कलसमरी जा कर बालाजी के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करा दी. इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर अब्दुल लतीफ को सौंपी गई.

एक ओर पुलिस बालाजी की तलाश कर रही थी, दूसरी ओर शातिरदिमाग बालाजी चेन्नई के अन्नानगर पश्चिम एक्सटेंशन में फ्यूचर टेक्निक प्राइवेट लिमिटेड नामक फरजी कंपनी खोल कर मोटा हाथ मारने की तैयारी में था. इस के लिए उस ने अपने एक परिचित एम बाला सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को कंपनी का मैनेजिंग डायरैक्टर बना कर कैनरा बैंक से 19 करोड़ रुपए का लोन ले लिया. पैसा हाथ में आते ही वह लीना के साथ भूमिगत हो गया.

जब यह धोखाधड़ी सामने आई तो बैंक अधिकारियों के होश उड़ गए. बैंक का डिप्टी जनरल मैनेजर टीएस नालाशिवन ने बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 170 और 34 के तहत थाने में शिकायत दर्ज कराई. मामला एक बड़ी ठगी और सरकारी पैसों का था, इसलिए पुलिस ने तत्काल काररवाई करते हुए कंपनी के बेकुसूर मैनेजिंग डायरैक्टर टी.एस. सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि असली ठग बालाजी पुलिस के हाथ नहीं लगा. पुलिस उसे तलाश रही थी. इस के बावजूद बालाजी चुप नहीं बैठा. उस ने चेन्नई स्थित स्काईलार्क टैक्सटाइल्स एंड आउटफिटर नामक कंपनी के मालिक चक्रवर्ती को अपने निशाने पर ले लिया. चक्रवर्ती राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका लेते थे. इस के लिए वह अधिकारियों से साठगांठ रखते थे.

लीना और बालाजी ने चक्रवर्ती को कर्नाटक राज्य के मैडिकल तथा ट्रांसपोर्ट डिपार्टमैंट के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका दिलाने के नाम पर 63 लाख रुपए ऐंठ लिए थे. चक्रवर्ती से उस ने खुद को तमिलनाडु अरबन डेवलपमैंट प्रोजेक्ट का डायरैक्टर जयकुमार और लीना को अपनी सेक्रैटरी बताया था. खुद के ठगे जाने का एहसास होने पर चक्रवर्ती ने अपना सिर पीट लिया. हाथ मलते हुए वह 6 मई, 2013 को थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज करा दी. उन की यह शिकायत लीना और बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 120बी के तहत दर्ज हुई थी.

इस तरह जब बालाजी और लीना के खिलाफ एक के बाद एक कई शिकायतें दर्ज हुईं तो चेन्नई पुलिस और सेंट्रल क्राइम ब्रांच पुलिस लीना और बालाजी के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. पुलिस का शिकंजा कसते देख दोनों चेन्नई छोड़ कर दिल्ली चले गए. दिल्ली में वे एक फार्महाउस किराए पर ले कर वीआईपी की तरह रहने लगे. लेकिन पुलिस की निगाहों से वे वहां भी नहीं बच सके और 27 मई, 2013 को एएटीएस द्वारा पकड़े गए.

एक साल तक जेल में रहने के बाद मार्च, 2014 में जब लीना और बालाजी जमानत पर बाहर आए तो वे मुंबई आ गए और यहां भी उन्होंने अपना पुराना जालसाजी का कारोबार शुरू कर दिया. लेकिन इस बार उन की सोच कुछ अलग तरह की थी. यहां उन्होंने महज एक साल में करीब एक हजार लोगों को अपनी ठगी का शिकार बना कर लगभग 10 करोड़ रुपए ठग लिए. लोगों को जाल में फंसाने के लिए बालाजी खुद को एक बड़ा बिजनैसमैन और बंगलुरु का सांसद बताता था.

रहने के लिए उस ने गोरेगांव के पौश इलाके में 3 हजार स्क्वायर फुट का एक आलीशान फ्लैट अपने ड्राइवर के नाम पर किराए पर लिया था, जिस की डिपौजिट 3 लाख रुपए और किराया 75 हजार रुपए था. आनेजाने के लिए महंगी लग्जरी विदेशी गाडि़यां थीं. इन्होंने अंधेरी के पौश इलाके लोखंडवाला के इनफिनिटी मौल में किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया नामक एक फरजी वित्तीय संस्था का औफिस खोला. लोगों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने घर और औफिस में लाखों रुपए इंटीरियर में खर्च किया. संस्था का चेयरमैन उन्होंने सलमान रिजवी को बनाया. उन की मदद के लिए स्टाफ भी रखा गया. कंपनी में निवेश कराने के लिए मोटे कमीशन पर एजेंटों की नियुक्ति की गई.

निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बालाजी और लीना खुद महंगी विदेशी गाडि़यों से 2-3 घंटे के लिए किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया के औफिस आते थे. इस के साथसाथ इस वित्तीय संस्था का प्रचारप्रसार कुछ इस तरह किया गया कि निवेशकों को सहज उन पर और उन की संस्था पर विश्वास हो गया. संस्था निवेशकों से 60 से ले कर 2 सौ और 15 सौ प्रतिशत तक अकल्पनीय ब्याज देने का वादा करती थी. इस के अलावा कंपनी की ओर से निवेशकों को उन के निवेश के आधार पर उपहारस्वरूप महंगी घड़ी, नैनो कार, कीमती चश्मा और विदेश घूमने का पैकेज दिया जाता था. साथ ही किसीकिसी को उस के द्वारा किए गए निवेश का 20 प्रतिशत तुरंत वापस कर दिया जाता था.

इस तरह के महंगे उपहारों के प्रचार से आकर्षित हो कर निवेशक खुदबखुद उस की कंपनी की ओर खिंचे चले आते थे. किसी निवेशक को संस्था और उन पर शक न हो, इस के लिए वे बाकायदा निवेशकों को उन के रिटर्न की गारंटी और बैंकों की ओर से फिक्स डिपौजिट की रसीद देते थे. यह अलग बात थी कि उन के द्वारा दी गई फिक्स डिपौजिट की रसीदें कैश नहीं होती थीं. क्योंकि उस के कैश होने की तारीख आने पर लीना अपनी अदाओं से और बालाजी अपनी प्रतिभा से निवेशकों को लालच दे कर उन्हें अपनी अन्य किसी स्कीम में पैसा लगाने के लिए तैयार कर लेते थे.

लीना और बालाजी ने किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया कंपनी के तहत कई अन्य लुभावनी स्कीमें भी चला रखी थीं. मसलन सुपर नंबर-5, स्पेशल हार्वेस्ट वीक, सुपर हार्वेस्ट प्लस वन, न्यू ईयर बोनस, क्रिसमस बोनस, वन प्लस वन, वन प्लस टू, गणेश स्पैशल, दुर्गा पूजा पोंगल स्पैशल और दीपावली गोल्डन डायमंड. लीना से डा. बोहरा की मुलाकात उस के इलाज के दौरान हुई थी. जब लीना के इलाज के लिए डा. बोहरा उस के फ्लैट पर गए तो उस के फ्लैट का डेकोरेशन और रहनसहन देख कर हैरान रह गए.

डाक्टर होने के नाते वह तमाम बिजनैसमैनों और उद्योगपतियों के घर गए थे, लेकिन उन्होंने इस तरह ठाठबाट से रहते हुए किसी को नहीं देखा था. लीना को देख डा. बोहरा चलने लगे तो लीना ने उन की फीस से 3 गुना फीस दी थी. इस से वह लीना और बालाजी से काफी प्रभावित हुए. वह उन के बारे में सोचने लगे कि इन का ऐसा कौन सा बिजनैस है, जो ये इस तरह शानोशौकत से रहते हैं. काफी सोचनेविचारने के बाद भी बात उन की समझ में नहीं आई.

अगले दिन जब वह लीना को देखने उन के घर गए तो उन्होंने बालाजी से उन के कारोबार के बारे में पूछ ही लिया. इस के बाद लीना और बालाजी ने उन्हें अपने कारोबार के बारे में बताया तो सच्चाई जान कर उन का मुंह खुला का खुला रह गया. यही नहीं, लीना और बालाजी ने उन से यह भी कहा कि अगर वह भी चाहे तो उन की तरह ठाठ से रह सकते हैं. उन के पास एक ऐसी स्कीम है, जिस में मात्र एक साल में 5 लाख रुपए का 15 लाख और 3 साल में 50 लाख हो सकते हैं.

डा. बोहरा पढ़ेलिखे और समझदार थे. वह अच्छी तरह जानते थे कि देश के सभी वित्तीय संस्थान रिजर्व बैंक के नियमानुसार काम करते हैं और रिजर्व बैंक में कोई ऐसी स्कीम नहीं है, जो मात्र एक साल में रकम को दोगुना और 3 गुना कर दे. इस के बावजूद डा. बोहरा ने आंख मूंद कर अपने 70 लाख रुपए लीना और बालाजी की फरजी कंपनी किंग औफ लायन ओके इंडिया में निवेश कर दिए. इस की वजह यह थी कि उन्हें विश्वास था कि जिस कंपनी के निदेशक मंडल में ‘मद्रास कैफे’ जैसी सुपरहिट फिल्म की अभिनेत्री के अलावा मशहूर फिल्मी हस्ती गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के घर के लोग शामिल हों, उस संस्था में रुपए डूबने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

इस के अलावा कंपनी ने विश्वास जमाने के लिए बैंकों की गारंटी और फिक्स डिपौजिट की रसीदें दी थीं, जिन में सारी शर्तें लिखी थीं. डा. बोहरा लीना और बालाजी के रहनसहन तथा बातव्यवहार से कुछ इस तरह प्रभावित हुए थे कि उन्होंने यह बात अपने दोस्तों और क्लीनिक में आने वाले कई संपन्न मरीजों को भी बताई. उन के कहने पर ही भारीभरकम ब्याज के लालच में कई लोगों ने लीना और बालाजी की संस्था में रुपए लगा दिए. उन के एक दोस्त डा. शेख ने तो 50 लाख रुपए निवेश किए ही, उन के कई अन्य जानपहचान वालों ने भी लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी में रुपए लगा दिए.

लीना और बालाजी जिस तरह करोड़ों रुपए कमा रहे थे, उसी तरह खर्च भी कर रहे थे. उन का मकसद सिर्फ मौजमस्ती करना था. वे अपने लिए महंगीमहंगी चीजें खरीदते थे. जिस का पेमेंट वह कैश में करते थे. वे बड़ीबड़ी विदेशी गाडि़यों में फाइव स्टार होटलों में जाते और वहां पार्टियां करते और अपनी फरजी कंपनी और स्कीमों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करते. लीना और बालाजी जहां बड़े और संपन्न लोगों का ध्यान अपनी कंपनी की ओर खींच रहे थे वहीं दूसरी तरफ उन की कंपनी के कर्मचारी और एजेंट मोटे कमीशन के लालच में मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों को ज्यादा से ज्यादा ब्याज का लालच दे कर उन्हें लुटवा रहे थे.

ये वे लोग थे, जो अपना पेट काट कर अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए एकएक पैसा जोड़ कर जमा कर रहे थे. ऐसे लोगों को कम समय में उन की रकम को दोगुना करने का लालच दिया जा रहा था. उन का सोचना था कि ब्याज मिलेगा तो उन की परेशानियां दूर हो जाएंगी. लेकिन इस का मौका ही नहीं आता था. जब उन के पैसे वापस करने का समय आता था तो उस पैसे का कुछ हिस्सा दे कर बाकी पैसे और अधिक ब्याज के लालच में किसी अन्य स्कीम में लगवा लिया जाता था. इस से वे खुश हो जाते थे और खुशहाल जिंदगी के सपने देखने लगते थे.

लीना और बालाजी ने इस मामले में अपने घर में काम करने वाली नौकरानी यशोदाबेन हरिजन को भी नहीं बख्शा. लीना ने उस के 50 हजार रुपए और कई महीने का वेतन रोक कर अपनी कंपनी की किसी स्कीम में लगवा दिए थे. चेन्नई से मुंबई आने के बाद लीना की मुलाकात सब से पहले फिल्म गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के पोते आदिल अख्तर हुसैन जयपुरी से जुहू के एक जिम में हुई थी. आदिल ने लीना की फिल्म ‘मद्रास कैफे’ देखी थी, जिस से वह उस से काफी प्रभावित थे. आदिल भी फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों में थे इसलिए लीना से जल्दी ही उन की दोस्ती हो गई.

दोस्ती घनिष्ठता में बदली तो लीना और बालाजी ने उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया. आदिल पौश इलाके मौडल टाउन सोसायटी, गुलमोहर रोड जेवीसीडी स्कीम जुहू विलेपार्ले पश्चिम स्थित गजल विला में अपने मातापिता के साथ रहते थे. उन्होंने लीना और बालाजी को अपने पिता अख्तर हुसैन से मिलवा कर उन की योजना के बारे में बताया तो उन्हें भी खुशी हुई. बिना सोचेविचारे वह आदिल और अपने एक रिश्तेदार नासिर हुसैन जयपुरी तथा एक परिचित सलमान रिजवी के साथ उन की योजना में शामिल हो गए.

चूंकि स्व. हसरत जयपुरी का परिवार हाई प्रोफाइल था, इसलिए उस का उठनाबैठना भी वैसे ही लोगों में था. उन की वजह से तमाम लोग लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी पर विश्वास ही नहीं किया, बल्कि जुड़ भी गए. सलमान रिजवी तो उन के कहने पर मैनेजिंग डायरैक्टर बन गए. इन की वजह से फिल्मों से जुड़े लोगों ने भी लीना और बालाजी की संस्था में रुपए निवेश किए. लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेश चंद्रशेखर उर्फ जयकुमार न जाने कितने लोगों को शिकार बनाता, उस के पहले ही मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारियों को उस के इस गोरखधंधे की सूचना मिल गई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

इस के बाद उन के फ्लैट और औफिस की तलाशी में उन के इस गोरखधंधे से जुड़े 4 सौ से अधिक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज और निवेशकों के ढेरों फार्म बरामद हुए. दिल्ली की ही तरह ही उन के पास 7 लग्जरी गाडि़यां, जिन में रोल्स रायस फैंटम, निसान जीटीआर, एस्टन मार्टिन, हमर, पजेरो, रेंज रोवर, मित्सुबिशी इवो, बीएमडब्लू 5300, लैंड क्रूजर जैसी गाडि़यां थीं. इन गाडि़यों को लीना पौल और बालाजी ने ओएलएक्स डौट कौम से खरीदा था. जिन का उन्होंने नगद भुगतान किया था.

इस के अलावा लीना पौल और बालाजी के फ्लैट से लगभग 1 करोड़ मूल्य की 117 विदेशी घडि़यां, 4 लाख 80 हजार रुपए के 12 महंगे मोबाइल फोन, लीना पौल के 78 हैंडबैग, 8 जैकेट, 37 सनग्लास, 43 ट्राउजर्स, 40 जोड़े जूते और नामीगिरामी कंपनियों के परफ्यूम, जिस की कीमत लाखों में थी, प्राप्त हुए हैं. इन लोगों ने बाथरूम में गोल्ड प्लेटेड नल लगवा रखे थे. बालाजी की अलमारी से 42 जींस, 200 टीशर्ट, 73 शर्ट और 80 जोड़े जूते मिले. उन की इन चीजों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये लोग कितनी शानोशौकत से रहते थे.

विस्तृत पूछताछ के बाद फिल्म अभिनेत्री से ठग बनी लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद्रशेखर उर्फ जयकुमार, अख्तर हुसैन जयपुरी, आदिल अख्तर जयपुरी, नासिर हुसैन जयपुरी, सलमान रिजवी के खिलाफ अपराध क्रमांक 33/15 पर भादंवि की धारा 420, 120बी, 3, 5, प्राइज चिटफंड सर्क्युलेशन बैंकिंग ऐक्ट 3 एमपीआईडी के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से इन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में बंद थे. आगे की तफ्तीश क्राइम ब्रांच की आर्थिक अपराध शाखा के इंसपेक्टर अशोक खेडकर कर रहे थे. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Kahani: खुशियों के दुश्मन

Hindi Kahani: थानेदार ने तफ्तीश कर के रिपोर्ट पेश कर दी थी कि जमील की मौत हादसा है, लेकिन उस की मां का कहना था कि जमील की मौत हादसा नहीं, साजिश के तहत की गई हत्या है. जब इस मामले की जांच दूसरे थानेदार इंसपेक्टर अहमदयार खान ने की तो यह बात सच भी निकली.

दिल्ली की सीआईए (क्राइम ब्रांच) में तैनात एसपी पी.एल. थांपसन को हिंदुस्तानी सिपाही ही नहीं, अंगरेज अफसर भी बास्टर्ड कहा करते थे, क्योंकि वह बहुत सख्त अधिकारी था. थांपसन के चेहरे पर कभी मुसकराहट नहीं आती थी. अनुशासन के मामले में वह इतना सख्त था कि अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को कुछ नहीं समझता था. किसी मजबूरी की वजह से भी किसी से कोई गलती हो जाती थी तो उस की मजबूरी को समझते हुए भी वह उसे माफ नहीं करता था.

थांपसन हर समय काम में लगा रहता था और किसी दूसरे को भी खाली नहीं बैठने देता था. अपने स्टाफ से वह सप्ताह में एक बार जरूर कहता था कि लोगों की इज्जत और जानमाल की सुरक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है. अगर कोई घटना हो जाए तो अपराधी को पकड़ने के लिए तब तक काम में लगे रहो, जब तक वह पकड़ा न जाए. वह अपने अफसरों को तांगे के घोड़ों की तरह काम में लगाए रखता था. मैं ने भी उस से सब से अच्छी बात जो सीखी थी, वह यह थी कि जो भी काम करो, लगातार और मेहनत से करो. निराशा को पास मत आने दो. जिस किसी पर जरा भी शक हो, उसे मत छोड़ो. तुम्हारी सारी सहानुभूति पीडि़त के साथ होनी चाहिए.

जिस अधिकारी को हम बास्टर्ड कहा करते थे, वह बहुत न्यायप्रिय और अपने काम को अपना नैतिक कर्तव्य समझता था. एक दिन मेरे साथी इंसपेक्टर टेनिसन ने मुझे बुला कर एक कागज पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इसे पढ़ो.’’

वह एक महिला का प्रार्थना पत्र था, जिस का जवान बेटा जिस ईंटों के भट्ठे पर काम करता था, उसी में गिर कर जल कर मर गया था. इस बात को 2 महीने बीत चुके थे. थांपसन ने बताया था कि यह प्रार्थना पत्र उसे एक बड़े सम्मानित व्यक्ति ने दिया था. जिस औरत का पत्र था, वह संबंधित थाने में जाती रही थी. उसे शक था कि उस का बेटा खुद गिर कर नहीं मरा, बल्कि उसे गिरा कर मारा गया है. थाने का थानेदार उसे यह कह कर टालता रहा कि उस ने तफतीश कर ली है, उस का बेटा मारा नहीं गया था, बल्कि खुद गिर कर मरा था. जिस सम्मानित व्यक्ति ने यह कागज दिया था, वह हाईकोर्ट में एडवोकेट थे. वह अपने एक मित्र डीएसपी के साथ थांपसन से मिले थे. उस आदमी ने एसपी थांपसन को बताया था कि वह भट्ठे के मालिक को जानते हैं और उन्हें लड़के  की मौत पर शक है.

थांपसन ने इस मामले में उस इलाके के थानेदार से बात की थी, लेकिन वह थानेदार की बात से संतुष्ट नहीं थे. एसपी ने कहा कि तुम दोनों इस केस की तफ्तीश करो, अगर थानेदार ने जानबूझ कर कोई गलती की है या बिना तफतीश किए रिपोर्ट में उस की मौत संयोगवश लिख दी है तो उसे गिरफ्तार कर के मुझे रिपोर्ट करो. थांपसन के कहे अनुसार, मैं और टेनिसन उस इलाके के थाने गए, जिस इलाके में भट्ठा था. थानेदार सदाकत अली खान अंबाला का रहने वाला था. वह मौजमस्ती करने वाला अनुभवी आदमी था. उस का परिवार काफी असरदार था.

थाने पहुंच कर हम ने उसे अपने आने के बारे मे बताया तो उस ने कहा, ‘‘उस औरत ने तो मेरी नाक में दम कर रखा है. यह सच है कि उस का जवान बेटा मरा है, मैं ने उसे संतुष्ट करने की बहुत कोशिश की, लेकिन अब पता चला कि वह ऊपर पहुंच गई है. आप लोगों को उस ने बिना वजह कष्ट दिया.’’

‘‘मां तो कभी संतुष्ट नहीं होगी, लेकिन आप हमें संतुष्ट करने के लिए केस की फाइल दिखा दें.’’ मैं ने कहा तो वह फाइल ले आया.

फाइल के अनुसार, किसी व्यक्ति ने आ कर बताया था कि उस का एक नौकर पांव फिसलने से भट्ठे में गिर गया और जल कर मर गया. वह घटनास्थल पर पहुंचा और लाश देखी. वह इतनी बुरी तरह जल गई थी कि पहचानी नहीं जा सकती थी. उस ने मौके पर 3 लोगों से पूछताछ की, जिन्होंने बताया कि वह फिसलने से ही भट्ठे में गिर कर मरा था. थानेदार ने इस घटना को संयोगवश हुई घटना बता कर केस बंद कर दिया था.

‘‘खान साहब, आप ने जबानी तौर पर मालूमात कर के जो तफतीश की थी, वह भी हमें सुना दो.

उस ने बताया, ‘‘पहली बात तो यह पता चली कि मरने वाला जमील अहमद विधवा मां का बेटा था. उस ने 2, ढाई साल पहले मैट्रिक की परीक्षा पास की थी और उस के बाद भट्ठे के मालिक के यहां नौकर हो गया था. भट्ठे का मालिक बहुत बड़ा ठेकेदार था, जो सरकारी ठेके ले कर निर्माण कार्य कराता था.’’

मैं ने थानेदार से पूछा, ‘‘इस के अलावा और कुछ बताएंगे?’’

‘‘आप पूछिए, बताता हूं.’’ उस ने कहा तो टेनिसन ने पूछा, ‘‘मरने वाले को भट्ठे पर क्या काम दिया गया था?’’

थानेदार ने कहा, ‘‘मैं ने यह नहीं पूछा था कि उसे क्या काम दिया गया था, बस इतना पता चला था कि वह वहां नौकर था.’’

‘‘आप को जरा भी शक नहीं हुआ कि मरने वाले की वहां किसी से दुश्मनी रही हो और उसे भटठे में धक्का दे दिया गया हो?’’

‘‘मैं ने फाइल में तो नहीं लिखा, लेकिन मैं ने पता किया था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी.’’

मैं ने नोट किया था कि यह कहते हुए थानेदार की जबान साथ नहीं दे रही थी. इस का मतलब वह झूठ बोल रहा था.

‘‘सदाकत भाई, हम तफतीश करने आए हैं, अगर कोई संदेह वाली बात हो तो हमें बता दो या यह कह दो कि आप ने तफ्तीश में उतनी रुचि नहीं ली, जितनी लेनी चाहिए थी. आप का यह कह देना काफी नहीं है कि वह मां है, इसलिए तंग कर रही है.’’

सदाकत अली बेचैन हो गया. उस के चेहरे के भावों से साफ लग रहा था कि उस से गलती हुई थी. अगर मेरे साथ अंगरेज अफसर नहीं होता तो शायद वह मुझ से बिना झिझके बात करता. अंगरेज अफसरों से हिंदुस्तानी अफसर डरते थे. इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा कि वह हमें उस औरत के घर तक पहुंचा दे, क्योंकि पुरानी दिल्ली में किसी का मकान ढूंढना आसान नहीं था.

सदाकत अली ने हमें एक हेडकांस्टेबल के साथ उस औरत के घर भेज दिया. जाते वक्त टेनिसन ने कहा, ‘‘एक काम करना खान, ठेकेदार खलील से कहना कि वह थाने आ जाए. हम वापस थाने आएंगे.’’

उस औरत के घर पहुंच कर हम ने घर का दरवाजा खटखटाया. 5-6 मिनट बाद एक अधेड़ उम्र की औरत ने दरवाजा खोला. चेहरेमोहरे और पहनावे से वह मिडिल क्लास की अच्छीभली महिला लग रही थी. इस उम्र में भी वह काफी सुंदर थी. वह हमें घर के अंदर ले गई. औरत का नाम राशिदा था. उस के पति को मरे 4-5 साल हो गए थे. उस का भाई कुछ पैसे दे दिया करता था, जिस से घर का खर्च चलता था. उस का बेटा जमील दसवीं पास कर के भट्ठे पर नौकरी करने लगा था.

‘‘आप यह बताइए कि आप को कैसे शक हुआ कि आप का बेटा भट्ठे में खुद नहीं गिरा, बल्कि उसे धक्का दे कर आग में गिराया गया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मेरा बेटा हर रात मेरे सपने में आता है और मुझ से कहता है कि मेरे हत्यारों को पकड़वाओ, मैं खुद नहीं गिरा.’’ उस ने भावुक हो कर कहा.

‘‘क्या वह यह नहीं बताता कि उसे किस ने धक्का दिया था?’’

‘‘नहीं, मैं पूछती हूं, तब भी नहीं बताता.’’ उस ने कहा, ‘‘लेकिन उस के इस तरह सपने में आने से मुझे पूरा यकीन है कि वह खुद नहीं गिरा.’’

यह एक मां के उदगार थे. उस की बात काटने के बजाय मैं ने और इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा कि हम सच्चाई का पता लगाना चाहते हैं, जिस से कि हम हत्यारे को पकड़ सकें. मैं ने राशिदा से पूछा, ‘‘जमील भट्ठे पर कितने दिनों से काम कर रहा था, वह वहां क्या काम करता था?’’

‘‘मेरा बेटा वहां 3 सालों से काम कर रहा था, वह वहां नौकर नहीं, मुंशी था. ठेकेदार के घर भी जाता था और घरपरिवार की जरूरत की चीजें भी ला कर देता था. ठेकेदार की एक बेटी कालेज में पढ़ती थी, उसे लाने ले जाने के लिए एक तांगा लगा था. मेरा बेटा सुबह को उस लड़की को ले कर जाता था और शाम को वापस घर लाता था. ठेकेदार इस काम का उसे अलग से पैसे देता था. 5-6 दिनों से वह भट्ठे पर जा रहा था. उस ने बताया था कि भट्ठे का मुंशी छुट्टी गया है और उस के आने तक उसे ही वहां का हिसाबकिताब रखना पड़ेगा.’’

इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा, ‘‘ठेकेदार को आप के बेटे पर पूरा भरोसा था?’’

‘‘हां जी, भरोसा था तभी तो खलील अपनी बेटी को मेरे बेटे के साथ भेजता था. भरोसे की एक वजह यह भी थी कि ठेकेदार हमारा दूर का रिश्तेदार था. पहले उस का यही एक भट्ठा था. तब मकान कम बनते थे, इसलिए काम भी कम था. जब हिंदूमुसलमानों ने मकान बनाने शुरू किए तो उस के भट्ठे का काम बढ़ गया और खलील ठेकेदार भी बन गया.

‘‘आदमी होशियार और चालाक था, हर किसी को खुश करना जानता था. इसलिए जल्दी ही उस का कारोबार फैलता गया. 2 साल पहले उस ने नई दिल्ली में अपनी कोठी भी बना ली. मेरे पति के मरने के बाद उस ने हमारे ऊपर एक उपकार यह किया कि दसवीं पास करते ही मेरे बेटे को नौकरी पर रख लिया. जमील जल कर मर गया तो ठेकेदार ने मुझे 5 हजार रुपए भिजवाए, लेकिन मैं ने यह कह कर लेने से मना कर दिया कि मैं अपने बेटे की कीमत नहीं लूंगी.’’

‘‘आप को ठेकेदार पर तो शक नहीं है?’’ टेनिसन ने पूछा.

‘‘नहीं, उस पर शक नहीं है,’’ राशिदा ने कहा, ‘‘लेकिन उस से शिकायत जरूर है.’’

‘‘कैसी शिकायत?’’ मैं ने पूछा तो उस ने कुछ ऐसी बातें बताईं, जिन पर वह खुद भी मुतमईन नहीं थी.

‘‘अगर तुम्हें ठेकेदार पर शक है तो साफ बता दो और अग

नहीं है तो कह दो कि शक नहीं है.’’ मैं ने थोड़ी झुंझलाहट में कहा.

‘‘ठेकेदार पर शक का कोई कारण नहीं है,’’ राशिदा ने कहा, ‘‘इतने अमीर आदमी के साथ हमारी क्या दुश्मनी हो सकती है? उसे जमील पर भरोसा था, तभी वह अपनी जवान बेटी को उस के साथ भेजा करता था.’’

‘‘यह भी तो एक कारण हो सकता है कि उस की बेटी जवान थी और आप का बेटा भी. हो सकता है ठेकेदार ने उन दोनों को आपत्तिजनक हालत में देख लिया हो.’’

‘‘मैं यह नहीं मान सकती, मेरा बेटा इतना होशियार और चालाक नहीं था. अगर ऐसी बात होती तो ठेकेदार मुझ से शिकायत करता या उसे नौकरी से निकाल देता. उसे पता था कि हमारे लिए यही सजा बहुत है.’’

बातोंबातों में राशिदा ने हमें बताया था कि ठेकेदार ने पहले उसे 5 हजार रुपए देने चाहे थे, बाद में यह रकम बढ़ा कर 8 हजार कर दी थी. आजकल हजार रुपए कुछ नहीं हैं, लेकिन उस जमाने के एक हजार रुपए आज के एक लाख रुपए के बराबर होते थे. राशिदा ने यह रकम नहीं ली थी और थाने पहुंच गई थी.

2 महीने गुजर गए, जमील का चालीसवां होने के बाद ठेकेदार ने अपनी बेटी की शादी कर दी थी. राशिदा 3-4 बार थाने गई. उस ने हमें बताया कि थानेदार कभी तो उस से बड़े प्यार से बातें करता था, कभी उसे थाने से निकाल देता था. जिस एडवोकेट ने उस का प्रार्थना पत्र एसपी थांपसन के पास पहुंचाया था, वह उस के पति का दोस्त था. राशिदा से हमें कोई सबूत नहीं मिला. बस एक ही बात जो शक पैदा कर रही थी, वह यह थी कि जमील ठेकेदार की बेटी को स्कूल ले जाता और ले आता था. हमें यह पता करना था कि ठेकेदार की लड़की का चरित्र कैसा था.

मैं और टेनिसन लौट कर थाने पहुंचे तो खलील ठेकेदार थानेदार के पास बैठा था. उस की उमर 50-60 साल के लगभग थी. शक्ल और सूरत से वह सम्मानित व्यक्ति लगता था. मेरी राय में वह या तो बहुत सभ्य और सम्मानित आदमी था या फिर पक्का गुरुघंटाल था. मैं ने और टेनिसन ने तय कर लिया था कि उसे भट्ठे पर ले जा कर बात करेंगे, क्योंकि हमें भट्ठा भी देखना था. हम ने उस से कहा कि वह हमें अपने भट्ठे पर ले चले. उस का भट्ठा दिल्ली के बाहरी इलाके में था.

ठेकेदार खलील के भट्ठे पर पहुंच कर हम ने उस से वह जगह दिखाने को कहा, जहां से जमील आग में गिरा था. उस ने हमें वह जगह दिखाई. मैं ने और टेनिसन ने भट्ठे का किनारा ध्यान से देखा. वहां फिसलने लायक नहीं था. ठेकेदार ने हमें बताया कि जमील किनारे तक चला गया था.

‘‘उस समय वह अकेला था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं,’’ ठेकेदार ने जवाब दिया, ‘‘मजदूर बहुत होते हैं, उन पर एक मेट होता है, जो उन्हें संभालता है. उस समय वही उस के साथ था. उसी ने मुझे यह सब बताया था.’’

‘‘तब आप को जरा भी शक नहीं हुआ कि उसे किसी ने गिरा दिया होगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘आप का मतलब है कि उस की किसी से दुश्मनी रही होगी,’’ ठेकेदार ने कहा, ‘‘उस बेचारे की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी. उसे तो भट्ठे पर आए 4 दिन हुए थे.’’

ठेकेदार का पूरा बयान हमें बाद में लेना था, अभी तो हम घटनास्थल देखने आए थे. हमें यह भी देखना था कि कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह था या नहीं? जिस मेट के साथ होने की बात ठेकेदार ने कही थी, वह वहीं था. मजदूर चले गए थे, चौकीदार आ गए थे. हम ने ठेकेदार से कहा कि वह रात को 9 बजे मेट को ले कर क्राइम ब्रांच औफिस आ जाए. हम दोनों रात 10 बजे हेडक्वार्टर पहुंचे. ठेकेदार मेट को लिए हमारे इंतजार में बैठा था. हम ने उसे 9 बजे का समय दिया था, लेकिन हम एक घंटा लेट आए थे. हम ने ठेकेदार को बुलाया. हमारे सवालों के जवाब में उस ने जमील के बारे में वही बातें बताईं, जो उस की मां बता चुकी थी.

‘‘साहब, मुझे इस लड़के के मरने का इतना दुख है कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते. बेचारा अनाथ था, छोटे भाई और मां का एकलौता सहारा. मेरे पास इतना कुछ है कि मैं उस लड़के को नौकरी पर लगा कर सब से ज्यादा वेतन दिया करता था. बहुत सज्जन और भरोसे का लड़का था. उस के रहते मुझे किसी बात की चिंता नहीं थी. मेरी जवान बेटी को कालेज ले जाता था. मैं उस की मां का सामना नहीं कर सकता.’’

यह सब कहते हुए ऐसा लग रहा था, जैसे वह अभी रो पड़ेगा. मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने उस की मां को देने के लिए 5 हजार रुपए भेजे थे, लेकिन उस ने लेने से मना कर दिया. उस के बाद तुम ने 3 हजार और बढ़ा कर भेजे, लेकिन वह भी उस ने लेने से मना कर दिया. तब तुम ने उसे धमकी दी कि वह दूसरे बेटे को भी खो दोगी, यह धमकी तुम ने क्यों दी?’’

‘‘नहीं साहब, मैं ने उसे कोई धमकी नहीं दी. मैं ने तो कहा था कि उस का दूसरा बेटा मैट्रिक पास कर ले तो उसे मैं नौकरी दे दूंगा.’’ यह बातें कहने में वह घबरा रहा था, ‘‘असली बात यह है साहब कि वह मां है, उस का जवान बेटा मर गया है. उसे शक है कि उस के बेटे को किसी ने उठा कर आग में फेंक दिया है. ऐसी स्थिति में मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता. हो सकता है, मैं ने उसे थाने जाने से रोकने के लिए कोई सख्त बात कह दी हो और वह उसे धमकी समझ बैठी हो. मैं ने खुद ही पुलिस को बुलाया था. थानेदार साहब ने इस मामले की बहुत मेहनत से तफ्तीश की थी.’’

‘‘जमील तुम्हारे दूसरे काम करता था, फिर तुम ने उसे भट्ठे पर क्यों भेजा था?’’ इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा.

‘‘भट्ठे का मुंशी 7-8 दिनों के लिए छुट्टी पर चला गया था. जो नौकर थे, वे पैसों में गड़बड़ कर देते थे, जमील मेरे घर का मेंबर था, इसलिए उसे भेजा था.’’

‘‘तुम्हारा मुंशी इस के पहले कब छुट्टी पर गया था?’’ इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा.

अचानक पूछे गए इस सवाल से उस की जबान जरा हकला सी गई, ‘‘यह मैं पूछ कर बताऊंगा.’’

इस के बाद मैं ने और टेनिसन ने उस पर सवालों की बौछार कर दी, जिस से वह घबरा गया. घबराहट उस के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी. अपने सवालों और उस के जवाबों से हम कई बातें समझ गए थे.

‘‘खलील साहब, मैं तुम्हें भाई की हैसियत से सलाह देता हूं कि अभी तुम्हारे पास समय है. अगर तुम हमें सच्ची बात बता देते हो तो तुम्हारे लिए आसानी रहेगी, क्योंकि हमें बाद में सच्चाई पता चली तो तुम्हारे लिए ठीक नहीं रहेगा. यह बात अच्छी तरह समझ लो कि इस केस की तफ्तीश सीआईए कर रही है. अभी तो तुम से बहुत आदर से बातें हो रही हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम दूसरे तरीके भी अपना सकते हैं.’’

‘‘आप को क्या शक है साहब?’’ उस ने पूछा.

‘‘शक नहीं, हमें पूरा यकीन है कि जमील को आग में फेंका गया है और तुम्हें इस की पूरी जानकारी है.’’

‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं मालूम. लेकिन जब आप कह रहे हैं कि उसे आग में फेंका गया है तो मैं इस बात का पता लगाऊंगा.’’ ठेकेदार ने कहा.

‘‘ठेकेदार साहब, हम तुम्हें कल शाम तक का समय देते हैं. अगर तुम्हारे दिल में कोई बात हो तो हमें बता दो.’’ कह कर ठेकेदार को घर भेज दिया.

ठेकेदार के जाने के बाद हम ने उस के मेट को बुलाया. वह 35-36 साल का छरहरे बदन का आदमी था. उस ने अपना नाम सिराज बताया. लेकिन सब उसे सागर के नाम से पुकारते थे. उस ने बताया कि वह पिछले 10 सालों से खलील के भट्ठे पर काम कर रहा था.

‘‘एक बात ध्यान में रख लो सागर, झूठ बोलोगे तो पिस जाओगे. यह धनी लोग अपना पाप गरीबों के खाते में डाल देते हैं. यहां भी मुझे ऐसा ही दिखाई दे रहा है. अच्छा यह बताओ कि जमील को ठेकेदार ने अन्य कामों से हटा कर भट्ठे पर क्यों लगाया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मुंशी छुट्टी चला गया था, उस की जगह जमील आया था.’’ उस ने कहा.

‘‘मुंशी कब से काम कर रहा है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हुजूर, कोई 6-7 साल से काम कर रहा है.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘वह इस के पहले कब छुट्टी गया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जहां तक मुझे याद है 3 साल पहले गया था.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘क्या उस समय भी ठेकेदार ने जमील को या किसी और को उस की जगह भट्ठे पर भेजा था?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘नहीं साहब.’’ उस ने कहा.

‘‘अच्छा यह बताओ, भट्ठे पर पैसे कौन खाता है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई नहीं खा सकता, क्योंकि मेमो बनता है.’’ उस ने कहा.

‘‘झूठ बोल रहे हो. पैसे तुम मारते हो,’’ मैं ने उसे भड़काने के लिए कहा, ‘‘ठेकेदार ने जमील को भट्ठे पर इसीलिए भेजा था.’’

‘‘क्या यह बात ठेकेदार ने कही है?’’ उस ने चौंक कर पूछा.

‘‘यही नहीं, ठेकेदार ने तुम्हारी बहुत सी करतूत बताई हैं.’’ मेरे इतना कहते ही उस के चेहरे का रंग बदलने लगा.

मैं ने और टेनिसन ने उस दौरान भी उस से कई सवाल पूछे. वह उन के जवाब तो दे रहा था, लेकिन हम उस के जवाब के बजाय उस के चेहरे के उतारचढ़ाव को देख रहे थे. इस से हमें लगा कि उस के दिल में कोई बात है. मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए हम ने कुछ देर के लिए उसे दूसरे कमरे में भेज दिया और हम दोनों आपसी विचारविमर्श करने लगे. भट्ठे के मजदूरों पर जो मेट लगाए जाते हैं, उन में ज्यादातर अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं. ठेकेदार खलील का यह मेट भी मुझे ऐसा ही लग रहा था. मैं ने और टेनिसन ने विचारविमर्श कर के तय किया कि इस मेट को भट्ठे पर न जाने दिया जाए, वरना इस के डर से कोई मजदूर सही बात नहीं बताएगा.

मेट सागर को हम ने दोबारा अपने कमरे में बुलाया और उस से पूछा कि जमील का चरित्र कैसा था? उस ने बताया कि उस का चरित्र ठीकठाक था. वह अपने काम से काम रखता था. उस ने यह भी बताया कि जमील ठेकेदार का दूर का रिश्तेदार था, इसलिए सब उस का सम्मान करते थे. मैं ने अपने शक की बिना पर उस से पूछा कि ठेकेदार की लड़की से जमील का क्या चक्कर चल रहा था?

‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं जानता सरकार. जमील उन के घर भी जाता था और उन की बेटी को कालेज भी ले जाता था और ले भी आता था.’’ उस ने कहा.

‘‘और लड़की के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘लड़की परदे में रहती थी, कालेज भी बुरका पहन कर जाती थी. वैसे हुजूर, मैं आप को बता दूं कि ठेकेदार की सभी औरतें परदे में रहती हैं.’’ वह बोला.

‘‘जमील जब भट्ठे में गिरा था, उस समय तुम उस के साथ थे. तब तुम ने उसे आगे जाने से रोका क्यों नहीं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे रोका था साहब, लेकिन उस का पांव ऐसा फिसला कि वह उस में गिर गया. मुझे लगा कि जैसे वह भट्ठे की आग देखने जा रहा है.’’ सागर ने बताया.

अगले दिन सुबह 8, साढ़े 8 बजे हम भट्ठे पर गए. ठेकेदार को हम ने नहीं बताया था कि हम वहां जाएंगे. वहां वही मुंशी मिल गया, जिस की जगह पर जमील को लगाया गया था. हम ने उस की बातचीत से महसूस किया कि मुंशी सागर से डरासहमा रहता था.

‘‘तुम पिछली बार छुट्टी पर कब गए थे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई 3 साल हो गए होंगे.’’ वह बोला.

‘‘इन 3 सालों में तुम्हें छुट्टी नहीं मिली या तुम खुद नहीं गए?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं कहीं दूर का आदमी नहीं हूं साहब,’’ उस ने हाथ के इशारे से कहा, ‘‘वह जो गली दिखाई दे रही है, उसी में रहता हूं.’’

‘‘अब शायद कोई लंबा काम आ पड़ा था, इसीलिए छुट्टी पर चले गए थे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे कोई काम नहीं था. वह तो एक दिन सागर ने मुझ से कहा कि तुम्हारे छुट्टी न लेने से ठेकेदार तुम्हें मैडल तो देगा नहीं. इसलिए छुट्टी लो और घूमोफिरो, मौजमस्ती करो. इस के बाद उस ने ठेकेदार से मुझे 8 दिनों की छुट्टी दिलवा दी थी.’’

जब मैं छुट्टी से लौटा तो पता चला कि जमील भट्ठे की आग में गिर कर मर गया. उस की मौत के बारे में जान कर मुझे बहुत दुख हुआ. मुंशी की बातों से साफ लग रहा था कि मुंशी को छुट्टी भिजवाना जमील की हत्या के षडयंत्र की एक कड़ी थी. अब हमें यह पता करना था कि यह साजिश अकेले सागर की थी या उस में ठेकेदार खलील भी शामिल था.

‘‘तुम बड़े काम के आदमी हो. ठेकेदार का यह भट्ठा तुम्हीं चला रहे हो. सागर तो कुछ काम करता नहीं, वह तो सिर्फ गुंडागर्दी करता रहता है.’’ उस की पीठ थपथपाते हुए मैं ने उस के अंदर खूब हवा भरी, जिस से वह कुछ और उगल दे. इंसपेक्टर टेनिसन ने भी उस की प्रशंसा के बड़ेबड़े पुल बांधे.

‘‘एक बात बताओ इदरीस,’’ मैं ने मुंशी से कहा, ‘‘जमील को मरे 2 महीने से ज्यादा हो गए हैं, जब तुम छुट्टी से लौट कर आए तो तुम ने मजदूरों से पूछा होगा कि जमील आग में कैसे गिरा? इस के बाद तुम ने सागर से पूछा होगा?’’

‘‘सब को हैरानी इस बात पर थी कि वह आग में गिरा कैसे? इतनी तेज आग के पास तो कोई जाता तक नहीं.’’ मुंशी ने जवाब दिया.

मैं ने कहा, ‘‘इदरीस कहीं ऐसा तो नहीं कि जमील का यहां किसी लड़की से चक्कर चल रहा हो और उस लड़की को सागर भी चाहता हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है और सही बात यह है कि सागर के विरुद्ध यहां कोई जबान नहीं खोल सकता. मैं भी उस से डरता हूं,’’ मुंशी ने कहा.

‘‘कहां है सागर?’’ इंसपेक्टर टेनिशन ने पूछा.

‘‘वह अभी आ जाएगा, वह साढ़े 10 बजे तक आता है.’’ मुंशी ने बताया.

‘‘वह अब नहीं आएगा, वह हवालात में बंद है.’’ टेनिसन ने कहा.

मुंशी हैरान हो कर देखने लगा.

‘‘हैरान न हो इदरीस,’’ मैं ने कहा, ‘‘सागर को हम ने गिरफ्तार कर लिया है.’’

हमारे साथ एक हेडकांस्टेबल और एक कांस्टेबल भी था. हम ने उन से कहा कि वे सागर को हथकड़ी लगा कर यहां ले आएं. मुंशी को जब पक्का यकीन हो गया कि उन का मेट गिरफ्तार हो गया है तो उस ने कहा, ‘‘साहब, अब मेरी समझ में आ गया कि सागर छुट्टी जाने के लिए मेरे पीछे क्यों पड़ा था. सच बात तो यह है कि यहां का हर मजदूर सागर से डरता है. यह आदमी मनमानी करता है.’’

पूछने पर मुंशी ने दिल्ली स्थित उस के घर का पता भी बता दिया था. इस के बाद मुंशी ने वहां काम करने वाले 5 मजदूरों को भी बुला लिया. हम ने उन सभी के बयान लिए. उन से पता चला कि सागर ही एक योजना के तहत जमील को भट्टे पर उस जगह ले गया था, जहां आग जल रही थी और उस ने उसे उस आग में धकेल दिया था. हम मजदूरों से पूछताछ कर रहे थे कि ठेकेदार आ गया. मैं ने उसे वहां से हटा दिया. ठेकेदार वहां से चला गया तो हम मजदूरों से और पूछताछ करने लगे. कुछ देर में पुलिस कांस्टेबल सागर को हथकड़ी लगाए ले आए. मैं ने देखा, मजदूर काम छोड़ कर हैरानी से सागर को हथकड़ी में बंधा देख रहे थे. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतना दबंग आदमी भी गिरफ्तार हो सकता है.

इस के बाद हम ने मजदूरों से सागर के बारे में पूछा तो उन्होंने उस के गंदे कामों से परदा उठाना शुरू कर दिया. वह सभी मजदूरों से 5 रुपए हर महीने कमीशन लेता था. उन की लड़कियों को अपनी नौकरानी समझता था. हमें जो कुछ पता करना था, कर लिया था. फिर उसे हेडक्वार्टर ले आए. सागर पुरानी दिल्ली का रहने वाला था. मैं ने उस इलाके के थानेदार को उस का नामपता बता कर उस के बारे में और जानकारी जुटाने को कहा, साथ ही यह भी कहा कि अगर उस का कोई जानकार हो तो उसे भी साथ ले आएं.

थानेदार ने मुझे फोन पर ही बता दिया कि यह आदमी थाने के रिकौर्ड में है और एक बार इसे सजा भी हो चुकी है. सागर के आपराधिक रिकौर्ड की पूरी रिपोर्ट उन्होंने एक कांस्टेबल द्वारा मेरे पास भिजवा दी. उस सिपाही की सागर से दोस्ती थी. उस ने सागर की पूरी कहानी हमें सुना दी. उस ने जीबी रोड की एक वेश्या का नाम भी बताया, जिस के पास सागर अकसर जाता रहता था. मैं ने उस कांस्टेबल से उस वेश्या का पता ले लिया.

अगले दिन मैं हेडक्वार्टर गया तो टेनिसन को थानेदार द्वारा सागर के बारे में दी गई रिपोर्ट दिखाई और कांस्टेबल ने जो बातें जुबानी बताई थीं, वह भी बता दीं. टेनिसन ने उस वेश्या को बुलाने के लिए एक एएसआई को भेजा. यहां मैं आप को अपराधियों की मानसिकता के बारे में बता दूं कि इस तरह के लोग मन बहलाने के लिए वेश्याओं के पास जा कर शराब पीते हैं और लूटे हुए माल से ऐश करते हैं. छोटीमोटी घटनाएं ऐसे लोगों की आदत में शामिल होती हैं, लेकिन हत्या ऐसी घटना होती है, जिसे कोई भी हजम नहीं कर सकता. आम तौर पर देखा गया है कि पेशेवर हत्यारे भी हत्या कर के अपनी प्रिय वेश्या के पास जा कर शराब के नशे में बड़े घमंड से वेश्या को बता देते हैं कि वे हत्या कर के आए हैं.

हम ने उस वैश्या को इसी आशय से बुलाया था कि उस से हत्या का कोई सुराग जरूर मिल जाएगा. लगभग एक घंटे बाद वह वेश्या आ गई. 35 की उमर रही होगी उस की. बहुत सुंदर थी वह. हम ने उसे बिठाया. उस के चेहरे पर घबराहट और डर था. हम ने उसे सामान्य करने के लिए इधरउधर की बातें कीं. वह एक वेश्या थी, जिस का सोसाइटी में न कोई स्थान था और न आदरसम्मान. मेरे इज्जत देने पर वह गुब्बारे की तरह फूलती चली गई. कुछ देर बाद बोली कि उसे यहां क्यों बुलवाया गया है?

‘‘तुम्हारा यार सागर फांसी चढ़ रहा है.’’ मैं ने कहा, ‘‘उस रात सागर तुम्हारे पास गया था, तब उस ने तुम्हें पूरी घटना बता दी थी. यह बात वह कुबूल कर चुका है. तुम्हें केवल पुष्टि के लिए बुलाया है.’’

‘‘हां.’’ उस ने एक ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘उस रात वह बहुत अधिक पी कर आया था. उल्टीसीधी बकबक कर रहा था. उस ने कहा था कि आज बहुत पैसे कमाए हैं. एक लड़के को जिंदा जला कर भस्म कर दिया है. मैं समझी कि डींगे मार रहा है.’’

‘‘नहीं, डींगें नहीं, वह सच कह रहा था. तुम्हें उस ने कितनी रकम बताई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘5 हजार रुपए बता रहा था, लेकिन मैं ने विश्वास नहीं किया कि इतनी रकम कौन देगा.’’

इस के बाद सागर को हवालता से निकलवा कर उस के कारनामों का पुलिंदा रख दिया, साथ ही वेश्या की बात भी उसे बता दी. इस के बाद उस से अपराध कबूलवाने के लिए कहा, ‘‘सागर, तुम ने किस आदमी पर भरोसा किया. उस ठेकेदार पर, जिस ने बयान में कहा है कि तुम ने जमील को धक्का दिया था. ठेकेदार ने हमें गवाह भी उपलब्ध करा दिए हैं. जिस वेश्या पर तुम ने भरोसा किया था, अभीअभी बयान दे कर गई है. इसलिए गनीमत इसी में है कि तुम अपना जुर्म स्वीकार कर लो, वरना तुम्हारी जुबान खुलवाने के लिए हमें दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’

यह सुनते ही उस ने ठेकेदार को गालियां देते हुए कहा कि उसी के कहने पर ही उस ने इतना बड़ा अपराध किया था और वही मेरे खिलाफ बयान दे गया. इस के बाद उस ने पूरी कहानी बयां कर दी. सिराज उर्फ सागर ठेकेदार का बौडीगार्ड था, साथ ही भट्ठे पर काम करने वाले मजदूरों को भी कंट्रोल करता था. किसी व्यक्ति को डरानेधमकाने या रुकी हुई रकम निकलवाने के लिए ठेकेदार उसी को इस्तेमाल करता था. एक दिन ठेकेदार ने सागर से कहा कि जमील को जमींदोज करना है. सागर ने कारण पूछा तो उस ने कहा कि उस की बेटी को जमील ने प्रेमजाल में फांस लिया है. उन का यह चक्कर बचपन से चल रहा है. लेकिन वह उसे स्कूल ले आने और ले जाने लगा तो उसे मिलने का मौका मिल गया.

शाइस्ता के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता आया था. लड़का शिक्षित और धनी व्यापारी का बेटा था. ठेकेदार ने रिश्ते के लिए हां कर दी. लेकिन शाइस्ता ने मां से साफ कह दिया कि वह जमील के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगी. अगर उस के साथ जबरदस्ती की गई तो वह निकाह के समय मना कर देगी. उसे मांबाप और बहनों ने बहुत समझाया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही. ठेकेदार ने उस की पढ़ाई छुड़वा कर शादी की तैयारियां शुरू कर दीं. शाइस्ता ने अपनेआप को एक कमरे में बंद कर लिया. उस ने धमकी दी कि वह दरवाजा तभी खोलेगी, जब जमील आ कर कहेगा. उस ने खानापीना तक छोड़ दिया.

बेटी की हालत देख कर ठेकेदार ने जमील को बुलाया. अब ठेकेदार को जमील दुश्मन दिख रहा था. उस ने सागर से कहा कि जमील को इस तरह से मारा जाए कि उस की बेटी को पता न चले कि उस की हत्या हुई है. सागर ने उसे 2-3 तरीके बताए, लेकिन ठेकेदार ने यह कह कर मना कर दिया कि इस से हत्या और अपहरण का शक होगा. तब ठेकेदार ने ही बताया कि जमील को भट्ठे की आग में डाल दिया जाए. यह तरीका सागर को भी आसान लगा. ठेकेदार ने उसे भरोसा दिया कि काम हो जाने पर वह उसे 5 हजार रुपए देगा.

सागर और ठेकेदार ने जमील को भट्ठे की आग में जलाने की योजना बनाई. इस के बाद योजना के अनुसार सागर ने मुंशी इदरीस को छुट्टी पर भेज कर उस की जगह जमील को काम पर लगवा दिया. 2-3 दिनों में सागर ने जमील से दोस्ती कर ली और एक दिन जमील के पास आ कर बोला, ‘‘आओ, मैं तुम्हें दिखाऊं कि भट्ठे में कच्ची ईंटें कैसे रखी जाती हैं और आग कैसे जलाई जाती है.’’

जमील सागर की बातों में आ कर उस के साथ भट्ठे पर चला गया. सागर ने मजदूरों को दूर भेज दिया. जमील को भट्ठे के किनारेकिनारे ले जाते हुए सागर उसे वहां ले आया, जहां तेज आग जल रही थी. जमील आग की गरमी से दूर हटने लगा तो सागर ने जमील को कूल्हे से इतनी जोर से धक्का मारा कि जमील आग में जा गिरा. जिस जगह वह गिरा था, वह जगह 10 फुट गहरी थी. जमील की केवल एक चीख सुनाई दी.

सागर ने शोर मचाया तो मजदूर इकट्ठा हो गए. तब तक जमील जल कर कोयला हो चुका था. आग में पानी फेंका गया. आग तो बुझ गई, लेकिन यह पता नहीं चल सका कि उस में आदमी जला है या पेड़ की टहनी. ठेकेदार को सूचना दी गई, वह आया और उस ने थाने को सूचना दी. इलाके का थानेदार सदाकत अली भट्ठे पर आया और थोड़ीबहुत पूछताछ कर के चला गया. मैं ने सागर से पूछा, ‘‘थानेदार ने तफतीश तो की होगी?’’

‘‘अजी उस ने कोई तफतीश नहीं की, 5 सौ रुपए ले कर लिख दिया कि मौके का निरीक्षण करने पर पता चला कि मौत दुर्घटना के कारण हुई थी. हम तो खुश थे कि मामला खतम हो गया. लेकिन जमील की मां की आहें रंग लाईं और असलियत सामने आ गई.’’

सागर के इस खुलासे के बाद ठेकेदार को गिरफ्तार कर लिया गया. जब उसे पता चला कि सागर ने सारा खुलासा कर दिया है तो उस के सामने भी अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था. पूरा मामला खुल चुका था. दोनों अभियुक्त भी गिरफ्तार किए जा चुके थे. इस में सदाकत अली की भूमिका संदिग्ध दिखी. इंसपेक्टर टेनिसन ने एसपी थांपसन के सामने दोनों अभियुक्तों को पेश किया. उन्होंने भी उस से पूछताछ की. जांच के बाद एसपी ने थानेदार सदाकत अली को निलंबित कर दिया. यह हत्या शाइस्ता की वजह से हुई थी, इसलिए उस का बयान भी जरूरी था. हम ने उसे भी थाने बुलवा लिया.

लेकिन उस की जगह उस का पति आया. मैं ने कहा, ‘‘आप शाइस्ता को हमारे पास भेजें. आप निश्चिंत रहें, हम उस से दोएक बातें पूछ कर उसे आप के साथ भेज देंगे.’’

दरअसल, शाइस्ता को आप के पास भेजने से पहले मैं आप को एक जरूरी बात बताना चाहता हूं. आप मेरी बात सुन लें, फिर शाइस्ता से जो चाहें, पूछ लें.’’

मैं ने इंसपेक्टर टेनिसन की ओर देखा. उन्होंने सिर हिलाया. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘मैं आप को ऐसी बात बताने जा रहा हूं, जिसे सुन कर आप हैरान रह जाएंगे. शाइस्ता से शादी के बाद मैं बहुत खुश था. लेकिन शादी की पहली रात उस ने मुझ से कहा, ‘आप ने न मेरा अपहरण किया है और न ही आप के मातापिता ने मेरे साथ कोई ज्यादती की है. इस में आप का कोई दोष नहीं है, इसलिए आप को यह बताना जरूरी है कि मैं ने आप को दिल से कबूल नहीं किया है. लेकिन मैं आप को मायूस नहीं करूंगी. मेरा शरीर आप का है, आप इसे जिस तरह चाहे प्रयोग करें, लेकिन भावनात्मक तौर पर मैं आप का साथ नहीं दे सकूंगी.’

‘‘मैं उस की बातें सुन कर हिल गया. मैं ने उस से पूछा कि क्या तुम किसी और को पसंद करती हो? उस ने कहा, ‘आप ने सुना होगा कि हमारे भट्ठे पर जमील नाम का एक लड़का आग में गिर कर मर गया था. मैं उसी से प्यार करती थी. वह दुर्घटना नहीं, बल्कि उसे मेरे घर वालों ने साजिश रच कर मारा है. लेकिन कोई भी ताकत उसे मेरे दिल से नहीं निकाल सकती. मैं आप से बागी नहीं हो सकती, आप का हर हुक्म मानूंगी.’

‘‘पता नहीं क्या हुआ सर, उस की हृदयस्पर्शी बातें सुन कर मैं ने मन ही मन तय कर लिया कि मैं शाइस्ता को उस के अतीत की बातें अपने मातापिता को भी पता नहीं चलने दूंगा. मुझ से जमील के बारे में कितनी भी बातें करे, मैं बुरा नहीं मानूंगा. मैं वही करूंगा जो वह कहेगी. उस ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले कर आंखों से लगाए और बहुत रोई. आज हमारी शादी को 20-21 दिन हो गए हैं, मैं ने उसे बिलकुल भी हाथ नहीं लगाया है.’’

उस की बातों को हम ने बड़े गौर से सुना और ताज्जुब भी हुआ. हमें शाइस्ता से बात करनी थी, इसलिए उसे हम ने कमरे में बुला लिया और उस से बात होने तक उस के पति को बाहर बैठ कर इंतजार करने को कहा. उस के जाने के बाद मैं और इंसपेक्टर टेनिसन एकदूसरे का मुंह देखते रहे. मैं ने अपनी सर्विस में बहुत से लोग देखे थे, लेकिन यह आदमी सब से अलग और अनोखा था. इंसपेक्टर टेनिसन ने शाइस्ता से बात करनी शुरू की. इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा, ‘‘क्या तुम्हें अपने पिता की गिरफ्तारी पर दुख नहीं है?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने दांत पीस कर कहा, ‘‘मुझे उस आदमी से नफरत है, उसे सख्त सजा दी जानी चाहिए.’’

2-3 बातें और पूछने के बाद हम ने कहा, ‘‘इस के लिए तुम्हें अदालत में गवाही देनी पड़ेगी.’’

‘‘मैं अदालत चलूंगी और वहां चिल्लाचिल्ला कर कहूंगी कि यह हत्यारा है और हत्या की वजह भी बताऊंगी.’’

सागर और ठेकेदार को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस के बाद न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई. शाइस्ता ने अपने पिता के खिलाफ गवाही दी. मुकदमे की लंबी काररवाही के बाद जज ने सागर को मृत्युदंड और ठेकेदार को 8 साल की सजा सुनाई. दोनों ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन उन की अपील निरस्त कर दी गईं. लगभग एक साल बाद मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आगरा घूमने गया तो इत्तफाक से वहां शाइस्ता और उस का पति मिल गया.

शाइस्ता ने बताया कि सागर को फांसी देने के बाद उस के पिता को जेल में 3 महीने बाद फालिज का अटैक पड़ा, जिस में उस की मौत हो गई. उस की लाश घर आई तो उस की ससुराल के सब लोग गए थे, लेकिन वह नहीं गई. बाप के मरने से उस के दिल को बहुत सुकून मिला था. अब वह पति के साथ खुश है. मैं ने उस के पति की ओर देखा, वह मुसकरा रहा था. उस के चेहरे से ही लग रहा था कि वह संतुष्ट है. Hindi Kahani

 

Hindi Story: छोटी बहू

Hindi Story: इंसपेक्टर नवाज खान को शक था कि चंदरमल के गायब होने के पीछे उस की मंझली बहू के प्रेमी का हाथ है. लेकिन जब उन्होंने इस मामले की जांच की तो…

उन दिनों मेरी पोस्टिंग अमृतसर के एक देहाती इलाके में थी. वहां लाला चंदरमल के बेटे अर्जुन से मेरा अच्छा दोस्ताना था. वह एक शरीफ और मुखलिस नौजवान था. अर्जुन का शालों का कारोबार था. उस की बीवी भी अच्छी औरत थी और मेरे घर आती थी. मेरी बीवी से उस की अच्छी पटती थी. उस का नाम सीता था. आज जो किस्सा मैं आप को सुनाने जा रहा हूं, उस में सीता की खास भूमिका है. वह एक नेक और भली औरत थी और चंदरमल की चहेती बहू थी. चंदरमल के दोनों बड़े बेटों की औरतें नाम की बहुएं थीं. न वे दोनों ससुर की कोई सेवा करती थीं, न उसे पूछती थीं. उस की सारी खिदमत और देखरेख सिर्फ सीता करती थी.

वैसे चंदरमल ने दोनों बड़े बेटों, विकास और प्रकाश को पहले ही अलग कर दिया था, जबकि अर्जुन ने अलग होने से साफ इनकार कर दिया था. वह और सीता बाप से अलग नहीं होना चाहते थे. पर चंदरमल ने समझाबुझा कर अपने घर के पास ही घर दिला कर उन्हें भी अलग कर दिया था. लेकिन अलग होने के बाद भी सीता सुबहशाम आ कर ससुर का खाना बनाती, खिलाती, सेवा करती. उस की जरूरतों का खयाल रखती.

लाला की बीवी मर चुकी थी. न चाहते हुए भी अर्जुन और सीता को लाला से अलग होना पड़ा था, इस के पीछे लाला चंदरमल की शराब की लत थी. वह रात होते ही पीना शुरू कर देता था, इसलिए वह नहीं चाहता था कि उस की बहू व उस के बच्चे नशे की हालत में उसे देखें. इसी वजह से उस ने अर्जुन को भी अलग कर दिया था. सोमवार के दिन वह सोमरस का पान कुछ ज्यादा ही कर लेता था. मदहोशी की हालत में कोई उसे गलत हरकतें करते न देखे, इसलिए वह अलग अकेले रहना पसंद करता था. ये सब बातें अर्जुन की बीवी मेरी बीवी को बताती थी.

फिर अचानक एक दिन लाला चंदरमल गायब हो गया. सीता ने बताया कि वह उस के घर के 3-4 चक्कर लगा चुकी है, पर वह नहीं मिला दरवाजे पर भी ताला लगा हुआ है. सीता बहुत परेशान थी. 2 दिनों बाद दीवाली थी और लाला दीवाली उस के घर पर मनाने वाला था. वह जब उस से मिलने गई तो घर बंद था. उसे खाना भी बनाना था, पर वह नहीं लौटा था. वह मेरे पास आ गई. हम ने समझाया, लौट आएंगे, कहीं काम से गए होंगे. समझदार आदमी हैं. पर हमारी तसल्ली कुछ काम न कर सकी. वह रोती रही, परेशान होती रही. उस की परेशानी अपनी जगह ठीक थी. वह ऐसा गायब हुआ कि लौट कर ही नहीं आया. कई दिन गुजर गए, उस का कोई सुराग न लगा. मैं ने भी काफी कोशिश की.

अर्जुन व सीता ने भी आसपास, रिश्तेदारों में काफी तलाश की, पर अब तक कुछ पता नहीं चला. मेरी तलाश भी बेकार गई. यह भी पता न चल सका कि वह खुद गया या कोई उसे उठा कर ले गया. वह कोई बच्चा नहीं था कि गुम हो जाता. मैं ने उसे सलाह दी कि वे लोग कानूनी तौर पर मामला उठाएं तो सही तरीके से तफ्तीश हो सकती है. इस पर वह बोली, ‘‘हम लोग राजी हैं, पर भाई प्रकाश और उन की पत्नी भगवती नहीं मान रहीं. वह कहती हैं कि फालतू के लफड़े में पड़ने से क्या फायदा? आप उसे जाने दें, मैं और मेरे पति कानूनी काररवाई करेंगे.’’

मुझे अर्जुन के भाईभाभी की बात समझ में नहीं आई. दूसरे दिन अर्जुन ने चंदरमल की गुमशुदगी दर्ज करा दी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘प्रकाश और उस की पत्नी भगवती रिपोर्ट के विरोध में क्यों हैं? क्या वे नहीं चाहते कि चंदरमल मिल जाएं?’’

इस पर अर्जुन ने कई बातें बताईं. प्रकाश व भगवती की लाला से नहीं पटती थी. वह उन से नाराज रहता था. भगवती चाहती थी कि लाला की सारी दौलत उन दोनों को मिल जाए. प्रकाश की शादी भी लाला ने नहीं करवाई थी. उस ने ऐसी ही चलतीफिरती औरत से अपनी मरजी से शादी कर ली थी.

लाला प्रकाश व भगवती से जरा भी खुश नहीं था. मैं ने लाला के दुश्मनों के बारे में पूछा तो कहने लगा, ‘‘मेरे बाबू जुबान के व धंधे के बड़े खरे थे. उन की कभी कोई शिकायत नहीं आई. ईमानदारी से लेनदेन करते थे. उन का ऐसा कोई दुश्मन भी नहीं था, जो उन्हें गायब करवा दे. मुझे तो कभीकभी भगवती पर शक होता है.

‘‘वह प्रकाश पर भी दबाव डालती थी कि लाला से हिस्सा मांगो. प्रकाश ने बापू से नहीं, मुझ से हिस्से की बात की थी. मैं ने उसे समझाया था कि बापू सब की बराबर मदद करते हैं, इसलिए हमारी गृहस्थी अच्छी चल रही है.

‘‘अगर हिस्से की बात करोगे तो बापू नाराज हो कर कहीं ये मदद भी बंद न कर दें. तब उस ने बेबसी से कहा था कि वह भगवती की वजह से मजबूर है. उस वक्त बात टल गई. बापू के गायब होने से उन की मुराद पूरी हो जाएगी, क्योंकि बापू के न रहने से हिस्से बंट जाएंगे.’’

अर्जुन की बातों से मुझे तफतीश शुरू करने में काफी मदद मिली. सब से पहले मैं प्रकाश के घर गया. उन के दरवाजे पर बड़ा सा ताला लगा था. दोनों गायब थे. इस का मतलब कुछ गड़बड़ तो थी. मुझे उन की वापसी का इंतजार करना था.

मैं ने अर्जुन से कहा कि वह अपने सगेसंबंधियों, जानने वालों में उन के बारे में पता करवाए. मकान मालिक भी अर्जुन से उन के बारे में पूछ रहा था. यह तय था कि वे लोग जानबूझ कर गायब हुए थे. भगवती कोई अच्छी औरत नहीं थी. हो सकता है, उस का ताल्लुक जरायमपेशा लोगों से रहा हो. मैं ने सीता से, भगवती के मांबाप का पता मालूम किया और अपने मुखबिर से कहा कि मुझे किसी ऐसे आदमी से मिलवाओ, जिस का जरायमपेशा लोगों से याराना हो. उस ने एक ताड़ी बेचने वाले से मुझे मिलवाया, वह नाजायज धंधा करता था. इसलिए पुलिस के लिए कुछ भी काम करने को तैयार था.

मैं ने उसे भगवती के मांबाप का पता दे कर कहा कि इस घराने के बारे में मुझे पूरी मालूमात पता कर के खबर करे. उस के बाप का नाम सुन कर वह बोला, ‘‘साहब, भगवानदास मेरा ग्राहक है. उस का बदमाश गिरधारी से भी याराना है और ऐसा सुना है कि भगवानदास के मरने के बाद उस का याराना उस की लड़की भगवती से हो गया था. अब वह लड़की कहां है, मुझे नहीं मालूम. यह पुराने दिनों की बात है.’’

मैं ने उसे गिरधारी का पता लगाने को कहा और भगवती व उस के घराने के बारे में जानकारी लाने को कहा. कुछ दिनों बाद ताड़ी बेचने वाला, जिस का नाम मकरंदी था, बोला, ‘‘साहब, गिरधारी बड़ा बदमाश है. सारे गलत काम करता है, जुएं का बड़ा अड्डा चलाता है. मैं आप को मौका देख कर ऐसे समय उस के अड्डे पर ले चलूंगा, जब वह वहां मौजूद हो.’’

मुझे और कोई सुराग नहीं मिला था. चंदरमल अभी तक गायब था. मैं ने गिरधारी को निशाना बनाने की सोची, क्योंकि भगवती से भी उस के संबंध थे. मकरंदी के कई शराब के अड्डे थे, जहां वह ताड़ी बेचता था और पूरे वक्त पुलिस की खुशामद में लगा रहता था. उस दिन वह अपने साथ एक आदमी तिवारी को ले कर आया, जो सूरत से ही बदमाश लगता था. वह कहने लगा, ‘‘यह तिवारी गिरधारी का खास आदमी है, पर आजकल इस की गिरधारी से लड़ाई है. यह हमें उस तक पहुंचा देगा.’’

उसी रात को मैं तिवारी और मकरंदी के साथ गिरधारी के अड्डे के लिए रवाना हो गया. शहर के आखिरी छोर पर एक बड़े मैदान के बाद एक 2 मंजिला मकान था. नीचे तो अंधेरा था, ऊपर के कमरों में उजाला था. यही गिरधारी का अड्डा था. अभी हम सीढि़यों के पास खड़े थे कि एक आदमी सीढि़यों से लुढ़कता हुआ हमारे सामने आ कर गिरा. तिवारी ने बताया कि जब कोई जुआरी पैसे नहीं अदा करता तो गिरधारी उसे इसी तरह ऊपर से नीचे लुढ़का देता है.

हम चुपचाप ऊपर पहुंचे. सामने के कमरे में 5-6 लोग बैठे जुआ खेल रहे थे. उन के पास ताश व पैसे रखे थे. तिवारी मेरा हाथ पकड़ कर दूसरे कमरे में ले गया, जहां एक सांडनुमा आदमी एक टेबल के पीछे बैठा था. तिवारी धीरे से बोला, ‘‘यही है गिरधारी.’’

वह हट्टाकट्टा काला आदमी था. उस के बाजू मुगदल की तरह थे. चौड़ी छाती, भैसें जैसी गरदन, निस्संदेह वह एक मजबूत कदकाठी वाला अडि़यल आदमी था. गिरधारी तिवारी की आवाज सुन कर फुरती से खड़ा हो गया. उस ने अपने कुत्ते को इशारा किया तो उस ने तिवारी पर छलांग लगा दी. मेरा ध्यान गिरधारी पर था, वह सांड की तरह झूमता सिर की टक्कर मारने के लिए मेरी तरफ बढ़ा. मैं फुरती से एक तरफ से हो गया, वह अपनी पूरी ताकत से जा कर अलमारी से टकराया. अलमारी का पट टूट गया.

मैं ने सोचा, अगर यह मुझ से टकराया होता तो मेरा क्या हाल होता? मुझे उसे दूसरा मौका नहीं देना था. मैं ने खुद को तैयार कर लिया. जैसे ही वह मेरी तरफ बढ़ा, मैं ने सीधे हाथ का मुक्का इस के माथे पर जड़ दिया. मुझे लगा, जैसे मेरा हाथ किसी दीवार पर पड़ा हो. उस वक्त पिस्तौल निकालना खतरनाक हो सकता था. मुक्का जबरदस्त था, वह बिलबिला कर माथे पर हाथ रख कर पीछे हटा. उस की अंगुलियों से खून बाहर निकल रहा था. वह चकरा कर जमीन पर बैठ गया.

मैं ने तिवारी को इधरउधर देखा. वह कोने में गिरा पड़ा था. कुत्ते ने उस का पेट फाड़ दिया था, पर उस ने भी चाकू से कुत्ते को खत्म कर दिया था. मकरंदी पता नहीं कहां गायब हो गया था. तिवारी को देखना जरूरी था, मैं उस की तरफ बढ़ा. गिरधारी ने इस का फायदा उठाया, वह कमरे से खिसक गया. मुझे बड़ी हैरत हुई. नामीगिरामी गुंडा मेरे एक ही मुक्के में मुकाबले से डर गया. शायद और कोई वजह रही होगी, जो वह वहां से भाग गया. मुझे जल्द से जल्द तिवारी को अस्पताल भेजना था. मैं ने बाजू के कमरे से 2-3 लोगों को बुलाया, जो डरतेडरते आए.

मैं ने उन के साथ तिवारी को अस्पताल भिजवाया. सब मुझ से डर रहे थे. वे मुझे गिरधारी से बड़ा बदमाश समझ रहे थे, जिस ने गिरधारी के अड्डे पर आ कर उस का यह हाल कर दिया था. वे लोग तिवारी को एक चारपाई पर डाल कर अस्पताल ले गए. इस चक्कर में मकरंदी कब और कहां गायब हो गया, पता ही नहीं चला. मैं अपने थाने चला गया. तीसरे दिन मकरंदी मेरे पास आया. उसे देख कर मुझे गुस्सा तो बहुत आया, पर उस ने यह कहते हुए हाथ जोड़ कर माफी मांग ली कि वह दिल का कमजोर है. लड़ाईभिड़ाई से घबरा कर भाग गया था. मकरंदी को मैं ने माफ कर दिया, क्योंकि उस ने एक अच्छा काम किया था. जब गिरधारी छिपतेछिपाते वहां से भाग रहा था तो उस ने उस का पीछा किया था और यह मालूम कर लिया था कि वह कहां जा कर छिपा था.

मैं ने फैसला कर लिया कि मैं मकरंदी के साथ गिरधारी तक जरूर पहुचूंगा. मैं अर्जुन से मिलने उस के घर चला गया. उन दोनों को मैं ने सारी बातें बताईं. इस पर सीता कहने लगी, ‘‘मुझे पता था कि भगवती का ताल्लुक गिरधारी से है, पर मैं ने इस डर से यह बात किसी को नहीं बताई कि सब कहते कि मैं अपनी भाभी पर जलन में दोष लगा रही हूं. मैं ने कई बार प्रकाश की गैरमौजूदगी में एक काले सांड जैसे आदमी को उस के घर में देखा था.’’

अब मेरा गिरधारी तक पहुंचना जरूरी हो गया था. मकरंदी ने तिवारी का हाल भी बताया कि अब वह अच्छा है. उस के पेट में टांके लगे हैं, पर खतरे की कोई बात नहीं है. मकरंदी ने मुझे बताया कि उस ने गिरधारी को एक महंत की धरमशाला में जाते देखा था. जिस वक्त हम धरमशाला पहुंचे, शाम हो चुकी थी. धरमशाला की चारदीवारी काफी नीची थी, बीच में बड़ा मैदान था, जिस में एक तालाब सा बना हुआ था. सामने बड़ा सा बरामदा था, पीछे कमरों की लाइन थी. बरामदे में एक चारपाई पर एक आदमी लेटा था, दूसरा आदमी उस का बदन दबा रहा था.

मकरंदी धीरे से बोला, ‘‘जो लेटा है, वह महंत सोमनाथ है और जो बदन दबा रहा है, वह यहां का नौकर है. यहां आने से पहले मुझे मकरंदी बता चुका था कि सोमनाथ बड़ा अय्याश आदमी है. सब तरह के बुरे काम करता है, यहां तक कि लड़कियां भी उठवा लेता है.

हमें देख कर सोमनाथ उठ बैठा और हैरानी से देखने लगा. उस की हैरत देख कर मकरंदी जल्दी से बोला, ‘‘महाराज, हम गिरधारी से मिलने आए हैं. उस ने मुझे बुलवाया था.’’

महंत ने एक कमरे की तरफ इशारा कर दिया. मकरंदी महंत के पास चारपाई पर बैठ कर बातें करने लगा. मैं समझ गया कि वह डरपोक आदमी है, इसलिए गिरधारी के पास नहीं जाएगा. मैं ने सोमनाथ को सुनाने के लिए कहा, ‘‘तुम यहीं बैठो, मैं बात कर के आता हूं.’’

फिर मैं उस कमरे की तरफ बढ़ गया. इस बार मैं अचानक हमला करना चाहता था. मैं ने धीरे से दरवाजा खोला और तेजी से अंदर दाखिल हुआ. कमरे में एक ही चारपाई थी और उस पर वह सांड लेटा हुआ था. मुझे देख कर वह बड़ी फुरती से उठा, पर मैं ने उसे टक्कर मारने का मौका नहीं दिया. मैं ने पिस्तौल के दस्ते से वार कर के उस की गरदन का पुट्ठा तोड़ दिया. वह चकरा कर नीचे गिरा तो मैं ने उस के पेट पर कस कर घुटना मारा. उस ने हाथपैर ढीले छोड़ दिए. इस तरह सांड ने आसानी से हार मान ली.

मैं उसे थाने ले आया और 2 मजबूत बंदे उस की धुलाई पर लगा दिए. जब उस के सिर से गुंडागर्दी का भूत उतर गया तो मैं ने उस से सीधा सवाल किया, ‘‘तुम ने किस के कहने पर लाला चंदरमल को गायब किया है?’’

वह कानों को हाथ लगा कर बोला, ‘‘आप सच मानें यह काम मैं ने नहीं किया है, आप चाहे कसम उठवा लें.’’

मै ने कहा, ‘‘तुम नहीं जानते, मुझे सब पता है. भगवती लाला से दौलत में हिस्सा चाहती थी. उस ने प्रकाश को आगे कर दिया था कि ससुर से हिस्सा मांगे. जब लाला नहीं माना तो उस ने तुम से कहा कि लाला चंदरमल को गायब करवा दो. तुम्हें दौलत का लालच आ गया. तुम्हारा और भगवती का संबंध है, मुझे यह भी मालूम है, इसलिए तुम यह काम करने पर राजी हो गए.’’

मेरी बातें सुन कर गिरधारी सिर झुका कर बोला, ‘‘मेरा और भगवती का ताल्लुक है, यह बात सच है. मैं मानता हूं, पर लाला को मैं ने गायब नहीं किया. हां, मैं ने भगवती और प्रकाश को गायब हो जाने को जरूर कहा था, क्योंकि मुझे पता लग गया था कि आप उन दोनों पर शक कर रहे हैं और जल्द ही उन्हें पकड़वा लेंगे.

‘‘भगवती भी डर गई थी, इसलिए वे दोनों छिप गए. हम से गलती हो गई. गायब होने से आप का शक और बढ़ गया. अब मैं आप को बताता हूं, वह अपने पति के साथ अपने चाचा के घर छिपी है. मैं पता बताता हूं. मुझे पता है, मकरंदी ने आप को मेरे खिलाफ भड़काया है. उस की मुझ से दुश्मनी चल रही है. उसी के चलते उस ने आप को मेरे बारे बताया है.’’

‘‘तुम्हारी और मकरंदी की क्या दुश्मनी है और क्यों?’’

‘‘मैं कसम खा कर सच कह रहा हूं. इस कमीने मकरंदी ने एक दिन मुझ से कहा था कि चलो लाला को गायब कर देते हैं. उस के पास काफी दौलत है. काफी कुछ दे दिला कर वह हम से अपनी जान छुड़वाएगा. हमें अच्छाखासा पैसा भी मिल जाएगा. मैं नहीं माना, इसी पर हमारी कहासुनी हो गई.

‘‘इसी वजह से उस ने मुझे कुरबानी का बकरा बनाया. आप के मुखबिर की मुट्ठी गरम कर के मुखबिर के तौर पर आप तक पहुंचा. आप चाहें तो अपने मुखबिर से पूछ सकते हैं. उस ने खुद अपना नाम आप तक भिजवाया है, ताकि आप की नजर में मुझे मुजरिम बना सके. वह बड़ा शातिर और कमीना आदमी है, यह सब उसी की चाल है.’’

मैं ने अपने मुखबिर को बुला कर सख्ती से पूछा तो उस ने कबूल कर लिया कि मकरंदी ने ही पैसे दे कर अपना नाम मुखबिर की तौर पर बताने को कहा था. इस के बाद वह हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा. गिरधारी का बयान मुझे सच्चा लगा. एक बात और मैं ने नोट की थी कि मकरंदी गिरधारी के सामने आने से बचता था. मैं ने गिरधारी से कहा, ‘‘मैं तुम्हें अभी तो छोड़ रहा हूं, पर तुम रोज थाने आओगे. अगर नहीं आए या फरार हुए तो मैं तुम्हें ही मुजरिम समझ बंद करवा दूंगा.’’

वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मैं ने सब सच कहा है. यह मकरंदी ही बदमाश है. उस ने ही लाला को उठाने की बात उस के शराबखाने के नौकर दीनानाथ के सामने कही थी. आप चाहें तो उस से भी पूछ लें, मैं बेकुसूर हूं.’’

गिरधारी के बयान के बाद मेरी अब तक की सारी तफतीश बेकार चली गई. अब मेरे सामने फिर वही सवाल खड़ा था कि लाला को किस ने गायब किया? मैं ने दूसरे दिन मकरंदी को थाने बुलाया और अपने हवलदार से कह दिया कि उसे बिठा कर पूछताछ करते रहो और मैं खुद मकरंदी के शराबखाने पहुंच गया. वहीं अड्डे पर मैं ने दीनानाथ को खूब धमकाया. उस से कहा कि एक चोर ने एक वारदात में उस का नाम लिया है. वह मुझे पहचानते ही डर गया, धमकी से भी घबराया. मैं ने कहा, ‘‘कल तुम थाने आओ, वहां कुछ पूछताछ करनी है, पर किसी को कुछ बताना नहीं. अगर किसी को कुछ पता चला तो मैं तुम्हें ही बंद कर दूंगा.’’

दूसरे दिन दीनानाथ मेरे पास थाने पहुंच गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘मुझे लाला चंदरमल और मकरंदी के बारे में पूरी बात सचसच बताओ.’’

वह कहने लगा, ‘‘लाला शराब खूब पीता था और मकरंदी उस के पास शराब पहुंचाता था. इसलिए उन दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई थी. लाला पैसों के मामले में एकदम खरा था. उस का कारोबार बहुत अच्छा चलता था. वह अपने बेटों में पैसे बांटता था, बाकी की शराब पी कर बराबर कर देता था. उस की बीवी तो मर गई थी, घर में अकेला था, इसलिए कोई रोकटोक नहीं थी.’’

‘‘अच्छा यह बताओ कि क्या कभी मकरंदी ने तुम से कहा था कि लाला को गायब कर दें और उस से पैसे ऐंठ लें?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह बात पहले मुझ से नहीं, गिरधारी के साथ हुई थी साहब, मुझे याद है कि गिरधारी कुछ रकम का हिसाब करने मकरंदी के पास आया था. उस वक्त मैं भी अड्डे पर मौजूद था. गिरधारी ने मकरंदी से कहा था कि इस वक्त जरा हाथ तंग है, बाकी के पैसे कुछ दिनों बाद दे देगा, इस पर मकरंदी ने कहा कि किसी साहूकार से ले लो. गिरधारी  ने कहा, ‘साहूकार (लाला) तो तुम्हारा यार है.’

मकरंदी ने कहा था, ‘‘चलो गिरधारी, लाला को गायब कर देते हैं. अच्छीखासी रकम ले कर उसे छोड़ेंगे, काफी पैसा मिल जाएगा.’’

गिरधारी ने इनकार करते हुए कहा था, ‘‘मैं इस तरह के गंदे काम नहीं करता, न किसी जुर्म में शामिल होना चाहता हूं.’’

इस पर उन दोनों में कुछ कहासुनी भी हुई थी. फिर गिरधारी ने बाकी बचे पैसे 2 दिनों में तिवारी से भिजवा दिए थे. उसी दिन मकरंदी ने मुझ से कहा, ‘‘दीनानाथ, चलो अपन दोनों मिल कर लाला को गायब करते हैं. जो पैसे मिलेंगे, आपस में बांट लेंगे.’’

मैं ने साफ इनकार कर दिया. मैं शराब का धंधा करता हूं, बुरा आदमी हूं, पर किसी की जान जोखिम में नहीं डाल सकता. ऐसा काम नहीं करूंगा. दीनानाथ के इनकार के बाद मकरंदी ही बचता था, जिसे इस सवाल का जवाब देना था कि आखिर लाला कहां गया? गिरधारी और दीनानाथ दोनों ही मकरंदी की तरफ इशारा कर रहे थे. दोनों के बयान एक जैसे थे और सच्चे थे. अब मेरा शक मकरंदी की तरफ गया. मैं ने दीनानाथ को कहीं बाहर न जाने का पाबंद कर के जाने दिया.

दीनानाथ के बयान के बाद जब मकरंदी थाने आया तो मैं ने उसे कमरा बंद कर के बिठा लिया और सख्ती से कहा, ‘‘तुम ने काफी चक्कर दिए. लाला को तुम ने ही गायब किया है. अभी सच बता दो, नहीं तो मुश्किल में पड़ जाओगे.’’

वह एकदम से परेशान हो गया कि कल तक थानेदार उस के साथ था, आज एकदम से खिलाफ हो गया और उस पर शक कर रहा है. मुजरिम का घबराना तफतीश के लिए अच्छा रहता है. मैं उस पर दबाव बना सकता था. मैं ने उसे हवालात में डाल दिया. वह बड़ा ढीठ आदमी था. एक दिन तक तो साफ इनकार करता रहा. दूसरे दिन मैं ने दीनानाथ को बुलवा लिया. उसे मकरंदी के सामने बिठा कर पूछा. उस ने साफसाफ कह दिया कि मकरंदी ने गिरधारी से और उस से लाला को उठवाने की बात कही थी.

दीनानाथ पुलिस से छूटना चाहता था, इसलिए उस ने पूरा सच उगल दिया. सच सुन कर मकरंदी का चेहरा फक पड़ गया. मैं ने कहा, ‘‘मकरंदी भलाई इसी में है कि तुम सच्चाई कबूल कर लो, नहीं तो पुलिस की मार के आगे टिक नहीं सकोगे.’’

मकरंदी ने सिर झुका लिया. अब मेरे सामने बैठा, वह अपने जुर्म का इकरार कर रहा था, ‘‘दीनानाथ के इनकार करने के बाद मैं ने खुद यह काम करने का फैसला कर लिया. वह सोमवार का दिन था. मुझे पता था कि उस दिन वह जम कर पीता था. इसलिए उस के घर मैं ने जो शराब भिजवाई थी, वह बिना मिलावट की असली शराब थी. मैं चाहता था कि इस सोमवार को जब लाला शराब पिए तो ऐसा नशा चढ़े कि अपना होश खो बैठे.

‘‘मैं उस के घर चला गया. जब मैं वहां पहुंचा तो वह पूरे होशोहवास में घर से निकल रहा था. मुझे बड़ी हैरानी हुई. सोमवार के दिन लाला इतनी ठीक हालत में कैसे? मैं ने लाला से पूछा, ‘क्या बात है? जलपानी नहीं लिया क्या?’ इस पर वह कहने लगा, ‘आज मैं ने जलपानी नहीं लिया (वह शराब को जलपानी कहता था). मैं अभी दिवाली के लिए अपनी छोटी बहू के घर जा रहा हूं. मैं उन लोगों के सामने शराब पी कर नहीं जाता.’

‘‘लाला की इस बात ने मेरा सारा प्लान खतरे में डाल दिया. मैं ने लाला से कहा कि दिवाली की खुशी में मैं खुद उस के साथ जलपानी लेने आया हूं. एक गिलास से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पहले वह हिचकिचाया, ‘नहीं..नहीं..’ करने लगा. लेकिन मैं ने थोड़ा जोर डाला तो वह मान गया.

‘‘हम दोनों बातें करतेकरते अड्डे की तरफ चले. वहां मैं ने लाला को एक गिलास दिया. उस के बाद तो थोड़ा कहने पर वह पीता चला गया. उस के ढह जाने से पहले मैं उसे श्मशानघाट की तरफ ले कर चला गया. वहां एक जगह ऐसी है, जहां कुम्हार मिट्टी खोदते हैं. उस जगह बड़ेबड़े गड्ढे बन गए हैं.

‘‘उस के करीब एक सूखा कुंआ है. वहां बड़ी वीरानी थी. दूरदूर तक कोई नहीं था. मैं लाला को बातों में लगा कर वहां तक ले गया, फिर हम कुएं के पास आ गए. उस वक्त तक लाला नशे में धुत हो चुका था. उस के पांव सीधे नहीं पड़ रहे थे. वह बुरी तरह लड़खड़ा रहा था.

‘‘मैं ने उस की सदरी की जेब टटोली और चाबी निकाल कर संभाल कर रख ली. उस में एक तिजोरी की चाबी भी थी. फिर मैं ने लाला को कुएं में धकेल दिया. लाला की एक चीख सुनाई दी और अंदर से धप्प की आवाज आई. फिर सन्नाटा छा गया. कुछ देर मैं मुंडेर पर बैठा रहा और फिर वापस आ गया.’’

मकरंदी का बयान सुन कर मैं एकदम शौक्ड रह गया. एक बूढ़े भले आदमी को उस शराब बेचने वाले ने बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था. वह आगे बोला, ‘‘वापसी के पहले मैं ने एक बार कुएं में झांक कर देखा, मुझे दूर नीचे एक गठरी सी दिखाई दी, वह लाला चंदरमल था. मैं वहां से सीधा लाला के घर गया, चाबियां मेरे पास थीं.

‘‘उस के घर का दरवाजा खोल कर मैं अंदर गया. घर में मैं ने सेफ तलाश ली. मैं ने उसे खोला उस में मुझे सोने की चंद इंटें और 10 हजार नकद मिल गए. मैं ने वह सब कुछ समेटा और ताला बंद कर के घर आ गया.

‘‘मैं ने घर में सारा सामान सुरक्षित रख दिया. फिर योजना बना कर आप को गिरधारी की राह पर लगा दिया, ताकि मुझ पर से शक हट जाए. लेकिन लगता है, लाला की रूह को चैन नहीं मिला, उस ने मुझे पकड़वा कर ही छोड़ा.’’

मकरंदी का बयान मैं ने मुंशी से लिखवाया. इस केस में आलाएकत्ल मिलने का कोई सवाल ही नहीं था. बस मुजरिम का इकबाली बयान था, जिस पर पूरा केस टिका था. मैं ने मकरंदी को हवालात में डाला और उस के घर खबर भिजवा दी. उस की बीवी और उस का एक भाई रोते हुए मेरे पास थाने आ पहुंचे. मैं ने उस के भाई को बता दिया कि उस ने कत्ल किया है. उसे मकरंदी से मिलवा भी दिया. उस की बीवी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि उस का शौहर खून कर सकता है. अब लाश को बरामद करने का काम करना था.

फिर मैं अर्जुन के घर पहुंचा, दोनों तपाक से मिले. मैं ने उस के दूसरे दोनों भाइयों को भी बुलवा लिया. जब वे सब इकट्ठा हो गए तो मैं ने उन्हें सारी बात बता दी. उन्हें बातया कि लाला इस वक्त कहां है. वे सारे रोनेधोने लगे. सीता का तो रोरो कर बुरा हाल था. उस का ससुर जिस वक्त उस के घर आने को निकल रहा था, उसी वक्त उस का कत्ल हो गया था. मैं तीनों भाइयों और 3-4 सिपाहियों को ले कर कुएं पर पहुंचा. लाला के 2 बेटे अर्जुन और प्रकाश कुएं में नीचे उतरे. ऊपर से लटकाए गए रस्से में लाश बांध कर ऊपर लाई गई. लाश की खराब हालत देख कर अर्जुन और प्रकाश की तबीयत खराब होने लगी.

थाने आ कर मैं ने बरामदगी व तलाशी के कागजात बनाए. मकरंदी के घर से सोना व पैसा बरामद करवाया. चालान तैयार किया, फिर कागजी और अदालती कामकाज शुरू हो गया. इस केस में मकरंदी को उम्रकैद की सजा हुई, क्योंकि मौके का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था. अदालत की नजर में गिरधारी और दीनानाथ की गवाही संदेहास्पद थी.

इस पूरे केस को हल करने में छोटी बहू सीता की खास भूमिका थी, उसी के रोनेधोने पर रिपोर्ट दर्ज हुई थी और बाकायदा तफ्तीश की गई थी. Hindi Story

Love Story: क्या इश्क में अंधी लाली खुद को संभाल पाई

Love Story: सतपाल गहरी नींद में सोया हुआ था. उस की पत्नी उर्मिला ने उसे जगाने की कोशिश की. वह इतनी ऊंची आवाज में बोली थी कि साथ में सोया उस का 5 साला बेटा जंबू भी जाग गया था. वह डरी निगाहों से मां को देखने लगा था. ‘‘क्या हो गया? रात को तो चैन से सोने दिया करो. क्यों जगाया मुझे?’’ सतपाल उखड़ी आवाज में उर्मिला पर बरस पड़ा.

‘‘बाहर गेट पर कोई खड़ा है. जोरजोर से डोर बैल बजा रहा है. पता नहीं, इतनी रात को कौन आ गया है? मुझे तो डर लग रहा है,’’ उर्मिला ने घबराई आवाज में बताया. ‘‘अरे, इस में डरने की क्या बात है? गेट खोल कर देख लो. तुम सतपाल की घरवाली हो. हमारे नाम से तो बड़ेबड़े भूतप्रेत भाग जाते हैं.’’

‘‘तुम ही जा कर देखो. मुझे तो डर लग रहा है. पता नहीं, कोई चोरडाकू न आ गया हो. तुम भी हाथ में तलवार ले कर जाना,’’ उर्मिला ने सहमी आवाज में सलाह दी. सतपाल ने चारपाई छोड़ दी. उस ने एक डंडा उठाया. गेट के करीब पहुंच कर उस ने गेट के ऊपर से झांक कर देखा, तो कांप उठा. बाहर उस की छोटी बहन खड़ी सिसक रही थी.

सतपाल ने हैरानी भरे लहजे में पूछा, ‘‘अरे लाली, तू? घर में तो सब ठीक है न?’’

लाली कुछ नहीं बोल पाई. बस, गहरीगहरी हिचकियां ले कर रोने लगी. सतपाल ने देखा कि लाली के चेहरे पर मारपीट के निशान थे. सिर के बाल बिखरे हुए थे.

सतपाल लाली को बैडरूम में ले आया. वह बारबार लाली से पूछने की कोशिश कर रहा था कि ऐसा क्या हुआ कि उसे आधी रात को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा? उर्मिला ने बुरा सा मुंह बनाया और पैर पटकते हुए दूसरे कमरे में चली गई. उसे लाली के प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं थी.

लाली की शादी आज से 10 साल पहले इसी शहर में हुई थी. तब उस के मम्मीपापा जिंदा थे. लाली का पति दुकानदार था. काम अच्छा चल रहा था. घर में लाली की सास थी, 2 ननदें भी थीं. उन की शादी हो चुकी थी. लाली के पति अजय ने उसे पहली रात को साफसाफ शब्दों में समझा दिया था कि उस की मां बीमार रहती हैं. उन के प्रति बरती गई लापरवाही को वह सहन नहीं करेगा.

लाली ने पति के सामने तो हामी भर दी थी, मगर अमल में नहीं लाई. कुछ दिनों बाद अजय ने सतपाल के सामने शिकायत की.

जब सतपाल ने लाली से बात की, तो वह बुरी तरह भड़क उठी. उस ने तो अजय की शिकायत को पूरी तरह नकार दिया. उलटे अजय पर ही नामर्दी का आरोप लगा दिया.

अजय ने अपने ऊपर नामर्द होने का आरोप सुना, तो वह सतपाल के साथ डाक्टर के पास पहुंचा. अपनी डाक्टरी जांच करा कर रिपोर्ट उस के सामने रखी, तो सतपाल को लाली पर बेहद गुस्सा आया. उस ने डांटडपट कर लाली को ससुराल भेज दिया. लाली ससुराल तो आ गई, मगर उस ने पति और सास की अनदेखी जारी रखी. उस ने अपनी जिम्मेदारियों को महसूस नहीं किया. अपने दोस्तों के साथ मोबाइल पर बातें करना जारी रखा.

आखिरकार जब अजय को दुकान बंद कर के अपनी मां की देखभाल के लिए घर पर रहने को मजबूर होना पड़ा, तब उस ने अपनी आंखों से देखा कि लाली कितनी देर तक मोबाइल फोन पर न जाने किसकिस से बातें करती थी. एक दिन अजय ने लाली से पूछ ही लिया कि वह इतनी देर से किस से बातें कर रही थी?

पहले तो लाली कुछ भी बताने को तैयार नहीं हुई, पर जब अजय गुस्से से भर उठा, तो लाली ने अपने भाई सतपाल का नाम ले लिया. उस समय तो अजय खामोश हो गया, क्योंकि उसे मां को अस्पताल ले जाना था. जब वह टैक्सी से अस्पताल की तरफ जा रहा था, तब उस ने सतपाल से पूछा, तो उस ने इनकार कर दिया कि उस के पास लाली का कोई फोन नहीं आया था.

अजय 2 घंटे बाद वापस घर में आया, तो लाली को मोबाइल फोन पर खिलखिला कर बातें करते देख बुरी तरह सुलग उठा था. उस ने तेजी से लपक कर लाली के हाथ से मोबाइल छीन कर 4-5 घूंसे जमा दिए. लाली चीखतीचिल्लाती पासपड़ोस की औरतों को अपनी मदद के लिए बुलाने को घर से बाहर निकल आई.

अजय ने उसी नंबर पर फोन मिलाया, जिस पर लाली बात कर रही थी. दूसरी तरफ से किसी अनजान मर्द की आवाज उभरी. अजय की आवाज सुनते ही दूसरी तरफ से कनैक्शन कट गया.

अजय ने दोबारा नंबर मिला कर पूछने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ से मोबाइल स्विच औफ हो गया. अजय ने लाली से पूछा, तो उस ने भी सही जवाब नहीं दिया.

अजय का गुस्से से भरा चेहरा भयानक होने लगा. उस के जबड़े भिंचने लगे. वह ऐसी आशिकमिजाजी कतई सहन नहीं करेगा. लाली घबरा उठी. उसे लगा कि अगर वह अजय के सामने रही और किसी दोस्त का फोन आ गया, तो यकीनन उस की खैरियत नहीं. उस ने उसी समय जरूरी सामान से अपना बैग भरा और अपने मायके आ गई.

लाली ने घर आ कर अजय और उस की मां पर तरहतरह के आरोप लगा कर ससुराल जाने से मना कर दिया. कई महीनों तक वह अपने मायके में ही रही. अजय भी उसे लेने नहीं आया. इसी तनातनी में एक साल गुजर गया. आखिरकार अजय ही लाली को लेने आया. उस ने शर्त रखी कि लाली को मन लगा कर घर का काम करना होगा. वह पराए मर्दों से मोबाइल फोन पर बेवजह बातें नहीं करेगी.

सतपाल ने बहुत समझाया, मगर लाली नहीं मानी. लाली का तलाक हो गया. सतपाल ने उस के लिए 2 लड़के देखे, मगर वे उसे पसंद नहीं आए.

दरअसल, लाली ने शराब का एक ठेकेदार पसंद कर रखा था. उस का शहर की 4-5 दुकानों में हिस्सा था. वह शहर का बदनाम अपराधी था, मगर लाली को पसंद था. काफी अरसे से लाली का उस ठेकेदार जोरावर से इश्क चल रहा था. जोरावर सतपाल को भी पसंद नहीं था, मगर इश्क में अंधी लाली की जिद के सामने वह मजबूर था. उस की शादी जोरावर से करा दी गई.

जोरावर शराब के कारोबार में केवल 10 पैसे का हिस्सेदार था, बाकी 90 पैसे दूसरे हिस्सेदारों के थे. उस की कमाई लाखों में नहीं हजारों रुपए में थी. वह जुआ खेलने और शराब पीने का शौकीन था. वह लाली को खुला खर्चा नहीं दे पाता था. अब तो लाली को पेट भरने के भी लाले पड़ गए. उस ने जोरावर से अपने खर्च की मांग रखी, तो उस ने जिस्म

बेच कर पैसा कमाने का रास्ता दिखाया. लाली ने मना किया, तो जोरावर ने घर में ही शराब बेचने का रास्ता सुझा दिया. अब लाली करती भी क्या. अपना मायका भी उस ने गंवा लिया था. जाती भी कहां? उस ने शराब बेचने का धंधा शुरू कर दिया. उस का जवान गदराया बदन देख कर मनचले शराब खरीदने लाली के पास आने लगे. उस का कारोबार अच्छा चल निकला.

जोरावर को लगा कि लाली खूब माल कमा रही है, तो उस ने अपना हिस्सा मांगना शुरू कर दिया. लाली ने पैसा देने से इनकार कर दिया. उस रात दोनों में झगड़ा हुआ. लाली जमा किए तमाम रुपए एक पुराने बैग में भर कर घर से भाग निकली. जोरावर ने देख लिया था. वह भी पीछेपीछे तलवार हाथ में लिए भागा. वह किसी भी सूरत में लाली से रुपए लेना चाहता था.

जोरावर नशे में था. उस के हाथों में तलवार चमक रही थी. वह उस की हत्या कर के भी सारा रुपया हासिल करना चाहता था. लाली बदहवास सी भागती हुई सड़क पर आ गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो जोरावर तलवार लिए उस की तरफ भाग रहा था. उस ने बचतेबचाते सड़क पार कर ली.

लेकिन जब जोरावर सड़क पार करने लगा, तो वह किसी बड़ी गाड़ी की चपेट में आ गया और मारा गया. रात के 3 बज रहे थे. किसी ने भी जोरावर की लाश की तरफ ध्यान तक नहीं दिया.

सतपाल के यहां आ कर लाली ने रोतेसिसकते अपनी दुखभरी दास्तान सुनाई, तो सतपाल की भी आंखें भर आईं. मगर उसी पल उस ने अपनी बहन की गलतियां गिनाईं, जिन की वजह से उस की यह हालत हुई थी. ‘‘हां भैया, अजय का कोई कुसूर नहीं है. मैं ने ही अपनी गलतियों की सजा पाई है. अजय ने तो हर बार मुझे समझाने, सही रास्ते पर लाने की कोशिश की थी, इसलिए अब भी मैं अजय के पास ही जाना चाहती हूं,’’ लाली ने इच्छा जाहिर की.

‘‘अब तुझे वह किसी भी हालत में नहीं अपनाएगा. उस ने तो दूसरी शादी भी कर ली होगी,’’ सतपाल ने अंदाजा लगाया. ‘‘बेशक, उस ने शादी कर ली हो. उस के घर में नौकरानी बन कर रह लूंगी. मुझे अजय के घर जाना है, वरना मैं खुदकुशी कर लूंगी,’’ लाली ने अपना फैसला सुना दिया.

सतपाल बोला, ‘‘ठीक है लाली, पहले तू 4-5 दिन यहीं आराम कर.’’ एक हफ्ते बाद सतपाल ने लाली

को मोटरसाइकिल पर बैठाया और दोनों अजय के घर की तरफ चल दिए. अजय घर पर अकेला ही सुबह का नाश्ता तैयार कर रहा था. सुबहसवेरे लाली को अपने भाई सतपाल के साथ आया देख वह बुरी तरह भड़क उठा.

दोनों को धक्के मार कर घर से बाहर निकालते हुए अजय ने कहा, ‘‘अब तुम लोग मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने आए हो. चले जाओ यहां से. अब तो मेरी मां भी मर चुकी है. मेरी पत्नी तो बहुत पहले मर चुकी थी. अब मेरा कोई नहीं है.’’

सतपाल ने लाली को घर चलने को कहा, तो वह वहीं पर रहने के लिए अड़ गई. सतपाल अकेला ही घर चला गया. लाली सारा दिन भूखीप्यासी वहीं पर खड़ी रही. रात को अजय वापस आया. लाली को खड़ा देख वह बेरुखी से बोला, ‘‘अब यहां खड़े रहने का कोई फायदा नहीं है.’’

‘‘अजय, मैं ने तो अपनी गलतियों को पहचाना है और मैं तुम्हारी सेवा करने का मौका एक और चाहती हूं.’’ मगर अजय ने उस की तरफ ध्यान नहीं दिया और घर का दरवाजा बंद कर लिया. अगली सुबह अजय ने दरवाजा खोला, तो लाली को बाहर बीमार हालत में देख चौंक उठा. वह बुरी तरह कांप रही थी. वह उसे तुरंत डाक्टर के पास ले गया. बीमार लाली को देख कर अजय को लगा कि ठोकर खा कर लाली सुधर गई है, इसलिए उस ने उसे माफ कर दिया. Love Story

Hindi Stories: उतावली – क्या कमी थी सारंगी के जीवन में

Hindi Stories: ‘‘मैं क्या करती, उन से मेरा दुख देखा नहीं गया तो उन्होंने मेरी मांग में सिंदूर भर दिया.’’ सारंगी का यह संवाद सुन कर हतप्रभ सौम्या उस का मुंह ताकती रह गई. महीनेभर पहले विधवा हुई सारंगी उस की सहपाठिन थी. सारंगी के पति की असामयिक मृत्यु एक रेल दुर्घटना में हुई थी.

सौम्या तो बड़ी मुश्किल से सारंगी का सामना करने का साहस जुटाती दुखी मन से उस के प्रति संवेदना और सहानुभूति व्यक्त करने आई थी. उलझन में थी कि कैसे उस का सामना करेगी और सांत्वना देगी. सारंगी की उम्र है ही कितनी और ऊपर से 3 अवयस्क बच्चों का दायित्व. लेकिन सारंगी को देख कर वह भौचक्की रह गई थी. सारंगी की मांग में चटख सिंदूर था, हथेलियों से कलाइयों तक रची मेहंदी, कलाइयों में ढेर सारी लाल चूडि़यां और गले में चमकता मंगलसूत्र. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ.

विश्वास होता भी कैसे. तीजत्योहार पर व्रतउपवास रखने वाली, हर मंदिरमूर्ति के सामने सिर झुकाने वाली व अंधभक्ति में लीन रहने वाली सारंगी को इस रूप में देखने की कल्पना उस के मन में नहीं थी. वह तो सोचती आई थी कि सारंगी सूनी मांग लिए, निपट उदास मिलेगी. सारंगी की आंखों में जरा भी तरलता नहीं थी और न ही कोई चिंता. वह सदा सुहागन की तरह थी और उस के चेहरे पर दिग्विजयी खुशी फूट सी रही थी. सब कुछ अप्रत्याशित.

एक ही बस्ती की होने से सारंगी और सौम्या साथसाथ पढ़ने जाती थीं. दोनों का मन कुछ ऐसा मिला कि आपस में सहेलियों सा जुड़ाव हो गया था. सौम्या की तुलना में सारंगी अधिक यौवनभरी और सुंदर थी. उम्र में उस से एक साल बड़ी सारंगी, पढ़ाई में कमजोर होने के कारण वह परीक्षाओं में पास होने के लिए मंदिरों और देवस्थानों पर प्रसाद चढ़ाने की मनौती मानती रहती थी. सौम्या उस की मान्यताओं पर कभीकभी मखौल उड़ा देती थी. सारंगी किसी तरह इंटर पास कर सकी और बीए करतेकरते उस की शादी हो गई. दूर के एक कसबे में उस के पति का कबाड़ खरीदनेबेचने का कारोबार था.

शुरूशुरू में सारंगी का मायके आनाजाना ज्यादा रहा. जब आती तो गहनों से लद के सजीसंवरी रहती थी. खुशखुश सी दिखती थी.

एक दिन सौम्या ने पूछा था, ‘बहुत खुश हो?’

‘लगती हूं, बस’ असंतोष सा जाहिर करती हुई सारंगी ने कहा.

‘कोई कमी है क्या?’ सौम्या ने एकाएक तरल हो आई उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘पूछो मत,’ कह कर सारंगी ने निगाहें झुका लीं.

‘तुम्हारे गहने, कपड़े और शृंगार देख कर तो कोई भी समझेगा कि तुम सुखी हो, तुम्हारा पति तुम्हें बहुत प्यार करता है.’

‘बस, गहनों और कपड़ों का सुख.’

‘क्या?’

‘सच कहती हूं, सौम्या. उन्हें अपने कारोबार से फुरसत नहीं. बस, पैसा कमाने की धुन. अपने कबाड़खाने से देररात थके हुए लौटते हैं, खाएपिए और नशे में. 2 तरह का नशा उन पर रहता है, एक शराब का और दूसरा दौलत का. अकसर रात का खाना घर में नहीं खाते. घर में उन्हें बिस्तर दिखाई देता है और बिस्तर पर मैं, बस.’ सौम्या आश्चर्य से उस का मुंह देखती रही.

‘रोज की कहानी है यह. बिस्तर पर प्यार नहीं, नोट दिखाते हैं, मुड़ेतुड़े, गंदेशंदे. मुट्ठियों में भरभर कर. वे समझते हैं, प्यार जताने का शायद यही सब से अच्छा तरीका है. अपनी कमजोरी छिपाते हैं, लुंजपुंज से बने रहते हैं. मेरी भावनाओं से उन्हें कोई मतलब नहीं. मैं क्या चाहती हूं, इस से उन्हें कुछ लेनादेना नहीं.

‘मैं चाहती हूं, वे थोड़े जोशीले बनें और मुझे भरपूर प्यार करें. लेकिन यह उन के स्वभाव में नहीं या यह कह लो, उन में ऐसी कोईर् ताकत नहीं है. जल्दी खर्राटे ले कर सो जाना, सुबह देर से उठना और हड़बड़ी में अपने काम के ठिकाने पर चले जाना. घर जल्दी नहीं लौटना. यही उन की दिनचर्या है. उन का रोज नहानाधोना भी नहीं होता. कबाड़खाने की गंध उन के बदन में समाई रहती है.’

सारंगी ने एक और रहस्य खोला, ‘जानती हो, मेरे  मांबाप ने मेरी शादी उन्हें मुझे से 7-8 साल ही बड़ा समझ कर की थी लेकिन वे मुझ से 15 साल बड़े हैं. जल्दी ही बच्चे चाहते हैं, इसलिए कि बूढ़ा होने से पहले बच्चे सयाने हो जाएं और उन का कामधंधा संभाल लें. लेकिन अब क्या, जीवन तो उन्हीं के साथ काटना है. हंस कर काटो या रो कर.’

चेहरे पर अतृप्ति का भाव लिए सारंगी ने ठंडी सांस भरते हुए मजबूरी सी जाहिर की. सौम्या उस समय वैवाहिक संबंधों की गूढ़ता से अनभिज्ञ थी. बस, सुनती रही. कोई सलाह या प्रतिक्रिया नहीं दे सकी थी.

समय बीता. सौम्या बीएड करने दूसरे शहर चली गई और बाहर ही नौकरी कर ली. उस का अपना शहर लगभग छूट सा गया. सारंगी से उस का कोई सीधा संबंध नहीं रहा. कुछ वर्षों बाद सारंगी से मुलाकात हुई तो वह 2 बच्चों की मां हो चुकी थी. बच्चों का नाम सौरभ और गौरव बताया, तीसरा होने को था परंतु उस के सजनेधजने में कोई कमी नहीं थी. बहुत खुश हो कर मिली थी. उस ने कहा था, ‘कभी हमारे यहां आओ. तुम जब यहां आती हो तो तुम्हारी बस हमारे घर के पास से गुजरती है. बसस्टैंड पर किसी से भी पूछ लो, कल्लू कबाड़ी को सब जानते हैं.’

‘कल्लू कबाड़ी?’

‘हां, कल्लू कबाड़ी, तेरे जीजा इसी नाम से जाने जाते हैं.’ ठट्ठा मार कर हंसते हुए उस ने बताया था.

सौम्या को लगा था कि वह अब सचमुच बहुत खुश है. कुछ समय बाद आतेजाते सौम्या को पता चला कि सारंगी के पति लकवा की बीमारी के शिकार हो गए हैं. लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी थीं कि वह चाहते हुए भी उस से मिल न सकी. लेकिन इस बार सौम्या अपनेआप को रोक न पाई थी. सारंगी के पति की अचानक मृत्यु के समाचार ने उसे बेचैन कर दिया था. वह चली आई. सोचा, उस से मिलते हुए दूसरी बस से अपने शहर को रवाना हो जाएगी.

बसस्टैंड पर पता करने पर एक दुकानदार ने एक बालक को ही साथ भेज दिया, जो उसे सारंगी के घर तक पहुंचा गया था. और यहां पहुंच कर उसे अलग ही नजारा देखने को मिला.

‘कौन है वह, जिस से सारंगी का वैधव्य देखा नहीं गया. कोई सच्चा हितैषी है या स्वार्थी?’ सनसनाता सा सवाल, सौम्या के मन में कौंध रहा था.

‘‘सब जान रहे हैं कि कल्लू कबाड़ी की मौत रेल दुर्घटना में हुई है लेकिन मैं स्वीकार करती हूं कि उन्होंने आत्महत्या की है. सुइसाइड नोट न लिखने के पीछे उन की जो भी मंशा रही हो, मैं नहीं जानती,’’ सारंगी की सपाट बयानी से अचंभित सौम्या को लगा कि उस की जिंदगी में बहुत उथलपुथलभरी है और वह बहुतकुछ कहना चाहती है.

सौम्या अपने आश्चर्य और उत्सुकता को छिपा न सकी. उस ने पूछ ही लिया, ‘‘ऐसा क्या?’’

‘‘हां सौम्या, ऐसा ही. तुम से मैं कुछ नहीं छिपाऊंगी. वे तो इस दुनिया में हैं नहीं और उन की बुराई भी मैं करना नहीं चाहती, लेकिन अगर सचाई तुम को न बताऊं तो तुम भी मुझे गलत समझोगी. विनय से मेरे विवाहेतर संबंध थे, यह मेरे पति जानते थे.’’

‘‘विनय कौन है?’’ सौम्या अपने को रोक न सकी.

‘‘विनय, उन के दोस्त थे और बिजनैसपार्टनर भी. जब उन्हें पैरालिसिस का अटैक हुआ तो विनय ने बहुत मदद की, डाक्टर के यहां ले जाना, दवादारू का इंतजाम करना, सब तरह से. विनय उन के बिजनैस को संभाले रहे. और मुझे भी. जब पति बीमार हुए थे, उस समय और उस के पहले से भी.’’

सौम्या टकटकी लगाए उस की बातें सुन रही थी.

‘‘जब सौरभ के पापा की शराबखोरी बढ़ने लगी तो वे धंधे पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते थे और स्वास्थ्य भी डगमगाने लगा. मैं ने उन्हें आगाह किया लेकिन कोई असर नहीं हुआ. एक दिन टोकने पर गालीगलौज करते हुए मारपीट पर उतारू हो गए तो मैं ने गुस्से में कह दिया कि अगर अपने को नहीं सुधार सकते तो मैं घर छोड़ कर चली जाऊंगी.’’

‘‘फिर भी कोई असर नहीं?’’ सौम्या ने सवाल कर दिया.

‘‘असर हुआ. असर यह हुआ कि वे डर गए कि सचमुच मैं कहीं उन्हें छोड़ कर न चली जाऊं. वे अपनी शारीरिक कमजोरी भी जानते थे. उन्होंने विनय को घर बुलाना शुरू कर दिया और हम दोनों को एकांत देने लगे. फिसलन भरी राह हो तो फिसलने का पूरा मौका रहता है. मैं फिसल गई. कुछ अनजाने में, कुछ जानबूझ कर. और फिसलती चली गई.’’

‘‘विनय को एतराज नहीं था?’’

‘‘उन की निगाहों में शुरू से ही मेरे लिए चाहत थी.’’

‘‘कितनी उम्र है विनय की?’’

‘‘उन से 2 साल छोटे हैं, परंतु देखने में उम्र का पता नहीं चलता.’’

‘‘और उन के बालबच्चे?’’

‘‘विधुर हैं. उन का एक बेटा है, शादीशुदा है और बाहर नौकरी करता है.’’

सौम्या ने ‘‘हूं’’ करते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे पति ने आत्महत्या क्यों की?’’

‘‘यह तो वे ही जानें. जहां तक मैं समझती हूं, उन में सहनशक्ति खत्म सी हो गई थी. पैरालिसिस के अटैक के बाद वे कुछ ठीक हुए और धीमेधीमे चलनेफिरने लगे थे. अपने काम पर भी जाने लगे लेकिन परेशान से रहने लगे थे. मुझे कुछ बताते नहीं थे. उन्हें डर सताने लगा था कि विनय ने बीवी पर तो कब्जा कर लिया है, कहीं बिजनैस भी पूरी तरह से न हथिया ले. एक बार विनय से उन की इसी बात पर कहासुनी भी हुई.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या, मुझे विनय ने बताया तो मैं ने उन से पूछा. अब मैं तुम्हें क्या बताऊं, सौम्या. कूवत कम, गुस्सा ज्यादा वाली बात. वे हत्थे से उखड़ गए और लगे मुझ पर लांछन लगाने कि मैं दुश्चरित्र हूं, कुल्टा हूं. मुझे भी गुस्सा आ गया. मैं ने भी कह दिया कि तुम्हारे में ताकत नहीं है कि तुम औरत को रख सको. अपने पौरुष पर की गई

चोट शायद वे सह न सके. बस, लज्जित हो कर घर से निकल गए. दोपहर में पता चला कि रेललाइन पर कटे हुए पड़े हैं.’’

बात खत्म करतेकरते सारंगी रो पड़ी. सौम्या ने उसे रोने दिया.

थोड़ी देर बाद पूछा, ‘‘और तुम ने शादी कब की?’’

‘‘विनय से मेरा दुख देखा नहीं जाता था, इसलिए एक दिन मेरी मांग…’’ इतना कह कर सारंगी चुप हो गई और मेहंदी लगी अपनी हथेलियों को फैला कर देखने लगी.

‘‘तुम्हारी मरजी से?’’

‘‘हां, सौम्या, मुझे और मेरे बच्चों को सहारे की जरूरत थी. मैं ने मौका नहीं जाने दिया. अब कोई भला कहे या बुरा. असल में वे बच्चे तीनों विनय के ही हैं.’’

कुछ क्षण को सौम्या चुप रह गई और सोचविचार करती सी लगी. ‘‘तुम ने जल्दबाजी की, मैं तुम्हें उतावली ही कहूंगी. अगर थोड़े समय के लिए धैर्य रखतीं तो शायद, कोई कुछ न कह पाता. जो बात इतने साल छिपा कर रखी थी, साल 2 साल और छिपा लेतीं,’’ कहते हुए सौम्या ने अपनी बायीं कलाई घुमाते हुए घड़ी देखी और उठ जाने को तत्पर हो गई. सारंगी से और कुछ कहने का कोई फायदा न था. Hindi Stories

Suspense Story: प्यार की खातिर दोस्त को दगा

Suspense Story: सुबह के साढ़े 6 बजे थे. बिहार के मुंगेर शहर में रहने वाला प्रेमनारायण सिंह ड्यूटी पर जाने के लिए घर से बाहर निकलने लगा तो पास में खड़ी पत्नी शिवानी की तरफ देख कर मुसकराया. पत्नी भी पति की तरफ देख कर मंदमंद मुसकराई. उधर प्रेमनारायण सिंह की बाइक घर से मुश्किल से डेढ़ सौ मीटर आगे ब्रह्मï चौक पहुंची थी कि अचानक किसी ने पीछे से उस पर लगातार 2 फायर कर दिए. गोली लगते ही वह सडक़ पर गिर कर बुरी तरह तड़पनेे लगा.

सुबह की फिजा में गोली चलने की आवाज दूरदूर तक गूंज उठी. गोली की आवाज सुन आसपास के घरों से कुछ लोग निकल कर लहूलुहान प्रेमनारायण सिंह के समीप पहुंचे. किसी ने उस के घर जा कर प्रेमनारायण को गोली लगने की बात कही तो प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी और अन्य लोग रोतेबिलखते घायल प्रेमनारायण सिंह के पास पहुंचे और उसे तुरंत एक निजी क्लिनिक ले गए, लेकिन वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

शिवानी ने फोन कर के मुंगेर के पूरब सराय पुलिस चौकी में अपने पति की हत्या की सूचना दी तो चौकी इंचार्ज राजीव कुमार कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर क्लिनिक पहुंच गए और प्रेमनारायण सिंह की लाश अपने कब्जे ले कर घटना की सूचना एसएचओ को दे दी. हत्या की खबरसुन कर एसएचओ भी क्लिनिक पहुंच गए. लाश का प्रारंभिक निरीक्षण करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद पुलिस वारदात वाली जगह ब्रह्मï चौक के निकट पहुंची और वहां का बारीकी से मुआयना करने लगी. सडक़ पर जहां प्रेमनारायण गोली लगने के बाद गिरा था, वहां पर काफी खून था. उस की बाइक भी वहीं पड़ी थी. वहां उपस्थित लोगों से पूछताछ करने पर बस इतना पता चला कि कोई बाइक सवार प्रेमनारायण को गोली मार कर फरार हो गया था.

सीसीटीवी फुटेज से मिला सुराग

कई लोगों से पूछताछ के बाद भी कोई भी बाइक का नंबर या उसेे चलाने वाले बदमाशों का हुलिया नहीं बता पाया. चौकी इंचार्ज राजीव कुमार ने प्रेमनारायण सिंह की पत्नी शिवानी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति की इलाके में किसी से दुश्मनी नहीं है. घर वालों से घटना के बारे में पूछताछ करने के बाद पुलिस वापस लौट आई. शिवानी की शिकायत पर प्रेमनारायण सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात अपराधियों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

एसएचओ ने इस घटना के बारे में मुंगेर के एसपी जगुनाथ रेड्डी जला रेड्डी को विस्तार से जानकारी दी तो उन्होंने इस सनसनीखेज हत्याकांड के रहस्य से परदा हटाने के लिए एक एसआईटी का गठन किया. इस टीम में एसडीपीओ (सदर) राजीव कुमार, ओपी प्रभारी राजीव कुमार, कासिम बाजार एसएचओ मिंटू कुमार, जमालपुर एसएचओ सर्वजीत कुमार, पूरब सराय चौकी इंचार्ज राजीव कुमार तथा अन्य कई सिपाही शामिल थे.

टीम ने इस मर्डर केस को सुलझाने के लिए घटनास्थल और उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर बारीकी से उस की जांच शुरू की तो उन्होंने फुटेज में 2 बाइक सवारों के अलावा कुछ संदिग्ध चेहरों की पहचान की. इस के अलावा मृतक प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी के मोबाइल की काल डिटेल्स की जांच में एक संदिग्ध नंबर मिला, जिस पर घटना के पहले और उस के बाद शिवानी धड़ल्ले से बातें कर रही थी. जब उस नंबर की काल डिटेल्स निकाली गई तो वह नंबर गौरव कुमार नाम के युवक का निकला.

हत्या के पीछे निकली लव क्राइम की कहानी

जब गौरव कुमार को थाने में बुला कर उस के और शिवानी के बीच मोबाइल पर चल रही लंबी बातचीत के बारे में पूछताछ की गई तो गौरव ने बताया कि वह प्रेमनारायण का दोस्त है, इसलिए उस का उन के घर आनाजाना है. इसी वजह से वह शिवानी से बातें करता है. लेकिन हैरत की बात थी कि जितनी वह शिवानी से बातें करता था, उतनी बातें शिवानी अपने पति से भी नहीं करती थी.

मामला संदेहास्पद लगा, इसलिए जब गौरव को थाने में बुला कर पूछताछ की गई तो थोड़ी देर के बाद उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में अपना जुर्म स्वीकार करते हुए पुलिस टीम को जो बातें बताईं, उस में पति पत्नी और वो के रिश्तों में उलझी लव क्राइम की एक दिलचस्प कहानी निकल कर सामने आई. उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में शामिल सभी लोगों के नामपते बताए, जिस में प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी तथा शूटर अभिषेक कुमार, इंद्रजीत कुमार, मोहम्मद इरशाद, राजीव, दीपक कुमार उर्फ दीपू थे. गौरव कुमार को हिरासत में लेने के बाद पुलिस टीम मृतक प्रेमनारायण के घर पहुंची और पति की मौत का नाटक कर रही शिवानी को हिरासत में ले लिया गया.

10 और 11 अगस्त को 2 आरोपी और 12 अगस्त को 3 आरोपियों को उन के ठिकानों पर दबिश डाल कर गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद इस हत्याकांड के पीछे जो खौफनाक कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है. 32 वर्षीय प्रेमनारायण सिंह मुंगेर के वार्ड नंबर 14 में अपनी पत्नी शिवानी और 4 साल की बेटी के साथ रहता था. करीब 5 साल पहले दोनों की शादी हुई थी. प्रेमनारायण मुंगेर में ही स्थित आईटीसी कंपनी में नौकरी करता था.

नौकरीपेशा होने की वजह से प्रेमनारायण सिंह के जीवन में हर प्रकार का सुखवैभव मौजूद था, लेकिन इस घर में उन के बड़े भाई का परिवार भी रहता था. शिवानी को जौइंट फैमिली में रहना पसंद नहीं था. इस के अलावा शिवानी की सास भी रहती थी. शिवानी के ससुर की कुछ साल पहले मृत्यु हो चुकी थी. परिवार के अन्य सदस्यों के साथ होने से शिवानी घर में अपनी मनमरजी से नहीं रह पाती थी. जबकि वह बिना किसी रोकटोक के आजाद रहना पसंद करती थी. ऐसा तभी संभव था, जब वह बाकी लोगों से अलग हो कर कहीं दूसरा घर खरीद लेते या किराए के मकान में रहने चले जाते.

प्रेमनारायण इस घर को छोड़ कर कहीं भी जाना नहीं चाहता था. यहां से जाने पर एक तो उसे घर के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते, दूसरे उसे अपनी मां और भाईभाभी से अलग होना पड़ जाता, जोकि वह चाहता नहीं था. रोजरोज की इस घरेलू कलह से बचने के लिए प्रेमनारायण ने अपने एक दोस्त गौरव कुमार की मदद ली.

दोस्ती की आड़ में प्रेम संबंध का खेल

गौरव कुमार मुंगेर के नजदीक नंदलालपुर का रहने वाला था और उसी के साथ सिगरेट फैक्ट्री में काम करता था. दोनों के बीच खूब जमती थी. वे रोज अपने घरों का हाल अकसर एकदूसरे को बताते रहते थे. कहते हैं कि अपनी परेशानी बांटने से मन का बोझ कुछ हल्का हो जाता है. इसी कारण प्रेमनारायण अपनी परेशानी गौरव के साथ शेयर कर लेता था. प्रेमनारायण के घर का हाल जानने के बाद गौरव भी उस के घर की समस्या हल करने में मदद करने की कोशिश करता.

2023 के जनवरी महीने में गौरव ने प्रेमनारायण के घर आनाजाना शुरू कर दिया. उस ने अपने दोस्त का पक्ष ले कर शिवानी को मनाने का प्रयास करना शुरू किया, लेकिन कुछ ही मुलाकातों के बाद शिवानी की बातों का गौरव के दिलोदिमाग पर कुछ ऐसा जादू हुआ कि वह जिस दिन शिवानी से नहीं मिलता, उस के दिल को सुकून नहीं मिलता था. शिवानी जानती थी कि गौरव कुंआरा है. वह गौरव को पसंद करने लगी. गौरव को जब भी वक्त मिलता, वह शिवानी को समझाने के बहाने उस से मिलने आ जाता. कुछ ही दिनों में उन के बीच जिस्मानी ताल्लुकात हो गए. उधर गौरव और शिवानी दोनों ने प्रेमनारायण को सदा अंधरे में रखा.

गौरव और शिवानी बड़ी खामोशी से प्यार की पींगें बढ़ाते रहे. प्रेमनाराण को कभी गौरव और शिवानी के अवैध संबंधों की भनक तक नहीं लगी. जब उन के अंतरंग संबंध प्रगाढ़ हो गए तो उन्होंने प्रेमनारायण को अपने रास्ते से सदा के लिए हटाने का फैसला कर लिया. गौरव ने शिवानी को समझाया कि प्रेमनारायण की हत्या के बाद उस की जगह पर तुम्हारी नौकरी लग जाएगी.

कुछ समय के बाद जब मामला ठंडा पड़ जाएगा, तब हम दोनों आपस में शादी कर लेंगे. इस बीच हम दुनिया वालों की आखों में धूल झोंक कर मिलते रहेंगे. शिवानी इस बात के लिए तैयार हो गई. तब गौरव कुमार अपने कुछ जानकारों की मदद से कुछ शातिर बदमाशों से मिला, जो सुपारी ले कर हत्या की वारदात को अंजाम देते थे. बदमाशों से प्रेमनारायण की हत्या की बात 7 लाख रुपए में तय हो गई. शिवानी ने बदमाशों को देने के लिए 7 लाख रुपए गौरव को सौंप दिए.

सुपारी दे कर शूटरों से कराई हत्या

4 अगस्त, 2023 को बेगूसराय का शूटर अभिषेक कुमार और समस्तीपुर का शूटर इंद्रजीत तथा मोहम्मद इरशाद मुंगेर स्थित गौरव कुमार के ठिकाने पर पहुंचे. गौरव कुमार मुंगेर के मंगल बाजार स्थित माधोपुर में किराए का कमरा ले कर रहता था. मुस्सफिल थाना क्षेत्र के नंदलालपुर से 2 बदमाश राजीव कुमार तथा दीपक कुमार उर्फ दीपू भी वहां पहुंचे. इन दोनों ने 5 अगस्त को प्रेमनारायण के घर के बाहर मौजूद रह कर उस की रेकी की. 6 अगस्त, 2023 की सुबह प्रेमनारायण सिंह जैसे ही अपनी बाइक से ड्यूटी जाने के लिए घर से निकला. पीछे से अभिषेक कुमार भी बाइक चलाते हुए उस के निकट पहुंचा और पीछे बैठे इंद्रजीत ने प्रेमनारायण की गोली मार कर हत्या कर दी.

घटना को अंजाम देने के बाद अभिषेक कुमार और शूटर इंद्रजीत मुख्य आरोपी गौरव कुमार के मंगल बाजार स्थित कमरे पर पहुंचे. वहां अपने हथियारों को छोड़ कर सभी मुंगेर से फरार हो गए. पुलिस एसआईटी की टीम ने गौरव के कमरे से 2 देशी पिस्तौल, 4 जिंदा कारतूस और 2 चले हुए कारतूस के खोखे बरामद कर लिए. कथा लिखे जाने तक मुंगेर पुलिस ने इस घटना में शामिल आरोपी गौरव समेत कुल 7 बदमाशों को गिरफ्तार कर मुंगेर की जिला अदालत में पेश कर दिया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित