Crime News Hindi: रिश्तों का कत्ल – बेटा बना हत्यारा

Crime News Hindi: आजकल के बच्चे यह नहीं समझते कि पिता केवल बच्चों का जन्मदाता ही नहीं होता, बल्कि उन का पालनहार होता है. ऐसे में अगर बेटा पिता का बेरहमी से कत्ल करने के साथ ही साथ उस के गुप्तांगों को भी कुचल दे तो बेरहमी की सीमा का पता लगता है. यह एक बाप का नहीं, बापबेटे के रिश्ते और भरोेसे का भी कत्ल होता है. ऐसी घटनाएं आजकल तेजी से बढ़ने लगी हैं. लखनऊ जिले के निगोहां  थाना क्षेत्र के रंजीत खेड़ा गांव में ऐसी ही घटना ने दिल को झकझोर कर रख दिया है.

‘‘यह खेती और जमीन मेरी है. इस का मैं मालिक हूं. मैं जिसे चाहूंगा, उसे दूंगा. तुम्हारे कहने से मैं इस को तुम्हें हरगिज नहीं दूंगा.’’ 70 साल के महादेव ने अपने बेटे जगदेव के साथ रोजरोज की लड़ाई से तंग आ कर यह इसलिए कहा कि ऐसी धमकी से बेटे जगदेव के मन में डर बैठेगा. वह पिता की बात मानेगा.

‘‘हमें पता है, तुम ने जमीन बेचने का बयाना ले लिया है. लेकिन इतना सुन लो कि उस में से मेरा हिस्सा मुझे भी चाहिए.’’ महादेव के बडे़ बेटे जगदेव ने पिता को अपना फैसला सुनाते हुए कहा.

बयाना वह पैसा होता है, जो जमीन बेचने के लिए अग्रिम धनराशि होती है. इस के बाद जब जमीन खरीदने वाला पूरा पैसा चुका देता है तो जमीन की लिखतपढ़त की जाती है. जगदेव को यह लग रहा था कि जब बयाने में ही उस का हिस्सा नहीं मिलेगा तो जमीन बिकने पर मिलने वाली रकम में भी उसे हिस्सा नहीं मिलेगा. ऐसे में वह बयाने की रकम से ही हिस्सा लेने की जिद करने लगा. जबकि महादेव जगदेव को हिस्सा नहीं देना चाहता था. जगदेव का अपने पिता के साथ मतभेद रहता था. उसे बारबार यह लगता था कि उस के पिता उस के बजाए छोटे भाईबहनों को अधिक चाहते हैं.

इस के अलावा उसे इस बात की नाराजगी रहती थी कि उस के पिता के संबंध उन्नाव में रहने वाली गायत्री नाम की महिला के साथ थे. जबकि गायत्री और महादेव के ऐेसे कोई संबंध नहीं थे. हमउम्र होेने के कारण दोनों एकदूसरे के साथ खुल कर बातें कर लेते थे. एकदूसरे का सुखदुख बांट लेते थे. बेटा जगदेव यह नहीं समझ पा रहा था कि 70 साल की उम्र में उस के पिता से क्या संबंध हो सकते हैं. उसे इस उम्र में भी पिता का किसी औरत से बात करना खराब ही लगता था. उसे सब चरित्रहीन ही दिखते थे. महादेव सारे पैसे अपने पास रखना चाहते थे. कारण यह था कि उन्हें लगता था कि अगर उन के पास पैसे नहीं होंगे तो कोई भी बुढ़ापे में सहारा नहीं देगा.

वैसे महादेव ने अपनी जमीन का ज्यादातर हिस्सा अपने बेटों को दे दिया था. कुछ जमीन ही उस ने अपने पास रखी थी. इस के अलावा थोड़ी सी जमीन वह बेचने की सोच रहा था. इसी जमीन के टुकड़े के बिकने पर मिले पैसों के कारण विवाद बढ़ गया था. गांव में रहने वाले बूढे़ लोगों के पास जमीन का ही सहारा होता है. आमतौर पर बूढ़े होते मांबाप की जमीन पर बेटों का कब्जा हो जाता है और बूढे़ बिना किसी आश्रय के जीवन गुजारने को मजबूर हो जाते हैं. जब तक मातापिता जीवित रहते हैं तब तक तो थोड़ाबहुत काम चल भी जाता है, पर दोनों में से कोई एक बचता है तो उस का जीवन कठिन हो जाता है.

घर में बेटे के साथ रोजरोज के झगड़े से तंग आ कर महादेव ने सोचा कि अब वह अपने ही बनाए घर में नहीं रहेगा. महादेव ने अपने खेत में एक कमरा बना रखा था, जहां ट्यूबवैल था. बेटे से रोज के झगडे़ को खत्म करने के लिए वह खेत में बने कमरे में रहने लगा. यह गांव से बाहर सुनसान जगह पर था. उसे यहां मच्छर और जंगली जानवरों का डर रहता था. पर घर में बेटे की गाली और मार खाने से यहां जंगल में अकेले रहने में उसे सुकून महसूस होता था. महादेव का दूसरा बेटा गया प्रसाद गांव में कम ही रहता था. वह मजदूरी करने शहर ही जाता था. ऐसे में उस का घर के मामलों में दखल कम रहता था.

महादेव की दोनों बेटियां श्वेता और बिटाना अपने मांबाप के करीब रहती थीं. उन की भी भाइयों से कम ही बनती थी. ऐसे में परिवार में आपस में कोई सामंजस्य नहीं था. महादेव लखनऊ जिले के निगोहां थानाक्षेत्र के रंजीत खेड़ा गांव में रहता था. उस की उम्र 70 साल के करीब थी. महादेव के 2 बेटे जगदेव  प्रसाद और गया प्रसाद और 2 बेटियां श्वेता और बिटाना थीं. सभी बच्चों की शादी हो चुकी थी. महादेव का उन्नाव आनाजाना था. वहां रहने वाली गायत्री (बदला हुआ नाम) से उस के नजदीकी रिश्ते थे. यह बात बेटे जगदेव को नागवार लगती थी. वह इस बात को ले कर अकसर अपने पिता को ताना मारता रहता था.

इस बात से नाखुश पिता महादेव घर की जगह खेत पर बने कमरे में पत्नी शांति देवी के साथ रहता था. 26 अगस्त, 2021 की रात शांति देवी और महादेव अगलबगल सो रहे थे. शांति देवी को ठीक से नींद नहीं आती थी तो डाक्टर की सलाह पर वह नींद की गोली खा कर सोती थी. ऐसे में उसे अपने आसपास का पता नहीं होता था.27 अगस्त की सुबह जब वह उठी तो देखा कि उस के बगल में सो रहे महादेव की किसी ने हत्या कर दी है. खून से लथपथ पति का शव देख कर शांति देवी चीख पड़ी. उस के चिल्लाने की आवाज सुन कर गांव के लोग वहां पहुंच गए.

घटना की सूचना गांव के लोगों ने निगोहां थाने की पुलिस को दी. पुलिस ने महादेव के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के बाद महादेव के बेटे जगदेव की लिखित तहरीर पर भादंवि की धारा 302 के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. मामले की सूचना मिलने के बाद एसपी (ग्रामीण) हृदेश कुमार और सीओ निगोहां नईमुल हसन ने हत्या की गुत्थी को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी जितेंद्र प्रताप सिंह व एसआई राम समुझ यादव के साथ एक पुलिस टीम का गठन किया.

थानाप्रभारी जितेंद्र प्रताप सिंह हत्या के कुछ दिन पहले ही निगोहां थाने में नई पोस्टिंग पर आए थे. ऐसे में आते ही हत्या की गुत्थी सुलझाने का दायित्व संभालना पड़ा. महादेव की दोनों बेटियों श्वेता और बिटाना का शक भाई के साथ रहने वाली महिला पर था. क्योंकि पिता को बिना शादी के उस का साथ रहना पसंद नहीं था. पुलिस की टीम ने जब गांव के लोगों और महादेव के घर वालों से अलगअलग बातचीत की तो मामले का हैरतअंगेज खुलासा हुआ. घरपरिवार की शंका से अलग आरोपी सामने आया. पुलिस ने जब गहरी छानबीन की तो पता चला कि महादेव की हत्या उस के बेटे जगदेव ने की है.

पुलिस की पूछताछ में जगदेव ने बताया कि जब पिता ने उसे जमीन में हिस्सा देने से मना किया और जमीन बेचने के लिए जो बयाना लिया था, उस में भी हिस्सा नहीं दिया था. उसे लगता था कि ऐसा वह किसी के बहकावे में आ कर कर रहे थे. जिस से वह तनाव में रहने लगा. 32 साल के जगदेव ने सोचा कि क्यों न वह अपने पिता का कत्ल कर दे, जिस से रोजरोज का झंझट ही खत्म हो जाए. जगदेव यह जानता था कि उस की मां नींद की दवा खा कर सो जाती है. उसे अपने आसपास का कुछ पता नहीं रहता था.

26 अगस्त, 2021 की रात करीब ढाई बजे जगदेव अपने पिता के कमरे तक पहुंच गया. वहां मां सो रही थी. पास में ही अलग चारपाई पर पिता महादेव भी सो रहे थे. जगदेव ने सब से पहले पिता के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया, जिस से वह आवाज न कर सकें. इस के बाद पत्थर से प्रहार कर के सिर को फोड़ दिया. पिता जीवित न रह जाएं, इस कारण उस ने पिता के निजी अंगों पर भी प्रहार कर के उन की हत्या कर दी. इस के बाद वह चुपचाप वहां से भाग गया. सुबह जब उस की मां ने शोर मचाया और गांव के लोग जमा हो गए तो जगदेव भी वहां पंहुचा और उस ने पुलिस को अपने पिता की हत्या की तहरीर दी. उस समय किसी को भी यह शंका नहीं थी कि उस ने ही पिता के साथ ऐसा किया होगा. जगदेव को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने उसे जेल भेज दिया.

Property Dispute: परिवार के 5 जनों को डसने वाला आस्तीन का सांप

Property Dispute: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मुरादनगर से सटा गांव है बसंतपुर सैंथली. यहां भी तेजी से शहरीकरण के चलते जमीनों के दाम आसमान छूने लगे हैं. बिल्डर आते हैं, किसानों को लुभाते हैं और उस भाव में खेतीकिसानी की जमीनों के सौदे करते हैं, जिस की उम्मीद किसानों ने कभी सपने में भी नहीं की होती.

एक बीघा के 50 लाख से ले कर एक करोड़ रुपए सुन कर किसानों का मुंह खुला का खुला रह जाता है कि इतना तो वे सौ साल खेती कर के भी नहीं कमा पाएंगे. और वैसे भी आजकल खेतीकिसानी खासतौर से छोटी जोत के किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित होने लगी है. लिहाजा वे एकमुश्त मिलने वाले मुंहमांगे दाम का लालच छोड़ नहीं पाते और जमीन बेच कर पास के किसी कसबे में बस जाते हैं. इसी गांव का एक ऐसा ही किसान है 48 वर्षीय लीलू त्यागी, जिस के हिस्से में पुश्तैनी 15 बीघा जमीन में से 5 बीघा जमीन आई थी. बाकी 10 बीघा 2 बड़े भाइयों सुधीर त्यागी और ब्रजेश त्यागी के हिस्से में चली गई थी.

जमीन बंटबारे के बाद तीनों भाई अपनीअपनी घरगृहस्थी देखने लगे और जैसे भी हो खींचतान कर अपने घर चलाते बच्चों की परवरिश करने लगे. बंटवारे के समय लीलू की शादी नहीं हुई थी, लिहाजा उस पर घरगृहस्थी के खर्चों का भार कम था. गांव के संयुक्त परिवारों में जैसा कि आमतौर पर होता है, दुनियादारी और रिश्तेदारी निभाने की जिम्मेदारी बड़ों पर होती है, इसलिए भी लीलू बेफिक्र रहता था और मनमरजी से जिंदगी जीता था. साल 2001 का वह दिन त्यागी परिवार पर कहर बन कर टूटा, जब सुधीर अचानक लापता हो गए. उन्हें बहुत ढूंढा गया पर पता नहीं चला कि उन्हें जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

कुछ दिनों की खोजबीन के बाद त्यागी परिवार ने तय किया कि सुधीर की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी जाए. लेकिन इस पर लीलू बड़ेबूढ़ों के से अंदाज में बोला, ‘‘इस से क्या होगा. उलटे हम एक नई झंझट में और फंस जाएंगे. पुलिस तरहतरह के सवाल कर हमें परेशान करेगी. हजार तरह की बातें समाज और रिश्तेदारी में होंगी. उस से तो अच्छा है कि उन का इंतजार किया जाए. हालांकि वह किसी बात को ले कर गुस्से में थे और मुझ से यह कह कर गए थे कि अब कभी नहीं आऊंगा.’’

परिवार वालों को लीलू की सलाह में दम लगा. वैसे भी अगर सुधीर के साथ कोई अनहोनी या हादसा हुआ होता तो उन की लाश या खबर मिल जानी चाहिए थी और वाकई पुलिस क्या  कर लेती. वह कोई दूध पीते बच्चे तो थे नहीं, जो घर का रास्ता भूल जाएं.  यह सोच कर सभी ने मामला भगवान भरोसे छोड़ दिया.  उन्हें चिंता थी तो बस उन की पत्नी अनीता और 2 नन्हीं बेटियों पायल और पारुल की, जिन के सामने पहाड़ सी जिंदगी पड़ी थी.

यह परेशानी भी वक्त रहते दूर हो गई, जब गांव में यह चर्चा शुरू हुई कि अब सुधीर के आने की तो कोई उम्मीद रही नहीं, अनीता कब तक उस की राह ताकती रहेगी. इसलिए अगर लीलू उस से शादी कर ले तो उन्हें सहारा और बेटियों को पिता मिल जाएगा. घर की खेती भी घर में रहेगी. गांव और रिश्ते के बड़ेबूढ़ों का सोचना ऐसे मामले में बहुत व्यावहारिक यह रहता है कि जवान औरत कब तक बिना मर्द के रहेगी. आज नहीं तो कल उस का बहकना तय है, इसलिए बेहतर है कि अगर देवरभाभी दोनों राजी हों तो उन की शादी कर दी जाए.

बात निकली तो जल्द उस पर अमल भी हो गया. एक सादे समारोह में लीलू और अनीता की शादी हो गई जो कोई नई बात भी नहीं थी. क्योंकि गांवों में ऐसी शादियां होना आम बात है, जहां देवर ने विधवा भाभी से शादी की हो. इतिहास भी ऐसी शादियों से भरा पड़ा है. देखते ही देखते अपने देवर की पत्नी बन अनीता विधवा से फिर सुहागन हो गई और वाकई में पारुल और पायल को चाचा के रूप में पिता मिल गया. इस के बाद तो बड़े भाई सुधीर की जमीन भी लीलू की हो गई. जल्द ही लीलू और अनीता के यहां बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम विभोर रखा गया. घर में सब उसे प्यार से शैंकी कहते थे.

कभीकभार जरूर गांव के कुछ लोगों में यह चर्चा हो जाती थी कि चलो जो हुआ सो अच्छा हुआ, लेकिन कभी सुधीर अगर वापस आ गया तो क्या होगा. मुमकिन है जी उचट जाने से वह साधुसंन्यासियों की टोली में शामिल हो गया हो और वहां से भी जी उचटने के कारण कभी घर आ जाए. फिर अनीता किस की पत्नी कहलाएगी? सवाल दिलचस्प था, जिस का मुकम्मल जबाब किसी के पास नहीं था. पर एक शख्स था जो बेहतर जानता था कि सुधीर अब कभी वापस नहीं आएगा. वह शख्स था लीलू.

इसी तरह 5 साल गुजर गए. अब सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही साल 2006 में पारुल की मृत्यु हो गई. घर और गांव वाले कुछ सोचसमझ पाते, इस के पहले ही लीलू ने कहा कि उसे किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था और आननफानन में उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया. गांवों में ऐसे यानी सांप वगैरह के काटे जाने के हादसे भी आम होते हैं, इसलिए कोई यह नहीं सोच पाया कि यह कोई सामान्य मौत नहीं, बल्कि सोचसमझ कर की गई हत्या है. और आगे भी त्यागी परिवार में ऐसी हत्याएं होती रहेंगी, जो सामान्य या हादसे में हुई मौत लगेंगी और हैरानी की बात यह भी रहेगी किसी भी मामले में न तो लाश मिलेगी और न ही किसी थाने में रिपोर्ट दर्ज होगी.

इस के 3 साल बाद ही पायल भी रहस्यमय ढंग से गायब हो गई तो मानने वाले इसे होनी मानते रहे. लेकिन अनीता अपनी दोनों बेटियों की मौत का सदमा झेल नहीं पाई और बीमार रहने लगी, जिस का इलाज भी लीलू ने कराया. अब सुधीर की जमीन का कोई वारिस नहीं बचा था, सिवाय अनीता के, जो अब हर तरह से लीलू और बड़े होते शैंकी की मोहताज रहने लगी थी. लीलू की तो जान ही अपने बेटे में बसती थी और वह उसे चाहता भी बहुत था. लेकिन यह नहीं देख पा रहा था कि उस के लाड़प्यार के चलते शैंकी गलत राह पर निकल पड़ा है.

और देख भी कैसे पाता क्योंकि वह खुद ही एक ऐसे रास्ते पर चल रहा था, जिसे कलयुग का महाभारत कहा जा सकता है और वह उस का धृतराष्ट्र है, जो पुत्र मोह में अंधा हो गया था. इसी अंधेपन का नतीजा था कि बीती 9 जुलाई को लीलू गाजियाबाद के सिहानी गेट थाने में पुलिस वालों के सामने खड़ा गिड़गिड़ा रहा था कि शैंकी मेरा इकलौता बेटा है, आप जितने चाहो पैसे ले लो लेकिन उसे छोड़ दो. बेटा छूट जाए, इस के लिए वह 10 लाख रुपए देने को तैयार था. लेकिन जुर्म की दुनिया में दाखिल हो चुके बिगड़ैल शैंकी ने जुर्म भी मामूली नहीं किया था, लिहाजा उस का यूं छूटना तो नामुमकिन बात थी.

दरअसल, शैंकी ने केन्या की एक लड़की, जिस का नाम रोजमेरी वाजनीरू है, से 7 जुलाई को 12 हजार रुपए नकद और एक मोबाइल फोन लूटा था. रोजमेरी से उस का संपर्क सोशल मीडिया के जरिए हुआ था. जब वह दिल्ली आई तो शैंकी बहाने से उसे अपनी कार में बैठा कर गाजियाबाद ले गया और हथियार दिखा कर लूट की इस वारदात को अंजाम दिया. दूसरे दिन सुबह रोजमेरी ने सिहानी गेट थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई तो शैंकी पकड़ा गया. वारदात में उस का साथ देने वाला शुभम भी गिरफ्तार किया गया था. वह भी मुरादनगर का रहने वाला है.

दोनों से वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार, 11 हजार रुपए नकद और वह कार भी बरामद की गई थी, जिस में बैठा कर रोजमेरी से लूट की गई थी. कुछ दिनों बाद दोनों को अदालत से जमानत मिल गई थी. लेकिन अब खुद जेल में बंद लीलू को जमानत मिल पाएगी, इस में शक है. क्योंकि उस के गुनाहों के आगे तो बेटे का गुनाह कुछ भी नहीं. बीती 24 सितंबर को लीलू को गाजियाबाद पुलिस ने अपने भतीजे रेशू की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया तो सख्ती से पूछताछ में उस ने खुलासा किया कि उस ने कोई एकदो नहीं बल्कि 20 साल में एकएक कर 5 हत्याएं की हैं. और ये पांचों ही उस के अपने सगे हैं.

यह सुन कर पुलिस वालों के मुंह तो खुले के खुले रह गए, साथ ही जिस ने भी सुना उस के भी होश उड़ गए कि कैसा कलयुग आ गया है, जिस में जमीन के लालच में एक सगे भाई ने दूसरे सगे बड़े भाई और 2 भतीजियों जो अनीता से शादी के बाद उस की बेटियां हो गई थीं, सहित 2 सगे भतीजों को भी इतनी साजिशाना और शातिराना तरीके से मारा कि किसी को उस पर शक भी नहीं हुआ. रेशू की हत्या के आरोप में वह कैसे पकड़ा गया, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस के पहले की 4 हत्याएं उस ने कैसे की थीं. इन में से 2 का जिक्र ऊपर किया जा चुका है.

अपने बड़े भाई सुधीर की हत्या लीलू ने एक लाख की सुपारी दे कर मेरठ में करवाई थी और लाश को नदी में बहा दिया था. इसलिए अनीता से शादी करने के बाद वह बेफिक्र था कि सुधीर आएगा कहां से, उसे तो मौत की नींद में वह सुला चुका है. यह कातिल कितना खुराफाती है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 20 साल पहले ही अपने गुनाहों की स्क्रिप्ट लिख चुका था और हरेक कत्ल के बाद किसी को शक न होने पर उस के हौसले बढ़ते जा रहे थे.

जब शैंकी पैदा हुआ तो उसे लगा कि सुधीर की जमीन उस की बेटियों के नाम हो जाएगी, लिहाजा पहले उस ने पारुल को खाने में जहर दे कर मारा और फिर पायल की भी हत्या कर उस की लाश को नदी में बहा दिया. इस दौरान जमीनजायदाद का धंधा करने के लिए उस ने अपने हिस्से की जमीन बेच दी और मुरादनगर थाने के सामने एक आलीशान मकान भी बनवा लिया. जब इस निकम्मे और लालची से दलाली का धंधा नहीं चला तो उस की नजर दूसरे भाई ब्रजेश की जमीन पर जा टिकी. उसे लगा कि अगर ब्रजेश और उस के बेटों व पत्नी को भी इसी तरह ठिकाने लगा दिया जाए तो उस की ढाई करोड़ की जमीन भी उस की हो जाएगी.

नेकी तो नहीं बल्कि बदी और पूछपूछ की तर्ज पर उस ने साल 2013 में  ब्रजेश के छोटे बेटे 16 वर्षीय नीशू की भी हत्या कर लाश नदी में बहा दी और अपनी गोलमोल बातों से पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से ब्रजेश को रोक लिया था. यह उस के द्वारा की गई चौथी हत्या थी. अब तक उसे समझ आ गया था कि और साल, 2 साल या 4 साल लगेंगे, लेकिन जमीन तो उस की हो ही जाएगी. असल में वह चाहता था कि पूरे कुटुंब की जमीन उस के बेटे शैंकी को मिल जाए, जिस से उसे जिंदगी में मेहनत ही न करनी पड़े जैसे कि उसे नहीं करनी पड़ी थी. जाहिर है रेशू की हत्या के बाद वह ब्रजेश और उन की पत्नी को भी ऊपर पहुंचा देने का मन बना चुका था.

ब्रजेश का बेटा 24 वर्षीय रेशू बीती 8 अगस्त को गायब हो गया था. यह उन के लिए एक और सदमे वाली बात थी. क्योंकि नीशू को गुजरे 8 साल बीत गए थे, अब रेशू ही उन का आखिरी सहारा बचा था जिस की सलामती के लिए वे दिनरात दुआएं मांगा करते थे. लेकिन यह अंदाजा दूसरों की तरह उन्हें भी नहीं था कि परिवार को डसने वाला सांप आस्तीन में ही है. लीलू ने इस बाबत और लोगों को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया था. उस ने योजना के मुताबिक रेशू को फोन कर गांव के बाहर मिलने बुलाया और घूमने चलने के बहाने कार में बैठा लिया. इस आई ट्वेंटी कार में इन दोनों के अलावा विक्रांत, सुरेंद्र त्यागी, राहुल और लीलू का भांजा मुकेश भी मौजूद था.

चलती कार में ही इन लोगों ने रेशू की हत्या रस्सी और लोहे की जंजीर से गला घोंट कर दी और उसे सीट पर जिंदा लोगों की तरह बिठा कर बुलंदशहर की तरफ चल पड़े. कहीं किसी को शक न हो जाए, इसलिए कुछ दूर जंगल में कार रोक कर इन्होंने रेशू की लाश को कार की डिक्की में डाल दिया. असल काम हो चुका था, बस लाश और ठिकाने लगानी बाकी थी. इस के लिए मूड बनाने के लिए इन लोगों ने बुलंदशहर में विक्रांत के ट्यूबवैल पर जोरदार पार्टी की. जब रात गहराने लगी तो इन वहशियों ने रेशू की लाश को एक बोरे में ठूंसा और बोरा पहासू इलाके में ले जा कर गंगनहर में बहा दिया. इस के बाद सभी अपनेअपने रास्ते हो लिए.

आरोपियों में से सुरेंद्र त्यागी हापुड़ का रहने वाला है और पुलिस में दरोगा पद से रिटायर हुआ है जबकि राहुल उस का नौकर था. लीलू ने सुरेंद्र को रेशू की हत्या की सुपारी दी थी, जिस ने बुलंदशहर के आदतन अपराधी विक्रांत को भी इस वारदात में शामिल कर लिया था. इन दोनों का याराना विक्रांत के एक जुर्म में जेल में बंद रहने के दौरान हुआ था. लीलू ने हत्या के एवज में 4 लाख रुपए नकद दिए थे और बाकी बाद में एक बीघा जमीन बेचने के बाद देने का वादा किया था. रेशू के लापता होने के बाद ब्रजेश ने बेटे को काफी खोजा और फिर थकहार कर 15 अगस्त को मुरादनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. हालांकि लीलू ने इस बार भी उन्हें यह कह कर रोकने की कोशिश की थी कि पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से क्या फायदा होगा.

लेकिन फायदा हुआ. 24 सितंबर को वह पकड़ा गया और अपने साथियों सहित जेल में है. लीलू इत्तफाकन पकड़ा गया, नहीं तो पुलिस भी हार मान चुकी थी कि अब रेशू नहीं मिलने वाला. पुलिस के पास रेशू को ढूंढने का कोई सूत्र नहीं था, सिवाय इस के कि उस के और लीलू के फोन की लोकेशन एक ही जगह की मिल रही थी, जो उसे हत्यारा मानने के लिए पर्याप्त नहीं था. लेकिन इनवैस्टीगेशन के दौरान एक औडियो रिकौर्डिंग पुलिस के हत्थे लग गई, जिस में लीलू रेशू की हत्या का प्लान बाकी चारों में से किसी को बता और समझा रहा था. फिर लीलू ने 5 हत्याओं की बात कुबूली. हत्याओं में 2-3 साल का गैप वह इसीलिए रखता था कि हल्ला न मचे और लोग पिछली हत्या का दुख भूल जाएं.

पुलिस हिरासत में लीलू कभी यह कहता रहा कि उसे उन हत्याओं का कोई मलाल नहीं. तो कभी यह कहता रहा कि सजा भुगतने के बाद वह भाईभाभी की सेवा कर किए गए जुर्म का प्रायश्चित करना चाहता है. हैरानी की बात सिर्फ यह है कि 5 हत्याओं का यह गुनहगार लीलू जेल से छूट जाने की उम्मीद पाले बैठा है. वह शायद इसलिए कि 5 में से एक भी लाश बरामद नहीं हो सकी. लेकिन अब लोगों की मांग है कि ऐसे आस्तीन के सांप का जिंदा रहना ठीक नहीं है, लिहाजा उसे फांसी की सजा मिलनी चहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह जरूर एक बड़ी कानूनी खामी साबित होगी. Property Dispute

Crime Kahaniyan: मामी की बेवफाई – लता बनी परिवार की बर्बादी का कारण

Crime Kahaniyan: 19वर्षीया काजल बेचैन हो कर अपने घर में टहल रही थी. वह बारबार रो रहे अपने छोटे भाई शिवम को चुप कराती थी, मगर शिवम मां को याद कर के बारबार रोने लगता था. हरिद्वार जिले के गांव हेतमपुर की रहने वाली काजल व शिवम की मां लता चौहान (38) गत शाम को पास के ही कस्बे बहादराबाद में सब्जी खरीदने के लिए घर से निकली थी, मगर आज तक वह वापस घर नहीं लौटी थी.

उस का मोबाइल भी स्विच्ड औफ आ रहा था. मां के वापस न लौटने व मोबाइल के स्विच्ड औफ होने से काजल व शिवम का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. दोनों भाईबहन पिछली शाम से ही अपने सभी रिश्तेदारों को फोन कर कर के अपनी मां के बारे में जानकारी कर रहे थे, मगर उन की मां के बारे में सभी रिश्तेदारों ने मोबाइल पर अनभिज्ञता जताई. इस के बाद सूचना पा कर कुछ रिश्तेदारों व कुछ पड़ोसियों का भी उन के घर पर आना शुरू हो गया था. सभी भाईबहन को दिलासा दे कर चले जाते.

इसी प्रकार 3 दिन बीत गए थे, लेकिन काजल व शिवम को अपनी मां के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिली. इस के बाद अब उन के रिश्तेदार काजल पर लता की गुमशुदगी थाने में दर्ज कराने पर जोर देने लगे. लेकिन थाने जाने के नाम से काजल को एक अंजाना सा डर लग रहा था. वह 14 जून, 2021 का दिन था. आखिर उस दिन काजल हरिद्वार के थाना सिडकुल पहुंच ही गई. वह थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला से मिली और उन्हें अपनी मां लता चौहान के गत 4 दिनों से लापता होने की जानकारी दी.

जब थानाप्रभारी बुटोला ने काजल से उस के पिता के बारे में पूछा तो काजल ने बताया, ‘‘सर पिछले 2-3 सालों से मेरे पिता चंदन सिंह नेगी व मां लता चौहान के बीच अनबन चल रही है. मेरे पिता फरीदाबाद (हरियाणा) में रह कर ड्राइवरी करते हैं. यहां पर 2 साल पहले मेरे फुफेरे भाई अंकित चौहान ने हमें एक मकान खरीद कर दिया था. इस मकान में हम तीनों रहते हैं. घर से चलते समय मेरी मां हरे रंग का सूट सलवार व पैरों में सैंडिल पहने थी.’’

इस के बाद काजल ने मां का मोबाइल नंबर भी थानाप्रभारी बुटोला को नोट करा दिया. फिर थानाप्रभारी के कहने पर काजल वापस घर आ गई. काजल की तहरीर पर थानाप्रभारी बुटोला ने लता की गुमशुदगी दर्ज कर ली और इस केस की जांच एसआई अमित भट्ट को सौंप दी. लता की गुमशुदगी का केस हाथ में आते ही अमित भट्ट सक्रिय हो गए. उन्होंने सब से पहले लता के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाने के लिए साइबर थाने से संपर्क किया था और थाने के 2 सिपाहियों को लता चौहान की डिटेल्स का पता करने के लिए सादे कपड़ों में गांव हेतमपुर में तैनात कर दिया.

उसी दिन शाम को थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला ने लता की गुमशुदगी की सूचना एएसपी डा. विशाखा अशोक भडाने व एसपी (सिटी) कमलेश उपाध्याय को दी. 2 दिनों में पुलिस को लता के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स मिल गई थी. काल डिटेल्स के अनुसार 10 जून, 2021 की शाम को लता चौहान व उस के भांजे अंकित चौहान की लोकेशन हेतमपुर से सलेमपुर की गंगनहर तक एक साथ थी. इस से पहले दोनों में बातें भी हुई थीं. इस के अलावा लता के मोबाइल पर अंतिम काल अंकित चौहान के ही मोबाइल से आई थी. इस के कुछ समय बाद लता चौहान व अंकित चौहान की लोकेशन भी अलगअलग हो गई थी. काल डिटेल्स की यह जानकारी तुरंत ही थानाप्रभारी ने एसपी (सिटी) कमलेश उपाध्याय को दी.

एसपी उपाध्याय ने थानाप्रभारी बुटोला व एसआई अमित भट्ट को अंकित चौहान से पूछताछ करने के निर्देश दिए. बुटोला व भट्ट ने जब अंकित चौहान से संपर्क करने का प्रयास किया, तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. पुलिस ने जब अंकित चौहान के बारे में जानकारी की तो पता चला कि वह लता का सगा भांजा था. अंकित मूलरूप से बिजनौर जिले के गांव मानपुर शिवपुरी का रहने वाला था. अंकित एमएससी करने के बाद किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था.  3 साल पहले जब लता के अपने पति से संबंध बिगड़ गए थे, तब से अंकित की लता से नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस दौरान अंकित लता व उस के दोनों बच्चों का पूरापूरा खयाल रखता था. लता के रहनेखाने से ले कर वह उन्हें हर चीज मुहैया कराता था.

यह जानकारी प्राप्त होने पर बुटोला व अमित भट्ट ने अंकित की तलाश में धामपुर व हेतमपुर में कुछ मुखबिर सतर्क कर दिए थे. विवेचक अमित भट्ट ने भी अंकित की तलाश में उस के धामपुर स्थित गांव मानपुर शिवपुरी में कई बार दबिश दी, मगर अंकित उन्हें न मिल पाया. इसी प्रकार 9 दिन बीत गए तथा पुलिस को अंकित चौहान के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई. वह 27 जून, 2021 का दिन था. शाम के 7 बज रहे थे. तभी श्री बुटोला के मोबाइल पर उन के खास मुखबिर का फोन आया. मुखबिर ने उन्हें बताया कि सर, जिस अंकित को तलाश कर रहे हो, वह इस समय यहां हरिद्वार के रोशनाबाद चौक पर खड़ा है. यह सुनते ही बुटोला की बांछें खिल गईं.

बुटोला ने इस मामले में विलंब करना उचित नहीं समझा. उन्होंने तुरंत अपने साथ विवेचक अमित भट्ट व फोर्स को साथ लिया और 5 मिनट में ही रोशनाबाद चौक पर पहुंच गए. मुखबिर के इशारे पर उन्होंने वहां से अंकित को हिरासत में ले लिया. वह उसे थाने ले आए. यहां पर जब बुटोला व भट्ट ने उस से लता के लापता होने के बारे में पूछताछ की, तो पहले तो वह पुलिस को गच्चा देने की कोशिश करता रहा. वह पुलिस को बताता रहा कि लता उस की मामी अवश्य थी, मगर अब वह कहां है, उस की उसे कोई जानकारी नहीं है. लेकिन सख्ती करने पर वह टूट गया और बोला, ‘‘साहब, अब लता इस दुनिया में नहीं है. 10 जून, 2021 की रात को मैं ने अपने दोस्त अमन निवासी कस्बा शेरकोट जिला बिजनौर, उत्तर प्रदेश के साथ मिल कर उस की

गला घोंट कर हत्या कर दी थी तथा उस की लाश हम ने गांव सलेमपुर स्थित गंगनहर में फेंक दी थी. लता को मैं घुमाने की बात कह कर सलेमपुर गंगनहर तक लाया था.’’

अंकित के मुंह से लता की हत्या की बात सुन कर थानाप्रभारी बुटोला तथा वहां मौजूद अन्य पुलिस वाले सन्न रह गए. पूछताछ में उस ने लता की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

अंकित गांव मानपुर में अपने पिता हरगोविंद, मां सरोज तथा छोटे भाई अनुज के साथ रहता था. उस ने बताया कि 3 साल पहले जब लता का अपने पति के साथ विवाद हुआ था तो उस दौरान उस ने ही लता की काफी मदद की थी. उसी दौरान लता उस की ओर आकर्षित हो गई थी. लता और अंकित के बीच अवैध संबंध बन गए थे. फिर अंकित ने लता को हेतमपुर में एक मकान खरीद कर दे दिया था. सब कुछ ठीक चल रहा था कि करीब 2 महीने पहले अंकित ने लता को उस के पड़ोसी के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिया था. यह देख कर अंकित को गुस्सा आ गया था. गुस्से में उस ने लता को उसे खरीद कर दिया हुआ मकान अपने नाम वापस करने का कहा तो वह टालने लगी और 2 लाख रुपए की मांग करने लगी.

लता की इस हरकत से अंकित परेशान हो गया था और अंत में वह उस की हत्या की योजना बनाने लगा. यह बात उस ने अपने दोस्त अमन को बताई तो वह भी अंकित का साथ देने को राजी हो गया. दोनों ने इस की योजना बनाई. योजना के अनुसार 10 जून, 2021 को अंकित अमन के साथ रात 8 बजे लता के घर पहुंचा था. इस के बाद उसे घुमाने की बात कह कर वह लता को ले कर गंगनहर किनारे गांव सलेमपुर पहुंचा था. उस समय वहां रात का अंधेरा छाया था.

मौका मिलने पर अमन ने तुरंत ही लता को पकड़ कर उस का गला घोंट दिया था. लता के मरने के बाद दोनों ने उस की लाश गंगनहर में फेंक दी थी. उस समय रात के 11 बज चुके थे. इस के बाद अमन वापस अपने घर चला गया था. लता का मोबाइल उस समय अंकित के पास ही था. जब उस ने 12 जून, 2021 को मोबाइल औन किया तो उस में फोन आने शुरू हो गए थे. तब अंकित ने उस में से सिमकार्ड निकाल कर मोबाइल व सिम को सिंचाई विभाग की गंगनहर में फेंक दिया था. इस के बाद पुलिस ने अंकित के बयान दर्ज कर लिए और लता की गुमशुदगी के मुकदमे को हत्या में तरमीम कर दिया.

पुलिस ने इस केस में आईपीसी की धाराएं 302 व 120बी और बढ़ा दी थीं. 2 जुलाई, 2021 को पुलिस ने अंकित को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक आरोपी अंकित जेल में ही बंद था. थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला द्वारा गंगनहर में लता के शव को तलाश किया जा रहा था. दूसरी ओर पुलिस दूसरे आरोपी अमन की तलाश में जुटी थी.

छाया : सोहेब मलिक

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Illicit Relationship: दिलबर ने ली जान

Illicit Relationship: कमलेश और जीरा के बीच भले ही शादी से पहले के संबंध रहे थे, लेकिन जीरा की शादी के बाद दोनों को यह गलती दोहरानी नहीं चाहिए थी. उन दोनों की इस गलती ने जब विकराल रूप ले लिया तो फिर खून की नदी तो बहनी ही थी, भले ही उस में लाश जीरा की बहती या कमलेश की.

खिदिरपुर गांव से सटा हुआ गांव है ताजपुर माझा. 23 जुलाई, 2015 की सुबह का उजाला फैला तो ताजपुर माझा के लोगों ने खेतों का रुख किया. एक ग्रामीण ने सिट्टू राय के खेत के पास की झाड़ी में एक जवान युवक को रक्तरंजित पड़ा देखा तो उस की घिग्गी बंध गई. उस ने हिम्मत कर के उस युवक के जिस्म पर नजर डाली तो उसे समझते देर नहीं लगी कि वह जीवित नहीं है. वह ग्रामीण चिल्लाता हुआ वहां से भागा, ‘‘झाडि़यों में लाश है, झाडि़यों में लाश है.’’

उस की आवाज सुन कर लोग खेतों के पास खड़ी झाडि़यों की तरफ दौड़ पड़े. देखते ही देखते लाश के पास काफी लोग जमा हो गए. मृतक जवान युवक था. उस के शरीर पर नई पैंट शर्ट और जूते थे, ऐसा लगता था जैसे वह किसी रिश्तेदारी में आया था. क्योंकि गांव के ज्यादातर लोग कहीं बाहर या रिश्तेदारी में आनेजाने पर ही नए कपड़े पहनते हैं. मृतक का सिर फटा हुआ था, जिस से बहा खून उस के चेहरे और शर्ट के काफी हिस्से पर फैल गया था.

खून चूंकि जम कर काला पड़ गया था, इस से लग रहा था कि उसे मरे हुए काफी समय हो गया है. आसपास एकत्र भीड़ में तरहतरह की चर्चाएं हो रही थीं, उसे पहचानने की कोशिश भी की गई, लेकिन कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. इसी बीच किसी ने थाना जमानियां की पुलिस को फोन कर के युवक की लाश मिलने की सूचना दे दी. कुछ ही देर में थानाप्रभारी जमानियां अवधेश नारायण सिंह पुलिस टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए. उन्हें देख कर भीड़ लाश के पास से हट गई. अवधेश नारायण सिंह ने युवक की लाश का निरीक्षण किया. उस के फटे सिर को देख कर ही उन्हें अनुमान हो गया कि उस की मौत ज्यादा खून बह जाने की वजह से हुई है.

मृतक के शरीर पर चोट के भी निशान नजर आ रहे थे. मरने से पहले शायद उसे काफी पीटा गया था. अवधेश नारायण सिंह को उस की जेबों की तलाशी में जो पर्स मिला, उस में केवल कुछ रुपए थे. इस के अलावा उस के पास से ऐसा कोई सामान नहीं मिला, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. लाश की पहचान के लिए उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछा तो सभी ने उसे पहचानने से मना कर दिया. लोगों ने यही शंका जाहिर की कि हो सकता है यह आसपास के किसी गांव का रहने वाला हो. इस पर अवधेश नारायण सिंह ने एक सिपाही को भेज कर पड़ोसी गांव खिदिरपुर से वहां के चौकीदार राममिलन को बुलवा लिया.

राममिलन ने युवक की लाश को देखते ही बता दिया कि मृतक राधोपुर गांव का कमलेश यादव है. राममिलन ने यह भी बताया कि कमलेश यादव का खिदिरपुर में जीरा देवी के पास काफी आनाजाना था. दोनों के अवैधसंबंधों के बारे में पूरा खिदिरपुर जानता है. इस महत्वपूर्ण जानकारी को सुन कर अवधेश नारायण सिंह को पक्का यकीन हो गया कि कमलेश यादव की हत्या अवैधसंबंधों के कारण ही हुई है और इस के सूत्र खिदिरपुर में जीरा देवी के घर से ही मिलेंगे. उन्होंने लिखापढ़ी कर के कमलेश की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया, साथ ही अपने मातहतों को निर्देश दिया कि वे कमलेश यादव के गांव राधोपुर खबर भेज कर उस के घर वालों को थाने बुला लें.

तत्पश्चात अवधेश नारायण सिंह 2 सिपाहियों और चौकीदार के साथ गांव खिदिरपुर की ओर रवाना हो गए. खिदिरपुर वहां से ज्यादा दूर नहीं था. जब वह जीरा देवी के दरवाजे पहुंचे तो अंदर तेजी से हलचल हुई, लगा कोई भागा है. दरवाजा खुला था. अवधेश नारायण सिंह धड़धड़ाते हुए अंदर चले गए. घर के आंगन में एक युवती घबराई हुई खड़ी थी. वही जीरा देवी थी. घर में पुलिस को देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

अवधेश नारायण सिंह की पैनी नजरों ने घर के आंगन में पड़े खून के उन धब्बों को देख लिया, जिन्हें साफ करने की कोशिश की तो गई थी, पर वे पूरी तरह से साफ नहीं हो पाए थे. श्री सिंह ने जीरा देवी को घूरते हुए पूछा, ‘‘अंदर कौन भागा है?’’

‘‘ज…जी… मेरी सास अंदर गई है.’’ जीरा देवी ने घबराई हुई आवाज में कहा और अंदर की तरफ जाने लगी. अवधेश सिंह ने उसे रोका नहीं, बल्कि उस के पीछे हो लिए. जीरा देवी जिस कमरे में गई, उस में कमलेश यादव की हत्या के पुख्ता सबूत मौजूद थे. कमरे में जीरा देवी की सास संधारी देवी खड़ी मिली, उस के हाथ में लोहे की खून सनी रौड थी, जिसे वह एक गीले कपड़े से साफ करने की कोशिश कर रही थी.

अब कुछ भी पूछने की आवश्यकता नहीं थी, उन्होंने वहां मौजूद सबूतों को अपने कब्जे में ले लिया और जीरा देवी व संधारी देवी को साथ ले कर थाने लौट आए. एक आदमी की हत्या और कुछ लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी मिलने पर पुलिस अधीक्षक वैभव कृष्ण भी आ गए थे. उन की और मीडिया की उपस्थिति में दोनों से सख्ती से पूछताछ हुई. आखिरकार जीरा देवी पुलिस की सख्ती के आगे टूट गई. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुए जो कुछ बताया, उस से कमलेश की हत्या की पूरी कहानी साफ हो गई. जीरा देवी ने बताया, ‘‘कमलेश अकसर मेरे साथ अनैतिक संबंध बनाने के लिए दबाव बनाता था. इस से मेरी ससुराल वालों की बहुत बदनामी हो रही थी.

अपने पड़ोसी प्यारेलाल के कहने पर कल रात मैं ने उसे घर पर बुलाया. कमलेश मुझ से मिलने के लिए घर आया तो मैं ने और मेरी सास ने लोहे की रौड और लाठी से उस पर वार कर के उसे मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद हम ने उस की लाश पास के गांव ताजपुर के एक खेत के पास खड़ी झाड़ी में फेंक दी. इस में मेरे पति का कोई हाथ नहीं है.’’

अवधेश सिंह जानते थे कि कमलेश की लाश को 2 औरतें पास के गांव के खेतों में ले जा कर नहीं फेंक सकतीं, इस में अवश्य ही किसी पुरुष का भी हाथ रहा होगा. उन्होंने अपनी पुलिस टीम को जीरा के पति करिमन यादव उर्फ करिया और उस के पड़ोसी प्यारेलाल को पकड़ कर लाने के आदेश दिए. गाजीपुर जिले के जमानियां थाना क्षेत्र का एक गांव है राधोपुर. इस गांव के एक छोटे से किसान रामअधार यादव की बेटी थी जीरा. रामअधार के पास खेती लायक इतनी जमीन थी कि वह अपने परिवार का भरणपोषण अच्छे से कर लेता था. जीरा बचपन से ही नटखट और चंचल स्वभाव की थी. पढ़ाईलिखाई के साथ खेतखलिहान और गांव की गलियों में खेलतेकूदते जीरा कब जवान हो गई, उसे पता ही नहीं चला.

उसे अपनी जवानी का अहसास तब हुआ, जब उस के जीवन में प्यार का एक मदहोश कर देने वाला झोंका आया. वह मदमस्त कर देने वाला आवारा झोंका था कमलेश. वह भी इसी गांव में जवान हुआ था. उस के पिता रामविलास यादव भी किसान थे. कमलेश की पढ़ने में ज्यादा रुचि नहीं थी. सारा दिन अपने दोस्तों के साथ गांव की गलियों में घूमना, फिल्मी गाने गुनगुना कर खुद को हीरो साबित करने की कोशिश करना उस का काम था. एक दिन वह अपनी साइकिल से कस्बे की ओर जा रहा था, तभी उस की नजरें सामने से आती हुई जीरा पर पड़ गईं.

19 वर्षीया कमसिन, अल्हड़, खूबसूरत जीरा की बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, कमर तक लहराते काले बाल, पतली छरहरी कंचन सी काया किसी भी युवा दिल को आकर्षित करने के लिए काफी थी. उस के चेहरे पर ऐसा चुंबकीय आकर्षण था कि कमलेश अपनी आंखें तक झपकाना भूल गया. उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उस का दिल सीने से निकल कर बाहर आ गया हो.

‘‘हाय, इतनी दिलकश हसीना मेरे गांव में रहती है और मुझे पता ही नहीं चला.’’ कमलेश ने सर्द आह भर कर कहा तो जीरा ने आंखें तरेरते हुए जवाब दिया, ‘‘अच्छा, अगर पहले पता चल जाता तो क्या कर लेते?’’

‘‘कसम पैदा करने वाले की, मैं तुम्हारा हाथ मांगने खुद ही तुम्हारे दरवाजे पर आ जाता.’’

जीरा थोड़ी शरमाई, फिर झेंप कर बोली, ‘‘क्यों घर में मांबाप नहीं हैं क्या तुम्हारे?’’

‘‘हैं, कहो तो भेज दूं अपने बाप को?’’ कमलेश ने शरारत से पूछा.

‘‘धत!’’ जीरा लाज से दोहरी हो कर तेजी से कमलेश की बगल से निकल गई.

‘‘उफ, यह शरमाना…’’ कमलेश ने फिर ठंडी सांस भरी और बोला, ‘‘अरे नाम तो बताती जाओ.’’

‘‘जीरा नाम है मेरा.’’ जीरा ने पलट कर बड़ी अदा से बताया और फिर लहराती हुई चली गई. कमलेश तब तक वहां खड़ा रहा, जब तक जीरा उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. उसे लगा जैसे आज उस का दिल उस के पास नहीं है, उसे जीरा चुरा कर ले गई है. वह उस दिन बेमन से कस्बे के बाजार गया.

इत्तफाक से दूसरे दिन जीरा उसे खेत में मिल गई. उस दिन सांझ ढल रही थी. जीरा ने जानवरों के लिए घास का गट्ठर तैयार कर लिया था और उसे उठाने का प्रयास कर रही थी, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. गट्ठर भारी था और आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था. तभी कमलेश वहां पहुंच गया. उस ने जीरा को देखा तो उस के पास चला आया.

‘‘क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं?’’ कमलेश ने प्यार से पूछा.

‘‘ना बाबा?’’ जीरा ने अपनी मुसकराहट छिपा कर घबराने का अभिनय किया, ‘‘तुम से उठवाऊंगी तो दंड भोगना पड़ेगा.’’

‘‘दंड.’’ कमलेश चौंका, ‘‘कैसा दंड?’’

‘‘मैं जानती हूं, फोकट में मुझ पर एहसान नहीं करोगे. बोझ उठवा दिया तो कहोगे, मुझ पर उपकार किया है, अब बापू को भेजूं तो ‘हां’ बोल देना.’’

कमलेश हंस पड़ा, ‘‘वह तो तुम्हें वैसे भी बोलना पड़ेगा जीरा. जानती हो तुम्हें जब से देखा है न दिन को चैन है, न रात को ठीक से सो पाया हूं. पता नहीं कैसा जादू कर दिया है तुम ने मुझ पर.’’

‘‘जादू तो तुम ने भी चला दिया मुझ पर.’’ जीरा सिर झुका कर लजाते हुए बोली, ‘‘लड़की हूं न, अपने दिल की बात होंठों पर लाते हुए झिझक होती है.’’

कमलेश ने प्यार से उस की कलाई थाम ली, ‘‘तुम्हारी हां की गवाही तुम्हारी शरम से झुकी आंखें भी दे रही है जीरा. मेरा यकीन करो, मैं ने तुम्हें अपना बनाया तो है रानी बना कर रखूंगा… तुम राज करोगी मेरे दिल पर.’’

जीरा ने आंखें तरेरी, ‘‘तुम्हारी रानी तो मैं तब बनूंगी, जब मुझे ब्याह लोगे. अगर मेरा ब्याह किसी और से हो गया तो मैं तुम्हारी रानी…’’

कमलेश ने जल्दी से उस की बात काट दी, ‘‘गलती से कह दिया पगली, तुम तो हर तरह से मेरी रानी रहोगी, शादी मुझ से हुई तब भी और नहीं हुई तब भी.’’

‘‘शादी तो तुम से ही होगी मेरी.’’ जीरा हंस कर बोली, ‘‘कोई और मुझे ब्याह कर ले जाए, मैं ऐसा होने नहीं दूंगी.’’

‘‘इतना चाहती हो मुझे?’’ कमलेश ने भावविभोर हो कर जीरा को अपने सीने से लगा लिया. क्षणभर के लिए तो जीरा भी कमलेश के सीने से लग कर अपनी सुधबुध भूल गई, लेकिन जल्दी ही वह संभल कर उस से अलग हटते हुए इधरउधर देखने लगी.

‘‘कोई नहीं है जीरा, बस यहां मैं हूं और तुम हो.’’ कमलेश ने अपनी उखड़ी सांसों को व्यवस्थित करते हुए कहा.

‘‘तुम पुरुष हो कमलेश, मैं स्त्री हूं और स्त्री को अपनी सीमा में रहने का पाठ पढ़ाया जाता है. अभी कोई देख लेता तो मेरी बदनामी हो जाती.’’

‘‘आगे से ध्यान रखूंगा जीरा.’’ कमलेश सिर झुका कर धीरे से बोला, ‘‘लेकिन तुम्हें इस बेचैन दिल को सुकून देने का वादा करना पड़ेगा.’’

‘‘स्त्री मन से कुछ छिपा नहीं रहता, वह पुरुष की नजरों को पल भर में पढ़ लेती है. मैं जान चुकी हूं कि तुम मुझे बेइंतहा प्यार करते हो और मुझे धोखा नहीं दोगे. औरत को अगर इतना विश्वास हो जाए तो वह पुरुष को बेझिझक अपना तनमन समर्पित कर देती है. मैं भी तुम्हारी बांहों में समा कर अपना सबकुछ तुम्हें सौंपने को आतुर हूं, लेकिन इस के लिए सही वक्त का इंतजार करना होगा.’’

‘‘ठीक है.’’ कमलेश ने ठंडी आह भर कर कहा, ‘‘मैं उस समय की प्रतीक्षा करूंगा.’’ इस के बाद कमलेश ने जीरा का घास का गट्ठर उठवा दिया. फिर दोनों अपनेअपने रास्ते घर चले गए.

जीरा कमलेश के मन में इस कदर समा गई थी कि वह जब तक दिन में एक बार उस का दीदार नहीं कर लेता था, उसे चैन नहीं पड़ता था. उसे देखे बिना जीरा का खाना भी गले से नीचे नहीं उतरता था. एक ही गांव के होने के कारण, कभी गली, कभी तालाब तो कभी खेत में उन्हें एकदूसरे का दीदार करने का अवसर मिल ही जाता था. वह एकदूसरे को देख कर आंखों की प्यास बुझा लेते थे, लेकिन उन के तन की प्यास उन्हें बेचैन कर रही थी.

एक दिन कमलेश को अपने खेत से लौटते वक्त देर हो गई. सांझ ढल गई थी और हलका अंधेरा जमीन पर उतर आया था. तभी एकाएक आसमान में काले बादलों के साए मंडराए और देखते ही देखते तेज बारिश होने लगी. कमलेश तेजी से दौड़ पड़ा. अभी वह कुछ ही दूर पहुंचा था कि उसे बरगद के पेड़ के नीचे जीरा नजर आई. वह पेड़ के नीचे खड़ी बारिश से बचने का प्रयास कर रही थी. वहां दूरदूर तक कोई नहीं था. कमलेश दौड़ता हुआ जीरा के पास पहुंच गया.

‘‘आज तुम्हें देर हो गई जीरा?’’ कमलेश ने सिर का पानी पोंछते हुए जीरा के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा तो जीरा उस के करीब सरक आई. ‘‘आज तुम्हारे लिए मैं ने देर कर दी है. मुझे मालूम था तुम अभी खेत में ही हो.’’

‘‘तुम्हारा इरादा नेक नहीं है?’’ कमलेश उस के और करीब आ कर फुसफुसाया.

‘‘तुम्हारा कौन सा नेक है.’’ जीरा को अपनी आवाज हलक में फंसती महसूस हुई. दोनों अब इतना करीब थे कि उन्हें एकदूसरे के दिलों की धड़कनें स्पष्ट सुनाई देने लगीं. कमलेश ने अपनी बांहों को आगे बढ़ाया तो जीरा उन में सिमट गई. तूफानी बारिश में दोनों के जिस्म सुलगने लगे. कमलेश ने जीरा का चेहरा दोनों हथेलियों में समेट कर उस के गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

जीरा की पूरी काया कसमसा उठी, वह कमलेश से कस कर लिपट गई. कमलेश ने उसे जकड़ लिया और अपने में समेटने लगा. जीरा ने अपना तन ढीला कर के मौन स्वीकृति दी तो कमलेश उसे ले कर जमीन पर झुकता चला गया. उस बारिश में दो तन एक हुए तो दोनों की आंखों में अजीब चमक और चेहरे पर तृप्ति के भाव थे. उस दिन के बाद जीरा अकसर खेतों से घर लौटने में देर करने लगी. कमलेश के साथ प्यार का अनैतिक खेल खेलने के लिए जीरा ने उपयुक्त स्थान और समय खोज निकाला था. सांझ के धुंधलके में जब खेतों में सन्नाटा व्याप्त हो जाता था, दोनों प्रेमी अपने तनमन की प्यास बुझाते थे.

जैसेजैसे यह खेल आगे बढ़ रहा था, उन के प्यार का बंधन भी मजबूत होता जा रहा था. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां है? एक दिन कमलेश और जीरा को एक आदमी ने बरगद के पेड़ के नीचे आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया तो बात जीरा के बाप को पता लगने में देर नहीं लगी. जीरा की पिटाई तो हुई ही, उस के घर से बाहर जाने पर भी पाबंदी लगा दी गई. जीरा के बाप ने आननफानन में उस के लिए वर की तलाश की और उसे शादी के बंधन में बांध कर राधोपुर से खिदिरपुर भेज दिया. जीरा चाह कर भी विरोध नहीं कर पाई. सब कुछ इतनी जल्दी से हुआ कि कमलेश भी मूकदर्शक बना रह गया.

2 प्यार करने वालों के दरमियान समाज ने एक ऐसी रेखा खींच दी, जिसे लांघना जीरा और कमलेश के लिए नामुमकिन तो नहीं था, लेकिन मुश्किल जरूर था. उधर जीरा लोकलाज के डर से ससुराल में अपने मन पर पत्थर रख कर बैठ गई. प्रेमिका की जगहंसाई न हो, इसलिए कमलेश भी खामोश हो कर रह गया. लेकिन अधिक समय तक ऐसा नहीं हो सका. 2 दिलों में धधक रही प्रीत और कामना की ज्वाला ने सारे बंधन तोड़ डाले. एक दिन जीरा ने ही कमलेश को अपनी ससुराल आने का न्योता दे दिया. कमलेश को उस ने ससुराल वालों के सामने मुंहबोले भाई के रूप में पेश कर दिया. परिणामस्वरूप जीरा की ससुराल में कमलेश की खूब आवभगत हुई. इसी की आड़ में कमलेश और जीरा की देह का मिलन भी हुआ.

दोनों तृप्त हुए तो इस रिश्ते की आड़ में कमलेश बारबार खिदिरपुर आने लगा. धीरेधीरे पहले गांव में, फिर जीरा की ससुराल वालों में भी इस रिश्ते को ले कर चर्चाएं होने लगीं. इन चर्चाओं में विश्वास कम, शक अधिक था. जीरा और कमलेश को इस की भनक लगी तो दोनों घर से भाग गए. कमलेश अपनी प्रेमिका जीरा को ले कर दिल्ली आ गया. यहां उस ने एक वर्ष तक जीरा को पत्नी के रूप में रखा. उस ने किराए का कमरा ले लिया था और एक कंपनी में काम करने लगा था. यह बात 2013 की है.

इधर जीरा के ससुराल वाले खुद और पुलिस की मदद से उन दोनों की तलाश करते रहे और अंत में दोनों को दिल्ली से ढूंढ़ निकाला. पुलिस उन्हें पकड़ कर खिदिरपुर ले आई. जीरा ने कोतवाली जमानियां में बयान दे कर कहा कि वह खुद कमलेश को ले कर दिल्ली गई थी. इस तरह उस ने कमलेश को सजा से तो बचा लिया, लेकिन पुलिस के और ससुराल वालों के समझाने पर उस ने कसम खाई कि अब वह पति की वफादार बन कर रहेगी. उस ने कमलेश को स्पष्ट रूप से कह दिया कि अब वह उस की वैवाहिक जिंदगी में दखल देने की कोशिश न करें, वह उसे भूल कर अपना विवाह कर ले और पत्नी के साथ राधोपुर में रहे.

कमलेश ने इसे प्यार भरी झिड़की समझ कर एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया. वह थोड़े दिनों तक तो शांत रहा, लेकिन फिर जीरा की याद आई तो शराब पी कर उस की ससुराल खिदिरपुर पहुंच गया. जीरा घर में अकेली मिली, उस ने कमलेश को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन कमलेश अपनी मनमानी कर के ही वहां से गया. ऐसा बारबार होने लगा. यह बात जीरा की ससुराल वालों को मालूम हुई तो वह कमलेश को सबक सिखाने की योजना बनाने लगे. जीरा भी चाहती थी कि कमलेश को अब उस की वैवाहिक जिंदगी से दूर कर दिया जाए. इस परिवार के पड़ोस में प्यारेलाल रहता था, वह भी उन का साथ देने को तैयार हो गया. उसी ने अपने फोन से जीरा की बात कमलेश से करवाई.

योजना के अनुसार जीरा ने उस दिन एक प्रेमिका का सच्चा अभिनय किया. उस ने मोबाइल पर कमलेश का नंबर मिला कर सुरीली आवाज में कहा, ‘‘कमलेश मैं तुम्हारी जीरा बोल रही हूं, कैसे हो तुम?’’

‘‘तुम पूछ रही हो जीरा,’’ कमलेश गहरी सांस भर कर बोला, ‘‘मैं तो तुम्हारे प्रेम के सहारे जिंदा रहना चाहता था, लेकिन तुम ही बेवफाई पर उतर आई हो. तुम्हारे पास आता हूं तो तुम बेरुखी से मुंह मोड़ लेती हो. अब तुम मेरी वाली जीरा नहीं रह गई.’’

‘‘नहीं कमलेश, जीरा तुम्हारी थी, तुम्हारी ही रहेगी.’’ जीरा गंभीर हो कर बोली, ‘‘मुझे अपनी ससुराल वालों के दबाव में तुम से बेरुखी करनी पड़ी थी. लेकिन वह सब नाटक था, हकीकत नहीं. मैं तुम्हें आज भी बहुत चाहती हूं.’’

‘‘सच,’’ कमलेश खुश हो कर बोला, ‘‘कहो कैसे फोन किया?’’

‘‘आज घर के सब लोग एक शादी में जा रहे हैं, तुम रात को खिदिरपुर आ जाओ, खूब मौजमस्ती करेंगे.’’

‘‘मैं आऊंगा जीरा, तुम दरवाजा खुला रखना.’’ कमलेश खुशी से चहका और फोन बंद कर के खिदिरपुर जाने की तैयारी करने लगा. उस दिन 22 जुलाई, 2015 का दिन था.

रात गहराने पर कमलेश ने जीरा के दरवाजे पर पहुंच कर हलकी सी दस्तक दी और हौले से दरवाजा धकेला. दरवाजा खुद ही अंदर की तरफ खुल गया. कमलेश के दिल की धड़कनें बेकाबू होने लगीं. वह उस पल की कल्पना कर के ही रोमांचित होने लगा, जब जीरा उस की बांहों के समाने वाली थी. अब वह पल बहुत करीब था. कमलेश ने उन्माद में अपने कदम आगे बढ़ा दिए. छोटी सी गली पार कर के जैसे ही उस ने आंगन में कदम रखा, उस के सिर पर एक भरपूर प्रहार हुआ. उस के मुंह से दर्दभरी हलकी चीख निकली और वह लहराता हुआ नीचे झुकता चला गया. बस इस के बाद उस पर रौड और डंडों से वार पर वार होने लगे. अचेत अवस्था में ही इस जानलेवा हमले में कब उस के प्राण निकल गए, पता ही नहीं चला. कुछ देर बाद हमलावरों का जुनून शांत हुआ तो जीरा की सास संधारी ने कमलेश की सांसे टटोलीं.

‘‘मर गया कमीना.’’ वह नफरत से थूकती हुई बोली.

‘‘हमारे रास्ते का कांटा निकल गया, चलो अब इसे ठिकाने लगा देते हैं.’’ जीरा के पति करिमन उर्फ करिया यादव ने अपने पास खड़ी अपनी पत्नी जीरा और मां संधारी की तरफ देख कर कहा.

इस के बाद 22 जुलाई की रात में ही उन लोगों ने कमलेश की लाश को पास के गांव ताजपुर माझा में सिट्टू राय के खेत की झाड़ी में ले जा कर छिपा दिया. उन्हें लगा था, दूसरे गांव में इस की पहचान नहीं हो पाएगी तो मामला रफादफा हो जाएगा. लेकिन कोतवाली जमानियां के प्रभारी अवधेश नारायण सिंह ने पहली इन्वैस्टीगेशन में ही कातिलों के गिरेबान पर हाथ डाल दिया. बेशक करिमन यादव भाग निकला, लेकिन थानाप्रभारी को विश्वास था कि वह जल्द ही पकड़ में आ जाएगा. प्यारेलाल को भी पकड़ लिया गया था.

कमलेश की हत्या का जुर्म जीरा और संधारी देवी कबूल कर चुकी थीं. थानाप्रभारी सिंह ने कमलेश के पिता रामविलास यादव को वादी बना कर हत्यारों के नाम एक तहरीर लिखवा ली और उन के विरुद्ध अपराध भा.दं.वि. की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर के तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर दिया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कमलेश की हत्या में शामिल प्यारेलाल पकड़ में आ गया था, जबकि करिमन की तलाश जारी थी. Illicit Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: बदनामी की चुभन

Hindi Stories: कोईकोई औरत बहती नदी सी होती है, जिधर रास्ता मिला उधर ही बह निकली. प्रियंका भी ऐसी ही औरत थी. वह भूल गई कि वह जीतीजागती औरत है, नदी नहीं. इसी का उसे ऐसा अंजाम भोगना पड़ा कि…

उत्तर प्रदेश के शहर बरेली में 30 अगस्त, 2015 की शाम एक महिला की हत्या की जानकारी होते ही शहर में सनसनी फैल गई. यह हत्या बारादरी थाना के मोहल्ला खुर्रम गौटिया में हुई थी. सूचना मिलने पर थानाप्रभारी मोहम्मद कासिम सहयोगियों के साथ मौके पर पहुंच गए. थानाप्रभारी की सूचना पर कुछ देर बाद एसपी (सिटी) समीर सौरभ और सीओ (तृतीय) असित श्रीवास्तव भी आ पहुंचे. मृतका का नाम प्रियंका गुप्ता था. उसे दुपट्टे से गला घोंट कर मारा गया था. लाश रसोई में पड़ी थी और अभी भी उस के गले में दुपट्टा लिपटा था.

उस की उम्र 30 साल के पास रही होगी. रसोई में स्लैब पर प्लेट में खाना रखा था, जो बाहर से पैक हो कर आया था. इस से अनुमान लगाया गया कि जब मृतका खाना खाने की तैयारी कर रही थी, तभी हत्यारों ने उस की हत्या कर दी थी. उस का मोबाइल भी खाने के पास रखा था. घर की अलमारियों में ताले लगे थे. घर में लूटपाट का कहीं कोई निशान नजर नहीं आ रहा था. इस से यह बात साफ हो गई कि हत्यारों का मकसद सिर्फ हत्या करना था. पुलिस को मौके से कोई भी अहम सबूत नहीं मिला था. जांच के लिए पुलिस ने मोबाइल और अन्य जरूरी चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम को भी मौके पर बुलवा लिया गया था. टीम ने आ कर फिंगर प्रिंट उठा लिए.

घर के बाहर काफी भीड़ जमा थी. मृतका का पति, उस के 2 भाई भी वहां मौजूद थे. सभी दुखी और परेशान थे. जिस घर में हत्या हुई थी, मृतका वहां पति के साथ किराए पर रहती थी. पूछताछ में पुलिस को पता चला कि मृतका के पति अजय गुप्ता का लकड़ी का कारोबार था. हत्या का सब से पहले पता उस के पति अजय को ही चला था. उस ने पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार वह उस मकान में पत्नी के साथ लगभग 2 सालों से रह रहा था. उस की पत्नी प्रियंका घरेलू औरत थी. 29 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन वह बरेली के ही सीबीगंज में रह रहे अपने भाइयों विकास और सचिन को राखी बांधने गई थी. साथ में अजय भी था.

भाइयों को राखी बांध कर कुछ देर बाद प्रियंका वहां से वापस आ गई थी. चूंकि अजय को उस दिन कारोबार के सिलसिले में बदायूं जिले के दातागंज जाना था, इसलिए लगभग साढ़े 12 बजे वह पत्नी को कार से घर के बाहर उतार कर खुद दातागंज चला गया था. शाम को उस ने प्रियंका को फोन किया तो घंटी बजती रही, लेकिन फोन नहीं उठाया गया. रात में भी बात नहीं हो सकी. अगले दिन भी अजय ने फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला तो उस के मन में आशंका हुई. शाम को लौटा तो घर का दरवाजा बंद था. दीवार फांद कर वह अंदर पहुंचा तो प्रियंका को मृत पाया.

इस के बाद उस ने प्रियंका के भाइयों और रुद्रपुर में रहने वाली अपनी साली अंजलि को फोन कर के उस के कत्ल की सूचना दी. जब प्रियंका के भाई आ गए तो उस ने पुलिस को सूचना दी. अजय के अनुसार, प्रियंका के कान से सोने के टौप्स, गले की चेन, अंगूठियां और हाथों के कड़े गायब थे. इस के अलावा घर का कोई अन्य सामान गायब नहीं हुआ था. घटनास्थल की स्थिति और अजय के बयान से पुलिस अधिकारियों ने अंदाजा लगाया कि प्रियंका की हत्या करने वाले एक से अधिक थे, क्योंकि प्रियंका खुद काफी तनदुरुस्त थी. उसे कोई एक आदमी आसानी से काबू नहीं कर सकता था, दूसरे हत्यारों को वह अच्छी तरह जानती थी. इस की वजह यह थी कि प्रियंका किसी अंजान के लिए दरवाजा नहीं खोलती थी.

पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और थाने आ कर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने मृतका और उस के पति अजय का मोबाइल नंबर ले लिया. एसएसपी धरमवीर यादव ने इस मामले का जल्द से जल्द खुलासा करने को कहा. एसपी समीर सौरभ ने सीओ असित श्रीवास्तव के नेतृत्व में मामले के खुलासे के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी मोहम्मद कासिम, एसआई अजब सिंह, अनिल कुमार, शाहिद चौहान, बृजपाल सिंह, कांस्टेबल वारिस, अशोक व मोहम्मद यामीन आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन इस पुलिस टीम को मृतका प्रियंका और अजय के बारे में जो जानकारियां मिलीं, वे चौंकाने वाली थीं. पता चला कि प्रियंका अजय की असली पत्नी नहीं थी. वह एक हाईप्रोफाइल कौलगर्ल थी और अजय के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. एक बार वह देहव्यापार के मामले में जेल भी जा चुकी थी. अजय गुप्ता शादीशुदा था और उस की पत्नी पैतृक घर में रहती थी. इस जानकारी के बाद पुलिस को अजय गुप्ता पर ही शक हुआ, क्योंकि बातें छिपाने के अलावा एक बात और भी थी, जो शक पैदा करती थी. वह बात यह थी कि शाम से ले कर जब अगली दोपहर तक प्रियंका ने फोन नहीं उठाया था तो उस ने यह बात उस के भाइयों को क्यों नहीं बताई.

उन्हें बता दिया जाता तो वे जा कर देख सकते थे. अजय एक दिन के लिए बाहर गया था और प्रियंका की हत्या हो गई थी. यह इत्तफाक भी हो सकता था और साजिश भी. एक बात यह भी थी कि अजय शादीशुदा था, इसलिए संभव था कि वह प्रियंका से पीछा छुड़ाना चाहता हो. हत्या वह खुद भी कर सकता था और किसी से करा भी सकता था. पुलिस ने उसे थाने बुला कर पूछताछ की तो उस ने हत्या में अपना हाथ होने से साफ मना कर दिया. पूछने पर प्रियंका के भाइयों ने भी बताया था कि रक्षाबंधन पर प्रियंका के साथ अजय भी उन के यहां आया था और दोनों खुश लग रहे थे.

अजय की भूमिका की जांच के लिए एक पुलिस टीम बदायूं रवाना की गई. वहां से पता चला कि अजय वास्तव में काम के सिलसिले वहां गया था. उस के मोबाइल की लोकेशन भी इस की तसदीक कर रही थी. दूसरी ओर पुलिस को प्रियंका के मोबाइल की जो काल डिटेल्स मिली, उस में कई रसूखदार लोगों के नंबर थे. पुलिस ने उन नंबरों में हत्या का राज तलाशने की कोशिश की. पुलिस ने प्रियंका के भाइयों को भी शक के दायरे में रख कर पूछताछ की. बदनामी के चलते वे भी ऐसा कर सकते थे. लेकिन इस पूछताछ में हत्या का कोई राज पता नहीं लग सका.

पुलिस के लिए मामला पेचीदा हो गया था. प्रियंका के बारे में चौंकाने वाली जानकारियां मिल रही थीं. पुलिस ने प्रियंका की बहन अंजलि से भी पूछताछ की. उस ने बताया कि वह बहन के पास आती रहती थी. हत्या से कुछ दिनों पहले ही वह अपने घर गई थी. पुलिस इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थी कि हत्यारे जानकार थे. इस के बाद पुलिस ने शक के आधार पर ऐसे जानकार लोगों की सूची बनाई, जिन का प्रियंका के घर आनाजाना था. इन में एक नाम निश्चल गुप्ता उर्फ सोनू का भी था. निश्चल अजय की बुआ का बेटा था. पुलिस को यह भी पता चला कि प्रियंका उसे कतई पसंद नहीं करती थी. पुलिस ने निश्चल का नंबर हासिल कर के जांच की तो 27 अगस्त को उस की लोकेशन बरेली में मिली.

इस के बाद अजय और प्रियंका के भाइयों से पूछताछ की गई तो सचिन ने बताया कि उस दिन निश्चल अपने दोस्तों के साथ दीदी के घर आया था. पूछने पर उस ने कहा था कि वह मिलने के लिए आया है. वह कुछ देर रुक कर चला गया था. पुलिस ने उस के मोबाइल की 30 अगस्त की लोकेशन चेक की तो चौंकी, क्योंकि उस दिन उस का मोबाइल पूरे दिन बंद रहा था. इस बात ने उसे शक के घेरे में ला दिया. उस की काल डिटेल्स में 2 अन्य नंबर भी थे. उन पर भी निश्चल की बातें होती रहती थीं, लेकिन 30 अगस्त को वे भी बंद थे. 3 सितंबर को पुलिस टीम ने निश्चल और उस के 2 संदिग्ध दोस्तों गवेंद्र और मंगतराम को हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने तीनों को थाने ला कर पूछताछ की. निश्चल पहले तो पुलिस को बरगलाता रहा, लेकिन जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि प्रियंका की हत्या उसी ने अपने 2 दोस्तों के साथ मिल कर की थी. निश्चल ने पुलिस को हत्या की ऐसी वजह बताई, जिसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. दरअसल, प्रियंका उर्फ पूजा रिश्तों और काम की ऐसी दलदल में उलझ चुकी थी, जिस से महत्त्वाकांक्षाओं के चलते उस का निकलना मुश्किल हो गया था. उस की जिंदगी नदी में डोलती उस नाव की तरह थी, जो बिना मांझी के खुद के इशारों पर तैरती है.

प्रियंका उत्तराखंड स्थित रुद्रपुर के भाटवाड़ा मंडी में रहने वाले प्यारेलाल गुप्ता की बड़ी बेटी थी. युवावस्था से ही प्रियंका न सिर्फ बनसंवर कर रहती थी, बल्कि अपनी मर्जी की जिंदगी जीती थी. प्रियंका चाहती थी कि वह शानदार जिंदगी जीए, लेकिन परिवार के हालात इतने बेहतर नहीं थे. परिवार की आर्थिक तंगियां उसे कांटे की तरह चुभती थीं. करीब 9 साल पहले घर वालों ने प्रियंका का विवाह दिल्ली के मंडावली, हसनपुर डिपो के रहने वाले सत्यप्रकाश के साथ कर दिया था. प्रियंका इस विवाह से काफी खुश थी. उस ने अच्छी जिंदगी के सपने सजा लिए थे. उस की परवरिश साधारण परिवार में हुई थी. उस ने सोचा था कि विवाह के बाद उस के सभी अरमान पूरे हो जाएंगे और पति उस का हर शौक पूरा कर देगा.

लेकिन ऐसा नहीं हो सका. क्योंकि सत्यप्रकाश रेलवे स्टेशन पर स्टौल लगाता था. उस की सीमित आय थी. उस की कमाई में दिल्ली जैसे महंगे शहर में जरूरतें ही पूरी हो सकती थीं, ख्वाहिशें नहीं. प्रियंका के लिए यह बड़ा झटका था. उस के ख्वाब चकनाचूर हुए तो उस ने अपने अरमानों को वक्ती तौर पर दफन कर दिया. वह चाहती थी कि उस का पति उसे सिनेमा दिखाए और खूब शौपिंग कराए, लेकिन सत्यप्रकाश के लिए यह संभव नहीं था.

समय अपनी गति से चलता रहा. प्रियंका 2 बच्चों, एक बेटे और बेटी की मां बनी. बाद में उस की बेटी की बीमारी के चलते मौत हो गई. अच्छा इंसान वही होता है, जो हालातों से समझौता कर के जिंदगी को उस के असल रूप में स्वीकार कर ले, लेकिन प्रियंका विपरीत विचारधारा की थी. खर्चों के मुद्दे पर उस की सत्यप्रकाश से अनबन रहने लगी. सत्यप्रकाश ने उसे बहुत समझाया, लेकिन छोटीछोटी बातों पर झगड़ा होना आए दिन की बात हो गई, तो रिश्तों में कड़वाहट बढ़ने लगी. आए दिन रिश्तों में शिकायतों की आंधियां चलने लगें तो उन का चलना मुश्किल हो जाता है.

प्रियंका और सत्यप्रकाश के मामले में भी ऐसा ही हुआ. शिकवेशिकायतों के बीच 2 साल पहले दोनों एकदूसरे से अलग हो गए. बेटे को सत्यप्रकाश ने अपने पास ही रख लिया. प्रियंका की जिंदगी किस दिशा में जाने वाली थी, यह वह खुद भी नहीं जानती थी. लेकिन यह भी सच था कि वह आजादी की जिंदगी चाहती थी. पति से अलगाव के बाद वह मायके आ गई. उस का यह कदम घर वालों को रास नहीं आया. लेकिन प्रियंका अपने सामने किसी दूसरे की चलने नहीं देती थी. उसी बीच वह एक युवक के संपर्क में आ गई. कुछ समय वह दिल्ली में उस के साथ रही. प्रियंका के खर्चीले स्वभाव से अजिज आ कर उस युवक ने भी उस से किनारा कर लिया.

प्रियंका के खर्चे बड़े थे, जबकि कमाई का कोई जरिया नहीं था. अपने खर्चों को पूरा करने के लिए उस ने देहव्यापार को अपना लिया. बाद में एक परिचित के माध्यम से वह बरेली आ कर गोल्डन ग्रीन पार्क कालोनी में किराए पर मकान ले कर रहने लगी. प्रियंका के कदम पूरी तरह बहक चुके थे. बेटी की हरकतों से अजिज आ कर पिता ने भी उस से किनारा कर लिया. इस के बाद उस ने खुद भी उन के पास जाना बंद कर दिया. उसे लगता था कि वह जो कर रही है, वह ठीक है. बरेली में उस के संपर्क में एक के बाद एक कई रसूखदार लोग आ गए. इन में रईसजादे भी थे और राजनीतिक लोग भी.

प्रियंका महत्वाकांक्षी तो थी ही. ऐसे लोग खुशियों के बदले उस की हसरतों को पूरा करते थे. वह नोटों में खेलने लगी. उस ने अपनी जैसी युवतियों का ग्रुप बना लिया. सभी मिल कर धंधा करती थीं. प्रियंका के यहां अकसर लोगों का आनाजाना लगा रहता था. वह भी बनसंवर कर उन के साथ जाती थी. इन सब बातों से लोगों को उस की गतिविधियों पर शक हुआ. लोग विरोध करते थे, लेकिन प्रिंयंका के संबंध चूंकि रसूखदार लोगों से थे, इसलिए सीधे विरोध की कोई हिम्मत नहीं कर पाया था. एक बार इस की भनक पुलिस को लग गई तो अगस्त, 2013 में जाल बिछा कर पुलिस ने उस के कौलगर्ल रैकेट का परदाफाश कर दिया.

पुलिस ने उसे 2 अन्य युवतियों के साथ गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. इस गिरफ्तारी के दौरान उस ने पुलिस से अपना असली नाम छिपा लिया. उस ने पुलिस को अपना नाम पल्लवी गुप्ता बताया था. कुछ दिनों बाद प्रियंका को अपने चाहने वालों की मदद से जमानत मिल गई. इस के बाद उस की मुलाकात अजय गुप्ता से हुई. अजय गुप्ता का लकड़ी का कारोबार था. विवाहित अजय का परिवार बरेली के ही सहसवानी टोला में रहता था. प्रियंका और अजय चंद मुलाकातों में एकदूसरे के नजदीक आ गए. उन के बीच प्यार हो गया.

प्रियंका को अजय के सहारे की जरूरत थी. प्रियंका जहां रहती थी, वहां उस के पास काफी लोगों का आनाजाना बढ़ गया था. वह ठिकाना भी बदलना चाहती थी. अजय की मदद से उस ने मोहल्ला खुर्रम गोटिया में बीना मिश्रा का मकान किराए पर ले लिया. अजय ने खुद को उस का पति बताया. यह बात अलग थी कि दोनों का रिश्ता लिवइन रिलेशन का था. अजय का दामन थामने के बाद भी प्रियंका ने अपना असल धंधा नहीं छोड़ा. अजय भी उस की असलियत जानता था. यह प्यार था या कुछ और, अजय ने उसे उसी रूप में स्वीकार कर लिया. प्रियंका का लाइफस्टाइल हाईप्रोफाइल था.

अजय के साथ आए दिन सिनेमा हौल जा कर फिल्में देखना और शौपिंग करना उस की आदत में शुमार था. कई रईसजादे प्रियंका के पास आतेजाते थे. वह भी अकसर ऐसे लोगों के साथ घूमने जाया करती थी. पुलिस को शक न हो, इसलिए प्रियंका कुछ महीने में अपना नंबर बदल देती थी. इस दौरान वह नशा करने की भी आदी हो गई थी. प्रियंका के 2 भाई विकास और सचिन बरेली के सीबीगंज इलाके में रहते थे. समय के साथ उस ने परिवार से भी औपचारिक रिश्ते बनाने शुरू कर दिए थे. 5 महीने पहले प्रियंका के पैर में फैक्चर हो गया था. औपरेशन के बाद वह बिस्तर पर पड़ गई थी. परेशानी में इंसान को अपनों की ही याद आती है. प्रियंका को बुरे वक्त में अपनी छोटी बहन अंजलि की याद आई.

उस ने फोन पर आग्रह किया तो वह देखभाल के लिए बरेली आ गई. अजय गुप्ता के घर उस के फुफेरे भाई निश्चल गुप्ता उर्फ सोनू का भी आनाजाना  था. निश्चल उत्तराखंड के ऊधमसिंह-नगर का रहने वाला था. वहां उस की मुलाकात अंजलि से हुई तो दोनों के बीच दोस्ती हो गई. निश्चल नौजवान युवक था और विवाहित भी. वह प्रियंका की हकीकत जानता था, इसलिए उसे ज्यादा पसंद नहीं करता था. प्रियंका भी इस बात को जानती थी, लिहाजा वह भी निश्चल को ज्यादा महत्व नहीं देती थी. यहां तक कि उसे उस का अपने घर आना भी पसंद नहीं था.

प्रियंका को अंजलि से उस की दोस्ती खटकती थी. निश्चल को पता चला कि प्रियंका अंजलि को भी अपने पेशे में उतारना चाहती है तो उस ने अंजलि को सख्ती से मना कर दिया. प्रियंका को भी पता चल गया कि अंजलि निश्चल की बातों में आ गई है. एक दिन किसी बात पर निश्चल का प्रियंका से झगड़ा हो गया. निश्चल ने प्रियंका को झिड़क दिया, ‘‘तुम ज्यादा बोलने लायक नहीं हो. मैं तुम्हारी हकीकत जानता हूं. अंजलि तुम्हारे पास रहेगी तो तुम उसे भी अपने जैसा कर दोगी.’’

प्रियंका ने उसे आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा अंजलि से क्या मतलब, तुम कौन होते हो हमारे मामले में दखल देने वाले.’’

‘‘वह मेरी दोस्त है.’’ निश्चल ने कहा.

‘‘दूसरों को सिखाने के बजाय अपने दामन में झांक कर देखो. अपनी पत्नी को ही ले लो?’’

‘‘मेरी पत्नी में क्या कमी है? वह तुम से लाख गुना अच्छी है.’’

‘‘वह खुद भी कौलगर्ल है.’’ प्रियंका ने कहा.

यह सुन कर निश्चल को गुस्सा आ गया, ‘‘तुम्हें शरम आनी चाहिए ऐसी बकवास करते हुए. आइंदा ऐसी बात की तो अच्छा नहीं होगा.’’

‘‘पत्नी के बारे में सुन कर इतना बुरा लगा? मैं एक नहीं, हजार बार कहूंगी.’’

बात बढ़ गई. अंजलि ने किसी तरह दोनों को समझा कर मामला शांत किया. इस घटना के बाद दोनों के रिश्ते और भी कड़वे हो गए.

प्रियंका निश्चल को फूटी आंख पसंद नहीं करती थी. निश्चल को प्रियंका की बातें कांटे की तरह चुभी थीं. बाद में उसे पता चला कि वह उस की पत्नी को बेवजह बदनाम कर रही है. ऐसी बातों के बाद निश्चल ने प्रियंका के घर आनाजाना कम कर दिया, लेकिन इस के बाद भी उसे ऐसी बातें पता चलीं तो उस ने सोच लिया कि वह प्रियंका को इस बार धमकी भरे अंदाज में समझाएगा. अगस्त के पहले सप्ताह में अंजलि वापस अपने घर रुद्रपुर चली गई. निश्चल अंजलि से बातें किया करता था. एक दिन बातोंबातों में अंजलि ने निश्चल को बताया कि उस की पत्नी के बारे में अंजलि अजीब बातें कर रही थी. इस बात ने निश्चल के दिल में प्रियंका के प्रति पनप रहे गुस्से की आग में घी का काम किया.

वह उस से नफरत करने लगा. निश्चल की दोस्ती अपने ही जिले के नारायन कालोनी निवासी गवेंद्र गुप्ता और गदरपुर सिमैनी निवासी मंगतराम से थी. निश्चल ने एक दिन अपने दोस्तों को बैठा कर कहा, ‘‘तुम मेरे दोस्त हो, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए.’’

‘‘कैसी मदद?’’ मंगतराम ने पूछा तो निश्चल ने प्रियंका की कड़वी बातें और उस की हकीकत बता कर कहा, ‘‘जो भी हो, मैं उसे एक बार समझाना चाहता हूं. मान गई तो अच्छा है वरना उस का किस्सा खत्म कर दूंगा. तुम लोगों को भी मेरे साथ चलना होगा.’’

‘‘ठीक है, हम तुम्हारा साथ देंगे.’’ दोनों दोस्तों ने कहा.

26 अगस्त को निश्चल अपने घर बुआ के घर जाने का बहाना कर के बरेली आ गया. उस रात वह अजय गुप्ता के पैतृक घर पर रुका. अगले दिन उस ने प्रियंका के घर जाने की ठान ली. निश्चल जानता था कि प्रियंका दिन में घर में अकेली ही होती है. उस के कहने पर अगले दिन यानी 27 अगस्त को उस के दोनों दोस्त भी मोटरसाइकिल से बरेली आ गए. निश्चल रुद्रपुर जाने की बात कह कर बुआ के घर से चला गया. तीनों स्टेशन के बाहर एकत्र हुए और वहां से वे प्रियंका के घर पहुंचे. इत्तफाक से उस समय प्रियंका का छोटा भाई सचिन उस से मिलने आया था. उसे देख कर उन का इरादा बदल गया. निश्चल के साथ चूंकि उस के दोस्त भी थे, इसलिए प्रियंका ने कड़वाहट जाहिर नहीं कि और उन्हें चायनाश्ता कराया. इस के बाद तीनों चले गए.

उस दिन की योजना फेल होने के बाद निश्चल किसी और मौके की तलाश में लग गया. 29 अगस्त को रक्षाबंधन का त्योहार था. निश्चल को पता चला कि अजय गुप्ता उस दिन काम के सिलसिले में बदायूं जाने वाला है. निश्चल को लगा कि यह अच्छा मौका है. 29 अगस्त को अजय गुप्ता प्रियंका को कार से सीबीगंज उस के भाइयों के पास ले गया. वहां प्रियंका ने अपने भाइयों को राखी बांधी. इस के बाद अजय गुप्ता उसे खुर्रम गौटिया वाले घर पर छोड़ कर खुद बदायूं चला गया. दोपहर करीब ढाई बजे निश्चल अपने दोस्तों के साथ मोटरसाइकिल से प्रियंका के घर पहुंचा. खतरे से अंजान प्रियंका ने उन के लिए दरवाजा खोल दिया. उस वक्त वह अकेली थी. तीनों अंदर आ कर बैठे तो निश्चल मुद्दे की बात पर आ गया.

वह धमकी भरे लहजे में प्रियंका से बोला, ‘‘तुम अपनी आदत से बाज नहीं आ रही हो और मेरी पत्नी को बदनाम कर रही हो. मैं तुम्हें आखिरी बार समझा रहा हूं, अगर आज के बाद मैं ने कुछ सुना तो अच्छा नहीं होगा.’’

उस की बात सुन कर प्रियंका भड़क उठी, ‘‘तेरा दिमाग खराब हो गया है, जो मुझे धमका रहा है. तू जानता नहीं मैं क्या चीज हूं?’’

‘‘बकवास बंद कर, मैं तुझे भी जानता हूं और तेरी औकात भी. एक कौलगर्ल है तू, इस से ज्यादा कुछ नहीं.’’

यह कहने के साथ ही आवेश में निश्चल कुर्सी से खड़ा हो गया. प्रियंका आगबबूला हो उठी. वह गालियां देते हुए बोली, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत. रुक मैं अभी अजय को फोन कर के बताती हूं.’’

इस के साथ वह रसोई की ओर बढ़ी. उस का मोबाइल रसोई में रखा था, क्योंकि जिस समय निश्चल आया था, वह रसोई में अपने लिए खाना लगा रही थी. निश्चल समझ गया कि प्रियंका मानने वाली नहीं है. बात और बिगड़ सकती थी. वह अजय को फोन करती उस से पहले ही तीनों उस के पीछे रसोई में पहुंच गए. औपरेशन के बाद प्रियंका का पैर अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था. लंगड़ाते हुए ठोकर लगने से वह रसोई में गिर गई. निश्चल ने अपने दोस्तों से कहा, ‘‘इसे निपटा देते हैं, वरना यह हमें फंसवा देगी.’’

तीनों तुरंत सहमत हो गए. निश्चल ने उठने की कोशिश कर रही प्रियंका को पलक झपकते दबोच कर उस के गले में पड़ा दुपट्टा पकड़ कर कस दिया. उस ने हाथपैर चलाए तो दोनों दोस्तों ने पकड़ लिए. प्रियंका ज्यादा विरोध नहीं कर पाई और जिंदगी से हाथ हाथ धो बैठी. प्रियंका के मरने के बाद तीनों ने उस के गहने उतार लिए. हत्या के बाद निश्चल ने घर में रखा ताला उठाया और बाहर लगा दिया. तीनों वापस चले गए. इस बीच रास्ते में उन्होंने घर की चाबी एक नाले में फेंक दी. पुलिस की जांच से बचने के लिए उन्होंने उस दिन अपने मोबाइल बंद कर रखे थे.

तीनों को उम्मीद थी कि प्रियंका की हत्या पहेली बन कर रह जाएगी और वे कभी पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन मोबाइल औफ करने वाली गलती उन्हें भारी पड़ गई. उधर अगले दिन अजय गुप्ता वापस आया तो हत्या का पता चला. इस बीच उस ने कई बार प्रियंका को फोन किया था, लेकिन कोई काल रिसीव नहीं हुआ था. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने निश्चल और उस के साथियों के कब्जे से प्रियंका के लूटे गए गहने और हत्या में प्रयुक्त मोटरसाइकिल बरामद कर ली. उन के पकड़े जाने के बाद अजय गुप्ता ने राहत की सांस ली, क्योंकि पुलिस उस पर संदेह कर रही थी. पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत तें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक किसी की भी जमानत नहीं हो सकी थी. प्रियंका ने महत्वाकांक्षाओं व आजादियों में न पड़ कर समय रहते खुद को संभाल लिया होता और विश्वास कर के निश्चल के लिए दरवाजा नहीं खोला होता तो ऐसी नौबत नहीं आती. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: बदनामी का दाग

True Crime Story: शादी के बाद भी सरोज अपने प्रेमी सूरज को भुला नहीं पाई थी. फिर एक दिन वह मायके में आई तो प्रेमी के साथ भाग गई. बदनामी के इस दाग को धोने के लिए सरोज की ससुराल और मायके वालों ने ऐसी खौफनाक साजिश को अंजाम दिया कि…

उ त्तर प्रदेश के लखनऊ-हरदोई मार्ग पर थाना कस्बा मलिहाबाद बसा है, जो आमों के लिए भी मशहूर है. इसी थाने के गांव वंशीगढ़ी से थोड़ा आगे निकलते ही जंगल शुरू हो जाता है. 26 जुलाई की सुबह गांव के कुछ लोग जानवरों को चराने इसी जंगल में गए तो उन्हें वहां एक लड़के और एक लड़की की लाश पड़ी दिखाई दी. उन्होंने यह बात गांव के चौकीदार निहाल पासी को बताई तो उस ने यह सूचना थाना मलिहाबाद पुलिस को दे दी.

लाशें पड़ी होने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सुधाकर पांडेय, एसएसआई अमरनाथ और कुछ सिपाहियों को साथ ले कर बंशीगढ़ी के जंगल पहुंच गए. जंगल में काफी अंदर एक जवान लड़के और लड़की की क्षतविक्षत लाश पड़ी थी. सबूत की तलाश में सुधाकर पांडेय ने आसपास की झाडि़यों में ताकझांक की तो उन्हें एक हैंडबैग मिला. उस की तलाशी ली गई तो उस में लड़की के कुछ कपड़े और एक पहचानपत्र मिला.

वह पहचानपत्र मृतक युवक का था. उस के अनुसार मृतक सूरज धानुक था, जो थाना मलिहाबाद के गांव सिरगामऊ का रहने वाला था. घर वालों से उस की पहचान हो सकती थी. इसलिए सुधाकर पांडेय ने लाशों की फोटोग्राफी करा कर मृतकों का सामान कब्जे में ले लिया और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ भिजवा दिया. थाने लौट कर थानाप्रभारी ने चौकीदार निहाल की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

सुधाकर पांडेय ने पहचानपत्र से मिले पते पर एक सिपाही को भेजा तो वहां उस की मां गुडि़या मिली. जब उस से सूरज की हत्या के बारे में बताया गया तो वह अपने देवर के बेटे के साथ रोते हुए थाना मलिहाबाद पहुंची. गुडि़या ने लाशों के फोटो देखने के बाद रोते हुए बताया कि सूरज के साथ जिस युवती की लाश मिली है, वह लड़की सरोज है. दोनों एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. कुछ दिनों पहले सूरज सरोज को उस की ससुराल से ले कर भाग गया था, जिस की वजह से सरोज की ससुराल तथा मायके वाले काफी नाराज थे. 18 जुलाई को सरोज के पति मंजेश ने हरदोई के थाना संडीला में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. उसे पूरा यकीन है कि दोनों की हत्या उन्हीं लोगों ने की है.

गुडि़या के बताए अनुसार, मृतका का नाम सरोज था. वह उसी के गांव के रहने वाले रामऔतार पाल की बेटी थी, जो हरदोई के थाना संडीला के गांव ककराली के रहने वाले मंजेश के साथ ब्याही थी. गुडि़या ने यह भी बताया कि थाना संडीला में सरोज को भगाने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. उन्होंने पता किया तो सचमुच वहां रिपोर्ट दर्ज थी. उन्होंने इस मामले को वहां ट्रांसफर करने की कोशिश शुरू कर दी. लेकिन अधिकारियों के आदेश के बाद मुकदमा ट्रांसफर नहीं हो सका.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, सूरज और सरोज की मौत बेरहमी से मारपीट और गला घोंटने से हुई थी. पोस्टमार्टम के बाद लाशें सौंपने की बात आई तो सूरज के घर वाले तो उस की लाश ले गए, लेकिन सरोज की लाश लेने न तो उस की ससुराल से कोई आया और न ही मायके से. काफी देर बाद उस की मां और बहनें आईं तो पुलिस ने सरोज की लाश उन के हवाले कर दी. पुरुषों के न आने से पुलिस को संदेह हुआ. सुधाकर पांडेय सरोज के पति मंजेश की तलाश में उस के घर पहुंचे तो मंजेश ही नहीं, घर के अन्य पुरुष भी गायब थे. इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि दोनों हत्याएं इन्हीं लोगों ने की होंगी.

मंजेश की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने उस के सभी रिश्तेदारों के घर छापा मारा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. पुलिस ने मंजेश के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि सरोज जब ससुराल से भागी थी, तभी से मंजेश अपने दोनों सालों दिनेश उर्फ तिवारी और शिवकुमार के संपर्क में था. इस के बाद सुधाकर पांडेय सिरगामऊ स्थित सरोज के मायके पहुंचे तो उस के भाई दिनेश और शिवकुमार भी घर से गायब मिले.

5 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने मुखबिर की सूचना पर दिनेश और शिवकुमार को उन के घरों से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर की गई पूछताछ में दिनेश और शिवकुमार ने अपना जुर्म कबूल करते हुए इस सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड के बारे में पुलिस के सामने जो बयान दिया, उस में औनर किलिंग की एक खौफनाक कहानी सामने आई, जो इस प्रकार थी. लखनऊ की थानाकोतवाली मलिहाबाद का एक गांव है सिरगामऊ. इसी गांव में शुकुल धानुक  अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी गुडि़या, 2 बेटे सूरज, रोहित और 2 बेटियां थीं. शुकुल धानुक खेतीबाड़ी कर के गुजारा करता था. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, जिस की वजह से वह बच्चों को पढ़ालिखा नहीं सका.

22 साल का सूरज खेती करने के साथसाथ आम के बागों की देखभाल करता था. बेटियां और दूसरा बेटा अभी छोटे थे. इसी गांव में रामऔतार भी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रूपमती, 3 बेटियां तथा 2 बेटे दिनेश और शिवकुमार थे. रामऔतार लखनऊ में सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी करता था. बड़ा बेटा दिनेश एक स्कूल की बस चलाता था. गांव में थोड़ीबहुत जमीन थी, जिस से खानेपीने भर का अनाज पैदा हो जाता था. इस तरह परिवार का गुजारा आराम से हो रहा था. रामऔतार और शुकुल धानुक के घर अगलबगल थे. लेकिन अलगअलग जाति के होने की वजह से दोनों परिवारों में ज्यादा मेलजोल नहीं था. हां, उन के बच्चे जातिपांत को न मानते हुए आपस में मेलजोल रखते थे.

सूरज और रामऔतार की तीसरे नंबर की बेटी सरोज हमउम्र थे, इसलिए बचपन से साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे. सूरज को सरोज बहुत अच्छी लगती थी. जब भी वह सरोज को देखता, उस की आंखों में अनोखी चमक आ जाती. इसलिए वह उसे हमेशा देखते रहना चाहता था. सरोज ने भी इस बात को महसूस किया तो उस के मन में भी सूरज के लिए कोमल भावनाएं अंगड़ाई लेने लगीं. इस का परिणाम यह निकला कि दोनों एकदूसरे को चाहने लगे.

सरोज उर्फ बउवा गोरे रंग की खूबसूरत लड़की थी. शोख, चंचल और मिलनसार स्वभाव की होने की वजह से सभी उसे प्यार करते थे. सूरज का घर बगल में ही था, इसलिए वह जैसे ही घर से बाहर निकलता, सरोज को पता चल जाता. इस के बाद किसी बहाने से वह सूरज से मिलने बागों की ओर निकल जाती, जहां दोनों घंटों अकेले में बैठ कर प्यार की मीठीमीठी बातें करते और एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाते. लेकिन जब शादी की बात आई तो सूरज ने कहा कि वह छोटी जाति का है, इसलिए उस के घर वाले इस शादी के लिए कभी तैयार नहीं होंगे.

इस बात से सरोज उदास हो गई. उसे उदास देख कर सूरज ने कहा कि वह उस के बिना जीने की बात सोच नहीं सकता, इसलिए गांव से भाग कर कहीं दूर चले जाएंगे, जहां उन के घर वाले उन्हें खोज नहीं पाएंगे. इस के बाद कुछ पैसे ले कर दोनों भाग गए. शाम को जब सरोज के घर से भाग जाने का पता चला तो बदनामी के डर से रामऔतार बेटों के साथ चोरीछिपे उस के बारे में पता लगाने लगा. उस ने थाने में सूरज के खिलाफ रिपोर्ट भी नहीं दर्ज कराई. उस के घर जा कर धमकी जरूर दे आए कि अगर सूरज ने सरोज को जल्दी घर ला कर नहीं छोड़ा तो इस का परिणाम बहुत भयानक होगा.

शुकुल धानुक और गुडि़या वैसे भी सीधेसादे स्वभाव के थे, उन्होंने इस मामले में चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. दूसरी ओर जीनेमरने की योजना बना कर भागे सूरज और सरोज के पास जब तक पैसे रहे, तब तक पतिपत्नी के रूप में अपनी ही दुनिया में डूबे रहे. लेकिन जब पैसे खत्म हो गए तो आटेदाल के भाव का पता चला. सूरज ने कामधंधे की बहुत तलाश की, लेकिन जहां भी काम मिलता, वेतन इतना कम होता कि दोनों का गुजारा होना मुश्किल था. जब उन के भूखों मरने की नौबत आ गई तो घर लौटने के अलावा उन के पास कोई उपाय नहीं बचा. आखिर हिम्मत कर के दोनों घर लौट आए. उन का सोचना था कि वे घर वालों से कह कर शादी कर लेंगे.

सरोज के लौटने पर पहले तो घर वालों ने उसे जी भर कर कोसा, उस के बाद उस के लिए लड़के की तलाश करने लगे. इसी के साथ उस के घर से बाहर निकलने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई. सरोज समझ गई कि अब सूरज के साथ जिंदगी बिताने का उस का सपना सपना ही बन कर रह जाएगा, क्योंकि उस के घर वाले किसी भी हालत में उस की शादी सूरज के साथ नहीं करेंगे. काफी दौड़धूप के बाद रामऔतार को पड़ोस के गांव ककराली में मिश्रीलाल का बेटा मंजेश सरोज के लिए पसंद आ गया. इस के बाद मंजेश से उस की शादी हो गई. यह सन 2012 की बात है.

शादी के बाद सरोज ससुराल चली गई. मंजेश सरोज जैसी सुंदर पत्नी पा कर बेहद खुश था. यही वजह थी कि वह पत्नी की हर इच्छा का खयाल रखता था. इस के बावजूद सरोज सूरज को भुला नहीं पाई. वह जब भी अकेली होती, सूरज को याद कर के आंसू बहाती रहती. धीरेधीरे ढाई साल गुजर गए. इस बीच वह मंजेश के बेटे की मां बन गई. सूरज भी सरोज को नहीं भुला सका था. दिनरात सरोज उस के खयालों में छाई रहती. शायद वह अपनी जिंदगी सरोज की यादों में काटना चाहता था. इसीलिए अभी तक उस ने शादी नहीं की थी. उसी बीच उस के पिता की मौत हो गई तो परिवार चलाने की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ गई.

एक दिन वह बागों से लौटा तो पता चला कि सरोज मायके आई है. उस ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो भी हो, वह सरोज से जरूर मिलेगा और उस के दिल का हाल पूछेगा. अब तक सरोज के घर वालों को लगने लगा था कि सरोज सूरज को भूल चुकी होगी, इसलिए उन्होंने उसे गांव में किसी के घर आनेजाने की छूट दे दी होगी. सूरज मौके की तलाश में रहने लगा. एक दिन दोनों मिले तो एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. सरोज ने सूरज का नंबर सहेली के नाम से सेव कर लिया. इस बीच दोनों सब की नजरें बचा कर कई बार मिले. इन मुलाकातों में जब सरोज ने बताया कि वह इस शादी से जरा भी खुश नहीं है तो सूरज चौंका. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सरोज अब भी उसे अपने दिल में बसाए है. उसे लगता था कि सरोज उसे भुला कर अपने परिवार में रम गई होगी.

सूरज ने पूछा, ‘‘क्या तुम अब भी मेरे साथ जिंदगी गुजारने को तैयार हो.’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए अपना बसा-बसाया घर छोड़ने को लिए तैयार हूं.’’

इस के बाद दोनों ने खूब सोचविचार कर योजना बना डाली. मायके से सरोज का भागना ठीक नहीं था. वैसे भी उस के घर वाले ज्यादा देर तक बाहर रहने पर चौकन्ने हो जाते थे. इसलिए उस ने कहा कि ससुराल जाने के कुछ दिनों बाद वह बच्चे को छोड़ कर अकेली सूरज के साथ भाग जाएगी. सरोज के साथ घर से भागने की योजना बनाने के बाद सूरज पैसों का इंतजाम करने लगा. कुछ दिनों बाद मंजेश आया तो सरोज ससुराल चली गई. ससुराल में किसी को भी उस के घर से भाग जाने का अंदाजा नहीं था, इसलिए उस के घर से बाहर आनेजाने की पूरी छूट थी.

16 जुलाई को सूरज सरोज से संडीला कस्बे में शीतला देवी के मेले में मिला तो कहा कि रात में वह गांव के बाहर आ कर उसे फोन कर देगा. उस के बाद वह तुरंत घर से निकल कर उस के पास आ जाए. सरोज ने हामी भर दी. रात में सूरज ने फोन किया तो अपने 8 महीने के बेटे को सोता छोड़ कर सरोज गांव के बाहर इंतजार कर रहे सूरज के पास आ गई. सूरज सरोज को साथ ले कर मन में नई जिंदगी बसाने के सतरंगी सपने देखता हुआ लखनऊ की ओर चल पड़ा. कुछ देर बाद बच्चे का रोना सुन कर उस की सास सोमा देवी ने सरोज को आवाज देते हुए बच्चे को चुप कराने को कहा. जब बच्चा चुप नहीं हुआ तो वह बहू सरोज के कमरे में गई. लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. सोमा को चिंता हुई कि इतनी रात में बहू कहां चली गई. उस ने बेटे को जगाया. इस के बाद सभी सरोज को तलाशने लगे.

सरोज के न मिलने पर घर वालों को शक हो गया कि जरूर वह किसी के साथ भाग गई होगी. इस के बाद मंजेश ने सरोज के घर छोड़ कर कहीं जाने की बात अपने साले दिनेश को बता कर पूछा कि कहीं सरोज वहां तो नहीं गई है. दिनेश ने कह दिया कि वह यहां नहीं आई है. बहन की करतूत सुन कर दिनेश ने अपना सिर पीट लिया. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि शादी के ढाई, तीन साल बाद सरोज इस तरह घर छोड़ कर चली जाएगी. उन्होंने मंजेश से कहा कि वह पता लगाए कि सरोज को जाते हुए किसी ने देखा तो नहीं, वह किस के साथ गई है.

काफी खोजबीन के बाद भी जब सरोज का कुछ पता नहीं चला तो 2 दिन बाद मंजेश ससुराल आ कर गांव में हो रही अपनी बदनामी के बारे में बता कर गालीगलौच करने लगा. रामऔतार का परिवार बेटी की इस करतूत से काफी दुखी था. दामाद की पीड़ा को समझते हुए उन्होंने उसे सब कुछ बता दिया. तब 18 जुलाई को मंजेश ने संडीला कोतवाली में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ अपनी पत्नी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. संडीला पुलिस ने काररवाई करते हुए सूरज के घर जा कर पूछताछ की तो वे उस के बारे में कुछ नहीं बता सके. सूरज का दोस्त धर्मेंद्र घर में ही मिल गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह सूरज और सरोज के प्रेमसंबंधों के बारे में तो जानता था, लेकिन वे कहां हैं, इस बात की जानकारी उसे नहीं है.

पूछताछ के बाद धर्मेंद्र को छोड़ दिया गया. इधर पुलिस ने सूरज और सरोज के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था. दूसरी ओर मंजेश अपने साले दिनेश, शिवकुमार तथा अन्य कुछ रिश्तेदारों के साथ सरोज की तलाश में लगा था. मंजेश के गांव ककराली में उस की पत्नी सरोज के घर से भाग जाने की बात चर्चा का विषय बनी हुई थी. लोग चटखारे लेले कर आपस में तरहतरह की बातें कर रहे थे, जिस से घर वालों का बाहर निकलना दूभर हो गया था. 26 जुलाई की शाम मंजेश अपने चचेरे चाचा राकेश के साथ अपनी ससुराल पहुंचा, तभी उस के मोबाइल पर सरोज का फोन आया कि वह इस समय दुबग्गा में है और उस के साथ घर चलना चाहती है.

सरोज का फोन सुन कर मंजेश ने दिनेश से कहा कि गांव में उस की इतनी बदनामी हो चुकी है कि अब वह सरोज को अपने घर नहीं ले सकता. दिनेश और शिवकुमार भी उसे अपने घर में नहीं रखना चाहते थे. तुरंत सभी ने सरोज की हत्या की योजना बना डाली. इस में दिनेश और शिवकुमार ने अपने चचेरे भाई हिन्ना उर्फ सुनील को भी शामिल कर लिया. वे भी चाहते थे कि किसी तरह सूरज मिल जाए तो वे उस का भी काम तमाम कर दें. मंजेश की मोटरसाइकिल पर राकेश और हिन्ना और दिनेश व शिवकुमार अपनी मोटरसाइकिल से रात 11 बजे अंधे की चौकी के पास कलामंडी होते हुए दुबग्गा में सरोज द्वारा बताए स्थान पर पहुंच गए. सरोज वहां मिल गई.

सरोज से सूरज के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले वह उसे छोड़ कर बालागंज की ओर गया है. दिनेश के चचेरे भाई सुनील उर्फ हिन्ना ने राकेश को तुरंत अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और बालागंज की ओर चल पड़ा. थोड़ी दूर जाने पर सूरज दिखाई दे गया. हिन्ना उसे गांव में पंचायत के सामने सरोज से उस की शादी करवाने का झांसा दे कर मोटरसाइकिल पर बीच में बैठा लिया और उसे भी वहां ले आया जहां मंजेश, राकेश और दिनेश सरोज को ले कर उस का इंतजार कर रहे थे.

सरोज ने डरते हुए चोर नजरों से सब की ओर देखा. उन के चेहरों के भाव देख कर वह कांप उठी. लेकिन अब बाजी उस के हाथ से निकल चुकी थी. दोनों को ले कर वे माल की ओर जाने वाली रोड पर चलते हुए वंशीगढ़ी के जंगल में पहुंचे. जंगल में सन्नाटा छाया था. राकेश सूरज को पकड़ कर एक जगह खड़ा हो गया तो मंजेश सरोज को ले कर जंगल के अंदर चला गया. उस के पीछेपीछे सरोज के दोनों भाई दिनेश और शिवकुमार भी थे. मंजेश ने सरोज को पकड़ने का इशारा किया तो दिनेश और शिवकुमार ने सरोज के हाथ और पैर कस कर पकड़ लिए. इस के बाद मंजेश ने सरोज के गले में पड़ी चुन्नी से उस का गला कस दिया. सरोज के बेहोश होने पर मंजेश ने डंडे से तो दिनेश, हिन्ना और शिवकुमार ने उसे लातघूंसों से मारना शुरू किया. थोड़ी देर में सरोज की मौत हो गई.

सरोज को मार कर वे सूरज के पास पहुंचे. सूरज अब तक समझ चुका था कि उन लोगों ने सरोज की हत्या कर दी होगी, अब उस की बारी है. सरोज को भी वे उसी जगह ले गए, जहां सरोज की लाश पड़ी थी. दिनेश ने उस के दोनों हाथ पकड़े तो राकेश ने उस का मुंह दबाया. हिन्ना और शिवकुमार ने उस के पैर पकड़ लिए. सूरज के बैग से शर्ट निकाल कर उसे वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. शर्ट से हिन्ना और शिवकुमार ने सूरज का गला कस दिया, जिस से वह भी बेहोश हो गया. इस के बाद उसे भी डंडे और लातघूंसों से पीटपीट कर मार दिया गया.

दोनों की हत्या करने के बाद मंजेश और उस के चाचा राकेश अपने गांव ककराली चले गए तो सरोज के भाई दिनेश, शिवकुमार तथा हिन्ना अपने गांव सिरगामऊ लौट आए. हत्या के 2 दिनों बाद जब उन्हें पता चला कि मलिहाबाद पुलिस लाशों को बरामद कर के जांच कर रही है तो सभी अपनेअपने घरों से फरार हो गए. लेकिन पुलिस के हाथ उन के गिरेबान तक पहुंच ही गए. शिवकुमार की  मोटरसाइकिल यूपी32-ईएल 3768 पुलिस ने बरामद कर ली थी. सूरज एसपी था, इसलिए मुकदमे में धारा 147 और 3(2)5 एससी/एसटी एक्ट की धारा और बढ़ा दी गई थी.

6 अगस्त को इंसपेक्टर सुधाकर पांडेय ने इस दोहरे हत्याकांड के आरोपी दिनेश उर्फ तिवारी तथा शिवकुमार को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 7 अगस्त को सरोज के पति मंजेश ने भी न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. 11 अगस्त को सुबह 10 बजे पुलिस ने हिन्ना उर्फ सुनील को कुशनगरी गांव के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपनी मोटरसाइकिल से कहीं जाने की फिराक में था. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हिन्ना की मोटरसाइकिल यूपी32- डीएच3125 भी अपने कब्जे में ले ली. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया.

21 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने अभियुक्तों की निशानदेही पर आलाकत्ल वे लाठीडंडे भी बरामद कर लिए गए, जिन से सूरज और सरोज की हत्या की गई थी. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी राकेश फरान था. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Delhi News: घर छिनने की नौबत पर मां और 2 बेटों ने दी जान

Delhi News: राजधानी दिल्ली से एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिस ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है. यहां मां और 2 बेटों ने फंदा लगाकर जान दे दी. क्या वजह थी कि परिवार इतना परेशान था कि अपनी जान देनी पड़ी. क्या है इस परिवार की दर्दनाक घटना, जो आप को भी सोचने पर मजबूर कर देगी. चलिए जानते हैं, इस पूरी स्टोरी को विस्तार से.

यह हैरान कर देने वाली घटना दिल्ली के कालकाजी क्षेत्र से सामने आई है. यहां मानसिक तनाव और पैसों की तंगी से परेशान अनुराधा कपूर नाम की महिला और उस के 2 बेटों आशीष कपूर और चैतन्य कपूर ने 19 दिसंबर, 2025 को फांसी लगाकर जान दे दी.

पुलिस के अनुसार, तीनों के शव उन के घर में पंखे से लटके मिले. सूचना मिलने पर कालकाजी थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शवों को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए सुरक्षित रख लिया. शुरुआती जांच में पुलिस को कमरे से एक सुसाइड नोट मिला जिस में लिखा था कि तीनों पैसों की तंगी और घर टूटने की वजह से मानसिक तनाव में थे. वे कालकाजी इलाके के जी ब्लौक के मकान नंबर B-70 में रहते थे. पुलिस ने बताया कि दोपहर करीब पौने 3 बजे एक पुलिसकर्मी कोर्ट का नोटिस ले कर उन के घर पहुंचा था.

कई बार गेट और डोरबेल बजाई, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं मिल पाया था. शक होने पर उस ने मामले की सूचना कालकाजी पुलिस स्टेशन को दे दी थी. इस के बाद पुलिस पहुंची, तो घर का गेट अंदर से बंद था. इस के बाद चाबी वाले को बुलाकर डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. पुलिस घर के अंदर गई तो मां और उस के दोनों बेटे फंदे से लटके हुए थे. इस के बाद तीनों को नीचे उतारकर अस्पताल भेजा, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया.

एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि घर से एक सुसाइड नोट मिला है, जिस में परिवार की परेशानी का जिक्र है. पुलिस का कहना है कि शुरुआती जांच में सामने आया है कि परिवार लंबे समय से पैसों की तंगी से जूझ रहा था. जिस घर में वे रहते थे, उसे ले कर पड़ोसी से विवाद चल रहा था. दूसरी पार्टी ने कोर्ट में केस जीत लिया था, जिस के बाद घर खाली करने का आदेश दिया गया.

सूत्रों के मुताबिक, 19 दिसंबर, 2025 को पुलिसकर्मी घर खाली करने का कोर्ट नोटिस देने पहुंचा था. फिलहाल पुलिस पूरे मामले की विस्तार से जांच कर रही है. Delhi News

Delhi Crime: डांस विवाद बना जानलेवा, युवक की चाकू मारकर हत्या

Delhi Crime: एक ऐसी घटना सामने आई है, जिस में डांस को ले कर हुए मामूली विवाद ने एक युवक की जान ले ली. आखिर ऐसा क्या विवाद था, जिस में एक युवक को अपनी जान गंवानी थी. क्या है इस पूरी घटना का सच? आइए जानते हैं इस क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो छोटे विवादों से सतर्क और सावधान रहने की सीख देती है.

यह हैरान कर देने वाली वारदात पूर्वी दिल्ली से सामने आई है. शकरपुर इलाके में 20 दिसंबर, 2025 की रात एक नाबालिग ने अपने दोस्त के साथ मिलकर चाकू से गोदकर बहन के कथित प्रेमी विशाल की हत्या कर दी. शादी समारोह में डांस करने को ले कर दोनों नाबालिगों और विशाल के बीच विवाद हुआ था, जिस के बाद घर के बाहर उस की जान ले ली गई.

विशाल अपने परिवार के साथ शकरपुर के स्कूल ब्लौक में रहता था. उस के परिवार में पापा के अलावा 4 बहनें और एक भाई है. विशाल पेशे से औटो ड्राइवर था. परिवार के अनुसार, शनिवार रात विशाल की बहन पूजा की सहेली प्रियंका की शादी पास के शिव मंदिर में थी, जिस में पूरा परिवार शामिल हुआ था.

रात करीब 11 बजे विशाल शादी में पहुंचा. उस ने पहले खाना खाया और फिर डांस करने लगा. वहां पहले से 2 नाबालिग भी डांस कर रहे थे. इसी दौरान विशाल का उन से विवाद हो गया, जो देखते ही देखते गंभीर हो गया. विवाद के बाद विशाल घबराई हुई हालत में अपनी बहनों के पास पहुंचा और उन्हें साथ ले कर घर आ गया. रास्ते में उस ने बताया कि नाबालिगों के पास चाकू था और वे उसे जान से मारने की धमकी दे रहे थे. बहनें घर के अंदर चली गईं और विशाल बाहर अपने एक परिचित से बात करने लगा.

इसी दौरान दोनों नाबालिग वहां पहुंचे और उन्होनेवविशाल पर 5 से ज्यादा बार चाकू से वार किए. शोर सुनकर जब फेमिली वाले बाहर आए, तब तक आरोपी मौके से फरार हो चुके थे. घायल विशाल को एलबीएस अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर दोनों आरोपियों की पहचान कर उन्हें पकड़ लिया.

पुलिस के अनुसार, एक आरोपी को शक था कि विशाल उस की बहन से प्रेम करता है, इसी नाराजगी में उस ने इस वारदात को अंजाम दिया. Delhi Crime

Family Dispute: नाकाम साजिश : बहू ने बनाई सास की हत्या की योजना

Family Dispute: कुलदीप कौर पिछले कई महीनों से परेशान थी, लेकिन परेशानी की वजह उस की समझ में नहीं आ रही थी. उस का मन हर समय बेचैन रहता था. अजीबोगरीब विचार मन को उलझाए रखते थे. वह कितना भी अच्छा सोचने की कोशिश करती, मन सकारात्मक सोच की ओर न जा कर नकारात्मक सोच में ही डेरा जमाए रहता था.

बुरे विचारों से जैसे कुलदीप का नाता जुड़ गया था. मन को समझाने और बुरे विचारों से दूर रहने के लिए वह अपना अधिकांश समय गुरुद्वारे में व्यतीत करने लगी थी. कुलदीप कौर की चिंता का विषय सात समंदर पार पंजाब में बैठी अपनी मां राजविंदर कौर थीं. हालांकि 57 वर्षीय राजविंदर कौर की देखभाल के लिए गांव के घर में उस की भाभी शगुनप्रीत कौर थी, लेकिन भाभी पर उसे भरोसा नहीं था.

कुलदीप के पति मनमोहन सिंह ने उसे कई बार समझाया भी था कि बेकार में चिंता करने से कोई फायदा नहीं है. अगर मन इतना ही परेशान है तो इंडिया का चक्कर लगा आओ. वहां अपनी मां से मिल लेना. लेकिन समस्या यह थी कि उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी. डाक्टरों ने ऐसी हालत में हवाई यात्रा करने से मना कर रखा था. बहरहाल, इसी उधेड़बुन में कुलदीप कौर के दिन गुजर रहे थे.

भरापूरा परिवार था बलदेव सिंह का

कुलदीप कौर मूलत: गांव बुट्टर सिविया, थाना मेहता, जिला अमृतसर, पंजाब की रहने वाली थी. उस के जीवन के 16 बसंत भी अपने गांव बुट्टर में ही गुजरे थे. गांव में रहते ही उस ने जवानी की दहलीज पर पांव रखे थे. कुलदीप का छोटा सा परिवार था. पिता बलदेव सिंह और मां राजविंदर कौर के अलावा उस के 2 भाई थे गगनदीप सिंह और सरबजीत सिंह. तीनों भाईबहनों का आपस में बहुत प्यार था. वे तीनों बहनभाई कम दोस्त ज्यादा लगते थे. आपस में इन की कोई बात एकदूसरे से छिपी नहीं रहती थी.

बलदेव सिंह जाट सिख किसान थे. उन के पास खेती की ज्यादा जमीन तो नहीं थी, पर जितनी थी वह परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए काफी थी. इसीलिए बलदेव सिंह ने अपने तीनों बच्चों को सिर उठा कर आजादी से जीना सिखाया था. उन्होंने तीनों बच्चों को अपनी हैसियत के हिसाब से पढ़ाया था. बच्चों के लिए अभी वह और भी बहुत कुछ करना चाहते थे, पर साल 2002 में उन की मौत हो गई. बलदेव सिंह की मौत के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारियां राजविंदर कौर के कंधे पर आ गई थीं. उस वक्त उन का बड़ा बेटा गगनदीप जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका था. वह मां का हाथ बंटा कर उस का सहारा बन गया. घर की गाड़ी फिर से अपनी स्पीड से दौड़ने लगी थी.

साल 2008 इस परिवार के लिए अच्छा साबित हुआ. इसी साल कुलदीप कौर के लिए एक अच्छे परिवार का रिश्ता आया, लड़के का नाम मनमोहन सिंह था. वह अच्छे घर का पढ़ालिखा गबरू जाट था और आस्ट्रेलिया में अपना कारोबार करता था. राजविंदर कौर को मनमोहन और उस का परिवार कुलदीप के लिए पसंद आया. कुलदीप को भी मनमोहन सिंह पसंद था. दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद सन 2008 में कुलदीप कौर और मनमोहन सिंह की शादी धूमधाम से संपन्न हो गई. इस शादी से सभी लोग खुश थे.

अचानक हो गई गगनदीप की मौत

खुशी का माहौल था, पर कहीं अनहोनी मुंह पसारे इस परिवार की खुशियों को लीलने के लिए घात लगाए बैठी थी. कुलदीप की शादी के कुछ दिनों बाद ही इस परिवार को तब बड़ा झटका लगा, जब अचानक गगनदीप की मौत हो गई.

गगनदीप की मौत का सदमा उस की मां राजविंदर कौर और उस के छोटे भाईबहन को भीतर तक तोड़ गया. कुलदीप की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे नाजुक मौके पर वह अपनी मां और छोटे भाई सरबजीत को अकेला छोड़ कर पति के साथ आस्ट्रेलिया जाए या यहीं रह कर उन का साथ दे.
संसार का नियम है, यहां लोग आतेजाते हैं, सब कुछ समय की गति से चलता रहता है. जबकि समय का चक्र और संसार के कामकाज कभी नहीं रुकते. वक्त का मरहम बड़े से बड़ा घाव भर देता है. बहरहाल, अपनी मां और भाई को दिलासा दे कर कुलदीप कौर अपने पति मनमोहन सिंह के साथ आस्ट्रेलिया चली गई. कुलदीप को आस्ट्रेलिया गए 10 साल बीत गए थे.

इस बीच वह सरताज सिंह और सम्राट सिंह 2 बच्चों की मां बन गई थी. उस के पीछे मायके में छोटे भाई सरबजीत सिंह की भी शगुनप्रीत कौर के साथ शादी हो गई थी. सरबजीत भी 2 बच्चों बेटी मनतलब कौर और बेटे वारिसदीप सिंह का बाप बन गया था. कुलदीप की अपनी मां और भाई से हर हफ्ते फोन पर बातें होती रहती थीं. सभी अपनीअपनी जिंदगी में मशगूल थे कि साल 2015 की एक मनहूस खबर ने कुलदीप को अंदर तक तोड़ कर रख दिया. इस घटना से राजविंदर कौर की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई थी. उसे अपने पति और बड़े बेटे गगनदीप की मौत का इतना दुख नहीं हुआ था, जितना दुख सरबजीत की मौत का हुआ.

सरबजीत की मौत बड़े रहस्यमय तरीके से हुई थी. वह रात को खाना खा कर ऐसा सोया कि सोता ही रह गया. सरबजीत अपने परिवार का एकमात्र सहारा था. उस की मौत से परिवार की गाड़ी पूरी तरह लड़खड़ा गई. वक्त ने ताजा जख्मों पर एक बार फिर से मरहम लगाया. राजविंदर कौर ने अपने आप को पूरी तरह से अकेला मान कर जीना सीख लिया था. समय का चक्र फिर से अपनी रफ्तार से चलने लगा. कुलदीप मां को फोन करकर के सांत्वना देती रहती थी. सैकड़ों मील दूर बैठी कुलदीप और कर भी क्या सकती थी. इसी तरह दिन गुजरते गए थे और साल 2016 आ गया.
दूसरे बेटे की मौत से टूट गई मां

कुलदीप कौर ने महसूस किया कि सरबजीत सिंह की मौत के बाद गांव से उस की मां के जो फोन आते थे, वह काफी मायूसी भरे होते थे. सुन कर कुलदीप को ऐसा लगता था, जैसे उस की मां बहुत परेशान और दुखी हैं. उस ने बहुत बार मां से इस बारे में पूछा भी था, पर मां ने उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था. वह बहुत दुखी लग रही थीं. ज्यादा कुरेद कर पूछने पर राजविंदर ने सिर्फ इतना ही बताया कि पिछले कुछ समय से शगुन का चालचलन ठीक नहीं है.

कुलदीप कौर ने जब शगुन से इस बारे में बात की तो उस ने बताया, ‘‘दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है. बीजी को एक तो बेटे की मौत का सदमा है, ऊपर से अकेलापन परेशान करता है. कभीकभी शुगर की बीमारी की वजह से भी उन्हें घबराहट होने लगती है. आप चिंता न करें, मैं सब संभाल लूंगी.’’

शगुन की गोलमोल बातें कुलदीप की समझ से बाहर थीं. वह अच्छी तरह जानती थी कि शगुन बहुत चालाक है. वह सच्ची बात कभी नहीं बताएगी. इसीलिए कुलदीप ने अपने गांव के कुछ खास लोगों को फोन कर के विनती की कि वे उस के घर हो रहे क्रियाकलापों पर नजर रखें. गांव के जानकार लोगों ने कुलदीप कौर की बात मान कर राजविंदर के घर पर नजर रखनी शुरू कर दी.

बाद में उन्होंने कुलदीप को बताया कि उस की मां के घर में सामने से तो सब कुछ ठीक नजर आता है. शगुन लोगों के सामने तो राजविंदर कौर का बहुत खयाल रखती है. बाकी उन की पीठ पीछे घर में सासबहू का आपस में कैसा बर्ताव है, कुछ कहा नहीं जा सकता. बहरहाल, ऐसा जवाब सुन कर कुलदीप कौर मन मसोस कर रह जाती थी और अपनी मां की सलामती की दुआ करती थी.

29 अक्तूबर, 2016 को शगुन ने कुलदीप कौर को आस्ट्रेलिया फोन कर के खबर दी कि बीजी का देहांत हो गया है. शगुन ने मौत की वजह राजविंदर का शुगर लेवल कम हो जाना बताया था. उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी, डाक्टरों ने उसे यात्रा के लिए मना कर रखा था सो अपने घर के एकांत में कुलदीप ने छाती पीट कर मां की मौत का मातम मना लिया. अब उस के मायके के परिवार में सिवाय उस के कोई और नहीं बचा था. राजविंदर की मौत के बाद 2-4 बार शगुन के फोन उसे आए थे, पर वह बिना सिरपैर की बातें ही किया करती थी. एक बात थी जो हर समय कुलदीप को परेशान कर रही थी. उसे हर समय ऐसा लगता था जैसे उस की मां की मौत स्वाभाविक नहीं थी. जरूर उस के साथ कोई अनहोनी घटी थी, पर क्या हुआ और कैसे यह बात उस की समझ में नहीं आती थी.

मां सरबजीत की मौत के बाद शगुन गांव की कोठी और सारी जमीन की मालकिन बन गई थी. कुलदीप अकसर यह भी सोचा करती थी कि कहीं उस की मां की मौत किसी षडयंत्र की वजह से तो नहीं हुई.
बहरहाल, कुलदीप ने एक बार फिर से अपने गांव के भरोसेमंद लोगों से अपनी मां की मौत से परदा उठाने के लिए विनती की. इस बात का पता लगाने में गांव के कुछ खास लोगों को पौने 2 साल का समय लग गया.

जुलाई 2018 में कुलदीप कौर को सूचना मिली थी कि उस की मां राजविंदर कौर की मौत में उस की भाभी शगुन का हाथ था. यह सुन कर वह ज्यादा हैरान नहीं हुई, क्योंकि उसे शगुन पर शुरू से ही शक था. यह तो दूर का मामला था, अगर वह कहीं पास होती तो कब की अपनी मां की मौत से परदा उठा देती.
खैर, अब भी देर नहीं हुई थी और अब वह पूरी तरह से यात्रा करने लायक थी. बीती जुलाई के दूसरे सप्ताह में वह आस्ट्रेलिया से भारत अपने गांव पंजाब पहुंच गई. जब अपने मायके के घर पहुंच कर उस ने वहां का नजारा देखा तो हैरान रह गई. उस की मां के घर 2 अनजान आदमी बैठे शगुन के साथ हंसीमजाक कर रहे थे.

गुस्से से बिफरते हुए जब कुलदीप कौर ने पूछा, ‘‘भाभी, ये लोग कौन हैं?’’ तो शगुन ने मिमियाते हुए जवाब दिया, ‘‘दीदी, तुम्हारे भाई की मौत के बाद ये दोनों खेतों में काम करने में मदद करते हैं.’’

कुलदीप को शक हुआ भाभी पर

कुलदीप अच्छी तरह जानती थी कि शगुन जो बता रही है, बात वह नहीं है. पर उस वक्त उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा. कुलदीप के आने की वजह से वे दोनों व्यक्ति वहां से चले गए. अगले दिन सुबह उठ कर कुलदीप नहाईधोई और गुरुद्वारे चली गई. अरदास के बाद वह अपने मौसा हरदयाल सिंह को साथ ले कर सीधे एसएसपी (देहात) अमृतसर परमपाल सिंह के पास जा पहुंची. कुलदीप ने अपनी मां की हत्या का शक जताते हुए उन्हें बताया कि मां की मौत में उस की भाभी और कुछ अन्य लोगों का हाथ है.

एसएसपी परमपाल सिंह ने कुलदीप द्वारा दिए प्रार्थनापत्र पर नोट लिख कर उसे संबंधित थाना मेहता भेज दिया. साथ ही उन्होंने थानाप्रभारी अमनदीप सिंह को फोन कर आदेश दिया कि इस मामले की गुत्थी जल्द से जल्द सुलझाएं. कुलदीप कौर ने उसी दिन थानाप्रभारी अमनदीप से मिल कर आस्ट्रेलिया जाने से ले कर अपनी गैरहाजिरी में अपने भाई और मां की मौत का सारा हाल विस्तार से कह सुनाया. कुलदीप कौर की पूरी बात सुनने के बाद अमनदीप सिंह ने तत्काल अपने खास मुखबिरों को शगुन और उस के साथियों की कुंडली खंगालने के काम पर लगा दिया. जल्दी ही उन्हें रिपोर्ट भी मिल गई.

एसएसपी के आदेश पर उन्होंने कुलदीप कौर की शिकायत को आधार बना कर उसी दिन यानी 30 जुलाई, 2018 को राजविंदर कौर की हत्या का मुकदमा भादंसं की धारा 302, 201, 120बी और 34 पर दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी. अमनदीप सिंह ने उसी दिन एएसआई कमलबीर सिंह, हवलदार जतिंदर सिंह, महिंदरपाल सिंह, कांस्टेबल महकप्रीत सिंह और लेडी हवलदार हरजिंदर कौर को साथ ले कर बुट्टर गांव पहुंचे और देर शाम शगुनप्रीत कौर और उस के आशिक सतनाम सिंह को हिरासत में ले लिया.

हत्या के इस मामले का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह भाग निकला था. संभवत: उसे पुलिस काररवाई की भनक लग गई थी. जसबीर की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही थी, पर वह पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस ने की काररवाई

थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने जब शगुनप्रीत और सतनाम सिंह से पूछताछ की तो दोनों आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. इस के बाद उसी दिन राजविंदर कौर की हत्या के आरोप में शगुन और सतनाम सिंह को अदालत में पेश कर आगामी पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान पूछताछ में राजविंदर की मौत की जो कहानी पता चली, वह कुछ इस तरह थी—
शगुनप्रीत कौर बचपन से ही दिलफेंक और महत्त्वाकांक्षी थी. शादी से पहले अपने गांव में उस के कई युवकों के साथ नाजायज संबंध थे.

अपने पति सरबजीत की मौत से पहले भी उस का गांव के कई युवकों के साथ नैनमटक्का चल रहा था, पर परदे के पीछे. क्योंकि तब उसे अपने पति का डर था.
लेकिन पति की मौत के बाद उस ने सरेआम यारियां जोड़नी शुरू कर दी थीं. अब उसे रोकनेटोकने वाला नहीं था. शगुन के अपने गांव के ही एक युवक सतनाम सिंह के साथ नाजायज संबंध बन गए थे. सतनाम आवारा आदमी था और नशीली वस्तुएं बेचता था.

शगुन ने प्रेमी के साथ बनाई योजना

जसबीर सिंह सतनाम के नशे के धंधे में उस का भागीदार था. उसे जब शगुन और सतनाम के संबंधों का पता चला तो बहती गंगा में हाथ धोने के लिए वह भी मचलने लगा. शगुन को इस बात से कोई ऐतराज नहीं था, बल्कि वह खुश थी कि उस के 2-2 चाहने वाले हैं. सरबजीत की मौत के बाद सतनाम सिंह शगुन के ही घर पर रहने लगा था.

यह बात राजविंदर को मंजूर नहीं थी. सतनाम के वहां रहने का वह विरोध करती थी. शगुन अपनी मनमानी पर उतर आई थी. उसे न तो सास का कोई डर था और न शरम. वह तो बस हवा में उड़ी चली जा रही थी.
जब राजविंदर कौर का विरोध बढ़ गया तो शगुन ने उसे रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. इस के 2 फायदे थे, एक तो राजविंदर की मौत के बाद उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं रहता और दूसरे सारी जमीनजायदाद उस के नाम हो जाती.

यह अलग बात थी कि राजविंदर की मौत के बाद सब कुछ उसे ही मिलने वाला था, पर उसे सब्र नहीं था. दूसरे उसे यह भी डर था कि मरने से पहले राजविंदर जायदाद किसी और के नाम न कर जाएं.
शगुनप्रीत और उस के आशिक सतनाम सिंह ने मिल कर राजविंदर कौर की हत्या की योजना बनाई. इस के लिए उन्होंने गांव के ही जसबीर सिंह को चुना और उसे ढाई लाख रुपए देने का वादा कर के तैयार कर लिया.

अपनी योजना के अनुसार, 28 अक्तूबर 2016 की आधी रात को तीनों ने मिल कर सोते समय राजविंदर कौर को गला दबा कर मार डाला. अगली सुबह योजना के तहत शगुन ने कुछ देर गांव वालों के सामने राजविंदर की बीमारी का नाटक रचा और बाद में शोर मचा कर यह खबर फैला दी कि शुगर लेवल कम होने की वजह से राजविंदर की मौत हो गई है. इतना ही नहीं, वह इतनी शातिर निकली कि रिश्तेदारों को बताए बिना ही जल्दबाजी में गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर सास का अंतिम संस्कार भी करा दिया. बाद में उस ने कुलदीप कौर को भी फोन कर के इस की खबर दे दी थी.

राजविंदर कौर की हत्या की योजना में शगुन और सतनाम सिंह ने ढाई लाख रुपए की सुपारी दे कर जसबीर को अपने साथ शामिल तो कर लिया था, पर हत्या के बाद उन्होंने उसे पैसे देने से इनकार कर दिया था. जसबीर काफी समय तक उन से पैसे मांगता रहा, जब उन्होंने पैसे देने से बिलकुल इनकार कर दिया तो गुस्से में आ कर उस ने गांव के कुछ लोगों के सामने इस बात का खुलासा कर दिया. गांव वाले पहले से ही तीनों पर नजर रखे हुए थे, सो उन्होंने यह खबर फोन द्वारा कुलदीप को दे दी.

रिमांड की अवधि समाप्त होने पर थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने शगुनप्रीत कौर और उस के प्रेमी सतनाम सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. इस अपराध का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह फरार था. Family Dispute

पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories: आखिरी फैसला – साधना बनी अपनों की कातिल

Crime Stories: उस दिन सितंबर, 2020 की 10 तारीख थी. साधना ने फैसला कर रखा था कि मां का बताया व्रत जरूर रखेगी. मां के अनुसार, इस व्रत से सुंदर स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति होती है. लेकिन व्रत रखने से पहले ही लेबर पेन शुरू हो गया.

इस में उस के अपने वश में कुछ नहीं था, क्योंकि उसे 2 दिन बाद की तारीख बताई गई थी. निश्चित समय पर वह मां बनी, लेकिन पुत्र नहीं पुत्री की. तीसरी बार भी बेटी आई है, सुन कर सास विमला का गुस्से से सिर भन्ना गया. वह सिर झटक कर वहां से चली गई. बच्ची के जन्म पर मां बिटोली आ गई थी. उस ने साधना को समझाया, ‘‘जी छोटा मत कर. बेटी लक्ष्मी का रूप होती है. क्या पता इस की किस्मत से मिल कर तेरी किस्मत बदल जाए.’’बेटी के मन पर छाई उदासी पर पलटवार करने के लिए मां बिटोली बोली, ‘‘आजकल बेटेबेटी में कोई फर्क नहीं होता. तेरी सास के दिमाग में पता नहीं कैसा गोबर भरा है जो समझती ही नहीं या जानबूझ कर समझना नहीं चाहती.’’

साधना क्या कर सकती थी. 2 की तरह तीसरी को भी किस्मत मान लिया. उसे भी बाकी 2 की तरह पालने लगी. वह भी बहनों की तरह बड़ी होने लगी.उस दिन अक्तूबर 2020 की पहली तारीख थी. सेहुद गांव निवासी कुलदीप खेतों से घर लौटा, तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खुलवाने के लिए कुंडी खटखटाई, पर पत्नी ने दरवाजा नहीं खोला. घर के अंदर से टीवी चलने की आवाज आ रही थी. उस ने सोचा शायद टीवी की तेज आवाज में उसे कुंडी खटकने की आवाज सुनाई न दी हो. उस ने एक बार फिर कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी लगाई. पर अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. कुलदीप का माथा ठनका. मन में घबराहट भी होने लगी.

उस के घर के पास ही भाई राहुल का घर था तथा दूसरी ओर पड़ोसी सुदामा का घर. भाई घर पर नहीं था. वह सुदामा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘चाचा, साधना न तो दरवाजा खोल रही है और न ही कोई हलचल हो रही है. मेरी मदद करो.’’

कुलदीप पड़ोसी सुदामा को साथ ले कर भाई राहुल के घर की छत से हो कर अपने घर में घुसा. दोनों कमरे के पास पहुंचे तो मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर छत की धन्नी से लोहे के कुंडे के सहारे चार लाशें फांसी के फंदे पर झूल रही थीं. लाशें कुलदीप की पत्नी साधना और उस की बेटियों की थीं. कुलदीप और सुदामा घर का दरवाजा खोल कर बाहर आए और इस हृदयविदारक घटना की जानकारी पासपड़ोस के लोगों को दी. उस के बाद तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई और लोग कुलदीप के घर की ओर दौड़ पड़े. देखते ही देखते घर के बाहर भीड़ उमड़ पड़ी. जिस ने भी इस मंजर को देखा, उसी का कलेजा कांप उठा.

कुलदीप बदहवास था, लेकिन सुदामा का दिलोदिमाग काम कर रहा था. उस ने सब से पहले यह सूचना साधना के मायके वालों को दी, फिर थाना दिबियापुर पुलिस को.पुलिस आने के पहले ही साधना के मातापिता, भाई व अन्य घर वाले टै्रक्टर पर लद कर आ गए. उन्होंने साधना व उस की मासूम बेटियोें को फांसी के फंदे पर झूलते देखा तो उन का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने कुलदीप व उस के पिता कैलाश बाबू के घर जम कर उत्पात मचाया. घर में टीवी, अलमारी के अलावा जो भी सामान मिला तोड़ डाला. साधना के सासससुर, पति व देवर के साथ हाथापाई की.

साधना के मायके के लोग अभी उत्पात मचा ही रहे थे कि सूचना पा कर थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा पुलिस टीम के साथ आ गए. उन्होंने किसी तरह समझाबुझा कर उन्हें शांत किया. चूंकि घटनास्थल पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, अत: थानाप्रभारी मिश्रा ने इस घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी और घटनास्थल पर अतिरिक्त पुलिस बल भेजने की सिफारिश की. इस के बाद वह भीड़ को हटाते हुए घर में दाखिल हुए. घर के अंदर आंगन से सटा एक बड़ा कमरा था. इस कमरे के अंदर का दृश्य बड़ा ही डरावना था. कमरे की छत की धन्नी में लोहे का एक कुंडा था. इस कुंडे से 4 लाशें फांसी के फंदे से झूल रही थीं.

मरने वालो में कुलदीप की पत्नी साधना तथा उस की 3 मासूम बेटियां थीं. साधना की उम्र 30 साल के आसपास थी, जबकि उस की बड़ी बेटी गुंजन की उम्र 7 साल, उस से छोेटी अंजुम थी. उस की उम्र 5 वर्ष थी. सब से छोेटी पूनम की उम्र 2 माह से भी कम लग रही थी. साड़ी के 4 टुकड़े कर हर टुकड़े का एक छोर कुंडे में बांध कर फांसी लगाई गई थी. कमरे के अंदर लकड़ी की एक छोटी मेज पड़ी थी. संभवत: उसी मेज पर चढ़ कर फांसी का फंदा लगाया गया था.

थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी सुनीति तथा एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित कई थानों की पुलिस ले कर घटनास्थल आ गए.उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने तनाव को देखते हुए सेहुद गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया. उस के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया. मां सहित मासूमों की लाश फांसी के फंदे पर झूलती देख कर एसपी सुनीति दहल उठीं. उन्होंने तत्काल लाशों को फंदे से नीचे उतरवाया. उस समय माहौल बेहद गमगीन हो उठा.मृतका साधना के मायके की महिलाएं लाशों से लिपट कर रोने लगीं. सुनीति ने महिला पुलिस की मदद से उन्हें समझाबुझा कर शवों से दूर किया.

फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. घटनास्थल पर मृतका का भाई बृजबिहारी तथा पिता सिपाही लाल मौजूद थे. पुलिस अधिकारियों ने उन से पूछताछ की तो बृजबिहारी ने बताया कि उस की बहन साधना तथा मासूम भांजियों की हत्या उस के बहनोई कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू, भाई राहुल तथा मां विमला देवी ने मिल कर की है.जुर्म छिपाने के लिए शवों को फांसी पर लटका दिया है. अत: जब तक उन को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक वे शवों को नहीं उठने देंगे. सिपाही लाल ने भी बेटे की बात का समर्थन किया.

बृजबिहारी की इस धमकी से पुलिस के माथे पर बल पड़ गए. लेकिन माहौल खराब न हो, इसलिए पुलिस ने मृतका के पति कुलदीप, ससुर कैलाश बाबू, सास विमला देवी तथा देवर राहुल को हिरासत में ले लिया तथा सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें थाना दिबियापुर भिजवा दिया. सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप के पड़ोसी सुदामा से पूछताछ की. सुदामा ने बताया कि कुलदीप जब खेत से घर आया था, तो घर का दरवाजा बंद था. दरवाजा पीटने और आवाज देने पर भी जब उस की पत्नी साधना ने दरवाजा नहीं खोला, तब वह मदद मांगने उस के पास आया. उस के बाद वे दोनों छत के रास्ते घर के अंदर कमरे में गए, जहां साधना बेटियों सहित फांसी पर लटक रही थी.

सुदामा ने कहा कि कुलदीप ने पत्नी व बेटियों को नहीं मारा बल्कि साधना ने ही बेटियों को फांसी पर लटकाया और फिर स्वयं भी फांसी लगा ली. निरीक्षण और पूछताछ के बाद एसपी सुनीति ने मृतका साधना व उस की मासूम बेटियों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए औरैया जिला अस्पताल भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने कड़ी सुरक्षा के बीच चारों शवों का पोस्टमार्टम किया, वीडियोग्राफी भी कराई गई. इस के बाद रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मासूम गुंजन, अंजुम व पूनम की हत्या गला दबा कर की गई थी, जबकि साधना ने आत्महत्या की थी. रिपोर्ट से स्पष्ट था कि साधना ने पहले अपनी तीनों मासूम बेटियों की हत्या की फिर बारीबारी से उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया. उस के बाद स्वयं भी उस ने फांसी के फंदे पर लटक कर आत्महत्या कर ली. उस ने ऐसा शायद इसलिए किया कि वह मरतेमरते भी जिगर के टुकड़ों को अपने से दूर नहीं करना चाहती थी.

थाने पर पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप तथा उस के मातापिता व भाई से पूछताछ की. कुलदीप के पिता कैलाश बाबू ने बताया कि कुलदीप व साधना के बीच अकसर झगड़ा होता था, जिस से आजिज आ कर उन्होंने कुलदीप का घर जमीन का बंटवारा कर कर दिया था. वह छोटे बेटे राहुल के साथ अलग रहता है. उस का कुलदीप से कोई वास्ता नहीं था. पूछताछ के बाद पुलिस ने कैलाश बाबू उस की पत्नी विमला तथा बेटे राहुल को थाने से घर जाने दिया, लेकिन मृतका साधना के भाई बृजबिहारी की तहरीर पर कुलदीप के खिलाफ भादंवि की धारा 309 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में घर कलह की सनसनीखेज घटना सामने आई.

गांव अमानपुर, जिला औरेया का सिपाही लाल दिबियापुर में रेलवे ठेकेदार के अधीन काम करता था. कुछ उपजाऊ जमीन भी थी, जिस से उस के परिवार का खर्च आसानी से चलता था. सिपाही लाल की बेटी साधना जवान हुई तो उस ने 12 फरवरी, 2012 को उस की शादी सेहुद गांव निवासी कैलाश बाबू के बेटे कुलदीप के साथ कर दी. लेकिन कुलदीप की मां विमला न बहू से खुश थी, न उस के परिवार से.

साधना और कुलदीप ने जैसेतैसे जीवन का सफर शुरू किया. शादी के 2 साल बाद साधना ने एक बेटी गुंजन को जन्म दिया. गुंजन के जन्म से साधना व कुलदीप तो खुश थे, लेकिन साधना की सास विमला खुश नहीं थी, क्योंकि वह पोते की आस लगाए बैठी थी. बेटी जन्मने को ले कर वह साधना को ताने कसने लगी थी. घर की मालकिन विमला थी. बापबेटे जो कमाते थे, विमला के हाथ पर रखते थे. वही घर का खर्च चलाती थी. साधना को भी अपने खर्च के लिए सास के आगे ही हाथ फैलाना पड़ता था. कभी तो वह पैसे दे देती थी, तो कभी झिड़क देती थी. तब साधना तिलमिला उठती थी. साधना पति से शिकवाशिकायत करती, तो वह उसे ही प्रताडि़त करता.

गुंजन के जन्म के 2 साल बाद साधना ने जब दूसरी बेटी अंजुम को जन्म दिया तो लगा जैसे उस ने कोई गुनाह कर दिया हो. घर वालों का उस के प्रति रवैया ही बदल गया. सासससुर, पति किसी न किसी बहाने साधना को प्रताडि़त करने लगे. सास विमला आए दिन कोई न कोई ड्रामा रचती और झूठी शिकायत कर कुलदीप से साधना को पिटवाती. विमला को साधना की दोनों बेटियां फूटी आंख नहीं सुहाती थीं. वह उन्हें दुत्कारती रहती थी.

बेटियों के साथसाथ वह साधना को भी कोसती, ‘‘हे भगवान, मेरे तो भाग्य ही फूट गए जो इस जैसी बहू मिली. पता नहीं मैं पोते का मुंह देखूंगी भी या नहीं.’’

धीरेधीरे बेटियों को ले कर घर में कलह बढ़ने लगी. कुलदीप और साधना के बीच भी झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साधना मायके चली गई. जब कई माह तक वह ससुराल नहीं आई, तो विमला की गांव में थूथू होने लगी. बदनामी से बचने के लिए उस ने पति कैलाश बाबू को बहू को मना कर लाने को कहा. कैलाश बाबू साधना को मनाने उस के मायके गए. वहां उन्होंने साधना के मातापिता से बातचीत की और साधना को ससुराल भेजने का अनुरोध किया, लेकिन साधना के घर वालों ने प्रताड़ना का आरोप लगा कर उसे भेजने से साफ मना कर दिया.

मुंह की खा कर कैलाश बाबू लौट आए. उन्होंने वकील से कानूनी सलाह ली और फिर साधना को विदाई का नोटिस भिजवा दिया. इस नोटिस से साधना के घर वाले तिलमिला उठे और उन्होंने साधना के मार्फत थाना सहायल में कुलदीप तथा उस के घर वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के अलावा औरैया कोर्ट में कुलदीप के खिलाफ भरणपोषण का मुकदमा भी दाखिल कर दिया. जब कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू को घरेलू हिंसा और भरणपोषण के मुकदमे की जानकारी हुई तो वह घबरा उठे. गिरफ्तारी से बचने के लिए कैलाश बाबू समझौते के लिए प्रयास करने लगे. काफी मानमनौव्वल के बाद साधना राजी हुई. कोर्ट से लिखापढ़ी के बाद साधना ससुराल आ कर रहने लगी.

कुछ माह बाद कैलाश बाबू ने घर, जमीन का बंटवारा कर दिया. उस के बाद साधना पति कुलदीप के साथ अलग रहने लगी. साधना पति के साथ अलग जरूर रहने लगी थी, लेकिन उस का लड़नाझगड़ना बंद नहीं हुआ था. सास के ताने भी कम नहीं हुए थे. वह बेटियों को ले कर अकसर ताने मारती रहती थी. कभीकभी साधना इतना परेशान हो जाती कि उस का मन करता कि वह आत्महत्या कर ले. लेकिन बेटियों का खयाल आता तो वह इरादा बदल देती.

10 सितंबर, 2020 को साधना ने तीसरी संतान के रूप में भी बेटी को ही जन्म दिया, नाम रखा पूनम. पूनम के जन्म से घर में उदासी छा गई. सब से ज्यादा दुख विमला को हुआ. उस ने फिर से साधना को ताने देने शुरू कर दिए. छठी वाले दिन साधना की मां विटोली भी आई. उस रोज विमला और विटोली के बीच खूब नोंकझोंक हुई. सास के ताने सुनसुन कर साधना रोती रही. विटोली बेटी को समझा कर चली गई. उस के बाद साधना उदास रहने लगी. वह सोचने लगी क्या बेटी पैदा होना अभिशाप है? अब तक साधना सास के तानों और पति की प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी.

अत: वह आत्महत्या करने की सोचने लगी. लेकिन खयाल आया कि अगर उस ने आत्महत्या कर ली तो उस की मासूम बेटियों का क्या होगा. उस का पति शराबी है, वह उन की परवरिश कैसे करेगा. वह या तो बेटियों को बेच देगा या फिर भूखे भेडि़यों के हवाले कर देगा. सोचविचार कर साधना ने आखिरी फैसला लिया कि वह मासूम बेटियों को मार कर बाद में आत्महत्या करेगी.1 अक्तूबर, 2020 की सुबह 7 बजे कुलदीप खेत पर काम करने चला गया. उस के जाने के बाद साधना ने मुख्य दरवाजा बंद किया और टीवी की आवाज तेज कर दी. फिर उस ने साड़ी के 4 टुकड़े किए और इन के एकएक सिरे को मेज पर चढ़ कर छत की धन्नी में लगे लोहे के कुंडे में बांध दिया.

साड़ी के टुकड़ों के दूसरे सिरे को उस ने फंदा बनाया. उस समय गुंजन और अंजुम चारपाई पर सो रही थीं. साधना ने कलेजे पर पत्थर रख कर बारीबारी से गला दबा कर उन दोनों को मार डाला फिर उन के शवों को फांसी के फंदे पर लटका दिया. 21 दिन की मासूम पूनम का गला दबाते समय साधना के हाथ कांपने लगे आंखों से आंसू टपकने लगे. लेकिन जुनून के आगे ममता हार गई और उस ने उस मासूम को भी गला दबा कर मार डाला और फांसी के फंदे पर लटका दिया. इस के बाद वह स्वयं भी गले में फंदा डाल कर झूल गई.

घटना की जानकारी तब हुई जब कुलदीप घर वापस आया. पड़ोसी सुदामा ने घटना की सूचना मोबाइल फोन द्वारा थाना दिबियापुर पुलिस को दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा आ गए. उन्होंने शवों को कब्जे में ले कर जांच शुरू की तो घर कलह की घटना प्रकाश में आई. 2 अक्टूबर, 2020 को थाना दिबियापुर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को औरैया कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Crime Stories