Love Story: प्रेमिका की खातिर – अपने ही परिवार का कातिल

Love Story: ठीक 3 साल पहले 26 अप्रैल, 2018 की सुबह के करीब साढ़े 11 बज रहे थे. उत्तर प्रदेश के कासगंज में थाना ढोलना क्षेत्र के पास रेलवे ट्रैक पर बकरियां चराते हुए एक आदमी चला जा रहा था. ट्रैक के दोनों ओर झाड़जंगल की वजह से वह आदमी लगभग हर दिन इसी ट्रैक के पास अपनी बकरियां चराने के लिए आता था.

लेकिन उस दिन उस ने कुछ ऐसा देखा जिस से उस की रूह कांप गई थी. रेलवे ट्रैक पर एक व्यक्ति की लाश पड़ी थी. उस लाश की स्थिति इतनी भयानक थी, जिसे देख कर उस का दिल दहशत से भर गया था. उस लाश का न तो सिर था और न ही दोनों हाथों की हथेलियां. यह देख बकरियां चराता हुआ यह शख्स अपनी बकरियां उसी ट्रैक पर छोड़ कर सीधा अपने घर की ओर भागा. उस लाश को देख कर वह इतना डर गया था कि उस के गले से आवाज तक नहीं निकल रही थी.

थोड़ा समय बीता तो वह उसी ट्रैक पर ढोलना थाने के पुलिसकर्मियों की टीम को ले कर पहुंचा और उस ने पुलिसकर्मियों को दूर से उस जगह की ओर इशारा कर के दिखाया, जहां पर वह लाश पड़ी थी. ढोलना थाने की पुलिस लाश के पास पहुंची और उन्हें भी अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. वैसे भी बिना गरदन और हथेलियों वाली डैड बौडी हर दिन देखने को नहीं मिलती. मौके पर पहुंची पुलिस की टीम ने आसपास के इलाके की घेराबंदी कर तुरंत जांच शुरू कर दी.

कुछ ही देर में देखते ही देखते उस इलाके में और अधिक पुलिसकर्मी आ पहुंचे और उन के साथ फोरैंसिक की पूरी टीम आ पहुंची. नियमित छानबीन करते हुए पुलिस को लाश के शरीर पर पहने कपड़ों की जेब से एक आधार कार्ड और एलआईसी का एक कागज भी मिला. आधार कार्ड पर मृत शख्स का नाम राकेश था. आधार कार्ड को बेस बना कर पुलिस ने जल्द ही आधार कार्ड पर दिए पते पर संपर्क साधा और मृत व्यक्ति के पिता बनवारी लाल को लाश की पहचान करने के लिए जल्द से जल्द आने के लिए कहा.

कुछ ही घंटों में बनवारी लाल अपने 2 बेटों, राजीव और प्रवेश के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. तीनों का शरीर पसीने से लथपथ था. बनवारी लाल एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी होने के नाते मामले की गंभीरता को बहुत अच्छे से समझ सकते थे. लेकिन बात लाश की पहचान की थी, वह भी तब जब उन्हें अपने बेटे की लाश की पहचान करनी थी तो उन का दिल जोरों से धड़क रहा था.

वह घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मियों से हांफते हुए बोले, ‘‘साहब, आप ने मुझे याद किया?’’

ढोलना थानाप्रभारी ने बनवारी लाल से कहा, ‘‘जी हां, आप को एक लाश की पहचान करने के लिए बुलाया गया है. क्योंकि मृत व्यक्ति की जेब से बरामद आधार कार्ड में राकेश का नाम दिया हुआ था और कुछ एलआईसी के कागजात भी थे.’’

बनवारी लाल हांफते स्वर में डरते हुए बोले, ‘‘जी साहब, आप हमें लाश के पास ले कर चलिए.’’

यह कहते हुए वह पुलिस टीम के साथ चल दिए. पुलिस की एक टीम बनवारी लाल और उन के दोनों बेटों को वहां ले गई, जहां पर मृत लाश को नीले रंग की प्लास्टिक की शीट में लपेट कर रखा गया था.

बनवारी लाल ने की लाश की शिनाख्त

लाश के पास खड़े व्यक्ति ने बनवारी लाल और अन्य 2 लोगों को आते हुए देख कर नीली शीट में लगी चेन को नीचे की ओर पैरों तक खींचा और बनवारी लाल को मृतक को देखने देने के लिए खुद साइड में खड़ा हो गया. मृत व्यक्ति का सिर नहीं होने की वजह से बनवारी लाल उसे एक नजर देख कर डर से कांप गए. लेकिन अगले ही पल उन का डर शोक में तब तब्दील हो गया, जब उन्होंने मृत व्यक्ति की लाश के पहने कपड़ों को देखा. ये वही कपड़े थे जो बनवारी लाल ने कुछ महीनों पहले अपने बेटे राकेश को उस के जन्मदिन पर गिफ्ट किए थे.

कपड़े देख कर बनवारी लाल अचानक से फूटफूट कर रोनेबिलखने लगे और जोर से चिल्लाचिल्ला कर राकेश का नाम ले कर चीखने लगे. अपने भाई की लाश की ऐसी हालत और पिता को रोताबिलखता देख कर राजीव और प्रवेश की आंखों से आंसू रोके नहीं रुके. लेकिन फिर भी पिता का सहारा बनते हुए दोनों ने बनवारी लाल को लाश से दूर किया. कुछ देर में थानाप्रभारी वहां आए और उन्होंने रोते हुए बनवारी लाल को ढांढस बंधाया. उन्होंने बनवारी लाल से कहा, ‘‘मुझे अफसोस है आप के बेटे की मौत पर. हमारी तफ्तीश जारी है. केस को सुलझाने के लिए हमें आप से राकेश को ले कर कुछ जरूरी सवाल करने हैं. आप थाने में पहुंचिए हम यहां पर अपनी जांच कर के थाने लौट कर आप से बात करेंगे.’’

सिर और हथेलियां कटी लाश को पहचानना किसी के वश की बात नहीं थी, इसलिए थानाप्रभारी ने लाश की पहचान को पुख्ता करने के लिए लाश की डीएनए जांच करवाना जरूरी समझा. उन्होंने जल्द ही राकेश के मातापिता से संपर्क कर उन का डीएनए सैंपल लिया और उसे आगरा स्थित विधि विज्ञान प्रयोगशाला में भेज दिया. इस घटना को तीन साल हो गए और साल 2021 की अगस्त में एक दिन अचानक से कासगंज के ढोलना थाने में आगरा के विधि विज्ञान प्रयोगशाला से डीएनए रिपोर्ट का रिजल्ट आया.

डीएनए रिपोर्ट ने बढ़ाई पुलिस की बेचैनी

रिपोर्ट खोल कर जब थानाप्रभारी ने देखा तो उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. उन के मन में हजारों सवाल तूफान की तरह खड़े हो उठे. 3 साल से ठंडे बस्ते में पड़ा मामला अचानक से अब एक नया मोड़ ले चुका था. दरअसल, जिस डीएनए रिपोर्ट का इतने लंबे समय से इंतजार हो रहा था, उस रिपोर्ट में मृत व्यक्ति का डीएनए बनवारी लाल और इंद्रावती के डीएनए से कोई मैच ही नहीं था. यह देख कर थानाप्रभारी ने 3 साल पुरानी इस केस की फाइलें निकलवाईं. मृत व्यक्ति की पहचान का पता लगाने के लिए उन्होंने अप्रैल, 2018 में उस इलाके से गुमशुदा लोगों की लिस्ट निकलवाई.

राकेश की उम्र के लोगों में उस इलाके से सिर्फ एक ही आदमी गायब हुआ था, वह था गांव नौगवां, थाना गंगीरी, अलीगढ़ का रहने वाला राजेंद्र उर्फ कलुआ. बिलकुल समय न गंवाते हुए पुलिस तुरंत कलुआ के घर पहुंची और उन से कलुआ के बारे में पूछताछ की. कलुआ तो नहीं मिला लेकिन पुलिस को कई ऐसे तार मिल गए जोकि इस केस से जुड़े हो सकते थे. कलुआ के मातापिता ने बताया कि उन के बेटे की दोस्ती राकेश के साथ थी. 25 अप्रैल को गायब होने के एक दिन पहले राकेश कलुआ को ले कर अपने बीवीबच्चों को ढूंढने का नाम ले कर उसे अपने साथ ले गया था. जिस के बाद कलुआ फिर कभी घर नहीं लौटा.

कलुआ के मांबाप से उन का डीएनए का सैंपल ले कर पुलिस ने फिर से आगरा स्थित विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया. इस बार डीएनए की रिपोर्ट जल्द ही आ गई थी. रिपोर्ट से यह साफ हो गया था कि 3 साल पहले रेलवे ट्रैक पर मरने वाला व्यक्ति राकेश नहीं बल्कि राजेंद्र उर्फ कलुआ था, क्योंकि डीएनए के सैंपल कलुआ के मांबाप से मिल गए थे. पूरे मामले में कुछ इस तरह से मोड़ आना किसी को भी अपना सिर पकड़ने पर मजबूर कर सकता था जोकि थानाप्रभारी ने किया भी.

थानाप्रभारी ने 3 साल पहले अपने मन में उठने वाले सवालों को एक बार फिर से महसूस किया. उन्हें अचानक से वह सवाल याद आया कि सिर कटी लाश को देख कर बनवारी लाल ने एक पल में कैसे पहचान लिया कि यह उन के बेटे की लाश थी? कलुआ से किस की कैसी दुश्मनी हो सकती थी? इस के अलावा इसी तरह के और भी कई सवाल थानाप्रभारी के मन में उठने लगे थे. इन सभी सवालों को ढूंढने के लिए पुलिस की टीम ने तत्परता से काम करना शुरू कर दिया था.

अगस्त के आखिरी दिनों तक पुलिस ने इस मामले की छानबीन के लिए प्रदेश में अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया था. उसी दौरान 31 अगस्त, 2021 के दिन पुलिस के एक ऐसे ही मुखबिर ने बताया कि वे जिस व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं, उसे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा से 10 किलोमीटर दूर बिसरख गांव में देखा गया है. यह व्यक्ति खुद राकेश ही था. ढोलना पुलिस बिना किसी देरी के मुखबिर की दी हुई सूचना पर बिसरख गांव जाने के लिए निकल पड़ी. उसी बीच ढोलना थानाप्रभारी ने बिसरख थाने की पुलिस को इस की सूचना दी.

करीब 2 घंटे बाद मुखबिर के बताए हुए पते पर छापा मार कर पुलिस की टीम ने दिलीप शर्मा नाम के एक शख्स को पकड़ लिया, जिस का हुलिया काफी हद तक राकेश की तरह था. दिलीप नाम का यह शख्स इलाके में प्रेमिका रूबी के घर में मौजूद था और वे दोनों कमरे में बंद हो कर एकदूसरे के साथ प्रेम प्रसंग में लीन थे. मामले की गंभीरता को देखते हुए ढोलना थानाप्रभारी बिसरख थाने में दिलीप को पूछताछ के लिए ले आए.

पूछताछ के दौरान पहले तो दिलीप ने खुद की पहचान दिलीप के नाम से बताई, लेकिन जब पुलिस की टीम ने उस की फोन लोकेशन, वाट्सऐप चैट इत्यादि के रिकौर्ड के आधार पर पूछताछ करनी शुरू की तो वह चारों खाने चित्त हो गया और अपना असली नाम राकेश बताते हुए पुलिस के सामने अपना गुनाह कुबूल कर लिया. उस ने सिर्फ अपने दोस्त कलुआ की ही हत्या नहीं, बल्कि अपनी पत्नी और 2 बच्चों की हत्या का जुर्म भी कुबूल कर लिया, जिसे सुन कर सब की आंखें खुली की खुली रह गईं. इस शातिर कातिल के कत्ल की कहानी सुन कर किसी की भी रूह कांप जाए.

नौगवां, गंगीरी अलीगढ़ का रहने वाला राकेश ग्रेटर नोएडा में एक डाइग्नोसिस सेंटर में लैब टेक्नीशियन था. वह अपने छोटे से परिवार, जिस में उस की पत्नी रत्नेश, 3 साल की बेटी अवनि और डेढ़ साल के बेटे अर्पित के साथ ग्रेटर नोएडा से 10 किलोमीटर दूर चिपयाना गांव की पंचविहार कालोनी में रहता था. यह उस का अपना घर था. उस के छोटे से परिवार में खुशियों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन राकेश अपने शादीशुदा जीवन से खुश नहीं था. राकेश की शादी साल 2012 में उत्तर प्रदेश के एटा की रहने वाली रत्नेश से हुई थी. लेकिन यह शादी उस ने अपने परिवार के दबाव में की थी.

राकेश प्रेमिका से करना चाहता था शादी

दरअसल, राकेश बिसरख गांव की रहने वाली रूबी को अपनी शादी से पहले से प्यार करता था. दोनों किसी समय में साथ में पढ़ते थे. लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ की वजह से उस ने पहले प्राइवेट इंस्टीट्यूट से लैब टेक्नीशियन का कोर्स किया और ग्रेटर नोएडा में जौब करने लगा. परिवार के दबाव में उस ने रत्नेश से शादी तो कर ली लेकिन रूबी के साथ उस का प्रेम संबंध खत्म नहीं हुआ, बल्कि वक्त के साथ उन का प्यार परवान चढ़ता गया. इसी दौरान रुबी की उत्तर प्रदेश में कांस्टेबल के पद पर नौकरी लग गई. राकेश के रत्नेश के साथ बच्चे भी हो गए. पहले अवनि फिर अगले साल अर्पित.

अपने परिवार में इतना उलझा हुआ होने के बावजूद वह रूबी से मिलने के लिए समय निकाल लिया करता था. रूबी और राकेश अकसर वाट्सऐप के जरिए अश्लील चैट भी किया करते थे, जिस से राकेश के मन में रूबी के लिए प्यार का तूफान उमड़ पड़ता था. साल 2018 की वैलेनटाइंस डे (14 फरवरी) के दिन जब राकेश इसी तरह से रूबी के साथ वाट्सऐप पर सैक्स चैट में लीन था तो उस की पत्नी रत्नेश ने राकेश को उसे पीछे से रंगेहाथों पकड़ लिया. उस दिन राकेश और रत्नेश का खूब झगड़ा भी हुआ.

प्रेमिका की खातिर पत्नी व 2 बच्चों की हत्या कर आंगन में गाड़ा

दोनों के बीच झगड़ा अपने चरम पर पहुंच चुका था और राकेश ने अपना आपा खो दिया. राकेश ने आव देखा न ताव, रत्नेश पर लोहे की रौड से वार कर उस का सिर फाड़ दिया. रत्नेश की वहीं मौके पर मौत हो गई. लेकिन रत्नेश की मौत के बाद मामला यहीं ठंडा नहीं हुआ. उस ने इस मौके का फायदा उठाया और अपने बच्चों से भी अपना पिंड छुड़ाने के बारे में विचार किया. उस ने जिस लोहे की रौड से रत्नेश की हत्या की थी, उसी से अपने दोनों बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया.

उस ने रातोंरात उन तीनों के लाशों को छिपाने के लिए अपने ही घर के आंगन में गहरा गड्ढा खोद दिया और उन तीनों को उसी में दफना दिया. अगले दिन उस ने मजदूरों को बुलवा कर अपने घर के आंगन में सीमेंट की पुताई कर फर्श बनवा दिया. यही नहीं, उस ने उसी दिन अपने स्थानीय इलाके के पुलिस थाने में जा कर अपने बीवी बच्चों की गुमशुदगी की सूचना भी दर्ज करवा दी. और यह सब उस ने अकेले नहीं किया, बल्कि अपनी प्रेमिका कांस्टेबल रूबी के दिए प्लान के अनुसार किया.

कुछ दिनों बाद जब रत्नेश के मायके से राकेश को फोन आने लगे तो पहले तो राकेश उन की बात यूं ही टालता रहा, लेकिन जब मायके वालों की तरफ से जोर बढ़ता गया तो उस ने अपनी प्रेमिका रूबी को यह बात बताई. रूबी ने इस से बचने के लिए एक और प्लान सुझाया. जिस को सफल बनाने के लिए राकेश को एक और कत्ल करना था, जोकि उसी की उम्र और कदकाठी का होना चाहिए था. इस के लिए उस ने अपने गांव के बचपन के दोस्त राजेंद्र उर्फ कलुआ को चुना.

वह अगले दिन गांव जा कर अपनी बीवीबच्चों की तलाश करने के बहाने अपने साथ कलुआ को ले कर निकल गया. उस ने कलुआ को रास्ते में दारू भी पिलाई और खाना भी खिलाया. जब वे रेलवे ट्रैक के पास सुनसान इलाके में पहुंचे तो राकेश ने मौका देख कर पहले से जंगलों में छिपा कर रखे गंडासे से कलुआ पर प्रहार कर दिया. कलुआ राकेश के पहले ही हमले को नहीं सह पाया और बेहाल हो कर नीचे गिर पड़ा.

राकेश ने घर वालों को किया साजिश में शामिल

राकेश ने मौके का फायदा उठा कर कलुआ पर इतने वार कर दिए कि उस की जान वहीं पर ही निकल गई. राकेश ने उस के बाद कलुआ का सिर और हाथ के पंजे काट दिए ताकि लाश की पहचान न हो सके. अपने इस काले कत्ल की दास्तान में उस ने अपने घरवालों को भी शरीक कर लिया. राकेश ने अपने घर वालों को लालच दिया कि अगर उस की शादी रूबी से हो गई तो मोटा पैसा दहेज में मिलेगा. उस ने लाश की पहचान करने के लिए अपने पिता को राजी कर लिया. जिस के बाद ये सारी कहानी शुरू हुई.

इस बीच राकेश ने अपनी पहचान छिपाने के लिए एक फरजी आधार कार्ड भी बनवा लिया, जिस में उस ने अपना नाम दिलीप शर्मा रखा. रूबी की मदद से उस ने प्राइवेट अस्पताल से कुछ दिनों में कहीं बाहर जा कर अपने नाक की प्लास्टिक सर्जरी भी करवा ली. लेकिन अंत में वह पकड़ा ही गया. पकड़े जाने के बाद पुलिस ने राकेश की निशानदेही पर पंचविहार कालोनी में उस के घर के आंगन में गड्ढा खुदवा कर उस की पत्नी और दोनों बच्चों के कंकाल और उस लोहे की रौड को बरामद कर लिया, जिस से उस ने अपने पूरे परिवार का खात्मा कर दिया था.

उस के बाद राकेश को साथ ले कर रेलवे स्टेशन के पास उस जगह पर छापा मारा, जहां पर उस ने कलुआ का कत्ल कर गंडासा छिपाया था. पुलिस ने इस पूरे मामले में अभी तक कुल 6 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. जिन में राकेश, उस की प्रेमिका रूबी, पिता बनवारी लाल, माता इंद्रावती व दोनों भाई राजीव और प्रवेश शामिल हैं. वे सभी फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे हैं. Love Story

Family Crime: काली नजर का प्यार – वर्षा ने क्यों किया पति पर वार

Family Crime: जिला हमीरपुर का एक बड़ा कस्बा है राठ. मूलत: मध्य प्रदेश के गांव सरमेड़ के रहने वाले मूलचंद्र अनुरागी का परिवार राठ के मोहल्ला भटियानी में रहता था. परिवार में पत्नी सरस्वती के अलावा 2 बेटे वीरेंद्र व अनिल थे. गांव में मूलचंद्र का पुश्तैनी मकान व जमीन थी. वह खुद गांव में रह कर घरजमीन की देखरेख करता था.

पत्नीबच्चों से मिलने वह राठ आताजाता रहता था. मूलचंद्र की पत्नी सरस्वती, राठ स्थित नवोदय विद्यालय में रसोइया थी. वह छात्रावास में रहने वाले छात्रों के लिए खाना बनाती थी. सरस्वती का बड़ा बेटा वीरेंद्र मिठाई की एक दुकान में काम करता था. वीरेंद्र बताशा बनाने का उम्दा कारीगर था, जबकि छोटा बेटा अनिल राठ की ही एक जूता बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी कर रहा था. चूंकि सरस्वती और उस के दोनों बेटे कमाते थे, सो घर की आर्थिक स्थिति ठीक थी.

सरस्वती बेटों के साथ खुशहाल तो थी, लेकिन घर में बहू की कमी थी. वह वीरेंद्र की शादी को लालायित रहती थी. वीरेंद्र अनुरागी जिस दुकान में काम करता था, उसी में अशोक नाम का एक युवक काम करता था. अशोक राठ कस्बे से आधा किलोमीटर दूर स्थित सैदपुर गांव का रहने वाला था. अशोक की छोटी बहन वर्षा अकसर उसे लंच देने आया करती थी. जयराम की 2 ही संतानें थीं अशोक और वर्षा. कुछ साल पहले जयराम की मृत्यु हो चुकी थी. मां चंदा देवी ने उन दोनों को तकलीफें सह कर बड़ा किया था. आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण अशोक और वर्षा ज्यादा पढ़लिख नहीं सके थे.

अशोक 10वीं कक्षा छोड़ कर नौकरी करने लगा था, जबकि वर्षा 10वीं कक्षा पास करने के बाद मां के घरेलू कामों में हाथ बंटाने लगी थी. 20 वर्षीय वर्षा गोरीचिट्टी, छरहरी काया की युवती थी. नैननक्श भी तीखे थे. सब से खूबसूरत थी उस की आंखें. खुमार भरी गहरी आंखें. उस की आंखों में ऐसी कशिश थी कि जो उन में देखे, खो सा जाए.

एक दिन वर्षा अपने भाई अशोक को लंच देने दुकान पर आई. वीरेंद्र की नजरें वर्षा की नजरों से मिलीं, तो वह उन में मानो डूब सा गया. जी में आया, उन्हीं खुमार भरी आंखों की अथाह गहराइयों में पूरी उम्र डूबा रहे. खुद भी उबरना चाहे तो उबर न सके. कुछ पल के लिए आंखों से आंखें मिली थीं, लेकिन उन्हीं लम्हों में वीरेंद्र वर्षा की आंखों पर फिदा हो गया. इस के बाद वर्षा की आंखें उस की सोच की धुरी बन गईं. उस दिन के बाद वीरेंद्र को वर्षा के आने का इंतजार रहने लगा. हालांकि अशोक से बोलचाल पहले से थी, लेकिन वर्षा तक पहुंच बनाने के लिए उस ने उस से संबंध प्रगाढ़ बना लिए. इन्हीं संबंधों की आड़ में उस ने वर्षा से परिचय भी कर लिया.

वर्षा से परिचय हुआ तो बेइमान कर देने वाली उस की नजरें वीरेंद्र का दिल और तड़पाने लगीं. अब वीरेंद्र को इंतजार था उस पल का, जब वर्षा अकेले में मिले और वह उस से अपने दिल की बात कह सके.
किस्मत ने एक रोज उसे यह मौका भी मुहैया करा दिया. उस रोज वर्षा भाई को खाना खिला कर जाने लगी, तो ताक में बैठा वीरेंद्र उस के पीछेपीछे चल पड़ा. तेज कदमों से वह वर्षा के बराबर में पहुंचा. वर्षा ने सिर घुमा कर वीरेंद्र को देखा और मुसकराने लगी.

वीरेंद्र बोला, ‘‘मुझे तुम से एक जरूरी बात कहनी है.’’

वर्षा के कदम पहले की तरह बढ़ते रहे, ‘‘बोलो.’’

‘‘मुझे जो कहना है, सड़क चलते नहीं कह सकता.’’

सहसा वीरेंद्र की नजर कुछ दूर स्थित पार्क पर पड़ी, ‘‘चलो, वहां पार्क में बैठते हैं. सुकून से बात हो जाएगी.’’
‘‘चलो,’’ वर्षा मुसकराई, ‘‘तुम्हारी बात सुन लेती हूं.’’

वे दोनों पार्क में जा कर बैठ गए. उस के बाद वर्षा वीरेंद्र से मुखातिब हुई, ‘‘अब बोलो, क्या कहना है?’’
वीरेंद्र के पास भूमिका बनाने का समय नहीं था. अत: उस ने सीधे तौर पर अपनी बात कह दी, ‘‘तुम्हारी आंखें बहुत हसीन हैं.’’

वर्षा की मुसकराहट गाढ़ी हो गई, ‘‘और मैं?’’
‘‘जिस की आंखें इतनी हसीन हैं, कहने की जरूरत नहीं कि वह कितनी हसीन होगी.’’
वर्षा ने उसे गहरी नजरों से देखा, ‘‘तुम मेरे हुस्न की तारीफ करने के लिए यहां ले कर आए हो या कुछ और कहना है?’’

वीरेंद्र ने महसूस किया कि वर्षा प्यार का सिलसिला शुरू करने के लिए उकसा रही है. अत: उस के दिल की बात जुबान से बयां हो गई, ‘‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मुझे तुम से प्यार हो गया है.’’

कुछ देर तक वर्षा उस की आंखों में देखती रही, फिर आहिस्ता से बोली, ‘‘प्यार ही तो ऐसी चीज है, जिस पर न दुनिया का कोई कानून लागू नहीं होता, न इसे दबाया या छिपाया जा सकता है. लेकिन प्यार के कुछ तकाजे भी होते हैं.’’

वीरेंद्र ने धड़कते दिल से पूछा, ‘‘कैसे तकाजे?’’

‘‘वफा, ईमानदारी और जिंदगी भर साथ निभाने का जज्बा.’’

वीरेंद्र समझ गया कि वर्षा कहना चाहती है कि वह उस का प्यार कबूल तो कर सकती है, मगर शर्त यह है कि उसे शादी करनी होगी. उस वक्त वीरेंद्र के सिर पर वर्षा को पाने का जुनून था, सो उस ने कह दिया, ‘‘मैं टाइमपास करने के लिए तुम्हारी तरफ प्यार का हाथ नहीं बढ़ा रहा हूं, बल्कि संजीदा हूं. मैं तुम से शादी कर के वफा और ईमानदारी से साथ निभाऊंगा.’’

दरअसल वर्षा अपनी मां की मजबूरियां जानती थी. चंदा देवी ने बहुत तकलीफें उठा कर पति का इलाज कराया था. इलाज में उस पर जो कर्ज चढ़ा था, उस की भरपाई होने में बरसों लग जाने थे. परिवार में कोई ऐसा न था जो युवा हो चुकी वर्षा के भविष्य के बारे में सोचता. मां बेटी को दुलहन बना कर विदा कर पाने की हैसियत में नहीं थी. छोटा भाई अशोक खुद अपनी जिम्मेदारियों से जूझ रहा था. अत: वर्षा को अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करना था.

वर्षा 20 साल की भरीपूरी युवती थी. उस के मन में किसी का प्यार पाने और स्वयं भी उसे टूट कर चाहने की हसरत थी. मन में इच्छा थी कि कोई उसे चाहने वाला मिल जाए, तो वह जीवन भर के लिए उस का हाथ थाम ले. इस तरह उस का भी जीवन संवर जाएगा और वह भी अपनी गृहस्थी, पति व बच्चों में रमी रहेगी. लोग गलत नहीं कहते, इश्क पहली नजर में होता है. वर्षा के दिल में भी तब से हलचल मचनी शुरू हो गई थी, जब वीरेंद्र से पहली बार उस की नजरें मिली थीं.

वर्षा की आंखें खूबसूरत थीं, तो वीरेंद्र की आंखों में भी प्यार ही प्यार था. उस पल से ही वीरेंद्र वर्षा की सोच का केंद्र बन गया था. वर्षा ने जितना सोचा, उतना ही उस की ओर आकर्षित होती गई. वर्षा का मानना था कि वीरेंद्र अच्छा और सच्चा आशिक साबित हो सकता है. उस के साथ जिंदगी मजे से गुजर जाएगी. वर्षा ने यह भी निर्णय लिया कि जब कभी भी वीरेंद्र प्यार का इजहार करेगा, तो वह मुहब्बत का इकरार कर लेगी. उम्मीद के मुताबिक उस दिन वीरेंद्र ने अपनी चाहत जाहिर की, तो वर्षा ने उस का प्यार कबूल कर लिया. उस दिन से वर्षा और वीरेंद्र का रोमांस शुरू हो गया.

वर्षा के प्रेम की जानकारी उस की मां चंदा देवी और भाई अशोक को भी हो गई थी. चूंकि वर्षा और वीरेंद्र शादी करना चाहते थे, सो उन दोनों ने उन के प्यार पर ऐतराज नहीं किया. एक प्रकार से वर्षा को मां और भाई का मूक समर्थन मिल गया था. दूसरी ओर वर्षा वीरेंद्र के जितना करीब आ रही थी, उतना ही उसे लग रहा था कि अभी वह वीरेंद्र को ठीक से समझ नहीं पाई, अभी उसे और समझना बाकी है. अत: वीरेंद्र को समझने के लिए वर्षा ने उस के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने का मन बना लिया. सोचा वीरेंद्र उस की अपेक्षाओं के अनुरूप साबित हुआ, तो उस से शादी कर लेगी. कसौटी पर खरा न उतरा, तो दोनों अपने रास्ते अलग कर लेंगे.

वर्षा को लिवइन रिलेशनशिप में भी दोहरा लाभ नजर आ रहा था. पहला लाभ यह है कि वीरेंद्र को ठीक से समझ लेगी. दूसरा लाभ यह कि अपनी जवानी को घुन नहीं लगाना पड़ेगा. वीरेंद्र उस की देह का सुख भोगेगा, तो वह भी वीरेंद्र के जिस्म से आनंद पाएगी.

एक रोज जब वर्षा और वीरेंद्र का आमनासामना हुआ और बातचीत का सिलसिला जुड़ा तो वीरेंद्र ने जल्द शादी करने का प्रस्ताव रखा. इस पर वर्षा बोली, ‘‘मुझे शादी की जल्दी नहीं है बल्कि हमें अभी एकदूसरे को समझने की जरूरत है.’’

‘‘6 महीने से हमारा रोमांस चल रहा है,’’ वीरेंद्र के शब्दों में हैरानी थी, ‘‘और अब तक तुम मुझे समझ नहीं पाई.’’

‘‘समझी तो हूं, लेकिन उतना नहीं जितना जीवन भर साथ रहने के लिए समझना चाहिए.’’

‘‘पूरी तरह समझने में कितना वक्त लगेगा?’’ वीरेंद्र ने उदास मन से पूछा.

कुछ देर गहरी सोच में डूबे रहने के बाद वर्षा ने जवाब दिया, ‘‘शायद 6 महीने और.’’

‘‘और इस दौरान मेरा क्या होगा?’’ वीरेंद्र ने पूछा.

वर्षा के होंठों पर मुसकान आई, ‘‘तुम्हारे साथ मैं भी रहूंगी.’’

वीरेंद्र के सिर पर हैरत का पहाड़ टूट पड़ा, ‘‘बिन ब्याहे मेरे साथ रहोगी.’’

‘‘इस में बुरा क्या है?’’ वर्षा मुसकराई, ‘‘नए जमाने के साथ लोगों की सोच और जिंदगी के तरीके भी बदलते रहते हैं. शहरों कस्बों में बहुत सारे लोग लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, हम भी रह लेंगे.’’
‘‘यानी कि शादी किए बिना ही तुम घर रहोगी.’’

वर्षा ने वीरेंद्र की ही टोन में जवाब दिया, ‘‘बेशक.’’

चूंकि वीरेंद्र वर्षा का दीवाना था. अत: जब वर्षा ने वीरेंद्र के सामने लिवइन रिलेशनशिप का प्रस्ताव रखा तो वह फौरन राजी हो गया. इधर वीरेंद्र ने अपने व वर्षा के प्रेम संबंधों की जानकारी मां को दी तो सरस्वती भड़क उठी. उस ने वीरेंद्र से साफ कह दिया कि वह बिनब्याही लड़की को घर में नहीं रख सकती. उस ने कोई बवाल कर दिया तो हम सब फंस जाएंगे. बदनामी भी होगी.

इस पर वीरेंद्र ने मां को समझाया कि वे दोनों एकदूसरे से प्रेम करते हैं. 6 महीने बीतते ही शादी कर लेंगे. वर्षा के घर वालों को भी साथ रहने में कोई ऐतराज नहीं है. इस बीच हम लोग वर्षा को परख भी लेंगे कि वह घर की बहू बनने लायक है भी या नहीं. सरस्वती देवी का मन तो नहीं था, लेकिन बेटे के समझाने पर वह राजी हो गई. इस के बाद वीरेंद्र ने 5 जून, 2020 को वर्षा को राठ स्थित शीतला माता मंदिर बुला लिया. यहां उस ने उस की मांग में सिंदूर लगाया. फिर उसे अपने घर ले आया. सरस्वती ने आधेअधूरे मन से बिनब्याही दुलहन का स्वागत किया और घर में पनाह दे दी.

वर्षा महीने भर तो मर्यादा में रही, उस के बाद रंग दिखाने लगी. वह न तो घर का काम करती और न ही खाना बनाती. सरस्वती देवी उस से कुछ कहती तो वह उसे खरीखोटी सुना देती. देवर अनिल के साथ भी वह दुर्व्यवहार करती. पति वीरेंद्र को भी उस ने अंगुलियों पर नचाना शुरू कर दिया. वर्षा मनमानी करने लगी तो घर में कलह होने लगी. कलह का पहला कारण यह था कि वर्षा को संयुक्त परिवार पसंद नहीं था. वह सास देवर के साथ नहीं रहना चाहती थी. कलह का दूसरा कारण उस की स्वच्छंदता थी. जबकि सरस्वती देवी चाहती थी कि वर्षा मर्यादा में रहे.

उधर वर्षा को घर की चारदीवारी कतई पसंद न थी. वह स्वच्छंद विचरण चाहती थी. तीसरा अहम कारण पति का वेतन था. वर्षा चाहती थी कि वीरेंद्र जो कमाए, वह उस के हाथ पर रखे. जबकि वीरेंद्र अपना आधा वेतन मां को दे देता था. इस बात पर वह झगड़ा करती थी. 10 नवंबर, 2020 की शाम 4 बजे सरस्वती देवी खाना तैयार करने नवोदय विद्यालय छात्रावास चली गई. अनिल व वीरेंद्र भी काम पर गए थे. घर में वर्षा ही थी. शाम 5 बजे वीरेंद्र घर आ गया. आते ही वर्षा ने वीरेंद्र से वेतन के संबंध में पूछा. वीरेंद्र ने बताया कि उसे वेतन मिल तो गया है. लेकिन उसे पैसा मां को देना है. क्योंकि दीपावली का त्यौहार नजदीक है और मां को घर का सारा सामान लाना है.

यह सुनते ही वर्षा गुस्से से बोली, ‘‘शारीरिक सुख मेरे से उठाते हो और पैसा मां के हाथ में दोगे. यह नहीं चलेगा. आज रात मां के कमरे में ही जा कर सोना, समझे.’’

वर्षा की बात सुन कर वीरेंद्र तिलमिला उठा और उस ने गुस्से में वर्षा के गाल पर एक तमाचा जड़ दिया. वर्षा गम खाने वाली कहां थी, वह वीरेंद्र से भिड़ गई. दोनो में मारपीट होने लगी. इसी बीच वर्षा की निगाह सिलबट्टे पर पड़ी. उस ने सिल का बट्टा उठाया और वीरेंद्र के सिर पर प्रहार कर दिया. बट्टे के प्रहार से वीरेंद्र का सिर फट गया और वह जमीन पर गिर पड़ा. इस के बावजूद वर्षा का हाथ नहीं रुका और उस ने उस के सिर व चेहरे पर कई और वार किए. जिस से वीरेंद्र की मौत हो गई. कथित पति की हत्या करने के बाद वर्षा ने घर पर ताला लगाया और फरार हो गई.

इधर रात 8 बजे सरस्वती देवी नवोदय विद्यालय छात्रावास से खाना बना कर घर आई तो घर के दरवाजे पर ताला लटक रहा था. सरस्वती ने वर्षा के मोबाइल फोन पर काल की तो उस का मोबाइल फोन बंद था.
फिर उस ने अपने छोटे बेटे अनिल को फोन कर घर पर बुला लिया. अनिल ने भी वर्षा को कई बार काल की लेकिन उस से बात नहीं हो पाई. सरस्वती और उस के बेटे अनिल ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वर्षा बदहवास हालत में घर के बाहर निकली थी. ताला लगाने के बाद वह बड़बड़ा रही थी कि सास और पति उसे प्रताडि़त करते हैं. वह रिपार्ट लिखाने पुलिस चौकी जा रही है. पड़ोसियों की बात सुन कर सरस्वती का माथा ठनका. किसी अनिष्ट की आशंका से उस ने राठ कोतवाली को सूचना दी.

सूचना पाते ही कोतवाल के.के. पांडेय पुलिस टीम के साथ आ गए. पांडेय ने दरवाजे का ताला तुड़वा कर घर के अंदर प्रवेश किया. उन के साथ सरस्वती व अनिल भी थे. कमरे में पहुंचते ही सरस्वती व अनिल दहाड़ मार कर रो पड़े. कमरे के फर्श पर 22 वर्षीय वीरेंद्र की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. सरस्वती ने पांडेय को बताया कि यह उन के बड़े बेटे की लाश है. चूंकि हत्या का मामला था. अत: के.के. पांडेय ने सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी. कुछ ही देर में एसपी नरेंद्र कुमार सिंह, एएसपी संतोष कुमार सिंह, तथा डीएसपी अखिलेश राजन घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

वीरेंद्र की हत्या सिल के बट्टे से सिर पर प्रहार कर के की गई थी. उस की उम्र 22-23 वर्ष के बीच थी. खून से सना आलाकत्ल बट्टा शव के पास ही पड़ा था, जिसे अधिकारियों ने सुरक्षित करा लिया. निरीक्षण के बाद अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल हमीरपुर भिजवा दिया. उस के बाद मृतक की मां व भाई से घटना के बारे में पूछताछ की. सरस्वती देवी ने बताया कि वर्षा उस के बेटे वीरेंद्र के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही थी. उसी ने वीरेंद्र की हत्या की है. उस का मायका राठ कोतवाली के गांव सैदपुर में है. सरस्वती देवी की तहरीर पर थानाप्रभारी के.के. पांडेय ने भादंवि की धारा 302 के तहत वर्षा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उस की तलाश शुरू कर दी.

रात 11 बजे थानाप्रभारी ने पुलिस टीम के साथ सैदपुर गांव में चंदा देवी के घर छापा मारा. घर पर उस की बेटी वर्षा मौजूद थी. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उसे थाना राठ कोतवाली लाया गया.
थाने पर जब उस से वीरेंद्र की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि वीरेंद्र से रुपए मांगने पर उस का झगड़ा हुआ था. गुस्से में उस ने वीरेंद्र पर सिल के बट्टे से प्रहार किया. जिस से उस का सिर फट गया और उस की मौत हो गई. पुलिस से बचने के लिए वह घर में ताला लगा कर मायके चली गई थी, जहां से वह पकड़ी गई.

11 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्ता वर्षा को हमीरपुर की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Family Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime: शक का कीड़ा

UP Crime: पत्नी सलीमा के चरित्र को ले कर आलमगीर के मन में ऐसा शक बैठ गया कि वह उस से उबर नहीं पा रहा था. इसी बीच एक युवती से आलमगीर की ऐसी नजदीकी बढ़ी कि उस से निकाह की खातिर वह एक खौफनाक गुनाह कर बैठा.

उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के थाना रमाला के किरठल गांव में सूरज की किरणें फूटने के साथ ही कोहराम मच गया था. इस की वजह थी एक लोमहर्षक वारदात, जो इतनी बड़ी थी कि पूरे गांव में मातम छा गया था. दरअसल, इसी गांव में रहने वाले आलमगीर के परिवार में पत्नी सलीमा के अलावा 4 बच्चे थे. आलमगीर अपने परिवार के साथ अलग रहता था, जबकि उस के पिता दिलशेर तथा भाई और बहन वाजिदा एकसाथ अलग घर में रहते थे. उस के 2 भाई वासिद और आलम दिल्ली में रह कर खराद का काम करते थे. एक भाई वाजिद गांव में ही रह कर दूध का काम करता था.

भाईबहनों में आलमगीर सब से बड़ा था. उस की बड़ी बेटी साहिबा अपने चाचा वासिद के पास दिल्ली गई हुई थी. उस की माली हालत कोई खास नहीं थी. किसी तरह मेहनत कर के वह परिवार को पाल रहा था. आलम ही नहीं, उस के पिता और भाइयों की स्थिति भी उसी जैसी थी. आलम के बच्चे गांव के मदरसे में पढ़ने जाते थे. 9 अप्रैल, 2015 की सुबह जब वे मदरसे में पढ़ने नहीं पहुंचे तो मौलवी ने आलमगीर की बेटी करीना की सहपाठीसहेली 10 वर्षीया सना को उन्हें बुलाने के लिए भेजा. सना भागती हुई मोहल्ला मूलेजाट स्थित आलमगीर के घर पहुंची तो दरवाजा खुला हुआ था. वह आवाज लगाते हुए जितनी तेजी से अंदर दाखिल हुई, उतनी ही तेजी से चिल्लाते हुए बाहर आ गई.

आलमगीर की बहन वाजिदा उधर से गुजर रही थी, सना की आवाज सुन कर उस के कदम ठिठक गए. उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटा?’’

डरीसहमी सना के गले से शब्द नहीं फूटे. उस ने घर की ओर इशारा कर दिया. अब तक कुछ और लोग आ चुके थे. माजरा समझने के लिए वे अंदर पहुंचे तो उन के होश उड़ गए. घर के अंदर 1-2 नहीं, 4 लाशें पड़ी थीं. दिल दहला देने वाले इस खूनी मंजर की सूचना किसी ने पुलिस को दी तो थाना रमाला के थानाप्रभारी राजेंद्र सिंह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल के मुआयना में पुलिस ने देखा कि 35 वर्षीया सलीमा, उस की 2 बेटियां 13 वर्षीया करीना, 6 वर्षीया यासमीन और 8 वर्षीय बेटे सूफियान की हत्या किसी धारदार हथियार से की गई थी.

घर के अंदर बाहरी कमरे में तख्त पर करीना की लाश पड़ी थी जबकि अंदर के कमरे में एक चारपाई पर सलीमा, सूफियान और यासमीन की लाशें पड़ी थीं. थानाप्रभारी राजेंद्र सिंह ने हत्याकांड की खबर अपने आला अधिकारियों को दी तो एएसपी विद्यासागर मिश्र, डीएसपी (बड़ौत) सी.पी. सिंह, डीएसपी (रमाला) राहुल मिठास, थानाप्रभारी (बड़ौत) राजेश वर्मा, अपराध शाखा के प्रभारी सतीशचंद्र और एडीएम यशवर्धन श्रीवास्तव भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. 4 हत्याओं की चर्चा मेरठ मंडल में फैल चुकी थी, इसलिए मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा ओर डीआईजी रमित शर्मा भी मौके पर आ पहुंचे. आलमगीर ड्राइवर था और नजदीकी जिला मुजफ्फरनगर में प्राइवेट बस चलाता था. वह हफ्ता 10 दिन में घर आता था.

उस समय आलमगीर घर में नहीं था, इसलिए घर वालों ने फोन कर के उसे घटना की सूचना दे दी. कुछ ही घंटे में वह आ गया. पत्नी और बच्चों की मौत से उस की हालत पागलों जैसी हो गई थी. पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श किया. सभी का अनुमान था कि हत्या से पहले मृतकों को खाने में कोई नशीला पदार्थ दिया गया था, जिस के बाद वे बेहोश हो गए तो उन के गले काटे गए. हत्या का तरीका एक जैसा था. सभी के गले के बीचोबीच वार किए गए थे. इस से यही लगता था कि हत्यारे के मन में मृतकों के प्रति काफी नफरत थी.

आसपड़ोस के किसी भी आदमी को हत्या के बारे में बिलकुल पता नहीं चल सका था. किसी को आतेजाते भी नहीं देखा गया था. आलम का रोरो कर बुरा हाल था. वह बारबार लाशों से लिपटे जा रहा था. हर कोई उसे दिलासा दे रहा था. पुलिस ने दिलासा दे कर उस से पूछा, ‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’

कुछ पल खामोश रहने के बाद उस ने शून्य में ताकते हुए कहा, ‘‘नहीं साहब.’’

‘‘तुम आखिरी बार घर कब आए थे?’’

‘‘पिछले सप्ताह 29 तारीख को आया था साहब. पता नहीं किस से मेरे बच्चों की क्या दुश्मनी थी, जो उस ने इन्हें मार दिया. अल्लाह उसे कभी माफ नहीं करेगा.’’ आलमगीर ने बिलखते हुए कहा.

‘‘सलीमा से तुम्हारी कब बात हुई थी?’’

‘‘2 दिनों पहले उस का फोन आया था. कह रही थी कि सूफियान की तबीयत खराब है. मैं ने कहा था कि उसे दवा दिला दो, मैं जल्दी ही घर आऊंगा.’’

इतना कह कर वह एक बार फिर फूटफूट कर रोने लगा. हालात और गम की वजह से उस से ज्यादा पूछताछ नहीं की जा सकती थी, इसलिए पुलिस अन्य लोगों से पूछताछ करने लगी. लोगों से पता चला कि आलम काफी व्यवहारकुशल आदमी था. गांव में उस की किसी से कोई अनबन नहीं थी. पुलिस का अनुमान था कि हत्यारा परिवार का ही कोई करीबी हो सकता है. इस की कुछ वजह भी थीं. जैसे कि घर में सब्जियों से सनी खाने की पैकिंग पौलीथिन घर के कोने में कूड़े पर पड़ी थीं. घर के आंगन में जो चूल्हा था, उस में राख नहीं थी. इस का मतलब वह पिछली रात नहीं जलाया गया था. साफ था रात का खाना बाहर से आया था.

सलीमा घर का दरवाजा अंदर से बंद कर के ही सोती रही होगी. किसी अंजान के लिए वह दरवाजा खोल नहीं सकती थी. घर में लूटपाट का भी कोई निशान नहीं था. मोबाइल भी घर में ही रखा था. इस के अलावा मृतका करीना के कमरे में एक अन्य चारपाई पर बिस्तर लगा था. संभवत: वह किसी करीबी के सोने के लिए ही लगाया गया होगा. पूरी आशंका थी कि उसी ने खाने में कोई नशीली चीज दे कर पहले सभी को बेहोश किया होगा, उस के बाद इत्मीनान से सभी की हत्या की होगी. बेहोश होने की वजह से कोई विरोध नहीं कर सका. करीना के हाथ पेट पर रखे थे, सलीमा के हाथ सीने पर थे, जबकि अन्य दोनों बच्चों के हाथ सिर के नीचे थे.

किसी अंजान के लिए जिस का मकसद मात्र कत्ल करना था, उस के लिए न दरवाजा खोला जाता, न बिस्तर लगाया जाता और न ही वह खाना बाहर से ले कर आता. ऐसे में कातिल आलमगीर का कोई रिश्तेदार या खास ही हो सकता था. लेकिन यह बात समझ से बाहर थी कि कोई इस तरह का आदमी पूरे परिवार को इस तरह क्यों खत्म करेगा? बहरहाल पुलिस ने जरूरी सामान को अपने कब्जे में ले लिया और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. हत्याओं में इस्तेमाल किया गया हथियार बरामद नहीं किया जा सका था. इस के बाद थाने आ कर आलमगीर के पिता दिलशेर की तरफ से अज्ञात हत्यारे के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया और पुलिस जांच में जुट गई.

4 हत्याओं की इस घटना से जिले में सनसनी फैल गई थी. अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद लाशें गांव लाई गईं. जब 4-4 जनाजे एकसाथ निकले तो लोगों की आंखें नम हो गईं. बच्चे बड़े सभी दुखी थे. हर कोई कातिल को कोस रहा था. गमगीन माहौल के बीच चारों लाशों को दफना दिया गया. दुख का पहाड़ आलमगीर पर टूटा था. इस दौरान वह रोरो कर बेहोश भी हो जाता था. गांव के बुजुर्ग उसे दिलासा दे रहे थे, ‘‘सब्र रखो आलम, अल्लाह को शायद यही मंजूर था.’’

पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली तो सभी की मौत की वजह सांस की नली कटना बताया गया. मृतकों के सिर पर भी किसी भारी चीज से प्रहार किए गए थे. पुलिस ने आलमगीर और सलीमा की काल डिटेल्स निकलवाई. सलीमा के नंबर पर आलमगीर की 2 दिन पहले बात हुई थी लेकिन आलमगीर की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा था, जिस पर उस की बहुत ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर गाजियाबाद की एक युवती का था. पुलिस ने गाजियाबाद जा कर उस युवती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि आलमगीर से उस के गहरे ताल्लुकात थे. दोनों के बीच प्रेमप्रसंग था, इसलिए दोनों बातें किया करते थे.

पुलिस उस वक्त चौंकी जब आलमगीर के मोबाइल की लोकेशन सुबह के 4 बजे तक गांव में ही मिली. इस का मतलब हत्या वाली रात वह गांव में ही था, जबकि उस ने बताया था कि वह गांव नहीं आया था. पुलिस के शक की सुई उसी पर जा कर ठहर गई. पुलिस ने बिना देर किए उसे हिरासत में ले लिया और थाने ले आई. थाने में पूछताछ की जाने लगी तो वह रोने और बेहोश होने का नाटक करने लगा. पुलिस जानती थी कि यह नाटक कर रहा है इसलिए उस से सख्ती से पेश आया गया. इस के बाद उस ने चौंकाने वाला जो खुलासा किया, एकबारगी पुलिस को भी विश्वास नहीं हुआ. किसी और ने नहीं, बल्कि आलमगीर ने ही पत्नी और अपने तीनों बच्चों की हत्या की थी. अब सवाल यह था कि आलमगीर ने अपनी ही पत्नी और प्राणों से प्यारे बच्चों की हत्या क्यों की? वह इतना कू्रर कैसे बन गया? इन सारे सवालों के जवाब उस की इस कहानी में छिपे हैं.

आलमगीर का विवाह सलीमा के साथ सन 2000 में हुआ था. सलीमा झारखंड राज्य के रांची शहर के मोहल्ला बडयातू की रहने वाली थी. सलीमा के पिता नहीं थे. उस का भाई महमूद दूरसंचार विभाग में नौकरी करता था. शादी के बाद सलीमा अपने मायके बहुत कम जाती थी. उस का भाई 2-3 सालों में उस से मिलने आ जाता था. विवाह होते ही आलमगीर पिता से अलग रहने लगा था. समय के साथ सलीमा 4 बच्चों की मां बनी. आलमगीर ड्राइवर था. वह प्राइवेट बस चलाता था. वह अकसर बाहर रहता था. बाद में वह मुजफ्फरनगर रूट पर बस चलाने लगा.

परिवार बड़ा था, जिस का खर्च पूरा करने के लिए उसे दिनरात मेहनत करनी पड़ती थी. उस की इतनी कमाई नहीं थी जिस से बच्चों को अच्छी तालीम दिला सके. इसलिए बच्चे गांव के मदरसे में तालीम ले रहे थे. सलीमा हंसमुख स्वभाव की थी, हर किसी से मुसकरा कर बात करती थी. आलमगीर को उस का यह व्यवहार बहुत खलता था. यहां तक कि उसे अपने पिता से भी सलीमा का इस तरह बात करना पसंद नहीं था. उस ने सलीमा को कई बार टोका. जब उस की आदत नहीं बदली तो उसे उस पर शक होने लगा.

वह 8-10 दिनों में ही घर आ पाता था. वह जितना दूर रहता था, उतना ही सलीमा के बारे में सोचता रहता था कि पत्नी कहीं चरित्रहीन तो नहीं है. वह जितना सोचता, उस का शक उतना ही बढ़ता गया. एक दिन उस ने शराब पी कर इस बात को ले कर झगड़ा किया तो सलीमा ने अपना सिर थाम लिया, ‘‘या अल्लाह, कैसी तोहमत लगा रहे हो, कुछ तो शरम करो?’’

‘‘शरम तो तुम्हें करनी चाहिए. तुम जब से मेरी जिंदगी में आई हो, मुझे तभी से तुम्हारे ऊपर शक है.’’

नशे में आलमगीर ने न जाने क्याक्या कह डाला. इस के बाद तो यह सिलसिला सा बन गया. शक्की आदमी को कितना भी समझाओ, विश्वास दिलाओ उस का शक दूर नहीं होता. ऐसा ही आलमगीर के साथ भी था.

एक बार आलमगीर करीब 20 दिनों बाद घर आया तो सलीमा से उस का झगड़ा हो गया. इस से उसे लगा कि सलीमा ने उस से जानबूझ कर झगड़ा किया है. शायद उस का घर आना उसे अच्छा नहीं लगता. अब आए दिन ऐसी बातों पर तकरार होने लगी. सलीमा इस बात से बहुत आहत थी. फिर भी क्लेश के बीच जिंदगी और दिन बीतते रहे. एक साल पहले की बात है. आलमगीर घर आया हुआ था. एक दिन शाम को वह मोबाइल घर पर ही छोड़ कर गांव में घूमने निकल गया. तभी उस का मोबाइल बजा तो सलीमा ने फोन रिसीव कर लिया. वह कुछ कहती, उस के पहले ही दूसरी ओर से कोई लड़की नाराजगी के लहजे में कहने लगी, ‘‘आलम, 2 दिन हो गए तुम ने मुझ से कोई बात नहीं की. मेरा दिल नहीं लग रहा है.

बीवी में इतना खो गए हो कि मेरा खयाल ही नहीं आ रहा है.’’

यह सुन कर सलीमा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह खामोश रही. दूसरी ओर से फिर कहा गया, ‘‘कुछ बोलते क्यों नहीं? मेरी मोहब्बत का इम्तिहान क्यों ले रहे हो?’’

सलीमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. वह भड़क उठी, ‘‘मैं आलमगीर की बीवी बोल रही हूं. तू कौन है, जो मेरा घर बरबाद करना चाहती है. तुझे शरम नहीं आती, बेहया…’’

उस के इतना कहते ही दूसरी ओर से फोन काट दिया गया. सलीमा गुस्से में बड़बड़ाती रही. सलीमा को बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि जो आदमी उस पर झूठा शक करता है, वह खुद इस तरह का काम कर सकता है. वह गुस्से से भरी बैठी थी. आलम के आते ही उस ने जम कर खरीखोटी सुनाई. बीवी पर शक करने वाला आलमगीर सन्न रह गया. उस ने टालने की कोशिश की, लेकिन सलीमा ने बखेड़ा खड़ा कर दिया. इस के बाद घर में अकसर कलह रहने लगी. दोनों एकदूसरे पर आरोप लगाते रहते. धीरेधीरे मनमुटाव और झगड़ा इतना बढ़ गया कि दोनों के बीच मारपीट होने लगी. सलीमा को पता चल गया था कि आलमगीर गाजियाबाद की किसी युवती से प्रेम करता है और उस के साथ निकाह करना चाहता है.

दूसरी ओर आलम को जो सलीमा पर शक था, वह बढ़ता ही गया. एक दिन उस ने कुछ कहा तो सलीमा ने उसे झिड़क दिया, ‘‘तुम अपने दिमाग का इलाज क्यों नहीं करा लेते. ऐसी बातें करोगे तो अल्लाह भी तुम्हें माफ नहीं करेगा. खराब तुम खुद हो, इसलिए मुझ पर शक करते हो.’’

‘‘मैं रोजरोज के झगड़ों से तंग आ गया हूं. अब मैं यह सब बरदाश्त नहीं कर सकता.’’

‘‘तो तुम क्या करोगे?’’ सलीमा चीखी.

‘‘मुझे भी नहीं पता, लेकिन मेरा शक गलत नहीं है.’’

‘‘और तुम जो हम से अलग गुलछर्रे उड़ा रहे हो, उस का क्या? गलत काम खुद करते हो और हमारे ऊपर झूठी तोहमत लगाते हो.’’

आलमगीर लड़झगड़ कर शांत हो गया लेकिन शक उस के दिमाग से निकला नहीं. शक इंसान को अंधा कर देता है. वक्त के साथ उसे इस बात का शक हो गया कि चारों बच्चे उस के नहीं है. अब वह मन ही मन सलीमा ही नहीं बच्चों से भी नफरत करने लगा. प्रेमिका के लिए उस के मन में मोहब्बत बढ़ने लगी और वह उस के साथ निकाह के सपने देखने लगा. आलमगीर ने सोचा कि वह पत्नी और बच्चों को रास्ते से हटा दे तो उस के शक का समाधान भी हो जाएगा और उस के बाद प्रेमिका से निकाह कर के आराम से रहेगा. उस का यह इरादा घर बरबाद करने वाला था लेकिन शक में उस की मति मारी गई थी. वह जब भी घर आता, सलीमा से जरूर झगड़ता था.

मन ही मन उस ने पत्नी और बच्चों को मारने का खतरनाक फैसला ले लिया. एक दिन वह जहर ले आया और शाम को दूध में मिला दिया. वह अपना काम कर पाता, इस के पहले ही कुछ रिश्तेदार आ गए. जिस की वजह से उस का काम नहीं हो पाया. उस ने दूध में छिपकली गिरने की बात कह कर सारा दूध नाली में फेंक दिया. उस के इरादों से उस की प्रेमिका पूरी तरह अंजान थी. जबकि वह ठान चुका था कि सभी को मार कर ही रहेगा. एक दिन वह घर में रखी दरांती अपने साथ ले गया और उस पर धार लगवा कर उसे तेज करा लाया. उस ने सोचा कि इस बार पूरी तैयारी कर के सभी को खत्म कर देगा.

अप्रैल के पहले सप्ताह की बात है. उस ने बस पर अपने साथ रहने वाले परिचालक से गेहूं में रखने की बात कह कर सल्फास मंगवा लिया. सल्फास की गोलियां गांवों में अकसर गेहूं को कीड़ों से बचाने के लिए उस के बीच रखी जाती हैं. सल्फास उसे आसानी से मिल गया. उस ने तय कर लिया कि इस बार वह जब भी घर जाएगा, सभी को खत्म कर देगा. पहले वह मोबाइल से बच्चों से बात कर लिया करता था, लेकिन इधर उस ने ऐसा करना कम कर दिया था. 6 अप्रैल को सलीमा ने उसे फोन किया कि बेटे की तबीयत खराब है. उस ने उसे दवा दिलाने की बात कही तो उस दिन भी दोनों के बीच फोन पर ही झगड़ा हुआ.

इस के बाद उस ने 8 अप्रैल को सभी को खत्म कर देने का विचार बना लिया. अकसर वह घर आने से पहले फोन कर देता था. लेकिन उस दिन उस ने जानबूझ कर फोन नहीं किया. उस ने आते समय शाम का खाना एक ढाबे से पैक कराया और कोल्डड्रिंक की बोतल भी खरीदीं. इस के बाद वह घर पहुंच गया. शाम ढलते ही गांव में लोग सो जाते हैं, इसलिए किसी ने उसे घर आते नहीं देखा. सलीमा ने तब तक खाना नहीं बनाया था. उस ने खाना दे कर सलीमा से उस दिन बहुत प्यार से कहा, ‘‘सभी को खाना परोस कर दे दो. मैं भी बेवजह तुम पर शक करता हूं.’’

सलीमा को लगा कि आलमगीर को अपनी गलती का अहसास हो गया है. परिवार खुश रहे किसी औरत के लिए इस से अच्छी बात और क्या हो सकती है. वह खुश हो गई. उस ने खाना लगाया तो सब ने साथ मिल कर खाया. सलीमा और बच्चों ने सभी के सोने के लिए बिस्तर लगा दिए. किसी को अंदाजा नहीं था कि आलमगीर के सिर पर शैतान सवार है और वह सभी की आखिरी रात है. वह कोल्डड्रिंक की जो बोतल लाया था, उस में सल्फास की गोलियां डाल कर मिला दीं और सभी को पिला दी. आलमगीर ने कोल्डड्रिंक नहीं पी. इस के बाद सभी सोने चले गए. आलमगीर भी बिस्तर पर लेट गया लेकिन उसे भला नींद कैसे आती.

सभी सो चुके थे. रात 11 बजे जब उसे लगा कि सभी गहरी नींद सो गए हैं और जहर अपना असर दिखा चुका होगा तो उस ने घर में रखी दराती और एक हथौड़ा निकाला. कपड़ों पर खून के दाग न लगें इस के लिए उस ने अपने सारे कपड़े उतार दिए. वह सिर्फ अंडरवियर पहने था. वह सलीमा के नजदीक पहुंचा और हथौड़े से उस के सिर पर वार किया. वह पहले से ही बेहोश थी, इसलिए चीखपुकार का कोई सवाल नहीं था. फिर उस ने दरांती से उस का गला काट दिया. इस के बाद उस ने एकएक कर के तीनों बच्चों सूफियान, यासमीन और करीना को भी मार दिया. हैवान बने आलमगीर को अपने बच्चों पर जरा भी दया नहीं आई. जब उसे इत्मीनान हो गया कि सभी मर चुके हैं तो उस ने खून सने हाथ और मुंह पर लगे खून को साफ किया और बिस्तर पर आ कर लेट गया.

सुबह 4 बजे उस ने दरांती और हथौड़ा चादर में लपेट कर साथ लिया और घर से निकल गया. यह संयोग ही था कि उसे जाते हुए भी किसी ने नहीं देखा. गांव के बाहर एक खेत में उस ने दरांती और हथौड़ा छिपा दिया. इस के बाद दिन निकलने का इंतजार करने लगा. सुबह उजाला होने पर वह मुजफ्फरनगर चला गया और घर से हत्याओं की सूचना आने का इंतजार करने लगा. सूचना मिलने पर वह गांव पहुंचा और दुखी होने का सफल नाटक किया. हर किसी की हमदर्दी आलमगीर के साथ थी. किसी को अंदाजा नहीं था कि वह इतना खतरनाक काम भी कर सकता है. उस ने नाटक तो बहुत बढि़या किया, लेकिन पुलिस के शिकंजे से बच नहीं सका.

पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त दरांती और हथौड़ा भी बरामद कर लिया. एसपी शरद सचान ने प्रेसवार्ता कर हत्याकांड का खुलासा किया. आलमगीर की करतूत पर हर कोई हैरान था. पुलिस ने उस की प्रेमिका से भी पूछताछ की लेकिन वह आलमगीर की योजना से अंजान थी, इसलिए निर्दोष मान कर उसे छोड़ दिया गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने आलमगीर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अब उस के घर वालों तथा नातेरिश्तेदारों ने निर्णय लिया है कि उस ने हैवानियत भरा जो काम किया है, इस के लिए उस की कोई पैरवी नहीं करेगा. उस के पिता दिलशेर का कहना था कि उसे बेटे की गंदी सोच और गुनाह का हमेशा अफसोस रहेगा. कथा लिखे जाने तक आलमगीर जेल में था. उस की जमानत नहीं हो सकी थी. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Family Dispute: तीसरे शौहर की तीसरी बीवी

Family Dispute: शफीक की तीसरी बीवी नगमा उस के निकम्मेपन से तो परेशान थी ही, उस ने उस की मां के 5 लाख रुपए भी हड़प लिए थे. ऐसे पति से छुटकारा पाने के लिए उस ने जो किया, क्या वह उचित था?

24 वर्षीया नगमा खान अपने मातापिता की एकलौती संतान थी. नगमा के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही पिता का साया उस के सिर से उठ गया था. मां ने छोटामोटा काम कर के उस की परवरिश की. बिना बाप की बेटी नगमा पर मोहल्ले के तमाम लड़कों की नजरें टिकी रहती थीं. बेटी के साथ कहीं कुछ ऐसावैसा न हो जाए, यह सोच कर मां ने जल्दी ही उस का निकाह आसिफ खान से करा दिया. आसिफ खान अशफाक खान का बेटा था. परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटे और बेटियां थीं. सभी बेटों और बेटियों का उन्होंने निकाह कर दिया था. परिवार में सुमति थी, लेकिन परिवार बड़ा होने की वजह से सभी अपनेअपने बालबच्चों के साथ अलगअलग घरों में रहते थे.

अशफाक खान के बेटों में पहला तौकीर खान, दूसरा तौफीक खान, तीसरा शफीक खान और चौथा बेटा आसिफ खान था. उन के चारों बेटों में शफीक खान अन्य भाइयों से अलग था. वह कोई कामधंधा करने के बजाय अपने आवारा दोस्तों के साथ दिनभर इधरउधर आवारागर्दी किया करता था. रंगीनमिजाज होने की वजह से शफीक ने 3-3 शादियां की थीं. उस के व्यवहार से तंग आ कर उस की पहले की दोनों बीवियां उसे छोड़ कर अपनेअपने मायके में रह रही थीं. 6 महीने से वह अपनी तीसरी बीवी नगमा के साथ किराए के मकान में रह रहा था. नगमा शफीक के छोटे भाई आसिफ की बीवी थी. लेकिन उस से उस का तलाक हो चुका था. तब शफीक ने उस से तीसरी शादी कर ली थी.

नगमा और आसिफ खान का जब निकाह हुआ था, तब कुछ दिनों तक तो दोनों ठीकठाक, हंसीखुशी से रहे. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे नगमा की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती गईं. अकसर वह पति से किसी न किसी महंगे समान या खानेपीने की चीजों की फरमाइश करने लगी. जबकि आसिफ को यह सब पसंद नहीं था. नगमा की इन्हीं हरकतों से तंग आ कर आखिर एक दिन उस ने नगमा को तलाक दे दिया. आसिफ से आजादी मिलने के बाद कुछ दिनों तक नगमा इधरउधर भटकती रही. इस के बाद उस ने अपने ही मोहल्ले के रहने वाले अपनी उम्र से 5 साल छोटे सरवर उर्फ मोनू से निकाह कर लिया. कुछ दिनों तक तो नगमा सरवर के साथ हंसीखुशी से रही. सरवर ने भी नगमा के हर सुखदुख का ध्यान रखा था. उसी बीच वह एक बेटे की मां बनी.

कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चला, लेकिन कुछ दिनों के बाद नगमा का आकर्षण सरवर के प्रति कम होता गया. दोनों के बीच छोटीछोटी बातों और घरेलू खर्च को ले कर कहासुनी होने लगी थी. इस क्लेश से परेशान हो कर नगमा सरवर का घर छोड़ कर अपनी मां के साथ आ कर रहने लगी. नगमा मां के साथ रह रही थी, तभी उस की मुलाकात पहले शौहर आसिफ के बड़े भाई शफीक से हुई. रंगीनमिजाज शफीक ने अपनी लच्छेदार और मीठीमीठी बातों से नगमा का मन मोह लिया. इस के बाद उस ने यह कह कर नगमा को अपने साथ रख लिया कि वह जल्दी ही उस से निकाह कर लेगा.

इस मामले में नगमा की मां ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर शफीक के प्रेम का भूत इस तरह सवार था कि उस ने मां की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. बिना निकाह किए ही वह शफीक के साथ रहने लगी थी. इस बात का शफीक की दोनों बीवियों ने ही नहीं, घरवालों ने भी विरोध किया, लेकिन शफीक ने सभी के विरोध को नजरअंदाज कर दिया. कुछ दिनों तक शफीक ने नगमा को खूब अच्छी तरह रखा. बाद में एकएक पैसे के लिए मोहताज रहने लगी. अब उसे सरवर को छोड़ कर शफीक के साथ आने का पछतावा होने लगा.

दूसरी एक बात उसे इस से भी ज्यादा परेशान कर रही थी. दरअसल शफीक ने नगमा की मां से 5 लाख रुपए यह कह कर ले लिए थे कि वह उसे एसआरए में चल रही योजना के अंतर्गत घर दिला देगा. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. उस ने वे पैसे भी मौजमस्ती में उड़ा दिए. नगमा जब भी अपनी मां के पैसे लौटाने को कहती, वह उस के साथ मारपीट करने लगता. इस स्थिति में वह जब कभी सरवर से मिलती, उस से सारी परेशानियां बता कर मन का बोझ हलका कर लेती. इसी के साथ उसे छोड़ देने का अफसोस भी जाहिर करती. क्योंकि अब उसे लगता था कि सरवर जैसा भी था, शफीक से तो ठीक ही था.

30 जनवरी की रात साढ़े 10 बजे शफीक घूम कर लौटा तो बैडरूम में नगमा को सरवर के साथ हंसहंस कर बातें करते देखा. इस बात से उस का खून खौल उठा. वह सरवर को गालियां देते हुए उस से मारपीट करने लगा. नगमा को शफीक की यह हरकत अच्छी नहीं लगी. वह दोनों को अलग करने लगी तो शफीक ने उसे भी गाली दे कर गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया. तमाचा इतना जोरदार था कि नगमा के मुंह से खून निकल आया. नगमा को यह बात बरदाश्त नहीं हुई और वह भी आपा खो बैठी. क्योंकि वह पहले से ही शफीक की हरकतों से परेशान थी. उसी का नतीजा था कि उस ने तुरंत एक क्रूर फैसला ले लिया. वह दौड़ कर बाथरूम में गई और वहां रखी कपड़ा धोने वाली मुंगरी उठा लाई.

शफीक सरवर से उलझा था इसलिए उस ने नगमा की ओर ध्यान नहीं दिया. इसी का फायदा उठा कर नगमा ने पीछे से उस के सिर पर मुंगरी से जोरदार वार कर दिया. वार इतना जोरदार था कि शफीक संभल नहीं सका और लड़खड़ा कर फर्श पर गिर पड़ा. इस के बाद सरवर को मौका मिल गया और वह शफीक पर पिल पड़ा. सरवर ने शफीक को इतना मारा कि वह बेहोश हो गया. नगमा और सरवर ने शफीक के साथ जो किया था, होश आने पर वह उन के साथ कुछ भी कर सकता था. इस से बचने के लिए दोनों ने उस के गले में रस्सी लपेट कर कस दी, जिस से शफीक की मौत हो गई.

शफीक को दोनों ने गुस्से में मार तो दिया, लेकिन गुस्सा शांत हुआ तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. अब उन्हें जेल जाने का डर सताने लगा. अब उन्हें शफीक की लाश को ठिकाने लगाने की चिंता सताने लगी. काफी सोचविचार कर सरवर शेख ने अपने दोस्त सोहेल मिर्जा को फोन कर के वहां बुलाया और लाश को ठिकाने लगाने में मदद मांगी. सोहेल ने मदद के लिए हामी भर दी तो सरवर और नगमा ने शफीक की लाश को एक चादर में लपेट दिया. इस के बाद सरवर उस लाश को उसी की मोटरसाइकिल से, जो वह अपने भाई की मांग कर लाया था, से रफीकनगर डंपिंग यार्ड में ले आए. लाश की शिनाख्त न हो सके, इस के लिए उन्होंने उस पर पहले मिट्टी का तेल, उस के बाद पेट्रोल डाल कर आग लगा दी.

31 जनवरी की सुबह 8 बजे महानगर मुंबई के उपनगर चेंबूर थाना शिवाजीनगर के सीनियर इंसपेक्टर बाला साहेब जाधव को पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि रफीकनगर के डंपिंग यार्ड में एक लाश जल रही है, जिस के आसपास आग फैली है. सूचना मिलते ही वह तुरंत हरकत में आ गए. तुरंत सारी औपचारिकताएं निभा कर वह सहायक इंसपेक्टर संजय दलवी, विकास भुजबल, नितिन भाट, सबइंसपेक्टर आनंद वागड़े, कांस्टेबल सुनील कलपीकट्टे, जनार्दन इंदुलकर, नारायन धड़म, संभाजी पोटे और सुनील निवालकर को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

प्राप्त सूचना के अनुसार लाश आग में जल रही थी, इसलिए चलने से पहले उन्होंने मामले की जानकारी फायरब्रिगेड को भी दे दी थी. फायरब्रिगेड की गाडि़यों ने घटनास्थल पर पहुंच कर आग को काबू में कर लिया था. पुलिस टीम के पहुंचने तक लाश इस तरह जल चुकी थी कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था. इंसपेक्टर बाला साहब जाधव सहायकों के साथ लाश का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर परिमंडल-7 के एडिशनल सीपी संग्राम सिंह निशायदार, एसीपी प्रकाश निलवाड़ आदि पुलिस फोटोग्राफर और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के साथ वहां पहुंच गए.

प्रेस फोटोग्राफर और क्राइम टीम का काम खत्म हो गया तो इन पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल एवं लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद उन्होंने बाला साहेब जाधव से विचारविमर्श कर के उन्हें कुछ निर्देश दिए. अधिकारियों के जाने के बाद बाला साहेब जाधव सबूत जुटाने में जुट गए. लेकिन लाश की स्थिति ऐसी थी कि वह कुछ कर नहीं सके. मदद के लिए उन्होंने शहर के ही सायन अस्पताल के डा. ढेरे को बुला कर उन्हीं की मदद से लाश को पोस्टमार्टम के लिए मुंबई उपनगर घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल भिजवाया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला मृतक पुरुष था और उसे गला घोंट कर मारा गया था. सबूत नष्ट करने के लिए लाश पर पेट्रोल और मिट्टी का तेल डाल कर जलाया गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर बाला साहेब जाधव ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा कर मामले की जांच की जिम्मेदारी इंसपेक्टर संजय दलवी और विकास भुजबल को सौंप दी थी. इस मामले में सब से बड़ी समस्या थी लाश की शिनाख्त. बिना शिनाख्त के जांच एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती थी. इस के लिए संजय दलवी ने शहर के सभी पुलिस थानों में संदेश भेज कर यह जानने की कोशिश की कि कहीं किसी की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. जब किसी थाने से कोई सूचना नहीं मिली तो मामला पेचीदा हो गया. दिन बीत रहे थे और अधजली लाश के बारे में कुछ पता नहीं चल रहा था.

जब कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो संजय दलवी और विकास भुजबल ने अपने सभी साथियों को मृतक के बारे में पता करने के लिए लगा दिया. उन की यह कोशिश रंग लाई. घटनास्थल के आसपास पूछताछ में उन्हें एक व्यक्ति ने बताया कि रात के 3-4 बजे के बीच वह डंपिंग यार्ड में शौच के लिए बैठा था तो वहां सफेद रंग की एक मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस से 2 लोग आए थे. पीछे बैठे आदमी के कंधे पर एक बड़ी गठरी थी. उसे वे डंपिंग यार्ड में ले आए और उसे एक जगह रख कर उस पर मिट्टी का तेल या पेट्रोल डाल कर आग लगा दी.

यह सब वह इसलिए चुपचाप बैठा देखता रहा, क्योंकि उस समय उस के पास काफी पैसे और महंगा मोबाइल फोन था. उसे डर लग रहा था कि पता नहीं वे किस तरह के आदमी हैं. उन के जाने के बाद वह भी चुपचाप वहां से चला गया था. थाना शिवाजीनगर पुलिस तो इस मामले की जांच में रातदिन एक किए ही थी, दूसरी ओर क्राइमब्रांच यूनिट-6 की टीम भी इस मामले से रहस्यों का परदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी. मगर कामयाबी शिवाजीनगर पुलिस के हाथ लगी.

संजय दलवी की टीम सफेद रंग की उस मोटरसाइकिल की खोज में लग गई, जिस से लाश को डंपिंग यार्ड तक लाया गया था. संयोग देखो, जिस मोटरसाइकिल के बारे में पुलिस पता कर रही थी, उस मोटरसाइकिल को थाना चेंबूर पुलिस बरामद कर चुकी थी. चेंबूर के किसी दुकानदार ने फोन कर के सूचना दी थी कि सफेद रंग की एक मोटरसाइकिल कुछ दिनों से उस की दुकान के सामने लावारिस खड़ी है. दुकानदार की सूचना पर थाना चेंबूर पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले कर उस के नंबर के आधार पर जब उस के मालिक को बुलाया तो वह अपनी मोटरसाकिल को थाने में देख कर चौंका. उस का नाम तौफीक खान था. उस ने पुलिस को बताया कि उस की इस मोटरसाइकिल को उस का छोटा भाई शफीक एक सप्ताह पहले मांग कर ले गया था.

चूंकि मोटरसाइकिल लावारिस खड़ी मिली थी, यह जान कर तौफीक का पूरा परिवार घबरा गया. किसी अनहोनी की चिंता में सभी बुरी तरह डर गए. पता नहीं शफीक कहां और किस स्थिति में है. उस के बारे में पता करने के लिए जब उस की पत्नी नगमा को फोन किया गया तो उस ने बताया कि वह 4-5 दिनों से घर नहीं आए हैं. घरवाले चिंता में पड़ गए कि वह घर नहीं आया तो गया कहां? उस की जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों से पता किया गया. जब कहीं से उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो घर वाले थाना नेहरूनगर जा पहुंचे. जब सारी बात वहां के थानाप्रभारी को बताई गई तो उन्होंने शफीक की गुमशुदगी दर्ज कर के बताया कि थाना शिवाजीनगर पुलिस ने बुरी तरह से जली एक लाश बरामद की है, जो अस्पताल की मोर्चरी में है. वे चाहें तो वहां जा कर उसे देख सकते हैं.

4 फरवरी, 2015 की शाम शफीक के पिता अशफाक खान अपने बेटों के साथ थाना शिवाजीनगर पहुंचे और विकास भुजबल तथा संजय दलवी से मिल कर शफीक के गायब होने के बारे में बता कर लाश देखने की इच्छा जाहिर की. संजय दलवी असफाक और उन के बेटों को राजावाड़ी अस्पताल ले गए और उन्हें वह लाश दिखाई, जो डंपिंग यार्ड से मिली थी. चूंकि लाश इस तरह जली थी कि उसे वे पहचान नहीं पाए. लेकिन सफेद रंग की मोटरसाइकिल का जो मामला था, उस से साफ हो गया कि वह लाश शफीक की ही थी. इस के बाद संजय दलवी ने शफीक के बारे में पता किया तो पता चला कि उस की 3 बीवियां थीं. वह मनमौजी और रंगीनमिजाज आदमी था. उस की पहली पत्नी का नाम शबाना था, जिस की 2 बेटियां थीं और वह उन के साथ जिला ठाणे के उपनगर मुंब्रा में रहती थी.

दूसरी पत्नी का नाम आसमा था और वह कुर्ला की पाइप लाइन में अपनी एक बेटी के साथ रहती थी. तीसरी पत्नी का नाम नगमा था, जो उस के साथ निसर्ग कौआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के मकान नंबर 6 के रूम नंबर 701 में रहती थी. शफीक के बारे में मिली इस जानकारी से जांच अधिकारियों को लगा कि शफीक की हत्या के पीछे उस की पत्नियों का हाथ हो सकता है. ईर्ष्यावश उन्हीं में से किसी ने उसे मरवा दिया है. उस की तीनों बीवियों से पूछताछ की गई तो इन में से आसमा और शबाना तो साफ निकल गईं, लेकिन नगमा फंस गई. वह पुलिस के किसी भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. मजबूर हो कर उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और फिर शफीक की हत्या की पूरी कहानी सुना दी.

नगमा के बयान के आधार पर संजय दलवी और विकास भुजबल की टीम ने 5 फरवरी, 2015 को शिवाजीनगर स्थित दुर्गा सेवा संघ के औफिस में छापा मार कर सरवर को गिरफ्तार कर लिया. मगर उस का साथी सोहेल मिर्जा उन के हाथ नहीं लगा. क्योंकि उसे एक दिन पहले क्राइम ब्रांच यूनिट-6 के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल की टीम ने पकड़ लिया था. पूछताछ के बाद उन्होंने सोहेल को शिवाजीनगर पुलिस के हवाले कर दिया था. पूछताछ में उन्होंने बताया था कि लाश को आग के हवाले कर के वे मोटरसाइकिल से चेंबूर स्थित मकवाना कंपाउंड पहुंचे और वहां एक दुकान के सामने मोटरसाइकिल खड़ी कर के अपनेअपने घर चले गए.

उन्हें लगा कि उन्होंने जिस तरह सारे काम निपटाए हैं, वे कतई नहीं पकड़े जाएंगे. लेकिन उन्होंने वह मोटरसाइकिल जिस दुकान के सामने खड़ी की थी, उस दुकान के मालिक ने थाना चेंबूर पुलिस को फोन कर के लावारिस खड़ी उस मोटरसाइकिल की सूचना दे दी थी, जिस से इस बात की सूचना शफीक के घर तक पहुंच गई थी. उस के बाद उस की खोज शुरू हुई तो उस की हत्या की जानकारी शफीक के घरवालों को हो गई और पुलिस नगमा तक पहुंच गई, जिस के बाद शफीक की हत्या का मामला खुल गया. पूछताछ के बाद नगमा, सरवर और शोहेल मिर्जा को पुलिस ने कुर्ला की अदालत में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Maharashtra Crime New: ड्रग क्वीन बेबी पाटनकर

Maharashtra Crime New: गरीबी में पलीबढ़ी शशिकला पाटनकर उर्फ बेबी ने महलों में रहने के जो सपने देखे थे, वे पूरे तो कर लिए, लेकिन न जाने कितनों के सपने तोड़ कर. अपने सपने पूरे करने के लिए उस ने जो रास्ता अख्तियार किया, क्या वह उचित था….

महाराष्ट्र के नवी मुंबई पनवेल के खारपाडा टोला नाके के पास जैसे ही एक लग्जरी बस आ कर रुकी, फुरती से उस में एक महिला के साथ कई लोग चढ़ गए. उन में से एकएक आदमी बस के दोनों गेटों के पास खड़े हो गए, ताकि बस से कोई भी आदमी बाहर न जा सके, बाकी लोग ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठी महिला के पास जा कर खड़े हो गए. महिला देखने में किसी धनाढ्य परिवार की लग रही थी. बस में चढ़े लोगोेंके साथ चढ़ी महिला ने सीट पर बैठी महिला से कहा, ‘‘मैडम चलिए, आप का सफर खत्म हो गया है. अब आप को हमारे साथ चलना है.’’

सीट पर बैठी उस महिला ने खड़ी महिला को एक बार ऊपर से नीचे तक देखा. इस के बाद थोड़ी नाराजगी जताते हुए बोली, ‘‘क्या मतलब है आप का. आप हैं कौन और मुझ से इस तरह की बात क्यों कह रही हैं?’’

‘‘हम कौन हैं, यह अभी आप को पता चल जाएगा. हम मतलब भी बता देंगे. बहरहाल अभी तो आप को हमारे साथ चलना होगा.’’ उस महिला को सवारी से बहस करता देख बस के ड्राइवर और कंडक्टर को बुरा लगा. उन्होंने सीट पर बैठी महिला का पक्ष लेते हुए उन लोगों से पूछा, ‘‘आप लोग कौन हैं, जो बस में बैठी महिला से इस तरह की बातें कर रहे हैं.’’

इसी के साथ अन्य सवारियों ने भी उन लोगों का विरोध करना शुरू कर दिया. इस के बाद उन लोगों में से एक ने अपना आईडी कार्ड दिखाते हुए कहा, ‘‘हम लोग मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच से हैं. इस महिला की हमें लंबे समय से तलाश थी.’’

जब सभी को पता चला कि ये पुलिस वाले हैं तो फिर किसी की भी बोलने की हिम्मत नहीं हुई. सीट पर बैठी महिला के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ने लगीं. पुलिस वालों ने उस महिला को बस से उतार कर अपनी वैन में बैठा लिया. इसी के साथ वे उसी बस में अलगअलग सीटों पर बैठे 3 अन्य लोगों को भी बस से उतार कर उसी वैन में बैठा लिया था. वे तीनों भी उसी महिला के साथी थे. उन चारों को पुलिस क्राइम ब्रांच के हेड औफिस ले आई. बस में बैठा कोई भी व्यक्ति नहीं समझ सका था कि वह महिला कौन थी और क्राइम ब्रांच वाले उसे और उस के साथियों को क्यों ले गए थे?

वह महिला कोई और नहीं, महाराष्ट्र की एक बहुत बड़ी ड्रग्स तस्कर 52 वर्षीया शशिकला मजगांवकर उर्फ बेबी रमेश पाटनकर थी. उस के साथ जिन 3 लोगों को हिरासत में लिया गया था, उस में उस का छोटा बेटा गिरीश पाटनकर, उस का दोस्त और उस की भांजी थी. बेबी को छोड़ कर बाकी तीनों के बयान ले कर पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया था. ड्रग्स तस्कर शशिकला मजगांवकर का नाम पुलिस की लिस्ट में तब आया था, जब सातारा लोकल क्राइम ब्रांच और मरीन लाइंस पुलिस ने उस के एक साथी कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे को 122 किलोग्राम मेफेड्रन  (मिथाइलमेथ कैथिनोन) के साथ गिरफ्तार किया गया था.

यह एक सिंथेटिक ड्रग है, जिस की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करीब 2 करोड़ रुपए से अधिक थी. कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा को ड्रग की इतनी बड़ी खेप के साथ गिरफ्तार कराने में शशिकला की ही मुख्य भूमिका थी. शशिकला ने ही सतारा पुलिस की लोकल क्राइम ब्रांच को इस की खबर दी थी. इस के बाद उस गिरफ्तार सिपाही धर्मराज से पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच ने शशिकला को गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की थी. शशिकला उर्फ बेबी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के साथ ड्रग्स तस्करी में लगे उस के दोनों भाई अर्जुन, शत्रुघ्न, उस के बेटे सतीश पाटनकर, ड्राइवर महेंद्र सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने उस की लग्जरी कारों को भी बरामद कर लिया.

अब तक की जांच में क्राइम ब्रांच को पता चला गया था कि शशिकला और कांस्टेबल धर्मराज के बीच गहरे रिश्ते थे. धर्मराज सिर्फ शशिकला के लिए ही काम करता था. इस पूछताछ और जांच में एक गरीब परिवार की बेटी शशिकला के ड्रग्स क्वीन बनने की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी : शशिकला माजगांवकर उर्फ बेबी पाटनकर का जन्म महाराष्ट्र के जनपद सतारा के एक गरीब किसान परिवार में हुए था. शशिकला चंचल स्वभाव की थी. उस की परवरिश गरीबी में हुई जरूर थी, लेकिन वह अतिमहत्त्वाकांक्षी थी. उस के परिवार में मातापिता के अलावा 2 भाई अर्जुन और शत्रुघ्न थे. वह अपने दोनों भाइयों से बड़ी थी. गरीबी की वजह से उन की पढ़ाईलिखाई भी नहीं हो सकी थी.

शशिकला को गरीबी से नफरत थी. उस की चाहत और सपने बड़े थे. वह अकसर धनदौलत के ख्वाब देखा करती थी. उस के सारे सपने और सारी चाहतें तब जल कर खाक हो गईं, जब उस की शादी एक साधारण से युवक रमेश पाटनकर से हो गई. सीधासाधा रमेश पाटनकर महानगर मुंबई के उपनगर वरली के सिद्धार्थनगर की झोपड़पट्टी में रहता था. वहां उस के साथ रहने में शशिकला का जैसे दम घुटता था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. पति जो भी मेहनतमजदूरी कर के लाता था, उसी में वह जैसेतैसे घर चलाती थी.

समय का पहिया अपनी गति से घूम रहा था. इसी बीच शशिकला 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई. परिवार बढ़ने पर घर के खर्च भी बढ़ गए थे. पति जो कमा कर लाता था, उस से घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था. उस ने अपने सपनों के साथ तो समझौता कर लिया था, लेकिन उसे बच्चों के भविष्य की भी चिंता थी. वह नहीं चाहती थी कि उसी की तरह उस के बच्चे भी अभावों भरी जिंदगी जिएं. शशिकला पति से आमदनी बढ़ाने की बात करती. लेकिन पति भी कोई ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, जिस से उसे कोई मोटी तनख्वाह की नौकरी मिलती. लिहाजा चाह कर भी वह अपनी आमदनी नहीं बढ़ा पा रहा था. इसी बात को ले कर शशिकला की पति से अकसर कहासुनी होती रहती थी. आखिरकार   रोजरोज की कहासुनी से तंग आ कर रमेश पाटनकर एक दिन घर छोड़ कर कहीं चला गया.

पति की इस बेरुखी से शशिकला टूट सी गई. अब तीनों बच्चों की परवरिश और पढ़ाईलिखाई की सारी जिम्मेदारी उस के कंधों पर आ गई. अचानक आने वाली इस परेशानी से वह घबराई नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश करने लगी. गुजरबसर के लिए शशिकला ने दूध का धंधा शुरू किया. वह सुबह उठ कर वरली की दूध डेयरी पर जाती और वहां से बोतल पैक दूध ला कर अपनी बस्ती के घरघर पहुंचाती. यह बात सन 1981 की है. इस से उस के घर की गाड़ी तो चलने लगी, लेकिन भविष्य के लिए हाथ में कुछ नहीं बचता था. इस के लिए वह हमेशा चिंतित रहती थी. अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए वह किसी हद तक जाने को तैयार थी. इसलिए वह किसी ऐसे काम की तलाश में थी, जिस से उसे भरपूर कमाई हो.

आखिर उसे एक दिन वह काम मिल ही गया, जिसे करने से उसे मोटी आमदनी हो सकती थी. शशिकला जिस बस्ती में रहती थी, वहीं उसे एक ऐसा व्यक्ति मिला, जिस ने उस की जीवनधारा ही बदल दी. उस ने बिना मेहतन के ढेर सारी दौलत कमाने का रास्ता सुझा दिया. वह काम ड्रग्स सप्लाई का था. यह काम थोड़ा जोखिम भरा जरूर था. लेकिन जितनी मेहनत वह दूध बेचने में करती थी, उतनी मेहनत इस काम में कर देने पर उस की झोली में ढेर सारी दौलत आ सकती थी.

शशिकला को उस आदमी की सलाह उचित लगी थी क्योंकि उस की बस्ती के ही तमाम लोग ड्रग्स का सेवन करते थे. उस ने  दूध बेचने के साथसाथ चरस, गांजा, हशीश, ब्राऊनशुगर आदि बेचना शुरू कर दिया. इस से उस की आमदनी बढ़ गई. जब कमाई बढ़ गई तो शशिकला ने दूध बेचने वाला काम बंद कर दिया और अपना पूरा ध्यान नशीले पदार्थों के धंधे पर लगा दिया. धीरेधीरे शशिकला ने बस्ती से बाहर पैर पसारने शुरू किए. इस के बाद उस ने मुंबई यूनिवर्सिटी परिसर को अपना अड्डा बना लिया. शुरूशुरू में ड्रग्स तस्करी में अपना पैर जमाने के लिए शशिकला पाटनकर को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ा था. लेकिन समय के साथ सब ठीक हो गया.

क्योंकि जल्दी ही उस के शहर के कई बड़े ड्रग्स तस्करों से अच्छे संबंध बन गए थे. इस लाइन में आने के बाद उस ने अपना नाम बेबी रख लिया था. बेबी उन्हीं तस्करों से माल ला कर मुंबई में सप्लाई करने लगी थी. गरीबी का अभिशाप दूर करने के लिए उस ने अपने पूरे परिवार, बेटे सतीश, बेटीबहू के अलावा दोनों भाइयों को भी अपने इस व्यवसाय में शामिल कर लिया था. किसी तरह की परेशानी न हो, सभी को उस ने धंधे के गुर भी सिखा दिए थे. मुंबई में अचानक ड्रग्स की विक्री की बाढ़ सी आ गई तो मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के अलावा एंटी नार्कोटिक्स (ड्रग्स कंट्रोल सेल) के अधिकारियों के कान खड़े हो गए. क्राइम ब्रांच ने मुखबिरों को सतर्क किया तो उन्हें अपने मुखबिरों से पता चला कि इस सारे रैकेट के पीछे किसी बेबी नाम की महिला का हाथ है.

क्राइमब्रांच और एंटी नार्कोटिक्स सेल के अधिकारी हाथ धो कर बेबी के पीछे पड़ गए तो वह घबरा कर कुछ दिनों के लिए भूमिगत हो गई. उस पर मामला तो दर्ज हो गया, लेकिन उस ने खुद को गिरफ्तारी से बचा लिया. उस के भूमिगत होने से ड्रग्स मार्केट में खलबली मच गई. बाजार में ड्रग्स के न आने से करोड़ो रुपए का नुकसान हो रहा था. बेबी इस बात को ले कर परेशान थी कि अगर कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा तो उस का करोबार ठप हो जाएगा. वह इस समस्या का समाधान ढूंढने लगी. इसी तलाश में उस की मुलाकात पुलिस कांस्टेबल धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे से हुई, जिस की मदद से उस ने एक बार फिर अपने कारोबार को शिखर पर पहुंचा दिया.

अपना काम निकालने के लिए बेबी ने उसे अपने रूपयौवन के जाल में इस तरह फंसाया कि वह उस में उलझ कर रह गया. यह सन 2002 की बात थी. धर्मराज उसी जनपद का रहने वाला था, जिस जनपद की बेबी रहने वाली थी. धर्मराज उन दिनों पुलिस की नौकरी में नयानया आया था. उसे भरती हुए लगभग 2 साल ही हुए थे. इस नौकरी से मिलने वाले थोड़े से वेतन से वह संतुष्ट नहीं था. उस के वेतन से उस के घरपरिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो पाता था. जब बेबी को भरोसा हो गया कि सिपाही धर्मराज उस के रूपजाल में पूरी तरह फंस चुका है तो उस ने उसे अपने कारोबार के बारे में सब कुछ बता कर करोबार को बढ़ाने में मदद मांगी.

बेबी की असलियत जान कर एक बार तो धर्मराज के होश उड़ गए. लेकिन जल्दी ही उस ने खुद को संभाल लिया. क्योंकि बेबी की तरह उस ने भी सुखसुविधाओं वाली जिंदगी के जो सपने देखे थे, वे पुलिस की नौकरी में मिलने वाले वेतन से कभी पूरे नहीं हो सकते थे. इसलिए शुरूशुरू में बेबी के साथ काम करने से भले ही वह घबराया हो, लेकिन जल्दी ही वह उस के साथ जुड़ गया. यह सच है कि पैसा अच्छोंअच्छों की नीयत खराब कर देता है, जबकि धर्मराज तो एक मामूली इंसान था, उस की कमाई न के बराबर थी. इसलिए वह बेबी के साथ जुड़ने से मना नहीं कर सका था.

धर्मराज बेबी के कहने पर उस के कारोबार से जुड़ गया. धर्मराज के जुड़ते ही बेबी के कारोबार को जैसे पंख लग गए. धर्मराज की मदद से बेबी अपना करोड़ो का माल बड़ी आसानी से इधर से उधर पहुंचा देती थी. सिपाही और वरिष्ठ अधिकारियों का ड्राइवर होने की वजह से धर्मराज पर कोई शक भी नहीं करता था. इस के अलावा भी पुलिस वालों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए बेबी खुद भी एक बड़े एनकाउंटर स्पैशलिस्ट की मुखबिर बन गई. विश्वास जमाने के लिए उस ने अपने ही कारोबार से जुड़े कई बड़े तस्करों की मुखबिरी कर के उन्हें पकड़ा दिया. इस से उसे दोहरा लाभ मिला. एक तो अधिकारी को उस पर भरोसा हो गया, दूसरे उस का कारोबार बढ़ गया.

अब वह सीधे राजस्थान के भवानी बाजार और मध्य प्रदेश के रतलाम शहर से भारी मात्रा में ड्रग्स मंगा कर पूरे मुंबई में सप्लाई करने लगी. इस बीच बेबी ने अपने कारोबार में धर्मराज की तरह कुछ अन्य पुलिस, कस्टम और इनकमटैक्स के बड़े अधिकारियों को जोड़ लिया था. जिस का उस ने जम कर फायदा उठाया. कुछ ही दिनों में बेबी गांजा, चरस, हशीश, ब्राऊनशुगर और म्यांऊम्यांऊ यानी एमडी मेफेड्रन जैसे खतरनाक ड्रग्स की महारानी बन गई. ड्रग्स तस्करी से बेबी पर नोटों की बरसात होने लगी. देखते ही देखते वह धन कुबेरों की लाइन में खड़ी गई. ड्रग्स तस्करी के पैसों से उस के सपने साकार होने लगे.

पुलिस जांच में बेबी की कई करोड़ की नामीबेनामी संपत्तियों का पता चला है. उस ने घर के सभी लोगों को सोने के गहनों से लाद दिया था. यही नहीं, सिद्धार्थनगर की जिस बस्ती में वह रहती थी, वहां की 20 चालों को उस ने खरीद लिया था, जिस से उसे मोटा किराया आता था. 4 लग्जरी कारों में उस की 2 कारें इनकमटैक्स विभाग में लगी थीं, जिन्हें उस का भाई देखता था. जरूरत पड़ने पर बेबी उन कारों का भी इस्तेमाल अपने कारोबार के लिए कर लेती थी.

इस के अलावा बेबी का नवी मुंबई में एक बड़ा सा प्लौट, पनवेल में एक फार्महाऊस, मुंबई के बोरीवली गौराई बीच में एक सुंदर सा आलीशान बंगला, पूना लोनावाला में एक बंगला, पूना के कोरेगांव में एक मंजिला गृह संकुल, वाइन शौप और कोकण विदर्भ में काफी जमीनजायदाद थी. पकड़े जाने पर 3 बैंक एकाउंट में 40-40 लाख रुपए कैश मिले थे. बेबी पाटनकर का सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. उस पर पहला मामला सन 2001 में दर्ज हुआ था. लेकिन 2014 में बेबी पर वरली, मुंबई और थाना जनपद वसई में अनेक मामले दर्ज हो गए तो उस का अस्तित्व डगमगा गया. उस ने इन 13 सालों में जिस तरह पुलिस और कस्टम के कई बड़े अधिकारियों को मैनेज कर के अपने कारोबार को फैलाया था, लगातार दर्ज होने वाली शिकायतों से उस की जमीजमाई बुनियाद हिल गई.

इस के बाद वह यह सोचने पर मजबूर हो गई कि कोई ऐसा है, जो उस के साम्राज्य में सेंध लगाना चाहता है. जब उस ने इस बात पर गहराई से विचार किया तो उसे अपने साथी धर्मराज उर्फ धर्मा पर संदेह हुआ. धर्मराज उर्फ धर्मा ही एक ऐसा आदमी था, जो उस के लगभग सभी रहस्यों को जानता था. इस की एक वजह यह भी थी कि अभी तक मुंबई और अन्य उपनगरों में बेबी द्वारा लाई गई ही एमडी बिकती थी. लेकिन इधर धर्मराज द्वारा उस के खंडाला कन्हेरी फार्महाऊस से 150 किलोग्राम एमडी छिपाने के बाद भी बाजार में बिक रही थी. इसी बात से उसे लगा कि धर्मराज ज्यादा पैसों के लालच में उस के साथ गद्दारी कर रहा है. जबकि बेबी का यह एक वहम था. वह 150 किलोग्राम एमडी को ले कर बेबी से थोड़ा नाराज जरूर था, लेकिन वह किसी भी तरह की कोई गद्दारी नहीं कर रहा था.

यह 150 किलोग्राम एमडी बेबी ने पूना के एक तस्कर सैमुअल से खरीदी थी. जबकि वह सैमुअल के बारे में ज्यादा कुछ जानती नहीं थी. बेबी से उसे उस के भाई बादशाह ने सन 2007 में मिलवाया था. सैमुअल बादशाह के साथ आर्थर रोड जेल में बंद रहा था. तभी दोनों में दोस्ती हुई थी. यह 150 किलोग्राम एमडी एसटी (स्टेट ट्रांसपोर्ट) की बस द्वारा 2 बार में लाई गई थी. बेबी ने इसे सिद्धार्थनगर स्थित अपने घर में रखवा दी थी. लेकिन दिसंबर, 2014 में सैमुअल पकड़ा गया तो बेबी डर गई. इस के बाद सारी एमडी उस ने धर्मराज को अपने किसी फार्महाऊस में छिपाने के लिए दे दी. धर्मराज उस एमडी को इस शर्त पर छिपाने के लिए राजी हुआ था कि बेबी उसे 25 लाख रुपए देगी.

बेबी ने शर्त मान ली तो धर्मराज ने उसे ले जा कर खंडाला कन्हेरी के अपने फार्महाऊस में छिपा दिया था. लेकिन बाद में बेबी ने शर्त में माने 25 लाख रुपए धर्मराज को नहीं दिए, जिस की वजह से दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था. दरअसल धर्मराज बेबी पाटनकर से मिले इन पैसों को पूना की किसी प्रौपर्टी में निवेश करना चाहता था. उस ने उस प्रौपर्टी के लिए डेढ़ लाख रुपए एडवांस भी दे दिए थे. बेबी के पैसे न देने से वह प्रौपर्टी तो हाथ से निकल ही गई थी, उस के पैसे भी डूब गए थे. इन पैसों को ले कर धर्मराज और बेबी के बीच अकसर कहासुनी होती रहती थी. इस कहासुनी से वह उसे गिरफ्तार कराने की धमकियां भी देता था.

पुलिस वाले कभी किसी के नहीं होते, यह सोच कर बेबी ने धर्मराज को पकड़वा देने में ही अपनी भलाई समझी और अपने ही करोड़ो रुपए के ड्रग को धर्मराज का बता कर सतारा लोकल क्राइम ब्रांच को सूचना दे दी. धर्मराज को अपनी गिरफ्तारी का शक उस पर न हो, इस के लिए वह धर्मराज को साथ ले कर 2 मार्च, 2015 को हिलस्टेशन चली गई थी. वह उस के साथ गोवा, कोल्हापुर, सांवतवाड़ी, रत्नागिरी, महाबलेश्वर और खंडाला जैसे पिकनिक प्वाइंटों पर घूमते हुए उस की गिरफ्तारी का चक्रव्यूह रचती रही. इस मामले में बेबी ने अपने एक विश्वसनीय सिपाही की मदद ली थी. वह सिपाही बेबी पाटनकर के कहने पर अपने एक निलंबित सबइंस्पेक्टर से मिला.

इस के बाद दोनों ने सिपाही धर्मराज के खंडाला कन्हेरी स्थित फार्महाऊस पर छापा मरवाने के लिए पहले पूना के एक कस्टम अधिकारी से बात की. लेकिन पूना के उस कस्टम अधिकारी ने किसी वजह से इस मामले में दिलचस्पी नहीं ली तो दोनों सतारा पुलिस की लोकल क्राइम ब्रांच के औफिस पहुंचे. सतारा क्राइम ब्रांच के अधिकारी तुरंत हरकत में आ गए. उन्होंने धर्मराज के खंडाला कन्हेरी स्थित फार्महाऊस पर छापा मार कर 110 किलोग्राम एमडी बरामद कर ली. धर्मराज उन दिनों मुंबई के मरीन लाइंस पुलिस थाने में तैनात था. वहां उस के लौकर से भी 12 किलोग्राम एमडी बरामद की गई.

9 मार्च, 2015 को पहले सतारा की क्राइम ब्रांच ने धर्मराज उर्फ धर्मा को गिरफ्तार किया. इस के बाद मरीन लाइंस पुलिस ने अपनी सुपुर्दगी में ले लिया. चूंकि सतारा की क्राइम ब्रांच पुलिस को 150 किलोग्राम एमडी की सूचना मिली थी, जबकि बरामद 122 किलोग्राम ही हुई थी. बाकी की 28 किलोग्राम एमडी कहां गई? इस के लिए धर्मराज से पूछताछ के बाद बेबी के बड़े बेटे सतीश पाटनकर को गिरफ्तार किया गया. उस ने पुलिस को बताया कि उस ने बेबी पाटनकर के कहने पर 40 किलोग्राम एमडी निकाली थी, जिस में से 12 किलोग्राम उस ने धर्मराज के लौकर में रखवा दी थी.

बेबी ने सिपाही धर्मराज को तो पकड़वा दिया. लेकिन ऐसा करते हुए वह यह भूल गई कि जिस आग को वह हवा दे रही है, उस आग में उस का खुद का भी दामन जल जाएगा. उस की लगाई आग की आंच जब उस के भाइयों और बेटे सतीश तक पहुंची तो वह समझ गई कि अब उस का भी खेल खत्म हो चुका है. जब उसे लगा कि अब पुलिस कभी भी उसे गिरफ्तार कर सकती है तो वह अपने सारे सोने के गहने गिरवी रख कर मुंबई से फरार हो गई. पुलिस ने उस के कई ठिकानों पर छापा मारा, लेकिन वह हाथ नहीं लगी. 13 मार्च, 2015 को बेबी का छोटा बेटा गिरीश अपनी मां को ले कर नवी मुंबई स्थित कामोठे में रहने वाली अपनी गर्लफ्रैंड के यहां पहुंचा.

गर्लफ्रैंड को भी साथ ले कर वह कार द्वारा सूरत चला गया. 14 मार्च, 2015 को सभी गर्लफ्रैंड की मौसी के यहां रुके. 15 मार्च को प्राइवेट कार से मुंबई के लिए निकले तो 16 मार्च को सुबह मुंबई के बोरिवली पहुंचे. गिरीश ने अपनी गर्लफ्रैंड को वहां छोड़ा और मां के साथ वाशी चला गया. यहां से मुंबई जा कर उस ने जमानत की कोशिश की, पर वकील ने उसे सलाह दी कि वह ऐसा न करे तो वह गिरीश की गर्लफ्रैंड के घर आगरा चली गई. कुछ दिनों तक आगरा में रहने के बाद वह दिल्ली आ गई. दिल्ली से वह कुराड़गांव में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहां चली गई. कुराड़गांव से बस द्वारा वह मुंबई आ रही थी, तभी एक सोशल वर्कर की नजर उस पर पड़ गई तो उस ने क्राइम ब्रांच सर्विस सेल के अधिकारियों को सूचना दे दी. इस के बाद वह पकड़ी गई.

इस तरह बेबी के पकड़े जाने पर 40 दिनों तक चले इस चूहेबिल्ली का खेल खत्म हो गया. गिरफ्तार बेबी के मामले की गंभीरता को देखते हुए ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर अतुलचंद्र कुलकर्णी ने आगे की तफ्तीश क्राइम ब्रांच यूनिट-2 प्रौपर्टी सेल के अधिकारियों को सौंप दी है. ड्रग्स क्वीन बेबी और सिपाही धर्मराज उर्फ धर्मा कालोखे से पूछताछ और उन के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स से कई पुलिस वालों और कस्टम अधिकारियों के नाम सामने आए हैं. इन में 30 मई को 4 लोग, एंटी नारकोटिक्स के इंसपेक्टर सुहास गोखले, गौतम गायकवाड़ सुधाकर, हवलदार ज्योतिराम माने और यशवंत पतारे को गिरफ्तार भी किया गया है. आगे की जांच क्राइम ब्रांच अधिकारी कर रहे हैं. इसी बीच उन्हें एक और बड़ी सफलता मिली.

ड्रग्स तस्कर सैमुअल को भारी मात्रा में ड्रग्स सप्लाई करने वाले तस्कर जानपाल दुरई को केरल से गिरफ्तार कर लिया गया. यह गिरफ्तारी सैमुअल के बयान पर हुई थी. जान पाल दुरई भी बेबी की तरह ही नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का मुखबिर था. उस ने नार्कोटिक्स ब्यूरो को कई बड़े टिप दिए थे. बहरहाल कथा लिखे जाने तक क्राइम ब्रांच बेबी से पूछताछ कर रहे थे. Maharashtra Crime New

कथा पुलिस सूत्रों और समाचार पत्रों पर आधारित

 

Illicit Relationship: 6 सालों बाद खुला अवैध संबंधों का राज

Illicit Relationship: अवैध संबंधों की वजह से राजकुमार की हत्या 6 साल पहले हुई थी. पुलिस ने राजकुमार के घर वालों की शिकायत पर अपहरण का केस तो दर्ज कर लिया, लेकिन काररवाई कुछ नहीं की. लेकिन राजकुमार के घर वालों ने हार नहीं मानी और 6 साल बाद ही सही, पत्नी और प्रेमी को बेनकाब कर दिया…

गुडि़या का कुछ ही देर पहले अपने पति राजकुमार से झगड़ा हुआ था. यह उस दिन की ही नहीं, हर रोज की बात थी. राजकुमार एक नंबर का पियक्कड़ था. उस दिन भी सुबह होते ही अद्धा ले कर बैठ गया था. गुडि़या ने उसे टोका, लेकिन वह कहां मानने वाला था. कुछ देर तक तो वह पत्नी की बातें सुनता रहा, लेकिन 4 पैग हलक से नीचे उतरते ही उस का दिमाग घूम गया. बिना कुछ कहे उस ने गुडि़या की चोटी पकड़ कर उसे रूई की तरह धुन दिया. मां को मार खाते देख कर बच्चे भय से चिल्लाने लगे तो राजकुमार ने उन को भी थप्पड़ों का स्वाद चखा दिया. फिर गंदीगंदी गालियां देते हुए अद्धा बगल में दबाए घर से बाहर निकल गया.

राजकुमार बरेली जनपद के भमोरा थानाक्षेत्र के गांव सिंघा में रहता था. उस के पिता ऋषिराज सिंह के पास खेती लायक थोड़ी जमीन थी, जिस पर खेती कर के वह किसी तरह परिवार का भरणपोषण करते थे. परिवार में राजकुमार की मां रूषमा देवी, 2 भाई व 4 बहनें थीं. चारों बहनें विवाहित थीं. राजकुमार के दोनों भाई प्रेमप्रकाश और बबलू उस से छोटे थे. वह खुद चौकीदारी का काम करता था. प्रेमप्रकाश रामपुर जिले में आबकारी विभाग में नौकरी करता था, जबकि बबलू दिल्ली में रह कर प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था. 18 वर्ष पहले राजकुमार का विवाह रामपुर जनपद के रमपुरा गांव की रहने वाली गुडि़या से हुआ था. वक्त के साथ गुडि़या एकएक कर के 3 बच्चों की मां बनी.

परिवार बढ़ा तो राजकुमार की जिम्मेदारियां भी बढ़ीं. परिवार चलाने के लिए उस ने अपने लिए नौकरी ढूंढनी शुरू की तो जल्दी ही उसे एक निजी कंपनी में सुरक्षागार्ड की नौकरी मिल गई. नौकरी मिल गई तो वह अपनी पत्नी गुडि़या और तीनों बच्चों को ले कर शहर आ गया और बारादरी थानाक्षेत्र के शहामतगंज में हरीलाल जैन के प्लौट में बने कमरे में किराए पर रहने लगा. नौकरी से राजकुमार को इतनी आमदनी हो जाती थी कि दालरोटी चल सके. दिक्कत तब आई, जब उसे शराब की लत लग गई. गुडि़या कुशल गृहिणी थी. कम आय में भी उसे गृहस्थी चलाना आता था. लेकिन राजकुमार की शराब की लत ने घर का बजट गड़बड़ा दिया. फलस्वरूप गुडि़या परेशान रहने लगी.

उस ने राजकुमार को हर तरह से समझाने का प्रयास किया, बच्चों की भी दुहाई दी. लेकिन उसे बीवीबच्चों से ज्यादा शराब प्यारी थी. राजकुमार सुधरता तो क्या, उलटा ढीठ बन गया. नतीजा यह हुआ कि पहले केवल शाम को पीने वाला राजकुमार रातदिन शराब में डूबा रहने लगा. उसे न पत्नी की फिक्र थी, न बच्चों की चिंता. वेतन के पैसों को वह शराब की बोतलों पर उड़ा देता था. नशे में राजकुमार इतना डूब चुका था कि नौकरी में भी लापरवाही करने लगा. पैसों की किल्लत होती तो घर के कीमती बरतन शराब की भेंट चढ़ जाते. गुडि़या रोकती तो पिटती, उस स्थिति में बदकिस्मती पर आंसू बहाने के अलावा उस के पास कोई चारा न रहता.

राजकुमार का एक दोस्त था ज्ञानप्रकाश. वह बरेली के कस्बा थाना फरीदपुर के कानूनगोयान मोहल्ले में मुकुंद सिंह के मकान में रहता था. वह मकान मालिक की बोलेरो जीप चलाता था. ज्ञानप्रकाश के पिता का देहांत हो चुका था. उस की 2 बहनें थीं, जिन का विवाह हो चुका था. दोनों में दोस्ती तो काफी दिन से थी, लेकिन बाद में जब दोस्ती गहरी हुई तो वह राजकुमार के कमरे पर भी आनेजाने लगा. ज्ञानप्रकाश को गुडि़या से हमदर्दी थी. उस ने राजकुमार को शराब पीना छोड़ कर गृहस्थी पर ध्यान देने की सलाह दी, लेकिन उस ने ज्ञान प्रकाश की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी. पतिपत्नी के झगड़े की वजह से ज्ञानप्रकाश कभीकभार ही राजकुमार के घर जाता था.

एक दिन ज्ञानप्रकाश कई दिनों के बाद राजकुमार के घर गया. उस के पहुंचने के कुछ देर पहले ही राजकुमार गुडि़या के साथ मारपीट कर के बाहर गया था. जब वह पहुंचा तो गुडि़या रो रही थी. उस की नजर ज्यों ही ज्ञानप्रकाश पर पड़ी, वह आंसू पोंछने लगी. फिर मुसकराने का प्रयास करती हुई बोली, ‘‘अरे ज्ञान तुम, आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए?’’

‘‘सच पूछो तो भाभी मैं आज भी नहीं आता.’’ ज्ञानप्रकाश ने गुडि़या की नम आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘लेकिन तुम्हारा दर्द मुझ से देखा नहीं जाता, इसलिए आ जाता हूं. लगता है, राजकुमार अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा.’’

‘‘जब अपनी ही किस्मत खोटी हो तो किसी को क्या दोष देना ज्ञान.’’ कहते हुए गुडि़या की आंखों में आंसू भर आए. ज्ञानप्रकाश और गुडि़या हमउम्र थे, इसलिए एकदूसरे की भावनाओं को अच्छी तरह समझते थे. गुडि़या जहां ज्ञानप्रकाश की सादगी और भोलेपन पर फिदा थी, वहीं ज्ञानप्रकाश उस की कोमल काया पर मोहित था.

दरअसल, 3 बच्चों की मां होने के बावजूद गुडि़या की जवानी अभी ढली नहीं थी. उस की कटीली मुसकान किसी को घायल करने में सक्षम थी. लेकिन शराबी राजकुमार को प्यालों की गहराई मापने से इतनी फुरसत नहीं थी कि पत्नी की आंखों में झांक कर उस की चाहत को जान पाता. ऐसी स्थिति में उस का झुकाव ज्ञानप्रकाश की ओर होने में ज्यादा समय नहीं लगा. इधर ज्ञानप्रकाश की भी दिली हालत गुडि़या से जुदा नहीं थी. गुडिया को रोता देख ज्ञानप्रकाश तड़प उठा. उस ने भावावेश में गुडि़या का हाथ थाम कर कहा, ‘‘ऐसा मत कहो भाभी, मैं सारी दुनिया की बातें तो नहीं जानता, पर अपनी गारंटी देता हूं, अगर तुम साथ दो तो कसम से मैं सारी जिंदगी तुम पर वार दूंगा.’’

यह सुन कर गुडि़या ज्ञानप्रकाश से लिपट कर रोने लगी. ज्ञानप्रकाश उसे कस कर भींचते हुए बोला, ‘‘असल में तुम गलत आदमी से बंध गई. खैर अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम चाहो तो सब कुछ फिर से बदल सकता है.’’

गुडि़या ने जवाब में कुछ कहने के बजाय ज्ञानप्रकाश को चूम लिया. उस के ऐसा करते ही ज्ञानप्रकाश भी उतावला हो कर उसे चूमने लगा. कुछ ही देर में वह उस से भी आगे निकलता गया. फलस्वरूप दोनों के बीच जिस्मानी संबंध बन गए. उस दिन दोनों के बीच एक नए रिश्ते की बुनियाद रखी गई. उस दिन के बाद गुडि़या और ज्ञानप्रकाश की दुनिया ही बदल गई. दोनों एकदूसरे से पतिपत्नी जैसा व्यवहार करने लगे. अब ज्ञानप्रकाश गुडि़या का खयाल तो रखता ही था, उस की घरगृहस्थी का सारा खर्च भी उठाने लगा था. गुडि़या की बेजान दुनिया में फिर से जीवन लौट आया. अब घर में बढि़या खाना पकता और ज्ञानप्रकाश राजकुमार के साथ बैठ कर खाना खाता. ऐसा नहीं था कि राजकुमार ज्ञानप्रकाश और गुडि़या के रिश्तों से अनजान रहा हो, उसे सब कुछ पता था.

लेकिन वह इस बात से खुश था कि अब उसे कोई शराब पीने से नहीं रोकता था. इतना ही नहीं, पैसा कम पड़ जाने पर ज्ञानप्रकाश उस की मदद भी कर दिया करता था. इन सब के एवज में उस ने ज्ञानप्रकाश और गुडि़या के रिश्ते को मौन स्वीकृति दे दी थी. राजकुमार की मूक सहमति मिलने के बाद गुडि़या और ज्ञानप्रकाश की बांछें खिल उठीं. इस के बाद दोनों बाजार वगैरह साथ घूमने जाने लगे. रातें भी एक छत के नीचे गुजरने लगीं, उधर शराब ने राजकुमार को बिलकुल बेगैरत बना दिया था.

फिर अचानक एक दिन नशे की हालत में ही उस की गैरत जाग उठी. उस ने गुडि़या से साफसाफ कहा, ‘‘बस बहुत हो चुका रासरंग, अब और नहीं. आज के बाद तुम ज्ञानप्रकाश से कोई रिश्ता नहीं रखोगी. बेहयाई की भी हद होती है.’’

राजकुमार के इस बदले हुए रूप ने गुडि़या को हैरान कर दिया. उस ने पूछा, ‘‘आज अचानक क्या हो गया तुम्हें?’’

राजकुमार गुडि़या को घूरते हुए बोला, ‘‘क्यों, समझ में नहीं आ रहा क्या या बेगैरती ने भेजा बिलकुल ही चाट लिया है?’’

‘‘गैरत या बेगैरती की बातें तुम्हारे मुंह से अच्छी नहीं लगतीं. अच्छा होगा, अब इस मामले में न ही पड़ो.’’ कहते हुए आवेश में गुडि़या की सांसें फूलने लगीं. वह क्षण भर रुक कर बोली, ‘‘सोच कर बताओ, बेगैरती का यह रास्ता मुझे किस ने दिखाया? तुम ने… अगर तुम अच्छे पति, अच्छे पिता और सच्चे इंसान होते तो मैं राह से क्यों भटकती? अब कुछ नहीं हो सकता, तीर कमान से निकल चुका है.’’

‘‘मैं कुछ सुनना नहीं चाहता, आइंदा वही होगा, जो मैं चाहूंगा.’’ राजकुमार कड़े स्वर में बोला.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता.’’

गुडि़या के दो टूक जवाब से राजकुमार पागल हो उठा. वह चीखते हुए उस पर झपटा, ‘‘ठहर, अभी बताता हूं कि क्या हो सकता है और क्या नहीं हो सकता.’’

राजकुमार ज्यों ही गुडि़या को पीटने दौड़ा, संयोग से ज्ञानप्रकाश वहां आ गया. पल भर में वह सारा माजरा समझ गया. उस ने आगे बढ़ कर राजकुमार को गिरा दिया. अचानक लगे धक्के से राजकुमार चारों खाने चित गिरा. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. वह खड़ा हो कर बोला, ‘‘ज्ञानप्रकाश खबरदार, अगर तुम हम दोनों के बीच आए, तुम्हारा सिर तोड़ दूंगा.’’

इतना सुनना था कि ज्ञानप्रकाश राजकुमार पर टूट पड़ा. उस ने मुक्कों और लातों से राजकुमार की बुरी गत बना दी. जिंदगी भर पति से पिटने वाली गुडि़या ने जब पति को पिटते देखा तो उस के प्रतिशोध ने सिर उठा लिया. उस ने भी ज्ञानप्रकाश के साथ राजकुमार पर हाथ आजमाए. उस दिन के बाद से उलटी गंगा बहने लगी. राजकुमार जरा भी चूंचपड़ करता गुडि़या और ज्ञानप्रकाश उसे पीटपीट कर हाथों की खुजली मिटा लेते. इतना ही नहीं, ज्ञानप्रकाश ने उसे शराब के पैसे देने भी बंद कर दिए थे. अब राजकुमार गुडि़या और ज्ञानप्रकाश की आंखों में खटकने लगा था. वैसे भी उस के रहते वह एक साथ सुकून की जिंदगी नहीं जी सकते थे. इसलिए उन्होंने राजकुमार को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

ज्ञानप्रकाश ने इस के लिए अपने बहनोई हरिशंकर उर्फ शंकर, अपने दोस्त सतीश और शंकर के चचेरे भाई टीकाराम को अपनी योजना में शामिल कर लिया. ये तीनों गांव प्रेमराजपुर, थाना भमोरा, जिला बरेली के रहने वाले थे. योजनानुसार ज्ञानप्रकाश जनवरी, 2009 में एक दिन देर रात राजकुमार को गुडि़या और बच्चों के साथ एक धार्मिक आयोजन में चलने के बहाने अपने बहनोई शंकर के गांव प्रेमराजपुर ले गया. शंकर ने बच्चों को गांव में अपने घर छोड़ दिया. इस के बाद ज्ञानप्रकाश और उस के साथियों ने गांव के पास ही सहासा के जंगल में ले जा कर राजकुमार को दबोच लिया. शंकर घर से कपड़ों में छिपा कर बांका ले आया था.

उसी बांके से ज्ञानप्रकाश और शंकर ने बारीबारी से राजकुमार पर वार किए, जिस से कुछ ही पलों में राजकुमार जमीन पर गिर कर ढेर हो गया. गुडि़या यह सब अपनी आंखों से देखती रही. राजकुमार की हत्या करने के बाद सतीश और टीकाराम चले गए. इस के बाद शंकर घर जा कर फावड़ा ले आया और फिर ज्ञानप्रकाश और उस ने वहीं 2 फुट गहरा गड्ढा खोद कर राजकुमार की लाश को दफना दिया. तत्पश्चात सब वहां से लौट आए, लेकिन गुडि़या अपने घर वापस नहीं गई. वह ज्ञानप्रकाश के साथ चली गई.

दूसरी ओर जब कई दिनों तक राजकुमार गुडि़या और बच्चों के साथ घर नहीं लौटा तो उस की तलाश शुरू हो गई. काफी प्रयास के बाद भी उस का पता नहीं चला तो राजकुमार की मां रूषमा देवी और भाई प्रेमप्रकाश की समझ में आ गया कि राजकुमार के साथ कोई अनहोनी हो गई है. उन्हें गुडि़या और ज्ञानप्रकाश के अवैधसंबंधों की जानकारी थी. ज्ञानप्रकाश का भी कोई अतापता नहीं था. इसलिए रूषमा देवी ने फरीदपुर थाने में गुडि़या और ज्ञानप्रकाश के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया. लेकिन फरीदपुर पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की. इस पर उस के घर वालों ने यह मुकदमा थाना बारादरी में स्थानांतरित कराने के लिए पुलिस अधिकारियों के पास कई चक्कर लगाए. लेकिन अधिकारियों ने इस में कोई रुचि नहीं ली.

राजकुमार के घर वालों ने हार नहीं मानी. उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिस के बाद अदालत ने मुकदमे को बारादरी थाने में स्थानांतरित करने का आदेश दिया. इसी बीच इसी साल फरवरी में गुडि़या राजकुमार के घर वालों के हत्थे चढ़ गई. उस से जब पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि राजकुमार दिल्ली में रह कर नौकरी कर रहा है, लेकिन वह दिल्ली में कहां है, उसे नहीं मालूम. घर वालों को बरगला कर गुडि़या उन की आंखों में धूल झोंक कर फिर गायब हो गई. जब ज्ञानप्रकाश को पता चला कि गुडि़या को उस के घर वालों ने पकड़ लिया है तो उस ने 20 फरवरी, 2015 को फरीदपुर के ही पीतांबरपुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली.

8 मार्च, 2015 को राजकुमार के अपहरण का मुकदमा फरीदपुर से बारादरी थाने स्थानांतरित कर दिया गया था. बारादरी थाने के इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम ने इस केस की जांच का जिम्मा सबइंसपेक्टर ओमवीर सिंह को सौंप दिया. 20 अप्रैल को एक बार गुडि़या फिर राजकुमार के घर वालों की पकड़ में आ गई. परिजनों ने उसे बारादरी पुलिस के सुपुर्द कर दिया. सबइंसपेक्टर ओमवीर सिंह ने महिला कांस्टेबल की उपस्थिति में गुडि़या से कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने पूरी घटना बयान कर दी. पूछताछ के बाद 20 अप्रैल, 2015 को ही ओमवीर सिंह ने पुलिस टीम के साथ सतीश को सैटेलाइट बसअड्डे से गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ के बाद ओमवीर सिंह उसे ले कर सहासा के जंगल में गए और राजकुमार की लाश बरामद करने के लिए एक खेत में खुदाई करवाई. लेकिन सफलता नहीं मिली. चूंकि सतीश लाश दफनाते समय मौजूद नहीं था, इसलिए वह सही जगह नहीं बता सका. इस के बाद पुलिस ने सतीश व गुडि़या को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. 28 अप्रैल को शंकर ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. इस की जानकारी मिलते ही एसआई ओमवीर सिंह ने अदालत से अनुमति ले कर जेल  में शंकर के बयान लिए. इस के बाद उन्होंने शंकर की पुलिस रिमांड के लिए अदालत में प्रार्थनापत्र दिया. 5 मई को पुलिस को शंकर का 24 घंटे का रिमांड मिल गया.

इस के बाद एसआई ओमवीर सिंह पुलिस टीम के साथ शंकर को ले कर सहासा के जंगल में गए. वहां राजकुमार के घर वालों, रिश्तेदारों व ग्रामीणों की मौजूदगी में शंकर की निशानदेही पर एक गड्ढा खुदवाया गया. 2 फुट की खुदाई होते ही कपड़े फावड़े में फंस गए. जब मिट्टी हटाई गई तो एक नरकंकाल मिला. कंकाल के साथ ही कोटपैंट, स्वेटर, मफलर, मौजे और जूते भी बरामद हुए. उन कपड़ों को देख कर प्रेमप्रकाश ने उस नरकंकाल की शिनाख्त अपने भाई राजकुमार के रूप में की. मां अपने बेटे का कंकाल देख कर फफक कर रो पड़ी. उसे किसी तरह सांत्वना दे कर चुप कराया गया. इस के बाद कंकाल को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया गया.

तत्पश्चात पुलिस शंकर को ले कर थाने लौट आई. अपहरण के मुकदमे में हत्या और साक्ष्य छिपाने की धाराएं और बढ़ाने के साथ ही इस केस में शंकर, सतीश और टीकाराम का नाम भी जोड़ लिया गया. इस के बाद शंकर की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से हत्या में इस्तेमाल बांका भी बरामद कर लिया. अगले दिन रिमांड अवधि खत्म होने से पहले शंकर को न्यायालय में पेश कर दिया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक टीकाराम फरार था, पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. Illicit Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bhopal Crime News: धरे गए एटीएम के शातिर ठग

Bhopal Crime News: परमिंदर, नरेंद्रजीत और रवींद्र ने एटीएम की एक ऐसी खामी पकड़ ली थी, जिस की तरफ न तो कभी बैंक वालों का ध्यान गया था, न ही शायद एटीएम बनाने वालों का. उसी खामी की वजह से इन्होंने कई बैंकों को करोड़ो का चूना लगा दिया.

पुराने भोपाल का पीरगेट इलाका तंग गलियों और संकरी सड़कों वाला है, जिस की वजह से यहां दिनभर इतनी भीड़भाड़ बनी रहती है कि आधा किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करने में आधा घंटा लग जाना मामूली बात है. यहां चलने वाले लोग खुद को देखने के बजाय आगे चल रहे लोगों को धकिया कर अपने लिए जगह बना कर आगे निकलने की जुगत में लगे रहते हैं. लेकिन जैसेजैसे रात गहराती जाती है, वैसेवैसे यहां भीड़ कम होने लगती है. 6 मई की रात लगभग 9 बजे रोजाना की तरह यहां भीड़भाड़ कम होने लगी तो आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम पर ड्यूटी कर रहे गार्ड पुष्पेंद्र सिंह यादव ने थोड़ी राहत महसूस की, क्योंकि दिन भर एटीएम के अंदरबाहर होती भीड़, सड़क की तरह अब एटीएम पर भी कम हो गई थी.

पुष्पेंद्र को लगा कि अब कम और जरूरतमंद लोग ही आएंगे तो वह एटीएम के अंदर चला गया और वहां रखे सामान की जांच करने के बाद वहां रखे रजिस्टर को उलटपलट कर बाहर आ गया. तभी बड़ी सी एक कार धीमी होती एटीएम के सामने आ कर रुकी, जिस से 2 नवयुवक उतरे, जिन में से एक सरदार था तो दूसरा सामान्य लड़कों जैसा. पुष्पेंद्र का सामना रोज ऐसे लोगों से होता रहता था, जो दूर से वाहन धीमा कर के सड़क के दोनों किनारे एटीएम ढूंढ़ते हुए आते थे और कार साइड में लगा कर पैसे निकाल कर चले जाते थे. दोनोें नवयुवक कार से उतर कर एटीएम के पास आए तो बाहर खड़े पुष्पेंद्र को देख कर कुछ सकपकाए. इस के बाद सामान्य से दिखने वाले युवक ने आवाज को रौबीला बनाने की कोशिश करते हुए पूछा, ‘‘एटीएम में कैश है या नहीं?’’

आमतौर पर इस तरह के सवाल वही लोग करते हैं, जिन्हें किसी अन्य एटीएम से नकद रुपए न मिले हों या फिर जो पहले कभी इस स्थिति से गुजर चुके हों कि कार्ड स्वाइप कर के पासवर्ड डाला हो, उस के बाद स्क्रीन पर संदेश आया हो कि कैश नहीं है. जवाब में गार्ड ने ‘हां’ में सिर हिलाया और बेखयाली से एटीएम के अंदर बने कमरे, जिसे बैकरूम कहा जाता है, में चला गया. लेकिन वह वहां लगे सीसीटीवी को गौर से देख रहा था, जिस में दोनों युवक साफ दिखाई दे रहे थे.

स्क्रीन पर उन की हरकतें देख कर पुष्पेंद्र चौंका. इस की वजह यह थी कि ग्राहक आते हैं, कार्ड डाल कर पैसा निकालते हैं और चले जाते हैं. लेकिन वे दोनों युवक एटीएम का बड़ी बारीकी से निरीक्षण कर रहे थे. पुष्पेंद्र की समझ में कुछ आता, उस के पहले ही दोनों में से एक युवक ने बैकरूम का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. लड़कों की इस हरकत से पुष्पेंद्र किसी अनहोनी के डर से घबरा गया, लेकिन उस ने अपनी समझ कायम रखी. इस के बाद वह पूरी तरह से सीसीटीवी पर आंखें गड़ा कर दोनों की हरकतें देखने लगा.

एक युवक ने कार्ड डाला और नोट निकाले, लेकिन कार्ड मशीन में डालने से पहले उस ने एक खास किस्म का इशारा अपने साथी को किया, जिस का मतलब पुष्पेंद्र उस समय समझ नहीं पाया. लेकिन जब नोट निकलने के तुरंत बाद उस ने झपट कर बिजली का मेन पावर स्विच बंद कर दिया, जिस से पूरे एटीएम में अंधेरा छा गया, तब पुष्पेंद्र को हैरानी हुई. यह सब इतनी जल्दी और अप्रत्याशित तरीके से हुआ था कि पुष्पेंद्र माजरा समझ नहीं पाया, लेकिन उन दोनों के भागते ही उस ने सब्र से काम लेते हुए बैकरूम का दरवाजा तोड़ कर एटीएम के बाहर छलांग सी लगाई तो रफ्तार पकड़ती कार का नंबर डीएल 07 2757 उस की आंखों और दिमाग दोनों में दर्ज हो गया. कार का मौडल स्विफ्ट भी उस ने पहचान लिया था.

एटीएम पर तैनात किए जाने वाले गार्डों को सिक्योरिटी एजेंसियां खासतौर से यह टे्रनिंग देती हैं कि ऐसी हालत में सब से पहले उन्हें क्या करना चाहिए. पुष्पेंद्र को वह सबक याद आया तो उस ने तुरंत अपने मोबाइल फोन से नजदीकी कोतवाली तलैया पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस हरकत में आ गई और कार की खोज शुरू कर दी. पुलिस की कोशिश रंग लाई और अगले दिन कार ही नहीं, दोनों युवक भी पकड़ लिए गए. थाने ला कर दोनों युवकों से पूछताछ की गई तो उन्होंने पुलिस को जो बताया, उस से वहां मौजूद पुलिस वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि एटीएम के जरिए करोड़ों की ठगी करने वाले ये युवक इतनी आसानी से उन के हाथ लग गए हैं. थाना पुलिस ने तुरंत इस घटना की सूचना आला अफसरों को दे दी.

पकड़े गए आरोपियों में से एक ने अपना नाम परमिंदर सिंह पुत्र हरविंदर सिंह, उम्र 27 वर्ष, निवासी 870-ए इस्लामगंज, लुधियाना और दूसरे ने नरेंद्रजीत सिंह पुत्र सुरेंद्र सिंह, उम्र 44 साल, निवासी 2158 टेलीफोन एक्सचेंज के पास, 29-ए सैक्टर फरीदाबाद, हरियाणा बताया. वे क्या करते हैं, कैसे करते हैं, यह जानकारी लेने से पहले पुलिस ने उन की तलाशी ली तो उन के पास से अलगअलग बैंकों के कई एटीएम कार्ड मिले. एक और साथी रवींद्र सिंह उर्फ बल्ला के साथ होने की बात भी उन्होंने कबूली. पूछताछ में पता चला कि ये तीनों व्यावसायिक इलाके एमपीनगर के होटल कृष्णा में ठहरे थे. पुलिस टीम होटल पहुंची तो रवींद्र सिंह उर्फ बल्ला वहां नहीं था, शायद वह फरार हो चुका था. लेकिन इस बात की पुष्टि हो गई कि ये तीनों अपने सही नामों से होटल में ठहरे थे.

होटल के उन के कमरे से अलगअलग बैंकों के 60 एटीएम कार्ड बरामद हुए थे, साथ ही एक डायरी भी, जिस में इन ठगों की ठगी के ब्यौरे दर्ज थे. उस ब्यौरे को देख कर पुलिस वालों की हैरानी और बढ़ गई. थोड़ी सख्ती करने पर उन्होंने एटीएम द्वारा ठगी करने की जो कहानी बयान की, वह इस तरह थी. ये तीनों ठग महज 12वीं तक पढे़ थे और दिलचस्प तरीके से ठगी को अंजाम देने से पहले ये लुधियाना की एक कोरियर कंपनी में काम करते थे. लगभग 2 सालों से इन्होंने पूरी तरह से एटीएम कार्ड द्वारा ठगी करने को व्यवसाय बना लिया था. इन 2 सालों में इन्होंने लगभग 2 करोड़ का चूना बैंकों को लगाया था. इस के लिए इन्होंने खुद के अलावा रिश्तेदारों और जानपहचान वालों के नाम से विभिन्न बैंकों में खाते खुलवा रखे थे, लेकिन उन के एटीएम कार्ड ये अपने पास रखते थे.

आम लोग एटीएम के तकनीकी तौरतरीकों को ज्यादा नहीं जानते. लेकिन इन शातिरों ने एटीएम की एक अहम खामी पकड़ रखी थी. यह खामी थी कि अगर कार्ड स्वाइप कर मशीन से पैसे निकाले जाएं तो उस की खाते में एंट्री होने में ढाई सेकेंड लगते हैं. इन्हीं ढाई सेकेंड का फायदा ये तीनों उठा रहे थे. तीनों में से एक पैसे निकालता था और दूसरा तुरंत पावर औफ कर देता था, जिस से निकाले गए पैसे की एंट्री खाते में नहीं हो पाती थी. निकाला गया पैसा जेब में रखने के बाद ये तुरंत संबंधित बैंक के कस्टमर केयर को फोन कर के कहते थे कि कार्ड डाल कर पासवर्ड भी डाला था, लेकिन हमारा पैसा नहीं निकला है.

उन की इस शिकायत पर बैंक निकाली गई रकम बाद में इन के खाते में डाल देती थी, क्योंकि निकासी की राशि उस के दस्तावेजों में दर्ज नहीं हो पाती थी. इस तरह ये रुपए भी निकाल लेते थे और एक बार फिर बैंक के अपने खाते में रुपए जमा करवा लेते थे. दरअसल, जब कोई भी एटीएम से पैसे निकालता है तो लेनदेन का कोड 00 दर्ज होता है. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में ढाई सेकेंड लगते हैं. इसी बीच अगर बिजली चली जाए या पावर औफ कर दिया जाए, जैसा ये लोग करते थे तो लेनदेन में एरर कोड यानी त्रुटि दर्ज होती है. ग्राहक की शिकायत पर बैंक को यह मानना पड़ता है कि पैसा एटीएम मशीन से नहीं निकला है, इसलिए वह पैसा बैंक को ग्राहक के खाते में डालना पड़ता है, ऐसा पैसा बैंक महीने के आखिर में क्लोजिंग के दौरान मिसलेनियस कैश में डाल देती है.

परमिंदर, नरेंद्रजीत और रवींद्र ने 2 सालों में ठगी की तकरीबन 5 सौ वारदातों को अंजाम देते हुए अलगअलग एटीएम से लगभग 2 करोड़ रुपए की कमाई की थी. जिन बैंकों को इन्होंने चूना लगाया था, उन में स्टेट बैंक औफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, इंडस बैंक, फेडरल बैंक, केनरा बैंक, बैंक औफ इंडिया, बैंक औफ बड़ौदा और थाइलैंड की भी एक बैंक शामिल है. इन ठगों ने दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, लुधियाना, फरीदाबाद, अमृतसर, सूरत, अहमदाबाद के अलावा ग्वालियर, झांसी, मुंबई, गोवा, बड़ौदा, अंबाला और चंडीगढ़ जैसे शहरों के एटीएम से रुपए निकाले थे. यह अलगअलग शहरों में जा कर इसलिए रुपए निकाल रहे थे, ताकि किसी को उन पर शक न हो.

रुपए निकालने ये कार से जाते थे. आमतौर पर ये उन एटीएम को ज्यादा निशाना बनाते थे, जो सुनसान इलाके में होते थे और वहां गार्ड नहीं होते थे. ठगी करतेकरते ये तीनों काफी चालाक हो गए थे. रुपए निकलने और एंट्री होने में ज्यादा वक्त लगे, इस के लिए ये एक बैंक का कार्ड दूसरे बैंक के एटीएम में इस्तेमाल करते थे. निकाले गए रुपए ये मौजमस्ती और अय्याशी में उड़ा रहे थे. आमतौर पर बगैर मेहनत की कमाई इसी तरह बरबाद होती है.

भोपाल पुलिस ने रवींद्र सिंह के पते पर छापा मारा तो वह वहां भी नहीं मिला. इसी के साथ वे लोग भी भूमिगत हो गए, जिन के खातों के एटीएम कार्ड्स इन के पास थे. इस से यही जाहिर होता है कि यह ठगी गिरोहबद्ध तरीके से हो रही थी. जिन लोगों के एटीएम इन के पास थे, उन्हें या तो कमीशन दिया जा रहा था या फिर झांसा कि हम रुपए निकालेंगे तो बाद में जमा करा देंगे. संभावना इस बात की ज्यादा है कि इन खातों में रुपए भी यही लोग जमा कराते रहे होंगे.

ठगी का मामला दर्ज करने के बाद पुलिस ने इन्हें रिमांड पर लिया. भोपाल में यह इन की पहली वारदात थी, जिस में सिक्योरिटी गार्ड पुष्पेंद्र यादव की सूझबूझ और फुर्ती की वजह से ये पकड़े गए, वरना ये इसी तरह बेखौफ हो कर बेधड़क बैंकों को ठगते रहते और अय्याशी करते रहते. इन ठगों के पकड़े जाने के बाद इन की ठगी का समाचार अखबारों में छपा और टीवी पर दिखाया गया तो जिस ने भी यह समाचार पढ़ा और देखा, दांतों तले अंगुली दबा ली कि अरे ऐसा भी होता है, लेकिन ऐसा हो रहा था.

पुलिस इस मामले में बैंकों की भूमिका को भी संदिग्ध मान रही है. इस बारे में उस ने रिजर्व बैंक औफ इंडिया को पत्र भी लिखा है कि लुटे बैंकों के प्रबंधकों की जांच किसी विशेष एजेंसी से कराई जाए. ठगी की रकम का औसत निकाला जाए तो इन्होंने एक खाते में से 2 सालों में लगभग 3 लाख रुपए निकाले हैं. हैरानी की बात यह है कि इस के बाद भी किसी बैंक या बैंक अधिकारी का ध्यान इस तरफ नहीं गया. जिन बैंकों के एटीएम से ये रुपए निकालते थे, उसे ये डायरी में शायद इसलिए दर्ज कर लेते थे कि याद रहे कि किस खाते में कितने रुपए हैं और पिछली बार कब रुपए निकाले गए थे. 60 में से 20 एटीएम कार्ड्स तीनों आरोपियों के खुद अपने नाम के थे, बाकी 40 दूसरे रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम थे. गिरफ्तारी के बाद दोनों आरोपियों से 44 हजार रुपए नकद बरामद हुए थे.

बगैर कुछ किए करोड़ों कमाने के इस हुनर के खुलासे से बैंकों के कान अब भले ही खड़े हो गए हैं, लेकिन ढाई सेकेंड की परेशानी का खामियाजा अब उन आम ग्राहकों को भुगतना तय है, जिन की रकम वाकई किसी और तकनीकी खामी या बिजली गुल हो जाने से नहीं निकलेगी. जरूरत इस बात की भी महसूस हो रही है कि बैंक जल्द ही लेनदेन के इस ढाई सेकेंड को दुरुस्त करे, वरना अगर ठगी के इस अनोखे धंधे में और लोग भी लिप्त हो गए तो बैंकों के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है. Bhopal Crime News

 

Delhi News: 3 दिनों तक कमरे में पड़ी रही युवक की लाश

Delhi News: एक ऐसी सनसनीखेज वारदात सामने आई है, जिस-ने सभी को झकझोर कर रख दिया. एक युवक की लाश 3 दिनों तक कमरे में बंद पड़ी रही. आखिर यह युवक कौन था और उस की मौत कैसे हुई? इस पूरे मामले की सच्चाई जानने के लिए पढ़िए पूरी कहानी.

यह दर्दनाक घटना ईस्ट दिल्ली जिले के पांडव नगर की है. यूपी के नोएडा में एक सड़क हादसे में घायल होने के बाद खून से लथपथ अपने दोस्त फैज उर्फ साहिल को सचिन नाम का युवक अपनी पीठ पर कपड़े से बांधकर उस के कमरे पर लाया था. कमरे में पहले से अलीम सो रहा था. सुबह जब सचिन और अलीम की नींद खुली तो उन्होंने फैज को उठाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं उठा. इस के बाद दोनों फैज को छोड़कर फरार हो गए.

डर के कारण दोनों ने इस बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं नहीं दी थी. 3 दिनों तक फैज की लाश उसी कमरे में पड़ी रही. इस दौरान फेमिली वाले लगातार उसे फोन करते रहे, लेकिन कोई कौल रिसीव नहीं हुई. जब परिजन फैज के कमरे पर पहुंचे और बेटे को मृत अवस्था में देखा तो उन के पैरों तले जमीन खिसक गई.

परिजनों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी. इस के बाद पुलिस ने लाश को अपने कब्जे में ले कर को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद परिजनों को सौंप दी.
शुरुआती जांच में मौत का कारण हादसा माना जा रहा है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर आगे की काररवाई की जाएगी. सीसीटीवी फुटेज में सचिन और अलीम आतेजाते दिखाई दे रहे हैं. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, 6 दिसंबर, 2025 को पांडव नगर थाना पुलिस को एक पीसीआर कौल मिली थी.

कौल करने वाले ने पुलिस को बताया कि पीर वाली गली, पीपीजी, मकान नंबर 52 में एक युवक 3 दिनों से फोन नहीं उठा रहा है. जब मौके पर जा कर देखा गया तो वह मृत पड़ा था. मृतक की पहचान फैज उर्फ साहिल के रूप में हुई. औपचारिक जांच में युवक के सिर के पिछले हिस्से में एक ही चोट पाए जाने की पुष्टि हुई.

पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है और फैज की कौल डिटेल्स भी निकाली गई है. जांच में सामने आया कि 2 दिसंबर को फैज की आखिरी बातचीत सचिन और अलीम से हुई थी. इसके बाद पुलिस ने दोनों को पूछताछ के लिए बुलाया है और मामले की गहन जांच जारी है. Delhi News

Haryana News: दोस्त के घर गई युवती की मिट्टी के ढेर में मिली लाश

Haryana News: एक ऐसी चौंकाने वाली वारदात सामने आई है, जिस ने पूरे गुरुग्राम को झकझोर कर रख दिया है. यह युवती अपनी फ्रेंड को फोन कर कहती है कि ‘2 घंटे में लौटती हूं.’ फिर इस युवती के साथ ऐसा क्या हुआ कि वह मिट्टी के ढेर में दफन पाई गई. आखिर क्या था इस हत्या का पूरा राज. चलिए जानते हैं इस क्राइम की स्टोरी को विस्तार से जो आप को इस घटना से अवगत कराएगी और होने वाले अपराध से भी सचेत करेगी.

यह दर्दनाक घटना हरियाणा के गुरुग्राम से सामने आई है. यहां एक हिंदू प्रेमी संजय ने असम की रहने वाली मुसलिम प्रेमिका जाबेदा खान का कत्ल कर दिया. जाबेदा खान ने फोन कर दोस्त को सूचित किया था कि वह 2 घंटे में वापस आ रही है. वह अपने प्रेमी संजय से मिलने गई हुई थी. फिर दोनों के बीच विवाद हुआ तो संजय ने जाबेदा की गला दबा कर हत्या कर दी. इस के बाद उस ने उस की लाश को मिट्टी में दबा दिया.

11 दिन बाद मिली सूचना ने पुलिस को भी हैरान कर दिया. इस के बाद आरोपी संजय को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है. उस ने पुलिस को बताया कि वह पहले जाबेदा को सुशांत लोक में अपने कमरे में ले कर गया था. वहां जा कर दोनों ने शारीरिक संबंध बनाए फिर दोनों के बीच किसी बात को ले कर विवाद हो गया. जब जाबेदा घर जाने लगी तो संजय उसे सुनसान जगह ले गया और वहां उस का गला दबा कर मार डाला तथा शव को मिट्टी में दबाकर फरार हो गया.

इस के बाद उस का फोन बंद था और 11 दिनों तक उस का कोई सुराग नहीं मिला. 10 दिसंबर, 2025 को पुलिस को जाबेदा की लाश मिली. इस के बाद पुलिस ने 24 घंटे के अंदर आरोपी संजय को अरेस्ट कर लिया. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पुलिस के अनुसार, जाबेदा के फ्रेंड ने पहली दिसंबर को गुरुग्राम के सेक्टर 17/18 थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. उस ने बताया था कि 27 नवंबर को उस की फ्रेंड जाबेदा खान ने कहा था कि वह 2 घंटे में वापस आएगी. लेकिन बाद में उस का फोन बंद हो गया. इस शिकायत के बाद ही पुलिस से काररवाई शुरू की थी.

अब पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. वह एसी रिपेयर का काम करता है. संजय अपने ताऊ के साथ सुशांत लोक, गुरुग्राम में रहता था. पुलिस उस से घटना के बारे में विस्तार से पूछताछ कर रही है. Haryana News

UP Crime: दबंगई का तेजाब

UP Crime: एडवोकेट मनी बिश्नोई अपने फार्महाउस में काम करने वाले हरिसिंह की बेटी राधिका पर बुरी नजर रखता था. एक दिन उस ने जबरदस्ती करनी चाही, जिस का राधिका ने विरोध किया…

मुरादाबाद से 30 किलोमीटर दूर हरिद्वार रोड पर स्थित है कस्बा कांठ. इसी कस्बे के मोहल्ला पट्टीवाला में नए साल 2015 के पहले दिन दबंगई का एक ऐसा खेल खेला गया, जिस की गूंज मीडिया द्वारा पूरे देश में पहुंच गई. गौर करने वाली बात तो यह है कि इंसानियत को शर्मसार करने वाली इस घटना को रफादफा करने की पुलिस ने पूरी कोशिश की थी. बात पहली जनवरी, 2015 को दोपहर के समय की है. राधिका सैनी अपने घर में कपड़े सिल रही थी. उस समय वह घर में अकेली थी. राधिका बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. उस के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए वह खाली समय में घर पर ही कपड़े सिल लिया करती थी, जिस से कुछ पैसों की आमदनी हो जाती थी.

उसी समय कांठ का ही रहने वाला मनी बिश्नोई नाम का एक युवक उस के घर आ गया. वह वकील था. अपने घर में अचानक उसे देख कर वह डर गई. इस से पहले कि वह उस से कुछ कहती, मनी ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. राधिका ने इस का विरोध किया, लेकिन वह नहीं माना. राधिका ने शोर मचाने की धमकी दी तो मनी ने अपने साथ लाए डिब्बे का तेजाब उस के मुंह पर उड़ेल दिया. तेजाब की जलन से राधिका चीखनेचिल्लाने लगी. उस की नानी प्रेमवती सैनी उस समय घर के बाहर बैठी कुछ औरतों से बातें कर रही थीं. जैसे ही उन्होंने राधिका के चीखने की आवाज सुनी, वह तेजी से घर की तरफ भागीं. घर से उन्होंने मनी बिश्नोई को भागते देखा, उस के हाथ में प्लास्टिक का एक डिब्बा था. उन्होंने कमरे में राधिका को दर्द से छटपटाते देखा.

उस का चेहरा जैसे उधड़ा हुआ था. कमरे से तेजाब की गंध भी आ रही थी. वह समझ गईं कि मनी ही उस के ऊपर तेजाब डाल कर भागा है. प्रेमवती ने उसी समय शोर मचा दिया तो मोहल्ले के तमाम लोग घर में आ गए. प्रेमवती ने सब को बता दिया कि मनी राधिका के ऊपर तेजाब डाल कर भाग गया है. मनी बिश्नोई का घर थोड़ी ही दूर पर था. वह दबंग परिवार से था, इसलिए सब कुछ जानते हुए भी किसी की हिम्मत नहीं हुई कि कोई उस के यहां जा कर शिकायत करे. खबर मिलते ही राधिका के पिता हरिसिंह सैनी और मां भारती सैनी भी घर पहुंच गईं. वे मनी बिश्नोई के फार्महाउस पर ही काम करते थे. बेटी की हालत देख कर उन का दिल कांप उठा. वे शिकायत करने के लिए दौड़ेदौड़े मनी बिश्नोई के घर गए और उस के पिता अनिल बिश्नोई से इस हादसे की शिकायत की.

अनिल बिश्नोई ने बेटे की करतूत को गंभीरता से लेने के बजाय उलटे जवाब दिया, ‘‘ऐसी कौन सी बड़ी बात हो गई, जो मुंह फाड़े जा रहे हो. बेटे ने गलती कर दी है तो तुम्हारी बेटी का इलाज करवा दूंगा और मनी को भी डांट दूंगा.’’  अनिल ने उन्हें धमकाते हुए कहा, ‘‘यदि कोई पूछे तो बता देना कि टौयलट में रखी तेजाब की बोतल धोखे से गिर गई थी. याद रखो, तुम ने मेरा नमक खाया है यदि नमकहरामी की तो अंजाम बुरा होगा. मैं जो कह रहा हूं, उसी में तुम्हारी भलाई है. इसलिए जो मैं कह रहा हूं, एक कागज पर मुझे लिख कर दे दो और हां, ध्यान रखो कि तुम पुलिस के पास गए तो तुम्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है.’’

हरिसिंह अपनी पत्नी के साथ उस के फार्महाउस पर काम करते थे. इसलिए जैसा उस ने कहा, मजबूरी में उन्होंने उसे लिख कर दे दिया. उधर तेजाब की जलन से राधिका बुरी तरह तड़प रही थी. वह छटपटा रही थी. अनिल बिश्नोई उस का इलाज कराने के लिए एक निजी चिकित्सक के पास ले गया. वह काफी झुलस चुकी थी. उस की हालत गंभीर बनी हुई थी. डाक्टर ने प्राथमिक उपचार करने के बाद राधिका को सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह दी. लेकिन अनिल उसे मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल ले जाने के बजाय उसे उस के घर छोड़ आया. राधिका की हालत गंभीर होने के बावजूद भी उस का इलाज न कराना गांव वालों को भी बुरा लगा. मोहल्ले के कुछ असरदार और पढ़ेलिखे लोगों ने हरिसिंह को थाने जाने की सलाह दी.

यह बात हरिसिंह की भी समझ में आ गई तो वह पत्नी को ले कर थाना कांठ पहुंच गए. थानाप्रभारी को उन्होंने बेटी पर तेजाब डालने वाली बात बताई तो थानाप्रभारी ने मनी बिश्नोई के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर के राधिका को कांठ के सरकारी अस्पताल में भरती करा दिया. उस की गंभीर हालत देख कर कांठ के अस्पताल से उसे मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल भेज दिया गया. उस की हालत गंभीर होने की वजह से पुलिस ने कोर्ट में उस के बयान भी नहीं कराए. हालत में सुधार होने पर 2 जनवरी को कोर्ट में बयान कराना था. अनिल को जब पता चला कि हरिसिंह ने उस के बेटे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी है तो उसे बहुत बुरा लगा. उस ने धमकी दी कि यदि उस ने रिपोर्ट वापस नहीं ली तो पूरे परिवार को खत्म कर देगा.

इतना ही नहीं, 2 जनवरी को अनिल अपने 25-30 समर्थकों के साथ हरिसिंह के घर पहुंच गया और अपनी हेकड़ी दिखाते हुए परिवार को धमकाया तथा उसी समय राधिका के छोटे भाई सचिन का अपहरण कर के ले गया. जाते समय अनिल ने यह धमकी दी थी कि 2 जनवरी, 2015 को राधिका ने कोर्ट में हमारे खिलाफ बयान दिया तो सचिन की हत्या कर दी जाएगी. इस धमकी पर राधिका ही नहीं, उस के घर वाले भी डर गए. भाई की जान बचाने के लिए राधिका ने कोर्ट में वही बयान दिया, जैसा अनिल बिश्नोई चाहता था. उस ने कोर्ट में कहा कि टौयलट में रखा तेजाब उस के ऊपर धोखे से गिर गया था, जिस से वह झुलस गई.

जब मनी के घर वालों को पता चला कि राधिका ने उन के पक्ष में ही बयान दिया है तो वे बहुत खुश हुए. अब उन्हें तसल्ली हो गई कि पुलिस भी उन का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. पक्ष में बयान देने के बावजूद भी उन्होंने सचिन को रिहा नहीं किया. हरिसिंह ने उस से अपने बेटे को रिहा करने की गुहार लगाई, तब कहीं जा कर 2 दिनों बाद उस ने उसे आजाद किया. उधर मीडिया द्वारा यह तेजाब कांड सुर्खियों में आया तो कई सामाजिक संगठन कांड के विरोध में सामने आ गए. सैनी समाज हरिसिंह के साथ जुड़ गया. मुरादाबाद की समाजसेविका व अधिवक्ता सीता सैनी ने हरिसिंह के परिवार वालों से मुलाकात की और उन्हें विश्वास दिलाया कि वह उन्हें हर तरह का सहयोग देने को तैयार हैं और जब तक उस दरिंदे को सजा नहीं मिल जाती, वह भी चुप नहीं रहेंगी. उन्होंने डरीसहमी राधिका की भी हिम्मत बंधाई और शांत न बैठने की सलाह दी.

उधर मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल में भरती राधिका की हालत दिनबदिन बिगड़ती जा रही थी. उस का संक्रमण बढ़ रहा था, जिस की वजह से अस्पताल के डाक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए. उन्होंने सुझाव दिया कि यदि राधिका का अच्छा इलाज करवाना है तो उसे दिल्ली के बड़े अस्पताल ले जाएं. पीडि़त लड़की के घर वालों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे उसे दिल्ली ले जाएं. मगर इस काम में राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षक समिति के सदस्य आगे आए. वे 18 जनवरी, 2015 को राधिका को मुरादाबाद से दिल्ली ले गए और दिल्ली के डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल में उन्होंने उसे एडमिट करवा दिया. सीता सैनी और अन्य लोगों के समझाने पर राधिका और उस के घर वालों की उम्मीद जागी कि अब शायद उन्हें न्याय मिलेगा.

फिर 9 जनवरी, 2015 को राधिका के मातापिता ने सीता सैनी के साथ मुरादाबाद के एसएसपी लव कुमार से मुलाकात कर के कहा कि राधिका ने 2 जनवरी को कोर्ट में जो बयान दिया था, वह अपने भाई की जान बचाने के लिए डर की वजह से दिया था. उन्होंने कोर्ट में फिर से बयान दर्ज कराने की मांग की. साथ ही गुहार लगाई कि इस केस की जांच कांठ के थानाप्रभारी के बजाय अन्य किसी अधिकारी से कराई जाए. उन की मांग पर एसएसपी ने यह मामला एसपी (ग्रामीण) प्रबल प्रताप सिंह के हवाले कर दिया और भरोसा दिया कि पीडि़त परिवार की सुरक्षा की जाएगी. घर वालों की मांग पर एसएसपी ने मामले की जांच कांठ के थानाप्रभारी से हटा कर कांठ के सीओ राहुल कुमार को सौंप दी.

एसएसपी के आदेश देते ही कांठ पुलिस हरकत में आ गई. सीओ राहुल कुमार ने अभियुक्त मनी बिश्नोई की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम उस के घर भेज दी. लेकिन उस के घर पर कोई नहीं मिला. घर के सभी लोग फरार हो चुके थे. इस के बाद पुलिस को चकमा दे कर अभियुक्त मनी बिश्नोई ने मुरादाबाद के एसीजेएम-5 के न्यायलय में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. चूंकि अनिल बिश्नोई एक दबंग व्यक्ति था. अपने वकील बेटे के जेल जाने पर वह अपनी बेइज्जती महसूस कर रहा था. इसलिए थाने में दर्ज कराई रिपोर्ट वापस कराने के लिए वह हरिसिंह सैनी को धमकियां देने लगा. हरिसिंह ने इस की शिकायत सीओ से की तो उन्होंने केस में पीडि़त परिवार को धमकाने और अपहरण की धाराएं बढ़ा दीं.

पुलिस को अभियुक्त मनी से पूछताछ भी करनी थी. इसलिए जांच अधिकारी ने अदालत में दरख्वास्त की तो अदालत ने उसे 6 घंटे के पुलिस रिमांड पर दे दिया. रिमांड अवधि में उस से पूछताछ के बाद तेजाब का खाली डिब्बा भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. उस ने राधिका के ऊपर तेजाब फेंकने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के महानगर मुरादाबाद के बंगला गांव निवासी हरिसिंह सैनी की शादी करीब 22 साल पहले कांठ के पट्टीवाला मोहल्ले की भारती के साथ हुई थी, जिस से उस के 2 बेटियां व एक बेटा पैदा हुआ. राधिका परिवार में बड़ी बेटी थी. हरिसिंह पहले मुरादाबाद की ही एक पीतल फर्म में काम करता था. काम मंदा होने पर वह परेशान हो गया’ तब वह अपनी सास प्रेमवती के कहने पर बीवीबच्चों के साथ अपनी ससुराल कांठ चला गया. कांठ के ही अलगअलग स्कूलकालेज में उस ने अपने बच्चों का दाखिला करा दिया. प्रेमवती ने अपनी बेटी भारती और दामाद हरिसिंह की कांठ में ही अनिल बिश्नोई के फार्महाउस में नौकरी लगवा दी.

खेतों में दोनों पतिपत्नी मेहनतमजदूरी कर के जो कमा रहे थे, उस से उन के परिवार की गाड़ी चल रही थी. बच्चों की पढ़ाई भी ठीक चल रही थी. राधिका बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. 19 साल की राधिका पढ़ाई में होशियार थी. घर पर उस का जो खाली समय बचता था, उस में वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा देती और कपड़े सिल लिया करती थी. जबकि उस के मातापिता अनिल बिश्नोई के फार्महाउस पर काम करने निकल जाते थे. वैसे तो उन्हें खाना देने के लिए उस के छोटे भाईबहन चले जाते थे, लेकिन कभीकभी राधिका भी उन्हें खाना देने फार्महाउस चली जाती थी. उसी दौरान अनिल बिश्नोई के बेटे एडवोकेट मनी बिश्नोई की नजर उस पर पड़ी तो वह उस के पीछे पड़ गया.

राधिका उस के मंसूबों को समझ गई थी, लेकिन वह उस का विरोध इसलिए नहीं कर रही थी कि वह एक दबंग आदमी का बेटा था और दूसरे उस के मांबाप भी उस के यहां काम करते थे. राधिका के चुप रहने पर मनी की हिम्मत और बढ़ गई. अब वह उस से अश्लील मजाक करने लगा. किसी न किसी बहाने उस ने उस के घर भी आना शुरू कर दिया. वहां भी वह उसे ही टकटकी लगाए देखता रहता था. एक दिन राधिका ने मनी की शिकायत अपने मातापिता से कर दी. मातापिता मनी से तो कुछ कह नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने उस बिगड़ैल की शिकायत उस के पिता अनिल बिश्नोई से की. बेटे द्वारा अपने नौकर की बेटी का पीछा करने की बात अनिल बिश्नोई को भी बुरी लगी. उन्होंने मनी को बहुत डांटा और कहा कि यह कदम उठाने से पहले वह कम से कम अपना और उस का स्तर तो देख लेता.

परंतु बेटे के ऊपर तो राधिका को पाने का जुनून सवार था, लिहाजा पिता की डांट और समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. वह उसे हासिल करने की जुगत में लगा रहा. कालेज आतेजाते समय वह उसे परेशान करता. इस की शिकायत हरिसिंह ने फिर से अनिल से की. बेटे की शिकायतें सुनसुन कर अनिल भी परेशान हो गया. तब उस ने मनी की यह सोच कर शादी कर दी कि बीवी के आने पर उस की नकेल कस जाएगी. लेकिन अनिल की यह सोच भी गलत साबित हुई. शादी होने के बावजूद भी वह राधिका को परेशान करता रहा. दिसंबर, 2014 के आखिरी सप्ताह में एक दिन उस ने राधिका को रास्ते में रोक लिया और उस ने धमकी दी कि यदि उस ने उस के साथ शादी नहीं की तो उस के पूरे परिवार को खत्म कर देगा.

डरीसहमी राधिका ने कोई जवाब नहीं दिया. घर आ कर उस ने यह बात अपने घर वालों को बता दी. जिस की शिकायत हरिसिंह ने फिर से अनिल बिश्नोई से की. तब अनिल बिश्नोई ने भी मनी को डांटा. इस से मनी और ज्यादा बौखला गया. उस ने घटना से 2 दिनों पहले राधिका को कालेज जाते समय रास्ते में रोक कर कहा कि अगर तू मेरी नहीं हुई तो तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा. राधिका उस की हरकतों से परेशान हो चुकी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसे उस से निजात कैसे मिले. पहली जनवरी, 2015 को दोपहर के समय वह अपने घर में बैठी कपड़े सिल रही थी. उस के मांबाप अपने काम पर गए हुए थे, तभी मनी बिश्नोई तेजाब का डिब्बा ले कर उस के यहां पहुंचा. उस ने राधिका के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. राधिका के विरोध करने पर जब उसे लगा कि उस का मकसद पूरा नहीं होगा तो उस ने डिब्बे में भरा तेजाब उस के चेहरे पर उड़ेल दिया.

अभियुक्त मनी बिश्नोई से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने रिमांड अवधि खत्म होने से पूर्व ही उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी और राधिका का दिल्ली के डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज चल रहा था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, राधिका परिवर्तित नाम है.