प्रेमी ने कहा, मेरी नहीं तो किसी और की नहीं, किया कत्ल

प्राची और आकाश अच्छे दोस्त थे, लेकिन आकाश इस दोस्ती को प्यार समझ बैठा. उस की यह गलतफहमी दोनों को ही महंगी पड़ी. प्राची जान से गई और आकाश…

प्राची महाराष्ट्र के ठाणे के उपनगर किशोर नगर स्थित आनंद भवन सोसायटी में रहती थी. वह के.जी. जोशी और एन.जी. वेडकर कालेज से बीकौम द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रही थी. इस के साथ ही साथ वह घर की आर्थिक मदद के लिए ठाणे की एक प्राइवेट कंपनी में पार्टटाइम जौब करती थी. वैसे तो प्राची अकसर अपने औफिस के लिए दोपहर 1 बजे के आसपास निकलती थी, लेकिन 4 अगस्त, 2018 को शनिवार था इसलिए कालेज बंद होने के कारण प्राची 11 बजे ही औफिस के लिए निकल गई थी. प्राची हंसमुख और मेहनती युवती थी. औफिस के लोग जितना काम पूरे दिन में नहीं करते थे, उस से अधिक काम वह पार्टटाइम में कर दिया करती थी. यही कारण था कि औफिस स्टाफ और बौस प्राची की बहुत इज्जत करते थे.

उस दिन प्राची स्कूटी से जब ठाणे आरटीओ के सामने पहुंची तो आकाश ने ओवरटेक कर के अपनी मोटरसाइकिल उस की स्कूटी के आगे लगा दी. प्राची आकाश को जानती थी. अचानक ब्रेक लगाने से वह गिरतेगिरते बची. उसे आकाश की यह हरकत अच्छी नहीं लगी. इस बेहूदे कृत्य पर प्राची आकाश पर भड़क गई, ‘‘यह क्या बदतमीजी है, तुम ने इस तरह से रास्ता क्यों रोका?’’

‘‘हां, रोका है, एक बार नहीं हजार बार रोकूंगा.’’ आकाश अपनी मोटरसाइकिल स्टैंड पर खड़ी करते हुए बोला.

‘‘देखो, मैं तुम से बहस नहीं करना चाहती. मेरा रास्ता छोड़ो, मुझे औफिस के लिए देर हो रही है.’’ प्राची ने अपनी स्कूटी स्टार्ट करते हुए कहा.

‘‘अगर मैं ने रास्ता नहीं छोड़ा तो मेरा क्या कर लोगी, पुलिस के पास जाओगी? जाओ, शौक से जाओ. पुलिस के पास तो तुम पहले भी गई थी, क्या कर लिया मेरा?’’ आकाश ने प्राची की स्कूटी की चाबी निकालते हुए कहा.

‘‘देखो आकाश, बहुत तमाशा हो चुका. तुम मेरा पीछा करना बंद करो और मेरी स्कूटी की चाबी मुझे दे दो.’’

कहते हुए प्राची अपना हेलमेट सिर पर लगाने लगी. तभी आकाश ने प्राची का हेलमेट छीन कर उसे हवा में उछालते हुए कहा, ‘‘तमाशा हमारा नहीं तुम्हारा है, प्राची. आखिर तुम यह मान क्यों नहीं लेतीं कि तुम्हें मुझ से प्यार है. हम दोनों एकदूसरे के लिए बने हैं. दोनों मिल कर एक नई दुनिया बसाएंगे, जहां हमारे ऐशोआराम के सारे साधन होंगे.’’ आकाश नरम लहजे में प्राची को समझाने की कोशिश करने लगा. लेकिन प्राची ने इस की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया.

‘‘आकाश, यह तुम्हारी गलतफहमी है. मैं ने न तो तुम्हें कभी प्यार किया था और न करती हूं. यह बात मैं तुम्हें कितनी बार कह चुकी हूं. मैं पहले भी तुम्हें अपना एक अच्छा दोस्त मानती थी और आज भी मानती हूं. इस से ज्यादा तुम मुझ से और कोई अपेक्षा न रखो, समझे.’’ प्राची ने साफसाफ कह दिया.

‘‘तो क्या यह तुम्हारा आखिरी फैसला है?’’ आकाश ने निराशा भरे शब्दों में पूछा.

‘‘हां…हां,’’ प्राची ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘हां, अब तुम मुझे भूल जाओ. तुम भी जियो और मुझे भी जीने दो.’’

‘‘प्राची, यही तो मुश्किल है. न तो मैं तुम्हें भूल सकता हूं और न तुम्हारे बिना रह सकता हूं. इस के लिए तो सिर्फ अब एक ही रास्ता बचा है…’’ कहते हुए आकाश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया.

‘‘एक ही रास्ता…क्या मतलब है तुम्हारा? कहना क्या चाहते हो तुम?’’ प्राची ने पूछा.

जब आकाश को लगा कि प्राची मानने वाली नहीं है और न ही वह उस की बात को तवज्जो दे रही है तो गुस्से में वह अपना संयम खो बैठा. उस ने तय कर लिया कि प्राची अगर उसे प्यार नहीं करती तो वह उसे किसी और से प्यार करने के लिए भी नहीं छोड़ेगा. यह सोचते हुए उस ने अपनी पैंट की जेब से चाकू निकाल लिया और यह कहते हुए उस पर हमला कर दिया कि अगर वह उस की नहीं हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. प्यार की आग में जल रहे आकाश ने प्राची के ऊपर इतनी ताकत से अनेक वार किए कि उस के चाकू का फल टूट कर जमीन पर गिर गया. इस के बाद वह आत्महत्या करने के मकसद से सड़क के दूसरी तरफ से आती हुई राज्य परिवहन निगम की बस के सामने कूद गया.

गनीमत यह रही कि बस के ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगा दिए, जिस से वह बच गया. उस के सिर में हलकी सी चोट आई थी. वह फटाफट उठा और वहां से औटो पकड़ कर फरार हो गया. भीड़ ने बस तमाशा देखा भीड़भाड़ भरे इलाके में फिल्मी स्टाइल से घटी इस घटना को वहां से गुजर रहे लोगों ने देखा था. लेकिन भीड़ में से कोई भी उस की मदद के लिए आगे नहीं आया, बल्कि कुछ लोग तो अपने मोबाइल से फोटो खींचने और वीडियो बनाने में लग गए. हद तो तब हो गई, जब जमीन पर घायलावस्था में पड़ी प्राची दर्द से कराहती और तड़पती रही. उसे उस समय अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं था.

किसी दूसरे शहर से आए 3 लोगों ने जब प्राची को सड़क पर लहूलुहान देखा तो वह उसे अस्पताल ले जाने की कोशिश करने लगे. लेकिन कोई औटो और टैक्सी वाला तड़प रही प्राची को अपनी गाड़ी में ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ. किसी तरह वे तीनों एक प्राइवेट वाहन से प्राची को जब करीब के अस्पताल ले कर पहुंचे तो वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. यह घटना थाणे के नौपाड़ा पुलिस स्टेशन इलाके में घटी थी. इस बीच किसी ने इस मामले की जानकारी नौपाड़ा के थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव को दे दी थी. थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव बिना देर किए सहायक इंसपेक्टर धुमाल और इंसपेक्टर सोडकर के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. वहां अपने एक अधिकारी को तैनात कर के वह क्रिटिकेयर सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल रवाना हो गए.

थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव ने इस मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों और थाणे पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. अस्पताल पहुंच कर थानाप्रभारी ने डाक्टरों से बात की और प्राची के शव का बारीकी से निरीक्षण किया. प्राची के गले और शरीर पर चाकू के 7-8 गहरे घाव थे. डाक्टरों ने बताया कि प्राची को अगर समय रहते अस्पताल लाया गया होता तो शायद वह बच सकती थी. प्राची के पास से मिले कालेज के परिचय पत्र से प्राची के घर का पता मिल गया था. पुलिस ने यह जानकारी प्राची के घर वालों को दे दी. बेटी की हत्या की सूचना मिलते ही पिता विकास जाडे सन्न रह गए, घर में रोनापीटना शुरू हो गया. उन्हें जिस अनहोनी का डर था, आखिर वह हो ही गई. घर वाले जिस हालत में थे, उसी हालत में क्रिटिकेयर अस्पताल की ओर दौड़े.

अस्पताल पहुंचने पर पुलिस ने उन्हें सांत्वना दे कर कुछ पूछताछ की. पर प्राची के परिवार वालों ने थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव को बताया कि उस की हत्या आकाश ने की होगी. क्योंकि आकाश ही एक ऐसा युवक था, जो उन की बेटी को एकतरफा प्यार करता था. आए दिन वह उसे परेशान किया करता था. प्राची के परिवार वालों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दी. सरेराह घटी घटना से पुलिस भी रह गई हैरान घटनास्थल का मंजर काफी मार्मिक और डरावना था. उस मंजर को जिस ने भी देखा, उस का कलेजा कांप उठा. घटनास्थल पर खून में सना टूटा हुआ चाकू पड़ा था. वहीं पर मृतका की स्कूटी और आकाश की पल्सर बाइक खड़ी थी. उसी समय थाणे के पुलिस कमिश्नर विवेक फणसलकर, डीसीपी डा. डी.एस. स्वामी, एसीपी अभय सायगांवकर मौकाएवारदात पर आ गए. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी थी.

फोरैंसिक टीम का काम खत्म होने के बाद पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने सरसरी तौर पर घटनास्थल का मुआयना कर थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव को आवश्यक दिशानिर्देश दिए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद थानाप्रभारी ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के घटनास्थल से सबूत एकत्र किए. मौके की काररवाई निपटाने के बाद थानाप्रभारी थाने लौट आए. वह प्राची के पिता विकास जाडे को भी साथ ले आए थे. उन की तहरीर पर उन्होंने आकाश के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. दिनदहाड़े दिल दहला देने वाली इस वारदात से इलाके के लोगों में दहशत फैल गई थी. आरोपी आकाश की तलाश के लिए डीसीपी ने 5 पुलिस टीमों का गठन किया. सभी टीमों को अलगअलग जिम्मेदारी सौंपी गई.

आकाश पवार भिवंडी के नारपोली थाने के अंतर्गत आने वाले गांव कल्हार का रहने वाला था. थाना नारपोली के थानाप्रभारी सुरेश जाधव सबइंसपेक्टर संजय गलवे, हैडकांस्टेबल संजय भोसले, सत्यवान मोहिते कोली और नंदीवाल को ले कर संजय के घर गए. लेकिन वह घर से फरार मिला. बाद में टीम ने अपने मुखबिरों की इत्तला पर कुछ ही घंटों में आकाश को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली. उस के सिर में हलकी सी चोट लगी थी, जिस का उपचार करवा कर पुलिस टीम उसे थाना नौपाड़ा ले आई और उसे थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव को सौंप दिया. आकाश ने बिना किसी दबाव के अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस तफ्तीश और आकाश पवार के बयानों के आधार पर प्राची जाडे हत्याकांड की दिल दहला देने वाली जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी—

वर्षीय आकाश पवार एक साधारण लेकिन भरेपूरे परिवार का युवक था. उस के पिता का नाम कुमार पवार था. वह मुंबई की एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे, जहां उन की अच्छीखासी सैलरी और मानसम्मान था. परिवार में किसी भी चीज की कमी नहीं थी. परिवार की गाड़ी बड़े ही आराम से चल रही थी. आकाश परिवार में सब से छोटा था. इसलिए परिवार के सभी सदस्य उसे बहुत प्यार करते थे. इसी वजह से वह जिद्दी बन गया था. वह जिस चीज की हठ करता था, उसे ले कर ही मानता था. आकाश सुंदर और स्मार्ट था. इस के अलावा वह फैशनपरस्त और दिलफेंक था. लेकिन पढ़ाई में उस का मन नहीं लगता था. बीकौम पहले साल में फेल हो जाने की वजह से कालेज प्रशासन ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इस के बाद भी वह अपने आवारा दोस्तों से मिलनेजुलने कालेज परिसर में आताजाता रहता था.

करीब 3 साल पहले 2015 में प्राची जाडे और आकाश पवार तब मिले थे, जब दोनों ने इंटरमीडिएट कक्षा में दाखिला लिया था. आकाश पहली ही नजर में प्राची का दीवाना हो गया था. इस के बाद वह प्राची के करीब जाने की कोशिश करने लगा. 65 वर्षीय विकास जाडे कोपरी पुलिस थाने के पास अपने 6 सदस्यों वाले परिवार के साथ रहते थे. उन की किराने की दुकान थी, जो अच्छीखासी चल रही थी. दुकान की आय से परिवार का आसानी से भरणपोषण हो रहा था. उन की चारों बेटियां परिवार के लिए मिसाल थीं. क्योंकि वे सभी अपने काम से काम रखती थीं. विकास जाडे के लिए उन की बेटियां ही सब कुछ थीं. इसलिए वह अपनी बेटियों की पढ़ाईलिखाई पर अधिक ध्यान देते थे.

जुनूनी आशिक था आकाश 20 वर्षीय प्राची चारों बेटियों में दूसरे नंबर की थी. वह अपनी तीनों बहनों से कुछ अलग थी. नरमदिल, चंचल स्वभाव और आधुनिक विचारों वाली प्राची किसी से भी बेझिझक बातें कर लिया करती थी. उस की मीठीमीठी बातें सब के दिल को छू लेती थीं. प्राची जितनी पढ़ाईलिखाई में होशियार थी, उतनी ही खेलकूद में निपुण थी. लंबी दौड़, ऊंची कूद में उसे बहुत रुचि थी. इस के अलावा वह स्कूल और कालेज के हर प्रोग्राम में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. वह चाहती थी कि अगर उस की मौत हो जाए तो उस की आंखें दान दे दी जाएं. ताकि उस के न रहने पर उस की आंखों से कोई और यह संसार देखे. और ऐसा ही हुआ. उस की आंखें बेकार नहीं गईं. उस के मातापिता ने आंखें नेत्र बैंक को दान कर दीं.

चूंकि आकाश प्राची के कालेज का साथी था, इसलिए उस की आकाश से दोस्ती हो गई. लेकिन वह दोस्ती सिर्फ औपचारिकता भर थी. प्राची आकाश को सिर्फ अपना दोस्त मानती थी और उस के साथ हंसतीबोलती व घूमतीफिरती थी. लेकिन आकाश पवार ने उस की दोस्ती का अलग ही मतलब निकाल लिया था. प्राची जब भी आकाश के सामने आती तो आकाश के दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं. प्राची का सुंदर मन रंग और रूप उस की आंखों में समा जाता था. और तो और वह प्राची को ले कर अपने जीवन के रंगीन सपनों में खो जाता था. प्राची और आकाश की दोस्ती प्राची और आकाश की दोस्ती को धीरेधीरे 5 साल से अधिक का समय हो गया था.

जब आकाश आवारा लड़कों के साथ घूमनेफिरने लगा तो प्राची ने उस से दूरी बना ली. इसी बीच आकाश बीकौम फर्स्ट ईयर में फेल हो गया तो प्राची ने आकाश से अपनी दोस्ती पूरी तरह खत्म कर ली. खुद को व्यस्त रखने के लिए उस ने एक प्राइवेट फर्म में नौकरी कर ली थी. प्राची के इस रवैए से आकाश को गहरा धक्का लगा. वह उसे प्यार करता था. अपनी जिंदगी से उसे ऐसे जाने नहीं देना चाहता था. प्राची का पीछा कर के वह उस से बात करने की कोशिश करता था. बात न करने पर वह प्राची को तरहतरह की धमकियां देता था. हद तो तब हो गई जब 11 जून, 2018 कालेज परिसर में उस ने प्राची को अपने एक क्लासमेट के साथ बातें करते देख लिया. आकाश को यह अच्छा नहीं लगा. वह वहीं पर प्राची पर भड़कते हुए बोला, ‘‘देख प्राची, अगर तूने मुझ से दोस्ती तोड़ी तो बहुत बुरा नतीजा होगा. तू मेरी है और मेरी ही रहेगी. मैं तुझे किसी और की नहीं होने दूंगा. खत्म कर दूंगा तुझे.’’

आकाश पवार की इस धमकी से प्राची बुरी तरह डर गई थी. धमकी वाली बात प्राची ने अपने परिवार वालों को बताई तो प्राची के पिता विकास जाडे ने उसी दिन कापूरवाड़ी पुलिस थाने में आकाश पवार के खिलाफ शिकायत कर दी. लेकिन पुलिस ने उस पर कोई कड़ी काररवाई नहीं की. इस की जगह पुलिस ने आकाश पवार से माफीनामा लिखवा कर उसे छोड़ दिया. प्राची जाडे और उस के परिवार वालों के इस कदम से आकाश पवार की हिम्मत और बढ़ गई. उस ने एकदो बार प्राची से मिलने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ. इस से उस का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और उस ने प्राची के प्रति एक क्रूर फैसला ले लिया. बाजार जा कर वह एक लंबे फल का चाकू खरीद लाया.

घटना के दिन आकाश पवार ने प्राची का पीछा कर रास्ता रोक लिया और वादविवाद के बाद जेब में छिपा कर लाए चाकू से प्राची पर हमला कर उस की हत्या कर दी. पुलिस जांच और आकाश पवार के बयान से पता चला कि मामला एकतरफा प्यार का था. आकाश पवार की गिरफ्तारी के बाद सड़कों पर कई सामाजिक संस्थाएं उतर गईं. उन्होंने प्राची जाडे की हत्या पर शोकसभा कर के कैंडल मार्च निकाला.

 

गर्लफ्रेंड के नामर्द कहने पर Boyfriend ने तमंचा निकाल मारी गोली

कुलदीप ने प्रेमिका के खून से हाथ रंग कर जो किया, वह भावावेश में उठाए गए कदम के साथसाथ जघन्य अपराध भी था. इस की सजा भी उसे मिलेगी, लेकिन उसे इस स्थिति तक पहुंचाने वाली शबनम भी कम गुनहगार नहीं थी. अगर वह…

कानपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक कस्बा है बिल्हौर. इस कस्बे से सटा एक गांव है दासा निवादा, जहां छिद्दू का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी रमा के अलावा 2 बेटे सतीश, नेमचंद्र तथा 2 बेटियां विजयलक्ष्मी और पूनम थीं. विजयलक्ष्मी को ज्यादातर शबनम के नाम से जाना जाता था. छिद्दू गरीब किसान था. उस के पास नाममात्र की जमीन थी. वह मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह परिवार का भरणपोषण करता था. खेतीकिसानी में उस के दोनों बेटे भी सहयोग करते थे.

तीखे नैननक्श और गोरी रंगत वाली विजयलक्ष्मी उर्फ शबनम छिद्दू की संतानों में सब से सुंदर थी. समय के साथ जैसेजैसे उस की उम्र बढ़ रही थी, उस के सौंदर्य में भी निखार आता जा रहा था. उस का गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें, तीखे नैननक्श, गुलाबी होंठ और कंधों तक लहराते बाल किसी को भी उस की ओर आकर्षित कर सकते थे. अपनी खूबसूरती पर शबनम को भी बहुत नाज था. यही वजह थी कि जब कोई लड़का उसे चाहत भरी नजरों से देखता तो वह उसे इस तरह घूर कर देखती मानो खा जाएगी. उस की टेढ़ी नजरों से ही लड़के उस से डर जाते थे. लेकिन कुलदीप शबनम की टेढ़ी नजर से जरा भी नहीं डरा.

कुलदीप का घर शबनम के घर से कुछ ही दूरी पर था. उस के पिता देवी गुलाम खेतीबाड़ी करते थे. उन की 3 संतानों में कुलदीप सब से छोटा था. वह सिलाई का काम करता था. उस की कमाई ज्यादा अच्छी नहीं तो बुरी भी नहीं थी. अच्छे कपड़े पहनना और मोटरसाइकिल पर घूमना कुलदीप का शौक था. शबनम तनमन से जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही वह पढ़नेलिखने में भी तेज थी. बिल्हौर के बाबा रघुनंदन दास इंटर कालेज से हाईस्कूल पास कर के उस ने 11वीं में दाखिला ले लिया था. अपने कामधाम और स्वभाव की वजह से वह अपने मांबाप की आंखों का तारा बनी हुई थी. शबनम के कालेज आनेजाने में ही कुलदीप की निगाह शबनम पर पड़ी थी. पहली ही बार में वह उस की ओर आकर्षित हो गया था. वह उसे तब तक देखता रहता था, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो जाती थी.

ऐसा नहीं था कि कुलदीप ने शबनम को पहली बार देखा था. इस के पहले भी उस ने शबनम को कई बार देखा था. लेकिन तब और अब में जमीनआसमान का अंतर था. शबनम कुलदीप के मन को भायी तो वह उस का दीवाना हो गया. उस के कालेज आनेजाने के समय वह रास्ते में खड़ा हो कर उस का इंतजार करने लगा. शबनम उसे दिखाई दे जाती तो वह उसे चाहत भरी नजरों से देखता रहता, लेकिन शबनम थी कि उसे भाव ही नहीं दे रही थी. धीरेधीरे उस की बेचैनी बढ़ने लगी थी. हर पल उस के मन में शबनम ही छाई रहती. यहां तक कि उस का मन सिलाई के काम में भी नहीं लगता था. उस के मन की बेचैनी तब और बढ़ जाती, जब शबनम उसे दिखाई दे जाती.

जब कुलदीप के लिए शबनम के करीब पहुंचने की तड़प बरदाश्त से बाहर हो गई तो उस ने शबनम के भाई सतीश से दोस्ती कर ली और मिलने के बहाने उस के घर आनेजाने लगा. सतीश के घर पर कुलदीप बातें भले ही दूसरों से करता था लेकिन उस की नजरें शबनम पर ही जमी रहती थीं. जल्दी ही इस बात को शबनम ने भी भांप लिया. कुलदीप की आंखों में अपने प्रति चाहत देख कर शबनम का मन भी विचलित हो उठा. वह भी अब कुलदीप के आने का इंतजार करने लगी. जब कुलदीप आता तो वह उस के पास ही मंडराती रहती. दोनों ही एकदूसरे का सामीप्य पाने के लिए बेचैन रहने लगे. कुलदीप की चाहत भरी नजरें शबनम की नजरों से मिलतीं तो वह मुसकरा कर मुंह फेर लेती. कई बार वह तिरछी नजरों से देखते हुए कुलदीप के आगेपीछे चक्कर लगाती रहती.

शबनम की कातिल निगाहों और मुसकान से कुलदीप समझ गया कि जो बात उस के मन में है, वही शबनम के मन में भी है. फिर भी वह अपनी बात शबनम से नहीं कह पा रहा था, जबकि शबनम पहल करने से कतरा रही थी. सोचविचार कर कुलदीप ऐसे मौके की तलाश में रहने लगा, जब वह शबनम से अपने दिल की बात कह सके. यह सच है कि चाह को राह मिल ही जाती है. आखिर एक दिन कुलदीप को मौका मिल ही गया. शबनम को घर में अकेली पा कर कुलदीप ने कहा, ‘‘शबनम, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. अगर बुरा न मानो तो मैं अपने मन की बात कह दूं?’’

‘‘बात ही तो कहनी है. कह दो. इस में बुरा मानने की क्या बात है.’’ शबनम नजरें चुराते हुए बोली. शायद उसे अहसास था कि कुलदीप क्या कहने वाला है.

‘‘शबनम तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, मुझे तुम्हारे अलावा कुछ सूझता ही नहीं है.’’ कुलदीप नजरें झुका कर बोला, ‘‘हर पल तुम्हारी सूरत मेरी नजरों के सामने घूमती रहती है.’’

कुलदीप की बात सुन कर शबनम के दिल में गुदगुदी सी होेने लगी. वह शरमाते हुए बोली, ‘‘कुलदीप, जो हाल तुम्हारा है, वही हाल मेरा भी है. तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो.’’

शबनम का जवाब सुन कर कुलदीप ने उसे बाहों में भर कर कहा, ‘‘तुम्हारे मुंह से यही बात सुनने के लिए मैं कब से इंतजार कर रहा था.’’

उस दिन के बाद दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. शबनम कालेज के लिए निकलती तो कुलदीप सड़क पर मोटरसाइकिल लिए उस का इंतजार करता मिलता. शबनम के आते ही वह उसे मोटरसाइकिल पर बिठा कर कालेज छोड़ आता. शबनम जब कुलदीप की मोटरसाइकिल पर बैठती तो उस के किशोर मन की कल्पना के घोड़े तेज रफ्तार से दौड़ने लगते. उसे लगता जैसे कुलदीप ही उस के सपने का राजकुमार है और वह उस के साथ घोड़े पर सवार हो कर कहीं दूर सपनों की दुनिया में जा रही है. कुलदीप उसे बाइक से कालेज छोड़ने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ता था. शबनम को भी उस का साथ भाने लगा था. शबनम बाइक से उतर कर जब उसे थैंक्स कहती तो कुलदीप का दिल खुश हो जाता.

इश्क की आग दोनों ओर बराबर भड़क रही थी. धीरेधीरे कुलदीप और शबनम के बीच की दूरियां सिमटने लगी थीं. अकसर तन्हाइयों में होने वाली दोनों की मुलाकातें उन्हें और ज्यादा नजदीक लाने लगी थीं. कुलदीप अब शबनम को तोहफे भी देने लगा था. एक रोज कुलदीप शबनम के लिए एक कीमती सलवार सूट ले कर आया. सलवार सूट देख कर शबनम खुशी से झूम उठी. उस ने चहकते हुए पूछा, ‘‘इतना महंगा सलवार सूट क्यों लाए?’’

‘‘कीमती आभूषण पर महंगा नगीना ही सजता है, शबनम.’’ कुलदीप ने उस के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे आगे इस सूट की कीमत कुछ भी नहीं है.’’ कुलदीप अपना चेहरा उस के एकदम करीब ले आया.

शबनम के होंठ कंपकंपाने लगे. निगाहें हया से झुक गईं. उस ने कांपते शब्दों में पूछा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए इतना मायने रखती हूं.’’

‘‘हां, शबनम.’’ कुलदीप की सांसें उस के चेहरे से टकराने लगीं, ‘‘तुम मेरे लिए मेरी सांसों से ज्यादा मायने रखती हो. मैं दिल हूं तुम धड़कन. मैं दीया, तुम बाती. तुम फूल मैं खूशबू.’’ कहने के साथ ही उस ने शबनम का चेहरा ऊपर उठाया.

शबनम उस की बातों से मदहोशी के आलम में आ चुकी थी. खुशियों भरी लज्जा से उस की आंखें बंद हो गई थीं.

कुलदीप ने चेहरा झुका कर शबनम के होंठों को चूम लिया. सांसों से सांसें मिलीं तो शबनम की मदहोशी बढ़ गई. उस ने कुलदीप को रोका नहीं, बल्कि उस से लिपट गई. फिर तो तन से तन मिलने में ज्यादा समय नहीं लगा. दोनों सारी मर्यादाएं तोड़ कर एकदूसरे की बांहों में समा गए. एक बार दोनों ने वासना की दलदल में कदम रखा तो उन की भावनाएं, उन की चाहत, सामाजिक मर्यादाएं सब उस दलदल में डूबते गए. घर के बाहर जहां भी मौका मिलता वे शरीर की आग शांत करने लगे. कुलदीप शबनम के प्यार में ऐसा दीवाना हुआ कि उस की हर डिमांड पूरी करने लगा. बात करने के लिए उस ने शबनम को महंगा मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया. रिचार्ज का पैसा भी शबनम उसी से लेती थी. इस के अलावा, कपड़े, फीस और उस के अन्य खर्चे भी कुलदीप ही उठाने लगा.

एक रोज शबनम ने कुलदीप से एक अजीब पेशकश की. उस ने प्यार के क्षणों में कहा, ‘‘कुलदीप मुझे बाइक चलाना सिखा दो. मैं भी तुम्हारी तरह फर्राटे भर कर बाइक चलाना चाहती हूं.’’

‘‘बाइक मर्द चलाते हैं, औरतें नहीं.’’ कुलदीप ने शबनम को समझाया, लेकिन वह जिद पर अड़ गई. अंतत: कुलदीप को शबनम की बात माननी पड़ी. वह उसे बाइक चलाना सिखाने लगा. कुलदीप की मेहनत और शबनम की लगन काम आई, कुछ ही दिनों में वह सचमुच फर्राटे भरते हुए मोटरसाइकिल चलाने लगी. उस ने लाइसेंस भी बनवा लिया था. इस के बाद उस ने कुलदीप के सहयोग से एक पुरानी मोटरसाइकिल खरीद ली और उसी से कालेज आनेजाने लगी. अब तक कुलदीप और शबनम के प्यार के चर्चे पूरे गांव में होने लगे थे. उड़तेउड़ते यह खबर शबनम के मांबाप के कानों में पड़ी तो सुन कर रमा और छिद्दू सन्न रह गए. उस दिन शबनम घर आई तो रमा उसे अलग कमरे में ले जा कर बोली, ‘‘शबनम, तुम पर मैं बहुत भरोसा करती थी, लेकिन तुम ने अभी से अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया. बता कुलदीप के साथ तेरा क्या चक्कर है?’’

‘‘मां अगर जानना चाहती हो तो सुनो. कुलदीप और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं. हम दोनों शादी कर के अपना घर बसाना चाहते हैं.’’ शबनम ने विस्फोट किया तो छिद्दू और रमा समझ गए कि शबनम बेलगाम हो गई है. उसे समझाना आसान नहीं होगा.

चूंकि सवाल इज्जत का था, सो शबनम के दो टूक जवाब देने के बावजूद रमा ने उसे समझाया. छिद्दू भी कुलदीप के पिता देवी गुलाम के घर गया और इज्जत की दुहाई दे कर कुलदीप को समझाने के लिए कहा. देवी गुलाम ने  आश्वासन दिया कि वह कुलदीप को समझाएगा. देवी गुलाम ने कुलदीप को समझाया भी, लेकिन उस ने पिता की बात एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी. परिवार वालों का विरोध बढ़ा तो शबनम अपने भविष्य को ले कर चिंतित हो उठी. उस ने अपनी चिंता से कुलदीप को भी अवगत करा दिया था. उस ने आश्वासन दिया कि वह किसी भी हाल में उस का साथ नहीं छोड़ेगा. समय आने पर उस की मांग में सिंदूर भरेगा. वह उसे भगा कर नहीं ले जाएगा, बल्कि गांव में ही उस के साथ सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह कर के घर बसाएगा.

शबनम को विश्वास दिलाने के लिए वह उसे मंदिर में ले गया और भगवान को साक्षी मान कर उस के साथ विवाह कर लिया. इस बात की जानकारी न तो शबनम के घर वालों को हुई और न ही कुलदीप के घर वालों को. कुलदीप को अब घर से पैसा मिलना बंद हो गया था. सिलाई की दुकान से उसे इतनी आमदनी नहीं थी कि वह अपना और शबनम का खर्च बरदाश्त कर पाता. इसलिए ज्यादा पैसा कमाने के लिए उस ने दिल्ली जाने का निश्चय कर लिया. इस बाबत उस ने शबनम से बात की तो उस ने सहमति दे दी. दरअसल शबनम को कुलदीप से ज्यादा पैसे से प्यार था. बिना पैसे के उस का काम नहीं चल सकता था. दिल्ली के लक्ष्मीनगर में कुलदीप का दोस्त अमर रेडीमेड कपड़ों के कारखाने में सिलाई का काम करता था. कुलदीप ने उस से बात की तो उस ने उसे दिल्ली बुला लिया.

दिल्ली आ कर कुलदीप कारखाने में ज्यादा से ज्यादा सिलाई का काम करने लगा ताकि प्रेमिका के लिए पैसा जुटा सके. कुलदीप और शबनम में ज्यादा बातें रात में होती थीं. शबनम कुलदीप से प्यार भरी बातें तो करती थी, लेकिन अपनी डिमांड पूरी करने का दबाव भी बनाती थी. कुलदीप यथाशक्ति उस की डिमांड पूरी करने का प्रयास करता था. जो डिमांड अधूरी रह जाती उसे वह छुट्टी पर घर आ कर पूरी करता था. कुलदीप को 2-4 दिन की ही छुट्टी मिलती थी. वह छुट्टी पर घर आता तो शबनम को हर तरह से खुश रखता. उस की डिमांड पूरी करता और शारीरिक सुख प्राप्त कर के वापस चला जाता. समय बीतता रहा. शबनम अब तक इंटरमीडिएट पास कर चुकी थी और बीटेक की डिग्री के लिए उस ने कृष्णा इंजीनियरिंग कालेज, कानपुर में दाखिल ले लिया था. वह मोटरसाइकिल से ही कालेज आतीजाती थी.

20 वर्षीय शबनम तेजतर्रार युवती थी. वह न किसी से दबती थी और न किसी के सामने झुकती थी. कभी कोई युवक उस पर फब्तियां कसता तो वह बाइक रोक कर उसे सबक सिखा देती थी. उस के गांव के लोग तो उस की छाया तक से डरते थे. बीटेक की पढ़ाई के दौरान शबनम के आंतरिक संबंध बीटेक के कुछ छात्रों से बन गए थे. वह उन के साथ घूमतीफिरती और मौजमस्ती करती. दोपहर को वह एक युवक के साथ होटल या रेस्टोरेंट जाती तो शाम को किसी दूसरे के साथ. जल्दी ही उस के चाहने वालों की फौज तैयार हो गई. चाहत के ऐसे ही फौजियों से उस की आर्थिक व शारीरिक दोनों तरह की पूर्ति होने लगी. दरअसल, कुलदीप के बाहर चले जाने के बाद वह पुरुष संसर्ग से वंचित रहने लगी थी. साथ ही उसे आर्थिक परेशानी से भी जूझना पड़ता था. इन्हीं आवश्यकताओं की वजह से उस के कदम बहक गए थे.

शबनम ने जम कर मौजमस्ती की तो उस की पढ़ाई में बाधा पड़ने लगी. इस का परिणाम यह निकला कि उस के 2 पेपर में बैक आ गई. खिन्न हो कर शबनम ने बीटेक की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी. इस के बाद उस ने तांतियागंज स्थित विशंभरनाथ डिग्री कालेज से बीकौम करने के लिए दाखिल ले लिया. शबनम पर घर वालों का कोई नियंत्रण नहीं था. वह अपनी मरजी से घर आती थी और  मरजी से जाती थी. उस की भाभी दया अगर कभी उस से मजाक करती तो वह उसे करारा जवाब देती, ‘‘भाभी, पहले तुम बताओ मायके में कितने यार छोड़ कर आई हो, फिर मैं बताऊंगी.’’

शबनम भले ही गरीबी में पली थी, लेकिन उस के सपने आसमान छूने वाले थे. वह पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, अपने सपने पूरे करना चाहती थी. वह तेजतर्रार ही नहीं शरीर से भी हृष्टपुष्ट थी. इसी के मद्देनजर वह पुलिस विभाग में नौकरी करने की इच्छुक थी. इस के लिए उस ने प्रयास भी शुरू कर दिया था. सिपाही भरती में उस ने आवेदन भी किया था, लेकिन यह परीक्षा निरस्त हो गई थी. इधर शबनम ने जब नए दोस्त बना लिए और वह उन के साथ मौजमस्ती करने लगी तो उस ने कुलदीप को दिल से ही निकाल दिया. अब उस का मन कुलदीप से ऊबने लगा था. प्रेमिका की यह फितरत कुलदीप समझ नहीं पाया. वह तो सपनों की दुनिया में जी रहा था. शबनम ने अब मोबाइल पर भी कुलदीप से बात करनी करीबकरीब बंद कर दी थी.

कुलदीप शबनम से बात करने की कोशिश करता तो वह उस का फोन रिसीव नहीं करती थी, कभी झुंझला कर रिसीव भी करती तो कोई न कोई बहाना बना देती. कभी कालेज में होने का बहाना बनाती तो कभी रात अधिक होने या सिरदर्द का बहाना कर फोन बंद कर देती. कुलदीप की समझ में नहीं आ रहा था कि शबनम बेवफाई क्यों कर रही है. कुलदीप, शबनम से बेइंतहा प्यार करता था. उस के बिना वह खुद को अधूरा महसूस करता था. जब शबनम ने उस से बातचीत करनी बंद कर दी तो वह परेशान रहने लगा. कारण जानने के लिए वह दिल्ली से अपने गांव आ गया. गांव में उस ने गुप्त रूप से शबनम की बेरुखी के बारे में पता किया तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे पता चला कि शबनम ने कई नए दोस्त बना लिए हैं, जिन के साथ वह मौजमस्ती करती है.

कुलदीप ने इन नए दोस्तों के बारे में शबनम से पूछा तो वह तुनक कर बोली, ‘‘कुलदीप, अब मैं कालेज में पढ़ती हूं. कालेज में लड़केलड़कियां साथ में पढ़ते हैं. उन से मेलजोल स्वाभाविक है. तुम व्यर्थ में शक कर रहे हो. मैं तुम से उतना ही प्यार करती हूं जितना पहले किया करती थी.’’

‘‘तो फिर मोबाइल पर बातचीत करनी क्यों बंद कर दी?’’ कुलदीप ने शिकायत की, तो शबनम बोली, ‘‘तुम वक्त बेवक्त फोन करते हो. कभी मैं कालेज में क्लास में होती हूं तो कभी रात को घर वाले कान लगाए रहते हैं. लेकिन अब तुम्हें शिकायत नहीं होगी. मैं तुम से बात करती रहूंगी.’’

शबनम ने अपनी चपल चाल से कुलदीप को संतुष्ट कर दिया. उस ने 1-2 दिन कुलदीप के साथ मौजमस्ती की और अपनी जरूरत की चीजों की खरीदारी भी. इस के बाद कुलदीप वापस दिल्ली चला गया. लेकिन इस बार दिल्ली में उस का मन नहीं लग रहा था. वह रात दिन शबनम के फोन का इंतजार करता रहता. पर शबनम फोन नहीं करती. कुलदीप फोन मिलाता तो वह रिसीव नहीं करती थी. शबनम से बात न हो पाने से कुलदीप परेशान हो गया. उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई. कुलदीप समझ गया कि शबनम बेवफा हो गई है. उस ने नए यार बना लिए हैं, जिन की वजह से उस ने उसे भुला दिया है. उस ने सोच लिया कि अगर शबनम उस की नहीं हुई तो वह उसे दूसरों की बांहों में भी नहीं झूलने देगा.

24 जून, 2018 को कुलदीप दिल्ली से अपने गांव दासानिवादा आ गया. यहां उस ने शिवराजपुर कस्बे के एक अपराधी से संपर्क किया और उस से 315 बोर का तमंचा व 6 कारतूस खरीद लिए. उस ने तमंचा लोड कर के सुरक्षित रख लिया. कुलदीप ने शबनम से मिल कर बात करने का काफी प्रयास किया, लेकिन शबनम नहीं मिली. 27 जून को कुलदीप को शबनम के चचेरे भाई से पता चला कि वह कालेज गई है. यह जानने के बाद कुलदीप बाइक ले कर राधन लिंक रोड पर पहुंच गया और शबनम के वापस लौटने का इंतजार करने लगा. इसी लिंक रोड से गांव आनेजाने का रास्ता जुड़ा था. कुलदीप को मालूम था कि गांव जाने के लिए शबनम इसी लिंक रोड से हो कर गुजरेगी.

इस बीच कुलदीप ने अपने मोबाइल से शबनम से बात करने की कोशिश की. लेकिन शबनम ने उस का फोन रिसीव नहीं किया. इस पर कुलदीप ने शबनम के फोन पर ‘काल मी’ मैसेज भेजा पर शबनम ने उसे फोन नहीं किया. लगभग 12 बजे कुलदीप को शबनम बाइक से आती दिखी. नजदीक आते ही उस ने शबनम को रोेक लिया. दोनों में फोन पर बात न करने को ले कर तकरार होने लगी. कुलदीप ने शबनम से कहा, ‘‘मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करता हूं. फिर भी तुम बेवफा बन गईं, मुझे भूल कर यारों के साथ गुलछर्रे उड़ाने लगीं.’’

कुलदीप के इस आरोप से शबनम तिलमिला गई. वह कुलदीप को मां की गाली देते हुए बोली, ‘‘तू अपना खर्चा पूरा कर नहीं पाता, मेरा कैसे करेगा. चल भाग, नामर्द कहीं का.’’

एक तो मां की गाली, ऊपर से नामर्द कहना, कुलदीप को नागवार लगा. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने कमर में खोसा हुआ तमंचा निकाला और शबनम की कनपटी पर लगाते हुए बोला, ‘‘बेवफा, बदजुबान, आज मैं तुझे सबक सिखा कर रहूंगा.’’

शबनम कुछ सोच पाती इस से पहले ही कुलदीप ने ट्रिगर दबा दिया. धांय की आवाज के साथ शबनम का भेजा उड़ गया. खून से लथपथ हो कर वह सड़क पर गिर गई. थोड़ी देर में उस ने दम तोड़ दिया. गोली चलने की आवाज सुन कर खेतों में काम कर रहे लोग उस ओर दौड़े तो कुलदीप बाइक से भाग निकला. कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई. इसी बीच किसी ने एक युवती की हत्या किए जाने की खबर थाना बिल्हौर की पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही बिल्हौर थानाप्रभारी ज्ञान सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल आ गए.

उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी. कुछ देर बाद ही एसपी (ग्रामीण) प्रद्युम्न सिंह, सीओ (बिल्हौर) आर.के. चतुर्वेदी, फोरेंसिक टीम के साथ आ गए. इसी बीच दासानिवादा निवासी छिद्दू और उस के दोनों बेटे सतीश व नेमचंद आए और युवती के शव को देख कर बिलख पड़े. छिद्दू ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि लाश उस की बेटी शबनम उर्फ विजयलक्ष्मी की है. लाश की पहचान हो गई तो पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. शबनम की कनपटी में सटा कर गोली मारी गई थी. जो आरपार हो गई थी. उस का भेजा उड़ चुका था. मौके पर पुलिस को मृतका का मोबाइल फोन मिला, जिसे जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लिया गया. मृतका की बाइक भी पुलिस ने थाने भिजवा दी. फोरेंसिक टीम ने भी साक्ष्य जुटाए. इस के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भेज दिया.

शबनम की हत्या के संबंध में एसपी (ग्रामीण) प्रद्युम्न सिंह ने छिद्दू और उस के बेटे से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि शबनम की हत्या गांव के ही कुलदीप ने की है. दोनों के बीच अवैध संबंध थे. यह पता चलते ही थानाप्रभारी ज्ञान सिंह ने मृतका के भाई सतीश को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत कुलदीप के खिलाफ रिपार्ट दर्ज कर ली और उस की तलाश में जुट गए. उस के घर पर छापा मारा गया पर वह फरार हो गया था.

कुलदीप को पकड़ने के लिए एसपी (गामीण) प्रद्युम्न सिंह ने एक पुलिस टीम गठित की. इस टीम में बिल्हौर थानाप्रभारी ज्ञान सिंह, एसआई बहादुर सिंह, शिवप्रताप तथा सिपाही उमेश रामवीर, जुनेंद्र व अफरोज को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने कुलदीप के पिता देवी गुलाम से उस के ठिकानों के संबंध में जानकारी हासिल की. इस के बाद कुलदीप के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर उसे चरखी, दादरी, लक्ष्मी नगर (दिल्ली), बीकानेर (राजस्थान), गोहना (हरियाणा) तथा नोएडा की संभावित जगहों पर खोजा गया. लेकिन कुलदीप हाथ नहीं लगा. आखिर पुलिस ने उस की तलाश में मुखबिर लगा दिए.

पुलिस टीम ने घटनास्थल से मिला मृतका का फोन खंगाला तो उस में कई दरजन नंबर सेव थे. ये नंबर थे तो लड़कों के, लेकिन फोन में लड़कियों के नाम से सेव किए गए थे. मृतका के मोबाइल पर आखिरी काल 3 मिनट की थी. इसी नंबर से ‘काल मी’ का मैसेज भी था. जांच से पता चला कि वह नंबर कुलदीप का था. 13 जुलाई, 2018 की सुबह 10 बजे थानाप्रभारी ज्ञान सिंह को मुखबिर ने खबर दी कि हत्यारोपी कुलदीप इस वक्त उत्तरीपुरा रेलवे फाटक के पास मौजूद है, अगर तुरंत एक्शन लिया जाए तो उसे पकड़ा जा सकता है. सूचना महत्त्वपूर्ण थी. ज्ञान सिंह ने पुलिस टीम के साथ छापा मार कर कुलदीप को रेलवे फाटक के पास स्थित होटल से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उस से शबनम की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने बड़ी आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने कहा कि उसे शबनम की हत्या का कोई गम नहीं है. उस की बेवफाई ने उसे गुनाह करने को मजबूर कर दिया था.

कुलदीप के पास से 315 बोर का तमंचा तथा 3 जीवित कारतूस भी मिले. पुलिस ने इस के लिए उस के खिलाफ आर्म्स एक्ट का मुकदमा अलग से दर्ज किया. यह वही तमंचा था, जिस से उस ने शबनम की हत्या की थी.

दिनांक 14 जुलाई, 2018 को थाना बिल्हौर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

‘मौत का खेल’ खेलने में गई जान पर कौन था कातिल

मौत का खेल खेलतेखेलते शिम्ट की सचमुच मौत हो गई. किसी की समझ में नहीं आया कि उस का कातिल कौन है, लेकिन कैलर मेरे सामने खुद को इसलिए कातिल बताने लगी, क्योंकि कातिल के नाम की पर्ची उस के पास थी. जबकि हकीकत में…   

मुमकिन है कि आप को मौत के खेल के बारे में जानकारी हो. इसलिए मैं पहले इस खेल के बारे में कुछ बातें आप को बता दूं. इस खेल में होता यह है कि लाटरी की कुछ पर्चियां एक हैट में डाल दी जाती हैं. खेल में शामिल होने वाले एकएक पर्ची उठा लेते हैं. इन पर्चियों में से एक पर कातिल और एक पर जासूस लिखा होता है. बाकी पर्चियां सादी होती हैंइस खेल में जिसे कातिल की पर्ची मिले उसे कातिल और जिसे जासूस की पर्ची मिले उसे जासूस का रोल अदा करना होता है. मरने वाले का किरदार अदा करने के लिए किसी का चुनाव नहीं किया जाता. उस का चुनाव खुद कातिल को करना होता है.

इस खेल में यह जरूरी है कि जिस के नाम कातिल की पर्ची निकले वह अपने वजूद को दूसरों के सामने गुप्त रखे. जबकि जासूस के बारे में खेल में शामिल लोग फैसला करते हैं कि उस के किरदार को दूसरों के सामने प्रकट किया जाए या नहीं. पर्चियां बंट जाने के बाद खेल में हिस्सा लेने वाले उस पूरे घर में फैल जाते हैं जहां खेल खेला जाना होता है. मकान का तहखाना और बागीचा वगैरह भी खेल के दायरे में शामिल होते हैं. इस खेल के लिए यह भी जरूरी है कि खेल रात के वक्त खेला जाए या कम से कम शाम का अंधेरा तो जरूर फैल चुका होकातिल की शख्सियत चूंकि गुप्त होती है इसलिए किसी को पता नहीं होता कि उस का शिकार कौन बनेगा और किस वक्त बनेगा. यह कातिल किसी को अपना शिकार बनाए तो उस के शिकार व्यक्ति की बनावटी चीख दूसरों को जरूर सुनाई दे ताकि वे समझ जाएं किकातिलअपना वार कर चुका है

इस के बाद सभी लोग वारदात की जगह पर इकट्ठा हो जाते हैं. लेकिन कातिल का शिकार हुए व्यक्ति को यह जाहिर करने की इजाजत नहीं होती कि कातिल कौन है. इस के बादजासूसकातिल की तलाश शुरू कर देता है. मैं भी मौत के इस खेल में हिस्सा ले चुका हूं और वह मेरी जिंदगी का पहला और आखिरी खेल था. इस के बाद मैं ने कभी इस खेल में हिस्सा नहीं लिया. उन दिनों की है जब मैंम्यूनिखमें रहता था. अचानक एक दिन मेरे एक दोस्त शिम्ट की तरफ से पार्टी में शामिल होने कादावतनामामिला. पार्टी म्यूनिख से 30 किलोमीटर दूरओम्बर्गमें थी. शहर के हंगामे से दूर यह छोटी सी बस्ती बसंत में जन्नत जैसी खूबसूरत बन जाती थी.

हरियाली भरी पहाड़ी के दामन में दूरदूर तक फैली खूबसूरत कोठियां और दिल को खुशी से भर देने वाले दृश्य देख कर वहीं रह जाने का मन करता था. लेकिन सब से बड़ी दिक्कत यह थी कि मेरे जैसा मिडिल क्लास आदमी वहां रहने के बारे में सोच भी नहीं सकता था. इस इलाके में सिर्फ उन लोगों की रिहाइश थी, जिन्हें खुद अपनी दौलत का अंदाजा नहीं था. मेरे दोस्तशिम्टकी गिनती भी देश के चंद अमीरतरीन लोगों में होती थी. पुरानी दोस्ती की वजह से वह मुझे हर खुशी के मौके पर आमंत्रित कर लिया करता था. वैसे भी म्यूनिख में दूसरे दोस्तों के मुकाबले शिम्ट का मेरे यहां ज्यादा आनाजाना था. शिम्ट के यहां होने वाली पार्टी के दूसरे दिन एक साहब के यहां कौकटेल पार्टी थी.

इस पार्टी में शिम्ट के साथ मैं भी शामिल हुआ. उस रोज उस खूबसूरत बस्ती के तमाम लोग मिस्टरवोल्फ गैंगके यहां जमा हुए थे. देर रात तक शराब के जाम छलकते रहे. यह शराब इस पार्टी के लिए खास तौर पर तैयार करवाई गई थी और बहुत मजेदार थी. यही वजह थी कि हर कोई बढ़चढ़ कर पी रहा था. आधी रात गुजर जाने के बाद किसी नेमौत का खेलखेलने की बात कही, जिसे फौरन ही मान लिया गया. पर्चियां बनाई गईं. हर किसी ने अपनीअपनी पर्ची निकाली. कौन कातिल था, कौन जासूस, किसी को कुछ पता नहीं था. पर्चियां निकलने के तुरंत बाद किसी ने मेन स्विच बंद कर दिया. कोठी एकदम अंधेरे में डूब गई.

इस के साथ ही मौत का खेल शुरू हो गया. मैं भी शराबनोशी में बराबर का शरीक था, लेकिन मेरा दिमाग पूरी तरह से मेरे बस में था. मेरे नाम जासूस की पर्ची निकली थी. यानी कि कत्ल की इस फरजी वारदात में मुझे जासूस का किरदार अदा करते हुए, कातिल की तलाश करनी थी. पहले तो मैं ने इस खेल में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली, लेकिन जब मैं ने महसूस किया कि इसे सिर्फ एक खेल समझने के बजाय हर शख्स संजीदा नजर रहा है तो मुझे भी इस में संजीदगी से दिलचस्पी लेनी पड़ी. मकान की ऊपरी मंजिल पर चारों तरफ एक खुली गैलरी बनी थी, जिस पर सुरक्षा की दृष्टि से कोई जंगला वगैरह नहीं लगा था

मकान के अंदर गहरे अंधेरे में रास्ता सुझाई नहीं दे रहा था, लेकिन कपड़ों की सरसराहट और पंजों के बल खास अंदाज से चलने की आवाजों से जाहिर हो रहा था कि हर कोई कातिल से बचने के लिए कहीं कहीं पनाह लेने की कोशिश में है. कातिल कोई गुप्त व्यक्ति था. कोई नहीं जानता था कि उस पर किस तरफ से हमला होगा. यह हमला मुझ पर भी हो सकता था. मैं चूंकि जासूस था, इसलिए यह खयाल मुझे कतई पसंद नहीं आया कि मैं ही कातिल का निशाना बनूं. निश्चित रूप से जासूस को दूसरों से ज्यादा समझदार और चालाक होना चाहिएमैं सुरक्षित अंदाज में चलता हुआ हाल से बाहर निकल आया. लाइट औफ होने से पहले मैं ने अपने दोस्त शिम्ट को भी उस तरफ जाते देखा था. कुछ देर अंधेरे में दुबके रहने के बाद मैं दोबारा मकान में दाखिल हो गया. मैं दबे कदमों से चलते हुए ऊपरी मंजिल पर पहुंच कर रुक गया.

सितारों की धुंधली सी रोशनी में बालकनी में एक साए को हिलते देख कर मैं ठिठक गयामैं उस की शक्ल तो नहीं देख सका, लेकिन यह अंदाजा लगाने में कोई परेशानी नहीं हुई कि वह कोई औरत थी. वह बड़ी सावधानी से पंजों के बल चलते हुए बालकनी के आखिरी सिरे पर जा रही थीकुछ देर बाद ही वह दूसरी तरफ घूम कर निगाहों से ओझल हो गई. जब मैं बालकनी के उस मोड़ पर पहुंचा तो मुझे गले में बंधा हुआ उस का स्कार्फ हवा में लहराता नजर आया. लेकिन फिर वह अचानक गायब हो गई. नीचे हाल में पहुंच कर मैं कुछ देर के लिए रुका. फिर जैसे ही बाहर निकला एक बार फिर उसी औरत का साया नजर आया. यकीनन वह वही औरत थी, जिसे मैं बालकनी पर देख चुका था. मैं ने उस के गले में बंधे हुए स्कार्फ से उसे पहचान लिया था

मैं उस की एक झलक से ज्यादा नहीं देख सका था, क्योंकि वह जल्दी से अंधेरे में गायब हो गई थी. मैं उस के पीछे लपका, लेकिन किसी चीज से ठोकर खा कर गिर गया. उस औरत के बारे में मेरे दिल में जिज्ञासा पैदा हो रही थी, लेकिन अब मैं उस का पीछा नहीं कर सकता था, क्योंकि मैं जिस चीज से टकरा कर गिरा था वह एक इंसानी जिस्म था. मैं घुटनों के बल झुक कर उस का मुआयना करने लगा. वह आदमी जमीन पर सीने के बल आड़ातिरछा पड़ा हुआ था. खेल के दौरान इस दृश्य का मतलब था कि कातिल अपना काम कर चुका था और अब जासूस का काम था कि वह कातिल को तलाश करेमैं ने एक विशेष इशारे में चीख कर खेल में शामिल लोगों को इस की सूचना दी. इस के साथ ही किसी ने लाइट जला दी और सब लोग इधरउधर से निकलनिकल कर वहां जमा होने लगे.

हर कोई एकदूसरे को पीछे धकेल कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा था, ताकि देख सके कि मरने वाला कौन है? जो लोग आगे थे, वे झुक कर जमीन पर पड़े हुए शख्स को अपने मजाक का निशाना बना रहे थेकोई उस की नाक दबा रहा था, कोई कान मरोड़ रहा था और कोई बाजू से पकड़ कर उसे उठाने की कोशिश कर रहा था. सब का मकसद एक ही था कि वह मरने की अदाकारी खत्म कर दे, ताकि जासूस अपना काम शुरू कर सके. लेकिन उस के जिस्म में जरा सी भी हरकत नहीं हुई. रोशनी होने के बाद लोगों ने उसे पहचान लिया, वह शिम्ट था. 2 आदमियों ने उसे बांहों से पकड़ कर उठाना चाहा, मगर वह अपनी कोशिश में कामयाब नहीं हो सके. शिम्ट के जिस्म में कोई हरकत नहीं हुईउसे उठाने की कोशिश की गई तो वह धड़ाम से दोबारा जमीन पर गिर पड़ा. कुछ लोग बुलंद आवाज में उस की अदाकारी की दाद दे रहे थे कि उस ने इस ड्रामे में हकीकत का रंग भर दिया है.

‘‘बस भई शिम्ट, बहुत देर हो गई. अब एक्टिंग खत्म करो.’’ एक और शख्स ने उसे कालर से पकड़ कर उठाते हुए कहा, लेकिन शिम्ट दोबारा नीचे गिर गया.

‘‘रुक जाओ, यह एक्टिंग नहीं हो सकती. मुझे मामला कुछ गंभीर नजर रहा है.’’ एक आदमी दूसरों से कहते हुए, उन्हें धकेल कर आगे बढ़ा. सब लोग अभी तक इसे मजाक ही समझ रहे थे. उस के शब्द सुन कर सभी गंभीर हो गए. माहौल पर एकदम खामोशी छा गई. हर कोई इस तरह एकदूसरे की तरफ देखने लगा, जैसे पूछ रहा हो कि क्या गड़बड़ है? साफ पता चल रहा था कि शिम्ट मर चुका है. मेहमानों में एक डाक्टर भी था. उस ने आगे बढ़ कर शिम्ट की जांच की. वह कई मिनट तक विभिन्न तरीकों से उस के जिस्म में जिंदगी कीलौतलाश करने की कोशिश करता रहा, फिर उस ने सीधा हो कर इस अंदाज में हम सब की तरफ देखा जैसे कुछ कहना चाहता हो, लेकिन कह नहीं पा रहा हो

चंद क्षण बाद आखिर उस ने मेरे खयाल की तसदीक कर दी. शिम्ट मर चुका था. डाक्टर ने बताया कि उस की मौत दम घुटने की वजह से हुई थी. ठीक उसी समय मैं भीड़ में से एक लड़की की चीख सुन कर चौंका. मैं ने जल्दी से उस की तरफ देखा. उस के गले में बंधे हुए स्कार्फ से मैं ने उसे पहचान लिया. यह वही लड़की थी, जिसे पहले मैं बालकनी और फिर ठोकर लग कर गिरने से पहले इसी जगह देख चुका था. चीख उस के हलक में ही घुट कर रह गई. चेहरे पर खौफ दहशत के भाव उभर आए. मैं ने गौर से उस की तरफ देखा. वह 21-22 साल की एक हसीन लड़की थीअखरोटी बालों वाली इस लड़की को मैं मौत का खेल शुरू होने से पहले पार्टी में देख चुका था. वह एक बेहतरीन प्यानो वादक थी. उस की मां अमेरिकन और बाप स्थानीय निवासी था

कभी उस के बाप की गिनती देश के अमीरतरीन लोगों में होती थी. लेकिन देश की सत्ता पर बैठे लोगों से राजनीतिक विरोध की वजह से उस पर इस का सीधा असर पड़ा. पहले उस का पौलिटिकल कैरियर प्रभावित हुआ. फिर कारोबार भी तबाह हो गया. उस की फैक्ट्रियों, मिलों में रहस्यमय तरीके से आग लगने की घटनाएं होने लगीं. इस सब का नतीजा यह निकला कि एक दिन उस की लाश घर में पंखे से लटकी पाई गई. कैलर उस की एकलौती बेटी थी. बाप के खुदकुशी करने के बाद आग लगने की वारदातें रुक गईं और कैलर उस की मां बचीखुजी पूंजी के सहारे जिंदगी के दिन गुजारने लगीं

अच्छी प्यानो वादक की हैसियत से कैलर को बड़ीबड़ी पार्टियों में आमंत्रित किया जाता था. जहां से उसे इतना पारिश्रमिक मिल जाता था कि घर का खर्च आसानी से चल जाए. इस वक्त वही खूबसूरत कैलर दहशत की हालत में कुछ इस तरह मुंह पर हाथ रखे सहमी खड़ी थी, जैसे अपनी चीखें रोकना चाहती हो.

‘‘लेडीज एंड जेंटलमेन.’’ डाक्टर की आवाज पर सभी उस की तरफ देखने लगे. डाक्टर कह रहा था, ‘‘हम यहां एक खेल, खेल रहे थे, जिस का नतीजा एक लाश की शक्ल में हमारे सामने है. हम में से कोई नहीं जानता कि इस खेल में किस का क्या किरदार था. इस स्थिति में किसी को इस घटना का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. यहां कोई किसी का दुश्मन नहीं है. मिस्टर शिम्ट की मौत किसी हादसे या इत्तेफाक का नतीजा भी हो सकती है

‘‘अब मेरी राय है कि इसे एक हादसा समझा जाए और अपनीअपनी पर्चियां नष्ट कर दी जाएं, ताकि इस खेल में किसी को किसी के किरदार का पता चल पाए. पर्चियां नष्ट करने का तरीका यह होगा कि सब लोग एकएक कर के कमरे में जाएं और अपनीअपनी पर्चियां आतिशदान में डाल दें. इस तरह किसी को किसी पर शुबहा करने का मौका नहीं मिल सकेगा.’’

दुनिया का कोई भी होशमंद इंसान कत्ल के इल्जाम में शामिल होना पसंद नहीं करता. इसलिए सब लोगों ने डाक्टर की तजवीज बिना हीलहुज्जत के कुबूल कर लीसभी ने अपनी पर्चियां इस तरह आतिशदान में जा डालीं, ताकि किसी को पता चल सके कि इस खेल में किस का क्या रोल था. मौत का खेल अपने अंजाम तक पहुंच चुका थाधीरेधीरे रात बीत गई और सुबह की लाली फैलने लगी. कुछ देर बाद पार्टी में आए मेहमान एकएक कर के रुखसत होने लगे. कोठी के लंबेचौड़े पार्किंग लौट पर खड़ी हुई कारें गायब हो गईं. कुछ मेहमान ऐसे भी थे, जिन के पास कारें नहीं थीं. उन्हें एक स्टेशन वैगन पर म्यूनिख से यहां तक लाया गया था. मेरा शुमार भी उन्हीं लोगों में था, जो वापसी के लिए वैगन का इंतजार कर रहे थे. पुलिस को इत्तला करने की किसी ने सोची तक नहीं, बस सब खुद को बचाना चाहते थे.

वैगन आई तो हम लोग उस में बैठ गए. पिछली सीट पर मेरे साथ प्यानो वादक कैलर के अतिरिक्त और कोई नहीं था. वह इस तरह जड़ हुई बैठी थी, जैसे उसे लकवा मार गया हो. स्टेशन वैगन शहर की तरफ जाने वाली सुनसान सड़क पर दौड़ रही थी. कैलर की वीरान निगाहें तेजी से पीछे भागते हुए दृश्यों पर जमी थींअचानक वह इस तरह बड़बड़ाई जैसे अपने आप से मुखातिब हो और उस का दिलोदिमाग काबू में हो, ‘‘मैंमैं अपने आप को माफ नहीं कर सकती. इस की जिम्मेदार मैं हूं.’’ वह कुछ पल खामोश रही फिर बड़बड़ाई, ‘‘ओह, यह सब मेरी वजह से हुआ है. उस की कातिल मैं हूं.’’

यह बात मेरे लिए आश्चर्यजनक थी. वह मेरे सामने अपने आप को मुलजिम ठहरा रही थी. मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह खुद को शिम्ट का कातिल क्यों समझ रही थी? और यह सब कुछ मुझे क्यों बता रही थी?

‘‘कत्ल? नहीं मिस कैलर, यह महज एक हादसा था और किसी को इस का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.’’ मैं ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘नहीं, यह हादसा नहीं कत्ल है. अगर हम यह खेल शुरू करते तो यह सब नहीं होता. हम इस खेल में शरीक थे, इसलिए किसी को भी इलजाम से बरी नहीं किया जा सकता.’’ वह पहले की तरह ही बड़बड़ाई.

‘‘मुमकिन है तुम्हारा ख्याल सही हो, लेकिन सब की पर्चियां नष्ट की जा चुकी हैं और अब यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कातिल कौन है?’’ मैं ने कहा. वह कुछ देर खामोशी से मेरी तरफ देखती रही, फिर हाथ मेरे सामने कर के मुट्ठी खोल दी. उस की हथेली पर कागज का एक पुरजा रखा हुआ था, जिस परकातिलशब्द लिखा हुआ था.

‘‘अब तुम समझ गए होगे कि मैं ऐसी बातें क्यों कर रही हूं.’’ वह दुखी स्वर में बोली. मैं वाकई हैरत में था कि वह ऐसी बातें क्यों कर रही थी. मैं कुछ देर उस के चेहरे की तरफ देखता रहा, फिर बोला, ‘‘यह सिर्फ एक हादसा था. तुम्हें इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए मिस कैलर.’’

‘‘ओह. तुम्हें शायद उस की मौत का कोई गम नहीं है. जबकि शिम्ट तुम्हारा दोस्त था.’’ उस के अंदाज में व्यंग्य साफ झलक रहा था.

‘‘मुझे उस की मौत का बहुत अफसोस है, लेकिन मौत पर किसी का बस तो नहीं है . यह संगीन इत्तेफाक मेरे साथ भी पेश सकता था.’’

‘‘संगीन इत्तेफाक?’’ उस ने सुलगती हुई निगाहों से मेरी तरफ देखा, ‘‘तुम्हें शायद अपने दोस्त से मोहब्बत नहीं, नफरत थी.’’

‘‘तुम गलत सोच रही हो. लेकिन मैं यह जरूर जानना चाहता हूं कि तुम अपने आप को उस की मौत का जिम्मेदारक्यों समझ रही हो?’’

‘‘मेरी पर्ची से तुम समझ चुके होगे कि इस खेल में मेरा किरदार क्या था. मुझे किसी एक को कत्ल करना था. मैं ऊपरी मंजिल पर किसी को तलाश करती रही, लेकिन जब कोई नहीं मिला तो मैं नीचे चली आई. वह दीवार से टेक लगाए खड़ा था. मैं ने मौका पा कर जब उस पर हमला किया तो उस ने कोई विरोध नहीं किया

‘‘यह देख मैं ने उस का गला दबोच लिया. उसे खत्म करने के बाद मैं वहां से हट गई, ताकि वह दूसरों को सूचना दे सके कि कातिल अपना रोल अदा कर चुका है. लेकिन उस की जगह तुम ने हम लोगों को कत्ल की सूचना दी. क्या ऐसी हालत में मैं यह समझूं कि उस की मौत मेरे हाथों हुई थी? मैं अपनेआप को उस की मौत की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकती.’’

कैलर खामोश हो कर सिसकियां भरने लगी. मैं ने परेशानी से दूसरे साथियों की तरफ देखा. वह हम पर ध्यान दिए बिना अपनी बातों में मग्न थे. वैगन शहर की सरहद में दाखिल हो चुकी थी. पूरब के क्षितिज पर फैलने वाली लाली बता रही थी कि सूरज निकलने ही वाला है. स्टेशन वैगन जैसे ही एक सड़क के मोड़ पर घूमी, कैलर ने ड्राइवर को गाड़ी रोक देने का निर्देश दिया. कैलर का निवास शहर के एक मध्यमवर्गीय इलाके में था. जबकि यह इलाका शहर की घटिया आबादी वाला था. उस के द्वारा वहां गाड़ी रुकवाने पर मुझे आश्चर्य हुआ. वहां रोशनी का इंतजाम था और सफाई पर तवज्जो दी गई थीदूर तक कच्चे और बेतरतीब मकान फैले हुए थे. आबादी के शुरू में चर्च था. बस्ती की यह अकेली पक्की इमारत थी. चर्च का कलश, अभीअभी निकले सूरज की किरणों में चमकने लगा था.

कैलर के उतरते ही मैं भी गाड़ी से नीचे उतर आया. उस ने मुड़ कर मेरी तरफ देखा और कुछ कहे बिना तेज कदमों से चर्च की तरफ चल दीमैं कुछ देर देखता रहा, फिर खुद भी उस के पीछे चल दिया. जब मैं गली में पहुंचा तो वह चर्च में दाखिल हो रही थीमैं चर्च के दरवाजे पर रुक कर उस की तरफ देखने लगा. वह इबादत वाले कमरे में पैर मोड़े बैठी अपने उस गुनाह की माफी मांग रही थी, जो उस की समझ के हिसाब से खेल ही खेल में उस के हाथों हो गया था. वह खुद को शिम्ट का कातिल समझ रही थी. उसे यकीन था कि उस ने शिम्ट का गला घोंट कर उसे मार डाला था. अगर वह दूसरों के सामने इस बात को प्रकट करती तो मुमकिन था कि वे उस की बात मान लेते, लेकिन कम से कम मैं इस बात को मानने को तैयार नहीं था

क्योंकि कैलर के गला दबोचने से पहले ही शिम्ट मर चुका था. यह कारनामा तो मैं ने अंजाम दिया था. खेल के शुरू में लाइट औफ होते ही मैं ने बाहर निकल कर उसे दबोच लिया था और हलक से आवाज निकालने का मौका दिए बिना जिंदगी से उस का संबंध खत्म कर दिया था. दरअसल, मैं लंबे अरसे से किसी ऐसे ही मौके की तलाश में था. उस की खूबसूरत बीवी, जो मुझ से बहुत ज्यादा प्यार करती थी और उस की बेशुमार दौलत, इन दोनों पर कब्जा करने के लिए मुझे इस से बेहतर मौका फिर कभी नहीं मिल सकता थाऔर अगर मैं इस सुनहरे मौके से फायदा उठाता तो मुझ से बड़ा बेवकूफ कोई होता.

 

‘कठपुतली’ रिव्यू : लड़कियों के सीरियल किलर की रहस्यमयी स्टोरी

‘कठपुतली’ रिव्यू : लड़कियों के सीरियल किलर की रहस्यमयी स्टोरी – भाग 6

अर्जन इति को भागने को बोलता है. अंधेरे में मुठभेड़ होती है, क्रिस्टोफर अर्जन का गला दबाने लगता है, तभी इति वो ट्यून चला देती है. क्रिस्टोफर का ध्यान उधर जाते ही अर्जन क्रिस्टोफर को मार गिराता है, तभी दिव्या भी वहां आ जाती है. अर्जन, दिव्या और इति लिपट जाते हैं और फिल्म का नीरस अंत हो जाता है.

‘कठपुतली’ (Cuttputlli) एक थ्रिलर (Thriller) के रूप में डिजाइन की गई है, लेकिन कहानी और स्क्रीनप्ले में इतने झोल हैं कि दर्शक पहले ही किलर के बारे में समझ जाते हैं. लेखक तुषार त्रिवेदी और असीम अरोड़ा ने अपनी सहूलियत के हिसाब से इस मूवी को लिखा है और यह बात भूल गए कि दर्शक भी सोचने समझने की शक्ति रखते हैं. घुप्प अंधरे में किया फिल्मांकन दर्शकों को निराश करता है.

‘कठपुतली’ में क्राइम है, थ्रिल का कोई नामोनिशान नहीं. इसे देखते हुए आप के मन में क्रिमिनल को जान लेने की जिज्ञासा नहीं जागती. बेहद सपाट तरीके से कहानी आगे बढ़ती है. लगातार मर्डर होते रहते हैं. पर फिल्म में किसी तरह की इंटेसिटी नहीं है.

क्या सिर्फ हर 15 से 20 मिनट में एक मर्डर दिखा देना ही क्राइम थ्रिलर होता है? क्लाइमैक्स में जब इस सेटअप से पेबैक की बारी आती है तो फिल्म हाथ खड़े कर देती है. कहने को फिल्म एक साइकोलौजिकल थ्रिलर बताई जाती है लेकिन इस से बढिय़ा साइकोलौजिकल थ्रिलर (Psychological Thriller) तो राधिका आप्टे की ‘अहिल्या’ है, जो यूट्यूब पर फ्री में उपलब्ध है.

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फिल्म में अक्षय कुमार का काम औसत रहा. रकुलप्रीत सिंह को जो भी दृश्य मिले वो कहानी को आगे नहीं ले जाते. रकुल और अक्षय की उम्र का फर्क साफ नजर आता है.

सरगुन मेहता और चंद्रचूड़ सिंह अपने किरदारों में मिसफिट नजर आए. पुलिस महकमे में केवल अर्जन सेठी को ही होशियार दिखाया गया है, दूसरे पुलिस वाले बुद्धू नजर आते हैं. अर्जन भी केस की कडिय़ों को इतना धीमा जोड़ता है कि दर्शक उस से 2 चाल आगे रहते हैं और जान जाते हैं कि अब क्या होने वाला है.

रकुलप्रीत सिंह

रकुलप्रीत सिंह का जन्म एक पंजाबी परिवार में 10 अक्तूबर, 1990 को नई दिल्ली में हुआ था. उस ने अपनी शुरुआती पढ़ाई आर्मी पब्लिक स्कूल धौलाकुआं, दिल्ली से की है. उस के बाद उस ने गणित में दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई की थी. वह कालेज के दिनों में नैशनल लेवल की गोल्फ प्लेयर भी रह चुकी है.

उस ने अपने करिअर की शुरुआत बतौर मौडल की थी, उस के बाद उस ने मिस फेमिना इंडिया में हिस्सा लिया था, जिस में वह यह खिताब तो हासिल नहीं कर सकी, मगर उसे इस प्रतियोगिता के दौरान पैंटालून फेमिना, मिस फ्रेश फेस, फेमिना मिस टैलेंटेड, फेमिना मिस ब्यूटीफुल, मिस ब्यूटीफुल स्माइल, मिस ब्यूटीफुल आईज के खिताबों से नवाजा गया था.

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इस प्रतियोगिता के बाद रकुल के लिए हिंदी सिनेमा के दरवाजे खुल गए. उस ने कई तमिल तेलुगु फिल्मों में काम किया. रकुल ने हिंदी सिनेमा में अपनी एंट्री दिव्या कुमार की फिल्म ‘यारियां’ से की थी.

वह इस फिल्म में हिमांशु कोहली के अपोजिट नजर आई थी. यह फिल्म उस साल की पहली सफल फिल्म बौक्स औफिस पर साबित हुई थी. सालों तक एकदूसरे को डेट करने के बाद जैकी भगनानी और रकुलप्रीत सिंह ने 21 फरवरी, 2024 को गोवा में फैमिली और क्लोज फ्रेंड्स की मौजूदगी में सात फेरे लिए थे.

रकुल ने अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘मेडे’ में, आयुष्मान खुराना के साथ ‘डाक्टर जी’ में, जौन अब्राहम के साथ ‘अटैक’, अजय देवगन के साथ ‘रनवे 34’, ‘थैंक गौड’ जैसी फिल्मों में काम किया है. उस की फिल्म ‘छतरी वाली’ भी काफी चर्चित रही, जिस में उस ने एक कंडोम बनाने वाली कंपनी में जौब कर सेफ सैक्स को ले कर अच्छा संदेश दिया है. ‘कठपुतली’ फिल्म में भी रकुल के लिए कुछ करने को ज्यादा मौका नहीं मिला है.

सरगुन मेहता

सरगुन मेहता का जन्म 6 सितंबर, 1988 को चंडीगढ़ में हुआ था. वह एक अभिनेत्री, मौडल और टेलीविजन होस्ट है, जिसे मुख्य रूप से पंजाबी सिनेमा में उस के अभिनय के लिए जाना जाता है. सरगुन को 3 पीटीसी पंजाबी फिल्म पुरस्कार और 2 पंजाबी फिल्मफेयर पुरस्कार मिल चुके हैं.

उस ने अपने कालेज में थिएटर परफारमेंस में अभिनय करना शुरू किया और बाद में टेलीविजन भूमिकाओं में कदम रखा. साल 2009 में जी टीवी के ’12/24 करोल बाग’ धारावाहिक के साथ स्क्रीन पर अपनी शुरुआत की.

कलर्स टीवी में सीरियल ड्रामा सीरीज ‘फुलवा’ ने उस के करिअर को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ दिया, जिस से उसे आलोचकों द्वारा खूब प्रशंसा मिली. उस ने डांस रियलिटी शो बुगीवुगी किड्स चैंपियनशिप को भी होस्ट किया.

मेहता ने अपनी फीचर फिल्म की शुरुआत साल 2015 की पंजाबी रोमांटिक कौमेडी ‘अंगरेजी’ से की, जो साल की दूसरी सब से अधिक कमाई करने वाली पंजाबी फिल्म के रूप में उभरी. फिल्म में अपने प्रदर्शन के लिए उसे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पीटीसी पंजाबी फिल्म पुरस्कार मिला.

बाद में सरगुन अन्य सफल पंजाबी फिल्मों में दिखाई दी, जिन में ‘लव पंजाब’ और ‘लाहौरिए’ जैसी फिल्में शामिल हैं. उस ने 4 विभिन्न पुरस्कार समारोहों में 4 वर्षों में 7 सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार जीते हैं.

चंद्रचूड़ सिंह

चंद्रचूड़ सिंह का जन्म 11 अक्तूबर, 1968 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था. चंद्रचूड़ सिंह की मां ओडिशा के बालनगिर के महाराजा की बेटी थीं और पापा बलदेव सिंह यूपी में अलीगढ़ की खैरा सीट से सांसद थे. चंद्रचूड़ सिंह को बचपन से ही ऐक्टिंग के साथ सिंगिंग करने का भी शौक था और इसी वजह से उस ने क्लासिकल की ट्रेनिंग भी ली थी.

यहां तक कि पढ़ाई पूरी करने के बाद स्कूल में म्यूजिक भी सिखाना शुरू कर दिया था और बच्चों को पढ़ाता भी था. इस के अलावा वह आईएएस की तैयारी भी कर रहा था, लेकिन इसी बीच फिल्मों के औफर मिलने की वजह से वह मुंबई आ गया.

चंद्रचूड़ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई दून स्कूल, देहरादून से की थी. हिंदी सिनेमा में आने से पहले वह दून स्कूल में बतौर संगीत अध्यापक के तौर पर कार्यरत था. चंद्रचूड़ सिंह की शादी अवंतिका कुमारी से हुई है और उस के एक बेटा भी है.

अभिनेता चंद्रचूड़ सिंह ने अपने करिअर की शुरुआत साल 1990 में फिल्म ‘आवारगी’ से की थी. हालांकि यह फिल्म बीच में ही अटक गई और उस की पहली रिलीज फिल्म साल 1996 में आई ‘तेरे मेरे सपने’ थी.

इस फिल्म के औडिशन का टेप देखने के बाद गुलजार साहब ने उसे फिल्म ‘माचिस’ के लिए साइन किया. यह फिल्म ब्लौकबस्टर रही और चंद्रचूड़ सिंह स्टार बन गया. इस के बाद उसे खासतौर पर ‘जोश’ फिल्म के लिए काफी सराहना मिली.

उसे फिल्म ‘माचिस’ फिल्मफेयर के बेस्ट मेल डेब्यू अवार्ड से भी नवाजा गया था. उस के बाद वह फिल्म ‘दाग द फायर’ और ‘जोश’ जैसी फिल्मों में नजर आया. उस ने कई हिंदी फिल्मों में काम किया, लेकिन कुछ एक हिट फिल्म के अलावा उस की कोई भी फिल्म बौक्स औफिस पर कुछ खास नहीं चल सकी.

‘कठपुतली’ रिव्यू : लड़कियों के सीरियल किलर की रहस्यमयी स्टोरी – भाग 5

स्कूल की छुट्टी होने पर हेलमेट पहने एक बाइक सवार आता है और आयशा उस के साथ बाइक पर बैठ कर चली जाती है. पुलिस टीम उस के पीछेपीछे चलती है. लड़की को स्कूल से लेने कौन आता है और उसे घर से दूर सड़क पर क्यों छोड़ जाता है, यह बात दर्शकों की समझ में नहीं आती है.

लड़की को बाइक सवार एक मोड़ पर छोड़ कर जाता है, तभी एक ब्लू रंग की वैन, जिस का नंबर एचपी02 6587 है, उस के करीब आती है और आयशा गाड़ी के पास जाती है. परमार और अर्जन दूर से उस पर नजर रखते हैं, तभी एक गाड़ी बीच में आ कर खड़ी हो जाती है.

अर्जन और परमार गाड़ी से उतर कर उस तरफ जाते हैं, मगर वह लड़की और वह गाड़ी गायब हो जाती है. थोडी दूर आगे बढऩे पर दोनों की नजर लड़की पर पड़ती है, जो आइसक्रीम के ठेले के पास खड़ी है. उस से बातचीत में पता चलता है कि वह लड़की आयशा की जुड़वां बहन समाया है. आयशा तो स्कूल से माल रोड पर स्थित नृत्य कला की क्लास में चली गई.

एसएचओ परमार फोर्स को माल रोड जाने के लिए कहती है और अर्जन के साथ नृत्य कला क्लास की तरफ रवाना होती हैं. क्लास के अंदर घुसने के पहले ही सिंड्रेला डौल का बौक्स अर्जन को बाहर ही मिल जाता है.

आयशा का जीपीएस ट्रेस करने पर उस की लोकेशन बोझ हाइवे की मिलती है. गुलेरिया वहां से वायरलेस सेट पर कहता है कि वह लेन नंबर 3 में मेरे सामने है. इतने में वह मैजिशियन (यूके के अभिनेता जोशुआ लेक्लेयर) गुलेरिया पर अटैक कर के वहां से निकल जाती है.

मैजिशियन ऐसी जगह आयशा को ले कर जाती है, जहां पूरी तरह से अंधेरा है. आयशा काफी डरी होती है. वह वहां से बाथरूम जाने की कह कर निकलती है और एसआई अर्जन को फोन कर के बताती है कि वह उस मैजिशियन के बाथरूम में है. अर्जन उसे बाथरूम की खिड़की से बाहर निकलने को कहता है. तभी जीपीएस लोकेशन ट्रेस करने वाला कांस्टेबल अली अर्जन को बताता है कि आप आयशा से 50 मीटर की दूरी पर हैं.

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मैजिशियन के रूप में मिला साइको किलर

अर्जन आयशा को फिर से काल कर के कहता है कि वह एक रूम में है, जिस में पियानो रखा है तो आयशा बताती है कि वह उसी रूम से भाग कर आई है, उस रूम में ही मैजिशियन है. तभी मैजिशियन को सामने देख आयशा जोर से चीखती है. उसी समय अली बताता है कि आयशा भी उसी रूम में है, जहां आप हैं.

मैजिशियन आयशा को पकडऩे की कोशिश करती है, तभी अर्जन उस पर गोली चला कर आयशा के पास पहुंच जाता है. इसी दौरान मैजिशियन भाग जाती है. अर्जन आयशा को सुरक्षित बाहर निकाल लाता है.

एसएचओ परमार पूरे शहर की नाकेबंदी करवाती है. दिव्या अपने घर में पुलिस सायरन की आवाज सुन कर अर्जन को फोन लगाती है, तभी अर्जन मैजिशियन के भागने की जानकारी देता है. अपना खयाल रखने की बोल दिव्या मोबाइल को चार्ज में लगाती है तभी घर की बिजली गुल हो जाती है.

दिव्या मोमबत्ती जला कर आती है तो सामने उसी मैजिशियन को देख कर चौंक जाती है. इधर पुलिस टीम मैजिशियन के घर की तलाशी लेती है तो वहां से 2 ब्रिटिश पासपोर्ट मिलने की जानकारी एसआई अर्जन को देती है. बताए गए नाम से अर्जन को याद आता है कि 12 साल पहले कोई ब्रिटिश मैजिशियन एग्नेस फर्नांडीज अपने बेटे क्रिस्टोफर के साथ मनाली आई थी. और अब तक टीनएज स्टूडेंट से बदला ले रही है.

इधर दिव्या उस से बचने के लिए भागती है और फोन उठाती है, तभी मैजिशियन दिव्या को चोट पहुंचा कर गिरा देती है. उसी वक्त अर्जन दिव्या के घर पहुंचता है तो दिव्या बताती है कि मैजिशियन इति को ले कर गई है. अर्जन अंधेरे में ही उस की तलाश में निकल पड़ता है.

सुनसान घने अंधेरे में उसे एक जगह मूवमेंट्स दिखता है और दोनों तरफ से फायरिंग होती है. अर्जन इति के पास पहुंच जाता है, जैसे ही वह इति को ले जाना चाहता है, मैजिशियन अटैक करती है. फिल्मांकन इतना घटिया किया गया है कि कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता.

दोनों की मुठभेड़ में मैजिशियन का विग गिर जाता है और सामने गंजे सिर के आदमी को देख कर अर्जन पहचान लेता है कि यह क्रिस्टोफर है. फिल्मांकन इतना घटिया किया गया है कि कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता.

क्रिस्टोफर क्यों बना साइको किलर

क्रिस्टोफर अर्जन को अपनी कहानी सुनाता है कि 12 साल पहले उस की मां उसे इंडिया लाई थी. लेकिन मेरी बीमारी की वजह से उस की शक्लसूरत का सभी मजाक उड़ाते थे. सोफिया नाम की एक लड़की उसे अच्छी लगती थी, उसे इंप्रेस करने के लिए उस ने मैजिक सीखा, परंतु जब उस ने गुलाब का फूल दे कर उसे प्रपोज किया तो सोफिया ने उसे भलाबुरा कह कर नकार दिया.

उस दिन वह बहुत रोया, बाद में सोफिया को उस की मां माफी मांगने के लिए लाई, परंतु उसे माफी से नहीं, मौत देने से संतोष मिला. मां ने सोफिया की मौत की जिम्मेदारी अपने सिर ले ली. 12 साल के बाद जब वह जेल से बाहर आई तो रास्ते में एक्सीडेंट में उस की मौत हो गई, परंतु क्रिस्टोफर ने उसे जिंदा रखा.

उस ने मां का गेटअप ले कर स्कूलों में कई मैजिक शो किए. उसे अपने चेहरे से इतनी नफरत हो गई थी कि हर लड़की का चेहरा बिगाडऩे और उसे जान से मारने में मजा आने लगा.

पूरी फिल्म सीरियल किलर के इर्दगिर्द घूमती है, मगर उस के कैरेक्टर को सही तरीके से नहीं फिल्माया गया है. अंत में जिस जल्दबाजी में उस के कैरेक्टर को दिखाया गया है, वह दर्शकों को निराश करता है.

किलर को ढूंढने का जो ट्रैक है, उस में न तनाव है और न ही थ्रिल. किलर ऐसा क्यों कर रहा है, इस राज से परदा उठाया जाता है तो कोई खास रोमांच पैदा नहीं होता. किलर को जितना होशियार फिल्म में बारबार संवादों के जरिए बताया गया है, उतना होशियार वह फिल्म में दिखाई नहीं देता.

कहानी बताने के बाद क्रिस्टोफर कहता है, ”तू भी मरेगा.’’ और इति की तरफ इशारा कर के कहता है, ”पहले इसे मरता देख.’’

‘कठपुतली’ रिव्यू : लड़कियों के सीरियल किलर की रहस्यमयी स्टोरी – भाग 4

अचानक गायब हो जाती है एक और लड़की

इस के बाद अर्जन अपना चेहरा पानी से धो कर आता है, फिर उसे कोई फोन आता है और वह हौस्पिटल से रवाना हो जाता है. वह पायल के उसी बर्थडे सेलिब्रेशन में पहुंचता है तो पता चलता है पायल वहां से गायब हो गई है और घर पर वही डौल वाला बौक्स मिलता है.

पुलिस टीम, फोरैंसिक टीम के साथ तलाशी ले कर पायल की खोज में निकल जाती है. इधर घर पर गमगीन माहौल में दिव्या अर्जन को पानी ले कर आती है तो उस के हाथ में मोबाइल देख कर अर्जन उस के जीजा से उस वीडियो बनाने वाले लड़के के बारे में पूछता है. रिशु नाम का लड़का अभी घर के बाहर ही था, उस के मोबाइल की वीडियो क्लिप में पायल घर के बाहर जाती दिखाई देती है.

इधर पुलिस पूरे शहर की नाकेबंदी कर पायल की तलाश करती है, मगर उस का कोई पता नहीं चलता. जन्मदिन पार्टी की भीड़ में पायल को सीरियल किलर कैसे ले जाता है और उस का मर्डर कर के घर के बाहर रखी कार की डिक्की में उस की लाश छोड़ जाता है, यह कहानी दर्शकों के गले नहीं उतरती.

दूसरे दिन अर्जन बाइक से अपने जीजा के घर लौटता है. वहां जीजा बताता है कि बड़ी मुश्किल से उस ने पायल की मम्मी को सुलाया है, उसे यकीन है कि अर्जन पायल को कुछ नहीं होने देगा. तभी नरिंदर सिंह के मोबाइल पर काल आता है तो वह एक तरफ चला जाता है. उसी समय अर्जन की नजर घर के सामने खड़ी कार पर जाती है, जिस के पिछले हिस्से से एक प्लास्टिक पन्नी बाहर निकली दिखती है.

अर्जन कार की डिक्की खोलता है और तुरंत बंद करता है. तभी नरिंदर सिंह पास आ कर पूछता है क्या है. अर्जन छिपाने की कोशिश करता है, मगर नरिंदर जैसे ही कार की डिक्की खोल कर देखता है तो उस में पौलीथिन में लिपटी हुई पायल की लाश मिलती है. पायल की मौत पर वह बुरी तरह रोने लगता है तो अर्जन भी उसे संभालते हुए रो पड़ता है.

तभी पायल की मम्मी वहां आ जाती है तो दोनों आंसू पोंछ कर सब कुछ छिपाते हुए पायल को जल्द खोजने की बात करते हैं. नरिंदर अर्जन को कार ले जाने को कहता है. अर्जन आंखों में आंसू लिए पायल को पोस्टमार्टम के लिए हौस्पिटल ले जाता है. अर्जन गुलेरिया को फोन लगा कर पायल की डैडबौडी मिलने और पोस्टमार्टम के लिए हौस्पिटल लाने की सूचना देता है.

अर्जन के घर पहुंचने पर नरिंदर बताता है कि पायल के बारे में उस की मम्मी को सब कुछ बता दिया है. वह बुरी तरह टूट चुकी है, इसलिए उसे ले कर भिंड जा रहा है. जैसे ही अर्जन कार में बैठी दीदी से मिलता है, वह अर्जन से कहती है कि वादा कर अब किसी की बेटी नहीं जाएगी.

एक ट्यून ले जाती है साइको किलर तक

फिल्म के अगले दृश्य में डीएसपी एसआई अर्जन सेठी को गल्र्स स्कूल में बिना परमिशन फायर करने के आरोप में जांच पूरी होने तक सस्पेंड कर देता है. अर्जन अपनी सर्विस रिवौल्वर जमा कर चला जाता है.

एक तालाब के किनारे दिव्या बख्शी और अर्जन खड़े हैं, जहां अर्जन दिव्या से कहता है दीदी समझती है कि मैं किलर को पकड़ लूंगा, मगर बिना ड्यूटी और इनवेस्टीगेशन पावर के कैसे संभव है. वो शिकार पर निकलेगा फिर किसी लड़की को शिकार बनाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएंगे.

यह बात थोड़ी दूर खेल रही इति के हियरिंग एड में रिकौर्ड हो जाती है, जिसे दिव्या डिलीट कर अर्जन को बताती है कि कोमल के पास भी यह हियरिंग एड थी और उस ने ही इसे सजेस्ट किया था. इस के बाद अर्जन  पोस्टमार्टम के समय कोमल के पास से मिली सामग्री की पड़ताल करता है तो उसे वो हियरिंग एड मिल जाता है. वह उसे औन करता है तो कोमल चीखचीख कर कह रही है ‘बचाओ मुझे मत मारो.’

इस के बाद उसे एक अलग ट्यून भी सुनाई देती है. इस ट्यून की पड़ताल में उसे म्यूजिक के जानकार से 2 बातें सुनने को मिलती हैं कि यह स्काटिश ट्यून है और जिसे आप ढूंढ रहे हैं वह ट्रेन पियानिस्ट है.

अर्जन उस ट्यून को पेन ड्राइव में ले कर रेलवे स्टेशन पर एनाउंसमेंट करवाने ले जाता है, जहां का कर्मचारी उसे स्टेशन मैनेजर की परमिशन का हवाला दे कर असमर्थता जताता है. तभी अर्जन को रोशनी नाम की रेडियो जौकी मिल जाती है, जो अपने रेडियो स्टेशन से उस ट्यून को बजा कर उस के कंपोजर को पहचानने के लिए कालर के लिए 10 हजार का गिफ्ट वाउचर देने का एनाउंसमेंट करती है.

कई कालर के जवाब आते हैं, लेकिन कोई सही जवाब नहीं मिलता. अर्जन जाने को होता है, तभी परवाणू से श्वेता नाम की कालर बताती है कि उस ने इस ट्यून को परवाणू के एपीएस स्कूल के एनुअल फंक्शन में सुना था.

अर्जन स्कूल के प्रिंसिपल से मिल कर फंक्शन की वीडियो रिकौर्डिंग देखता है तो वह ट्यून मैजिक शो के दौरान बजती है. उसी शो में स्टेज पर मैजिशियन के साथ समीक्षा भारती दिखाई देती है. स्कूल अथौरिटी उस मैजिशियन के बारे में कोई जानकारी नहीं दे पाते, तभी अर्जन दिव्या से उस के स्कूल में भी इस तरह के शो होने की तहकीकात करता है. दिव्या उसे बताती है कि उस के स्कूल में उस ओल्ड लेडी का  मैजिक शो हुआ था. वह गुलेरिया से अमृता के स्कूल के फंक्शन की वीडियो रिकौर्डिंग भी मंगाता है.

पूरी जांचपड़ताल के बाद अर्जन एसएचओ परमार को बताता है कि चारों लड़कियों के मर्डर में काफी समानता है. चारों के स्कूल में एक ओल्ड लेडी मैजिक शो कर के उन लड़कियों को स्टेज पर बुला कर इंप्रेस करती है और 2 दिन बाद किडनैपिंग कर के उन का मर्डर करती है.

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अब जा कर एसएचओ परमार को अर्जन की बातों पर भरोसा होता है और अर्जन से कहती है कि आज से हम तुम्हारे साथ हैं. वह डीएसपी से बात कर के किलर को खोजने के इस मिशन की जिम्मेदारी सौंपती है.

एसआई अर्जन सेठी के नेतृत्व में शहर के सभी स्कूलों की जांच की जाती है. एसएचओ परमार अर्जन को फोन कर के कहती है कि 14 जनवरी को सेंट पीटर्स स्कूल में एनुअल फंक्शन में मैजिक शो हुआ है, जिस में आयशा नाम की लड़की को वालेंटियर बनाया था तो अर्जन कहता है कि आज 16 जनवरी है. आप मेरे पहुंचने तक स्कूल की छुट्टी मत होने दीजिए.

परमार स्कूल जा कर प्रिंसिपल से मिलती है, तभी अर्जन भी पहुंच जाता है और आयशा की क्लास में सुरक्षा के 5 पौइंट बताता है. किसी तरह की परेशानी होने पर अपना मोबाइल नंबर बता कर वह आयशा के पास जा कर पूछता है कि आप ने नंबर नोट किया. उस के हां कहने पर वह नंबर डायल करने को कहता है और आयशा का नंबर सेव कर लेता है, फिर अपने अपने मोबाइल को छिपा कर रखने की हिदायत देता है.

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‘कठपुतली’ रिव्यू : लड़कियों के सीरियल किलर की रहस्यमयी स्टोरी – भाग 3

अगले दृश्य में स्कूल टीचर दिव्या से स्कूल की लड़की कोमल अपने पैरेंट्स की एनिवर्सरी के कारण आज का होमवर्क कल करने की परमीशन मांगती है तो दिव्या परमीशन देते हुए उस की तरफ से विश करने को कहती है. इस पर कोमल दिव्या मैम की आवाज की रिकौर्डिंग कर लेती है.

दिव्या कोमल से गैजेट्स के बारे में जानकारी हासिल करती है, फिर दोनों अपनेअपने आटो से घर चले जाते हैं. इधर कोमल जब रात 8 बजे तक घर नहीं लौटी तो मातापिता पुलिस थाने में कोमल की गुमशुदगी दर्ज कराने पहुंचते हैं.

सबइंसपेक्टर नरिंदर सिंह और अर्जन सेठी कोमल की पतासाजी के लिए दिव्या से पूछताछ करते हैं तो पता चलता है जिस आटोरिक्शा में वह गई थी, उस पर एक विशेष तरह का सिंबल बना हुआ था.

फिर वे शहर के सभी इलाकों में आटो के पीछे बने उस सिंबल की खोज में वे जाते हैं, तभी दिव्या को फोन आता है कि इति को कुछ लड़के परेशान कर रहे हैं. दिव्या अर्जन को बता कर चली जाती है.

दिव्या इति के स्कूल से उसे ले कर बाहर निकलती है तो कुछ लड़के जोर से हंस देते हैं तो इति घबरा जाती है. तभी अर्जन बाइक ले कर वहां पहुंचता है. उसे देख कर लड़के भाग जाते हैं. इति बाइक की सवारी करने का इशारा करती है तो अर्जन दिव्या और इति को बाइक से घर छोड़ता है.

अर्जन के इति के बारे में पूछने पर दिव्या बताती है कि इति उस की बहन की बेटी है, बीमारी की वजह से दीदी की मौत होने पर उस के पापा ने अपने पास रखने से इंकार कर दिया.

स्कूल टीचर आया शक के दायरे में

दिव्या के घर पर इति पेंटिंग्स बनाती है, जिसे देख कर दिव्या को याद आता है कि कोमल जिस आटो से गई थी, उस में वैसा ही सिंबल था और उस पर अंगरेजी में क्र्रष्टश्वक्र लिखा था. वह अर्जन को काल कर के बताना चाहती है, मगर उस का फोन बिजी आ रहा है.

इधर अर्जन हवलदार गुलेरिया (गुरप्रीत घुग्गी) के साथ बाइक से जा रहा है और मोबाइल पर किसी से टिंबर ट्रेल रोड पर लाश मिलने की सूचना देते हुए फोरैंसिक टीम भेजने को कहता है. तभी गुलेरिया की बाइक खराब होने पर वह आटोरिक्शा ले कर घटनास्थल पर पहुंचता है. तभी दिव्या काल कर के बताती है कि कोमल जिस आटो पर स्कूल से निकली थी, उस पर रेड कलर का स्टार बना था, जिस के नीचे अंगरेजी में क्र्रष्टश्वक्र लिखा था.

अर्जन सामने देखता है तो उसे समझ आता है कि वह इसी आटो से आया था. उसे आटो जाता दिखाई देता है तो पीछा कर के उसे पकड़ लेता है. जब अर्जन उसी आटोरिक्शा को रुकने के लिए बोलता है तो वह रुकता नहीं है. जब सामने से कोई वाहन रास्ता रोक लेता है तो आटो चालक रिक्शा छोड़ कर क्यों भागता है, इस सीन में भी कोई लौजिक समझ नहीं आता है.

आटोरिक्शा चालक को टौर्चर करने पर वह बताता है कि पुरुषोत्तम तोमर उस के आटो में आ कर बैठ जाता था और लड़कियों को अपने घर ले जाता था. जब पुलिस आटो चालक को ले कर पुरुषोत्तम तोमर के घर जाती है तो वह घर पर नहीं मिलता. लेकिन उस की फोटो देख कर नरिंदर सिंह बताता है कि यह पायल के स्कूल का मैथ्स टीचर है. उस के घर कोमल का बैग और बाहर वही डौल वाला बौक्स भी मिलता है. पुलिस समझती है कि कातिल यही स्कूल टीचर है.

अगले सीन में टीचर तोमर पायल को कम माक्र्स लाने पर टौर्चर कर के उस का यौनशोषण कर रहा होता है, तभी अर्जन और नरिंदर सिंह फोर्स ले कर पहुंचते हैं. पुलिस पायल और टीचर को बंद कमरे में देख कर तोमर की धुलाई करती है.

पुलिस की पिटाई से घायल तोमर हौस्पिटल में पुलिस को बताता है कि वह उस दिन कोमल के साथ आटो में गया था और बुक देने के बहाने कोमल को घर ले गया था. तोमर उसे पानी लाने के लिए अंदर जाता है और पानी में कोई दवा मिलाता है, जिसे कोमल देख लेती है. तभी वह बाहर से दरवाजा बंद कर भाग निकलती है. दूसरे दरवाजे से जब तक वह बाहर आता है, कोमल वहां से भाग जाती है.

तोमर की इस सच्चाई पर अर्जन और नरिंदर सिंह को यकीन नहीं होता और वे उसे हौस्पिटल में चांटा मार देते हैं. बाद में डाक्टर उन्हें रोक कर बाहर करता है. इधर डीएसपी को एसएचओ गुडिय़ा परमार केस सौल्व होने का श्रेय इंसपेक्टर मचान को देती है तो अर्जन को गुस्सा आता है. तभी उस का जीजा नरिंदर पायल के बर्थडे को सेलिब्रेट करने को कहता है.

अर्जन अपने जीजा नरिंदर को कार में रखा टेडी बियर दिखाता है और दोनों पायल के बर्थडे सेलिब्रेशन में जाते हैं, वहां अर्जन को दिव्या भी मिल जाती है. दिव्या अर्जन से उस की पसंद नापसंद पूछती है और फिर ताना मार कर कहती है कि तुम्हें तो बाबाजी के आश्रम में होना चाहिए. इतना कह कर वह वहां से जाने लगती है. तभी पायल के कहने पर अर्जन गाना गाता है तो दिव्या भी रुक जाती है.

आधी से अधिक फिल्म निकल जाने के बाद अर्जन और दिव्या के रोमांटिक सीन के साथ ‘ओ साथिया…’ गाना दर्शकों को सुकून देता है. पूरी फिल्म में केवल एक यही गाना है, दर्शक जिस के भरोसे हैं.

दिव्या और अर्जन की मुलाकातों में एकदो गाने और भी जुड़ जाते तो शायद फिल्म दर्शकों को बांधे रखती. फिल्म में रोमांस और फैमिली ड्रामा वाले जो दृश्य डाल दिए गए हैं. वह बिलकुल फिट नहीं लगते. निर्माता यदि ओटीटी के लिए फिल्म बना रहे हैं तो इस तरह के कामर्शियल फिल्मों के फार्मूलों से परहेज ही करना चाहिए था. गाना खत्म होने पर अर्जन को फोन आता है और वह जल्द आने की कहता हुआ वहां से चला जाता है.

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उधर हौस्पिटल में सेकेंड फ्लोर पर एडमिट पुरुषोत्तम तोमर ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल को अगवा कर लेता है. एसएचओ परमार उसे समझाने की कोशिश में आगे बढती है तो वह उस की पिस्टल छीन कर उस की कनपटी पर लगा कर पीछे की तरफ बढ़ता है, तभी अर्जन कुछ सोच कर नीचे की तरफ भागता है.

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तोमर पिस्टल की नोक पर परमार को ले कर लिफ्ट में घुस जाता है. लिफ्ट बंद होते ही पुलिस फोर्स नीचे की तरफ भागती है. नीचे लिफ्ट का दरवाजा खुलता है तो तोमर लिफ्ट में लुढ़क जाता है. बदहवास सी परमार पहले निकलती है. उस के बाद चेहरे पर खून के निशान लिए अर्जन बाहर आता है, जाहिर है अर्जन ने किसी तरह पहले से ही लिफ्ट में आ कर तोमर पर गोली चला कर परमार को बचा लिया.

लिफ्ट बंद होते ही गोली चलने की आवाज आती है. दर्शकों को समझ ही नहीं आता गोली किस ने चलाई.

‘कठपुतली’ रिव्यू : लड़कियों के सीरियल किलर की रहस्यमयी स्टोरी – भाग 2

पायल अपनी टीचर दिव्या बख्शी के सामने अपने मामा अर्जन का परिचय पापा के रूप में कराती है तो टीचर उसे गणित और अंगरेजी में कमजोर बताती है. इस पर अर्जन घर चल कर पायल को मारने की बात कहता है तो टीचर अर्जन को डांट देती है.

दरअसल, पायल ने टीचर को झूठ बोल कर यह बताया था कि उस की मां नहीं है. इसी दौरान पायल के मम्मीपापा भी वहां आ जाते हैं और पायल का झूठ सामने आ जाता है. यह दृश्य मौजूदा दौर की शिक्षा की पोल खोलता है, जिस में कम माक्र्स आने पर बच्चों को इतना भयभीत किया जाता है कि उन्हें झूठ बोलना पड़ता है.

स्कूल से बाहर आ कर पायल को उस की मम्मी मारने की कोशिश करती है तो अर्जन रोकता है और मैथ्स की कोचिंग लगाने का सुझाव देता है. मगर पायल की मम्मी उस का स्कूल चेंज करने की बात कह कर चली जाती है. इस के बाद जीजा नरिंदर अर्जन को एक फोटो की कौपी करा कर उसे शहर के इलाकों में पोस्टर लगाने को कहता है.

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अर्जन जब फोटो ले कर निकलता है तो एक चिल्ड्रन फेयर में उस की मुलाकात पायल की टीचर दिव्या बख्शी और उस की गूंगी और बहरी भांजी इति से होती है.

घर जा कर अर्जन डौल की फोटो देखता है तो उसे कुछ याद आता है. वह सीरियल किलर की पुरानी अखबार की कतरन निकालता है, जिस में स्कूल की लड़की को किडनैप कर के हत्या कर के इसी तरह की डौल मिली थी. वह इसी पुराने केस की फाइल निकलवाता है और एसएचओ परमार मैडम को कुछ क्लू देने की कोशिश करता है. मगर एसएचओ बुरी तरह डांट कर उस के आइडिया को नकार देती है.

इधर डेविड नाम के युवक को मर्डर के इल्जाम में अरेस्ट कर पूछताछ की जाती है तो वह बताता है कि वह लड़की को पसंद करता था. लड़की ने जब उसे भाव नहीं दिया तो उस ने जान से मारने की धमकी दी, परंतु मर्डर नहीं किया है.

इसी दौरान अर्जन सेठी एसएचओ परमार को सीरियल किलर के केस की हिस्ट्री दिखा कर कहता है कि इस केस का क्लू इस डौल से ही मिल सकता है, परंतु परमार मैडम उसे दुत्कारते हुए सिगरेट लेने के लिए भेज देती है. अर्जन बाहर गुमटी वाले से मैडम के लिए सिगरेट लेने आ जाता है, तभी पुलिस की गाडिय़ां सायरन बजाते हुए थाने से निकलती हैं.

गाड़ी से रवाना होते समय नरिंदर सिंह अर्जन को बताता है कि रेलवे ब्रिज के पास डैड बौडी मिली है. अर्जन भी वहीं पहुंचता है. आईकार्ड से डैडबौडी की पहचान स्कूल की लड़की अमृता राणा के रूप में होती है. पिछले 2 मर्डर की तरह इस हत्या में भी वही पैटर्न अपनाया गया है. अर्जन परवाणू में हुए समीक्षा भारती मर्डर केस की फाइल देखने परवाणू जाता है और समीक्षा के मातापिता के अलावा स्कूल जा कर कई लोगों से डौल के बारे में तहकीकात करता है.

साइको किलर तक पहुंचने की बनाई रणनीति

अगले सीन में पुलिस टीम पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टर बताती हैं कि पूरे जीवन में उन्होंने इस तरह के मर्डर का पहला केस देखा है, जिस से लगता है किलर का मकसद मर्डर नहीं दर्द देना है और यह किसी सायको का काम हो सकता है.

तभी डीएसपी वहां पहुंचते हैं और एसएचओ परमार को डांट लगाते हैं. इस के बाद वह पूछते हैं एसआई अर्जन सेठी कौन है. अर्जन उन्हें सैल्यूट करता है तो डीएसपी उस से परवाणू वाले केस के संबंध में हुई इंक्वायरी के बारे में पूछते हैं.

अर्जन पूरी फाइल डीएसपी को दिखाता है. डाक्टर उस फाइल को देख कर कहती है कि मर्डर का पैटर्न एक सा है. इस सीन और डायलौग को देख कर दर्शक यह अंदाजा नहीं लगा पाते कि केस के संबंध में बताने वाली लेडी लाश का पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टर है और आने वाला अफसर डीएसपी है.

एसआई अर्जन सेठी डीएसपी को कहता है कि सायको किलर का मकसद अपनी पब्लिसिटी करना और डर फैलाना है, उस को पावर से नहीं माइंड गेम से हराना है.

इसी दौरान अमृता के पैरेंट्स आते हैं और इमोशनली शाक की वजह से कहते हैं यह मेरी बेटी नहीं है. अर्जन डीएसपी से कहता है कि यदि किलर पब्लिसिटी चाहता है तो अभी हम मीडिया को इस बारे में कुछ न बताएं. किलर जहां भी है, वह एक गलती जरूर करेगा.

फिल्म आगे बढ़ती है, स्कूल में मैथ्स टीचर पुरुषोत्तम तोमर (सुजीत शंकर) पाइथागोरस प्रमेय पढ़ा रहा है. एक लड़की खड़ी हुई, जिसे टौर्चर कर के टीचर पूछता है कि समझ में आया? तभी इंसपेक्टर नरिंदर सिंह अपनी बेटी पायल को क्लास में ले कर आते हैं और टीचर को बताते हैं कि उन्होंने स्कूल चेंज कर आप के स्कूल में एडमिशन कराया है.

इधर एसआई अर्जन और नरिंदर सिंह पूरे शहर में खिलौनों की दुकान पर उस डौल की तलाश कर रहे हैं, जो किलर डैडबौडी के पास छोड़ता है.

जांच में यह तो पता चलता है कि लोकल वेबसाइट पर किसी ने बल्क में डौल का और्डर पोस्ट औफिस के जरिए किया था, परंतु एड्रेस की जगह पोस्ट बौक्स नंबर का यूज किया था.

अगले सीन में मैथ्स टीचर पुरुषोत्तम तोमर उसी लड़की को चाक फेंक कर मारता है. लड़की बुरी तरह डरी हुई है. टीचर उसे टौर्चर कर के कहता है कि मैथ्स में फेल हो कर मेरा और स्कूल का रिकौर्ड खराब करोगी. तभी स्कूल का चपरासी स्कूल में फंक्शन शुरू होने की सूचना देता है तो सभी बच्चे हाल में जाने लगते हैं, वह लड़की भी जाने को होती है तो टीचर उसे एक्स्ट्रा क्लास के बहाने रोक लेता है और पैरेंट्स को फोन करने की धमकी दे कर दरवाजा बंद कर के उस का यौन शोषण करता है.

फिल्म में मैथ्स टीचर तोमर नौवीं क्लास की लड़कियों को जिस तरह से शारीरिक रूप से प्रताडि़त करता है, वह बात हैरान करती है क्योंकि यह शहर का नामी स्कूल है. फिर कोई लड़की कभी इस के खिलाफ न तो आवाज उठाती है और न ही अपने पैरेंट्स से शिकायत करती है.

उधर स्कूल फंक्शन में मैजिक शो चल रहा और बच्चे उस का मजा ले रहे हैं. कुछ समय बाद टीचर और वह लड़की भी फंक्शन में आ कर बैठ जाते हैं. निर्माता निर्देशक चाहते तो फिल्म में मैजिक शो को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर के फिल्म को दर्शकों के लिए और भी इंटरेस्टिंग बना सकते थे, लेकिन इसे केवल लपेटा गया है.

‘कठपुतली’ रिव्यू : लड़कियों के सीरियल किलर की रहस्यमयी स्टोरी – भाग 1

कलाकार: अक्षय कुमार, रकुलप्रीत सिंह, सरगुन मेहता, चंद्रचूड़ सिंह, हृषिता भट्ट, गुरप्रीत घुग्गी, सुजीत शंकर,  जोशुआ लेक्लेयर आदि

निर्देशक: रंजीत एम. तिवारी

निर्माता: वाशु भगनानी, जैकी भगनानी,  दीपशिखा देशमुख

लेखक: राम कुमार और असीम अरोड़ा

पटकथा: तुषार त्रिवेदी

छायांकन: राजीव रवि

संपादन: चंदन अरोड़ा

ओटीटी: डिज्नी प्लस  हौटस्टार

फिल्म ‘कठपुतली’ (Cuttputlli) एक ऐसे सीरियल किलर (Serial Killer) की कहानी है जो स्कूल में मैजिक शो (Magic Show) कर के टीनएज लड़कियों को पहले इंप्रैस करता है और फिर उन का मर्डर करता है. सीरियल किलर खूबसूरत लड़कियों का मर्डर बेदर्दी के साथ करता है. लड़कियों के चेहरे पर वह वार करता है, उन के दांत तोड़ता है और आंखें निकाल लेता है. सीरियल किलर का रोल यूके के  कलाकार जोशुआ लेक्लेयर (Joshua LeClair) ने निभाया है.

निर्माता वाशु भगनानी (Vashu Bhagnani), जैकी भगनानी (Jackky Bhagnani), दीपशिखा देशमुख की डिज्नी प्लस हौटस्टार (Disney Plus Hotstar) पर आई फिल्म ‘कठपुतली’ विष्णु विशाल की तमिल फिल्म ‘रत्सासन’ (Ratsasan) का हिंदी रीमेक है, जिस में अक्षय कुमार (Akshay Kumar), रकुलप्रीत सिंह (Rakulpreet Singh), चंद्रचूड़ सिंह (Chandrachud Singh), सरगुन मेहता (Sargun Mehta) समेत कई स्टार्स हैं. इस का निर्देशन ‘बेल बौटम’ वाले डायरेक्टर रंजीत एम. तिवारी ने किया है.

निर्देशक रंजीत एम. तिवारी का निर्देशन औसत दरजे का है. ड्रामे को वह मनोरंजक नहीं बना पाए. फिल्म का पहला घंटा बेहद सुस्त लगता है. ऐसा लगता है कि कहानी को बिना मतलब की बातों से खींचा गया है.

तमिल फिल्म ‘रत्सासन’ साल 2018 में आई थी और यह परदे पर हिट साबित हुई थी. किसी भी फिल्म का रीमेक बनाने की सब से बड़ी चुनौती यह होती है कि वह हूबहू न लगे और दर्शकों को कुछ नया मिले. लेकिन निर्माता कुछ नया परोसने में नाकामयाब ही रहे. फिल्म तो रीमेक है ही, राइटर्स ने डायलौग भी यहांवहां से जुटाए हैं.

फिल्म में अक्षय कुमार ने एसआई अर्जन सेठी का रोल किया है. एक जगह वह स्कूल टीचर दिव्या बख्शी से कहता है, ‘पहले रब होते हैं, फिर होते हैं मांबाप. फिर आते हैं भाईबहन, फिर रिश्तेदार, फिर दोस्त, फिर पड़ोसी और उस के बाद आते हैं टीचर्स.’

इस के बाद दिव्या का रोल कर रही रकुलप्रीत सिंह कहती है, ‘क्या आप के घर में कुत्ते नहीं हैं? आप उन का नाम भी अपनी लिस्ट में रख लेते.’ यह डायलौग मशहूर कौमेडियन भुवन बाम के एक स्केच से उठाया हुआ है.

फिल्म ‘कठपुतली’ (Cuttputlli) को मसूरी और देहरादून में शूट किया गया था, लेकिन फिल्म में कहीं भी मसूरी और देहरादून के लोकेशन का जिक्र ही नहीं. इन सभी लोकेशन को हिमाचल प्रदेश के कसौली में होना बताया गया है. जिसे ले कर भी दर्शकों में नाराजगी है. क्योंकि मूवी के हीरो अक्षय कुमार को शूटिंग के दौरान ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ब्रांड एंबेसडर बनाया था, बावजूद इस के फिल्म में उत्तराखंड का नाम नहीं है.

अक्षय कुमार की फिल्म ‘रक्षाबंधन’ फ्लौप होने के बाद ‘कठपुतली’ के फिल्म मेकर्स को अंदेशा था कि सिनेमाघरों में यह फ्लौप न हो जाए, यही सोच कर स्टार नेटवर्क को इस के राइट्स 150 करोड़ में बेचे गए हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘कठपुतली’ का बजट 100 करोड़ रुपए है.

इंट्रो के बाद ‘कठपुतली’ फिल्म की कहानी शुरू होती है, हिमाचल प्रदेश के परवाणू शहर की सुबह से. मल्होत्रा साहब कुत्ते को जंजीर से बांधे टहलने निकले हैं,  पीछे से बोहरा साहब आवाज दे कर उन के साथ हो लेते हैं.

दोनों की बातचीत के दौरान उन का कुत्ता हाथ छोड़ कर एक तरफ दौड़ लगा देता है, जहां उस के पीछे दोनों पहुंचते हैं. वहां पर पौलीथिन में लिपटी एक डैडबौडी मिलती है. पुलिस फोन करने पर पुलिस आती है और जांच में पता चलता है कि लाश एक 15 साल की स्कूल में पढऩे वाली लड़की की है.

फिल्म के अगले दृश्य में अर्जन सेठी (अक्षय कुमार) एक अखबार की न्यूज की कतरन अपने कमरे की दीवार पर चिपका कर अपने रूममेट को बताता है कि वह सीरियल किलर पर फिल्म बनाना चाहता है और पिछले 7 सालों से वह सीरियल किलर पर रिसर्च कर रहा है. उस का इंटरेस्ट सीरियल किलर की साइक्लोजी पर ज्यादा रहता है. उस के पिता पुलिस में थे और उस के पास साइक्लोजी का डिप्लोमा भी है.

इसी दौरान एक बुजुर्ग अंकल उस के कमरे में आ कर पूछते हैं कि उन की बीवी तो यहां नहीं आई तो अर्जन कहता है कि उन को गुजरे हुए 4 साल हो गए हैं. फिर वह बुजुर्ग मुसकरा कर नाचते हुए चले जाते हैं.

रूममेट के पूछने पर अर्जन बताता है कि यह अल्जाइमर के मरीज हैं. फिल्म में डाले गए इस अंकल वाले सीन को दिखाने की क्या आवश्यकता थी, यह दर्शकों की समझ से परे है.

उस के बाद अर्जन अपने रूममेट के साथ अपनी स्क्रिप्ट ले कर चंडीगढ़ जाता है और कई प्रोड्यूसरों से मिल कर सीरियल किलर पर फिल्म बनाने को कहता है. लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगती है, क्योंकि प्रोड्यूसर उसे कुछ और ही लिखने को कहते हैं.

दोनों वापस आटोरिक्शा से लौटते हैं तो उस का दोस्त उसे समझाता है कि लंदन की पैदाइश कब तक आटो में धक्का खाएगा, कुछ पंजाब में रौक शौक क्यों नहीं लिख लेता. मगर अर्जन उस की बात मानने के बजाय उस से अगले दिन राखी के त्योहार पर कसौली जाने की बात कहता है.

सीन फिल्माने में दिखीं खामियां

अगले दिन अर्जन कसौली अपनी बहन सीमा (जिस का किरदार हृषिता भट्ट ने निभाया है) के घर जाता है, जहां उस का जीजा नरिंदर सिंह (चंद्रचूड़ सिंह) पुलिस इंसपेक्टर है. खाना खाते समय बहन उस से कुछ कामधंधा करने को कहती है, तभी जीजा उसे बताता है कि वह थोड़ी सी मेहनत कर पुलिस इंसपेक्टर बन सकता है. अर्जन जीजा की बात मान कर परीक्षा दे कर फिजिकल टेस्ट में भी पास हो कर सबइंसपेक्टर बन जाता है और उस की पोस्टिंग भी कसौली में हो जाती है.

अर्जन सेठी का सब इंसपेक्टर की परीक्षा पास करना और जल्द ही एसआई बनना इतना आसान बताया गया है कि यकीन ही नहीं होता. देश में बेरोजगारी चरम पर है और नौकरी के लिए करोड़ों बेरोजगार अपनी चप्पलें घिस रहे हैं, मगर अर्जन को उस के बाप की अनुकंपा नियुक्ति की तरह नौकरी आसानी से मिल जाती है, यह बात गले नहीं उतरती.

पहले दिन ड्यूटी पर जाते समय उस का जीजा नरिंदर उसे समझा देता है कि जो भी काम मिले, सिर हिला कर उसे करना है. थाने में सीनियर इंसपेक्टर रविचंद्र मचान (शाहिद लतीफ) उसे किसी मुलजिम को मारने को कहता है तो अर्जन मारने के बजाय उसे कहानी सुनाने लगता है. सीनियर इंसपेक्टर कहता है कि क्राइम इस के बस का नहीं है,  इसे स्टेशनरी सेक्शन में लगा देना चाहिए.

अगले सीन में एक लड़की अमृता घर से स्कूल जाने के लिए निकलती है और सड़क पर अपने डौगी को देख कर उसे पकड़ कर लाने को कहती है. तभी सड़क पर एक कार आ कर रुकती है. कार का अगला शीशा खुलता है और वह लड़की कार के पास जा कर मुसकराती है.

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इस के बाद के दृश्य में अमृता की मम्मी कुकर की सीटी की आवाज के साथ शेरू के भौकने पर अमृता के लिए आवाज लगाती है. वह बारबार आवाज देती है, मगर कोई जवाब नहीं मिलता तो वह घर से बाहर निकल कर आती है तो शेरू दिखाई देता है, जिस के गले में एक बौक्स बंधा हुआ है.

इस के बाद अमृता के मम्मीपापा उस की गुमशुदगी दर्ज कराने कसौली थाने पहुंचते हैं. एसएचओ गुडिय़ा परमार (सरगुन मेहता) को सारी डिटेल्स बता कर एक बौक्स दिखाते हैं जो शेरू ले कर आया था.

अमृता के सुबह स्कूल निकलने और तुरंत बाद उस के घर पर मम्मी द्वारा उसे खोजने और पुलिस थाने में गुमशुदगी दर्ज कराने को डायरेक्टर द्वारा बहुत जल्दबाजी में फिल्माया गया है. इस से पता ही नहीं चलता कि वह स्कूल से एक बजे आ जाती है और उस दिन शाम 6 बजे तक नहीं आई तो पुलिस में शिकायत की गई.

एसएचओ परमार जब बौक्स को खोलती है तो उस में बड़े बालों की एक सिंड्रेला डौल (कठपुतली) निकलती है, जिस के चेहरे पर खरोंच के निशान हैं. अर्जन बाहर से इस कठपुतली को बड़े गौर से देखता है. कत्ल के बाद बौक्स में जो सिंड्रेला डौल मिलती है, उसे कठपुतली समझ कर फिल्म का नाम रखा गया है, जो किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है.

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दरअसल, कठपुतली राजस्थान की एक लोककला है, जिस में लकड़ी, कपड़े से बनाई पुतलियों (गुडिय़ों) को धागे के सहारे अंगुलियों से नचाया जाता है.

घर में जीजा नरिंदर शराब लेते हुए अर्जन को समझाता है कि मिसिंग केस के चक्कर में न पड़ कर वह स्टेशनरी का काम ही देखता रहे. जीजा नरिंदर अंदर बर्फ लेने जाता है, तभी भांजी पायल (रेने तेजानी) अपने स्कूल के रिपोर्ट कार्ड पर उस के सिग्नेचर करवाती है  और कल स्कूल ड्रौप करने को कहती है. दूसरे दिन वह भांजी को बाइक से उस के स्कूल ले कर जाता है और क्लास टीचर से मिलता है.