Transgender Love Story : पूरी न हुई तमन्ना 

Transgender Love Story : तमन्ना भले ही हिजड़ा थी, लेकिन चाहने वाला दिल तो उस के अंदर भी था. उस की इसी चाहत का फायदा उठाया शेषपाल ने. उस के दिल में चाहत जगा कर उस का धन तो लूटा ही, धर्म भी लूट लिया. जब तमन्ना ने अपने गहने और पैसे वापस मांगे तो…

जब से ओमकार और ओमवती को पता चला था कि उन के यहां पैदा हुआ बच्चा न लड़का है न लड़की, तब से पतिपत्नी काफी परेशान रहते थे. उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के थाना ढोलना के गांव पचगाई के रहने वाले ठाकुर ओमकार सिंह की यह चौथी संतान थी. ओमकार सिंह ने पत्नी को समझाया कि जो भी होगा देखा जाएगा, बस इतनी सावधानी रखना कि बच्चे की असलियत का किसी को पता न चलने पाए.

ओमकार और ओमवती ने बच्चे का नाम पुष्पेंद्र रखा. उन्होंने पुष्पेंद्र की असलियत अपने हिसाब से बहुत छिपाई, पर जब वह बड़ा हुआ तो उस की चालढाल और हावभाव से ही लोगों को उस की असलियत का पता चल गया. फिर वही हुआ, जिस बात का उन्हें डर था. एक दिन कासगंज की भोली किन्नर की नजर उस पर पड़ी तो उस ने उस की असलियत जान ली और उसे अपने साथ ले आई.

उस समय पुष्पेंद्र की उम्र 12-13 साल थी. अब तक उस की मां की मौत हो चुकी थी और पिता संन्यासी बन चुके थे, बड़े भाइयों की शादियां हो चुकी थीं. भाई उसे बोझ समझते थे तो उन की पत्नियां भी उस का जरा भी खयाल नहीं रखती थीं. इस तरह उस की फिक्र करने वाला कोई नहीं था, इसलिए उस ने भोली के साथ चले जाना ही उचित समझा.

भोली के घर आ कर शुरूशुरू में तो पुष्पेंद्र को यह सब बड़ा अजीब लगा, लेकिन उन के साथ रहतेरहते उसे वहां अच्छा लगने लगा. वह भी उन के जैसे कपड़े पहनने लगा और उन के साथ बधाई गाने जाने लगा, क्योंकि अब तक उसे इस बात का अहसास हो गया था कि वह भी इन्हीं लोगों जैसा है.

पुष्पेंद्र जब हिजड़ों वाले सारे कामधाम सीख गया तो भोली उसे अपने गुरु पूजा के पास ले गई, जहां पूरे रीतिरिवाज के अनुसार पुष्पेंद्र को पूजा ने अपने परिवार में शामिल कर लिया. उस का नाम रखा गया तमन्ना. तमन्ना कुछ दिनों तक तो भोली के साथ रही, उस के बाद वह अपने गुरु पूजा के साथ गंदे नाले स्थित उस के निवास पर रहने लगी.

पुष्पेंद्र उर्फ तमन्ना ने अब तक अपनी जिंदगी के सच को सहज रूप से स्वीकार कर लिया था. पूजा के संरक्षण में वह मौज से रहने लगी. वह सुंदर थी और युवा भी, इसलिए वह जहां भी बधाई गाने जाती, उस की अच्छी कमाई होती. सब कुछ बढि़या चल रहा था. लेकिन जब वह जवान हुई तो उसे साथी की जरूरत महसूस होने लगी.

उस के दिन तो आराम से कट जाते थे, पर रातों को जब वह बिस्तर पर लेटती तो भविष्य को ले कर उसे नींद नहीं आती. वह यही सोचती रहती कि आखिर उस का भविष्य क्या होगा?

प्रकृति की गलती की वजह से वह समाज से अलग हो गई थी. समाज उसे अपना नहीं मानता था. आखिर वह अपने इस दिल का क्या करे, जो हजारों चाहतें पाले था. उस का दिल चाहता था कि कोई उसे अपनी मजबूत बाहों में ले कर उसे प्यार करे. लोगों की खुशियों के लिए तमन्ना नाचतीगाती थी, उन का दिल बहलाती थी, पर उस का अपना दिल बहलाने वाला कोई नहीं था. उस का तनमन पल भर के प्यार के लिए तरसता रहता था.

कासगंज से सटे गांव बहेडि़या के रहने वाले मोहनलाल यादव के बेटे मुकेश यादव को बेटा पैदा हुआ तो तमन्ना साथियों के साथ उस के यहां बधाई गाने गई. उस ने वहां ऐसा समां बांधा कि घर वालों ने खुश हो कर उसे भी खुश कर दिया. यही नहीं, यहीं उस के जीवन में बहार आ गई. दरअसल वह मुकेश के छोटे भाई शेषपाल को भा गई थी. उस ने तमन्ना से उस का मोबाइल नंबर मांगा तो उस ने सहज रूप से उसे अपना मोबाइल नंबर दे दिया.

लेकिन घर आ कर जब तमन्ना ने शेषपाल के बारे में सोचा तो उसे लगा कि उस ने ऐसे ही उस का नंबर नहीं लिया. क्योंकि नंबर मांगते समय शेषपाल की आंखों में जो चाहत नजर आई थी, वैसी उस ने किसी की आंखों में नहीं देखी थी. अगले दिन उस की यह सोच तब सच साबित हुई, जब उस के मोबाइल पर फोन कर के शेषपाल ने कहा, मैं शेषपाल बोल रहा हूं. कौन शेषपाल? तमन्ना ने पूछा. कल जब तुम मेरे यहां बधाई गाने आई थीं, तब मैं ने तुम्हारा नंबर लिया था न? मैं तुम से मिलना चाहता हूं.

तमन्ना का दिल धड़क उठा. किसी लड़के ने पहली बार उस से मिलने की इच्छा व्यक्त की थी. तमन्ना सोच में पड़ गई कि वह क्या जवाब दे. वह जवाब देने के बारे में सोच ही रही थी कि शेषपाल ने यह कह कर फोन काट दिया कि कल दोपहर को वह बाजार में उस का इंतजार करेगा. तमन्ना को उस रात नींद नहीं आई. वह इसी सोच में रात भर करवट बदलती रही कि वह उस से क्यों मिलना चाहता है? अगले दिन सजधज कर वह किसी से बिना कुछ कहे शेषपाल से मिलने बाजार पहुंच गई.

बीच बाजार में बात करना ठीक नहीं था, इसलिए शेषपाल उसे रिक्शे से शहर के बाहर ले आया. शहर से बाहर आ कर तमन्ना ने पूछा, तुम मुझे यहां क्यों ले आए हो? दिल की बात कहने के लिए. शेषपाल ने मन की बात सीधे कह दी. मैं क्या हूं, यह जानते हुए भी? तमन्ना ने कहा, मैं हिजड़ा हूं और हिजड़ों का न समाज में कोई स्थान है और न किसी के दिल में.

तमन्ना का हाथ थाम कर शेषपाल ने कहा, लेकिन मेरे दिल में है. जानती हो, कल रात से मैं सो नहीं पाया हूं. क्योंकि अब इस दिल पर मेरा वश नहीं रह गया है. मुझे अब किसी की परवाह नहीं है. न घर वालों की और न समाज की. मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं और तुम्हें कभी धोखा नहीं दूंगा. सिर्फ प्यार करने लगे हो या उस के आगे का भी सोचा है? तुम मुझ से ब्याह कर के अपनी पत्नी बना कर मुझे अपने घर में रख सकते हो? बिलकुल रखूंगा, कसम खाता हूं.  कह कर शेषपाल ने तमन्ना को बांहोें में भर लिया.

तमन्ना उस की बांहों में समा गई थी. उसे कब से एक ऐसे ही मर्द की तलाश थी. उसे लगा कि अब उस की तलाश पूरी हो गई है. शेषपाल टैंपो चलाता था. उस दिन के बाद जब भी उसे मौका मिलता, वह तमन्ना को अपने टैंपो में बैठा कर शहर से बाहर निकल जाता और एकांत में उस के साथ भविष्य के सपने सजाता.

पूजा को जब पता चला कि तमन्ना किसी लड़के के साथ घूमती है तो उस ने तमन्ना से इस बारे में पूछा. सच्चाई बताने के बजाय उस ने बात को टाल दिया. लेकिन जब एक दिन पूजा ने उसे शेषपाल के साथ देख लिया तो उस ने उसे समझाया कि मर्द हिजड़ों का सिर्फ इस्तेमाल करते हैं, उस से प्यार नहीं करते. इसलिए वह किसी मर्द के फरेब में न आए.

पूजा की इस बात पर तमन्ना ने उसे विश्वास दिलाया कि शेषपाल उन मर्दों में नहीं है. वह उसे बेहद प्यार करता है. वह उस से शादी करने को तैयार है. पूजा ने दुनिया देखी थी. उसे पता था कि अगर उस ने तमन्ना पर अंकुश लगाया तो वह बागी हो सकती है. जब ठोकर लगेगी तो उसे खुद ही पता चल जाएगा कि मर्द कितना बेवफा होता है.

प्यार गहराया तो तमन्ना ने कहा, शेषपाल, शादी के बाद हम कोई बच्चा गोद ले लेंगे. उस के बाद हमारा भरापूरा परिवार हो जाएगा. तमन्ना, हमें बच्चा गोद लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मैं तुम्हारा औपरेशन करवाऊंगा. उस के बाद तुम लड़की बन जाओगी और मेरे बच्चों को जन्म दोगी. शेषपाल ने कहा. क्या ऐसा भी हो सकता है? तमन्ना ने हैरानी से पूछा. हां, बिलकुल हो सकता है. 3-4 लाख रुपए खर्च होंगे. उस के बाद तुम सचमुच की औरत बन जाओगी. शेषपाल ने कहा.

इस तरह शेषपाल ने तमन्ना के दिल में उम्मीदों के चिराग जला दिए. इस के बाद वह उसे अपना सब कुछ मानने लगी और गृहस्थ जीवन के सपने देखने लगी. शेषपाल ने जब उस से कहा कि अब वह उस के बिना नहीं रह सकता तो तमन्ना ने कहा, पहले शादी करो, उस के बाद ही मैं तुम्हारे घर चलूंगी.

शेषपाल तमन्ना को अपने गांव ले गया और गांव के मंदिर में उस के साथ शादी कर ली. जब वह तमन्ना को ले कर घर पहुंचा तो उसे देख कर सब हैरान रह गए. शेषपाल का घर में दबदबा था, इसलिए कोई कुछ कह नहीं सका. लेकिन जब घर वालों को पता चला कि शेषपाल ने जिस से शादी की है, वह औरत नहीं, हिजड़ा है तो उस की मां उर्मिला और पिता मोहनलाल ने विरोध किया. मांबाप को चुप कराने के लिए शेषपाल ने कहा, यह बहुत पैसे वाली है. औपरेशन के बाद यह लड़की बन जाएगी. उस के बाद सब ठीक हो जाएगा.

उर्मिला और मोहनलाल दबंग बेटे से खुल कर कुछ नहीं कह सके. लेकिन मोहनलाल तमन्ना के पैसे ऐंठने में लग गया. उस ने तमन्ना से पैसे ले कर अपना पूरा घर पक्का करवा डाला. इस के बाद वह तमन्ना को घर के बाहर का रास्ता दिखाने पर विचार करने लगा, लेकिन शेषपाल इस के लिए तैयार नहीं था.

शेषपाल के मना करने पर मोहनलाल ने कहा, तुम्हारी वजह से परिवार की बदनामी हो रही है. अगर तमन्ना घर में रही तो दूसरे बच्चों की भी शादियां नहीं होंगी. हिजड़ा से तो वंश भी नहीं चलेगा. वंश तो औरत से ही चलेगा. प्यार का नशा उतरेगा, तब पछताओगे. लेकिन तब तक तुम किसी काबिल नहीं रहोगे. इसलिए इसे किसी भी तरह घर से निकालो.

दूसरी ओर तमन्ना शेषपाल पर औपरेशन के लिए दबाव डाल रही थी. लेकिन अभी तक डाक्टर ने पूरी तरह भरोसा नहीं दिया था कि औपरेशन के बाद तमन्ना पूरी तरह लड़की बन जाएगी. इस से शेषपाल को लगने लगा कि वह बेकार ही उम्मीदों के पीछे भाग रहा है. ऐसे में ही जब तमन्ना ने पूछा कि वह औपरेशन करवाने कब ले चल रहा है तो शेषपाल ने गुस्से में कहा, अब कभी नहीं ले जाऊंगा. इस का मतलब तुम भी अपने घर वालों के कहने में आ गए हो?  तमन्ना ने गुस्से में कहा.

इस पर नाराज हो कर शेषपाल ने तमन्ना की पिटाई कर दी. एक बार हाथ उठ गया तो उस के बाद मारपीट का सिलसिला सा चल निकला. शेषपाल ने तमन्ना के सारे गहने और पैसे हथिया लिए थे. उस ने पैसे और गहने वापस मांगे तो शेषपाल ने उसे घर से भगा दिया.

वापस आ कर तमन्ना ने सारी बात पूजा को बताई तो वह उसे कोतवाली ले गई. तमन्ना ने सीओ शबीह हैदर को सारी बात बताई तो उन्होंने 7 अक्तूबर, 2015 को शेषपाल और उस के भाइयों मुकेश तथा रजनेश के खिलाफ अपराध संख्या 280/2015 पर भादंवि की धारा 323, 504, 506 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

मुकदमा दर्ज होने की जानकारी शेषपाल को हुई तो वह परेशान हो उठा. उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस का यह डर तब और बढ़ गया, जब उस के पिता मोहनलाल ने कहा कि अब इन हिजड़ों से छुटकारा पाना आसान नहीं है. इसलिए इस सारे झंझट की जड़ को ही खत्म कर दो.

तमन्ना अपनी जिंदगी पटरी पर लाने की कोशिश कर रही कि एक दिन शेषपाल मोटरसाइकिल ले कर उस के घर पहुंचा और उसे मनाने की कोशिश करने लगा. लेकिन तमन्ना उस के साथ जाने को तैयार नहीं थी. शेषपाल ने प्यार की दुहाई देते हुए अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी तो वह मान गई और उस की मोटरसाइकिल से उस के साथ चल पड़ी. उस समय तमन्ना ने सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रेमी उसे मौत के मुंह में धकेलने ले जा रहा है.

शहर से बाहर आ कर शेषपाल ने जिस की मोटरसाइकिल थी, उसे दे दी. इस के बाद वह तमन्ना के साथ अपने टैंपो के पास पहुंचा, जिस में मुकेश, रजनेश, छोटू और सतीश बैठे थे. उन सब को देख कर तमन्ना को हैरानी हुई. वह कुछ कहती, उस के पहले ही शेषपाल ने कहा, तमन्ना अब हम नए सिरे से जिंदगी शुरू करना चाहते हैं. इसलिए घर जाने से पहले हम सब योगीपुर के माता के मंदिर में माथा टेकने चल रहे हैं.

बिना कुछ कहे तमन्ना टैंपो में बैठ गई. लेकिन जब टैंपो सोरों पार कर के गंगा नदी के किनारे की ओर बढ़ने लगा तो उसे कुछ संदेह हुआ. उस ने पूछा, हम इधर कहां जा रहे हैं? शेषपाल ने हंसते हुए कहा, हम तुम्हारी अंतिम यात्रा पर जा रहे हैं.

यह सुन कर तमन्ना कांप उठी. वह समझ गई कि उस की जान खतरे में है. लेकिन दूरदूर तक वहां कोई नहीं था, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकी. जैसे ही टैंपो गंगा किनारे रुका, वह कूद कर भागी. 3 लोगों से वह कैसे बच कर भाग सकती थी. उन्होंने उसे घेर लिया और उसी के दुपट्टे से उस की हत्या कर दी. इस के बाद पांचों ने लाश को जला कर अस्थियां गंगा में बहा दीं.

जब तमन्ना घर लौट कर नहीं आई तो पूजा ने उसे फोन किया. उस का फोन नहीं मिला तो पूजा को लगा कि जरूर कुछ गड़बड़ है. उन्होंने ओमकार को बुलवाया और उन्हें साथ ले कर 18 फरवरी, 2016 को वह एसपी सुनील कुमार से मिलने जा पहुंची.

उन के आदेश पर कासगंज कोतवाली में भादंवि की धारा 364 के तहत मोहनलाल, शेषपाल, मुकेश, छोटू, रजनेश तथा सतीश के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. 20 फरवरी को कोतवाली पुलिस ने मोहनलाल को गिरफ्तार कर लिया, जबकि बाकी नामजद अभियुक्त फरार हो गए थे. थाने में हुई पूछताछ में मोहनलाल ने बताया कि शेषपाल तमन्ना को ले तो आया था, लेकिन वह उसे कहां ले गया, उसे मालूम नहीं है. पुलिस ने उसी दिन उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

23 फरवरी को जांच अधिकारी अशोक कुमार ने शेषपाल और रजनेश को कासगंज बसस्टाफ से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों बस से दिल्ली जाने के लिए वहां पहुंचे थे. थाने में की गई पूछताछ में उन्होंने स्वीकार कर लिया कि तमन्ना की हत्या कर के लाश को उन्होंने जला दिया है और अस्थियां गंगा में बहा दी हैं.

शेषपाल का कहना था कि तमन्ना उस के गले पड़ गई थी. वह उस से छुटकारा पा कर किसी लड़की से शादी कर के अपना घर बसाना चाहता था. जबकि तमन्ना ने उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. उस की रिपोर्ट पर उसे ही नहीं, उस के घर वालों को भी जेल भेज दिया जाता, जिस से समाज में उस की बदनामी होती. उस के बाद उस का विवाह भी नहीं होता. इसी बदनामी से बचने के लिए उस ने तमन्ना को मार दिया था.

उस के इस अपराध में मुकेश, छोटू और सतीश भी शामिल थे. शेषपाल ने यह अपराध कर के खुद की तो जिंदगी बरबाद की ही, इस अपराध में शामिल अन्य लोगों की भी जिंदगी बरबाद कर दी. क्या उस ने तमन्ना के पैसों के लिए उस से प्यार किया था? अगर सच्चा प्यार किया होता तो शायद उसे कभी मारता न.

उस ने जो किया, उस की सजा तो उसे मिलेगी ही, आगे क्या होगा, यह समय बताएगा. पुलिस फरार आरोपियों की तलाश कर रही है. Transgender Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Extramarital Affair Murder : सुख की तलाश में सुनीता 

Extramarital Affair Murder : घरपरिवार से दुखी सुनीता ने सुख की खातिर विकास को अपना बनाया था. लेकिन विकास का अपना घरपरिवार था. वह सुनीता को कैसे अपनी बना सकता था. जब सुनीता उस के लिए गले की हड्डी बनी तो उस ने उसे दूर तो कर दिया, लेकिन…

प्रकाश आहिरे अपने परिवार के साथ महानगर मुंबई के उपनगर घाटकोपर (पश्चिम) में भीमनगर वी.वी.एस. पवार की चाल में रहता था. उस के परिवार में पत्नी सुनीता, 2 बेटियां और एक बेटा था. प्रकाश एक नंबर का शराबी था. अधिक शराब पीने की ही वजह से उसे टीबी हो गई थी. इसलिए परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी सुनीता पर आ गई थी.

सुनीता के लिए इस से भी ज्यादा दुख की बात यह थी कि बेटा भी बाप की राह पर चल पड़ा था. वह जो भी कमाता था, शराब पी जाता था. परिवार के भूखों मरने की नौबत आ गई तो सुनीता को कमाने की जरूरत महसूस हुई. उस ने जानपहचान वालों से कहीं नौकरी दिलाने की बात की तो किसी ने उसे दादर स्थित एक नल की टोंटी बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी दिला दी.

सुनीता को वहां वेतन तो कोई ज्यादा नहीं मिल रहा था, फिर भी इतना मिल जाता था कि पेट को रोटी और तन को कपड़ा मिल जाता था. जैसेतैसे दिन बीत रहे थे, लेकिन समय कब बदल जाए, कोई नहीं जानता. अचानक सुनीता एक बार फिर आर्थिक संकट में घिर गई.

वह जिस नल की टोंटी बनाने वाली फैक्ट्री में काम करती थी, वह एकाएक बंद हो गई थी. इस के बाद सुनीता ही नहीं, वहां काम करने वाले सभी लोग बेरोजगार हो गए थे. इस तरह सुनीता के सामने एक बार फिर वही समस्या खड़ी हो गई, जो पहले थी. वह नौकरी के लिए फिर भटकने लगी.

उसी बीच उस की मुलाकात प्रवीण धाड़ी से हुई. प्रवीण सुनीता के साथ दादर की नल की टोंटी बनाने वाली कंपनी में काम करता था. दोनों में पटती भी थी, इसलिए सुनीता ने जब उसे घर की स्थिति बता कर नौकरी के बारे में कहा तो उस ने उसे नौकरी दिलाने का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि दिला भी दी.

प्रवीण का एक दोस्त था विकास म्हात्रे, जिस की थाणे के कल्याण के पास दिवा में प्लास्टिक के तार बनाने की एक छोटी सी फैक्ट्री थी. उसे एक ईमानदार मेहनती महिला कर्मचारी की जरूरत थी. सुनीता को उस ने वेतन 4 हजार रुपए देने की ही बात कही थी. लेकिन मरता क्या न करता. सुनीता ने विकास म्हात्रे के यहां नौकरी कर ली थी.

वह सुबह लोकल ट्रेन से दिवा तक जाती तो रात 8 बजे तक घर लौटती थी. काम ज्यादा होने पर कभीकभी देर भी हो जाती थी. उसे विकास म्हात्रे के यहां काम करते कुछ ही महीने हुए थे कि एक दिन अचानक वह गायब हो गई. उस के इस तरह अचानक गायब होने से घर में मातम छा गया, क्योंकि उसी की वजह से घर चल रहा था.

सुनीता के भाई देवीदास और बेटी श्रद्धा ने सुनीता को काफी खोजा, जब वह कहीं नहीं मिली तो घाटकोपर जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. यह 10 जून, 2015 की बात थी. थाना घाटकोपर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर व्यंकटेश पाटील ने अधिकारियों तथा पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे कर मामले की जांच शुरू कर दी.

सुनीता विकास म्हात्रे की फैक्ट्री में नौकरी करती थी और सुबह वहीं जाने की बात कह कर घर से निकली थी, इसलिए पुलिस का ध्यान उसी पर जम गया था. उसे थाने बुला कर पूछताछ की गई तो उस ने खुद को सुनीता के मामले में एकदम अनभिज्ञ बताया. जब इस से कोई जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर ले कर उसे छोड़ दिया.

22 जून, 2015 को नवी मुंबई के निलजे गांव की लोढा हैवन इमारत के रहने वाले एलआईसी एजेंट संतोष व्हटकर किसी काम से नवी मुंबई महापे जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें पेशाब लगी. महापे रोड के टीवीएमटी नाले के पास मोटरसाइकिल रोक कर वह पेशाब करने नाले के किनारे गए तो वहां लगे मिट्टी के ढेर पर महिला की लाश देख कर उन के होश उड़ गए. वह पेशाब करना भूल गए और मोटरसाइकिल उठा कर सीधे महापे टोल नाका पहुंचे, जहां ड्यूटी पर तैनात पुलिस वालों को लाश के बारे में बताया.

पुलिस वालों ने इस की जानकारी थाना एमआईडीसी पुलिस को दी तो थानाप्रभारी इंसपेक्टर चंद्रसेन देशमुख अपने साथ इंसपेक्टर चंद्रकांत काटकर, अरुण पवार, प्रवीण शेडके, एसआई प्रदीप श्राफ, हैडकांस्टेबल आशीष महाडिक, दिगंबर आंजे, प्रकाश सालुके और दीपक कांबले को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

बरसात की वजह से लाश फूल गई थी. लाश पर जो नाइटी थी, वह जगहजगह से फटी हुई थी. उस के हाथ पीछे की तरफ मजबूत रस्सी से बंधे थे. साफ लग रहा था कि हत्या कर के लाश यहां सुनसान में ला कर फेंकी गई थी. लाश फेंकने वाले ने यह सोच कर लाश यहां फेंकी थी कि बरसात में लाश बह कर दूर निकल जाएगी.

चंद्रसेन देशमुख ने लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. जांच में सब से बड़ी समस्या शिनाख्त की थी, बिना शिनाख्त के जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी.

इस के लिए पुलिस ने नवी मुंबई, थाणे, रायगढ़, पालघर और कोंकण के सभी थानों से संपर्क किया. इस के अलावा लाश के फोटो दैनिक अखबारों में छपवाए गए. जब इस सब से भी कोई लाभ नहीं हुआ तो लाश के पैंफ्लेट छपवा कर पूरे शहर में चस्पा करवाए गए. लेकिन पुलिस को इस का भी कोई लाभ नहीं मिला. जब लाश की शिनाख्त ही नहीं हो सकी तो जांच कैसे आगे बढ़ती?

धीरेधीरे 4 महीने बीत गए. 27 सितंबर, 2015 को थाना घाटकोपर के सिपाही रावत और पानसरे किसी काम से तुर्दे गए तो वहां उन्होंने कई जगहों पर सुनीता की लाश के पैंफ्लेट लगे देखे. वे जिस गुमशुदा महिला की तलाश 4 महीने से कर रहे थे, उस की तो हत्या हो चुकी थी. उन्होंने यह बात तुरंत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बताई और थाना एमआईडीसी जा कर सुनीता की लाश मिलने के बारे में जानकारी जुटाई.

इस के बाद उन्होंने वह लाश सुनीता की ही थी, इस की पुष्टि के लिए उस के घर वालों को वहीं बुला लिया. घर वालों को जब थाने में रखे सुनीता के सामान और फोटो दिखाए गए तो सुनीता के भाई देवीदास और बेटी श्रद्धा ने बताया कि फोटो और सामान सुनीता के ही हैं.

चूंकि थाना घाटकोपर पुलिस की नजर में विकास म्हात्रे संदिग्ध था, इसलिए उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ मे इस बार भी वह पहले की ही तरह नाटक करता रहा. पुलिस उस के साथ सख्ती न कर सके, इस के लिए वह कभी बेहोश हो जाता तो कभी दीवार पर सिर पटकने लगता, साथ ही धमकी देता कि अगर उसे परेशान किया गया तो वह आत्महत्या कर लेगा.

विकास को रास्ते पर आते न देख चंद्रसेन देशमुख ने वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के उस से सच्चाई उगलवाने की एक नई युक्ति निकाली. संयोग से उन की वह युक्ति सफल भी हो गई. उसी युक्ति से विकास ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

18 जनवरी, 2016 को चंद्रसेन देशमुख ने अपने एक तेजतर्रार पुलिस अधिकारी को वकील के रूप में विकास के पास भेजा. उस अधिकारी ने विकास से कहा कि उसे उस की पत्नी ने उस के पास भेजा है. उसे पूरा भरोसा है कि वह उसे बचा लेगा. लेकिन वह उसे तभी बचा सकेगा, जब वह शुरू से ले कर अंत तक की पूरी कहानी उसे बता दे. आखिर विकास उस के झांसे में आ गया और सुनीता की हत्या का सारा सच उगल दिया. उस ने सुनीता की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

42 वर्षीय विकास म्हात्रे महानगर मुंबई के उपनगर अंधेरी (पूर्व) में करीम की चाल में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटियां थीं. उस की प्लास्टिक के तार बनाने की छोटी सी फैक्ट्री थी. शुरू में वह अपना यह काम घर से ही करता था. लेकिन कुछ दिनों बाद उस ने अपनी तार बनाने वाली मशीन मुंबई से दूर थाणे के दिवा के गांव दानीवाली की चाल में लगा ली थी.

काम अच्छा चलने लगा तो विकास को सहयोगी की जरूरत महसूस हुई. उस की नजर में पुरुष की अपेक्षा महिला सहयोगी ज्यादा अच्छी लगी. उसे लगता था कि औरतें कम पैसे में भी मेहनत और ईमानदारी से काम करती हैं. इस बारे में उस ने अपने दोस्त प्रवीण धाड़ी से बात की तो उस ने सुनीता की नौकरी उस के यहां लगवा दी. सुनीता को नौकरी की जरूरत थी ही, इसलिए कम वेतन पर भी उस ने विकास के यहां नौकरी कर ली.

इस तरह सुनीता विकास को एक सहयोगी के रूप में मिल गई. विकास सुनीता का काफी ध्यान रखता था. उस का ध्यान रखना सुनीता को अच्छा भी लगता था. परिणामस्वरूप वह विकास के करीब आती गई. उस के करीब आने के बाद सुनीता बीमार पति, शराबी बेटे और अविवाहित बेटी तथा घर के झंझटों से मुक्त रहने लगी.

सुनीता का अपनी ओर झुकाव देख कर विकास भी सुनीता के करीब आने की कोशिश करने लगा. एक दिन सुनीता के दिल की बात भांपने के लिए उस ने कहा, पता नहीं क्यों, आज मेरा काम में मन नहीं लग रहा है. सुनीता ने हंसते हुए कहा, लगता है, पत्नी की याद आ रही है. पत्नी को याद करने सेक्या फायदा? मेरी पत्नी बीमारी की वजह से इतनी कमजोर है कि वह मेरे किसी काम की नहीं है. विकास ने ठंडी सांस लेते हुए कहा. तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं. सुनीता विकास की आंखों में आंखें डाल कर बोली. विकास सुनीता से क्या चाहता है, इस बात से वह अंजान नहीं थी. इसीलिए उस ने उस से इस तरह कहा था.

इस मामले में तुम मेरी क्या मदद कर सकती हो? विकास ने पूछा. तुम मुझे 5 सौ रुपए दो. उस के बाद देखो मैं तुम्हारी कैसे मदद करती हूं. सुनीता ने हंस कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.

विकास ने जेब से 5 सौ रुपए का नोट निकाल कर सुनीता के हाथ पर रख दिया. उस ने नोट को मुट्ठी में दबाया और बाथरूम में चली गई. कुछ देर बाद जब वह बाहर आई तो उस के बदले रूप को देख कर विकास दंग रह गया.

सुनीता के बदन पर सिर्फ पेटीकोट ब्लाऊज था. विकास जो चाहता था, सुनीता उस के लिए तैयार थी. वहां उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था, इसलिए मर्यादा तोड़ कर उन दोनों ने एक नया रिश्ता कायम कर लिया. एक बार मर्यादा टूटी तो उन का जब मन करता, वे एक हो जाते. जब से सुनीता का विकास से संबंध बना था, वह खुश रहने लगी थी. अब उस का मन घर में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि उस के घर का जो माहौल था, उस में उस का दम घुटता था.

इसीलिए उस का घर से मोह भंग हो गया था. अब उसे विकास ज्यादा अच्छा लगने लगा था. शायद यही वजह थी कि वह उस के साथ विवाह कर के साथ रहने का सपना देखने लगी थी. जबकि विकास के मन में ऐसा कुछ नहीं था. उस का अपना घरपरिवार था. वह अपने परिवार के साथ खुश भी था.

सन 2015 के जून महीने के पहले सप्ताह में एक दिन सुनीता बिना किसी को कुछ बताए अपना सारा सामान ले कर विकास की फैक्ट्री में हमेशाहमेशा के लिए आ गई. उस ने विकास पर शादी के लिए जोर डाला तो दोनों में जम कर झगड़ा हुआ.

विकास ने उसे कंपनी से बाहर जाने के लिए कहा तो उस ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘अगर तुम ने मुझे यहां से निकाला तो मैं सीधे थाने जा कर तुम्हारे खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करवा दूंगी. उस के बाद तुम जेल तो जाओगे ही, तुम्हारी बदनामी भी खूब होगी.’’

सुनीता की इस धमकी से विकास बुरी तरह डर गया. उस ने सोचा कि अगर सुनीता ने सचमुच ऐसा कर दिया तो वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा. अब वह उस से छुटकारा पाने के उपाय सोचने लगा. काफी सोचनेविचारने के बाद उसे लगा कि अब सुनीता से छुटकारा मार कर ही मिल सकता है. बस उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.

सुनीता किसी भी तरह अपने घर जाने को तैयार नहीं हुई तो विकास और उस में कहासुनी होने लगी. इसी कहासुनी के बीच विकास को गुस्सा आ गया तो उस ने सुनीता को धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया और प्लास्टिक की थैलियों से उस का मुंह और नाक दबा दिया. जब उस की मौत हो गई तो तसल्ली के लिए उस ने लाश को 2-3 बार उठा कर पटका.

जब उसे पूरा विश्वास हो गया कि सुनीता मर चुकी है तो उस ने उस के दोनों हाथों को पीछे कर के रस्सी से बांध दिए और उसे उठा कर ड्रम में डाल दिया. इस के बाद उसे ऊपर से सीमेंट डाल कर पैक कर दिया और उसे उठा कर बाथरूम में रख दिया. यह 4 जून, 2015 की बात थी.

सुनीता को ठिकाने लगा कर विकास परिवार के साथ शिर्डी चला गया. दूसरी ओर सुनीता घर लौट कर नहीं आई तो उस के घर वाले उस की तलाश करने लगे. 10 जून, 2015 को विकास घूमफिर कर लौटा तो उसे सुनीता की लाश की चिंता हुई. लाश को ठिकाने लगाना बहुत जरूरी था. ड्रम को उठा कर वह दानीवाली नाका ले आया और वहां से टैंपो द्वारा महापे रोड ले गया. उस समय तक रात के 11 बज चुके थे. उस समय तक सड़क सूनी हो चुकी थी.

उस ने टीवीएमटी नाले के पास टैंपो रुकवा कर ड्रम को उतारा और उसे तोड़ कर लाश को बाहर निकाला. इस के बाद लाश को नाले में ले जा कर फेंक दिया और अपने घर आ कर आराम से सो गया. लेकिन वह सुबह उठा तो पुलिस उस के सामने खड़ी थी.

सुनीता की हत्या की पूरी कहानी सुना कर विकास ने वकील के कागज पर दस्तखत कर दिए. अगले दिन जब उसे पता चला कि वह उस की पत्नी द्वारा भेजा गया कोई वकील नहीं, पुलिस अधिकारी था तो उस ने अपना सिर पीट लिया. लेकिन अब क्या हो सकता था. उस ने तो अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.  Extramarital Affair Murder

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधा

Love Crime Story : बेवफाई का ऐसा सिला

Love Crime Story . शिवप्रसाद सचमुच अर्शली को बहुत प्यार करता था. यही वजह थी कि उस ने उस के लिए अपने घर वालों तक से बगावत कर दी थी. यही नहीं, अपनी सारी कमाई भी उस पर लुटा दी थी. इस के बावजूद जब अर्शली ने उस से किनारा कर लिया तो प्रेमिका की यह बेवफाई उस से बरदाश्त नहीं हुई और…

सपना 22 वर्षीया अर्शली लौरेंस उर्फ जैनी उर्फ छोटी को बेटी की तरह मानती थी. जब वह उसे 2 दिनों सेदिखाई नहीं दी तो उसे चिंता हुई. अर्शली की मां सोफिया भी नजर नहीं आ रही थी. उन के कमरे में बाहर से ताला बंद था. उन की स्कूटी भी गैलरी में नहीं थी. उन का फोन भी बंद था.

सपना की समझ में नहीं आ रहा था कि मांबेटी बिना बताए कहां चली गईं. जबकि इस से पहले वे जब भी कहीं बाहर जाती थीं, बता कर जाती थीं. यही नहीं, घर की चाबी दे कर सारी जिम्मेदारी भी उसे ही सौंप जाती थीं.

सपना किन्नर थी और अपनी साथी बौबी के साथ सोफिया के मकान की पहली मंजिल पर किराए पर रहती थी. वह सुबह निकलती थी तो शाम को ही घर आती थी. 3 अप्रैल की दोपहर सपना घर से निकलने लगी तो सोफिया के कमरे से उसे दुर्गंध सी आती महसूस हुई. उस ने खिड़की के पास खड़ी हो कर लंबी सांस ली तो उसे लगा कमरे से मांस के सड़ने की दुर्गंध आ रही है.

उस की समझ में नहीं आया कि सोफिया के कमरे से इस तरह की दुर्गंध क्यों आ रही है? चूंकि मांबेटी 3 दिनों से गायब थीं, इसलिए सपना को किसी अनहोनी की आशंका हुई. इस के बाद उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया.

चूंकि यह इलाका थानाकोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने इस की सूचना थानाकोतवाली शाहपुर पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही कोतवाली  प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला एसआई विमलेंद्र कुमार, देवेंद्र कुमार सिंह, सिपाही मनीष सिंह, राजीव शुक्ला, रामविनय, रामनिहाल, संतोष कुमार और शिवानंद उपाध्याय को साथ ले कर बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा स्थित सोफिया लौरेंस के घर पहुंच गए.

चूंकि मोहल्ले वालों को अभी तक कुछ पता नहीं था, इसलिए एकाएक इतने पुलिस वालों को देख कर सब हैरान रह गए. सभी अपनेअपने घरों से निकल कर बाहर आ गए. सपना घर के बाहर ही खड़ी थी. पुलिस वालों ने उस से बात की तो उस ने जो आशंका व्यक्त की, सुन कर पुलिस वालों को भी किसी अनहोनी की आशंका हुई.

दरवाजे पर ताला लगा था. आनंद प्रकाश शुक्ला ने दरवाजा खोलने से पहले घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो थोड़ी ही देर में सीओ अभय कुमार मिश्र, एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, एसएसपी अनंतदेव के अलावा कई थानों के थानाप्रभारी भी पुलिस बल के साथ वहां आ गए. इन्हीं के साथ फोरैंसिक टीम भी आ गई थी.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में सोफिया के कमरे के दरवाजे पर लगे ताले को तोड़ कर दरवाजा खोला गया तो तेज दुर्गंध बाहर निकली. दरवाजे के पास खड़े पुलिस अधिकारी पीछे हट गए. थोड़ी देर में दुर्गंध थोड़ी कम हुई तो नाक पर रूमाल रख कर पुलिस अधिकारी कमरे में घुसे.

सामने ही बैड पर 2 महिलाओं की लाशें कंबल से ढकी पड़ी थीं. दोनों ही लाशें बुरी तरह से सड़ चुकी थीं. कमरे का सामान यथावत था. बिस्तर पर खून बहा था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों महिलाओं की हत्या की गई थी.

लाशें बुरी तरह सड़ चुकी थीं, इसलिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि हत्याएं कैसे की गई थीं. पूछने पर पता चला कि मरने वाली दोनों महिलाएं मांबेटी थीं. उस समय उन का वहां अपना कोई नहीं था. इसलिए पुलिस ने किराएदार सपना की उपस्थिति में घर की तलाशी ली.

घर के आंगन के एक कोने में शराब और बीयर की तमाम बोतलें पड़ी थीं. पूछने पर पता चला कि मांबेटी दोनों शराब और बीयर पीती थीं. चूंकि वे क्रिश्चियन थीं, इसलिए पुलिस के लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. पुलिस ने कमरे में मांबेटी के मोबाइल फोन तलाशे तो वे गायब मिले. इस के अलावा सपना ने बताया था कि उन की स्कूटी थी, जो गैलरी में खड़ी रहती थी, वह भी नहीं थी. इस से पुलिस को लगा कि हत्यारा दोनों के मोबाइल फोन के अलावा स्कूटी भी ले गया था.

फोरैंसिक टीम ने अपना काम निबटा लिया तो पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया. उस समय वहां मृतका सोफिया और उस की बेटी अर्शली के बारे में बताने वाला उन का कोई नहीं था.

सोफिया की सास मरियम 3 महीने पहले बड़ी पोती एलिना की हत्या हो जाने के बाद अपनी बेटी सन्नो के पास जौनपुर चली गई थीं. इसलिए इन दोनों हत्याओं की रिपोर्ट किराएदार किन्नर सपना की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई.

मामला गंभीर था, इसलिए इस के खुलासे के लिए एसएसपी अनंतदेव ने अपने औफिस में एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, सीओ अभय कुमार मिश्र, कोतवाली शाहपुर के प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला और क्राइम ब्रांच की एक मीटिंग बुलाई.

मीटिंग में उन्होंने हेमराज मीणा के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस ने सीओ अभय कुमार मिश्र की देखरेख में मामले की जांच शुरू की. जांच के लिए पुलिस टीम घटनास्थल पर दोबारा पहुंची तो पता चला कि मकान के भूतल पर सोफिया लौरेंस अपनी बेटी अर्शली के साथ रह रही थीं, जबकि पहली मंजिल के 2 कमरों में एक में किन्नर सपना और बौबी रहती थीं तो दूसरे कमरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी.

इन किराएदारों को सोफिया की सास मरियम लौरेंस ने रखा था. जबकि इस समय मरियम जौनपुर में अपनी बेटी सन्नो लौरेंस के पास थीं. यह भी पता चला कि मरियम लौरेंस की बड़ी पोती यानी मृतका सोफिया की बड़ी बेटी एलिना लौरेंस की 7-8 दिसंबर, 2015 की रात संदिग्ध परिस्थितियों में जहरीला पदार्थ खाने से मौत हो गई थी. वह मोहल्ले के ही अभिषेक मधई से 7 सालों से प्रेम करती आ रही थी.

अभिषेक भी उसे प्यार करता था. मरने से 3 महीने पहले वह अभिषेक के साथ लिवइन रिलेशन में रहने उस के घर चली गई थी. यह बात अभिषेक के पिता मोटीन मधई और मां अर्चना लौरेन को पसंद नहीं थी. इसलिए वे बेटे अभिषेक और एलिना को ताने मारते रहते थे.

7 दिसंबर, 2015 की रात अभिषेक और एलिना रात 9 बजे के करीब घर लौटे तो उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे शराब पिए हुए हैं. रात के 3 बजे के करीब अभिषेक के कमरे में किसी चीज के गिरने की तेज आवाज आई तो अर्चना की नींद टूट गई. भाग कर वह अभिषेक के कमरे में पहुंची तो वह बैड पर औंधे मुंह पड़ा उल्टियां कर रहा था, जबकि एलिना फर्श पर निढाल पड़ी थी. पूछने पर अभिषेक ने बताया कि दोनों ने जहरीला पदार्थ खा लिया है.

बेटे की बात सुन कर अर्चना बुरी तरह डर गईं. उस ने पति को जगा कर सारी बात बताई. पतिपत्नी ने तड़पती एलिना को वहीं छोड़ दिया और बेटे को ले कर अस्पताल चले गए. डाक्टरों ने अभिषेक को तो बचा लिया, लेकिन घर में पड़ी एलिना ने दम तोड़ दिया.

एलिना की मौत की खबर मरियम और सोफिया को मिली तो वे सन्न रह गईं. पोती की आकस्मिक मौत से मरियम लौरेंस को गहरा सदमा लगा. सोफिया और मरियम ने कोतवाली शाहपुर में मुकदमा दर्ज कराया कि अभिषेक के घर वालों ने एलिना की हत्या की है. मुकदमा दर्ज होने के बाद कोतवाली पुलिस ने एलिना की हत्या के जुर्म में अभिषेक को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

इस के बाद पुलिस यह पता लगाने लगी कि सोफिया के घर किनकिन लोगों का आनाजाना था. इसी बात की जानकारी जुटाने में पुलिस को पता चला कि मोहल्ले के रहने वाले मिंटू के दोस्त शिवप्रसाद का उस के घर काफी आनाजाना था. लोगों का यह भी कहना था कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे.

पुलिस ने मिंटू से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे. हत्याएं उस ने की हैं या किसी और ने, इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकता. पुलिस मिंटू को साथ ले कर आम बाजार स्थित शिवप्रसाद के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया.

पुलिस वालों को देख कर जहां शिवप्रसाद के घर वाले हैरान थे, वहीं उस ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास था कि आप लोग जल्दी ही मेरे घर आने वाले हैं. इसीलिए मैं घर छोड़ कर कहीं गया नहीं. क्योंकि अगर मैं घर छोड़ कर कहीं भाग जाता तो आप लोग मेरे घर वालों को परेशान करते. आप लोगों को बता दूं कि मैं ने ही सोफिया और अर्शली की हत्या की है.’’

शिवप्रसाद की बातें हैरान करने वाली थीं. पुलिस को लगा, कहीं यह पागल तो नहीं है. इसलिए उन्हें उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. पुलिस को उस की बातों पर यकीन तब हुआ, जब उस ने अर्शली की स्कूटी, सोफिया तथा अर्शली के मोबाइल फोन और लोहे की वह रौड तथा धारधार रेडियम वाला चाकू बरामद करा दिया, जिस से अर्शली और सोफिया की हत्या की गई थी.

आम लोगों के लिए यह हैरान करने वाली ही बात थी. शायद ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई कातिल घर में बैठ कर पुलिस के आने का इंतजार कर रहा था. आनंद प्रकाश शुक्ल शिवप्रसाद और बरामद सामान ले कर कोतवाली आ गए और हत्यारे की गिरफ्तारी की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी.

अधिकारियों की उपस्थिति में शिवप्रसाद ने अर्शली और सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह प्रेम में धोखा खाने के बाद बदला लेने की कहानी थी.

अगले दिन 4 अप्रैल को एसएसपी अनंतदेव ने पुलिस लाइंस के मनोरंजन कक्ष में पत्रकारवार्ता आयोजित कर शिवप्रसाद को पत्रकारों के सामने पेश किया तो प्रेमिका की बेवफाई की जो कहानी उस ने पुलिस को बताई थी, वही कहानी पत्रकारों को भी सुना दी. सीधेसादे शिवप्रसाद ने हालात और परिस्थितियों के हाथों मजबूर हो कर प्रेमिका अर्शली और उस की मां सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की थानाकोतवाली शाहपुर के बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा में ज्यादातर ईसाई रहते हैं. इसी मोहल्ले में मरियम लौरेंस भी रहती थी. उन की 2 संतानें थीं, बेटा एलिसिएंस लौरेंस उर्फ पन्नो तथा बेटी सन्नो. मरियम लौरेंस रेलवे अस्पताल में नर्स थीं. उन के पति की बहुत पहले मौत हो चुकी थी. पति की मौत के बाद उन्होंने ही बेटे और बेटी को पालपोस कर बड़ा किया था.

पन्नो बड़ा हुआ और उस में दुनियादारी की समझ आई तो उस ने परिवार का सहारा बनना चाहा. मरियम ने अपनी मेहनत की बदौलत काफी चलअचल संपत्ति जुटा रखी थी. पन्नो ने नौकरी करने के बजाय घर के सामने पड़ी अपनी खाली जमीन पर आटा चक्की लगा ली. उस की मेहनत रंग लाई और उस की आटा चक्की चल निकली.

लेकिन जब पन्नो के पास पैसे आए तो एकाएक उस के दोस्तों की संख्या बढ़ गई. इन्हीं दोस्तों की वजह से उसे शराब पीने की बुरी लत लग गई. जब इस की जानकारी मरियम को हुई तो बेटे को लाइन पर लाने के लिए उन्होंने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी. पर पन्नो पर इस सब का कोई असर नहीं हुआ. धीरेधीरे पन्नो की लत बढ़ती गई और उस की आटा चक्की की सारी कमाई शराब में उड़ने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि आटा चक्की बंद हो गई.

मरियम बेटे की आदत से परेशान रहने लगी थीं. उसे सुधारने की उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. आखिर में उन्हें एक रास्ता उस की शादी कर देना नजर आया. मरियम ने खूब सोचसमझ कर उस की शादी सोफिया लौरेंस से कर दी. इस के बाद बेटी सन्नो की शादी जौनपुर में कर के वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गईं.

शादी के बाद पन्नो पर गृहस्थी का बोझ पड़ा तो उस ने आटा चक्की की जगह जनरल स्टोर खोल लिया. उस की दुकान चल निकली और ठीकठाक कमाई होने लगी. पन्नो को सोफिया से 2 बेटियां हुई एलिना और अर्शली. इस तरह भरापूरा परिवार हो गया. पोतियों के साथ मरियम का भी समय आराम से कटने लगा.

चूंकि एलिना पहली संतान थी, इसलिए मरियम उसे कुछ ज्यादा ही प्यार करती थीं. अर्शली छोटी थी, इसलिए वह मांबाप को ज्यादा प्यारी थी. वे उसे प्यार से जैनी कहते थे. एलिना और अर्शली बड़ी हुईं तो उन की खूबसूरती में निखार आ गया. दोनों बहनें थीं भी बला की खूबसूरत. पन्नो की बेटियां बड़ी हो रही थीं, जिस से घर का खर्च बढ़ रहा था, लेकिन उस की कमाई घटती जा रही थी.

इस की सब से बड़ी वजह थी पन्नो की शराब पीने की आदत. अब तो उस के साथ सोफिया भी बीयर पीने लगी थी. रोजाना शाम को पतिपत्नी शराब और बीयर की बोतलें ले कर बैठ जाते, इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे दुकान की पूजी शराब में उड़ती गई.

मरियम पोतियों का वास्ता दे कर बेटेबहू को समझातीं तो वे उन की बात समझने के बजाय डांट कर उन्हें ही चुप करा देते. जब उन्होंने देखा कि उन की बातों का बेटे और बहू पर कोई असर नहीं हो रहा है तो चुप रहने में ही वह अपनी भलाई समझने लगीं. बेटेबहू के व्यवहार से वह बहुत दुखी रहती थीं.

पन्नो की कमाई का एक मात्र जरिया दुकान थी. धीरेधीरे दुकान खाली हो गई. इस तरह कमाई का रास्ता बंद हो गया. बेटियां बड़ी हो रही थीं, उन के भी खर्चे थे. पन्नो और सोफिया को चिंता सताने लगी कि परिवार का खर्च कैसे चलेगा. सोचविचार कर पन्नो ने एक औटो खरीद लिया और उसे चलाने लगा.

उसी बीच एलिना अपने घर के पीछे रहने वाले अभिषेक मधई को दिल दे बैठी. उस समय एलिना 17 साल की थी. दोनों छिपछिप कर मिलने लगे. उन के इस प्यार की जानकारी सिर्फ अर्शली को थी. सोफिया के मकान के बगल में मिंटू रहता था. चूंकि मिंटू सोफिया का पड़ोसी था, इसलिए वह उस के घर भी आताजाता था. मिंटू का दोस्त था शिवप्रसाद, जो कोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आने वाले आम बाजार के रहने वाले रामप्रसाद का बेटा था.

रामप्रसाद रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, लेकिन नौकरी से रिटायर हो चुके थे, इसलिए घर खर्च चलाने के लिए शिवप्रसाद औटो चलाता था. उस के परिवार में पिता और 2 बहनें थीं.

मिंटू के यहां आनेजाने में शिवप्रसाद की नजर खूबसूरत अर्शली पर पड़ी तो वह उसे भा गई. उस ने उस के बारे में मिंटू से पूछा तो उस ने उस के बारे में उसे सब कुछ बता दिया. अर्शली शिवप्रसाद को इतनी पसंद आ गई कि ईसाई होने के बावजूद वह उसे दिल दे बैठा.

मिंटू के जरिए दोनों का परिचय हुआ तो जल्दी ही उन में दोस्ती हो गई. उन की यह दोस्ती प्यार में बदली तो उन का यह प्यार जुनूनी हो गया. हालत यह हो गई कि दोनों ही रातदिन एकदूसरे के खयालों में खोए रहने लगे. यह करीब 3 साल पहले की बात है.

उसी बीच सोफिया पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. शराब पीने से खोखले हो चुके पन्नो की अचानक मौत हो गई. पति की मौत से जहां सोफिया टूट गई, वहीं अर्शली को भी पिता की मौत का गहरा सदमा लगा था. लेकिन दुख की इस घड़ी में शिवप्रसाद साया की तरह हर घड़ी उस के साथ खड़ा ही नहीं रहा, बल्कि हर तरह से उस की मदद भी की.

उन्हीं दिनों शिवप्रसाद का मकान बन रहा था. उस के पिता रामप्रसाद ने मकान बनवाने के लिए उसे ढाई लाख रुपए दिए थे. अर्शली के प्यार में पागल शिवप्रसाद ने सारे रुपए उस पर लुटा दिए. इन पैसों को ले कर बापबेटे में खूब झगड़ा भी हुआ, लेकिन रामप्रसाद कर ही क्या सकते थे. एकलौती औलाद थी, घर से भी तो नहीं निकाल सकते थे.

शिवप्रसाद औटो से जो कमाता था, अर्शली पर खर्च करता था. पिता की मौत के बाद अर्शली की पढ़ाई छूट गई थी. शिवप्रसाद ने उस का दाखिला कराया, इस साल उस ने 12वीं की परीक्षा दी थी, परीक्षा का परिणाम अभी आया नहीं था.

पन्नो की मौत के बाद कमाई का कोई जरिया नहीं रहा तो मरियम ने अपने मकान की पहली मंजिल पर बने 2 कमरों को किराए पर उठा दिया, जिस से सोफिया और अर्शली का खर्च निकल सके. एक कमरे में किन्नर सपना और बौबी रहती थी, जबकि दूसरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी. इसी किराए और मरियम की पेंशन से घर का खर्च चल रहा था.

एलिना और अभिषेक का प्रेमप्रसंग पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गया था. इस की वजह यह थी कि बिना ब्याह के ही एलिना प्रेमी के घर रहने चली गई थी, लेकिन 3 महीने बाद ही प्रेमी के घर जहर खाने से एलिना की मौत हो गई. सोफिया ने बेटी की हत्या का आरोप लगा कर अभिषेक को जेल भिजवा दिया.

एलिना की मौत से मरियम को ऐसा आघात लगा कि वह बीमार रहने लगीं. उन की हालत दिन पर दिन बिगड़ती गई तो मां की हालत देख कर सन्नो उन्हें अपने साथ जौनपुर ले गई. मरियम के जाने के बाद घर में सोफिया और अर्शली ही रह गईं.

सोफिया को अर्शली और शिवप्रसाद के रिश्ते की जानकारी थी. एलिना की मौत के बाद वह डर गई कि अर्शली के साथ भी कहीं वैसा ही हो गया तो उस का एकमात्र सहारा छिन जाएगा. इस के बाद उस ने एलिना का उदाहरण दे कर अर्शली को समझा कर कहा कि अब उस की शादी उस के पसंद के लड़के के साथ होगी.

अर्शली ने मां की भावना का आदर करते हुए वादा किया कि अब वह उन की मर्जी के खिलाफ कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें परेशानी हो. मां से किए वादे के अनुसार अर्शली ने शिवप्रसाद से अचानक बातचीत बंद कर दी.

उस ने उस से कह भी दिया कि वह उस का पीछा करना छोड़ दे. अगर उस ने उस का पीछा नहीं छोड़ा तो वह उस की शिकायत पुलिस से कर देगी. अब वह वहीं शादी करेगी, जहां मां कहेंगी.

अचानक अर्शली में आए इस बदलाव से शिवप्रसाद हैरान रह गया. उस की समझ में नहीं आया कि अर्शली ने अचानक उस से मुंह क्यों मोड़ लिया? वह जब भी उस से बात करने की कोशिश करता, अर्शली पुलिस की धमकी दे कर उसे चुप करा देती. अर्शली की यह बेवफाई शिवप्रसाद को शूल बन कर चुभने लगी.

शिवप्रसाद ने अर्शली से प्यार ही नहीं किया था, बल्कि उस पर लाखों रुपए खर्च भी किए थे. एक तरह से उस ने अर्शली के लिए खुद को बरबाद कर लिया था.

घरपरिवार से उस के लिए बगावत की थी. ऐसे में भला वह कैसे चाहता कि अर्शली किसी और की हो जाए. शायद यही सोच कर शिवप्रसाद ने तय कर लिया कि अर्शली अगर उस की नहीं तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. सोफिया ने अर्शली को उस से दूर किया था, इसलिए शिवप्रसाद की नजरों में असली गुनहगार वही थी.

अर्शली को पाने के लिए शिवप्रसाद पागल था. एक दिन वह बहुत बेचैन हुआ तो ‘रौकी हैंडसम’ फिल्म देखने चला गया. फिल्म में हत्या का एक सीन दिखाया गया था, जिस में रेडियम (चमकदार) चाकू से अंधेरे में हत्या की गई थी. फिर क्या था, शिवप्रसाद ने उसी वक्त तय कर लिया था कि उसे क्या करना है.

उस रात वह बिना कुछ खाएपिए ही सो गया. अगले दिन वह कोतवाली शाहपुर के असुरन चौक की एक दुकान से रेडियम वाला चाकू खरीद लाया. 29 मार्च की रात 11 बजे वह अर्शली के घर के पिछवाड़े से छत पर जा कर छिप गया. चूंकि तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए उसे छत पर चढ़ते किसी ने नहीं देखा था.

सोफिया और अर्शली रात में सोने से पहले बीयर पीती थीं. उस रात भी मांबेटी ने बीयर पी और खाना खा कर एक ही बैड पर सो गईं. यह बात शिवप्रसाद को पता थी. शिवप्रसाद रात गहराने की प्रतीक्षा करता रहा. रात 3 बजे वह दबे पांव सीढि़यों से नीचे उतरा और सीधे सोफिया के कमरे में जा पहुंचा.

मांबेटी को एक ही बैड पर सोई देख कर उस ने कमरे के एक कोने में रखी लोहे की रौड उठाई और सोफिया के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए. सोफिया चीखी तो अर्शली उठ कर बैठ गई और चिल्लाने लगी. शिवप्रसाद डर गया और उस ने अपने बचाव के लिए चाकू से अर्शली के पेट में ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

अर्शली तड़पने लगी तो उस ने खून सने हाथों से उस का गला दबा दिया. मांबेटी मर चुकीं थीं. उन के ऊपर कंबल डाल कर उस ने बैड पर रखे दोनों के मोबाइल फोन उठा कर जेब में डाल लिए.

शिवप्रसाद ने गैलरी में रखी स्कूटी बाहर निकाली और दरवाजे पर ताला बंद कर के उसी स्कूटी से अपने घर चला गया. वह करीब 4 बजे अपने घर पहुंचा और इत्मीनान से सो गया. वह सुबह उठा तो भी घर छोड़ कर कहीं नहीं गया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शिवप्रसाद को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस तरह पुलिस ने 12 घंटे में ही हत्यारोपी शिवप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया था. इस के लिए एसएसपी अनंतदेव ने शिवप्रसाद को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

शिवप्रसाद ने जो किया, शायद अब उसे पछतावा हो रहा होगा. लेकिन अब वह कर ही क्या सकता है. उस की अब बाकी की जिंदगी तो जेल में ही बीतनी है. दुख की बात तो यह है कि सोफिया और अर्शली का अंतिम संस्कार भी करने वाला कोई नहीं था. उन का अंतिम संस्कार पुलिस ने किया था. Love Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: दिल दौलत और दगाबाज दोस्त

Hindi Crime Story: टेड सैंडी को दिल से प्यार करता था जबकि सैंडी को उस की दौलत से प्यार था. इस में जब टेड का दोस्त रिक भी सैंडी के साथ मिल गया तो दोनों ने टेड की दौलत के लिए उसे ठिकाने लगा दिया.

उत्तरी अमेरिका के शहर लास वेगास को दुनिया का फन सिटी माना जाता है. वहां चौबीसों घंटे जुआ खेला जाता है, इसलिए वहां जुआ खेलने वालों का जमघट लगा रहता है. यहां सिर्फ जुआ ही नहीं खेला जाता सैक्स और फैशनेबल कपड़ों का भी व्यापार होता है. इस की वजह से यहां अपराधी भी बहुत हैं. यहां रातदिन टौपलेस लड़कियों के डांस शो और शराब के साथ जुआ चलता रहता है. इस शहर की रौनक सालोंसाल से ज्यों की त्यों बनी है. कसीनो में डूबी रातों, स्पा बाथ के जलवे और सैक्स का मजा लूटने यहां तमाम पर्यटक आते हैं.

कसीनो में पैसे वाले लोग हजारोंलाखों रुपयों की बाजियों में डूबे रहते हैं. एक तरफ बाजी जीतने वाले को खुशी होती है तो दूसरी ओर हजारोंलाखों हारने वाले पर भी ‘जीत’ का नशा छाया रहता है. कसीनो का मायाजाल ही ऐसा होता है कि हारने का भी गम नहीं होता. वह इसी उम्मीद में रहता है कि कभी उस का भी समय आ सकता है. 17 सितंबर, 1996 की रात निवेडा वैली पर काले बादलों का ऐसा साया मंडराया, जो कभी फीका नहीं पड़ा. निवेडा वासियों के दिल में अब घोड़ों, जुआ और लड़कियों के शौकीन टेड बिनियन की सिर्फ यादें ही रह गई हैं.

स्मार्ट, गणित में माहिर और बेशुमार दौलत का मालिक. टेड के पास इतनी दौलत थी कि नोट गिनने वाली मशीन भी थक जाए. खतरों से खेलने वाला, मौत से न डरने वाला, टेड आखिर में मारा गया. जो दौलत उसे जान से प्यारी थी, उसी दौलत की वजह से उसे जान गंवानी पड़ी. टेड बिनियन लड़कियों का भी खूब शौकीन था. उसे हर रोज एक नई लड़की की तलाश होती थी. पैसा उस के पास था ही, इसलिए हर रात उसे नई लड़की आसानी से मिल जाती थी. उस रात वह लड़की की ही तलाश में चिताह क्लब पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात साथ वाली टेबल पर बैठी सैंडी मर्फी से हुई.

टेड बारबार उसी की ओर देख रहा था. उस के इस तरह देखने से सैंडी को अंदाजा हो गया कि वह क्या चाहता है. सैंडी को पता था कि टेड अरबपति है. टेड ने सैंडी को अपनी तरफ खींचने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने भाव नहीं दिया. तब उस ने उसे नोटों की गड्डी दिखाई. लेकिन सैंडी ने उसे लौटाते हुए कहा, ‘‘तुम ने मुझे समझा क्या है? तुम्हें क्या लगता है कि पैसे ले कर मैं तुम्हारे साथ चल दूंगी.’’

टेड ने सोचा था कि सैंडी भी अन्य लड़कियों की तरह होगी, लेकिन वह वैसी नहीं थी. जबकि यह उस की एक अदा थी, जिस की बदौलत वह टेड को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गई थी. उस के इस अंदाज से टेड अंदर तक घायल हो गया था. लड़कियों को सिर्फ मौजमस्ती की चीज समझने वाले टेड के दिल में सैंडी अपनी इस अदा से उतर गई थी. जबकि सही बात यह थी कि सैंडी पैसों की तलाश में ही कैलिफोर्निया से लास वेगास आई थी. वह पैसों के लिए क्लबों में टौपलेस डांस करती थी. सैंडी की यह अदा टेड के लिए दिखावा भर थी. वह टेड की अमीरी और खुले दिल से अनजान नहीं थी. वह खुद उसे अपनी ओर खींचना चाहती थी. जिस में वह कामयाब भी हो गई थी.

इस के बाद उन्हें मिलते देर नहीं लगी. उन की मुलाकातें होने लगीं. एक लंबे समय के बाद सैंडी को पता चला कि टेड ही उस कसीनो का मालिक है, जहां वह काम करती थी. 2 सप्ताह में ही सैंडी की जिंदगी बदल गई थी. टेड की पत्नी को जब पति और सैंडी के प्रेम के बारे में पता चला तो उस की पत्नी डौरिस अपनी 15 वर्षीया बेटी को ले कर चली गई. उस ने तलाक का मुकदमा करने में भी देर नहीं की. टेड शराब तो पीता ही था, पत्नी के जाने के बाद हेरोइन भी लेने लगा.

डोरिस के घर से जाते ही जो सैंडी पैसों की खातिर हर रात क्लबों में जिस्म दिखाने का नाच करती थी, वह अरबपति के घर की मालकिन बन गई. एक तरह से उस के हाथ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी लग गई थी. लास वेगास ने उस की जिंदगी बदल दी थी. टेड सैंडी की अदाओं पर फिदा था. हर रात उस के साथ बाहर जा कर खाना खाता, कसीनो में जुआ खेलता और फिर रात भर सैंडी के साथ मजे लेता. यही उस की जिंदगी का नियम बन गया था.

सैंडी ने जिंदगी में जो चहा था, पा लिया था. अब टेड की बेशुमार दौलत सैंडी के हाथों में थी. उस की जिंदगी ने नया करवट तब लिया, जब उस की जिंदगी में टेबिश आया. रिक टेबिश लास वेगास सन 1991 में आया था. यहां उस ने अपनी ट्रांसपोर्ट कंपनी खोली थी. इस के बाद जल्दी ही उस की गिनती करोड़पतियों में होने लगी थी. पिएरो रेस्टोरेंट के रौसलेट में रिक की मुलाकात टेड से हुई तो जल्दी ही दोनों गहरे दोस्त बन गए. एक दिन टेड रिक को अपने घर ले गया तो वहां उस ने उसे सैंडी से मिलवाया. इस के बाद अक्सर तीनों की मुलाकातें होने लगीं.

टेड बिनियन अपने कारोबार में व्यस्त रहता था, जिस की वजह से सैंडी का झुकाव रिक की ओर हो गया. वह उस के साथ शौपिंग पर भी जाने लगी. इस तरह दोनों करीब आते गए. इस के बाद एक शाम जब दोनों घर में अकेले थे तो सैंडी ने कहा, ‘‘रिक, क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमारे बीच अपनापन इस हद तक बढ़ गया है कि अब इसे रिश्ते का नाम दे दिया जाना चाहिए.’’

‘‘कैसा रिश्ता?’’ रिक ने पूछा.

‘‘प्यार का रिश्ता,’’ सैंडी ने कहा, ‘‘तुम्हारे साथ होने पर दिल में कुछकुछ होने लगता है. सच कहूं, मेरा दिल बिलकुल खाली है. टेड को तो मेरे दिल ने सिर्फ नाम का पति माना है. उस बूढ़े में इतनी ताकत कहां है कि उसे पूरी तरह से पति मान लिया जाए. वह शरीर में आग तो लगा देता है, लेकिन बुझाना उस के वश की बात नहीं है.’’

रिक उस के कहने का मतलब समझ गया था. वह तो वैसे ही सैंडी पर फिदा था. इस तरह खुले आमंत्रण पर भला कैसे खुद को रोक पाता. उस ने सैंडी को बाहों में भर लिया. इस का नतीजा यह रहा कि दोनों के बीच जिस्मानी दूरी खत्म होते देर नहीं लगी. दोनों एकांत के साथी बने तो हर छोटीबड़ी बातों के भी राजदार बन गए. इस सब से बेखबर टेड का भी रिक पर विश्वास बढ़ता गया. यही वजह थी कि एक दिन टेड ने उस से पार्किंग के नीचे बने बेसमेंट में दबी चांदी के सिक्कों की बोरियों को कहीं दूसरी जगह ले जाने के बारे में सलाह मांगी. क्योंकि टेड अपनी बहन की दखलंदाजी से परेशान था. वह उस की दौलत हड़पना चाहती थी.

इस के बाद रिक की सलाह पर टेड ने चांदी के सिक्कों से भरी बोरियां लास वेगास से 60 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव पाहरूपम पहुंचा दी. टेड ने वहां जमीन खरीद कर इंजीनियर्स ग्रुप की मदद से एक तहखाना बनवाया था और उसी में अपनी दौलत रखवा दी थी. 17 सितंबर, 1998 की रात लास वेगास के मेट्रोपैलिटन डिपार्टमेंट में एक फोन आया, जिस में एक औरत कह रही थी कि उस के पति की तबीयत बहुत खराब है. उन्होंने सांस लेना बंद कर दिया है.

उस ने घर का पता बताया था 2406, पोलोकिनो लेन. यह टेड बिनियन का घर था. वह फोन सैंडी ने किया था. थोड़ी देर में घर के बाहर 3 जीपें आ कर रुकीं. इसी के साथ डाक्टरों की 2 टीमों के साथ पुलिस वालों की लाइन लग गई. भीतर से सैंडी चिल्लाई,  ‘‘आप लोग इन्हें बचा लो, यह मर जाएंगे, इन की सांस रुक गई है.’’

एक डाक्टर उसे चुप कराने लगा तो बाकी अंदर चले गए. रेंकल ने बाहर आ कर उस से पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘मैं उन की बीवी हूं.’’ सैंडी बोली.

‘‘आप की पति से आखिरी बार कब मुलाकात हुई थी?’’

‘‘आज सुबह.’’

रेंकल सैंडी को वहीं छोड़ कर अंदर टेड के पास पहुंचा. उस की नब्ज टटोली तो रुक चुकी थी. शरीर एकदम ठंडा हो चुका था. साफ था टेड मर चुका था. सैंडी भी आ गई और टेड की लाश से लिपट कर रोने लगी. पुलिसकर्मियों ने उसे पकड़ कर अलग किया और सांत्वना दिया. टेड को जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया. वहां सैंडी की तबीयत खराब हो गई तो उसे दवा दे कर सुला दिया गया. कुछ देर में रिक भी आ गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में उस ने बताया कि वह टेड और सैंडी दोनों का दोस्त है. वह कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर जा रहा था. टेड की मौत का पता चला तो एयरपोर्ट से सीधे अस्पताल आ गया.

पुलिस ने अनुमान लगाया कि कैसीनों का लाइसैंस न मिलने से टेड ने आत्महत्या की होगी. सैंडी ने बताया कि देर शाम उस ने टेड के हाथ में बंदूक देखी थी. चाह कर भी उसे नींद नहीं आ रही थी. परेशानी की वजह से उन्होंने हेरोइन की ज्यादा डोज ले ली होगी? जांच करने वाली टीम ने पाया कि टेड बिनियन की मौत आत्महत्या नहीं थी, बल्कि उसे आत्महत्या दिखाने की कोशिश की गई थी. जांच में उस के कमरे से जो एक्सानेक्स की शीशी मिली थी, उस की अधिक डोज देने से टेड तड़पतड़प कर एक कमरे से दूसरे कमरे में भटका होगा. कमरा बंद होने की वजह से छलांग लगाने का भी कोई रास्ता नहीं था. इस दवा के कारण उल्टी भी हुई होगी, जिसे साफ किया गया होगा.

यह अपराध काफी गहराई तक सोच कर किया गया था. टेड बिनियन की मौत के 2 दिनों बाद 19 सितंबर, 1998 पुलिस को सूचना मिली कि 2 बड़ेबड़े भरे हुए ट्रक पाहरूम से बाहर जाते हुए देखे गए हैं. उन दोनों ट्रकों में से एक को रिक टेबिश चला रहा है, जबकि दूसरे को उस का साथी डेविड मेटसन. दोनों ट्रकों को पीछा कर के पकड़ लिया गया. उस समय तो रिक बहाना कर के बच गया था. उस ने कहा था कि टेड बिनियन ने उसे ये ट्रक मि. एंथनी के पास पहुंचाने को कहा था. लेकिन आगे की जांच में सैंडी और रिक शक के दायरे में आ गए. इस के बाद 14 जून, 1999 को सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में पता चला कि जिस रात टेड का कत्ल हुआ था, दोनों होटल पेनिनसुला में एक साथ दिखाई दिए थे. होटल का कमरा मिस्टर एंड मिसेज टेबिश के नाम से बुक कराया गया था. रात गुजारने के बाद दोनों सुबह वहां से एक साथ घर के लिए निकले थे. लेकिन उस समय सबूत न होने की वजह से वे छूट गए थे. करीब 4 सालों बाद अक्टूबर, 2004 में सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को सबूतों के साथ पेशी के लिए कोर्ट में लाया गया, जहां दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. सैंडी ने माना कि उस ने टेड बिनियन के साथ शादी प्यार की वजह से नहीं, उस की दौलत की वजह से की थी. वह उस की दौलत हासिल करना चाहती थी. इस के बाद रिक उस की जिंदगी में आया तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया.

सैंडी की तरह रिक भी टेड की दौलत हड़पना चाहता था. सैंडी ने जब उस से टेड की दौलत हथिया कर शादी करने को कहा तो वह राजी हो गया. सैंडी जानती थी कि टेड हेरोइन के नशे का आदी है. इस के अलावा वह कई तरह की नशीली गोलियां भी खाता था. उस ने टेड को मारने के लिए इन्हीं चीजों का सहारा लेने का फैसला किया. रिक भी इस पर सहमत हो गया. घटना वाले दिन पहले दोनों ने दवा की हाई डोज दे कर टेड को मार दिया. उस के बाद दोनों ने जिस्मानी भूख मिटाई.

उन्होंने माना कि टेड बिनियन को जबरदस्ती 12 पैकेट हेरोइन खिलाई गई थी. उस के बाद एक्सानेक्स की 10 गोलियां उस के मुंह में ठूंस दी थी, ताकि उस की अरबों की दौलत के मालिक वे खुद बन सकें. दोनों के अपराध स्वीकार करने और सबूतों के आधार पर जज ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. उम्रकैद की सजा मिलने के बाद सैंडी और रिक ने कई बार जमानत की अर्जी दी, लेकिन उन्हे खारिज कर दिया गया. 2 जनवरी, 2010 को फिर सैंडी ने उम्र का हवाला देते हुए जमानत की अर्जी दाखिल की कि अभी उस की उम्र ही क्या है, अपने किए की वह काफी सजा भुगत चुकी है, इसलिए उस के भविष्य को ध्यान में रख कर उसे जमानत दी जाए. लेकिन इस बार भी उसे जमानत नहीं मिल सकी. दोनों की उम्रकैद की सजा बरकरार है. यह प्रकरण इतना विख्यात हुआ था कि हौलीवुड में इस पर फिल्म बनी थी. Hindi Crime Story

Web Series: मिसेज देशपांडे – एक खूंखार सीरियल किलर

Web Series: इस वेब सीरीज में मिसेज देशपांडे का किरदार निभा रही माधुरी दीक्षित एक सीरियल किलर जीनत है, जो 25 सालों से जेल में बंद है, लेकिन इस के बाद भी शहर में पुराने तरीके से ही सीरियल मर्डर की घटनाएं हो रही हैं. इस नए सीरियल किलर को पकडऩे के लिए पुलिस जीनत को जेल से बाहर निकालती है. नकलची सीरियल किलर को पकडऩे में पुलिस कामयाब तो हो जाती है, लेकिन उस के द्वारा जीनत की ही तरह हत्याएं करने की जो कहानी सामने आती है, उसे सुन कर पुलिस अधिकारी ही नहीं, बल्कि जीनत तक चौंक जाती है, क्योंकि…

प्रोड्यूसर: एलाहा हेपतुल्ला, समीर नायर, दीपक सहगल, निर्देशक: नागेश कुकुनूर, लेखक: नागेश कुकुनूर, रोहित वनावलीकर, ओटीटी:जियो हौटस्टार

कलाकार: माधुरी दीक्षित, प्रियांशु चटर्जी, बहारुल इसलाम, सिद्धार्थ चांदेकर, दीक्षा जुनेजा, प्रदीप वेलंकर, निमिशा नायर, हार्दिक सोनी, जेबा हुसैन, जुबिन शाह, उमाकांत पाटिल, सुलक्षणा जोगलेकर, केविन दवे, जितेंद्र लाड, अंजलि जोगलेकर, असित चटर्जी, दीपाली घोरपडे, खुशी हजारे, अर्जुन पांडे, केनेथ देसाई आदि.

‘मिसेज देशपांडे’ एक मनोवैज्ञानिक क्राइम थ्रिलर सीरीज है, जिस में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री माधुरी दीक्षित मुख्य भूमिका में है. 6 एपिसोड की यह वेब सीरीज 19 दिसंबर, 2025 को जियो हौटस्टार पर प्रसारित हुई थी.

यह वेब सीरीज 1917 में आई फ्रेंच सीरीज ‘ला मांटे’ पर आधारित है. हर क्राइम थ्रिलर की ही तरह यह सीरीज भी सस्पेंस और मर्डर मिस्ट्री की परतें एकएक कर खोलती है. आखिर कैसी है इस क्राइम वेब सीरीज की कहानी और बाकी की चीजें, चलिए जानते हैं इस का सस्पेंस और इस का रिव्यू.

एपिसोड नंबर 1

पहले एपिसोड का नाम ‘टेक्स वन टू कैच वन’ रखा गया है. एपिसोड की शुरुआत में हम विराट मल्होत्रा (जुबिन शाह) को देखते हैं. उस ने किसी लड़की को अपने साथ रात बिताने के लिए फोन किया था, मगर वह नहीं आई. इस के बाद विराट अपने एक खास डीलर को फोन कर 2 रशियन लड़कियों को अपने कमरे में बुलाता है. विराट अब अपने कमरे में ड्रग्स का सेवन करने लगता है, तभी डोर बेल बजने पर जैसे ही विराट दरवाजा खोलता है तो एक नकाबपोश विराट पर हमला कर उस का गला एक चमकदार रस्सी से घोंट देता है. फिर उस की लाश शीशे के सामने रख कर वहां एक ट्रौफी रख कर भाग जाता है.

तभी वहां पर दोनों रशियन गर्ल आ जाती हैं. कमरे में विराट की लाश को देख कर वे डर जाती हैं. अब वहां पर उस केस को हैंडल करने इंसपेक्टर पल्लवी सोनवाने (सुलक्षणा जोगलेकर) आती है और पूछताछ व मौकामुआयना करने लगती है. थोड़ी ही देर में घटनास्थल पर मुंबई के पुलिस कमिश्नर अरुण खत्री (प्रियांशु चटर्जी) आ कर इंसपेक्टर पल्लवी से केस की जानकारी लेता है.

जब पुलिस कमिश्नर अरुण खत्री लाश के पास जाता है तो उसे कुछ साल पहले के केस याद आ जाते हैं, जिन में कातिल ने सभी केसों में लोगों को मार कर शीशे के सामने बिठा दिया था. उस के बाद पुलिस कमिश्नर सीधे हैदरावाद जेलर शकुंतला राव (अंजलि जोगलेकर) को फोन कर के जीनत (माधुरी दीक्षित) नामक कैदी के बारे में पूछताछ करता है तो जेलर शकुंतला बताती है कि जीनत तो जेल में ही है. अब जेलर शकुंतला जीनत को बुलाती है.

इस के बाद पुलिस कमिश्नर अरुण खत्री जीनत से मिलने हैदराबाद जेल जाता है, क्योंकि जीनत ने उन्हें मैसेज भेजा था कि वह पुलिस की मदद करना चाहती है. उन दोनों की बातचीत से पता चलता है कि आज से 25 साल पहले मिसेज सीमा देशपांडे ने पूरे 8 खून इसी पैटर्न पर किए थे. आठवें कत्ल में अरुण ने ही सीमा को गिरफ्तार किया था. बाकी 7 मर्डर स्वीकार करने के लिए सीमा ने यह शर्त रखी थी कि उस का नाम सीमा से बदल कर जीनत रख दिया जाए, जिसे स्वीकार कर उसे हैदराबाद जेल भेज दिया गया था.

अब जीनत यानी सीमा देशपांडे अरुण से कहती है कि ये नया खूनी मेरे ही पैटर्न पर मर्डर कर रहा है. यदि आप को इसे पकडऩा है तो आप को मुझे जेल से छुड़वाना होगा, तभी मैं इस नए सीरियल किलर को पकड़वा सकती हूं. पुलिस कमिश्नर अरुण खत्री डीजीपी महाराष्ट्र (शिवराज वालवेकर) को अपनी गारंटी पर सीमा को जेल से बाहर निकलवा देता है. इस के बाद हम एक आदमी को ड्रग्स माफिया से मिलते देखते हैं. तभी वहां पर पुलिस आ कर सब को गिरफ्तार कर लेती है.

असल में बौस से पैसे ले कर जाने वाला वह आदमी एसीपी तेजस फडके (सिद्धार्थ चांदेकर) था, जो वेश बदल कर ड्रग्स माफिया के ग्रुप में शामिल हो कर उन के पूरे गिरोह को पकडऩा चाहता था. पुलिस ने अभी रेड डाल कर उस के औपरेशन पर पानी फेर दिया था. इस के बाद अरुण खत्री सारी फाइलें तेजस को दे कर कहता है कि तुम ये सब ठीक तरह से पढ़ लो, आज के बाद तुम्हें ही यह केस हैंडल करना है.

अरुण एसीपी तेजस से कहता है कि अब हमें सीमा देशपांडे के साथ मिल कर इस नए सीरियल किलर को पकडऩा है, जो सीमा की तर्ज पर 3 मर्डर कर चुका है. इस के बाद हम तन्वी (दीक्षा जुनेजा) को देखते हैं, जो अपना एक सैलून अपनी बहन दिव्या (निमिशा नायर) के साथ चलाती है. तभी सैलून में तेजस आता है तो तन्वी उस से लिपट जाती है.

यहां पर अब पता चलता है कि तन्वी और तेजस पतिपत्नी हैं, लेकिन अपने पुलिस केस के सिलसिले में तेजस महीनों बाद ही अपनी पत्नी से मिल पाता है. इस के बाद अरुण खत्री के कहने पर एक घर को तैयार किया जाता है, जहां पर सीमा को रखा जा सके. सीमा ने 8 मर्डर किए थे, इसलिए उस की नई शिफ्टिंग के दौरान सभी पुलिस वाले भी काफी डरे हुए थे कि कहीं सीमा यहां से भाग न जाए.

अब सीमा देशपांडे अपने नए ठिकाने पर आ कर काफी खुश लग रही थी, साथ ही उस ने जो वस्तु जेल में पीसी थी, वह उसे अपने बैड के नीचे छिपा कर रख लेती है. अब सीमा से मिलने उस के नए ठिकाने पर कमिश्नर अरुण और जांच अधिकारी तेजस आते हैं. तेजस विराट मल्होत्रा की फोटो दिखाते हुए सीमा से पूछता है कि आप इस केस के बारे में बताइए, आप को क्या लगता है? अब अरुण और तेजस सीमा को क्राइम सीन पर ले कर आते हैं, वहां पर सीमा कहती है कि इस नए सीरियल किलर ने तो विराट मल्होत्रा के हाथ में एक ट्रौफी भी रखी है, जैसा मैं ने अपने तीसरे मर्डर में किया था.

सीमा आगे बताती है कि मेरी पूरी फाइल पढऩे के बाद ही किलर ने ये सब मर्डर करने शुरू कर दिए हैं. अरुण कहता है कि तुम्हारी वह फाइल अब तक केवल 6 लोगों ने ही पढ़ी है, इस पर सीमा कहती है कि उन्हीं 6 लोगों में से कोई अवश्य इस नए सीरियल किलर को जानता होगा. अगले दिन एसीपी तेजस कमिश्नर अरुण को बताता है कि उन 6 लोगों में से 3 लोग मर चुके हैं. एक जज है, जिन की उम्र अभी 75 साल की है.

उन्होंने बताया कि उन्होंने सीमा देशपांडे की फाइल जला ही डाली है. सर, अब आप और जेहान दारूवाला (कीनिथ देसाई) नाम का वकील बचे हैं, इसलिए अब मैं दारूवाला से पूछताछ करता हूं. अब तेजस वकील दारूवाला से मिल कर उस से इस फाइल के बारे में पूछताछ करता है तो दारूवाला अपने चैंबर में, उस फाइल को ढूंढने लगता है, लेकिन वह फाइल नहीं मिलती तो दारूवाला कहता है कि जरूर यह फाइल मेरे भांजे ने चुरा ली होगी.

वकील दारुवाला बताता है कि जब मेरी बड़ी बहन मरी थी तो मैं ने उस के बेटे होश (केविन दवे) को अपने पास रख कर उस की परवरिश करने लगा था. लेकिन होश तो हमेशा आवारा की तरह घूमता रहता था. तभी होश वकील दारूवाला के घर की तरफ आता दिखता है, उसी समय एसीपी तेजस होश को पकडऩे की कोशिश करता है तो होश भाग जाता है. यहीं पर पहला एपिसोड समाप्त हो जाता है.

पहले एपिसोड की बात करें तो इस में काफी खामियां नजर आ रही हैं. कमिश्नर अरुण अपनी गारंटी पर एक ऐसे खूनी जिस ने 8 मर्डर किए थे, उसे डीजीपी के मना करने पर भी अपनी गारंटी पर जेल से छुड़वा लेता है. यह बात कल्पना से परे है. एसीपी तेजस फडके एक ड्रग्स रैकेट के पीछे लगा हुआ था, लेकिन पुलिस कमिश्नर खुद उस के औपरेशन को फेल कर देता है. यह बात भी समझ से परे है.

एपिसोड नंबर 2

दूसरे एपिसोड का नाम ‘द सीक्रेट लैटर्स’ रखा गया है. अब अगला सीन वर्तमान में आ जाता है, जहां दूसरे दिन सीमा के घर पर आ कर एसीपी तेजस वे सभी लैटर सीमा को दिखाता है, जो उसे होश के कमरे से मिले थे. ये वही पत्र थे, जो सीमा ने होश को लिखे थे. तेजस अब सीमा से पूछता है कि तुम ने ही इतने सारे लैटर्स होश को खुद लिखे थे यानी कि तुम जानती थी कि यह नया सीरियल किलर होश ही है.

इधर हम दूसरी ओर देखते हैं कि होश ने एक व्यक्ति को कमरे में बंद कर के रखा हुआ है. तभी वह नायलौन की एक चमकदार रस्सी निकालता है. इसी तरह की रस्सी से विराट का कत्ल किया गया था. आगे हम देखते हैं कि कमिश्नर अरुण से मिलने इंसपेक्टर पल्लवी आती है और बताती है कि विराट के मर्डर से पहले ऐसे ही 4 मर्डर हुए थे. मैं ने इस में काफी रिसर्च कर ली है, इसलिए आप मुझे विराट का केस दे दें.

अरुण कहता है कि यदि तुम्हारी जरूरत पड़ेगी तो मैं जरूर इस केस में शामिल कर लूंगा, लेकिन तुम इस नए सीरियल किलर वाली बात किसी भी मत बताना. उस के बाद इंसपेक्टर पल्लवी चली जाती है. सीमा फिर फोन पर एसीपी तेजस को बताती है कि होश ने उसे 12 जुलाई तक जो लैटर लिखे थे, उस में वह नौरमल लग रहा था. उस के बाद होश का मुझे 17 अगस्त को लैटर आया, जिस में वह काफी भड़का हुआ और काफी गुस्से में था.

इस का मतलब इस दौरान किसी ने उसे जरूर भड़काया होगा, अब एसीपी तेजस वकील दारूवाला के पास आ कर उस से पूछता है कि होश जुलाई से अगस्त के बीच में कहां था. दारूवाला बताता है कि उन दिनों होश एक कंसट्रक्शन कंपनी में काम कर रहा था. बाद में उस ने वहां काम करना भी छोड़ दिया था. तेजस उस कंसट्रक्शन कंपनी के इंजीनियर से बात की तो उस ने बताया कि होश बहुत ही झगड़ालू और पागल किस्म का इंसान था. प्रोजेक्ट मैनेजर जतिन (ऋषभ ठाकुर) के कहने पर उसे काम पर रखना पड़ा था.

अगले सीन में देखते हैं कि लोनावाला के जतिन के बंगले में एक कमरे में होश ने जतिन की पत्नी और बेटी को बंधक बना कर रखा है. उन के लिए होश खाना ले कर आता है, लेकिन वे दोनों काफी डरी हुई थीं, जबकि होश ने जतिन को एक दूसरी जगह बंधक बना कर रखा हुआ था. तभी यहां पर तेजस पुलिस टीम के साथ आ कर जतिन की पत्नी और बेटी को बचा लेता है और होश को अरेस्ट कर लेता है. तेजस होश को पुलिस स्टेशन ला कर जूस पिला कर तीनों मर्डर और जतिन के बारे में पूछताछ करता है. तब होश कहता है कि कंफेस तो मैं कर लूंगा, लेकिन पहले मुझे सीमा से मुलाकात करवा दो, जिसे हैदराबाद जेल में जीनत के नाम से कैद किया गया है.

उस के बाद तेजस सीमा को ले कर होश से मिलाने आता है. पुलिस उन दोनों की अकेले में मुलाकात करवाती है. इन दोनों को देखने और उन की बात सुनने के लिए पुलिस ने साउंड और कैमरे लगा रखे थे, जहां कुछ दूरी पर कमिश्नर अरुण और तेजस उन की हर गतिविधि को देख रहे थे. सीमा होश से आराम से बातें करने लग जाती है, फिर होश सीमा से कहता है कि तुम्हारा वह सीक्रेट मेरे पास सेफ रहेगा.

यह सुनते ही सीमा के हावभाव एकदम से बदल जाते हैं, जिसे अरुण और तेजस भी भांप लेते हैं. सीमा होश से कहती है कि तुम ने ये तीनों खून नहीं किए हैं, क्योंकि तुम मारने की केवल बात कर सकते हो, तुम्हारे अंदर खून करने की हिम्मत बिलकुल भी नहीं है. यह सुन कर होश रोने लग जाता है, फिर सीमा उस से जतिन के बारे में पूछती है तो वह एड्रेस बता देता है, जिसे सुन कर तेजस तुरंत एक पुलिस टीम जतिन को तलाशने के लिए भेज देता है.

इधर सीमा अब होश को अपनी ओर खींच कर उस के कान में कुछ कहती है और माइक में हाथ लगा लेती है ताकि उस की आवाज कोई भी न सुन सके. यह सुन कर होश जोरजोर से रोने लग जाता है. तभी वहां तेजस भाग कर आता है और सीमा से पूछता है कि तुम ने होश से क्या कहा तो सीमा कुछ नहीं कहती. अब सीमा अरुण और तेजस से कहती है कि होश ने कोई मर्डर नहीं किया है. मुझे लगता है कि जो भी असली खूनी है, वह बाहर ही आराम से घूम रहा है. यह सुन कर कमिश्नर अरुण परेशान हो जाता है.

अब हम बार में एक आदमी को देखते हैं जो लड़कियों से अय्याशी कर रहा होता है, फिर वह नशे में अपनी कार की तरफ जाने लगता है तो कोई उस का पीछा करने लगता है. उधर पुलिस टीम जतिन को सुरक्षित छुड़ा कर ले आती है. सीमा तेजस से कहती है कि मैं ने केवल उन्हीं लोगों को मारा था, जो बुरे काम करते थे. फिर हम देखते हैं कि जो आदमी बार में लड़कियों के साथ अय्याशी कर रहा था, जब वह अपने घर आता है तो वहां पर कोई नायलौन की रस्सी से गला घोंट कर उस का मर्डर कर देता है.

यानी कि जो भी किलर है, वह अभी भी मर्डर किए जा रहा है. उस के बाद यहां पर दूसरा एपिसोड समाप्त हो जाता है. दूसरे एपिसोड में भी काफी खामियां नजर आ रही हैं. यहां पर जेल की एक महिला सिपाही को सीमा और होश के लैटर आपस में आदानप्रदान करते दिखाया गया है.

यानी कि जेल में जब लैटर घूस ले कर लिए दिए जा सकते हैं तो और भी कुछ घूस दे कर किया जा सकता है. अर्थात जेल में भ्रष्टाचार व्याप्त है, यह बात भी उचित नहीं लगती. एसीपी तेजस होश को जूस पिला कर पूछताछ करना भी तर्कसंगत नहीं लगता. नाटकीयता साफसाफ नजर आ रही है.

एपिसोड नंबर 3

तीसरे एपिसोड का नाम ‘ट्रुथ इन द वुड्स’ रखा गया है. एपिसोड की शुरुआत में फ्लैशबैक में सीमा देशपांडे को दिखाया जाता है. जब वह किशोरावस्था में कत्थक नृत्य की प्रैक्टिस कर रही होती है, तभी एक आदमी उस के पास आता है, जिसे देख कर वह डर जाती है. उस अय्याश आदमी के मर्डर की खबर पा कर कमिश्नर अरुण और एसीपी तेजस भी पहुंच कर लाश का निरीक्षण करने लगते हैं. अरुण कहता है कि अब यह सीरियल किलर रोज मर्डर कर के हमें चुनौती देने लगा है.

अब एक  नई पुलिस टीम बना ली जाती है, जिस में इंसपेक्टर पल्लवी को भी शामिल किया जाता है. तेजस अब पुलिस को इसे खोजने में लगा देता है कि मरे हुए लोगों का आपस में क्या कनैक्शन था. अब हम एक युवा को देखते हैं जो अपने शरीर पर मांबेटे का टैटू बनवा रहा है. यह अलैक्स (विश्वास किनी) होता है, जिस का किरदार काफी रहस्यमयी और दिलचस्प है.

अब तेजस अपने औफिस में आता है तो उस का औफिसर उसे उस दिन सीमा ने होश के कान में जो बात कही थी, वह सुनवाता है. जिस में सीमा होश से कह रही थी कि तुम्हारे जीने का कोई फायदा नहीं, तुम एक कमजोर इंसान हो, तुम्हें तो मर जाना चाहिए. फिर हम होश को देखते हैं जो हौस्पिटल की खिड़की के शीशे से अपनी गरदन काट कर मर जाता है. यह देख कर हौस्पिटल के डौक्टर और पुलिस हैरान हो कर रह जाते हैं.

तेजस अब सीमा के पास आ कर कहता है कि तुम्हारे कारण ही होश ने आत्महत्या कर अपनी जान दे डाली है. तुम यही तो चाहती थी ताकि तुम्हारा सीके्रट कभी बाहर न आ सके. इस पर सीमा ‘हां’ कहती है. तेजस अब सीमा को उस अय्याश आदमी का फोटो दिखा कर पूछता है कि ये कौन हो सकता है. इस के बाद तेजस अपनी पुलिस टीम के पास आ कर बताता है कि ऐसा लग रहा है यह सीरियल किलर पहले से ही लोगों को जानता था, जिन के उस ने खून किए हैं.

इस के बाद वकील दारुवाला का फोन तेजस के पास आता है, जिस में वह बताता है कि कुछ साल पहले सरकार ने सभी प्रमुख केसों की फाइलें डिजिटलाइज कर दी थीं, जिस में सीमा के भी सारे मर्डर की फाइल्स भी थीं. इसलिए हो सकता है कि इस सीरियल किलर ने औनलाइन इन मर्डर को देखा होगा. अब तेजस सबइंसपेक्टर हानिया (जेबा हुसैन) से कहता है कि तुम जल्दी पता करो कि सरकार ने जो मर्डर की फाइल्स औनलाइन की थी, उस का टेंडर किस को दिया गया था? अब हम अलेक्स को देखते हैं, जो अभी अपने घर पर था. उस ने जो टैटू बनवाया था, वही मांबेटे की तसवीर उस के घर पर भी थी, उस के बाद वह अपने बैग से एक फोटो निकालता है, जिस में सीमा की फोटो भी होती है.

फिर अलेक्स अपने बैग से वही नायलौन वाली रस्सी भी निकालता है, जिस से यह लगता है कि अलैक्स ही सीरियल किलर हो सकता है. फिर तेजस के नानाजी अजोवा (प्रदीप वेलेकर) एक यात्रा पर निकल जाते हैं, जब वह जाने लगते हैं तो उन पर अलैक्स नजर रखने लगता है. सीमा भी इधर रात को 3 बजे जाग रही होती है, जैसे वह किसी का इंतजार कर रही हो. यहां पर अब हमें पता चलता है कि सीमा ने जो जेल में पुडिय़ा बनाई थी, उस से ही उस ने मोदक बनाए थे और प्रसाद मिला कर वही सब पुलिस टीम को खिला दिए थे, जिस में बेहोशी की दवा मिली थी.

केवल अकेला इंसपेक्टर ओमकार ही था, जिस ने यह प्रसाद नहीं खाया था, इस को खा कर सभी पुलिस वाले बेहोश हो जाते हैं. तभी वहां इंसपेक्टर ओमकार आता है तो सीमा तबीयत खराब होने का बहाना करने लगती है. यह देख कर ओमकार जैसे ही सीमा के पास आता है तो सीमा तत्काल झपट कर उस के गले में प्रैशर डाल कर ओमकार को बेहोश कर देती है. उस के बाद सीमा उस परची वाले घर पर जाती है तो दरवाजा नहीं खुलता और वह पूरी रात घर के बाहर ही बैठी रहती है.

अगले दिन पता चलता है कि सीमा भाग चुकी है, जिस से अरुण और तेजस काफी परेशान हो जाते हैं. उधर तन्वी जब अपना सैलून सुबहसुबह खोलती है तो उस की सहेली दिव्या (निमिशा नायर) तन्वी को बताती है कि कल मेरी तो मेरे बौयफ्रेंड के साथ डेट ही खराब हो गई. ये दोनों आपस में बातें कर रहे होते हैं, तभी सैलून में सीमा आ कर तन्वी से हेयर कट करने को कहती है. तन्वी उस के हेयर कट करने लगती है तो सीमा उस से बातें करने लगती है.

इधर अरुण तेजस से पूछता है कि तुम ने सीमा को अपने परिवार के बारे में तो नहीं बताया? तेजस के ‘हां’ कहने पर अरुण कहता है कि अपने परिवार वालों से बात बात करो कि कहीं सीमा उन्हें नुकसान न पहुंचा दे. तेजस पहले अपने नानाजी को फोन करता है, वह ठीक होते हैं. फिर वह पत्नी तन्वी को फोन करता है तो तन्वी सीमा के हेयर कट करने के कारण फोन नहीं उठाती. फिर वह तन्वी के सैलून के सीसीटीवी में अपने मोबाइल पर जब सीमा को वहां देखता है तो तुरंत गाड़ी में सैलून की तरफ भागता है.

इधर सीमा सैलून में तन्वी और दिव्या से खूब बातें करती है. तन्वी सीमा को बताती है कि वह अपने पति तेजस के साथ काफी खुश है. तभी सैलून में तेजस आ कर सीमा से कहता है कि मेरे साथ तुरंत चलो. तन्वी तेजस से पूछती है कि यह महिला कौन हैं तो तेजस कहता है तुम्हें बाद में बताऊंगा और वह सीमा को अपने साथ गाड़ी में बिठा कर ले जाता है. एक सुनसान जगह पर वह गाड़ी रोक कर सीमा को गाड़ी से बाहर निकाल कर उस से कहता है कि सीमा तेरा मर जाना ही ठीक है, क्योंकि तू एक सीरियल किलर है.

इस पर सीमा कहती है कि मेरी ममता ही मुझे वहां पर खींच कर ले गई थी और वह फिर बताती है कि तेजस मैं तेरी मां हूं और तेरे परिवार से मिलने गई थी. यह सुन कर तो तेजस के होश ही उड़ जाते हैं. उस के बाद यहां पर तीसरा एपिसोड समाप्त हो जाता है. इस एपिसोड की कहानी और निर्देशन में काफी खामियां दिखाई दे रही हैं. होश एक गंभीर मुजरिम है, जिस का हौस्पिटल में इलाज चल रहा था. वह आत्महत्या कर लेता है. ऐसे गंभीर अपराधी की गतिविधि पर नजर रखने के लिए एक पुलिस वाला तक नहीं है.

एपिसोड नंबर 4

चौथे एपिसोड का नाम ‘ए किलर इज बौर्न’ रखा गया है. शुरुआत में फ्लैशबैक में दिखाया गया है कि सीमा अपने रेस्टोरेंट में या तो वहां पर तेजस (फडके तनुश पाठक) भी होता है जो काफी छोटा था. फिर सीन वर्तमान में आता है जहां तेजस सीमा के साथ गाड़ी में बैठा होता है. तेजस सीमा के साथ अरुण के पास आता है. वह अरुण से पूछता है कि सर आप को यह सच पता था कि सीमा मेरी मां है? अरुण कहता है हां, मुझे पता था. सीमा ने ही केस में तुम्हारा नाम सजेस्ट किया था. अरुण सीमा से कहता है कि अब तुम्हारा यहां पर कोई काम नहीं है, इसलिए तुम अब वापस हैदराबाद जाने के लिए रेडी हो जाओ.

इधर तेजस अपने नाना से कहता है कि तुम ने मेरी मां के बारे में झूठ कहा था कि वह मर चुकी है. नाना उसे काफी समझाने की कोशिश करते हैं. अब हम टीवी पर देखते हैं, जहां पर ऐंकर प्रतीक सूर्यवंशी (असित चटर्जी) बताता है कि अब ये मर्डर 25 साल पुराने मर्डर्स की तर्ज पर हो रहे हैं. इस के बाद इंसपेक्टर पल्लवी को जेलो नाम की उस कंपनी का पता लग जाता है, जिस ने इन सारी फाइलों को डिजिटलाइज किया था.

इस के बाद एसआई हानिया पल्लवी को बताती है कि 7 महीने पहले जेलो कंपनी में काम करने वाले सुनील गुप्ते (साहित्य पंसारे) नाम के कर्मचारी का उसी तर्ज पर मर्डर हुआ था और उस की लाश कुएं में फेंक दी गई थी और मृतक की आंखों को खुला रखने के लिए ग्लू का इस्तेमाल किया गया था. इस के बाद जब सीमा को वापस हैदराबाद ले जाया जा रहा होता है, तब कमिश्नर अरुण सीमा को सुनील गुप्ते की फोटो दिखाता है. सीमा कहती है कि यह मर्डर भी उसी सीरियल किलर ने किया है. लेकिन मैं इस की सच्चाई केवल तेजस को ही बताऊंगी, क्योंकि इसी बहाने मैं आखिरी बार अपने बेटे को देख तो सकूंगी.

अब अरुण तेजस को सीमा के पास भेजता है तो सीमा उसे बताती है कि एक रात जब वह अपना रेस्टोरेट बंद कर रही थी, तभी सीन फ्लैशबैक में जाता है, जहां जोसेफ एल्पट (शरद जाधव) नाम का एक आदमी सीमा के साथ दुष्कर्म करने के इरादे से वहां पर आ कर सीमा के प्रतिरोध करने पर उसे मारने की कोशिश करता है. अपने बचाव के लिए सीमा वहां पर पड़ी नायलौन की रस्सी से जोसेफ का गला घोंट कर उसे मार डालती है.

फिर सीन वर्तमान में आता है, जहां सीमा तेजस को बताती है कि उस के बाद मेरे पापा आए और उन्होंने जोसेफ की लाश को कुएं में फेंक दिया और कुएं को बंद कर दिया. सीमा आगे बताती है कि उस दिन रात को जोसेफ का बेटा अलेक्स (राज यादव) भी वहां पर था. हालांकि वह काफी छोटा था, लेकिन उस ने इस कत्ल को अपनी आंखों से देखा था, इसीलिए वही अब सीरियल किलर हो सकता है.

सीमा बताती है कि उस के बाद उस ने अलेक्स को अपने पास रख कर अपने बच्चे की तरह उस की परवरिश की थी, क्योंकि उस की तो मां भी नहीं थी. फिर मुझे जेल हो गई तो अलेक्स कहां गया, इस के बारे में मुझे पता नहीं चल सका था. तेजस उस समय तुम भी बहुत छोटे थे. अब तेजस अपने नाना को फोन कर के कहता है कि पहला मर्डर तो नाना आप ने ही छिपाया था. अलेक्स कहां गया बताओ, उस के नाना कहते हैं कि इस के अलावा मेरे पास और कोई आप्शन भी नहीं था. सीमा के जेल जाने के बाद मैं ने अलेक्स को एक अनाथालय में भेज दिया था.

उस के बाद तेजस अनाथालय में जा कर पूछताछ करता है तो वहां का वार्डन तेजस को बताता है कि अलेक्स के पास एक बैग था, जो भी उस को छूता था तो वह मरनेमारने पर उतारू हो जाता था. पता नहीं बैग में वह क्या रखता था? वार्डन बताता है कि फिर वह चोरियां करने लगा. इस के बाद वह कहां गया हमें पता नहीं. परंतु एक साल पहले उस का मुझे फोन आया था, जिस में उस ने बताया कि वह अब एक अच्छा इंसान बन गया है.

इधर तेजस के कहने पर कुएं को खोला जाता है तो उस के अंदर एक कंकाल मिलता है. अलेक्स तन्वी के घर आ कर बताता है कि वह तेजस का बचपन का दोस्त है. ते हैं. तभी तन्वी फोन कर बताती है कि आज उस के पास अलेक्स आया था, जो तुम्हारे और नानाजी के बारे में कुछ बातें बता रहा था. तेजस तुरंत अलेक्स का फोटो तन्वी से ले कर सभी पुलिस स्टेशनों को भेज देता है, ताकि अलेक्स को जल्द से जल्द पकड़ा जा सके.

तेजस को पता चलता है कि अलेक्स एक बार में काम करता है तो वह उस बार में जा कर अलेक्स को गिरफ्तार कर पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन ले आता है. अलेक्स बताता है कि जब मैं ने टीवी पर तुझे देखा तो मुझे अच्छा लगा. साथ ही तू जब अपने घर से आई (मां) को ले कर जा रहा था तो मुझे खुशी हुई कि आई तो जिंदा है, जबकि नानाजी ने मुझे बताया था कि आई मर चुकी है.

जब तेजस बैग में मिली चीजों के बारे में पूछता है तो अलेक्स बताता है कि जब नानाजी आई की मौत की खबर सुना कर मुझे अनाथालय ले जा रहे थे तो मैं ये सब चीजें आई की याद के तौर पर रख ली थीं. सीमा आई तो मेरे दिल के काफी करीब हैं. तभी वहां इंसपेक्टर पल्लवी तेजस को बताती है कि अब तक जितने भी मर्डर हुए हैं, उस में अलेक्स की लोकेशन बार की ही थी यानी कि अलेक्स ने ये खून नहीं किए थे. तेजस अब अलेक्स को रिहा कर देता है.

दूसरे दिन अलेक्स तेजस के घर खाने पर आता है तो तेजस, तन्वी और दिव्या उस से खूब दिल खोल कर बातें करते हैं. जब तन्वी अलेक्स और दिव्या को बातें करते देखती है तो काफी खुश हो जाती है, क्योंकि दिव्या अलेक्स को पसंद करने लगी थी. तभी वहां पर एक पुलिस औफिसर तेजस के लिए एक पार्सल दे कर जाता है. तेजस उसे खोलता है तो उस में एक मोबाइल था, जिस में अब तक के सारे मर्डर्स की फोटो थीं. साथ ही उस में एक परची में लिखा था कि मैं सीमा से बात करना चाहता हूं, इसलिए कल 12 बजे कौल करूंगा.

यह सब देख कर तेजस के होश उड़ जाते हैं कि यह किलर तो सब कुछ जान गया है, इस के बाद यहीं पर चौथा एपिसोड समाप्त हो जाता है. चौथे एपिसोड में भी काफी भटकाव की स्थिति दिखाई दे रही है. तेजस कुएं को खुदवा कर उस में से कंकाल बरामद करवाता है, मगर अपने नाना को गिरफ्तार नहीं करवाता. अलेक्स जब पहली बार तन्वी से मिलता है तो वह अपने मोबाइल से चुपके से अलेक्स का फोटो ले लेती है. यह कहानी भी साफसाफ, मनगढ़ंत सी दिखाई देती है.

एपिसोड नंबर 5

पांचवें एपिसोड का नाम ‘शिष्य’ रखा गया है. एपिसोड की शुरुआत में फ्लैशबैक में 1999 का सीन दिखाते हैं, जहां सुहास (कामरान शाह) नाम का एक छोटा बच्चा सीमा के रेस्टोरेंट में खाना खाने आता है. सीमा देखती है कि सुहास को उस के पिता (श्रीरंग गोखले) डांटते हुए प्रताडि़त करते हुए जबरदस्ती खाना खिला रहे हैं. जब सुहास के पेरेंट्स हाथ धोने चले जाते हैं तो सीमा सुहास से पूछती है कि मुझे बताओ क्या बात है. तब नन्हा सुहास अपने शरीर पर चोटों के निशान दिखाते हुए कहता है कि मेरे पापा बुरे हैं, मेरी बुरी तरह पिटाई करते हैं.

अब रात को सीमा अपनी एक ब्लैक ड्रेस पहनती है और सुहास के घर आ कर उस के पिता का नायलौन की रस्सी से गला घोंट कर मर्डर कर देती है और लाश को शीशे के सामने रख देती है. यही नहीं, वह करीब 2 घंटे तक लाश के पास लाश के अकडऩे का इंतजार भी करती है और फिर लाश अकडऩे पर उस की आंखें खोल कर चली जाती है. हानिया को पार्सल में जो मोबाइल मिला था, तेजस अब उस का पता करने को कहता है. दोपहर को एक बजे उसी फोन पर किलर का फोन सीमा के लिए आता है. तेजस मोबाइल का स्पीकर औन कर देता है और किलर का औन कौल ट्रैस पर लगा देता है. किलर सीमा से कहता है कि आप मेरी गुरु हैं और मैं आप का शिष्य हूं.

सीमा उस से पूछती है कि तुम 4 लोगों को तो मार ही चुके हो, अब पांचवां कौन है? इस पर किलर कहता है कि इस का आप को जल्द ही पता चल जाएगा और किलर फिर फोन काट देता है. सीमा बताती है कि मुझे ये लगता है कि यह किलर आदमी नहीं, बल्कि एक औरत हो सकती है. सीन अब चेंज होता है. किलर ने एक डेंटिस्ट महेंद्र तोपार्देकर (सुदर्शन पाटिल) को अपना नया टारगेट बना कर रस्सी से बांधा हुआ था. किलर अब उसी फोन पर वीडियो कौल कर के वही दृश्य सीमा को फोन पर दिखाते हुए कहता है कि अब आप ये मर्डर अपनी आंखों से देख पाएंगी.

तेजस जल्दी से वहां के दृश्य से उस जगह का पता लगा लेता है. वह अब अपनी टीम ले कर शौप पर निकलता है. इधर सीमा किलर को अपनी बातों में उलझा कर तरहतरह के सवाल पूछने लग जाती है. अब किलर जैसे ही उस डेंटिस्ट का नायलौन की रस्सी से गला घोंट रहा होता है, वैसे ही तेजस हाथ में पिस्टल ले कर उसी शौप पर पहुंच जाता है. तेजस को देखते ही किलर भागता है और भागते हुए तेजस पर वार कर के उसे बेहोश कर देता है, पर उस डेंटिस्ट महेंद्र की जान बच जाती है.

उस के बाद तेजस फोन कर के सीमा को बताता है कि वह सेफ है. तब सीमा कहती है कि जब किलर मुझे लाइव मर्डर दिखा रहा था तो वही गाना गुनगुना रहा था, जो मैं ने सुहास के पिता का मर्डर करते समय गुनगुनाया था. इस का मतलब यही है कि बचपन में उस समय सुहास ने ही मुझे अपने पापा का मर्डर करते देख लिया होगा. शायद यह किलर सुहास ही हो सकता है. इस के बाद तेजस उसी डेंटिस्ट महेंद्र के पास आता है, जो हौस्पिटल में भरती था, तब डेंटिस्ट महेंद्र बताता है कि वह किलर एक लड़की है. एक बार मुझे वह एक बार में मिली थी. हम ने काफी देर तक एकदूसरे से प्यार भरी बातें कीं. उस के बाद मैं उसे अपने रूम में ले कर आ गया. हम ने आपस में किस किए.

जैसे ही हम अब कुछ आगे और करना चाहते थे, मुझे ऐसा लगा उस के बौडी पार्ट कुछ अलग थे. मैं समझ गया कि उस ने सर्जरी करा रखी है तो मैं ने उसे अपने घर से जाने के लिए कह दिया. वह पहले एक लड़का था, जो बाद में सर्जरी करा कर शैफाली बन गई थी. अब तेजस पुलिस टीम के पास आ कर ये सारी बातें सीमा को बता देता है. तभी दोपहर के 12 बजे का समय हो जाता है और किलर का फोन सीमा के लिए आता है तो सीमा कहती है सुहास तुम कैसे हो?

जिस पर किलर कहता है कि अच्छा तुम अब मेरे बारे में जान गई हो, लेकिन तुम ने मुझे धोखा क्यों दिया जो पुलिस मेरे पीछे आ गई. सीमा कहती है कि तुम ऐसे किसी को जान से मत मारो, जिस की कोई गलती ही न हो. मुझे ऐसे सनकी किलर पसंद नहीं हैं. जिस पर सुहास कहता है कि मैं ने आप के लिए आज तक काफी कुछ किया है, जिस के कारण आज तुम्हारा परिवार एक हो पाया है और अब तुम्हीं मुझ से बात करने के लिए मना कर रही हो. अब आप ने मुझे गुस्सा दिला दिया है तो मैं आप के बेटे की खुशियां छीन लूंगी, यह कहते हुए सुहास फोन काट देता है.

अब सीमा सोचने लगती है कि सुहास ने अब तक तेजस के लिए क्याक्या किया होगा. उधर तेजस भी यही सोच रहा था कि आखिर ये है कौन, जो मुझे इतनी अच्छी तरह से जानता है और मेरी खुशियां छीन सकता है. यहीं पर पांचवां एपिसोड खत्म हो जाता है. पांचवें एपिसोड में भी कहानी को भटकाने की कोशिश की गई है, जिस के कारण नाटकीयता साफसाफ झलक रही है. सीमा जब सुहास के पिता का मर्डर करने आती है तो सुहास और उस की मां को कहीं भी नहीं दिखाया गया है और वह मर्डर करने के बाद पूरे 2 घंटे तक लाश के पास बैठ कर लाश के अकडऩे का इंतजार करती है. यह बात तो समझ से ही परे है.

एपिसोड नंबर 6

छठे और आखिरी एपिसोड का नाम ‘द फाइनल जजमेंट’ रखा गया है. एपिसोड की शुरुआत में हम फ्लैशबैक में देखते हैं कि सुहास जब छोटा होता है तो वह अपने पापा की मौत के बाद खुशीखुशी अपना लड़कियों की तरह होने पर लिपिस्टिक लगा कर प्रचार करता है. पर उसे जैसे ही पता चलता है कि सीमा की मौत हो गई है तो वह बहुत दुखी हो कर रोने लगता है.

बड़ा होते ही सुहास अपनी मां को वृद्धाश्रम में छोड़ कर आता है और फिर अपना घर बेच कर उस पैसे से अपना सैक्स मैडिकली चेंज करा कर लड़की बन जाता है. फिर हम दिव्या (निमिशा नायर) को देखते हैं जो सुहास नहीं बल्कि दिव्या बन चुकी थी और अब तक ये मर्डर दिव्या ही कर रही थी. इधर तेजस तन्वी को फोन कर के सेफ रहने को कहता है, तभी वहां पर दिव्या आ कर तन्वी को किडनैप कर ले जाती है. यह सारी बातें फोन पर तेजस सुन लेता है और पुलिस टीम को दिव्या के घर पूरी तहकीकात करने भेजता है. लेकिन दिव्या के घर पुलिस टीम को कुछ भी नहीं मिलता है.

सीमा दिव्या से कहती है कि तुम मेरे परिवार को नुकसान मत पहुंचाओ, मैं तुम से सीधे मिल लूंगी, लेकिन इस के बदले में तुम्हें तन्वी को रिहा करना होगा. दिव्या मान जाती है और सीमा को एक मौल का एड्रेस दे कर उसे वहां बुलाती है. तेजस कहता है कि दिव्या साइको है, तुम्हें मार भी सकती है, मगर सीमा कमिश्नर अरुण की परमिशन ले कर वहां जाने की ठान लेती है. इधर इंसपेक्टर पल्लवी को लगता है कि यहां पर सीमा दिव्या से मिली हुई हो सकती है.

तेजस भी अपनी पुलिस टीम के साथ उस मौल में पहुंचता है तो दिव्या तेजस को फोन कर के फोन सीमा को देने के लिए कहती है और कहती है कि यदि कोई भी सीमा के पीछे आएगा तो इस से तन्वी की जान जा सकती है. लेकिन तेजस खुद न जा कर अपनी पुलिस टीम के कुछ साथियों को सीमा के पीछे लगा देता है. मगर दिव्या तेजस से कई कदम आगे थी, वह सीमा को इधरउधर रास्तों से एक जगह बुला कर उस के हाथों में हथकड़ी लगा कर तन्वी को छोड़ देती है. जिस के बाद दिव्या निकल जाती है. तेजस उसे पकड़ नहीं पाता.

तन्वी को देख कर तेजस की जान में जान आ जाती है. अब दिव्या सीमा को वहीं पर ले कर आती है, जहां पर उस ने तन्वी को पहले कैद कर के रखा था. फिर तन्वी तेजस को बताती है कि दिव्या ने उसे जहां कैद किया था, वहां पर जेलो कंपनी के बौक्स रखे थे. तेजस हानिया से जेलो कंपनी के पुराने औफिस का पता करने को कहता है. इधर दिव्या सीमा को बताती है कि जब आप के मरने की खबर आई थी तो मैं बहुत रोई थी. फिर वह उसे अपना जेंडर चेंज करने की कहानी बताती है.

दूसरी ओर तेजस को दिव्या की लोकेशन पता चल जाती है तो वह दिव्या को पकडऩे आता है. लेकिन दिव्या भागने लगती है, तब तेजस दिव्या के कंधे पर गोली मार देता है. वहीं हम देखते हैं कि सीमा मौका देख कर वहां से भाग जाती है. अब हौस्पिटल में तेजस दिव्या से सीमा के बारे में पूछता है तो वह बताती है कि वह अपना एक पुराना बदला लेने गई है. अब हमें फ्लैशबैक में दिखाया जाता है कि जब सीमा छोटी थी, तब एक दिन उस के पापा दीनानाथ (प्रदीप वेलंकर) ने कमरे में ले जा कर उस के साथ दुष्कर्म किया था. यह लगभग काफी दिनों तक होता रहा.

जब सीमा की मां (वैभवी सबा) ने इस का विरोध किया तो सीमा के पापा ने मां को उस के सामने ही मार डाला था. अब सीमा वर्तमान में दीनानाथ के पास पहुंचती है तो वह अपने पापा से कहती है पहले तो मैं सब कुछ भूल गई थी, मगर काउंसलिंग के बाद मुझे सब कुछ याद आ गया है, इसलिए मैं तुम्हें ही मारने आई हूं. सीमा अपने पापा को मारने वाली होती है कि तभी वहां तेजस आ जाता है तो वह अब खुद अपने नाना को मारना चाहता था, क्योंकि उस ने भी काउंसलिंग वाली फाइल पढ़ ली थी.

तब सीमा कहती है कि तेजस, इसे तुम मत मारो, इसे तो मेरे हाथों से ही मरना चाहिए. यह सुन कर तेजस अपनी मां को सीने से लगा कर रोने लगता है. तभी उस के नाना अपनी पुरानी करतूत से आहत हो कर छत से कूद कर अपनी जान दे देते हैं. फिर यह केस बंद हो जाता है. अब सीमा को हैदराबाद जेल वापस भेजा जा रहा है, क्योंकि अब सीमा का बदला भी पूरा हो गया था और किलर भी पकड़ा जा चुका था. सीमा कमिश्नर अरुण को धन्यवाद देती है कि उन के कारण ही वह अपने बेटे तेजस से मिल पाई थी.

ये लोग अब गाड़ी में आगे जाने लगते हैं तो हम देखते हैं कि आधे रास्ते में आ कर तेजस की गाड़ी अचानक से कहीं गायब हो जाती है, तभी वहां पर इंसपेक्टर ओमकार अपनी गाड़ी से आता है तो देखता है कि तेजस अपनी गाड़ी में बंघा पड़ा था. तेजस ओमकार से कहता है कि मेरी पिस्टल सीमा ने छीन ली और मुझे यहां बांध कर न जाने कहां फरार गई, इसलिए जल्दी जा कर उसे ढूंढो. वहीं अब हम सीमा को देखते हैं जो बस में बैठ कर कहीं जा रही थी. यहां पर वेब सीरीज ‘मिसेज देशपांडे’ समाप्त हो जाती है.

छठे एपिसोड में भी लेखक ने कहानी में काफी भटकाव दिखाए हैं. सुहास को यह बात भला कैसे चली थी कि सीमा की मौत हो चुकी है. तेजस को इस बात का बिलकुल भी शक दिव्या पर नहीं होता, जबकि छठे एपिसोड तक आतेआते दर्शक समझ चुके थे कि कातिल दिव्या ही हो सकती है. यदि पूरी वेब सीरीज की बात करें तो इस के निर्माण में संदिग्धों को बड़े अजीबोगरीब तरीके से पेश किया गया है, जिस से कोई भी तुरंत समझ जाता है कि यह कहानी दर्शकों को वेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है.

माधुरी दीक्षित

सुप्रसिद्ध अभिनेत्री और कुशल नृत्यांगना माधुरी दीक्षित का जन्म 15 मई, 1967 को मुंबई (महाराष्ट्र) में हुआ था. पिता शंकर दीक्षित और मम्मी स्नेहलता दीक्षित की लाडली बेटी माधुरी की इच्छा बचपन से ही डौक्टर बनने की थी. शायद यही वजह रही थी कि माधुरी ने अपना जीवनसाथी डा. श्रीराम नेने को चुना. मुंबई के डिवाइन चाइल्ड हाईस्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद माधुरी दीक्षित ने मुंबई यूनिवर्सिटी से स्नातक की शिक्षा पूरी की.

माधुरी दीक्षित हिंदी सिनेमा की सफल अभिनेत्री रही है. माधुरी ने अपने अभिनय करिअर की शुरुआत सन 1984 में ‘अबोध’ फिल्म से की थी. किंतु माधुरी को असली पहचान वर्ष 1998 में आई प्रसिद्ध फिल्म ‘तेजाब’ से मिली, जिस के बाद उस ने मुड़ कर नहीं देखा. एक के बाद एक सुपरहिट फिल्मों के कारवां ने माधुरी को भारतीय सिनेमा की सर्वोच्च अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया. इस की प्रमुख फिल्में ‘राम लखन’, ‘परिंदा’, ‘त्रिदेव’, ‘किशन कन्हैया’, ‘दिल’, ‘प्रहार’ आदि रही हैं.

माधुरी दीक्षित को फिल्म ‘दिल’, ‘बेटा’, ‘हम आप के हैं कौन’, ‘दिल तो पागल है’ के लिए फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार और वर्ष 2003 में फिल्म ‘देवदास’ के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. वर्ष 2008 में माधुरी दीक्षित को भारत सरकार के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया.

माधुरी दीक्षित का विवाह 1999 में डा. श्रीराम माधव नेने से हुआ था. इन के 2 बेटे हैं. माधुरी दीक्षित ने वेब सीरीज ‘मिसेज देशपांडे’ से पहले वेब सीरीज ‘द फेम गेम’ (2022 नेटफ्लिक्स) और ‘मजा मां’ (2022 अमेजन प्राइम वीडियो) में काम किया है.

सिद्धार्थ चांदेकर

वेब सीरीज ‘श्रीमती देशपांडे’ में सीमा (माधुरी दीक्षित) के बेटे की भूमिका एसीपी तेजस खड़के निभाने वाले प्रसिद्ध अभिनेता सिद्धार्थ चांदेकर का जन्म 14 जून, 1991 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था. सिद्धार्थ की मम्मी का नाम सीमा चांदेकर है, जो मराठी फिल्मों की अभिनेत्री रही हैं. सिद्धार्थ ने अपनी स्कूली शिक्षा पुणे के एस.डी. कटारिया हाईस्कूल से पूरी की थी. उस के बाद उस ने पुणे के सर परशुरामभाऊ कालेज से स्नातक की शिक्षा पूरी की. सिद्धार्थ के अभिनय करिअर की शुरुआत वर्ष 2007 में हिंदी फिल्म ‘हम ने जीना सीख लिया’ से हुई थी. हालांकि यह फिल्म फ्लौप रही थी, लेकिन सिद्धार्थ ने हार नहीं मानी.

इस के बाद सिद्धार्थ ने लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘अग्निहोत्र’ से मराठी सिनेमा में पदार्पण किया. उस के बाद अवधूत गुप्ते की मराठी फिल्म ‘जैदा’ में उमेश जगताप की भूमिका निभाई, जो काफी पसंद की गई. सिद्धार्थ को ब्लौकबस्टर फिल्म ‘क्लासमेट्स’ में अनी के किरदार से सब से ज्यादा जाना जाता है. 2014 में उस ने अजय नाइक की फिल्म ‘बावरे प्रेम’ में उर्मिला कानिकटर के साथ अभिनय किया.

वर्ष 2016 में आई भारतीय मराठी भाषा की बायोपिक ‘वजंदर’, जिस का निर्देशन सचिन कुंडलकर ने किया था, में सिद्धार्थ ने आलोक का किरदार निभाया था. सिद्धार्थ ने रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘औनलाइन बिनलाइन’ फिल्म ‘लास्ट ऐंड फाउंड’, और ‘बसस्टौप’ में भी काम किया है.

सिद्धार्थ और मराठी फिल्मों की अभिनेत्री मिताली की शादी को मराठी सिनेमा जगत की अब तक की सब से भव्य शादी माना गया. इस जोड़े ने शाही अंदाज में अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत की. पुणे के पास ढेपेवाडा में हुई यह शादी बेहद खूबसूरत थी, समारोह काफी भव्य था. सिद्धार्थ वेब सीरीज ‘माया नगरी: सिटी औफ ड्रीम्स’, ‘अंधातरी’, ‘जीवलगा’ और ‘मारू कंफ्यूज्ड मैन’ नामक मराठी हिंदी वेब सीरीजों में काम कर चुका है. Web Series

 

 

Hindi True Crime: कंटीली राह का राही

Hindi True Crime: शादीशुदा होते हुए भी धर्मवीर बाजारू औरतों के पास जाता था. इस से खफा हो कर उस की बीवी भी मायके चली गई. फिर एक दिन उस का यही शौक उस के लिए जानलेवा साबित हुआ.

गोरखपुर राजकीय रेलवे पुलिस के थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी को उन के एक खास मुखबिर ने सूचना दी कि पुराना पार्सल गेट नंबर-6 पर स्थित आरपीएफ मालखाने के पास एक युवक लहूलुहान पड़ा तड़प रहा है. थानाप्रभारी ने टाइम देखा तो उस समय रात के करीब 10 बज रहे थे. यह सूचना मिलते ही वह उसी समय पुलिस टीम के साथ मुखबिर द्वारा बताई जगह पर पहुंच गए. स्ट्रीट लाइट की रोशनी में वहां सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था. एक युवक पेट के बल खून से लथपथ पड़ा था. पास जा कर देखा तो पता चला कि उस की दाहिनी कनपटी पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था.

पास ही एक बड़ा पत्थर पड़ा था जिस पर ताजा खून लगा था. लग रहा था कि हत्यारों ने इसी पत्थर से उस के ऊपर वार किया था. मौके पर शराब की 2 खाली शीशियां भी पड़ी थीं. पुलिस ने युवक की जामातलाशी ली तो उस की पैंट की जेब से एक कागज की परची मिली. उस परची पर एक मोबाइल नंबर और एक बैंक का खाता नंबर लिखा था. पुलिस ने उन सबूतों को अपने कब्जे में ले लिया. युवक का जिस्म अभी भी गरम था. उस की सांसें भी चल रही थीं. रेलवे के नियम के अनुसार रेलवे परिक्षेत्र में हुई घटना, दुर्घटना के घायलों को आरपीएफ के जवान ही अस्पताल ले जाते हैं, इसलिए थानाप्रभारी ने आरपीएफ को घटना की सूचना दे दी.

सूचना पा कर आरपीएफ के 2 जवान मौके पर पहुंचे और गंभीर रूप से घायल युवक को टैंपो से नेताजी सुभाषचंद्र बोस जिला अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने युवक को मृत घोषित कर दिया. इस के बाद थानाप्रभारी गिरिजा शंकर त्रिपाठी ने जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भेज दिया. यह बात 31 अक्तूबर, 2014 की है. मृतक कौन था और कहां का रहने वाला था, पुलिस के पास इस की कोई जानकारी नहीं थी. मृतक के पास से जो परची मिली थी, उस पर लिखे फोन नंबर को थानाप्रभारी ने अपने फोन से रात में ही मिलाया. दूसरी ओर से काल किसी पुरुष ने रिसीव की. उस ने पूछा, ‘‘हैलो, कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘मैं गोरखपुर जीआरपी थाने से इंसपेक्टर गिरिजाशंकर त्रिपाठी बोल रहा हूं.’’ थानाप्रभारी ने अपना परिचय देने के बाद उस से पूछा, ‘‘क्या मैं जान सकता हूं कि तुम कौन बोल रहे हो और कहां रहते हो?’’

‘‘सर, मैं गोरखपुर से धर्मेश उपाध्याय बोल रहा हूं.’’ पुलिस का नाम सुनते ही धर्मेश की आंखों से नींद गायब हो गई, ‘‘क्या बात है सर, इतनी रात गए…’’

‘‘यह नंबर तुम्हारा ही है?’’ उस की बात बीच में काट कर इंसपेक्टर त्रिपाठी ने सवाल किया.

‘‘जी हां, यह मेरा ही नंबर है.’’ धर्मेश ने जवाब दिया.

‘‘हमें मालखाने के पास एक युवक घायलावस्था में मिला था. उसी की जेब से मिली परची पर यह नंबर लिखा था. तुम अस्पताल आ कर उस युवक को देख लो कि कहीं वह तुम्हारा कोई परिचित तो नहीं है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

धर्मेश का बड़ा भाई धर्मवीर कई दिनों से घर से निकला हुआ था. यह बात थानाप्रभारी को बताते हुए उस ने उन से घायल मिले युवक की कदकाठी और कपड़ों के बारे में पूछा तो थानाप्रभारी ने घायल युवक का जो हुलिया बताया, वह उस के भाई धर्मवीर से मेल खा रहा था. उसे चिंता होने लगी. यह बात उस ने दूसरे कमरे में सो रहे पिता प्रेमनारायण उपाध्याय को बताई तो उन की नींद भी हराम हो गई. थानाप्रभारी ने धर्मेश को उस युवक की मौत की खबर नहीं दी थी, ताकि घर वाले रात में परेशान न हों. लेकिन घर वालों की नींद तो गायब हो चुकी थी. बेटे की फिक्र में प्रेमनारायण का बदन कांपने लगा. धर्मेश का गांव डिगुलपुर जिला मुख्यालय से दूर था.

वहां से जिला अस्पताल जाने के लिए कोई साधन नहीं था, इसलिए भोर होते ही वह पिता के साथ गोरखपुर के लिए निकल पड़ा. रास्ते भर दोनों धर्मवीर की सलामती के लिए प्रार्थना करते रहे. सुबह 8 बजे तक दोनों गोरखपुर के थाना जीआरपी पहुंचे. थानाप्रभारी ने मृतक युवक के कपड़े उन्हें दिखाए तो कपड़े देखते ही दोनों रोने लगे. कपड़े धर्मवीर उपाध्याय के ही थे. मैडिकल कालेज ले जा कर जब उन्हें लाश दिखाई गई तो उन्होंने उस की पुष्टि धर्मवीर उपाध्याय के रूप में कर दी. शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस ने राहत की सांस ली. थानाप्रभारी गिरिजाशंकर त्रिपाठी ने प्रेमनारायण और उन के बेटे धर्मेश से बात की तो उन्होंने बताया कि धर्मवीर की हत्या महराजगंज के सुभाष पांडेय और कुशीनगर के संत यादव ने की होगी.

धर्मेश ने इन दोनों के खिलाफ थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी. नामजद मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस ने दोनों की तलाश में उसी शाम उन के घरों पर दबिश डाली तो दोनों आरोपी अपनेअपने घरों से दबोच लिए गए. दोनों को पुलिस गोरखपुर ले आई. दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो वे खुद को निर्दोष बताते हुए धर्मवीर की हत्या से साफ इनकार करते रहे. पूछताछ के बाद पता चला कि संत यादव कुशीनगर जिले के कसया कस्बे का बड़ा व्यवसाई था. उस के पास कई ट्रक थे. सुभाष पांडेय उस का बिजनैस पार्टनर था. घटना से करीब 15-20 दिनों पहले ही धर्मवीर उपाध्याय किसी परिचित के माध्यम से संत यादव के संपर्क में आया था.

धर्मवीर उपाध्याय गोरखपुर के सिकरीगंज इलाके डिगुलपुर गांव के रहने वाले प्रेमनारायण उपाध्याय का बड़ा बेटा था. प्रेमनारायण सीआरपीएफ के जवान थे, जो 2 साल पहले रिटायर हुए थे. धर्मवीर के अलावा उन का एक और बेटा धर्मेश था. संत यादव को ड्राइवर की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने उसे अपने यहां नौकरी पर रख लिया था. अक्तूबर 2014 में संत यादव ने उसे सामान से भरा ट्रक ले कर असम भेजा था. धर्मवीर सामान ले कर असम पहुंचा. लौटते समय उसे वहां से 67 हजार रुपए भाड़ा मिला. असम से वापस लौटते समय धर्मवीर की संत यादव से बातचीत भी हुई थी, तब उस ने भाड़े के 67 हजार रुपए मिलने की बात बता दी थी. लेकिन हफ्ते भर बाद भी वह गोरखपुर नहीं पहुंचा तो संत यादव को चिंता हुई.

उस ने धर्मवीर को फोन किया, पर उस का फोन लगातार स्विच्ड औफ मिला. कई दिनों बाद भी जब उस का धर्मवीर से संपर्क नहीं हुआ तो उस के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. इस के बाद संत यादव को विश्वास हो गया कि धर्मवीर ने उस के साथ बड़ा धोखा किया है. वह ट्रक और रुपए दोनों ले कर चंपत हो गया है. उस ने अपने स्तर पर उस का पता लगाना शुरू किया. कई दिनों बाद उसे ट्रक के बारे में पता चल गया. ट्रक बिहार के आरा जिले में लावारिस हालत में खड़ा था. आरा पहुंच कर संत यादव ट्रक ले कर वापस आ गया. उसे इस बात का शक होने लगा कि कहीं किसी ने धर्मवीर की हत्या तो नहीं कर दी.

इसी बीच धर्मवीर के घर वालों को उस की हत्या की जानकारी मिल गई. धर्मवीर के घर वालों को संत यादव और उस के साथी सुभाष पर ही शक हुआ. इसी शक के आधार पर धर्मेश ने दोनों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज करवाया था. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को भी लगने लगा कि पैसों के विवाद में ही इन दोनों ने मिल कर धर्मवीर की हत्या कर दी होगी. सच उगलवाने के लिए पुलिस कई दिनों तक उन से सख्ती से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस उन दोनों से कोई ठोस जानकारी नहीं उगलवा पाई. तब पुलिस ने हिदायत दे कर उन्हें छोड़ दिया.

इस केस की मौनिटरिंग कार्यवाहक रेलवे पुलिस उपाधीक्षक नम्रता श्रीवास्तव कर रही थीं. उन्होंने इस केस को खोलने में लगी टीम की बैठक बुलाई. बैठक में हत्या के विभिन्न कोणों पर रोशनी डाली गई. बैठक में धर्मवीर के पारिवारिक पहलुओं पर जांच केंद्रित करने का फैसला किया गया. पुलिस ने जांच की गई तो पता चला कि धर्मवीर और उस की पत्नी मनीषा के रिश्तों के बीच काफी गहरी खाई है. मनीषा अपनी तीनों बेटियों को ले कर महराजगंज के फरेंदा गांव स्थित अपने मायके में रह रही थी. पुलिस को एक और चौंका देने वाली सूचना मुखबिर से मिली कि मनीषा की बुआ का बेटा पूना में रहता था.

वह क्रिमिनल था. पुलिस का ध्यान इसी बात पर गया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मनीषा ने उसी की मदद से पति को ठिकाने लगवा दिया हो? यानी कुल मिला कर पुलिस के शक की सूई मनीषा की तरफ घूम गई. शक के आधार पर पुलिस ने मनीषा से कई चक्र में पूछताछ की, लेकिन इस पूछताछ से भी कोई हल नहीं निकला. पुलिस की जांच में वह भी बेकसूर दिखी. पुलिस की जांच जहां से चली थी, वहीं फिर आ कर रुक गई. पुलिस को उस की कालडिटेल्स से काफी उम्मीद बंधी थी. धर्मवीर की कालडिटेल्स पुलिस चेक कर चुकी थी, उस से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली.

पुलिस को सारी उम्मीदों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा था. थानाप्रभारी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि धर्मवीर की हत्या किस ने और क्यों की? एक दिन थानाप्रभारी अपने कक्ष में बैठे इसी घटना पर मंथन कर रहे थे. उसी समय उन के दिमाग में एक आइडिया आया. उसी आइडिया को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जिस जगह पर धर्मवीर की हत्या हुई थी, उस इलाके में उस दिन सक्रिय रहे मोबाइल नंबरों की जानकारी निकलवाई. पता चला कि उस दिन उस इलाके के फोन टावर के संपर्क में 35 हजार फोन नंबर आए थे. अब इतने नंबरों में से कातिल का नंबर ढूंढना आसान नहीं था. फिर भी उन्होंने अपनी टीम से उन सभी नंबरों का विश्लेषण कराया.

कई महीने की कड़ी मशक्कत के बाद उन नंबरों में से 4 नंबर संदिग्ध निकले. उन नंबरों की जांच की गई तो वे चारों नंबर स्विच्ड औफ मिले. उन नंबरों को पुलिस ने जांच के दायरे में ले लिया. इस बीच थानाप्रभारी एक बार फिर धर्मवीर के गांव डिगुलपुर पहुंचे. लोगों से बात करने पर उन्हें पता चला कि धर्मवीर शराबी तो था ही, अय्याश प्रवृत्ति का भी था. यह जानकारी उन के लिए अहम साबित हुई. छानबीन कर के वह गोरखपुर वापस लौट आए. इसी बीच मुखबिर ने उन्हें एक चौंका देने वाली सूचना दी. मुखबिर ने उन चारों संदिग्ध नंबरों को देख कर बताया कि उन में से एक नंबर कुशमिला उर्फ मुसकान नामक युवती का है. मुसकान कालगर्ल थी. उस का धंधा स्टेशन के इर्दगिर्द चलता था और घटना के बाद से वह गायब थी.

पुलिस ने मुसकान के फोन नंबर की जांच की तो पता चला कि उस ने अपना सिम फरजी आईडी पर लिया था, इसलिए पुलिस उस के ठिकाने तक नहीं पहुंच सकी. घटना को हुए 10 महीने बीत चुके थे, लेकिन पुलिस हत्यारों का पता तक नहीं लगा पाई थी. शक की सूई मुसकान पर थी, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. पुलिस ने उस के नंबर को सर्विलांस पर लगा रखा था. अगस्त, 2015 में जैसे ही उस ने अपना फोन नंबर औन किया, तभी सर्विलांस से उस की लोकेशन बिहार के बेतिया जिले की आई. पुलिस ने कई दिनों तक उस के फोन पर होने वाली बातें सुनीं.

बातचीत के दौरान एक बार मुसकान के मुंह से गोरखपुर में मालखाने के पास एक युवक की हत्या करने की बात निकल गई. इस के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि धर्मवीर की हत्या में उस का हाथ है. उस के बाद पुलिस ने मुसकान की गिरफ्तारी की योजना बनाई. गुपचुप तरीके से गोरखपुर पुलिस बिहार के पश्चिमी चंपारण के बेतिया जिला पहुंची. स्थानीय पुलिस के सहयोग से गोरखपुर पुलिस ने पता लगा लिया कि मुसकान बेतिया में एक आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करती है. पुलिस ने उस आर्केस्ट्रा कंपनी में दबिश दी. वहां जा कर पता चला कि वह तो 2 दिन पहले ही गोरखपुर चली गई. लिहाजा पुलिस खाली हाथ वापस लौट आई.

13 अगस्त, 2015 को सुबहसुबह एक मुखबिर ने इंसपेक्टर गिरिजा शंकर त्रिपाठी को फोन कर के सूचना दी कि पुराने पार्सल गेट पर मुसकान अपने एक साथी के साथ खड़ी है. वह कहीं भागने की फिराक में है. सूचना पक्की और बेहद महत्त्वपूर्ण थी, इंसपेक्टर त्रिपाठी बगैर देर किए घर से निकल लिए. जिस समय खबरी का फोन उन के पास आया था, उस समय वह घर से कार्यालय आने के लिए तैयार हो रहे थे. सूचना मिलने के 10 मिनट बाद वह थाने पहुंच गए. घर से निकलने से पहले उन्होंने टीम के सदस्यों को थाने में पहुंचने के लिए कह दिया था. थाने पहुंचते ही उन्हें एसएसआई सुधीर कुमार, एसआई राघवेंद्र मिश्र, हरीश तिवारी, हेडकांस्टेबल किसलय मिश्र, कांस्टेबल रणजीत पांडेय, अनिल कुमार, विजय सिंह, अभय पांडेय, संजय सिंह, संदीप यादव और महिला कांस्टेबल शीला गौड़ तैयार मिलीं.

टीम को ले कर वह पुराना पार्सल गेट नंबर 6 पर पहुंच गए. पुलिस ने गेट को चारों ओर से घेर लिया. पुलिस को देख कर मुसकान डर गई. उस ने वहां से खिसकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया. उसे और उस के साथी को गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. पूछताछ में पता चला कि उस के साथ वाले युवक का नाम विजय पांडेय है. पुलिस ने उन से धर्मवीर उपाध्याय की हत्या किए जाने की वजह पूछी तो बिना किसी हीलाहवाली के दोनों ने अपना इकबालिया जुर्म कबूल करते हुए कहा कि उन्होंने ही धर्मवीर की हत्या की थी. घटना को अंजाम देने में उन के 2 और साथी विकास कुमार उर्फ मुकेश और सुमेर कुमार उर्फ समीर भी शामिल थे.

फिर मुसकान और विकास ने पुलिस के सामने रोंगटे खड़े कर देने वाली जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के गांव डिगुलपुर के रहने वाले प्रेमनारायण उपाध्याय सीआरपीएफ में नौकरी करते थे. वह 2 साल पहले ही नौकरी से रिटायर हुए थे. उन के 2 बेटे थे धर्मवीर और धर्मेश. धर्मवीर गांव के आवारा लड़कों के साथ रह कर बिगड़ गया था. तब उन्होंने यह सोच कर महराजगंज के फरेंदा की मनीषा के साथ उस की शादी कर दी कि गृहस्थी में फंस कर वह सुधर जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह बात 15 साल पहले की है.

शादी के बाद भी उस के चालचलन में कोई तब्दीली नहीं आई. आवारा दोस्तों के साथ घूमनेफिरने, शराब पीने की उस की आदत नहीं गई. मनीषा ने उसे समझाया भी, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. ऐसे में मनीषा के सामने आंसू बहाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा था. ऐसे शख्स से शादी कर के उस के सारे सपने रेत के ढेर की तरह ढह गए थे. इसी दौरान धर्मवीर ने ड्राइविंग सीख ली. वह ट्रक चलाने लगा. ट्रक ले कर वह जब भी बाहर जाता, 2-3 महीने बाद ही घर लौटता. इतने दिनों बाद घर लौटने पर भी वह परिवार के साथ कम यारदोस्तों के संग ज्यादा समय बिताता था. दोस्तों में ही कमा कर लाए हुए अधिकांश पैसे खर्च कर देता था. उस की इस आदत से उस के मांबाप ही नहीं, सासससुर भी चिंतित रहते थे.

इसी तरह शादी के 5-6 साल बीत गए. मनीषा भी 3 बेटियों की मां बन गई. मनीषा पति से नाखुश रहती थी. बच्चों के भविष्य की चिंता मनीषा को रहती थी. एक दिन वह तीनों बेटियों को ले कर ससुराल से मायके आ गई. धर्मवीर को जब यह पता चला तो वह गुस्से से पागल हो उठा. वह ससुराल पहुंच गया और पत्नी से लड़नेझगड़ने लगा. उस ने पत्नी को लाने के लिए काफी मिन्नतें कीं. लेकिन मनीषा ने ससुराल लौटने से साफ मना कर दिया. धर्मवीर ने ऐसा कई बार किया, पर मनीषा नहीं आई. 23-24 अक्तूबर, 2014 को धर्मवीर सामान से लदा ट्रक ले कर असम पहुंच गया था. सामान डिलीवरी करने के बाद उसे वहां से भाड़े के 67 हजार रुपए मिले.

एक साथ इतनी बड़ी रकम देखते ही धर्मवीर की नीयत डोल गई. ट्रक मालिक संत यादव ने जब भाड़े के बारे में उस से पूछा तो उस ने भाड़ा मिलने की बात बता दी. उस के बाद धर्मवीर ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर के रख दिया और ट्रक बिहार के आरा जिले में छोड़ कर ट्रेन से गोरखपुर आ गया. जब हफ्ते भर बाद भी धर्मवीर संत यादव के पास नहीं पहुंचा तो वह समझ गया कि धर्मवीर ने उस के साथ धोखा किया है. उधर रुपए ले कर धर्मवीर गोरखपुर के रास्ते अपनी ससुराल पहुंच गया. वह 1-2 दिन ससुराल में रुका. बच्चों और पत्नी को खुश करने के लिए खूब पैसे खर्च किए.

उस के बाद वहां से अपने साढ़ू के यहां महराजगंज चला गया. 2 दिन साढ़ू के यहां रुक कर 31 अक्तूबर, 2014 को शाम 6 बजे के करीब वह गोरखपुर पहुंच गया. उस समय उस के पास 40 हजार रुपए बचे थे. बाकी के 27 हजार रुपए वह खर्च कर चुका था. इधरउधर समय बिताने के बाद धर्मवीर साढ़े 9 बजे स्टेशन पहुंचा. वह अय्याश तो था ही, इसलिए वह यह भी जानता था कि उसे जिस चीज की तलाश है, वह यहीं मिलेगी. पैदल टहलते हुए वह पुराना पार्सल गेट नंबर-6 पहुंचा. वहां उसे 22 वर्षीय मुसकान मिली. बात करने पर मामला 500 रुपए में तय हो गया.

धर्मवीर मुसकान के साथ जाने से पहले शराब पीना चाहता था. उस ने मुसकान को यह बात बताई तो उस ने भी उस के साथ 2 पैग लेने को कह दिया. धर्मवीर उस की इच्छा जान कर खुश हो गया. वह उसे रिक्शे पर बैठा कर धर्मशाला बाजार ले गया. उस के पीछेपीछे मुसकान के साथी विकास पांडेय, विकास उर्फ मुकेश और सुमेर उर्फ समीर भी लग गए. वहीं से धर्मवीर ने शराब के साथ खाने के लिए मछली भी खरीदी. धर्मशाला बाजार के रेलवे लाइन के किनारे एक जगह बैठ कर दोनों ने मछली खाई और शराब पी. वहां से वे पुराना पार्सल गेट नंबर 6 पहुंचे. अब तक वहां गहरा सन्नाटा फैल गया था. वहीं पर धर्मवीर मुसकान के साथ हसरतें पूरी करना चाहता था. इस से पहले कि वह कुछ करता, तभी मुसकान के तीनों साथी वहां आ धमके.

अचानक सामने लड़कों को देख कर धर्मवीर सकपका गया. वे तीनों धर्मवीर से पैसों की मांग करने लगे तो दिखावे के लिए मुसकान ने उन लड़कों से विरोध जताया. धर्मवीर उन से उलझ गया. कुछ ही देर में धर्मवीर और उन तीनों लड़कों के बीच गुत्थमगुत्था हो गई. उसी दौरान सुमेर ने पीछे से धर्मवीर के दोनों हाथ पकड़ लिए और मुकेश ने धक्का दे कर पेट के बल गिरा दिया. सुमेर ने धर्मवीर की पीठ पर घुटना रख कर मुंह दबा दिया. विकास पांडेय के कहने पर मुसकान ने धर्मवीर के पैर दबोच लिए. तब धर्मवीर को लगा कि मुसकान भी इन लड़कों के साथ मिली है. वे लड़के नशेड़ी थे, इसलिए धर्मवीर उन के काबू में नहीं आ रहा था. फिर विकास पांडेय ने पास में पड़ा पत्थर उठा कर उस के सिर पर दे मारा.

पत्थर के वार से धर्मवीर का सिर फट गया और वह तड़पने लगा. विकास ने धर्मवीर की जेब टटोली. उस की जेब से 40 हजार रुपए निकले. इतने रुपए पा कर वे बहुत खुश हुए. चारों ने 10-10 हजार रुपए आपस में बांट लिए और तुरंत मौके से फरार हो गए. मुसकान और उस के साथियों ने पुलिस से बचने के लिए अपनेअपने मोबाइल औफ कर दिए. उन्होंने तय कर लिया कि कोई भी एकदूसरे को तब तक फोन नहीं करेगा जब तक मामला ठंडा नहीं हो जाता. मुसकान गोरखपुर छोड़ कर बेतिया, बिहार चली गई. कई साल पहले वह बेतिया में रह चुकी थी. वहां रह कर वह आर्केस्ट्रा कंपनी में नाचती थी. मुसकान गोरखपुर से बेतिया कैसे पहुंची, उस की रोमांचित कर देने वाली अपनी अलग कहानी है.

दरअसल, मुसकान गोरखपुर जिले के खोराबार के महेवा मंडी स्थित खिरवनिया गांव के रहने वाले रघुनाथ मल्लाह की बेटी थी. उसे बचपन से ही नाचनेगाने का शौक था. वह घर में टेलीविजन के कार्यक्रम देख कर नाचती थी. घर वालों को उस का यह काम पसंद नहीं था. 15 साल की उम्र में वह घर से बेतिया भाग गई और वहां अपने एक रिश्तेदार की मदद से आर्केस्ट्रा कंपनी में नाचने लगी. आर्केस्ट्रा कंपनी का मालिक उस का दैहिक शोषण करने लगा तो वह उस कंपनी को छोड़ कर दूसरी कंपनी में चली गई. वहां भी वह नहीं बच पाई. इस बार आर्केस्ट्रा के मालिक ने उस से प्रेमविवाह किया. 2-3 सालों तक मौजमस्ती करने के बाद उस ने मुसकान को छोड़ दिया.

ठोकरें खा कर मुसकान अपने घर लौट आई. घर वालों ने उसे घर में पनाह नहीं दी. दरदर की ठोकरें खाती मुसकान पेट की आग बुझाने के लिए अपने तन को बेचने पर मजबूर हो गई. उस से मिलने वाले पैसों से फुटपाथ पर खानाबदोश की जिंदगी शुरू की. फिर समय ने ऐसी करवट ली कि उस के हाथ खून से सन गए और वह हत्यारिन बन गई. कुशमिला उर्फ मुसकान को अपने किए पर बहुत पछतावा है. काश, उस ने घर वालों की बात मान ली होती तो शायद उसे यह दिन नहीं देखना पड़ता. कथा लिखे जाने तक चारों आरोपियों में से सुमेर उर्फ समीर को छोड़ कर बाकी 3 जेल की सलाखों के पीछे थे. समीर पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाया था. पुलिस तीनों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. कथा लिखने तक किसी की जमानत नहीं हुई थी. Hindi True Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Haridwar Crime Story: विद्रोही बीवी का दंश

Haridwar Crime Story: नफीस और गुफराना आपसी मतभेदों के चलते अलगअलग रहने लगे थे. जब गुफराना को पता चला कि नफीस दूसरी शादी के चक्कर में है तो उस की करोड़ों की जायदाद के चक्कर में उस ने गुनाह की ऐसी भूमिका बनाई कि पुलिस भी चकरा गई. 26 अप्रैल, 2015 को सुबह के 11 बज रहे थे. जिला हरिद्वार के रुड़की शहर की सिविल लाइंस कोतवाली के एसएसआई आर.के. सकलानी कोतवाली में ही थे. पिछले कुछ दिनों से एटीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ और ठगी की शिकायतें मिल रही थीं. इसलिए आर.के. सकलानी क्षेत्र की एटीएम मशीनों की सुरक्षा व्यस्था की चैकिंग करने की सोच रहे थे. तभी उन के मोबाइल की घंटी बजने लगी. सकलानी ने काल रिसीव की तो पता चला कि दूसरी ओर शहर के विधायक प्रदीप बत्रा हैं.

बातचीत हुई तो प्रदीप बत्रा ने सकलानी को बताया कि कोतवाली क्षेत्र स्थित मोहल्ला ग्रीनपार्क का रहने वाला 40 वर्षीय नफीस 9 अप्रैल से गायब है. उन्होंने यह भी बताया कि नफीस के घर वाले गांव बिझौली में रहते हैं और उसे सभी परिचितों और रिश्तेदारों के यहां ढूंढ़ चुके हैं. आर.के. सकलानी ने बत्रा साहब से कहा कि वह नफीस के घर वालों को उस के फोटो के साथ कोतवाली भेज दें. वह नफीस को ढूंढ़ने में उन की पूरी मदद करेंगे. थोड़ी देर बाद नफीस का भाई नसीर अपने 2 रिश्तेदारों के साथ कोतवाली सिविल लाइंस पहुंच गया. उसे चूंकि विधायकजी ने भेजा था, इसलिए सकलानी ने नफीस के लापता होने के मामले में पूरी दिलचस्पी लेते हुए नसीर से जरूरी बातें पूछीं.

उस ने बताया कि 9 अप्रैल को नफीस मोटरसाइकिल से अपने भतीजे साकिब के पास गया था. साकिब मदरसा जामिया तुलउलूम का छात्र था. शाम को उस ने साकिब को बाइक की चाबी दे कर कहा था कि वह थोड़ी देर में आ रहा है. लेकिन वह आज तक वापस नहीं लौटा. नसीर ने यह भी बताया कि उस के पास मोबाइल था, जो उसी दिन से बंद है.

‘‘नफीस की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी?’’ सकलानी के पूछने पर नसीर ने बताया कि नफीस सीधासादा इंसान था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. एसएसआई सकलानी ने नसीर से नफीस का फोटो ले कर उस की गुमशुदगी का मामला दर्ज करा दिया. उस का पता लगाने की जिम्मेदारी एसआई अजय कुमार को सौंपी गई. अजय कुमार ने भी नसीर से उस के भाई नफीस के बारे में विस्तृत पूछताछ की. चूंकि नफीस को गायब हुए 10 दिन हो चुके थे, इसलिए यह मामला थोड़ा गंभीर लग रहा था. अजय कुमार ने नफीस के कई रिश्तेदारों से पूछताछ भी की और उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवाई. लेकिन कई दिनों की भागदौड़ के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला.

एक दिन सकलानी की एक वीआईपी ड्यूटी के बारे में पड़ोस की कोतवाली भगवानपुर के कोतवाल योगेंद्र सिंह भदौरिया से बात हुई तो बातोंबातों में भदौरिया ने बताया कि 20 दिनों पहले उन के इलाके में एक अज्ञात व्यक्ति की लाश मिली थी, जिस की शिनाख्त अभी तक नहीं हुई है. भदौरिया ने यह भी बताया कि मृतक क्रीम कलर की चैकदार शर्ट और मटमैले रंग की पैंट पहने था और उस का शरीर और चेहरा काफी हद तक कुचला हुआ था. यह सुन कर सकलानी ने सोचा कि कहीं वह लाश नफीस की ही न रही हो. यह बात दिमाग में आते ही उन्होंने एसआई अजय कुमार और मृतक के भाई नसीर को कोतवाली भगवानपुर भेजा.

चूंकि लाश काफी दिनों पहले मिली थी, इसलिए पुलिस ने 3 दिनों तक लाश की शिनाख्त का इंतजार करने के बाद उसे दफन करा दिया था. अलबत्ता लाश के कपड़े कोतवाली के मालखाने में ही रखे थे. पुलिस ने जब उन कपड़ों को नसीर को दिखाया तो वह उन्हें देखते ही रोने लगा. वे कपड़े नफीस के ही थे. भगवानपुर पुलिस ने बताया कि नफीस की लाश 9 से 10 अप्रैल, 2015 की रात को देहरादून रोड स्थित पुहाना गांव के तिराहे के पास मिली थी. लाश का चेहरा काफी हद तक कुचला हुआ था. इसीलिए उस की शिनाख्त नहीं हो सकी थी.

भगवानपुर कोतवाली के इंसपेक्टर योगेंद्र सिंह भदौरिया ने बताया कि वे इस मामले को दुर्घटना समझ रहे थे. फिर भी उन्होंने मृतक की शिनाख्त कराने का पूरा प्रयास किया था. मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उस की मृत्यु का कारण सिर की चोटों की वजह से अत्यधिक रक्तस्राव होना बताया गया था. शिनाख्त की काररवाई के बाद अजय कुमार रुड़की लौट आए. शाम को उन्होंने इस मामले में वरिष्ठ उपनिरीक्षक आर.के. सकलानी, कोतवाल बी.डी. उनियाल व एएसपी प्रहलाद नारायण मीणा से विचारविमर्श किया. लंबी बातचीत से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि यह मामला एक्सीडेंट का नहीं, बल्कि कत्ल का था.

एएसपी प्रहलाद नारायण मीणा ने जांच अधिकारी अजय कुमार को निर्देश दिया कि वह मृतक नफीस की काल डिटेल्स देख कर उन लोगों से पूछताछ करें, जिन्होंने घटना वाले दिन उसे फोन किया था. साथ ही उस की पारिवारिक स्थिति की गोपनीय जानकारी भी जुटाएं. एसआई अजय कुमार ने नफीस की पारिवारिक जानकारी जुटाई तो पता चला कि थाना मंगलौर के अंतर्गत आने वाले गांव बिझौली का रहने वाला 40 वर्षीय नफीस खेतीबाड़ी करता था. 18 वर्ष पूर्व नफीस का निकाह पुरकाजी, मुजफ्फरनगर की गुफराना उर्फ सुक्खी से हुआ था. दोनों के 2 बच्चे थे अजमल और एहतराम. नफीस के पास बिझौली में खेती की जमीन भी थी और मकान भी.

इस के अलावा रुड़की शहर में भी उस का एक मकान था. उस की कुल संपत्ति करीब ढाई करोड़ की थी. यह भी पता चला कि नफीस अय्याश किस्म का इंसान था. इसी वजह से 3 साल पहले उस की गुफराना से अनबन हो गई थी. वह दोनों बच्चों के साथ अपने मायके पुरकाजी में ही रह रही थी. यह सारी बातें एसएसपी स्वीटी अग्रवाल को पता चलीं तो उन्होंने इस मामले की जांच में एसओजी टीम को भी शामिल कर दिया. एसओजी टीम ने जब नफीस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स खंगालीं तो पता चला कि नफीस के लापता होने से पूर्व उस की एक नंबर पर बात हुई थी. उस नंबर पर एसओजी को कुछ संदेह हुआ. क्योंकि उस नंबर पर बात होने के बाद नफीस का मोबाइल स्विच औफ हो गया था.

एसओजी टीम के प्रभारी मोहम्मद यासीन ने जब उस नंबर की जांच की तो पता चला कि वह नंबर मोहल्ला झोझियान, पुरकाजी निवासी इकराम के नाम से था. पुलिस ने जब इकराम के बारे में सुरागरसी की तो मालूम हुआ कि वह कहने को तो ट्रक ड्राइवरी करता था, लेकिन आपराधिक प्रवृत्ति का था. 2 साल पहले वह एक मोटर- साइकिल लूट के मामले में थाना छपार, मुजफ्फरनगर में गिरफ्तार हो कर जेल भी गया था. फिलहाल वह घर से फरार है. इस के बाद सकलानी, अजय कुमार और एसओजी टीम ने इकराम की गिरफ्तारी के लिए मेरठ, गाजियाबाद व हापुड़ में उस के ठिकानों पर दबिश देनी शुरू कर दी.

आखिरकार 2 मई, 2015 को पुलिस ने इकराम को उस वक्त पुरकाजी से ही गिरफ्तार कर लिया, जब वह चोरीछिपे अपने घर वालों से मिलने आ रहा था. गिरफ्तारी के बाद पुलिस उसे रुड़की ले आई. कोतवाली में पुलिस ने जब उस से नफीस की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि नफीस की हत्या की गई थी और वह हत्या की वारदात में शामिल था. उस ने यह भी बताया कि इस हत्या में उस की खुद की बीवी भूरी, महबूब और शमीम भी शामिल थे. जबकि हत्या की सुपारी नफीस की पत्नी गुफराना उर्फ सुक्खी ने दी थी. इकराम से पूछताछ के बाद इस मामले की हकीकत कुछ इस तरह सामने आई.

18 वर्ष पूर्व जब गुफराना और नफीस का निकाह हुआ था, इकराम काफी छोटा था. पुरकाजी में वह इन लोगों का पड़ोसी था. पड़ोसी होने के नाते इकराम गुफराना को फूफो कहता था. उस का एक भाई और 4 बहनें थीं. पैसे की कमी की वजह से उस की बहनों की शादियां नहीं हुई थीं. इकराम बाइक लूट के अपने मुकदमे की पैरवी के लिए मुजफ्फरनगर कोर्ट जाता रहता था. भूरी नाम की एक तलाकशुदा महिला भी अपने पति से चल रहे तलाक के मुकदमें की वजह से वहां आतीजाती थी. वहीं पर दोनों की मुलाकात हुई. धीरेधीरे मुलाकातें बढ़ने लगीं तो इकराम भूरी की मदद करने लगा.

बाद में इकराम ने भूरी से निकाह कर लिया और मुजफ्फरनगर के मोहल्ला लद्दावाला में किराए का मकान ले कर रहने लगा. एक बार इकराम पुरकाजी आया तो एक दिन फूफी गुफराना उसे मिल गई. दोनों की पुरानी जानपहचान थी, इसलिए खूब बातें हुईं. बातोंबातों में गुफराना ने उसे बताया कि उस का शौहर नफीस किसी औरत से दूसरा निकाह करने वाला है, इसलिए उस ने बच्चों सहित उसे घर से निकाल दिया है. गुफराना ने इकराम से यह भी कहा कि अगर किसी तरह वह नफीस को ठिकाने लगा दे तो वह उसे 8 लाख रुपए देगी. कुछ दिनों तक इकराम ने गुफराना की इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब एक दिन उस ने बड़ी गंभीरता से कहा कि 8 लाख की रकम कम नहीं होती तो वह नफीस की हत्या करने के लिए तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने मिल कर नफीस की हत्या की योजना बना ली.

इस के बाद गुफराना ने इकराम को एडवांस के तौर पर 80 हजार रुपए भी दे दिए. गुफराना ने नफीस का मोबाइल नंबर भी इकराम को दे दिया. योजना के अनुसार, इकराम ने 19 मार्च, 2015 को रुड़की की रामपुर चुंगी के निकट भूरी के रहने के लिए किराए के एक कमरे का इंतजाम कर दिया. आगे की योजना के तहत एक दिन भूरी ने नफीस के मोबाइल पर मिसकाल की. इस के जवाब में नफीस ने लौट कर फोन किया और भूरी से लंबी बात की. इस के बाद भूरी और नफीस एकदूसरे को अकसर फोन करने लगे. कुछ ही दिनों में भूरी ने नफीस को अपने प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद नफीस अकसर उस से मिलने उस के कमरे पर जाने लगा.

नफीस को सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस खूबसूरत औरत के प्रेमजाल में फंस कर वह पैसा उड़ा रहा है, वह उस की मौत का तानाबाना बुन चुकी है. बहरहाल षडयंत्र से अनभिज्ञ नफीस भूरी के भ्रमजाल में फंसा रहा. योजना के तहत 9 अप्रैल, 2015 को इकराम ने देहरादून जाने के लिए 2500 रुपए में पुरकाजी निवासी सुनील की टैक्सी बुक की और शाम को अपने दोस्तों शमीम और जावेद के साथ रामपुर चुंगी स्थित भूरी के कमरे पर आ गया. टैक्सी ड्राइवर अर्जुन उन के साथ था. योजना के अनुसार, गुफराना का भाई महबूब भी उस वक्त भूरी के कमरे पर मौजूद था. शाम 7 बज कर 30 मिनट पर भूरी ने फोन कर के नफीस को अपने कमरे पर बुलवा लिया.

जब नफीस कमरे पर आया तो महबूब और जावेद बाहर खड़ी कार में बैठ गए. भूरी ने नफीस से कमरे पर मौजूद शमीम का परिचय अपने रिश्तेदार के रूप में कराया. इस के बाद वह दूध गरम करने लगी. उधर थोड़ी देर बैठे रहने के बाद इकराम ने टैक्सी चालक अर्जुन से कहा कि अभी बच्चों को तैयार होने में देर लगेगी, तब तक तुम जावेद के साथ जा कर अपनी शाम रंगीन कर लो. टैक्सी की चाबी मुझे दे दो, मैं इस में तेल डलवा देता हूं. इस के बाद टैक्सी चालक अर्जुन जावेद के साथ शराब के ठेके पर पहुंच गया, जहां उस ने खूब शराब पी. जावेद उसे पीने के लिए उकसा रहा था. दूसरी ओर भूरी ने नफीस की नजर बचा कर गर्म दूध में नशे की 4 गोलियां डाल दी थी. नफीस भूरी पर अंधविश्वास करता था. उस ने दूध पी लिया.

नशीला दूध पीने के बाद नफीस को नींद आने लगी तो वह वहीं सो गया. तभी शमीम और इकराम कमरे में आए. आते ही उन्होंने नफीस का गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद वे उस की लाश को टैक्सी की पिछली सीट पर डाल कर गांव सालियर होते हुए पुहाना जहाजगढ़ मार्ग पर ले आए. एक सुनसान जगह देख कर इन लोगों ने नफीस की लाश को सड़क के किनारे फेंक दिया. नफीस की लाश की शिनाख्त न हो सके, इस के लिए इकराम ने कई बार टैक्सी आगेपीछे कर के उस का मृत शरीर और चेहरा कुचल दिया, ताकि यह दुर्घटना का मामला लगे. इस के बाद तीनों वापस भूरी के कमरे पर आ गए.

ड्राइवर अर्जुन और जावेद नशे में धुत हो कर रात 12 बजे वापस लौटे. रात को सब वहीं सो गए. सुबह इकराम ने अर्जुन को उलाहना दिया कि तुम्हारे ज्यादा पीने की वजह से हम देहरादून नहीं जा सके. इकराम को यकीन था कि अर्जुन कुछ भी नहीं समझ पाया होगा. अगले दिन सुबह 7 बजे शमीम व जावेद बाइक से मुजफ्फरनगर चले गए तथा इकराम व भूरी टैक्सी से पुरकाजी लौट आए. नफीस की जेब से निकाला पैसों से भरा पर्स इकराम ने भूरी को सौंप दिया था.

नफीस की हत्या का खुलासा होने के बाद एसआई अजय कुमार ने नफीस की गुमशुदगी का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 201, 328, 34 व 120 बी में परिवर्तित कर दिया. इस के बाद एसओजी प्रभारी मोहम्मद यासीन तथा उन की टीम के सदस्यों, अशोक, जाकिर, आशुतोष तिवारी, कपिल, शेखर, राहुल, अमित, पूरण, हेमंत, अंशु चौधरी और रश्मि गुज्यांल ने पुरकाजी व मुजफ्फरनगर में दबिशें दे कर गुफराना व भूरी को भी गिरफ्तार कर लिया और रुड़की ले आए. भूरी व गुफराना ने अपने बयानों में इकराम के बयानों का ही समर्थन किया. गुफराना ने बताया कि वह इकराम को अपने शौहर नफीस की हत्या की सुपारी के 80 हजार रुपए दे चुकी है तथा शेष रकम अपना आम का बाग बेच कर देती.

इस के बाद पुलिस ने भूरी की निशानदेही पर मृतक नफीस का पर्स उस के मुजफ्फरनगर स्थित मकान से बरामद कर लिया. उस की निशानदेही पर आर.के. सकलानी ने हत्या में इस्तेमाल इंडिका टैक्सी पुरकाजी से बरामद कर ली. 3 मई, 2015 को एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने इकराम, भूरी और गुफराना उर्फ सुक्खी को मीडिया के सामने पेश कर के नफीस हत्याकांड का खुलासा किया. तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी की भनक पा कर अभियुक्त जावेद, शमीम व महबूब फरार हो गए थे. पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए प्रयासरत थी. Haridwar Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Delhi Crime Story: कंबल में लपेट दिया अपना रिलेशन

Delhi Crime Story: पति की हत्या के आरोप में जेल गई अनीता, जमानत पर छूटने के बाद अपनी सहेली पुष्पा के भाई शिवनंदन के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी. इसी दौरान उन दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ कि शिवनंदन ने लिवइन रिलेशन को कंबल में लपेट कर रख दिया.

बात पहली जून, 2015 की है. सुबह करीब साढ़े 8 बजे दिल्ली के उत्तर पश्चिमी जिले के थाना आदर्श नगर के ड्यूटी औफिसर को पुलिस नियंत्रण कक्ष द्वारा सूचना मिली कि मजलिस पार्क के मकान नंबर ए/308 से दुर्गंध आ रही है और दरवाजे पर ताला लगा है. ड्यूटी औफिसर ने इस काल के बारे में थानाप्रभारी संजय कुमार को अवगत करा दिया. बंद मकान से बदबू आने की बात सुन कर ही थानाप्रभारी समझ गए कि वहां कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. क्योंकि इस तरह की जो भी काल आती हैं, उन में से ज्यादातर मामले हत्या के ही निकलते हैं. यानी कोई किसी की हत्या कर के लाश को कमरे में छिपा कर दरवाजा बंद कर के फरार हो जाता है.

बहरहाल थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ मजलिस पार्क की तरफ निकल गए. जहां से बदबू आने की बात कही गई थी, वह पहली मंजिल पर था. पुलिस ने भी उस मकान से आती हुई दुर्गंध को महसूस किया. वहीं पर करीब 20 साल का एक युवक नीरज भी था. वह उस मकान में रहने वाले शिवनंदन का सौतेला बेटा था. नीरज ने पुलिस को बताया कि मकान की चाबी उस के पिता के पास है और वह पता नहीं कहां चले गए. तभी आसपास रहने वाले लोग भी वहां आ गए. उन्होंने भी दुर्गंध वाली बात उन्हें बताई. वहां मौजूद लोगों की मौजूदगी में पुलिस ने दरवाजे पर लगा ताला तोड़ कर जैसे ही किवाड़ खोले तो बदबू और बढ़ गई. नाक पर रुमाल रख कर पुलिस घर में घुसी और यह खोजने लगी कि यह बदबू आ कहां से रही है.

दरवाजे के पास ही एक बरामदा था. फिर एक कमरा बना था. उस के बराबर में किचन थी. किचन के पास बाथरूम था. फिर उस के बराबर में एक कमरा था. कमरे के पीछे बालकनी थी. पुलिस ने कमरे और बाथरूम को छान मारा लेकिन वहां कुछ नहीं मिला. इस के बाद पुलिस किचन में पहुंची तो वहां 2 चूहे मरे मिले. उन चूहों से तेज बदबू आ रही थी इसलिए पुलिस ने नीरज से उन चूहों को फिकवा दिया. पुलिस तो बदबू के दूसरे ही मायने लगा रही थी, लेकिन वहां मामला दूसरा ही निकला. लिहाजा थानाप्रभारी राहत की सांस ले कर वहां से चले गए. करीब साढ़े 9 बजे थानाप्रभारी के मोबाइल पर नीरज का फोन आया. उस ने उन्हें बताया कि मकान से बदबू अभी भी आ रही है. मकान का कोनाकोना छान मारा. लेकिन अब कोई मरा हुआ चूहा भी नहीं मिला. फिर भी पता नहीं बदबू कहां से आ रही है.

थानाप्रभारी एसआई प्रवीण कुमार के साथ एक बार फिर मजलिस पार्क में उसी मकान पर पहुंच गए. इस बार वहां नीरज के साथ उस का सौतेला पिता शिवनंदन भी मिल गया. बदबू महसूस होने पर पुलिस ने एक बार फिर से खोजबीन शुरू कर दी. इस बार भी बदबू किचन की तरफ से ही आ रही थी. पुलिस ने सोचा कि पहले की तरह कोई चूहा ही मरा पड़ा होगा. वह किचन में खोजबीन करने लगी. लेकिन वहां कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी पुलिस की नजर ऊपर की तरफ स्लैब पर बने लकड़ी के रैक पर गई. उस रैक को जैसे ही खोला तो बदबूदार भभका आया.  रैक में एक कंबल दिखाई दिया. देखने पर लग रहा था जैसे उस कंबल में कोई इंसान लिपटा हुआ हो.

पुलिस ने वह कंबल उतार कर खोला तो उस में एक युवती की लाश निकली उस की उम्र करीब 40 साल थी. वह महिला क्रीम कलर का सूट पहने हुए थी. जिस पर ब्राउन कलर के फूल थे. जामुनी रंग की चुन्नी भी उस के गले में थी. लाश को देखते ही नीरज चीखते हुए बोला कि यह तो मेरी मां अनीता है. शिवनंदन भी रो रहा था क्योंकि वह उसी के साथ पत्नी बन कर लिवइन रिलेशन में रह रही थी. शिवनंदन और उस के सौतेले बेटे से पुलिस ने अनीता की हत्या के बारे में पूछा तो दोनों ने बताया कि अनीता की हत्या किस ने की, इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं है. गम के माहौल में पुलिस ने उन दोनों से ज्यादा पूछताछ तो नहीं की लेकिन पुलिस के शक की सुई दोनों बापबेटों पर ही टिकी थी.

मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को बुला कर पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी की और लाश को पोस्टमार्टम के लिए जहांगीरपुरी के बाबू जगजीवनराम मेमोरियल अस्पताल भिजवा दिया. हत्या के इस मामले को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी संजय कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में इंसपेक्टर राकेश कुमार, एसआई प्रवीण कुमार, हेडकांस्टेबल बालकिशन, राजेंद्र सिंह, अंगद सिंह, कांस्टेबल नवीन कुमार, गजेंद्र, विकास, मनोज आदि को शामिल किया गया. जिस मकान में अनीता की लाश मिली थी, उस में शिवनंदन और अनीता का बेटा नीरज भी रहता था. उन दोनोें के होते हुए कोई मकान में वारदात कर के चला जाए और इस बात की भनक उन्हें न लगे, ऐसी संभावना बहुत कम थी.

दोनों में से कोई न कोई हत्या का राज जरूर जानता होगा. ऐसा पुलिस का मानना था. लिहाजा उन दोनों से पूछताछ करने के लिए पुलिस ने उन्हें थाने बुला लिया. पूछताछ में शिवनंदन ने बताया कि वह आजादपुर मंडी में काम करता है. रोजाना सुबह जल्दी घर से निकलने के बाद देर रात को घर लौटता है. नीरज भी सब्जीमंडी में दूसरी जगह काम करता था. वह भी सुबह घर से जाने के बाद शाम को घर लौटता है.

‘‘जब तुम लोग घर से निकल जाते थे तो घर पर अनीता ही रह जाती होगी?’’ थानाप्रभारी ने उन से पूछा.

‘‘हां, घर पर वही रहती थी.’’ शिवनंदन बोला.

‘‘तो कौन से दिन वह घर पर नहीं मिली?’’ थानाप्रभारी ने जानना चाहा.

‘‘29 मई को जब हम शाम को घर आए तो वह घर से गायब मिली.’’ शिवनंदन ने बताया.

‘‘फिर तुम ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘नहीं, पुलिस में खबर इस वजह से नहीं की क्योंकि वह कईकई दिनों के लिए घर से गायब हो जाती थी. यही सोचा कि वह 2-4 दिनों में आ जाएगी.’’ शिवंनदन ने कहा.

‘‘बाहर…बाहर कहां और क्यों जाती थी?’’ थानाप्रभारी चौंके.

‘‘सर, पता नहीं कहां जाती थी. मगर इतना पता है कि एक बार वह जिस्मफरोशी के आरोप में चंडीगढ़ पुलिस द्वारा और नशीले पदार्थ की तस्करी के आरोप में पंचकुला पुलिस द्वारा गिरफ्तार की गई थी.’’ शिवनंदन ने बताया.

यह सुन कर पुलिस समझ गई कि अनीता जरूर आवारा और आपराधिक प्रवृत्ति की रही होगी. चाहे वह जैसी भी रही हो, उस का मर्डर तो हुआ ही था. एक बात तो तय थी कि उस का मर्डर बड़ी तसल्ली से उस घर में ही किया गया था. यह काम घर का कोई नजदीकी व्यक्ति ही कर सकता है. वह व्यक्ति कौन हो सकता है, जानने के लिए थानाप्रभारी ने शिवनंदन से पूछा कि उन के घर में और कौनकौन आता था?  जब शिवनंदन ने बताया कि कोई नहीं आता था तो पुलिस को शिवनंदन पर शक गहरा गया. उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अनीता की हत्या उस ने ही की थी.

अनीता ने उस के सामने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे जिस की वजह से उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उस ने अनीता की हत्या करने के पीछे की जो कहानी बताई वह बड़ी दिलचस्प निकली. शिवनंदन मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के अथर गांव के रहने वाले गयाप्रसाद का बेटा था. शिवनंदन के अलावा गया प्रसाद के एक बेटा और 5 बेटियां थीं. गयाप्रसाद खेतीबाड़ी कर के अपने परिवार का भरणपोषण कर रहे थे. जैसेजैसे बच्चे जवान होते गए वह उन की शादी करते गए. उन्होंने मंझली बेटी पुष्पा की शादी उत्तर पश्चिमी दिल्ली के मजलिस पार्क में रहने वाले रमेश चंद से की थी. रमेश आजादपुर सब्जी मंडी में काम करता था.

रमेश का काम अच्छा चल रहा था. 10 साल की उम्र में शिवनंदन भी अपने बहनोई रमेश के पास दिल्ली आ गया. रमेश ने उसे पढ़ाना चाहा लेकिन उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा तो रमेश उसे अपने साथ ही काम पर सब्जीमंडी में ले जाने लगा. कुछ दिनों में ही वह मंडी का काम समझ गया. इस तरह वह 14-15 साल की उम्र में ही पैसे कमाने लगा था. वह जो पैसे कमाता उन्हें अपने पिता के पास भेज देता था. इस बीच अनीता 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई थी. बताया जाता है कि शिवनंदन की बहन पुष्पा के अपने भतीजे से ही नाजायज संबंध हो गए थे. इस बात की जानकारी रमेश को हुई तो उस ने पत्नी पुष्पा को समझाया.

पुष्पा को जब लगा कि उस के अवैध संबंधों में पति बाधक है तो उस ने सन 2004 में पति की हत्या कर दी. पति की हत्या के आरोप में पुष्पा को जेल जाना पड़ा. तब शिवनंदन ने ही अपने दोनों भांजों और भांजी की परवरिश की. एक साल बाद जेल में ही पुष्पा की मुलाकात अनीता से हुई. अनीता मूलरूप से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली थी. उस की शादी दिल्ली के खजूरी खास क्षेत्र के रहने वाले देवेंद्र सिंह से हुई थी. बताया जाता है कि सन 2005 में उस ने भी अपने पति की हत्या कर दी थी. पति की हत्या के आरोप में उसे जेल जाना पड़ा था. अनीता के 2 बेटे थे नीरज और सूरज. उस के जेल जाने के बाद बच्चों को लक्ष्मीनगर में रहने वाली उन की मौसी ले गई थी.

पुष्पा और अनीता हमउम्र थीं इसलिए जेल में वे दोनों अच्छी दोस्त बन गई थीं. शिवनंदन जेल में अपनी बहन से मिलने जाता ही था. वहीं पर बहन ने उस की मुलाकात अनीता से कराई थी. अविवाहित शिवनंदन अनीता से मिल कर बहुत प्रभावित हुआ. वह उसे मन ही मन चाहने लगा. अनीता की वजह से वह जल्दजल्द बहन से मिलने जाने लगा. इसी बीच पुष्पा को सजा हो गई तो वह सजा पूरी कर के घर आ गई. कई साल पहले अनीता के मांबाप की मौत हो चुकी हो चुकी थी. दिल्ली के लक्ष्मीनगर में जो उस की बहन रह रही थी, वह भी ऐसी नहीं थी जो उस की जमानत करा सके. उस की जमानत कराने वाला कोई नहीं था जिस से वह जेल में ही बंद थी.

पुष्पा चाहती थी कि किसी तरह अनीता भी जेल से बाहर आ जाए. इसलिए एक दिन उस ने शिवनंदन से उस की जमानत कराने को कहा. शिवनंदन भी यही चाहता था, इसलिए उस ने सन 2010 में किसी तरह अनीता की जमानत करा दी. जमानत के बाद अनीता को पुष्पा ने अपने घर ही रख लिया. शिवनंदन की कमाई से ही घर का खर्चा चल रहा था. एक ही घर में रहने की वजह से शिवनंदन और अनीता एकदूसरे के बेहद नजदीक आ गए. पुष्पा को उन के संबंधों की भनक लग चुकी थी. उन से इस बारे में कुछ कहने के बजाय उस ने मुंह फेर लिया.

इतना ही नहीं, पुष्पा का उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में एक मकान और था. वह अपने तीनों बच्चों को ले कर बुराड़ी चली गई. मजलिस पार्क वाले मकान में शिवनंदन ही रहने लगा, मगर वह इस के बदले बहन को किराया दे देता था. शिवनंदन और अनीता ने जब महसूस किया कि उन के संबंधों पर पुष्पा को कोई आपत्ति नहीं है तो उन की हिम्मत और बढ़ गई. इस के बाद वे बिना शादी किए पतिपत्नी की तरह रहने लगे. हालांकि अनीता उस से उम्र में 15 साल बड़ी थी, इस के बाद भी दोनों के इस तरह रहने पर पुष्पा भी खुश थी. अनीता ने अपने दोनों बेटों को भी अपने पास बुला लिया. बड़ा बेटा सूरज अपने किसी जानकार के साथ नौकरी के लिए मुंबई चला गया. तब से वह मुंबई में ही है. जबकि छोटा 20 साल का नीरज मां के साथ ही रह रहा था. नीर को शिवनंदन ने आजादपुर सब्जी-मंडी में काम पर लगवा दिया.

शिवनंदन तो सुबह ही घर से मंडी के लिए निकल कर देर शाम को ही घर लौटता था. इस दौरान अनीता अकेली ही घूमने के लिए निकल जाती थी. वह कहां जाती और किस के साथ घूमती थी, यह बात वह पुष्पा को भी नहीं बताती थी. शिवनंदन को जब अनीता की इस हरकत की जानकारी मिली तो उस ने उसे समझाया लेकिन वह नहीं मानी. इस के बाद तो उस की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि वह कईकई दिनों तक घर से बाहर रहने लगी. इस दौरान वह अपना फोन भी स्विच्ड औफ कर लेती थी. अनीता जब अपनी मनमरजी करने लगी तो शिवनंदन ने भी उस से कहनासुनना बंद कर दिया.

शिवनंदन को पता नहीं था कि वह गलत धंधा भी करने लगी है. वह गलत धंधा क्या है इस का पता उसे तब लगा जब वह 3 साल पहले नशीले पदार्थ के साथ पंचकुला पुलिस द्वारा गिरफ्तार की गई. ड्रग की खेप वह दिल्ली से पंजाब पहुंचाने जा रही थी. पुष्पा को अनीता के गिरफ्तार होने की जानकारी मिली तो वह हैरान रह गई. उसे लगा कि अनीता शायद गलत तरह के लोगों के बीच फंस गई है और वे लोग उस से ड्रग सप्लाई करा रहे हैं. वह उस से बात कर के सच्चाई जानना चाहती थी. इसलिए वह उस से जेल में मिलने पहुंच गई. पुष्पा को देखते ही अनीता फूटफूट कर रोई. अनीता ने उसे बताया कि ड्रग सप्लाई का काम वह किसी के दबाव में कर रही थी. यानी पुष्पा जैसा सोच रही थी, बात वही निकली.

बहरहाल पुष्पा को अनीता पर दया आ गई. और उस ने भाई से कह कर उस की जमानत करा ली. वह फिर से शिवनंदन के साथ ही रहने लगी. कुछ दिनों तक तो अनीता वहां ठीक रही, बाद में वह अपने पुराने ढर्रे पर उतर आई. बिना बताए घर से निकल कर देर रात घर लौटना जैसे उस का रोज का नियम बन गया था. शिवनंदन उसे डांटता तो वह 2-4 दिन तो ठीक रहती उस के बाद वही उस का घूमनाफिरना शुरू हो जाता था. पुष्पा को कभीकभी गुस्सा आता कि वह उसे घर से निकाल दे लेकिन यह सोच कर खयाल भी आ जाता था कि इस के मांबाप तो हैं नहीं. यहां के बाद ये जाएगी कहां. इसलिए वह बारबार अनीता को समझाती ही रहती थी.

शिवनंदन को कोई परेशानी न हो इसलिए उस ने अपने घर के दरवाजे पर लगने वाले ताले की दूसरी चाबी अपने पास रख ली. करीब एक साल पहले वह अचानक घर से फिर गायब हो गई. उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ था. शिवनंदन और पुष्पा ने उसे संभावित जगहों पर तलाशा लेकिन वह कहीं नहीं मिली. फिर 4-5 दिनों बाद पुष्पा के मोबाइल पर चंडीगढ़ पुलिस का फोन आया. पुलिस ने बताया कि अनीता वेश्यावृत्ति के आरोप में गिरफ्तार की गई है. यह खबर मिलते ही पुष्पा चौंक गई. इस के बाद वह समझ गई कि अनीता कईकई दिनों तक बाहर क्यों रहती है. उस ने यह बात शिवनंदन को बताई तो वह भी हैरान रह गया.

अब की बार शिवनंदन ने तय कर लिया कि वह अनीता से न तो जेल में मिलने जाएगा और न ही उस की जमानत कराएगा लेकिन पुष्पा के मन में तो अब भी उस के लिए दया थी. आखिर उस ने शिवनंदन को चंडीगढ़ जाने के लिए तैयार कर लिया. दोनों ने उस से जेल में मुलाकात की. अनीता ने इस बार भी लाख सफाई दी कि उसे झूठे आरोप में फंसाया गया है, वह बेकुसूर है. लेकिन शिवनंदन को उस पर विश्वास नहीं हुआ क्योंकि वह उस का विश्वास पहले ही तोड़ चुकी थी. अनीता पुष्पा से इस बार और माफ करने के लिए गिड़गिड़ाने लगी. उस के आंसू देख कर पुष्पा का दिल फिर से पसीज गया. लिहाजा भाई से कहसुन कर उस ने अनीता की फिर से जमानत करा ली.

इस बार उस ने अनीता को हिदायत दी कि वह अब कोई ऐसावैसा काम न करे जिस से उन्हें परेशानी हो. अनीता ने वादा तो कर लिया लेकिन उसे निभा नहीं पाई. फिलहाल उस ने घर से बाहर निकलना तो बंद कर दिया था, पर वह घर पर ही अपने फोन से पता नहीं किसकिस से बतियाती रहती थी. शिवनंदन उस के आचरण को जान ही चुका था. इसलिए उसे इस बात का शक था कि वह अपने किसी यार से ही बात करती होगी. उस ने इस बारे में अनीता से पूछा भी पर अनीता यही कह देती कि अपनी सहेलियों से बातें करती है. 29 मई, 2015 को अनीता का बेटा नीरज सब्जीमंडी गया हुआ था. शिवनंदन घर पर ही था. अनीता उस दिन भी अपने फोन पर काफी देर से किसी से बातें कर रही थी. शिवनंदन मन ही मन कसमसा रहा था. जैसे ही अनीता की बात खत्म हुई तो शिवनंदन ने पूछा, ‘‘किस का फोन था जो इतनी लंबी बात चली?’’

‘‘तुम्हें क्यों बताऊं किस का फोन था. जब तुम किसी से बातें करते हो तो मैं क्या तुम से पूछती हूं?’’ अनीता बोली.

‘‘मैं इतनी देर तक किसी से बात भी तो नहीं करता. और यदि तुम्हारे पूछने पर मैं नहीं बताता तो कहती.’’ उस ने कहा.

‘‘देखोजी, मैं किसी से बात करूं या ना करूं इस से तुम्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिए.’’ अनीता तुनक कर बोली.

इसी बात पर अनीता और शिवनंदन के बीच कहासुनी हो गई. अनीता ने शिवनंदन पर हाथ छोड़ दिया. शिवनंदन भी आपा खो बैठा उस ने दोनों हाथों से अनीता का गला दबा दिया. कुछ ही देर में अनीता का दम घुट गया. उस के मरते ही शिवनंदन घबरा गया. उस ने गुस्से में अनीता को मार तो दिया, लेकिन अब उस के सामने समस्या यह थी कि वह उस की लाश को ठिकाने कहां लगाए. अगर वह उसे कहीं बाहर ले जाए तो उस के पकड़े जाने की संभावना थी. लिहाजा वह उसी घर में उसे ठिकाने लगाने की सोचने लगा. काफी सोचनेविचारने के बाद उस ने एक कंबल में उस की लाश लपेट ली. फिर उसे किचन के ऊपर के स्लैब पर बनी लकड़ी की रैक में छिपा दिया. इस के बाद वह मकान के दरवाजे पर ताला लगा कर सब्जीमंडी चला गया.

शाम को शिवनंदन और नीरज सब्जीमंडी से लौटे तो नीरज ने घर में मां को नहीं देखा तो वह चौंका. तब शिवनंदन ने कह दिया कि वह पहले की तरह कहीं गई होगी. अनीता कईकई दिनों के लिए अचानक घर से गायब हो जाती थी, इसलिए वह कुछ नहीं बोला. उसे पता नहीं था कि उस की मां अब इस दुनिया में नहीं है. 2-3 दिनों बाद लाश सड़ने लगी तो शिवनंदन ने किचन में खाना बनाना बंद कर दिया ताकि नीरज को कोई शक न हो. वह बाजार से ही खाना मंगाने लगा. उधर अनीता की लाश से बदबू वाला तरल पदार्थ रिसने लगा. उस तरल पदार्थ को शायद किचन में गए चूहों ने पीया होगा, जिस से उन की मौत हो गई. शिवनंदन और नीरज रोजाना ही उसी घर में सोते थे. बदबू बढ़ने पर नीरज ने उस से पूछा भी लेकिन शिवनंदन ने कोई चूहा मरने की बात कह कर उस की बात टाल दी.

पहली जून को शिवनंदन और नीरज अपने काम पर निकल गए. नीरज किसी काम से घर आया तो उस से पड़ोसियों ने बदबू आने वाली बात बताई. उसी दौरान किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. फोन काल पर पुलिस वहां आई और मरे हुए चूहे निकलवा कर चली गई. एकडेढ़ घंटे बाद शिवनंदन भी वहां आ गया. उसे जब पता चला कि किचन में जाने के बावजूद भी पुलिस लाश का पता नहीं लगा पाई तो वह बहुत खुश हुआ. उस ने सोचा कि अब वह पकड़ा नहीं जाएगा. लेकिन उस की यह खुशी केवल कुछ देर तक ही रही. क्योंकि उसी दौरान बदबू आने की शिकायत पुलिस से दोबारा जो कर दी गई थी. दूसरी बार पहुंची पुलिस ने बदबू की वजह ढूंढ ही निकाली.

शिवनंदन से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे हत्या और लाश ठिकाने लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर के जिला एवं सत्र न्यायालय रोहिणी के महानगर दंडाधिकारी कपिल कुमार के समक्ष पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. शिवनंदन और पुष्पा ने अनीता को सुधरने के कई मौके दिए थे लेकिन अनीता अपनी बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के चलते गलत पर गलत काम करती रही. यदि वह सही रास्ते पर चलती तो शायद शिवनंदन के हाथों नहीं मारी जाती. बहरहाल, अनीता का बेटा सूरज मां की मौत के बाद भी मुंबई से नहीं आया. मामले की तफ्तीश इंसपेक्टर राकेश कुमार कर रहे हैं. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Hindi Stories: कातिल दरोगा

Hindi stories: फरियाद ले कर पुलिस चौकी पहुंची खूबसूरत ईशा को देख कर दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह इतना प्रभावित हुआ कि शादीशुदा होते हुए भी वह उसे चाहने लगा. इतना ही नहीं, खुद को अविवाहित बता कर उस ने ईशा से शादी भी कर ली. बाद में यही झूठ ऐसा जी का जंजाल बना कि वह एक खौफनाक अपराध कर बैठा. कानपुर के थाना काकादेव क्षेत्र में एक मोहल्ला है नवीन नगर. कौशलेश सचान अपनेपरिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विनीता के अलावा एक बेटा ऐश्वर्य राज, 2 बेटियां ईशा व प्रगति थीं. कौशलेश साधन संपन्न व्यक्ति थे. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

कौशलेश सचान की बड़ी बेटी का नाम वैसे तो ईशा था लेकिन घर में सब लोग उसे ईशू कहते थे. गोरी, तीखे नाकनक्श और बड़ीबड़ी आंखों वाली ईशा सुशील और विनम्र स्वभाव की थी. ईशा तनमन से जितनी खूबसूरत थी, पढ़नेलिखने में भी उतनी ही तेज थी. उस ने कानपुर के सरस्वती बालिका इंटर कालेज से प्रथम श्रेणी में इंटरमीडिएट और एएनडी कालेज में बीए पास किया. ईशा की इच्छा थी कि वह आईएएस बने. इसलिए प्रथम श्रेणी में बीए पास करने के बाद उस ने आईएएस की तैयारी के लिए कोचिंग शुरू कर दी थी. लेकिन लगातार 3 साल तक परीक्षा देने के बाद भी वह सिविल सर्विस में न निकल सकी.

एक दिन ईशा अपनी मां विनीता के साथ जेके मंदिर गई. दर्शन करने के बाद जब वह गेट के बाहर निकली, तो एक झपटमार ने उस के गले की सोने की चेन खींच ली और साथ ही उस का पर्स भी छीन कर भाग निकला. बदहवास मांबेटी थाना नजीराबाद पहुंचीं. उस इलाके के चौकी इंचार्ज सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल उस समय थाने में ही थे. ईशा ने ज्ञानेंद्र सिंह को लूट की पूरी घटना बताई तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर के लुटेरे की तलाश शुरू कर दी. 3-4 दिन बाद ही ज्ञानेंद्र ने छोटे यादव नाम के लुटेरे को पकड़ लिया. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह की इस त्वरित काररवाई से ईशा काफी प्रभावित हुई.

बयान दर्ज कराने, लुटेरे और सामान की शिनाख्त करने के लिए ईशा को कई बार थाना नजीराबाद आनाजाना पड़ा. इसी आनेजाने में ईशा और दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. ज्ञानेंद्र सिंह जहां ईशा की खूबसूरती पर फिदा था, वहीं ईशा भी शरीर से हृष्टपुस्ट व स्मार्ट दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को देख कर उस की ओर आकर्षित हो गई थी. दोनों को एक अनजाना आकर्षण एकदूसरे की तरफ खींचने लगा था. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को ईशा कुछ ज्यादा ही पसंद आ गई थी, इसलिए उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया था. वह जब तब ईशा से बातें करने लगा. ईशा को भी उस की रसभरी बातों में प्यार झलकता था. वह भी उस से खूब बातें करने लगी. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें भी होने लगीं. बात आगे बढ़ी तो दोनों साथसाथ सैरसपाटे के लिए भी जाने लगे. ज्ञानेंद्र ईशा को फिल्म भी दिखाता और रेस्तरां में खाना भी खिलाता.

सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल मूल रूप से चित्रकूट जिले के मऊ थाना अंतर्गत आने वाले गांव छिवलहा का रहने वाला था. उस का सलेक्शन 2007 के बैच में हुआ था. उस की पहली पोस्टिंग कानपुर के किदवई नगर थाने की साकेत नगर पुलिस चौकी में हुई थी. इस के बाद वह कानपुर शहर और देहात के कई थानों में तैनात रहा. कुछ समय वह क्राइम ब्रांच में भी रहा. ज्ञानेंद्र सिंह नौकरी के अलावा प्लौटिंग का भी काम करता था. इस काम में उस ने खूब पैसा कमाया. उस के पास 4-5 लग्जरी कारें थीं, जिन्हें उस ने एक ट्रैवलिंग एजेंसी में लगवा रखा था. ज्ञानेंद्र सिंह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. उस की शादी मध्य प्रदेश स्थित सतना जिले की बछरांवा निवासी नीलम के साथ हुई थी.

पत्नी और बच्चों के साथ वह साकेत नगर, कानपुर में रह रहा था. जबकि ईशा से उस ने खुद को अविवाहित बताया था. एक रोज ज्ञानेंद्र सिंह ईशा के घर पहुंचा, तो उस वक्त वह घर में अकेली थी. उस के मातापिता किसी काम से माल रोड गए हुए थे, और भाईबहन कालेज में थे. ज्ञानेंद्र सिंह और ईशा कमरे में बैठ कर बातचीत करने लगे. बातोंबातों में ज्ञानेंद्र ने ईशा की खूबसूरती के कसीदे काढ़ने शुरू कर दिए. यह देख उस ने ज्ञानेंद्र की बेचैन आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘ज्ञानेंद्र, क्या सचमुच मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं? कहीं तुम मुझे खुश करने के लिए मेरी झूठी तारीफ तो नहीं कर रहे?’’

ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा को चाहत भरी नजरों से देखा, वह उसे ही अपलक निहार रही थी. ज्ञानेंद्र ने महसूस किया कि दिल की बात कहने का ऐसा मौका मुश्किल से ही मिलेगा. इसलिए वह ईशा की कलाई थामते हुए बोला, ‘‘ईशा, मुझे तुम से प्यार हो गया है. तुम्हारे बगैर सबकुछ सूनासूना सा लगता है. मुझे लगता है कि तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए ऐसी ही फीलिंग्स हैं. अगर ऐसा है तो प्लीज मेरा प्यार स्वीकार कर लो.’’

‘‘ज्ञानेंद्र, तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारे मुंह से ये शब्द सुनने के लिए कितनी बेकरार थी. कितनी देर लगा दी तुम ने अपने दिल की बात कहने में. मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं कि मैं तुम से कितना प्यार करती हूं. आई लव यू ज्ञानेंद्र.’’

उस दिन दोनों ने अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया, इस के बाद जैसे दोनों की दुनिया ही बदल गई. समय के साथ उन की मोहब्बत दिन दूनी रात चौगुनी परवान चढ़ती गई. ज्ञानेंद्र जब ड्यूटी पर होता तो ईशा से मोबाइल पर बातें करता और जब समय मिलता तो उस के साथ घूमताफिरता. इस तरह दोनों एकदूसरे के इतना करीब आ गए कि उन्हें लगने लगा, अब एकदूसरे के बिना नहीं रहा जा सकता. अंतत: शुरुआत ईशा ने की. उस ने अपने दिल की बात घरवालों को बता कर ज्ञानेंद्र सिंह से शादी करने की इच्छा जाहिर की.

ईशा की बात सुन कर पहले तो उस की मां विनीता और पिता कौशलेश चौंके, लेकिन बाद में बेटी की खुशी के लिए राजी हो गए. दरअसल ईशा ने उन्हें समझाया था कि दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह उन की ही जातिबिरादरी का है. अच्छा कमाता है और पुलिस विभाग में अच्छे पद पर तैनात है. बेटी की मरजी जान कर वे लोग ईशा की शादी ज्ञानेंद्र से करने को राजी हो गए. सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र से बात की गई तो उस ने बताया कि कुछ कारणों से उस ने अपने घर वालों से संबंध विच्छेद कर रखा है इसलिए उस के परिवार का कोई सदस्य शादी में शामिल नहीं हो पाएगा.

बहरहाल, बातचीत के बाद कौशलेश ने 10 मार्च, 2013 को अपनी बेटी ईशा का विवाह ज्ञानेंद्र सिंह के साथ कर दिया. शादी के बाद ज्ञानेंद्र उसे साकेत नगर स्थित अपने घर ले गया. उस वक्त उस की पत्नी नीलम मायके गई हुई थी. इस के बाद ईशा ज्यादातर मायके में ही रही. वह उसे अपने घर तभी ले जाता था, जब नीलम मायके गई होती थी. बहरहाल, हंसीखुशी से एक वर्ष कब बीत गया, पता ही न चला. इसी बीच ईशा ने एक खूबसूरत बच्ची को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने सान्या रखा. सान्या के जन्म से जहां ईशा के जीवन में बहार आ गई थी, वहीं ज्ञानेंद्र खोयाखोया सा रहने लगा था. दिखावे के तौर पर तो वह उसे प्यार करता था, लेकिन अंदर ही अंदर परेशान रहता था.

ईशा और ज्ञानेंद्र में पहली बार तकरार तब शुरू हुई जब वह अपनी बेटी सान्या का बर्थडे सर्टिफिकेट बनवाने नगर निगम पहुंची. दरअसल, ज्ञानेंद ने सर्टिफिकेट में पिता की जगह अपना नाम लिखवाने से मना कर दिया था. इस बात को ले कर ईशा और ज्ञानेंद्र में काफी विवाद हुआ. यहीं से ईशा को ज्ञानेंद्र पर शक हुआ. जब ईशा ने गुप्त रूप से ज्ञानेंद्र के संबंध में जानकारी हासिल की तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे पता चला कि ज्ञानेंद्र शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता है. वह अपनी पत्नी नीलम और बच्चों के साथ कानपुर में ही रहता है. वह उसे तभी अपने घर ले जाता है, जब नीलम मायके गई होती है.

उस दिन देर रात ज्ञानेंद्र सिंह घर आया तो ईशा ने उस से पूछा, ‘‘मैं कौन हूं तुम्हारी. पत्नी, प्रेमिका या रखैल?’’

‘‘यह तुम कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हो? तुम पत्नी हो मेरी.’’ ज्ञानेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘झूठ बोल रहे हो, तुम शादीशुदा और 2 बच्चों के पिता हो. तुम्हारी पत्नी का नाम नीलम है, जिस के साथ तुम वैवाहिक जीवन बिता रहे हो. तुम फरेबी और धोखेबाज हो. प्यार का नाटक कर के तुम ने मुझे धोखा दिया और मुझ से शादी कर ली. लेकिन अब मैं चुप नहीं बैठूंगी. तुम्हारे खिलाफ लड़ाई लड़ूंगी. जरूरत पड़ी तो रिपोर्ट भी दर्ज कराऊंगी.’’

ज्ञानेंद्र सिंह समझ गया कि ईशा को असलियत का पता चल गया है, इसलिए उस ने माफी मांग ली. फिर बोला, ‘‘ईशा तुम मेरी दूसरी पत्नी बन कर रह सकती हो. मैं तुम्हें पूरा सम्मान दूंगा. कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. चाहो तो अपने और बेटी के नाम पर जितना चाहे पैसा जमा करा सकती हो. मैं खुशीखुशी जमा कर दूंगा.’’

‘‘मिस्टर ज्ञानेंद्र, पत्नी दूसरी पहली नहीं होती. पत्नी सिर्फ पत्नी होती है. अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो अपनी पत्नी नीलम को तलाक दे दो.’’

‘‘उसे तलाक देना आसान नहीं है.’’ ज्ञानेंद्र ने मजबूरी जाहिर की तो ईशा बोली, ‘‘मेरा क्या होगा. यह सोचा है तुम ने? अपनी पत्नी और बच्चों की चिंता थी तो मेरे साथ प्यार का स्वांग कर के धोखे से शादी क्यों की? अगर तुम ने नीलम को तलाक नहीं दिया तो इस का अंजाम अच्छा नहीं होगा. मैं जहर खा कर जान दे दूंगी या फिर तुम्हारे खिलाफ धोखाधड़ी से शादी रचाने और शारीरिक शोषण करने की रिपोर्ट दर्ज कराऊंगी.’’

ईशा की धमकी सुन कर ज्ञानेंद्र सिंह अंदर तक कांप गया.वह तनाव में रहने लगा. ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियां बढ़ना स्वभाविक था. फलस्वरूप दोनों में आएदिन झगड़ा होने लगा. लड़झगड़ कर ईशा मायके आ गई. आखिरकार इस गंभीर समस्या के निदान के लिए दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा के कत्ल की योजना बना डाली. अपनी इस योजना में उस ने अपने साथी मनीष कठेरिया, उस के भाई बच्चा और मनीष के साथी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को शामिल कर लिया. मनीष कठेरिया किदवई नगर में रहता था. वह दबंग किस्म का आदमी था. साकेत नगर में उस की ‘टेलीकाम विला’ नाम से मोबाइल शौप तथा ‘बालाजी ट्रैवल्स’ के नाम से ट्रैवलिंग एजेंसी थी. इस के अलावा वह कमेटी भी चलाता था. पुलिस से दोस्ती करना उस का शौक था.

दर्जनों थानेदारों से उस के दोस्ताना संबंध थे. जिन्हें वह मुफ्त में मोबाइल फोन और आनेजाने के लिए लग्जरी गाडि़यां मुहैया कराता था. इस सेवा के एवज में वह अपने काम निकलवाता था. ज्ञानेंद्र सिंह जब साकेत नगर चौकी इंचार्ज था, तभी उस की दोस्ती मनीष से हुई थी. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती बढ़ती गई. अर्जुन जूही बारादेवी में रहता था और मनीष कठेरिया का दोस्त था. वह मनीष की ट्रैवलिंग एजेंसी में लग्जरी कार चलाता था. अर्जुन की प्रेमिका अवंतिका किदवई नगर में रहती थी. दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया था. मनीष कठेरिया ने ही अर्जुन और अवंतिका का परिचय दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह से कराया था. मनीष का भाई बच्चा गोविंद नगर में रहता था.

आर्थिक मदद के लिए वह मनीष के पास आता था. मनीष के कहने पर बच्चा हर काम करने के लिए तत्पर रहता था. मनीष की कमेटी का पैसा बच्चा ही वसूल किया करता था. वह हमेशा मारपीट पर आमादा रहता था. इसी बीच ज्ञानेंद्र सिंह का तबादला प्रतापगढ़ हो गया था. वहां वह आंसपुर (देवसरा) थाने में तैनात रहा. बाद में काम में लापरवाही बरतने के कारण उसे लाइन हाजिर कर दिया गया था. लाइन हाजिर होने के बाद वह पुलिस लाइन में ड्यूटी कर रहा था. ईशा की धमकी ने उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम कर दी थी. उसे पता था कि ईशा ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो उस की नौकरी तो जाएगी ही उसे जेल की हवा भी खानी पड़ेगी. इसलिए वह जल्द से जल्द ईशा का काम तमाम करना चाहता था. इस के लिए वह बराबर अपने दोस्तों से संपर्क बनाए हुए था. उस ने उन से मिल कर ईशा की हत्या की योजना बना ली थी.

अपनी योजना के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह 17 मई, 2015 को ईशा के घर नवीन नगर, काकादेव पहुंचा. वहां उस ने ईशा की मां, मौसी, मामा व अन्य घरवालों से माफी मांगी और वादा किया कि वह ईशा को शारीरिक या मानसिक पीड़ा नहीं पहुंचाएगा और जैसा वह कहेगी, वैसा ही करेगा. उस के कहने पर पहली पत्नी नीलम को तलाक भी दे देगा. उस ने यह भी कहा कि अगर किसी वजह से वह नीलम को तलाक न दे सका तो ईशा व उस की बेटी के भरणपोषण के लिए मोटी रकम देगा. ईशा के घरवालों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया. 18 मई, 2015 की शाम 4 बजे दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह अपने साथी मनीष कठेरिया के साथ लग्जरी कार से ईशा के घर पहुंचा और उस की मां विनीता के पैर छू कर बोला, ‘‘मांजी, हम ईशा को कुष्मांडा देवी के दर्शन कराने ले जाना चाहते हैं. हमें आप की इजाजत चाहिए.’’

ईशा ज्ञानेंद्र की पत्नी थी, सो उन्हें क्या ऐतराज हो सकता था. लिहाजा उन्होंने ईशा को ज्ञानेंद्र के साथ जाने की इजाजत दे दी. ईशा व ज्ञानेंद्र को रात 8 बजे तक मंदिर से वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन जब दोनों रात 10 बजे तक वापस नहीं आए तो ईशा की मां विनीता सचान को चिंता हुई. उन्होंने ईशा और ज्ञानेंद्र से मोबाइल पर बात करनी चाही, लेकिन दोनों के मोबाइल स्विच्ड औफ थे. रात भर विनीता बेटी के आने का इंतजार करती रहीं, लेकिन वह वापस नहीं लौटी. सुबह को परेशानहाल विनीता सचान थाना काकादेव पहुंचीं. थाने पर उस समय थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव मौजूद थे. उन्होंने सारी बात बताते हुए रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगई. लेकिन विभाग का मामला होने की वजह से पुलिस ने उन्हें टरका दिया. इस पर विनीता सचान डीआईजी आशुतोष पांडेय से मिलीं और शक जताते हुए रिपोर्ट दर्ज कराने की विनती की.

डीआईजी आशुतोष पांडेय को मामला गंभीर लगा. अत: उन्होंने थानाप्रभारी उदय प्रताप को तत्काल रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दे दिया. आदेश मिलते ही उदय प्रताप ने विनीता सचान की ओर से भादंवि की धारा 364 के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. 20 मई को काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को कौशांबी के थाना महेवाघाट द्वारा एक युवती की सिर विहीन लाश मिलने की सूचना दी गई. शक के आधार पर थानाप्रभारी विनीता सचान, उन के पुत्र ऐश्वर्य राज व अन्य घरवालों के साथ महेवाघाट थाना पहुंचे. पुलिस ने लाश मोर्चरी में रखवा दी थी. विनीता सचान ने जब उस लाश को देखा तो वह फफक कर रो पड़ीं. यह लाश उन की बेटी ईशा की ही थी. विनीता ने लाश की पहचान ईशा के हाथ में बंधी कलाई घड़ी तथा बांह पर गुदे लव आकार के टैटू से की थी.

लाश की शिनाख्त होने पर महेवाघाट थाना पुलिस ने अपने यहां दर्ज हत्या के मामले को थाना काकादेव, कानपुर ट्रांसफर कर दिया. चूंकि ईशा की लाश की शिनाख्त हो चुकी थी, इसलिए काकादेव पुलिस ने अपहरण के इस मामले में धारा 302/201/120बी और जोड़ दी. साथ ही विनीता के बयान के आधार पर ज्ञानेंद्र सिंह के साथसाथ बच्चा, मनीष कठेरिया, अर्जुन और उस की कथित पत्नी अवंतिका को भी आरोपी बना दिया. चूंकि यह मामला पुलिस के एक दरोगा से जुड़ा था इसलिए डीआईजी आशुतोष पांडेय ने ईशा के हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने, कत्ल में प्रयुक्त हथियार और सिर बरामद करने के लिए एक विशेष पुलिस टीम बनाई. इस टीम में सीओ स्वरूप नगर आतिश कुमार, क्राइम ब्रांच के सीओ अमित कुमार राय, प्रभारी आर.के. सक्सेना तथा काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने ज्ञानेंद्र, बच्चा, मनीष कठेरिया तथा उस के साथी अर्जुन के ठिकानों पर ताबड़तोउ़ छापे मारे. लेकिन सभी आरोपी फरार थे. पुलिस टीम ने उन के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. साथ ही करीब एक दर्जन लोगों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की. निर्दोष पाए जाने पर बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. पुलिस टीम को ईशा के मोबाइल की लोकेशन आगरा में मिली. पुलिस टीम आगरा गई और हाइवे के एक ढाबे के कर्मचारी से ईशा का मोबाइल बरामद कर लिया. उस कर्मचारी ने बताया कि कुछ लोग यह मोबाइल खाना खाने के बाद मेज पर छोड़ गए थे. पुलिस टीम को समझते देर नहीं लगी कि हत्यारोपियों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए ऐसा किया होगा.

25 मई, 2015 को पुलिस टीम ने हत्यारोपी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को छपेड़ा पुलिया, काकादेव से कार सहित गिरफ्तार कर लिया. अर्जुन अपनी प्रेमिका को स्विफ्ट डिजायर कार से घुमाने बिठूर जा रहा था. यह कार मनीष कठेरिया की थी. अर्जुन और अवंतिका के पास से ईशा का एक कंगन भी बरामद हुआ. पूछताछ में अर्जुन ने बताया कि घटना वाले दिन शाम 4 बजे ज्ञानेंद्र सिंह स्विफ्ट कार से ईशा के घर पहुंचा था. उस वक्त कार में मनीष और उस का भाई बच्चा भी मौजूद था. ईशा को साथ ले कर तीनों नौबस्ता आए. मनीष ने उसे व अवंतिका को फोन कर के वहीं बुला लिया.

सभी 6 लोग 2 गाडि़यों के साथ विधनू, घाटमपुर, फतेहपुर होते हुए कौशांबी की ओर बढ़े. रास्ते में एक सुनसान जगह पर ज्ञानेंद्र ने गाड़ी रोक दी. उसी वक्त मनीष ने ईशा को दबोच लिया और ज्ञानेंद्र ने तेज धार वाले चाकू से ईशा का सिर धड़ से अलग कर दिया. धड़ से खून का फव्वारा छूटा तो मनीष ने अपनी शर्ट उतार कर सिर को धड़ से बांध दिया. फिर ईशा के शरीर से कपड़े और जेवर उतार कर सिर को यमुना नदी में तथा धड़ को महेवाघाट यमुना पुल के पास फेंक दिया. तत्पश्चात गाड़ी की अदलाबदली कर के तथा कंगन दे कर उसे वापस भेज दिया गया. मनीष, बच्चा व दरोगा ज्ञानेंद्र दूसरी गाड़ी से कहीं चले गए. अर्जुन व अवंतिका का बयान दर्ज करने के बाद काकादेव पुलिस ने दोनों को जेल भेज दिया.

अब पुलिस टीम ने शातिर दिमाग ज्ञानेंद्र सिंह, उस के साथी मनीष कठेरिया व बच्चा को गिरफ्तार करने के लिए जाल बिछाया. इस से घबरा कर 30 मई को मनीष कठेरिया ने सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे 3 दिनों की रिमांड पर ले लिया. मनीष से कोहना व किदवई नगर थाने में कड़ाई से पूछताछ की गई, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने उस की मां उषा को थाने बुलवा लिया. दोनों को आमनेसामने बैठा कर पुलिस टीम ने पूछताछ शुरू की. जबान न खुलने पर पुलिस ने उस की मां उषा को जेल भेजने की धमकी दी. इस धमकी से मनीष टूट गया और उस ने जबान खोल दी.

वह पुलिस टीम को महेवाघाट थाना क्षेत्र ले गया. वहां उस ने एक गड्ढे से मृतक ईशा का पर्स व सोने का एक कंगन बरामद करा दिया. पर्स में कुछ नकदी व जरूरी कागजात थे. पुलिस टीम ने यहीं से मनीष की खून से सनी शर्ट भी बरामद कर ली, जिसे उस ने हत्या के बाद खून रोकने के लिए इस्तेमाल किया था. बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने मनीष को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. मनीष को जेल भेजने के बाद पुलिस टीम ने ईशा की हत्या के मुख्य आरोपी दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को पकड़ने की कवायद शुरू की. एसएसपी शलभ माथुर ने उसे पकड़ने के लिए 12 हजार का ईनाम घोषित कर दिया था. लेकिन दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह पुलिस की हर युक्ति को धता बता कर 8 जून को कोर्ट में हाजिर हो गया. पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम हाथ मलती रह गई.

दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह द्वारा आत्मसमर्पण की बात कानपुर कोर्ट में फैली तो वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वे झुंड बना कर सीजेएमएम कोर्ट जा पहुंचे. पुलिस जब ज्ञानेंद्र को ले जाने लगी तो वकील उस पर टूट पड़े और उसे लातघूंसों से जम कर पीटा, उन्होंने उस के कपड़े फाड़ दिए और मुंह पर थूका. बड़ी मसक्कत के बाद पुलिस उसे जेल ले जा सकी. कत्ल में इस्तेमाल हथियार और मृतका का सिर बरामद करने के लिए पुलिस टीम ने दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को 17 जून को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. काफी जद्दोजहद के बाद ज्ञानेंद्र सिंह ने मुंह खोला. वह पुलिस टीम को महेवाघाट, कौशांबी में यमुना नदी के दूसरी तरफ ले गया, जहां उस ने जमीन में गड़े सर्जिकल चाकू, ईशा का मंगलसूत्र, चेन और अंगूठी बरामद कराई. ईशा के सिर के संबंध में पूछने पर ज्ञानेंद्र ने बताया कि उसे यमुना नदी की तेज धारा में फेंक दिया गया था.

सिर को बरामद करने के लिए पुलिस ने यमुना नदी में जाल डलवाया, लेकिन सिर बरामद नहीं हो सका था. पुलिस पूछताछ में ज्ञानेंद्र ने बताया कि ईशा उस पर पहली पत्नी नीलम को तलाक देने का दबाव बना रही थी. जिस से परेशान हो कर उस ने उसे ठिकाने लगा दिया. वह उसे मंदिर दर्शन कराने के बहाने ले गया था. रास्ते में कार के भीतर ही उस का काम तमाम कर दिया गया. फिर धड़ को महेवाघाट थाने के पास यमुना नदी के पास फेंक दिया गया और सिर यमुना नदी में. वारदात के वक्त मनीष कठेरिया, उस का भाई बच्चा, अर्जुन तथा उस की प्रेमिका अवंतिका उस के साथ थे.

19 जून, 2015 को काकादेव पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर अभियुक्त ज्ञानेंद्र सिंह को सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. अभियुक्त बच्चा फरार था. Hindi stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Stories: एक थी प्रिया

Hindi Crime Stories: डा. प्रिया की शादी हुए 5 साल हो गए थे, लेकिन उन के और डा. कमल के संबंध पतिपत्नी की तरह नहीं बन पाए थे. आखिर इस की वजह क्या थी, आगे इस का परिणाम क्या हुआ?  दिल्ली के थाना नबी करीम पुलिस की जीप 18 अप्रैल की रात करीब 2 बजे पहाड़गंज स्थित होटल प्रेसीडेंसी पहुंची तो मैनेजर बाहर ही मिल गया. थानाप्रभारी जीप से जैसे ही उतरे, मैनेजर ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, हमारे होटल के कमरा नंबर 302 में ठहरी डा. प्रिया वेदी  के कमरे में कोई हलचल नहीं हो रही है. हमें डर लग रहा है कि उस में कोई अनहोनी तो नहीं हो गई?’’

‘‘डा. प्रिया वेदी कौन हैं, होटल में कब से ठहरी हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘वह अकेली ही थीं या उन के साथ कोई और भी था?’’

‘‘सर, आज ही दिन के साढ़े बारह बजे के आसपास वह अकेली ही आई थीं. सामान के नाम पर उन के पास एक ट्रौली बैग था. पहचान पत्र के रूप में उन्होंने राजस्थान ट्रांसपोर्ट अथौरिटी की ओर से जारी किया गया ड्राइविंग लाइसेंस दिया था.’’

‘‘वह जब से आईं, बाहर बिलकुल नहीं निकलीं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘कमरे में जाने के बाद से उन्होंने न तो रूम अटेंडेंट को बुलाया है और न ही कमरे से बाहर निकली हैं. सर, जब वह यहां आई थीं तो कुछ तनाव में लग रही थीं. रिसैप्शन पर ही मैं ने उन्हें ठंडा पानी मंगा कर पिलाया था, ताकि वह रिलैक्स महसूस करें. मैं ने उन से पूछा भी था, पर उन्होंने कुछ बताया नहीं था. वैसे भी किसी से उस की व्यक्तिगत बातों के बारे में ज्यादा नहीं पूछा जा सकता.’’

‘‘इस बीच आप ने उन के बारे में पता करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘सर, आधी रात तक जब उन के कमरे से किसी तरह की सर्विस की कोई काल नहीं आई तो मैं ने रूम अटेंडेंट को भेजा कि जा कर मैडम से पूछ लो कि उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है. लेकिन बारबार बेल बजाने के बाद भी जब उन्होंने दरवाजा नहीं खोला तो मुझे शक हुआ और मैं ने पुलिस को सूचना दे दी.’’ मैनजर ने एक ठंडी सांस ले कर कहा.

‘‘चलो, मुझे वह कमरा दिखाओ, जिस में डा. प्रिया वेदी ठहरी हुई हैं.’’

मैनेजर पुलिस टीम को तीसरी मंजिल स्थित कमरा नबंर 302 पर ले गया. थानाप्रभारी ने कमरे का दरवाजा खुलवाने की काफी कोशिश की. जब दरवाजा खुलवाने की उन की हर कोशिश नाकामयाब हो गई तो उन्होंने कहा, ‘‘अब कमरे का दरवाजा तोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.’’

मैनेजर ने रिसैप्शन से 2-3 कर्मचारियों को बुलवा लिया तो उन्होंने कमरे के दरवाजे पर जोरजोर धक्के दिए, जिस से अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर जाने पर कमरे में पड़ा बैड खाली मिला. कमरे से अटैच बाथरूम खोला गया तो उस में डा. प्रिया खून से लथपथ पड़ी थीं. उन के एक हाथ की नस कटी थी तो दूसरे में ड्रिप लगी थी. होटल मैनेजर ने बताया कि यही डा. प्रिया वेदी हैं. थानाप्रभारी ने डा. प्रिया की नब्ज देखी तो वह थम चुकी थी. उन में जीवन का कोई भी लक्षण नहीं था. थाना नबी करीम पुलिस डा. प्रिया की लाश का निरीक्षण कर ही रही थी कि उन के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर थाना डिफेंस कालोनी पुलिस भी उन के घर वालों के साथ होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई.

घर वालों ने भी उस लाश की शिनाख्त डा. प्रिया के रूप में कर दी. उन्होंने बताया कि यह दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट थीं और अपने पति डा. कमल वेदी के साथ एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहती थीं. पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो डा. प्रिया वेदी का लिखा साढ़े 3 पेज का एक सुसाइड नोट मिला. होटल के कमरे का हर सामान अपनी जगह रखा था. डा. प्रिया का भी सामान सुरक्षित था. इस से साफ लग रहा था कि यह हत्या का नहीं, खुदकुशी का ही मामला है. पुलिस ने जरूरी काररवाई के बाद डा. प्रिया वेदी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इतनी काररवाई निपटातेनिपटाते सुबह हो गई थी.

19 अप्रैल को पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने डा. प्रिया की लाश घर वालों को सौंप दी तो उसी दिन उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अंतिम संस्कार में एम्स के भी कई डाक्टर शामिल हुए थे. वे डा. प्रिया की मौत को ले कर तरहतरह की बातें कर रहे थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि डा. प्रिया वेदी ने आत्महत्या की है. उन का कहना था कि वह बहुत ही हंसमुख और मिलनसार थीं. साथी डाक्टरों से उन के काफी अच्छे संबंध थे. उन का कहना था कि उन्होंने अपने दिल में छिपे दर्द का  कभी किसी को अहसास नहीं होने दिया. डा. प्रिया एम्स में अगस्त, 2014 से एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के पद पर काम कर रही थीं. उन के पति डा. कमल वेदी भी एम्स में ही स्किन के डाक्टर थे. वह डा. कमल से एक साल जूनियर थीं.

होटल के कमरे में पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला था, उस में डा. प्रिया ने पति पर समलैंगिक होने का आरोप लगाया था. पुलिस की शुरुआती जांच में यह बात सामने भी आई है कि डा. प्रिया ने खुदकुशी करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट पर कई बातें लिखी थीं. डा. प्रिया ने फेसबुक पर लिखा था कि मैं पिछले 5 सालों से डा. कमल वेदी के साथ शादीशुदा जिंदगी बिता रही हूं, लेकिन हमारे शारीरिक संबंध नहीं बने, जो कि दांपत्य के लिए जरूरी होते हैं. शादी ही इसी के लिए होती है. मुझे एक फर्जी ईमेल आईडी मिली थी, जिस के द्वारा मेरे पति समलैंगिकों से बातें करते थे. मुझे जब इन सब बातों का पता चला तो मुझे प्रताडि़त किया जाने लगा.

उसी दिन डा. प्रिया के घर वालों ने दिल्ली के नबी करीम पुलिस थाने में डा. कमल के खिलाफ दहेज प्रताड़ना एवं अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज करा दिया. दिल्ली पुलिस ने शुरुआती जांच में मिले साक्ष्यों एवं डा. प्रिया के घर वालों के बयान के आधार पर 19 अप्रैल को डा. कमल को गिरफ्तार कर लिया. डा. प्रिया कौन थीं, कितने संघर्षों के बाद डाक्टर बन कर उन्होंने पिता का सपना पूरा किया था? इतना संघर्ष कर के जीवन को संवारने वाली डा. प्रिया ने आखिर आत्महत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए हमें जयपुर से शुरुआत करनी होगी.

राजस्थान की राजधानी जयपुर, जो गुलाबी नगर के नाम से मशहूर है, के चांदपोल बाजार में एक छोटी सी गली है, जिसे गोविंदरावजी का रास्ता कहते हैं. इसी रास्ते में कान महाजन बड़ के पास रामबाबू वर्मा रहते हैं. वह टेलरिंग यानी कपड़ों की सिलाई की दुकान से गुजरबसर करते थे. उन के 3 बच्चे थे, सब से बड़ा बेटा विजय, उस से छोटी बेटी प्रिया और सब से छोटा बेटा लोकेश. उन के तीनों ही बच्चे पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार थे. रामबाबू वर्मा खुद तो ज्यादा नहीं पढ़ सके थे, लेकिन वह बच्चों को पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे. यही उन का सपना भी था, जिसे पूरा करने के लिए वह जम कर मेहनत कर रहे थे. उन का चूनेमिट्टी का मकान था. सीमित आय थी. जाहिर है, घर के हालात बहुत अच्छे नहीं थे. कपड़ों की सिलाई की आमदनी से किसी तरह परिवार की दालरोटी चल रही थी. बच्चे पढ़ने लगे तो खर्च बढ़ता गया.

लेकिन रामबाबू ने हिम्मत नहीं हारी. वह बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन दूनी और रात चौगुनी मेहनत करने लगे. पत्नी भी उन का साथ देती थीं. इस तरह बच्चों की पढ़ाई के लिए पतिपत्नी न दिन देख रहे थे न रात. पतिपत्नी की दिनरात की मेहनत रंग लाई और बड़े बेटे विजय का सिलेक्शन मैडिकल में हो गया. प्रिया उस से छोटी थी. भाई के सिलेक्शन के बाद उस ने भी डाक्टर बनने का मन बना लिया. पढ़ाई में वह तेज थी ही, भाई का सपोर्ट मिला तो उस ने भी मातापिता को निराश करने के बजाय उन के सपनों में रंग भर दिया.

प्रिया ने प्रीमैडिकल टैस्ट पास कर लिया. बड़ा बेटा विजय मैडिकल की पढ़ाई कर ही रहा था. रामबाबू वर्मा के लिए 2 बच्चों की मैडिकल की पढ़ाई का खर्च वहन करना मुश्किल था. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बैंक से बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लिया, लेकिन उन की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं आने दी. प्रिया का अजमेर के जेएलएन मैडिकल कालेज में दाखिला हुआ था. वह पूरी लगन से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी. बीचबीच में वह घर भी आती रहती थी. इस तरह चांदपोल की गली में प्रिया आइडियल गर्ल बन गई थी. क्योंकि पुराने से मकान में रह कर गरीबी में पलबढ़ कर वह डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी.

आखिर वह दिन भी आ गया, जब प्रिया एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर के डाक्टर बन गई. रामबाबू वर्मा के लिए वह सब से ज्यादा खुशी का दिन था. उन का सब से बड़ा सपना पूरा हो गया था. बड़े बेटे विजय के डाक्टर बनने से ज्यादा खुशी उन्हें प्रिया के डाक्टर बनने से हुई थी. इस के बाद 24 अप्रैल, 2010 को उन्होंने प्रिया की शादी डा. कमल वेदी से कर दी. डा. कमल वेदी राजस्थान के सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ के रहने वाले महेश वेदी के बेटे थे. परिवार वालों की सहमति से दोनों की शादी धूमधाम से हुई थी. रामबाबू वर्मा के लिए खुशी की बात थी कि उन्हें डाक्टर बेटी के लिए डाक्टर दामाद भी मिल गया था. वह निश्चिंत थे कि बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी.

दोनों की जोड़ी खूब जमेगी. प्रिया भी अपने ही पेशे का जीवनसाथी मिलने से खुश थी. वह जानती थी कि एक डाक्टर की भावना को दूसरा डाक्टर ही अच्छी तरह समझ सकता है. बेटी को डाक्टर बना कर और उस की शादी कर के रामबाबू वर्मा  एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए थे. अब उन के ऊपर छोटे बेटे लोकेश की जिम्मेदारी रह गई थी. लोकेश भी पढ़ाई में तेज था. वह बैंक की नौकरियों की तैयारी कर  रहा था. वह भी अपने प्रयासों में सफल हो गया और उसे बैंक में नौकरी मिल गई. फिलहाल वह कोटा में एक बैंक में प्रोबेशनरी अफसर है. डा. कमल वेदी को उसी बीच सन 2012 में दिल्ली के एम्स में नौकरी मिल गई. वह एम्स में स्किन के डाक्टर हैं. इस के बाद सन 2014 में डा. प्रिया भी एम्स में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के रूप में तैनात हो गईं. पतिपत्नी को एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहने के लिए मकान भी मिल गया था.

डा. प्रिया को भले ही एम्स में पति डा. कमल के साथ नौकरी मिल गई थी, लेकिन वह खुश नहीं थीं. डा. प्रिया के मायके वालों के अनुसार डा. कमल ने प्रिया को कभी पति का प्यार नहीं दिया. वह अपने वैवाहिक जीवन को ले कर परेशान रहती थी. जब इस बात की जानकारी रामबाबू को हूई तो उन्होंने कमल के पिता महेश वेदी से बात की. महेश वेदी ने रामबाबू को भरोसा दिलाया कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा. डा. कमल ने भले ही प्रिया के वैवाहिक जीवन के सुनहरे सपनों को चूरचूर कर दिया था, लेकिन प्रिया अपने पति कमल से बेहद प्यार करती थी. वह न तो पति को छोड़ना चाहती थी और न ही अपने परिवार को टूट कर बिखरने देना चाहती थी.

करीब ढाई साल पहले रामबाबू वर्मा को जब बेटी पर हो रहे जुल्मों की जानकारी मिली तो प्रिया ने उन्हें मां की कसम दिला  कर चुप करा दिया था. वह चुपचाप मानासिक और शारीरिक अत्याचार सहन करती रही. डा. प्रिया ने फेसबुक पर पोस्ट लिख कर अपना दर्द बयां किया था. उन्होंने लिखा था कि शादी के 6 महीने बाद ही मुझे यकीन हो गया था कि मेरा पति डा. कमल समलैंगिक है और उस के कई लोगों के साथ समलैगिक संबंध हैं. उनहोंने लोगों के नाम भी फेसबुक पर लिखे थे. उन्होंने जब कमल के लैपटौप में उस के समलैंगिक संबंधों के सबूत दिखाए तो कमल ने कहा कि किसी ने उस का एकाउंट हैक कर के इस तरह की चीजें डाल दी हैं.

डा. प्रिया ने आगे लिखा था कि मैं सच जान चुकी थी. फिर भी मैं कमल से बेहद प्यार करती थी, लेकिन वह मेरे प्यार को समझ नहीं पाए. अगर हमारे समाज में ऐसे लोग हैं तो कभी उन से शादी मत कीजिए. अपने जीवन के अंतिम समय से कुछ घंटे पहले डा. प्रिया ने फेसबुक पर जो स्टेटस अपडेट किया था, उस में डा. कमल को गुनहगार बताया था. उन का कहना था कि वह कमल से बेहद प्यार करती थीं, इस के बावजूद उस ने उसे छोटीछोटी चीज के लिए तरसाया. केवल एक महीने पहले उस ने खुद को समलैंगिक माना. इस सब के बावजूद वह उस की मदद करना चाहती थीं, लेकिन वह उसे टौर्चर करता रहा.

इसी फेसबुक पेज पर डा. प्रिया ने एक रात पहले के वाकए का जिक्र करते हुए लिखा था, ‘तुम ने मुझे इतना अधिक टौर्चर किया है कि अब तुम्हारे साथ सांस भी नहीं ले सकती. तुम इंसान नहीं, राक्षस हो, क्योंकि तुम ने मेरी खुशी छीन ली. तुम्हारे जैसे लोग केवल लड़की और उस के घर वालों की भावनाओं से खेलते हैं. डा. कमल, मैं ने तुम से कभी कुछ नहीं चाहा था, क्योंकि मैं तुम्हें बेहद प्यार करती थी, जबकि तुम ने कभी मेरे प्यार की अहमियत नहीं समझी. कमल तुम मेरे गुनहगार हो. 18 अप्रैल की सुबह डा. प्रिया जब उठीं तो बेहद तनाव में थीं. बीती रात ही डा. कमल ने उस से झगड़ा किया था. वह फ्रेश हुईं और एक ट्रौली बैग में जरूरी सामान रख कर कुछ देर वह सोचती रहीं, फिर एकाएक मन को कठोर कर के अस्पताल में इमरजेंसी ड्यूटी होने की बात कह कर घर से निकल पड़ीं.

सुबह करीब साढ़े 9 बजे प्रिया ने जयपुर में अपने पिता को फोन किया कि प्लीज पापा, जल्दी आ जाओ. आप नहीं आओगे तो मेरा मरा मुंह देखोगे. उसी दिन सुबह करीब 11 बजे प्रिया ने कोटा में रहने वाले अपने छोटे भाई लोकेश को फोन कर के यही बातें कही थीं. प्रिया की बातों से उस के घर वालों की चिंता बढ़ गई थी. रामबाबू वर्मा तुरंत घर वालों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. दूसरी ओर कोटा से छोटा भाई लोकेश भी अपने एक कजिन के साथ दिल्ली के लिए चल पड़ा था. रास्ते से उन्होंने कई बार प्रिया को फोन किए, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. इस बीच प्रिया का भी कोई फोन नहीं आया.

जब रामबाबू वर्मा, लोकेश और उन के अन्य रिश्तेदार दिल्ली पहुंचे तो रात हो चुकी थी. प्रिया के बारे में जब उन्हें कोई सही सूचना नहीं मिली तो सभी थाना डिफेंस कालोनी पहुंचे और प्रिया की गुमशुदगी दर्ज करने का अनुरोध किया. पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज कर प्रिया के मोबाइल के आधार पर उस की लोकेशन पता की तो वह पहाड़गंज इलाके में मिली. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि वह पहाड़गंज में होंगी. पुलिस ने प्रिया के पति डा. कमल एवं घर के अन्य लोगों से भी बात की. वे भी प्रिया के बारे में कुछ नहीं बता सके थे. इस के बाद पुलिस मिली मोबाइल लोकेशन के आधार पर रामबाबू वर्मा, लोकेश एवं डा. कमल आदि को साथ ले कर पहाड़गंज के होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई, जहां डा. प्रिया की लाश मिली.

पूछताछ में पता चला कि डा. प्रिया एवं डा. कमल के रिश्तों में इतनी दूरियां आ चुकी थीं कि इसी साल 26 जनवरी को जब जयपुर में प्रिया के छोटे भाई लोकेश की शादी थी तो उस में केवल प्रिया ही गई थी. लेकिन प्रिया ने अपने व्यवहार से किसी को इस बात की भनक नहीं लगने दी थी कि हालत यहां तक पहुंच चुकी है. बहरहाल, डा. प्रिया की मौत ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं. उस के घर वाले प्रिया को इंसाफ दिलाने की मांग कर रहे हैं. जयपुर के स्टैच्यू सर्किल पर प्रिया की याद में कैंडल मार्च भी निकाला गया. फेसबुक पर तेजी से वायरल होने के बाद डा. प्रिया का सुसाइड नोट उस में से हटा दिया गया. डा. प्रिया का वाल पोस्ट उस की मौत के बाद करीब साढ़े 3 हजार लोगों ने शेयर किया था. इस के बाद फेसबुक ने प्रिया की प्रोफाइल को रिमेंबरिंग प्रिया वेदी कर दिया, साथ ही उन का वाल पोस्ट फेसबुक से हटा दिया. Hindi Crime Stories