लगभग साल भर बाद अबू फैजल काठमांडू से वापस घर आया तो पड़ोसियों ने शाहरुख और रुखसार की शिकायत उस से की तो उस का माथा ठनका. उस ने इस बारे में पत्नी से बात की.
उस ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘रुखसार एक बात पूछूं?’’
‘‘एक नहीं, चार पूछो.’’ वह बोली.
‘‘मुझे तुम्हारे और किसी अजनबी के बारे में जो बातें सुनने को मिली हैं. क्या वह सच हैं?’’
‘‘क्या बात?’’
‘‘यही कि तुम्हारे किसी शख्स के साथ नाजायज संबंध हैं.’’
‘‘कहने वालों के मुंह में कीड़े पड़ें. मैं बताती हूं कि वह शख्स शाहरुख है. वह नौबस्ता में रहता है. बाजार में उस से मुलाकात हुई थी. शाहरुख हमारी मदद करता है, अपने रिजवान को प्यार करता है और बुरी नजर रखने वालों से हमें बचाता है, इसलिए लोग हम से जलते हैं और वे तुम्हारे कान भर रहे हैं.’’
अबू फैजल ने उस समय सहज ही अपनी बीवी पर भरोसा कर लिया, लेकिन उस के मन में शक का कीड़ा रह जरूर गया था. इस शक की वजह से उस ने दोबारा काठमांडू जाने का विचार त्याग दिया और जाजमऊ की उसी जूता फैक्ट्री में फिर से काम करने लगा, जिस में पहले करता था.
पति के नेपाल नहीं जाने पर रुखसार भी सतर्क हो गई और उस ने अपने प्रेमी शाहरुख को भी सतर्क कर दिया. अब दोनों सतर्कता के साथ मिलते.
लेकिन होशियारी के बावजूद एक रोज अबू फैजल ने अपने ही घर में शाहरुख और रुखसार को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया. उस रोज शाहरुख तो भाग गया, लेकिन रुखसार भाग कर कहां जाती. अबू फैजल ने उस की जम कर पिटाई की. रंगेहाथ पकड़े जाने के बावजूद रुखसार ने माफी नहीं मांगी, बल्कि उस ने घर में कलह करनी शुरू कर दी.
वह चीख चीख कर उस से बात कर रही थी. कलह से परेशान अबू फैजल ने रुखसार को समझाया और शाहरुख से संबंध तोड़ने की सलाह दी. उस समय तो रुखसार चुप हो गई. अबू फैजल ने सोचा कि पत्नी ने उस की बात मान ली है लेकिन उस ने बाद में प्रेमी से मिलना जारी रखा.
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अबू फैजल अपने स्तर से पत्नी को सही राह पर लाने में सफल नहीं हुआ तब उस ने सास को सारी बातें बता कर मदद मांगी. सास शमशाद बेगम ने भी हर तरह से रुखसार को समझाया, मगर जिस राह पर वह चल पड़ी थी उस से कदम पीछे खींचने को वह तैयार न थी.
रुखसार की हठधर्मी और मनमानी के चलते अबू फैजल से उस के मतभेद बढ़ते गए. फिर घर में झगड़े भी शुरू हो गए. रोजरोज के झगड़े से तंग आ कर एक दिन रुखसार ने शौहर का घर छोड़ दिया और मायके जा कर रहने लगी. यह 20 जनवरी, 2019 की बात है.
29 जनवरी, 2019 को अबू फैजल ससुराल पहुंचा तो उसे पता चला कि रुखसार अपने प्रेमी शाहरुख के साथ यहां से भाग गई है. अबू फैजल अपनी सास और साले के साथ रुखसार को खोजने लगा. वह उसे ढूंढते हुए गल्लामंडी स्थित शाहरुख के घर पहुंचे. रुखसार वहां मौजूद थी.
शमशाद बेगम बेटी को समझाबुझा कर घर ले आई. अबू फैजल गुस्से से लाल था. वह रुखसार पर हाथ उठाता, उस के पहले ही सास ने उसे रोक दिया. अबू फैजल पत्नी को अपने साथ घर ले जाना चाहता था, लेकिन रुखसार जाने को राजी नहीं हुई.
पहली फरवरी, 2019 की सुबह करीब 8 बजे अबू फैजल अपनी फैक्ट्री चला गया. उस रोज शमशाद बेगम की छोटी बेटी की तबीयत कुछ खराब थी. अत: दोपहर बाद वह बेटी को ले कर दवा लेने चली गई. उधर अबू फैजल फैक्ट्री गया जरूर लेकिन उस का मन काम में नहीं लगा और लंच के बाद वह घर की ओर निकल पड़ा.
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शाम लगभग 3 बजे अबू फैजल ससुराल पहुंचा. उस समय घर पर उस की बीवी रुखसार व बेटा रिजवान था. उस ने रिजवान को 10 रुपए दिए और घर के बाहर भेज कर दरवाजा भीतर से बंद कर दिया. रुखसार घर में सजीसंवरी बैठी थी. अबू फैजल को शक हुआ तो वह गुस्से से ताना कसते हुए बोला, ‘‘सजसंवर कर क्या अपने यार से मिलने जा रही हो?’’
‘‘हां,जा रही हूं. रोज जाऊंगी, तुम से देखते बने तो देखो, वरना आंखें फोड़ लो.’’ रुखसार भी गुस्से से बोली.
‘‘बदचलन, बदजात एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी.’’ कहते हुए अबू फैजल पत्नी को पीटने लगा.
इसी दौरान उस की नजर सामने रखे सिलबट्टे पर पड़ी. लपक कर उस ने सिल का पत्थर उठाया और रुखसार के सिर और चेहरे पर वार करने लगा. दर्द से रुखसार चीखने चिल्लाने लगी.
इसी समय शमशाद बेगम बेटी शबनम के साथ दवा ले कर वापस घर आ गई. उस ने घर का दरवाजा बंद पाया और अंदर से चीख सुनी तो उस ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया.
अबू फैजल ने दरवाजे पर दस्तक तो सुनी, लेकिन उस के हाथ थमे नहीं. उस के हाथ तभी थमे, जब रुखसार खून से लथपथ हो कर जमीन पर पसर गई और उस की सांसें थम गईं.
बीवी की हत्या करने के बाद अबू फैजल ने खून सना पत्थर शव के पास फेंका और दरवाजा खोला. सामने सास को देख कर वह बोला, ‘‘मैं ने तुम्हारी बेटी को मार डाला है. अब तुम चाहो तो मुझे भी मार डालो.’’
कहते हुए वह तेजी से भाग गया और थाने पहुंच गया. थाने पहुंच कर कार्यवाहक एसओ रविशंकर पांडेय को उस ने सारी बात बता दी.
हत्यारोपी अबू फैजल से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 2 फरवरी, 2019 को उसे कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत स्वीकृत नहीं हुई थी. मासूम रिजवान अपनी नानी शमशाद बेगम के संरक्षण में था.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
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दिल्ली पुलिस के कंट्रोलरूम को 30 अप्रैल, 2014 को सूचना मिली कि केशोपुर डिपो (Keshopur Depot) के नजदीक गहरे नाले के किनारे बेडशीट में लिपटी हुई कोई चीज पड़ी है और उस बेडशीट पर खून के धब्बे भी लगे हैं. यह इलाका पश्चिमी दिल्ली के ख्याला (Khyala Police Station) थाने के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोलरूम ने यह सूचना वायरलैस द्वारा ख्याला (Khyala) थाने को बता दी. सूचना में बताई गई जगह पर जब तक थाना पुलिस वहां पहुंची, तब तक वहां तमाम लोग इकट्ठे हो गए थे.
खून सनी बेडशीट देख कर पुलिस को भी शक हो रहा था. वहीं पर खून से सना तकिया भी पड़ा था. पुलिस ने जब वह बेडशीट खुलवाई तो उस में एक अधेड़ आदमी की लाश निकली.
50-55 साल के उस आदमी की गरदन और पैरों पर केबल का तार लपेटा हुआ था. उस का सीना चीरा हुआ था और उस के सिर, और शरीर के अन्य भाग पर कई जगह घाव थे. भीड़ में से कोई भी शख्स उस लाश की शिनाख्त नहीं कर सका तो पंचनामा करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए दीनदयाल अस्पताल भिजवा दी.
ख्याला थाने में अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या कर लाश छिपाने का मामला दर्ज कर लिया गया. इस केस को सुलझाने के लिए पश्चिमी जिले के डीसीपी रणवीर सिंह ने एसीपी इलिश सिंघल की देखरेख में एक पुलिस टीम बनाई.
टीम ने सब से पहले अज्ञात लाश मिलने की सूचना दिल्ली के सभी थानों को वायरलैस द्वारा दे दी और लाश की शिनाख्त के लिए जिले में सार्वजनिक स्थानों पर लाश के फोटो लगे पैंफ्लेट चिपकवाए.
पहली मई को पुलिस को खबर मिली कि थाना राजौरी गार्डन में एक आदमी आया है. वह पैंफ्लेट में छपे फोटो को देख कर कह रहा है कि वह उस का रिश्तेदार है. चूंकि हत्या का मामला थाना ख्याला में दर्ज था, इसलिए ख्याला पुलिस थाना राजौरी गार्डन पहुंच गई.
ख्याला पुलिस ने जब उस आदमी से पूछताछ की तो उस ने मरने वाले उस अधेड़ का नाम दलजीत सिंह (Daljeet Singh) बताया और कहा कि वह उस का रिश्तेदार है व राजौरी गार्डन की शहीद भगत सिंह कालोनी में डीडीए फ्लैट्स में रहता है.
पुलिस जब डीडीए कालोनी में दलजीत सिंह के फ्लैट पर पहुंची तो वहां उस की बेटी परमजीत कौर मिली. पुलिस ने परमजीत से उस के पिता दलजीत के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह एक ट्रैवल एजेंसी में ड्राइवर हैं और 30 अप्रैल की सुबह कार ले कर घर से निकले हैं. अभी तक वह घर नहीं लौटे हैं.
पुलिस ने बताया कि उन की तो हत्या हो चुकी है. इतना सुनते ही परमजीत रोने लगी. तसल्ली दे कर पुलिस ने उसे चुप कराया. अस्पताल ले जा कर जब उसे लाश दिखाई तो उस ने उस की शिनाख्त अपने पिता के रूप में की.
लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस का अगला काम हत्यारों तक पहुंचना था. वह जिस ट्रैवल एजेंसी में नौकरी करता था, पुलिस ने उस एजेंसी के मालिक ललित कुमार से बात की. ललित ने बताया कि 30 अप्रैल को दलजीत सिंह ड्यूटी पर आया ही नहीं था.
इस बीच पुलिस ने दलजीत की फैमिली बैकग्राउंड के बारे में पता लगा लिया था. जिस में जानकारी मिली कि परमजीत कौर की कई युवकों से दोस्ती थी. यह दोस्ती उस के पिता को पसंद नहीं थी. इस से पुलिस को परमजीत पर ही शक होने लगा. पिता ड्यूटी पर गए थे, जबकि वह ड्यूटी पर पहुंचे ही नहीं थे. इसलिए पुलिस ने परमजीत से एक बार फिर पूछताछ की.
इस बार सख्ती से की गई पूछताछ में परमजीत ने पुलिस के सामने सच्चाई उगल दी. उस ने पुलिस को बताया कि वह बाप नहीं, दुराचारी था जो अपनी ही बेटी पर गलत नजर रखता था. हालात ऐसे बन गए, जिस की वजह से उसे मारना पड़ा. फिर उस ने अपने ही पिता के कत्ल की जो कहानी बताई, वह पारिवारिक रिश्ते को तारतार करने वाली निकली.
दलजीत सिंह पश्चिमी दिल्ली स्थित राजौरी गार्डन की शहीद भगत सिंह कालोनी में परिवार के साथ रहता था. परिवार में पत्नी के अलावा उस की 3 बेटियां थीं. 2 बेटियों की वह शादी कर चुका था. शादी के लिए अब 23 साल की परमजीत कौर ही बची थी. करीब 3 साल पहले दलजीत की पत्नी की मौत हो गई. इस के बाद घर में केवल 2 लोग ही रह गए थे.
परमजीत ने पुलिस को बताया कि मां के मरने के बाद उस का पिता उस के साथ गलत हरकतें करने लगा. विरोध करने पर वह उसे धमका देता. जिस से वह डर गई. इस के बाद तो उस की हिम्मत बढ़ गई और वह उस का शारीरिक शोषण करने लगा.
पिछले 3 सालों से परमजीत कौर पिता के शारीरिक शोषण का शिकार होती रही. पड़ोस में ही रहने वाले पिं्रस संधु और अशोक शर्मा नाम के युवकों से परमजीत की दोस्ती थी. एक दिन उस ने अपने दिल का दर्द दोस्तों के सामने बयां कर दिया और इस जिल्लतभरी जिंदगी से छुटकारा दिलाने का अनुरोध किया.
एक बाप अपनी सगी बेटी के साथ इस तरह की हरकतें कर सकता है, यह उन्होंने पहली बार सुना था. परमजीत से इस बारे में सलाह मशविरा करने के बाद उन्होंने ऐसे दुराचारी बाप को सबक सिखाने की योजना बना ली.
29 अप्रैल, 2014 को दलजीत सिंह घर लौटा और खाना खा कर सो गया. तभी परमजीत ने अपने दोस्त प्रिंस संधु और अशोक शर्मा को बुला लिया. फिर तीनों ने गहरी नींद में सोए दलजीत पर विकेट से हमला किया. जब उस ने चीखने की कोशिश की तो परमजीत ने उस का मुंह दबोच लिया. उस के सिर से काफी खून निकल चुका था, इसलिए थोड़ी देर में ही उस की मौत हो गई.
कहीं वह जिंदा न रह जाए, इसलिए उन लोगों ने शीशे के तेज धार वाले टुकड़े से उस का सीना चीर कर पेसमेकर निकाल लिया. फिर उस के पैर और उस की गरदन केबल के तार से बांध दी. लाश एक बेडशीट में लपेट दी. डैडबाडी ठिकाने लगाने के लिए वह उसे इनोवा कार में डाल कर केशोपुर डिपो के पास ले गए. एक तकिए पर भी खून लग गया था, उन्होंने वह तकिया भी कार में रख लिया.
केशोपुर डिपो के पास एक गहरा नाला है. उन्होंने सोचा कि लाश गहरे पानी में फेंक देंगे तो वह बह कर कहीं दूर चली जाएगी. यही सोच कर उन्होंने कार से लाश निकाल कर फेंकी तो वह नाले के पानी में गिरने के बजाय किनारे पर ही गिर गई. फिर उन्होंने खून से सना तकिया भी जल्दी से वहीं फेंक दिया.
लाश ठिकाने लगा कर उन्होंने कार उत्तम नगर के मोहन गार्डन इलाके में एक जगह खड़ी कर दी और अपनेअपने घर चले गए.
परमजीत से पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रिंस संधु और अशोक शर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया.
— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित परमजीत कौर परिवर्तित नाम है
रुखसार और अबू फैजल के दिन मजे से बीतने लगे. अबू फैजल बीवी की हर ख्वाहिश पूरी करता. जिस दिन उस की फैक्ट्री में छुट्टी होती, वह उसे घुमाने के लिए शहर में ले जाता था. उस दिन वह किसी रेस्तरां में खाना खाते थे.
इस तरह हंसीखुशी से रहते हुए 3 साल कब बीत गए, उन्हें पता ही नहीं चला. इस दौरान उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रिजवान रखा. बेटे के जन्म के बाद घर में खुशियां और बढ़ गईं.
इस के बाद रुखसार ने अपनी अम्मी से फोन पर बात करनी शुरू कर दी. तब शमशाद बेगम ने भी उसे माफ कर दिया. फिर रुखसार ने अपने मायके जाना भी शुरू कर दिया था.
रिजवान के जन्म के बाद घर का खर्च बढ़ा तो अबू फैजल पहले से अधिक मेहनत करने लगा. वह जूता फैक्ट्री में ओवरटाइम करने लगा था. ज्यादा कमाई के लिए अब उस का ज्यादातर समय फैक्ट्री में बीतता था. वह पत्नी को पहले की तरह दिलोजान से चाहता था. मगर पहले की तरह वह उस के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था. इस कमी को रुखसार महसूस करती थी.
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रुखसार खुद तो ज्यादा पढ़ीलिखी न थी, लेकिन वह अपने बेटे रिजवान को अच्छी तालीम दिलाना चाहती थी. इसी मकसद से उस ने बेटे का दाखिला एक कौन्वेंट स्कूल में करा दिया था.
यद्यपि अबू फैजल अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते बेटे का दाखिला मदरसे में कराना चाहता था. लेकिन बीवी के आगे उस की एक न चली. दाखिले को ले कर मियांबीवी में कुछ बहस भी हुई थी.
गृहस्थी का खर्च, मकान का किराया और बच्चे की पढ़ाई का खर्च बढ़ा तो अबू फैजल की आर्थिक स्थिति खराब हो गई. इस का परिणाम यह हुआ कि मियांबीवी में झगड़ा शुरू हो गया. रुखसार शौहर पर दबाव डालने लगी कि वह कमाई का जरिया बढ़ाए, लेकिन अबू फैजल की समझ में नहीं आ रहा था कि वह आमदनी कैसे बढ़ाए.
उन्हीं दिनों अबू फैजल की मुलाकात मोहम्मद आलम से हुई. वह भी जूता फैक्ट्री में कारीगर था और उसी के साथ काम करता था. लेकिन उस ने नौकरी छोड़ दी थी और काठमांडू चला गया था. वहां भी वह जूता फैक्ट्री में काम करता था और अच्छा पैसा कमा रहा था.
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अबू फैजल ने उस से अपनी आर्थिक स्थिति का रोना रोया तो मोहम्मद आलम ने उसे सलाह दी कि वह भी उस के साथ काठमांडू चले. दोनों मिल कर वहां अच्छा पैसा कमाएंगे.
इस बारे में अबू फैजल ने अपनी बीवी से विचारविमर्श किया. रुखसार ने पहले तो नानुकुर की लेकिन बाद में इजाजत दे दी. इस के बाद अबू फैजल दोस्त के साथ काठमांडू चला गया.
इस के बाद वह हर माह रुखसार को पैसा भेज देता. इस पैसे से रुखसार घर का खर्च चलाती. अबू फैजल रुखसार को बहुत चाहता था. अत: हर दूसरे तीसरे रोज वह मोबाइल से उस से बातचीत कर लेता था. रिजवान भी अपने अब्बू से फोन पर बतिया लेता था और जल्दी वापस आने की जिद करता था.
अबू फैजल के काठमांडू जाने के बाद रुखसार को उस की याद सताने लगी. उस का दिन तो जैसेतैसे कट जाता था, लेकिन रातें काटे नहीं कटती थीं. रात भर वह करवटें बदलती रहती थी. पति के सान्निध्य के लिए वह अब बेचैन रहने लगी थी. उस दौरान उस की नजरें किसी ऐसे मर्द को तलाशने लगीं जो उसे शारीरिक सुख के साथ उस की आर्थिक मदद भी कर सके.
एक रोज रुखसार गल्लामंडी में घरेलू सामान खरीदने गई तो उस की मुलाकात शाहरुख नाम के युवक से हुई. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हुए. दोनों में कुछ औपचारिक बातें हुईं. उसी दौरान उन्होंने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए. इस के बाद दोनों में मोबाइल पर हंसीमजाक और बातचीत होने लगी. रात की तनहाइयों में रुखसार शाहरुख से घंटों तक बतियाती थी.
25 वर्षीय अविवाहित शाहरुख नौबस्ता में रहता था और गल्लामंडी में काम करता था. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ा था. लेकिन उस की अपने परिवार वालों से पटती नहीं थी. इसलिए वह परिवार से अलग रहता था. वह जो कमाता था, अपने ऊपर ही खर्च करता था. वह उस से नजदीकियां बढ़ाने और अपना बनाने के लिए प्रयत्न करने लगा.
शाहरुख को पता चल गया था कि उस का शौहर नेपाल में काम करता है, इसलिए अब वह रुखसार के घर जाने लगा. रुखसार और उस के बेटे रिजवान के लिए वह खानेपीने का सामान ले जाता था. वह कभीकभी आइसक्रीम खिलाने के बहाने रिजवान को बाहर भी ले जाता.
घर आतेजाते शाहरुख और रुखसार की नजदीकियां बढ़ीं तो दोनों एकदूसरे का सान्निध्य पाने के लिए बेचैन रहने लगे. आग और घी पास हो तो घी पिघल ही जाता है. शाहरुख और रुखसार की निकटता भी कुछ ऐसा ही रंग लाई. फिर एक दिन दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए.
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नाजायज रिश्ता एक बार कायम हुआ फिर तो इस का सिलसिला ही चल पड़ा. जब भी मौका मिलता, शाहरुख रुखसार के यहां चला जाता और उस के बच्चे रिजवान को पैसे दे कर बाहर भेज देता, फिर दोनों देह की दरिया में गोते लगाने लगते. कभीकभी शाहरुख रुखसार को अपने कमरे पर भी ले जाता था. शाहरुख अब अपनी सारी कमाई रुखसार पर खर्च करने लगा.
लेकिन शाहरुख और रुखसार के नाजायज संबंध ज्यादा दिनों तक पासपड़ोस में रहने वाले लोगों से छिपे नहीं रहे. लोग उन्हें शक की निगाह से देखने लगे.
पहली फरवरी, 2019 की बात है. शाम के 5 बजे थे. कानपुर के थाना नौबस्ता के कार्यवाहक एसओ रविशंकर पांडेय अपने औफिस में बैठे थे. तभी एक आदमी ने दरवाजे का परदा हटा कर उन के औफिस में प्रवेश किया. एसओ रविशंकर पांडेय ने नजर उठा कर उस आदमी की तरफ देखा तो उस के चेहरे पर हड़बड़ाहट और भय साफ दिख रहा था.
उन्होंने उसे अंदर आने का इशारा किया. वह आदमी उन के सामने जा कर हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मैं ने एक बड़ा गुनाह कर दिया है.’’
इतना सुनते ही एसओ उस की तरफ गौर से देखते हुए बोले, ‘‘तुम ने क्या कर दिया और तुम कौन से गांव से आए हो?’’
‘‘साहब, मेरा नाम अबू फैजल है और मैं ईदगाह मछरिया में रहता हूं. मेरी ससुराल भी राजीव नगर मछरिया में है. मैं अपनी ससुराल आया हुआ था. यहीं पर मैं ने अपनी बीवी को मार डाला है. और उस की लाश घर में पड़ी है. काफी दिन से मैं तिलतिल कर मर रहा था. मगर आज मेरा दिमाग खराब हो गया और मैं ने पत्नी रुखसार को मार डाला. साहब, मुझे गिरफ्तार कर लीजिए.’’
एसओ रविशंकर पांडेय ने बड़े गौर से अबू फैजल को देखा फिर सिपाहियों को बुला कर अबू फैजल को हिरासत में लेने के आदेश दिए. इस के बाद एसएसपी अनंत देव तिवारी, एसपी (साउथ) रवीना त्यागी तथा सीओ आर.के. चतुर्वेदी को जानकारी दे कर वह आवश्यक पुलिस बल के साथ आरोपी अबू फैजल को ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.
जब वह घटनास्थल पर पहुंचे तो उस समय घर में कोहराम मचा था. कमरे के अंदर फर्श पर रुखसार का शव पड़ा था. उस के जिस्म से निकला खून उस के चारों ओर फैला हुआ था. लाश के पास सिलवट्टे का पत्थर भी पड़ा हुआ था. उस पर भी खून लगा था.
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लाश के पास मृतका की मां शमशाद बेगम व बहनें बिलखबिलख कर रो रही थीं. गांव की और भी तमाम औरतें व आदमी वहां जमा थे. रविशंकर पांडेय ने मृतका की मां शमशाद बेगम को सांत्वना दी फिर शव से अलग ले जा कर उस से पूछताछ की.
शमशाद बेगम ने बताया कि आज उस की छोटी बेटी की तबीयत खराब थी. वह उसे ले कर डाक्टर के पास गई थी. दवा ले कर वापस आई तो घर का दरवाजा अंदर से बंद मिला. दरवाजा खटखटाया तो बेटी रुखसार ने दरवाजा नहीं खोला.
दरवाजा पीटने व चीखने पर पड़ोस के लोग भी आ गए. फिर से दरवाजा पीटना शुरू किया तो दामाद अबू फैजल ने दरवाजा खोला और फिर बोला, ‘‘मैं ने रुखसार को मार डाला है. अब तुम मुझे भी मार डालो.’’ कहते हुए वह तेजी से भाग गया. उस के बाद जब मैं घर के अंदर गई तो कमरे में रुखसार मरी पड़ी थी. अबू फैजल ने उसे मार डाला.
पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी.
चूंकि अबू फैजल बीवी की हत्या का जुर्म कबूल कर चुका था, इसलिए पुलिस ने मृतका की मां शमशाद बेगम की तरफ से भादंवि की धारा 302 के तहत अबू फैजल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.
अबू फैजल से पूछताछ करने के बाद रुखसार की हत्या की जो कहानी सामने आई वह अवैध संबंधों पर रचीबसी निकली—
उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के नौबस्ता थाने के अंतर्गत एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र मछरिया पड़ता है. इसी मछरिया क्षेत्र के राजीव नगर मोहल्ले में शमशाद बेगम नफीस के मकान में किराए पर रहती थी. नफीस बाबूपुरवा में रहता था. शमशाद बेगम के शौहर अब्दुल हामिद का इंतकाल हो चुका था.
शमशाद बेगम की 3 बेटियां और एक बेटा था. वह एक मेहनतकश महिला थी. पति के गुजर जाने के बाद वह किसी प्रकार अपने परिवार का पालनपोषण करती थी. वह अपनी बड़ी बेटी की शादी कर चुकी थी.
मंझली बेटी रुखसार जब जवान हुई तो उस की शादी की चिंता होने लगी. रुखसार खूबसूरत थी. वह बनठन कर जब घर से निकलती तो तमाम लड़के उस पर डोरे डालने की कोशिश में लगे रहते थे. लेकिन वह किसी को लिफ्ट नहीं देती. उस के इन्हीं चाहने वालों में एक था अबू फैजल. रुखसार और अबू फैजल मदरसे में 8वीं कक्षा तक साथ पढ़े थे.
अबू फैजल मछरिया (नौबस्ता) में ईदगाह के पास रहता था. उस के 2 अन्य भाई भी थे, जो उस से अलग अपनी घरगृहस्थी बसा कर रह रहे थे. अबू फैजल जाजमऊ स्थित एक जूता फैक्ट्री में नौकरी करता था. वह अच्छा कमाता था और ठाटबाट से रहता था.
अबू फैजल जब काम पर जाता तो रुखसार के घर के सामने से गुजरता था. तब अकसर दोनों की आंखें चार हो जाती थीं. हकीकत यह थी कि वह रुखसार को चाहता था. वह उस के दिल में समा चुकी थी. रातदिन वह उसी के ख्वाब देखता रहता था. रुखसार भी कोई नादान बच्ची नहीं थी. वह भी उस की आंखों की भाषा अच्छी तरह समझती थी. लेकिन शरमोहया की दीवार तोड़ने का वह साहस नहीं कर पाती थी.
एक दिन रुखसार नौबस्ता बाजार जा रही थी, तभी अबू फैजल उसे रास्ते में मिल गया. उस ने एकांत देख कर अनायास ही रुखसार का हाथ थाम लिया और बोला, ‘‘रुखसार, मैं तुम से एक बात कहना चाहता था, लेकिन कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी.’’
रुखसार उस की बातों का मतलब समझ तो गई थी, लेकिन वह अनभिज्ञ होते हुए बोली, ‘‘बताओ, क्या कहना चाहते थे?’’
‘‘रुखसार, बात यह है कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं. दिलोजान से चाहता हूं मैं तुम्हें.’’ एक ही सांस में अबू फैजल ने बात कह दी.
रुखसार नजरें नीचे किए मंदमंद मुसकराने लगी. यह देख कर अबू फैजल समझ गया कि रुखसार ने उस की मोहब्बत कबूल कर ली. वह बहुत खुश हुआ. उचित मौका देख कर अबू फैजल रुखसार को कुछ दूरी पर स्थित अंबेडकर पार्क में ले गया. वहां एकांत में उस ने रुखसार से कहा, ‘‘रुखसार, वादा करता हूं कि मैं तुम्हें हर तरह से खुश रखने की कोशिश करूंगा और ताउम्र तुम्हारा साथ निभाऊंगा.’’
रुखसार ने आंखें फाड़ कर अबू फैजल को देखा और मुसकराते हुए बोली, ‘‘फैजल, आज तुम यह कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हो? बीच रास्ते में इस तरह किसी लड़की का हाथ पकड़ना और एकांत में पार्क लाना अच्छे लोगों का काम नहीं. भला ऐसे लड़के से कौन लड़की मोहब्बत करेगी.’’
रुखसार सिर्फ दिखावे के लिए ऐसा कह रही थी. यह बात अबू फैजल उस की मुसकराहट से जान गया था. उस का आत्मविश्वास बढ़ा तो उस ने आगे बढ़ कर रुखसार को अपनी बांहों में समेट लिया.
तभी रुखसार बोली, ‘‘फैजल, मुझे डर लग रहा है.’’
‘‘कैसा डर?’’
‘‘यही कि तुम मुझे मंझधार में तो नहीं छोड़ दोगे? यदि ऐसा हुआ तो मैं जीते जी मर जाऊंगी.’’ रुखसार ने अपनी शंका जाहिर की.
‘‘यह तुम कैसी बातें कर रही हो? मैं तुम से वादा करता हूं कि मरते दम तक तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगा.’’ अबू फैजल ने विश्वास दिलाया.
‘‘मुझे तुम से यही उम्मीद थी, अबू.’’ कह कर रुखसार उस के सीने से लिपट गई.
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इस के बाद रुखसार और अबू फैजल का प्यार दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगा. दोनों के प्यार की भनक जब शमशाद बेगम को लगी तो उसे अपने पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आई. उस ने बेटी को डांटाफटकारा और उस के प्यार पर पहरा बैठा दिया, पर रुखसार नहीं मानी. उस ने घर वालों से बगावत कर दी और एक रोज घर से भाग कर अपने प्रेमी अबू फैजल से लव मैरिज कर ली. उस के बाद वह फैजल के साथ ईदगाह मछरिया वाले घर में रहने लगी. कुछ समय बाद शमशाद बेगम ने भी यह रिश्ता मंजूर कर लिया.
मुंबई के उपनगर मुलुंड (पूर्व) के नवघर पुलिस थाने के इंसपेक्टर संपत मुंडे थाने के चार्जरूम में तैनात सबइंसपेक्टर मांजरे के पास बैठे किसी पुराने मामले पर विचारविमर्श कर रहे थे, तभी मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) के एक अधिकारी अपने कुछ कर्मचारियों के साथ थाने आ कर उन से मिले.
उन्होंने बताया कि ईस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे के किनारे बने बीएमसी के डंपिंग ग्राउंड में प्लास्टिक की सफेद रंग की एक बड़ी सी थैली मिली है, जिस में से किसी औरत के लंबे बाल बाहर निकले हुए हैं. लगता है, थैली में किसी महिला की लाश है.
बीएमसी कर्मचारियों की बात को संपत मुंडे ने बड़ी गंभीरता से लिया. उन्होंने सब इंसपेक्टर मांजरे को इस मामले की प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कहा और यह बात अपने सीनियर इंसपेक्टर गणेश गायकवाड़ व उच्च अधिकारियों को बताने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी सूचना दे दी. इस के बाद वह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. यह 14 सितंबर, 2014 की शाम 7-8 बजे के बीच की बात थी.
घटनास्थल पुलिस थाने से अधिक दूर नहीं था, इसलिए पुलिस टीम को वहां पहुंचने में मुश्किल से 10-15 मिनट लगे. पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंची तो वहां बीएमसी के कुछ कर्मचारी और बेगारी मजदूर मौजूद थे. फौरी तौर पर घटनास्थल का निरीक्षण कर के पुलिस टीम उस थैले को डंपिंग ग्राउंड से बाहर निकलवा कर लाई. थैले का मुंह खोला गया तो उस के अंदर का दृश्य देख कर पुलिस दल के साथसाथ बीएमसी कर्मचारियों का भी मुंह खुला रह गया.
उस छोटे से थैले में एक महिला के शव को 2 चादरों के बीच लपेट कर ठूंस कर भरा गया था. महिला की उम्र 25-26 साल के आसपास थी. उस के शरीर पर पेटीकोट और ब्लाउज के अलावा कोई कपड़ा नहीं था.
महिला का शव थैली से बाहर निकलवाने के बाद संपत मुंडे ने उस की लाश का निरीक्षण किया. उन्होंने और सबइंसपेक्टर मांजरे ने मृतका की शिनाख्त के लिए वहां मौजूद बीएमसी कर्मचारियों और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान पाया.
इस का मतलब वह मृतका उस इलाके की रहने वाली नहीं थी. परेशानी की बात यह थी कि लाश के कपड़ों और प्लास्टिक की थैली में ऐसी कोई चीज भी नहीं मिली, जिस के सहारे उस के बारे में पता लगाया जा सकता.
इस घटना की सूचना पा कर मुंबई के एडिशनल सीपी डा. विनय कुमार राठौर, एसीपी मारुति अह्वाड़, नवघर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर गणेश गायकवाड़, इंसपेक्टर सुनील काले, प्रेस फोटोग्राफर और फ्रिगरप्रिंट ब्यूरो के अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे.
साथ ही क्राइम ब्रांच सीआईडी भी हरकत में आ गई थी. क्राइम ब्रांच सीआईडी प्रमुख सदानंद दाते, अपर पुलिस कमिश्नर के. प्रसन्ना, डीसीपी मोहन कुमार दहिकर, एसीपी प्रफुल्ल भोसले ने विचारविमर्श के बाद इस मामले की तफ्तीश की जिम्मेदारी क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के सीनियर इंसपेक्टर शंकर पाटिल को सौंप दी.
घटनास्थल पर आए प्रेस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो का काम खत्म हो जाने के बाद इंसपेक्टर गणेश गायकवाड़ ने सारी औपचारिकताएं पूरी कर के मृतका की लाश पोस्टमार्टम के लिए मुलुंड के शताब्दी अस्पताल भेज दी.
पुलिस की परेशानी यह थी कि बीएमसी के जिस डंपिंग ग्राउंड में महिला की लाश मिली थी, वह बहुत बड़ा था और वहां मुंबई के कई क्षेत्रों का हजारों टन कूड़ा फेंका जाता था. यह तो तय था कि मृतका की लाश कूड़े के साथ वहां तक पहुंची थी, लेकिन लाश किस क्षेत्र से आई थी, यह पता लगाना आसान नहीं था.
बहरहाल, तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए नवघर पुलिस थाने के इंसपेक्टर सुनील काले और इंसपेक्टर संपत मुंडे मृतका की शिनाख्त के लिए जीजान से जुट गए. इस के लिए उन्होंने उस के हुलिए सहित सारी जानकारी मुंबई के सभी थानों को भेज दी. अखबारों का भी सहारा लिया गया, इस के साथ कुछ मुखबिरों को भी लगाया गया.
इंसपेक्टर मुंडे को उम्मीद थी कि कहीं से कोई न कोई जानकारी जरूर मिल जाएगी, लेकिन उन का यह प्रयास सफल नहीं रहा. दूसरी तरफ क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल और उन के सहायकों का भी यही हाल था. मामले में जैसेजैसे देरी हो रही थी, वैसेवैसे उन की परेशानी बढ़ती जा रही थी.
आखिर निराश हो कर सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल ने अपनी तफ्तीश की दिशा बदल दी. उन्होंने अपने सहायकों के साथ एक बार फिर घटनास्थल का दौरा किया. बीएमसी कर्मचारियों से पूछताछ कर के उन्होंने वहां कूड़ा ले कर आने वाली गाडि़यों की एंट्री डायरी चेक की तो पता चला कि उस दिन 2575 नंबर की गाड़ी कचरा लेकर काफी देर से डंपिंग ग्राउंड में आई थी.
उस गाड़ी के जाने के बाद ही बीएमसी कर्मचारियों को वह थैला नजर आया था, जिस में लाश थी. वह गाड़ी उस दिन किसकिस इलाके का कचरा उठा कर लाई थी, जब इस की जांच की गई तो मालूम पड़ा कि उस दिन वह गाड़ी सायन, धारावी और माहिम इलाके का कचरा ले कर आई थी.
इस का मतलब था कि उस महिला का शव इन्हीं में से किसी क्षेत्र से आया था. इस से जांच अधिकारियों को तफ्तीश का रास्ता तो मिल गया था, लेकिन मंजिल अभी भी दूर थी. माहिम-सायन और धारावी का इलाका इतना छोटा नहीं था कि आसानी से मृतका का सुराग मिल जाता. लेकिन क्राइम ब्रांच के जांच अधिकारी इस से निराश नहीं हुए, बल्कि दोगुने उत्साह से तफ्तीश में जुट गए.
पुलिस टीम मृतका का फोटो ले कर माहिम, सायन और धारावी क्षेत्र में आने वाले शाहूनगर पुलिस थाने से ले कर धारावी काला किला, पीला बंगला, केमकर चौक, नेताजी नगर, लक्ष्मीबाग, नाइक नगर जैसी बस्तियों में छानबीन में जुट गई.
इसी छानबीन के दौरान नवरात्र मंडल के एक कार्यकर्ता ने मृतका का फोटो देख कर असिस्टेंट इंसपेक्टर अनिल ढोले को बताया कि मृतका अपने पति के साथ राजीव गांधी नगर में रहती थी. लेकिन वह पिछले कई दिनों से लापता है. उस कार्यकर्ता के साथ अनिल ढोले जब राजीव गांधी नगर गए तो उन्हें पता चला कि मृतका का नाम रेखा गौतम था. लेकिन उस के घर के बाहर ताला लगा हुआ था.
पड़ोसियों ने बताया कि रेखा के पति का नाम संजय गौतम है. घटना वाले दिन रेखा अपने पति के साथ विरार स्थित जीवदानी माता का दर्शन करने गई थी. लेकिन रास्ते में वह अपने पति से बिछुड़ गई थी. उस के पति ने उसे बहुत खोजा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली. संजय के बारे में पूछताछ करने पर उस के एक पड़ोसी ने बताया कि वह अपने रिश्तेदार के घर चला गया है.
जांच अधिकारी ने यह जानकारी सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल को दे दी. पाटिल के निर्देशन में इंसपेक्टर संजय सुर्वे और असिस्टेंट इंसपेक्टर अनिल ढोले ने पुलिस टीम के साथ संजय के उस रिश्तेदार के घर छापा मार कर उसे गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के लिए संजय को सीआईडी औफिस लाया गया.
पूछताछ में संजय कुमार गौतम ने खुद को बेगुनाह बताया. उस के अनुसार जिस दिन वह अपनी पत्नी रेखा को जीवदानी देवी के मंदिर ले कर निकला था, उस दिन लोकल ट्रेन में बहुत भीड़ थी. भीड़ की वजह से वह रेखा को महिला डिब्बे में चढ़ने के लिए कह कर खुद जेंट्स कंपार्टमेंट में चढ़ गया था.
विरार रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर जब वह रेखा के डिब्बे के पास गया तो वह वहां नहीं थी. उसे रेलवे प्लेटफार्म पर तलाश करने के बाद थकहार कर वह विरार पुलिस थाने पहुंचा, ताकि पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा सके. लेकिन वहां के अधिकारियों ने उसे यह कह कर वापस लौटा दिया कि वह बांद्रा रेलवे स्टेशन पुलिस में जा कर अपनी शिकायत दर्ज करवाए.
जब वह बांद्रा रेलवे स्टेशन पुलिस के पास गया तो वहां के पुलिस वालों ने यह कह कर मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया कि वह पहले अपने नातेरिश्तेदारों के यहां पता करे.
संजय गौतम ने अपनी पत्नी रेखा के गायब होने के बारे में जो कुछ बताया था, वह इंसपेक्टर संजय सुर्वे के गले नहीं उतरा. उस के चेहरे के हावभावों को देख कर उन्हें दाल में कुछ काला नजर आ रहा था. उन्होंने जब संजय गौतम के साथ थोड़ी सी सख्ती बरती तो उन्हें पूरी की पूरी दाल ही काली नजर आई. संजय गौतम पुलिस के सवालों के सामने टूट गया. उस ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया. पूछताछ के दौरान संजय गौतम ने अपनी पत्नी की हत्या की जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी.
28 वर्षीय संजय गौतम उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के गांव लालगंज का रहने वाला था. उस के पिता रघुनाथ प्रसाद गौतम गांव में टेलरिंग का काम करते थे. उन के व्यवहार की वजह से गांव में उन की काफी इज्जत और प्रतिष्ठा थी. वह सीधेसरल स्वभाव के व्यक्ति थे. संजय गौतम उन का एकलौता बेटा था. वह बीए पास था. इस के साथ ही वह टेलरिंग का काम भी जानता था और इस काम में पिता की मदद किया करता था.
रघुनाथ प्रसाद गौतम ने 3 फरवरी, 2014 को संजय की शादी पड़ोस के गांव की रेखा से कर दी. वह सुंदर सुशील लड़की थी. शादी के बाद रेखा ससुराल आ गई. संजय की तरह रेखा भी बीए पास थी. पतिपत्नी दोनों ही पढ़ेलिखे थे और महत्त्वाकांक्षी भी. इसलिए चाहते थे कि कहीं बाहर जा कर किसी बड़े शहर में रहें, जहां खूब पैसा कमा सकें. वैसे भी गांव में रह कर तो बस गुजरबसर ही हो सकता था.
शादी के कुछ दिनों बाद रेखा ने संजय को समझाया कि वह टेलरिंग का अच्छा कारीगर है. गांव में रह कर वह अपना टैलेंट बरबाद कर रहा है. अगर वह शहर में रह कर यही काम करे तो अच्छी आय हो सकती है. यह उन दोनों के भविष्य के लिए भी ठीक रहेगा और घरपरिवार के लिए भी. संजय को रेखा की यह बात ठीक लगी और वह इस बारे में गंभीरता से सोचने लगा.
सोचनेविचारने के बाद संजय जुलाई, 2014 में अपनी पत्नी रेखा को ले कर मुंबई आ गया. मुंबई के धारावी इलाके में संजय के गांव के कई लोग रहते थे, जिन की मदद से वह राजीव गांधी नगर की विश्वकर्मा चाल में किराए का एक कमरा ले कर पत्नी के साथ रहने लगा. उसी इलाके की एक टेलरिंग शौप में उसे नौकरी भी मिल गई.
मुंबई आने के बाद पतिपत्नी दोनों ही बहुत खुश थे. रेखा अपनी गृहस्थी संवारने में लगी थी. लेकिन इस दंपति की खुशी उस समय कलह में बदल गई जब एक दिन रेखा ने संजय गौतम को जलाने के लिए मजाक में कह दिया कि कालेज की पढ़ाई के दौरान उस का एक बौयफ्रैंड था, जिसे वह बहुत प्यार करती थी और उस से शादी करना चाहती थी.
यह मजाक रेखा को बहुत महंगा पड़ा. उस के इस मजाक ने संजय के दिमाग में संदेह का बीज बो दिया. धीरेधीरे इस बीज ने अंकुरित हो कर वृक्ष का रूप ले लिया.
उन दोनों के प्यार के बीच दरार पड़नी शुरू हो गई. संजय गौतम की दिनचर्या बदल गई. जहां वह रेखा पर प्यार के फूल बरसाता था, वहीं अब कांटा बन कर चुभने लगा था. बातबात में रेखा की उपेक्षा और उस से मारपीट करना उस के लिए आम बात हो गई थी. रेखा ने अपनी बात को मजाक बता कर उस से कई बार माफी भी मांगी, सफाई भी दी, लेकिन वह संजय गौतम के संदेह का समाधान नहीं कर पाई.
समय के साथसाथ रेखा के प्रति संजय गौतम का संदेह कम होने के बजाय दिनबदिन बढ़ता ही गया. इस का नतीजा यह हुआ कि पतिपत्नी के बीच वैमनस्य बढ़ता गया. अब संजय रेखा की हर बात पर नजर रखने लगा था. वह उसे फोन पर किसी से बात करते देखता तो उस से सैकड़ों सवाल कर डालता. यहां तक कि कई बार तो उस की पिटाई भी कर देता. उस के दिमाग में शक का कीड़ा इस तरह घर कर गया था कि पत्नी के प्रेम संबंध का पता लगाने के लिए वह अपने गांव और ससुराल भी गया.
वहां उस ने अपने परिचितों और कालेज के कुछ दोस्तों से मिल कर रेखा के बारे में जानकारी ली. लेकिन उसे ऐसी कोई बात पता नहीं चली और वह खाली हाथ मुंबई लौट आया. इस के बावजूद संजय गौतम के दिमाग से संदेह का भूत नहीं उतरा.
कहावत है कि पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास के धरातल पर टिका होता है, अगर विश्वास टूट जाए तो घरगृहस्थी को बिखरते देर नहीं लगती. ऐसा ही कुछ इस मामले में भी हुआ.
जब संजय के विश्वास की टूटन बढ़ती गई तो उस ने रेखा को अपनी जिंदगी से निकाल फेंकने का फैसला कर लिया. इस के लिए वह मन ही मन योजना भी बनाने लगा. इसी योजना के तहत उस ने रेखा की प्रताड़ना बढ़ा दी.
अपनी योजना के अनुसार, घटना के दिन संजय गौतम ने रेखा के चरित्र को ले कर उसे काफी मारापीटा. इतना ही नहीं, बाजार जा कर वह चूहे मारने की दवा ले आया और रात को साढ़े 8 बजे उसे जबरन वह दवा खिला दी.
दवा खाने के बाद जब रेखा की तबीयत खराब होने लगी तो संजय घर से बाहर चला गया. उधर रेखा को कई उल्टियां हुईं और छटपटाते छटपटाते उस ने दम तोड़ दिया.
कई घंटों के बाद जब संजय गौतम घर लौटा तो रेखा मर चुकी थी. अब संजय के सामने रेखा की लाश को ठिकाने लगाने की समस्या थी. सुबह होने के पहले अगर वह रेखा की लाश को ठिकाने नहीं लगाता तो इलाके में बात फैल जाने का डर था.
कुछ देर सोचने के बाद उस ने रेखा की लाश को 2 चादरों के बीच लपेट कर घर में पड़ी प्लास्टिक की छोटी बोरी में भर कर उस का मुंह बांध दिया. इस के बाद वह सुबह साढ़े 3 बजे लाश को कंधे पर रख कर बोरी को ओएनजीसी कार्यालय के सामने रखे बीएमसी के कचरे के डिब्बे में डाल आया.
सुबह जब कचरे का डिब्बा उठाने वाली बीएमसी की गाड़ी आई तो वह कचरा के साथ उस बोरी को भी उठा ले गई. इस तरह रेखा के शव वाली बोरी मुलुंड स्थित डंपिंग ग्राउंड में पहुंच गई.
दूसरी ओर रेखा की लाश को ठिकाने लगाने के बाद संजय गौतम ने अपने आसपास रहने वालों के बीच यह बात फैला दी कि जीवदानी देवी का दर्शन करने विरार जाते समय उस की पत्नी रेखा उस से बिछड़ गई है.
पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के अफसरों ने उसे गिरफ्तार कर नवघर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर गणेश गायकवाड़ और जांच अधिकारी इंसपेक्टर सुनील काले को सौंप दिया.
इंसपेक्टर सुनील काले ने अभियुक्त संजय गौतम से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उस के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत केस दर्ज किया और उसे महानगर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के जेल भेज दिया.
कथा लिखे जाने तक अभियुक्त संजय गौतम न्यायिक हिरासत में था.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
अपनी नौकरी के चलते गीता को घर का काम निपटा कर जल्दी सोना होता था और सुबह जल्दी ही उठना पड़ता था. लेकिन उस दिन उठने में थोड़ी देर हो गई थी. अब उस के पास एक ही रास्ता था कि जल्दी से रसोई का काम निपटाए. काम भी कम नहीं था. सुबह के नाश्ते से ले कर दोपहर का खाना तक बनाना होता था. इस की वजह यह थी कि उस की बेटी सुदीक्षा कालेज जाती थी, जो दोपहर को घर लौटती थी. इसलिए उस का खाना बनाना जरूरी था. साथ ही यह भी कि उसे खुद को और पति कुलदीप को अपना लंच बौक्स साथ ले कर जाना होता था.
दरअसल 37 वर्षीय गीता पंजाबी भाषा की प्रोफेसर थी और पिछले 15 सालों से सिविल लाइंस लुधियाना स्थित एक शिक्षण संस्थान में पढ़ाती थी. उस का पति कुलदीप रेलवे में बतौर इलेक्ट्रिशियन तैनात था.
कुलदीप सुबह साढ़े 8 बजे अपनी ड्यूटी पर चला जाता था और शाम को साढ़े 5 बजे घर लौटता था. कुलदीप के चले जाने के बाद साढ़े 9 बजे गीता भी अपने कालेज चली जाती थी. जबकि सुदीक्षा कालेज के लिए 10 बजे घर से निकलती थी. सब के जाने के बाद घर में कुलदीप का छोटा भाई हरदीप अकेला रह जाता था.
हरदीप नगर निगम लुधियाना की पार्किंग के एक ठेकेदार के पास काम करता था. उस की रात की ड्यूटी होती थी. वह अपने भाईभाभी के पास ही रहता था. हरदीप रात 8 बजे घर से ड्यूटी पर जाता था और सुबह 9 बजे लौटता था. काम से लौट कर वह दिन में घर पर ही सोता था.
कुलदीप, उस की पत्नी गीता, बेटी सुदीक्षा और हरदीप सहित 4 सदस्यों का यह परिवार लुधियाना के अजीत नगर, बकौली रोड, हैबोवाल के मकान नंबर 1751/21 ए की गली नंबर-3 में रहता था. कुलदीप के पिता राममूर्ति की कुछ वर्ष पहले मौत हो चुकी थी.
पिता की मौत के बाद कुलदीप ही घर का एक मात्र बड़ा सदस्य था. कुलदीप को मिला कर परिवार में 3 कमाने वाले थे, सो घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था.
पिता की दुश्मन बेटी
उस दिन कुलदीप, गीता और सुदीक्षा घर से जाने की तैयारी कर रहे थे. अपनेअपने हिसाब से सभी को जल्दी थी. गीता ने नाश्ता तैयार कर लिया था. उस ने पति को आवाज दी, ‘‘नाश्ता लग गया है, जल्दी आ जाइए. मुझे कालेज के लिए देर हो रही है.’’
कुलदीप नाश्ते की टेबल पर आ कर बैठ गया तो गीता ने उसे परांठे परोस दिए. कुलदीप नाश्ता करने लगा तो उसे बेटी का ध्यान आया. उस ने गीता से पूछा, ‘‘सुदीक्षा कहां है?’’
‘‘अपने कमरे में होगी, तुम नाश्ता करो.’’
कुलदीप ने वहीं बैठेबैठे सुदीक्षा को आवाज दे कर पुकारा, पर वह नहीं आई. कुलदीप ने 2-3 बार आवाज दी पर सुदीक्षा के कमरे से कोई जवाब नहीं आया. गीता ने एक बार फिर टोका, ‘‘तुम नाश्ता करो, वह आ जाएगी.’’ पर कुलदीप को चैन नहीं आया, क्योंकि उसे सुबह का नाश्ता और रात का खाना पत्नी और बेटी के साथ खाना पसंद था.
पत्नी के मना करने के बावजूद कुलदीप नाश्ता छोड़ कर बेटी के कमरे में गए. सुदीक्षा के कमरे में जा कर उन्होंने देखा कि सुदीक्षा कानों में हैडफोन लगाए किसी से हंसहंस कर बातें कर रही थी. यह देख कर कुलदीप को गुस्सा आ गया. उस ने आगे बढ़ कर देखा तो स्क्रीन पर तरुण का नाम था.
तरुण उर्फ तेजपाल सिंह भाटी, सुदीक्षा का बौयफ्रैंड था, यह बात कुलदीप अच्छी तरह जानता था. तरुण हंसबड़ारोड पर पंज पीर के पास मेहर सिंह नगर में रहता था, उस की मैडिकल शौप थी. पिछले 3 सालों से सुदीक्षा और तरुण के प्रेमसंबंध थे. कुलदीप शुरू से ही इन संबंधों का विरोध करता था. इसे ले कर उस ने सुदीक्षा को कई बार फटकारा भी था. इतना ही नहीं तरुण को ले कर बापबेटी म७ें कई बार कहासुनी भी हुई थी. फिर भी सुदीक्षा ने तरुण का साथ नहीं छोड़ा.
कुलदीप उसे बराबर समझाता था कि फालतू के प्यारव्यार के चक्कर में न पड़ कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. लेकिन सुदीक्षा ने पिता की बात कभी नहीं मानी. वह खुद को आजाद मानती थी और आजाद ही रहना चाहती थी. अपनी जिंदगी में उसे किसी की दखलंदाजी बरदश्त नहीं थी. तरुण के मामले में तो वह किसी की भी नहीं सुनती थी.
फोन की स्क्रीन पर तरुण का नंबर देख कर कुलदीप के तनबदन में आग लग गई. उस ने डांटते हुए सुदीक्षा से कहा, ‘‘हजार बार मना किया है कि इस लफंगे से संबंध नहीं रखना, पर तुम हो कि मानती ही नहीं. क्या मेरी बातें तुम्हारी समझ में नहीं आतीं, या सब कुछ जानसमझ कर अनजान बनने का नाटक करती हो.’’
सुदीक्षा के कमरे से पति के जोरजोर से बोलने की आवाज सुन कर गीता भी वहां आ गई. उस ने भी बेटी को डांट कर चुप रहने के लिए कहा. लेिकन बापबेटी के बीच फोन पर तरुण से बातचीत को ले कर कहासुनी चालू रही. इस बहस में दोनों में से कोई हारने को तैयार नहीं था.
कुलदीप पिता होने का अधिकार समझ कर बेटी को गलत राह पर जाने से रोक रहा था, जो अपनी जगह पर ठीक भी था. जब बच्चे अपना लक्ष्य भूल कर रास्ता भटकने लगते हैं, तो पिता का कर्तव्य बन जाता है कि वह अपनी संतान को गलत राह पर जाने से रोके और अपनी समझ के अनुसार उस का सही मार्गदर्शन करे. यही कुलदीप कर रहा था.
दूसरी ओर कोई तरुण को भलाबुरा कहे यह सुदीक्षा को बरदाश्त नहीं था. यही कारण था कि कुलदीप जब भी बेटी को समझाने की कोशिश करता तो वह हत्थे से उखड़ जाती थी. इस के साथ ही बापबेटी के बीच तरुण को ले कर महाभारत शुरू हो जाता था.
तरुण के मामले में सुदीक्षा अपने पिता को अपना कट्टर दुश्मन मानती थी. उस दिन कहासुनी से शुरू हुई बात अचानक इतनी ज्यादा बढ़ गई कि गुस्से में कुलदीप ने सुदीक्षा के हाथों से मोबाइल छीन कर फर्श पर पटक दिया. इस के बाद वह गुस्से में नाश्ता किए बिना ही घर से निकल गया. खाने का टिफिन भी घर पर ही छोड़ दिया था.
परिवार में किसी तीसरे का दखल भी बढ़ाता है कलह
कुलदीप के बिना कुछ खाएपीए घर से निकल जाने के बाद गीता और सुदीक्षा भी बिना नाश्ता किए अपनेअपने कालेज चली गईं. रात को कुलदीप ने एक बार फिर बेटी को प्यार से समझाने के लिए खाने की टेबल छत पर लगवाई. कुलदीप का भाई हरदीप खाना खा कर काम पर जाने की तैयारी कर रहा था.
गीता, सुदीक्षा और कुलदीप ने जब तक खाना शुरू किया तब तक हरदीप जा चुका था. मांबाप और बेटी के बीच जो थोड़ा बहुत मनमुटाव था, वह एक साथ खाना खाने से खत्म हो गया. खाना खाने के बाद कुलदीप नीचे अपने कमरे में सोने के लिए चला गया. गीता और सुदीक्षा छत पर ही सो गईं. यह बीती 19 जुलाई की बात है.
अगली सुबह यानी 20 जुलाई, 2018 की सुबह साढ़े 5 बजे उठ कर गीता छत से नीचे आई. यह उस का रोज का नियम था. नित्यकर्म से फारिग हो कर जब वह पति कुलदीप को जगाने उस के कमरे में की ओर जा रही थी, तभी अचानक उस की नजर खुले हुए मुख्य दरवाजे पर पड़ी, मुख्यद्वार खुला हुआ था.
वह तेजी से कुलदीप के कमरे की ओर लपकी. कमरे के भीतर का दृश्य देख कर उस की आत्मा तक कांप उठी. सामने बेड पर खून से लथपथ कुलदीप की लाश पड़ी थी.
गीता ने डर कर जोरजोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. उस के रोने चिल्लाने की आवाज सुन कर अड़ोसीपड़ोसी जमा हो गए. किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन पर सूचना दी कि अजीत नगर की गली नंबर-3 के मकान नंबर-1715/21 ए में एक आदमी की हत्या हो गई है, जल्दी पहुंचें.
पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना संबंधित थाने हैबोवाल को दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी परमदीप सिंह अपने सहायक पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.
सुबह का समय था, दिन अभी पूरी तरह से नहीं निकला था. इस के बावजूद वहां अपेक्षा से अधिक भीड़ जमा थी. जहां हत्या हुई थी, वह 40 वर्षीय कुलदीप सिंह संघड़ उर्फ मोनू का था. हत्या भी उसी की हुई थी. थानाप्रभारी परमदीप सिंह ने घटनास्थल का मुआयना किया. कुलदीप की लाश कमरे में बैड पर पड़ी थी. उस की हत्या किसी तेजधार हथियार से गला रेत कर की गई थी. कटने पर गले से बहा खून बैड पर फैला हुआ था.
खून देख कर ऐसा लगता था, जैसे कुलदीप की हत्या कुछ घंटे पहले ही की गई हो, क्योंकि खून का रंग अभी तक लाल था, काला नहीं हुआ था. घनी आबादी वाली उस मध्यमवर्गीय परिवारों की कालोनी के एक मकान में इस तरह हत्या हो जाना आश्चर्य वाली बात थी.
मामले की गंभीरता को देखते हुए परमदीप सिंह ने घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों और क्राइम टीम को दे दी थी. सूचना मिलते ही लुधियाना पुलिस कमिश्नर डा. सुखचैन सिंह गिल, एडीसीपी गुरप्रीत कौर पोरवाल, एसीपी (वेस्ट) गुरप्रीत सिंह, स्पैशल स्टाफ की टीम और क्राइम ब्रांच टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.
डौग स्क्वायड भी मौके पर बुला लिया गया था. सब ने आते ही अपनाअपना काम शुरू कर दिया. घटनास्थल से कुछ फिंगरप्रिंट भी उठाए गए. खोजी कुत्ते ज्यादा मदद नहीं कर पाए. वह मृतक के कमरे से निकल कर आंगन में चक्कर लगाने के बाद बाहर सड़क पर आ कर रुक गए.
साथसाथ खाना खा कर अलग सोए थे
थानाप्रभारी परमदीप सिंह को मृतक कुलदीप की 37 वर्षीय पत्नी गीता ने बताया कि कुलदीप ने रात को करीब साढे़ 9 बजे मेरे और 17 वर्षीय बेटी सुदीक्षा के साथ छत पर खाना खाया था. खाना खाने के बाद लगभग 10 बजे वह नीचे अपने कमरे में सोने चले गए थे. बाद में मैं ने नीचे आ कर घर का मुख्य द्वार बंद कर के ताला लगाया था, फिर मैं छत पर बेटी के साथ सोने चली गई थी.
रोज की तरह सुबह साढ़े 5 बजे जब मैं छत से उतर कर नीचे आई, तो मैं ने कुलदीप के कमरे में उन की लाश देखी. उस समय घर का मुख्य द्वार खुला हुआ था. यह देख मैं ने घबरा कर शोर मचा दिया. जिस से अड़ोसीपड़ोसी जमा हो गए. उन्हीं में से किसी ने पुलिस को फोन किया होगा.
मृतक कुलदीप के भाई हरदीप ने बताया कि वह रात के करीब साढे़ 9 बजे जब काम पर जा रहा था, तब भाईभाभी और सुदीक्षा छत पर बैठ कर खाना खा रहे थे. सुबह साढ़े 5 बजे मेरे दोस्त और पड़ोसी लाला ने फोन पर मुझे यह खबर दी. हरदीप ने यह भी बताया कि रात को रोजाना कुलदीप ही बाहर वाले मुख्य दरवाजे पर ताला लगाया करता था.
उस ने यह भी बताया कि कुलदीप को शराब पीने की आदत थी. अपनी ड्यूटी से आने के बाद वह सोने से पहले तक 1-2 घंटे घर पर ही बैठ कर शराब पीया करता था. हरदीप के अनुसार घर से उस के भाई की काले रंग की स्पलेंडर मोटर साइकिल और 2 फोन भी गायब थे, जिन में एक फोन ओप्पो कंपनी का था और दूसरा चाइनीज सेट था.
मृतक की बेटी सुदीक्षा ने अपने बयान में सिर्फ इतना ही बताया कि मां के रोने की आवाज सुन कर वह छत से नीचे आई थी.
बहरहाल सब थानाप्रभारी ने मृतक कुलदीप के भाई हरदीप के बयानों के आधार पर कुलदीप की हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 120 बी, 34 के अंतर्गत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ दर्ज कर लिया. प्राथमिक काररवाई कर के उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दी. इस हत्याकांड से पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया था.
पुलिस को नहीं मिला क्लू
खुद को हाईटेक सिस्टम से लैस बताने वाली लुधियाना पुलिस ने घटनास्थल की हाईटेक तरीके से ही जांच की थी. पुलिस की पूरी टीम ने डेढ़ से 2 घंटे में पूरे घटनास्थल की जांच की. अब तक की जांच पड़ताल में यह बात सामने आई कि कुलदीप के हत्यारे जो भी रहे हों, वह थे जानने वाले.
क्योंकि घटनास्थल से ऐसा कोई चिह्न नहीं मिला था, जिस से पता चलता कि हत्यारों ने घर में प्रवेश करने के लिए कोई जोर जबरदस्ती की हो. संभवत: कुलदीप की हत्या में किसी नजदीकी का हाथ था.
बहरहाल, परमजीत सिंह ने आगामी तफ्तीश शुरू करते हुए घटनास्थल के आसपास लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक की. मृतक की पत्नी गीता, बेटी सुदीक्षा और नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा कुलदीप के दोस्तों और सहकर्मियों से भी पूछताछ की गई. लेकिन परमदीप सिंह के हाथ ऐसा कोई सूत्र नहीं लगा जिसे कुलदीप की हत्या से जोड़ कर देखा जा सके.
पूछताछ के दौरान पड़ोसियों ने बताया था कि कुलदीप और उस की पत्नी गीता के बीच अकसर झगड़ा होता था. इस बारे में जब गीता से पूछा गया तो उस ने बताया कि कुलदीप अनुशासनप्रिय था. लेकिन शाम को थोड़ी पीने के बाद वह और भी ज्यादा अनुशासित हो जाता था. वह जब तब सुदीक्षा को ठीक से पढ़ने और कोई अधिकारी बनने के बारे में कहा करता था, जिसे ले कर दोनों के बीच कहासुनी हो जाती थी.
बाहर से कौन और कैसे आया?
थानाप्रभारी परमदीप सिंह के लिए यह केस चुनौतीपूर्ण बन चुका था. उन्होंने एक बार फिर सारे घटनाक्रम का शुरू से अध्ययन किया. कत्ल के वक्त केवल मांबेटी ही घर पर थीं. पुलिस को यह बात खटक रही थी कि आखिर कातिल घर में दाखिल कैसे हुए. क्योंकि बिना फ्रैंडली एंट्री के घर में दाखिल होना संभव नहीं था.
वारदात के वक्त मृतक कुलदीप का छोटा भाई हरदीप भी अपनी ड्यूटी पर गया हुआ था. छानबीन में वह न केवल निर्दोष पाया गया, बल्कि उस के बयान ने पुलिस के शक की सुई मृतक की पत्नी गीता की ओर घुमा दी थी.
गीता ने बताया था कि खाना खाने के बाद उस ने खुद मुख्यद्वार बंद किया था. जबकि हरदीप का कहना था कि मुख्यद्वार उस का भाई कुलदीप ही बंद करता था. सोने से पहले कुलदीप को 5-7 मिनट टहलने की आदत थी. टहलने के बाद वह मुख्यद्वार बंद कर चाबी कमरे में खूंटी के पास लटका देता था ताकि सुबह गीता को चाबी ढूंढने में परेशानी न हो. सोचने वाली बात यह भी थी कि जब घर में 2 लोग मौजूद थे तो किसी तीसरे ने बाहर से आ कर कुलदीप की हत्या कैसे कर दी.
इस का मतलब घर का एक आदमी बाहर वाले से मिला हुआ था. या दोनों ही मिले हुए थे. अथवा दोनों ने ही मिल कर कुलदीप की हत्या की थी और मामले को लूटपाट का जामा पहना दिया गया था. जो भी खिचड़ी पकी थी, वह घर के अंदर ही पकी थी. यह बात जेहन में आते ही परमदीप सिह ने गीता और सुदीक्षा की पिछले एक हफ्ते की काल डिटेल्स निकलवाई.
काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर सामने आया जिस पर सुदीक्षा की बहुत बात होती थी. कई काल्स तो घंटे भर से भी ज्यादा की थीं और कई काल देर रात भी की गई थीं. यहां तक कि घटना वाली रात 19 जुलाई को थोड़ेथोड़े अंतराल से दोनों की उस समय तक बात होती रहती थी, जिस समय कुलदीप की हत्या की जा रही थी.
सोचने वाली बात यह थी कि क्या ऐसा संभव था कि नीचे वाले कमरे में लूटपाट के साथ किसी की हत्या की जा रही हो और ऊपर छत पर फोन पर बातें करने वाले को भनक तक ना लगे.
कोई खटका, कोई आहट सुनाई ना दे, ऐसा कैसे संभव था? यह बात परमदीप सिंह को हजम नहीं हो रही थी.
उन्होंने तत्काल उस नंबर के मोबाइल की काल डिटेल्स चैक कीं तो पुलिस के कान खड़े हो गए. थोड़ी सख्ती करने पर सारी सच्चाई सामने आ गई. पुलिस ने सुदीक्षा के 21 वर्षीय प्रेमी तरुण उर्फ तेजपाल सिंह भाटी को हिरासत में ले लिया, जो हंबड़ा स्थित पंजपीर रोड के मेहर सिंह नगर का रहने वाला था. उस की मैडिकल शौप थी. वह बीए सैकेंड ईयर में पढ़ रहा था.
परमिंदर कौर जालंधर के पृथ्वीनगर के मकान नंबर एन-ए-28 में रहती थी. उस के पति इकबाल सिंह दुबई के बहरीन में रहते थे. वहां वह किसी विदेशी कंपनी में नौकरी करते थे. उस की 2 बेटियां थीं, बड़ी 30 वर्षीया कमलप्रीत कौर और छोटी 26 वर्षीया रंजीत कौर. बड़ी बेटी कमलप्रीत कौर की शादी उस ने सन् 2001 में न्यूबलदेवनगर के मकान नंबर 197 में रहने वाले सुरजीत सिंह के सब से छोटे बेटे गुरमीत सिंह के साथ कर दी थी.
रंजीत कौर की अभी शादी नहीं हुई थी. वह जालंधर के पटेल अस्पताल में स्टाफ नर्स थी और मां के साथ रहती थी. कमलप्रीत कौर के पति की मौत हो चुकी थी. वह अपनी 2 बेटियों, 12 वर्षीया खुशप्रीत कौर और 10 वर्षीया राजवीर कौर के साथ ससुराल में रहती थी.
4 मार्च, 2014 की दोपहर 2 बजे के लगभग कमलप्रीत कौर अपनी मैरून कलर की एक्टिवा स्कूटर से गई तो लौट कर नहीं आई. जब इस बात की जानकारी परमिंदर को हुई तो उस ने बेटी को फोन किया. कमलप्रीत के पास 2 फोन थे. दोनों ही फोनों की घंटी बजती रही, लेकिन फोन उठा नहीं. इस के बाद रात को दोनों फोन बंद हो गए.
अगले दिन सवेरा होते ही परमिंदर कौर बेटी की तलाश में निकल पड़ी. उस ने नातेरिश्तेदार, जानपहचान वालों के यहां ही नहीं, हर उन संभावित जगहों पर बेटी को तलाशा, जहां उस के मिलने की संभावना थी. लेकिन कमलप्रीत का कहीं पता नहीं चला.
कमलप्रीत का कहीं कुछ पता नहीं चला तो परमिंदर कौर ने जालंधर के थाना डिवीजन नंबर 8 में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. कमलप्रीत के ढूंढ़ने की जिम्मेदारी ड्यूटी पर तैनात एएसआई अजमेर सिंह को सौंपी गई. यह 4-5 अप्रैल, 2014 के मध्यरात्रि की बात है.
एएसआई अजमेर सिंह ने लापता कमलप्रीत कौर का हुलिया और उस की स्कूटर का नंबर वायरलेस द्वारा प्रसारित करवा दिया. इस के अलावा जिले के सभी थानों को सूचना दे कर कमलप्रीत कौर की तलाश में मदद मांगी. अगले दिन मुखबिरों को भी कमलप्रीत कौर के फोटो दे कर उस के बारे में पता लगाने को कहा गया.
लेकिन इस सब का कोई नतीजा नहीं निकला. चूंकि बीती रात से ही कमलप्रीत के दोनों फोन बंद थे, इसलिए एएसआई अजमेर सिंह ने कमलप्रीत के दोनों फोनों के नंबर एक सिपाही को दे कर ड्यूटी लगा दी थी कि वह लगातार दोनों नंबरों पर फोन करता रहे. उस सिपाही की मेहनत रंग लाई और शाम को कमलप्रीत के एक फोन की घंटी बज उठी.
उस ने यह बात एएसआई अजमेर सिंह को बताई तो उन्होंने अपने मोबाइल से कमलप्रीत के उस नंबर पर फोन मिला दिया तो इस बार फोन रिसीव कर लिया गया. फोन रिसीव करने वाले का नाम सुरेंद्र था. उस से कमलप्रीत कौर के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा, ‘‘मैं किसी कमलप्रीत कौर को नहीं जानता. यह फोन भी मेरा नहीं है. मैं बस से जालंधर से फगवाड़ा जा रहा था तो बस में सीट के नीचे से मुझे यह फोन मिला था.’’
कमलप्रीत का फोन लावारिस हालत में बस में मिला, यह बात एएसआई अजमेर सिंह की समझ में नहीं आई. अपना परिचय देते हुए उन्होंने सुरेंद्र को फोन के साथ थाने बुला लिया. थाने आ कर भी सुरेंद्र ने वही सब बताया, जो उस ने फोन पर बताया था. अजमेर सिंह ने सुरेंद्र से फोन ले कर जमा कर लिया. पूछताछ में उन्हें लगा कि सुरेंद्र सच बोल रहा है तो उन्होंने उसे जाने दिया.
शाम को सारी बातें अजमेर सिंह ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर विमलकांत को बताईं तो उन्होंने उन की मदद के लिए उन के नेतृत्व में एक टीम बना दी. यह पुलिस टीम लगातार दो दिनों तक कमलप्रीत कौर की तलाश करती रही, लेकिन कहीं से भी कोई सुराग नहीं मिला.
6 मार्च को कमलप्रीत की बहन रंजीत कौर ने थानाप्रभारी विमलकांत को फोन कर के बताया, ‘‘सर, मुझे संदेह है कि मेरी बहन कमलप्रीत कौर के गायब होने के पीछे उस के जेठ महेंद्र सिंह का हाथ हैं. क्योंकि वह मेरी बहन से दुश्मनी रखता था. मुझे पूरा विश्वास है कि उसी ने मेरी बहन को अगवा कर कहीं छिपा दिया है या फिर उस की हत्या कर दी है.’’
इस के बाद थानाप्रभारी ने रंजीत कौर को थाने बुला कर उस से एक तहरीर ले कर कमलप्रीत कौर के अपहरण का मुकदमा उस के जेठ महेंद्र सिंह के खिलाफ दर्ज करा दिया. महेंद्र सिंह गांव बलीना, दोआबा के गुरुद्वारा भगतराम में मुख्य ग्रंथी था. यह गुरुद्वारा साहिब गांव वालों के अधीन था. गांव वाले उसे पाठ अरदास व गुरुद्वारा की सेवा के लिए 4 हजार रुपए मासिक वेतन देते थे.
महेंद्र सिंह के रहने और खाने की भी व्यवस्था गुरुद्वारा साहिब की ओर से थी. इंसपेक्टर विमलकांत सीधे उस पर हाथ नहीं डालना चाहते थे. इसलिए वह उस के बारे में पूरी जानकारी जुटाने लगे. इस छानबीन में पता चला कि 4 भाइयों में महेंद्र सिंह दूसरे नंबर पर था, जबकि कमलप्रीत का पति गुरमीत सिंह चौथे नंबर पर सब से छोटा था.
लगभग 25 साल पहले महेंद्र सिंह का विवाह हुआ था. उस के 3 बच्चों में 2 बेटे और 1 बेटी थी. लगभग 10 साल पहले किन्हीं कारणों से उस की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी. अब तक उस के बडे़ बेटे और बेटी की शादी हो चुकी थी. शादी के बाद उस का बेटा उस से अलग रहने लगा था. इस समय सिर्फ छोटा बेटा 14 वर्षीय गगनदीप सिंह ही उस के साथ रहता था.
थानाप्रभारी विमलकांत ने कमलप्रीत कौर की दोनों बेटियों, खुशप्रीत कौर और राजवीर कौर से भी पूछताछ की थी. उन्होंने बताया था कि उस दिन उन की मां दोपहर 2 बजे के आसपास ताऊ महेंद्र सिंह के बेटे गगनदीप के साथ अपनी स्कूटर से गई थीं. जाते समय उन्होंने कहा था कि वह ताऊ से पैसे लेने जा रही हैं.
थानाप्रभारी विमलकांत ने गगनदीप को बुला कर कमलप्रीत के बारे में पूछा तो उस ने बताया, ‘‘चाची मेरे साथ आई जरूर थीं, लेकिन पठानकोट रोड पर फ्लाईओवर पर उन्होंने मुझ से कहा था कि तुम चलो, मैं थोड़ी देर में आ रही हूं.’’
थानाप्रभारी विमलकांत गगनदीप से पूछताछ कर ही रहे थे कि रंजीत कौर ने थाने आ कर अपना फोन दिखाते हुए कहा, ‘‘सर, 4 मार्च को मेरे फोन पर कमलप्रीत का यह मैसेज आया था, जिसे मैं ने आज पढ़ा है. देखिए सर, इस में उस ने क्या लिखा है?’’
थानाप्रभारी विमलकांत ने रंजीत का फोन ले कर वह मैसेज पढ़ा. वह 4 मार्च को 1 बज कर 20 मिनट पर आया था. मैसेज था, ‘‘मैं अपने जेठ के साथ जा रही हूं. मुझे कोई प्रौब्लम आए तो फौरन फोन उठा लेना.’’
अब तक की तफ्तीश से महेंद्र सिंह वैसे ही शक के घेरे में आ गया था, इस मैसेज से स्पष्ट हो गया कि कमलप्रीत कौर के लापता होने के पीछे किसी न किसी रूप में ग्रंथी महेंद्र सिंह का ही हाथ है. अब समय बेकार करना ठीक नहीं था, इसलिए थानाप्रभारी ने तुरंत उस के घर छापा मार दिया. लेकिन वह घर पर नहीं मिला.
थानाप्रभारी ने महेंद्र सिंह के पीछे मुखबिरों को लगा दिया इस के बाद उन्हीं की सूचना पर 7 मार्च को पठानकोट रोड चौक पर नाका लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर उस से पूछताछ शुरू हुई तो उस ने जल्दी ही स्वीकार कर लिया कि उसी ने कमलप्रीत की हत्या कर दी है.
लाश के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि कमलप्रीत की लाश को उस ने गुरुद्वारा साहिब के सीवर में फेंक दी है. महेंद्र के अपना अपराध स्वीकार कर लेने के बाद इंसपेक्टर विमलकांत ने तुरंत इस बात की सूचना एडीसीपी (प्रथम) नरेश डोगरा तथा एसीपी सतीश मल्होत्रा को दे दी थी.
अधिकारियों की उपस्थिति में अभियुक्त ग्रंथी महेंद्र सिंह की निशानदेही पर गुरुद्वारा भगतराम के सीवर पाइप से मृतका कमलप्रीत कौर की लाश बरामद कर ली गई. लाश केवल अंदर के कपड़ों यानी ब्रा पैंटी में थी. इस से लोगों को लगा कि हत्या से पहले मृतका के साथ दुष्कर्म किया गया था.
इंसपेक्टर विमलकांत ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया और थाने आ कर कमलप्रीत के अपहरण के मुकदमे के साथ हत्या और लाश को खुर्द बुर्द करने की धाराएं जोड़ दीं.
अगले दिन यानी 8 मार्च को जेएमआईसी सिमरन सिंह की अदालत में महेंद्र सिंह को पेश कर के पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में महेंद्र ने जो बताया, वह इस प्रकार था.
महेंद्र सिंह ने पुलिस को बताया था कि उस ने छोटे भाई की पत्नी कमलप्रीत की हत्या इसलिए की है, क्येंकि उस ने उस के भाई गुरमीत सिंह की हत्या की थी. उस के प्रिंस और सत्ती से अवैध संबंध थे. इसी वजह से उस ने गुरमीत को जहर दे कर मार दिया था.
महेंद्र सिंह के बताए अनुसार, गुरमीत तनदुरुस्त और अच्छाखासा नौजवान था. उसे कोई बीमारी भी नहीं थी, इसलिए जिस दिन वह मरा था, उसी दिन उसे शक हो गया था कि उस के भाई गुरमीत की मौत स्वाभाविक नहीं थी. उसे साजिश रच कर मारा गया था. इस के बाद वह पता लगाने लगा. तब उसे पता चला कि गुरमीत की पत्नी कमलप्रीत के प्रिंस और सत्ती से अवैध संबंध थे.
इस के बाद महेंद्र सिंह कमलप्रीत पर नजर रखने लगा. इसी साल जनवरी के दूसरे सप्ताह में एक रात उस ने एक सपना देखा. सपने में गुरमीत ने आ कर उस से कहा था कि उसे जहर दे कर मारा गया था. यह काम कमलप्रीत ने अपने हाथों से किया था.
बस इसी के बाद से अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए महेंद्र मौके की तलाश में लग गया था. वह प्रिंस, सत्ती और कमलप्रीत की हत्या कर के अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता था. लेकिन 3-3 हत्याएं करना उस के वश की बात नहीं थी.
कमलप्रीत के मृतक पति गुरमीत सिंह की लाम्मा पिंड चौक के पास ‘राजा भांगड़ा ग्रुप’ के नाम से भांगड़ा पार्टी थी. वह शादीब्याह एवं अन्य अवसरों पर गाना व भांगड़ा करता था. उस का यह काम बहुत बढि़या चल रहा था. अपने इस काम से उस ने खूब पैसा कमाया, जिसे उस ने ब्याज पर उठा दिया था. 23 अक्टूबर को ज्यादा शराब पीने की वजह से उस की मौत हो गई थी. उस ने जो पैसा उठा रखा था, उस की मौत के बाद तमाम लोगों ने वापस नहीं किया था.
गुरमीत का पैसा बहुत लोगों ने दबा रखा है, यह महेंद्र सिंह को पता था. कमलप्रीत की हत्या करने से कुछ दिनों पहले उस ने कमलप्रीत को फोन किया कि गुरमीत ने बुलारा गांव के एक आदमी को डेढ़ लाख रुपए दे रखे थे. वह आदमी 3 किश्तों में वे रुपए लौटाना चाहता है.
कमलप्रीत जेठ की बात पर विश्वास कर के उस आदमी से मिलने को तैयार हो गई. तब महेंद्र ने रुपए दिलवाने के एवज में उस से 3 हजार रुपए कमीशन के तौर पर मांगे. कमलप्रीत ने उस की यह शर्त स्वीकार कर ली. इस के बाद महेंद्र ने बातचीत करने के लिए उसे गुरुद्वारा के अपने कमरे पर बुलाया. उस दिन बातचीत कर के कमलप्रीत घर लौट गई.
4 मार्च, 2014 को सुबह महेंद्र ने कमलप्रीत को फोन कर के अपने कमरे पर बुलाया. कमलप्रीत ने अकेली आने में असमर्थता व्यक्त की तो उस ने अपने बेटे गगनदीप को भेज दिया. कमलप्रीत गगनदीप के साथ किशनपुरा उस की बताई जगह पर एक्टिवा स्कूटर से पहुंची.
ग्रंथी महेंद्र सिंह वहां पहले से ही मौजूद था. वह उसे अपने साथ अपने कमरे पर ले गया. वहां कमरे में बंद कर के महेंद्र उस से अपने भाई गुरमीत की मौत के बारे में पूछने लगा. सपने की बात बता कर उस ने कहा कि उसी ने अपने अवैध संबंधों की वजह से गुरमीत को जहर दे कर मारा था.
कमलप्रीत ने रोते हुए कहा, ‘‘यह सब झूठ है. न तो मेरा किसी से अवैध संबंध है और न मैं ने तुम्हारे भाई की हत्या की है. जरा सोचो, मैं अपने पति की हत्या कर के स्वयं को क्यों विधवा बनाऊंगी. एक विधवा की जिंदगी क्या होती है, यह मुझ से ज्यादा और कौन जान सकता है. जिस प्रिंस और सत्ती पर तुम आरोप लगा रहे हो, वह मुझे अपनी बहन मानते हैं.’’
कमलप्रीत के रोने को महेंद्र सिंह ने ढोंग समझा. उस ने उसे डांटते हुए जान से मारने की धमकी दी तो कमलप्रीत डर गई और पति की हत्या की बात स्वीकार कर ली. इस के बाद उस ने एक कागज दे कर गुरमीत को जहर दे कर मारने की बात लिखने को कहा.
कमलप्रीत ने सोचा, लिख कर देने से वह उस का पीछा छोड़ देगा, इसलिए उस ने लिख दिया, ‘प्रिंस, सत्ती और मैं ने गुरमीत को शराब में सल्फास की गोलियां मिला कर पिला दी थीं, जिस से उस की मौत हो गई थी.’ दरअसल उस समय महेंद्र के सिर पर खून सवार था. उस की आंखों में हैवानियत नाचती देख कमलप्रीत डर गई थी और उस ने वह सब लिख दिया था, जो वह चाहता था.
कमलप्रीत द्वारा लिखी बात पढ़ कर महेंद्र की आंखों में खून उतर आया. उस ने बैड पर बैठी कमलप्रीत का गला पकड़ा और पूरी ताकत से दबा दिया. कमलप्रीत बैड पर गिर पड़ी. वह जिंदा न रह जाए, इस के लिए उस ने उस के गले में पड़ी चुन्नी को लपेट कर पूरी ताकत से कस दिया. इस के बाद लाश को वहीं कमरे में बंद कर के उस के दोनों फोन ले कर वह रामा मंडी, जालंधरअमृतसर रोड पर गया और लुधियाना जाने वाली बस की सीट के नीचे रख कर वापस आ गया.
इस के बाद कमलप्रीत का स्कूटर ले जा कर उस ने जालंधर कैंट के रेलवे स्टेशन की पार्किंग में खड़ा कर दिया. स्टेशन से लौटतेलौटते रात के 8 बज चुके थे. अब उसे लाश को ठिकाने लगाना था. लाश को ठिकाने लगाने से पहले उस ने कमलप्रीत की सलवार कमीज को कैंची से काट कर शरीर से अलग कर दिया.
उन कपड़ों को जला कर उस ने उस की राख को ले जा कर जेहला गांव के निकट गुरुद्वारे के पास खेतों में फेंक दिया, ताकि कोई सुबूत न रहे. उस के कमरे पर आतेआते गांव में सन्नाटा पसर चुका था. उस ने कमलप्रीत की लाश उठाई और गुरुद्वारा में बने सीवर में डाल दिया. इस तरह से कमलप्रीत की हत्या कर के उस ने सारे सुबूत मिटा दिए. लेकिन उस ने कुछ ऐसी गलतियां कर दी थीं, जिस की वजह से वह पुलिस गिरफ्त में आ गया था.
महेंद्र से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर विमलकांत ने प्रिंस और सत्ती को थाने बुला कर पूछताछ की. उन का कहना था कि वे कमलप्रीत को अपनी बहन मानते थे और भाई की तरह उस के छोटे मोटे काम कर दिया करते थे. मृतका कमलप्रीत की मां और बहन तथा पड़ोसियों ने भी उन की बात को सच बताया.
थानाप्रभारी ने एक बार फिर महेंद्र से पूछताछ की तो इस बार उस ने कमलप्रीत की हत्या की जो कहानी बताई, वह कुछ और ही निकली.
दरअसल, मृतक गुरमीत का कामधंधा बहुत अच्छा चल रहा था, जिस से महेंद्र उस से जलता था. गुरमीत का पृथ्वीनगर में एक मकान था, जो काफी कीमती था. महेंद्र उसे हथियाना चाहता था. इसीलिए उस ने कमलप्रीत के प्रिंस और सत्ती से अवैध संबंधों की बात फैला कर कमलप्रीत की हत्या कर दी, ताकि उस मकान को वह हासिल कर सके.
इंसपेक्टर विमलकांत ने महेंद्र की निशानदेही पर कमलप्रीत की एक्टिवा स्कूटर, मोबाइल फोन और वह कैंची भी बरामद कर ली थी, जिस से उस ने उस के कपड़े काटे थे. तमाम पुलिस काररवाई पूरी कर के महेंद्र सिंह को एक बार फिर 10 मार्च, 2014 को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. मृतका कमलप्रीत कौर की दोनों बेटियां खुशप्रीत कौर और राजवीर कौर अपनी मौसी रंजीत कौर के पास रह रही थीं.
– कथा पुलिस सूत्रों व मृतका के परिजनों द्वारा बातचीत पर आधारित
संतोष ने पत्नी को मजबूरी में गांव भेज तो दिया था लेकिन उस के जाने के बाद वह भी परेशान हो गया था. अब उसे खाना खुद ही बनाना पड़ता था. काम में व्यस्त रहने से वह इतना थक जाता था कि कभी बिना खाना खाए ही सो जाता था.
उसे बच्चों की भी याद आ रही थी. स्कूल से भी खबर आ रही थी कि आखिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं आ रहे हैं? संतोष का मन करता कि वह बच्चों को ले आए, लेकिन पत्नी की चरित्रहीनता याद आते ही वह अपना विचार बदल देता.
जब गुडि़या को गांव से कानपुर आने का मौका नहीं मिला तो राजू संतोष को मनाने तथा उस से फिर से दोस्ती करने का प्रयास करने लगा. लेकिन संतोष उसे झिड़क देता था. एक दिन उस ने कह दिया, ‘‘तू आस्तीन का सांप है. अब मैं तेरे झांसे में नहीं आऊंगा. मैं ने तुझे भाई जैसा मानसम्मान दिया, पर तूने मुझे ही डंस लिया.’’
‘‘बड़े भैया, मुझे अपनी गलती का अहसास है. बस मुझे एक बार माफ कर दो, फिर ऐसी गलती दोबारा नहीं करूंगा.’’
राजू ने बारबार मिन्नत की तो संतोष का दिल पसीज गया. फिर से दोस्ती बहाल हो जाने पर उस दिन दोनों ने दोस्ती के नाम पर फिर से जाम पर जाम टकराए. राजू ने अपनी कामयाबी की जानकारी गुडि़या को दी तो उस के मन में आस जगी कि संतोष अब उसे अपने पास बुला लेगा.
उन्हीं दिनों संतोष वायरल फीवर की चपेट में आ गया. राजू ही उसे अस्पताल ले गया. राजू ने संतोष को सलाह दी कि वह भाभी को बुला ले तो उस की सही तरीके से देखभाल हो जाएगी. संतोष ने पहले तो मुंह बनाया फिर कुछ सोच कर गुडि़या को फोन कर बताया कि वह बीमार है, अत: बच्चों के साथ जल्दी आ जाए.
पति की बात सुन कर गुडि़या खुशी से उछल पड़ी. उस ने फटाफट अपना सामान बांध कर बच्चों को तैयार किया और दूसरे दिन कानपुर आ गई. गुडि़या की सेवा से संतोष ठीक हो गया और बच्चे भी स्कूल जाने लगे.
राजू और गुडि़या कुछ दिनों तक तो अंजान बने रहे, उस के बाद फिर से दोनों का चोरीछिपे मिलन शुरू हो गया. गुडि़या के आने के बाद राजू संतोष से किए गए अपने वादे को भूल गया.
एक रोज संतोष की अपनी कंपनी में ही तबीयत खराब हो गई. उस का बदन बुखार से तप रहा था इसलिए वह दोपहर के समय ही कंपनी से घर की ओर चल दिया. दरवाजे पर पहुंचते ही उस ने आवाज लगाई, ‘‘गुडि़या, दरवाजा खोल.’’
कई बार दरवाजा खटखटाने के बाद गुडि़या ने दरवाजा खोला. वह कमरे में पहुंचा तो उस ने खिड़की से किसी को भागते देखा. पत्नी से पूछा तो वह साफ मुकर गई. लेकिन गुडि़या के उलझे बाल, बिस्तर की हालत तो कुछ और ही बयां कर रही थी.
वह समझ गया कि जरूर इस का यार राजू यहां से भागा है. यानी इस ने अपने यार से मिलना बंद नहीं किया है. गुस्से में संतोष ने गुडि़या की चोटी पकड़ कर पूछा, ‘‘बता, तेरे साथ कमरे में कौन था? सचसच बता वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’
गुडि़या घबरा तो गई, लेकिन फिर संभलते हुए बोली, ‘‘कोई भी नहीं था. तुम्हें जरूर कोई वहम हुआ है. तुम्हारी तबीयत शायद ठीक नहीं है.’’
गुडि़या ने हमदर्दी जताई तो संतोष को लगा कि शायद उसे बुखार है, इसलिए गलतफहमी हुई है. लेकिन उस का मन बारबार कह रहा था कि कमरे के अंदर राजू था जो उस के साथ सोया था. उस रात राजू को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहा.
संतोष के मन में शक पैदा हुआ तो फिर बढ़ता ही गया. अब तो संतोष राजू की मौजूदगी में भी गुडि़या की पिटाई कर देता. राजू बीचबचाव करने आता तो उसे झिड़क देता.
गुडि़या राजू की दीवानी थी, इसलिए उसे न तो पति की परवाह थी और ही परिवार के इज्जत की. इसी दीवानगी में एक दिन गुडि़या ने राजू से कहा, ‘‘तुम्हारी वजह से संतोष मुझे मारता पीटता है और तुम दुम दबा कर भाग जाते हो. आखिर तुम कैसे प्रेमी हो, कुछ करते क्यों नहीं?’’
‘‘घर का मामला है भाभी, मैं कर भी क्या सकता हूं.’’ राजू ने मजबूरी जाहिर की तभी गुडि़या बोली, ‘‘विरोध तो कर सकते हो. मुझ पर उठने वाला उस का हाथ तो मरोड़ सकते हो.’’
‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकता भाभी. क्योंकि तुम पर मेरा कोई अधिकार नहीं है. फिर भी मैं तुम्हारी बात पर गौर करूंगा.’’ राजू ने कहा.
28 नवंबर, 2018 की रात संतोष यह कह कर घर से निकला कि वह अपनी ड्यूटी पर जा रहा है. संतोष चला गया तो गुडि़या ने राजू से मोबाइल पर बात की, ‘‘राजू तुम फटाफट आ जाओ. आज तो मौज ही मौज है. वह घर पर नहीं है. पूरी रात अपनी है. जम कर मौजमस्ती करेंगे.’’
रात 12 बजे के आसपास राजू खिड़की के रास्ते गुडि़या के कमरे में पहुंच गया. गुडि़या ने एक कमरे में अपने बच्चों को सुला दिया था. दूसरे कमरे में गुडि़या सजीसंवरी बैठी थी. आते ही राजू ने गुडि़या को अपने बाहुपाश में लिया और दोनों जिस्मानी भूख मिटाने लगे.
इधर सुबह 5 बजे संतोष घर आया. वह कमरे के पास पहुंचा तो उस ने कमरे के अंदर हंसने की आवाजें सुनीं. संतोष का माथा ठनका, वह समझ गया कि कमरे के अंदर गुडि़या और राजू ही होंगे.
गुस्से में उस ने दरवाजा पीटना शुरू किया तो कुछ देर बाद गुडि़या ने दरवाजा खोला, तो उस ने खिड़की से कूदते राजू को देख लिया था. संतोष ने गुस्से में गुडि़या के बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. फिर वह उसे लातघूंसों से पीटने लगा.
अचानक संतोष की नजर कमरे में रखी कुल्हाड़ी पर पड़ी. उस ने कुल्हाड़ी उठाई और ताबड़तोड़ कई वार गुडि़या के सिर और गरदन पर किए. गुडि़या खून से लथपथ हो कर जान बख्श देने की गुहार लगाने लगी.
शोर सुन कर बच्चे भी जाग गए लेकिन पिता का रौद्र रूप देख कर वे सहम गए. फिर भी कृष्णा ने बाप के हाथ से कुल्हाड़ी छीन ली और बोला, ‘‘पापा, मम्मी को मत मारो. हम लोगों को रोटी कौन देगा.’’
कहते हुए कृष्णा कुल्हाड़ी ले कर घर के बाहर भागा.
उस ने पड़ोस में रहने वाली रेखा आंटी को बताया कि उस के पापा उस की मम्मी को कुल्हाड़ी से मार रहे हैं. रेखा भागीभागी गुडि़या के कमरे में पहुंची. गुडि़या की उस समय सांसें चल रही थीं. रेखा पुलिस को फोन करने कमरे से बाहर आई तो संतोष ने कमरे में रखा फावड़ा उठा लिया और जोरदार वार कर के गुडि़या को मौत के घाट उतार दिया. हत्या करने के बाद संतोष भागा नहीं बल्कि पत्नी के शव के पास बैठ कर फूटफूट कर रोने लगा.
इधर रेखा निषाद ने पड़ोसियों व थाना अरमापुर पुलिस को सूचना दे दी. खबर मिलते ही अरमापुर थानाप्रभारी आर.के. सिंह भी वहां आ गए. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर मृतका के पति संतोष व उस के बच्चों से बात की.
संतोष ने हत्या का जुर्म कबूलते हुए पुलिस अधिकारियों को बताया कि उस की पत्नी बदचलन थी, इसलिए उसे मार दिया. उसे हत्या का कोई अफसोस नहीं है. मृतका के बच्चों ने बताया कि मां की हत्या उस के पिता संतोष ने उन की आंखों के सामने की थी. उन्होंने मां को बचाने का प्रयास भी किया था, लेकिन बचा नहीं सके. पड़ोसी रेखा भी हत्या की चश्मदीद गवाह बनी.
थाना अरमापुर के इंसपेक्टर आर.के. सिंह ने मृतका गुडि़या के शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाया. फिर रेखा निषाद को वादी बना कर संतोष निषाद के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. पोस्टमार्टम के बाद शव को मृतका के मातापिता को सौंप दिया गया. कृष्णा, नंदिनी व लाडो को भी पालनपोषण के लिए नानानानी अपने साथ ले गए.
30 नवंबर, 2018 को पुलिस ने अभियुक्त संतोष निषाद को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. सभी बच्चे अपनी ननिहाल में थे.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
इन्हीं दिनों संतोष खेतों की देखभाल के लिए एक सप्ताह की छुट्टी ले कर अपने गांव चला गया. गुडि़या को यह मौका अच्छा लगा तो उस ने एक रोज रात में राजू को अपने कमरे पर रोक लिया. खाना खाने के बाद एक चारपाई पर राजू लेट गया और दूसरी पर गुडि़या.
राजू सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. उस का मन भाभी गुडि़या की तरफ ही लगा हुआ था. तभी आधी रात के बाद गुडि़या अपनी चारपाई से उठ कर उस के पास आ लेटी. इस के बाद तो राजू की खुशी का ठिकाना न रहा. वह गुडि़या से बोला, ‘‘क्या हुआ भाभी?’’
‘‘डर लग रहा था, इसलिए तुम्हारे पास चली आई.’’ गुडि़या ने उस से सटते हुए कहा.
‘‘डर लग रहा है तो लाइट जला दूं क्या?’’ राजू ने पूछा.
‘‘नहीं, लाइट जलाने की अब कोई जरूरत नहीं है. क्योंकि अब तुम मेरे पास हो.’’ कहते हुए वह उस से लिपट गई.
राजू गुडि़या की मंशा समझ चुका था. वह भी जवान था. गुडि़या के स्पर्श से उस के शरीर में भी सरसराहट दौड़ गई थी. फिर जब गुडि़या ने उसे उकसाया तो ऐसे में भला वह कैसे शांत रह सकता था. नतीजतन दोनों ने ही उस रात अपनी हसरतें पूरी कीं.
उस दिन के बाद राजू और गुडि़या अकसर कामलीला रचाने लगे. राजू अपनी अधिकांश कमाई गुडि़या व उस के बच्चों पर खर्च करने लगा. उस के घर आने का विरोध संतोष न करे, इसलिए वह उस की भी आर्थिक मदद करने लगा.
इस के अलावा संतोष जब भी शराब पीने की इच्छा जताता तो राजू उसे ठेके पर ले जाता और शराब पिलाता. इतना ही नहीं, राजू अब गुडि़या के घरेलू काम में भी हाथ बंटाने लगा. राशन लाना, बच्चों को स्कूल छोड़ना तथा शाम को सब्जी लाना उस की दिनचर्या बन गई थी.
संतोष जब गांव चला जाता तो राजू रात में उस के घर रुकता और फिर दोनों रात भर रंगरलियां मनाते. राजू जब संतोष के साथ उस के घर आता तब तो कोई बात नहीं थी, लेकिन उस की गैरमौजूदगी में जब वह अकसर उस के घर पड़ा रहने लगा तो पड़ोसियों के मन में शंका पैदा होने लगी. धीरेधीरे मोहल्ले में गुडि़या और राजू के संबंधों की चर्चा फैल गई.
एक दिन संतोष को उस के पड़ोसी रामसिंह भदौरिया ने अपने पास बुला कर कहा, ‘‘संतोष, तुम रातदिन काम में व्यस्त रहते हो और घर आ कर नशे में डूब जाते हो. कभी अपने घर की तरफ भी ध्यान दिया करो कि तुम्हारे यहां कौन आता है कौन जाता है. तुम्हें कुछ पता भी है?’’
‘‘चाचा, मेरे घर में तो सब ठीक चल रहा है. अगर कोई गड़बड़ है तो बताओ. हमें आप की बात पर पूरा भरोसा है.’’ संतोष ने पूछा.
‘‘वह जो तुम्हारा दोस्त राजू है न, वह ठीक नहीं है. तुम घर पर नहीं होते तब वह तुम्हारे घर आता है. बच्चों को पैसे दे कर घर के बाहर भेज देता है. फिर तुम्हारे घर का दरवाजा बंद हो जाता है. पूरे मोहल्ले में तुम्हारी बीवी और राजू के नाजायज संबंधों की चर्चा हो रही है और तुम कान बंद किए बैठे हो.’’ राम सिंह ने बताया.
संतोष निषाद को जब यह बात पता चली तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने इस बारे में पत्नी व राजू से बात की तो दोनों ने साफ कह दिया कि ऐसी कोई बात नहीं है. गुडि़या ने कहा कि राजू उस की मदद करता है, इसलिए पड़ोसी जलते हैं. घर में झगड़ा कराने के लिए वे तुम्हारे कान भर रहे हैं.
संतोष ने उस समय तो पत्नी की बात पर विश्वास कर लिया और फिर कुछ दिनों के लिए जरूरी काम से अपने गांव चला गया. लगभग एक सप्ताह बाद जब वह गांव से लौटा तो घर में राजू मौजूद था. उस समय राजू और गुडि़या हंसीठिठोली और शारीरिक छेड़छाड़ कर रहे थे.
अब उसे विश्वास हो गया कि राम सिंह चाचा ने जो बात उसे बताई थी, वह सच थी. यह देख कर संतोष का पारा चढ़ गया. उसी समय उस ने गुडि़या की जम कर पिटाई कर दी. मौका पा कर राजू वहां से खिसक गया.
अगले दिन संतोष जब अपनी ड्यूटी पर पहुंचा तो कंपनी में उसे राजू मिल गया. संतोष ने राजू को वहीं पर खूब फटकारा. राजू ने उस समय उस से माफी मांग ली, पर बाद में राजू और गुडि़या पहले की तरह मिलते रहे. किसी न किसी तरह संतोष को इस की जानकारी मिलती रही.
पत्नी की इस बेवफाई से संतोष टूट गया था. वह शराब तो पहले भी पीता था लेकिन अब और ज्यादा पीने लगा. उसे गुडि़या से इतनी अधिक नफरत हो गई थी कि उस ने उस से बातचीत तक करनी बंद कर दी.
लेकिन जिस दिन राजू घर के पास दिख जाता था, उस दिन गुस्से से संतोष का खून खौल जाता था. राजू को ले कर गुडि़या से उस की तकरार होती थी. नौबत मारपीट तक आ जाती थी. पूरा मोहल्ला जान गया था कि झगड़े की जड़ राजू और गुडि़या के अवैध संबंध हैं.
इस के बाद तो खुल्लमखुल्ला पूरे मोहल्ले में दोनों के संबंधों की चर्चा होने लगी. इस से संतोष की खूब बदनामी हो रही थी. तब संतोष ने राजू के घर आने पर प्रतिबंध लगा दिया. गुडि़या अपने से 10 साल छोटे प्रेमी राजू की दीवानी थी. वह किसी भी हाल में उस से अलग नहीं होना चाहती थी.
पति के चौकस हो जाने पर गुडि़या भी सतर्क हो गई. गुडि़या को जब भी मौका मिलता था, वह फोन कर के राजू को बुला लेती थी. पड़ोसियों को भनक न लगे, इस के लिए वह राजू को कमरे के पीछे खुलने वाली खिड़की से अंदर बुलाती थी, फिर शारीरिक मिलन के बाद वह उसी खिड़की से चला जाता था.
लेकिन सतर्कता के बावजूद एक रोज पड़ोसन रेखा निषाद ने राजू को खिड़की के रास्ते गुडि़या के घर में जाते देख लिया. उस ने यह बात संतोष को बताई तो उस का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने गुडि़या की जम कर पिटाई की और दूसरे दिन बच्चों सहित गुडि़या को अपने गांव वाले घर भेज दिया. गुडि़या ने गांव पहुंचने की जानकारी राजू को दे दी.
गुडि़या के गांव जाने पर राजू परेशान रहने लगा. अब दोनों की बात मोबाइल पर ही हो पाती थी. राजू गुडि़या पर दबाव बनाने लगा कि वह किसी न किसी बहाने से वापस आ जाए. उस के बिना उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा. गुडि़या राजू को आश्वासन देती कि अभी उचित समय नहीं है. संतोष का गुस्सा जब शांत हो जाएगा, तब वह उस से बात कर के आ जाएगी.