Police Story : SP सुरेंद्र दास ने आत्महत्या करने के लिए जहर क्यों खाया

Police Story : सुरेंद्र कुमार दास कानपुर के एसपी पद पर थे. उन के जीवन में किसी भी चीज का अभाव नहीं था. इस के बावजूद भी ऐसी क्या वजह रही जो उन्हें खुदकुशी करने के लिए मजबूर होना पड़ा. 5 सितंबर की बात है. कानपुर के एसपी (पूर्वी) सुरेंद्र कुमार दास अपनी पत्नी डा. रवीना सिंह के साथ सरकारी आवास में थे. पतिपत्नी के बीच काफी दिन से तनाव चल रहा था. एसपी सुरेंद्र दास तनाव में थे. वह अपनी परेशानी किसी से बता भी नहीं पा रहे थे. उन के दिल की बात किसी को पता नहीं थी. डा. रवीना को भी हालत की गंभीरता का अंदाजा नहीं था. सुबह का समय था. सुरेंद्र दास ने पत्नी को आवाज दी.

वह आई तो एसपी सुरेंद्र दास ने बिना हावभाव बदले रवीना के हाथ में एक कागज का टुकड़ा देते हुए बोले, ‘‘मैं ने जहर खा लिया है. मैं ने इस के लिए तुम्हें या किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया है.’’

पति की बात सुन कर रवीना अवाक रह गई. उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे कुछ समझ नहीं रहा था कि क्या करे? वह बोली, ‘‘आप नहीं होंगे तो इस लेटर का हम क्या करेंगे?’’

रवीना ने लेटर को बिना पढ़े, बिना देखे मरोड़ कर कमरे में एक तरफ फेंक दिया. बिना वक्त गंवाए रवीना ने पुलिस आवास पर तैनात पुलिसकर्मियों को एसपी साहब की तबीयत खराब होने की जानकारी दे दीपुलिसकर्मियों की मदद से वह पति को प्राइवेट अस्पताल में ले गई. 5 बज कर 20 मिनट पर वहां से उन्हें उर्सला अस्पताल और 6 बज कर 20 मिनट पर रीजेंसी अस्पताल ले जाया गया. पुलिस अफसर के जहर खाने की बात तेजी से फैलने लगी. कानपुर से ले कर राजधानी लखनऊ के पुलिस मुख्यालय तक अफसरों में हड़कंप मच गया. सुरेंद्र कुमार दास के बेहतर इलाज के लिए हरसंभव प्रयास किए जाने लगे

कानपुर के रीजेंसी अस्पताल के डाक्टरों ने एम्स दिल्ली और मुंबई के बड़े अस्पतालों के डाक्टरों से संपर्क साधा ताकि एसपी साहब को बेहतर इलाज दिया जा सके. एसपी सुरेंद्र कुमार दास के शरीर के अंदरूनी अंगों पर जहरीले पदार्थ का असर पड़ने लगा था, जिस से शरीर के दूसरे अंगों के फेल होने का खतरा बढ़ता जा रहा था. स्वास्थ्य में सुधार और बेहतर इलाज के लिए मुंबई से हवाई जहाज से इलाज में सहायक एक्मो नाम का एक उपकरण मंगाया गया. यह उपकरण लखनऊ और कानपुर में उपलब्ध नहीं था. एक्मो के द्वारा शरीर के अंगों को काम करने के लिए मदद दी जाती है.

एसपी सुरेंद्र कुमार दास 2014 बैच के आईपीएस अधिकारी थे. मूलरूप से वह बलिया जिले के रहने वाले थे. उन के पिता लखनऊ के रायबरेली रोड स्थित पीजीआई कालोनी में रहते थे. कानपुर शहर में वह एसपी (पूर्वी) के पद पर तैनात थे. उन की पत्नी रवीना डाक्टर थी. दोनों की शादी 9 अप्रैल, 2017 को हुई थी. यह शादी अखबार के वैवाहिक विज्ञापन के माध्यम से हुई थी. रवीना के पिता भी सरकारी डाक्टर हैं. शादी के बाद सुरेंद्र दास अंबेडकर नगर में बतौर सीओ तैनात थे. उस समय रवीना भी उन के साथ रहती थी. रवीना वहां अंबेडकर नगर मैडिकल कालेज में बतौर डाक्टर संविदा पर तैनात थी

रवीना ने जुलाई माह में ही नौकरी जौइन की थी और एक महीने बाद अगस्त में ही नौकरी छोड़ दी. सुरेंद्र दास जब कानपुर में एसपी (पूर्वी) के रूप में तैनात किए गए तो रवीना उन के साथ रहने लगी थी. एसपी सुरेंद्र कुमार दास के जहर खाने की सूचना उन के कल्ली, लखनऊ स्थित घर पहुंची तो सुरेंद्र की मां इंदु देवी, बड़ा भाई नरेंद्र दास, भाभी सुनीता कानपुर के लिए रवाना हो गएमुंबई और रीजेंसी अस्पताल के डाक्टरों की टीम ने सुरेंद्र दास को बचाए रखने का प्रयास जारी रखा, लेकिन 5 दिन के संघर्ष के बाद रविवार 9 सितंबर की दोपहर 12 बज कर 20 मिनट पर सुरेंद्र दास का निधन हो गया. उन के शव को कानपुर से लखनऊ उन के एकता नगर स्थित निवास पर लाया गया. पूरी कालोनी सदमे में थी.

सुरेंद्र दास के पिता रामचंद्र दास सेना से रिटायर हुए थे. उन्होंने करीब डेढ़ दशक पहले एकता नगर में पंचवटी नाम से मकान बनाया था. सुरेंद्र दास 2 भाई थे. उन के बड़े भाई नरेंद्र दास अपने मकान में ही हार्डवेयर की दुकान चलाते थे. सुरेंद्र दास की 5 बहनें पुष्पा, आरती, सुनीता, अनीता और सावित्री थीं. सभी बहनों की शादी हो चुकी थी. सुरेंद्र दास पढ़ाई में तेज थे. उन के पिता रामचंद्र दास ने सुरेंद्र की पढ़ाई के लिए अलग जमीन पर कमरा बनवा दिया था, जिस से उन की पढ़ाई में व्यवधान आए. यहीं रह कर सुरेंद्र पढ़ाई करने लगे. दिन भर वह कमरे में रह कर पढ़ाई करते थे. वहां से वह घर केवल खाना खाने आते थे.

जब उन का चयन आईपीएस के लिए हुआ तो पूरी कालोनी में खुशियां मनाई गईं. कालोनी में रहने वाले सभी मातापिता अपने बच्चों को सुरेंद्र दास जैसा बनने का उदाहरण देते थे. कालोनी के कुछ बच्चे सुरेंद्र दास के संपर्क में रहते थे. वे उन बच्चों को कंपटीशन की तैयारी की सलाह देते थे. 10 साल पहले सुरेंद्र दास के पिता नरेंद्र दास की मौत हो गई थी. सुरेंद्र दास की खुदकुशी पर किसी को यकीन नहीं हो रहा था. इस का कारण यह था कि वह संस्कारी स्वभाव के थे. कालोनी में रहने वाले किसी भी बुजुर्ग से वह ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे, हमेशा अंकल कह कर उन्हें इज्जत देते थे. उन की मौत के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पुलिस प्रमुख ओमप्रकाश सिंह सहित सभी अफसरों ने उन के घर जा कर शोक जताया.

सुरेंद्र दास के परिवार ने उन की मौत के लिए पत्नी डा. रवीना सिंह को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया था. सुरेंद्र दास के भाई नरेंद्र दास ने कहा कि वह रवीना के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की रिपोर्ट दर्ज कराएंगे. नरेंद्र दास ने कहा कि सुरेंद्र दास की मौत के लिए रवीना ही हिम्मेदार है. रवीना उन्हें परिवार से अलग रखना चाहती थी, जबकि सुरेंद्र परिवार से दूर नहीं रहना चाहते थे. वह भावुक और संवेदनशील इंसान थे. जबकि रवीना उन पर शक करती थी, जब वह गश्त पर जाते थे तो वह उन के साथ ही जाती थीवैसे भी रवीना का अपने मायके की तरफ झुकाव ज्यादा था. पुलिस लाइन में जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल के कपड़े खरीदने को ले कर दोनों में विवाद हुआ था. सुरेंद्र उन के साथ जाना चाहते थे, जबकि वह अकेले जाना चाहती थी.

सुरेंद्र दास के भाई नरेंद्र दास का आरोप था कि रवीना ने पति को इतना प्रताडि़त किया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली. इस के अलावा उन के पास कोई रास्ता नहीं थावह पूरी तरह से टूट गए थे और बिना सोचेसमझे आत्महत्या कर ली. नरेंद्र ने कहा कि सुसाइड नोट में हैंड राइटिंग की जांच कराएंगे. नरेंद्र ने बताया कि रवीना नानवेज खाती थी, जबकि सुरेंद्र पूरी तरह से शाकाहारी थेकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भी रवीना ने नानवेज खाया था, जिस की वजह से दोनों में तनाव था. नरेंद्र दास का कहना था कि मानसिक तनाव में ही सुरेंद्र दास यह सोच रहे थे कि आत्महत्या कैसे की जाए. कानपुर के एसएसपी .के. तिवारी के अनुसार सुरेंद्र दास के सुसाइड नोट में पारिवारिक कलह, पत्नी से छोटीछोटी बातों में तनाव और कई बातें भी लिखी थीं. सुरेंद्र ने सीधे तौर पर अपनी आत्महत्या के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया था.

एसपी सुरेंद्र दास के भाई नरेंद्र दास ने भले ही उन की पत्नी रवीना को आत्महत्या का जिम्मेदार बताया हो, पर खुद सुरेंद्र ने अपने सुसाइड नोट में पत्नी रवीना को जिम्मेदार नहीं माना. सुरेंद्र दास ने अपने 7 लाइन के पत्र में अंगरेजी और हिंदी दोनों में लिखा था. अंगरेजी में उन्होंने लिखा था कि वह पिछले एक सप्ताह से आत्महत्या करने के तरीके खोज रहे थे. गूगल पर आत्महत्या करने का सब से आसान तरीके को समझने के लिए पढ़ा और वीडियो देखी. इस के बाद 2 तरीकों पर ध्यान दिया. पहला ब्लेड से शरीर की नस काटनी थी. दूसरा जहर खाने का तरीका था

नस काटने में दर्द होने की संभावना ज्यादा थी. ऐसे में मुझे जहर खाने का तरीका सब से अच्छा लगा. इस के लिए उन्होंने सल्फास लाने के लिए अपने एक कर्मचारी को कहा कि उन्हें चूहे और सांप भगाने हैं. 4 सितंबर को जहर खाने से पहले सुरेंद्र दास ने सल्फास मंगवा कर रख ली थी. इन तमाम आरोपों पर सुरेंद्र दास की पत्नी डा. रवीना की तरफ से कोई भी बात नहीं कही गई. रवीना ने केवल इतना कहा कि मेरा सब कुछ चला गया है. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए. मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी है. मैं हाथ जोड़ कर कह रही हूं कि मुझे किसी से कुछ नहीं कहना हैरवीना के परिजनों ने हर आरोप को गलत बताते हुए कहा कि सच्चाई सुरेंद्र दास के परिवार को पता है. वह अपने परिवार से परेशान थे और 4 महीने से वह अपने परिवार के संपर्क में नहीं थे. सुरेंद्र की मौत की फाइल अभी बंद नहीं हुई है. ऐसे में संभव है कि कुछ दिनों के बाद कोई सुराग मिले तो फिर से नए तथ्य सामने आएं

एक बात साफ है कि सुरेंद्र अपने जीवन में बेहद तनाव के दौर में गुजर रहे थे. इस बारे में उन्होंने अपने घरपरिवार और पत्नी से भी किसी तरह की कोई चर्चा नहीं की थी. अगर वह अपने करीबी लोगों से अपने तनाव के बारे में चर्चा कर लेते तो शायद वह ऐसा कदम नहीं उठाते. एसपी सुरेंद्र दास की आत्महत्या को ले कर जब आरोपों का दौर चला तो उन की पत्नी डा. रवीना के मातापिता ने सामने कर प्रैस कौन्फ्रैंस की. रवीना के पिता रावेंद्र ने कई कथित सबूतों के साथ आरोप लगाया कि सुरेंद्र का परिवार नहीं चाहता था कि सुरेंद्र रवीना के साथ रहे. उन्होंने यह भी कहा कि सुरेंद्र की शादी की बात पहले तूलिका नाम की लड़की से हुई. बात नहीं बनी तो मोनिका से सगाई हुई, लेकिन वह भी टूट गई

अगस्त 2016 में सुरेंद्र की पहली मुलाकात रवीना से हुई. बात आगे बढ़ी तो सुरेंद्र का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था. लेकिन सुरेंद्र ने किसी तरह अपनी मां को मना लिया. शादी से पहले सुरेंद्र के बड़े भाई नरेंद्र ने शादी का सामान रवीना के एटीएम कार्ड से खरीदा. अप्रैल, 2017 में रवीना अपनी ससुराल पहुंची तो वहां उस से अभद्रता की गई. भद्दे कमेंट्स किए गए. यहां तक कि उसे खाना भी नहीं दिया गया. रावेंद्र के अनुसार, सुरेंद्र का बड़ा भाई नरेंद्र एक व्यावसायिक प्लौट खरीदने के लिए सुरेंद्र से पैसे मांग रहा था. एकता नगर का प्लौट बेचने के चक्कर में दोनों भाइयों में झगड़ा होता था

रावेंद्र के अनुसार, सुरेंद्र की मां इंदु अपने बेटे के पास नहीं जाती थीं. सुरेंद्र दास जब सहारनपुर में तैनात थे तो लखनऊ आते थे लेकिन अपने परिवार को सूचना देने से मना कर देते थे. बाद में अंबेडकर नगर ट्रांसफर के समय सुरेंद्र ने दहेज का सामान लाने के लिए ट्रक भेजा था, लेकिन नरेंद्र ने सामान देने से मना कर दिया. बहरहाल, दोनों पक्षों की ओर से आरोपप्रत्यारोप चल रहे हैं. कौन सच बोल रहा है, कौन झूठ कहा नहीं जा सकता. हां, यह तय है कि सुरेंद्र दास ने मानसिक द्वंद के चलते ही आत्महत्या की. दुख यह जान कर होता है कि जो व्यक्ति कानून का रखवाला था, आत्महत्या कर के वह खुद ही कानून से खेल कर दुनिया से दूर चला गया. आखिर कोई तो ऐसी बात रही होगी जो उन से बरदाश्त नहीं हुई. इस बात का पता लगाया जाना जरूरी है.    

Crime story : आशिक ने माशूका के चेहरे को चाकू से गोद डाला

Crime story : मार्निंग वौक पर निकले कुछ लोगों ने हाईवे के किनारे एक महिला की लाश पड़ी देखी तो उन्होंने  इस बात की सूचना थाना नौबस्ता पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह सहयोगियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां काफी लोग इकट्ठा थे, लेकिन उन में से कोई भी महिला की शिनाख्त नहीं कर सका. मृतका की उम्र 35 साल के आसपास थी. वह साड़ीब्लाउज और पेटीकोट पहने थी. उस के सिर पर गंभीर चोट लगी थी, चेहरा किसी नुकीली चीज से Crime story गोदा गया था. गले में भी साड़ी का फंदा पड़ा था.

लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए कानपुर स्थित लाला लाजपत राय चिकित्सालय भिजवा दिया. लेकिन घटनास्थल की काररवाई में पुलिस ने काफी समय बरबाद कर दिया था, इसलिए देर हो जाने की वजह से उस दिन लाश का पोस्टमार्टम नहीं हो सका. यह 5 जुलाई, 2014 की बात थी.

अगले दिन यानी 6 जुलाई को कानपुर से निकलने वाले समाचार पत्रों में जब एक महिला का शव नौबस्ता में हाईवे पर मिलने का समाचार छपा तो थाना चकेरी के मोहल्ला रामपुर (श्यामनगर) के रहने वाले शिवचरन सिंह भदौरिया को चिंता हुई. इस की वजह यह थी कि उस की पत्नी नीलम उर्फ पिंकी पिछले 2 दिनों से गायब थी. इस बीच उस ने अपने हिसाब से उस की काफी खोजबीन की थी, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला था. अखबार में समाचार पढ़ने के बाद शिवचरन सिंह अपने दोनों बेटों, सचिन और शिवम को साथ ले कर थाना नौबस्ता पहुंचा और थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह को बताया कि उस की पत्नी परसों से गायब है. वह हाईवे के किनारे मिली महिला की लाश को देखना चाहता है.

चूंकि शव पोस्टमार्टम हाऊस में रखा था, इसलिए थानाप्रभारी ने उन लोगों को एक सिपाही के साथ वहां भेज दिया. शिवचरन सिंह बेटों के साथ वहां पहुंचा तो लाश देखते ही वह फूटफूट कर रो पड़ा. क्योंकि वह लाश उस की पत्नी नीलम की थी. उस के दोनों बेटे सचिन और शिवम भी मां की लाश देख कर रोने लगे थे. इस तरह हाईवे के किनारे मिले महिला के शव की शिनाख्त हो गई थी. लाश की शिनाख्त कर शिवचरन सिंह बेटों के साथ थाने आ गए. थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह ने शिवचरन से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की पत्नी नीलम 4 जुलाई की शाम 4 बजे से गायब है. घर से निकलते समय उस ने बच्चों से कहा था कि वह उन की स्कूली ड्रेस लेने दर्जी के यहां जा रही है. उधर से ही वह घर का सामान भी ले आएगी. लेकिन वह गई तो लौट कर नहीं आई.

आज सुबह उस ने अखबार में महिला के शव मिलने की खबर पढ़ी तो वह थाने आया और पोस्टमार्टम हाउस जा कर देखी तो पता चला कि उस की तो हत्या हो चुकी है.

‘‘हत्या किस ने की होगी, इस बारे में तुम कुछ बता सकते हो?’’ थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, हमें संदेह नहीं, पूरा विश्वास है कि नीलम की हत्या सबइंसपेक्टर जगराम सिंह ने की है. वह हमारे बड़े भाई का चचेरा साला है. उस का हमारे घर बहुत ज्यादा आनाजाना था. उस के नीलम से अवैध संबंध थे. पीछा छुड़ाने के लिए उसी ने उस की हत्या की है. वह अपने परिवार के साथ बर्रा में रहता है. इन दिनों उस की तैनाती लखनऊ में है.’’

शिवचरन सिंह ने जैसे ही कहा कि नीलम की हत्या सबइंसपेक्टर जगराम सिंह ने की है, थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह ने उसे डांटा, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब है. नीलम की हत्या नहीं हुई है. मुझे लगता है, उस की मौत एक्सीडेंट से हुई है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आएगी तो पता चल जाएगा कि वह कैसे मरी है.’’

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, नीलम की हत्या बड़ी ही बेरहमी से की गई थी. उस की मौत सिर की हड्डी टूटने से हुई थी. उस के चेहरे को चाकू की नोक से गोदा गया था. गला भी साड़ी से कसा गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया था कि नीलम की हत्या हुई थी. इस के बावजूद थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह ने हत्या की रिपोर्ट दर्ज नहीं की. इस का मतलब था कि जगराम सिंह ने सिफारिश कर दी थी. विभागीय मामला था, इसलिए थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह उस का पक्ष ले रहे थे.

हत्या के इस मामले को दबाने की खबर जब स्थानीय अखबारों में छपी तो आईजी आशुतोष पांडेय ने इसे गंभीरता से लिया. उन्होंने इस मामले को ले कर थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह से 2 बार बात की, लेकिन उस ने उन्हें कोई उचित जवाब नहीं दिया. इस के बाद उन्होंने क्षेत्राधिकारी ओमप्रकाश को इस मामले की जांच कर के तुरंत रिपोर्ट देने को कहा.

क्षेत्राधिकारी ओमप्रकाश ने उन्हें जो रिपोर्ट दी, उस में सबइंसपेक्टर जगराम सिंह पर हत्या का संदेह व्यक्त किया गया था. थानाप्रभारी अरुण कुमार सिंह ने जो किया था, उस से पुलिस की छवि धूमिल हुई थी, इसलिए आईजी आशुतोष पांडेय ने उन्हें लाइनहाजिर कर दिया और खुद 10 जुलाई को थाना नौबस्ता जा पहुंचे. उन्होंने सबइंसपेक्टर जगराम सिंह को थाने बुला कर पूछताछ की और उसे साथ ले कर घटनास्थल का निरीक्षण भी किया.

मृतका नीलम और जगराम सिंह के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो उस में नीलम के मोबाइल फोन पर अंतिम फोन जगराम सिंह का ही आया था. दोनों के बीच बात भी हुई थी. इस के बाद नीलम का फोन बंद हो गया था. नीलम के मोबाइल फोन की अंतिम लोकेशन थाना चकेरी क्षेत्र के श्यामनगर की थी. काल डिटेल्स से पता चला कि जगराम और नीलम की रोजाना दिन में कई बार बात होती थी. कभीकभी दोनों की घंटों बातें होती थीं.

सारे सुबूत जुटा कर आईजी आशुतोष पांडेय ने सबइंसपेक्टर जगराम सिंह से नीलम की हत्या के बारे में पूछा तो उसने स्वीकार कर लिया कि साले की मदद से उसी ने नीलम की Crime story हत्या की थी और लाश ले जा कर नौबस्ता में हाईवे के किनारे फेंक दी थी. जगराम सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो थाना नौबस्ता पुलिस ने शिवचरन सिंह भदौरिया की ओर से नीलम की हत्या का मुकदमा सबइंसपेक्टर जगराम सिंह और उस के साले लक्ष्मण सिंह के खिलाफ दर्ज कर लिया. इस के बाद जगराम सिंह ने नीलम की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह जिस्म के नाजायज रिश्तों में जिंदगी लेने वाली थी.

उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के कस्बा खागा के रहने वाले राम सिंह के परिवार में पत्नी चंदा के अलावा 2 बेटे पप्पू, बब्बू और बेटी नीलम उर्फ पिंकी थी. राम सिंह पक्का शराबी था. अपनी कमाई का ज्यादा हिस्सा वह शराब में उड़ा देता था. बाप की देखा देखी बड़े बेटे पप्पू को भी शराब का शौक लग गया. जैसा बाप, वैसा बेटा. पप्पू कुछ करता भी नहीं था.

नीलम उर्फ पिंकी राम सिंह की दूसरे नंबर की संतान थी. वह सयानी हुई तो राम सिंह को उस की शादी की चिंता हुई. उस के पास कोई खास जमापूंजी तो थी नहीं, इसलिए वह इस तरह का लड़का चाहता था, जहां ज्यादा दानदहेज न देना पड़े. उस ने तलाश शुरू की तो जल्दी ही उसे कानपुर शहर के थाना चकेरी के श्यामनगर (रामपुर) में किराए पर रहने वाला शिवचरन सिंह भदौरिया मिल गया. शिवचरन सिंह शहर के मशहूर होटल लिटिल में चीफ वेटर था. राम सिंह को शिवचरन पसंद आ गया. उस के बाद अपनी हैसियत के हिसाब से लेनदेन कर के उस ने नीलम की शादी शिवचरन सिंह के साथ कर दी.

नीलम जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर शिवचरन बेहद खुश था.  से समय गुजरने लगा. समय के साथ नीलम 2 बेटों सचिन और शिवम की मां बनी. बच्चे होने के बाद खर्च तो बढ़ गया, जबकि आमदनी वही रही. शिवचरन को 5 हजार रुपए वेतन मिलता था, जिस में से 2 हजार रुपए किराए के निकल जाते थे, हजार, डेढ़ हजार रुपए नीलम के फैशन पर खर्च हो जाते थे. बाकी बचे रुपयों में घर चलाना मुश्किल हो जाता था. इसलिए घर में हमेशा तंगी बनी रहती थी.

पैसों को ले कर अक्सर शिवचरन और नीलम में लड़ाईझगड़ा होता रहता था. रोजरोज की लड़ाई और अधिक कमाई के चक्कर में शिवचरन ने नीलम की ओर ध्यान देना बंद कर दिया. पत्नी की किचकिच की वजह से वह तनाव में भी रहने लगा. इस सब से छुटकारा पाने के लिए वह शराब पीने लगा. संयोग से उसी बीच शिवचरन के घर उस के बड़े भाई के चचेरे साले यानी नीलम की जेठानी प्रीति के चचेरे भाई जगराम सिंह का आनाजाना शुरू हुआ.

जगराम सिंह अपने परिवार के साथ बर्रा कालोनी में रहता था. वह हेडकांस्टेबल था, लेकिन इधर प्रमोशन से सबइंस्पेक्टर हो गया था. उस की ड्यूटी लखनऊ में दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री सुदीप रंजन सेन के यहां थी. नीलम जगराम सिंह की मीठीमीठी बातों और अच्छे व्यवहार से काफी प्रभावित थी. एक तरह से नीलम उस की बहन थी, लेकिन 2 बच्चों की मां होने के बावजूद नीलम की देहयष्टि और सुंदरता ऐसी थी कि किसी भी पुरुष की नीयत खराब हो सकती थी. शायद यही वजह थी कि भाई लगने के बावजूद जगराम सिंह की भी नीयत उस पर खराब हो गई थी.

घर आनेजाने से जगराम सिंह को नीलम की परेशानियों का पता चल ही गया था, इसलिए उस तक पहुंचने के लिए वह उस की परेशानियों का फायदा उठाते हुए हर तरह से मदद करने लगा. नीलम जब भी उस से पैसा मांगती, वह बिना नानुकुर किए दे देता. अगर कभी शिवचरन पैसे मांग लेता तो वह उसे भी दे देता. शिवचरन भले ही जगराम की मन की बात से अंजान था, लेकिन नीलम सब जानती थी. वह जान गई थी कि जगराम उस पर इतना क्यों मेहरबान है. उस की नजरों से उस ने उस के दिल की बात जान ली थी. एक तो नीलम को पति का सुख उस तरह नहीं मिल रहा था, जिस तरह मिलना चाहिए था, दूसरे जगराम अब उस की जरूरत बन गया था.

इसलिए उसे जाल में फंसाए रखने के लिए नीलम उस से हंसी मजाक ही नहीं करने लगी, बल्कि उस के करीब भी आने लगी थी. आसपड़ोस में सभी लोगों को उस ने यही बता रहा था कि यह उस के जेठानी का भाई है. इसलिए नीलम को लगता था कि उस के आने जाने पर कोई शक नहीं करेगा. नीलम की मौन सहमति पा कर एक दिन उसे घर में अकेली पा कर जगराम सिंह ने उस का हाथ पकड़ लिया. बनावटी नानुकुर के बाद उस ने जगराम को अपना शरीर सौंप दिया. जगराम से उसे जो सुख मिला, उस ने रिश्तों की मर्यादा को भुला दिया.

इस के बाद नीलम और जगराम जब भी मौका पाते, एक हो जाते. नीलम को जगराम सिंह के साथ शारीरिक सुख में कुछ ज्यादा ही आनंद आता था, इसलिए वह उस का भरपूर सहयोग करने लगी थी. कभीकभी तो जगराम से मिलने वाले सुख के लिए वह बच्चों को बहाने से घर के बाहर भी भेज देती थी. कुछ सालों तक तो उन का यह संबंध लोगों की नजरों से छिपा रहा, लेकिन जगराम सिंह का शिवचरन के घर अक्सर आना और घंटो पड़े रहना, लोगों को खटकने लगा. नीलम और उस के सबइंसपेक्टर भाई के हावभाव और कार्यशैली से लोगों को विश्वास हो गया कि उन के बीच गलत संबंध है.

जगराम सिंह बेहद चालाकी से काम ले रहा था. वह जब भी शिवचरन की मौजूदगी में आता, काफी गंभीर बना रहता. वह इस बात का आभास तक न होने देता कि उस के और नीलम के बीच कुछ चल रहा है. तब वह पूरी तरह से रिश्तेदार बना रहता. लेकिन एकांत मिलते ही वह रिश्तेदार के बजाय नीलम का प्रेमी बन जाता. जब मामला कुछ ज्यादा ही बढ़ गया तो पड़ोसियों ने शिवचरन के कान भरने शुरू किए. उसने अतीत में झांका तो उसे भी संदेह हुआ. फिर एक दिन जगराम घर आया तो वह होटल जाने की बात कह कर घर से निकला जरूर, लेकिन आधे घंटे बाद ही वापस आ गया. उस ने देखा कि दोनों बेटे बाहर खेल रहे हैं और कमरे की अंदर से सिटकनी बंद है.

उस ने सचिन से पूछा, ‘‘क्या बात है, कमरे का दरवाजा क्यों बंद है, तुम्हारी मम्मी कहां हैं.?’’

‘‘मम्मी और मामा कमरे में हैं. हम कब से उन्हें बुला रहे हैं, वे दरवाजा खोल ही नहीं रहे हैं.’’ सचिन ने कहा.

शिवचरन को संदेह तो था ही, अब विश्वास हो गया. वह नीलम को आवाज दे कर दरवाजा पीटने लगा. अचानक शिवचरन की आवाज सुन कर दोनों घबरा गए. वे जल्दी से उठे और अपने अपने कपड़े ठीक किए. इस के बाद नीलम ने आ कर दरवाजा खोला. नीलम की हालत देख कर शिवचरन सारा माजरा समझ गया. उसे कुछ कहे बगैर वह कमरे के अंदर आया तो देखा जगराम सोने का नाटक किए चारपाई पर लेटा था. शिवचरन खून का घूंट पी कर रह गया. उस समय उस ने न तो नीलम से कुछ कहा और न ही जगराम सिंह से. लेकिन उस के हावभाव से नीलम समझ गई कि उस के मन में क्या चल रहा है. उस ने अपने भयभीत चेहरे पर मुसकान लाने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन तनाव में होने की वजह से सफल नहीं हो पाई.

शिवचरन सोच ही रहा था कि वह क्या करे, तभी जगराम जम्हुआई लेते हुए उठा और शिवचरन को देख कर बोला, ‘‘अरे तुम इतनी जल्दी कैसे आ गए, तबीयत तो ठीक है?’’

शिवचरन ने जगराम सिंह के चेहरे पर नजरें जमा कर दबे स्वर में कहा, ‘‘तबीयत तो ठीक है, लेकिन दिमाग ठीक नहीं है.’’

इतना कह कर ही शिवचरन बाहर चला गया. उस ने जिस तरह यह बात कही थी, उसे सुन कर जगराम ने वहां रुकना उचित नहीं समझा और चुपचाप बाहर निकल गया. उस के जाते ही शिवचरन वापस लौटा और नीलम की चोटी पकड़ कर बोला, ‘‘बदलचन औरत, इस उम्र में तुझे यह सब करते शरम भी नहीं आई? वह भी उस आदमी के साथ जो तेरा भाई लगता है.’’

नीलम की चोरी पकड़ी गई थी, इसलिए वह कुछ बोल नहीं पाई. गुस्से में तप रहे शिवचरन ने नीलम को जमीन पर पटक दिया और लात घूसों से पिटाई करने लगा. नीलम चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन शिवचरन ने उसे तभी छोड़ा, जब वह उसे मारते मारते थक गया. इस के बाद शिवचरन नीलम पर नजर रखने लगा था. उस ने बेटों से भी कह दिया था कि जब भी मामा घर आए, वे उस से बताएं. जिस दिन शिवचरन को पता चलता कि जगराम आया था, उस दिन शिवचरन नीलम पर कहर बन कर टूटता था. अब जगराम और नीलम काफी सावधानी बरतने लगे थे. वह तभी नीलम से मिलने आता था, जब उसे पता चलता था कि घर पर न बेटे हैं और न शिवचरन.

इसी बात की जानकारी के लिए जगराम सिंह ने नीलम को एक मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया था. इस से दोनों की रोजाना बातें तो होती ही रहती थीं, इसी से मिलने का समय भी तय होता था. एक दिन शिवचरन ने नीलम को जगराम से बातचीत करते पकड़ लिया तो मोबाइल फोन छीन कर पटक दिया. लेकिन अगले ही दिन जगराम ने उसे दूसरा मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया. काफी प्रयास के बाद भी शिवचरन नीलम और जगराम को अलग नहीं कर सका तो उस ने जगराम के घर जा कर उस की पत्नी लक्ष्मी से सारी बात बता दी. इस के बाद जगराम के घर कलह शुरू हो गई. यह कलह इतनी ज्यादा बढ़ गई कि लक्ष्मी ने बच्चों के साथ आत्मदाह करने की धमकी दे डाली.

पत्नी की इस धमकी से जगराम डर गया. उस ने पत्नी से वादा किया कि अब वह नीलम से संबंध तोड़ लेगा. उस ने नीलम से मिलना कम कर दिया तो इस से नीलम नाराज हो गई. इधर उस ने पैसों की मांग भी अधिक कर दी थी, जिस से जगराम को परेशानी होने लगी थी. एक ओर जगराम सिंह अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ नहीं सकता था. दूसरी ओर अब नीलम से भी पीछा छुड़ाना आसान नहीं रह गया था. वह बदनाम करने की धमकी देने लगी थी. उस की धमकी और मांगों से तंग आ कर जगराम सिंह ने नीलम से पीछा छुड़ाने के लिए अपने साले लक्ष्मण के साथ मिल कर उसे खत्म करने की योजना बना डाली.

संयोग से उसी बीच नीलम ने बच्चों की ड्रेस, फीस, कापीकिताब और घर के खर्च के लिए जगराम से 10 हजार रुपए मांगे. जगराम ने कहा कि पैसों का इंतजाम होने पर वह उसे फोन से बता देगा. 24 जुलाई, 2014 की शाम 4 बजे जगराम सिंह ने नीलम को फोन किया कि पैसों का इंतजाम हो गया है, वह श्यामनगर चौराहे पर आ कर पैसे ले ले. फोन पर बात होने के बाद नीलम ने बेटों से कहा कि वह उन की ड्रेस लेने दर्जी के पास जा रही है और उधर से ही वह घर का सामान भी लेती आएगी.

नीलम श्यामनगर चौराहे पर पहुंची तो जगराम अपने साले लक्ष्मण सिंह के साथ कार में बैठा था. नीलम को भी उस ने कार में बैठा लिया. कार चल पड़ी तो नीलम ने जगराम से पैसे मांगे. लेकिन उस ने पैसे देने से मना कर दिया. तब नीलम नाराज हो कर उसे बदनाम करने की धमकी देने लगी. नीलम की बातों से जगराम को भी गुस्सा आ गया. वह उस से छुटकारा तो पाना ही चाहता था, इसलिए पैरों के नीचे रखी लोहे की रौड निकाली और नीलम के सिर पर पूरी ताकत से दे मारा. उसी एक वार में नीलम लुढ़क गई. इस के बाद जगराम ने नीलम की साड़ी गले में लपेट Crime story कर कस दी. नीलम मर गई तो चाकू से उस के चेहरे को गोद दिया.

जगराम अपना काम करता रहा और लक्ष्मण कार चलाता रहा. चलती कार में नीलम की बेरहमी से हत्या कर के जगराम और लक्ष्मण ने देर रात उस की लाश को नौबस्ता ले जा कर हाईवे के किनारे फेंक दिया और खुद कार ले कर अपने घर चले गए.

पूछताछ के बाद 10 जुलाई, 2014 को थाना नौबस्ता पुलिस ने अभियुक्त सबइंसपेक्टर जगराम सिंह को कानपुर की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हुई थी. उस का साला लक्ष्मण फरार था. पुलिस उस की तलाश में जगहजगह छापे मार रही थी.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Top 5 Cyber Crime Story : टॉप 5 साइबर क्राइम स्टोरी हिंदी में

Top 5 Cyber Crime Story  : आजकल साइबर क्राइम बहुत तेजी से बढ़ रहा है जिसके कारण कई लोग इसका शिकार भी बने है और कुछ लोगो को जान गंवानी पढ़ी. तो खुद को इस ठगी और धोखाधड़ी से बचाने के लिए और समाज को इस साइबर क्राइम से जागरूक करने के लिए पढ़ें ये Top 5 Cyber Crime Story in Hindi में पढ़े.

साइबर फ्रौड से बचने के लिए किए जा रहे तमाम सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं. देश भर में साइबर फ्रौड की घटनाएं आए दिन बढ़ती जा रही हैं. साइबर क्रिमिनल्स लोगों को अलगअलग तरीकों से अपना शिकार बना रहे हैं. पुलिसिया सिस्टम आखिर इस पर अंकुश लगाने में नाकाम क्यों है?

राजस्थान के जोधपुर में प्रभाव नगर के रहने वाले नरेश कुमार बैरवा अपने मोबाइल में सोशल मीडिया साइट्स पर बिजी थे, तभी उन के पास एक फोन काल आई तो उन का ध्यान उधर चला गया. नरेश कुमार ने जैसे ही काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ”मैं सीबीआई औफिस से बात कर रहा हूं. अगस्त महीने में आप के आधार कार्ड द्वारा जो सिम कार्ड लिया गया है, उस मोबाइल नंबर का इस्तेमाल मुंबई में मनी लांड्रिंग में हुआ है.’’

”लेकिन सर, मैं तो पिछले 20 सालों से मुंबई गया ही नहीं हूं, फिर यह कैसे संभव है.’’ नरेश कुमार घबराते हुए बोले.

”ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत करो, जो पूछा जाए, उस का सहीसही जबाब दो. लो, हमारे सर से बात करो.’’ फोन करने वाले ने धमकाते हुए कहा.

”हमारे रिकौर्ड के मुताबिक आप का मोबाइल नंबर मनी लांड्रिंग केस में उपयोग हुआ है. सचसच बताइए, नहीं तो हमारी टीम जल्द ही आप के बैंक अकाउंट और प्रौपर्टी की जांच करने आप के घर पहुंच रही है.’’ दूसरे व्यक्ति ने कड़क आवाज में कहा.

”लेकिन सर… मेरी बात तो सुनिए…’’

”हमें कुछ नहीं सुनना, अपने बैंक अकाउंट के नंबर और उस में जमा पैसों का पूरा विवरण दो. तुम्हें पता नहीं इस मामले में बड़े लोग जुड़े हुए हैं और वो तुम्हारी जान भी ले सकते हैं, इसलिए जो कहा जा रहा है, वो करो. एक बात और ध्यान से सुनो कि काल डिस्कनेक्ट नहीं करना.’’ जान का खतरा होने का डर दिखाते हुए फोन करने वाले व्यक्ति ने कहा.

नरेश कुमार बुरी तरह डर गए और अपनी बैंक डिटेल्स उन्होंने फोन करने वाले लोगों को बता दी. यह घटना 25 नवंबर, 2024 की थी. अगले दिन 26 नवंबर की सुबह सीबीआई औफिसर बन कर मनी लांडिंग का केस बताया और फरजी सेटअप लगा कर नरेश कुमार से पूछताछ शुरू कर दी. पूछताछ के नाम पर सीबीआई अफसर बताने वाले अधिकारी ने कहा, ”आप के बैंक अकाउंट में करोड़ों रुपया आया है. यह पैसा बैंक मैनेजर ने गलती से आप के अकाउंट में ट्रांसफर किया है. बैंक स्टेटमेंट में इस की एंट्री भी आप को दिखाई नहीं देगी.’’

”लेकिन सर, मुझे तो इस की कोई जानकारी ही नहीं है, किस ने मेरे अकाउंट में रुपए भेजे हैं?’’

अफसर ने झांसा देते हुए कहा, ”अगर इस पूरे मामले में आप का इन्वौल्वमेंट नहीं है तो आप को डरने की कोई जरूरत नहीं है. यदि आप देशभक्त हो तो इस तरह की ठगी को ले कर आप को सहयोग करना होगा, जिस से गलत ट्रांजैक्शन करने वाले बैंक मैनेजर के खिलाफ काररवाई की जा सके.’’

इस के बाद नरेश कुमार को रिजर्व बैंक औफ इंडिया के नाम से एक फार्म औनलाइन भेजा गया और उस पर साइन करवाए गए. इस में यह लिखवाया कि यदि इस में मेरा इन्वौल्वमेंट नहीं होता है तो मेरी पूरी जमापूंजी 24 घंटे में रिटर्न कर दी जाएगी. अगले 3 दिन अफसरों ने नरेश कुमार से अलगअलग धनराशि के 11 चैक बनवा लिए, जिस में कुल जमा रुपए एक करोड़ 84 लाख 50 हजार थी. नरेश कुमार चैक जमा कराने घर से 2 किलोमीटर दूर स्टेट बैंक औफ इंडिया (स्क्चढ्ढ) की ब्रांच में जाते रहे. उन्होंने यह भी कहा कि अगर यह बात किसी को बताई तो जांच में समस्या आ सकती है और असली आरोपी अलर्ट हो सकता है. इसी वजह से वह चुपचाप बैंक में चैकजमा करवा कर लौट आते.

61 साल के नरेश कुमार बैरवा इंडियन आयल कारपोरेशन लिमिटेड में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर काम करते थे. लगातार स्वास्थ्य खराब रहने से साल 2020 में उन्होंने वीआरएस ले लिया था. रिटायरमेंट पर उन्हें बड़ी रकम विभाग की तरफ से मिली थी. नरेश कुमार जोधपुर में किराए के मकान में रह कर अपना इलाज करवा रहे थे. तथाकथित अफसरों के बताए अनुसार नरेश 24 घंटे बाद रुपया अकाउंट में वापस आने का इंतजार करते रहे, लेकिन 30 नवंबर तक जब पैसा वापस नहीं आया तो नरेश कुमार ने उसी नंबर पर काल कर रुपयों की मांग की तो फिर से उन्हें धमकाया गया और कहा गया, ”आप को अपने भाई का नंबर भी देना होगा. उन की जान को भी खतरा है.’’

परिवार को जान से मारने की धमकी सुन कर नरेश और ज्यादा घबरा गए और अपने भाई का नंबर भी दे दिया. इस के बाद भाई को भी काल कर के कहा कि आप का भाई किसी मुसीबत में फंस गया है. जल्दी नजदीकी थाने जा कर उन की मदद करो. परंतु भाई उस तथाकथित अफसर के झांसे में नहीं आया और फोन काट दिया. इस के बाद भाई ने नरेश से बात कर के  बताया कि ये ठगी करने वाले लोग हैं. तब जा कर उन्हें समझ आया कि उन के साथ साइबर फ्रौड हुआ है. फिर दोनों भाइयों ने थाने जा कर मामला दर्ज करवाया.

विदेश में रहने वाली महिला डाक्टर से कानपुर में ठगी

इसी तरह कानपुर में ग्वालटोली की रहने वाली डा. आभा गुप्ता ने ग्वालटोली थाने में 4 अक्तूबर, 2024 को शिकायत दर्ज कराई कि नौबस्ता में रहने वाले राहुल कटियार, पनकी रतनपुर में रहने वाली नेहा तिवारी और बैंक कर्मचारी रजत सिंह ने उन की बहन के साथ Top 5 Cyber Crime Story फरजीवाड़ा किया है. शिकायत में बताया गया कि तीनों ने विदेश में रहने वाली उन की बहन डा. प्रतिभा रोहतगी के नाम पर डेढ़ करोड़ रुपए का लोन ले कर हड़प लिया. नेहा तिवारी और राहुल कटियार फाइनैंस सेक्टर में काम करते थे. ये दोनों डा. प्रतिभा का भी अकाउंट देखते थे. इसी का फायदा उठा कर उन्होंने विदेश में रहने वाली डा. प्रतिभा के दस्तावेजों के सहारे डेढ़ करोड़ का लोन करा लिया था.

ग्वालटोली में रहने वाली  92 साल की डा. प्रतिभा रोहतगी ‘आभा नर्सिंग होम’ चलाती थीं. पिछले 4 सालों से वह अल्जाइमर से पीडि़त हैं और इस के चलते उन्होंने पावर औफ अटार्नी अपनी छोटी बहन डा. आभा गुप्ता के नाम पर कर दी थी. इस के बाद से वह कैलिफोर्निया में शिफ्ट हो गईं. उन के ग्वालटोली वाले घर में देखभाल के लिए कुछ कर्मचारी रहते हैं. प्रतिभा के एक कंपनी में शेयर फंसे थे. साल 2021 में उसी सिलसिले में प्रतिभा की मुलाकात राहुल कटियार और नेहा तिवारी से हुई थी. धीरेधीरे दोनों डा. प्रतिभा का फाइनैंस का काम देखने लगे थे.

इन दोनों ने बैंक कर्मचारियों की मदद से प्रतिभा के नाम पर किदवई नगर स्थित एचडीएफसी बैंक में फरजी दस्तावेजों से खाता खुलवा लिया. इस काम में बैंक के कर्मचारी रजत सिंह ने भी उन का साथ दिया, फिर इसी बैंक की दिल्ली की न्यू फ्रेंड्स कालोनी स्थित ब्रांच में औनलाइन खाता खुलवा कर ब्रांच से डेढ़ करोड़ का लोन ले लिया. लोन की यह रकम उन्होंने किदवई नगर वाले खाते में ट्रांसफर करा ली.

इस के बाद जब लोन की किस्तें नहीं भरी गईं तो बैंक से उन के पास नोटिस आ गया. इस के बाद बहन डा. आभा को पूरा मामला समझ आया. उस समय आभा अमेरिका में थी. आभा ने अमेरिका से ही कानपुर के पुलिस कमिश्नर से शिकायत की. पुलिस कमिश्नर ने एसीपी (कर्नलगंज) से गोपनीय जांच कराई तो पूरे खेल का खुलासा हुआ. डा. प्रतिभा रोहतगी के नाम से डेढ़ करोड़ का लोन लेने के बाद शातिरों ने रुपए निकालने के लिए भी बेहद चालाकी भरा रास्ता चुना. आरोपियों ने दिल्ली की न्यू फ्रेंड्स कालोनी स्थित ब्रांच में खाता खुलवाने के बाद रुपए किदवई नगर ब्रांच में खोले गए डा. प्रतिभा के फरजी अकाउंट में ट्रांसफर करा लिए.

फिर आभा नर्सिंग होम के पास स्थित एक एटीएम से कई बार में पूरे रुपए निकाल लिए, जिस से अगर भविष्य में यह बात खुले तो कह सकें कि डा. प्रतिभा ने ही अपने नजदीकी एटीएम से रुपए निकाले हैं. डा. आभा ने बताया कि बहन प्रतिभा ने साल 2020 में ही पावर औफ एटार्नी मेरे नाम कर दी थी. इस वजह से किसी भी खाते से एक भी रुपए का लेनदेन बिना मेरी इजाजत के नहीं हो सकता. डेढ़ करोड़ की ठगी की मास्टरमाइंड नेहा तिवारी ने अपने पति से भी धोखाधड़ी कर के लाखों रुपए हड़प लिए थे. किदवई नगर में रहने वाले विशाल पांडे से 5 मई, 2018 को नेहा की शादी हुई थी. विशाल को शादी के बाद से ही नेहा की गतिविधियां संदिग्ध लगने लगी थीं.

अलगअलग लोगों से मिलना, पार्टी करना और देर रात घर आना नेहा का शौक बन गया था. उस ने धोखाधड़ी कर के पति से भी लाखों रुपए हड़प लिए तो दोनों के बीच झगड़ा हुआ और नौबत तलाक तक आ गई. नेहा तिवारी ने फरवरी, 2021 में विशाल के खिलाफ दहेज का मुकदमा दर्ज करा दिया. डीसीपी (सेंट्रल) दिनेश त्रिपाठी ने बताया कि पूछताछ में नेहा ने यह बात कुबूल की है कि ठगी की रकम से उस ने हाईवे पर 2 बीघा जमीन खरीदी और उस पर बड़ा ढाबा खोल दिया. इस में ठगी में शामिल राहुल भी पार्टनर है. नेहा ने ठगी की रकम से अपने भाई के नाम पर भी जमीन खरीदी थी.

2 महीने से कानपुर पुलिस को चकमा दे रही शातिर ठग नेहा तिवारी को आखिरकार पुलिस ने पहली दिसंबर, 2024 को गिरफ्तार कर लिया. नेहा के एक साथी राहुल कटियार को पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है. नेहा उस का भी फाइनेंस मैनेज करती थी. इन दोनों के साथ एक बैंक कर्मचारी रजत भी शामिल था.

राजस्थान में बुजुर्ग दंपति को लगाई एक करोड़ की चपत

राजस्थान के श्रीगंगानगर साइबर थाने में 16 नवंबर, 2024 को चूनावढ़ क्षेत्र गांव के  रहने वाले बुजुर्ग दंपति 69 वर्षीय जसविंदर कौर पत्नी सोहन सिंह ने भी उन्हें डिजिटल अरेस्ट कर एक करोड़ रुपए की चपत लगाने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. बुजुर्ग दंपति के 2 बेटे हैं. एक बेटा हरप्रीत सिंह कनाडा में और दूसरा बेटा पवनदीप सिंह आस्ट्रेलिया में रहता है. दोनों बेटों के विदेश चले जाने के बाद 3 साल पहले बुजुर्ग दंपति अपनी 32 बीघा जमीन की देखभाल नहीं कर पा रहे थे, इसलिए उन्होंने जमीन बेच कर इस के एवज में मिली लगभग एक करोड़ से अधिक रकम अलगअलग बैंक Top 5 Cyber Crime Story अकाउंट्स में जमा कर दी.

15 नवंबर, 2024 को जसविंदर कौर के मोबाइल पर एक कालर ने फोन करते हुए खुद को दिल्ली में सीबीआई अधिकारी बताते हुए परिचय दिया. उस ने धमकाते हुए कहा, ”आप के बैंक अकाउंट्स में फरजी तरीके से काफी धनराशि जमा हुई है. जमा के संबंध में सीबीआई की ओर से केस दर्ज किया जा रहा है.’’ तकरीबन घंटे भर की बातचीत में बुजुर्ग दंपति को उलझा कर सीबीआई अफसर बने कालर ने बातचीत के दौरान फैमिली के सदस्यों के बारे में पूरी डिटेल्स मांग ली.

बैंकिंग के बारे में बुजुर्ग दंपति को ज्यादा जानकारी नहीं थी. इसी का फायदा उठाते हुए जालसाज ने 16 नवंबर को उन्हें बारबार फोन किया और धमकी दी कि अगर उन्होंने अपनी पूरी जमा राशि 3 अलगअलग खातों में ट्रांसफर नहीं की और पुलिस को इस की वास्तविकता सत्यापित करने की परमिशन नहीं दी तो उन्हें 7 साल के लिए जेल भेज दिया जाएगा. जालसाज ने उन्हें भरोसे में लेते हुए कहा, ”अगर जांच में यह पाया गया कि आप के अकाउंट में जमा यह रकम जैनुइन तरीके से कमाई की है तो कुछ दिनों के भीतर यह रकम आप के खाते में सुरक्षित रूप से रिफंड कर दी जाएगी.’’

अगले दिन इस कालर ने एक बैंक अकाउंट भी दिया. यह अकाउंट भोपाल के शाहपुरा के बैंक का था. उस के बताए अनुसार उन्होंने उस अकाउंट में एक करोड़ 5 लाख 59 हजार 960 रुपए जमा करवा लिए. जब इस घटना के बारे में जसविंदर ने अपने परिचितों को बताया, तब उन्हें अपने साथ ठगी होने का अहसास हुआ. मोबाइल फोन पर फरजी सीबीआई अफसर बन क र बुजुर्ग महिला और उस के पति को डिजिटल अरेस्ट कर लगभग एक करोड़ 5 लाख रुपए ठग लिए. जैसे ही उन्हें अहसास हुआ कि वे डिजिटल फ्रौड का शिकार हो गए हैं, उन्होंने मामले की सूचना साइबर सेल को दी. जिस के बाद गंगानगर के एसपी गौरव यादव ने जांच शुरू की. जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि भोपाल में 2 बैंक अकाउंट्स में 18 लाख रुपए जमा किए गए थे.

पुलिस टीम ने तुरंत बैंक अधिकारियों से संपर्क किया और खातों को फ्रीज कर दिया, ताकि कोई लेनदेन न हो सके. गंगानगर साइबर थाने में 18 नवंबर को मामला दर्ज होने के बाद आखिरकार साइबर पुलिस ने इस गैंग के 3 सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया. डीवाईएसपी कुलदीप वालिया और एसआई चंद्रभान की अगुवाई में टीम ने जयपुर से 3 युवकों को दबोचा. जयपुर के सुंदरनगर सांगानेर निवासी अजय प्रजापति, सांगानेर लक्ष्मी कालोनी निवासी मोहित सोनी और दौसा जिले के गांव माहरिया हाल निवासी किशन सिंह राजावत को गिरफ्तार किया. जांच अधिकारी ने बताया कि आरोपी मोहित सोनी ने अपने साथियों से करीब 10-15 हजार रुपए ले रखे थे.

आरोपियों को 6 दिसंबर, 2024 को अदालत में पेश कर 3 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया है. मामला दर्ज होते ही जांच अधिकारी डीवाईएसपी कुलदीप वालिया ने एक करोड़ 5 लाख रुपए डाले गए बैंक अकाउंट की डिटेल्स निकाली तो सामने आया कि यह मध्य प्रदेश में चल रहा भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का अकाउंट है.

जांच में सामने आया कि इस अकाउंट में पीडि़त दंपति के एक करोड़ 5 लाख रुपए ही नहीं बल्कि उसी 16 नवंबर को 24 घंटों के दौरान 5 करोड़ 5 लाख 95 हजार रुपए की रकम साइबर फ्रौड के जरिए जमा हुई थी. आप को यह जान कर हैरानी होगी कि साइबर ठगों का यह मकडज़ाल इतना बड़ा है कि खाली इसी केस की स्टडी की तो सामने आया कि ठगी की यह रकम 24 घंटे के भीतर देश के 15 दूसरे राज्यों के 40 जिलों में  80 से अधिक बैंक अकाउंट्स में भेज दी गई. ठगी का यह गेम 24 घंटे के दौरान ही खेला गया.

मोहित ने बताया कि उस ने अपने साथियों की उधारी रकम चुकाने के लिए अपना बैंक अकाउंट आरोपी किशन सिंह को किराए पर दिया था. आरोपी किशन सिंह के कहे अनुसार मोहित के खाते में 5 लाख रुपए जमा हुए थे. इसी प्रकार अजय प्रजापति के बैंक अकाउंट में 5 लाख रुपए जमा किए गए. किशन सिंह ठेकेदारी के रूप में काम करता था. आरोपी उन लोगों को झांसे में लेता था, जो 10-12 लाख रुपए में अपना बैंक अकाउंट किराए पर देते थे.

पढ़ेलिखे लोग ठगों को आसानी से कैसे दे देते हैं करोड़ों रुपए

रूआबांधा सेक्टर भिलाई के रहने वाले इंद्रप्रकाश कश्यप पश्चिम बंगाल के खडग़पुर स्थित रश्मि ग्रुप औफ कंपनीज के वाइस प्रेसिडेंट हैं. 7 नवंबर, 2024 को उन के मोबाइल पर अज्ञात नंबर से एक वाट्सऐप काल आया. उन्होंने जैसे ही काल रिसीव किया तो दूसरी तरफ से बात करने वाले शख्स ने कहा, ”मैं टेलीकाम रेग्युलेटरी अथौरिटी औफ इंडिया (ट्राई) से बोल रहा हूं. आप इंद्रप्रकाश बोल रहे हैं न?’’

”हां जी, मैं इंद्रप्रकाश ही बोल रहा हूं.’’ जबाब देते हुए उन्होंने कहा.

”आप के आधार कार्ड से जो सिम ली गई है, उस से 29 लोगों को आपत्तिजनक मैसेज भेजे गए हैं.’’ इस के बाद इसी दौरान उस व्यक्ति ने मुंबई के कथित साइबर ब्रांच के अधिकारी को फोन ट्रांसफर कर दी.

उस अधिकारी ने उन से कहा, ”आप के आधार कार्ड से मलाड मुंबई के केनरा बैंक में एक अकाउंट खोला गया है और उस अकाउंट से करोड़ों रुपए का सस्पेक्टेड ट्रांजैक्शन की गई है. साइबर ब्रांच को उस में जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल के खाते से भी रुपयों का लेनदेन मिला है. जिस के आधार पर सीबीआई कोलाबा ने एफआईआर की है और सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में गिरफ्तारी वारंट जारी किया है.’’

इंद्रप्रकाश ये बातें सुन कर डर गए, जिस का फायदा उठा कर आरोपियों ने कहा कि जांच होने तक वे उन्हें डिजिटल अरेस्ट कर रहे हैं. इस के बाद वह व्यक्ति समयसमय पर वीडियो काल कर उन की गतिविधि पर नजर रखने लगे. फिर इंद्रप्रकाश से कहा गया कि वे एक एसएसए (सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट) खोल रहे हैं, जिस में उन्हें अपने सभी खातों में जमा रुपयों को ट्रांसफर करना होगा, जिसे जांच के 2 दिन बाद उन्हें वापस कर दिया जाएगा. उन को पूरी तरह से अपने जाल में फंसाने के लिए आरोपियों ने उन्हें वीडियो काल पर एक फरजी कोर्ट रूम भी दिखाया, जहां पर जज बन कर बैठे व्यक्ति के सामने उन की पेशी कराई गई. जज बने व्यक्ति ने पीडि़त को डिजिटल अरेस्ट करने का आदेश दिया, जिस के बाद पीडि़त इंद्रप्रकाश कश्यप पूरी तरह से आरोपितों के चंगुल में फंस गए थे.

इंद्रप्रकाश के अकाउंट्स से संबंधित डाक्यूमेंट्स भिलाई में थे तो आरोपियों ने उन्हें भिलाई जाने के लिए कहा. ट्रेन में भी आरोपी उन पर नजर रखे रहे. इस के बाद पीडि़त 11 नवंबर को भिलाई आए और उन के बताए हुए बैंक अकाउंट में 49 लाख एक हजार 190 रुपए ट्रांसफर कर दिए. बाद में जब इंद्रप्रकाश को ठगी का अहसास हुआ तो उन्होंने थाने में मामला दर्ज कराया. पुलिस ने इंद्रप्रकाश के मोबाइल पर आने वाले वाट्सऐप नंबरों एवं बैंक अकाउंट के संबंध में जानकारी खंगाल कर काल डिटेल्स निकाली और ठगी में उपयोग किए बैंक अकाउंट्स के स्टेटमेंट प्राप्त कर लिए.

इनवैस्टीगेशन के बाद पता चला कि आरोपी बापू श्रीधर भराड़ ने औरंगाबाद के आईसीआईसीआई बैंक के एक अकाउंट का यूज किया था. इस के बाद पुलिस की एक टीम औरंगाबाद (महाराष्ट्र) भेजी गई, जहां  पहुंच कर पता चला कि अकाउंट का यूज वैष्णवी आटो स्पेयर, दिशा कामर्शियल कौंप्लेक्स बजाज नगर, औरंगाबाद के नाम पर किया गया था.

उक्त कंपनी 4-5 साल पहले तक चल रही थी, वर्तमान में कहीं और चले जाने का पता चला. इस के बाद टीम श्रीधर भराड़ के निवास के एड्रैस अक्षय तृतीया अपार्टमेंट पहुंची, जहां से कोई जानकारी नहीं मिल पाई. आखिर में पुलिस टीम ने बैंक में मोबाइल टावर के डंप डाटा के आधार पर महाराष्ट्र औरंगाबाद बजाज नगर एमआईडीसी आरएल 96/1 निवासी बापू श्रीधर भराड़ (40 वर्ष) को राहेगांव से अरेस्ट कर लिया. उस से अन्य आरोपियों के बारे में पतासाजी करने लगी.

भिलाई के एडीशनल एसपी सुखनंदन राठौर ने बताया कि आरोपी ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि उस ने अपने कारपोरेट बैंक अकाउंट को 20 प्रतिशत के कमीशन पर जालसाजों को दिया था और उस व्यक्ति का नाम बताया तथा यह भी कुबूल किया कि उस के अकाउंट से 2 करोड़ रुपए का ट्रांजेक्शन 2 बार में हुआ है. ठगी करने वाले गिरोह के बारे में उसे जानकारी नहीं है. डिजिटल अरेस्ट मामले में अकाउंट होल्डर को गिरफ्तार किया है.

पूछताछ में जो डिटेल मिली है, जिस अकाउंट पर आरोपी के खाते से ट्रांजैक्शन हुए हैं, उस अकाउंट के आधार पर पतासाजी की जा रही है  जल्द ही पूरे गिरोह का परदाफाश किया जाएगा.

ठगों ने डीसीपी पर भी फेंका ठगी का जाल

साइबर फ्रौड करने वाले क्रिमिनल्स के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें पुलिस तक का खौफ नहीं है. 24 नवंबर, 2024 को इंदौर क्राइम ब्रांच के एडीशनल डीसीपी राजेश दंडोतिया पुलिस कंट्रोल रूम स्थित क्राइम ब्रांच में मीडिया ब्रीफिंग कर रहे थे, तभी उन के मोबाइल पर फोन नंबर 1(684) 751-6466 से आटो रिकार्डेड काल आया. काल करने वाले ने एडिशनल डीसीपी को बताया कि वह रिजर्व बैंक औफ इंडिया (आरबीआई) का औफिसर है. ठग ने कहा कि आप के नाम से जारी आधार कार्ड का दुरुपयोग हुआ है और उस से एक लाख रुपए का संदिग्ध ट्रांजैक्शन हुआ है, इसलिए आरबीआई द्वारा आप के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है. साथ ही 11 हजार 930 रुपए की पेनल्टी भी लगाई है.

ठग ने केस के संबंध में बयान दर्ज कराने और एक्सप्लेनेशन के लिए 2 घंटे में मुंबई में अंधेरी ईस्ट थाना पुलिस के सामने पेश होने को कहा. मोबाइल नंबर देख कर और ठग की बात सुनते ही एडिशनल डीसीपी समझ गए कि उन्हें डिजिटल अरेस्ट करने का प्रयास किया जा रहा है. उन्होंने तुरंत मीडियाकर्मियों को इशारा कर ठग की बातचीत रिकौर्ड करानी शुरू कर दी. ठग ने उन से बाकायदा पुलिस अधिकारी के अंदाज में बात की और हाजिर होने का आदेश दिया. औनलाइन बयान दर्ज करने के नाम पर ठग ने जैसे ही वीडियो काल लगाया एडिशनल डीसीपी वरदी में दिखे, तब ठग ने मीडियाकर्मियों की भीड़ देख कर पूछा, ”ये आसपास कौन खड़े हैं?’’

एडीसीपी ने जब अपना परिचय दिया और कहा, ”मैं खुद एक पुलिस अधिकारी हूं और मैं ने तुम्हारी करतूत कैमरे में रिकौर्ड कर ली है.’’

इतना सुनते ही ठग ने फोन कट कर दिया.

क्यों बढ़ रहे हैं साइबर फ्रौड के मामले

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ सालों में साइबर क्राइम के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो साल  2017 में 3,466 मामले, 2018 में 3,353, 2019 में 6,229, 2020 में 10,395, 2021 में 14,007 और 2022 में 17,470 मामले दर्ज किए गए. फरवरी 2024 में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में बताया था कि साल 2023 में साइबर धोखाधड़ी की 11,28,265 शिकायतें मिली थीं. इंटरनेट यूजर्स की बढ़ती संख्या के साथ साइबर फ्रौड का खतरा पिछले कुछ सालों में बढ़ा है. सूचना और प्रसारण सचिव संजय जाजू ने हाल ही में कहा है कि 90 करोड़ से अधिक इंटरनेट यूजर्स के साथ भारत ने डिजिटल इंडिया के तहत असाधारण डिजिटल विकास को देखा है, लेकिन इस विकास के साथ साइबर धोखाधड़ी की चुनौतियां भी आई हैं, जिन से निपटने में सरकार नाकाम रही है.

डिजिटल अरेस्ट में स्कैमर आडियो या वीडियो काल के दौरान लोगों को डराने के लिए कभी सीबीआई तो कभी कस्टम अधिकारी तो कभी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अधिकारियों के तौर पर बात करते हैं और लोगों को गिरफ्तारी का डर दिखा कर उन्हें उन के ही घर में कैद कर के पैसे ऐंठते हैं. मार्च 2024 में गृह मंत्रालय ने एक प्रैस विज्ञप्ति जारी कर लोगों को पुलिस अधिकारियों, सीबीआई, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य जांच एजेंसियों के नाम पर फरजी काल करने वाले ब्लैकमेलर्स के प्रति सतर्क किया था.

इन धोखाधड़ी करने वालों का तरीका आमतौर पर पीडि़तों से संपर्क करना और दावा करना होता है कि पीडि़त ने या तो नशीले पदार्थ, नकली पासपोर्ट या अन्य प्रतिबंधित वस्तुओं जैसे अवैध सामानों वाला एक पार्सल भेजा है या प्राप्त करने वाला है. कुछ मामलों में वे आरोप लगाते हैं कि पीडि़त का कोई करीबी रिश्तेदार या दोस्त किसी क्राइम या दुर्घटना में शामिल रहा है और अब हिरासत में है. तथाकथित मामले को सुलझाने के लिए धोखाधड़ी करने वाले पैसे की मांग करते हैं. कुछ मामलों में पीडि़तों को एक ‘डिजिटल अरेस्ट’ से गुजरने के लिए बरगलाया जाता है, उन्हें स्काइप या अन्य वीडियो कौन्फ्रेंसिंग प्लेटफार्म के जरिए लगातार निगरानी में तब तक रखा जाता है, जब तक कि उन क्रिमिनल्स की मांगें पूरी नहीं हो जातीं.

फ्रौड करने वाले क्रिमिनल पुलिस थानों और गवर्नमेंट औफिस के दिखाने के लिए स्टूडियो का इस्तेमाल करते हैं और रियल औफिसर दिखने के लिए वे वरदी भी पहनते हैं. यह एक तरह का संगठित औनलाइन आर्थिक क्राइम है. हालांकि, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई चीज नहीं है, फिर भी शिक्षित व्यक्ति लगातार इन फ्रौड करने वालों के Top 5 Cyber Crime Story झांसे में आ रहे हैं. इंडियन साइबर क्राइम कोआर्डिनेशन सेंटर ने एक एडवाइजरी जारी की है, जिस में कहा गया है कि सीबीआई, पुलिस या ईडी किसी भी अपराधी को  वीडियो काल पर गिरफ्तार नहीं करते हैं.

साइबर क्राइम से बचने के लिए क्या करें

साइबर सिक्योरिटी से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर क्राइम में वृद्धि के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सरकारी तंत्र भी दोषी है, जो इस खतरे को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा. साइबर फ्रौड करने वाले क्रिमिनल बेखौफ हो कर लंबे समय से वित्तीय धोखाधड़ी करते आ रहे हैं. यह सरकारी नीतियों की विफलता है, जिस के कारण ये क्रिमिनल अब निडर हो गए हैं. सरकार की ओर से ऐसे क्राइम को रोकने के लिए उठाए गए कदम केवल कागजों पर ही हैं. मन की बात कार्यक्रम में साइबर फ्रौड को ले कर कही गई बातें देश के प्राइम मिनिस्टर की लाचारी को दर्शाती हैं. देश के मध्यमवर्गीय परिवारों के बैंक अकाउंट की निगरानी के लिए आधार और पैन नंबर की लिंकिंग साइबर ठगों को मालामाल कर रही है.

फोन पर किसी से भी बैंक डिटेल्स साझा न करें, किसी के भी डराने पर घबराएं नहीं बल्कि पुलिस को सूचना दें. अपने परिचितों की आवाज में पैसे ट्रांसफर करने वालों से सावधान रहें, अन्य नंबरों से इस की जांच करें. वाट्सऐप के नए अनजान ग्रुपों में यदि कोई शामिल करता है तो उसे तुरंत ब्लौक कर दें. यदि फोन पर कोई खुद को बैंककर्मी, पुलिसकर्मी या फिर कोई और सरकारी कर्मी बता कर निजी जानकारी मांगे तो हरगिज न दें. फोन पर आने वाले स्पैम मेल, मैसेज आदि पर क्लिक न करें बल्कि इन्हें तुरंत डिलीट कर दें. लोगों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कभी भी पुलिस, सीबीआई, ईडी, आरबीआई या कस्टम अधिकारी वीडियो काल के जरिए आप से पूछताछ या बयान दर्ज करने की काररवाई नहीं करते.

इसलिए जब भी इस तरह कोई वीडियो काल करे और आप को धमकाने या डराने की कोशिश करे तो सब से पहले तो ऐसी काल को तुरंत डिसकनेक्ट कर दें. कोई भी अनजान व्यक्ति आप के बैंक अकाउंट की डिटेल के लिए फोन, एसएमएस या ईमेल करे तो इसे इग्नोर कर दें. इस के बावजूद भी यदि कोई साइबर फ्रौड का शिकार हो जाए तो सब से पहले बैंक को सूचना दे कर नजदीकी पुलिस स्टेशन में अपनी शिकायत दर्ज कराएं. साइबर फ्रौड के शिकार होने या ऐसे फ्रौड काल आने पर व्यक्ति को तुरंत साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर घटना की सूचना देनी चाहिए और अपने नजदीकी थाने में संपर्क करना चाहिए.

साइबर क्राइम और पीछा करने से ले कर आर्थिक क्राइम तक, कोई भी साइबर क्राइम के लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (www.cybercrime.gov.in) पर रिपोर्ट की जा सकती है.

—कथा मीडिया रिपोट्र्स पर आधारित

 

 

एक ऐसी भी औरत : पति और प्रेमी से बेवफाई का अंजाम

बीना कानपुर शहर के मोहल्ला दीनदयालपुरम की केडीए कालोनी निवासी मेवालाल की बड़ी बेटी थी. बीना के अलावा उस की 2  और बेटियां थीं. बेटियों से छोटा एक बेटा था करन. मेवालाल की पत्नी कुसुम घरेलू महिला थी जबकि वह फेरी लगा कर कपड़े बेचा करता था.

बीना जवान हो चुकी थी. मेवालाल चाहता था कि कोई सही लड़का मिल जाए तो वह उस के हाथ पीले कर दे. थोड़ी खोजबीन के बाद उसे कानपुर देहात के कस्बा मूसानगर निवासी भीखाराम का बड़ा बेटा रामबाबू पसंद आ गया. भीखाराम के पास 3 बीघा खेती की जमीन थी और कस्बे के मुर्तजा नगर में अपना मकान भी था.

रामबाबू व उस के घर वालों ने जब खूबसूरत बीना को देखा तो वह उन्हें पसंद आ गई. बीना को देख कर भीखाराम बिना किसी दहेज के बेटे की शादी करने के लिए तैयार हो गया. अंतत: सामाजिक रीतिरिवाज से 10 जून, 2008 को बीना और रामबाबू का विवाह हो गया. इस शादी से रामबाबू भले ही खुश था लेकिन बीना खुश नहीं थी. इस की वजह यह थी कि बीना ने जिस तरह पढ़ेलिखे और स्मार्ट पति के सपने संजोए थे, रामबाबू वैसा नहीं था.

बीना ससुराल में हफ्ते भर रही, पर वह पति के साथ भावनात्मक रूप से नहीं बंध सकी. हफ्ते बाद वह मायके आई तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. कुसुम ने कारण पूछा तो वह रोआंसी हो कर बोली, ‘‘मां, तुम लोगों ने सिर्फ ये देखा कि वे दहेज नहीं मांग रहे, पर यह नहीं देखा कि लड़का कैसा है.’’

‘‘सब कुछ तो है उन के पास, तुझे किस चीज की कमी है. तुझे तो पता है कि अभी तेरी 2 बहनें और हैं. हमें उन्हें भी ब्याहना है.’’ कुसुम ने अपनी मजबूरी जाहिर की तो बीना चुप हो गई.

मां के इस जवाब के बाद बीना ने हालात से समझौता कर लिया. वह ससुराल में पति के साथ रहने लगी. ससुराल का वातावरण दकियानूसी था. बातबात पर रोकटोक होती थी. पति की कमाई भी सीमित थी, जिस के कारण बीना को अपनी इच्छाएं सीने में ही दफन करनी पड़ती थीं.

वक्त के साथ बीना 2 बच्चों शिवम और शिवानी की मां बन गई. परिवार बढ़ा तो खर्चे भी बढ़ गए. जब बीना को लगा कि रामबाबू की कमाई से घर का खर्च नहीं चल पाएगा तो उस ने पति को कानपुर शहर जा कर नौकरी या कोई काम करने की सलाह दी. पत्नी की यह बात रामबाबू को भी ठीक लगी.

रामबाबू का एक दोस्त था सजीवन, जो कानपुर शहर की योगेंद्र विहार कालोनी में रहता था. वह किसी फैक्ट्री में काम करता था. कहीं काम दिलाने के संबंध में उस ने सजीवन से बात की. सजीवन ने उसे सुझाव दिया कि वह साइकिल मरम्मत का काम शुरू करे. पंक्चर लगाने आदि से उसे अच्छी कमाई होने लगेगी.

रामबाबू को दोस्त की सलाह पसंद आ गई, उस ने खाडे़पुर कालोनी मोड़ पर साइकिल मरम्मत की दुकान खोल ली और योगेंद्र विहार कालोनी में एक कमरा किराए पर ले कर रहने लगा.

रामबाबू का साइकिल रिपेयरिंग का काम अच्छा चलने लगा. पैसा आने लगा तो रामबाबू पत्नी और बच्चों को भी शहर ले आया. शहर आ कर बीना खुश थी. शहर आने के बाद वह बनसंवर कर रहने लगी. बीना ने घर के पास ही स्थित शिशु मंदिर में बच्चों का दाखिला करा दिया. बच्चों को स्कूल भेजने व लाने का काम वह खुद करती थी.

पिंटू नाम का एक युवक रामबाबू की दुकान पर अपनी साइकिल रिपेयर कराने आता था. पिंटू बर्रा 8 में रहता था और नौबस्ता स्थित एक प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करता था. पिंटू की रामबाबू से दोस्ती हो गई. जरूरत पड़ने पर रामबाबू पिंटू से पैसे भी उधार ले लेता था. कभीकभी दोनों साथ बैठ कर शराब भी पी लेते थे. पीनेपिलाने का खर्च पिंटू ही उठता था.

एक दिन पिंटू दुकान पर आया तो रामबाबू बोला, ‘‘पिंटू, आज मेरे बेटे शिवम का जन्मदिन है. मेरी तरफ से आज तुम्हारी दावत है. शाम को फैक्ट्री से सीधे घर आ जाना, भूलना मत.’’

‘‘ठीक है, मैं जरूर आऊंगा.’’ कहते हुए पिंटू फैक्ट्री चला गया. शाम को पिंटू गिफ्ट ले कर रामबाबू के घर पहुंच गया. रामबाबू उस का ही इंतजार कर रहा था. उस ने पिंटू को गले लगाया फिर पत्नी को आवाज दी, ‘‘बीना, देखो तो कौन आया है.’’

बेटे का जन्मदिन होने की वजह से बीना पहले से ही सजीधजी थी. पति की आवाज सुन कर वह आ गई. वह पिंटू की ओर देख कर बोली, ‘‘मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘भाभीजी, जब मैं आप के घर कभी आया ही नहीं तो पहचानेंगी कैसे? मैं रामबाबू भैया का दोस्त हूं, नाम है पिंटू.’’ वह बोला.

पिंटू की बीना से यह पहली मुलाकात थी. पहली ही मुलाकात में बीना पिंटू के दिलोदिमाग पर छा गई. रामबाबू ने पिंटू की खूब खातिरदारी की. उस समय बीना भी मौजूद रही. इस के बाद पिंटू ने ठान लिया कि वह किसी भी तरह बीना को हासिल कर के रहेगा.

वह उसे हासिल करने का प्रयास करने लगा. पिंटू जानता था कि बीना तक पहुंचने का रास्ता रामबाबू ही है. अत: उस ने रामबाबू को शराब का आदी बनाने की सोची. इसी के चलते वह शराब की बोतल ले कर रामबाबू के घर जाने लगा. घर में दोनों बैठ कर शराब पीते फिर खाना खाते. इस बीच पिंटू की निगाहें बीना के जिस्म पर ही गड़ी रहती थीं. शराब के नशे में पिंटू कभीकभी बीना से मजाक व छेड़खानी भी कर लेता था.

बीना जल्द ही पिंटू के आने का मकसद समझ गई थी. वह बीना की आर्थिक मदद भी करने लगा. बच्चों की जरूरत का सामान और खानेपीने की चीजें भी लाने लगा. धीरेधीरे पिंटू ने अपने अहसानों व लच्छेदार बातों से बीना के दिल में जगह बना ली. अब बीना भी पिंटू से खुल कर हंसनेबोलने लगी थी.

एक दिन बीना सजधज कर बाजार के लिए घर से निकलने वाली थी, तभी पिंटू आ गया. वह बीना को एकटक देखता रहा, फिर बोला, ‘‘भाभी बनठन कर किस पर बिजली गिराने जा रही हो?’’

‘‘मक्खनबाजी बंद करो, अभी मुझे कहीं जाना है. बाद में बात करेंगे. ओके…’’ कहते हुए बीना बाजार के लिए चल दी. पिंटू भी वहां से चला गया.

एक दिन बीना का पति रामबाबू मूसानगर गया हुआ था और बच्चे स्कूल. बीना घर के काम निपटाने के बाद बच्चों को स्कूल से लाने की तैयारी कर रही थी, तभी पिंटू आ गया. इस अकेलेपन में पिंटू खुद को रोक नहीं सका और उस ने बीना को अपनी बांहों में भर लिया. बीना ने कसमसा कर हलका प्रतिरोध किया, लेकिन पिंटू की पकड़ मजबूत थी सो वह छूट नहीं सकी.

हकीकत में बीना पिंटू की बांहों में एक अकल्पनीय सुख महसूस कर रही थी. यही वजह थी कि उस के सोए हुए अरमान जाग उठे. वह भी पिंटू से अमरबेल की तरह लिपट गई. इस के बाद उन्माद के तूफान में उन की सारी मर्यादाएं बह गईं.

उस दिन बीना तो मर्यादा भूल ही गई थी, पिंटू भी भूल गया था कि वह अपने दोस्त की गृहस्थी में आग लगा रहा है. जल्दी ही बीना पिंटू के प्यार में इतनी दीवानी हो गई कि वह पति से ज्यादा प्रेमी का खयाल रखने लगी. पिंटू भी अपनी कमाई बीना पर खर्च करने लगा. बीना जो भी डिमांड करती, पिंटू उसे पूरी करता. रामबाबू उन दोनों के मिलन में बाधक न बने, इसलिए पिंटू रामबाबू को शराब की दावत दे कर उस का विश्वासपात्र दोस्त बना रहता था.

ऐसे रिश्तों को ज्यादा दिनों तक छिपा कर नहीं रखा जा सकता, देरसबेर पोल खुल ही जाती है. जब पिंटू का रामबाबू की अनुपस्थिति में बीना के यहां ज्यादा आनाजाना हो गया तो पड़ोसियों को शक होने लगा. कालोनी में उन के संबंधों को ले कर कानाफूसी शुरू हो गई. किसी तरह बात रामबाबू के कानों तक भी पहुंच गई. रामबाबू अपने दोस्त पिंटू पर अटूट विश्वास करता था, इसलिए उस ने सुनीसुनाई बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. लेकिन उस के मन में शक का कीड़ा जरूर कुलबुलाने लगा.

शक के आधार पर एक रोज रामबाबू ने बीना से पिंटू के बारे में पूछा तो वह तुनक कर बोली, ‘‘पिंटू तुम्हारा दोस्त है. तुम्हीं उसे ले कर घर आए थे. वह आता है तो मैं उस से हंसबोल लेती हूं. पासपड़ोस के लोग जलते हैं, पड़ोसियों की झूठी बातों में आ कर तुम भी मुझ पर शक करने लगे.’’

‘‘मैं शक नहीं कर रहा, केवल पूछ रहा हूं.’’ रामबाबू प्यार से बोला.

‘‘पूछना क्या है, अगर तुम्हें मुझ से ज्यादा पड़ोसियों की बातों पर भरोसा है तो पिंटू को घर आने से मना कर दो. लेकिन सोच लो, पिंटू हमारी मदद भी करता है और तुम्हारी पार्टी भी. तुम्हारी कमाई से मकान का किराया, बच्चों की फीस और घरगृहस्थी का खर्च क्या चल पाएगा?’’

पत्नी की बात पर विश्वास कर रामबाबू शांत हो गया.

एक दिन रामबाबू दुकान पर गया और काम भी किया. लेकिन 2 घंटे बाद उसे लगा कि बदन टूट रहा है और बुखार है. वह दुकान बंद कर के घर पहुंच गया. कमरा अंदर से बंद था. कुंडी खुलवाने के लिए उस ने जंजीर की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि तभी उसे कमरे के अंदर से पत्नी के हंसने की आवाज आई. रामबाबू ने अपना हाथ रोक लिया. उस ने दरवाजे की झिर्री से देखा तो दंग रह गया. उस की पत्नी आपत्तिजनक स्थिति में थी.

रामबाबू का खून खौल उठा. लेकिन उस समय वह बोला कुछ नहीं. वह कुछ देर जड़वत खड़ा रहा. फिर खटखटाने पर दरवाजा खुला तो उसे देख कर बीना व पिंटू अपराधबोध से कांपने लगे. दोनों ने रामबाबू से माफी मांगी और भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने का वादा किया.

दोनों को माफ करने के अलावा रामबाबू के पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. पत्नी की बेवफाई से रामबाबू को गहरी ठेस लगी थी. उसे अब अपनी इज्जत बचानी थी, इसलिए उस ने कानपुर शहर छोड़ कर घर जाने का निश्चय कर लिया.

बीना को घर वापस जाने की बात पता चली तो उस ने बच्चों की पढ़ाई का सवाल उठाया. लेकिन रामबाबू मानने को तैयार नहीं हुआ. पत्नी और बच्चों को साथ ले कर वह मूसानगर स्थित अपने घर आ गया. रामबाबू खेतीकिसानी व मजदूरी कर के बच्चों का पालनपोषण करने लगा. उस ने दोनों बच्चों का दाखिला कस्बे के प्राइमरी स्कूल में करा दिया.

बीना के गांव चले जाने के बाद पिंटू परेशान हो उठा. उसे बीना की याद आने लगी. पिंटू से जब नहीं रहा गया तो वह बीना की ससुराल पहुंच गया. वहां रामबाबू ने उसे बेइज्जत किया और बीना से नहीं मिलने दिया. इस के बाद तो यह सिलसिला ही बन गया. पिंटू आता और बेइज्जत हो कर वापस हो जाता.

कुछ महीने ससुराल में रहने के बाद बीना ने विरोध शुरू कर दिया. दरअसल बीना ससुराल में कैदी जैसा जीवन व्यतीत कर रही थी. घर से बाहर निकलने पर पाबंदी थी, जबकि वह स्वतंत्र विचरण करना चाहती थी. साथ ही वह अभावों से भी जूझ रही थी.

एक दिन बीना ने रामबाबू से साफ कह दिया कि वह शहर जा कर खुद कमाएगी और अपना व बच्चों का पालनपोषण करेगी. रामबाबू ने विरोध किया लेकिन वह नहीं मानी. बीना ससुराल छोड़ कर कानपुर शहर चली गई.

नौबस्ता थाने के अंतर्गत धोबिन पुलिया कच्ची बस्ती में किराए पर मकान ले कर वह अकेली ही रहने लगी. उस ने नौकरी के लिए दौड़धूप की तो उसे आवासविकास नौबस्ता स्थित एक प्लास्टिक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई.

नौकरी मिल जाने के बाद बीना अपने दोनों बच्चों को भी साथ रखना चाहती थी. लेकिन रामबाबू ने बच्चों को उस के साथ भेजने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन बच्चों के लिए उस का मन तड़पता तो वह जबतब बच्चों से मिलने जाती और उन्हें खर्चा दे कर चली आती. कभीकभी वह बच्चों से मोबाइल पर भी बात कर लेती थी.

पिंटू को जब पता चला कि बीना वापस कानपुर शहर आ गई है तो उस ने फिर से बीना से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. पर बीना ने उसे पहले जैसी तवज्जो नहीं दी.

बीना जिस प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करती थी, वहीं पर 25-26 साल का सुनील भी काम करता था. सुनील बीना के घर से कुछ दूरी पर कच्ची बस्ती में ही रहता था. बीना और सुनील हंसमुख स्वभाव के थे, इसलिए दोनों में खूब पटती थी. छुट्टी वाले दिन वह सुनील के साथ घूमने भी जाती थी, सुनील उसे चाहने लगा था.

धीरेधीरे सुनील और बीना नजदीक आते गए और दोनों में नाजायज संबंध बन गए. सुनील सुबह बीना के घर आता. दोनों साथ चायनाश्ता करते और फिर साथसाथ फैक्ट्री चले जाते. शाम को भी सुनील बीना का घर छोड़ देता. कभीकभी वह बीना के घर रुक जाता, फिर रात भर दोनों मौजमस्ती करते.

बीना के सुनील के साथ संबंध बन गए तो उस ने पहले प्रेमी पिंटू को भाव देना बंद कर दिया. अब पिंटू जब भी उस के पास आता तो बीना विरोध करती. वह उसे घर में शराब पीने को भी मना करती.

पिंटू को वह अपने पास फटकने नहीं देती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि बीना में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया. उस ने गुप्त रूप से पता किया तो सच्चाई सामने आ गई. उसे पता चल गया कि बीना के सुनील से संबंध बन गए हैं.

सुनील को ले कर बीना और पिंटू में झगड़ा होने लगा. पिंटू बीना पर दबाव डालने लगा कि वह सुनील का साथ छोड़ दे लेकिन बीना इस के लिए तैयार नहीं थी. प्रेमिका की इस बेवफाई से पिंटू परेशान रहने लगा.

10 फरवरी, 2018 को पिंटू रात 8 बजे शराब के ठेके से बोतल खरीद कर बीना के घर पहुंचा तो वहां सुनील मौजूद था. सुनील वहां से चला गया तो पिंटू ने बीना से सुनील के बारे में पूछा. बीना ने उसे सब कुछ सच बता दिया. इस पर पिंटू को गुस्सा आ गया.

पिंटू ने तेज धार वाला चाकू साथ लाया था. उस ने चाकू निकाला और उस की गरदन पर वार कर दिया. बीना जमीन पर गिर गई. उस के बाद पिंटू बीना के सीने पर बैठ गया और यह कहते हुए उस की गरदन रेत दी कि बेवफाई की सजा यही है. बीना की हत्या करने के बाद पिंटू ने शराब पी फिर बाहर से दरवाजे की कुंडी बंद कर फरार हो गया.

11 फरवरी की सुबह सुनील बीना के घर पहुंचा तो दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद थी. वह कुंडी खोल कर कमरे में गया तो उस के होश उड़ गए. फर्श पर बीना की खून से सनी लाश पड़ी थी. सुनील ने पहले पासपड़ोस के लोगों फिर थाना नौबस्ता पुलिस को सूचना दी.

सूचना पाते ही नौबस्ता थानाप्रभारी अखिलेश जायसवाल पुलिस टीम के साथ आ गए. उन्होंने महिला की हत्या की सूचना अपने अधिकारियों को दे दी. कुछ देर बाद ही एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा, एसपी (साउथ) अशोक कुमार वर्मा वहां पहुंच गए.

मृतका की उम्र 32 वर्ष के आसपास थी. फोरैंसिक टीम ने भी मौके पर जांच की. पुलिस अधिकारियों ने सूचना देने वाले सुनील तथा मृतका के पति रामबाबू से पूछताछ की. रामबाबू ने पत्नी की हत्या का शक अपने दोस्त पिंटू करिया पर जताया. रामबाबू की तहरीर पर पुलिस ने पिंटू करिया के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया और उस की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी.

शाम करीब 5 बजे नौबस्ता थानाप्रभारी अखिलेश जायसवाल ने मुखबिर की सूचना पर पिंटू करिया को नौबस्ता के दासू कुआं के पास से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने सहज ही अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि बीना ने उस के साथ विश्वासघात किया था. इसी खुन्नस में उस ने उसे मार डाला.

पुलिस ने पिंटू की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू और खून सने कपड़े भी बरामद कर लिए. पूछताछ के बाद पुलिस ने 12 फरवरी, 2018 को उसे कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

अवैध संबंधों में हुई थी भाजपा नेता की हत्या

उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर के एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा को दोपहर 12 बजे के करीब थाना फीलखाना से सूचना मिली कि भाजपा के दबंग नेता सतीश कश्यप तथा उन के सहयोगी ऋषभ पांडेय पर माहेश्वरी मोहाल में जानलेवा हमला किया गया है. दोनों को मरणासन्न हालत में हैलट अस्पताल ले जाया गया है.

मामला काफी गंभीर था, इसलिए वह एसपी (पूर्वी) अनुराग आर्या को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल पर थाना फीलखाना के थानाप्रभारी इंसपेक्टर देवेंद्र सिंह मौजूद थे. सत्तापक्ष के नेता पर हमला हुआ था, इसलिए मामला बिगड़ सकता था.

इस बात को ध्यान में रख कर एसएसपी साहब ने कई थानों की पुलिस और फोरैंसिक टीम को घटनास्थल पर बुला लिया था. माहेश्वरी मोहाल के कमला टावर चौराहे से थोड़ा आगे संकरी गली में बालाजी मंदिर रोड पर दिनदहाड़े यह हमला किया गया था. सड़क खून से लाल थी. अखिलेश कुमार मीणा ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के बाद फोरैंसिक टीम ने अपना काम किया.

घटनास्थल पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था. दुकानों के शटर गिरे हुए थे, आसपास के लोग घरों में दुबके थे. वहां लोग कितना डरे हुए थे, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि वहां कोई कुछ भी कहने सुनने को तैयार नहीं था. बाहर की कौन कहे, छज्जों पर भी कोई नजर नहीं आ रहा था. यह 29 नवंबर, 2017 की बात है.

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घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद अखिलेश कुमार मीणा हैलट अस्पताल पहुंचे. वहां कोहराम मचा हुआ था. इस की वजह यह थी कि जिस भाजपा नेता सतीश कश्यप तथा उन के सहयोगी ऋषभ पांडेय पर हमला हुआ था, डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था. पुलिस अधिकारियों ने लाशों का निरीक्षण किया तो दहल उठे.

मृतक सतीश कश्यप का पूरा शरीर धारदार हथियार से गोदा हुआ था. जबकि ऋषभ पांडेय के शरीर पर मात्र 3 घाव थे. इस सब से यही लगा कि कातिल के सिर पर भाजपा नेता सतीश कश्यप उर्फ छोटे बब्बन को मारने का जुनून सा सवार था.

अस्पताल में मृतक सतीश कुमार की पत्नी बीना और दोनों बेटियां मौजूद थीं. सभी लाश के पास बैठी रो रही थीं. ऋषभ की मां अर्चना और पिता राकेश पांडेय भी बेटे की लाश से लिपट कर रो रहे थे. वहां का दृश्य बड़ा ही हृदयविदारक था. अखिलेश कुमार मीणा ने मृतकों के घर वालों को धैर्य बंधाते हुए आश्वासन दिया कि कातिलों को जल्दी ही पकड़ लिया जाएगा.

अखिलेश कुमार मीणा ने मृतक सतीश कश्यप की पत्नी बीना और बेटी आकांक्षा से हत्यारों के बारे में पूछताछ की तो आकांक्षा ने बताया कि उस के पिता की हत्या शिवपर्वत, उमेश कश्यप और दिनेश कश्यप ने की है. एक महिला से प्रेमसंबंधों को ले कर शिवपर्वत उस के पिता से दुश्मनी रखता था. उस ने 10 दिनों पहले धमकी दी थी कि वह उस के पिता का सिर काट कर पूरे क्षेत्र में घुमाएगा.

मृतक सतीश कश्यप ने इस की शिकायत थाना फीलखाना में की थी, लेकिन पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया और एक महिला सपा नेता के कहने पर समझौता करा दिया. अगर पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया होता और शिवपर्वत पर काररवाई की होती तो आज भाजपा नेता सतीश कश्यप और ऋषभ पांडेय जिंदा होते.

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अखिलेश कुमार मीणा ने मृतक ऋषभ के घर वालों से पूछताछ की तो उस की मां अर्चना पांडेय ने बताया कि उन का बेटा अकसर नेताजी के साथ रहता था. वह उन का विश्वासपात्र था, इसलिए वह जहां भी जाते थे, उसे साथ ले जाते थे. आज भी वह उन के साथ जा रहा था. ऋषभ स्कूटी चला रहा था, जबकि नेताजी पीछे बैठे थे. रास्ते में कातिलों ने हमला कर के दोनों को मार दिया.

मृतक सतीश कश्यप की बेटी आकांक्षा ने जो बताया था, उस से साफ था कि ये हत्याएं प्रेमसंबंध को ले कर की गई थीं. इसलिए एसएसपी साहब ने थानाप्रभारी देवेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर तुरंत रिपोर्ट दर्ज करें और हत्यारों को गिरफ्तार करें.

मृतक सतीश कश्यप के घर वालों ने शिवपर्वत पर हत्या का आरोप लगाया था, इसलिए देवेंद्र सिंह ने सतीश कश्यप के बड़े भाई प्रेम कुमार की ओर से हत्या का मुकदमा शिवपर्वत व 2 अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

जांच में पता चला कि बंगाली मोहाल का रहने वाला शिवपर्वत नगर निगम में सफाई नायक के पद पर नौकरी करता था. वह दबंग और अपराधी प्रवृत्ति का था. उस के इटावा बाजार निवासी राकेश शर्मा की पत्नी कल्पना शर्मा से अवैधसंबंध थे. इधर कल्पना शर्मा का मिलनाजुलना सतीश कश्यप से भी हो गया था. इस बात की जानकारी शिवपर्वत को हुई तो वह सतीश कश्यप से दुश्मनी रखने लगा. इसी वजह से उस ने सतीश की हत्या की थी.

शिवपर्वत को गिरफ्तार करने के लिए एसपी अनुराग आर्या ने एक पुलिस टीम बनाई, जिस में उन्होंने थाना फीलखाना के थानाप्रभारी इंसपेक्टर देवेंद्र सिंह, चौकीप्रभारी फूलचंद, एसआई आशुतोष विक्रम सिंह, सिपाही नीरज, गौतम तथा महिला सिपाही रेनू चौधरी को शामिल किया.

शिवपर्वत की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए, लेकिन वह पकड़ा नहीं जा सका. इस के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने के लिए उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन के आधार पर उसे फूलबाग चौराहे से गिरफ्तार कर लिया गया. शिवपर्वत को गिरफ्तार कर थाना फीलखाना लाया गया.

एसपी अनुराग आर्या की मौजूदगी में उस से पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी बहानेबाजी के सीधे सतीश कश्यप और ऋषभ पांडेय की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि उस की प्रेमिका कल्पना शर्मा की बेटी की शादी 30 नवंबर को थी. इस शादी का खर्च वही उठा रहा था, जबकि सतीश कश्यप भी शादी कराने का श्रेय लूटने के लिए पैसे खर्च करने लगे थे. यही बात उसे बुरी लगी थी.

उस ने उन्हें चेतावनी भी दी थी, लेकिन वह नहीं माने. उस की नाराजगी तब और बढ़ गई, जब कल्पना शर्मा ने सतीश कश्यप को भी शादी में निमंत्रण दे दिया. इस के बाद उस ने सतीश कश्यप की हत्या की योजना बनाई और शादी से एक दिन पहले उन की हत्या कर दी. ऋषभ को वह नहीं मारना चाहता था, लेकिन वह सतीश कश्यप को बचाने लगा तो उस पर भी उस ने हमला कर दिया. इस के अलावा वह जिंदा रहता तो उस के खिलाफ गवाही देता.

पूछताछ के बाद पुलिस ने उस से हथियार, खून सने कपड़े बरामद कराने के लिए कहा तो उस ने फेथफुलगंज स्थित जगमोहन मार्केट के पास के कूड़ादान से चाकू और खून से सने कपडे़ बरामद करा दिए. बयान देते हुए शिवपर्वत रोने लगा तो अनुराग आर्या ने पूछा, ‘‘तुम्हें दोनों की हत्या करने का पश्चाताप हो रहा है क्या?’’

शिवपर्वत ने आंसू पोंछते हुए तुरंत कहा, ‘‘सर, हत्या का मुझे जरा भी अफसोस नहीं है. मैं यह सोच कर परेशान हो रहा हूं कि मेरी प्रेमिका इस बात को ले कर परेशान हो रही होगी कि पुलिस मुझे परेशान कर रही होगी.’’

सतीश कश्यप और ऋषभ की हत्याएं कल्पना शर्मा की वजह से हुई थीं, इसलिए पुलिस को लगा कि कहीं हत्या में कल्पना शर्मा भी तो शामिल नहीं थी. इस बात का पता लगाने के लिए पुलिस टीम ने कल्पना शर्मा के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि घटना से पहले और बाद में शिवपर्वत की उस से बात हुई थी.

इसी आधार पर पुलिस पूछताछ के लिए कल्पना को भी 3 दिसंबर, 2017 को थाने ले आई, जहां पूछताछ में उस ने बताया कि सतीश कश्यप उर्फ छोटे बब्बन की हत्या की योजना में वह भी शामिल थी. इस के बाद देवेंद्र सिंह ने उसे भी साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. शिवपर्वत और कल्पना शर्मा से विस्तार से की गई पूछताछ में भाजपा नेता सतीश कश्यप और उन के सहयोगी ऋषभ पांडेय की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

महानगर कानपुर के थाना फीलखाना का एक मोहल्ला है बंगाली मोहाल. वहां की चावल मंडी में सतीश कश्यप अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी बीना के अलावा 2 बेटियां मीनाक्षी, आकांक्षा और एक बेटा शोभित उर्फ अमन था.

सतीश कश्यप काफी दबंग था. उस की आर्थिक स्थिति भी काफी अच्छी थी, इसलिए वह किसी से भी नहीं डरता था. इस की वजह यह थी कि उस का संबंध बब्बन गैंग के अपराधियों से था. इसीलिए बाद में उसे लोग छोटे बब्बन के नाम से पुकारने लगे थे.

इसी नाम ने सतीश को दहशत का बादशाह बना दिया था.फीलखाना के बंगाली मोहाल, माहेश्वरी मोहाल, राममोहन का हाता और इटावा बाजार में उस की दहशत कायम थी. लोग उस के नाम से खौफ खाते थे. उस पर तमाम मुकदमे दर्ज हो गए. वह हिस्ट्रीशीटर बन गया. 10 सालों तक इलाके में सतीश की बादशाहत कायम रही. लेकिन उस के साथ घटी एक घटना से उस का हृदय परिवर्तित हो गया. उस के बाद उस ने अपराध करने से तौबा कर ली.

दरअसल उस के बेटे का एक्सीडेंट हो गया, जिस में उस की जान बच गई. इसी के बाद से सतीश ने अपराध करने बंद कर दिए. अदालत से भी वह एक के बाद एक मामले में बरी होता गया.

अपराध से किनारा करने के बाद सतीश राजनीति करने लगा. पहले वह बसपा में शामिल हुआ. सपा सत्ता में आई तो वह सपा में चला गया. सपा सत्ता से गई तो वह भाजपा में आ गया. राजनीति की आड़ में वह प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा करता था. वह विवादित पुराने मकानों को औने पौने दामों में खरीद लेता था. इस के बाद उस पर नया निर्माण करा कर महंगे दामों में बेचता था. इस में उसे अच्छी कमाई हो रही थी.

ऋषभ सतीश कश्यप का दाहिना हाथ था. उस के पिता राकेश पांडेय इटावा बाजार में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी अर्चना के अलावा बेटा ऋषभ और बेटी रेनू थी. वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. 8वीं पास कर के ऋषभ सतीश कश्यप के यहां काम करने लगा था.

वह उम्र में छोटा जरूर था, लेकिन काफी होशियार था. सतीश कश्यप का सारा काम वही संभालता था. हालांकि सतीश का बेटा अमन और बेटी आकांक्षा भी पिता के काम में हाथ बंटाते थे, लेकिन ऋषभ भी पूरी जिम्मेदारी से सारे काम करता था. इसलिए सतीश हमेशा उसे अपने साथ रखते थे. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा था.

बंगाली मोहाल में ही शिवपर्वत वाल्मीकि रहता था. उस के परिवार में पत्नी रामदुलारी के अलावा 2 बेटियां थीं. वह नगर निगम में सफाई नायक था. उसे ठीकठाक वेतन तो मिलता ही था, इस के अलावा वह सफाई कर्मचारियों से उगाही भी करता था. लेकिन वह शराबी और अय्याश था, इसलिए हमेशा परेशान रहता था. उस की नजर हमेशा खूबसूरत महिला सफाईकर्मियों पर रहती थी, जिस की वजह से कई बार उस की पिटाई भी हो चुकी थी.

एक दिन शिवपर्वत इटावा बाजार में बुटीक चलाने वाली कल्पना शर्मा के घर के सामने सफाई करा रहा था, तभी उस की आंख में कीड़ा चला गया. वह आंख मलने लगा और दर्द तथा जलन से तड़पने लगा. उसे परेशान देख कर कल्पना शर्मा ने रूमाल से उस की आंख साफ की और कीड़ा निकाल दिया. कल्पना शर्मा की खूबसूरत अंगुलियों के स्पर्श से शिवपर्वत के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई. वह भी काफी खूबसूरत थी, इसलिए पहली ही नजर में शिवपर्वत उस पर मर मिटा.

इस के बाद शिवपर्वत कल्पना के आगेपीछे घूमने लगा, जिस से वह उस के काफी करीब आ गया. वह उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करने लगा. कल्पना अनुभवी थी. वह समझ गई कि यह उस का दीवाना हो चुका है. कल्पना का पति राजेश कैटरर्स का काम करता था. वह अकसर बाहर ही रहता था. ज्यादातर रातें उस की पति के बिना कटती थीं, इसलिए उस ने शिवपर्वत को खुली छूट दे दी, जिस से दोनों के बीच मधुर संबंध बन गए.

नाजायज संबंध बने तो शिवपर्वत अपनी पूरी कमाई कल्पना पर उड़ाने लगा, जिस से उस के अपने घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई. पत्नी और बच्चे भूखों मरने लगे. पत्नी वेतन के संबंध में पूछती तो वह वेतन न मिलने का बहाना कर देता. पर झूठ कब तक चलता. एक दिन रामदुलारी को पति और कल्पना शर्मा के संबंधों का पता चल गया. वह समझ गई कि पति सारी कमाई उसी पर उड़ा रहा है.

औरत कभी भी पति का बंटवारा बरदाश्त नहीं करती तो रामदुलारी ही कैसे बरदाश्त करती. उस ने पति का विरोध भी किया, लेकिन शिवपर्वत नहीं माना. वह उस के साथ मारपीट करने लगा तो आजिज आ कर वह बच्चों को ले कर मायके चली गई. इस के बाद तो शिवपर्वत आजाद हो गया. अब वह कल्पना के यहां ही पड़ा रहने लगा. उस की बेटी उसे पापा कहने लगी.

खूबसूरत और रंगीनमिजाज कल्पना शर्मा की सतीश कश्यप से भी जानपहचान थी. सतीश की उस के पति राजेश से दोस्ती थी. उसी ने कल्पना से उस को मिलाया था. उस के बाद दोनों में दोस्ती हो गई, जो बाद में प्यार में बदल गई थी. लेकिन ये संबंध ज्यादा दिनों तक नहीं चल सके. दोनों अलग हो गए थे.

कल्पना शर्मा की बेटी सयानी हुई तो वह उस की शादी के बारे में सोचने लगी. बेटी की शादी धूमधाम से करने के लिए वह मकान का एक हिस्सा बेचना चाहती थी. सतीश कश्यप को जब इस बात का पता चला तो वह कल्पना शर्मा से मिला और उस का मकान खरीद लिया. मकान खरीदने के लिए वह कल्पना शर्मा से मिला तो एक बार फिर दोनों का मिलना जुलना शुरू हो गया. सतीश ने उसे आश्वासन दिया कि वह उस की बेटी की शादी में हर तरह से मदद करेगा.

मदद की चाह में कल्पना शर्मा का झुकाव सतीश की ओर हो गया. अब वह शिवपर्वत की अपेक्षा सतीश को ज्यादा महत्त्व देने लगी. एक म्यान में 2 तलवारें भला कैसे समा सकती हैं? प्रेमिका का झुकाव सतीश की ओर देख कर शिवपर्वत बौखला उठा. उस ने कल्पना शर्मा को आड़े हाथों लिया तो वह साफ मुकर गई. उस ने कहा, ‘‘शिव, तुम्हें किसी ने झूठ बताया है. हमारे और नेताजी के बीच कुछ भी गलत नहीं है.’’

कल्पना शर्मा ने बेटी की शादी तय कर दी थी. शादी की तारीख भी 30 नवंबर, 2017 रख दी गई. गोकुलधाम धर्मशाला भी बुक कर लिया गया. वह शादी की तैयारियों में जुट गई. शिवपर्वत शादी की तैयारी में हर तरह से मदद कर रहा था. लेकिन जब उसे पता चला कि सतीश कश्यप भी शादी में कल्पना की मदद कर रहा है तो उसे गुस्सा आ गया.

शिवपर्वत ने कल्पना शर्मा को खरीखोटी सुनाते हुए कहा कि अगर सतीश उस की बेटी की शादी में आया तो ठीक नहीं होगा. अगर उस ने उसे निमंत्रण दिया तो अनर्थ हो जाएगा. प्रेमिका को खरीखोटी सुना कर उस ने सतीश को फोन कर के धमकी दी कि अगर उस ने कल्पना से मिलने की कोशिश की तो वह उस का सिर काट कर पूरे इलाके में घुमाएगा. देखेगा वह कितना बड़ा दबंग है.

शिवपर्वत सपा का समर्थक था. सपा के कई नेताओं से उस के संबंध थे. उस के भाई भी सपा के समर्थक थे और उस का साथ दे रहे थे. सतीश ने शिवपर्वत की धमकी की शिकायत पुलिस से कर दी. सीओ कोतवाली ने शिवपर्वत को थाने बुलाया तो वह सपा नेताओं के साथ थाने आ पहुंचा. सपा नेताओं ने विवाद पर लीपापोती कर के समझौता करा दिया.

शिवपर्वत के मना करने के बावजूद कल्पना शर्मा ने बेटी की शादी का निमंत्रण सतीश कश्यप को दे दिया था. जब इस की जानकारी शिवपर्वत को हुई तो उस ने कल्पना शर्मा को आड़ेहाथों लिया. तब कल्पना ने कहा कि सतीश कश्यप दबंग है. उस से डर कर उस ने उसे शादी का निमंत्रण दे दिया है. अगर वह चाहे तो उसे रास्ते से हटा दे. इस में वह उस का साथ देगी.

‘‘ठीक है, अब ऐसा ही होगा. वह शादी में शामिल नहीं हो पाएगा.’’ शिवपर्वत ने कहा.

इस के बाद उस ने शादी के एक दिन पहले सतीश कश्यप की हत्या करने की योजना बन डाली. इस के लिए उस ने फेरी वाले से 70 रुपए में चाकू खरीदा और उस पर धार लगवा ली. 29 नवंबर की सुबह सतीश किसी नेता से मिल कर घर लौटे तो उन्हें किसी ने फोन किया. फोन पर बात करने के बाद वह ऋषभ के साथ स्कूटी से निकल पड़े. पत्नी बीना ने खाने के लिए कहा तो 10 मिनट में लौट कर खाने को कहा और चले गए.

करीब 11 बजे वह बालाजी मंदिर मोड़ पर पहुंचे तो घात लगा कर बैठे शिवपर्वत ने स्कूटी रोकवा कर उन पर हमला कर दिया. सतीश कश्यप सड़क पर ही गिर पड़े. सतीश को बचाने के लिए ऋषभ शिवपर्वत से भिड़ गया तो उस ने उस पर भी चाकू से वार कर दिया. ऋषभ जान बचा कर भागा, लेकिन आगे गली बंद थी. वह जान बचाने के लिए घरों के दरवाजे खटखटाता रहा, लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला.

पीछा कर रहे शिवपर्वत ने उसे भी घायल कर दिया. ऋषभ जमीन पर गिर पड़ा. इस पर शिवपर्वत का गुस्सा शांत नहीं हुआ. लौट कर उस ने सड़क पर पड़े तड़प रहे सतीश कश्यप पर चाकू से कई वार किए. एक तरह से उस ने उस के शरीर को गोद दिया. इस के बाद इत्मीनान से चाकू सहित फरार हो गया.

शिवपर्वत ने इस बात की सूचना मोबाइल फोन से कल्पना शर्मा को दे दी थी. इस के बाद रेल बाजार जा कर कपड़ों की दुकान से उस ने एक जींस व शर्ट खरीदी और सामुदायिक शौचालय जा कर खून से सने कपड़े उतार कर नए कपड़े पहन लिए और फिर रेलवे स्टेशन पर जा कर छिप गया.

इस वारदात से इलाके में दहशत फैल गई थी. दुकानदारों ने शटर गिरा दिए थे और गली के लोग घरों में घुस गए थे. लेकिन किसी ने घटना की सूचना पुलिस और सतीश कश्यप के घर वालों को दे दी थी.

खबर पाते ही सतीश कश्यप की पत्नी बीना अपनी दोनों बेटियों मीनाक्षी और आकांक्षा तथा बेटे अमन के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचीं. उन की सूचना पर ऋषभ के पिता राकेश और मां अर्चना भी आ गईं. थाना फीलखाना के प्रभारी देवेंद्र सिंह भी आ गए. उन्होंने घायलों को हैलट अस्पताल भिजवाया और वारदात की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी.

पूछताछ के बाद थाना फीलखाना पुलिस ने अभियुक्त शिवपर्वत और कल्पना शर्मा को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हुई थीं. कल्पना शर्मा के जेल जाने से उस की बेटी का रिश्ता टूट गया.

सोचने वाली बात यह है कि शिवपर्वत को मिला क्या? उस ने जो अपराध किया है, उस में उसे उम्रकैद से कम की सजा तो होगी नहीं. उस ने जिस कल्पना के लिए यह अपराध किया, क्या वह उसे मिल पाएगी? उस ने अपनी जिंदगी तो बरबाद की ही, साथ ही कल्पना और उस की बेटी का भी भविष्य खराब कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

गेमिंग ऐप्स : निश्चित है हार

जब शरद ने अपने घर से पैसे नहीं मंगाए तो उस के साथियों ने मिल कर उस की पिटाई करनी शुरू कर दी, साथ ही उस की पिटाई का वीडियो भी बनाते रहे.

पहले तो वे उसे ऐसे ही पीटते रहे. जब इस पर भी शरद ने घर से पैसे नहीं मंगाए तो उस के कपड़े उतार कर उस के साथ मारपीट की. फिर उसे स्प्रे फ्लेम से जलाया. यही नहीं, हद तो तब हो गई जब शरद से कहा गया कि वह अपने गुप्तांग में खुद ही ईंट बांध कर उठक बैठक करे. शरद को डर के मारे यह भी करना पड़ा.

शरद के साथ यह सब एकदो दिन नहीं, पूरे 11 दिनों तक होता रहा और वह इन लोगों के सामने रोताबिलखता और गिड़गिड़ाता रहा, पर इन लोगों को उस पर जरा भी दया नहीं आई.

उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना लवेदी का रहने वाला 17 साल का शरद (बदला हुआ नाम) 12वीं पास करने के बाद नीट (डाक्टरी की प्रवेश परीक्षा) की तैयारी करने के लिए कानपुर आ गया था. कानपुर के थाना काकादेव के अंतर्गत आने वाली एक कोचिंग में उस ने एडमिशन लिया और वहीं पास ही एक मकान में किराए का कमरा ले कर रहने लगा.

इटावा के और भी तमाम लड़के कानपुर में रह कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे. घर से दूर अकेले रह रहे शरद की ऐसे ही कुछ लड़कों से दोस्ती हो गई.

किसी अन्य शहर में कोई अपने इलाके का मिल जाता है तो वह अपना ही लगने लगता है. वे लड़के शरद से उम्र में बड़े और समझदार थे, इसलिए जब कभी समय मिलता, शरद उन के कमरे पर चला जाता. उन से मिल कर दिमाग पर जो पढ़ाई का बोझ होता था, वह भी थोड़ा हलका हो जाता था और उन से कुछ सीखने को भी मिल जाता था.

21 अप्रैल, 2024 को कोचिंग की छुट्टी थी. शरद पढ़ते पढ़ते ऊब गया था, इसलिए उस ने सोचा कि क्यों न दोस्तों के पास जा कर मूड थोड़ा हलका कर ले. वह काकादेव के पांडुनगर में ही रहने वाले अपने दोस्तों शिवा और केशव के यहां चला गया.

शरद के ये दोनों दोस्त शिवा और केशव भी इटावा के थाना बकेवर के रहने वाले थे. दोनों ही कानपुर के काकादेव पांडुनगर में रह कर एसएससी की तैयारी कर रहे थे. बातचीत में जब शरद ने कहा कि उस के पास पैसे नहीं है तो शिवा और केशव ने कहा, ”तुम औनलाइन गेम क्यों नहीं खेल लेते, तुरंत पैसे मिल जाएंगे.’’

”पहली बात तो यह कि मैं ने कभी औनलाइन कोई गेम खेला नहीं है. फिर हार गया तो जो पैसे हैं, वे भी चले जाएंगे. मैं नहीं खेलता कोई गेमवेम.’’ शरद बोला.

”कोई नहीं हारता. अगर सभी हारते रहते तो अब तक ये सारे गेम कब का बंद हो गए होते. देखते नहीं बड़ेबड़े क्रिकेटर और हीरो इन गेम का प्रचार करते हैं. एक बार खेल कर तो देखो. थोड़े पैसे लगाना. जीत जाना तो आगे खेलना, वरना बंद कर देना.’’ केशव ने कहा.

शरद अभी नासमझ ही तो था. दोस्तों के कहने में आ गया. उस ने एविएटर गेम डाउनलोड किया और खेलना शुरू किया. शुरूशुरू में वह जीता. इस गेम में फाइटर विमान उड़ाना होता है. इस में कई लोग एक साथ खेलते हैं. गेम खेलने वाला खुद अपने साथी चुन सकता है. जिस का विमान सब से पहले क्रैश हो जाता है, वह हार जाता है.

शुरू में शरद भी जीतता रहा. उस ने करीब 50 हजार रुपए जीते, लेकिन जब हारने लगा तो जीते हुए 50 हजार रुपए तो हार ही गया, दोस्तों के भी करीब 20 हजार रुपए हार गया.

इस के बाद दोस्तों ने उस से अपने रुपए मांगने शुरू किए. कुछ दिन तो शरद टालता रहा. पर जब ज्यादा दिन हो गए तो एक दिन उस के दोस्तों शिवा और केशव ने अपने कुछ अन्य दोस्तों तन्मय चौरसिया, संजीव यादव, अभिषेक कुमार वर्मा और योगेश कुमार विश्वकर्मा के साथ मिल कर शरद को पकड़ कर अपने कमरे पर बंधक बना लिया.

इन में तन्मय चौरसिया कानपुर के काकादेव के रानीगंज का रहने वाला था. बीफार्मा की पढ़ाई कर के वह एक कोचिंग संचालक की कार चलाता था. जबकि जौनपुर का रहने वाला संजीव कानपुर के काकादेव में ही रह कर यूपीएससी की तैयारी कर रहा था.

वहीं महोबा के श्रीनगर कोतवाली क्षेत्र का रहने वाला अभिषेक कुमार वर्मा काकादेव के आर.एस. पुरम में रह कर नीट की तैयारी कर रहा था. उसी तरह सिद्धार्थनगर भिटिया का रहने वाला योगेश कुमार विश्वकर्मा भी काकादेव में रह कर नीट की तैयारी कर रहा था.

इन सभी लोगों का पूरा एक ग्रुप था. ये सभी मिल कर अपने से छोटे बच्चों को इसी तरह गेम खिला कर उन से पैसे ऐंठते थे. शिवा और केशव ने शरद को दिए तो थे 20 हजार रुपए, पर ब्याज जोड़ कर उस से 50 हजार रुपए मांग रहे थे. इन सभी का लीडर तन्मय चौरसिया था.

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इन छहों लोगों ने शरद से कहा कि वह अपने घर से पैसे मंगा कर उन के पैसे दे. जब उस ने ऐसा नहीं किया तो उन्होंने शरद को प्रताडि़त कर पिटाई भी की.

इन लोगों ने शरद के साथ जो मारपीट की थी, उस की जो वीडियो बनाई थी, उन वीडियो को वायरल करने की धमकी दे कर उसे प्रताडि़त करते रहे और अपने पैसे मांगते रहे. आखिर 11 दिन बाद यानी 5 मई, 2024 को इन लोगों ने शरद के साथ मारपीट की वीडियो वायरल कर दी.

जब इस बात की जानकारी शरद को हुई तो उसे लगा कि जिस इज्जत को बचाने के लिए उस ने इतनी प्रताडऩा सही, वह तो अब सब खत्म हो गई. तब 5 मई की शाम को शरद ने अपने घर वालों को फोन कर के सारी बात बता दी.

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                                                       गिरफ्तार आरोपी

इस के बाद 6 मई की सुबह थाना काकादेव में शरद के घर वालों ने 6 लोगों— शिवा, केशव, तन्मय, संजीव, योगेश और अभिषेक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस के पहुंचने से पहले ही ये सभी आरोपी फरार हो गए थे. लेकिन काकादेव पुलिस ने शाम तक सभी को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पूछताछ में सभी अभियुक्तों ने अपना अपराध स्वीकार भी कर लिया था.

शरद का कहना था कि 4 लोगों ने उस के साथ कुकर्म भी किया था. उस की भाभी ने भी मीडिया से बातचीत करते समय यह बात कही थी, पर पुलिस ने कुकर्म की धारा नहीं जोड़ी है. पुलिस ने छहों आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 34, 343, 323, 500, 506, 307, 7/8 पोक्सो ऐक्ट और 67ख आईटी ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया है.

अंत में प्रैस कौन्फ्रेंस के दौरान थाना काकादेव के एसएचओ के.पी. गौड़ ने कहा कि नाबालिग युवक बहुत मजबूत था. मैडिकल में उस के पूरे शरीर पर चोट के निशान मिले. 11 दिनों तक बंधक बना कर उसे बड़ी बेरहमी से मारापीटा गया. लड़का हिम्मत वाला था, वरना मर जाता. उसे इस तरह यातना दी गई थी कि केवल उस की जान जानी बाकी थी.

औनलाइन गेम खेलने के बाद इतनी यातना सहनी होगी, शरद ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा. बहरहाल, उसे यातना देने वाले अब जेल पहुंच गए हैं.

ऐसा ही कुछ रूपेश के साथ भी हुआ था. 6 महीने पहले ही रूपेश का विवाह हुआ था. पत्नी प्रिया एक आईटी कंपनी में नौकरी करती थी. प्रिया की अकसर नाइट शिफ्ट होती थी, इसलिए वह दिन में घर में रहती थी. रूपेश भी एक कंपनी में नौकरी करता था. उस की ड्यूटी दिन की होती थी, इसलिए रात में वह अकेला ही घर में रहता था.

एक दिन उस के मोबाइल पर एक मैसेज आया, जिस में एक गेमिंग एप्लीकेशन का लिंक था. उस ने सोचा कि चलो खेल कर देखते हैं कि इस में क्या होता है. उस गेम का नाम था ‘रमी लोटस’. यह एक स्लाइडिंग गेम था. एक जैसी स्लाइड आती थीं. जीतने पर कुछ रिवाड्र्स मिलते थे. शुरुआत में वह जीतने लगा. उस ने 500 रुपए लगाए तो उसे 700 रुपए मिले. एक हजार रुपए लगाए तो 15 सौ रुपए मिले. इसी तरह लगभग एक सप्ताह चला.

खाते में पैसे आने लगे तो लालच बढ़ता गया. वह अधिक पैसे लगाने लगा. इस में भी वह न जीत की स्थिति में होता था और न हार की स्थिति में यानी वह न जीतता था और न हारता था. इस तरह 12 से 15 दिन बीत गए.

रूपेश को एप्लीकेशन पर विश्वास हो गया तो वह बड़ी रकम लगाने लगा. अचानक वह हारने लगा. हारी गई रकम वापस पाने के लिए वह और अधिक रुपए लगाता गया और वह लगातार हारता रहा. इस तरह उस ने करीब ढाई लाख रुपए गंवा दिए. यह उस की पिछले ढाईतीन साल की बचत थी. वह पैसे वापस पाने के लिए अधिक रुपए लगाता रहा और लगातार हारता रहा.

जब पास का सारा पैसा खत्म हो गया तो उस ने क्रेडिट कार्ड से पैसा निकाला, शेयर मार्केट से पैसा लिया. जब सब जगह से उम्मीदें खत्म हो गईं तो रूपेश को चिंता हुई. जिस यूपीआई से वह पैसे ट्रांसफर करता था, उस ऐप कंपनी के कुछ लोगों के नाम उसे मिले. वे लोग बेंगलुरु, इंदौर और मुंबई के थे. रूपेश ने उन्हें मेल किया, ‘आप लोगों ने गेम को इस तरह सेट किया है कि मेरा सारा पैसा डूब गया.’

उन लोगों ने रूपेश को जवाब भेजा कि ‘आप जीता हुआ पैसा तुरंत वापस कर दीजिए, उस के बाद ही आप द्वारा लगाई गई रकम वापस की जाएगी.’

उन के इस जवाब से रूपेश समझ गया कि उसे एक बार फिर फंसाने की कोशिश की जा रही है. रूपेश ने जवाब दिया, ‘अब मैं कोई रकम लौटा नहीं सकता.’

रूपेश ने थाने जा कर पुलिस से मदद मांगी. पर पुलिस ने मदद करने की कौन कहे, उस की शिकायत तक नहीं दर्ज की. पुलिस का कहना था कि जिस ऐप पर उस ने अपने पैसे गंवाए हैं, वह मान्यता प्राप्त एप्लीकेशन है. वह औनलाइन शिकायत दर्ज कराए तो कुछ हो सकता है.

रूपेश ने औनलाइन शिकायत की. पर कुछ नहीं हुआ. 3 महीने तक वह भागदौड़ करता रहा, काफी परेशान हुआ. लेकिन कहीं से उसे कोई मदद नहीं मिली. अब उस ने अपना पूरा ध्यान अपनी नौकरी पर लगा दिया है.

विवेक भी कैसे हारा पौने 3 करोड़

अब बात करते हैं इंदौर के विवेक की, जिस की कहानी रूपेश से बिलकुल अलग और भयानक है. विवेक ने बीकौम तक की पढ़ाई की थी. पिता की सोनेचांदी के गहनों की दुकान थी. पिता की मौत के बाद वह अपनी पुश्तैनी दुकान संभालने लगा. दुकान का मालिक बनते ही वह औनलाइन गेमिंग ऐप पर सट्टा लगाने लगा. इस में उस का करीब 12 लाख रुपए का नुकसान हुआ.

इस नुकसान की भरपाई के लिए उस ने अधिक पैसा लगाया. इंदौर में उस की एक प्रौपर्टी 2 करोड़ 57 लाख रुपए में बिकी थी. उस ने सारा पैसा औनलाइन गेमिंग में लगा दिया और अंत में वह सारा पैसा हार गया. 10 लाख रुपए उस ने 20 प्रतिशत ब्याज पर उधार लिए. उन्हें भी वह हार गया. उधार न दे पाने की वजह से लोगों ने उस पर ठगी के मुकदमे दर्ज करा दिए.

विवेक की बहन सौफ्टवेयर इंजीनियर थी. पति की मौत के बाद वह यूके चली गई थी. वह वहां से वापस आई तो उसे भाई के बारे में पता चला. उस ने विवेक को रिहैबिलिटेशन सेंटर में भरती कराया. 15 महीने उस का इलाज चला. इलाज के बाद वह सेंटर से बाहर आ गया है और अब उस की स्थिति पहले से काफी ठीक है.

एक भाई ने गंवाए 40 लाख तो दूसरे ने कैसे गंवा दिए 7 करोड़

पिछले साल मुंबई से 28 साल के रोहित को इंदौर के अंकुर रिहैबिलिटेशन सेंटर में लाया गया था. उसे औनलाइन गेमिंग की ऐसी लत लगी थी कि वह 40 लाख रुपए हार गया था. रिहैब सेंटर में उस के रिश्तेदार ले कर आए थे. इलाज के बाद स्थिति में सुधार हुआ. इस साल उस के छोटे भाई को उसी रिहैब सेंटर में लाया गया है.

बड़े भाई की अपेक्षा छोटा भाई औनलाइन गेमिंग में बहुत बुरी तरह फंसा था. उस ने 7 करोड़ रुपए गंवाए थे. इतना पैसा गंवाने के बाद उस ने आत्महत्या की कोशिश की. इन दोनों भाइयों के पिता की मौत हो चुकी है और मां यूएस में रहती हैं. छोटे भाई का इलाज अभी भी रिहैब सेंटर में चल रहा है.

लखनऊ के एक डाक्टर ने ‘द लायन वेबसाइट’ में पैसा लगाया था. यह वेबसाइट क्रिकेट, फुटबाल, टेनिस, पोकर, तीन पत्ती और कैसिनो द्वारा गैंबलिंग कराती है. डाक्टर ने 50 हजार रुपए लगाए और 2 लाख रुपए जीते. जीतने के बाद उन्हें 2 लाख 50 हजार रुपए मिलने थे, पर मिले नहीं.

कंपनी के लोग उन्हें वाट्सऐप चैट पर पैसा देने के लिए अलगअलग तारीखें देते रहे. बाद में उन्हें बताया गया कि उन के नाम से किसी और ने कंपनी से पेमेंट ले लिया है. इस के बाद जवाब देना बंद कर दिया गया.

डाक्टर के पास पेमेंट नंबर और चैट के सारे सबूत हैं, लेकिन अब सारे नंबर बंद हो चुके हैं. इसलिए वह कुछ नहीं कर पा रहे हैं. पुलिस के पास जाने से भी घबराते हैं, क्योंकि पुलिस तो यही कहेगी कि आखिर जुआ खेलने की क्या जरूरत थी.

किस तरह फंसाया जाता है लोगों को

अब आइए यह जानते हैं कि यह औनलाइन सट्टेबाजी होती कैसे है? इस के लिए वेबसाइट भले ही किसी देश में रजिस्टर्ड हो, पर हर देश के हर राज्य में इन की एक टीम होती है, जिसे लौगइन आईडी बनाने का टारगेट दिया जाता है. डाटाबेस कंपनी द्वारा ही दिया जाता है, जिस में देश भर के लोगों के मोबाइल नंबर होते हैं.

टेलीकालिंग के लिए अलग लोग होते हैं. इंस्टाग्राम, फेसबुक और टेलीग्राम ऐप को प्रमोट करने के लिए अलग लोग होते हैं. ग्राहकों को मैसेज और काल द्वारा डायरेक्ट लिंक्स भेजी जाती हैं. क्योंकि इन टीमों का काम केवल लोगों तक लिंक्स पहुंचाना होता है. बाकी ये लोग किसी को फंसाते नहीं, लालच में लोग खुद ही फंसते हैं.

हां, अपने प्रचार के लिए ये लोग फेक काल कर के यह जरूर कहते हैं कि तमाम लोगों को इतने दिनों में इतना लाभ मिला है. इस के बाद कोई भी व्यक्ति एक बार इन का गेम खेल लेता है तो उस की सारी जानकारी कंपनी के पास पहुंच जाती है. फिर कंपनी की ओर से दबाव डाला जाता है कि वह आदमी किसी भी तरह गेम खेले.

इन वेबसाइटों के डोमेन विदेशों में बुक होते हैं. ये सारी वेबसाइटें विदेशी सर्वर पर ही चलती हैं. साथ में ऐसी कोडिंग की जाती है कि एक लिमिट के बाद कंपनी को ही लाभ हो और यूजर हारे.

कंपनी के पास सौफ्टवेयर इंजीनियर्स और डेवलपर्स की टीम होती है. अगर कोई साइट ब्लौक कर दी जाती है तो तुरंत समान नाम वाली दूसरी साइट पर काम शुरू कर दिया जाता है. जिस खाते में पैसा आता है, उस से पैसा निकालने के लिए अलग टीम होती है. कभी भी एक खाते में पैसा नहीं रखा जाता. ये खाते नकली नाम से खुलवाए गए होते हैं.

इधर तमाम लोग इस तरह के ऐप की फ्रेंचाइजी लेने लगे हैं. इस में लाइसैंस मुख्य कंपनी के नाम होता है. बाकी के लोगों को बिजनैस के हिसाब से कमीशन मिलता है. फ्लैट या किसी कमरे से 2-2, 4-4 लोग ऐप चला रहे हैं. इस में किसी बड़े सेटअप की जरूरत नहीं होती.

छत्तीसगढ के महादेव सट्टेबाजी ऐप का खुलासा होने के बाद केंद्र सरकार ने 122 गैंबलिंग ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया था. लेकिन ऐसे सैकड़ों ऐप अभी भी चल रहे हैं. इस के अलावा गेम के नाम पर तमाम गैंबलिंग वाली वेबसाइटें भी बड़ी संख्या में चल रही हैं.

गेमिंग ऐप कैसे करते हैं काम

पहले लोगों को अधिक से अधिक पैसा कमाने का लालच दिया जाता है. इस के लिए फेसबुक, टेलीग्राम और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म का उपयोग किया जाता है. सेलेब्स द्वारा प्रमोशन किया जाता है. यूजर केवल वाट्सऐप नंबर पर ही संपर्क कर सकता है. संपर्क करने पर उसे 2 नंबर दिए जाते हैं. इस में एक नंबर पैसा जमा कराने के लिए होता है. दूसरा नंबर यूजर आईडी का होता है, जिस के द्वारा बेटिंग की जाती है.

यूपीआई द्वारा प्रौक्सी बैंक खाते में पेमेंट लिया जाता है. प्रौक्सी खाते में आने वाली रकम हवाला, क्रिप्टो और अन्य गैरकानूनी तरीके से ट्रांसफर की जाती है. भारतीय बैंक के खातों से जुड़े पेमेंट प्रौक्सी को बदल देते हैं. इसलिए जिस रास्ते से ट्रांजेक्शन होता है, उसे जाना नहीं जा सकता. रास्ता कहीं और दिखाता है और पेमेंट कहीं और होता है.

इस तरह की ज्यादातर वेबसाइटें साइप्रस, माल्टा, कुराकाओ, मोरेशियस और केमेन आइलैंड जैसे देशों में रजिस्टर्ड हैं, क्योंकि यहां सट्टेबाजी कानूनी है.

गैंबलिंग औफर करने वाली वेबसाइटों के डोमेन विदेशों में बुक होते हैं. इन के सर्वर भी वहीं होते हैं. क्योंकि इन देशों में जुआ कानूनी है और टैक्स भी कम है. वहां बैठ कर भारत में गैंबलिंग कराई जाती है. जांच से पता चला है कि गेमिंग के नाम पर सट्टेबाजी कराने वाले ज्यादातर मोबाइल ऐप्स महादेव बेटिंग, महादेव बुक या रेड्डी अन्ना बुक के नाम दर्ज हैं.

इस पूरी सांठगांठ के पीछे सब से बड़ा खिलाड़ी महादेव है. इस ग्रुप के पास विविध नामों से 5 हजार से अधिक वेबसाइटें हैं. पता चला है कि ज्यादातर वेबसाइटें महादेव बुक के लाइसैंस पर चल रही हैं. महादेव ने कुराकाओ से लाइसैंस लिया है. ज्यादातर कंपनियों ने इस लाइसैंस के साथ ओरिजोना में रजिस्टर्ड कराया है.

टेक एक्सपर्ट के अनुसार अगर औनलाइन जुए को स्किल बेस्ड गेम माना जाता है तो ऐप एल्गोरिदम पूरे गेम को कंट्रोल करता है. यह इस तरह सिंक्रनाइज होता है कि कंपनी खिलाडिय़ों की अपेक्षा अधिक फायदा करती है. अगर इसे कौशल्य खेल के रूप में वर्गीकृत किया जाए तो इस में विश्लेषण के आंकड़े और डाटा अध्ययन का समावेश होना चाहिए. अनुमान पर आधारित निर्णय को कौशल्य नहीं माना जा सकता.

अभिनेता क्यों कर रहे हैं ऐप का प्रचार

क्रिकेटबेट9 यह क्रिकेटबज की मिरर वेबसाइट है. क्रिकेटबज पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो इस के संचालकों ने क्रिकेटबेट9 वेबसाइट शुरू कर दी. इसे मुख्यत: औपरेट चंडीगढ़ से किया जा रहा है. इन के पास भी महादेव बुक का लाइसैंस है.

महादेव बुक ने खुद अनेक वेबसाइटों को अपने नाम का लाइसैंस दिया है. इस ने भारत में नहीं, कुराकाओ में रजिस्ट्रेशन कराया है. इसलिए ठगी करने के बाद भी कंपनियां बच जाती हैं. इस तरह की कंपनियां 150 से 2 सौ तक वेबसाइटें लांच करती हैं. एक पर प्रतिबंध लगने के बाद दूसरी में शिफ्ट हो जाती हैं. इसे एक्सचेंज कहा जाता है.

ये ऐप्स अपनी इस तरह ब्रांडिंग करते हैं जैसे वे गेम खेला रहे हैं. जबकि ये सब सट्टेबाजी होती है. हर व्यक्ति ऐप पर बेटिंग करता है. ये ऐप्स अल्गोरिदम्स द्वारा नियंत्रित होते हैं. शुरुआत में जीतते हैं, जिस से यूजर्स आदी हो जाता है, बाद में उसे लूट लिया जाता है.

अल्गोरिदम मशीन लर्निंग पर चलती है. उसे जिस तरह कंप्यूटर में फीड किया जाएगा, वह उसी तरह काम करेगा. वह इस तरह डिजाइन किया जाता है कि कंपनी का फायदा हो और यूजर्स हारें. ये ऐप्स ह्यूमन इंटरफेस से गुजरते हैं. इस पर हमेशा नजर रखी जाती है.

कितना बड़ा है गेमिंग ऐप का बाजार?

पिछले कुछ सालों में भारत में फैंटेसी ऐप की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है. लाखों यूजर्स ड्रीम11, माई सर्कल11, एमपीएल जैसे प्लेटफार्म पर पहुंच रहे हैं. इंडियन प्रीमियर लीग यानी कि आईपीएल के 16वें सीजन में फैंटेसी गेमिंग ऐप शिखर की विज्ञापन की थी. टीएएम मीडिया रिसर्च के एडवरटाइजिंग के अनुसार इन का हिस्सा पिछले आईपीएल की अपेक्षा 15 प्रतिशत से बढ़ कर 18 प्रतिशत हो गया है.

सौरव गांगुली, कपिल शर्मा, हरभजन सिंह, विराट कोहली, शुभमन गिल, हार्दिक पांडया, आमिर खान, आर. माधवन, शरमन जोशी इन गेमिंग ऐप्स का प्रचार करते हैं. कंसल्टेंसी रेडसकर की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2022 की अपेक्षा 2023 में फैंटेसी गेमिंग प्लेटफार्म की आमदनी में 24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. यह अब 341 मिलियन डालर अथवा 28 सौ करोड़ हो गया है. इस दौरान 6 करोड़ यूजर्स ने फैंटेसी गेमिंग प्रवृत्तियों में भाग लिया, जिस में 66 प्रतिशत लोग छोटे शहरों से आते हैं.

ये गेमिंग ऐप्स यूजर्स से एंट्री फीस वसूल करते हैं. इन की टीम अंडर परफार्म करेगी तो पैसा खोने का डर है. ड्रीम11 भारत का सब से बड़ा फैंटेसी स्पोट्र्स प्लेटफार्म है. इस के 20 करोड़ रजिस्टर्ड यूजर्स हैं. एमपीएल9 करोड़ और माई सर्कल11 अपने पास 4 करोड़ यूजर्स होने का दावा करता है.

गेमिंग ऐप द्वारा जुए को क्यों नहीं रोका जा सकता

भारत में फैंटेसी गेमिंग ऐप को नियंत्रित करने के लिए पब्लिक गैंबलिंग अधिनियम 1867 का उपयोग होता है. यह अधिनियम देश में तमाम तरह के गैंबलिंग को प्रतिबंधित करता है. जबकि इन कौशल्य वाले खेलों को नहीं रोकता. इन के विज्ञापन भ्रम में डालने वाले होते हैं. जिन में ज्यादा से ज्यादा पैसा जीतते हुए दिखाया जाता है. जबकि सच्चाई यह है कि ज्यादातर खिलाड़ी बहुत छोटा एमाउंट जीतते हैं.

मनोचिकित्सकों के अनुसार हमारे दिमाग में एक रिवार्ड सेंटर है. वहां से हमें आनंद मिलता है, अच्छा लगता है. यह फूड, सैक्स और सिद्धियों से क्रिएट होता है. औनलाइन सट्टेबाजी में शुरुआत में लोग जीतते हैं, जिस से उन्हें अच्छा लगता है. यह एक तरह की बीमारी है, जिसे मनोचिकित्सा में पैथोलौजिकल गैंबलिंग कहा जाता है.

इस में रोगी कुछ सोचेविचारे बिना काम करने लगता है. शुरू में वह कमाई करने के लिए खेलता है. पर औनलाइन गेम इस तरह प्रोग्राम किया जाता है कि वह खेलने वाले को औड और इवन क्रम में जिताता और हराता है. अंत में यूजर हार जाता है. दिमाग के अंदर एक रिवार्डिंग कैमिकल डोपामाइन होता है. एक बार रिवार्ड मिलने पर बारबार रिवार्ड प्रयास करते हैं. पैसे हार जाने के बाद शरम लगती है. जिस की भरपाई करने के लिए खेलने वाला अधिक पैसे लगाता है.

दरअसल, सट्टा तो पहले भी लोग खेलते थे. पर पहले लोग हिसाब रखते थे. औनलाइन गेमिंग ने ऐसी स्थिति खड़ी कर दी है कि युवा किसी भी तरह का हिसाब रखे बिना पैसा लगाते हैं.

छत्तीसगढ़ में महादेव सट्टेबाजी ऐप का खुलासा होने के बाद केंद्र सरकार के इलेक्ट्रौनिक्स और इनफौर्मेशन मंत्रालय ने 122 गैरकानूनी सट्टेबाजी ऐप्स को प्रतिबंधित कर दिया है. महादेव ऐप पर तरहतरह के गेम खेलाए जाते थे. जिस में कार्ड गेम, चांस गेम, क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस, फुटबाल शामिल थे. इस के द्वारा यूजर आईडी बना कर सट्टेबाजी की जाती थी. मनी लौंड्रिंग होती थी और पैसा बेनामी खाते में जाता था.

ईडी ने भी कहा है कि महादेव ऐप के प्रमोटर ने यूएई से 508 करोड़ रुपए कुरिअर द्वारा छत्तीसगढ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को दिए थे. इस के पहले मार्च, 2023 में आईटी मंत्रालय ने 138 सट्टेबाजी और जुए के ऐप पर प्रतिबंध लगाया था.

केंद्र सरकार ने इन सट्टेबाजी ऐप्स पर भले ही प्रतिबंध लगा दिया है, पर अभी भी सट्टेबाजी के अनेक ऐप्स चल रहे हैं. यह उसी पैटर्न पर काम कर रहे हैं, जिस तरह महादेव बेटिंग ऐप काम करता था.

नोट: कहानी में कुछ पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं.

फोन बना दोधारी तलवार

पूनम का मूड सुबह से ही ठीक नहीं था. बच्चों को स्कूल भेजने का भी उस का मन नहीं हो रहा था. पर बच्चों को स्कूल भेजना जरूरी था, इसलिए किसी तरह उस ने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज दिया. पूनम के चेहरे पर एक अजीब सा खौफ था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी परेशानी किस से कहे. वह सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गई.

पूनम का मूड खराब देख कर उस के पति विनय ने हंसते हुए पूछा, ‘‘डार्लिंग, तुम कुछ परेशान सी लग रही हो. आखिर बात क्या है?’’

पूनम ने पलकें उठा कर पति को देखा. फिर उस की आंखों से आंसू बहने लगे. वह फूट फूट कर इस तरह रोने लगी, जैसे गहरे सदमे में हो.

विनय ने करीब आ कर उसे सीने से लगा लिया और उस के आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ‘‘क्या हुआ पूनम, तुम मुझ से नाराज हो क्या? क्या तुम्हें मेरी कोई बात बुरी लग गई?’’

‘‘नहीं,’’ पूनम सुबकते हुए बोली.

‘‘तो फिर क्या बात है, जो तुम इस तरह रो रही हो?’’ विनय ने हमदर्दी दिखाई.

पति का प्यार मिलते ही पूनम ने मोबाइल की ओर इशारा कर के सुबकते हुए बोली, ‘‘मेरी परेशानी का कारण यह मोबाइल है.’’

विनय ने हैरत से एक नजर मेज पर रखे मोबाइल फोन पर डाली, उस के बाद पत्नी से मुखातिब हुआ, ‘‘मैं समझा नहीं, इस मोबाइल से तुम्हारी परेशानी का क्या संबंध है? साफसाफ बताओ, तुम कहना क्या चाहती हो?’’

पूनम मेज से मोबाइल उठा कर पति के हाथ में देते हुए बोली, ‘‘आप खुद ही देख लो. इस के मैसेज बौक्स में क्या लिखा है?’’

विनय की उत्सुकता बढ़ गई. उस ने फटाफट फोन के मैसेज का इनबौक्स खोल कर देखा. जैसे ही उस ने मैसेज पढ़ा, उस के चेहरे पर एक साथ कई रंग आए गए.

मैसेज में लिखा था, ‘मेरी जान, तुम ने मुझे अपने रूप का दीवाना बना दिया है. मैं ने जब से तुम्हें देखा है, चैन से जी नहीं पा रहा हूं. मैं तुम्हें जब भी विनय के साथ देखता हूं, मेरा खून खौल जाता है. आखिर तुम उस के साथ जिंदगी कैसे गुजार रही हो. मैं ने जिस दिन से तुम्हें देखा है, मेरी आंखों से नींद उड़ चुकी है.’

मैसेज पढ़ कर विनय को गुस्सा आ गया. फोन को मेज पर रख कर उस ने पत्नी से कहा, ‘‘ये सब क्या है?’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानती.’’ पूनम दबी जुबान से बोली.

विनय कुछ देर सोचता रहा, फिर उस ने पत्नी की आंखें में झांका. उसे लगा कि पत्नी सच बोल रही है, क्योंकि अगर वह उस के साथ गेम खेल रही होती तो इस तरह परेशानी और रुआंसी नहीं होती. उसे लगा कि वाकई कोई उस की पत्नी को परेशान कर रहा है.

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के कल्याणपुर थाने का एक मोहल्ला है शारदानगर. इसी मोहल्ले के इंद्रपुरी में विनय झा अपने परिवार के साथ रहता था. उस का अपना आलीशान मकान था, जिस में सभी भौतिक सुखसुविधाएं थीं. उस का हौजरी का व्यवसाय था. इस से उसे अच्छीखासी आमदनी होती थी, जिस से उस की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत थी.

विनय झा इस से पहले अपने भाइयों के साथ दर्शनपुरवा में रहता था. वहां उस का अपना छोटा सा कारखाना था. उस का परिवार काफी दबंग किस्म का था. दबंगई से ही इन लोगों ने पैसा कमाया और फिर उसी पैसे से हौजरी का काम शुरू किया. व्यवसाय अच्छा चलने लगा तो विनय ने इंद्रपुरी में मकान बनवा लिया.

पूनम से विनय की शादी कुछ साल पहले हुई थी. पूनम बेहद खूबसूरत थी. पहली ही नजर में विनय उस का दीवाना हो गया था. उस की दीवानगी पूनम को भी भा गई. दोनों की पसंद के बाद उन की शादी हो गई. दोनों ही अपने गृहस्थ जीवन में खुश थे. 8 साल के अंतराल में पूनम 2 बच्चों की मां बन गई.

ससुराल में सभी भौतिक सुखसुविधाएं थीं. उसे किसी भी चीज की कमी नहीं थी. पति भी चाहने वाला मिला था. सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक पूनम को अश्लील मैसेज तथा प्रेमप्रदर्शन वाले फोन आने लगे. पूनम पति का गुस्सा जानती थी, अत: पहले तो उस ने पति को कुछ नहीं बताया, पर जब अति हो गई तो मजबूरी में बताना पड़ा.

विनय झा ने जब पत्नी के फोन में आए हुए मैसेज पढ़े तो उस की आंखों में खून उतर आया. जिस फोन नंबर से मैसेज आए थे, विनय ने उस नंबर पर काल की तो फोन रिसीव नहीं किया गया. इस पर विनय गुस्से में बड़बड़ाया, ‘‘कमीने…तू एक बार सामने आ जा. अगर तुझे जिंदा दफन न कर दिया तो मेरा नाम विनय नहीं.’’

गुस्से में कांपते विनय ने पूनम से पूछा, ‘‘क्या वह तुम्हें फोन भी करता है?’’

‘‘हां,’’ पूनम ने सिर हिलाया.

‘‘क्या कहता है?’’

‘‘नाजायज संबंध बनाने को कहता है. अब कैसे बताऊं आप को, इस ने तो मेरी जान ही सुखा दी है. लो, आप दूसरे मैसेज भी पढ़ लो. इन से पता चल जाएगा कि उस की मानसिकता क्या है.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ कि वह तुम्हें फोन कब करता है या मैसेज कब भेजता है?’’ विनय ने पूछा.

‘‘जब आप घर पर नहीं होते, तभी उस के फोन आते हैं. जब आप घर पर होते हो तो न फोन आता है न मैसेज.’’ वह बोली.

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि वह मुझ पर निगाह रखता है. उसे मेरे घर जानेआने का वक्त भी मालूम है.’’ कहते हुए विनय ने मैसेज बौक्स खोल कर दूसरे मैसेज भी पढ़े. एक मैसेज तो बहुत जुनूनी था, ‘‘तुम मुझ से क्यों नहीं मिलतीं? रात को सपने में तो खूब आती हो. अपने गोरे बदन को मेरे बदन से सटा कर प्यार करती हो. आह जान, तुम कितनी प्यारी हो. एक बार मुझ से साक्षात मिल कर मेरी जन्मों की… नहीं तो समझ लेना मैं तुम्हारी चौखट पर आ कर जान दे दूंगा. अभी तो मैं इसलिए चुप हूं कि तुम्हें रुसवा नहीं करना चाहता.’’

मैसेज पढ़ कर विनय की मुट्ठियां भिंच गईं, ‘‘कमीने, तेरी प्यास तो मैं बुझाऊंगा. तू जान क्या देगा, मैं ही तेरी जान ले लूंगा.’’

पति का रूप देख कर पूनम का कलेजा कांप उठा. उसे लगा कि उस ने पति को बता कर कहीं गलती तो नहीं कर दी. विनय ने डरीसहमी पत्नी को मोबाइल देते हुए समझाया, ‘‘अब जब उस का फोन आए तो उस से बात करना. मीठीमीठी बातें कर के उस का नाम व पता हासिल कर लेना. इस के बाद मैं उस के सिर से प्यार का भूत उतार दूंगा.’’

पति की बात पर सहमति जताते हुए पूनम ने हामी भर दी.

एक दिन विनय जैसे ही घर से निकला, पूनम के मोबाइल पर उस का फोन आ गया. पूनम के हैलो कहते ही वह बोला, ‘‘पूनम, तुम मुझे भूल गई, लेकिन मैं तुम्हें नहीं भूला और न भूलूंगा. याद है, हम दोनों की पहली मुलाकात कब और कहां हुई थी?’’

पूनम अपने दिमाग पर जोर डाल कर कुछ याद करने की कोशिश करने लगी. तभी उस ने कहा, ‘‘2 साल पहले, जब मैं तुम्हारे घर फर्नीचर बनाने आया था. याद है, उस समय मैं तुम्हारे इर्दगिर्द रहा करता था. तुम्हारी खूबसूरती को निहारता रहता था. तुम इतराती इठलाती होंठों पर मुसकान बिखेरती इधर से उधर निकल जाती थी और मैं तड़पता रह जाता था.’’

‘‘अच्छा, तब से तुम मेरे दीवाने हो. पागल, तब प्यार का इजहार क्यों नहीं किया? अच्छा, तुम्हारा नाम मुझे याद नहीं आ रहा, अपने बारे में थोड़ा बताओ न.’’ पूनम खिलखिला कर हंसी.

‘‘हाय मेरी जान, तुम हंसती हो तो मेरे दिल में घंटियां सी बज उठती हैं. सो स्वीट यू आर.’’ उधर से रोमांटिक स्वर में कहा गया, ‘‘मैं तुम्हारा दीवाना विजय यादव बोल रहा हूं.’’

विजय यादव का नाम सुनते ही पूनम चौंकी. अब उसे उस की शक्लसूरत भी याद आ गई. इस के बाद पूनम ने उसे समझाया, ‘‘देखो विजय, अब बहुत हो गया. मैं किसी की पत्नी हूं, तुम्हें ऐसे मैसेज भेजते हुए शर्म आनी चाहिए. मैं कह देती हूं कि आइंदा मुझे न फोन करना और न मैसेज करना, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’

पूनम ने फोन काटा ही था कि उस का पति विनय आ गया. उस ने पूछा, ‘‘किस का फोन था?’’

‘‘उसी का जो फोन करता है और अश्लील मैसेज भेजता है. आज मैं ने जान लिया कि वह कौन है.’’ पूनम ने विनय को बताया, ‘‘विजय यादव जो अपने यहां फर्नीचर बनाने आया था, वही यह सब कर रहा है. वैसे मैं ने उसे ठीक से समझा दिया है, शायद अब वह ऐसी हरकत न करे.’’

विजय यादव उर्फ   के पिता रामकरन यादव रावतपुर क्षेत्र के केशवनगर में रहते थे. रामकरन फील्डगन फैक्ट्री में काम करते थे. उन के 3 बेटों में इंद्रबहादुर मंझला था. वह बजरंग दल का नेता था और प्रौपर्टी तथा फर्नीचर का व्यवसाय करता था. ब्रह्मदेव चौराहा पर उस की फर्नीचर की दुकान थी. दुकान पर करीब आधा दर्जन से ज्यादा कारीगर काम करते थे.

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इंद्रबहादुर आर्थिक रूप से संपन्न होने के साथ दबंग भी था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां थीं. वह बजरंग दल का जिला संयोजक था. उस की एक बड़ी खराब आदत थी उस का अय्याश होना. घर में खूबसूरत बीवी होने के बावजूद वह इधर धर मुंह मारता रहता था.

करीब 2 साल पहले इंद्रबहादुर इंद्रपुरी में  विनय झा के घर फर्नीचर बनाने आया था. उस समय जब उस ने खूबसूरत पूनम को देखा तो वह उस पर मर मिटा. उस ने उसी समय उसे अपने दिल में बसा लिया. उस के बाद वह किसी न किसी बहाने उस के आगे पीछे मंडराने लगा. किसी बहाने से उस ने पूनम का फोन नंबर ले लिया. फिर वह उसे फोन करने लगा और अश्लील मैसेज भेजने लगा.

पूनम के समझाने के बाद वाकई कुछ दिनों तक इंद्रबहादुर ने उसे न तो फोन किया और न ही मैसेज भेजे. इस से पूनम को तसल्ली हुई. पर 15-20 दिनों बाद उस की यह खुशी परेशानी में बदल गई. वह फिर से उसे फोन करने लगा.

एक रोज तो विजय ने हद कर दी. उस ने फोन पर पूनम से कहा कि अब उस से रहा नहीं जाता. उस की तड़प बढ़ती जा रही है. वह उस से मिल कर अपने अरमान पूरे करना चाहता है. गुरुदेव चौराहा आ कर मिलो. उस ने यह भी कहा कि अगर वह नहीं आई तो वह खुद उस के घर आ जाएगा.

इंद्रबहादुर की धमकी से पूनम डर गई. वह नहीं चाहती थी कि वह उस के घर आए. क्योंकि वह पति व परिवार के अन्य सदस्यों की निगाहों में गिरना नहीं चाहती थी. इसलिए वह उस से मिलने गुरुदेव चौराहे पर पहुंच गई. वहां वह उस का इंतजार कर रहा था. पूनम ने उस से घरपरिवार की इज्जत की भीख मांगी, लेकिन वह नहीं पसीजा. वह एकांत में मिलने का दबाव बनाता रहा.

इस के बाद तो यह सिलसिला ही बन गया. इंद्रबहादुर जब बुलाता, पूनम डर के मारे उस से मिलने पहुंच जाती. इस मुलाकात की पति व परिवार के किसी अन्य सदस्य को भनक तक न लगती. एक दिन तो इंद्रबहादुर ने पूनम को जहरीला पदार्थ देते हुए कहा, ‘‘मेरी जान, तुम इसे अपने पति को खाने की किसी चीज में मिला कर खिला देना. कांटा निकल जाने पर हम दोनों मौज से रहेंगे.’’

पूनम जहरीला पदार्थ ले कर घर आ गई. उस ने उस जहर को पति को तो नहीं दिया, लेकिन खुद उस का कुछ अंश दूध में मिला कर पी गई. जहर ने असर दिखाना शुरू किया तो वह तड़पने लगी. विनय उसे तुरंत अस्पताल ले गया, जिस से पूनम की जान बच गई. विनय ने पूनम से जहर खाने की बाबत पूछा तो उस ने सारी सच्चाई बता दी.

इस के बाद पूनम को ले कर इंद्रबहादुर और विनय में झगड़ा होने लगा. दोनों एकदूसरे को देख लेने की धमकी देने लगे. इसी झगड़े में एक दिन आमनासामना होने पर इंद्रबहादुर ने छपेड़ा पुलिया पर विनय के पैर में गोली मार दी. विनय जख्मी हो कर गिर पड़ा. उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां किसी तरह विनय की जान बच गई.

विनय ने थाना कल्याणपुर में इंद्रबहादुर के खिलाफ भादंवि की धारा 307 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. विनय ने घटना के पीछे की असली बात को छिपा लिया. उस ने लेनदेन तथा महिला कर्मचारी को छेड़ने का मामला बताया. पुलिस ने भी अपनी विवेचना में पूनम का जिक्र नहीं किया. पुलिस ने इंद्रबहादुर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

लगभग 10 महीने तक इंद्रबहादुर जेल में रहा. इस के बाद 9 अक्तूबर, 2017 को वह कानपुर जेल से जमानत पर रिहा हुआ. जेल से बाहर आने के बाद वह फिर पूनम से मिलने की कोशिश करने लगा. लेकिन इस बार पूनम की ससुराल वाले सतर्क थे. उन्होंने पूनम का मोबाइल फोन बंद करा दिया था और घर पर कड़ी निगरानी रख रहे थे.

काफी मशक्कत के बाद भी जब वह पूनम तक नहीं पहुंच पाया, तब उस ने एक षडयंत्र रचा. षडयंत्र के तहत उस ने एक लड़की को सेल्सगर्ल बना कर विनय के घर भेजा और उस के जरिए पूनम को अपने नाम से लिया गया सिमकार्ड और मोबाइल फोन भिजवा दिया. पूनम के पास फोन पहुंचा तो विजय एक बार फिर पूनम के संपर्क में आ गया.

अब वह दिन में कईकई बार पूनम को फोन करने लगा. दोनों के बीच घंटों बातचीत होने लगी. बातचीत में विजय पूनम से एकांत में मिलने की बात कहता था. पूनम ने उसे उस की शादीशुदा जिंदगी और परिवार की इज्जत का हवाला दिया तो वह पूनम को बरगलाने की कोशिश करने लगा.

उस ने पूनम को समझाया कि वह अपने पति विनय की कार में चरस, स्मैक और तमंचा रख दे. यह सब चीजें वह उसे मुहैया करा देगा. इस के बाद वह पुलिस को फोन कर के विनय को पकड़वा देगा. विनय के जेल जाने के बाद दोनों आराम से साथ रहेंगे.

पूनम ने इंद्रबहादुर द्वारा फोन देने तथा बातचीत करने की जानकारी पति विनय को नहीं दी थी. दरअसल पूनम डर रही थी कि पति को बताने से वह भड़क जाएगा और उस से झगड़ा करेगा. इस झगड़े और मारपीट में कहीं उस के पति की जान न चली जाए. क्योंकि इंद्रबहादुर गोली मार कर विनय को पहले भी ट्रेलर दिखा चुका है.

इधर पति का साथ छोड़ने और अवैध संबंध बनाने की बात जब पूनम ने नहीं मानी तो इंद्रबहादुर ने एक और षडयंत्र रचा. उस ने पूनम को बदनाम करने के लिए रिचा झा और राधे झा नाम की फरजी आईडी से फेसबुक एकाउंट बना लिया. इस के बाद इंद्रबहादुर उर्फ विजय यादव ने पूनम के साथ अपनी अश्लील फोटो फेसबुक पर अपलोड कर इस की जानकारी उस के पति विनय, परिवार के अन्य लोगों तथा रिश्तेदारों को दे दी, ताकि वह बदनाम हो जाए.

विनय झा ने जब पूनम के साथ इंद्रबहादुर की अश्लील फोटो फेसबुक पर देखी तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने पूनम से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सारी सच्चाई विनय को बता दी.

सच्चाई जानने के बाद विनय ने इस गंभीर समस्या पर अपने बड़े भाई विनोद झा और भतीजे सत्यम उर्फ विक्की से बात की. विनोद व सत्यम भी फेसबुक पर पूनम अश्लील फोटो देख चुके थे. वे दोनों भी इस समस्या का निदान चाहते थे. गहन मंथन के बाद पूनम, विनय, विनोद तथा सत्यम उर्फ विक्की ने इंद्रबहादुर उर्फ विजय यादव की हत्या की योजना बनाई. हत्या की योजना में विनय ने अपने मामा के साले के लड़के अनुपम को भी शामिल कर लिया.

अनुपम गाजियाबाद का रहने वाला था. उस का आपराधिक रिकौर्ड था. वह पूर्वांचल के एक बड़े माफिया के संपर्क में भी रहा था. इस के बाद अनुपम ने पूनम, विनय, विनोद व सत्यम उर्फ विक्की के साथ विजय की हत्या की अंतिम रूपरेखा तैयार की और हत्या के लिए एक चापड़ खरीद कर रख लिया. इस के बाद अनुपम वापस गाजियाबाद चला गया.

24 सितंबर, 2017 को अनुपम अपने एक अन्य साथी के साथ कानपुर आया और विनय झा के घर पर रुका. उस ने इंद्रबहादुर की हत्या के संबंध में एक बार फिर पूनम, विनोद व सत्यम उर्फ विक्की से विचारविमर्श किया. इस के बाद वह उन के साथ वह जगह देखने गया, जहां इंद्रबहादुर उर्फ विजय यादव को षडयंत्र के तहत बुलाना था.

शाम पौने 6 बजे पूनम झा ने योजना के तहत इंद्रबहादुर को फोन किया. उस ने उसी मोबाइल से बात की, जो उस ने पूनम को भिजवाया था. फोन पर पूनम ने उस से कहा कि वह पति विनय को फंसा कर जेल भिजवा कर उस के साथ रहने को तैयार है, लेकिन इस से पहले वह उस की सारी योजना समझना चाहती है, इसलिए वह उस से मिलने अरमापुर थाने के पीछे मजार के पास आ जाए. चरस, स्मैक व असलहा भी साथ ले आए, ताकि मौका देख कर वह उस सामान को पति की गाड़ी में रख सके.

पूनम की बातों में फंस कर इंद्रबहादुर उर्फ विजय यादव अपनी बोलेरो गाड़ी से अरमापुर थाने के पीछे पहुंच गया. यह सुनसान इलाका है. वहां पूनम व उस का पति तथा अन्य साथी पहले से मौजूद थे. इंद्रबहादुर पूनम से बात करने लगा. उसी समय अनुपम ने रेंच से विजय के सिर पर पीछे से वार कर दिया. विजय लड़खड़ा कर जमीन पर गिरा तो पूनम के पति विनय झा, जेठ विनोद झा, भतीजे सत्यम उर्फ विक्की तथा अनुपम ने उसे दबोच लिया.

उसी समय पूनम विजय की छाती पर सवार हो गई और बोली, ‘‘कमीने, तूने मेरी और मेरे परिवार की इज्जत नीलाम कर बदनाम किया है. आज तुझे तेरे पापों की सजा दे कर रहूंगी.’’ कहते हुए पूनम ने चापड़ से विजय की गरदन पर वार कर दिया. गरदन पर गहरा घाव बना और खून बहने लगा. इस के बाद विनय ने चापड़ से कई वार किए. इस के बाद वे सब उसे मरा समझ कर वहां से भाग निकले. चापड़ उन्होंने पास की झाड़ी में छिपा दिया.

इंद्रबहादुर गंभीर घायलावस्था में पड़ा कराह रहा था. कुछ समय बाद उधर से एक राहगीर निकला तो इंद्रबहादुर ने आवाज दे कर उसे रोक लिया. उस ने राहगीर को अपने बड़े भाई वीरबहादुर यादव का नंबर दे कर कहा कि वह फोन कर के उसे उस के घायल होने की सूचना दे दे. उस राहगीर ने वीरबहादुर को सूचना दे दी.

सूचना पाते ही वीरबहादुर अपने साथियों के साथ वहां पहुंच गया. गंभीर रूप से घायल इंद्रबहादुर ने अपने बड़े भाई को बता दिया कि उस की यह हालत पूनम झा, उस के पति विनोद, भतीजे सत्यम उर्फ विक्की तथा रिश्तेदार अनुपम व उस के साथी ने की है. यह बता कर विजय बेहोश हो गया. वीरबहादुर ने भाई विजय यादव के बयान की मोबाइल पर वीडियो बना ली थी.

वीरबहादुर अपने घायल भाई इंद्रबहादुर को साथियों के साथ हैलट अस्पताल ले गया. पर उस की हालत गंभीर बनी हुई थी, इसलिए उसे वहां से रीजेंसी अस्पताल भेज दिया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. बजरंग दल के नेता इंद्रबहादुर की हत्या की खबर फैली तो हड़कंप मच गया.

उस के सैकड़ों समर्थक अस्पताल पहुंच गए. एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा को खबर लगी तो वह भी रीजेंसी अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने मृतक के परिजनों व समर्थकों को आश्वासन दिया कि हत्यारों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.

मीणा ने अरमापुर थानाप्रभारी समीर गुप्ता को आदेश दिया कि वह शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाएं तथा रिपोर्ट दर्ज कर अभियुक्तों के खिलाफ सख्त काररवाई करें. मीणा ने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया और पोस्टमार्टम हाउस व अस्पताल के बाहर भारी पुलिस फोर्स भी तैनात कर दिया.

एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा का आदेश पाते ही अरमापुर थानाप्रभारी समीर गुप्ता ने मृतक विजय यादव के भाई वीरबहादुर यादव से घटना के संबंध में बात की. उस ने भाई के मरने से पहले रिकौर्ड किया वीडियो उन्हें सौंप दिया.

वीरबहादुर की तहरीर पर पुलिस ने भादंवि की धारा 302 के तहत पूनम झा, उस के पति विनय, जेठ विनोद झा, भतीजे सत्यम उर्फ विक्की, रिश्तेदार अनुपम तथा उस के साथी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.

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चूंकि हत्या का यह मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए नामजद अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए एसएसपी ने एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में अरमापुर थानाप्रभारी समीर गुप्ता, क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर मनोज मिश्रा, क्राइम ब्रांच प्रभारी विनोद मिश्रा, सर्विलांस सेल प्रभारी देवी सिंह, कांस्टेबल चंदन कुमार गौड़, देवेंद्र कुमार, भूपेंद्र कुमार, धर्मेंद्र, ललित, राहुल कुमार तथा महिला कांस्टेबल पूजा को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने ताबड़तोड़ छापे मार कर 25 नवंबर की दोपहर पूनम झा, उस के पति विनय झा, जेठ विनोद झा तथा भतीजे सत्यम उर्फ विक्की को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई.

प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी खुद को बेकसूर बताते रहे, लेकिन जब पुलिस ने पूनम झा के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगाली तो उस में इंद्रबहादुर से घंटों बातचीत होने और घटना से पहले भी इंद्रबहादुर से बातचीत होने का रिकौर्ड सामने आ गया.

इस के बाद सख्ती करने पर सभी आरोपी टूट गए और हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन की निशानदेही पर झाडि़यों में छिपाया गया चापड़ तथा पूनम ने अपनी साड़ी बरामद करा दी, जो उस ने हत्या के समय पहनी थी.

पुलिस टीम ने सभी आरोपियों को एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा के सामने पेश किया. मीणा ने आननफानन प्रैस कौन्फ्रैंस बुला कर पत्रकारों के समक्ष घटना का खुलासा कर दिया. आरोपी विनय ने पत्रकारों को बताया कि इंद्रबहादुर जबरन उस की पत्नी के साथ संबंध बनाना चाहता था. इस के लिए वह पूनम पर दबाव बना रहा था. वह पूनम की मार्फत उसे तथा उस के परिवार को गलत धंधे में भी फंसाना चाहता था.

पूनम जब तैयार नहीं हुई तो उस ने फरजी फेसबुक आईडी बना कर पूनम को बदनाम किया. इसी के बाद उस ने विजय की हत्या की योजना बनाई और उसे मौत की नींद सुला दिया.

पुलिस ने 26 नवंबर, 2017 को सभी अभियुक्तों को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत स्वीकृत नहीं हुई थी. अभियुक्त अनुपम व उस का साथी फरार था. पुलिस उन की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

समाज की डोर पर 2 की फांसी

डेयरी संचालक भूरा राजपूत अपना काम निपटा कर वापस घर आया तो उस की नजर घरेलू कामों में लगीं बेटियों पर पड़ी. उन की 4 बेटियों में 3 तो घर में थीं लेकन सब से बड़ी बेटी शैफाली घर में नजर नहीं आई. उन्होंने पत्नी से पूछा, ‘‘रेनू, शैफाली दिखाई नहीं दे रही. वह कहीं गई है क्या?’’

‘‘अपनी सहेली शिवानी के घर गई है. कह रही थी, उस की किताबें वापस करनी हैं.’’ रेनू ने पति को बताया.

पत्नी की बात सुन कर भूरा झल्ला उठा, ‘‘मैं ने तुम्हें कितनी बार समझाया है कि शैफाली को अकेले घर से मत जाने दिया करो, लेकिन मेरी बात तुम्हारे दिमाग में घुसती कहां है. उसे जाना ही था तो अपनी छोटी बहन को साथ ले जाती. उस पर अब मुझे कतई भरोसा नहीं है.’’

पति की बात सही थी. इसलिए रेनू ने कोई जवाब नहीं दिया.

शैफाली सुबह 10 बजे अपनी मां रेनू से यह कह घर से निकली थी कि वह शिवानी को किताबें वापस कर घंटा सवा घंटा में वापस आ जाएगी. लेकिन दोपहर एक बजे तक भी वह घर नहीं लौटी थी. उसे गए हुए 3 घंटे हो गए थे. जैसेजैसे समय बीतता जा रहा था, वैसेवैसे रेनू और उस के पति भूरा की चिंता बढ़ती जा रही थी.

रेनू बारबार उस का मोबाइल नंबर मिला रही थी, लेकिन उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. जब भूरा से नहीं रहा गया तो शैफाली का पता लगाने के लिए घर से निकल पड़ा. उस ने बेटे अशोक को भी साथ ले लिया था.

शैफाली की सहेली शिवानी का घर गांव के दूसरे छोर पर था. भूरा राजपूत वहां पहुंचा तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. भूरा ने दरवाजा खटखटाया तो कुछ देर बाद शिवानी के भाई संदीप ने दरवाजा खोला. शैफाली के पिता को देख कर संदीप घबरा गया. लेकिन अपनी घबराहट को छिपाते हुए उस ने पूछा, ‘‘अंकल आप, कैसे आना हुआ?’’

भूरा गुस्से में बोला, ‘‘शैफाली और शिवानी कहां हैं?’’

‘‘अंकल शैफाली तो यहां नहीं आई. मेरी बहन शिवानी मातापिता और भाई के साथ गांव गई है. वे लोग 2 दिन बाद वापस आएंगे.’’ संदीप ने जवाब दिया.

संदीप की बात सुन कर भूरा अपशब्दों की बौछार करते हुए बोला, ‘‘संदीप, तू ज्यादा चालाक मत बन. तू ने मेरी भोलीभाली बेटी को अपने प्यार के जाल में फंसा रखा है. तू झूठ बोल रहा है कि शैफाली यहां नहीं आई. उसे जल्दी से घर के बाहर निकाल वरना पुलिस ला कर तेरी ऐसी ठुकाई कराऊंगा कि प्रेम का भूत उतर जाएगा.’’

‘‘अंकल मैं सच कह रहा हूं, शैफाली नहीं आई. न ही मैं ने उसे छिपाया है.’’ संदीप ने फिर अपनी बात दोहराई.

यह सुनते ही भूरा संदीप से भिड़ गया. उस ने संदीप के साथ हाथापाई की. फिर पुलिस लाने की धमकी दे कर चला गया. उस के जाते ही संदीप ने दरवाजा बंद कर लिया. यह बात 13 जून, 2019 की है. भूरा राजपूत लगभग 2 बजे पुलिस चौकी मंधना पहुंचा.  संयोग से उस समय बिठूर थाना प्रभारी विनोद कुमार सिंह भी चौकी पर मौजूद थे.

भूरा ने उन्हें बताया, ‘‘सर, मेरा नाम भूरा राजपूत है और मैं कछियाना गांव का रहने वाला हूं. मेरे गांव में संदीप रहता है. उस ने मेरी बेटी शैफाली को बहलाफुसला कर अपने घर में छिपा रखा है. शायद वह शैफाली को साथ भगा ले जाना चाहता है. आप मेरी बेटी को मुक्त कराएं.’’

चूंकि मामला लड़की का था. थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह पुलिस के साथ कछियाना गांव निवासी संदीप के घर जा पहुंचे. घर का मुख्य दरवाजा बंद था. थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह ने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, साथ ही आवाज भी लगाई. लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.

संदीप के दरवाजे पर पुलिस देख कर पड़ोसी भी अपने घरों से बाहर आ गए. वे लोग जानने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर संदीप के घर ऐसा क्या हुआ जो पुलिस आई है. जब दरवाजा नहीं खुला तो थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ पड़ोसी विजय तिवारी की छत से हो कर संदीप के घर में दाखिल हुए.

घर के अंदर एक कमरे का दृश्य देख कर सभी पुलिस वाले दहल उठे. कमरे के अंदर संदीप और शैफाली के शव पंखे के सहारे साड़ी के फंदे से झूल रहे थे. इस के बाद गांव में कोहराम मच गया. भूरा राजपूत और उस की पत्नी रेनू बेटी का शव देख कर फफक पड़े. शैफाली की बहनें भी फूटफूट कर रोने लगीं. पड़ोसी विजय तिवारी ने संदीप द्वारा आत्महत्या करने की सूचना उस के पिता दिनेश कमल को दे दी.

थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह ने प्रेमी युगल द्वारा आत्महत्या करने की बात वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी तो कुछ देर बाद एसपी (पश्चिम) संजीव सुमन तथा सीओ अजीत कुमार घटनास्थल पर आ गए. उन्होंने फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

उस के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और फंदों से लटके शव नीचे उतरवाए. मृतक संदीप की उम्र 20-22 वर्ष थी, जबकि मृतका शैफाली की उम्र 18 वर्ष के आसपास. मौके पर फोरैंसिक टीम ने भी जांच की.

टीम ने मृतक संदीप की जेब से मिले पर्स व मोबाइल को जांच के लिए कब्जे में ले लिया. मृतका शैफाली की चप्पलें और मोबाइल भी सुरक्षित रख ली गईं. पुलिस टीम ने वह साड़ी भी जांच की काररवाई में शामिल कर ली जिस से प्रेमीयुगल ने फांसी लगाई थी.

दोनों के परिजनों ने लगाए एकदूसरे पर आरोप

अब तक मृतक संदीप के मातापिता  व भाईबहन भी गांव से लौट आए थे और शव देख कर बिलखबिलख कर रोने लगे. संदीप की मां माधुरी गांव जाने से पहले उस के लिए परांठा सब्जी बना कर रख कर गई थी. संदीप ने वही खाया था.

पुलिस अधिकारियों ने मृतकों के परिजनों से घटना के संबंध में पूछताछ की और दोनों के शव पोस्टमार्टम हेतु लाला लाजपत राय अस्पताल कानपुर भिजवा दिए. मृतकों के परिजन एकदूसरे पर दोषारोपण कर रहे थे, जिस से गांव में तनाव की स्थिति बनती जा रही थी. इसलिए पुलिस अधिकारियों ने सुरक्षा की दृष्टि से गांव में पुलिस तैनात कर दी. साथ ही आननफानन में पोस्टमार्टम करा कर शव उन के घर वालों को सौंप दिए.

कानपुर महानगर से 15 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक कस्बा है मंधना. जो थाना बिठूर के क्षेत्र में आता है. मंधना कस्बे से कुरसोली जाने वाली रोड पर एक गांव है कछियाना. मंधना कस्बे से मात्र एक किलोमीटर दूर बसा यह गांव सभी भौतिक सुविधाओं वाला गांव है.

भूरा राजपूत अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता है. उस के परिवार में पत्नी रेनू के अलावा एक बेटा अशोक तथा 4 बेटियां शैफाली, लवली, बबली और अंजू थीं. भूरा राजपूत डेयरी चलाता था. इस काम में उसे अच्छी आमदनी होती थी. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

भाईबहनों में बड़ी शैफाली थी. वह आकर्षक नयननक्श वाली सुंदर युवती थी. वैसे भी जवानी में तो हर युवती सुंदर लगती है. शैफाली की तो बात ही कुछ और थी. वह जितनी खूबसूरत थी, पढ़ने में उतनी ही तेज थी. उस ने सरस्वती शिक्षा सदन इंटर कालेज मंधना से हाईस्कूल पास कर लिया था. फिलहाल वह 11वीं में पढ़ रही थी.

पढ़ाई लिखाई में तेज होने के कारण उस के नाज नखरे कुछ ज्यादा ही थे. लेकिन संस्कार अच्छे थे. स्वभाव से वह तेजतर्रार थी, पासपड़ोस के लोग उसे बोल्ड लड़की मानते थे.

कछियाना गांव के पूर्वी छोर पर दिनेश कमल रहते थे. उन के परिवार में पत्नी माधुरी के अलावा 2 बेटे थे. संदीप उर्फ गोलू, प्रदीप उर्फ मुन्ना और बेटी शिवानी थी. दिनेश कमल मूल रूप से कानपुर देहात जनपद के रूरा थाने के अंतर्गत चिलौली गांव के रहने वाले थे. वहां उन की पुश्तैनी जमीन थी. जिस में अच्छी उपज होती थी. दिनेश ने कछियाना गांव में ही एक प्लौट खरीद कर मकान बनवा लिया था. इस मकान में वह परिवार सहित रहते थे. वह चौबेपुर स्थित एक फैक्ट्री में काम करते थे.

दिनेश कमल का बेटा संदीप और बेटी शिवानी पढ़ने में तेज थे. इंटरमीडिएट पास करने के बाद संदीप ने आईटीआई कानपुर में दाखिला ले लिया. वह मशीनिस्ट ट्रेड से पढ़ाई कर रहा था.

शैफाली की सहेली का भाई था संदीप

शिवानी और शैफाली एक ही गांव की रहने वाली थीं, एक ही कालेज में साथसाथ पढ़ती थीं. अत: दोनों में गहरी दोस्ती थीं. दोनों सहेलियां एक साथ साइकिल से कालेज आतीजाती थीं. जब कभी शैफाली का कोर्स पिछड़ जाता तो वह शिवानी से कौपी किताब मांग कर कोर्स पूरा कर लेती और जब शिवानी पिछड़ जाती तो शैफाली की मदद से काम पूरा कर लेती. दोनों के बीच जातिबिरादरी का भेद नहीं था. लंच बौक्स भी दोनों मिलबांट कर खाती थीं.

एक रोज कालेज से छुट्टी होने के बाद शिवानी और शैफाली घर वापस आ रही थीं. तभी रास्ते में अचानक शैफाली का दुपट्टा उस की साइकिल की चेन में फंस गया. शैफाली और शिवानी दुपट्टा निकालने का प्रयास कर रही थीं, लेकिन वह निकल नहीं रहा था.

उसी समय पीछे से शिवानी का भाई संदीप आ गया. वह मंधना बाजार से सामान ले कर लौट रहा था. उस ने शिवानी को परेशान हाल देखा तो स्कूटर सड़क किनारे खड़ा कर के पूछा, ‘‘क्या बात है शिवानी, तुम परेशान दिख रही हो?’’

‘‘हां, भैया देखो ना शैफाली का दुपट्टा साइकिल की चेन में फंस गया है. निकल ही नहीं रहा है.’’

‘‘तुम परेशान न हो, मैं निकाल देता हूं.’’ कहते हुए संदीप ने प्रयास किया तो शैफाली का दुपट्टा निकल गया. उस रोज संदीप और शैफाली की पहली मुलाकात हुई. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए. खूबसूरत शैफाली को देख कर संदीप को लगा यही मेरी सपनों की रानी है. हृष्टपुष्ट स्मार्ट संदीप को देख कर शैफाली भी प्रभावित हो गई.

सहेली के भाई से हो गया प्यार

उसी दिन से दोनों के दिलों में प्यार की भावना पैदा हुई तो मिलन की उमंगें हिलोरें मारने लगीं. आखिर एक रोज शैफाली से नहीं रहा गया तो उस के कदम संदीप के घर की ओर बढ़ गए. उस रोज शनिवार था. आसमान पर घने बादल छाए थे, ठंडी हवा चल रही थी. संदीप घर पर अकेला था. वह कमरे में बैठा टीवी पर आ रही फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ देख रहा था. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. संदीप ने दरवाजा खोला तो सामने खड़ी शैफाली मुसकरा रही थी.

‘‘शिवानी है?’’ वह बोली.

‘‘वह तो मां के साथ बाजार गई है, आओ बैठो. मैं शिवानी को फोन कर देता हूं.’’ संदीप ने कहा.

‘‘मैं बाद में आ जाऊंगी.’’ शैफाली ने कहा ही था कि मूसलाधार बारिश शुरू हो गई.

‘‘अब कहां जाओगी?’’

‘‘जी.’’ कहते हुए शैफाली कमरे में आ गई और संदीप के पास बैठ कर फिल्म देखने लगी.

कमरे का एकांत हो 2 युवा विपरीत लिंगी बैठे हों, और टीवी पर रोमांटिक फिल्म चल रही हो तो माहौल खुदबखुद रूमानी हो जाता है. ऐसा ही हुआ भी शैफाली ने फिल्म देखते देखते संदीप से कहा, ‘‘संदीप एक बात पूछूं?’’

‘‘पूछो?’’

‘‘प्यार करने वालों का अंजाम क्या ऐसा ही होता है.’’

‘‘कोई जरूरी नहीं.’’ संदीप ने कहा, ‘‘प्यार  करने वाले अगर समय के साथ खुद अनुकूल फैसला लें और समझौता न कर के आगे बढ़ें तो उन का अंत सुखद होगा.’’

‘‘अपनी बात तो थोड़ा स्पष्ट करो.’’

‘‘देखो शैफाली, मैं समझौतावादी नहीं हूं. मैं तो तुरत फुरत में विश्वास करता हूं और दूसरे मेरा मानना है कि जो चीज सहज हासिल न हो उसे खरीद लो.’’

‘‘अच्छा संदीप अगर मैं कहूं कि मैं तुम से प्यार करती हूं, तब तुम मेरा प्यार हासिल करना चाहोगे या खरीदना पसंद करोगे?’’

शैफाली के सवाल पर संदीप चौंका. उस का चौंकना स्वाभाविक था. वह यह तो जानता था कि शैफाली बोल्ड लड़की है, लेकिन उस की बोल्डनैस उसे क्लीन बोल्ड कर देगी, वह नहीं जानता था. संदीप, शैफाली के प्रश्न का उत्तर दे पाता, उस के पहले ही शिवानी मां के साथ बाजार से लौट आई. आते ही शिवानी ने चुटकी ली, ‘‘शैफाली, संदीप भैया से मिल लीं. आजकल तुम्हारे ही गुणगान करता रहता है ये.’’

‘‘धत…’’ शैफाली ने शरमाते हुए उसे झिड़क दिया. फिर कुछ देर दोनों सहेलियां हंसी मजाक करती रहीं. थोड़ा रुक कर शैफाली अपने घर चली गई.

बढ़ने लगा प्यार का पौधा

उस दिन के बाद दोनों में औपचारिक बातचीत होने लगी. दिल धीरेधीरे करीब आ रहे थे. संदीप शैफाली को पूरा मानसम्मान देने लगा था. जब भी दोनों का आमना सामना होता, संदीप मुसकराता तो शैफाली के होंठों पर भी मुसकान तैरने लगती. अब दोनों की मुसकराहट लगातार रंग दिखाने लगी थी.

एक रविवार को संदीप यों ही स्कूटर से घूम रहा था कि इत्तेफाक से उस की मुलाकात शैफाली से हो गई. शैफाली कुछ सामान खरीदने मंधना बाजार गई थी. चूंकि शैफाली के मन में संदीप के प्रति चाहत थी. इसलिए उसे संदीप का मिलना अच्छा लगा. उसने मुसकरा कर पूछा, ‘‘तुम बाजार में क्या खरीदने आए थे?’’

‘‘मैं बाजार से कुछ खरीदने नहीं बल्कि घूमने आया था. मुझे पंडित रेस्तरां की चाय बहुत पसंद है. तुम भी मेरे साथ चलो. तुम्हारे साथ हम भी वहां एक कप चाय पी लेंगे.’’

‘‘जरूर.’’ शैफाली फौरन तैयार हो गई.

पास ही पंडित रेस्तरां था. दोनों जा कर रेस्तरां में बैठ गए. चायनाश्ते का और्डर देने के बाद संदीप शैफाली से मुखातिब हुआ, ‘‘बहुत दिनों से मैं तुम से अपने मन की बात कहना चाह रहा था. आज मौका मिला है, इसलिए सोच रहा हूं कि कह ही दूं.’’

शैफाली की धड़कनें तेज हो गईं. वह समझ रही थी कि संदीप के मन में क्या है और वह उस से क्या कहना चाह रहा है. कई बार शैफाली ने रात के सन्नाटे में संदीप के बारे में बहुत सोचा था.

उस के बाद इस नतीजे पर पहुंची थी कि संदीप अच्छा लड़का है. जीवनसाथी के लिए उस के योग्य है. लिहाजा उस ने सोच लिया था कि अगर संदीप ने प्यार का इजहार किया तो वह उस की मोहब्बत कबूल कर लेगी.

‘‘जो कहूंगा, अच्छा ही कहूंगा.’’ कहते हुए संदीप ने शैफाली का हाथ पकड़ा और सीधे मन की बात कह दी, ‘‘शैफाली मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

शैफाली ने उसे प्यार की नजर से देखा, ‘‘मैं भी तुम से प्यार करती हूं संदीप, और यह भी जानती हूं कि प्यार में कोई शर्त नहीं होती. लेकिन दिल की तसल्ली के लिए एक प्रश्न पूछना चाहती हूं. यह बताओ कि मोहब्बत के इस सिलसिले को तुम कहां तक ले जाओगे?’’

साथ निभाने की खाईं कसमें

‘‘जिंदगी की आखिरी सांस तक.’’ संदीप भावुक हो गया, ‘‘शैफाली, मेरे लफ्ज किसी तरह का ढोंग नहीं हैं. मैं सचमुच तुम से प्यार करता हूं. प्यार से शुरू हो कर यह सिलसिला शादी पर खत्म होगा. उस के बाद हमारी जिंदगी साथसाथ गुजरेगी.’’

शैफाली ने भी भावुक हो कर उस के हाथ पर हाथ रख दिया, ‘‘प्यार के इस सफर में मुझे अकेला तो नहीं छोड़ दोगे?’’

‘‘शैफाली,’’ संदीप ने उस का हाथ दबाया, ‘‘जान दे दूंगा पर इश्क का ईमान नहीं जाने दूंगा.’’

शैफाली ने संदीप के होंठों को तर्जनी से छुआ और फिर उंगली चूम ली. उस की आंखों की चमक बता रही थी कि उसे जैसे चाहने वाले की तमन्ना थी, वैसा ही मिल गया है.

शैफाली और संदीप की प्रेम कहानी शुरू हो चुकी थी. गुपचुप मेलमुलाकातें और जीवन भर साथ निभाने के कसमेवादे, दिनों दिन उन का पे्रमिल रिश्ता चटख होता गया. दोनों का मेलमिलाप कराने में शैफाली की सहेली शिवानी अहम भूमिका निभाती रही.

एक दिन प्यार के क्षणों में बातोंबातों में संदीप ने बोला, ‘‘शैफाली, अपने मिलन के अब चंद महीने बाकी हैं. मैं कानपुर आईटीआई से मशीनिस्ट टे्रड का कोर्स कर रहा हूं. मेरा यह आखिरी साल है. डिप्लोमा मिलते ही मैं तुम से शादी कर लूंगा.’’

संदीप की बात सुन कर शैफाली खिलखिला कर हंस पड़ी.

संदीप ने अचकचा कर उसे देखा, ‘‘मैं इतनी सीरियस बात कर रहा हूं और तुम हंस रही हो.’’

‘‘बचकानी बात करोगे तो मुझे हंसी आएगी ही.’’

‘‘मैं ने कौन सी बचकानी बात कह दी?’’

‘‘शादी की बात.’’ शैफाली ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘बुद्धू शादी के बाद पत्नी की सारी जिम्मेदारियां पति की हो जाती हैं. एक पैसा तुम कमाते नहीं हो, मुझे खिलाओगे कैसे? मेरे खर्च और शौक कैसे पूरे करोगे?’’

‘‘यह मैं ने पहले से सोच रखा है,’’ संदीप बोला, ‘‘डिप्लोमा मिलते ही मैं दिल्ली या नोएडा जा कर कोई नौकरी कर लूंगा. शादी के बाद हम दिल्ली में ही अपनी अलग दुनिया बसाएंगे.’’

बनाने लगे सपनों का महल

संदीप की यह बात शैफाली को मन भा गई. दिल्ली उस के भी सपनों का शहर था. इसीलिए संदीप ने उस से दिल्ली में बसने की बात कही तो उस का मन खुशी से झूम उठा.

संदीप और शैफाली का प्यार परवान चढ़ ही रहा था कि एक दिन उन का भांडा फूट गया. हुआ यूं कि उस रोज शैफाली अपने कमरे में मोबाइल पर संदीप से प्यार भरी बातें कर रही थी. उस की बातें मां रेनू ने सुनीं तो उन का माथा ठनका. कुछ देर बाद उन्होंने उस से पूछा, ‘‘शैफाली, ये संदीप कौन है? उस से तुम कैसी अटपटी बातें करती हो?’’

शैफाली न डरी न लजाई, उस ने बता दिया, ‘‘मां संदीप मेरी सहेली शिवानी का भाई है. गांव के पूर्वी छोर पर रहता है. बहुत अच्छा लड़का है. हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं.’’

रेनू कुछ देर गंभीरता से सोचती रही, फिर बोली, ‘‘बेटी अभी तो तुम्हारी पढ़ने लिखने की उम्र है. प्यारव्यार के चक्कर में पड़ गई. वैसे तुम्हारी पसंद से शादी करने पर मुझे कोई एतराज नहीं है. किसी दिन उस लड़के को घर ले अना, मैं उस से मिल लूंगी और उस के बारे में पूछ लूंगी. सब ठीकठाक लगा तो तुम्हारे पापा को शादी के लिए राजी कर लूंगी.’’

3-4 दिन बाद शैफाली ने संदीप को चाय पर बुला लिया. होने वाली सास ने बुलाया है. यह जान कर संदीप के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. उसे विश्वास हो था कि शैफाली के घर वालों की स्वीकृति के बाद वह अपने घर वालों को भी मना लगा. उस ने अभी तक अपने मांबाप को अपने प्यार के बारे में कुछ भी नहीं बताया था. घर में उस की बहन शिवानी ही उस की प्रेम कहानी जानती थी.

शैफाली की मां रेनू ने संदीप को देखा तो उस की शक्ल सूरत, कदकाठी तो उन्हें पसंद आई. लेकिन जब जाति कुल के बारे में पूछा तो रेनू की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. संदीप दलित समाज का था.

नहीं बनी शादी की बात

संदीप के जाने के बाद रेनू ने शैफाली को डांटा, ‘‘यह क्या गजब किया. दिल लगाया भी तो एक दलित से. राजपूत और दलित का रिश्ता नहीं हो सकता. तू भूल जा उसे, इसी में हम सब की भलाई है. समाज उस से तुम्हारा रिश्ता स्वीकर नहीं करेगा. हम सब का हुक्कापानी बंद हो जाएगा. तुम्हारी अन्य बहनें भी कुंवारी बैठी रह जाएंगी. भाई को भी कोई अपनी बहनबेटी नहीं देगा.’’

शैफाली ने ठंडे दिमाग से सोचा तो उसे लगा कि मां जो कह रही हैं, सही बात है. इसलिए उस ने उस वक्त तो मां से वादा कर लिया कि वह संदीप को भूल जाएगी. लेकिन वह अपना वादा निभा नहीं सकी. वह संदीप को अपने दिल से निकाल नहीं पाई.

संदीप के बारे में वह जितना सोचती थी उस का प्यार उतना ही गहरा हो जाता. आखिर उस ने निश्चय कर लिया कि चाहे जो भी हो, वह संदीप का साथ नहीं छोड़ेगी. शादी भी संदीप से ही करेगी.

भूरा राजपूत को शैफाली और संदीप की प्रेम कहानी का पता चला तो उस ने पहले तो पत्नी रेनू को आड़े हाथों लिया, फिर शैफाली को जम कर फटकार लगाई. साथ ही चेतावनी भी दी, ‘‘शैफाली, तू कान खोल कर सुन ले, अगर तू इश्क के चक्कर में पड़ी तो तेरी पढ़ाई लिखाई बंद हो जाएगी और तुझे घर से बाहर जाने की इजाजत नहीं मिलेगी.’’

घर वालों के विरोध के कारण शैफाली भयभीत रहने लगी. वह अच्छी तरह जान गई थी कि परिवार वाले उस की शादी किसी भी कीमत पर संदीप के साथ नहीं करेंगे. उस ने यह बात संदीप को बताई तो उस का दिल बैठ गया. वह बोला, ‘‘शैफाली घर वाले विरोध करेंगे तो क्या तुम मुझे ठुकरा दोगी?’’

‘‘नहीं संदीप, ऐसा कभी नहीं होगा., मैं तुम से प्यार करती हूं और हमेशा करती रहूंगी. हम साथ जिएंगे, साथ मरेंगे.’’

‘‘मुझे तुम से यही उम्मीद थी, शैफाली.’’ कहते हुए संदीप ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. उस की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे.

रेनू अपनी बेटी शैफाली पर भरोसा करती थीं. उन्हें विश्वास था कि समझाने के बाद उस के सिर से इश्क का भूत उतर गया है. इसलिए उन्होंने शैफाली के घर से बाहर जाने पर एतराज नहीं किया. लेकिन उस का पति भूरा राजपूत शैफाली पर नजर रखता था. उस ने  पत्नी से कह रखा था कि शैफाली जब भी घर से निकले, छोटी बहन के साथ निकले.

संदीप ने बुला लिया शैफाली को

13 जून, 2019 की सुबह 8 बजे संदीप के पिता दिनेश कमल अपनी पत्नी माधुरी बेटी शिवानी तथा बेटे मुन्ना के साथ अपने गांव चिलौली (कानपुर देहात) चले गए. दरअसल, बरसात शुरू हो गई थी. उन्हें मकान की मरम्मत करानी थी. उन्हें वहां सप्ताह भर रुकना था. जाते समय संदीप की मां माधुरी ने उस से कहा, ‘‘बेटा संदीप, मैं ने पराठा, सब्जी बना कर रख दी है. भूख लगने पर खा लेना.’’.

मांबाप, भाईबहन के गांव चले जाने के बाद घर सूना हो गया. ऐसे में संदीप को तन्हाई सताने लगी. इस तनहाई को दूर करने के लिए उस ने अपनी प्रेमिका शैफाली को फोन किया, ‘‘हैलो, शैफाली आज मैं घर पर अकेला हूं. घर के सभी लोग गांव गए हैं. तुम्हारी याद सता रही थी. इसलिए जैसे भी हो तुम मेरे घर आ जाओ.’’

‘‘ठीक है संदीप, मैं आने की कोशिश करूंगी.’’ इस के बाद शैफाली तैयार हुई और मां से प्यार जताते हुए बोली, ‘‘मां, कुछ दिन पहले मैं अपनी सहेली शिवानी से कुछ किताबें लाई थी. उसे किताबें वापस करने उस के घर जाना है. घंटे भर बाद वापस आ जाऊंगी.’’ मां ने इस पर कोई ऐतराज नहीं किया.

शैफाली किताबें वापस करने का बहाना बना कर घर से निकली ओर संदीप के घर जा पहुंची. संदीप उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस के आते ही संदीप ने उसे बांहों में भर कर चुंबनों की झड़ी लगा दी. इस के बाद दोनों प्रेमालाप में डूब गए.

दोनों ने लगा लिया मौत को गले

इधर भूरा राजपूत घर पहुंचा तो उसे अन्य बेटियां तो घर में दिखीं पर शैफाली नहीं दिखी. उस ने पत्नी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह सहेली के घर किताबें वापस करने लगने लगी थी. यह सुनते ही भूरा का मथा ठनका. उसे शक हुआ कि शैफाली बहाने से घर से निकली है और प्रेमी संदीप से मिलने गई है.

भूरा ने कुछ देर शैफाली के लौटने का इंतजार किया, फिर उस की तलाश में घर से निकल से निकल पड़ा. वह सीधा संदीप के घर पहुंचा. संदीप घर पर ही था. शैफाली के बारे में पूछने पर उस ने भूरा से झूठ बोल दिया कि शैफाली उस के घर नहीं है. शैफाली को ले कर भूरा की संदीप से हाथापाई भी हुई फिर वह पुलिस लाने की धमकी दे कर वहां से पुलिस चौकी चला गया.

संदीप ने शैफाली को घर में ही छिपा दिया था. पिता की धमकी से वह डर गई थी. उस ने संदीप से कहा, ‘‘संदीप, घर वाले हम दोनों को एक नहीं होने देंगे. और मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती. अब तो बस एक ही रास्ता बचा है वह है मौत का. हम इस जन्म में न सही अगले जन्म में फिर मिलेंगे.’’

संदीप ने शैफाली को गौर से देखा फिर बोला, ‘‘शैफाली मैं भी तुहारे बिना नहीं जी सकता. मैं तुम्हारा साथ दूंगा. इस के बाद दोनों ने मिल कर पंखे के कुंडे से साड़ी बांधी और साड़ी के दोनों किनारों का फंदा बनाया, एकएक फंदा डाल कर दोनों झूल गए. कुछ ही देर में उन की मौत हो गई.

इधर भूरा राजपूत अपने साथ पुलिस ले कर संदीप के घर पहुंचा. बाद में पुलिस को कमरे में संदीप और शैफाली के शव फंदों से झूले मिले. इस के बाद दोनों परिवारों में कोहराम मच गया.

संतान प्राप्ति के लिए नरबलि, दोषियों को उम्रकैद

उस दिन कानपुर देहात की माती अदालत में आम दिनों से कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. सर्दी होने के बावजूद लोग 10 बजे से पहले ही कचहरी पहुंच गए थे. अपर जिला जज-13 पोक्सो वाकर शमीम रिजवी की अदालत के बाहर सब से ज्यादा भीड़ मौजूद थी. भीड़ में आम लोगों के अलावा वकील भी शामिल थे.

अदालत में भीड़ जुटने का कारण यह था कि उस दिन कानपुर देहात के बहुचर्चित मासूम मानसी अपहरण हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. इसलिए मानसी के मातापिता के अलावा उन के कई परिचित भी अदालत में आए हुए थे.

भीड़ में इस बात को ले कर खुसरफुसर हो रही थी कि अदालत क्या फैसला सुनाएगी. कोई कह रहा था कि आरोपियों को फांसी होगी तो कोई उम्रकैद होने का अनुमान लगा रहा था. दरअसल, इस मामले से कानपुर देहात की जनता का भावनात्मक जुड़ाव रहा था. इसलिए कानपुर देहात की जनता की नजरें फैसले पर टिकी हुई थीं.

अपर जिला जज वाकर शमीम रिजवी नियत समय पर कोर्टरूम आ कर अपनी कुरसी पर बैठ गए. उन के कुरसी पर बैठते ही अदालत में सन्नाटा छा गया. आरोपी परशुराम, सुनैना, अंकुल व वीरन अदालत के कटघरे में मौजूद थे. जज ने बारीबारी से उन पर नजर डाली. मृतका मानसी के घर वाले, शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय तथा विपक्ष के वकील ताराचंद्र व रवि तिवारी भी अदालत में मौजूद थे.

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अदालत में शांति बनाए रखने का आदेश देने के बाद अपर जिला जज वाकर शमीम रिजवी ने दंड के रूप में दी जाने वाली सजा पर दोनों पक्षों को ध्यान से सुना. अभियुक्तों के वकीलों का तर्क था कि इस से पहले अभियुक्तों ने कोई भी अपराध नहीं किया है. उन के खिलाफ अपराध भी पहली बार सिद्ध हुआ है, जो जघन्य से जघन्यतम नहीं है. इसलिए उन के करिअर, उम्र व भविष्य को देखते हुए उन्हें दिए जाने वाले दंड में नरमी बरती जानी चाहिए.

जबकि अभियोजन पक्ष की तरफ से जिला शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय ने उन की बात का विरोध करते हुए कहा कि 6 वर्षीय बच्ची की हत्या कर उस का कलेजा निकाल कर खाना बेहद क्रूरतम अपराध है.

उस की हत्या के पीछे तंत्रमंत्र बड़ा कारण था. इसलिए पैरों पर महावर लगाई गई थी. यह रेयरेस्ट औफ रेयर मामला है. इसलिए आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, इन्हें कम से कम फांसी की सजा दी जानी चाहिए.

वकीलों की दलीलें सुनने के बाद जज साहब ने शाम 4 बजे दोषियों को सजा सुनाने की बात कही. इस के बाद वह अपने चैंबर में चले गए. यह बात 16 दिसंबर, 2023 की है.

मासूम मानसी कौन थी? उस का अपहरण व हत्या क्यों की गई? यह सब जानने के लिए हमें करीब 3 साल पीछे जाना होगा.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है-घाटमपुर. इस कस्बे से कुछ दूरी पर स्थित है-भदरस गांव. कमल कुरील इसी दलित बाहुल्य गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी जयश्री के अलावा 2 बेटियां थीं, जिन में मानसी बड़ी थी. कमल कुरील किसान था. खेतीबाड़ी से ही वह अपने परिवार का भरणपोषण करता था. मानसी 6 वर्ष की थी, जबकि छोटी बेटी 4 वर्ष की.

किस ने दी बच्ची की बलि

14 नवंबर, 2020 को दीपावली का त्योहार था. शाम को नए कपड़े पहनकर मानसी व दया घर के बाहर अपनी सहेली के साथ खेल रही थीं. कुछ देर बाद दया तो घर वापस आ गई, लेकिन मानसी घर वापस नहीं आई. कमल व उस की पत्नी जयश्री तब मानसी की खोज में जुट गए.

अड़ोसपड़ोस के लोगों को मासूम मानसी के गायब होने की जानकारी हुई तो वे भी उस के मातापिता के साथ उस की खोज में जुट गए. उन्होंने गांव की हर गली, कोना छान मारा. खेतखलिहान, बागबगीचा भी खंगाला, तालाब, कुआं भी देखा, लेकिन मानसी का कुछ भी पता न चला.

सुबह 5 बजे कुछ लोग गांव के बाहर स्थित भद्रकाली मंदिर की तरफ गए तो उन्होंने मासूम मानसी की लाश भद्रकाली मंदिर के पास पड़ी देखी. हालात देख कर लग रहा था कि वहां उस की बलि दी गई थी. कमल व उस की पत्नी जयश्री को खबर लगी तो दोनों नंगे पांव ही भागे.

इसी बीच गाँव के किसी व्यक्ति ने दीपावली की रात गांव के कमल कुरील की 6 वर्षीय बेटी मानसी की बलि देने की सूचना थाना घाटमपुर के इंसपेक्टर राजीव सिंह को दे दी.

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खबर पाते ही एसएचओ पुलिस टीम के साथ भदरस गांव पहुंच गए. भद्रकाली मंदिर गांव के बाहर था. वहां भारी भीड़ जुटी थी. दरअसल, मासूम बच्ची की बलि चढ़ाए जाने की बात भदरस ही नहीं, बल्कि अड़ोस पड़ोस के गांवों तक फैल गई थी. अत: सैकड़ों लोगों की भीड़ वहां जमा थी.

भीड़ देख कर राजीव सिंह के हाथपांव फूल गए. क्योंकि वहां मौजूद लोगों में गुस्सा भी था. लोगों ने साफ कह दिया था कि जब तक एसएसपी घटनास्थल पर नहीं आएंगे, तब तक वह बच्ची के शव को नहीं उठने देंगे. इंसपेक्टर राजीव सिंह ने यह जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी, फिर जांच में जुट गए.

मानसी की नग्न लाश भद्रकाली मदिर के पास नीम के पेड़ के नीचे गन्नू तिवारी के खेत में पड़ी थी. शव के पास मृत बच्ची का पिता कमल कुरील बदहवास खड़ा था और उस की पत्नी जयश्री कुरील दहाड़ मार कर रो रही थी. घर की महिलाएं उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं.

मासूम का पेट किसी नुकीले व धारदार औजार से चीरा गया था और पेट के अंदर के अंग दिल, फेफड़े, लीवर, आंतें तथा किडनी गायब थीं. बच्ची के गुप्तांग पर चोट के निशान थे. माथे पर तिलक लगा था और पैरों पर महावर लगी थी. देखने से ऐसा लग रहा था कि नरपिशाचों ने बलि देने से पहले मासूम के साथ दुराचार भी किया था. शव के पास ही मृतका की चप्पलें, जींस तथा अन्य कपड़े पड़े थे. नमकीन का एक खाली पैकेट भी वहां पड़ा मिला.

इंसपेक्टर सिंह ने वहां पड़ी चीजों को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया. उसी दौरान एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव तथा सीओ (घाटमपुर) रवि कुमार सिंह भी वहां आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम तथा कई थानों की फोर्स बुलवा ली. पुलिस अधिकारियों ने उत्तेजित भीड़ को आश्वासन दिया कि जिन्होंने भी दिल को झकझोर देने वाली इस घटना को अंजाम दिया है, वे जल्द ही पकड़े जाएंगे और उन्हें सख्त से सख्त सजा दिलाई जाएगी.

अधिकारियों के इस आश्वासन पर लोग नरम पड़ गए, उस के बाद उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. बालिका का शव देख कर पुलिस अधिकारी भी सिहर उठे.

एसएसपी के बुलावे पर डौग स्क्वायड भी घटनास्थल पर पहुंची. डौग स्क्वायड प्रभारी अवधेश सिंह ने जांच शुरू की. उन्होंने नीम के पेड़ के नीचे पड़ी बालिका के खून के अंश व उस की चप्पलें खोजी कुतिया यामिनी को सुंघाई. उसे सूंघने के बाद यामिनी खेत की पगडंडी से होते हुए गांव की ओर दौड़ पड़ी.

कई जगह रुकने के बाद वह सीधे मृतक बच्ची के घर पहुंची. यहां से बगल के घर से होते हुए गली के सामने बने एक घर पर पहुंची. 4 घरों में जाने के बाद गली के कोने में स्थित एक मंदिर पर जा कर वह रुक गई.

टीम ने पड़ताल की, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा. इस के बाद यामिनी गांव का चक्कर लगा कर घटनास्थल पर वापस आ गई. यामिनी हत्यारों तक नहीं पहुंच सकी.

मुख्यमंत्री योगी के आदेश पर एक पैर पर दौड़ी पुलिस

निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका मानसी के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय कानपुर भिजवा दिया. मोर्चरी के बाहर भी भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया था.

उधर नरबलि की खबर न्यूज चैनलों तथा इंटरनेट मीडिया पर वायरल होते ही कानपुर से ले कर लखनऊ तक सनसनी फैल गई.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद इस दुस्साहसिक वारदात को संज्ञान में लिया. मुख्यमंत्री ने मंडलायुक्त, डीएम व एसएसपी से वार्ता की और तुरंत आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई करने का आदेश दिया.

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उन्होंने दुखी परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की और 5 लाख रुपए आर्थिक मदद देने की घोषणा की. उन्होंने कहा, ”सरकार इस प्रकरण की फास्टट्रैक कोर्ट में सुनवाई करा कर अपराधियों को जल्द सजा दिलाएगी.’’

मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई तो प्रशासन एक पैर पर दौडऩे लगा. आननफानन में 3 डाक्टरों का पैनल गठित किया गया और शव का पोस्टमार्टम कराया गया. मासूम के शव का परीक्षण करते समय पोस्टमार्टम करने वाली टीम के हाथ भी कांप उठे थे.

मासूम के पेट के अंदर कोई अंग था ही नहीं. दिल, फेफड़े, लीवर, आंतें, किडनी, स्प्लीन और इन अंगों को आपस में जोड़े रखने वाली मेंब्रेंन तक गायब थी. मासूम के निजी अंगों में चोट के निशान थे, जिस से दुष्कर्म की पुष्टि हुई थी.

बच्ची के पेट में कुछ था या नहीं, आंतें गायब होने से इस की पुष्टि नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम के बाद मानसी का शव उस के पिता कमल कुरील को सौंप दिया गया.

इधर रात 10 बजे एसडीएम (नर्वल) रिजवाना शाहिद के साथ तत्कालीन विधायक (घाटमपुर क्षेत्र) उपेंद्र पासवान भदरस गांव पहुंचे और मृतका मानसी के पिता कमल कुरील को 5 लाख रुपए का चैक सौंपा. उन्हें 2 बीघा कृषि भूमि का पट्टा दिलाने का भी भरोसा दिया गया.

चैक लेते समय कमल व उन की पत्नी जयश्री की आंखों में आंसू थे. उन्होंने नरपिशाचों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग की.

चूंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले को वर्कआउट करने में देरी पर नाराजगी जताई थी, इसलिए एसएसपी प्रीतिंदर सिंह व एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव ने थाना घाटमपुर में डेरा डाल दिया और डीएसपी रवि कुमार सिंह के निर्देशन में खुलासे के लिए पुलिस टीम गठित कर दी.

इस टीम ने भदरस गांव पहुंच कर अनेक लोगों से गहन पूछताछ की. गांव के एक झोलाछाप डाक्टर ने गांव के गोंगा के मझले बेटे अंकुल कुरील पर शक जताया. पड़ोसी परिवार की एक बच्ची ने भी बताया कि शाम को उस ने मानसी को अंकुल के साथ जाते हुए देखा था.

अंकुल कुरील पुलिस की रडार पर आया तो पुलिस टीम ने उसे घर से उठा लिया. उस समय वह ज्यादा नशे में था. उसे थाना घाटमपुर लाया गया. उस से कई घंटे तक पूछताछ की, लेकिन अंकुल नहीं टूटा.

आधी रात के बाद जब नशा कम हुआ, तब उस से सख्ती के साथ दूसरे राउंड की पूछताछ की गई. इस बार वह पुलिस की सख्ती से टूट गया और मासूम मानसी की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया.

अंकुल ने जो बताया, उस से पुलिस अधिकारियों के रोंगटे खड़े हो गए और मामला ही पलट गया. अंकुल ने बताया कि उस के चाचा परशुराम व चाची सुनयना ने 1,500 रुपए में मासूम बच्ची का कलेजा लाने की सुपारी दी थी.

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                           आरोपी अंकुल कुरील और बीरन

उस के बाद उस ने अपने दोस्त वीरन के साथ मिल कर कमल की बेटी मानसी को पटाखा देने के बहाने फुसलाया. उसे वे गांव से एक किलोमीटर दूर भद्रकाली मंदिर के पास ले गए. वहां दोनों ने पहले उस बच्ची के साथ दुराचार किया फिर अंगौछे से उस का गला घोंट दिया.

उस के बाद चाकू से उस का पेट चीर कर अंगों को निकाल लिया गया. उस ने कलेजा पौलीथिन में रख कर चाची सुनयना को ले जा कर दे दिया. सुनयना और परशुराम ने कलेजे के 2 टुकड़े किए और कच्चा ही खा गए, ऐसा उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए किया था. इस के बाद वादे के मुताबिक चाची ने 500 रुपए मुझे तथा हजार रुपए वीरन को दिए. फिर हम लोग घर चले गए.

16 नवंबर, 2020 की सुबह 7 बजे पुलिस टीम ने पहले वीरन, फिर परशुराम तथा उस की पत्नी सुनयना को गिरफ्तार कर लिया. सुनयना के घर से पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त अंगौछा तथा 2 चाकू बरामद कर लिए. चाकू को सुनयना ने भूसे के ढेर में छिपा दिया था.

उन तीनों को थाने लाया गया. यहां तीनों की मुलाकात हवालात में बंद अंकुल से हुई तो वे समझ गए कि अब झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है. अत: उन तीनों ने भी पूछताछ में सहज ही मानसी की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.

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पुलिस ने जब परशुराम कुरील से कलेजा खाने की वजह पूछी तो उस के चेहरे पर पश्चाताप की जरा भी झलक नहीं थी. उस ने कहा कि सभी जानते हैं कि किसी बच्ची का कलेजा खाने से निस्संतानों के भी बच्चे हो जाते हैं. वह भी निस्संतान था. उस ने बच्चा पाने की चाहत में कलेजा खाया था.

चूंकि सभी ने जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था. इसलिए इंसपेक्टर राजीव सिंह ने मृतका के पिता कमल कुरील की तहरीर पर भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत अंकुल, वीरन, परशुराम व सुनयना के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. अंकुल व वीरन के खिलाफ दुराचार तथा पोक्सो ऐक्ट के तहत भी मुकदमा दर्ज किया गया.

पुलिस पूछताछ में आरोपियों ने दिल कंपा देने वाली घटना का खुलासा किया.

बच्चा पैदा होने की लालसा में दी थी बलि

परशुराम कुरील भदरस गांव में ही कमल कुरील के घर के पास ही रहता था. परशुराम की शादी सुनयना के साथ लगभग 15 साल पहले हुई थी. परशुराम के पास कृषि भूमि नाममात्र की थी. वह साबुन का व्यवसाय करता था. वह गांव कस्बे में फेरी लगा कर साबुन बेचता था. इसी व्यवसाय से वह अपने घर का खर्च चलाता था.

भदरस और उस के आसपास के गांवों में अंधविश्वास की बेल खूब फलतीफूलती है, जिस का फायदा ढोंगी तांत्रिक उठाते हैं. भदरस गांव भी तांत्रिकों के मकडज़ाल में फंसा है. यहां घरघर कोई न कोई तांत्रिक पैठ बनाए हुए है.

बीमारी में तांत्रिक अस्पताल नहीं मुरगे की बलि, पैसा कमाने को मेहनत नहीं, बकरे की बलि, दुश्मन को ठिकाने लगाने के लिए शराब और बकरे की बलि, संतान के लिए नरबलि की सलाह देते हैं. इन तांत्रिकों पर पुलिस भी काररवाई करने से बचती है. कोई जघन्य कांड होने पर ही पुलिस जागती है.

परशुराम और उस की पत्नी सुनयना भी तांत्रिकों के मकडज़ाल में फंसे हुए थे. महीने में एक या 2 बार उन के घर तंत्रमंत्र व पूजापाठ करने कोई न कोई तांत्रिक आता रहता था.

दरअसल, सुनयना की शादी को 15 वर्ष से अधिक का समय बीत गया था. लेकिन उस की गोद सूनी थी. पहले तो उस ने इलाज पर खूब पैसा खर्च किया, लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो वह अंधविश्वास में उलझ गई और तांत्रिकों और मौलवियों के यहां माथा टेकने लगी.

तांत्रिक उसे मूर्ख बना कर पैसे ऐंठते. धीरेधीरे 5 साल और बीत गए, लेकिन सुनयना की गोद सूनी की सूनी ही रही.

सामाजिक तिरस्कार से टूट गई थी सुनयना

सुनयना की जातिबिरादरी के लोग उसे बांझ समझने लगे थे और उस का सामाजिक बहिष्कार करने लगे थे. समाज का कोई भी व्यक्ति परशुराम को सामाजिक कार्य में नहीं बुलाता था. कोई भी औरत अपने बच्चे को उस की गोद में नहीं देती थी, क्योंकि उसे जादूटोना करने का शक रहता था.

परिवार के लोग उसे अपने बच्चे के मुंडन, जन्मदिन आदि में भी नहीं बुलाते थे, जिस से उसे पीड़ा होती थी. सामाजिक तिरस्कार से सुनयना टूट जरूर गई थी, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी थी.

10 सालों से उस का तांत्रिकों के पास आनाजाना बना हुआ था. एक रोज वह विधनू कस्बे के एक तांत्रिक के पास गई और उसे अपनी पीड़ा बताई. तांत्रिक ने उसे आश्वासन दिया कि वह अब भी मां बन सकती है, यदि वह एक उपाय कर सके.

” कौन सा उपाय?’’ सुनयना ने उत्सुकता से पूछा.

”यही कि तुम्हें दीपावली की रात 10 साल से कम उम्र की एक बालिका की पूजापाठ कर बलि देनी होगी. फिर उस का कलेजा निकाल कर पतिपत्नी दोनों को आधाआधा खाना होगा. बलि देने तथा कलेजारूपी प्रसाद चखने से मां काली प्रसन्न होंगी और तुम्हें संतान प्राप्ति होगी.’’

”ठीक है बाबा, मैं उपाय करने का प्रयत्न करूंगी. अपने पति से भी रायमशविरा करूंगी.’’ सुनयना ने तांत्रिक से कहा.

उन्हीं दिनों परशुराम के हाथ ‘कलकत्ता का काला जादू’ नामक तंत्रमंत्र की एक किताब हाथ लगी. इस किताब में भी संतान प्राप्ति के लिए उपाय लिखा था और मासूम बालिका का कलेजा कच्चा खाने का जिक्र किया गया था.

परशुराम ने यह बात पत्नी सुनयना को बताई तो वह बोली, ”विधनू के तांत्रिक ने भी उसे ऐसा ही उपाय करने को कहा था.’’

अब परशुराम और सुनयना के मन में यह अंधविश्वास घर कर गया कि मासूम बच्ची का कच्चा कलेजा खाने से उन को संतान हो सकती है. इस पर उन्होंने गंभीरता से सोचना शुरू किया तो उन्हें लगा अंकुल उन की मदद कर सकता है. अंकुल परशुराम के बड़े भाई गोंगा कुरील का बेटा था. 3 भाइयों में वह मंझला था. वह नशेबाज और निर्दयी था, गंजेड़ी भी. अपने भाईबहनों के साथ मारपीट और हंगामा भी करता रहता था.

अपने स्वार्थ के लिए परशुराम ने भतीजे अंकुल को मोहरा बनाया. अब वह उसे घर बुलाने लगा और मुफ्त में शराब पिलाने लगा. गांजा फूंकने को पैसे भी देता. अंकुल जब हां में हां मिलाने लगा, तब एक रोज सुनयना ने उस से कहा, ”अंकुल, तुम्हें तो पता ही है कि हमारे पास बच्चा नहीं है. लेकिन तुम चाहो तो मैं मां बन सकती हूं.’’

”वह कैसे चाची?’’

”इस के लिए तुम्हें मेरा एक काम करना होगा. आने वाली दीपावली की रात तुम्हें किसी बच्ची का कलेजा ला कर देना होगा. देखो ‘न’ मत करना. यदि तुम मेरा काम कर दोगेे तो हमारे घर में भी खुशी आ सकती है.’’

”ठीक है चाची, मैं तुम्हारे लिए यह काम कर दूंगा.’’

अंकुल राजी हो गया तो उन लोगों ने मासूम बच्ची पर मंथन किया. मंथन करते करते उन के सामने मानसी का चेहरा आ गया. मानसी कमल कुरील की बेटी थी. उस की उम्र 7 साल थी. कमल परशुराम के घर के पास रहता था.

वीरन कुरील अंकुल का दोस्त था. पारिवारिक रिश्ते में वह उस का भाई था. वीरन भी नशेड़ी था, सो उस की अंकुल से खूब पटती थी. अंकुल ने वीरन को सारी बात बताई और उसे भी अपने साथ मिला लिया था. अब अंकुल के साथ वीरन भी परशुराम के घर जाने लगा और नशेबाजी करने लगा.

14 नवंबर, 2020 को दीपावली थी. अंकुल और वीरन शाम 5 बजे परशुराम के घर पहुंच गए. परशुराम ने दोनों को खूब शराब पिलाई. सुनयना ने दोनों को कलेजा लाने की एवज में 1500 रुपए देने का भरोसा दिया.

इस के बाद उस ने अंकुल व वीरन को गोश्त काटने वाले 2 चाकू दिए. इन चाकुओं को पत्थर पर घिस कर दोनों ने धार बनाई. सुनयना ने महावर की एक शीशी अंकुल को दी और कुछ आवश्यक निर्देेश दिए.

शाम 6 बजे अंकुल और वीरन परशुराम के घर से निकले, तब तक अंधेरा घिर चुका था. वे दोनों जब कमल के घर के सामने आए तो उन की निगाह मासूम मानसी पर पड़ी. वह नए कपड़े पहने पेड़ के नीचे एक बच्ची के साथ खेल रही थी. अंकुल ने मानसी को बुलाया और पटाखों का लालच दिया.

मानसी पर मौत का साया मंडरा रहा था. वह मान गई और अंकुल के साथ चल दी. दोनों मानसी को ले कर गांव के बाहर आए और फिर भद्रकाली मंदिर की ओर चल पड़े. मानसी को आशंका हुई तो उस ने पूछा, ”भैया, कहां ले जा रहे हो?’’

यह सुनते ही अंकुल ने उस का मुंह दबा दिया और वीरन ने चाकू चुभो कर उसे डराया, जिस से उस की घिग्घी बंध गई. फिर वे दोनों मानसी को भद्रकाली मंदिर के पास ले गए और नीम के पेड़ के नीचे पटक दिया.

उन दोनों ने मानसी के शरीर से कपड़े अलग किए तो उन के अंदर का शैतान जाग उठा. उन्होंने बारीबारी से उस के साथ दुराचार किया. इस बीच मासूम चीखी तो उन्होंने अंगौछे से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई.

इस के बाद सुनयना के निर्देशानुसार अंकुल ने मानसी के पैरों में लाल रंग लगाया तथा माथे पर टीका किया. फिर चाकू से उस का पेट चीर डाला. अंदर से अंग काट कर निकाल लिए और कलेजा पौलीथिन में रख कर वहां से निकल लिए. रास्ते में पानी भरे एक गड्ढे में बाकी अंग फेंक दिए और कलेजा ला कर परशुराम को दे दिया.

शराब से धो कर दोनों ने खाया कलेजा

परशुराम ने कलेजे को शराब से धोया फिर चाकू से उस के 2 टुकड़े किए. उस ने एक टुकड़ा स्वयं खा लिया तथा दूसरा टुकड़ा पत्नी सुनयना को खिला दिया. सुनयना ने खुश हो कर 500 रुपए अंकुल को और 1,000 रुपए वीरन को दिए. उस के बाद वे दोनों अपनेअपने घर चले गए.

इधर दीया जलाते समय कमल को मानसी नहीं दिखी तो उस ने खोज शुरू की. कमल व उस की पत्नी जयश्री रात भर बेटी की खोज करते रहे. लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चला. सुबह गांव के कुछ लोगों ने उसे बेटी की हत्या की जानकारी दी. तब वह वहां पहुंचा. इसी बीच किसी ने घटना की जानकारी थाना घाटमपुर पुलिस को दे दी थी.

17 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्त अंकुल, वीरन, परशुराम व सुनयना को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन चारों को जिला जेल भेज दिया गया.

जेल जाने के बाद आरोपियों ने अपने वकीलों के माध्यम से जमानत पाने का प्रयास किया, लेकिन उन के खिलाफ ठोस सबूत मिल जाने से उन को जमानत नहीं मिली. इस चर्चित कांड में मुकदमे के विवेचना अधिकारी इंसपेक्टर राजीव सिंह ने विवेचना कर के सबूतों सहित सभी साक्ष्य जुटा कर आरोपियों के खिलाफ गैंगरेप, हत्या, शव गायब करने तथा पोक्सो एक्ट सहित अन्य धाराओं में 37 दिन में अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया.

अदालत में करीब 3 साल तक इस बहुचर्चित मामले की काररवाई चलती रही, जिस में 10 गवाहों के बयान भी दर्ज किए गए. इन गवाहों में अदालत ने गांव के झोलाछाप डाक्टर रवि तथा मृतका के साथ खेल रही पड़ोस की लड़की का बयान अहम माना. इन दोनों ने ही आरोपी अंकुल का नाम पुलिस को बताया था.

पोस्टमार्टम करने वाले 2 डाक्टरों की गवाही को भी अदालत ने अहम माना. शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय ने भी केस की जम कर पैरवी की. न्यायालय में पेश हुए साक्ष्यों के आधार पर ही अपर जिला जज वाकर शमीम रिजवी ने आरोपियों को दोषी ठहराया.

सजा सुनाने के लिए अपर जिला जज साहब शाम 4 बजे कोर्ट में पहुंच गए. उस समय आरोपियों के अलावा मामले से जुड़े सभी वकील व मानसी के मातापिता तथा अन्य लोग भी कोर्टरूम में मौजूद थे.

अपर जिला जज वाकर शमीम रिजवी ने बिना कोई भूमिका बनाए सीधे फैसला सुनाते हुए कहा, ”अभियुक्त अंकुल व वीरन ने अमानवीय तथा हृदयविदारक जघन्य अपराध किया था. अपराध प्रवृत्ति को देखते हुए दोनों समाज के लिए खतरा हैं. ऐसे हालात में उन के साथ नरमी का रुख अपनाए जाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता.

”6 साल की मासूम बच्ची का अपहरण कर गैंगरेप करना फिर हत्या कर कलेजा निकालना जघन्य अपराध माना जाना न्यायोचित प्रतीत होता है. इसलिए अभियुक्त अंकुल व वीरन को उम्रकैद की सजा दी जाती है. सजा के साथ दोनों को 45-45 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया जाता है. अर्थदंड न देने पर 6 माह की सजा और भुगतनी होगी.’’

कुछ क्षण रुकने के बाद जज साहब ने कहा, ”आरोपी दंपति परशुराम व सुनयना ने नियोजित तरीके से षडयंत्रपूर्वक अपराध किया था. उन दोनों ने संतान पाने के लिए 7 साल की बच्ची का कलेजा सहयोगियों के मार्फत मंगवाया और फिर खाया. उन का यह अपराध अतिगंभीर व हृदयविदारक है.

उन के खिलाफ नरमी का रुख अपनाया जाना न्यायोचित नहीं होगा. अत: उन्हें उम्रकैद की सजा दी जाती है. सजा के साथ दोनों को 20-20 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया जाता है. अर्थदंड न देने पर 6 माह की सजा और भुगतनी होगी.’’

अदालत का फैसला आते ही कमल व उस की पत्नी जयश्री की आंखें छलक पड़ीं. शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय के साथ मौजूद कमल ने रुंधे गले से कहा कि हमें सजा से संतोष तो है, लेकिन दोषियों को फांसी होती तो हमारे कलेजे को और ठंडक मिल जाती.

शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय ने कहा कि उन्होंने कोर्ट से केस के रेयरेस्ट औफ द रेयर होने की बात कह कर फांसी की सजा की मांग की थी, लेकिन कोर्ट का फैसला उम्रकैद आया. हम अध्ययन करेंगे और यदि कुछ बिंदु निकलते हैं तो फांसी के लिए हाईकोर्ट में अपील भी करेंगे.

सजा सुनाए जाने के बाद चारों दोषियों परशुराम, सुनयना, अंकुल व वीरन को कानपुर देहात की माती जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक चारों दोषी माती जेल में बंद थे.

—कथा अदालत के फैसले पर आधारित. कथा में मानसी, कमल और जयश्री परिवर्तित नाम हैं.

आग बनी शोला : जब पति और बेटे बने जान के दुश्मन

उस दिन जून 2019 की 10 तारीख थी. रात के 10 बज रहे थे. कानपुर के थाना अनवरगंज के थानाप्रभारी रमाकांत  पचौरी क्षेत्र में गश्त पर थे. गश्त करते हुए जब वह डिप्टी पड़ाव चौराहा पहुंचे, तभी उन के मोबाइल पर एक काल आई.

उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘सर, मैं गुरुवतउल्ला पार्क के पास से पप्पू बोल रहा हूं. हमारे घर के सामने पूर्व सभासद नफीसा बाजी की बेटी शहला परवीन किराए के मकान में रहती है. उस के घर के बाहर तो ताला बंद है, लेकिन घर के अंदर से चीखने चिल्लाने की आवाजें आ रही हैं. लगता है, उस घर के अंदर किसी की जान खतरे में है. आप जल्दी आ जाइए.’’

डिप्टी पड़ाव से गुरुवतउल्ला पार्क की दूरी ज्यादा नहीं थी. अत: थानाप्रभारी रमाकांत पचौरी चंद मिनटों बाद ही बताई गई जगह पहुंच गए. वहां एक मकान के सामने भीड़ जुटी थी.

भीड़ में से एक व्यक्ति निकल कर बाहर आया और बोला, ‘‘सर, मेरा नाम पप्पू है और मैं ने ही आप को फोन किया था. अब घर के अंदर से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आनी बंद हो चुकी हैं.’’

रमाकांत पचौरी ने सहयोगी पुलिसकर्मियों की मदद से उस मकान का ताला तोड़ा फिर घर के अंदर गए. कमरे में पहुंचते ही पचौरी सहम गए. क्योंकि कमरे के फर्श पर एक महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. पड़ोसियों ने बताया कि यह तो शहला परवीन है. इस की हत्या किस ने कर दी.

शव के पास ही खून सनी ईंट तथा एक मोबाइल फोन पड़ा था. लग रहा था कि उसी ईंट से सिर व मुंह पर प्रहार कर बड़ी बेरहमी से उस की हत्या की गई थी. शहला की उम्र यही कोई 35 साल के आसपास थी. पुलिस ने लाश के पास पड़ा फोन सबूत के तौर पर सुरक्षित कर लिया.

घनी आबादी वाले मुसलिम इलाके में पूर्व पार्षद नफीसा बाजी की बेटी शहला परवीन की हत्या की सूचना थानाप्रभारी ने पुलिस अधिकारियों को दी तो कुछ ही देर में एसएसपी अनंतदेव तिवारी, एसपी (क्राइम) राजेश कुमार, एसपी (पूर्वी) राजकुमार, सीओ (कलेक्टरगंज) श्वेता सिंह तथा सीओ (अनवरगंज) सैफुद्दीन भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

एसएसपी अनंतदेव ने फारैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. बढ़ती भीड़ तथा उपद्रव की आशंका को देखते हुए एसएसपी ने रायपुरवा, चमनगंज तथा बेकनगंज थाने की फोर्स भी बुलवा ली. पूरे क्षेत्र को उन्होंने छावनी में तब्दील कर दिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो वह भी आश्चर्यचकित रह गए. शहला परवीन की हत्या बड़ी ही बेरहमी से की गई थी. उस के शरीर पर लगी चोटों के निशानों से स्पष्ट था कि हत्या से पहले शहला ने हत्यारों से अपने बचाव के लिए संघर्ष किया था.

कमरे के अंदर रखी अलमारी और बक्सा खुला पड़ा था, साथ ही सामान भी बिखरा हुआ था. देखने से ऐसा लग रहा था कि हत्या के बाद हत्यारों ने लूटपाट भी की थी. शहला का शव जिस कमरे में पड़ा था, उस का एक दरवाजा पीछे की ओर गली में भी खुलता था.

पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि वारदात को अंजाम देने के बाद हत्यारे पीछे वाले दरवाजे से ही फरार हुए होंगे और इसी रास्ते से अंदर आए होंगे. पुलिस अधिकारियों के मुआयने के बाद फोरैंसिक टीम ने भी जांच की और साक्ष्य जुटाए. टीम ने अलमारी, बक्सा, ईंट आदि से फिंगरप्रिंट भी उठाए.

भाई ने बताए हत्यारों के नाम

अब तक सूचना पा कर मृतका का भाई तारिक शादाब भी वहां आ गया था. बहन की लाश देख कर वह फफकफफक कर रोने लगा. थानाप्रभारी ने उसे धैर्य बंधाया फिर पूछताछ की. तारिक शादाब ने बताया कि उस की बहन की हत्या उस के पति मोहम्मद शाकिर और बेटों शाकिब व अर्सलान उर्फ कल्लू ने की है. उस ने कहा कि हत्या में शाकिर का बहनोई गुड्डू भी शामिल है, जो कुख्यात अपराधी है.

पुलिस अधिकारियों ने पड़ोसी पप्पू से पूछताछ की. उस ने भी बताया कि शहला के पति व बेटों को उस ने शहला के घर के आसपास देखा था. उस ने उन्हें टोका भी था. तब उन्होंने उसे धमकी दी थी कि टोकाटाकी करोगे तो परिणाम भुगतोगे.

उन की धमकी से वह डर गया था. पप्पू ने भी शहला के पति व बेटों पर शक जाहिर किया. कुछ अन्य लोगों ने बताया कि शहला का पति उस के चरित्र पर शक करता था. शायद अवैध संबंधों में ही उस के पति ने उसे हलाल कर दिया है.

अब तक हत्या को ले कर वहां मौजूद भीड़ उत्तेजित होने लगी थी. अत: पुलिस अधिकारियों ने आनन फानन में शहला परवीन के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भिजवा दिया. बवाल व तोड़फोड़ की आशंका को देखते हुए घटनास्थल के आसपास पुलिस तैनात कर दी.

चूंकि मृतका शहला परवीन के भाई तारिक शादाब ने अपने बहनोई व भांजे पर हत्या का शक जाहिर किया था, अत: थानाप्रभारी रमाकांत पचौरी ने तारिक शादाब की तरफ से भादंवि की धारा 302 के तहत मोहम्मद शाकिर, उस के दोनों बेटे शाकिब, अर्सलान तथा शाकिर के बहनोई गुड्डू हलवाई के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद हत्यारोपियों को पकड़ने के लिए एसएसपी अनंतदेव ने एसपी (क्राइम) राजेश कुमार की अगुवाई में एक पुलिस टीम गठित कर दी. टीम में थानाप्रभारी रमाकांत, सीओ (अनवरगंज) सैफुद्दीन, एसआई राम सिंह, देवप्रकाश, कांस्टेबल अतुल कुमार, दयाशंकर सिंह, राममूर्ति यादव, मोहम्मद असलम तथा अब्दुल रहमान को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर मृतका के भाई तारिक शादाब से विस्तृत जानकारी हासिल कर उस का बयान दर्ज किया. पुलिस ने मृतका के पड़ोसी पप्पू से भी कुछ अहम जानकारियां हासिल कीं. इस के बाद पुलिस टीम मृतका शहला परवीन की मां नफीसा बाजी (पूर्व पार्षद) के घर दलेलपुरवा पहुंची. नफीसा बाजी बीमार थीं. बेटी की हत्या की खबर सुन कर उन की तबीयत और बिगड़ गई. पुलिस ने जैसे तैसे कर के उन का बयान दर्ज किया.

चूंकि रिपोर्ट नामजद थी, इसलिए पुलिस ने आरोपियों की तलाश के लिए उन के घर दबिश दी तो वह सब घर से फरार मिले. पुलिस टीम ने उन्हें तलाशने के लिए उन के संभावित ठिकानों पर ताबड़तोड़ दबिश दी. लेकिन आरोपी पकड़ में नहीं आए. तब इंसपेक्टर रमाकांत पचौरी ने अपने कुछ खास मुखबिरों को आरोपियों की टोह में लगा दिया और खुद भी उन्हें तलाशने में लगे रहे.

12 जून, 2019 की दोपहर को मुखबिर ने थानाप्रभारी को आरोपियों के बारे में खास सूचना दी. मुखबिर की सूचना पर थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ तुरंत हमराज कौंप्लैक्स पहुंच गए.

जैसे ही उन की जीप रुकी तो वहां से 3 लोग चाचा नेहरू अस्पताल की ओर भागे, लेकिन पुलिस टीम ने उन को कुछ ही दूरी पर धर दबोचा. उन से पूछताछ की तो उन्होंने अपने नाम मोहम्मद शाकिर, शाकिब तथा अर्सलान उर्फ कल्लू बताए. इन में शाकिब तथा अर्सलान शाकिर के बेटे थे. पुलिस उन तीनों को थाने ले आई. उन की गिरफ्तारी की खबर सुन कर एसपी (क्राइम) राजेश कुमार और सीओ सैफुद्दीन भी थाने पहुंच गए.

थाने में एसपी (क्राइम) राजेश कुमार तथा सीओ सैफुद्दीन ने उन तीनों से शहला परवीन की हत्या के संबंध में सख्ती से पूछताछ की तो वे टूट गए और उन्होंने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

मोहम्मद शाकिर ने बताया कि उस की पत्नी शहला परवीन चरित्रहीन थी. उस की बदलचलनी की वजह से समाज में उस की इज्जत खाक में मिल गई थी. हम ने उसे बहुत समझाया, नहीं मानी तो अंत में उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. हम तो उस के आशिक रेहान को भी मार डालते, लेकिन वह बच कर भाग गया.

चूंकि मोहम्मद शाकिर तथा उस के बेटों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था. अत: पुलिस ने उन तीनों को हत्या के जुर्म में विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच तथा अभियुक्तों के बयानों के आधार पर एक ऐसी औरत की कहानी सामने आई, जिस ने बदचलन हो कर न सिर्फ अपने शौहर से बेवफाई की बल्कि बेटों को भी समाज में शर्मसार किया.

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के अनवरगंज थानांतर्गत एक मोहल्ला है दलेलपुरवा. इसी मोहल्ले में हरी मसजिद के पास मोहम्मद याकूब अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी नफीसा बाजी के अलावा 2 बेटे तारिक शादाब, असलम और एक बेटी शहला परवीन थी. मोहम्मद याकूब का कपड़े का व्यापार था. व्यापार से होने वाली आमदनी से वह अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. व्यापार में उन के दोनों बेटे भी उन का सहयोग करते थे.

मोहम्मद याकूब जहां व्यापारी थे, वहीं उन की पत्नी नफीसा बाजी की राजनीति में दिलचस्पी थी. वह समाजवादी पार्टी की सक्रिय सदस्य थीं. दलेलपुरवा क्षेत्र से उन्होंने 2 बार पार्षद का चुनाव लड़ा, पर हार गई थीं. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. वह पार्टी के साथसाथ समाजसेवा में जुटी रहीं. तीसरी बार जब उन्हें पार्टी से टिकट मिला तो वह पार्षद का चुनाव लड़ीं. इस बार वह जीत कर दलेलपुरवा क्षेत्र की पार्षद बन गईं.

नफीसा बाजी की बेटी शहला परवीन भी उन्हीं की तरह तेजतर्रार थी. वैसे तो शहला बचपन से ही खूबसूरत थी, लेकिन जब वह जवान हुई तो वह पहले से ज्यादा खूबसूरत दिखने लगी थी. जब वह बनसंवर कर घर से निकलती तो देखने वाले देखते ही रह जाते. शहला पढ़ने में भी तेज थी. उस ने फातिमा स्कूल से हाईस्कूल तथा जुबली गर्ल्स इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी.

शहला शादी लायक हो चुकी थी, मोहम्मद याकूब उस का निकाह कर उसे मानमर्यादा के साथ ससुराल भेजना चाहते थे. एक दिन मोहम्मद याकूब ने अपने पड़ोसी जावेद खां से बेटी के रिश्ते के बारे में बात की तो वह उत्साह में भर कर बोला, ‘‘याकूब भाई, मेरी जानपहचान में एक अच्छा लड़का है मोहम्मद शाकिर. वह चमनगंज में रहता है और कपड़े का व्यवसाय करता है. जिस दिन फुरसत में हो, मेरे साथ चमनगंज चल कर उसे देख लेना. सब कुछ ठीक लगे तो बात आगे बढ़ाएंगे.’’

शाकिर से हो गया निकाह

एक सप्ताह बाद मोहम्मद याकूब जावेद के साथ चमनगंज गए. मोहम्मद शाकिर साधारण शक्ल वाला हंसमुख युवक था. उस में आकर्षण जैसी कोई बात नहीं थी. परंतु वह कमाऊ था, उस का परिवार भी संपन्न था. इस के विपरीत शहला परवीन चंचल व खूबसूरत थी.

कहीं बेटी गलत रास्ते पर न चल पड़े, सोचते हुए मोहम्मद याकूब ने शाकिर को अपनी बेटी शहला परवीन के लिए पसंद कर लिया. इस बारे में उन्होंने बेटी की राय लेनी भी जरूरी नहीं समझी. इस के बाद आगे की बातचीत शुरू हो गई. बातचीत के बाद दोनों पक्षों की सहमति से रिश्ता पक्का हो गया.

तय तारीख को मोहम्मद शाकिर की बारात आई, निकाह हुआ और शहला परवीन शाकिर के साथ विदा कर दी गई. यह सन 1998 की बात है.

सुहागरात को शहला परवीन ने अपने शौहर शाकिर को देखा तो उस के अरमानों पर पानी फिर गया. पति मोहमद शाकिर किसी भी तरह से उसे पसंद नहीं था. उस रात वह दिखावे के तौर पर खुश थी, पर मन ही मन कुढ़ रही थी.

सप्ताह भर बाद शहला का भाई तारिक उसे लेने आ पहुंचा. तभी मौका देख कर शाकिर ने शहला से कहा, ‘‘दुलहन का मायके जाना रिवाज है. रिवाज के मुताबिक तुम्हें मायके भेजना ही पड़ेगा. खैर तुम जाओ. तुम्हारे बिना किसी तरह हफ्ता 10 दिन रह लूंगा.’’

शहला परवीन ने शौहर को घूर कर देखा और कर्कश स्वर में बोली, ‘‘अपनी यह मनहूस सूरत ले कर मेरे मायके मत आना. नहीं तो तुम्हें देख कर मेरी सहेलियां हंसेंगी. कहेंगी देखो शहला जैसी हूर का लंगूर शौहर आया है.’’

यह सुन कर शाकिर को लगा, जैसे किसी ने उस के कानों में गरम शीशा उड़ेल दिया हो. वह पत्नी को देखता रहा और वह भाई के साथ मायके चली गई. 8-10 दिन बाद जब शहला को विदा कर लाने की तैयारी शुरू हुई तो शाकिर ने घर वालों के साथ ससुराल जाने से इनकार कर दिया. तब घर वाले ही शहला को विदा करा लाए.

शाकिर को विश्वास था कि ससुराल आ कर शहला शिकायत करेगी कि सब आए पर तुम नहीं आए. लेकिन ऐसा कुछ कहने के बजाए शहला ने उलटा शौहर की छाती में शब्दों का भाला घोंप दिया, ‘‘अच्छा हुआ तुम नहीं आए, वरना तमाशा बन जाते और शर्मिंदा मुझे होना पड़ता.’’

छाती में शब्दों के शूल चुभने के बावजूद शाकिर चुप रहा. उस का विचार था कि वह अपने प्रेम से शहला का दिल जीत लेगा और खुदबखुद सब ठीक हो जाएगा. शहला को उस की जो शक्ल बुरी लगती है, वह अच्छी लगने लगेगी.

शाकिर ने की दिल जीतने की कोशिश

शाकिर पत्नी को प्यार से जीतने की कोशिश करता रहा और शहला उसे दुत्कारती रही. इस तरह प्यार और नफरत के बीच उन की गृहस्थी की गाड़ी ऐसे ही चलती रही.

समय बीतता गया और शहला 2 बेटों शाकिब व अर्सलान की मां बन गई. शाकिर को विश्वास था कि बच्चों के जन्म के बाद शहला के व्यवहार में कुछ बदलाव जरूर आएगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस का बर्ताव पहले जैसा ही रहा.

वह बच्चों की परवरिश पर भी ज्यादा ध्यान नहीं देती थी और अपनी ही दुनिया में खोई रहती थी. उसे घर में कैद रहना पसंद न था, इसलिए वह अकसर या तो मायके या फिर बाजार घूमने निकल जाती थी. शाकिर रोकटोक करता तो वह उस से उलझ जाती और अपने भाग्य को कोसती.

शहला परवीन की अपने शौहर से नहीं पटती थी. इसलिए दोनों के बीच दूरियां बनी रहती थीं. शहला का मन पुरुष सुख प्राप्त करने के लिए भटकता रहता था, लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.

उन्हीं दिनों शहला के जीवन में मुबीन ने प्रवेश किया. मुबीन अपराधी प्रवृत्ति का था. अनवरगंज क्षेत्र में उस की तूती बोलती थी. व्यापारी वर्ग तो उस के साए से भी डरता था.

वह व्यापारियों से हफ्ता वसूली करता था. शाकिर का कपड़े का व्यवसाय था. मुबीन शाकिर से भी रुपए वसूलता था. शहला परवीन मुबीन को अच्छी तरह जानती थी लेकिन शौहर के रहते वह उस के सामने नहीं आती थी.

एक रोज शहला घर में अकेली थी, तभी मुबीन उस के घर में बेधड़क दाखिल हुआ और दबे पांव जा कर शहला के पीछे खड़ा हो गया. शहला किसी काम में ऐसी व्यस्त थी कि उसे भनक तक नहीं लगी कि कोई उस के पीछे आ खड़ा हुआ है. शहला तब चौंकी जब मुबीन ने कहा, ‘‘शहला भाभी नमस्ते.’’

शहला फौरन पलटी. मुबीन को देख कर उस का चेहरा फूल की तरह खिल गया. वह अपने चेहरे पर मुसकान बिखरते हुए बोली, ‘‘नमस्ते मुबीन भाई, तुम कब आए, मुझे पता ही नहीं चला. बताओ, कैसे आना हुआ? तुम्हारे भैया तो घर पर हैं नहीं.’’

‘‘भैया नहीं हैं तो क्या हुआ. क्या भाभी से मिलने नहीं आ सकता?’’ मुबीन भी हंसते हुए बोला.

‘‘क्यों नहीं?’’ कहते हुए शहला उस के पास बैठ कर बतियाने लगी. बातों ही बातों में मुबीन बोला, ‘‘भाभी, एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानोगी.’’

‘‘एक नहीं चार कहो, मैं बिलकुल बुरा नहीं मानूंगी.’’ शहला ने कहा.

‘‘भाभी, कसम से तुम इतनी खूबसूरत हो कि कितना भी देखूं, जी नहीं भरता.’’ वह॒ बोला.

‘‘धत…’’ कहते हुए शहला के गालों पर लाली उतर आई. कुछ देर बतियाने के बाद मुबीन वहां से चला गया.

इस के बाद मुबीन का शहला के घर आनेजाने लगा. दोनों एकदूसरे की बातों में रमने लगे. शहला और मुबीन हमउम्र थे, जबकि शहला का पति शाकिर उम्र में उस से 6-7 साल बड़ा था. मुबीन शरीर से हृष्टपुष्ट तथा स्मार्ट था. क्षेत्र में उस की हनक भी थी, सो शहला उस से प्यार करने लगी. वह सोचने लगी कि काश उसे मुबीन जैसा छबीला पति मिलता.

मुबीन भी शहला को चाहने लगा था. आते जाते मुबीन ने शहला से हंसीमजाक के माध्यम से अपना मन खोलना शुरू किया तो शहला भी खुलने लगी. आखिर एक दिन दोनों के बीच नाजायज संबंध बन गए. इस के बाद जब भी मौका मिलता, दोनों शारीरिक भूख मिटा लेते. शहला को अब पति की कमी नहीं खलती थी.

शहला और मुबीन के नाजायज रिश्ते ने रफ्तार पकड़ी तो पड़ोसियों के कान खड़े हो गए. एक आदमी ने शाकिर को टोका, ‘‘शाकिर भाई, तुम दिनरात कमाई में लगे रहते हो. घर की तरफ भी ध्यान दिया करो.’’

‘‘क्यों, मेरे घर को क्या हुआ? साफ साफ बताओ न.’’ शाकिर ने पूछा.

‘‘साफ साफ सुनना चाहते हो तो सुनो. तुम्हारे घर पर बदमाश मुबीन का आना जाना है. तुम्हारी लुगाई से उस का चक्कर चल रहा है.’’ उस ने सब बता दिया.

उस की बात सुन कर शाकिर का माथा ठनका. जरूर कोई चक्कर है. अफवाहें यूं ही नहीं उड़तीं. उन में कुछ न कुछ सच्चाई जरूर होती है.

शाम को शाकिर जब घर लौटा तो उस ने पत्नी से पूछा, ‘‘शहला, मैं ने सुना है मुबीन तुम से मिलने घर आता है. वह भी मेरी गैरमौजूदगी में.’’

शहला न डरी न घबराई बल्कि बेधड़क बोली, ‘‘मुबीन आता है पर मुझ से नहीं तुम से मिलने आता है. तुम नहीं मिलते तो चला जाता है.’’

‘‘तुम उसे मना कर दो कि वह घर न आया करे. उस के आने से मोहल्ले में हमारी बदनामी होती है.’’

‘‘मुझ से क्यों कहते हो, तुम खुद ही उसे क्यों नहीं मना कर देते.’’

‘‘ठीक है, मना कर दूंगा.’’

इस के बाद शाकिर मुबीन से मिला और उस ने उस से कह दिया कि वह उस की गैरमौजूदगी में उस के घर न जाया करे.

शाकिर की बात सुनते ही मुबीन उखड़ गया. उस ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. शाकिर डर गया और अपनी जुबान बंद कर ली. मुबीन बिना रोकटोक उस के घर आता रहा और शहला के साथ मौजमस्ती करता रहा.

मुबीन ने जब शाकिर का सुखचैन छीन लिया तब उस ने अपने रिश्तेदारों को घर बुलाया और इस समस्या से निजात पाने के लिए विचार विमर्श किया. आखिर में तय हुआ कि इज्जत तभी बच सकती है, जब मुबीन को ठिकाने लगा दिया जाए.

इस के बाद शाकिर के भाई, शहला के भाई और मामा ने मिल कर दिनदहाड़े खलवा में मुबीन की हत्या कर दी. हत्या के आरोप में सभी को जेल जाना पड़ा. यह बात सन 2012 की है.

इस घटना के बाद करीब 4 साल तक घर में शांति रही. शहला का शौहर के प्रति व्यवहार भी सामान्य रहा. अब तक शहला के दोनों बेटे शाकिब और अर्सलान भी जवान हो गए थे. बापबेटे रोजाना सुबह 10 बजे घर से निकलते तो फिर देर शाम ही घर लौटते थे. कपड़ों की बिक्री का हिसाब किताब लगा कर, खाना खा कर वे सो जाते थे.

शहला परवीन न शौहर के प्रति वफादार थी और न ही उसे बेटों से कोई लगाव था. वह तो खुद में ही मस्त रहती थी. बनसंवर कर रहना और घूमना फिरना उस की दिनचर्या में शामिल था. उस का बनाव शृंगार देख कर कोई कह नहीं सकता था कि वह 2 जवान बच्चों की मां है.

शहला को घर में सभी सुख सुविधाएं हासिल थीं पर शौहर की बांहों का सुख प्राप्त नहीं हो पाता था. शाकिर अपने धंधे में लगा रहता था. काम की वजह से बीवी से भी दूरियां बनी रहती थीं. दूसरी ओर शहला उसे पसंद भी नहीं करती थी. वह तो किसी नए प्रेमी की तलाश में थी. हालांकि इस खेल में उसे शौहर तथा जवान बच्चों का डर लग रहा था.

उसी दौरान उस की नजर रेहान पर पड़ी. रेहान गम्मू खां के अहाते में रहता था और प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. वह उस का दूर का रिश्तेदार भी था. उस का जब तब शहला के यहां आनाजाना लगा रहा था. वह हैंडसम था.

शहला परवीन का दिल रेहान पर आया तो वह उसे खुला आमंत्रण देने लगी, आंखों के तीरों से उसे घायल करने लगी. खुला आमंत्रण पा कर रेहान भी उस की ओर आकर्षित होने लगा. जब भी उसे मौका मिलता, शहला के साथ हंसीमजाक और छेड़छाड़ कर लेता. शहला उस की हंसीमजाक का जरा भी बुरा नहीं मानती थी. दोनों के पास एकदूसरे का मोबाइल नंबर था. जल्दी ही दोनों की मोबाइल पर प्यारभरी बातें होने लगीं.

आदमी हो या औरत, मोहब्बत होते ही उस का मन कल्पना की ऊंची उड़ान भरने लगता है. रेहान और शहला का भी यही हाल था. दोनों मोहब्बत की ऊंची उड़ान भरने लगे थे. आखिर एक रोज रेहान ने चाहत का इजहार किया तो शहला ने इकरार करने में जरा भी देर नहीं लगाई. इतना ही नहीं, शहला ने उसी समय अपनी बांहों का हार रेहान के गले में डाल दिया.

इस के बाद दोनों के बीच शारीरिक रिश्ता बनते देर नहीं लगी. एक बार अवैध रिश्ता बना तो उस का दायरा बढ़ता गया. शहला अब पति की कमी प्रेमी से पूरी करने लगी. उसे जब भी मौका दिखता, फोन कर रेहान को अपने यहां बुला लेती और दोनों रंगरलियां मनाते.

कभी कभी रेहान शहला को होटल में भी ले जाता था, जहां वे मौजमस्ती करते. शहला परवीन रेहान के साथ घूमने फिरने भी जाने लगी. रेहान उसे कभी बाहर पार्क में ले जाता तो कभी तुलसी उपवन. वहां दोनों खूब बतियाते.

पर एक दिन शाकिर ने शहला और रेहान को अपने ही घर में आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. वे दोनों एकदूसरे की बांहों में इस कदर मस्त थे कि उन्हें खबर ही नहीं हुई कि दरवाजे पर खड़ा शाकिर उन की कामलीला देख रहा है.

घर में अनाचार होते देख शाकिर का खून खौल उठा. उस ने दोनों को ललकारा तो रेहान सिर पर पैर रख कर भाग गया लेकिन शहला कहां जाती. शाकिर ने सारा गुस्सा उसी पर उतारा. उस ने पीट पीट कर पत्नी को अधमरा कर दिया.

शाकिर ने शहला को रंगे हाथों पकड़ने की जानकारी अपने दोनों बेटों को दी तो बेटों ने भी मां को खूब लताड़ा. शौहर और बेटों ने शहला को जलील किया. इस के बावजूद उस ने रेहान का साथ नहीं छोड़ा.

कुछ दिनों बाद ही वह घर से बाहर रेहान से मिलने लगी. चोरी छिपे मिलने की जानकारी शाकिर को हुई तो उस ने फिर से शहला की पिटाई की. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा.

जब भी शाकिर को दोनों के मिलने की जानकारी होती, उस दिन शहला की शामत आ जाती. लेकिन पिटाई के बावजूद जब शहला ने रेहान का साथ नहीं छोड़ा तो आजिज आ कर शाकिर ने शहला को तलाक दे दिया. तलाक के मामले में बेटों ने बाप का ही साथ दिया. यह बात जनवरी, 2018 की है.

शौहर से तलाक मिलने के बाद शहला कुछ महीने मायके दलेलपुरवा में रही. उस के बाद उस ने अनवरगंज थाना क्षेत्र के डिप्टी पड़ाव में गुरुवतउल्ला पार्क के पास किराए पर मकान ले लिया और उसी में रहने लगी. इस मकान में उस का प्रेमी रेहान भी आने लगा. शहला को अब कोई रोकने टोकने वाला नहीं था, सो वह प्रेमी के साथ खुल कर मौज लेने लगी.

रेहान के पास पैसों की कमी नहीं थी, सो वह शहला पर दिल खोल कर खर्च करता था. पे्रमी के आनेजाने की जानकारी पड़ोसियों को न हो, इस के लिए वह मकान के आगे वाले गेट पर ताला लगाए रखती थी और पीछे के दरवाजे से आती जाती थी. इसी पीछे वाले दरवाजे से उस का प्रेमी रेहान भी आता था.

शहला और रेहान के अवैध संबंधों की जानकारी शाकिर के घर वालों व नाते रिश्तेदारों को भी थी. इस से पूरी बिरादरी में उस की बदनामी हो रही थी. उस के दोनों बेटे शादी योग्य थे. पर मां शहला की चरित्रहीनता के कारण बेटों का रिश्ता नहीं हो पा रहा था. आखिर आजिज आ कर शाकिर ने शहला और रेहान को सबक सिखाने की योजना बनाई. अपनी इस योजना में शाकिर ने अपने बहनोई गुड्डू हलवाई तथा दोनों बेटों को भी शामिल कर लिया.

बन गई हत्या की योजना

10 जून, 2019 की रात 8 बजे शाकिर को एक रिश्तेदार के माध्यम से पता चला कि शहला के घर में रेहान मौजूद है और वह आज रात को वहीं रुकेगा. यह खबर मिलने के बाद शाकिर ने अपने बहनोई गुड्डू हलवाई को बुला लिया. फिर बहनोई व बेटों के साथ शाकिर शहला के घर जा पहुंचा. घर के बाहर गेट पर ताला लगा था. वे लोग पीछे के दरवाजे से घर के अंदर दाखिल हुए.

घर के अंदर कमरे में रेहान और शहला आपत्तिजनक अवस्था में थे. शाकिर ने उन दोनों को ललकारा और सब मिल कर रेहान को पीटने लगे. प्रेमी को पिटता देख शहला बीच में आ गई. वह प्रेमी को बचाने के लिए पति और बेटों से भिड़ गई. दोनों बेटे मां को पीटने लगे. इसी बीच मौका पा कर रेहान वहां से भाग निकला.

रेहान को भगाने में शहला ने मदद की थी, सो वे सब मिल कर शहला को लात घूंसो से पीटने लगे. इसी समय शाकिर की निगाह वहीं पड़ी ईंट पर चली गई. उस ने लपक कर ईंट उठा ली और उस से शहला के सिर व मुंह पर ताबड़तोड़ प्रहार किए. जिस से शहला का सिर फट गया और खून बहने लगा.

कुछ देर तड़पने के बाद शहला ने दम तोड़ दिया. हत्या के बाद उन सब ने मिल कर अलमारी व बक्से के ताले खोले और उस में रखी नकदी तथा जेवर निकाल लिए तथा सामान बिखेर दिया. फिर पीछे के रास्ते से ही फरार हो गए.

इधर पड़ोसी पप्पू ने शहला के घर चीखनेचिल्लाने की आवाज सुनी तो उस ने थाना अनवरगंज पुलिस को सूचना दे दी. सूचना पाते ही इंसपेक्टर रमाकांत पचौरी घटनास्थल पर आए और शव को कब्जे में ले कर जांच शुरू की. जांच में अवैध रिश्तों में हुई हत्या का परदाफाश हुआ और कातिल पकड़े गए.

13 जून, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त मोहम्मद शाकिर, उस के बेटों शाकिब और अर्सलान को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया.

कथा संकलन तक उन की जमानत नहीं हुई थी. एक अन्य अभियुक्त गुड्डू हलवाई फरार था. पुलिस उसे पकड़ने का प्रयास कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित