कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा था. कमरे में सिर्फ 3 लोग बैठे थे, एसपी (देहात) डा. ईरज राजा के सामने लोनी सर्किल के सीओ रजनीश कुमार उपाध्याय और लोनी बौर्डर थाने के थानाप्रभारी सचिन कुमार थे. पिछले 24 घंटे में उस पेचीदा मामले ने 3 अफसरों के दिमाग को हिला कर रख दिया था.
कत्ल की उस वारदात में कई ऐसे पेंच थे, जिस ने सवालों का अंबार खड़ा कर दिया था. उन्हीं उलझी हुई कडि़यों को जोड़ने के लिए तीनों अधिकारी माथापच्ची कर रहे थे. लेकिन अभी तक कोई ऐसा क्लू हाथ नहीं आ रहा था, जिस से कत्ल की इस वारदात का अंतिम सिरा हाथ आ सके.
20 नवंबर को लोनी के ए-105 इंद्रापुरी में रहने वाले मनीष त्यागी ने लोनी बौर्डर थाने में आ कर सूचना दी कि उस के घर के सामने खाली प्लौट में एक लाश पड़ी है.
इस सूचना पर लोनी बौर्डर थानाप्रभारी सचिन कुमार जब अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे तो देखा कि वह किसी पुरुष की लाश थी. लाश बुरी तरह से जली हुई थी. खासकर लाश का चेहरा इतनी बुरी तरह तरह जला हुआ था कि उसे देख कर मरने वाले की पहचान कर पाना भी मुमकिन नहीं था.
पुलिस ने सब से पहले आसपास रहने वाले लोगों को बुला कर लाश की पहचान कराने की कोशिश की. लोगों से यह भी पूछा गया कि किसी घर से कोई लापता तो नहीं है.
लोगों ने लाश के कपड़ों व कदकाठी से उस की पहचान करने की कोशिश की, मगर पुलिस को इस काम में कोई सफलता नहीं मिली.
लाश की सूचना मिलने पर लोनी क्षेत्र के सीओ रजनीश कुमार उपाध्याय और एसपी (देहात) डा. ईरज राजा भी घटनास्थल पर पहुंच चुके थे.
सभी ने एक खास बात नोट की थी कि हत्यारे ने लाश के चेहरे व ऊपरी भाग को ही जलाने का प्रयास किया था. धड़ से नीचे का हिस्सा व उस पर पहने हुए कपड़े सहीसलामत थे.
लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने से पहले पुलिस ने जब उस के पहने हुए कपड़ों की तलाशी ली तो आश्चर्यजनक रूप से उस में से डेढ़ सौ रुपए तथा एक आधार कार्ड बरामद हुआ.
आधार कार्ड मिलने के बाद पुलिस वालों की आंखें चमक उठीं. मृतक की जेब से जो आधार कार्ड मिला था, उस के मुताबिक मृतक 40 वर्षीय सुदेश कुमार पुत्र रामपाल था, जिस के निवास का पता मकान नंबर 331, गली नंबर 4, फेस -4 शिवविहार, करावल नगर, पूर्वी दिल्ली था.
एसपी (देहात) के आदेश पर एसएसआई प्रदीप शर्मा के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम को उत्तरपूर्वी दिल्ली के करावल नगर में उक्त पते पर भेजा.
पुलिस को वहां सुदेश की पत्नी अनुपमा मिली. पुलिस ने जब अनुपमा से उस के पति के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति एक दिन पहले किसी काम से बाहर गए हैं और अब तक लौट कर नहीं आए.
आशंकित अनुपमा ने जब पुलिस से इस पूछताछ का कारण जानना चाहा तो पुलिस को बताना पड़ा कि उन्हें लोनी बौर्डर के इंद्रापुरी इलाके में एक जली हुई लाश मिली है जिस की जेब में वह आधार कार्ड मिला है जिस की वजह से वो उनके घर पहुंची है.
‘‘हांहां, लाश उन्हीं की होगी, क्योंकि वह आधार कार्ड हमेशा अपनी जेब में रखते थे.’’ कहते हुए अनुपमा ठीक उसी तरह दहाड़ें मार कर रोने लगी, आमतौर पर जैसे एक औरत अपने पति की मौत के बाद विलाप करती है.
‘‘देखिए, आप रोना बंद कीजिए क्योंकि मरने वाले की जेब से जो आधार कार्ड मिला है वह आप के पति का है इसलिए पहले आप लाश की पहचान कर दीजिए. …हो सकता है जो शव मिला है वह आप के पति का न हो,’’ कहते हुए दिलासा दे कर एसएसआई प्रदीप शर्मा अनुपमा व उस के बेटे को अपने साथ ले गए.
तब तक थानाप्रभारी सचिन कुमार, एसपी (देहात) डा. ईरज राजा व सीओ उपाध्याय के कहने पर शव का पंचनामा तैयार कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. एसएसआई प्रदीप शर्मा अनुपमा व उस के बेटे को ले कर वहीं पहुंच गए.
उन्होंने जब अनुपमा को जली हुई अवस्था में मिला शव दिखाया तो अनुपमा का विलाप और भी बढ़ गया, क्योंकि उस ने शव देखते ही हृदयविदारक ढंग से रोना शुरू कर दिया था.
अब जबकि लाश की पहचान सुदेश कुमार के रूप में हो चुकी थी और उस की पत्नी ने ही पहचान की थी, इसलिए पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए डाक्टरों के सुपुर्द कर दिया. उसी दिन शव का पोस्टमार्टम हो गया और पुलिस ने सुदेश का शव उस की पत्नी अनुपमा के सुपुर्द कर दिया. अनुपमा ने उसी शाम अपने परिजनों व जानपहचान वालों की मौजूदगी में शव का अंतिम संस्कार भी कर दिया.
सवाल था कि सुदेश की हत्या क्यों और किस ने की है और शव को इतनी दूर ले जा कर ठिकाने लगाने व उस की पहचान मिटाने का काम किस ने किया है? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए गहन जांचपड़ताल की जरूरत थी.
इसलिए डा. ईरज राजा ने सीओ रजनीश कुमार उपाध्याय के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. टीम में थानाप्रभारी सचिन कुमार, एसएसआई प्रदीप शर्मा, एसआई अमरपाल सिंह, ब्रजकिशोर गौतम, कृष्ण कुमार, हैडकांस्टेबल उदित कुमार, राजीव कुमार, अरविंद कुमार, महिला कांस्टेबल कविता, एसओजी के हैडकांस्टेबल अरुण कुमार, नितिन कुमार, पंकज शर्मा व अनिल सिंह आदि को शामिल किया गया.
पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी थी, इस के लिए सब से पहले पुलिस टीम ने सुदेश कुमार की जन्म कुंडली खंगालनी शुरू की. क्योंकि आमतौर पर जब कातिल गुमनाम हो तो कत्ल का सुराग मरने वाले की जन्म कुंडली में ही छिपा होता है.
पुलिस की टीम ने सुदेश कुमार की पत्नी, उस के बेटे व आसपड़ोस के लोगों से जा कर पूछताछ शुरू की तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई. दरअसल, जिस सुदेश के कातिल को पुलिस तलाश कर रही थी, उस के बारे में जानकारी मिली कि वो तो खुद एक कातिल है और इस समय पैरोल पर है.
दरअसल अपने घर में ही परचून की दुकान चलाने वाले सुदेश के परिवार में पत्नी अनुपमा के अलावा 2 बच्चे थे. 17 साल का बड़ा बेटा सुनील और 13 साल की एक बेटी वंशिका. लेकिन बेटी इलाके के खराब माहौल के कारण गंदी सोहबत का शिकार हो गई और कम उम्र में ही उस के इलाके के किशोर लड़कों से प्रेम संबध बन गए.
सुदेश व उस की पत्नी ने बेटी को कई बार डांटफटकार कर उसे समझाना चाहा, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. एक दिन ऐसा हुआ कि सुदेश की बेटी इलाके के एक युवक के साथ घर से भाग गई.

इस के कारण इलाके में उन की बहुत बदनामी हुई. काफी भागदौड़ के बाद बेटी घर तो वापस आ गई, लेकिन अपमान का घूंट सुदेश से पिया नहीं गया.
भोपाल के रहने वाले अक्षय सोमकुंवर की शादी करीब 8 साल पहले सुधा से हुई थी. दोनों एकदूसरे की पसंद थे. उन्होंने प्रेम किया था. सुधा और उस के परिवार के सभी सदस्य इस शादी से बेहद खुश थे, क्योंकि अक्षय सरकारी नौकरी करता था. नौकरी भले ही साधारण थी, लेकिन वह जहां काम करता था, उस जगह का नाम सुनते ही लोग सुधा को काफी मानसम्मान देते थे. सुधा भी अक्षय के कारण मिलने वाली इज्जत पा कर खुश हो जाती थी.
दरअसल, अक्षय भोपाल में मध्य प्रदेश सरकार के एक मंत्रालय में काम करता था. वह वल्लभ भवन में लिफ्टमैन था. अक्षय को आए दिन लिफ्ट में बड़ेबड़े राजनेता, मंत्री, मुख्यमंत्री और विभागों के बड़ेबड़े अधिकारियों से आमनेसामने होने का मौका मिलता था.
लिफ्ट में उन से उस की कोई बात नहीं हो पाती थी, लेकिन वह इतना जानता था कि जरूरत पड़ने पर किसी भी वीआईपी के पास आसानी जा सकता है.
इस कारण अक्षय के कई दोस्त बन गए थे. वे उसे गाहेबगाहे मदद भी करते रहते थे. उन्हीं में एक खास दोस्त सागर भी था. वह फोर्थ ग्रेड का कर्मचारी था और उसी बिल्डिंग में काम करता था. उस के संबंध दूसरे कई विभाग के अधिकारियों से थे. वह वहां का कोई भी काम चुटकी में निकलवा लिया करता था.
अक्षय और सागर से अच्छी दोस्ती होने के चलते दोनों फुरसत में अकसर साथ बैठते थे. एकदूसरे के सुखदुख की बातें करते थे. भविष्य की योजनाएं बनाते थे. परिवार की खुशहाली की बातें करते थे. पारिवारिक समस्याओं का समाधान निकाला करते थे.
इस सिलसिले में कई बार अक्षय की पीड़ा आंखों से छलक आती थी. जब वह मायूस हो जाता था, तब सागर उसे समझाता हुआ हिम्मत बंधाया करता था.
अक्षय के बुलावे पर सागर उस के घर भी आनेजाने लगा था. सुधा उसे कभी भी बगैर चाय पिलाए वापस नहीं जाने देती थी. अक्षय की तरह सुधा भी उस से पारिवारिक बातें किया करती थी.
घरेलू सुविधाओं और अच्छे रहनसहन की कमियों को दूर करने को ले कर चर्चा करती. उन का 4 साल का बेटा भी सागर से काफी घुलमिल गया था.
देखते ही देखते सागर अक्षय और सुधा के परिवार का एक अहम सदस्य की तरह बन गया. जब वह 2 दिनों तक घर नहीं आता, तब सुधा अक्षय से उस का हालचाल पूछ लिया करती थी. इसी के साथ सुधा को बेटे की पढ़ाई शुरू करने की चिंता भी सताने लगी थी.
कालोनी में रहने वाली औरतों के साथ जब उठतीबैठती थी, तब सभी अपनेअपने बच्चों की प्राइवेट स्कूल में एडमिशन की बातें करती थीं. पढ़ाई पर आने वाले खर्च की जब बात होती, तब वह चुप लगा जाती थी. सुधा को पता था कि वह महंगे प्राइवेट स्कूल में बच्चे का नाम नहीं लिखवा सकती है. इसे ले कर वह अक्षय से भी शिकायत करती थी.
कई बार आर्थिक तंगी को ले कर पति के साथ उस की नोकझोंक भी हो जाती थी. एक दिन की बात है. शाम के वक्त अक्षय ड्यूटी खत्म कर लौटा था. उस के आते ही सुधा उस पर ऐसे बरस पड़ी, मानो पहले से तैयार बैठी हो.
‘‘तुम्हारा घर पर कोई ध्यान है या नहीं?’’ सुधा के नाराजगी भरे तेवर देख कर अक्षय ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या बात हुई? रसोई का कुछ सामान लाना है क्या?’’
‘‘सामान क्या लाना है? वह तो मैं सागर से मंगवा चुकी हूं,’’ सुधा बोली.
‘‘सागर आया था, कब? मुझे तो बताया नहीं था,’’ अक्षय चौंकते हुए बोला.
‘‘तुम, कब आया… बताया नहीं, ऐसे ही करते रहना. स्कूल में नाम लिखवाने का फार्म दे गया है. किसी से भरवा लेना. पैसे का इंतजाम भी कर लेना.’’
यह कहती हुई सुधा ने पास में बक्से पर रखे कुछ पन्ने का फार्म अक्षय को पकड़ा दिया. और पैर पटकती हुई कमरे में ही एक दीवार के साथ बनी रसोई से बरतनों को समेटने लगी. अक्षय ने पीने को पानी मांगा तो सुधा गुस्से में बोली, ‘‘खुद ले कर पी लो.’’
इसी बीच किसी ने दरवाजा खटखटाया. अक्षय ने पूछा, ‘‘कौन है?’’
‘‘मैं हूं सागर,’’
दोस्त की आवाज सुन कर अक्षय बोल पड़ा, ‘‘अरे आ जाओ.’’
कुछ सेकेंड में सागर उस के पास था. उस ने अपनी जेब से एक लंबा सा चौकलेट बार निकाल कर पास खेल रहे बच्चे को दे दिया. बच्चे ने झट चौकलेट लेने के लिए हाथ बढ़ा दिया, लेकिन अक्षय ने उसे डपटते हुए कहा, ‘‘झट से चौकलेट के लिए हाथ बढ़ा दिया. यह नहीं कि अंकल के लिए पानी ले कर आओ.’’
‘‘वह छोटा बच्चा है, पानी गिरा देगा. सागर, यह लो पानी.’’ सुधा सागर के सामने खड़ी मुसकरा रही थी.

उस के तेवर बदले हुए थे. चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई थी. यह देख कर सोच में पड़ गया कि कुछ समय पहले सुधा जिस तरह उस से झगड़े के मूड में थी, उस के चेहरे पर आई अचानक मुसकान की क्या वजह हो सकती है. यह उस के लिए दूसरा झटका था.
‘‘मम्मी, पापा को भी पानी दो,’’ बच्चा बोल पड़ा.
‘‘हांहां लाती हूं, वह कौन गेस्ट हैं. चाय पीओगे सागर?’’
‘‘जरूर सुधा, तुम्हारे हाथ की बनी चाय कैसे छोड़ सकता हूं,’’ सागर तपाक से बोल पड़ा.
जिला सीतापुर के मिश्रिख थाना कोतवाली के अंतर्गत आने वाले गांव बदौव्वा में लालजी रहते थे. वह खेती करते थे. परिवार में उन की पत्नी रमा और 2 बेटी और 2 बेटे थे. उन सब में शशि सब से छोटी भी थी और अविवाहित भी. बाकी सभी का विवाह हो चुका था. शशि की उम्र 16 साल थी. उस ने गांव के ही सरकारी स्कूल से 8वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी. खूबसूरत, चंचल और अल्हड़ स्वभाव की शशि के शरीर की बनावट और कमनीयता किसी की भी नजरों में चढ़ जाती थी. गांव में सुंदर युवती हो और उस के आगेपीछे मंडराने वाले मनचले न हों, यह नहीं हो सकता.
शशि के आगेपीछे घूमने वाले मनचलों की कमी नहीं थी. शशि को उन की घूरती नजरों से कोई दिक्कत नहीं थी, बल्कि उसे यह सब अच्छा लगता था. धीरेधीरे कई युवक उस के संपर्क में आए, लेकिन कोई भी शशि को प्रभावित नहीं कर पाया.
एक दिन गांव में काफी चहलपहल थी, क्योंकि वहां एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया गया था. चूंकि धार्मिक अनुष्ठान था, इसलिए गांव वाले काफी उल्लास में थे और यज्ञस्थल पर जाने के लिए उत्साहित भी. यज्ञ में शामिल होने वालों में सभी समुदायों के लोग थे.
शशि भी यज्ञस्थल पर जाने के लिए तैयार थी. वह अपनी सहेली मीना के घर पहुंची और चहकती हुई बोली, ‘‘मीना, तुम भी चलो न मेरे साथ यज्ञ देखने.’’
‘‘हां शशि, मैं ने भी सुना है यज्ञ के बारे में. मेरा भी मन यज्ञ देखने का हो रहा है.’’ मीना ने कहा.
‘‘तो फिर जल्दी से तैयार हो जाओ और मेरे साथ चलो.’’ शशि बोली.
थोड़ी देर बाद मीना तैयार हो कर शशि के साथ पैदल ही यज्ञस्थल की ओर चल दी. दोनों बहुत खुश थीं और बातें करते हुए यज्ञस्थल की ओर चली जा रही थीं.
थोड़ी देर में दोनों यज्ञस्थल पर पहुंच गईं. वहां का भव्य नजारा देख कर दोनों का दिल खुशी से झूम उठा. पंडितों द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ हवन किया जा रहा था. यज्ञ के धुएं से वातावरण सुगंधित था. शशि और मीना ने हाथ जोड़ कर नमन किया और वहीं बिछी दरी पर बैठ गईं.
अचानक शशि की नजर दूसरी ओर बैठे एक युवक पर चली गई. वह कोहरावां गांव का मोहम्मद एहसान था. कोहरावां बदौव्वा गांव के पास ही है. कोहरावां के मोहम्मद नवाब खेती और दूध की डेयरी का काम करते थे. मोहम्मद एहसान उन का ही बेटा था. वह पिता के दूध के काम में मदद करता था. 24 वर्षीय एहसान का एक बड़ा भाई था सलमान और एक छोटा मेराज.
शशि की जिंदगी में आया प्रेमी
शशि ने उसे देखा तो देखती ही रह गई. वह यह भी भूल गई कि वह धार्मिक अनुष्ठान में आई है. तभी एहसान की नजर शशि पर चली गई तो वह उसे एकटक देखता पा कर खुद भी उसे देखने लगा. शशि उसे देख कर मुसकरा दी तो एहसान को लगा जैसे उस के दिल पर किसी ने बरछी चला दी हो. वह अपनी सुधबुध खो बैठा. काफी देर तक दोनों एकदूसरे को निहारते रहे. तभी मीना शशि को ले कर वहां से जाने लगी तो एहसान का दिल छटपटा उठा. वह शशि को अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहता था.
शशि भी जाते हुए बारबार पीछे मुड़ कर उसे ही देख रही थी. मीना ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या बात है शशि, कोई मिल गया क्या जिसे तुम बारबार पीछे मुड़ कर देख रही हो? अरे मुझे भी कुछ बताओ या फिर खुद ही खुश होती रहोगी. बोलो भी…’’
दबाव देते हुए मीना ने पूछा तो शशि ऐसे सिटपिटा गई, मानो उस की चोरी पकड़ी गई हो. फिर भी उसे जवाब तो देना ही था. उस ने मीना को प्यार से झिड़कते हुए कहा, ‘‘ओह मीना, तुम भी शरारती हो गई हो. मैं भला यज्ञ की भव्यता के अलावा और किसे देख सकती हूं. तुम तो हमेशा मुझे शक की नजरों से देखती हो. अब चलो, किसी दुकान पर चाट खाई जाए.’’
‘‘हां, वह देखो सामने चाट की दुकान है. आओ, वहीं चलते हैं.’’ कहती हुई मीना शशि के साथ चाट की दुकान पर पहुंची और चाट खाने लगी.
शशि ने देखा कि एहसान भी यज्ञ छोड़ कर उस के पीछेपीछे बाहर चला आया था और उस से दूर खड़ा हो कर उसे एकटक देख रहा था. वह बारबार नजरें उस की तरफ घुमाती तो उसे अपनी ओर देखते हुए पाती. उस का दिल तेजी से धड़कने लगा, जैसे वह उस का काफी करीबी हो. पता नहीं क्यों वह शशि को अपना सा लग रहा था.
कुछ ऐसा ही एहसान को भी महसूस हो रहा था. उसे भी न जाने क्यों शशि अपने दिल के करीब लग रही थी. एहसान शशि के चेहरे को अपनी आंखों में बसा लेना चाहता था, ताकि वह दिल से ओझल न हो सके. शशि की नजर भी उस से नहीं हट रही थी. जब मीना ने देखा कि शशि एक खूबसूरत नौजवान को देख रही है तो उस ने शरारत करते हुए कहा, ‘‘अच्छा जी, तो ये बात है. लगता है, वह हमारी रानी को कुछ ज्यादा ही पसंद आ गया है.’’
‘‘धत, यह क्या बकवास कर रही है? मैं किसी को देखूंगी तो क्या वह मेरी पसंद का हो जाएगा? वह तो यूं ही उस पर मेरी नजर चली गई थी. अब चलो यहां से, नहीं तो तुम अपनी बकवास बंद नहीं करोगी.’’ शशि ने कहा.
‘‘हांहां, मैं कहां कह रही हूं कि तुम यहीं रुको, चलो यहां से.’’ कहती हुई मीना शशि का हाथ पकड़ कर चल दी तो एहसान मायूस हो गया. मानो कोई उस के दिल को चुरा कर ले जा रहा हो. वह शशि को तब तक देखता रहा, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई.
घर पहुंच कर शशि एहसान के खयालों में खो गई. पता नहीं क्यों उस का दिल उस के लिए धड़क रहा था. रात में जबवह सोई तो उसे सपने में भी एहसान ही दिखाई दिया. वह उस से प्यार भरी बातें कर रहा था. शशि उस से मिल कर खुशी से चहक रही थी.
रात को सपने में कुछ ऐसा ही एहसान भी देख रहा था. अचानक उस की नींद टूट गई और वह हड़बड़ा कर उठ बैठा. मन की शांति के लिए उस ने गिलास ठंडा पानी पीया. फिर वह सोने की कोशिश करने लगा, लेकिन उसे नींद नहीं आई. उस ने फैसला किया कि वह कल भी यज्ञस्थल पर जाएगा. हो सकता है, उस खूबसूरत लड़की से एक बार फिर मुलाकात हो जाए.
अगले दिन निर्धारित समय पर शशि अकेली ही यज्ञस्थल की ओर चल दी. उस वक्त उस के दिमाग में कई सवाल उमड़घुमड़ रहे थे. वह सवालों की उधेड़बुन में यज्ञस्थल पर पहुंच गई. जब शशि वहां पहुंची तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि एहसान भी वहीं बैठा था. उसे लगा मानो वह उसी का इंतजार कर रहा हो.
प्यार के पंछियों की पहली उड़ान
एहसान की नजर शशि से टकराई तो दोनों के दिल खुशी से धड़क उठे. अनायास ही शशि मुसकरा दी तो एहसान के दिल के फूल खिल गए. जवाब में वह भी मुसकरा दिया. शशि वहां से निकली और एहसान को देखते हुए यज्ञस्थल से बाहर आ गई. मानो उस ने इशारा किया हो कि वह भी बाहर आए.
आगेआगे शशि और पीछेपीछे एहसान चलते हुए दोनों सुरक्षित जगह पर पहुंचे और एकदूसरे को देखने लगे. अनायास एहसान शशि के करीब आया और उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम एहसान है और मैं पास के गांव कोहरावां का रहने वाला हूं.’’
थोड़ा शरमाते हुए शशि बोली, ‘‘मेरा नाम शशि है और मैं इसी गांव में रहती हूं. मुझे तुम्हारा चेहरा जानापहचाना सा लग रहा था. शायद मैं ने कभी तुम्हें देखा हो, लेकिन कल ही मेरा ध्यान तुम पर गया.’’
‘‘शशि…बड़ा ही प्यारा नाम है. तुम सचमुच अप्सराओं की तरह सुंदर हो. मुझे तुम्हारा नाम और तुम दोनों ही बहुत पसंद हो. क्या मैं तुम्हें पसंद हूं?’’ एहसान ने उत्सुकता में पूछा.
शशि ने ‘हां’ में सिर हिला दिया, साथ ही कहा भी, ‘‘एहसान, सिर्फ परिचय से कोई एकदूसरे का नहीं हो जाता, बल्कि उस के लिए एकदूसरे के बारे में सारी बात जानना भी जरूरी होता है. तभी दो दिल एकदूसरे के करीब हो सकते हैं.’’
‘‘बिलकुल ठीक कहा शशि, आओ हम उस पेड़ के नीचे बैठ कर बातें करते हैं.’’ कहते हुए एहसान शशि के साथ पेड़ की छांव में जा बैठा और बातें करने लगा. दोनों ने एकदूसरे को विस्तार से अपनेअपने परिवारों के बारे में बताया.
एहसान ने कहा, ‘‘जिंदगी हमारी है, इसलिए अपनी जिंदगी के बारे में सिर्फ हम ही निर्णय ले सकते हैं. तुम मुझ से मिलने के लिए रोज यहीं आना. यहां लोगों की नजर हम पर नहीं पड़ेगी. बोलो, आओगी न?’’
‘‘हां एहसान, मैं जरूर आऊंगी. तुम मेरा इंतजार करना.’’ शशि ने कहा और वहां से अपने घर की ओर चल दी.
शशि आज ऐसे खुश थी, मानो कोई बड़ा खजाना मिल गया हो. वह एहसान की यादों में इतनी खो गई थी कि कब सवेरा हुआ और कब वह उस के पास पहुंच गई, उसे पता ही नहीं चला. एहसान भी उसी पेड़ की छांव में उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. दोनों एकदूसरे से मिल कर काफी खुश हुए. एहसान शशि से रोमांटिक बातें करने लगा तो शशि शरमा गई, लेकिन बोली कुछ नहीं. तब एहसान ने पूछा, ‘‘शशि, तुम्हें पता है कि तुम कितनी सुंदर हो?’’
‘‘हां, मुझे पता है, पर इस में मेरा क्या कुसूर है?’’ शशि ने पूछा.
‘‘इस में तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है. कुसूर है तो सिर्फ तुम्हारी सुंदरता का, जिस ने मेरा दिल चुरा लिया है. मेरे इस दिल को अपने पास संभाल कर रखना. इसे कभी तोड़ना नहीं.’’ एहसान ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘यह कैसी बातें कर रहे हो? मैं भला तुम्हारा दिल कैसे तोड़ सकती हूं? हमारा मिलन तो जन्मजन्मांतर का है. तुम्हें देख कर मुझे पहली ही नजर में ऐसा लगा जैसे तुम मेरे हो और मैं तुम्हारे पास खिंची चली आई.’’ शशि ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा.
‘‘मैं कितना खुशकिस्मत हूं कि तुम मुझे यज्ञ में अनायास ही मिल गई. शायद मेरे नसीब में लिखा था तुम्हें पाना.’’ कहते हुए एहसान ने शशि के हाथ को चूमा तो वह शरमा गई.
उन दोनों का प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ने लगा. लेकिन गांव का माहौल कुछ ऐसा होता है कि अधिक दिनों तक कोई भी बात किसी से छिपी नहीं रह सकती. एहसान और शशि के प्रेमिल संबंध भी लोगों से छिपे नहीं रह सके.
लालजी को पता चला तो उस ने शशि की खूब पिटाई की और उसे सख्त हिदायत दी कि वह आज के बाद एहसान से मिलने की भूल कर भी कोशिश न करे, नहीं तो उस से बुरा कोई नहीं होगा. उस के घर से निकलने पर भी पाबंदी लगा दी गई. लालजी अब जल्द से जल्द शशि के हाथ पीले कर देना चाहता था. शशि के कारण पूरे गांव में उस की बदनामी हो रही थी. मिश्रिख थानाक्षेत्र के ही अमजदपुर गांव में रामप्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे और खेतीकिसानी करते थे. परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 3 बेटियां श्रीकांती, महिमा व सरिता थीं और 2 बेटे बबलू और सोनू.
रामप्रसाद अपनी 2 बेटियों का विवाह कर चुके थे. उन्होंने बड़े बेटे बबलू का भी विवाह कर दिया था. बबलू लखनऊ में रह कर ड्राइवरी करता था. जबकि सोनू अभी अविवाहित था. सोनू पिता के साथ खेती में हाथ बंटाता था.
लालजी को एक रिश्तेदार के माध्यम से सोनू और उस के परिवार के बारे में पता चला तो वह सोनू के पिता रामप्रसाद से जा कर मिले. बात आगे बढ़ी और जल्द ही शशि का रिश्ता सोनू के साथ तय हो गया. शशि ने लाख विरोध किया लेकिन उस की एक नहीं चली.
प्यार में अड़ंगा, शशि हुई परेशान
इसी साल 9 मार्च को धूमधाम से शशि और सोनू का विवाह हो गया. शशि को न चाहते हुए भी विवाह कर के ससुराल जाना पड़ा. वह एहसान के साथ जिंदगी गुजारने का सपना देख रही थी, लेकिन उस के घर वालों ने उस के सपनों को तोड़ दिया था.
पगफेरे की रस्म के लिए जब शशि अपने मायके गई तो वह एहसान से मिली और उस के गले लग कर बिलखबिलख कर रोई. एहसान की भी आंखें गीली हो आईं. वह शशि की हालत देख कर बेचैन हो उठा. उस ने सांत्वना दे कर किसी तरह शशि को शांत किया. फिर उस से कहा कि हम कभी अलग नहीं होंगे, कोई भी हमें जुदा नहीं कर सकता.
शशि जब तक मायके में रही, एहसान से मिलती रही. वहां से वापस ससुराल आई तो मोबाइल पर चोरीछिपे एहसान से बातें करने लगी.
30 मार्च को सोनू शशि को बाइक पर बैठा कर अपनी ससुराल गया, जो उस के गांव से महज 12 किलोमीटर की दूरी पर थी. एक दिन रुक कर उसे अकेले 31 मार्च को वापस घर आना था, लेकिन शशि की मौसी ने उस दिन आने नहीं दिया. 1 अप्रैल को शाम 4 बजे सोनू बाइक से अपनी ससुराल से घर जाने के लिए चल दिया. अभी वह साढ़े 4 बजे के करीब सहादतनगर गांव के पास पहुंचा ही था कि पीछे से आए बाइक पर बैठे 2 अज्ञात युवकों ने सोनू की कनपटी पर तमंचे से फायर कर दिया. गोली लगते ही सोनू बाइक समेत जमीन पर गिर पड़ा. कुछ पल छटपटाने के बाद उस ने दम तोड़ दिया.
कुछ लोगों ने काफी दूर से घटना होते देखी थी. जब तक वे वहां पहुंचे, तब तक हत्यारे फरार हो चुके थे. उन में से किसी ने इस की सूचना मिश्रिख कोतवाली को दे दी.
सूचना पा कर इंसपेक्टर अशोक सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश का निरीक्षण करने के बाद उन्होंने मृतक की शिनाख्त कराई तो उस की शिनाख्त सोनू के रूप में हो गई.
इंसपेक्टर अशोक सिंह ने सोनू के परिजनों को घटना की सूचना भेज दी. कुछ ही देर में सोनू के परिजन वहां पहुंच गए और लाश को देख कर रोनेबिलखने लगे. इंसपेक्टर अशोक सिंह ने सोनू के घर वालों से कुछ आवश्यक पूछताछ की, फिर लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया.
इस के बाद कोतवाली आ कर उन्होंने सोनू के भाई बबलू की लिखित तहरीर पर अज्ञात के विरुद्ध भादंवि की धारा 302 और एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.
इंसपेक्टर अशोक सिंह ने इस मामले की जांच शुरू की तो उन्हें सोनू की पत्नी शशि पर शक हो गया. विवाह को एक माह भी नहीं बीता था और ससुराल से आते वक्त ही सोनू की हत्या हो गई थी. सोनू के साथ ही उन्होंने शशि के मोबाइल की भी काल डिटेल्स निकलवाई.
प्रेमी बना हत्यारा
सोनू के ससुराल से निकलने के पहले और बाद में भी शशि के नंबर से एक नंबर पर काल की गई थी. उस नंबर पर उस से पहले भी हर रोज कई बार काल की गई थी. उस नंबर की जानकारी की गई तो वह नंबर कोहरावां गांव निवासी एहसान का निकला. इस का मतलब था कि सोनू की हत्या में शशि का भी हाथ था.
12 अप्रैल को इंसपेक्टर अशोक सिंह ने शशि को अपनी हिरासत में ले लिया और महिला सिपाही की उपस्थिति में उस से कड़ाई से पूछताछ की. घबरा कर उस ने अपना जुर्म स्वीकार करते हुए सोनू की हत्या करने वाले अपने प्रेमी एहसान और उस के दोस्त रामशंकर का नाम भी बता दिया. इस के बाद दोनों को उसी दिन बढ़ैया गांव के पास से गिरफ्तार कर लिया गया.
विवाह के कुछ दिन में ही शशि की हरकतों से सोनू को शक हो गया था कि शशि चोरीछिपे किसी से बात करती है. उस ने इस का कई बार विरोध भी किया था. प्रेमी से मिलना तो दूर, बात करना भी मुश्किल होने लगा तो शशि तड़प उठी. उस ने अपने प्रेमी एहसान से पूरी बात बताई. इस के बाद दोनों ने तय किया कि वे सोनू को रास्ते से हटा देंगे. क्योंकि उस को हटाए बिना वे कभी एक नहीं हो सकते. शशि के हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि उस ने अपनी मांग का सिंदूर मिटाने का फैसला कर लिया.
एहसान ने अपने दोस्त रामशंकर उर्फ छोटू निवासी परागपुर थाना मिश्रिख को सोनू की हत्या करने के लिए अपने साथ मिला लिया था. 1 अप्रैल को एहसान अपने दोस्त के साथ रास्ते में खड़ा हो कर सोनू के आने का इंतजार करने लगा. सोनू का दोपहर डेढ़ बजे ससुराल से निकलने का प्रोग्राम था, इसलिए एहसान पहले से ही आ कर उस के आने का इंतजार कर रहा था. लेकिन सोनू ससुराल से 4 बजे के करीब निकला. उस के निकलते ही शशि ने एहसान को फोन कर के बता दिया.
जैसे ही सोनू सामने से आता दिखा, रामशंकर ने बाइक स्टार्ट की. एहसान उस के पीछे बैठ गया. रामशंकर ने गाड़ी को स्पीड दे दी. सोनू की बाइक के करीब पहुंचते ही एहसान ने सोनू की कनपटी पर फायर कर दिया. गोली लगने से सोनू की मौत हो गई. गोली मारने के बाद दोनों वहां से फरार हो गया.
लेकिन उन का गुनाह छिप न सका. पुलिस ने उन के पास से हत्या में प्रयुक्त तमंचा, 2 कारतूस, एक कारतूस का खोखा और 4 मोबाइल बरामद किए. साथ ही हत्या में प्रयुक्त बाइक नंबर यूपी34 एन5189 भी बरामद कर ली गई. यह बाइक एहसान के भाई सलमान की थी. आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
राजस्थान के कोटा जिले में इटावा कस्बे के बूढादीत गांव में रहने वाले बुद्धि प्रकाश मीणा का कोई 12 साल पहले वहीं के निवासी सीताराम की बेटी प्रियंका से विवाह हुआ था. बुद्धि प्रकाश खेतिहर किसान था. प्रियंका का दांपत्य जीवन 10 साल ही ठीकठाक रह पाया. इस के बाद दोनों में खटपट रहने लगी.
इस बीच प्रियंका ने एकएक कर के एक बेटा और 2 बेटियों समेत 3 बच्चों को जन्म दिया.
दांपत्य जीवन के 12 साल गुजर जाने और 3 बच्चों की पैदाइश के बाद बुद्धि प्रकाश और प्रियंका के बीच खटास कैसे पैदा हुई? उस की वजह था पड़ोस में आ कर बसने वाला युवक महावीर मीणा.
दरअसल कदकाठी की दृष्टि से आकर्षक लगने वाला महावीर मीणा प्रियंका की नजरों में चढ़ गया था. प्रियंका की हर बात महावीर पर जा कर खत्म होती थी कि क्यों तुम अपने आप को महावीर की तरह नहीं ढाल लेते? जबकि बुद्धि प्रकाश का जवाब मुसकराहट में डूबा होता था कि महावीर की अभी शादी नहीं हुई है. इसलिए उसे अभी किसी की फिक्र नहीं है.
प्रियंका जवान थी, खूबसूरत भी. बेशक वह 3 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन उस की देह के कसाव में कोई कमी नहीं आई थी. उस की अपनी भावनाएं थीं. इसलिए मन करता था कि बुद्धि प्रकाश भी सजीले नौजवान की तरह बनठन कर रहे. फिल्मी हीरो की तरह उस से प्यार करे.
लेकिन बुद्धि प्रकाश 35 की उम्र पार कर चुका था. मेहनतकश खेतीकिसानी में खटने के कारण उस पर उम्र हावी हो चली थी. इसलिए पत्नी की इच्छाओं की गहराई भांपने का उसे कभी खयाल तक नहीं आया. प्रियंका को अपने मेहनतकश पति के पसीने की गंध सड़ांध मारती लगती थी.
चढ़ती उम्र और बढ़ती आकांक्षाओं के साथ प्रियंका में पति के प्रति नफरत में इजाफा होता चला गया. संयोग ही रहा कि उस के बाजू वाले मकान में रहने के लिए महावीर मीणा आ गया. महावीर छैलछबीला था और प्रियंका के सपनों के मर्द की तासीर पर खरा उतरता था. प्रियंका अकसर अपने पति बुद्धि प्रकाश को उस का उदाहरण देते हुए कहती थी, तुम भी ऐसे सजधज कर क्यों नहीं रहते. बुद्धि प्रकाश सीधासादा गृहस्थ इंसान था, इसलिए पत्नी की उड़ान को पहचानने की बजाय बात को टालते हुए कह देता, ‘‘अभी महावीर पर गृहस्थी की जिम्मेदारी नहीं पड़ी. जब पड़ेगी तो वह भी सजनासंवरना भूल जाएगा.’’
पड़ोसी के नाते महावीर की बुद्धि प्रकाश से मेलमुलाकात बढ़ी तो गाहेबगाहे महावीर के यहां उस का आनाजाना भी बढ़ गया. अकसर प्रियंका के आग्रह पर वह वहीं खाना भी खा लेता था.
असल में महावीर की नजरें प्रियंका पर थीं. उस की पारखी नजरों से यह बात छिपी नहीं रही कि असल में प्रियंका को क्या चाहिए? लेकिन सवाल यह था कि पहल कौन करे.
महावीर दोपहर में अकसर वक्त गुजारने के लिए अपने दोस्त की फलसब्जी की दुकान पर बैठ जाता था. दोस्त को सहूलियत थी कि अपने जरूरी काम निपटाने के लिए महावीर के भरोसे दुकान छोड़ जाता था.
एक दिन दुकान पर अकेला बैठा था तो प्रियंका सब्जी खरीदने पहुंची. लेकिन महावीर ने फलसब्जी के पैसे नहीं लिए. प्रियंका ने पैसे देने चाहे तो महावीर मुसकरा कर बोला, ‘‘तुम्हारी मुसकराहट में दाम वसूल हो गए. सारी दुकान ही अपनी समझो…’’
प्रियंका को शायद ऐसे ही मौके की तलाश थी. मुसकरा कर कहा, ‘‘ऐसी दोपहरी में दुकान पर बैठने की बजाय घर आओ.’’ प्रियंका ने मुसकरा कर निमंत्रण दिया तो महावीर बोला, ‘‘खातिरदारी का वादा करो तो आऊं.’’
‘‘मेरी तरफ से मेहमाननवाजी में कोई कमी नहीं रहेगी, तुम अकेले में आ कर देखो तो…’’ प्रियंका ने हंस कर कहा.
इस के बाद एक दिन महावीर प्रियंका के घर दोपहर के समय चला गया. प्रियंका तो जैसे उस का इंतजार कर रही थी. मौके का फायदा उठाते हुए उस दिन दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं.
इस के बाद तो प्रियंका महावीर की मुरीद हो गई. मौका मिलने पर दोपहर के समय वह प्रियंका के घर चला जाता. इस तरह कुछ दिनों तक उन का यह खेल बिना किसी रुकावट के चलता रहा.
कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. एक दिन बुद्धि प्रकाश खेत से जल्दी ही लौट आया और उस ने प्रियंका को महावीर के साथ रंगरलियां मनाते देख लिया. फिर तो बुद्धि प्रकाश का खून खौल उठा.
महावीर तो भाग गया, लेकिन उस ने प्रियंका की जम कर धुनाई शुरू कर दी. प्रियंका ने गलती मानी तो बुद्धि प्रकाश ने यह चेतावनी देते हुए उसे छोड़ दिया कि अगली बार ऐसा हुआ तो तुम दोनों जिंदगी से हाथ धो बैठोगे.
जिसे पराया घी चाटने की आदत पड़ जाए वह कहां बाज आता है. एक बार की बात है. पति के सो जाने के बाद प्रियंका अपने प्रेमी से फोन पर बातें कर रही थी. उसी दौरान बुद्धि प्रकाश की नींद खुल गई. उस ने पत्नी की बातें सुन लीं. फिर क्या था, उसी समय बुद्धि प्रकाश ने प्रियंका पर जम कर लातघूंसों की बरसात कर दी.
प्रियंका किसी भी हालत में महावीर का साथ नहीं छोड़ना चाहती थी. इस की वजह से अकसर ही उसे पति से पिटाई खानी पड़ती थी. रोजरोज की कलह और पिटाई से अधमरी होती जा रही प्रियंका का पोरपोर दुखने लगा था.
प्रियंका का सब से ज्यादा आक्रोश तो इस बात को ले कर था कि बुद्धि प्रकाश जम कर शराब पीने लगा था और नशे में धुत हो कर उसे गंदीगंदी गालियों से जलील करता था.
प्रियंका ने महावीर पर औरत का आखिरी अस्त्र चला दिया कि तुम्हारे कारण मैं हर रोज रूई की तरह धुनी जाती हूं और तुम कुछ भी नहीं करते. प्रियंका ने महावीर के सामने शर्त रख दी, ‘‘तुम्हें फूल चाहिए तो कांटे को जड़ से खत्म करना पड़ेगा.’’
प्रियंका की खातिर महावीर बुद्धि प्रकाश का कत्ल करने को तैयार हो गया. फिर योजना के तहत अगले दिन महावीर यह कहते हुए बुद्धि प्रकाश के पावोंं में गिर पड़ा, ‘‘दादा, मैं कल गांव छोड़ कर जा रहा हूं ताकि तुम्हारी कलह खत्म हो सके.’’
बुद्धि प्रकाश ने भी महावीर पर यह सोच कर भरोसा जताया कि संकट अपने आप ही जा रहा है.
महावीर ने बुद्धि प्रकाश को यह कहते हुए शराब की दावत दे डाली कि भैया आखिरी मुलाकात का जश्न हो जाए. बुद्धि प्रकाश के मन में तो कोई खोट नहीं थी. उस ने सहज भाव से कह दिया, ‘‘ठीक है भैया, अंत भला सो सब भला.’’
महावीर ने तो थोड़ी ही शराब पी, लेकिन बुद्धि प्रकाश को जम कर पिलाई. नशे में बेहोश हो चुके बुद्धि प्रकाश को महावीर ने घर के बरामदे में रखे तख्त पर ला कर पटक दिया. फिर प्रियंका की मदद से रस्सी से उस का गला घोंट दिया.
पुलिस द्वारा निकाली गई काल डिटेल्स के मुताबिक महावीर ने रात करीब 12 बजे बुद्धि प्रकाश की हत्या करने के बाद प्रियंका से 20 से 25 मिनट बात की. इस के बाद प्रियंका सो गई थी. प्रियंका से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के प्रेमी महावीर मीणा को भी गिरफ्तार कर लिया. फिर दोनों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.
—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित
भूपेंद्र ने खेला खेल
जेल से आते ही उस ने शशि की पिटाई की और उसे घर से निकल जाने को कह दिया. शशि ने फिर से अपने साथ पति द्वारा मारपीट की शिकायत चौकी में कर दी. इस मामले में पुलिस ने पप्पू पर कोई खास काररवाई तो नहीं की बल्कि उसे समझाते हुए पत्नी के साथ भविष्य में मारपीट न करने की चेतावनी दे कर छोड़ दिया. जेल से वापस आने के बाद पप्पू ने भूपेंद्र की नौकरी छोड़ दी. उस के बाद भूपेंद्र ने पप्पू के घर आनाजाना भी कम कर दिया.
इस पर भूपेंद्र ने शशि से मिलने का दूसरा रास्ता निकाला. जब कभी पप्पू किसी काम से बाहर जाता तो वह भूपेंद्र को फोन कर के गांव से बाहर बुला लेती और फिर उस के साथ मौजमस्ती करने निकल जाती. बाद में उस ने अपने बच्चों तक की परवाह करनी बंद कर दी. कभीकभी तो जब बच्चे ज्यादा भूखे होते तो पप्पू ही उन्हें कच्चापक्का खाना बना कर खिलाता.
शशि सुबह ही बनठन कर निकलती और देर रात घर लौटती. पति कुछ कहता तो वह उस पर ही चढ़ बैठती थी. हर रोज की चिकचिकबाजी से पप्पू परेशान हो गया तो उस ने शशि को तलाक देने की योजना बनाई. उस ने एक दिन उस से कोरे स्टांप पेपर पर अंगूठा भी लगवा लिया.
यह बात शशि ने भूपेंद्र को बताई तो उस ने शशि के कान भरते हुए उसे पति के खिलाफ ही भड़का दिया. भूपेंद्र ने शशि से कहा कि पप्पू तुम्हारी हत्या करने की साजिश रच रहा है. अगर अपनी खैर चाहती हो तो तुम पहले ही उसे मौत के घाट उतार दो.
भूपेंद्र की बात सुनते ही शशि भड़क उठी. उस ने कहा कि पति को मारना मेरे बस की बात नहीं है. अगर तुम मुझे दिल से चाहते हो तो यह काम तुम ही क्यों नहीं कर देते. अपने प्यार की खातिर इतना काम तो तुम ही कर सकते हो.
शशि के मन की बात सामने आते ही भूपेंद्र समझ गया कि अगर वह पप्पू को अपने रास्ते से हटा दे तो शशि पूरी तरह से उसी की रखैल बन कर रह जाएगी. इस के बाद उस ने पप्पू को मौत की नींद सुलाने के लिए तानेबाने बुनने शुरू कर दिए.
भूपेंद्र अगर शशि के लिए कुछ भी करने को तैयार था, तो इस का भी एक बड़ा कारण था. भूपेंद्र की शादी को कई साल बीत चुके थे, लेकिन उस की बीवी को कोई औलाद नहीं हुई थी. जिस के लिए उस की बीवी और वह परेशान रहते थे. शशि की ओर से पप्पू को अपने बीच से हटाने के लिए छूट मिलते ही उस ने सोच लिया था कि पप्पू को मौत की नींद सुलाने के बाद वह कोर्टमैरिज कर के उसे अपने घर ले आएगा.
लिखी गई हत्या की पटकथा
भूपेंद्र के गांव में ही उस का एक जिगरी दोस्त था मंजीत सिंह. मंजीत सिंह भूपेंद्र के हर सुखदुख में काम आता था. भूपेंद्र ने अपने मन की बात मंजीत के सामने रखी तो मंजीत उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद भूपेंद्र ने अगला तानाबुना बुना. वह जानता था कि पप्पू इस वक्त उस से बहुत खफा है और उस की किसी भी चाल में फंसने वाला नहीं है.
भूपेंद्र के दिखावे के लिए शशि से मिलनाजुलना बंद कर दिया ताकि पप्पू के दिल में उस के प्रति नफरत की आग शांत हो सके. जब पप्पू ने देखा कि भूपेंद्र ने शशि से मिलना लगभग बंद कर दिया है तो पप्पू का व्यवहार भी पत्नी के प्रति नरम हो गया. फिर एक दिन शशि ने भूपेंद्र को फोन कर के अपने घर बुला लिया. उस वक्त पप्पू भी घर पर ही था.
पप्पू के घर पहुंचते ही भूपेंद्र ने उस के सामने अपनी गलती मानते हुए क्षमा मांगी. उस ने भविष्य में ऐसी कोई भी गलती न करने की कसम भी खाई. यह सब नाटक करने के बाद उस ने पप्पू से कहा कि उस के बिना उस का सारा कामधंधा चौपट हो गया है. वह आज ही उस के साथ चल कर ट्रैक्टर संभाल ले.
पप्पू उस की चिकनीचुपड़ी बातों में आ गया और फिर से उस का ट्रैक्टर चलाने लगा. उसे भूपेंद्र पर फिर से विश्वास हो गया था. उसी विश्वास के सहारे 26 जुलाई, 2018 को किसी काम के बहाने भूपेंद्र ने पप्पू को अपने साथ लिया और बाइक पर बैठा कर भोगपुर डैम की ओर ले गया. उस के साथ मंजीत भी था.
डैम के किनारे सुनसान जंगल में पहुंचते ही तीनों एक जगह बैठ गए. मौका पाते ही मंजीत ने गरमी का बहना कर के अपने सिर से पगड़ी उतार ली. फिर मौका पा कर दोनों ने पप्पू को दबोच लिया. पप्पू को कब्जे में कर के दोनों ने पगड़ी के कपड़े से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. कहीं वह जीवित न रह जाए, इस के लिए भूपेंद्र ने अपनी बेल्ट खोली और फिर से उस के गले में डाल कर खींच दी.
पप्पू की हत्या करने के बाद दोनों ने उस की लाश उठा कर 20 मीटर दूर पानी में फेंक दी. पप्पू को मौत की नींद सुलाने के बाद दोनों बाइक से अपने घर पहुंच गए. पप्पू की हत्या करने वाली बात भूपेंद्र ने मोबाइल पर शशि को भी बता दी थी. उस की हत्या की बात सुनने के बाद शशि घर से बाहर नहीं निकली. उस के बच्चों ने पापा के बारे में पूछा तो उस ने कह दिया कि उस के पापा किसी काम से बाहर गए हुए हैं, वह आज रात नहीं आएंगे. बच्चों को खाना खिला कर उस ने सुला दिया.
इस केस के खुलते ही अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त पगड़ी, बेल्ट, बाइक, मोबाइल फोन, मृतक की चप्पलें आदि भी बरामद कर लीं. पुलिस ने मृतक की पत्नी शशि, भूपेंद्र सिंह और मंजीत सिंह के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया.
पप्पू के दोनों मासूम बच्चे अपने ताऊ राजपाल सिंह के पास थे. राजपाल सिंह ने बताया कि शशि जाते हुए भी अपने बेटे राज को जेल से छूट कर आने के बाद देख लेने की धमकी दे कर गई थी, उस की जान को खतरा हो सकता है.
जेल जाने के दौरान भी शशि के चेहरे पर न तो पति की मौत का कोई गम था और न ही अपने दोनों बच्चों के भविष्य को ले कर किसी तरह की चिंता. शशि ने जातेजाते भी पत्रकारों से कहा कि उसे अपने पति की हत्या का कोई अफसोस नहीं.