गांवों में दिनचर्या अमूमन अल सुबह ही शुरू हो जाती है. अंबेडकर नगर माजरा गांव में भी लोग सुबह उठ कर अपने काम में जुटना शुरू हो गए थे, लेकिन उस सुबह का आगाज अच्छा नहीं हुआ, क्योंकि गांव के ही सईद अहमद के घर से रोनेपीटने की आवाजें आने लगी थीं. सईद के परिवार में पत्नी शकीला (50 वर्ष) 3 बेटियां रजिया (20 वर्ष), सुलताना (18 वर्ष), शबाना (15 वर्ष) और 2 बेटे दिलशाद व शमशाद थे.
शमशाद बाहर नौकरी करता था जबकि दूसरा बेटा दिलशाद अपनी पत्नी नसरीन के साथ इसी घर में बने दूसरे कमरे में रहता था. रोने की आवाजें सुन कर लोग दौड़ कर सईद के घर की तरफ पहुंचे तो वहां का मंजर खौफनाक था.
यह देख कर हर किसी के पैरों तले से जमीन खिसक गई. लोगों ने जो कुछ देखा वह उन की कल्पनाओं से जुदा था. एक कमरे में शकीला व उस की 2 बेटियां रजिया व शबाना खून से लहूलुहान मृत पड़ी थीं, जबकि सुलताना कराह रही थी. सईद का वहां कुछ पता नहीं था.
लोगों ने इस की सूचना पुलिस को दी. यह दिल दहला देने वाली घटना उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के शिकारपुर थाना क्षेत्र के गांव अंबेडकरनगर माजरा में 3 मार्च, 2021 की देर रात हुई थी.
दिन निकलते ही तिहरे हत्याकांड की सूचना से पुलिस विभाग में भी हड़कंप मच गया. थानाप्रभारी सुभाष सिंह मौके पर पहुंचे. वारदात की सूचना मिलने पर एसएसपी संतोष सिंह, एसपी (क्राइम) कमलेश बहादुर व सीओ गोपाल सिंह भी वहां आ पहुंचे. पुलिस ने मौका मुआयना किया. मृतकाओं के सिर पर किसी भारी वस्तु से प्रहार किए गए थे.
घर में लूटपाट भी नहीं हुई थी. पुलिस की नजर वहां पड़े एक हथौड़े पर गई. उस पर खून लगा था. पहली नजर में पुलिस समझ गई कि उसी हथौड़े से हत्याएं की गई हैं. पुलिस ने सब से पहले घायल सुलताना को अस्पताल पहुंचाया.

हैरानी की बात यह थी कि घर या आसपड़ोस में किसी को वारदात का पता तक नहीं चला था. घटना का पता सब से पहले सईद की बहू नसरीन को चला था.
पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘सर, मैं हर रोज की तरह सुबह सो कर उठी तो अम्मीजान के कमरे से कराहने की आवाज आ रही थी. मैं उस तरफ पहुंची तो अम्मी व मेरी ननद इस हालत में पड़े थे. यह देख कर मेरी चीख निकल गई, मैं ने पड़ोस में अपनी ददियासास संतो को दौड़ कर बुलाया फिर गांव वाले आ गए.’’
पुलिस ने उस के बयान को गंभीरता से सुन कर नोट कर लिया. नसरीन के बयानों में सच्चाई थी. शक सईद पर था, क्योंकि वह लापता था. सब से बड़ा सवाल यह था कि यदि हत्याएं वाकई सईद ने की थीं तो फिर इस की आखिर क्या वजह थी?
बहरहाल, पुलिस ने मौके पर काररवाई पूरी कर सभी शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिए. हत्याओं में इस्तेमाल हथौड़े को कब्जे में लिया. सईद के खिलाफ उस के बेटे शमशाद की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस सईद की तलाश में जुट गई, लेकिन अगले कई दिनों तक भी उस का कोई पता नहीं चल सका. हत्याओं की असल वजह से परदा उठाने वाला एक सईद ही था, जो फरार था.
पुलिस टीमें सईद की तलाश में लगी हुई थीं. उस की नातेरिश्तेदारियों में भी दबिशें दी गईं. सईद का पता नहीं चला तो पुलिस ने उस के ऊपर 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित कर दिया. उधर सईद की घायल बेटी सुलताना खतरे से बाहर आ चुकी थी.
सईद पुलिस के लिए एक तरह से चुनौती बन चुका था. इस बीच पुलिस को पता चला कि सईद पहले पंजाब के मोहाली में भी नौकरी करता था, वहां भी वह छिप सकता था.
पुलिस टीम वहां पहुंची और उस की पुरानी पहचान के हिसाब से लोगों से जानकारियां एकत्र कीं. इस से पुलिस को सफलता मिली, और वह 21 मई, 2021 को सईद तक पहुंच गई.
सईद मोहाली की ही मानकपुर शरीफ दरगाह में शरण लिए हुए था. पुलिस टीम सईद को दबोच कर बुलंदशहर ले आई. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने पत्नी व बेटियों की हत्या करना स्वीकार कर लिया.
गहनता से की गई पूछताछ में ऐसी कहानी निकलकर सामने आई कि पुलिस भी सोचने पर मजबूर हो गई. चौंकाने वाली बात यह थी कि सईद ऐसा हैवान था जिसे अपने परिवार को उजाड़ने का जरा भी अफसोस नहीं था.
सईद मेहनतमजदूरी करता था. किसी तरह परिवार की गाड़ी चल रही थी. सईद की कमाई इतनी नहीं थी कि परिवार का खर्च चल सके.
परिवार को सहारा मिल सके इसलिए शकीला ने भी लोगों के खेतों में काम करना शुरू कर दिया. शकीला को घर आने में देरसबेर भी हो जाती थी. यह बात सईद को पसंद नहीं थी.
‘‘शकीला मुझे इस तरह तुम्हारा काम करना पसंद नहीं है.’’ एक दिन सईद ने अपने मन की बात पत्नी से कह दी.
‘‘यह सब मैं अपने लिए नहीं बल्कि परिवार के लिए कर रही हूं. गांव की अन्य औरतें भी तो काम करती हैं, फिर मैं कर रही हूं तो इस में बुराई ही क्या है.’’ पत्नी का जवाब सुन कर सईद देखता रह गया.
शकीला की बात अपनी जगह बिलकुल सही थी. सईद से घर के हालात छिपे नहीं थे, लेकिन उस की परेशानी दूसरी थी. दरअसल उस के दिमाग में शक का कीड़ा घर कर गया था. वह पत्नी पर शक करने लगा था.
शक ऐसा रोग है कि जिस का इलाज किसी के पास नहीं होता. सईद का शक्की स्वभाव ज्यादा बढ़ने लगा तो परिवार में झगड़े होने लगे.
जबकि शकीला ने कुछ सालों की मेहनत से कई मजदूर महिलाओं को अपने साथ जोड़ लिया था और आलू खुदाई आदि के ठेके भी लेने लगी थी.
जब भी वह घर देर से आती तो सईद झगड़ा जरूर करता. एक दिन शकीला ने सईद को समझाया भी, ‘‘देखो तुम्हारे शक की कोई वजह नहीं है, तुम्हे शक करने की बीमारी हो गई है. इस उम्र में मेरे लिए क्या बिगड़ना बचा है.’’
‘‘मैं सब जानता हूं. तुम जैसी औरतें अपने शौहर को बहलाने के लिए इसी तरह की नौटंकियां किया करती हैं.’’ सईद ने उसे गहरी नजरों से घूरते हुए कहा.
‘‘तुम्हें तो फिक्र है नहीं, कल को बेटियां जवान हो रही हैं, कभी सोचा है कि इन की शादियां कैसे होंगी. तुम यूं ही शक करते रहे, तो न जाने एक दिन क्या होगा.’’ शकीला बोली.
सईद अपने शक से बाहर निकलने को कतई तैयार नहीं था. समय के साथ परिवार कलह का अखाड़ा बन गया और नौबत मारपीट तक आने लगी.
शकीला पति को समझाते समझाते थक चुकी थी, लेकिन उस पर कोई असर नहीं होता था. शकीला अब बेटियों को भी यदाकदा काम पर ले जाती थी. इस से परिवार में झगड़ा व मारपीट और भी ज्यादा बढ़ गया.

घर में जब भी झगड़ा होता था तो बेटियां मां के साथ हो जाती थीं. एक दिन बेटी रजिया ने तो सईद का सीधे सामना किया, ‘‘अब्बू तुम जो बारबार अम्मी पर तोहमत लगाते हो, वह अच्छी बात नहीं है. बहुत जुल्म हो गए तुम्हारे.’’
बेटी की बात पर सईद को ताव आ गया, ‘‘मां की तरह तुम्हारी भी जुबान चलने लगी है.’’ कहते हुए उस ने बेटी को तमाचा जड़ दिया. इस से रजिया रोते हुए बिफर गई.
‘‘रोजरोज के झगड़ों से हम भी तंग आ चुके हैं, अब यदि तुम ने कुछ किया तो हम पुलिस में शिकायत कर देंगे.’’ बेटी ने कहा तो सईद नरम पड़ गया.
कहते हैं कि शक इंसान को किसी भी हद तक सोचने पर मजबूर कर देता है. उस रात सईद को पूरी रात नींद नहीं आई, क्योंकि उस के दिमाग में नई बात चल चुकी थी कि बेटियां भी उस की पत्नी की तरह हो गई हैं.
वह उन के चरित्र पर भी शक कर बैठा. एक बार इस शक ने पैर जमाए तो वह दिमाग में घर कर के बैठ गया. शकीला घर से बाहर जाती तो बेटियों को भी साथ ले जाती थी. सईद हमेशा शक की नजर से देखता था और उन के वापस आने पर तानेबाजी कर के उन से झगड़ा किया करता था.
लाख समझाने के बाद भी सईद का शक बढ़ता गया तो वह खोयाखोया रहने लगा. खातेपीते, सोतेजागते उसे दिमाग में सिर्फ शक ही चलता रहता था.
शक पूरी तरह उस की जिंदगी का हिस्सा बन चुका था. एक दिन शकीला देर शाम काम से घर वापस आई तो सईद ने घर में तूफान खड़ा कर दिया, ‘‘मैं जानता हूं तू यारों के साथ गुलछर्रे उड़ा कर आई होगी.’’
‘‘तुम्हें शर्म आनी चाहिए ऐसी बात कहते हुए’’ शकीला ने जवाब दिया.
‘‘तुम्हें गलत करते हुए शर्म नहीं आती तो मुझे बोलते हुए क्यों आएगी.’’ वह बोला.
‘‘कोई एक बात तो बताओ जो मुझे गलत साबित कर दे. कम से कम लोगों से जा कर ही पूछ लो. मैं इसलिए मेहनत करती हूं ताकि घर अच्छे से चल सके.’’ शकीला ने समझाया.
‘‘मुझे किसी से पूछने की जरूरत नहीं है. मैं सब जानता हूं. तुझे घर चलाने की फिक्र नहीं यारों से मिलने की ज्यादा होती है.’’ सईद ने ताना दिया.
‘‘घर में बेटीबहू हैं, लेकिन तुम्हें इस उम्र में भी ऐसी बात करते हुए जरा भी शर्म नहीं आती. बेगैरती की हदों को लांघ चुके हो तुम.’’ पत्नी ने कहा.
‘‘एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी, मुझ से जबान लड़ाती है. सब को बरबाद कर दूंगा.’’ सईद चीख कर बोला और शकीला को पीटना शुरू कर दिया.
शकीला को उस की बेटियों ने बचाया. बड़ी बेटी रजिया उसी समय पुलिस को फोन करना चाहती थी, लेकिन बदनामी परिवार की ही होनी थी इसलिए शकीला ने ही उसे रोक दिया.
सईद के दोनों बेटों व बहू नसरीन ने भी सईद को कई बार समझाया, लेकिन अपने सामने वह किसी की सुनने को तैयार ही नहीं होता था. पिता के गुस्सैल व झगड़ालू स्वभाव के चलते बेटों ने मां को संभल कर रहने की सलाह दी.
उधर सईद ने मन ही मन पूरे परिवार को खत्म करने की ठान ली. 2 /3 मार्च की देर रात तक सईद जागता रहा. वह बाहर घर की बैठक में सोता था. उस की पत्नी व बेटियां एक कमरे में जबकि बेटा दिलशाद व उस की पत्नी दूसरे कमरे में.
12 बजे के बाद का समय था. पूरे गांव में सन्नाटा था. सईद ने हथौड़ा उठाया और चुपके से शकीला के कमरे में दाखिल हो गया. उस समय शकीला उस की बेटियां रजिया, शबाना व सुलताना गहरी नींद में थीं. सईद ने सब से पहले पूरी ताकत से शकीला के सिर पर हथौड़े से वार किए, उस की चीख भी नहीं निकल सकी. सईद के शक्की स्वभाव ने उसे शैतान बना दिया.
इस के बाद उस ने बेटियों के सिर पर भी ताबड़तोड़ प्रहार कर दिए. खून के रिश्तों पर शक का हथौड़ा बरसाते हुए उस के हाथ नहीं कांपे. सईद का इरादा अपनी बहू को भी खत्म करने का था. वह उस के कमरे की तरफ गया, लेकिन दरवाजा बंद देख कर उस ने अपना इरादा टाल दिया.
इस के बाद वह बैठक में आया और घर से निकल गया. अल सुबह उस ने बस पकड़ी और पंजाब के मोहाली में दरगाह में खुद को गरीब मजदूर बता कर पनाह ले ली. बहुत साल पहले वह पंजाब में नौकरी कर चुका था इसलिए उसे अपने लिए वह सुरक्षित ठिकाना लगा. सईद को लगता था कि वह कभी पकड़ा नहीं जाएगा, लेकिन वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया.
पूछताछ के बाद पुलिस ने सईद को अदालत में पेश किया जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.
सईद ने यदि अपने शक्की स्वभाव को काबू रख कर, परिवार पर भरोसा कर के जिंदगी जी होती तो शायद ऐसी नौबत कभी भी नहीं आती.
सोनी के घर वालों से कत्ल और कातिल का कोई सुराग नहीं मिला था. इसलिए सेक्टर-126 थाने की पुलिस ने आसपड़ोस के लोगों से भी पूछताछ की ताकि पता चल सके कि सोनी का चालचलन कैसा था और संदीप की गैरमौजूदगी में किसी ने उस के घर में किसी को आतेजाते तो नहीं देखा था. लेकिन कालोनी के लोगों से पूछताछ में भी कोई मदद नहीं मिली.
अब बारी थी संदीप से कुछ अहम मुद्दों पर पूछताछ करने की. संदीप ने पुलिस को बताया कि उस की पत्नी के शायद अपने ही गांव के अजय नाम के लड़के से शादी से पहले ही संबंध थे. संदीप ने आशंका जताई कि हो सकता है उस ने ही सोनी को मार दिया हो.
यह जानकारी बेहद महत्त्वपूर्ण थी. इसलिए पुलिस की एक टीम उसी दिन कासगंज रवाना हो गई और अजय को हिरासत में ले कर नोएडा ले आई.
दरअसल, अजय को पूछताछ के लिए लाने का आधार यह था कि पुलिस ने संदीप से मिली जानकारी के आधार पर सोनी के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई और जब उसे खंगाला गया तो पता चला कि सोनी और अजय के बीच हर दिन कई बार फोन पर लंबीलंबी बातें होती थीं और वाट्सऐप पर मैसेज का आदानप्रदान भी होता था.
मोबाइल काल डिटेल्स की रिपोर्ट साफ बता रही थी कि दोनों के बीच साधारण संबंध नहीं थे. अजय से जब पूछताछ हुई तो पहले उस ने पुलिस को बरगलाने का प्रयास किया, लेकिन जब उस के साथ सख्ती की गई तो वह टूट गया और कुबूल कर लिया कि सोनी के साथ उस के पिछले कई सालों से संबंध थे.
सोनी की जब से शादी हुई थी, इस के बाद भी जब वह अपने गांव आती थी तो दोनों मौका मिलने पर एकांत में मिल कर अपनी पुरानी मोहब्बत की यादों को ताजा करते रहते थे.
थानाप्रभारी राठी ने जब अजय का मोबाइल फोन चैक कराया तो उन्हें उस में सोनी तथा अजय के कुछ ऐसी अवस्था के फोटो मिले जो दोनों के बीच के नाजायज रिश्ते को साबित करते थे.
लेकिन अजय के फोन की काल डिटेल्स रिपोर्ट और उस की लोकेशन से कहीं भी यह साबित नहीं हो रहा था कि वह सोनी की हत्या वाले दिन या उस से पहले नोएडा आया था या फिर उस ने किसी संदिग्ध नंबर पर बात की थी.
इंसपेक्टर राठी एक बात तो अच्छी तरह समझ गए कि अजय और सोनी के बीच संबंध होने के बावजूद अजय के पास सोनी की हत्या का कोई मोटिव नहीं था, लेकिन संदीप जिस को यह बात पता थी कि उस की बीवी के अजय से संबंध हैं तो उस के पास तो सोनी की हत्या करने का पुख्ता आधार था.
‘एक सीधे से दिखने वाले अनपढ़ आदमी ने पुलिस को कैसे अपने जाल में फंसा कर गुमराह कर दिया,’ बड़बड़ाते हुए राठी ने मुक्का मेज पर मारते हुए उसी समय एसआई राजेंद्र सिंह को तत्काल सोनी के पति संदीप यादव की काल डिटेल्स निकलवाने का आदेश दिया.
थानाप्रभारी राठी को न जाने क्यों यकीन होने लगा था कि सोनी की हत्या के पीछे कहीं न कहीं संदीप का हाथ हो सकता है, इसीलिए उन्होंने उस की काल डिटेल्स निकलवाई थी. लेकिन उस में कोई ऐसी जानकारी, संदिग्ध नंबर या लोकेशन नहीं मिली, जिस से इस मामले में अजय की भूमिका को साबित किया जा सके.
एक सप्ताह बीत चुका था पुलिस को सोनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई थी. जिस बात का शक था वही हुआ. लक्ष्मी की मौत सिर में चोट लगने से हुई थी. इतना ही नहीं, उस की मौत के बाद उस के साथ शारीरिक संबंध भी बनाया गया था.
बस यही वो कारण था जिस की वजह से पुलिस को संदीप यादव पर किए गए शक से अपना ध्यान हटाना पड़ा. क्योंकि कोई भी पति किसी दूसरे आदमी को अपनी पत्नी की हत्या के बाद उस के शव के साथ ऐसा घिनौना काम न तो खुद करेगा न ही किसी दूसरे को करने देगा.
संदीप को संदेह से बाहर करने का दूसरा कारण यह भी था कि एक तो उस की काल डिटेल्स में कोई संदिग्ध बात नहीं मिली.
दूसरे महामाया फ्लाईओवर के नीचे रेहड़ी पटरी लगाने वाले कई लोगों से पूछताछ के बाद इस बात की पुष्टि भी हो गई थी कि संदीप यादव उस शाम को हमेशा की तरह शाम को 6 बजे अपना काम खत्म कर के साइकिल ले कर वहां से गया था.
इस के बाद संदीप पर शक करने की कोई वजह पुलिस के पास नहीं थी. राठी ने एक बार फिर से घटनास्थल के आसपास रहने वाले लोगों से पूछताछ करने का फैसला किया.
इसी कड़ी में पुलिस इलाके के हर घर में जा कर पूछताछ कर रही थी, लेकिन पुलिस ने तब पहली बार नोटिस किया कि एक प्लौट पर बना कमरा ऐसा था, जो घटना वाली रात को पूछताछ करते हुए भी पुलिस को बंद मिला और एक सप्ताह बाद जब पुलिस ने दोबारा छानबीन की तब भी बंद पाया गया.
पुलिस ने जब आसपास के लोगों से इस मकान में रहने वाले शख्स के बारे में पूछा तो पता चला कि बुलंदशहर के छतारी कस्बे का रहने वाला रामवीर साहू उस कमरे में रहता है.
रामवीर साहू पहले तो गुड़ बेचने का काम करता था, लेकिन 3-4 महीनों से वह आटोरिक्शा चलाने का काम कर रहा था. लोगों ने बताया कि जिस दिन सोनी की हत्या हुई, उस दिन सुबह के वक्त तो वह अपने घर में दिखा था, लेकिन इस के बाद से वह किसी को दिखाई नहीं दिया.
यह जानकारी साहू को संदेह के दायरे में लाने के लिए काफी थी. पुलिस ने जब संदीप यादव से रामवीर साहू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि कालोनी में रहने के कारण उस की साहू से जानपहचान तो है लेकिन वह उस के बारे में बहुत अधिक नहीं जानता.
संदीप ने बताया कि कभीकभी साहू महामाया मेट्रो स्टेशन के नीचे जहां वह कचौरी बेचता है, सवारी लेने के लिए आ कर खड़ा हो जाता था. संदीप ने बताया कि इसी कारण अकसर उस की साहू से बातचीत हो जाती थी.
संदीप और कालोनी के दूसरे लोगों से साहू के बारे में जो सब से महत्त्वपूर्ण जानकारी मिली, वह यह थी कि वह अकसर शराब के नशे में रहता था. शराब तो मजदूर तबके के ज्यादातर लोग पीते हैं लेकिन साहू एक तरह से शराब का लती था. दिन हो या रात, वह अकसर शराब के नशे में दिख जाता था.
साहू के बारे में कुछ और जानकारी एकत्र की गई तो पता चला कि वह अविवाहित था और इस इलाके में आने से पहले अपनी बहन के पास छलेरा गांव में रहता था.
रामवीर साहू थानाप्रभारी राठी के रडार पर आ चुका था. उन्होंने साहू की बहन का पता हासिल कर लिया और छलेरा में जा कर जब उस की बहन से उस के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि 20 जनवरी, 2022 की रात को वह उस के पास आया था लेकिन उस ने बहुत शराब पी रखी थी.
अगली सुबह जब उस ने साहू को शराब पी कर अपने घर आने की बात पर खरीखोटी सुनाई तो वह दोपहर को वहां से गांव जाने की बात कह कर चला गया. साहू के बारे में जैसेजैसे जानकारियां मिल रही थीं, उस के खिलाफ शक का दायरा बढ़ता जा रहा था.
सोनी हत्याकांड की जांच में अब तक हुई प्रगति के बारे में जब एडीसीपी रणविजय सिंह को साहू के बारे में तमाम जानकारियां मिलीं तो उन्होंने थानाप्रभारी राठी को उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाने के लिए कहा.
राठी ने काल डिटेल्स निकलवा कर उस के फोन को ट्रेसिंग पर भी लगवा दिया. एसआई राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम लगातार साहू के पीछे लगी थी. पुलिस टीम बुलंदशहर में उस के गांव छतारी पहुंची तो पता चला कि साहू 21 जनवरी को अपने गांव आया तो था लेकिन गांव में कोई नहीं था.
क्योंकि उस का एक भाई दिल्ली के शाहदरा इलाके में रहता है. उस की बेटी की 10 फरवरी को शादी थी. उसी में शरीक होने के लिए मातापिता और परिवार के दूसरे लोग गए हुए थे.
पुलिस की एक टीम रामवीर साहू के भाई अजयवीर के घर का पता ले कर वहां पहुंची तो पता चला कि 23 जनवरी को रामवीर वहां आया जरूर था, लेकिन परिवार को उस का शराब पीना पसंद नहीं था और उस ने खूब शराब पी हुई थी. इसलिए परिवार वालों ने उसे वहां से यह कह कर भगा दिया कि उन के यहां शराबियों के लिए कोई जगह नहीं है.
पुलिस टीम को वहीं से यह जानकारी मिली कि रामवीर की एक मौसी इंद्रवती उत्तरपूर्वी दिल्ली के घड़ौली में रहती है, जिन से उस की खूब पटती भी है. हो सकता है रामवीर उन के यहां गया हो.
मौसी का पता ले कर जब पुलिस टीम घड़ौली में उस की मौसी इंद्रवती के घर पहुंची तो पता चला कि 25 जनवरी को रामवीर उन के यहां आया था, लेकिन वह काफी शराब पिए हुए था और काफी डरासहमा हुआ था.
‘‘अरे भाभी, औरत की खूबसूरती सब को रास थोड़े ही आती है. अरविंद भैया तो अनाड़ी हैं. शराब में डूबे रहते हैं. इसलिए तुम्हारी कद्र नहीं करते.’’
‘‘और तुम?’’ सरिता ने आंखें नचाते हुए पूछा.
‘‘मुझे सचमुच तुम्हारी कद्र है भाभी. यकीन न हो तो परख लो. अब मैं तुम्हारी खैरखबर लेने आता रहूंगा. छोटाबड़ा जो भी काम कहोगी, करूंगा.’’ दलबीर सिंह ने सरिता की चिरौरी सी की.
दलबीर सिंह की यह बात सुन कर सरिता खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘तुम आराम से चारपाई पर बैठो. मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’
थोड़ी देर में सरिता 2 कप चाय ले आई. दोनों पासपास बैठ कर गपशप लड़ाते हुए चाय पीते रहे और चोरीछिपे एकदूसरे को देखते रहे. दोनों के दिलोदिमाग में हलचल सी मची हुई थी. सच तो यह था कि सरिता दलबीर पर फिदा हो गई थी. वह ही नहीं, दलबीर सिंह भी सरिता का दीवाना बन गया था.
दोनों के दिल एकदूसरे के लिए धड़के तो नजदीकियां खुदबखुद बन गईं. इस के बाद दलबीर सिंह अकसर सरिता से मिलने आने लगा. सरिता को दलबीर सिंह का आना अच्छा लगता था.
जल्द ही वे एकदूसरे से खुल गए और दोनों के बीच हंसीमजाक होने लगा. सरिता चाहती थी कि पहल दलबीर सिंह करे, जबकि दलबीर चाहता था कि जिस्म की भूखी सरिता स्वयं उसे उकसाए.
आखिर जब सरिता से नहीं रहा गया तो एक रोज रात में उस ने दलबीर सिंह को अपने घर रोक लिया. फिर तो उस रात दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. हर रिश्ता टूट कर बिखर गया और एक नए रिश्ते ने जन्म लिया, जिस का नाम है अवैध संबंधों का रिश्ता.
उस दिन के बाद सरिता और दलबीर सिंह अकसर एकांत में मिलने लगे. लेकिन यह सच है कि ऐसे संबंध ज्यादा दिनों तक छिपते नहीं हैं. उन का भांडा एक न एक दिन फूट ही जाता है. सरिता और दलबीर के साथ भी ऐसा ही हुआ.
एक रात जब सरिता और दलबीर सिंह देह मिलन कर रहे थे तो सरिता की देवरानी आरती ने छत से दोनों को देख लिया. उस ने यह बात अपने पति मुकुंद को बताई. फिर तो यह बात गांव में फैल गई. और उन के नाजायज रिश्तों की चर्चा पूरे गांव में होने लगी.
सरिता के पति अरविंद दोहरे को जब सरिता और दलबीर सिंह के संबंधों का पता चला तो उस के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. उस ने इस बारे में पत्नी व दोस्त दलबीर से बात की तो दोनों मुकर गए और साफसाफ कह दिया कि ऐसी कोई बात नहीं है. गांव के लोग उन्हें बेवजह बदनाम कर रहे हैं.
लेकिन एक रोज अरविंद ने जब दोनों को हंसीठिठोली करते अचानक देख लिया तो उस ने सरिता की पिटाई की तथा दलबीर सिंह को भी फटकारा. लेकिन उन दोनों पर इस का कोई
असर नहीं हुआ. दोनों पहले की तरह ही मिलते रहे.
पत्नी की इस बेवफाई से अरविंद टूट चुका था. महीना-15 दिन में जब वह घर आता था तो दलबीर को ले कर सरिता से उस की जम कर तकरार होती थी. कई बार नौबत मारपीट तक आ जाती थी. अरविंद का पूरा परिवार और गांव वाले इस बात को जान गए थे कि दोनों के बीच तनाव सरिता और दलबीर सिंह के नाजायज संबंधों को ले कर है.
अरविंद की जब गांव में ज्यादा बदनामी होने लगी तो उस ने फफूंद कस्बे में रहना जरूरी नहीं समझा और अपने गांव आ कर रहने लगा. पर सरिता तो दलबीर सिंह की दीवानी थी. उसे न तो पति की परवाह थी और न ही परिवार की इज्जत की. वह किसी न किसी बहाने दलबीर से मिल ही लेती थी.
हां, इतना जरूर था कि अब वह उस से घर के बजाय बाहर मिल लेती थी. दरअसल घर से कुछ दूरी पर अरविंद का प्लौट था. इस प्लौट में एक झोपड़ी बनी हुई थी. इसी झोपड़ी में दोनों का मिल लेते थे.
जुलाई, 2020 में सरिता का छोटा बेटा नीरज उर्फ जानू बीमार पड़ गया. उस के इलाज के लिए सरिता ने अपने प्रेमी दलबीर सिंह से पैसे मांगे, लेकिन उस ने धंधे में घाटा होने का बहाना बना कर सरिता को पैसे देने से इनकार
कर दिया.
उचित इलाज न मिल पाने से एक महीने बाद सरिता के बेटे जानू की मौत हो गई. बेटे की मौत का सरिता को बेहद दुख हुआ.
विपत्ति के समय आर्थिक मदद न करने के कारण सरिता दलबीर सिंह से नाराज रहने लगी थी. वह न तो स्वयं उस से मिलती और न ही दलबीर को पास फटकने देती. सरिता सोचती, ‘जिस प्रेमी के लिए उस ने पति से विश्वासघात किया. परिवार की मर्यादाओं को ताक पर रख दिया, उसी ने बुरे वक्त पर धोखा दे दिया. समय रहते यदि उस ने आर्थिक मदद की होती, तो आज उस का बेटा जीवित होता.’
सरिता ने प्रेमी से दूरियां बनाईं तो दलबीर सिंह परेशान हो उठा. वह उसे मनाने की कोशिश करता, लेकिन सरिता उसे दुत्कार देती. दलबीर सरिता को भोगने का आदी बन चुका था. उसे सरिता के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.
आखिर जब उस से नहीं रहा गया तो उस ने सरिता को मनाने के लिए उसे प्लौट में बनी झोपड़ी में बुलाया. सरिता वहां पहुंची तो दलबीर ने उस से पूछा, ‘‘सरिता, तुम मुझ से दूरदूर क्यों भागती हो. मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करता हूं.’’
‘‘तुम मुझ से नहीं, मेरे शरीर से प्यार करते हो. तुम्हारा प्यार स्वार्थ का है. सच्चे प्रेमी सुखदुख में एकदूसरे का साथ देते हैं. लेकिन तुम ने हमारे दुख में साथ नहीं दिया. जब तुम स्वार्थी हो, तो अब मैं भी स्वार्थी बन गई हूं. अब मुझे भी तन के बदले धन चाहिए.’’
उस ने इस घटना के बाद मार्च 2018 में वंशिका की हत्या कर उस के शव को मंडोला में आवासविकास कालोनी के पास खाली जमीन में फेंक दिया. इस के बाद उस ने करावल नगर थाने में बेटी की गुमशुदगी की भादंवि की धारा 363 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.
बाद में वंशिका का शव बरामद होने के बाद पुलिस ने जांचपड़ताल के बाद सुदेश को अपनी बेटी की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया था. तभी से सुदेश मंडोली जेल में बंद था.
लेकिन 2021 को कोरोना की दूसरी लहर में जब सरकार ने विचाराधीन कैदियों को पैरोल पर छोड़ने का फैसला किया तो 21 मई को सुदेश को भी अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया था. उसी वक्त से सुदेश अपने बच्चों के बीच था.
21 नवंबर को सुदेश की पैरोल अवधि खत्म हो गई थी. वह जेल में पेश होने के लिए गया, मगर वहां किसी कानूनी अड़चन के कारण उसे जेल में नहीं लिया गया और उसे 22 दिसंबर, 2021 दूसरी डेट पर जेल में पेश होने के लिए कहा गया.
लेकिन इसी बीच किसी ने बेदर्दी से सुदेश की हत्या कर दी. ऐसा कौन था, जिस से सुदेश की ऐसी दुश्मनी थी कि वह उस की इतनी बेदर्दी के साथ हत्या कर देगा.
यह सब जानने के लिए पुलिस ने सुदेश की पत्नी व उस के जानपहचान वालों से खूब कुरेद कर पूछताछ की, मगर सुदेश की हत्या का कारण व उस के कातिल का कोई सुराग नहीं मिल सका.
पुलिस को न तो किसी से सुदेश की दुश्मनी का सुराग मिल रहा था, न ही किसी से लेनदेन के विवाद की खबर मिल रही थी. लेकिन एक ऐसी बात जरूर थी, जिस के कारण जांच की कवायद से जुड़े एसपी देहात डा. ईरज राजा, सीओ रजनीश उपाध्याय और थानाप्रभारी सचिन कुमार उस पर घंटों से माथापच्ची कर रहे थे.
दरअसल, गहराई से पड़ताल करने के बाद कुछ ऐसे सवाल उभरे थे जिन का पुलिस को जवाब ढूंढना था. पुलिस को लाश की जेब से सुदेश कुमार का आधार कार्ड तो मिल गया था, लेकिन जो एक बात हैरान कर रही थी, वह यह कि लाश बेशक बुरी तरह जली हुई थी, लेकिन जेब में पड़ा आधार कार्ड बिलकुल सहीसलामत था, जिसे देखने से लगता था कि शायद यह कार्ड किसी ने आग बुझने के बाद लाश की जेब में डाल दिया हो.
बस यही बात थी जो पुलिस को लगातार खटक रही थी. क्योंकि अगर किसी ने सुदेश की हत्या करने के बाद उस के चेहरे को इसलिए जलाया था कि उस की पहचान न हो सके तो भला वह कातिल उस की जेब में आधार कार्ड क्यों छोड़ेगा.
दोनों ही बातें एकदम विरोधाभासी लग रही थीं और शक पैदा कर रही थीं. शक का एक दूसरा कारण और भी था. क्योंकि सुदेश की मौत के बाद जब उस के शव का पोस्टमार्टम हो गया तथा उस का अंतिम संस्कार हो गया तो 3 दिन बाद से ही उस की पत्नी लोनी बौर्डर थाने में आ कर पुलिस से सुदेश की मौत का डेथ सर्टिफिकेट देने की मांग करने लगी.
जिस महिला के पति की मौत होती है वह तो महीनों तक अपने गम व सदमे से उबर नहीं पाती, लेकिन दूसरी तरफ अनुपमा हर रोज थाने आ कर पुलिस से अपने पति की मौत का सर्टिफिकेट देने की मांग कर रही थी.
पुलिस के लिए उस का व्यवहार बड़ा अटपटा था. पुलिस ने जब उस से कारण पूछा तो वह कहने लगी कि उसे मंडोली जेल में सर्टिफिकेट देना है और उन्हें सुदेश के सरेंडर करने की डेट से पहले यह बताना है कि उस की मौत हो चुकी है.
अनुपमा का यह रवैया भी हैरान कर रहा था. इसलिए एसपी देहात ने इस केस की तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए टैक्निकल सर्विलांस टीम के साथसाथ मुखबिरों की मदद लेने का फैसला किया. क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि सुदेश की हत्या के पीछे कोई गहरी साजिश हो सकती है.
सीओ उपाध्याय के निर्देश पर पुलिस की एक टीम ने गोपनीय ढंग से सुदेश के घर के आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगालने का काम शुरू किया ताकि पता लगाया जा सके कि वारदात से पहले सुदेश कब और किस के साथ घर से गया था और उस ने कौन से कपड़े पहने थे.
संयोग से सुदेश के घर से कुछ ही दूर लगे एक सीसीटीवी कैमरे में ऐसी फुटेज मिल गई, जिस ने पूरे केस की तसवीर ही बदल दी.
सीसीटीवी कैमरे में 19 नवंबर, 2021 की रात को एक संदिग्ध शख्स नजर आया. यह शख्स एक साइकिल पर एक बड़ी सी बोरी ले कर जा रहा था. पुलिस ने सीसीटीवी में दिख रहे इस शख्स की पहचान पता करने की कोशिश की और मुखबिरों को भी यह तसवीर दिखाई. तब आसपास के लोगों ने पुलिस को बताया कि वह शख्स कोई और नहीं बल्कि खुद सुदेश कुमार था.
इस का मतलब था कि सुदेश कुमार मरा नहीं, बल्कि अब भी जिंदा है. तो फिर उस की साइकिल पर जो बोरी लदी थी, उस में वह क्या ले कर जा रहा था?
सीसीटीवी में सब से हैरान करने वाली बात यह दिखी कि आखिरी बार देर रात को करीब 11 बजे अपने घर से निकले सुदेश के शरीर पर वह कपड़े भी नहीं थे जो इंद्रापुरी में जली हालत में मिली लाश के शरीर पर थे, जिसे अनुपमा ने अपने पति की बताया था.
राज बहुत गहरा था. इसीलिए इस की तह में जाने के लिए पुलिस की टीम ने आसपास में रहने वाले कुछ लोगों को अपने विश्वास में ले कर सुदेश के घर पर नजर रखने के लिए लगा दिया.
पुलिस को 1-2 दिन में ही जानकारी मिली कि सुदेश वाकई मरा नहीं जिंदा है और अकसर देर रात में अपने घर चोरीछिपे आता है ताकि किसी को भनक न लग सके.
इतनी जानकारी मिलने के बाद पुलिस समझ गई कि यह एक बड़ी साजिश है इसीलिए पुलिस ने अब सुदेश की पत्नी के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया.
पुलिस को फोन की सर्विलांस लगाने का फायदा मिला और एक ऐसा संदेश मिला जिस से पता चला कि सुदेश न सिर्फ जिंदा है बल्कि चोरीछिपे अपने परिवार से भी मिलता है.
इसी क्रम में वह 10 दिसंबर, 2021 की रात को अपने घर आया था और आसपास जाल बिछा कर खड़ी पुलिस टीम ने सुदेश को दबोच लिया. पुलिस ने उस की पत्नी अनुपमा को भी हिरासत में ले लिया.
दोनों को थाने ला कर उच्चाधिकारियों के सामने जब पूछताछ शुरू हुई तो एक ऐसे हत्याकांड की ऐसी कहानी सामने आई, जिस में मृतक मान कर पुलिस उस के कातिल को पकड़ने के लिए दिनरात एक कर रही थी लेकिन पता चला वह न सिर्फ जिंदा है बल्कि उस ने खुद को मरा साबित करने के लिए किसी और की हत्या कर उसे अपनी पहचान दे दी थी. और इस काम में उस की पत्नी ने उस की पूरी मदद की थी.
सुदेश व उस की पत्नी से पूछताछ में पता चला कि 22 दिसंबर को इसे वापस जेल जाना था. जब वह जेल में था तो उसे साथी कैदियों ने बताया था कि जिस तरीके के सबूत उस के खिलाफ हैं, उस के मुताबिक उसे सजा मिलनी तय थी और कम से कम उसे उम्रकैद की सजा मिलेगी.
जब 21 नवंबर को उसे जेल में नहीं लिया गया तो उस ने सोचा कि शायद ऊपर वाला भी नहीं चाहता कि वह जेल जाए. इस के बाद से ही उस ने इस बात पर दिमाग लगाना शुरू कर दिया कि कैसे जेल जाने से बचा जाए. कई दिन तक खूब दिमाग लगाया, लेकिन कोई तरकीब नहीं सूझी.
अचानक एक दिन टीवी पर एक फिल्म देख कर आइडिया मिल गया, जिस में जेल से भागे एक कैदी ने किसी आदमी की हत्या कर उसे अपने कपड़े पहना कर उस के चेहरे को जला दिया और पुलिस ने मान लिया कि कैदी मारा गया है.
अक्षय को उस रोज झटके पर झटके लग रहे थे. वह कभी सुधा के गिरगिट की तरह बदलते रंग को समझने की कोशिश कर रहा था तो कभी पत्नी और दोस्त द्वारा एकदूसरे का नाम ले कर की जा रही बातचीत पर हैरान हो रहा था.
इस से पहले दोनों कभी भी इस तरह से एकदूसरे का नाम नहीं लेते थे. सागर हमेशा सुधा को भाभीजी और सुधा सागर को भाईसाहब कह कर बुलाती थी.
उस रोज सागर, सुधा और अक्षय ने साथ चाय पी. चाय पीते हुए सागर ने पब्लिक स्कूल में बच्चे का नाम लिखवाने के बारे में बातें कीं. इस पर अक्षय ने मायूसी से कहा कि उस के पास फीस, किताबों और स्कूल ड्रैस के लायक पैसे नहीं हैं. इस पर सुधा ने ताना दे डाला था, ‘‘तो बच्चा पैदा क्यों किया? शादी ही नहीं करते?’’
यह बात अक्षय को काफी तकलीफ दे गई. लेकिन दोस्त के सामने कुछ कह नहीं पाया. उस दिन अक्षय और सुधा के बीच जो तकरार की शुरुआत हुई, उस का सिलसिला बढ़ता ही चला गया.
अक्षय अपनी पत्नी के बदलते रंगढंग से परेशान रहने लगा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि सुधा के व्यवहार में इस तरह से बदलाव क्यों आ गए. उस ने सुधा के साथ 2014 में प्रेम विवाह किया था. इस के लिए उसे अपने मातापिता की काफी मिन्नतें करनी पड़ी थीं.
वही सुधा उस के साथ प्रेम की सारी बातें भूल चुकी थी. अक्षय से हमेशा झगड़ने के मूड में रहती थी. बातबात पर ताने मारती रहती थी. किंतु सागर की तारीफ के पुल बांधने से भी पीछे नहीं हटती थी.
सुधा की जुबान से सागर की तारीफ ऐसे निकलती थी, मानो उस के सामने उस की कोई औकात ही नहीं थी. एक तो कोरोना लौकडाउन की वजह से वह पहले ही परेशान हो गया था. काम के दौरान उस की थोड़ी ऊपरी कमाई थी, वह एकदम से बंद हो चुकी थी.
सागर अब अक्षय की गैरमौजूदगी में सुधा से मिलने उस के घर आने लगा था. वह अक्षय से भी काफी कटाकटा रहता था. उन की दोस्ती सिर्फ दुआसलाम तक ही थी. घर आने पर अक्षय को हमेशा सुधा के मुंह से सागर की बातें ही सुनने को मिलती थीं.
अक्षय समझ गया था कि सुधा और सागर के बीच प्रेम संबंध बन चुके हैं. इस का उसे सबूत सागर द्वारा दिए गए गिफ्ट से मिल गया था. अक्षय ने जब इस बारे में सुधा को टोका था तब उस ने भी खुल कर कह दिया था कि वह सागर से प्यार करती है. उस रोज भी सुधा और अक्षय के बीच काफी तकरार हुई थी.
अगले रोज जब अक्षय ड्यूटी से घर आया, तब उस ने कमरे के दरवाजे पर ताला लगा पाया. वह चौंक गया. उसी वक्त पड़ोस से एक लड़का भागता हुआ आया और उसे चाबी पकड़ा कर चला गया.
अक्षय ताला खोल कर कमरे में दाखिल हुआ. कमरे की हालत देख कर वह हैरान रह गया. बिछावन पर कागज, रस्सियां और पौलीथिन की थैलियों का कूड़ा बिखरा हुआ था. सामने नजर उठा कर देखा, 3 में से 2 बक्से गायब थे. उन में सुधा के कपड़े थे. सामने अलगनी पर सुधा और उस के बच्चे का कोई कपड़ा नहीं था.
अक्षय समझ गया कि सुधा उसे छोड़ कर बच्चे के साथ बगैर बताए कहीं चली गई है. वह रसोई के पास पानी पीने के लिए गया. वहां एक परची गिलास के नीचे रखी थी. उस पर 2 पंक्तियां लिखी थीं, ‘मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना. मैं बच्चे के साथ सागर के पास जा रही हूं. अब वहीं मेरा और बच्चे का भविष्य है.’
अक्षय के लिए यह बहुत बड़ा झटका था. उस ने सुधा को फोन मिलाया. किंतु उस ओर से कोई जवाब नहीं आया. सुधा के फोन में खराबी थी. उसे ठीक करवाने के लिए भी सुधा कई दिनों से रट लगाए हुए थी.
फोन नहीं मिलने पर अक्षय को खुद पर बहुत कोफ्त हुई. मन में सोचा कि अगर उस ने फोन ठीक करा दिया होता तो आज उस की फोन पर बात तो हो ही जाती.
खैर, अक्षय ने तुरंत सागर को फोन किया. उस का फोन स्विच्ड औफ था. तुरंत भागाभागा सागर के कमरे पर गया. वहां मालूम हुआ कि उस ने अपना कमरा बदल लिया है. उस के नए किराए के कमरे के बारे में पासपड़ोस वाले भी नहीं बता पाए.
सागर से मुलाकात वल्लभ भवन में हो सकती थी. अगले दिन रविवार की छुट्टी थी, इसलिए अक्षय ने सागर से मिलने के लिए सोमवार तक काफी बेचैनी से इंतजार किया. बगैर कुछ खाएपिए वह सो गया.
रविवार को भी जैसेतैसे बच्चे और सुधा की याद में खोया रहा. भूख तेज लगने लगी, तब किसी तरह से उस ने खिचड़ी बना कर खा ली.
सोमवार को अक्षय समय से पहले ही औफिस पहुंच गया. पहले वहां गया, जिस सेक्शन में सागर की ड्यूटी थी. सागर ड्यूटी पर नहीं आया था. उस के साथ काम करने वाले ने बताया कि उस ने 2 हफ्ते की छुट्टी ले रखी है. किसी ने बताया कि वह शादी में अपने गांव जाने वाला था.
शादी की बात सुन कर अक्षय के पैरों तले जमीन खिसकती नजर आई. वह समझ गया हो न हो, वह सुधा को ले कर गांव चला गया हो. उस से शादी करने वाला हो. वैसे भी उस की शादी की उम्र निकल चुकी थी.
वह काफी गुस्से में आ गया था, लेकिन क्या करता. किस पर अपना गुस्सा निकाले, समझ नहीं पा रहा था. नाराजगी सागर पर थी, लेकिन सुधा की बेवफाई से भी वह आहत हो चुका था.
जैसेतैसे कर 3 दिन बीत गए. सागर के बारे में पता लगाता रहा. हाटबाजार में बेवजह घूमता रहा कि शायद सुधा या सागर दिख जाएं.
ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-94 में एक गांव है नोरंगाबाद. इस गांव में छलेरा गांव के जिन लोगों की जमीन नोएडा अथारिटी ने अधिग्रहीत की थी, उन्हें इस के बदले में मुआवजे के साथ अलगअलग साइज के प्लौट भी नियम के अनुसार यहां आवंटित किए गए थे.
चूंकि अभी इस इलाके में ज्यादा आबादी और विकास नहीं हुआ है, इसलिए जिन लोगों को यहां प्लौट मिले थे, उन में से कुछ ने अपने प्लौट की घेराबंदी कर के उस में एक या 2 कमरे बना कर उन्हें मजदूर तबके के लोगों को किराए पर दे दिया. सेक्टर 94 के इस इलाके में अभी सिर्फ मजदूर पेशा लोगों के ही 15 से 20 परिवार किराए पर रहते हैं. इस इलाके में बिजली पानी तो है लेकिन घनी आबादी न होने के कारण शाम होते ही यहां सन्नाटा पसर जाता है.
इसी इलाके में छलेरा गांव के रहने वाले चरणसिंह का भी प्लौट था, जिस में उन्होंने बाउंड्री करवा कर उस में एक कमरा, शौचालय, स्नानघर और रसोई बना कर उसे किराए पर दिया हुआ था.
पिछले डेढ़ साल से इस कमरे में मूलरूप से अलीगढ़ का रहने वाला संदीप यादव (24) अपनी पत्नी सोनी यादव (22) के साथ किराए पर रहता था. संदीप की डेढ़ साल पहले ही कासगंज की रहने वाली सोनी से शादी हुई थी.
दोनों की शादी कोरोना के बीच लौकडाउन के दौरान हुई थी. संदीप पहले सेक्टर-94 में ही हिंडन बैराज के पास किराए के किसी दूसरे कमरे में अपने एक दोस्त के साथ रहता था. लेकिन शादी के बाद गृहस्थी होने के कारण उस ने चरण सिंह का मकान किराए पर ले लिया.
संदीप शादी से पहले तो नोएडा में एक बड़े ढाबे पर काम करता था. लेकिन लौकडाउन के बाद जब नौकरी चली गई और शादी हो गई तो पेट पालने और जीवन चलाने के लिए उस ने महामाया फ्लाईओवर के नीचे साइकिल पर ही आलू की सब्जी और खस्ता कचौरी बेचने का काम शुरू कर दिया.
संयोग से काम भी ठीकठाक चलने लगा और संदीप नौकरी से ज्यादा अपने काम से पैसा कमाने लगा. कुल मिला कर घरगृहस्थी मजे से चलने लगी.
अपने घर पर ही पत्नी सोनी की मदद से वह सुबह के वक्त खस्ता कचौरी और सब्जी खुद तैयार करता और फिर साइकिल पर रख कर उसे बेचने के लिए हर सुबह 10 से 11 बजे तक महामाया फ्लाईओवर के नीचे पहुंच जाता और शाम को 5 बजे तक अपना माल बेच कर वापस घर लौट जाता था.
20 जनवरी को भी संदीप यादव हर रोज की तरह सुबह करीब साढ़े 10 बजे साइकिल पर कचौरी और सब्जी ले कर सेक्टर-94 स्थित घर से निकला था और शाम को करीब 7 बजे घर लौटा.
घर के बाहर साइकिल खड़ी करने के बाद हमेशा की तरह संदीप ने सोनी को बाहर से ही दरवाजा खोलने के लिए आवाज लगाई. लेकिन काफी देर तक जब दरवाजा नहीं खुला तो उस ने दरवाजे को धकेलते हुए थोड़ा कड़ी आवाज में कहा क्या बात है महारानी बहरी हो गई है या कान में तेल डाल लिया है.
कमरे में गहन अंधकार और सन्नाटा पसरा हुआ था. अन्य दिनों की अपेक्षा संदीप को इस दिन पत्नी सोनी का यह व्यवहार कुछ अजीब लग रहा था.
संदीप ने अनुमान से दरवाजे के पास लगे बिजली के बोर्ड को टटोल कर कमरे की लाइट जला दी. कमरे में रोशनी होते ही संदीप फर्श पर सोनी की खून से लथपथ लाश पड़ी दिखी.
लाश देखते ही संदीप के गले से चीख निकल गई. सिर को पकड़ कर संदीप गला फाड़ कर रोने लगा. कालोनी के मकान एकदूसरे से काफी दूर बने थे.
लेकिन शाम के सन्नाटे में संदीप के रोने और चीखने की आवाजें इतनी तेज थीं कि चंद समय में ही वहां कालोनी में रहने वाले कई मजदूर परिवार एकत्र हो गए. वैसे भी उस समय ज्यादातर लोग अपने काम से घर लौटते हैं.
सभी ने संदीप को अपनी पत्नी की लाश के पास फूटफूट कर रोते देखा. कालोनी के एकत्रित हुए मजदूरों में से ही किसी ने तब तक निकट की ओखला पुलिस चौकी के इंचार्ज राजेंद्र सिंह को जा कर इस हादसे की सूचना दी तो वह तत्काल ही अपने मातहत पुलिसकर्मियों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.
कालोनी के लोगों ने संदीप की पत्नी सोनी की हत्या के बारे में जो खबर दी थी, वह एकदम सही थी. लिहाजा घटनास्थल का मुआयना कर राजेंद्र सिंह ने सेक्टर-126 थाने के प्रभारी भरत कुमार राठी को हत्या की इस वारदात से अवगत करा दिया.
थानाप्रभारी राठी भी हैडकांस्टेबल मोनू, जगपाल सिंह और कांस्टेबल अमित कुमार के साथ जब तक घटनास्थल पर पहुंचे, तब तक वायरलैस पर जानकारी पा कर नोएडा जोन-1 की एसीपी अंकिता शर्मा और एडिशनल डीसीपी रणविजय सिंह भी मौके पर पहुंच गए.
क्राइम और फोरैंसिक टीमों ने भी घटनास्थल पर पहुंच कर अपना काम शुरू कर दिया. संदीप ने बताया कि सुबह जब वह घर से गया था तब उस की पत्नी एकदम ठीक थी. शाम को 7 बजे लौटा तो पत्नी की लाश घर में पड़ी मिली.
संदीप से पूछताछ में पता चला कि घर में लूटपाट जैसी कोई वारदात नहीं हुई थी. जिस का मतलब साफ था कि किसी ने सोनी की हत्या की नीयत से ही इस वारदात को अंजाम दिया था.
थानाप्रभारी राठी ने जब गहराई से लाश का निरीक्षण किया तो देखा कि कातिल ने बेदर्दी के साथ किसी चीज से सोनी के चेहरे पर वार किया था जिस के कारण नाक पर काफी गहरा जख्म था और वहां से बहने वाला खून जम कर काला पड़ चुका था. एक खास बात यह थी कि कातिल ने बड़ी बेहरमी के साथ सोनी के सिर को शायद कई बार जमीन पर दे कर मारा होगा. क्योंकि सिर के पिछले हिस्से में काफी चोट लगी थी और वहां से काफी खून भी बहा था.
घटनास्थल के निरीक्षण से एक बात यह भी साफ हुई कि सोनी का शायद कातिल के साथ काफी संघर्ष हुआ होगा. क्योंकि उस के बदन के कपड़े काफी अस्तव्यस्त हो चुके थे.
ब्लाउज के आगे का हिस्सा पूरी तरह फटा हुआ था और शरीर पर पहनी हुई साड़ी भी घुटनों से ऊपर तक खिसकी हुई थी, जिससे लग रहा था कि उस के साथ कातिल ने या तो शारीरिक संबंध बनाए होंगे या फिर इस का प्रयास किया होगा.
उच्चाधिकारियों के निर्देश पर जांच की सभी औपचारिकताएं पूरी कर के थानाप्रभारी राठी ने सोनी यादव के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. एडिशनल डीसीपी रणविजय सिंह के आदेश पर थानाप्रभारी राठी ने दफा 302 आईपीसी यानी हत्या का मुकदमा पंजीकृत कर के जांचपड़ताल का काम खुद अपने हाथों में ले लिया.
एक बात थी जो पुलिस की समझ से परे थी. वह यह कि संदीप यादव ने बताया था कि उस की न तो किसी से दुश्मनी है न ही घर में लूटपाट हुई है. वैसे भी संदीप के घर में लूटपाट के लिए कोई ऐसी कीमती चीज भी नहीं थी कि उस के लिए बदमाश किसी की जान ले लें.
हां, जिस संदिग्ध हाल में सोनी का शव मिला था, उस से यह जरूर लग रहा था कि कोई ऐसा जरूर है जिस की सोनी के ऊपर नीयत खराब थी.
थानाप्रभारी राठी को एक बार संदीप यादव से कुछ खास बिंदुओं को ले कर पूछताछ करनी जरूरी लगी. लिहाजा उन्होंने अगली सुबह पोस्टमार्टम के बाद जब सोनी के शव का अंतिम संस्कार हो गया तो संदीप को पूछताछ के लिए थाने बुलाया.
इस दौरान सोनी के घर वाले भी अगली सुबह तक उस की हत्या की सूचना पा कर उस के घर पहुंच गए थे. सोनी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कासगंज कस्बे की रहने वाली थी, उस के परिवार में मातापिता के अलावा 2 भाई और 4 बहनें थीं. 2 भाई शैलेश व अखिलेश यादव से बड़ी एक बहन थी, जबकि 3 बहनें छोटी थीं.
परिवार की दोनों सब से छोटी लड़कियों को छोड़ कर सभी की शादी हो चुकी थी. सोनी की शादी 2020 के मध्य में कोरोना लौकडाउन के दौरान करीब डेढ़ साल पहले हुई थी.

जब पुलिस ने सोनी के भाई अखिलेश से उस की बहन के बारे में पूछा तो उस ने अपने बहनोई संदीप पर कोई शक तो नहीं जताया, लेकिन उस की यह शिकायत थी कि जब संदीप के पास रहने का कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं था तो उन्हें सोनी को ऐसे स्थान पर ला कर रखना ही नहीं चाहिए था.
उस ने अपनी बहन सोनी से कहा भी था कि जब तक संदीप रहने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं ले लेता, वह वापस नहीं जाए. लेकिन सोनी ने उस की एक नहीं मानी, जिस का खमियाजा उस की जान के रूप में चुकाना पड़ा.
अरविंद दोहरे अपने काम से शाम को घर लौटा तो उस की पत्नी सरिता के साथ दलबीर सिंह घर में मौजूद था. उस समय दोनों हंसीठिठोली कर रहे थे. उन दोनों को इस तरह करीब देख कर अरविंद का खून खौल उठा. अरविंद को देखते ही दलबीर सिंह तुरंत बाहर चला गया.
उस के जाते ही अरविंद पत्नी पर बरस पड़ा, ‘‘तुम्हारे बारे में जो कुछ सुनने को मिल रहा है, उसे सुन कर अपने आप पर शरम आती है मुझे. मेरी नहीं तो कम से कम परिवार की इज्जत का तो ख्याल करो.’’
‘‘तुम्हें तो लड़ने का बस बहाना चाहिए, जब भी घर आते हो, लड़ने लगते हो. मैं ने भला ऐसा क्या गलत कर दिया, जो मेरे बारे में सुनने को मिल गया.’’ सरिता ने तुनकते हुए कहा तो अरविंद ताव में बोला, ‘‘तुम्हारे और दलबीर के नाजायज रिश्तों की चर्चा पूरे गांव में हो रही है. लोग मुझे अजीब नजरों से देखते हैं. मेरा भाई मुकुंद भी कहता है कि अपनी बीवी को संभालो. सुन कर मेरा सिर शरम से झुक जाता है. आखिर मेरी जिंदगी को तुम क्यों नरक बना रही हो?’’ ‘‘नरक तो तुम ने मेरी जिंदगी बना रखी है. पत्नी को जो सुख चाहिए, तुम ने कभी दिया है मुझे? अपनी कमाई जुआ और शराब में लुटाते हो और बदनाम मुझे कर रहे हो.’’ सरिता तुनक कर बोली.
पत्नी की बात सुन कर अरविंद का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने उस की पिटाई करनी शुरू कर दी. वह उसे पीटते हुए बोला, ‘‘साली, बदजात एक तो गलती करती है, ऊपर से मुझ से ही जुबान लड़ाती है.’’
सरिता चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन अरविंद के हाथ तभी रुके जब वह पिटतेपिटते बेहाल हो गई. पत्नी की जम कर धुनाई करने के बाद अरविंद बिस्तर पर जा लेटा.
सरिता और अरविंद के बीच लड़ाईझगड़ा और मारपीट कोई नई बात नहीं थी. दोनों के बीच आए दिन ऐसा होता रहता था. उन के झगड़े की वजह था अरविंद का दोस्त दलबीर सिंह.
अरविंद के घर दलबीर सिंह का आनाजाना था. अरविंद को शक था कि सरिता और दलबीर सिंह के बीच नाजायज संबंध हैं. इस बात को ले कर गांव वालों ने भी उस के कान भरे थे. बीवी की किसी भी पुरुष से दोस्ती चाहे जायज हो या नाजायज, कोई भी पति बरदाश्त नहीं कर सकता. अरविंद भी नहीं कर पा रहा था. जब भी उस के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाता, वह बेचैन हो जाता था.
उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के फफूंद थाना क्षेत्र में एक गांव है लालपुर. अरविंद दोहरे अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी सरिता के अलावा 2 बच्चे थे. अरविंद के पास मामूली सी खेती की जमीन थी. वह जमीन इतनी नहीं थी कि मौजमजे से गुजर हो पाती. फिर भी वह सालों तक हालात से उबरने की जद्दोजहद करता रहा.
सरिता अकसर अरविंद को कोई और काम करने की सलाह देती थी. लेकिन अरविंद पत्नी की बात को नजरअंदाज करते हुए अपनी खेतीकिसानी में ही खुश था. पत्नी की बात न मानने के कारण ही दोनों में अकसर झगड़ा होता रहता था.
अरविंद अपनी जमीन पर खेती करने के साथसाथ गांव के दूसरे लोगों की जमीन भी बंटाई पर ले लेता था. फिर भी परिवार के भरणपोषण के अलावा वह कुछ नहीं कर पाता था. अगर बाढ़ या सूखे से फसल चौपट हो जाती, तो उसे हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं मिल पाता था.
इसी सब के चलते जब अरविंद पर कर्ज हो गया तो वह खेती की देखभाल के साथ फफूंद कस्बे में एक ठेकेदार के पास मजदूरी करने लगा.
वहां से उस का रोजाना घर आना संभव नहीं था, इसलिए वह फफूंद कस्बे में ही किराए का कमरा ले कर रहने लगा. अब वह हफ्ता-15 दिन में ही घर आता और पत्नी के साथ 1-2 रातें बिता कर वापस चला जाता. 30 वर्षीय सरिता उन दिनों उम्र के उस दौर से गुजर रही थी, जब औरत को पुरुष की नजदीकियों की ज्यादा चाहत होती है.
जैसे तैसे कुछ वक्त तो गुजर गया. लेकिन फिर सरिता का जिस्म अंगड़ाइयां लेने लगा. एक रोज उस की नजर दलबीर सिंह पर पड़ी तो उस ने बहाने से उसे घर बुला लिया. दलबीर सिंह गांव के दबंग छोटे सिंह का बड़ा बेटा था. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.
दूध के व्यवसाय से वह खूब कमाता था. दलबीर सिंह और उस के पति अरविंद हमउम्र थे. दोनों में खूब पटती थी. अरविंद जब गांव आता था, तो शाम को दोनों बैठ कर शराब पीते थे. सरिता को वह भाभी कहता था. घर के अंदर आते ही सरिता ने पूछा, ‘‘देवरजी, हम से नजरें चुरा कर कहां जा रहे थे?’’
‘‘भाभी, अभीअभी तो घर से आ रहा हूं. खेत की ओर जा रहा था कि आप ने बुला लिया.’’ दलबीर सिंह ने मुसकरा कर जवाब दिया.
उस दिन दलबीर सिंह को सरिता ज्यादा खूबसूरत लगी. उस की निगाहें सरिता के चेहरे पर जम गईं. यही हाल सरिता का भी था. दलबीर सिंह को इस तरह देखते सरिता बोली, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हो मुझे. क्या पहली बार देखा है? बोलो, किस सोच में डूबे हो?’’
‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है, मैं तो यह देख रहा था कि साधारण मेकअप में भी तुम कितनी सुंदर लग रही हो. अड़ोसपड़ोस में तुम्हारे अलावा और भी हैं, पर तुम जैसी सुंदर कोई नहीं है.’’
‘‘बस… बस रहने दो, बहुत बातें बनाने लगे हो. तुम्हारे भैया तो कभी तारीफ नहीं करते. महीना-15 दिन में आते हैं, वह भी किसी न किसी बात पर झगड़ते रहते हैं.’’