Uttar Pradesh Crime: रहस्य में दफन हो गई सारा की मौत

Uttar Pradesh Crime: अमनमणि त्रिपाठी ने घर वालों की मरजी के बिना संभ्रांत परिवार की लड़की सारा सिंह से कोर्टमैरिज तो कर ली लेकिन बाद में ऐसे क्या हालात हुए कि वह उस से किनारा करने की सोचने लगा? फिर एक दिन…

पौ फटते ही सूरज की किरणें धरती को चूमने लगी थीं. चिडि़यों के मधुर कलरव से फिजाएं गूंज उठी थीं. कलियां भी मुसकान बिखरने लगी थीं तो वहीं चंचल मकरंद कलियों पर मंडराने लगे थे. चिडि़यों के मीठे स्वर जब सारा के कानों से टकराए तो वह अंगड़ाइयां लेती हुई बिस्तर से उतरी और तरोताजा होने के लिए गुसलखाने की ओर बढ़ी. कुछ देर बाद वहां से लौटी तो दीवार पर टंगी घड़ी पर नजर दौड़ाई. उस वक्त सुबह के साढ़े 6 बज रहे थे. फिर एक नजर घर में दौड़ाई, घर के बाकी लोग सो रहे थे.

फटाफट तैयार हो कर उस ने नाश्ता किया. उस समय वह बहुत खुश थी. बारबार दीवार घड़ी पर नजर डाल कर वह दरवाजे से ही सड़क की तरफ इस तरह से देखती जैसे उसे किसी के आने का इंतजार हो. दरवाजे से आ कर वह बेचैनी से लौन में चहलकदमी कर ने लगती. उस की जूतियों की खटपट से सारा की मां सीमा सिंह की नींद टूट गई.

बेटी को अलसुबह तैयार हुआ देख कर उन्होंने उस से पूछा, ‘‘बेटी, इतनी जल्दी तैयार हो कर कहां जा रही हो? रात तुम ने मुझे बताया नहीं कि सुबह तुम्हें कहीं जाना है?’’

‘‘जी मां, मैं बताना भूल गई थी. दरअसल बात यह है कि शादी की दूसरी सालगिरह पर अमन ने दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला जाने का कार्यक्रम बनाया है. आज हम पहले दिल्ली जाएंगे. फिर वहां से आगे की तैयारी करेंगे.’’

‘‘ठीक है, बेटा. जाओ, पर इतना लंबा सफर तुम कैसे तय करोगे?’’ सीमा सिंह बोलीं.

‘‘मां, हम ने इस बार कार से जाने का मन बनाया है.’’ सारा मां को बता रही थी कि उसी समय उसे दरवाजे के बाहर किसी गाड़ी के आने की आवाज आई. वह कमरे से दरवाजे की तरफ गई. वहीं से वह चहक कर बोली, ‘‘मां गाड़ी आ गई.’’

सीमा सिंह ने बाहर की तरफ देखा तो एक कार के पास सफेद कमीज पहने दामाद अमनमणि त्रिपाठी खड़ा था. सारा अपना सूटकेस उठा कर मां को ‘बाय’ कहती हुई घर से निकल कर सफेद रंग की मारुति स्विफ्ट कार नंबर यूपी-53-बीआर-0060 में जा कर बैठ गई. सास को बायबाय कर के अमनमणि वहां से चला गया. इस के बाद अमनमणि ने कार दिल्ली की ओर दौड़ा दी. यह बात 9 जुलाई, 2015 की है. सीमा सिंह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर के घोसडि़या चौराहे के पास स्थित आलीशान कोठी में अपने परिवार के साथ रहती थीं.

उन के परिवार में 4 बच्चे थे, जिन में बेटी सारा तीसरे नंबर की थी. सीमा सिंह के पति अशोक कुमार सिंह की कई साल पहले स्वाभाविक मौत हो चुकी थी. उन की मौत के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी सीमा सिंह के कंधों पर आ गई थी. सीमा सिंह कोई मामूली हैसियत वाली महिला नहीं थीं. वह अधिवक्ता के अलावा अखिल भारतीय कांगे्रस पार्टी की सदस्य भी थीं. वह एक रईस खानदान की बहू थीं. धनदौलत की उन के घर में कोई कमी नहीं थी. बेटी सारा चंचल और बला की खूबसूरत थी. अपने आजादखयाल के चलते ही सारा सिंह ने कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी से अलीगंज स्थित आर्य समाज मंदिर में 27 जुलाई, 2013 को शादी की थी.

शादी की दूसरी सालगिरह को यादगार बनाने के लिए वह पति के साथ घूमने निकली थी. वैसे सारा लंबी दूरी की यात्रा हवाई जहाज से ही करती थी. लेकिन आज लंबे सफर के लिए कार से निकलने पर सीमा सिंह को हैरानी हुई. उसी दिन सीमा सिंह अपने बच्चों के साथ दोपहर का खाना खा रही थीं कि उसी बीच उन के छोटे बेटे सिद्धार्थ सिंह के मोबाइल पर किसी अंजान नंबर से काल आई. सिद्धार्थ ने जैसे ही उस काल को रिसीव किया, काल डिसकनैक्ट हो गई. कुछ क्षण बाद उसी नंबर से फिर काल आई. सिद्धार्थ ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘तुम्हारे बहनोई का एक्सीडैंट हो गया है.’’ इतना कहने के बाद दूसरी ओर से फोन डिसकनैक्ट हो गया.

सिद्धार्थ कुछ समझ नहीं पाया. उस ने मोबाइल मां की तरफ बढ़ाते हुए कहा कि किसी ने फोन कर के बताया है कि बहनोई का एक्सीडैंट हो गया है. बेटे के मुंह से एक्सीडैंट की बात सुन कर सीमा अचंभित हुई. क्योंकि अमनमणि के साथ उन की बेटी सारा भी थी.

बेटी की चिंता करते हुए वह उसी नंबर को रिडायल करने लगीं, जिस नंबर से बेटे के मोबाइल पर फोन आया था. वह नंबर मिला ही रही थीं कि उसी दौरान उन के मोबाइल पर सारा के मोबाइल से काल आई. सीमा सिंह ने झट काल रिसीव कर के कहा, ‘‘हैलो, बेटा सारा, क्या हुआ?’’

‘‘मम्मी सारा नहीं, मैं अमन बोल रहा हूं,’’ रोते हुए अमन बोला, ‘‘मम्मी हमारे साथ बड़ी दुर्घटना घट गई है.’’

‘‘रोओ मत बेटा, बताओ क्या हुआ?’’ सीमा सिंह बोलीं.

‘‘मम्मीजी, सारा अब इस दुनिया में नहीं रही. मैं इस के बिना कैसे जीऊंगा.’’ इतना कह कर अमनमणि बिलख-बिलख कर रोने लगा.

बेटी की मौत की खबर सुन कर सीमा सिंह एकदम सन्न रह गईं. वह बोलीं, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’

रोतेरोते अमनमणि त्रिपाठी ने उन्हें बताया कि फिरोजाबाद के पास सिरसागंज इलाके में उस की कार का एक्सीडैंट हो गया.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, यह झूठ है.’’ कहते हुए वह भी रोने लगीं. बहन की मौत की खबर पर सिद्धार्थ की आंखों से भी आंसू टपकने लगे.

सिद्धार्थ ने यह खबर बड़े भाई हर्ष को भी फोन कर के दे दी. वह शहर में किसी काम से निकला था. बड़े बेटे के घर आने के बाद सीमा सिंह बेटे व अपने शुभचिंतकों के साथ फिरोजाबाद के लिए रवाना हो गईं. शाम करीब 6-7 बजे वह फिरोजाबाद के सिरसागंज थाने पहुंच गईं. थानाप्रभारी अतर सिंह से उन्होंने बेटी और दामाद के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि एक्सीडैंट बहुत खतरनाक था. सारा की मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी. उस की डेडबौडी पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी गई है और अमनमणि को ऋषि कुमार पांडेय के अपहरण वाले मामले में हिरासत में ले लिया गया है. सीमा सिंह दामाद से मिलना चाहती थीं, लेकिन थानाप्रभारी ने मिलने से मना कर दिया.

सीमा सिंह की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि पुलिस उन्हें दामाद से मिलने क्यों नहीं दे रही है? वह अमनमणि से मिल कर जानना चाहती थीं कि आखिर यह दुर्घटना कैसे हुई? उन के काफी अनुरोध करने के बाद पुलिस ने उन्हें अमनमणि से मिलने की इजाजत दी. अमन को एक कमरे में कैद कर के रखा गया था. अमन ने सीमा सिंह को बताया कि गाड़ी तेज गति से जा रही थी कि अचानक सामने से साइकिल सवार एक लड़की आ गई. उस लड़की को बचाने के चक्कर में गाड़ी पलटी खा कर गिर गई और सारा सदा के लिए चिरनिद्रा में चली गई.

दामाद की बात सीमा सिंह के गले नहीं उतर रही थी. क्योंकि दुर्घटना में अमनमणि को भी थोड़ीबहुत चोट आनी चाहिए थी, लेकिन उस के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी. उस के कपड़ों पर धूलमिट्टी ही लगी हुई थी, जबकि वह खुद भी उसी कार में था. सीमा सिंह को तब और आश्चर्य हुआ, जब उन्हें थाने में ही अमनमणि त्रिपाठी के बाबा पूर्व विधायक श्यामनारायणमणि त्रिपाठी सहित गोरखपुर के उस के तमाम शुभचिंतक मिले. यह आश्चर्य की बात इसलिए थी कि गोरखपुर से फिरोजाबाद वे लोग इतनी जल्दी कैसे पहुंच गए? इस से सीमा सिंह को लगने लगा कि यह दुर्घटना नहीं हो सकती, बल्कि उन की बेटी सारा को सुनियोजित तरीके से मारा गया है.

अमनमणि त्रिपाठी समाजवादी पार्टी का नेता था, इसलिए सूचना मिलते ही मीडिया से जुड़े लोग वहां पहुंच गए. मीडिया ने इस मामले को खूब उछाला, जिस से यह मामला हाई प्रोफाइल बन गया. घटना की सूचना मिलते ही सारा के मामा एस.के. रघुवंशी, जो अखिलेश सरकार में गृहसचिव के पद पर तैनात हैं, वह भी मौके पर पहुंच गए. उन्हें भी कार दुर्घटना पर संदेह हो रहा था. सारा सिंह के मायके वाले उस की मौत को साजिश के तहत की गई हत्या मान रहे थे. 2 दिनों बाद सारा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली, जिस में सारा की मौत की वजह सिर और छाती में आई बड़ी चोट बताई गई.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के 9 दिनों बाद सीमा सिंह ने फिरोजाबाद के एसएसपी पीयूष श्रीवास्तव से मुलाकात की. उन्होंने उन्हें एक तहरीर देते हुए कहा कि उन की बेटी को इन लोगों ने एक साजिश के तहत मारा है. उस तहरीर के आधार पर एसएसपी ने सिरसागंज थाने में भादंवि की धारा 498ए, 302, 120बी के तहत अमनमणि त्रिपाठी, उस के पिता अमरमणि त्रिपाठी, मां मधुमणि त्रिपाठी आदि के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया. सपा के युवा नेता अमनमणि त्रिपाठी और रसूख खानदान की बेटी सारा सिंह की दोस्ती कैसे हुई? दोस्ती के रास्ते वे पतिपत्नी के रिश्ते में कैसे बंधे? इन सवालों के जवाब पाने के लिए हमें इन के अतीत के पन्नों में झांकना होगा.

30 वर्षीय अमनमणि त्रिपाठी पूर्व मंत्री और मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन सजा काट रहे सपा के कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी का बेटा है. अमनमणि के अलावा उन की 2 बेटियां थीं. अमनमणि दूसरे नंबर का था. अमरमणि त्रिपाठी की दोनों बेटियों को राजनीति से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन बेटा अमनमणि त्रिपाठी पिता की राजनीतिक विरासत को आगे संभाल कर रखना चाहता था. पिता से ही उस ने राजनीति के सारे गुर सीख लिए थे. इस में उस के बाबा पूर्व मंत्री श्याम-नारायणमणि त्रिपाठी भीष्मपितामह के रूप में उस के साथ रहे.

धीरेधीरे अमनमणि का राजनीतिक कद बढ़ता गया. वह भी पिता के विधानसभा क्षेत्र लक्ष्मीपुर में लोगों का चहेता बनता गया. इस से अमनमणि लोकसभा चुनाव लड़ने की जुगत में लग गया. उस की मेहनत रंग लाई और पिछले लोकसभा चुनाव में उसे टिकट भी मिल गया. लेकिन उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा. उस के पिता के राजनीतिक बैरी कांगे्रस के कद्दावर नेता अखिलेश सिंह ने बाजी मार ली. चुनावी जंग में अमनमणि के साथ उस के खास दोस्त अमित कुमार उर्फ मानू पांडेय, संदीप त्रिपाठी, रवि शुक्ला, गौरव त्रिपाठी, संतोषमणि त्रिपाठी, आशीष शाही, राज त्रिवेदी, त्रिपुरारी मिश्रा, अनूप शंकर पांडेय, पंकज तिवारी, राजीव ऋषि तिवारी, के. सी. पांडेय, अरुण शुक्ला और अमरदीप शुक्ला ने जीजान से मेहनत की. ये हर वक्त साए की तरह उस के पीछेपीछे चलते रहे.

अमनमणि त्रिपाठी फेसबुक का शौकीन था. बात वर्ष 2012-13 की है. फुरसत के समय वह अपना काफी समय सोशल साइट फेसबुक पर बिताता था. सारा सिंह भी फेसबुक पर दोस्तों से बातें करती रहती थी. अमनमणि त्रिपाठी ने फेसबुक पर सारा सिंह का फोटो देखा तो उस की खूबसूरती पर वह ऐसा लट्टू हुआ कि उस ने उसी समय उसे अपने दिल में बसा लिया. अमनमणि त्रिपाठी के सब से करीबी कहे जाने वाले व्यवसाई मित्र दयालमुनि पांडेय थे. उस ने दयालमुनि पांडेय को सारा सिंह का फोटो दिखाते हुए अपने मन की बात बताई. दयालमुनि पांडेय सारा सिंह को अच्छी तरह से जानते थे. लिहाजा एक दिन उन्होंने सारा सिंह और अमनमणि का आमनेसामने परिचय करा दिया. उस के बाद अमनमणि और सारा सिंह के बीच दोस्ती हो गई.

बताया जाता है कि सारा सिंह की एक व्यवसाई से शादी पक्की हो चुकी थी. उसी बीच अमनमणि और सारा सिंह के बीच दोस्ती की जड़ें गहराई तक पहुंच रही थीं. लखनऊ में अमरमणि त्रिपाठी की लारेंस टैरेस, हजरतगंज में आलीशान कोठी थी.  गोरखपुर छोड़ कर अमनमणि त्रिपाठी लखनऊ रहने लगा. उन दोनों की दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी. अमनमणि सारा को पागलपन की हद तक चाहने लगा था. सारा भी उस पर जान छिड़कती थी. पैसों की उस के पास कोई कमी नहीं थी. वह उस पर दोनों हाथों से पानी की तरह दौलत बहाने लगा था. उस पर इतना पैसा खर्च कर दिया कि उस का हाथ खाली हो गया. वह उसे बहुत ज्यादा चाहता था.

उस से सारा की दूरियां सही नहीं जाती थीं. वह जल्द से जल्द उस से शादी करना चाहता था. सारा का भी हाल कुछ ऐसा ही था. सारा ने अपनी प्रेम कहानी मां से बताई तो सीमा सिंह चौंक गईं. उन्होंने बेटी से कहा, ‘‘क्या तुम अमरमणि त्रिपाठी के बारे में जानती हो? वह मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है. ऐसे आदमी से मैं रिश्ता कतई नहीं जोड़ सकती.’’

मां का टका सा जवाब सुन कर सारा असमंजस में पड़ गई कि वह क्या करे? उस ने यह बात अमनमणि को बताई तो उस ने साफ तौर पर कह दिया कि लोग उस के परिवार के बारे में बिना सिरपैर की बातें करते हैं. उसने सारा से कह दिया कि वह उसे बेपनाह मोहब्बत करता है और शादी उसी से करेगा. उस के बाद वह सारा पर शादी का दबाव बनाने लगा. सारा भी अमनमणि को चाहती थी, लेकिन मां वाली बात से वह फैसला नहीं ले पा रही थी. अंत में उस ने अमनमणि के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर ही लिया. इस के बाद 27 जुलाई, 2013 को अलीगंज के आर्य समाज मंदिर में अमनमणि ने सारा सिंह से विवाह कर लिया. उस विवाह में अमनमणि के गांव के 2 दोस्त गवाह के रूप में मौजूद थे. दोनों ने ही इस शादी की भनक अपने घर वालों तक को नहीं लगने दी.

शादी के 10 दिनों बाद अमनमणि त्रिपाठी सारा से मिलने उस की आलीशान कोठी पर पहुंचा. उस वक्त सीमा सिंह घर पर मौजूद थीं और सारा अपने कमरे में थी. अपने यहां अमनमणि को देख कर सीमा चौंक गईं. वह सीमा सिंह से बोला, ‘‘आंटी सारा कहां है? मैं उसे लेने आया हूं.’’

‘‘लेने.’’ सीमा सिंह चौंकते हुए बोलीं, ‘‘तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे तुम्हारा उस पर कोई अधिकार हो.’’

‘‘हां अधिकार है, तभी तो कह रहा हूं. वह मेरी पत्नी है, यकीन न हो तो यह देख लो.’’ कह कर उस ने अपनी पैंट की जेब से मोबाइल फोन निकाला और उस ने मंदिर में सारा के साथ की गई शादी की फोटो दिखाए, जिस में वह सारा की मांग में सिंदूर भरता हुआ नजर आ रहा था.

फोटो देख कर सीमा सिंह को विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सारा को आवाज दी. मां की आवाज सुन कर सारा आई. उन्होंने अमनमणि द्वारा दिखाए फोटो के बारे में पूछा तो सारा ने सारी बात बता दी. बेटी का जवाब सुन कर उन्होंने अपना माथा पकड़ लिया. बेटी को जो करना था, सो वह कर चुकी थी. बात को तूल देने के बजाय सीमा चुप रहीं और अंत में उन्होंने उस रिश्ते को मजबूरी में स्वीकार कर लिया. लेकिन बेटी के इस फैसले से वह खुश नहीं थीं. समाज में सीमा सिंह की भी अपनी इज्जत थी. इस इज्जत को बनाए रखने के लिए वह सामाजिक रीतिरिवाज से यह शादी करना चाहती थीं.

इस संबंध में बात करने के लिए वह गोरखपुर पहुंच कर मैडिकल कालेज में अमनमणि के मातापिता अमरमणि त्रिपाठी और उन की पत्नी मधुमणि से मिलीं. सीमा सिंह ने उन से अमनमणि और सारा द्वारा कोर्ट में शादी करने की बात बताई तो वे भड़क गए. उन्होंने साफ कह दिया कि यह शादी हरगिज मंजूर नहीं है. सीमा के साथ अमनमणि भी था. बेटे की इस करतूत पर अमरमणि ने वहीं पर बेटे के 2-4 थप्पड़ भी जड़ दिए. बात न बनने पर सीमा सिंह वहां से वापस लखनऊ लौट गईं. अमनमणि भी उन्हीं के साथ लखनऊ आ गया. मांबाप से नाखुश अमनमणि 4 महीने तक गोरखपुर नहीं लौटा.

बेटे के इस कदम को अमरमणि त्रिपाठी अपनी बेइज्जती समझ रहे थे. उन्होंने और उन के रिश्तेदारों ने अमनमणि को समझाते हुए सारा से रिश्ता तोड़ने के लिए दबाव डाला, पर अमनमणि सारा को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ. संकट की इस घड़ी में अमनमणि के नजदीकी दोस्त मानू पांडेय ने उस की सब से ज्यादा मदद की. बाद में अमरमणि त्रिपाठी और मधुमणि को जब पता चला कि मानू ही अमनमणि की आर्थिक मदद कर रहा है तो अमरमणि ने मानू को आगाह करते हुए बेटे से दूर रहने की हिदायत दी. ऐसा न करने पर उसे मधुमिता शुक्ला जैसा हश्र करने की चेतावनी भी दे डाली.

मानू पांडेय अमरमणि त्रिपाठी के रुतबे से अच्छी तरह परिचित था. डर की वजह से उस ने अपने जिगरी दोस्त अमनमणि का साथ छोड़ दिया. वह उस से दूर हो गया. मानू के दूर होते ही अमनमणि की आर्थिक तंगी बढ़ गई. अमनमणि को पता नहीं था कि मानू उस से दूरी क्यों बना रहा है? वह मानू को जब भी बुलाता, वह कोई न कोई काम का बहाना बना देता था. मानू का यह व्यवहार उसे कतई पसंद नहीं था. इसी बात पर अमनमणि मानू से खफा हो गया.

दरअसल मानू पांडेय गोरखपुर जिले के थरुवापार गांव के रहने वाले ऋषि कुमार पांडेय का बेटा था. वैसे उस का नाम अमित कुमार पांडेय था, लेकिन प्यार से सब उसे मानू कहते थे. ऋषिकुमार पांडेय नगर निगम के रजिस्टर्ड ठेकेदार थे. मानू छात्र जीवन से ही नेता था. उसी दौरान वह बसपा के कद्दावर नेता रामभुआल निषाद के संपर्क में आया. इस के बाद उस का अनेक राजनीतिज्ञों के संपर्क होता गया. मानू पांडेय और अमनमणि के बीच दोस्ती होने की भी एक अलग कहानी है. बात 7 मई, 2012 की है. दोपहर के समय बाहुबली पप्पू निषाद नाम का प्रौपर्टी डीलर अपने मुकदमे की तारीख निपटा कर स्कौर्पियो से कचहरी से लौट रहा था. उस की गाड़ी में 5-6 लोग और सवार थे.

वह कचहरी से करीब 500 मीटर पूरब दिशा में पहुंचा था कि तभी 3 मोटरसाइकिलों पर सवार 6 जनों ने उस की कार को चारों तरफ से घेर लिया. उन के हाथों में हथियार थे. इस से पहले कि पप्पू निषाद कुछ समझ पाता, उन लोगों ने उस की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. अपनी जान बचाने के लिए पप्पू निषाद गाड़ी से कूद कर छात्रसंघ चौराहे के पास स्थित मेगामार्ट में फिल्मी स्टाइल में शीशा तोड़ कर घुस गया. तब कहीं जा कर उस की जान बची. पप्पू निषाद ने इस मामले में पूर्व मंत्री रामभुआल निषाद, उस के भाई मनोज निषाद के अलावा सूरज निषाद, मनीष कन्नौजिया, रामजीत यादव, गुड्डू कटाई और दिनेशचंद यादव को नामजद किया था.

लेकिन पुलिस तफ्तीश में अमित कुमार पांडेय उर्फ मानू पांडेय का नाम भी सामने आ रहा था. पुलिस ने नामजद आरोपियों को तो गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था, लेकिन मानू पांडेय का कहीं पता नहीं लग पा रहा था. उस की तलाश में पुलिस जीजान से जुटी थी. पुलिस से बचने के लिए मानू इधरउधर छिप रहा था. उसी दौरान उस के दोस्तों ने सलाह दी कि समाजवादी पार्टी के किसी कद्दावर नेता की मदद ली जाए तो बात बन सकती है. क्योंकि प्रदेश में सपा की सरकार थी. मानू सोचने लगा कि वह किस नेता से संपर्क करे. मानू के नाना हड़बड़ शुक्ला अमरमणि त्रिपाठी का कारोबार पिछले 25 सालों से देख रहे थे. उन दिनों अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी की राजनीति भी चमक रही थी. मानू अमनमणि से परिचित तो था, लेकिन संबंध ज्यादा गहरे नहीं थे.

नाना की मार्फत मानू की जब अमनमणि से मुलाकात हुई तो मानू ने उसे अपनी परेशानी बताते हुए मदद मांगी. बताया जाता है कि अमनमणि के संपर्क में आने के बाद पुलिस मानू को गिरफ्तार नहीं कर पाई. इस के बाद उन दोनों की दोस्ती काफी मजबूत हो गई थी. लेकिन इस गलतफहमी की वजह से उन के बीच दूरियां बढ़ गई थीं. उसी दौरान एक नई घटना घट गईं अमनमणि और सारा की शादी के समय मांग में सिंदूर भरते हुए फोटो फेसबुक पर किसी ने डाल दी. फिर वहीं से वह फोटो स्थानीय अखबार हिंदुस्तान ने अपने सभी संस्करणों में छाप दी. फोटो छपते ही अमनमणि बौखला गया.

उसे पता था कि शादी की यह फोटो मानू के अलावा और कि॒सी के पास नहीं है. इसलिए उसे विश्वास हो गया कि यह सब मानू पांडेय ने ही किया होगा. उस ने तय कर लिया कि वह उसे इस का सबक जरूर सिखाएगा. मानू पांडेय और अमनमणि त्रिपाठी की दोस्ती में दरार पड़ चुकी थी. यह दरार उन्हें दुश्मनी के मुकाम तक ले गई. अमनमणि त्रिपाठी एक रसूखदार बाप की औलाद था. बताया जाता है कि मानू की हत्या के लिए उस ने शूटर लगा दिए. अपनी जान की सलामती के लिए मानू और उस के घर वाले भूमिगत हो गए. उन के इधरउधर रहने के बाद उन का अंधियारीबाग वाला मकान खाली पड़ा था.

मौके का फायदा उठाते हुए अमनमणि ने उस मकान पर कब्जा जमा लिया. मानू को जब पता चला तो वह उस से अपना मकान खाली कराने में लग गया. एक साल की कड़ी मशक्कत के बाद उसे अपना मकान वापस मिला. उसी दौरान मानू की मां शीला पांडेय की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई. उन्हें एक गंभीर बीमारी हुई थी. मानू पांडे और उस का बड़ा भाई अनुराग पांडेय दिल्ली में अपनी बहन के पास थे. दोनों भाइयों ने अपने पिता से कह दिया कि वह मां को दिल्ली ले कर आ जाएं. तब ऋषि पांडेय अपनी स्कौर्पियो से पत्नी को दिल्ली के लिए ले कर चल दिए.

5 अगस्त, 2014 की रात को मानू की मां शीला की तबीयत बेहद नाजुक हो गई. उस समय ऋषि पांडेय और उन की बड़ी बहू प्रियंका ही घर पर थे, वे उन्हें ले कर दिल्ली के लिए निकल गए. उन्होंने आक्सीजन मास्क लगवा दिया था, ताकि रास्ते में शीला को कोई परेशानी न हो. कहीं से यह सूचना अमनमणि त्रिपाठी को मिल गई तो वह अपने साथियों संदीप त्रिपाठी व रवि शुक्ला के साथ लालबत्ती लगी फौरच्यूनर गाड़ी से निकल गया. रात डेढ़ बजे के करीब लखनऊ के आवास विकास मुख्यालय के सामने उस ने अपनी गाड़ी ऋषि पांडे की गाड़ी के सामने रोक दी और पिस्टल की नोक पर ऋषि पांडेय का अपहरण कर के अपनी गाड़ी में बैठा लिया.

पत्नी की सीरियस हालत का हवाला देते हुए ऋषि पांडेय ने छोड़ने की काफी मनुहार की, लेकिन अमनमणि का दिल नहीं पसीजा. वह उन्हें हजरतगंज में स्थित अपनी कोठी में ले गया. वहां ले जा कर उस ने ऋषि पांडेय को एक कमरे में बंद कर दिया. उन तीनों ने उन की जम कर धुनाई की. फिर अमनमणि ने उन से 1 लाख रुपए की मांग की. वह जानता था कि पत्नी के इलाज के लिए दिल्ली जा रहे हैं तो उन के पास पैसे जरूर होंगे. अमनमणि त्रिपाठी उन पर पैसों के लिए दबाव बना रहा था कि तभी पता नहीं उस के दिमाग में क्या बात आई कि उस ने उन्हें अपने घर में रखना उचित नहीं समझा. उसी वक्त उन्हें गाड़ी में बैठा कर दूसरे ठिकाने पर ले जाने लगा. वह बीच रास्तें में था कि उस के किसी दोस्त का फोन आया.

उस ने बताया कि पुलिस को तुम्हारे बारे में पता चल चुका है. फोन आते ही अमनमणि ने अपनी योजना बदल दी. उस ने अपनी गाड़ी का रुख वीवीआईपी इलाके की तरफ कर दिया और वहीं पर चलती गाड़ी से धक्का मार कर उन्हें गिरा दिया और साथियों सहित फरार हो गया. उधर अनुराग पांडेय की पत्नी प्रियंका ने अपने ससुर के अपहरण की खबर पुलिस के अलावा दिल्ली में मौजूद अपने पति और देवर को दे दी थी. पिता के अपहरण की सूचना मिलते ही अनुराग और मानू रात में ही कार से लखनऊ के लिए रवाना हो गए. पुलिस भी ऋषि पांडेय को खोजने में जुट गई.

आखिर रात 3 बजे के करीब ऋषि पांडेय वीवीआईपी इलाके में सड़क के किनारे पड़े मिल गए. उन्होंने पुलिस को बता दिया कि अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी ने ही अपने साथियों के साथ मिल कर उन का अपहरण किया था. जिस इलाके में ऋषि पांडेय मिले थे, वह इलाका थाना कैंट क्षेत्र में आता था. इसलिए वहीं पर अमनमणि त्रिपाठी, रवि शुक्ला और एक अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 304, 386, 323, 504, 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने थोड़े प्रयास के बाद रवि शुक्ला को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. 30 अगस्त, 2014 को पुलिस ने उस के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया. पुलिस की पकड़ से अमनमणि त्रिपाठी और संदीप त्रिपाठी अभी भी दूर थे. पुलिस संदीप त्रिपाठी के ऊपर 5 हजार रुपए इनाम भी घोषित कर चुकी थी. 20 दिसंबर, 2014 को उत्तर प्रदेश एसटीएफ की गोरखपुर इकाई के प्रभारी सत्यप्रकाश सिंह ने संदीप त्रिपाठी को गोरखपुर के खोराबार इलाके के खिरवनिया गांव के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस के अन्य साथी भागने में सफल रहे.

टीम ने उस के कब्जे से एक पिस्टल, 5 कारतूस, 3 मोबाइल फोन और 6 सिम बरामद किए. 22 दिसंबर, 2014 को पुलिस ने उस के खिलाफ भी न्यायलय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया. तीसरे आरोपी अमनमणि की पुलिस सरगर्मी से तलाश कर रही थी. मार्च, 2015 में विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पांडेय का एक कार्यक्रम सिद्धार्थनगर जिले में आयोजित हुआ. वहां प्रदेश के बड़ेबड़े नेता पहुंचे थे. मंत्री शिवपाल यादव के ठीक बगल वाली सीट पर अमनमणि त्रिपाठी भी नजर आया तो प्रैस फोटोग्राफरों ने उस का फोटो खींच लिया.

दूसरे दिन समाचार पत्रों में इस तसवीर को प्रमुखता से छापा गया. पुलिस फिर उसे गिरफ्तार करने के लिए सक्रिय हुई तो वह फिर से भूमिगत हो गया. अदालत ने अमनमणि त्रिपाठी को भगोड़ा घोषित कर दिया. इस के बाद पुलिस ने अदालत से उस के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 82/83 (कुर्की) आदेश करा कर उस के गोरखपुर के कोतवाली इलाके के दुर्गाबाड़ी रोड आवास पर नोटिस चस्पा कर दिया. इस बीच सारा, पति की हकीकत जान चुकी थी. उसे जब पता चला कि उस का पति आपराधिक छवि का है तो उस के दिल को काफी ठेस पहुंची.

उस ने पति को समझाने की काफी कोशिश की कि वह गुनाह के रास्ते से तौबा कर के अच्छे रास्ते पर चले, पर वह पत्नी की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देता. जब वह यही बात बारबार कहती तो वह उस की पिटाई कर देता. सारा यह सारी बातें मां से कह देती थी, तब सीमा सिंह नाराज होते हुए अमनमणि को फटकार सुनाती थी. ऐसा कई बार हुआ था. जब वह सारा की आए दिन पिटाई करने लगा तो सीमा सिंह ने गोमतीनगर में एक फ्लैट किराए पर दिलवा दिया और कहा कि जब तक तुम्हारे मांबाप इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक तुम सारा को ले कर वहां रह सकते हो. लेकिन अमनमणि ने ऐसा नहीं किया.

वह इधरउधर रह कर सिर छिपाता रहा तो सारा मायके में रही. धीरेधीरे सारा और अमन के बीच दूरियां बढ़ती गईं. दूरियां बढ़ने की एक वजह यह भी थी कि अमन उस पर शक करने लगा था कि उस की पत्नी का झुकाव कहीं उसी व्यवसाई की ओर तो नहीं हो रहा है, जिस से उस की शादी होने वाली थी. शक के दौरान वह मौका मिलने पर पत्नी के दोनों मोबाइल के चारों नंबरों की काल डिटेल्स चेक करता रहता था. कोई भी नंबर उसे अंजान लगता तो वह उसे ले कर सारा के साथ झगड़ा और मारपीट करता. इन सब के पीछे खास वजह यह थी कि वह जान चुका था कि उस की सच्चाई पत्नी के सामने खुल चुकी है. वह उस की आपराधिक छवि को जान चुकी है.

पति से आजिज हो कर सारा मां से कहने लगी कि वह किसी तरह से अमनमणि से तलाक दिला दें. वह उस के साथ जीवन नहीं बिता सकेगी. रातरात भर वह अवारा दोस्तों के साथ घूमता है. बेटी की बात सुन कर सीमा सिंह को काफी आघात पहुंचा था. उन्होंने बेटी को तलाक दिलाने का फैसला ले लिया. बेटी ने जो गलती की थी, उस की सजा उसे मिल चुकी थी. इसलिए एक दिन उन्होंने अमनमणि को समझाते हुए कहा कि वह सारा को तलाक दे दे. अमनमणि ने उस समय तो उन की बात का जवाब नहीं दिया, पर बाद में उस ने सारा से कह दिया कि वह चाहे जो कर ले, पर उसे किसी कीमत पर तलाक नहीं देगा. यह बात जून, 2015 की थी.

उस के बाद पता नहीं क्या हुआ कि अचानक अमनमणि के व्यवहार में परिवर्तन आ गया. उस ने सीमा सिंह से वादा किया कि वह सारा को अब कोई परेशानी नहीं होने देगा, उसे बड़े प्यार से रखेगा. उस पर कभी हाथ भी नहीं छोड़ेगा. यही नहीं, उस ने हमेशाहमेशा के लिए अपने मांबाप का घर छोड़ने का भी वादा कर लिया. पति के अंदर आए इस बदलाव से सारा काफी खुश हुई. कोमल दिल की सारा ने पति को माफ कर दिया और नए तरीके से जिंदगी शुरू करने के ख्वाब देखने लगी.

अमन ने उस से कहा कि वह पिछली सालगिरह पर कोई खुशी नहीं मना पाया. उन की खुशियों में कोई भी शामिल नहीं हुआ. इस बार वह सालगिराह बड़ी धूमधाम से मनाएगा. उस ने इस मौके पर दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला घूमने का प्रस्ताव सारा के सामने रखा तो सारा ने हां कर दी. वह बड़ी खुश थी. लेकिन उसे क्या पता था कि जो खुशी पाने के लिए वह फूली नहीं समा रही, वह खुशी उसे कभी नहीं मिलेगी. पूरी योजना बनाने के बाद 9 जुलाई, 2015 की सुबह सफेद कलर की मारुति स्विफ्ट कार ले कर अमनमणि सारा की कोठी के सामने पहुंच गया. सारा चहकते हुए उस में बैठ गई.

अमनमणि उसे ले कर लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए कह कर निकला. और दिन के एक बजे के करीब फिरोजाबाद के सिरसागंज इलाके में एक लड़की को बचाने के चक्कर में एक्सीडैंट हो गया. सारा की घटनास्थल पर ही मौत हो गई, लेकिन अमन को एक खरोंच तक नहीं आई. बहरहाल, घटना के बाद पुलिस ने अमनमणि त्रिपाठी को ऋषिकुमार पांडेय के अपहरण के केस में गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस को उस की पिछले 11 महीने से तलाश थी. मृतका सारा सिंह की मां सीमा सिंह से टेलीफोन पर बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि सारा की दुर्घटना में हुई मौत एक बड़ा षडयंत्र है.

यह स्वाभाविक मौत नहीं, बल्कि सीधेसीधे हत्या है. यह हत्या पूर्व मंत्री और आपराधिक छवि के सपा नेता अमरमणि त्रिपाठी और उन की पत्नी मधुमणि त्रिपाठी ने मिल कर की है. जिस क्षेत्र में घटना घटी है, उस के आसपास का क्षेत्र अमरमणि के प्रभाव वाला है. उस क्षेत्र में बड़ी संख्या में अमरमणि के रिश्तेदार भी रहते हैं. उन्होंने इस की सीबीआई जांच कराने की मांग की है.

कथा लिखे जाने तक मामले की जांच थाना पुलिस कर रही थी. कथा संकलन तक प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की संस्तुति नहीं की थी. Uttar Pradesh Crime

—कथा में दयालमुनि पांडेय परिवर्तित नाम है, कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Faridabad Crime: नकली नोट बनाने व चलाने में 2 गिरफ्तार

Faridabad Crime: एक ऐसा मामला सामने आया जहां अपराधी नकली नोट बनाकर खुलेआम चला रहे थे. आखिर पुलिस को कैसे पता चला इन शातिरों का और कैसे अपराधी कर रहे थे इन नोटों का इस्तेमाल. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी जो खोलेगी अनेक राज.

यह मामला हरियाणा के फरीदाबाद से सामने आया है, जहां पुलिस ने कम समय में अमीर बनने के लालच में नकली नोट छापने वाले 2 युवकों को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने उन के कब्जे से अलगअलग कीमत के नकली नोट और एक आधुनिक प्रिंटर बरामद किया है, जिस का इस्तेमाल नकली नोट छापने में किया जा रहा था. यह काररवाई शहर में चल रही सतर्कता के दौरान की गई.

पुलिस के मुताबिक, बरामद नकली नोटों में 500 रुपए का एक, 200 रुपए के 5 नोट और 100 रुपए के 10 नोट शामिल हैं. पुलिस ने जब आरोपियों से पूछताछ की तो नकली नोटों के पूरे गिरोह का खुलासा हुआ. एक आरोपी नकली नोट छापता था, जबकि दूसरा उन्हें बाजार में चलाता था. दोनों को अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. Faridabad Crime

Gurugram Crime: प्रेमी संग पति पर किया जानलेवा हमला

Gurugram Crime: कब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे, जहां महिलाएं अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की जान लेने पर उतारू हो जाती हैं. ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां बौयफ्रेंड के प्यार में पत्नी ने अपने ही पति पर जानलेवा हमला कर दिया. आखिर क्यों? क्या प्रेम में जान लेना ही आखिरी रास्ता था? पत्नी का यह कदम कई सवाल खड़े करता है. चलिए जानते हैं इस पूरी घटना की विस्तार से कहानी, जो आप को सोच ने पर मजबूर कर देगी.

यह हैरान कर देने वाली घटना दिल्ली से सटे गुरुग्राम से सामने आई है, जहां अवैध संबंधों के चलते पत्नी पूनम ने अपने प्रेमी मनखुश के साथ मिलकर अपने ही पति शिव शंकर पर कुल्हाड़ी से जानलेवा हमला कर दिया. पुलिस के अनुसार, पूनम ने अपने पति शिव शंकर को मंदिर दर्शन के बहाने घर से बुलाया था. फिर रास्ते में वीपीएस स्कूल के पास पति को स्कूटी से गिराकर उस पर हमला किया गया.
वहां पर मौजूद पूनम का प्रेमी मनखुश उर्फ मिंटू भी मौजूद था. दोनों वारदात को अंजाम दे कर मौके से फरार हो गए.

यह मामला तब सामने आया जब पुलिस को खोह गांव में एक स्कूल के पास एक व्यक्ति के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना मिली. मौके पर पहुंची पुलिस टीम को पता चला कि घायल व्यक्ति को इलाज के लिए फरीदाबाद के अस्पताल में भरती कराया गया है. पुलिस ने दोनों आरोपियों को अरेस्ट कर लिया है. दोनों बिहार के रहने वाले हैं और उन के बीच पिछले 6 महीनों से अवैध संबंध थे.

Love Story: प्रेम कहानी का दर्दनाक अंत

Love Story: 29 जुलाई, 2017 की रात साहिल उर्फ शुभम वोल्वो बस पकड़ कर लखनऊ से जौनपुर जा रहा था. उस के साथ उस का भाई सनी भी था. रात गहराते ही बस की लगभग सभी सवारियां सो गई थीं. रात 2 बजे फोन की घंटी बजी तो साहिल की आंखें खुल गईं. उस ने मोबाइल स्क्रीन देखी, नंबर उस की भाभी शिवानी का था. उस ने जैसे ही फोन रिसीव कर के कान से लगाया, दूसरी ओर से शिवानी ने रोते हुए कहा, ‘‘साहिल, राहुल अब नहीं रहा. मैं भी उस के बिना नहीं रह सकती.’’

‘‘कैसे, क्या हुआ, कहां है राहुल?’’ साहिल ने परेशान हो कर पूछा.

‘‘राहुल ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. वह परदे की रस्सी बना कर उसी से लटक गया है.’’ शिवानी ने रोतेरोते कहा.

उस समय साहिल लखनऊ से काफी दूर बस में था. वह खुद कुछ कर नहीं सकता था, इसलिए वह सोचने लगा कि शिवानी की मदद कैसे की जाए. एकाएक उस की समझ में कुछ नहीं आया तो उस ने कहा, ‘‘भाभी, आप जल्दी से राहुल भैया को उतारिए.’’

‘‘साहिल, मैं हर तरह से कोशिश कर चुकी हूं, पर उतार नहीं पाई. मैं ने घर से बाहर जा कर कालोनी वालों को आवाज भी लगाई, पर कोई भी मेरी मदद के लिए नहीं आया. अब तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं. मैं राहुल के बिना कैसे रहूंगी?’’ शिवानी ने रोते हुए साहिल से मदद मांगी.

‘‘भाभी, मैं तो लखनऊ से बहुत दूर हूं. आप एक काम करें, वहीं मेज पर लाइटर रखा होगा, आप उस से परदे की गांठ में आग लगा दीजिए, परदा जल कर टूट जाएगा. आप इतना कीजिए, तब तक मैं मदद के लिए किसी से बात करता हूं.’’

कह कर साहिल ने फोन काट दिया. इस के बाद उस ने अपने कुछ दोस्तों को फोन किए, पर किसी से बात नहीं हो सकी. इस के बाद उस ने लखनऊ पुलिस को फोन किया. उस वक्त रात के करीब ढाई बजे थे. लखनऊ पुलिस को फोन कर के साहिल ने बताया कि उस का भाई राहुल और भाभी शिवानी विनयखंड, गोमतीनगर के मकान नंबर 3/137 में रहते हैं, जो होटल आर्यन के पास है. उस के भाई को कुछ हो गया है. वह जौनपुर से विधायक और एक बार सांसद रह चुके कमला प्रसाद सिंह का पोता है.

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कमला प्रसाद सिंह की जौनपुर में अच्छी साख थी. वह 2 बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके थे. जमुई में उन का इंटर कालेज भी है. उन के 2 बेटे विनय और अनिल हैं. राहुल अनिल का बड़ा बेटा था. पुलिस को जैसे ही पता चला कि विधायक और सांसद रहे कमला प्रसाद सिंह के घर का मामला है तो पुलिस तुरंत हरकत में आ गई.

पुलिस की पीआरवी टीम के कमांडर रामनरेश गौतम सबइंसपेक्टर सुशील कुमार और ड्राइवर निहालुद्दीन के साथ विनयखंड पहुंच कर आर्यन होटल के पास मकान नंबर 3/137 खोजने लगे. रात का समय था, कालोनी में सन्नाटा पसरा था, इसलिए मकान मिल नहीं रहा था.  पुलिस को फोन करने के बाद साहिल ने शिवानी को फोन किया. लेकिन उस का फोन बंद हो चुका था. साहिल ने इस बात की जानकारी घर वालों को भी दे दी थी. जैसे ही घर वालों को इस घटना का पता चला, उन्होंने शिवानी को फोन करने शुरू कर दिए. लेकिन तब तक शिवानी का फोन बंद हो चुका था. इस से सब परेशान हो गए.

साहिल ने एक बार फिर पुलिस को फोन किया. पुलिस ने बताया कि वे मकान तलाश रहे हैं, लेकिन मकान मिल नहीं रहा है. इस पर साहिल ने कहा, ‘‘मेरे मकान का दरवाजा खुला होगा, क्योंकि भाभी ने बताया था कि वह दरवाजा खोल कर बाहर आई थीं.’’

जैसे फिल्मों और क्राइम सीरियलों में पुलिस समय पर नहीं पहुंचती, उसी तरह यहां भी हुआ. उधर साहिल से बात करने के बाद शिवानी ने अपना मोबाइल फोन बंद कर लिया था. वह लाइटर से परदे को जला रही थी, तभी राहुल की गरदन में फंसा फंदा खुल गया और वह नीचे गिर गया. उस के शरीर में कोई हरकत होती न देख शिवानी परेशान हो गई. उसे समझते देर नहीं लगी कि राहुल मर गया है.

पति को मरा देख कर वह वहां रखी प्लास्टिक की कुरसी पर चढ़ गई और परदे के दूसरे छोर में फंदा बना कर गले में डाला और पैर से कुरसी गिरा दी. इस के बाद वह भी लटक गई. थोड़ी देर पहले जो हाल राहुल का हुआ था, वही हाल शिवानी का भी हुआ. इस तरह पुलिस के पहुंचने से पहले ही उस ने भी मौत को गले से लगा लिया.

आखिरकार पुलिस तलाश करती हुई उस घर तक पहुंच गई, जिस का मेनगेट और दरवाजा खुला था. पुलिस ने खिड़की से झांक कर देखा तो पता चला कि एक औरत रस्सी से लटक रही थी और एक पुरुष की लाश फर्श पर पड़ी थी. पुलिस ने कमरे के दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया.

मामला एक सांसद के परिवार का था. इसलिए मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने तत्काल एएसपी (उत्तरी) अनुराग वत्स, सीओ (गोमतीनगर) दीपक कुमार सिंह, थाना गोमतीनगर के थानाप्रभारी विश्वजीत सिंह को भी इस घटना की सूचना दे दी. उस समय सभी अधिकारी गश्त पर थे, इसलिए सूचना मिलते ही घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने जल्दी से लाश उतार कर फर्श पर लेटा दी. पुलिस की गाड़ी देख कर कालोनी वाले भी इकट्ठा होने लगे थे. पुलिस को उन से पूछताछ में पता चला कि ज्यादातर यह मकान खाली ही रहता था. कभीकभी ही कोई उस में रहने आता था. इसलिए आसपास रहने वालों से उन लोगों का कोई खास संबंध नहीं था. आमनेसामने पड़ जाने पर दुआसलाम जरूर हो जाती थी.

सांसद के पौत्र और पौत्रवधू की मौत की खबर पा कर पूरी कालोनी में हड़कंप मच गया था. पुलिस ने घर वालों से बातचीत कर के सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की. लेकिन कोई ऐसी बात सामने नहीं आई, जिस से आत्महत्या पर शक किया जा सकता. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गया था कि मामला आत्महत्या का ही है. पोस्टमार्टम के बाद शिवानी और राहुल की लाशें जौनपुर के लाइनबाजार स्थित कमला प्रसाद सिंह के घर पहुंचीं तो वहां हड़कंप मच गया. घर के सभी लोगों का रोरो कर बुरा हाल था. जौनपुर में ही दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

मामले की जांच के लिए पुलिस ने शिवानी और साहिल के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस से भी पहले से दिए गए बयान और हालात मिलते नजर आए. शिवानी और राहुल के बीच दोस्ती कालेज में पढ़ाई के दौरान हुई थी. जल्दी ही यह दोस्ती प्यार में बदल गई थी. उस के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.

शिवानी के पिता सेना से रिटायर हो चुके थे. वह लखनऊ के कैंट एरिया में रहते थे. सन 2015 में घर वालों की मरजी से शिवानी और राहुल की शादी हुई थी. राहुल जौनपुर के केराकत इंटर कालेज में क्लर्क था. शादी के बाद राहुल परिवार के साथ जौनपुर में रहता था. वहीं से वह केराकत जा कर अपनी नौकरी करता था.

कभीकभी राहुल लखनऊ भी आता रहता था. लखनऊ में वह जमीन का कारोबार करने लगा था, जिस से उसे अलग से आमदनी होने लगी थी. लखनऊ के विनयखंड स्थित मकान का उपयोग किसी के आनेजाने पर ही होता था. प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2 दिन पहले ही राहुल लखनऊ आया था. जबकि शिवानी पहले से अपने मायके में रह रही थी. क्योंकि कुछ महीनों से राहुल और शिवानी के बीच संबंध ठीक नहीं थे.

पढ़ाई के दौरान एकदूसरे पर जान छिड़कने वाले राहुल और शिवानी के बीच कुछ समय से तनाव रहने लगा था. दोनों को एकदूसरे से दूर रहना गंवारा नहीं था, इसलिए पढ़ाई के बाद कैरियर बनाने के बजाय दोनों ने शादी कर ली थी. शादी के बाद राहुल ने जौनपुर के केराकत स्थित एक इंटर कालेज में नौकरी कर ली थी, जिस की वजह से उसे जौनपुर में रहना पड़ रहा था, जबकि शिवानी को वहां रहना पसंद नहीं था. इस बात को ले कर अकसर दोनों में कहासुनी होती रहती थी.

प्यार के बाद दोनों को ही शादी की हकीकत उतनी प्यारी नहीं लग रही थी, जितनी लगनी चाहिए थी. जौनपुर में मन न लगने से शिवानी लखनऊ में अपने मातापिता के यहां रह रही थी. राहुल जब भी लखनऊ आता, विनयखंड के मकान में ही रुकता था. उस के आने पर शिवानी भी आ जाती थी.

राहुल गुस्सैल स्वभाव का था, इसलिए जराजरा सी बात में दोनों के बीच लड़ाई हो जाती थी. शिवानी राहुल को बहुत प्यार करती थी, जिस की वजह से वह उस के गुस्से के बाद भी उस से अलग नहीं रहना चाहती थी. जबकि शिवानी कभी खुद के बारे में सोचती थी तो उसे लगता था कि अपने कैरियर को ले कर उस ने जो सपने देखे थे, वे सब बिखर गए. इसे ले कर वह भी तनाव में रहती थी.

शिवानी अपनी खुद की पहचान बनाना चाहती थी, पर शादी के बाद इस बात का कोई मतलब नहीं रह गया था. उस का यह द्वंद्व उस के संबंधों पर भारी पड़ रहा था. शिवानी राहुल से कभी कुछ कहती तो आपस में बहस के बाद दोनों में लड़ाई हो जाती थी. ऐसे में तनाव कम होने के बजाय और बढ़ जाता था.

29 जुलाई, 2017 की शाम को साहिल उर्फ शुभम अपने चचेरे भाई सनी के साथ राहुल से मिलने विनयखंड स्थित घर पर आया. भाइयों के आने की खुशी में पार्टी हुई, जिस में शराब भी चली. पुलिस को वहां मेज पर सिगरेट का एक खाली पैकेट, एक भरा पैकेट, शराब और बीयर की खाली बोतलें मिली थीं. बैड का बिस्तर भी बेतरतीब था. साहिल और सनी के जौनपुर चले जाने के बाद भी राहुल संभवत: शराब पीता रहा था.

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यह बात शिवानी को अच्छी नहीं लगी होगी. उस ने रोका होगा तो दोनों में बहस होने लगी होगी. नशे में होने की वजह से राहुल को गुस्सा आ गया होगा. इस के बाद शिवानी अपने कमरे में जा कर सो गई होगी. रात में 2 बजे के करीब जब उस की नींद खुली होगी तो उस ने देखा होगा कि राहुल परदे की रस्सी का फंदा बना कर उस में लटका है. पति को उस हालत में देख कर शिवानी की कुछ समझ में नहीं आया होगा. नशे में गुस्से की वजह से राहुल ने यह कदम उठा लेगा, यह शिवानी ने कभी नहीं सोचा था. वह परेशान हो गई होगी.

बहुत सारी शिकायतों के बाद भी शिवानी राहुल के बिना जिंदगी नहीं गुजार सकती थी. शायद यही वजह थी कि उस ने भी उस के साथ मरने का फैसला कर लिया. परदे से बनी जिस रस्सी के फंदे पर लटक कर राहुल ने अपनी जान दी थी, उसी के दूसरे सिरे पर फंदा बना कर शिवानी ने भी लटक कर जान दे दी. साथ जीनेमरने की कसम खाने वाली शिवानी ने अपना वचन निभा दिया.

राहुल और शिवानी की मौत अपने पीछे तमाम सवाल छोड़ गई है. प्यार करना, उस के बाद शादी करना कोई गुनाह नहीं है. प्यार के बाद शादी के बंधन को निभाने के लिए पतिपत्नी के बीच जिस भरोसे, प्यार और संघर्ष की जरूरत होती है, वह राहुल और शिवानी के बीच नहीं बन पाया. लड़ाईझगड़े में जान देने जैसे फैसले मानसिक उलझन की वजह से होते हैं. अगर राहुल ने नशे में यह फैसला नहीं लिया होता तो वह भी आज जिंदा होता और शिवानी भी.

राहुल की मौत के बाद शिवानी ने भी खुद को खत्म कर लिया. उन दोनों के इस फैसले से उन के परिवार वालों पर क्या गुजरेगी, उन दोनों ने नहीं सोचा. इस तरह की मौत का दर्द परिवार वालों को पूरे जीवन दुख देता रहता है. ऐसे में अगर पतिपत्नी के बीच कोई अनबन होती है तो जल्दबाजी में कोई फैसला लेना ठीक नहीं होता. Love Story

Family Crime: मौज मजे में पति की हत्या

Family Crime: मानने वाले प्रेमीप्रेमिका और पतिपत्नी का रिश्ता सब से अजीम मानते हैं. लेकिन  जबजब ये रिश्ते आंतरिक संबंधों की महीन रेखा को पार करते हैं, तबतब कोई न कोई संगीन जुर्म सामने आता है.

हरिओम तोमर मेहनतकश इंसान था. उस की शादी थाना सैंया के शाहपुरा निवासी निहाल सिंह की बेटी बबली से हुई थी. हरिओम के परिवार में उस की पत्नी बबली के अलावा 4 बच्चे थे. हरिओम अपनी पत्नी बबली और बच्चों से बेपनाह मोहब्बत करता था. बेटी ज्योति और बेटा नमन बाबा राजवीर के पास एत्मादपुर थानांतर्गत गांव अगवार में रहते थे, जबकि 2 बेटियां राशि और गुड्डो हरिओम के पास थीं. राजवीर के 2 बेटों में बड़ा बेटा राजू बीमारी की वजह से काम नहीं कर पाता था. बस हरिओम ही घर का सहारा था, वह चांदी का कारीगर था.

हरिओम और बबली की शादी को 15 साल हो चुके थे. हंसताखेलता परिवार था, घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. लेकिन अचानक एक ऐसी घटना घटी, जिस से पूरे परिवार में मातम छा गया. 3 नवंबर, 2019 की रात में हरिओम अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ घर से लापता हो गया. पिछले 12 साल से वह आगरा में रह रहा था. 36 वर्षीय हरिओम आगरा स्थित चांदी के एक कारखाने में चेन का कारीगर था.

पहले वह बोदला में किराए पर रहता था. लापता होने से 20 दिन पहले ही वह पत्नी बबली व दोनों बच्चियों राशि व गुड्डो के साथ आगरा के थानांतर्गत सिकंदरा के राधानगर इलाके में किराए के मकान में रहने लगा था. आगरा में ही रहने वाली हरिओम की साली चित्रा सिंह 5 नवंबर को अपनी बहन बबली से मिलने उस के घर गई. वहां ताला लगा देख उस ने फोन से संपर्क किया, लेकिन दोनों के फोन स्विच्ड औफ थे.

चित्रा ने पता करने के लिए जीजा हरिओम के पिता राजबीर को फोन कर पूछा, ‘‘दीदी और जीजाजी गांव में हैं क्या?’’

इस पर हरिओम के पिता ने कहा कि कई दिन से हरिओम का फोन नहीं मिल रहा है. उस की कोई खबर भी नहीं मिल पा रही. चित्रा ने बताया कि मकान पर ताला लगा है. आसपास के लोगों को भी नहीं पता कि वे लोग कहां गए हैं. किसी अनहोनी की आशंका की सोच कर राजबीर गांव से राधानगर आ गए. उन्होंने बेटे और बहू की तलाश की, लेकिन उन की कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर पिता राजबीर ने 6 नवंबर, 2019 को थाना सिकंदरा में हरिओम, उस की पत्नी और बच्चों की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

जांच के दौरान हरिओम के पिता राजबीर ने थाना सिकंदरा के इंसपेक्टर अरविंद कुमार को बताया कि उस की बहू बबली का चालचलन ठीक नहीं था. उस के संबंध कमल नाम के एक व्यक्ति के साथ थे, जिस के चलते हरिओम और बबली के बीच आए दिन विवाद होता था. पुलिस ने कमल की तलाश की तो पता चला कि वह भी उसी दिन से लापता है, जब से हरिओम का परिवार लापता है. पुलिस सरगरमी से तीनों की तलाश में लग गई. इस कवायद में पुलिस को पता चला कि बबली सिकंदरा थानांतर्गत दहतोरा निवासी कमल के साथ दिल्ली गई है. उन्हें ढूंढने के लिए पुलिस की एक टीम दिल्ली के लिए रवाना हो गई.

शनिवार 16 नवंबर, 2019 को बबली और उस के प्रेमी कमल को पुलिस ने दिल्ली में पकड़ लिया. दोनों बच्चियां भी उन के साथ थीं, पुलिस सब को ले कर आगरा आ गई. आगरा ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो मामला खुलता चला गया. पता चला कि 3 नवंबर की रात हरिओम रहस्यमय ढंग से लापता हो गया था. पत्नी और दोनों बच्चे भी गायब थे. कमल उर्फ करन के साथ बबली के अवैध संबंध थे. वह प्रेमी कमल के साथ रहना चाहती थी. इस की जानकारी हरिओम को भी थी. वह उन दोनों के प्रेम संबंधों का विरोध करता था. इसी के चलते दोनों ने हरिओम का गला दबा कर हत्या कर दी थी.

बबली की बेहयाई यहीं खत्म नहीं हुई. उस ने कमल के साथ मिल कर पति की गला दबा कर हत्या दी थी. बाद में दोनों ने शव एक संदूक में बंद कर यमुना नदी में फेंक दिया था.

  पूछताछ और जांच के बाद जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी—

फरवरी, 2019 में बबली के संबंध दहतोरा निवासी कमल उर्फ करन से हो गए थे. कमल बोदला के एक साड़ी शोरूम में सेल्समैन का काम करता था. बबली वहां साड़ी खरीदने जाया करती थी. सेल्समैन कमल बबली को बड़े प्यार से तरहतरह के डिजाइन और रंगों की साडि़यां दिखाता था. वह उस की सुंदरता की तारीफ किया करता था. उसे बताता था कि उस पर कौन सा रंग अच्छा लगेगा. कमल बबली की चंचलता पर रीझ गया. बबली भी उस से इतनी प्रभावित हुई कि उस की कोई बात नहीं टालती थी. इसी के चलते दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए थे.

अब जब भी बबली उस दुकान पर जाती, तो कमल अन्य ग्राहकों को छोड़ कर बबली के पास आ जाता. वह मुसकराते हुए उस का स्वागत करता फिर इधरउधर की बातें करते हुए उसे साड़ी दिखाता. कमल आशिकमिजाज था, उस ने पहली मुलाकात में ही बबली को अपने दिल में बसा लिया था. नजदीकियां बढ़ाने के लिए उस ने बबली से फोन पर बात करनी शुरू कर दी. जब दोनों तरफ से बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो नजदीकियां बढ़ती गईं. फोन पर दोनों हंसीमजाक भी करने लगे. फिर उन की चाहत एकदूसरे से गले मिलने लगी. बातोंबातों में बबली ने कमल को बताया कि वह बोदला में ही रहती है.

इस के बाद कमल बबली के घर आनेजाने लगा. जब एक बार दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूटी तो फिर यह सिलसिला सा बन गया. जब भी मौका मिलता, दोनों एकांत में मिल लेते थे. हरिओम की अनुपस्थिति में बबली और कमल के बीच यह खेल काफी दिनों तक चलता रहा. लेकिन ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं, एक दिन हरिओम को भी भनक लग गई. उस ने बबली को कमल से दूर रहने और फोन पर बात न करने की चेतावनी दे दी.

दूसरी ओर बबली कमल के साथ रहना चाहती थी. उस के न मानने पर वह घटना से 20 दिन पहले बोदला वाला घर छोड़ कर सपरिवार सिकंदरा के राधानगर में रहने लगा. 3 नवंबर, 2019 को हरिओम शराब पी कर घर आया. उस समय बबली मोबाइल पर कमल से बातें कर रही थी. यह देख कर हरिओम के तनबदन में आग लग गई. इसी को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ तो हरिओम ने बबली की पिटाई कर दी. बबली ने इस की जानकारी कमल को दे दी. कमल ने यह बात 100 नंबर पर पुलिस को बता दी. पुलिस आई और रात में ही पतिपत्नी को समझाबुझा कर चली गई. पुलिस के जाने के बाद भी दोनों का गुस्सा शांत नहीं हुआ, दोनों झगड़ा करते रहे.

रात साढे़ 11 बजे बबली ने कमल को दोबारा फोन कर के घर आने को कहा. जब वह उस के घर पहुंचा तो हरिओम उस से भिड़ गया. इसी दौरान कमल ने गुस्से में हरिओम का सिर दीवार पर दे मारा. नशे के चलते वह कमल का विरोध नहीं कर सका. उस के गिरते ही बबली उस के पैरों पर बैठ गई और कमल ने उस का गला दबा दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद हरिओम की मौत हो गई. उस समय दोनों बच्चियां सो रही थीं. कमल और बबली ने शव को ठिकाने लगाने के लिए योजना तैयार कर ली. दोनों ने शव को एक संदूक में बंद कर उसे फेंकने का फैसला कर लिया, ताकि हत्या के सारे सबूत नष्ट हो जाएं.

योजना के तहत दोनों ने हरिओम की लाश एक संदूक में बंद कर दी. रात ढाई बजे कमल टूंडला स्टेशन जाने की बात कह कर आटो ले आया. आटो से दोनों यमुना के जवाहर पुल पर पहुंचे. लाश वाला संदूक उन के साथ था. इन लोगों ने आटो को वहीं छोड़ दिया. सड़क पर सन्नाटा था, कमल और बबली यू टर्न ले कर कानपुर से आगरा की तरफ आने वाले पुल पर पहुंचे और संदूक उठा कर यमुना में फेंक दिया. इस के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. दूसरे दिन 4 नवंबर को सुबह कमल बबली और उस की दोनों बच्चियों को साथ ले कर दिल्ली भाग गया.

बबली की बेवफाई ने हंसतेखेलते घर को उजाड़ दिया था. उस ने पति के रहते गैरमर्द के साथ रिश्ते बनाए. यह नाजायज रिश्ता उस के लिए इतना अजीज हो गया कि उस ने अपने पति की मौत की साजिश रच डाली. पुलिस 16 नवंबर को ही कमल व बबली को ले कर यमुना किनारे पहुंची. उन की निशानदेही पर पीएसी के गोताखोरों को बुला कर कई घंटे तक यमुना में लाश की तलाश कराई गई, लेकिन लाश नहीं मिली. अंधेरा होने के कारण लाश ढूंढने का कार्य रोकना पड़ा.

रविवार की सुबह पुलिस ने गोताखोरों और स्टीमर की मदद से लाश को तलाशने की कोशिश की. लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला. बहरहाल, पुलिस हरिओम का शव बरामद नहीं कर सकी. शायद बह कर आगे निकल गया होगा. पुलिस ने बबली और उस के प्रेमी कमल को न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Family Crime

Crime Story: रसीली नहीं थी रशल कंवर

Crime Story: डूंगरदान पत्नी को सुखी और खुश रखने के लिए गांव से शहर ले आया था. वह जितना कमाता था, उतने में गृहस्थी आराम से चल जाती थी, लेकिन दिन भर घर में अकेली रहने वाली पत्नी रसाल कंवर ने अपना सुख खोजा पति के दोस्त मोहन सिंह राव में. इस के चलते कुछ न कुछ तो गलत होना ही था. आखिर…

रविवार 14 जुलाई, 2019 का दिन था. दोपहर का समय था. जालौर के एसपी हिम्मत अभिलाष टाक को फोन पर सूचना मिली कि बोरटा-लेदरमेर ग्रेवल सड़क के पास वन विभाग की जमीन पर एक व्यक्ति का नग्न अवस्था में शव पड़ा है.

एसपी टाक ने तत्काल भीनमाल के डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई को घटना से अवगत कराया और घटनास्थल पर जा कर काररवाई करने के निर्देश दिए. एसपी के निर्देश पर डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई तत्काल घटनास्थल की ओर रवाना हो गए, साथ ही उन्होंने थाना रामसीन में भी सूचना दे दी. उस दिन थाना रामसीन के थानाप्रभारी छतरसिंह देवड़ा अवकाश पर थे. इसलिए सूचना मिलते ही मौजूदा थाना इंचार्ज साबिर मोहम्मद पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल पर आसपास के गांव वालों की भीड़ जमा थी. वहां वन विभाग की खाई में एक आदमी का नग्न शव पड़ा था. आधा शव रेत में दफन था. उस का चेहरा कुचला हुआ था. शव से बदबू आ रही थी, जिस से लग रहा था कि उस की हत्या शायद कई दिन पहले की गई है. वहां पड़ा शव सब से पहले एक चरवाहे ने देखा था. वह वहां सड़क किनारे बकरियां चरा रहा था. उसी चरवाहे ने यह खबर आसपास के लोगों को दी थी. कुछ लोग घटनास्थल पर पहुंचे और पुलिस को खबर कर दी.

मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को खाई से बाहर निकाल कर शिनाख्त कराने की कोशिश की, मगर जमा भीड़ में से कोई भी मृतक की शिनाख्त नहीं कर सका. शव से करीब 20 मीटर की दूरी पर किसी चारपहिया वाहन के टायरों के निशान मिले. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि हत्यारे शव को किसी गाड़ी में ले कर आए और यहां डाल कर चले गए. पुलिस ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए. शव के पास ही खून से सनी सीमेंट की टूटी हुई ईंट भी मिली. लग रहा था कि उसी ईंट से उस के चेहरे को कुचला गया था. कुचलते समय वह ईंट भी टूट गई थी.

मौके की सारी काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए राजकीय चिकित्सालय की मोर्चरी भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने उस का पोस्टमार्टम किया. जब तक शव की शिनाख्त नहीं हो जाती, तब तक जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी. शव की शिनाख्त के लिए पुलिस ने मृतक के फोटो वाट्सऐप पर शेयर कर दिए. साथ ही लाश के फोटो भीनमाल, जालौर और बोरटा में तमाम लोगों को दिखाए. लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका.

सोशल मीडिया पर मृतक का फोटो वायरल हो चुका था. जालौर के थाना सिटी कोतवाली में 2 दिन पहले कालेटी गांव के शैतानदान चारण नाम के एक शख्स ने अपने रिश्तेदार डूंगरदान चारण की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. कोतवाली प्रभारी को जब थाना रामसीन क्षेत्र में एक अज्ञात लाश मिलने की जानकारी मिली तो उन्होंने लाश से संबंधित बातों पर गौर किया. उस लाश का हुलिया लापता डूंगरदान चारण के हुलिए से मिलताजुलता था. कोतवाली प्रभारी बाघ सिंह ने डीएसपी भीनमाल हुकमाराम को सारी बातें बताईं.

मारा गया व्यक्ति डूंगरदान चारण था

इस के बाद एसपी जालौर ने 2 पुलिस टीमों का गठन किया, इन में एक टीम भीनमाल थाना इंचार्ज साबिर मोहम्मद के नेतृत्व में गठित की गई, जिस में एएसआई रघुनाथ राम, हैडकांस्टेबल शहजाद खान, तेजाराम, संग्राम सिंह, कांस्टेबल विक्रम नैण, मदनलाल, ओमप्रकाश, रामलाल, भागीरथ राम, महिला कांस्टेबल ब्रह्मा शामिल थी. दूसरी पुलिस टीम में रामसीन थाने के एएसआई विरधाराम, हैडकांस्टेबल प्रेम सिंह, नरेंद्र, कांस्टेबल पारसाराम, राकेश कुमार, गिरधारी लाल, कुंपाराम, मायंगाराम, गोविंद राम और महिला कांस्टेबल धोली, ममता आदि को शामिल किया गया.

डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई दोनों पुलिस टीमों का निर्देशन कर रहे थे. जालौर के कोतवाली निरीक्षक बाघ सिंह ने उच्चाधिकारियों के आदेश पर डूंगरदान चारण की गुमशुदगी दर्ज कराने वाले उस के रिश्तेदार शैतानदान को राजदीप चिकित्सालय की मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो उस ने उस की शिनाख्त अपने रिश्तेदार डूंगरदान चारण के रूप में कर दी. मृतक की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने उस के परिजनों से संपर्क किया तो इस मामले में अहम जानकारी मिली. मृतक की पत्नी रसाल कंवर ने पुलिस को बताया कि उस के पति डूंगरदान 12 जुलाई, 2019 को जालौर के सरकारी अस्पताल में दवा लेने गए थे.

वहां से घर लौटने के बाद पता नहीं वे कहां लापता हो गए, जिस की थाने में सूचना भी दर्ज करा दी थी. रसाल कंवर ने पुलिस को अस्पताल की परची भी दिखाई. पुलिस टीम ने अस्पताल की परची के आधार पर जांच की. पुलिस ने राजकीय चिकित्सालय जालौर के 12 जुलाई, 2019 के सीसीटीवी फुटेज की जांच की तो पता चला कि डूंगरदान को काले रंग की बोलेरो आरजे14यू बी7612 में अस्पताल तक लाया गया था. उस समय डूंगरदान के साथ उस की पत्नी रसाल कंवर के अलावा 2 व्यक्ति भी फुटेज में दिखे. उन दोनों की पहचान मोहन सिंह और मांगीलाल निवासी भीनमाल के रूप में हुई. पुलिस जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही थी.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज जांच के बाद गांव के विभिन्न लोगों से पूछताछ की तो सामने आया कि मृतक डूंगरदान चारण की पत्नी रसाल कंवर से मोहन सिंह राव के अवैध संबंध थे. इस जानकारी के बाद पुलिस ने रसाल कंवर और मोहन सिंह को थाने बुला कर सख्ती से पूछताछ की. मांगीलाल फरार हो गया था. रसाल कंवर और मोहन सिंह राव ने आसानी से डूंगरदान की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. केस का खुलासा होने की जानकारी मिलने पर पुलिस के उच्चाधिकारी भी थाने पहुंच गए. उच्चाधिकारियों के सामने आरोपियों से पूछताछ कर डूंगरदान हत्याकांड से परदा उठ गया.

पुलिस ने 16 जुलाई, 2019 को दोनों आरोपियों मृतक की पत्नी रसाल कंवर एवं उस के प्रेमी मोहन सिंह राव को कोर्ट में पेश कर 2 दिन के रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान उन से विस्तार से पूछताछ की गई तो डूंगरदान चारण की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी. मृतक डूंगरदान चारण मूलरूप से राजस्थान के जालौर जिले के बागौड़ा थानान्तर्गत गांव कालेटी का निवासी था. उस के पास खेती की थोड़ी सी जमीन थी. वह उस जमीन पर खेती के अलावा दूसरी जगह मेहनतमजदूरी करता था. उस की शादी करीब एक दशक पहले जालौर की ही रसाल कंवर से हुई थी.

करीब एक साल बाद रसाल कंवर एक बेटे की मां बनी तो परिवार में खुशियां बढ़ गईं. बाद में वह एक और बेटी की मां बन गई. जब डूंगरदान के बच्चे बड़े होने लगे तो वह उन के भविष्य को ले कर चिंतित रहने लगा. गांव में अच्छी पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी, लिहाजा डूंगरदान अपने बीवीबच्चों के साथ गांव कालेटी छोड़ कर भीनमाल चला गया और वहां लक्ष्मीमाता मंदिर के पास किराए का कमरा ले कर रहने लगा. भीनमाल कस्बा है. वहां डूंगरदान को मजदूरी भी मिल जाती थी. जबकि गांव में हफ्तेहफ्ते तक उसे मजदूरी नहीं मिलती थी.

डूंगरदान के पड़ोस में ही मोहन सिंह राव का आनाजाना था. मोहन सिंह राव पुराना भीनमाल के नरता रोड पर रहता था. वह अपराधी प्रवृत्ति का रसिकमिजाज व्यक्ति था. उस की नजर रसाल कंवर पर पड़ी तो वह उस का दीवाना हो गया. मोहन सिंह ने इस के लिए ही डूंगरदान से दोस्ती की थी. इस के बाद वह उस के घर आनेजाने लगा. मोहन सिंह रसाल कंवर से भी बड़ी चिकनीचुपड़ी बातें करता था. जब डूंगरदान मजदूरी करने चला जाता और उस के बच्चे स्कूल तो घर में रसाल कंवर अकेली रह जाती. ऐसे मौके पर मोहन सिंह उस के यहां आने लगा. मीठीमीठी बातों में रसाल को भी रस आने लगा. मोहन सिंह अच्छीखासी कदकाठी का युवक था.रसाल और मोहन के बीच धीरेधीरे नजदीकियां बढ़ने लगीं.

थोड़े दिनों के बाद दोनों के बीच अवैध संबंध कायम हो गए. इस के बाद रसाल कंवर उस की दीवानी हो गई. डूंगरदान हर रोज सुबह मजदूरी पर निकल जाता तो फिर शाम होने पर ही घर लौटता था. रसाल और मोहन पूरे दिन रासलीला में लगे रहते. डूंगरदान की पीठ पीछे उस की ब्याहता कुलटा बन गई थी. दिन भर का साथ उन्हें कम लगने लगा था. मोहन चाहता था कि रसाल कंवर रात में भी उसी के साथ रहे, मगर यह संभव नहीं था. क्योंकि रात में पति घर पर होता था.

ऐसे में एक दिन मोहन सिंह ने रसाल कंवर से कहा, ‘‘रसाल, जीवन भर तुम्हारा साथ तो निभाऊंगा ही, साथ ही एक प्लौट भी तुम्हें ले कर दूंगा. लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम्हारे बदन को अब मेरे सिवा और कोई न छुए. तुम्हारे तनमन पर अब सिर्फ मेरा अधिकार है.’’

‘‘मैं हर पल तुम्हारा साथ निभाऊंगी.’’ रसाल कंवर ने प्रेमी की हां में हां मिलाते हुए कहा.

रसाल के दिलोदिमाग में यह बात गहराई तक उतर गई थी कि मोहन उसे बहुत चाहता है. वह उस पर जान छिड़कता है. रसाल भी पति को दरकिनार कर पूरी तरह से मोहन के रंग में रंग गई. इसलिए दोनों ने डूंगरदान को रास्ते से हटाने का मन बना लिया. लेकिन इस से पहले ही डूंगरदान को पता चल गया कि उस की गैरमौजूदगी में मोहन सिंह दिन भर उस के घर में पत्नी के पास बैठा रहता है. यह सुनते ही उस का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. गुस्से से भरा डूंगरदान घर आ कर चिल्ला कर पत्नी से बोला, ‘‘मेरी गैरमौजूदगी में मोहन यहां क्यों आता है, घंटों तक यहां क्या करता है? बताओ, तुम से उस का क्या संबंध है?’’ कहते हुए उस ने पत्नी का गला पकड़ लिया.

रसाल मिमियाते हुए बोली, ‘‘वह तुम्हारा दोस्त है और तुम्हें ही पूछने आता है. मेरा उस से कोई रिश्ता नहीं है. जरूर किसी ने तुम्हारे कान भरे हैं. हमारी गृहस्थी में कोई आग लगाना चाहता है. तुम्हारी कसम खा कर कहती हूं कि मोहन सिंह से मैं कह दूंगी कि वह अब घर कभी न आए.’’

पत्नी की यह बात सुन कर डूंगरदान को लगा कि शायद रसाल सच कह रही है. कोई जानबूझ कर उन की गृहस्थी तोड़ना चाहता है. डूंगरदान शरीफ व्यक्ति था. वह बीवी पर विश्वास कर बैठा. रसाल कंवर ने अपने प्रेमी मोहन को भी सचेत कर दिया कि किसी ने उस के पति को उस के बारे में बता दिया है. इसलिए अब सावधान रहना जरूरी है. उधर डूंगरदान के मन में पत्नी को ले कर शक उत्पन्न तो हो ही गया था. इसलिए वह वक्तबेवक्त घर आने लगा. एक रोज डूंगरदान मजदूरी पर गया और 2 घंटे बाद घर लौट आया. घर का दरवाजा बंद था. खटखटाने पर थोड़ी देर बाद उस की पत्नी रसाल कंवर ने दरवाजा खोला. पति को अचानक सामने देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

डूंगरदान की नजर कमरे में अंदर बैठे मोहन सिंह पर पड़ी तो वह आगबबूला हो गया. उस ने मोहन सिंह पर गालियों की बौछार कर दी. मोहन सिंह गालियां सुन कर वहां से चला गया. इस के बाद डूंगरदान ने पत्नी की लातघूंसों से खूब पिटाई की. रसाल लाख कहती रही कि मोहन सिंह 5 मिनट पहले ही आया था. मगर पति ने उस की एक न सुनी. पत्नी के पैर बहक चुके थे. डूंगरदान सोचता था कि गलत रास्ते से पत्नी को वापस कैसे लौटाया जाए. वह इसी चिंता में रहने लगा. उस का किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था. वह चिड़चिड़ा भी हो गया था. बातबात पर उस का पत्नी से झगड़ा हो जाता था.

आखिर, रसाल कंवर पति से तंग आ गई. यह दुख उस ने अपने प्रेमी के सामने जाहिर कर दिया. तब दोनों ने तय कर लिया कि डूंगरदान को जितनी जल्दी हो सके, निपटा दिया जाए. रसाल कंवर पति के खून से अपने हाथ रंगने को तैयार हो गई. मोहन सिंह ने योजना में अपने दोस्त मांगीलाल को भी शामिल कर लिया. मांगीलाल भीनमाल में ही रहता था.

साजिश के तहत रसाल और मोहन सिंह 12 जुलाई, 2019 को डूंगरदान को उपचार के बहाने बोलेरो गाड़ी में जालौर के राजकीय चिकित्सालय ले गए. मांगीलाल भी साथ था. वहां उस के नाम की परची कटाई. डाक्टर से चैकअप करवाया और वापस भीनमाल रवाना हो गए. रास्ते में मौका देख कर रसाल कंवर और मोहन सिंह ने डूंगरदान को मारपीट कर अधमरा कर दिया. फिर उस का गला दबा कर उसे मार डाला.

इस के बाद डूंगरदान की लाश को ठिकाने लगाने के लिए बोलेरो में डाल कर बोरटा से लेदरमेर जाने वाले सुनसान कच्चे रास्ते पर ले गए, जिस के बाद डूंगरदान के शरीर पर पहने हुए कपड़े पैंटशर्ट उतार कर नग्न लाश वन विभाग की खाली पड़ी जमीन पर डाल कर रेत से दबा दी. उस के बाद वे भीनमाल लौट गए. भीनमाल में रसाल कंवर ने आसपास के लोगों से कह दिया कि उस का पति जालौर अस्पताल चैकअप कराने गया था. मगर अब उस का कोई पता नहीं चल रहा. तब डूंगरदान की गुमशुदगी उस के रिश्तेदार शैतानदान चारण ने जालौर सिटी कोतवाली में दर्ज करा दी.

पुलिस पूछताछ में पता चला कि आरोपी मोहन सिंह आपराधिक प्रवृत्ति का है. उस ने अपने साले की बीवी की हत्या की थी. इन दिनों वह जमानत पर था. मोहन सिंह शादीशुदा था, मगर बीवी मायके में ही रहती थी. भीनमाल निवासी मांगीलाल उस का मित्र था. वारदात के बाद मांगीलाल फरार हो गया था. थाना रामसीन के इंचार्ज छतरसिंह देवड़ा अवकाश से ड्यूटी लौट आए थे. उन्होंने भी रिमांड पर चल रहे रसाल कंवर और मोहन सिंह राव से पूछताछ की.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने 19 जुलाई, 2019 को दोनों आरोपियों रसाल कंवर और मोहन सिंह को फिर से कोर्ट में पेश कर दोबारा 2 दिन के रिमांड पर लिया और उन से पूछताछ कर कई सबूत जुटाए. उन की निशानदेही पर मृतक के कपड़े, वारदात में प्रयुक्त बोलेरो गाड़ी नंबर आरजे14यू बी7612 बरामद की गई. मृतक डूंगरदान के कपडे़ व चप्पलें रामसीन रोड बीएड कालेज के पास रेल पटरी के पास से बरामद कर ली गईं.

पूछताछ पूरी होने पर दोनों आरोपियों को 21 जुलाई, 2019 को कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. पुलिस तीसरे आरोपी मांगीलाल माली को तलाश कर रही है. Crime Story

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

MP Crime News: कातिल किलर – ब्लैकमेलिंग का हुए शिकार

MP Crime News: घटना मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले की है. 17 अप्रैल, 2019 को दिन के यही कोई 3 बजे थे. उसी समय जीवाजीगंज थाना क्षेत्र के पीपलीनाका इलाके की महावीर सोसायटी में स्थित पंडित रमेश व्यास के मकान से गोलियां चलने की आवाज आईं. एक के बाद एक 2 गोलियों की आवाज सुन कर रमेश व्यास की पत्नी गीताबाई डर गई.

उस समय वह अपने 3 मंजिला मकान में भूतल पर थी. गोलियों की आवाज सुन कर गीताबाई भागीभागी ऊपर की मंजिल पर पहुंची, जहां उस का 37 वर्षीय बेटा देवकरण अपनी 27 वर्षीया पत्नी अंतिमा के साथ रहता था. गीताबाई ने जैसे ही बेटे और बहू को देखा तो उस की चीख निकल गई. क्योंकि बहूबेटा दोनों खून से लथपथ पड़े थे. गीताबाई के चीखने और रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी भी आ गए. उन्होंने जब देवकरण और उस की पत्नी को देखा तो वे भी हैरान रह गए कि ऐसा कैसे हो गया.

उन दोनों की मौत हो चुकी थी. थोड़ी देर में मोहल्ले के तमाम लोग इकट्ठे हो गए. उसी दौरान किसी ने थाना जीवाजीगंज में फोन कर के सूचना दे दी. घटना की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी शांतिलाल मीणा एसआई कैलाश भारती आदि के साथ मौके पर पहुंच गए. मकान की ऊपर वाली मंजिल के एक कमरे में उन्होंने पलंग पर देवकरण व उस की पत्नी अंतिमा के शव देखे. दोनों ही शव खून से लथपथ थे. पास ही एक पिस्टल पड़ी थी.

निरीक्षण में पता चला कि अंतिमा के सिर में गोली काफी नजदीक से मारी गई थी. लग रहा था कि देवकरण ने पहले अंतिमा की हत्या की फिर खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली. थानाप्रभारी को लगा कि शायद पतिपत्नी के बीच किसी विवाद के कारण यह घटना हुई है पर पुलिस जांच के दौरान अलमारी से जो सुसाइड नोट मिला, उस से पूरी कहानी ही बदल गई. सुसाइड नोट में देवकरण ने रेखा और सुमन नाम की 2 युवतियों का उल्लेख करते हुए लिखा था कि वह उन्हें ब्लैकमेल कर रही थीं. उन की ब्लैकमेलिंग से परेशान हो कर वह आत्महत्या कर रहे हैं.

घटना की जानकारी मिलने पर आईजी राकेश गुप्ता व एसपी (उज्जैन) सचिन अतुलका और एडीशनल एसपी नीरज भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. पुलिस ने देवकरण के मातापिता से इस बारे में पूछताछ की तो वे भी उन दोनों के बारे में ऐसी कोई जानकारी नहीं दे सके, जिन का जिक्र सुसाइड नोट में था. इस के बाद थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. फिर केस दर्ज कर के एसपी के निर्देश पर थानाप्रभारी शांतिलाल मीणा ने जांच शुरू कर दी.

थानाप्रभारी ने सब से पहले मृतक देवकरण के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से यह बात सामने आई कि देवकरण की अकसर एकमपुरा सोसायटी में रहने वाली रेखा, इंदौर के पलासिया में रहने वाली उस की छोटी बहन सुमन और एक युवक लाखन से बात होती थी. इस में खास बात यह थी कि देवकरण को इन तीनों की तरफ से ही काल की जाती थी. देवकरण अपनी तरफ  से उन्हें कोई फोन नहीं करता था. देवकरण ने अपने सुसाइड नोट में 2 युवतियों द्वारा ब्लैकमेलिंग की बात भी लिखी थी, इसलिए थानाप्रभारी ने शक के आधार पर रेखा व सुमन को हिरासत में लेकर उन से पूछताछ की. लेकिन दोनों युवतियों ने देवकरण को पहचानने से इनकार कर दिया.

बाद में रेखा ने चौंकाने वाली बात यह बताई कि लगभग ढाई साल पहले देवकरण ने उस से गंधर्व विवाह किया था. इसलिए पत्नी होने के नाते वह देवकरण से खर्च के लिए पैसा मांगती थी. लेकिन ब्लैकमेल करने की बात से उस ने इनकार कर दिया. अब तक पुलिस लाखन को भी हिरासत में ले कर थाने लौट आई थी. थानाप्रभारी मीणा को युवतियों की बात झूठी लगी. लिहाजा उन्होंने रेखा, सुमन व लाखन को अलगअलग रूम में बैठा कर पूछताछ की. उन के द्वारा विरोधाभासी बयान देने पर पता चल गया कि वे तीनों झूठ बोल रहे हैं.

अंतत: उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि वे देवकरण को काफी दिनों से ब्लैकमेल करते आ रहे थे. थानाप्रभारी की पूछताछ में देवकरण को ब्लैकमेल करने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उज्जैन के पीपलीनाका क्षेत्र की महावीर सोसायटी में रहने वाले पंडित रमेश शंकर व्यास छोटा सर्राफा स्थित नरसिंह मंदिर के पुजारी थे. उन्होंने अपने बेटे देवकरण को भी पूजापाठ, ज्योतिष की शिक्षा दी थी. इस के बाद देवकरण भी पिता के साथ मंदिर में रह कर पूजापाठ के काम में उन की मदद करने लगा था.. रेखा सिकरवार से देवकरण की मुलाकात सन 2016 में हुई थी. हुआ यह कि रेखा को उस के पति ने छोड़ दिया था. इस के लिए रेखा अपने ग्रह नक्षत्र दिखाने के लिए पंडित रमेशचंद्र व्यास के पास आई थी. रमेशचंद्र व्यास ने रेखा को अपनी कुंडली के बारे में देवकरण से सलाह लेने को कहा. देवकरण ने कुंडली देख कर उस की परेशानियां तो बता दीं, लेकिन खुद परेशानी में फंस गया.

हुआ यह कि सलाह के सिलसिले में रेखा ने देवकरण से उस का मोबाइल नंबर ले लिया और फिर अकसर उस से फोन पर अपनी समस्याओं के बारे में बातचीत करने लगी. मंदिरों में पूजापाठ का काम सुबह काफी जल्द शुरू हो कर देर रात तक चलता था. मंदिर में पूजा के अलावा देवकरण कई यजमानों के घर विभिन्न तरह के अनुष्ठान करवाने के लिए जाता था, इसलिए रेखा से उस की बात अकसर रात में ही हो पाती थी.

इसी बातचीत के दौरान रेखा का देवकरण की तरफ झुकाव हो गया. रेखा काफी शातिर थी. वह जानती थी कि देवकरण के पास काफी पैसा है, इसलिए उस ने उसे शीशे में उतारने की योजना बनाई. उस ने एक रोज पूजापाठ के बहाने देवकरण को अपने घर बुलाया. देवकरण जब वहां पहुंचा तो उस के घर पूजापाठ की कोई तैयारी नहीं थी. यह देख वह कुछ देर रुक कर वापस लौटने लगा तो रेखा ने उसे रोक कर कहा, ‘‘क्या सिर्फ पूजा करना ही अनुष्ठान है? स्त्रीपुरुष का प्यार भी तो अनुष्ठान ही होता है.’’

देवकरण कोई बच्चा नहीं था जो रेखा के कहने का मतलब न समझता. रेखा के प्रति उस के मन में भी आकर्षण था, लेकिन अपने परिवार की इज्जत एवं पेशे की पवित्रता को ध्यान में रख कर वह खुद आगे नहीं बढ़ा था. लेकिन जब रेखा ने खुला प्रेम प्रस्ताव दिया तो वह खुद को रोक नहीं सका, अंतत: दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. इस के बाद आए दिन दोनों की एकांत में मुलाकातें होने लगीं. रेखा के पास रोजीरोटी का कोई सहारा नहीं था, सो देवकरण से वह देहसुख के बदले पैसे वसूलने लगी.

इसी दौरान रेखा की छोटी बहन सुमन सिकरवार को भी उस के पति ने छोड़ दिया, जिस से वह भी मायके आ कर रहने लगी थी. खर्च बढ़ा तो रेखा की देवकरण से मांग भी बढ़ने लगी. लेकिन देवकरण ने इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इसी बीच पिता रमेशचंद्र व्यास ने देवकरण का रिश्ता उज्जैन में ही फ्रीगंज निवासी अंतिमा के साथ तय कर दिया.

यह बात रेखा को पता चली तो वह समझ गई कि पत्नी के आने के बाद देवकरण उस के कब्जे में ज्यादा दिन नहीं रहेगा. इसलिए देवकरण जब उसे अपनी शादी का निमंत्रण पत्र देने गया तो रेखा ने उसे खूब लताड़ा. रेखा ने कहा कि उस ने वादा किया था कि वह शादी के बाद भी उस का खर्च उठाता रहेगा. अप्रैल, 2017 में अंतिमा से देवकरण का विवाह हो गया. वह बहुत सुंदर थी. अंतिमा के मधुर व्यवहार से ससुराल में सब खुश थे. पत्नी के प्यार ने देवकरण को रेखा से दूर कर दिया. लेकिन रेखा, उस की मां और बहन सुमन को यह मंजूर नहीं था. देवकरण उन के लिए वह खजाना था, जिस में हाथ डाल कर वे जब चाहे पैसा निकाल सकती थीं.

इसलिए रेखा, उस की बहन सुमन और मां भागवंती देवकरण को धमकाने लगीं. उन्होंने धमकी दी कि अगर उस ने पैसा नहीं दिया तो वे उसे बलात्कार के आरोप में जेल पहुंचा देंगी. इसी दौरान रेखा की छोटी बहन सुमन एक साड़ी शोरूम में नौकरी करने लगी थी, जहां पहले से वहां काम कर रहे लाखन के साथ उस के अवैध संबंध बन गए. लाखन भी शातिर था, इसलिए कुछ ही दिन में उस ने सुमन की बहन रेखा को अपने प्रेमजाल में फांस लिया.

कुछ दिनों में यह जानकारी सुमन को भी मिल गई. लाखन और रेखा के संबंधों पर सुमन ने भी कोई ऐतराज नहीं जताया. इस बीच जब रेखा और देवकरण का मामला लाखन की जानकारी में आया तो मां और दोनों बेटियों के साथ वह भी देवकरण को पैसों के लिए धमकाने लगा. देवकरण के पिता रमेशचंद्र की समाज में काफी इज्जत थी. लोग उन का बहुत सम्मान करते थे, इसलिए देवकरण परेशान रहने लगा. साथ ही उसे पत्नी अंतिमा की भी चिंता थी. उसे लगता था कि यदि अंतिमा को रेखा के बारे में पता चलेगा तो वह उस के बारे में क्या सोचेगी.

दूसरी तरफ 2 सालों में 5 लाख से भी ज्यादा रुपए और ज्वैलरी हड़पने के बाद भी रेखा, सुमन, दोनों बहनों के प्रेमी लाखन और मां भागवंती की मांग लगातार बढ़ती जा रही थी. घटना के एक दिन पहले देवकरण उदयपुर में एक यजमान के घर बड़ा अनुष्ठान करवाने गया हुआ था. यह बात रेखा को पता चली तो वह उस पर दबाव बनाने लगी कि अनुष्ठान की दक्षिणा में मिली धनराशि वह सीधे ला कर उसे सौंप दे.

देवकरण ऐसा करता तो घर पर पिता को क्या जवाब देता, इसलिए उस ने रेखा की बात नहीं मानी, जिस से रेखा की मां भागवंती ने उसे फोन पर धमकी दी कि वह उस के हाथपैर तुड़वा देगी. लाखन ने भी देवकरण को धमकाया कि यदि उस ने पैसे नहीं दिए तो अंजाम भुगतने को तैयार रहे. इस से देवकरण को लगने लगा कि अब उस की इज्जत को कोई नहीं बचा सकता. इस से उस ने परिवार की इज्जत बचाने के लिए खुद की जान देने का निर्णय कर लिया. लेकिन खुद की जान देने से पहले उस ने अपनी गलती के लिए पत्नी अंतिमा से क्षमा मांगने की सोच कर अपनी परेशानी बता दी.

इस पर अंतिमा ने कहा कि जब वह नहीं रहेगा तो वह अकेली जीवित रह कर क्या करेगी. इसलिए उस ने भी साथ मरने का फैसला कर लिया. जिस के बाद 17 अप्रैल को मंदिर से घर वापस आ कर देवकरण ने अपने कमरे में अपनी लाइसेंसी पिस्टल से पहले अंतिमा के सिर में गोली मारी, फिर खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली.

पूछताछ करने के बाद देवकरण को ब्लैकमेल करने वाली दोनों बहनों रेखा, सुमन उन की मां भागवंती और प्रेमी लाखन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. MP Crime News

Family Dispute: सौतिया डाह में पत्नी ने लिया बदला

62 वर्षीय रामविलास साह जिला सीतामढ़ी के डुमरा थाना क्षेत्र में आने वाले गांव बनचौरी में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में दूसरी पत्नी सुनीता के अलावा 2 बेटे थे. पहली पत्नी मनतोरिया से उस के 6 बच्चे थे. लेकिन मनतोरिया अपने बच्चों के साथ दूसरे मकान में रहती थी. एक तरह से उस का पति रामविलास से कोई संबंध नहीं था. रामविलास के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. डुमरा इलाके में वह बड़े काश्तकारों में शुमार था. रामविलास के दिन बड़ी खुशहाली में कट रहे थे. अपने नियमानुसार वह सुबह 5 बजे बिस्तर त्याग देता था.

4 जून, 2018 को सुबह के 9 बजे गए थे. उस दिन न तो रामविलास उठा और न ही उस की पत्नी सुनीता और न ही उस के दोनों बेटे. घर में भी कोई हलचल नहीं हो रही थी. यह देख कर पड़ोस में रहने वाले रामविलास के भतीजे श्रवण को बड़ा अजीब लगा. इस के पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि चाचा या चाची इतनी देर तक सोते रहे हों. यह देख कर श्रवण से नहीं रहा गया तो वह चाचाचाची को आवाज लगाते हुए उन के घर के अंदर दाखिल हो गया. घर का मुख्य दरवाजा यूं ही भिड़ा हुआ था, हलका सा धक्का देते ही किवाड़ खुल गई. श्रवण आवाज देते हुए चाचाचाची के कमरे में पहुंच गया.

कमरे में जा कर उस की नजर बिस्तर पर पड़ी तो उस का दिल दहल गया. बिस्तर पर रामविलास साह और उस की पत्नी सुनीता देवी की रक्तरंजित लाशें पड़ी थीं. श्रवण चिल्लाते हुए उलटे पांव बाहर आ गया. उस के चीखने की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी वहां आ गए. जब वे लोग रामविलास के घर में गए तो पतिपत्नी की लाशें देख कर हैरत में रह गए. उन के दोनों बच्चे घर में दिखाई नहीं दे रहे थे. लोगों ने जब दूसरे कमरे में देखा तो उन के दोनों बेटों नवल और राहुल की लाशें भी खून से लथपथ पड़ी मिलीं.

हत्यारों ने चारों की हत्या बड़ी बेरहमी से गला रेत कर की थी. थोड़ी देर में ही 4-4 लाशें पाए जाने की खबर बनचौरी गांव में ही नहीं बल्कि पूरे डुमरा क्षेत्र में फैल गई. जिस ने भी सुना दौड़ा चला आया. देखतेदेखते वहां भारी भीड़ जमा हो गई थी. इसी बीच किसी ने घटना की सूचना थाना डुमरा को दे दी थी. एक ही परिवार के 4 लोगों की हत्या की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विकास कुमार सिंह तुरंत पुलिस टीम के साथ बनचौरा के लिए रवाना हो गए. जब वह घटनास्थल पर पहुंचे तो रामविलास के घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा था.

उच्चाधिकारियों को घटना की सूचना देने के बाद थानाप्रभारी घटनास्थल का निरीक्षण करने लगे. घटना की सूचना मिलते ही एसपी विकास बर्मन, एएसपी संदीप कुमार नीरज, डीएसपी (सदर) कुमार वीर वीरेंद्र, डीएसपी राजवंश सिंह, नगर थाने के इंसपेक्टर मुकेश चंद कुंवर, एसआई शशि भूषण सिंह आदि घटनास्थल पर पहुंच गए. छानबीन के दौरान पुलिस अधिकारियों ने पाया कि हत्यारों ने चारों को गोली मारी थी. बाद में उन्होंने सब के गले रेते थे. ऐसा काम वही कर सकता था, जो उन से सख्त नफरत करता हो. मतलब यह कि हत्यारा नहीं चाहता था कि उन में से कोई भी जिंदा बचे. वह उन्हें आखिरी सांस तक मरते देखना चाहता था.

छानबीन के दौरान पुलिस ने मौके से 4 खोखे बरामद किए. हत्यारों ने घर में रखे किसी भी सामान को हाथ नहीं लगाया था, कमरे का सारा सामान अपनी जगह रखा था. इस से साफ जाहिर हो रहा था कि हत्यारों का मकसद सिर्फ हत्या करना था. इस का मतलब रामविलास साह और उस के परिवार की हत्या किसी साजिश के तहत की गई थी. निश्चित रूप से हत्यारे परिचित रहे होंगे, जिन्हें घर के कोने की जानकारी थी. तभी वह बड़ी आसानी से अपना काम कर के निकल गए और किसी को कानोंकान भनक तक नहीं लगी.

घटना की सूचना मृतक रामविलास के साले यानी सुनीता के भाई बिरजू साह को मिली तो वह भी बनचौरी पहुंच गया. बहनोई और भांजों की लाशें देख वह दहाड़ मार कर रोने लगा. उस की बहन के घर में कोई दीया जलाने वाला तक नहीं बचा था. पड़ोसियों, गांव वालों आदि से बात करने के बाद पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर चारों लाशें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दीं. पुलिस ने मृतका सुनीता के भाई बिरजू को थाने बुलवा कर पूछताछ की तो उस ने इस सामूहिक नरसंहार के लिए अपने बहनोई की पहली बीवी मनतोरिया देवी और उस के 3 बेटों बिटटू कुमार, विक्रम कुमार उर्फ पप्पू और रोहित कुमार को जिम्मेदार मानते हुए नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी.

बिरजू साह की तहरीर पर पुलिस ने नामजद लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 120बी, 34 और 27 आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया. घटना की मौनिटरिंग एसपी विकास बर्मन खुद कर रहे थे. उन्होंने सदर डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र को निर्देश दिया कि पुलिस की एक टीम बना कर आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें ताकि वे भाग न सकें.

डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एक स्पैशल टीम गठित की, जिस में तेजतर्रार और विश्वासपात्र पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. नामजद चारों आरोपी गांव बनचौरी के ही रहने वाले थे. पुलिस को मुखबिर के जरिए सूचना मिली कि आरोपी गांव में ही छिपे हैं और भाग निकलने का मौका ढूंढ रहे हैं. मुखबिर की सूचना पर पुलिस अविलंब बनचौरी पहुंची और रामविलास की पत्नी मनतोरिया के घर दबिश दी. घर खुला हुआ था लेकिन वहां कोई नहीं मिला. तभी पुलिस को पता चला कि चारों आरोपी अभीअभी घर छोड़ कर फरार हुए हैं.

आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस गांव के बाहर पहुंची. पुलिस को देखते ही आरोपी बिट्टू, विक्रम और रोहित भागने लगे. पुलिस ने दौड़ कर तीनों आरोपियों को पकड़ लिया. ये तीनों भाई थे. इन की मां मनतोरिया उन के साथ नहीं थी. शायद वह किसी दूसरे रास्ते से निकल गई थी. पुलिस तीनों आरोपियों को थाने ले आई. थानाप्रभारी विकास कुमार सिंह ने आरोपियों की गिरफ्तारी की सूचना डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र सिंह और एसपी विकास बर्मन को दे दी.

दोनों अधिकारी थाने पहुंच गए. एसपी और डीएसपी के समक्ष थानाप्रभारी ने तीनों आरोपियों से चौहरे हत्याकांड के संबंध में पूछताछ की तो उन्होंने बिना किसी झिझक के अपना जुर्म कबूल कर लिया. चारों की हत्या किए जाने का उन्हें कोई मलाल नहीं था. उन के चेहरों पर कोई अफसोस नहीं दिख रहा था बल्कि उन की आंखों में मृतकों के प्रति नफरत की चिंगारी फूट रही थी. पुलिस ने जब उन से हत्याओं की वजह पूछी तो उन्होंने विस्तार से कहानी सुनाई. पता चला कि इस खूनी कहानी की काली दास्तान पारिवारिक रंजिश की बुनियाद पर लिखी जा गई थी.

तीनों आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद एसपी विकास वर्मन ने पुलिस लाइंस में पत्रकार वार्ता का आयोजन किया. तीनों आरोपियों ने पत्रकारों के सामने अपने पिता, सौतेली मां और दोनों सौतेले भाइयों की हत्या किए जाने का जुर्म कबूल किया. इस के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया. इस खूनी कहानी को विस्तार से जानने के लिए हमें 30 साल पीछे जाना होगा, जब इस कहानी की बुनियाद रखी गई.

रामविलास साह अपने पिता के साथ खेतीकिसानी का काम करता था. करीब 40 साल पहले उस के पिता ने उस का विवाह मनतोरिया के साथ कर दिया था. रामविलास की जिंदगी में मनतोरिया बहार बन कर छा गई. समय के साथ मनतोरिया 6 बच्चों की मां बनी. जिन में 3 बेटे और 3 बेटियां थीं. करीब 30 साल पहले रामविलास साह ने सुनीता से दूसरी शादी रचा ली थी. पति के इस फैसले पर मनतोरिया आगबबूला हो गई. बच्चे भी पिता की दूसरी शादी से खुश नहीं थे, उन्होंने सुनीता को मां मानने से इनकार कर दिया. यहीं से रामविलास साह के जीवन में महाभारत की शुरुआत हो गई. रामविलास ने सुनीता से किस विवशता अथवा मजबूरी के तहत शादी की थी, इसे रामविलास ही जानता होगा.

हालांकि रामविलास दोनों पत्नियों को बराबर प्यार देता था. पहली पत्नी के बच्चों को वही दुलार देता था जो उन्हें देता आया था. बच्चों के साथ उस ने कभी भेदभाव नहीं किया. लेकिन बच्चे पिता से नाखुश रहते थे और अपनी मां का ही साथ देते थे.

खैर, आगे चल कर सुनीता भी 2 बच्चों नवल कुमार उर्फ भोलू और राहुल कुमार की मां बन गई. नवल और राहुल के पैदा होने के बाद तो घर में कलह और बढ़ गई. पहली पत्नी मनतोरिया और उस के बच्चे रामविलास पर दबाव बना रहे थे कि वह सुनीता से संबंध तोड़ दे. लेकिन रामविलास ने मनतोरिया और बच्चों से दो टूक कह दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए वह सुनीता से कभी अलग नहीं हो सकता. पति का यह जवाब सुन कर मनतोरिया मन मसोस कर रह गई.

आखिर रामविलास ने इस कलह से निबटने के लिए अपनी संपत्ति 2 बराबर भागों में बांट दी. एक हिस्सा मनतोरिया के नाम लिख दिया और दूसरा हिस्सा सुनीता के नाम. यही नहीं उस ने पुस्तैनी मकान भी पहली पत्नी को दे दिया और उसी गांव में घर से थोड़ी दूरी पर एक नया घर बना कर सुनीता और दोनों बच्चों के साथ रहने लगा. लेकिन उस का यह पूरा खेल उल्टा पड़ गया. मनतोरिया और उस के तीनों बच्चों को ये सब इसलिए नागवारा गुजरा कि रामविलास ने सौतेली मां को अपनी जायदाद में से हिस्सा क्यों दिया. उन्होंने पिता से कहा कि वह सौतेली मां का हिस्सा उन्हें दे दें, नहीं तो इस का अंजाम बुरा हो सकता है. लेकिन रामविलास ने पत्नी और बच्चों की बातों पर ध्यान नहीं दिया.

बात इसी साल मार्चअप्रैल महीने की है. मनतोरिया और उस के तीनों बेटों बिट्टू, विक्रम और रोहित के मन में लालच आ गया. उन्होंने धोखे से सुनीता के हिस्से की 12 कट्ठे जमीन में से 4 कट्ठा जमीन 4 लाख रुपए में बनचौरी गांव के पवन साह को बेच  दी. पवन साह के नाम जमीन का बैनामा होने तक सुनीता या रामविलास को कानोंकान खबर तक नहीं हुई. लेकिन यह बात छिपने वाली नहीं थी. आखिरकार रामविलास को पता चल ही गया कि मनतोरिया ने धोखे से सुनीता के हिस्से की 4 कट्ठा जमीन गांव के पवन साह को बेच दी है. इस बात को ले कर मनतोरिया और सुनीता के बीच विवाद छिड़ गया.

रामविलास सुनीता का ही साथ दे रहा था. उस ने मनतोरिया को इस के लिए खूब खरीखोटी सुनाई. इस पर मनतोरिया के सब से छोटे बेटे रोहित ने पिता को भलाबुरा कह दिया. बेटे की बात रामविलास के दिल में चुभ गई. उस ने आव देखा न ताव, उस के गाल पर 2 थप्पड़ रसीद कर दिया. बेटे पर हाथ उठाने वाली बात न तो मनतोरिया को अच्छी लगी और न ही बिट्टू और विक्रम को. 2 थप्पड़ों से उस के सीने में धधक रही नफरत की आग ज्वाला बन गई. यह बात तीनों बेटों को नागवार गुजरी कि पिता ने कैसे हाथ उठाया. उन्होंने ठान लिया कि इस का परिणाम उन्हें भुगतना ही होगा. सुनीता जब तक जिंदा रहेगी तब तक उन्हें चैन नहीं मिलेगा.

उस रोज के बाद से तीनों भाइयों के सिर पर खून सवार हो गया. वह पिता, सौतेली मां और उस के दोनों बेटों को मौत के घाट उतारने की योजना बनाने लगे. बिट्टू और विक्रम ने रुपयों का बंदोबस्त कर के आर्म्स सप्लायर वीरेंद्र ठाकुर से 25 हजार रुपए में 2 पिस्टल और कारतूस खरीद लिए. उस के बाद बेटों ने मां को बता कर उसे भी अपनी योजना में शामिल कर लिया. मनतोरिया तो चाहती ही थी कि उस की सौतन सुनीता उस के रास्ते से हट जाए. उस ने बच्चों को डांटने के बजाए उन की पीठ थपथपाई. मां के योजना में शामिल हो जाने से बेटों के हौसले बुलंद हो गए. बिट्टू और रोहित ने साथ देने के लिए खोया गांव में रहने वाले ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह को भी योजना में शामिल कर लिया.

अब वह जल्द से जल्द अपनी योजना को अंजाम देना चाहते थे. आखिर इस के लिए उन्होंने 3 जून, 2018 की रात तय की. योजना को अंजाम देने से पहले तीनों भाइयों ने रात में शराब पी. 3-4 जून, 2018 की रात करीब 12 बजे बिट्टू, विक्रम और रोहित हथियार ले कर अपने पिता रामविलास साह के घर की ओर बढ़े. बिट्टू और विक्रम ने खिड़की से भीतर झांक कर देखा तो रामविलास और सुनीता गहरी नींद में सोए थे. दूसरे कमरे में नवल और राहुल भी सो रहे थे.

बिट्टू और विक्रम के मुख्य शिकार नवल और राहुल ही थे. उन्होंने पहले उन्हीं की हत्या करने की योजना बनाई थी. विक्रम ने खिड़की से ही नवल और राहुल के सीने में 1-1 गोली उतार दी, जबकि बिट्टू ने पिता रामविलास और सौतेली मां सुनीता को गोली मारी, रोहित बाहर खड़ा पहरा दे रहा था. गोली मारने के बाद बिट्टू और विक्रम घर में घुस गए और दोनों ने फलदार चाकू से चारों के गले रेत दिए. इस के बाद इन लोगों ने सीने पर ताबड़तोड़ वार कर अपने आक्रोश को ठंडा किया. जब उन्हें विश्वास हो गया कि चारों के जिस्म ठंडे पड़ गए हैं, तो उन्हें तसल्ली हुई.

इस खूनी खेल को अंजाम देने में उन्हें केवल आधा घंटा लगा. इस के बाद वे अपने घर पहुंचे और खून से सने अपने हाथपैर धोए. फिर मां को बता दिया कि उन्होंने उन चारों को मौत के घाट उतार दिया. अब उन के रास्ते का कांटा सदा के लिए हट गया है. उसी रात उन्होंने अपनी मां को ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह के साथ भेज दिया. वहां से दोनों मनतोरिया को कहां ले गए अब तक पता नहीं चला. 4 जून, 2018 को ही तीन आरोपी गिरफ्तार कर लिए. मनतोरिया कथा लिखने तक पुलिस की गिरफ्त से दूर थी.

पुलिस ने बिट्टू कुमार, विक्रम और रोहित की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल और चाकू भी बरामद कर लिए. इस के अलावा उन्हें पिस्टल और कारतूस उपलब्ध कराने वाले बिट्टू के ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह को 6 जून, 2018 को गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने तीनों आरोपियों से पूछताछ कर के उन्हें जेल भेज दिया. Family Dispute

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Aligarh Crime: ससुर ही हो दुराचारी फिर कहां जाए बहू बेचारी

Aligarh Crime: बड़े ही धूमधाम से शादी की गई. जब वह ससुराल आई तो उसे ही घर संभालने की जिम्मेदारी दे दी गई. बहू ने सलीके से घर संभाल लिया. पर ससुर की नीयत में खोट आ गई और बन गया बहू की जवानी का प्यासा. यों कहें कि ससुर का दिल बहू की मचलती जवानी पर आ गया और कर बैठा ऐसी हरकत कि बहू का ही नहाते समय का वीडियो बना लिया और करने लगा जिस्मानी संबंध बनाने के लिए ब्लैकमेल. वहीं पति ने भी ससुराल से फोन कर दिया और तलाक दे कर पीछा छुड़ाने में भलाई समझी. अब बहू मायके में रह कर अपना इलाज करा रही है.

यह घटना अलीगढ़ की है जबकि पीड़िता संगम विहार, दिल्ली की है. अलीगढ़ में ससुर ने अपनी बहू से छेड़छाड़ की. बाथरूम में नहाते समय उस का वीडियो बना लिया और उसे ब्लैकमेल करने लगा.

पीड़िता के पुरजोर विरोध करने पर पति व घर के दूसरे सदस्य उसे परेशान करने लगे. सिजेरियन आपरेशन के बाद टांके भी नहीं कटे थे कि उसे बीमार हालत में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ (ससुराल) से संगम विहार, नई दिल्ली (मायके) भिजवा दिया गया.

मायके संगम विहार, दिल्ली में कुछ दिन ही बीते थे कि पति ने फोन कर उसे तलाक दे दिया. इस पर पीड़िता ने संगम विहार थाने में शिकायत दी है और कार्यवाही करने की मांग की है. वहीं वूमन सेल के एसीपी ने बताया कि ससुराल पक्ष को जल्दी ही नोटिस भेज कर बुलाया जाएगा और पुलिस भी कानून सम्मत कार्यवाही करेगी.

पुलिस को दी शिकायत में पीड़िता ने अपना दर्द बयां किया है कि 10 सितंबर, 2017 को उस का निकाह अलीगढ़ के मौलाना आजाद नगर निवासी 23 साला युवक से हुआ था. एक दिन वह घर में खाना बना रही थी. अकेला पा कर ससुर रसोई में घुस आया और छेड़छाड़ करने लगा. जब इस का पुरजोर विरोध किया गया तो ससुर व घर के दूसरे लोगों ने उस की पिटाई की.

7 नवंबर, 2018 को ससुराल वालों ने मच्छर मारने की दवा पिला कर उसे व पेट में पल रहे बच्चे को मारने की कोशिश की. मामला पुलिस तक पहुंचा तो ससुराल वालों ने मौखिक समझौता करा दिया. 23 दिसंबर, 2018 को पीड़िता के कपड़ों में आग लगा दी गई, लेकिन वह किसी तरह बच गई. पुलिस को भी इस की सूचना दी गई थी.

पीड़िता का आरोप है कि 23 दिसंबर, 2018 को वह बाथरूम में नहा रही थी, तभी उस के ससुर ने छिप कर उस का वीडियो बना लिया. फिर वीडियो को इंटरनैट पर वायरल करने की धमकी दे कर संबंध बनाने की कहने लगा.

21 फरवरी, 2019 को पीड़िता ने सिजेरियन आपरेशन से एक बच्चे को जन्म दिया, जिस का खर्च पीड़िता के पिता ने उठाया. उस के टांके कटे भी नहीं थे कि उसे ससुराल अलीगढ़ से बीमार हालत में मायके संगम विहार, दिल्ली भिजवा दिया गया.

पिता ने सफदरजंग अस्पताल में उस का इलाज कराया. 3 अप्रैल की रात 10 बजे पति का फोन आया तो महिला यह सोच कर खुश हो गई कि शायद वह उसे ले जाएगा. लेकिन पति ने कहा कि वह उसे अब नहीं रख सकता, इसलिए उस ने 3 बार तलाक, तलाक, तलाक बोल कर फोन काट दिया. पीड़िता हैरान है कि पति ने भी उसे छोड़ दिया है.

ससुर ने तो रिश्ता तारतार कर ही दिया और पति ने भी आग में घी डालने का काम किया और तलाक दे कर पीछा छुड़ा लिया. ऐसे रिश्ते कितने दिनों तक महफूज रहेंगे और अदालतें भी इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं करती हैं. ससुर तो अपनी करतूतों से बाज नहीं आएगा वहीं पति भी पल्ला झाड़ कर चुप हो गया. पुलिस मामले को सुलझाने के बजाय उलझा ज्यादा देती है. समझौता कराना आसान है पर उसे घर में रह कर निभाना पीड़िता के लिए ज्यादा ही दुखदायी लगा. ऐसे घर में लौटना अब असंभव है. Aligarh Crime

Hindi Stories: गुनाहों की प्रतीमा

Hindi Stories: प्रतिमा ने जिस मौजमस्ती का जीवन जीने के लिए प्रवीण नाईक से शादी की थी, वह सास ऊषा नाईक और जेठानीडा. नेहा नाईक के रहते संभव नहीं था. इस कांटे को दूर करने के लिए उस ने जो किया, वह गुनाहों की प्रतिमा बन गई. पर्यटकों के लिए स्वर्ग कहे जानेवाले गोवा के जिला वास्कोडिगामा शहर से मांगोर हिल जाने वाले रास्ते के बाईं ओर पहाडि़यों से घिरा मायामोले इलाका यहां का अत्यंत पौश इलाका माना जाता है. यहां एक से बढि़या एक मकान, फार्महाऊस और बहुमंजिली इमारतें हैं. पौश इलाका होने की वजह से यहां उच्च और संभ्रांत लोग रहते हैं. इन्हीं में एक परिवार नामदेव नाईक का भी था, जो एक खूबसूरत इमारत के डुप्लेक्स फ्लैट में रहता था.

कुछ दिनों पहले बीमारी की वजह से नामदेव नाईक का निधन हो गया तो उन के पीछे परिवार में पत्नी ऊषा नाईक, 2 बेटे सिद्धार्थ  नाईक, प्रवीण नाईक और उन की बहुएं डा. नेहा नाईक तथा प्रतिमा नाईक रहती थीं. सिद्धार्थ एवं नेहा की 6 महीने की एक बेटी भी थी. परिवार संपन्न और खुशहाल था. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. सिद्धार्थ नाईक और प्रवीण नाईक, दोनों भाई मर्चेंट नेवी में नौकरी करते थे. नौकरी की वजह से दोनों भाइयों का ज्यादातर समय समुद्र के बीच बीतता था. साल में एक या 2 बार दोनों भाई बारीबारी से छुट्टियां ले कर घर आते थे. उन की अनुपस्थिति में घर की सारी जिम्मेदारियां मां ऊषा नाईक निभाती थीं.

29 जनवरी, 2015 की रात 3, साढ़े 3 बजे जब इमारत के सभी लोग सो रहे थे, तभी दरवाजा पीटने और चीखनेचिल्लाने के शोर से सभी की आंखें खुल गईं. शोर सुन कर घबराए लोग अपनेअपने फ्लैटों का दरवाजा खोल कर बाहर आए तो ऊषा नाईक की छोटी बहू प्रतिमा नाईक को बदहवास हालत में रोतेबिलखते देख कर हैरान रह गए. वह जेठानी की दुधमुंही बच्ची को सीने से चिपटाए जोरजोर से रोते हुए कह रही थी, ‘‘मेरी मदद करो. डाकुओं ने मेरे घर को लूट लिया. मेरी सास और जेठानी को मार डाला. उन्होंने मुझे भी मारापीटा, वे मुझे भी मारना चाहते थे, लेकिन संयोग से मैं बच गई.’’

प्रतिमा नाईक जो कह रही थी, उसे सुन कर इमारत में रहने वालों के होश उड़ गए. सोसायटी के सचिव बाबूराव नाईक को साथ ले कर कुछ लोग ऊषा नाईक के फ्लैट पर पहुंचे तो वहां की स्थिति देख कर सभी की आंखें हैरत से फटी की फटी रह गईं. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था. ऊषा की लाश बैडरूम में तो डा. नेहा की लाश उन के बैडरूम में पड़ी थी. लूट और 2-2 हत्याओं का मामला था. अब तक पूरी सोसायटी के लोग एकत्र हो चुके थे. सोसायटी के सचिव बाबूराव नाईक ने घटना की सूचना ऊषा के दोनों बेटों, सिद्धार्थ और प्रवीण को देने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी थी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलेस पर प्रसारित की तो थाना वास्कोडिगामा पुलिस को तो घटना की जानकारी हो ही गई थी, इसी के साथ अधिकारियों को भी घटना की जानकारी हो गई थी.

मामला शहर की पौश कालोनी के एक उच्च और सभ्रांत परिवार से जुड़ा था, जिस में 2 लोगों की हत्याएं हो गई थीं, इसलिए सूचना मिलते ही थाना वास्कोडिगामा के सीनियर इंसपेक्टर सागर इकोसकर तुरंत सहायक इंसपेक्टर शैलेष नार्वेकर, संतोष देसाई, उदय परब, रामआसरे, रवि देसाई को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. थाना पुलिस के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही आईजी सुनील गर्ग, पुलिस कमिश्नर शेखर प्रभु देसाई, एडिशनल पुलिस कमिश्नर लौरेस डिसूजा प्रेस फोटोग्राफर, फिंगरप्रिंट ब्यूरो और डाग स्क्वायड के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस टीम के पहुंचने तक पूरी इमारत के लोग मृतका ऊषा के फ्लैट पर इकट्ठा हो गए थे.

सभी लोग परेशान थे. नाईक परिवार की छोटी बहू प्रतिमा की हालत तो बहुत ज्यादा खराब थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज की चोट लगी थी, जिस से उस के सिर में बड़ा सा गुम्मड़ निकल आया था. पड़ोसी उसे सांत्वना दे कर संभाल रहे थे. वह इस तरह तड़प रही थी, जैसे उसे अंदरूनी चोटें भी लगी थीं. पुलिस ने उसे इलाज के लिए अस्पताल भिजवा दिया और छोटी बच्ची को संभालने के लिए पड़ोसियों के हवाले कर दिया. प्रतिमा को अस्पताल भिजवा कर थाना पुलिस मामले की जांच में जुट गई. अलमारी और शोकेस खुले पड़े थे. उस में रखा सामान कमरे में बिखरा पड़ा था.

अलमारी का लौकर खाली पड़ा था, इस का मललब उस में रखा सामान गायब था. उस में क्या रखा था, यह बताने वाला उस समय वहां कोई नहीं था. फ्लैट की लौबी के सोफे पर ऊषा नाईक की लाश पड़ी थी. डा. नेहा नाईक की लाश उन के बैडरूम में बेड पर पड़ी थी. लाशों के निरीक्षण से पुलिस को पता चला कि सासबहू की हत्याएं एक ही तरह से की गई थीं. उन के गले में रस्सी डाल कर कस दिया गया था. वह रस्सी भी पुलिस को फ्लैट से मिल गई थी. फर्श पर लालमिर्ची का पाउडर बिखरा था. पुलिस अधिकारियों के साथ आए जासूसी कुत्ते को लाशों को सुंघा कर छोड़ा गया तो पहले वह फ्लैट में ही घूमता रहा. कई चक्कर लगा कर वह फ्लैट से बाहर निकला तो भ्रमित सा हो गया.

इस तरह कुत्ते से पुलिस को कोई मदद नहीं मिल सकी. पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं और थाने आ कर लूट और हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. मामला गंभीर था, इसलिए मामले की जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी इंसपेक्टर सागर इकोसकर ने स्वयं संभाली. शुरुआती जांच में स्पष्ट हो चुका था कि मामला लूटपाट में हत्याओं का था. लूट के लिए लुटेरों ने 2 निर्दोष महिलाओं की हत्या कर दी थी. सोचने की बात यह थी कि अत्यंत सुरक्षित फ्लैट में लुटेरों ने प्रवेश कैसे किया? जांच में फ्लैट के दरवाजों और खिड़कियों के लौक सुरिक्षत पाए गए थे. जिस फ्लैट में वारदात हुई थी, वह ग्राउंड फ्लोर पर था. उस का एक दरवाजा आगे और एक पीछे की ओर था. पीछे वाले दरवाजे की ओर गहरी खाई थी, इसलिए उधर से लुटेरों के आने का कोई चांस नहीं था.

इसी तरह की बातें सागर इकोसकर को परेशान कर रही थीं. उन के दिमाग में जो भी सवाल घूम रहे थे, उन के जवाब परिवार में एकमात्र बची प्रत्यक्षदर्शी प्रतिमा ही दे सकती थी. इसलिए प्राथमिक इलाज के बाद उसे पूछताछ के लिए थाने ले आया गया. इस पूछताछ में प्रतिमा नाईक ने बताया कि इस घर में आए अभी उसे 8 महीने ही हुए हैं. इसलिए इस घर के बारे में उसे ज्यादा कुछ नहीं मालूम. उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक अपनी 6 महीने की बेटी के साथ ग्राउंड फ्लोर पर अलगअलग कमरों में सोती थीं. उस का कमरा फर्स्ट फ्लोर पर था, इसएिल वह फर्स्ट फ्लोर पर सोती थी.

घटना की रात तीनों ने साथसाथ खाना खाया था. खाना खाने के बाद सभी ने एकएक गिलास दूध पिया. उस समय तक रात के साढ़े 9 बज गए थे. सभी लोग बैठे टीवी देख रहे थे, तभी उस की जेठानी की बेटी रोने लगी तो वह प्रतिमा और सास को गुडनाइट कह कर बेटी के साथ सोने चली गईं. डा. नेहा के जाने के बाद प्रतिमा भी फर्स्ट फ्लोर के अपने कमरे में सोने चली गई. ऊषा नाईक काफी देर तक टीवी देखती थीं, इसलिए वह बैठीं टीवी देखती रहीं. रात ढाई बजे के करीब अचानक उस की आंख खुली तो उसे ग्राउंड फ्लोर से उठापटक की आवाजें आती सुनाई दीं. ये कैसी आवाजें हैं, यह जानने के लिए प्रतिमा अपने कमरे से निकल कर नीचे आई तो वहां का नजारा देख कर सन्न रह गई.

4-5 नकाबपोश ऊषा नाईक और डा. नेहा को पकड़ कर उन के गले में रस्सी का फंदा डाल कर कस रहे थे. उन की मदद के लिए प्रतिमा आगे बढ़ी तो नकाबपोशों ने उसे भी पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. लुटेरों में किसी ने उस के सिर पर डंडे से मार दिया, जिस से उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह संभल पाती, लुटेरों ने उस के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. गला कसने से प्रतिमा बेहोश हो गई. इस के बाद घर में क्या हुआ, उसे पता नहीं. यह संयोग था कि वह मरी नहीं. थोड़ी देर बाद उसे होश आया तो उस का सब कुछ खत्म हो चुका था. उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा की मौत हो चुकी थी. बच्ची जोरजोर से रो रही थी. प्रतिमा ने उसे उठा कर कर सीने से लगाया और फ्लैट के बाहर आ कर सारी बातें पड़ोसियों को बताईं.

प्रतिमा के बताए अनुसार, घर में लगभग 20 लाख रुपए के गहने थे. नकद के बारे में उसे पता नहीं था. प्रतिमा के बयान के आधार पर सागर इकोसकर ने मामले को अपराध क्रमांक 20/15 पर भादंवि की धारा 449/307/302/201डी, 120बी और 34 के तहत दर्ज कर के अब तक की जांच की जानकारी आईजी सुनील गर्ग और एसपी शेखर प्रभु देसाई को दी. इन अधिकारियों ने सागर इकोसकर को कुछ जरूरी दिशानिर्देश दे कर उन की मदद के लिए साऊथ गोवा के सातों थाने की पुलिस को लगा दिया. सागर इकोसकर ने सहयोगियों के साथ पूरे मामले पर गंभीरता से मंथन किया तो उन्हें जांच में मिले तथ्यों और प्रतिमा के बयानों में काफी अंतर नजर आया. उन के जेहन में कुछ ऐसे सवाल उभर कर आए, जो उन्हें बेचैन करने लगे थे.

पहली बात तो यह थी कि लुटेरे उस फ्लैट के अंदर कैसे पहुंचे? दूसरी बात यह कि अगर लुटेरों ने प्रतिमा की सास और जेठानी को मार दिया था तो प्रतिमा को क्यों छोड़ दिया? तीसरी बात यह कि उन की सुरक्षित अलमारी को बिना किसी तोड़फोड़ के कैसे खोला गया? चौथी सब से अहम बात यह थी कि मृतका ऊषा नाईक और डा. नेहा नाईक ने मरते समय किसी तरह का विरोध क्यों नहीं किया था? जब कि आमतौर पर मरते समय आदमी अपनी जान बचाने के लिए आखिरी समय तक संघर्ष करता है. डा. नेहा नाईक के बैड पर बिछी चादर एकदम ठीकठाक थी. उसी तरह ऊषा नाईक जिस सोफे पर मरी पड़ी थीं, उस सोफे का कवर भी जस का तस था. इस का मतलब यह था कि मरने वालों को मरने से पहले बेहोश किया गया था और ऐसा काम घर का ही कोई कर सकता था.

सभी सवालों पर जब गहराई से विचार किया गया तो शक के दायरे में प्रतिमा आ गई. इस की वजह यह थी कि परिवार में सिर्फ 4 लोग थे, जिन में 2 लोगों को मार दिया गया था. 6 महीने की बच्ची किसी तरह की साजिश कर नहीं सकती थी. अब सिर्फ प्रतिमा बचती थी. लेकिन समस्या यह थी कि मामला एक प्रतिष्ठित परिवार का था, इसलिए सीधे प्रतिमा पर हाथ नहीं डाला जा सकता था. असलियत का पता लगाने के लिए सागर इकोसकर और उन के सहयोगी प्रतिमा के बारे में जानकारी जुटाने में जुट गए. इस के बाद प्रतिमा के बारे में पुलिस को जो जानकारी मिली, वह काफी चौंका देने वाली थी.

सारी जानकारी जुटा कर पुलिस ने प्रतिमा नाईक को दोबारा पूछताछ के लिए थाने बुलाया तो वह पुलिस के एक भी सवाल का सही और संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. पुलिस के सवालों के आगे मजबूर हो कर अंतत: उस ने खुद ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने सास और जेठानी की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी. 27 वर्षीया प्रतिमा जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी थी. गोलमटोल चेहरा, जवानी से भरपूर यौवन, कजरारी आंखों वाली प्रतिमा अपने मातापिता और 3 बहनों के साथ वास्कोवयना के मांगोर हिल स्थित अंबा बाई मंदिर के पास हिल क्रौस्ट इमारत की पहली मंजिल पर रहती थी.

एक साधारण परिवार में पैदा हुई प्रतिमा के सपने बहुत बड़े थे. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, लेकिन वह जिंदगी अमीरों जैसी जीना चाहती थी. प्रतिमा की एक बहन ने 2 साल पहले किसी अमीर घर के लड़के से प्रेम विवाह कर लिया था और ठाठ से रह रही थी. बहन की ही तरह वह भी प्रेम विवाह कर के ठाठ से जिंदगी जीना चाहती थी. लेकिन वह ससुराल इस तरह की चाहती थी, जहां सिर्फ उस की चले. वह अपनी मनमर्जी की जिंदगी जी सके. उसे कोई रोकनेटोकने वाला न हो. उस का अपना जीवनसाथी भी इस तरह का हो, जो उस की हर इच्छा पूरी कर सके. और यह सब सारे गुण उसे प्रवीण नाईक में दिखाई दिए थे.

9 महीने पहले प्रतिमा ने प्रवीण नाईक को अपने एक दोस्त के यहां पार्टी में देखा तो देखती ही रह गई. सभ्य, सुशील, गोरेचिट्टे, लंबेचौड़े, स्वस्थ, सुंदर प्रवीण नाईक को देख कर प्रतिमा को लगा कि वह जो चाहती है, वह सब कुछ इस आदमी में है. इस के बाद वह उस से जानपहचान बनाने के लिए उस के इर्दगिर्द मंडराने लगी. प्रवीण उस बीच छुट्टी पर आया था और दोस्त के बुलाने पर उस के यहां पार्टी में चला गया था. प्रतिमा का आगेपीछे घूमना प्रवीण को अच्छा लगा. उस के लिए यह एक सुखद अहसास था, जो उसे बहुत अच्छा लगा था. बाद में जब उस के दोस्त ने उन का परिचय कराया तो दोनों एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए.

इस के बाद दोनों की मुलाकातें शुरू हुईं तो प्रतिमा ने जल्दी ही प्रवीण को अपनी अदाओं से इस तरह आकर्षित कर लिया कि वह उस की हर बात के लिए राजी रहने लगा. वह उसे अपने घर पर भी ले जाने लगा. प्रतिमा ने प्रवीण का घर और उस की आर्थिक स्थिति को देखा तो वह उस से जल्द ही जल्द शादी करने के बारे में सोचने लगी. क्योंकि शादी के बाद ही प्रवीण का सब कुछ उस का अपना हो सकता था. वह प्रवीण पर विवाह के लिए दबाव बनाने लगी. प्रवीण मां और भाईभाभी से बात करने के बहाने विवाह को कुछ दिनों के लिए टालना चाहता था, लेकिन प्रतिमा इस के लिए तैयार नहीं थी. क्योंकि वह जल्दी से जल्दी प्रवीण की दुलहन बन कर उस की संपत्ति पर राज करना चाहती थी.

आखिर प्रतिमा की जिद के आगे प्रवीण को झुकना पड़ा. उस की मां और भाईभाभी राजी नहीं थे, लेकिन किसी तरह उन्हें मना कर प्रवीण ने प्रतिमा से शादी कर ली. इस तरह प्रवीण की दुलहन बन कर प्रतिमा कामत पैलेस में आ गई. आते ही सब से पहले उस ने अपने घूमनेफिरने के लिए प्रवीण से एक कार खरीदवाई. प्रवीण के पास पैसों की कहां कमी थी. उस ने उस के एक बार कहने पर कार खरीद दी. प्रतिमा के हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि उस ने एक काम ऐसा कर डाला कि घर के सभी लोगों की नजरों से वह उतर गई. अपनी जेठानी डा. नेहा के लाखों के गहनों पर प्रतिमा की नजर पड़ी तो अपने विवाह के एक सप्ताह बाद ही जेठानी की अनुमति ले कर वह उस के कमरे में सोने गई तो उसी बीच उन के सारे गहनों पर हाथ साफ कर दिया.

प्रतिमा आजाद खयाल की युवती थी. पति से तोहफे में मिली कार से वह अपने दोस्तों और सहेलियों को अकसर घुमाते हुए पार्टियां दिया करती थी. घर में रहती तो ज्यादातर अपने मोबाइल फोन से चिपकी रहती. यह सब उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक को पसंद नहीं था. डा. नेहा नाईक के गहनों की चोरी का राज खुला तो घर में काफी हंगामा हुआ. प्रतिमा की तरफ अंगुलियां उठीं तो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए उस ने जहर खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की. उस के इस नाटक से घर वाले डर गए और अपनी इज्जत की खातिर इस मामले को घर में ही रफादफा कर दिया.

उन गहनों को प्रतिमा पहन तो सकती नहीं थी, इसलिए उस ने उन्हें बेचने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपनी एक सहेली के पति और अपने एक मुंहबोले भाई अभिजीत कोरगांवकर को शामिल किया. जेठानी के सारे गहने उन्हें सौंपते हुए उस ने कहा कि इन्हें बेच कर वे अपने हिस्से का पैसा ले कर उस के हिस्से का पैसा उस के खाते में डाल देंगे. अभिजीत कोरगांवकर वास्कोवयना में रहता था और किसी की कार चलाता था. उस ने वही किया, जैसा प्रतिमा ने उस से कहा था. प्रवीण जब तक घर में रहा, प्रतिमा मौजमस्ती करती रही. प्रवीण के जाते ही प्रतिमा को उस घर में घुटन सी महसूस होने लगी, क्योंकि घर में हुई चोरी की वजह से घर के किसी आदमी को उस पर विश्वास नहीं रह गया था. हर कोई उसे संदेह की नजरों से देखता था.

प्रतिमा की हर हरकत और काम पर उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नजर रखती थीं. उसे कहीं भी आनेजाने, हर किसी से मिलने का हिसाब देना पड़ता था. उसे बताना पड़ता था कि वह कहां, क्यों और किस से मिलने गई थी. प्रतिमा पर लगने वाली यही पाबंदियां ऊषा नाईक और डा. नेहा नाईक के लिए काल बन गईं, क्योंकि सास और जेठानी उस की मौजमस्ती की जिंदगी में बाधा बन गई थीं. एक तो सास और जेठानी की रोजरोज की टोकाटाकी, दूसरे पति से लंबी दूरी उस से सहन नहीं हो रही थी. उसे लगने लगा कि ऐसी जिंदगी से क्या फायदा, जिस की जवानी और शबाब दोनों में घुन लग जाए.

विवाह रुपएपैसे और मौजमस्ती का वास्तविक आनंद क्या होता है? यह सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक के रहते वह नहीं उठा सकती थी. वह ससुराल की धनदौलत पर कब्जा कर के अपने तरीके से मौजमस्ती करने के बारे में सोच रही थी. और यह सब तभी संभव हो सकता था, जब उस के रास्ते से सास और जेठानी हट जाएं. लेकिन वे जल्दी हटने वाली नहीं थीं. इसलिए इस के लिए उसे ही कुछ करना पड़ेगा. लेकिन वह क्या करे, कैसे करे, यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी. वह इन्हीं विचारों में खोई थी कि एक दिन टीवी प्रोग्राम के एक एपीसोड ने उस की सारी समस्या हल कर दी. उस एपीसोड में उस ने जो देखा, वही किया.

घटना की रात प्रतिमा ने सास और जेठानी के साथ खाना खाया. वह उन्हें पीने के लिए जो दूध लाई थी, उस में नींद की गोलियां मिला दी थीं, जिसे पीने के कुछ देर बाद डा. नेहा को नींद आने लगी. वह बेटी को ले कर अपने कमरे में सोने चली गईं. प्रतिमा सास ऊषा नाईक के साथ बैठी टीवी देखती रही. ऊषा नाईक जिस सोफे पर बैठी थीं, टीवी देखतेदेखते उसी पर लुढ़क गईं. उन के लुढ़कते ही प्रतिमा ने उठ कर टीवी बंद कर दिया. घर में सन्नाटा छा गया. प्रतिमा कपड़ा सुखाने वाली नायलौन की रस्सी काट लाई और सास के गले में लपेट कर कस दिया. बेहोशी की हालत में वह मर गईं. इस के बाद वैसा ही जेठानी के साथ किया.

सास और जेठानी की हत्या करने के बाद प्रतिमा ने अलमारी खोल कर उस के लौकर में रखे सारे गहने और नकदी निकाल कर एक कपड़े में बांध दिया. घर में लूट हुई है, यह दिखाने के लिए अलमारी का सारा सामान पूरे कमरे में फैला दिया. डौग स्क्वायड को भ्रमित करने के लिए उस ने कमरे के फर्श पर लालमिर्च पाउडर फैला दिया. अपने हिसाब से हत्या के सारे सबूतों को मिटा कर के वह आराम करने के लिए लेट गई. रात लगभग 2 बजे प्रतिमा ने अभिजीत कोरगांवकर को फोन कर के सारी बात बताई और उसे घर के पास बुलाया. वह आया तो उस ने गहनों और नकदी की पोटली उसे दे कर वापस भेज दिया.

अभिजीत के जाने के बाद प्रतिमा ने खुद को निर्दोष साबित करने के लिए अपने सिर पर एक भारी लकड़ी से जोर से प्रहार किया, जिस से उस के सिर पर गुम्मड़ निकल आया. गले पर नायलौन की रस्सी लपेट कर ऐसा निशान बनाया कि पुलिस का ध्यान लुटेरों की ओर चला जाए. अपने बचने की पूरी तैयारी करने के बाद उस ने मृतका डा. नेहा की बेटी को सीने से लगा कर जो किया, वह आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं. प्रतिमा नाईक से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर इकोसकर ने 3 फरवरी, 2015 को अभिजीत कोरगांवकर को भी गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर 10 लाख रुपए कीमत के गहने और नकदी बरामद कर ली.

उस ज्वैलर्स को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जिस ने 8 महीने पहले अभिजीत कोरगांवकर से प्रतिमा द्वारा दिए गए गहनों को खरीदा था. सारे सबूत जुटा कर सभी को मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक प्रतिमा और अभिजीत जेल में थे. पुलिस मामले की जांच कर रही थी. पुलिस को शक है कि नाईक परिवार में हुई हत्याओं और लूट में प्रतिमा अकेली नहीं थी. उस ने पुलिस को गुमराह किया है, उस रात उस के साथ फ्लैट में जरूर कोई और था, वह उस का मुंहबोला भाई भी हो सकता है. लेकिन जांच पूरी हुए बगैर इस बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित