Agra News: मिटा दिया साया – पिता बने भविष्य पर बोझ

Agra News: रात लगभग 2 बजे सुनील कुमार के घर में कोहराम मच गया. बरामदे में सुनील कुमार की लहूलुहान लाश पड़ी थी. लाश के पास में ही उस की पत्नी आशा देवी बैठी रो रही थी. शोर सुन कर आसपास के लोग भी आ गए. बेटे अनुज ने उसी समय थाना चित्राहाट में फोन कर घटना की जानकारी दी. यह घटना आगरा के चित्राहाट थाना क्षेत्र के नाहि का पुरा गांव में 25 मार्च, 2021 की रात को हुई थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया उसी समय टीम के साथ गांव में जा पहुंचे. उन्होंने अनुज से घटना के बारे में जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने घटना की जानकारी एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट को दी. वह भी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पूछताछ में अनुज ने पुलिस को बताया कि रोजाना की तरह पिता रात को बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे. जबकि परिवार के अन्य सदस्य ऊपरी मंजिल पर सोए हुए थे.

रात लगभग 2 बजे पिता की चीख सुन कर आंखें खुल गईं. वह और मां दोनों बरामदे की ओर दौड़े. बरामदे में गांव का अनवर जो हमारे परिवार से रंजिश मानता है, पिता के सिर पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था. उन लोगों ने रोकने का प्रयास किया तो वह जान से मारने की धमकी देता हुआ भाग गया. सिर से निकले खून के छींटों से दीवार भी लाल हो गई थी. अचानक हुए हमले से पिता अपना बचाव नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. घटनास्थल की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

घर वालों के अनुसार 21 मार्च को खेत पर अनुज और अनवर के बेटे विजय के बीच विवाद हो गया था. अनवर ने अपने बेटे विजय का पक्ष लेते हुए अनुज के सिर में ईंट मार दी थी, जिस से सिर से खून बहने लगा. इतना ही नहीं अनवर ने धमकी दी, ‘‘मैं तेरा काल हूं, तेरी बलि चढ़ाऊंगा.’’

घर आ कर अनुज ने पिता सुनील कुमार को घटना की जानकारी दी. इस पर सुनील अपने घायल बेटे को ले कर अनवर के घर पहुंचा. शिकायत करने पर अनवर के घर वालों ने गालीगलौज करने के साथ ही पितापुत्र को जान से मारने की धमकी दी थी. इस के बाद थाना चित्राहाट में घटना की अनवर के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. लेकिन बाद में गांव के लोगों ने बीच में पड़ कर सुलह करा दी थी. इस के बाद अनवर ने वारदात को अंजाम दे दिया.

पीडि़त घर वालों ने पुलिस को बताया कि यदि आरोपी अनवर जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया तो अनुज के साथ भी अनहोनी हो सकती है. अनुज की तरफ से अनवर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

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44 वर्षीय सुनील कुमार पूर्व प्रधान रामप्रकाश का बेटा था. सुनील के परिवार में पत्नी आशा देवी के अलावा बेटा अनुज और 2 बेटियां थीं. परिवार ने अनवर की धमकी को हलके में लिया था. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी अनवर की तलाश में जुट गई. आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह नहीं मिला. फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट ने पुलिस की टीम का गठन किया.

पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया. पुलिस जहां अनवर की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी, वहीं वह घटना के संबंध में गहराई से जांचपड़ताल में जुटी थी. इस संबंध में पुलिस को गांव वालों ने बताया कि सुनील अय्याश किस्म का व्यक्ति था. गांव के अलावा आसपास के गांवों में कई महिलाओं से उस के अवैध संबंध थे. वह उन पर खूब पैसा खर्च करता था. इस के लिए वह पहले अपनी जायदाद बेच चुका था.

हाल ही में उस ने बेटी की शादी के नाम पर कुछ जमीन का सौदा भी कर दिया था. इसी को ले कर घर में क्लेश हो रहा था. सुनील की बेटी व बेटा भी इस बात से नाराज थे. पुलिस का मानना था कि बच्चों के बीच हुए विवाद के बाद जब दोनों पक्षों में सुलह हो गई थी तब अनवर ने सुनील की हत्या क्यों की? और वह भी अकेले. हत्या जैसी घटना को अकेले अनवर अंजाम नहीं दे सकता था.

उस का कोई साथी भी इस में जरूर शामिल होगा. लेकिन मृतक के घर वालों से पूछताछ के साथ ही अनुज ने रिपोर्ट में भी केवल अनवर को ही नामजद किया था. इस बीच आरोपी अनवर की तलाश में जुटी पुलिस की टीमों के हाथ कई अहम सुराग लगे, जिस से वह पुलिस की पकड़ में आ गया. अनवर को पुलिस थाने ले लाई. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि सुनील की हत्या के बाद वह मौके पर पहुंचा था. मृतक का शव चारपाई से उस ने ही उतरवा कर जमीन पर रखवाया था. उस के बाद सुनील के घर वालों की कानाफूसी पर वह वहां से निकल गया था.

मृतक की पत्नी से भी पुलिस को अहम सुराग मिले थे, जिस से इस हत्याकांड में बेटा व बेटी के लिप्त होने की बात सामने आई थी. पुलिस ने सुनील की हत्या के आरोप में मृतक के बेटे अनुज, बेटी अल्पना के साथ ही अल्पना के प्रेमी संजेश तथा संजेश के दोस्त मदन यादव को 29 मार्च, 2021 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में शामिल आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले उन के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और 30 मार्च को सुनील हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. चारों आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल करते हुए हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया, जिस से सुनील के सिर को कूंच कर हत्या की गई थी, को एक खेत से हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों ने सुनील कुमार की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुनील कुमार अपनी जायदाद  बेचबेच कर अपने शौक पूरे कर रहा था. पिता की हरकतों से परिवार में क्लेश चल रहा था. हाल ही में सुनील ने अपनी 6 बीघा जमीन का 20 लाख रुपए में सौदा किया था. इस बात की जानकारी घर वालों को जैसे ही हुई, उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया. ननिहाल वालों को भी इस संबंध में बताया, उन्होंने भी सुनील को समझाया लेकिन उन के समझाने का भी सुनील पर कोई असर नहीं हुआ.

इस पर बेटे अनुज और बेटी अल्पना को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. यदि पिता संपत्ति बेचबेच कर इसी तरह बरबाद करते रहे तो परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. तब दोनों भाईबहनों ने पिता सुनील का पुरजोर विरोध किया तो सुनील ने अनुज और अल्पना के साथ मारपीट कर दी. संपत्ति के विवाद में आए दिन हो रहे गृह क्लेश के बीच 21 मार्च को गांव में बच्चों के विवाद में अनुज का अनवर से झगड़ा हो गया. इसी घटना को आधार बना कर अनुज और अल्पना ने अपने पिता सुनील की हत्या की योजना बना डाली.

अल्पना के पिछले 6 सालों से सूरजनगर गांव के संजेश से प्रेम संबंध थे. उधर सुनील अल्पना की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहा था, जबकि अल्पना संजेश से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

अनुज और अल्पना ने प्रेमी संजेश के साथ पिता सुनील कुमार की हत्या की साजिश रची. अल्पना ने संजेश को बताया कि पिता को हम दोनों के प्रेम संबंधों का पता चल गया है और वह उस की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, साथ ही वह अपने शौक पूरा करने के लिए जमीन भी बेच रहे हैं. यदि उन्होंने इसी तरह सारी जमीन बेच दी तो हमारे लिए कुछ नहीं बचेगा. उन्होंने 20 लाख रुपए में जमीन बेचने का सौदा भी कर लिया है. यदि उन्हें जल्दी से रास्ते से नहीं हटाया गया तो हम लोगों को पछताना पड़ेगा.

सुनील ने कुछ दिन पहले अल्पना व अनुज के साथ मारपीट की थी. ये बात संजेश को बुरी लगी थी. तब प्रेमी संजेश ने अपनी प्रेमिका अल्पना की खातिर सुनील को ठिकाने लगाने के लिए अपने गांव के ही दोस्त मदन यादव को तैयार कर लिया. 25 मार्च, 2021 की रात को संजेश की फोन काल पर ही मदन यादव सुनील की हत्या करने के लिए वहां पहुंच गया. रात 2 बजे घर के बरामदे में सो रहे सुनील के सिर पर चारपाई के पाए से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी. हत्या को अंजाम देने के बाद संजेश और मदन अपने घर चले गए. उन के जाने के बाद योजनानुसार अनुज ने शोर मचाया.

पुलिस जब चारों आरोपियों अनुज, अल्पना, संजेश और मदन यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय ले जा रही थी, तो वे हंस रहे थे. पिता की हत्या के बाद बेटे अनुज और बेटी अल्पना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories: अधूरी औरत

Hindi Stories: मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछली तरफ शीशम के पेड़ के नीचे बैठी देखा था…

स्वा स्थ्य विभाग ने मेरी बदली नसीरपुर कर दी. मुझे पता चला कि 3 घंटे का सफर बस से, और आगे एक घंटा तांगे से जाना होगा. मैं ने अपने आने की खबर भिजवा दी और कोई 2 बजे के करीब बस में सवार हो गया. मेरा खयाल था कि शाम तक गांव पहुंच जाऊंगा, मगर यह सब गलत हो गया. जिस बस में मैं सवार था, वह इतनी भरी हुई थी कि बाद में चढ़ने वाले लोगों को खड़े होने की भी मुश्किल से जगह मिली थी.

बरसात का मौसम था. मैं ने किताब निकाली और पढ़ने लगा. किताब में मैं इस कदर खोया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि बस कहांकहां रुकी. जब बस एक जगह अचानक झटके खाने के बाद रुक गई तो मुसाफिरों में खलबली सी मची और शोर होने लगा. तब मैं ने चौंक कर पूछा कि क्या मामला है? मालूम हुआ कि बस में खराबी आ गई है. क्लीनर खराब हुए पुर्जे को ठीक कराने के लिए वापस 6 मील ले जाएगा. मुसाफिरों में काफी बेदिली फैली, मगर अब इंतजार के सिवा कोई चारा नहीं था. मुसाफिर बस से उतर कर इधरउधर टहलने लगे. मैं भी वक्त गुजारने के लिए इधरउधर घूमता रहा.

क्लीनर साहब की वापसी रात 9 बजे के करीब हुई और 10 बजे के करीब बस ने दोबारा सफर शुरू किया. जब बस बसअड्डे पर पहुंची तो वहां कोई तांगा मौजूद नहीं था. अब मेरे पास कस्बे तक पैदल मार्च करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मैं ने सामान कंधे पर डाला और पैदल ही चल पड़ा. अब तक देर इतनी हो गई थी कि बारबार यह खयाल आ रहा था कि कहीं चौकीदार क्लीनिक में इंतजार कर के चला न गया हो. उस वक्त मौसम अचानक खुशगवार हो गया था. ठंडी हवा चलने लगी, कभीकभी बिजली भी चमक उठती. बारिश किसी भी वक्त शुरू हो सकती थी.

मैं तेजतेज कदम उठाने लगा. जैसे ही कस्बा नजर आया, बूंदाबांदी शुरू हो गई. क्लीनिक कस्बे से बाहर पक्की इमारत में था. मैं तकरीबन दौड़ता हुआ क्लीनिक पहुंचा, मगर वही हुआ, जिस का डर था. चौकीदार इंतजार कर के जा चुका था. शायद उसे अब मेरे आने की उम्मीद नहीं रही होगी. मैं बरामदे में खड़ा हो कर सोचने लगा. थोड़े फासले पर एक हवेली नजर आई. बाकी मकान ज्यादातर कच्चे थे. अब तक बारिश काफी तेज हो गई थी. इस तरह बरामदे में खड़े हो कर रात गुजारना मुश्किल था. मैं ने सोचा, क्यों न हवेली में रात बिताई जाए.

मैं बारिश में भीगता हुआ हवेली पर जा पहुंचा और जोरजोर से गेट खटखटाने लगा. काफी देर तक किसी ने गेट नहीं खोला. दरअसल गेट से काफी आगे जा कर कमरे थे. इसलिए शायद आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी. मैं बारिश में भीग गया था. मैं हवेली के पीछे चला गया. वहां जानवर बंधे थे. मैं उन के बीच से गुजरता हुआ आगे बढ़ने लगा. अचानक मेरी नजर एक औरत पर पड़ी. वह अर्धनग्न अवस्था में शीशम के पेड़ के नीचे बैठी थी. आंखें उस ने बंद कर रखी थीं और होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदा रही थी. औरत जवान और खूबसूरत थी. मैं ने फौरन अपनी निगाहें फेर लीं और वापस हो लिया.

मैं सख्त हैरान था कि आधी रात के वक्त वह दरख्त के नीचे क्या कर रही थी. भूतप्रेत पर मुझे यकीन नहीं था. उस वक्त मैं ने मुनासिब नहीं समझा कि आगे बढ़ कर उस औरत से कुछ पूछूं. मैं वापस क्लीनिक पर आ गया. वह रात मैं ने बरामदे में बैठ कर बिता दी. इस बीच मेरे दिमाग पर उस औरत के बारे में जानने का भूत सवार हो गया. गांव नसीरपुर की जिंदगी किसी ऐसे गरम मकान में रहने की तरह थी, जिस की दीवारें नजर नहीं आतीं. ऐसा महसूस होता था, जैसे वह हुकूमत की भूलीबिसरी बस्ती हो. गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित था. मच्छर इस कदर थे कि चाहे कितनी भी मात्रा में कुनैन का इस्तेमाल क्यों न कर लो, बुखार जरूर हो जाता था. बुखार भी ऐसा, जो आदमी की सारी ताकत खत्म कर देता था.

शुरू में इक्कादुक्का मरीज बुखार की शिकायत ले कर आते रहे. क्योंकि ज्यादातर लोग डाक्टरी इलाज को मानते ही नहीं थे. इसी दौरान गांव की मसजिद के मौलवी साहब बहुत सख्त बीमार हो गए. उन की टांग पर एक पुराना जख्म था, जिस की वजह से उन्हें बुखार रहने लगा. सब लोग जहरबाद समझते रहे. मैं ने मौलवी साहब का इलाज किया. पहले एक छोटा सा औपरेशन किया, फिर इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिए. मौलवी साहब की सेहत बहाल होने लगी. गांव से हो कर मेरी चर्चा आसपास के गांवों तक जा फैली तो दूरदूर से लोग आने लगे. इस से पहले गांव वालों का इलाज काका करता था.

काका गांव का नाई था. वह जर्राह भी था. यह सब कुछ उस ने अपने बाप से सीखा था. जर्राह से ज्यादा वह मुझे मालिशिया लगता था, क्योंकि वह ज्यादातर लोगों का इलाज मालिश से किया करता था. सिरदर्द में सिर की मालिश, पेट के दर्द में भी वह मरीज को लिटा कर तेल से पेट की मालिश करता था. चोट की हालत में भी मालिश करता. गांव वालों के इसरार पर उस ने दांत भी उखाड़ने शुरू कर दिए थे. जब 2-3 आदमियों के दांत उस ने गलत उखाड़ दिए तो मैं ने उस को जा कर समझाया कि अब बस कर दे.

एक वक्त में इतने ज्यादा काम तो शहर के डाक्टर भी नहीं करते. वहां भी अब हर बीमारी का स्पैशलिस्ट होता है. यही बड़े डाक्टर की पहचान है. उस ने दांत का डाक्टर बनने का खयाल छोड़ दिया और सिर्फ हड्डियों और जर्राही का स्पैशलिस्ट बनने पर संतोष कर लिया. उस गांव के चौधरी मलिक अल्लाहबख्श थे. गांव वालों का कहना था कि वह बहुत नेक इंसान थे. उस गांव के लोग ही नहीं, आसपास के गांव वाले भी उन की बड़ी इज्जत करते थे. उन की उम्र कोई 70 बरस के करीब थी. अब वह अक्सर बीमार रहते थे. 1-2 बार इलाज के सिलसिले में मुझे उन की खिदमत में हाजिर होना पड़ा था. वह मेरी बड़ी इज्जत करते थे. कभीकभी वैसे भी गपशप के लिए हवेली में बुला लेते थे.

हवेली में उन के बेटे से भी मुलाकात हुई. उस का नाम था मलिक असद. वह 30-35 बरस का मजबूत कदकाठी का आदमी था. उस के बाल घुंघराले और आंखें स्याह थीं. रंग सांवला था. चेहरा सख्त था. वह तबीयत का भी बड़ा जालिम था. मैं ने खुद उसे 1-2 बार हवेली में मजदूरों की पिटाई करते देखा था. गांव के लोग उस से डरते थे और उसे बुरा कहते थे. एक दिन बड़े चौधरी साहब ने बुला भेजा. नौकर ने मुझे एक बड़े से कमरे में ले जा कर बिठाया. उस कमरे में बहुत सी कुर्सियां और मोढ़े रखे थे. जब भी गांव का कोई मसला खड़ा होता, चौधरी वहीं सब को इकट्ठा करते थे. चौधरी साहब आए और बेंत से बनी आरामकुर्सी पर बैठ गए.

थोड़ी देर वह कुछ सोचते रहे, फिर बड़ी राजदारी से बोले, ‘‘डाक्टर पुत्तर, मेरी बहू बीमार है. अजीब सी बीमारी है. उसे कुछ पता नहीं चलता. कभी तो वह बिलकुल ठीक होती है, कभी वह पूरापूरा दिन कमरे में सोई पड़ी रहती है. जब जागती है तो सब से झगड़ने लगती है. मैं उस की वजह से बहुत परेशान हूं. मेरा दिल कहता है, तुम उस का इलाज कर सकते हो.’’

‘‘चौधरी साहब, आप अल्लाह पर भरोसा रखें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा. आप मुझे मरीज दिखाएं.’’

मैं वाकई दिल से बड़े चौधरी की इज्जत करता था. चौधरी साहब मुझे पहली बार हवेली के अंदर ले गए. वह एक बैडरूम था. कमरे में एक दीवान और 2-3 कुर्सियां पड़ी थीं. एक बैड था, जिस पर एक औरत लेटी थी. जैसे ही चौधरी साहब ने उसे सीधी किया, मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछवाड़े पेड़ के नीचे देखा था. मैं ने अपने आप पर काबू पाया और सोचने लगा कि यह औरत चौधरी की बहू है यानी मलिक असद की बीवी है. यह उस रात क्या कर रही थी? मेरी दिलचस्पी, जाहिर है, अपनी चिंता को पहुंच गई थी.

औरत बेसुध पड़ी थी. मैं ने और चौधरी साहब ने उसे जगाने की पूरी कोशिश की, मगर वह नहीं जागी. जाहिर तौर पर उसे कोई बीमारी नजर नहीं आ रही थी. बुखार भी नहीं था. मैं ने सुई चुभो कर देखी तो वह तकलीफ महसूस कर रही थी. ब्लडप्रेशर कुछ कम था, मगर उस की सूजी हुई आंखें मुझे शक में डाल रही थीं. मैं ने उस के खून का नमूना ले कर चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप फिक्र न करें. मैं खून टेस्ट करने के बाद ही आप को बता सकूंगा कि इन्हें क्या तकलीफ है. आप इस दौरान इन्हें कोई दवा न दें. खास ध्यान रखें कि यह कोई भी चीज न खाएं. सुबह इन को क्लीनिक भेज दें, तब तक ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट मेरे सामने होगी.’’

चौधरी साहब की हवेली से निकलने के बाद मेरे जेहन में यही बात बारबार आ रही थी कि यह औरत नशा जरूर करती है. मैं ने क्लीनिक आते ही खून टेस्ट करना शुरू कर दिया, क्योंकि मैं खुद उस गुत्थी को सुलझाना चाहता था. खून की रिपोर्ट से जाहिर हो गया कि चौधरी की बहू को नशे की लत पड़ चुकी थी. यह जान कर मुझे खुद भी अफसोस होने लगा. बहरहाल मैं खुद को कल के लिए तैयार कर चुका था. अगले दिन मैं शाम तक इंतजार करता रहा, मगर चौधरी की बहू क्लीनिक पर नहीं आई. इस का मतलब साफ था कि वह खुद आना नहीं चाहती थी और उसे अपनी इस आदत के जाहिर होने का अंदेशा था. लेकिन उस नशे से वह मौत के मुंह में जा सकती थी.

शाम को मैं चौधरी साहब से मिलने गया. उन्हें बताया कि मरीजा क्लीनिक पर नहीं आई तो वह बहुत हैरान हुए. उन्होंने नौकरानी को बुला कर बुराभला कहा और फिर खुद जा कर बहू को लिवा लाए. उस वक्त वह बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थी. उस के रखरखाव में एक खास शान थी. उस की बड़ीबड़ी आंखें मेरे चेहरे पर जमी हुई थीं, जिन में एक खास किस्म की वहशत और गुस्सा था. उस के खुश्क होंठ एकदूसरे से जुडे़ थे. वह अपने चेहरे पर आई जुल्फों की लट सिर के झटके से बारबार पीछे की तरफ लौटाती रही. वह खामोश बैठी रही, जैसे किसी से बात करना ही न चाहती हो.

मैं ने जरा हौसले के साथ उस खामोशी को तोड़ते हुए कहा, ‘‘अब आप की तबीयत कैसी है?’’

उस ने अपनी पलकें उठाईं और मेरी तरफ देखा. मैं आज तक उन आंखों को नहीं भूल सका. उस की आंखों में एक अजीब सी मस्ती थी, जैसे इंद्रधनुष आंखों में उतर आया हो. उस ने बड़ी अदा से कहा, ‘‘मेरी तबीयत पहले से बेहतर हो रही है. मुझे किसी दवा की जरूरत नहीं.’’

यह कह कर वह उठी और तेजी के साथ दरवाजे से बाहर निकल गई. मैं ने हैरत से चौधरी साहब की तरफ देखा. वह भी मेरी तरफ देख रहे थे. उन के चेहरे पर गुस्से और शर्मिंदगी के आसार साफ नजर आ रहे थे. मैं चूंकि सूरतेहाल को समझने लगा था, इसलिए मैं ने चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप की बहू को कोई घरेलू परेशानी है. है तो यह आप के घर का मसला, लेकिन डाक्टर के लिए यह सब जानना बहुत जरूरी होता है. आप जब तक मुझे सब कुछ बताएंगे नहीं, मेरे लिए उन का इलाज करना मुश्किल हो जाएगा.’’

पहले तो चौधरी साहब परेशान नजर आने लगे. जोरजोर से हुक्का गुड़गुड़ाते रहे, जैसे किसी फैसले पर पहुंच रहे हों. फिर उन्होंने आहिस्ताआहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मेरी बहू दरअसल बांझ है. 5 साल शादी को हो गए हैं, मगर औलाद नहीं हुई. बेचारी बड़ी परेशान रहती है. जब से मलिक असद की दूसरी शादी की तैयारी की बात सुनी है, बहुत चिड़चिड़ी हो गई है. बातबात पर लड़तीझगड़ती है. कमरा बंद कर के दिन भर पड़ी रहती है.’’

‘‘चौधरी साहब, आप की बहू कोई दवा इस्तेमाल कर रही है, जो अगर जल्दी बंद न की गई तो बहुत देर हो जाएगी. इस से उस की जिंदगी को भी खतरा हो सकता है. आप पता कराएं कि वह क्या चीज खा रही है. घर के किसी न किसी शख्स को तो पता ही होगा. आखिर वह दवा या कोई और चीज कहीं से तो खरीदी जाती है.’’

मेरी बात सुन कर चौधरी साहब ने जोरजोर से ‘रज्जो…रज्जो…’ पुकारना शुरू कर दिया. एक लड़की भागीभागी दरवाजे से दाखिल हुई. रज्जो चौधरी साहब की नौकरानी का नाम था. वह घबराई हुई चौधरी साहब को देखने लगी. मैं ने उसे संभलने का मौका दिए बगैर जोर से कहा, ‘‘रज्जो, जो दवा तुम बीबीजी को ला कर देती हो, वह शीशी ले कर आओ.’’

वह बौखला कर बोली, ‘‘जी…नहीं, मैं नहीं ला कर देती. वह खुद मेरे साथ जा कर मलंग बाबा से लाती हैं. कसम कुरान की, मलंग बाबा पुडि़या पर दम कर के बीबी जी को देते हैं.’’

मेरा चलाया हुआ तीर निशाने पर सीधा जा लगा था. मैं ने नरम पड़ते हुए कहा, ‘‘जाओ, एक पुडि़या ला कर मुझे दिखाओ. खबरदार, बीबीजी को पता न लगे.’’

रज्जो ने चौधरी साहब की तरफ देखा. चौधरी साहब ने इशारा किया तो वह चली गई. कोई एक घंटे बाद रज्जो ने हमें वह पुडि़या लाकर दी. मैं उस पुडि़या को ले कर क्लीनिक आ गया. वह अफीम की पुडि़या थी. उस से साफ जाहिर था कि मलंग बाबा कोई धोखेबाज था और चौधरी की बहू को नशे की आदी बना रहा था. मैं उसी वक्त हवेली वापस आया, क्योंकि मलंग बाबा का अड्डा बंद कराना न सिर्फ नेकी का काम था, बल्कि लोगों को मौत के मुंह से निकालना भी था.

चौधरी साहब को जैसे ही सूरतेहाल मालूम हुई, उन्होंने तांगे का बंदोबस्त किया और हम पुलिस चौकी चल दिए. पुलिस चौकी कस्बे से 3 मील के फासले पर थी. चौकी का इंचार्ज चौधरी से परिचित था. उसे हालात बताए गए तो उस ने फौरन एक छापामार पार्टी के साथ रात को मलंग बाबा के अड्डे पर धावा बोल दिया.  मलंग बाबा और उस के 2 नौजवान साथी गिरफ्तार हुए. उन के अड्डे से अफीम बरामद हुई. अगले दिन पुलिस से पता चला कि मलंग बाबा जेल से भागा हुआ फरार कैदी था. एक साल से वह भेष बदल कर यह धंधा कर रहा था. गांव के लोगों को ताबीज के बहाने अफीम दे कर बेवकूफ बना रहा था. चौधरी की बहू से तो वह खूब रकम हथिया रहा था.

जैसे ही चौधरी की बहू की अफीम की खुराक बंद हुई, उस का सारा बदन टूटने लगा. बुखार में जिस्म तपने लगा. उस की आंखों में खौफ छा गया. वह मेरे पांव पड़ती कि मैं उस को अफीम दे दूं या मौत का टीका लगा दूं. उस के शरीर की दुर्दशा देख कर और बुखार की तपिश को कम करने के लिए मैं कभीकभी उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता, मगर जब वह जागती तो फिर वैसे ही तड़पने लगती. मैं ने और बड़े चौधरी साहब ने कई रातें उस के बिस्तर के पास बैठ कर गुजार दीं. इस बीच मैं ने देखा कि चौधरी का बेटा मलिक असद न तो उस की परवाह करता था और न ही उस के पास ठहरता था. यह मेरे लिए बड़ी हैरत की बात थी.

मेरे दिल में उस के लिए नफरत के जज्बात उभरने लगे. उन दिनों चौधरी साहब तख्तपोश पर बैठे रहते और मैं मरीजा के सिरहाने बेबस हो कर बैठा रहता. मेरे हाथ चौधरी साहब ने वैसे ही बांध रखे थे. मैं उसे अस्पताल नहीं ले जा सकता था, जहां उसे बचाने की कोशिश की जाती. मैं बाहर से किसी मदद का इंतजाम भी नहीं कर सकता था, क्योंकि यह चौधरी की इज्जत का मामला था. मैं सिर्फ अपनी जानकारी के मुताबिक इलाज करता रहा, मगर शायद अल्लाह ने चौधरी साहब की दुआएं सुन ली थीं. 10 दिनों के बाद उन की बहू की हालत में तब्दीली आनी शुरू हो गई. वह संभलने लगी. अब वह न तो जिद करती और न ही उठउठ कर भागती और न शोर मचाती. उसे सुकून आना शुरू हो गया.

अब उस ने मेरी तरफ बड़ी एहसानमंद निगाहों से देखना शुरू कर दिया. उस की हालत को पूरी तरह संभलने में 3 महीने लग गए. इस दौरान मैं हर रात चौधरी साहब की हवेली में जाता रहा. मैं ने महसूस किया कि छोटा चौधरी कईकई दिनों और रातों को घर से गायब रहता था. एक दिन मैं अपने क्लीनिक में मरीजों से फारिग हुआ ही था कि चौधरी साहब की बहू अपनी नौकरानी के साथ क्लीनिक में तशरीफ ले आई. पहले तो वह कुछ देर खामोश बैठी रही, फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आपने मुझे दोबारा जिंदगी दी है, लेकिन आप ने ऐसा क्यों किया? मैं तो खुद अपनी जिंदगी खत्म करना चाहती थी. आप ने मुझे बचा कर मेरे दुख के सफर को और लंबा कर दिया. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप को अपना मसीहा कहूं या दुश्मन?’’

मिसेज मलिक असद की बातें सुन कर पहले तो मैं एक लम्हे के लिए चुप रह गया. लेकिन मैं ने बाद में हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मिसेज मलिक, मेरा कोई कमाल नहीं. कुदरत को यही मंजूर था. अल्लाह ने आप को दोबारा जिंदगी दी है. वही इस के भेद जानता है. वैसे आप इतनी मायूस क्यों हैं?’’

मिसेज मलिक ने मेरी तरफ देख कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, आप ने मुझे मौत के मुंह से निकाला है तो मैं आप को बताना चाहती हूं कि कई बार आदमी उन हालात से दोचार हो जाता है, जहां आगे कोई रास्ता नहीं होता. वह जीना नहीं चाहता. मैं किस के लिए जीऊं? आप को पता है कि औरत मां बन कर ही पूरी औरत बनती है.’’

मैं चाहता था कि वह अपने दिल का दर्द खुल कर कह दे. एक तो उस के अंदर का गुबार निकल जाएगा, दूसरे शयद इस मामले में मैं कोई मदद कर सकूं. मैं ने बात बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप बताएं आप को क्या दुख है? अल्लाह ने आप को सेहत बख्शी है तो आप की दूसरी तकलीफें भी रफा कर देगा.’’

मेरी बातों का यह असर हुआ कि उस ने बिलखबिलख कर रोना शुरू कर दिया. फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आज से 5 साल पहले बडे़ चौधरी साहब ने बड़े अरमानों से मुझे अपनी बहू बनाया था. मगर आज सोचती हूं कि काश, मेरी शादी न हुई होती. एक साल तो हंसीखुशी से गुजर गया, लेकिन उस के बाद मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. चौधरी के तमाम रिश्तेदार और गांव के तमाम लोगों की नजरें मुझे तीर की तरह चुभने लगीं.

‘‘जो लोग मेरे आगेपीछे फिरते थे, वही मुझे ताना देने लगे कि मैं बांझ हूं. पहले छोटा चौधरी, फिर घर वाले और जब बड़े चौधरी ने भी आंखें फेर लीं तो मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. मैं ने कोई पीरफकीर न छोड़ा. दूरदूर तक तावीज करवाए, मगर मेरे यहां बच्चा न हुआ.

‘‘फिर उस मलंग बाबा ने मुझे अफीम पर लगा दिया. मुझे भी नशे में रहना अच्छा लगने लगा. अब आप ने मुझ से वह भी छीन लिया. खुदा के लिए मुझे जहर ही दे दें. अगले माह छोटे चौधरी की दूसरी शादी होने वाली है. मैं इस से पहले अपने आप को खत्म करना चाहती हूं. अब आप खुद बताएं, मैं आप को हमदर्द कहूं या दुश्मन?’’

चौधरी की बहू की बातें सुन कर मेरे दिल में भी उस के बारे में हमदर्दी के जज्बात उभरने लगे. अगर खुदा ने उस को औलाद की दौलत नहीं दी तो इस में उस बेचारी का क्या कसूर? इस के बावजूद मैं ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप मायूस क्यों होती हैं? अल्लाह बड़ा कारसाज है. आप ने इस सिलसिले में कोई इलाज करवाया है? अब तो जमाना बहुत तरक्की कर गया है. आप शहर जा कर इलाज करवाएं. सब ठीक हो जाएगा इंशाअल्लाह.’’

मेरी बातें सुन कर मिसेज मलिक ने बड़ी उदासी से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब क्या फायदा? अब तो उस के दिन भी तय होने वाले हैं.’’

‘‘आप ऐसा करें कि शहर में एक तजुर्बेकार लेडी डाक्टर मेरी परिचित हैं. आप उन से जांच करवाएं और रिपोर्ट मुझे ला कर दें. आप इस काम के लिए फौरन, बल्कि कल ही शहर चली जाएं.’’

पहले तो मिसेज मलिक टालमटोल से काम लेती रहीं, मगर मेरे मजबूर करने पर उन्होंने वादा कर लिया.

तीसरे दिन मिसेज मलिक बड़ी खुशखुश मेरे क्लीनिक में आईं और लिफाफा मेरे हाथ में दे कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब बताएं कि मैं क्या करूं?’’

मैं ने लिफाफा खोला और रिपोर्ट पढ़ने लगा. साथसाथ मेरी हैरत में इजाफा होता चला गया, क्योंकि रिपोर्ट में डाक्टर ने लिखा था कि मिसेज मलिक में किसी किस्म का कोई नुक्स नहीं है. अगर औलाद नहीं हो रही है तो उन के शौहर की जांच करवाई जाए. इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद हम दोनों एकदूसरे की तरफ हैरत से देख रहे थे. मिसेज मलिक की आंखों में आंसू थे और मैं सोचने लगा था कि यह औरत नासमझी में अपने आप को कितनी बड़ी सजा दे रही थी, बल्कि अपनी जान तक देने पर तैयार थी. मैं ने मिसेज मलिक को तसल्ली दी.

अगले दिन मैं हवेली गया. मैं छोटे चौधरी से तनहाई में बात करना चाहता था, मगर पता चला कि वह हवेली में मौजूद नहीं था. मैं पैगाम दे कर लौट आया कि जब छोटे चौधरी आएं तो मुझे खबर भेज दें.

रात को छोटे चौधरी से मुलाकात हुई. मैं ने बड़ी नरमी से बातचीत करते हुए कहा, ‘‘चौधरी साहब, आप के यहां औलाद नहीं हुई. आप को इस बारे में पता है कि इस की क्या वजह है?’’

यह सुनते ही चौधरी के तेवर बदलने लगे. उस के चेहरे की लकीरें गहरी होने लगीं और वह बड़े गुस्से से बोला, ‘‘डाक्टर, मुझे पता है, मेरी बीवी बांझ है. तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं. यह हमारा निजी मामला है.’’

‘‘नहीं चौधरी साहब, आप को यही तो गलतफहमी है. आप की बीवी बिलकुल ठीक है. वह बच्चा पैदा करने की पूरी खूबी रखती है. आप को अपना इलाज करवाना होगा.’’

मेरे यह कहने की देर थी कि चौधरी आगबबूला हो गया, ‘‘डाक्टर, यह बात अब दोबारा नहीं कहना, नहीं तो तुम्हारी लाश किसी को नहीं मिलेगी. और दित्तू, डाक्टर को हवेली से बाहर निकाल दे.’’

इस से पहले कि मैं कुछ कहता, 2 आदमियों ने मुझे बांहों से घसीट कर हवेली से बाहर कर दिया. मैं चौधरी की बेवकूफी पर अफसोस करता हुआ क्लीनिक वापस आ गया. सारी रात मुझे नींद नहीं आई. मैं सोचता रहा कि ये लोग कितने बेवकूफ हैं. इन के भले की बात भी इन को बुरी लगती है. अगले दिन मैं ने मिसेज असद मलिक से उन लोगों का पता पूछा, जहां चौधरी असद मलिक की शादी हो रही थी. वह कस्बा नसीरपुर गांव से 15 मील दूर था. लड़की का वालिद नंबरदार था. उम्र 60 साल थी. बीवी की मौत हो गई थी. 1 बेटी और 2 बेटों की शादी हो गई थी. सिर्फ 1 ही बेटी रह गई थी. मैं ने नंबरदार यूसुफ को अपना परिचय दिया तो वह बड़ी भलमनसाहत से पेश आया.

मैं ने नंबरदार से अर्ज की, ‘‘आप की बेटी की शादी मलिक असद से तय हो गई है और जल्दी ही शादी भी होने वाली है. आप की जानकारी में यह बात भी जरूर होगी कि चूंकि मलिक असद की पहली बीवी से औलाद नहीं है, इसीलिए वह दूसरी शादी कर रहे हैं. मगर मैं डाक्टर होने के नाते अपना फर्ज समझता हूं कि आप को सच्चाई से आगाह कर दूं. मलिक असद की बीवी बांझ नहीं है. वह पूरी तरह सेहतमंद है और औलाद पैदा करने के काबिल है. मेरे पास इस का सबूत मौजूद है. अगर आप इस बात को बुनियाद बना कर शादी कर रहे हैं तो अपनी बेटी की जिंदगी में कांटे बो रहे हैं. आप मेरी बात समझ गए होंगे. मैं ने अपना फर्ज अदा कर दिया है. अब आप जैसा मुनासिब समझें, फैसला करें.’’

मेरी बातें सुन कर नंबरदार परेशान हो गया. काफी देर चुपाचाप हुक्का पीता रहा. फिर बोला, ‘‘डाक्टर साहब, आप के कहने का मतलब है कि मलिक असद ही औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है?’’

‘‘मेरा मतलब है कि मलिक असद को इलाज की जरूरत है. अगर वह इलाज करवा ले तो उस की पहली बीवी से औलाद हो सकती है. अगर दूसरी शादी सिर्फ औलाद की खातिर हो रही है तो आप पहले छानबीन कर लें.’’

नंबरदार सिर झुका कर सोचता रहा. फिर कहने लगा, ‘‘ठीक है डाक्टर साहब, मैं ने आप की बात सुन ली है. आप की मेहरबानी कि आप ने ये बातें बता दीं. मैं सोच कर जवाब दूंगा.’’

मैं नंबरदार को सलाम कर के खुशखुश वापस आ गया. दूसरे दिन जब मैं ने मिसेज मलिक को सारी बातें बताईं तो वह भी बहुत खुश हुई और उस की आंखों में मेरे लिए शुक्रगुजारी के आंसू आ गए. मैं ने उसे समझाया कि बात अभी खत्म नहीं हुई. उसे बड़ी समझदारी और खिदमत से अपने शौहर का दिल जीतना होगा. उस के दिल में अपने लिए जगह बनानी होगी और उसे इलाज पर राजी करना होगा.

2 ही दिन गुजरे थे. मैं शाम के वक्त खेतों में सैर कर रहा था. शाम के वक्त मैं रोज गांव से बाहर निकल जाता था. हलकीहलकी ताजी हवा और पत्तों की सरसराहट से मुझे अजीब सा सुकून मिलता था. मैं अपनी धुन में चला जा रहा था कि एकदम मेरे सामने मलिक असद आ खड़ा हुआ. उस के साथ 2 आदमी और थे. दोनों आदमियों के हाथों में लाठियां थीं. मलिक असद की आंखों में गुस्सा भरा था—‘‘डाक्टर, मैं ने तुम्हें समझाया था कि यह बात दोबारा न करना, वरना तुम्हारी लाश नहीं मिलेगी. अब तैयार हो जाओ. तुम्हें मैं दूसरी दुनिया में पहुंचा दूंगा. तुम्हें मलिक असद का पता नहीं है.’’

उस ने अपने आदमियों को इशारा किया. बस मुझे इतना याद है कि एक लाठी मेरे सिर पर लगी. उस के बाद मुझे होश नहीं रहा. जब होश आया तो मैं अस्पताल के कमरे में एक बैड पर लेटा था. मेरे पास कमरे में बड़े चौधरी और उन की बहू थी. मुझे होश में आते देख कर बड़े चौधरी ने मेरे पांव पकड़ लिए और मिसेज मलिक असद सजदे में गिर गईं. चौधरी साहब कहने लगे, ‘‘पुत्तर डाक्टर, मुझे माफ कर दो. मैं बहुत शर्मिंदा हूं. तुम चाहो तो मेरे बेटे को पुलिस के हवाले कर दो. मगर यकीन करो, अगर मुझे इस का पता होता तो मैं अपने बेटे की जान ले लेता और तुम्हें नुकसान न पहुंचने देता.’’

इस दौरान मिसेज असद भी सजदे से उठ गई थीं. मेरी एक टांग पर पलस्तर चढ़ा था. मैं ने फाइल पढ़ी तो पता चला कि सिर के जख्म पर 10 टांके लगे थे और बाईं टांग टूट गई थी. इस के बावजूद मैं मुसकरा रहा था, ‘‘चौधरी साहब, आप का इस में कोई कसूर नहीं. मैं इस वाकये की कोई रिपोर्ट नहीं करना चाहता. मैं सिर्फ छोटे चौधरी से मिलना चाहता हूं.’’

मेरी बात सुन कर बड़े चौधरी की आंखों में आंसू आ गए. वह अपने आंसू पोंछते हुए कमरे से बाहर चले गए. मिसेज मलिक ने मुझे बताया, ‘‘आप से लड़ाई की इस घटना से पहले नंबरदार और उस के भाई हवेली में आए थे और मलिक असद के सामने बड़े चौधरी से कहने लगे थे, ‘आप के बेटे में नुक्स है. वह औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है. आप ने हम से गलतबयानी की है, बल्कि हमें धोखा दिया है. हम यह रिश्ता तोड़ने आए हैं.’

‘‘यह सुन कर मलिक असद उन से झगड़ पड़ा. अगर बड़े चौधरी न होते तो वे लोग भी जख्मी हो जाते. बडे़े चौधरी ने हालात को संभाला और उन से कहने लगे कि आप लोगों से मैं ने कोई झूठ नहीं बोला है, आप लोगों को यह बात किस ने बताई है?

‘‘जब नंबरदार ने आप का नाम बताया तो बड़े चौधरी चुप रह गए. इसी दौरान मलिक असद गुस्से में बाहर निकल गया. मुझे शक हुआ. मैं ने अपनी नौकरानी से कहा कि वह मलिक असद का पीछा करे. उस ने मुझे आ कर बताया कि उन लोगों ने आप को जख्मी कर दिया है.

‘‘मैं ने फौरन बड़े चौधरी को बताया और हम अपने आदमियों के साथ वहां पहुंचे तो आप की हालत काफी खराब थी. फौरन तांगा मंगवाया और सड़क पर आ कर गाड़ी का बंदोबस्त किया. यहां अस्पताल में आ कर भी हम बहुत परेशान रहे. आप को पूरे 6 दिनों बाद होश आया है. इस दौरान पुलिस भी हमें परेशान करती रही.’’

मैं मिसेज मलिक की बातें सुन कर मुसकराता रहा. मुझे पूरे 15 दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इस दौरान मलिक असद को बड़े चौधरी लिवा लाए. वह भी अपने किए पर शर्मिंदा था. मैं उस से बहुत प्यार से मिला. मैं ने जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने मुझ पर बहुत ज्यादती की है. इस का यह असर हुआ कि वह दिनरात मेरे पास रहने लगा. मैं ने इस दौरान डाक्टर राशिद से उस की मुलाकात कराई और उन से सिफारिश की कि वह उस का इलाज करें. मैं ठीक हो कर गांव आ गया और अपने काम में खो गया. इस वाकए का यह असर हुआ कि मुझे चौधरी की हवेली में ही रहने के लिए जाना पड़ा. खानापीना भी वहीं होने लगा.

मलिक असद और उस की बीवी बड़ी खुशगवार जिंदगी बिताते रहे. मैं जब तक उस गांव में तैनात रहा, मिसेज मलिक ने मुझे सगी बहन का प्यार दिया. 2 सालों बाद मुझे पता चला कि मलिक असद के घर एक फूल सी बच्ची पैदा हुई है तो उस वक्त की मेरी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं. Hindi Stories

लेखक – डा. फरहान  

Social Story: अवनीश का खूनी खेल – कर्मो की मिली सजा

Social Story: कानपुर शहर से 30 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है अकबरपुर. यह  (देहात) जिले के अंतर्गत आता है. तहसील व जिला मुख्यालय होने के कारण कस्बे में हर रोज चहलपहल रहती है. इस नगर से हो कर स्वर्णिम चतुर्भुज राष्ट्रीय मार्ग जाता है जो पूर्व में कानपुर, पटना, हावड़ा तथा पश्चिम में आगरा, दिल्ली से जुड़ा है.

इस नगर में एक ऐतिहासिक तालाब भी है जो शुक्ल तालाब के नाम से जाना जाता है. शुक्ल तालाब ऐतिहासिक वास्तुकारी का नायाब नमूना है. बताया जाता है कि सन 1553 में बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल ने शीतल शुक्ल को इस क्षेत्र का दीवान नियुक्त किया था. दीवान शीतल शुक्ल ने सन 1578 में इस ऐतिहासिक तालाब को बनवाया था.

इसी अकबरपुर कस्बे के जवाहर नगर मोहल्ले में सभासद जितेंद्र यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी अर्चना यादव के अलावा बेटी अक्षिता (5 वर्ष) तथा बेटा हनू (डेढ़ वर्ष) था. जितेंद्र के पिता कैलाश नाथ यादव भी साथ रहते थे. वह पुलिस में दरोगा थे, लेकिन अब रिटायर हो चुके हैं. जितेंद्र यादव की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उन का अपना बहुमंजिला आलीशान मकान था.

जितेंद्र यादव की पत्नी अर्चना यादव पढ़ीलिखी महिला थी. वह नगर के रामगंज मोहल्ला स्थित प्राइमरी पाठशाला में सहायक शिक्षिका थी, जबकि जितेंद्र यादव समाजवादी पार्टी के सक्रिय सदस्य थे. 2 साल पहले उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सभासद का चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी. वर्तमान में वह जवाहर नगर (वार्ड 14) से सभासद है. जितेंद्र यादव का अपने मकान के भूतल पर कार्यालय था, साथ ही पिता कैलाश नाथ यादव रहते थे, जबकि भूतल पर जितेंद्र अपनी पत्नी अर्चना व बच्चों के साथ रहते थे.

मकान के दूसरी और तीसरी मंजिल पर 4 किराएदार रहते थे, जिन में 2 महिला पुलिसकर्मी अनीता व ऊषा प्रजापति थीं. मकान की देखरेख व किराया वसूली का काम कैलाश नाथ यादव करते थे. ऊषा का पति अवनीश प्रजापति मूलरूप से प्रयागराज जनपद के फूलपुर का रहने वाला था. महिला कांसटेबल ऊषा पहले प्रयागराज में तैनात थी. उस के साथ उस का पति भी रहता था. अवनीश वहां लैब टैक्नीशियन था, लेकिन लौकडाउन लगने के कारण मई 2020 में उस की लैब बंद हो गई थी.

ऊषा का ट्रांसफर भी प्रयागराज से कानपुर देहात जनपद के थाना अकबरपुर में हो गया था. उस के बाद वह पति अवनीश के साथ अकबरपुर कस्बे में सभासद जितेंद्र यादव के मकान में किराए पर रहने लगी थी. ऊषा की शादी अवनीश प्रजापति के साथ 4 साल पहले हुई थी. 4 साल बीत जाने के बाद भी ऊषा मां नहीं बन सकी थी. इस से उस का बेरोजगार पति अवनीश टेंशन में रहता था. अवनीश घर में ही पड़ा रहता था. उस का काम केवल इतना था कि वह पत्नी ऊषा को ड्यूटी पर अकबरपुर कोतवाली स्कूटर से छोड़ आता था और ड्यूटी समाप्त होने पर घर ले आता था.

ऊषा पुलिसकर्मी होने के बावजूद जितनी सरल स्वभाव की थी, उस का पति बेरोजगार होते हुए भी उतने ही कठोर स्वभाव का था. अवनीश की न तो किसी अन्य किराएदार से पटती थी और न मकान मालिक से. हां, वह सभासद जितेंद्र यादव से जरूर भय खाता था, जितेंद्र की पत्नी अर्चना यादव तो उसे फूटी आंख नहीं सुहाती थी. सभासद की पत्नी अर्चना यादव तथा ऊषा के पति अवनीश प्रजापति के बीच पटरी नहीं बैठती थी. दोनों के बीच अकसर तनाव बना रहता था. तनाव का पहला कारण यह था कि अवनीश साफसफाई से नहीं रहता था. वह मकान में भी गंदगी फैलाता रहता था.

अर्चना यादव शिक्षिका थीं. वह खुद भी साफसफाई से रहती थीं और मकान में रहने वाले अन्य किराएदारों को भी साफसफाई से रहने को कहती थीं. अन्य किराएदार तो अर्चना के सुझाव पर अमल करते थे, लेकिन अवनीश नहीं करता था. वह गुटखा और पान खाने का शौकीन था. पान खा कर उस की पीक कमरे के बाहर ही थूक देता था. कमरे के अंदर की साफसफाई का कूड़ा भी बाहर जमा कर देता था, जो हवा में उड़ कर पूरे फ्लोर पर फैल जाता था.

तनाव का दूसरा कारण अवनीश की बेशरमी थी. उस की नजर में खोट था. वह अर्चना को घूरघूर कर देखता था. उसे देख कर वह कभी मुसकरा देता, तो कभी कमेंट कस देता. उस की हरकतों से अर्चना गुस्सा करती तो कहता, ‘‘अर्चना भाभी, जब तुम गुस्सा करती हो तो तुम्हारा चेहरा गुलाब जैसा लाल हो जाता है और गुलाब मुझे बहुत पसंद है.’’

अर्चना ने अवनीश की हरकतों और गंदगी फैलाने की शिकायत अपने ससुर कैलाश नाथ यादव से की तो उन्होंने अवनीश को डांटाफटकारा और कमरा खाली करने को कह दिया. लेकिन अवनीश की पत्नी ऊषा ने बीच में पड़ कर मामले को शांत कर दिया. ऊषा प्रजापति ने मामला भले ही शांत कर दिया था, लेकिन अर्चना की शिकायत ने अवनीश के मन में नफरत के बीज बो दिए थे. वह मन ही मन उस से नफरत करने लगा था. अर्चना अपने बच्चों को भी अवनीश से दूर रखती थी. दरअसल, ऊषा की कोई संतान नहीं थी, अर्चना को डर था कि गोद भरने के लिए कहीं ऊषा व अवनीश उस के बच्चों पर कोई टोनाटोटका न कर दें.

एक रोज अर्चना किसी काम से छत पर जा रही थी. वह पहली मंजिल पर पहुंची तो अवनीश के कमरे के अंदरबाहर कूड़ा बिखरा देखा. इस पर उस ने गुस्से में कहा, ‘‘अवनीश कुत्ता भी पूंछ से जगह साफ कर के बैठता है, लेकिन तुम तो उस से भी गएगुजरे हो जो गंदगी में पैर फैलाए बैठे हो.’’

अर्चना की बात सुन कर अवनीश का गुस्सा बढ़ गया, ‘‘भाभी, मैं कुत्ता नहीं इंसान हूं. मुझे कुत्ता मत बनाओ. आप मकान मालकिन हैं, लेकिन इतना हक नहीं है कि आप मुझे कुत्ता कहें. आज तो मैं किसी तरह आप की बात बरदाश्त कर रहा हूं, लेकिन आइंदा नहीं करूंगा.’’

इस बार अर्चना ने अपने सभासद पति जितेंद्र से अवनीश की शिकायत की. इस पर सभासद ने अवनीश को खूब फटकार लगाई, साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर उसे मकान में रहना है तो सफाई का पूरा ध्यान रखना होगा. वरना मकान खाली कर दो. अर्चना द्वारा बारबार शिकायत करने से अवनीश के मन में नफरत और बढ़ गई. उसे लगने लगा कि अर्चना जानबूझ कर किराएदारों के सामने उस की बेइज्जती करती है. उस के मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़कने लगी. वह बेइज्जती का बदला लेने की सोचने लगा.

28 फरवरी, 2021 की सुबह अवनीश ने पान की पीक कमरे के बाहर थूक दी. पीक की गंदगी को ले कर अर्चना और अवनीश में जम कर तूतूमैंमैं हुई. ऊषा ने किसी तरह पति को समझा कर शांत किया और गंदगी साफ कर दी. झगड़ा करने के बाद अवनीश दिन भर कमरे में पड़ा रहा और अर्चना को सबक सिखाने की सोचता रहा. आखिर उस ने एक बेहद खतरनाक योजना बना ली. रात 8 बजे अवनीश अपनी पत्नी ऊषा को अकबरपुर कोतवाली छोड़ने गया. वहां से लौटते समय उस ने पैट्रोल पंप से एक बोतल में आधा लीटर पैट्रोल लिया और वापस घर लौट आया.

उस ने ऊपरनीचे घूम कर पूरे मकान का जायजा लिया. ग्राउंड फ्लोर स्थित कार्यालय में सभासद जितेंद्र यादव क्षेत्रीय लोगों के साथ क्षेत्र की समस्यायों के संबंध में बातचीत कर रहे थे, कैलाश नाथ भी अपने कमरे में थे. जायजा लेने के बाद अवनीश पहली मंजिल पर आया. वहां अर्चना यादव रसोई में थी. पास में उन की 5 साल की बेटी अक्षिता तथा 18 माह का बेटा हनू भी बैठा था. अर्चना खाना पका रही थीं, जबकि दोनों बच्चे खेल रहे थे. इस बीच सिपाही अनीता कोई सामान मांगने अर्चना के पास आई. फिर वापस अपने कमरे में चली गई.

सही मौका देख कर अवनीश अपने कमरे में गया और वहां से पैट्रोल भरी बोतल ले आया. फिर वह रसोई में पहुंचा और पीछे से अर्चना यादव व उस के बच्चों पर पैट्रोल उड़ेल दिया. उस समय गैस जल रही थी, अत: पैट्रोल पड़ते ही गैस ने आग पकड़ ली. अर्चना व उस के बच्चे धूधू कर जलने लगे. आग की लपटों से घिरी अर्चना चीखी तो महिला सिपाही अनीता ने दरवाजा खोला. सामने का खौफनाक मंजर देख कर वह सहम गई. वह उसे बचाने को आगे बढ़ी तो अवनीश ने उस पर वार कर दिया. अनीता चीखनेचिल्लाने लगी.

भूतल पर सभासद जितेंद्र यादव साथियों सहित मौजूद थे. उन्होंने चीखपुकार सुनी तो पिता कैलाश नाथ व अन्य लोगों के साथ भूतल पर पहुंचे और आग की लपटों से घिरी पत्नी अर्चना व बच्चों के ऊपर कंबल डाल कर आग बुझाई. इसी बीच पकड़े जाने के डर से अवनीश भागा और केबिल के सहारे नीचे आ गया. घर के बाहर सभासद की स्कौर्पियो कार खड़ी थी. उस ने उसे भी जलाने का प्रयास किया. इसी बीच सभासद के साथियों ने उसे दौड़ाया तो वह भागने लगा. भागते समय सड़क पार करते हुए वह मिनी ट्रक की चपेट में आ गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उपचार हेतु सरकारी अस्पताल पहुंचा दिया.

इधर सभासद जितेंद्र यादव ने गंभीर रूप से जली पत्नी और दोनों बच्चों को अपनी कार से प्राइवेट अस्पताल राजावत पहुंचाया. लेकिन डाक्टरों ने उन की गंभीर हालत देख कर जिला अस्पताल रेफर कर दिया. सभासद  के पिता कैलाश नाथ यादव ने घटना की सूचना पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को दी तो हड़कंप मच गया. कुछ ही देर में कोतवाल तुलसी राम पांडेय, डीएसपी संदीप सिंह, एसपी केशव कुमार चौधरी, एएसपी घनश्याम चौरसिया तथा डीएम दिनेश चंद्र जिला अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने सभासद जितेंद्र यादव को धैर्य बंधाया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया.

चूंकि अर्चना की हालत नाजुक थी. अत: जिलाधिकारी डा. दिनेश चंद्र ने अर्चना का बयान दर्ज कराने के लिए एसडीएम संजय कुशवाहा को जिला अस्पताल बुलवा लिया. संजय कुशवाहा ने अर्चना का बयान दर्ज किया. अर्चना ने कहा कि किराएदार अवनीश ने पैट्रोल डाल कर उसे और उस के दोनों मासूम बच्चों को जलाया है. जिला अस्पताल में अर्चना व उस के बच्चों की हालत बिगड़ी तो डाक्टरों ने उन्हें कानपुर शहर के उर्सला अस्पताल में रेफर कर दिया. उर्सला अस्पताल में रात 11 बजे जितेंद्र के मासूम बेटे हनू ने दम तोड़ दिया.

रात 1 बजे बेटी अक्षिता की भी सांसें थम गईं. उस के बाद 4 बजे अर्चना ने भी उर्सला अस्पताल में आखिरी सांस ली. इस के बाद तो परिवार में कोहराम मच गया. जितेंद्र पत्नी व मासूम बच्चों का शव देख कर बिलख पड़े. अर्चना की मां व भाई भी आंसू बहाने लगे. पहली मार्च को सभासद जितेंद्र यादव की पत्नी अर्चना यादव व उस के मासूम बच्चों को किराएदार अवनीश द्वारा जिंदा जलाने की खबर अकबरपुर कस्बे में फैली तो सनसनी फैल गई. चूंकि मामला सभासद के परिवार का था, उन के सैकड़ों समर्थक थे. अत: उपद्रव की आशंका से पुलिस अधिकारियों ने अकबरपुर कस्बे में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया.

इधर अर्चना व उस के बच्चों की मौत की खबर अकबरपुर कोतवाल तुलसीराम पांडेय को मिली तो उन्होंने अवनीश व उस की पत्नी ऊषा की सुरक्षा बढ़ा दी. उन्होंने अवनीश को अस्पताल से डिस्चार्ज करा कर अपनी कस्टडी में ले लिया. सभासद जितेंद्र यादव की तहरीर पर कोतवाल तुलसीराम पांडेय ने भादंवि की धारा 326/302 के तहत अवनीश प्रजापति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उसे बंदी बना लिया. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद डीएसपी संदीप सिंह ने अभियुक्त अवनीश से घटना के संबंध में पूछताछ की तथा उस का बयान दर्ज किया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का भी बारीकी से निरीक्षण किया तथा साक्ष्य जुटाए.

2 मार्च, 2021 को नगरवासियों ने मृतकों की आत्माओं की शांति के लिए कैंडल मार्च निकाला और अंडर ब्रिज के नीचे उन की फोटो पर पुष्प अर्पित किए. अनेक युवकों के हाथों में हस्तलिखित तख्तियां थी. उन की मांग थी कि हत्यारे को फांसी की सजा मिले. युवक सीबीआई जांच की भी मांग कर रहे थे. उन को शक था कि इस साजिश में कुछ और लोग भी शामिल हैं, जिन का परदाफाश होना जरूरी है.

3 मार्च, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त अवनीश प्रजापति को कानपुर देहात की माती कोर्ट में मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. सभासद जितेंद्र यादव और उन के पिता इस हृदयविदारक घटना से बेहद दुखी हैं. जितेंद्र यादव से दर्द साझा किया गया तो वह फफक पड़े. बोले, ‘किस पर भरोसा करूं. चंद मिनटों में ही हमारा सब कुछ खत्म हो गया. किराएदार ऐसा कर सकता है, कभी सोचा नहीं था. अवनीश ने मेरे परिवार को योजना बना कर जलाया है. बदले की आग में उस ने हमारी दुनिया ही उजाड़ डाली.’ Social Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News: खुद को बचाने के लिए मार दिया दोस्त को

Crime News: कंधे पर बैग टांग कर घर से निकलते हुए राजा ने मां से कहा कि वह 2 दिनों के लिए बाहर जा रहा है तो मां ने पूछा, ‘‘अरे कहां जा रहा है, यह तो बताए जा.’’ लेकिन जब बिना कुछ बताए ही राजा चला गया तो माधुरी ने झुंझला कर कहा, ‘‘अजीब लड़का है, यह भी नहीं बताया कि कहां जा रहा है?’’

यह 19 अक्तूबर, 2016 की बात है. मीरजापुर की कोतवाली कटरा के मोहल्ला पुरानी दशमी में अशोक कुमार का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी माधुरी के अलावा 4 बेटों में राजन उर्फ राजा सब से छोटा था. उस की अभी शादी नहीं हुई थी. अशोक कुमार के परिवार का गुजरबसर रेलवे स्टेशन पर चलने वाले खानपान के स्टाल से होता था. अशोक कुमार के 2 बेटे उन के साथ ही काम करते थे, जबकि 2 बेटे गोपाल और राजा मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर स्थित होटल जननिहार में काम करते थे. चूंकि मीरजापुर और मुगलसराय स्टेशन के बीच बराबर गाडि़यां चलती रहती हैं, इसलिए उन्हें आनेजाने में कोई परेशानी नहीं होती थी.

राजा 2 दिनों के लिए कह कर घर से गया था, जब वह तीसरे दिन भी नहीं लौटा तो घर वालों ने सोचा कि किसी काम में लग गया होगा, इसलिए नहीं आ पाया. लेकिन जब चौथे दिन भी वह नहीं आया तो घर वालों को चिंता हुई. दरअसल इस बीच उस का एक भी फोन नहीं आया था. घर वालों ने फोन किया तो राजा का फोन बंद था. जब राजा से बात नहीं हो सकी तो उस की मां माधुरी ने उस के सब से खास दोस्त रवि को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘राजा दिल्ली गया है. मैं भी इस समय बाहर हूं.’’

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया था. राजा का फोन बंद था, इसलिए उस से बात नहीं हो सकती थी. उस के दोस्त रवि से जब भी राजा के बारे में पूछा जाता, वह खुद को शहर से बाहर होने की बात कह कर राजा के बारे में कभी कहता कि इलाहाबाद में है तो कभी कहता फतेहपुर में है. अंत में उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया.

जब राजा का कहीं पता नहीं चला तो परेशान अशोक कुमार मोहल्ले के कुछ लोगों को साथ ले कर कोतवाली कटरा पहुंचे और राजा के गायब होने की तहरीर दे कर गुमशुदगी दर्ज करा दी. कोतवाली पुलिस ने गुमशुदगी तो दर्ज कर ली, लेकिन काररवाई कोई नहीं की. इस के बाद अशोक कुमार 26 अक्तूबर को समाजवादी पार्टी के युवा नेता और सभासद लवकुश प्रजापति के अलावा मोहल्ले के कुछ प्रतिष्ठित लोगों को साथ ले कर मीरजापुर के एसपी अरविंद सेन से मिले और उन्हें अपनी परेशानी बताई.

अशोक कुमार की बात सुन अरविंद सेन ने तत्काल कटरा कोतवाली पुलिस को काररवाई का आदेश दिया. कोतवाली पुलिस ने राजा के बारे में पता करने के लिए उस के दोस्त रवि से पूछताछ करनी चाही, लेकिन वह घर से गायब मिला. अब तक राजा को गायब हुए 10 दिन हो गए थे. रवि घर पर नहीं मिला तो पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिया, क्योंकि उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था.

पुलिस की लापरवाही से तंग आ कर बेटे के बारे में पता करने के लिए अशोक कुमार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. मामला न्यायालय तक पहुंचा तो पुलिस ने तेजी दिखानी शुरू की. 28 अक्तूबर, 2016 को राजा के दोस्त रवि और उस के पिता को एसपी औफिस के पास एक मिठाई की दुकान से पकड़ कर कोतवाली लाया गया. लेकिन उन से की गई पूछताछ में कोई जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इसी तरह अगले दिन भी हुआ.

संयोग से उसी बीच एसपी अरविंद सेन ही नहीं, कोतवाली प्रभारी का भी तबादला हो गया. मीरजापुर जिले के नए एसपी कलानिधि नैथानी आए. दूसरी ओर कटरा कोतवाली प्रभारी की जिम्मेदारी इंसपेक्टर अजय श्रीवास्तव को सौंपी गई. अशोक कुमार 9 नवंबर को नए एसपी कलानिधि नैथानी से मिले. एसपी साहब ने तुरंत इस मामले में काररवाई करने का आदेश दिया. उन्हीं के आदेश पर कोतवाली प्रभारी ने अपराध संख्या 1232/2016 पर भादंवि की धारा 364 के तहत मुकदमा दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी.

इस घटना को चुनौती के रूप में लेते हुए एसपी कलानिधि नैथानी ने कोतवाली प्रभारी कटरा, प्रभारी क्राइम ब्रांच स्वाट टीम एवं सर्विलांस को ले कर एक टीम गठित कर दी. इस टीम ने मुखबिरों द्वारा जो सूचना एकत्र की, उसी के आधार पर 14 नवंबर, 2016 को राजा के दोस्त रवि कुमार को मीरजापुर के नटवां तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. उस से राजा के बारे में पूछा गया तो उस ने उस के गायब होने के पीछे की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस वाले जहां हैरान रह गए, वहीं रवि के पकड़े जाने की खबर सुन कर कोतवाली आए राजा के घर वाले रो पड़े. क्योंकि उस ने राजा की हत्या कर दी थी.

उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के थाना नरसैना के गांव रूखी के रहने वाले नरेश कुमार पीएसी में होने की वजह से मीरजापुर में परिवार के साथ रहते हैं. वह पीएसी की 39वीं वाहिनी में स्वीपर हैं. रवि कुमार उन्हीं का बेटा था. उस की दोस्ती राजा से हो गई थी, इसलिए कभी वह उस से मिलने मुगलसराय तो कभी उस के घर आ जाया करता था. दोनों में पक्की दोस्ती थी.

रवि का एक चचेरा भाई दीपेश उर्फ दीपू फिरोजाबाद के टुंडला की सरस्वती कालोनी में किराए का कमरा ले कर पत्नी के साथ रहता था. वह वहां दर्शनपाल उर्फ जेपी की गाड़ी चलाता था. जेपी की बहन राजमिस्त्री का काम करने वाले प्रवीण कुमार से प्यार करती थी. यह जेपी को पसंद नहीं था. उस ने बहन को समझाया . बहन नहीं मानी तो प्रेमी से उसे जुदा करने के लिए उस ने प्रवीण कुमार को ठिकाने लगाने का मन बना लिया.

यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने ड्राइवर दीपेश उर्फ दीपू को साथ मिलाया और 13 अक्तूबर, 2016 को बहन के प्रेमी प्रवीण कुमार को अगवा कर लिया. दोनों उसे शहर से बाहर ले गए और गोली मार कर हत्या कर दी. दोनों के खिलाफ इस हत्या का मुकदमा थाना टुंडला में दर्ज हुआ. चूंकि इस मुकदमे में एससी/एसटी एक्ट भी लगा था, इसलिए पुलिस दोनों के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. दर्शनपाल उर्फ जेपी तो गिरफ्तार हो गया, लेकिन दीपेश उर्फ दीपू फरार चल रहा था.

पुलिस उस की गिरफ्तारी के लिए जगहजगह छापे मार रही थी. पुलिस दीपेश को तेजी से खोज रही थी. इस स्थिति में पुलिस से बचने के लिए वह मीरजापुर आ गया था. टुंडला में घटी घटना के बारे में उस ने चचेरे भाई रवि को बता कर कहा, ‘‘रवि, मैं बुरी तरह फंस गया हूं. अगर तुम मेरी मदद करो तो मैं बच सकता हूं.’’

इस के बाद राजा और दीपेश ने योजना बनाई कि किसी ऐसे आदमी को खोजा जाए, जिसे टुंडला ले जा कर हत्या कर के उस की लाश को जला दिया जाए और लाश के पास दीपेश अपनी कोई पहचान छोड़ दे, जिस से पुलिस समझे कि लाश दीपेश की है और उस की हत्या हो चुकी है. इस के बाद पुलिस उस का पीछा करना बंद कर देगी.

जब ऐसे आदमी की तलाश की बात आई तो रवि को अपने दोस्त राजा उर्फ राजन की याद आई. क्योंकि राजा का हुलिया दीपेश से काफी मिलताजुलता था. फिर क्या था, दोनों ने राजा को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली, उसी योजना के तहत उस ने 18 अक्तूबर को राजा को फोन कर के कहा, ‘‘राजा, हम लोगों ने किराए पर एक गाड़ी की है, जिस से कल यानी 19 अक्तूबर को दिल्ली घूमने चलेंगे. मेरा चचेरा भाई दीपेश भी आया हुआ है, वह भी साथ चलेगा. मैं चाहता हूं कि तुम भी चलो.’’

राजा तैयार हो गया तो रवि ने 19 अक्तूबर, 2016 को पीएसी कालोनी के एक परिचित की गाड़ी बुक कराई और राजा को साथ ले कर दिल्ली के लिए चल पड़ा. योजना के अनुसार रास्ते में पैट्रोल खरीद लिया गया. इस के बाद उन्होंने बीयर खरीदी और राजा को जम कर पिलाई. वह नशे में हो गया तो रात 11 बजे के करीब फिरोजाबाद के थाना पचोखरा के गांव सराय नूरमहल और गढ़ी निर्भय के बीच सुनसान स्थान पर पेशाब करने के बहाने गाड़ी रुकवाई और राजा को उतार कर मारपीट कर पहले उसे बेहोश किया, उस के बाद पैट्रोल डाल कर जला दिया.

जब उन्हें विश्वास हो गया कि राजा मर गया है तो पहचान के लिए दीपेश ने अपना जूता राजा की लाश के पास रख दिया, जिस से बाद में उस लाश की पहचान उस की लाश के रूप में हो. इस के बाद दीपेश ने फिरोजाबाद पुलिस को मोबाइल से फोन कर के कहा, ‘‘मैं दीपेश उर्फ बाबू बोल रहा हूं. 3-4 बदमाश मेरा पीछा कर रहे हैं. मुझे बचा लीजिए अन्यथा ये मुझे मार डालेंगे.’’

जिस जगह पर रवि और दीपेश ने राजा को जलाया था, दीपेश का घर वहां से करीब 8 किलोमीटर दूर था. दीपेश ने इस जगह को यह सोच कर चुना था, जिस से पुलिस को लगे कि वह चोरीछिपे अपने गांव आया था. बदमाशों को पता चल गया तो उन्होंने उसे मार डाला. पुलिस को फोन कर के रवि और दीपेश फरार हो गए. जबकि पुलिस सर्विलांस के माध्यम से लोकेशन के आधार पर उन की तलाश में मीरजापुर से फिरोजाबाद तक उन के पीछे लगी थी. दीपेश तो फरार हो गया, लेकिन रवि मीरजापुर तो कभी सोनभद्र तो कभी सिगरौली जा कर छिपा रहा. आखिर ज्यादा दिनों तक वह पुलिस की नजरों से बच नहीं पाया और 14 नवंबर को उसे पकड़ लिया गया.

पूछताछ के बाद रवि की निशानदेही पर पुलिस ने पैट्रोल का डिब्बा, वह गाड़ी जेस्ट कार संख्या यूपी 63जेड 8586, जिस से वे राजा को ले गए थे, बरामद कर ली. इस के बाद उसे उस स्थान पर भी ले जाया गया, जहां उस ने दीपेश के साथ मिल कर राजा को जलाया था. राजा के पिता अशोक कुमार भी साथ थे, इसलिए उन्होंने राजा के अधजले कपड़ों को पहचान लिया था. पुलिस ने रवि को प्रैसवार्ता में पेश किया, जहां उस ने अपना अपराध स्वीकार कर के हत्या की सारी कहानी सुना दी.

घटना का खुलासा होने के बाद कोतवाली पुलिस ने राजा उर्फ राजन की गुमशुदगी हत्या में तब्दील कर आरोपी रवि को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. दीपेश उर्फ दीपू की तलाश में पुलिस ने ताबड़तोड़ छापे मारने शुरू कर दिए तो दबाव में आ कर उस ने फिरोजाबाद की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. अदालत ने उसे जेल भेज दिया था. Crime News

Crime Story: गलतफहमी – बेकसूर परिवार को मिली सजा

Crime Story: भीकाजी बोर्डे का घर औरंगाबाद के चिखनठाना की चौधरी कालोनी में था.बोर्डे परिवार में कुल जमा 3 सदस्य थे. भीकाजी बोर्डे, पत्नी कमलाबाई और बेटा भगवान दिनकर बोर्डे. भीकाजी की एक बेटी भी थी विमल, जिस की वह शादी कर चुके थे. विमल 2 बच्चों की मां थी और पति से चल रहे किसी विवाद की वजह से मायके में रह रही थी. उस के दोनों बच्चे पति के पास रह रहे थे.

23 वर्षीय अमोल बोर्डे भगवान दिनकर बोर्डे का दोस्त था. उस का घर बोर्डे परिवार के घर से कुछ दूरी पर था. दोनों हमउम्र थे. दोस्ती के नाते दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

जब से भीकाजी की बेटी विमल मायके आई थी, तब से अमोल भीकाजी के घर कुछ ज्यादा ही आने लगा था. उसे इस बात की जानकारी थी कि विमल और उस के पति के बीच तनातनी चल रही है और वह हालफिलहाल पति के पास जाने वाली नहीं है. दरअसल, अमोल अभी अविवाहित था, इसलिए दोस्त की बहन को दूसरी नजरों से देखने लगा था.

भाई का दोस्त होने के नाते विमल उसे भी भाई समझती थी. वह बात भी उसी अंदाज में करती थी. वैसे भी विमल बातूनी लड़की थी. जब विमल और अमोल के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो अमोल ने बातों के कुछ शब्दों को ऐसा रंग देना शुरू कर दिया कि उस की चाहत नजर आए. उस के ऐसे शब्दों पर या तो विमल ने ध्यान नहीं दिया या दिया भी तो उस की बातों को गंभीरता से नहीं लिया. अमोल ने मीठीमीठी बातों से विमल को शीशे में उतारने की काफी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. बहुत कुछ समझ कर भी विमल अमोल को ऐसा कुछ नहीं कहना चाहती थी जिस से भाई भगवान दिनकर और अमोल की दोस्ती में दरार पड़े. लेकिन वह कब तक यह सब सहन करती.

आखिर एक दिन सब्र का प्याला छलक ही गया. हुआ यह कि उस दिन विमल घर पर अकेली थी. अमोल को पता चला तो वह मौके का फायदा उठाने की सोच कर उस के घर पहुंच गया. विमल ने उसे बैठने के लिए कुरसी दी और उस के लिए चाय बनाने चली गई. उस समय वह घर में अकेली थी. अमोल ने अपनी मनमरजी करने के लिए इस मौके को उचित समझा. वापस लौट कर विमल ने चाय का प्याला अमोल को दिया तो उसी समय अमोल ने उस का हाथ पकड़ लिया. उस की इस हरकत पर विमल चौंक गई. उस की नीयत में खोट देख कर उसे गुस्सा आ गया. उस ने अपना हाथ छुड़ाने के बाद चाय का प्याला मेज पर रखा, फिर उसे जम कर लताड़ा और उसी समय घर से भगा दिया.

अमोल को इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि विमल उस की इतनी बेइज्जती करेगी. विमल के हंसहंस कर बात करने से वह तो यही सोचता था कि विमल भी उसे चाहती है. इसी का फायदा उठाने के लिए वह आया भी था. लेकिन उसे उलटे विमल के गुस्से का सामना करना पड़ा. बेइज्जती सह कर वह उस समय वहां से चला गया. घर पहुंचने के बाद भी विमल द्वारा की गई बेइज्जती अमोल के दिमाग में घूमती रही. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में वह क्या करे.

उधर शाम के समय विमल के मातापिता और भाई घर लौटे तो विमल ने अमोल की हरकत मां कमलाबाई को बता दी. कमलाबाई को बहुत गुस्सा आया. अमोल उस के बेटे का दोस्त था इसलिए वह उसे भी अपने घर का सदस्य समझती थी, लेकिन उस की सोच इतनी घटिया थी, वह नहीं समझ पाई थी. घर की बदनामी को देखते हुए कमलाबाई ने इस बात का शोरशराबा तो नहीं किया लेकिन बेटी को उस से सतर्क रहने की सलाह जरूर दे दी.

अगले दिन अमोल को अपने दोस्त यानी विमल के भाई भगवान दिनकर बोर्डे की याद आई. वह उस के साथ घूमता और गप्पें मारता था, इसलिए उस का मन दोस्त से मिलने के लिए कर रहा था. विमल ने जिस तरह उसे लताड़ा था, वह बात भी उस के दिमाग में घूम रही थी. अमोल यह समझ रहा था कि उस ने विमल के साथ जो हरकत की थी, उस के बारे में विमल अपने घर वालों से चर्चा तक नहीं करेगी, क्योंकि ज्यादातर लड़कियां इस तरह की बातें शुरुआत में अपने तक ही छिपा कर रखती हैं. मातापिता को ये बातें बताने में उन्हें शर्म महसूस होती है.

यही सोच कर अमोल बिना किसी डर के अपने दोस्त भगवान दिनकर बोर्डे से मिलने उस के घर पहुंच गया. विमल अमोल की हरकत मां को पहले ही बता चुकी थी. लिहाजा विमल की मां कमलाबाई ने अमोल को आड़े हाथों लिया. उस ने भी अमोल को जम कर खरीखोटी सुनाई. इतना ही नहीं, उसे बेइज्जत करते हुए धमकी दी कि वह इसी समय वहां से चला जाए और आइंदा उस के घर में कदम न रखे.

बेइज्जती सह कर अमोल वहां से उलटे पांव लौट आया. इस अपमान की ज्वाला उस के सीने में दहकने लगी थी. उस ने तय कर लिया कि विमल और उस की मां ने उस की जो बेइज्जती की है, वह उस का बदला जरूर लेगा. बदले की भावना उस के मन में घर कर गई. बात 25 सितंबर, 2019 की है. अमोल अपने घर पर ही था. उस के दिमाग में बेइज्जती वाली बातें ही घूम रही थीं. वह सोच रहा था कि इस अपमान का बदला कैसे ले. रात के 8 बजे थे. उस समय अमोल को भूख लगी थी. उस ने अपनी मां से खाना परोसने को कहा. मां खाना परोस कर ले आई.

निवाला तोड़ कर वह खाने को हुआ, तभी उस के दिमाग में बदला लेने वाली बात फिर आ गई. अमोल ने खाना छोड़ दिया और किचन की तरफ चल दिया. उस की मां ने बिना खाना खाए उठने की वजह पूछी, लेकिन वह कुछ नहीं बोला. अमोल ने किचन से चाकू उठा कर अपनी जेब में रख लिया. उस की मां पूछती रही, लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया. वह घर के बाहर निकल गया. मां पूछने के लिए उस के पीछेपीछे आ रही थी, लेकिन अमोल ने घर का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया ताकि मां घर से बाहर न आए. उस की मां, पिता और भांजी घर में ही बंद रह गए. वे समझ नहीं पा रहे थे कि अमोल ने ऐसा क्यों किया.

अपने घर से करीब 70 मीटर दूर वह सीधे विमल के घर में घुस गया. घर में घुसते ही उस ने मुख्य दरवाजा बंद कर दिया. उस समय वह बहुत गुस्से में था. विमल के मांबाप ने जब अमोल को अपने घर में देखा तो उन्होंने उस से वहां आने की वजह पूछी. तभी अमोल ने जेब में रखा चाकू निकाल लिया और अपने दोस्त दिनकर बोर्डे की तरफ बढ़ा. अमोल को गुस्से में देख कर भगवान बोर्डे अपनी जान बचाने के लिए भागा. अमोल ने दौड़ कर भगवान को पकड़ लिया और उस की गरदन पर चाकू से वार कर दिया. तभी भगवान के मातापिता भी वहां आ गए. बेटे के खून के छींटें उन के ऊपर भी गए. दिनकर भगवान बोर्डे वहीं गिर गया और कुछ ही देर में उस की मृत्यु हो गई.

इस के बाद अमोल बोर्डे ने दिनकर की मां कमलाबाई पर हमला किया. फिर उस ने उस के पिता को भी निशाने पर ले लिया. इस तरह उस ने परिवार के 3 लोगों की हत्या कर दी. इस दौरान विमल दरवाजा खोल कर बाहर भाग गई थी. विमल ने यह बात पड़ोसियों को बताई तो वे घरों से बाहर निकल आए. 3 हत्याएं करने के बाद अमोल खून सना चाकू ले कर घर से बाहर निकला तो कई लोग वहां खड़े थे. लेकिन अमोल की आंखों में तैर रहे गुस्से और खून सने चाकू को देख कर कोई भी कुछ कह नहीं सका और वह वहां से चला गया.

किसी ने इस तिहरे हत्याकांड की खबर पुलिस को दे दी थी. सूचना मिलने पर एमआईडीसी सिडको थाने के प्रभारी सुरेंद्र मोलाले थोड़ी देर में दिनकर बोर्डे के घर पहुंच गए. तभी लोगों ने पुलिस को अमोल बोर्डे के बारे में जानकारी दी कि वह चौराहे पर खड़ा है. यह सूचना मिलने के बाद पुलिस ने चौराहे पर खड़े अमोल बोर्डे को हिरासत में ले लिया. थानाप्रभारी सुरेंद्र मोलाले ने अभियुक्त अमोल से ट्रिपल मर्डर के बारे में पूछताछ की तो उस ने सारी कहानी बता दी.

उस ने कहा कि उस ने अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए इस वारदात को अंजाम दिया. अमोल बोर्डे से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Crime Story

Social Story: पाकिस्तान के योग गुरू शमशााद हैदर

Social Story: शमशाद हैदर उस मुल्क में लोगों को योग सिखा रहे हैं, जहां योग को मजहबी आईने से देखा जाता है. कट्टरपंथियों ने उन्हें योग न सिखाने की धमकियां भी दीं लेकिन…

भोर होते ही शमशाद हैदर हरेभरे पेड़ों के बीच बने ग्राउंड में पहुंच गए. पूरे ग्राउंड पर हरी मखमली घास थी. उस पर जमी शबनम की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं. पक्षियों की चहचहाहट भी शुरू हो गई थी. भोर का वक्त वाकई अंतरमन को सुकून पहुंचाता है. उस वक्त हवाएं ताजगी से लबरेज होती हैं और फिजा बिलकुल शांत. लगता है कि जैसे प्रकृति बांहें फैला कर इंसान का इस्तकबाल कर रही हो. वक्त का दायरा बढ़ना शुरू हुआ तो उस मैदान में लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया. आने वाले ज्यादातर शख्स कुरतापाजामा पहने हुए थे. उन के चेहरे पर दाढ़ी थी और सिर पर जालीदार टोपी. वहां जो भी आ रहा था वही हैदर को बड़े अदब के साथ अस्सलामु अलैकुम कर रहा था.

हैदर भी मुसकरा कर उन का स्वागत करते हुए ‘वालेकुम अस्सलाम मियां, तशरीफ लाइए,’ कह रहे थे. दुआसलाम के दौरान वह लोगों की खैरखबर भी पूछ रहे थे. आगंतुकों में युवा व अधेड़ परदानशीं महिलाएं व चंद बच्चे भी शरीक थे. कुछ ही देर में वहां आए सभी लोग 4-5 कतारों में साथ लाई चटाई व चादर बिछाने के बाद उस पर पालथी लगा कर बैठ गए. इन कतारों में से एक अलग कतार महिलाओं की भी थी. हैदर भी एक सफेद चादर बिछा कर ठीक उन के सामने बैठ गए थे और अनुलोम विलोम व प्राणायाम के बाद उन्होंने विभिन्न आसन करने शुरू कर दिए. वह जैसा करते, लोग भी वैसा कर रहे थे. करीब एक घंटे बाद यह सिलसिला थम गया. लोग जाने लगे, तो एक बुजुर्ग शख्स शमशाद हैदर के नजदीक आ कर समझाने वाले अंदाज में बोले, ‘‘खबरदार भी रहा कीजिए हैदर मियां.’’

‘‘इंसानियत के दुश्मनों से क्या डरना चचा. फिर मैं तो नेकी की राह पर चल रहा हूं.’’ हैदर ने मुसकरा कर जवाब दिया, तो बुजुर्ग थोड़ा उत्तेजित हो गए. वैसे उन का यह अंदाज हैदर के लिए तो कतई नहीं था.

उन्होंने हाथ नचा कर कहा, ‘‘अरे यही नेकियां तो जालिमों के दिलों में छाले पैदा करती हैं. अब, सलीम का ही मसला लो, उस का क्या कुसूर था कि उन जालिमों ने उसे मारापीटा और उस के घर को भी आग के हवाले कर दिया. यह तो शुक्र है कि उस बेचारे की किसी तरह जान बच गई. वो तो ऐलानिया तौर पर कह रहे थे कि किसी को ऐसा नहीं करने देंगे. उन्हें लगता है कि योग पर हिंदुस्तान की मजहबी मुहर लगी है.’’

‘‘यही तो गलतफहमी है चचा. हकीकत में तो योग मजहबी बंदिशों से आजाद कला और विज्ञान है.’’ हैदर बोले.

‘‘ठीक है हैदर मियां अब चलता हूं. तुम्हें समझाना मैं ने अपना फर्ज समझा.’’ कहते हुए बुजुर्ग वहां से रुखसत हो गए.

दरअसल इस तरह का योगाभ्यास करना या सिखाना हिंदुस्तान में तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन जिस जगह हैदर यह सब करा रहे थे वह आतंकपरस्त पाकिस्तान के प्रमुख शहर इस्लामाबाद की सरजमीं थी. कट्टरपंथी ताकतें इस के सख्त खिलाफ थीं. यही वजह थी कि लोगों को योग से जोड़ने की कोशिश करने वाले लाहौर के बाशिंदे सलीम के साथ कट्टरपंथियों ने एक दिन न केवल मारपीट की बल्कि उस के आशियाने को भी आग के हवाले कर दिया.

यूं तो हैदर भी कुछ ऐसे लोगों की धमकियों के शिकार थे, लेकिन इस के बावजूद भी वह न केवल खुद योग कर रहे थे बल्कि लोगों को भी सिखा रहे थे. उस रोज भी वह इस्लामाबाद शहर के उस ग्राउंड में लोगों को योग सिखाने पहुंच गए थे. योग से अनेक लोगों को लाभ हो रहा था, इसलिए उन के शिविर में लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही थी. कट्टरपंथी योग को भी हिंदुस्तानी देन समझते थे, इसलिए वे इस का विरोध कर रहे थे. जबकि शमशाद हैदर की फितरत अलग थी. वह नहीं मानते थे कि योग पर सिर्फ हिंदुस्तान का हक है. उन्होंने मजहबी मुकाम से ऊपर उठ कर विज्ञान के नजरिए से उसे देखा था.

पहले उन्होंने हिंदुस्तान, नेपाल, तिब्बत जा कर खुद योग की बारीकियों को सीखा था. फिर अपने मुल्क में आ कर लोगों को सिखाने लगे. शुरुआती दिक्कतों के बाद हजारों लोग उन से जुड़ गए और वह बन गए योगा टीचर. शमशाद हैदर ने कभी खुद भी नहीं सोचा था कि वह ऐसे मुकाम पर पहुंच जाएंगे. दरअसल मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे शमशाद हैदर पाकिस्तान के पंजाब सूबे के बाशिंदे थे. लेकिन वर्षों पहले उन के वालिदैन रावलपिंडी के नजदीकी शहर इस्लामाबाद में आ कर बस गए थे.

मर्गल्ला पहाड़ी के किनारे बसे करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस शहर को पाकिस्तान के महंगे शहर के रूप में जाना जाता है. इस शहर को पार्कों का नगर भी कहा जाता है. मशहूर पार्क फातिमा जिन्ना, जापानी पार्क, शकरपडि़आ यहीं पर हैं. यहां प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय भी है. सन 1992 के बाद की बात है. हैदर अपेंडिक्स के दर्द से पीडि़त हो गए. उन्होंने डाक्टरों को दिखाया. डाक्टरों द्वारा दी गई दवा से दर्द तो कुछ वक्त के लिए ठीक हो जाता था, लेकिन स्थाई समाधान नहीं हुआ. उस से वह तनावग्रस्त रहने लगे. वह आधाशीशी के दर्द से भी पीडि़त हो गए.

हैदर के लिए यह तकलीफों का दौर था. एक दिन उन्हें एक चिकित्सक ने बताया कि यदि वह अपने दिमाग और शरीर पर नियंत्रण कर लें, तो उन्हें समस्या से स्थाई राहत मिल सकती है. चिकित्सक ने सलाह तो दे दी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था. उन्होंने इस की पुरजोर कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सके. उन्हें किसी ने बताया कि योग एक ऐसी कला है, जिस के द्वारा इस तरह के मरीजों को लाभ मिल जाता है. पाकिस्तान में लोग योग को जानते तक नहीं थे. उन्होंने योग के बारे में थोड़ाबहुत पढ़ कर अपने स्तर से जैसा हो सकता था योग किया, इस से उन्हें फौरी राहत मिली, तो उन्होंने फैसला कर लिया कि वह न सिर्फ योग सीखेंगे बल्कि लोगों को भी सिखा कर उन्हें बीमारियों से निजात दिलाएंगे.

यह फैसला लेने के बाद उन्होंने योग विषय को पढ़ना शुरू किया. उन्होंने योग सीखने के लिए सब से पहले नेपाल और तिब्बत का रुख किया. वहां रह कर योग सीखा. इस से कुछ ही दिनों में उन्हें अपने अंदर ढेरों बदलाव महसूस हुए. योग के मामले में संस्कृति व आयुर्वेद प्रधान भारत देश आगे था. इस का एक बड़ा इतिहास था. यह बात उन्हें पता चल चुकी थी. हैदर की सोच थी कि इल्म जहां से भी मिले, उसे ले लेना चाहिए. नतीजतन उन्होंने योग की गहराइयों को जानने के लिए वीजा बनवा कर भारत का रुख किया. सन 2005 में वह विश्वविख्यात आध्यात्मिक गुरु सत्य नारायण गोयनका के नासिक के इगतपुरी स्थित सेंटर में आ गए.

भारत के अलावा कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड, बर्मा (अब म्यांमार), नेपाल समेत कई देशों में गोयनका के सेंटर थे. किसी पाकिस्तानी की योग में इस तरह रुचि देख कर वह भी हैरान हुए. उन्होंने उन्हें योग की बारीकियां पूरे मनोयोग से सिखाईं. नतीजतन एक दिन हैदर एक अच्छे योगी बन गए. पाकिस्तान आ कर हैदर चंद लोगों को योगासन सिखाने लगे. उन्हें लगा था कि यह बात किसी को नागवार नहीं गुजरेगी, लेकिन जब कट्टरपंथी लोगों को यह पता चला कि हैदर पड़ोसी मुल्क से योग सीख कर आए हैं तो उन के प्रति दिलों में नाराजगी बढ़ गई. कट्टरपंथियों के लिए जैसे यह नाकाबिले बरदाश्त था.

इंसान के पास ऐसा कोई हुनर नहीं होता कि वह लोगों के दिलों की बात जान कर हर किसी को खुश रख सके. हैदर को भी लगा कि सभी उन से संतुष्ट कैसे हो सकते हैं. परेशानी तब हुई जब एक दिन कुछ लोगों ने हैदर को बीच राह रोक लिया. पहली ही नजर में वह जान गए कि उन के इरादे नेक नहीं हैं. उन में से एक हैदर से मुखातिब हुआ, ‘‘सुना है आजकल लोगों को कुछ सिखा रहे हो मियां.’’

हैदर ने शांत अंदाज में जवाब दिया, ‘‘जी.’’ इतने में दूसरा शख्स सख्त लहजे में बोला, ‘‘जानते हो, तुम ऐसे मुल्क की बातें सिखा रहे हो जो हमारा सब से बड़ा दुश्मन है.’’

‘‘ऐसा नहीं है. लोगों को जो सिखा रहा हूं वह सिर्फ हिंदुस्तान की बात नहीं बल्कि सेहत को दुरुस्त रखने की एक कला है. अब आप ही बताओ कि अपनी सेहत को दुरुस्त रखना कौन सा गुनाह है?’’

‘‘जो भी हो सुधर जाओ हैदर मियां वरना यह तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा.’’ उन्होंने धमकी दी.

उन लोगों से ज्यादा उलझना हैदर ने ठीक नहीं समझा. इसलिए वह वहां से चुपचाप चले गए. लोग इस इतिहास को भी नहीं जानते थे कि योग के पुरातन गुरु पतंजलि का जन्म पाकिस्तान के ही मुलतान इलाके में हुआ था. हैदर ने कट्टरपंथियों के खौफ को अपने ऊपर काबिज नहीं होने दिया. उन्होंने ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी और अपने साथ अमन व सेहतमंद लोगों को जोड़ना शुरू कर दिया. धीरेधीरे उन्होंने एक समूह बना लिया. योग से लोगों को फायदा होना शुरू हुआ, तो वह हैदर की प्रशंसा करने लगे. एकएक कर के वह उन से जुड़ते चले गए.

समूह चीटियों का हो या इंसानों का, वह हमेशा ताकतवर होता है. हैदर के मामले में भी ऐसा ही हुआ. उन की पहचान बढ़ने लगी और वह छोटे पार्कों से ले कर बड़े ग्राउंड में जा कर योग सिखाने लगे. फिर उन्होंने इसे पेशे के तौर पर भी अपना लिया. जो लोग निजी तौर पर उन से योग सीखना चाहते थे, उन से उन्होंने फीस लेनी शुरू कर दी. हैदर से पुरुषों के अलावा कई महिलाएं व लड़कियां भी योग सीखती थीं. उन की शख्सियत एक अच्छे इंसान के रूप में थी. मोहब्बत का कोई वक्त, उम्र या जगह पहले से मुकर्रर नहीं होती. यह अपने आप हो जाया करती है.

योग सिखाने के दौरान ही हैदर की मुलाकात एक युवती शुमाइला से हुई. शुमाइला अस्थमा से पीडि़त थी और हर सुबह उन से योग सीखने आती थी. हैदर ने अपना ध्यान उन पर लगा दिया. शुमाइला को कुछ दिनों में बीमारी से निजात मिल गई. हैदर से वह खासी प्रभावित हुई. वक्त की रफ्तार के बीच दोनों ने एकदूसरे के दिलों पर कब चुपके से दस्तक दे दी इस का खुद उन्हें भी तब पता चला जब दीदार की चाह में उन की नजरें बेकरार रहने लगीं और दिलोदिमाग में बारबार एकदूसरे के खयाल आने लगे. मुलाकात के दौरान उन के दिल की धड़कनों में इजाफा हो जाता. चाहतों का अंदाज कभी बातों से तो कभी आंखों की गहराइयों से होता है.

आंखें अल्फाज नहीं देतीं, लेकिन बेजुबान हो कर भी बहुत कुछ बयां कर जाती हैं. बेकरारी बरदाश्त से बाहर होने लगी तो एक दिन दोनों ने इजहार भी कर दिया. दोनों के बीच मोहब्बत का पौधा खिला, तो हसरतों में ऐसा इजाफा हुआ कि उन्हें एकदूसरे में अपनी दुनिया नजर आने लगी. बेकरारी के करार के लिए दोनों परिवारों की रजामंदी से हैदर ने शुमाइला को सन 2012 में अपनी शरीक-ए-हयात बना लिया. अब उन की जिंदगी में जैसे खुशियों का दरख्त लहरा गया था. शुमाइला चूंकि खुद अच्छे से योग सीख चुकी थीं इसलिए उन्होंने भी महिलाओं को योग सिखाना शुरू कर दिया. योग को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने एक संस्था बना ली. फिर वक्त ने उन की ख्याति को एक बड़ा मुकाम बख्श दिया.

45 वर्षीय शमशाद की ख्याति मुसलिम योग अध्यापक के रूप में हो गई. उन की शोहरत योग गुरू के रूप में इतनी बढ़ गई कि अब संभ्रांत तबके के हजारों लोग उन से योग सीख रहे हैं. इन में कई विभागों के अधिकारी, इंजीनियर, डाक्टर, व्यवसाई व आम आदमी शामिल हैं. वह स्कूलों में जा कर भी बच्चों को योग की शिक्षा देते हैं. 10 हजार से ज्यादा छात्र उन से योग सीख कर आगे बढ़ रहे हैं. उन से योग सीखने वालों में राजनीतिज्ञ व पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के खिलाड़ी भी हैं. हैदर के शिष्यों में सिंध प्रांत चीफ मिनिस्टर सैयद कईम अली शाह और गवर्नर गुलाम मुस्तफा खार भी शामिल हैं.

इस्लामाबाद व लाहौर जैसे शहरों के पार्कों में मुसलिम लोगों का योग करना अब आम बात है. हजारों लोगों को योग सिखा कर पाकिस्तान में बड़ा नाम बन चुके अमनपसंद योगी शमशाद हैदर कहते हैं कि शह और मात व दुश्मनी का खेल कोई मजहब नहीं सिखाता. विज्ञान और प्रकृति कभी मजहबी नहीं होते. लोगों को मोहब्बत से रहना चाहिए. Social Story

—कथा पात्रों से बातचीत पर आधारित॒॒॒॒॒॒

 

True crime Story: भंग हुए सपनों के कंकाल

True crime Story: सुरजीत सिंह ने अपनी एकलौटी बेटी बरखा की शादी ब्रिटेन में रहने वाले एनआरआई जसबीर से इसलिए की थी ताकि उस की जिंदगी हंसीखुशी से कट सके. लेकिन ब्रिटेन पहुंचने पर उसे पति की सच्चाई पता चली तो…

रात का दूसरा पहर अपने अंतिम पड़ाव पर था. बावजूद इस के बिस्तर पर लेटी बरखा की आंखों से नींद कोसों दूर थी. नींद आती भी तो कैसे? एक एनआरआई लड़के के साथ अगले दिन उस की सगाई जो होने वाली थी. इसलिए उस की आंखों में नींद की जगह हसीन ख्वाबों ने डेरा जमा रखा था. वह पलकें बंद किए रहरह कर मुस्कराए जा रही थी. वह खुद भी नहीं चाहती थी कि वे ख्वाब उस की आंखों से दूर हों. आखिर उसे एक अजीब से आनंद की अनुभूति जो हो रही थी. समय कब रुकता है. वह तो अपनी गति से सरकता जा रहा था. रात का तीसरा और फिर चौथा पहर भी यूं ही गुजर गया. सुबह के उजाले ने दस्तक दे दी थी. अन्य दिनों की अपेक्षा उस दिन उस ने कुछ पहले ही बिस्तर छोड़ दिया.

उस के चेहरे पर ताजगी देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह रात भर सोई नहीं थी. चेहरे पर मुस्कराहट अब भी कायम थी. दिल उमंगों से भरा था और रोमरोम रोमांचित हो रहा था. बरखा रानी पंजाब के होशियारपुर जिले के रहने वाले सुरजीत सिंह की इकलौती बेटी थी. यही कारण था कि वह सब की लाडली थी. वह सुंदर तो थी ही साथ ही पढ़ने में तेज थी. उस का हंसमुख व चंचल स्वभाव सभी को पसंद था. उस ने संस्कारों का दामन सदा थामे रखा था, तभी तो कभी कोई ऐसा कदम उठाने की गलती नहीं की, जिस से किसी को उस के चरित्र पर अंगुली उठाने का मौका मिले.

यही कारण था कि मांबाप भी उस पर पूरा भरोसा करते थे. एमए करने के बाद बरखा टीचर बनना चाहती थी, पर उस के पिता सुरजीत सिंह नहीं चाहते थे कि बेटी शादी से पहले नौकरी करे. वह चाहते थे कि पढ़ालिखा कर उस की शादी अपनी ही बिरादरी के किसी ऐसे संस्कारी युवक से करें, जो विदेश में रह कर खूब कमाता हो ताकि बेटी सुखी रह सके. उन के कई रिश्तेदार और परिचित विदेश में रहते थे. उन से भी उन्होंने बरखा के लिए कोई एनआरआई लड़का देखने के लिए कह दिया था. कुछ दिनों बाद उन के एक रिश्तेदार ने उन्हें बरखा के लिए एक लड़का बताया. वह अच्छा पढ़ालिखा होने के साथ संस्कारी भी था और ब्रिटेन में रह कर अच्छा कमा रहा था.

उस युवक का नाम था जसबीर राम गिंडे. वैसे जसबीर भी पंजाब का ही रहने वाला था. वहीं से उस ने बीटेक की पढ़ाई की थी. फिर आईटी क्षेत्र में महारत हासिल कर के वह ब्रिटेन चला गया था. वहां आईटी औफिसर के पद पर उस की नौकरी स्काटलैंड के रायल बैंक में लग गई थी. 2 साल बाद जब वह वहां ठीक से स्थापित हो गया तो अपने परिवार को भी वहीं ले गया. उस के परिवार में मांबाप के अलावा एक छोटी बहन थी. उस ने विक्टरी लेन, रीड्सवुड में एक बंगला भी खरीद लिया था. बंगला खरीदने में उस के पिता ने भी अपनी जमीन बेच कर उस की आर्थिक मदद की थी.

जसबीर गिंडे 28 साल का हो गया था. सो उस के मातापिता चाहते थे कि जल्दी से उस के सिर पर सेहरा बांध दें. बेटे का घर बसाने के बाद वह बेटी के भी हाथ पीले करना चाहते थे. क्यों कि वह भी 26 साल की हो चली थी. वैसे वह बेटी की शादी पहले करनी चाहते थे. लेकिन उस ने शर्त रखी थी कि वह भाभी के आने बाद ही घर से विदा होगी. जसबीर शादी नहीं करना चाहता था, पर मांबाप की इच्छा के आगे उसे झुकना पड़ा. यह अक्टूबर, 2012 की बात है. पिता के कहने पर जसबीर शादी के उद्देश्य से परिवार सहित भारत आया था. पहली नजर में ही उसे बरखा की खूबसूरती भा गई.

उस के मातापिता व बहन को भी बरखा पसंद आ गई थी. वहीं बरखा व उस के मातापिता को भी जसबीर और उस का परिवार पसंद आ गया था. इसलिए उन का रिश्ता तय हो गया. उसी समय यह बात भी तय हो गई कि शादी यानी आनंदकारज की रस्म मार्च, 2013 में होगी. रिश्ता पक्का होने के बाद जसबीर और बरखा करीब एक सप्ताह साथ घूमेफिरे, ताकि एकदूसरे को और अच्छे से जान सकें. इस दौरान दोनों ही खुश और संतुष्ट थे. जसबीर को लगा कि बरखा उस के लिए एक सफल जीवनसाथी सिद्ध होगी. वहीं बरखा को भी लगा कि उस ने जिस तरह के युवक के साथ जिंदगी जीने का ख्वाब देखा था, जसबीर वैसा ही है.

करीब 15 दिन भारत में रह कर जसबीर परिवार के साथ ब्रिटेन लौट गया. जाते समय बरखा ने उस से मुस्करा कर कहा था, ‘‘मैं तुम्हारा सेहरा बांध कर आने का इंतजार करूंगी.’’

बरखा और जसबीर की फोन पर अकसर बातें होती रहती थीं. इसी तरह वक्त गुजरता गया. मार्च, 2013 का महीना भी आ गया. शादी की तारीख से एक सप्ताह पहले ही जसबीर का परिवार भारत आ गया. आते ही वह बरखा से मिला. दोनों ने घंटों साथ बिताए. इस के बाद बरखा की नींद गायब हो गई. नींद की जगह जसबीर की यादों ने ले ली थी. सगाई तय होने के अगले दिन दोनों गुरुग्रंथ साहिब के समक्ष गुरुद्वारे में सात फेरों के बंधन में बंध गए. एक सादा समारोह में शादी करने के बाद दोनों परिवारों की तरफ से एक बैंक्वेट हाल में रिसैप्शन दिया गया, जिस में करीब 700 लोगों ने शिरकत की.

घर से विदा होने के बाद वह जसबीर के पुश्तैनी मकान में पहुंची. वहां वह 2 दिन ठहरने के बाद मायके लौट आई. जसबीर के परिवार को ब्रिटेन लौटना था. इसलिए उन्होंने हनीमून भी नहीं मनाया था. उन्होंने तय किया था कि वे ब्रिटेन पहुंच कर ही हनीमून मनाएंगे. बरखा का पासपोर्ट तो बन चुका था, पर वीजा नहीं मिला था. इस कारण दोनों के बीच फिर से सात समुद्र की दूरी बन गई. पर उन के साथ कुछ हसीन यादें थीं. जिनके सहारे और मोबाइल पर बात कर के उन का वक्त कटता रहा.

इस दौरान जसबीर की बहन के लिए भी अच्छा लड़का मिल गया तो उस की सगाई भी तय कर दी गई. बहन की शादी से पहले ही जसबीर पत्नि का वीजा लगवाने की कोशिश करने लगा. आखिर 6 महीने बाद अगस्त में बरखा को वीजा मिल गया. वीजा मिलने के बाद जसबीर और उस का परिवार तो खुश था, बरखा की खुशी का भी ठिकाना नहीं था. वह भारत से ही दुलहन की तरह सजधज कर ब्रिटेन पहुंची. वहां एयरपोर्ट पर जसबीर उसे लेने आया. पति को देख कर उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह उस के गले लग गई. खुशी के कारण उस की आंखों से आंसू छलक आए.

बरखा जब जसबीर के विक्टरी लेन स्थित घर पर पहुंची तो उस के स्वागत में परिवार के सभी लोग खड़े मिले. मेन दरवाजे पर एक फीता बंधा था और पूरे घर को दुलहन की तरह सजाया गया था. बरखा ने जैसे ही फीता काटने की रस्म अदा की तो सभी ने ताली बजा कर, नाचगा कर खुशी का इजहार किया. पूरे परिवार ने दिल खोल कर बरखा का इस तरह स्वागत किया, जिस की कल्पना तक बरखा ने नहीं की थी. जसबीर ने उसे तोहफे की टोकरी देते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा नए घर में स्वागत है.’’ इस पर बरखा मंदमंद मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी. उन के इस अपनेपन में वह अपने वतन, अपने घरवालों की याद को भी बिसरा बैठी थी. वह अपने भाग्य पर इतरा रही थी.

बरखा के आने से घर का माहौल ही बदल गया था. उस के आने के चौथे दिन ही उस की ननद यानी जसबीर की छोटी बहन की शादी होनी थी. इस खुशी में बरखा के आने से चार चांद लग गए थे. बरखा ने इस तरह सारा घर संभाल लिया था, जैसे वह वहां बरसों से रह रही हो. ननद की शादी की तैयारी उस ने अपने हाथों से की. यहां तक कि ननद को सजाया भी उस ने ही. बहन की शादी के बाद तीसरे दिन जसबीर और बरखा हनीमून के लिए लंदन चले गए. दोनों ने एक सप्ताह खूब सैर की, खूब आनंद उठाया. इस दौरान जसबीर ने बरखा को ऊपरी तौर पर तो प्यार किया. उस की हर खुशी का खयाल भी रखा, पर उस ने पतिपत्नी के बीच बनने वाले सुख का अहसास उसे नहीं करवाया. बरखा ने भी इस बात पर ज्यादा गौर नहीं किया.

हनीमून से लौट कर दोनों खुश थे. फिर जसबीर अपनी नौकरी पर जाने लगा. अपनी नई जिंदगी की शुरुआत के साथ जसबीर अपने और बेहतर भविष्य की तलाश में भी लग गया. वह बैंक की नौकरी छोड़ कर लंदन स्थित फाइनेंशियल ओंबड्समैन सर्विस में नौकरी पाने की कोशिश करने लगा. बरखा का दिन घर के काम और सासससुर की देखभाल में बीत जाता, तो रात को उसे उम्मीद होती कि पति उसे औरतपन के सुख से अवगत कराएगा, पर ऐसा नहीं होता तो उसे थोड़ा दुख होता. पर उस ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया.

बरखा की कई बार रात को आखें खुलीं तो उस ने पति को किसी से मोबाइल पर बात करते हुए पाया. एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘आखिर इतनी रात को किस से बात करते हो? क्या कोई और लड़की है तुम्हारी जिंदगी में? अगर ऐसा है, तो मुझे साफसाफ बता दो.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल, मैं दोस्तों से बात करता हूं. दिन में तो काम की वजह से समय मिल नहीं पाता. इस कारण रात को तसल्ली से बात कर लेता हूं.’’ जसबीर ने सफाई दी.

‘‘लाओ, जरा अपना फोन दिखाओ.’’ बरखा ने सच्चाई जानने की कोशिश की.

जसबीर ने एक पल भी नहीं गंवाया, न ही किसी प्रकार की नानुकुर की. उस ने अपना मोबाइल पत्नी के हाथ में थमा दिया. बरखा ने काल डिटेल्स की जांच की. उस ने देखा कि जिस नंबर पर जसबीर ने रात को बात की थी, वह किसी अंगरेज युवक का था. उस के मोबाइल में किसी भी लड़की के नाम से कोई नंबर सेव नहीं था. इस से वह संतुष्ट तो हो गई, पर उसे यह बात खलती रही कि उसे जसबीर पर शक नहीं करना चाहिए था.

‘‘देख लिया.’’ जसबीर ने कहा, ‘‘मेरा भरोसा करो. मेरा किसी लड़की से किसी तरह का संबंध नहीं है. यकीन करो कि आज तक मैं ने कभी किसी लड़की को नजर भर कर देखा तक नहीं है. मेरी जिंदगी में आने वाली तुम पहली और आखिरी लड़की हो. मैं भरोसा दिलाता हूं कि कभी तुम्हारा भरोसा नहीं टूटने दूंगा.’’

जसबीर की बात से बरखा संतुष्ट थी. उसे पूरा यकीन हो गया था कि जसबीर सही बोल रहा है. एक शाम औफिस से आने के बाद जसबीर कहीं जाने के लिए तैयार होने लगा तो बरखा ने पूछ ही लिया, ‘‘कहां जा रहे हो?’’

‘‘अरे हां, मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गया. दरअसल, मैं एक क्लब का मेंबर हूं. वहां आज रात हम दोस्तों ने पार्टी रखी है. वहीं जाना है. मैं रात को घर नहीं आऊंगा. तुम चिंता मत करना.’’ जसबीर ने कहा. बरखा को जसबीर की बात पर कोई शक नहीं था. इस कारण उस ने ज्यादा पूंछताछ नहीं की. जसबीर तैयार हो कर चला गया.

रात में सासससुर को खाना खिलाने के बाद रसोई साफ करके बरखा भी सोने चली गई. सुबह उस के उठने से पहले ही कालबेल बजी तो उसी ने दरवाजा खोला, उस का पति लौटा था. बरखा ने महसूस किया कि जसबीर के चेहरे पर खुशी और संतुष्टी के भाव थे. वह बेहद उत्साहित दिख रहा था. उसने प्यार से बरखा को चूमते हूए कहा, ‘‘खूब मजा आया रात दोस्तों के साथ मस्ती कर के.’’

इस पर बरखा मुस्करा दी और उस के लिए रसोई में चाय बनाने चली गई. जसबीर के बंगले में 4 कमरे थे. एक ड्राईंगरूम और 3 बेडरूम. एक बेडरूम जसबीर के मातापिता के लिए था. दूसरा जसबीर और बरखा के लिए. तीसरा बेडरूम जसबीर की बहन का था. जो उस की शादी के बाद खाली रहता था. यह बेडरूम जसबीर व बरखा के बेडरूम के बराबर में ही था. 11 सितंबर, 2013 की रात करीब 2 बजे की बात है. प्यास महसूस होने पर बरखा की नींद टूटी तो उस ने पाया कि जसबीर बेड पर नहीं था. जबकि वह उस के साथ ही सोया था. उस ने सोचा कि शायद बाथरूम गया होगा. पानी पीने के बाद उस की आंख तुरंत नहीं लगी. वह करवटें बदलती रही. इसी बीच उसे तरहतरह की अवाजें सुनाई देने लगीं. वह चौंकी. उठ कर इधरउधर देखा. कहीं कोई नहीं था.

वह सोच में पड़ गई. फिर उस ने सोचा कि पति ही बाथरूम में स्पीकर औन कर के अपने किसी दोस्त से बतिया रहा होगा. क्योंकि वह दोस्तों से रात में ही बातें करता था. तभी उस की नजर मेज पर रखे मोबाइल पर गई. मोबाइल पति का ही था. वह चौंकी कि जब मोबाइल यहां है तो वो बाथरूम में किस से बातें कर रहा है. वह बिस्तर से उठी और बाथरूम का दरवाजा खटखटाने लगी. अंदर से जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उस ने दरवाजे का हैंडल घुमाया. दरवाजा खुल गया. दरवाजे के खुलते ही वह चौंक गई क्योंकि पति बाथरूम में था ही नहीं. उसे अब चिंता हुई कि आधी रात को वह चला कहां गया.

उस ने सासससुर के बेडरूम के नजदीक जा कर देखा. वहां भी दरवाजा बंद था और अंदर खामोशी छाई थी. अब वह खाली पड़े बेडरूम की तरफ गई. उस ने दरवाजे पर कान लगाए तो महसूस किया कि आवाजें उसी बेडरूम से आ रही थीं. अंदर से आने वाली आवाजें पुरुषों की ही थीं. एक आवाज को तो वह पहचान गई, वह उस के पति की थी. लेकिन दूसरी आवाज उसे अनजानी लगी. दोनों आवाजों का लहजा उसे अजीब लगा. उस ने दरवाजे के हैंडल को घुमाया. अंदर से लौक न होने की वजह से वह खुल गया. दरवाजा खोलते ही बरखा की नजर अंदर बेड पर पड़ी तो वह हैरान रह गई. उसे अपनी आंखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था.

बेड पर जसबीर के साथ उस की ही उम्र का एक भारतीय मूल का युवक और था. उस समय दोनों के शरीर पर कपड़े का नामोनिशान नहीं था. दोनों एकदूसरे से लिपटे हुए पतिपत्नी की तरह प्यार कर रहे थे. यह देख कर बरखा समझ गई कि उस का पति ‘गे’ है, इसीलिए वह उस से शारीरिक संबंध नहीं बनाता था. बरखा की हैरत का ठिकाना नहीं था. दिल तो किया कि उसी समय पति को जलील करे, पर इतनी रात में किसी तरह का बवाल खड़ा करना उस ने उचित नहीं समझा. उस ने सोचा कि एकांत के समय वह जसबीर से बात करेगी. बहरहाल वह आहत थी. उस के सारे ख्वाब पलभर में टूट कर बिखर गए.

हौले से दरवाजा बंद कर के वह अपने बेडरूम में आ कर लेट गई. उस की नींद तो उड़ चुकी थी. अब तो वीरान आंखों में ख्वाबों की जगह आंसुओं ने ले ली. वह रोती रही और अपनी किस्मत को कोसती रही. सुबह करीब 5 बजे बरखा ने बेडरूम का दरवाजा खुलने की आवाज सुनी तो हल्की सी आंख खोल कर देखा. जसबीर लौट आया था. वह आंख बंद कर सोने का नाटक कर ऐसे ही लेटी रही. जसबीर भी उस के बराबर में आ कर लेट गया. फिर जल्दी ही उसे नींद आ गई. बरखा ने 6 बजे के करीब बिस्तर छोड़ दिया. क्योंकि इसी समय उस के सासससुर भी उठ जाते थे. वह उन्हें बेड टी बना कर देती थी. उस ने बाथरूम में जा कर चेहरा देखा तो उस की आंखें रोरो कर लाल हो चुकी थीं. चेहरा भी भावशून्य दिख रहा था. उस ने अच्छे से चेहरा धोया और रसोई में चाय बनाने चली गई.

चाय बना कर जब वह सासससुर के बेडरूम में गई तो उस का चेहरा देख सास ने टोका, ‘‘क्या बात है बरखा, तुम्हारी आंखें क्यों लाल हैं?’’

‘‘पता नहीं, सारी रात जलन सी होती रही.’’ वह सच्चाई छिपा गई.

‘‘लापरवाही ठीक नहीं है. जसबीर को जगने दे. डाक्टर के पास चली जाना.’’ सास ने कहा.

‘‘ठीक है.’’ बरखा बोली. फिर वह अपने कामों में लग गई. करीब 9 बजे जसबीर सो कर उठा और तैयार हुआ. बरखा ने अन्य दिनों की तरह उस का नाश्ता लगा दिया. वह नाश्ता करने लगा. उसे यह अहसास नहीं हुआ कि बरखा ने उस का नंगापन देख लिया है. जबकि बरखा के अंदर एक तूफान उमड़ रहा था.

जसबीर बैंक चला गया. उस के जाने के बाद वह सारे दिन तरहतरह के खयालों में खोई रही.

रात में जब बरखा बेडरूम में पहुंची तो जसबीर ने टोका, ‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही. मां कह रही हैं कि तुम्हारी आंखें भी लाल थीं. सब खैरियत तो है?’’

बरखा ने लंबी सांस ली, ‘‘खैरियत ही तो नहीं है.’’

‘‘क्या हुआ?’’ जसबीर ने पूछा.

‘‘मैं ने तुम्हें नंगा ही नहीं देखा, तुम्हारा नंगापन भी देख लिया है.’’ उस ने गुस्से में कहा.

‘‘क्या कह रही हो, समझ नहीं आया. साफसाफ कहो.’’ जसबीर नहीं जानता था कि पत्नी किस तूफान को थामे है.

‘‘मुझे पता चल गया कि तुम मुझ से दूर क्यों रहते हो? मुझे यहां आए एक महीना हो गया, पर तुम ने मुझे पत्नी का सुख नहीं दिया.’’ बरखा का ज्वालामुखी धीरेधीरे फटने लगा था.

‘‘क्या पता चल गया?’’ जसबीर नासमझ बनते हुए बोला.

‘‘यही कि तुम ‘गे’ हो.’’ बरखा शेरनी की तरह दहाड़ी.

‘‘क्या, क्या कह रही हो?’’ अपनी सच्चाई सुन कर जसबीर हड़बड़ा गया.

‘‘अगर तुम में किसी औरत को रखने की काबिलियत नहीं है तो क्यों की मुझ से शादी?’’ वह गुर्राई.

‘‘बरखा, तुम समझने की कोशिश करो. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’ जसबीर मामला शांत करने की गरज से बोला.

‘‘अगर तुम ‘गे’ थे, तो पहले ही बता देना चाहिए था. मुझे गलतफहमी में रख कर शादी क्यों की?’’

‘‘मैं शादी नहीं करना चाहता था, मांबाप की जिद के कारण करनी पड़ी. डरता था कि मेरे गे होने का राज खुल गया तो उन पर क्या गुजरेगी. पर सच मानो बरखा, मैं तुम से प्यार करता हूं. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’ जसबीर ने उसे सफाई दी.

‘‘तुम्हारे इस तरह के प्यार के साथ जिंदगी नहीं गुजरेगी. तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद कर के रख दी.’’ वह शांत होने का नाम नहीं ले रही थी.

‘‘मैं खुद को बदल दूंगा बरखा, मुझे कुछ समय दो.’’ जसबीर गुनहगार की तरह गिड़गिड़ा रहा था.

‘‘तुम जिस आदत के आदी हो, वह कभी नहीं बदलती. तुम नपुंसक हो नपुंसक. अब मैं सब को बता दूंगी कि तुम गे हो.’’ वह चीखी.

नपुंसक की गाली सुन कर जसबीर भी खुद पर काबू नहीं रख पाया. वह भी चीखा, ‘‘अपनी हद मेें रहो वरना…’’

‘‘वरना क्या. हां, बताओ वरना क्या.’’ कहते हुए बरखा ने उसे बेड से धक्का दे कर नीचे गिरा दिया.

इस के बाद तो जसबीर जैसे होश ही खो बैठा, ‘‘अभी बताता हूं.’’ कहते हुए उस ने बेड के पास रखे वैक्यूम क्लीनर का पाइप खींचा और उस के गले में लपेट कर कसने लगा. साथ ही बड़बड़ाता रहा, ‘‘देखो, मैं क्या कर सकता हूं.’’

जसबीर ने उस का गला तब तक दबाए रखा, जब तक कि उस की सांस नहीं थम गई. कुछ ही देर में उस की गरदन एक ओर लुढ़क गई, तो जसबीर की आंखें फटी की फटी रह गईं. उस का गुस्सा उड़नछू हो गया. अब उसे अफसोस हुआ कि वह क्या कर बैठा. मगर अब हो भी क्या सकता था. वह घबराया. उस के मातापिता अपने बेडरूम में सो रहे थे. उस ने हलके से मेन गेट खोला और बाहर का जायजा लिया. उसे दूर तक कहीं कोई नजर नहीं आया. वह फटाफट बेडरूम में लौटा और पत्नी की लाश को घसीट कर लान में ले आया और वहां रखे इनसिनेटर (कूड़ेदान) में डाल कर ऊपर से कुछ सूखे पत्ते उस में डाल दिए.

इस के बाद वह थोड़ी दूर स्थित पेट्रोल पंप पर जा कर वहां से एक कैन में पेट्रोल भरवा लाया. वह पेट्रोल इनसिनेटर के अंदर उड़ेल कर आग लगा दी. उसी समय उस के बंगले के सामने वाले बंगले की खिड़की से एक महिला ने उसे यह सब करते हुए देख लिया था. उस ने सोचा कि वह कूड़े को आग लगा रहा है. जसबीर आग लगा कर बेडरूम में लौट आया और आगे के बारे में सोचने लगा. उधर सुबह उस के मातापिता सो कर उठे और उन्हें बेड टी नहीं मिली तो वह बरखा को आवाज लगाने लगे. जसबीर को इस का अहसास ही नहीं था. वह तो अपनी उलझन में उलझा था. उस की मां बरखा को खोजते हुए बेडरूम में आ गईं. उन्होंने जसबीर से पूछा, ‘‘बेटा, बरखा कहां है? आज चाय नहीं दी.’’

मां की आवाज सुन कर जसबीर हड़बड़ाहट में बोला, ‘‘वह तो रात को मुझ से झगड़ने के बाद घर छोड़ कर चली गई.’’

‘‘कहां गई? तू ने उसे जाने क्यों दिया? कहां होगी वह. इस परदेश में उस का हमारे अलावा कोई है भी नहीं.’’ जसबीर की मां घबरा गईं.

जसबीर खामोश रहा, तो वह फिर बोलीं, ‘‘यहां बैठा क्या कर रहा है? जा कर उसे खोज. पुलिस में रिपोर्ट लिखवा.’’

जसबीर होश में आया. उसे बचाव का कोई रास्ता नहीं सूझा तो वह तैयार हो कर वाल्सेल पुलिस स्टेशन जा पहुंचा और बरखा की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. गुमशुदगी दर्ज करने के बाद इंसपेक्टर सर्बजीत जोहल कुछ सहकर्मियों के साथ जसबीर के बंगले पर पहुंचे. वहां पड़ोसियों से पूछताछ करने पर सामने वाले बंगले में रहने वाली महिला ने बता दिया कि रात को उस ने जसबीर के बंगले में स्थित बगीचे में रखे इनसिनेटर से धुआं उठते देखा था. वहां से कुछ अजीब सी गंध भी आ रही थी.

इंसपेक्टर सर्बजीत ने बगीचे में रखे इनसिनेटर का ढक्कन उठाया, तो चौंक पड़े. उस में राख के बीच एक मानव कंकाल पड़ा था. संभवतया वह किसी महिला का था क्योंकि वहां पर कुछ गहने भी थे. सोने की चूडि़यां, ब्रेसलेट और अंगूठी. इस बारे में जब जसबीर की मां से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ये वही जेवर हैं, जो बरखा ने शादी के रोज से अब तक पहने रखे थे. इस से यही पता लगा कि वह कंकाल बरखा का ही था.

लाश की शिनाख्त हो गई, तो सवाल उठा कि घर में ही हत्या कर बरखा की लाश को जला दिया गया और घर में किसी को पता भी नहीं चला. जबकि सभी साक्ष्य बता रहे थे कि हत्या पूरी योजना के साथ की गई होगी. इस बारे में जसबीर से पूछा गया, तो वह बारबार झूठ बोलता रहा. इंसपेक्टर सर्बजीत को शक था कि जसबीर ने ही बरखा को जलाया होगा. उसे उसी समय हिरासत में ले लिया गया और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस स्टेशन में जब जसबीर से सख्ती से पूछताछ की गई, तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपनी नवविवाहिता बरखा की हत्या की थी. उस ने कहा कि यह सब गुस्से में हुआ. उस का इरादा उस की हत्या करने का नहीं था.

दूसरे दिन यानी 13 सितंबर, 2013 को जसबीर को वाल्वर हैमाट कोर्ट में पेश किया गया. साथ ही बरखा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी पेश की गई. रिपोर्ट में बताया गया कि बरखा की मौत दम घुटने के कारण हुई. जसबीर को कोर्ट से जेल भेज दिया गया. वहीं भारत में रहने वाले बरखा के मातापिता को घटना की सूचना दे दी गई. उस के पिता सुरजीत सिंह ब्रिटेन पहुंच गए और अंतिम संस्कार के लिए बेटी का कंकाल अपने साथ भारत ले आए.

कोर्ट में जसबीर के खिलाफ मुकदमा चला. कई पेशियां हुईं. डिफेंस केस के वकील डेविड नाथन ने कोर्ट में बताया कि सारी जांच के बाद यह नतीजा निकलता है कि जसबीर ने अपनी पत्नी की हत्या पूरी योजना के साथ की थी. उस ने जिस अमानवीयता से घटना को अंजाम दिया, उस के हिसाब से आरोपी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जसबीर लंबे समय से डिप्रेशन में रहता था. 2010-11 में उस ने अपने डिप्रेशन का इलाज करवाया था. इलाज करने वाले डा. श्रीनिवास ने कोर्ट में बताया कि जसबीर राम गिंडे ने उन से करीब 2 साल इलाज करवाया था. वह काम से संबंधित तनाव में रहता था.

डिप्रेशन के चलते उस ने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी. एक बार तो उस ने अपनी कलाई भी काट ली थी और एक बार फांसी लगाने की भी कोशिश की थी. कोर्ट में वह वीडियो भी दिखाई गई, जब बरखा शादी के बाद पहली बार जसबीर के बंगले में दाखिल हुई थी. वहीं जसबीर की बहन की शादी की वीडियो भी दिखाई गई. इस के विपरीत पुलिस ने उस पेट्रोल पंप की सीसीटीवी फुटेज भी पेश की, जिस में साफ दिख रहा था कि घटना वाली रात जसबीर ने वहां से पेट्रोल खरीदा था.

कोर्ट में दरजन भर गवाह पेश किए गए. इन में एक सरकारी वकील डेबी गोल्ड ने कोर्ट में बयान दिया कि जब जसबीर भारत में रहता था, तो वहां पंजाब में भी उस के कई गे दोस्त थे. ब्रिटेन में भी उस के कई एशियन और ब्रिटिश गे युवकों से शारीरिक संबंध थे. उस ने गे मेल फ्रेंड्स क्लब भी बना रखा था. गे क्लब में मेलमुलाकात के साथ आपस में देह संबंध भी बनाए जाते थे. उन्होंने बताया कि वह चाह कर भी अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध नहीं बना सकता था. इसलिए वह पत्नी से तलाक लेने की भी सोच रहा था. पर डर था कि इस के लिए उसे कारण बताना होगा. अगर वह गे होना कारण बताता तो उस के परिवार की भी बदनामी होती. कुल मिला कर वह एक झूठी मैरिज लाइफ बिता रहा था.

वहीं आरोपी जसबीर राम गिंडे ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कोर्ट में बयान दिया कि जब वह 12 साल का था, तब उसे पता चला कि वह समलैंगी प्रवृत्ति का है. विपरीत लिंगी की तरफ उस का कोई आकर्षण नहीं था. उस ने कभी अपने मातापिता को अपनी सच्चाई नहीं बताई थी. क्योंकि वे इसे सहन नहीं कर पाते. इसी कारण वह शादी नहीं करना चाहता था, पर मातापिता की इच्छा के कारण उसे मजबूर होना पड़ा था.

जसबीर ने आगे बताया कि लाख छिपाने के बाद भी आखिर पत्नी को उस की सच्चाई पता चल गई थी. इस पर 12 सितंबर, 2013 की रात बरखा ने उसे बहुत जलील किया. बात बढ़ गई तो गुस्से में अपना आपा खो दिया और हत्या का गुनाह कर बैठा. सारे गवाह और सुबूत जसबीर के खिलाफ थे. वहीं वह खुद अपना अपराध स्वीकार कर चुका था. इसलिए जज जान वार्नर ने उसे दोषी करार देते हुए कहा कि अभियुक्त ने बरखा के साथ क्रूरतापूर्वक व्यवहार किया था. उस की निर्दयता से हत्या कर दी. हद तो यह हो गई कि मानवीयता की हद पार करते हुए उस ने उस के शरीर को पेट्रोल डाल कर जला दिया. फिर झूठी रिपोर्ट लिखवाने पुलिस स्टेशन चला गया.

यानी उस ने योजना अनुसार घटना को अंजाम दिया. इसलिए अभियुक्त जसबीर राम गिंडे का यह अपराध क्षमा की श्रेणी में नहीं आता. 25 अप्रैल, 2015 को जज जान वार्नर ने अपना फैसला सुनाते हुए जसबीर राम गिंडे को 21 साल की सजा सुनाई. साथ ही यह भी कहा कि उस की जमानत की किसी अरजी पर कभी सुनवाई नहीं की जाएगी. वह समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. कोर्ट से पुलिस वैन में जेल जाते वक्त जसबीर राम गिंडे की आंखों के आंसू थम नहीं रहे थे. उसे अपने किए पर पछतावा था. True crime Story

 

Love Story: खूनी इश्क

Love Story: फूलजहां की जिद के आगे झुकते हुए फौजदार उस की शादी अच्छन से करने को राजी हो गए थे. लेकिन उस के भाइयों को न जाने उस की शादी पर क्यों ऐतराज था कि उन्होंने फूलजहां के न मानने पर उसे मार दिया. दिन भर की यात्रा पूरी कर के जिस तरह सूरज अपने घर लौटने को बेताब था, उसी तरह घर लौटने को बेताब पक्षी भी कोलाहल मचाते हुए अपने ठिकाने की ओर लौट रहे थे. उन का यह शोर वातावरण को बेहद खुशनुमा बना रहा था. लेकिन इस सब से बेखबर अच्छन चहलकदमी करते हुए गांव की ओर से आने वाली पगडंडी पर नजरें जमाए था.

उस के चेहरे के भावों से ही लग रहा था कि उसे किसी का बड़ी बेसब्री से इंतजार है. शायद उसी के इंतजार में कभी उस की नजर घड़ी पर जाती थी तो कभी गांव की ओर जाने वाली पगडंडी पर. आखिर इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं और फूलजहां आती हुई दिखाई दे गई. उसे आता देख कर अच्छन के चेहरे पर सुकून के भाव आ गए और होंठ मुसकरा उठे. उस ने फूलजहां के पास जा कर कहा, ‘‘फूल, आज आने में तुम ने बड़ी देर कर दी, तुम्हारा इंतजार करतेकरते मेरी आंखें पथरा गईं. मुझे तो लगने लगा था कि तुम आओगी ही नहीं.’’

‘‘अच्छू, मुझे आने में थोड़ी देर क्या हो जाती है, तुम बेचैन हो उठते हो. अब मैं तुम्हारी तरह लड़का तो हूं नहीं कि जहां मरजी हो, चल दूं. लड़की हूं न, 10 बहाने बनाने पड़ते हैं, तब कहीं जा कर घर से निकल पाती हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारी परेशानी समझता हूं, लेकिन मैं अपने इस दिल को कैसे समझाऊं, जो जब तक तुम्हें देख नहीं लेता, उसे चैन नहीं मिलता. इन आंखों को तुम्हारी मजबूरी कैसे बताऊं, जो हर वक्त तुम्हें देखने के लिए बेचैन रहती हैं.’’ अच्छन ने कहा.

उस के प्यार भरे ये बोल सुन कर फूलजहां के गाल लाल हो उठे और पलकें झुक गईं. उस ने शरमाते हुए पूछा, ‘‘अच्छू, एक बात पूछूं, तुम मुझे हमेशा इसी तरह प्यार करते रहोगे न? कभीकभी मुझे डर लगता है कि कहीं तुम मुझे बीच मंझधार में छोड़ कर किसी और के न हो जाओ?’’

‘‘फिर कभी ऐसी बातें मत करना फूल,’’ फूलजहां की इस बात पर अच्छन तड़प कर बोला, ‘‘मैं पूरी दुनिया को छोड़ सकता हूं, पर तुम से अलग नहीं हो सकता. अगर कभी तुम्हें लगे कि मैं तुम से दूर हो रहा हूं तो बेझिझक तुम मुझे अपने हाथों से जहर दे देना. मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं होगी, क्योंकि जिंदगी में मैं ने केवल तुम्हें चाहा है.’’

अच्छन आगे कुछ और कहता, फूलजहां ने आगे बढ़ कर उस के होंठों पर उंगली रख दी, ‘‘बसबस, बहुत हो गया. मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. मुझे तुम पर पूरा भरोसा है.’’

उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर का एक कस्बाथाना है परौर. इसी थाने के बम्हनी चौकी गांव में फौजदार अपने परिवार के साथ रहते थे. उन का काफी बड़ा परिवार था. पत्नी शकीना बेगम के अलावा 8 बेटे और 4 बेटियां थीं. बेटों में जगनूर, गुल हसन, मसनूर हसन, शब्बन, जाहिद, गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे, नूर हसन, नबी हसन और बेटियां आसीन, रियासीन, मरजीना तथा फूलजहां थीं. फौजदार के बेटे जैसेजैसे बड़े होते गए, काम पर लगते गए. इस समय उन के सभी बेटे दिल्ली में अलगअलग फैक्ट्रियों में नौकरी कर रहे हैं. बेटियां जैसेजैसे सयानी हुईं, उन्होंने उन की शादियां कर दीं. इस तरह उन की दोनों बड़ी बेटियों का निकाह हो चुका है. बेटों में केवल गुल हसन का निकाह हुआ है. वह अपनी पत्नी और बच्चों को ले कर दिल्ली में रहता है.

फौजदार की दोनों छोटी बेटियां मरजीना और फूलजहां भी विवाह लायक हो गईं थीं. फूलजहां सब से छोटी थी, इसलिए उस पर सभी का प्यार कुछ ज्यादा ही उमड़ता था. बड़े भाइयों ने तो उसे गोद में खिलाया था, इसलिए वह शुरू से ही उन की आंखों का तारा थी. यही वजह थी कि वह बोलने लायक हुई तो जैसे ही उस के मुंह से कुछ निकलता, उस के भाई झट उसे पूरी कर देते थे. इसी वजह से वह जिद्दी हो गई थी और अपनी हर बात मनवाने की कोशिश करती थी.

उस के घर से थोड़ी दूरी पर उस की फूफी का मकान था. उस के फूफा अकरम गांव में ही रह कर खेतीकिसानी करते थे. उन के एक बेटा अच्छन के अलावा 2 बेटियां थीं. धीरेधीरे अच्छन जवान हो चुका था. उसी दौरान ममेरी बहन फूलजहां से उसे प्यार हो गया था. रिश्ते में दोनों भाईबहन थे, बचपन से दोनों एकदूसरे के साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. लेकिन जवान होते ही उन की आंखों को एकदूसरे की सूरत भाने लगी थी, क्योंकि दिल ने दिल से प्यार की डोर जो बांध दी थी. वह प्यार की डोर जवान होने पर एकदूसरे को इतना करीब ले आई कि वे एकदूसरे से अलग होने की बात सपने में भी नहीं सोच सकते थे.

उम्र के 17वें बसंत में पहुंची छरहरी देहयष्टि वाली फूलजहां अब लड़कों से बातें करने में हिचकिचाने लगी थी. कोई लड़का उस की ओर देख लेता तो वह शरमा जाती. ये सारे बदलाव शायद जवान होने की वजह से आए थे. लेकिन अगर उस में कुछ नहीं बदला था तो वह था उस का जिद्दीपन और अच्छन के प्रति प्यार. जब भी अच्छन उस की आंखों के सामने होता, वह उसी को देखा करती. उस पल चेहरे पर जो खुशी होती थी, कोई भी देख कर भांप सकता था कि दोनों के बीच कुछ जरूर चल रहा है.

अच्छन को भी उस का इस तरह से देखना भाता था, क्योंकि उस का दिल भी तो फूलजहां के प्यार का मरीज था. दोनों की आंखों में एकदूसरे के लिए प्यार साफ झलकता था. वे इस बात को महसूस भी करते थे, लेकिन दिल की बात एकदूसरे से कह नहीं पा रहे थे. एक दिन फूलजहां अच्छन के घर पहुंची तो उस समय घर में वह अकेला ही था. फूलजहां को देखते ही उस का दिल तेजी से धड़क उठा. उसे लगा कि दिल की बात कहने का उस के लिए यह सब से अच्छा मौका है. अच्छन उसे कमरे में बैठा कर फटाफट 2 कप चाय बना लाया. चाय का घूंट भर कर फूलजहां ने दिल्लगी करते हुए कहा, ‘‘चाय तो बहुत अच्छी बनी है, तुम कहीं चाय की दुकान क्यों नहीं खोल लेते.’’

‘‘अगर तुम रोजना मेरी दुकान पर आ कर चाय पीने का वादा करो तो मैं आज ही दुकान खोले लेता हूं.’’ अच्छन ने फूलजहां की आंखों में झांकते उस की बात का जवाब उसी की अंदाज में दिया तो फूलजहां लाजवाब हो गई. दोनों इसी बात पर काफी देर तक हंसते रहे. अचानक अच्छन गंभीर हो कर बोला, ‘‘फूल, मुझे तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘कहो.’’

‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगी?’’

‘‘जब तक कहोगे नहीं कि बात क्या है, मुझे कैसे पता चलेगा कि अच्छा मानना है या बुरा.’’

‘‘फूल, मैं तुम से प्यार करता हूं. यह प्यार आज का नहीं, वर्षों का है, जो आज किसी तरह हिम्मत जुटा कर कह पाया हूं. ये आंखें सिर्फ तुम्हें देखना पसंद करती हैं और दिल को करार तुम्हारे पास रहने पर आता है. तुम्हारे प्यार में मैं इतना दीवाना हो चुका हूं कि अगर तुम ने मेरा प्यार स्वीकार नहीं किया तो मैं पागल हो जाऊंगा.’’

आखिर अच्छन ने दिल की बात कह ही दी, जिसे सुन कर फूलजहां का चेहरा शरम से लाल हो गया, पलकें झुक गईं. होंठों ने कुछ कहना चाहा, लेकिन जुबां ने साथ नहीं दिया. फूलजहां की हालत देख कर अच्छन बोला, ‘‘कुछ तो कहो फूल, क्या मैं तुम से प्यार करने लायक नहीं?’’

‘‘क्या कहना जरूरी है. तुम खुद को दीवाना कहते हो और मेरी आंखों में बसी चाहत को नहीं देख सकते. सच पूछो तो जो हाल तुम्हारा है, वही हाल मेरा भी है. मैं ने भी तुम्हें बहुत पहले से दिल में बसा लिया है. डरती थी कि कहीं यह मेरा एकतरफा प्यार न हो.’’

फूलजहां ने भी चाहत का इजहार कर दिया तो अच्छन खुशी से झूम उठा. उसे लगा कि सारी दुनिया की दौलत फूलजहां के रूप में उस की झोली में आ कर समा गई है. इस तरह दोनों के बीच प्यार का इजहार हो गया तो फिर एकांत में भी उन के मिलनेजुलने का सिलसिला शुरू हो गया. दोनों घंटों गांव के बाहर सुनसान में मिलने लगे. वे एकदूसरे पर जम कर प्यार बरसाते और हमेशा एकदूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते. जैसेजैसे समय बीतता गया, दोनों की चाहत बढ़ती और प्रगाढ़ होती गई.

दोनों ने अपने प्यार को जमाने की नजरों से बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन जल्द ही उन की चाहत के चर्चे गांव की गलियों में तैरते हुए फूलजहां के पिता फौजदार के कानों तक पहुंच गए. उस ने फूलजहां को इस बात के लिए डांटाफटकारा, लेकिन फूलजहां पर उन के डांटने का कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि उस ने साफसाफ कह दिया कि वह अच्छन से प्यार करती है और निकाह भी उसी से करेगी. इस के बाद उन के घर में काफी वादविवाद हुआ, लेकिन फूलजहां अच्छन से निकाह करने की अपनी जिद पर अड़ी रही.

उधर अच्छन को पता चला तो उस ने भी अपने घर वालों से अपने दिल की बात बता दी. ऐतराज करने के बजाय अच्छन की मां ने अपने भाई फौजदार से उस की बेटी फूलजहां का निकाह अपने बेटे अच्छन से कराने की बात कही. वह उस समय तो कुछ नहीं बोले, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पत्नी शकीना से बात की तो फूलजहां की जिद और अच्छन के घर वालों की सहमति देख कर वह भी मन मार कर फूलजहां का निकाह अच्छन से करने को तैयार हो गए.

फूलजहां से पहले मरजीना का निकाह होना था, क्योंकि वह उस से बड़ी थी. लेकिन फूलजहां ने जिद पकड़ ली कि पहले उस का निकाह किया जाए, मरजीना का बाद में. मांबाप हमेशा अपनी औलादों के सामने असहाय हो जाते हैं. फौजदार भी फूलजहां की जिद के आगे मजबूर हो गए. फिर क्या था, फूलजहां और अच्छन के निकाह की तैयारियां शुरू हो गईं. लेकिन जब फूलजहां अच्छन के निकाह की बात फूलजहां के भाइयों गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे और गुल हसन को पता चली तो न जाने क्यों उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी. 12 अगस्त को वे दिल्ली से शाहजहांपुर पहुंचे और फूलजहां को अच्छन से निकाह न करने के लिए समझाने लगे, लेकिन फूलजहां नहीं मानी. अब इस बात को ले कर घर में रोज कलह होने लगी.

16 अगस्त की रात 10 बजे फूलजहां तंग आ कर अपने प्रेमी अच्छन के घर चली गई, जिस के बाद उस के दोनों भाइयों का अपने पिता फौजदार से काफी झगड़ा हुआ. बेटों के डर से फौजदार अगले दिन यानी 17 अगस्त की सुबह पत्नी शकीना और बेटी मरजीना को साथ ले कर अपने रिश्तेदारी में चले गए. सुबह होने पर अच्छन के मामा मुख्तयार ने नन्हे और गुल हसन के पास खबर भिजवाई कि वे आ कर अपनी बहन फूलजहां को ले जाएं. दूसरी ओर गांव में फूलजहां और अच्छन के निकाह को ले कर पंचायत बैठ गई. 5 घंटे तक पंचायत चली, लेकिन पंच किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे.

गांव में हो रही बदनामी से नन्हे और गुल हसन काफी नाराज थे. दोनों शराब खरीद कर ले आए और घर में बैठ कर पीने लगे. नशा चढ़ा तो गांव में हो रही बदनामी को ले कर दोनों में बात हुई कि बदनामी की जड़ फूलजहां है, इसे खत्म कर देना ही ठीक है. नन्हे ने छुरी उठाई और गुल हसन के साथ अच्छन के घर पहुंच गया. वहां फूलजहां अच्छन के साथ बैठी मिली. नन्हे फूलजहां के बालों को पकड़ कर घसीटते हुए बाहर निकालने लगा तो वह भाइयों से कहने लगी, ‘‘मुझे क्यों मार रहे हो, मैं ने आप लोगों का क्या बिगाड़ा है?’’

फूलजहां भाइयों से भिड़ गई. इस छीनाझपटी में नन्हे के हाथ से चाकू छूट गया, जिसे फूलजहां ने उठा लिया. उस ने अपने बचाव में चाकू चलाया तो वह नन्हे के हाथ में लग गया. गुल हसन ने किसी तरह उस के हाथ से चाकू छीन लिया और उसे घसीट कर अच्छन के घर से बाहर ले आया. दोनों भाई अच्छन को गालियां दे रहे थे. मौका देख कर अच्छन जान बचा कर भाग गया. गांव वालों ने दोनों भाइयों के सिर पर खून सवार देखा तो दुबक गए. उन्हें रोकने की किसी की हिम्मत नहीं हुई. दोनों भाई फूलजहां को घसीट कर अपने घर के पास ले आए और उसे जमीन पर पटक दिया. नन्हे ने उसे दबोच लिया तो गुल हसन छुरी से उस का गला इस तरह काटने लगा, जैसे किसी जानवर का काटा जाता है.

फूलजहां तड़पी, चिल्लाई, लेकिन बेदर्द भाइयों को उस पर बिलकुल रहम नहीं आया. गांव वाले भी अपनी आंखों के सामने सब कुछ होता देखते रहे, लेकिन आगे नहीं आए. कुछ ही पलों में फूलजहां की मौत हो गई. गुल हसन ने फूलजहां का सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया. इस के बाद उसे एक कपड़े में बांध कर पूरे गांव में घूमे. लोग डर से अपने घरों में दुबक गए. इसी बीच किसी ने पुलिस के आने की बात कही तो दोनों भाई गांव छोड़ कर भाग गए.

दरअसल, दिनदहाड़े नृशंस हत्या होते देख गांव के चौकीदार महेश ने परौर थाने जा कर घटना की सूचना दे दी थी. घटना काफी संगीन थी, इसलिए थानाप्रभारी राजेश सिंह ने घटना की सूचना तुरंत उच्चाधिकारियों को दी और खुद पुलिस बल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर लाश का जायजा लेने के बाद उन्होंने गांव वालों से पूछताछ शुरू कर दी. इसी बीच सीओ जलालाबाद आदेश कुमार त्यागी भी पहुंच गए. पूछताछ के बाद थानाप्रभारी राजेश सिंह ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भिजवा दिया.

थाने लौट कर राजेश सिंह ने चौकीदार महेश को वादी बना कर गुल मोहम्मद उर्फ नन्हे और गुल हसन के खिलाफ फूलजहां की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के बाद अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए छापे मारे जाने लगे. परिणामस्वरूप अगले दिन शाम 5 बजे नन्हे उन की पकड़ में आ गया. उस के  पास से हत्या में प्रयुक्त छुरी बरामद हो गई. 19 अगस्त को पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इसी दिन फूलजहां की बिना सिर की लाश का पोस्टमार्टम हुआ. पोस्टमार्टम के बाद लाश गांव वालों के सुपुर्द कर दी गई. गांव वालों ने ही गांव से कुछ दूरी पर बने कब्रिस्तान में बिना सिर वाली फूलजहां की लाश को दफना दिया.

20 अगस्त को राजेश सिंह ने दोपहर को जुआ मोड़ से गुल हसन को गिरफ्तार कर लिया. उसे थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि हत्या करने के बाद उस ने कपड़े में बंधे सिर को मोहनपुर गांव के पास रामगंगा के घाट पर जा कर पानी के तेज बहाव में फेंक दिया था. इस के बाद नाव से उस पार कटरी में जा कर छिप गया था. 19 अगस्त की रात वह ससुराल पहुंचा तो ससुराल वालों ने कहा कि इस तरह भागते रहने से अच्छा है कि वह थाने जा कर हाजिर हो जाए. इस के बाद 20 अगस्त की सुबह वह थाने जा रहा था, तभी जुआ मोड़ पर पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

राजेश सिंह ने फूलजहां के कटे सिर को बरामद करने के लिए रामगंगा में एक दरजन गोताखोरों को उतारा, लेकिन फूलजहां का कटा सिर बरामद नहीं हो सका. अगले दिन गुल हसन को भी सीजेएम की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi crime story: इज्जत लुटा कर इलाज

Hindi crime story: तंत्रमंत्र की दुकानदारी   करने वाले ठग तांत्रिकों को पता होता है कि इज्जत लुटा कर भी जल्दी कोई औरत विरोध में खड़ी नहीं होगी, क्योंकि उसे बदनामी का डर होता है. इसी का वे फायदा भी उठाते हैं.

परिवार में किसी एक पर मुसीबत आ जाए तो इसे सहज रूप में लिया जा सकता है, लेकिन अगर पूरा परिवार ही किसी न किसी परेशानी से ग्रस्त हो तो दिमाग बहुत दूर तक की सोचने लगता है. इंसानी फितरत है कि परेशानी में आदमी जो भी सोचता है, उलटा ही सोचता है.

वीना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. परेशानी आने पर उस के दिमाग में भी उलटेसीधे विचार आने लगे थे. उसे लगने लगा था कि हो न हो, किसी ने ‘कुछ करा दिया है’. उस के दिमाग में यह बात गहरे तक बस गई थी. इस के बाद आसपड़ोस के लोगों से वह कहने लगी थी कि ‘किसी ऐसे तांत्रिक के बारे में बताओ, जो अपनी अलौकिक शक्तियों से उस के परिवार को परेशानियों से निजात दिला सके.’

कोई 7-8 साल पहले वीना की शादी महेश से हुई थी. 6 और 4 साल के उस के 2 बेटे थे. चंडीगढ़ के सब से बड़े कस्बे मनीमाजरा में किराए का मकान ले कर वह परिवार के साथ रहती थी. महेश का चावलों का कारोबार था. कुछ दिनों पहले तक इस परिवार में सब ठीकठाक था. वीना खुद भी सेहतमंद थी और उस के दोनों बच्चे तथा पति भी स्वस्थ थे. महेश का स्वास्थ्य ठीक था तो वह काम भी डट कर करता था. लिहाजा मेहनत के हिसाब से कमाई भी होती थी. परिवार में सब खुश थे.

लेकिन हालात ने करवट बदली तो सब बिगड़ता चला गया. वीना और उस के परिवार की खुशियों को जैसे किसी की नजर लग गई. बिना किसी बीमारी के ही महेश के स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी. इस का सीधा असर उस के काम पर पड़ा, आमदनी घट गई. इसी के साथ दोनों बच्चे भी अकसर बीमार रहने लगे. वीना और महेश को तीसरे बच्चे की चाहत नहीं थी. उसी परिस्थिति में लाख एहतियात बरतने के बावजूद वीना गर्भवती हो गई. पांव भारी हुए तो उस का भी स्वास्थ्य गिरने लगा. गर्भपात कराने के लिए वह डाक्टर के पास गई तो उस के स्वास्थ्य को देख कर डाक्टर ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. फलस्वरूप गर्भ 7 महीने का था.

इस सब से वीना के दिमाग में एक बात बैठ गई कि उन से जलने वाले किसी आदमी ने उस के परिवार पर ‘कुछ’ करवा दिया है. ऐसे में उठतेबैठते हर किसी से एक ही बात कहती थी कि अगर पहचान का कोई तांत्रिक हो तो बताओ. एक दिन वीना की पड़ोसन राधा ने उसे बताया, ‘‘हां, एक तांत्रिक है, जिसे सब बंगाली बाबा कहते हैं. वह मनीमाजरा के मढ़ीवाला टाउन में रहता है. भला और होशियार आदमी है. तुम एक बार उस के पास चली जाओ, समझो सारी मुसीबतों से छुटकारा मिल गया. उस का इलाज थोड़ा अजीबोगरीब जरूर है, मगर है पक्का. रूहानी ताकतों का मालिक है वह बंगाली बाबा.’’

वीना हैरानी से आंखें फाड़े राधा की बातें सुनती रही. दूसरी ओर राधा तांत्रिक का बखान करती जा रही थी, ‘‘यह हम लोगों के लिए संयोग की ही बात है कि उस जैसा पहुंचा हुआ तांत्रिक मनीमाजरा में रह रहा है. पैसे का भी उसे कोई लालच नहीं है. जो चाहो दे दो. न मन हो तो कोई बात नहीं. कुछ भी नहीं कहता.’’

राधा की बातों से वीना काफी प्रभावित हुई. उस समय वीना मात्र 26 साल की थी. अभी तो पूरी जिंदगी उस के सामने पड़ी थी. परेशानियों में घिरी जिंदगी वैसे ही बेमजा हो जाती है. यह सोच कर उस ने राहत महसूस की कि अब तांत्रिक बंगाली बाबा की बदौलत उस की सारी मुसीबतें दूर हो जाएंगी. शाम को महेश घर आया तो वीना ने उसे तांत्रिक के बारे में बता कर उस के डेरे पर चलने को कहा. लेकिन महेश ने मना करते हुए कहा, ‘‘ऐसे लोगों के पीछे समय और पैसा मत बरबाद करना. ये लोग ठग होते हैं. बिना मतलब तुम्हें किसी चक्कर में डाल देंगे.’’

वीना को पहले से ही पता था कि उस का पति नास्तिक है. तंत्रमंत्र, पूजापाठ, साधुसंतों पर उसे जरा भी विश्वास नहीं है. वह था भी अडि़यल स्वभाव का. दूसरे की बात जल्दी नहीं मानता था. इसलिए वीना ने इस बारे में उस से और ज्यादा बात करना ठीक नहीं समझा. अगले दिन शाम को वह राधा के घर पहुंची और उस से अपने साथ तांत्रिक के पास चलने को कहा. राधा उस समय घरेलू कामों में व्यस्त थी. इसलिए उस ने वीना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम अकेली ही चली जाओ. तांत्रिक बुजुर्ग आदमी है, फालतू बातें नहीं करता. तुम जरा भी मत घबराओ, कहीं कोई परेशानी नहीं होगी. फिर ऐसी पाक जगहों पर कोई सिफारिश थोड़े ही चलती है. आज तुम अकेली ही चली जाओ, अगली बार मैं तुम्हारे साथ चलूंगी.’’

उस समय शाम के 5 बज रहे थे. राधा के मना करने पर निराश हो कर वीना पहले अपने घर गई. वहां से दोनों बच्चों को साथ ले कर 6 बजे तांत्रिक बंगाली बाबा के यहां जा पहुंची. तांत्रिक बुजुर्ग आदमी था. शक्लसूरत से भी शरीफ लग रहा था. दाढ़ी के पीछे उस का गंभीर चेहरा उस के रूहानियत से जुड़ा होने का आभास दिला रहा था.

तांत्रिक का व्यक्तित्व देख कर वीना को लगा कि निश्चित उस के परिवार पर आई मुसीबतें दूर हो जाएंगी. तांत्रिक के दरबार में उस समय 5-6 लोग बैठे थे. उन के सामने वह तांत्रिक आसन पर बैठा था. वह आए लोगों को बारीबारी से बुलाता, उन की समस्याएं सुनता और झाड़फूंक करने के बाद इलायची का प्रसाद दे कर कहता, ‘‘फिर कोई परेशानी आए तो सीधे मेरे पास आ जाना. वैसे तुम्हें आने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इतने में ही ठीक हो जाएगा.’’

इस के बाद वह उसे विदा कर देता. वीना दोनों बच्चों के साथ बैठ कर अपनी बारी का इंतजार करने लगी. उस ने बच्चों को पहले ही सहेज दिया था, इसलिए वे खामोश बैठे थे. एक बार भी नजर उठा कर तांत्रिक ने उस की ओर नहीं देखा था. जो आदमी नंबर आने पर उस के पास पहुंचता था, वह उस से भी नजरें मिला कर बात नहीं करता था. कुछ बोलता भी तो बस नीचे देखते हुए बुदबुदाने के स्वर में बोलता था.

नंबर आने पर वीना तांत्रिक के सामने जा कर बैठ गई. दोनों बच्चे उस के अगलबगल बैठ गए. तांत्रिक ने नजरें झुकाए हुए ही वीना के पैरों की ओर देखा, फिर धीरेधीरे नजरें ऊपर करते हुए उस के चेहरे पर गड़ा दीं. वीना काफी खूबसूरत थी, लेकिन उसे एक बार भी यह नहीं लगा कि तांत्रिक उस की खूबसूरती को निहार रहा है. उस ने इस सब को एकदम सहज रूप से लिया. वीना ने अपनी समस्या बताने के लिए जैसे ही मुंह खोला, तांत्रिक ने हाथ के इशारे से उसे कुछ कहने से रोक दिया. उस के चेहरे पर अपनी नजरें जमाए हुए ही उस ने कहा, ‘‘मेरी बच्ची, तुम्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है.

मैं तुम्हारी आंखों में ही सब कुछ देख रहा हूं. अभी यह जान लेना थोड़ा मुश्किल है कि इसे किस ने भेजा है, मगर हकीकत पूरी तरह मेरे सामने है. उस ने भीतर से तुम्हें पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया है. यह शैतानी ताकत तुम्हारे जरिए तुम्हारे परिवार को बरबाद करना चाहती है.’’

वीना ने तो पहले ही से यह बात अपने मन में बैठा रखी थी. इसलिए हैरान होते हुए वह बोली, ‘‘यह बात एकदम सही है. मेरे परिवार में एकएक कर के सभी धीरेधीरे परेशानियों में घिरते जा रहे हैं. आप के पास मैं आई ही अपनी इसी परेशानी के लिए हूं.’’

‘‘मुझे तुम्हारी इस बरबादी का जिम्मेदार तुम्हारे भीतर बैठा दिखाई दे रहा है.’’

‘‘लेकिन बंगाली बाबा, किस ने यह सब किया या करवाया है? वह कौन सी ताकत है, जिस ने मुझे अपने काबू में कर रखा है?’’ वीना ने भयभीत होते हुए पूछा.

‘‘मैं पहले ही तुम से कह चुका हूं, मेरी बच्ची कि करने या करवाने वाले की बाबत अभी नहीं बताया जा सकता. वक्त आने पर इस बात का खुलासा भी कर दूंगा.’’ तांत्रिक ने कहा.

इस के बाद अपनी दोनों आंखें बंद कर के दोनों हाथ ऊपर उठा कर मंत्र पढ़ने के अंदाज में बुदबुदाने लगा. कुछ देर यही क्रम चलता रहा. उस के बाद आंखें खोल कर बोला, ‘‘जिस ने तुम्हें काबू में कर रखा है, वह एक बदजात जिन्न है. उस के बारे में तुम्हें बाद में खुल कर बताऊंगा. बहरहाल इस सब की तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं तुम्हारे शरीर के अंदर ही इस जिन्न को मसलमसल कर मार दूंगा. उस का वजूद मिटते ही तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी. यह सब करने से पहले तुम्हें एक बात बता देना चाहता हूं.’’

‘‘जी बंगाली बाबा, बताइए. मैं आप की हर बात मानूंगी. बस आप मेरे परिवार पर आई. मुसीबतों को हमेशा के लिए खत्म कर दीजिए.’’

‘‘उन्हें तो खत्म समझो. देखो, अब मैं जो तुम्हें बताने जा रहा हूं, उसे गौर से सुनना.’’ तांत्रिक ने कहा.

‘‘जी बाबा.’’

‘‘मैं अपने काम की किसी से कोई फीस तो लेता नहीं. रोटी कमाने के मेरे पास दूसरे तमाम काम हैं. हां, तुम्हारा यह जो काम मैं करने जा रहा हूं, इस की फीस जरूर लेता हूं.’’

‘‘जी बाबा.’’

‘‘दरअसल, यह जो काम मैं करने जा रहा हूं, इस के लिए मुझे कई बार वह सब भी करना पड़ता है, जो करने को मेरा मन गवाही नहीं देता. लेकिन न करूं तो मेरी पनाह में आया आदमी ठीक नहीं होगा. इसलिए करने से पहले मैं अपने किए की खुदा से माफी मांग लेता हूं और अपनी पनाह में आए आदमी से उम्मीद करता हूं कि पूरी तरह ठीक हो जाने पर वह अपनी हैसियत के मुताबिक 11, 21 या फिर 31 गरीबों को भरपेट खाना खिलाए. इस काम की मैं तुम से भी यही फीस चाहता हूं मेरी बच्ची.’’

‘‘बिलकुल बंगाली बाबा. बस एक बार सब ठीक काम हो जाए. मैं वैसा ही करूंगी, जैसा आप कहेंगे.’’ वीना ने कहा.

अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ फेर कर तांत्रिक ने कहा, ‘‘दूसरी बात यह कि तांत्रिक क्रियाएं बहुत नाजुक होती हैं. जैसा मैं कहूं, तुम्हें वैसा ही करना होगा. अगर तुम इस क्रिया को आज ही शुरू करवाना चाहती हो तो अपने बच्चों को घर छोड़ कर अकेली आ जाओ. बच्चों की मौजूदगी में वे तांत्रिक क्रियाएं नहीं की जा सकतीं, जिन्हें इस मामले में अमल में लाना है.’’

तांत्रिक की हर बात पर वीना हां में हां करती जा रही थी. इस के बाद उस के कहे अनुसार वह बच्चों को अपनी एक परिचिता के यहां छोड़ आई. उस के लौट कर आने के बाद तांत्रिक ने बेझिझक कहा, ‘‘अंदर वाले कमरे में पलंग बिछा है, जा कर उस पर एकदम सीधी लेट जाओ.’’

वीना पूरी तरह तांत्रिक के कहे में आ चुकी थी. शक की कोई गुंजाइश उसे नजर नहीं आ रही थी. इसलिए बिना किसी झिझक के वह अंदर जा कर पलंग पर लेट गई. तांत्रिक बाहर बैठा क्या कर रहा है, उसे पता नहीं था. करीब आधे घंटे तक वह उसी तरह लेटी रही.

इस के बाद तांत्रिक आया तो वह कुछ बुदबुदा रहा था. उस के हाथ में नीले रंग के धागों में बंधी ताबीजें थीं. उस में से एक ताबीज उस ने वीना के गले में डाल दी. बाकी ताबीजें उस के हवाले करते हुए बोला, ‘‘इन्हें अपने पति और बच्चों को पहना देना.’’

‘‘जी बंगाली बाबा.’’ कह कर वीना ने ताबीज ले कर माथे से लगा लिए.

इस के बाद, ‘‘ये प्रसाद खा लो.’’ कह कर तांत्रिक ने एक छोटी इलायची वीना के मुंह में डाल दी और बाहर चला गया.

इलायची चबाते ही वीना पर नशा सा छाने लगा. उसे लगने लगा, वह मदहोश होती जा रही है. तभी तांत्रिक अंदर आया और गौर से वीना को देखने लगा. इस बार भी वह पहले की ही तरह कुछ बुदबुदा रहा था. फिर वह उस की बगल में लेट गया. नशे जैसी स्थिति में होने की वजह से चाह कर भी वीना उस की किसी हरकत का विरोध नहीं कर सकी. वीना को सब दिखाई दे रहा था, उस के साथ क्या किया जा रहा है, इस का भी उसे आभास हो रहा था, लेकिन वह किसी भी तरह का विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. इलायची में कोई नशीली चीज खिला कर तांत्रिक ने उसे बेबस कर दिया था. अंत में उस ने अपनी मनमरजी कर डाली.

मुंह काला करने के बाद तांत्रिक ने कहा, ‘‘इसी तरह तुम्हें लगातार 3 दिनों तक अकेली आना होगा. 4 दिनों की क्रिया के बाद जिन्न खुदबखुद खत्म हो जाएगा. जिन्न मर गया तो समझो तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो गईं.’’

वीना ने उठ कर कपड़े पहने और धीमेधीमे कदमों से अपनी परिचिता के यहां से बच्चों को ले कर घर आ गई. जो कुछ उस के साथ हुआ था, उसे सब याद था. इस सब से अब उसे आत्मग्लानि होने लगी थी, साथ ही तांत्रिक पर गुस्सा आ रहा था. सोचने लगी, ‘यह इंसान है या पिशाच, जिस ने 7 महीने की गर्भवती का भी लिहाज नहीं किया.’

तांत्रिक के बारे में सोचसोच कर वीना की कनपटियां सुलगने लगीं. पति काम से लौटा तो तबीयत खराब होने का बहाना कर के चुपचाप लेटी रही. पति से इस बारे में बात करना उसे ठीक नहीं लगा. मर्दों का क्या भरोसा, बात का बतंगड़ बना दें. गलती खुद उसी की थी, जो कथित रूहानी ताकतों से इलाज कराने अपनी मरजी से तांत्रिक के पास चली गई. पति ने उसे इस सब के लिए पहले ही मना किया था. जैसेतैसे वीना ने वह रात गुजारी. रात भर में वह जितना अपनेआप को कोस सकती थी, कोसती रही. इस के साथ मन ही मन वह निर्णय भी लेती रही कि ढोंगी तांत्रिक बंगाली बाबा को उस के किए की सजा जरूर दिलाएगी.

अगले दिन जब महेश काम पर चला गया तो वीना फिर तांत्रिक के बारे में सोचने लगी. उस ने सोचा कि अगर वह चुप रहती है तो तांत्रिक आगे भी इसी तरह अन्य औरतों को खराब करता रहेगा. मैला तन ले कर वीना अपने पति को धोखा नहीं देना चाहती थी. काफी कशमकश के बाद उस ने सोच लिया कि अंतत: जो होगा, देखा जाएगा. पहली जरूरत तांत्रिक को सजा दिलाने की है. उस ने तांत्रिक के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने के लिए सोचा, मगर अकेली थाने जाने की हिम्मत नहीं हुई. लिहाजा इस बारे में रायमशविरा करने वह अपनी जेठानी के घर चली गई.

जेठानी चंडीगढ़ के सेक्टर 20 में रहती थी. देवरानी के मुंह से तांत्रिक की घिनौनी करतूत सुन कर वह हैरान रह गई. वह उसे तत्काल समाजसेवी परमजीत कौर और भजन कौर के पास ले गई. दोनों ने सारी बातें सुन कर सुझाव दिया कि आज शाम वीना फिर तांत्रिक के पास जाएगी. वे तांत्रिक को रंगेहाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले करना चाहती थीं. वे तांत्रिक बंगाली बाबा की घिनौनी करतूत की चश्मदीद गवाह भी बनना चाहती थीं. फिर ऐसा ही किया गया. उसी रात 8 बजे वीना को बंगाली बाबा के ‘दरबार’ में भेजा गया. परमजीत कौर और भजन कौर कुछ अन्य लोगों के साथ बाहर चौकन्नी हो कर खड़ी थीं.

पहले दिन वाली प्रक्रियाएं करने के बाद बंगाली बाबा ने वीना के मुंह में इलायची डाली. वीना ने उस की आंख बचा कर झट से इलायची उगल दी. इस के बाद बंगाली बाबा तंत्रमंत्र की नौटंकी करते हुए जैसे ही उस की बगल में लेटा, उस ने शोर मचा दिया. बस फिर क्या था, महिलाओं ने तेजी से भीतर घुस कर तांत्रिक को रंगेहाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया. वीना के बयान के आधार पर भादंवि की धाराओं 356 व 341 के तहत थाना मनीमाजरा में तांत्रिक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया.

जब इस बात की जानकारी डीएसपी (ईस्ट) विजयपाल सिंह को मिली तो वह भी थाने पहुंच गए. उन्होंने इस मामले की जांच इंसपेक्टर धनराज शर्मा को सौंपी गई. तांत्रिक को रात भर हवालात में रखा गया. अगले दिन उसे अदालत में पेश कर के उसे पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. अभी तक पूछताछ में तांत्रिक यही कह रहा था कि वह काले इल्म का जबरदस्त जानकार है. इस इल्म के तहत जिन्नों को इसी तरह भगाया जाता है. चूंकि प्रक्रिया में विघ्न पड़ गया है, इसलिए वीना के अलावा वे लोग भी बरबाद हो जाएंगे, जिन्होंने उस का अमल तोड़ने की जुर्रत की है. काले इल्म से उस ने कुछ पुलिसकर्मियोंको भी बरबाद करने की धमकी दी. लेकिन जब पुलिस ने उस पर सख्ती की तो वह सारी हेकड़ी भूल कर असलियत बताने को तैयार हो गया.

उस की उम्र 50 साल के आसपास थी. उस का नाम था शाहिद तौफीक. वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के कस्बा मलिहाबाद का रहने वाला था. उस के परिवार में बीवी मल्लिका खातून के अलावा 4 बेटे थे. कामधंधे की तलाश में वह 20 साल पहले अकेला ही चंडीगढ़ आया था. काम जम जाने के बाद वह अपने परिवार को भी साथ ले आया था. धीरेधीरे उस ने अपनी बीवी और चारों लड़कों को भी काम से लगा दिया था. इस से उस की अच्छीखासी कमाई होने लगी थी. सब कुछ बहुत बढि़या चल रहा था कि अचानक शाहिद तौफीक तांत्रिक बन गया. इस के बाद वह अकेला ही रहने लगा. पहले वह मियांजी के नाम से, फिर बंगाली बाबा के नाम से मशहूर हो गया.

शाहिद को पहले तंत्रमंत्र की कोई जानकारी नहीं थी. करीब 5 साल पहले वह कुछ दिनों के लिए एक धार्मिक डेरे पर पहुंच गया, जहां तंत्रक्रियाएं की जाती थीं. वहीं वह थोड़ा तंत्रमंत्र सीख गया. वहां से लौट कर उस ने खुद को तांत्रिक घोषित कर तंत्र विद्या से समस्याओं के समाधान की अपनी ढोंग की दुकान खोल ली. शाहिद खर्च भर का कमा लेता था. ज्यादा पैसे कमाने की उसे कोई जरूरत भी नहीं थी. इसीलिए उस ने इस विद्या को लोकसेवा घोषित कर के बिना फीस के कथित रूहानी इलाज करना शुरू कर दिया. इस से उस का अच्छाखासा प्रचार हुआ और दूरदूर से लोग उस के पास आने लगे.

कथित तंत्रक्रियाओं के दौरान शाहिद ने 2 बातें देखीं, एक तो इस में तीरतुक्के ज्यादा चलते थे. अपनी परेशानियों के कारण उस के पास आने वाले लोग दरअसल मानसिक तनाव से ग्रस्त होते थे. तंत्रक्रियाओं के नाटक के चलते पीडि़त व्यक्ति स्वयं को हलका महसूस करने लगता था. मानसिक तनाव में कमी आती थी तो वह अपने काम में तवज्जो देने लगता, इस से उस का काम संवरने लगता. दूसरी बात उस ने यह देखी कि तंत्र के नाम पर किसी भी औरत को भैरवी बना कर उस से आराम से मनमानी की जा सकती थी. यही सब वह करता भी था. तंत्रमंत्र की आड़ में उस ने न जाने कितनी औरतों को खराब किया, इस का हिसाब खुद उस के पास नहीं था.

इज्जत लुटा कर भी कभी कोई औरत उस के विरोध में खड़ी नहीं होती थी. उस के पकड़े जाने पर भी कोई पीडि़ता उस के खिलाफ बयान देने थाने नहीं आई. भला हो वीना का, जिस ने उस पाखंडी तांत्रिक के चेहरे से शराफत का मुखौटा नोच फेंका था, वरना तंत्रमंत्र में आस्था रखने वाली न जाने कितनी औरतें अपनी इज्जत लुटवाती रहतीं. Fपुलिस ने तांत्रिक के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे 7 साल की बामशक्कत कैद की सजा हुई. ऊपरी अदालतों में अपील करने से भी उसे कोई लाभ नहीं मिला. अपनी सजा भुगत कर कुछ साल पहले वह जेल से बाहर आया. इस बीच उस का परिवार मनीमाजरा छोड़ कर उत्तर प्रदेश चला गया था. शाहिद भी शायद वहीं चला गया है.

वीना और उस के घर वालों के बारे में यही सुखद समाचार है कि अपनी मेहनत से महेश ने जहां अपना अच्छाखासा धंधा जमा लिया है, वहीं वीना खुद भी बेकरी का कारोबार करती है. महेश ने उस की महाभूल को गलती की संज्ञा दी, जो उस के लिए सबक बन कर काम आई. आज उन के 2 नहीं, 3 बेटे हैं और तीनों शहर के बेहतरीन एवं नामचीन स्कूलों में पढ़ रहे हैं. तीनों की गिनती मेधावी छात्रों में होती है. Hindi crime story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

True Crime Story: अधेड़ उम्र का इश्क – पति की कातिल दुलारी

True Crime Story: बांदा जिले के बुधेड़ा गांव के रहने वाले शिवनारायण निषाद 18 जून, 2021 की रात को गांव में रामसेवक के घर एक शादी के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे. जब वह देर रात तक वापस नहीं लौटे तो घर पर मौजूद पत्नी दुलारी की चिंता बढ़ने लगी. उस समय दुलारी घर पर अकेली थी. उस का 20 वर्षीय बेटा और 17 वर्षीय बेटी राधा गांव अलमोर में स्थित एक रिश्तेदारी में गए हुए थे. दुलारी ने पति की चिंता में जैसेतैसे कर के रात काटी.

सुबह होने पर दुलारी ने अपने बेटे को फोन कर के रोते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे पिताजी गांव में ही रामसेवक चाचा के घर मंडप पूजन के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे, लेकिन अभी तक वह घर वापस नहीं लौटे हैं.’’

बेटे दीपक ने जब अपने पिता के गायब होने ही बात सुनी तो वह भी घबरा गया. फिर वह मां को समझाते हुए बोला, ‘‘घबराओ मत मां, मैं घर आ रहा हूं. हो सकता है पिताजी रात होने पर वहीं रुक गए हों. फिर भी आप उन के घर जा कर पूछ आओ.’’

‘‘ठीक है बेटा, मैं रामसेवक चाचा के घर पता करने जा रही हूं.’’ दुलारी ने दीपक से कहा.

दुलारी जब रामसेवक के घर पहुंची तो रामसेवक ने बताया कि शिवनारायण गांव के ही 2 लोगों सूबेदार और चौथैया के साथ रात 10 बजे ही वहां से लौट गए थे.

यह बात दुलारी ने दीपक को फोन कर के बताई तो दीपक के मन में तमाम तरह की आशंकाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया. उसी दिन दीपक अपनी बहन के साथ गांव अलमोर से घर वापस  लौट आया. दुलारी और घर के लोग सोचने लगे कि जब रामसेवक चाचा के यहां से वह लौट आए तो कहां चले गए. अभी तक वह घर क्यों नहीं आए? उस दिन दीपक अपने ताऊ पिता रामआसरे, मां दुलारी और परिजनों के साथ पिता को आसपास खोजने में लगा रहा.

इस के बाद परिजनों ने सूबेदार और चौथैया से शिवनारायण के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि हम लोग रात में 10 बजे साथ ही लौटे थे और गांव के शिवलाखन की पान परचून की दुकान पर गए, लेकिन उस समय उस की दुकान बंद थी. तब हम लोग अलगअलग हो कर अपनेअपने घरों को वापस लौट गए थे. इस के बाद शिवनारायण कहां गया, हमें नहीं पता. शिवनारायण की 2 बेटियां, जो अपनी ससुराल में थीं, वह भी पिता के लापता होने की सूचना मिलने पर मायके आ चुकी थीं.

अब शिवनारायण के घर वालों के मन में तमाम तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी थीं. बेटे दीपक और बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. इस दौरान बेटे ने अपने सभी रिश्तेदारियों में फोन कर उन के बारे में जानना चाहा. लेकिन सभी जगह निराशा ही हाथ लग रही थी.

शिवनारायण को गायब हुए 2 दिन होने वाले थे, फिर भी घर वाले पुलिस के पास न जा कर इधरउधर खोजने में ही लगे हुए थे. इसी दौरान 20 जून, 2021 की सुबह गांव के सूबेदार और अन्य लोग जब यमुना नदी किनारे से जा रहे थे. तो उन्होंने हाथपैर बंधे घुटनों के बीच डंडा फंसे एक लाश पड़ी देखी. यह बात उन्होंने गांव के अन्य लोगों को बताई. इस के बाद वह लाश देखने के लिए यमुना किनारे गए. वहां ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी.

गांव वालों ने वह लाश पहचान ली. मृतक और कोई नहीं 2 दिन से गायब हुआ शिवनारायण ही था. इधर ग्रामीणों ने नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना स्थानीय थाने जसपुरा के थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को भी दे दी. थानाप्रभारी सुनील इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को देने के बाद अपने मातहतों के साथ घटनास्थल पर रवाना हो गए. नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना पा कर शिवनारायण निषाद के परिजन भी रोतेबिलखते वहां पहुंच चुके थे. पति की लाश देख कर दुलारी दहाड़ें मार कर रोने लगी.

सूचना पा कर बांदा के एसपी अभिनंदन के अलावा एएसपी महेंद्र प्रताप सिंह चौहान, सीओ (सदर) सत्यप्रकाश शर्मा के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस नें अपनी जांच में पाया कि लाश पानी में फूल कर उतरा कर नदी के किनारे आई है. ऐसे में अनुमान लगाया कि शिवनारायण की हत्या 18 जून की रात में कर दी गई थी. क्योंकि पानी में पड़ा शव करीब 24 घंटे बाद ही उतरा कर ऊपर आता है. थानाप्रभारी ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने वहां से कुछ सबूत भी जुटाए.

पुलिस ने लाश को देख कर यह कयास लगाया कि हत्या में एक से ज्यादा लोग शामिल रहे होंगे. क्योंकि पुलिस को घटनास्थल पर ऐसा कोई निशान और न ही दोपहिया व चार पहिया वाहनों के टायरों के निशान मिले, जिस से यह कहा जा सके कि हत्या इसी जगह पर की गई थी. इसी को आधार बना कर पुलिस यह मान रही थी कि हत्या कहीं और की गई है. लाश को नदी में ठिकाने लगाने के उद्देश्य से यहां ला कर फेंका गया था.

जिस समय बुधेड़ा गांव में पुलिस अधिकारी व थाने की पुलिस घटनास्थल का मौकामुआयना कर रही थी, पुलिस को वहां जमीन पर खून पड़ा भी दिखा. साथ ही कुछ दूरी पर चूडि़यों के टुकड़े भी बरामद हुए थे. जिन्हें फोरैंसिक टीम ने अपने कब्जे में ले लिया. मौके पर मौजूद गांव वालों ने बताया कि टूटी चूडि़यां मृतक की पत्नी दुलारी की हैं. उन का कहना था कि मामले की जानकारी होने पर दुलारी वहां बैठ कर रो रही थी. हो सकता है उस दौरान चूडि़यां टूट कर बिखर गई हों.

लेकिन पुलिस किसी भी साक्ष्य को हलके में नहीं ले रही थी, इसलिए वहां मौजूद हर संदिग्ध वस्तु को अपने कब्जे में ले रही थी. इस दौरान हत्या से जुड़े साक्ष्यों को इकट्ठा करने के लिए पुलिस ने शव मिलने वाले स्थान से पैदल ही नदी किनारे करीब डेढ़ किलोमीटर तक छानबीन की, लेकिन वहां से पुलिस को कोई अन्य और खास सबूत नहीं मिला.

पुलिस ने जरूरी साक्ष्यों को इकट्ठा करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. इस दौरान पुलिस ने परिजनों से शिवनारायण के घर वालों से किसी से रंजिश होने की बात पूछी तो उन्होंने बताया कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं थी. दोपहर तक पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंट कर हत्या करने और फेफड़ों में पानी न होने की पुष्टि हुई. इस के बाद पुलिस ने शिवनारायण के बेटे दीपक की तहरीर पर हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत दर्ज कर लिया.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने एसपी के निर्देश पर जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में कांस्टेबल शुभम सिंह, सौरभ यादव, अमित त्रिपाठी, महिला कांस्टेबल अमरावती व संगीता वर्मा को शामिल कर जांच शुरू की. थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को शुरुआती पूछताछ में मृतक शिवनारायण के बड़े भाई रामआसरे और बेटे दीपक ने बताया कि 6 महीने पहले गांव के ही एक दुकानदार ने शिवनारायण से विवाद किया था और धमकी दी थी.

इस के बाद पुलिस दुकानदार और रात में दावत में साथ रहे व लाश मिलने की सूचना देने वाले सूबेदार सहित 4 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले गई. लेकिन पुलिस को उन लोगों से पूछताछ में ऐसी कोई बात नहीं मिली, जिस से उन पर हत्या का शक किया जा सके. जसपुरा थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह शिवनारायण निषाद के हत्या की हर एंगल से जांच कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने मृतक के घर के हर सदस्य का बयान दर्ज किया था.

उन्हें जांच में पता चला कि शिवनारायण रात के 9 बजे ही दावत से अपने घर के लिए वापस लौट लिए थे. चूंकि उस समय हलकी बारिश हो रही थी, ऐसे में 45 साल की उम्र में उन के कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता था. ऐसे में पुलिस यह मान कर चल रही थी कि शिवनारायण घर लौटे थे और उन के साथ घर पर ही कोई घटना हुई थी. उस दिन घर पर मृतक शिवनारायण की पत्नी ही मौजूद थी. क्योंकि उस के बच्चे रिश्तेदारी में पैलानी थानांतर्गत अमलोर गांव गए हुए थे. मौके पर मिली चूडि़यों के टुकड़ों के आधार पर पुलिस का शक पत्नी दुलारी पर और भी पुख्ता होता जा रहा था.

उधर पुलिस को मृतक के हाथपांव के बांधने और घुटनों के बीच डंडा बांधने की बात समझ आ चुकी थी. यह हत्या के बाद लाश को उठा कर ले जाने में उपयोग किया गया होगा. इसी दौरान पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि उसी गांव के रहने वाले जगभान सिंह उर्फ पुतुवा का अकसर शिवनारायण निषाद के घर आनाजाना था. चूंकि शिवनारायण जगभान के खेतों में बंटाई पर खेती करता था. इसी दौरान जगभान का  शिवनारायण की पत्नी दुलारी से अवैध संबंध हो गए थे. जिस की जानकारी होने पर शिवनारायण और जगभान के बीच खटास पैदा हो गई थी.

अब पुलिस शिवनारायण की पत्नी दुलारी और जगभान पर अपनी जांच केंद्रित कर आगे बढ़ रही थी. इसी सिलसिले में थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जगभान के घर जा कर पता करना चाहा तो वह घर पर नहीं मिला. लेकिन उस की पत्नी दुलारी ने पुलिस को बताया कि वह शाम को 6 बजे पास के एक गांव में शादी में गए थे. वहां से वह साढ़े 11 बजे रात में लौट कर आए थे. दुलारी ने यह भी बताया कि उन के साथ ही गांव के भोला निषाद की 4 बेटियां भी शादी में गई थीं. जहां भोला की 3 लड़कियां वहीं रुक गई थीं, जबकि एक उन के साथ वापस आई थी.

इस के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जहां शादी थी, वहां पता किया तो लोगों ने बताया कि जगभान वहां से साढ़े 8 बजे ही निकल  गया था. फिर पुलिस ने भोला निषाद के घर जा कर पूछताछ की तो  लड़कियों ने बताया कि जगभान उन के घर 9 बजे आए थे, उस के बाद तुरंत वह वापस चले गए. अब पुलिस के सामने सवाल यह था कि जगभान जब भोला के घर से साढ़े 8 बजे चला आया तो वह अपने घर साढ़े 11 बजे रात में पहुंचा था. तो इन ढाई घंटों के दौरान वह कहां रहा.

इस आशंका के आधार पर पुलिस ने जगभान सिंह से ढाई घंटे गायब रहने का कारण पूछा तो वह उस का सही जबाब नहीं दे पाया. पुलिस ने जब कड़ाई से मृतक की पत्नी दुलारी और जगभान सिंह से पूछताछ की गई तो उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या किए जाने की बात स्वीकारते हुए हत्या का राज उगल दिया. उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के जसपुरा थाना क्षेत्र के बुधेड़ा गांव के निवासी शिवनारायण गांव में रह कर खेती करता था. वह दूसरों के खेत बंटाई पर ले कर भी खेती करता था.

शिवनारायण ने गांव के ही जगभान सिंह का खेत भी बंटाई पर ले रखा था. खेत बंटाई में लेने के कारण खेत मालिक जगभान शिवनारायण के घर आनेजाने लगा था. इस बीच जगभान और शिवनारायण की पत्नी दुलारी के बीच नजदीकियां बढ़ाने लगी थीं. दोनों की ये नजदीकियां कब शारीरिक संबंधों में बदल गईं, उन्हें पता ही नहीं चला. लेकिन एक दिन शिवनारायण ने जगभान और दुलारी को साथ में देख लिया तो वह आगबबूला हो गया और जगभान सिंह को घर न आने कि कड़ी हिदायत दे डाली. इस के बावजूद भी जगभान सिंह शिवनारायण के घर आता रहा.

लेकिन बारबार शिवनारायण द्वारा जगभान को घर आने से मना करने की वजह से बीते साल जगभान ने शिवनाराण को अपना खेत बंटाई पर नहीं दिया, तभी से दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था. इसी बात से जगभान और दुलारी शिवनारायण से खार खाए बैठे थे. वह इसी उधेड़बुन में थे कि किसी तरह शिवनारायण को ठिकाने लगाया जाए. हत्यारोपी दुलारी ने बताया कि घटना वाले दिन उन के अविवाहित बेटाबेटी गांव अलमोर में अपने एक दिश्तेदार के घर गए हुए थे. उस दिन घर में कोई नहीं था. उसी दिन दोनों ने शिवनरायण को ठिकाने लगाने के लिए तानाबाना बुन लिया था.

जगभान दावत से लौटने के बाद  रात के 9 बजे दुलारी के घर पहुंच गया. इधर मंडप कार्यक्रम से घर लौटे शिवनरायण ने दुलारी को जगभान के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखा तो गुस्से में उस का खून खौल गया और वह पत्नी को मारनेपीटने लगा और जगभान से गालीगलौज करने लगा. तभी दुलारी ने प्रेमी जगभान के साथ मिल कर अपने पति को चारपाई पर पटक दिया और गला दबा कर उस की हत्या कर दी. उसी दौरान उन लोगों नें लाश को ठिकाने लगाने का प्रयास किया, लेकिन गांव के लोग उस समय जाग रहे थे. ऐसे में उन्होंने शिवनारायण की लाश चारपाई के नीचे छिपा दी. इस के बाद जगभान रात के 11 बजे अपने घर चला आया.

जगभान ने बताया कि रात करीब 2 बजे जब मोहल्ले के लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तब वह रात के सन्नाटे में फिर से शिवनारायण के घर पहुंचा. जहां उस ने और दुलारी ने शिवनारायण की लाश के हाथपांव बांध कर दोनों पैरों के बीच डंडा डाल कर लाश को यमुना नदी में फेंक आए. इतना सब करने के बाद दुलारी और जगभान अपनेअपने घर चले गए. घर आने के बाद दुलारी ने पति के गायब होने की खबर पूरे गांव में फैला दी और जानबूझ कर पति को खोजने का नाटक करती रही. लेकिन पुलिसिया जांच में उन का जुर्म छिप नहीं सका.

पुलिस ने शिवनारायण की पत्नी दुलारी और उस के आशिक जगभान से पूछताछ करने के बाद दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया. वहीं एसपी अभिनंदन ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को ईनाम देने की घोषणा की है. True Crime Story