Hindi Crime Story: सपनों से सस्ता सिंदूर – पति को बनाया शिकार

Hindi Crime Story: 31 वर्षीय कल्पना बसु कर्नाटक के जिला बीवी का धोखा में आने वाले तालुका माहेर की रहने वाली थी. उस का जन्म एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था. उस के जन्म के कुछ दिनों पहले ही पिता का निधन हो गया था. मां ने मेहनतमजदूरी कर उसे पालापोसा. पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह ज्यादा पढ़ाईलिखाई भी नहीं कर पाई थी.

कल्पना खूबसूरत होने के साथसाथ महत्त्वाकांक्षी भी थी. वह चाहती थी कि उसे ऐसा जीवनसाथी मिले जो उस की तरह हैंडसम हो और उस की भावनाओं की कद्र करते हुए सभी इच्छाओं को पूरा करे. लेकिन उस के इन सपनों पर पानी तब फिर गया जब उस की शादी एक ऐसे मामूली टैक्सी ड्राइवर बसवराज बसु के साथ हो गई, जो उस के सपनों के पटल पर कहीं भी फिट नहीं बैठता था.

38 वर्षीय बसवराज बसु उसी तालुका का रहने वाला था, जिस तालुका में कल्पना रहती थी. प्यार तो उसे बचपन से ही नहीं मिला था. उस के पैदा होने के बाद ही मांबाप दोनों की मौत हो गई थी. उसे नानानानी ने पालपोस कर बड़ा किया था. नानानानी की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह भी पढ़लिख नहीं सका. जिंदगी का बोझ उठाने के लिए जैसेतैसे वह टैक्सी ड्राइवर बन गया था. ड्राइविंग का लाइसैंस मिलने पर वह माहेर शहर आ कर कैब चलाने लगा. जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया तो नातेरिश्तेदारों ने उस की शादी कराने की सोची. आखिरकार उस की शादी कल्पना से हो गई.

खुले विचारों वाली कल्पना से शादी कर के वह खुश था. लेकिन कल्पना उस से खुश नहीं थी. ड्राइवर के साथ शादी हो जाने से उस की सारी ख्वाहिशों और सपनों पर जैसे पानी फिर गया था. पति के रूप में एक मामूली टैक्सी ड्राइवर को पा कर उस के सारे सपने कांच की तरह टूट कर बिखर गए थे.

कुल मिला कर बसवराज बसु और कल्पना का कोई मेल नहीं था, लेकिन मजबूरी यह थी कि वह करती भी तो क्या. बसवराज बसु अपनी आमदनी के अनुसार पत्नी की जरूरतों को पूरी करने की कोशिश करता था, पर पत्नी की ख्वाहिशें कम नहीं थीं. उस की आकांक्षाएं ऐसी थीं, जिन्हें पूरा करना बसवराज के वश की बात नहीं थी. लिहाजा वह अपनी किस्मत को ही कोसती रहती.

समय अपनी गति से चलता रहा. कल्पना 2 बच्चों की मां बन गई. इस के बाद कल्पना की जरूरतें और ज्यादा बढ़ गई थीं, जिन्हें बसवराज बसु पूरा नहीं कर पा रहा था. ऐसी स्थिति में कल्पना की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. उस का पति जब घर से टैक्सी ले कर निकलता था तो तीसरेचौथे दिन ही घर लौट कर आता था. घर आने के बाद भी वह कल्पना का साथ नहीं दे पाता था. ऐसे में कल्पना जल बिन मछली की तरह तड़प कर रह जाया करती थी.

उड़ान के लिए कल्पना को लगे पंख

कल्पना खूबसूरत और जवान थी. बस्ती में ऐसे कई युवक थे, जो उस को चाहत भरी नजरों से देखते थे. एक दिन कल्पना के मन में विचार आया कि क्यों न ऐसे युवकों से लाभ उठाया जाए. इस से उस के सपने तो पूरे हो ही सकते हैं, साथ ही शरीर की जरूरत भी पूरी हो जाएगी.

यही सोच कर कल्पना ने उन युवकों को हरी झंडी दे दी. कई युवक उस के जाल में फंस गए. बच्चों के स्कूल और पति के काम पर जाने के बाद वह मौका देख कर उन्हें घर बुला कर मौजमस्ती करने लगी, साथ ही उन से मनमुताबिक पैसे भी लेने लगी.

कल्पना का रहनसहन और घर के बदलते माहौल को पहले तो बसवराज समझ नहीं सका, लेकिन जब सच्चाई उस के सामने आई तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस पत्नी को वह अपनी जान से भी ज्यादा चाहता है, जिस के लिए वह रातदिन मेहनत करता है, उस के पीठ पीछे वह इस तरह का काम करेगी. उस ने यह भी नहीं सोचा कि दोनों बच्चों पर इस का क्या असर पड़ेगा.

मामला काफी नाजुक था. मौका देख कर बसवराज बसु ने जब कल्पना को समझाना चाहा तो वह उस पर ही बरस पड़ी. उस ने पति को घुड़कते हुए कहा कि तुम्हारे और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद अगर मैं अकेली रहती हूं. ऐसे में अगर मैं किसी से दोचार बातें कर लेती हूं तो इस में बुरा क्या है. तुम्हें यह अच्छा नहीं लगता तो मैं आत्महत्या कर लेती हूं.

कल्पना का बदला व्यवहार और माहौल देख कर बसवराज बसु यह बात अच्छी तरह से समझ गया कि कल्पना को समझानेबुझाने से कोई फायदा नहीं होगा. इसलिए उस ने उस जगह को छोड़ देना ही सही समझा. वह पत्नी और बच्चों को ले कर बेलगांव शहर चला गया.

वहां बसवराज कुड़चड़े थाने के अंतर्गत आने वाले अनु अपार्टमेंट में किराए का फ्लैट ले कर रहने लगा. उस ने टैक्सी चलानी बंद कर दी और किसी की निजी कार चलाने लगा. उसे विश्वास था कि बेलगांव में रह कर पत्नी के आशिक छूट जाएंगे और वह सुधर जाएगी.

लेकिन बसवराज की यह सोच गलत साबित हुई. कल्पना चतुर और स्मार्ट महिला थी. बेलगांव आ कर वह और भी आजाद हो गई. यहां उसे न समाज का डर था और न गांव का. उस ने उसी अपार्टमेंट में रहने वाले पंकज पवार नाम के युवक को फांस लिया. पंकज एक निजी कंपनी में डाटा एंट्री औपरेटर था. वह मडगांव का रहने वाला था.

बसवराज की सोच हुई गलत साबित

31 वर्षीय पंकज पवार की शादी हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे भी थे. लेकिन वह कल्पना के लटकोंझटकों से बच नहीं सका. कल्पना से संबंध बन जाने के बाद पंकज पवार उस के फ्लैट पर आनेजाने लगा. एक दिन पंकज कल्पना से मुलाकात कराने के लिए अपने 3 दोस्तों सुरेश सोलंकी, अब्दुल शेख और आदित्य को भी साथ ले आया. पहली ही मुलाकात में ही कल्पना ने उस के तीनों दोस्तों पर ऐसा जादू किया कि वे भी उस के मुरीद हो गए. उन तीनों से भी कल्पना के संबंध बन गए.

कुछ ही दिनों में कल्पना के यहां आने वाले युवकों की संख्या बढ़ने लगी. धीरेधीरे कल्पना के कारनामों की जानकारी इलाके भर में फैल गई. उस की वजह से बसवराज बसु की ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले की बदनामी होने लगी. ऐसे में बसवराज का वहां रहना मुश्किल हो गया. दोनों बच्चे अब काफी बड़े हो गए थे. बसवराज बसु ने अपने बच्चों के भविष्य के मद्देनजर कल्पना को काफी समझाया, लेकिन अपनी मौजमस्ती के आगे उस ने बच्चों को कोई अहमियत नहीं दी.

कल्पना पर जब पति के समझाने का कोई असर नहीं हुआ तो वह उसे छोड़ कर वहीं पर जा कर रहने लगा, जहां वह नौकरी करता था. इस के बावजूद वह अपनी पूरी पगार ला कर कल्पना को दे जाता था.
हालांकि कल्पना के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. बसवराज बसु के जाने के बाद वह और भी आजाद हो गई थी. वह अपने चारों दोस्तों के साथ बारीबारी से घूमतीफिरती और मौजमजा करती. इस के अलावा वह उन से अच्छीखासी रकम भी ऐंठती थी. वह पूरे समय अपने रूपयौवन को सजानेसंवारने में लगी रहती थी. यहां तक कि अब वह घर पर खाना तक नहीं बनाती थी. खाना पकाने के लिए उस ने अपने प्रेमी अब्दुल शेख की पत्नी सिमरन शेख को सेवा में रख लिया था.

2 अप्रैल, 2018 को बसवराज बसु की जिंदगी का आखिरी दिन था. एक दिन पहले उसे जो पगार मिली थी, उसे पत्नी को देने के लिए वह 2 अप्रैल को दोपहर में फ्लैट पर पत्नी के पास पहुंचा. घर का जो माहौल था, उसे देख कर उस का खून खौल उठा. कल्पना ने बेशरमी की हद कर दी थी. वहां पर सुरेश सोलंकी, आदित्य और अब्दुल शेख जिस अवस्था में थे, उसे देख कर साफ लग रहा था कि कल्पना उन के साथ क्या कर रही थी. यह देख कर बसवराज का खून खौल गया.

वह पत्नी को खरीखोटी सुनाते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हें खर्चे के लिए पैसे देने के लिए आता हूं. लेकिन तुम्हारा यह घिनौना रूप देख कर तुम्हें पैसा देने और यहां आने का मन नहीं होता. लेकिन बच्चों के लिए यह सब करना पड़ता है.’’

बसवराज की मौत आई रस्सी में लिपट कर

पति की बात सुन कर कल्पना डरी नहीं बल्कि वह भी उस पर हावी होते हुए बोली, ‘‘तो मत आओ. मैं ने तुम्हें कब बुलाया और पैसे मांगे. तुम क्या समझते हो, मेरे पास पैसे नहीं हैं? तुम कान खोल कर सुन लो, मैं जिस ऐशोआराम से रह रही हूं, वह तुम्हारे पैसों से नहीं मिल सकता. तुम्हारी पूरी पगार से तो मेरा शैंपू ही आएगा. रहा सवाल बच्चों का तो उन की चिंता तुम छोड़ दो.’’

कल्पना की यह बात सुन कर बसवराज बसु को जबरदस्त धक्का लगा. इस के बाद पतिपत्नी के बीच झगड़ा बढ़ गया. तभी गुस्से में आगबबूला कल्पना ने अपने तीनों प्रेमियों को इशारा कर दिया. कल्पना का इशारा पाते ही उस के तीनों प्रेमियों ने मिल कर बसवराज बसु को पीटपीट कर बेदम कर दिया.
शारीरिक रूप से कमजोर बसवराज बसु बेहोश हो कर जमीन पर गिर गया. उसी समय अब्दुल शेख की बीवी सिमरन भी वहां आ गई. तभी कल्पना के घर के अंदर बंधी नायलौन की रस्सी खोल कर बसवराज के गले में डाल कर पूरी ताकत से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. यह देख कर सिमरन सहम गई.

टुकड़ों में बंट गया पति

अब्दुल शेख और कल्पना ने सिमरन को धमकी दी कि अपना मुंह बंद रखे. अगर मुंह खोला तो उस का भी यही हाल होगा. डर की वजह से सिमरन चुप रही. कल्पना और उस के प्रेमियों का गुस्सा शांत हुआ तो वे बुरी तरह घबरा गए. हत्या के समय पंकज वहां नहीं था.

थोड़ी देर सोचने के बाद कल्पना और उस के प्रेमियों ने बसवराज बसु की लाश ठिकाने लगाने का फैसला ले लिया. कल्पना ने शव ठिकाने लगवाने के मकसद से पंकज को फोन कर के बुला लिया. लेकिन पंकज को जब हत्या का पता चला तो वह घबरा गया. पहले तो पंकज ने इस मामले से अपना हाथ खींच लिया, लेकिन अपनी प्रेमिका कल्पना को मुसीबत में घिरी देख कर वह उस का साथ देने के लिए तैयार हो गया.
चारों ने मिल कर बसवराज बसु के शव को बाथरूम में ले जा कर उस के 3 टुकड़े किए और उन टुकड़ों को कपड़ों में लपेट कर प्लास्टिक की 3 बोरियों में भर दिया. मौका देख कर उसी रात 12 बजे इन लोगों ने तीनों बोरियों को अब्दुल शेख की कार की डिक्की में रख दिया. इस के बाद ये लोग कुड़चड़े महामार्ग के अनमोड़ घाट गए और उन बोरियों को एकएक किलोमीटर की दूरी पर घाट की घाटियों में दफन कर के लौट आए.

जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त बेखबर होते गए. उन का मानना था कि इस हत्याकांड से कभी परदा नहीं उठेगा और उन का राज राज ही रह जाएगा. लेकिन वे यह भूल गए थे कि उन के इस राज की साक्षी अब्दुल शेख की बीवी सिमरन शेख थी, जिस की आंखों के सामने बसवराज बसु की हत्या का सारा खेल खेला गया था. वह इस राज को अपने सीने में छिपाए हुए थी.
पता नहीं क्यों सिमरन को हत्या में शामिल लोगों से डर लगने लगा था. यहां तक कि अपने पति से भी उस का विश्वास नहीं रहा. उसे ऐसा लगने लगा जैसे उस की जान को खतरा है. वे लोग अपना पाप छिपाने के लिए कभी भी उस की हत्या कर सकते हैं. इस डर की वजह से सिमरन शेख बेलगांव की जानीमानी पत्रकार ऊषा नाईक देईकर से मिली और उस ने बसवराज बसु हत्याकांड की सारी सच्चाई बता दी.

आखिर राज खुल ही गया

बसवराज बसु की हत्या की सच्चाई जान कर ऊषा नाईक के होश उड़ गए. उन्होंने सिमरन शेख को साहस और सुरक्षा का भरोसा दे कर मामले की सारी जानकारी बेलगांव कुड़चड़े पुलिस थाने के थानाप्रभारी रवींद्र देसाई और उन के वरिष्ठ अधिकारियों को दी. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में थानाप्रभारी रवींद्र देसाई ने अपनी जांच तेजी से शुरू कर दी.

उन्होंने 24 घंटे के अंदर बसवराज बसु हत्याकांड में शामिल कल्पना बसु के साथ पंकज पवार, अब्दुल शेख और सुरेश सोलंकी को गिरफ्त में ले कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश किया, जहां सीपी अरविंद गवस ने उन से पूछताछ की. पुलिस गिरफ्त में आए चारों आरोपी कोई पेशेवर अपराधी नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

9 मई, 2018 को उन्हें गिरफ्तार कर पुलिस अनमोड़ घाट की उस जगह पर ले कर गई, जहां उन्होंने बसवराज बसु के शव के टुकड़े दफन किए थे. उन की निशानदेही पर पुलिस ने शव के तीनों टुकड़ों को बरामद कर लिया. घटना के समय बसवराज जींस पैंट पहने हुए था. उस की पैंट की जेब में उस का ड्राइविंग लाइसेंस मिला, जिस से यह बात सिद्ध हो गई कि शव बसवराज का ही था. शव को कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए मडगांव के बांबोली अस्पताल भेज दिया.

पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए कल्पना बसु, पंकज पवार, सुरेश सोलंकी और अब्दुल शेख से विस्तृत पूछताछ कर के उन के विरुद्ध भांदंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. फिर चारों को मडगांव मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी आदित्य गुंजर फरार था, जिस की पुलिस बड़ी सरगरमी से तलाश कर रही थी. Hindi Crime Story

Hindi Stories: एक निर्णय से बदल गई कई जिंदगियां

Hindi Stories: रूढि़वादी विचारों में फंस कर लोग आर्गन डोनेट करने में हिचकिचाते हैं. लेकिन एक आम गृहिणी संतोष ने पति के आर्गन डोनेट कर के कई लोगों को नई जिंदगी दी. आज चिकित्सा के क्षेत्र में जितना तेजी से विकास हो रहा है, मरीजों की संख्या भी उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही है. इस

का अनुमान प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले मरीजों से लगाया जा सकता है. प्रदूषण, असंयमित दिनचर्या व अन्य वजहों से आज आर्गन फेल्योर मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है. आर्गन डोनेट कर के इस तरह के मरीजों की सहायता की जा सकती है, लेकिन समाज में फैले रूढि़वादी विचार इस रास्ते में बाधक बने हुए हैं. पर हाल ही में एक मरीज के घर वालों ने रूढि़वादी विचारों को त्याग कर एक ऐसा फैसला लिया कि कई लोगों की जिंदगी बदल गई.

दिल्ली के पश्चिम विहार निवासी रामबाबू आनंद पर्वत स्थित किसी निजी कंपनी में नौकरी करते थे. 29 जुलाई की शाम 6, साढ़े 6 बजे ड्यूटी पूरी कर के शाम को स्कूटर से वह अपने घर लौट रहे थे, तभी पंजाबीबाग के नजदीक किसी भारी वाहन ने पीछे से उन के स्कूटर में टक्कर मार दी. जिस से वह स्कूटर से उछल कर दूर जा गिरे और बेहोश हो गए. टक्कर मार कर वह भारी वाहन तेज गति से भाग गया. 57 वर्षीय रामबाबू को देखने के लिए सड़क पर चलने वाले कई लोग जमा तो हो गए, लेकिन इतनी हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा था कि उन्हें किसी अस्पताल तक पहुंचा सके. कुछ लोगों की मानवीयता जागी भी, लेकिन वे घायल रामबाबू को अस्पताल ले जा कर पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ना चाहते थे.

उधर से कार से गुजरने वाले लोग भीड़ को देख कर कार की गति धीमी कर के जायजा लेने की कोशिश तो करते, लेकिन जब उन्हें पता चलता कि मामला एक्सीडेंट का है तो वे वहां से खिसक जाते. दिल्ली में ज्यादातर लोग संवेदनहीन हो गए हैं. इस की वजह पुलिस का लफड़ा हो या उन की भागती जिंदगी, लेकिन इस मानसिकता की वजह से दुर्घटनाग्रस्त अनेक लोगों को समय पर चिकित्सा नहीं मिल पाती. कुछ देर बाद एक औटो वाले ने घायल रामबाबू को लोगों के सहयोग से अपने औटो में डाला और उन्हें नजदीक के एमजीएस अस्पताल ले गया.

आपातकालीन वार्ड में रामबाबू का इलाज शुरू हो गया. इस दुर्घटना में उन्हें कोई खुली चोट नहीं आई थी. लेकिन जब अस्पताल में जांच हुई तो पता चला कि उन के सिर में गंभीर चोट आई है. प्राथमिक उपचार के बाद डाक्टरों ने उन्हें आईसीयू में भरती कर दिया. रामबाबू को आईसीयू में भरती कर तो लिया, लेकिन डाक्टरों ने उन का उपयुक्त तरीके से इलाज शुरू नहीं किया. इस की वजह यह थी कि रामबाबू की तरफ से अस्पताल में एडवांस पैसे जमा नहीं हुए थे. और पैसे जमा करता भी कौन, क्योंकि उन का कोई परिजन या नजदीकी वहां था नहीं.

जो औटो वाला उन्हें भरती करने आया था, वह भी वहां से कब का जा चुका था. रामबाबू की सीरियस हालत को देखते हुए डाक्टरों को उन का इलाज शुरू कर देना चाहिए था. रही बात पैसों की तो उन के घर वालों के पहुंचने पर उन से ले लेते. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए अस्पताल प्रशासन की तरफ से स्थानीय पंजाबीबाग थाने की पुलिस को जानकारी दे दी गई. लिहाजा पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई.

पुलिस को रामबाबू के पास ड्राइविंग लाइसेंस और स्कूटर के जो कागज मिले थे, उन से पता चला कि वह पश्चिमी दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके के हैं. उन कागजों से उन्हें एक फोन नंबर मिला. उस फोन नंबर पर बात की गई तो वह रामबाबू की पत्नी संतोष का था. पुलिस ने संतोष को रामबाबू की दुर्घटना की जानकारी देते हुए पंजाबीबाग के एमजीएस अस्पताल आने को कहा.

पति का एक्सीडेंट होने की बात सुन कर संतोष घबरा गईं. उस समय वह घर पर अकेली थीं. उन का एकलौता बेटा चिराग नोएडा में अपनी नौकरी पर था. उन्होंने उस समय बेटे को फोन कर के यह जानकारी दी और खुद अपने पड़ोसियों के साथ एमजीएस अस्पताल पहुंच गईं. आईसीयू में इलाज शुरू करने से पहले डाक्टर ने उन से पैसे जमा कराने को कहा. लेकिन जल्दबाजी में वह घर से पैसे ले कर चलना ही भूल गई थीं. पति के एक्सीडेंट की खबर मिलने पर वह इतना घबरा गई थीं कि जल्दी से पड़ोसी को बता कर उस के साथ अस्पताल आ गईं. वह डाक्टरों से लाख कहती रहीं कि इलाज शुरू करें, बेटे के आने पर पैसे जमा करा देंगी, लेकिन डाक्टरों का दिल नहीं पसीजा.

एक, सवा घंटा बाद रामबाबू का बेटा चिराग जब नोएडा से अस्पताल पहुंचा तो उस ने इधरउधर से पैसे इकट्ठे कर के अस्पताल में जमा कराए. इस के बाद ही करीब साढ़े 8 बजे डाक्टरों ने रामबाबू का इलाज शुरू किया. जांच में पता चला कि उन के मस्तिष्क की कुछ नसें फट गई हैं.

डाक्टरों की टीम उन के उपचार में लगी रही, पर उन की हालत में सुधार नहीं हो पा रहा था. इस से घर वालों की चिंता बढ़ती जा रही थी. चिराग बारबार डाक्टरों के पास जा कर पिता की तबीयत के बारे में पूछ रहा था. जब चिराग को लगा कि इस अस्पताल में पिता की हालत सुधरने वाली नहीं है तो उस ने सर गंगाराम अस्पताल के अपने जानकार न्यूरोसर्जन से सलाह ली. चिराग ने व्हाट्सऐप से न्यूरोसर्जन को पूरी रिपोर्ट भेज दी थी. न्यूरोसर्जन ने उसे सलाह दी कि ब्रेन की कंडीशन ठीक नहीं है, इसलिए उन्हें आब्जर्वेशन में रखना पड़ेगा.

चिराग अपने पिता को किसी अच्छे अस्पताल में ले जाना चाहता था. इस के लिए उस ने सब से पहले सर गंगाराम अस्पताल में बात की, पर वहां के आईसीयू में कोई बेड खाली नहीं मिला. इस के बाद उस ने साकेत के मैक्स अस्पताल में बात की. इत्तफाक से वहां के आईसीयू में भी बेड खाली नहीं था. वह परेशान हुआ जा रहा था. ऐसे में उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तभी उस के एक परिचित ने राजेंद्र प्लेस स्थित बीएल कपूर अस्पताल के बारे में बताया कि वह भी मल्टीस्पैशिलिटी अस्पताल है. वहां बात कर के देखो.

तब चिराग ने बीएल कपूर अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता को अपने पिता की हालत से अवगत कराते हुए आईसीयू में बेड उपलब्ध कराने की मांग की. उन के हां कहने के बाद चिराग 30 जुलाई को तड़के 3-4 बजे अपने पिता को एमजीएस अस्पताल से बीएल कपूर अस्पताल ले गया. वहां आईसीयू में वेंटिलेटर पर रख कर डाक्टरों की टीम उन के इलाज में जुट गई. सीनियर न्यूरोसर्जन डा. विकास गुप्ता और डा. राजेश पांडे के नेतृत्व में टीम रामबाबू के उपचार में लगी रही, लेकिन उन की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. उन की हालत सीरियस बनी हुई थी. अगले दिन तक उन की हालत सुधरने के बजाय और ज्यादा सीरियस हो गई. आखिर 31 जुलाई को सुबह साढ़े 10 बजे रामबाबू का ब्रेन डेड हो गया.

ब्रेन डेड होने की हालत में मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है, जबकि शरीर के अन्य अंग कुछ घंटों तक सक्रिय रहते हैं. डा. विकास गुप्ता ने रामबाबू का ब्रेन डेड होने वाली बात उन के एकलौते बेटे चिराग को बताई तो उस के ऊपर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. वह अस्पताल में ही फफकफफक कर रोने लगा. संतोष को जब पता लगा कि उस के पति अब इस दुनिया में नहीं रहे तो वह भी जोरजोर से रोने लगीं. कुछ रिश्तेदार मांबेटे को ढांढस बंधाने लगे. उन के परिवार के लिए यह एक गहरा सदमा था.

ब्रेन डेड होने की स्थिति में रामबाबू का ठीक होना असंभव था, क्योंकि कुछ घंटों बाद उन के बाकी आंतरिक अंगों के निष्क्रिय हो जाने पर डाक्टर उन्हें मृत घोषित कर देते. रामबाबू का इलाज कर रही टीम ने यह बात अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता को बताई तो उन्होंने सोचा कि ऐसी हालत में यदि उन के अन्य अंगों को जरूरतमंद लोगों में प्रत्यारोपित कर दिए जाएं तो कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है. इस से पहले इस अस्पताल में इसी तरह के 9 जनों के आर्गन दूसरे मरीजों में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किए जा चुके थे. मगर यह काम रामबाबू के घर वालों की सहमति के बिना नहीं हो सकता था.

ऐसे में सब से बड़ी समस्या रामबाबू के परिजनों से बात करने की थी, क्योंकि उन का तो रोरो कर बुरा हाल था. घर वाले ही नहीं, रिश्तेदार भी शोक में डूबे थे. एक तो उन के घर का आदमी चला गया था, ऊपर से उस के अंगदान की बात उन से करना आसान नहीं था.

अब डाक्टरों के सामने यह बात एक चुनौती जैसी हो गई कि गमगीन माहौल में संतोष और उन के बेटे से किस तरह बात की जाए. दूसरे बात यह भी थी कि उन के परिवार से बातचीत की शुरुआत जल्दी की जाए क्योंकि उन्होंने बात करने में देर कर दी तो रामबाबू के आर्गन भी निष्क्रिय हो जाएंगे, जिस से उन का ट्रांसप्लांट नहीं हो सकेगा. रामबाबू के परिवार की ओर से अस्पताल में जो लोग मौजूद थे, उन में उन का बेटा चिराग ही ज्यादा भागदौड़ कर रहा था. वही ज्यादा एक्टिव था. डाक्टरों ने सब से पहले उस से ही बात करना मुनासिब समझा.

डाक्टरों की टीम ने एक कक्ष में बैठा कर उस से बातचीत शुरू की. सब से पहले उन्होंने उसे सांत्वना देते हुए समझाया. जब वह कुछ सामान्य हुआ तो कहा, ‘‘देखो चिराग, आप के परिवार की जो क्षति हुई है, उस की पूर्ति कोई नहीं कर सकता, लेकिन आप थोड़ा समझ कर फैसला लेंगे तो कई लोगों को नई जिंदगी दे सकते हैं.’’

डाक्टर की बात सुन कर चिराग चौंका और उन की तरफ गौर से देखते हुए बोला, ‘‘वह कैसे?’’

‘‘देखो, आप के पिता का ब्रेन डेड हो चुका है. अब इस के कुछ घंटे बाद शरीर के आंतरिक अंग भी निष्क्रिय हो जाएंगे. यदि उन के अंग डोनेट कर दिए जाएं तो कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है. यह बहुत बड़ा परोपकार होगा.’’ डाक्टर ने समझाया.

चिराग पढ़ालिखा और समझदार था, फिर भी उसे यह बात सुन कर एक झटका सा लगा क्योंकि एक तो उस के पिता जा चुके थे, ऊपर से डाक्टर उन के अंगदान करने को कह रहे थे. वह बोला, ‘‘आप यह क्या कह रहे हैं?’’

‘‘देखो चिराग, आप पढ़ेलिखे और समझदार हो, इसलिए आप जानते होगे कि भारत में ऐसे तमाम मरीज हैं, जिन्हें आर्गन की जरूरत है, लेकिन तमाम वजहों से वे आर्गन ट्रांसप्लांट नहीं करा सकते. सोचो, ऐसे में उन को आप के पिता के आर्गन मिल गए तो वे लोग कितनी दुआएं देंगे.’’ डाक्टर ने कहा.

डाक्टर की बात चिराग की समझ में आ तो गई, लेकिन अंतिम निर्णय तो उस की मां संतोष को ही लेना था, क्योंकि उन की लिखित अनुमति के बिना यह काम नहीं हो सकता था. चिराग के हावभाव देख कर डाक्टरों को लग रहा था कि बात पौजिटिव जा रही है.

‘‘कल्पना करो चिराग, उन की दोनों आंखें उन लोगों को ट्रांसप्लांट की जाएंगी, जिन की जिंदगी में अंधेरा है. जब वे आप के पिता की आंखों से दुनिया देखेंगे तो कितनी खुशी महसूस करेंगे. वे आप को जिंदगी भर दुआएं देंगे और यह बात ध्यान रखो कि आप को यह फैसला बहुत जल्दी लेना है.’’ डाक्टर ने समझाया.

डाक्टरों से बात कर के जैसे ही चिराग कक्ष से बाहर निकला, उस के रिश्तेदारों ने उस से पूछना शुरू कर दिया कि डाक्टर क्या कह रहे थे? जब चिराग ने उन्हें पिता के अंगदान करने वाली बात बताई तो कुछ रिश्तेदार आश्चर्यचकित हो कर अपनीअपनी दलीलें देने लगे कि ऐसे दुख के माहौल में डाक्टर भी भला यह कैसी बात कर रहे हैं. कुल मिला कर दलीलें देने वाले रिश्तेदार अंगदान करने के पक्ष में नहीं थे.

डाक्टरों की बात चिराग की समझ में आ चुकी थी, इसलिए उस ने रिश्तेदारों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. उस ने इस बारे में अपनी मां से बात की. बेटे की बात सुन कर एक बार को संतोष भी उस की तरफ देखने लगीं कि यह क्या कह रहा है? एक तो पति चले गए थे, ऊपर से यह उन का शरीर फड़वा कर अंगदान करने को कह रहा है. उन्होंने साफ कह दिया कि वह उन की लाश की दुर्गति नहीं होने देंगी.

चिराग के 1-2 रिश्तेदार थे, जो उस की बात से सहमत थे. तब चिराग ने उन के साथ मां को समझाया. थोड़ी कोशिश के बाद बात उन की समझ में आ गई. लेकिन उन्होंने शर्त यह रखी कि पति के जो भी अंग जिन लोगों को ट्रांसप्लांट किए जाएं, उन से बदले में कोई पैसा न लिया जाए. तब डाक्टरों ने उन्हें भरोसा दिया कि जब आप अंगदान कर रहे हैं तो पैसे लेने की बात ही नहीं उठती. इस के बाद संतोष ने पति के अंगदान करने की लिखित अनुमति दे दी.

रामबाबू के ब्रेन डेड का पहला टेस्ट सुबह साढ़े 10 बजे हुआ था. दूसरा टेस्ट 6 घंटे के अंतराल पर होना था, उस के बाद ही अंग प्रत्यारोपण की काररवाई होनी थी. अब उन्हें अनुमति मिल ही गई थी. इस के बाद डाक्टरों ने शाम साढ़े 4 बजे फिर से रामबाबू का परीक्षण किया तो उस में भी रिपोर्ट ब्रेन डेड की ही आई.

संतोष से कानूनी प्रक्रिया पूरी कराने के बाद अब आगे की काररवाई करनी थी. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए कुछ कानूनी औपचारिकताएं भी पूरी करनी थीं. रामबाबू की दुर्घटना पश्चिमी दिल्ली के थाना पंजाबीबाग क्षेत्र में हुई थी, इसलिए उस थाने के एसएचओ ईश्वर सिंह को भी शाम 7 बजे अस्पताल बुलवा लिया गया. रामबाबू के कौनकौन से अंग दान करने हैं, यह जानने के लिए थानाक्षेत्र के हिसाब से संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस के डाक्टर का वहां होना जरूरी था.

डाक्टरों ने एसएचओ ईश्वर सिंह को आर्गन डोनेट करने वाली बात बताई तो उन्होंने इस काम में भरपूर सहयोग किया. उन्होंने संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल के डाक्टर को बुलाने के लिए एक गाड़ी भेज दी. उस गाड़ी से रात साढ़े 9-10 बजे डा. ढींगरा बीएल कपूर अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने जांच कर के बताया कि रामबाबू का हार्ट, लीवर, किडनी और दोनों कार्निया ही ट्रांसप्लांट लायक हैं. अब बात यह थी कि ये अंग किसे ट्रांसप्लांट किए जाएं. किडनी ट्रांसप्लांट के 30-35 मरीज बीएल कपूर अस्पताल में ही वेटिंग लिस्ट में थे. डा. एच.एस. भटियाल, डा. आदित्य प्रधान और डा. सुनील प्रकाश की टीम ने रामबाबू की दोनों किडनियां इसी अस्पताल के प्रतीक्षारत 2 रोगियों में ट्रांसप्लांट कर दीं.

इसी अस्पताल के एक मरीज को उन का लीवर ट्रांसप्लांट कर दिया गया. कार्निया के लिए सेंटर फौर साइट से डा. ए.के. नायक को बुला लिया गया. वे रामबाबू की दोनों कार्निया अपने साथ ले गए. अब उन का हार्ट बचा था. ऐसा मरीज बीएल कपूर अस्पताल की प्रतीक्षा सूची में नहीं था. इस के लिए डा. संजय मेहता ने पहले दिल्ली के एम्स अस्पताल से संपर्क किया. वहां कई पेशेंट हार्ट ट्रांसप्लांट की वेटिंग लिस्ट में थे. रामबाबू का ब्लड ग्रुप ए पौजिटिव था. उन का हार्ट उसी ब्लड ग्रुप के पेशेंट में ट्रांसप्लांट किया जा सकता था. एम्स के डाक्टरों ने इसी ग्रुप के वेटिंग लिस्ट के मरीजों से बात करनी चाही.

रात के 2 बज चुके थे, उस समय उन के कई मरीजों के फोन बंद मिले. कुछ मरीज दिल्ली से बाहर थे. 1-2 मिले भी, लेकिन वे दिल्ली से दूर के थे. उन का उसी समय अस्पताल पहुंचना असंभव था. लिहाजा एम्स में भी हार्ट ट्रांसप्लांट का मरीज नहीं उपलब्ध हो सका. एम्स में मरीज उपलब्ध न होने पर सर गंगाराम अस्पताल में बात की गई, वहां भी कोई ऐसा मरीज नहीं मिला, जो रात में ही हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए उन के अस्पताल आ सकता.

हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए अपोलो और मेदांता अस्पताल में भी बात की, लेकिन वहां भी कोई मरीज नहीं मिला तो मैक्स अस्पताल में बात की गई. इस अस्पताल में भी कई मरीज वेटिंग में थे. वेटिंग लिस्ट के मरीजों से बात की गई तो साकेत स्थित मैक्स अस्पताल का 42 वर्षीय मिराजुद्दीन उसी समय अस्पताल आने को तैयार हो गया.

दिल्ली के अबुल फजल एन्क्लेव के शाहीन बाग का रहने वाला मिराजुद्दीन दैनिक मजदूर था. कई अस्पतालों में इलाज कराने के बाद पिछले 3 महीने से उस का मैक्स अस्पताल के डा. राजेश मल्होत्रा के नेतृत्व में इलाज चल रहा था. उस का हार्ट डायलेस हो चुका था. वह 15-20 प्रतिशत ही काम कर रहा था. उस से बात की गई तो वह उसी समय अस्पताल आने को तैयार हो गया. मैक्स अस्पताल साकेत की तरफ से पेशेंट कन्फर्म की सूचना बीएल कपूर अस्पताल को दे दी गई.

रामबाबू राजेंद्र प्लेस स्थित बीएल कपूर अस्पताल में थे. वहां से हार्ट साकेत के मैक्स अस्पताल लाना था. यह दूरी 20 किलोमीटर थी. हार्ट निकालने के बाद कुछ घंटे के अंदर ही दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट होना जरूरी था. इन दोनों अस्पतालों को जो सड़कें जोड़ती हैं, उन पर अकसर ज्यादा ट्रैफिक रहता है. वैसे रात में रोड अकसर खाली मिलता है. फिर भी इत्तफाक से हार्ट ले जाने वाली एंबुलेंस जाम में फंसने के बाद उन की कोशिश पर कहीं पानी न फिर जाए. यही चिंता दोनों अस्पतालों के डाक्टरों को थी.

तब बीएल कपूर अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता ने रात में ही दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त शरद अग्रवाल से बात कर के मदद मांगी. अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को समझते हुए शरद अग्रवाल ने उन्हें सहयोग देने का आश्वासन दिया. उन्होंने रात में ही ट्रैफिक पुलिस के अधिकारियों से बात कर के उक्त दोनों अस्पतालों के बीच ग्रीन कारीडोर बनाने के निर्देश दिए, ताकि हार्ट को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने में कोई असुविधा न हो.

ट्रैफिक पुलिस अलर्ट हो गई. हार्ट ले कर जाने वाले मार्ग पर ट्रैफिक पुलिस के जवान तैनात हो गए. पूरी तैयारी के बाद चीफ कार्डियो सर्जन डा. रजनीश मल्होत्रा ने 4 डाक्टरों की टीम बीएल कपूर अस्पताल भेज दी. हार्ट सुरक्षित निकालने से पहले टीम ने हार्ट में कार्डियोप्लीजिया का इंजेक्शन दे दिया, जिस से उन का हार्ट 90 मिनट के लिए रुक गया.

इस के बाद उसे प्रिजर्व कर के आइस में रख लिया. उस जीवित हार्ट को ले कर रात 3 बजे डाक्टरों की टीम बीएल कपूर अस्पताल से मैक्स अस्पताल के लिए रवाना हो गई. एंबुलेंस से आगे पुलिस की 2 गाडि़यां ग्रीन कारीडोर में रास्ता बनाते हुए चल रही थीं. 3 बज कर 16 मिनट पर डाक्टर उस हार्ट को ले कर साकेत स्थित मैक्स अस्पताल पहुंच गए.

मैक्स अस्पताल में डा. रजनीश मल्होत्रा के नेतृत्व में टीम पेशेंट मिराजुद्दीन के साथ औपरेशन थिएटर में तैयार थी. टीम ने हार्ट ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू कर दी. सुबह 6 बजे तक औपरेशन की प्रक्रिया चली. इस के बाद उस में खून का प्रवाह शुरू कर दिया. मिराजुद्दीन के शरीर में रामबाबू का हार्ट काम करने लगा. यह देख कर डा. रजनीश मल्होत्रा की टीम बहुत खुश हुई. क्योंकि मैक्स अस्पताल में हार्ट ट्रांसप्लांट का यह पहला मामला था. जब हार्ट सही तरीके से काम करने लगा तो डा. रजनीश मल्होत्रा ने मिराजुद्दीन को 24 घंटे वेंटीलेटर पर रख कर दूसरे वार्ड में ट्रांसफर कर दिया.

सफलतापूर्वक हार्ट ट्रांसप्लांट होने की प्रक्रिया में ट्रैफिक पुलिस की भी अहम भूमिका रही. दोनों अस्पतालों के डाक्टरों ने पुलिस की ग्रीन कारीडोर व्यवस्था की सराहना की है. संतोष और उन के बेटे द्वारा लिए गए अहम फैसले ने कई मरीजों को नई जिंदगी दी है. संतोष की तरह अन्य लोगों को भी इस तरह की सामाजिक सेवा में आगे आना चाहिए.

उत्तर भारत के गिनेचुने अस्पतालों में ही हार्ट ट्रांसप्लांट की सुविधा मौजूद है. दिल्ली में सब से ज्यादा हार्ट ट्रांसप्लांट एम्स में किए गए हैं. एम्स में अब तक करीब 25 हार्ट ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं. Hindi Stories

 

Emotional Story: मजा, जो बन गया सजा

Emotional Story: न्यू आगरा के रहने वाले रामप्रसाद ने मंजू की शादी कर के यही सोचा था कि वह बेटी से मुक्ति पा गए हैं. लेकिन मंजू को न पति अच्छा लगा था, न उस के घर वाले. यही वजह थी कि एक बेटी पैदा होने के बाद भी वह ससुराल में मन नहीं लगा पाई और एक दिन बेटी को ले कर बाप के घर आ गई.

बेटी ससुराल वालों से लड़ाईझगड़ा कर के हमेशा के लिए मायके आ गई है, यह बात न तो रामप्रसाद को अच्छी लगी थी और न उन की पत्नी को. उन्होंने मंजू को ऊंचनीच समझा कर ससुराल भेजना चाहा तो उस ने साफ कह दिया कि उन्हें उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है, वह कहीं नौकरी कर के अपना और बेटी का गुजारा कर लेगी.

मंजू ने यह बात कही ही नहीं, बल्कि कोशिश कर के नौकरी कर भी ली. उसे एक कंपनी में चपरासी की नौकरी मिल गई थी. इस के बाद वह निश्चिंत हो गई, क्योंकि उसे वहां से गुजारे लायक वेतन मिल जाता था. रहने के लिए पिता का घर था ही.

मंजू अपनी नौकरी पर औटो से आतीजाती थी. इसी आनेजाने में कभी मंजू की मुलाकात औटोचालक करन शर्मा से हुई तो दोनों में जल्दी ही जानपहचान हो गई.

करन अकसर मंजू को अपने औटो से लाने ले जाने लगा तो धीरेधीरे उन की यह जानपहचान दोस्ती में बदल गई. उस के बाद दोनों में प्यार हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन यहां परेशानी यह थी कि दोनों ही शादीशुदा नहीं, बच्चे वाले थे.

मंजू तो खैर पति को छोड़ कर आ गई थी, लेकिन करन शर्मा तो पत्नी और बच्चों के साथ रह रहा था. इस के बावजूद वह मजा लेने के चक्कर में मंजू से प्यार कर बैठा.

करीब 7 साल पहले करन की शादी भावना से हुई थी. उस के 2 बच्चे थे  बेटा ललित और बेटी आयुषि. भावना अपने इस छोटे से परिवार में खुश थी. प्यार करने वाला पति था तो सुंदर से 2 बच्चे. इन्हीं सब की देखभाल में उस का समय बीत जाता था.

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लेकिन अचानक मंजू ने उस के प्यार में सेंध लगा दी थी. मंजू के ही चक्कर में पड़ कर करन देर से घर आने लगा. वह भावना को घर का खर्च भी कम देने लगा. इस की वजह यह थी कि अब वह अपनी कमाई का एक हिस्सा मंजू पर खर्च करने लगा था.

कुछ दिनों तक तो भावना की समझ में ही नहीं आया कि पति में यह बदलाव कैसे आ गया? लेकिन जब उस ने देखा कि करन देर रात तक न जाने किस से फोन पर बातें करता रहता है तो उसे संदेह हुआ. उस ने पूछा भी कि इतनी रात तक वह किस से बातें करता रहता है? करन ने लापरवाही से कह दिया कि उस का एक दोस्त है, उसी से वह बातें करता है.

आखिर बहाना कब तक चलता. भावना को लगा कि पति झूठ बोल रहा है तो उसे डर लगा कि पति कहीं किसी गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा है. भावना का डर गलत भी नहीं था.

उधर मंजू के दबाव में करन ने उस से नोटरी के यहां शादी कर ली थी. शादी के बाद मंजू मायके में नहीं रहना चाहती थी, इसलिए करन ने थाना सिकंदरा की राधागली में किराए पर एक कमरा ले लिया और उसी में दोनों पतिपत्नी के रूप में रहने लगे. मंजू की बेटी इच्छा भी उसी के साथ रह रही थी.

मंजू को लगता था कि वह करन को अपने प्यार की डोर में इस तरह से बांध लेगी कि वह अपनी ब्याहता पत्नी को भूल जाएगा. जबकि वास्तविकता यह थी कि करन 2 नावों की सवारी कर रहा था. वह मंजू से इस तरह मिल रहा था कि भावना को पता न चले, क्योंकि वह जानता था कि अगर उसे पता चल गया तो घर में तूफान आ जाएगा.

यही वजह थी कि करन रात में मंजू के यहां जाता तो कोई न कोई बहाना बना कर जाता था. लेकिन पति के बदले हावभाव से परेशान हो कर भावना ने उस की शिकायत ससुर से कर दी. राधेश्याम ने बेटे को डांटफटकार कर तरीके से रहने को कहा. भावना ने भी धमकी दी कि अगर वह ढंग से नहीं रहा तो वह बच्चों को छोड़ कर मायके चली जाएगी.

पत्नी की इस धमकी से करन डर गया, क्योंकि अगर पत्नी घर छोड़ कर चली जाती तो वह बच्चों को कैसे संभालता? आखिर पत्नी की धमकी के आगे करन ने सरेंडर कर दिया और मंजू से मिलनाजुलना कम कर दिया. उस के इस व्यवहार से मंजू को लगा कि वह परेशानी में फंस गई है, क्योंकि करन से शादी करने के बाद वह नौकरी भी छोड़ चुकी थी. अब वह पूरी तरह से करन पर ही निर्भर थी. मकान के किराए के अलावा घर के खर्चे की भी चिंता थी.

एक दिन ऐसा भी आया, जब करन का मोबाइल फोन बंद हो गया. मंजू परेशान हो उठी. करन के बिना वह कैसे रह सकती थी? वह मायके भी नहीं जा सकती थी. करन के घर का पता भी उस के पास नहीं था. आखिर औटो वालों की मदद से उस ने करन को खोज निकाला.

मंजू करन के घर पहुंच गई. उस ने करन से साथ चलने को कहा तो भावना भड़क उठी. मंजू को भलाबुरा कहते हुए भावना ने कहा कि करन उसे छोड़ कर कैसे जा सकता है. उस ने उस से ब्याह किया है. उस से उस के 2 बच्चे हैं.

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मंजू और भावना में लड़ाई होने लगी. शोर सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. किसी ने थाना पुलिस को फोन कर दिया. सूचना पा कर थाना सिकंदरा के थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय करन के घर पहुंच गए. वह करन, मंजू और भावना को थाने ले आए.

तीनों की बातें सुन कर ब्रजेश पांडेय की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? एक आदमी ने मौजमस्ती के लिए 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया था. करन को न मंजू छोड़ रही थी और न भावना. छोड़ती भी कैसे, दोनों का भविष्य अब उसी पर टिका था. इस परेशानी को ध्यान में रख कर थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय ने कहा कि करन एक महीने मंजू के साथ रहेगा और एक महीने भावना के साथ. जब तक वह जिस के साथ रहेगा, उस की कमाई पर उसी का हक होगा.

मंजू को यह समझौता कतई मंजूर नहीं था, क्योंकि उस का रिश्ता तो रेत की दीवार की तरह था, जो कभी भी ढह सकती थी. लेकिन भावना इस समझौते पर राजी थी. मंजू ने इस समझौते का विरोध करते हुए कहा कि एक दिन करन उस के साथ रहेगा और एक दिन भावना के साथ.

हालांकि इस समझौते का कोई कानूनी मूल्य नहीं था, फिर भी ब्रजेश पांडेय ने एक कागज पर लिखवा कर दोनों औरतों और करन के दस्तखत करवा लिए. इस समझौते से जहां मंजू ने राहत की सांस ली, वहीं भावना को मजबूरी में सौतन के लिए अपने पति का बंटवारा करना पड़ा.

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करन ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा भी होगा, इसलिए अब वह परेशान था. उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन उस ने जो गलती की थी, अब उस का खामियाजा तो उसे भोगना ही था.

थानाप्रभारी ने जो समझौता कराया था, करन के घर वालों ने उस का सख्ती से विरोध किया. जब इस समझौते की खबर अखबारों में छपी तो सभी हैरान थे कि एक पुलिस अधिकारी ने ऐसा समझौता कैसे करा दिया? बात उच्चाधिकारियों तक पहुंची तो कोई बवाल होता, उस के पहले ही इंसपेक्टर ब्रजेश पांडेय का तबादला कर दिया गया.

कुछ भी हो, मंजू को लग रहा है कि उस की अपनी गृहस्थी बस गई है. करन अब एक दिन उस के साथ रहता है तो अगले दिन भावना के साथ. उस दिन वह जो कमाता है, उसे देता है जिस के साथ रहता है. लेकिन करन का लगाव भावना और अपने बच्चों के प्रति अधिक था, इसलिए अब वह मंजू पर उतना ध्यान नहीं देता, जितना देना चाहिए. इस से आए दिन उस का मंजू से झगड़ा होता रहता है.

करन ने जो गलती की है, अब वह उस का खामियाजा भोग रहा है. उसे भी कहां सुख मिल रहा है. कभी वह मंजू की ओर भागता है तो कभी भावना की ओर. परेशानी की बात तो यह है कि अभी इस समझौते को हुए ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, खींचतान शुरू हो गई है. आगे क्या होगा, कौन जानता है.

आखिर एक आदमी की गलती से 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. उस का भी क्या होगा, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है. यह समझौता भी कितने दिनों तक चलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. Emotional Story

Social Story: बहू भी कराती है हत्या

Social Story: आमतौर पर यह माना जाता है कि ससुराल में बहू पर ही अत्याचार होता है. यह अत्याचार कभी ससुर करता है कभी सास. लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबीपनाह गांव की रहने वाली बहू पर उसकी ससुराल वालों ने कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि खुद उसने ही करोडों की जायदाद के लालच में अपने ससुर की हत्या चचेरे देवर और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी और हत्या के आरोप में अपने पति और सगे देवर को फंसाने की कोशिश की, पर अपराध छिपाये नही छिपता और बहू को अपने डेढ साल के बच्चे के साथ जेल जाना पड़ा.

नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने दो बेटो संजय और रणविजय सिंह के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह की आम कह बाग और दूसरी जायदाद थी. जिसकी कीमत करोडो में थी. मुन्ना के बडे बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी.

सुशीला के 2 बच्चे 4 साल की बडी लडकी और डेढ साल का बेटा था. सुशीला पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इस कारण उसने अपने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिये. जिससे वह अपनी शादी न करे. सुशील को डर था कि देवर की शादी के बाद उसकी पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक लगेगा. यह बात जब मुन्ना सिह को पता चली तो वह अपने छोटे बेटे की शादी कराने का प्रयास करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिन्ता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उसकी मदद नहीं करेगा.

तब उसने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया. जब शिवम पूरी तरह से उसके काबू में आ गया तो उसने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिये कहा. शिवम जब इसके लिये तैयार नहीं हुआ तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रूपये देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात सुशीला के सुसर बुजुर्ग किसान मुन्ना सिंह चैहान आम की फसल बेचकर अपने घर आये. इसके बाद खाना खाकर आम की बाग में सोने के लिये चले गये. वह अपने पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने शिवम को फोन गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेन्द्र को भी ले आया था.

तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पांव पहुंच कर तीनो ने उनको दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल ड़ाल दिया. सुशीला ने उनके पांव पकड लिया और शिवम,राघवेन्द्र ने उनको काबू में किया. जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गये. वही पर दोनो ने गमझे से गला दबा कर उनकी हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार 2 सौ रूपये मिले. शिवम ने 45 सौ रूपये राघवेन्द्र को दे दिये. सुशीला ने आलमारी और बक्से की चाबी ले ली. सबलोग अपने घर चले आये. सुबह पूरे गांव मे मुन्ना सिह की हत्या की खबर फैल गई. मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया.

एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहु सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना के संबंध अपने बेटो से अच्छे नहीं थे. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनो बेटो संजय और रणविजय से पूछताछ शुरू की तो दोनो बेकसूर नजर आये.

इस बीच गांव में यह पता चला कि मुन्ना सिंह की बहू सुशीला के देवर से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की तो उसकी कुछ हरकते संदेह प्रकट करने लगी.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल की काल डिटेल देखनी शुरू की तो उनको पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम के फोन को देखा तो उसमें राघवेन्द्र का फोन मिला. इसके बाद पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला से सबसे पहले अलग अलग बातचीत शुरू की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उसके देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था. सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे तो वह अकेली पूरे जायदाद की मालकिन बन जायेगी. पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला तीनो को आमने सामने बैठाया.तो सबने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

14 जून को माल पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के समाने पेश किया. वहां से तीनो को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ साल के बेटे को भी जेल ले गई. उसकी 4 साल की बेटी को पिता संजय और चाचा रणविजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते वक्त भी सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था. वह बारबार शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज हो रही थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि मारने के समय उसने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड रखे थे.

Crime Story: ये है असली ‘शोले’, शौहर ही बन गया ‘गब्बर’

Crime Story: मनोज ने बांहों में जोर से कस कर अपनी बीवी फूलकुमारी को जकड़ लिया और भाभी सविता देवी ने उस के जिस्म पर गरम सलाखों से मारना शुरू कर दिया. बीचबीच में मनोज का बड़ा भाई सरोज उसे उकसाता रहा. फूलकुमारी रोतीचिल्लाती, तो उसे फिल्म ‘शोले’ की हीरोइन बसंती की तरह नाचने के लिए कहा जाता. जब वह नाचने से इनकार करती, तो गरम सलाखों से दागा जाता. दर्द से तड़पती फूलकुमारी नाचने की कोशिश करती, पर गश खा कर जमीन पर गिर पड़ती थी. चेहरे पर पानी डाल कर उसे होश में लाया जाता और उस के बाद फिर से उसे नाचने का फरमान सुना दिया जाता. फिल्म ‘शोले’ के खतरनाक विलेन गब्बर सिंह की हैवानियत को भी फूलकुमारी के पति और ससुराल वालों ने मात दे दी थी.

फूलकुमारी के बेटी को जन्म देने के साथ ही परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया था और उस की शादीशुदा और पारिवारिक जिंदगी लगातार खराब होती गई थी.

बेटी को जनने वाली फूलकुमारी पर उस के सास, ससुर, भैसुर, गोतनी और उस के पति का जोरजुल्म शुरू हो गया. फूलकुमारी और उस के मांबाप को परेशान करने के लिए मनोज ने यह रट लगानी शुरू कर दी कि उसे दहेज में मोटरसाइकिल नहीं मिली है. वह फूलकुमारी पर दबाव बनाने लगा कि वह अपने मांबाप से मोटरसाइकिल दिलाए, नहीं तो तलाक के लिए तैयार हो जाए.

मनोज की इस कारिस्तानी में गांव का ही रामानंद केवट भी बढ़चढ़ कर मदद करने लगा. रामानंद केवट पर औरतों को सताने के पहले से कई मुकदमे दर्ज हैं. उस ने अपने बड़ी बहू को इस कदर तंग किया था कि उस ने फांसी लगा कर अपनी जिंदगी ही खत्म कर ली थी. वह छोटी बहू को भी डराधमका कर रखता है और कहीं बाहर आनेजाने भी नहीं देता है. फूलकुमारी देवी बताती है कि मनोज ने मायके वालों से फोन पर बात करने पर भी पाबंदी लगा दी. 4 जून, 2016 को उसे घर के एक कमरे में धकेल कर दरवाजा बंद कर दिया गया और सास मुन्नी देवी पहरेदार के रूप में बाहर डंडा ले कर बैठी रहती थीं.

24 मई, 2014 को बिहार की राजधानी पटना के दीघा थाने की बिंद टोली में काफी धूमधाम से मनोज और फूलकुमारी की शादी हुई थी. भोजपुर जिले के आरा शहर के रघु टोला में रहने वाले किसान रामदयाल केवट और मुन्नी देवी के बेटे मनोज के साथ फूलकुमारी आरा आ गई.

इस बीच मनोज के बड़े भाई धनोज की बीवी रिंकू ने 6 मार्च, 2015 को बेटी को जन्म दिया. घर में खुशियां मनाई गईं और जम कर पार्टी हुई. उस के बाद जनवरी, 2016 को धनोज और रिंकू मुंबई चले गए. धनोज मुंबई में गरम मसाले का कारोबार करता है. उस के बाद मनोज और फूलकुमारी देवी के घर भी 27 अक्तूबर, 2015 को बेटी का जन्म हुआ. फूलकुमारी के बेटी होने के बाद पूरे घर में कुहराम मच गया.

जब फूलकुमारी के पिता रवींद्र महतो को अपनी बेटी की दर्दभरी कहानी का पता चला, तो वे बेटी की ससुराल आरा पहुंचे. उन्हें बेटी से नहीं मिलने दिया गया और बेइज्जत कर के घर से भगा दिया गया. उस के बाद रवींद्र महतो महिला थाने पहुंचे और इंचार्ज पूनम कुमारी से मिल कर पूरी घटना की जानकारी दी.

रवींद्र ने जब एफआईआर दर्ज करने की गुजारिश की, तो थाना इंचार्ज ने उन से कहा कि आप लोग पटना के दीघा थाना इलाके में रहते हैं, इसलिए आरा में एफआईआर दर्ज करने से आप लोगों को बारबार पटना से आरा आनेजाने में काफी पैसा और समय बरबाद होगा. आरा के सभी मामले पटना में ही रैफर कर दिए जाते हैं, इसलिए दीघा थाने जा कर एफआईआर दर्ज कराएं, तो अच्छा रहेगा.

थानाध्यक्ष पूनम कुमारी ने कहा कि दीघा थाने के थानाध्यक्ष के पास जा कर मामला दर्ज कराएं. पूनम कुमारी ने यह भी भरोसा दिलाया कि अगर दीघा थानाध्यक्ष मामला दर्ज नहीं करेंगे, तो उन से उन की बात करा देना. महिला थाने से निराशा हाथ लगने के बाद रवींद्र महतो पटना के दीघा थाने गए. वहां पर पुलिस वालों को बेटी के साथ हुए अत्याचार की कहानी सुनाई और एफआईआर दर्ज करने की गुहार लगाई.

रवींद्र की बातों को सुनने के बाद पुलिस वालों ने साफतौर पर कहा कि यह मामला तो भोजपुर जिले के आरा शहर का है, इसलिए यहां तो किसी भी हालत में एफआईआर दर्ज नहीं होगी. आरा में जा कर ही मामला दर्ज कराएं. इस के बाद फूलकुमारी के पिता रवींद्र महतो थाने में ही बैठ कर रोने लगे और बेटी को इंसाफ दिलाने की रट लगाने लगे. इस के बाद भी पुलिस वालों ने उन की मदद नहीं की.

पटना पुलिस हैडक्वार्टर के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, 9 जून, 2016 को दोपहर में महिला थाने की थानाध्यक्ष पूनम कुमारी ने रिपोर्ट में कहा था कि घायल के परिजन खुद ही इंजरी रिपोर्ट और एफआईआर दर्ज नहीं कराना चाह रहे थे. उन का कहना था कि पटना में एफआईआर दर्ज करेंगे. इस से यह साफ हो जाता है कि महिला थानों में भी औरतों के मामले को ले कर किस कदर लापरवाही बरती जाती है. Crime Story

Hindi Stories: एक औरत की खता

Hindi Stories: रिजवाना खूबसूरत महिला थी. उस की खूबसूरती के जाल में उलझ कर नूर हसन ने मर्यादाओं को तोड़ दिया. लेकिन तलाक के डर से उस ने प्रेमी नहीं पति का साथ दिया. घर तो बचा लिया, लेकिन जेल जाने से नहीं बच सकी. एक रात नूर हसन जब अचानक लापता हो गया तो उस के घर वालों की परेशानी बढ़ गई. वह घर वालों के साथ ही सोया था,

सुबह देखा तो वह बिस्तर से गायब था. वह कहां चला गया? कोई नहीं जानता था. घर वालों को भी उस ने कुछ नहीं बताया था. हैरानी की बात यह थी कि उस का मोबाइल भी स्विच औफ आ रहा था. घर वालों ने अपने हिसाब से उस की खूब खोजबीन की. लेकिन जब उस का कुछ पता नहीं चला तो उस के चाचा अब्दुल हमीद ने थाना डोईवाला में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

38 वर्षीय नूर हसन उत्तराखंड के डोईवाला कस्बे के गांव कुडकावाला निवासी दिवंगत सकी जान का बेटा था. वह घर के पास ही परचून की दुकान चलाता था. उस के परिवार में पत्नी शबनम के अलावा 2 बच्चे थे, जिन में एक 2 साल की बेटी और दूसरा 6 माह का दुधमुंहा बेटा था.

नूर हसन 6 अगस्त की देर रात लापता हुआ था. उस की गुमशुदगी दर्ज कर के थानाप्रभारी संदीप नेगी ने इस मामले की जांच में  एसएसआई प्रदीप चौहान व अन्य को लगा दिया था. पुलिस को लग रहा था कि नूर हसन शायद पत्नी से नाराज हो कर कहीं चला गया होगा, इसलिए पुलिस ने शबनम से पूछताछ की. पुलिस को उस ने बताया था कि वे दोनों हंसीखुशी से रहते थे. नाराजगी जैसी उन के बीच बिलकुल बात नहीं थी. वह लगभग 9 बजे बच्चों के साथ सो गई थी. सुबह नूर हसन गायब था और घर का दरवाजा खुला हुआ था. सुबह उस ने सोचा कि वह टहलने गए होंगे.

लेकिन जब 11 बजे तक वह नहीं आए, तो उस ने उन का मोबाइल नंबर मिलाया. मोबाइल स्विच औफ होने से उसे फिक्र हुई और उस ने अपने घर वालों को यह बात बताई. पूछताछ में एक बात बिलकुल साफ हो गई थी कि नूर हसन घर से अपनी मरजी से गया था. आखिर ऐसी क्या वजह थी, जो उस ने पत्नी को भी नहीं बताई. पुलिस ने जांच के लिए उस का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया. मोबाइल की काल डिटेल्स के लिए कंपनी को लिख दिया गया.

पुलिस नूर हसन का कुछ पता लगा पाती, उस से पहले ही 3 दिनों बाद यानी 11 अगस्त, 2015 को लोगों ने इस्तेमाल में न आने वाले कुएं में एक शव देखा. कुएं से बदबू फैलने के बाद लोगों ने उस में देखा था. इस की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना पा कर थानाप्रभारी संदीप नेगी मय पुलिस बल के मौके पर पहुंच गए थे. कुआं गहरा था और उस में पानी के साथ गंदगी भी अटी पड़ी थी. ऐसे कुएं में जहरीली गैसें होती हैं, यह पुलिस जानती थी, इसलिए आक्सीजन सिलेंडर किट के जरिए अग्निशमन दल के कांस्टेबल दीपक थपलियाल को उस में उतारा गया.

अंतत: कड़ी मशक्कत के बाद शव को बाहर निकाल लिया गया. शव सड़ने लगा था. कुएं से शव मिलने की सूचना से गांव में सनसनी फैल गई थी. थोड़ी देर में वहां लोगों की भीड़ जमा हो गई. कुएं से जो शव बरागद हुआ था, उस की शिनाख्त नूर हसन के रूप में हो गई. नूर हसन की कनपटी और सिर में पीछे की तरफ चोट के निशान थे. मामला सीधेसीधे हत्या का था. पुलिस का अनुमान था, किसी बहाने से उसे कुएं तक बुलाया गया था और वहीं उस की हत्या कर के शव कुएं में फेंक दिया गया था. सूचना पा कर एसपी (देहात) जी.सी. ध्यानी व पुलिस उपाधीक्षक अरुण पांडे ने भी मौका मुआयना किया था.

पुलिस ने लिखापढ़ी कर के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के साथ ही अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर के इस की विवेचना एसएसआई प्रदीप चौहान को सौंप दी गई. एसएसपी पुष्पक ज्योति ने इस मामलें में अधीनस्थों को त्वरित काररवाई कर के केस का खुलासा करने के निर्देश दिए. नूरहसन की हत्या के खुलासे के लिए थानाप्रभारी संदीप नेगी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में एसएसआई प्रदीप चौहान, एसआई संजीत कुमार, कांस्टेबल मनोज कुमार, विपिन सैनी, सुरेश रमोलसा , नवनीत, धन सिंह व महिला कांस्टेबल सुलेखा को शामिल किया गया.

इस बीच मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में मृत्यु की वजह सिर में किसी भारी वस्तु से लगी चोट से हुआ ब्रेन हैमरेज व पानी में डूबना बताया गया था. एक दिन बाद मृतक की काल डिटेल्स भी पुलिस को मिल गई थी. पुलिस ने काल डिटेल्स की जांच की तो पाया कि लापता होने वाली रात नूर हसन की 1:33 और 1:38 बजे एक नंबर पर बात हुई थी. पुलिस समझ गई कि हत्या का राज उसी नंबर में छिपा है, जिस ने फोन किया था. पुलिस को लगा कि संदिग्ध नंबर के मालिक तक पहुंचते ही केस का खुलासा हो जाएगा.

पुलिस ने उस नंबर का कंपनी से पता हासिल किया तो वह चौंकी, क्योंकि वह नंबर भी नूर हसन के नाम पर ही था. उस नंबर से केवल नूर हसन से ही बात की जाती थी. लापता होने वाली रात से दोनों ही नंबर बंद थे. दूसरा नंबर या तो नूर हसन  के परिवार में होना चाहिए था या किसी ऐसे खास शख्स के पास, जो उस के बेहद नजदीक था. ऐसा भी संभव था कि उस ने दूसरा नंबर अपनी पत्नी को दिया हो. पुलिस ने उस की पत्नी से पूछताछ की तो उस ने उस नंबर के बारे में कोई भी जानकारी होने से इनकार कर दिया. उस ने यह भी बताया कि नंबर कौन इस्तेमाल कर रहा था, वह यह भी नहीं जानती. इस से हत्या की गुत्थी सुलझाने के बजाय और उलझ गई. देखतेदेखते कई दिन बीत गए.

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि जिस मोबाइल में वह संदिग्ध नंबर इस्तेमाल किया गया था, उस में 2 सिमकार्ड इस्तेमाल होते थे. पुलिस ने दूसरे सिमकार्ड का नंबर हासिल कर के उस के मालिक का पता लगाया तो वह कुडकावाला के ही फिरोज के नाम निकला. इस से हत्या का मामला सुलझता नजर आया. 19 अगस्त को पुलिस उस के पास पहुंची तो पता चला कि वह मोबाइल उस की पत्नी रिजवाना इस्तेमाल करती थी. रिजवाना खूबसूरत महिला थी. पुलिस को सामने देख पतिपत्नी, दोनों बुरी तरह घबरा गए. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने ऐसा सनसनीखेज खुलासा किया कि पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई.

नूर हसन रिजवाना के हुस्न में उलझा हुआ था. यही हुस्न उसे बड़ी खामोशी और चालाकी से मौत की दहलीज तक ले गया. विस्तृत पूछताछ में चौंकाने वाली जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी. रिजवाना देहरादून के महूवाला क्षेत्र की रहने वाली थी. करीब 10 साल पहले उस का निकाह फिरोज के साथ हुआ था. रिजवाना तेजतर्रार खूबसूरत युवती थी. उसे पा कर फिरोज खुशी से फूला नहीं समाया था. समय के साथ रिजवाना 2 बच्चों की मां बनी. फिरोज गांव में ही छोटा सा हेयरकटिंग सैलून चलाता था. उस का छोटा सा परिवार हर तरह की खुशिया समेटे हुए था. रिजवाना उन युवतियां में थी, जो अपनी खूबसूरती पर नाज करती हैं.

रिजवाना के पड़ोस में ही नूर हसन रहता था. वह पहले शहर में वेल्डिंग का काम करता था, लेकिन यह काम उसे रास नहीं आया तो एक साल पहले उस ने गांव आ कर परचून की दुकान खोल ली. एक दिन रिजवाना नूर हसन की दुकान पर आई तो वह उसे देखता रह गया. एक ही मोहल्ले का होने के कारण दोनों एकदूसरे को पहले से ही जानते थे, लेकिन उस दिन नूर हसन की नजरें उस पर अटक गई थीं. उस का मन किया कि रिजवाना के हुस्न की तारीफ करे, लेकिन वह यह सोच कर खामोश रहा कि कहीं वह बुरा न मान जाए. जिन हसरत भरी निगाहों से उस ने रिजवाना को देखा था, उस से रिजवाना को अपनी खूबसूरती पर और भी नाज हो गया था.

कहते हैं कि मर्द की नजरों को पहचानने में औरत का कोई सानी नहीं होता. दूसरे शब्दों में यह कुदरती हुनर होता है. अगले कुछ दिनों में रिजवाना की समझ में आ गया कि कुछ तो है, जो नूर हसन के दिल में चल रहा है. तभी वह उसे ऐसी नजरों से देखता है. यूं तो नूर हसन खुद भी 2 बच्चों का पिता था, परंतु रिजवाना की खूबसूरती उसे लुभा रही थी. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह कभी मौका मिलने पर उस की खूबसूरती की तारीफ जरूर करेगा. एक दिन रिजवाना फिर उस की दुकान पर आई तो वह तारीफ करते हुए बोला,‘‘आप बुरा न माने तो एक बात कहूं भाभीजान?’’

‘‘हां कहो?’’ रिजवाना बोली.

‘‘पहले वादा कीजिए कि आप नाराज नहीं होंगी. इस से मुझे जो दर्द होगा, मैं खुद को कभी माफ नहीं कर सकूंगा.’’ यह बात उस ने इतने गंभीर लहजे में कही कि रिजवाना के मन में जिज्ञासा जाग गई और वह भी गंभीर हो गई, ‘‘ऐसी क्या बात है, जो तुम कहना चाहते हो?’’

‘‘बस यही कहना था कि आप बहुत खूबसूरत हैं. जो हुस्न आप ने पाया है, वह सब को नहीं मिलता. फिरोज खुशनसीब है, जो उसे आप जैसी शरीकेहयात मिली है.’’

तारीफ के अल्फाज हर किसी को खुश कर देते हैं. रिजवाना के साथ भी ऐसा ही हुआ. अपनी तारीफ सुन कर वह अंदर ही अंदर बहुत खुश हुई. वेसे भी नूर हसन की हसरतपूर्ण निगाहों ने उस के दिल में पहले ही जगह बना ली थी. इस के बाद जब दोनों मिलते, बातें कर लिया करते. एकाध बार ऐसा भी हुआ, जब नूर हसन फिरोज की अनुपस्थिति में किसी काम के बहाने उस के घर गया. रिजवाना कोई नादान नहीं थी. वह समझ गई कि नूर हसन उसे चाहता है. अब तक नूर हसन उसे भी अच्छा लगने लगा था. दोनों के दिलों में जो पनप रहा था, उसे एक दिन प्यार का नाम दे कर दोनों ने इजहार कर दिया.

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया और अकसर बातें करने लगे. कुछ समय ऐसे ही चलता रहा. इस के बाद दोनों एकदूसरे से मिलने का बहाना तलाशने लगे. रिजवाना सामान लेने के बहाने उस की दुकान पर आती तो वह भी किसी न किसी बहाने उस के घर पहुंच जाता. जमाने से उन्होंने अपने दिलों में पनपते प्यार को छिपाया हुआ था. रिजवाना ऐसी गलती कर चुकी थी, जो उसे नहीं करनी चाहिए थी. रिजवाना के मोबाइल में अकसर बैलेंस कम होने लगा तो फिरोज उस से सवालजवाब करने लगा. इस से उसे शक हो सकता था.

रिजवाना सतर्क हो गई. उस ने यह बात नूर हसन को बताई तो उस ने अपने नामपते से एक नया सिम कार्ड खरीदा और उसे रिजवाना को दे दिया, साथ ही ताकीद भी कर दी कि इस नंबर से वह सिर्फ उस से ही बात करेगी. रिजवाना के पास ड्यूल सिमकार्ड वाला मोबाइल था. उस के बाद वह नूर हसन से सिर्फ उसी नंबर से बात करने लगी. वह भी उसी नंबर पर बात करता था. दूसरी ओर फिरोज को पता भी नहीं था कि उस की बीवी क्या गुल खिला रही है. खुफिया मुलाकातों के दौर में एक दिन रिजवाना व नूर हसन ने मर्यादाओं की दीवार को गिरा दिया. दोनों शादीशुदा थे, नैतिक व सामाजिक नजरिए से यह गलत था, लेकिन दिल के हाथों की मजबूरी बहाना बन गई.

पतन की दलदल ऐसी होती है, जो इस में एक बार गिरता है, वह गिरता ही जाता है. उन दोनों के साथ भी ऐसा ही हुआ. उन के रिश्ते अकसर बनने लगे. वह पकड़े जा सकते थे. इस का रास्ता भी दोनों ने खोज निकाला. रिजवाना को जिस रात नूर हसन के आगोश में समाना होता था, उस रात वह॒॒फिरोज को खाने में नींद की गोलियां दे दिया करती थी. जब वह गहरी नींद में हो जाता था तो वह नूर हसन को फोन कर के बुला लेती थी. दोनों के बीच यह आए दिन का सिलसिला बन गया था. ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. दोनों को ले कर लोगों में चर्चाएं होने लगीं. फिरोज को पता चल गया कि दिन में नूर हसन उस के घर जाता है. उस ने रिजवाना को डांटाफटकारा.

कुछ दिन तो रिजवाना सही रास्ते पर रही, लेकिन बहुत जल्द उस ने पुराना ढर्रा अपना लिया. फिरोज को किसी ने बताया था कि नूर हसन रात में भी उस की पत्नी से चोरीछिपे मिलता है. रिजवाना की गतिविधियों पर उसे शक तो हो ही गया था, इस तरह की बातों ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया. एक दिन उस ने नूर हसन को अपने घर से निकलते हुए देख लिया. वह घर के अंदर दाखिल हुआ तो रिजवाना चौंक गई. फिरोज उस की हालत देख कर समझ गया कि वह गलत डगर पर है. फिरोज गुस्से वाला युवक था. उस का खून खौल उठा. उस ने रिजवाना की जम कर पिटाई की और तलाक की धमकी दे डाली.

रिजवाना को अपना घर टूटता नजर आया तो वह त्रियाचरित्र पर उतर आई. उस ने रोरो कर बताया कि नूर हसन ने उसे अपने जाल में उलझा लिया था और उसे बदनाम करने की धमकी देता था, इसलिए वह खामोशी से अपने साथ होने वाले जुल्मों को सहती रही. फिरोज को उस के नाटक और आंसुओं पर भरोसा हो गया. उस ने रिजवाना को तो माफ कर दिया, लेकिन उसी दिन मन में ठान लिया कि वह नूर हसन को सबक सिखा कर रहेगा.

रिजवाना समझ गई थी कि घर टूटने से बेहतर अपने कदम संभालने में ही भलाई है. उस ने नूर हसन से बातें करनी बंद कर दीं. फिरोज अपमान की आग में झुलस रहा था. उस ने रिजवाना से कह दिया कि वह नूर हसन को जिंदा नहीं छोड़ेगा. वह जानता था कि रिजवाना के माध्यम से ही वह नूर हसन को उलझा सकता है. दोनों ने उसे मारने की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, 6 अगस्त की शाम रिजवाना ने उसे फोन कर के कहा, ‘‘मुझे तुम से कुछ बात करनी है.’’

‘‘कह दो इस में सोचने की क्या बात है?’’ नूर हसन ने कहा.

रिजवाना राजदराना अंदाज में बोली, ‘‘मैं फोन पर नहीं कह सकती.’’

‘‘तो आज रात आ जाता हूं.’’ नूर हसन ने कहा तो वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘नहीं, तुम्हारा घर आना ठीक नहीं है. एक गड़बड़ हो गई है. मैं रात को मौका देख कर फोन करूंगी. तुम कुएं पर आ जाना, हम वहीं मिल लेंगे.’’

‘‘ठीक है.’’ नूर हसन ने कहा.

कई दिनों से दोनों के बीच रिश्ते नहीं बने थे. नूर हसन के मन में मिलने की तड़प थी. वह उस पर पूरा भरोसा करता था. रात में वह उस के फोन का बेसब्री से इंतजार करने लगा. उस की पत्नी व बच्चे सो चुके थे. देर रात एक बजे के बाद रिजवाना का फोन आया और उस ने उसे कुएं पर आने के लिए कहा. नूर हसन को ख्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि रिजवाना आज उसे मौत का पैगाम दे रही है. वह चुपके से घर से निकल गया.

उधर नूर हसन को फोन कर के फिरोज व रिजवाना कुएं पर पहुंच गए. रात के गहरे सन्नाटे में वहां कोई नहीं था. फिरोज छिप कर खड़ा हो गया, जबकि रिजवाना उस का इंतजार करने लगी. कुछ ही मिनटों में नूर हसन वहां आ गया. रिजवाना को अकेली पा कर उसे सुकून मिला. रिजवाना ने उसे बातों में  उलझा लिया, तभी फिरोज ने एक पत्थर उठाया और तेजी से उस के सिर व कनपटी पर वार कर दिए. अचानक हुए वार को नूर हसन सह नहीं पाया. वह बेहोश हो कर नीचे गिर गया. फिरोज ने रिजवाना की मदद से उसे उठाया और कुएं में डाल कर घर चले आए. बाद में नूर हसन का शव मिलने पर फिरोज न सिर्फ कुएं पर गया, बल्कि उस के परिवार के गम में भी शरीक हुआ. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि पुलिस कभी उन तक पहुंच पाएगी, लेकिन उन की यह सोच गलत साबित हुई और वह गिरफ्त में आ गए.

पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को एसएसपी पुष्पक ज्योति ने ढाई हजार रुपए का इनाम देने की घोषण भी की.

नूर हसन ने दूसरे की बीवी से रिश्ते बना कर विश्वास न किया होता और रिजवाना ने गलती कर के त्रियाचरित्र न दिखाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. अब उन के बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया है. कथा लिखे जाने दोनों हत्यारोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी और पुलिस उन के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही थी. Hindi Stories

True Crime Story: फिल्मी स्टाइल में सवा करोड़ की लूट

True Crime Story: कार ड्राइवर सुनील ने मालिक की सवा करोड़ की रकम लूटने के लिए जिस तरह योजना बनाई थी, वह थी तो बड़ी सटीक, लेकिन पुलिस उस से भी आगे निकली. लूट की रकम खर्च करने के पहले ही उसे साथियों के साथ पकड़ लिया.

8 सितंबर, 2015 को दोपहर करीब 2 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से एक डस्टर कार तेज गति से दौड़ पड़ी. कार में ड्राइवर सुनील के अलावा 5 लोग थे. कार थौमसन रोड पर कुछ दूर ही चली थी कि मंदिर के पास अचानक एक पल्सर मोटरसाइकिल सवार ने ओवरटेक कर के उस कार को रोक ली. अचानक मोटरसाइकिल के सामने आने पर डस्टर कार के ड्राइवर ने तेजी से ब्रेक लगाए, जिस से कार डिवाइडर से टकरातेटकराते बची. मोटरसाइकिल सवार एक सिख था, जो पुलिस वरदी में था. उस के साथ वाला व्यक्ति सफारी सूट पहने था. उस के पास वायरलैस था. वह मोटरसाइकिल खड़ी कर के सिख ड्राइवर की ओर आया और गेट खोल कर ड्राइवर से बोला, ‘‘खिसको.’’

इस से पहले कि कार ड्राइवर कुछ कहता, सिख ने ड्राइवर को जबरदस्ती खिसका कर ड्राइविंग सीट पर कब्जा कर लिया.

सिख के ड्राइविंग सीट संभालते ही डस्टर कार के पास एक आल्टो कार आ कर रुकी. उस में से 6 लोग उतरे, जिन में से 3 लोग डस्टर कार की पिछली सीट पर बैठ गए. पिछली सीट पर बैठे एक आदमी ने हड़बड़ा कर पूछा, ‘‘कौन हैं आप लोग?’’

तीनों में से एक आदमी ने रिवौल्वर तान कर डांटते हुए कहा, ‘‘दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच.’’

‘‘लेकिन आप का बर्ताव पुलिस जैसा नहीं है?’’ ड्राइवर बोला.

यह सुन कर आल्टो कार से आए लोग ठहाका लगा कर हंसे. सिख ने हंसते हुए कहा, ‘‘लगता है, इन का वास्ता पुलिस से कभी नहीं पड़ा, इसलिए ये पुलिस का बर्ताव नहीं जानते. संदीप जरा इन्हें पुलिस का बर्ताव तो दिखाओ.’’

संदीप ने रिवौल्वर लहराते हुए कहा, ‘‘इस में 7 गोलियां हैं और तुम लोग हो 4. हिसाब लगा लो, 3 के हिस्से में 2-2 गोलियां आएंगी और एक के हिस्से में एक गोली. अब अगर तुम में से किसी की भी जुबान से एक लफ्ज भी निकला तो मुझे ट्रिगर दबाने में वक्त नहीं लगेगा.’’

उस आदमी की बात सुन कर सभी डर गए.

डस्टर कार को सिख चला रहा था. डस्टर के पीछेपीछे आल्टो कार भी आ रही थी. संदीप की धमकी के बाद कार में एकदम खामोशी थी.

उस खामोशी को तोड़ते हुए संदीप ने कहा, ‘‘सामान डिक्की में ही रखा है न?’’

‘‘क…कैसा सामान?’’ डस्टर कार के ड्राइवर, जिसे सिख ने ड्राइविंग सीट से खिसकाया था, ने हड़बड़ा कर पूछा.

संदीप ने उस के सिर पर एक मुक्का मार कर कहा, ‘‘होशियारी दिखाता है, मैं उस सामान के बारे में पूछ रहा हूं, जिसे ये लोग झारखंड से लाए हैं. 2 सूटकेस और एक बड़ा गत्ते का डिब्बा, जिस में एक करोड़ से ज्यादा रुपए रखे हैं.’’

‘‘रुपए?’’ तीनों चौंके. उन में से एक ने कहा, ‘‘उस में रुपए नहीं, दूसरा कीमती सामान है. सामान क्या है, यह हमें भी नहीं पता.’’

‘‘तुम्हें नहीं पता तो कोई बात नहीं, लेकिन हमें पता है. उस में एक करोड़ से ज्यादा रुपए हैं.’’ संदीप ने कहा, ‘‘तुम लोग हवाला करोबार से जुड़े हो. बेखौफ हो कर इतनी बड़ी रकम ले कर आए हो. रास्ते में तुम्हारे साथ कुछ हो गया तो… तुम्हें जहां जाना है, हम सुरक्षित पहुंचा देंगे.’’

सिख कार को गीता कालोनी की ओर जाने वाली सुनसान सड़क पर ले जाने लगा तो ड्राइवर ने कहा, ‘‘आप इधर कहां जा रहे हैं, हमें तो गुड़गांव जाना है. आप शायद रास्ता भूल गए हैं?’’

सिख ने उस की पसलियों पर कोहनी मार कर कहा, ‘‘तू हमें रास्ता बताएगा? चुपचाप बैठा रह, वरना कार से बाहर फेंक दूंगा.’’

सिख की इस धमकी से ड्राइवर की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. कुछ देर बाद सिख ने कार सुनसान जगह पर रोक दी, जहां जंगल था. आल्टो कार भी आ कर वहीं रुक गई.

सिख ने सभी को कार से बाहर उतारा और उन में से 3 को हड़काते हुए जंगल में ले गया. उन्हें धमका कर बोला, ‘‘जब तक मैं न कहूं, सिर झुकाए यहीं बैठे रहना. जांच में खलल डाला तो यहीं ढेर कर दूंगा.’’

उन लोगों को वहीं छोड़ कर सिख कार के पास आ गया. डर की वजह से तीनों सिर झुकाए वहीं बैठे रहे.

काफी देर बाद भी जब सिख ने उन्हें जंगल से बाहर आने को नहीं कहा तो उन्हें शंका हुई. वे डरतेडरते कार के पास पहुंचे तो वहां ड्राइवर सुनील सड़क पर पड़ा कराह रहा था. उस के कपड़े फटे हुए थे.

सुनील ने कराहते हुए बताया, ‘‘वे लोग कार की डिक्की में रखे दोनों सूटकेस और गत्ते का डिब्बा ले कर अपनी कार से भाग गए हैं. मैं ने उन्हें रोका तो उन्होंने मेरी पिटाई कर के मेरे कपड़े फाड़ दिए. मैं ने कार का नंबर पढ़ने की कोशिश की, मगर नंबर प्लेट पर काला पेंट लगा था, इसलिए नंबर नहीं पढ़ सका.’’

दरअसल, झारखंड के जिला रांची के रहने वाले प्रभय महतो और लक्ष्मी सिंह जिला रायगढ़ स्थित आलोक स्टील कंपनी के एकाउंट डिपार्टमेंट में नौकरी करते थे. 5 सितंबर, 2015 को कंपनी के मालिक आलोक संगता ने दोनों से कहा कि उन्हें 7 सितंबर, 2015 को कुछ जरूरी सामान ले कर गुड़गांव स्थित कंपनी के औफिस जाना है. कंपनी की ओर से प्रभय महतो और लक्ष्मी सिंह का रिजर्वेशन गरीबरथ एक्सप्रैस में रायगढ़ के बरकाना रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली तक का करा दिया गया था. आलोक संगता ने दोनों को 2 सूटकेस और एक गत्ते का डिब्बा दे कर कंपनी की कार से बरकाना रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया था.

शाम 7 बजे ट्रेन बरकाना रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली के लिए चली और सुबह 11 बजे गाजियाबाद स्टेशन पर पहुंची. तभी कंपनी के गुड़गांव औफिस के ब्रजेश पांडेय ने प्रभय महतो को फोन कर के पूछा, ‘‘आप लोग इस समय कहां हैं?’’

प्रभय महतो ने बताया कि ट्रेन गाजियाबाद रेलवे स्टेशन से चल चुकी है. ट्रेन आनंद विहार रेलवे स्टेशन पहुंची तो ब्रजेश पांडेय ने फिर फोन कर के उन की लोकेशन पूछी. टे्रन करीब पौने 2 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफौर्म नंबर 7 पर पहुंची तो प्रभय महतो और लक्ष्मी सिंह अपने साथ लाए सामान को ले कर उतरे. ट्रेन के गेट पर ही उन्हें गुड़गांव औफिस के ब्रजेश पांडेय, विजय मिश्रा और ड्राइवर सुनील मिले. तीनों ने सूटकेस और गत्ते का डिब्बा उठा लिए. इस के बाद सभी स्टेशन से बाहर कार पार्किंग में गए, जहां उन्होंने अपनी डस्टर कार खड़ी कर रखी थी. सामान कार की डिक्की में रख कर सभी कार में बैठ गए. सुनील ड्राइविंग सीट पर बैठा तो उसी के बराबर में अगली सीट पर ब्रजेश बैठ गया.

बाकी के तीनों पिछली सीट पर बैठ गए. सुनील कार चला कर कुछ ही दूर पहुंचा था कि लूट की यह वारदात हो गई. लक्ष्मी सिंह और प्रभय महतो को नहीं मालूम था कि सूटकेसों एवं गत्ते के डिब्बे में कौन सा कीमती सामान था? यह बात तो उन्हें अब पता चली कि उन में एक करोड़ से ज्यादा रुपए रखे थे. कंपनी के मालिक आलोक संगता तो इसी तरह कीमती सामान कह कर अकसर रायगढ़ स्थित कंपनी औफिस से उन्हें गुड़गांव भेजते रहते थे. बस हर बार वह कर्मचारी बदल दिया करते थे. लेकिन नई दिल्ली स्टेशन पर से वह सामान लेने के लिए ब्रजेश पांडेय, विजय मिश्रा और ड्राइवर सुनील ही आते थे.

लूट कितने की हुई थी, यह ब्रजेश और उस के साथियों को भी पता नहीं थी. लुटेरे उन के मोबाइल भी अपने साथ ले गए थे, इसलिए वे लूट की खबर भी अपने मालिक और पुलिस को नहीं दे सके. वे कार से गुड़गांव औफिस जाना चाहते थे, लेकिन सुनील ने जब डस्टर कार स्टार्ट करनी चाही तो वह स्टार्ट नहीं हुई. शायद जाते समय लुटेरे कार में कुछ गड़बड़ी कर गए थे, जिस से कार स्टार्ट नहीं हो रही थी. वे बस द्वारा आईएसबीटी पहुंचे और वहां से औटो ले कर गुड़गांव औफिस पहुंचे.

गुड़गांव औफिस पहुंच कर प्रभय महतो ने कंपनी के मालिक आलोक संगता को फोन द्वारा वारदात की सूचना दी. संगता ने प्रभय महतो से कह दिया कि वह तुरंत पुलिस को फोन न करे. उन्होंने कहा कि वह अपने बड़े भाई अभिषेक संगता से सलाह ले कर उन्हें सूचना देते हैं. जब इस लूट की खबर अभिषेक संगता को बताई गई तो उन्होंने प्रभय महतो को पटियाला हाउस कोर्ट के एक वकील का पता बताते हुए उन से मिलने को कहा. प्रभय महतो अपने साथियों के साथ पटियाला हाउस पहुंचा और अभिषेक संगता द्वारा बताए वकील से मिला. वकील के कहने पर प्रभय महतो ने पुलिस कंट्रोल रूम को लूट की सूचना दी.

यह इलाका थाना कमला मार्केट थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम की कार के अलावा थाना कमला मार्केट के भी 2 पुलिसकर्मी उस स्थान पर पहुंच गए, जहां यह घटना घटी थी. थानाप्रभारी यशवीर सिंह भी घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने एक करोड़ से अधिक रुपए की लूट की सूचना डीसीपी परमादित्य को दी तो वह भी घटनास्थल पर पहुंच गए और दिल्ली के समस्त थानों को वायरलैस द्वारा सूचना प्रसारित करा दी, ताकि नाकाबंदी कर बदमाशों की तलाश की जा सके.

पुलिस अधिकारियों को जब पता चला कि लुटेरों में एक सरदार भी था और वह पुलिस वरदी में था तो वे हैरान रह गए. डीसीपी के निर्देश पर थानाप्रभारी ने प्रभय महतो की ओर से अज्ञात बदमाशों के खिलाफ भादंवि की धारा 365/392/397/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. दिनदहाड़े एक करोड़ से ज्यादा की लूट की वारदात ने पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए थे. पुलिस के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती थी. इसलिए डीसीपी परमादित्य ने इस केस के खुलासे के लिए जिले के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों की अगुवाई में पुलिस की 3 टीमें बनाईं.

पहली टीम कमला मार्केट के थानाप्रभारी यशवीर सिंह, दूसरी हौजकाजी के थानाप्रभारी जरनैल सिंह और तीसरी चांदनी महल के थानाप्रभारी अनिल शर्मा के नेतृत्व में बनाई. स्पैशल स्टाफ के प्रभारी को भी टीमों के साथ लगा दिया गया. तीनों टीमों का नेतृत्व एसीपी अनिल कपूर कर रहे थे. पुलिस कमिश्नर के आदेश पर क्राइम ब्रांच भी इस केस की छानबीन में जुट गई. पुलिस की तीनों टीमों ने घटनास्थल का मुआयना किया और ब्रजेश पांडेय, विजय मिश्रा, सुनील, प्रभय महतो एवं लक्ष्मी सिंह से विस्तृत पूछताछ की. उन्होंने डस्टर कार की जांच की तो पता चला कि उस में सैंटर लौकिंग सिस्टम था.

पूछताछ में ड्राइवर सुनील के हावभाव और जवाब देने का अंदाज देख कर थानाप्रभारी यशवीर सिंह को उस पर शक हुआ. सुनील पर शक करने के लिए यशवीर सिंह के दिमाग में 4 बातें थीं. पहला सुनील का वेतन 14 हजार रुपए प्रति महीना था, जबकि वह अमीरों की तरह रहता था. उस के गले में सोने की मोटी चेन, हाथों की अंगुलियों में सोने की अंगूठियां, महंगी जींस, टीशर्ट, कीमती घड़ी थी.

दूसरा कारण यह था कि जब डस्टर कार में कीमती सामान था तो उस ने कार को ओवरटेक करने वाले मोटरसाइकिल सवार सिख को देखते ही कार क्यों रोकी थी? तीसरी वजह डस्टर कार में सेंटर लौकिंग सिस्टम था तो सिख ने कार का गेट कैसे खोल लिया? इस से साफ जाहिर था कि सुनील ने सेंटर लौकिंग सिस्टम को पहले से ही खोल रखा था. चौथा कारण सुनील के पास 5 मोबाइल थे, जबकि उस ने पुलिस को एक ही फोन होना बताया था. बहरहाल थानाप्रभारी यशवीर सिंह ने सुनील से कहा कुछ नहीं. उन्होंने उस की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सबइंसपेक्टर मंगेश सिंह को सादा लिबास में लगा दिया. पता चला कि सुनील दिल्ली में किराए के मकान में रहता था, जो मोतीबाग के नजदीक था. एसआई योगेश सिंह उस पर नजर रखने लगे.

जिस जगह पर डस्टर कार रोक कर उस में लुटेरे सवार हुए थे, थानाप्रभारी जरनैल सिंह की टीम ने वहां एक जगह पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग फुटेज निकलवाई. फुटेज में एक सिख युवक दिखाई दिया, जो पुलिस वरदी में था. फुटेज में 1-2 औटो भी दिखाई दिए, जिन नंबरों के आधार पर थानाप्रभारी जरनैल सिंह की टीम उन के चालकों तक पहुंच गई. पुलिस ने उन चालकों से उस लूट के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने लूट की वारदात से तो अनभिज्ञ बताया, लेकिन फुटेज में दिखे सिख युवक को पहचान लिया. उन्होंने बताया कि इस का नाम बेअंत सिंह है और यह दिल्ली कैंट इलाके में रहता है. उन्होंने यह भी बताया कि पहले यह औटो चलाता था, लेकिन अब उस के कई औटो किराए पर चल रहे हैं. इसी वजह से वे उसे जानते हैं.

इंसपेक्टर जरनैल सिंह के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. इस के बाद डीसीपी की सलाह पर उन्होंने बेअंत सिंह के घर की निगरानी पर एसआई दीपक कुमार व हेडकांस्टेबल जगदेव सिंह सिद्धू को लगा दिया. ड्राइवर सुनील की गतिविधियों पर नजर रख रहे एसआई मंगेश सिंह ने 10 सितंबर, 2015 की शाम 5 बजे देखा, सुनील बनठन कर औटो पर सवार हो कर चल पड़ा. मंगेश सिंह भी उस के पीछे लग गए. काफी देर बाद औटो दिल्ली कैंट स्थित एक मकान के बाहर रुका. औटोचालक को पैसा देने के बाद सुनील एक मकान के बाहर खड़े हो कर मोबाइल से बात करने लगा. कुछ देर बाद दरवाजा खुला तो सुनील अंदर चला गया. उस के बाद दरवाजा बंद हो गया.

एसआई मंगेश सिंह ने उसी मकान के पास सादा लिबास पहने थाना हौजकाजी के एसआई दीपक कुमार और हेडकांस्टेबल जगदेव सिंह सिद्धू को खड़े देखा तो वह उन के पास पहुंच गए. वहां पर एक आल्टो कार भी खड़ी थी. लूट की वारदात में भी आल्टो कार का प्रयोग हुआ था. इस से उन्हें लगा कि लुटेरों का इस मकान से जरूर कोई संबंध है. लगभग 5 मिनट बाद 2 युवक उसी मकान के सामने रुके. एक ने फोन किया तो दरवाजा खुला. दोनों के अंदर घुसते ही दवाजा बंद हो गया. लगभग 5 मिनट बाद औटो से 3 युवक उतरे. उन में से एक ने फोन किया तो दरवाजा खुला. उन तीनों के अंदर जाते ही दवाजा बंद हो गया.

‘‘क्या चक्कर है? लूट की वारदात में 7 लोग शामिल थे और यहां भी 7 इकट्ठे हो गए हैं,’’ हेडकांस्टेबल सिद्धू ने कहा तो मंगेश सिंह बोले, ‘‘लूट की कामयाबी का जश्न मनाने के लिए इकट्ठे हुए होंगे.’’

एसआई दीपक कुमार मुसकराते हुए बोले, ‘‘शायद इन लोगों को पता नहीं कि तिहाड़ जेल में इन का स्वागत होने वाला है.’’

लगभग आधे घंटे बाद सुनील और बेअंत सिंह के साथ 5 युवक उस मकान से बाहर आए और मकान के सामने खड़ी आल्टो कार में बैठ गए. बेअंत सिंह कार ड्राइव करने लगा. एसआई मंगेश सिंह, दीपक कुमार, हेडकांस्टेबल जगदेव सिंह सिद्धू कार के पीछे लग गए. आल्टो कार कनाट प्लेस स्थित एक वाइन शौप के सामने रुकी. एक युवक उतरा और उस दुकान से व्हिस्की की 2 बोतलें खरीद कर पास ही स्थित एक होटल में चला गया. अन्य लोग भी कार से उतर कर उसी होटल में घुस गए.  नशे में अकसर लोग डींगें हांकने लगते हैं. वे सातों क्या डींगें हाकेंगे, यह जानने के लिए उन का पीछा कर रहे पुलिसकर्मी भी उसी होटल में पहुंच गए और बातें सुनने के लिए उन्हीं के इर्दगिर्द बैठ गए. यह सारी जानकारी उन्होंने एसीपी अनिल कपूर को दे दी थी.

सातों एक ही मेज के इर्दगिर्द रखी कुर्सियों पर बैठ कर शराब पीने लगे, साथ ही वे मुर्गे की टांगें भी खींच रहे थे. हेडकांस्टेबल सिद्धू उन के पास एक खाली कुर्सी पर जा कर बैठ गए. उन्होंने वेटर को गोभी परांठा और कौफी का और्डर दे दिया. सातों 2 घंटे वहां बैठ कर सारी शराब पी गए, लेकिन लूट के बारे में कोई बात नहीं की. इधरउधर की फालतू बातें करते रहे. शराब पी कर सभी होटल से बाहर निकले तो सुनील और बेअंत सिंह तो कार में बैठ गए, जबकि बाकी के पांचों युवक अलगअलग रूट की बसों से कहीं चले गए.

एसआई दीपक कुमार कार का पीछा करने लगे. बेअंत सिंह ने कार पूसा रोड के पास रोकी तो सुनील कार से उतर कर 755 नंबर की बस में बैठ गया. इस के बाद बेअंत सिंह अपने घर चला गया. उधर बस से सुनील भी अपने घर चला गया था. पलपल की जानकारी एसीपी अनिल कपूर को मिल रही थी. उन्होंने थानाप्रभारी यशवीर सिंह की टीम से सुनील को हिरासत में ले कर पूछताछ करने को कहा तो पुलिस टीम सुनील को हिरासत में ले कर थाना कमला मार्केट ले आई. एसीपी अनिल कपूर की मौजूदगी में यशवीर सिंह ने जब सुनील से सख्ती से पूछताछ की तो वह ज्यादा देर तक झूठ की बैसाखियों पर खड़ा नहीं रह सका और सच उगल दिया. उस ने लूट में शामिल सभी साथियों के नाम बता दिए.

इस के बाद थाना चांदनी महल के थानाप्रभारी अनिल शर्मा की टीम ने दिल्ली कैंट, आनंद निकेतन, ग्रेटर कैलाश, फतेहपुर बेरी, रानापुर खुर्द में ताबड़तोड़ छापे मार कर बेअंत सिंह और उस के साथियों, श्रद्धा, सुदेश, अशोक, नरेश उर्फ दीपक, संदीप को गिरफ्तार कर लिया. ये सभी लूट की वारदात में शामिल थे. डीसीपी परमादित्य की उपस्थिति में सभी से पूछताछ की गई तो सहजता से सभी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और लूट की वारदात की पृष्ठभूमि में छिपी कहानी बयां कर दी.

ड्राइवर सुनील पहले दिल्ली में औटो चलाता था. वह असम का रहने वाला था. 4 साल पहले उस ने औटो चलाना बंद कर के रायगढ़ (झारखंड) स्थित आलोक स्टील कंपनी प्रा. लि. के गुड़गांव स्थित औफिस की कार चलाने लगा. कंपनी के मालिक आलोक संगता गुड़गांव एवं नोएडा में रियल एस्टेट का भी कारोबार करते थे. आलोक संगता हर 2-3 महीने में रायगढ़ से अपने कर्मचारियों के जरिए सूटकेसों व गत्ते डिब्बों में करोड़ों रुपए की रकम गुड़गांव औफिस भेजा करते थे. किसी भी कर्मचारी को इस बात की भनक नहीं होती थी कि सूटकेसों व गत्ते के डिब्बे में करोड़ों रुपए की रकम होती है. यह बात सिर्फ आलोक संगता के सब से खासमखास ब्रजेश पांडेय को पता होती थी.

करीब 7 महीने पहले ब्रजेश पांडेय ने शराब के नशे में सुनील को यह बात बताई तो उस के दिमाग में लालच आ गया और वह लूट की वारदात कराने का खाका बनाने लगा. सेना से निकाले गए बेअंत सिंह से सुनील की अच्छी जानपहचान थी. बेअंत सिंह के पास कई औटो थे, जिन पर उस ने ड्राइवर रख रखे थे. सुनील भी पहले बेअंत सिंह का औटो चलाता था. सुनील ने कंपनी की रकम की लूट की बात बेअंत सिंह को बता कर योजना भी बता दी. बेअंत सिंह लूट की वारदात को अंजाम देने के लिए तैयार हो गया.

बेअंत सिंह ने अपने ही औटोचालक श्रद्धा (27 वर्ष), सुदेश (33 वर्ष), अशोक (29 वर्ष), नरेश उर्फ दीपक (31 वर्ष), संदीप उर्फ बिट्टू (35 वर्ष) को लूट की योजना में शामिल कर लिया. 7 सितंबर, 2015 की सुबह ब्रजेश पांडेय ने सुनील से कहा, ‘‘कल दोपहर को कंपनी से 2 कर्मचारी कंपनी का कीमती सामान ले कर आएंगे. उन्हें लेने के लिए हमें नई दिल्ली स्टेशन जाना है. ट्रेन 2 बजे के आसपास आएगी. उस वक्त तुम औफिस में ही रहना.’’

सुनील को जिस मौके का इंतजार था, वह मौका 8 सितंबर को खत्म होने वाला था. 7 सितंबर, 2015 की शाम को वह बेअंत सिंह के घर गया और पूरी बात बता दी. बेअंत सिंह ने योजना में शामिल औटो चालकों को फौरन अपने घर बुला लिया. इस के बाद योजना के एकएक पहलू पर बात हुई. बेअंत सिंह ने हरिनगर के एक दरजी से सिपाही की वरदी सिलवा ली थी, एक देसी तमंचे का भी इंतजाम कर लिया था. 8 तिसंबर, 2015 की सुबह 8 से 10 बजे तक सभी ने, जिस जगह लूट करनी थी, वहां लूट का कई बार ट्रायल किया.

दोपहर 1 बजे बेअंत सिंह अपनी लाइसैंसी रिवौल्वर, पुलिस वरदी, देशी तमंचा ले कर अपनी आल्टो कार से पूसा रोड पहुंचा. वहीं सभी एकत्र हुए. वहीं पर बेअंत सिंह ने वरदी पहनी. सुनील ने अपनी पलसर मोटरसाइकिल श्रद्धा को दे रखी थी. अब उन्हें ड्राइवर सुनील के सिग्नल मिलने का इंतजार था. उन का इंतजार खत्म हुआ दोपहर 2 बजे. जब सुनील ने बेअंत सिंह को फोन कर के कहा, ‘‘भाईसाहब, आप तैयार रहना, आज नाइट शो देखने जरूर चलेंगे.’’

यह बेअंत सिंह के लिए कोड वर्ड में इशारा था. यह सुन कर बेअंत सिंह मोटर साइकिल पर सवार हुआ और पांचों औटोचालक उस की आल्टो कार में सवार हुए. सभी थौमसन रोड पर खड़े हो कर मौके का इंतजार करने लगे. कुछ देर बाद डस्टर कार आती नजर आई तो सभी अलर्ट हो गए. बेअंत सिंह ने मोटरसाइकिल से कार को ओवरटेक कर के उस के आगे खड़ी कर दी. सुनील ने कार का सेंट्रल लौकिंग सिस्टम पहले ही खुला रखा था. बेअंत सिंह दरवाजा खोल कर सुनील को धकेल कर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया.

आल्टो कार भी वहीं आ कर रुक गई तो बेअंत सिंह ने अगली सीट पर बैठे ब्रजेश पांडेय को उतार कर आल्टो कार में बैठा दिया. इस के बाद योजनाबद्ध तरीके से उन्होंने लूट की इस बड़ी वारदात को अंजाम दिया. पुलिस ने अभियुक्तों की निशानदेही पर लूट की वारदात में प्रयुक्त आल्टो कार, पलसर मोटरसाइकिल, पुलिस वरदी, बेअंत सिंह का लाइसैंसी रिवौल्वर, देसी तमंचा के अलावा लूटे गए 1 करोड़ 25 लाख रुपए बरामद कर लिए.

सातों अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें तीसहजारी कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. अपने मालिक की रकम पर सुनील के मन में लालच नहीं आता तो वह और उस के 6 साथी आज सलाखों के पीछे नहीं होते. लालच उसे ही नहीं, उस के साथियों को भी ले डूबा. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News: बहनों से छेड़छाड़, भाइयों की मुसीबत

Crime News: साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाला राजा नामक नौजवान दिल्ली से लगे नोएडा के एक कार गैराज में नौकरी करता था. उसे घायल हालत में अस्पताल में भरती कराया गया. 3 दिन जिंदगी और मौत से जूझने के बाद राजा की सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट गई. वह मारपीट में बुरी तरह से घायल हुआ था. उस के सिर व बदन के दूसरे हिस्सों पर चोटों के निशान थे.

उस की मौत ने न सिर्फ उस के परिवार, बल्कि उस के जानकारों को भी हिला कर रख दिया. राजा की गलती महज इतनी थी कि वह अपनी बहन के साथ आएदिन होने वाली छेड़छाड़ का विरोध करता था. किसी ने सोचा भी नहीं था कि विरोध करने पर मनचला अपने साथियों के साथ उसे इस तरह निशाना बना लेगा. एक भाई के लिए यह जरूरी भी हो जाता है कि जब कोई सिरफिरा शोहदा उस की बहन को छेड़े, तो वह विरोध करे, लेकिन मनचलों के हौसले बुलंद होते हैं. उन्हें लगता है कि ऐसे विरोध से उन की तौहीन हो गई है और वे सीनाजोरी कर के मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं.

दरअसल, राजा की बहन को एक शोहदा वसीम अकसर ही परेशान किया करता था. मौका लगने पर छेड़छाड़ और फब्तियां कसता था. राजा ने इस बात का कई बार विरोध किया, लेकिन उस की हरकतें बंद नहीं हुईं. एक दिन वसीम ने अपने साथियों के साथ मिल कर राजा की जम कर पिटाई कर दी. गंभीर चोटों के बाद उस की मौत हो गई. पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. कानून ने अपना काम किया, लेकिन बात सिर्फ इतने पर खत्म नहीं हो जाती. सवाल है कि किसी सभ्य समाज में क्या एक भाई को यह सब सहना चाहिए?

समाज में इस तरह की वारदातों में इजाफा हो रहा है. हर छोटेबड़े शहर में शोहदे हैं. हर मिनट कोई लड़की आहत हो कर खून का घूंट पी रही होती है और शोहदे कौलर तान कर निकल जाते हैं. विरोध करने पर सिरफुटौव्वल होती है. बहन के साथ होने वाली छेड़छाड़ के विरोध की कीमत चुकाने वाला राजा कोई एक अकेला नौजवान नहीं था. उत्तर प्रदेश के बरेली में तो बहन से छेड़छाड़ करने पर दबंगों ने एक भाई की सरेआम हत्या कर दी. दरअसल, संजय नगर इलाके में एक लड़की सावित्री घर के बाहर खड़े हो कर अपने भाई नन्हे से बात कर रही थी. इसी बीच मोटरसाइकिल सवार एक लड़के ने उसे हलकी टक्कर मार दी.

सावित्री ने विरोध किया, तो उस ने दबंगई दिखा कर छेड़छाड़ कर दी. गुस्से में आए भाई ने उस लड़के को पीट दिया. वह लड़का तब तो चला गया, लेकिन कुछ देर बाद वह अपने दोस्तों के साथ आया और भाई से मारपीट कर दी. उन्होंने उस के सिर पर फरसे से वार किए. तेज वार से नन्हे लहूलुहान हो कर गिर गया और उस की मौत हो गई. मामला किसी छोटी जाति की लड़की का हो, तो दबंग उस पर अपना हक समझते हैं कि वह बिना नानुकर किए उन की बात मान ले.

सुलतानपुर का मामला कुछ ऐसा ही है. कादीपुर कोतवाली क्षेत्र में पिछड़ी जाति के निषाद की बेटी रीना (बदला नाम) खेत पर गई थी, तभी 3 दबंगों ने छेड़छाड़ करते हुए उसे दबोच लिया. इसी बीच रीना का भाई उधर पहुंच गया. बहन की चीखपुकार सुन कर उस की आबरू बचाने के लिए वह दबंगों से भिड़ गया. उन्होंने उसे मारपीट कर अधमरा कर दिया. बाद में अस्पताल में उस की मौत हो गई. गांवदेहात में कमजोर लोगों की बहूबेटियों पर दबंगों की गंदी नजरें मंडराती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. विरोध करने पर उन्हें तरहतरह से सताया जाता है.

हापुड़ के हरसांव गांव का रहने वाला एक लड़का अपनी बहन के साथ जा रहा था, तभी रास्ते में एक मनचले ने उस की बहन का हाथ पकड़ लिया. भाई ने विरोध किया, तो उस के साथ मारपीट कर मनचला मौके से फरार हो गया. छेड़छाड़ करने वाले सड़कों, महल्लों से ले कर स्कूलकालेजों के बाहर तक मंडराते हैं. गाजियाबाद शहर के एक कालेज के बाहर 10वीं जमात की एक छात्रा के साथ मनचले अकसर छेड़छाड़ किया करते थे. उस ने इस की शिकायत अपने भाई से की.

एक दिन उस छात्रा का भाई छुट्टी के वक्त पहुंच गया. मनचलों ने वही हरकत दोहराई, तो भाई ने विरोध किया. मनचलों को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने भाई को दौड़ादौड़ा कर इतना पीटा कि उसे आईसीयू में भरती कराना पड़ा. हालांकि बाद में पुलिस ने मनचलों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. इसी तरह कानपुर शहर में एक वारदात हुई. 12वीं जमात की एक छात्रा के साथ एक मनचला अकसर छेड़खानी किया करता था. एक दिन वह घर से कोचिंग क्लास के लिए निकली, तो मनचले ने रास्ता घेर कर उसे रोक लिया और उसे जबरन मोटरसाइकिल पर बैठाने की कोशिश की.

घर पहुंच कर उस लड़की ने अपने भाई को जानकारी दी. गुस्साया भाई अपने एक दोस्त के साथ मनचले के घर शिकायत करने पहुंचा. मनचले ने उलटा उन पर हमला बोल दिया. बैल्ट व डंडों से पीट कर उन दोनों को घायल कर दिया. मेरठ शहर के सदर इलाके में भी एक नौजवान को अपनी बहन के साथ हुई छेड़छाड़ का विरोध करना भारी पड़ गया. हुआ यों कि एक लड़की अपने घर के बाहर खड़ी थी. इसी दौरान 2 दोस्तों के साथ जा रहे एक लड़के ने लड़की पर फब्तियां कसीं और उस का मोबाइल नंबर पूछा.

इसी बीच घर से बाहर निकले भाई ने उन लड़कों की इस हरकत का विरोध किया, तो उन्होंने उस के साथ मारपीट कर दी. मौके पर खड़ी भीड़ तमाशा देखती रही. पुलिस के पहुंचने तक हमलावर फरार हो गए. छेड़छाड़ करने वाले ज्यादातर मनचले इस सोच के मारे होते हैं कि वे कुछ भी हासिल कर सकते हैं. जो लड़की के पक्ष में आता है, उसे गुंडई कर के सबक भी सिखाते हैं. ऐसे मनचले लड़कियों को गंदे इशारे करते हैं, उन्हें छू कर निकलते हैं, वासना भरी नजरों से घूरते हैं और सीटी बजाते हैं.

अमूमन हर रोज ऐसी हरकतों को सहा जाता है. जब कोई भाई अपनी बहन को छेड़छाड़ से बचाने की कोशिश करता है, तो उसे बहुतकुछ सहना पड़ता है. मामला मारपीट और पुलिस तक जाए, तो समाज कई बार लड़की को ही गलत नजर से देखता है. उस का घर से निकलना तक बंद हो जाता है. मनचलों को कानून का डर नहीं होता. छेड़छाड़ के मामले में शायद ही कभी किसी को सजा हुई हो. वकील सुदेश त्यागी बताते हैं कि पुलिस ऐसे मामलों में छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ धारा-294 के तहत कार्यवाही करती है. इस में ज्यादा से ज्यादा 3 महीने की सजा या जुर्माने का प्रावधान है. ऐसे में अपराध अदालत के सामने साबित भी करना होता है.

समाज में बढ़ती छेड़छाड़ की बीमारी से उन भाइयों की हालत का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है, जो अपनी बहन की आबरू को ले कर फिक्रमंद रहते हैं. वे गलत हरकत का विरोध करते हैं, तो उन्हें तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है, रंजिशें पनपती हैं और हत्याएं तक हो जाती हैं. पुलिस अफसर नरेंद्र प्रताप कहते हैं कि इस तरह के मामलों में तुरंत पुलिस को सूचित करना चाहिए. औरतों के लिए अलग से भी हैल्पलाइन नंबर हैं. उन पर भी सूचना दी जा सकती है.

दुखी हो कर बने कातिल

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले का रहने वाला संतराम भी ऐसा ही एक भाई है, जिसे छेड़छाड़ से तंग आ कर हत्या तक करनी पड़ गई. दरअसल, राजीव नामक दबंग लड़का संतराम की बहन पर बुरी नजर रखता था. वह अकसर उस के साथ छेड़छाड़ करता था. बारबार समझाने पर भी जब वह नहीं माना, तो संतराम ने दूसरा रास्ता अख्तियार कर लिया. एक दिन संतराम ने अपने साथी के साथ मिल कर राजीव को बुलाया. पहले उसे शराब पिलाई, फिर डंडे से सिर पर वार कर के उस की हत्या कर दी. तफतीश में मामला खुला, तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

हरियाणा के करनाल शहर का मामला भी कुछ ऐसा ही रहा. 5 नौजवानों ने चाकुओं से गोद कर बसस्टैंड इलाके में एक लड़के विजय राणा की हत्या कर दी. गिरफ्तारी के बाद पता चला कि विजय राणा आरोपियों में से एक की बहन के साथ छेड़छाड़ व पीछा किया करता था. इसी बात से गुस्साए भाई ने अपने साथियों के साथ मिल कर उस की हत्या कर डाली. Crime News

Hindi stories: अजब संयोग

Hindi stories: जिस दिन सेहर के मांबाप ने रिश्ता मंजूर किया, उस के तीसरे रोज हमारे तायाजान का इंतकाल हो गया. वह साल भर से बीमार थे और उन की उम्र भी सत्तर से ऊपर थी. मैं ने हर मुमकिन कोशिश की कि यह खबर सेहर तक न पहुंचे. लेकिन सेहर से यह बात भला कैसे छिप सकती थी?  मैं अपने दोस्त वाजिद के ड्राइंगरूम में बैठा उस से गप्पें लड़ा रहा था. पास ही उस का छोटा भाई हामिद भी बैठा था. हम तीनों इंतजार में थे कि भीतरी दरवाजे का परदा हटे और वाजिद की बहन अपनी चंचल मुसकराहट के साथ हमें चाय पेश करे.

इसी बीच बाहरी दरवाजे की घंटी बजी. हामिद उठ कर दरवाजा खोलने गया. फिर जनाना सैंडिलों की टकटक की आवाज आई तो मेरी नजर बेअख्तियार उसी तरफ चली गई. दरवाजे का परदा फर्श से करीब एक फुट ऊंचा था और उस के पास से गुजरने वाले के सिर्फ पैर नजर आते थे. अचानक मेरी नजर उन पैरों पर पड़ी. उफ मेरे खुदा, इतने खूबसूरत पांव शायद ही पहले कभी देखे हों. सफेद हील की सैंडिलों में उस के गुलाबी पांव बहुत भले लग रहे थे. नाखूनों पर नफासत से लगी नेलपौलिश और गजब ढा रही थी. वह चली गइ, लेकिन मैं बहुत देर तक नजरें जमाए वहीं देखता रहा. उस के खूबसूरत पांव देख कर मुझे यकीन हो चला था कि वह खुद भी बेहद हसीन होगी.

न जाने कब तक मैं सोचों में गुम रहता कि वाजिद की आवाज ने मुझे चौंका दिया, ‘‘यार हैदर, अब वापस आ जाओ. वह तो कब की जा चुकी है.’’

कुछ ही देर बाद वाजिद की बड़ी बहन चाय की ट्रे लिए कमरे में दाखिल हुई. मैं वाजिद का बेतकल्लुफ दोस्त था और इस नाते हम दोनों के घर वाले भी एकदूसरे से बखूबी वाकिफ थे. इसलिए मैं भी उन्हें वाजिद की तरह बाजी ही कहता था और वह भी मुझ से बड़ी बहन की तरह सलूक करती थीं. उन के हाथ में चाय की ट्रे देख कर मुझे थोड़ी सी हैरत हुई और मैं कह उठा, ‘‘अरे बाजी, आप ने क्यों तकलीफ की? हमें ही आवाज दे ली होती.’’

‘‘तुम खुद तो यहां छिपे बैठे हो. आवाज किसे देती? और जितनी देर में आवाज यहां तक पहुंचती, उतनी देर में मैं खुद ही पहुंच गई.’’

‘‘मैं तो इसलिए कह रहा था कि शायद आप के यहां मेहमान आए हुए हैं. आप उन्हें अटैंड कर रही होंगी.’’

‘‘मेहमान, मेहमान तो कोई नहीं आया.’’ वह चौंकते हुए बोलीं, फिर जैसे उन्हें कुछ याद आ गया, हंसते हुए कहने लगीं, ‘‘अच्छा, तुम शायद सेहर की बात कर रहे हो. अरे भई, वह तो शबनम की सहेली है और उसी के कमरे में बैठी है. मगर तुम मेहमानों के बारे में इतने फिक्रमद क्यों हो, क्या इरादे हैं?’’

‘‘कुछ नहीं, मेरा क्या इरादा हो सकता है? वह तो मैं ने घंटी की आवाज सुनी थी, इसलिए पूछ लिया.’’ मैं ने झेंपते हुए कहा.

बाजी वापस चली गईं और मैं सेहर के बारे में सोचने लगा. पैरों की झलक तो मैं ने देख ही ली थी. अब नाम भी मालूम हो गया था. बाजी ने तो मजाक में एक बात कही थी, लेकिन मैं सेहर के बारे में संजीदा होता गया. मुझे यकीन था कि सेहर और उस के घर वाले मेरा रिश्ता कबूल कर लेंगे. लेकिन इस यकीन की दीवार में उस वक्त दरारें पड़ जातीं, जब मैं अपनी कटी हुई अंगुलियों के बारे में सोचता. जी हां, यही वह कमी थी, जिस के कारण मैं अपना सपना सच कर पाने में नाकाम रहा था. वह मनहूस दिन मैं कभी न भूलूंगा, जब एक हादसे ने मेरी शख्सियत को ग्रहण लगा दिया था.

अपिया दीदी के जन्म के 5 साल बाद मैं पैदा हुआ था. मेरे जन्म पर खूब खुशियां मनाई गईं. अम्मी, पापा और अपिया, सभी मुझे उठाएउठाए फिरते. मैं उन दिनों शायद डेढ़, 2 साल का था, जब बकरीद के मौके पर पापा ने कुछ रोज पहले ही बकरा ला कर घर में बांध दिया. मैं सारा दिन उस से खेलता रहता. उसे जबरदस्ती ठूंसठूंस कर घास खिलाता. हमारे यहां ईद के तीसरे दिन कुरबानी हुआ करती थी. जब पापा कसाई को ले कर आए तो मैं वहीं खड़ा रहा और कसाई की एकएक हरकत देखता रहा. इस दौरान अम्मी ने कई बार मुझे आवाजें दीं, मगर मैं ने वहां से हिलने का नाम न लिया.

बोटियां बनाने के बाद कसाई ने बकरे की सिरी अपने सामने रखी तो मैं ने उस पर सवालों की बौछार कर दी, ‘‘आप इस का क्या करेंगे?’’

‘‘अब इसे भी काटेंगे.’’ कसाई ने अपना छुरा ऊपर उठाया.

उसी लम्हे मैं ने अपना बायां हाथ बकरे की सिरी पर रख दिया और बोला, ‘‘इस को न काटें.’’

मगर उस वक्त तक देर हो गई थी. कसाई को अंदाजा नहीं था कि मैं अपना हाथ बीच में ले आऊंगा. उस का छुरा नीचे आया और मेरे बाएं हाथ की तीन अंगुलियों को काटता हुआ सिरी की हड्डी पर पड़ा. सिरी के तो 2 टुकड़े हो गए, मगर इस के साथ ही मेरी अंगुलियां हाथ से जुदा हो कर दूर जा गिरीं. मेरी चीखें सुन कर सब लोग आ गए. पापा मुझे ले कर अस्पताल की तरफ दौड़े. त्यौहार का मौका था. इसलिए बड़ी मुश्किल से डाक्टर मिला. उस ने खून साफ कर के मेरे हाथ की डे्रसिंग की और इंजेक्शन लगा दिया. डे्रसिंग के बाद पापा मुझे घर ले आए.

बचपन तो जैसेतैसे बीत गया, मगर जवानी में कदम रखते ही मुझे अपनी इस कमी का तीखा अहसास होने लगा. मैं अच्छी शख्सियत का मालिक होने के बावजूद इस अहसास से पीछा छुड़ाने में नाकाम रहा. बस, यही खयाल हर सोच पर छा जाता कि मेरा हाथ देख कर कौन मुझे अपनी लड़की देगा. सेहर के बारे में जानने के बाद मैं अजीब दुविधा की हालत में फंस गया था. इस से पहले जब भी अम्मी ने मेरे रिश्ते की बात चलानी चाही, मैं ने उन्हें मना कर दिया. मैं नहीं चाहता था कि मेरे मांबाप जिस घर में रिश्ता ले कर जाएं, वहां इनकार हो जाए. लेकिन अब मैं ने फैसला कर लिया था कि सेहर के मामले में यह खतरा उठा कर ही रहूंगा.

दूसरे दिन मैं फिर वाजिद के यहां गया. वह घर पर मौजूद नहीं था. बाजी मेरी हालत देख कर हैरानी से बोलीं, ‘‘यह तुम ने क्या हालत बना रखी है? तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं बिलकुल ठीक हूं बाजी. आप से एक बात करनी है. वह सेहर है न, उस के पांव…’’

मेरी बात सुन कर बाजी खिलखिला कर हंसते हुए बोलीं, ‘वाह जनाब, न सूरत देखी न जानपहचान हुई, सिर्फ पांवों पर मर मिटे?

‘‘बाजी, मैं संजीदा हूं.’’

‘‘मेरे भैया, मैं ने कब कहा कि तुम संजीदा नहीं हो, लेकिन पहले उस से मिल तो लो.’’

‘‘जाहिर है, यह काम भी आप को ही कराना होगा.’’

अभी यह बातचीत हो ही रही थी कि अचानक मुझे खयाल आया और मैं माथे पर हाथ मारते हुए बोला, ‘‘अरे बाजी, मैं तो भूल ही गया. इतवार को अपिया की मंगनी है. अम्मी ने आप सब लोगों को बुलाया है. आप के लिए तो खास तौर पर ताकीद की है कि शबनम को ले कर जरा जल्दी आ जाएं.’’

‘‘कहो तो सेहर को भी साथ ले आऊं? इसी बहाने मुलाकात भी हो जाएगी.’’ बाजी मुझे छेड़ते हुए बोलीं.

मंगनी वाले दिन हमारे घर बड़ी चहलपहल थी. सारे मेहमान आ गए थे. मगर मुझे बाजी का इंतजार था. खुदाखुदा कर के वह और शबनम आई. सेहर उन के साथ नहीं थी. हंगामे में उन से कुछ पूछना बेकार था. जलसा खतम होते ही मैं अपिया के कमरे की तरफ लपका. बाजी ने मेरी बेचैनी भांप ली थी. मैं ने सारे लिहाज को ताक पर रख कर उन से पूछा, ‘‘बाजी, कुछ मालूम हुआ?’’

‘‘आराम से बैठो. अभी बताती हूं.’’

मैं उन के करीब कालीन पर बैठ गया. वह प्यार से मेरे सिर में अंगुलियां फेरते हुए बोलीं, ‘‘मेरे भैया, हर बात को दिमाग पर सवार नहीं कर लेते.  इस तरह जिंदगी बहुत कठिन हो जाती है.’’

बाजी की यह बात सुन कर मैं चौंक उठा. जरूर कोई ऐसी बात थी, जिसे बाजी बताने में हिचक रही थीं. मेरे दिल की धड़कन तेज होने लगी. शायद सेहर ने मुझे कबूल करने से इनकार कर दिया था और इसलिए वह बाजी के साथ हमारे घर नहीं आई. मगर मैं अपने होशोहवास काबू में रखते हुए बोला, ‘‘बाजी, आप बेफिक्र हो कर मुझे सब कुछ बता दें. मैं बुरी से बुरी खबर सुनने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘सेहर शबनम की बहुत करीबी सहेली है. इसलिए मैं ने पहले शबनम से बात करना मुनासिब समझा और यह एक तरह से अच्छा ही हुआ,’’

बाजी लम्हा भर रुकीं और फिर मेरे चेहरे को गौर से देखते हुए बोलीं, ‘‘सेहर की 2 बहनें और भी हैं. वह सब से बड़ी है. बहुत छोटी उम्र में सेहर के लिए पहला रिश्ता आया और उस की मंगनी कर दी गई, लेकिन मंगनी के दूसरे ही दिन लड़के के किसी करीबी रिश्तेदार की मौत हो गई और उन लोगों ने सेहर को मनहूस मान कर मंगनी तोड़ दी.

‘‘कुछ दिनों बाद दूसरा रिश्ता आया. मंगनी की रस्म एक बार फिर धूमधाम से अदा की गई. लेकिन बदकिस्मती कि वहां भी किसी की मौत हो गई और वह मंगनी भी टूट गई. इन 2 इत्तफाकों ने सेहर को इतना मायूस कर दिया कि अब वह शादी के नाम से ही डर जाती है. उस की दोनों छोटी बहनों की शादी हो चुकी है. लोगों की बातें सुनसुन कर वह खुद भी अपने आप को मनहूस समझने लगी है.’’ यह कह कर बाजी ने गहरी सांस ली और खामोश हो गईं.

मेरे दिल में एक बार फिर उम्मीद के चिराग जल उठे. मैं ने कहा, ‘‘बाजी, यह तो कोई खास बात नहीं. सेहर जैसी पढ़ीलिखी लड़कियों को ऐसा नहीं सोचना चाहिए. मेरा खयाल है, आप सेहर से सीधे तौर पर बात करें और उसे मेरे बारे में सब कुछ बता दें.’’

‘‘वह तो मैं कर ही लूंगी, लेकिन पहले तुम्हारी अम्मी की रजामंदी तो ले लूं. ऐसा न हो कि वह भी सेहर को मनहूस समझ कर इनकार कर दें.’’

‘‘यह काम भी आप ही को करना होगा. मेरी तो हिम्मत नहीं पड़ती कि अम्मी से अपनी शादी की बात करूं.’’

बाजी मेरी बात पर हंस कर बोलीं, ‘‘खुद कुछ मत करना. हर काम में मुझे ही आगे कर देना. वैसे यह तो बताओ कि इस सारी भागदौड़ का मुझे क्या इनाम मिलेगा?’’

‘‘एक अदद प्यारा सा दूल्हा, जो मैं तलाश करूंगा.’’

बाजी ने मेरे सिर पर हलकीसी चपत लगाई. दूसरे दिन अपिया ने मुझे बताया कि अम्मी इस रिश्ते के लिए तैयार हैं और एकदो रोज में वह सेहर को देखने जाएंगी. अपिया की जबानी यह खुशखबरी सुन कर मैं खुशी से झूम उठा. तभी मेरी नजर अपने हाथ पर गई, ‘‘अपिया, मेरे हाथ के बारे में उन लोगों को साफसाफ बता देना. हो सकता है…’’ मेरे अंदर के खौफ ने मुझे जुमला पूरा न करने दिया. अपिया ने बढ़ कर मेरे हाथ थाम लिए और प्यार से बोलीं, ‘‘मेरे प्यारे भाई, यह कोई ऐसी बड़ी बात नहीं, जिसे तुम ने अपने दिमाग पर सवार कर रखा है. तुम बेफिक्र रहो. इंशाअल्लाह, सब ठीक हो जाएगा.’’

दूसरे दिन शाम को बाजी और शबनम हमारे घर आईं. फिर अम्मी और अपिया को साथ ले कर सेहर के यहां गईं. उन के जाते ही मैं बेचैन हो गया. न जाने कैसेकैसे खयाल दिल में आ रहे थे. घबरा कर मैं बाहर निकल आया और इधरउधर भटकता रहा. काफी देर बाद घर लौटा. सब लोग वापस आ गए थे. अपिया किचन में थीं. मैं सीधा वहीं पहुंचा. अपिया के चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं था, जिस से मैं नतीजे के बारे में अंदाजा लगा पाता.

आखिर अपिया खुद ही बोलीं, ‘‘सेहर बड़ी प्यारी लड़की है. तुम्हारी पसंद की दाद देनी पड़ेगी. उन लोगों ने जवाब देने के लिए कुछ मोहलत मांगी है.’’

‘‘आप ने उन्हें मेरे हाथ के बारे में बता दिया था न?’’

‘‘हां बाबा, सब कुछ बता दिया. वे लोग बड़े रोशन खयाल हैं. उन्होंने इस बात को कोई अहमियत नहीं दी, बल्कि खुद ही सेहर के बारे में भी सब कुछ बता दिया. अम्मी ने भी उन लोगों से कह दिया कि ये सब जाहिलाना बातें हैं. इस में सेहर का क्या कसूर?’’

मैं खुशी से दीवाना हो गया और बेअख्तियार दौड़ता हुआ अम्मी के पास चला गया. अम्मी मुझे देखते ही मुसकरा दीं और मेरे सिर पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘खुश रहा करो बेटा. अल्लाह ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा. अब दुआ करो कि सेहर भी अपने खौफ से छुटकारा हासिल कर ले और इस रिश्ते के लिए हामी भर ले.’’

‘‘अम्मी, पापा ने तो कुछ नहीं कहा?’’ मैं ने डरतेडरते पूछा.

‘‘नहीं बेटा, वह क्या कहेंगे? हम सब तुम्हारी खुशी में खुश हैं.’’

कई दिन बीत गए, लेकिन उन लोगों की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. मेरी बेचैनी दिनबदिन बढ़ती जा रही थी. अपिया भी फिक्रमंद नजर आ रही थीं. उन का खयाल था कि एक बार फिर याद दिलाने के लिए सेहर के घर जाना चाहिए. मगर अम्मी का कहना था कि कुछ दिन और देख लो.

इसी दौरान एक रोज शबनम का फोन आया. संजोग से मैं घर पर ही था. शबनम ने बताया कि सेहर उस के पास ही बैठी है और मुझ से कुछ बात करना चाहती है. मेरे कहने पर शबनम ने फोन का रिसीवर सेहर को थमा दिया.

‘‘हैदर साहब, शबनम के बेहद इसरार पर में ने अपने आप को बड़ी मुश्किल से रजामंद किया है कि आप से सीधे तौर पर बातचीत करूं. सब से पहले तो मैं यह कहना चाहूंगी कि आप अपने दिमाग से यह खयाल निकाल दें कि हाथ की मामूली सी खराबी की वजह से कोई लड़की आप को कबूल करने को तैयार नहीं होगी. मर्द की खूबसूरती उस की शराफत और काबिलियत होती है और ये खूबियां आप में मौजूद हैं. वह लड़की बेहद खुशनसीब होगी, जिसे आप जैसा हमसफर मिलेगा. लेकिन मैं अपने मामले में यही चाहती हूं कि आप मेरा खयाल दिल से निकाल दें. मेरा तो नाम लेने वाला भी मुश्किलों में घिर जाता है.’’

‘‘सेहर साहिबा, इस मेहरबानी का बेहद शुक्रिया. आप ने जो कुछ मेरे बारे में कहा है, वह मुझ जैसे इंसान को शर्मिंदा करने के लिए काफी है, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि जो मशविरा आप मुझे दे रही हैं, अगर वही मैं आप को दूं तो?’’

‘‘जी, मैं समझी नहीं…’’

‘‘बिलकुल सामने की बात है सेहर,’’ मैं बेतकल्लुफी पर उतर आया, ‘‘जिस तरह आप की नजर में मेरे हाथ की खराबी की कोई अहमियत नहीं है, ठीक उसी तरह आप को भी बेकार का वहम दिमाग से निकाल देना चाहिए. कुदरत के कामों में इंसान का क्या दखल? मुझे हैरत है कि आप समझदार और पढ़ीलिखी होने के बावजूद ऐसे वहमों में उलझी हुई हैं. जरूरी तो नहीं कि हर बार ऐसा ही हो. अगर खुदा न करे, ऐसी कोई बात हुई तो आप को उस से कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा. यह मेरा वादा है.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि आप अपनी जिद नहीं छोड़ेंगे?’’

‘‘सवाल ही नहीं पैदा होता. मैं हर कीमत पर आप को अपनाने का इरादा कर चुका हूं.’’

‘‘तो फिर अच्छी तरह सुन लीजिए. मेरे मांबाप पहले ही मेरी वजह से बहुत दुख उठा चुके हैं. अब मैं उन्हें और दुखी नहीं करना चाहती. अगर आप लोगों ने रिश्ता खत्म किया तो मैं जबरदस्ती आप के घर चली आऊंगी और फिर सारी उम्र वहां से निकलने का नाम नहीं लूंगी, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाए.’’ उस के लहजे में झुंझलाहट थी.

‘‘आप अभी तशरीफ ले आएं. अच्छा है, दोनों तरफ का खर्च बच जाएगा.’’ मैं ने हंसते हुए कहा. फिर वही हुआ, जिस का सेहर को शुबहा था. जिस दिन सेहर के मांबाप ने रिश्ता मंजूर किया, उस के तीसरे रोज हमारे तायाजान का इंतकाल हो गया. वह साल भर से बीमार थे और उन की उम्र भी 70 से ऊपर थी. मैं ने हर मुमकिन कोशिश की कि यह खबर सेहर तक न पहुंचे. लेकिन सेहर से यह बात भला कैसे छिप सकती थी?

फिर एक दिन शबनम का फोन आया और मुझे मौजूद पा कर उस ने रिसीवर सेहर को थमा दिया.

‘‘मैं ने आप से कहा था न कि मेरा खयाल दिल से निकाल दें. क्या अब भी आप मुझे मनहूस नहीं कहेंगे?’’ सेहर भर्राई हुई आवाज में बोली.

‘‘पहले यह बताएं कि यह खबर आप तक कैसे पहुंची?’’ मैं ने कुछ तेज लहजे में पूछा.

‘‘इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. आज नहीं तो कल, यह खबर मुझे मिलनी ही थी.’’

‘‘देखो सेहर, तायाजान पिछले एक साल से बीमार थे. अब अगर उन का वक्त पूरा हो गया तो इस में तुम्हारा क्या कुसूर? फिर तुम्हें परेशान होने की जरूरत भी क्या है? तुम तो पहले ही धमकी दे चुकी हो कि हर हालत में हमारे ही घर आओगी.’’

मेरी यह बात सुनते ही वह खिलखिला कर हंस दी और रिसीवर शबनम को पकड़ा दिया.

‘‘हैदर भाई, अभी कुछ देर पहले तो यहां सावनभादो की झड़ी लगी हुई थी. आप ने क्या कह दिया कि यहां तो मौसम ही बदल गया है?’’

‘‘तुम कहां से आ गई कबाब में हड्डी बन कर… 2 मिनट चैन से बात भी नहीं करने देती.’’

‘‘बस जी, अब कोई बात नहीं होगी. वह कह रही है… ऐसे जिद्दी इंसान से तो मैं इकट्ठे ही बात करूंगी.’’

मेरे दिमाग से बहुत बड़ा बोझ उतर गया. सेहर का खौफ दूर हो गया था और वह मजबूती के साथ जिंदगी का सफर तय करने के लिए तैयार थी. मैं ने बाजी और अपिया को इस बात पर तैयार कर लिया कि हमारी शादी जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही बेहतर होगा. क्या मालूम कल कोई और हादसा हो जाए और सेहर के लिए नई मुश्किल पैदा हो. आखिर वह दिन भी आ गया, जिस का हम सब को शिद्दत से इंतजार था.

धड़कते दिल के साथ मैं दुलहन के कमरे में दाखिल हुआ. सेहर सिर झुकाए मसहरी पर बैठी थी. मेरी नजर सब से पहले उस के पांवों पर गई. उस के गुलाबी पांवों में सुर्ख मेंहदी और भी गजब ढा रही थी. जब मैं ने उस का घूंघट उठाया तो मुझे अपनी किस्मत पर यकीन हो आया. वह मेरे तसव्वुर से कहीं ज्यादा हसीन निकली.

‘‘सेहर, तुम जानती हो कि मैं ने सिर्फ तुम्हारे पांव देख कर ही तुम्हें पसंद कर लिया था? है न अजीब बात?’’

‘‘सारी बातें ही अजीब हुई हैं. मुझे तो अब भी यकीन नहीं आ रहा.’’ उस ने हौले से जवाब दिया.

‘‘यकीन तो दिला दूं, लेकिन मुझे क्या मिलेगा, बोलो?’’ मैं ने कहा तो वह लजा कर रह गई.

मजे की बात तो यह देखिए कि तब से अब तक हमारे घर न तो कोई गमी हुई और न दूसरी कोई बिपदा आई. सेहर के कदम बहुत अच्छे सगुन साबित हुए. Hindi stories

 

Social Story: विचित्र संयोग

Social Story: आनंदी धनंजय और आनंद रोहिणी की मुलाकात एक अजीब संयोग था. लेकिन इस का परिणाम इतना भयंकर होगा, इस की किसी ने कल्पना नहीं की थी.  रविवार के सुबह सात बजे के लगभग धनवानों का इलाका सेक्टर-15ए अभी सोया पड़ा था. चारों ओर शांति फैली थी. वीआईपी इलाका होने के कारण यहां सवेरा यों भी जरा देर से उतरता है, क्योंकि यहां रात का आलम ही कुछ और होता है. चहलपहल थी तो सिर्फ सेक्टर-2 के पीछे के इलाके में. सवेरे 4 बजे से ही यहां मछलियों का बाजार लग जाता है. ट्रौली रिक्शे और टैंपो रुक रहे थे और उन के साथ ही मछलियों के ढेर लग रहे थे. मछलियां लाने के लिए यहां टैंपो और ट्रौली रिक्शों की लाइन लगी थी.

इसी बाजार के पास फाइन चिकन एंड मीट शौप है, जहां सवेरे 4 बजे से ही बकरों को काटने और उन्हें टांगने का काम शुरू हो जाता है. इस इलाके के लोग इसी दुकान से गोश्त खरीदना पसंद करते थे. सामने स्थित डीटीसी बस डिपो से बसें बाहर निकलने लगी थीं. डिपो के एक ओर नया बास गांव है, जिस में स्थानीय लोगों के मकान हैं. डिपो के सामने पुलिस चौकी है, जिस के बाहर 2-3 सिपाही बेंच पर बैठ कर गप्पें मार रहे थे और चौकी के अंदर बैठे सबइंसपेक्टर आशीष शर्मा झपकियां ले रहे थे.

गांव के पीछे के मयूरकुंज की अलकनंदा इमारत की पांचवी मंजिल के एक फ्लैट में एक सुखी जोड़ा रहता था. यह फ्लैट सेक्टर-62 की एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले धनंजय विश्वास का था. फ्लैट में धनंजय अपनी पत्नी रोहिणी के साथ रहते थे. रोहिणी दिल्ली में पंजाब नेशनल बैंक में प्रोबेशनरी औफिसर थी. वह आगरा की रहने वाली थी. 2 वर्ष पूर्व धनंजय से उस का विवाह हुआ था. इस से पहले धनंजय दिल्ली में अपने मातापिता के साथ रहता था. विवाह के बाद उस के सासससुर ने यह फ्लैट खरीदवा दिया था. रोहिणी वाकई रोहिणी नक्षत्र के समान सुंदर थी. धनंजय और उस की जोड़ी खूब फबती थी.

धनंजय के औफिस का समय सवेरे 9 बजे से शाम 6 बजे तक था. वह औफिस अपनी कार से जाता था. लेकिन लौटने का उस का कोई समय निश्चित नहीं था. रोहिणी शाम साढ़े छह बजे तक घर लौट आती थी. इन हालात में पतिपत्नी शाम का खाना साथ ही खाया करते थे. हां, छुट्टी के दिनों दोनों मिल कर हसंतेखेलते खाना बनाते थे. धनंजय हर रविवार को सेक्टर-2 में लगने वाली मछली बाजार से मछलियां और फाइन चिकन एंड मीट शौप की दुकान से मीट लाता था. पहली जून की सुबह 6 बजे फ्लैट की घंटी बजने पर दूध देने वाले गनपत से दूध ले कर धनंजय फटाफट तैयार हो कर मीट लेने के लिए निकल गया. रोहिणी को वह सोती छोड़ गया था.

वह कार ले कर निकलने लगा तो  चौकीदार ने हंसते हुए पूछा, ‘‘साहब, आज रविवार है न, मीट लेने जा रहे हो?’’

धनंजय ने हंस कर कार आगे बढ़ा दी थी. फाइन चिकन एंड मीट शौप पर आ कर उस ने 2 किलोग्राम मीट और एक किलोग्राम कीमा लिया. इस के बाद उस ने रास्ते में मछली और नाश्ते के लिए अंडे, ब्रेड, मक्खन और 4 पैकेट सिगरेट लिए. लगभग साढ़े 7 बजे वह फ्लैट पर लौट आया. वाचमैन नीचे ही था, साफसफाई करने वाले अपने काम में लगे थे. ऊपर पहुंच कर उस ने ‘लैच की’ से दरवाजा खोला. दरवाजे के अंदर अखबार पड़ा था, जिसे नरेश पेपर वाला दरवाजे के नीचे से अंदर सरका गया था. अखबार उठाते हुए उस ने रोहिणी को आवाज लगाई, ‘‘उठो भई, मैं तो बाजार से लौट भी आया.’’

धनंजय के फ्लैट में सुखसुविधा के सभी आधुनिक सामान मौजूद थे. उस ने डाइनिंग टेबल पर सारा सामान रख कर 2 बड़ी प्लेटें उठाईं. एक में उस ने गोश्त और दूसरे में मछली निकाली. फ्लैट के हौल में शानदार दरी बिछी थी और कीमती सोफे सजे थे. एक कोने में टीवी और डीवीडी प्लेयर रखा था. दूसरे कोने में शो केस के नीचे टेलीफोन रखा था, वहीं मेज पर लैपटौप था. पीछे की ओर गैलरी थी, जहां से दिल्ली की ओर जाने वाली सड़क के साथसाथ दूर तक फैली हरियाली और नोएडा गेट दिखाई देता था. इस हौल के बाईं ओर बैडरूम का दरवाजा था. बैडरूम में डबल बैड, गोदरेज की 2 अलमारियां और एक ड्रेसिंग टेबल था. बैडरूम से लग कर ही एक छोटा गलियारा था. गलियारे में ही टौयलेट और बाथरूम था.

सारा सामान डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद बैडरूम में घुसते ही धनंजय की चीख निकल गई, ‘‘रोहिणी?’’

उस की सुंदर पत्नी, उसे जीजान से चाहने वाली जीवनसंगिनी, जो अभी रात में उस के सीने पर सिर रख कर सोई थी, जिसे वह सुबह की मीठी नींद में छोड़ कर गया था, रक्त से सराबोर बैड पर मरी पड़ी थी. रोहिणी के गले, सीने और पेट से उस वक्त भी खून रिस रहा था, जिस से सफेद बैडशीट लाल हो गई थी. कुछ क्षणों बाद धनंजय रोहिणी का नाम ले कर चीखता हुआ बाहर की ओर भागा. उस के अड़ोसपड़ोस में 3 फ्लैट थे. दाईं ओर के 2 फ्लैटों में सक्सेना और मिश्रा तथा बाईं ओर के फ्लैट में रावत रहते थे. पागलों की सी अवस्था में धनंजय ने सक्सेना के फ्लैट की घंटी पर हाथ रखा तो हटाया ही नहीं. वह पड़ोसियों के नाम लेले कर चिल्ला रहा था.

कुछ क्षणों बाद तीनों पड़ोसी बाहर निकले. वे धनंजय की हालत देख कर दंग रह गए. धनंजय कांप रहा था. वह कुछ कहना चाहता था, पर उस के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. उस के कंधे पर हाथ रख कर सक्सेना ने पूछा, ‘‘क्या हुआ विश्वास?’’

सक्सेना रिटायर्ड कर्नल थे. उन्होंने ही नहीं, मिश्रा और रावत ने भी किसी अनहोनी का अंदाजा लगा लिया था. धनंजय ने हकलाते हुए कहा, ‘‘रो…हि…णी.’’

सक्सेना, उन का बेटा एवं बहू, मिश्रा और रावत उस के फ्लैट के अंदर पहुंचे. बैडरूम का हृदयविदारक दृश्य देख कर सक्सेना की बहू डर के मारे चीख पड़ी और उलटे पांव भागी. अपने आप को संभालते हुए सक्सेना ने कोतवाली पुलिस को फोन लगा कर घटना की सूचना दी. कोतवाली में उस समय ड्यूटी पर सबइंसपेक्टर दयाशंकर थे. दयाशंकर ने मामला दर्ज कर के मामले की सूचना अधिकारियों को दी और खुद 2 सिपाही ले कर अलकनंदा के लिए निकल पड़े. उन के पहुंचते ही वहां के चौकीदार ने उन्हें सलाम किया. लोगों के बीच से जगह बनाते हुए दयाशंकर सीधे पांचवीं मंजिल पर पहुंचे. लोग सक्सेना के घर में जमा थे. धनंजय सोफे पर अपना सिर थामे बैठा था.

दयाशंकर के पहुंचते ही धनंजय उठ कर खड़ा हो गया. आगे बढ़ कर सक्सेना ने अपना परिचय दिया और धनंजय के फ्लैट की ओर इशारा किया. थोड़ी ही देर में फोरैंसिक टीम के सदस्य भी आ पहुंचे. इंसपेक्टर प्रकाश राय भी आ पहुंचे थे. उन के वहां पहुंचते ही एक व्यक्ति सामने आया, ‘‘गुडमौर्निंग सर? आप ने मुझे पहचाना? मैं रिटायर्ड इंसपेक्टर खन्ना. इन फ्लैटों की सुरक्षा व्यवस्था मेरे जिम्मे है. सोसाइटी के सेक्रैटरी ने फोन पर मुझे सूचना दी. दयाशंकर साहब से मुझे पता चला कि आप आ रहे हैं.’’

प्रकाश राय को खन्ना का चेहरा जानापहचाना लगा. मगर उन्हें याद नहीं आया कि वह उस से कहां मिले थे. सीधे ऊपर न जा कर उन्होंने इमारत को गौर से देखना शुरू किया. इमारत में ‘ए’ और ‘बी’ 2 विंग थे. दोनों विंग के लिए अलगअलग सीढि़यां थीं. धनंजय ‘ए’ विंग में रहता था. इमारत के गेट पर ही वाचमैन के लिए एक छोटी सी केबिन थी, जिस में से आनेजाने वाला हर व्यक्ति उसे दिखाई देता था.

इमारत के चारों और घूमते हुए पीछे एक जगह रुक कर प्रकाश राय ने खन्ना से पूछा, ‘‘ये कमरे किस के है?’’

‘‘सफाई कर्मचारियों और वाचमैन के .’’

‘‘कितने वाचमैन हैं?’’

‘‘2 हैं. इन की ड्यूटी 2 शिफ्टों में है. सुबह 8 बजे से रात 8 बजे और रात 8 बजे से सवेरे 8 बजे तक.’’

‘‘इन के खाने की छुट्टी?’’

‘‘वो तो सर, ये अपनी सुविधा के अनुसार खाने जाते हैं. वैसे भी यह समस्या पहली शिफ्ट में आती है. ज्यादातर ये अपना खाना साथ लाते हैं. इसी कमरे में वे खाना खाते हैं. तब तक हम यहां के स्वीपर को गेट पर बैठा देते हैं.’’

‘‘दोनों के नाम क्या हैं और इन के घर कहां है?’’

‘‘कल नाइट शिफ्ट पर नारायण था. वह सेक्टर-10 में रहता है. मौर्निंग शिफ्ट में जो अभी पौने 8 बजे आया है, उस का नाम भास्कर है, वह खोड़ा में रहता है.’’

‘‘अच्छा, यहां स्वीपर कितने हैं?’’

‘‘एक ही है साहब, रणधीर और उस की पत्नी देविका. ये दोनों अपने दोनों बच्चों के साथ यहीं रहते हैं. बाहर का काम रणधीर और टायलेट वगैरह साफ करने का काम देविका करती है.’’

खन्ना से बात करतेकरते प्रकाश राय इमारत के गेट पर आ गए. तभी एसएसपी, एसपी और सीओ भी आ गए. इन्हीं अधिकारियों के साथ डौग स्क्वायड की टीम भी आई थी.

ऊपर जांच चल रही थी. प्रकाश राय एक सिपाही के साथ नीचे रुक गए, बाकी सभी अधिकारी ऊपर चले गए. प्रकाश राय देविका के बारे में सोच रहे थे. वह सभी के घर में आजा सकती थी. वाचमैन जरूरी काम के बिना किसी फ्लैट में जा नहीं सकते थे. नारायण जो रात की ड्यूटी पर था, उसी के रहते हत्या हुई थी. लेकिन उस से पूछताछ करने पर प्रकाश राय के हाथ कोई सूत्र नहीं लगा. उस ने धनंजय को मीट ले आने जाते और लौटते देखा था बस.

‘‘अच्छा नारायण, धनंजय साहब के जाने के बाद तुम यहीं थे क्या? यहां से कहीं नहीं गए?’’

‘‘साहब, मैं यहां से वहां राउंड मार रहा था और नीचे की लाइन बंद कर रहा था. रणधीर ने पंप चालू किया या नहीं, यह देखने भी गया था.’’

‘‘यानी इस दौरान कोई ऊपर जा सकता था?’’

‘‘साहब, आप जो कह रहे हैं, वह संभव है.’’

‘‘अच्छा नारायण, सुबह तुम ने किसी अनजान आदमी को बाहर जाते तो नहीं देखा?’’

‘‘साहब, मेरे रहते कोई अंदर गया ही नहीं तो बाहर कैसे…?’’

‘‘सुनो नारायण, रात को ही कोई अंदर आ गया होगा या किसी के यहां मेहमान के रूप में आया होगा तो…?’’

नारायण चुप हो गया. उसे अपनी बुद्धि पर तरस आने लगा. कुछ सोच कर बोला, ‘‘साहब, दूध वाला और पेपर वाला, ये दोनों आए थे. गनपत दूध वाला जब आया था, धनंजय साहब घर में ही थे. उन्होंने ही दूध लिया होगा. उस के जाने के बाद ही वह मीट लेने चले गए थे. वह ‘ए’ विंग के 7 फ्लैटों में दूध सप्लाई करता है, बाकी के सभी लोग 9 बजे डेयरी की गाड़ी से दूध लेते हैं.’’

‘‘पेपरवाला नरेश धनंजय साहब के जाने के बाद आया था. 2-3 मिनट में ही वह लौट गया था. सिर्फ एक व्यक्ति मुझे याद है रणधीर. धनंजय साहब के जाने के बाद रणधीर सफाईवाला झाडू और प्लास्टिक की बाल्टी ले कर सीढि़यां साफ करने गया था. धनंजय साहब के लौटने से पहले नीचे आ कर वह ‘बी’ इमारत मे चला गया था.’’

‘‘ठीक है नारायण.’’ कह कर प्रकाश राय ने इशारे से सिपाही को पास बुला कर कहा, ‘‘तुम किसी बहाने से बाहर जाओ और थोड़ी देर बाद लौट कर नारायण से गप्पें मारते हुए रणधीर के बारे में कुछ पता लगाने की कोशिश करो.’’

प्रकाश राय के ऊपर पहुंचते ही दयाशंकर ने धनंजय से उन का परिचय कराया. धनंजय के कंधे पर हाथ रखते हुए और सहानुभूति जताते हुए प्रकाश राय ने कहा, ‘‘धनंजय, तुम्हारे साथ जो हुआ, उस का मुझे बेहद अफसोस है. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि अगर तुम्हारा सहयोग मिलेगा तो मैं खूनी को कानून के शिकंजे में जकड़ कर ही रहूंगा. आओ, अंदर चलते हैं.’’

अंदर फिंगरप्रिंट्स वाले प्रिंट्स की तलाश में लगे थे और फोटोग्राफर फोटो खींच रहा था. प्रकाश राय ने खून से लथपथ रोहिणी की लाश देखी. फिर वह कमरे का निरीक्षण करने लगे. वह सिर्फ एक ही बात सोच रहे थे कि हत्यारा मुख्य द्वार से आया था या दरवाजे से लग क र जो पैसेज है उस में से किचन पार कर के आया था? पैसेज की जांच के लिए वह किचन के दरवाजे पर आए तो किचन टेबल पर ढेर सारा मीट और मछलियां देख कर चौंके. खाने वाले सिर्फ 2 और सामान इतना. प्रकाश राय बैडरूम में लौट आए. सबइंसपेक्टर दयाशंकर और एएसआई राजेंद्र सिंह अलमारी को सील कर रहे थे. आश्चर्य की बात यह थी कि अलमारी का लौकर खुला था. उस में चाबियां लटक रही थीं. अलमारी का सारा सामान ज्यों का त्यों था, जो इस बात का प्रमाण था कि हत्यारे ने सिर्फ लौकर का माल साफ किया था.

बैडरूम में दूसरी अलमारी भी थी. उसे हाथ नहीं लगाया गया था. दयाशंकर ने प्रकाश राय की ओर प्रश्नभरी नजरों से देखा और फिर धनंजय से कहा, ‘‘मिस्टर विश्वास, आप जरा यह अलमारी खोलने की मेहरबानी करेंगे?’’

धनंजय ने एक बार प्रकाश राय को और फिर दयाशंकर की ओर देखते हुए पूछा, ‘‘मैं इन चाबियों को हाथ लगा सकता हूं?’’

प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट को प्रश्नभरी नजरों से देखा. एक्सपर्ट ने गर्दन हिलाते हुए अनुमति दे दी. धनंजय ने पहली अलमारी से चाबी निकाल कर दूसरी अलमारी खोली. प्रकाश राय ने गौर से देखा, अलमारी का सारा सामान ज्यों का त्यों था. कहीं कोई उलटपुलट नहीं की गई थी. पहली अलमारी के लौकर से चोरी गए सामान के बारे में धनंजय से पूछा, ‘‘धनंजय, तुम्हारे अंदाज से कितना सामान चोरी गया होगा?’’

‘‘रोहिणी के जेवरात ही लगभग 30-40 लाख रुपए के थे. 40-42 हजार नकदी भी थी.’’

‘‘इतनी नकदी तुम घर में रखते हो?’’

‘‘नहीं साहब, कल शनिवार  था, रोहिणी ने 40 हजार रुपए बैंक से निकाले थे. बैंक में हम दोनों का जौइंट एकाउंट है. कल सवेरे यह रकम मैं एक टूरिस्ट कंपनी में जमा कराने वाला था.’’

‘‘कारण?’’

‘‘अगले महीने मैं और रोहिणी घूमने के लिए जाने वाले थे.’’ कहते हुए उस ने प्रकाश राय को चेकबुक थमा दी. उन्होंने चेकबुक देखा. धनंजय सही कह रहा था. राजेंद्र सिंह को चेकबुक देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘राजेंद्र सिंह, इस चेकबुक को भी कब्जे में ले लो और ‘एवन ट्रैवेल्स’ के एजेंट का स्टेटमेंट भी ले लो. रकम बरामद होने पर प्रमाण के रूप में यह सब काम आएगा.’’

इस के बाद गैलरी में आ कर प्रकाश राय ने इशारे से एक सिपाही को बुला कर दबी आवाज में कहा, ‘‘तुम नीचे जा कर रणधीर से बातें करो और किसी बहाने से उस के घर में जा कर देखो, कहीं कुछ सामान दिखाई देता है क्या? रणधीर संदिग्ध है. बात करतेकरते उस से कहो कि साहब को नारायण पर शक है. वह जरूर कुछ न कुछ बताएगा.’’

सिपाही के रवाना होते ही प्रकाश राय किचन में आए. एसआई दयाशंकर और एएसआई राजेंद्र सिंह किचन का निरीक्षण कर रहे थे. प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘धनंजय साहब, बुरा मत मानिएगा. मैं एक बात जानना चाहता हूं. तुम और रोहिणी, सिर्फ 2 लोग हो, इस के बावजूद इतना सारा गोश्त और मछली?’’

‘‘साहब, आज मेरे घर पार्टी थी. मेरे औफिस के 2 अधिकारी आशीष तनेजा और देवेश तिवारी अपनीअपनी बीवियों के साथ खाना खाने आने वाले थे. बारीबारी से हम तीनों एकदूसरे के घर अपनी पत्नियों सहित जमा होते हैं और खातेपीते हैं. इस रविवार को मेरे यहां इकट्ठा होना था.’’

‘‘तुम हमेशा फाइन चिकन एंड मीट शौप से ही मीट लाते हो?’’

‘‘जी सर.’’

इतने में सचमुच आशीष तनेजा और देवेश तिवारी अपनीअपनी पत्नियों के साथ धनंजय के घर आ पहुंचे. रोहिणी की हत्या के बारे में सुन कर वे कांप उठे. सक्सेना उन्हें अपने फ्लैट में ले गए. सवेरे 9 बजे धनंजय के मातापिता भी अलकनंदा आ पहुंचे थे. सक्सेना ने फोन कर के उन से कहा था कि रोहिणी सीरियस है. सक्सेना ने दिल्ली में रह रहे रोहिणी के मातापिता को भी खबर कर दी थी. निरीक्षण का काम लगभग पूरा हो गया था. प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘धनंजय, हमारे एक्सपर्ट को अंगुलियों के कुछ निशान मिले हैं.

वे निशान तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी के भी हो सकते हैं. तुम दोनों के निशान छोड़ कर अन्य निशानों की जांच एक्सपर्ट को करनी पड़ेगी. तुम्हारी अंगुलियों के निशान हमें अभी नहीं चाहिए. हमारे सिपाही के आने पर तुम अपनी अंगुलियों के निशान दे देना. रोहिणी के निशान हम पोस्टमार्टम के समय ले लेंगे.’’

अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा किया और अन्य सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद एसएसपी और एसपी तो चले गए, लेकिन सीओ और इंसपेक्टर प्रकाश राय सहयोगियों के साथ कोतवाली आ गए. सभी चाय पीतेपीते रोहिणी मर्डर केस के बारे में विचारविमर्श करने लगे.

प्रकाश राय अपने ही विचारों में खोए थे. ठीक से वह कुछ कह नहीं सकते थे, इसलिए वह चुपचाप सभी की बातें सुन रहे थे. बातचीत के दौरान सहज ही सबइंसपेक्टर दयाशंकर बोले, ‘‘एक साल पहले ऐसी ही एक घटना दिल्ली में घटी थी. पर अपराधी को उसी समय पकड़ लिया गया था.’’

‘‘जी,’’ एएसआई राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘उस घटना में एक इमारत में अपराधी घुसा था. डुप्लीकेट चाबी से वह फ्लैट का दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा था कि पड़ोसी ने उसे देख लिया और वह पकड़ा गया. वह बंगलादेश का रहने वाला था. रफीक नाम था उस का.’’

‘‘घर में कौनकौन था?’’

‘‘घर की मालकिन और उस के 2 बच्चे.’’

‘‘और उस का पति कहां गया था?’’

‘‘वह सुबह सब्जी लाने मंडी गया था.’’

‘‘सब्जी लाने?’’ प्रकाश राय आश्चर्य से थोड़ा तेज आवाज में बोले, ‘‘और वह रविवार का दिन था क्या?’’

‘‘जी सर, रविवार ही था.’’

‘‘दयाशंकर, वह आदमी अंदर है या बाहर, पता करो.’’

दिल्ली पुलिस से पता चला कि वह बाहर है. उसे 4 महीने की सजा हुई थी. इस समय वह नोएडा में ही रह रहा है और सेक्टर-62 की किसी फैक्ट्री में नौकरी करता है.  प्रकाश राय उत्साहित हो कर बोले, ‘‘अरे उसे पकड़ कर लाओ यहां, इस केस में उस का हाथ हो सकता है.’’ फिर दयाशंकर की ओर देख कर बोले, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि इस केस में किसी न किसी ने अपराधी को इनफौर्मेशन दी होगी. रविवार को धनंजय सेक्टर-2 की मार्केट मीटमछली लाने जाता है और रोहिणी घर में अकेली होती है, यह बात जरूर किसी न किसी ने उसे बताई होगी. इन में उस इमारत का नारायण, भास्कर रणधीर, उस की औरत देविका, पेपरवाला, दूधवाला, कोई भी हो सकता है. कोई न कोई उस जैसे लोगों को खबर देता होगा, उस के बारे में पता करो.’’

‘‘ठीक है सर, हम पता करते हैं.’’

‘‘दयाशंकर, तुम अभी उस की तलाश में लग जाओ. इस केस में अगर उस का हाथ हुआ तो उस के पास बहुत माल है. तुम अपना स्टाफ ले कर निकल पड़ो. उस के हाथ लगते ही मुझे सूचित करो.’’

दयाशंकर उसी वक्त सहयोगियों के साथ निकल पड़े. सीओ साहब भी चले गए. इस के बाद प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह से कहा, ‘‘अगर वह आदमी इस मामले में शामिल हुआ तो कोई बात नहीं. पर वह इस मामले में शायद ही शामिल हो.’’

‘‘सर,’’ राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘आप यह किस उम्मीद पर कह रहे हैं?’’

‘‘मान लो, वह सस्पेक्ट है और उस ने ही यह जुर्म किया है तो सवाल यह उठता है कि वह अंदर घुसा कैसे? गेट पर नारायण था. मान लो, नारायण थोड़ी देर को इधरउधर हो गया और वह अंदर हो गया तो भी पांचवें माले पर जा कर लौक खोल कर हत्या करने, अलमारी खोल कर सारा सामान समेटने और नीचे आने में उसे कम से कम आधा घंटा तो लगा ही होगा. इतनी देर उस का वहां ठहरना संभव ही नहीं था. दूसरी दृष्टि से विचार करो तो धनंजय जब नीचे आया, तब नारायण मौजूद था. धनंजय सवा 6 बजे नीचे आया था. उस के जाने के तुरंत बाद वह अंदर घुस नहीं सकता था, क्योंकि नारायण वहीं था.

मान लो, वह 5-10 मिनट बाद अंदर घुसा और अपना काम किया तो धनंजय और उस का आमनासामना अवश्य होता, क्योंकि धनंजय 7 बजे के लगभग वापस आ गया था. उस वक्त भी नारायण नीचे ही मौजूद था. मगर न उस ने और न सीढ़ी साफ करने गए रणधीर ने उसे देखा. हत्यारा नया है, शातिर होता तो डीवीडी प्लेयर और रोहिणी का कीमती मोबाइल और लैपटौप न छोड़ता.’’ इतने में फोन की घंटी बज उठी. प्रकाश राय ने फोन रिसीव किया, ‘‘हैलो, हां मैं प्रकाश राय. बोलो, शाबाश. किधर टकरा गया वह तुम से? कुछ मिला? ठीक है, तुम उसे सस्पेक्ट मान कर बंद कर दो. मैं तुम्हें फोन करता हूं बाद में.’’ प्रकाश राय ने फोन काट दिया. राजेंद्र सिंह ने अंदाजा लगाते हुए कहा, ‘‘रफीक को पकड़ लिया शायद?’’

‘‘हां,’’ प्रकाश राय ने शांत स्वर में कहा, ‘‘पुलिस ने उसे उस की फैक्ट्री के बाहर से पकड़ लिया है. सोचने वाली बात यह है कि जिस के पास इतने रुपए होंगे, वह नौकरी पर क्यों जाएगा?’’

‘‘लेकिन सर,’’ राजेंद्र सिंह ने अक्ल लगाई, ‘‘हत्यारा जो भी हो, वह नारायण के रहते अंदर गया कैसे?’’

‘‘2 ही बातें हो सकती हैं. अपराधी पाइप के सहारे छत पर चढ़ कर छिपा रहा हो या फिर अंदर का ही कोई व्यक्ति हो.’’ प्रकाश राय ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘कुछ भी हो, हमें नारायण और रणधीर पर नजर रखनी है. ये मुजरिम हो सकते हैं या खबर देने वाले. यह भी एक संभावना है कि हत्या का उद्देश्य चोरी न रहा हो, यानी जेवरात और नकदी उड़ा कर एक बहाना बनाया गया हो. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रोहिणी के गले में सोने का मंगलसूत्र, हाथ में 4 सोने की चूडि़यां, कानों में झुमके और डे्रसिंग टेबल पर उस की कीमती कलाई घड़ी, कीमती मोबाइल फोन और लैपटौप अपराधी ज्यों का त्यों छोड़ गया था. नारायण या रणधीर ने किसी की मदद से यह कृत्य किया होता तो रोहिणी के शरीर के गहने और घर का सारा सामान चला गया होता. इतनी बड़ी इमारत में रहने वाला भी तो कोई हत्या कर सकता है.’’

प्रकाश राय के मुंह से यह सुन कर राजेंद्र सिंह गंभीर हो गए, क्योंकि ऐसी स्थिति में हत्यारे को अंदरबाहर आनेजाने की जरूरत ही नहीं थी. अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि सिपाही नरेश शर्मा प्रकाश राय के कमरे में घुसा. उसे देख कर प्रकाश राय ने पूछा, ‘‘क्यों नरेश, कोई खास खबर?’’

नरेश को प्रकाश राय ने धनंजय के घर में ही रणधीर पर नजर रखने की हिदायत दे दी थी. उसी क्षण से नरेश उस के पीछे लग गया था. दूसरे सिपाही देवनाथ को नारायण के पीछे प्रकाश राय पहले ही लगा चुके थे.

‘‘साहब, खास कुछ भी नहीं है. आप के चले आने के बाद हाथ में एक बर्तन लिए वह बाहर निकला. मैकडोनाल्ड की गली से पीछे जा कर देशी दारू के ठेके पर उस ने एक गिलास चढ़ाई और फिर अपने घर आ कर सोया पड़ा है.’’

‘‘तुम खुद ठेके में गए थे?’’

‘‘नहीं साहब, मेरी जानपहचान का एक फेरीवाला अंदर गया था. अब भी वह रणधीर के घर पर नजर रखे हुए है. मैं आप को यही खबर देने आया था.’’

‘‘नरेश, तुम रणधीर पर कड़ी नजर रखो. मुझे उस पर पूरा शक है. मेरा अनुमान है कि रणधीर और नारायण आज शाम को किसी स्थान पर जरूर मिलेंगे.’’

‘‘ठीक है साहब.’’ कह कर नरेश चला गया. राजेंद्र सिंह को संबोधित करते हुए प्रकाश राय बोले, ‘‘आज रात उस बिल्डिंग पर कड़ी नजर रखनी है. अपने 4-5 सिपाही तैयार रखना. नारायण और रणधीर, दोनों साथी हुए तो रणधीर आज रात को सामान ठिकाने लगाने की कोशिश…’’

प्रकाश राय अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि फोन की घंटी बज उठी. उन्होंने रिसीवर उठाया. दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘सर, मैं मिश्रा बोल रहा हूं.’’

‘‘हां, बोलो मिश्रा, क्या खबर है?’’

‘‘साहब, वह व्यापारी अभी तक घर में ही है और उस का औफिस नीचे ही है. उसे जो बिल्डिंग बेचनी है, उस के ग्राउंड फ्लोर पर ही उस का औफिस है.’’

मिश्रा ने जिन सांकेतिक शब्दों का प्रयोग किया था, उन्हें प्रकाश राय समझ गए. व्यापारी का मतलब था नारायण, औफिस यानी घर और ग्राउंड फ्लोर औफिस का मतलब था नारायण ग्राउंड फ्लोर पर ही रहता था. मिश्रा की भाषा से ही प्रकाश राय समझ गए कि मिश्रा कई लोगों के सामने से बोल रहा था. उन्होंने मिश्रा से कहा, ‘‘तुम वहीं ठहरो और अपने आदमियों के वहां पहुंचने तक रोके रहो. संभव हुआ तो मैं भी आऊंगा. कोई विशेष बात होने पर मुझे फोन करना.’’ इस के बाद वह राजेंद्र सिंह से बोले, ‘‘तुम पोस्टमार्टम के बाद रोहिणी का शव विश्वास को जल्दी से जल्दी दिलाने की कोशिश करो.’’

‘‘यस सर.’’ कह कर राजेंद्र सिंह अपने स्टाफ के साथ निकल पड़े. अब प्रकाश राय अकेले थे और नए सिरे से रोहिणी मर्डर केस के बारे में सोचने लगे. एक सूत्र से दूसरा सूत्र जोड़ कर वह अपना जाल बिछाना चाहते थे. उन्होंने अपनी डायरी निकाली. उन्हें अपने कुछ महत्त्वपूर्ण आदमियों को फोन करने थे. वे समाज के जिम्मेदार लोग थे और इन से प्रकाश राय की अच्छी जानपहचान थी. इन्हें प्रकाश राय ने विशेष मतलब से बुलाया था और एक जरूरी काम सौप दिया था. इन्हें रोहिणी के दाहसंस्कार के समय शोकसंतप्त चेहरा बना क र लोगों की बातों को चुपचाप सुन कर उस की रिपोर्ट प्रकाश राय को देनी थी. मजे की बात यह थी कि ये लोग एकदूसरे को नहीं जानते थे.

अंतिम निवास विद्युत शवदाहगृह में 2 व्यक्तियों की बातचीत सुन कर आशीष तनेजा के कान खड़े हो गए, ‘‘कमाल की बात है. आनंदी दिखाई नहीं दी?’’

‘‘सचमुच हैरानी की बात है भई, वह तो रोहिणी की बहुत पक्की सहेली थी. लगता है, उसे किसी ने खबर नहीं दी. रोहिणी के पास तो उस का फोन नंबर भी था.’’

‘‘आनंदी दिखाई देती तो मिस्टर आनंद के भी दर्शन हो जाते.’’

‘‘शनिवार को तो बैंक में आनंदी का फोन भी आया था?’’

आनंदी को ले कर कुछ ऐसी ही बातें देवेश तिवारी से भी सुनीं. उधर मेहता ने जो कुछ सुना, वह इस प्रकार था.

‘‘विवाह आगरा में था, इसीलिए दोनों आगरा गए थे.’’

‘‘आगरा तो वे हमेशा आतेजाते रहते थे.’’‘‘वैसे विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ.’’

ऐसा ही कुछ नागर ने भी सुना था. इन लोगों ने अपने कानों सुनी बातें फोन पर प्रकाश राय को बता दीं.

यह पता नहीं चल रहा था कि आगरा में किस का विवाह था. प्रकाश राय के लिए यह जानना जरूरी भी नहीं था. एक विचार जो जरूर उन्हें सता रहा था, वह यह कि रोहिणी की पक्की सहेली होने के बावजूद आनंदी उस के अंतिम दर्शन करने भी नहीं आई थी. और तो और आनंदी का पति भी दाहसंस्कार में शामिल नहीं हुआ था. इन दोनों का न होना लोगों को हैरान क्यों कर रहा था? अब इस आनंदी को कहां ढूंढ़ा जाए?

प्रकाश राय स्वयं राजेंद्र सिंह को ले कर चल पड़े. रास्ते में प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह को आनंदी के बारे में जो कुछ सुना था, बता दिया. रोहिणी के बैंक के मैनेजर रोहित बिष्ट से मिल कर प्रकाश राय ने अपना परिचय दिया और वहां आने का कारण बताते हुए कहा, ‘‘जो कुछ हुआ, बहुत बुरा हुआ. हमें तो दुख इस बात का है कि हत्यारे का हमें कोई सुराग तक नहीं मिल रहा है.’’

‘‘हम तो आसमान से गिर पड़े. सवेरे 10 बजे आते ही फोन पर रोहिणी की हत्या की खबर मिली.’’

‘‘तुम्हें फोन किस ने किया था?’’

‘‘सक्सेना नाम के किसी व्यक्ति ने. पर एकाएक हमें विश्वास ही नहीं हुआ. हम ने मिसेज विश्वास के घर फोन किया. तब पता चला कि रोहिणी वाकई अब इस दुनिया में नहीं रही. हम कुछ लोग अलकनंदा गए थे. मैं दाह संस्कार में जा नहीं पाया. हां, मेरे कुछ साथी जरूर गए थे.’’

‘‘आप जरा बुलाएंगे उन्हें?’’

कुछ क्षणों बाद ही 5-6 बैंक कर्मचारी मैनेजर के कमरे में आ गए. उन्होंने प्रकाश राय से उन का परिचय कराया. बातचीत के दौरान प्रकाश राय ने वहां उपस्थित हेड कैशियर सोलंकी से पूछा, ‘‘शनिवार को मिसेज विश्वास ने कुछ रुपए निकाले थे क्या?’’

‘‘हां, 40 हजार…’’

‘‘खाता किस के नाम था?’’

‘‘मिस्टर और मिमेज विश्वास का जौइंट एकाउंट है.’’

‘‘आप ने मिसेज विश्वास को जो रकम दी थी, वह किस रूप में थी?’’

‘‘5 सौ के नए कोरे नोटों के रूप में दिया था. उन नोटों के नंबर भी हैं मेरे पास.’’

प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह से नोटों के नंबर लेने और उस चेक को कब्जे में लेने को कहा.

कुछ क्षण रुक कर उन्होंने अपना अंदाज बदलते हुए कहा, ‘‘अरे क्या खूब याद आया बिष्ट साहब, विश्वास के यहां हमें बारबार ‘बैंक, आनंदी, कल फोन किया था’- ऐसा सुनाई पड़ रहा था. आप के यहां कोई आनंदी काम..?’’

‘‘नहीं,’’ वहां मौजूद एक अधिकारी ने कहा, ‘‘वह आनंदी गौड़ है. रोहिणी की फास्टफ्रैंड. वह यहां काम नहीं करती.’’

‘‘अच्छा, यह बात है. बारबार आनंदी का नाम सुनने पर मुझे लगा कि वह यहीं काम करती होगी. आप को मालूम है, यह आनंदी कहां रहती है?’’

‘‘निश्चित रूप से तो मालूम नहीं, पर वह दिल्ली में कहीं रहती है. 2-3 बार वह बैंक में भी आई थी. शनिवार को उस का फोन भी आया था. शायद एक, डेढ़ महीना पहले ही उन की जानपहचान हुई थी. मिसेज विश्वास ने ही मुझे बताया था?’’

‘‘एक विवाह में शामिल होने के लिए अप्रैल महीने के अंत में गई थीं और 3 मई को ड्यूटी पर आ गई थीं.’’

‘‘यहां किसी ने मिसेज आनंदी को रोहिणी की हत्या के बारे में बताया तो नहीं है. अगर नहीं तो अब कोई नहीं बताएगा. क्या किसी के पास उस का नंबर है. अगर नहीं है तो रोहिणी के काल डिटेल्स से तलाशना पड़ेगा.’’

मैनेजर ने बैंक की औपरेटर से इंटरकौम पर बात की तो प्रकाश राय को आनंदी का फोन नंबर मिल गया. इस के बाद उन्होंने उस नंबर से आनंदी के घर का पता मालूम कर लिया.

‘‘पता कहां का है?’’ मैनेजर से पूछे बिना नहीं रहा गया.

‘‘साउथ एक्स का. अच्छा मिसेज गौड़ ने किसलिए फोन किया था?’’

‘‘औपरेटर ने बताया है कि किसी वजह से मोबाइल पर फोन नहीं मिला तो मिसेज गौड़ ने लैंडलाइन पर फोन किया था. वह रविवार को मिसेज विश्वास को शौपिंग के लिए साथ ले जाना चाहती थीं. पर रोहिणी ने कहा था कि उस के यहां कुछ मेहमान खाना खाने आ रहे हैं, इसलिए वह नहीं आ सकेगी.’’

इतने में ही राजेंद्र सिंह और मिश्रा वहां आ पहुंचे. राजेंद्र सिंह अपना काम पूरा कर चुके थे. प्रकाश राय ने रोहिणी का बियरर चेक ले कर उसे देखा और बडे़ ही सहज ढंग से पूछा, ‘‘मिस्टर बिष्ट, आप के बैंक में सेफ डिपौजिट वाल्ट की सुविधा है?’’

‘‘हां, है. आप को कुछ…?’’

‘‘नहीं, नहीं, मैं ने यों ही पूछा. अब हम चलते हैं.’’

प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह बैंक से निकल कर साउथ एक्स में जहां आनंदी रहती थी, वहां पहुंचे. प्रकाश राय ने ऊपर पहुंच कर एक फ्लैट के दरवाजे की घंटी बजाई. फ्लैट के दरवाजे पर लिखा ‘आनंद गौड़’ नाम वह पहले ही पढ़ चुके थे. कुछ क्षणों बाद दरवाजा खुला. प्रकाश राय को समझते देर नहीं लगी कि उन के सामने आनंदी और उस के पति आनंद गौड़ खड़े हैं और दोनों बाहर जाने की तैयारी में हैं. मिस्टर गौड़ ने आश्चर्य से प्रकाश राय को देखा. प्रकाश राय ने शांत भाव से कहा, ‘‘मुझे आनंद गौड़ से मिलना है.’’

आनंद ने आनंदी को और आनंदी ने आनंद को देखा. 2 अपरिचितों को देख कर वे हड़बड़ा गए थे.

‘‘मैं ही आनंद गौड़ हूं, आप…?’’

‘‘हम दोनों नोएडा पुलिस से हैं. एक जरूरी काम से आप के पास आए हैं. घबराने की कोई बात नहीं है. मुझे आप से थोड़ी जानकारी चाहिए.’’

‘‘आइए, अंदर आइए.’’

प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह ने घर में प्रवेश किया. ड्राइंगरूम में बैठते हुए प्रकाश राय बोले, ‘‘मिस्टर आनंद, जिन लोगों का पुलिस से कभी सामना नहीं होता, उन का आप की तरह घबरा जाना स्वाभाविक है. मैं आप से एक बार फिर कहता हूं, आप घबराइए मत. बस, आप मेरी मदद कीजिए.’’

बातचीत के दौरान आनंद से प्रकाश राय को मालूम हुआ कि आनंद के परिवार में मातापिता, भाईबहन और पत्नी, सभी थे. 2 साल पहले आनंद और आनंदी का विवाह हुआ था. करोलबाग में आनंद के पिता की करोलबाग शौपिंग सेंटर नामक एक शानदार दुकान थी . टीवी, डीवीडी प्लेयर, फ्रिज, पंखा आदि कीमती सामानों की यह दुकान काफी प्रसिद्ध थी. मंगलवार को दुकान बंद रहती थी. इसलिए मिस्टर आनंद घर पर मिल गए थे. पतिपत्नी अपने किसी रिश्तेदार के यहां पूजा में जा रहे थे कि वे वहां पहुंच गए थे.

आनंद ने अपने निजी जीवन के बारे में सब कुछ बता दिया तो आनंदी ने प्रकाश राय से कहा, ‘‘अब तो बताइए कि आप हमारे घर कौन सी जानकारी हासिल करने आए हैं?’’

‘‘मिसेज आनंदी, आप यह बताइए कि आप मिसेज रोहिणी विश्वास को जानती हैं?’’

प्रकाश राय के मुंह से रोहिणी का नाम सुन कर आनंद और आनंदी भौचक्के रह गए.

‘‘हां, वह मेरी सहेली है. क्यों, क्या हुआ उसे?’’

‘‘आप की और रोहिणी की मुलाकात कब और कहां हुई थी?’’

‘‘हमारी जानपहचान हुए लगभग एक महीना हुआ होगा. अप्रैल के अंतिम सप्ताह में हम दोनों घूमने आगरा गए थे. 3 मई को आगरा से दिल्ली आते समय शताब्दी एक्सप्रेस में हमारी मुलाकात हुई थी.’’

‘‘लेकिन जानपहचान कैसे हुई?’’

‘‘हम आगरा स्टेशन से गाड़ी में बैठे थे. रोहिणी और उस के पति भी वहीं से गाड़ी में बैठे थे. उन की सीट हमारे सामने थी. बांतचीत के दौरान हमारी जानपहचान हुई. हम दोनों के पति गाड़ी चलते ही सो गए थे. हम एकदूसरे से बातें करने लगी थीं. फिर हम बचपन की सहेलियों की तरह घुलमिल गईं.’’

‘‘सारे रास्ते तुम दोनों के पति सोते ही रहे?’’

‘‘अरे नहीं, दोनों जाग गए थे. फिर हम ने एकदूसरे का परिचय कराया. रोहिणी को हजरत निजामुद्दीन उतरना था, हमें नई दिल्ली. उतरने से पहले हम दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने घर का पता और फोन तथा मोबाइल नंबर दे दिया था.’’

‘‘तुम अपने पति के साथ रोहिणी के घर जाती थी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘रोहिणी के पति तुम्हारे घर आया करते थे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘इस का कारण?’’ प्रकाश राय ने आनंद की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘कारण…?’’ आनंद गड़बड़ा गया, ‘‘एक तो दुकान के कारण मुझे समय नहीं मिलता था, दूसरे न जाने क्यों मुझे मिस्टर विश्वास से मिलने की इच्छा नहीं होती थी.’’

‘‘रोहिणी से आखिरी बार तुम कब मिली थीं?’’ प्रकाश राय ने आनंदी से पूछा.

‘‘पिछले हफ्ते मैं रोहिणी के बैंक गई थी.’’

‘‘अच्छा रोहिणी को तुम ने आखिरी बार फोन कब किया था और क्यों?’’

‘‘पिछले शनिवार को. लाजपतनगर में शौपिंग के लिए मैं ने उसे बुलाया था. पर उस ने मुझे बताया कि रविवार को उस के यहां कुछ लोग खाने पर आने वाले थे.’’

अब तक आनंद दंपति ने जो कुछ बताया था, वह सब सही था. प्रकाश राय थोड़ा सा घबराए हुए थे. एक प्रश्न का उत्तर उन्हें नहीं मिल रहा था. इतनी पूछताछ के बाद बेचैन हुए आनंद ने प्रकाश राय से पूछा, ‘‘आप रोहिणी के बारे में इतनी पूछताछ क्यों कर रहे है?’’

गंभीर स्वर में प्रकाश राय ने कहा, ‘‘लोग हम से सत्य को छिपाते हैं, लेकिन हमारा काम ही है लोगों को सच बताना. परसों सवेरे 6 से 7 बजे के बीच किसी ने छुरा घोंप कर रोहिणी की हत्या कर दी है.’’

‘‘नहीं..,’’ आनंदी चीख पड़ी. लगभग 10 मिनट तक आनंदी हिचकियां लेले कर रोती रही. उस के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. आनंदी के शांत होने पर प्रकाश राय ने पूरी घटना सुनाई और अफसोस जाहिर करते हुए कहा, ‘‘अभी तक हमें कोई भी सूत्र नहीं मिला है. हमारी जांच जारी है, इसलिए रोहिणी के सभी परिचितों से मिल कर हम पूछताछ कर रहे हैं. कल उस का अंतिम संस्कार भी हो गया है.’’

‘‘लेकिन सर, किसी ने भी हमें इस घटना की सूचना क्यों नहीं दी?’’ आनंद ने पूछा.

‘‘मैं भी यही सोच रहा हूं मिस्टर आनंद, तुम्हारी पत्नी और रोहिणी में बहुत अच्छी मित्रता थी. फिर भी धनंजय ने तुम्हें खबर क्यों नहीं दी, जबकि उस ने कर्नल सक्सेना को तमाम लोगों के फोन नंबर दे कर इस घटना की खबर देने को कहा था. है न आश्चर्य की बात?’’

‘‘मैं क्या कह सकता हूं?’’

‘‘मैं भी कुछ नहीं कह सकता मिस्टर आनंद. कारण मैं धनंजय से पूछ नहीं सकता. पूछने से लाभ भी नहीं, क्योंकि धनंजय कह देगा, मैं तो गम का मारा था, मुझे यह होश ही कहां था? अच्छा आनंदी, मैं तुम से एक सवाल का उत्तर चाहता हूं. रोहिणी ने कभी अपने पति के बारे में कोई ऐसीवैसी बात या शिकायत की थी तुम से?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं. वह तो अपने वैवाहिक जीवन में बहुत खुश थी.’’

प्रकाश राय का प्रश्न और आनंदी का उत्तर सुन कर आनंद ने जरा घबराते हुए पूछा,  ‘‘आप धनंजय पर ही तो शक नहीं कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं, उस पर मैं शक कैसे कर सकता हूं, अच्छा, अब हम चलते हैं. जरूरत पड़ने पर मैं फिर मिलूंगा.’’

प्रकाश राय सोच रहे थे कि पूरे सफर के दौरान आनंद और धनंजय ने एकदूसरे से ज्यादा बात क्यों नहीं की? यहां भी वे एकदूसरे से क्यों नहीं मिलते थे?

मंगलवार, 5 मई. रोहिणी कांड की गुत्थी ज्यों की त्यों बरकरार थी. प्रकाश राय को कई लोगों पर शक था, पर प्रमाण नही थे. सिर्फ शक के आधार पर किसी को पकड़ कर बंद करना प्रकाश राय का तरीका नहीं था. दोपहर बाद प्रकाश राय के औफिस पहुंचने से पहले ही उन की मेज पर फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो की रिपोर्ट रखी थी. रिपोर्ट देखतेदेखते उन के मुंह से निकला, ‘‘अरे यह…तो.’’ घंटी बजा कर इन्होंने राजेंद्र सिंह को बुलाया.

‘‘राजेंद्र सिंह, रोहिणी मर्डर केस का अपराधी नजर आ गया है.’’ कह कर प्रकाश राय ने उन्हें एक नहीं, अनेक हिदायतें दीं. राजेंद्र सिंह और उन के स्टाफ को महत्पूर्ण जिम्मेदारी सौंप कर योजनाबद्ध तरीके से समझा कर बोले,  ‘‘जांच को अब नया मोड़ मिल गया है. भाग्य ने साथ दिया तो 2-3 दिनों में ही अपराधी पूरे सबूत सहित अपने शिकंजे में होगा. समझ लो, इस केस की गुत्थी सुलझ गई है. बाकी काम तुम देखो. मैं अब जरा अपने दूसरे केस देखता हूं.’’

उत्साहित हो कर राजेंद्र सिंह निकल पड़े उन के आदेशों का पालन करने. 7 मई की सुबह 9 बजे दयाशंकर अपने स्टाफ के साथ औफिस पहुंचे. पिछली रात प्रकाश राय के निर्देश के अनुसार राजेंद्र सिंह पूरी तरह मुस्तैद थे. थोड़ी देर बाद प्रकाश राय के गाड़ी में बैठते ही गाड़ी सेक्टर-15 की ओर चल पड़ी. करीब साढ़े 9 बजे प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह अलकनंदा स्थित धनंजय के घर पहुंचे. प्रकाश राय को देख कर धनंजय जरा अचरज में पड़ गया. उस के पिता भी हौल में ही बैठे थे. उस की मां और बहन अंदर कुछ काम में व्यस्त थीं. ज्यादा समय गंवाए बगैर प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘विश्वास, तुम जरा मेरे साथ बाहर चलो. रोहिणी के केस में हमें कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं.

हम तुम्हें दूर से ही एक व्यक्ति को दिखाएंगे. तुम ने अगर उसे पहचान लिया तो समझो इस हत्या में उस का जरूर हाथ है. उस के पास से तुम्हारी संपत्ति भी मिल जाएगी. अब उसे पहचानने के लिए हमे तुम्हारी मदद की जरूरत है.’’

‘‘ठीक है, आप बैठिए. मैं 10 मिनट में तैयार हो कर आता हूं.’’ कह कर धनंजय अंदर चला गया और प्रकाश राय उस के पिता के साथ गप्पें मारने लगे. गप्पें मारतेमारते उन्होंने बड़े ही सहज ढंग से पास रखी टेलिफोन डायरी उठाई, उस के कुछ पन्ने पलटे और यथास्थान रख दिया. फिर वह टहलते हुए शो केस के पास गए. उस में रखा चाबी का गुच्छा उन्हें दिखाई दिया. शो केस  में रखी कुछ चीजों को देख कर वह फिर सोफे पर आ बैठे.

15-20 मिनट में धनंजय तैयार हो गया. प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह के साथ निकलने से पहले उस ने शो केस में से सिगरेट का पैकेट, लाइटर, पर्स, चाबी और रूमाल लिया. अब प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह धनंजय को साथ ले कर निरुला होटल की ओर चल पड़े. लगभग 10 मिनट बाद उन की गाड़ी होटल के निकट स्थित बैंक के सामने जा कर रुकी. गाड़ी रुकते ही प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘विश्वास, हम ने तुम्हारी सोसायटी के वाचमैन नारायण को गिरफ्तार कर लिया है. इस समय वह हमारे कब्जे में है. इस बैंक के सेफ डिपौजिट लौकर डिपार्टमेंट में 2 चौकीदार काम करते हैं. इन में से हमें एक पर शक है. मुझे विश्वास है कि उस ने नारायण के साथ मिल कर चोरी और हत्या की है. हम उसे दरवाजे पर ला कर तुम्हें दिखाएंगे. देखना है कि तुम उसे पहचानते हो या नहीं?’’

धनंजय को ले कर प्रकाश राय बैंक में दखिल हुए और बैंक के लौकर डिपार्टमेंट में पहुंचे. वहां मौजूद 2-4 लोगों में से प्रकाश राय ने एक व्यक्ति से पूछा, ‘‘आप…?’’

‘‘मैं बैंक मैनेजर हूं.’’

‘‘आप इन्हें जानते हैं?’’

‘‘हां, यह धनंजय विश्वास हैं.’’

‘‘इन का खाता है आप के बैंक में?’’

‘‘खाता तो नहीं है, लेकिन कल दोपहर 3 बजे इन्होंने लौकर नंबर 106 किराए पर लिया है.’’

‘‘आप जरा वह लौकर खोलने का कष्ट करेंगे?’’

बैंक मैनेजर सुरेशचंद्र वर्मा ने लौकर के छेद में चाबी डाल कर 2 बार घुमाई, पर लौकर एक चाबी से खुलने वाला नहीं था, क्योंकि दूसरी चाबी धनंजय के पास थी. प्रकाश राय धनंजय से बोले, ‘‘मिस्टर विश्वास, तुम्हारी जेब में चाबी का जो गुच्छा है, उस में लौकर नंबर 106 की दूसरी चाबी है. उस से इस लौकर को खोलो.’’

धनंजय घबरा गया. उस ने चाबी निकाल कर कांपते हाथों से लौकर खोल दिया. प्रकाश राय ने लौकर में झांक कर देखा और फिर धनंजय से पूछा, ‘‘यह क्या है मिस्टर विश्वास?’’

धनंजय ने गरदन झुका ली. प्रकाश राय ने लौकर से कपड़े की एक थैली बाहर निकाली. उस थैली में धनंजय के फ्लैट से चोरी हुए सारे जेवरात और 5 सौ रुपए के नोटों का एक बंडल भी था, जिस पर रोहिणी के पंजाब नेशनल बैंक की मोहर लगी थी. इस के अलावा एक और चीज थी उस में, एक रामपुरी छुरा.

‘‘मिस्टर विश्वास, यह सब क्या है?’’ प्रकाश राय ने दांत भींच कर पूछा.

एक शब्द कहे बिना धनंजय ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक कर रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मैं अपना गुनाह कबूल करता हूं. रोहिणी का खून मैं ने ही किया था.’’

दरअसल, हुआ यह था कि मंगलवार को औफिस में आते ही प्रकाश राय को जो फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट मिली थी, उस के अनुसार फ्लैट में केवल रोहिणी और धनंजय के ही प्रिंट्स मिले थे. किसी तीसरे व्यक्ति की अंगुलियों के निशान थे ही नहीं. इसलिए प्रकाश राय की नजरें धनंजय पर जम गई थीं. प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट अलग रख कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट गौर से देखना शुरू किया था. रिपोर्ट के अनुसार, रोहिणी की मृत्यु लगभग 12 से 14 घंटे पहले हुई थी. रोहिणी का पोस्टमार्टम शाम 4 बजे हुआ था यानी राहिणी की मृत्यु आधी रात के बाद 2 बजे से सुबह 4 बजे के बीच हुई थी.

फिर धनंजय सवा 6 बजे से 7 बजे के बीच हत्या होने की बात कैसे कह रहा था? पूरा माजरा प्रकाश राय की समझ में धीरेधीरे आता जा रहा था. धनंजय को अपने ही घर में चोरी करने की क्या जरूरत थी? इस सवाल का जवाब भी प्रकाश राय की समझ में आ गया था. उन्होंने राजेंद्र सिंह को समझाते हुए कहा, ‘‘राजेंद्र सिंह, धनंजय बहुत ही चालाक है. तुम एक काम करो,पिछले 2 दिनों से धनंजय बाहर नहीं गया है. आज भी वह घर पर ही होगा. कुछ दिनों बाद वह चोरी का सामान किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर जरूर रखेगा. उस का सारा घर हम लोगों ने छान मारा है. हो सकता है, उस ने बिल्डिंग में ही कहीं सामान छिपा कर रखा हो या फिर…

‘‘धनंजय जिस वक्त गोश्त लाने निकला था, उस समय उस ने सामान कहीं बाहर रख दिया होगा. पर उस ने कहां रखा होगा. राजेंद्र सिंह कहीं ऐसा तो नहीं कि वह थैली ले कर नीचे उतरा हो और स्कूटर की डिक्की में रख दी हो? हो सकता है राजेंद्र सिंह,’’ प्रकाश राय चुटकी बजाते हुए बोले, ‘‘वह थैली अभी उसी डिक्की में ही हो? राजेंद्र सिंह तुम फौरन अपने स्टाफ सहित निकल पड़ो और धनंजय पर नजर रखो.’’

इस के बाद राजेंद्र सिंह ने अलकनंदा के आसपास अपने सिपाहियों को धनंजय पर निगरानी रखने के लिए तैनात कर दिया था. धनंजय अपने स्कूटर पर ही निकलेगा, यह राजेंद्र सिंह जानते थे. इसलिए राजेंद्र सिंह ने स्कूटर वाले और टैक्सी वाले अपने 2 मित्रों को सहायता के लिए तैयार किया. सारी तैयारियां कर के राजेंद्र सिंह अलकनंदा के पास ही एक इमारत में रह रहे अपने एक गढ़वाली मित्र के घर में जम गए.

5 तारीख का दिन बेकार चला गया. धनंजय और उस के परिवार को सांत्वना देने के लिए लोगों का आनाजाना लगातार बना हुआ था. शायद इसीलिए धनंजय बाहर नहीं निकल पाया था. लेकिन 6 तारीख को दोपहर के समय धनंजय के नीचे उतरते ही राजेंद्र सिंह सावधान हो गए. धनंजय अपनी स्कूटर स्टार्ट कर के जैसे ही बाहर निकला, वैसे ही अपने सिपाहियों के साथ टैक्सी में बैठ कर राजेंद्र सिंह उस के पीछे हो लिये. गोल चक्कर होते हुए धनंजय निरुला होटल के पास स्थित बैंक के सामने आ कर रुक गया. राजेंद्र सिंह ने थोड़ी दूरी पर ही टैक्सी रुकवा दी.

स्कूटर खड़ी कर के धनंजय ने डिक्की खोली और कपड़े की एक थैली निकाली. धनंजय के हाथ में थैली देख कर ही राजेंद्र सिंह ने मन ही मन प्रकाश राय के अनुमान की प्रशंसा की.थैली ले कर धनंजय के बैंक में घुसते ही राजेंद्र सिंह ने अपने मित्र को बैंक में भेजा, क्योंकि यह जानना जरूरी था कि धनंजय का बैंक में खाता है या किसी परिचित से मिलने गया था. थैली किसी को देने गया था या लौकर में रखने? उन के मित्र ने लौट कर उन्हें बताया कि धनंजय मैनेजर के साथ लौकर वाले कमरे में गया है. इस से पहले सीधे मैनेजर की केबिन में जा कर उस ने एक फार्म भरा था.

धनंजय को खाली हाथ बाहर आते देख कर अपने 2 सिपाहियों को उस का पीछा करने के लिए कह कर राजेंद्र सिंह वहीं ओट में खड़े हो गए. धनंजय के वहां से जाते ही राजेंद्र सिंह सीधे बैंक मैनेजर की केबिन में पहुंचे. अपना परिचय दे कर उन्होंने कहा, ‘‘अभी 5 मिनट पहले जिस व्यक्ति ने आप के यहां लौकर लिया है, वह वांटेड है. हमारे आदमी उस का पीछा कर रहे हैं. आप हमें सिर्फ यह बताइए कि आप से उस की क्या बातचीत हुई. ’’

‘‘धनंजय को एक महीने के लिए लौकर चाहिए  था. यहां उपलब्ध लौकर्स में से उस ने 106 नंबर लौकर पसंद किया. नियमानुसार फार्म भर कर एडवांस जमा किया और लौकर में एक थैली रख कर चला गया.’’

लौकर खोलने के लिए 2 चाबियां लगती थीं. पहले बैंक की चाबी, फिर जिस व्यक्ति ने लौकर लिया हो, उस की चाबी से लौकर खुल सकता था. बैंक अधिकारी तहखाने में बने सेफ डिपौजिट वाल्ट में आ कर एक चाबी से लौकर खोल कर चले जाते थे. बाद में ग्राहक बैंक से प्राप्त चाबी से लौकर को खोल कर जो भी सामान रखना चाहे, रख सकता था. इसलिए ग्राहक ने लौकर में क्या रखा या निकाला, बैंक को इस की जानकारी नहीं रहती है.

राजेंद्र सिंह ने बैंक से ही प्रकाश राय को फोन किया. इस के बाद राजेंद्र सिंह ने बैंक मैनेजर से कहा, ‘‘यह व्यक्ति शायद कल फिर आए, तब इसे लौकर खोलने की इजाजत मत दीजिएगा. मैं कुछ सिपाही कल सवेरे बैंक खुलने से पहले ही यहां भेज दूंगा. वह यहां आया तो इसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. अगर यह खुद नहीं आया तो हम इसे ले कर आएंगे.’’

धनंजय को बैंक ले जाने के लिए जब प्रकाश राय अलकनंदा पहुंचे थे तो वहां शो केस की वस्तुओं को देखने के बहाने उन्होंने चाबी के गुच्छों में लौकर नंबर 106 की चाबी देख ली थी. टेलीफोन के पास रखी धनंजय की टेलीफोन डायरी को उन्होंने केवल आनंदी का नंबर जानने के लिए यों ही उल्टापलटा था. ‘ए’ पर आनंदी का नंबर न पा कर उन्होंने ‘जी’ पर नजर दौड़ाने के लिए पन्ने पलटे, क्योंकि आनंदी का पूरा नाम आनंदी गौड़ था. मगर ‘एफ’ और ‘एच’ के बीच का ‘जी’ पेज गायब था. वह पेज फाड़े जाने के निशान मौजूद थे.

पकड़े जाने के थोड़ी देर बाद ही धनंजय ने अपने आप पर काबू पा लिया था. गहरी सांस ले कर उस ने कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, मैं ने ही अपनी बीवी की हत्या की है. उस के चरित्र पर मुझे लगातार शक रहता था. आगे चल कर मेरा शक विश्वास में बदल गया. लेकिन कुछ बातें अपनी आंखों से देखने पर मैं बेचैन हो उठा. मेरे मन की शांति समाप्त हो गई. मैं परेशान रहने लगा. मैं अपनी पत्नी को बेहद चाहता था, पर मुझे धोखा दे कर उस ने सब कुछ नष्ट कर दिया था. उस की चरित्रहीनता का कोई सबूत मैं नहीं दे सकता था. मेरे पास एक ही रास्ता था, उसे हमेशा के लिए मिटा देने का. वही मैं ने किया भी.’’

प्रकाश राय धनंजय को कोतवाली ले आए. धनंजय ने बड़े योजनाबद्ध तरीके से रोहिणी का खून किया था. रोहिणी को यह दिखाने के लिए कि वह उस से बेहद प्रेम करता है, उस ने बाहर जाने का प्लान बनाया और 40 हजार रुपए भी निकलवाए थे, लेकिन वह कहीं जाने वाला नहीं था. रविवार पहली तारीख को उस ने जानबूझ कर आशीष तनेजा और देवेश तिवारी को अपने घर बुलाया. रात 3 से 4 बजे के बीच रोहिणी की हत्या करने के बाद सवेरे उठ कर वह बड़े ही सहज ढंग से मटनमछली लाने गया था, सिर्फ इसलिए कि कोई उस पर शक न करे. इतना ही नहीं, पुलिस को चकमा देने के लिए उस ने खुद चोरी भी की थी. चोरी का सारा सामान उस ने मटन लेने जाते समय स्कूटर की डिक्की में रख दिया था.

इस के बाद वह कुछ बताने को तैयार नहीं था. जब प्रकाश राय ने टेलीफोन डायरी का ‘जी’ पेज कैसे फटा, इस बारे में पूछा तो जवाब में उस ने सिर्फ 2 शब्द कहे, ‘‘मालूम नहीं.’’

धनंजय को अगले दिन कोर्ट में पेश करना था. उस रात प्रकाश राय देर तक औफिस में ठहरे थे. एक सिपाही से उन्होंने धनंजय को अपने पास बुलवाया और उसे कुर्सी पर बैठा कर बोले,‘‘धनंजय, मेरा काम पूरा हो गया है. कल तुम्हें जेल भेजने के बाद हमारी मुलाकात कोर्ट में होगी. मुझे मालूम है कि तुम कुछ न कुछ छिपा रहे हो. मैं सत्य जानने के लिए उत्सुक हूं. अब तुम मुझे कुछ भी बतोओगे, उस का कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि तुम्हारे सारे कागजात तैयार हो गए हैं. उस में परिवर्तन नहीं हो सकता है. तुम जो कुछ भी बताओगे, वह मेरे तक ही सीमित रहेगा. अब मुझे बताओ कि तुम ने आनंद और आनंदी को रोहिणी की हत्या की खबर क्यों नहीं दी और आनंदी के फोन नंबर का ‘जी’ तुम ने क्यों फाड़ डाला?’’

धनंजय गंभीर हो गया. उस की आंखों में आंसू भर आए. कुछ क्षणों बाद खुद को संभालते हुए बोला, ‘‘जो सच है, मैं सिर्फ आप को बता रहा हूं. एक सुखी परिवार को नष्ट करना या बचाना, आप के हाथ में है. पर मुझे विश्वास है कि आप यह बात किसी और को नहीं बताएंगे.

‘‘आगरा में रोहिणी की मौसेरी बहन का विवाह था. उसी विवाह में हम आगरा गए थे. विवाह के बाद शताब्दी एक्सप्रेस से हम लौट रहे थे तो हमारी मुलाकात आनंद और आनंदी से हो गई. वे सामने की सीट पर बैठे थे. मैं 2-3 पैग पिए हुए था, फिर भी मुझे नींद नहीं आ रही थी. उस समय मेरी नींद उड़ गई थी.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘मेरे सामने बैठी आनंदी और कोई नहीं, मेरी प्रेमिका थी. हम दोनों एकदूसरे को जीजान से चाहते थे.’’

‘‘क्या?’’ प्रकाश राय की आंखें हैरानी से फैल गईं, ‘‘अच्छा, फिर क्या हुआ?’’

‘‘मेरी क्या हालत हुई होगी, आप अंदाजा लगा सकते हैं. पास में पत्नी बैठी थी और सामने प्रेमिका, वह भी अपने पति के साथ. मुझे देखते ही आनंदी भी परेशान हो गई थी. मैं असहज मानसिक अवस्था और बेचैनी के दौर से गुजर रहा था, वह भी उसी दौर से गुजर रही थी. सचसच कहूं तो हम दोनों ही अपने ऊपर काबू नहीं रख पा रहे थे.

‘‘इस मुलाकात के असर से उबरने में मुझे 4 दिन लगे. तब मुझे नहीं मालूम था कि एक चक्रव्यूह से निकल कर मैं दूसरे चक्रव्यूह में फंस गया हूं. तब मैं यह भी नहीं जानता था कि इस दूसरे चक्रव्यूह से निकलने के लिए मुझे रोहिणी की हत्या करनी पड़ेगी. खैर…

‘‘ट्रेन में आनंदी और रोहिणी की गप्पें जो शुरू हुईं तो थोड़ी देर बाद वे एकदूसरे की पक्की सहेली बन गईं. आनंदी 2-3 बार मेरे घर भी आई थी. खुदा का लाख शुक्र था कि हर बार मैं घर पर नहीं रहा. मैं आनंदी से मिलना भी नहीं चाहता था. मैं उस से संबंध बढ़ा कर रोहिणी को धोखा देना नहीं चाहता था. इसलिए रोहिणी और आनंदी की बढ़ती दोस्ती से मैं चिंतित था.’’धनंजय सांस लेने के लिए रुका. प्रकाश राय को लगा, कुछ कहने के लिए वह अपने आप को तैयार कर रहा है. उन का अंदाजा गलत नहीं था. धनंजय भारी स्वर में बोला,

‘‘एक दिन ऐसी घटना घटी कि मैं पागल सा हो गया. मुझे लगा, मेरे दिमाग की नसें फट जाएंगी. अपने सिर को दोनों हाथों से थाम कर मैं जहां का तहां बैठ गया. अपने आप पर काबू पाना मुश्किल हो गया. मैं कंपनी के काम से सेक्टर-18 गया था. वहां एक होटल में मैं ने रोहिणी को एक युवक के साथ सटी हुई बैठी देखा, हकीकत जाहिर करने के लिए यह काफी था. मैं यह जानता था कि उस होटल में रूम किराए पर मिलते थे. मैं उस होटल से थोड़ी दूरी पर ही बैठ कर कल्पना से सब देखता रहा. खून कैसे खौलता है, मैं ने उसी वक्त महसूस किया. 12 बजे उस होटल में गई रोहिणी 4 बजे बाहर निकली थी.

‘‘इसके बाद कुछ दिनों की छुट्टी ले कर मैं ने रोहिणी का पीछा किया. अनेक बार रोहिणी मुझे उसी युवक के साथ दिखाई दी. वह युवक और कोई नहीं, आनंद था…आनंदी का पति.’’

धनंजय ने आंखों में भर आए आंसुओं को पोंछा. प्रकाश राय स्तब्ध बैठे थे, पत्थर की मूर्ति बने. थोड़ी देर बाद शांत होने पर धनंजय बोला, ‘‘कैसा अजीब इत्तफाक था. विवाह से पहले मेरी प्रेमिका के साथ मेरे शारीरिक संबंध थे और विवाह के बाद मेरी प्रेमिका के पति के साथ मेरी पत्नी के शारीरिक संबंध. आनंदी को तो मैं पहले से जानता था, लेकिन रोहिणी और आनंद की पहचान तो शताब्दी एक्सप्रेस में हुई थी. यात्रा के दौरान जिस चक्रव्यूह में मैं फंसा था, उस से निकलने के लिए मैं ने रोहिणी को हमेशा के लिए मिटा दिया और आनंदी मेरी नजरों के सामने न आए, इसीलिए मैं ने टेलीफोन डायरी से ‘जी’ पेज फाड़ दिया था. मुझे जो भी सजा होगी, इस का मुझे जरा भी रंज नहीं होगा. मैं खुशीखुशी सजा भोग लूंगा. बस यही है मेरी दास्तान.’’

इस केस की बदौलत आनंद और आनंदी से प्रकाश राय की जानपहचान हो गई थी. कुछ दिनों बाद आनंद से उन्हें एक ऐसी बात पता चली कि उन का सिर चकरा कर रह गया था. जबजब आनंद और आनंदी उन के सामने आते थे, वह बेचैन हो जाते थे और सोचने पर मजबूर हो जाते थे कि काश, धनंजय और आनंदी एवं रोहिणी और आनंद का विवाह हो गया होता.

एक दिन बातचीत में आनंद ने कहा, ‘‘मुझे धनंजय की सजा का दुख नहीं है. अच्छा ही हुआ, उसे सजा होनी भी चाहिए. मुझे दुख है तो रोहिणी का. मैं ने आप से कहा था कि रोहिणी की और मेरी मुलाकात शताब्दी एक्सप्रेस में हुई थी. रोहिणी को देख कर मैं अभेद्य चक्रव्यूह में फंस गया था. आगरा से दिल्ली तक की यात्रा के घंटे मैं ने कैसे बिताए, मैं ही जानता हूं, क्योंकि मेरे सामने बैठी रोहिणी कोई और नहीं, मेरी पूर्व प्रेमिका थी.’’

यह सुनते ही प्रकाश राय के होश फाख्ता होतेहोते बचे. विचित्र था संयोग और भयानक थी भाग्य की विडंबना. क्या सचमुच नियति के खेल में मनुष्य मात्र खिलौना होता है?  (कथा सत्य घटना पर आधारित है, किसी का जीवन बरबाद न हो, कथा में स्थानों एवं सभी पात्रों के नाम बदले हुए हैं) Social Story