Crime Story: हत्या जिन के लिए खेल है

Crime Story: किसी का भी खून करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि ज्यादातर लोग खून देख कर ही घबरा जाते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें किसी को भी मार देना खेल लगता है. यह कहानी ऐसे ही लोगों की है.

लुधियाना न्यू कोर्ट का माहौल उस दिन बड़ा रहस्यमयी लग रहा था. गेट से ले कर अंदर तक चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन अदालत लुधियाना के बहुचर्चित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला हत्याकांड का फैसला सुनाने वाली थी. हत्यारे कितने खतरनाक और खूंखार थे, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उन्हें जेल से अदालत तक लाने के लिए 60 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी. अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रिया सूद की अदालत को सुरक्षा की दृष्टि से पुलिसकर्मियों ने पूरी तरह से घेर रखा था. क्योंकि उन्हीं की अदालत में फैसला सुनाया जाने वाला था.

राष्ट्रपति पदक से सम्मानित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला की 1 फरवरी, 2012 की रात बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. इस दोहरे हत्याकांड को 6 लोगों, उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ पिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू, हसनजीत सिंह उर्फ जीता, दविंदरपाल सिंह उर्फ लाडी और रविंदर सिंह उर्फ रिंकू ने मिल कर अंजाम दिया था. पंजाब पुलिस ने इन लोगों को बड़ी मेहनत से पकाड़ा था. डीएसपी बलराज गिल की तैनाती उन दिनों जिला मोगा में डीएसपी हैडक्वार्टर के रूप में थी. चुनाव की वजह से पिछले एक महीने से वह काफी व्यस्त थे. ठीकठाक चुनाव संपन्न हो गए तो उन्होंने चैन की सांस ली थी और 1 फरवरी को छुट्टी ले कर लुधियाना स्थित अपने घर आ गए थे.

बलराज गिल सरदार कश्मीरा सिंह की एकलौती संतान थे. कश्मीरा सिंह बीएसएफ में कमांडेट थे और रिटायर्ड होने के बाद घर पर ही रह रहे थे. घर पहुंच कर बलराज गिल ने कुछ देर आराम किया, उस के बाद शाम को सत्संग सुनने चले गए. चुनाव की वजह से वह कई दिनों से सत्संग सुनने नहीं जा सके थे. सत्संग सुनने के बाद बलराज गिल कुछ देर अपने सत्संगी मित्रों के पास बैठ कर बातें करते रहे, उस के बाद घर चले गए. 7 बजे के करीब उन के फोन पर किसी का फोन आया तो पत्नी से 10 मिनट में आने की बात कह कर वह अपनी सफेद रंग की ओपट्रा कार से मौडल टाउन स्थित इश्मीत चौक के पास प्रिंटिंग प्रैस चलाने वाले अपने दोस्त मनिंदरपाल सिंह के पास जा पहुंचे.

वहीं पर बलराज और मनिंदर के क्लासमेट अनमोल सिंह मिल गए. तीनों दोस्त चाय पीते हुए बातें कर रहे थे कि तभी बलराज के फोन पर किसी का फोन आया, जिसे सुनने के बाद वह अपनी कार छोड़ कर मनिंदर की कार ले कर चले गए. जाते समय वह दोस्तों से कह गए कि थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे. लेकिन वह गए तो लौट कर ही नहीं आए. जब काफी देर हो गई तो दोस्तों को चिंता हुई. उन्होंने बलराज को फोन किए, पर उन के दोनों फोन बंद मिले. रात 10 बजे उन्होंने बलराज के घर फोन किया तो उन के पिता कश्मीरा सिंह ने बताया कि बलराज अभी तक घर भी नहीं पहुंचे हैं.

इस के बाद मनिंदरपाल और अनमोल ने कई जगह फोन कर के बलराज के बारे में पूछा, लेकिन कहीं से उन के बारे में कुछ पता नहीं चला. रात 12 बजे तक स्पष्ट हो गया कि बलराज गिल के साथ या तो कोई हादसा हो गया है या फिर उन का अपहरण आदि कर लिया गया है. चिंता की बात यह थी कि बलराज अपना सर्विस रिवौल्वर और सुरक्षा गार्डों को साथ नहीं ले गए थे. वह निहत्थे और अकेले ही गए थे. वैसे तो बलराज गिल जांबाज पुलिस अफसर थे, बड़ेबड़े खूंखार अपराधियों को काबू कर के उन्होंने सलाखों के पीछे पहुंचाया था. लेकिन निहत्थे और अकेले होने की वजह से सभी चिंतित थे.

बहरहाल, जब स्पष्ट हो गया कि बलराज लापता हो गए हैं तो क्षेत्रीय पुलिस और उन की सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी उन की तलाश में लग गए. शहर का चप्पाचप्पा छान मारा गया, लेकिन बलराज गिल का कहीं कोई सुराग नहीं मिला. अगले दिन हंबड़ा रोड स्थित गोल्फ लिंक क्षेत्र में बने एक फार्महाउस से बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका की लाश मिली. उन की कारें कई दिनों बाद शहर से दूर सुनसान जगह से पुलिस ने बरामद की थीं. दोनों कारों की नंबर प्लेटें बदली हुई थीं. बलराज और मोनिका की हत्या की बात सुन कर पूरे शहर में भय का माहौल बन गया था. जब यह खबर बलराल के घर पर पहुंची थी तो वहां कोहराम मच गया.

पिता कश्मीरा सिंह ने तो जैसेतैसे खुद को संभाल लिया था, लेकिन मां गुरदीप कौर का बुरा हाल था. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उन का शेर जैसा बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा. बलराज गिल सचमुच सुंदरस्वस्थ और लंबेचौड़े जवान थे. उन का ऐसा शरीर था कि वह 4-5 लोगों पर भारी पड़ सकते थे. उन की पत्नी हरिंदर कौर गिल कुंदनपुरी के सरकारी स्कूल में वाइस प्रिंसिपल थीं. पति की हत्या की बात सुन कर वह बेहोश हो गई थीं. बेटे गुरमन सिंह और बहन गुरशरण कौर का भी रोरो कर बुरा हाल था. लुधियाना के अलावा अन्य जिलों जालंधर, पटियाला, मोगा के भी पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. आईजी, डीआईजी एवं एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया.

शिनाख्त के बाद बलराज और मोनिका की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था. इस के बाद कश्मीरा सिंह की तहरीर पर थाना हैबोवाल में 2 फरवरी, 2012 को भादंवि की धारा 302, 404, 201, 465, 468, 471 व 120बी के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के युद्ध स्तर पर हत्यारों की तलाश शुरू कर दी गई थी. फार्महाउस के हालात बता रहे थे कि इस हत्याकांड को लगभग आधा दर्जन लोगों ने अंजाम दिया था. फार्महाउस के कई गमले टूटे हुए थे. कमरों के अंदर और बाहर खून ही खून फैला था. क्राईम टीम और फिंगर प्रिंट विशेषज्ञों की टीम ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल से हाथोंपैरों के निशान उठाए थे. मृतक बलराज गिल की मुट्ठी में कुछ बाल मिले थे.

मोनिका की लाश बाथरूम के पास मिली थी. बाथरूम की दीवार पर खून और उन के सिर के बाल चिपके हुए थे. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए घटनास्थल के 33 फोटो खींचे थे और 2 वीडियो बनाई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार बलराज गिल के सिर और गरदन पर तेज धार हथियार से वार किए गए थे. मोनिका के सिर, बाजू और पीठ के अलावा शरीर के अन्य अंगों पर भी तेज धार हथियार के घाव पाए गए थे. बलराज के सिर और गरदन पर किए गए वार उन की मौत का कारण बने थे. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के अनुसार मरने से पहले बलराज गिल ने हत्यारों से जम कर संघर्ष किया था.

बहरहाल, इस हाईप्रोफाइल दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए डीजीपी के निर्देश पर लुधियाना पुलिस कमिश्नर ईश्वर सिंह और एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो की देखरेख में एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम बनाई गई थी, जिस में एसीपी परमजीत सिंह पन्नू, एसीपी साहनेवाल जसविंदर सिंह, एसीपी क्राईम और सीआईए स्टौफ के तेजतर्रार प्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह गिल, एडीशनल थानाप्रभारी, एसआई अजायब सिंह के अलावा अन्य एसीपी और इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी, सुरेंद्र मोहन को शामिल किया गया था. इस मामले की जांच में अन्य एजेंसियों को भी टीम की मदद के लिए लगा दिया गया था.

स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम और एसआईटी ने हंबड़ा रोड और आसपास के गांवों से लगभग 2 हजार संदिग्ध युवकों को पूछताछ के लिए उठा लिया था. पुलिस की इस काररवाई से लोगों में रोष पैदा हो गया था. गांवों के प्रधानों और हिरासत में लिए लोगों के घर वालों ने डीजीपी और मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि पुलिस हत्यारों को पकड़ने के बजाय उन लोगों को परेशान कर रही है, जो बरसों पहले गलत राह छोड़ कर शराफत की जिंदगी जी रहे हैं. हत्याएं सुनसान इलाके में हुई थीं और हत्यारे ऐसा कोई सबूत नहीं छोड़ गए थे, जिस से जांच आगे बढ़ पाती. जांच आगे न बढ़ते देख डीजीपी पंजाब के आदेश पर दिल्ली की स्पैशल टैक्निकल टीम के विशेषज्ञों को बुलाया गया था. साइबर क्राइम यूनिट और टैक्निकल सपोर्ट इंचार्ज इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह की देखरेख में वैज्ञानिक तरीके से जांच शुरू की गई.

घटनास्थल के आसपास ज्यादा सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे, फिर भी दिल्ली से आई साइबर टीम ने 5 किलोमीटर के क्षेत्र में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चेक की. इन में एक कैमरे से इनोवा और ओपट्रा कार की फुटेज मिली, जिस में इनोवा आगे जा रही थी और ओपट्रा उस के पीछे चल रही थी. लेकिन उन कारों में सवार लोगों के चेहरे नहीं दिखाई दे रहे थे. तब दिल्ली पुलिस ने लेटेस्ट टैक्नोलौजी का सहारा लिया. एक स्पैशल पीसी असैंबल कर इस हत्याकांड से पहले से ले कर हत्याकांड के बाद का सारा डाटा इकट्ठा कर सर्च किया तो पता चला कि हत्यारों में से एक हत्यारा मृतक बलराज का मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रहा है.

उस की अंतिम लोकेशन नरपुर बेर के टावर की मिली थी. उस के बाद फोन बंद हो गया था. उस फोन में चलने वाले नंबर की काल डिटेल्स से मिले नंबरों में एक नंबर गोल्फ लिंक वाले क्षेत्र में चल रहा था. उस के साथ 2 अन्य लोगों की भी लोकेशन मिल रही थी. अब तक की जांच से एसआईटी टीम, साइबर टीम और सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह को हत्यारों से जुड़े कुछ अहम सुराग मिल चुके थे. 2 फरवरी से 5 अप्रैल, 2012 तक पुलिस और हत्यारों के बीच आंखमिचौली का खेल चलता रहा. पुलिस को हत्यारों की लोकेशन तो मिल रही थी, लेकिन वे उन के हाथ नहीं लग रहे थे. जबकि पुलिस को यहां तक पता चल चुका था कि इस हत्या में 6 लोग शामिल थे. हत्या के बाद 3-3 लोग अलगअलग जगहों पर घूम रहे थे.

3 आरोपियों ने मोनिका की इनोवा कार पर फर्जी नंबर प्लेट लगा कर जगराओ और गुरदासपुर में बेचने की भी कोशिश की थी, लेकिन वह बिकी नहीं. तब उन्होंने उसे लुधियाना के लोधी क्लब के पीछे खड़ी कर दी थी. 3 आरोपी हिमाचल प्रदेश में घूम रहे थे, जहां वे नयना देवी मंदिर भी गए थे. बहरहाल, पुलिस ने अपना घेरा तंग कर के इस हाईप्रोफाइल डबल मर्डर मामले के 3 आरोपियों हरविंदर उर्फ बिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू तथा उमेश कारड़ा को गिरफ्तार कर लिया. यह गिरफ्तारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने की थी. इस के बाद बाकी 3 अभियुक्तों को गिरफ्ताल करने के लिए इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने उन के घर छापा मारा तो वे घर से फरार मिले.

लेकिन 7 अप्रैल को वार्ड नंबर 31 के प्रधान जसपाल सिंह ने उन तीनों आरोपियों रविंदर सिंह, दविंदरपाल सिंह और हसनजीत सिंह को सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह के समक्ष पेश कर दिया था. इस तरह सभी अभियुक्तों के पकड़े जाने के बाद पुलिस उच्चाधिकारियों ने जब सब से पूछताछ की गई तो इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त डकैती और लूटपाट करते थे. इन का निशाना अधिकतर सुनसान इलाके के फार्महाउस या वे कोठियां होती थीं, जिन में 2-4 लोग रहते थे. 1 फरवरी की रात लगभग 8 बजे ये सभी हंबड़ा रोड पर स्थित संजय अग्निहोत्री के फार्महाउस के पास लूटमार करने के इरादे से इकट्ठा हुए थे. सभी बैठे योजना बना रहे थे कि कहां धावा बोला जाए? उस समय उन्हें यह पता नहीं था कि सामने वाला फार्महाउस किस का है और यहां कौन आने वाला है?

वे शराब पीते हुए लूटपाट की बातें कर रहे थे कि तभी वहां डीएसपी बलराज गिल अपने मित्र मनिंदरपाल सिंह की ओपट्रा कार से पहुंचे. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद उन की महिला मित्र मोनिका कपिला अपनी इनोवा कार से पहुंचीं. बाहर बैठे लूट की योजना बना रहे लुटेरों ने उन्हें आते देखा तो उन्हें लगा कि फार्महाउस पर इस समय ये दोनों ही हैं. उन्हें लगा कि दोनों के पास कुछ न कुछ माल तो होगा ही और अगर कुछ भी न हुआ तो 2 लग्जरी कारें तो हैं ही. यहीं हाथ मारा जाए. इस तरह आननफानन में लूट की योजना बन गई. लुटेरों के हिसाब से फार्महाऊस में 2 लोग यानी एक औरत और एक मर्द है, जबकि वे 6 थे. 2 लोगों को वे आसानी से काबू कर सकते थे.

यही सोच कर 2 लुटेरे फार्महाऊस की दीवार फांद कर अंदर आए और अंदर से लीवर घुमा कर मुख्य गेट खोल दिया. इस के बाद बाकी 4 लुटेरे भी अंदर आ गए. फार्महाऊस के कमरे में बैठे बलराज और मोनिका बातें कर रहे थे कि तभी बलराज ने पदचाप की आवाज सुनी. बाहर कौन है, यह देखने के लिए वह बाहर लौन में आए तो लुटेरों ने उन्हें दबोच लिया. अचानक हुए इस हमले से वह विचलित तो हुए, लेकिन जल्दी ही खुद को संभाल कर लुटेरों से भिड़ गए. काफी देर तक लुटेरों और बलराज के बीच हाथापाई होती रही. अंत में लुटेरों ने तेजधार हथियारों से उन पर हमला कर के उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया.

वह जमीन पर गिर पड़े तो लुटेरे उन्हें घसीट कर कमरे के अंदर ले गए और सोफे पर पटक दिया. मोनिका ने जब बलराज की हालत देखी तो अपनी जान बचाने के लिए वह कमरे से लगे बाथरूम की ओर भागीं. 2 लुटेरे मोनिका के पीछे भागे. लुटेरों को मोनिका का पीछा करते देख बलराज एक बार फिर उठे. लेकिन बाकी के 4 लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर हथियारों से उन पर फिर से वार कर दिए, जिस से उन की मौत हो गई. मोनिका का पीछा कर लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर उन का सिर बाथरूम की दीवार से टकरा दिया, जिस से उन का सिर फट गया और दीवार पर खून और सिर के बाल चिपक गए. इस के बाद मोनिका की भी उन्होंने हथियारों से वार कर के हत्या कर दी.

दोनों को मार कर लुटेरे उन के पास से नकदी, गहने, मोबाइल तथा दोनों कारें लूट कर फार्महाऊस से चले गए. जाते हुए उन्होंने फार्महाऊस का गेट बाहर से बंद कर दिया था.  इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने सभी छहों अभियुक्तों की निशानदेही पर अभियुक्त हरविंदर से बलराज गिल का सैमसंग का मोबाइल फोन, पर्स और ओपट्रा कार की चाबी बरामद की, प्रितपाल के कब्जे से एप्पल का फोन और बलराज की कलाई घड़ी बरामद की, उमेश के कब्जे से नोकिया फोन तथा इनोवा कार की चाबी बरामद की. पूछताछ एवं बरामदगी के बाद 2 मई, 2012 को सभी छहों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने समय से अदालत में चालान पेश कर दिया. पुलिस द्वारा तैयार किए गए आरोपपत्र में 65 गवाहों को शामिल किया गया था, लेकिन अदालत में केवल 44 गवाहों के ही बयान हो सके. अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में घटनास्थल की वीडियो की 4 सीडीज और 85 फोटोग्राफ्स पेश किए गए थे. इसी बीच 4 नवंबर को अभियुक्त उमेश कारड़ा ने साथियों सहित जेल से भागने की कोशिश भी की. इस के बाद इन पर जेल से भागने का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. 1 जनवरी, 2013 को यह मुकदमा लोअर कोर्ट से एडिशनल सैशन जज प्रिया सूद की अदालत में भेज दिया गया. उसी दिन सभी आरोपियों पर चार्ज फ्रेम किया गया.

2 फरवरी, 2013 को रविंदर और हसनजीत ने अदालत में जमानत याचिका दायर की, जिसे 11 फरवरी को खाजिर कर दिया गया. अदालत की काररवाई के दौरान 20 अगस्त, 2013 को आरोपी हरविंदर सिंह पर एक गवाह को धमकाने का मामला दर्ज हुआ. हरविंदर सिंह ने गवाह जसपाल सिंह को गवाही देने के लिए अदालत में जान से मारने की धमकी दी थी. अभियुक्त दविंदरपाल ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जो जनवरी, 2014 में मंजूर कर ली गई. अब अदालत में गवाहियां शुरू हो गई थीं.

अभियोजन पक्ष की ओर से चीफ पब्लिक प्रौसीक्यूटर सुखचैन सिंह गिल पैरवी कर रहे थे. मृतक बलराज गिल के पिता कश्मीरा सिंह की ओर से एडवोकेट हरप्रीत संधु मुकदमा लड़ रहे थे. बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट अशोक लखनपाल और नगेंद्र सिंह गोरा पेश हुए थे. 41 गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने इस केस को किसी और अदालत में चलाने की याचिका दायर की, जिसे सैशन जज ने यह कह खारिज कर दिया कि अदालत बदले जाने से केस की सुनवाई में देर होगी और सुनवाई प्रभावित होगी.

गवाहियां समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों की बहस और दलीले सुनने के बाद अतिरिक्त सैशन जज प्रिया सूद ने फैसला सुनाने की तारीख 9 सितंबर तय कर दी, लेकिन उस दिन वह फैसला नहीं सुना सकीं. जबकि उन्होंने सभी छहों आरोपियों को हत्याओं का दोषी करार दे दिया था. फैसला सुनाने के लिए उन्होंने 11 सितंबर की तारीख दी. दोषी करार देने के बाद जमानत पर चल रहे दोषी दविंदरपाल सिंह को तत्काल पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. माननीय जज प्रिया सूद ने 11 सितंबर 2015 को इस दोहरे हाईप्रोफाइल हत्याकांड में अभियुक्त उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ बिंदर तथा प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू को हत्याएं करने, सामान चोरी करने, जाली दस्तावेज तैयार करने, सबूत खुर्दबुर्द करने तथा साजिश रचने के अपराध में दोषी करार देते हुए दोहरी उम्रकैद यानी 42 साल की कैद तथा 1-1 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई.

जुरमाना अदा न करने पर सजा 1-1 साल और बढ़ा दी जाएगी. रविंदर सिंह उर्फ रिंकू तथा दविंदरपाल सिंह को सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने और जाली दस्तावेज तैयार करने का दोषी करार देते हुए 3-3 साल की सजा और 5-5 हजार रुपए जुरमाने की तथा हसनजीत सिंह उर्फ हसन को साजिश रचने, सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने का दोषी करार देते हुए 7 वर्ष की सजा और 20 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. सजा सुनाने से पहले अभियोजन पक्ष के वकीलों ने अभियुक्तों को फांसी की सजा की मांग की थी. लेकिन अदालत ने उन की यह मांग नहीं स्वीकार की थी.

मजे की बाज यह थी कि सजा सुनने के बाद भी दोषियों के चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी. 9 सितंबर को अदालत द्वारा दोषी करार देने के बाद अभियुक्त जब जेल पहुंचे थे तो उन्होंने झगड़ा कर के 3 विचाराधीन कैदियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया था. हत्यारों की मानसिकता का इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें सजा होने पर जब घर वाले रोने लगे तो उन्होंने कहा, ‘‘आप लोग क्यों परेशान होते हैं, सजा तो शेरों को होती है.’’ Crime Story

 

Rajasthan Crime Story: हत्यारा निकला प्रशासनिक अधिकारी

Rajasthan Crime Story: 2 बच्चों के पिता आरएएस अधिकारी प्रदीप बालाच ने गर्लफ्रैंड के चक्कर में अपनी पत्नी नेहा की सुनियोजित तरीके से हत्या कर के उसे दुर्घटना का रूप देने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन…

नेहा को जब पता चला कि उस का रिश्ता एक आरएएस अधिकारी प्रदीप बालाच से पक्का हो गया है तो वह फूली नहीं समा रही थी. उस के मांबाप व घर के अन्य लोग भी खुश थे कि एक प्रशासनिक अधिकारी प्रदीप के साथ शादी के बाद नेहा राज करेगी. लड़का नेहा को हर वह खुशी देगा, जो उसे चाहिए. प्रदीप बालाच राजस्थान के बाड़मेर जिले के गांव गडरा रोड के रहने वाले प्रेम प्रकाश बालाच का बेटा था. प्रेम प्रकाश कोई बड़े आदमी नहीं थे, वह एक साधारण आदमी थे.

खेतीकिसानी से होने वाली आमदनी से उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ायालिखाया था. प्रदीप शुरू से ही पढ़ाई में होशियार था. स्कूली पढ़ाई पूरी कर के कालेज की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी. बाद इस के वह राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) की तैयारी करने लगा. उस की मेहनत रंग लाई और आरएएस में उस का चयन हो गया. राजस्थान इंस्टीट्यूट औफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (रीपा), जोधपुर में ट्रेनिंग करने के बाद 13 नवंबर, 2006 को प्रदीप की पहली नियुक्ति जैसलमेर में उपजिलाधिकारी के पद पर हुई. इस के बाद वह जैसलमेर में करीब 2 सालों तक विभिन्न पदों पर प्रशिक्षु के रूप में कार्य करते रहे.

जैसलमेर में तैनाती के दौरान ही 31 जनवरी, 2007 को प्रदीप की शादी बाड़मेर के रहने वाले भीमाराम की बेटी निर्मला उर्फ नेहा के साथ हुई थी. यह शादी बड़ी धूमधाम से हिंदू रीतिरिवाज से हुई थी. शादी में जैसलमेर के तत्कालीन जिलाधिकारी सहित तमाम प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा इलाके के अनेक प्रतिष्ठित लोग भी शामिल हुए थे. गोरे रंग और शर्मीले स्वभाव की नेहा जब अपनी ससुराल पहुंची तो अपने मृदु  व्यवहार से उस ने सब का मन मोह लिया. ससुराल में नेहा की सभी तारीफ कर रहे थे. इस से नेहा भी खुश हो रही थी. नेहा ने अपने दिल में ढेरों सपने संजोए थे. वह दुनिया की वे सब खुशियां पाना चाहती थी, जो एक लड़की चाहती है.

शादी के बाद प्रदीप और नेहा के नवजीवन की शुरुआत हुई. दोनों ही बेहद खुश थे. प्रदीप की छुट्टियां कब बीत गईं, पता ही नहीं चला. छुट्टियां समाप्त होने पर प्रदीप जैसलमेर में अपनी ड्यूटी पर चले गए. एक बार मायके जाने के बाद नेहा भी प्रदीप के साथ जैसलमेर में रहने लगीं. हंसीखुशी के साथ उन का समय गुजर रहा था. इसी बीच नेहा एक बेटे की मां बन गईं. बेटा पैदा होने के बाद घर में खुशी और बढ़ गई. नेहा का समय बच्चे के लालनपालन में व्यतीत होने लगा.

जैसलमेर में लगभग 2 साल रहने के बाद प्रदीप का ट्रांसफर भरतपुर हो गया. भरतपुर के बाद जहांजहां भी प्रदीप का ट्रांसफर हुआ, नेहा उन के साथ ही रही. लेकिन जब प्रदीप को जोधपुर का जिला आबकारी अधिकारी बना कर भेजा गया तो नेहा के पारिवारिक जीवन में अचानक बदलाव आ गया. वह एक और बेटे की मां बन गई. नेहा के साथ उस के सासससुर भी रह रहे थे. जोधपुर आने के बाद नेहा महसूस कर रही थी कि उस का पति उस से कुछ ज्यादा ही चिड़ाचिड़ा सा रहने लगा है. उस ने इस पर कुछ खास ध्यान नहीं दिया. वह सोचती थी कि ड्यूटी की भागादौड़ी की वजह से यह सब हो रहा है, सब ठीक हो जाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. ठीक होने के बजाय घर में हर समय कलह रहने लगी.

बातबात पर प्रदीप व उस की मां उसे डांटतेफटकारते थे. नेहा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये लोग उस के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में आखिर वह क्या करे. रोजरोज की किचकिच से परेशान हो कर नेहा ने एक दिन अपनी मां पार्वती देवी व सहेलियों को यह बात बता दी. मां ने नेहा को ही समझाया कि पारिवारिक विवाद हर घर में होता है. आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा. लेकिन घर का माहौल ठीक नहीं हुआ. दिनप्रतिदिन घर में कलह बढ़ती ही गई. नेहा जैसे ही प्रदीप के सामने पड़ती, वह उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए कहता, ‘‘मैं ने तुम से शादी कर के बहुत बड़ी गलती की है. काश, मैं अपनी मनमरजी से शादी करता तो मेरा जीवन आज नरक नहीं बनता.’’

पति के मुंह से यह बात सुन कर नेहा समझ गई कि प्रदीप ने अपने घर वालों के दबाव में शादी की है. तभी तो वह इस तरह की बातें कह रहा है. नेहा कुछ कहती तो प्रदीप उस पर चिल्लाने लगता. सास तो उसे चैन से बैठने तक नहीं देती. नेहा कहां तो प्रदीप से शादी करने के बाद खुद को किस्मत वाली समझ रही थी. लेकिन अब उस के व्यवहार को देख कर सोचती थी कि इस से तो भला था वह किसी गरीब लड़के से ब्याही होती. एक रोज तो हद ही हो गई. प्रदीप ने अपने मोबाइल में एक लड़की का फोटो दिखाते हुए कहा, ‘‘अगर तू मेरी जिंदगी में नहीं आई होती तो मैं इस से ब्याह रचाता. क्योंकि मैं इस से प्यार करता हूं और यह मुझ से. हम दोनों अच्छे मित्र हैं.’’

यह बात सुन कर नेहा के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. अब पति की बेरुखी का कारण उस की समझ में आ गया था. नेहा ने एक दिन मौका मिलते ही प्रदीप के मोबाइल से उस की गर्लफ्रैंड की फोटो अपने मोबाइल में ट्रांसफर कर ली. नेहा जब मायके गई तो वह फोटो उस ने मां को दिखाते हुए अपना दुखड़ा रोया. दामाद की हकीकत जान कर पार्वती भी हक्कीबक्की रह गई. पार्वती ने बेटी की समस्या के बारे में पति और बेटे को भी अवगत कराया. तब भीमाराम अपने कुछ रिश्तेदारों को ले कर प्रदीप के यहां गए और बेटी को तंग करने के मुद्दे पर बात की. उस समय प्रदीप ने उन से वादा किया कि वह आईंदा नेहा को तंग नहीं करेगा.

बात आईगई हो गई. नेहा भी मायके से जोधपुर लौट आई. उस के लौटने पर प्रदीप आंखें तरेर कर बोला, ‘‘अपने मांबाप से मेरी शिकायत कर के तुम ने अच्छा नहीं किया. मैं आबकारी अधिकारी हूं. इसलिए पुलिस के बड़ेबड़े अधिकारियों से मेरे अच्छे संबंध हैं. तुम पुलिस के पास जाओगी, तब भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

पति की बात सुन कर नेहा अवाक सी रह गई. कहां तो वह समझ रही थी कि प्रदीप अब उस से कुछ नहीं कहेगा, लेकिन उस ने तो पहले जैसे ही तेवर दिखाने शुरू कर दिए. नेहा की आंखें भर आईं. पति से बहस करने के बजाय वह चुप हो गई, ताकि बात न बिगड़े. लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. सास और प्रदीप ने उस का जीना हराम कर दिया था. प्रदीप अकसर देर रात को घर लौटने लगा. नेहा जब उस से देर से आने की वजह पूछती तो वह कहता कि वह अपनी महिलामित्रों के साथ ऐश कर रहा था. यह सब वह नेहा को चिढ़ाने के लिए कहता था या फिर वह जो कह रहा था सच था, इस बात को वह ही जानता था.

कोई भी महिला सब कुछ सहन कर सकती है, पर यह हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकती कि उस का पति किसी दूसरी महिला से नजदीकी बनाए. उसी बीच नेहा ने एक दिन पति को घर में ही एक महिला से हंसहंस कर बातें करते देख लिया. वह वही महिला थी, जिस का फोटो उस ने पति के मोबाइल में देखा था. बात गंभीर थी, इसलिए नेहा ने यह बात अपनी मां को फोन पर बता दी. बेटी की बात सुन कर मायके वाले भी बहुत आहत हुए. नेहा की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी.

वह भी चाहते थे कि किसी तरह प्रदीप पर दबाव बना कर उसे लाइन पर लाया जाए. इसलिए वह अपने गांव के कुछ संभ्रांत लोगों को ले कर प्रदीप के गांव गडरा रोड चले गए. जोधपुर से प्रदीप और उस के घर वाले भी अपने गांव चले गए. गांव में पंचायत हुई. पंचायत में प्रदीप ने फिर से वादा किया कि वह नेहा को अब तंग नहीं करेगा. मगर यह उस का मात्र दिखावा था. वह मन से नेहा को निकाल चुका था. उस के दिल में नेहा की जगह कोई और बस गई थी. यही कारण था कि नेहा के सामने वह इस तरह के हालात खड़े कर रहा था कि नेहा परेशान हो कर खुदबखुद मायके जा कर रहने लगे.

लेकिन वह उस से दूर नहीं होना चाहती थी.  प्रदीप को जब लगा कि नेहा उस का पीछा छोड़ने वाली नहीं है तो वह उस से छुटकारा पाने के उपाय खोजने लगा. इस के लिए उस के दिमाग में यही उपाय आया कि किसी भी तरह नेहा को ठिकाने लगा दिया जाए. इस से उस का नेहा से हमेशा के लिए पीछा छूट जाएगा और कुछ समय बाद वह अपनी उस प्रेमिका से शादी भी कर लेगा, जिस का फोटो नेहा को दिखाया था. भोलीभाली नेहा अपने फरेबी पति के शौतानी दिमाग में मच रही खलबली से नावाकिफ थी. उस के लिए पति और दोनों बेटे ही संसार की सारी खुशियां थीं. नेहा का सोचना था कि हर काली रात के बाद उजाला जरूर होता है. आज नहीं तो कल उस के जीवन से भी अंधकार के बादल छंट जाएंगे और जीवन में उजियारा आएगा. मगर यह उस की सोच भर साबित हुई.

योजना को अंजाम देने के लिए प्रदीप नेहा को ले कर कई बार अपने गांव भी गया, लेकिन मौका न मिलने पर योजना सफल नहीं हो सकी. फिर एक दिन प्रदीप ने नेहा से कहा, ‘‘यदि तुम मेरी बीवी बनी रहना चाहती हो तो अपने बाप से 10 लाख रुपए और एक बंगला दिलवा दो. अगर यह नहीं हुआ तो तुम्हें ठिकाने लगा कर मैं अपनी गर्लफ्रैंड से शादी कर लूंगा. मैं अधिकारी हूं, इसलिए पुलिस भी मेरा कुछ नहीं कर पाएगी.’’

यह बात नेहा के दिल पर हथौड़े की तरह लगी. उस ने इस की चर्चा अपने मायके में की. मगर मायके वालों की इतनी हैसियत नहीं थी कि वे प्रदीप की यह मांग पूरी करते. नेहा ने मांबाप की असमर्थता प्रदीप से बता दी. अब प्रदीप ने अपनी चाल चली. 15 अप्रैल, 2015 को प्रदीप नेहा को जोधपुर से ले कर बाड़मेर गया. प्रदीप अपने साथ छोटे भाई हितेश को भी ले गया था. बाड़मेर में एक रात रुक कर अगले दिन वह अपने गांव गडरा रोड गया. पति के बदले मिजाज को देख कर नेहा को शक हो गया. उस ने फोन से अपनी मां पार्वती से बात करते हुए कहा कि मुझे प्रदीप और उस के छोटे भाई हितेष पर शक हो रहा है. ये मेरे साथ कोई अनहोनी कर सकते हैं.

मां ने समझाते हुए कहा कि यह तेरा वहम है. भला वे ऐसा क्यों करेंगे?

‘‘मम्मी, वहम नहीं, न जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि अब मैं आप से कभी नहीं मिल सकूंगी.’’ इतना कह कर नेहा रोने लगी. मां ने धैर्य रखने को कहा.

3-4 दिन गांव में रुकने के बाद 19 अप्रैल, 2015 की रात प्रदीप ने नेहा से कहा, ‘‘चलो, कोई पूजा करनी है, जिस से घर की सुखशांति लौट आए और रोजरोज के क्लेश से मुक्ति मिल जाए.’’

नेहा भी घर में शांति चाहती थी, इसलिए पति के साथ चली गई. पति के साथ वह चली तो गई, लेकिन उस समय कार में बैठने पर उसे डर लग रहा था. बहरहाल वह कार में बैठ कर चली तो गई, लेकिन वापस जीवित नहीं लौटी. दो-ढाई घंटे बाद प्रदीप उस की लाश ले कर वापस अपने घर लौटा. उस समय उस के साथ उस का छोटा भाई हितेष और भाजपा नेता दशरथ मेघवाल भी थे. पड़ोसियों और मोहल्ले वालों के पूछने पर प्रदीप ने विस्तार से बताया, ‘‘चलती गाड़ी का दरवाजा अचानक खुल जाने से नेहा सड़क पर गिर गई. घायल अवस्था में इसे गडरा रोड अस्पताल ले जाया गया, जहां डा. अशोक मीणा ने हालत नाजुक बताई और ऐंबुलैंस से इसे बाड़मेर ले जाने की सलाह दी. तब मैं बाड़मेर अस्पताल ले गया. लेकिन वहां के डाक्टर ने मृत घोषित कर दिया.

‘‘चूंकि मामला दुर्घटना का था, इसलिए डाक्टर ने पुलिस को सूचना दे दी. उस समय आधी रात का समय था. एक कांस्टेबल अस्पताल आया. उस ने कहा कि शव मोर्चरी में रखवा देते हैं, सुबह पोस्टमार्टम के बाद ले जाना. मैं ने सिपाही को अपना परिचय देते हुए कहा कि इन की मौत कार का गेट खुलने पर गिरने से हुई है. मैं इन का पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहता. सिपाही को मेरी बात समझ आ गई और मैं लाश को घर ले आया.’’

प्रदीप ने नेहा की मौत की खबर उस के मायके वालों को देने के बजाय सुबह नेहा का अंतिम संस्कार कर दिया. शव के ऊपर उस ने नमक डाल दिया था. नेहा मेघवाल जाति की थी और राजस्थान में मेघवाल जाति के लोगों का अंतिम संस्कार जमीन में दफना कर ही किया जाता है. मेघवाल जाति हिंदू धर्म में ही आती है, इस के बावजूद भी इस जाति के लोग चिता जलाने के बजाय अंतिम संस्कार लाश को दफना कर करते हैं. नेहा एक जिला आबकारी अधिकारी की पत्नी थी, इसलिए मीडिया वालों को जब घटना की जानकारी हुई तो प्रिंट और इलेक्ट्रौनिक मीडिया में नेहा की मौत की खबर प्रसारित हुई तो प्रदीप को जानने वाले अनेक लोग उस के गांव पहुंचने लगे.

नेहा के मायके वालों को जब नेहा की ऐक्सीडैंट में मौत होने की खबर मिली तो उस के मायके में चीखपुकार मच गई. मायके वाले प्रदीप के गांव पहुंचे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि चलती कार का गेट अचानक कैसे खुल जाएगा. अगर मान भी लिया जाए कि नेहा की मौत ऐक्सीडैंट में हुई थी तो प्रदीप ने उन्हें सूचना क्यों नहीं दी. सूचना दिए बगैर और बिना पोस्टमार्टम कराए ही, उस ने जल्दबाजी में उस का अंतिम संस्कार क्यों कर दिया. ऐसे कई सुलगते सवाल थे, जो नेहा के पिता भीमाराम एवं माता पार्वती के साथ उस के भाइयों के दिमाग में घूम रहे थे.

उन्हें ऐसा लग रहा था कि प्रदीप ने नेहा को मार कर ऐक्सीडैंट का रूप दिया है. पार्वती और भीमराम ने 22 अप्रैल, 2015 को बाड़मेर के पुलिस अधीक्षक पारिस देशमुख अनिल से मुलाकात कर के बेटी की शादी होने के बाद से उसे प्रताडि़त करने, दहेज मांगने की पूरी बात बताई. उन्होंने बताया कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि हत्या का मामला है. उन्होंने नेहा के पति प्रदीप बालाच, देवर हितेष और सास के ऊपर शक जताते हुए उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर कानूनी काररवाई करने की मांग की. नेहा की लाश का पोस्टमार्टम नहीं करवाने और मायके वालों को मौत की सूचना दिए बगैर आननफानन में लाश का अंतिम संस्कार कराने पर एसपी को भी शक हो गया.

उन्होंने गडरा रोड के थानाप्रभारी को निर्देश दिया कि प्रदीप बालाच और उस के भाई को थाने बुला कर पूछताछ की जाए, ताकि नेहा की मौत की सच्चाई सामने आ सके. उधर मीडियाकर्मी अपने स्तर पर नेहा की मौत के राज से परदा उठाने के लिए मैदान में कूद पड़े. प्रदीप बालाच ने जहां नेहा की दुर्घटना होने की बात बताई थी, उस जगह रात 10 बजे रियाज खां नाम का एक शख्स अपनी गाड़ी ले कर गुजर रहा था. रियाज ने सड़क किनारे बोलेरो देख कर अपनी गाड़ी रोक दी थी. उसे बोलेरो में लाल शर्ट पहने ड्राइवर व एक बच्चा बैठा दिखा. सड़क से दूर एक व्यक्ति टौर्च लिए खड़ा था.

रियाज ने जब ड्राइवर से पूछा कि कहां से आए हो तो उसने जवाब देने के बजाय जीप के गेट का शीशा ऊपर चढ़ा दिया. इस के बाद रियाज वहां से गाड़ी ले कर चला गया. रियाज को पत्रकारों ने ढूंढ़ निकाला था और उस से बात कर के यह साबित कर दिया था कि जरूर नेहा को मारा गया था. प्रदीप आबकारी विभाग, जोधपुर की बोलेरो जीप नंबर आरजे19यू आर1069 ले कर जोधुपर से गडरा रोड आया था. उस समय नेहा का 4 वर्षीय बेटा रजत भी था. पत्रकारों ने आबकारी विभाग, जोधपुर के ड्राइवर सुगनलाल से बात की तो उस ने बताया कि उस दिन जीप प्रदीप बालाच के पास थी. नेहा की मौत की खबर मिलने पर वह 20 अप्रैल को प्रदीप बालाच की इनोवा गाड़ी में प्रदीप के मातापिता को ले कर गडरा रोड गया था. इनोवा को गडरा में छोड़ कर वह सरकारी बोलेरो गाड़ी ले कर जोधपुर लौट आया था.

मीडिया द्वारा पुलिस को यह खबरें मिलीं तो एसपी के निर्देश पर चोहटन के सीओ नीरज पाठक ने भाजपा के पदाधिकारी दशरथ मेघवाल से पूछताछ की. दशरथ ने बताया, ‘‘मुझे फोन पर प्रदीप बालाच ने बताया था कि कार का गेट खुलने से नेहा का ऐक्सीडैंट हो गया है और मैं गाड़ी ले कर पहुंचूं. चूंकि उन से मेरे घनिष्ठ संबंध थे, इसलिए मैं गाड़ी ले कर घटनास्थल पर गया और नेहा को ले कर गडरा रोड अस्पताल गया. नेहा की हालत गंभीर थी, इसलिए वहां के डाक्टर ने उसे बाड़मेर रैफर कर दिया. बाड़मेर के डाक्टर ने नेहा को मृत घोषित कर दिया था.’’

इस के बाद सीओ नीरज पाठक ने गडरा रोड सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डा. अशोक मीणा के बयान भी नोट किए. इन बयानों के बाद सीओ को जो चौंकाने वाले तथ्य मिले, उस से लगा कि प्रदीप की ससुराल वालों द्वारा लगाए आरोप सही हैं. पुलिस प्रदीप के खिलाफ पहले सबूत जुटाना चाहती थी. इसलिए 24 अप्रैल, 2015 को मैडिकल बोर्ड और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में नेहा का शव जमीन से निकाल कर पोस्टमार्टम कराया. नमक डालने की वजह से शव सड़गल चुका था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि नेहा की मौत सड़क हादसे में नहीं हुई थी. उस के शरीर पर ऐसी कोई गंभीर चोट नहीं थी, जिस से लगे कि उस की मौत हो गई. नेहा की मौत के कारणों को जानने के लिए विसरा को मैडिकल कालेज, जोधपुर भेज दिया गया.

पुलिस को पूछताछ में पता चला कि प्रदीप बालाच की सरकारी बोलेरो गाड़ी घटनास्थल पर मौजूद थी. इस के बाद उसे बाड़मेर रैफर करने तक प्रदीप ने 3 बार गाडि़यां बदलीं. अपनी सरकारी गाड़ी से नेहा को वह अस्पताल क्यों नहीं ले गया? उस ने अस्पताल ले जाने के लिए भाजपा नेता को क्यों बुलाया? ये सारे सबूत मिल जाने के बाद प्रदीप बालाच और उस के छोटे भाई से पूछताछ करनी जरूरी थी. पुलिस जब उस के घर पहुंची तो हितेष घर से गायब मिला और प्रदीप ने थाने आने से मना कर दिया. सीओ ने इस बात से एसपी को अवगत कराया. एसपी को प्रदीप की यह बात नागवार लगी. उन का मानना था कि सरकारी अधिकारी होने के नाते आबकारी अधिकारी प्रदीप को पुलिस जांच में सहयोग करना चाहिए.

उन्होंने सीओ नीरज पाठक के नेतृत्व में भारी पुलिस बल प्रदीप के घर 25 अप्रैल, 2015 को भेज दिया. पुलिस प्रदीप को पूछताछ के लिए गडरा रोड थाने ले आई. पुलिस अधीक्षक पारिस देशमुख, सीओ चोहटन नीरज पाठक, गडरा रोड थानाप्रभारी बाबूलाल विश्नोई ने प्रदीप से नेहा की हत्या से संबंधित मनोवैज्ञानिक तरीके से रातभर पूछताछ की. लेकिन वह पुलिस को गुमराह करने के लिए बारबार रोने का नाटक करता रहा. पूरी रात ऐसे ही बीत गई. सुबह को अधिकारियों ने उस से फिर पूछताछ की. इस बार वह पुलिस अधिकारियों के सवालों के चक्रव्यूह में फंस गया. आखिर उस ने पत्नी नेहा की हत्या का राज उगल दिया. वह फफकफफक कर रोते हुए बोला, ‘‘हां, मैं ने नेहा की हत्या की है. लंबे समय से कलह के कारण मैं परेशान हो गया था और बस इसी कारण मैं ने उस की जान ले ली.’’

प्रदीप ने बताया कि वह नेहा को टोनेटोटके के बहाने हेलीपैड पर ले गया. वहां टोटका करने के लिए अगरबत्ती जलाई, गेहूं, ज्वार के दाने रखे. जब नेहा पूजा कर रही थी, उस समय गाड़ी में रखे डंडे से नेहा के सिर पर वार किया, जिस से वह घायल हो गई. उसी समय उस ने अपने छोटे भाई हितेष को वहां बुला लिया. फिर वे दोनों नेहा को गाड़ी में डाल कर जैसिंधर गांव से दूर सुनसान सड़क पर ले गए. वहां उन्होंने गाड़ी रोकी और नेहा को धक्का दे कर गिरा दिया ताकि हत्या को हादसे का रूप दे सकें. बाद में उस का गला घोंट दिया.

पुलिस टीम ने जोधुपर से आबकारी विभाग की बोलेरो गाड़ी भी जब्त कर ली. इस के अलावा घटनास्थल से माचिस, लकड़ी के टुकड़े व अन्य सामग्री जब्त की. भीमाराम की तहरीर के आधार पर नेहा की हत्या का मुकदमा गडरा रोड थाना में भादंवि की धारा 302, 498ए, 201 के तहत प्रदीप बालाच, उस के छोटे भाई हितेष बालाच व मां के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. जांच एसआई बाबूलाल बिश्नोई को सौंप दी गई. पुलिस ने हितेष की गिरफ्तारी के लिए अलगअलग टीमें गठित कर उस की तलाश शुरू कर दी. प्रदीप बालाच को 27 अप्रैल को बाड़मेर कोर्ट में पेश किया, वहां से उसे 3 दिन के रिमांड पर ले कर उस से विस्तार से पूछताछ की और घटनास्थल की तफ्तीश कराने के साथ कई सबूत भी जुटाए.

प्रदीप ने पुलिस अधिकारियों से कहा कि पत्नी की हत्या कर के उस ने बड़ा अपराध किया है. उधर 27 अप्रैल, मंगलवार को हितेष बालाच ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. पुलिस टीम उसे भी घटनास्थल पर ले गई और मौका मुआयना कर नेहा की हत्या से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी हासिल की. हितेष को 28 अप्रैल को कोर्ट में पेश कर 2 दिनों के रिमांड पर ले लिया. 30 अप्रैल को पुलिस ने रिमांड अवधि समाप्त होने पर प्रदीप व हितेष को बाड़मेर कोर्ट में पेश कर और रिमांड मांगा. प्रदीप को 2 दिनों के रिमांड पर दिया, वहीं हितेष को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया.

2 दिनों के रिमांड अविध पूर्ण होने पर गडरा पुलिस द्वारा प्रदीप बालाच को 2 मई, 2015 को बाड़मेर कोर्ट में पेश किया, जहां न्यायाधीश द्वारा प्रदीप बालाच को भी न्यायिक अभिरक्षा में भेजने के आदेश दिए. दोनों भाई न्यायिक अभिरक्षा में बाड़मेर जेल में बंद अपने किए की भूल पर पछताते हुए आंसू बहा रहे हैं. नेहा के दोनों मासूम बेटे मां की ममता की छांव से हमेशा के लिए दूर हो गए. 5 मई को पुलिस ने नेहा की सास को भी गिरफ्तार कर लिया. उसे धारा 498ए (दहेज के लिए प्रताडि़त करना) के तहत गिरफ्तार किया था. गिरफ्तारी के बाद उसे बाड़मेर की अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया.

5 मई, 2015 को राज्य सरकार ने पत्नी की हत्या के आरोपी प्रदीप को निलंबित कर दिया है. 48 घंटे से अधिक पुलिस अभिरक्षा में रहने के कारण राज्य सरकार ने निलंबन आदेश जारी किए. कथा लिखने तक प्रदीप व हितेष बाड़मेर जेल में बंद थे. Rajasthan Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों/समाचार पत्रों/नेहा के मायके पक्ष द्वारा दी जानकारी पर आधारित)

 

Crime Story: शैतानी दिमाग की साजिश

Crime Story: 10 सितंबर, 2018 को लुधियाना के जिला एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ की अदालत में अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा भीड़ थी. वजह यह थी कि उस दिन लुधियाना शहर के एक ऐसे दोहरे मर्डर केस का फैसला सुनाया जाना था, जिस ने पूरे शहर में सनसनी फैला दी थी. इस में हतप्रभ कर देने वाली बात यह थी कि आरोपी रिशु ग्रोवर मृतकों के परिवार का ही सदस्य था और उस परिवार की हर तरह से देखरेख करता था.

इस के बावजूद उस ने मां और बेटी की इतनी वीभत्स तरीके से हत्या की थी कि उन की लाशें देख कर पुलिस तक का कलेजा कांप उठा था. यह केस लगभग 5 सालों तक न्यायालय में चला, जिस में 23 गवाहों ने अपने बयान दर्ज कराए. इन गवाहों में एक गवाह ऐसा भी था, जिस ने आरोपी को घटनास्थल से फरार होते देखा था. अभियोजन पक्ष ने इस केस में पुलिस वालों, फोटोग्राफर, फिंगरप्रिंट एक्सर्ट्स, पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों आदि के बयान भी अदालत में दर्ज कराए थे.

निर्धारित समय पर जिला एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ के अदालत में बैठने के बाद जिला अटौर्नी रविंदर कुमार अबरोल ने कहा कि आरोपी रिशु ग्रोवर ने अपनी ताई और उन की बेटी की खंजर से बेहद क्रूरतम तरीके से हत्या की थी. लिहाजा ऐसे आरोपी को फांसी की सजा मिलनी चाहिए. वहीं बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि ये दोनों मर्डर किसी और ने किए हैं. हत्याएं करने के बाद हत्यारा खून से दीवार पर एक नाम भी लिख कर गया था.

खून से दीवार पर जिस का नाम लिखा गया था, पुलिस को उस शख्स से सख्ती से पूछताछ करनी चाहिए थी. लेकिन पुलिस ने उस शख्स को बचा कर सीधेसादे रिशु ग्रोवर को फंसा कर जेल में डाल दिया. रिशु पर लगाए गए सारे आरोप निराधार हैं. लिहाजा उसे इस केस से बाइज्जत बरी किया जाना चाहिए. जिला एडिशनल सेशन जज ने तमाम गवाहों के बयान, सबूतों और वकीलों की जिरह के बाद आरोपी रिशु ग्रोवर को दोषी करार दिया और सजा सुनाने के लिए 13 सितंबर, 2018 का दिन नियत कर दिया.

आखिर ऐसा क्या हुआ था कि इस हत्याकांड के फैसले पर लुधियाना के लोगों के अलावा वकीलों और मीडिया तक की निगाहें जमी थीं. सनसनी फैला देने वाले इस केस को समझने के लिए हमें घटना की पृष्ठभूमि में जाना होगा. लुधियाना के बाबा थानसिंह चौक के निकट मोहल्ला फतेहगंज में बलदेव राज अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी ऊषा के अलावा 2 बेटियां आशना व हिना एक बेटा राहुल था. बड़ी बेटी आशना की वह शादी कर चुके थे. शादी के लिए 2 बच्चे और बचे थे. वह उन की शादी की भी तैयारी कर रहे थे, लेकिन इस से पहले ही उन की मृत्यु हो गई.

बलदेव राज की मृत्यु के बाद घर की जिम्मेदारी ऊषा के ऊपर आ गई थी. खेती की जमीन से वह परिवार की गुजरबसर करने लगीं. पंजाब के तमाम लोग विदेशों में काम कर के अच्छा पैसा कमा रहे हैं. ज्यादा पैसे कमाने की चाह में राहुल भी अपने एक जानकार की मदद से आस्ट्रेलिया चला गया. वहां उसे अच्छा काम मिल गया था. राहुल के आस्ट्रेलिया जाने के बाद लुधियाना में उस के घर में 55 वर्षीय मां ऊषा और 21 वर्षीय बहन हिना ही रह गई थीं. राहुल ने अपनी बहन आशना और बहनोई विकास मल्होत्रा का खयाल रखने को कह दिया था. इस के अलावा उस ने अपने चाचा के बेटे रिशु ग्रोवर से भी मांबहन का ध्यान रखने को कहा था.

रिशु टिब्बा रोड के इकबाल नगर में रहता था. वैसे भी ऊषा का घर बाबा थानसिंह चौक पर ऐसी जगह रास्ते में था कि रिशु आतेजाते अपनी ताई ऊषा का हालचाल जान लिया करता था. जब रिशु ऊषा के यहां आनेजाने लगा तो ऊषा उस से घर के छोटेमोटे काम कराने लगीं. इस में रिशु के मातापिता को भी कोई ऐतराज नहीं था. कुछ समय और बीता तो ताई के कहने पर रिशु कभीकभी रात को भी उन के घर रुकने लगा.

इसी बीच एक यह परेशानी सामने आई कि बाबू नाम का एक लड़का हिना के पीछे पड़ गया. बाबू का सेनेटरी का काम था. हिना जब भी घर से बाहर निकलती, बाबू उस का रास्ता रोक कर उस से छेड़छाड़ करता था. इस से परेशान हो कर हिना ने इस की शिकायत पहले रिशु से की और बाद में यह बात अपनी बहन और जीजा को भी बता दी. रिशु ने अपने तरीके से बाबू को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना. कोई हल न निकलता देख हिना के बहनोई विकास ने इस की शिकायत थाना डिवीजन नंबर-3 में कर दी. पुलिस ने बाबू को थाने बुला कर धमका दिया. इस के बावजूद वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया. यह सन 2012 की बात है.

इस बीच राहुल आस्ट्रेलिया से लुधियाना लौटा तो यह बात उसे भी पता चली. लगभग 2 महीने लुधियाना में रहने के बाद जब वह वापस आस्ट्रेलिया लौटा तो अपनी मां ऊषा और बहन हिना की जिम्मेदारी फिर से रिशु को सौंप गया. आगे चल कर यही राहुल की सब से बड़ी भूल साबित हुई. रिशु एक आवारा, बदचलन और बेहद गिरा हुआ इंसान था. सिगरेट, शराब, जुए से ले कर कोई ऐसा गलत ऐब नहीं बचा था, जो रिशु में नहीं था. ऊषा और हिना का ध्यान रखने की आड़ में वह ऊषा के घर पर ही अपना डेरा जमा कर बैठ गया. दरअसल, रिशु के खुराफाती दिमाग में एक भयानक षड्यंत्र ने जन्म ले लिया था. उस का सीधा निशाना हिना थी जो इस बात से बिलकुल अनजान थी.

नाजायज रिश्ते, नाजायज तरीके. कब किसी इंसान को गुनाह के रास्ते पर ला कर खड़ा कर दें, कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. जिस भाई को राहुल मां और बहन की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप गया था, उसी भाई के मन में एक अपराध ने जन्म ले लिया था. अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए रिशु ने अपनी ताई की बेटी हिना को अपने जाल में फंसाना शुरू कर दिया. जल्दी ही वह अपने मकसद में कामयाब भी हो गया. उस ने हिना के साथ नाजायज रिश्ता कायम कर लिया. बाद में वह इसी नाजायज रिश्ते की आड़ ले कर उसे ब्लैकमेल कर पैसे ऐंठने लगा. उस से मिले पैसों का इस्तेमाल वह अपने सपने पूरे करने में खर्च करता था.

ताज्जुब की बात यह थी कि उसी घर में रहते हुए भी ऊषा को इस सब की भनक तक नहीं लग पाई थी. इस की वजह यह थी कि रिशु अपनी ताई को खाने में नींद की गोलियां दे देता था. गोलियों के नशे को ऊषा अपनी उम्र का रोग समझती थीं. शुरूशुरू में तो हिना रिशु के आकर्षण में फंस गई थी पर जब तक उसे उस की नीयत का पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. लेकिन अब पछताने से कोई फायदा नहीं था. क्योंकि वह सिर से ले कर पांव तक रिशु के चंगुल में फंसी हुई थी, जहां से अकेले बाहर निकलना उस के बूते की बात नहीं थी.

अंत में हार कर हिना ने अपने भाई राहुल को आस्ट्रेलिया फोन कर के यह बात बता दी. यहां हिना ने एक बार फिर बड़ी गलती की. वह राहुल से अपने और रिशु के शारीरिक संबंधों और रिशु द्वारा ब्लैकमेल करने की बात छिपा गई थी. यह बात फरवरी 2013 की है. अपनी बहन की बात सुन राहुल आस्ट्रेलिया से लुधियाना आया और उस ने रिशु को आड़े हाथों लिया. रिशु के मातापिता ने भी उस की अच्छी खबर ली. आखिर अपनी करनी से शर्मिंदा हो कर रिशु ने राहुल के अलावा अन्य सभी रिश्तेदारों से माफी मांग ली.

बात तो यहीं खत्म हो गई थी पर राहुल कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. उस ने हिना की शादी करने के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी. लड़का मिल भी गया. राहुल ने लुधियाना के पखोवाल रोड निवासी सौरव के साथ हिना की मंगनी कर के शादी पक्की कर दी. शादी की तारीख 20 नवंबर, 2013 तय हुई. इस बार राहुल ने बहन की शादी की जिम्मेदारी अपनी बहन आशमाऔर जीजा विकास मल्होत्रा को सौंपी. यह सब कर के वह 24 अप्रैल, 2013 को आस्ट्रेलिया लौट गया. आस्ट्रेलिया जा कर उस ने वहां से 4 लाख रुपए और करीब 100 डौलर अपनी मां को भेजे. मां ने शादी की तैयारियां शुरू कर दी थीं. राहुल समयसमय पर अपनी मां को फोन कर के बात करता रहता था.

21 मई, 2013 को राहुल ने आस्ट्रेलिया से अपनी मां को फोन कर के हालचाल पूछना चाहा तो मां का फोन बंद मिला. उस ने 2-3 बार मां को फोन मिलाया, पर हर बार फोन बंद ही मिला. उस ने 22 मई को फिर से मां को फोन किया. उस दिन भी उन का फोन स्विच्ड औफ था. बहन हिना का फोन भी बंद था. राहुल परेशान था कि दोनों के फोन क्यों नहीं मिल रहे. फिर उस ने अपने जीजा विकास मल्होत्रा को फोन कर कहा, ‘‘जीजाजी, पता नहीं क्यों मां और हिना का फोन नहीं मिल रहा है. मैं कल से कोशिश कर रहा हूं. आप वहां जा कर पता तो करें, क्या बात है?’’

‘‘ऐसी तो कोई बात नहीं है. मैं और आशमा कल रात को वहीं थे. हो सकता है वे लोग सो रहे हों या कोई सामान खरीदने बाजार गए हों. फिर भी मैं जा कर देखता हूं.’’ विकास ने कहा. उस के बाद विकास अपनी पत्नी आशमा को ले कर ससुराल गया.

दोनों ने वहां जा कर देखा तो मकान का मुख्य दरवाजा बंद जरूर था पर उस में कुंडी नहीं लगी थी. असमंजस की हालत में विकास ने अंदर जा कर देखा तो नीचे वाले कमरे में बैड पर सास ऊषा की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. मां की लाश देख कर आशमा की चीख निकल गई. विकास भी घबरा गया और सोचने लगा कि हिना कहां है. इस के बाद उस ने ऊपर के फ्लोर पर जा कर देखा तो बाथरूम के बाहर हिना की भी खून सनी लाश पड़ी थी. उस की लाश के पास दीवार पर खून से ‘बाब’ लिखा हुआ था. बाब यानी बाबू.

विकास को यह समझते देर नहीं लगी थी कि ये दोनों हत्याएं बाबू सेनेटरी वाले ने ही की है. क्योंकि वह हिना को अकसर परेशान करता था. विकास ने इस की सूचना थाना डिवीजन-3 को दे दी. साथ ही उस ने फोन द्वारा राहुल को भी बता दिया. सूचना मिलते ही इंसपेक्टर बृजमोहन, एसआई प्रीतपाल सिंह, एएसआई राजवंत पाल, हवलदार वरिंदर पाल सिंह, सरजीत सिंह और सिपाही राजिंदर सिंह के साथ बताए गए पते की तरफ रवाना हो गए.

घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने लाशों का मुआयना किया तो पता चला कि उन की हत्या किसी धारदार हथियार से की गई थी. मौके पर उन्होंने क्राइम टीम को बुलवाया. कई जगह से फिंगरप्रिंट और खून के सैंपल लिए और दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया. प्राथमिक पूछताछ में विकास मल्होत्रा से यह बात भी पता चली थी कि वारदात को अंजाम देने के बाद हत्यारे घर में रखे 4 लाख रुपए, 100 डौलर और सोने की एक चेन भी ले गए थे. विकास के बयानों के आधार पर पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड का मुकदमा आईपीसी की धारा 302, 460 के तहत दर्ज कर के तफ्तीश शुरू कर दी.

विकास ने इस हत्याकांड का शक बाबू पर जाहिर किया था और दीवार पर भी खून से ‘बाब’ लिखा हुआ था, इसलिए इंसपेक्टर बृजमोहन ने बाबू को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी.सख्ती से पूछताछ करने पर भी बाबू इस हत्याकांड के बारे में कुछ नहीं बता पाया था. उस का कहना था कि वह हिना का पीछा जरूर करता था पर इन हत्याओं में दूरदूर तक भी उस का कोई हाथ नहीं है. अचानक पुलिस को शक हुआ कि कहीं पैसों के लालच में विकास ने ही तो इस घटना को अंजाम नहीं दिया क्योंकि उसे भी पता था कि घर में इतना कैश रखा है. फोरेंसिक रिपोर्ट में यह बताया गया था कि घटनास्थल से मिले खून के सैंपल के साथ एक किसी तीसरे आदमी का भी खून था, जो शायद हत्यारे का था.

इन्हीं आशंकाओं को देखते हुए पुलिस ने विकास से पूछताछ की. विकास ने भी खुद को बेकसूर बताया. उस से की गई पूछताछ के बाद भी पुलिस को हत्यारों से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. संभावनाओं का पिटारा पुलिस के सामने खुला हुआ था. लेकिन अभी तक कोई ठोस लीड नहीं मिल रही थी. तफ्तीश के दौरान पुलिस को एक ऐसा शख्स मिला, जिस ने हत्यारे को घर से निकलते देखा था और वह उसे अच्छी तरह से पहचानता भी था.

इस के बाद पुलिस ने अन्य सबूत जुटाने के लिए हिना के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर खंगाली. उस में कई संदिग्ध नंबर थे. उन सभी नंबरों में एक नंबर ऐसा भी था जिस पर हिना की सब से ज्यादा बातें होती थीं. वह नंबर हिना के चचेरे भाई रिशु ग्रोवर का था. इस हत्याकांड के 2 दिन बाद राहुल भी आस्ट्रेलिया से आ गया. 25 मई को ही वह इंसपेक्टर बृजमोहन से मिला. राहुल ने बताया कि रिशु ने उस की बहन हिना से नाजायज संबंध बना लिए थे. इतना ही नहीं वह हिना को ब्लैकमेल कर उस से पैसे भी ऐंठता रहता था.

राहुल के बयानों ने इस केस का पासा पलट दिया और कातिल सामने आ गया. पता चला कि हिना और ऊषा का हत्यारा कोई और नहीं बल्कि रिशु ग्रोवर था. पुलिस ने रिशु को हिरासत में ले लिया. रिशु के खून की जांच कराई गई तो वह उसी खून से मैच कर गया जो घटनास्थल पर मृतकों के अलावा मिला था. रिशु से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस की निशानदेही पर इंसपेक्टर बृजमोहन ने नाले से हत्या में इस्तेमाल खंजर, प्लास्टिक के दस्ताने और एक रूमाल बरामद किया. पुलिस ने हत्या के बाद लूटे हुए पैसों में से 2 लाख 11 हजार रुपए और 100 डौलर भी बरामद कर लिए. काररवाई पूरी करने के बाद रिशु को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था.

तफ्तीश पूरी करने के बाद इंसपेक्टर बृजमोहन ने एक महीने बाद इस केस की चार्जशीट अदालत में दाखिल कर दी थी. पुलिस ने अदालत में तमाम गवाह पेश किए. उन में एक ऐसी महिला गवाह थी जिस ने इस हत्याकांड को अंजाम देने के बाद रिशु को घटनास्थल से फरार होते देखा था. दरअसल वह महिला रोज तड़के ढाई बजे सेवा करने के लिए गुरुद्वारा साहिब जाती थी. उसी समय उस ने रिशु को ऊषा के घर से निकलते देखा था. अदालत ने उस महिला की गवाही को अहम माना. तमाम गवाहों और सबूतों के आधार पर एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ ने रिशु ग्रोवर को दोषी ठहराया.

रिशु को दोषी ठहराने के बाद लोगों के जेहन में एक ही सवाल घूम रहा था कि पता नहीं 13 सितंबर को जज साहब उसे कौन सी सजा सुनाएंगे. लोगों के 3 दिन इसी ऊहापोह की स्थिति में गुजरे. आखिर वो दिन भी आ गया जो माननीय जज ने सजा सुनाने के लिए मुकर्रर किया था. 13 सितंबर को तमाम लोग बड़ी बेताबी के साथ कोर्टरूम में पहुंच गए थे. सुबह ठीक 10 बजे माननीय जज अदालत में बैठे. उन्होंने केस फाइल पर नजर डालते हुए कहा कि जिला अटौर्नी रविंदर कुमार अबरोल की दलीलों, गवाहों के बयानों और मौके पर मिले अन्य साक्ष्यों से यह बात पूरी तरह साबित हो जाती है कि रिशु ग्रोवर ने अपनी ताई और हिना को खंजर से ताबड़तोड़ वार कर के बेरहमी से मार डाला था.

रिशु चचेरी बहन से अवैध संबंध बना कर उसे ब्लैकमेल कर पैसे वसूलता था, जबकि 6 महीने बाद उस की शादी होनी थी. लिहाजा ब्लैकमेलिंग का धंधा व पैसा मिलना बंद होने की रंजिश में उस ने ही दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया था और हिना की शादी के लिए घर में रखा सारा पैसा लूट लिया था. रिशु इतना शातिरदिमाग था कि दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने के बाद उस ने पुलिस को गुमराह करने के लिए घर में रखे गहने व कैश भी गायब कर दिए थे. साथ ही दीवार पर खून से ‘बाब’ लिख दिया था, जिस से पुलिस उस तक न पहुंच सके.

दोषी की घृणित मानसिकता से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि उस ने जघन्यतम अपराध किया है. ऐसे आदमी को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है. अभियोजन पक्ष ने अपनी चार्जशीट में आरोपी पर जो आरोप लगाए हैं, वह उन्हें पूरी तरह से साबित करने में सक्षम रहा है. आरोपी का दोष पूरी तरह से साबित होता है, लिहाजा भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत दोषी रिशु ग्रोवर को अदालत मृत्युदंड की सजा सुनाती है. अपना फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश अरुणवीर वशिष्ठ ने अपनी कलम की निब तोड़ दी और उठ कर अपने चैंबर में चले गए. रिशु ग्रोवर को फांसी की सजा सुनाए जाने पर आशमा और उस के पति विकास ने संतोष व्यक्त किया. Crime Story

Domestic Dispute: रिश्तों का एक रंग ऐसा भी

Domestic Dispute: इंसपेक्टर अमित कुमार की पत्नी दीपमाला ने अपनी छोटी बहन मधु और बहनोई दीपक के बीच बनी खटास को दूर करने की कोशिश की. लेकिन उन्हें क्या पता था कि रिश्तों का यह बदरंग चेहरा एक दिन उन के ही परिवार के लिए खौफनाक बन जाएगा.

अमित कुमार आबकारी विभाग में इंसपेक्टर थे, उन के पास अपनी कार थी. औफिस टाइम के बाद वह शाम 7 बजे तक उत्तमनगर स्थित अपने घर पहुंच जाते थे. उस दिन भी वह रोजाना की तरह 7 बजे घर पहुंच गए थे. कार गैरेज में खड़ी कर के उन्होंने पत्नी दीपमाला को फोन किया कि मार्केट से कुछ मंगाना तो नहीं है. पत्नी के फोन पर घंटी तो जा रही थी, लेकिन वह फोन नहीं उठा रही थी. अमित ने सीढि़यां चढ़तेचढ़ते उन्हें दोबारा फोन किया. लेकिन इस बार भी पत्नी ने फोन नहीं उठाया. उन का फ्लैट दूसरी मंजिल पर था. सीढि़यां चढ़ कर वह फ्लैट के दरवाजे पर पहुंच गए.

उन के फ्लैट का ताला बंद था. दरवाजे पर ताला लगा देख कर उन्होंने सोचा कि दीपमाला शायद बच्चों के साथ बाजार गई होंगी. दीपमाला के पास २ फोन थे. अमित ने दूसरे नंबर पर भी २ बार फोन किया, लेकिन दीपमाला ने फोन रिसीव नहीं किया. अमित कुमार दिल्ली के आईटीओ पर स्थित चीफ कमिश्नर एक्साइज एंड सर्विस टैक्स कार्यालय में इंसपेक्टर थे. इस से पहले उन की पोस्टिंग दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर थी. वहां से 4-5 महीने पहले ही उन का कमिश्नर औफिस में ट्रांसफर हुआ था. वह अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ उत्तमनगर के मोहनगार्डन  के जे ब्लौक के एक फ्लैट में किराए पर रह रहे थे. उन की गृहस्थी हंसीखुशी के साथ चल रही थी.

अमित के एक जानकार दीपक अरोड़ा थे, जो उसी बिल्डिंग में तीसरी मंजिल पर रहते थे. वह उन्हीं के घर जा कर बैठ गए. उन्होंने दीपक से अपनी पत्नी और बच्चों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. थोड़ी देर में दीपमाला घर लौट आएगी, यह सोच कर अमित कुमार  काफी देर तक  दीपक अरोड़ा और उन की पत्नी से बातें करते रहे. बीचबीच में वह पत्नी को फोन भी मिलाते रहे, लेकिन उन की बात नहीं हो पाई.  वह यह सोच कर परेशान हो रहे थे कि आखिर दीपा ऐसी कौन सी जगह गई है कि फोन तक रिसीव नहीं कर रही है. वह वहां बैठे जरूर थे, लेकिन उन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

हालांकि दीपक अरोड़ा उन्हें बारबार समझाने की कोशिश कर रहे थे कि चिंता न करें, वह थोड़ी बहुत देर में आ जाएंगी. मगर उन के दिल को तसल्ली नहीं हो रही थी. दीपक के घर एक घंटे तक इंतजार करने के बाद दीपक फिर अपने फलैट के दरवाजे पर आ गए. उन्होंने एक बार फिर से पत्नी का फोन मिलाया. इस बार भी उन्हें निराशा ही मिली. अमित को औफिस से लौटे हुए एक घंटे से ज्यादा हो चुका था. अगर दीपमाला बाजार गई होती तो उसे लौट आना चाहिए था. जब अंधेरा घिरने लगा तो अमित का धैर्य जवाब देने लगा. वह अपने फोन की टौर्च जला कर दरवाजे की जाली से कमरे में रौशनी डालते हुए आंख लगा कर कमरे में झांकने लगे.

टौर्च की रौशनी कमरे में अंदर तक पहुंच रही थी, क्योंकि मेन गेट का लकड़ी का दरवाजा खुला था. इस के अलावा अन्य कमरों के दरवाजे भी खुले दिखे. यह देख कर अमित चौंके, क्योंकि दीपा जब भी कहीं जाती थी, लकड़ी और जाली के दोनों दरवाजे बंद कर के जाती थी. ऐसे में अमित की परेशानी बढ़नी स्वभाविक थी. लेकिन समस्या यह थी कि  दरवाजे पर ताला लगा हुआ था और वह अंदर नहीं जा सकते थे. फ्लैट के पीछे वाली साइड बालकनी थी. बालकनी में पड़ोसी के फलैट  से जाया जा सकता था. अमित को परेशान देख कर उन के पड़ोसी भी आ गए थे, अमित का दिल नहीं माना तो वह पड़ोसी के फलैट से हो कर अपने फलैट की बालकनी में पहुंच गए.

फलैट में अंधेरा था. मोबाइल टौर्च की मदद से वह लाइटें जलाने के  लिए स्विच बोर्ड के पास जा रहे थे कि तभी उन्हें बाथरूम के बाहर खून के निशान दिखाई दिए. घर में खून देखकर वह चौंक गए. किचन के साथ बाथरूम था. उस बाथरूम के बराबर में एक बैडरूम था. इस के अलावा एक और बैडरूम था, जिस में बाथरूम अटैच्ड था. इस बैडरूम की अलग से एक लौबी थी. घर में खून कहां से आया, जानने के लिए अमित ने बाथरूम की लाइट जलाई. लाइट जलते ही उन की चीख निकल गई, क्योंकि वहां उन के 9 वर्षीय बेटे सक्षम की लाश पड़ी थी. उस के पास ही उन की 7 साल की बेटी शैली की भी लाश थी. दोनों के गले कटे हुए थे. पूरे बाथरूम में खून ही खून फैला हुआ था.

अपने दोनों बच्चों की यह दशा देख कर अमित जोरजोर से रोने लगे. फ्लैट के अंदर अमित के चीखने और रोने की आवाज सुन कर दरवाजे के बाहर खड़े पड़ोसी समझ गए कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. झांक कर उन्होंने अमित से रोने की वजह पूछी तो अमित ने रोतेरोते बताया कि वह बरबाद हो गए, किसी ने उस के दोनों बच्चों को मार डाला है. अमित की बात सुन कर लोग दंग रह गए. वह भी फ्लैट में घुसना चाहते थे, लेकिन दरवाजे पर ताला लगा था. आपस में बात कर के लोगों ने वह ताला तोड़ना शुरू कर दिया. एकदो लोग उसी तरह पड़ोसी के फलैट से बालकनी में चले गए, जैसे अमित गए थे.

उधर अमित पत्नी को तलाशने के लिए एकएक कमरा देखने लगे. जब अटैच्ड बाथरूम वाले कमरे में पहुंचे तो वह एक बार फिर जोरों से चीखे, क्योंकि उस कमरे में बिछे फोल्डिंग पलंग पर उनकी पत्नी दीपमाला उर्फ दीपा की लाश पड़ी थी. दीपा का भी गला कटा हुआ था. उन के पैर पलंग से लटके हुए थे और एक पैर फर्श को छू रहा था. उन का कुर्ता वक्षों तक फटा हुआ था. अमित ने रोतेरोते पत्नी के कपड़े संभाले. तब तक लोगों ने दरवाजे का ताला तोड़ दिया था. वे सब अंदर पहुंचे तो अंदर 3-3 लाशें देख कर हैरान रह गए.

अमित का रोरो कर बुरा हाल था. कुछ लोग उन्हें दिलासा देने लगे. लेकिन यह संभव नहीं था, क्योंकि उन की बसीबसाई गृहस्थी बरबाद हो गई थी. पता नहीं उन से किस ने दुश्मनी निकाली थी. घटना के समय अमित अपने औफिस में थे, इसलिए वह बच गए थे. अगर वह भी घर पर होेते तो शायद जिंदा नहीं बच पाते. इसी दौरान किसी ने इस तिहरे हत्याकांड की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी थी. मोहनगार्डन इलाका पश्चिमी दिल्ली के उत्तमनगर थाने के अंतर्गत आता था. इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना थाना उत्तमनगर को दे दी गई. थोड़ी देर में इस तिहरे हत्याकांड की खबर पूरे मोहनगार्डन इलाके में फैल गई. रात होने के बावजूद तमाम लोग अमित कुमार के फ्लैट के पास जुटने लगे.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी भगवान सिंह, एसआई गोविंद सिंह, दीपक कुमार, कमल आदि के साथ रामा रोड पर स्थित मोहनगार्डन के जे ब्लौक में पहुंच गए. वहां काफी संख्या में लोग खड़े थे. भगवान सिंह अपनी टीम के साथ अमित के फ्लैट में पहुंचे. उन्होंने सब से पहले वह जगह देखी, जहां लाशें पड़ी थीं. यह बात पहली जून, 2015 की है. एक ही परिवार के 3 लोगों की हत्या पर थानाप्रभारी भी हैरत में रह गए. उन्होंने इस की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दी, साथ ही उन्होंने घटनास्थल की जांच होने तक अमित के अलावा सभी लोगों को फ्लैट से बाहर जाने के लिए कह दिया. मामला बड़ा था, इसलिए ज्वांइट सीपी दीपेंद्र पाठक, डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार, एडिशनल डीसीपी मोनिका भारद्वाज, एसीपी ओमवती मलिक भी घटनास्थल पर पहुंच गई.

मामले की गंभीरता को देखते हुए डीसीपी ने सीबीआई की सीएफएसएल टीम, एफएसएल टीम, क्राइम इनवैस्टिगेशन टीम को भी बुला लिया. सभी जांच टीमों ने घटनास्थल से जरूरी सबूत जुटाए. उन का काम निपटने के बाद पुलिस अधिकारियों ने पूरे फ्लैट का बारीकी से निरीक्षण किया. इस से पता चला कि दीपमाला उर्फ दीपा और उन के दोनों बच्चों की हत्या किसी तेज धार वाले हथियार से की गई थी. उन तीनों की गरदन एक ही तरह से काटी गई थी. इस से यही अनुमान लगाया गया कि तीनों का हत्यारा एक ही रहा होगा. जिस कमरे में दीपा की लाश पलंग पर पड़ी थी, उस में एक अलमारी भी रखी थी. जिस पलंग पर लाश पड़ी थी, उस पर कुछ कपड़े भी पड़े थे. उन कपड़ों पर भी खून के छींटे पड़े थे.

दीपा के फटे कपड़े और खुले बालों से लग रहा था कि उन्होंने हत्यारे का काफी विरोध किया था. उन की उंगलियों पर भी जख्म था. बाथरूम में 2 बच्चों का गला काटा गया था, वहां पूरे फर्श  पर खून फैला हुआ था. दोनों भाईबहनों की लाशें पासपास ही पड़ी थीं. सक्षम के दाएं  हाथ पर भी तेज धार हथियार की चोट दिख रही थी. बाथरूम के बाहर खून से सने पैरों के निशान थे. जिन की डाइरेक्शन बाथरूम से बाहर आने की थी. पुलिस और एक्सपर्ट टीम यह पता लगाने में जुट गई कि हत्यारे ने सब से पहले किसे मारा. दरअसल बाथरूम से बाहर खून से सने पैरों के निशानों से लग रहा था कि हत्यारे ने पहले बाथरूम में ले जा कर दोनों बच्चों का कत्ल किया होगा. संभावना थी कि उस ने यह सब मां के सामने ही किया होगा. उसी दौरान वह हत्यारे से भिड़ गई होंगी.

ड्राइंगरूम में चाय के 2 खाली कप भी रखे थे. जांच के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची की हत्यारा चाहे जो भी रहा होगा, वह कोई परिचित ही होगा. क्योंकि उस की फ्लैट में फ्रेंडली एंट्री हुई थी. वह पहले भी इस फ्लैट में आताजाता रहा होगा. टेबल पर रखे खाली कपों से पता चल रहा था कि दीपा ने उसे चाय पिलाई थी. जिस वक्त पुलिस जांच कर रही थी, उसी समय अमित का भाई जो नोएडा की किसी कंपनी में सीए है, वह भी अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंच गए. पुलिस ने उन से कुछ पूछताछ करनी चाही, लेकिन वह इतने दुखी थे कि कुछ नहीं बोले.

पुलिस अधिकारियों ने अमित से प्रारंभिक पूछताछ की तो उन्होंने पूरी कहानी बता दी. पुलिस ने उन से उन सभी लोगों के नामपते मालूम किए, जिन का उन के फ्लैट में आनाजाना था. हालांकि अमित भी पुलिस के शक के घेरे में थे, लेकिन उस समय पुलिस ने उन से ज्यादा पूछताछ करनी जरूरी नहीं समझी. पुलिस ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि किसी ने अमित के फ्लैट से रोने या चीखने की आवाज नहीं सुनी थी. पुलिस को यह भी पता चला कि अमित का 9 वर्षीय बेटा सक्षम और 7 वर्षीय बेटी शैली शाम को अन्य बच्चों के साथ नीचे जा कर खेलते थे. उस दिन भी वह शाम 5 बजे तक बच्चों के साथ खेले थे. इस से पुलिस ने यही अंदाजा लगाया कि वारदात शाम 5 बजे के बाद हुई थी.

दीपा के दोनों फोन कमरे में ही मिले थे. इस के अलावा कमरे का सारा सामान अपनी अपनी जगह पर था. इससे यही लगा कि हत्यारे का मकसद फ्लैट में लूटपाट करना नहीं था, बल्कि वह सिर्फ हत्या करने के लिए आया था और अपना काम कर के चला गया. दीपा के साथ सैक्सुअल अटैक जैसी आशंका भी नहीं दिखाई दी थी. घटनास्थल की प्रारंभिक काररवाई करने के बाद पुलिस ने तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल भिजवा दिया और अमित की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. केस की जांच थानाप्रभारी भगवान सिंह ने अपने हाथ में ले ली.

अगले दिन सहारनपुर से दीपा के मांबाप भी दिल्ली आ गए. पुलिस ने उन से पूछताछ  की तो उन्होंने बताया कि दीपा अपने पति के साथ हंसीखुशी से रह रही थी. उसे पति से कोई शिकायत नहीं थी. 3 जून को वह बच्चों को ले कर मायके आती, मगर उस से पहले ही यह सब हो गया. अमित को उन के सासससुर ने भले ही क्लीन चिट दे दी थी, पर पुलिस को अब भी उन पर शक था. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने तीनों शव घर वालों के हवाले कर दिए. तीनों लाशों को उन के घर सहारनपुर ले जाया गया. डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार ने इस तिहरे हत्याकांड को सुलझाने को 2 पुलिस टीमें बनाईं, पहली टीम विकासपुरी क्षेत्र की एसीपी ओमवती मलिक के नेतृत्व में बनी, जिस में थानाप्रभारी भगवान सिंह, एसआई गोविंद सिंह, दीपक कुमार, हेडकांस्टेबल महावीर सिंह, अजीत सिंह, कांस्टेबल हरीश कुमार और रामकुमार आदि को शामिल किया गया.

दूसरी पुलिस टीम स्पेशल स्टाफ के इंसपेक्टर सुरेंद्र राठी के नेतृत्व में बनी, जिस में एसआई ईश्वर सिंह, चरण सिंह आदि तेजतर्रार पुलिस अफसरों को शामिल किया गया. इस टीम को निर्देशित करने का दायित्व एसीपी औपरेशन दिनेश तिवारी का था. पुलिस को पहला शक आबकारी इंसपेक्टर अमित कुमार पर ही था. इस संदेह को दूर करने के लिए पुलिस ने अमित के फोन की काल डिटेल्स निकलवाईं तो घटना वाले दिन उन के फोन की लोकेशन औफिस के समय तक आईटीओ इलाके में ही मिली. इससे संतुष्टी नहीं हुई तो जांच टीम अमित की गैरमौजूदगी में उनके औफिस पहुंच गई. औफिस में काम करने वालों ने बताया कि पहली जून को अमित सुबह से शाम तक औफिस में ही थे.

अमित पत्नी व बच्चों के अंतिम संस्कार के लिए सहारनपुर गए हुए थे. इस बीच पुलिस ने दीपा के दोनों फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा ली थी. अमित के दिल्ली लौटने पर पुलिस ने उन से पत्नि व बच्चों की हत्या की बाबत पूछताछ की तो वह खुद को निर्दोष बताते रहे. थानाप्रभारी भगवान सिंह ने जब उन से पूछा कि उन की किसी से कोई रंजिश या दुश्मनी तो नहीं है? यह सुन कर अमित कुछ सोचने लगे, फिर कुछ देर बाद बोले, ‘‘हमारी किसी से दुश्मनी तो नहीं है, लेकिन हमारा छोटा साढू़ दीपक हम लोगों से खुश नहीं था. दूसरे वह पत्नी और बच्चों के अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखाई दिया.’’

अमित ने यह भी बताया कि दीपा के मायके वालों को दीपक जब अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखा तो उन्होंने उस के घर जा कर पूछताछ की. उस के घर वालों ने बताया कि वह पहली जून को दिल्ली गया था और वहां से रात पौने 12 बजे घर लौटा था. उस समय दीपक दूसरे कमरे में था. दीपा के मायके वालों ने जब दीपक को बुला कर पूछताछ की तो वह इस बात का जवाब नहीं दे पाया कि वह दिल्ली क्यों गया था. वह दिल्ली जाने की बात से साफ नकारता रहा. तब दीपा के मायके वालों ने उस से कह दिया कि वह कहीं नहीं जाए, क्योंकि दिल्ली पुलिस कभी भी उस से पूछताछ करने के लिए आ सकती है.

उन लोगों के जाने के थोड़ी देर बाद दीपक भी अपने घर से निकल गया. दीपक भी सहारनपुर में रहता था. इस से दीपा की छोटी बहन मधु की शादी हुई थी. 5 जून को दीपक की तलाश में एक पुलिस टीम सहारनपुर गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. उसे ढूंढने के लिए यह टीम सहारनपुर में ही डेरा डाले रही. अगली सुबह यानी 6 जून को दीपक के घर सहारनपुर के ही थाना कुतुबशेर से फोन आया. बताया गया कि अंबाला रेलवे लाइन पर बड़ी नहर के पास दीपक नाम के एक व्यक्ति की लाश मिली है. उस की जेब से जो परची मिली है, उसी पर एक फोन नंबर लिखा था, उसी नंबर पर काल की गई थी.

यह खबर मिलते ही दीपक के घर वाले रोतेबिलखते थाना कुतुबशेर पहुंच गए. वहां से पुलिस उन्हें उस जगह ले गई, जहां रेलवे लाइन के किनारे एक युवक की लाश पड़ी थी. उन लोगों ने उस की शिनाख्त दीपक के रूप में की. लाश का सिर ही क्षतिग्रस्त था. इससे यह पता लगाना मुश्किल था कि उस ने आत्महत्या की थी या फिर उस की साजिशन हत्या कर के लाश को वहां डाला गया था. बहरहाल थाना कुतुबशेर पुलिस ने दीपक की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. मृतका दीपा के मायके वालों को इस बात का गहरा सदमा पहुंचा. पहली जून को बड़ी बेटी दीपा और उस के दोनों बच्चों को किसी ने मार दिया. इस घटना को अभी हफ्ता भी नहीं हुआ था कि छोटी बेटी मधु भी 25 साल की उम्र में विधवा हो गई थी.

सहारनपुर में मौजूद दिल्ली पुलिस की टीम को जब यह बात पता चली कि जिस दीपक की उन्हें तलाश थी, उस की मौत हो गई है तो टीम को भी निराशा हुई. वह थाना कुतुबशेर पहुंच गई और थानाप्रभारी से बातचीत कर के दिल्ली लौट आई. डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार को जब दीपक की मौत की जानकारी मिली तो उन्हें भी लगा कि कहीं उसे किसी साजिश के तहत तो नहीं मार दिया गया. क्योंकि सामने ऐसा कोई क्लू नहीं था, जिस पर काम कर के तफतीश आगे बढ़ाई जा सकती.

डीसीपी ने पुलिस टीम को मृतक दीपक के फोन की काल डिटेल्स खंगालने के  निर्देश दिए. आदेश मिलते ही पुलिस ने दीपक के फोन की काल डिटेल्स निकलवाईं. उस में पहली जून को उस के फोन की लोकेशन दिल्ली की नहीं निकली. जिन लोगों से उस की फोन पर आखिरी मर्तबा बात हुई थी. पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. वे थे राजेश कुमार और गुलशन. दोनों ही सहारनपुर के रहने वाले थे. पुलिस ने दोनों से दीपा ओर उस के दोनों बच्चों की हत्या और दीपक की रेलवे ट्रैक पर मिली लाश के बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि दीपक उन का दोस्त था, लेकिन इन चारों की मौत के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता.

उन दोनों की बातों से पुलिस को लग रहा था कि ये लोग सच्चाई छिपाने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने दीपा और उस के दोनों बच्चों की हत्या की पूरी कहानी पुलिस के सामने बयां कर दी. सेंट्रल एक्साइज एंड सर्विस टैक्स इंसपेक्टर अमित कुमार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के रहने वाले थे. करीब 12 साल पहले उन की शादी सहारनपुर के दूसरे मोहल्ले में रहने वाली दीपमाला उर्फ दीपा से हुई थी. दीपा भी खूबसूरत और पढ़ीलिखी लड़की थी. कालांतर में दीपा एक बेटे और एक बेटी की मां बनीं.

अमित और दीपा अपने बच्चों की परवरिश पर ध्यान देने लगे. अमित सरकारी अफसर थे. उन के यहां किसी भी चीज का अभाव नहीं था. सुखसुविधाओं के बीच बच्चों की परवरिश हो रही थी. उन्होंने मोहनगार्डन स्थित एक अच्छे स्कूल में उन का दाखिला भी करा दिया था. अमित दिल्ली के आइजीआई एयरपोर्ट पर तैनात थे. उन्होंने पश्चिमी दिल्ली के उत्तमनगर स्थित मोहनगार्डन के जे ब्लौक में एक फ्लैट किराए पर ले रखा था. दीपा हाउस वाइफ थीं. वह बच्चों पर पूरा ध्यान देती थीं. उन का फ्लैट दूसरी मंजिल पर था. शाम को वह बच्चों को पार्क में ले जाती थीं. दीपा एक व्यावाहारिक महिला थीं, इसलिए उस ब्लौक में रहने वाली कई महिलाओं से उन की दोस्ती हो गई थी. कुल मिला कर उन की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी.

दीपा से 10 साल छोटी उन की बहन मधु की शादी सहारनपुर के ही रहने वाले दीपक से हुई थी. दीपक एक जूता फैक्ट्री में काम करता था. इसके खिलाफ कुतुबशेर थाने में कई मामले दर्ज थे. जिसकी वजह से उसे 2014 में जिलाबदर कर दिया गया था. शादीशुदा होते हुए भी उस के संबंध दूसरे मोहल्ले की रहने वाली विमला से थे. एक बार मधु ने दीपक और विमला को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. उस वक्त दीपक ने पत्नि से माफी मांगी तो उसने उसे माफ कर दिया था. लेकिन दीपक ने विमला का साथ नहीं छोड़ा. वह उस से मिलता रहा.

मधु ने इस की शिकायत अपने मांबाप और बहन दीपा से की. सभी ने दीपक को समझाया, पर दीपक पर विमला के इश्क का ऐसा भूत सवार था कि वह विमला को नहीं भुला सका. इसी स्थिति के चलते एक दिन अमित कुमार और दीपा ने सहारनपुर पहुंच कर दीपक को अन्य रिश्तेदारों के सामने चेतावनी दी कि अगर वह नहीं माना तो मधु की तरफ से उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी जाएगी. रिश्तेदारों के सामने खुद की बेइज्जती दीपक को बुरी लगी. इस के बाद वह दीपा और उस के पति से खुन्नस रखने लगा. पति के अच्छे पद पर होने की वजह से दीपा बनठन कर रहती थी. नएनए डिजाइन के गहने पहनती थी. जबकि दीपक की तनख्वाह मामूली थी. वह जैसेतैसे घर चला रहा था. उसे अमित और दीपा से ईर्ष्या थी. वह उन्हें सबक सिखाना चाहता था.

जिस जूता फैक्ट्री में दीपक नौकरी करता था, उसी में उस के 2 दोस्त राजेश और गुलशन भी नौकरी करते थे. वे भी सहारनपुर में ही रहते थे. इन से दीपक की ऐसी दोस्ती थी कि वह उन्हें हर बात बता देता था. उस ने अपनी बेइज्जती की बात भी उन दोनों को बताई. उस ने उन से कहा कि दीपा के पास बहुत पैसा है और गहने भी हैं. अगर उसे उस के फ्लैट में मार कर पैसा और ज्वैलरी लूट ली जाए तो इस से एक पंथ दो काज हो जाएंगे. लोग यही सोचेंगे कि किसी ने लूट का विरोध करने पर हत्या की है. राजेश और गुलशन ने यह काम करने के लिए हामी भर दी.

लेकिन योजना को अंजाम देने के लिए दीपक राजेश और गुलशन को बिना बताए पहली जून, 2015 को दिल्ली आ गया. उस के मोबाइल की लोकेशन दिल्ली न आए, इसलिए उस ने अपने फोन को स्विच्ड औफ कर दिया. वह जानता था कि उस के साढू ड्यूटी पर होंगे, जिस से वह अपना काम आसानी से निपटा देगा. शाम 4 बजे वह अमित के फ्लैट पर पहुंचा. घंटी बजने पर दीपा ने दरवाजा खोला. ड्राइंगरूम में बिठा  कर वह उस से बातें कर ने लगी. उन्होंने उसे चाय बना कर पिलाई. दीपक की योजना से अनभिज्ञ दीपा उस दिन भी उसे समझा रही थीं. उस समय उन का 9 वर्षीय बेटा सक्षम और 7 वर्षीय बेटी वैष्णवी उर्फ शैली नीचे बच्चों के साथ खेल रहे थे.

दीपा से बातचीत करते समय दीपक मौके की तलाश में था. जैसे ही दीपा ड्राइंगरूम से उठ कर किचन में गइर्ं तो वह भी उन के पीछे पीछे वहां पहुंच गया. तभी उस ने दीपा के गले में पड़े दुपट्टे को कसना शुरू कर दिया. दीपा भी हट्टीकट्टी थीं. अचानक गला कसने से दीपा घबरा गई. उन्होंने पूरी ताकत लगाते हुए अपनी सुरक्षा करने की कोशिश की. उस समय उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था. शोर मचाते हुए वह अपनी जान बचाने के लिए कमरे की तरफ भागीं.

इस से दीपक घबरा गया. इसलिए वह भी उन के पीछेपीछे कमरे में पहुंच गया और कोई भारी चीज उनक के सिर पर मारी, जिस से वह फोल्डिंग पलंग पर गिर गईं. उन के गिरते ही उस ने साथ लाए चाकू से उन का गला रेत दिया. गला कटते ही खून का फव्वारा फूट पड़ा. जिस से पलंग पर रखे कपड़ों पर भी छींटे पड़ गए. कुछ देर छपपटाने के बाद दीपा का शरीर शांत हो गया. उन के मरने के बाद उस ने उस की अंगूठी और कानों की बालियां निकाल लीं. नीचे शैली और सक्षम अन्य बच्चों के साथ खेल रहे थे, खेलतेखेलते शैली के हाथ में किसी चीज से खरोंच लग गई. उस खरोंच को अपनी मम्मी को दिखाने के लिए वह रोती हुई ऊपर आई. कमरे का दरवाजा बंद था.

शैली ने जैसे ही घंटी बजाई, दीपक डर गया कि पता नहीं कौन आया है. उस ने आने वाले से निपटने की सोच ली. दीपक ने दरवाजा खोला तो बच्ची को देख कर उसे तसल्ली हुई. शैली दीपक को जानती थी. मौसा को देखते ही उसने मुसकराते हुए नमस्ते किया और फिर वह उस से पूछने लगी, ‘‘मौसाजी मम्मी कहां हैं?’’

दीपक ने उस से कहा कि वह बाथरूम में है, वह शैली को हाथ पकड़ कर बाथरूम में ले गया. उस बच्ची को क्या पता था कि उस के साथ क्या होने वाला है. बाथरूम में जाते ही उस ने शैली का गला काट दिया. इसी दौरान अचानक मौसम बदल गया. आंधी आने की वजह से नीचे खेल रहे सभी बच्चे अपनेअपने घर चले गए. सक्षम भी ऊपर अपने घर आ गया. दरवाजा बंद होने पर उस ने घंटी बजाई तो दीपक फिर घबरा गया. उसने सोचा कि इस बार शायद अमित आ गया है. उस ने तय कर लिया था कि इस दौरान जो भी आएगा, वह उस का काम तमाम कर देगा. उस ने दूसरी बार दरवाजा खोला तो सामने सक्षम था.

मौसा को देखते ही सक्षम ने उस के पैर छुए. उस का आदर भाव देख कर दीपक उसे मारना नहीं चाहता था, लेकिन उस को जिंदा छोड़ने पर उस के फंसने की संभावना थी. इसलिए उसे ठिकाने लगाने के लिए वह सक्षम को भी बाथरूम में ले गया. वहां छोटी बहन की लाश देख कर सक्षम घबरा गया. इस बारे में वह अपने मौसा से कुछ पूछने की हिम्मत जुटा पाता, इस से पहले ही दीपक ने उस का भी गला काट दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद उस का भी शरीर ठंडा हो गया. 3 हत्याएं करने के बाद दीपक ने बाथरूम में ही खून से सने हाथ धोए और जल्दबाजी में केवल जाली वाले दरवाजे पर ताला लगा कर चला गया.

रात करीब 12 बजे वह अपने घर पहुंचा. अगले दिन उसने फोन कर के अपने दोस्तों राजेश और गुलशन को एक जगह बुला लिया और दीपा व उस के दोनों बच्चों की हत्या करने की पूरी बात बता दी. उसने दीपा की अंगूठी और बालियां उन दोनों को देते हुए कहा कि यह बात किसी से न बताएं. उधर दीपा और उस के बच्चों की हत्या की बात सुन कर दीपा के मायके वाले और दीपक के मातापिता दिल्ली पहुंच गए, लेकिन दीपक का साढू़ के घर नहीं गया. न ही वह उन तीनों के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ. इस से दीपा के मातपिता को उस पर शक हो गया. वे दीपक से पूछने उस के घर भी गए. इस के बाद दीपक को लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा. शायद इसीलिए उसने रेलवे ट्रैक पर जा कर ट्रेन के आगे आत्महत्या कर ली.

पुलिस ने राजेश और गुलशन को भादंवि की धारा 120 बी के तहत गिरफ्तार कर के 9 जून को तीस हजारी न्यायालय में ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 3 दिनों के  पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उन की निशानदेही पर उन से दीपक द्वारा दी गई दीपा की ज्वैलरी बरामद की गई. इस के बाद उन्हें 12 जून को पुन: न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. Domestic Dispute

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, कथा में विमला परिवर्तित नाम है

Hindi Stories: अंजानों पर विश्वास का नतीजा

Hindi Stories: संजय गुप्ता सोनू की फितरत समझ नहीं पाए और उस पर विश्वास कर के उस का पुलिस वेरीफिकेशन भी नहीं कराया. शातिर सोनू ने इसी का फायदा उठा कर ऐसा क्या कर डाला कि अब संजय गुप्ता को पछतावा हो रहा है.

उत्तर प्रदेश का नोएडा शहर देश की राजधानी दिल्ली की सीमा से सटे तेजी से विकसित व्यावसायिक नगर के रूप में जाना जाता है. यह शहर एशिया के बड़े औद्योगिक उपनगरों में से एक है. यहां की अधिकांश जमीनों पर बड़ीबड़ी इमारतें बन गईं हैं. विकास की पगडंडियों के बीच यहां रहने वालों की अपनीअपनी जिंदगियां हैं. सेक्टर-41 की कोठी नंबर बी-169 में रहने वाले संजय गुप्ता की पत्नी श्रीमती राखी गुप्ता अच्छी चित्रकार थीं. उन्होंने सैंकड़ों पेंटिंगें बनाई थीं. यह उन का पेशा नहीं, बल्कि शौक था, जिसे पूरा करने के लिए वह कैनवास पर जिंदगी के रंगों को अक्सर उकेरा करती थीं. अभिव्यक्ति के अपने मायने होते हैं, उसे प्रदर्शित करने का सभी का अपना अलगअलग अंदाज होता है.

उस दिन भी सफेद कैनवास पर अपनी अंगुलियों से ब्रश के जरिए जो चित्र उन्होंने उकेरा था, वह एक खुशहाल परिवार का था, जिस में पतिपत्नी और उन के 2 बच्चे प्रसन्न मुद्रा में नजर आ रहे थे. सभी की बांहें एकदूसरे के गले में थीं. ब्रश को किनारे रख कर राखी पेंटिंग को निहारने लगीं. काफी देर तक अपलक निहारने के बाद उन की आंखों में अचानक आंसू छलक आए. आंसुओं ने लुढ़क कर अपना सफर शुरू किया तो राखी ने साड़ी के पल्लू से उन के वजूद को मिटाने की कोशिश की. सोफे पर बैठे संजय की नजर पत्नी पर गई तो नजदीक जा कर उन के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘‘तुम बारबार परेशान क्यों हो जाती हो?’’

‘‘मेरा दुख तुम जानते हो, फिर भी…’’

‘‘हम कोशिश तो कर रहे हैं. इस तरह हिम्मत नहीं हारते, एक दिन हमारा बेटा अवश्य ठीक हो जाएगा.’’

‘‘पता नहीं कैसा संयोग है. मेरा फूल सा बेटा बिस्तर पर पड़ा है. इंजीनियर बनना था, कितने सपने थे हमारे. काश, इस की जगह मेरी यह हालत हो जाती.’’

‘‘मैं तुम्हारा दर्द समझता हूं राखी. लेकिन इस तरह परेशान होने से भी तो काम नहीं चलेगा.’’ संजय ने कहा.

‘‘फिर भी मैं ने कभी नहीं सोचा था कि हमारा होनहार बेटा इस हाल में होगा. मैं मां हूं, इस का दर्द महसूस करती हूं. वह सब जानतासमझता है, लेकिन अपनी वेदना व्यक्त करने में नाकाम है. जब उस की आंखों में छटपटाती बेबसी देखती हूं तो तड़प कर रह जाती हूं. हर पल इसी के बारे में सोचती रहती हूं. मुझे जिंदगी में कुछ नहीं चाहिए, बस मेरा बेटा ठीक हो जाए.’’ कहने के साथ ही राखी फफक कर रो पड़ीं.

‘‘भरोसा रखो, एक दिन सब ठीक हो जाएगा.’’ संजय ने प्यार से समझाया तो राखी ने हर बार की तरह उस दिन भी सुखद उम्मीदों के साथ अपने दिल को समझाने की नाकाम कोशिश की.

यह एक कड़वी हकीकत है कि जिंदगी कई बार इंसान के साथ बहुत सख्ती से पेश आती है. बेबसी तब तूफान की तरह और भी बढ़ जाती है, जब उसे संभालने की सभी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं. इस दर्द को वह शख्स बखूबी महसूस कर सकता है, जो इस से रूबरू हुआ हो. संजय गुप्ता और उन की पत्नी भी पलपल ऐसी पीड़ा से गुजर रहे थे, जहां उन की कोशिशों को ग्रहण सा लग गया था. संजय गुप्ता रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े थे. वह मूलरूप से उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रहने वाले थे, लेकिन वर्षों पहले वह वहां से चले आए थे. वह अहमदाबाद में इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन (इसरो) में वैज्ञानिक थे, परंतु कई सालों पहले नौकरी छोड़ कर वह नोएडा में प्रौपर्टी का काम करने लगे थे.

बच्चों को उन्होंने शुरू से ही साथ रखा था. उन के परिवार में पत्नी राखी के अलावा 2 बच्चे थे, जिन में बड़ा बेटा जितार्थ और उस से छोटी बेटी स्मिति. दोनों ही बच्चे पढ़ने में होनहार थे. स्मिति दिल्ली के एक फैशन इंस्टीट्यूट में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी, जबकि जितार्थ मणिपाल यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. संजय के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. एक साल पहले तक उन की जिंदगी बहुत खुशहाल थी. किसी की हंसतीखेलती जिंदगी में कब गमों का दरिया बहने लगे, इस बात को कोई नहीं जानता.

3 मार्च, 2013 को गुप्ता परिवार में भी ऐसा ही एक दरिया बह निकला. संजय को सूचना मिली कि उन का बेटा गोवा में एक रोड ऐक्सीडेंट का शिकार हो गया है. संजय वहां पहुंचे. जितार्थ को बे्रन हेमरेज हुआ था. लंबे उपचार के बाद वह हेमरेज से उबरा जरूर, लेकिन उस के चलनेफिरने, बोलने की शक्ति जाती रही.  जितार्थ स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया. वह कब तक ऐसा ही रहेगा, इस का जवाब किसी के पास नहीं था. संजय और उन की पत्नी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. संजय बेटे को नोएडा ले आए और बेहतर से बेहतर इलाज कराया. लेकिन उस की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ.

लिहाजा डाक्टरों की सलाह पर वह उसे घर ले आए. घर के एक कमरे में उस के लिए बैड लगवा दिया गया. वह कोमा जैसी स्थिति में था. सभी दैनिक क्रियाएं वह बिस्तर पर ही करता था. बेटे को ले कर संजय भी परेशान थे और राखी भी. बेटा स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया था. उस की देखभाल जरूरी थी, इसलिए संजय ने अक्टूबर, 2014 में उस के लिए नर्सिंग का काम जानने वाले 2 अटेंडैंट रख लिए, क्योंकि 24 घंटे किसी एक अटेंडैंट को घर पर रखा नहीं जा सकता था. दोनों अटेंडैंट की ड्यूटी 12-12 घंटे की हुआ करती थी. सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक अटेंडैंट सोनू जितार्थ की देखभाल करता था तो रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक रहता दूसरा लड़का था. सोनू ने खुद को बदायूं का रहने वाला बताया था. नोएडा में वह मोरना में कहीं किराए पर रहता था.

संजय के पास दौलतशोहरत सब कुछ था, लेकिन बेटे के लिए वह कुछ नहीं कर पा रहे थे. बेटे को ले कर राखी अक्सर परेशान हो जाती थीं. उस दिन भी वह चित्रकारी करतेकरते बेटे के बारे में सोच कर रोने लगी थीं. संजय ने किसी तरह समझा कर उन्हें चुप कराया था. उन का परिवार जिस कोठी में रह रहा था, वह सीमा खन्ना की थी. सीमा खन्ना ग्राउंड फ्लोर पर रहती थीं, जबकि संजय का परिवार पहली मंजिल पर किराए पर रहता था.

बेटे की वजह से राखी पूरे वक्त घर पर ही रहती थीं. वह संवेदनशील महिला थीं. खाली वक्त में वह ऐसे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया करती थीं, जो पैसे दे कर ट्यूशन नहीं पढ़ सकते थे. ये बच्चे 3 से साढ़े 3 बजे के बीच राखी के यहां आते थे. राखी का सोचना था कि शिक्षा जीवन का प्राथमिक आधार है, इसलिए सभी को शिक्षित होना चाहिए. राखी गरीबों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहती थीं. मेल नर्स सोनू के आने के बाद संजय सुबह अपने औफिस चले जाते थे. बेटी स्मिति कालेज चली जाती थी. सुबह घर में एक नौकरानी सुनीता काम करने आती थी. 12 बजे तक वह भी चली जाती थी.

इस के बाद घर में राखी गुप्ता, मेल अटेंडैंट सोनू और बेटा जितार्थ ही रह जाते थे. रोज की लगभग यही दिनचर्या थी. किसी शहर के विकास के बीच अपराध की भी अपनी एक चाल होती है. आम दिनों की भांति 6 अप्रैल, 2015 को भी सेक्टर-41 शांत था. लोगों की आवाजाही और उन के काम जारी थे. राजेंद्र प्रसाद के 2 बच्चे राखी के यहां ट्यूशन पढ़ने आते थे. लगभग 3 बजे बच्चे कोठी की पहली मंजिल पर पहुंचे तो दरवाजा खुला हुआ था. वे रोज आते थे, इसलिए उन्हें लगा कि राखी मैडम दरवाजा बंद करना भूल गई होंगी.

वे अंदर दाखिल हुए तो वहां का नजारा देख कर बुरी तरह डर गए. वे उलटे पांव सीधे अपने घर पहुंचे और उन्होंने वहां जो देखा था, पिता राजेंद्र प्रसाद को बताया. बच्चों की बात से वह हैरान रह गए. राजेंद्र तुरंत संजय के घर पहुंचे और पूरी बात मकान मालकिन सीमा खन्ना और आसपास के लोगों को बताई. आपस में विचारविमर्श कर के कुछ लोग हिम्मत कर के पहली मंजिल पर पहुंचे तो वहां की हालत देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. 45 वर्षीया राखी गुप्ता खून से लथपथ फर्श पर पड़ी थीं. उन के आसपास खून ही खून फैला था. किसी ने उन की नब्ज टटोली तो वह थम चुकी थी. उन का बीमार बेटा जितार्थ भी नीचे पड़ा था. लेकिन वह ठीक था.

सीमा खन्ना ने तुरंत इस मामले की खबर संजय गुप्ता को दी तो वह कुछ ही देर में घर आ गए. राखी की मौत हो चुकी थी. किसी ने उन की गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर नुकीली चीज से प्रहार किए थे. जितार्थ चूंकि बिस्तर से गिर गया था, इसलिए वह दर्द से छटपटा रहा था. उस के सिर में चोट लगी थी. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. इस बीच पुलिस को भी घटना की सूचना दे दी गई थी. सूचना पा कर कोतवाली सेक्टर-39 के थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान तुरंत पुलिस बल के साथ मौके पर आ पहुंचे. मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों को दे दी. सूचना पा कर एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह और एएसपी विजय ढुल भी मौके पर आ पहुंचे थे.

पुलिस ने मौकामुआयना किया तो हत्या की वजह समझ में नहीं आई. लेकिन यह जरूर लगा कि कातिल का मकसद सिर्फ राखी की हत्या करना नहीं था. क्योंकि थोड़ी नकदी और राखी का मोबाइल गायब था लेकिन घर में रखे अन्य लाखों रुपए बच गए थे. हालांकि जिस लौकर में नकदी रखी थी, उसे तोड़ने की कोशिश जरूर की गई थी. राखी पर किसी नुकीली चीज से प्रहार किए गए थे, लेकिन हत्या में प्रयुक्त वह नुकीली चीज मौके से बरामद नहीं हुई थी. पुलिस ने डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम को मौके पर बुलवा लिया था. चौंकाने वाली बात यह थी कि मेल अटेंडैंट सोनू लापता था, जबकि उस समय उसे ड्यूटी पर होना चाहिए था.

पुलिस ने निरीक्षण के बाद पूछताछ शुरू की, ‘‘सब से पहले इस घटना की जानकारी किसे हुई?’’

‘‘मुझे साहब.’’ राजेंद्र प्रसाद ने आगे बढ़ कर कहा.

‘‘कैसे?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में राजेंद्र प्रसाद ने अपने बच्चों के वहां ट्यूशन पढ़ने आने की बात बता दी.

पुलिस ने संजय गुप्ता से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्होंने किसी से भी अपनी दुश्मनी होने से इनकार कर दिया. जितार्थ घटना का चश्मदीद तो था, लेकिन वह कुछ भी बताने लायक नहीं था. हैरानी की बात यह थी कि पड़ोस में भी किसी को घटना के बारे में कुछ पता नहीं चला था. वैसे भी आजकल शहरी जीवनशैली में लोगों की दुनिया अपने तक ही सिमट गई है. संजय गुप्ता के सेक्टर-2 स्थित अपने औफिस चले जाने के बाद घर में कुल 3 लोग ही रह जाते थे. एक राखी गुप्ता, दूसरा उन का 22 वर्षीया बेटा जितार्थ और तीसरा 25 वर्षीय अटेंडैंट सोनू. मकान के जिस हिस्से में संजय गुप्ता का परिवार रहता था, उस में मुख्य दरवाजे पर जाली वाला दरवाजा भी लगा हुआ था.

जाहिर है, अंजान आदमी के लिए दरवाजा नहीं खोला जा सकता था. पुलिस ने सोनू के मोबाइल पर फोन किया तो वह बंद था. इस से उस पर शक हुआ. जबकि संजय यह मानने को तैयार नहीं थे कि सोनू इस तरह हत्या कर सकता है. हत्या के बाद जिस तरह वह गायब था, उसी से संदेह हो रहा था. मकान मालकिन सीमा खन्ना ने पुलिस को बताया कि उन्होंने सोनू को चुपचाप जाते देखा था. उस की तलाश में एक पुलिस टीम मोरना भेजी गई तो उस के मकान मालिक ने बताया कि 1 अप्रैल को वह उन का घर छोड़ कर चला गया था. सवाल यह था कि अगर सोनू ने राखी की हत्या की थी तो इस की वजह क्या थी?

इस बीच पुलिस ने राखी गुप्ता के शव का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और संजय गुप्ता की तहरीर पर सोनू के खिलाफ राखी की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. दिनदहाड़े हुई हत्या की इस घटना से समूचे इलाके में हड़कंप मच गया था. लोग पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाने लगे थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में राखी के शरीर पर नुकीली चीज के 8 घाव पाए गए थे. ये घाव उन के गले, हाथ और कंधे पर थे. ये संभवत: किसी सर्जिकल चीज के थे. मैडिकल ट्रीटमेंट के कुछ सामान जितार्थ के कमरे में रहते थे. हाथों पर घाव पाए जाने से एक बात साफ थी कि राखी ने मरने से पहले संघर्ष किया था. दूसरी ओर गिरने की वजह से जितार्थ के सिर में चोट आई थी. डाक्टरों ने उस का सीटी स्कैन कराया. वह नौर्मल था.

पुलिस का सोनू तक पहुंचना जरूरी था. हैरानी की बात यह थी कि सोनू का कोई स्थाई पता या फोटो गुप्ता परिवार के पास नहीं था. संजय ने पुलिस को बताया कि सोनू का फोटो राखी के मोबाइल में था, जबकि उन के मोबाइल को वह साथ ले गया था. घटना क्यों और कैसे घटी, सोनू ही इस से परदा उठा सकता था. एसएसपी ने एएसपी विजय ढुल के निर्देशन में मामले के खुलासे के लिए 3 पुलिस टीमों को गठन किया. पुलिस ने सोनू के मोबाइल की काल डिटेल्स व लोकेशन निकलवाई. उस की आखिरी लोकेशन सेक्टर-39 की मिली थी. इस के बाद उस का मोबाइल बंद हो गया था.

पुलिस ने सोनू के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटानी शुरू की. पता चला कि संजय ने सोनू को अपने यहां इस के पहले काम करने वाले राजकुमार के माध्यम से नौकरी पर रखा था. पुलिस राजकुमार तक पहुंच गई. राजकुमार से पता चला कि सोनू पहले नोएडा के सेक्टर-40 स्थित एक अस्पताल में 2 साल और एक डाक्टर दंपत्ति के घर करीब एक साल तक काम कर चुका था. उसी बीच उस की उस से मुलाकात हुई थी. इस से ज्यादा उस के बारे में वह भी कुछ नहीं जानता था.

पुलिस ने उस की बताई दोनों जगहों पर जा कर पूछताछ की तो पता चला कि सोनू झगड़ालू स्वभाव का था. एक बार उस ने एक नर्स को जान से मारने की धमकी भी दी थी. हैरानी की बात यह थी कि दोनों ही जगहों पर सोनू का फोटो और पता नहीं मिल सका. इन सभी जगहों पर उसे सोनू शेख या सोनू राघव के नाम से जाना जाता था. यही उस का असली नाम था, यह भी किसी को पता नहीं था. घटना को घटे 2 दिन बीत गए, लेकिन संदिग्ध हत्यारे का कोई सुराग नहीं लग सका. पुलिस ने सोनू के फोटो की तलाश के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का भी सहारा लिया. जिस मोबाइल नंबर का इस्तेमाल सोनू करता था, वह फर्जी आईडी पर लिया गया था. इस से उस का पता मिलने की संभावना भी खत्म हो चुकी थी.

सोनू की जो काल डिटेल्स मिली थी, उस में एक नंबर पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर पर बात की तो वह नंबर कर्नाटक की एक युवती रीतू (परिवर्तित नाम) का था. उस युवती ने बताया कि 2 महीने पहले मिसकाल के जरिए सोनू उस के संपर्क में आया था, तभी से उस से बातें होने लगी थीं. उस के बारे में वह ज्यादा कुछ नहीं जानती. युवती को उस ने अपना नाम सोनू शर्मा बताया था. इलेक्ट्रौनिक सर्विलांस से पुलिस को पता चला कि सोनू ने अपने मोबाइल में नए नंबर का सिम डाल लिया है. उस नंबर की लोकेशन के अनुसार, सोनू नोएडा से दिल्ली होते हुए पश्चिमी बंगाल चला गया था. उस की लोकेशन पुलिस को वहां के मुर्शिदाबाद जिले की मिल रही थी.

उस नंबर से उस ने दिल्ली के एक नंबर पर बात की थी. पुलिस उस नंबर तक पहुंची तो वह नंबर उस की मौसी का निकला. उस से पता चला कि सोनू की मां दिल्ली में ही रहती थी, लेकिन उस ने दूसरा विवाह कर लिया था, इसलिए उस का अपने परिवार से अब कोई ताल्लुक नहीं था. वह लोगों के घरों में साफसफाई का काम करती थी. उस से पुलिस को सोनू के घर का पता मिल गया. वह पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद का रहने वाला था. डीआईजी रमित शर्मा पूरे मामले पर नजर रखे हुए थे. एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह से उन्होंने केस की प्रगति की पूरी जानकारी ली और एक पुलिस टीम पश्चिम बंगाल रवाना करने के आदेश दिए.

एसएसपी ने थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान के नेतृत्व में 9 अप्रैल को एक पुलिस टीम वहां के लिए रवाना कर दी. इस पुलिस टीम में सबइंसपेक्टर पतनीश यादव, आलोक सिंह और कांस्टेबल अशोक यादव आदि शामिल थे. अगले दिन पुलिस मुर्शिदाबाद स्थित सोनू के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और अपने साथ नोएडा ले आई. पुलिस के लिए यकीनन यह बड़ी सफलता थी. नोएडा ला कर पुलिस ने उस से पूछताछ की तो राखी की हत्या की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

सोनू मूलरूप से पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद निवासी जिल्ले का बेटा था. जिल्ले मेहनतमजदूरी किया करता था. कई सालों पहले सोनू नौकरी की तलाश में दिल्ली चला आया. कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद वह नोएडा आ गया और छोटेमोटे काम करने लगा. इस के बाद वह एक अस्पताल में वार्डबौय का काम करने लगा. समय के साथ वह काम सीख गया. कुछ अस्पतालों में नौकरी करने के बाद उस ने एक डाक्टर दंपत्ति के यहां भी नौकरी की. सोनू शातिर दिमाग युवक था. वह मुसलमान था, लेकिन किसी को वह अपना नाम सोनू शर्मा तो किसी को सोनू शेख तो किसी को सोनू राघव बताता था.

अपना असली नामपता वह किसी को नहीं बताता था. इस के पीछे वजह यह थी कि वह रातोरात अमीर बनने के सपने देखा करता था और किसी अच्छे मौके की तलाश में था. वह नोएडा में ही किराए का कमरा ले कर रहता था. सन 2015 में गुप्ता परिवार को जितार्थ के लिए मेल अटेंडैंट की जरूरत पड़ी तो राजकुमार ने सोनू के बारे में बताया. उन्होंने बेटे की देखभाल के लिए सोनू से बात की तो वह तैयार हो गया. इस के बाद वह उन के घर आने लगा. गुप्ता परिवार सोनू को परिवार के सदस्य की तरह मानता था. उसे 9 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन पर रखा गया था, लेकिन 2 महीने में ही संजय ने उस की तनख्वाह बढ़ा कर 11 हजार रुपए कर दी थी.

सोनू होशियार तो था ही. वह जानता था कि सब से पहले हर किसी का विश्वास जीतना चाहिए. इसलिए उस ने बातों और काम से पूरे परिवार का विश्वास जीत लिया. वह ड्यूटी के समय जितार्थ के पास ही रहता था. इस बीच या तो टीवी वह देखता था या राखी से बातें कर लिया करता था. शुरू में तो सोनू मन लगा कर काम करता रहा. लेकिन झूठ और दिखावे की चमक बहुत लंबे समय तक बरकरार नहीं रहती. समय के साथ राखी की समझ में आने लगा कि वह दिखावा ज्यादा करता है, काम कम. संजय सोनू को 11 हजार रुपए अपने बेटे की पूरी तरह से देखभाल के लिए दे रहे थे. धीरेधीरे सोनू देखभाल में लापरवाही करने लगा. इस की भी एक वजह थी. दरअसल सोनू इस काम से परेशान हो गया था. वह अमीर बनने के सपने देखता था, लेकिन सपने पूरे होने की उसे कोई राह नहीं दिख रही थी.

3 महीने पहले सोनू का संपर्क मोबाइल के जरिए गलत नंबर लग जाने से कोलकाता की रहने वाली रीतू से हो गया, जो कर्नाटक में रहती थी. वह उस से बातें करने लगा. वह उस से आधाआधा घंटे मोबाइल पर बातें करता रहता. राखी को उस की यह लापरवाही बहुत अखरती थी. शुरूशुरू में तो उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा, लेकिन धीरेधीरे उन्होंने सोनू को टोकना शुरू कर दिया. उस का किसी ने पुलिस वेरीफिकेशन नहीं कराया था. संजय गुप्ता ने भी यही गलती की. इस बात से सोनू खुश था.

सोनू की लापरवाही से बेटे की जान भी जा सकती थी. एक दिन राखी ने लापरवाही पर सोनू को न सिर्फ जम कर फटकरा, बल्कि उसे थप्पड़ भी मार दिया. सोनू ने आगे से लापरवाही न करने का वादा किया. वह कभी धोखा दे कर भाग न जाए, इस के लिए राखी ने अपने मोबाइल में उस का फोटो खींच लिया. कुछ समय बाद राखी ने महसूस किया कि सोनू लापरवाही के मामले में बदला नहीं है. जब देखो तब वह मोबाइल पर बातें करने में लगा रहता है. जितार्थ को प्रतिदिन दवाइयां व इंजेक्शन देने होते थे. सोनू इस में भी लापरवाही करने लगा था. सोनू की इस लापरवाही पर राखी उसे खरीखोटी सुना कर थप्पड़ जड़ दिया करती थीं. इस पर सोनू खून का घूंट पी कर रह जाता था.

वक्त के साथ सोनू को राखी का डांटना अखरने लगा. थप्पड़ को ले कर उस के मन में नफरत पैदा होने लगी. सोनू शातिर तो था ही, वह राखी को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगा. मन ही मन उस ने सोच लिया कि एक दिन वह राखी के घर को लूट लेगा. इस से उस के थप्पड़ का बदला भी पूरा हो जाएगा और वह मालामाल भी हो जाएगा. सोनू को इस बात का डर नहीं था कि वह पकड़ा जाएगा, क्योंकि उस का रिकौर्ड किसी के पास नहीं था. उस ने अपने मन के गुस्से को जाहिर नहीं होने दिया और आराम से रहता रहा. सोनू का जितार्थ की देखभाल से मन उचट गया था.

वह काम में लापरवाही करने के साथ ही रीतू से मोबाइल पर बातें भी किया करता था. इस पर राखी की सोनू से अकसर नोंकझोंक हो जाया करती थी. सोनू ने लूटने की योजना मन ही मन बना ली थी. इसलिए 1 अप्रैल को उस ने किराए का मकान भी खाली कर दिया. इस के बाद वह उचित मौके की तलाश में रहने लगा. 6 अप्रैल को भी सोनू ने लापरवाही की और मोबाइल पर बातें करने के चक्कर में जितार्थ के गले में कफ निकालने के लिए लगने वाली नली ठीक से नहीं लगाई. इसी बीच राखी कमरे में आ गईं. यह देख कर वह भड़क गईं, ‘‘तुम से कोई भी काम ठीक से नहीं किया जाता?’’

‘‘सौरी मैडम वह…’’ सोनू अपनी बात कह पाता, उस से पहले ही राखी ने उस के गाल पर तमाचा रसीद कर दिया. सोनू पहले ही खार खाए बैठा था. उस दिन वह आगबबूला हो उठा. उस का खून खौल गया. उस ने गालियां देते हुए राखी का हाथ झटक दिया, ‘‘तुम्हारे हाथ बहुत चलते हैं, आज मैं सब से पहले इन का चलना बंद किए देता हूं.’’

कह कर सोनू ने जितार्थ की दवाइयों की ट्रे में रखा सर्जिकल चाकू उठा लिया और राखी की गर्दन पर वार कर दिया. इस अप्रत्याशित हमले से राखी तड़प उठीं. उन्होंने विरोध किया, लेकिन सोनू नौजवान था. उस ने एक के बाद एक राखी पर कई वार कर दिए. राखी नीचे गिर कर तड़पने लगीं. जितार्थ यह सब देख रहा था. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था, लेकिन अंदर ही अंदर घुट रहा था. मां को बचाने के लिए उस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी तो हिलने डुलने से बिस्तर से नीचे गिर गया. सोनू ने इस की परवाह नहीं की. राखी के बचने की कोई गुंजाइश न रहे, उस ने और कई वार कर दिए. राखी की मौत हो गई.

इस के बाद सोनू ने राखी का मोबाइल, घड़ी, डीवीडी व सेफ में रखे करीब 10 हजार रुपए उठा कर एक बैग में रख लिए. सोनू जानता था कि राखी के मोबाइल में उस का फोटो है, इसलिए उस ने उसे भी ले लिया था. उस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू भी अपने पास रख लिया. हत्या के दौरान उस की कमीज पर थोड़ा खून लग गया था. लगभग साढ़े 12 बजे वह वहां से चला गया. उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया और चालू किया तो नया सिमकार्ड उस में डाल लिया. उस रात वह अपने दोस्त के घर रुका. इस से पहले उस ने सर्जिकल चाकू और कमीज को सेक्टर-41 में एक स्थान पर छिपा दिया था.

अगले दिन वह दिल्ली पहुंचा और कालका मेल से कोलकाता होते हुए मुर्शिदाबाद स्थित अपने घर चला गया. सोनू ने सोचा था कि उस का असली नामपता चूंकि किसी के पास नहीं है, इसलिए पुलिस पश्चिम बंगाल तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. वह आराम से रह रहा था कि इसी बीच वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू और खून से सनी कमीज बरामद कर ली थी. पूछताछ और जरूरी कागजी काररवाई कर के पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

गुप्ता परिवार ने सोनू की फितरत को समझने की भूल कर दी. उस का पुलिस वैरीफिकेशन न करा कर भी उन्होंने भूल की. सोनू जैसे लोगों पर विश्वास और गुस्सा दोनों ही खतरनाक साबित हुए. कथा लिखे जाने तक सोनू जेल में था. 28 मई को पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया था. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: ‘मैं आज भी अब्बू की बेटी हूं’ – अंजुम आरा

Hindi Stories: अंजुम आरा देश की दूसरी मुसलिम आईपीएस महिला हैं, जो बड़ी बात है. पढि़ए अंजुम के आईपीएस बनने की कहानी उन्हीं की जुबानी  उस रोज मेरे घर में खुशी का माहौल था. मेरे वालिदैन बहुत खुश थे. कुछ इस तरह जैसे कोई नाविक अपनी कश्ती को उस के मुकाम पर पहुंचा कर खुश होता है. मैं भी बहुत खुश थी. खुशी स्वाभाविक ही थी, क्योंकि मुझे मेरी मेहनत का फल मिल गया था और अब्बूअम्मी को अपनी अच्छी परवरिश का. मेरी सफलता का पता चलने के साथ ही नातेरिश्तेदारों के फोन आने शुरू हो गए थे. आसपास के कई लोग ऐसे भी थे, जिन्हें मेरे बारे में पता चल गया था और वे मुबारकबाद देने के लिए सीधे घर चले आए थे.

यूं तो जिंदगी के सफर में छोटीबड़ी खुशियों की लहरें आतीजाती रहती हैं, लेकिन उस रोज उन लहरों की ऊंचाई काफी ऊंची थी. मेरे अब्बू अयूब शेख का चेहरा खुशी से दमक रहा था. उन की आंखों की चमक कुछ जुदाजुदा सी थी. उन के लहजे में गुरूर के बजाय एक पिता के फर्ज का वजन नजर आ रहा था. वह खुद ही लोगों को बता रहे थे कि मेरी बेटी अंजुम आईपीएस बन गई है. यूं भी कामयाबी का यह गुल उन की मेहनत और हौसलाअफजाई की शाख पर ही खिला था.

यकीनन अब्बू के लिए फख्र की बात थी, क्योंकि हमारी पढ़ाई के दरमियान उन्होंने बहुत सी ऐसी बातें सुनी थीं, जो बंदिशें लगाने वाली थीं. लोग खराब जमाने की दुहाई देते थे. कुछ लोगों ने उन्हें उकसाया भी था कि बेटियों को इतना पढ़ा कर कौन से आसमान की सैर कराओगे. लेकिन मेरे अब्बू दकियानूसी सोच वाले नहीं थे. उन्होंने बेटी समझ कर हमारी पढ़ाई और परवरिश में कभी कोई भेदभाव नहीं किया था. वे जानते थे कि दुनिया की किसी भी किताब में यह नहीं लिखा है कि लड़कियों को ऊंची तालीम नहीं दिलाई जा सकती. फिर भी हमारे धर्म में कई लोग बेटियों को ऊंची तालीम दिलाने में परहेज करते हैं, ऐसा हम सुनते आए थे. लेकिन अब्बू ने इस की परवाह नहीं की और हमें ऊंची तालीम दिलाई.

हम ने भी उन की सोच को दिलोदिमाग में गहराई तक बैठा लिया था. पढ़ाई से जुनून की हदों के पार जा कर हम ने खूब मेहनत की थी. यही वजह थी कि जब मेरा रिजल्ट आया था तो मैं ने सब से पहले यह खुशी अब्बू को ही सुनाई थी. मैं ने उन्हें इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था. वह पुरानी बातों में जान फूंक कर मेरी अम्मी मोमिना से कह उठे थे, ‘‘देखा, मैं कहता था न कि एक दिन अंजुम हमारा नाम रौशन करेगी. अरे आईपीएस बन गई वह.’’ उन की बात पर अम्मी के दोनों हाथ खुदबखुद इबादत की मुद्रा में उठ गए थे.

अब्बू और अम्मी दोनों के चेहरों पर साफसाफ लिखा था कि उन्हें मुझ पर नाज है. ऐसी खुशियों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. हमारे परिवार में अम्मीअब्बू के अलावा हम चार भाई बहन थे. मेरे अलावा सब से बड़े भाई परवेज शेख, 2 बहनें सलमा और रेशमा. मैं भाई के बाद दूसरे नंबर पर आती थी, जबकि सब से छोटी रेशमा थी. मेरे भाई इंजीनियर थे. उन की तालीम धीरेधीरे कमाई का जरिया भी बन गई थी. जबकि सलमा एमबीए और रेशमा एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी. हमारे वालिद ने हमें न सिर्फ आजादी से पढ़ने दिया था, बल्कि घर में पढ़ाई का माहौल भी दिया था. बेटियों के साथ जरा भी सौतेला व्यवहार नहीं किया. सचमुच इस मामले में हम खुशनसीब थे.

बेटियों के मामले में वालिदैन का ऐसा रुख खास मायने रखता है. हमारे अब्बू बेटियों को न तो बेटों से जुदा मानते थे और न ही पुरानी सोच के वारिस बन कर हमारी पहरेदारी करते थे. अब्बू तालीम की ताकत को बखूबी जानते थे. वह अकसर कहते थे, ‘‘एक बात हमेशा जेहन में रखो, जो शख्स तालीम की रोशनी में नहाया हो उसे जिंदगी की हर फिक्र से आजाद रहना चाहिए.’’ साथ ही वह ताकीद भी किया करते थे, ‘‘तालीम की रोशनी वाले चिराग को हासिल करने के लिए सब्र का इम्तिहान दे कर बहुत मेहनत करनी पड़ती है.’’

मेरा ख्वाब सिविल सर्विसेज में जाने का था. लंबे इंतजार के बाद 2011 में मेरा यह ख्वाब पूरा हो गया था. सिविल सर्विसेज एग्जामिनेशन का रिजल्ट आने के साथ ही घर में खुशियां पसर गई थीं. हमारी खुशियां रिजल्ट वाले दिन और रात तक ही नहीं सिमटी थीं, बल्कि उन में अगले दिन तब और भी इजाफा हो गया, जब मीडिया में खबरें आईं. खबरों में बताया गया कि अंजुम आरा देश की दूसरी मुसलिम लड़की है, जो आईपीएस बनी है. मैं ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मेरे लिए खुशियों की इतनी बड़ी सौगात ले कर भी आएगा. कई दिनों तक मुबारकबाद का सिलसिला चलता रहा. कोई घर आता तो अब्बू हमारी तारीफें करते नहीं थकते. अम्मी भी ऐसा ही करतीं. दरअसल मेरे परिवार के इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे भी एक कहानी थी.

मेरे अब्बू इंजीनियर थे. यह नौकरी उन्होंने बड़ी मुश्किल से पाई थी. 1992 में उन की तैनाती उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुई. यह जिला लकड़ी के सामान बनाने और उस पर नक्काशी करने के लिए खास माना जाता है. अब्बू गंगोह कस्बे में रहते थे. मेरा जन्म भी वहीं हुआ. मेरी पढ़ाई यहीं हुई. हम 4 भाईबहन थे. परिवार का खर्च चलाने के लिए अब्बू को बहुत काम करना होता था. ड्यूटी से फारिग हो कर वह हमें पढ़ाने के लिए बैठ जाया करते थे. दरअसल वह बचपन के उसी मुकाम पर हमारी बुनियाद को मजबूत कर देना चाहते थे. सहारनपुर के शिशु लोक विद्यामंदिर में प्राथमिक पढ़ाई के बाद मैं ने आर्य कन्या इंटर कालेज से हाईस्कूल व एचआर इंटर कालेज से इंटर तक की पढ़ाई की.

2006 में अब्बू का तबादला लखनऊ हो गया तो वह परिवार के साथ वहीं शिफ्ट हो गए. भाई वहां इंजीनियर की पढ़ाई करने लगा. मैं ने बीटेक की पढ़ाई के लिए अच्छे कालेज में दाखिला ले कर पढ़ाई शुरू कर दी थी. बहनें भी पढ़ रही थीं. सही कहूं तो हमारी पढ़ाई के मामले में हमारे वालिदैन ने कभी कोई समझौता नहीं किया. हमारा ध्यान पढ़ाई पर ही रहे, इसलिए बहुत से मसलों से हमें दूर ही रखा जाता था. लखनऊ की आबोहवा सहारनपुर से जुदा थी. तहजीब का यह शहर हमें बहुत पसंद आया. चूंकि हम बाहरी माहौल से ज्यादा वास्ता नहीं रखते थे, इसलिए हमारा वहां भी मन लग गया. कालेज, घर, भाईबहन इसी में दिन और रात बीत जाते थे.

लेकिन इस का मतलब यह नहीं था कि हम बाहरी दुनिया से कतई अलग हो कर कैद से हो गए थे. मुझे भी आम लड़कियों की तरह घूमनाफिरना, शौपिंग करना पसंद था. इस मामले में अब्बू से इजाजत लेने के लिए हम भाईबहन एक हो जाया करते थे. हमारा ताल्लुक मुसलिम धर्म से था. लिहाजा घर में उस का गहराई से पालन किया जाता था. हम भी उस से रूबरू थे. हमें अदब, फितरत, आदतें, लिबास, इबादत, हुक्म, हिम्मत, फर्ज, तारीफ, इकरार, हद और पाकीजगी की वे बातें समझाई जाती थीं, जिन का जिक्र मजहबी किताबों में होता था. बड़ों को इज्जत दें और अदब से पेश आएं, इस के साथ ही नेकनीयत का सबक भी दिया था. सही मायने में यह मुकम्मल परवरिश थी.

अम्मीअब्बू की तरह हम भाईबहन भी अमन और इबादत पसंद थे. मुझे याद नहीं पड़ता कि अब्बू का कभी किसी से कोई झगड़ा वगैरह हुआ हो. सब का अपनेअपने नजरिए से जिंदगी गुजारने का तरीका होता है, फिर इंसान की अपनी फितरत भी होती है. बड़ी हो कर जब मैं जमाने को थोड़ा जाननेसमझने लगी तो बखूबी समझ में आ गया था कि बेटियों के मामले में भरोसा व चट्टान जैसी मजबूत सोच को कायम रखना बड़ा मुश्किल होता है. वक्तबेवक्त आप को कुछ बातें बेवजह न चाहते हुए भी परेशान करती हैं. अब्बू के साथ भी कुछकुछ ऐसा होता था.

जब हमारी तालीम हो रही थी तो बहुत लोगों को यह बात शायद कांटे की तरह चुभती थी. कई मर्तबा ऐसा भी हुआ, जब अब्बू के साथ टोकाटाकी की गई. लेकिन हमें अपने अब्बू पर फख्र था, जो जमाने से बेपरवाह हो कर भी हमारे ऊपर भरोसा करते थे. वह इस सोच के कतई शिकार नहीं थे कि बेटियों को पढ़ाई से महरूम रखा जाए. वह बेटेबेटियों को बराबर का हक देना चाहते थे. उन की आंखों में बेटियों की कामयाबी के सुनहरे ख्वाब तैरते थे.

सच कहूं तो अब्बू ने अपने दिलोदिमाग में हमारी कामयाबी के ख्वाबों की जैसे एक खूबसूरत सी मीनार बनाई हुई थी. हम भी किसी सूरत में उस मीनार को गिराना नहीं चाहते थे. जब हम भाईबहन आपस में बातें किया करते तो यह भी चर्चा होती थी कि हमें अपने लिए बेहतर मुकाम बनाना ही है. और यह अच्छी तालीम से ही संभव था. इसलिए हम लोग अपना वक्त जाया नहीं करते थे. हमारा ज्यादातर वक्त पढ़ाई में ही बीतता था. हमारा घर किसी जन्नत से कम नहीं था. भाईबहनों अब्बूअम्मी के साथ गुजारे लम्हें कौन भूलना चाहता है. वैसे भी खूबसूरत यादों की उम्र बहुत लंबी होती है. घर में नमाज होती थी. रमजान के पाक महीने में इबादतों का दौर चलता था.

कई मर्तबा ऐसा भी हुआ, जब हम अब्बू के साथ उन के पुश्तैनी गांव कम्हरिया गए. तब हम काफी छोटे थे. यह गांव लखनऊ से दूर आजमगढ़ जिले में था. गांव साधारण था और लोग भी. हम शहर में रहते थे लिहाजा गांव के बच्चों से हमारी रंगत थोड़ा जुदा थी. हमारे दादू इस्माइल शेख और दादी सितारूनिशां गांव में ही रहते थे. हां, बीचबीच में वे हम लोगों के पास भी आया करते थे. दादू को गांव में इज्जत की नजरों से देखा जाता था. गांव की हरियाली, बागबगीचे, खेतखलिहान बहुत कुछ अच्छा तो था, लेकिन हमारा मन वहां कम ही लगता था. अब्बू गांव में घुमाने ले जाते थे तो एक 2-3 कमरों के बरामदे वाले स्कूल की तरफ अंगुली उठा कर बताते थे कि कभी तख्तीबस्ते के साथ उन्होंने भी यहां तालीम ली थी.

तख्ती, लकड़ी की कलम व स्लेट चौक से लिखने जैसी बातें वह बताते थे. राइटिंग को सुधारने का अभ्यास भी उन्होंने इन्हीं चीजों से किया था. हमें यह बेहद रोमांचक लगता था, क्योंकि अपने जमाने में हम ने ये चीजें नहीं देखी थीं. वह बताते थे कि उन्होंने ढिबरी और लालटेन की टिमटिमाती रोशनी में पढ़ाई की थी. अब्बू यह भी बताते थे कि उन्होंने खेतों में काम किया है. पढ़ाई के साथ वह किसानी का काम करते थे. तब हमें यह सब रोमांचक किस्सा ही लगता था. क्योंकि अपनी पैदाइस के बाद हम ने अब्बू को नौकरी करते ही  पाया था. इसलिए हमें उन की नौकरी की बदौलत थोड़ी बेहतर परवरिश मिल गई थी.

गांव के अन्य बच्चों, उन के रहनसहन व लिबास को देख कर हमें अपनी अहमियत का अंदाजा भी हो जाता था. उम्र बढ़ने के साथ ही समझ आ गया था कि अब्बू हमें ऐसी बातें इसलिए बताते थे कि तालीम को ले कर हमारे हौंसले और भी मजबूत हो जाएं. हम उस की अहमियत को जान सकें. वह बताना चाहते थे कि छोटे से गांव से निकल कर उन्होंने किस तरह संघर्ष किया था. अब्बू दादू और दादी को बहुत चाहते थे. उन्होंने उन की जिंदगी में तालीम का चिराग रोशन न किया होता तो शायद कुछ भी मुमकिन नहीं होता. अब्बू की काबिलियत और परिवार को देख कर दादू की आंखों में चमक आ जाती थी. शयद ऐसी बातें हम भाईबहनों के दिमाग में बैठ गई थीं कि हमारे अब्बू इतना कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं.

समय के साथ भाई की इंजीनियरिंग की पढ़ाई कंपलीट हो गई थी. मैं ने बीटेक में फर्स्ट डिवीजन हासिल की थी. मेरी ख्वाहिश थी कि सिविल सर्विस में जाऊं. इस के पीछे एक वजह यह भी थी कि मुझे ज्यादा से ज्यादा लोगों को उन का हक दिलाने और उन की मदद करने का मौका मिल सके. ऐसी ख्वाहिश कभी मेरे दिल में पैदा नहीं हुई थी कि कोई ऐसा पेशा चुना जाए, जिस में खूब पैसा मिले. मैं ने सुना था कि दौलत की चकाचौंध इंसान को कई बार गुमराह भी कर देती है. मैं ने पुलिस सेवा में जाने के अपने इरादे परिवार में जाहिर किए तो सभी को खुशी हुई. अब्बू ने मुझे समझाते हुए कहा, ‘‘मुझे तुम पर नाज है अंजुम, जो ऐसा सोचती हो, लेकिन एक बात का खयाल रखना, इस के लिए तुम्हें मेहनत करनी होगी.’’

‘‘वह मैं कर लूंगी.’’ मैं ने अब्बू को आश्वस्त किया. पढ़ाई के मामले में मैं बचपन से ही अव्वल थी. हाईस्कूल और इंटर भी मैं ने  फर्स्ट डिवीजन से पास किया था. मैं जानती थी कि यह इतना आसान नहीं है. लेकिन परिवार का सपोर्ट था और मैं पढ़ाई के लिए दिमाग को खाली रखती थी. मैं ने कोचिंग लेनी शुरू की.

उस दौरान मेरे दिमाग में देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी का किरदार भी होता था. मैं कामयाब लड़कियों के बारे में सोचती थी कि उन्होंने भी आखिर अपनी मेहनत से ऊंचे मुकाम पाए थे. मैं ने दिनरात एक कर के तैयारी की थी. संघ लोक सेवा आयोग ने एग्जाम कराया. मेरी मेहनत ने गुल खिलाया. उसी का तकाजा था कि मैं ने मनचाहा मुकाम हासिल कर लिया. इंडियन पुलिस सर्विस (आईपीएस) में चयन के बाद मैं ट्रेनिंग के लिए चली गई. एक साल तक ट्रेनिंग चली, ट्रेनिंग लगभग आखिरी मुकाम तक पहुंची तो मेरे लिए रिश्ते की तलाश शुरू हुई. मुझे मणिपुर में पोस्टिंग मिली. दूसरी तरफ मेरे लिए डा. यूनुस को पसंद कर लिया गया. यूनुस खुद भी आईएएस अधिकारी थे और पंजाब प्रांत के रहने वाले थे. रिश्ता सभी को पसंद था. मैं ने भी उन्हें पसंद किया.

शादी की बातों का सिलसिला चला और बहुत जल्द निकाह की तारीख भी मुकर्रर कर दी गई. मैं छुट्टी ले कर घर आई. घर में खुशियों का माहौल था. जम कर खरीदारी हुई. खुशनुमा माहौल के दरमियान 26 मई, 2013 को मैं और डा. यूनुस मुस्लिम रस्मोरिवाज से शौहरबीवी के रिश्ते में बंध गए. यूनुस हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में अतिरिक्त उपायुक्त (एडीसी) थे. बाद में मेरी पोस्टिंग भी शिमला में बतौर असिस्टेंट सुपरिटेंडेट औफ पुलिस (एएसपी) हो गई. इस दरमियान हमारी खुशहाल जिंदगी में 7 मार्च, 2014 को बेटा अरहान आ गया. हम दोनों मिल कर अरहान की देखभाल करते हैं. जिंदगी बिना शिकवाशिकायत के पुरसुकून है. मेरी बेटी होगी तो मैं उसे भी बेटे जैसी परवरिश दे कर ऊंची तालीम दूंगी.

मेरी जिंदगी का सितारा तालीम से चमका और यह मुमकिन हुआ मेरे वालिदैन की सोच और विश्वास से. मनचाही तालीम और मेहनत इंसान को किसी भी मुकाम पर पहुंचा सकती है. मैं अच्छी तरह समझती हूं कि तालीम की रोशनी कभी जाया नहीं जाती. आज सब अब्बू की मिसाल देते हैं कि ‘अयूब तुम ने अपनी बेटियों को कामयाब बना दिया.’ मेरी एक बहन सलमा एमबीए कर रही है, जबकि सब से छोटी रेशमा एमबीबीएस के आखिरी दौर में है.

पुलिस की नौकरी में मैं अपने फर्ज को ले कर हमेशा सजग रहती हूं. ड्यूटी और परिवार के बीच तालमेल बैठाने में थोड़ी मुश्किल जरूर आती है, लेकिन ऐसी सभी मुश्किलें उन तकलीफों से बहुत कम हैं, जो हमारे लिए वालिदैन ने कभी देखी थीं. मेरे पास कोई फरियादी आता है तो उस की बात गहराई से सुनती हूं. फिर कोशिश करती हूं कि उसे राहत मिले और मसला हल हो जाए. क्योंकि पुलिस के पास कोई उसी सूरत में आता है, जब वह निराश होता है. वह चाहता है कि उस की समस्या का समाधान हो.

व्यावहारिक तौर पर फौरी राहत पहुंचाना भी हर पुलिसकर्मी का फर्ज है. सोशल प्रोग्राम होते हैं तो मैं उन में लोगों को समझाती हूं कि तालीम के मामले में वह बेटाबेटी में फर्क न करें. बेटियों को आगे बढ़ने का मौका दें. लोग उन्हें इज्जत दें. यह हकीकत है कि मेरे वालिदैन ने भरोसा कर के मुझे नहीं पढ़ाया होता तो इस मुकाम पर कभी नहीं पहुंचती. Best Stories

—कथा अंजुम आरा से बातचीत पर आधारित

Film: सलमान खान का नया रूप – बजरंगी भाईजान

Film: बड़े फिल्म स्टार तो कई हैं, लेकिन सलमान खान की बात ही अलग है, जब भी उन की कोई नई फिल्म आती है तो दर्शक उत्साह से भर उठते हैं. ईद पर आई उन की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ को ले कर वह खुद भी उत्साहित हैं और उन के चाहने वाले भी…

शाहरुख खान, आमिर खान, रितिक रोशन, अजय देवगन, अक्षय कुमार और रणबीर कपूर सभी बड़े फिल्मी सितारे हैं. इन सभी की फिल्मों ने 100-100 करोड़ से ज्यादा कमाए हैं लेकिन लोगों में जो क्रेज सलमान खान का है, वह किसी का नहीं. इस मामले में बौलीवुड के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख खान भी कहीं पीछे छूट जाते हैं. इस की वजह शायद यह है कि जो इंसानियत, सहृदयता, संस्कार, मासूमियत, दूसरों की मदद करने का जज्बा, सुगठित बदन, जबरदस्त अभिनय क्षमता और खूबसूरती सलमान में है, वैसा पूरा पैकेज किसी दूसरे हीरो में नजर नहीं आता. इस से भी बड़ी बात है उन की स्क्रिप्ट की समझ, जो शायद उन्होंने अपने पिता सलीम खान से सीखी, जो फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज लेखक रहे हैं.

शायद इन्हीं खूबियों की वजह से सलमान खान की फिल्म ‘वांटेड’ के बाद लगभग सभी फिल्मों ने सौ करोड़ से ज्यादा कमाए. उन की 2009 में आई ‘वांटेड’, 2010 में आई ‘दबंग’ 2011 में आई ‘रेडी’ और ‘बौडीगार्ड’ ने बहुत मोटी कमाई की. ये सभी उन की सुपरहिट फिल्में थीं.

आजकल बड़े सितारों की फिल्मों का 100-200 और 300 करोड़ क्लब में शामिल होने का क्रेज सा बन गया है. सलमान की लगातार हिट हुई फिल्मों की बात करें तो उन की ‘एक था टाइगर’ ने 198 करोड़, ‘दबंग’ ने 145 करोड़, ‘दबंग-2’ ने 158 करोड़, ‘बौडीगार्ड’ ने 142 करोड़, ‘रेडी’ ने 120 करोड़, ‘जय हो’ ने 111 करोड़ और ‘किक’ ने 233 करोड़ रुपए कमाए. ‘किक’ उन की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म थी. इस मामले में शाहरुख खान की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ 226 करोड़ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ भी 203 करोड़ पर सिमट कर रह गई थीं. हां, आमिर खान की ‘धूम-3’ ने 280 करोड़ और ‘पीके’ ने 339 करोड़ की कमाई कर के जरूर सलमान खान से बाजी मारी.

अब जब सलमान की ‘बजरंगी भाईजान’ रिलीज हो गई है तो उन की चाहत है कि उन की यह फिल्म ‘पीके’ की तरह 300 करोड़ क्लब में शामिल हो. दर्शकों ने जिस तरह फिल्म को हाथोंहाथ लिया है, उस से यह असंभव भी नहीं लगता. निस्संदेह ‘बजरंगी भाईजान’ बहुत अच्छी फिल्म है. इस फिल्म के डाइरैक्टर कबीर खान और सलमान खान इस से पहले भी फिल्म ‘एक था टाइगर’ में साथसाथ काम करचुके हैं, जो इन दोनों की सुपरहिट फिल्म थी. वहीं से दोनों की कैमिस्ट्री भी बनी.

कबीर खान की बात करें तो डाक्युमेंट्री फिल्मों की दुनिया से व्यावसायिक सिनेमा में आए कबीर खान ‘एक था टाइगर’ के अलावा ‘काबुल एक्सप्रेस’ और ‘न्यूयार्क’ फिल्में बना चुके हैं जो हिट फिल्में थीं. कबीर खान पहले यशराज फिल्म्स के लिए काम कर रहे थे. स्वतंत्र रूप से यह उन की पहली फिल्म है, जिस के निर्माता खुद सलमान खान हैं. फिल्म का टाइटल भी कबीर खान ने ही फाइनल किया है. इस फिल्म के लेखक हैं दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक बी. विजेंद्र प्रसाद.

बी. विजेंद्र प्रसाद दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध निर्देशक राजमौली के पिता हैं, जिन की फिल्म ‘बाहुबली’ ने पिछले दिनों उत्तर और दक्षिण भारत में ही नहीं, विदेशों तक में खूब धूम मचाई. यह शायद पहली ऐसी भारतीय फिल्म थी जिस का पहले दिन का ही कलेक्शन 60 करोड़ रहा. उम्मीद है यह फिल्म 500 करोड़ तक कमाएगी. यहां यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब फिल्म की कहानी इतनी अच्छी थी तो बी. विजेंद्र प्रसाद ने इसे अपने बेटे राजमौली को क्यों नहीं दिया? दरअसल इस के पीछे भी एक कहानी है.

असल में ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी कुछ इस तरह की थी कि विजेंद्र प्रसाद चाहते थे कि यह फिल्म पहले हिंदी में बने, इस के बाद तमिल या तेलुगू में. विजेंद्र प्रसाद को लग रहा था कि इस फिल्म में हीरो की भूमिका सलमान खान ज्यादा बेहतर ढंग से निभा सकते हैं, इसलिए वह पहले सलमान खान से ही मिले. सलमान को कहानी बहुत पसंद आई क्योंकि इस में हीरो की भूमिका रियल करेक्टर जैसी थी. वह इस कहानी को मुंहमांगी कीमत पर खरीदने को तैयार हो गए, लेकिन विजेंद्र प्रसाद ने शर्त रखी कि वह इस फिल्म में सहनिर्माता बनना चाहते हैं.

यह बात सलमान को मंजूर नहीं थी, सो बात नहीं बनी. इस के बाद विजेंद्र प्रसाद राकेश रोशन से मिले. कहानी उन्हें भी पसंद आई पर बात सहनिर्माता बनने पर अटक गई. अलबत्ता राकेश रोशन कहानी की पूरी कीमत चुकाने को तैयार थे. दोनों जगह बात न बनती देख अंतत: विजेंद्र प्रसाद ने फैसला किया कि जब कहानी ही देनी है तो क्यों न सलमान खान को दी जाए जो कहानी के नायक के किरदार के हिसाब से एकदम फिट हैं. और इस तरह विजेंद्र प्रसाद की कहानी सलमान के हाथों में आ गई. चूंकि स्क्रिप्ट दमदार थी इसलिए सलमान ने इसे खुद ही बनाने का फैसला किया. इस के लिए उन्होंने बतौर डाइरैक्टर चुनाव किया कबीर खान का, जो ‘एक था टाइगर’ के समय से उन के अच्छे दोस्त बन गए थे.

फिल्म की स्टार कास्ट में उन्होंने करीना कपूर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, 6 वर्षीय बच्ची हर्षाली मल्होत्रा, नजीम खान, अलीकुली मिर्जा, दीप्ति नवल, ओम पुरी और शरत सक्सेना का चुनाव किया. फिल्म में अदनान सामी की एक कव्वाली के अलावा उन्होंने उन का स्पैशल अपीयरेंस भी रखा. वैसे फिल्म की बात करें तो इस की पूरी कहानी सलमान खान यानी (फिल्म में) पवन कुमार  चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी और हर्षाली मल्होत्रा यानी मुन्नी के ही इर्दगिर्द घूमती है. यह एक ऐसे साधारण युवक की कहानी है जो अजीब हालात में फंस कर असाधारण काम कर गुजरता है. हर्षाली मल्होत्रा यानी मुन्नी इस फिल्म का अहम किरदार है. फिल्म में यह ऐसी अनपढ़ पाकिस्तानी गूंगी बच्ची है जो भारत में अपनी मां से बिछुड़ गई है. उस के पास कोई पहचान भी नहीं है.

सलमान खान यानी पवन कुमार चतुर्वेदी मुन्नी को कैसे उस के घर वालों तक पहुंचाते हैं, यही फिल्म की कहानी है. मानवीय  रिश्तों वाली इस कहानी को इतनी खूबसूरती से गढ़ा गया है कि ज्यादातर बातें हास्यरस की चाशनी में लपेट कर कही गई हैं ताकि दर्शक बोर न हो और बात सीधे उस के दिल तक जाए. भारत-पाकिस्तान के रिश्ते राजनैतिक स्तर पर भले ही कैसे भी हों, आतंकवाद के समर्थक भले ही भारत में तबाही मचाने के मंसूबे बांधते हों, लेकिन हकीकत यह है कि आम हिंदुस्तानी या आम पाकिस्तानी के मन में किसी तरह का वैरभाव नहीं है.

वैसे भी मेहनत से रोजीरोटी का जुगाड़ करने वालों के पास बिना वजह की दुश्मनी का समय नहीं होता. न ही वे एकदूसरे का बुरा सोचते हैं. उन के बीच इंसानियत का रिश्ता हमेशा कायम रहता है. ‘बजरंगी भाईजान’ में भी इस हकीकत को समझाने का प्रयास किया गया है. इस फिल्म के टाइटल ‘बजरंगी भाईजान’ को ले कर भी खूब होहल्ला मचा. कई शहरों में इस फिल्म का प्रदर्शन रोकने के लिए अदालतों में अर्जियां दी गईं. कई जगह सुनवाई भी हुई. यह सोचेसमझे या देखे बिना ही कि फिल्म में क्या है? बात सिर्फ इतनी सी कि बजरंगी के साथ भाईजान क्यों जोड़ा गया.

जैसे बजरंगी के सारे कौपीराइट हिंदुओं के पास हों और भाईजान मुस्लिमों की प्रौपर्टी. मसलन जैसे मुट्ठी भर कुछ लोग भाईजान जैसे मीठे शब्द, जो शब्द नहीं बल्कि एक भावनात्मक रिश्ता है, को भी मजहबी रंग में रंग देना चाहते हों तो कुछ बजरंगी (हनुमानजी) नाम रखने पर भी पाबंदी लगा देना चाहते हों. यह अलग बात है कि 2-4 बजरंगी हर गांव, कस्बे और शहर में मिल जाएंगे. और भाईजान तो हिंदू और मुस्लिम दोनों में चलता है. वैसे यह सब इसलिए बेकार की बातें हैं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही निर्देश दे रखा है कि सेंसर द्वारा पास की गई फिल्म का प्रदर्शन रोकने की अपीलों पर ध्यान न दिया जाए.

बहरहाल, तमाम तरह की अफवाहों और विवादों के बावजूद बजरंगी भाईजान पूरी भव्यता से प्रदर्शित हुई और सफल भी रही. लेकिन इस फिल्म का एक भावनात्मक पहलू और भी है, जिसे शायद ही कोई जानता हो. दरअसल, सलमान खान अपने पिता का न केवल बहुत ज्यादा सम्मान करते हैं, बल्कि उन से घबराते भी हैं. उन से पूछे बिना वह कोई भी बड़ा काम नहीं करते. सर्वविदित है कि सलमान के पिता सलीम खान विख्यात पटकथा लेखक रहे हैं, जिन्होंने ‘शोले’ जैसी कालजयी फिल्म लिखी. ऐसे में पटकथा पर उन की गहरी पैठ होना स्वाभाविक ही है. इसी के मद्देनजर सलमान उन से अपनी फिल्म की पटकथाओं पर उन की राय जरूर लेते हैं. इतना ही नहीं, फिल्म बन जाने के बाद प्रीमियर से पहले उन्हें दिखाते भी हैं ताकि उन की राय जानी जा सके.

जब ‘बजरंगी भाईजान’ बन गई तो कबीर खान और सलमान ने घर पर यह फिल्म सलीम साहब को दिखाई. फिल्म देखने के बाद कबीर खान ने सलीम साहब से उन की राय पूछी तो वह बोले, ‘‘यह फिल्म सलमान के 25 साल के कैरियर की सब से बेहतरीन फिल्म है. लेकिन फिल्म के अंत में सलमान और करीना पर जो गाना फिल्माया गया है, वह अनावश्यक है. इस गाने से फिल्म का प्रभाव खत्म हो रहा है.’’ बहरहाल, सलीम साहब की राय मान कर कबीर खान और सलमान ने वह गाना हटा दिया. अब यह फिल्म 2 घंटे 40 मिनट की रह गई है.

‘बजरंगी भाईजान’ भले ही दिल्ली बेस्ड है, लेकिन इसे पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और कश्मीर में फिल्माया गया है. भारत-पाक का बौर्डर होने की वजह से सब से ज्यादा शूटिंग राजस्थान में हुई. फिल्म में सब से खूबसूरत लोकेशन कश्मीर की हैं. यहां गुलमर्ग में ऐसी जगह शूटिंग की गई है, जहां आज तक कोई फिल्मकार नहीं गया था. साथ ही पहलगाम और सोनमर्ग में भी कई सीन फिल्माए गए हैं. फिल्म के लिए अलगअलग जगह शूटिंग इसलिए की गई क्योंकि फिल्म में सलमान बच्ची को उस के घर पहुंचाने के लिए उसे ले कर जगहजगह घूमते हैं.

सलमान खान को दर्शक एक्शन हीरो के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन बजरंगी भाईजान की कहानी एकदम अलग तरह की है, दिल को छू जाने वाली. करीब 2 घंटे 40 मिनट की इस फिल्म में दर्शक आखिर तक बंधा रहता है तो इस की वजह सलमान का रियल कैरेक्टर जैसा अभिनय है. फिल्म के निर्देशक कबीर खान ने भी अपने निर्देशन से कहानी पर कुछ ऐसी पकड़ बनाए रखी है कि पूरी फिल्म में हर वर्ग के दर्शक कहानी के किरदारों से बखूबी बंधे रहते हैं. दरअसल, पाकिस्तान के छोटे से गांव की रहने वाली सईदा (हर्षाली मल्होत्रा) जन्म से गूंगी है. उस के पिता पाकिस्तानी आर्मी में हैं और मां घरेलू महिला. सईदा बोल तो कुछ नहीं सकती लेकिन समझती सब कुछ है.

गांव के कुछ लोग सईदा के अब्बूअम्मी को बताते हैं कि अगर वह दिल्ली जा कर निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करे तो उन की बच्ची की जुबान लौट सकती है. परेशानी यह है कि सईदा के अब्बू को पाक आर्मी में होने की वजह से भारत का वीजा नहीं मिल सकता. ऐसी स्थिति में सईदा की अम्मी बेटी को ले कर समझौता एक्सप्रेस से दिल्ली आती है. दरगाह पर सजदा करने के बाद जब वह समझौता एक्सप्रेस से वापस लौटती है तो जरा सी देर के लिए एक सुनसान जगह पर ट्रेन रुकती है. इसी दौरान सईदा मां को छोड़ कर ट्रेन से उतर जाती है. तभी टे्रन चल पड़ती है और सईदा वहीं खड़ी रह जाती है.

सईदा की मां सीमा पार जा कर अपनी बेटी को ढूंढने के लिए भारत आना चाहती है, पर दो देशों की सीमा आड़े आ जाती है जिस की वजह से वह भारत नहीं आ पाती. दूसरी ओर सईदा एक मालगाड़ी में सवार हो कर कुरुक्षेत्र जा पहुंचती है. कुरुक्षेत्र में हनुमान जयंती पर विशाल जुलूस निकल रहा है. इस जुलूस में बजरंगबली के पक्के भक्त पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी (सलमान खान) भी शामिल हैं. इसी जुलूस के दौरान सईदा की मुलाकात बजरंगी से होती है लेकिन गूंगी और अनपढ़ होने की वजह से वह अपने बारे में कुछ भी नहीं बता पाती.

बजरंगी सईदा को ले कर स्थानीय पुलिस स्टेशन में जाता है, लेकिन यह जान कर कि बच्ची गूंगी और अनपढ़ है, पुलिस बजरंगी को हिदायत दे कर वापस भेज देती है. बजरंगी अजीबोगरीब स्थिति में फंस जाता है. उसे न बच्ची का नाम पता होता है, न धर्म और न यह कि वह कहां की रहने वाली है. वह कई तरह के इशारों से उस की हकीकत जानने की कोशिश करता है, लेकिन बच्ची न कुछ समझ पाती है न बता पाती है. बजरंगी दिल्ली में अपने पिता के दोस्त त्रिपाठीजी (शरत सक्सेना) के घर रहता है. त्रिपाठीजी की बेटी रसिका (करीना कपूर) स्कूल टीचर है और बजरंगी से प्यार करती है.

बजरंगी त्रिपाठी और रसिका को बताता है कि वह बच्ची उसे कुरुक्षेत्र में मिली है और हिंदू है. रसिका भी इशारोंइशारों में बच्ची से उस की हकीकत पता लगाने की कोशिश करती है, पर नाकाम रहती है. इस के बाद बजरंगी बच्ची को उस के मांबाप तक पहुंचाने के मिशन में जुट जाता है. अपनी सुविधा के लिए बजरंगी और रसिका बच्ची को मुन्नी कह कर बुलाने लगते हैं. कहानी में मोड़ तब आता है जब बजरंगी और रसिका को पता चलता है कि वह बच्ची पाकिस्तानी है. बजरंगी बच्ची को उस के मांबाप तक पहुंचाने के लिए वीजा लेने की कोशिश करता है लेकिन उसे वीजा नहीं मिलता. इस के बाद वह बच्ची को बिना पासपोर्ट वीजा के ही पाकिस्तान पहुंचाने का फैसला करता है.

बजरंगी बच्ची को ले कर बौर्डर पार भी कर जाता है पर पकड़ा जाता है. यहीं पर उस की मुलाकात पाकिस्तान के लोकल टीवी चैनल के खोजी पत्रकार चांद नवाज (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) से होती है. चांद नवाज को बजरंगी में सच्चाई और इंसानियत का जज्बा नजर आता है. वह हर तरह से बजरंगी की मदद करने का फैसला करता है. अंतत: चांद नवाज की मदद से बजरंगी छिपतेछिपाते सईदा के घर तक पहुंचता है और बच्ची को उस के मांबाप को सौंप देता है. बजरंगी जब सईदा को उस के मातापिता के पास छोड़ कर जाने लगता है और वह उसे माता कह कर पुकारती है तो हर दर्शक भावुक हो जाता है. यानि अंतिम दृश्य में बच्ची बोलने लगती है.

बजरंगी की भूमिका में सलमान खान ने जबरदस्त अभिनय किया है. उन के लिए वाकई यह चैलेंजिंग कैरेक्टर था, जिसे उन्होंने अपने अभिनय से जीवंत बना दिया. एक्टिंग के मामले में नवाजुद्ीन सिद्दीकी भी पीछे नहीं हैं. कई जगह तो वह सलमान पर भी हावी रहे. वह चूंकि फिल्म में सलमान को भाईजान बोलते हैं, इसलिए फिल्म का नाम ‘बजरंगी भाईजान’ रखा गया. हर्षाली मल्होत्रा भले ही 6 साल की बच्ची रही हों पर एक्टिंग के मामले में उस ने कमाल किया है. देखा जाए तो यह पूरी फिल्म सलमान खान, हर्षाली मल्होत्रा और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के ही कंधों पर टिकी है. भारतपाक के रिश्ते भले ही चाहे जैसे भी हों लेकिन इस फिल्म के माध्यम से इंसानियत का जो मैसेज दिया गया है, वह दिल को छू लेने वाला है. Film

 

 

 

UP News: पालतू कुत्ते के लिए 2 बहनों ने किया सुसाइड

UP News: एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे देख लोग भी हैरान हैं. उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में एक कुत्ते के प्यार में 2 बहनों ने आत्महत्या करके जान दे दी. आखिर ऐसा क्या था कि कुत्ते के प्यार ने दोनों बहनों को सुसाइड करने के लिए मजबूर कर दिया था. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से.

यह दर्दनाक घटना  लखनऊ के पारा की जलालपुर दौदा खोड़ा कालोनी से सामने आई है. यहां एक महीने से पालतू कुत्ता बीमार था. इसी के चलते 22 और 24 साल की दो संगी बहनों जिया सिंह व राधा सिंह ने फिनायल पी कर जान दे दी.

राधा और जिया अपने डॉग से बहुत ही प्यार करती थीं. उस की तबियत में कोई भी सुधार न होने के कारण दोनों ने यह कदम उठा लिया. दोनों को अस्पताल ले जाया गया. जहां पर बड़ी बहन और बाद में छोटी बहन ने दम तोड़ दिया. इन दोनों बहनों ने जरमन शेफर्ड नस्ल का एक डॉग पाल रखा था. उस डॉग का नाम टोनी था और वह एक महीने से बीमार चल रहा था. दोनों बहनों के माइंड में चल रहा था टोनी अब कभी ठीक नहीं होगा. इसी वजह से दोनों डिप्रेशन में चल रही थीं.

बताया जा रहा है कि छोटी बहन की मानसिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी. बुधवार को दोनों ने फिनायल पी ली और अपनी मम्मी गुलाबो देवी को बताया. इस के बाद गुलाबो देवी ने अपने बड़े बेटे वीर सिंह को इस की सूचना दी. भाई के घर पहुंचने से पहले पड़ोसी दोनों को लक्ष्मी बाई अस्पताल ले जाया गए थे. इसी दौरान राधा ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. और जिया की अस्पताल में मौत हो गई.

पड़ोसियों ने बताया कि, राधा के पिता कैलाश सिंह रुई धुनाई का काम करते थे. वह 6 महीने से भी ज्यादा समय से बीमार हैं और घर पर बिस्तर पर पड़े रहते हैं. उन का भी इलाज चल रहा है. भाई वीर सिंह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता है. उनका एक छोटा भाई भी था, जिस की 7 साल पहले ब्रेन हेमरेज से मौत हो चुकी थी.

इन दोनों बहनों ने क्या सोच कर ऐसा कदम उठा लिया, कुछ पता नहीं चल पा रहा है. राधा और जिया अपने डॉगी टोनी को बहुत प्यार किया करती थीं. टोनी खाना न खाए तो वे दोनों भी खाना छोड़ दिया करती थीं.  पिछले दिनों से जब से कुत्ता बीमार था, तब से वे दोनों बहनें ज्यादा ही डिप्रेशन में रह रही थीं.

इंसपेक्टर सुरेश ने बताया कि कुत्ता 15 दिन से बीमार था, जिस की वजह से दोनों बहनें डिप्रेशन में थीं. उन्होंने अपनी मम्मी से अंतिम समय मे कहा था कि उन के मरने के बाद कुत्ते को घर से बाहर न निकलें. पुलिस मामले की जांच कर रही है. UP News

Hindi Stories: शौक की कोई सीमा नहीं

Hindi Stories: रवि भसीन ने जो काम शौक में शुरू किया था, धीरेधीरे वह उन का जुनून बन गया. इसी का नतीजा है कि आज उन की कोठी दुर्लभ और बेशकीमती चीजों का संग्रहालय बन गई है.

पाकिस्तान में जिला झेलम के गांव लिल्ले खिऊड़ा निवासी बख्शी गोपाल दास भसीन काले नमक की खानों के मालिक थे. इलाके के नामीगिरामी व्यक्ति. इस जगह तैयार होने वाले काले नमक की सप्लाई पूरी दुनिया में होती थी. भसीन साहब के बेटे थे बख्शी ईश्वर दास. कौशल्या देवी से शादी कर के वह 4 लड़कों व 4 लड़कियों के पिता बने. इन में से चौथे नंबर के थे 1945 में जन्मे रविकांत. विभाजन के बाद यह परिवार हिंदुस्तान आ कर शाहाबाद मारकंड में बस गया. यहां परिवार के लोगों ने प्रौपर्टी डीलिंग का व्यवसाय शुरू किया जो खूब फलाफूला. यहीं रहते रविकांत ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की.

इस बीच ईश्वर दास ने मनीमाजरा क्षेत्र में चूने के भट्ठे लगा लिए थे. उन का यह काम भी अच्छा चल निकला था. 1964 में ये लोग चंडीगढ़ शिफ्ट कर के सेक्टर-22बी में रहने लगे. जिन दिनों रविकांत कक्षा 8 में था उस के दादा बख्शी गोपालदास ने उसे मुगलकालीन चांदी के कुछ सिक्के दे कर समझाया था, ‘‘इन्हें न खर्च करना न किसी को देना, हमेशा संभाल कर रखना. इतना ही नहीं, बल्कि और भी कोई दुर्लभ वस्तु कहीं से मिले तो उसे भी सहेज कर रखना. ऐसा करने से तुम्हें बड़ा संतोष मिलेगा.’’

रवि पर जुनून की तरह जैसे यही धुन सवार होने लगी. उस के कब्जे में जो भी एंटीक चीजें आईं, उन्हें वह संभालतासहेजता रहा. धीरेधीरे यह उस का शौक बन गया. एक तरह से कारोबार का हिस्सा भी. देखतेदेखते इस तरह की चीजों के संग्रह से रवि भसीन का एक कमरा भर गया. इस संग्रह में पुरातन सिक्कों के अलावा अनेक ऐसी दुर्लभ वस्तुएं भी थीं, जिन्हें देख कर सामने वाला आश्चर्यचकित रह जाता था. 1973 में रविकांत की पूनम से शादी हो गई. पूनम को पति के शौक का पता चला तो उन्होंने भी इसे अपनी पसंद बना कर सहयोग देना शुरू कर दिया. रविकांत ने अब तक अपना अलग प्रौपर्टी डीलिंग का व्यवसाय शुरू कर लिया था. इस के साथ ही एंटीक वस्तुओं की खोज में वह यहांवहां भ्रमण भी किया करते थे.

ऐसी किसी वस्तु की जहां कहीं होने की उन्हें खबर मिलती, वह तुरंत वहां के लिए रवाना हो जाते. आने वाले कुछ ही समय में वह पूरा हिंदुस्तान तो घूम ही लिए, चीन, इंग्लैंड, अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया, हांगकांग, कुवैत व पाकिस्तान जा कर भी वहां से दुर्लभ वस्तुएं एकत्रित कर लाए. इस के बाद तो उन का घर एंटीक वस्तुओं का अजायबघर सा बन गया. इस के लिए उन्होंने भारी रकम खर्च की थी. इन दुर्लभ वस्तुओं में पाषाण प्रतिमाएं, पैडल से चलने वाला हारमोनियम, केरोसीन से चलने वाले पंखे व रूम हीटर, इटली की पुरातनकालीन पेंटिंग्स, शाही दरबार की क्रौकरी और 1×4 इंच चौड़ी व 3×4 इंच लंबाई वाली हैंडलिथो बुक जैसी पुरानी, लेकिन महत्त्वपूर्ण चीजें घर की शोभा बढ़ाने लगीं

. हैंडलिथो बुक में 56 पन्ने हैं. जिन्हें पढ़ने के लिए कछुए की हड्डी के फ्रेम में लगा मैग्नीफाइंग ग्लास इस्तेमाल किया जाता है. भसीन के पास यह ग्लास भी उपलब्ध है. इस किताब में यूरोप की महान हस्तियों का वर्णन है. सन 1838 में प्रकाशित हुई इस छोटी सी पुस्तक में जहां 6 महान शख्सियतों की जीवनी प्रकाशित की गई है, वहीं इस में हाथ से बनी 8 कलाकृतियां भी मौजूद हैं. इस पुस्तक को पीतल के फोल्डिंग कवर से ढंका गया है. महाराजा रंजीत सिंह के दौर की सिख घड़ी, 200 साल पुराना कैंपर लकड़ी का संदूक व मुगलों के जमाने का हुक्का भी भसीन के संग्रह के बेमिसाल तोहफे हैं. सिख घड़ी आज भी चलती है. इस की अलग तरह की आवाज कानों में मधुर रस घोल देती है.

रवि भसीन के पास फिएट टोपोलेनो 2 सीटर कार भी थी जो उन्होंने सन् 1994 में महाराजा ग्वालियर से खरीदी थी. अभी कुछ साल पहले यह कार उन से अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने खरीद ली थी. रवि के संग्रह में पौन इंच की ‘द इंग्लिश बिजौयस’ बुक भी है तो 1 इंच के आकार की कुरान भी है. उन के पास मुगलकाल, रजवाड़ों और अंगे्रजों के जमाने की अति दुर्लभ वस्तुएं हैं. धातु व कांच के बने बर्तन, शोपीस, ऐतिहासिक ग्रंथ, किताबें, हस्तलिखित धार्मिक पुस्तकें, पुरातनकाल के हथियार, पेंटिंग्स व फर्नीचर वगैरह भी उन के संग्रह में शामिल हैं.

भसीन के पास हाथ से सुनहरी अक्षरों में उर्दू में लिखी खास किस्म के पन्नों वाली ऐसी अद्भुत किताब भी है जिस के बारे में उन का दावा है कि यह कुर्बानी के बकरे की आंतों से निर्मित पन्नों पर सोने की स्याही से लिखी गई है. इस के अलावा उन के पास महाराजा नाभा की सवा 200 साल पुरानी व 36 फीट लंबी जन्मपत्रिका है जिस की बेजोड़ कारीगरी देखते ही बनती है. एक सदी पुराना हस्तलिखित शिवपुराण व 200 साल पहले लिखा गया 7 पन्नों का हस्तलिखित महासार भी उन के संग्रह के नायाब तोहफे हैं. इस की पृष्ठभूमि के बारे में भसीन बताते हैं कि किसी जानवर की हड्डी को घिस कर बनाए गए पत्थरनुमा पन्नों पर गोमूत्र व फूलों से बनी स्याही से लिखा गया है, यह महाभारत सार.

मुगल बादशाहत के दौरान जब किसी को मृत्युदंड दिया जाता था तो अपना हुक्म सुनाते वक्त बादशाह खास किस्म की अंगूठी पहन कर हुक्म सुनाया करता था. अपने हुक्मनामे पर वह इसी अंगूठी को मोहर के रूप में इस्तेमाल कर के ठप्पा लगाता था. यह खास अंगूठी भी रवि भसीन के पास मौजूद है. भसीन के यहां अंगे्रजों के जमाने की बड़ीबड़ी दीवार घडि़यों का तो अच्छाखास संग्रह है. इन में कुकु क्लौक व ग्रैंडफादर क्लौक बहुत मशहूर घडि़यां हैं. ग्रैंडफादर क्लौक वजन से चलती है, जो 7 दिन बाद बंद हो जाती है. इसे फिर से चालू करने के लिए वजन ऊपर खिसकाने पड़ते हैं. पहाड़ी राजा पीतल की जिन बड़ीबड़ी दूरबीनों का इस्तेमाल किया करते थे, वे भी अच्छीखासी मात्रा में रवि भसीन के एंटीक कलैक्शन में शामिल हैं.

इन के अलावा राजाओं द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले पीतल के हमाम, बाएं हाथ का विशाल शंख, गऊमुखी शंख व अंग्रेजों के जमाने के मैडल ही नहीं, बकरे की आंतों की सुराही भी भसीन के यहां आने वालों को सहज ही आकर्षित कर लेती है. अंगे्रजों के जमाने में अंबाला जेल में कैदियों पर चमड़े के जो कोड़े बरसाए जाते थे, उन में से 2 कोड़े व अंगे्रजों के जमाने के अनेक टेलीफोन सेट्स के अलावा रवि भसीन के पास पुरातनकाल के ऐसे वुडन बौक्स भी हैं जो मुस्काफुर (कैंफर) की लकड़ी के बने हैं. आज भी इन के करीब बैठो तो इन में से निकलती भीनीभीनी सुगंध मनमस्तिष्क छा कर मंत्रमुग्ध कर देती है.

भसीन के पास पुरातन तलवारों का भी जखीरा है तो आदिकाल से 20वीं सदी तक के सिक्कों का विशाल संग्रह भी है. सिक्कों का पूरा इतिहास भी रवि भसीन को मालूम है. वह बताते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता के दौरान जो सिक्के मिले थे और जिन का जिक्र वैदिक ग्रंथों में है, उस से यह बात सामने आई है कि मौखरी, प्रतिहार, कलेचेरी, चालुक्य, चोल, राष्ट्रकूट, पांड्या, गुप्त, मौर्य, कौसल व मुगल शासकों ने अपनी सुविधा, प्रतिष्ठा व संपन्नता के अनुसार सिक्कों में सभी तरह की धातुओं का प्रयोग किया था. इतिहास साक्षी है कि कुषाण शासकों ने सर्वथा पहली दफा यूनानी शैली में सोने का ढला हुआ सिक्का प्रचलित किया. मौर्य शासकों ने पहले टुकड़ों को जोड़ कर, फिर ठप्पे वाले और फिर ढलाई के सिक्के जारी किए.

यह वंश जब तहसनहस हुआ तो अलगअलग तरीकों से अस्तित्व में आईं रियासतों के शासकों ने अपने काल की मुद्राएं भी अलगअलग तरीकों से निकालीं. यहीं से सिक्कों पर राजा के नाम के साथ उस का फोटो उकेरने का प्रचलन शुरू हुआ. कुछ शासकों ने अपने सिक्कों पर धार्मिक चित्र भी उकेरे. 12वीं सदी में तोमरवंश का विनाश करने के बाद मोहम्मद गोरी ने अपना अलग सिक्का जारी किया. मुगल शासन के 1206 ई. से 1526 ई. के कार्यकाल में भी हर शासक ने अपना अलग सिक्का चलाया. इल्तुतमिश ने सिक्कों पर कलमा खुदवाना शुरू किया. फिर टकसाल का नाम व सिक्का बनाने की तिथि अंकित करना शुरू की.

बलवन ने शासन संभालते ही सिक्कों पर से हर तरह के हिंदू चिह्न हटवा दिए. अलाउद्दीन खिलजी का शासन आया तो उस ने सिकंदर द्वितीय की उपाधि सिक्कों पर खुदवा दी. उस वक्त तक मिश्रित धातुओं के सिक्कों का दौर था. शेरशाह सूरी ने यह चलन बंद करवा कर शुद्ध चांदी व तांबे के सिक्के प्रचलित करवाए. पानीपत की ऐतिहासिक लड़ाई में इब्राहीम लोदी को पराजित करने के बाद बाबर ने हिंदुस्तान में मुगल साम्राज्य की नींव रखते ही स्वर्णमुद्रा चलाना आरंभ की और इसे नाम दिया. अशर्फी सम्राट अकबर का दौर आने पर उन्होंने मेहराबी मोहरें चलाईं. जहांगीर ने हिंदू चक्रचिह्न वाला सिक्का चलाया था, मुगलों ने ‘अल्लाह हू अकबर’ भी लिखवाया. उल्लेखनीय है कि जहांगीर काल में नूरजहां के नाम से भी सिक्का चला था.

ब्रिटिश काल में पहले अशर्फी पर और फिर सिक्कों पर ब्रिटिश चिह्न उभारे जाने लगे. महारानी विक्टोरिया के नाम से 1940 ई. में सोनेचांदी के सिक्के प्रचलन में आए. 1876 में भी सिक्कों पर तिथियां उकेरी गई थीं. इस के बाद 1906 में धातु गिलट से सिक्के बनाए जाने लगे. फिर तो पाई, धेला, आना, दुअन्नी, चवन्नी और अठन्नी वगैरह भी अस्तित्व में आ गए. इतनी सारी मुद्राओं का चलन जार्ज सप्तम के कार्यकाल में आम लोगों की सुविधा के लिए किया गया था.

बकौल रवि भसीन उन के पास इस तरह के अनेक सिक्के मौजूद हैं. इतना ही नहीं, अकबर के शासनकाल वाला तांबे का 40 ग्राम के वजन का दमड़ा और महाराजा रंजीत सिंह द्वारा जारी प्रथम सिख सिक्का जिस पर कुछ शब्द अंकित थे, के अलावा उन के संग्रह में तुगलक, अलाउद्दीन खिलजी, बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह, बाबर, अकबर, जहांगीर व शाहजहां के शासनकाल के निहायत ही दुर्लभ सिक्के भी सुरक्षित हैं. इस के अलावा रवि भसीन के पास ईरान का 27 ग्राम का चांदी का सिक्का, पूर्वी अफ्रीका का 1 रुपए का सिक्का व फ्रांस में सन् 1901 व 1906 में जारी हुए सोने के सिक्के भी मौजूद हैं.

अपने इस शौक को समृद्ध बनाने के लिए रवि भसीन ने निरंतर 40 सालों तक बहुत भागदौड़ की, देशदुनिया की खाक छानी, हालांकि इस दौरान उन की सेहत उन्हें धोखा देने लगी थी. वह कई तरह की बीमारियों से घिरने लगे थे. 1985 में उन्हें शुगर की समस्या ने परेशान करना शुरू कर दिया था. 1997 आतेआते उन की किडनियां जवाब देने लगीं. 1999 में उन की दोनों किडनियां फेल होने की रिपोर्ट आ गई. तब रवि की शरीकेहयात पूनम भसीन ने उन्हें अपनी 1 किडनी दे कर उन की जान बचाई. भसीन दंपत्ति का एक ही बेटा है, करन. वह पिछले 5 सालों से ब्रिस्बेन की 1 हास्पिटैलिटी फर्म में अकाउंट्स मैनेजर है. भसीन दंपति पंचकूला के सेक्टर-11बी की अपनी कोठी में रह रहे हैं.

पतिपत्नी दोनों अपने इसी संग्रह को समर्पित हैं. इस के चलते उन की कोठी का नजारा देखते ही बनता है. उन के घर का हर कमरा, फर्श, दीवार यहां तक कि छत और रसोईघर भी उन के इस बेशकीमती खजाने से अटे पड़े हैं. कोठी के मुख्यद्वार के बाहर बागीची में रौक गार्डन निर्माता पदमश्री नेकचंद द्वारा रवि भसीन को भेंट की गई उन की 1 कृति मौजूद है. यहीं 300 साल पुरानी पीतल की बैलगाड़ी रखी है. जहां एक ओर पत्थर की चौखटें व हवेली के स्तंभ जमीन पर लेटाए गए हैं, वहीं गैलरी में लकड़ी का सीलिंगफैन टंगा है. यहीं एक कोने में मिट्टी के तेल से बर्फ जमाने वाला फ्रिज रखा है. भसीन की कोठी के भीतर जा कर इंसान तिलिस्म सरीखी दुनिया से घिर जाता है. Hindi Stories

 

Hindi Crime Story: पति की मौत का फरमान

Hindi Crime Story: कामिनी गांव के ही रहने वाले मार्तंड यादव से शादी करना चाहती थी. लेकिन घर वालों ने उस की शादी पवन से कर दी. इस का परिणाम यह निकला कि निर्दोष पवन मारा गया.

गांव में भागवत कथा होने की वजह से काफी चहलपहल थी. कथा में जाने के लिए हर कोई उत्साहित था, क्योंकि वहां बहुत ही सुंदर कथा होती थी. उस के बाद हवन होता था. कामिनी भी वहां रोजाना अपनी सहेली मीना के साथ कथा सुनने जाती थी. उस दिन वह मीना के साथ कथा सुनने पहुंची तो वहां का नजारा ही कुछ और था. गांव के कई लोग पंडितों द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चारण के साथ हवन कर रहे थे. उस से जो धुआं उठ रहा था, वातावरण सुगंधित हो रहा था. कामिनी और मीना ने हाथ जोड़ कर सिर झुकाया और वहां बिछी दरी पर बैठ गईं. अचानक कामिनी की नजर दूसरी ओर बैठे एक युवक पर पड़ी, जो एकटक उसी को ताक रहा था. वह कोई और नहीं, उसी के गांव का मार्तंड यादव उर्फ पिंकू था.

कामिनी उम्र के उस दौर में पहुंच गई थी, जब लड़कों का इस तरह ताकना लड़कियों को अच्छा लगता है. यही वजह थी कि कामिनी ने भी उस की ओर उसी तरह ताका. नजरें मिलीं तो मार्तंड मुसकराया, लेकिन कामिनी ने नजरें झुका लीं. लेकिन यह भी सच है कि इस स्थिति में लड़की पहली बार भले ही नजरें झुका ले, लेकिन पलट कर जरूर देखती है. और कहते हैं कि अगर पलट कर देख लिया तो समझो मामला फिट है यानी वह भी चाहती है. कामिनी से रहा नहीं गया, उस ने नजरें उठाईं तो मार्तंड को अपनी ओर ताकते पाया. उसे उस तरह ताकते देख कामिनी को हंसी आ गई.

बस, फिर क्या था, कामिनी की इस हंसी पर मार्तंड मर मिटा. एक तो कामिनी ने पलट कर देखा था, दूसरे हंसी थी, इसलिए मार्तंड को लगा, अब मामला फिट है. अब वह सबकुछ भूल कर सिर्फ कामिनी को ही देख रहा था. कामिनी का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उसे इस तरह बारबार उधर देखते देख कर मीना ने पूछा, ‘‘क्या बात है, जो तू बारबार उधर लड़कों की ओर देख रही है?’’

कामिनी इस तरह सिटपिटा गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उसे जवाब तो देना ही था, इसलिए उस ने मीना को प्यार से झिड़कते हुए कहा, ‘‘यार, तुम भी न जाने क्याक्या सोचती रहती हो? इस तरह की जगहों पर कोई क्या देखेगा? तुम्हारे दिमाग में हमेशा खुराफात ही चलता रहता है.’’

अब तक हवन खत्म हो गया था. प्रसाद ले कर कामिनी मंडप से बाहर आई तो मार्तंड भी उस के पीछेपीछे बाहर आ गया. वह उस से थोड़ी दूरी बना कर चल रहा था. उसे अपने पीछे आते देख कामिनी का दिल तेजी से धड़कने लगा कि मीना के सामने ही वह उसे कुछ कह न दे. अब वह उसे अपना सा लग रहा था. कुछ ऐसा ही मार्तंड को भी महसूस हो रहा था. वह उस से अपने दिल की बेचैनी कहना तो चाहता था, लेकिन मीना की उपस्थिति उसे ऐसा करने से रोक रही थी. कुछ भी रहा हो, मार्तंड की नजरें उसी पर टिकी थीं. कामिनी भी बारबार पलट कर उसे देख रही थी. आखिर मीना ने उस की चोरी पकड़ ही ली. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अच्छा तो यह बात है, अब समझ में आया, यह महाशय हमारे पीछेपीछे क्यों चले आ रहे हैं?’’

‘‘क्या बकवास कर रही है? कोई पीछेपीछे आ रहा है तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि मैं उस पर मर मिटी हूं. चलो, घर चलो, नहीं तो तुम इसी तरह बकवास करती रहोगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘मैं कहां कह रही हूं कि तुम यहीं रुको. चलो न घर.’’ मीना ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा और तेजी से घर की ओर चल पड़ी.

मार्तंड कामिनी को तब तक देखता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. घर पहुंच कर कामिनी मार्तंड के खयालों में डूब गई. पता नहीं क्यों वह उस के दिल में बस गया था, जबकि वह बहुत खूबसूरत भी नहीं था. गांव में उस से भी खूबसूरत लड़के थे, जो उस पर मरते थे. लेकिन उस ने कभी किसी को भाव नहीं दिया था. दूसरी ओर मार्तंड भी कामिनी के खयालों में डूबा था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कामिनी जैसी खूबसूरत लड़की का दिल उस के लिए धड़क सकता है. इसलिए अगले दिन के इंतजार में उसे नींद नहीं आई. वह जानता था कि कामिनी रोज कथा सुनने आती है. इसलिए उस ने तय कर लिया था कि अगर अगले दिन कामिनी मिल गई तो कैसे भी वह उस से अपने दिल की बात जरूर कह देगा.

संयोग से अगले दिन कामिनी अकेली ही वहां आई. शायद उसे विश्वास था कि उस के सपनों का राजकुमार मार्तंड अवश्य वहां आएगा और उस से बात करने की कोशिश भी करेगा. उसे बात करने में कोई संकोच न हो, यही सोच कर वह मीना को साथ नहीं लाई थी. जब वह वहां पहुंची तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि मार्तंड वहीं बैठा था, जहां कामिनी एक दिन पहले बैठी थी. शायद वह उसी का इंतजार कर रहा था. मार्तंड की नजरें उस से मिलीं तो दोनों के होठों पर मुसकान तैर उठी. कामिनी आ कर उस से थोड़ी दूरी पर महिलाओं के झुंड में बैठ गई. दोनों बैठे तो भागवत कथा सुनने थे, लेकिन दोनों के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

आखिर  नहीं रहा गया तो मार्तंड ने कुछ इशरा किया. उस के बाद कामिनी उठ कर चल पड़ी. लोगों की नजरें बचा कर मार्तंड भी उस के पीछेपीछे चल पड़ा. सुरक्षित स्थान पर आ कर जरा भी संकोच किए मार्तंड ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘कामिनी, अब मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है कि मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम्हारे हावभाव से ही मुझे पता चल गया है कि तुम भी मुझे प्यार करती हो, इसलिए चलो एकांत में कहीं बैठ कर बातें करते हैं.’’

गांवों में एकांत कहां होता है, बागों या खेतों के बीच. दोनों गेहूं के खेतों के बीच बैठ कर बातें करने लगे. मार्तंड ने उस एकांत में कामिनी के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामिनी, यह जिंदगी हमारी है, इसलिए इस के बारे में सिर्फ हमें ही निर्णय लेने का हक है. तुम मुझ से मिलने के लिए रोज यहीं आना. यहां लोगों की नजर हम पर नहीं पड़ेगी. बोलो, आओगी न?’’

‘‘मैं जरूर आऊंगी मार्तंड. तुम मेरा इंतजार करना.’’ कामिनी ने कहा और अपने घर चली गई.

मनचाहा प्रेमी मिल जाने से कामिनी खुश थी. वह मार्तंड की यादों में खोई रहने लगी. अब उसे हमेशा उस समय का बेसब्री से इंतजार रहता, जब उसे मार्तंड से मिलने जाना होता. मार्तंड उस से जब भी रोमांटिक बातें करता, वह शरमा जाती. वह उस की सुंदरता की तारीफें करते हुए कहता, ‘‘तुम्हारी इसी सुंदरता ने मेरा दिल चुरा लिया है. अब मेरे इस दिल को तुम संभाल कर रखना, इसे कभी तोड़ना मत.’’

कामिनी कहती, ‘‘तुम भी कैसी बातें करते हो, मैं भला तुमरे दिल को क्यों तोड़ूंगी, अब तो वह हमारा हो चुका है.’’

‘‘मैं कितना भाग्यशाली हूं, जो तुम जैसी प्यार करने वाली मिल गई. शायद तुम मेरे भाग्य में लिखी थी.’’

ऐसी ही बातें कर के मार्तंड ने कामिनी को लुभा कर उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. दोनों मन से तो एक थे ही, तन से भी एक हो गए. उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना शिवगढ़ के निमडवल गांव में रहते थे रामेश्वर प्रसाद. वह खेती कर के अपना गुजरबसर करते थे. उन के परिवार में पत्नी रमा और 2 बेटियां तथा 2 बेटे थे. कामिनी उन के बच्चों में सब से छोटी थी. उन के बाकी बच्चों का विवाह हो चुका था. कामिनी ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसे मार्तंड से प्यार हो गया.

कामिनी ने गांव के ही सरकारी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की थी. वह खूबसूरत थी, इसलिए जवान होते ही गांव के मनचले लड़के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगे थे. उन्हीं में मार्तंड भी था. आखिर में उसी ने बाजी मार ली थी. वह प्रभाकर यादव का बेटा था. वह नल वगैरह ठीक करने का काम करता था. गांवों में इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह पातीं, इसलिए मार्तंड और कामिनी के संबंध भी उजागर हो गए. जब बेटी की करतूत का पता रामेश्वर प्रसाद को चला तो उन्होंने कामिनी की खूब पिटाई की और सख्त हिदायत दी कि अब वह मार्तंड से बिलकुल नहीं मिलेगी. उस के घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी गई.

इस हालत में रामेश्वर जल्द से जल्द कामिनी की शादी के बारे में सोचने लगा. क्योंकि उस की वजह से उन की गांव में बदनामी हो रही थी. रामेश्वर का एक रिश्तेदार हरभजन लखनऊ के थाना नगराम के गांव सेंधूमऊ में रहता था. सेंधूमऊ के बगल में ही एक गांव है बघौली. उसी गांव में ललई प्रसाद अपने परिवार के साथ रहता था. वह भी खेती करता था. उस के परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 2 बेटियां और एकलौता बेटा पवन था. उस ने दोनों बेटियों की शादी कर दी थी. बेटे की अभी शादी नहीं हुई थी. वह गोसाईगंज के दयाल इंस्टीट्यूट से बीबीए कर रहा था.

हरभजन पवन से परिचित था. वह जानता था कि पवन बहुत ही नेक और पढ़ालिखा लड़का है. इसलिए उस ने उस से कामिनी से रिश्ते की बात चलाई तो वह बात आगे बढ़ाने को राजी हो गया. उस ने अपने पिता से बात की तो उन की सहमति मिलने के बाद सभी कामिनी को देखने गए. कामिनी के घर वालों को भी पवन और उस का घरपरिवार पसंद था, इसलिए बातचीत के बाद शादी तय हो गई. कामिनी ने पवन के सामने ही विवाह से मना कर दिया था, लेकिन रामेश्वर प्रसाद ने किसी तरह बात संभाल ली थी. 20 मई, 2015 को कामिनी और पवन का विवाह धूमधाम से हो गया. कामिनी को न चाहते हुए भी पवन से विवाह करना पड़ा. जबकि वह मार्तंड से शादी करना चाहती थी.

शादी के बाद भी वह उसे एक पल के लिए नहीं भूल पा रही थी. क्योंकि उस ने उसी के साथ जिंदगी गुजारने का सपना जो देखा था. लेकिन घर वालों ने उस के सपनों को तोड़ दिया था. पग फेरा में कामिनी मायके आई तो मार्तंड से मिली. तब वह उस से गले मिल कर बिलखबिलख कर रोई. मार्तंड की भी आंखें नम हो गईं. कामिनी की हालत देख कर वह बेचैन हो उठा. उस ने कामिनी को ढांढ़स बंधा कर कहा, ‘‘कामिनी हम कभी अलग नहीं होंगे, कोई भी हमें जुदा नहीं कर सकता. हम हमेशा इसी तरह मिलते रहेंगे.’’

इस के बाद मार्तंड ने एक सस्ता सा मोबाइल फोन खरीद कर कामिनी को दे दिया, जिस से उन में बराबर बातें हो सकें. कामिनी जब तक मायके में रही, मार्तंड से बराबर मिलती रही. ससुराल आने पर मिलना तो बंद हो गया, लेकिन मोबाइल से सब की चोरी वह उस से बातें कर लेती थी. 12 अगस्त, 2015 की शाम साढ़े 6 बजे पवन घर लौटा और कपड़े बदल कर आराम करने लगा. रात 8 बजे कामिनी ने उसे सौ रुपए का नोट देते हुए कहा कि उसे कोल्ड ड्रिंक पीनी है, जा कर ला दे. पवन उन्हीं कपड़ों में दहेज में मिली हीरो पैशन प्रो बाइक से कोल्ड ड्रिंक लेने चला गया.

कोल्ड ड्रिंक की दुकान उस के घर से लगभग 3 सौ मीटर की दूरी पर थी. थोड़ी देर बाद पवन का फोन आया कि गांव के बाहर उस की बाइक खड़ी है, किसी से मंगवा लें. वह किसी जरूरी काम से जा रहा है. इस के बाद पवन के पिता वहां गए और गांव के एक लड़के से कह कर बाइक ले आए. सुबह गांव के कुछ बच्चे गांव के बाहर तालाब पर शौच के लिए गए तो उन्होंने वहां झाडि़यों में पवन की लाश पड़ी देखी. बच्चों ने यह बात तुरंत पवन के घर वालों को बताई तो घर वाले रोतेबिलखते वहां पहुंचे. पवन के पिता ललई प्रसाद ने इस घटना की सूचना थाना नगराम पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद थाना नगराम के थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक पवन ने नीले रंग पर सफेद धारी वाली कैपरी और सफेद शर्ट पहन रखी थी. उस के गले और मुंह पर किसी तेज धारदार हथियरा के घाव थे. सुधीर कुमार सिंह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ राकेश नायक भी आ गए. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मैडिकल कालेज भिजवा कर पूछताछ शुरू की. इस के बाद थाने आ कर सुधीर कुमार सिंह ने मृतक के पिता ललई प्रसाद की ओर से अज्ञात के खिलाफ पवन की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. थानाप्रभारी मामले की जांच के लिए बघौली गांव जाने की तैयारी कर रहे थे कि किसी ने फोन कर के उन्हें बताया कि मृतक पवन की पत्नी कामिनी अपना सामान बांध कर कहीं जाने की तैयारी कर रही है.

यह सुन कर सुधीर कुमार सिंह को हैरानी हुई. जिस औरत के पति की हत्या हुई हो, अभी उस की लाश भी न दफनाई गई हो, इस दुख की घड़ी में ससुराल वालों का साथ देने के बजाय वह घर से जाने की तैयारी कर रही है. उन्हें लगा, कहीं ऐसा तो नहीं कि इस घटना के पीछे उसी का हाथ हो. सीओ राकेश नायक भी थाने में मौजूद थे. कामिनी के बारे में सीओ साहब को बताया तो उन्होंने भी कामिनी पर शक जाहिर किया. फिर क्या था, थानाप्रभारी ललई प्रसाद के घर जा पहुंचे. उन्हें जो सूचना मिली थी, वह सही थी. कामिनी अपना बैग तैयार कर के बैठी थी. शक के आधार पर सुधीर कुमार सिंह ने बैग की तलाशी ली तो उस में से कपड़ों और व्यक्तिगत सामान के अलावा 1 हजार रुपए, एक सिम और एक युवक की फोटो बरामद हुई. उन्होंने बैग में नीचे लगे पैड के अंदर हाथ डाला तो उस में से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ.

घर वालों से उस मोबाइल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. इस के पास जो मोबाइल था, उसे तो पवन ने पहले ही ले लिया था.

सुधीर कुमार सिंह ने जब कामिनी से उस के पास मिले फोटो के बारे में पूछा तो वह काफी देर तक उस फोटो को देखती रही, उस के बाद बोली, ‘‘यह युवक उस के गांव का रहने वाला है.’’

पुलिस कामिनी को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में महिला कांस्टेबल के जरिए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कई नाम बताए. उन सभी को पुलिस ने थाने ला कर पूछताछ की तो पता चला कि वे निर्दोष थे. कामिनी ने जो नाम बताए थे, वे उस के पुराने आशिक थे, जिन्हें वह फंसाना चाहती थी. सुधीर कुमार सिंह ने कामिनी का मोबाइल खंगाला तो उस में सिर्फ एक ही नंबर मिला, जिस से उस में लगभग रोज ही फोन आए थे. घटना वाले दिन भी उस नंबर से अंतिम बार रात 11 बजे फोन आया था. जब उस नंबर के बारे में कामिनी से सख्ती से पूछा गया तो उस ने बताया कि उस नंबर से फोन करने वाला और फोटो वाला युवक एक ही है. उस का नाम मार्तंड यादव उर्फ पिंकू है, जो उस के मायके निमडवल में रहता है.

सुधीर कुमार सिंह ने उसी मोबाइल से उस नंबर पर स्पीकर औन कर  के कामिनी से बात करने को कहा. कामिनी ने उस नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन रिसीव करने वाले ने कहा, ‘‘सब ठीक कर दिया मैं ने, किसी को शक भी नहीं हुआ.’’

‘‘क्या कह…’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि सुधीर कुमार सिंह ने उसे कुछ भी बताने से मना कर दिया.

‘‘मैं ने अपने दोस्तों के साथ सब कुछ बहुत सही ढंग से कर दिया है. अब हम एक साथ रह सकेंगे.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘लेकिन यह सब कर के तुम ने मुझे फंसा दिया. पुलिस मुझ पर शक कर रही है. तुम आ कर मुझे बचाओ. तुम कहां हो?’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि मार्तंड को शायद शक हो गया. उस ने तुरंत फोन काट दिया. दोबारा फोन किया गया तो फोन बंद हो चुका था. इस के बाद मार्तंड के घर छापा मारा गया, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. तब उस के पिता को हिरासत में ले कर थाने लाया गया. लेकिन वह भी मार्तंड के बारे में कुछ नहीं बता सका. उसी दिन यानी 14 अगस्त को एक मुखबिर की सूचना पर दोपहर साढे़ 12 बजे सुधीर कुमार सिंह ने मार्तंड यादव और उस के दोस्त विक्रम यादव को समेसी के पास एक नहर के किनारे से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद 15 अगस्त को पुलिस ने मार्तंड के एक अन्य दोस्त सूरजलाल को छतौनी से गिरफ्तार कर लिया. मार्तंड से की गई पूछताछ में पवन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

मार्तंड द्वारा दिए गए मोबाइल से कामिनी चोरीछिपे उस से बात कर लिया करती थी, लेकिन किसी दिन पवन ने कामिनी को मोबाइल पर बात करते देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि कामिनी का किसी के साथ चक्कर चल रहा है. उसी ने यह मोबाइल कामिनी को दिया है. पवन ने कामिनी को मारापीटा ही नहीं, उस का मोबाइल भी छीन लिया. कामिनी वैसे ही मार्तंड से दूर हो कर तड़प रही थी. ऐसे में बात करने का जरिया मोबाइल भी छिन गया तो वह गुस्से से भर उठी. आग में घी का काम किया पवन की पिटाई ने. कामिनी ने किसी तरह मार्तंड तक मोबाइल छिन जाने की बात पहुंचा दी.

इसी के साथ यह भी कहा कि अगर वह किसी तरह पवन को ठिकाने लगा दे तो वह हमेशाहमेशा के लिए उस की हो जाएगी. उस के बाद उन्हें मिलने से कोई नहीं रोक पाएगा. मार्तंड तो हर हाल में कामिनी को अपनी बनाना चाहता था. उस ने कामिनी से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं जल्द ही उसे ठिकाने लगा दूंगा.’’

मार्तंड ने अपने 2 दोस्तों, विक्रम और सूरजलाल को दोस्ती का वास्ता दे कर पवन की हत्या में साथ देने को कहा तो वे तैयार हो गए. इस के बाद योजना भी बन गई. अपनी उसी योजना के अनुसार, मार्तंड अपने दोस्तों के साथ 2 मोटरसाइकिलों से कामिनी की ससुराल उस समय पहुंचा, जब पवन घर पर नहीं था. यह बात कामिनी ने मार्तंड को पहले ही बता दी थी. जब तीनों वहां पहुंचे तो कामिनी ने अपनी सास रामकली को बताया कि तीनों उस की सगी मौसी के बेटे हैं. रामकली के हटते ही मार्तंड ने एक मोबाइल फोन कामिनी को दे दिया और पूरी योजना बता दी. इस के बाद वह दोस्तों के साथ चला आया.

13 अगस्त की शाम मार्तंड ने कामिनी को फोन किया कि वह रात 8 बजे तक दोस्तों के साथ उस के गांव के बाहर पहुंच जाएगा. शाम साढ़े 6 बजे तक पवन घर आ जाता था. रात 8 बजे जब मार्तंड गांव के बाहर आ गया तो उस ने कामिनी को फोन कर के पवन को भेजने को कहा. इस के बाद कामिनी ने पवन को कोल्डड्रिंक लाने के बहाने बाहर भेज दिया. पवन मोटरसाइकिल से कोल्डड्रिंक ले कर लौट रहा था तो रास्ते मे दोस्तों के साथ मार्तंड ने उसे हाथ दे कर रोक कर कहा, ‘‘भाई मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई है. जरा देख लीजिए.’’

पवन ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर के जेब में पड़ी टौर्च निकाली. उस ने टौर्च जलाई तो मार्तंड के चेहरे पर पड़ी. उस का चेहरा देख कर पवन ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें पहचानता हूं, तुम तो मेरी ससुराल के हो, यहां कैसे, कामिनी से मिलने आए थे क्या?’’

‘‘नहीं, यहीं पास में मेरी एक रिश्तेदारी है, वहीं आया था. लेकिन यहां पहुंचते ही मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई.’’

इस के बाद उन में बातें होने लगीं. उसी बीच मार्तंड ने शौच जाने की बात कही तो पवन उसे तालाब की तरफ टौर्च की रोशनी में ले जाने लगा. इस के पहले उस ने फोन कर के अपनी मोटरसाइकिल मंगवा लेने के लिए घर वालों को कह दिया था. मार्तंड पवन से बातें करते हुए तालाब की ओर जा रहा था, तभी पीछेपीछे चल रहे विक्रम ने कपड़ों में छिपा हंसिया निकाल कर पवन की गरदन पर पूरी ताकत से प्रहार कर दिया. अचानक हुए इस हमले से पवन लड़खड़ा कर गिर पड़ा. वह संभल पाता, उस के पहले ही मार्तंड ने विक्रम से हंसिया ले कर पवन पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

पवन तड़पने लगा. और फिर बिना चीखेचिल्लाए मौत के मुंह में समा गया. इस के बाद तीनों उसे घसीट कर झाडि़यों में ले गए. वहां उस की जेब से दोनों मोबाइल निकाल कर तालाब में फेंक दिए. हत्या में प्रयुक्त हंसिया भी वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. इस के बाद वे मोटरसाइकिल से चले गए. उन्होंने सोचा था कि वे पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ ही लिया. सुधीर कुमार सिंह ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया, तीनों मोबाइल, दोनों मोटरसाइकिलें बरामद कर ली थीं. इस के बाद पुलिस ने मुकदमे में धारा 120बी तथा 34 के अलावा एससी/एसटी की धारा 3(2)5 भी बढ़ा दी थी.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित