Agra Crime: केमिस्ट्री शिक्षक गिरफ्तार, यूट्यूब से सीखकर बना रहा सिंथेटिक ड्रग्स

Agra Crime: एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां एक केमिस्ट्री का टीचर यूट्यूब पर वीडियो देखकर सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था. जब इस टीचर के बारे में पता चला तो सभी हैरान थे. अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों एक टीचर सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से.

यह मामला यूपी के आगरा के खंदौली से सामने आया है, जहां आरोपी मनोज फिरोजाबाद जिले के थाना नारखी क्षेत्र के गांव मरसलगंज का रहने वाला है. फिलहाल 36 वर्षीय मनोज आगरा के थाना खंदौली क्षेत्र के नगला मट्टू में दिनेश उपाध्याय के मकान में किराए पर रह रहा था. वह इसी किराए के घर में सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था.पुलिस ने मनोज को अरेस्ट कर लिया है.

पुलिस के अनुसार, मनोज से करीब 700 लीटर से अधिक केमिकल और उपकरण बरामद किए हैं. जिस में पुलिस को 450 लीटर डिस्टिल्ड वाटर, 120 लीटर मिथाइल, 27.5 लीटर हाइड्रोब्रोमिक एसिड, 100 लीटर एथाइल, 50 लीटर एसीटोन, 40 लीटर हाइड्रोक्लोरिक एसिड, 9 लीटर एथेनाल. इस के अलावा और भी उपकरण पुलिस ने बरामद किए हैं. बताया जाता है कि इस केमिकल का इस्तेमाल एमडीएमए जैसे नशीले पदार्थ के लिए किया जाता है. पुलिस ने आरोपी को अरेस्ट कर लिया है और उस से विस्तार से पूछताछ की जा रही है. Agra Crime

Suspense Crime Story: दौलत की खातिर दांव पर लगी दोस्ती

Suspense Crime Story: 19मार्च, 2021 की रात 10 बजे शीला देवी अपने देवर आनंद प्रजापति के साथ जनता नगर चौकी पहुंचीं. उस समय इंचार्ज ए.के. सिंह चौकी पर मौजूद थे. उन्होंने शीला देवी को बदहवास देखा, तो पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम घबराई हुई क्यों हो? कोई गंभीर बात है क्या?’’

‘‘हां सर. हमें किसी अनहोनी की आशंका है.’’

‘‘कैसी अनहोनी? साफसाफ पूरी बात बताओ.’’

‘‘सर, दरअसल बात यह है कि रात 8 बजे मेरा बेटा शैलेश, उस का दोस्त अर्श गुप्ता व विनय घर पर नीचे कमरे में शराब पी रहे थे. कुछ देर बाद कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आईं. फिर वे लोग बाइक से कहीं चले गए.

‘‘उन के जाने के बाद मैं कमरे में गई, तो वहां खून से सनी चादर देखी. अनहोनी की आशंका से मैं घबरा गई. मैं ने इस की जानकारी पड़ोस में रहने वाले अपने देवर आनंद को दी, फिर उन के साथ सूचना देने आप के पास आ गई. आप मेरी मदद करें.’’

शीला देवी की बात सुनकर ए.के. सिंह को लगा कि जरूर कोई अनहोनी घटना घटित हुई है. उन्होंने यह सूचना बर्रा थानाप्रभारी हरमीत सिंह को दी फिर 2 सिपाहियों के साथ शीला देवी के बर्रा भाग 8 स्थित मकान पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के चंद मिनट बाद ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह भी आ गए. हरमीत सिंह ने ए.के. सिंह के साथ कमरे का निरीक्षण किया तो सन्न रह गए. कमरे के फर्श पर खून पड़ा था और पलंग पर बिछी चादर खून से तरबतर थी. कमरे का सामान भी अस्तव्यस्त था. खून की बूंदें कमरे के बाहर गली तक टपकती गई थीं.

निरीक्षण के बाद हरमीत सिंह ने अनुमान लगाया कि कमरे के अंदर कत्ल जैसी वारदात हुई है या फिर गंभीर रूप से कोई घायल हुआ है. शैलेश और उस का दोस्त या तो लाश को ठिकाने लगाने गए हैं या फिर अस्पताल गए हैं. कहीं भी गए हों, वे लौट कर घर जरूर आएंगे. अत: उन्होंने घर के आसपास पुलिस का पहरा लगा दिया तथा खुद भी निगरानी में लग गए. रात लगभग डेढ़ बजे शैलेश और उस का दोस्त अर्श गुप्ता वापस घर आए तो पुिलस ने उन्हें दबोच लिया और थाना बर्रा ले आए. दोनों के हाथ और कपड़ों पर खून लगा था. इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने पूछा, ‘‘तुम दोनों ने किस का कत्ल किया है और लाश कहां है?’’

शैलेश कुछ क्षण मौन रहा फिर बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपने बचपन के दोस्त विनय प्रभाकर का कत्ल किया है. वह बर्रा भाग दो के मनोहर नगर में रामजानकी मंदिर के पास रहता था. उस की लाश को मैं ने अर्श की मदद से रिंद नदी में फेंक दिया है. पैट्रोल खत्म हो जाने की वजह से हम ने विनय की मोटरसाइकिल खाड़ेपुर-फत्तेपुर मोड़ पर खड़ा कर दी और वापस लौट आए.’’

‘‘तुम ने अपने दोस्त का कत्ल क्यों किया?’’ थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने शैलेश से पूछा.

इस सवाल पर शैलेश काफी देर तक हरमीत सिंह को गुमराह करता रहा. पहले वह बोला, ‘‘साहब, नशे में गलती हो गई. हम ने उस का कत्ल कर दिया.’’

फिर बताया कि उस के मोबाइल फोन में उस की महिला मित्र की कुछ आपत्तिजनक फोटो थीं. उन फोटो को विनय ने धोखे से अपने मोबाइल फोन में ट्रांसफर कर लिया था. वह उन फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दे कर ब्लैकमेल कर रहा था, इसलिए हम ने उसे मार डाला. लेकिन थानाप्रभारी हरमीत सिंह को उस की इन दोनों बातों पर यकीन नहीं हुआ. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने सख्ती की तो दोनों टूट गए.

फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने 10 लाख रुपए की फिरौती मांगने के लिए विनय की हत्या की योजना बनाई थी. कुछ माह पहले संजीत हत्याकांड की तरह शव को ठिकाने लगाने के बाद उसी के मोबाइल फोन से उस के घर वालों को फोन कर फिरौती मांगने की योजना थी. उस ने दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की थी. लेकिन फिरौती मांगने के पहले ही वे पकड़े गए.

शैलेश व अर्श की जामातलाशी में उन के पास से 3 मोबाइल फोन मिले, जिस में एक मृतक विनय का था तथा बाकी 2 शैलेश व अर्श के थे. उन के पास एक पर्स भी बरामद हुआ जिस में मृतक का फोटो, आधार कार्ड तथा कुछ रुपए थे. बरामद पर्स मृतक विनय प्रभाकर का था. शैलेश व अर्श गुप्ता की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त आलाकत्ल बांका तथा लाश ठिकाने लगाने में इस्तेमाल मोटरसाइकिल बरामद कर ली. बांका उस ने अपने कमरे में छिपा दिया था और पैट्रोल खत्म होने से उस ने मोटरसाइकिल खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ी कर दी थी.

फिरौती और हत्या के इस मामले में थानाप्रभारी हरमीत सिंह कोई कोताही नहीं बरतना चाहते थे. क्योंकि इस के पहले संजीत अपहरण कांड में बर्रा पुलिस गच्चा खा चुकी थी. अपहर्त्ताओं ने फिरौती की रकम भी ले ली थी और उस की हत्या भी कर दी थी. इस मामले में लापरवाही बरतने में एसपी व डीएसपी सहित 5 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था. अत: उन्होंने घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी.

सूचना पा कर रात 3 बजे एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय थाना बर्रा पहुंच गए. उन्होंने घटना के संबंध में गिरफ्तार किए गए शैलेश व अर्श गुप्ता से विस्तार से पूछताछ की. फिर दोनों को साथ ले कर रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. इस के बाद कातिलों की निशानदेही पर नदी किनारे पड़ा विनय प्रभाकर का शव बरामद कर लिया.

विनय की हत्या बड़ी निर्दयतापूर्वक की गई थी. उस का गला धारदार हथियार से काटा गया था, जिस से सांस की नली कट गई थी और उस की मौत हो गई थी. मृतक विनय की उम्र 26 वर्ष के आसपास थी और उस का शरीर हृष्टपुष्ट था. 20 मार्च की सुबह 5 बजे बर्रा थाने के 2 सिपाही मृतक विनय के घर पहुंचे और उस की हत्या की खबर घर वालों को दी. खबर पाते ही घर व मोहल्ले में सनसनी फैल गई. घर वाले रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. वहां विनय का शव देख कर मां विमला तथा बहन रीता बिलख पड़ीं. पिता रामऔतार प्रभाकर तथा भाई पवन की आंखों से भी अश्रुधारा बह निकली. पुलिस अधिकारियों ने उन्हे धैर्य बंधाया.

पवन ने एसपी दीपक भूकर को बताया कल शाम साढ़े 7 बजे किसी का फोन आने पर उस का भाई विनय यह कह कर अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से घर से निकला था कि अपने दोस्त से मिलने जा रहा है. उस के बाद वह घर नहीं लौटा. रात भर हम लोग उस के घर वापस आने का इंतजार करते रहे. उस का फोन भी बंद था. सुबह 2 सिपाही घर आए. उन्होंने विनय की हत्या की सूचना दी. तब हम लोग यहां आए. लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि विनय की हत्या किस ने और क्यों की?

‘‘तुम्हारे भाई की हत्या किसी और ने नहीं, उस के बचपन के दोस्त शैलेश प्रजापति व उस के साथी अर्श गुप्ता ने की है. वह तुम लोगों से फिरौती के 10 लाख रुपए वसूलना चाहते थे. लेकिन शैलेश की मां ने ही उस का भांडा फोड़ दिया और दोनों पकड़े गए.’’

यह जानकारी पा कर पवन व उस के घर वाले अवाक रह गए. क्योंकि वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि शैलेश ऐसा विश्वासघात कर सकता है. निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम हाउस हैलट अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह शैलेश के उस कमरे में पहुंचे, जहां विनय का कत्ल किया गया था. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने जहां घटनास्थल का निरीक्षण किया, वहीं फोरैंसिक टीम ने भी बेंजाडीन टेस्ट कर साक्ष्य जुटाए.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल बांका भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने मृतक के भाई पवन को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201 तथा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत शैलेश प्रजापति तथा अर्श गुप्ता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्हें न्यायसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की सनसनीखेज घटना का खुलासा हुआ.

कानपुर शहर का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-बर्रा. इस क्षेत्र के बड़ा होने से इसे कई भागों में बांटा गया है. रामऔतार प्रभाकर अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के भाग 2 में मनोहरनगर में जानकी मंदिर के पास रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विमला के अलावा 2 बेटे पवन कुमार, विनय कुमार तथा बेटी रीता कुमारी थी. रामऔतार प्रभाकर आर्डिनैंस फैक्ट्री में काम करते थे. किंतु अब रिटायर हो चुके थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

फैक्ट्री में रामऔतार प्रभाकर के साथ सोमनाथ प्रजापति काम करते थे. सोमनाथ भी बर्रा भाग 8 में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शीला देवी के अलावा एकलौता बेटा शैलेश था. सोमनाथ भी रिटायर हो चुके थे. सोमनाथ बीमार रहते थे. उन्हें सुनाई भी कम देता था और दिखाई भी. उन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. रामऔतार और सोमनाथ इस के पहले अर्मापुर स्थित फैक्ट्री की कालोनी में रहते थे. 3 साल पहले दोनों ने बर्रा क्षेत्र में जमीन खरीद ली थी और अपनेअपने मकान बना कर रहने लगे थे. मकान बदलने के बावजूद दोनों की दोस्ती में कमी नहीं आई थी. दोनों परिवार के लोगों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

रामऔतार का बेटा विनय और सोमनाथ का बेटा शैलेश बचपन के दोस्त थे. दोनों एकदूसरे के घर आतेजाते थे. विनय ने हाईस्कूल पास करने के बाद आईटीआई से मशीनिस्ट का कोर्स किया था. वह नौकरी की तलाश में था. जबकि शैलेश ड्राइवर बन गया था. वह बुकिंग की कार चलाता था.

शैलेश का एक अन्य दोस्त अर्श गुप्ता था. वह फरनीचर कारीगर था और गुजैनी गांव में रहता था. अर्श और शैलेश शराब के शौकीन थे. अकसर दोनों साथ पीते थे और लंबीलंबी डींग हांकते थे. उन दोनों ने विनय को भी शराब पीना सिखा दिया था. अब हर रविवार को शैलेश के घर शराब पार्टी होती थी. तीनों बारीबारी से पार्टी का खर्चा उठाते थे.

एक शाम खानेपीने के दौरान विनय ने शैलेश व अर्श को बताया कि उस की बहन रीता की शादी तय हो गई है. 27 अप्रैल को बारात आएगी. शादी में लगभग 10-12 लाख रुपया खर्च होगा. पिता व भाई ने रुपयों का इंतजाम कर लिया है. शादी की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. शैलेश व अर्श मामूली कमाने वाले युवक थे. वह शार्टकट से लखपति बनना चाहते थे. इस के लिए शैलेश उरई में पान मसाला का कारोबार करना चाहता था. उरई में वह जगह भी देख आया था. लेकिन कारोबार के लिए उस के पास पैसा नहीं था.

पैसा कहां से और कैसे आए, इस के लिए शैलेश और अर्श ने सिर से सिर जोड़ कर विचारविमर्श किया तो उन्हें विनय याद आया. विनय ने बताया था कि उस के यहां बहन की शादी है और घर वालों ने 10-12 लाख रुपए का इंतजाम किया है. दौलत की चाहत में शैलेश व अर्श ने दोस्त के साथ छल करने और फिरौती के रूप में 10 लाख रुपया वसूलने की योजना बनाई. संजीत हत्याकांड दोनों के जेहन में था. उसी तर्ज पर उन दोनों ने विनय की हत्या कर के उस के घर वालों से फिरौती वसूलने की योजना बनाई.

योजना के तहत 19 मार्च, 2021 की रात पौने 8 बजे शैलेश ने अर्श के मोबाइल से विनय प्रभाकर के मोबाइल पर काल की और पार्टी के लिए घर बुलाया. विनय की 5 दिन पहले ही लोहिया फैक्ट्री में नौकरी लगी थी. फैक्ट्री से वह साढ़े 7 बजे घर लौटा था कि 15 मिनट बाद शैलेश का फोन आ गया. पार्टी की बात सुन कर वह शैलेश के घर जाने को राजी हो गया.

रात 8 बजे विनय अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से बर्रा भाग 8 स्थित शैलेश के घर पहुंच गया. उस समय कमरे में शैलेश व अर्श गुप्ता थे और पार्टी का पूरा इंतजाम था. इस के बाद तीनों ने मिल कर खूब शराब पी. विनय जब नशे में हो गया तो योजना के तहत अर्श व शैलेश ने उसे दबोच लिया और उस की पिटाई करने लगे. विनय ने जब खुद को जाल में फंसा देखा तो वह भी भिड़ गया. कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. इसी बीच शैलेश ने कमरे में छिपा कर रखा बांका निकाला और विनय की गरदन पर वार कर दिया. विनय का गला कट गया और वह फर्श पर गिर पड़ा.

इस के बाद अर्श ने विनय को दबोचा और शैलेश ने उस की गरदन पर 2-3 वार और किए. जिस से विनय की गरदन आधी से ज्यादा कट गई और उस की मौत हो गई. हत्या करने के बाद उन दोनों ने शव को तोड़मरोड़ कर चादर व कंबल में लपेटा और फिर विनय की मोटरसाइकिल पर रख कर रिंद नदी में फेंक आए. वापस लौटते समय उन की बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया, इसलिए उन्होंने बाइक को खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ा कर दिया. फिर पैदल ही घर आ गए.

घर पर उन के स्वागत के लिए बर्रा पुलिस खड़ी थी, जिस से वे पकड़े गए. दरअसल, शैलेश की मां शीला ने ही कमरे में खून देख कर पुलिस को सूचना दी थी, जिस से पुलिस आ गई थी. 21 मार्च, 2021 को थाना बर्रा पुलिस ने आरोपी शैलेश प्रजापति व अर्श गुप्ता को  कोर्ट में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: हम मर जाएंगे – परिवार वालों ने किया जुदा

Crime Story: 22 फरवरी की सुबह 6 बजे रामपुर गांव के कुछ लोग मार्निंग वाक पर निकले तो उन्होंने पानी की टंकी के पास लिंक मार्ग से 50 मीटर दूर खेत में एक युवक को बुरी तरह से जख्मी हालत में पड़े देखा. युवक की जान बचाने के लिए उन में से किसी ने थाना खानपुर पुलिस को सूचना दे दी.

सूचना प्राप्त होते ही खानपुर थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचित कर दिया था. विश्वनाथ यादव जिस समय वहां पहुंचे, उस समय ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. भीड़ को परे हटाते हुए वह खेत में पहुंचे, जहां युवक जख्मी हालत में पड़ा था. युवक की उम्र 24 साल के आसपास थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी, जो आरपार हो गई थी. उस के एक हाथ में पिस्टल थी तथा दूसरी पिस्टल उस के पैर के पास पड़ी थी.

जामातलाशी में उस के पास से 2 मोबाइल फोन, आधार कार्ड तथा पुलिस विभाग का परिचय पत्र मिला, जिस में उस का नामपता दर्ज था. परिचय पत्र तथा आधार कार्ड से पता चला कि युवक का नाम अजय कुमार यादव है तथा वह बभरौली गांव का रहने वाला है. तुरंत उस के घर वालों को सूचना दे दी गई.

इंसपेक्टर विश्वनाथ यादव अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह, एएसपी गोपीनाथ सोनी तथा डीएसपी राजीव द्विवेदी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा युवक के पास से बरामद सामान का अवलोकन किया. देखने से ऐसा लग रहा था कि युवक ने आत्महत्या का प्रयास किया था. अब तक अजय के पिता रामऔतार यादव भी घटनास्थल आ गए थे. वह आत्महत्या की बात से सहमत नहीं थे.

चूंकि अजय यादव मरणासन्न स्थिति में था, अत: पुलिस अधिकारियों ने उसे इलाज हेतु तत्काल सीएचसी (सैदपुर) भिजवाया लेकिन वहां के डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और उसे बीएचयू ट्रामा सेंटर रैफर कर दिया. इलाज के दौरान अजय यादव की मौत हो गई. चूंकि अजय यादव सिपाही था, अत: उस की मौत को एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह ने गंभीरता से लिया. उन्होंने जांच के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में क्राइम ब्रांच, सर्विलांस टीम तथा स्वाट टीम को शामिल किया गया.

इस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर बरामद सामान को कब्जे में लिया. सर्विलांस सेल प्रभारी दिनेश यादव ने अजय के पास से बरामद दोनों फोन की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि 22 फरवरी की रात 3 बजे एक फोन से अजय के फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भेजा गया था, जिस में लिखा था, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

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जिस मोबाइल फोन से मैसेज भेजा गया था, उस फोन की जानकारी की गई तो पता चला कि वह मोबाइल फोन इचवल गांव निवासी राजेश सिंह की बेटी सोनाली सिंह के नाम दर्ज था. जबकि फोन मृतक अजय की जेब से बरामद हुआ था. अजय और सोनाली का क्या रिश्ता है? उस ने 3 बजे रात को अजय को मैसेज क्यों भेजा? जानने के लिए पुलिस टीम सोनाली सिंह के गांव इचवल पहुंची और उस के पिता राजेश सिंह से पूछताछ की.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह आज सुबह से गायब है. हम ने सैदपुर कैफे से उस की औनलाइन एफआईआर भी कराई है. राजेश सिंह ने एफआईआर की कौपी भी दिखाई. राजेश सिंह की बात सुन कर पुलिस टीम का माथा ठनका. राजेश सिंह को गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करानी थी, तो थाना खानपुर में करानी चाहिए थी. आनलाइन रिपोर्ट क्यों दर्ज कराई? दाल में जरूर कुछ काला था. यह औनर किलिंग का मामला हो सकता था. संभव था अजय और सोनाली सिंह प्रेमीप्रेमिका हों और इज्जत बचाने के लिए राजेश सिंह ने अपनी बेटी की हत्या कर दी हो.

ऐसे तमाम प्रश्न टीम के सदस्यों के दिमाग में आए तो उन्होंने शक के आधार पर राजेश सिंह के घर पर पुलिस तैनात कर दी. साथ ही पुलिस सानिया उर्फ सोनाली सिंह की भी खोज में जुट गई. अजय का मोबाइल फोन खंगालने पर उस का और सोनाली सिंह का विवाह प्रमाण पत्र मिला, जिस में दोनों की फोटो लगी थी.

प्रमाण पत्र के अनुसार दोनों 5 नवंबर, 2018 को कोर्टमैरिज कर चुके थे. इस प्रमाण पत्र को देखने के बाद पुलिस टीम का शक और भी गहरा गया. पुलिस टीम ने सोनाली सिंह के पिता राजेश सिंह व परिवार के 4 अन्य सदस्यों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. 23 फरवरी, 2021 की सुबह पुलिस टीम को इचवल गांव में राजेश सिंह के खेत में एक युवती की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. पुलिस टीम तथा अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे और लाश का निरीक्षण किया.

मृतका राजेश सिंह की 25 वर्षीय बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी. चेहरे को भी कुचला गया था. निरीक्षण के बाद पुलिस ने सोनाली सिंह के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गाजीपुर भेज दिया. शव के पास से पिस्टल या तमंचा बरामद नहीं हुआ, लेकिन एक जोड़ी मर्दाना चप्पल तथा टूटी हुई चूडि़यां जरूर मिलीं. चप्पलों की पहचान मृतक सिपाही अजय के घर वालों ने की. उन्होंने पुलिस को बताया कि चप्पलें अजय की थीं.

पुलिस टीम ने हिरासत में लिए गए राजेश सिंह से बेटी सोनाली सिंह की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो वह टूट गया और उस ने सोनाली सिंह तथा उस के प्रेमी अजय यादव की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. यही नहीं, उस ने हत्या में इस्तेमाल अजय यादव की बाइक यूपी81 एसी 5834 भी बरामद करा दी.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया सिपाही अजय यादव से प्यार करती थी और दोनों ने कोर्ट में शादी भी कर ली थी. तब अपनी इज्जत बचाने के लिए उस ने दोनों को मौत की नींद सुलाने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम सिंह को शामिल किया. इस के बाद पहले सानिया की हत्या की फिर अजय की. उस के बाद दोनों के शव अलगअलग जगहों पर डाल दिए.

पुलिस अजय की हत्या को आत्महत्या समझे, इसलिए उस के एक हाथ में पिस्टल थमा दी तथा बेटी का मोबाइल फोन अजय की जेब में डाल दिया, ताकि लगे कि अजय ने पहले सोनाली सिंह की गोली मार कर हत्या की फिर स्वयं गोली मार कर आत्महत्या कर ली. बेटी के शव के पास अजय की चप्पलें छोड़ना, सोचीसमझी साजिश का ही हिस्सा था. राजेश के बाद अन्य आरोपियों ने भी जुर्म कबूल कर लिया.

थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने डबल मर्डर का परदाफाश करने तथा आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थिति सभागार में प्रैसवार्ता की और आरोपियों को मीडिया के समक्ष पेश कर डबल मर्डर का खुलासा कर दिया.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने मृतक के पिता रामऔतार यादव की तहरीर पर धारा 302 आईपीसी के तहत राजेश सिंह, अवधराज सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह तथा नीलम सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, उस में दोनों की हत्याओं की वजह मोहब्बत थी.

गाजीपुर जिले के खानपुर थाना अंतर्गत एक गांव है इचवल कलां. इसी गांव में ठाकुर राजेश सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी नीलम सिंह के अलावा बेटा दीपक सिंह तथा बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. राजेश सिंह के पिता अवधराज सिंह भी उन के साथ रहते थे. पितापुत्र दबंग थे. गांव में उन की तूती बोलती थी. उन के पास उपजाऊ जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

राजेश सिंह की बेटी सोनाली उर्फ सानिया सुंदर, हंसमुख व मिलनसार थी. पढ़ाई में भी तेज थी. वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजकीय डिग्री कालेज सैदपुर से बीए की डिग्री हासिल कर चुकी थी और बीएड की तैयारी कर रही थी. दरअसल, सानिया टीचर बन कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. इसलिए वह कड़ी मेहनत कर रही थी.

सानिया उर्फ सोनाली के आकर्षण में गांव के कई युवक बंधे थे. लेकिन अजय कुमार यादव कुछ ज्यादा ही आकर्षित था. सानिया भी उसे भाव देती थी. सानिया और अजय की पहली मुलाकात परिवार के एक शादी समारोह में हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हो गए थे. इस के बाद जैसे जैसे उन की मुलाकातें बढ़ती गईं, वैसेवैसे उन का प्यार बढ़ता गया.

अजय कुमार यादव के पिता रामऔतार यादव सानिया के पड़ोस के गांव बभनौली में रहते थे. वह सीआरपीएफ में कार्यरत थे. लेकिन अब रिटायर हो गए थे और गांव में रहते थे. उन की 5 संतानों में 4 बेटियां व एक बेटा था अजय कुमार. बेटियों की वह शादी कर चुके थे और बेटा अजय अभी कुंवारा था. रामऔतार यादव, अजय को पुलिस में भरती कराना चाहते थे, सो वह उस की सेहत का खास खयाल रखते थे. अजय बीए पास कर चुका था और पुलिस भरती की तैयारी कर रहा था. उस ने पुलिस की परीक्षा भी दी.

एक दिन अजय ने सानिया के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह गहरी सोच में डूब गई. कुछ देर बाद वह बोली, ‘‘अजय, मुझे तुम्हारा शादी का प्रस्ताव तो मंजूर है, लेकिन मुझे डर है कि हमारे घर वाले शादी को कभी राजी नही होंगे.’’

‘‘क्यों राजी नही होंगे?’’ अजय ने पूछा.

‘‘क्योंकि मैं ठाकुर हूं और तुम यादव. मेरे पिता कभी नहीं चाहेंगे कि ठाकुर की बेटी यादव परिवार में दुलहन बन कर जाए. मूंछ की लड़ाई में वह कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं.’’

‘‘घर वाले राजी नहीं होंगे, फिर तो एक ही उपाय है कि हम दोनों कोर्ट में शादी कर लें.’’

‘‘हां, यह हो सकता है.’’ सानिया ने सहमति जताई.

इस के बाद 5 नवंबर, 2018 को सानिया उर्फ सोनाली और अजय कुमार ने गाजीपुर कोर्ट में कोर्टमैरिज कर के विवाह प्रमाण पत्र हासिल कर लिया. कोर्ट मैरिज करने की जानकारी सानिया के घर वालों को नहीं हुई, लेकिन अजय के घर वालों को पता था. उन्होंने सानिया को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया.

दिसंबर, 2018 में अजय का चयन सिपाही के पद पर पुलिस विभाग में हो गया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग अमेठी जिले के गौरीगंज थाने में हुई. अजय और सानिया की मुलाकातें चोरीछिपे होती रहती थीं. मोबाइल फोन पर भी उन की बातें होती रहती थीं. कोर्ट मैरिज के बाद उन का शारीरिक मिलन भी होने लगा था. इस तरह समय बीतता रहा.

जनवरी, 2021 के पहले हफ्ते में राजेश सिंह को अपनी पत्नी नीलम सिंह व बेटे दीपक सिंह से पता चला कि सानिया पड़ोस के गांव बभनौली के रहने वाले युवक अजय यादव से प्रेम करती है और दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली है. दरअसल, नीलम सिंह ने बेटी को देर रात अजय से मोबाइल फोन पर बतियाते पकड़ लिया था. फिर डराधमका कर सारी सच्चाई उगलवा ली थी. यह जानकारी नीलम ने पति व बेटे को दे दी थी.

राजेश सिंह ठाकुर था. उसे यह गवारा न था कि उस की बेटी यादव से ब्याही जाए, अत: उस ने सानिया की जम कर पिटाई की और घर से बाहर निकलने पर सख्त पहरा लगा दिया. नीलम हर रोज डांटडपट कर तथा प्यार से बेटी को समझाती लेकिन सानिया, अजय का साथ छोड़ने को राजी नहीं थी. 21 फरवरी को अजय की चचेरी बहन की सगाई थी. वह 15 दिन की छुट्टी ले कर अपने गांव बभनौली आ गया. सिपाही अजय के आने की जानकारी राजेश सिंह को हुई तो उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम के साथ गहन विचारविमर्श किया.

जिस में तय हुआ कि पहले अजय व सानिया को समझाया जाए, न मानने पर दोनों को मौत के घाट उतार दिया जाए. अवैध असलहा घर में पहले से मौजूद था. योजना के तहत 22 फरवरी की रात 3 बजे राजेश सिंह व नीलम सिंह ने सानिया को धमका कर सिपाही अजय यादव के मोेबाइल फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भिजवाया, जिस में लिखा, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

अजय ने मैसेज पढ़ा, तो उसे लगा कि सानिया मुसीबत में है. अत: वह अपनी मोटरसाइकिल से सानिया के गांव इचबल की ओर निकल पड़ा. इधर मैसेज भिजवाने के बाद राजेश सिंह, नीलम सिंह, दीपक सिंह, अवधराज सिंह व अंकित सिंह ने सानिया उर्फ सोनाली को अजय का साथ छोड़ने के लिए हर तरह से समझाया. लेकिन जब वह नहीं मानी तो राजेश सिंह ने उसे गोली मार दी. फिर लाश को घर में छिपा दिया.

कुछ देर बाद अजय आया, तो उसे भी समझाया गया. लेकिन वह ऊंचे स्वर में बात करने लगा. इस पर वे सब अजय को बात करने के बहाने गांव के बाहर अंबिका स्कूल के पास ले गए. वहां अजय सानिया को अपनी पत्नी बताने लगा तो उन सब ने उसे दबोच लिया और पिस्टल से उस के सिर में गोली मार दी और मरा समझ कर रामपुर गांव के पास सड़क किनारे खेत में फेंक दिया. एक पिस्टल उस के हाथ में पकड़ा दी तथा दूसरी उस के पैर के पास डाल दी. सानिया का मोबाइल फोन भी अजय की पाकेट में डाल दिया. इस के बाद वे सब वापस घर आए और सानिया का शव घर के पीछे गेहूं के खेत में फेंक दिया. अजय की चप्पलें भी शव के पास छोड़ दीं.

सुबह राजेश व नीलम ने पड़ोसियों को बताया कि उन की बेटी सानिया बिना कुछ बताए घर से गायब है. फिर सैदपुर कस्बा जा कर कैफे से औनलाइन एफआईआर दर्ज करा दी. उधर रामपुर गांव के कुछ लोगों ने युवक को मरणासन्न हालत में देखा तो पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने काररवाई शुरू की तो डबल मर्डर की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

24 फरवरी, 2021 को थाना खानपुर पुलिस ने अभियुक्त राजेश सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह, अवधराज सिंह तथा नीलम सिंह को गाजीपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

MP Crime: काली करतूतों से बुने रंगीन सपने

MP Crime: मीनाक्षी ने खुशहाल परिवार के व्यवसाई मनीष से प्रेम विवाह किया था. फिर ऐसा क्या हुआ कि यार के साथ मिल कर उसे पति की हत्या करानी पड़ी.

भोर की लालिमा फैलनी शुरू हुई ही थी कि उज्जैन के महाकाल मंदिर से उठते आरती के स्वर फिजा में गूंजने लगे. रोजाना की तरह घंटेघडि़यालों की गूंज के बीच इस दिन यानी 18 अगस्त, 2015 को भी उज्जैन अंगड़ाई लेने लगा. शहर की विवेकानंद कालोनी के विष्णुनगर की रहने वाली मीनाक्षी भी मंदिर से आने वाली आवाज सुन कर जाग गई. अब लेटे रहना उस के वश में नहीं था. उस ने जल्दी से बिस्तर छोड़ दिया.

आमतौर पर सुबहसुबह के इस शोर से जागने के बाद मीनाक्षी चिड़चिड़ा उठती थी लेकिन वह दिन उस के लिए कुछ खास था, तभी तो उसे पहली बार मंदिर के घंटों की आवाज मधुर लग रही थी. फ्रैश होने के लिए वह बाथरूम में घुस गई और करीब आधे घंटे बाद जब बाहर निकली तो उस का पति मनीष पहले की तरह गहरी नींद में सो रहा था. अपने गीले बालों का जूड़ा बांधते हुए उस ने पति को झकझोरते हुए उठाया. मनीष अलसाया सा उठ गया. उसे भी अपने औफिस जाना था इसलिए वह भी जाने की तैयारी में जुट गया. मीनाक्षी घर के रोजाना के काम करने लगी. काम निपटातेनिपटाते करीब साढ़े 9 बज गए.

सुबह के 10 बजने को थे. मनीष और मीनाक्षी दोनों के काम पर जाने का वक्त हो चुका था. इसलिए दोनों एक ही कमरे में तैयार हो रहे थे. इसी दौरान कंघी करते मनीष ने आईने में अपने पीछे खड़ी मीनाक्षी को कुरता पहनते देखा तो उसे शरारत सूझी. उसे छेड़ने के लिए वह पीछे मुड़ा ही था कि इस बीच मीनाक्षी का मोबाइल बज उठा. रिंगटोन सुन कर मीनाक्षी ने हवा में उठी अपनी बांहें नीचे झुका लीं. इस से मनीष अपनी सोची शरारत अधूरी रह जाने से मन मसोस कर रह गया.

‘‘हैलो, हां बस 5 मिनट में निकलने वाली हूं.’’ कहते हुए मीनाक्षी ने मोबाइल पर बात खत्म की और जल्दी से कपड़े ठीक करने के बाद पैरों में सैंडिल डालते हुए बोली, ‘‘तुम तैयार हो मनीष?’’

‘‘हां.’’ मनीष ने भी कह दिया.

‘‘तो चलो.’’ कहते हुए मीनाक्षी कमरे से बाहर आ गई. मनीष भी कमरे से निकल आया तो मीनाक्षी ने दरवाजे पर ताला लगाया और पास बैठे सासससुर को उपेक्षा की नजर से देखती हुई मनीष के साथ घर से बाहर निकल गई.

मनीष मीणा उज्जैन की विवेकानंद कालोनी में रहने वाले आर.के. मीणा का एकलौता बेटा था. उज्जैन के टावर चौराहे के पास वसावड़ा पैट्रोल पंप के पीछे की गली में वह श्रीजी नाम से एक फाइनैंस कंपनी चलाता था. जबकि मीनाक्षी बेगमगंज इलाके में स्थित अरुणोदय सर्वेश्वरी कल्याण समिति नाम के एनजीओ में काम करती थी. पतिपत्नी दोनों सुबह एक साथ स्कूटी पर घर से निकलते थे.

मनीष को टावर चौराहे पर उस के औफिस छोड़ कर मीनाक्षी अपने औफिस चली जाती थी. उस रोज भी वह हमेशा की तरह स्कूटी चला रही थी और मनीष पीछे बैठा था. हवा के झोंकों में उड़ते मीनाक्षी के खुले बाल मनीष के चेहरे से टकरा कर उस के मन में अजीब सी हलचल पैदा कर रहे थे. इस से रोमांचित हो कर मनीष ने अपनी बाहें पत्नी की कमर में डाल दीं. तभी मीनाक्षी ने उसे रूखे स्वर में टोका, ‘‘हम अपने कमरे में नहीं, सड़क पर हैं.’’

‘‘जानता हूं, मैं तुम्हें भगा कर नहीं लाया, बैंडबाजे के साथ तमाम लोगों के सामने ब्याह कर लाया हूं.’’ मनीष ने शरारत से कहा.

‘‘मुझे भी पता है. लेकिन शादीशुदा होने का मतलब यह तो नहीं कि सड़क पर ही कपड़े उतार दूं.’’ मीनाक्षी ने चिढ़ कर कहा.

मीनाक्षी के इस व्यवहार पर मनीष को गुस्सा आ गया. उस ने अपने हाथ वापस खींच लिए. इस के बाद वह टावर चौराहे तक न केवल चुप रहा, बल्कि मीनाक्षी ने जब स्कूटी रोकी तो बिना उस की ओर देखे अपने औफिस की तरफ चल पड़ा तो मीनाक्षी बोली, ‘‘सुनो, नाराज हो गए क्या?’’

मनीष कुछ नहीं बोला तो मीनाक्षी ने फिर पूछा, ‘‘नाराज हो गए?’’ मनीष फिर भी चुप रहा. इस पर मीनाक्षी ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा बाबा, आज शाम को जल्दी घर आ जाऊंगी. फिर अपनी सारी नाराजगी दूर कर लेना, ओके.’’

मनीष हलके से मुसकरा दिया और वापस मुड़ कर औफिस की तरफ चल पड़ा. उस के जाते ही स्कूटी मोड़ कर मीनाक्षी भी आगे बढ़ गई. कुछ दूरी पर जा कर उस ने सड़क के किनारे स्कूटी खड़ी कर के पीछे मुड़ कर मनीष की तरफ देखा. इस के बाद मोबाइल पर कोई नंबर डायल कर के 2-3 सेकेंड बात की और फिर तेजी से स्कूटी चला कर वहां से चली गई.

इधर मनीष ने रोज की तरह अपने औफिस से पहले पड़ने वाली चाय की एक दुकान पर चाय पी. इस के बाद वह पैट्रोल पंप के पास की गली में घुस गया. उस का औफिस उसी गली में था. उस समय सुबह के करीब साढ़े 10 बजे थे. वह औफिस पहुंच पाता, उस से पहले ही किसी ने उसे गोली मार दी. गली के दुकानदार मनीष को जानते थे. जैसे ही लोगों को इस घटना का पता चला, लोग वहां जमा हो गए और किसी ने फोन द्वारा इस की सूचना थाना माधोनगर को दे दी.

किसी को गोली मारने की खबर पा कर थानाप्रभारी एम.एस. परमार कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पता चला कि मनीष मीणा के सिर पर नजदीक से गोली मारी गई है. थानाप्रभारी ने गंभीर रूप से घायल मनीष को सिविल अस्पताल भेज दिया और घटना की जानकारी एसपी एम.एस. वर्मा, एएसपी अमरेंद्र सिंह और एसपी (सिटी) विजय डाबर को दे दी. थानाप्रभारी को किसी तरह मनीष की पत्नी और उस के घर वालों के फोन नंबर हासिल हो गए तो उन्होंने उन्हें भी फोन कर के अस्पताल बुला लिया. थानाप्रभारी को लोगों ने बताया कि गोली चलने की आवाज सुन कर जब वे दुकानों से बाहर आए तो उन्होंने एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 युवकों को जाते देखा था.

घटनास्थल पर 7.65 एमएम कारतूस का एक खाली खोखा मिला. पुलिस को लगा कि यह हमलावरों द्वारा चलाई गई गोली का ही होगा. कुछ ही देर में एसपी, एएसपी और सीएसपी भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने भी घटना के बारे में लोगों से बात की. पुलिस द्वारा सूचना देने के कुछ देर में ही मनीष की पत्नी मीनाक्षी अस्पताल पहुंच गई. गंभीर अवस्था में घायल पति को अस्पताल में देख कर मीनाक्षी जोरजोर से रोने लगी. रोतेरोते ही वह बेहोश हो गई. उसी समय मनीष के मातापिता भी अस्पताल पहुंच गए.

मनीष की हालत इतनी गंभीर थी कि पुलिस उस का बयान तक नहीं ले सकती थी. डाक्टरों की टीम आईसीयू में उस का उपचार करने में लगी थी. बहरहाल पुलिस ने हत्या की कोशिश करने का मामला दर्ज कर घटना की जांच शुरू कर दी. उस गली में कुछ सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस ने उन कैमरों की फुटेज देखी तो उस में 2 लड़के मोटरसाइकिल पर दिखाई तो दे रहे थे, लेकिन तसवीर इतनी धुंधली थी कि न तो उन के चेहरे पहचाने जा सके और न ही मोटरसाइकिल का नंबर.

इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हमलावर काफी शातिर रहे होंगे. उधर मनीष की न तो बेहोशी टूट रही थी और न ही पुलिस को जांच की कोई दिशा मिल रही थी. चूंकि मनीष फाइनैंस एजेंसी के अलावा विवादित प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त भी करता था. इसलिए पुलिस को लग रहा था कि उस की हत्या के पीछे कोई प्रौपर्टी विवाद हो सकता है. इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए पुलिस इस बात की जांच की कि वह किनकिन लोगों से ज्यादा मिलताजुलता था और उस ने कौनकौन से विवादित प्रौपर्टी का सौदा किया था.

एसपी एम.एस. वर्मा ने साइबर सेल प्रभारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को मृतक और उस से जुड़े लोगों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स की जांच करने की जिम्मेदारी सौंप दी. दीपिका शिंदे सेल के आरक्षक राहुल कुशवाहा के साथ इस काम में जुट गईं. दीपिका शिंदे ने सब से पहले मृतक मनीष के अलावा उस की पत्नी मीनाक्षी के मोबाइल नंबरों की भी काल डिटेल्स निकाल कर उस की स्कैनिंग की.

जांच में पता चला कि मनीष को टावर चौराहे पर छोड़ने के बाद मीनाक्षी ने जिस नंबर पर बात की थी, घटना के कुछ समय बाद उसी नंबर से मीनाक्षी के पास भी फोन आया था. इंसपेक्टर शिंदे ने दोनों फोन के समय के साथ मीनाक्षी के अस्पताल पहुंचने के समय का मिलान किया तो यह बात सामने आई कि पति को गोली मारे जाने की सूचना मिलने पर मीनाक्षी आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम समय में ही अस्पताल पहुंच गई थी.

मीनाक्षी जिस एनजीओ में नौकरी करती थी, इंसपेक्टर शिंदे ने उस एनजीओ के संचालक से पूछताछ की तो पता चला कि मीनाक्षी उस रोज सुबह 10 बज कर 35 मिनट पर औफिस पहुंची थी और केवल 5 मिनट रुक कर वापस चली गई थी. इधर पुलिस जांच में कड़ी से कड़ी जोड़ने की कोशिश कर रही थी. घटना को हुए 3 दिन बीत चुके थे. मीनाक्षी पुलिस पर दबाव बनाने के लिए कुछ लोगों के साथ आईजी औफिस गई.

पति के हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग को ले कर उस ने आईजी औफिस का घेराव करने की कोशिश की. पुलिस अधिकारियों ने किसी तरह उसे समझाया. उस के हंगामे को देखते हुए वह खुद पुलिस के शक के दायरे में आ गई. इसी के मद्देनजर आरक्षक राहुल कुशवाहा मीनाक्षी के फोन को सर्विलांस पर लगा कर उस की निगरानी करने लगे. इस से यह पता लग रहा था कि वह फोन पर किसकिस से बातें कर रही थी.

कुशवाहा मीनाक्षी के हर मूवमेंट की जानकारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को दे रहे थे. इस से यह बात निकल कर सामने आ रही थी कि मनीष भले ही अस्पताल में जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहा था, लेकिन मीनाक्षी ने घटना के पहले और बाद में जिस मोबाइल नंबर पर बात की थी, उसी नंबर पर उस की अब भी लगातार लंबीलंबी बातें हो रही थीं. वह मोबाइल नंबर हनीफ का था.

जबकि घटना के बाद से 2 दिन तक मीनाक्षी अस्पताल नहीं आई थी. मनीष के मातापिता ही उस की देखभाल कर रहे थे. पुलिस ने जब उन से मीनाक्षी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मीनाक्षी मनीष की जान बचाने के लिए घर पर रह कर 48 घंटे की अखंड पूजा कर रही है. उस का कहना था कि पूजा के बाद वह महाकाल से अपने पति को मौत के मुंह से वापस ले आएगी. लेकिन घटना के पांचवे रोज ही मनीष जिंदगी की जंग हार गया. उस की मौत के बाद पुलिस ने इस मामले में हत्या की धारा जोड़ कर जांच आगे बढ़ाई.

पुलिस को यह बात हजम नहीं हुई थी कि एक ओर तो वह अस्पताल में पति को उस के हाल पर छोड़ कर घर में थी, वहीं दूसरी ओर मोबाइल पर उस की किसी से लंबीलंबी बातें चल रहीं थी. इंसपेक्टर शिंदे ने एसपी एम.एस. वर्मा के सामने मीनाक्षी पर अपनी शंका व्यक्त की तो एसपी ने मीनाक्षी से पूछताछ करने के निर्देश दिए. एसपी के निर्देश पर पुलिस टीम मीनाक्षी के घर पहुंची तो मनीष के पिता ने मीनाक्षी को थाने ले जाने पर कड़ा विरोध जताया. लेकिन पुलिस ने उन की एक न सुनी. पुलिस मीनाक्षी को साइबर सेल ले आई. जैसे ही मीनाक्षी साइबर सेल पहुंची, आरक्षक राहुल ने उसे देखते ही पहचान लिया. क्योंकि उन्होंने उसे इसी साल अप्रैल महीने में अंबरनगर कालोनी के एक सूने मकान में अपने प्रेमी हनीफ के संग रंगरलियां मनाते पकड़ा था. तब मीनाक्षी के पति को भी साइबर सेल बुलाया गया था.

जिस युवक के साथ उसे पकड़ा गया था, वह मीनाक्षी के साथ एनजीओ में काम करता था. काल डिटेल्स से पता चला कि इसी हनीफ के साथ मीनाक्षी की फोन पर लंबीलंबी बातें हो रही थीं. इस बात की जानकारी मिलते ही पुलिस की एक टीम हनीफ की तलाश में उस के एनजीओ के औफिस पहुंची. पुलिस को देख कर हनीफ डर गया. उस ने झट से अपने मोबाइल का सिम और मेमोरी कार्ड निकाल कर अपने मुंह में छिपा लिया. लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया था. पुलिस ने हनीफ को हिरासत में ले कर उस के मुंह से सिमकार्ड और डाटा कार्ड निकलवा कर बरामद कर लिया.

जांच में यह भी पता चला कि घटना वाले दिन एनजीओ के हाजिरी रजिस्टर में हनीफ के औफिस आने का समय साढ़े 11 बजे का लिखा था, जिसे ओवर राइट कर के साढ़े 10 बनाया गया था. मनीष को गोली साढ़े 10 बजे के करीब मारी गई थी. इस से पुलिस समझ गई कि वह साढ़े 10 बजे औफिस में नहीं था. लेकिन उस ने अपनी मौजूदगी औफिस में दिखाने के लिए रिकौर्ड में छेड़खानी की कोशिश की थी. पुलिस हनीफ को हिरासत में ले कर साइबर सेल आ गई. उन दोनों से पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने यह बात तो स्वीकार कर ली कि उन के आपस में प्रेमसंबंध हैं, लेकिन मनीष की हत्या की बात से दोनों मुकर गए.

काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस को पता लग गया था कि जिस वक्त मनीष को गोली मारी गई थी, उस वक्त हनीफ के फोन की लोकेशन टावर चौराहे के पास थी. जबकि मनीष उस समय अपनी उपस्थिति अपने औफिस की बता रहा था. इस के बाद पुलिस ने उन दोनों से सख्ती से पूछताछ की. फलस्वरूप दोनों ने मनीष की हत्या की बात स्वीकार करते हुए पूरी कहानी सिलसिलेवार सुना दी, जो इस प्रकार निकली. विवेकानंद कालोनी निवासी आर.के. मीणा के एकलौते बेटे मनीष की करीब 5 साल पहले मीनाक्षी से मुलाकात हुई थी. दरअसल मनीष पहले एक एनजीओ चलाता था. मीनाक्षी उसी के एनजीओ में काम करती थी. मीनाक्षी तराना की रहने वाली थी. रोजरोज तराना से औफिस आनेजाने में उसे बड़ी परेशानी होती थी. इसलिए वह उज्जैन में किराए का मकान ले कर अकेली रहने लगी. यह बात मनीष भी जानता था.

मनीष उस का बौस था, सो वह मीनाक्षी के अकेलेपन का फायदा उठा कर उस के नजदीक आने की कोशिश करने लगा. इस में वह सफल भी हो गया. दरअसल मीनाक्षी को पता था कि मनीष एक रईस मातापिता की एकलौती संतान है. उसे लगा कि मनीष से मोहब्बत कर के उसे बड़ा फायदा हो सकता है, इसलिए उस ने मनीष के लिए अपने तनमन की लगाम ढीली छोड़ दी. इस के बाद उन दोनों के बीच की दूरियां कुछ ही मुलाकातों में खत्म हो गईं. मीनाक्षी मनीष के दिल और दिमाग पर छा गई.

मनीष के घर वाले बेटे के लिए किसी शरीफ परिवार की बहू चाहते थे. लेकिन जब उन्हें बेटे के द्वारा पता चला कि वह अपने ही औफिस में काम करने वाली मीनाक्षी को चाहता है तो उस की खुशी देख कर उन्होंने अपनी रजामंदी दे दी. इस तरह 2 साल पहले मीनाक्षी अपने बौस की पत्नी बन कर उस के घर आ गई.

चूंकि दोनों का प्रेमविवाह था, इसलिए शादी के बाद का शुरुआती वक्त तो पंख लगा कर बीत गया. शादी के कुछ समय बाद मनीष ने एनजीओ बंद कर के टावर चौराहे के पास श्रीजी फाइनैंस कंपनी खोल ली. कंपनी के माध्यम से मनीष केवल लोगों को विभिन्न बैंकों से लोन ही नहीं दिलवाता था, बल्कि उस ने विवादित प्रौपर्टी की खरीद- फरोख्त का काम भी शुरू कर दिया था.

मीनाक्षी चाहती तो अपने पति की कंपनी में सहयोग कर सकती थी, लेकिन उस ने ऐसा न कर के बेगमगंज इलाके में स्थित अरुणोदय सर्वेश्वरी कल्याण समिति नामक एनजीओ में नौकरी कर ली. मनीष ने मीनाक्षी के इस फैसले का विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि वह अपनी फाइनैंस कंपनी के माध्यम से न केवल ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी कर रहा था, बल्कि विवादित प्रौपर्टियों में भी रुचि ले रहा था. इसलिए वह मीनाक्षी को कंपनी से दूर ही रखना चाहता था.

उस की योजना मीनाक्षी के लिए नया एनजीओ खुलवा कर लाखों कमाने की थी. लेकिन पति से अलग रह कर नौकरी करते हुए मीनाक्षी की मुलाकात खंदार मोहल्ले में रहने वाले हनीफ से हुई. हनीफ एकदूसरे एनजीओ में काम करता था. मुलाकात के बाद वे वाट्सएप के माध्यम से अपने विचारों का आदानप्रदान करते रहे. उन के बीच गहरी दोस्ती हो गई. दोनों दिनभर एकदूसरे के संपर्क में रहने लगे. फिर रोज ही उन की मुलाकातें होने लगीं.

मीनाक्षी बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी थी. अपने बारे में बढ़ाचढ़ा कर बातें करना उस की आदत में शुमार था. उस ने हनीफ को भी यही बताया था कि मनीष करोड़पति है और उस की ज्यादातर प्रौपर्टी मेरे ही नाम पर है. हनीफ मीनाक्षी जैसी कितनी लड़कियों को रंगीन सपने दिखा कर उन का शारीरिक शोषण कर चुका था. इसलिए उसे लगा कि मीनाक्षी के हाथ आने पर वह आसानी से करोड़पति बन सकता है. उस ने मीनाक्षी के नजदीक आने की कोशिश करनी शुरू कर दी.

2 साल पहले मनीष के साथ मोहब्बत की कमसें खाने और उस से प्रेमविवाह करने वाली मीनाक्षी ने भी अपनी तरफ बढ़ते हनीफ के कदमों को रोकने की कोशिश नहीं की. इस बीच मीनाक्षी और हनीफ के बीच शारीरिक रिश्ते भी कायम हो गए. इस के बाद तो मीनाक्षी को मनीष में 50 कमियां और हनीफ में हजार अच्छाइयां नजर आने लगीं.

हनीफ दूसरे एनजीओ में काम करता था, इसलिए दोनों का आसानी से मिलना संभव नहीं हो पाता था. इसलिए मीनाक्षी ने उस की नौकरी अपने ही एनजीओ में लगवा दी. इस से दोनों का मिलना काफी आसान हो गया. काम के नाम पर हनीफ और मीनाक्षी औफिस से बाहर निकल जाते. इस के बाद हनीफ मीनाक्षी को ले कर अपने एक दोस्त के कमरे पर चला जाता. वहीं पर दोनों अपनी हसरतें पूरी करते. हसरतें पूरी कर के वह औफिस आ जाते थे.

इस तरह धीरेधीरे मीनाक्षी मनीष से दूर हो कर हनीफ के पास होती गई. लेकिन इन का खेल ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सका. हुआ यह कि हनीफ अकसर मीनाक्षी को ले कर अंबरनगर स्थित अपने एक दोस्त के कमरे पर जाता था. लेकिन रोजरोज का यह खेल मोहल्ले वालों की नजरों में आ गया. अप्रैल, 2015 में जब एक दिन मीनाक्षी और हनीफ उस दोस्त के यहां गए तो मोहल्ले वालों ने दोनों को पकड़ कर पुलिस को खबर कर दी. पुलिस आने पर विवाद की स्थिति बन गई. खबर मिलने पर मीनाक्षी का पति भी वहां आ गया. तब मीनाक्षी का कहना था कि वह अपने दोस्त के घर खाना खाने आई थी. बहरहाल पुलिस ने उन्हें हिदायत दे कर छोड़ दिया.

मीनाक्षी ने मनीष को लाख सफाई देने की कोशिश की, लेकिन मनीष समझ गया था कि मीनाक्षी जैसी लड़की केवल खाना खाने के लिए तो ऐसे गंदे माहौल में नहीं जा सकती. वह कभी अंडे को हाथ तक नहीं लगाती थी. वह हनीफ का मन रखने के लिए मांसाहार कैसे कर सकती है. घर पहुंच कर मनीष ने गुस्से में मीनाक्षी की पिटाई कर दी. इतना ही नहीं, उस ने मीनाक्षी को चेतावनी भी दे दी कि उस के 1-2 दोस्त जेल में बंद हैं, जिन के बाहर आते ही वह हनीफ को ठिकाने लगवा देगा. मीनाक्षी पति की आदत और पहुंच को जानती थी. इसलिए उसे विश्वास था कि वह हनीफ को जरूर मरवा देगा. इसलिए वह फिर हनीफ से मिली और उस ने उसे बता दिया कि मनीष उस की हत्या करवा सकता है.

हनीफ डर गया. उस के सोचा कि इस से पहले मनीष उस के खिलाफ कोई कदम उठाए, क्यों न मनीष को ही ठिकाने लगा दिया जाए. उस ने मीनाक्षी को अपनी योजना बताई तो वह राजी हो गई. क्योंकि वह जानती थी कि एक बार मनीष की नजरों में गिरने के बाद अब वह उस घर में कभी अपनी पुरानी हैसियत नहीं पा सकती. तब हनीफ ने मीनाक्षी को सलाह दी कि वह मनीष के साथ गहरे प्यार का नाटक कर उस का मकान और जायजाद सब अपने नाम करवा ले, ताकि मनीष की हत्या के बाद उस के मातापिता को घर से निकाल कर दोनों आपस में निकाह कर आराम से रह सकें.

मीनाक्षी को भी प्रेमी की बात पसंद आ गई. इसलिए घटना से कुछ दिनों पहले जब मनीष ने 35 लाख की एक जमीन खरीदी तो मीनाक्षी ने जिद कर के उस की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली. इस के बाद हनीफ और मीनाक्षी ने मिल कर मनीष की हत्या की फूलप्रूफ योजना बनाई. इस के लिए हनीफ ने 2 महीने तक मनीष के औफिस के चारों तरफ रैकी कर गली में गोली मारने का फैसला किया. मीनाक्षी और मनीष जानते थे कि हत्या के बाद मीनाक्षी की काल डिटेल्स भी निकाली जाएगी, जिस के चलते हनीफ और मीनाक्षी से पुलिस पूछताछ कर सकती है. इसलिए पुलिस के सभी संभावित प्रश्नों के जवाब भी उन्होंने पहले से ही तैयार कर लिए थे.

यह सब करने के बाद हनीफ ने अपनी मौसी के लड़के रिजवान को साथ देने के लिए तैयार किया. दोनों ने कई बार मनीष की गली से मोटरसाइकिल ले कर तेजी से निकलने की प्रैक्टिस की. अंतत: परफेक्ट हो जाने के बाद 18 अगस्त, 2015 को हनीफ ने मनीष की हत्या कर दी. इतनी फूलप्रूफ योजना के तहत हत्या करने के बावजूद भी आखिर वे पुलिस के चंगुल में फंस ही गए. काली करतूतों की बुनियाद पर रंगीन सपने सजाने वाले हनीफ और मीनाक्षी से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर के सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: जयपुर की रेव पार्टी – बेटे के कंलक से आहत गुलाबो

True Crime Story: अपने कालबेलिया डांस से दुनिया भर में पहचान बनाने वाली गुलाबो की नृत्य कला वाकई अनूठी है. इसी के बूते पर उस ने दौलत और शोहरत अर्जित की, लेकिन उस के बेटे भवानी सिंह ने फार्महाउस पर रेव पार्टी कर के मां को शर्मसार तो किया ही, कानून के पचड़े में भी फंसा दिया.

उस दिन तारीख थी 31 अगस्त. रात काफी गहरा गई थी. घड़ी की सूइयों ने कुछ ही देर पहले 12 बजाए थे. कैलेंडर के हिसाब से 1 सितंबर की तारीख शुरू हो चुकी थी. जयपुर के पुलिस कमिश्नर जंगा श्रीनिवास राव अपने सरकारी आवास पर बैडरूम में लेटे सोने की तैयारी कर रहे थे. दिन भर की भागदौड़ और औफिस में लंबी सिटिंग से वह बुरी तरह थक चुके थे. बैडरूम की दीवार पर लगे टीवी पर दिन भर की खबरें चल रही थीं. उस समय करीब सभी चैनलों पर सब से ज्यादा चर्चित शीना मर्डर केस और इंद्राणी की खबरें आ रही थीं. हालांकि शीना मर्डर केस 2-3 दिनों से मीडिया में हौट बना हुआ था. उस दिन नई बात यह थी कि इंद्राणी कोर्ट में बेहोश हो गई थीं.

सीनियर आईपीएस औफिसर होने के नाते जंगा के दिमाग में इंद्राणी केस को ले कर कई तरह के सवाल उमड़घुमड़ रहे थे. साथ ही वह आजकल के सामाजिक पतन के बारे में भी सोच रहे थे. उन की सोच का दायरा उन हाईप्रोफाइल लोगों के इर्दगिर्द सिमटा था, जो धनदौलत, अय्याशी और शोहरत के लिए अपने खून के रिश्तों को भी तारतार करने में पीछे नहीं रहते.

टीवी बंद कर के राव बिस्तर पर लेट गए और आंखें मूंद कर सोने का प्रयास करने लगे. तभी उन के मोबाइल पर एक काल आई. नंबर अनजाना था. फिर भी उन्होंने फोन रिसीव करते हुए कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘पुलिस कमिश्नर साहब बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘हां, मैं पुलिस कमिश्नर बोल रहा हूं.’’ राव ने शालीनता से कहा.

‘‘सर, जयपुर में एक नामी महिला के फार्महाउस पर रेव पार्टी हो रही है, जिस में विदेशी महिलाएं भी आई हुई हैं. उन के साथ कई युवक हैं, सब के सब पैसे वालों की बिगड़ी औलादें.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘आप कौन बोल रहे हैं और यह पार्टी हो कहां रही है?’’ पुलिस कमिश्नर ने फोन करने वाले से पूछा.

‘‘सर, मुझे अपना शुभचिंतक समझ लीजिए. नाम बताने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि आप के पास मेरा मोबाइल नंबर आ गया है. मैं जानता हूं, आप को झूठी सूचना दूंगा तो मुझे हवालात जाना पड़ेगा.’’ फोन करने वाले ने लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘सर, आप जगह पूछ रहे हैं, जो बताना जरूरी है. यह रेव पार्टी हरमाड़ा में सीकर रोड से निकलने वाली नींदड़ जयरामपुरा रोड पर हो रही है. वहां कई गाडि़यां भी खड़ी हैं.’’ कह कर सूचना देने वाले ने फोन काट दिया.

जंगा श्रीनिवास राव अनुभवी पुलिस औफिसर थे. वे फोन करने वाले की विश्वासपूर्वक कही गई बातों से ही समझ गए कि सूचना गलत नहीं है. फोन करने वाले ने केवल अपना नाम छिपाया था, नंबर नहीं इसलिए विश्वास किया जा सकता था कि सूचना सही है. नवधनाढ्य वर्ग में आजकल तरहतरह की नैतिकअनैतिक पार्टियों का चलन बढ़ रहा है. जयपुर राजस्थान का महानगर है, देश भर में हीरेजवाहरात का सब से बड़ा कारोबार जयपुर में ही होता है. कालेसफेद धंधों से अथाह पैसा कमाने वालों की संख्या रोजाना बढ़ रही है. जयपुर के चारों ओर छोटेबड़े तमाम फार्महाउस हैं.

राजनेताओं से ले कर आला अफसरों, बड़े व्यापारियों और कारोबारियों के फार्महाउसों पर आए दिन छोटीमोटी पार्टियां होती रहती हैं. लेकिन जयपुर में रेव पार्टी का आयोजन कभीकभार ही सुनने में आता है. इसलिए रेव पार्टी की सूचना पर राव ने तुरंत काररवाई करने का फैसला कर लिया. उन्होंने अपने अधीनस्थ 5 अधिकारियों को शौर्ट नोटिस पर अपने घर बुला लिया. रात करीब डेढ़ बजे तक पांचों अधिकारी पुलिस कमिश्नर के बंगले पर पहुंच गए. जंगा ने उन अधिकारियों को मोबाइल पर मिली सूचना के बारे में बताते हुए कहा कि तुरंत काररवाई करनी है.

अगर गैरकानूनी रूप से कोई पार्टी हो रही है तो कोई कितना भी बड़ा आदमी हो, उसे पकड़ने में हमें जरा भी नहीं झिझकना है. इसी के साथ पुलिस कमिश्नर ने पांचों अधिकारियों को अलगअलग थानों से 70-75 जवानों की टीम बना कर छापा मारने के निर्देश दिए. पुलिस कमिश्नर के निर्देश पर पांचों अधिकारियों ने फोन कर के अपने अधीनस्थ थानाप्रभारियों को तुरंत एकएक पुलिस टीम बनाने को कहा. साथ ही उन्हें यह भी निर्देश दिए कि वह हरमाड़ा थाना इलाके में नींदड़-जयरामपुरा रोड पर गणेश मंदिर के पास पहुंच जाएं. कुछ ही देर में जयपुर के विभिन्न थानों से अलगअलग टीमों के साथ पुलिस की गाडि़यां दौड़ पड़ीं. दूसरी ओर पुलिस कमिश्नर के बंगले से निकल कर पांचों अधिकारी भी गणेश मंदिर के पास पहुंच गए. उस समय तक रात के लगभग 3 बज चुके थे.

जयरामपुरा रोड पर गणेश मंदिर के पास कई फार्महाउस बने हुए हैं. एडिशनल डीसीपी (पश्चिम) करण शर्मा के नेतृत्व में पुलिस की टीमें गणेश मंदिर के आसपास के फार्महाउसों की टोह लेती हुई आगे बढ़ने लगीं. कुछ ही देर में पुलिस को सड़क किनारे एक फार्महाउस के अंदर कई गाडि़यां खड़ी नजर आईं. फार्महाउस में बाहर ज्यादा रोशनी नहीं थी. अंदर की ओर केवल एक बल्ब जल रहा था, लेकिन अंदर से तेज धूमधड़ाके की आवाजें आ रही थीं. पुलिस दल ने अपनी गाडि़यां कुछ दूर रोक दीं और फार्महाउस का बाहर से जायजा लिया. मेनगेट अंदर से बंद था. पुलिस दल को 2-3 लोग अंदर अंधेरे में पेड़ों के आसपास खड़े नजर आए. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि अंदर जरूर कोई न कोई पार्टी चल रही है और ये लोग बाहर की निगरानी के लिए खड़े हैं.

एडिशनल डीसीपी ने अपने साथी अधिकारियों और जवानों से तुरंत एक्शन लेने को कहा. देखते ही देखते 70 से ज्यादा पुलिस जवानों ने फार्महाउस को घेर लिया. कुछ जवान गेट फांद कर अंदर दाखिल हो गए. उन्होंने सब से पहले अंधेरे में निगरानी कर रहे लोगों को दबोचा. इस के बाद उन्होंने मेनगेट खोल कर अधिकारियों को अंदर बुला लिया. पुलिस अफसर जब फार्महाउस के अंदर एक विशाल हाल में पहुंचे तो दंग रह गए. वहां तमाम युवक डीजे की धुन पर झूम रहे थे. तेज आवाज में अंगरेजी संगीत बज रहा था. डांस के नाम पर झूमने वाले सभी युवक नशे में थे.

शराब की बोतलें खुली हुई थीं. वहां मौजूद सभी युवक बरमूडा टीशर्ट पहने हुए थे और पूरी मस्ती के मूड में थे. उन के साथ एक विदेशी युवती भी मौजूद थी. उस समय पार्टी पूरे शबाब पर थी. सारे युवा अपनेअपने तरीके से मौजमस्ती कर रहे थे. उन में से कई तो मदमस्त हो कर थिरक रहे थे. पुलिस को देखते ही पार्टी में भगदड़ मच गई. नशे में झूमते युवा इधरउधर भागने लगे. पुलिस ने भागदौड़ कर के 26 युवकों को पकड़ लिया. साथ ही पार्टी में शामिल फिनलैंड की एक युवती भी पकड़ी गई. पुलिस ने मौके से महंगी शराब की बोतलें, चरस, गांजा, एनर्जी ड्रिंक्स, शक्तिवर्धक दवाएं और आपत्तिजनक सामान के अलावा कार तथा 13 हाईपावर बाइकें जब्त कीं. पुलिस की इस काररवाई के  दौरान पार्टी में एंजौय कर रहे कई युवा अंधेरे का फायदा उठा कर इधरउधर भाग कर आसपास के फार्महाउसों में उगी फसलों में छिप गए.

फार्महाउस से पकड़े गए सभी लोगों को पुलिस हरमाड़ा थाने ले आई. वहां एडिशनल डीसीपी ने पकड़े गए युवकों से पूछताछ शुरू की तो उन्हें बड़ा झटका लगा. यह फार्महाउस अंतरराष्ट्रीय नृत्यांगना गुलाबो का था. दुनिया भर में अपने कालबेलिया डांस से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली वही गुलाबो, दौलत और शोहरत जिस के कदम चूमती थी. स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी जिसे अपनी बहन मानते थे. कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी भी जिसे ननद मानती हैं. पकड़े गए युवाओं में गुलाबो का बेटा भवानी सिंह भी था.

पूछताछ में पता चला कि फिनलैंड की रहने वाली 24 वर्षीया युवती तरू आरियो नेपाल में अपने पुरुष मित्र के पास आई थी. तरू ने नेपाली मित्र से भारत घूमने की इच्छा जताई तो उस ने अपनी व्यस्तता के बारे में बता कर तरू आरियो को अपने एक नेपाली साथी के साथ भारत भेज दिया. तरू टूरिस्ट वीजा पर हिमाचल होते हुए राजस्थान आई थी. राजस्थान में कई जगह घूमने के बाद वह पुष्कर पहुंची थी. पुष्कर से उसे वही नेपाली युवक इस रेव पार्टी में जयपुर ले आया था. पुलिस ने पकड़े गए युवाओं की मैडिकल जांच कराई, ताकि यह पता चल सके कि उन्होंने नशे के लिए कौनकौन से ड्रग लिए थे?

आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने हर्षित कौशिक, ऋषि कौशिक, सुनील मोतियानी, आकाश रोचवानी, भवानी सपेरा, अभिमन्यु, उवेश करणी, चिराग मीणा, हर्ष शेखावत, विजय प्रकाश, आलविन, राजेंद्र सैनी, पूर्व सिंह राठौड़, मुकेश धानका, कदीर, अक्षत स्थापक, आशीष भावन, प्रखर मिश्रा, श्रेय वर्मा, विशाल चंदानी, गौरव, राज शर्मा, सर्वोत्तम शर्मा, हर्ष को एनडीपीएस एक्ट में और फिनलैंड निवासी युवती तरू ओरियो को शांतिभंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए युवकों में कई निजी कालेजों के छात्र भी थे. पुलिस ने हरमाड़ा थाने में मुकदमा दर्ज कर के उस में गुलाबो को भी नामजद किया. पुलिस ने 1 सितंबर को सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया.

अदालत ने 25 युवकों को जेल भेज दिया, जबकि विदेशी युवती को जमानती मुचलके पर छोड़ दिया गया. गुलाबो के बेटे भवानी सपेरे का पुलिस ने 2 दिनों का रिमांड लिया, ताकि उस से विस्तृत पूछताछ की जा सके. बाद में उसे भी जेल भेज दिया गया. पुलिस को गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि रेव पार्टी का आयोजन गुलाबो के बेटे भवानी ने किया था. यह पार्टी भवानी के दोस्त ऋषि कौशिक ने अपने जन्मदिन की आड़ में आयोजित की थी. पकड़े गए युवक भवानी और ऋषि के जानकार थे. पुलिस के सामने यह बात भी आई कि पार्टी में आए युवाओं को भवानी ने ही स्मैक, गांजा सहित अन्य नशीले पदार्थ उपलब्ध कराए थे. पुलिस को इस फार्महाउस पर पहले भी इस तरह की पार्टियां आयोजित होने की बातें पता चली है.

भवानी की गिरफ्तारी पर पुलिस ने पुष्टि करने के लिए गुलाबो को फोन किया. गुलाबो ने पुलिस को बताया कि वह अपने भाई को राखी बांधने के लिए पुष्कर गई थी. इसी दौरान उस के बेटे भवानी का फोन आया था. उस ने कहा था कि वह रात को अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में जाएगा. इस पर गुलाबो ने भवानी को रात में जल्दी घर पहुंचने की ताकीद की थी. गुलाबो का कहना है कि भवानी ने उस से झूठ बोला और गलत गतिविधि में पकड़ा गया. अगर उस ने गलती की है तो उसे सजा मिलनी चाहिए.

बेटे भवानी के इस तरह अपने ही फार्महाउस पर आयोजित रेव पार्टी में पकड़े जाने से गुलाबो को बड़ा झटका लगा. झटका इसलिए कि उस ने जीवन भर अपनी कला और मेहनत के बल पर दुनिया में जो नाम और शोहरत हासिल की थी, वह सब बेटे भवानी ने एक ही दिन में मिट्टी में मिला दी थी. बेटे की करतूतों पर गुलाबो की परेशानी स्वाभाविक ही थी. राजस्थान के कालबेलिया समुदाय में सन 1960 में जन्मी गुलाबो अपने मातापिता की सातवीं संतान थी. गुलाबो का असली नाम धनवंतरि है. गुलाबो नाम उस के पिता ने दिया था. जन्म के एक घंटे बाद ही परिजनों ने उसे दुत्कार दिया था, लेकिन परिवार की ही एक बेऔलाद आंटी ने उसे गोद ले लिया था. गुलाबो का बचपन मातापिता की उपेक्षा और आर्थिक तंगी में गुजरा.

सपेरा परिवार से होने के कारण गुलाबो सांपों के बीच खेलतीकूदती हुई बड़ी हुई. कई बार उस ने सांपों का जूठा दूध पी कर अपनी भूख मिटाई. घरपरिवार में सांप व बीन रहती थी, इसलिए वह 2 साल की उम्र से ही बीन की धुन पर डांस करने लगी थी. जैसेजैसे वह बड़ी होती गई, उस के सपेरा नृत्य में निखार आता गया. डांस में अपने शारीरिक लोच के कारण वह बचपन से ही लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगी थी. 12 साल की उम्र में गुलाबो ने अजमेर जिले के पुष्कर में आयोजित ऊंट महोत्सव में पहली बार हजारों देसीविदेशी पर्यटकों के सामने कालबेलिया नृत्य की अपनी कला का प्रदर्शन किया.

राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से किए गए काफी प्रयासों के बाद गुलाबो के घर वालों ने उसे स्टेज पर परफौरमेंस की अनुमति दी थी. गुलाबो के घर वालों का कहना था कि कालबेलिया समाज के लोग स्टेज पर परफौरमेंस नहीं करते. गुलाबो ने पुष्कर में अपनी नृत्यकला दिखाने के बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा. वह पुष्कर से जयपुर, फिर दिल्ली और इस के बाद दुनिया के तमाम बड़े देशों में अपने डांस का जादू बिखेरती चली गई. इसी दौरान सन 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने विदेशों में भारत की अच्छी छवि बनाने के लिए फेस्टिवल औफ इंडिया सीरीज शुरू कराई.

इसी सीरीज में अपने नृत्य के बल पर गुलाबो ने राजीव गांधी और सोनिया गांधी का दिल जीत लिया. इस के बाद से राजीव गांधी गुलाबो को अपनी बहन मानने लगे थे. राजीव गांधी की अकाल मौत के बाद सोनिया गांधी ने भी गुलाबो पर स्नेह बनाए रखा. इसी दौरान गुलाबो की शादी सोहन नाथ से हो गई. सोहननाथ कालबेलिया समुदाय से नहीं था, लेकिन बाद में वह कालबेलिया समाज में कनवर्ट हो गया. शादी के बाद गुलाबो जयपुर आ कर शास्त्रीनगर में मकान बना कर रहने लगी.  दुनिया भर में डांस की परफौरमेंस से गुलाबो के पास शोहरत के साथ पैसा भी आया.

पैसा आया तो गुलाबो ने जयपुर में सीकर रोड स्थित नींदड़-जयरामपुरा रोड पर एक जमीन खरीद ली. बाद में इस जमीन को उस ने फार्महाउस के रूप में विकसित कर लिया. कालांतर में गुलाबो के 5 बच्चे हुए. गुलाबो रियलिटी शो बिग बौस के पांचवें सत्र की प्रतिभागी भी रह चुकी है. फिल्म अभिनेता संजय दत्त की मेजबानी वाला यह सीजन 2 अक्तूबर, 2011 से 7 जनवरी, 2012 तक प्रसारित किया गया था. इस सीजन के दिवाली स्पैशल एपिसोड की शुरुआत अभिनेता सलमान खान की मेजबानी से हुई थी. इस सत्र की विजेता अभिनेत्री जूही परमार रही थीं.

गुलाबो आज राजस्थान ही नहीं, भारतीय कला संस्कृति की रोल मौडल है. वह इंटरनेशनल कल्चर एवं म्यूजिक सर्किट का एक हिस्सा है. इतना ही नहीं, वह कई फिल्मों में मशहूर अभिनेताओं के साथ अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन भी कर चुकी है. पिछले दिनों गुलाबो ने राजस्थान के चर्चित भंवरी केस पर बनी फिल्म में एक आइटम नंबर भी किया था. इस आइटम नंबर में गुलाबो के साथ उस की 3 बेटियों ने भी अपनी नृत्य कला दिखाई है. गुलाबो हर साल डेनमार्क के कोपेनहेगन में बच्चों को डांस का प्रशिक्षण देने जाती है.

गुलाबो के डांस में बिजली जैसी तेजी और शरीर में गजब की लचक है. सलमासितारों से जड़े काले लहंगे पर कांचली कुर्ती और ओढ़नी ओढ़ कर गुलाबो जब संगीत की धुन पर फिरकी की तरह तेजी से घूमते हुए कालबेलिया डांस करती है तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. गुलाबो कालबेलिया डांस का प्रशिक्षण स्कूल खोलना चाहती है, लेकिन फिलहाल बेटे भवानी की करतूत से उसे गहरा झटका लगा है. इस से उबरने में उसे समय लगेगा. True Crime Story

Crime News: खुद को बचाने के लिए मार दिया दोस्त को

Crime News: कंधे पर बैग टांग कर घर से निकलते हुए राजा ने मां से कहा कि वह 2 दिनों के लिए बाहर जा रहा है तो मां ने पूछा, ‘‘अरे कहां जा रहा है, यह तो बताए जा.’’ लेकिन जब बिना कुछ बताए ही राजा चला गया तो माधुरी ने झुंझला कर कहा, ‘‘अजीब लड़का है, यह भी नहीं बताया कि कहां जा रहा है?’’

यह 19 अक्तूबर, 2016 की बात है. मीरजापुर की कोतवाली कटरा के मोहल्ला पुरानी दशमी में अशोक कुमार का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी माधुरी के अलावा 4 बेटों में राजन उर्फ राजा सब से छोटा था. उस की अभी शादी नहीं हुई थी. अशोक कुमार के परिवार का गुजरबसर रेलवे स्टेशन पर चलने वाले खानपान के स्टाल से होता था. अशोक कुमार के 2 बेटे उन के साथ ही काम करते थे, जबकि 2 बेटे गोपाल और राजा मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर स्थित होटल जननिहार में काम करते थे. चूंकि मीरजापुर और मुगलसराय स्टेशन के बीच बराबर गाडि़यां चलती रहती हैं, इसलिए उन्हें आनेजाने में कोई परेशानी नहीं होती थी.

राजा 2 दिनों के लिए कह कर घर से गया था, जब वह तीसरे दिन भी नहीं लौटा तो घर वालों ने सोचा कि किसी काम में लग गया होगा, इसलिए नहीं आ पाया. लेकिन जब चौथे दिन भी वह नहीं आया तो घर वालों को चिंता हुई. दरअसल इस बीच उस का एक भी फोन नहीं आया था. घर वालों ने फोन किया तो राजा का फोन बंद था. जब राजा से बात नहीं हो सकी तो उस की मां माधुरी ने उस के सब से खास दोस्त रवि को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘राजा दिल्ली गया है. मैं भी इस समय बाहर हूं.’’

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया था. राजा का फोन बंद था, इसलिए उस से बात नहीं हो सकती थी. उस के दोस्त रवि से जब भी राजा के बारे में पूछा जाता, वह खुद को शहर से बाहर होने की बात कह कर राजा के बारे में कभी कहता कि इलाहाबाद में है तो कभी कहता फतेहपुर में है. अंत में उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया.

जब राजा का कहीं पता नहीं चला तो परेशान अशोक कुमार मोहल्ले के कुछ लोगों को साथ ले कर कोतवाली कटरा पहुंचे और राजा के गायब होने की तहरीर दे कर गुमशुदगी दर्ज करा दी. कोतवाली पुलिस ने गुमशुदगी तो दर्ज कर ली, लेकिन काररवाई कोई नहीं की. इस के बाद अशोक कुमार 26 अक्तूबर को समाजवादी पार्टी के युवा नेता और सभासद लवकुश प्रजापति के अलावा मोहल्ले के कुछ प्रतिष्ठित लोगों को साथ ले कर मीरजापुर के एसपी अरविंद सेन से मिले और उन्हें अपनी परेशानी बताई.

अशोक कुमार की बात सुन अरविंद सेन ने तत्काल कटरा कोतवाली पुलिस को काररवाई का आदेश दिया. कोतवाली पुलिस ने राजा के बारे में पता करने के लिए उस के दोस्त रवि से पूछताछ करनी चाही, लेकिन वह घर से गायब मिला. अब तक राजा को गायब हुए 10 दिन हो गए थे. रवि घर पर नहीं मिला तो पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिया, क्योंकि उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था.

पुलिस की लापरवाही से तंग आ कर बेटे के बारे में पता करने के लिए अशोक कुमार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. मामला न्यायालय तक पहुंचा तो पुलिस ने तेजी दिखानी शुरू की. 28 अक्तूबर, 2016 को राजा के दोस्त रवि और उस के पिता को एसपी औफिस के पास एक मिठाई की दुकान से पकड़ कर कोतवाली लाया गया. लेकिन उन से की गई पूछताछ में कोई जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इसी तरह अगले दिन भी हुआ.

संयोग से उसी बीच एसपी अरविंद सेन ही नहीं, कोतवाली प्रभारी का भी तबादला हो गया. मीरजापुर जिले के नए एसपी कलानिधि नैथानी आए. दूसरी ओर कटरा कोतवाली प्रभारी की जिम्मेदारी इंसपेक्टर अजय श्रीवास्तव को सौंपी गई. अशोक कुमार 9 नवंबर को नए एसपी कलानिधि नैथानी से मिले. एसपी साहब ने तुरंत इस मामले में काररवाई करने का आदेश दिया. उन्हीं के आदेश पर कोतवाली प्रभारी ने अपराध संख्या 1232/2016 पर भादंवि की धारा 364 के तहत मुकदमा दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी.

इस घटना को चुनौती के रूप में लेते हुए एसपी कलानिधि नैथानी ने कोतवाली प्रभारी कटरा, प्रभारी क्राइम ब्रांच स्वाट टीम एवं सर्विलांस को ले कर एक टीम गठित कर दी. इस टीम ने मुखबिरों द्वारा जो सूचना एकत्र की, उसी के आधार पर 14 नवंबर, 2016 को राजा के दोस्त रवि कुमार को मीरजापुर के नटवां तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. उस से राजा के बारे में पूछा गया तो उस ने उस के गायब होने के पीछे की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस वाले जहां हैरान रह गए, वहीं रवि के पकड़े जाने की खबर सुन कर कोतवाली आए राजा के घर वाले रो पड़े. क्योंकि उस ने राजा की हत्या कर दी थी.

उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के थाना नरसैना के गांव रूखी के रहने वाले नरेश कुमार पीएसी में होने की वजह से मीरजापुर में परिवार के साथ रहते हैं. वह पीएसी की 39वीं वाहिनी में स्वीपर हैं. रवि कुमार उन्हीं का बेटा था. उस की दोस्ती राजा से हो गई थी, इसलिए कभी वह उस से मिलने मुगलसराय तो कभी उस के घर आ जाया करता था. दोनों में पक्की दोस्ती थी.

रवि का एक चचेरा भाई दीपेश उर्फ दीपू फिरोजाबाद के टुंडला की सरस्वती कालोनी में किराए का कमरा ले कर पत्नी के साथ रहता था. वह वहां दर्शनपाल उर्फ जेपी की गाड़ी चलाता था. जेपी की बहन राजमिस्त्री का काम करने वाले प्रवीण कुमार से प्यार करती थी. यह जेपी को पसंद नहीं था. उस ने बहन को समझाया . बहन नहीं मानी तो प्रेमी से उसे जुदा करने के लिए उस ने प्रवीण कुमार को ठिकाने लगाने का मन बना लिया.

यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने ड्राइवर दीपेश उर्फ दीपू को साथ मिलाया और 13 अक्तूबर, 2016 को बहन के प्रेमी प्रवीण कुमार को अगवा कर लिया. दोनों उसे शहर से बाहर ले गए और गोली मार कर हत्या कर दी. दोनों के खिलाफ इस हत्या का मुकदमा थाना टुंडला में दर्ज हुआ. चूंकि इस मुकदमे में एससी/एसटी एक्ट भी लगा था, इसलिए पुलिस दोनों के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. दर्शनपाल उर्फ जेपी तो गिरफ्तार हो गया, लेकिन दीपेश उर्फ दीपू फरार चल रहा था.

पुलिस उस की गिरफ्तारी के लिए जगहजगह छापे मार रही थी. पुलिस दीपेश को तेजी से खोज रही थी. इस स्थिति में पुलिस से बचने के लिए वह मीरजापुर आ गया था. टुंडला में घटी घटना के बारे में उस ने चचेरे भाई रवि को बता कर कहा, ‘‘रवि, मैं बुरी तरह फंस गया हूं. अगर तुम मेरी मदद करो तो मैं बच सकता हूं.’’

इस के बाद राजा और दीपेश ने योजना बनाई कि किसी ऐसे आदमी को खोजा जाए, जिसे टुंडला ले जा कर हत्या कर के उस की लाश को जला दिया जाए और लाश के पास दीपेश अपनी कोई पहचान छोड़ दे, जिस से पुलिस समझे कि लाश दीपेश की है और उस की हत्या हो चुकी है. इस के बाद पुलिस उस का पीछा करना बंद कर देगी.

जब ऐसे आदमी की तलाश की बात आई तो रवि को अपने दोस्त राजा उर्फ राजन की याद आई. क्योंकि राजा का हुलिया दीपेश से काफी मिलताजुलता था. फिर क्या था, दोनों ने राजा को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली, उसी योजना के तहत उस ने 18 अक्तूबर को राजा को फोन कर के कहा, ‘‘राजा, हम लोगों ने किराए पर एक गाड़ी की है, जिस से कल यानी 19 अक्तूबर को दिल्ली घूमने चलेंगे. मेरा चचेरा भाई दीपेश भी आया हुआ है, वह भी साथ चलेगा. मैं चाहता हूं कि तुम भी चलो.’’

राजा तैयार हो गया तो रवि ने 19 अक्तूबर, 2016 को पीएसी कालोनी के एक परिचित की गाड़ी बुक कराई और राजा को साथ ले कर दिल्ली के लिए चल पड़ा. योजना के अनुसार रास्ते में पैट्रोल खरीद लिया गया. इस के बाद उन्होंने बीयर खरीदी और राजा को जम कर पिलाई. वह नशे में हो गया तो रात 11 बजे के करीब फिरोजाबाद के थाना पचोखरा के गांव सराय नूरमहल और गढ़ी निर्भय के बीच सुनसान स्थान पर पेशाब करने के बहाने गाड़ी रुकवाई और राजा को उतार कर मारपीट कर पहले उसे बेहोश किया, उस के बाद पैट्रोल डाल कर जला दिया.

जब उन्हें विश्वास हो गया कि राजा मर गया है तो पहचान के लिए दीपेश ने अपना जूता राजा की लाश के पास रख दिया, जिस से बाद में उस लाश की पहचान उस की लाश के रूप में हो. इस के बाद दीपेश ने फिरोजाबाद पुलिस को मोबाइल से फोन कर के कहा, ‘‘मैं दीपेश उर्फ बाबू बोल रहा हूं. 3-4 बदमाश मेरा पीछा कर रहे हैं. मुझे बचा लीजिए अन्यथा ये मुझे मार डालेंगे.’’

जिस जगह पर रवि और दीपेश ने राजा को जलाया था, दीपेश का घर वहां से करीब 8 किलोमीटर दूर था. दीपेश ने इस जगह को यह सोच कर चुना था, जिस से पुलिस को लगे कि वह चोरीछिपे अपने गांव आया था. बदमाशों को पता चल गया तो उन्होंने उसे मार डाला. पुलिस को फोन कर के रवि और दीपेश फरार हो गए. जबकि पुलिस सर्विलांस के माध्यम से लोकेशन के आधार पर उन की तलाश में मीरजापुर से फिरोजाबाद तक उन के पीछे लगी थी. दीपेश तो फरार हो गया, लेकिन रवि मीरजापुर तो कभी सोनभद्र तो कभी सिगरौली जा कर छिपा रहा. आखिर ज्यादा दिनों तक वह पुलिस की नजरों से बच नहीं पाया और 14 नवंबर को उसे पकड़ लिया गया.

पूछताछ के बाद रवि की निशानदेही पर पुलिस ने पैट्रोल का डिब्बा, वह गाड़ी जेस्ट कार संख्या यूपी 63जेड 8586, जिस से वे राजा को ले गए थे, बरामद कर ली. इस के बाद उसे उस स्थान पर भी ले जाया गया, जहां उस ने दीपेश के साथ मिल कर राजा को जलाया था. राजा के पिता अशोक कुमार भी साथ थे, इसलिए उन्होंने राजा के अधजले कपड़ों को पहचान लिया था. पुलिस ने रवि को प्रैसवार्ता में पेश किया, जहां उस ने अपना अपराध स्वीकार कर के हत्या की सारी कहानी सुना दी.

घटना का खुलासा होने के बाद कोतवाली पुलिस ने राजा उर्फ राजन की गुमशुदगी हत्या में तब्दील कर आरोपी रवि को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. दीपेश उर्फ दीपू की तलाश में पुलिस ने ताबड़तोड़ छापे मारने शुरू कर दिए तो दबाव में आ कर उस ने फिरोजाबाद की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. अदालत ने उसे जेल भेज दिया था. Crime News

Punjab Crime: संत का खूनी कारनामा

Punjab Crime: संत से शादी करने के लिए जसपाल कौर को दशमेश से तलाक लेना पड़ता जबकि दशमेश तलाक देने वाला नहीं था. इस समस्या से निजात पाने के लिए संत ने जो खूनी साजिश रची, उस का परिणाम क्या निकला?

पंजाब के जिला लुधियाना के गांव सिंघवाला खुर्द के रहने वाले दशमेश सिंह के पिता का नाम बलवान सिंह तो मां का सुरजीत कौर था. उस के 5 भाई भगवंत, निरवैर, अशोकजीत, मनोरजीत और सुरिंदरजीत सिंह के अलावा एकलौती बहन कुलदीप कौर थी. इन में दशमेश चौथे नंबर पर था. बलवान सिंह खेतीबाड़ी करते थे. थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के उन के सभी बेटे खेतीबाड़ी के काम में उन का हाथ बंटाने लगे थे. लेकिन कुछ दिनों बाद निरवैर, दशमेश और मनोरजीत को खेतीकिसानी का यह काम अच्छा नहीं लगा तो निरवैर जहां फौज में भरती हो गया, वहीं दशमेश और मनोरजीत समयसमय पर विदेश चले गए.

विदेश जाने से पहले ही दशमेश की शादी गांव कुंभड़ाखुर्द के रहने वाले परमल सिंह की बेटी जसपाल कौर से हो गई थी, जिस से वह 3 बच्चों का बाप बना. दशमेश की शादी के समय एक मजेदार घटना यह घटी थी कि बलवान सिंह गए तो थे अपने बड़े बेटे भगवंत सिंह के लिए लड़की देखने. लेकिन उसी समय उन्हें 2 लड़कियां और पसंद आ गई थीं, जो भगवंत की होने वाली ससुराल में रिश्तेदारी में आई थीं. दोनों सगी बहनें थीं और उन के नाम थे सतविंदर कौर और जसपाल कौर. भगवंत सिंह की शादी वाले दिन ही इन दोनों बहनों का भी बलवान सिंह के 2 बेटों, निरवैर सिंह और दशमेश सिंह से ब्याह हो गया था. इस तरह एक ही दिन बलवान सिंह के 3 बेटों की एक साथ शादियां हो गई थीं, जिस की गांवों में खूब चर्चा हुई थी.

निरवैर सिंह शादी से पहले ही फौज में भरती हो गया था, इस के बाद दशमेश ने भी कुछ दिनों तक सेना की नौकरी की. लेकिन अचानक सेना की नौकरी छोड़ कर वह ग्रीस चला गया, जहां 2 सालों तक रहा. ग्रीस से लौट कर साल भर घर पर रहा. उस के बाद वह फिर ग्रीस चला गया. इस बार वह 3 सालों बाद लौटा. कुछ महीने गांव में रहने के बाद बाद वह जर्मनी चला गया, जहां से पत्नी के बारबार बुलाने के बावजूद वह पूरे 8 सालों बाद लौटा. घर लौटने के कुछ दिनों बाद ही थाना खरड़ के अंतर्गत आने वाले एक पोखर में उस की लाश पड़ी मिली. दशमेश की लाश सब से पहले गांव वडाली के रहने वाले राजकुमार ने उस पोखर में औंधे मुंह पड़ी देखी थी.

लाश पर कपड़ों के नाम पर एकमात्र अंडरवीयर था. वह काफी सड़गल चुकी थी. लाश से उठने वाली दुर्गंध ने ही राजकुमार को अपनी ओर आकर्षित किया था. दुर्गंध की वजह से ही वह पोखर के पास गया था,तब उसे लाश दिखाई दी थी. पोखर में लाश पड़ी होने की सूचना पा कर थोड़ी ही देर में पुलिस उपाधीक्षक एच.पी. सिंह थानाप्रभारी सुरजीत सिंह के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. घटनास्थल पर लाश के पास ही पुलिस को पौलीथिन की एक छोटी थैली में एक पत्र मिला था. पत्र में जो लिखा था, उस के अनुसार वह मृतक का सुसाइड नोट लग रहा था. पत्र में लिखे अनुसार, दशमेश सिंह ने घरेलू कारणों से आत्महत्या की थी, जिस का जिम्मेदार उस ने स्वयं को ठहराया था.

इस के अलावा पुलिस को अन्य कोई सूत्र नहीं मिला था. पुलिस ने मौके की आवश्यक काररवाई करने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद थानाप्रभारी सुरजीत सिंह ने मृतक दशमेश सिंह के पिता बलवान सिंह से पूछताछ की तो उस समय उन्होंने केवल इतना ही कहा कि मरने वाला उन का बेटा दशमेश सिंह था, जो विदेश में रहता था. घर में ऐसी कोई परेशानी वाली बात नहीं थी, जिस से वह आत्महत्या जैसा संगीन कदम उठाता. जबकि सुरजीत सिंह को मामला आत्महत्या का ही लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया. इस की एक वजह यह भी थी कि कुछ महीने पहले इस परिवार में आत्महत्या की एक और घटना घट चुकी थी.

दरअसल, दशमेश के छोटे भाई सुरिंदर सिंह ने भी कुछ महीने पहले आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने घर वालों के लिए जो संदेश छोड़ा था, उस में उस ने लिखा था कि वह एक बताए न जा सकने वाले कारण की वजह से आत्महत्या कर रहा है. इसी बात को ध्यान में रख कर पुलिस यह मान कर चल रही थी कि परिवार में इस तरह की मानसिक प्रवृत्ति बन चुकी है. उसी मानसिक प्रवृत्ति की वजह से दशमेश ने भी आत्महत्या की है. यही सोच कर पुलिस मामले की जांच करने के बजाय शांत हो कर बैठ गई.

बेटे की अंतिम क्रियाओं से फारिग हो कर बलवान सिंह थाना खरड़ पहुंचे और पुलिस से कहा कि दशमेश ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि गहरी साजिश के तहत उसे मार डाला गया है. स्थानीय पुलिस ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया तो वह एसएसपी साहब से मिले. उन्होंने बलवान सिंह की बातों को गौर से सुना और मामले की फाइल सुरजीत सिंह से ले कर सीआईए के इंसपेक्टर को सौंप दी. 2 सप्ताह की गहन छानबीन के बाद सीआईए इंसपेक्टर ने अपनी जो रिपोर्ट एसएसपी साहब को सौंपी, उस के अनुसार दशमेश सिंह की साजिश के तहत हत्या की गई थी. रिपोर्ट में साजिश के लिए जिन 2 लोगों को दोषी ठहराया गया था, उन में एक उस क्षेत्र का बहुत ही सम्मानित एवं पूज्यनीय व्यक्ति था.

उस पर हाथ डालने से आसपास के गांवों के हजारों लोग पुलिस के खिलाफ खड़े हो सकते थे. उसी बीच सुरजीत सिंह का तबादला कर के इंसपेक्टर दीदार सिंह को खरड़ थाने का थानाप्रभारी बना दिया गया. उन के चार्ज संभालने के 3 दिनों बाद एसएसपी ने उन्हें अपने निवास पर बुला कर इस मामले की फाइल उन्हें सौंपते हुए कहा, ‘‘दीदार सिंह, इस मामले की गुप्तरूप से छानबीन कर के 2 हफ्तों में मुझे अपनी रिपोर्ट दो.’’

दीदार सिंह को फाइल देने से पहले एसएसपी साहब ने फाइल से सीआईए इंसपेक्टर की रिपोर्ट निकाल कर अपने पास रख ली थी.

दीदार सिंह ने फाइल संभालते हुए कहा, ‘‘जी सर, मैं पूरी छानबीन कर के निश्चित अवधि में अपनी रिपोर्ट अवश्य दे दूंगा.’’

इस के बाद एसएसपी साहब को सैल्यूट कर के वह कैंप औफिस से बाहर निकल आए.  थाने लौट कर उन्होंने फाइल का गहन अध्ययन किया. इस के बाद एएसआई गुरबख्श सिंह और एएसआई इकबाल सिंह की मदद से इस मामले की जांच में जुट गए. ठीक 11 दिनों बाद रिपोर्ट तैयार कर के उन्होंने एसएसपी साहब के सामने रख दी. दीदार सिंह की रिपोर्ट में भी दशमेश की आत्महत्या को हत्या करार देते हुए उन्हीं 2 लोगों पर शक जाहिर किया गया था, जिन का उल्लेख सीआईए इंसपेक्टर ने अपनी रिपोर्ट में किया था.

रिपोर्ट को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद एसएसपी साहब ने कहा, ‘‘दीदार सिंह, कल सुबह दशमेश के घर के किसी सदस्य को बुला कर उस का बयान दर्ज करो. उस के बाद जिला अटौर्नी की राय ले कर एफआईआर दर्ज करो. उस के बाद जरूरी काररवाई करो.’’

दीदार सिंह ने दशमेश के यहां संदेश भेजा तो बलवान सिंह अपने बेटे अशोकजीत के साथ थाने आ पहुंचे. उन्होंने अशोकजीत से तहरीर ले कर संदिग्ध लोगों के नामपते लिख कर अपनी संस्तुति के साथ वह तहरीर डीएसपी के माध्यम से जिला न्यायवादी के पास भिजवा दी. अगले ही दिन सहायक जिला न्यायवादी ज्ञानचंद ने इस पर टिप्पणी लिख कर भिजवा दिया कि इस मामले में भादंवि की धारा 302/34 के तहत प्राथमिकी दर्ज कर के छानबीन की जा सकती है. फिर क्या था, थाना खरड़ में दशमेश सिंह की हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया. खरड़ थाना पुलिस ने हत्या का यह मामला जिन 2 लोगों के खिलाफ दर्ज किया था, उन में एक तो थी दशमेश सिंह की विधवा जसपाल कौर और दूसरा था उस इलाके का जानामाना संत इंदरजीत सिंह.

जैसे ही दोनों को मुकदमा दर्ज होने का पता चला था, वे भूमिगत हो गए थे. उन की तलाश में दीदार सिंह ने अनेक संभावित स्थानों पर छापे मारे, लेकिन दोनों ही उन के हाथ नहीं लगे, लेकिन इस से वे निराश नहीं हुए और अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए लगातार प्रयास करते रहे. अंतत: उन की कोशिश कामयाब हो ही गई. गांव ध्यानपुर के सरपंच पाला सिंह ने दोनों वांछित अभियुक्तों जसपाल कौर और संत इंदरजीत सिंह को ला कर थानाप्रभारी दीदार सिंह के सामने पेश कर दिया. दरअसल जसपाल कौर और संत इंदरजीत सिंह पुलिसिया काररवाई से घबरा कर पाला सिंह की शरण में पहुंच गए थे. पाला सिंह के सामने दोनों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए पुलिस की मारपीट से बचा लेने की गुहार की थी.

इस के बाद पाला सिंह दोनों को समझाबुझा कर थाने ले आए थे तब बयान दर्ज कर के पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को विधिवत गिरफ्तार कर अलगअलग हवालातों में बंद कर दिया था. अगले दिन दोनों को खरड़ के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी एच.एस. मदान की अदालत में पेश कर के थाना खरड़ पुलिस ने पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. दीदार सिंह द्वारा की गई पूछताछ में इन लोगों ने जो कुछ बताया, उस से ढोंगी संत के घिनौने आपराधिक सिलसिले की एक ऐसी अमानवीय सनसनीखेज कहानी सामने आई, जो औरों के लिए एक सीख बन सकती है.

शादी के बाद सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. दशमेश सिंह अपनी पत्नी से खुश था तो जसपाल कौर को भी पति से कोई शिकायत नहीं थी. समयसमय पर उस ने 3 बच्चों को जन्म दिया. इस के बावजूद उस की सुंदरता में कोई कमी नहीं आई. जसपाल कौर जहां संतोषी युवती थी, वहीं दशमेश बहुत ज्यादा महत्त्वाकांक्षी था. उस पर हमेशा जिंदगी में आगे बढ़ने और अधिकाधिक पैसा कमाने की धुन सवार रहती थी. इस के लिए वह तरहतरह की योजनाएं बनाता रहता था. उन्हीं में से एक योजना यह भी थी कि बारबार भारत लौटने के बजाय कई सालों तक विदेश में रह कर ढेरों रुपया पत्नी को भेजता रहे, ताकि जब वह लौटे तो उसे फिर से विदेश जाने की जरूरत न पड़े.

उस ने यही किया भी. विदेश में लंबे समय तक रह कर वह भले ही घर नहीं आया था, लेकिन रुपए उसने इस कद्र भेजे थे कि उस के परिवार ने कल्पना नहीं की थी. पैसा भले ही खूब आ रहा था, लेकिन पति के बिना जसपाल कौर को सब सूना लगता था. उस ने 2 साल तो जैसेतैसे काट लिए, लेकिन उस के बाद उस का समय काटे नहीं कटता था. दशमेश को वह हर हफ्ते चिट्ठी लिखती और उस से वापस आने का आग्रह करती. दूसरी ओर दशमेश पर अधिक से अधिक पैसा कमाने की धुन सवार थी. इसलिए उस ने पत्नी की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद पत्नी की आहत भावनाओं की जैसे उसे जरा भी चिंता नहीं थी.

इस के बाद पति के विछोह में या अन्य किसी वजह से जसपाल कौर बीमार रहने लगी. गांव के डाक्टरों से ले कर लुधियाना के बड़े डाक्टरों तक से उस का इलाज कराया गया, लेकिन किसी की समझ में उस की बीमारी नहीं आई. जसपाल कौर की बड़ी बहन सतविंदर कौर, जो उस की जेठानी भी थी, ने अपने फौजी पति से कह कर गांव में ही अलग मकान ले लिया था, क्योंकि परिवार के साथ रहना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था. छोटी बहन की बीमारी से वह भी परेशान थी.

एक दिन सतविंदर कौर ने जसपाल को अपने घर बुला कर कहा, ‘‘कुल्हैड़ गांव में एक संतजी हैं. वह किसी भी बीमारी का इलाज चुटकियों में कर देते हैं. बहुत पहुंचे हुए महात्मा हैं. अपनी समस्याएं ले कर दूरदूर से लोग उन के पास आते हैं और संतजी उन की परेशानियां चुटकी बजा कर दूर कर देते हैं.’’

‘‘दीदी, यह सब फालतू की बातें हैं.’’ जसपाल ने कहा.

‘‘इसीलिए तो मैं ने आज तक तुम से इस बारे में कोई बात नहीं की. पता नहीं तुम खुद को क्या समझती हो.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है दीदी.’’

‘‘यह बात नहीं, वह बात नहीं. इतने डाक्टरों से इलाज करवा लिया, क्या हुआ, हो गई ठीक?’’

‘‘चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में दिखाने जाऊंगी. देखो, वहां के डाक्टर क्या कहते हैं.’’

‘‘कुछ नहीं कहेंगे, फालतू के टैस्ट कर के तेरा सत्यानाश कर देंगे. ऐसे ही मर जाएगी एक दिन तू.’’ सतविंदर ने बहन को डांटते हुए कहा, ‘‘अच्छा, एक बात बता, कभी मुझे बीमार होते देखा है? मेरी मान, किसी दिन मेरे साथ संतजी के पास चल. एक हफ्ते में तू भलीचंगी न हो जाए तो कहना.’’

‘‘जिस बीमारी का इलाज डाक्टर नहीं कर सके दीदी, भला एक संत उस का इलाज क्या करेगा? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा.’’

‘‘समझने की जरूरत भी नहीं है,’’ सतविंदर ने कहा, ‘‘आज तक किसी डाक्टर ने तुम्हें तुम्हारी बीमारी के बारे में बताया है? दरअसल तुम्हें कोई बीमारीवीमारी नहीं है. किसी ने कुछ कर करा दिया है. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि संतजी तुम्हें हफ्ते भर में भलीचंगी कर देंगे.’’

इस के बाद जसपाल कौर बहन सतविंदर कौर के साथ संतजी के यहां जा पहुंची थी.

संत का इतिहास कुछ इस तरह से था. एक बार दसवीं में फेल होने के बाद इंदरजीत सिंह ने पढ़ाई को तिलांजलि दे दी और गुरुद्वारा में जा कर पूजापाठ करने लगा. उस की इस पूजापाठ से गांव वाले उस की इज्जत करने लगे. इस से प्रेरित हो कर वह इस दिशा में और आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा. उसी बीच एक ऐसी घटना घटी कि उस की इज्जत एकदम से बढ़ गई.

गांव की परमजीत कौर को दौरे पड़ते थे. एक दिन वह गुरुद्वारा में मत्था टेकने आई तो इंदरजीत ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बीमारी के लिए दवा तैयार कर रहा हूं. वाहेगुरु ने चाहा तो उस दवा से ठीक हो जाओगी.’’

इंदरजीत देसी दवा बनाने के नुस्खे वाली किताबें पढ़ा करता था. उन्हीं नुस्खों पर दवा तैयार कर के उस ने परमजीत कौर को दी. मनोवैज्ञानिक प्रभाव था या अन्य कोई वजह, संयोग से कुछ ही दिनों में परमजीत बिलकुल ठीक हो गई. इसी तरह के कुछ और मामले इंदरजीत ने सुलझाए तो गांव में उस का रुतबा बढ़ गया. इस के बाद वह कहने लगा कि उस ने अपनी अलौकिक शक्ति से ये कारगर दवाएं तैयार की थीं. इसी वजह से गांव में सब उसे सम्मान की दृष्टि से देखने लगे. लोग अब उसे संतजी कह कर बुलाने लगे.

धीरेधीरे संत इंदरजीत की शोहरत आसपास के इलाकों में फैल गई. अनुभव के आधार पर संत इंदरजीत की देसी दवाओं और जड़ीबूटियों की काफी जानकारी हो गई थी. आशीर्वाद लेने और अपने भविष्य के बारे में जानने के लिए आने वाले लोगों के अलावा लड़कियां और महिलाओं की एक ऐसी संख्या थी, जो जरा सी बीमारी के लिए भी दवा लेने उस के पास चली आती थीं. उन्हीं में एक सतविंदर कौर भी थी. वह संतजी से काफी प्रभावित थी. यही वजह थी कि वह अपनी छोटी बहन जसपाल कौर को भी समझाबुझा कर उस के पास ले आई थी. जसपाल कौर में ऐसा न जाने क्या था कि पहली ही नजर में वह संत इंदरजीत को भा गई थी. उसे लगा कि शायद यह उसी के लिए बनी है.

जसपाल कौर भी संत के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुई थी. पति से सालों से दूर रह रही जसपाल को भी संत भा गया था. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए थे. फिर तो पहली नजर के इस प्यार ने उन के भीतर इस कदर कशिश बढ़ा दी कि दोनों 2-4 दिनों के अंतर से मिलने लगे. जसपाल न आ पाती तो इंदरजीत खुद उस के गांव पहुंच जाता. चाहत बढ़ी तो जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. इस के बाद जसपाल की हर बीमारी उड़नछू हो गई. जसपाल के बताए अनुसार, संतजी के आगोश में आने के बाद वह पूरी दुनिया भूल गई थी. संत का सभी आदर करते थे. उस की तरफ अंगुली उठाने की हिम्मत किसी में नहीं थी. जसपाल कौर को ले कर जब उस की सच्चाई लोगों के सामने आने लगी तो पहले लोगों ने दबी जुबान में, फिर खुल कर इस मामले पर चर्चा करने लगे.

कुछ लोगों ने इस की चर्चा बलवान सिंह से भी की. बलवान सिंह ने इस बात को गंभीरता से लिया और जसपाल कौर को समझाना चाहा तो उस ने उन का घर छोड़ दिया और बड़ी बहन सतविंदर के साथ रहने लगी. बच्चों को भी वह अपने साथ नहीं लाई. बलवान सिंह गांव में अपनी रुसवाई नहीं करवाना चाहते थे, साथ ही विदेश में रह रहे बेटे को भी इस बारे में बता कर परेशान नहीं करना चाहते थे. लिहाजा वह जितना चुप रहे, जसपाल उतनी ही बागी होती गई.

फलस्वरूप तथाकथित संत इंदरजीत के प्रति लोगों के मन में गुस्सा पैदा होने लगा. जब यह गुस्सा बढ़ने लगा तो गांव में टिके रहना संत को खतरे से खाली नहीं लगा. उसे लगने लगा कि जसपाल के साथ उस के संबंधों को ले कर गांव में कभी भी विस्फोट हो सकता है, जो उन दोनों के लिए काफी महंगा साबित हो सकता है. यह सब सोच कर एक रात संत इंदरजीत ने गांव छोड़ दिया और खरड़ के नजदीकी गांव छिन्नाहर्षा में जा कर रहने लगा. जल्दी ही संत ने यहां भी अपनी प्रतिष्ठा कायम कर ली. जसपाल कौर भी उस के साथ थी. अब तक जसपाल की ससुराल वालों ने उस की तरफ से मुंह मोड़ लिया था. सब ने तय कर लिया था कि दशमेश के स्वदेश लौटते ही उस से जसपाल को तलाक दिलवा दिया जाएगा.

लेकिन दशमेश के छोटे भाई सुरिंदर सिंह को अपनी भाभी के इस गलत दिशा में उठे कदम काफी दुखी किया था. यह बात उस से बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस के बारे में सोचसोच कर उस का मन अवसाद से भर जाता था. एक दिन वह छिन्नाहर्षा स्थित संत के डेरे पर गया. जसपाल कौर और संत इंदरजीत बैठे बातें कर रहे थे. संत को नजरअंदाज कर के सुरिंदर ने जसपाल कौर के पैरों को छू कर कहा, ‘‘भाभी, मैं ने तुम्हें हमेशा मां के रूप में देखा है. मैं तुम से यह कहने आया हूं कि इस संत को छोड़ कर अपनी दुनिया में लौट चलो.’’

‘‘तुम अपने घर जाओ सुरिंदर, अब यही मेरी दुनिया है.’’ जसपाल कौर ने दो टूक जवाब दिया.

‘‘भाभी, तुम मुझ से ज्यादा समझदार हो. इस बात को तुम मुझ से बेहतर जानती हो कि औरत की जन्नत उस के पति का घर होती है.’’

‘‘देखो सुरिंदर, फालतू बातें करने की जरूरत नहीं है. मैं यहां खुश नहीं, बहुत ज्यादा खुश हूं. अब मुझे तुम लोगों से कुछ लेनादेना नहीं है.’’ जसपाल कौर झुंझला कर बोली.

‘‘क्या भैया से भी नहीं?’’ सुरिंदर ने पूछा.

‘‘नहीं.’’

‘‘मुझ से और अपने बच्चों से भी तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है?’’

‘‘नहीं, तुम सब लोग मेरे लिए मर चुके हो.’’

‘‘भाभी, अगर ऐसा है तो तुम एक बात सुन लो, अगर तुम कल तक घर नहीं लौटी तो तुम्हारा यह देवर अपनी जान दे देगा.’’

‘‘अरे कल का इंतजार क्यों, आज ही अपनी जान दे दो. तुम जियो या मरो, मुझे कोई परवाह नहीं है. मेरे पास दुनिया का हर सुख है.’’ जसपाल कौर ने कहा.

देवरभाभी की इस बातचीत में संत इंदरजीत कुछ नहीं बोला. वह चुपचाप मंदमंद मुसकराता रहा. अगली रात सुरिंदर ने बहुत ज्यादा शराब पी कर आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने घर वालों के लिए जो संदेश छोड़ा था, उस में उस ने लिखा था कि वह आत्महत्या का कारण नहीं बता सकता. इस तरह यह मामला रफादफा हो गया था. क्योंकि किसी ने गहराई में जाने की कोशिश ही नहीं की थी. दशमेश को भी यही सूचना भेजी गई थी कि ज्यादा शराब पीने की वजह से सुरिंदर भगवान को प्यारा हो गया था. देखतेदेखते 6 महीने का समय बीत गया. संत इंदरजीत और जसपाल कौर का लगाव धीरेधीरे इतना गहरा हो गया कि लोगों का मुंह बंद करने के लिए उन्होंने शादी करने का मन बना लिया.

इस के लिए जरूरी था कि जसपाल कौर दशमेश से तलाक ले, जिस के लिए शायद वह किसी भी कीमत पर राजी न होता. इसी बात के हल के लिए संत ने मन ही मन खतरनाक योजना बना डाली. इस के बाद उस ने जसपाल से कहा, ‘‘तुम दशमेश को किसी तरह यहां बुलाओ. मैं कुछ इस तरीके से उस का पत्ता साफ करूंगा कि किसी को हम पर जरा भी शक नहीं होगा.’’

‘‘जैसा आप कहेंगे संतजी, मैं वैसा ही करूंगी. मैं दशमेश को बुलाने की कोशिश करती हूं.’’

संत के निर्देशानुसार जसपाल ने दशमेश को लगातार कई पत्र लिखे और फोन किए. इस पर भी दशमेश आने को राजी नहीं हुआ तो उस ने धमकी देते हुए कहा कि अगर अब वह वापस नहीं आया तो वह उसे छोड़ कर किसी और के साथ घर बसा लेगी. आशा के अनुरूप दशमेश भारत लौट आया. गांव पहुंचने पर पत्नी की करतूतों के बारे में पता चला तो वह गुस्से में भरा संत इंदरजीत के डेरे पर जा पहुंचा. लेकिन संत ने उसे अपनी वाणी और शब्दजाल से ऐसा संतुष्ट किया कि उस का गुस्सा शांत हो गया. इस के बाद संत ने कोई बूटी घोल कर शरबत तैयार किया और उसे दशमेश को प्रेम से पिला दिया. उस के पीने के बाद वह उठनेबैठने और चलनेफिरने लायक नहीं रहा.

इस के बाद संत और जसपाल ने चारों तरफ यह बात फैला दी कि दशमेश भी संत का पक्का शिष्य बन गया है. संत ने क्षेत्र के अपने भक्तों में अपना ऐसा प्रभुत्व स्थापित कर लिया था कि उस की प्रचारित अफवाह पर सब ने यकीन कर लिया. अगर जसपाल कौर का मामला दरकिनार कर दिया जाए तो संत इंदरजीत अपने भक्तों के लिए किसी अवतार से कम नहीं था. अपने इसी प्रभाव का फायदा उठाते हुए एक रात संत इंदरजीत ने दशमेश को सल्फास घुली शराब पिला कर मौत की नींद सुला दिया और आधी रात के बाद जसपाल की मदद से उस की लाश को गांव वडाली को जाने वाले रास्ते पर स्थित एक पोखर में फेंक दिया.

लाश फेंकने से पहले उन्होंने दशमेश के शरीर पर अंडरवियर छोड़ कर उस के सारे कपड़े उतार लिए थे और खुद को बचाने के लिए उसी के साथ संत ने खुद की लिखावट बदल कर दशमेश की ओर से सुसाइड नोट भी लिख कर वहां छोड़ दिया था. संत इंदरजीत और जसपाल कौर अपराधी प्रवृत्ति के तो थे नहीं, जिस्मानी भूख मिटाने के चक्कर में बिना कुछ सोचेसमझे यह अपराध कर बैठे थे. शायद यही वजह थी कि बचने की तमाम कोशिश करने के बावजूद वे फंस गए थे. संत की करतूत जब उस के भक्तों के सामने आई तो सभी ने नफरत से उस की ओर से मुंह मोड़ लिया. दशमेश के कपड़े आदि बरामद करने के लिए जिस दिन पुलिस संत को ले कर छिन्नाहर्षा स्थित उस के आश्रम पहुंची, हजारों लोगों ने उस के विरुद्ध नारे लगाए और पुलिस प्रशासन से उसे और जसपाल कौर को फांसी दिलवाने की मांग की.

संत और जसपाल कौर को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था. दोनों का कहना था कि उन्हें सजा हो भी गई तो सजा के बाद वे दोनों बाहर आएंगे तो पतिपत्नी की तरह साथसाथ रहेंगे. रिमांड अवधि समाप्त होने पर थाना खरड़ पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें पटियाला की केंद्रीय जेल भेज दिया गया. पुलिस ने समय पर दोनों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश कर दिया.  रोपड़ की अदालत में 3 साल केस चला. माननीय सेशन जज ने संत इंदरजीत और जसपाल कौर को दशमेश सिंह की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसे दोनों पटियाला की जेल में भुगत रहे हैं.

बहरहाल, यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज पारंपरिक आस्थाओं और धर्मों से हट कर पाखंड और प्रपंच से ओतप्रोत एक ऐसी आडंबरी दुनिया रच दी गई है, जिस के स्वयंभू भगवान बन बैठे हैं. इस के संचालक अपने छल से न केवल लोगों को ठगते हैं, बल्कि उन्हें अपराध करना भी सिखाते हैं और खुद भी अपराध की राह पर चलने से नहीं कतराते. आज बहुत जरूरी है कि ऐसे ढोंगी संतोंबाबाओं की कुदृष्टि से समाज को बचाने में कोई कसर न छोड़ी जाए. Punjab Crime

 

Crime Story: हत्या जिन के लिए खेल है

Crime Story: किसी का भी खून करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि ज्यादातर लोग खून देख कर ही घबरा जाते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें किसी को भी मार देना खेल लगता है. यह कहानी ऐसे ही लोगों की है.

लुधियाना न्यू कोर्ट का माहौल उस दिन बड़ा रहस्यमयी लग रहा था. गेट से ले कर अंदर तक चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन अदालत लुधियाना के बहुचर्चित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला हत्याकांड का फैसला सुनाने वाली थी. हत्यारे कितने खतरनाक और खूंखार थे, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उन्हें जेल से अदालत तक लाने के लिए 60 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी. अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रिया सूद की अदालत को सुरक्षा की दृष्टि से पुलिसकर्मियों ने पूरी तरह से घेर रखा था. क्योंकि उन्हीं की अदालत में फैसला सुनाया जाने वाला था.

राष्ट्रपति पदक से सम्मानित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला की 1 फरवरी, 2012 की रात बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. इस दोहरे हत्याकांड को 6 लोगों, उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ पिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू, हसनजीत सिंह उर्फ जीता, दविंदरपाल सिंह उर्फ लाडी और रविंदर सिंह उर्फ रिंकू ने मिल कर अंजाम दिया था. पंजाब पुलिस ने इन लोगों को बड़ी मेहनत से पकाड़ा था. डीएसपी बलराज गिल की तैनाती उन दिनों जिला मोगा में डीएसपी हैडक्वार्टर के रूप में थी. चुनाव की वजह से पिछले एक महीने से वह काफी व्यस्त थे. ठीकठाक चुनाव संपन्न हो गए तो उन्होंने चैन की सांस ली थी और 1 फरवरी को छुट्टी ले कर लुधियाना स्थित अपने घर आ गए थे.

बलराज गिल सरदार कश्मीरा सिंह की एकलौती संतान थे. कश्मीरा सिंह बीएसएफ में कमांडेट थे और रिटायर्ड होने के बाद घर पर ही रह रहे थे. घर पहुंच कर बलराज गिल ने कुछ देर आराम किया, उस के बाद शाम को सत्संग सुनने चले गए. चुनाव की वजह से वह कई दिनों से सत्संग सुनने नहीं जा सके थे. सत्संग सुनने के बाद बलराज गिल कुछ देर अपने सत्संगी मित्रों के पास बैठ कर बातें करते रहे, उस के बाद घर चले गए. 7 बजे के करीब उन के फोन पर किसी का फोन आया तो पत्नी से 10 मिनट में आने की बात कह कर वह अपनी सफेद रंग की ओपट्रा कार से मौडल टाउन स्थित इश्मीत चौक के पास प्रिंटिंग प्रैस चलाने वाले अपने दोस्त मनिंदरपाल सिंह के पास जा पहुंचे.

वहीं पर बलराज और मनिंदर के क्लासमेट अनमोल सिंह मिल गए. तीनों दोस्त चाय पीते हुए बातें कर रहे थे कि तभी बलराज के फोन पर किसी का फोन आया, जिसे सुनने के बाद वह अपनी कार छोड़ कर मनिंदर की कार ले कर चले गए. जाते समय वह दोस्तों से कह गए कि थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे. लेकिन वह गए तो लौट कर ही नहीं आए. जब काफी देर हो गई तो दोस्तों को चिंता हुई. उन्होंने बलराज को फोन किए, पर उन के दोनों फोन बंद मिले. रात 10 बजे उन्होंने बलराज के घर फोन किया तो उन के पिता कश्मीरा सिंह ने बताया कि बलराज अभी तक घर भी नहीं पहुंचे हैं.

इस के बाद मनिंदरपाल और अनमोल ने कई जगह फोन कर के बलराज के बारे में पूछा, लेकिन कहीं से उन के बारे में कुछ पता नहीं चला. रात 12 बजे तक स्पष्ट हो गया कि बलराज गिल के साथ या तो कोई हादसा हो गया है या फिर उन का अपहरण आदि कर लिया गया है. चिंता की बात यह थी कि बलराज अपना सर्विस रिवौल्वर और सुरक्षा गार्डों को साथ नहीं ले गए थे. वह निहत्थे और अकेले ही गए थे. वैसे तो बलराज गिल जांबाज पुलिस अफसर थे, बड़ेबड़े खूंखार अपराधियों को काबू कर के उन्होंने सलाखों के पीछे पहुंचाया था. लेकिन निहत्थे और अकेले होने की वजह से सभी चिंतित थे.

बहरहाल, जब स्पष्ट हो गया कि बलराज लापता हो गए हैं तो क्षेत्रीय पुलिस और उन की सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी उन की तलाश में लग गए. शहर का चप्पाचप्पा छान मारा गया, लेकिन बलराज गिल का कहीं कोई सुराग नहीं मिला. अगले दिन हंबड़ा रोड स्थित गोल्फ लिंक क्षेत्र में बने एक फार्महाउस से बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका की लाश मिली. उन की कारें कई दिनों बाद शहर से दूर सुनसान जगह से पुलिस ने बरामद की थीं. दोनों कारों की नंबर प्लेटें बदली हुई थीं. बलराज और मोनिका की हत्या की बात सुन कर पूरे शहर में भय का माहौल बन गया था. जब यह खबर बलराल के घर पर पहुंची थी तो वहां कोहराम मच गया.

पिता कश्मीरा सिंह ने तो जैसेतैसे खुद को संभाल लिया था, लेकिन मां गुरदीप कौर का बुरा हाल था. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उन का शेर जैसा बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा. बलराज गिल सचमुच सुंदरस्वस्थ और लंबेचौड़े जवान थे. उन का ऐसा शरीर था कि वह 4-5 लोगों पर भारी पड़ सकते थे. उन की पत्नी हरिंदर कौर गिल कुंदनपुरी के सरकारी स्कूल में वाइस प्रिंसिपल थीं. पति की हत्या की बात सुन कर वह बेहोश हो गई थीं. बेटे गुरमन सिंह और बहन गुरशरण कौर का भी रोरो कर बुरा हाल था. लुधियाना के अलावा अन्य जिलों जालंधर, पटियाला, मोगा के भी पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. आईजी, डीआईजी एवं एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया.

शिनाख्त के बाद बलराज और मोनिका की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था. इस के बाद कश्मीरा सिंह की तहरीर पर थाना हैबोवाल में 2 फरवरी, 2012 को भादंवि की धारा 302, 404, 201, 465, 468, 471 व 120बी के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के युद्ध स्तर पर हत्यारों की तलाश शुरू कर दी गई थी. फार्महाउस के हालात बता रहे थे कि इस हत्याकांड को लगभग आधा दर्जन लोगों ने अंजाम दिया था. फार्महाउस के कई गमले टूटे हुए थे. कमरों के अंदर और बाहर खून ही खून फैला था. क्राईम टीम और फिंगर प्रिंट विशेषज्ञों की टीम ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल से हाथोंपैरों के निशान उठाए थे. मृतक बलराज गिल की मुट्ठी में कुछ बाल मिले थे.

मोनिका की लाश बाथरूम के पास मिली थी. बाथरूम की दीवार पर खून और उन के सिर के बाल चिपके हुए थे. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए घटनास्थल के 33 फोटो खींचे थे और 2 वीडियो बनाई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार बलराज गिल के सिर और गरदन पर तेज धार हथियार से वार किए गए थे. मोनिका के सिर, बाजू और पीठ के अलावा शरीर के अन्य अंगों पर भी तेज धार हथियार के घाव पाए गए थे. बलराज के सिर और गरदन पर किए गए वार उन की मौत का कारण बने थे. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के अनुसार मरने से पहले बलराज गिल ने हत्यारों से जम कर संघर्ष किया था.

बहरहाल, इस हाईप्रोफाइल दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए डीजीपी के निर्देश पर लुधियाना पुलिस कमिश्नर ईश्वर सिंह और एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो की देखरेख में एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम बनाई गई थी, जिस में एसीपी परमजीत सिंह पन्नू, एसीपी साहनेवाल जसविंदर सिंह, एसीपी क्राईम और सीआईए स्टौफ के तेजतर्रार प्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह गिल, एडीशनल थानाप्रभारी, एसआई अजायब सिंह के अलावा अन्य एसीपी और इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी, सुरेंद्र मोहन को शामिल किया गया था. इस मामले की जांच में अन्य एजेंसियों को भी टीम की मदद के लिए लगा दिया गया था.

स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम और एसआईटी ने हंबड़ा रोड और आसपास के गांवों से लगभग 2 हजार संदिग्ध युवकों को पूछताछ के लिए उठा लिया था. पुलिस की इस काररवाई से लोगों में रोष पैदा हो गया था. गांवों के प्रधानों और हिरासत में लिए लोगों के घर वालों ने डीजीपी और मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि पुलिस हत्यारों को पकड़ने के बजाय उन लोगों को परेशान कर रही है, जो बरसों पहले गलत राह छोड़ कर शराफत की जिंदगी जी रहे हैं. हत्याएं सुनसान इलाके में हुई थीं और हत्यारे ऐसा कोई सबूत नहीं छोड़ गए थे, जिस से जांच आगे बढ़ पाती. जांच आगे न बढ़ते देख डीजीपी पंजाब के आदेश पर दिल्ली की स्पैशल टैक्निकल टीम के विशेषज्ञों को बुलाया गया था. साइबर क्राइम यूनिट और टैक्निकल सपोर्ट इंचार्ज इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह की देखरेख में वैज्ञानिक तरीके से जांच शुरू की गई.

घटनास्थल के आसपास ज्यादा सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे, फिर भी दिल्ली से आई साइबर टीम ने 5 किलोमीटर के क्षेत्र में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चेक की. इन में एक कैमरे से इनोवा और ओपट्रा कार की फुटेज मिली, जिस में इनोवा आगे जा रही थी और ओपट्रा उस के पीछे चल रही थी. लेकिन उन कारों में सवार लोगों के चेहरे नहीं दिखाई दे रहे थे. तब दिल्ली पुलिस ने लेटेस्ट टैक्नोलौजी का सहारा लिया. एक स्पैशल पीसी असैंबल कर इस हत्याकांड से पहले से ले कर हत्याकांड के बाद का सारा डाटा इकट्ठा कर सर्च किया तो पता चला कि हत्यारों में से एक हत्यारा मृतक बलराज का मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रहा है.

उस की अंतिम लोकेशन नरपुर बेर के टावर की मिली थी. उस के बाद फोन बंद हो गया था. उस फोन में चलने वाले नंबर की काल डिटेल्स से मिले नंबरों में एक नंबर गोल्फ लिंक वाले क्षेत्र में चल रहा था. उस के साथ 2 अन्य लोगों की भी लोकेशन मिल रही थी. अब तक की जांच से एसआईटी टीम, साइबर टीम और सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह को हत्यारों से जुड़े कुछ अहम सुराग मिल चुके थे. 2 फरवरी से 5 अप्रैल, 2012 तक पुलिस और हत्यारों के बीच आंखमिचौली का खेल चलता रहा. पुलिस को हत्यारों की लोकेशन तो मिल रही थी, लेकिन वे उन के हाथ नहीं लग रहे थे. जबकि पुलिस को यहां तक पता चल चुका था कि इस हत्या में 6 लोग शामिल थे. हत्या के बाद 3-3 लोग अलगअलग जगहों पर घूम रहे थे.

3 आरोपियों ने मोनिका की इनोवा कार पर फर्जी नंबर प्लेट लगा कर जगराओ और गुरदासपुर में बेचने की भी कोशिश की थी, लेकिन वह बिकी नहीं. तब उन्होंने उसे लुधियाना के लोधी क्लब के पीछे खड़ी कर दी थी. 3 आरोपी हिमाचल प्रदेश में घूम रहे थे, जहां वे नयना देवी मंदिर भी गए थे. बहरहाल, पुलिस ने अपना घेरा तंग कर के इस हाईप्रोफाइल डबल मर्डर मामले के 3 आरोपियों हरविंदर उर्फ बिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू तथा उमेश कारड़ा को गिरफ्तार कर लिया. यह गिरफ्तारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने की थी. इस के बाद बाकी 3 अभियुक्तों को गिरफ्ताल करने के लिए इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने उन के घर छापा मारा तो वे घर से फरार मिले.

लेकिन 7 अप्रैल को वार्ड नंबर 31 के प्रधान जसपाल सिंह ने उन तीनों आरोपियों रविंदर सिंह, दविंदरपाल सिंह और हसनजीत सिंह को सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह के समक्ष पेश कर दिया था. इस तरह सभी अभियुक्तों के पकड़े जाने के बाद पुलिस उच्चाधिकारियों ने जब सब से पूछताछ की गई तो इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त डकैती और लूटपाट करते थे. इन का निशाना अधिकतर सुनसान इलाके के फार्महाउस या वे कोठियां होती थीं, जिन में 2-4 लोग रहते थे. 1 फरवरी की रात लगभग 8 बजे ये सभी हंबड़ा रोड पर स्थित संजय अग्निहोत्री के फार्महाउस के पास लूटमार करने के इरादे से इकट्ठा हुए थे. सभी बैठे योजना बना रहे थे कि कहां धावा बोला जाए? उस समय उन्हें यह पता नहीं था कि सामने वाला फार्महाउस किस का है और यहां कौन आने वाला है?

वे शराब पीते हुए लूटपाट की बातें कर रहे थे कि तभी वहां डीएसपी बलराज गिल अपने मित्र मनिंदरपाल सिंह की ओपट्रा कार से पहुंचे. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद उन की महिला मित्र मोनिका कपिला अपनी इनोवा कार से पहुंचीं. बाहर बैठे लूट की योजना बना रहे लुटेरों ने उन्हें आते देखा तो उन्हें लगा कि फार्महाउस पर इस समय ये दोनों ही हैं. उन्हें लगा कि दोनों के पास कुछ न कुछ माल तो होगा ही और अगर कुछ भी न हुआ तो 2 लग्जरी कारें तो हैं ही. यहीं हाथ मारा जाए. इस तरह आननफानन में लूट की योजना बन गई. लुटेरों के हिसाब से फार्महाऊस में 2 लोग यानी एक औरत और एक मर्द है, जबकि वे 6 थे. 2 लोगों को वे आसानी से काबू कर सकते थे.

यही सोच कर 2 लुटेरे फार्महाऊस की दीवार फांद कर अंदर आए और अंदर से लीवर घुमा कर मुख्य गेट खोल दिया. इस के बाद बाकी 4 लुटेरे भी अंदर आ गए. फार्महाऊस के कमरे में बैठे बलराज और मोनिका बातें कर रहे थे कि तभी बलराज ने पदचाप की आवाज सुनी. बाहर कौन है, यह देखने के लिए वह बाहर लौन में आए तो लुटेरों ने उन्हें दबोच लिया. अचानक हुए इस हमले से वह विचलित तो हुए, लेकिन जल्दी ही खुद को संभाल कर लुटेरों से भिड़ गए. काफी देर तक लुटेरों और बलराज के बीच हाथापाई होती रही. अंत में लुटेरों ने तेजधार हथियारों से उन पर हमला कर के उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया.

वह जमीन पर गिर पड़े तो लुटेरे उन्हें घसीट कर कमरे के अंदर ले गए और सोफे पर पटक दिया. मोनिका ने जब बलराज की हालत देखी तो अपनी जान बचाने के लिए वह कमरे से लगे बाथरूम की ओर भागीं. 2 लुटेरे मोनिका के पीछे भागे. लुटेरों को मोनिका का पीछा करते देख बलराज एक बार फिर उठे. लेकिन बाकी के 4 लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर हथियारों से उन पर फिर से वार कर दिए, जिस से उन की मौत हो गई. मोनिका का पीछा कर लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर उन का सिर बाथरूम की दीवार से टकरा दिया, जिस से उन का सिर फट गया और दीवार पर खून और सिर के बाल चिपक गए. इस के बाद मोनिका की भी उन्होंने हथियारों से वार कर के हत्या कर दी.

दोनों को मार कर लुटेरे उन के पास से नकदी, गहने, मोबाइल तथा दोनों कारें लूट कर फार्महाऊस से चले गए. जाते हुए उन्होंने फार्महाऊस का गेट बाहर से बंद कर दिया था.  इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने सभी छहों अभियुक्तों की निशानदेही पर अभियुक्त हरविंदर से बलराज गिल का सैमसंग का मोबाइल फोन, पर्स और ओपट्रा कार की चाबी बरामद की, प्रितपाल के कब्जे से एप्पल का फोन और बलराज की कलाई घड़ी बरामद की, उमेश के कब्जे से नोकिया फोन तथा इनोवा कार की चाबी बरामद की. पूछताछ एवं बरामदगी के बाद 2 मई, 2012 को सभी छहों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने समय से अदालत में चालान पेश कर दिया. पुलिस द्वारा तैयार किए गए आरोपपत्र में 65 गवाहों को शामिल किया गया था, लेकिन अदालत में केवल 44 गवाहों के ही बयान हो सके. अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में घटनास्थल की वीडियो की 4 सीडीज और 85 फोटोग्राफ्स पेश किए गए थे. इसी बीच 4 नवंबर को अभियुक्त उमेश कारड़ा ने साथियों सहित जेल से भागने की कोशिश भी की. इस के बाद इन पर जेल से भागने का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. 1 जनवरी, 2013 को यह मुकदमा लोअर कोर्ट से एडिशनल सैशन जज प्रिया सूद की अदालत में भेज दिया गया. उसी दिन सभी आरोपियों पर चार्ज फ्रेम किया गया.

2 फरवरी, 2013 को रविंदर और हसनजीत ने अदालत में जमानत याचिका दायर की, जिसे 11 फरवरी को खाजिर कर दिया गया. अदालत की काररवाई के दौरान 20 अगस्त, 2013 को आरोपी हरविंदर सिंह पर एक गवाह को धमकाने का मामला दर्ज हुआ. हरविंदर सिंह ने गवाह जसपाल सिंह को गवाही देने के लिए अदालत में जान से मारने की धमकी दी थी. अभियुक्त दविंदरपाल ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जो जनवरी, 2014 में मंजूर कर ली गई. अब अदालत में गवाहियां शुरू हो गई थीं.

अभियोजन पक्ष की ओर से चीफ पब्लिक प्रौसीक्यूटर सुखचैन सिंह गिल पैरवी कर रहे थे. मृतक बलराज गिल के पिता कश्मीरा सिंह की ओर से एडवोकेट हरप्रीत संधु मुकदमा लड़ रहे थे. बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट अशोक लखनपाल और नगेंद्र सिंह गोरा पेश हुए थे. 41 गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने इस केस को किसी और अदालत में चलाने की याचिका दायर की, जिसे सैशन जज ने यह कह खारिज कर दिया कि अदालत बदले जाने से केस की सुनवाई में देर होगी और सुनवाई प्रभावित होगी.

गवाहियां समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों की बहस और दलीले सुनने के बाद अतिरिक्त सैशन जज प्रिया सूद ने फैसला सुनाने की तारीख 9 सितंबर तय कर दी, लेकिन उस दिन वह फैसला नहीं सुना सकीं. जबकि उन्होंने सभी छहों आरोपियों को हत्याओं का दोषी करार दे दिया था. फैसला सुनाने के लिए उन्होंने 11 सितंबर की तारीख दी. दोषी करार देने के बाद जमानत पर चल रहे दोषी दविंदरपाल सिंह को तत्काल पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. माननीय जज प्रिया सूद ने 11 सितंबर 2015 को इस दोहरे हाईप्रोफाइल हत्याकांड में अभियुक्त उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ बिंदर तथा प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू को हत्याएं करने, सामान चोरी करने, जाली दस्तावेज तैयार करने, सबूत खुर्दबुर्द करने तथा साजिश रचने के अपराध में दोषी करार देते हुए दोहरी उम्रकैद यानी 42 साल की कैद तथा 1-1 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई.

जुरमाना अदा न करने पर सजा 1-1 साल और बढ़ा दी जाएगी. रविंदर सिंह उर्फ रिंकू तथा दविंदरपाल सिंह को सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने और जाली दस्तावेज तैयार करने का दोषी करार देते हुए 3-3 साल की सजा और 5-5 हजार रुपए जुरमाने की तथा हसनजीत सिंह उर्फ हसन को साजिश रचने, सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने का दोषी करार देते हुए 7 वर्ष की सजा और 20 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. सजा सुनाने से पहले अभियोजन पक्ष के वकीलों ने अभियुक्तों को फांसी की सजा की मांग की थी. लेकिन अदालत ने उन की यह मांग नहीं स्वीकार की थी.

मजे की बाज यह थी कि सजा सुनने के बाद भी दोषियों के चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी. 9 सितंबर को अदालत द्वारा दोषी करार देने के बाद अभियुक्त जब जेल पहुंचे थे तो उन्होंने झगड़ा कर के 3 विचाराधीन कैदियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया था. हत्यारों की मानसिकता का इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें सजा होने पर जब घर वाले रोने लगे तो उन्होंने कहा, ‘‘आप लोग क्यों परेशान होते हैं, सजा तो शेरों को होती है.’’ Crime Story

 

Hindi Stories: अंजानों पर विश्वास का नतीजा

Hindi Stories: संजय गुप्ता सोनू की फितरत समझ नहीं पाए और उस पर विश्वास कर के उस का पुलिस वेरीफिकेशन भी नहीं कराया. शातिर सोनू ने इसी का फायदा उठा कर ऐसा क्या कर डाला कि अब संजय गुप्ता को पछतावा हो रहा है.

उत्तर प्रदेश का नोएडा शहर देश की राजधानी दिल्ली की सीमा से सटे तेजी से विकसित व्यावसायिक नगर के रूप में जाना जाता है. यह शहर एशिया के बड़े औद्योगिक उपनगरों में से एक है. यहां की अधिकांश जमीनों पर बड़ीबड़ी इमारतें बन गईं हैं. विकास की पगडंडियों के बीच यहां रहने वालों की अपनीअपनी जिंदगियां हैं. सेक्टर-41 की कोठी नंबर बी-169 में रहने वाले संजय गुप्ता की पत्नी श्रीमती राखी गुप्ता अच्छी चित्रकार थीं. उन्होंने सैंकड़ों पेंटिंगें बनाई थीं. यह उन का पेशा नहीं, बल्कि शौक था, जिसे पूरा करने के लिए वह कैनवास पर जिंदगी के रंगों को अक्सर उकेरा करती थीं. अभिव्यक्ति के अपने मायने होते हैं, उसे प्रदर्शित करने का सभी का अपना अलगअलग अंदाज होता है.

उस दिन भी सफेद कैनवास पर अपनी अंगुलियों से ब्रश के जरिए जो चित्र उन्होंने उकेरा था, वह एक खुशहाल परिवार का था, जिस में पतिपत्नी और उन के 2 बच्चे प्रसन्न मुद्रा में नजर आ रहे थे. सभी की बांहें एकदूसरे के गले में थीं. ब्रश को किनारे रख कर राखी पेंटिंग को निहारने लगीं. काफी देर तक अपलक निहारने के बाद उन की आंखों में अचानक आंसू छलक आए. आंसुओं ने लुढ़क कर अपना सफर शुरू किया तो राखी ने साड़ी के पल्लू से उन के वजूद को मिटाने की कोशिश की. सोफे पर बैठे संजय की नजर पत्नी पर गई तो नजदीक जा कर उन के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘‘तुम बारबार परेशान क्यों हो जाती हो?’’

‘‘मेरा दुख तुम जानते हो, फिर भी…’’

‘‘हम कोशिश तो कर रहे हैं. इस तरह हिम्मत नहीं हारते, एक दिन हमारा बेटा अवश्य ठीक हो जाएगा.’’

‘‘पता नहीं कैसा संयोग है. मेरा फूल सा बेटा बिस्तर पर पड़ा है. इंजीनियर बनना था, कितने सपने थे हमारे. काश, इस की जगह मेरी यह हालत हो जाती.’’

‘‘मैं तुम्हारा दर्द समझता हूं राखी. लेकिन इस तरह परेशान होने से भी तो काम नहीं चलेगा.’’ संजय ने कहा.

‘‘फिर भी मैं ने कभी नहीं सोचा था कि हमारा होनहार बेटा इस हाल में होगा. मैं मां हूं, इस का दर्द महसूस करती हूं. वह सब जानतासमझता है, लेकिन अपनी वेदना व्यक्त करने में नाकाम है. जब उस की आंखों में छटपटाती बेबसी देखती हूं तो तड़प कर रह जाती हूं. हर पल इसी के बारे में सोचती रहती हूं. मुझे जिंदगी में कुछ नहीं चाहिए, बस मेरा बेटा ठीक हो जाए.’’ कहने के साथ ही राखी फफक कर रो पड़ीं.

‘‘भरोसा रखो, एक दिन सब ठीक हो जाएगा.’’ संजय ने प्यार से समझाया तो राखी ने हर बार की तरह उस दिन भी सुखद उम्मीदों के साथ अपने दिल को समझाने की नाकाम कोशिश की.

यह एक कड़वी हकीकत है कि जिंदगी कई बार इंसान के साथ बहुत सख्ती से पेश आती है. बेबसी तब तूफान की तरह और भी बढ़ जाती है, जब उसे संभालने की सभी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं. इस दर्द को वह शख्स बखूबी महसूस कर सकता है, जो इस से रूबरू हुआ हो. संजय गुप्ता और उन की पत्नी भी पलपल ऐसी पीड़ा से गुजर रहे थे, जहां उन की कोशिशों को ग्रहण सा लग गया था. संजय गुप्ता रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े थे. वह मूलरूप से उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रहने वाले थे, लेकिन वर्षों पहले वह वहां से चले आए थे. वह अहमदाबाद में इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन (इसरो) में वैज्ञानिक थे, परंतु कई सालों पहले नौकरी छोड़ कर वह नोएडा में प्रौपर्टी का काम करने लगे थे.

बच्चों को उन्होंने शुरू से ही साथ रखा था. उन के परिवार में पत्नी राखी के अलावा 2 बच्चे थे, जिन में बड़ा बेटा जितार्थ और उस से छोटी बेटी स्मिति. दोनों ही बच्चे पढ़ने में होनहार थे. स्मिति दिल्ली के एक फैशन इंस्टीट्यूट में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी, जबकि जितार्थ मणिपाल यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. संजय के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. एक साल पहले तक उन की जिंदगी बहुत खुशहाल थी. किसी की हंसतीखेलती जिंदगी में कब गमों का दरिया बहने लगे, इस बात को कोई नहीं जानता.

3 मार्च, 2013 को गुप्ता परिवार में भी ऐसा ही एक दरिया बह निकला. संजय को सूचना मिली कि उन का बेटा गोवा में एक रोड ऐक्सीडेंट का शिकार हो गया है. संजय वहां पहुंचे. जितार्थ को बे्रन हेमरेज हुआ था. लंबे उपचार के बाद वह हेमरेज से उबरा जरूर, लेकिन उस के चलनेफिरने, बोलने की शक्ति जाती रही.  जितार्थ स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया. वह कब तक ऐसा ही रहेगा, इस का जवाब किसी के पास नहीं था. संजय और उन की पत्नी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. संजय बेटे को नोएडा ले आए और बेहतर से बेहतर इलाज कराया. लेकिन उस की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ.

लिहाजा डाक्टरों की सलाह पर वह उसे घर ले आए. घर के एक कमरे में उस के लिए बैड लगवा दिया गया. वह कोमा जैसी स्थिति में था. सभी दैनिक क्रियाएं वह बिस्तर पर ही करता था. बेटे को ले कर संजय भी परेशान थे और राखी भी. बेटा स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया था. उस की देखभाल जरूरी थी, इसलिए संजय ने अक्टूबर, 2014 में उस के लिए नर्सिंग का काम जानने वाले 2 अटेंडैंट रख लिए, क्योंकि 24 घंटे किसी एक अटेंडैंट को घर पर रखा नहीं जा सकता था. दोनों अटेंडैंट की ड्यूटी 12-12 घंटे की हुआ करती थी. सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक अटेंडैंट सोनू जितार्थ की देखभाल करता था तो रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक रहता दूसरा लड़का था. सोनू ने खुद को बदायूं का रहने वाला बताया था. नोएडा में वह मोरना में कहीं किराए पर रहता था.

संजय के पास दौलतशोहरत सब कुछ था, लेकिन बेटे के लिए वह कुछ नहीं कर पा रहे थे. बेटे को ले कर राखी अक्सर परेशान हो जाती थीं. उस दिन भी वह चित्रकारी करतेकरते बेटे के बारे में सोच कर रोने लगी थीं. संजय ने किसी तरह समझा कर उन्हें चुप कराया था. उन का परिवार जिस कोठी में रह रहा था, वह सीमा खन्ना की थी. सीमा खन्ना ग्राउंड फ्लोर पर रहती थीं, जबकि संजय का परिवार पहली मंजिल पर किराए पर रहता था.

बेटे की वजह से राखी पूरे वक्त घर पर ही रहती थीं. वह संवेदनशील महिला थीं. खाली वक्त में वह ऐसे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया करती थीं, जो पैसे दे कर ट्यूशन नहीं पढ़ सकते थे. ये बच्चे 3 से साढ़े 3 बजे के बीच राखी के यहां आते थे. राखी का सोचना था कि शिक्षा जीवन का प्राथमिक आधार है, इसलिए सभी को शिक्षित होना चाहिए. राखी गरीबों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहती थीं. मेल नर्स सोनू के आने के बाद संजय सुबह अपने औफिस चले जाते थे. बेटी स्मिति कालेज चली जाती थी. सुबह घर में एक नौकरानी सुनीता काम करने आती थी. 12 बजे तक वह भी चली जाती थी.

इस के बाद घर में राखी गुप्ता, मेल अटेंडैंट सोनू और बेटा जितार्थ ही रह जाते थे. रोज की लगभग यही दिनचर्या थी. किसी शहर के विकास के बीच अपराध की भी अपनी एक चाल होती है. आम दिनों की भांति 6 अप्रैल, 2015 को भी सेक्टर-41 शांत था. लोगों की आवाजाही और उन के काम जारी थे. राजेंद्र प्रसाद के 2 बच्चे राखी के यहां ट्यूशन पढ़ने आते थे. लगभग 3 बजे बच्चे कोठी की पहली मंजिल पर पहुंचे तो दरवाजा खुला हुआ था. वे रोज आते थे, इसलिए उन्हें लगा कि राखी मैडम दरवाजा बंद करना भूल गई होंगी.

वे अंदर दाखिल हुए तो वहां का नजारा देख कर बुरी तरह डर गए. वे उलटे पांव सीधे अपने घर पहुंचे और उन्होंने वहां जो देखा था, पिता राजेंद्र प्रसाद को बताया. बच्चों की बात से वह हैरान रह गए. राजेंद्र तुरंत संजय के घर पहुंचे और पूरी बात मकान मालकिन सीमा खन्ना और आसपास के लोगों को बताई. आपस में विचारविमर्श कर के कुछ लोग हिम्मत कर के पहली मंजिल पर पहुंचे तो वहां की हालत देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. 45 वर्षीया राखी गुप्ता खून से लथपथ फर्श पर पड़ी थीं. उन के आसपास खून ही खून फैला था. किसी ने उन की नब्ज टटोली तो वह थम चुकी थी. उन का बीमार बेटा जितार्थ भी नीचे पड़ा था. लेकिन वह ठीक था.

सीमा खन्ना ने तुरंत इस मामले की खबर संजय गुप्ता को दी तो वह कुछ ही देर में घर आ गए. राखी की मौत हो चुकी थी. किसी ने उन की गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर नुकीली चीज से प्रहार किए थे. जितार्थ चूंकि बिस्तर से गिर गया था, इसलिए वह दर्द से छटपटा रहा था. उस के सिर में चोट लगी थी. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. इस बीच पुलिस को भी घटना की सूचना दे दी गई थी. सूचना पा कर कोतवाली सेक्टर-39 के थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान तुरंत पुलिस बल के साथ मौके पर आ पहुंचे. मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों को दे दी. सूचना पा कर एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह और एएसपी विजय ढुल भी मौके पर आ पहुंचे थे.

पुलिस ने मौकामुआयना किया तो हत्या की वजह समझ में नहीं आई. लेकिन यह जरूर लगा कि कातिल का मकसद सिर्फ राखी की हत्या करना नहीं था. क्योंकि थोड़ी नकदी और राखी का मोबाइल गायब था लेकिन घर में रखे अन्य लाखों रुपए बच गए थे. हालांकि जिस लौकर में नकदी रखी थी, उसे तोड़ने की कोशिश जरूर की गई थी. राखी पर किसी नुकीली चीज से प्रहार किए गए थे, लेकिन हत्या में प्रयुक्त वह नुकीली चीज मौके से बरामद नहीं हुई थी. पुलिस ने डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम को मौके पर बुलवा लिया था. चौंकाने वाली बात यह थी कि मेल अटेंडैंट सोनू लापता था, जबकि उस समय उसे ड्यूटी पर होना चाहिए था.

पुलिस ने निरीक्षण के बाद पूछताछ शुरू की, ‘‘सब से पहले इस घटना की जानकारी किसे हुई?’’

‘‘मुझे साहब.’’ राजेंद्र प्रसाद ने आगे बढ़ कर कहा.

‘‘कैसे?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में राजेंद्र प्रसाद ने अपने बच्चों के वहां ट्यूशन पढ़ने आने की बात बता दी.

पुलिस ने संजय गुप्ता से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्होंने किसी से भी अपनी दुश्मनी होने से इनकार कर दिया. जितार्थ घटना का चश्मदीद तो था, लेकिन वह कुछ भी बताने लायक नहीं था. हैरानी की बात यह थी कि पड़ोस में भी किसी को घटना के बारे में कुछ पता नहीं चला था. वैसे भी आजकल शहरी जीवनशैली में लोगों की दुनिया अपने तक ही सिमट गई है. संजय गुप्ता के सेक्टर-2 स्थित अपने औफिस चले जाने के बाद घर में कुल 3 लोग ही रह जाते थे. एक राखी गुप्ता, दूसरा उन का 22 वर्षीया बेटा जितार्थ और तीसरा 25 वर्षीय अटेंडैंट सोनू. मकान के जिस हिस्से में संजय गुप्ता का परिवार रहता था, उस में मुख्य दरवाजे पर जाली वाला दरवाजा भी लगा हुआ था.

जाहिर है, अंजान आदमी के लिए दरवाजा नहीं खोला जा सकता था. पुलिस ने सोनू के मोबाइल पर फोन किया तो वह बंद था. इस से उस पर शक हुआ. जबकि संजय यह मानने को तैयार नहीं थे कि सोनू इस तरह हत्या कर सकता है. हत्या के बाद जिस तरह वह गायब था, उसी से संदेह हो रहा था. मकान मालकिन सीमा खन्ना ने पुलिस को बताया कि उन्होंने सोनू को चुपचाप जाते देखा था. उस की तलाश में एक पुलिस टीम मोरना भेजी गई तो उस के मकान मालिक ने बताया कि 1 अप्रैल को वह उन का घर छोड़ कर चला गया था. सवाल यह था कि अगर सोनू ने राखी की हत्या की थी तो इस की वजह क्या थी?

इस बीच पुलिस ने राखी गुप्ता के शव का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और संजय गुप्ता की तहरीर पर सोनू के खिलाफ राखी की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. दिनदहाड़े हुई हत्या की इस घटना से समूचे इलाके में हड़कंप मच गया था. लोग पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाने लगे थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में राखी के शरीर पर नुकीली चीज के 8 घाव पाए गए थे. ये घाव उन के गले, हाथ और कंधे पर थे. ये संभवत: किसी सर्जिकल चीज के थे. मैडिकल ट्रीटमेंट के कुछ सामान जितार्थ के कमरे में रहते थे. हाथों पर घाव पाए जाने से एक बात साफ थी कि राखी ने मरने से पहले संघर्ष किया था. दूसरी ओर गिरने की वजह से जितार्थ के सिर में चोट आई थी. डाक्टरों ने उस का सीटी स्कैन कराया. वह नौर्मल था.

पुलिस का सोनू तक पहुंचना जरूरी था. हैरानी की बात यह थी कि सोनू का कोई स्थाई पता या फोटो गुप्ता परिवार के पास नहीं था. संजय ने पुलिस को बताया कि सोनू का फोटो राखी के मोबाइल में था, जबकि उन के मोबाइल को वह साथ ले गया था. घटना क्यों और कैसे घटी, सोनू ही इस से परदा उठा सकता था. एसएसपी ने एएसपी विजय ढुल के निर्देशन में मामले के खुलासे के लिए 3 पुलिस टीमों को गठन किया. पुलिस ने सोनू के मोबाइल की काल डिटेल्स व लोकेशन निकलवाई. उस की आखिरी लोकेशन सेक्टर-39 की मिली थी. इस के बाद उस का मोबाइल बंद हो गया था.

पुलिस ने सोनू के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटानी शुरू की. पता चला कि संजय ने सोनू को अपने यहां इस के पहले काम करने वाले राजकुमार के माध्यम से नौकरी पर रखा था. पुलिस राजकुमार तक पहुंच गई. राजकुमार से पता चला कि सोनू पहले नोएडा के सेक्टर-40 स्थित एक अस्पताल में 2 साल और एक डाक्टर दंपत्ति के घर करीब एक साल तक काम कर चुका था. उसी बीच उस की उस से मुलाकात हुई थी. इस से ज्यादा उस के बारे में वह भी कुछ नहीं जानता था.

पुलिस ने उस की बताई दोनों जगहों पर जा कर पूछताछ की तो पता चला कि सोनू झगड़ालू स्वभाव का था. एक बार उस ने एक नर्स को जान से मारने की धमकी भी दी थी. हैरानी की बात यह थी कि दोनों ही जगहों पर सोनू का फोटो और पता नहीं मिल सका. इन सभी जगहों पर उसे सोनू शेख या सोनू राघव के नाम से जाना जाता था. यही उस का असली नाम था, यह भी किसी को पता नहीं था. घटना को घटे 2 दिन बीत गए, लेकिन संदिग्ध हत्यारे का कोई सुराग नहीं लग सका. पुलिस ने सोनू के फोटो की तलाश के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का भी सहारा लिया. जिस मोबाइल नंबर का इस्तेमाल सोनू करता था, वह फर्जी आईडी पर लिया गया था. इस से उस का पता मिलने की संभावना भी खत्म हो चुकी थी.

सोनू की जो काल डिटेल्स मिली थी, उस में एक नंबर पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर पर बात की तो वह नंबर कर्नाटक की एक युवती रीतू (परिवर्तित नाम) का था. उस युवती ने बताया कि 2 महीने पहले मिसकाल के जरिए सोनू उस के संपर्क में आया था, तभी से उस से बातें होने लगी थीं. उस के बारे में वह ज्यादा कुछ नहीं जानती. युवती को उस ने अपना नाम सोनू शर्मा बताया था. इलेक्ट्रौनिक सर्विलांस से पुलिस को पता चला कि सोनू ने अपने मोबाइल में नए नंबर का सिम डाल लिया है. उस नंबर की लोकेशन के अनुसार, सोनू नोएडा से दिल्ली होते हुए पश्चिमी बंगाल चला गया था. उस की लोकेशन पुलिस को वहां के मुर्शिदाबाद जिले की मिल रही थी.

उस नंबर से उस ने दिल्ली के एक नंबर पर बात की थी. पुलिस उस नंबर तक पहुंची तो वह नंबर उस की मौसी का निकला. उस से पता चला कि सोनू की मां दिल्ली में ही रहती थी, लेकिन उस ने दूसरा विवाह कर लिया था, इसलिए उस का अपने परिवार से अब कोई ताल्लुक नहीं था. वह लोगों के घरों में साफसफाई का काम करती थी. उस से पुलिस को सोनू के घर का पता मिल गया. वह पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद का रहने वाला था. डीआईजी रमित शर्मा पूरे मामले पर नजर रखे हुए थे. एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह से उन्होंने केस की प्रगति की पूरी जानकारी ली और एक पुलिस टीम पश्चिम बंगाल रवाना करने के आदेश दिए.

एसएसपी ने थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान के नेतृत्व में 9 अप्रैल को एक पुलिस टीम वहां के लिए रवाना कर दी. इस पुलिस टीम में सबइंसपेक्टर पतनीश यादव, आलोक सिंह और कांस्टेबल अशोक यादव आदि शामिल थे. अगले दिन पुलिस मुर्शिदाबाद स्थित सोनू के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और अपने साथ नोएडा ले आई. पुलिस के लिए यकीनन यह बड़ी सफलता थी. नोएडा ला कर पुलिस ने उस से पूछताछ की तो राखी की हत्या की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

सोनू मूलरूप से पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद निवासी जिल्ले का बेटा था. जिल्ले मेहनतमजदूरी किया करता था. कई सालों पहले सोनू नौकरी की तलाश में दिल्ली चला आया. कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद वह नोएडा आ गया और छोटेमोटे काम करने लगा. इस के बाद वह एक अस्पताल में वार्डबौय का काम करने लगा. समय के साथ वह काम सीख गया. कुछ अस्पतालों में नौकरी करने के बाद उस ने एक डाक्टर दंपत्ति के यहां भी नौकरी की. सोनू शातिर दिमाग युवक था. वह मुसलमान था, लेकिन किसी को वह अपना नाम सोनू शर्मा तो किसी को सोनू शेख तो किसी को सोनू राघव बताता था.

अपना असली नामपता वह किसी को नहीं बताता था. इस के पीछे वजह यह थी कि वह रातोरात अमीर बनने के सपने देखा करता था और किसी अच्छे मौके की तलाश में था. वह नोएडा में ही किराए का कमरा ले कर रहता था. सन 2015 में गुप्ता परिवार को जितार्थ के लिए मेल अटेंडैंट की जरूरत पड़ी तो राजकुमार ने सोनू के बारे में बताया. उन्होंने बेटे की देखभाल के लिए सोनू से बात की तो वह तैयार हो गया. इस के बाद वह उन के घर आने लगा. गुप्ता परिवार सोनू को परिवार के सदस्य की तरह मानता था. उसे 9 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन पर रखा गया था, लेकिन 2 महीने में ही संजय ने उस की तनख्वाह बढ़ा कर 11 हजार रुपए कर दी थी.

सोनू होशियार तो था ही. वह जानता था कि सब से पहले हर किसी का विश्वास जीतना चाहिए. इसलिए उस ने बातों और काम से पूरे परिवार का विश्वास जीत लिया. वह ड्यूटी के समय जितार्थ के पास ही रहता था. इस बीच या तो टीवी वह देखता था या राखी से बातें कर लिया करता था. शुरू में तो सोनू मन लगा कर काम करता रहा. लेकिन झूठ और दिखावे की चमक बहुत लंबे समय तक बरकरार नहीं रहती. समय के साथ राखी की समझ में आने लगा कि वह दिखावा ज्यादा करता है, काम कम. संजय सोनू को 11 हजार रुपए अपने बेटे की पूरी तरह से देखभाल के लिए दे रहे थे. धीरेधीरे सोनू देखभाल में लापरवाही करने लगा. इस की भी एक वजह थी. दरअसल सोनू इस काम से परेशान हो गया था. वह अमीर बनने के सपने देखता था, लेकिन सपने पूरे होने की उसे कोई राह नहीं दिख रही थी.

3 महीने पहले सोनू का संपर्क मोबाइल के जरिए गलत नंबर लग जाने से कोलकाता की रहने वाली रीतू से हो गया, जो कर्नाटक में रहती थी. वह उस से बातें करने लगा. वह उस से आधाआधा घंटे मोबाइल पर बातें करता रहता. राखी को उस की यह लापरवाही बहुत अखरती थी. शुरूशुरू में तो उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा, लेकिन धीरेधीरे उन्होंने सोनू को टोकना शुरू कर दिया. उस का किसी ने पुलिस वेरीफिकेशन नहीं कराया था. संजय गुप्ता ने भी यही गलती की. इस बात से सोनू खुश था.

सोनू की लापरवाही से बेटे की जान भी जा सकती थी. एक दिन राखी ने लापरवाही पर सोनू को न सिर्फ जम कर फटकरा, बल्कि उसे थप्पड़ भी मार दिया. सोनू ने आगे से लापरवाही न करने का वादा किया. वह कभी धोखा दे कर भाग न जाए, इस के लिए राखी ने अपने मोबाइल में उस का फोटो खींच लिया. कुछ समय बाद राखी ने महसूस किया कि सोनू लापरवाही के मामले में बदला नहीं है. जब देखो तब वह मोबाइल पर बातें करने में लगा रहता है. जितार्थ को प्रतिदिन दवाइयां व इंजेक्शन देने होते थे. सोनू इस में भी लापरवाही करने लगा था. सोनू की इस लापरवाही पर राखी उसे खरीखोटी सुना कर थप्पड़ जड़ दिया करती थीं. इस पर सोनू खून का घूंट पी कर रह जाता था.

वक्त के साथ सोनू को राखी का डांटना अखरने लगा. थप्पड़ को ले कर उस के मन में नफरत पैदा होने लगी. सोनू शातिर तो था ही, वह राखी को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगा. मन ही मन उस ने सोच लिया कि एक दिन वह राखी के घर को लूट लेगा. इस से उस के थप्पड़ का बदला भी पूरा हो जाएगा और वह मालामाल भी हो जाएगा. सोनू को इस बात का डर नहीं था कि वह पकड़ा जाएगा, क्योंकि उस का रिकौर्ड किसी के पास नहीं था. उस ने अपने मन के गुस्से को जाहिर नहीं होने दिया और आराम से रहता रहा. सोनू का जितार्थ की देखभाल से मन उचट गया था.

वह काम में लापरवाही करने के साथ ही रीतू से मोबाइल पर बातें भी किया करता था. इस पर राखी की सोनू से अकसर नोंकझोंक हो जाया करती थी. सोनू ने लूटने की योजना मन ही मन बना ली थी. इसलिए 1 अप्रैल को उस ने किराए का मकान भी खाली कर दिया. इस के बाद वह उचित मौके की तलाश में रहने लगा. 6 अप्रैल को भी सोनू ने लापरवाही की और मोबाइल पर बातें करने के चक्कर में जितार्थ के गले में कफ निकालने के लिए लगने वाली नली ठीक से नहीं लगाई. इसी बीच राखी कमरे में आ गईं. यह देख कर वह भड़क गईं, ‘‘तुम से कोई भी काम ठीक से नहीं किया जाता?’’

‘‘सौरी मैडम वह…’’ सोनू अपनी बात कह पाता, उस से पहले ही राखी ने उस के गाल पर तमाचा रसीद कर दिया. सोनू पहले ही खार खाए बैठा था. उस दिन वह आगबबूला हो उठा. उस का खून खौल गया. उस ने गालियां देते हुए राखी का हाथ झटक दिया, ‘‘तुम्हारे हाथ बहुत चलते हैं, आज मैं सब से पहले इन का चलना बंद किए देता हूं.’’

कह कर सोनू ने जितार्थ की दवाइयों की ट्रे में रखा सर्जिकल चाकू उठा लिया और राखी की गर्दन पर वार कर दिया. इस अप्रत्याशित हमले से राखी तड़प उठीं. उन्होंने विरोध किया, लेकिन सोनू नौजवान था. उस ने एक के बाद एक राखी पर कई वार कर दिए. राखी नीचे गिर कर तड़पने लगीं. जितार्थ यह सब देख रहा था. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था, लेकिन अंदर ही अंदर घुट रहा था. मां को बचाने के लिए उस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी तो हिलने डुलने से बिस्तर से नीचे गिर गया. सोनू ने इस की परवाह नहीं की. राखी के बचने की कोई गुंजाइश न रहे, उस ने और कई वार कर दिए. राखी की मौत हो गई.

इस के बाद सोनू ने राखी का मोबाइल, घड़ी, डीवीडी व सेफ में रखे करीब 10 हजार रुपए उठा कर एक बैग में रख लिए. सोनू जानता था कि राखी के मोबाइल में उस का फोटो है, इसलिए उस ने उसे भी ले लिया था. उस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू भी अपने पास रख लिया. हत्या के दौरान उस की कमीज पर थोड़ा खून लग गया था. लगभग साढ़े 12 बजे वह वहां से चला गया. उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया और चालू किया तो नया सिमकार्ड उस में डाल लिया. उस रात वह अपने दोस्त के घर रुका. इस से पहले उस ने सर्जिकल चाकू और कमीज को सेक्टर-41 में एक स्थान पर छिपा दिया था.

अगले दिन वह दिल्ली पहुंचा और कालका मेल से कोलकाता होते हुए मुर्शिदाबाद स्थित अपने घर चला गया. सोनू ने सोचा था कि उस का असली नामपता चूंकि किसी के पास नहीं है, इसलिए पुलिस पश्चिम बंगाल तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. वह आराम से रह रहा था कि इसी बीच वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू और खून से सनी कमीज बरामद कर ली थी. पूछताछ और जरूरी कागजी काररवाई कर के पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

गुप्ता परिवार ने सोनू की फितरत को समझने की भूल कर दी. उस का पुलिस वैरीफिकेशन न करा कर भी उन्होंने भूल की. सोनू जैसे लोगों पर विश्वास और गुस्सा दोनों ही खतरनाक साबित हुए. कथा लिखे जाने तक सोनू जेल में था. 28 मई को पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया था. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Crime Story: पति की मौत का फरमान

Hindi Crime Story: कामिनी गांव के ही रहने वाले मार्तंड यादव से शादी करना चाहती थी. लेकिन घर वालों ने उस की शादी पवन से कर दी. इस का परिणाम यह निकला कि निर्दोष पवन मारा गया.

गांव में भागवत कथा होने की वजह से काफी चहलपहल थी. कथा में जाने के लिए हर कोई उत्साहित था, क्योंकि वहां बहुत ही सुंदर कथा होती थी. उस के बाद हवन होता था. कामिनी भी वहां रोजाना अपनी सहेली मीना के साथ कथा सुनने जाती थी. उस दिन वह मीना के साथ कथा सुनने पहुंची तो वहां का नजारा ही कुछ और था. गांव के कई लोग पंडितों द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चारण के साथ हवन कर रहे थे. उस से जो धुआं उठ रहा था, वातावरण सुगंधित हो रहा था. कामिनी और मीना ने हाथ जोड़ कर सिर झुकाया और वहां बिछी दरी पर बैठ गईं. अचानक कामिनी की नजर दूसरी ओर बैठे एक युवक पर पड़ी, जो एकटक उसी को ताक रहा था. वह कोई और नहीं, उसी के गांव का मार्तंड यादव उर्फ पिंकू था.

कामिनी उम्र के उस दौर में पहुंच गई थी, जब लड़कों का इस तरह ताकना लड़कियों को अच्छा लगता है. यही वजह थी कि कामिनी ने भी उस की ओर उसी तरह ताका. नजरें मिलीं तो मार्तंड मुसकराया, लेकिन कामिनी ने नजरें झुका लीं. लेकिन यह भी सच है कि इस स्थिति में लड़की पहली बार भले ही नजरें झुका ले, लेकिन पलट कर जरूर देखती है. और कहते हैं कि अगर पलट कर देख लिया तो समझो मामला फिट है यानी वह भी चाहती है. कामिनी से रहा नहीं गया, उस ने नजरें उठाईं तो मार्तंड को अपनी ओर ताकते पाया. उसे उस तरह ताकते देख कामिनी को हंसी आ गई.

बस, फिर क्या था, कामिनी की इस हंसी पर मार्तंड मर मिटा. एक तो कामिनी ने पलट कर देखा था, दूसरे हंसी थी, इसलिए मार्तंड को लगा, अब मामला फिट है. अब वह सबकुछ भूल कर सिर्फ कामिनी को ही देख रहा था. कामिनी का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उसे इस तरह बारबार उधर देखते देख कर मीना ने पूछा, ‘‘क्या बात है, जो तू बारबार उधर लड़कों की ओर देख रही है?’’

कामिनी इस तरह सिटपिटा गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उसे जवाब तो देना ही था, इसलिए उस ने मीना को प्यार से झिड़कते हुए कहा, ‘‘यार, तुम भी न जाने क्याक्या सोचती रहती हो? इस तरह की जगहों पर कोई क्या देखेगा? तुम्हारे दिमाग में हमेशा खुराफात ही चलता रहता है.’’

अब तक हवन खत्म हो गया था. प्रसाद ले कर कामिनी मंडप से बाहर आई तो मार्तंड भी उस के पीछेपीछे बाहर आ गया. वह उस से थोड़ी दूरी बना कर चल रहा था. उसे अपने पीछे आते देख कामिनी का दिल तेजी से धड़कने लगा कि मीना के सामने ही वह उसे कुछ कह न दे. अब वह उसे अपना सा लग रहा था. कुछ ऐसा ही मार्तंड को भी महसूस हो रहा था. वह उस से अपने दिल की बेचैनी कहना तो चाहता था, लेकिन मीना की उपस्थिति उसे ऐसा करने से रोक रही थी. कुछ भी रहा हो, मार्तंड की नजरें उसी पर टिकी थीं. कामिनी भी बारबार पलट कर उसे देख रही थी. आखिर मीना ने उस की चोरी पकड़ ही ली. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अच्छा तो यह बात है, अब समझ में आया, यह महाशय हमारे पीछेपीछे क्यों चले आ रहे हैं?’’

‘‘क्या बकवास कर रही है? कोई पीछेपीछे आ रहा है तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि मैं उस पर मर मिटी हूं. चलो, घर चलो, नहीं तो तुम इसी तरह बकवास करती रहोगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘मैं कहां कह रही हूं कि तुम यहीं रुको. चलो न घर.’’ मीना ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा और तेजी से घर की ओर चल पड़ी.

मार्तंड कामिनी को तब तक देखता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. घर पहुंच कर कामिनी मार्तंड के खयालों में डूब गई. पता नहीं क्यों वह उस के दिल में बस गया था, जबकि वह बहुत खूबसूरत भी नहीं था. गांव में उस से भी खूबसूरत लड़के थे, जो उस पर मरते थे. लेकिन उस ने कभी किसी को भाव नहीं दिया था. दूसरी ओर मार्तंड भी कामिनी के खयालों में डूबा था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कामिनी जैसी खूबसूरत लड़की का दिल उस के लिए धड़क सकता है. इसलिए अगले दिन के इंतजार में उसे नींद नहीं आई. वह जानता था कि कामिनी रोज कथा सुनने आती है. इसलिए उस ने तय कर लिया था कि अगर अगले दिन कामिनी मिल गई तो कैसे भी वह उस से अपने दिल की बात जरूर कह देगा.

संयोग से अगले दिन कामिनी अकेली ही वहां आई. शायद उसे विश्वास था कि उस के सपनों का राजकुमार मार्तंड अवश्य वहां आएगा और उस से बात करने की कोशिश भी करेगा. उसे बात करने में कोई संकोच न हो, यही सोच कर वह मीना को साथ नहीं लाई थी. जब वह वहां पहुंची तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि मार्तंड वहीं बैठा था, जहां कामिनी एक दिन पहले बैठी थी. शायद वह उसी का इंतजार कर रहा था. मार्तंड की नजरें उस से मिलीं तो दोनों के होठों पर मुसकान तैर उठी. कामिनी आ कर उस से थोड़ी दूरी पर महिलाओं के झुंड में बैठ गई. दोनों बैठे तो भागवत कथा सुनने थे, लेकिन दोनों के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

आखिर  नहीं रहा गया तो मार्तंड ने कुछ इशरा किया. उस के बाद कामिनी उठ कर चल पड़ी. लोगों की नजरें बचा कर मार्तंड भी उस के पीछेपीछे चल पड़ा. सुरक्षित स्थान पर आ कर जरा भी संकोच किए मार्तंड ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘कामिनी, अब मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है कि मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम्हारे हावभाव से ही मुझे पता चल गया है कि तुम भी मुझे प्यार करती हो, इसलिए चलो एकांत में कहीं बैठ कर बातें करते हैं.’’

गांवों में एकांत कहां होता है, बागों या खेतों के बीच. दोनों गेहूं के खेतों के बीच बैठ कर बातें करने लगे. मार्तंड ने उस एकांत में कामिनी के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामिनी, यह जिंदगी हमारी है, इसलिए इस के बारे में सिर्फ हमें ही निर्णय लेने का हक है. तुम मुझ से मिलने के लिए रोज यहीं आना. यहां लोगों की नजर हम पर नहीं पड़ेगी. बोलो, आओगी न?’’

‘‘मैं जरूर आऊंगी मार्तंड. तुम मेरा इंतजार करना.’’ कामिनी ने कहा और अपने घर चली गई.

मनचाहा प्रेमी मिल जाने से कामिनी खुश थी. वह मार्तंड की यादों में खोई रहने लगी. अब उसे हमेशा उस समय का बेसब्री से इंतजार रहता, जब उसे मार्तंड से मिलने जाना होता. मार्तंड उस से जब भी रोमांटिक बातें करता, वह शरमा जाती. वह उस की सुंदरता की तारीफें करते हुए कहता, ‘‘तुम्हारी इसी सुंदरता ने मेरा दिल चुरा लिया है. अब मेरे इस दिल को तुम संभाल कर रखना, इसे कभी तोड़ना मत.’’

कामिनी कहती, ‘‘तुम भी कैसी बातें करते हो, मैं भला तुमरे दिल को क्यों तोड़ूंगी, अब तो वह हमारा हो चुका है.’’

‘‘मैं कितना भाग्यशाली हूं, जो तुम जैसी प्यार करने वाली मिल गई. शायद तुम मेरे भाग्य में लिखी थी.’’

ऐसी ही बातें कर के मार्तंड ने कामिनी को लुभा कर उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. दोनों मन से तो एक थे ही, तन से भी एक हो गए. उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना शिवगढ़ के निमडवल गांव में रहते थे रामेश्वर प्रसाद. वह खेती कर के अपना गुजरबसर करते थे. उन के परिवार में पत्नी रमा और 2 बेटियां तथा 2 बेटे थे. कामिनी उन के बच्चों में सब से छोटी थी. उन के बाकी बच्चों का विवाह हो चुका था. कामिनी ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसे मार्तंड से प्यार हो गया.

कामिनी ने गांव के ही सरकारी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की थी. वह खूबसूरत थी, इसलिए जवान होते ही गांव के मनचले लड़के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगे थे. उन्हीं में मार्तंड भी था. आखिर में उसी ने बाजी मार ली थी. वह प्रभाकर यादव का बेटा था. वह नल वगैरह ठीक करने का काम करता था. गांवों में इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह पातीं, इसलिए मार्तंड और कामिनी के संबंध भी उजागर हो गए. जब बेटी की करतूत का पता रामेश्वर प्रसाद को चला तो उन्होंने कामिनी की खूब पिटाई की और सख्त हिदायत दी कि अब वह मार्तंड से बिलकुल नहीं मिलेगी. उस के घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी गई.

इस हालत में रामेश्वर जल्द से जल्द कामिनी की शादी के बारे में सोचने लगा. क्योंकि उस की वजह से उन की गांव में बदनामी हो रही थी. रामेश्वर का एक रिश्तेदार हरभजन लखनऊ के थाना नगराम के गांव सेंधूमऊ में रहता था. सेंधूमऊ के बगल में ही एक गांव है बघौली. उसी गांव में ललई प्रसाद अपने परिवार के साथ रहता था. वह भी खेती करता था. उस के परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 2 बेटियां और एकलौता बेटा पवन था. उस ने दोनों बेटियों की शादी कर दी थी. बेटे की अभी शादी नहीं हुई थी. वह गोसाईगंज के दयाल इंस्टीट्यूट से बीबीए कर रहा था.

हरभजन पवन से परिचित था. वह जानता था कि पवन बहुत ही नेक और पढ़ालिखा लड़का है. इसलिए उस ने उस से कामिनी से रिश्ते की बात चलाई तो वह बात आगे बढ़ाने को राजी हो गया. उस ने अपने पिता से बात की तो उन की सहमति मिलने के बाद सभी कामिनी को देखने गए. कामिनी के घर वालों को भी पवन और उस का घरपरिवार पसंद था, इसलिए बातचीत के बाद शादी तय हो गई. कामिनी ने पवन के सामने ही विवाह से मना कर दिया था, लेकिन रामेश्वर प्रसाद ने किसी तरह बात संभाल ली थी. 20 मई, 2015 को कामिनी और पवन का विवाह धूमधाम से हो गया. कामिनी को न चाहते हुए भी पवन से विवाह करना पड़ा. जबकि वह मार्तंड से शादी करना चाहती थी.

शादी के बाद भी वह उसे एक पल के लिए नहीं भूल पा रही थी. क्योंकि उस ने उसी के साथ जिंदगी गुजारने का सपना जो देखा था. लेकिन घर वालों ने उस के सपनों को तोड़ दिया था. पग फेरा में कामिनी मायके आई तो मार्तंड से मिली. तब वह उस से गले मिल कर बिलखबिलख कर रोई. मार्तंड की भी आंखें नम हो गईं. कामिनी की हालत देख कर वह बेचैन हो उठा. उस ने कामिनी को ढांढ़स बंधा कर कहा, ‘‘कामिनी हम कभी अलग नहीं होंगे, कोई भी हमें जुदा नहीं कर सकता. हम हमेशा इसी तरह मिलते रहेंगे.’’

इस के बाद मार्तंड ने एक सस्ता सा मोबाइल फोन खरीद कर कामिनी को दे दिया, जिस से उन में बराबर बातें हो सकें. कामिनी जब तक मायके में रही, मार्तंड से बराबर मिलती रही. ससुराल आने पर मिलना तो बंद हो गया, लेकिन मोबाइल से सब की चोरी वह उस से बातें कर लेती थी. 12 अगस्त, 2015 की शाम साढ़े 6 बजे पवन घर लौटा और कपड़े बदल कर आराम करने लगा. रात 8 बजे कामिनी ने उसे सौ रुपए का नोट देते हुए कहा कि उसे कोल्ड ड्रिंक पीनी है, जा कर ला दे. पवन उन्हीं कपड़ों में दहेज में मिली हीरो पैशन प्रो बाइक से कोल्ड ड्रिंक लेने चला गया.

कोल्ड ड्रिंक की दुकान उस के घर से लगभग 3 सौ मीटर की दूरी पर थी. थोड़ी देर बाद पवन का फोन आया कि गांव के बाहर उस की बाइक खड़ी है, किसी से मंगवा लें. वह किसी जरूरी काम से जा रहा है. इस के बाद पवन के पिता वहां गए और गांव के एक लड़के से कह कर बाइक ले आए. सुबह गांव के कुछ बच्चे गांव के बाहर तालाब पर शौच के लिए गए तो उन्होंने वहां झाडि़यों में पवन की लाश पड़ी देखी. बच्चों ने यह बात तुरंत पवन के घर वालों को बताई तो घर वाले रोतेबिलखते वहां पहुंचे. पवन के पिता ललई प्रसाद ने इस घटना की सूचना थाना नगराम पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद थाना नगराम के थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक पवन ने नीले रंग पर सफेद धारी वाली कैपरी और सफेद शर्ट पहन रखी थी. उस के गले और मुंह पर किसी तेज धारदार हथियरा के घाव थे. सुधीर कुमार सिंह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ राकेश नायक भी आ गए. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मैडिकल कालेज भिजवा कर पूछताछ शुरू की. इस के बाद थाने आ कर सुधीर कुमार सिंह ने मृतक के पिता ललई प्रसाद की ओर से अज्ञात के खिलाफ पवन की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. थानाप्रभारी मामले की जांच के लिए बघौली गांव जाने की तैयारी कर रहे थे कि किसी ने फोन कर के उन्हें बताया कि मृतक पवन की पत्नी कामिनी अपना सामान बांध कर कहीं जाने की तैयारी कर रही है.

यह सुन कर सुधीर कुमार सिंह को हैरानी हुई. जिस औरत के पति की हत्या हुई हो, अभी उस की लाश भी न दफनाई गई हो, इस दुख की घड़ी में ससुराल वालों का साथ देने के बजाय वह घर से जाने की तैयारी कर रही है. उन्हें लगा, कहीं ऐसा तो नहीं कि इस घटना के पीछे उसी का हाथ हो. सीओ राकेश नायक भी थाने में मौजूद थे. कामिनी के बारे में सीओ साहब को बताया तो उन्होंने भी कामिनी पर शक जाहिर किया. फिर क्या था, थानाप्रभारी ललई प्रसाद के घर जा पहुंचे. उन्हें जो सूचना मिली थी, वह सही थी. कामिनी अपना बैग तैयार कर के बैठी थी. शक के आधार पर सुधीर कुमार सिंह ने बैग की तलाशी ली तो उस में से कपड़ों और व्यक्तिगत सामान के अलावा 1 हजार रुपए, एक सिम और एक युवक की फोटो बरामद हुई. उन्होंने बैग में नीचे लगे पैड के अंदर हाथ डाला तो उस में से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ.

घर वालों से उस मोबाइल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. इस के पास जो मोबाइल था, उसे तो पवन ने पहले ही ले लिया था.

सुधीर कुमार सिंह ने जब कामिनी से उस के पास मिले फोटो के बारे में पूछा तो वह काफी देर तक उस फोटो को देखती रही, उस के बाद बोली, ‘‘यह युवक उस के गांव का रहने वाला है.’’

पुलिस कामिनी को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में महिला कांस्टेबल के जरिए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कई नाम बताए. उन सभी को पुलिस ने थाने ला कर पूछताछ की तो पता चला कि वे निर्दोष थे. कामिनी ने जो नाम बताए थे, वे उस के पुराने आशिक थे, जिन्हें वह फंसाना चाहती थी. सुधीर कुमार सिंह ने कामिनी का मोबाइल खंगाला तो उस में सिर्फ एक ही नंबर मिला, जिस से उस में लगभग रोज ही फोन आए थे. घटना वाले दिन भी उस नंबर से अंतिम बार रात 11 बजे फोन आया था. जब उस नंबर के बारे में कामिनी से सख्ती से पूछा गया तो उस ने बताया कि उस नंबर से फोन करने वाला और फोटो वाला युवक एक ही है. उस का नाम मार्तंड यादव उर्फ पिंकू है, जो उस के मायके निमडवल में रहता है.

सुधीर कुमार सिंह ने उसी मोबाइल से उस नंबर पर स्पीकर औन कर  के कामिनी से बात करने को कहा. कामिनी ने उस नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन रिसीव करने वाले ने कहा, ‘‘सब ठीक कर दिया मैं ने, किसी को शक भी नहीं हुआ.’’

‘‘क्या कह…’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि सुधीर कुमार सिंह ने उसे कुछ भी बताने से मना कर दिया.

‘‘मैं ने अपने दोस्तों के साथ सब कुछ बहुत सही ढंग से कर दिया है. अब हम एक साथ रह सकेंगे.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘लेकिन यह सब कर के तुम ने मुझे फंसा दिया. पुलिस मुझ पर शक कर रही है. तुम आ कर मुझे बचाओ. तुम कहां हो?’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि मार्तंड को शायद शक हो गया. उस ने तुरंत फोन काट दिया. दोबारा फोन किया गया तो फोन बंद हो चुका था. इस के बाद मार्तंड के घर छापा मारा गया, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. तब उस के पिता को हिरासत में ले कर थाने लाया गया. लेकिन वह भी मार्तंड के बारे में कुछ नहीं बता सका. उसी दिन यानी 14 अगस्त को एक मुखबिर की सूचना पर दोपहर साढे़ 12 बजे सुधीर कुमार सिंह ने मार्तंड यादव और उस के दोस्त विक्रम यादव को समेसी के पास एक नहर के किनारे से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद 15 अगस्त को पुलिस ने मार्तंड के एक अन्य दोस्त सूरजलाल को छतौनी से गिरफ्तार कर लिया. मार्तंड से की गई पूछताछ में पवन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

मार्तंड द्वारा दिए गए मोबाइल से कामिनी चोरीछिपे उस से बात कर लिया करती थी, लेकिन किसी दिन पवन ने कामिनी को मोबाइल पर बात करते देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि कामिनी का किसी के साथ चक्कर चल रहा है. उसी ने यह मोबाइल कामिनी को दिया है. पवन ने कामिनी को मारापीटा ही नहीं, उस का मोबाइल भी छीन लिया. कामिनी वैसे ही मार्तंड से दूर हो कर तड़प रही थी. ऐसे में बात करने का जरिया मोबाइल भी छिन गया तो वह गुस्से से भर उठी. आग में घी का काम किया पवन की पिटाई ने. कामिनी ने किसी तरह मार्तंड तक मोबाइल छिन जाने की बात पहुंचा दी.

इसी के साथ यह भी कहा कि अगर वह किसी तरह पवन को ठिकाने लगा दे तो वह हमेशाहमेशा के लिए उस की हो जाएगी. उस के बाद उन्हें मिलने से कोई नहीं रोक पाएगा. मार्तंड तो हर हाल में कामिनी को अपनी बनाना चाहता था. उस ने कामिनी से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं जल्द ही उसे ठिकाने लगा दूंगा.’’

मार्तंड ने अपने 2 दोस्तों, विक्रम और सूरजलाल को दोस्ती का वास्ता दे कर पवन की हत्या में साथ देने को कहा तो वे तैयार हो गए. इस के बाद योजना भी बन गई. अपनी उसी योजना के अनुसार, मार्तंड अपने दोस्तों के साथ 2 मोटरसाइकिलों से कामिनी की ससुराल उस समय पहुंचा, जब पवन घर पर नहीं था. यह बात कामिनी ने मार्तंड को पहले ही बता दी थी. जब तीनों वहां पहुंचे तो कामिनी ने अपनी सास रामकली को बताया कि तीनों उस की सगी मौसी के बेटे हैं. रामकली के हटते ही मार्तंड ने एक मोबाइल फोन कामिनी को दे दिया और पूरी योजना बता दी. इस के बाद वह दोस्तों के साथ चला आया.

13 अगस्त की शाम मार्तंड ने कामिनी को फोन किया कि वह रात 8 बजे तक दोस्तों के साथ उस के गांव के बाहर पहुंच जाएगा. शाम साढ़े 6 बजे तक पवन घर आ जाता था. रात 8 बजे जब मार्तंड गांव के बाहर आ गया तो उस ने कामिनी को फोन कर के पवन को भेजने को कहा. इस के बाद कामिनी ने पवन को कोल्डड्रिंक लाने के बहाने बाहर भेज दिया. पवन मोटरसाइकिल से कोल्डड्रिंक ले कर लौट रहा था तो रास्ते मे दोस्तों के साथ मार्तंड ने उसे हाथ दे कर रोक कर कहा, ‘‘भाई मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई है. जरा देख लीजिए.’’

पवन ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर के जेब में पड़ी टौर्च निकाली. उस ने टौर्च जलाई तो मार्तंड के चेहरे पर पड़ी. उस का चेहरा देख कर पवन ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें पहचानता हूं, तुम तो मेरी ससुराल के हो, यहां कैसे, कामिनी से मिलने आए थे क्या?’’

‘‘नहीं, यहीं पास में मेरी एक रिश्तेदारी है, वहीं आया था. लेकिन यहां पहुंचते ही मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई.’’

इस के बाद उन में बातें होने लगीं. उसी बीच मार्तंड ने शौच जाने की बात कही तो पवन उसे तालाब की तरफ टौर्च की रोशनी में ले जाने लगा. इस के पहले उस ने फोन कर के अपनी मोटरसाइकिल मंगवा लेने के लिए घर वालों को कह दिया था. मार्तंड पवन से बातें करते हुए तालाब की ओर जा रहा था, तभी पीछेपीछे चल रहे विक्रम ने कपड़ों में छिपा हंसिया निकाल कर पवन की गरदन पर पूरी ताकत से प्रहार कर दिया. अचानक हुए इस हमले से पवन लड़खड़ा कर गिर पड़ा. वह संभल पाता, उस के पहले ही मार्तंड ने विक्रम से हंसिया ले कर पवन पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

पवन तड़पने लगा. और फिर बिना चीखेचिल्लाए मौत के मुंह में समा गया. इस के बाद तीनों उसे घसीट कर झाडि़यों में ले गए. वहां उस की जेब से दोनों मोबाइल निकाल कर तालाब में फेंक दिए. हत्या में प्रयुक्त हंसिया भी वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. इस के बाद वे मोटरसाइकिल से चले गए. उन्होंने सोचा था कि वे पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ ही लिया. सुधीर कुमार सिंह ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया, तीनों मोबाइल, दोनों मोटरसाइकिलें बरामद कर ली थीं. इस के बाद पुलिस ने मुकदमे में धारा 120बी तथा 34 के अलावा एससी/एसटी की धारा 3(2)5 भी बढ़ा दी थी.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित